योगासन

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादिका

श्री स्वामी विष्णुशरणानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण :      १९८२

द्वितीय हिन्दी संस्करण : १९८८

तृतीय हिन्दी संस्करण :     १९९६

चतुर्थ हिन्दी संस्करण :      २००६

पंचम हिन्दी संस्करण :      २०१८

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

ISBN 81-7052-126-2 HS 203

 

 

 

 

PRICE: 115/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा

प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पत्रालय : शिवानन्दनगर, जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड,

पिन : २४९१९२' में मुद्रित।

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प्रकाशकीय वक्वव्य

 

योगासनों को जो महत्ता प्राप्त हुई है, उसका स्वरूप द्विविध है। आसन मात्र सर्वतोमुखी शारीरिक व्यायामों का समूह नहीं हैं, वे योगाभ्यास के प्रारम्भिक सोपान भी हैं। शरीर-शोधन के लिए तथा उच्चतर एकता हेतु आवश्यक स्नायविक सन्तुलन के साथ इसकी (शारीरिक शोधन की) समस्वरता के लिए आसनों की इन प्रविधियों को हठयोग और राजयोग-दोनों में निर्दिष्ट किया गया है। पातंजल योगदर्शन में ध्यानाभ्यास के लिए उपयुक्त किसी विशिष्ट आसन का उल्लेख नहीं है; परन्तु हठयोग में शरीर को स्वस्थ रखने एवं इसके कार्यकलापों में सामंजस्य उत्पन्न करने हेतु विभिन्न आसनों के अभ्यास पर बल दिया गया है जिससे कि प्राणायाम के अभ्यास द्वारा प्राण-प्रवाह में सन्तुलन तथा सामंजस्य लाने की सूक्ष्मतर प्रक्रिया में यह (अभ्यास) सहायक हो सके। इस प्रकार योगासन योग के मूल रूप के आधार ही हैं।

 

(ब्रह्मलीन) श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज परम तत्त्व पर ध्यान करने के प्रधान योग में विभिन्न योगों को (सोपानों, अवस्थाओं तथा प्रक्रियाओं के रूप में) मिलाने के लिए विख्यात हैं। उन्होंने इस पुस्तक में योगासनों का वर्णन सीधे-सादे ढंग से किया है जिससे कि सामान्य व्यक्ति भी इन्हें समझ सकें।

 

इस पुस्तक में अत्यधिक प्राविधिक विवरणों का समावेश सप्रयोजन नहीं किया गया है ताकि सामान्य जन भी इस (पुस्तक) से लाभान्वित हो सकें और उनके लिए सामान्य सांसारिक स्तर से ऊपर उठ कर एक नवीन तथा उच्चतर क्षेत्र में प्रवेश करने का मार्ग प्रशस्त हो सके। महत्त्वपूर्ण आसनों के वर्णन के साथ-साथ उनके चित्र भी दिये गये हैं; फिर भी, किसी प्रशिक्षक के मार्गनिर्देशन में आसनाभ्यास करना उचित होगा।

 

श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज जैसी दिव्य विभूति द्वारा रचित इस ग्रन्थ के पूर्व हिन्दी संस्करणों का हिन्दी पाठकों में आशातीत स्वागत हुआ। आशा है, यह संस्करण भी पाठकों के लिए पूर्ववत् उपयोगी सिद्ध होगा।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

देवी-स्तोत्र

 

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।।

 

शरण में आये हुए दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीड़ा दूर करने वाली नारायणी देवी! तुम्हें नमस्कार है।

गुरु-स्तोत्र

 

गुरुमूर्ति स्मरेन्नित्यं गुरोर्नाम सदा जपेत्।

गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यन्न भावर्येत्।।

 

व्यक्ति को चाहिए कि वह सदा गुरु के रूप का स्मरण करे, सदा गुरु के नाम का जप करे तथा गुरु की आज्ञा का पालन करे और गुरु के अतिरिक्त अन्य किसी का चिन्तन करे।

 

गुरुरेको जगत्सर्वं ब्रह्माविष्णुशिवात्मकम्

गुरोः परतरं नास्ति तस्मात् सम्पूजयेद् गुरुम् ।।

 

ब्रह्मा, विष्णु और शिवात्मक सारा संसार एकमात्र गुरु है। गुरु से महान् कोई नहीं है; अतः गुरु की पूजा करनी चाहिए।

परा-पूजा

 

हे केशव प्रभु! मेरी समस्या यह है : मैं तुम्हें कैसे प्रसन्न करूँ ?

 

. गंगा स्वयं तुम्हारे श्रीचरणों से प्रवाहित हो रही हैं। क्या मैं तुम्हारे स्नानार्थ जल लाऊँ?

 

. तुम्हारा सच्चिदानन्द स्वरूप तुम्हारा वस्त्र है। अब मैं तुम्हें कौन-सा पीताम्बर पहनाऊँ ?

 

. विश्व के समस्त प्राणियों तथा जड़ पदार्थों में तुम निवास करते हो। हे वासुदेव! अब मैं तुम्हें कौन-सा आसन बैठने के लिए दूँ?

 

. सदा-सर्वदा सूर्य-चन्द्र-दोनों ही तुम्हारी सेवा कर रहे हैं। फिर व्यर्थ ही मैं तुम्हें दर्पण क्या दिखाऊँ ?

 

. तुम प्रकाशों के प्रकाश हो। बोलो, अब तुम्हारे लिए मैं कौन-सा अन्य प्रकाश जलाऊँ?

 

. तुम्हारा स्वागत करने के लिए अहर्निश अनाहतनाद हो रहा है। तब क्या मैं तुम्हें प्रसन्न करने के लिए ढोल-मजीरा या शंख बजाऊँ?

 

. चारों वेद चारों प्रकार के स्वरों में केवल तुम्हारी स्तुति ही कर रहे हैं। फिर तुम्हारे लिए मैं किस स्तोत्र का पाठ करूँ?

 

. समस्त रस तुम्हारे सुवास ही हैं। हे राम ! तब मैं भोग के रूप में तुम्हारे समक्ष कौन-सा पदार्थ रखूँ?

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विश्व-प्रार्थना

 

हे स्नेहमय करुणा-सागर प्रभु! हे शान्ति के असीम सागर!

 

.            तुम वरुण, इन्द्र, ब्रह्मा तथा रुद्र हो।

तुम सबके माता-पिता तथा पितामह हो।

तुम नीलाम्बर, चन्द्रमा तथा तारक-समूह हो।

तुम्हारी जय हो, जय हो, सहस्र बार जय हो !

 

.            तुम अन्तर, बाह्य, अधः तथा ऊर्ध्व-सर्वत्र हो।

तुम प्रत्येक दिशा में-पूर्व, पश्चिम तथा चतुर्दिक् हो।

तुम अन्तर्यामी, साक्षी तथा स्वामी हो।

तुम्हारी जय हो, पुनः पुनः जय हो!

 

.            तुम सर्वव्यापी तथा अन्तर्व्याप्त हो।

पुष्पाहार के सूत्र के समान तुम सूत्रात्मन् हो।

तुम जीवन, बुद्धि, विचार अथवा चेतना हो।

मैं तुम्हें प्रत्येक स्थान पर तथा प्रत्येक में देख सकूँ-

इसका आशीर्वाद दो।

 

.            हे परम महिम मधुर आराध्य सत्ता !

हे सूर्यों के सूर्य, प्रकाशों के प्रकाश, देवों के देव!

मेरी दृष्टि को धुँधला बना देने वाले

अज्ञानावरण को विदीर्ण करो

तथा मुझे अपने साथ एकत्व अनुभव करने की

शक्ति प्रदान करो।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भूमिका

 

मैं उस ब्रह्म को करबद्ध कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ जो शरणागतों के समस्त भयों, दुःखों और कष्टों को नष्ट करने वाला है, जो अजन्मा होते हुए भी अपनी महानता से जन्म लेता हुआ प्रतीत होता है, जो अचल होते हुए भी चलायमान लगता है, जो एक होते हुए भी (एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म) उन लोगों को अनेक रूप धारण किये प्रतीत होता है जिनकी दृष्टि अनन्तविध मिथ्या दृश्यों को देखने से धुँधली पड़ गयी है।

 

हे आदिनाथ भगवान् शिव ! सर्वप्रथम मैं आपको प्रणाम करता हूँ जिन्होंने पार्वती जी को हठयोग (जो परमोत्कृष्ट राजयोग को उपलब्ध करने का एक सोपान है) की शिक्षा दी थी।

 

गोरक्ष तथा मत्स्येन्द्र हठयोग भली प्रकार जानते थे। योगी स्वात्माराम ने उनकी ही कृपा से यह योग उनसे सीखा। योग की इस शाखा के अज्ञानान्धकार में जो भटक रहे हैं, हठयोग का ज्ञान प्राप्त करने में जो असमर्थ हैं, उन्हें परम दयालु स्वात्माराम योगी हठविद्या का प्रकाश प्रदान करते हैं।

 

जीवन का लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार है। भारतीय दर्शन की समस्त प्रणालियों का एक ही लक्ष्य है-पूर्णता द्वारा आत्मा की मुक्ति।

 

प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है तथा दुःख से बचता है। कोई किसी को सुख प्राप्त करने का उपाय नहीं सिखाता। सुख की खोज करना मानव का अन्तर्निष्ठ स्वभाव है। आनन्द मनुष्य का स्वरूप ही है।

 

इच्छाओं की पूर्ति से मन को वास्तविक शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती, यद्यपि उससे स्नायुओं को क्षणिक प्रसन्नता का अनुभव अवश्य होता है। जिस प्रकार अग्नि पर घी डालने से अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार विषय-भोग करने से इच्छाएँ तीव्र होती हैं तथा मन और अधिक अशान्त हो जाता है। जो पदार्थ दिक्काल तथा कारणत्व से अनुबन्धित होने के कारण विनाशी तथा अनित्य हैं, उनसे यथार्थ स्थायी सुख की आशा कैसे की जा सकती है?

 

विषय-पदार्थों से प्राप्त सुख क्षणिक तथा अनित्य होता है। एक दार्शनिक के लिए यह सुख कदापि सुख नहीं है- यह खुजलाहट अनुभव होने पर शरीर को खुजलाने के समान है। विषय-सुख के साथ ही कठिन श्रम, पाप, भय, पीड़ा, चिन्ता तथा अनेक बुराइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं।

 

सांसारिक कार्यकलापों के कोलाहल तथा उनकी प्रचण्ड हलचल के बीच रहते हुए भी जीवन में शान्ति के कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जब मन कुछ समय के लिए दूषित सांसारिकता से ऊपर उठ कर जीवन की उच्चतर समस्याओं पर मनन करता है- 'मैं कौन हूँ?', 'यह संसार किन-किन उपादानों से, कहाँ से, कब और क्यों उत्पन्न हुआ ?' आदि। सच्चे जिज्ञासु गम्भीरतापूर्वक अपने चिन्तन के क्षेत्र को और अधिक विस्तृत कर लेते हैं। वे सत्य का अन्वेषण करने तथा उसे समझने के प्रयास में जुट जाते हैं। उनमें विवेकोदय होता है। वे आत्मज्ञान-सम्बन्धी पुस्तकों के अध्ययन में रत हो जाते हैं, चिन्तन-मनन करते हैं, निदिध्यासन करते हैं, अपने मन को शुद्ध करते हैं तथा अन्ततोगत्वा सर्वोच्च आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं। जिनका मन सांसारिक वासनाओं तथा लालसाओं से सन्तृप्त रहता है, वे असावधान रहते हैं। वे राग-द्वेष की तरंगों से बलात् दोलायित होते रहते हैं तथा जन्म-मरण और उसकी सहगामी बुराइयों के विक्षुब्ध संसार-सागर में असहाय हो कर हिचकोले खाते रहते हैं।

 

अध्यात्म-मार्ग कण्टकाकीर्ण तथा अधःपाती है। इस पर दृढ़ संकल्प, निर्भीक मनोवृत्ति तथा अदम्य शक्ति वाले व्यक्ति ही चल पाये हैं। यदि एक बार आप इस मार्ग पर चलने का निश्चय कर लें, तो प्रत्येक वस्तु सुगम एवं सरल हो जायेगी और आपके ऊपर भगवत्कृपा अवतरित होगी। समस्त आध्यात्मिक संसार आपका समर्थन करेगा। यह मार्ग आपको सीधे असीम परमानन्द, परम शान्ति, शाश्वत जीवन तथा शाश्वत प्रकाश के उन लोकों में ले जायेगा जहाँ आत्मा को यातना देने वाले त्रिताप, चिन्ताएँ, परेशानियाँ तथा भय प्रवेश करने का साहस नहीं करते; जहाँ जाति, धर्म, वर्ण आदि के समस्त विभेद एक दिव्य प्रेम में विलीन हो जाते हैं और जहाँ कामनाएँ तथा स्पृहाएँ पूर्णतः तृप्त हो जाती हैं।

 

जिस प्रकार एक ही कोट जॉन, दास अथवा अहमद को फिट नहीं सकता, उसी प्रकार एक ही मार्ग सब लोगों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता। चार प्रकार के स्वभाव वाले लोगों के लिए चार मार्ग उपयुक्त होते हैं। वे सब मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं और वह लक्ष्य है परम सत्ता की प्राप्ति। मार्ग अलग-अलग हैं; किन्तु गन्तव्य-स्थान एक ही है। कर्मपरायण, भक्तिपरायण, रहस्यविद् तथा दार्शनिक (विवेकशील) -इन चार प्रकार के व्यक्तियों के विभिन्न दृष्टिकोणों से परम सत्य की प्राप्ति हेतु जिन चार मार्गों का बोध कराया गया है, वे हैं (क्रमशः) कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग तथा ज्ञानयोग।

 

ये चार मार्ग एक-दूसरे के विरोधी नहीं, वरन् परस्पर पूरक हैं। इसका तात्पर्य यह है कि हिन्दू-धर्म की विभिन्न पद्धतियों में परस्पर सामंजस्य है। धर्म के द्वारा पूर्ण मानव-उसका हृदय, बुद्धि और हाथ-विकसित तथा प्रशिक्षित होना चाहिए। एकपक्षीय विकास वांछनीय नहीं है। कर्मयोग मल (मन के विकारों) का निवारण, मन को शुद्ध तथा हाथों को विकसित करता है। भक्तियोग विक्षेप को दूर करके हृदय को विकसित करता है। राजयोग मन को स्थिर तथा एकाग्र करता है। ज्ञानयोग अविद्या के आवरण को हटा कर इच्छा-शक्ति एवं विवेक को विकसित करता है तथा आत्मज्ञान उत्पन्न करता है। अतएव मनुष्य को चारों प्रकार के योगों का अभ्यास करना चाहिए। अध्यात्म-मार्ग पर ठीक प्रगति करने के लिए ज्ञानयोग को प्रमुख तथा अन्य योग-प्रणालियों को उसका सहायक बनाया जा सकता है।

 

'योग' शब्द का अर्थ है-जीवात्मा तथा परमात्मा का मिलन। जो विद्या इस गुह्य ज्ञान को प्राप्त करने का मार्ग बतलाती है, वह योगशास्त्र कहलाती है। हठयोग का सम्बन्ध शरीर से एवं श्वास-नियन्त्रण से है। राजयोग मन से सम्बन्धित है। राजयोग तथा हठयोग एक-दूसरे के अनिवार्य पूरक हैं। पूर्णयोगी बनने के लिए दोनों का ही व्यावहारिक ज्ञान होना आवश्यक है। जहाँ भली प्रकार से अभ्यास किये हुए हठयोग की समाप्ति होती है, वहीं से राजयोग का प्रारम्भ होता है।

 

'हठ' शब्द '' तथा ''- इन दो अक्षरों से बना हुआ संयुक्त शब्द माना जाता है। '' का अर्थ है चन्द्रमा (इडा-नाड़ी) तथा '' का अर्थ है सूर्य (पिंगला नाड़ी) ये दोनों नाड़ियाँ बायें-दायें नासारन्ध्रों से प्रवाहित होने वाले श्वासों के अनुरूप हैं। हठयोग सूर्य तथा चन्द्र एवं प्राण तथा अपान को श्वास के नियमन द्वारा जोड़ने का उपाय बतलाता है।

 

हठयोग स्वास्थ्य तथा दीर्घायु प्राप्त करने में सहायक है। इसके अभ्यास से हृदय, फेफड़ों, मस्तिष्क तथा पाचन तन्त्र की क्रियाएँ नियमित होती हैं। पाचन तथा रुधिर-परिसंचरण की क्रियाएँ भी भली प्रकार होती रहती हैं। वृक्क (गुरदे), यकृत तथा अन्य आन्तरांग भी सुचारु रूप से कार्य करने लगते हैं। हठयोग समस्त प्रकार के रोगों को दूर करता है।

 

इस पुस्तक में योगशास्त्र द्वारा निर्धारित ९० शारीरिक आसनों, महत्त्वपूर्ण बन्धों तथा मुद्राओं एवं प्राणायाम के प्रकारों का वर्णन है। प्राणायाम का अभ्यास आसनों के साथ-साथ ही किया जाता है। योग के प्रथम दो अंग यम तथा नियम हैं। आसन अष्टांगयोग का तृतीय अंग तथा प्राणायाम चतुर्थ अंग है। प्राचीन ऋषियों ने आध्यात्मिक संस्कृति की रक्षा करने एवं उच्चस्तरीय स्वास्थ्य, बल तथा स्फूर्ति को बनाये रखने में सहायक उपकरणों के रूप में इनका प्रतिपादन किया था।

 

साधारण शारीरिक व्यायामों से केवल शरीर की बाह्य आभासी मांसपेशियों का विकास होता है। उनके अभ्यास से आकर्षक डील-डौल वाला पहलवान बना जा सकता है। किन्तु आसनों के माध्यम से शरीर के आन्तरिक अंगों-यथा यकृत, प्लीहा, अग्न्याशय, अँतड़ियों, हृदय, फेफड़ों, मस्तिष्क-तथा शरीर की उपापचय व्यवस्था, उसके चयापचय की स्वस्थता तथा उसके विभिन्न प्रकार के कोशाणुओं और ऊतकों की संरचना, विकास एवं पोषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाली महत्त्वपूर्ण वाहिनीहीन (अन्तःस्रावी) ग्रन्थियों (यथा- गरदन के मूल पर स्थित अवटु-ग्रन्थि तथा परावटु-ग्रन्थि, प्लीहा में स्थित अधिवृक्क ग्रन्थि, मस्तिष्क में स्थित पीयूष ग्रन्थि तथा शंकुरूप-ग्रन्थि) का सम्पूर्ण व्यायाम हो जाता है।

योगासनों की प्रविधियों में सम्बन्धित विस्तृत निर्देश और उनके चित्र इस पुस्तक में दिये गये हैं। इसे पढ़ कर कोई भी व्यक्ति योगासनों का अभ्यास कर सकता है।

 

भारतवर्ष को इस समय बलवान् और स्वस्थ मानव-प्रजाति की आवश्यकता है। कई कारणों से इसमें हास गया है। हमारे प्राचीन ऋषियों द्वारा बताये हुए इन अमूल्य व्यायामों का नियमित एवं विवेचित अभ्यास निश्चय ही मानव-प्रजाति को पुनरुज्जीवित करने तथा एक शक्तिशाली स्वस्थ पीढ़ी के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है।

 

'स्थिरसुखमासनम्' -आसन वह है जो स्थिर तथा सुखदायक हो। इससे कोई दुःखदायी अनुभूति अथवा कष्ट नहीं होना चाहिए। यदि आसन स्थिर हो, तो मन शीघ्र ही विक्षुब्ध हो जायेगा तथा उसकी एकाग्रता समाप्त हो जायेगी। शरीर चट्टान के समान स्थिर होना चाहिए तथा इसे किंचित् भी नहीं हिलना चाहिए। आसन स्थिर होने से ध्यानाभ्यास में प्रगति होगी तथा शरीर की चेतना समाप्त हो जायेगी।

 

प्राचीनकालीन गुरुकुलों में इन आसनों का अभ्यास कराया जाता था। इसी कारण लोग बलवान्, स्वस्थ तथा दीर्घायु होते थे। विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में इन आसनों का प्रचार होना चाहिए।

 

आसनों की संख्या उतनी ही है, जितनी इस सृष्टि में जीवों की योनियाँ हैं (८४ लाख) भगवान् शिव के द्वारा बताये हुए आसनों की संख्या ८४ लाख है। उनमें से ८४ आसन सर्वश्रेष्ठ हैं और इन (८४ आसनों) में से ३२ आसन मानव जाति के लिए अत्यन्त उपयोगी माने गये हैं।

 

चौरासी लाख योनियों से हो कर मानव अपनी वर्तमान स्थिति में पहुँचा है। मानव-गर्भ का भली प्रकार अध्ययन करने से भूतकाल की विभिन्न योनियों के चिह्न प्रकट होंगे।

 

कुछ आसन खड़े हो कर किये जाते हैं यथा-ताड़ासन, त्रिकोणासन, गरुड़ासन आदि। जिन आसनों का अभ्यास बैठ कर किया जाता, वे हैं-पश्चिमोत्तानासन, जानुशिरासन, पद्मासन, लोलासन आदि। कुछ आसनों का अभ्यास लेट कर किया जाता है, ये आसन हैं-उत्तानपादासन, कर्णपीड़ासन, चक्रासन आदि। दुर्बल एवं सुकुमार व्यक्ति लेट कर आसनों का अभ्यास कर सकते हैं। कुछ आसनों जैसे शीर्षासन, वृक्षासन, सर्वांगासन, विपरीतकरणीमुद्रा आदि का अभ्यास शिर नीचे और पैर ऊपर करके किया जाता है।

 

सामान्यतः इन आसनों का अभ्यास दश-बारह वर्ष की आयु के बाद से ही किया जा सकता है। बीस-तीस वर्ष की आयु वाले व्यक्ति इन सब आसनों का अभ्यास भली प्रकार कर लेते हैं। एक-दो महीने के अभ्यास के पश्चात् समस्त कठोर नाड़ियाँ, कण्डराएँ, मांसपेशियाँ तथा अस्थियाँ लचीली बन जाती हैं। वृद्ध जन भी समस्त प्रकार के आसनों का अभ्यास कर सकते हैं। हाँ, यदि वे शारीरिक रूप से स्वस्थ हों, तो शीर्षासन का अभ्यास करना उनके लिए आवश्यक नहीं है। दूसरी ओर, कुछ लोग वृद्धावस्था में शीर्षासन भी करते हैं।

 

वेदान्ती इस कारण आसन-प्राणायाम का अभ्यास करने से भय खाते हैं कि इससे देहाध्यास गहन होगा और वैराग्य-साधना में बाधा पड़ेगी। यद्यपि हठयोग तथा वेदान्त परस्पर बिलकुल भिन्न हैं, फिर भी वेदान्ती अपने सर्वोत्तम लाभ के लिए प्राणायामों के साथ आसनों को सम्मिलित कर सकता है। मैंने कई वेदान्तियों को अस्वस्थ दशा, क्षीणकाय तथा जर्जरावस्था में देखा है। वे कोई भी कठोर वेदान्ती साधना नहीं कर पाते। वे यन्त्रवत् , , का उच्चारण मात्र कर सकते हैं। उनमें इतनी आन्तरिक शक्ति नहीं होती कि शुद्ध सात्त्विक अन्तःकरण से अपनी ब्रह्माकार-वृत्ति को ऊपर उठा सकें। शरीर मन से अत्यधिक सम्बन्धित है। दुर्बल तथा रोगी शरीर का अर्थ दुर्बल मन भी होता है। यदि वेदान्ती अपने शरीर-मन को सबल तथा स्वस्थ बनाये रखने के लिए प्राणायाम और आसनों का थोड़ा अभ्यास कर ले, तो वह भली प्रकार निदिध्यासन करके उत्कृष्ट आध्यात्मिक साधना सम्पन्न कर सकता है। यद्यपि शरीर जड़ तथा निःसार है, तदपि आत्म-साक्षात्कार के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है। इस उपकरण को निर्मल, हृष्ट-पुष्ट तथा स्वस्थ रखा जाना चाहिए। आपको आपके लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए यह शरीर एक घोड़े के समान है। यदि घोड़ा ठोकर खा कर गिर पड़े तो आप अपने गन्तव्य स्थान पर नहीं पहुँच सकते हैं। यदि यह साधन (शरीर) निर्बल हो जाता है, तो आप अपने आत्म-साक्षात्कार के लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सकेंगे।

षट्कर्मों के नियमित अभ्यास से शुद्धि होती है। ये षट्कर्म हैं-धौति, वस्ति, नेति, नौलि, त्राटक तथा कपालभाति।

 

आसनों से शक्ति प्राप्त होती है तथा मुद्रा से स्थिरता। प्रत्याहार धैर्य प्रदान करता है। प्राणायाम का अभ्यास करने से शरीर हलका हो जाता है। ध्यान से आत्म-साक्षात्कार होता है। समाधि निर्लिप्तता अर्थात् कैवल्य प्रदान करती है।

 

इतिहास के आदिकाल से अनेक असाधारण घटनाएँ मानव-जगत् में घटित होती मानी गयी हैं। पाश्चात्य देशों में वैश्व-चेतना शीर्षक के अन्तर्गत कई धार्मिक व्यक्तियों के अनुभव अंकित किये गये हैं। कुशल तान्त्रिकों ने सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से पृथक् करने की घटना प्रदर्शित की। सतही ज्ञान रखने वाले कुछ वैज्ञानिक जब विभिन्न प्रकार की योग की अलौकिक घटनाओं को समझने में असमर्थ हो जाते हैं, तब इनकी उपेक्षा करने का प्रयत्न करने लगते हैं। अनेक समझदार वैज्ञानिक ऐसी असाधारण घटनाओं (जो कठोर योगाभ्यासों का परिणाम हैं) का अध्ययन, अनुसन्धान तथा सामान्यीकरण करने हेतु प्रयत्नशील हैं। मानव अपनी अन्तर तथा बाह्य प्रकृति पर नियन्त्रण स्थापित करके अपने को दिव्यता में तत्त्वान्तरित कर सकता है।

 

वाराणसी के (ब्रह्मलीन) त्रैलिंग स्वामी, आलन्दी के ज्ञानदेव, राजा भर्तृहरि, चांगदेव-इन सभी ने योग-साधना द्वारा अपने-आपको ईश्वरत्व के स्तर तक उठा लिया था। जो-कुछ किसी एक ने प्राप्त किया है, लगन से प्रयत्न करने पर हम सभी उसे प्राप्त कर सकते हैं। यह माँग और पूर्ति का प्रश्न है। माँग प्रबल होने पर उसकी पूर्ति तुरन्त हो जाती है। प्रश्न यह है-क्या आपमें ईश्वर की माँग है? क्या आपमें आध्यात्मिक पिपासा तथा क्षुधा है?

 

आप सबमें सदा-सर्वदा सुख, परमानन्द, अमरता, शान्ति, मनस्थैर्य, महिमा तथा वैभव निवास करें!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय वक्वव्य... 3

देवी-स्तोत्र. 4

गुरु-स्तोत्र. 4

परा-पूजा.. 4

विश्व-प्रार्थना.. 6

भूमिका.. 7

प्रथम अध्‍याय

सूर्य-नमस्कार. 17

द्धितीय अध्‍याय

ध्यान के लिए आसन. 20

सामान्य निर्देश. 20

. पद्मासन. 21

. सिद्धासन. 23

. स्वस्तिकासन. 25

. सुखासन. 25

तृतीय अध्‍याय

मुख्य आसन. 28

. शीर्षासन. 28

. सर्वांगासन. 31

. हलासन. 33

. मत्स्यासन. 35

. पश्चिमोत्तानासन. 36

१०. मयूरासन. 37

११. अर्ध-मत्स्येन्द्रासन. 39

१२. शलभासन. 40

१३. भुजंगासन. 42

१४. धनुरासन. 43

१५. गोमुखासन. 44

१६. वज्रासन. 45

१७. गरुड़ासन. 48

१८. ऊर्ध्व पद्मासन. 49

१९. पादांगुष्ठासन. 50

२०. त्रिकोणासन. 51

२१. बद्धपद्मासन. 52

२२. पादहस्तासन. 53

२३. मत्स्येन्द्रासन. 55

२४. चक्रासन. 56

२५. शवासन. 57

चतुर्थ अध्‍याय

विविध आसन. 59

२६. जानुशीर्षासन. 59

२७. तोलांगुलासन. 60

२८. गर्भासन. 60

२९. ससांगासन. 61

३०. सिंहासन. 61

३१. कुक्कुटासन. 62

३२. गोरक्षासन. 62

३३. कन्दपीड़ासन. 62

३४. संकटासन. 63

३५. योगासन. 64

३६. उत्कटासन. 64

३७. ज्येष्टिकासन. 65

३८. अद्वासन. 65

३९. ऊर्ध्वपादासन. 65

४०. उष्ट्रासन. 65

४१. मकरासन. 66

४२. भद्रासन प्रविधि तथा लाभ. 66

४३. वृश्चिकासन. 66

४४. योगनिद्रासन. 66

४५. अर्ध-पादासन. 67

४६. कोकिलासन. 67

४७. कर्णपीड़ासन. 67

४८. वातायनासन. 67

४९. पर्यंकासन. 68

५०. मृतासन. 68

विशेष निर्देश. 68

आसनों का उपयोग (तालिका) 78

पंचम अध्‍याय

महत्त्वपूर्ण मुद्राएँ और बन्ध... 80

. महामुद्रा.. 80

. योगमुद्रा.. 80

. खेचरीमुद्रा.. 81

. वज्रोलीमुद्रा.. 82

. विपरीतकरणीमुद्रा.. 82

. शक्तिचालनमुद्रा.. 83

. महावेध. 83

. महाबन्ध... 83

. मूलबन्ध... 83

१०. जालन्धरबन्ध... 84

११. उड्डियानबन्ध... 84

१२. योनिमुद्रा.. 85

षष्‍ठ अध्‍याय

प्राणायाम-विज्ञान. 86

. कपालभाति.. 87

. सूर्यभेद. 88

. उज्जायी.. 89

. सीत्कारी. 89

. शीतली-प्राणायाम. 89

. भस्त्रिका-प्राणायाम. 90

. भ्रामरी. 91

. मूर्च्छा.... 92

. प्लावनी.. 92

१०. केवल-कुम्भक.. 92

प्राणायाम के लाभ. 93

प्राणायाम-सम्बन्धी संकेत. 93

योग परिशिष्‍ट

कुण्डलिनी.. 98

अभ्यास-क्रम एवं दिनचर्या.. 99

महत्त्वपूर्ण संकेत. 102

योगासनों की विस्तृत सूची.. 104

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम अध्याय

सूर्य-नमस्कार

 

सूर्य नमस्कार की प्रणाली लयबद्ध श्वसन के साथ कई प्रकार के योगासनों, द्रुतगति, सूर्य-स्नान तथा दिव्य शक्ति (जिसका प्रतिनिधित्व सूर्य करता है) के प्रार्थनामय चिन्तन का सम्मिश्रण है। सूर्य नमस्कार का अभ्यास सम्पूर्ण संसार को प्रकाश, जीवन, आनन्द तथा ऊष्मा प्रदान करने वाले प्रातःकालीन सूर्य की ओर मुँह करके तथा उसकी प्राणदायिनी किरणों से समग्र शरीर को निमज्जित करते हुए किया जाता है।

 

सूर्य नमस्कार के अन्तर्गत १२ आसन किये जाते हैं। प्रत्येक आसन की क्रिया अपने से आगामी आसन की क्रिया में सहज एवं सौम्य रूप से प्रवहणशील रहती है। सूर्य नमस्कार का अभ्यास करते समय शरीर को ओजपूर्ण गति करनी पड़ती है। इससे मांसपेशियाँ निर्मित होती हैं; परन्तु साथ ही, इस अभ्यास में योग के इस महत्त्वपूर्ण नियम का भी ध्यान रखा जाता है कि शरीर पर कोई अनावश्यक जोर पड़े। इसका परिणाम एक असाधारण तथा अनूठे प्रभाव के रूप में सामने आता है-अर्थात् सूर्य नमस्कार का अभ्यास करने के पश्चात् (मात्र शारीरिक संवर्धन करने वाले व्यायाम आदि करने के परिणाम-स्वरूप शरीर पर पड़े हुए प्रभाव के असमान) अभ्यासी का शरीर थकता नहीं तथा वह पूर्ण रूप से ताजगी अनुभव करता है।

 

इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात उस आन्तरिक भावदशा से सम्बन्धित है जिसमें रहते हुए सूर्य नमस्कार का अभ्यास किया जाता है। अभ्यास करते समय प्रत्येक छोटी-से-छोटी गति के प्रति जागरूक रहते हुए शरीर, विशेषकर मेरुदण्ड, में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन का ध्यान रखा जाता है। ऐसा होने देने के लिए अभ्यास की अवधि में मन को शान्त तथा सहज रहना चाहिए। कुछ महीनों के अभ्यास के पश्चात् इस प्रकार की जागरूकता (सतर्कता) विकसित हो जाती है।

 

प्रविधि

 

. सीधे खड़े हो जायें। वक्षस्थल के सामने हाथों को जोड़ें- जिस प्रकार प्राच्य ढंग से अभिवादन किया जाता है। श्वास बाहर निकालें।

 

. अपनी दोनों भुजाओं को सीधा रखते हुए शिर के ऊपर ले जायें तथा घड़ को उसके आधार से धीरे-धीरे यथासम्भव पीछे की ओर झुकायें। ऐसा करते समय श्वास अन्दर लें। यदि आप इस गति के अन्त में श्वास छोड़ेंगे तो आपको और अधिक झुकने में सहायता मिलेगी।

 

. श्वास छोड़ते हुए ऊपर की ओर उठें और आगे की ओर झुकें। मेरुदण्ड में खिंचाव उत्पन्न करें। घुटनों को सीधा रखते हुए अपनी हथेलियाँ भूमि पर समतल रखें। उँगलियाँ सामने की ओर पैरों के समानान्तर रखें। चेहरा दोनों घुटनों के बीच में रखें।

 

. श्वास अन्दर लेते हुए, दाहिने पैर को पीछे की ओर ले जायें। बायें पैर को घुटने से मोड़ें तथा (इस पैर की) जाँघ को धड़ के बिलकुल निकट रखें। ऊपर की ओर देखें। श्वास अन्दर लें।

 

. बायें पैर को पीछे की ओर ले जायें। पीठ और भुजाएँ सीधी रखें। श्वास छोड़ें।

 

. श्वास छोड़ते हुए कोहनियों को मोड़ें। शरीर को फर्श की ओर लायें। माथे, सीने, हथेलियों, घुटनों और पैरों की उँगलियों से फर्श को स्पर्श करें। शरीर के अन्य अंग फर्श को स्पर्श नहीं करेंगे। श्रोणीय झुकाव रखते हुए नितम्बों को ऊपर उठाये रखें।

 

. शिर को ऊपर और पीछे की ओर ले जायें। भुजाओं को सीधा करें और मेरुदण्ड को यथासम्भव पीछे की ओर झुकायें। श्वास अन्दर लें।

 

. श्वास बाहर निकालते हुए कूल्हों को ऊपर और पीछे की ओर उठायें। शरीर को अँगरेजी के उलटे 'वी' अक्षर के आकार में ले आयें तथा पैरों और हथेलियों को फर्श पर रखें।

 

. दाहिने पैर को आगे की ओर ले आयें तथा (दाहिने पैर के) तलवे को दोनों हथेलियों के बीच फर्श पर समतल रखें (क्रम-संख्या के समान) श्वास अन्दर लें।

 

१०. बायें पैर को आगे ले जायें, घुटनों को सीधा कर लें तथा शिर नीचे की ओर करें (क्रम-संख्या के समान) श्वास छोड़ें।

 

११. श्वास अन्दर लें। शरीर को सीधा करें। अपनी भुजाओं को सीधा रखते हुए शिर के ऊपर ले जायें तथा शरीर को पीछे की ओर यथासम्भव मोड़ें (क्रम-संख्या के समान)

 

१२. सीधे खड़े हो जायें (क्रम-संख्या के समान) सामान्य ढंग से खड़े होने की स्थिति में जायें।

 

प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्य नमस्कार के अभ्यास की कम-से-कम १२ आवृत्तियाँ करें (एक आवृत्ति में उपर्युक्त क्रमानुसार १२ आसन होते हैं)

 

१२ आवृत्तियाँ पूरी करने के पश्चात् फर्श पर पीठ के बल लेट जायें। पैरों की उँगलियों तथा शिर के ऊपरी भाग के बीच के प्रत्येक अंग को एक-एक करके शिथिल करें। इसे शवासन कहते हैं। प्रारम्भ में यदि अभ्यासी तीन या चार आवृत्तियों के बाद थकने लगे तो उसे आवृत्तियों की संख्या शनैः शनैः (प्रतिदिन या प्रति दो दिन में एक-एक करके) बढ़ानी चाहिए। उसे इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी कारण से शरीर के किसी भी भाग पर अधिक जोर पड़े। आवृत्तियों की संख्या अपनी क्षमता के अनुसार बढ़ानी चाहिए। कुछ अभ्यासी अधिक थकान का अनुभव किये बिना एक-साथ ही १०८ आवृत्तियाँ पूरी कर लेते हैं।

 

सूर्य-नमस्कार का अभ्यास आरम्भ करने से पूर्व अभ्यासी को सर्वशक्तिमान् सूर्य भगवान् से निम्नांकित प्रार्थना करनी चाहिए :

 

सूर्य-प्रार्थना

 

सूर्य सुन्दरलोकनाथममृतं वेदान्तसारं शिवं

ज्ञानं ब्रह्ममयं सुरेशममलं लौकेकचित्तं स्वयम्।

इन्द्रादित्यनराधिपं सुरगुरुं त्रैलोक्यचूडामणिं

ब्रह्माविष्णुशिवस्वरूपहृदयं वन्दे सदा भास्करम्।।

 

मैं सदा सूर्य भगवान् की वन्दना करता हूँ, जो सुन्दर लोकनाथ हैं; अमर हैं; वेदान्त के सार, मंगलकारी तथा स्वतन्त्र ज्ञान-स्वरूप एवं ब्रह्ममय अपि देवताओं के अधिपति हैं; जो नित्य शुद्ध हैं; जो जगत् के एकमात्र चैतन्य हैं; जो इन्द्र, मनुष्यों तथा देवताओं के अधिपति और देवताओं के गुरु हैं; जो तीनों लोकों के चूड़ामणि हैं तथा जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव के हृदय-स्वरूप और प्रकाश देने वाले हैं।

 

सूर्य पृथ्वी के निवासियों के लिए अत्यन्त देदीप्यमान् तथा जीवनदायिनी शक्ति है। यह अप्रकट सर्वशक्तिमान् ईश्वर का दृश्य प्रतिनिधि है। अधिकांश मानव किसी मूर्त पदार्थ अथवा विचार की सहायता के बिना अनुभवातीत परम तत्त्व का चिन्तन नहीं कर सकते। उनके लिए सूर्य पूजा तथा ध्यान का सर्वोत्तम विषय है।

 

इस प्रकार सूर्य नमस्कार मानव के लिए अत्यन्तावश्यक शरीर, मन तथा आत्मा के भव्य तथा सम्पूर्ण संवर्धन की आधारशिला प्रस्तुत करता है।

 

 

 

 

 

 

द्वितीय अध्याय

ध्यान के लिए आसन

सामान्य निर्देश

 

जप और ध्यान के लिए चार आसन निर्धारित हैं। ये हैं-पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन और सुखासन।

 

इन चारों में से किसी भी एक आसन में शरीर को बिना हिलाये लगातार तीन घण्टे तक बैठने में समर्थ होना चाहिए। तभी आप आसन-जय प्राप्त कर सकेंगे। तत्पश्चात् आप प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास आरम्भ कर सकेंगे। स्थिर आसन प्राप्त किये बिना ध्यान-योग में आप भली प्रकार आगे नहीं बढ़ सकते। आपको आसन में जितनी अधिक स्थिरता प्राप्त होगी, उतना ही अधिक आप मन को एकाग्र कर सकेंगे। यदि आप एक घण्टा भी आसन-मुद्रा में स्थिर रह सकें, तो आप चित्त की एकाग्रता को और उसके फल-स्वरूप अनन्त शान्ति तथा आत्मिक आनन्द को प्राप्त कर सकेंगे।

 

ध्यान-मुद्रा में बैठने पर यह विचार करें कि 'मैं चट्टान के समान दृढ़ हूँ, कोई भी शक्ति मुझे नहीं हिला सकती।' यदि मन को अनेक बार यह निर्देश देते रहें, तो आसन शीघ्र स्थिर हो जायेगा। ध्यान के लिए बैठने पर आपको सजीव मूर्ति के समान हो जाना चाहिए। तभी आपके आसन में यथार्थ स्थिरता आयेगी। वर्ष भर के नियमित अभ्यास से आपको सफलता मिलेगी और फिर आसन में लगातार तीन घण्टे तक आप बैठ सकेंगे। आधे घण्टे से आरम्भ करें और धीरे-धीरे अभ्यास का समय बढ़ाते जायें।

 

यदि कुछ समय बाद टाँगों में तीव्र पीड़ा होने लगे, तो तुरन्त टाँगों को खोल कर पाँच मिनट तक हाथों से मालिश कर लें और पुनः आसन में बैठ जायें। आसन में प्रगति कर लेने पर आप पीड़ा का अनुभव नहीं करेंगे। आप पीड़ा के स्थान में अत्यधिक आनन्द का अनुभव करेंगे। प्रातः एवं सायं-दोनों समय आसन का अभ्यास करें।

 

आसन में बैठ जाने पर नेत्र बन्द कर लें, भृकुटी अथवा त्रिकुटी (अर्थात् दोनों भौंहों के मध्य भाग) या हृदय-प्रदेश पर, जिसे अनाहत चक्र कहते हैं, दृष्टि को केन्द्रित करें। त्रिकूट (आज्ञा-चक्र) मन का स्थान है। इस स्थान पर कोमलता से अर्थात् बिना बल लगाये ध्यान लगाने से सरलतापूर्वक मन को वश में किया जा सकता है। आपको तुरन्त एकाग्रता प्राप्त होगी। नासिकाग्र पर मन को एकाग्र करने (नासिकाग्र दृष्टि) से भी वही लाभ होगा; किन्तु इसमें मन को जमाने में अधिक समय लगेगा। जो लोग भृकुटी अथवा नासाग्र-भाग पर दृष्टि नहीं जमा सकते, वे किसी बाह्य बिन्दु अथवा हृदय, शिर, ग्रीवा आदि आन्तरिक चक्रों पर जमा सकते हैं। त्रिकूट (आज्ञा चक्र) पर दृष्टि जमाने को भ्रूमध्य-दृष्टि भी कहा जाता है।

 

शिर, गरदन और धड़ के ऊपरी भाग मेरुदण्ड को एक सीधी समरेखा में रखें। पद्म, सिद्ध, स्वस्तिक अथवा सुख में से किसी भी एक आसन के अभ्यास में टिके रहें और बारम्बार अभ्यास के द्वारा उसे बिलकुल दृढ़ एवं त्रुटिहीन बना लें। आसन कभी बदलें। एक ही आसन के अभ्यास में दृढ़तापूर्वक लगे रहें। उसमें जोंक की भाँति चिपक जायें। ध्यान के लिए एक ही आसन अपनाने के पूर्ण लाभ को भली प्रकार से समझ लें।

 

. पद्मासन

 

पद्म का अर्थ है कमल। इस आसन का प्रदर्शन करने पर यह एक प्रकार से कमल-जैसा प्रतीत होता है, इसलिए इसका नाम पद्मासन रखा गया है। इसे कमलासन भी कहते हैं।

 

जप और ध्यान के लिए निर्दिष्ट चार आसनों में से पद्मासन सर्वोपरि है। यह ध्यानाभ्यास करने के लिए सर्वश्रेष्ठ आसन है। घेरण्ड, शाण्डिल्य आदि ऋषियों ने इस महत्त्वपूर्ण आसन की अत्यधिक प्रशंसा की है। यह गृहस्थियों के लिए अत्यधिक अनुकूल है। इस आसन में स्त्रियाँ भी बैठ सकती हैं। पद्मासन दुबले-पतले तथा युवा मनुष्यों के लिए भी उपयुक्त है।

 

प्रविधि

 

टाँगों को आगे फैला कर भूमि पर बैठें। फिर दायाँ पैर बायीं जंघा पर और बायाँ पैर दायीं जंघा पर रखें। अब हाथों को जानु-सन्धियों पर रखें।

 

आप दोनों हाथों की अँगुलियों का ताला बना कर बँधे हाथों को बायें टखने पर रख सकते हैं। यह कुछ व्यक्तियों के लिए बहुत ही सुखकर है। या आप फिर अपना दायाँ हाथ दायें घुटने पर और बायाँ हाथ बायें घुटने पर रख सकते हैं। इसमें हथेलियाँ ऊपर की ओर होनी चाहिए और तर्जनी अँगूठे के मध्य भाग को छूती हुई होनी चाहिए। इसे चिन्मुद्रा कहते हैं।

 

 

 

 

 

पद्मासन के प्रकार

 

() अर्धपद्मासन

 

यदि आप आरम्भ में अपने दोनों पैरों को जंघाओं पर रख सकें, तो कुछ देर तक कभी एक पैर एक जंघा पर तथा कुछ देर तक दूसरा पैर दूसरी जंघा पर रखें। कुछ दिन अभ्यास करने से आप अपने दोनों पैरों को जंघाओं पर रख सकेंगे। यह अर्धपद्मासन है।

 

() वीरासन

 

आराम से बैठ कर, दायाँ पैर बायीं जंघा पर तथा बायाँ पैर दायीं जंघा के नीचे रखें। गौरांग महाप्रभु इसी आसन में ध्यान के लिए बैठा करते थे। यह आरामदायक मुद्रा है। वीरासन का अर्थ है वीर-मुद्रा

 

() पर्वतासन

 

साधारण पद्मासन लगा कर घुटनों के बल खड़े हो जायें और अपने हाथों को ऊपर उठायें। यह पर्वतासन है। फर्श पर एक मोटा कम्बल बिछा कर यह आसन करें ताकि घुटनों पर चोट लगे। प्रारम्भ dot 7 जब तक आप सन्तुलन प्राप्त कर लें, कुछ दिनों के लिए आप स्टूल या बेंच का सहारा ले सकते हैं। बाद tilde pi आप हाथों को ऊपर उठा सकते हैं।

 

वीरासन में बैठ कर हाथों को ऊपर उठायें और स्थिर हो जायें। कुछ लोग इसे भी पर्वतासन करते हैं।

 

() समासन

बायीं एड़ी को दायीं जंघा के सिरे पर और दायीं एड़ी को बायीं जंघा के सिरे पर रखें। आराम से बैठें। दार्थी या बायीं किसी भी ओर झुकें। यह समासन कहलाता है।

() कार्मुकासन

 

साधारण पद्मासन लगायें। दायें हाथ से दायें पैर का अँगूठा और बायें हाथ से बायें पैर का अँगूठा पकड़ें। इस प्रकार अपने हाथों की कोहनी पर कैंची बना लें।

 

 

 

 

() उत्थित पद्मासन

 

पद्मासन में बैठ कर अपनी दोनों हथेलियों को अपने दोनों ओर भूमि पर टेक लें। धीरे-धीरे शरीर को उठायें, झटका नहीं लगने पाये, शरीर काँपे। इस उठी हुई स्थिति में जितनी देर ठहरें, श्वास को रोके रखें। नीचे आने पर आप श्वास को बाहर निकाल सकते हैं। जो लोग कुक्कुटासन नहीं कर सकते, वे यह आसन कर सकते हैं। इसमें हाथ पार्श्व (side) में रखे जाते हैं, जब कि कुक्कुटासन में हाथ जंघा और पिण्डलियों के बीच में रखे जाते हैं। इन दोनों में इतना ही अन्तर है।

 

() बद्धपद्मासन

 

कुछ लोग इसे पद्मासन-मुद्रा भी कहते हैं।

 

() ऊर्ध्वपद्मासन

 

() लोलासन

 

(१०) कुक्कुटासन

 

(११) तोलांगुलासन

. सिद्धासन

 

पद्मासन के बाद महत्त्व की दृष्टि से सिद्धासन आता है। कुछ लोग इस आसन को ध्यान के लिए पद्मासन से भी अधिक उपयोगी मानते हैं। यदि आप इस आसन को सिद्ध कर लें तो आपको अनेक सिद्धियाँ उपलब्ध हो जायेंगी। कई प्राचीन सिद्ध-योगियों ने इस आसन का अभ्यास किया था, इसी कारण इसका नाम सिद्धासन पड़ा।

 

भारी जंघाओं वाले स्थूल जन भी इस आसन को सरलतापूर्वक लगा सकते हैं। वस्तुतः यह आसन कुछ लोगों को पद्मासन की अपेक्षा अधिक उपयोगी लगता है। युवक ब्रह्मचारियों, जो ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करना चाहते हैं, को इस आसन का अभ्यास करना चाहिए। महिलाओं के लिए यह आसन उपयुक्त नहीं है।

 

 

प्रविधि

 

बायें या दायें पैर की एड़ी को गुदा से थोड़ा ऊपर सीवनी के मध्य में, जो कि पाचन-नली का अन्तस्थल द्वार है, रखें। दूसरी एड़ी को जननेन्द्रिय की जड़ पर रखें। पैर और टाँगों को इतने अच्छे ढंग से जमायें कि टखनों के जोड़ एक-दूसरे को छूते रहें। हाथों को उसी प्रकार रखें जिस प्रकार उन्हें हम पद्मासन में रखते हैं।

 

सिद्धासन के विभिन्न प्रकार

 

() गुप्तासन

 

बायीं एड़ी को जननेन्द्रिय के ऊपर रखें। इसी प्रकार दायीं एड़ी को भी जननेन्द्रिय के बाहरी अंग पर रखें। दोनों टखने आमने-सामने या एक-दूसरे से सटे रहें। दाहिने पैर की अँगुलियों को बायीं जंघा और बायीं पिण्डलियों के बीच खाली भाग में डाल दें और बायें पैर की अंगुलियों को दायीं टाँग से ढक दें। गुप्त का अर्थ है छिपा हुआ। इस आसन से जननेन्द्रिय को भली-भाँति ढका जाता है, इसलिए इसे गुप्तासन कहा जाता है।

 

() वज्रासन

 

बायीं एड़ी को जननेन्द्रिय के नीचे और दायीं एड़ी को इसके ऊपर रखें। वज्र का अर्थ है सुदृढ़। वज्रासन का एक और प्रकार भी है। इस सम्बन्ध में अलग से अन्यत्र निर्देश दिये गये हैं।

 

() बद्धयोन्यासन

 

साधारण सिद्धासन में बैठ जायें और योनि-मुद्रा करें। यह बद्धयोन्यासन है। योनि-मुद्रा का वर्णन अन्य मुद्राओं के साथ किया गया है।

 

() क्षेमासन

 

सिद्धासन में बैठ कर यदि आप अपने दोनों हाथों को सीने की सीध में ऊपर को उठाते हैं तो इसे क्षेमासन कहा जाता है। इसका अर्थ है कि आप मानव-कल्याण के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। इसमें हथेलियाँ आपस में आमने-सामने होनी चाहिए।

 

() स्थिरासन

 

कुछ लोग साधारण सिद्धासन को ही स्थिरासन कहते हैं।

 

() मुक्तासन

 

साधारण सिद्धासन को मुक्तासन भी कहते हैं।

 

. स्वस्तिकासन

 

स्वस्तिकासन का आशय है, शरीर को सीधा रख कर आराम से बैठना।

 

प्रविधि

 

टाँगों को आगे फैला कर बैठें, फिर बायीं टाँग को मोड़ कर इस पैर को दायीं जंघा की पेशियों के पास रखें। इसी प्रकार दायीं टाँग को मोड़ कर उसे बायीं जंघा तथा पिण्डलियों की मांसपेशियों के मध्य वाले खाली स्थान में रख दें। अब आपके दोनों पैर जंघाओं तथा टाँगों की पिण्डलियों के बीच में हो जायेंगे। ध्यान के लिए यह आसन अति-सुखद है। हाथों को पद्मासन की भाँति रखें।

. सुखासन

 

जप और ध्यान के लिए किसी भी आनन्ददायक आसन को सुखासन कहते हैं। इसमें महत्त्वपूर्ण बात यह है कि शिर, गरदन और धड़ सीधे समरेखा में बिना मुड़े रहने चाहिए। जो लोग ३०-४० वर्ष की आयु के बाद जप तथा ध्यान प्रारम्भ करते हैं, वे सामान्यतया पद्म, सिद्ध अथवा स्वस्तिकासन में अधिक समय तक नहीं बैठ पाते हैं। अब मैं सुखासन का एक ऐसा सुन्दर तथा सरल रूप बताता हूँ जिसमें वृद्ध लोग भी देर तक बैठ कर ध्यान लगा सकते हैं। यह सुखासन विशेषकर उन वृद्ध लोगों के लिए उपयुक्त है, जो निरन्तर प्रयत्न करने पर भी देर तक पद्म या सिद्ध आसन में बैठने में असमर्थ हैं। युवक लोग भी इस आसन का अभ्यास कर सकते हैं।

 

प्रविधि

 

पाँच हाथ लम्बा वस्त्र ले कर उसे लम्बाईवार इस प्रकार मोड़ें कि उसकी चौड़ाई आधा हाथ मात्र रह जाये। दोनों पैरों को अपनी जंघाओं के नीचे रखते हुए साधारण तरीके से बैठ जायें। दोनों घुटनों को अपने सीने के समकक्ष उस समय तक ऊपर उठाते रहें जब तक कि दोनों घुटनों के बीच में c - 80 इंच का अन्तर नहीं रह जाता। अब उस मोड़े हुए कपड़े को ले कर उसका एक छोर बायें घुटने के पास रखें। फिर उसे बायीं ओर से पीठ के पीछे से ला कर दायें घुटने की ओर से लाते हुए आरम्भ के बिन्दु पर ला कर दोनों सिरों को गाँठ बाँध दें। अपनी दोनों हथेलियों को परस्पर आपने-सामने रखते हुए उन्हें घुटनों के बीच में रखें। इस आसन में हाथ, पैर और रीढ़ की हड्डी को सहारा मिलता है; इसलिए आपको कभी थकान अनुभव नहीं होगी। यदि आप कोई अन्य आसन नहीं कर सकते तो कम-से-कम इस आसन में बैठ कर देर तक जप-ध्यान कीजिए।

 

सुखासन के प्रकार

 

() पवनमुक्तासन

 

बैठ कर दोनों एड़ियाँ मिलायें एवं दोनों घुटनों को छाती तक उठायें। अब आप दोनों हाथों से घुटने बाँध दें।

 

() वाम पवनमुक्तासन

 

इसमें केवल बायें घुटने को ही भूमि से ऊपर उठाया जाता है और उसे पवनमुक्तासन की भाँति दोनों हाथों से बाँधा जाता है।

 

() दक्षिण पवनमुक्तासन

 

इस आसन में दायें घुटने को उठाया जाता है और उसे हाथों से बाँधा जाता है तथा बायीं टाँग को भूमि पर रखा जाता है।

 

उपर्युक्त तीनों आसन भूमि पर लेटे हुए किये जा सकते हैं।

 

() भैरवासन

 

वाम पवनमुक्तासन में बैठें और दोनों घुटनों को हाथों से बाँधने के बजाय हाथों को केवल जंघाओं के पार्श्व में पैरों के समीप रख लें।

 

 

 

 

पद्म, सिद्ध और स्वस्तिक आसनों के लाभ

 

हठयोग-सम्बन्धी ग्रन्थों में पद्म और सिद्ध आसनों के गुणों तथा लाभों की अत्यधिक प्रशंसा की गयी है। जो व्यक्ति इनमें से किसी भी आसन में नित्य प्रति १५ मिनट तक भी नेत्र मूँद कर हृदय-कमल में परमात्मा का ध्यान करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वह शीघ्र ही मोक्ष को प्राप्त करता है। इन आसनों से पाचन शक्ति बढ़ कर भूख लगती है तथा स्वास्थ्य एवं सुख में वृद्धि होती है। इनसे गठिया रोग दूर होता है एवं वात, पित्त, कफ आदि त्रिदोष सन्तुलित रहते हैं। इनसे टाँगों और जंघाओं की नाड़ियाँ शुद्ध तथा शक्तिशाली होती हैं। ये ब्रह्मचर्य-पालन के लिए अति-उपयुक्त हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

तृतीय अध्याय

मुख्य आसन

. शीर्षासन

 

शीर्षासन के अन्य नाम भी हैं जैसे कपाल्यासन, वृक्षासन और विपरीतकरणी। यह आसन सब आसनों का राजा है।

 

प्रविधि

 

एक कम्बल को चार तह करके बिछा लें। दोनों घुटनों के बल बैठें और अँगुलियों को एक-दूसरे में डाल कर ताला-सा बनायें और उसे कोहनी तक भूमि पर रखें। अब शिर के ऊपरी भाग को इन अँगुलियों के ताले पर अथवा दोनों हाथों के बीच में रखें। धीरे-धीरे टाँगों को उठायें जब तक कि वे सीधी स्थिति में हो जायें। प्रारम्भ में पाँच सेकण्ड तक इस स्थिति में खड़े रहें। धीरे-धीरे प्रति सप्ताह १५ सेकण्ड बढ़ाते रहें और उस समय तक बढ़ाते रहें जब कि आप २० मिनट या आधा घण्टे तक इसे लगा सकें। फिर धीरे-धीरे टाँगें नीचे ले आयें। शक्तिशाली लोग दो-तीन महीने में ही इस आसन को आधा घण्टे तक करने लगते हैं। इसे धीरे-धीरे करें। मन में बेचैनी मत रखें। चित्त को शान्त रखें। आपके सामने शाश्वतता है। इस कारण शीर्षासन के अभ्यास में शिथिलता मत करें। यह आसन खाली पेट करना चाहिए। यदि आपके पास समय हो, तो इसे प्रातः-सायं दोनों समय करें। इस आसन को बहुत धीरे-धीरे करें और झटका मत लगने दें। शिर के बल खड़े होने पर नासिका द्वारा धीरे-धीरे श्वास लेना चाहिए, मुँह के द्वारा कभी श्वास नहीं लेना चाहिए।

 

हथेलियों को शिर के दोनों ओर भूमि पर रख कर भी यह आसन किया जा सकता है। यदि आपका शरीर स्थूल है, तो इस प्रकार से आसन लगाना आपके लिए सरल रहेगा। सन्तुलन सीखते समय अँगुलियों की ताले वाली पद्धति अपनानी चाहिए। जो लोग पैरेलल बार्स पर या भूमि पर सन्तुलन रख सकते हैं, उन लोगों के लिए यह आसन कठिन नहीं है। अभ्यास करते समय आप अपने मित्र से टाँगें सीधी रखने के लिए सहायता ले लें या आरम्भ में दीवार का सहारा ले लें।

 

अभ्यास के प्रारम्भ में किसी-किसी को कुछ उत्तेजना-सी हो सकती है, किन्तु शीघ्र ही यह दूर हो जाती है। इससे प्रसन्नता और आनन्द की प्राप्ति होती है। आसन पूरा हो चुकने पर पाँच मिनट तक थोड़ा विश्राम करें और फिर एक प्याला दूध पी लें। जो लोग देर तक अर्थात् २० मिनट या आधे घण्टे तक इस आसन का अभ्यास करते हों, उन्हें आसन लगाने के बाद किसी भी प्रकार का हलका नाश्ता, दूध या अन्य कुछ अवश्य ले लेना चाहिए। यह बहुत जरूरी है, अपरिहार्य है। गरमी की ऋतु में इस आसन का अभ्यास अधिक देर तक नहीं करना चाहिए। सर्दी में स्वेच्छानुसार देर तक आप यह आसन लगा सकते हैं।

 

कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इस आसन को एक बार में दो-तीन घण्टे तक करते हैं। बदरीनारायण के पण्डित रघुनाथ शास्त्री को इस आसन dot overline 4 बहुत रुचि थी और वे इसका अभ्यास या घण्टे तक करते थे। वाराणसी के एक योगी तो इस आसन में समाधिस्थ भी हो जाते थे। श्री जसपत राय, पी. वी. आचार्य जी महाराज एवं अन्य सत्पुरुष नियमित रूप से इस आसन को एक बार overline 4 ही एक घण्टे से अधिक समय तक करते थे।

 

लाभ

यह आसन ब्रह्मचर्य की साधना के लिए अति-लाभप्रद है। यह आपको ऊध्वरेता बनाता है। इससे वीर्य ऊर्जा आध्यात्मिक ओज-शक्ति में परिणत हो जाती है। इसे काम-वासना का उदात्तीकरण भी कहते हैं। इससे स्वप्न दोष से मुक्ति मिलती है। इस आसन से ऊर्ध्वरता योगी वीर्य-शक्ति को आध्यात्मिक शक्ति में परिणत होने के लिए ऊपर की ओर मस्तिष्क में प्रवाहित करते हैं। इससे उन्हें ध्यान तथा भजन में सहायता मिलती है। इस आसन को करते समय ऐसा विचार करें कि वीर्य ओज में रूपान्तरित हो कर मस्तिष्क में संचित होने के लिए मेरुदण्ड में प्रवाहित हो रहा है। शीर्षासन से स्फूर्ति और शक्ति बढ़ती है तथा सजीवता आती है।

 

शीर्षासन वास्तव में एक वरदान और अमृततुल्य है। इसके लाभप्रद परिणामों एवं प्रभावों का वर्णन करने के लिए कोई शब्द नहीं है। केवल इसी आसन से मस्तिष्क को प्रचुर मात्रा में प्राण और रक्त प्राप्त हो सकते हैं। यह आकर्षण-शक्ति के विरुद्ध कार्य करके हृदय से प्रचुर मात्रा में रक्त खींचता है। इससे स्मरण शक्ति में प्रशंसनीय वृद्धि होती है। वकील, सिद्ध पुरुष और चिन्तकों के लिए यह आसन बहुत उपयोगी है। इस आसन द्वारा स्वाभाविक रूप से प्राणायाम और समाधि उपलब्ध हो जाते हैं; किसी अन्य प्रयत्न की अपेक्षा नहीं होती। यदि आप श्वास पर ध्यान दें तो आपको विदित होगा कि यह उत्तरोत्तर सूक्ष्म होता जाता है। अभ्यास के आरम्भ में श्वास लेने में कुछ कठिनाई प्रतीत होगी, किन्तु अभ्यास के बढ़ने पर यह कठिनाई बिलकुल समाप्त हो जायेगी और इस आसन से आप वास्तविक आनन्द और आत्मिक स्फूर्ति का अनुभव करेंगे।

 

शीर्षासन के बाद ध्यान हेतु बैठने से महान् लाभ होता है। अनाहत-शब्द स्पष्ट रूप से सुनायी देने लगता है। हृष्ट-पुष्ट नवयुवकों को यह आसन करना चाहिए। इस आसन से प्राप्त होने वाले लाभ असंख्य हैं। इस आसन का अभ्यास करने वालों को अधिक सहवास नहीं करना चाहिए।

 

यह आसन सर्वरोगनाशक रामबाण औषधि है। यह मानसिक शक्तियों को प्रकाशित करता, कुण्डलिनी-शक्ति को जाग्रत करता, आन्त्र और उदर-सम्बन्धी सब रोगों को दूर करता और मानसिक शक्ति को बढ़ाता है। यह शक्तिशाली रक्तशोधक तथा उत्तेजना शान्त करने वाला टानिक है। इसके अभ्यास से नेत्र, नाक, गला, शिर, पेट, मूत्राशय, जिगर, तिल्ली, फेफड़े, वृक्कशूल, बहरापन, सुजाक, मधुमेह, बवासीर, दमा, क्षयरोग, आतशक इत्यादि रोग दूर हो जाते हैं। इससे पाचन शक्ति (जठराग्नि) बढ़ती है। इस आसन से चेहरे की झुर्रिया तथा भूरापन दूर हो जाता है। योगतत्त्वोपनिषद् के अनुसार, 'जो मनुष्य इस आसन को लगातार तीन घण्टे तक करते हैं, वे काल पर विजय पा लेते हैं।' स्त्रियाँ भी इस आसन का अभ्यास कर सकती हैं। उनके गर्भाशय तथा डिम्ब-सम्बन्धी रोग, यहाँ तक कि