जीवन में सफलता के रहस्य

और

आत्म-दर्शन

 

Sure Ways for Success in Life and Good-Realisation

 

का हिन्दी रूपान्तर

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय: शिवानन्दनगर- २४९ १९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

 

प्रथम हिन्दी संस्करण: १९५३

नवम हिन्दी संस्करण : २०१८

 

 

(,००० प्रतियां)

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

ISBN 81-7052-056-8

HS 73

 

 

 

 

 

PRICE: 185/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्मनाभानन्द

द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पो. शिवानन्दनगर-२४९ १९२, जिला टिहरी-गढ़वाल,

उत्तराखण्ड' में मुद्रित।

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समर्पण

 

 

जिनके जीवन का कुछ लक्ष्य है,

और जो उस लक्ष्य की ओर जाना चाहते हैं।

जिनके जीवन में महत्त्वाकांक्षाएँ हैं,

जो उन्हें पूरा करना चाहते हैं।

जिनके जीवन में सदाचार का अभाव है,

पर जो सदाचारी बनना चाहते हैं।

जिनको समाज पतित कहता है,

पर जो उठना चाहते हैं-

विश्व के ऐसे मनुष्यों को

सस्नेह भेंट!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक का वक्तव्य

 

'जीवन में सफलता के रहस्य' इस नाम से ही पुस्तक का पूर्ण परिचय मिल जाता है।

 

स्वामी शिवानन्द जी ने इस पुस्तक में अनेकों प्रयोगों को अच्छी तरह से दिग्दर्शित किया है। यह प्रयोग इतने सरस और सरल हैं कि प्रत्येक व्यक्ति, यदि चाहे, उनका व्यवहार कर सकता है। मुझे इतना निश्चय तो जरूर है कि इस पुस्तक में वर्णित प्रयोग खरे सोने के समान हैं, जिनको स्वामी जी ने अपने तपस्वी जीवन की कसौटी पर कस कर शुद्ध सिद्ध किया है।

 

श्री स्वामी जी ने जो-कुछ इसमें लिखा है, वह उनके दीर्घकालीन आध्यात्मिक जीवन का रक्षित अनुभव है; क्योंकि स्वामी जी इस पुस्तक में दिये गये नियमों का पालन आजीवन अपने दैनिक जीवन में करते रहे थे।

 

श्री स्वामी जी को पवित्र जीवन में इतना अधिक विश्वास था कि वे उस जीवन की प्राप्ति के लिए सब-कुछ त्याग देने को तैयार थे। वे कहते थे कि चाहे तुम विद्वान् बनो या नहीं, वैज्ञानिक भी बनो या नहीं, नेता बनो या नहीं, पर सच्चरित्र और पवित्र अवश्य बनो ! सच्चरित्रता और पवित्रता-बाहरी और भीतरी दोनों-इस जीवन की सफलता के द्वार खोलती हैं और आत्म-दर्शन को भी सिद्ध करती है।

 

पुस्तक पढ़ने से प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरणा मिलेगी, ऐसा हमें दृढ़ निश्चय है। पुस्तक (अँगरेजी) के अनेकों संस्करण बिकते चले गये, यही पुस्तक की लोकप्रियता का एक उदाहरण है। तदतिरिक्त नित्य-प्रति कई लोगों के पत्रों से (जो पुस्तकानुदर्शित विधि से साधना कर रहे हैं) ज्ञात होता है कि पुस्तक ने उनके जीवन में बहुत सुन्दर परिवर्तन कर दिये हैं। अनेक मद्यपों ने मद्यपान का त्याग कर दिया, अनेक लोगों ने सिगरेट पीना और सिनेमा जाना छोड़ दिया। बहुत से लोग समाचार-पत्र और उपन्यास भी नहीं पढ़ते। कई विद्यार्थियों ने ब्रह्मचर्य में अपने को दीक्षित कर दिया है। लोगों को इस पुस्तक से अवश्य प्रेरणा मिली है, इसमें सन्देह नहीं।

 

परमात्मा सबको कुशल और मंगल का वरदान दे!

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चतुःश्लोकी भागवत

 

ज्ञानं परमगुहां मे यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदंग गृहाण गदितं मया ।।

 

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः

तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।

 

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।१ ।।

 

ऋतेऽर्थ यत्प्रतीयेत प्रतीयेत चात्मनि

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।२।।

 

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु

प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु तेष्वहम् ।।३ ।।

 

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः

अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ।।४ ।।

 

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना

भवान् कल्पविकल्पेषु विमुह्यति कर्हिचित् ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

याचना

 

अधक गति से मार्ग पर बढ़ता चलूँ,

 

यह साधना दो।

 

सजग अम्बर में अरुण-सा रश्मि ले चढ़ता चलूँ,

 

यह कामना दो।

 

सार ले निस्सार जीवन को पुनः गढ़ता चलूँ,

 

यह कल्पना दो।

 

विश्व के कल्याण का शुभ पाठ मैं पढ़ता चलूँ,

 

यह भावना दो।

 

छोड़ कर जड़ता सतत संघर्ष से लड़ता चलूँ,

 

यह सान्त्वना दो।

 

भावना

 

मैं उन्मुक्त गगन का पंछी

मैं अजस्र अमृत की धारा।

मैं प्रशान्त सामोद सनातन

मैं खुशियों का दीप्त सितारा ।।

 

जा रे क्रन्दन विसह वेदने

ध्वस्त हुई कष्टों की कारा।

कहाँ रहे काँटे अब मग में

फूलों से पथ गया सँवारा ।।

 

आज्ञा

 

 

जारे जगजीवन को समझो अवस्तु आशा से भी रहकर वंचित

जागरण स्वप्न निद्रा में भी होवे तुम्हारा चित विचलित ।।

 

हो अनासक् अविचल सदैव तुम वृद्ध, युवा अथवा कुमार।

त्रय-तापों से, त्रय-भोगों से, अन्तस्तल रख कर  निर्विकार ।।

 

शुभ तथा अशुभ लौकिक दैविक वासना चित्र सन्तत विलीन।

तुम त्रय-कालों में स्वयं सिद्ध तुम महानन्द में सदा लीन ।।

 

यह जर्जरता या रोग-शोक हैं तेरी गतिविधि के रूप।

कर मूल धारणा को अमूल तुम जान सको अपना स्वरूप ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

उपनिषद् के विचारों में तल्लीन

 

जो आत्मा में सब-कुछ देखता है और आत्मा को ही सबमें देखता है, उसमें जुगुप्सा नहीं रहती।

 

आत्या सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम तथा महान् से भी महत्तम, प्रत्येक जीव के हृदय में विराज रहा है।

 

जो इच्छाओं से मुक्त है, मन और इन्द्रियाँ जिसने बस में रख ली हो, जो आत्मा की महानता को देखता है, वह शोक-रहित हो जाता है।

 

प्रणय धनुष है, मन तीर है और ब्रह्म है लक्ष्य एकाग्र चित्त वाले व्यक्ति से यह निशाना साधा जा सकता है और तब जिस प्रकार तीर लक्ष्य में मुद्रित हो जाता है, वह भी ब्रह्म में स्थिर हो जायेगा।

 

ब्रह्मानंद का अनुभव कर, जहाँ तक पहुँच कर शब्द भी लौट आते हैं, मन के साथ-साथ; और मनुष्य किसी से भयभीत नहीं होता तथा विचार उसे सन्तान नहीं कर सकते।

 

क्यों नहीं मैंने सुकर्म किये, क्यों मैंने पाप किया-निश्चयतः जो आत्मा को जानता है, वह इन दोनों को भी आत्मा ही जानता है।

 

वह तेजोमय है, निर्गुण, सर्वव्यापक, अन्दर और बाहर स्थित, अजन्मा, प्राण-मन-इन्द्रिय-रहित, अव्याकृतत्व से परे और सबसे पार है।

 

- यह - अमृत है। यह समस्त जगत् ही इसका व्याख्यान है। क्या था, क्या है और क्या होगा, यह सब निश्चयतः ही है। तीनों कालों से परे भी यदि कुछ है तो ही।

 

मन से जिसको जाना नहीं जा सकता, पर जिसके द्वारा, सन्तों ने कहा है, मन को जान लिया जाता है, जान लो यहाँ ब्रह्म है, कि वह जिसे यहाँ पूजा जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

साधना का पथ

 

.         एक ही आसन पर निश्चल हो कर घण्टे तक बैठने की आदत हो जानी चाहिए।

 

.         अभ्यास करते-करते कम-से-कम ३० मिनट तक प्राणायाम का अभ्यास अवश्य करना चाहिए।

 

.         प्रातः बजे उठ कर ध्यान आरम्भ करना चाहिए, तदुपरान्त आसन और प्राणायाम।

 

.         गुरु के बतलाये गये तरीकों से धारणा और ध्यान का अभ्यास करो।

 

.         सद्-विचार, सद्-अनुभव सद-कर्म और सद्भावन करो।

 

.         दुर्गुणों को अपने से दूर हटाओ।

 

.         इन्द्रियों पर अपना अनुशासन स्थापित करो। दिन में दो-चार घण्टे मौन धारण करो।

 

.         सद्गुणों का विकास करो।

 

.         आध्यात्मिक दैनन्दिनी रखो और निश्चित दिनचर्या का पालन करो।

 

१०.       अपना इष्ट-मन्त्र नित्य-प्रति एकाग्रचित्त हो कर लिखो।

 

११.       शाकाहारी भोजन करो, मांसादि रजोगुणी पदार्थों को वर्जित जानना चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

तुम कौन हो ?

 

तुम कौन हो? तुमको ही नहीं मालूम कि तुम कौन हो ?

तुम सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप हो।

 

यह देह जो नाश को प्राप्त होती है, यह इन्द्रियाँ जो किसी दिन निष्क्रिय हो जाती हैं, यह हँसना, यह रोना और विलखना तुम्हारा स्वभाव नहीं, तुम तो निर्विकार आत्मा हो।

 

भले ही नौकरी मिल रही हो, भले ही खाने को रोटी का टुकड़ा मिले और पीने को पानी तथा पहनने को वस्त्र का टुकड़ा भी-किन्तु इससे तुम्हारी आत्मा के अमरत्व में क्षीणता नहीं आती। आत्मा भूख और प्यास, सर्दी और गरमी, निन्दा और अपमान-सबसे परे है।

 

मान लो और निश्चय कर लो कि तुम आत्मा ही हो, जो जन्म, मृत्यु, पाप, पुण्य, सुख और दुःख से परे है।

 

यह देह तुम्हारी नहीं।

 

तुम राजाओं के महाराजा तथा परम शक्तिशाली सम्राट् हो

 

तत्त्वमसि ! तुम वह हो! तुम ही ब्रह्म हो

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

संकल्पोपासना

 

संकल्प आत्म-बल है, इसमें महान् शक्ति है।

संकल्प का विकास कर आत्मा का साक्षात्कार करना चाहिए।

इच्छाओं ने तुम्हारे संकल्प को निर्बल कर दिया है।

विवेक, वैराग्य और त्याग से इच्छा का दमन और संकल्प का विकास करो।

मेरा संकल्प शक्तिमान् है, मैं पर्वतों को तोड़ सकता हूँ,

समुद्र की तरंगों को रोक सकता हूँ और तत्त्वों को मिटा सकता हूँ।

प्रकृति मेरी आज्ञानुवर्तिनी है, मैं विश्व संकल्प के साथ एकरस हूँ।

मुनि अगस्त्य के समान मैं समुद्र को पी सकता हूँ।

मेरा संकल्प इतना तीव्र है कि कोई उसका विरोध नहीं कर सकता।

लोगों को मैं प्रभावित कर सकता हूँ और जीवन में सफलता की सिद्धि भी।

मैं स्वस्थ हूँ, निरोग हूँ और हूँ आनन्दमय,

सदा प्रसन्न तो मैं हूँ ही, लाखों को प्रसन्नता का वरदान भी देता ही हूँ।

संकल्प करते ही मैं शक्ति का प्रयोग कर सकता हूँ।

योगियों में परम योगी, राजाओं का महाराजा,

सम्राटों का महासम्राट् और शाहों का मैं हूँ शहंशाह

स्पर्श मात्र से ही मैं साधकों का उत्थान करता हूँ।

सत्संकल्प के चमत्कार से मैं आश्चर्यों को जन्म देता हूँ।

दूर और सुदूर के देशों में भी मैं लाखों को रोगमुक्त करता हूँ।

यह सब मेरी संकल्प-शक्ति का प्रभाव है-अतः संकल्प का विकास करो।

वासनाओं को त्याग कर आत्म-विचार करना-

संकल्प-साधना का यही श्रेयपूर्ण मार्ग है।

आध्यात्मिक दैनिकी रखो; चिन्ता, उद्विग्नता त्यागो,

साधारण तपस्या करो और धारणा की सिद्धि भी,

धैर्य का विकास करो, क्रोध पर विजय भी,

इन्द्रियों को वश में कर, ध्यान का अभ्यास करो,

सहन-शक्ति होनी चाहिए, ब्रह्मचर्य का अभ्यास भी,

यह सब संकल्प-उपार्जन में तुम्हारी सहायता करेंगे।

मैं तो मन हूँ, देह ही पर हूँ अमर आत्मा

तीनों अवस्थाओं का साक्षी, पूर्ण-ज्ञान-महान्

 

योग की वर्णमाला

 

खण्ड अभ्यास से योग में सफलता मिलती है।

 

सनों से स्वस्थ शरीर तथा ओजस्वी मन की प्राप्ति की जा सकती है।

 

न्द्रियों का नियन्त्रण योग के अभ्यास से किया जा सकता है।

 

श्वर की प्राप्ति के लिए ऋषि-मुनि योग का अभ्यास करते थे।

 

ड्डियान बन्ध के अभ्यास से सुन्दर शरीर, शक्ति, ओज और प्रतिभा की प्राप्ति होती है तथा अन्नवाही स्रोतों का शुद्धिकरण होता है।

 

र्ध्वरेता बनने के लिए शीर्षासन का अभ्यास करना चाहिए।

 

षि गण योगविद्या के वैज्ञानिक थे।

 

काग्रता से हठयोग का अभ्यास किया जाये, तो बड़ा आनन्द मिलता है।

 

तिहासिक दृष्टि से हठयोग भारत की बहुत प्राचीन शास्त्र-विद्या है।

 

-शक्ति के विकास के लिए हठयोग का अभ्यास करना चाहिए।

 

षध-विज्ञान भी यही स्वीकार करता है कि हठयोग से सभी रोगों का उन्मूलन किया जा सकता है।

 

न्तःकरण पर योग का बड़ा ही सुन्दर प्रभाव पड़ता है।

 

र्मयोग मन को पवित्र करता तथा साधक को भगवद्-दर्शन के योग्य बना देता है।

 

से आकाश का बोध होता है। अतः खेचरी मुद्रा से आकाश में चलने की क्रिया सिद्ध होती है। खेचरी मुद्रा की सिद्धि प्राप्त कर हठयोगी आकाश में गमन कर सकता है।

 

रिमा अष्टसिद्धियों में से एक सिद्धि का नाम है, जिसको प्राप्त कर वह अतितर भारी हो जाता है।

 

टाकाश और महाकाश में एक ही आकाश है, उसी प्रकार सभी जीवों में एक ही आत्मा है।

 

क्र लिंग-शरीर में शक्ति के केन्द्रों को कहा जाता है। वे छह होते हैं।

 

चक्रों के नाम हैं-मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, आज्ञा और सहस्रार

 

 

का अर्थ है-परमात्मा के पविचतम नामों का सतत उच्चारण करना। जप करने से मन पवित्र होता है तथा एकाग्रता का भी उदय होता है।

 

झंकार के समान एक ध्वनि सुनायी देती है। योगी नादयोग में सिद्धि पाने पर इस ध्वनि को सुनता है।

 

कटकी लगा कर किसी वस्तु पर दृष्टि को स्थिर करने का नाम त्राटक है।

 

ठाकुर जी को भोग लगा कर ही जो स्वयं भोजन करता है, वही ब्राह्मण है।

 

को राजयोग के अनुसार साधक की निर्बलता कहा गया है। इसके निवारण के लिए साहस की प्रतिपक्षीय भावना का अभ्यास करना चाहिए।

 

ढों और पाखण्ड योग के दुश्मन हैं, योगी को इनसे बचना चाहिए।

 

मानसिक, वाचिक और शारीरिक-तपस्या तीन प्रकार की होती है। तपस्या करने से तीनों का परिशोधन होता है।

 

का-माँदा व्यक्ति, जो संसार को अच्छी तरह समझ चुका हो और उसके सामने हार भी खा चुका हो, योग की शरण में कर ही शान्ति और विश्राम पा सकता है।

 

से इन्द्रियों के दमन का अर्थ प्रकट होता है। यह साधन-चतुष्टय के षट्- सम्पत् का दूसरा अंग है।

 

ध्या का क्या अर्थ है? एक ही विचार की तन्मय धारा के प्रवाह को ध्यान कहा जाता है। मकान

 

वविध भक्ति इस प्रकार जाननी चाहिए-श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वन्दन, सख्य, दास्य, आत्म-निवेदन

 

द्मासन करने पर ध्यान में सरलता की अनुभूति होती है।

 

उठा कर सर्प, शस्त्र उठा कर योद्धा, चोंच उठा कर गृद्ध वार किया करते हैं; पर इन्द्रियाँ विषय-वासना को उठा कर ही अपना वार किया करती हैं, जो दुर्जेय रहता है।

 

ब्रह्मचर्य जीवन में सफलता की कुंजी है।

 

क्तियोग आज के लौहयुग में भगवद् दर्शन का उत्तम मार्ग है।

 

न्दिर जाना धर्मान्धता नहीं और किसी जाति का धर्मगत पाखण्ड ही। यह तो उत्पाती मनुष्य को एक प्रकार के अनुशासन और सिद्धान्तों में बाँधने का मनोवैज्ञानिक आधार है।

 

ज्ञादि कर्मों को मिथ्या अथवा निःसार या पाखण्ड कह कर दूषित नहीं किया जा सकता। यज्ञ का प्रभाव वैदिक साहित्य में परिलक्षित होता है और यज्ञ का अभाव आज की स्थिति को प्रकट करता है।

 

जोगुणी वृत्ति से अनेकों मानसिक उपद्रव होते हैं, सात्त्विक बन कर रजोगुण को हटा देना चाहिए।

 

घिमा अष्टसिद्धियों में एक ऐसी सिद्धि है, जिसको प्राप्त कर योगी अत्यन्त लघु रूप धारण कर सकता है।

 

वैराग्य और विवेक-दोनों का उपार्जन जीवन की सफलता में सहायक सिद्ध होता है।

 

शान्ति ही मनुष्य-जीवन का परम लक्ष्य है। इसकी प्राप्ति के लिए योग ही एकमात्र साधन है।

 

ट्दर्शनों का सारांश यही है कि सर्वत्र एक ही आत्मा है।

 

न्तोष धारण किया जाये, तो कितना अच्छा है। सन्तोष धारण कर लेने पर मन किसी भी वस्तु के अभाव में दुःखी नहीं होता और प्राप्ति में उछलता ही है।

 

ठयोग की सिद्धि प्राप्त होते ही राजयोग का आरम्भ होता है।

 

क्षमा एक गुण है। इस गुण का उपार्जन कर लीजिए, जीवन में आनन्द की लहर लहराने लग जायेगी।

 

त्राटक का अर्थ है-किसी एक वस्तु पर दृष्टि को निर्निमेष किये रहना।

 

ज्ञा मनुष्य-जीवन का चरम विकास है। ज्ञान के उपरान्त और कुछ प्राप्तव्य नहीं रहता। योग-साधना का उद्देश्य ज्ञान की प्राप्ति करना ही है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादक के दो शब्द

 

इस पुस्तक का आपके जीवन से निकटतम सम्बन्ध है।

 

यह कागज की किताब नहीं, आपके जीवन की किताब है। समझ लीजिए कि आप अपने जीवन को ही इस पुस्तक में पढ़ रहे हैं।

 

इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करने का उद्देश्य अनुवाद का कर्तव्य निभाना नहीं; बल्कि हिन्दी भाषा-भाषी समाज के आगे नवीन जीवनधारा को रख देना है। समाज में जो उत्पात मचा हुआ है, उसका निराकरण करना है और जीवन में जो भयावह अशान्ति छायी हुई है, उसको मिटाना है।

 

यदि इस पुस्तक के उपदेशों ने लोगों के जीवन में प्रत्याशित पवित्र प्रभाव डाला, तो अनुवादकों का श्रम सार्थक हो जायेगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-प्रवेश

(लेखक की भूमिका)

 

जीवन क्या है? क्या केवल साँस लेना, भोजन को पचाना, मलमूत्रादि वेगों का त्याग करना, शरीर रचना और निर्माण के अन्य कार्यों का होना ही जीवन की परिभाषा का पूरक है या जीवन का अर्थ इससे अलग कुछ और है? क्या केवल विचार करना, योजनाएँ बनाना, विचार-विमर्श करना, नाम-यश आदि के लिए प्रयत्न करना ही जीवन की सिद्धि का बोधक है?

 

क्या सन्तति-प्रजनन से जीवन का अर्थ स्पष्ट होता अथवा जीव-जन्तुओं के गतिशील होने पर शरीर के अन्दर जो प्रतिक्रिया होती है, वह तो जीवन नहीं है? वैज्ञानिक और नृतत्त्व के वैज्ञानिकों के जीवन-विषयक दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। दार्शनिकों ने जीवन को दूसरे दृष्टिकोण से आँका है।

 

जीवन दो प्रकार का होता है-यथा भौतिक जीवन और चेतनात्मक जीवन नृतत्त्व-शास्त्री तथा देहविज्ञानवादियों का कहना है कि सोचना, अनुभव करना, जानना, संकल्प करना, पचाना, मलादि वेगों को त्यागना, रक्तादि का संचरण, स्खलन आदि क्रियाओं से जीवन में गति आती है अथवा जीवन का बोध इन क्रियाओं से होता है। परन्तु इस प्रकार का जीवन शाश्वत नहीं है। इस जीवन में खतरे, दुःख, चिन्ताएँ और घबराहट, पाप, पुण्य, जन्म, मृत्यु, व्याधियाँ, वृद्धावस्था और अनेकों प्रतिक्रियाएँ व्याप्त रहती हैं।

 

अतः जिन महात्माओं ने इन्द्रियों और मन पर संयम स्थापित कर, त्याग, तपस्या और वैराग्य-साधना कर आत्ममय जीवन बिताया है, उनको यह कहते तनिक भी झुंझलाहट नहीं हुई कि आध्यात्मिक जीवन ही शाश्वत है, भौतिक जीवन तो केवल बाहरी और अस्थिर आवरण है।

 

इसी जीवन की प्राप्ति के लिए उन्होंने अनेकों विधियों से प्रयोग किये। वे प्रयोग एक ही व्यक्ति मात्र के लिए नहीं, अपितु अनेकों व्यक्तियों के लिए, जिनकी रुचियाँ, जिनकी आदतें और जिनकी योग्यताएँ अलग-अलग होती हैं, विभिन्न मार्गों को खोज निकाला। जिन लोगों में श्रद्धा, विश्वास और कर्मठता है, वे अवश्य उन योगों में से किसी एक प्रयोग को अपने जीवन में व्यवहत कर सकते हैं यह आवश्यकता नहीं रहती कि प्रत्येक व्यक्ति एक ही प्रयोग का व्यवहार करे अथवा एक ही सिद्धान्त का अनुयायी हो

 

भौतिक जीवन की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति उसकी असारता को जानता है। भौतिक जीवन की अनेकों सीमाएँ, अनेकों कमियाँ हैं। भौतिक जीवन को ही परम जीवन समझने वाला व्यक्ति कभी भी सुखी और सफल नहीं बन सकता, जो रात और दिन भौतिक जीवन की तृप्ति के लिए ही चेष्टा कर रहा है, उसे कामयाबी नहीं मिल सकती-यह सिद्ध सत्य है।

 

परन्तु जो लोग भौतिक जीवन में ही सन्तुष्ट रह कर आत्मचेतनामय जीवन को प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए अनेकों मार्ग हैं, जिनका अनुसरण कर वे अवश्य सफलता की प्राप्ति कर सकते हैं।

 

इसका अर्थ यह नहीं है कि हम भौतिक जीवन की अवहेलना करें। पदार्थ तो परमात्मा का ही व्यक्त स्वरूप है। भौतिक पदार्थमय जीवन का निर्माण परमात्मा की लीला का उपकरण ही तो है। पदार्थ और उसके अन्दर वर्तमान शक्ति को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। आग और तेज, हिम और शीतलता, पुष्प और सौरभ तथा शक्ति और शक्तिमान् जिस प्रकार अभिन्न हैं, उसी प्रकार शक्ति और उसका व्यक्त स्वरूप भी है। ब्रह्म और माया अभिन्न हैं। इस भौतिक लोक का जीवन आत्मचेतनामय जीवन का उपकरण है, सफलता का प्रथम रंगमंच है। संसार से परमोच्च शिक्षा ग्रहण की जा सकती है। प्रकृति की गोद में पल कर ही मनुष्य अच्छी शिक्षाएँ प्राप्त कर सकता है। अभिप्राय यह है कि आत्मचेतनामय जीवन की प्राप्ति करने के लिए जिन-जिन गुणों से व्यक्ति को सुसज्जित होना पड़ता है, उन सबका उपार्जन इसी भौतिक देह के माध्यम से इसी भौतिक लोक में किया जा सकता है। जहाँ सुर और असुर शक्तियों का युद्ध होता है, वह स्थान है यह भौतिक शरीर

 

किन्तु जो इस जीवन के अर्थ को समझ कर जीवन से उपलिप्त हो कर रहता है, वह कभी सफलता की प्राप्ति नहीं कर सकता। जीवन को उपकरण मान कर उच्च जीवन की प्राप्ति करना ही ज्ञानी के लिए श्रेयस्कर है। काँटे को काँटे से निकाल कर दोनों काँटों को फेंक दिया जाता है। इसी प्रकार संसार में रह कर सांसारिकता से युद्ध कर उसे पराजित करना होगा-इसी में शूरता और वीरता है।

 

विज्ञान क्या और धर्म क्या, राजनीति और धर्म-यह सभी अभिन्न हैं। साथ-साथ ही इनका विकास किया जाता है। यदि इनमें किसी एक की भी अवहेलना की गयी, तो जीवन की पूर्णता विच्छिन्न हो जाती है। यदि देश की आर्थिक स्थिति को भुला दिया गया, तो आध्यात्मिक स्थिति कितनी खतरनाक और सन्देहजनक हो जायेगी? देश में धनाभाव होने से आध्यात्मिक प्रचारक किस प्रकार अपना कार्य सम्पन्न कर सकेंगे ? यदि देश की राजनीतिक हालत अच्छी नहीं है, तो महात्मा गण किस प्रकार अपने उपदेशों को क्रान्तिमय समाज में प्रसारित कर सकेंगे? देश में शान्ति होनी चाहिए, विज्ञान की उन्नति भी तभी धर्म के प्रति लोगों की रुचि हो सकती है, तभी धर्म के व्यवहार के लिए लोगों को समय भी मिल सकता है और सुविधा भी।

 

मन किसी भी वस्तु को ग्रहण तभी कर सकता है, जब वह पूर्णतः शान्त हो राजा जनक अपने समय में साधु और संन्यासियों को प्रश्रय दिया करते थे। ऋषियों के आश्रम तब पूर्णतः सम्पन्न थे, उनकी आर्थिक सुरक्षा राजा के अधीन थी। आज वैसी दशा नहीं है, महात्माओं और संन्यासियों को निवृत्तिमार्गगामी होने पर भी प्रवृत्ति की ओर उन्मुख होना पड़ रहा है। समाज के ढाँचे को गिरता देख कर कौन-सा संन्यासी चुप रह सकेगा। आखिर संन्यासी भी समाज का ही व्यक्ति है ? समाज से आया है, आकाश से तो नहीं गिरा। समाज के वातावरण का प्रभाव उस पर अवश्य पड़ा है। समाज की दुर्व्यवस्था को वह चुपचाप देखता रहे, यह सम्भव नहीं। अतः राजनीति और विज्ञान तथा धर्म साथ-साथ उपार्जित किये जाने चाहिए।

 

आज कुछ लोग केवल राजनीति का दम्भ भर रहे हैं, कुछ लोग केवल विज्ञान के रंग में रंगे हैं, किसी को भी धर्म के प्रति श्रद्धा नहीं। मध्य काल में योग्य शिक्षकों के अभाव ने धर्म के स्वरूप को विकृत कर दिया था, बौद्ध और हिन्दू धर्म आपस में भिड़ पड़े थे; अतः धर्म में भयंकर परिवर्तन हुए, जिनका प्रभाव अभी तक नहीं मिट पाया है। इसके लिए कुछ समय की जरूरत है। यदि प्रत्येक व्यक्ति धर्म के सही अर्थ को समझ जाये, तो कार्य की पूर्ति में देर नहीं लगेगी।

 

यह कहना भी ठीक नहीं है कि धर्म समाज को साम्प्रदायिकता से संकुचित कर देता है। मैं तो यह कहता हूँ कि जो धर्म समाज को किसी प्रकार के सीमित बन्धन में डाल देता है, वह धर्म जल्दी ही दुनिया से मिट जाये, तो अच्छा और जो इसे मिटा सकेगा, वही अपने युग का नेता होगा, सन्त कहलायेगा। धर्म समाज को सीमित नहीं बनाता। धर्म का प्रथम सम्बन्ध व्यक्ति से है; पर एक ही व्यक्ति से नहीं, व्यक्ति-व्यक्ति से व्यक्तिगत रूप में। इसी व्यक्तिगत सम्पर्क का प्रभाव कालान्तर में समाज, राष्ट्र और मानव-जगत् में पड़ना अनिवार्य है। इस प्रकार धर्म प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से सम्बन्ध स्थापित कर समाज और राष्ट्र के निर्माण में सहायक होता है। राजनीति और विज्ञान को गौण भी कहा जाये, तो अनुचित नहीं होगा धर्म इनका आधार है। यदि धर्म के आधार पर इनका विकास या उत्थान नहीं किया गया, तो बुद्धिहीन व्यक्ति के समान ही इसकी उपमा दी जा सकेगी।

 

प्रत्येक देश में धर्म के मूलभूत सिद्धान्त वही हैं, जो दूसरे देशों में; पर इतना जरूर है कि उनकी विधियों में काल, स्वभाव, रुचियों और योग्यताओं के कारण विभिन्नता गयी है, जो अनुचित नहीं है। लक्ष्य एक है, धर्म एक है, पन्थ अलग-अलग हैं; उनको एक नहीं किया जा सकता।

 

यदि धर्म का ह्रास हुआ तो समाज में अव्यवस्था जाती है, व्यक्ति-व्यक्ति में अनुचित सम्बन्धों की सृष्टि हो जाती है। क्रान्ति, उत्पात आदि इसके परिणाम हैं। सदाचार के गिर जाने से (जो धर्म का पूरक है) समाज अवश्य गिरेगा, इसमें सन्देह नहीं है।

 

समाज में फैली असफलताओं का कारण है धर्म के प्रति अरुचि या घृणा दोनों ने समाज को निराशा की ओर बहा दिया है। धर्माचरण करने से मनुष्य अपने जीवन में शान्ति और सफलता की प्राप्ति कर पाता है और आशा से नित्य प्रसन्न रहता है।

 

इसलिए जीवन की सफलता आत्म-दर्शन पर निर्भर है और आत्म-दर्शन जीवन की सफलता की सही कुंजी है। जीवन की सफलता और आत्म-दर्शन की प्राप्ति के लिए कुछ साधनाएँ करनी पड़ती हैं, कुछ नियमों का पालन भी करना पड़ता है, कुछेक व्यवहारों को तिलांजलि देनी पड़ती है। यदि यह सब कर दिया गया तो मनुष्य के जीवन में वह दिन भी नहीं आता, जिसे असफल कहा जा सके। असफलता उसी व्यक्ति के मत्थे पड़ती है, जो जीवन की कला में कुशल नहीं है। जीवन की इस कला में निपुण बनने के लिए यह पुस्तक अति उपादेय है।

 

इस पुस्तक में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उन-उन आवश्यक बातों का वर्णन किया गया है, जिनका व्यवहार कर वह अपने अन्दर प्रथमतः शक्ति को जगा सकेगा और बाद में उस शक्ति के सहारे जीवन में निश्चित सफलता को प्राप्त कर सकेगा। अनेकों ने, जिनकी गणना नहीं हो सकती, इसी मार्ग से जीवन की सफलता को पाया; अतः प्रयोगों की सत्यता में सन्देह नहीं रह जाता। आवश्यकता है कि जीवन में इनका व्यवहार भी किया जाये।

 

प्रत्येक व्यक्ति को वह शक्ति प्राप्त हो, जो आत्म-दर्शन और जीवन-सफलता के ज्ञान और प्रकाश को प्रसारित करती है!

 

 

 

 

 

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जीवन में सफलता के रहस्य

 

और

 

आत्म-दर्शन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

समर्पण.. 3

प्रकाशक का वक्तव्य... 4

चतुःश्लोकी भागवत. 5

याचना.. 6

भावना.. 6

आज्ञा.. 7

उपनिषद् के विचारों में तल्लीन. 8

साधना का पथ. 9

तुम कौन हो ?. 10

संकल्पोपासना.. 11

योग की वर्णमाला.. 12

अनुवादक के दो शब्द.. 16

विषय-प्रवेश. 17

प्रथम प्रयोग. 27

संकल्प और स्मृति का विकास. 27

ईश्वर ?. 27

आध्यात्मिक संस्कृति.. 28

() ज्ञानयोग. 28

() भक्तियोग. 29

() राजयोग. 30

विशेष शिक्षाएँ. 30

संकल्प की उन्नति.. 33

संकल्पोन्नति के लिए नियम. 34

संकल्प-व्यवहार किस प्रकार हो ?. 34

इच्छा-शक्ति की साधना.. 36

योग्यता और संकल्प... 38

इच्छा और संकल्प... 38

स्वतन्त्र संकल्प... 39

मन को शान्त और सन्तुलित रखो... 39

सदा सतर्क रहो.. 40

संकल्पोन्नति के पूर्व-लक्षण.. 41

निपुण बनो.. 41

धैर्य और दृढ़ लगन. 41

जीवन का एक निश्चित लक्ष्य हो.. 41

पौर्वात्य और पाश्चात्य संस्कृति के प्रयोग. 42

उपसंहार. 43

सदाचार-संस्कृति का सौन्दर्य. 44

भावों का विकास. 46

प्रतिपक्ष-भावना के नियम. 48

विचारोन्नति.. 49

अधीन-सचेतन-मन. 52

स्मृति का विकास. 54

स्मृति की उन्नति के लिए अभ्यास. 57

दिलचस्पी से स्मृति का विकास होता है. 63

स्वास्थ्य और मन. 64

दर्शन और श्रवण-शक्ति का विकास किस प्रकार ?. 64

श्रवण-शक्ति के विकास के लिए अभ्यास. 65

दृष्टि-विकास के लिए अभ्यास. 67

अष्टावधान. 70

मानसिक विश्राम. 71

शारीरिक उन्नति.. 72

द्वितीय प्रयोग. 76

राजयोग महाविद्या.... 76

राजयोग का अभ्यास. 76

मानसिक शिल्पशाला.. 80

वासनाएँ. 87

चंचल मन पर विजय पाइए. 95

योगाभ्यास अथवा आत्म-संयम. 101

एकाग्रता का अभ्यास या धारणा.. 102

त्राटक का अभ्यास. 105

त्राटक के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण अभ्यास. 105

विशेष आदेश और उपदेश. 107

ध्यान के अभ्यास. 108

तृतीय प्रयोग. 113

आत्म-शक्ति के प्रभाव. 113

व्यक्तित्व... 113

उपदेश या अनुशीलन की शक्ति.... 116

चतुर्थ प्रयोग. 119

सद्गुणों का उपार्जन. 119

चरित्र-निर्माण.. 119

व्यक्ति, समाज और सदाचार. 122

व्यवहार-कुशलता या हिल-मिल कर रहना.. 126

अहिंसा : सर्वभूतदया.. 129

सत्य-सम्भाषण.. 132

आत्म-निर्भरता-स्वावलम्बन. 133

धैर्य और उद्योग. 134

निष्कपटता और ईमानदारी. 135

सन्तोष. 136

नियम और समय की पाबन्दी... 139

समाजपटुता.. 141

युक्ति और कौशल. 142

सुवक्ता बनने की कला.. 143

विशेष शिक्षाएँ. 145

पंचग प्रयोग. 149

दुर्गुणों का निराकरण.. 149

संकोच-लज्जा-शर्म. 149

कायरता-भीरुता-कातरता.. 150

निराशावाद. 151

विश्वासान्धता.. 153

सन्देह-दृष्टि... 153

असहिष्णुता.. 154

आत्महीनता की भावना (आत्मलघुत्व) 155

उदासीनता.. 156

अनिश्चय. 157

असावधानी और विस्मृति.. 157

आत्म-संशय. 158

कपट या कुटिलता.. 159

घूसखोरी का अभिशाप. 160

घृणा.. 161

ईर्ष्या, घमण्ड और पाखण्ड... 163

क्रोध पर विजय. 163

चिन्ता, शोच और व्याकुलता.. 168

भय पर विजय. 171

धूम्रपान. 172

मद्यपान. 173

जुआ... 173

अन्य दुर्व्यसन. 174

काम पर विजय. 176

आसक्ति.... 181

क्षुद्र-वृत्ति.. 185

षष्ठ प्रयोग. 187

योग की अभ्यास-माला.. 187

निषेध-वाक्य... 187

साधना.. 187

ब्रह्मचर्य. 187

सदाचार. 188

वैराग्य... 189

अनुशासन. 189

आनन्द और शान्ति का मार्ग. 190

गृहस्थों के कर्तव्य-उनका धर्म. 191

साधकों को आदेश. 193

विद्यार्थियों को शिक्षाएँ. 204

शक्ति का उपार्जन-उसकी सुरक्षा.. 208

मौन-साधना का महत्त्व... 216

साधना की दैनन्दिनी क्यों रखी जाये ?. 222

आध्यात्मिक दैनन्दिनी के प्रश्नों का स्पष्टीकरण.. 226

सप्तम प्रयोग. 241

उपसंहार. 241

समय बड़ा मूल्यवान् है. 241

इन्द्रिय-संयम. 243

सत्संग की महिमा : उससे लाभ. 245

सत्संग का प्रभाव. 245

घर-घर में सत्संग कीजिए. 247

अकेले-अकेले सत्संग. 247

सत्संग और परमात्म-दर्शन. 248

बीसवीं शती, तुम भी सुन लो.. 248

जब भगवान् परीक्षा लेते हैं. 249

अष्टम प्रयोग. 252

दो कथाएँ. 252

तीन खोपड़ियाँ.. 252

विल्वमंगल और चिन्तामणि... 253

 

 

 

प्रथम प्रयोग

संकल्प और स्मृति का विकास

ईश्वर ?

 

ईश्वर सच्चिदानन्द (अस्तित्वपूर्ण, ज्ञानमय और केवलानन्द) है। ईश्वर सत्य है। ईश्वर प्रेम है। परमात्मा प्रकाशों का प्रकाश है। ईश्वर सर्वव्यापी, बुद्ध और चैतन्य है। ईश्वर ही वह सर्वव्यापी शक्ति है, जो इस ब्रह्माण्ड का संचालन करती है और इसको सुव्यवस्थित भी रखती है। वह (परमेश्वर) इस शरीर और मन का आन्तरिक शासक (अन्तर्यामी) है। वह सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी है। वह तुम्हारे मन का मूक साक्षी है। वह सूत्रधार अर्थात् तुम्हारे जीवन की डोरी को धारण करने वाला है। वह सम्पूर्ण जगत् और सभी वेदों का योनिभूत कारण है। वही संकल्पों को प्रेरणा देता है। उसके छह गुण ज्ञान, वैराग्य, सौन्दर्य (माधुर्य), ऐश्वर्य, श्री और कीर्ति हैं। अतः वह भगवान् कहलाता है।

 

उसकी सत्ता भूत, वर्तमान और भविष्य में निरन्तर रहती है। जगत् की परिवर्तनशील घटनाओं के मध्य वही एक अपरिवर्तनशील और निर्विकार है। संसार की सभी नश्वर वस्तुओं के मध्य वही अविनश्वर है। वह नित्य, शाश्वत, अविनाशी, अव्यय और अक्षर है। उसने इस जगत् को अपनी लीला के हित गुणत्रयसमायुक्त किया है। वह मायापति है।

 

वह स्वतन्त्र है। उसको सत्यकाम और सत्यसंकल्प कहा जाता है। वह जीवों के कर्मों का फल देने वाला है। वह दयामय है। वह जीवों की प्यास को शीतल जल और रसान्वित फलों से बुझाता है। परमात्मा की शक्ति से तुम देखते हो, सुनते हो और चलते हो। जो कुछ तुम देखते हो, वह ईश्वर है। जो कुछ तुम सुनते हो, वह ईश्वर है। ईश्वर तुम्हारे हाथों द्वारा काम करता है और मुख द्वारा भोजन करता है। केवल अज्ञान और अहंकार के कारण तुम उसे भूल गये हो।

 

नित्य सुख और परम शान्ति तभी प्राप्त की जा सकती है, जब ईश्वरीय राह पर चलो। यही कारण है कि विचारवान्, बुद्धिमान्, जिज्ञासु तथा साधक ईश्वर-दर्शन और ब्रह्म-साक्षात्कार की चेष्टा करते हैं। ईश्वर का दर्शन हो जाने पर जन्म-मरण का चक्कर तथा उसके सहकारी दुःखों का नाश हो जाता है। यह विश्व (जगत) दीर्घकालीन स्वप्न के समान है। यह माया की बाजीगरी है। पाँचों इन्द्रियाँ मनुष्य को हर दम भ्रमित करती रहती हैं। अपनी आँखें खोलो। विवेक-बुद्धि से काम लो। ईश्वर के रहस्यों को समझो। भगवान् की सर्वव्यापकता की अनुभूति करो। सदा यही अनुभव करो कि वह तुम्हारे निकटतम है। उसको अपनी हृदय-गुहा में सर्वदा विराजमान हुआ जानो 'आत्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः' श्रुति प्राचीन काल से यही कहती रही है।

आध्यात्मिक संस्कृति

() ज्ञानयोग

 

आध्यात्मिक उन्नति सभी उन्नतियों में श्रेष्ठ समझी गयी है। मैं इसी उन्नति को विशेष रूप से मानता हूँ। संस्कृति का अर्थ है-शुद्धता या शिक्षा। जो अन्तर्यामी आत्मा या ब्रह्म से सम्बन्ध रखता हो, जिसकी प्रकृति अस्तित्वपूर्ण, ज्ञानमय और केवलानन्द हो-वह आध्यात्मिक है। मेरा मतलब उस अध्यात्मवाद से नहीं, जो भूत-विज्ञान, प्रेतात्मा-संलाप तथादिक बातों से सम्बन्ध रखता है। अध्यात्मवाद के अन्तर्गत आत्मोन्नति, आत्म-चिन्तन, आत्म-ध्यान और आत्म-चर्चा तथा वेदान्तोपनिषद् का श्रवण और आत्मा के स्मरण को प्रधान माना जाता है। आध्यात्मिक साधक को आत्म-दर्शन की प्राप्ति के लिए अधिकारी बनने का प्रयत्न करना चाहिए। अधिकारित्व प्राप्त करने के लिए चार योग्यताएँ होनी चाहिए-

 

()        विवेक (सत् और असत् का यथार्थ ज्ञान);

 

()        वैराग्य (विषय-पदार्थों से विरक्त होना);

 

()        षड्सम्पत्ति या छह गुण-

() शम अर्थात् मन की पवित्रता,

() दम अर्थात् इन्द्रियों का संयम करना,

() उपरति या संन्यास-भावना,

() तितिक्षा अर्थात् सहनशीलता,

() श्रद्धा अर्थात् वेद और गुरु-वचन तथा अपने-आपमें विश्वास और

() समाधान अर्थात् मन की एकाग्रता;

तथा

 

()        मुमुक्षुत्व (जन्म और मरण से मुक्त हो जाने की तीव्र इच्छा)

 

आध्यात्मिक संस्कारों को जगाने के लिए आरम्भ में आत्मबोध, तत्त्वबोध, विवेक-चूड़ामणि, पंचदशी, उपनिषद्, विचारसागर आदि वेदान्तिक ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए।

 

ध्यान के लिए '' या 'सोहऽम्' या 'अहं ब्रह्मास्मि' या 'शिवोऽहम्' मन्त्र का मानसिक जप करना चाहिए। तुम अपनी इच्छा के अनुसार इनमें से किसी एक मन्त्र को चुन सकते हो। सदा यह अनुभव करना चाहिए-

 

'मैं अमर आत्मा हूँ। मैं शाश्वत सत्य हूँ। मैं सर्वव्यापी प्रकाश, शुद्ध, बुद्ध और चैतन्य हूँ।'

 

इन मन्त्रों का जप तथा चिन्तन करने से आत्म-साक्षात्कार होगा।

() भक्तियोग

 

आध्यात्मिक उन्नति के लिए दूसरे रास्ते हैं-भक्तियोग और राजयोग

 

जिसका मन भक्ति की ओर झुक रहा है, उसे नौ प्रकार की विधियों से भक्ति का अभ्यास करना चाहिए। नवविध भक्ति यह है-

 

() श्रवण, () कीर्तन, () स्मरण, () पाद-सेवन, () अर्चन, () वन्दन, () दास्य, () सख्य और () आत्म-निवेदन

 

अपना इष्टदेव चुन लेना चाहिए। भगवान् राम, कृष्ण या देवी या गायत्री या शिव-इनमें से किसी को चुन लो। तत्पश्चात् तदेवता-सम्बन्धी मन्त्र का जप करो अर्थात्-

 

श्री कृष्ण का मन्त्र है-       ' नमो भगवते वासुदेवाय'

 

श्री राम का मन्त्र है-          ' श्री राम जय राम जय जय राम'

 

श्री देवी का मन्त्र है-          ' क्लीं कालिकायै नमः'

 

श्री शिव का मन्त्र है-         ' नमः शिवाय'

 

इसी प्रकार सभी देवताओं के अपने-अपने मन्त्र-विशेष हैं। अपने इष्टदेव के मन्त्र का जप प्रतिदिन प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त ( से बजे) में करना चाहिए।

 

रामायण और भागवत का स्वाध्याय करना चाहिए। भागवतजनों की संगति में रहना चाहिए। कीर्तन करना चाहिए, भगवन्नाम का भजन करना चाहिए। अपने हृदय में भगवान् का ध्यान करना चाहिए। सदा भगवान् के गुणों-सर्वदयामय, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञतादि का ध्यान करना चाहिए। मनुष्य के स्वभाव-सुलभ काम-वासना, क्रोध, लोभ, बेईमानी, निष्ठुरता आदि दुर्गुणों पर विजय पानी चाहिए। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्यादि का, जो सच्चरित्रता के द्योतक हैं, पालन करना चाहिए।

 

इस प्रकार साधक को धीरे-धीरे भक्ति का आचरण प्राप्त हो सकेगा और इष्टदेवता के दर्शन हो जायेंगे। यही सर्वसाधारण के लिए भक्ति का पथ है।

() राजयोग

 

आध्यात्मिक विकास का एक मार्ग और है। यह मार्ग है मन को संकल्प रहित कर देने का और चित्तवृत्तियों के निग्रह का। यह राजयोग है। राजयोग के आठ अंग होते हैं, अतः यह 'अष्टांगयोग' के नाम से भी जाना जाता है। अष्टांगयोग पर पतंजलि महर्षि ने 'योग-दर्शन' नामक अत्यन्त सुन्दर पुस्तक लिखी है।

 

राजयोग के आठ अंग हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि

 

राजयोग के साधक को यम और नियम में पूरी निपुणता प्राप्त कर लेनी चाहिए। यम-नियम में सफलता प्राप्त कर लेने पर ही वह योगनिष्ठ होने की आशा कर सकता है।

 

यम के अन्तर्गत अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय (चोरी करना) और अपरिग्रह (लालच करना) का अभ्यास करना पड़ता है।

 

नियम के अन्तर्गत शौच, सन्तोष, तपस्या, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर-भक्ति) का अभ्यास करना पड़ता है।

 

अतः राजयोग को पूर्ण विज्ञान कहा जाता है। इसकी प्रक्रिया परम वैज्ञानिक है। साधक को सर्वप्रथम आचार-विचार की शुद्धि करनी पड़ती है, तभी वह राजयोग के अन्य अंगों में सफलतापूर्वक बढ़ता जाता है।

विशेष शिक्षाएँ

 

प्रारम्भ में अपनी स्मृति को समुन्नत करो। इच्छित व्यायाम करो और नित्य-प्रति इसमें नियमित रहो। प्रतिदिन का वृत्तान्त रखो और वह भी मन में ही। यह मुख्य है। केवल किताबों के पन्नों को रँगने से काम नहीं चलेगा। यदि तुम जल्दी आत्म-सुधार करना चाहते हो, यदि तुम एक सच्चा मनुष्य बनना चाहते हो, तो सभी शिक्षाओं को आचरण के साँचे में ढालो। तुम, अपनी गलतियों को सुधार सकते हो। मैं तुमको शीघ्र ही एक व्यावहारिक मनुष्य बना देना चाहता हूँ।

 

एक छोटी-सी पुस्तिका रखो; अर्थात् एक दैनिकी (दिन-भर का ब्योरा) में अपने दिन-भर के कार्यों का वृत्तान्त नोट कर लो। यदि तुम बहुत ही इच्छुक और लगन के पत्रके हो, तो स्मृति की उन्नति के अभ्यास को केवल तीन महीनों में पूर्ण कर सकते हो। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति के लिए छह माह का समय पर्याप्त है और तीसरे दर्जे के साधक के लिए साल भर का समय उन्नति के अभ्यास के लिए पर्याप्त है। इस प्रकार जब तुम स्मृति की उन्नति कर चुकोगे, तो संकल्पोन्नति का बीड़ा उठा सकोगे।

 

जब स्मृति के विकास से कुछ बल प्राप्त होने लगता है, तो संकल्पोन्नति में अधिकाधिक प्रेरणा मिलेगी। तुम्हें अभ्यास में प्रसन्नता प्राप्त होगी और एक प्रकार का आनन्द अनुभूत होगा। तुम्हारी प्रत्येक स्नायु में संकल्प का प्रवाह संचरित होगा। इससे तुमको उत्साह और साहस की प्राप्ति होगी। अतः शान्तिपूर्वक और दृढ़ता से अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते रहो। अपनी प्रतिज्ञा के अभिप्राय को अच्छी तरह समझ लो और सदा याद रखो। धीरे-धीरे भावना प्रत्यक्ष होती जायेगी। हतोत्साह तो कभी होना ही नहीं चाहिए। तुमको अपने पुराने संस्कारों से युद्ध करना पड़ेगा। अतः धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करो। धैर्य, ध्यान, सहन-शक्ति, मन की साम्यता, सावधानी आदि गुणों के विकास की चेष्टा करनी चाहिए। यह जान लो कि संकल्पों के विकास के लिए इन गुणों का विकास अनिवार्य है। जिस प्रकार बीज के बिना वृक्ष नहीं पनपता, उसी प्रकार इन गुणों के बिना संकल्प की उन्नति नहीं हो सकती। ध्यान का भी विकास करो। तीन माह तक संकल्प-साधना करो। इस काल में तुमको आन्तरिक बल का अनुभव होगा और वे कार्य जो कुछ काल पूर्व कठिन प्रतीत होते थे, अब आसानी से किये जा सकेंगे। तुम यह भी अनुभव करोगे कि तुम्हारा मन स्थिर होने लग गया है या हो ही गया है। पहले जो विचार तुम्हारे मन को सहज में ही उद्विग्न कर देते थे, वे अब वैसा नहीं कर पायेंगे। कठिन-से-कठिन कार्य को अब तुम सरलता से कर पाओगे और किसी भी कार्य में शान्ति को निभा सकोगे। अब तुम किसी कार्य को अपने हाथों में लेते हो, तो योग्य दीखते हो। तुम्हारी वाणी में शक्ति का आविर्भाव हुआ दीखता है। तुम्हारे व्यक्तित्व में ही परिवर्तन गया है। तुम्हारी मुस्कान में एक विशेष आकर्षण है। अब बहुत लोग तुम्हारी उपस्थिति में प्रभावी व्यक्तित्व का अनुभव करते हैं। तुम्हारा मित्र-वर्ग तुम्हारे मुख-मण्डल पर ज्योति की आभा की उज्ज्वलता की चमक पाता है।

 

मन को स्थिर करने का अभ्यास (एक केन्द्र में लाने का अभ्यास) संकल्प और स्मृति की साधना के साथ-साथ चलना चाहिए। मन की एकाग्रता से साधना में सफलता मिलती है। मन एकाग्र हुए बिना साधना में उन्नति नहीं हो सकती है। हर रोज

 

प्रातःकाल घण्टे-आधे घण्टे मन को एकाग्र करने का अभ्यास करना चाहिए। मन की एकाग्रता के लिए एक आध्यात्मिक आधार की आवश्यकता है। यह याद रखो कि मन को केन्द्रस्थ करने का अभ्यास तुम केवल संकल्प और स्मृति के विकास के लिए ही नहीं करते हो, वरन् ईश्वर-दर्शन के लिए भी करते हो। वास्तव में ध्येय तो यही है। इसको कभी भी भूलो मेरे और दूसरों के अनुशासनों में यही मुख्य भेद है। ब्रह्मचर्य और ईश्वर-दर्शन दोनों कुंजियाँ हैं। मैं डंके की चोट पर इसी अनुशासन को भिन्न-भिन्न स्थलों में कहा करता हूँ। मैं तुम्हारे संकल्प और स्मृति की उन्नति को तुम्हारे ही जीवन की सफलता और ईश्वर-दर्शन के लिए चाहता हूँ।

 

अपनी मनोनुकूलता के अनुसार मन को एक केन्द्र पर स्थापित कर दो। भगवान कृष्ण या भगवान् राम या भगवान् शिव या भगवान् मसीह या भगवान् बुद्ध-किसी एक की मूर्ति पर अपने मन को स्थिर कर सकते हो। यही एकाग्रता संकल्प और स्मृति की उन्नति में सहायक होगी। मन की एकाग्रता के अनुभवों का लेखा एक डायरी में लिखते रहो। प्रति-सप्ताह या प्रति माह डायरी के पिछले पन्नों को दोहराते भी रहो।

 

चौथी बात है गुणों के विकास की। चरित्र-निर्माण सम्बन्धी साहित्य का अध्ययन करो, उससे तुम बहुत प्रकार के गुणों की साधना के तरीकों को सीख सकोगे। जो गुण तुममें अनुपस्थित है, उसी की साधना करो। क्रम-क्रम से साहस, दया, विश्व-प्रेम, भद्रता, सहिष्णुता, सन्तोष, निष्कपटता और ईमानदारी आदि गुणों की साधना करो। एक-एक महीने के लिए एक-एक गुण के विकास का निश्चय कर लो और उसका क्रमिक विकास करो। धीरे-धीरे वह गुण तुम्हारे चरित्र में ढल जायेगा। सच बात तो यह है कि जब तुम एक गुण का विकास कर चुकते हो, तो बहुत से गुण अपने-आप तुममें जायेंगे। अगर तुमने नम्रता और साहस का विकास कर लिया है, तो दूसरे सहायक और उप-सहायक अथवा आधारभूत गुण स्वतः प्रत्यक्ष हो कर तुम्हारे चरित्र में साथ-साथ ढल जायेंगे। अनिवार्य रूप से सद्गुणों का अभ्यास कम-से-कम आधा घण्टा रोज करना चाहिए।

 

यदि तुम ब्रह्मचर्य और सत्य में स्थिर हो गये, तो बहुत से गुण स्वतः तुममें अवतरित हो जायेंगे। विनम्रता, उत्साह, ब्रह्मचर्य और सत्यता-इन चारों गुणों में से किसी एक को विकास के लिए चुन लो।

 

पाँचवीं बात है अवगुणों के उन्मूलन की। वैसे तो सद्गुणों के विकास से ही दुर्गुणों का मूलोच्छेदन हो जायेगा, किन्तु अच्छा यह है कि दुर्गुणों के दमन का सीधा उद्योग किया जाये। उनका दमन हो जाने पर सद्गुणों का विकास द्रुत गति से होगा।

 

उस अवस्था में सफलता आसान और निश्चित हो जाती है। अगर तुम काम-वासना, क्रोध या अभिमान को हटा सके, तो सब अवगुण अपने-आप लुप्त हो जायेंगे। सभी अवगुण अहंकार के सेवक हैं। अगर अहंकार का नाश हो जाये, तो सारी सेना भयातुर हो कर भाग जायेगी। सभी अवगुणों का गर्भ क्रोध है। अगर क्रोध का नाश कर दिया जाये, तो सम्भावी अवगुण लापता होते जायेंगे। इसलिए अपनी शक्ति से अहंकार और क्रोध के आक्रमण का प्रतिकार करो।

 

छठवीं बात जो ध्यान में रखने की है, वह है इन्द्रिय-संयम। यदि इन्द्रियाँ उपद्रवी हैं, तो मन की एकाग्रता स्थापित नहीं की जा सकती। अतः सावधानी से प्रत्येक इन्द्रिय के कार्य-कलापों का निरीक्षण करते रहो तथा मौन-अभ्यास, उपवास, त्राटक, ब्रह्मचर्य, प्रत्याहार, अपरिग्रह और दम आदि सुन्दर तरीकों से उसका मार्ग भी अवरुद्ध करते रहो। इन्द्रियों के कारण ही तुम्हारी मनुष्यता बहिर्मुख हो जाती है और इन्द्रियाँ ही मन की गति को अन्तर्मुख नहीं होने देतीं। अतः इन्द्रियों को वश में करने का अर्थ है-मन को वशीभूत करना।

 

सातवीं बात जो ध्यान में रखने योग्य है, वह है शारीरिक उन्नति। मैं पुनः याद दिलाता हूँ कि शारीरिक उन्नति के बिना कोई भी उन्नति सम्भव नहीं है। अगर तुम्हारी शरीर-प्रकृति पुष्ट और स्वस्थ नहीं है, तो तुम इस दुनिया में कोई सुन्दर कार्य नहीं कर सकोगे अतः नियमित व्यायामों से अपने शरीर को तेजस्वी बनाये रखो।

 

आठवीं बात है अपनी दैनन्दिनी रखने की। अगर तुम शीघ्र उन्नति चाहते हो, तो अपना रोजनामचा रखो; उसमें अपने पूरे दिन का ब्योरा अंकित करो। उस रोजनामचे में जो कुछ अंकित किया जाये, वह विवेक और सत्यशीलता से किया जाये। यदि तुम अपने को तत्कथित साधनों से सुसज्जित कर लो, तो संसार के शक्तिशाली सम्राट् बन सकते हो। तुम आरोग्य, धन, आध्यात्मिक सुख और दीर्घायु के आनन्द की प्राप्ति कर सकते हो। मैं विद्यार्थियों के योग्य आसनों को ठीक-ठीक बतलाया करता हूँ, किन्तु अभ्यास की जिम्मेदारी तुम पर निर्भर है। तुमको स्वयं सुचारु रूप से कार्य करना होगा। भूख लगने पर तुम्हें ही स्वयं भोजन करना पड़ता है, दूसरे के भोजन करने * से तुम्हारी भूख नहीं मिटा करती। प्यास लगने पर तुम स्वयं ही जल पी कर प्यास बुझा सकते हो, दूसरे के जल पीने से तुम्हारा काम नहीं चलेगा। अब अमरत्व का अमृत भी स्वयं पियो और आध्यात्मिक आनन्द की प्राप्ति करो। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता के सौभागी बनो। एक साल तक अभ्यास करते-करते यह सद्गुण तुम्हारे चरित्र में समीकृत हो जायेंगे और तुम्हारा जीवन-निर्माण ही इनके आधार पर होने लगेगा। अतः जब तक पूर्णता की प्राप्ति हो, इनका अभ्यास करते रहो।

संकल्प की उन्नति