जीवन में सफलता के रहस्य

और

आत्म-दर्शन

 

Sure Ways for Success in Life and Good-Realisation

 

का हिन्दी रूपान्तर

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय: शिवानन्दनगर- २४९ १९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

 

प्रथम हिन्दी संस्करण: १९५३

नवम हिन्दी संस्करण : २०१८

 

 

(,००० प्रतियां)

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

ISBN 81-7052-056-8

HS 73

 

 

 

 

 

PRICE: 185/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्मनाभानन्द

द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पो. शिवानन्दनगर-२४९ १९२, जिला टिहरी-गढ़वाल,

उत्तराखण्ड' में मुद्रित।

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समर्पण

 

 

जिनके जीवन का कुछ लक्ष्य है,

और जो उस लक्ष्य की ओर जाना चाहते हैं।

जिनके जीवन में महत्त्वाकांक्षाएँ हैं,

जो उन्हें पूरा करना चाहते हैं।

जिनके जीवन में सदाचार का अभाव है,

पर जो सदाचारी बनना चाहते हैं।

जिनको समाज पतित कहता है,

पर जो उठना चाहते हैं-

विश्व के ऐसे मनुष्यों को

सस्नेह भेंट!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक का वक्तव्य

 

'जीवन में सफलता के रहस्य' इस नाम से ही पुस्तक का पूर्ण परिचय मिल जाता है।

 

स्वामी शिवानन्द जी ने इस पुस्तक में अनेकों प्रयोगों को अच्छी तरह से दिग्दर्शित किया है। यह प्रयोग इतने सरस और सरल हैं कि प्रत्येक व्यक्ति, यदि चाहे, उनका व्यवहार कर सकता है। मुझे इतना निश्चय तो जरूर है कि इस पुस्तक में वर्णित प्रयोग खरे सोने के समान हैं, जिनको स्वामी जी ने अपने तपस्वी जीवन की कसौटी पर कस कर शुद्ध सिद्ध किया है।

 

श्री स्वामी जी ने जो-कुछ इसमें लिखा है, वह उनके दीर्घकालीन आध्यात्मिक जीवन का रक्षित अनुभव है; क्योंकि स्वामी जी इस पुस्तक में दिये गये नियमों का पालन आजीवन अपने दैनिक जीवन में करते रहे थे।

 

श्री स्वामी जी को पवित्र जीवन में इतना अधिक विश्वास था कि वे उस जीवन की प्राप्ति के लिए सब-कुछ त्याग देने को तैयार थे। वे कहते थे कि चाहे तुम विद्वान् बनो या नहीं, वैज्ञानिक भी बनो या नहीं, नेता बनो या नहीं, पर सच्चरित्र और पवित्र अवश्य बनो ! सच्चरित्रता और पवित्रता-बाहरी और भीतरी दोनों-इस जीवन की सफलता के द्वार खोलती हैं और आत्म-दर्शन को भी सिद्ध करती है।

 

पुस्तक पढ़ने से प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरणा मिलेगी, ऐसा हमें दृढ़ निश्चय है। पुस्तक (अँगरेजी) के अनेकों संस्करण बिकते चले गये, यही पुस्तक की लोकप्रियता का एक उदाहरण है। तदतिरिक्त नित्य-प्रति कई लोगों के पत्रों से (जो पुस्तकानुदर्शित विधि से साधना कर रहे हैं) ज्ञात होता है कि पुस्तक ने उनके जीवन में बहुत सुन्दर परिवर्तन कर दिये हैं। अनेक मद्यपों ने मद्यपान का त्याग कर दिया, अनेक लोगों ने सिगरेट पीना और सिनेमा जाना छोड़ दिया। बहुत से लोग समाचार-पत्र और उपन्यास भी नहीं पढ़ते। कई विद्यार्थियों ने ब्रह्मचर्य में अपने को दीक्षित कर दिया है। लोगों को इस पुस्तक से अवश्य प्रेरणा मिली है, इसमें सन्देह नहीं।

 

परमात्मा सबको कुशल और मंगल का वरदान दे!

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चतुःश्लोकी भागवत

 

ज्ञानं परमगुहां मे यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदंग गृहाण गदितं मया ।।

 

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः

तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।

 

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।१ ।।

 

ऋतेऽर्थ यत्प्रतीयेत प्रतीयेत चात्मनि

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।२।।

 

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु

प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु तेष्वहम् ।।३ ।।

 

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः

अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ।।४ ।।

 

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना

भवान् कल्पविकल्पेषु विमुह्यति कर्हिचित् ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

याचना

 

अधक गति से मार्ग पर बढ़ता चलूँ,

 

यह साधना दो।

 

सजग अम्बर में अरुण-सा रश्मि ले चढ़ता चलूँ,

 

यह कामना दो।

 

सार ले निस्सार जीवन को पुनः गढ़ता चलूँ,

 

यह कल्पना दो।

 

विश्व के कल्याण का शुभ पाठ मैं पढ़ता चलूँ,

 

यह भावना दो।

 

छोड़ कर जड़ता सतत संघर्ष से लड़ता चलूँ,

 

यह सान्त्वना दो।

 

भावना

 

मैं उन्मुक्त गगन का पंछी

मैं अजस्र अमृत की धारा।

मैं प्रशान्त सामोद सनातन

मैं खुशियों का दीप्त सितारा ।।

 

जा रे क्रन्दन विसह वेदने

ध्वस्त हुई कष्टों की कारा।

कहाँ रहे काँटे अब मग में

फूलों से पथ गया सँवारा ।।

 

आज्ञा

 

 

जारे जगजीवन को समझो अवस्तु आशा से भी रहकर वंचित

जागरण स्वप्न निद्रा में भी होवे तुम्हारा चित विचलित ।।

 

हो अनासक् अविचल सदैव तुम वृद्ध, युवा अथवा कुमार।

त्रय-तापों से, त्रय-भोगों से, अन्तस्तल रख कर  निर्विकार ।।

 

शुभ तथा अशुभ लौकिक दैविक वासना चित्र सन्तत विलीन।

तुम त्रय-कालों में स्वयं सिद्ध तुम महानन्द में सदा लीन ।।

 

यह जर्जरता या रोग-शोक हैं तेरी गतिविधि के रूप।

कर मूल धारणा को अमूल तुम जान सको अपना स्वरूप ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

उपनिषद् के विचारों में तल्लीन

 

जो आत्मा में सब-कुछ देखता है और आत्मा को ही सबमें देखता है, उसमें जुगुप्सा नहीं रहती।

 

आत्या सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम तथा महान् से भी महत्तम, प्रत्येक जीव के हृदय में विराज रहा है।

 

जो इच्छाओं से मुक्त है, मन और इन्द्रियाँ जिसने बस में रख ली हो, जो आत्मा की महानता को देखता है, वह शोक-रहित हो जाता है।

 

प्रणय धनुष है, मन तीर है और ब्रह्म है लक्ष्य एकाग्र चित्त वाले व्यक्ति से यह निशाना साधा जा सकता है और तब जिस प्रकार तीर लक्ष्य में मुद्रित हो जाता है, वह भी ब्रह्म में स्थिर हो जायेगा।

 

ब्रह्मानंद का अनुभव कर, जहाँ तक पहुँच कर शब्द भी लौट आते हैं, मन के साथ-साथ; और मनुष्य किसी से भयभीत नहीं होता तथा विचार उसे सन्तान नहीं कर सकते।

 

क्यों नहीं मैंने सुकर्म किये, क्यों मैंने पाप किया-निश्चयतः जो आत्मा को जानता है, वह इन दोनों को भी आत्मा ही जानता है।

 

वह तेजोमय है, निर्गुण, सर्वव्यापक, अन्दर और बाहर स्थित, अजन्मा, प्राण-मन-इन्द्रिय-रहित, अव्याकृतत्व से परे और सबसे पार है।

 

- यह - अमृत है। यह समस्त जगत् ही इसका व्याख्यान है। क्या था, क्या है और क्या होगा, यह सब निश्चयतः ही है। तीनों कालों से परे भी यदि कुछ है तो ही।

 

मन से जिसको जाना नहीं जा सकता, पर जिसके द्वारा, सन्तों ने कहा है, मन को जान लिया जाता है, जान लो यहाँ ब्रह्म है, कि वह जिसे यहाँ पूजा जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

साधना का पथ

 

.         एक ही आसन पर निश्चल हो कर घण्टे तक बैठने की आदत हो जानी चाहिए।

 

.         अभ्यास करते-करते कम-से-कम ३० मिनट तक प्राणायाम का अभ्यास अवश्य करना चाहिए।

 

.         प्रातः बजे उठ कर ध्यान आरम्भ करना चाहिए, तदुपरान्त आसन और प्राणायाम।

 

.         गुरु के बतलाये गये तरीकों से धारणा और ध्यान का अभ्यास करो।

 

.         सद्-विचार, सद्-अनुभव सद-कर्म और सद्भावन करो।

 

.         दुर्गुणों को अपने से दूर हटाओ।

 

.         इन्द्रियों पर अपना अनुशासन स्थापित करो। दिन में दो-चार घण्टे मौन धारण करो।

 

.         सद्गुणों का विकास करो।

 

.         आध्यात्मिक दैनन्दिनी रखो और निश्चित दिनचर्या का पालन करो।

 

१०.       अपना इष्ट-मन्त्र नित्य-प्रति एकाग्रचित्त हो कर लिखो।

 

११.       शाकाहारी भोजन करो, मांसादि रजोगुणी पदार्थों को वर्जित जानना चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

तुम कौन हो ?

 

तुम कौन हो? तुमको ही नहीं मालूम कि तुम कौन हो ?

तुम सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप हो।

 

यह देह जो नाश को प्राप्त होती है, यह इन्द्रियाँ जो किसी दिन निष्क्रिय हो जाती हैं, यह हँसना, यह रोना और विलखना तुम्हारा स्वभाव नहीं, तुम तो निर्विकार आत्मा हो।

 

भले ही नौकरी मिल रही हो, भले ही खाने को रोटी का टुकड़ा मिले और पीने को पानी तथा पहनने को वस्त्र का टुकड़ा भी-किन्तु इससे तुम्हारी आत्मा के अमरत्व में क्षीणता नहीं आती। आत्मा भूख और प्यास, सर्दी और गरमी, निन्दा और अपमान-सबसे परे है।

 

मान लो और निश्चय कर लो कि तुम आत्मा ही हो, जो जन्म, मृत्यु, पाप, पुण्य, सुख और दुःख से परे है।

 

यह देह तुम्हारी नहीं।

 

तुम राजाओं के महाराजा तथा परम शक्तिशाली सम्राट् हो

 

तत्त्वमसि ! तुम वह हो! तुम ही ब्रह्म हो

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

संकल्पोपासना

 

संकल्प आत्म-बल है, इसमें महान् शक्ति है।

संकल्प का विकास कर आत्मा का साक्षात्कार करना चाहिए।

इच्छाओं ने तुम्हारे संकल्प को निर्बल कर दिया है।

विवेक, वैराग्य और त्याग से इच्छा का दमन और संकल्प का विकास करो।

मेरा संकल्प शक्तिमान् है, मैं पर्वतों को तोड़ सकता हूँ,

समुद्र की तरंगों को रोक सकता हूँ और तत्त्वों को मिटा सकता हूँ।

प्रकृति मेरी आज्ञानुवर्तिनी है, मैं विश्व संकल्प के साथ एकरस हूँ।

मुनि अगस्त्य के समान मैं समुद्र को पी सकता हूँ।

मेरा संकल्प इतना तीव्र है कि कोई उसका विरोध नहीं कर सकता।

लोगों को मैं प्रभावित कर सकता हूँ और जीवन में सफलता की सिद्धि भी।

मैं स्वस्थ हूँ, निरोग हूँ और हूँ आनन्दमय,

सदा प्रसन्न तो मैं हूँ ही, लाखों को प्रसन्नता का वरदान भी देता ही हूँ।

संकल्प करते ही मैं शक्ति का प्रयोग कर सकता हूँ।

योगियों में परम योगी, राजाओं का महाराजा,

सम्राटों का महासम्राट् और शाहों का मैं हूँ शहंशाह

स्पर्श मात्र से ही मैं साधकों का उत्थान करता हूँ।

सत्संकल्प के चमत्कार से मैं आश्चर्यों को जन्म देता हूँ।

दूर और सुदूर के देशों में भी मैं लाखों को रोगमुक्त करता हूँ।

यह सब मेरी संकल्प-शक्ति का प्रभाव है-अतः संकल्प का विकास करो।

वासनाओं को त्याग कर आत्म-विचार करना-

संकल्प-साधना का यही श्रेयपूर्ण मार्ग है।

आध्यात्मिक दैनिकी रखो; चिन्ता, उद्विग्नता त्यागो,

साधारण तपस्या करो और धारणा की सिद्धि भी,

धैर्य का विकास करो, क्रोध पर विजय भी,

इन्द्रियों को वश में कर, ध्यान का अभ्यास करो,

सहन-शक्ति होनी चाहिए, ब्रह्मचर्य का अभ्यास भी,

यह सब संकल्प-उपार्जन में तुम्हारी सहायता करेंगे।

मैं तो मन हूँ, देह ही पर हूँ अमर आत्मा

तीनों अवस्थाओं का साक्षी, पूर्ण-ज्ञान-महान्

 

योग की वर्णमाला

 

खण्ड अभ्यास से योग में सफलता मिलती है।

 

सनों से स्वस्थ शरीर तथा ओजस्वी मन की प्राप्ति की जा सकती है।

 

न्द्रियों का नियन्त्रण योग के अभ्यास से किया जा सकता है।

 

श्वर की प्राप्ति के लिए ऋषि-मुनि योग का अभ्यास करते थे।

 

ड्डियान बन्ध के अभ्यास से सुन्दर शरीर, शक्ति, ओज और प्रतिभा की प्राप्ति होती है तथा अन्नवाही स्रोतों का शुद्धिकरण होता है।

 

र्ध्वरेता बनने के लिए शीर्षासन का अभ्यास करना चाहिए।

 

षि गण योगविद्या के वैज्ञानिक थे।

 

काग्रता से हठयोग का अभ्यास किया जाये, तो बड़ा आनन्द मिलता है।

 

तिहासिक दृष्टि से हठयोग भारत की बहुत प्राचीन शास्त्र-विद्या है।

 

-शक्ति के विकास के लिए हठयोग का अभ्यास करना चाहिए।

 

षध-विज्ञान भी यही स्वीकार करता है कि हठयोग से सभी रोगों का उन्मूलन किया जा सकता है।

 

न्तःकरण पर योग का बड़ा ही सुन्दर प्रभाव पड़ता है।

 

र्मयोग मन को पवित्र करता तथा साधक को भगवद्-दर्शन के योग्य बना देता है।

 

से आकाश का बोध होता है। अतः खेचरी मुद्रा से आकाश में चलने की क्रिया सिद्ध होती है। खेचरी मुद्रा की सिद्धि प्राप्त कर हठयोगी आकाश में गमन कर सकता है।

 

रिमा अष्टसिद्धियों में से एक सिद्धि का नाम है, जिसको प्राप्त कर वह अतितर भारी हो जाता है।

 

टाकाश और महाकाश में एक ही आकाश है, उसी प्रकार सभी जीवों में एक ही आत्मा है।

 

क्र लिंग-शरीर में शक्ति के केन्द्रों को कहा जाता है। वे छह होते हैं।

 

चक्रों के नाम हैं-मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, आज्ञा और सहस्रार

 

 

का अर्थ है-परमात्मा के पविचतम नामों का सतत उच्चारण करना। जप करने से मन पवित्र होता है तथा एकाग्रता का भी उदय होता है।

 

झंकार के समान एक ध्वनि सुनायी देती है। योगी नादयोग में सिद्धि पाने पर इस ध्वनि को सुनता है।

 

कटकी लगा कर किसी वस्तु पर दृष्टि को स्थिर करने का नाम त्राटक है।

 

ठाकुर जी को भोग लगा कर ही जो स्वयं भोजन करता है, वही ब्राह्मण है।

 

को राजयोग के अनुसार साधक की निर्बलता कहा गया है। इसके निवारण के लिए साहस की प्रतिपक्षीय भावना का अभ्यास करना चाहिए।

 

ढों और पाखण्ड योग के दुश्मन हैं, योगी को इनसे बचना चाहिए।

 

मानसिक, वाचिक और शारीरिक-तपस्या तीन प्रकार की होती है। तपस्या करने से तीनों का परिशोधन होता है।

 

का-माँदा व्यक्ति, जो संसार को अच्छी तरह समझ चुका हो और उसके सामने हार भी खा चुका हो, योग की शरण में कर ही शान्ति और विश्राम पा सकता है।

 

से इन्द्रियों के दमन का अर्थ प्रकट होता है। यह साधन-चतुष्टय के षट्- सम्पत् का दूसरा अंग है।

 

ध्या का क्या अर्थ है? एक ही विचार की तन्मय धारा के प्रवाह को ध्यान कहा जाता है। मकान

 

वविध भक्ति इस प्रकार जाननी चाहिए-श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वन्दन, सख्य, दास्य, आत्म-निवेदन

 

द्मासन करने पर ध्यान में सरलता की अनुभूति होती है।

 

उठा कर सर्प, शस्त्र उठा कर योद्धा, चोंच उठा कर गृद्ध वार किया करते हैं; पर इन्द्रियाँ विषय-वासना को उठा कर ही अपना वार किया करती हैं, जो दुर्जेय रहता है।

 

ब्रह्मचर्य जीवन में सफलता की कुंजी है।

 

क्तियोग आज के लौहयुग में भगवद् दर्शन का उत्तम मार्ग है।

 

न्दिर जाना धर्मान्धता नहीं और किसी जाति का धर्मगत पाखण्ड ही। यह तो उत्पाती मनुष्य को एक प्रकार के अनुशासन और सिद्धान्तों में बाँधने का मनोवैज्ञानिक आधार है।

 

ज्ञादि कर्मों को मिथ्या अथवा निःसार या पाखण्ड कह कर दूषित नहीं किया जा सकता। यज्ञ का प्रभाव वैदिक साहित्य में परिलक्षित होता है और यज्ञ का अभाव आज की स्थिति को प्रकट करता है।

 

जोगुणी वृत्ति से अनेकों मानसिक उपद्रव होते हैं, सात्त्विक बन कर रजोगुण को हटा देना चाहिए।

 

घिमा अष्टसिद्धियों में एक ऐसी सिद्धि है, जिसको प्राप्त कर योगी अत्यन्त लघु रूप धारण कर सकता है।

 

वैराग्य और विवेक-दोनों का उपार्जन जीवन की सफलता में सहायक सिद्ध होता है।

 

शान्ति ही मनुष्य-जीवन का परम लक्ष्य है। इसकी प्राप्ति के लिए योग ही एकमात्र साधन है।

 

ट्दर्शनों का सारांश यही है कि सर्वत्र एक ही आत्मा है।

 

न्तोष धारण किया जाये, तो कितना अच्छा है। सन्तोष धारण कर लेने पर मन किसी भी वस्तु के अभाव में दुःखी नहीं होता और प्राप्ति में उछलता ही है।

 

ठयोग की सिद्धि प्राप्त होते ही राजयोग का आरम्भ होता है।

 

क्षमा एक गुण है। इस गुण का उपार्जन कर लीजिए, जीवन में आनन्द की लहर लहराने लग जायेगी।

 

त्राटक का अर्थ है-किसी एक वस्तु पर दृष्टि को निर्निमेष किये रहना।

 

ज्ञा मनुष्य-जीवन का चरम विकास है। ज्ञान के उपरान्त और कुछ प्राप्तव्य नहीं रहता। योग-साधना का उद्देश्य ज्ञान की प्राप्ति करना ही है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादक के दो शब्द

 

इस पुस्तक का आपके जीवन से निकटतम सम्बन्ध है।

 

यह कागज की किताब नहीं, आपके जीवन की किताब है। समझ लीजिए कि आप अपने जीवन को ही इस पुस्तक में पढ़ रहे हैं।

 

इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करने का उद्देश्य अनुवाद का कर्तव्य निभाना नहीं; बल्कि हिन्दी भाषा-भाषी समाज के आगे नवीन जीवनधारा को रख देना है। समाज में जो उत्पात मचा हुआ है, उसका निराकरण करना है और जीवन में जो भयावह अशान्ति छायी हुई है, उसको मिटाना है।

 

यदि इस पुस्तक के उपदेशों ने लोगों के जीवन में प्रत्याशित पवित्र प्रभाव डाला, तो अनुवादकों का श्रम सार्थक हो जायेगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-प्रवेश

(लेखक की भूमिका)

 

जीवन क्या है? क्या केवल साँस लेना, भोजन को पचाना, मलमूत्रादि वेगों का त्याग करना, शरीर रचना और निर्माण के अन्य कार्यों का होना ही जीवन की परिभाषा का पूरक है या जीवन का अर्थ इससे अलग कुछ और है? क्या केवल विचार करना, योजनाएँ बनाना, विचार-विमर्श करना, नाम-यश आदि के लिए प्रयत्न करना ही जीवन की सिद्धि का बोधक है?

 

क्या सन्तति-प्रजनन से जीवन का अर्थ स्पष्ट होता अथवा जीव-जन्तुओं के गतिशील होने पर शरीर के अन्दर जो प्रतिक्रिया होती है, वह तो जीवन नहीं है? वैज्ञानिक और नृतत्त्व के वैज्ञानिकों के जीवन-विषयक दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। दार्शनिकों ने जीवन को दूसरे दृष्टिकोण से आँका है।

 

जीवन दो प्रकार का होता है-यथा भौतिक जीवन और चेतनात्मक जीवन नृतत्त्व-शास्त्री तथा देहविज्ञानवादियों का कहना है कि सोचना, अनुभव करना, जानना, संकल्प करना, पचाना, मलादि वेगों को त्यागना, रक्तादि का संचरण, स्खलन आदि क्रियाओं से जीवन में गति आती है अथवा जीवन का बोध इन क्रियाओं से होता है। परन्तु इस प्रकार का जीवन शाश्वत नहीं है। इस जीवन में खतरे, दुःख, चिन्ताएँ और घबराहट, पाप, पुण्य, जन्म, मृत्यु, व्याधियाँ, वृद्धावस्था और अनेकों प्रतिक्रियाएँ व्याप्त रहती हैं।

 

अतः जिन महात्माओं ने इन्द्रियों और मन पर संयम स्थापित कर, त्याग, तपस्या और वैराग्य-साधना कर आत्ममय जीवन बिताया है, उनको यह कहते तनिक भी झुंझलाहट नहीं हुई कि आध्यात्मिक जीवन ही शाश्वत है, भौतिक जीवन तो केवल बाहरी और अस्थिर आवरण है।

 

इसी जीवन की प्राप्ति के लिए उन्होंने अनेकों विधियों से प्रयोग किये। वे प्रयोग एक ही व्यक्ति मात्र के लिए नहीं, अपितु अनेकों व्यक्तियों के लिए, जिनकी रुचियाँ, जिनकी आदतें और जिनकी योग्यताएँ अलग-अलग होती हैं, विभिन्न मार्गों को खोज निकाला। जिन लोगों में श्रद्धा, विश्वास और कर्मठता है, वे अवश्य उन योगों में से किसी एक प्रयोग को अपने जीवन में व्यवहत कर सकते हैं यह आवश्यकता नहीं रहती कि प्रत्येक व्यक्ति एक ही प्रयोग का व्यवहार करे अथवा एक ही सिद्धान्त का अनुयायी हो

 

भौतिक जीवन की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति उसकी असारता को जानता है। भौतिक जीवन की अनेकों सीमाएँ, अनेकों कमियाँ हैं। भौतिक जीवन को ही परम जीवन समझने वाला व्यक्ति कभी भी सुखी और सफल नहीं बन सकता, जो रात और दिन भौतिक जीवन की तृप्ति के लिए ही चेष्टा कर रहा है, उसे कामयाबी नहीं मिल सकती-यह सिद्ध सत्य है।

 

परन्तु जो लोग भौतिक जीवन में ही सन्तुष्ट रह कर आत्मचेतनामय जीवन को प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए अनेकों मार्ग हैं, जिनका अनुसरण कर वे अवश्य सफलता की प्राप्ति कर सकते हैं।

 

इसका अर्थ यह नहीं है कि हम भौतिक जीवन की अवहेलना करें। पदार्थ तो परमात्मा का ही व्यक्त स्वरूप है। भौतिक पदार्थमय जीवन का निर्माण परमात्मा की लीला का उपकरण ही तो है। पदार्थ और उसके अन्दर वर्तमान शक्ति को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। आग और तेज, हिम और शीतलता, पुष्प और सौरभ तथा शक्ति और शक्तिमान् जिस प्रकार अभिन्न हैं, उसी प्रकार शक्ति और उसका व्यक्त स्वरूप भी है। ब्रह्म और माया अभिन्न हैं। इस भौतिक लोक का जीवन आत्मचेतनामय जीवन का उपकरण है, सफलता का प्रथम रंगमंच है। संसार से परमोच्च शिक्षा ग्रहण की जा सकती है। प्रकृति की गोद में पल कर ही मनुष्य अच्छी शिक्षाएँ प्राप्त कर सकता है। अभिप्राय यह है कि आत्मचेतनामय जीवन की प्राप्ति करने के लिए जिन-जिन गुणों से व्यक्ति को सुसज्जित होना पड़ता है, उन सबका उपार्जन इसी भौतिक देह के माध्यम से इसी भौतिक लोक में किया जा सकता है। जहाँ सुर और असुर शक्तियों का युद्ध होता है, वह स्थान है यह भौतिक शरीर

 

किन्तु जो इस जीवन के अर्थ को समझ कर जीवन से उपलिप्त हो कर रहता है, वह कभी सफलता की प्राप्ति नहीं कर सकता। जीवन को उपकरण मान कर उच्च जीवन की प्राप्ति करना ही ज्ञानी के लिए श्रेयस्कर है। काँटे को काँटे से निकाल कर दोनों काँटों को फेंक दिया जाता है। इसी प्रकार संसार में रह कर सांसारिकता से युद्ध कर उसे पराजित करना होगा-इसी में शूरता और वीरता है।

 

विज्ञान क्या और धर्म क्या, राजनीति और धर्म-यह सभी अभिन्न हैं। साथ-साथ ही इनका विकास किया जाता है। यदि इनमें किसी एक की भी अवहेलना की गयी, तो जीवन की पूर्णता विच्छिन्न हो जाती है। यदि देश की आर्थिक स्थिति को भुला दिया गया, तो आध्यात्मिक स्थिति कितनी खतरनाक और सन्देहजनक हो जायेगी? देश में धनाभाव होने से आध्यात्मिक प्रचारक किस प्रकार अपना कार्य सम्पन्न कर सकेंगे ? यदि देश की राजनीतिक हालत अच्छी नहीं है, तो महात्मा गण किस प्रकार अपने उपदेशों को क्रान्तिमय समाज में प्रसारित कर सकेंगे? देश में शान्ति होनी चाहिए, विज्ञान की उन्नति भी तभी धर्म के प्रति लोगों की रुचि हो सकती है, तभी धर्म के व्यवहार के लिए लोगों को समय भी मिल सकता है और सुविधा भी।

 

मन किसी भी वस्तु को ग्रहण तभी कर सकता है, जब वह पूर्णतः शान्त हो राजा जनक अपने समय में साधु और संन्यासियों को प्रश्रय दिया करते थे। ऋषियों के आश्रम तब पूर्णतः सम्पन्न थे, उनकी आर्थिक सुरक्षा राजा के अधीन थी। आज वैसी दशा नहीं है, महात्माओं और संन्यासियों को निवृत्तिमार्गगामी होने पर भी प्रवृत्ति की ओर उन्मुख होना पड़ रहा है। समाज के ढाँचे को गिरता देख कर कौन-सा संन्यासी चुप रह सकेगा। आखिर संन्यासी भी समाज का ही व्यक्ति है ? समाज से आया है, आकाश से तो नहीं गिरा। समाज के वातावरण का प्रभाव उस पर अवश्य पड़ा है। समाज की दुर्व्यवस्था को वह चुपचाप देखता रहे, यह सम्भव नहीं। अतः राजनीति और विज्ञान तथा धर्म साथ-साथ उपार्जित किये जाने चाहिए।

 

आज कुछ लोग केवल राजनीति का दम्भ भर रहे हैं, कुछ लोग केवल विज्ञान के रंग में रंगे हैं, किसी को भी धर्म के प्रति श्रद्धा नहीं। मध्य काल में योग्य शिक्षकों के अभाव ने धर्म के स्वरूप को विकृत कर दिया था, बौद्ध और हिन्दू धर्म आपस में भिड़ पड़े थे; अतः धर्म में भयंकर परिवर्तन हुए, जिनका प्रभाव अभी तक नहीं मिट पाया है। इसके लिए कुछ समय की जरूरत है। यदि प्रत्येक व्यक्ति धर्म के सही अर्थ को समझ जाये, तो कार्य की पूर्ति में देर नहीं लगेगी।

 

यह कहना भी ठीक नहीं है कि धर्म समाज को साम्प्रदायिकता से संकुचित कर देता है। मैं तो यह कहता हूँ कि जो धर्म समाज को किसी प्रकार के सीमित बन्धन में डाल देता है, वह धर्म जल्दी ही दुनिया से मिट जाये, तो अच्छा और जो इसे मिटा सकेगा, वही अपने युग का नेता होगा, सन्त कहलायेगा। धर्म समाज को सीमित नहीं बनाता। धर्म का प्रथम सम्बन्ध व्यक्ति से है; पर एक ही व्यक्ति से नहीं, व्यक्ति-व्यक्ति से व्यक्तिगत रूप में। इसी व्यक्तिगत सम्पर्क का प्रभाव कालान्तर में समाज, राष्ट्र और मानव-जगत् में पड़ना अनिवार्य है। इस प्रकार धर्म प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से सम्बन्ध स्थापित कर समाज और राष्ट्र के निर्माण में सहायक होता है। राजनीति और विज्ञान को गौण भी कहा जाये, तो अनुचित नहीं होगा धर्म इनका आधार है। यदि धर्म के आधार पर इनका विकास या उत्थान नहीं किया गया, तो बुद्धिहीन व्यक्ति के समान ही इसकी उपमा दी जा सकेगी।

 

प्रत्येक देश में धर्म के मूलभूत सिद्धान्त वही हैं, जो दूसरे देशों में; पर इतना जरूर है कि उनकी विधियों में काल, स्वभाव, रुचियों और योग्यताओं के कारण विभिन्नता गयी है, जो अनुचित नहीं है। लक्ष्य एक है, धर्म एक है, पन्थ अलग-अलग हैं; उनको एक नहीं किया जा सकता।

 

यदि धर्म का ह्रास हुआ तो समाज में अव्यवस्था जाती है, व्यक्ति-व्यक्ति में अनुचित सम्बन्धों की सृष्टि हो जाती है। क्रान्ति, उत्पात आदि इसके परिणाम हैं। सदाचार के गिर जाने से (जो धर्म का पूरक है) समाज अवश्य गिरेगा, इसमें सन्देह नहीं है।

 

समाज में फैली असफलताओं का कारण है धर्म के प्रति अरुचि या घृणा दोनों ने समाज को निराशा की ओर बहा दिया है। धर्माचरण करने से मनुष्य अपने जीवन में शान्ति और सफलता की प्राप्ति कर पाता है और आशा से नित्य प्रसन्न रहता है।

 

इसलिए जीवन की सफलता आत्म-दर्शन पर निर्भर है और आत्म-दर्शन जीवन की सफलता की सही कुंजी है। जीवन की सफलता और आत्म-दर्शन की प्राप्ति के लिए कुछ साधनाएँ करनी पड़ती हैं, कुछ नियमों का पालन भी करना पड़ता है, कुछेक व्यवहारों को तिलांजलि देनी पड़ती है। यदि यह सब कर दिया गया तो मनुष्य के जीवन में वह दिन भी नहीं आता, जिसे असफल कहा जा सके। असफलता उसी व्यक्ति के मत्थे पड़ती है, जो जीवन की कला में कुशल नहीं है। जीवन की इस कला में निपुण बनने के लिए यह पुस्तक अति उपादेय है।

 

इस पुस्तक में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उन-उन आवश्यक बातों का वर्णन किया गया है, जिनका व्यवहार कर वह अपने अन्दर प्रथमतः शक्ति को जगा सकेगा और बाद में उस शक्ति के सहारे जीवन में निश्चित सफलता को प्राप्त कर सकेगा। अनेकों ने, जिनकी गणना नहीं हो सकती, इसी मार्ग से जीवन की सफलता को पाया; अतः प्रयोगों की सत्यता में सन्देह नहीं रह जाता। आवश्यकता है कि जीवन में इनका व्यवहार भी किया जाये।

 

प्रत्येक व्यक्ति को वह शक्ति प्राप्त हो, जो आत्म-दर्शन और जीवन-सफलता के ज्ञान और प्रकाश को प्रसारित करती है!

 

 

 

 

 

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जीवन में सफलता के रहस्य

 

और

 

आत्म-दर्शन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

समर्पण.. 3

प्रकाशक का वक्तव्य... 4

चतुःश्लोकी भागवत. 5

याचना.. 6

भावना.. 6

आज्ञा.. 7

उपनिषद् के विचारों में तल्लीन. 8

साधना का पथ. 9

तुम कौन हो ?. 10

संकल्पोपासना.. 11

योग की वर्णमाला.. 12

अनुवादक के दो शब्द.. 16

विषय-प्रवेश. 17

प्रथम प्रयोग. 27

संकल्प और स्मृति का विकास. 27

ईश्वर ?. 27

आध्यात्मिक संस्कृति.. 28

() ज्ञानयोग. 28

() भक्तियोग. 29

() राजयोग. 30

विशेष शिक्षाएँ. 30

संकल्प की उन्नति.. 33

संकल्पोन्नति के लिए नियम. 34

संकल्प-व्यवहार किस प्रकार हो ?. 34

इच्छा-शक्ति की साधना.. 36

योग्यता और संकल्प... 38

इच्छा और संकल्प... 38

स्वतन्त्र संकल्प... 39

मन को शान्त और सन्तुलित रखो... 39

सदा सतर्क रहो.. 40

संकल्पोन्नति के पूर्व-लक्षण.. 41

निपुण बनो.. 41

धैर्य और दृढ़ लगन. 41

जीवन का एक निश्चित लक्ष्य हो.. 41

पौर्वात्य और पाश्चात्य संस्कृति के प्रयोग. 42

उपसंहार. 43

सदाचार-संस्कृति का सौन्दर्य. 44

भावों का विकास. 46

प्रतिपक्ष-भावना के नियम. 48

विचारोन्नति.. 49

अधीन-सचेतन-मन. 52

स्मृति का विकास. 54

स्मृति की उन्नति के लिए अभ्यास. 57

दिलचस्पी से स्मृति का विकास होता है. 63

स्वास्थ्य और मन. 64

दर्शन और श्रवण-शक्ति का विकास किस प्रकार ?. 64

श्रवण-शक्ति के विकास के लिए अभ्यास. 65

दृष्टि-विकास के लिए अभ्यास. 67

अष्टावधान. 70

मानसिक विश्राम. 71

शारीरिक उन्नति.. 72

द्वितीय प्रयोग. 76

राजयोग महाविद्या.... 76

राजयोग का अभ्यास. 76

मानसिक शिल्पशाला.. 80

वासनाएँ. 87

चंचल मन पर विजय पाइए. 95

योगाभ्यास अथवा आत्म-संयम. 101

एकाग्रता का अभ्यास या धारणा.. 102

त्राटक का अभ्यास. 105

त्राटक के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण अभ्यास. 105

विशेष आदेश और उपदेश. 107

ध्यान के अभ्यास. 108

तृतीय प्रयोग. 113

आत्म-शक्ति के प्रभाव. 113

व्यक्तित्व... 113

उपदेश या अनुशीलन की शक्ति.... 116

चतुर्थ प्रयोग. 119

सद्गुणों का उपार्जन. 119

चरित्र-निर्माण.. 119

व्यक्ति, समाज और सदाचार. 122

व्यवहार-कुशलता या हिल-मिल कर रहना.. 126

अहिंसा : सर्वभूतदया.. 129

सत्य-सम्भाषण.. 132

आत्म-निर्भरता-स्वावलम्बन. 133

धैर्य और उद्योग. 134

निष्कपटता और ईमानदारी. 135

सन्तोष. 136

नियम और समय की पाबन्दी... 139

समाजपटुता.. 141

युक्ति और कौशल. 142

सुवक्ता बनने की कला.. 143

विशेष शिक्षाएँ. 145

पंचग प्रयोग. 149

दुर्गुणों का निराकरण.. 149

संकोच-लज्जा-शर्म. 149

कायरता-भीरुता-कातरता.. 150

निराशावाद. 151

विश्वासान्धता.. 153

सन्देह-दृष्टि... 153

असहिष्णुता.. 154

आत्महीनता की भावना (आत्मलघुत्व) 155

उदासीनता.. 156

अनिश्चय. 157

असावधानी और विस्मृति.. 157

आत्म-संशय. 158

कपट या कुटिलता.. 159

घूसखोरी का अभिशाप. 160

घृणा.. 161

ईर्ष्या, घमण्ड और पाखण्ड... 163

क्रोध पर विजय. 163

चिन्ता, शोच और व्याकुलता.. 168

भय पर विजय. 171

धूम्रपान. 172

मद्यपान. 173

जुआ... 173

अन्य दुर्व्यसन. 174

काम पर विजय. 176

आसक्ति.... 181

क्षुद्र-वृत्ति.. 185

षष्ठ प्रयोग. 187

योग की अभ्यास-माला.. 187

निषेध-वाक्य... 187

साधना.. 187

ब्रह्मचर्य. 187

सदाचार. 188

वैराग्य... 189

अनुशासन. 189

आनन्द और शान्ति का मार्ग. 190

गृहस्थों के कर्तव्य-उनका धर्म. 191

साधकों को आदेश. 193

विद्यार्थियों को शिक्षाएँ. 204

शक्ति का उपार्जन-उसकी सुरक्षा.. 208

मौन-साधना का महत्त्व... 216

साधना की दैनन्दिनी क्यों रखी जाये ?. 222

आध्यात्मिक दैनन्दिनी के प्रश्नों का स्पष्टीकरण.. 226

सप्तम प्रयोग. 241

उपसंहार. 241

समय बड़ा मूल्यवान् है. 241

इन्द्रिय-संयम. 243

सत्संग की महिमा : उससे लाभ. 245

सत्संग का प्रभाव. 245

घर-घर में सत्संग कीजिए. 247

अकेले-अकेले सत्संग. 247

सत्संग और परमात्म-दर्शन. 248

बीसवीं शती, तुम भी सुन लो.. 248

जब भगवान् परीक्षा लेते हैं. 249

अष्टम प्रयोग. 252

दो कथाएँ. 252

तीन खोपड़ियाँ.. 252

विल्वमंगल और चिन्तामणि... 253

 

 

 

प्रथम प्रयोग

संकल्प और स्मृति का विकास

ईश्वर ?

 

ईश्वर सच्चिदानन्द (अस्तित्वपूर्ण, ज्ञानमय और केवलानन्द) है। ईश्वर सत्य है। ईश्वर प्रेम है। परमात्मा प्रकाशों का प्रकाश है। ईश्वर सर्वव्यापी, बुद्ध और चैतन्य है। ईश्वर ही वह सर्वव्यापी शक्ति है, जो इस ब्रह्माण्ड का संचालन करती है और इसको सुव्यवस्थित भी रखती है। वह (परमेश्वर) इस शरीर और मन का आन्तरिक शासक (अन्तर्यामी) है। वह सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी है। वह तुम्हारे मन का मूक साक्षी है। वह सूत्रधार अर्थात् तुम्हारे जीवन की डोरी को धारण करने वाला है। वह सम्पूर्ण जगत् और सभी वेदों का योनिभूत कारण है। वही संकल्पों को प्रेरणा देता है। उसके छह गुण ज्ञान, वैराग्य, सौन्दर्य (माधुर्य), ऐश्वर्य, श्री और कीर्ति हैं। अतः वह भगवान् कहलाता है।

 

उसकी सत्ता भूत, वर्तमान और भविष्य में निरन्तर रहती है। जगत् की परिवर्तनशील घटनाओं के मध्य वही एक अपरिवर्तनशील और निर्विकार है। संसार की सभी नश्वर वस्तुओं के मध्य वही अविनश्वर है। वह नित्य, शाश्वत, अविनाशी, अव्यय और अक्षर है। उसने इस जगत् को अपनी लीला के हित गुणत्रयसमायुक्त किया है। वह मायापति है।

 

वह स्वतन्त्र है। उसको सत्यकाम और सत्यसंकल्प कहा जाता है। वह जीवों के कर्मों का फल देने वाला है। वह दयामय है। वह जीवों की प्यास को शीतल जल और रसान्वित फलों से बुझाता है। परमात्मा की शक्ति से तुम देखते हो, सुनते हो और चलते हो। जो कुछ तुम देखते हो, वह ईश्वर है। जो कुछ तुम सुनते हो, वह ईश्वर है। ईश्वर तुम्हारे हाथों द्वारा काम करता है और मुख द्वारा भोजन करता है। केवल अज्ञान और अहंकार के कारण तुम उसे भूल गये हो।

 

नित्य सुख और परम शान्ति तभी प्राप्त की जा सकती है, जब ईश्वरीय राह पर चलो। यही कारण है कि विचारवान्, बुद्धिमान्, जिज्ञासु तथा साधक ईश्वर-दर्शन और ब्रह्म-साक्षात्कार की चेष्टा करते हैं। ईश्वर का दर्शन हो जाने पर जन्म-मरण का चक्कर तथा उसके सहकारी दुःखों का नाश हो जाता है। यह विश्व (जगत) दीर्घकालीन स्वप्न के समान है। यह माया की बाजीगरी है। पाँचों इन्द्रियाँ मनुष्य को हर दम भ्रमित करती रहती हैं। अपनी आँखें खोलो। विवेक-बुद्धि से काम लो। ईश्वर के रहस्यों को समझो। भगवान् की सर्वव्यापकता की अनुभूति करो। सदा यही अनुभव करो कि वह तुम्हारे निकटतम है। उसको अपनी हृदय-गुहा में सर्वदा विराजमान हुआ जानो 'आत्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः' श्रुति प्राचीन काल से यही कहती रही है।

आध्यात्मिक संस्कृति

() ज्ञानयोग

 

आध्यात्मिक उन्नति सभी उन्नतियों में श्रेष्ठ समझी गयी है। मैं इसी उन्नति को विशेष रूप से मानता हूँ। संस्कृति का अर्थ है-शुद्धता या शिक्षा। जो अन्तर्यामी आत्मा या ब्रह्म से सम्बन्ध रखता हो, जिसकी प्रकृति अस्तित्वपूर्ण, ज्ञानमय और केवलानन्द हो-वह आध्यात्मिक है। मेरा मतलब उस अध्यात्मवाद से नहीं, जो भूत-विज्ञान, प्रेतात्मा-संलाप तथादिक बातों से सम्बन्ध रखता है। अध्यात्मवाद के अन्तर्गत आत्मोन्नति, आत्म-चिन्तन, आत्म-ध्यान और आत्म-चर्चा तथा वेदान्तोपनिषद् का श्रवण और आत्मा के स्मरण को प्रधान माना जाता है। आध्यात्मिक साधक को आत्म-दर्शन की प्राप्ति के लिए अधिकारी बनने का प्रयत्न करना चाहिए। अधिकारित्व प्राप्त करने के लिए चार योग्यताएँ होनी चाहिए-

 

()        विवेक (सत् और असत् का यथार्थ ज्ञान);

 

()        वैराग्य (विषय-पदार्थों से विरक्त होना);

 

()        षड्सम्पत्ति या छह गुण-

() शम अर्थात् मन की पवित्रता,

() दम अर्थात् इन्द्रियों का संयम करना,

() उपरति या संन्यास-भावना,

() तितिक्षा अर्थात् सहनशीलता,

() श्रद्धा अर्थात् वेद और गुरु-वचन तथा अपने-आपमें विश्वास और

() समाधान अर्थात् मन की एकाग्रता;

तथा

 

()        मुमुक्षुत्व (जन्म और मरण से मुक्त हो जाने की तीव्र इच्छा)

 

आध्यात्मिक संस्कारों को जगाने के लिए आरम्भ में आत्मबोध, तत्त्वबोध, विवेक-चूड़ामणि, पंचदशी, उपनिषद्, विचारसागर आदि वेदान्तिक ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए।

 

ध्यान के लिए '' या 'सोहऽम्' या 'अहं ब्रह्मास्मि' या 'शिवोऽहम्' मन्त्र का मानसिक जप करना चाहिए। तुम अपनी इच्छा के अनुसार इनमें से किसी एक मन्त्र को चुन सकते हो। सदा यह अनुभव करना चाहिए-

 

'मैं अमर आत्मा हूँ। मैं शाश्वत सत्य हूँ। मैं सर्वव्यापी प्रकाश, शुद्ध, बुद्ध और चैतन्य हूँ।'

 

इन मन्त्रों का जप तथा चिन्तन करने से आत्म-साक्षात्कार होगा।

() भक्तियोग

 

आध्यात्मिक उन्नति के लिए दूसरे रास्ते हैं-भक्तियोग और राजयोग

 

जिसका मन भक्ति की ओर झुक रहा है, उसे नौ प्रकार की विधियों से भक्ति का अभ्यास करना चाहिए। नवविध भक्ति यह है-

 

() श्रवण, () कीर्तन, () स्मरण, () पाद-सेवन, () अर्चन, () वन्दन, () दास्य, () सख्य और () आत्म-निवेदन

 

अपना इष्टदेव चुन लेना चाहिए। भगवान् राम, कृष्ण या देवी या गायत्री या शिव-इनमें से किसी को चुन लो। तत्पश्चात् तदेवता-सम्बन्धी मन्त्र का जप करो अर्थात्-

 

श्री कृष्ण का मन्त्र है-       ' नमो भगवते वासुदेवाय'

 

श्री राम का मन्त्र है-          ' श्री राम जय राम जय जय राम'

 

श्री देवी का मन्त्र है-          ' क्लीं कालिकायै नमः'

 

श्री शिव का मन्त्र है-         ' नमः शिवाय'

 

इसी प्रकार सभी देवताओं के अपने-अपने मन्त्र-विशेष हैं। अपने इष्टदेव के मन्त्र का जप प्रतिदिन प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त ( से बजे) में करना चाहिए।

 

रामायण और भागवत का स्वाध्याय करना चाहिए। भागवतजनों की संगति में रहना चाहिए। कीर्तन करना चाहिए, भगवन्नाम का भजन करना चाहिए। अपने हृदय में भगवान् का ध्यान करना चाहिए। सदा भगवान् के गुणों-सर्वदयामय, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञतादि का ध्यान करना चाहिए। मनुष्य के स्वभाव-सुलभ काम-वासना, क्रोध, लोभ, बेईमानी, निष्ठुरता आदि दुर्गुणों पर विजय पानी चाहिए। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्यादि का, जो सच्चरित्रता के द्योतक हैं, पालन करना चाहिए।

 

इस प्रकार साधक को धीरे-धीरे भक्ति का आचरण प्राप्त हो सकेगा और इष्टदेवता के दर्शन हो जायेंगे। यही सर्वसाधारण के लिए भक्ति का पथ है।

() राजयोग

 

आध्यात्मिक विकास का एक मार्ग और है। यह मार्ग है मन को संकल्प रहित कर देने का और चित्तवृत्तियों के निग्रह का। यह राजयोग है। राजयोग के आठ अंग होते हैं, अतः यह 'अष्टांगयोग' के नाम से भी जाना जाता है। अष्टांगयोग पर पतंजलि महर्षि ने 'योग-दर्शन' नामक अत्यन्त सुन्दर पुस्तक लिखी है।

 

राजयोग के आठ अंग हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि

 

राजयोग के साधक को यम और नियम में पूरी निपुणता प्राप्त कर लेनी चाहिए। यम-नियम में सफलता प्राप्त कर लेने पर ही वह योगनिष्ठ होने की आशा कर सकता है।

 

यम के अन्तर्गत अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय (चोरी करना) और अपरिग्रह (लालच करना) का अभ्यास करना पड़ता है।

 

नियम के अन्तर्गत शौच, सन्तोष, तपस्या, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर-भक्ति) का अभ्यास करना पड़ता है।

 

अतः राजयोग को पूर्ण विज्ञान कहा जाता है। इसकी प्रक्रिया परम वैज्ञानिक है। साधक को सर्वप्रथम आचार-विचार की शुद्धि करनी पड़ती है, तभी वह राजयोग के अन्य अंगों में सफलतापूर्वक बढ़ता जाता है।

विशेष शिक्षाएँ

 

प्रारम्भ में अपनी स्मृति को समुन्नत करो। इच्छित व्यायाम करो और नित्य-प्रति इसमें नियमित रहो। प्रतिदिन का वृत्तान्त रखो और वह भी मन में ही। यह मुख्य है। केवल किताबों के पन्नों को रँगने से काम नहीं चलेगा। यदि तुम जल्दी आत्म-सुधार करना चाहते हो, यदि तुम एक सच्चा मनुष्य बनना चाहते हो, तो सभी शिक्षाओं को आचरण के साँचे में ढालो। तुम, अपनी गलतियों को सुधार सकते हो। मैं तुमको शीघ्र ही एक व्यावहारिक मनुष्य बना देना चाहता हूँ।

 

एक छोटी-सी पुस्तिका रखो; अर्थात् एक दैनिकी (दिन-भर का ब्योरा) में अपने दिन-भर के कार्यों का वृत्तान्त नोट कर लो। यदि तुम बहुत ही इच्छुक और लगन के पत्रके हो, तो स्मृति की उन्नति के अभ्यास को केवल तीन महीनों में पूर्ण कर सकते हो। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति के लिए छह माह का समय पर्याप्त है और तीसरे दर्जे के साधक के लिए साल भर का समय उन्नति के अभ्यास के लिए पर्याप्त है। इस प्रकार जब तुम स्मृति की उन्नति कर चुकोगे, तो संकल्पोन्नति का बीड़ा उठा सकोगे।

 

जब स्मृति के विकास से कुछ बल प्राप्त होने लगता है, तो संकल्पोन्नति में अधिकाधिक प्रेरणा मिलेगी। तुम्हें अभ्यास में प्रसन्नता प्राप्त होगी और एक प्रकार का आनन्द अनुभूत होगा। तुम्हारी प्रत्येक स्नायु में संकल्प का प्रवाह संचरित होगा। इससे तुमको उत्साह और साहस की प्राप्ति होगी। अतः शान्तिपूर्वक और दृढ़ता से अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते रहो। अपनी प्रतिज्ञा के अभिप्राय को अच्छी तरह समझ लो और सदा याद रखो। धीरे-धीरे भावना प्रत्यक्ष होती जायेगी। हतोत्साह तो कभी होना ही नहीं चाहिए। तुमको अपने पुराने संस्कारों से युद्ध करना पड़ेगा। अतः धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करो। धैर्य, ध्यान, सहन-शक्ति, मन की साम्यता, सावधानी आदि गुणों के विकास की चेष्टा करनी चाहिए। यह जान लो कि संकल्पों के विकास के लिए इन गुणों का विकास अनिवार्य है। जिस प्रकार बीज के बिना वृक्ष नहीं पनपता, उसी प्रकार इन गुणों के बिना संकल्प की उन्नति नहीं हो सकती। ध्यान का भी विकास करो। तीन माह तक संकल्प-साधना करो। इस काल में तुमको आन्तरिक बल का अनुभव होगा और वे कार्य जो कुछ काल पूर्व कठिन प्रतीत होते थे, अब आसानी से किये जा सकेंगे। तुम यह भी अनुभव करोगे कि तुम्हारा मन स्थिर होने लग गया है या हो ही गया है। पहले जो विचार तुम्हारे मन को सहज में ही उद्विग्न कर देते थे, वे अब वैसा नहीं कर पायेंगे। कठिन-से-कठिन कार्य को अब तुम सरलता से कर पाओगे और किसी भी कार्य में शान्ति को निभा सकोगे। अब तुम किसी कार्य को अपने हाथों में लेते हो, तो योग्य दीखते हो। तुम्हारी वाणी में शक्ति का आविर्भाव हुआ दीखता है। तुम्हारे व्यक्तित्व में ही परिवर्तन गया है। तुम्हारी मुस्कान में एक विशेष आकर्षण है। अब बहुत लोग तुम्हारी उपस्थिति में प्रभावी व्यक्तित्व का अनुभव करते हैं। तुम्हारा मित्र-वर्ग तुम्हारे मुख-मण्डल पर ज्योति की आभा की उज्ज्वलता की चमक पाता है।

 

मन को स्थिर करने का अभ्यास (एक केन्द्र में लाने का अभ्यास) संकल्प और स्मृति की साधना के साथ-साथ चलना चाहिए। मन की एकाग्रता से साधना में सफलता मिलती है। मन एकाग्र हुए बिना साधना में उन्नति नहीं हो सकती है। हर रोज

 

प्रातःकाल घण्टे-आधे घण्टे मन को एकाग्र करने का अभ्यास करना चाहिए। मन की एकाग्रता के लिए एक आध्यात्मिक आधार की आवश्यकता है। यह याद रखो कि मन को केन्द्रस्थ करने का अभ्यास तुम केवल संकल्प और स्मृति के विकास के लिए ही नहीं करते हो, वरन् ईश्वर-दर्शन के लिए भी करते हो। वास्तव में ध्येय तो यही है। इसको कभी भी भूलो मेरे और दूसरों के अनुशासनों में यही मुख्य भेद है। ब्रह्मचर्य और ईश्वर-दर्शन दोनों कुंजियाँ हैं। मैं डंके की चोट पर इसी अनुशासन को भिन्न-भिन्न स्थलों में कहा करता हूँ। मैं तुम्हारे संकल्प और स्मृति की उन्नति को तुम्हारे ही जीवन की सफलता और ईश्वर-दर्शन के लिए चाहता हूँ।

 

अपनी मनोनुकूलता के अनुसार मन को एक केन्द्र पर स्थापित कर दो। भगवान कृष्ण या भगवान् राम या भगवान् शिव या भगवान् मसीह या भगवान् बुद्ध-किसी एक की मूर्ति पर अपने मन को स्थिर कर सकते हो। यही एकाग्रता संकल्प और स्मृति की उन्नति में सहायक होगी। मन की एकाग्रता के अनुभवों का लेखा एक डायरी में लिखते रहो। प्रति-सप्ताह या प्रति माह डायरी के पिछले पन्नों को दोहराते भी रहो।

 

चौथी बात है गुणों के विकास की। चरित्र-निर्माण सम्बन्धी साहित्य का अध्ययन करो, उससे तुम बहुत प्रकार के गुणों की साधना के तरीकों को सीख सकोगे। जो गुण तुममें अनुपस्थित है, उसी की साधना करो। क्रम-क्रम से साहस, दया, विश्व-प्रेम, भद्रता, सहिष्णुता, सन्तोष, निष्कपटता और ईमानदारी आदि गुणों की साधना करो। एक-एक महीने के लिए एक-एक गुण के विकास का निश्चय कर लो और उसका क्रमिक विकास करो। धीरे-धीरे वह गुण तुम्हारे चरित्र में ढल जायेगा। सच बात तो यह है कि जब तुम एक गुण का विकास कर चुकते हो, तो बहुत से गुण अपने-आप तुममें जायेंगे। अगर तुमने नम्रता और साहस का विकास कर लिया है, तो दूसरे सहायक और उप-सहायक अथवा आधारभूत गुण स्वतः प्रत्यक्ष हो कर तुम्हारे चरित्र में साथ-साथ ढल जायेंगे। अनिवार्य रूप से सद्गुणों का अभ्यास कम-से-कम आधा घण्टा रोज करना चाहिए।

 

यदि तुम ब्रह्मचर्य और सत्य में स्थिर हो गये, तो बहुत से गुण स्वतः तुममें अवतरित हो जायेंगे। विनम्रता, उत्साह, ब्रह्मचर्य और सत्यता-इन चारों गुणों में से किसी एक को विकास के लिए चुन लो।

 

पाँचवीं बात है अवगुणों के उन्मूलन की। वैसे तो सद्गुणों के विकास से ही दुर्गुणों का मूलोच्छेदन हो जायेगा, किन्तु अच्छा यह है कि दुर्गुणों के दमन का सीधा उद्योग किया जाये। उनका दमन हो जाने पर सद्गुणों का विकास द्रुत गति से होगा।

 

उस अवस्था में सफलता आसान और निश्चित हो जाती है। अगर तुम काम-वासना, क्रोध या अभिमान को हटा सके, तो सब अवगुण अपने-आप लुप्त हो जायेंगे। सभी अवगुण अहंकार के सेवक हैं। अगर अहंकार का नाश हो जाये, तो सारी सेना भयातुर हो कर भाग जायेगी। सभी अवगुणों का गर्भ क्रोध है। अगर क्रोध का नाश कर दिया जाये, तो सम्भावी अवगुण लापता होते जायेंगे। इसलिए अपनी शक्ति से अहंकार और क्रोध के आक्रमण का प्रतिकार करो।

 

छठवीं बात जो ध्यान में रखने की है, वह है इन्द्रिय-संयम। यदि इन्द्रियाँ उपद्रवी हैं, तो मन की एकाग्रता स्थापित नहीं की जा सकती। अतः सावधानी से प्रत्येक इन्द्रिय के कार्य-कलापों का निरीक्षण करते रहो तथा मौन-अभ्यास, उपवास, त्राटक, ब्रह्मचर्य, प्रत्याहार, अपरिग्रह और दम आदि सुन्दर तरीकों से उसका मार्ग भी अवरुद्ध करते रहो। इन्द्रियों के कारण ही तुम्हारी मनुष्यता बहिर्मुख हो जाती है और इन्द्रियाँ ही मन की गति को अन्तर्मुख नहीं होने देतीं। अतः इन्द्रियों को वश में करने का अर्थ है-मन को वशीभूत करना।

 

सातवीं बात जो ध्यान में रखने योग्य है, वह है शारीरिक उन्नति। मैं पुनः याद दिलाता हूँ कि शारीरिक उन्नति के बिना कोई भी उन्नति सम्भव नहीं है। अगर तुम्हारी शरीर-प्रकृति पुष्ट और स्वस्थ नहीं है, तो तुम इस दुनिया में कोई सुन्दर कार्य नहीं कर सकोगे अतः नियमित व्यायामों से अपने शरीर को तेजस्वी बनाये रखो।

 

आठवीं बात है अपनी दैनन्दिनी रखने की। अगर तुम शीघ्र उन्नति चाहते हो, तो अपना रोजनामचा रखो; उसमें अपने पूरे दिन का ब्योरा अंकित करो। उस रोजनामचे में जो कुछ अंकित किया जाये, वह विवेक और सत्यशीलता से किया जाये। यदि तुम अपने को तत्कथित साधनों से सुसज्जित कर लो, तो संसार के शक्तिशाली सम्राट् बन सकते हो। तुम आरोग्य, धन, आध्यात्मिक सुख और दीर्घायु के आनन्द की प्राप्ति कर सकते हो। मैं विद्यार्थियों के योग्य आसनों को ठीक-ठीक बतलाया करता हूँ, किन्तु अभ्यास की जिम्मेदारी तुम पर निर्भर है। तुमको स्वयं सुचारु रूप से कार्य करना होगा। भूख लगने पर तुम्हें ही स्वयं भोजन करना पड़ता है, दूसरे के भोजन करने * से तुम्हारी भूख नहीं मिटा करती। प्यास लगने पर तुम स्वयं ही जल पी कर प्यास बुझा सकते हो, दूसरे के जल पीने से तुम्हारा काम नहीं चलेगा। अब अमरत्व का अमृत भी स्वयं पियो और आध्यात्मिक आनन्द की प्राप्ति करो। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के सौभागी बनो। एक साल तक अभ्यास करते-करते यह सद्गुण तुम्हारे चरित्र में समीकृत हो जायेंगे और तुम्हारा जीवन-निर्माण ही इनके आधार पर होने लगेगा। अतः जब तक पूर्णता की प्राप्ति हो, इनका अभ्यास करते रहो।

संकल्प की उन्नति

 

अब एक प्रमुख संस्कृति का नम्बर आता है। विद्यार्थियों को इस ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। इससे उनको अत्यधिक लाभ प्राप्त होगा। आत्म-बल को ही संकल्प कहा जाता है। संकल्प शत्रुओं का दमन करने वाली शक्ति है। संकल्प का शुद्ध और अप्रतिहत अभ्यास किया जाये, तो अद्भुत कार्य भी सिद्ध कर लिये जा सकते हैं। बलवती इच्छा वाले व्यक्ति के लिए इस संसार में कोई भी प्राप्तव्य असम्भव नहीं है। संसार में बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनको संकल्प, मन और बुद्धि की चेतना का ज्ञान भी नहीं है, यद्यपि वे संकल्प और मन के विषय में खूब तर्क किया करते हैं।

वासना से संकल्प अशुद्ध और निर्बल हो जाता है। एक-एक इच्छा, यदि वश में कर ली गयी, तो संकल्प बन जाती है। काम-शक्ति, मांसल शक्ति, क्रोध आदि शक्तियों पर जब अधिकार प्राप्त कर लिया जाता है, तो वे संकल्प में विलीन हो जाती हैं। इच्छाएँ जितनी कम हों, संकल्प उतना ही बलवान् होता जाता है।

 

नेपोलियन का संकल्प अत्यन्त शक्तिशाली था, इसीलिए उसे युद्धों में आशातीत सफलता मिली। विश्वामित्र के संकल्प में शक्ति थी और इसीलिए वे त्रिशंकु के लिए तीसरे लोक की रचना कर सके थे। दत्तात्रेय की इच्छा-शक्ति प्रबल रहने के कारण ही एक नारी की सृष्टि सम्भव हुई। सम्सतबरेज़ का संकल्प अत्यन्त तेजस्वी था। ज्ञानदेव का संकल्प भी तेजस्वी था। सभी ज्ञानी और योगी जनों का संकल्प शक्तिमान् हुआ करता है, तभी वे आश्चर्यजनक कार्य सफलतापूर्वक कर सकते हैं।

 

ब्रह्मचर्य की तेजस्विता पर संकल्पों का तेज निर्भर है। ब्रह्मचर्य में स्थित हुए बिना संकल्प की साधना में उन्नति नहीं की जा सकती। सच कहा जाये, तो ब्रह्मचर्य के तेज का ही दूसरा नाम संकल्प है। प्रत्येक वीर्य-बिन्दु में अमित शक्ति है, जिसमें चुम्बकीय आकर्षण रहता है। अतः बिन्दु-संयम से शक्ति का संयम और बिन्दु-पतन से शक्ति का ही पतन हुआ करता है।

 

ज्ञानी पुरुष जो-कुछ सोचते हैं, वह शुद्ध संकल्प है वही सत्संकल्प है। सत्संकल्प की शक्ति के कारण वे किसी भी कार्य को सफलतापूर्वक कर सकते हैं। योगी या ज्ञानी सत्संकल्प के बल से ही निर्माणात्मक कार्यों को किया करते हैं। शिखिध्वज की पत्नी चुडाला ने किस प्रकार अपने कार्य की सम्पूर्ति के लिए, संकल्प-बल का आश्रय लिया था, सबको विदित है।

संकल्पोन्नति के लिए नियम

 

प्रातःकाल चार बजे उठो और आसन लगा कर ध्यान करो तथा इन संकल्पों का आवाहन करो :

 

()        मेरा संकल्प शुद्ध, तेजस्वी और अप्रतिहत है।                     

 

()        संकल्प से मैं किसी भी कार्य को कर सकता हूँ।         

 

()        मेरा संकल्प सत्य है और अजेय है।                        

 

अमर आत्मा पर ध्यान करने से संकल्प का विकास होता है। यह नियम सबसे अच्छा है। अपने संकल्पों का दुरुपयोग करो, अन्यथा महान् पतन के आगार में जा गिरोगे। आरम्भ में अपने संकल्प की परीक्षा लो। जब तक संकल्प शक्तिमय और तेजस्वी नहीं हो जाते, प्रतीक्षा करते रहो।

 

मनुष्य के अन्दर जितने प्रकार के मानसिक बल हैं, संकल्प-बल उन सबका राजा है। इच्छा, क्रिया और ज्ञान से शक्तिमय हो जाने से संकल्प का प्रतिपादन होता है और हमारी सभी शक्तियों-निर्णय-शक्ति, स्मृति-शक्ति, प्रज्ञा, साधारण शक्ति, तर्क-शक्ति, विवेक-शक्ति, अनुमान-शक्ति, प्रतिभिज्ञा-शक्ति तथादिक सभी शक्तियों का विकास पलक मारते ही होने लगता है। तदनन्तर वे अपने स्वामी-संकल्प महोदय के सहायक बन कर उसके कार्य में सहायता देने आते हैं। अर्थात् संकल्प-बल पर जिन-जिन शक्तियों का विकास किया जाता है, वे शक्तियाँ ही बाद में संकल्प-शक्ति की सहायिका बन जाती हैं।

संकल्प-व्यवहार किस प्रकार हो ?

 

यदि संकल्प के विकास में विलम्ब हो, तो दुःखी और चिन्तित नहीं होना चाहिए। किसी--किसी दिन संकल्प तुम्हारी सब इच्छाओं की पूर्ति करेगा ही।

जिस दिन संकल्प का आविर्भाव होगा, तुम केवल इच्छा मात्र से दूसरों के दुखों दूर कर सकोगे।

इसका एक प्रयोग है। इच्छा करो कि रोगी उस रोग से मुक्त हो जावे। होते-होते यह इच्छा सचमुच में घट जायेगी। तुम ही वास्तव में चकित हो जाओगे। संकल्प करते ही शारीरिक व्याधियों का निवारण किया जा सकेगा।

 

ध्यानपूर्वक और निश्चयपरायण बुद्धि से संकल्प करो - "मैं श्रीनिवास को बजे सुबह मिलूंगा।" तुम्हें आश्चर्य होगा कि वह व्यक्ति प्रातःकाल ही तुम्हारे पाम पहुँचेगा। इस प्रकार संकल्प को अपना हितैषी और आज्ञाकारी बन्धु बनाया जा सकता है। तुम जो कुछ सुन्दर और उचित चाहोगे, वह सब संकल्प-बल से ही तुमको प्राप्त हो जायेगा।

 

शान्तिपूर्वक और दृढ़ता के साथ संकल्प करो कि 'मैं उस नौकरी को जरूर प्राप्त करूँगा।' देखिए, तुम्हें अवश्य सफलता मिलेगी। यदि विलम्ब हो, तो संकल्प का प्रयोग पुनः करो। हाँ, यह है कि प्रारम्भ में संकल्प के प्रयोग में कुछ कठिनाई अवश्य अनुभूत होगी; क्योंकि तुम्हें इसका अभ्यास नहीं है और इसमें तुम सफल हो हुए हो। पर अभ्यास करते-करते जब तुम युक्ति और पद्धति को समझते जाओगे, संकल्प का प्रयोग भी देखते-देखते हो जायेगा और प्रकाम्य वस्तु की प्राप्ति पलक मारते ही हो जायेगी।

 

संकल्प की तेजस्विता, पवित्रता और व्यापकता पर ही ब्रह्म-दर्शन निर्भर है। अभ्यास से तुम पूर्णता प्राप्त करोगे और अनुभव से तुमको नवीन प्रयोगात्मक शिक्षा मिलेगी।

 

एक बात जानने योग्य है। अपने संकल्पों के प्रयोग में तुम्हें बहुत सावधान रहना होगा। संकल्प-शक्ति को महान् आध्यात्मिक सफलताओं की प्राप्ति के लिए, निश्चयरूपतः सुरक्षित रखना ही बुद्धिमानी है। सांसारिक सफलता के लिए शक्ति का प्रयोग करना मूर्खता होगी। यह जीवन, जिसके लिए तुम इस महान् शक्ति का प्रयोग करते हो, केवल एक बुलबुला है, केवल दीर्घ-स्वप्न के समान है। ऐसे संसार की सफलताएँ तुम्हें नित्य-शान्ति और चिर-सुख नहीं दे सकेंगी। यदि विश्वास नहीं है, तो अपने संकल्पों का प्रयोग एक या दो सांसारिक सफलताओं के लिए करके देखो। तब तुम स्वयं समझ जाओगे और तभी तुमको इस महान् शक्ति की उपयोगिता का पता चलेगा। अतः अपने संकल्पों का प्रयोग आत्म-साक्षात्कार के लिए करो। सांसारिक सफलताओं को ठुकरा कर अलग रख दो। इनका मूल्य ही क्या है? खर या काक की विष्ठा के समान ही यह त्याज्य हैं। वैभवशाली सांसारिक बनने के बदले आत्मज्ञानी और राजयोगी बन जाओ। तभी तुम नित्य-तृप्म हो सकोगे। तभी तुम त्रिलोकी के सम्राट् से भी महान् अधिकार-ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकोगे। इस प्रकार तुम्हारी सभी इच्छाएँ महान् संकल्प में समाश्रित होती जायेंगी। तुम आप्तकाम हो सकोगे। क्या यह वस्तुतः एक ऊँची अवस्था नहीं है?

 

 

इच्छा-शक्ति की साधना

 

ध्यान का नियमित अभ्यास, घृणा, अप्रसन्नता और चिड़चिड़ेपन का दमन, विपत्तियों में धीरता, तपस्या, उपवास, प्रकृति-विजय, तितिक्षा, दृढ़ता, सत्याग्रह तथा दैनन्दिनी रखना ये सब संकल्प के विकास को सुलभ बनाते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरों की बातों को भी ध्यानपूर्वक सुने, यद्यपि वे बातें दिलचस्प और मनोनीत हों। क्रोध के कारण अधीरता का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। धैर्यपूर्वक सबकी बातें सुननी चाहिए, तभी दूसरे के हृदय को जीता जा सकता है। जो काम तुम्हें अच्छा लगे, यदि दूसरे उसे चाहते हों तो करना चाहिए। इससे संकल्प का विकास होता है। आरम्भ में वे काम तुम्हें दिलचस्प नहीं लगेंगे, किन्तु कुछ दिनों के अनन्तर उनमें से नवीन आनन्द बरसने लगता है।

 

विषम परिस्थितियों की शिकायत मत करो। जहाँ-कहीं तुम रहो और जहाँ-कहीं तुम जाओ, अपने लिए अनुकूल मानसिक जगत् का निर्माण करो। जहाँ-कहीं तुम जाओगे, वहाँ कठिनाइयाँ और हानियाँ अवश्य मिलेंगी ही। तुम उनका निवारण तभी कर सकते हो, जब तुम्हारा मानसिक जगत् एकदम अप्रभावित हो। विषम परिस्थितियों में रह कर जो मनुष्य अपने को शान्त, दृढ़ और संयमी बनाये रखता है, वही सफलता के सही अर्थ को स्पष्ट करता है।

 

सुख और सुविधाओं को पाने से तुम मजबूत नहीं बन सकोगे। तुम्हारा मन निर्बल और परिस्थितियों का दास बन जायेगा। अतः सभी स्थानों का सदुपयोग करो। 'यह जगह ऐसी है, वह ऐसा है' इत्यादि-इत्यादि शिकायतें करने की आदत त्याग दो बातावरण, परिस्थिति या घिराव या स्थान के स्वभाव में कुछ नहीं; यह केवल अपने मन की अवस्था का प्रतिबिम्ब है। यदि तुम्हारे मन में शान्ति है, सरलता और पवित्रता है, तो तुम किसी भी स्थान में एक ही प्रकार का महान् आनन्द अनुभूत करोगे, इसमें सन्देह नहीं है। अतः हर स्थान में अपने लिए नवीन और अनुकूल मानसिक जगत् का निर्माण करो। किसी भी वस्तु से मन को उद्विग्न होने दो। सच पूछो तो तुम गंगोत्री के निकट-हिमालय के प्रदेश में भी राग-द्वेष पाओगे। तुम संसार के किसी भी हिस्से में एक आदर्श स्थान या अनुकूल परिस्थिति नहीं पा सकोगे। कश्मीर शीत-प्रधान सुन्दर प्रदेश है, लेकिन पिस्सूओं के कारण तुम तंग हो जाओगे, सोना मुश्किल हो जायेगा। बनारस संस्कृत विद्या का महान् केन्द्र है, लेकिन गरमी की ऋतु में यह स्थान गरम हवा के लिए प्रसिद्ध है। हिमालय में उत्तरकाशी सुन्दर स्थान है, लेकिन तुम वहाँ तरकारी या फल नहीं पा सकते। इसी प्रकार यह संसार सुन्दर और असुन्दर, अनुकूल और प्रतिकूल का मिश्रण है-इसे हर समय याद रखो। किसी स्थान में और किसी भी अवस्था में अपने को प्रसन्न रखने की चेष्टा करो। तुम्हारे व्यक्तित्व में इससे बल और तेज उतरेगा। यह एक महान् रहस्य है। इसे अपने हृदय में रखो और ऐसे स्थान को खोजो, जिसमें अनहत प्रसन्नता है, अनन्त धन है, शाश्वत सुखदायक निवास है। तुम किसी भी कार्य में सफल बनोगे और किसी भी कठिनाई पर विजय की प्राप्ति कर सकोगे।

 

मन की एकाग्रता का अभ्यास संकल्प की उन्नति में अति सहायक है। मन का क्या स्वभाव है, इसका अच्छी तरह ज्ञान प्राप्त कर लो। मन किस तरह इधर-उधर घूमता है और किस तरह अपने-अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन कर दिया करता है-यह सब अच्छी तरह सोच-समझ कर हृदय में रखना चाहिए। मन के चलायमान स्वभाव को वश में करने के लिए आसन और प्रभावशाली तरीकों को खोज निकालना होगा। संकल्प की उन्नति, मन की एकाग्रता का अभ्यास, स्मृति का विकासाभ्यास आदि सभी प्रयोग एक-दूसरे से सम्बन्ध रखते हैं। इन सबका व्यवहार संकल्पोन्नति में सहायता देता है।

 

कहाँ एकाग्रता के अभ्यास या स्मृति के विकास की समाप्ति होती है और कहाँ से संकल्प का विकास आरम्भ होता है, इसकी सीमान्त-रेखा नहीं खींची जा सकती। कोई सीमित नियम नहीं हैं। हाँ, मन की एकाग्रता के अन्य नियमों को जानने के लिए मन की यात्रा पर रोक-थाम रखो।

 

मिस्टर ग्लेडस्टोन ज्यों ही बिस्तर पर जाते थे, उनको गहरी निद्रा जाया करती थी। महात्मा गान्धी जी को भी यही अभ्यास था। वे जब चाहते, तभी उठ सकते थे। उन्होंने अपने अतिचेतन मन को इस प्रकार शिक्षित किया था कि वह उनकी आज्ञाओं का पालन तत्पर हो कर किया करता था। अतिचेतन मन निरन्तर अभ्यास से आज्ञा का तत्पर पालन किया करता है। तुमको भी इस प्रकार का अभ्यास करना होगा। प्रायः देखा गया है कि लोग बिस्तर पर करवट बदलते-बदलते रात काट देतेसंकल्प और स्मृति का विकास हैं, उनको निद्रा नहीं आती। जहाँ मनुष्य को एक घण्टे की गहरी निद्रा आयी कि वह निद्रा के पूरे विश्राम को पा लेता है और मन की शिथिल शक्ति पुनः जागृत और कार्यरत हो जाया करती है।

 

तुम जिस क्षण बिस्तर पर जाते हो, मन को स्वतन्त्र छोड़ दो और यह विचार करो, 'मुझे अच्छी तरह निद्रा आयेगी।' अन्य किसी भी प्रकार के विचार करो। यही आदत नेपोलियन को भी थी। लड़ाई के मैदान में, जहाँ जोर से रण के मारू बजते थे, नेपोलियन स्वेच्छानुसार अश्व की पीठ पर ही निद्रा ले लेता था और इच्छानुसार ही जाग जाया करता था और तुरन्त ही नवीन बल पा कर रण में प्रविष्ट होता था। तुम भी अपने को इस प्रकार अभ्यस्त करो कि किसी भी विषम स्थिति में स्वेच्छानुसार सो सको और जाग भी जाओ।

 

डाक्टरों, वकीलों और व्यापारी वर्ग के लिए इच्छा-शक्ति का अत्यन्त महत्त्व है। आज जीवन इतना विशाल और पेचीदा हो गया है कि उद्योगी लोग सोने के लिए पर्याप्त और उचित समय नहीं पा सकते हैं। जब कभी पाँच मिनट के लिए अवकाश प्राप्त हो, उन्हें एक स्थान पर कुछ देर के लिए आँखें बन्द कर निद्रा देवी की गोद में विश्राम लेना चाहिए। उनको इस निद्रा से पर्याप्त और प्रेरक विश्राम मिलेगा। तत्परतः वे अपने आगे के कार्यक्रम को सुस्थिर-चित्त हो कर कर सकेंगे। उद्योगी लोगों के लिए इस प्रकार का अभ्यास वरदान के समान है। उन लोगों की नसों में तनाव और गुरुता जाती है। इस अभ्यास से वे अपने शरीर को विश्राम देने के लिए ढीला छोड़ सकते हैं। यदि इसका अभ्यास किया गया, तो इसमें अनेकों आश्चर्य निहित मिलेंगे

 

डा. एनी बेसेन्ट चलती मोटर में सम्पादकीय नोट लिख लिया करती थीं। आजकल बहुत से उद्योगी वैद्य हैं, जो स्नानागार में समाचार पत्र देख लेते हैं। उनका मन सदा विचारशील रहता है। शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए मन को सदा काम में लगाये रखना चाहिए। जो शक्तिशाली और विलक्षण व्यक्तित्वशाली मनुष्य बनना चाहते हैं, उन्हें अपने जीवन के प्रत्येक क्षण का उपयोग महान् कार्यों में करना चाहिए और मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए सचेष्ट रहना चाहिए। व्यर्थ की बातचीत सदा के लिए त्याग देनी चाहिए। प्रत्येक को समय के मूल्य का ज्ञान होना चाहिए। संकल्प में तेज तभी निखरने लगेगा, जब समय का उचित उपयोग किया जाये। व्यवहार और दृढ़ता, लगन और ध्यान, धैर्य और अप्रतिहत प्रयत्न, विश्वास और स्वावलम्बन मनुष्य को ख्यातिमान् बना देते हैं।

योग्यता और संकल्प

 

अपने संकल्पों का व्यवहार योग्यतानुसार करना चाहिए, अन्यथा संकल्प क्षीण हो जायेगा, तुम हतोत्साह हो जाओगे। अपना दैनिक नियम अथवा कार्य-व्यवस्था अपनी योग्यता के अनुसार बना लो और उसका सम्पालन नित्य-प्रति सावधानी से करो। अपने कार्यक्रम में पहले कुछ ही विषयों को सम्मिलित करो। यदि तुम अपने कार्यक्रम को अनेकों विषयों से भर दोगे, तो उसे निभा सकोगे और लगन के साथ दिलचस्पी ही ले सकोगे। तुम्हारा उत्साह कम होता जायेगा। शक्ति तितर-बितर हो जायेगी। मस्तिष्क में शिथिलता का आभास होगा। अतः तुमने जो कुछ करने का निश्चय किया है, उसका अक्षरशः पालन प्रतिदिन किया जाना चाहिए।

 

विचारों की अधिकता संकल्पित कार्यों की सफलता में बाधा पहुँचाती है। इससे भ्रान्ति, संशय और दीर्घसूत्रता का उदय होता है। संकल्प की तेजस्विता में ढीलापन जाता है। अवसर हाथ से चले जाते हैं। कभी-कभी तो यह भी हो जाता है कि तुम किसी कार्य को हाथ में लेने से हिचकिचा जाते हो। अतः आवश्यक है कि कुछ समय के लिए विचार करो और तभी निर्णय करो। ज्यों ही मन में विचार आये, त्यों-ही संकल्प करना आरम्भ कर देना चाहिए। कभी-कभी सोचते तो हो, पर कर नहीं पाते हो। उचित विचार और उचित अनुभवों के अभाव में ही यह हुआ करता है। अतः उचित रीति से सोचना चाहिए और उचित अनुभव ही करने चाहिए, तभी संकल्प की सफलता अनिवार्य है। उचित विचार और सत्य अनुभव सदा आपके साथ-साथ चला करेंगे।

इच्छा और संकल्प

 

भगवद्-इच्छा सर्वशक्तिमान् है। ईश्वर का संकल्प हुआ कि तत्क्षण ही कार्य का सम्पादन हो जाता है। मनुष्य संकल्प करता है, पर उसे इच्छित वस्तु की प्राप्ति होने या कार्य के पूर्ण होने में देर लग जाती है। इसका कारण क्या है? संकल्प की कमजोरी ही। मनुष्य सोचता है, संकल्प करता है और धीरे-धीरे उस वस्तु को कुछ काल के अन्दर प्राप्त कर लेता है। मनुष्य निर्माण भी करता है। यदि संकल्प शुद्ध और बलवान् है, तो पदार्थ की प्राप्ति अथवा कार्य की सफलता तत्क्षण में ही प्राप्त की जा सकती है।

 

किन्तु केवल संकल्प ही किसी वस्तु की प्राप्ति में सफल नहीं होता है। संकल्प के साथ निश्चित उद्देश्य को भी जोड़ना होगा। इच्छा या कामना तो मानस-सरोवर में एक छोटी लहर-सी है; लेकिन संकल्प वह शक्ति है, जो इच्छा को कार्य-रूप में परिणत कर देती है। इच्छा का कार्यान्वित होना संकल्प पर निर्भर है।

 

इच्छा और संकल्प का अस्तित्व भिन्न-भिन्न है। इच्छा किसी प्रकार की समृद्धि को प्राप्त करने की कामना है, जब कि संकल्प निश्चय करने की शक्ति है, जिसके पीछे किसी काम्य वस्तु की प्राप्ति का ध्येय नहीं रहता। इच्छा वासना है, जो मन से सम्बन्ध रखती है; जब कि संकल्प नियम है और आत्मा के व्यक्त गुणों का लक्षण है। यह विश्व चैतन्य है- यह ईश्वर का संकल्प हुआ। जब आत्मा अपने चारों ओर के पदाधों के आकर्षण और विकर्षण से अप्रभावित हो कर अपना कार्य निर्धारित करता है, तो संकल्प प्रकट होता है। जब बाहरी आकर्षण और विकर्षण कार्य का निर्धारण करते हैं तथा मनुष्य आत्मा की आवाज को सुन कर या आन्तरिक आदेश को पहचान कर इन सबसे विमुख हो जाता है, तब इच्छा प्रकट होती है।

स्वतन्त्र संकल्प

 

मनुष्य जिन-जिन पदार्थों की कामना करता है, सोचता है और जिनके लिए वह काम करता है, उनसे अलग हो जाने का प्रयत्न भी करता रहे। यह समझना चाहिए कि इन सभी विषयों का आत्मा से तादात्म्य नहीं है। इस प्रकार जो इच्छाएँ निम्नतमा इच्छाओं के कारण बाहरी वस्तुओं की ओर उन्मुख हुई थीं, मन के तत्त्वावधान में संकल्प का रूप धारण कर लेती हैं और उच्च मन ही बुद्धि का रूप धारण कर लेता है। चूँकि निम्नतर मन उच्चतर मन का और उच्चतर मन ही बुद्धि का रूप धारण कर लेता है, अतः शुद्ध संकल्प परम संकल्प में आत्म-शासित हो जाता है। केवल इसी अवस्था में बन्धन टूट जाते हैं और उत्साह-शक्ति अनवरुद्ध हो जाती है। तभी कहा जाता है कि 'संकल्प स्वतन्त्र हो चुके हैं।'

मन को शान्त और सन्तुलित रखो

 

जो मनुष्य संकल्प-विकास की चेष्टा कर रहा है, उसे सदा मस्तिष्क शान्त रखना चाहिए। सभी परिस्थितियों में अपने मन का सन्तुलन कायम रखना चाहिए। मन को शिष्टाचार की शिक्षा देनी चाहिए। यह अभ्यास करने की बात है। मन का सन्तुलन हुआ, तो पहुँचे हुए ज्ञानी या योगी के लक्षणों का आभास प्रत्यक्ष होता है। जो अपने मन को सदा सन्तुलित रखता है, वास्तव में वह सुखी व्यक्ति और सिद्ध योगी है, वह सभी कार्यों में आशातीत सफलता प्राप्त करेगा।

 

मन को सन्तुलित करने के लिए तुम पचासों चेष्टाओं में असफल होते रहोगे, किन्तु धैर्य खोना इक्यावनवीं चेष्टा से तुम मन को सन्तुलित करने में सफल बन सकोगे। संकल्प को बल प्राप्त होगा। आरम्भ में असफलताओं के बावजूद भी हतोत्साह नहीं होना चाहिए। वीर पुरुष मकड़ी से भी शिक्षा ग्रहण किया करते हैं। सात बार युद्ध में हार जाने पर भी आठवीं बार वे प्रयत्न करते रहने पर विजयी बनते हैं।

 

भयानक संकट के आने पर भी मन का सन्तुलन नहीं खोना चाहिए, मन की वृत्ति में नीचता नहीं आनी चाहिए। मन को शान्त और उत्साही रखो। बहे हुए दूध पर चिल्लाने से क्या लाभ ? घटना घट चुकी है। हँस-हँस कर विफलताओं का प्रतिकार करना होगा।

 

जो-कुछ भी तुम करते हो, अच्छे ढंग से करो। याद रखो कि जो स्वस्थ नहीं, उसे रोग का आघात सहना ही पड़ेगा। कठिनाइयों को उड़ा देने के तरीके खोज निकालो। मन को कभी भी उद्विग्न न होने दो। भावनाओं की प्रचुरता और बुलबुले के समान उठने वाली उत्तेजनाओं के प्रवाह में बह न जाओ। उनको वश में करो। आखिर संकट आया क्यों, यह झंझट बरसी कैसे इस पर मनन करो और भविष्य में सावधानी से काम करो। परिस्थितियों पर विजय पाने के लिए अनेकों प्रभावशाली और आसान तरीके हैं, उन्हें सीखो ।

 

विवेकी बनो और दूरदर्शी भी। इस प्रकार विपत्तियों और दुर्घटनाओं पर विजय पायी जा सकती है। विफलताओं, दोषों और गलतियों पर ध्यान रखते हुए भी उनमें लीन हो जाओ। ज्यों-ज्यों तुम्हारा संकल्प दिन-प्रति-दिन शुद्धतर और महत्तर होता जायेगा, त्यों-त्यों सभी अवगुण स्वतः ही हटते जायेंगे।

 

समय मिलने पर यह विचार अवश्य करो कि तुम क्यों असफल हो रहे हो? कारण खोज कर दूसरी बार चेष्टा करो और सावधानी से आगे बढ़ो। जिन कारणों से पहली बार असफलता मिली थी, उनका निराकरण करो-उन्हें अलग हटाओ। अपने को स्थिर-चित्त रखो, सदा सावधान रहो, फुर्तीले और कुशल बनो। तेजस्वी होते हुए भी सुकर्म के योग्य होना चाहिए। तेजस्विता का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

सदा सतर्क रहो

 

कभी-कभी व्यावहारिक कठिनाइयाँ दुविधा में डाल देती हैं। तुम्हें हतोत्साह नहीं हो जाना चाहिए। हिम्मत हारो, बल्कि अपनी बुद्धि का उपयोग करो। चतुर तरीकों और सफल योजनाओं का आविष्कार करो। अपनी आन्तरिक शक्तियों और जागृतिभूत तेजस्विता को काम में लाओ। जब घर में आग लग जाती है, तो तुम कितनी फुर्ती से काम पर जुट जाते हो। किस प्रकार और कहाँ से यह दृढ़ता और स्फूर्ति आयी? पता नहीं चलता कि कहाँ से वह तेज और वह बल आया था। उस समय तुम्हें अन्येतर व्यापार अनुभूत नहीं होते, तुम्हारा चित्त एकाग्र हो जाता है। ततः तुम सुन्दर व्यवस्थापूर्वक कार्य करने लग जाते हो और इस प्रकार जायदाद और तथादिक वस्तुओं की यथासम्भव रक्षा कर पाते हो। जब बला टल जाती है, तो कहते हो कि 'ईश्वर की रहस्यमयी शक्ति उस समय मेरे अन्दर कार्य कर रही थी।' समय का निरर्थक प्रयोग करो। जब एक बार कार्य का निश्चय कर लिया है, तो दक्षतापूर्वक उसका सम्पादन करो। दीर्घसूत्रता समय का नाश कर देती है। दीर्घसूत्री व्यक्ति इस लोक और परलोक में कभी भी सफल नहीं हो पाता है।

संकल्पोन्नति के पूर्व-लक्षण

 

अनुद्विग्न मन, समभार, प्रसन्नता, आन्तरिक बल, कठिन कार्य सम्पादन की क्षमता, प्रभावी व्यक्तित्व, शान्ति, ओजपूर्ण मुखमण्डल, चमकती आँखें, सतर्क दृष्टि, स्पष्ट स्वर, सरल चरित्र, दृढ़ स्वभाव, निडरता आदि लक्षणों से पता चलता है कि संकल्पोन्नति हो रही है।

निपुण बनो

 

गीता में भगवान् ने बारहवें अध्याय के सोलहवें श्लोक में कहा है कि 'तुम्हें दक्ष हो जाना चाहिए।' जब कभी तुम उभय-सम्भव तर्क में पड़ जाते हो, तो यही दक्षता तुम्हारा मार्ग निश्चित कर देती है, जिससे तुम सीधी सफलता प्राप्त कर सकते हो। इसके लिए बुद्धि अति सूक्ष्म रहनी चाहिए और कुशाग्र भी। प्राचीन काल में क्षत्रिय राजा गण युद्ध-काल में कितने फुर्तीले और निपुण रहते थे। शिवाजी और नेपोलियन में वह गुण प्रचुरता में था।

धैर्य और दृढ़ लगन

 

विकट परिस्थितियों पर विजय पाने और सफल बनने के लिए, दृढ़ लगन और अनहत धैर्य की आवश्यकता है। घृति और मानसिक साम्य संकल्पोन्नति में सहायक होते हैं।

 

साधारण-सी घटना से विचलित नहीं होना चाहिए और बात-बात में धैर्य का त्याग ही करना चाहिए। विपत्ति-काल में धैर्य धारण करना चाहिए। कहा है कि समुद्र में-विशाल सागर के मध्य, पोत के डूब जाने पर भी, पोतस्थ नाविक और यात्री तैर कर तट पर पहुँचने की आशा करते हैं। जिस व्यक्ति में धैर्य नहीं, वह जल्दबाज भी होता है और बात-बात में हताश, निराश और स्वभावतः विफल भी हो जाता है।

जीवन का एक निश्चित लक्ष्य हो

बहुसंख्यक लोगों का, यहाँ तक कि शिक्षित कहे जाने वाले व्यक्तियों का भी जीवन में कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता है। फल यह होता है कि वे लोग इधर-उधर मारे-मारे फिरते हैं; जैसे समुद्र में लकड़ी का एक कुन्दा चपल लहरों के साथ निरवलम्ब इधर-उधर भटकता है। आज के जन-समुदाय को अपने कर्तव्य का यथार्थ ज्ञान नहीं है। बहुत से विद्यार्थी अपनी बी. . और एम. . की पढ़ाई खत्म कर लेते हैं; पर आगे क्या करना होगा, इसका उन्हें पता नहीं रहता। अपनी प्रकृति के अनुसार किसी अच्छे उद्यम को चुनने की शक्ति उनमें नहीं है, जिससे वे जीवन को किसी आधार पर खड़ा तो कर सकें। अतः वे आलसी बन जाते हैं और साहस के कार्य या किसी कार्य को, जिसमें कुशलता, चतुराई और कुशाग्र बुद्धि की आवश्यकता है, करने में अयोग्य सिद्ध होते हैं।

 

इस तरह उनका समय बरबाद होता जाता है और सारा जीवन उदासी, निराशा और दुःख में बीत जाता है। उनके पास शक्ति है, बुद्धि भी है, पर कोई निश्चित लक्ष्य या ध्येय नहीं और जीवन का कोई कार्यक्रम ही, इसलिए उनका जीवन असफलता का प्रतीक बन जाता है। प्रत्येक को प्रथमतः अपने जीवन के लक्ष्य का उचित ज्ञान होना चाहिए। उसके बाद कार्य करने का एक ऐसा ढंग निकालना चाहिए जो अपने ध्येय की सफलता के अनुकूल हो।

 

लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कड़ी मेहनत तो जरूर करनी होगी, साथ-साथ अपना आदर्श भी निश्चित होना चाहिए और जीवन में हर क्षण उसी आदर्श के अनुसार कर्म करना चाहिए। लड़खड़ाते पग से दश साल बाद भी या अभी ही तथा इसी क्षण तुम अपने लक्ष्य को ठीक तौर से समझ सकोगे, यह कोई बड़ी बात नहीं है; किन्तु अपना एक आदर्श ध्येय अवश्य होना चाहिए। तभी संकल्प का विकास किया जा सकता है।

 

जब व्यक्ति ने सफलतापूर्वक अपने द्वितीय आश्रम (गृहस्थाश्रम) को निबाह लिया है, जब उसके सभी पुत्र जीवन में दक्ष हो चुके हैं, जब उसकी पुत्रियों का विवाह भी हो चुका है, तब उसे अपने जीवन के अवशेष भाग को भागवत-आचार, धर्म-पुस्तकों के अध्ययन और ध्यान में व्यतीत करना चाहिए। पर ऐसा होता ही कहाँ है? बहुत से लोगों को तो इसका विचार तक नहीं आता कि वे क्या करने जा रहे हैं? प्रथम नौकरी से अवकाश मिलते ही वे दूसरी नौकरी पकड़ लेते हैं। उनमें लालच यथावत् वर्तमान रहता है। यहाँ तक कि वे जीवन के अन्तिम क्षणों तक रुपयों को ही गिनते रहते हैं; पोतों और पड़पोतों के विषय में ही सोचते रहते हैं। ऐसे लोगों के भाग्य को क्या कहा जाये ? वे सचमुच दयनीय हैं। सुखी है वह, जो नौकरी से अवकाश पाते ही अपना सारा समय धर्म-कर्म में व्यतीत करने लगता है।

पौर्वात्य और पाश्चात्य संस्कृति के प्रयोग

 

हिन्दू-संस्कृति पौर्वात्य संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है। हिन्दू साधुओं और ऋषियों की पूर्वीय संस्कृति और पाश्चात्य देशों की मनमोहक संस्कृति की रीतियों में आसमान और जमीन का अन्तर पड़ जाता है। मुख्य भेद यही है कि पाश्चात्य देशों में लोग अपने संकल्प और स्मृति को भौतिक विकास और सांसारिक उन्नति के हेतु प्रयुक्त करते हैं। उन्होंने सामान्यतः परा जीवन की तो अवहेलना ही कर दी है। यह उन लोगों की महान् भूल है। परन्तु भारत के योगी जन अपनी स्मृति और संकल्प-शक्ति को आध्यात्मिक उन्नति के लिए शिक्षित करते हैं। उनका लक्ष्य सदा आत्म-साक्षात्कार ही हुआ करता है। आत्म-विषयक सिद्धियों का प्रकाशन अथवा प्रदर्शन वे केवल अपने विद्यार्थियों को इस विषय की शिक्षा देने के लिए ही करते हैं। उस प्रदर्शन का अर्थ होता है कि 'इस इन्द्रियजन्य सुख से बढ़ कर महान् सुख आत्मनिष्ठ जीवन में है, जहाँ सच्चा आनन्द और अमरत्व प्राप्त होते हैं।'

 

उनका कथन है कि 'अमरत्व की प्राप्ति तो कर्म से, धन से और सन्तति होती है, बल्कि एकमात्र त्याग से होती है। सच्चा सुख भूमा या निस्सीम या अनन्त में है। संसार के नश्वर पदार्थों में सुख नहीं है। वास्तविक और अनन्त शान्ति केवल ब्रह्म में ही है। उस पूर्ण की खोज और उसका ज्ञान अवश्य होना चाहिए।' उनकी यही शासनावली हमारे कानों में सदा गूँजती रही है।

 

अतः पाश्चात्यों को आध्यात्मिक संस्कृति की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, और किसी भी संस्कृति के आध्यात्मिक आधारों को तो भूलना ही नहीं चाहिए। भौतिक उन्नति की प्राप्ति तो कुछ सीमा तक ही हो सकती है। साथ-साथ आध्यात्मिक गुणों का विकास भी होते रहना चाहिए। सभी संस्कृतियों और कार्यों के लिए एक आध्यात्मिक आधार होना चाहिए। यह आवश्यक है। यदि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो वह 'संस्कृति' नहीं रहेगी। इसका तात्पर्य यह है कि संकल्पोन्नति के साथ-साथ तपस्या का अभ्यास और सच्चरित्रता का दिव्य भाव अवश्य होना चाहिए।

 

शौनक नामक एक बुद्धिमान् गृहस्थ ने ऋषि अंगिरा के पास जा कर यह प्रश्न किया-"पूज्यवर, परमोच्च संस्कृति अथवा महान् संस्कृति कौन-सी है, जिसको जानने के अनन्तर सभी संस्कृतियों का ज्ञान हो जाता है?"

 

अंगिरा ने उत्तर दिया-"यह ब्रह्मविद्या या पराविद्या है।"

 

आध्यात्मिक संस्कृति को दूसरे शब्दों में आत्म-ज्ञान कहा जाना चाहिए। मैं इसलिए पाश्चात्य देशों के सांस्कृतिकों का ध्यान इस ओर आकृष्ट करता हूँ। कुछ भारतीय धर्मगुरु भौतिकवाद की एकदम उपेक्षा कर डालते हैं और तामसिक तपस्या करते हैं। यह भी अवज्ञेय है। गीता में भी यही कहा गया है। अतिशयता कभी-कभी विनाश की जननी और सदैव अनौचित्य की कुंजी है। मुक्ति और भुक्ति दोनों की आवश्यकता है, जैसा तान्त्रिक कहा करते हैं। योग और व्यवहार दोनों का समन्वय किया जाना चाहिए।

उपसंहार

 

एक दूसरी बात है, मुख्य है वह संकल्पोन्नति असम्भव या कठिन या यथासम्भव या दुःसाध्य नहीं है। ऐसी शिकायत कभी नहीं करनी चाहिए। कम-से-कम एक साधक के लिए तो यह शिकायत वांछनीय नहीं है। जो साधक संकल्प और स्मृति की साधना का प्रयोग कर रहे हैं, उनके लिए अच्छा होगा, यदि वे अपने शब्दकोष से इन कठिनाइयों और क्लेशों का बहिष्कार कर दें; क्योंकि इनके प्रयोग करने वालों में नपुंसकत्व या स्त्रीत्व का आभास होता है। डरपोक औरतें ही कहा करती हैं- 'यह कठिन है, ओहो, वह तो असम्भव है; अरे ऐसा कभी हो ही नहीं सकता' इत्यादि। सिंह के समान साहसी आचरण करो। आध्यात्मिक वीरता को अपने अन्दर प्रत्यक्ष करो। आध्यात्मिक क्षेत्र में निरन्तर रण हो रहा है, अपनी बहादुरी दिखलाओ। संकल्प मात्र से तुम क्या नहीं कर सकते हो? संकल्प के बल से गतिहीन में गति लायी जा सकती है और मृत्यु में जीवन का स्फुरण भर दिया जा सकता है। ईसामसीह ने जो कुछ किया, तुम उसे संकल्प-बल से कर सकते हो। यह प्रकृति का अटूट नियम है कि संकल्प अनेकों मार्गों के अवरुद्ध अभियानों को खोलता है; संकल्प सफलता का अग्रदूत है।

 

अतः मन को सद्-अनुशीलन में शिक्षित करो। निषेधात्मक विचारों को भूल जाओ। आत्मा की महिमा को जानो। उसकी शक्ति को पहचानो, उसकी महत्ता के गौरव का ध्यान करो। तुम्हारे मन, विचार, संकल्प और स्मृति की आड़ में और है ही क्या? केवल आत्मा ही आत्मा। वह सबमें व्यापक है, सबकी रग-रग में समाया हुआ है। वह ज्ञान, आनन्द, शक्ति, सौन्दर्य, शान्ति और समृद्धि तथा कल्याण एवं सुख का भण्डार है-यदि यह जान जाओ, तो संकल्प दिव्य संकल्प बन जायेंगे।

 

ऐसा अनुभव करो कि सूर्य, चन्द्रमा, तारे और अग्नि तुम्हारी आज्ञा से अपना-अपना कार्य कर रहे हैं। ऐसा समझो कि तुम्हारी आज्ञा से वायु बहती है, जल बरसता है, अग्नि जलती है, नदियाँ बहती हैं तथा इन्द्र, अग्नि और यम अपना-अपना कार्य करते हैं। तुम प्रतापों के प्रताप, सूर्यों के सूर्य, प्रकाशों के महाप्रकाश, पवित्रताओं की परम पवित्रता, देवत्व के परम देवत्व, देवताओं के महादेव, सम्राटों के महासम्राट् और सबसे महान् ईश्वर हो। तुम ही सत्य हो, तुम ही ब्रह्म हो, तुम ही अविनश्वर, अविनाशी और अमर आत्मा हो, जो ब्रह्माण्ड में समाया हुआ है। अपने दैवी वैभवों को पहचानो ब्रह्म की महिमा का अनुभव करो। अपनी स्वतन्त्रता, अपना सच्चिदानन्द स्वभाव, अपना महाकेन्द्र, आदर्श और लक्ष्य कभी भूलो। उस प्रकाश, ज्ञान, प्रेम, शान्ति, सुख और आनन्द के समुद्र में सदा आनन्दमग्न रहो। महावाक्य का महत्त्व समझो। 'तत्त्वमसि' - वह तुम (ही) हो, उपनिषदों के इस वाक्य का साक्षात्कार करो।

सदाचार-संस्कृति का सौन्दर्य

 

क्या तुम इसका कारण जानते हो कि मैं क्यों इस विषय को तृतीय क्रम में चुन रहा हूँ? वस्तुतः आत्मा ही प्रत्येक का आधार है। मैं इसीलिए आध्यात्मिक संस्कृति को सर्वप्रधान मानता हूँ। आत्मा और संकल्प में घनिष्ठ सम्बन्ध है; क्योंकि संकल्प आत्म-गति या आत्म-प्रकाशन है। अतएव में आध्यात्मिक उन्नति के उपरान्त ही संकल्पोन्नति पर विचार प्रकट कर चुका हूँ।

 

सदाचार के पक्ष का ज्ञान हुए बिना संकल्पोन्नति सम्भव नहीं है। इसलिए यह तृतीय क्रम में रहा है। सदाचार में उन्नति कर लेने से चरित्र की पूर्णता प्राप्त होगी। सदाचारी बुद्धिवादी से कहीं अधिक शक्तिमान् है। चरित्र की उन्नति होने से नाना प्रकार की सिद्धियों और गुप्त शक्तियों की प्राप्ति होती है। यदि तुम योगसूत्रों का अध्ययन करो, तो उनमें अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह के अभ्यास से जो शक्तियाँ प्रकट होती हैं, उनका विवेचन पाओगे। जो सदाचार में उन्नति कर रहे हैं, अष्ट-सिद्धियाँ और नव-निधियाँ उनके चरणों के पास लोटा करती हैं; वे सदा उनकी सेवा में प्रस्तुत रहती हैं।

 

दर्शन-शास्त्री सदाचारी हो, यह अनिवार्य नहीं; परन्तु आध्यात्मिक साधक को सदाचारी होना अनिवार्य है। सच्चरित्रता आध्यात्मिकता के साथ-साथ चलती है। दोनों का अस्तित्व साथ-साथ है। तीन प्रकार की तपस्याओं अर्थात् शारीरिक, वाचिक और मानसिक का आदेश गीता के १७ वें अध्याय में है। राजयोग-दर्शन में यम का अभ्यास और बौद्धों के आठ नियम (उचित विचार, उचित प्रयास, उचित कर्म, उचित चर्चा आदि) मनुष्य की नैतिक उन्नति के लिए अत्यन्त विचारवान् सिद्धान्त हैं। सदाचार या उचित आचरण से मनुष्य नैतिक बनता है और आत्म-तत्त्व या ब्रह्मज्ञान पाने योग्य हो जाता है।

 

सदा यह प्रयत्न करना चाहिए कि प्रत्येक परिस्थिति में सच बोला जाये। आरम्भ में तुम अपनी आमदनी से हाथ भी धो सकते हो, पर अन्त में तुम्हारी विजय दुर्निवार्य है। तुम उपनिषदों के सत्य को जानोगे - 'सत्यमेव जयते नानृतम्', अर्थात् एकमात्र सत्य की ही विजय होती है, असत्य कभी विजयी नहीं होता।

 

एक वकील जो कानून की कचहरी में सत्य बोलता है, झूठी गवाही नहीं पढ़ाता, आरम्भ में अपनी वकालत को खो सकता है; परन्तु कालान्तर में वही वकील न्यायाधीशों और मुवक्किलों से सम्मान प्राप्त कर सकेगा। उसके पास सहस्रों मुवक्किल जमा हो जायेंगे। किन्तु उपक्रम में उसे उपर्युक्त बलिदान अवश्य करना होगा। वकील लोग प्रायः शिकायत किया करते हैं- 'हम लोग क्या कर सकते हैं? हम लोगों का तो पेशा ही ऐसा है। हम लोगों को असत्य भाषण करना ही पड़ेगा, अन्यथा हम लोग अपना मुकदमा हार जायेंगे।'

 

यह सब झूठे बहाने हैं। उत्तर प्रदेश में एक ऐड्वोकेट थे। वह मानसिक रूप से संन्यासी का व्यवहार करते रहे। उन्होंने कभी भी झूठी गवाही नहीं दिलवायी। वह ऐसे मुकदमों को हाथ में लेते ही नहीं थे। किन्तु जब तक वे जीवित रहे, वकीलों में आदर्श नेता के समान पूजे गये और न्यायाधीशों, मुवक्किलों तथा अपने मित्रों के श्रद्धापात्र बने रहे। अतः भाइयो, क्यों अपने विवेक की हत्या कर रहे हो? क्यों अपनी आत्मा का हनन कर रहो हो? क्या तुम सभी पूर्वोक्त वकील साहब के आदर्श का अनुसरण करोगे? सच्चे बनो। तुम्हारे अन्तिम दिन आनन्द से करेंगे। अपने जीवन को भोग-विलासी बनाने और अपनी पत्नी को प्रसन्न रखने के लिए अपने विवेक की हत्या करो। जीवन तो एक--एक दिन लुप्त हो जाने वाली वस्तु है और एक बुलबुले के समान दो क्षणों का भी मेहमान नहीं है। अपने को दिव्य बनाने के लिए साधना करो।

 

अहिंसा ही परम धर्म है। किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिए। सत्य बोलना चाहिए और धर्म का आचरण करना चाहिए। दूसरों के प्रति वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, जैसा तुम दूसरों को अपने प्रति करते हुए देखना चाहते हो। अपने प्रतिवासी से अपने ही समान प्रेम-भाव का व्यवहार करो। मनुष्य की नैतिक उन्नति के लिए यह सब अत्यन्त आवश्यक बातें हैं। आत्मिक एकता या जीवन का एकत्व या अद्वैत-दर्शन के लिए नैतिकता ही दृढ़ आधार है। नैतिक उन्नति वेदान्त दर्शन के लिए रास्ता तैयार करती है।

 

प्रायः सभी साधक गृह-त्याग करने के पश्चात् नैतिक शुद्धि की परवाह कर, समाधि और ध्यान में कूद कर बड़ी भारी गलती किया करते हैं। यद्यपि उन्होंने १५ साल तक ध्यान का अभ्यास किया है, तथापि उनका मन उसी मूढ़ स्थिति में रहता है। ईर्ष्या, घृणा, गुरुत्व का विचार, अहंकार और घमण्ड उनके मन में भरे हुए रहते हैं। नैतिक संस्कृति के बिना ध्यान या समाधि कदापि सम्भव नहीं। समाधि और ध्यान तो स्वतः जाते हैं, जब नैतिक शुद्धि का मन में अवतरण होता है।

भावों का विकास

 

'भाव' शब्द संस्कृत पद है। इसका अर्थ होता है-मानसिक दृष्टिकोण या स्वभाव। आन्तरिक भावना या अनुभव ही भाव है। मनुष्य में जो गुण प्रबल हैं, उनके स्वभाव के अनुसार भाव भी तीन प्रकार के होते हैं, अर्थात् सात्त्विक भाव, राजसिक भाव और तामसिक भाव। सात्त्विक भाव दैवी भाव है और शुद्ध है। जिस तरह विचार, स्मृति या संकल्प का विकास अभ्यास द्वारा हो सकता है, उसी तरह भाव का विकास भी हो सकता है। दुर्भाव को सुभाव में रूपान्तरित किया जा सकता है। मित्रता या शत्रुता की भावना मानसिक सृष्टि है। यह आन्तरिक विचार या भावना है। बहुत दिनों का विश्वासी मित्र एक क्षण में अपना कट्टर वैरी बन जाता है। केवल एक कठोर शब्द ही सारी स्थिति को पलक मारते ही बदल देता है। जब मित्रता का भाव रहता है, तो केशव आशा करता है या सोचता है कि उसका मित्र राजेन्द्र बीमारी की हालत में उसकी सेवा करेगा; वह यह भी सोचता है कि संकट और आवश्यकता पड़ने पर वह अपने मित्र से ऋण भी ले सकता है-इस प्रकार की अनेकों भावनाएँ केशव के मन में इसलिए उठती हैं कि वह राजेन्द्र को अपना मित्र समझता है। यह सब मनुष्य की भावनाएँ हैं। जब दोनों अपनी मित्रता से हाथ धो बैठते हैं, तब केशव के मन में राजेन्द्र-विषयक नाना प्रकार की भावनाएँ जागती हैं। उसे अपने पुराने मित्र में किसी प्रकार का विश्वास ही नहीं हो पाता। वह उससे डरता रहता है। रास्ते में कहीं मिल जाने पर मुँह फिरा लेता है। वह उसकी निन्दा करता है। अनेकों शंकाओं से उसका मन भरा हुआ रहता है। देखिए, सम्पूर्ण परिस्थिति मौलिक रूप में बदल गयी है। भाव पूर्णतया बदल गया है।

 

वेदान्त का सिद्धान्त है कि मनुष्य जब अज्ञान से रहित होता है तो वह ब्रह्म है; अर्थात् वह ब्रह्म हो जाता है। मनुष्य अपने को भ्रम से समझ बैठता है कि वह यह शरीर है और छोटा जीव है, जिसे छोटे-छोटे अधिकार और लौकिक ज्ञान प्राप्त हैं। यह उसके वर्तमान का भाव है। यह मानवीय भाव है। इसका रूपान्तर ब्रह्म-भाव में हो जाना चाहिए। सोचो कि तुम ब्रह्म हो। अनुभव करो कि तुम शुद्ध और सर्वव्यापी ज्ञान, प्रकाश और चैतन्य हो; समझो कि तुम अमर हो। विचारों कि तुम सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी हो। विश्वास करो कि तुम साक्षी हो। साक्षी और अकर्ता के भाव अपने मन में आने दो। 'मैं कर्ता नहीं हूँ, मैं भोक्ता नहीं हूँ इस प्रकार के भावों को मन में लाने का अभ्यास किया करो; अशुद्ध भावनाएँ पराभूत हो जायेंगी और तुम कर्म-बन्धन को तोड़ सकोगे।

 

वेदान्त यह सिखलाता है कि नाम और रूपों की अवहेलना कर, हर जगह ब्रह्म को ही देखो और उसी का अनुभव करो। वेदान्त तुम्हें उचित विचार और गम्भीर ध्यान से आत्म-भाव का विकास करना सिखलाता है।

 

जब कोई बाहरी विचार हमारे मन पर अधिकार स्थापित करने लगता है, तो एक प्रकार की मानसिक स्थिति और भावना उस विचार की प्रकृति के समान हमारे अन्दर आती है। अपने शत्रु के विषय में कुछ देर सोचो, तो तुम्हारे अन्दर शत्रु-भाव आने लगेंगे। दया या विश्व-प्रेम के विषय में सोचो, तो प्रेम-भाव या करुणा-भाव प्रकट होगा। विश्व-सेवा की सोचो, तो सेवा-भाव तुम्हारे अन्दर जायेगा। भगवान् कृष्ण और उनकी वृन्दावन लीला का विचार करो, तो कृष्ण भक्ति का जागरण होगा। भावना और विचार साथ-साथ चलते हैं। विचार को भावना से अलग नहीं किया जा सकता, उनका सम्बन्ध आग और उसकी गरमी के समान अभिन्न है। सावधानी और अन्तरावलोकन द्वारा सदा मानसिक परिस्थितियों का ध्यान रखना चाहिए। मन में किसी प्रकार का निषेधात्मक या अनिच्छित भाव प्रकट नहीं होने देना चाहिए। कलुषित भावना को शुद्ध भावना में बदल देना चाहिए। स्थिर भावना अनिश्चित भावनाओं को पीछे धकेल देती है। सात्त्विक भावना मूल्यवान् सम्पत्ति के समान है।

 

सात्त्विक भाव की लड़ी द्वारा अपने को ब्रह्म से सम्बद्ध किये रहना चाहिए। आरम्भ में घमासान युद्ध होगा; अपने आसुरी और दैवी भावों में एक अन्तर्द्वन्द्व होगा। अपना आसुरिक स्वभाव दैवी स्वभाव पर अधिकार जमाने का प्रयत्न करेगा। निरन्तर अभ्यास से ही अन्ततः सात्त्विक भाव की विजय सम्भव हो सकेगी।

 

भाव पर भोजन का प्रभाव अनिवार्य रूप से पड़ता है। सात्त्विक भोजन से सात्त्विक भावों का उदय होता है। अपने को अनन्य भाव में समाश्रित करने का अभ्यास करो। पन्दरह दिनों तक केवल फल तथा दूध का आहार सेवन करो और तब मन के भाव और स्वभाव में परिवर्तन देखो। तुम्हारा मन सात्त्विक भावना से आश्चर्यजनक शान्ति की प्राप्ति कर रहा होगा। जब इस सात्त्विक भाव का उदय होता है, तब मन स्वभावतः ईश्वर की ओर दौड़ने लगेगा और समाधि का अवतरण स्वतः ही हो जायेगा।

 

जब भक्त सोचता है कि वह ईश्वर का सेवक है, तब उसमें 'दास्य-भाव' का आगमन होता है। जब वह सोचता है कि भगवान् उसके सखा हैं, तो 'सख्य-भाव' का उदय होता है। वह जब ईश्वर को वत्सलता के रूप में देखने का प्रयत्न करता है, तो वात्सल्य-भाव' जागता है। इस प्रकार वह अपनी भावना के अनुसार अपने अन्दर माधुर्य अथवा शान्त भाव विकसित करता है। जब वह अनुभव करता है कि भगवान सब जगह हैं, तो उसमें तन्मयता का भाव आता है।

 

भक्त सदा यह सोचता है कि भगवान् ही सब-कुछ करते हैं, वह तो उनके हाथों का उपकरण मात्र है, केवल निमित्त है। अपने अन्दर यह भाव जगाने से वह कर्तापन और भोक्तापन का विचार त्याग देता है और इस प्रकार कर्म के जटिल बन्धनों से अपने को मुक्त करता है। इस भाव का विकास करने से भक्त पूर्ण और विकार-रहित शान्ति प्राप्त करता है। जब कभी उसके जीवन में अच्छी या बुरी घटना घटती है, तो वह कहता है- 'ईश्वर ही सब-कुछ हैं। वह मेरे लिए कार्य करते हैं। वह जो-कुछ भी करते हैं, अच्छा ही करते हैं। ईश्वर न्यायी हैं। ईश्वर की इच्छा ही सम्पन्न होती है। सब-कुछ भगवान् का है, मैं भगवान् का हूँ, सब भगवान् के हैं।' इस अभ्यास से वह जीवन की सभी परिस्थितियों और दशाओं में प्रसन्नचित्त रहता है।

 

भक्त और वेदान्ती के भावों में यह भेद है। वेदान्ती साक्षी और अकर्ता का भाव ग्रहण करता है; भक्त निमित्त-भाव की उन्नति करता है; भक्त दास्य-भाव का विकास करता है। वेदान्ती अपने को ब्रह्म-स्वरूप मानता है; भक्त अपने में दैत भावना (भक्त और भगवान् की भावना) विकसित करता है। वह भगवान् का पूजन करता है। अन्ततोगत्वा भक्त भी ज्ञानी के समान ज्ञान की चरम अवस्था प्राप्त करता है। मात्र आरम्भिक साधना और भाव में भेद होता है। अन्त में दोनों एक ही समतल भूमि पर मिलते हैं।

 

धनी तथा पण्डित गर्व और गुरुत्व का भाव ग्रहण करते हैं। सच्चे संन्यासी में समदर्शिता, एकत्व और प्रेम का भाव रहता है। प्रत्येक मंनुष्य में उसके स्वभाव और गुणों के अनुसार अलग-अलग भाव होता है। पिता और पुत्र का सम्बन्ध, पति और पत्नी का सम्बन्ध, नौकर और मालिक का सम्बन्ध प्रेम की विभिन्न सीमाओं का विकास करता है। यदि इस प्रेम को पवित्र और उच्चतर दैवी आवेगों में रूपान्तरित कर दिया जाये, तो इसके क्षुद्र आवेग परिमार्जित किये जा सकते हैं। निम्नतर भाव का परिवर्तन उच्चतर दिव्य भावों में होता है। दिव्य भावों के विकास के लिए सांसारिक सम्बन्ध और भावों का समन्वय प्रारम्भिक शिक्षा के समान जानना चाहिए। यह बात कभी भूलो।

प्रतिपक्ष-भावना के नियम

 

मान लो कि तुम दुःख की भावना से सन्तप्त हो। एक प्याले में दूध या चाय ले लो। शान्तिपूर्वक बैठो। अपने नेत्र बन्द कर लो। अपने अन्दर जागृत हुई नैराश्य-भावना के कारणों का पता लगाओ और परिहार की चेष्टा करो। प्रतिकूल भाव का विचार ही इसके निवारण का सबसे अच्छा तरीका है। सामान्य विचार सदैव निषेधात्मक विचारों पर विजय पाते हैं, यह प्रकृति का सुन्दर नियम है। अब दृढ़ता से प्रतिकूलता की बातें सोचो। विषाद के प्रतिकूल आनन्द की बातें सोचो। आनन्द से क्या-क्या लाभ होते हैं, वह सोचो। ऐसा अनुभव करो कि वास्तव में तुमको वह गुण प्राप्त हैं। बार-बार मन में इस सूत्र को दोहराओ- ' आनन्दोऽहम्।' अनुभव करो कि तुम अत्यन्त सुखी हो। मुस्कराना आरम्भ करो और अनेकों बार हँसो। कुछ राग अलाप करो, जिससे तुममें प्रफुल्लता आयेगी। गाने से विषाद दूर किया जा सकता है। बार-बार जोर से '' का उच्चारण करो और खुली हवा में इधर-उधर दौड़ो। इन प्रयोगों से विषाद दूर हो जायेगा। यह नियम राजयोग में 'प्रतिपक्ष-भावना' के नाम से जाना जाता है। यह सबसे आसान नियम है। बलात्कार और शक्तिपूर्वक संकल्प का उपयोग कर विषाद को हटाने से संकल्प को भी चोट पहुँचती है। इसके प्रयोग में दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है, अन्यथा विषाद का दमन सम्भव नहीं होगा। साधारण मनुष्यों को इस प्रयोग से सफलता नहीं मिलेगी। निषेधात्मक भावना के बदले प्रतिकूल सामान्य-भावना रख देने से विषादमयी भावना जल्दी दूर हो जाती है; यही सबसे आसान रीति है। कुछ काल में विषादादि निम्न भावनाएँ लुप्त हो जाती हैं। इसका अभ्यास और अनुभव करो।

 

यदि तुम बार-बार असफल भी रहो, तो भी इसका अभ्यास करते जाओ। कुछ अभ्यास और स्थिरता के बाद सफलता अवश्य मिलेगी। सभी निम्न भावनाओं के साथ यह नियम बरता जा सकता है। यदि क्रोध की भावना प्रबल है तो प्रेम के विचारों को अपने अन्दर जगाने के प्रयोग करो। यदि काम-भावना उपद्रव कर रही है तो ब्रह्मचर्य के लाभों को सोचो। यदि बेईमानी की भावना प्रबल है तो ईमानदारी, पवित्रता आदि के सम्बन्ध में सोचो। यदि कृपणता (कंजूसी) के विचार प्रबल हैं तो दान और दानी व्यक्तियों के सम्बन्ध में सोचो और दान के प्रयोग करो। यदि मोह प्रबल है तो विवेक और आत्म-विचार के सम्बन्ध में सोचो। छल-कपट की भावना प्रबल होने पर निष्कपटता और उसके मूल्यवान् लाभों को सोचो। यदि द्वेष की भावना प्रबल है तो भद्रता और उदारता के विषय में विचार करो और उनके प्रयोग करो। यदि कायरता सबल है तो साहस की बातें सोचो। इस प्रकार अनिश्चित और निषेधात्मक भावनाओं को प्रतिपक्ष भावनाओं से टाल दिया जा सकेगा और आपकी स्थिति सामान्य हो जायेगी। किन्तु इसके लिए निरन्तर और सतत अभ्यास की आवश्यकता है। अपने नियमों के चुनाव में सावधान रहो।

विचारोन्नति

 

बहुत कम लोग इस कला या विज्ञान को जानते हैं। यहाँ तक कि शिक्षित कहलाने वाले व्यक्ति भी इस शिक्षा से वंचित हैं। सभी चिन्ताग्रस्त हैं। इस मानसिक कारखाने में अनिश्चित और नाना प्रकार के विचार आते हैं और चले जाते हैं। उन विचारों में तो कोई सिलसिला है और एकरूपता ही। तो उनमें कोई ताल है और उनका कोई कारण ही। उनमें किसी प्रकार का मेल या संगठन। तरीका और शिष्टाचार। सभी विचार व्यर्थ, गोलमाल और भ्रान्ति में हैं। विचारों में स्वच्छता नहीं है। तुम किसी एक विषय को नियमित और सिलसिलेवार दो मिनट के लिए भी नहीं सोच सकते हो। तुम्हें विचारों और मानसिक समक्षेत्र के नियमों का ज्ञान नहीं है। तुम्हारे अन्दर पाशविकता का संग्रह है। विषयी मन में घुसने के लिए भी सभी प्रकार के इन्द्रियजन्य सुख आपस में लड़ रहे हैं और एक विचार दूसरे विचार पर विजय पाने की चेष्टा में सतत सचेष्ट है। इन्द्रियाँ अपने-अपने विचारों को मन के अन्दर घुसाना चाहती हैं। कान रेडियो का आनन्द लेना चाहते हैं। मन में क्षुद्र, विषयी घृणापूर्ण, द्वेषमय और वीभत्स विचारों का साम्राज्य है। वे दिव्य विचारों को अन्दर प्रवेश करने का अवसर नहीं देते। मन का ढाँचा भी इस प्रकार का है कि मानसिक शक्ति विषय-वासना की ही ओर दौड़ती है।

 

प्रत्येक व्यक्ति का सोचने, समझने और काम करने का अपना तरीका होता है। जिस तरह एक व्यक्ति की आकृति दूसरे से भिन्न हुआ करती है, उसी तरह विचारों और समझ में भी अन्तर होता है। यही कारण है कि प्रायः मित्रों में अनबन हो जाया करती है। एक मित्र दूसरे के मतलबों को ठीक से नहीं समझ पाता। अतः घनिष्ठ मित्रों में भी झगड़ा हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे के विचारों के स्फुरण के साथ मेल रखे, तभी एक-दूसरे को आसानी से समझ सकता है। कामुक विचार, घृणा की भावना, द्वेष और स्वार्थ के विचार-मन में विकारों का रूप धारण कर लेते हैं, जिनके कारण बुद्धि और समझ में विकार जाता है, स्मरण शक्ति का हास होने लगता है और मन में भ्रम उत्पन्न होता है।

 

प्रत्येक विचार का विशेष रूप-रंग हुआ करता है, विशेष आकार-प्रकार हुआ करता है और लम्बाई तथा चौड़ाई भी। विचार एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक जाते और पहुँचते हैं।

 

विचारों से मनुष्य प्रभावित होता है। शक्तिपूर्ण विचार वाला व्यक्ति निर्बल विचार वाले व्यक्ति को जल्दी प्रभावित कर सकता है। मानसिक संक्रमण द्वारा योगी लोग संसार के किसी भी हिस्से के लोगों के पास अपने विचार पहुँचा सकते हैं। मानसिक संक्रमण प्राचीन योगियों की विद्युत्-वेग से शब्द या विचार भेजने की क्रिया है।

 

व्यक्ति के मानसिक कारखाने से घृणा या क्रोध का विचार लोगों की ओर बाण-सन्धान करता है, व्यक्ति को हानि पहुँचाता है, विचार-जगत् में विरोध तथा फूट फैलाता है और फिर भेजने वाले के पास ही लौटता है तथा उसको भी चोट पहुँचाता है। यदि मनुष्य विचार की शक्ति और उसके प्रभाव को समझ ले, तो वह अपने विचारों के निर्माण में बहुत ही सावधान हो जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह मानसिक शिष्टाचार, खान-पान में एकता, सत्य-भाषण, सत्संगति, धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन, जप, ध्यान, प्राणायाम और प्रार्थना का अभ्यास कर सात्त्विक विचारों को उत्पन्न करने की शक्ति का विकास करे।

 

अच्छा मनुष्य यदि अपने मित्र से दूर भी रहता है, तो वह अपने मित्र को अच्छे विचारों द्वारा सहायता पहुँचा सकता है। सच तो यह है कि अपने अन्दर किसी भी दुर्विचार को आश्रय नहीं देना चाहिए। सदा अपने विचारों का निरीक्षण कर, व्यर्थ और निम्न विचारों को दूर हटाया जाये और मानसिक शक्ति की सुरक्षा की जाये। व्यर्थ की चिन्ता से शक्ति ही नष्ट होती है।

 

अपने को सदा धार्मिक कार्यों और धार्मिक पुस्तकों के स्वाध्याय में संलग्न रखो। वहीं से तुम अच्छे और पवित्र विचारों की शिक्षा पा सकते हो। जिन विचारों में सार और ध्येय नहीं, उनकी उपेक्षा ही की जानी चाहिए। एक विषय पर विचार करो, उसके भिन्न-भिन्न रूपों का चिन्तन करना आरम्भ करो। जब तुम किसी विषय पर विचार करते हो, तो उस समय किसी दूसरे विचार या विचारों को अपने सचेतन मन में आने दो। बार-बार मन को अपने लक्ष्य की ओर प्रेरित करो। मान लो, तुम जगद्गुरु शंकराचार्य के जीवन-चरित्र और उनकी शिक्षाओं के विषय में सोचते हो, तो उनकी जन्म-भूमि, उनके प्रारम्भिक जीवन, चरित्र, व्यक्तित्व और गुण, उनकी शिक्षा और विद्वत्ता, उनका दर्शन, उनके कुछ श्लोकों के प्रवचन, उनकी सिद्धियाँ और दिग्विजय, उनके चार शिष्य, चार मठ और प्रस्थानत्रय पर भाष्य तथा उनसे सम्बन्चित प्रत्येक विषय ले कर सोचते रहो। एक-एक कर उनके इन गुणों का पूर्णतया विचार कर लो। इस अभ्यास से सामूहिक और संगठित तथा नियमबद्ध चिन्तन का विकास होगा। मानसिक शक्ति को अधिक बल और तेज की प्राप्ति होगी; उसका रूप सुन्दर और परिमार्जित हो जायेगा। साधारण व्यक्तियों में यह मानसिक शक्ति अपरिमार्जित और निस्तेज रहती है। प्रत्येक विचार का एक-एक मूर्त रूप होता है। उदाहरण के लिए लीजिए, मेज क्या है? एक मानसिक शक्ति (मूर्ति) और कुछ स्थूल पदार्थों का मिश्रण। जो कुछ बाहर देखा जाता है, उसकी प्रतिमूर्ति मन में स्थित हो जाती है। आँखों के अन्दर की पुतली एक छोटी-सी वस्तु है; किन्तु उसके अन्दर बड़े-से-बड़ा स्वरूप समा जाता है। यह आश्चर्यों का आश्चर्य है। पर्वत की मूर्ति पहले से ही मन में रहती है। मन प्रभावित होने वाली फिल्म के समान है, जिसमें बाहर के सभी दृश्यों का अंकन हो जाता है, जिस प्रकार फोटो खींचने पर फिल्म में।

 

तुम्हें अवश्य ही मानसिक संयोग, सम्बन्ध और क्रमिक नियमों का ज्ञान रखना चाहिए। तब तुम बहुत शीघ्रता से विचारोन्नति कर सकते हो। प्रत्येक वस्तु के साथ तुम्हारा साहचर्य-सम्बन्ध होना चाहिए।

 

विचारोन्नति के लिए ब्रह्मचर्य और सात्त्विक आहार परमावश्यक है। प्रातःकाल बजे उठ जाओ। वीरासन या पद्मासन या सिद्धासन में बैठो। दश मिनट तक अपना मन्त्र जपो और तब विचारोन्नति का अभ्यास करो। रात को भी एक बैठक का अभ्यास करो।

 

जब तुम किसी एक विषय के सम्बन्ध में सोच रहे हो, तो दूसरे विचार या विचारों को मन में घुसने दो। जब तुम गुलाब के फूल के सम्बन्ध में सोचते हो, तो केवल गुलाब के फूलों के विषय में ही सोचते जाओ। किसी इतर विचार को मन में आने ही दो। जब तुम दया के विषय में सोचते हो, तो केवल दया के सम्बन्ध में ही सोचो। तत्काल क्षमा और सहनशीलता के विषय में सोचो। जब तुम गीता का अध्ययन करते हो, तो चाय या क्रिकेट मैच के विषय में मत सोचो। तात्पर्य यह है कि एक ही विचार में पूर्णतया दत्तचित्त रहो।

 

नेपोलियन ने अपने विचारों को इसी प्रकार अपने वश में किया। जब मैं बहुत सुख देने वाली चीजों के विषय में सोचता हूँ, तो दुःखद विचारों के लिए अपने मन के अनुभवों की दरार बन्द कर देता हूँ और सुखदायी विचारों वाले अनुभवों के द्वार खोलता हूँ। यदि मैं सोना चाहता हूँ, तो मन के सभी अनुभवों या विचारों को बन्द कर देता हूँ।

 

विचार में गति है और तेज भी। विचार में महान् शक्ति है। विचार में संचरण-शक्ति भी है। विचार नाना प्रकार के होते हैं। विचारों को अपने स्वभाव से प्रेरणा मिलती है। दृष्टि-सम्बन्धी विचार होते हैं। कर्ण-सम्बन्धी विचार भी होते हैं। लाक्षणिक विचार भी होते हैं। कुछ विचार स्वाभाविक होते हैं। गति या रूप में भी विचार होते हैं जैसे किसी खेल को खेलते समय हम सोचते हैं तथा हममें उत्तेजक विचार भी होते हैं। मानसिक थकावट में दृष्टि-सम्बन्धी विचार कर्ण-सम्बन्धी विचारों में और कर्ण-सम्बन्धी विचार गति-सम्बन्धी विचारों में परिवर्तित होते हैं। मन और प्राण में घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसलिए सोचने और साँस लेने की क्रिया में आत्मीयता है। जब मन एकाग्र हो जाता है, श्वास भी शनैः शनैः चलने लगता है। यदि कोई उत्तेजित हो कर सोचता है, तो श्वास और उच्छ्वास की क्रिया भी तेज हो जाती है।

अधीन-सचेतन-मन

 

अधीन-सचेतन-मन को ही वेदान्त में चित्त के नाम से पुकारा गया है। अधीन-सचेतन-मन का अधिकांश भाग पुनः प्राप्तिभूत अनुभवों और स्मृतियों से भरा है, जो पृष्ठभूमि में दबा दिये गये थे।

 

स्मृति लुप्त होने के चिह्न प्रकट होते-होते उम्र बढ़ने का बोध होता है। सबसे पहला चिह्न यह है कि तुम मनुष्यों के नामों का स्मरण करने में कठिनाई अनुभव करते हो। ऐसा क्यों होता है? सभी नाम मनमाने हैं, काल्पनिक या कल्पनाजनित हैं। नामों में साहचर्य नहीं है। मन प्रायः साहचर्य द्वारा ही स्मरण रखता है, क्योंकि उसी हालत में गहरा संस्कार पड़ता है। तुम स्कूलों में पढ़े हुए कुछ परिच्छेदों को वृद्धावस्था में भली प्रकार याद रख सकते हो; लेकिन जिस प्रकरण को आज सुबह तुमने पढ़ा था, सायंकाल के समय उसका स्मरण करना तुम्हारे लिए कठिन है। इसका कारण यह है कि मन धारणा-शक्ति को खो चुका है। मस्तिष्क-शक्ति का हास हो गया है। जो लोग अधिक मानसिक श्रम करते हैं, ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन नहीं करते, चिन्ताओं और दुःखों में उलझे रहते हैं, वे स्मरण शक्ति से हाथ धो बैठते हैं। चूँकि घटनाओं के साथ तुम्हारा साहचर्य रहा है, इसलिए वृद्धावस्था में भी तुम उनको याद कर सकते हो।

 

मानसिक प्रयोग केवल चेतना के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है। अधीन-सचेतन-मन का विस्तार सचेतन-मन से अधिक है। वेदान्तियों के चित के कूट-द्वारा से संवाद जब तैयार हो जाता है, बिजली की भाँति अधीन-सचेतन-मन से बाहर निकल कर सचेतन-मन की सतह पर जाता है। हम लोग मन के कार्यों के दश प्रतिशत भाग से ही परिचित रहते हैं; कम-से-कम हमारा ९० प्रतिशत मानसिक जीवन चित्त-जगत् में ही रहता है। हम लोग किसी समस्या का समाधान करने की चेष्टा करते हैं, पर असफल रहते हैं। हम लोग चारों ओर देखते हैं, प्रयत्न करते हैं; किन्तु फिर भी विफल ही रहते हैं। सहसा एक विचार मन में आता है, जिससे समस्या का समाधान हो जाता है। यह समाधान अधीन-सचेतन-मन के माध्यम से हुआ।

 

कभी-कभी तुम यह विचारते हुए सो जाते हो कि 'मैं प्रातःकाल उठ कर अवश्य ही गाड़ी पकडूंगा।' यह निश्चयात्मक संवाद अधीन सचेतन-मन द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है और यह अधीन सचेतन-मन ही तुमको निश्चित रूप से ठीक समय पर उठा देता है। अधीन-सचेतन-मन तुम्हारा निरन्त मित्र और सच्चा साथी है। तुम बार-बार गणित या रेखागणित की किसी समस्या को सुलझाने में रात को असफल रहते हो। प्रातःकाल उठने पर जब तुम प्रयत्न करने बैठते हो, तो तुरन्त उचित उत्तर पा जाते हो। यह उत्तर अधीन सचेतन-मन से विद्युत् की तरह बाहर आता है।

अधीन-सचेतन-मन निद्रा काल में विश्राम नहीं लेता, सतत कार्य करता रहता है। यह व्यवस्था करता है, वर्गीकरण करता है, तुलना करता है, सत्य बातों को चुनता है और सन्तोषजनक सुझाव देता है। अधीन-सचेतन-मन की सहायता से तुम अपने पापी स्वभाव को (अच्छे गुण सीख कर) बदल सकते हो। यदि तुम भय पर विजय पाना चाहते हो, तो मन में सोचो कि भय कोई वस्तु नहीं है, और 'प्रतिपक्ष-भावना' द्वारा मन में साहस का आदर्श जगाओ। जब साहस का विकास हो गया, तो भय अपने-आप ही चला जायेगा। 'प्रतिपक्ष-भावना' अनिश्चित भावना पर सदा विजय प्राप्त किया करती है। इच्छा और रुचि के अभ्यास से तुमको अरुचिकर चीजों और कार्यों में रुचि प्राप्त हो सकती है। तुम पुराने नियमों को बदल कर नयी आदतों, नये विचारों और नवीन स्वादों और अधीन सचेतन-मन के नूतन चरित्र में स्थित हो सकते हो।

 

स्मृति या स्मरण, धारणा और अनुसन्धान चित्त के कार्य हैं। जब तुम किसी मन्त्र को दोहराते हो, तो चित्त का काम उसका 'स्मरण' करना है। चित्त बहुत से कार्यों का सम्पादन करता है। मन या बुद्धि की अपेक्षा यह अच्छे और महत्तर कार्यों को करने की क्षमता रखता है।

 

कार्य, भोग और अनुभव सूक्ष्म संस्कार के रूप में अधीन-सचेतन-मन पर अपना प्रभाव अंकित कर देते हैं। संस्कार ही जीवन तथा सुख-दुःख के कारण हैं। संस्कार के पुनरुत्थान से स्मृति का जागरण होता है। योगी जब अन्दर-ही-अन्दर (आत्मा में) गोता लगाता है, तो इन संस्कारों के सम्पर्क में आता है और अपनी आन्तरिक दृष्टि द्वारा उन्हें प्रत्यक्ष देखता है। इन संस्कारों पर संयम (धारणा, ध्यान और समाधि) द्वारा वह (योगी) अपने पूर्व-जन्मों की जानकारी प्राप्त कर लेता है। दूसरों के संस्कारों पर अपना संयम स्थापित कर वह उनके पूर्व-जन्मों का ज्ञान भी सम्प्राप्त कर लेता है।

 

जब तुम किसी बात को याद रखने की इच्छा करते हो, तो तुम्हें उद्योग करना होगा; अपने अधीन-सचेतन-मन की भिन्न-भिन्न गहराइयों में नीचे-ऊपर जाना होगा और अप्रासंगिक बातों के अजीब और आश्चर्यजनक सम्मिश्रण में से सत्य को चुनना होगा-जिस तरह डाक छाँटने वाला अत्यन्त दक्षता के साथ रेल के डिब्बे में ही डाक छाँटने लगता है। अधीन सचेतन-मन नाना प्रकार की खोजों के बाद सत्य वस्तु को (यथाक्रम) सचेतन-मन में ला देता है। वह विविध विषयों में से अपने अनुकूल उचित विषय चुन सकता है।

 

जिस समय व्यक्ति किसी प्रकार का अनुभव करता है, उसी क्षण एक संस्कार उसके चित्त में पड़ जाता है। तात्कालिक अनुभव और अधीन सचेतन-मन में एक संस्कार पड़ने की कोई रोक-टोक नहीं है। स्मृति भी इसी का कार्य है। वेदान्तिक क्रम से यह एक अलग शक्ति या श्रेणी है। कभी-कभी यह मन के अन्तर्गत मानी जाती है। सांख्य-दर्शन में यह बुद्धि या महत्-तत्त्व में ही सन्निहित है। पतंजलि ऋषि के योग-दर्शन का चित्त और वेदान्तियों का अन्तःकरण एक ही है।

स्मृति का विकास

 

जो चित्त या अधीन-सचेतन-मन और स्मृति में निवास करता है, जो इस स्मृति के भीतर है, जिसको चित्त और स्मृति नहीं जानते, स्मृति और अधीन-सचेतन-मन जिसका शरीर है, जो स्मृति और चित्त पर अन्दर से शासन करता है, वह सबका आन्तरिक शासक है, अमर आत्मा, अन्तर्यामी और अमृतम् है। उसको मेरा मूक प्रणाम!

 

स्मृति का विकास अत्यन्त आवश्यक कार्य है। स्मृति उन्नत होने से ब्रह्म-साक्षात्कार में सहायता मिलती है। स्मृतिहीन व्यक्ति अपने प्रयास में सदा असफल रहता है। यदि कर्मचारी स्मृतिहीन हो तो अध्यक्ष अप्रसन्न हो जाता है। भुलक्कड़ व्यक्ति अनेकों भूलें करता है। जिसकी स्मरण शक्ति तीव्र है, जो चीजों को बहुत दिनों तक याद रख सकता है, वह अपने कार्यों में आशातीत सफलता प्राप्त करता है। जिसकी स्मरण-शक्ति तीव्र है, उसका व्यवसाय सफलतापूर्वक चलता है और वह प्रत्येक कार्य विधिपूर्वक करता है। स्मृति-सम्पन्न विद्यार्थी सभी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होता है, स्मृति का नवमांश बुद्धि है।

 

याददाश्त, यादगार और स्मृति पर्यायवाची शब्द हैं। स्मरण का अर्थ है याद करना। यह अधीन-सचेतन-मन या चित्त का कार्य है। सोचने और करने के संस्कार चित्त में गहरे पड़ जाते हैं। चित्त बिम्बग्राही शीशे के समान है। इसमें सभी संस्कार अमिट-सा रूप धारण कर जमा हो जाते हैं। जब कभी तुम पिछली घटनाओं को याद करने का उद्योग करते हो, तब वे (संस्कार) कूट-द्वार से सचेतन-मन की सतह पर लौटते हैं। जिस तरह नाटक का पात्र नेपथ्य से रंगमंच पर खड़ा होता है, उसी तरह संस्कार कूट-द्वार से विशाल लहरों या मानसिक चित्रों के रूप में बाहर निकलते हैं। यदि तुममें दूरदर्शिनी शक्ति (दिव्य दृष्टि) है, तो तुम भूमि के भीतर की गतियों के चित्रों को इनमें देख सकते हो।

 

स्मृति को दो रूपों में व्यवहृत किया जाता है। हम लोग कहते हैं कि मोहन की स्मृति (स्मरण-शक्ति) अच्छी है। यहाँ इसका अर्थ होता है कि मोहन में पुरानी घटनाओं को (एकत्र कर) प्रकाशित करने की बड़ी सामर्थ्य है। तुम कभी कहते हो- 'मुझे उस घटना की याद ही नहीं।' यहाँ इसका अर्थ होता है कि तुम सचेतन-मन की सतह पर उन सब घटनाओं को प्रारम्भिक रूप में नहीं ला सकते हो जो कुछ समय पूर्व घटी थीं। यह स्मरण शक्ति का एक कार्य है।

 

यदि अनुभव नवीन है, तो तुम उसे संकल्प द्वारा याद कर सकते हो। स्मृति से तुम्हें कोई नया ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है; यह केवल दोहराने की क्रिया करती है। जब दोहराने की क्रिया में सम्मिश्रण होता है, तो स्मृति ज्ञान का कारण बनती है, पर स्वयं ज्ञान नहीं बन सकती।

 

मान लो, तुम किसी मित्र से उपहार के रूप में एक सुन्दर पंखा पाते हो। जब तुम उस पंखे को व्यवहार में लाते हो, तो वह तुमको कभी-कभी उस मित्र की याद दिला देता है। तुम उसके सम्बन्ध में कुछ देर के लिए सोचते हो। अतः पंखा स्मृति-हेतु, स्मृति-बोधक या स्मृति का कारण हुआ।

 

अच्छी स्मृति के निम्नांकित चार लक्षण अच्छे माने गये हैं:

 

()        यदि तुम किसी प्रकरण को एक बार पढ़ते हो और पुनः उसकी प्रत्यावृत्ति कर सकते हो, तो तुम्हारी

स्मृति अच्छी है। यह 'सुगमता लक्षण' है।

 

()        अगर तुम उसी को बिना कुछ जोड़े या घटाये, फिर से दोहरा सकते हो, तो यह 'अवैकल्य लक्षण'

कहलाता है।

 

()        अगर तुम किसी बात या प्रकरण को दीर्घ काल तक याद रख सकते हो, तो यह 'धारणा लक्षण' है।

 

()        अगर तुम किसी प्रकरण को शीघ्र ही बिना किसी कठिनाई के पुनः दोहरा सकते हो, तो यह 'उपाहरण

लक्षण' है।

 

यदि तुम्हारा भाई डरपोक है, तो उसी प्रकार के मनुष्य को किसी अन्य स्थान में देखने से तुम्हें अपने भाई की याद जायेगी। पदार्थों की एकता के कारण यह सादृश्यता कहलाती है।

 

मान लो, तुम किसी बौने आदमी को मद्रास में देख रहे हो। जब तुम किसी लम्बे आदमी को देखोगे, तुरन्त तुम्हें उस बौने की याद भी जायेगी, जिसे मद्रास में देखा था। किसी बड़े स्थान का दृश्य तुम्हें किसी किसान की कुटिया या संन्यासी के गंगातीरस्थ उद्यान का स्मरण दिलायेगा। यह स्मृति-भावना पदार्थों की विपरीतता के कारण होती है।

 

किसी आँधी वाले दिन जब तुम सड़क पर टहलते समय किसी गिरे हुए वृक्ष को देखते हो, तो यह अनुमान लगा लेते हो कि यह वृक्ष आँधी के कारण गिरा होगा। इस अवस्था में स्मृति का सम्बन्ध कारण और परिणाम से है। इसको 'कार्य-कारण-सम्बन्ध' कहते हैं।

 

स्मृति का विकास करने के लिए अधीन-सचेतन-मन के कार्यों का ज्ञान होना आवश्यक है। अधीन-सचेतन-मन में ही चरित्रों का कार्य-प्रदिपादन हुआ करता है। सचेतन-मन कुछ आराम भी करता है; पर अधीन सचेतन-मन सर्वदा काम करता है। जब तुम लगातार कई घण्टों तक अपने मन को ठोकने के बाद भी किसी समस्या के समाधान में असफल रहते हो, तो अधीन सचेतन-मन ही दूसरे दिन प्रातःकाल विद्युत् के समान उत्तर ला देता है। रात को जब तुम यह निश्चय कर सोते हो कि तुम्हें बजे रात की गाड़ी पकड़नी है, तो अधीन-सचेतन-मन तुम्हें ठीक उसी घड़ी उठा देता है। यदि तुम इसको भली-भाँति हिला-मिला चुके हो, तो यह सचकी अपेक्षा अधिक आज्ञाकारी सेवक है। इसके द्वारा तुम अनेकों कार्य कर सकते हो। संसार में विलक्षण-गुण-सम्पन्न सभी महापुरुष और बुद्धिमान् व्यक्तियों ने मन के इस अंग पर अपना पूर्ण शासन स्थापित किया और वे इससे काम लेना जानते थे। चित्त का कार्य है छान-बीन करना, चुनना, वार्तालाप का प्रसंग तैयार करना तथा मन के अन्दर से पुरानी स्मृतियों को बाहर निकाल लाना।

 

जब तुम किसी दुविधा में पड़ जाते हो, आकुल हो जाते हो, जब तुम्हें भ्रान्ति हो जाती है और जब तुम्हारे अन्दर ज्ञान की स्वच्छता का अभाव हो जाता है कि किस प्रकार अमुक कठिन समस्या को हल किया जाये, तो स्वभावतः तुम अपनी कठिनाइयों को इस (चित्त) के समक्ष उपस्थित कर दो और इसको निश्चित आदेश दे दो। प्रातःकाल उठते ही तुम्हारी समस्या का निश्चित हल प्राप्त हो जायेगा। इसका प्रयोग करो; दो-चार बार अभ्यास करने पर तुम्हें आशातीत सफलता प्राप्त होगी। तुम्हें अनुभव हो जायेगा कि अधीन सचेतन-मन सच्चा मित्र बन गया है।

 

जिस व्यक्ति की धारणा शक्ति दीर्घायु और स्वस्थ है, वह भारी-से-भारी काम भी पलक मारते ही कर देता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी कार्य को कुछ ही समय में सीख सकता है और किसी भी कला को अल्प काल में ही ग्रहण कर सकता है। डाक्टर जान्सन की विशेषता थी कि वे अनेकों प्रकरणों को कुछ देर में लगातार दोहरा दिया करते थे। उनकी धारणा शक्ति पर उनकी माँ आश्चर्यचकित हो जाया करती थीं, जब कि जान्सन चन्द मिनटों में पाठ याद कर लिया करते थे। अतः धारणा-शक्ति की उन्नति करनी चाहिए। इससे अनेकों व्यापार सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाया करते हैं।

 

बाबू भगवानदास-लिखित 'प्रणवनाद' की भूमिका में लिखा है कि उन्होंने एक पण्डित (जो जन्मान्ध था) से सभी गीतों को सुन कर एक विशाल ग्रन्थ लिखा। वह व्यक्ति जन्मान्ध था; पर उसे अनेकों पुस्तकों के पन्ने अच्छी तरह कण्ठस्थ थे। ऐसे अनेकों आश्चर्य हैं जिनको सुन कर हमें दाँतों तले अँगुली दबा लेनी पड़ती है।

 

प्राचीन काल में संस्कृत के विद्वान् वेदों को मुखाग्र कर लेते थे। शिक्षा की उस (गुरुकुलीय) प्रणाली में एक विशिष्ट सौन्दर्य था; वह (सौन्दर्य) था-स्मृति-शक्ति को अप्रत्याशित सीमा तक विकसित करने की क्षमता। अभी भी ऐसे पण्डित विद्यमान हैं, जिनके लिए वेद-वेदान्त और सभी शास्त्र हस्तामलकवत् हैं। गुरुकुलीय प्रणाली के आधार पर शिक्षा देने से विद्यार्थी की स्मृति-प्रतिभा को पूर्ण बल मिलता है। इस दृष्टिकोण से आज के विश्वविद्यालयीय छात्र प्राचीन विद्यार्थी-समुदाय की बराबरी नहीं कर सकते।

 

स्मृति-प्रतिभा के विकास के लिए ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है। खान-पान में सुचर्या का पालन और इन्द्रियों का संयम धारणा-शक्ति के विकास में अति-आवश्यक समझा जाना चाहिए। वीर्य, बुद्धि तथा चित्त का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। अतः जो लोग धारणा शक्ति का विकास करना चाहते हैं, वे अवश्यमेव वीर्य धारण का अभ्यास करें। वीर्य के रूप में जीवन-शक्ति का पतन हो जाने से स्मृति का लोप होने लगता है। आजकल के नवयुवक ब्रह्मचर्य के महत्त्व को नहीं समझते हैं। वे अविद्या के अन्धकार में भटकते रहते हैं। उनके दिमाग नग्न चित्रों तथा अश्लील प्रसंगों से भरे रहते हैं। उनका समय उपन्यास पढ़ने में ही व्यतीत हो जाता है। अनेकों मार्गों से उनकी विषय-वासना उभरती रहती है। कुसंग के कारण उनमें सज्ञान का अभाव होता है। मिथ्याभिमान, हठ और स्वेच्छाचार उनके स्वभाव के लिए कोई नवीन वस्तु नहीं हैं। सन्तों-महात्माओं की संगति में जाना तो दूर रहा, वे कभी सत्संगति की इच्छा नहीं रखते। जब तक वे सन्तों की संगति नहीं करेंगे, तब तक उनके मन में आत्म-विकास की भावना किस प्रकार जागृत हो सकेगी?

 

ऐसे लोगों के जीवन में किसी प्रकार के नियम नहीं हुआ करते- खाने का नियम, पीने का नियम और किसी प्रकार के अन्य व्यावहारिक नियम! 'भोजन का शरीर और मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है'- यह सत्य उनकी समझ में आता ही नहीं। यही कारण है जिससे वे लोग जीवन में असफलता पाते हैं, निराश तथा दुःखी हो कर अन्धकारमय जीवन व्यतीत करते हैं।

 

जो लोग ब्रह्मचर्य की साधना कर रहे हैं, जिनका इन्द्रियों पर संयम है, जो साधु तथा सन्तों की संगति में रह रहे हैं, वे सदा सुरक्षित रह सकते हैं। वे ही जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों से भूल-चूक में कुछ गलती भी हो जाये, तो सत्संग द्वारा उसका परिष्कार हो जाता है।

 

'साहचर्य-विधान' और स्मृति का घनिष्ठ सम्बन्ध है। हाथ की घड़ी से तुम्हें अपने मित्र का स्मरण हो आता है, जिसने वह घड़ी तुम्हें उपहार में दी थी। घड़ी के सम्पर्क से तुम्हें मित्र की याद आयी।

 

'चार' शब्दान्त एक शब्द से-समाचार, सदाचार, आचार, उपचार, अनाचार, दुराचार तथा अन्य चारान्त शब्दों का स्मरण हो आता है।

 

'वान्' शब्दान्त शब्दों में स्वतः भगवान्, पहलवान, गाडीवान, पकवान तथा अन्य 'वान्' शब्दों का स्मरण हो आता है।

 

एक वस्तु का जब किसी दूसरी विजातीय वस्तु से सम्बन्ध स्थिर होता है, वह साहचर्य-सम्बन्ध है। एक वस्तु या घटना या स्मृति को उसी प्रकार के स्वभाव वाले अन्य तत्त्व से मिला दो, स्मृति अनेकों यथानिश्चित सम्बन्धों के रूप में प्रकट होगी।

स्मृति की उन्नति के लिए अभ्यास

 

स्मृति के विकास के लिए यहाँ कुछ सरल तरीके दिये जा रहे हैं।

वीरासन या पद्मासन या सिद्धासन या स्वस्तिकासन या सुखासन में बैठो। नेत्रों को मूँद लो। कल्पना करो कि एक सुन्दर विशाल उपवन है। उस उपवन में एक कोने में चमेली का फूल है, दूसरे कोने में गुलाब, तीसरे में चम्पा और चौथे में कुमुदिनी।

 

पहले चमेली के विषय में विचार करो, तब अपने मन को गुलाब के फूल पर, तब चम्पा और अन्त में कुमुदिनी की ओर आमुख करो। पुनः मन को चमेली की ओर ले जाओ। इसी तरह मन को दो या तीन मिनटों तक घुमाते रहो।

 

रात को आकाश की ओर एकटक देख कर, एक छोटे से क्षेत्र में तारों की गणना कर लो। पिछले बुधवार को प्रातःकाल में क्या खाया और सायंकाल में क्या खाया- स्मरण करने का प्रयत्न करो। कल तुम किन-किन व्यक्तियों से मिले-क्रमवार सोचो।

 

गीता का एक मुख्य श्लोक पढ़ लो। उसी के समान (समानान्तर) उद्धरणों को रामायण, भागवत, उपनिषद्, योगवासिष्ठ और बाइबिल में खोजो। उन उद्धरणों को मिला दो और उन्हें अपने दिमाग के अन्तःपुर में सन्निहित रखने का प्रयत्न करो।

 

'बैं-नी--पी-ला-गु' अक्षरों का स्मरण करो। नाना प्रकार के रंगों को याद करने का प्रयत्न करो-जैसे बैंगनी, नीला, हरा, पीला, लाल और गुलाबी। अपनी स्मृति में किसी विषय-विशेष को समस्थिर रखने के लिए, इसी प्रकार के नवीन शब्दों की गुप्त भाषा या संहिता शब्द बना लो। प्रत्येक का अपना संहिता-शब्द अलग-अलग हो सकता है।

 

आलंकारिक शब्दों सहित वाक्य-रचना करो। यह स्मरण शक्ति के विकास का सुन्दर साधन है। '' से या '' से या '' से आरम्भ होने वाले शब्दों से बने वाक्यों या श्लोकों को पूछ-खोज कर कण्ठस्थ करो। जैसे माघ कवि के निम्नांकित चरण। ऐसे ही अनेकों एकाक्षर पद याद कर लो।

 

जजौजोजाजिजिज्जाजी तं ततोऽतिततातितुत्

भाभोऽभीभाभिभूभाभूरारारिररिरीररः ।। सर्ग १९-३।।

 

भूरिभिर्भारिभिर्रैर्भूभारैरभिरेभिरे

भेरीरेभिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभाः ।।१९-६६।।

 

दाददो दुद्ददुद्दादी दादादो दुददीददोः

दुद्दादं दददे दुहे ददाददददोऽददः ।।१९-११४ ।।

 

जप, ध्यान, कीर्तन, प्रार्थना, शीर्षासन और प्राणायाम के अभ्यास से भी स्मृति का विकास किया जा सकता है। इनके अभ्यास से बौद्धिक सामर्थ्य की उन्नति की जा सकती है। शीर्षासन से ब्रह्मचर्य में अतीव सहायता मिला करती है। जप और ध्यान करने से अपने अन्दर सात्त्विकता प्रकट की जा सकती है और प्राणायाम की सहायता से अनेक शारीरिक विकलताओं का निवारण किया जा सकता है।

स्मृति की उन्नति के लिए इन सिद्धान्त विषयों का उच्चारण भी लाभप्रद है :

 

()        मेरी स्मृति शक्तिशालिनी है,                                 ॐ।

 

()        मैं प्रत्येक प्रसंग को पूर्णतः स्मरण रख सकता हूँ,      ॐ।

 

()        मेरी स्मरण-शक्ति में आशातीत विकास हुआ है,       ॐ।

 

()        मेरी स्मृति स्थिर और दीर्घायु है,                            ॐ।

 

इन सूत्रों को प्रतिदिन दोहराओ। प्रातःकाल और रात को अनेकों बार इन सिद्धान्तों का उच्चारण करो। तुम्हें प्रतीत होगा कि तुम प्रतिदिन आश्चर्यजनक रूप से उन्नति करते जा रहे हो।

 

एक नोट-बुक रख लो। जो-जो काम तुमको दिन में करने हैं, उनको (नोट-बुक) में प्रातःकाल के समय अंकित कर लो। रात्रि को निरीक्षण करो कि तुम उन सब कामों को कर चुके हो या नहीं। जो-जो काम सम्पन्न हो चुके हैं, उनमें सही के निशान लगाते जाओ।

 

ताश की एक गड्डी ले लो। उनमें से ताशों को बाहर निकाल कर, सावधानी से प्रत्येक ताश को बारीबार देख लो। अब उनको बन्द कर दो। एक कागज पर (अपनी याद से) उन ताशों के क्रम लिखो। इस प्रकार का अभ्यास करते-करते ताशों की संख्या १२ तक बढ़ायी जा सकती है और एक बार उन ताशों के क्रम को देखते ही उनको बिना देखे अंकित कर देने की योग्यता होनी चाहिए।

 

किसी आराम-कुर्सी पर बैठ जाओ। मन में अपने पिता जी के चित्र का ध्यान करो। नेत्रों को मूँद लो। मन-ही-मन उनके सभी शारीरिक लक्षणों और शरीर के अवयवों की विशेषता का सूक्ष्म वर्णन करने का प्रयत्न करो। किसी महापुरुष को एक बार देख चुकने के बाद, उनके विशेष गुणों और आकृति को अपने मन में उतार लेने की चेष्टा करो।

 

पर्यायवाची समानार्थक शब्दों को याद रखने का अभ्यास करो। इस अभ्यास से शब्दकोष में भी वृद्धि होगी और सुन्दर लेख लिखने तथा स्वच्छ भाषण देने में सहायता भी मिलेगी। तुम एक अच्छे सम्पादक हो कर अच्छी पुस्तकों की रचना करने में सफल बन सकोगे। एक शब्द मन में ला कर साहचर्य-विधान के अनुसार तत्सम्बन्धी दूसरे शब्दों से उसका संयोग करो। 'करुणा' शब्द का स्मरण कर उदारता, शिष्टता, सज्जनता, भद्रता तथादि सद्गुणवाची शब्दों को खोज निकालने का यत्न करो। 'काफी' शब्द का विचार आते ही मन में नीलगिरि की पहाड़ियों का विचार आना चाहिए एवं 'स्टेन' की कम्पनी का विचार भी। इसी प्रकार कम्पनी के संस्थापक का स्मरण हो आयेगा।

 

समानता या सादृश्य-सम्पर्क से संसार के अन्य देशों का स्मरण कर सकते हो, जहाँ काफी की खेती की जाती है। तुरन्त काफी के समान अन्य पेयों का स्मरण हो आना चाहिए तथा किस प्रकार यह व्यापार चला, कौन उसका संस्थापक था तथा कहाँ-कहाँ उसकी खेती होती है-यह सब स्मरण हो आना चाहिए।

 

इस प्रकार (कभी-कभी) ऐसे विचारों से साक्षात्कार होगा, जिनको तुम डायरी में नोट किये बिना नहीं रह सकोगे।

 

मुम्बई या कोलकाता के किसी व्यापारिक स्थान में शाम के समय टहलते हुए मन-ही-मन यह नोट कर लो कि कौन-सी दुकान कहाँ पर, किस तरतीब से है और किस दुकान में क्या हो रहा है। उनकी कुछ विशेषताओं को भी मन में अंकित कर लो। घर जाने के बाद एक नोट-बुक में उन दुकानों का यथाक्रम विवरण नोट कर लो। दूसरे दिन पुनः वहीं पर जा कर अपने विवरण को मिलाओ।

 

भिन्न-भिन्न वस्तुओं के निर्माताओं के नाम और उनके द्वारा निर्मित वस्तुओं के तत्कालीन मूल्यों को याद रखने का अभ्यास करो। संसार के प्रसिद्ध दार्शनिकों के नामादि याद रखो। उनकी शिक्षाओं और कार्यों को याद रखने का यत्न करो। शंकर, रामानुज, केण्ट, प्लेटो आदि दार्शनिकों का पूरा जीवन-चरित्र याद रखो और उनके दर्शन की सम और विषम तुलना करो। ऐसा करने से स्मृति में सूक्ष्म गुणों का आविर्भाव होगा। स्थूल वस्तुओं को याद रखना सरल है। अनेक विशेष घटनाओं को भी आसानी से याद किया जा सकता है। अनेक विशिष्ट व्यक्तियों का स्मरण भी किया जा सकता है। एक की याद आते ही साहचर्य-विधान से सम्पर्क जनित अनेक पदार्थों और घटनाओं का स्मरण हो आता है। स्मृति, दर्शन और श्रवण का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। मन उसी विषय पर विचार करता है, जिसको देखा या सुना हो। जिसने दर्शन और श्रवण-शक्ति का विकास कर लिया है, उसकी स्मरण शक्ति का विकास भी सत्वर हो जाया करता है।

 

किसी पुस्तक के एक या दो पृष्ठ पढ़ो। पढ़ने के बाद पुस्तक बन्द कर लो और अपने मन में मुख्य मुख्य बातों को लाने की चेष्टा करो। पुस्तक में दिये गये विषय का वर्णन अपनी भाषा में लिख डालो। उन प्रकरणों की तुलना दूसरी पुस्तक के प्रकरणों से करो। दोनों में अन्तर निकालो। तदनन्तर अपना निष्कर्ष और अनुमान निकालो। इस अभ्यास से स्मरण शक्ति का आश्चर्यजनक विकास होगा और किसी भी प्रकरण को दीर्घ काल तक याद रखा जा सकेगा।

 

जब तुम कोई पुस्तक पढ़ते हो, तो उसके सुन्दर प्रकरणों के एक ओर लाल पेंसिल से रेखा खींच दो। असावधानी से अक्षरों के ऊपर पेंसिल नहीं फेरनी चाहिए। पुस्तक का अध्ययन कर चुकने पर उन रेखांकित उद्धरणों को एक नोट बुक में अंकित कर लो। सप्ताह में एक बार (अवश्य) उनकी पुनरावृत्ति करते रहनी चाहिए। पुस्तकों का अध्ययन करते समय अपने साथ एक शब्दकोष अवश्य रखना चाहिए। (अनुमान लगा कर) किसी शब्द का स्वतन्त्र अर्थ नहीं करना चाहिए। जो शब्द समझ में नहीं आता, उसका अर्थ शब्दकोष में खोज लेना चाहिए। प्रारम्भ में यह अभ्यास श्रमपूर्ण सिद्ध होगा; किन्तु अभ्यास होते-होते तुम्हें इससे अतीव लाभ मिलेगा। बहुत से आलसी विद्यार्थी पन्ने उलटते हुए आगे चले जाते हैं, शब्दकोष देखते हैं और प्रकरणों को कापी में अंकित करते हैं; फल यह होता है कि उनको वह बात याद नहीं रहती। वे पहले दिन के पढ़े हुए प्रकरण को दूसरे दिन ही भूल जाते हैं। जो विद्यार्थी ऊपर लिखे हुए तरीके से अध्ययन करते हैं, वे कभी भी अपना पाठ नहीं भूल सकते सच पूछो तो वे ही विद्वान् बनते हैं। उनका शब्दज्ञान अत्यन्त विशाल होगा और उनकी भाषण-पटुता आश्चर्यजनक होगी। वे अच्छे सम्पादक और साहित्यिक बन सकेंगे।

 

स्मरण-शक्ति को संस्कृत में 'स्मृति-शक्ति' कहा जा सकता है। स्मरण-शक्ति के लिए धारणा शक्ति की आवश्यकता है। बातों को मन में रखने की शक्ति धारणा-शक्ति कही जाती है।

सोने से पहले दश मिनट तक आत्म-चिन्तन करो। कुर्सी पर आराम से बैठ जाओ। अपनी आँखों को बन्द कर डालो। दिन-भर में जो-जो अच्छे या बुरे कार्य किये हों, उनको सोचो। उन सभी गलतियों को सोचो, जिनको जान कर या अनजान में किया हो। पहले-पहल अपने कार्यों में से एक या दो गलतियाँ भी निकाल सको तो कोई बात नहीं, क्योंकि तुम्हें ऐसा करने का अभ्यास नहीं है; लेकिन प्रतिदिन के नियमित और क्रमिक अभ्यास से तुम दैनिक कार्यों में से गलतियों को खोज निकाल सकोगे। मन के अन्दर के कार्यों का निरीक्षण करने से मन सूक्ष्म और तेज होता है। इससे मन अधिकाधिक अन्तर्मुख होता जाता है। यह अभ्यास पलक मारते ही कार्यों का विश्लेषण कर सकता है, उनकी छानबीन कर लाता है, उनको एकत्रित कर सकता है और उनकी स्पष्ट सूची हमारे सामने रखता है। इस अभ्यास से स्मरण शक्ति तीव्र होगी। अपनी दैनन्दिनी में हर रात को या दूसरे दिन सुबह पूरे दिन की गलतियों तथा विशेषताओं को अंकित करो। एक दिन ऐसा भी आयेगा, जब अपने पूरे दिन के कार्यों की सूक्ष्म छानबीन करने पर भी तुम एक गलती तक नहीं खोज सकोगे। जब मैं दैनन्दिनी की बात सोचता हूँ, तो मुझे तुरन्त बेंजामिन फ्रैंकलिन का स्मरण हो आता है। वे डायरी रखने के कायल थे।

 

गीता के अठारह अध्यायों को अनेक बार पढ़ो। विभिन्न शीर्षकों के अनुसार श्लोकों को याद करने की चेष्टा करो। सोचो कि गीता में कौन-कौन से श्लोक विवेक की व्याख्या करते हैं; कौन-कौन से श्लोक वैराग्य, सदाचार, गुणों के विकास, तपस्याओं के तीन भेद, भोजन के तीन भेद तथा अन्य विषयों का विवेचन करते हैं। उन श्लोकों को याद रखो जो प्राणायाम, मन की एकाग्रता, भक्तियोग, ज्ञानयोग, राजयोग आदि का वर्णन करते हैं। साथ-साथ उन श्लोकों को मन में भर कर मन के विभिन्न स्थलों पर उनका वर्गीकरण करना होगा। स्मृति की उन्नति के लिए यह भी एक तरह का अभ्यास है। किसी भी प्रकार के अभ्यास को अपनी रुचि, प्रकृति और योग्यता के अनुसार चुना जा सकता है।

 

फुटबाल या क्रिकेट के मैच में जा कर ध्यानपूर्वक प्रत्येक विशेषता का विचार करो और घर कर उसका यथातथ्य विवरण लिखने का अभ्यास करो। विवरण लिखने के उपरान्त उसे दोहरा लो और सुधार कर लो। सुधार करने के अनन्तर उसकी शुद्ध प्रति तैयार कर लो।

 

अपने पास सदा कागज और पेंसिल रखने चाहिए; यह अच्छी आदत है। जो इस जीवन में महान् बनना चाहते हैं, वे हमेशा (चलते हुए भी) साधारण घटनाओं तक में किसी विशेषता को लक्ष्य कर अपनी डायरी में नोट कर लें। जो लोग संकेत-लिपि जानते हैं, वे उसका उपयोग कर सकते हैं। इससे दो लाभ होंगे; लिपि का अभ्यास भी बना रहेगा और साथ-साथ नोट भी होता जायेगा। जब-जब अवकाश मिले, उन नोटों को सुधार और घटा-बढ़ा कर सुन्दर प्रबन्ध तैयार किया जा सकता है।

 

जब-जब मन में कुछ अच्छे विचार प्रकट हों, अथवा जब-जब विशेष विचार उदय हों, तुरन्त उन्हें नोट-बुक में अंकित कर लिया जाये। यही आदत जीवन के सभी कार्यों और प्रयासों में सफलता की कुंजी है। इस अभ्यास का विकास करो। अनुभव करो और सुखी रहो। केवल सिद्धान्तों को रटने अथवा बक देने से काम नहीं चलेगा। एक व्यावहारिक मनुष्य बन जाना चाहिए। मैं सदा इस बात पर जोर दिया करता हूँ और कहते-कहते कभी थकता नहीं। मैं तुम्हें प्रशंसनीय आदर्शों का एक महान् व्यक्ति सिद्ध कर देना चाहता हूँ और अभी इस क्षण-अज्ञात भविष्य में नहीं-एक महान् व्यक्ति बनाना चाहता हूँ। मेरी बातों पर पूरा ध्यान दो। मैं एक सरल तरीका जानता हूँ, जिसका प्रयोग कर प्रत्येक व्यक्ति सुगमता से उन्नति के शिखर पर जा पहुँचता है। मुझमें सेवा की तीव्र उत्कण्ठा है, पर मैं ठीक प्रकृति के साधकों को नहीं पाता हूँ। यदि तुम ध्यान दे कर मेरे तरीकों को हासिल कर सकोगे, तो निकट भविष्य में ही जन-शिरोमणि बन सकोगे।

 

सभाओं में जाया करो, वहाँ जो-जो भाषण सुनो, उनको अपनी भाषा में अंकित करते जाओ। घर में उनकी शुद्ध प्रतियाँ तैयार कर किसी स्थानीय समाचार-पत्र में प्रकाशित होने के लिए भेज दो। तुम अल्प काल में ही प्रथम श्रेणी के संवाददाता और योग्य सम्पादक बन सकते हो। बदरीनारायण या गंगोत्तरी या गोमुख-जहाँ से गंगा का उद्गम होता है की यात्रा करो और जो कुछ रास्ते में देखो, लिखते जाओ। यह संस्मरण किसी भी पत्र में प्रकाशित करवा सकते हो। नित्य-प्रति समाचार-पत्र पढ़ते हो, तो उसके सम्पादकीय लेख भी अवश्य पढ़ो; उन पर अपने स्वतन्त्र विचार लिखने की चेष्टा करो। उन विचारों को उसी पत्र के सम्पादक के पास भेज दो। इस प्रकार के अभ्यासों से धारणा शक्ति का अपूर्व विकास हो सकेगा

 

स्मृति की उन्नति के लिए एक दूसरा अभ्यास भी है। कुर्सी पर आरामपूर्वक बैठ जाओ। संसार के सबसे समृद्ध धनी व्यक्तियों के नाम याद रखने का प्रयत्न करो-जैसे हैदराबाद के निजाम, राक्फेलर, फोर्ड इत्यादि। संसार की सबसे बड़ी नदियों-आमेजन, नील, ब्रह्मपुत्र का स्मरण करो। भारत की सात पवित्र नदियों के नामगंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु और कावेरी-भी याद किये जा सकते हैं।

 

नियाग्रा और शिवसमुद्रम् के जल प्रपातों को याद रखो। गंजाम जिले में चिलका और हिमालय में मानसरोवर झील है, यह स्मरण करो। कवियों के नामों का स्मरण करो-जैसे कालिदास, वर्ड्सवर्थ, मिल्टन, शेक्सपियर, कीट्स इत्यादि। निबन्ध-लेखकों में जान्सन और इमर्सन; दार्शनिकों में शंकराचार्य, रामानुज, कैण्ट, हीगल, प्लेटो; वैज्ञानिकों में न्यूटन, बोस, रमण और आइन्स्टीन; ज्ञानियों में शंकर, दत्तात्रेय, याज्ञवल्क्य और जड़भरत; योगियों में ज्ञानदेव, भर्तृहरि, त्रिलिंग स्वामी और सदाशिव ब्रह्म; भक्तों में गौरांग महाप्रभु, तुलसीदास, हाफिज़, मीरा आदि; पंच-कन्याओं में कुन्ती, द्रौपदी, मन्दोदरी, अहल्या और अनसूया; सप्तर्षियों में अत्रि, भृगु, वसिष्ठ, गौतम, कश्यप, पुलस्त्य और अंगिरा; सात चिरंजीवियों में अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान्, विभीषण, कृप और परशुराम; बारह ब्रह्मविद्या-गुरुओं में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, वसिष्ठ, शक्ति, पराशर, व्यास, शुकदेव, गौड़पाद, गोविन्दपाद, शंकराचार्य और कृष्ण का स्मरण करो। इस प्रकार के अभ्यास से धारणा-शक्ति को बल मिलेगा।

 

अधीन-सचेतन-मन से काम लेने की कला का पूरा ज्ञान होना चाहिए। यदि शेक्सपियर के किसी नाटक में कोई बात भूल गये हो तो बिछौने पर बैठ कर, रात को सोने से कुछ पहले अपने चित्त को निश्चित आदेश दो। जिस प्रकार तुम किसी मित्र या नौकर से बातचीत करते हो, उसी प्रकार अधीन सचेतन-मन से भी कर सकते हो। तुम उससे इस तरह कह सकते हो- "देखो भाई, में कालेज में पढ़े हुए शेक्सपियर के 'मर्चेन्ट आफ वेनिस' और 'ऐज़ यू लाइक इट' के अमुक प्रकरणों को भूल गया हूँ। उनको अब मेरी स्मृति में जल्दी ले आओ। मुझे कल को प्रातःकाल ही उन प्रकरणों की आवश्यकता है। जल्दी करो।" स्पष्ट शब्दों में आज्ञा दो। दूसरे दिन सुबह के समय तुम्हारे समक्ष स्पष्ट उत्तर जायेगा। यदि ऐसा हुआ, तो दूसरे दिन फिर वही आज्ञा दो। तीसरे दिन अवश्य उत्तर मिल जायेगा। कभी-कभी अधीन सचेतन-मन बड़ा व्यस्त रहता है और दिमाग भर जाता है। काम के अधिक बोझ तथा अन्य तनावों के कारण दिमाग पर दबाव और तनाव रहते हैं। अतः शान्त मन से प्रतीक्षा करनी होगी। एक या दो बार आदेश अवश्य दोहराने होंगे। प्रारम्भ में तो अधीन-सचेतन-मन को पर्याप्त समय अवश्य देना होगा। उसे बहुधा तंग भी नहीं करना होगा। अभ्यस्त रहने से वह प्रारम्भ में तुम्हारे आदेशों को साफ-साफ नहीं समझ सकता है।

 

न्यायाधीश को गवाहियों का सारांश लिखना पड़ता है और न्याय की तैयारी करनी होती है। उसका दिमाग कभी-कभी संशय भ्रमित हो जाता है। वह घबड़ा उठता है। उसका निर्णय किसी निश्चित समाधान पर नहीं पहुँच पाता है। ऐसी अवस्था में अधीन-सचेतन-मन यदि सुशिक्षित रहा हो, तो उसके लिए अत्यन्त सुन्दर रीति से काम कर सकेगा, सभी बातों की व्यवस्था पूर्ण नियम के साथ कर, उसके समक्ष एक स्पष्ट उत्तर ला देगा।

 

जिन बातों में विचार और विवेचन की अधिक आवश्यकता है, उनके लिए तुमको अधीन-सचेतन-मन की सहायता मिलेगी; किन्तु इसके लिए कुछ दिन तक प्रतीक्षा करनी होगी। हर रात अपने मन को आज्ञाएँ देनी होंगी और दूसरे दिन परिणामों को देखना होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि नित्य-प्रति विविध प्रकार की आज्ञाएँ दे-दे कर अधीन-सचेतन-मन को तंग करने लग जाओ। विषय-विशेष ले कर नित्य-प्रति एक या दो आज्ञाएँ दोहराओ। मन के सामने उन सभी बातों को रख देना होगा, जिनका तुम समाधान चाहते हो।

दिलचस्पी से स्मृति का विकास होता है

 

डाक्टरों को चिकित्सा-कोष में उल्लिखित औषधियों और चिकित्सा-सम्बन्धी विषयों का खूब स्मरण रहता है, क्योंकि वे रोगों की चिकित्सा में पर्याप्त दिलचस्पी लेते हैं; किन्तु राजनीति के विषय को याद रखना उनके लिए सम्भव नहीं, क्योंकि इस ओर उनकी रुचि नहीं है। वकील को ही देखिए, वह न्याय के सभी विधानों को याद रखता है; किन्तु उससे पिछले महीने हुई क्रिकेट मैच की बात पूछिए, तो वह कुछ नहीं बतला सकेगा; क्योंकि इस ओर उसकी दिलचस्पी नहीं है।

 

अतः रुचि (दिलचस्पी) का होना जरूरी है, तब स्मृति आप-से-आप अनुसरण करेगी। जिस विषय को याद रखना चाहते हो, उसमें रुचि पैदा करने का प्रयत्न करो; तब स्मृति स्वयं ही उस विषय का प्रकाशन करेगी। दूसरी बात यह है कि सभी विषयों को याद रखने के लिए उन सभी विषयों में रुचि उत्पन्न करनी होगी और लगभग सभी का साधारण ज्ञान भी प्राप्त करना होगा। प्रत्येक के मन में द्भुत प्रतिभाशाली व्यक्ति बनने की महती आकांक्षा होनी चाहिए।

स्वास्थ्य और मन

 

स्वस्थ मनुष्य की स्मरण शक्ति अच्छी होगी। दुबले, पतले और कोमल शरीर वाले मनुष्य की स्मृति खराब होगी। स्वस्थ शरीर स्मृति की उन्नति में अपना सहयोग देता है; इसलिए उचित भोजन और व्यायाम से उत्तम स्वास्थ्य, साहस और वीर्य- शक्ति की प्राप्ति करो।

 

ब्रह्मचर्य, आहार, सत्संग और बहुत-सी बातों का (जो अब तक बतलायी गयी हैं तथा आगे भी बतलायी जाती रहेंगी) अभ्यास कर अक्षय और स्फूर्त स्मृति का लाभ करो।

दर्शन और श्रवण-शक्ति का विकास किस प्रकार ?

 

शरीर की इन्द्रियों का उपयोग उचित रीति से किया जाये, तो वे दुर्बल हो जाया करती हैं। जिस प्रकार हाथ और पैरों का विकास तत्सम्बन्धी व्यायामों से होता है और योग्य आहार मिलने तथा असत् व्यवहार से उनका क्षय होता है, उसी प्रकार इन्द्रिय-जनित दुर्बलता से शरीर के अन्य अवयव कार्य-विरत होने लगते हैं। दृष्टि और

 

स्मृति, श्रवण और स्मृति में घनिष्ठ सम्बन्ध है। जिस व्यक्ति की तीव्र दृष्टि है, सूक्ष्म उपलब्धि है, दृष्टि और श्रवण-शक्ति बलवान् है, उसकी स्मृति उत्तम कोटि की होगी। इन बाहरी अंगों की प्रतिमूर्तियाँ सूक्ष्म शरीर में स्थित रहती हैं। योगी दिव्य दृष्टि द्वारा दूर की चीजें देखता और आन्तरिक शक्ति द्वारा दूर की बातें सुनता है।

 

लोग प्रायः बहुत असावधान रहा करते हैं। उनमें महान् वस्तुओं को सीखने और ज्ञान के संचय की रुचि नहीं रहती है। हमारे देश में करोड़ों व्यक्ति ऐसे हैं, जो अपना नाम तक नहीं लिख सकते हैं। भारतवर्ष- जो बुद्धिमान् और प्रतिभाशाली ऋषियों और प्रबुद्ध साधुओं का देश रहा है, अभी अन्य देशों की तुलना में पूर्ण अज्ञान से भरा हुआ है। लन्दन और पेरिस का एक साधारण श्रमजीवी, जो खानों में पसीना बहा कर काम करता है, राजनीति से खूब परिचित रहता है, अखबार पढ़ता है और बहुत-सी स्वदेशीय परिस्थितियों पर बहस कर सकता है; अतः वे देश सभ्य और उन्नत हैं। भारत के बहुसंख्यक लोग अज्ञान और अन्धकार के दलदल में फंसे हुए हैं। इसका मूल कारण नेताओं की लापरवाही, जनता की अभिरुचियों का अवसान, फूट और पारस्परिक प्रेम का अभाव है।

 

जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए, योग्य वैद्य या वकील या सफल व्यापारी बनने के लिए नेत्रों और कर्णों को बहुत सीमा तक विकसित करना होगा। अन्धा या गूँगा या बहरा व्यक्ति समाज का अभिशाप ही नहीं-मृतक भी है। ज्ञान की प्राप्ति कहो या धन की दोनों के लिए आँखों, कानों और वाणी का अवलम्बन चाहिए। इन्द्रियाँ ही ज्ञान और धन-संचय के लिए आयतन मानी जाती हैं। जगत् के सभी पदार्थों या कार्यों का ज्ञान इन्हीं दो मार्गों से होता है और वाक् इन्द्रिय से दूसरे को दिया जाता है।

 

राह चलते समय बहुत सतर्क रहना चाहिए। अपनी आँखों को सावधान रखना चाहिए। रास्ते में जो कुछ सुनते हो, देखते हो या पढ़ते हो, याद रखने की चेष्टा करते जाओ। इस प्रकार निरीक्षण-शक्ति का विकास होता रहेगा। इस अभ्यास के द्वारा धारणा-शक्ति का विकास और ध्यान का आविर्भाव भी होगा। ध्यान से निरीक्षण में सहायता मिलती है। उत्कण्ठा की शक्ति को खेल में परिणत कर डालो। उत्कर्ष कुछ दिनों उपरान्त इच्छा के रूप में बदल जायेगा। रुचि और ध्यान स्वतः जायेंगे।

 

जब कोई व्यक्ति कुछ बातें करता है, तो ध्यानपूर्वक सुनो। यदि वह बात रोचक है, तो उसे अपनी दैनन्दिनी में नोट कर लो। सप्ताह में एक बार दैनन्दिनी के उस पृष्ठ को अवश्य दोहराओ।

श्रवण-शक्ति के विकास के लिए अभ्यास

 

अपने पास एक घड़ी रखो और उसकी ध्वनि को ध्यानपूर्वक सुनो। दूसरे दिन उसको कुछ दूरी पर रखो और उसके शब्द को पुनः ध्यानपूर्वक सुनो। इसी प्रकार प्रत्येक दिन उसको दूर रखते जाओ और उसकी ध्वनि को ध्यानपूर्वक सुनने का अभ्यास करो। एक सप्ताह के अनन्तर एक कान को अनामिका (चौथी अँगुली) से बन्द कर लो और ध्यानपूर्वक शब्द सुनो। दूसरे दिन दूसरे कान को बन्द कर पहले कान से शब्द सुनो। दूरी को बढ़ाते जाओ और शब्द को काफी देर तक सुनते जाओ। कुछ काल के अनन्तर दोनों कानों को बन्द करने तथा घड़ी के दूर रहने पर भी शब्द को स्पष्ट रूप से सुना जा सकेगा।

 

एक दूसरा अभ्यास भी है। दोनों अँगूठों से दोनों कान, तर्जनी (दूसरी अंगुली) से दोनों आँखें, मध्यमा (तीसरी अँगुली) से दोनों नासिका-मार्ग और अनामिका से मुँह बन्द कर लो। इसे योनिमुद्रा कहा जाता है। बन्द करने के अनन्तर ध्यानपूर्वक अन्तर में होती हुई शब्दों की लहरों की ध्वनि को सुनने का प्रयत्न करो। अन्तर की इस ध्वनि को अनाहत ध्वनि कहते हैं। यह ध्वनि हृदय से निकला करती है और शरीर में संचरित रहती है। अभ्यास होते-होते दश प्रकार के स्वर सुनायी देंगे। वे हैं बाँसुरी की ध्वनि, मृदंग की ध्वनि, इसी प्रकार शंख, घण्टी और मेघ की ध्वनियाँ। अन्य ध्वनियाँ झंकार के समान, किंकिणी की ताल के समान, सारंगी के समान, मंजीरे और ढोलक की ध्वनियों के समान सुनायी देंगी। कानों को एक शब्द से दूसरे शब्द के सुनने में लगाओ और सावधानी से भिन्न-भिन्न प्रकार के शब्दों के भेदों को समझो और अन्त में कानों को इस ध्वनि को सुनने के लिए शिक्षित करो। किसी एक स्वर के सुनने में नियुक्त और निपुण कर दो। प्रथम स्थूल शब्दों को सुनने का अभ्यास करो, बाद में सूक्ष्म शब्दों को सुनो।

 

तीसरे प्रकार का अभ्यास यह है कि अपने कानों को गंगा की अनाहत ध्वनि में तल्लीन करो। यह ध्वनि दीर्घोच्चारित प्रणव के समान सुनायी देगी। अपने कानों को इस ध्वनि को सुनने के लिए शिक्षित करो। इस ध्वनि को सुनने का अभ्यास रात को नौ बजे या प्रातःकाल चार बजे करो, जिस समय प्रकृति शान्त रहती है और जन-कलरव नहीं रहा करता है।

 

अपने कानों को सदा सूक्ष्म रखो। नाना प्रकार के शब्दों के अन्तर को समझते रहो-जैसे पक्षियों और जानवरों के शब्द, लड़कों का कोलाहल, कारखानों की आवाज, मोटर-गाड़ियों की ध्वनि, वायुयानों का स्वर, बाइसिकलों की सिसकार; इसी प्रकार चीखना, चिल्लाना, चीत्कारना, सिसकना, हँसना, चिढ़ाना, मजाक करना आदि।

 

एक शान्त कमरे में बैठना बुद्धिमानी का काम है। अपने कानों को बन्द कर लो और इन विभिन्न शब्दों पर मन की एकाग्रता को केन्द्रित करो। एक स्वर से दूसरे स्वर में क्या अन्तर है, समझो। अर्थात् वह योग्यता जानी चाहिए कि बिना देखे, किसी व्यक्ति को उसके पदचाप से पहचान जाओ। संसार में कई व्यक्ति ऐसे हैं, जिनका स्वर एक-दूसरे से मिलता है। अतः तुममें यह समझने की योग्यता होनी चाहिए कि मिस्टर बोस की बोली और मेरे चाचा की बोली, जो एक-दूसरे से मिलती है, किस प्रकार एक-दूसरे से अलग-अलग पहचानी जा सकती है। दोनों के स्वरों में कौन-कौन-सी लहरें समान हैं और कौन-कौन-सी रागिनी में अन्तर पड़ता है यह सब ध्यानपूर्वक समझना चाहिए। इसी प्रकार अनेकों रागों को सुनते ही पहचानने का प्रयत्न करो। किस प्रकार के स्वरों के जागने से कल्याणी के बोल समझ में सकते हैं और किस प्रकार भैरवी, दीपक, मालकोश, काफ़ी या बागेश्वरी तथादि रागों को तुरन्त पहचाना जा सकता है। जब तुम किसी बालक को अपनी गोद में लिये रहते हो, तो उसकी छाती पर कान लगा कर उसके हृदय की आवाज को सुनने का प्रयत्न करो और ध्यान को एकाग्र करो।

 

पक्षियों की आवाजें भी ध्यानपूर्वक सुनते रहो। गौरैया की आवाज में कैसे स्वर होते हैं और किस प्रकार वह बोल आरम्भ करती है- यह सब तुम्हारे मन में तुरन्त उतर आने चाहिए। पक्षियों तथा अन्य जानवरों पर जब कभी कोई संकट उपस्थित होता है, तो वे अपने मित्रों को उसकी सूचना विशेष प्रकार के सांकेतिक शब्दों में देते हैं। उन शब्दों में या तो सावधान रहने का सन्देश रहता है या कर सहायता देने का उन शब्दों में संकट की उग्रता या साधारणता का सन्देश भी निहित रहता है। ध्यानपूर्वक कुछ दिन सुनते और गौर करते रहने से तुम उन सबको समझ जाओगे। अनेकों व्यक्ति ऐसे भी थे जो पक्षियों तथा अन्य जानवरों की भाषाओं को समझ सकते थे।

 

तुम जिस प्रकार स्त्री और पुरुष की बोली में अन्तर समझ पाते हो, दीर्घ काल तक पशुओं की बोली और उनके हाव-भाव तथा परिस्थिति का निरीक्षण करते रहने से उनके संकेतों को ठीक उसी प्रकार समझ सकोगे, जैसे मनुष्य की बोली को समझने की क्षमता रखते हो। विभिन्न प्रकार के स्वरों पर सम्यक् धारणा और ध्यान की साधना करने पर उनकी विशिष्ट पद्धति को समझा जा सकता है।

 

कई आदमियों का स्वर स्त्रियों के स्वर के समान होता है और कई स्त्रियाँ मर्दों के समान मोटा बोलती हैं। इन दोनों में भेद समझने की क्षमता होनी चाहिए।

 

साँप के फुफकारने की ध्वनि को समझना चाहिए और उसकी फुफकार में क्या अन्तर है, यह भी अच्छी तरह जानना चाहिए। अमुक झाड़ी से आते हुए शब्द को सुन कर कैसे यह निश्चय करें कि वहाँ साँप है या छिपकली- यह जानने की चेष्टा करो।

 

विषय-भोग करने से पहले और बाद में बिल्ली एक विशेष प्रकार का शब्द किया करती है। कौन-सा शब्द किसका सूचक है, इसको समझो।

 

कुत्ते, घोड़े और हाथी बहुत चालाक जानवर होते हैं। उनमें साधारण चेतना होती है। वे कुछ शब्दों द्वारा हँसते, मुस्कराते और प्रसन्नता तथा कृतज्ञता के भावों को प्रकट करते हैं। तुममें उन सब स्वरों की प्रकृति को समझने की योग्यता होनी चाहिए।

 

जिन अभ्यासों का वर्णन ऊपर दिया जा चुका है, उनका अभ्यास करने पर तुम अपनी श्रवण-शक्ति का आश्चर्यजनक विकास कर सकते हो, अपने सापार और लोक-कार्य में सुसफल हो सकते हो। क्षिप्रग्राही कानों और तीक्ष्ण नेत्रों से अधिक धन की प्राप्ति सुगमता से की जा सकती है।

दृष्टि-विकास के लिए अभ्यास

 

जब कभी किसी आदमी से मिलो, तो उसको शिर से पैर तक सावधानी से देखो और मन में इन सब बातों को नोट करते जाओ उसकी विशेष आकृति, उसकी आँखें, उसकी भौहें, उसके दाँत तथा उसकी भुजाएँ इत्यादि पुनः नोट करो कि वह कैसे वत्र पहने हुए है। उसकी मूँछे हैं कि नहीं, शिर पर टोपी है तो किस प्रकार की है। उसकी बोली पर ध्यान दो। उसके व्यवहार, उसकी भाव-भंगिमा और उसकी गति का निरीक्षण करो। वह व्यक्ति स्वभाव से दयालु है या निष्ठुर, तेज है या सुस्त, नम्र है या उग्र, साँवला है या गोरा या काला है।

 

बहुत से लोग ऐसे हैं, जो अपने अन्तरंग मित्रों की आकृति का विवरण भी नहीं दे सकते। जिनके साथ वे सालों रहे हैं, उनके शरीर और आकृति में क्या विशेषता है, नहीं बतला सकते पुत्र अपने पिता की आकृति की विशेषता नहीं कह पाता है, यद्यपि उनमें घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसका प्रत्यक्ष कारण यह है कि पुत्र ने अपनी निरीक्षण-शक्ति या स्मृति का विकास नहीं किया है। जब तक निरीक्षण-शक्ति तीव्र और असाधारण हो, मनुष्य वैज्ञानिक नहीं बन सकता। वैज्ञानिक को प्रकृति में घटने वाली सूक्ष्मतम घटनाओं तक का निरीक्षण करना पड़ता है, तभी वह निष्कर्ष और अनुमान का निश्चय कर सकेगा-यदि व्यक्ति में इस शक्ति का अभाव हुआ, अथवा यह शक्ति अभ्यास द्वारा विकसित की गयी तो वह कुछ भी नहीं बन सकता।

 

अपने किसी मित्र की बैठक में जा कर वहाँ की प्रत्येक वस्तु का सूक्ष्म निरीक्षण करो और सावधानी से उन्हें अपने मन में अंकित कर लो। आँखों को बन्द कर एक बार पुनः उनकी यथावत् कल्पना करो। दूसरे या और किसी दिन, जब पुनः वहाँ का चक्कर लगाओ, तो अपनी याददास्त से उस दिन की और आज की स्थिति का मिलान करो-कौन-सी चीज उस दिन कहाँ थी और आज वहाँ पर है या नहीं; कौन-सी चीज नयी गयी है तथा कौन-सी चीज अपनी जगह से हटा दी गयी है। यह केवल मित्र के कमरे में नहीं, अपने घर की रसोई में भी किया जा सकता है। यह अभ्यास दीर्घ काल तक करते रहना चाहिए। इस अभ्यास को अनेकों प्रकार से किया जा सकता है। फुलवाड़ी की स्थिति, मित्रों के वस्त्र, घर की चीजें तथा मित्रों की बैठक की सजावट इन सबका अभ्यास किया जा सकता है।

 

किसी स्थानीय पुस्तकालय में जा कर यह जानने की चेष्टा करो कि कौन-सी पुस्तक कहाँ पर रहा करती है। ऐसा नित्य करो। जिस दिन कोई पुस्तक अपने स्थान पर हो, तुरन्त नोट कर लो अथवा जिस दिन कोई नवीन पुस्तक अलमारी के उस स्थान पर रख दी गयी हो, उसको भी नोट करते रहो। आरम्भ में यह अभ्यास किंचित् कठिन है; किन्तु अभ्यास करते-करते वह दिन भी सकता है, जिस दिन तुम अलमारी को देखे बिना, उसमें रखी हुई पुस्तकों का क्रमवार विवरण दे सकोगे कि कल अमुक-अमुक पुस्तकें वहाँ पर अनुपस्थित थीं और अमुक अमुक नवीन पुस्तकें रखी गयी थीं। यदि ऐसा हो गया, तो समझ लो कि दर्शन-शक्ति का धारणा-शक्ति और स्मरण-शक्ति से संयोग हो चुका है और तीनों शक्तियाँ परस्पर अपूर्व सहयोग के साथ कार्य कर रही हैं।

 

श्रीनगर में एक अन्धा व्यक्ति रहता था, जो वस्त्रों के रंगों का निश्चय केवल स्पर्श द्वारा ही करता था। स्पर्श-शक्ति के विकास की क्या ही आश्चर्यजनक सीमा है! यह सब शिक्षा की ही विशेषता है। रात को देखने की शक्ति मन्द हो जाती है, पर सुनने की शक्ति का विकास हो जाता है। यह प्रकृति की केन्द्रीकरण विधि है। बहुत से बहरे और गूँगे व्यक्ति तीव्र अनुभवी और प्रखर प्रतिभाशाली होते हैं। वे प्रेस में कम्पोजिटर हो कर अच्छा काम करते हैं। जब एक इन्द्रिय कार्यविरत हो जाती है या कर दी जाती है, तो दूसरी इन्द्रिय में उसकी शक्ति का केन्द्रीकरण होता है; अतः दूसरी इन्द्रिय की शक्ति का विकास हो जाता है। कार्यविरत इन्द्रिय की शक्ति दूसरी इन्द्रिय के द्वार से प्रकाशित और व्यवहृत होती है। अभ्यास से उसका विकास और भी जल्दी किया जा सकता है।

 

एक सिपाही था, जो बारूद के घटकों के नाम ही याद नहीं रख पाता था, यद्यपि उसने लगातार कई महीनों तक उन्हें याद रखने का प्रयत्न किया। इसका कारण स्मृति-शक्ति का कुण्ठित हो जाना है; स्मृति-शक्ति का विक्षेपावृत होना इसका कारण हो सकता है।

 

कचहरी में न्यायाधीश के कान क्षिप्रग्राही होने चाहिए। तभी वह अपने न्यायालयीय कार्य योग्यतापूर्वक सम्पन्न कर सकता है।

 

सेनापति की दृष्टि अत्यन्त तीक्ष्ण रहनी चाहिए। तभी वह पैदल सेनाओं और घुड़सवारों को देख सकता है, दूर से आते हुए शत्रु-शैन्य का निरीक्षण कर सकता है। इस शक्ति का उसमें अभाव हुआ, तो वह सफल सेनापति नहीं बन सकता।

 

अपनी श्रवण और ध्यान की शक्तियों की उन्नति करनी होगी। इन दोनों के विकास से स्मृति की उन्नति सम्भव है और सुगम भी। कुछ लोगों में श्रवण-शक्ति का विकास अधिक रहता है और कुछ लोगों की दर्शन-शक्ति अधिक विकसित रहती है।

 

साँपों की शक्ति श्रवण-इन्द्रिय द्वारा प्रकट होती है। उनके कान क्षिप्रग्राही होते हैं। वे अपनी आँखों से सुन लेते हैं। उनके अलग कान नहीं होते। व्याघ्र की नाक तेज रहती है; वे रक्त की गन्ध से अपने शिकार का पता चला लिया करते हैं।

 

संगीतज्ञों और गाने वालों के कान क्षिप्रग्राही हुआ करते हैं। उनको इनका विकास करना होता है। शब्दों की गूँज में से उनको बहुत-सी विभिन्न लहरों को खोजना पड़ता है और रागिनी के भेद समझने पड़ते हैं।

 

इसी प्रकार अपनी रुचि, शक्ति तथा परिस्थितियों के अनुसार किसी--किसी शक्ति का विकास करते रहना चाहिए। अच्छा तो यह है कि अपने व्यवसाय के अनुसार तथा उससे सम्बन्ध रखने वाली शक्ति का उत्तरोत्तर विकास किया जाये। मनुष्य के अन्दर शक्ति का स्रोत छिपा पड़ा है, कुशल व्यक्ति भगीरथ प्रयत्न से उसका विकास और उद्भव कर सकता है। जब उस शक्ति का समुद्भव होता है, तो साधक कला और विज्ञान में आश्चर्यजनक उन्नति कर लेता है।

 

 

 

अष्टावधान

 

अष्टावधान का अर्थ एक ही समय आठ काम करना होता है। दशावधानी उसे कहते हैं, जो एक ही साथ दश काम करने की क्षमता रखता हो। शतावधानी संज्ञा उसकी है, जो एक ही समय सौ कार्य करने की योग्यता रखता हो। अवधान का अर्थ है ध्यान और एकाग्रता। इसमें स्मृति और एकाग्रता के सम्पुट की आवश्यकता भी है। यह वास्तव में स्मृति का एक अद्भुत और आश्चर्यजनक कर्म है।

 

आठ कामों को एक-साथ सम्पन्न कर सकने की योग्यता वाले व्यक्ति को अष्टावधानी कहा जाता है। तुम भी एक ही समय आठ काम कर सकते हो। इसमें स्मृति और एकाग्रता के क्रमिक विकास की प्रथम आवश्यकता है।

 

पहले-पहल एक ही समय में दो काम करने का अभ्यास डालो; धीरे-धीरे कामों की संख्या बढ़ा दो। आजकल ऐसे भी मनुष्य हैं, जो एक ही समय में आठ काम कर सकते हैं। वे शतरंज के खेल की ओर ध्यान दे सकते हैं, ताश खेलते रहते हैं, आठ या दश अंकों की संख्या को आठ से गुणा करते रहते हैं (केवल उत्तर निकालते हुए), आज कौन-सा दिन है और क्या तिथि है-यह भी साथ-साथ बतला सकते हैं और अन्य सवालों का जवाब भी दे देते हैं।

 

स्कूल का अध्यापक लड़कों को गणित का अभ्यास कराते-कराते, आगे क्या सिखाना चाहिए और कैसे सिखाना चाहिए- यह सब कुछ सोचता रहता है तथा कौन-कौन-से विद्यार्थी क्या कर रहे हैं; कौन-कौन-से विद्यार्थी उत्तर देने योग्य नहीं दीखते यह सब जानता रहता है। यदि अध्यापक इस गुण में तत्पर नहीं हो सका, तो वह सफल अध्यापक नहीं कहा जा सकता है। उसका विकास किसी सीमा तक क्यों हो, केवल एकांगी ही है।

 

संगीत गाते हुए, व्यक्ति हारमोनियम के स्वरों, गीत के रागों और राग की अनेकों लहरों और विशेषताओं, हारमोनियम पर कलापूर्ण अंगुलियों की अठखेलियों, तबले वाले के बोलों के गुण-दोषों तथा श्रोताओं की भावनाओं, साथ-साथ अपने प्रतिद्वन्द्वी के हाव-भावों का विश्लेषण भी करता रहता है। यदि वह ऐसा नहीं कर सका, तो सफल गायक नहीं कहा जा सकता है। वह अष्टावधानी नहीं है।

 

कुछ अष्टावधानियों के प्रयोग इस प्रकार हैं। वह कुछ लड़कों को एक कतार में खड़ा कर प्रत्येक का नाम पूछते हुए उन्हें एक-एक नम्बर-विशेष दे सकता है। बाद में वह किसी अन्य कार्य में लग जाता है। इस समय उन लड़कों में से कोई लड़का तुरन्त उसके सम्मुख आता है, तो वह सुगमता से बतला सकता है कि 'तुम गोपाल हो और तुम्हारा नम्बर है, तुम राम हो और तुम्हारी संख्या मैंने निश्चित की थी' इत्यादि

 

चेन्नै में एक डाक्टर था, जो बड़े अस्पताल में आठ कम्पाउण्डरों को एक-साथ घड़ाके से आठ दवाइयाँ लिखा देता था।

 

प्राचीन काल में ऐसे अनेकों व्यक्ति हुए हैं जो सौ कार्य एक ही साथ सम्पन्न करने की योग्यता रखते थे। अनेकों व्यक्ति एक ही साथ उनके सामने प्रश्नों की झड़ी लगा देते थे। कोई मौखिक स्मृति की परीक्षा लेते, कोई मानसिक गणना-शक्ति की जांच करते और कोई विविध कला-विषयक प्रश्न पूछ लेते थे। वह व्यक्ति बिना देर किये उनका उत्तर देने में समर्थ होता था। मन की एकाग्रता की इस सामर्थ्य का प्रदर्शन केवल बुद्धि के प्रसंग से होता है, बल्कि इन्द्रियों से भी इसका सम्बन्ध है। जो व्यक्ति शतावधानी होगा, वह विभिन्न घण्टियों के स्वरों को अपनी डायरी में यथार्थतः अंकित कर सकेगा। एक ही प्रकार की आकृति और रंग वाले पदार्थ, जो साधारण व्यक्ति को भ्रम में डाल सकते हैं, अष्टावधानी के लिए इतने स्पष्ट रहते हैं जैसे विविध आकृतियों और रंगों वाले विविध पदार्थ। उसके सामने दो घड़ियाँ रख दीजिए, जिनका स्वर एक-समान और एकदम मिलता-जुलता हो प्रत्येक घड़ी में नम्बर लिख कर उसे एक ही बार दिखला दीजिए और साथ-साथ घड़ी भी बजा दीजिए। अब उसे दूसरे कमरे में ले जा कर किसी भी घड़ी में शब्द कीजिए, वह तुरन्त बतला देगा कि वह शब्द अमुक नम्बर की घड़ी का है।

 

यदि तुम अभ्यास करो, तो इस कला की प्राप्ति कर सकते हो। इसके लिए सर्वप्रथम एकाग्रता और स्मृति की उन्नति करनी होगी। अपनी इच्छानुसार किन्हीं दो चीजों को एक समय ले कर धीरे-धीरे उनकी संख्या में वृद्धि करते जाओ। इस प्रकार क्रमिक अभ्यास से सफलता प्राप्त करोगे और तुम्हारा व्यक्तित्व उच्चतर होता जायेगा।

 

अनेकों अवधानों का अभ्यास हो जाने से उपार्जन क्षमता और कार्य-परायणता की योग्यता अद्भुत गति से बढ़ती जाती है।

मानसिक विश्राम

 

जिस तरह तुम आसनों और शारीरिक व्यायामों के अनन्तर अपनी मांसपेशियों को विश्राम देने के लिए शवासन करते हो, उसी प्रकार तुम्हें अपने मन को, एकाग्रता और ध्यान के अभ्यास के उपरान्त, स्मृति और संकल्पोन्नति के अभ्यास के बाद विश्राम देना होगा। मांसपेशियों की विश्रान्ति से मन को शान्ति पहुँचती है, उसी प्रकार मन की विश्रान्ति शरीर को विश्राम देती है। शरीर और मन एक-दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध रखते हैं।

 

भय, चिन्ता और क्रोध को विनष्ट कर दो। साहस, प्रसन्नता, आनन्द, शान्ति और हर्ष के विषय में सोचो। पन्दरह मिनट के लिए शिथिलीकरण और विश्राम की अवस्था में बैठो। विश्राम के लिए तुम किसी आराम-कुर्सी में बैठ सकते हो। अपने नेत्रों को मूँद लो। बाहरी पदार्थों से अपने मन को खींच लो। मन को शान्त कर लो।

 

बुलबुले के समान जागने वाले विचारों को शान्त कर दो। अपनी आत्मा के विषय में सोचो। पवित्र विचारों में मन को बार-बार लगा दो। सोचो कि तुम आनन्द और शान्ति के सागर हो। अपनी आँखें खोलो। तुम्हें अत्यन्त मानसिक शान्ति, मानसिक उत्साह और मानसिक बल का अनुभव होगा। तुम्हें शान्त, शुद्ध और पवित्र मन की प्राप्ति होगी। अनुभव और अभ्यास द्वारा दैवी सुख का अनुभव करो। यह तुम किसी भी समय में, जब तुम्हें पसन्द हो, कर सकते हो और किसी भी जगह में, जिसे तुम चुनो। प्रतिदिन अनेकों बार इसका अभ्यास कर सकते हो।

 

आँखों को बन्द कर लो। जो तुम्हारे मन को बहुत अच्छा लगता है, उसके विषय में सोचो। इससे तुम्हारे मन को शान्ति प्राप्त होगी। हिमालय पर्वत की सुषमा पर विचार करो। पवित्र गंगा अथवा कश्मीर के किसी नयनाभिराम दृश्य अथवा आगरा के ताजमहल, इसी प्रकार सूर्यास्त अथवा सागर की विशालता अथवा आकाश की असीमता तथा नीलिमा पर विचार करो। इससे अलौकिक आनन्द की प्राप्ति होगी।

 

शारीरिक उन्नति

 

शारीरिक उन्नति या शरीर का विकास उतना ही प्रमुख है, जितना कि मन, संकल्प या स्मृति का विकास। यदि शरीर स्वस्थ, पुष्ट और फुरतीला नहीं, तो कोई भी उन्नति सम्भव नहीं है। विविध विकास स्वस्थ शरीर पर ही निर्भर रहा करते हैं। 'स्वस्थ शरीर के अन्दर स्वस्थ मन का निवास' यह कहावत सत्य है। शरीर परमात्मा का मन्दिर है।

 

शारीरिक उन्नति के लिए भिन्न-भिन्न मार्ग हैं। तुमको निःसन्देह अपनी आवश्यकता, रुचि और स्वभाव के अनुसार किसी एक मार्ग को चुन लेना चाहिए। जिसका शरीर अस्वस्थ है, उसे दोनों समय टहलने जाना चाहिए। सदा अकेले टहलने की आदत होनी चाहिए। तभी तुम परम पिता परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव कर सकते हो और तभी प्रकृति के साथ तुम्हारा पूर्ण संयोग हो सकता है। प्रातःकाल टहलना लाभदायक है। शीतल वायु अत्यन्त ताजी और जीवन प्रदान करने वाली होती है।

 

सूर्यास्त से पूर्व ही टहलना समाप्त हो जाना चाहिए। विवाह, बारात या जलूस की गति से नहीं टहलना चाहिए। तेजी से टहलना चाहिए। प्रतिदिन कम-से-कम तीन या चार मील जरूर टहलना चाहिए। टहलने के साथ-साथ प्राणायाम भी कर सकते हो। छह डग भरने तक पूरक करो। छह डग भरने तक कुम्भक और रेचक

 

अब मैं दूसरे प्रकार के व्यायाम-दौड़ने के सम्बन्ध में कुछ बतलाता हूँ। यह परमोत्तम व्यायाम है। इसके अभ्यास से फेफड़ों का भली-भाँति विकास होता है और खून साफ हो जाता है। खुले मैदानों में दौड़ो। मैं इसे ही अधिक पसन्द करता हूँ। कुछ ही दिनों में तुम्हें इसका अभ्यास हो जायेगा और स्वस्थ देह की प्राप्ति भी हो जायेगी। मद्रास के भूतपूर्व प्रसिद्ध सर्जन डा. रंगाचारी प्रतिदिन खुले मैदान में दौड़ा करते थे। समुद्र-तट पर दौड़ लगाना अत्यन्त लाभदायक है। इससे फेफड़ों को जीवन-वायु प्रचुर मात्रा में मिला करेगी। दौड़ते समय '' का मानसिक जप करो। यह तुम्हारी मानसिक स्थिति को आध्यात्मिक बनायेगा। जब पसीना बहने लगे, तो अपने हाथों से पसीना पोंछ कर शरीर पर ही रगड़ डालो, तौलिये का उपयोग नहीं करना चाहिए।

 

तैरना भी एक प्रकार का सुन्दर व्यायाम है। इससे मांसपेशियाँ फैलती हैं। कमर के दर्द में इससे आशातीत लाभ पहुँचता है। तैरते हुए प्राणायाम भी किया जा सकता है। इसका अभ्यास किसी विशाल तालाब में हो सकता है।

 

टेनिस का खेल भी अच्छा व्यायाम है। इसमें दौड़ना भी होता है। यह गम्भीर गतिपूर्ण खेल है, जो मनुष्य को अधिक नहीं थकाता। यह आनन्दकर और मन को प्रसन्न करने वाला खेल है। इसमें घुटनों और अंगुलियों का विकास होता है। यद्यपि बैडमिन्टन को महिलाओं का खेल कहा जाता है, तथापि इसके लाभ अधिक हैं।

 

जिन लोगों से पास बल है और जो अपने वक्षःस्थल, भुजाओं, कन्धों और दूसरी मांसपेशियों का विकास करना चाहते हैं, उन्हें व्यायाम-विद्या सीखनी चाहिए। इसमें सभी प्रकार की पेशियों का सन्तुलनात्मक विकास होता है। कूदना, भुजाएँ झुका कर चलना, दो समानान्तर डण्डों के मध्य अपने पर दबाव डालना- यह सब लाभप्रद व्यायाम हैं।

 

दण्ड-बैठक से शरीर के सभी अंगों का सामंजस्यपूर्ण विकास होता है। व्यायाम करने वाला समविभक्तांग बन जाता है। इसके प्रभाव स्थायी रहते हैं। इसके अभ्यास में खर्च भी नहीं करना पड़ता। इसका अभ्यास कहीं पर भी किया जा सकता है।

 

प्रतिदिन सूर्य नमस्कार (व्यायाम) करना चाहिए। इसका विधान प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रतिदिन दो बार बतलाया गया है। इसमें तो आयु का विचार किया जाता है और स्त्री-पुरुष का ही। इसमें आसनों, प्राणायामों और सूर्य की उपासना का सुन्दर सम्मिश्रण है। जिन्हें नेत्रों का रोग है, उन्हें इस व्यायाम से अत्यन्त लाभ होगा। प्लीहा, पेट, आँत और गुर्दे की बीमारियाँ भी इस व्यायाम के अभ्यास से अच्छी हो जाती हैं। सूर्य नमस्कार करने वालों की संख्या भारत और इतर देशों में दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है और आज यही व्यायाम प्रधानता प्राप्त करता जा रहा है। औंध के राजा ने इस पर हिन्दी और अँगरेजी में एक अच्छी पुस्तक लिखी है।

 

सूर्य नमस्कार की खोज प्राचीन काल में भारत के ऋषियों ने की थी। उन्होंने इसके प्रत्येक अंग का सावधानी से निरीक्षण किया। आज इसकी बराबरी करने वाला अन्य कोई व्यायाम नहीं है। यह व्यायाम केवल शारीरिक ही नहीं, कई अंशों तक आध्यात्मिक और यौगिक भी है। इसके अभ्यास से कुण्डलिनी शक्ति भी जागृत की जा सकती है।

 

शारीरिक व्यायामों से आसनों का महत्त्व और भी अधिक है। योगासनों के अभ्यास से आन्तरिक इन्द्रियों का सुगठन किया जा सकता है। और कोई ऐसी विधि नहीं है, जिससे आन्तरिक इन्द्रियों का सुचारु गठन किया जा सके। आसनों के अभ्यास से अनेकों रोगों को भी दूर किया जा सकता है (किया भी गया है) कुछ आसनों से ब्रह्मचर्य-धारण में सहायता मिलती है। भुजंगासन, शलभासन और धनुरासन कोष्ठबद्धता को दूर करते हैं। नौलि क्रिया से पेट की मांसपेशियों पर भार पड़ता है और तज्जन्य प्रभाव से पेट की अनेकों बीमारियाँ दूर की जा सकती है। नौलि क्रिया से जठराग्नि बढ़ती है।

 

पश्चिमोत्तानासन, योगमुद्रा, चक्रासन, अर्धसुप्तासन, मत्स्येन्द्रासन आदि से मेरुदण्ड में असाधारण लचीलापन जाता है। रीढ़ के सख्त हो जाने से बुढ़ापा जल्दी जाता है। रीढ़ के लचकदार हो जाने से मनुष्य का शरीर गिलहरी के समान फुरतीला हो जायेगा; उसे बुढ़ापे का अनुभव नहीं होगा।

 

व्यायाम किसी प्रकार का क्यों हो, उसमें बाँह और कलाई के विकास के लिए पर्याप्त गुण होने चाहिए। जाँघों और पैरों के टखनों के विकास के लिए भी व्यायाम करने चाहिए। कुछ ऐसे व्यायाम किये जाने चाहिए, जिनसे रीढ़ को बगल में, आगे और पीछे घुमाना पड़े। वक्षःस्थल, गर्दन और पेट के विकास के लिए भी कुछ व्यायामों का सुन्दर सम्मिश्रण होना चाहिए। व्यायामों का सम्मिश्रण सुन्दर हुआ, तो दोषों का आना सम्भव है।

 

व्यायाम करने वाले व्यक्ति को निम्नांकित नियमों का पालन करना चाहिए। व्यायामों में नियमित रहना सर्वप्रधान नियम है। यदि शीघ्रतापूर्वक शारीरिक उन्नति करना चाहते हो, तो आसनों के अभ्यास में नियमित रहना होगा। जो अधिक व्यायाम करते हैं, उन्हें सारपूर्ण और स्वास्थ्यकर भोजन करना चाहिए, अन्यथा मांसपेशियों के क्षय होने की सम्भावना अधिक है। उन्नति महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकेगी।

 

घी, दूध, मक्खन, मेवा आदि का नियमित सेवन करना होगा। शीर्षासन का अभ्यास करने वाले व्यक्ति को सब आसनों के अनन्तर तीस मिनट रुक कर हलका जलपान करना चाहिए। महीने में एक बार शरीर को तोल लेना चाहिए और वजन को अपनी डायरी में अंकित कर लो। व्यायाम दोनों समय-प्रातःकाल और सायंकाल किये जाने चाहिए। स्नान करने से पहले कम-से-कम आधे घण्टे तक विश्राम करना चाहिए। अभ्यासी के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। यदि ब्रह्मचर्य धारण अच्छी तरह किया गया, तो व्यायामों से आश्चर्यजनक लाभ प्रत्यक्ष हो जायेंगे। अविद्या और मोह के कारण जो ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर सकते और यहाँ तक कि अपनी वासना पर संयम भी नहीं रख सकते, वे किस प्रकार इनके अभ्यास से लाभान्वित हो सकेंगे? फूटे घड़े को कैसे भरा जा सकता है? केवल उसके छेद को बन्द करने से ही तो; इसी प्रकार हम शरीर के इस क्षयकारी मार्ग पर रोक लगा दें, तभी आसनों और व्यायामों का फायदा प्रत्यक्ष हो सकेगा।

 

आसनों का अभ्यास बड़े तड़के करना चाहिए। शारीरिक व्यायाम शाम को किये जा सकते हैं। यदि आसनों के साथ-ही-साथ शारीरिक व्यायाम भी करना चाहो तो आसनों के अभ्यास के अनन्तर १५ मिनट आराम कर लो, तभी शारीरिक व्यायामों का अभ्यास करो। आसनों के अभ्यास के अनन्तर प्राणायाम का अभ्यास शुद्ध वायुपूर्ण स्वच्छ स्थान में करना चाहिए। एक और बात ध्यान में रखें कि आसनों अथवा व्यायामों के अभ्यास में सीमा का उल्लंघन किया जाये। आसन और व्यायाम करते समय हमें आनन्द, प्रसन्नता और विश्राम का अनुभव होना चाहिए और आसनों के बाद भी यही अनुभव रहना चाहिए। थकावट या तनाव का अनुभव रत्ती-भर भी नहीं रहना चाहिए। यदि थकावट और तनाव का अनुभव हो, तो समझना चाहिए कि हम हद से ज्यादा कसरत कर रहे हैं और अपनी सामर्थ्य से बाहर जा रहे हैं।

 

आसनों के अभ्यास के अनन्तर बादाम लाभकारी समझा गया है। यह ठण्ढा और बलवर्धक होता है। बादाम की मात्रा में क्रमिक वृद्धि की जानी चाहिए। अधिक खा लेने से अजीर्ण की सम्भावना रहती है।

 

इस नश्वर शरीर के लिए कोई मोह नहीं करना चाहिए। इस शरीर को केवल निमित्त जान कर इसकी रक्षा करनी चाहिए। तुम इस शरीर से पूर्णतः भिन्न हो। यह पाँच तत्त्वों का बना हुआ है और नाश तथा क्षय को प्राप्त होने वाला है। तुम सच्चे अर्थ में अविनाशी, सर्वव्यापक आत्मा हो। जिस प्रकार तुम्हारा घर (जिसमें तुम रहते हो) तुमसे एकदम पृथक् है, उसी प्रकार यह शरीर (जिसमें कुछ काल से अज्ञान के कारण आवृत हो गये हो) तुमसे बिलकुल पृथक् है। इस शरीर के साथ सम्बन्ध जोड़ना ही तुम्हारे बन्धन या मनुष्य जीवन के सभी दुःखों और कष्टों का मूल कारण है। इस शरीर के दास बन कर इस पर अपना आधिपत्य कायम करो। इसको इस प्रकार की शिक्षा दो कि यह हर समय तुम्हारी आज्ञाओं का पालन करता रहे, कि मनोनुकूल कार्य करने पर विवश करे। पर-उपकार के लिए सदा सन्नद्ध रहो, किसी न्याय-कार्य तथा लोकोपकार के लिए शरीर को समर्पण करने में जरा भी हिचको आत्म-निषेध, आत्म-त्याग और आत्म-बलिदान के लिए सदा तैयार रहो।

 

उपसंहार में यही कहना है कि नियमित रूप से अभ्यास करना आरम्भ कर दो। शरीर, मन और बुद्धि को चतुर और तीक्ष्ण बना लो। सन्तुष्ट और सुखी जीवन व्यतीत करना सीखो 'मैं स्वस्थ हूँ, मुझे सर्वत्र आनन्द का अनुभव हुआ करता है' - हृदय में इस प्रकार के अनुभवों का उदय हो जाना चाहिए।

 

इस शरीर रूपी अश्व को अपने लक्ष्य (ब्रह्म-निर्वाण) की प्राप्ति के लिए उपयुक्त करो। जीवन की नदी को पार करने के लिए इस शरीर को नौका के समान व्यवहृत करो। प्राणमय शरीर मिलना बड़े भाग्य की बात है, उस पर भी यह मनुष्य-जीवन तो अनेकों जन्मों में किये गये महापुण्यों का उदय है। यदि इस शरीर का (जो पुण्यों के फल से उत्पन्न हुआ है) युक्त उपयोग नहीं करोगे और निश्चित कार्य की सफलता नहीं कर पाओगे, तो जीवन का कुछ भी अर्थ नहीं रहेगा, पशु और हममें असमानता का कोई कारण नहीं हो सकता।

 

 

 

 

 

 

 

द्वितीय प्रयोग

राजयोग महाविद्या

राजयोग का अभ्यास

 

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'योग' शब्द की उत्पत्ति मूल संस्कृत धातु 'युज्' है, जिसका अर्थ होता है-मिलना या संयोग

 

परमात्मा के साथ मिलना मानव जीवन और उसके प्रयासों का लक्ष्य है। यही हम लोगों के अस्तित्व का चरम विकास होना चाहिए।

 

योग से हर प्रकार के दुःखों, कष्टों और क्लेशों का निवारण किया जा सकता है। योग के अभ्यास से मनुष्य जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति पा लेता है। योग से सिद्धि और मुक्ति-दोनों प्राप्त की जा सकती हैं। योगी बनो और अमरत्व का अनुभव करो। इसीलिए तुम गीता में पाते हो- "तस्माद्योगी भवार्जुन" (अध्याय , श्लोक ४६)

 

योग मन की बाहरी वृत्तियों का मोड़ना और आगे जा कर आनन्दमय शुद्धावस्था की प्राप्ति करना सिखलाता है। योग हम लोगों को आसुरी प्रकृति को बदलने और दिव्य स्वरूप की प्राप्ति करने के नियम सिखलाता है। सभी विचारों और विक्षेपों पर विजय प्राप्त कर लेना ही राजयोग का लक्ष्य है। इसीलिए इसे राजयोग कहा जाता है। इसका अर्थ होता है-सभी योगों में श्रेष्ठ, अर्थात् सभी योगों का राजा।

 

कुत्तों और घोड़ों में भी मन होता है; लेकिन उनमें तो विवेक है, बुद्धि और विचार-शक्ति ही। इसीलिए उनके लिए स्वतन्त्रता प्राप्त करना सम्भव नहीं। अज्ञानी लोग अपना सम्बन्ध शरीर, मन और मन की वृत्तियों से रखते हैं। मन और शरीर केवल उपादान कारण हैं। यदि तुम मन और मन की वृत्तियों के साथ मिल कर काम करोगे, तो दुःख और कष्ट ही पाओगे। सम्पूर्ण जगत् का निर्माण मन की वृत्तियों से ही हुआ है। यदि विचारों और उद्वेगों को शान्त कर दिया जाये, तो केवलावस्था या उच्चतम आनन्द और शान्ति की अवस्था प्राप्त की जा सकती है।

 

जिस तरह किसी सरोवर की ऊपरी सतह के जल-बिन्दु का चांचल्य और लहरों की गति शान्त हो जाने पर सरोवर की निचली सतह भी देखी जा सकती है; उसी प्रकार यदि मानसिक वृत्तियाँ शान्त हो जायें, तो तुम अपने स्वरूप की यथार्थता को देख सकते हो। जिस तरह साबुन शरीर को साफ करता है, उसी प्रकार मन्त्रों का जप, भगवद्-ध्यान, नाम-कीर्तन और यम-नियम का अभ्यास तुम्हारे मन और उसमें रहने वाली विकृत वृत्तियों को निर्मल करने में सहायक बनेंगे। जिस प्रकार अन्न से इस शरीर का पोषण होता है, उसी प्रकार मन तथा आत्मा के लिए आध्यात्मिक भोजन देना होगा।

 

जब तुम्हें व्यापार में घाटा होता है या इकलौते पुत्र की अकाल मृत्यु से दुःखी हो जाते हो अथवा कोई दुःखदायी समाचार सुनते हो- जिससे तुम्हारे जीवन का गहरा सम्बन्ध रहा हो, तो तुम सारपूर्ण और स्वास्थ्यकर भोजन करने पर भी शारीरिक क्षीणता को प्राप्त होते हो। इस अवस्था में तुमको असीम निर्बलता का आभास होता है और आन्तरिक क्षीणता प्रतीत होती है। इससे क्या सिद्ध होता है? यही कि मन का अस्तित्व है और उसके लिए अचूक औषधि है-आनन्द

 

जब कोई स्त्री अपनी पुत्री के विवाह के प्रबन्ध में अति-व्यस्त रहती है, तो भोजन तक करना भूल जाती है; किन्तु भोजन करने पर भी वह सदा प्रसन्नचित्त ही रहती है। भूखे रहने पर भी उसका हृदय आनन्द से उछलता रहता है। इसका क्या कारण है? प्रसन्नता और आनन्द-दो प्रभावशाली औषधियाँ उसके मन के लिए हैं। यद्यपि वह भोजन नहीं करती है, तो भी आन्तरिक मानसिक शक्ति और आनन्द का अनुभव करती है।

 

अधिकार प्राप्त करने से मन की शान्ति भंग होती है। जिनको अधिकार प्राप्त हैं, वे सदा उनका दुरुपयोग करते हैं। वे दूसरों पर हुक्म, अधिकार और शासन करना चाहते हैं। पद और अधिकार को त्यागना अत्यन्त कठिन है। यही कारण है कि राजयोग-दर्शन मनुष्य को आरम्भ में यम-नियम के अभ्यास में दीक्षित करता है। जो यम-नियम के अभ्यास में लगा हुआ है, वह अपने अधिकारों का दुरुपयोग नहीं करेगा। वह दूसरों पर हुक्म नहीं चलायेगा। वह विनम्र होगा। उसमें सेवा और आत्म-त्याग की लगन होगी।

 

जीवन का एक कार्यक्रम बना लो। आध्यात्मिक नियमों का एक नक्शा खींच लो। नियमितता और क्रमिक रूप से उसका अनुसरण करो। अपने को खूब होशियारी और लगन के साथ उसमें दत्तचित्त कर दो। अपने मूल्यवान् क्षण व्यर्थ में नष्ट करो। जीवन क्षण-भंगुर है। समय थोड़ा है। कल कभी नहीं आयेगा। या तो अभी या कभी नहीं। दृढ़ निश्चय के साथ खड़े हो जाओ। 'मैं इसी क्षण से इसी जीवन में योगी बनूँगा' -कमर कस लो। दृढ़ और निरन्तर योग साधना करो। ज्ञानदेव, गोरखनाथ, सदाशिव ब्रह्म और अन्य योगियों के पद-चिह्नों पर चलो।

 

यदि तुम वास्तव में अपने अभ्यास में बहुत सच्चे हो और तुम्हारा मन वैराग्य और सांसारिक पदार्थों के प्रति उदासीनता के साथ-साथ मोक्ष की तीव्र उत्कण्ठा से भरा हुआ है, तो तुम अल्पकाल में ही लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हो। इसमें सन्देह का कोई कारण नहीं है।

 

 

 

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चित्त मानसिक पदार्थ या वस्तु या विषय है। यह विभिन्न प्रकार के रूपों और आकृतियों को धारण करता है। इन रूपों को 'वृत्ति' कहा जाता है। इन वृत्तियों में परिवर्तन होते रहते हैं। इन परिवर्तनों को 'विचार-लहर' या 'वृत्तियों के भँवर' के नाम से जाना जाता है। यदि चित्त एक आम के सम्बन्ध में सोचता है, तो आम की वृत्ति तुरन्त ही चित्त में प्रतिबिम्बित हो जाती है। जब यह वृत्ति शान्त हो जाती है, तब दूसरी वृत्ति का उदय होता है और यह उस वृत्ति में तदाकार हो जाता है। यह वही बन जाता है। जब यह घृणा और द्वेषादि की बातें सोचेगा, तो स्वयं घृणा और द्वेषादि का स्वरूप बन जायेगा। यह वृत्तियाँ ही मन की अशान्ति का कारण बनती हैं।

 

संस्कारों और वासनाओं के कारण चित्त में वृत्तियाँ उठती हैं। यदि वासनाओं और इच्छाओं का मूलोच्छेदन कर दिया जाये, तो वृत्तियाँ अपने-आप शान्त हो जायेंगी।

 

जब एक वृत्ति शान्त होती है, तो अधीन-सचेतन-मन पर एक निश्चित प्रभाव अंकित कर देती है, जिसे संस्कार या आन्तरिक प्रभाव कहा जाता है। सभी संस्कारों की समष्टि (कुल जोड़) कर्मस्व अवस्था में निहित मानी जाती है। यह संचित कर्म है। संचित कर्म को 'जमा किया हुआ कर्म' भी कहते हैं। जब मनुष्य इस भौतिक देह को त्यागता है, तब अपने साथ ९७ तत्त्वों के सूक्ष्म शरीर और कर्मस्व को भी अपनी-अपनी मानसिक सतह पर ढो कर ले जाता है। यह कर्मस्व असम्प्रज्ञात समाधि द्वारा प्राप्त हुए उच्चतम ज्ञान द्वारा भस्म कर दिया जाता है।

 

वह स्थान, जहाँ तुम्हें मन की एकाग्रता प्राप्त हो सकती है, ध्यान और यौगिक अभ्यास के लिए उचित है। मन की एकाग्रता का अभ्यास करते हुए तुम्हें सावधानी से मन की अस्त-व्यस्त किरणों (शक्तियों) को एकत्रित और केन्द्रित करना होगा। चित्त में वृत्तियाँ जागती रहेंगी। तुम्हें उन वृत्तियों को सदुपायों से शान्त करना होगा। जब सभी लहरें शान्त हो जायेंगी, तभी मन शान्त, शुद्ध और पवित्र बन जायेगा। उस अवस्था में ही योगी को शान्ति और आनन्द मिलता है। सुख अपने अन्दर है, उसे प्राप्त करने के लिए अपने मन को वश में करना होगा; कि नाम, यश, प्रतिष्ठा, पदवी, धन और स्त्री-पुत्रों द्वारा।

 

मन को एक बिन्दु पर केन्द्रित करने के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए। यदि मन केन्द्र-बिन्दु से इधर-उधर विचलने लगे, तो प्रयत्न कर बार-बार उसे बिन्दु पर लाने के लिए अथक परिश्रम किया जाये। यही अभ्यास या यौगिक साधना है। चित्त के बौद्धिक आवेगों को अभ्यास द्वारा और मन के आवेगों को वैराग्य के द्वारा रोको। ऐसा करने पर ही मन शान्त हो सकेगा। तभी तुम आसानी से इसे अपने वश में कर सकोगे।

 

मन की शुद्धता से ही योग की पूर्णता प्राप्त होती है। दूसरों के प्रति अपने व्यवहार को शुद्ध रखो; अपने आचरण को सुधारो। दूसरों के प्रति ईर्ष्या या द्वेष या लड़ाई की भावना रखो। सबके प्रति हमदर्द बनो। पापियों से घृणा करो। सभी प्राणियों के प्रति दया का व्यवहार करो। प्रत्येक व्यक्ति के समक्ष विनम्र बनो। बड़ों के प्रति सज्जनता से व्यवहार करने का अभ्यास करो। यदि योगाभ्यास में कृतकर्म और सचेष्ट हो जाओ, तो सफलता को प्राप्त करना सुगम हो जायेगा। मोक्ष की प्राप्ति के लिए मन में उत्कट अभिलाषा और तीव्र वैराग्य, व्यवहार में कुशलता और सत्यता होनी चाहिए। सच्चे और चेष्टावान् बनो

 

इन्द्रिय-दमन, गुरु-भक्ति और सतत अभ्यास से योग में सफलता मिल जाती है। साधक को सदा धैर्य और सतत प्रयत्न से काम लेना चाहिए। बहुधा ऐसा देखा गया है कि जो निवृत्ति-मार्ग को अपनाते हैं, वे कुछ दिनों के बाद आलसी बन जाते हैं। इसका कारण यह है कि वे मानसिक शक्ति का उपयोग करना नहीं जानते, गुरु के उपदेशों के अनुसार नहीं चलते और ही किसी प्रकार का दैनिक कार्यक्रम ही रखते हैं। वैराग्य होने पर भी उन्हें आध्यात्मिक पथ का कोई अनुभव नहीं है। अतः वे काफी समय बीतने पर भी किसी प्रकार की आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर पाते हैं।

 

निरन्तर ध्यानपरायण योग का विद्यार्थी दुःखी रहता है, तो समझना चाहिए कि अवश्य उसके ध्यान में कोई त्रुटि होगी। यदि वह निराश और निर्बल है, तो निश्चयतः कहीं पर गलती है। इसका सुधार करना चाहिए। ध्यान के अभ्यास से मनुष्य बली, सुखी और स्वस्थ बनता है। साधक स्वयं ही दुःखी हो, तो गृहस्थी को सुखी, समृद्ध और शक्तिशाली कैसे बना सकेगा? गृहस्थ लोग शान्ति और आनन्द के लिए महात्माओं की सन्निधि को खोजते हैं। याद रखो कि सदा मुस्कराता हुआ चेहरा सच्ची आध्यात्मिकता और आन्तरिक दिव्य जीवन का जीता-जागता चिह्न है।

 

जिस प्रकार छत पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी रहती हैं, उसी प्रकार सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार, निर्विचार और अन्य कई योग की सीढ़ियाँ हैं। आनन्द की अन्तिम अवस्था-असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करने से पूर्व ही इन समाधियों से सम्पन्न हो जाना होगा। कुछ महात्मा ऐसे हैं, जो जन्म से ही समाधि की चरम सीमा तक पहुँचे हैं। वे जन्म-सिद्ध कहलाते हैं। उन्होंने अपने पूर्व-जन्मों में अत्यन्त साधना कर इसके संस्कारों की प्राप्ति की होगी।

 

योग की प्रत्येक अवस्था का अनुभव हो जाना चाहिए। साहसपूर्वक धीरे-धीरे सँभल-सँभल कर, आनन्दचित्त हो अपना पग बढ़ाते जाना चाहिए। जब तक योग के प्राथमिक अंगों का अभ्यास और उनकी सिद्धि प्राप्त कर लो, तब तक योग की उच्च भूमिकाओं और उसके उच्च अभ्यासों को हाथ भी लगाओ। ध्यान और समाधि का यह राजमार्ग है।

 

इस जगत् के ज्ञान का कुल योग ब्रह्मसाक्षात्कारजन्य आध्यात्मिक ज्ञान की तुलना में कुछ भी नहीं है। सांसारिक ज्ञान असत्य और मिथ्या है। आध्यात्मिक साधक जब 'धर्ममेध समाधि' की प्राप्ति करता है, तो उसके गिरने का भय नहीं रहता उसके लिए तो दुःख है और दोष ही। यह अवस्था तभी प्राप्त की जा सकती है, जब योगी ने सभी सांसारिक अधिकारों की तिलांजलि दे दी हो। जब 'धर्ममेध समाधि' का अवतरण होता है, तब योगी शान्ति, पवित्रता, सन्तोष और दिव्य आनन्द को प्राप्त करता है।

 

जिस प्रकार आग सूखे पत्तों या घास के ढेर को पूर्णतः जला देती है, उसी प्रकार योग भी सभी कर्मों को जला देता है। योगी कैवल्य की प्राप्ति कर लेता है। समाधि द्वारा उसे 'सहज ज्ञान' होता है। एक ही क्षण में यथार्थ ज्ञान उसके अन्दर प्रकाशित हो जाता है। ऐसे सिद्ध के लिए भूत और भविष्य का क्या अस्तित्व? केवल वर्तमान की स्थिति ही रह जाती है।

 

जिसका श्रुति और शास्त्रों में दृढ़ विश्वास है, जिसने सदाचार का पालन कर लिया है, गुरु-सेवा में जो निरन्तर तत्पर है, जिसने साधुओं के संग में अपना अमूल्य समय उपयुक्त किया है, जिसमें तीव्र वैराग्य है और (अन्ततः) जो काम, क्रोध, मोह, लोभ और मिथ्या गर्व से मुक्त है, वह आसानी से संसार को पार कर सकता है और समाधि की प्राप्ति कर लेता है।

 

नेति, धौति, वस्ति, नौलि, आसन, मुद्रा और बन्ध के अभ्यास से शरीर स्वस्थ, बली और अपने वश में रहता है; पर ये ही योग के सब-कुछ अंग नहीं हैं। ध्यान का अभ्यास भी करना चाहिए। ध्यान, समाधि और आत्म-साक्षात्कार में अपने को निष्ठित करने के लिए इन सभी अभ्यासों की परम आवश्यकता है। केवल हठयोग के अभ्यास से ही पूर्ण योग की प्राप्ति नहीं हो सकती।

मानसिक शिल्पशाला

 

जो मन के अन्दर निवास करता है, जो मन के अन्दर है, मन जिसको नहीं जानता, मन जिसका शरीर है और जो मन पर शासन करता है, वही तुम्हारा अमर, आन्तरिक शासक और आत्मा है। इस आन्तरिक शासक को, जो मन और मानसिक शिल्पशाला को संचालित करता है, नमस्कार है।

 

जिस प्रकार लोहे का एक टुकड़ा चुम्बक की सन्निधि में रह कर गतिशील हो जाता है, उसी प्रकार आन्तरिक शासक की उपस्थिति में यह (प्राणहीन) मन चलता और काम करता है; किन्तु इस सिद्धान्त को पाश्चात्यवादियों ने अभी तक अच्छी तरह नहीं समझ पाया है। इसीलिए वे अशान्त हैं और घनघोर अज्ञान में भटक रहे हैं। ब्रह्म-सम्बन्धी ज्ञान या सूक्ष्म प्राण की चेतना मन में विचारों का निर्माण करती है।

 

हेनरी फोर्ड का विशाल कारखाना कैसा आश्चर्यजनक है! उसने ठीक प्रकार से समय का मूल्य पहचाना। समय उसके लिए धन था। कहते हैं, सच्चे शब्दों में, उसे साँस लेने की फुरसत भी नहीं थी। वह सदा अपने व्यापार के कार्यों में लगा रहता था। उसके अन्दर केवल एक ही विचार सदा चक्कर मारता रहता था कि मोटरों का निर्माण किस प्रकार अधिक संख्या में किया जाये। यदि उसकी मानसिक शक्ति ईश्वर की ओर निर्दिष्ट हो जाती, तो वह एक महान् (शक्तिशाली) योगी बन सकता था। वह अपूर्व महापुरुष बनने के सभी गुणों से सम्पन्न था। उसकी एकाग्रता आश्चर्यजनक थी, केवल कार्य में अन्तर था। योगाभ्यास करने के बदले वह संसार के किसी एक कार्य का सम्पादन कर रहा था। लोक-कार्य करते हुए भी उसे राजयोगी कहा जा सकता है। उसकी उदारता, हृदय-प्रवणता और भावुकता धन्यबाद के योग्य हैं। उसने अपने श्रमिकों का विचार बुद्धिमानी से किया। वह उनको अच्छी-खासी मजदूरी देता था, उनके लिए उचित औषधियों का प्रबन्ध करता था। विकलांग लोगों के लिए उसने पेन्शनें बाँध रखी थीं। उसकी दया का वर्णन नहीं किया जा सकता। उसकी महान शिल्पशाला को देखते ही दाँतों तले अँगुली दबानी पड़ेगी। उसके कारखाने में कितने चतुर और कुशल कार्यकर्ता हैं। उसके अन्तर्गत कितने व्यक्ति कर्तव्यपरायण हो रहे हैं और अनजाने में कितनों को योगजन्य एकाग्रता का अभ्यास करवाया जा रहा है (वे दूसरों की उपस्थिति का अनुभव तक नहीं कर पाते)

 

जब प्रिंस आफ वेल्स आठवें एडवर्ड थे, तो उन्होंने इस कारखाने का निरीक्षण किया। जिस क्षण उन्होंने कारखाने में प्रवेश किया, एक कच्चा लोहा आग में गलाया गया और साँचे में मोटर के विभिन्न हिस्सों (कल-पुर्जी) को उनकी उपस्थिति में बनाना आरम्भ किया गया। सभी हिस्सों को तैयार करने के बाद उन्हें सुन्दरता से जोड़ दिया गया। एक नवीन मोटर तैयार कर दी गयी और राजकुमार के कारखाने से प्रस्थान करते-करते वह (मोटर) उनको उपहार स्वरूप दे दी गयी। कुशलता और सिद्धि का कितना अद्भुत उदाहरण है!

 

उससे भी अधिक अद्भुत है, आधुनिक युग का रेडियो स्टेशन और बेतार का तार। इसने दुनिया को एक-साथ मिला दिया है और आवागमन को अत्यन्त सुविधाजनक बना दिया है। विज्ञान का यह अद्भुत खेल जीवन, शक्ति और चेतना की एकता को सिद्ध करता है और (शान्तिपूर्वक) उपनिषदों की वाणी, प्राचीन महर्षियों के अद्वैत अनुभव को प्रचारित और प्रमाणित करता है। व्याख्यानदाता अथवा गाने वाले की ध्वनि संसार के सभी लोगों को एक ही बार (और एक ही समय में) सुनायी देती है। आन्तरिक बल से दूर के किसी आदमी की बात सुनने की कथाएँ पुराणों में आती हैं और टेलीविजन द्वारा अति-दूरस्थ व्यक्ति को देखने की बात भी आज सत्य सिद्ध हो गयी है। जब रेडियो का सैद्धान्तिक प्रतिपादन किया जाता है, तो सभी लोगों का हृदय संयुक्त हो जाता है। वे एकता का अनुभव करते हैं। रेडियो (स्पष्ट शब्दों में) शंकर के अद्वैत दर्शन की महिमा की वास्तविकता और यथार्थता का भौतिक प्रमाण है। रेडियो के अध्ययन से हृदय में विशाल विचार जागने लगते हैं; मन में विश्व-प्रेम, जन-सेवा आदि की भावनाएँ उठती हैं। रेडियो का सिद्धान्त उपनिषदों की एकता, तादात्म्यता और समजातित्व को प्रसारित और प्रमाणित करता है। माइक्रोफोन आवाज की लहरों को विपुलित, विस्तृत और गहरा करता है; उन्हें आकाश के माध्यम से सभी दिशाओं में तीव्र और प्रकृष्ट गति से भेजता है; एक ही सेकण्ड में ये लहरें सात बार दुनिया का चक्कर लगाया करती हैं। कितना आश्चर्यजनक सिद्धान्त है। यही वेदान्त का सिद्धान्त है। यही ज्ञानयोग है। रेडियो आदि समीचीन उपकरण ब्रह्म के बाहरी प्रतीक हैं।

 

अब मैं सबसे अधिक आश्चर्यजनक कारखाने का वर्णन करूँगा, जो तुम्हारे अत्यन्त निकट है और आश्चयों का परमाश्चर्य है।

 

पक्का भौतिकवादी भी एक सेकण्ड में पूर्ण आस्तिक बन जायेगा, यदि वह आँखों को बन्द कर इस कारखाने के कार्यों पर मनन करने लगे। केन उपनिषद् का दर्शन इसी वाक्य से आरम्भ होता है-"मन का निर्देशक कौन है" (केनोपनिषद, प्रथम मन्त्र); अर्थात् कौन इस मन को शक्ति और प्रकाश देता है? उपनिषद् यह कहते हुए आगे चलता है कि 'ब्रह्म सभी मनों का मन है, प्राणों का प्राण है, नेत्रों का नेत्र है, कानों का कान है।' कितना विस्तृत और आदर्श दर्शन है यह, जो मनुष्य को शुद्ध और उच्च विचारों की चोटी पर पहुँचा देता है। यह रहस्यमय जीवन की समस्याओं को हल करता है। 'प्रज्ञानं ब्रह्म', 'अहं ब्रह्मास्मि', 'तत्त्वमसि' और 'अयमात्मा ब्रह्म' ये चार महावाक्य बल और सुख का संचार करते हैं, मनुष्य के जीवन में सुन्दर और आश्चर्यजनक परिवर्तन करते हैं। इन्हीं विचारों ने मुझे सम्राटों का सम्राट् और बादशाहों का बादशाह बना दिया है। अब में धनी व्यक्तियों की शान-शौकत, मिथ्याभिमान और कृत्रिम जीवन पर हँसता हूँ। अब मैं शंकराचार्य की उक्ति को सच्चा समझता हूँ कि 'कौपीन धारण करने वाला निश्चयतः दुनिया में सबसे अधिक सुखी है' (कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः - देखिए, 'कौपीनपंचकम्')

 

जिसके पास गेरुआ वस्त्र और कौपीन को धारण करने की शक्ति है, वह सबसे महान् व्यक्ति है। अब मैं राजा भर्तृहरि के स्वगत भाषण की महिमा को पूर्ण रूप से समझता हूँ, जो कहा करते थे- "मैं अपने इष्टदेवता शिव का ध्यान करके आत्मा में ही आनन्द पाना चाहता हूँ। मैं पवित्र जंगलों और गंगा के किनारे किसी चट्टान पर बैठ, एक कौपीन धारण कर ध्यान करूंगा। भोजन के लिए यह हाथ ही कटोरे या पात्र का कार्य कर लेंगे। आसमान ही मेरा चंदवा और दोनों हाथ ही मेरा तकिया। मेरे शरीर की त्वचा मेरा वस्त्र और कन्दराएँ मेरी निवासस्थली। हरी-हरी घासों और फूलों से भरी पृथ्वी माता ही मेरी मखमल की दरी, पेड़ की जड़ें या जंगल के फूल-फल ही मेरे भोजन और गंगा का पवित्र जल ही मेरी राजकीय सुरा" (देखिए, 'भर्तृहरि शतक' का वैराग्य प्रकरण)

 

प्रिय मित्रो, अब ईमानदारी से बोलो कि कौन मनुष्य इस भूमण्डल पर सबसे अधिक सुखी है? क्या धनी जमींदार सुखी है या एक योगी, जो गंगा के किनारे पर कौपीन पहने हुए ध्यान करता है, किसी को दुःख नहीं देता और किसी के दुःख का कारण भी नहीं होता; किन्तु बदले में संसार के साथ आत्मवत् व्यवहार करता है और अपनी आत्मा को ही आब्रह्मकीटपर्यन्त देखता है?

 

अब एक बैरन की कहानी सुनो, जो एक पादरी (धर्मपिता) से वार्तालाप कर रहा था। उसने पादरी से कहा- "मेरे धन की बात सुन कर तुम मेरे पास यह देखने के लिए आये हो कि मैं किस प्रकार का जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। इस सुन्दर भवन में, मैं सबसे भाग्यहीन व्यक्ति हूँ। मैं सभी प्रकार के दुःख और चिन्ताओं से घिरा हुआ हूँ। मैं इस सूत्र वाक्य का अर्थ पूरी तरह समझता हूँ कि 'मुकुट वाले व्यक्ति का मन सदा अशान्त रहता है।' मुझे नींद नहीं आती।"

 

बैरन पादरी से कह रहा था- "मैं मधुमेह, अपच, वायु-विकार, आन्त्रिक सूजन, आन्त्रिक व्रण और अनेकों रोगों से ग्रस्त हूँ। मैं पार्क डेविस की प्रयोगशाला की सभी औषधियों को आजमा चुका हूँ, फिर भी मुझे रोगों से मुक्ति नहीं मिलती। मैं भूखा हूँ, फिर भी भोजन नहीं कर सकता। मुझे जौ के आटे की कंजी पीने को मिलती है। जब मैं मिठाइयों और नारंगियों को देखता हूँ, तो मुझे खाने से रोक दिया जाता है। वे कहते हैं कि मेरे खून में तनाव या दबाव या शुगर बढ़ जायेगी। मेरी कहानी का दूसरा भाग भी सुनिए। मैं रात-दिन चारों ओर से अपने पहरेदारों की रखवाली में रहता हूँ। मैं अधम कैदी के समान जीवन व्यतीत करने को बाध्य हूँ। अब मैं हिन्दुओं के कर्म-सिद्धान्त और आत्मा के दर्शन पर पूर्णतः विश्वास करता हूँ। मैं ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ कि मुझे कृपा कर कौपीन सहित चिन्तामुक्त योगी के रूप में जन्म दें, जिससे मैं हिमालय में गंगा नदी के किनारे योग का अभ्यास कर सकूँ। मैं यह धन नहीं चाहता हूँ। यह धन आध्यात्मिक आन्तरिक शान्ति और सुखों तथा आत्मानन्द का सबसे बड़ा शत्रु है।"

 

यह बात अनहोनी नहीं है। प्रत्येक बुद्धिमान् व्यक्ति इस सिद्धान्त को एक स्वर से स्वीकृत करेगा। अच्छा तो अब हम फिर से मानसिक शिल्पशाला की ओर चलें। पिछले पृष्ठों में मैंने कहा था कि इस मानसिक शिल्पशाला का एक संचालक है। उस संचालक के परोक्ष दर्शन हो जाने से आत्म-साक्षात्कार, मुक्ति, परिपूर्णता और अमरता की प्राप्ति की जाती है। धारणा तथा ध्यान से शुद्ध हुए हृदय के द्वारा उस महान् शिल्पी का दर्शन किया जा सकता है। में दोबारा यह बतला देना चाहता हूँ कि आत्म-साक्षात्कार प्रमुख कर्तव्य है, इस कर्तव्य की पूर्ति हो जाने से आनन्द और शान्ति की प्राप्ति हो सकती है। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि ईश्वर या आत्मा सर्वत्र विराजमान है तथा सभी प्रकार के विचारों और कार्यों का आदि कारण है। वह संकल्प को शक्ति प्रदान करता है तथा बुद्धि को प्रकाश।

 

इस मानसिक शिल्पशाला के प्रहरी आँख और कान हैं। इस मार्ग से अन्दर प्रवेश किया जाता है, अर्थात् जहाँ पर यह पहरा देते हैं, उसे पारिभाषिक भाषा में 'वे इन' (WAY IN) कहा जाना चाहिए। मुख दूसरा द्वार है, उसे बाहर का रास्ता या 'वे आउट' (WAY OUT) कहा जाना चाहिए। आँखों और कानों के द्वार से मानसिक शिल्पशाला के अन्दर उत्पादन करने योग्य सामग्री आया करती है। इन्हीं मार्गों से ज्योति और शब्दों की लहरें अन्दर प्रविष्ट करायी जाती हैं। शिल्पशाला में इन लहरों को दृष्टि अथवा दर्शन के रूप में परिवर्तित किया जाता है; इस परिवर्तन का कार्य मन को सौंपा गया है। मन के द्वारा दृष्टि अथवा दर्शन बुद्धि को सौंपा जाता है। बुद्धि द्वारा इन दृश्यों को विचारों के रूप में परिणत कर दिया जाता है। बुद्धि द्वारा विचारों के रूप में बदले जाने पर मुख के द्वार से इनका बहिः प्रकाशन होता है; वाक्-इन्द्रिय इस कार्य को सम्पन्न करती है। जिस प्रकार चीनी की फैक्टरी में गन्ने को अनेकों रसायनों में मिश्रित कर टैंकों में परिशोधित कर स्फटिक के समान बना दिया जाता है, जिस प्रकार साधारण मिट्टी को प्लास्टर आफ पेरिस के साथ एकीकृत कर अनेकों प्रक्रियाओं द्वारा पात्र, थाली, कप तथा अन्य रूप दे दिया जाता है, जिस प्रकार साधारण रेत को काँच का रूप दे दिया जाता है-उसी प्रकार इस आश्चर्यजनक मानसिक शिल्पशाला में ज्योति तथा लहरों को शक्तिमान् विचारों के रूप में परिणत कर बाहर प्रकाशित कर दिया जाता है।

 

बाहरी आँखें और बाहरी कान तो केवल उपकरण मात्र हैं। उनको बाहरी निमित्त माना जाता है। वास्तविक दृष्टि और श्रवण-केन्द्र तो मस्तिष्क के अन्दर तथा कारण-शरीर में स्थित हैं। यह केन्द्र ही इन्द्रिय-निकेतन है। इस बात को अच्छी तरह समझ लो बुद्धि उपर्युक्त सामग्रियों को मन से ले कर पुरुष अथवा चेतन-आत्मा को सौंप देती है-यह पुरुष इस विशाल परदे के पीछे नेपथ्य में साक्षी के समान स्थित है। बुद्धि को मुख्य अमात्य जानना चाहिए, मन की अपेक्षा वह आत्म-पुरुष के अधिक सन्निकट है। मन आज्ञाधिपति (या सेनापति) है। पाँचों इन्द्रियाँ उसकी आज्ञा की पूर्ति करने के लिए सदा सन्नद्ध रहती हैं। दूसरे शब्दों में बुद्धि को न्यायाधीश या विचारपति जानना चाहिए; मन वकील के समान उसके सामने तथ्य अथवा घटना को उपस्थित करता है।

 

मन इस मानसिक शिल्पशाला का 'मुख्य कर्मचारी' है। उसके सहायक और उप-कर्मचारी हैं। पाँच इन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही उप-कर्मचारी का काम करती हैं। ज्ञानेन्द्रियों का काम बाहरी समाचारों को एकत्र करना है और कर्मेन्द्रियों का कार्य है मुख्य कर्मचारी की आज्ञा का सम्पालन करना।

 

ज्यों-ही ज्ञानेन्द्रिय द्वारा एकत्रित समाचार या सत्य बुद्धि द्वारा आत्म-पुरुष के सामने प्रस्तुत कर दिये जाते हैं, त्यों-ही अहंकार की द्युति का जन्म होता है। बुद्धि आत्म-पुरुष से उसका सन्देश प्राप्त करती है, उस पर विचार और निश्चित निर्णय करने पर पुनः मन को सन्देश देती है-मन उस सन्देश को कार्य-रूप में परिणत करता है। सन्देश को कार्य-रूप में परिणत करने का उत्तरदायित्व वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ और पायु-इन पाँच कर्मेन्द्रियों को सौंपा जाता है। यही पाँच अपने मुख्य कर्मचारी की आज्ञा बजाते हैं।

 

मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के कुल योग को अन्तःकरण अथवा आन्तरिक उपकरण कहा जाता है। विचारपति का कार्य करते समय अन्तःकरण ही न्यायाधीश बन जाता है, किसी सभा या संस्था में कार्य करते समय सभापति, सभाओं का सभापतित्व करते समय सभाध्यक्ष, मालगोदाम की देख-रेख करते समय उसका रक्षक बन जाता है।

 

जब तुम आम के उद्यान से हो कर जाते हो, तो मन संकल्प-विकल्प करता है। वह सोचता है- 'आम मीठा होगा या नहीं?' इस अवसर पर बुद्धि उसकी सहायता करती है। वह निश्चय करने पर कहती है- 'यह आम अच्छा है, यह कलमी आम है।' चित्त का कार्य है अनुसन्धान करना। वह अनुसन्धान करता है- 'मैं आम पाने के लिए उपाय सोचूँगा। देखना चाहिए कि इस उद्यान का मालिक कौन है? यदि मिल जाये, तो मैं उससे आम खरीद लूँगा।' इसी समय अहंकार का उदय होता है, वह दृढ़तापूर्वक कहता है- 'किसी भी तरह क्यों हो, मैं आम अवश्य लूँगा।'

 

मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार द्वारा कार्य का निश्चय (इत्यादि) हो जाने से मन पाँव (कर्मेन्द्रिय) को आदेश देता है। आदेश मिलते ही पाँव उसे माली के पास ले जाते हैं। अहंकार के अंश से तुम आम खरीदते हो। अहंकार ही उस आम को खाता है। आम का यह संस्कार मन में स्थित हो जाता है और इस प्रकार मन में उस वासना का जन्म हो जाता है। कालान्तर में मन के अन्दर वासना-स्मृति के कारण पुनः भोग की इच्छा होती है। इस प्रकार संकल्प का जन्म होता है। संकल्प के जागते ही मन आम खाने के लिए पुनः लालायित हो उठता है। यही संसार-चक्र है, इसे ही वासना-चक्र कहते हैं; अर्थात् अविद्या, काम और कर्म। अनन्त काल से यह चक्र घूमता रहा है-इसी कारण मनुष्य बन्धन में जा गिरा है। कामना के होते ही भोग, भोगते ही वासना, वासना से पुनः कामना की उत्पत्ति और कामना से फिर वही गोल और अनन्त चक्र

 

वासना की पुनरावृत्ति होते-होते काम या कामना का उदय होता है। मनुष्य के लिए इस काम-वासना पर विजय प्राप्त करना कठिन हो जाता है; अतः वह काम और इन्द्रियों का दास बन जाता है। तृष्णा का अर्थ होता है-किसी पदार्थ के लिए सदा लालायित रहना। इच्छा और वासना में इतना ही अन्तर है कि इच्छा स्थूल होती है, किन्तु वासना सूक्ष्म और अधीन सचेतन-मन के अन्दर छिपी हुई रहती है। किसी वस्तु का भोग करने पर जो आनन्द प्राप्त होता है, उससे मन में मोह की उत्पत्ति होती है। मोह और मृत्यु में कोई अन्तर नहीं है। जो व्यक्ति पदार्थ-वासना में आसक्त है, वह सदा बन्धन में आबद्ध रहता है और अनेकों पदार्थ उसे घेरे हुए रहते हैं। उन विषय-पदार्थों से छूटना उसके लिए कभी-कभी असम्भव भी हो जाता है; किन्तु जिस व्यक्ति ने इस मानसिक शिल्पशाला के संचालक को अच्छी तरह जान लिया है, जो इस शिल्पशाला के अन्तरंग कार्यों से अच्छी तरह परिचित है और जिसने साक्षी-भाव द्वारा इन ग्रन्थियों को खोल लिया है, वही इन (पदार्थ-वासना) के चक्कर से मुक्ति पा सकता है।

 

यदि हम अपने अन्दर अन्तर्दर्शन की शक्ति जागृत कर सकें, तो हमें इस मानसिक कारखाने के आन्तरिक कार्यों पर आश्चर्य करना होगा। हम निर्वाक् हो जायेंगे। जिस प्रकार किसी विशाल नगर के टेलीफोन कार्यालय के केन्द्र में विभिन्न स्थानों से समाचार प्राप्त होते हैं तथा केन्द्रीय आपरेटर अनेकों स्विचों को संयुक्त, विभक्त और सन्धित कर समाचारों को यथास्थान प्रसारित करता है, ठीक उसी प्रकार इस विशाल मानसिक शिल्पशाला में मन संयोजन, वियोजन और सन्धिकरण का कार्य किया करता है। मान लें, हम किसी पदार्थ को देखना चाहते हैं तो मन तुरन्त अन्य चार केन्द्रों-श्रवण, घ्राण, रसना और विचार (अनुभव) रूप इन्द्रियों से सन्धिकरण करता है। मन की कार्य-शक्ति इतनी तीव्र गति वाली है कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। विचारिए कि अधीन सचेतन-मन (अथवा चित्त) के अन्दर कितने असंख्य खाने (दराजें) हैं, जिनमें प्रत्येक प्रकार के अनुभव, विचार, दृश्य इत्यादि सुव्यवस्थित रूप से अंकित किये रहते हैं। उनका नामकरण, वर्गीकरण और कर्म-निश्चय इतना सुव्यवस्थित रहता है कि त्रुटि की कोई भी सम्भावना नहीं रहती।

आर. एम. एस. (पत्रों का वर्गीकरण करने वाला रेलवे डाक विभाग) में जिस प्रकार प्रमुख वर्गीकर्ता अत्यन्त तीव्र गति से पत्रों को यथास्थान पर व्यवस्थित करता है, उसी प्रकार चित्त या अधीन-सचेतन-मन भी तड़ित् गति से प्रत्येक कार्य पूर्ण सावधानी तथा चातुरी से करता जाता है।

 

मन में ज्यों-ही (कोई) विचार प्रविष्ट होता है, त्यों-ही यह विद्युत् लहर का रूप धारण कर सतह पर जाता है और जीव (प्राणी) को प्रभावित करने लगता है। यदि उनके रंगों पर ध्यान करें तो यह अनुभव होंगे। आध्यात्मिक विचारों के मन में आते ही सुन्दर पीले रंग का अनुभव होगा। जब मन में क्रोध का आविर्भाव हो, त्यों-ही ध्यानपूर्वक अनुभव करने का प्रयत्न करना चाहिए-लाल रंग के बाण तीव्रता से छूटते हुए प्रतीत होंगे। तात्पर्य यह है कि विचारों को प्रकृति और स्वभाव के अनुसार उनके रंगों में विभिन्नता होती है।

 

इस प्रकार पता चलता है कि इस विश्व और समस्त ब्रह्माण्ड में पूर्ण शासन की स्थापना है। आधारभूत अन्तर्यामी के कारण-भगवान् ही उसका आधार होने से सृष्टि का प्रत्येक कार्य शान्ति और सफलतापूर्वक चल रहा है। परमात्मा इस सृष्टि का संचालक और पथ-प्रदर्शक है। जिस प्रकार महाराजा की उपस्थिति में अमात्यादि कर्मचारी यथाविधि कार्य करते रहते हैं; उसी प्रकार परमात्मा के सर्वव्यापक (सब जगह उपस्थित) होने से मन और अन्य इन्द्रियाँ परस्पर सहयोगपूर्वक कार्य करते हैं।

 

भाव, भावना, उद्रेक, रुचि, वृत्ति और प्रवृत्ति के अलग-अलग और निश्चित स्थान हैं। मन में पठार और निचले भू-भाग भी हैं। पर्वत और घाटियाँ भी हैं। आध्यात्मिक शिखर, वृत्तिपरायण मन और बुद्धि के प्रदेश भी हैं। शुद्ध मन और अशुद्ध मन-दोनों का स्थान भी यहीं है। निवृत्ति सम्पन्न मन और प्रवृत्ति सम्पन्न मन इसके पर्याय जानने चाहिए।

 

व्यक्ति की संकल्प-शक्ति मन की किसी तीव्र इच्छा को पूर्ण करने के लिए जब मैदान में उतरती है, तो धारणा आदि अन्य (गुणात्मक) शक्तियाँ उसके पीछे कतारवार खड़ी हो जाती हैं। वे अपने स्वामी को सहायता देती जाती है। जब संकल्प-शक्ति द्वारा कार्य सम्पन्न किया जा चुका है, तो कल्पना-शक्ति आगे आयेगी और योजना बनाने लगेगी। स्मरण शक्ति कल्पना-शक्ति को सहायता देगी। तीनों गुण, विविध प्रवृत्तियाँ, तेरह कुवृत्तियाँ-ये सब विविध रंगों में अपने स्वरूप को प्रकट करेंगी। चल-चित्र में जिस प्रकार अनेकों अभिनेता आते और चले जाते हैं, उसी प्रकार विविध प्रवृत्तियाँ मंच पर कर अपना कार्य सम्पन्न करती हुई वापस चली जाती है, जहाँ से उनका आना हुआ था। यदि कुछ दिन तक ध्यानपूर्वक इस कार्यवाही पर गौर किया जाये, तो अत्यन्त आनन्द और आश्चर्य का अनुभव होगा। इस अनुभव को शब्द व्यक्त नहीं कर पाते हैं। इसके परिचय के लिए अन्तर्दृष्टि का विकास करना होगा-धारणा और चित्त-शुद्धि इसके लिए उपयुक्त उपकरण हैं।

 

यही क्यों, यदि नित्य-प्रति प्रातःकाल बजे जाग कर वीरासन या पद्मासन या सुखासन में बैठ कर आत्म-निरीक्षण अथवा मानसिक निरीक्षण और मानसिक विश्लेषण (या चिन्तन) करना आरम्भ कर दिया जाये, तो इस मानसिक कारखाने के कार्यकलापों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होने लगेगा।

 

अतः प्रियवर, इस मानसिक महाविशाल कार्यालय के संचालक को कभी भूलना। वह और कोई नहीं, तुम्हारा आत्मा है। आधी रात को जब यह मानसिक शिल्पशाला कुछ समय के लिए (अंशतः) स्थिर हो जाती है, तब भी वह जागता ही रहता है, सचेत रहता है। नियमित धारणा का अभ्यास कर (मन को एकाग्र करते हुए) उसे (मन को) शुद्ध कर लो, तो उस संचालक के दर्शन प्राप्त हो सकेंगे। मन की विविध (सदात्मक) प्रवृत्तियों का विकास कर इस जीवन में सफलता के भागी बनो और परात्पर जीवन (परलोक) में उसकी सुखमय गोद में अनन्त काल के लिए विश्राम करो।

 

शिल्पशाला के हे महाशिल्पी ! हमें ठीक-ठीक शिल्पकला बताना और हमारी शिल्पशाला का सदा संचालन करते रहना।

वासनाएँ

 

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इस जीवन के अस्तित्व का क्या अर्थ निकाला जाये ? यह जीवन क्यों है ? उत्तर केवल एक है-परमात्मा के साक्षात्कार के लिए, विश्वादि सृष्टियों में परिव्याप्त पूर्णता का ज्ञान प्राप्त करने के लिए।

 

तब दर्शन किस प्रकार हो और ज्ञान कैसे प्राप्त किया जाये? वासनाओं के अस्त होने पर ही आत्मज्ञान, परमात्म-दर्शन का सूर्योदय होता है। वासनाओं के लुप्त होते ही ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। जब तक वासनाओं का तिरस्कार नहीं किया गया, तब तक ज्ञान प्राप्त हो ही कैसे सकता है? 'वासना का त्याग ही मोक्ष है' - श्रुति ऐसा कहती है।

 

इच्छाओं की सूक्ष्म अवस्था को वासना कहा जाता है। वासना का स्थूल रूप ही इच्छा है। जो वासना अन्तर्हित रहती है, उसे 'क्षय-वासना' कहते हैं। कुछ दार्शनिकों का मत है कि वासना प्रवृत्तिलक्षणात्मक है, अर्थात् प्रवृत्तियों अथवा वित्त-वृत्तियों (अभिलाषाओं) का पर्याय ही वासना है। कुछ और लोगों का मत है कि किसी योजना या निश्चय के बिना तीव्र तृष्णा के वशीभूत हो कर (अन्धे के समान) वासनात्मक पदार्थों के भोग में तन्मय होने की भावना को वासना कहा जाना चाहिए।

 

वासना दो प्रकार की होती है-शुभ वासना और अशुभ वासना। शुभ वासना व्यक्ति को जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त करती है। अशुभ वासनाओं से पुर्नजन्म होता है। अशुभ वासनाओं के कारण मन सदा व्यग्र और चंचल तथा पदार्थों के प्रति आसक्त रहता है। यदि शुभ वासनाओं को स्वीकृत करोगे, तो अवर्णनीय आनन्द की प्राप्ति होगी। जिस प्रकार भुने या तले हुए बीज पनपने योग्य नहीं रहते, ठीक उसी प्रकार शुभ वासना भी पुनर्जन्म के रूप में नहीं पनप सकती है।

 

पूर्व-जन्म में जो वासनाएँ संचित की जा चुकी हैं, वे आगामी जन्मों में भी साथ-साथ चिपकी रहेंगी। शुभ वासनाओं के संचय से मुक्ति मिलेगी और अशुभ वासनाओं के संचय होने से दुःख, चिन्ता, सन्ताप तथा अनेकों जन्मों की प्राप्ति होगी। अशुभ वासनाशील व्यक्ति बार-बार इस संसार में जन्म लेता रहता है और दुःख पाता है।

 

इच्छा होती है-जैसे सिनेमा जाने की इच्छा, मांसाहार की इच्छा, मैथुन की इच्छा, अयुक्त मार्गों से दूसरे के धन को हरने की इच्छा-यह अशुभ वासनाएँ हैं। काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, छल-कपट, भ्रम, घृणा, द्वेष-यह अशुभ वासनाएँ हैं। जिस प्रकार अशुभ इच्छा होती है, उसी प्रकार शुभ इच्छा भी होती है-जैसे सत्संग और सन्तों के साथ बैठने की इच्छा, महात्माओं और भक्त लोगों की सेवा करने की इच्छा, दीन और हीन लोगों की सेवा करने की इच्छा-यह शुभ वासनाएँ हैं। दया, प्रेम, सहनशीलता, दानशीलता, ब्रह्मचर्य, सत्यता, क्षमाशीलता और साहस-यह शुभ वासनाओं के कुछ रूप हैं।

 

अशुभ वासना तीन प्रकार की होती है-लोक-वासना, शास्त्र-वासना और देह-वासना नाम और यश, प्रतिष्ठा और ख्याति, शक्ति और मर्यादा की प्राप्ति की इच्छा को लोक-वासना कहा जाता है; अर्थात् यह लोक-वासनाएँ हैं। महापण्डित बनने की इच्छा, दूसरों के साथ तर्क करने की इच्छा और तर्क में उन पर विजय पा लेने की इच्छा को शास्त्र-वासना कहा जाता है; अर्थात् शास्त्रादि से सम्बन्ध रखने वाली इच्छा को शास्त्र-वासना कहते हैं। मन में एक इच्छा होती है कि सुन्दर शरीर-गठन होना चाहिए, स्वस्थ शरीर होना चाहिए, काया कल्प द्वारा दीर्घ जीवन की प्राप्ति करनी चाहिए, मक्खन आदि खा कर शरीर को भारी, स्थूल बनाना चाहिए-यह सब देहात्मक वासनाएँ हैं; अर्थात् देह से सम्बन्ध रखने वाली इच्छाएँ देह-वासना के नाम से जानी जाती है। अतः यह सभी वासनाएँ अशुभ हैं, जो जीव को संसार से बाँधे रहती और बार-बार उसे इस लोक में वापस लाती हैं।

 

जो शक्तिशाली वासना तुम पर अपना अधिकार स्थापित करती है, उसी वासना के स्वरूप में तुम तन्मय हो जाते हो। बीज से वृक्ष पैदा होता है और वृक्ष से ही बीज। इसी तरह प्राणों की लहरों के द्वारा वासना का उदय होता है और वासना के उदय होने से प्राण प्रगतिमय होते हैं। दोनों में से एक को नष्ट कर दीजिए, दोनों का नाश अवश्यम्भावी है।

 

अविद्या अथवा अज्ञान से सर्वप्रथम अहंकार का जन्म होता है। अहंकार की दो कन्याएँ-राग और वासना हैं। दोनों (राग और वासना) का आपस में सहौदर्य है। जहाँ वासना, वहाँ राग। वासना और राग साथ-साथ रहते हैं। राग को आसक्ति या मोह कहा जा सकता है। राग के कारण ही ममता (अपनापन) होती है। यदि राग और वासनाओं का लोप करना हो, तो पहले-पहल अहंकार का ही मूलोच्छेदन करना होगा। अहंकार के मूलोच्छेदन के लिए अविद्या को हटाना होगा। अविद्या को हटाने पर अहंकार, राग और वासनाएँ अपने-आप मर जायेंगी।

 

अहंकार के साथ अशुभ वासनाओं का अनन्य सम्बन्ध है। उनका स्वभाव अज्ञानात्मक है। इसका मतलब हुआ कि वासनाओं से दबा या घिरा हुआ व्यक्ति अज्ञानी और निर्बल भी है। अशुभ वासनाओं को अन्तर्मुख और शुभ वासनाओं को विकसित कर देने पर ही खोयी हुई दिव्य सत्ता की प्राप्ति हो सकती है। जिसने अज्ञान को और उसके साथ-साथ शुभ वासनाओं को भी जला दिया है, वह कभी भी दुःख और सन्ताप का अनुभव नहीं करेगा; वह सदा अनन्त आनन्द का ही अनुभव करेगा।

 

वासनाओं का स्वरूप अति सूक्ष्म होता है। जिस प्रकार बीज में फूल अन्तर्हित रहता है, उसी प्रकार वासनाएँ हृदय में अन्तर्हित रहती हैं। संस्कारों की पीठिका के प्रगतिमय हो जाने पर आनन्द की स्मृति का आविर्भाव होता है। आनन्द के अनुभव का स्मरण करते ही इच्छाएँ जागती हैं। जब इच्छा जाग जाती है, तो इन्द्रियाँ मन के सहयोग में काम करने लग जाती हैं। फल-स्वरूप मनुष्य इच्छित वस्तु की प्राप्ति और उसके उपभोग के लिए भरसक प्रयत्न करता है। यह सब कार्य क्षण मात्र में सम्पन्न हुआ करते हैं।

 

जो चीज एक बार मीठी या अच्छी लगी थी, वह दूसरे समय पर अप्रिय और अरुचिकर प्रतीत होगी। क्या यह बात सच नहीं? सोचो तो सही। इच्छित वस्तु की प्राप्ति आनन्ददायक और अनिच्छित वस्तु की प्राप्ति दुःखदायी सिद्ध हुई है। इसलिए पदार्थ-भोग का कारण अशुभ वासना है। जब हम तत्कथित भोग से तृप्त हो जाते हैं, तब आनन्द का स्रोत बन्द हो जाता है, परन्तु वासना रुक गयी तो? वासना के रुकते ही मन का नाश हो जायेगा और अन्य सभी उपकरणों का निवारण भी। तात्पर्य यह है कि आत्मज्ञान की शत्रु-इन वासनाओं को अन्तर्हित कर अमरत्व की प्राप्ति करो।

 

मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है। जिस मन में अशुभ वासनाएँ हैं या पनप रही हैं, वह मन मनुष्य को बन्धन की ओर ले जाता है। जिस मन में अशुभ वासनाएँ नहीं हैं, वह उसे मुक्ति की ओर ले जाता है। वासनाओं का क्षय हो जाने पर मन का भौतिक अस्तित्व नहीं रहता। साधक में मन-तत्त्व अनुपस्थित हो जाता है। मन-तत्त्व के होने पर व्यक्ति में ज्ञान-चक्षुओं का विकास होने लगता है और ज्ञान का स्रोत फूट पड़ता है। इसी अवस्था में साधक अकथनीय शान्ति का अनुभव करने लगता है।

 

मन वासनामय है; जगत् भी वासनामय है। वासनाओं के माध्यम से मन भोग-पदार्थों में लिप्त रहता है और हरदम भोग-विलास की ही बातें सोचता रहता है; पर वासनाओं का क्षय होते ही वह पदार्थों में रमना छोड़ देता है और तब हम निर्विचार अवस्था की प्राप्ति कर पाते हैं।

 

मन को एक वस्त्र के समान समझना चाहिए। जब वस्त्र को पीले रंग से रंगते हैं तो वह पीला हो जाता है, यदि लाल रंग से रंगते हैं तो वह लाल हो जाता है; अर्थात् वस्त्र को जिस रंग से रंगना चाहें, वही रंग उसमें प्रत्यक्ष होता है और वह वस्त्र भी उसी रंग का माना जाता है। इसी प्रकार मन को वासनाओं के जिस रंग से रंगा गया हो, वही रंग उसमें प्रत्यक्ष हो जाता है। सात्त्विक वासनाओं से मन में श्वेत रंग प्रत्यक्ष होता है, तो राजसिक वासनाओं से लाल और तामसिक वासनाओं से काला रंग चढ़ जाता है। जैसी वासना, वैसी भावना (मन की विशेष क्रिया को भावना कहा जाता है)

 

जब तक मन को आत्म-विचार के अभ्यास से विषय-उपरत नहीं कर दिया जाये, तब तक वासनाएँ रहेंगी ही। वे बार-बार आक्रमण करती रहेंगी, लुक-छिप कर साधक को सन्तप्त करती रहेंगी। कभी तो वे इन्द्रियों के द्वार से अन्दर प्रवेश करेंगी, कभी-कभी संस्कारों के मार्ग से और कभी नेत्रों की राह से भी। उनकी उपस्थिति और उनके प्रवेश-मार्ग को जानने के लिए सतत जागृत और सचेत रहना चाहिए।

 

जब मन अशुभ वासनाओं से पूर्णतया मुक्त हो जाता है, तो हम अनेकों प्रतिकूलताओं और आपत्तियों के बावजूद भी सन्तुलित और धीर रह सकते हैं। वासनाओं का निवारण होते ही मन शान्त और स्निग्ध हो जाता है। वैराग्य और विवेक, इन्द्रिय-संयम, आत्म-चिन्तन और ध्यान द्वारा मन की अशुभ वासनाओं का दमन किया जा सकता है।

 

यह बात अवश्य जान लेनी चाहिए कि अशुभ वासनाएँ दृढ़ और हठी हुआ करती हैं। उनको भगाओ भी, तो वे मन के अन्दर के किसी कोने में चुपचाप छिप जाया करती हैं और वहीं से अपनी चालाकी के खेल खेला करती हैं। कभी-कभी तो वे अपना वेष बदल कर मन के अन्दर रहा करती हैं। योगाभ्यास करते रहने से वे कुछ काल तक दबी हुई रहती हैं। अगर हम अपने ध्यान में नियमित नहीं हैं, यदि हममें वैराग्य का अभाव होने लग गया तो वे फिर मौका पा कर दोगुने वेग से आक्रमण करेंगी। इस प्रकार प्रतिक्रिया होने लगती है। अतः यह जरूरी है कि हमें बुद्धि द्वारा उनकी उपस्थिति का पता लगाने की शक्ति प्राप्त होती रहे। इसके लिए शुद्ध और कुशाग्र बुद्धि की आवश्यकता है। अनेकों जन्मान्तरों से अभ्यस्त हुई यह वासनाएँ आसानी से नहीं भगायी जा सकती हैं। इनमें बल रहता है और शक्ति होती है। निरन्तर आध्यात्मिक साधना, आत्म-चिन्तन, विवेक, दम, प्रत्याहार और योगाभ्यास करते रहने से ही इनका दमन किया जा सकता है।

 

जब नया साधक साधना आरम्भ करता है, तो शुभ और अशुभ वासनाओं के बीच झगड़ा आरम्भ होता है। विचारों की प्रकृति वासनाओं की प्रकृति पर निर्भर करती है। जब मन में बुरे विचार जाग रहे हों, तो अशुभ वासनाओं को मन में स्थित हुआ जानना चाहिए। इसीलिए आरम्भ में अथक परिश्रम कर शुभ वासनाओं से मन को परिपूर्ण कर देना चाहिए और सदा शुद्ध विचारों को ही मन के अन्दर रहने देना चाहिए।

 

जिसकी वासनाओं का क्षय हो चुका है, वही साधक धारणा और ध्यान में सफलता प्राप्त कर सकेगा। वासनाओं के दमन से मन का दमन हो जाता है। मन और है क्या, केवल वासनाओं का समूह मात्र ही तो है? बहुत से साधकों की शिकायत है-'हम पिछले १५ सालों से ध्यान का अभ्यास करते रहे हैं; किन्तु अभी तक धारणा और ध्यान में पूर्ण एकाग्रता नहीं हो पायी है। साधकों की इस शिकायत का कारण यह है कि उन्होंने वासनाओं का दमन या निवारण नहीं कर पाया होगा। उनमें वासनाओं का जोर होगा। इसलिए आवश्यक है कि वे प्रथमतः पूरे प्रयत्न से वासनाओं का दमन करें-वासना ही शान्ति और ध्यान की शत्रु है। यदि हम नित्य-दृष्टि में स्थापित हो चुके हैं, यदि हमें पूर्ण विश्वास हो चुका है कि यह संसार नश्वर है तो वासनाएँ स्वतः ही पराभूत हो जायेंगी। सांसारिक प्रवृत्तिशील व्यक्ति अशुभ वासनाओं का दास रहता है। साधक में जब कभी अशुभ वासनाएँ अपना शिर उठाती हैं, तो वह अपनी संकल्प-शक्ति तथा आध्यात्मिक बल से उनको तुरन्त हटा देता है। जीवन्मुक्त में वासनाओं की भस्म मात्र ही रहती है। लोकरत गृहस्थी में वासनाओं का साम्राज्य खूब फैला हुआ रहता है। साधक में वासनाएँ नियन्त्रित रहती हैं, उनको शिर उठाने का अवसर भी नहीं मिलता।

 

पर यह बात जरूर है कि वासनाओं को अन्दर-ही-अन्दर दबाना किसी भी हालत में सहायक नहीं होगा। वासनाओं का तो निराकरण और निष्कासन ही हो जाना चाहिए, जिस प्रकार जहरीले सर्प के विष-दन्त निकाल लिये जाते हैं। तभी ब्रह्म-पद की प्राप्ति की जा सकती है।

 

निरन्तर प्रयत्नों से वासनाओं को शुभ मार्गगामी बनाया जा सकता है। वासनाओं के अशुभ प्रभाव को बाँध से रोक कर उसे शुभ मार्ग से ले जाना होगा। शुभ वासनाएँ प्रचुर मात्रा में हैं, तो कोई हानि नहीं। वैसे तो शुभ वासना भी एक प्रकार का बन्धन है; किन्तु जिस प्रकार हम एक काँटे से दूसरे काँटे को निकाल कर बाद में दोनों को फेंक देते हैं, उसी प्रकार शुभ वासनाओं से अशुभ वासनाओं का पराभव कर (उनको निष्कासित कर) शुभ वासनाओं का भी त्याग करना ही होगा। यहाँ तक कि अन्त में मोक्ष-प्राप्ति की वासना भी नहीं रहनी चाहिए। तभी 'तत्' शब्द से सूचित ब्रह्म-पद की प्राप्ति की जा सकती है।

 

आत्मज्ञान की प्राप्ति करने के लिए अन्य अभ्यासों के साथ-साथ वासना-क्षय, मनोनाश और तत्त्व-ज्ञान का अभ्यास भी करना चाहिए। केवल एक ही प्रकार की साधना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अनेकों अभ्यासों का समन्वय करना होगा, तभी मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।

 

जिसके हृदय में वासना का लेश मात्र भी नहीं है, वही संसार में सचमुच सुखी और समृद्ध है, वही जीवन्मुक्त है।

 

प्रह्लाद, आत्मज्ञान प्राप्त हो जाने तथा ब्रह्म में समाधिगत हो जाने पर भी, भगवान् हरि के स्पर्श से इस भौतिक चेतना में उतर आया था; क्योंकि उसमें संस्कारों का अवशेष मात्र रहा हुआ था। पर वे संस्कार शुभ वासनात्मक ही थे। जीवन्मुक्त सन्तों में वासनाएँ भस्मीभूत बीज के समान शेष रहती है, उनमें पुनर्जन्म की शक्ति नहीं रहती। जिस प्रकार गहरी निद्रा में वासना बीज के समान अनंकुरित अवस्था में रहती है, उसी प्रकार शुभ वासनाएँ, सात्त्विक ज्ञान से सम्पर्क रखने के कारण, ध्यानी जीवन्मुक्तों में भी रहती हैं। जब तक शरीरपात नहीं होता, तब तक जीवन्मुक्तों में वासना के अवशेष अन्तर्हित अवस्था में विद्यमान रहते हैं। धीरे-धीरे उनका विलोप होता है। जीवन्मुक्त पुरुष इस संसार की प्रत्येक वस्तु को शुभ वासनामयी दृष्टि से देखते हैं।

 

शुद्ध विचार और विवेक के अभ्यास से अपने-आपको इन पदार्थों के सम्पर्क से दूर ही रखना होगा। पदाथों के अभाव में अहं-भावना और ममत्व कहाँ, और इन दोनों के अभाव में पदार्थ भाव कहाँ? अतः बार-बार यही विचार करो और इसी विचार को अपने मन के अन्दर पुष्ट करो कि अहं-भाव और ममत्व के साथ पदार्थों का कोई सम्बन्ध नहीं है-दोनों एक-दूसरे से भिन्न-भिन्न हैं। अपने-आपको असीमित और अपार सच्चिदानन्द परब्रह्म के साथ एक समझो। इस भौतिक देह के अभ्यास का तो त्याग ही श्रेयस्कर है। विदेहमुक्त बन जाओ, जैसे राजा जनक थे। अब वासनाएँ रही कहाँ ?

 

यह कारण शरीर अज्ञान-जनित है। इसमें वासना और संस्कारों की प्रचुरता है। ब्रह्म अथवा आत्मा में वासनाएँ कहाँ ? वह तो शुद्ध, निर्विकार, निर्लिप्त और द्वन्द्वातीत है। आत्मा निरिन्द्रिय और अप्राण है। इन गुणों से युक्त ब्रह्म का सदा ध्यान करने से वासनाओं का क्षय हो जाता है। शुद्धि का अवतरण हो तो अशुद्धि कहाँ, या यों कहिए कि अशुद्धि का निवारण होते ही शुद्धि का अवतरण स्वाभाविक हो जाता है। अनुकूलता से प्रतिकूलता का समाधान होता है-यह प्रकृति का महाविधान है।

 

वासनाओं का नाश कर (इस मन का भी नाश कर) दो और सदा के लिए सच्चिदानन्द ब्रह्म में संस्थित रहो। उस अमर ब्रह्म-पद की प्राप्ति करो, जहाँ परम आनन्द, शाश्वत सुख और नित्य-तृप्ति है।

 

सृष्टि की सभी शिल्पशालाओं में शरीर रूपी शिल्पशाला अत्यन्त अद्भुत है। यह मानव द्वारा नहीं, ईश्वर द्वारा बनायी गयी है। इस आश्चर्यजनक शिल्पशाला में वासनाओं को इच्छाओं में बदला जाता है, अशुभ वासनाओं का दमन होता है, शुभ वासनाओं का उत्पादन किया जाता है तथा विचारों की श्रृंखला जोड़ी जाती है; अन्त में महामूल्यवान् वस्तु ब्रह्मज्ञान रूपी नवनीत (मक्खन) - उसमें से मथ कर निकाल लिया जाता है।

 

इस अद्वितीय शिल्पशाला के अदृश्यभूत महाशिल्पी, तुम्हारी जय हो! आश्चर्यजनक वस्तुओं से भरी पूरी तथा आज तक की अज्ञात शिल्पशाला के शासक और राजा! तुम्हें प्रणाम है, नमस्कार है और पुनः नमस्कार है।

 

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वासनाओं का दमन कठिन है। मान लेता हूँ कि आप सुमेरु पर्वत को स्थानच्युत कर सकते हैं; किन्तु सन्देह होता है, जब कहते हैं कि आपने अपनी वासनाओं का दमन कर लिया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि वासना दमन का कार्य असम्भव है। मैं तो यह भी कहूँगा कि विलक्षण, दृढ़ निश्चयी और लौह-सदृश्य संकल्पवान् के लिए वासनाओं का दमन करना अत्यन्त सरल कार्य है, जब कि साधारण व्यक्ति के लिए वासनाओं के बन्धन से मुक्ति पाना असाध्य हो जाता है।

 

व्यक्तियों के अन्तस्तल पर वासनाओं का तीव्र असर हुआ करता है। वासनाएँ उनके मन पर अधिकार स्थापित कर लेती हैं और उनको अपना शिकार (या दास) बना लेती हैं। सच बात तो यह है कि वासनाएँ मादक द्रव्यों, कोकेन और अफीम से भी अधिक नशीली होती हैं; क्योंकि इन नशीले पदार्थों का असर कुछ ही घण्टों तक रहता है, जब कि वासनाओं का प्रभाव अनेकों सालों तक मनुष्य को दुःखी और सन्तप्त करता रहता है। कुछ ही साल क्यों, अनेकों जन्मों में भी वासनाओं का प्रभाव वैसे का वैसा ही बना रहता है और जब तक आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब तक वह जोंक के समान मनुष्य से चिपटी रहती हैं।

 

जो वासनाओं के अधीन हो कर चलते हैं, वे दुनिया में अजीब ढंग के पियक्कड़ हैं। उनमें सत्य और असत्य का निर्धारण करने वाली विवेक-बुद्धि नहीं है। उनकी बुद्धि सदा मेघाच्छन्न आकाश-सी रहा करती है। भोग-पदार्थ के लिए वे सदा लालायित रहा करते हैं। वासनाओं का प्रभाव उन पर इतनी प्रबलता से होता है कि वे परिणामों के बारे में कुछ भी नहीं सोच सकते। उनकी स्मरण-शक्ति निर्बल हो जाती है। वे बार-बार बेशर्म की तरह उन्हीं कामुक प्रवृत्तियों में लिप्त रहते हैं। जब वे वासना के पंजे में जकड़े रहते हैं, उनकी बुद्धि कार्य-निर्धारण में असफल हो जाती है। विषय-वासनाओं को बार-बार दोहराने से और भोगने से वासनाएँ गहरी और दृढ़ हो जाती हैं, अर्थात् भोग-विलास से वासनाओं को बल मिला करता है। वासना जितनी गहरी होगी, उतनी ही उसकी शक्ति और उतना ही अधिक मनुष्य में भ्रम और अहंकार तथा अज्ञान होगा।

 

वासनाओं से दबे और भ्रमित व्यक्ति अशुद्ध कार्य किया करते हैं। उनमें अहंकार, आत्म-अभिमान और गर्व की प्रचुरता होती है। उनके मन में सदा बुरे विचार चक्कर लगाया करते हैं। उनके जीवन का केवल मात्र लक्ष्य भोग-विलासों में आनन्द लेना है।

 

विषय-भोगों की पूर्ति के लिए वे अयुक्त, असत्य, अयोग्य और अनर्थकारी रीतियों से धन-सम्पत्ति का संग्रह करते हैं, सदा असंख्य आशाओं और प्रतीक्षाओं से भरे रहते हैं। धन प्राप्त करने के लिए वे हर प्रकार का अधम कार्य करने पर सन्नद्ध हो जाते हैं। धन ही उनका सर्वस्व है और धन ही उनका भगवान्। ऐसे व्यक्ति लोलुप और क्रोधी होते हैं। छल-कपट, धूर्तता, क्रोध, पाखण्ड, षड्यन्त्र और बेईमानी उनमें कूट-कूट कर भरी हुई रहती है।

 

लौकिक प्रकृति के व्यक्ति सदा प्रशंसा की अपेक्षा करते हैं और निन्दा से दूर रहना चाहते हैं। उनके प्रत्येक कार्य इस लक्ष्य और प्रकार से किये जाते हैं कि लोग उनकी प्रशंसा करें, 'वाह-वाह' के नारे लगायें, उनके कारनामों की तारीफें करें। इस वासना को भी अशुभ वासना कहा जाना चाहिए। यही लोक-वासना है। क्या यह कभी सम्भव है? नहीं, कभी नहीं। संसार की खाज को आज तक कोई नहीं मिटा सका। क्या उस वृद्ध बाप, युवा पुत्र और गधे की कहानी नहीं सुनी है, जो हर प्रकार के उपायों को बरत कर भी दुनिया को खुश नहीं कर सके थे? तुम विशालतम बरतन का मुँह अच्छी तरह बन्द कर सकते हो; किन्तु अनेकों मुख वाले इस संसार को चुप करना कठिन ही नहीं, असम्भव है। कुछ प्रशंसा करेंगे और कुछ निन्दा। अतः सन्तुलित और समतापूर्ण मन बनाये रखो। निन्दा और प्रशंसा से ऊपर उठना होगा। प्रशंसा को सूअर की विष्ठा या हलाहल विष के समान समझते हुए लोक-व्यवहार करना होगा। निर्द्वन्द्व अवस्था की प्राप्ति करनी होगी। तभी आनन्दमय बन सकोगे। तभी तुम्हारे अन्दर शान्ति और प्रसन्नता का अपार सौन्दर्य निखरने लगेगा।

 

औरों की क्या पूछते हों, दुनिया ने श्री राम, भगवान् श्री कृष्ण, महादेव शिव और भगवती सीता तक की निन्दा करनी नहीं छोड़ी। दुनिया में ऐसे-ऐसे महान् पुरुषों की भी उनके समय में और आज तक निन्दा होती रही है। संसारी उन पर तरह-तरह के दोष आरोपित करते हैं। जब दुनिया वालों का भगवान् के प्रति ऐसा व्यवहार है, तो साधारण व्यक्ति के प्रति क्या पूछना ?

गोरा आदमी काले को पसन्द नहीं करता है और वैसे ही काला आदमी भी। आर्यसमाजी सनातनी से खार खाता है और सनातनी आर्यसमाजी से। शैव और वैष्णव की आपस में नहीं बनती। प्रोटेस्टेण्ट और कैथोलिक सम्प्रदाय का भी आपस में यही हाल है। मनुष्य का तो यह स्वभाव ही है कि वह अपनी भूमि, अपने देश, परिवार, सम्प्रदाय, समाज, अपनी पूजा-पद्धति, अपने धर्म और अपनी भाषा की प्रशंसा और दूसरे की निन्दा करे। यह अल्प बुद्धि के कार्य हैं, जिनका जन्म अज्ञान से हुआ है; क्योंकि जब व्यक्ति का हृदय आध्यात्मिक संस्कृति की साधना से विकसित हो जाता है और जब उनमें आत्मा का ज्ञान प्रस्फुटित हो जाता है-तब उपरोक्त वासनाओं का लेश मात्र भी नहीं रहता। इस विषय पर अच्छी तरह विचार कीजिए, मनुष्य की अवस्था कितनी शोचनीय और पतित हो चुकी है; वासनाओं का कुप्रभाव उस पर किस प्रकार अंकित हो चुका है। इतना होने पर भी वह वासना के उन्मूलन के लिए कुछ नहीं कर रहा है। जोंक की तरह हमेशा चिपके रहना ही उसे पसन्द है और 'मैं ठीक कर रहा हूँ' - यही उसका पूर्ण निश्चय है। सच कहा जाये तो वह इस मनुष्य-देह में ही गधे से गया-बीता काम कर रहा है।

 

धर्म-सम्बन्धी अनेक ग्रन्थों का अध्ययन भी अशुभ वासना के अन्तर्गत माना जाता है। इसे शास्त्र-वासना के नाम से कहा गया है। बात ठीक है, आत्मा या ब्रह्म किताबों में तो नहीं पाया जाता है। कुछ व्यक्तियों की धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने में बड़ी आसक्ति रहती है। वे व्यावहारिक आध्यात्मिक साधना से बहुत दूर रहा करते हैं। उनका जीवन केवल अध्ययन करते-करते बीत जाता है। उनको किताबों का कीड़ा कहना चाहिए। शास्त्रों का पार कहाँ; वे अनन्त हैं। जीवन छोटा है। रास्ते में भी बड़ी-बड़ी बाधाएँ हैं। अतः तत्त्व की बात जान कर तथ्य को ग्रहण करना चाहिए और उसे अपने आचार-विचार के साथ समीकृत कर लेना चाहिए। आत्मा ही तत्त्व है। आत्मा का साक्षात्कार कर लेने पर आपके लिए वेदों का कुछ मूल्य नहीं रह जाता। भरद्वाज ने तीन जन्मों में केवल वेदों का अध्ययन किया। चौथे जन्म में भी वह वेदों का अध्ययन करता जा रहा था। तब देवराज इन्द्र ने कर उसको इस बन्धन से मुक्त किया। इन्द्र ने भरद्वाज को ब्रह्मविद्या की दीक्षा दी और कैवल्य के मन्त्र से पुनीत किया। देवराज के कथनानुसार भरद्वाज ने वेदाध्ययन को मुक्ति दे कर अनवरत ध्यान का अभ्यास किया और उसी जन्म में आत्मा का परोक्ष ज्ञान भी प्राप्त कर लिया।

 

किन्तु सबसे शक्तिशाली वासना है-काम-वासना अतः पूरी शक्ति के साथ काम-वासना का दमन करना चाहिए (और शिश्नेन्द्रिय का सर्वप्रथम)

 

अनेकों विषयों का अध्ययन भी अशुभ-वासना के अन्तर्गत है। यह भी शास्त्र-वासना का एक अंग है। एक बार दुर्वासा महर्षि एक गाड़ी-भर ग्रन्थ ले कर शिव जी के पास गये। वहाँ नारद जी ने उनको एक गधे की उक्ति सुनायी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार गधा अपने ऊपर चन्दन लादे जाने पर भी चन्दन के अस्तित्व से अनभिज्ञ रहता है और केवल बोझ का ही अनुभव करता है, उसी प्रकार ग्रन्थाध्यायी पण्डित भी पुस्तकों का कीड़ा बन कर मात्र उनके बोझ का ही वहन करता है, कि सार का ग्रहण। उनके इस कथन से दुर्वासा को ज्ञान हो गया, वे सब-कुछ समझ गये उन्होंने सभी ग्रन्थों को सागर में डुबा दिया। तब जा कर शिव जी ने उनको ब्रह्मज्ञान की दीक्षा दी। दुर्वासा ने गम्भीर ध्यान द्वारा आत्म-पद को प्राप्त किया। कठोपनिषद् की उक्ति है : "आत्मा प्रवचन, बुद्धिमत्ता और श्रवण अथवा विद्वत्ता -किसी के द्वारा भी प्राप्त नहीं किया जा सकता है।"

 

विद्वत्ता का अहंकार भी शास्त्र-वासना के अन्तर्गत है। आत्मज्ञान के मार्ग का यह बड़ा भारी रोड़ा है। इस प्रकार के अहंकार से अभिमान में दुगनी शक्ति आती है तथा अविद्या का अन्धकार और भी गहनतम हो जाता है। उद्दालक का पुत्र श्वेतकेतु अपनी विद्वत्ता के घमण्ड में फूल गया था। उसने पिता से उचित व्यवहार नहीं किया। उद्दालक ने तुरन्त एक प्रश्न पूछ कर उसके अहंकार को धूसरित कर दिया- "तुमने, हे श्वेतकेतु, क्या विज्ञानों के विज्ञान का भी ज्ञान प्राप्त कर लिया है, जिससे तुम सभी ज्ञानों में पारंगत हो सकोगे ?" श्वेतकेतु 'नहीं' के अतिरिक्त और कोई दूसरा उत्तर नहीं दे सका। तब उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को, जो तुरन्त गुरुकुल से शिक्षा पा कर लौटा था, ब्रह्मविद्या सिखलायी, जिसे 'महाविज्ञान' की संज्ञा दी गयी।

 

अब रही देह-वासना, वह क्या है? फूल की मालाओं से शरीर को सुन्दर बनाये रखने की इच्छा, सुगन्धित तैलों का सेवन, पाउडर इत्यादि का उपलेप, शरीर को सुन्दर और कोमल बनाने के सभी सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग, देह के प्रति अनावश्यक और आवश्यकता से अधिक आसक्ति-यही देह-वासना है। देह के प्रति वासना को ही 'देह-वासना' कहा जाता है।

चंचल मन पर विजय पाइए

 

अपने मन की आदतों और उसके रिवाजों को अच्छी तरह जानना चाहिए। तभी मन पर नियन्त्रण स्थापित करना आसान होगा और तभी संकल्प को शक्तिमय, स्मृति को विकसित और विचारों को परिशुद्ध कर सकोगे। मन की एक आदत (जो सबसे मुख्य है) इधर-उधर घूमने की है। एक लक्ष्य पर जमे रहना मन के लिए, सम्भव नहीं-सा है। यह वायु की तरह इधर-उधर घूमता रहता है। यही भगवान् श्री कृष्ण से अर्जुन ने कहा था-

 

चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम्

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।।

 

"मन चंचल है, हे कृष्ण! प्रमथन करने वाला है, बली और दृढ़ है यह। इसका निग्रह वायु के समान दुष्कर है" (गीता : /३४)

 

इस पर श्री कृष्ण ने कहा- "हे अर्जुन, निस्सन्देह मन का निग्रह कठिन है और यह चंचल भी है; किन्तु निरन्तर अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इस पर नियन्त्रण स्थापित किया जा सकता है।" यहाँ पर भगवान् श्री कृष्ण मन पर नियन्त्रण स्थापित करने का सुगम उपाय संक्षेप में सूचित कर रहे हैं। मन पर विजय पाने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि हम इच्छाओं का उन्मूलन करें और इन्द्रियों पर अपना अधिकार पूर्णतया स्थापित कर लें। मन के चंचल होने का कारण और है ही क्या-केवल इच्छा ही तो मन को व्यग्र और उद्विग्न बनाया करती है। इन्द्रियाँ विषयों के पीछे भागा करती हैं और मन इन्द्रियों का अनुसरण करता है, जैसे कुत्ता स्वामी का। विषय-पदार्थों में रमे रहने के कारण मन की वृत्तियाँ (या किरणें) इतस्ततः बिखरी हुई रहती हैं। विषय-पदार्थों को पाने, उन पर अपना अधिकार स्थापित करने तथा उनको भोगने की इच्छा होने के कारण मानसिक शक्तियाँ छितरी हुई रहती हैं। अभी-अभी मन सुन्दर गीत सुनना चाहता है तो वह अपने पाँव और कानों को आदेश देता है। पाँव उसे वहाँ ले जाते हैं। कानों से वह सुन्दर गीत का आनन्द लेता है।

 

यह क्षुद्र जीव (प्राणी, मनुष्य) मन और इन्द्रियों के पाश में बंध जाता है। कुछ ही देर में जीभ कहती है- 'चलो, ताजमहल होटल तक चलें। वहाँ प्रथम श्रेणी की काफी पीयेंगे।'

 

इसी प्रकार कुछ देर में शिश्नेन्द्रिय उत्तेजित हो जाती है और मनुष्य में काम-वासना प्रज्वलित होने लगती है। मनुष्य अन्धा हो कर इन इन्द्रिय-पाशों में फंसता चला जाता है। पाँचों इन्द्रियाँ उसे इधर-उधर भटकाती रहती हैं, उसे क्षण-भर का विश्राम नहीं मिलता। पाँचों ज्ञानेन्द्रियों और क्षुद्र जीव के साथ-साथ मन इनमें रमण करता है।

 

यदि रमण करते हुए मन पर नियन्त्रण स्थापित करना है, तो सभी प्रकार की बासनाओं और इच्छाओं का त्याग कर देना होगा और इन्द्रियों पर अपना पूर्ण आधिपत्य जमा लेना होगा। तभी धारणा, ध्यान, स्मृति-साधना और विचार-साधना में सफलता प्राप्त हो सकती है।

 

जब-जब मैं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पूर्व पंजाब तथा कश्मीर में पर्यटन के लिए गया, तो अनेकों शिक्षित व्यक्तियों से मिला था। वे मुझसे पूछते थे-'स्वामी जी, एकाग्रता और ध्यान किस प्रकार किये जायें? हम लोग पिछले १५-२० सालों से एकाग्रता में संलग्न हो रहे हैं और ध्यान भी करते रहे हैं, किन्तु सफलता अभी तक नहीं मिल पायी।'

 

इसका कारण यही है कि वे लोग ध्यान करने का वैज्ञानिक और वैधानिक तरीका अभी तक नहीं समझ पाये हैं। उन्होंने चित्त शुद्धि नहीं प्राप्त की है। उनमें लोक-वासना वर्तमान है। उनका मन सन्तुलित और अनुशासनबद्ध नहीं है। इन प्रारम्भिक आवश्यक साधनाओं में सफल हुए बिना ही वे असम्भव कार्य करना चाहते हैं। यह कैसे सम्भव हो सकता है? यह तो किसी हाथी को डोरी से बाँधने का असफल प्रयास हुआ। श्री कृष्ण भगवान् ने अस्थिर मन को स्थिर करने के लिए यह उपदेश दिया है-"मन की कल्पनाओं से जन्यमाण सभी इच्छाओं को त्याग कर, चारों ओर से इन्द्रियों के व्यापारों पर नियन्त्रण स्थापित कर, धीरे-धीरे उसे (साधक को) समता की प्राप्ति करनी चाहिए, और मन को आत्मा में प्रतिष्ठित करने पर और कुछ विचारना नहीं चाहिए। जब और जितनी बार अस्थिर और उत्तेजित मन भटके, उतनी ही बार उसे लगाम डाल कर अपने नियन्त्रण में ले आना चाहिए।"

 

इस अभ्यास से क्या फल मिलता है? जिसका मन शान्त है, जिसने अपने कामपूर्ण स्वभाव का दमन कर दिया है और जिसकी वासनाएँ जल कर राख हो चुकी हैं तथा जो दोषहीन जीवन बिता रहा है, उस योगी के लिए निर्विकार और शाश्वत आनन्द का द्वार सदा खुला रहता है।

 

श्री कृष्ण भगवान् के उपदेशों पर ध्यान दो- 'सभी इच्छाओं को बिना किसी विचार के त्याग देना चाहिए।' प्रायः देखा जाता है कि कुछ लोग आत्म-तृप्ति के लिए अपने मन में कुछ इच्छाएँ रखे रहते हैं। उनके मन में कुछ--कुछ इच्छाएँ वर्तमान रहती हैं। एक गृहस्थी, जो एकाग्रता और ध्यान का अभ्यास करता है, पूर्णतः इच्छाहीन हो, ऐसा हो ही नहीं सकता; कुछ--कुछ इच्छा उसमें आत्म-सन्तोष के लिए छिपी हुई रहेगी। इससे यह होता है कि उन लोगों की शक्ति निचले छेद से चूती रहती है और परिणाम स्वरूप वे विशेष उन्नति नहीं कर सकते हैं। अभ्यास करते-करते वे चार-पाँच सीढ़ियाँ पार कर लेते हैं, किन्तु सहसा नीचे गिरते हैं। मानसिक विक्षेप और मन के परिभ्रमण को रोकने के लिए परिपूर्ण वैराग्य की आवश्यकता है। इन्द्रियों का चारों ओर से दमन होना चाहिए।

 

इन्द्रियों में से किसी एक का नियन्त्रण करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सभी इन्द्रियों को सभी ओर से काबू में करना होगा। यह मुख्य विषय है, इसे भूलना चाहिए। यह जरूर है कि अभ्यास और साधना कठिन तथा परिश्रमपूर्ण हैं; किन्तु इससे हतोत्साह हो जाने की कोई आवश्यकता नहीं। साधना करते रहो और धैर्यपूर्वक उसकी प्रतिक्रिया पर भी ध्यान देते जाओ। कुछ लोगों में यह गलती है कि वे अत्यन्त उत्साह और धड़ल्ले से साधना आरम्भ कर देते हैं। तीन महीनों तक वे छह घण्टे रोज एकाग्रता का अभ्यास किया करते हैं; किन्तु तीन महीनों के बाद, जब देखते हैं कि उनको कोई भी सिद्धि प्राप्त नहीं हुई, अभ्यास को त्याग देते हैं। यह बहुत बुरा काम है। तभी श्री कृष्ण भगवान् कहते हैं- "धीरे-धीरे अभ्यास करना आरम्भ करो और उस अभ्यास में नियमित रहो।" अर्थात् अभ्यास का सम्पालन नित्य-प्रति करते रहो। मन को बार-बार एक लक्ष्य पर निर्धारित करना, एक बिन्दु पर अनुविद्धित करना अभ्यास कहलाता है। मन की एकाग्रता को धारणा कहते हैं। जब अस्थिर मन स्थिर और शान्त हो जाता है, उस अवस्था को 'एकाग्रता की अवस्था' कहते हैं। एकाग्रता में मन की वृत्ति एकाकार हो जाती है।

 

नये साधकों के लिए एकाग्रता का अभ्यास श्रमदायक और रुचिहीन प्रतीत होता है; किन्तु एकाग्रता का विज्ञान संसार के सभी विज्ञानों से अधिक रुचिकर और लाभदायक है। जब व्यक्ति धारणा में आगे कदम बढ़ाता जाता है, जब उसे एकाग्रता के अभ्यास में रुचि होने लगती है, जब उसे एकाग्रता के लाभ स्पष्ट प्रतीत हो जाते हैं, वह अभ्यास को कदापि नहीं छोड़ता। यदि एक दिन का भी अभ्यास छूट गया, तो वह विकल हो जाता है। ऐसे साधक के लिए एकाग्रता का मूल्य आँकना कठिन है। एकाग्रता उसके लिए परम आनन्द, आन्तरिक आध्यात्मिक शक्ति, असीमित दिव्य वैभव और अनन्त शान्ति है। एकाग्रता के फल-स्वरूप साधक को ब्रह्मज्ञान होने लगता है, दिव्य चक्षु खुल जाते हैं और परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है। तीनों लोकों में यह अपूर्व विज्ञान है। इसके लाभों को पूर्णतया दिग्दर्शित करना मेरे लिए असम्भव है।

 

अब एक कुर्सी पर मन को स्थापित करें। इसका अर्थ है कि हम कुर्सी के सभी भागों का अच्छी तरह ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। कुर्सी किस लेकड़ी की बनी हुई है, कौन-सा रंग उस पर चढ़ाया गया है, उसके भाग किस प्रकार सम-विभक्त है, जुड़ाई और ठुकाई किस प्रकार से की गयी है तथा किस शिल्पी ने उसे तैयार किया है, इत्यादि-इत्यादि अतः जब हम कुर्सी पर मन को एकाग्र करना चाहते हैं, तो इन बातों पर अवश्य विचार करना होगा। ऐसा नहीं करने पर मन इधर-उधर घूमता रहेगा। जब मन एक लक्ष्य में तन्मय हो जाता है, उसे इधर-उधर भटकने की याद नहीं रहती, वह एकाग्र हो जाता है। पर जब तक मन को किसी एक लक्ष्य में स्थित किया जाये, वह इधर-से-उधर भटकता रहता है।

 

यदि मन की चंचलता को ध्यान से देखें, तो पता चलेगा कि उसके भटकने में एक प्रकार का नियम है। एकाग्रता की कड़ी के बिखरे रहने पर भी सम्पर्क-भाव बना रहता है। मन एक पुस्तक की बात सोचते-सोचते किताबघर की बातें सोचने लगता है। किताबघर की बातें सोचते-सोचते वह रेलवे बुक स्टाल में पहुँच जाता है और फिर पुस्तक के प्रकाशक की याद करता है। स्कैटिंग का स्मरण करते ही वह आल्प्स पर्वतों में पहुँच जाता है। चीड़ के वृक्षों की याद आते ही मन को अल्मोड़ा की याद आने लगती है और अल्मोड़े का विचार आते ही उसे स्वामी विवेकानन्द जी की याद आने लगती है, जिन्होंने मायावती में अद्वैत आश्रम की संस्थापना की थी। यहाँ पर मन अद्वैत भावों में भी रम सकता है; क्योंकि उसका सम्पर्क अद्वैत आश्रम से स्थापित हो चुका है। यह भी हो सकता है कि वह वहीं से विषय-वासनाओं में चक्कर लगाने लगे। अल्मोड़ा की वेश्याओं की याद भी उसे सकती है। मन की शुद्धता पर विचारों की प्रणाली निर्भर रहती है।

 

उपर्युक्त सभी घटनाएँ क्षण मात्र में मन के अन्दर घट जाया करती हैं। मन इतनी तीव्रता और तड़िद्वेग से दौड़ लगाता है कि कल्पना तक नहीं की जा सकती। पहले मन एक विषय को पकड़ता है, उस पर विचार करता है और तब तज्जन्य सम्पर्क से अन्य बातें सोचने लगता है। यह भी एकाग्रता है, यद्यपि इस एकाग्रता को अविच्छिन्न नहीं कहा जा सकता। जब मन एक ही प्रकार के विचारों में रमता है, तो उसे तैलधारावत् अविच्छिन्न धारणा कहते हैं। अतः साधक को चाहिए कि विषय से अलग हट कर, दौड़ते हुए मन को, बार-बार पूर्व-विषय में स्थित करे और उसी विषय-सम्बन्धी विचारों को सोचे। यह आध्यात्मिक साधना है। यह योगाभ्यास है। यही धारणा और ध्यान है। इस साधना का पूर्ण विकास समाधि में होता है, जो अतिचेतन अवस्था है, जिसे तुरीय अवस्था भी कहते हैं।

 

एकाग्रता में यह बात विचारणीय है कि प्रारम्भ में मन को एक ही विषय में एकाग्र किया जाये, अर्थात् मन को एक ही बात सोचने के लिए अभ्यस्त करना चाहिए। इतना अवश्य है कि मन उस विषय से सम्बन्ध रखने वाली सभी घटनाओं और विषयों के बारे में विचार कर सकता है। उसे अन्यत्र नहीं जाने देना चाहिए। कुछ समय बाद, अभ्यास करते-करते मन केवल एक ही विषय के एक ही विचार को सोचने में सिद्ध हो जायेगा। अनवरत और अविचलित साधना का यही सुन्दर पुरस्कार मिला करता है।

 

जब हम किसी मेज का विचार करते हैं, तो मेज से सम्बन्ध रखने वाली सभी बातों का विचार करें और मेज-सम्बन्धी जो-जो घटनाएँ अपने जीवन में घट चुकी हैं, उनका विचार करें। आज तक कितने प्रकार की मेजें देखी हैं, उन पर गम्भीर विचार कर याद करने का प्रयत्न करें कि मित्र योगेश के यहाँ की मेज में क्या विशेषता है, इत्यादि-इत्यादि। जिस प्रकार तेल की धारा एक बरतन से दूसरे बरतन तक अविच्छिन्न रहती है; जिस प्रकार गिरजाघर की घण्टी लगातार बजती रहती है, ठीक उसी प्रकार विचार भी निर्बाध गति से बहते रहने चाहिए। एक ही विषय से सम्बन्ध रखने वाले विभिन्न विचार हो सकते हैं, आरम्भ में उनको भी विषय के अन्तर्गत कर दिया जाये। धीरे-धीरे उन सम्पर्क-जनित विषयों को अर्थात् विषय से सम्बन्ध रखने बाले विचारों की संख्या को कम करते जायें। उनको कम करते-करते कुछ काल के बाद केवल एक ही विषय पर जाना चाहिए। यहाँ पर धारणा की पूर्ति हो जाती है। जब इस (एक) विचार का भी लय हो जाता है, तब समाधि का अवतरण होता है।

 

जब मन में केवल एक ही विचार रहता है, तो उसे 'सविकल्प समाधि' कहा जाता है। यह समाधि की निम्न अवस्था है। जब मन का अन्तिम विचार भी लय हो जाता है, जब मन में एक विचार भी नहीं रहता और जब सर्वथा विचारशून्यता जाती है, तो मन का अत्यन्ताभाव हो जाता है। यह मानसिक शून्यता है। इस स्थिति को महर्षि पतंजलि के शब्दों में 'निर्विचार की अवस्था' घोषित किया गया है; किन्तु साधक ने तो इस स्थिति से भी ऊपर जाना है, जहाँ वह ब्रह्म-दर्शन कर सकेगा और असीम शान्ति की प्राप्ति भी। जब वह इस अवस्था की प्राप्ति कर लेगा, तभी कहा जा सकता है कि चरम सीमा में पदार्पण कर दिया गया है।

 

मन तो जड़ वस्तु है, किन्तु अधिष्ठान आत्मा से जीवन-ज्योति पा कर चैतन्यवत् दिखलायी देता है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में रखा गया जल सूर्य की गरमी से गरम हो जाता है, उसकी अपनी स्वतन्त्र गरम सत्ता नहीं होती, उसी भाँति मन जड़ होते हुए भी ब्रह्म से जीवन-संचरण प्राप्त कर चैतन्य वस्तु के समान ही आभासित होता है। बुद्धि का प्रतिबिम्ब मानस-प्रदेश में बिम्बित होने पर मन सक्रिय और चेतन प्रतीत होता है। सत्यद्रष्टा ऋषियों ने यही कहा था। यहाँ पर हम यह कहना नहीं भूलते कि पश्चिम के मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक अभी अन्धकार की खाई में ही हैं, अभी तक उनको अज्ञान ने ही दबा रखा है। उनका कहना है कि विचार और मन से परे कुछ नहीं है, बुद्धिवाद ही जीवन की चरम सीमा है। हम उनसे और क्या कहें, केवल यही कि 'तुम जो कुछ सोचते हो, सोचते ही जाओ। तुम्हारा जो कुछ भी विश्वास है, उसी पर अपने को स्थिर रखो।' किन्तु कभी--कभी उनको सत्य को अंगीकार करना ही होगा, अन्य मार्ग है ही कहाँ? कुछ दार्शनिकों और मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मन मस्तिष्कजन्य स्खलन है। हद है ऐसे विश्वास की। अब जा कर वे मानस-द्वय के सिद्धान्त को समझ पाये हैं, जिसका विस्तारपूर्वक वर्णन भारतीय सन्तों ने दीर्घ काल पूर्व कर दिया था। सच पूछो तो मन आत्मा के समान स्वयम्भू और स्वयं-ज्योति नहीं है। वह तो आत्मा के प्रकाश से प्रकाश ले कर प्रकाशित हुआ दीखता है। पावस ऋतु में खद्योत के समान है वह। आत्मा सूर्यों का सूर्य और सभी प्रकाशों का परम प्रकाश है। शास्त्रों ने उसे परम ज्योति, अनन्त ज्योति और स्वयं-ज्योति के नाम से सूचित किया है।

 

अच्छा, फिर अपने पूर्व-प्रसंग की ओर चलें। जब हम कुर्सी पर मन को एकाग्र करने का अभ्यास करते हैं, तो अन्य वस्तुओं के विचारों को मन के अन्दर आने दें। यदि मन अस्थिर हो कर इधर-उधर भाग भी रहा है, तो उसे फिर-फिर कर वापस ले आते रहें। गुलाब के फूल पर मन को एकाग्र करना चाहें, तो केवल गुलाब की ही भावना में तन्मय हो जाना चाहिए। किसी पुस्तक पर अपने विचारों को स्थिर कर रहे हैं, तो पुस्तक से इतर किसी का विचार किया जाये। किसी एक वस्तु का विचार करने पर दूसरी वस्तु की कल्पना को अपने मन के अन्दर आने दें और यदि मन अपने लक्ष्य से भागने लगे, तो उसे बार-बार उसी लक्ष्य पर ले आयें।

 

जितनी देर तक हो सके, उस विषय पर विचार करते रहो, तत्सम्बन्धी सभी विचारों को समाप्त कर दो। इसके लिए अपना प्रिय विषय चुन लो; किन्तु ध्यान रहे कि वह विषय अशुभ और अशुद्ध हो-आदर्शवादी हो सकता है, कोई हानि नहीं। एक समय पर केवल एक ही काम करना और वह भी सफलता के साथ, अपेक्षाकृत वह एक ही श्रेयस्कर है।

 

अब अपने हाथों में कोई काम लो, उसकी सफलता के लिए अपना पूरा तन-मन लगा दो। पूरे दिल से काम करो। एकाग्रता से काम करो एकाग्रतापूर्वक काम करने से घण्टे का काम मात्र आधे घण्टे में सुविधापूर्वक किया जा सकता है। यह यौगिक प्रक्रिया है। एकाग्रतापूर्वक कार्य करने से पूर्ण योगी बन जाओगे

 

इसी प्रकार अध्ययन भी पूरे ध्यान से करो। मन को भटकने दो। बाहरी शब्दों से मन को असंस्पृष्ट रखो मात्र लक्ष्य पर ही दत्तचित्त रहो। आँखों को भी इधर-उधर दौड़ने दो। अध्ययन करते समय खाने, पीने या मित्रों की बातें सोचा करो। उतनी देर के लिए सारा संसार मन से अदृश्य हो जाना चाहिए। एकाग्रता हो तो इस प्रकार की। यह असम्भव नहीं है, किन्तु अभ्यास पर निर्भर है। कुछ काल तक निरन्तर अभ्यास करते रहने से और धैर्यपूर्वक व्रत पर दृढ़ रहने से एकाग्रता का अवतरण हो जायेगा। देर भी हो तो दुःखी नहीं होना चाहिए। हताश और निराश नहीं होना चाहिए। सम्भव है कि कुछ देर हो, अतः शान्ति और ठण्ढे दिल से प्रतीक्षा करो। तक्षशिला का निर्माण क्या एक ही दिन में हुआ था? हथेली पर रखते ही क्या दही जम जाती है? समय चाहिए, समय-प्रत्येक कार्य के लिए समय की आवश्यकता है। समय की पूर्ति होते ही सफलता का अवतरण होता है; पर अभ्यास एक दिन के लिए भी नहीं छूटना चाहिए, चाहे आप बीमार ही क्यों हों। असफलता यदि निराशावाद की जननी हुई तो सफलता की वर्णमाला है। ठोकर खा कर ही तो बच्चा चलना सीखता है और तुतलेपन के अन्दर ही तो मानव की वाणी का रहस्य अन्तर्निहित है। निर्बलता नवीन साहस और शौर्य का सुप्रभात लायेगी। अतः बढ़े चलना चाहिए, आगे धँसते जाना चाहिए। कमर कस लेनी चाहिए। निराशा को दूर भगा देना चाहिए। उत्साह के साथ आगे चलते रहना चाहिए। शौर्य के साथ आगे चलना चाहिए। खुशी के साथ आगे चलना चाहिए। ज्योतिर्मय भविष्य हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। अभ्यास करना आरम्भ कर दें। अनुभव करें, आनन्दित हों। योगी बन कर विश्व पर शासन करें।

 

मैं तुम्हें इसके लिए योग्य बना दूंगा। मेरी बात सुनो। सच्ची लगन के साथ काम आरम्भ कर दो। जाग जाओ। ज्योति की किरणें फूट रही हैं। अमरत्व की सन्तानो! ज्योति के पुत्रो, जागो! ब्राह्ममुहूर्त का आरम्भ हो रहा है। .३० बजने वाले हैं। एकाग्रता के अभ्यास का यही सुन्दर और अनुकूल समय है। स्मृति और संकल्प-शक्ति के विकास का यही स्वर्ण अवसर है। मन को अच्छी तरह काबू में रखने के लिए यही मंगलमय घड़ी है। वीरासन में बैठ कर सच्चे दिल से अभ्यास आरम्भ कर दो। सफलता की प्राप्ति अवश्य करोगे। मन को ब्रह्म में लीन कर दो-ज्ञान, आनन्द और परम शान्ति की प्राप्ति करो।

योगाभ्यास अथवा आत्म-संयम

 

ऋषियों में इन्द्रियों का संयम स्वाभाविक है। उनकी इन्द्रियाँ सदा संयम की अवस्था में रहती हैं। वह इन्द्रियों के व्यापारों से विचलित नहीं हुआ करते। इन्द्रिय-दमन का अभ्यास साधकों के लिए है, जो प्रारम्भ में इन्द्रिय-जय करना चाहते हैं। इन्द्रियों की अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती; अतः पूर्ण सफलता पाने के लिए मन पर संयम की स्थापना अनिवार्य है। तात्पर्य यह हुआ कि इन्द्रियों का दमन करने के लिए मन का दमन अथवा मनोजय (अथवा मनोलय भी) आवश्यक है। यदि मन को विषय-पदार्थों से निरासक्त कर सको, तो इन्द्रियों पर विजय सहज में प्राप्त हो सकेगी।

 

अज्ञानी व्यक्ति दैहिक तपस्याएँ कर इन्द्रियों को विषय-पदार्थों से विमुख कर सकता है। रोगी के विषय में भी यही बात चरितार्थ होती है। रोगी की इन्द्रियाँ निर्बल हो जाती हैं; अतः वह विषयों से विमुख-सा हो जाता है। तपस्वी और रोगी-दोनों में विषय-वासना और विषयेच्छा किसी--किसी रूप में वर्तमान रहती है, पूर्णतः लुप्त नहीं हो पाती; परन्तु आत्म-द्रष्टा सन्त की सभी इन्द्रियाँ, उनकी विषय-वासनाएँ और विषयेच्छाएँ पूर्णतः भस्म हो जाती हैं, उनमें विषय की कामना भी नहीं रहती।

 

राजा का कोष यदि अच्छी तरह से सुरक्षित भी रहे तो चतुर चोर किसी--किसी तरह चालाकी से उसे लूट लिया करते हैं। इसी प्रकार आध्यात्मिक साधक विवेकादि गुणों से सम्पन्न हो कर अपनी भरसक शक्ति द्वारा इन्द्रियों पर नियन्त्रण स्थापित करता है; किन्तु इन्द्रियाँ इतनी चालाक होती हैं कि वे किसी--किसी तरह उसके मन को भटका ले जाती हैं। देखिए, विश्वामित्र कितनी दुष्कर तपस्या कर रहे थे; किन्तु इन्द्र द्वारा भेजी गयी अप्सरा ने उनकी इन्द्रियों को विचलित कर दिया और वे इन्द्रिय-वासना के जोर से बहा दिये गये।

 

राजा दुर्ग के बाहरी और अन्दर के द्वारों को बन्द कर अपने महल में निःशंक हो कर विश्राम करता है। उसके शत्रु अब उसे कष्ट नहीं दे सकते (क्योंकि उसने केवल अन्दर का द्वार बन्द किया, अपितु बाहरी प्रमुख द्वार को भी बन्द कर उस पर कड़ा पहरा डाल दिया है) इसी प्रकार योगी भी अपने शरीर महल का बाहरी फाटक बन्द कर लेता है (इन्द्रियों का निग्रह कर लेने पर विषय-वासनाएँ पास नहीं फटक सकर्ती); त्याग तथा शान्ति का अभ्यास कर मन की अशुभ वासनाओं तथा तज्जन्य संस्कारों के आन्तरिक द्वार भी बन्द कर देता है-अर्थात् तो बाहरी पदार्थ और आन्तरिक बासनाएँ ही उसे विचलित कर पाती हैं। इस प्रकार वह निःशंक हो कर आत्मा में विश्राम पाता है।

जिस प्रकार बालक माता की गोद में रह कर अत्यन्त सुख की अनुभूति करता है, जिस प्रकार सरदार सम्राट् को आत्म-समर्पण कर पूर्ण सुरक्षा और बचाव को निश्चित जानता है, उसी प्रकार साधक भी इन्द्रियों पर अपना पूर्ण नियन्त्रण कायम कर लेने के बाद भी तथा अपने को परमात्मा के चरणों में सौंप देने पर ही पूर्ण शान्ति और सुरक्षा का अनुभव करता है। इसी दृष्टिकोण से भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा- "सभी इन्द्रियों पर निग्रह स्थापित कर साधक को अपने को मुझे समर्पण कर देना चाहिए। जिसकी इन्द्रियाँ अपने वश में हो चुकी हैं, उसकी बुद्धि स्थितप्रज्ञ हो जाती है।"

 

इन्द्रियों का गुण है बहिर्मुख हो जाना। वे साधारण व्यक्ति को विषय-पदार्थों की ओर घसीट ले जाती हैं, उसकी वृत्ति को बहिर्मुख बना देती हैं; पर विवेक और वैराग्यशील साधक विषयों की ओर जाती हुई इन्द्रियों पर अपना नियन्त्रण रखता है और उनकी अस्थिरता पर रोक लगाता है-इस प्रकार बेकाबू घोड़े को लगाम से अपने वश में कर चतुर गाड़ीवान के समान निश्चित स्थान पर पहुँच पाता है। जैसे कछुआ अपने शरीर को चारों ओर से अन्दर खींच लेता है, उसी प्रकार सन्त पुरुष भी इन्द्रियों को विषय-पदार्थों से हटा कर अन्तर्मुख कर लेते हैं। इन्द्रियों के अन्तर्मुखी हो जाने पर ज्ञान अनवरत और निर्बाध हो जाता है। बुद्धि समान और शान्त हो जाती है।

 

यदि इन्द्रियों पर संयम की लगाम नहीं जोड़ी गयी, तो वे बड़ा उत्पात मचाती हैं। विषय-पदार्थों की धारणा (विषय-विचार) बुराइयों की जड़ है। इन्द्रिय-संयम में शान्ति और प्रसन्नता है। जिसकी इन्द्रियाँ विप्लवकारिणी हैं, वह क्षण-भर भी एकाग्रतापूर्वक विचारों को दृढ़ नहीं कर सकता है। उसमें ध्यान करने की शक्ति का सर्वथा अभाव रहता है। इन्द्रियों के संयम से शक्ति, आन्तरिक शान्ति, सन्तोष की भावना और अप्रतिहत ज्ञान की प्राप्ति होती है। विजितेन्द्रिय जीवन के महत्तम आनन्द की प्राप्ति कर लेता है। उसकी प्रसन्नता,