मरणोत्तर जीवन

और

पुनर्जन्म

 

What Becomes of the Soul After Death

 

का हिन्दी अनुवाद

 

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय: शिवानन्दनगर-२४९ १९२

जिला: टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dishq.org

 

प्रथम हिन्दी संस्करण: १९६६

 

द्वितीय हिन्दी संस्करण : १९८०

 

तृतीय हिन्दी संस्करण : १९८५

 

चतुर्थ हिन्दी संस्करण : १९९६

 

पंचम हिन्दी संस्करण : २००७

 

षष्ठ हिन्दी संस्करण : २०१५

 

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

ISBN 81-7052-121-1 HS 99

 

PRICE: 135/-

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्यनाभानन्द द्वारा

प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पो. शिवानन्दनगर-२४९ १९२, जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड' में मुद्रित

For online orders and Catalogue visit: disbooks.org

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

समर्पण

 

मरणोपरान्त जीवन के

समस्त रहस्यों को उद्घाटित करने वाले

भगवान् यम, मार्कण्डेय, नचिकेता, सावित्री और

भगवान् शिव के शाश्वत परिचारी नन्दी को

समर्पित !

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दिसम्बर, १९५७

 

अमरता की सन्तानो !

 

एक जीवन्त, अपरिवर्तनशील, शाश्वत चेतना है जो सभी नाम और रूपों में अन्तर्निहित है। वह परमात्मा या ब्रह्म है।

 

परमात्मा सभी क्रियाओं का अन्त है। वह सभी साधनों एवं योगाभ्यासों का अन्त है। उसे खोजो उसे जानो। तभी तुम स्वतन्त्र एवं पूर्ण हो सकते हो। संसार को एक मरीचिका की तरह देखो निःस्वार्थ सेवा, वैराग्य, निर्विषय, प्रार्थना एवं चिन्तन-परायण जीवन व्यतीत करो। तुम शीघ्र ही ईश्वर-साक्षात्कार कर लोगे।

 

ईश्वर तुम्हें प्रसन्न रखे ! तत्सत्!

 

 

 

तुम्हारी अपनी ही आत्मा

                                                                                                                                                              स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक का वक्तव्य

 

अनन्त काल से मृत्यु के बाद जीवन की समस्या अत्यन्त ही मोहक रही है। मनुष्य सदा इस प्रश्न के चक्कर में पड़ा रहा है कि मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है। प्रस्तुत पुस्तक-जैसा कि इसका नाम है, विस्तृत रूप से इसी विषय की विवेचना करती है-प्राचीन काल से चले रहे इस प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करती है।

 

आधुनिक काल में इस समस्या पर बहुत-सी अटकलबाजियाँ लगायी गयी हैं। इसने बहुत से अनुसन्धान-कार्यों को भी आगे बढ़ाया है। भौतिक मृत्यु के बाद भी चेतना के जारी रहने का तथ्य बहुत से आधुनिक चिन्तकों द्वारा भी स्वीकृत किया जा रहा है जिनमें अत्याधुनिक डाक्टर जे. बी. राइन हैं जिन्होंने इसके पक्ष में अपना विश्वास व्यक्त किया है। इस विषय पर बहुत-सी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं; लेकिन अब तक उनमें से अधिकांश सूक्ष्म या प्रेतात्म-जगत् के बारे में लिखी गयी हैं। अब तक प्रेतलोक की परिस्थितियों के बारे में ही ज्यादा अध्ययन किया गया है जो कब्र से बाहर के अनेकों अपार्थिव लोकों में सिर्फ एक है। आत्मवाद, प्रेतात्माओं को बुलाने वाली मण्डली एवं स्वीकृत माध्यमों का साक्षीपन ही इन पुस्तकों का मुख्यतः विवेच्य विषय रहा है।

 

हम यह महसूस करते हैं कि प्रस्तुत पुस्तक का अध्ययन लोगों में यह विश्वास पैदा करेगा कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है, कि मनुष्य के कर्म निश्चित रूप से उसके ऊपर मृत्यूपरान्त प्रतिक्रिया करते एवं उसके विचारों को प्रोत्साहित करते हैं। हमें कोई सन्देह नहीं है कि पाठकों को इस भौतिक शरीर से परे का ज्ञान होने पर इस पृथ्वीलोक पर स्थित इस भौतिक शरीर का वास्तविक मूल्यांकन करने में सहायता मिलेगी।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रस्तावना

 

परलोक-विद्या या मृतात्माओं के एवं उनके रहने वाले लोकों का विज्ञान एक रोचक विषय है। यह एक रहस्यात्मक विज्ञान है जो बहुत ही रहस्य या छुपे आश्चर्यो से भरा पड़ा है। छान्दोग्योपनिषद् की पंचाग्नि-विद्या से इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है।

 

बहुत-सी विलक्षण वस्तुओं का आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक, शक्तिशाली सम्राट् जिन्होंने आश्चर्यजनक कार्य किये, धार्मिक कवि, अद्भुत कलाकार, असंख्य ब्राह्मण, ऋषि, योगी आये और चले गये। आप सभी यह जानने को अत्यन्त इच्छुक हैं कि वे कहाँ चले गये ? क्या अभी भी उनका अस्तित्व है? मृत्यु के उस पार क्या है? क्या वे अस्तित्वहीन हो गये या शून्य-वायु में विलीन हो गये ? ऐसे प्रश्न निर्बाध रूप से सबके हृदय में उठते रहते हैं। यह प्रश्न आज भी वैसे ही उठता है जैसा हजारों वर्ष पूर्व उठा करता था। इसे कोई भी नहीं रोक सकता; क्योंकि यह हमारी प्रकृति से अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है।

 

मृत्यु एक ऐसा विषय है जो सबकी गहन उत्सुकता से सम्बन्धित है। आज या कल सभी मरेंगे। मृत्यु का भय सभी मानव-प्राणियों पर छाया रहता है। यह मृतक के सम्बन्धियों के ऊपर, जो मृतक आत्मा का हाल जानने के लिए उत्सुक रहते हैं, अत्यन्त अनावश्यक दुःख, शोक और चिन्ता लाता है।

 

इस प्रश्न ने पश्चिम में भी बहुत से वैज्ञानिक क्षेत्रों में बड़े परिमाण में रुचि एवं ध्यान को आकर्षित किया है। बहुत से परीक्षण किये गये हैं, लेकिन ये अनुसन्धान इसी प्रश्न तक सीमित रहे हैं कि 'भौतिक शरीर के नाश के अनन्तर आत्मा रहती है या नहीं' या 'आत्मा का अस्तित्व है या नहीं' विज्ञान तथा मध्यस्थता के द्वारा प्रेतात्म- जगत् से सम्बन्ध स्थापित कर आत्मा के अस्तित्व को साबित कर दिया गया है।

 

इसका विज्ञान मृत्यु के सभी भयों का हरण कर लेगा एवं आपको इस योग्य बनायेगा कि आप इसे पर्याप्त प्रकाश में देख सकें और अपनी प्रगति में इसका महत्व जान सकें। यह अवश्य ही आपको मृत्यु को जीतने का एवं अमरता प्राप्त करने का उचित तरीका खोजने को प्रेरित करेगा।

 

यह आपको जबर्दस्ती प्रोत्साहित करेगा कि आप तत्परता से ब्रह्म-विद्या का अध्ययन करें, सच्चे गुरु या दीप्त ऋषि की खोज करें जो आपको सही रास्ते पर लाये और कैवल्य एवं ब्रह्मज्ञान के रहस्यों को आपको बताये।

 

इस पुस्तक में मृत्यु के दूसरे पक्ष का सही-सही वर्णन किया गया है। यह वैज्ञानिक तरीकों से परीक्षण किया गया है एवं वर्णन किया गया है। यह पुस्तक इस विषय पर पर्याप्त सूचना देती है। यह इस विषय पर आपको तथ्यों का भण्डार देगी। इसमें उपनिषद् की शिक्षाओं के तत्त्वों का सन्निवेश है।

 

आप इस अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय की अज्ञानता एवं मिथ्या विश्वासों के कारण बहुत कष्ट सह चुके हैं। अगर आप इस पुस्तक को पढ़ेंगे, तो अज्ञान का परदा हट जायेगा। आप मृत्यु के भय से स्वतन्त्र हो जायेंगे।

 

योग-साधना का एक लक्ष्य मृत्यु का प्रसन्नता और निर्भयता से सामना करना है। एक योगी या ऋषि या एक सच्चे साधक को मृत्यु का भय नहीं रहता। मृत्यु उन लोगों से काँपती है जो जप, ध्यान एवं कीर्तन करते हैं। मृत्यु एवं उसके दूत उस तक पहुँचने का साहस तक नहीं कर सकते। भगवान् कृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं-"मेरी शरण में आने से ये महात्मा फिर जन्म को प्राप्त नहीं होते, जो दुःख एवं मृत्यु का लोक है, वे परमानन्द में मिल जाते हैं।"

 

मृत्यु एक सांसारिक व्यक्ति को दुःखदायक है। एक निष्काम व्यक्ति मरने के बाद कभी भी नहीं रोता। एक पूर्णज्ञान प्राप्त व्यक्ति कभी नहीं मरता। उसके प्राण कभी प्रस्थान नहीं करते। मृत्यु के भय पर विजय प्राप्त करो। मृत्यु की विजय सभी आध्यात्मिक साधनाओं की उच्चतम उपयोगिता है। भगवान् से प्रार्थना करो कि वह प्रत्येक जन्म में तुम्हें अपनी पूजा के योग्य बनाये। अगर तुम अनन्त आनन्द चाहते हो तो इस जन्म-मृत्यु के चक्र का नाश करो, अनन्त आत्मा में वास करो और सदा के लिए आनन्दमय हो जाओ।

 

भीष्म की मृत्यु उनकी अपनी इच्छा पर निर्भर थी। सावित्री अपने पति सत्यवान् को अपनी सतीत्व-शक्ति के बल पर वापस लायी। भगवान् शिव की प्रार्थना से मार्कण्डेय ने मृत्यु को जीत लिया। तुम भी ज्ञान, भक्ति एवं ब्रह्मचर्य के बल पर मृत्यु को जीत सकते हो।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मरणोन्मुख उपासक की प्रार्थना

(ईशावास्योपनिषद्)

 

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्

तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ।।

 

आदित्यमण्डलस्थ ब्रह्म का मुख ज्योतिर्मय पात्र से ढका हुआ है। हे पूषन्। मुझ सत्यधर्मा को आत्मा की उपलब्धि कराने के लिए तू उसे उघाड़ दे।

 

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह

तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि

योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ।।

 

हे जगत्पोषक सूर्य! हे एकाकी गमन करने वाले ! हे यम (संसार का नियमन करने वाले)! हे सूर्य (प्राण और रस का शोषण करने वाले) ! हे प्रजापतिनन्दन ! तू अपनी किरणों को हटा ले (अपने तेज को समेट ले) ! तेरा जो अतिशय कल्याणमय रूप है, उसे मैं देखता हूँ। यह जो आदित्यमण्डलस्थ पुरुष है, वह मैं हूँ।

 

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।

क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर ।।

 

अब मेरा प्राण सर्वात्मक वायु-रूप सूत्रात्मा को प्राप्त हो और यह शरीर भस्मशेष हो जाये। हे मेरे संकल्पात्मक मन ! अब तू स्मरण कर, अपने किये हुए को स्मरण कर, अब तू स्मरण कर, अपने किये हुए को स्मरण कर।

 

अग्न्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ।।

 

हे अग्ने ! हमें कर्म-फल-भोग के लिए सन्मार्ग से ले चल। हे देव! तू समस्त ज्ञान और कर्मों को जानने वाला है। हमारे पाखण्डपूर्ण पापों को नष्ट कर। हम तेरे लिए अनेक नमस्कार करते हैं।

 

 

 

 

 

मृत्यु-संस्तुति

 

हे मृत्यु, हे यम! तुझे है अभिनन्दन

तू है ईश्वरीय नियमों का प्रणेता

सभी बनते हैं तेरे ही शिकार

बनते हैं तेरे ही ग्रास।

 

तू काल है

तू है धर्मराज !

हे सर्वज्ञ काल!

तू है नियम का विधायक

 

तू है ज्ञाता

तीनों कालों का......-भूत, वर्तमान और भविष्य

तूने ही पुराकाल में दी थी दीक्षा

नचिकेता को, आत्म या ब्रह्म-विद्या की।

 

मैंने काल या मृत्यु का किया है अतिक्रमण,

मैं हूँ सनातन तत्त्व

कहाँ है काल उस सनातन तत्त्व में?

काल तो है मात्र मानस-सृजन

 

मैंने मन का किया है अतिक्रमण

मुझे भय है नहीं अब मृत्यु का हे मृत्यु!

मैं हूँ परे तेरी पहुँच के

मैं करता हूँ, तुझे अल्विदा

 

मैं हूँ कृतज्ञ तेरे सारे सदय कार्यों के लिए

तुझे है अनेकानेक नमस्कार

हे यम! मैं चाहता हूँ विदेह-मुक्ति में प्रवेश

मैं प्राप्त करूँगा परमात्मा में अखण्ड विलयन

 

 

वास्तविक जीवन क्या है

 

नित्य आत्मा में जीवन

आत्म-सुख का सतत आस्वादन

सदा-सर्वदा परमात्मा का पूजन

यही है वास्तविक जीवन

 

सदा ईश्वर के नाम का जपन

सर्वदा उसी की कीर्ति का गायन

सदा उसी का स्मरण

यही है वास्तविक जीवन

 

करो यम-नियम का अभ्यास

करो बीमार और गरीबों की सेवा

करो श्रुतियों का श्रवण,

यही है वास्तविक जीवन

 

चिन्तन तथा ध्यान

गुरु की सेवा

उनके उपदेशों का अनुगमन

यही है वास्तविक जीवन

 

अपने आत्मा का साक्षात्कार

निज-आत्मा का ही सर्वत्र दर्शन

और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति

यही है वास्तविक जीवन

 

मानवता के लिए अर्पित जीवन

करना आत्म-संयम का अभ्यास

करना मन और इन्द्रियों पर शासन

यही है वास्तविक जीवन

 

करो प्राणायाम का अभ्यास

करो ब्रह्म-विचार

करो संकल्प का पालन

यही है वास्तविक जीवन

 

में ही निवास

का ही सतत कीर्तन

का ही अविरल ध्यान

यही है वास्तविक जीवन

 

नाम-रूपों की कर उपेक्षा

करना अन्तर्हित वस्तु का दर्शन

करना अमृत-सुधा का पान

यही है वास्तविक जीवन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

वास्तविक मृत्यु क्या है

 

नित्यप्रति गीता, उपनिषदों का नहीं पठन

और सदा ईश्वर का स्मरण

साधु एवं गुरुओं का सेवन

यही है वास्तविक मरण।

 

रखना समदर्शन

मन का ही सन्तुलन

आत्मदृष्टि का ही अवलम्बन

यही है वास्तविक मरण।

 

ब्रह्मज्ञान से वंचित

विस्तृत हृदय से भी शून्य

दानशील कार्यों से रहित

यही है वास्तविक मरण।

 

देह से ही तादात्म्य-प्राप्त

ईश्वरीय स्वरूप का विस्मरण

निरुद्देश्य जीवन में भ्रमण

यही है वास्तविक मरण।

 

खाना, पीना, मौज उड़ाना

समय का व्यर्थ गमन

निज नाम और यश को खोना

यही है वास्तविक मरण।

 

जुआ तथा ताश के खेल

उपन्यास, मदिरापान तथा धूम्रपान

गपशप, निन्दा, मात्सर्य में संलग्न

यही है वास्तविक मरण।

 

पिशुनता, निन्दा,

दूसरों के दोषदर्शन

ठगी तथा मिथ्याचरण

यही है वास्तविक मरण

 

अर्थ का अवैधिक उपार्जन

पर-स्त्रियों के प्रति दुराचरण

दूसरों के प्रति हिंसात्मक आचार

यही है वास्तविक मरण

 

विषयपरायण जीवन

वीर्य का करना व्यर्थ नाश

कामदृष्टि का अवलम्बन

यही है वास्तविक मरण

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जन्म तथा मृत्यु

 

जन्म तथा मृत्यु हैं दो भ्रामक दृश्य

इस जगत्-रूपी नाटक के।

वास्तव में तो कोई जन्म लेता है

और मरता ही है।

 

कोई जाता है और आता ही है।

यह है माया का जादू

यह है मन का ही खेल

ब्रह्म का है एकमेव अस्तित्व

 

शरीर के लिए ही है जन्म

पंचतत्त्वों से ही होता है शरीर का गठन

आत्मा तो है जन्म-रहित तथा मृत्यु-रहित

मृत्यु है भौतिक शरीर का विक्षेपण।

 

मृत्यु है सुषुप्ति के ही समान

जन्म है सुषुप्ति से जागरण

हे राम ! मृत्यु से भय कर

जीवन तो है अखण्ड और अबाध।

 

पुष्प मुरझाते हैं, पर सुरभि फैलती रहती है

शरीर विनष्ट होता है

परन्तु आत्म-सुरभि

अमर एवं शाश्वत है।

 

विवेक करना सीखो

सत्य एवं असत्य के बीच

सदा असीम का करो चिन्तन

यही है जन्म-मृत्यु से रहित, सनातन

 

माया तथा मोह का करो अतिक्रमण

तीनों गुणों से बनो अतीत

शरीर के प्रति आसक्ति का करो त्याग

अमरात्मा में बनो विलीन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पुनर्जन्म

 

मन के ही कारण है पुनर्जन्म

मन के ही व्यवहारों पर है यह अवलम्बित

तुम विचारते हो, मन में बनते हैं संस्कार

संस्कार ही है वृत्ति का बीज

ये संस्कार एक-दूसरे से बन कर आबद्ध

देते हैं वासना को जन्म।

 

जैसा तुम विचारते हो

वैसा ही तुम बन जाते हो।

अपने विचारों के अनुकूल ही

तुम जन्म धारण करते हो।

 

सत्त्व तुम्हें ऊपर ले जाता है।

रजस् मध्य में ही रखता है

तमस् अधःपतन दिलाता है

दुर्गुणों में ही आच्छन्न रखता है।

 

मन ही कारण है

मनुष्य के बन्धन और मुक्ति का।

मलिन मन बाँधता है

शुद्ध मन मुक्ति प्रदान करता है।

 

जब तुम सत्य का साक्षात्कार करते हो

तुम आत्मा को जानते हो।

भावी जन्मों के कारण का विनाश होता है,

वृत्तियाँ विनष्ट होती हैं, संस्कार भस्मीभूत होते हैं।

 

तुम पुनर्जन्म से मुक्त हो

तुम पूर्णता प्राप्त करते हो

तुम परम शान्ति पाते हो

तुम अमर बन जाते हो-यही सत्य है।

 

यदि एक ही जन्म है

यदि बुरे कर्म करने वाले नरकाग्नि में

जलते हैं सर्वदा

तो, प्रगति की कोई आशा नहीं,

यह बुद्धिग्राह्य नहीं है।

यह तर्कसंगत नहीं है।

 

वेदान्त में निकृष्ट पापी के लिए भी आशा है

कितना समुन्नत है यह दर्शन!

यह घोषित करता है

मित्र! तू शुद्ध आत्मा है

पाप तुझे छू नहीं सकता

अपने गत ईश्वरत्व को प्राप्त करो

पाप कुछ भी नहीं है।

 

पाप भूल मात्र है

तुम पल मात्र में ही पाप को विनष्ट कर सकते हो।

वीर बनो, प्रसन्न रहो

उठो, जागो, उत्तिष्ठत जाग्रत

 

गीता कहती है-

"निकृष्ट पापी भी

धर्मात्मा बन सकता है,

वह ज्ञान-नौका द्वारा

पाप सन्तरण कर सकता है।"

 

इससे क्या समझते हो, हे मित्र!

प्रतिभाशाली लड़का, शिशुपन में ही पियानो बजाता है

बचपन में ही भाषण देता है

वह गूढ़ गणित की समस्याओं को हल कर देता है।

 

एक लड़का अपने पूर्व-जन्म का विवरण देता है

दूसरा पूर्ण योगी के रूप में प्रकट होता है

इससे यह प्रमाणित है कि पुनर्जन्म है।

बुद्ध ने बहुत जन्मों में ही अनुभव प्राप्त किया था,

अन्तिम जन्म में ही वे बुद्ध बने

 

जिसे संगीत में रुचि है

वह कई जन्मों में अनुभव प्राप्त करता है

तथा अन्ततः एक जन्म में पूर्ण कुशल बन जाता है।

हर जन्म में वह संगीत के संस्कार का अर्जन करता है,

शनैः-शनैः वासनाएँ तथा रुचि बढ़ती जाती है,

किसी एक जन्म में वह कुशल संगीतज्ञ बन जाता है।

यही बात है प्रत्येक कला के विषय में।

 

बच्चा माँ का दूध पीता है,

शिशु बत्तख तैरते हैं

पूर्व-जन्म के संस्कारों से ही

सारे सद्गुण एक जन्म में ही विकसित

नहीं हो सकते।

 

क्रमिक प्रगति द्वारा ही मनुष्य

सभी सद्गुणों का अर्जन कर सकता है।

 

साधु जन सभी सद्गुणों में पारंगत होते हैं

साधुओं और सिद्धों के अस्तित्व से

पुनर्जन्म प्रमाणित होता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशक का वक्तव्य... 5

प्रस्तावना.. 6

मरणोन्मुख उपासक की प्रार्थना.. 8

मृत्यु-संस्तुति.. 9

वास्तविक जीवन क्या है. 10

वास्तविक मृत्यु क्या है. 12

जन्म तथा मृत्यु... 14

पुनर्जन्म... 16

प्रथम प्रकरण.. 25

मृत्यु क्या है?. 25

. पुनर्जन्म तथा मानव का उद्विकास. 25

. मृत्यु क्या है?. 29

. मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है. 30

. मृत्यु का क्रम. 31

. मृत्यु के चिह्न... 32

. मृत्यु के समय तत्त्वों का अलग होना.. 33

. उदान वायु के कार्य. 34

. आत्मा क्या है?. 35

. शरीर-सम्बन्धी दार्शनिक विचार. 37

१०. मूर्च्छा, निद्रा तथा मृत्यु... 40

द्वितीय प्रकरण.. 42

मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा की यात्रा.. 42

. मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा की यात्रा () 42

. तृतीय स्थान. 44

. कर्म तथा पुनर्जन्म () 46

. मृत्यूपरान्त जीवात्मा कैसे शरीर छोड़ता है. 48

. शरीर-त्याग करते समय जीवात्मा राजा के तुल्य है. 50

. निष्क्रमण की प्रक्रिया.. 50

. जीवात्मा कैसे उत्क्रमण करता है. 51

. मृत्यु के पश्चात् जीवात्मा की यात्रा () 53

. दो मार्ग-देवयान तथा पितृयान. 55

() अर्चि मार्ग (देवयान) 55

() धूम्र मार्ग (पितृयान) 55

तृतीय प्रकरण.. 57

मृत्यु से पुनरुत्थान तथा न्याय. 57

. मृत्यु से पुनरुत्थान. 57

. न्याय-दिवस. 58

चतुर्थ प्रकरण.. 60

मृत्यूपरान्त आत्मा.... 60

. मृत्यूपरान्त आत्मा.... 60

. गीता इस विषय में क्या कहती है?. 61

. मृत्यु तथा उसके अनन्तर. 62

. शोपेनहावर का मन्तव्य 'मृत्यूपरान्त की दशा' 64

. अन्तिम विचार आकार धारण करता है. 68

. व्यक्तित्व तथा व्यक्तिगत सत्ता.. 70

. प्राचीन मिश्रवासियों की मान्यता.. 72

पंचम प्रकरण.. 74

पुनर्जन्म का सिद्धान्त... 74

. पुनर्जन्म का सिद्धान्त... 74

. कर्म तथा पुनर्जन्म () 78

. पुनर्जन्म-एक नितान्त सत्य () 83

. जीवात्मा का देहान्तर-गमन. 84

. पुनर्जन्मवाद. 87

. पुनर्जन्म-एक नितान्त सत्य () 90

. निम्न-योनियों में फिर से जन्म... 92

. बालक की क्रमिक वृद्धि.... 98

षष्ठ प्रकरण.. 101

विभिन्न लोक.. 101

. प्रेतलोक.. 101

. प्रेतों के अनुभव. 102

. पितृलोक.. 103

. स्वर्ग. 104

. नरक.. 108

. कर्म और नरक.. 109

. असूर्य-लोक.. 113

. यमलोक का मार्ग. 113

. धर्म (न्याय) की नगरी. 115

१०. यम-सभा.. 116

११. इन्द्रलोक.. 118

१२. वरुणलोक.. 119

१३. कुवेरलोक.. 120

१४. गोलोक.. 121

१५. वैकुण्ठलोक.. 123

१६. सप्त-लोक.. 125

१७. अपार्थिव लोकों में निवास. 127

सप्तम प्रकरण.. 130

प्रेतात्म-विद्याल. 130

प्रेतात्म-विद्या.... 130

अष्टम प्रकरण.. 135

मृतकों के लिए श्राद्ध तथा प्रार्थना.. 135

. श्राद्ध-क्रिया का महत्त्व... 135

. दिवंगत आत्मा के लिए प्रार्थना और कीर्तन. 139

. मरणासन्न व्यक्ति के पास शास्त्रों का पाठ क्यों किया जाता है?. 140

नवम प्रकरण.. 143

मृत्यु पर विजय. 143

. मृत्यु पर विजय. 143

. मृत्यु क्या है तथा उस पर किस तरह विजयी हों ?. 144

. अमरता की खोज.. 148

दशम प्रकरण.. 151

कथा-वार्ता.. 151

. कीट की कहानी.. 151

. नचिकेता की कथा.. 154

. मार्कण्डेय की कथा.. 156

एकादश प्रकरण.. 158

पत्र. 158

. मेरे पति की आत्मा कहाँ है?. 158

. स्वर्ग कहाँ है ?. 160

. मेरे पुत्र के विषय में क्या ?. 162

. प्रश्नोत्तरी. 164

परिशिष्ट . 167

पुनर्जन्म... 167

. स्वर्ग में निवास. 167

. ज्ञानी की मरणोत्तर दशा.. 168

. पशु-योनि में अधोगमन. 168

. स्थूल-शरीर की मृत्यु के पश्चात् भी लिंग-शरीर जीवित रहता है. 169

. आगामी जन्म का स्वरूप. 169

. स्वर्ग तथा नरक के विषय में वेदान्तिक दृष्टिकोण.. 170

. ऐन, जो पूर्व-जन्म में सिपाही थी.. 171

. पूर्व-जन्म की माँ से भेंट. 171

. बर्मी भाषा बोलने वाले सोल्जर कैस्टर. 172

१०. जमापुखुर ग्राम का युवक.. 172

११ . हिल-दक्षिण अमरीका का पर्यवेक्षक.. 173

१२. बजीतपुर के डाकबाबू का लड़का.. 174

१३. अपने माता-पिता को भूल जाने वाली हंगरी देश की बालिका.. 174

१४. दिल्ली के जंगबहादुर की पुत्री.. 175

१५. कानपुर के देवीप्रसाद का पुत्र (अमृत बाजार पत्रिका, दि.--३८) 175

१६. डेढ़ वर्ष की आयु में गीता-पाठ. 175

१७. पाँच वर्ष की बालिका तथा पिआनो.. 175

१८. कलकत्ता के बैरिस्टर की पुत्री.. 176

१९. जीव के पुनर्जन्म की एक विचित्र घटना.. 176

२०. जीवात्मा के परिवर्तन की एक विचित्र घटना.. 179

२१. पुनर्जन्म की एक नवीनतम सुप्रसिद्ध घटना-शान्ति देवी.. 180

२२. मृदुला अपने विगत जीवन का विवरण देती है. 182

२३. मृत्यु के अनन्तर तुरन्त जी उठना.. 186

२४. मृत पत्नी का बालिका के रूप में पुनरागमन. 187

२५. वायलेट फूल का गुच्छा ले कर घूमने वाली मृत पुत्री.. 188

२६. वे विचित्र पद-चिह्न... 190

२७. श्रद्धा का वर्णन. 191

२८. मृत्यु के सम्बन्ध में पाश्चात्य दार्शनिकों के विचार. 193

परिशिष्ट . 196

कुछ पराभौतिक अनुभव. 196

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मरणोत्तर जीवन और पुनर्जन्म

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम प्रकरण

मृत्यु क्या है?

. पुनर्जन्म तथा मानव का उद्विकास

 

पुनर्जन्म का, मरणोत्तर जीवन का प्रश्न युगों से अब तक प्रहेलिका ही बना रहा है। जीवन जिन समस्याओं का पूर्वाभास देता है, उन सबका उत्तर देने में मानव-ज्ञान मुश्किल से सक्षम है। गौतम बुद्ध ने कहा है-"हमारी इन्द्रियों द्वारा हमारी भ्रान्ति के अनुसार सृष्ट इस रूप तथा भ्रान्तिमय जगत् में व्यक्ति या तो है या नहीं है, या तो जीता है या मर जाता है; किन्तु सच्चे तथा रूपहीन जगत् में ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यहाँ सब बातें हमारे ज्ञान के अनुसार दूसरे ढंग से होती हैं। और यदि आप पूछें कि क्या मनुष्य मृत्यु से परे रहता है, तो मैं उत्तर देता हूँ 'नहीं'- उस मानव-मन के किसी बोधगम्य अर्थ में नहीं जो मृत्यु के समय स्वयं मर जाता है। और यदि आप पूछते हैं कि क्या मृत्यु होने पर मनुष्य पूर्ण रूप से मर जाता है, तो मेरा उत्तर है 'नहीं'; क्योंकि जो मरता है, वह इस रूप तथा भ्रान्तिमय जगत् का है।"

 

तथापि मानव-मन किसी निश्चित निष्कर्षहीन रहस्यमय उत्तर से अपने को उलझाने नहीं देता और ज्ञानियों ने एक बार जो कुछ कहा था, उसमें अन्ध-विश्वास का युग बहुत दिन हुए जाता रहा। आज हमसे अकेले विलक्षण प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तियों की ही नहीं, अपितु सामूहिक रूप से ठोस प्रमाण की सतत माँग है। यदि जीवात्मा के आवागमन जैसे गम्भीर रहस्य के विषय में ऐसा भाव है, तो उसका स्पष्ट उत्तर यह है कि 'अच्छा होगा कि आप अपने मरने तक प्रतीक्षा करें, और तब आप निर्णायक रूप से जान सकेंगे।' अतएव, इस पर शान्त, बुद्धिसंगत, निष्पक्ष तथा अवैयक्तिक विचार की आवश्यकता है।

 

कार्य-कारण-सिद्धान्त तथा तत्परिणामी पुनर्जन्म की अपरिहार्यता हिन्दू-दर्शन का सचमुच मूल-सिद्धान्त ही है। किन्तु हम इस बात की उपेक्षा नहीं कर सकते कि इस भूलोक की २०० करोड़ की जनसंख्या में से ८० करोड़ लोगों की पुनर्जन्म में विश्वास की कोई धार्मिक परम्परा नहीं है, जब कि लगभग ४५ करोड़ लोग इसकी सम्भावनाओं के विषय में बिलकुल अज्ञेयवादी हैं।

 

तब यह स्वाभाविक है कि यदि हिन्दू यह सोचें कि वे ही मनुष्यों में सर्वाधिक बुद्धिमान् हैं तथा शेष अज्ञानी लोगों का एक अति-विशाल समूह है जिनके लिए अज्ञानता ही परमानन्द है, तो यह केवल डींग मारना ही होगा। तब यह प्रश्न उठेगा कि यदि कोई यह विश्वास करे कि उसका वर्तमान जन्म उसके पूर्व-जन्म के कमाँ का परिणाम है, तो पूर्व-जन्म को उत्पन्न करने वाला कारण क्या था ? यही सही, एक और पुनर्जन्म। किन्तु, उस जन्म का कारण क्या था?

 

अब इसका उत्तर देने के लिए हमें उद्विकास के नियम का आश्रय लेना होगा और कहना पड़ेगा कि सुदूर अतीत में हम एक बार पशु थे और उस जीवन-संस्तर से हम मानव-प्राणी बने। किन्तु फिर प्रश्न उठेगा कि कार्य-कारण के सिद्धान्त को उचित सिद्ध करने के लिए मानव-प्राणी के रूप में जन्म लेने के लिए भी कोई कारण रहा होगा, और चूँकि पशुओं में सदाचार तथा दुराचार के निर्णय करने की बुद्धि नहीं होती तो मानव-परिवार में अपने जन्म के लिए हम कैसे उत्तरदायी हो सकते हैं? कोई बात नहीं। आइए, हम इस तर्कहीन परिकल्पना को अस्थायी रूप से ठीक मान लें और अपने को प्राणि-परिवार और द्भिज तथा खनिज जगत् की ओर वापस ले जायें और अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुँचें कि भगवान् ही उत्तरदायी आद्य कारण है; किन्तु कार्य-कारण के सिद्धान्त में विश्वास करते हुए, इतना अधिक तर्क के होने पर भगवान् कैसे इतना अन्यायी तथा उन सब कष्टों, संघर्षों और दुःखों का आद्य कारण हो सकता है जिन्हें मानव-प्राणी के रूप में जन्म ले कर हमें भोगना होता है।

 

आद्य कारण का कोई उत्तर नहीं है। सर्वोत्तम मार्ग है: भले बनें और भला करें, सद्विवेक में आस्था रखें तथा व्यक्ति की योग्यता और जीवन के नैतिक सिद्धान्तों का सम्मान करें तथा शेष भगवान् पर छोड़ दें। ऐसी अनेक चीजें हैं जो मानव-मस्तिष्क के कार्यक्षेत्र से बाहर हैं और आत्मज्ञान- यह शब्द कैसा भी प्रभावशाली हो- उनका एकमात्र समाधान है। तथापि पुनर्जन्म की धारणा की यों ही उपेक्षा नहीं की जा सकती है; क्योंकि कुछ ऐसे ठोस तर्कसंगत अध्याहार हैं, जो विश्वास को बनाये रखने में विवेक पर प्रभाव डालते हैं।

 

वैदिक साहित्य की प्रारम्भावस्था में, वास्तव में पुनर्जन्म का कोई उल्लेख, पाप की कोई कालिमा, नरकाग्नि का कोई भय तथा मर्त्य मानव के लिए कोई स्वर्गिक प्रलोभन नहीं था; किन्तु आरण्यक युग के प्रारम्भ में, जब वैदिक मानस सावयची ईश्वरत्व की बहुदेववादी धारणा से एक परम सत्ता के अद्वैतात्मक आदर्श की दिशा में उन्नत हुआ, तो मानव-मन में भगवान् की निष्कलंक सत्ता को सुरक्षित करने के लिए तर्कसंगत आवश्यकता के रूप में कार्य-कारण तथा जीवात्मा के देहान्तरगमन के सिद्धान्त का विकास किया गया।

 

अब यह सर्वविदित है कि विश्व के तीन प्रमुख धर्मों ने जिनका उद्भव यद्यपि हिन्दू-धर्म की अपेक्षा आधुनिक है-नरक में शाश्वत शैतानी के विकराल दृश्य को प्रस्तुत करना आवश्यक समझा, जिससे लोग एक-दूसरे के गले पर झपटने से दूर रहें तथा सामाजिक सुव्यवस्था, संस्कृति के मूल्य तथा शान्ति की उपयोगिता को सम्मान दें। इसके साथ ही इस उद्देश्य की पूर्ति को निर्दिष्ट कर स्वर्ग में आनन्दपूर्ण अमरत्व का सजीव प्रलोभन पेश किया गया है। किन्तु इससे उद्विकास के सिद्धान्त की प्रतिष्ठा तत्काल कम हो जाती है और व्यक्ति को उत्तर काल में उद्धार का एकमात्र अवसर प्रदान किये बिना ही अकस्मात् नरक का दण्ड दे दिया जाता है या अत्यधिक कृपापूर्वक उसे व्यष्टिकृत सत्ता में अनन्त काल तक के लिए स्वर्ग में लटकाये रखा जाता है। इसमें इस बात का भी कोई समाधान नहीं है कि एक व्यक्ति दुष्ट होने पर भी क्यों फले-फूले तथा सुखी रहे और अन्य पुण्यात्मा होने पर अभाव तथा दुःखों से पूर्ण नीरस जीवन यापन करे।

 

इसके विपरीत भारतीय ऋषियों ने इससे अच्छा समाधान प्रस्तुत किया तथा व्यक्ति के विकास के लिए पुनर्जन्म को उत्तरदायी बनाया। व्यक्ति ही अपने भाग्य का स्वामी है। इस संसार की सृष्टि ही क्यों की गयी, इस प्रश्न का उत्तर देने में अपनी असमर्थता को उन्होंने निःसंकोच रूप से स्वीकार किया और उसके आधार पर उन्होंने निश्चयपूर्वक कहा कि भगवान् सद्-असद् का, सुख-दुःख का उत्तरदायी नहीं है। व्यक्ति ही अपनी नियति के लिए उत्तरदायी है। इसके साथ ही वह स्व-प्रयास से इसमें सुधार लाने में समर्थ है। अतएव जीवन की सभी रहस्यमयताओं तथा अन्यायों के लिए भगवान् पर दोषारोपण नहीं किया जा सकता है तथा उन (भगवान) का स्थान मानव की विचारधारा में अक्षत बना रहा। अतएव मृत्यूपरान्त यादृच्छ अनुद्धार का औचित्य सिद्ध करने वाले किसी भी विश्वास की अपेक्षा पुनर्जन्म का सिद्धान्त कहीं अधिक विश्वासोत्पादक है।

 

इसके अतिरिक्त हमारे पास ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे बालक स्वल्प प्रशिक्षण से सहज ही निपुण कलाकार अथवा प्रतिभाशाली गायक बन जाता है, जब कि कुछ अभिजातवर्गीय परिवारों में हम देखते हैं कि अत्यधिक शिक्षा प्राप्त अध्यापकों के भारी प्रयास तथा स्वयं बालक की ओर से भी कठोर श्रम के बावजूद भी वह शिक्षा-प्राप्ति में बहुत ही कम उन्नति कर पाता है। विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न बालकों के उदाहरण भी हैं, जिनके प्रशिक्षण की कोई पृष्ठभूमि नहीं है। एक अन्य उदाहरण लीजिए। दो बालक एक ही माता-पिता के यहाँ जन्म लेते हैं तथा एक ही वातावरण में उनका पालन-पोषण होता है। उनमें से एक शिष्टाचार-सम्पन्न प्रतिभाशाली विद्वान् बनता है तथा दूसरा बिना किसी भी प्रत्यक्ष कारण के मन्द-बुद्धि चिथड़ा पहनने वाला दरिद्र बनता है। एकमात्र पुनर्जन्म का सिद्धान्त इस भेद का उत्तर दे सकता है।

 

सांसारिक दृष्टिकोण से भी पुनर्जन्म जीवन की सम्पोषक शक्ति है। कितने ही स्वप्न तथा कितनी ही आकांक्षाएँ अपरितुष्ट ही रह जाती हैं, यौवन क्षीण हो कर वृद्धावस्था तथा अशक्तता का रूप से लेता है और दुर्गाह्य आशा-रूपी तृणमणि अधिकाधिक धुँधली तथा अशक्त बन जाती है; किन्तु इसकी अनि-शिखा का टिमटिमाना इस सुदूर की आशा से बना रहता है कि कदाचित् किसी अन्य जीवन में वे आशाएँ पूर्ण हो जायेंगी। अतएव इस दृष्टिकोण से भी पुनर्जन्म जीवन के लिए एक सौम्य सान्त्वना तथा आश्वासन है।

 

एक अन्य विचारधारा है जो यह विश्वास करती है कि शरीर तथा आत्मा के पंचतत्त्वों के चरम विस्मृति में चले जाने से मृत्यु का घन जीवन का अन्तिम रूप से अवसान कर देता है। यह सुविधाजनक विश्वास कुछ बौद्धिक वितण्डावादियों के लिए ही आकर्षक है। किन्तु यदि ऐसी बात हो तो प्रेतों तथा आत्मायनों में प्राप्त होने वाले अकाट्य अनुभवों के लिए क्या स्पष्टीकरण है? अतः मरणोपरान्त जीवन को नियम-विरुद्ध नहीं घोषित किया जा सकता है। आइए, अब हम यह विचार करें कि आध्यात्मिक साधकों का क्या मनोभाव होना चाहिए।

 

मनुष्य के अन्दर आश्चर्यजनक सम्भाव्यताएँ हैं। वह भाग्य का दास नहीं है। एक बार बुद्ध ने अपने अत्यधिक प्रतिभाशाली शिष्यों में सारिपुत्र से बौद्ध धर्म की स्थापना के लिए संसार जिनका अत्यधिक ऋणी है-प्रश्न किया: "क्यों! भिक्षु! क्या जीवन तुम्हें बोझिल नहीं लगता और क्या तुम मृत्यु द्वारा इससे मुक्त होना नहीं चाहते ? या जीवन तुम्हें मोहित करता है; क्योंकि एक महान् जीवन-लक्ष्य को पूर्ण करना है।" सारिपुत्र ने उत्तर दिया- "श्रद्धेय गुरुदेव, मैं जीवन की आकांक्षा नहीं रखता। मैं मृत्यु की आकांक्षा नहीं रखता। जैसे सेवक अपनी भृत्ति की प्रतीक्षा करता है, वैसे ही मैं अपनी आने वाली घड़ी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।"

 

साधक की भी ऐसी ही मनोवृत्ति होनी चाहिए। उसे स्वयं कुछ पूर्ण करना नहीं है; क्योंकि उसका जीवन भगवद्-इच्छा की पूर्ति है। उसमें किसी सुयोग्य आध्यात्मिक जीवन-लक्ष्य को प्रोत्साहित करने के लिए पुनः जन्म लेने की कामना को भी कोई स्थान नहीं होना चाहिए; क्योंकि क्या भगवान् हमारी अपेक्षा अधिक नहीं जानता कि वह किसको इस संसार में अपने सन्देशवाहक के रूप में भेजे ? और, क्या परम सत्ता के महान् ब्रह्माण्डीय ऐक्य में अपने शरीर तथा मन और अपनी वैयक्तिकता के विलय में और इस प्रकार सूक्ष्म शरीर में विद्यमानता अथवा स्थूल शरीर से काराबद्ध रूप में स्व-जीव-भाव को सदा के लिए समाप्त कर देने में आनन्दित होना मानव का सर्वोत्कृष्ट आदर्श नहीं है?

 

प्रत्येक साधक अपने लिए पुनर्जन्म के स्वत्व-त्याग के अधिकार को बहुत ही निश्चयपूर्वक सुरक्षित रखता है; क्योंकि मोक्ष उसका जन्म-सिद्ध अधिकार है और वह अपने भाग्य का स्वामी है। कोई भी मनोग्रन्थि - चाहे वह आध्यात्मिक हो या ऐहिक-सदा के लिए अच्छी नहीं होती। मृत्यु के समय किसी मनोग्रन्थि से उत्पीड़ित होने की अपेक्षा मन को किसी भी अस्वस्थ भय की मनोग्रन्थि से परिमार्जित करना अच्छा है। जीवन के भौतिक मूल्यों के क्षणिक स्वरूप से अवगत हो जाने पर व्यक्ति को अपने इस रक्त-मांस-मय कारागृह में पुनः यन्त्रणा पाने की सम्भावनाओं को अस्वीकार कर देना चाहिए और उसके पास जो भी इच्छा तथा विचार-शक्ति हो, उनसे पूर्ण बल तथा तीव्रता के साथ अपने वैध पावने की माँग करनी चाहिए।।

 

विचार कर्म का निश्चय करता है और कर्म भाग्य का निश्चय करता है। प्रत्येक व्यक्ति में शक्ति का एक विशाल भण्डार है और व्यक्ति निश्चय ही मात्र अपनी इच्छा-शक्ति से तथा अवश्यम्भावी भगवत्कृपा के साथ भावी जीवन की किसी भी सम्भावना को ध्वस्त कर सकता है तथा अपने वर्तमान जीवन को इस प्रकार आकार दे सकता है कि उसमें ऐहिक कामनाओं का कोई चिह्न और क्षतचिह्नित कार्यों की अमिट छाप का कोई संकेत तक रह जाये। क्या अप्रतिम ज्ञानी तथा त्यागी दत्तात्रेय ऋषि ने नहीं कहा - "दीक्षित व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता है।"

 

. मृत्यु क्या है?

 

इस स्थूल शरीर से जीवात्मा का अलग हो जाना ही मृत्यु कहलाती है। मृत्यु के अनन्तर ही नवीन तथा उत्तम जीवन का प्रारम्भ होता है। मृत्यु आपके व्यक्तित्व और आत्म-चेतना को रोकती नहीं। यह तो जीवन के उत्तम स्वरूप का द्वार उन्मुक्त करती है। इस भाँति मृत्यु पूर्णतर जीवन का प्रवेश द्वार है।

 

जन्म और मरण तो माया के जादू हैं। जो जन्म लेता है, वह मरना आरम्भ करता है। जीवन ही मरण है और मरण ही जीवन है। इस संसार-रूपी रंगभूमि में प्रवेश करने तथा बाहर जाने के लिए जन्म और मरण-ये दो द्वार हैं। वास्तव में तो कोई आता है और कोई जाता ही है। ब्रह्म अर्थात् जो शाश्वत सत्ता है, एकमात्र वही विद्यमान है।

 

जिस प्रकार आप एक घर से निकल कर दूसरे घर में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार जीवात्मा भी अनुभव प्राप्त करने के लिए एक शरीर से निकल कर दूसरे शरीर में जाता है। जिस प्रकार एक मनुष्य पुराने फटे हुए वस्त्रों को निकाल फेंकता है तथा नये वस्त्र धारण करता है, उसी भाँति इस शरीर का निवासी (पुरुष) जीर्ण-शीर्ण शरीर को फेंक कर नये शरीर में प्रवेश करता है।

 

मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है। जीवन नित्य निरन्तर प्रवाहशील प्रगति है, जिसका कभी भी अन्त नहीं। यह तो गुजरने का मार्ग है। प्रत्येक जीवात्मा को अपना अनुभव प्राप्त करने तथा नया विकास साधने के लिए उसमें हो कर जाना पड़ता है। इस भाँति मृत्यु एक आवश्यक घटना है।

 

इस शरीर से जीवात्मा का अलग होना निद्रा से अधिक कोई विशेष बात नहीं है। जिस प्रकार मनुष्य सो जाता है और जाग उठता है, उसी भाँति जन्म और मृत्यु-ये दोनों ही हैं। मृत्यु निद्रा की-सी दशा है और जन्म जाग्रति की-सी। मृत्यु श्रेष्ठतर नवीन जीवन का विकास प्रारम्भ करती है। विवेकी तथा ज्ञानी पुरुष मृत्यु से भयभीत नहीं होते; क्योंकि वे जानते हैं कि मृत्यु तो जीवन का प्रवेश-द्वार है। उन ज्ञानी जन के लिए मृत्यु उस म्यान के सदृश्य नहीं है जिसमें रहने वाली तलवार जीवन-सूत्र को काट डालती है; परन्तु उनके लिए तो मृत्यु देवदूत बनी रहती है जिसके पास स्वर्ण की वह कुंजी है जो आत्मा को विशेष विकसित, पूर्ण और सुखमय स्थिति का अनुभव कराने के लिए जीवन का द्वार उन्मुक्त कर देती है।

 

प्रत्येक जीवात्मा की स्थिति एक वृत्त के समान है। इस वृत्त की परिधि किसी भी स्थान पर नहीं है; परन्तु इसका केन्द्र इस शरीर में है। एक शरीर से दूसरे शरीर में इस केन्द्र का स्थानान्तरित होना ही मृत्यु कहलाती है। तो फिर तुम मृत्यु से क्यों भयभीत होते हो?

 

जो यह सर्वोत्तम आत्मा परमात्मा है, वह मृत्यु-रहित है, विनाश-रहित है, काल-रहित है, कारण-रहित है और दशा-रहित है। वह इस शरीर, मन तथा समस्त संसार का मूल-कारण अथवा अधिष्ठान है। पाँच महाभूतों से बने इस शरीर की ही मृत्यु होती है। भला इस शाश्वत आत्मा की मृत्यु किस प्रकार हो सकती है; क्योंकि आत्मा तो देश, काल तथा कारण से परे है।

 

यदि तुम जन्म-मृत्यु से छुटकारा पाना चाहते हो, तो तुम्हें बिना शरीर का बनना पड़ेगा। कर्म के परिणाम-स्वरूप ही यह शरीर रहता है। तुम्हें ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए जिसमें फल की आशा हो। यदि तुम अपने-आपको राग-द्वेष आदि से बचा सकते हो, तो कर्म से मुक्त रह सकोगे। यदि तुम केवल अपने अहंकार को मार डालो, तो तुम अपने-आपको राग-द्वेष से मुक्त रख सकोगे। उस अविनाशी आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर यदि तुम अपने अज्ञान का निवारण कर सको, तो तुम अपने अहंकार को दूर कर सकोगे। इस शरीर का मूल कारण एकमेव अज्ञान ही है।

 

यह आत्मा सभी प्रकार के शब्द, रूप, रस, स्पर्श आदि से परे है। यह स्वयं निराकार एवं निर्गुण है। यह प्रकृति से भी परे है। यह तीन प्रकार के (स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण) शरीरों से तथा शरीर के पाँच कोशों से परे है। यह अनन्त, अविनाशी तथा स्वयं-प्रकाश है। जो पुरुष इस शाश्वत आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है, वह अपने-आपको काल के कराल गाल से बचा लेता है।

. मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है

 

शरीर में रहनी वाली व्यक्तिगत आत्मा ही 'जीवात्मा' कहलाती है। ये जीवात्माएँ अपनी क्रियाओं के सम्पादनार्थ तथा इस जगत् से अनुभव प्राप्त करने के लिए विविध शरीरों का निर्माण करती हैं। स्व-निर्मित इन शरीरों में वे जीव प्रवेश करते हैं और जब वे शरीर में रहने के अनुपयुक्त हो जाते हैं, तब उन्हें वे परित्याग कर देते हैं। वे जीव पुनः नवीन शरीरों का निर्माण करते हैं और पुनः उसी प्रकार उन शरीरों का भी परित्याग कर देते हैं। यह प्रवेश तथा निर्गमन ही जीवों का आविर्भाव तथा तिरोभाव कहलाता है। शरीर में जीवात्मा का प्रवेश होना 'जन्म' कहलाता है और शरीर से जीवात्मा का अलग होना 'मरण' कहलाता है। यदि शरीर में जीवात्मा विद्यमान हो, तो उसे मृतक कहते हैं।

 

स्त्री के शोणित में पुरुष के शुक्र के सम्मिश्रण की क्रिया को माता के उदर में बालक का गर्भ धारण करना कहते हैं। पुरुष के शुक्र के अणु तथा स्त्री के शोणित के अणु जीवाणु हैं। वे कोरी आँखों से दिखायी नहीं पड़ते; परन्तु सूक्ष्मदर्शक यन्त्र से वे दृष्टिगोचर होते हैं। सामान्य रूप से इस प्रकार के जीवाणुओं के सम्मिश्रण को ही 'गर्भ' कहते हैं तथा वैज्ञानिक रीति से इसे शोणित के फलद्रूप होने की क्रिया कहते हैं।

 

एक व्यक्ति की मृत्यु के विषय में जो घटनाएँ होती हैं, उनके क्रम को जानने के लिए तथा इस विषय में वर्तमान अज्ञान के आवरण को विदीर्ण करने के लिए विचारशील मानव सदा ही प्रयत्नशील रहा है; परन्तु मृत्यु के परे जीवन के विषय में जो अज्ञान का आवरण है, उसे दूर करने में मनुष्य को पूर्ण सफलता मिल चुकी है, यह नहीं कहा जा सकता।

 

इस रहस्य के उद्घाटन के लिए आधुनिक विज्ञान भी प्रयत्नशील है; परन्तु अद्यावधि कोई ऐसा तथ्य इसके हाथ नहीं लगा है, जो किसी प्रकार की मान्यता की आधारभूमि बन सके। परन्तु इस विषय में जो प्रयोग किये जा रहे हैं, उनसे बहुत-सी रोचक बातों का पता चलता है।

 

ऐसा कहा जाता है कि इस बात का अभी पता नहीं लग सका कि एक कोश से बने हुए शरीर की स्वाभाविक मृत्यु कब हुई? जब इस पृथ्वी पर एक कोश से बने हुए प्राणियों के जीवन का प्रारम्भ हुआ, उस समय उनके लिए मृत्यु अज्ञात थी। जब एक कोश से बने हुए प्राणियों से अनेक कोश वाले प्राणियों का इस जगत् में विकास हुआ, तभी से यह मृत्यु का दृश्य देखने में आता है।

 

विज्ञान की प्रयोगशालाओं में किये गये प्रयोगों से पता चला है कि बिल्ली या मुर्गे के शरीर से अलग किये हुए चूलिका-ग्रन्थि, स्त्रीबीज, अण्डकोष, प्लीहा, हृदय, गुरदा इत्यादि सम्पूर्ण अंग जब जीवित रखे जाते हैं, तो उनमें नये कोश तथा तन्तुओं का उभार होने के कारण उनके आकार तथा परिमाण में वृद्धि होती है।

 

यह भी देखने में आया है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व समाप्त हो जाने के अनन्तर भी शरीर के अंग अपनी क्रियाएँ करते रहते हैं। रुधिर के श्वेत कणों की यदि सँभाल की जाये, तो वे जिस शरीर से निकाले गये हैं, उसके नाश हो जाने पर भी महीनों तक जीवित रहते हैं। परन्तु यह बात सच है कि उनमें जो जीवन है, वह रक्त-कणों का जीवन है, वह उस व्यक्ति का जीवन नहीं है।

 

मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है। यह तो केवल एक ही व्यक्तित्व के विकास का अन्त है। विश्व में विश्वमय बनने के लिए जीवन सतत प्रवहणशील है तथा जब तक वह अनन्त में विलीन नहीं हो जाता, तब तक वह प्रगतिशील बना रहता है।

. मृत्यु का क्रम

 

श्री वसिष्ठ मुनि अपने योगवासिष्ठ में कहते हैं :

 

"शरीर में होने वाली व्याधियों के कारण इस शरीर की नाड़ियों की शक्ति क्षीण पड़ जाती है और उसके परिणाम स्वरूप नाड़ियों के संकोच और विकास की गति अवरुद्ध हो जाती है। नाड़ियों के इस संकोच और विकास के कारण ही अन्दर का श्वास बाहर और बाहर का श्वास अन्दर आता-जाता रहता है। इस गति के अवरुद्ध होने से शरीर अपना सन्तुलन खो बैठता है तथा पीड़ा का अनुभव करता है। इसके कारण तो अन्दर का श्वास भली-भाँति बाहर होता है और बाहर का श्वास ही भली-भाँति शरीर में पुनः प्रवेश करता है। श्वासोच्छ्वास की क्रिया अवरुद्ध हो जाती है। श्वासोच्छ्वास की क्रिया में अवरोध होने से मनुष्य अचेत हो जाता है और मृत्यु को प्राप्त होता है। व्यक्ति की सम्पूर्ण वासनाएँ तथा आसक्तियाँ जो उस समय उसके अन्दर वर्तमान होती हैं, वे सब-की-सब बाहर निकल आती हैं। जो व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण वासनाओं तथा संस्कारों के साथ शरीर के अन्दर रहता है, उसे ही जीव कहते हैं। जब शरीर मृत्यु को प्राप्त होता है, तब व्यक्ति के अन्दर रहने वाले प्राण जीव के साथ शरीर से बाहर निकल आते हैं और वायु में भटकते रहते हैं। वायु-मण्डल की वायु इस प्रकार के जीव के साथ रहने वाले अनेक प्राणों से आपूर्ण रहती है। वायु में रहने वाले ये जीव अपने पूर्व-जीवन के अनुभवों के कारण उन प्राणों के अन्दर टिके रहते हैं। मैं उन्हें देख सकता हूँ। इस भाँति जो जीवात्मा अपनी सम्पूर्ण कामनाओं के साथ रहता है, उसे उस समय प्रेत (परलोक में गया हुआ) कहते हैं।

 

"जहाँ पर जब एक (शरीर) मृत्यु को प्राप्त होता है, तब मृत्यु की अचेतनावस्था दूर हो जाने पर वह (जीव) वहीं पर दूसरे लोक का अनुभव करने लगता है।"

. मृत्यु के चिह्न

 

मृत्यु के वास्तविक चिह्न को खोज निकालना बहुत ही कठिन है। हृदय के स्पन्दन का स्तम्भित हो जाना, नाड़ी की गति रुक जाना अथवा श्वासोच्छ्वास का स्थगित होना-ये मृत्यु के वास्तविक चिह्न नहीं हैं। हृदय का स्पन्दन तथा नाड़ी एवं श्वासोच्छ्वास इत्यादि क्रियाओं का बन्द होना, अवयवों का कठोर पड़ जाना, शरीर में उष्णता का अभाव ये सभी मृत्यु के सामान्य कारण हैं। नेत्रों में अपना प्रतिबिम्ब पड़ता है कि नहीं-इसका पता डाक्टर लगाते हैं और उसके पाँव को झुकाने का भी प्रयास करते हैं; परन्तु ये चिह्न मृत्यु के ठीक-ठीक चिह्न नहीं हैं। कारण यह है कि ऐसे बहुत से उदाहरण देखने में आये हैं कि श्वासोच्छ्वास तथा हृदय की धड़कन बन्द होने पर भी कुछ समय पश्चात् वे व्यक्ति पुनः जीवित हो उठे।

 

हठयोगियों को पेटी में बन्द कर उन्हें चालीस दिन तक पृथ्वी के अन्दर गाड़ देते हैं। उसके अनन्तर उन्हें बाहर निकाला जाता है और वे जीवित रहते हैं। श्वासोच्छ्वास दीर्घ काल तक रोका जा सकता है। यदि कृत्रिम रूप से प्राणायाम के द्वारा श्वास को रोका जाये, तो भी दो दिवस तक श्वासोच्छ्वास बन्द रहता है। इस विषय के बहुत से उल्लेख पाये जाते हैं। लगातार घण्टों तक तथा कई दिनों तक भी हृदय की धड़कन रोकी जाती है और पुनः चालू की जाती है। इससे यह कहना बहुत कठिन है कि मृत्यु का ठीक तथा अन्तिम चिह्न क्या हो सकता है? शरीर का बिगड़ जाना तथा सड़ जाना ही मृत्यु का अन्तिम चिह्न हो सकता है।

 

मृत्यु के अनन्तर शरीर बिगड़ने लगे, इसके पहले ही किसी को तुरन्त गाड़ नहीं देना चाहिए। कोई ऐसा सोच सकता है कि अमुक व्यक्ति मर गया है; परन्तु हो सकता है कि वह मनुष्य अर्धसमाधि, अचेतनावस्था अथवा समाधि की दशा में रह रहा हो। ये सम्पूर्ण अवस्थाएँ मृत्यु से मिलती-जुलती हैं। बाह्य चिह्न समान ही होते हैं।

 

हृदय की गति रुक जाने के कारण जिन लोगों की मृत्यु होती है, उनके शव को तुरन्त ही नहीं गाड़ देना चाहिए; क्योंकि ऐसा सम्भव है कि कुछ समय के अनन्तर उनका श्वासोच्छ्वास पुनः चालू हो जाये। शरीर में बिगाड़ होने के पश्चात् ही उनके शव को गाड़ने आदि की क्रिया करनी चाहिए।

 

एक योगी स्वेच्छा से अपने हृदय के स्पन्दन को रोक सकता है। वह समाधि की दशा में घण्टों अथवा दिनों तक रह सकता है। समाधि-अवस्था में हृदय की धड़कन तथा श्वासोच्छ्वास की क्रियाएँ नहीं होतीं। यह निद्रा-रहित निद्रा अथवा सम्पूर्ण चेतनावस्था है। जब योगी स्थूल चेतना की स्थिति में आता है, तब हृदय की धड़कन तथा श्वासोच्छ्वास की क्रियाएँ पुनः प्रारम्भ हो जाती हैं। विज्ञान इस विषय का कुछ स्पष्टीकरण नहीं कर सकता। डाक्टर जब स्वयं अपनी आँखों से इन अवस्थाओं को देखते हैं, तो वे अवाक् हो जाते हैं।

. मृत्यु के समय तत्त्वों का अलग होना

 

यह स्थूल शरीर पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश- इन पाँच महाभूतों से बना हुआ है। देवताओं का शरीर तैजस अथवा दिव्य पदार्थ का बना होता है। उनमें अग्नि-तत्त्व की अधिकता रहती है। इसी भाँति जलचरों में जल-तत्त्व तथा पक्षियों में वायु-तत्त्व की अधिकता रहती है।

 

शरीर के अन्दर जो कठोरता का अंश है, वह पृथ्वी-तत्त्व के कारण है। रस-भाग जल के कारण है। शरीर में तुम जो उष्णता का अनुभव करते हो, वह अग्नि-तत्त्व के कारण है। शरीर का हिलना-डुलना तथा दूसरी क्रियाएँ वायु के कारण होती हैं। अवकाश आकाश के कारण है। जीवात्मा इन पाँच तत्त्वों से भिन्न है।

 

पाँचों महातत्त्व प्रकृति के अक्षय कोष से उत्पन्न हुए हैं। मृत्यु के पश्चात्