योग-सन्दर्शिका

 

PRACTICAL GUIDE TO YOGA

का अविकल अनुवाद

 

 

 

 

 

लेखक

 

श्री स्वामी चिदानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादक

 

श्री शिवगोविन्द गुप्त

एम.., एल.टी., साहित्यरत्न

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

 

 

 

षष्ठ हिन्दी संस्करण : २०१७

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

HC 45

 

 

 

 

 

PRICE: 55/-

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्यनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर, जि. टिहरी-गढ़वाल,

उत्तराखण्ड, पिन २४९१९२' में मुद्रित

For online orders and Catalogue visit: dlsbooks.org

प्रकाशकीय

 

दिव्य जीवन संघ ( डिवाइन लाइफ सोसायटी) ने हठयोग तथा योगासनों पर प्रथम बार गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज की पुस्तक प्रकाशित की थी। वर्ष १९७७ में आश्रम के वरिष्ठ साधक तथा हठयोग-प्रशिक्षक श्री स्वामी योगस्वरूपानन्द जी (उन दिनों ब्रह्मचारी कृष्णमूर्ति के नाम से ज्ञात) ने परम पूज्य श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज द्वारा हठयोग तथा आसनों पर दिये गये व्यावहारिक निर्देशों को मूल अँगरेजी पुस्तक 'Practical Guide to Yoga' में संकलित किया था। यह पुस्तक सम्भवतः इस विषय पर दिव्य जीवन संघ का दूसरा प्रकाशन थी। प्रस्तुत पुस्तक 'योग-सन्दर्शिका' मूल पुस्तक का हिन्दी संस्करण है।

 

योग-साधना में शारीरिक स्वस्थता की अनिवार्यता के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। अपने दैनिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए गृहस्थों के लिए भी शारीरिक स्वस्थता का महत्त्व है। इस पुस्तक में कुछ चुने हुए आसनों की व्यावहारिक व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। पूर्णकालिक साधक ही नहीं, गृहस्थ जन भी सरलतापूर्वक इन आसनों का अभ्यास कर सकते हैं। इस दृष्टि से जनसाधारण तथा आध्यात्मिक साधकों के लिए इस पुस्तक की विषय-सामग्री एक वरदान है।

 

इस पुस्तक में साधकों के मन में उठने वाले अनेक प्रश्नों के उत्तर दिये गये हैं, उनकी शंकाओं का समाधान किया गया है तथा योगासनों से होने वाली सम्भावित हानियों से सम्बन्धित अनावश्यक तथा आधारहीन मान्यताओं को निर्मूल करने का प्रयास किया गया है। ध्यान के परम लक्ष्य-जिसकी ओर अभ्यासी जिज्ञासु योगासनाभ्यास में पूर्णता प्राप्त करने के पश्चात् बढ़ता है-को प्राप्त करने हेतु व्यावहारिक निर्देश भी इसमें दिये गये हैं।

 

पुस्तक में वर्णित अधिकांश आसनों को चित्रित करने के लिए परम पूज्य श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज ने स्वयं अपने छायाचित्र प्रदान किये थे। इस दृष्टि से पुस्तक का महत्त्व बढ़ गया है।

 

श्री शिवगोविन्द गुप्त, एम.., एल.टी., साहित्यरत्न ने मनोयोगपूर्वक मूल पुस्तक का हिन्दी अनुवाद किया है। इसके लिए हम उनके अत्यन्त आभारी हैं। अन्य भाषाओं के अतिरिक्त अँगरेजी में इस पुस्तक के कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। आशा है, प्रस्तुत हिन्दी संस्करण का भी सुधी पाठक स्वागत करेंगे।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

भूमिका

 

आद्य योगीश्वर भगवान् शिव तथा जगद्गुरु योगेश्वर भगवान् कृष्ण को प्रणाम। ब्रह्मलीन योगी गुरु प्रातःस्मरणीय पूज्य श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज के श्रीचरणों में साष्टांग प्रणाम। आत्मविकास के मार्ग के पधिक योग के समस्त विद्यार्थी योगाभ्यास में पूर्ण सफलता प्राप्त करें-यह मेरी हार्दिक कामना है!

 

प्रस्तुत पुस्तक के लिए भूमिका लिखते हुए मुझे अति-प्रसन्नता हो रही है। योग के विद्यार्थियों के लिए यह एक उत्तम सन्दर्भ-सामग्री है। यह उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो अपने शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य तथा शक्ति के लिए योगासनों का दैनिक अभ्यास करते हैं। दैनिक योग-साधना के समस्त पक्षों पर प्रकाश डालने वाली बहुमूल्य सामग्री इस पुस्तक के पृष्ठों में समाहित है। सूर्यनमस्कार तथा ध्यान से सम्बन्धित विवरणों को भी इस पुस्तक में सम्मिलित कर दिये जाने के कारण पाठकों के लिए यह अत्यन्त उपयोगी बन गयी है। चित्रों के कारण इसकी उपयोगिता और भी बढ़ गयी है।

 

अभ्यास प्रारम्भ करने से पूर्व आप इस पुस्तक को आरम्भ से अन्त तक पढ़ डालें। अध्याय संख्या , , तथा २१ पर विशेष ध्यान दें। सम्यक् दृष्टिकोण रखते हुए आध्यात्मिक भाव से अपना दैनिक योगाभ्यास-कार्यक्रम प्रारम्भ करें। अभ्यास-पथ पर धीरे-धीरे आगे बढ़ें। अन्तिम सीमाओं पर पहुँचने का प्रयत्न करें। जल्दबाजी करें। जिस आसन या क्रिया का अभ्यास आप करें, केवल उसी पर मन को संकेन्द्रित करें। इससे अभ्यास अधिक प्रभावकारी बन जायेगा। सन्तुलित तथा तनावमुक्त रहते हुए, प्रसन्न मन से अभ्यास करें। योगाभ्यास के स्थल को साफ-सुथरा रखें। अभ्यास करते समय पहने जाने वाले कपड़ों तथा प्रयोग में लाये जाने वाले कम्बलों आदि को किसी अन्य उद्देश्य से उपयोग में लायें। इस बात का सदैव स्मरण रखें कि योग एक पवित्र विद्या है। वह शारीरिक, मानसिक तथा प्राणिक संवर्धन एवं आध्यात्मिक प्रकटन की एक प्रणाली है। इसका अभ्यास मुख्यतः एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, यद्यपि यह (प्रक्रिया) भौतिक शरीर, श्वास तथा मन के नियन्त्रण पर आधारित है। यदि आप इन बातों को ध्यान में रखेंगे, तो आपको योग-जो समग्र मानवता को स्वास्थ्य, शान्ति तथा आनन्द प्रदान करने में सहायक है-से अधिकतम लाभ प्राप्त होगा।

 

योगाभ्यास में नियमित रहें; नियत समय पर ही अभ्यास करने का प्रयत्न करें। चाहे थोड़ा ही अभ्यास करें; परन्तु पुस्तक में दिये गये निर्देशों के अनुसार ही करें। यदि अपने वर्तमान दैनिक कार्यक्रम के कारण आप योगाभ्यास के लिए समय नहीं निकाल पाते, तो मेरा सुझाव है कि आप सुबह एक घण्टा पहले उठ जाया करें। इस प्रकार आपको एक घण्टा अधिक समय मिल जायेगा। इस समय में आप योगाभ्यास कर सकते हैं। अध्याय में दिये गये आवश्यक निर्देशों का पालन करें। योग के प्रति वास्तविक रुचि तथा स्थायी उत्साह बनाये रखें। आसनों का अभ्यास करते समय प्रारम्भ से ही उनके पूर्ण रूप की पराकाष्ठा तक जाने का प्रयास करें। अभ्यास करते समय धीरे-धीरे आगे बढ़ें। आप यथासमय आसनों को भली प्रकार से करने लगेंगे। आपका शरीर अनावश्यक क्लान्ति तथा तनाव से भी मुक्त रह सकेगा। अभ्यास की सम्पूर्ण अवधि में अपने विवेक तथा सामान्य बोध का उपयोग करें।

 

एक आवश्यक बात। आजकल योग के विद्यार्थियों को यह कह कर भयभीत कर दिया जाता है कि योगासनों से शरीर और मन को हानि पहुँच सकती है तथा शरीर अनेक असाध्य व्याधियों से ग्रस्त हो सकता है। यह भी कह दिया जाता है कि योग्य गुरु या प्रशिक्षक के मार्गदर्शन के अभाव में योगाभ्यास करना हितकर नहीं है। मैं इस बात को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। यद्यपि मुख्य साधना के रूप में हठयोग अथवा कुण्डलिनीयोग के पूर्णकालिक अभ्यास के लिए योग्य गुरु की आवश्यकता होती है; परन्तु किसी साधारण व्यक्ति द्वारा सामान्य स्वास्थ्य बनाये रखने के उद्देश्य से कुछ चुने हुए आसनों का अभ्यास करते समय इस प्रकार का नियम लागू नहीं होता। सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति नित्य आधे से एक घण्टे के लिए कुछ चुने हुए आसनों का अभ्यास कर सकते हैं। इसमें किसी प्रकार का जोखिम नहीं। इस प्रकार के अभ्यास के परिणाम स्वास्थ्यकर तथा हितकर होते हैं। यदि आसनों से सम्बन्धित निर्देशों का भली प्रकार पालन किया जाये, तो आसनों का इस प्रकार का सीमित अभ्यास करते समय भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।

 

ब्रह्मचारी श्री कृष्णमूर्ति जी (अब स्वामी योगस्वरूपानन्द) ने इस सन्दर्शिका की पाठ्य-सामग्री का सुविचारित संकलन किया है। योग के विद्यार्थी के रूप में वह निष्कपटता से ज्ञान-प्राप्ति में रत हैं। इसके लिए मैं उन्हें बधाई देता हूँ। सामान्यतः साधना विशेषतः योग, आसन, प्राणायाम आदि पर मैंने उनसे विचारपूर्वक चर्चा की थी। उस अवसर पर मेरे निर्देशों तथा व्याख्यानों को उन्होंने ध्यानपूर्वक सुना तथा उन्हें लिपिबद्ध भी किया। उनके इस परिश्रम का परिणाम ही यह सन्दर्शिका है। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि उनके इस सत्प्रयास का फल योग के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए उपयोगी तथा ठोस सामग्री प्रस्तुत करने वाली इस पुस्तक के रूप में अब समस्त साधकों के लिए उपलब्ध है। मेरी कामना है कि पुस्तक का सर्वाधिक प्रचार हो! ईश्वर समस्त योगाभ्यासियों को स्वास्थ्य, शक्ति तथा सफलता प्रदान करें!

 

-स्वामी चिदानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दो शब्द

 

'योग' शब्द का अर्थ बहुत विस्तृत है। अधिकांश व्यक्ति हठयोग या राजयोग (अष्टांगयोग) को ही योग मानते हैं। यद्यपि योग के बारे में बहुत-कुछ लिखा जा चुका है, तथापि एक सामान्य व्यक्ति के लिए योग अब भी एक रहस्य है। महाभारत तथा (उसके एक अंश) भगवद्गीता को भी योगशास्त्र कहा जाता है। समस्त योग-साहित्य में इस बात पर बल दिया गया है कि मानव की समस्याओं का समाधान केवल योग के पास है।

 

आचार्य शंकर ने अपने ग्रन्थ 'अपरोक्षानुभूति' में राजयोग की चर्चा की है तथा अन्त में लिखा है-"इस प्रकार समस्त अंगों समेत राजयोग वर्णित किया गया। जिन व्यक्तियों की सांसारिक कामनाएँ आंशिक रूप से क्षीण हो पायी हैं, उनके लिए राजयोग के साथ हठयोग को भी संयुक्त कर देना चाहिए।" हठयोगप्रदीपिका के अनुसार, "त्रिविध तापों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए हठयोग एक शरण्यस्थल के समान है। प्रत्येक प्रकार के योग का अभ्यास करने वाले साधकों का आधार हठयोग है" ( - १०) | हठयोग के अन्तर्गत आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा तथा क्रियाएँ सम्मिलित हैं। योग-साधकों के लिए यह चिन्तन का विषय है कि कब तथा कैसे योगाभ्यास प्रारम्भ किया जाये।

 

यह मेरा सौभाग्य है कि अपनी आध्यात्मिक साधना में मैं परम पूज्य श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज का मार्गनिर्देशन प्राप्त करता रहा हूँ। लालबहादुर शास्त्री नेशनल एकाडेमी ऑफ ऐडमिनिस्ट्रेशन, भारत सरकार, मसूरी, उत्तराखण्ड के प्रथम श्रेणी के अधिकारियों के लिए योग-कक्षाएँ संचालित करने हेतु सन् १९७२ में मेरी प्रतिनियुक्ति की गयी थी। तब परम पूज्य स्वामी जी ने स्वयं इन कक्षाओं के पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार की थी तथा तदनुसार योगासन, सूर्यनमस्कार तथा प्राणायाम के एक समूह का अभ्यास कैसे कराया जाये, इसके बारे में मुझे विधिवत् शिक्षा दी थी।

 

 

उपर्युक्त एकाडेमी तथा अन्य संस्थाओं में योग-कक्षाएँ संचालित करते समय मैंने अब तक इस पाठ्यक्रम का अक्षरशः अनुकरण किया है। प्रत्येक शिक्षण-सत्र के अन्त में मैं विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करता रहा हूँ। उनके द्वारा पूछे गये प्रश्नों ने मेरा ध्यान एक ऐसी पुस्तक की आवश्यकता की ओर आकर्षित किया जिसमें आधुनिक समाज के व्यस्त मानव के लिए ऐसे आसन-प्राणायाम-समूह से सम्बन्धित निर्देश हों जिनका अभ्यास एक घण्टे के अन्दर सम्पन्न किया जा सके। जब मैंने स्वामी चिदानन्द जी महाराज के समक्ष ऐसी पुस्तक से सम्बन्धित अपना सुझाव प्रस्तुत किया, तब उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया तथा योग की एक पुस्तक को प्रकाशित करने की अनुमति दे दी। अब प्रश्न उठा कि योगासनों के चित्र कहाँ से और कैसे उपलब्ध हों? तब पूज्य स्वामी जी ने योगासनाभ्यास के अपने छायाचित्रों को भी प्रकाशित करने की अनुमति दे दी। इस प्रकार वर्ष १९७७ में इस पुस्तक के मूल अँगरेजी संस्करण का विमोचन किया गया। परम पूज्य श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज ने जब ये छायाचित्र खिंचवाये थे, तब वह अपने जीवन के ६० वर्ष पूरे कर चुके थे। इस अवस्था में भी योगासनाभ्यास के प्रति उनकी रुचि ने ५० वर्ष से भी अधिक की आयु के अनेक ऐसे व्यक्तियों को प्रेरित किया जो यह समझते थे कि योग मात्र युवकों के लिए है, वृद्धों के लिए नहीं। इस पुस्तक के चित्रों को देख कर योग-सम्बन्धी अनेक भ्रान्तियों का निवारण हो जाता है। अनेक भारतीय भाषाओं तथा फ्रांसीसी भाषा में इस पुस्तक का अनुवाद किया जा चुका है। यह तथ्य इस पुस्तक की उपादेयता का द्योतक है।

 

ईश्वर तथा पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना है कि वे अपने अनुग्रह की वर्षा आपके ऊपर करें तथा आपकी योग-साधना को सफल बनायें!

 

-स्वामी योगस्वरूपानन्द

 

 

विश्व-प्रार्थना

 

हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव!

तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है।

तुम सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ हो

तुम सच्चिदानन्दघन हो

तुम सबके अन्तर्वासी हो

 

हमें उदारता, समदर्शिता और मन का समत्व प्रदान करो।

श्रद्धा, भक्ति और प्रज्ञा से कृतार्थ करो।

हमें आध्यात्मिक अन्तःशक्ति का वर दो,

जिससे हम वासनाओं का दमन कर मनोजय को प्राप्त हों।

हम अहंकार, काम, लोभ, घृणा, क्रोध और द्वेष से रहित हों।

हमारा हृदय दिव्य गुणों से परिपूरित करो।

 

हम सब नाम-रूपों में तुम्हारा दर्शन करें।

तुम्हारी अर्चना के ही रूप में इन नाम-रूपों की सेवा करें।

सदा तुम्हारा ही स्मरण करें।

सदा तुम्हारी ही महिमा का गान करें।

तुम्हारा ही कलिकल्मषहारी नाम हमारे अधर-पुट पर हो।

सदा हम तुममें ही निवास करें

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रार्थनाएँ

 

प्रथम प्रार्थना अभ्यास आरम्भ करने के पहले तथा द्वितीय प्रार्थना अभ्यास समाप्त करने के बाद की जानी चाहिए।

 

.         सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।

 सह वीर्य करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु

मा विद्विषावहै।।

शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

 

अर्थ-हे परमात्मन्! आप हम गुरु-शिष्य दोनों की साथ-साथ सब प्रकार से रक्षा करें, हम दोनों का आप साथ-साथ समुचित रूप से पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-ही-साथ सब प्रकार से बल प्राप्त करें, हम दोनों की अध्ययन की हुई विद्या तेजपूर्ण हो-कहीं किसी से हम विद्या tilde pi परास्त हों और हम दोनों जीवन-भर परस्पर स्नेह-सूत्र में बँधे रहें, हमारे अन्दर परस्पर कभी द्वेष हो। हे परमात्मन् ! तीनों तापों की निवृत्ति हो।

 

 

.         पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।

 

अर्थ-यह सच्चिदानन्द परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्म से ही पूर्ण है; क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है, इसलिए भी वह परिपूर्ण है। उस पूर्ण ब्रह्म में से पूर्ण को निकाल लेने पर भी वह पूर्ण ही बचा रहता है। त्रिविध ताप की शान्ति हो।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुक्रमणिका

 

प्रकाशकीय. 3

भूमिका.. 4

दो शब्द.. 6

विश्व-प्रार्थना.. 8

प्रार्थनाएँ. 9

. योग का प्रयोजन. 12

. योगासनों के लाभ. 15

.आवश्यक निर्देश. 16

. खड़े हो कर किये जाने वाले प्रारम्भिक आसन. 19

. ताड़ासन. 19

. त्रिकोणासन. 20

. सूर्यनमस्कार. 21

. शवासन या मृतासन. 29

. शीर्षासन. 32

. सर्वांगासन. 34

. मत्स्यासन. 35

. हलासन. 37

१०. पश्चिमोत्तानासन. 38

११. भुजंगासन. 39

१२. मकरासन. 41

१३. शलभासन. 41

१४. धनुरासन. 42

१५. चक्रासन. 43

१६. अर्ध-मत्स्येन्द्रासन. 44

१७. योग-मुद्रा.. 45

१८. मयूरासन. 47

१९. बैठ कर किये जाने वाले आसन. 48

. पद्मासन. 48

.सिद्धरान. 49

. स्वास्तिकासन. 49

. वज्रासन. 50

२०. प्राणायाम. 51

. गहरे श्वसन का व्यायाम. 51

. कपालभाति.. 52

. भस्त्रिका.. 53

. शीतली.. 54

. सीत्कारी. 55

. उज्जायी.. 56

. सुखपूर्वक प्राणायाम. 57

२१.ध्यान. 59

२२. उपसंहार. 60

परिशिष्ट.. 61

 

 

 

 

 

 

 

 

. योग का प्रयोजन

 

भगवद्गीता का कथन है : "समत्वं योग उच्यते"[1] चित्त की समता को योग कहते हैं। समस्त वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद भी मनुष्य अभिलिखित इतिहास के प्रारम्भ से अद्यावधि पूर्व-काल की भाँति ही सतत पीड़ा भोग रहा है जो उसके अन्तःकरण और बाह्य विश्व में असामंजस्य के कारण है।

 

मनुष्य प्रकृति का ही एक अंग है और प्रकृति तीन गुणों, मूल तत्त्वों-तमस्, रजस् और सत्त्व से निर्मित और परिचालित होती है। यह ध्यान दें कि गुणों से यहाँ आशय गुण-धर्म अथवा विशिष्टता से नहीं है; वरन् गुण वे तत्त्व हैं जिनसे विश्व अपने-आपको बहुविध रूपों में अभिव्यक्त करता है। तमस् को गतिहीनता तथा रजस् को गतिशीलता की स्थिति कहते हैं और सत्त्व एक ऐसी स्थिति है जो उपर्युक्त दोनों स्थितियाँ नहीं है और इन दोनों का अतिक्रमण कर जाती है। उद्विकास की प्रक्रिया भी इन तीनों गुणों के द्वारा संचालित होती रहती है। उद्विकास का अर्थ है संरचना और इसका प्रगामी परिवर्द्धन अथवा विस्तार। यह क्रियाशीलता पर ही आधारित है। ये तीनों गुण रस्सी की तीन लड़ियों के समान परस्पर अवलम्बन देते हुए एक-साथ रहते हैं; किन्तु सदा ही इनमें से कोई एक गुण अन्य दोनों गुणों को अपने अधीन रख कर प्रबल होता है।

 

हमारे शरीर पर तमोगुण का आधिपत्य रहता है। यह स्थूल, जड़ और दृष्टिगोचर है। प्राण पर रजोगुण की प्रधानता होती है। यह गतिशील है और हम इसका अस्तित्व शरीर की गति से अनुभव करते हैं। मन पर सत्त्वगुण का प्राधान्य होता है। हमारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व शरीर, प्राण और मन की संहति के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है।

 

इस संहति को हम 'मैं' कह कर पुकारते हैं। हमारे सभी दुःख इन तीनों-शरीर, प्राण एवं मन में असामंजस्य होने से होते हैं। यह असामंजस्य की स्थिति ही मनुष्य को त्रिगुणों के चंगुल में डालती है। सामंजस्य की स्थिति ही उसे उसकी पकड़ से छुड़ा सकती है। योग यह सामंजस्य स्थापित करता है और इसके लिए यह आसन, प्राणायाम और ध्यान निर्धारित करता है।

 

आसन शरीर में, प्राणायाम प्राणों में और ध्यान मन में सामंजस्य लाने के लिए है। तमोगुण का स्वभाव है रोकना या धीमा करना; किन्तु ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि जब रजोगुण द्वारा गति ऊर्ध्वगामी होती है तो तमोगुण अनुपस्थित रहता है। किसी भी प्रक्रिया को चाहे वह कितनी ही छोटी हो, एक शक्ति अभिव्यक्ति हेतु, एक दूसरी शक्ति उसकी प्रगति हेतु तथा एक और अन्य शक्ति उसको रोकने या यथावत् बनाये रखने को चाहिए। जो शक्ति अभिव्यक्त करती है वह सत्त्वगुण है, जो गति का कारण बनती है वह रजोगुण है और जो नियन्त्रित या सम्पोषित करती है वह तमोगुण है। कोई भी गुण, अन्य दो से प्रभावित हुए बिना, अकेले नहीं रहता। जलपात्र के आन्दोलित होने पर उस पात्र में रखा हुआ कमल भी आन्दोलित हो उठता है, पात्र की हलचल जल में संचारित हो जाती है और जल उसे कमल में संचारित करता है। इसी प्रकार कोई भी शारीरिक हलचल प्राण तक पहुँचती है जो इसे पुनः मन को सम्प्रेषित करता है। अपने समस्त व्यक्तित्व को निश्चल या स्थिर रखने के लिए योग आसन, प्राणायाम और ध्यान निर्धारित करता है।

 

ऋषि दृढ़तापूर्वक घोषणा करते हैं कि एकमात्र योग ही सभी तापों को विनष्ट कर सकता है। भगवद्गीता कहती है : "योगो भवति दुःखहा[2]  योग दुःख का नाश करने वाला होता है। योग की अनेक परिभाषाएँ हैं, परन्तु मात्र उनको स्मरण करते रहना और उनको (वाणी से) दोहराते रहना वांछित फल उत्पन्न नहीं करता। इसके स्थान में हमें इसे अपने दैनिक जीवन में कार्यान्वित करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सिद्धान्तों को समझ कर उन्हें अपने दैनन्दिन क्रियाकलापों में प्रयुक्त करता है तो उसका जीवन स्वयमेव योग की एक प्रक्रिया बन जाता है और योग दुःख का नाश करने वाला है ही।

 

योगाभ्यास मानव-व्यक्तित्व के शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक स्वरूपों में सामंजस्य लाता है। मानव-शरीर विभिन्न अंगों से बनता है। इसी प्रकार योग में भी अनेक अंग हैं। वे प्रधानतः अष्ट-शीर्षों में विभाजित किये गये हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।[3] यदि कोई व्यक्ति एक पग आगे बढ़ता है तो शरीर के समस्त अंग भी युगपत् आगे बढ़ते हैं। इसी प्रकार यदि कोई योग के एक अंग का भी अभ्यास पूर्णता की उच्च कोटि तक करता है तो योग के अन्य समस्त अंग अभ्यासकर्ता के बिना अधिक प्रयत्न किये ही अवश्यमेव उसका साथ देते हैं।

 

योगासनों का अभ्यास करने की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति के लिए यह स्वाभाविक ही है कि वह अनुकूल और सहायक बाह्य वातावरण प्राप्त  करे। यह 'यम' अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह के पालन से प्राप्त होता है।[4] मन के भय, चिन्ता, श्रम अथवा क्लान्ति से क्षुब्ध होने की दशा में व्यक्ति को योगासन नहीं करने चाहिए। यम के अभ्यास से इन पर विजय पायी जा सकती है। केवल बाह्य अनुकूल वातावरण ही पर्याप्त नहीं है। मन की आन्तरिक प्रशान्ति भी होनी ही चाहिए। यह 'नियम' के पालन से सहज प्राप्तव्य है। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान 'नियम' के संघटक हैं [5] इस प्रकार योगाभ्यास के लिए यम और नियम दो महत्त्वपूर्ण अपरिहार्य पूर्वापेक्षाएँ हैं। योग के तृतीय एवं चतुर्थ अंग हैं आसन और प्राणायाम।

 

आसनों के अभ्यास के समय शरीर के अंगों की गति तीव्र नहीं करनी चाहिए और शरीर को झटका ही देना चाहिए। इससे श्वास-क्रिया स्वतः नियमित हो जाती है। योगासनों को करते समय मन में दैनिक कार्यक्रम, व्यवसाय अथवा अन्य पदार्थों का चिन्तन नहीं करना चाहिए। ऐसे सभी विचारों से मन को वापस कर लेना चाहिए। इसको पंचम अंग 'प्रत्याहार' कहते हैं। यहाँ एक प्रश्न उठ सकता है कि मन को बाह्य पदार्थों से वापस करने पर उसको किस पर स्थिर किया जाये; क्योंकि मन का स्वभाव ही बहिर्गामी है, अतः इस विषय के विशेषज्ञों ने यह सुझाव दिया है कि आसन करते समय व्यक्ति का जिस आसन का अभ्यास चल रहा हो उससे सम्बद्ध शरीर के अंगों पर मन को केन्द्रित करना चाहिए। किसी पदार्थ-विशेष पर मन को थोड़े समय के लिए केन्द्रित करना 'धारणा' कहलाता है।[6] चित्त को ध्येय-पदार्थ में दीर्घकाल तक लगातार टिकाये रखना 'ध्यान' कहलाता है- तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्" "[7] इस प्रकार जब योग के सभी सातों अंगों का सन्निवेश किया जाता है तो उसके परिणामस्वरूप अष्टम अंग 'समाधि"[8] अनुक्रम-परम्परा से स्वयमेव जाता है। इस प्रकार आसनों का अभ्यास समाधि की ओर ले जाता है।

 

यद्यपि प्राचीन ऋषियों ने अनेक आसनों के नाम ऐसे सरीसृप, पशु और पक्षियों के नामों पर रखे हैं जिनसे उनका कुछ सादृश्य है; किन्तु मानव के अतिरिक्त अन्य ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो योगासनों के साथ योग के आठों अंगों का संयोग करके उनका अभ्यास कर सके। केवल शरीर को मोड़ना ही योगासन नहीं है। योग में समस्त आठों अंगों का सम्मिश्रण होना चाहिए। इसीलिए महर्षि पतंजलि ने कहा है : "योगांगानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्याते: " -योग के अष्टांगों के अनुष्ठान से अशुचि का नाश होता है और अशुचि के नाश होने से विवेकख्याति-पर्यन्त ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। इस चरमोद्देश्य को ले कर ही योग की संस्तुति की गयी है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

. योगासनों के लाभ

 

सुन्दर स्वास्थ्य सर्वोत्कृष्ट परिसम्पत्ति है। सुन्दर स्वास्थ्य के बिना व्यक्ति के जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता की आशा करना असम्भव ही है। सुस्वास्थ्य बनाये रखने तथा मांसपेशियों को विकसित करने के उद्देश्य से आजकल अनेक आधुनिक शारीरिक व्यायाम-पद्धतियाँ हैं। शारीरिक  व्यायाम करने वाले इन्हें शारीरिक अवयवों के यन्त्रवत् संचालन और व्यायामों से विकसित करते हैं। ऐसे शारीरिक व्यायामों में मांसपेशियों की गति तीव्र रहती है; परिणामतः हृदय और फुफ्फुसों की क्रिया भी तीव्र हो जाती है। अभ्यासकर्ता बहुत शीघ्र ही श्रान्त हो जाता है। उसमें उद्विग्नता, मनोवैज्ञानिक तनाव और भय का होना भी सम्भव है। कुछ व्यायाम केवल वक्षःस्थल और हाथों को ही पुष्ट करते हैं जिससे शरीर का विकास असन्तुलित होता है; परिणामतः व्यक्तित्व में असामंजस्य जाता है।

 

योगासनों से शरीर की समस्त मांसपेशियों, आन्तरिक अवयवों, स्नायुओं एवं शारीरिक ढाँचे का सुसमन्वित विकास होता है। इनमें द्रुत गति नहीं होती, अतएव शक्ति का अपव्यय नहीं होता। योगासनों के करने में शरीर के अवयवों की गति मन्द एवं तालबद्ध होती है। दूसरी ओर, ये शक्ति का संरक्षण करते हैं।

 

कुछ महत्त्वपूर्ण आसनों और एक या दो प्राणायामों में नियमित अभ्यास से तीनों महत्त्वपूर्ण अंग अर्थात् हृदय, फुफ्फुस और प्रमस्तिष्क-मेरुदण्ड-सहित मस्तिष्क स्वस्थ दशा में रखे जाते हैं। शारीरिक अवयवों की स्वस्थ क्रियाशीलता सुन्दर स्वस्थ स्नायुओं पर निर्भर करती है। मस्तिष्क, हृदय और फुफ्फुस जीवन की त्रिपादिका हैं। हृदय और फुफ्फुस मस्तिष्क के नियन्त्रण में रहते हैं। प्रमस्तिष्क-मेरुदण्डीय प्रणाली-सहित ये तीनों महत्त्वपूर्ण अवयव नियमित योगासनों द्वारा स्वस्थ अवस्था में रखे जाते हैं।

 

यदि मांसपेशियों को उपयुक्त व्यायाम नहीं कराया जाता तो वे संकुचित हो जाती हैं और शरीर में कड़ापन तथा भारीपन जाता है। फलतः रुधिर-संचार एवं स्नायु-वेग में बाधा जाती है; उनकी अक्रियाशीलता अवयवों में गड़बड़ी पैदा करती है। योगासनों में से कुछ आसन अवयवों के विकास के समनुरूप ही, मांसपेशियों के विकास पर विशेष प्रभावी होते हैं।

 

इन योगासनों का स्वरूप (व्याधि) निवारक और आरोग्यकर दोनों ही होता है। कुल मिला कर ये नैसर्गिक स्वास्थ्य बनाये रख कर व्याधियों को शरीर पर आक्रमण करने से निवारण करते हैं। कुछ आसन वर्तमान व्याधियों जैसे प्रतिश्याय, खाँसी, मलावरोध और जठरीय रोगों को भी दूर करते हैं।

 

कतिपय योगासनों में पश्चगामी तथा अग्रगामी गति होती है। अन्य आसन मेरुदण्ड की पार्श्विक गति में सहायक होते हैं। कुछ आसन फुफ्फुस, गले आदि को स्वच्छ करते हैं। इस प्रकार शरीर सम्पूर्ण रूप में विकसित, स्फूर्त और शक्तिवान् हो जाता है। सम्पूर्ण शरीर नमनशील हो जाता है जिससे शरीर के किसी भी अंग में रुधिर के गतिरोध का निवारण होता है।

 

इन योगासनों का एक अन्य विलक्षण रूप है ग्रन्थियों की अन्तःस्रावी प्रणाली पर और नलिकाविहीन ग्रन्थियों-जैसा कि इनको कहा जाता है-पर इनका प्रभाव। कुछ चुने हुए आसनों के द्वारा अवटु-ग्रन्थि, पीयूष-ग्रन्थि तथा शंकुरूप-ग्रन्थि की विकृत क्रियाशीलता ठीक हो जाती है। इन सबके अतिरिक्त, कुछ आसन मनुष्य के मस्तिष्क, उसकी एकाग्रता (धारणा) शक्ति और स्मरण शक्ति पर बहुत बड़ा प्रभाव डालते हैं। वे उसकी प्रसुप्त आध्यात्मिक शक्ति को भी जाग्रत करते हैं। आधुनिक शारीरिक व्यायाम प्राण को बहिर्गामी बनाते हैं, जब कि योगासन प्राण की धारा को अन्तःस्रावी बनाते हैं। ये योगासन आभ्यन्तरिक अवयवों की क्रियाशीलता के नियमन द्वारा स्वास्थ्य-सुधार में सहायक होते हैं। इनका नियमित अभ्यास प्रत्येक अभ्यासी को सुन्दर स्वास्थ्य, दीर्घ जीवन, शक्ति, उत्साह और बल प्रदान करता है। योगासनों के सावधानीपूर्वक नियमित अभ्यास से सम्पूर्ण व्यक्तित्व मनोहर एवं आकर्षक बन जाता है।

जब एक बार इस प्रणाली के सम्बन्ध में प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त कर लिया जाये तो यह सरल, सुनिश्चित प्रभावोत्पादक, मितव्ययी और बिना किसी बाह्य (उपकरण की) सहायता के अभ्यास-योग्य हो जाती है।

 

.आवश्यक निर्देश

 

चेतावनी और सावधानी हेतु एक शब्द। इसमें कुछ विधि-निषेध हैं जिनका कि, किसी भी मूल्य पर हो, पालन करना ही चाहिए जिससे कि योगाभ्यास से अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सके और उसके हानिकारक परिणामों का निवारण किया जा सके :

 

() साधारणतः बारह वर्ष की आयु के पश्चात् ही युवकों को योगासनों का अभ्यास करना चाहिए, इसके पूर्व नहीं। शीर्षासन और सर्वांगासन-जैसे कुछ विशिष्ट आसनों के लिए न्यूनतम आयु-सीमा अधिक है (देखिए, इन आसनों के अन्तर्गत 'सावधानी' शीर्षक)

 

() व्याधियों को दूर करने के लिए आसनों का अभ्यास अनुभवी मार्गदर्शक की वैयक्तिक देख-रेख में ही करना चाहिए।

 

() जो पुरानी नेत्र-व्याधि, कर्णस्राव, उच्च रक्तचाप और हृदय की व्याधियों से ग्रस्त vec ET उनको योगासनों का अभ्यास नहीं करना चाहिए। वे केवल शवासन द्वारा शिथिलीकरण का अभ्यास कर सकते हैं जो उनके लिए अति-लाभदायक है।

 

() प्रातः चार या साढ़े चार बजे उठ जाइए। यदि निद्रालुता मालूम पड़े तो खड़े हो कर किये जाने वाले आसन और चार से छह तक सूर्यनमस्कार करें। तब मल-मूत्र-विसर्जन से निवृत्त हो कर अपने मुख को धो डालिए।

 

() यदि प्रातःकाल उठते ही मल-विसर्जन से निवृत्त होने की आपकी आदत हो तो आप बिना शौच के भी आसनों का अभ्यास कर सकते हैं। आसन, प्राणायाम और ध्यान को समाप्त करके आप शौचालय जा सकते हैं।

 

() अपनी क्षमता या सुविधा के अनुसार गुनगुने या ठण्ढे जल से स्नान कर लीजिए।

 

() एक लँगोटी या कौपीन या बन्धन पट्टी या सटा हुआ अण्डरवियर पहनिए।

 

() फर्श पर तह करके एक कम्बल बिछाइए और उस पर योगासनों का अभ्यास कीजिए।

 

() आसन करते समय ऐनक या ढीले आभूषण मत पहनिए। ये टूट-फूट सकते हैं और चोट भी पहुँचा सकते हैं।

 

(१०) यदि आपको प्रातः ही बिस्तर की चाय पीने की आदत है तो चाय के पश्चात् चार से छह संख्या में सूर्यनमस्कार का अभ्यास करें और तब मल-मूत्र का त्याग कर अभ्यास प्रारम्भ करें।

 

(११) आसनों को खाली पेट प्रभात में अथवा भोजन के कम-से-कम तीन या चार घण्टे पश्चात् करना चाहिए। आसनों के अभ्यास के पश्चात् आधे घण्टे का अन्तर पूर्ण भोजन या स्नान करने हेतु अवश्य होना चाहिए।

 

(१२) आसनों के अभ्यास के दश मिनट के पश्चात् एक प्याला दूध या चाय ली जा सकती है। यदि अभ्यास से पूर्व लेना हो तो कम-से-कम आधे घण्टे से एक घण्टे तक का समयान्तर होना ही चाहिए।

 

(१३) प्रारम्भ में प्रत्येक आसन का अभ्यास कुछ सेकण्ड तक किया जा सकता है और शनैः -शनैः समय की अवधि बढ़ायी जा सकती है। शरीर में झटका या तीव्र गति नहीं होनी चाहिए।

 

(१४) आसनों और प्राणायाम के अभ्यास के पश्चात् सुखासन में बैठना चाहिए और अपनी सुविधा के अनुसार कम-से-कम दश से तीस मिनट तक ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।

 

(१५) यदि प्रातः सभी आसनों का अभ्यास करना सम्भव हो तो खड़े होने के आसन और सूर्यनमस्कार तथा तत्पश्चात् शवासन करना चाहिए। शेष आसनों और प्राणायामों का अभ्यास सायंकाल में किया जा सकता है।

 

(१६) शीर्षासन और प्राणायाम प्रारम्भ करने के पूर्व व्यक्ति को देखना चाहिए कि उसका शरीर और मस्तिष्क प्रशान्त, निराकुल और अनुद्विग्न है। यदि अभ्यासी श्रान्त, मानसिक थकानयुक्त या भावात्मक उलझन में हो तब शवासन में दश से पन्दरह मिनट तक विश्राम करना चाहिए और तब अभ्यास आरम्भ करना चाहिए।

 

(१७) आसनों का अभ्यास जहाँ ताजी हवा का मुक्त प्रवाह हो ऐसे अच्छे वातायनयुक्त स्वच्छ कमरे में करना चाहिए। ठण्डे प्रदेशों में बन्द कमरे में भी अभ्यास किया जा सकता है। फर्श समतल होना चाहिए। आसनों का अभ्यास खुले, हवादार स्थानों और समुद्र तट के समीप तथा नदी की बालू-पीठिका पर भी किया जा सकता है।

 

(१८) यदि आसनों के अभ्यास का क्रम विषम (असमर्थ) परिस्थितियोंवश कभी बन्द करना पड़े तो विपरीत प्रतिक्रिया का कोई भय नहीं है। कुछ दिनों पश्चात् आप पुनः अभ्यास प्रारम्भ कर सकते हैं।

 

(१९) यदि आप नवीन अभ्यासकर्ता हैं तो आसनों का अभ्यास सर्वांगासन से आगे को प्रारम्भ करना चाहिए। योगमुद्रा के पश्चात् शीर्षासन का प्रयास करें। शीर्षासन से पूर्व शवासन में एक या दो मिनट विश्राम कर लेना चाहिए। जब शीर्षासन कर रहे हों तो मस्तिष्क-कोशाणु ताजे तथा अश्रान्त होने चाहिए। शरीर पूर्णतः विश्राम का ही अनुभव कर रहा हो। एक बार यदि शीर्षासन पर अधिकार प्राप्त कर लिया हो तो इसे आप प्रारम्भ में ही इस पुस्तक में दिये हुए अनुक्रम के अनुसार कर सकते हैं।

 

(२०) यदि आप योगासनों से शीघ्र एवं पूर्ण लाभ उठाना चाहते हैं तो नियमितता सर्वाधिक आवश्यक तत्त्व है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

. खड़े हो कर किये जाने वाले प्रारम्भिक आसन

 

. ताड़ासन

 

(पर्वतासन अथवा खड़े होने की आकृति)

 

यह खड़े हो कर किये जाने वाले सभी आसनों का आधार है। खड़े होने की स्थिति में इसे विश्राम हेतु मानना चाहिए।

 

विधि

 

पैरों को मिला कर तथा पैर के अँगूठों, एड़ियों और घुटनों को एक-दूसरे से स्पर्श कराते हुए सीधे तन कर खड़े हो जायें। हाथ की उँगलियों को जाँघ की मांसपेशियों के बगल में फैलाये रखें। सीना आगे को ताने रखें।

 

 

शरीर का समस्त भार समान रूप से एड़ियों और पादांगुलियों पर रहे। श्वसन-क्रिया सामान्य और धीमी रहे। अपने नेत्र बन्द कर लें। सभी बाह्य ध्वनियाँ किसी रुकावट के बिना श्रवण करें और प्रकृति से एक (समरस) हो जायें।

 

लाभ

 

दोनों पैरों की उँगलियों और एड़ियों पर भार समान वितरित हो जाने से आसनकर्ता शरीर में हलकापन अनुभव करेगा। शरीर में प्राण का प्रभाव समान होने के कारण मस्तिष्क शान्ति प्राप्त कर लेता है।

 

. त्रिकोणासन

 

त्रिकोणासन में मेरुदण्ड का झुकाव पार्श्वीय होता है, जब कि सूर्यनमस्कार में उसका झुकाव आगे और पीछे की ओर होता है। इस प्रकार खड़े हो कर किये जाने वाले इन आसनों का अभ्यास करने से पीठ की रीढ़ अधिक लचीली हो जाती है। लचीलापन युवावस्था का लक्षण है।

 

विधि

 

ताड़ासन में खड़े हो जायें। अपने पैरों को दो से ढाई फुट तक की दूरी पर अलग-अलग रखें। शनैः-शनैः हथेलियों को नीचे भूमि की ओर रख कर दोनों हाथों को कन्धे के समतल तक शनैः-शनैः फैलायें और उनको पृथ्वी के समानान्तर रखें। धीरे-धीरे श्वास छोड़ें और गरदन दाहिनी ओर मोड़ दें तथा दाहिनी हथेली से दाहिने पैर के टखने के पास पृथ्वी को स्पर्श किये रहने का प्रयत्न करें। इस पूरे समय में पैरों को बिना झुकाये सीधे तने हुए रखें। पूरी हथेली पैर के पंजे के ऊपर विश्राम करती हुई रखी जा सकती है। बायाँ हाथ शिर के ऊपर फैला हुआ और भूमि के समानान्तर रखें। दृष्टि आगे की ओर करें। प्रारम्भ में कुछ सेकण्डों तक सामान्य श्वसन के साथ इस आकृति को बनाये रखें, फिर शनैः-शनैः एक मिनट तक बढ़ा दें। इस आसन में पूरे समय रीढ़ पर मन एकाग्र किये रहें। बायें हाथ को धीरे-धीरे अपनी पूर्व-स्थिति पर ले आयें। दाहिने हाथ को भूमि से उठायें और साथ ही गरदन सीधी करें तथा पैरों को पास ला कर मिला दें और ताड़ासन में सीधे खड़े हो जायें।

 

 

दो या तीन गहरे श्वास ले कर गरदन को बायीं ओर मोड़ कर या झुका कर पूर्वोक्त को दोहरायें।

 

लाभ

 

यह आसन पैरों, हाथों और कमर की कठोरता को दूर, पैरों की अल्प विकृति या विरूपता का सुधार और पृष्ठशूल तथा ग्रीवा की मोच का निवारण और वक्षःस्थल को विकसित करता है।

 

नोट : खड़े हो कर किये जाने वाले इन आसनों को और सूर्यनमस्कार के अभ्यास को सामान्य स्वास्थ्य वाले युवा एवं वृद्ध सभी बिना किसी आयु-प्रतिबन्ध के कर सकते हैं।

 

. सूर्यनमस्कार

 

सूर्यनमस्कार अथवा सूर्य को प्रणाम करने के आसनों का अभ्यास प्रातः बड़े तड़के अथवा सायं सूर्याभिमुख हो कर किया जाता है। सूर्य स्वास्थ्य एवं दीर्घ आयुष्य के देवता मान जाते हैं। सूर्यनमस्कार के व्यायाम में भारतीय ऋषियों की प्रतिभा ने एक अद्वितीय पद्धति का विकास किया है जो संयुक्त रूप से शरीर, मन एवं आत्म-चेतना की उन्नति को पूर्ण संश्लेषण निष्पन्न करती है। भारतीय ऋषि ने अपनी अन्तर्ज्ञानमयी अन्तर्दृष्टि से जनमानस के स्वभाव में बड़ी बुद्धिमत्ता के द्वारा इस सर्वतोमुखी एवं आत्म-संस्कृति की अप्रतिम पद्धति को प्रत्येक मनुष्य के नित्यकर्म में पिरो दिया है।

 

यहाँ इस विश्व में एकमात्र शरीर और मन का सुसामंजस्यपूर्ण विकास ही मनुष्य को उसकी इच्छाओं की पूर्ति और सफल एवं सुखी जीवन-यापन में सक्षम बना सकता है। व्याधिग्रस्त शरीर मन को (अध्यात्म के) उच्चतम क्षेत्र में उड़ान भरने में रुकावट डालने में एक भारी अवसादकारी भार का कार्य करता है। एक उत्तम सुगठित शरीर चाहे बलिष्ठ एवं स्वस्थ हो; किन्तु यदि वह अविकसित एवं व्याधिग्रस्त मन को ही आश्रय देने का कार्य करता है तो वह हानिकारक अधिक होता है, किसी को लाभदायक नहीं होता। इसी प्रकार एक उत्तम शरीर और सतर्क मन, जिसकी अन्तश्चेतना पूर्णतया प्रसुप्त हो, बिना नींव की एक मनोहर कोठी के समान है जो किसी भी क्षण धराशायी हो सकती है। शरीर, मन एवं आत्म-चेतना का सम्पूर्णतया सामंजस्यपूर्ण विकास ही व्यक्ति को पूर्ण बनाता है। सूर्यनमस्कार इस सामंजस्यपूर्ण विकास को प्राप्त कराता है।

 

सूर्यनमस्कार योगासनों और प्राणायाम की मिश्रित प्रक्रिया है विद्यार्थियों के अधिक जटिल एवं क्लिष्ट यौगिक आसनों और प्राणायाम के अभ्यास करने से पूर्व उनके मेरुदण्ड तथा शरीर की मांसपेशियों को कुछ लचीलापन प्राप्त करना चाहिए। यह सूर्यनमस्कार का व्यायाम उदरीय वसा को घटाता, मेरुदण्ड और शरीर के अंग-प्रत्यंग में लचीलापन लाता और श्वसन-क्षमता को बढ़ाता है।

इसमें रीढ़ की बारह अवस्थितियाँ होती हैं। प्रत्येक अवस्थिति विभिन्न अस्थि-रज्जुओं को फैलाती और रीढ़ वाले अंगों में भिन्न-भिन्न गतियाँ देती है। इनमें श्वास को गहराई से लेते हुए (पूरक) तथा श्वासोच्छ्रास (रेचक) करते हुए और कुछ स्थितियों में थोड़ा कुम्भक करते हुए पृष्ठवंश को आगे तथा पीछे की ओर बारी-बारी से झुकाया जाता है। जब कभी शरीर आगे को झुकाया जाता है तो उदर और उरः प्राचीर का संकुचन श्वास को बाहर फेंकता है। जब शरीर पीछे को मुड़ता है तो वक्षःस्थल विस्तृत होता है और गम्भीर अन्तःश्वसन स्वतः होने लगता है। इस प्रकार शरीर लचीला हो जाता है और फुफ्फुस का सम्पूणर्णांग कार्य प्रारम्भ कर देता है, परिणामतः सही श्वसन-क्रिया होती है। इसके अतिरिक्त उससे हाथ-पैर की मांसपेशियों का सरल व्यायाम होता है और रुधिर का सुसंचार भी सुनिश्चित रहता है। साथ ही सूर्य की जीवनदायिनी रश्मियाँ जो कि स्वेद के साथ विष का शोषण करती हुई एवं रुधिर-परिसंचरण को अनुप्राणित करती हुई तथा मानव-जीवन-रचना को जीवन प्रदान करती हुई-जीवन जो कि केवल सूर्य ही प्रदान कर सकता है-मनुष्य-शरीर पर पड़ती है। कठोर हाथ, पैर एवं पृष्ठवंश वाले मनुष्य के लिए खोया हुआ लचीलापन वापस लाने के लिए सूर्यनमस्कार का व्यायाम एक वरदान है।

 

विधि

 

सावधानी : इन सभी आकृतियों को करते समय शरीर के अवयवों की गति तथा श्वसन-क्रिया बहुत ही धीमी और तालबद्ध होनी चाहिए। शरीर के किसी अवयव में आकस्मिक झटके और जिससे फुफ्फुसों पर तनाव पड़े ऐसे तेजी से लगातार गम्भीर श्वास लेने तथा छोड़ने और भीतर रोकने का पूर्णतया परिहार करना चाहिए।

 

आकृति संख्या : सूर्य की ओर मुँह करें। दोनों हाथ (प्रणाम की मुद्रा में) जोड़ें। हथेलियों को परस्पर मिला कर दोनों अँगूठों से मध्य वक्षःस्थल स्पर्श करते हुए, पैरों को परस्पर मिला कर सीधे खड़े हो जायें।

 

 

 

आकृति संख्या : धीरे-धीरे श्वास भीतर लें। साथ ही, हाथों को शिर के ऊपर उठायें। पीछे की ओर झुकें।

 

 

आकृति संख्या : धीरे-धीरे श्वास निकालें और आगे को तब तक इतना झुकते जायें जब तक कि हथेलियाँ पैरों की पंक्ति में समतल रख ली जायें। बिना पैरों को झुकाये, उनको सीधा रखते हुए, अपने मस्तक से घुटने स्पर्श करें। प्रारम्भ में ऐसा करने में घुटनों में कुछ झुकाव सकता है; किन्तु कुछ दिनों के अभ्यास के पश्चात् पैर सीधे रखे जा सकेंगे।

 

आकृति संख्या : धीमी एवं गहरी श्वास लेने के पश्चात् दाहिने पैर को शरीर से अधिकतम पीछे ले जायें। हाथों और दायें पैर को भूमि पर बिना हिले दृढ़ता से रखें। शिर उठायें और सामने देखें। बायाँ घुटना दोनों हाथों के मध्य में रहना चाहिए।

 

 

 

आकृति संख्या : श्वास रोक लें। बायाँ पैर पीछे और दाहिना पैर बायें पैर के समानान्तर करें। इस प्रकार शरीर को एक सीधी रेखा-जैसा बना लें। शरीर का सम्पूर्ण भार हाथों और पैरों की उँगलियों पर रहना चाहिए।

 

 

 

 

आकृति संख्या : श्वास निकालें। शरीर को धीरे-धीरे इस प्रकार नीचे लायें कि केवल आठ अवयव-पैर के दो अँगूठे, दो घुटने, दो हाथ, वक्षःस्थल और मस्तक-भूमितल का स्पर्श करें। उदर-प्रदेश कुछ उठा हुआ रखना है।

 

 

आकृति संख्या : श्वास लेने के साथ-साथ अपना शिर शनैः-शनैः ऊपर उठायें और रीढ़ को यथासम्भव पीछे की ओर मोड़ें।

 

आकृति संख्या : श्वास निकालें, अपना शिर धीरे-धीरे नीचे लायें और शरीर को उठायें। पैरों की उँगलियाँ और हाथ भूमितल पर टिके हों।

 

 

 

 

आकृति संख्या : श्वास अन्दर लें और बायें पैर को हाथों के समतल लायें। दक्षिण पैर और घुटने को भूमि का स्पर्श करना चाहिए। आगे दृष्टि रखें (यह आकृति संख्या के समान ही है)

 

 

आकृति संख्या १० : श्वास छोड़ें। दाहिना पैर भी आगे ले जायें और आकृति संख्या पर वापस जायें।

 

 

आकृति संख्या ११ : श्वास लें और हाथों को शिर के ऊपर ले जायें तथा आकृति संख्या की तरह पीछे की ओर झुकें।

 

 

आकृति संख्या १२ : शनैः-शनैः अपने हाथों को आकृति संख्या की भाँति ले जायें; साथ hat delta*T श्वास छोड़ें और ताड़ासन में विश्राम करें। यह एक सूर्यनमस्कार हुआ।

 

 

 

 

नोट : सूर्यनमस्कार की दूसरी आवृत्ति का अभ्यास करते समय बायें पैर से प्रारम्भ करें, फिर तीसरी आवृत्ति में दायें पैर से। इसी प्रकार हर आवृत्ति में प्रारम्भ करते समय दायें-बायें का क्रम बदलते रहें। प्रतिदिन १२ आवृत्तियाँ की जा सकती हैं।

 

बारह सूर्यनमस्कार पूरे कर लेने पर पीठ के बल भूमि पर चित लेट जायें और अँगूठे से ले कर मस्तक तक के प्रत्येक अवयव को एक-एक करके विश्राम करने दें। इसे शवासन (शव की आकृति) कहते हैं। प्रारम्भ में तीन या चार सूर्यनमस्कार करने के पश्चात् यदि अभ्यासकर्ता थकावट अनुभव करे तो वह वहीं रुक सकता है और शनैः-शनैः (प्रतिदिन एक अथवा प्रति दो दिन में एक) संख्या बढ़ायें। सभी समय यह सावधानी रखें कि किसी तरह भी हो, शरीर के किसी भी अंग पर अत्यधिक थकान होने पाये। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी क्षमता के अनुसार संख्या बढ़ायी जा सकती है। ऐसे भी मनुष्य हैं जो एक बार में एक सौ आठ (१०८) सूर्यनमस्कार बिना अधिक थकान के कर सकते हैं।

 

जो आध्यात्मिक अथवा धर्मप्रवण हों, उनके लिए अच्छा होगा कि वे निम्नांकित अतिरिक्त निर्देशों का भी पालन करें-

 

सूर्यनमस्कार करने से पूर्व अभ्यासकर्ता सर्वशक्तिमान् ईश्वर के निम्न स्तोत्र का पाठ कर सकता है :

 

सूर्य सुन्दरलोकनाथममृतं वेदान्तसारं शिवं

ज्ञानं ब्रह्ममयं सुरेशममलं लोकैकचित्तं स्वयम्।

इन्द्रादित्यनराधिपं सुरगुरुं त्रैलोक्यचूडामणिं

ब्रह्माविष्णुशिवस्वरूपहृदयं वन्दे सदा भास्करम्।।

 

अर्थ : मैं सदा सूर्य की उपासना करता हूँ जो विश्व के सुन्दर स्वामी, अमर, वेदों के सारतत्त्व और कल्याणकारी हैं; परम ज्ञानवान्, ब्रह्मस्वरूप, देवों के प्रभु, सदा पवित्र तथा स्वयं विश्व के चित्स्वरूप हैं; इन्द्र, देवताओं तथा मनुष्यों के स्वामी, देवों के गुरु और त्रिलोक के चूड़ामणि हैं; ब्रह्मा, विष्णु और शिव के स्वरूपों के हृदय हैं और प्रकाशदाता हैं।

 

फिर प्रत्येक नमस्कार के साथ मन-ही-मन भगवान् सूर्य के बारह नामों को क्रमशः एक-एक करके दोहरायें। ये बारह नाम हैं :

 

() मित्राय नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो सभी को स्नेहमय है)

 

() रवये नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो परिवर्तन का कारण है)

 

() सूर्याय नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो क्रिया का संचालक है)

 

() भानवे नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो प्रकाश का विस्तारक है)

 

है) () खगाय नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो आकाशचारी

 

() पूष्णे नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो सबका पोषणकर्ता है)

 

() हिरण्यगर्भाय नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो सर्व वस्तु धारणकर्ता है)

 

() मरीचये नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो रश्मियों से युक्त है)

 

() आदित्याय नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो अदिति का पुत्र है)

 

(१०) सवित्रे नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो सर्वोत्पादक

 

(११) अर्काय नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो पूजा के योग्य है)

 

(१२) भास्कराय नमः (उस ईश्वर को नमस्कार है जो प्रकाश का कारण-प्रदाता- है)

 

इस भूग्रह में सूर्य सर्वाधिक प्रकाशमान और जीवन-प्रदाता होने से यह अदृश्य ईश्वर का दृश्य प्रतिनिधि है। अधिकतर व्यक्तियों के लिए इन्द्रियगम्य पदार्थ या विचार के बिना भावातीत परम ब्रह्म अचिन्त्य है। उनके लिए सूर्य पूजा एवं ध्यान के लिए सर्वोत्कृष्ट पदार्थ का रूप धारण करता है।

 

इस प्रकार सूर्यनमस्कार शरीर, मन एवं आत्म-चेतना की सुसर्वांगीण उन्नति के लिए नींव का कार्य करता है जो प्रत्येक मानव के लिए परमावश्यक है।

 

. शवासन या मृतासन

(विश्राम आकृति)

 

अब आप पूर्णतया विश्राम (शिथिलीकरण) करने जा रहे हैं। जो-कुछ भी थकान, तनाव या परिश्रम शरीर में हो उसे इस आसन द्वारा हटाना है जिसको शवासन कहते हैं।

 

शवासन में ध्यान का आसन सम्मिलित है। यह केवल शरीर को ही नहीं, वरन् मन को भी विश्राम प्रदान करता है। यह उपशम, आराम और सुख प्रदाता है। मांसपेशियों के व्यायाम में विश्राम एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

 

विधि

 

पीठ के बल लेट जायें। हथेलियों का रुख ऊपर (आकाश) की ओर करते हुए अपने हाथों को अपनी जंघाओं के बगल में रखें। पैरों को इस प्रकार अलग-अलग रखें कि वे एक-दूसरे को स्पर्श करें। अपने नेत्रों को बन्द कर लें।

 

 

अपने दोनों पैरों की उँगलियों पर चित्त एकाग्र करें। धीरे से उनको झुका दें और तब शिथिल हो जायें। अब अपने-आपको शरीर के उस उपांग (उँगलियों) से मानसिक विच्छेद करें अर्थात् आत्म-सुझाव दें : 'मेरा मन पैर की उँगलियों के विचार से रहित हो जाये।' अनुभव करें कि पैर की सभी उँगलियाँ शीतल और पूर्णतया शिथिल होती जा रही हैं। फिर एड़ियों पर मन एकाग्र करें। पैरों का भारी भार उन पर टिका है। एड़ियों को ढीला छोड़ दें और उनको भार से मुक्त करें तथा अनुभव करें कि वे शीतल और शिथिल हो रही हैं। पिण्डली की मांसपेशियों पर चित्त एकाग्र करें। उन्हें शिथिल करें। अनुभव करें कि पिण्डली से ऊपर तक दोनों पैर पूर्णतया शिथिल हैं। फिर घुटनों पर ध्यान केन्द्रित करें जो केवल भारी अस्थियाँ हैं, और कुछ नहीं। पैरों का भार उन पर टिका हुआ है। घुटनों को शिथिल कर दें। अब अनुभव करें कि घुटनों तक दोनों पैर आराम में हैं और शीतल हो गये हैं। जंघाओं, भारी मांसपेशियों तथा अस्थियों पर ध्यान दें और दोनों जंघाओं को शिथिल कर दें। फिर कूल्हे पर, भारी अस्थियों और मांसपेशियों पर चित्त एकाग्र करें। शरीर का सम्पूर्ण भार उन पर आधारित होगा। कूल्हों को शिथिल कर (विश्राम) दें। अनुभव करें कि कूल्हे तक पूरे शरीर के निम्नांग पूर्णतया विश्श्राम में हैं। एक बार किसी विशेष अंग को विश्राम दें तो शरीर के उस अंग पर आपको कोई नियन्त्रण नहीं रखना चाहिए। अब मेरुदण्ड पर चित्त एकाग्र करें। शरीर का सम्पूर्ण भार इस पर आधारित होगा। रीढ़ की अस्थियों को एक-एक करके शिथिल कर दें। शनैः-शनैः ग्रीवा तक शिथिल कर दें। उदर पर चित्त एकाग्र करें और उदर-मांसपेशियों को पूर्णतया शिथिल छोड़ दें। धीमी श्वसन-क्रिया के कारण पेट में धीमी चाल अनुभव करें। वक्षःस्थल पर चित्त एकाग्र करें। अनुभव करें कि वक्षःस्थल का सम्पूर्ण भार पसली की हड्डियों पर आधारित है। पसली की हड्डियों और वक्षःस्थल को ढीला छोड़ दें। धीमी श्वास लें और फेफड़ों की सुव्यवस्थित गति का अनुभव करें। अनुभव करें कि शिथिलीकरण के कारण सम्पूर्ण वक्षःस्थल-प्रदेश बहुत हलका हो रहा है। कन्धों पर चित्त एकाग्र करें। शरीर का भारी भार कन्धों के पश्च भाग पर आश्रित होगा। कन्धों, द्विशिर-पेशियों, कोहनियों, प्रवाहुओं, कलाइयों और उँगलियों को शिथिल (विश्राममय) कर दें। अनुभव करें कि दोनों हाथ पूर्ण विश्राम में हैं और शीतल हो गये हैं। अब ग्रीवा पर ध्यान एकाग्र करें। ग्रीवा पर शिर का भारी भार है। ग्रीवा को शिथिल कर दें। धीरे से अपने शिर को दाहिनी ओर घुमायें। धीरे से पुनः इसे घुमायें और वापस केन्द्र, पर लायें। अपना शिर बायीं ओर घुमायें और धीरे से लुढ़का कर वापस केन्द्र पर लायें। अपनी ग्रीवा को पूर्णतया शिथिल कर दें। अपने शिर पर मन एकाग्र करें। शिर को शिथिल कर दें। अपने चेहरे पर ध्यान दें और मुख की मांसपेशियों को शिथिल कर दें। अधरों पर ध्यान दें। अधर-पुटों को धीरे से अलग करें और उनको शिथिल करें। अपनी दोनों दन्तावलियों