स्वर योग

 

'SVARA YOGA' का हिन्दी अनुवाद

 

 

 

 

लेखक

 

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादिका

शिवानन्द राधिका अशोक

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-249 192

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dishq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण-2006

द्वितीय हिन्दी संस्करण-2008

तृतीय हिन्दी संस्करण-2011

चतुर्थ हिन्दी संस्करण-2016

पंचम हिन्दी संस्करण-2019

[ 500 प्रतियाँ ]

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

HS 14

 

 

 

 

PRICE: 80/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, शिवानन्दनगर, जि. टिहरी गढ़वाल,

उत्तराखण्ड, पिन 249 192' में मुद्रित

For online orders and Catalogue visit: disbooks.org

प्रकाशकीय

 

स्वर योग प्राचीन हिन्दू विज्ञान एवं कला है जिसने इस शरीर में जीवन-तत्त्व, प्राण तथा जीवन के कार्यों को पूर्णत: विश्लेषित किया है। यह विभिन्न नाड़ियों के बारे में व्यवहृत है जिनके साथ प्राण इस शरीर में स्पन्दित होता है, इसे जीवन देता है तथा यह उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु को स्थिर करने हेतु प्राण के प्रवाह को नियमित करने के साधनों का भी निर्देश देता है। यह विज्ञान अथवा स्वर योग प्राणायाम विज्ञान से अधिक सूक्ष्म और भली प्रकार समझा जा सकने योग्य है। यदि प्राणायाम से इसकी तुलना की जाये, तो स्वर योग के समक्ष प्राणायाम इसकी बाह्य रेखा के समान है। स्वर योग में हमें रोग तथा मृत्यु को रोकने हेतु विभिन्न प्रभावशाली साधन प्राप्त होते हैं। स्वर योग की साधना निपुण योगी के मार्ग-दर्शन में की जानी चाहिए।

 

बीसवीं सदी के आधुनिक ऋषि और योगी स्वामी शिवानन्द जी ने इस पुस्तक में इस अल्पज्ञात किन्तु महत्त्वपूर्ण और व्यावहारिक, वैज्ञानिक और योग की शाखा (जिसका वर्णन प्राणायाम साधना, हठयोग, योगाभ्यास और कुण्डलिनी योग में सामान्य रूप से नहीं मिलता है) के बारे में लिखा है। आध्यात्मिक साधकों और पाठकों हेतु इस पुस्तक के विषय पूर्ण व्यावहारिक लाभ के हैं। और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रत्येक पाठक के लिए यह उपयोगी है।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादिका के दो शब्द

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

परम पूज्य गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज के चरणों में मेरा शत-शत नमन।

गुरुदेव की लिखी हुई प्रत्येक पुस्तक पूर्ण रूप से व्यावहारिक जीवन में उतारने योग्य है; क्योंकि गुरुदेव ने पहले स्वयं इन्हें जीवन में व्यवहार में लाया है, उसके बाद ही इन्हें जन-मानस के लाभ हेतु पुस्तक के रूप में लिखा है। वास्तव में इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करते समय मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि गुरुदेव स्वयं ही स्वर योगी थे। ये बात तो वैसे सर्व विदित है कि स्वामी जी त्रिकालदर्शी थे और यह स्वर योगी को प्राप्त होने वाली सिद्धियों में से एक है।

 

गुरुदेव ने इस पुस्तक में हमें अत्यन्त सरल स्वर साधना बतायी है तथा यह बतलाया है कि किस दिन हमारा कौन-सा स्वर चलना चाहिए, कौन-से स्वर में कौन-से कार्य करने चाहिए जिससे हम उस कार्य में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकें तथा यदि आपका स्वर सही चल रहा हो, उसे कैसे ठीक किया जाये, इस हेतु उपाय भी इस पुस्तक में दिये गये हैं। इसके साथ-साथ हमारा शरीर जिन पंच तत्त्वों से निर्मित है, उनके बारे में तथा उनके प्रयोग के बारे में भी इस पुस्तक में वर्णन है और हमें इसमें एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण किन्तु सरल साधना मिलती है, वह है छाया त्राटक जिसके बारह वर्ष तक अभ्यास करने से मनुष्य त्रिकालज्ञ हो जाता है।

 

प्रस्तुत पुस्तक में उस योग के बारे में गुरुदेव ने लिखा है जो हमारी श्वासों से सम्बन्धित है। यह तो हम सभी जानते हैं कि जब तक श्वास है, तभी तक हमारा जीवन है; लेकिन यह बात बहुत ही कम लोगों को विदित है कि इन्हीं श्वासों को नियमित करके हम जीवन के प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं और अनन्त काल तक स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकते हैं और इसी साधना का नाम है स्वर योग साधना।

 

अन्त में मेरा आप सभी से यही विनम्र निवेदन है कि आप इस पुस्तक को पढ़ कर अपने दैनिक जीवन में प्रयोग में लायें तथा अपने प्रत्येक कार्य में सफलता और दीर्घायु तथा स्वस्थ जीवन प्राप्त करें।

 

गुरुदेव की अहेतुकी कृपा से मुझे कुछ पुस्तकों का अंग्रेजी से हिन्दी माध्यम में अनुवाद करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मेरे द्वारा अनुवादित कुछ पुस्तकों का उल्लेख इस प्रकार है: घर की सरल औषधियाँ, अच्छी नींद कैसे सोयें, सौ वर्ष कैसे जियें, कुण्डलिनी योग, स्वर योग, हठ योग, धारणा और ध्यान, कर्म और रोग, आधुनिक सन्त स्वामी शिवानन्द एक जीवनी, देवी माहात्म्य, धनवान् कैसे बनें और मूर्तिपूजा का दर्शन।

 

सदा गुरुदेव की सेवा में

शिवानन्द राधिका अशोक

अनुक्रमणिका

 

प्रकाशकीय. 3

अनुवादिका के दो शब्द.. 4

अध्‍याय-1

प्रस्तावना.. 9

सच्चा च्यवनप्राश. 10

स्वास्थ्य और दीर्घायु. 11

स्वर योग. 11

अध्‍याया-2

स्वर एवं योग. 13

स्वर. 13

योग. 14

अध्‍याया-3

प्राण और इसके विभाग. 16

नाड़ियाँ.. 16

श्वास के विभाग. 17

शरीर की स्वच्छता.. 18

प्राणायाम हेतु नियम. 19

अध्‍याय-4

सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि.... 21

सुषुम्ना.... 22

नाड़ियों के लक्षण.. 22

काल पर विजय. 23

अध्‍याय-5

स्वर विज्ञान. 25

स्वर (प्रवाह) की अवधि.. 25

स्वस्थ प्रवाह (स्वर) 25

स्वर का महत्त्व... 27

स्वर-परिवर्तन. 27

सुषुम्ना नाड़ी में श्वास-प्रवाह. 28

स्वर का उपयोग. 29

अध्‍याय-6

तत्त्व... 31

पंच तत्त्व... 31

तत्त्वों पर ध्यान. 32

रंगों द्वारा तत्त्वों की पहचान. 33

आकार से तत्त्वों की पहचान. 33

श्वास-प्रवाह की दिशा द्वारा तत्त्वों की पहचान. 34

रंग-परीक्षण द्वारा तत्त्वों की पहचान. 34

तत्त्वों का स्वाद. 34

श्वास-प्रवाह की लम्बाई. 35

तत्त्व तथा नक्षत्रों एवं ग्रहों आदि का सम्बन्ध... 35

तत्त्व और मानव-शरीर. 36

तत्त्वों के लाभ. 36

अध्‍याया-7

सामान्य अनुमान. 38

वार्षिक पूर्वानुमान. 38

स्वयं के लिए दिशा-निर्देश. 39

नाड़ियों का प्रवाह. 40

अध्‍याय-8

महत्त्वपूर्ण निर्देश. 42

अध्‍याय-9

व्यावहारिक पथ-प्रदर्शन. 46

अभ्यास हेतु उपयुक्त आसन. 46

तीन महत्त्वपूर्ण नाड़ियाँ.. 46

अच्छे तथा बुरे की भविष्यवाणी हेतु नियम. 47

श्वास के साथ पंच तत्त्वों का संयोग. 48

रोगों के लिए. 49

नाड़ी को कैसे चलना चाहिए. 49

भीतर आने वाली तथा बाहर जाने वाली श्वास. 52

स्वरों द्वारा परिणाम के संकेत. 52

अध्‍याय-10

मन का क्रमशः ऊर्ध्वारोहण.. 53

अध्‍याय-11

कुण्डलिनी जागरण होने पर अनुभव. 55

योगी अमृत का पान करता है. 56

परिशिष्‍ट

शिव-स्वरोदयम्. 57

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

स्वर योग

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय

प्रस्तावना

 

वर्तमान कुछ शताब्दियों में विज्ञान की अपार प्रगति के बाद भी यह जीवन सदा रहस्यमय है। यहाँ तक कि प्रवीण चिकित्सकों द्वारा की गयी शोधों के बाद भी यह रहस्य सुलझ नहीं सका है। संक्षेप में यह जीवन किसी भी प्रयोगशाला में प्रयोग का विषय नहीं बना। भारतवर्ष के सन्तों और ऋषियों की मानसिक प्रयोगशालाएँ ही हमारी एकमात्र पथ-प्रदर्शक हैं, जो हमारे जीवन की इस पहेली को सुलझाती हैं। यही ज्ञान हमने अपने प्राचीन ऋषियों और योगियों से उत्तराधिकार में प्राप्त किया है।

 

भारतीय दर्शन शास्त्र, योग-वेदान्त के इतिहास में हमें जीवन के प्रति अनेक बुद्धिमत्तापूर्ण दृष्टिकोण मिलते हैं। दर्शन के विभिन्न तत्त्वदर्शियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से जीवन को स्वयं के तरीके से विश्लेषित किया है। लेकिन हिन्दू विचारों के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ उपनिषद् ने हमें जीवन का सही प्रस्तुतिकरण दिया है। उपनिषदों के ऋषियों को प्रत्येक जीव के जन्म, वृद्धि तथा क्रियाकलापों के निष्पक्ष और पूर्ण विश्लेषण ने इस निर्णय पर पहुँचाया है कि श्वास ही जीवन, ऊर्जा और क्रियाशीलता है तथा यह कि श्वसन क्रिया ही जीवन, ऊर्जा और गतिविधि है।

 

मनुष्य, जैसा कि हम देखते हैं, तीन भागों से निर्मित है। प्रथम तो हम मांस और रक्त का पिण्ड देखते हैं जो नाड़ी तन्तुओं के जाल द्वारा आपस में जुड़ा हुआ है तथा इसका आधार हड्डियों से निर्मित कंकाल है। यह मांस का पिण्ड स्वयं कोई कार्य करने में असमर्थ है। दूसरा भाग है वह चेतना जो इस पिण्ड के भीतर निवास करती है। चेतना भी अपने अद्वैत गुण के कारण निष्क्रिय रहती है। यहाँ तक कि जीव, जो अहंकार से युक्त है, उसमें कारण स्थिति में यह चेतना उसी प्रकार रहती है जैसे शहर को अन्धकार की चादर ने ढाँक रखा हो। कारण स्थिति में किसी प्रकार की गतिविधि नहीं होती है। इससे अगली स्थिति सूक्ष्म अवस्था में क्रियाविधि प्रारम्भ होती है। यही तीसरा भाग है। जीव तथा सूक्ष्म शरीर को जोड़ने वाला तन्तु है प्राण। इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल भौतिक शरीर को जोड़ने वाला तन्तु वह वायु है जिसे हम श्वास द्वारा भीतर लेते हैं। यह वायु इसमें निहित प्राण का स्थूल रूप है।

 

यह प्राण की गति है जो सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के विभिन्न केन्द्रों को संचालित करती है। यह हमारे द्वारा श्वास के द्वारा लिये जाने वाले प्राण की गति है जो हमारे हाथों, पैरों तथा अंगों को संचालित करती है और यह हमारे शरीर के प्रत्येक कार्य को सहारा देती है।

 

ईशावास्योपनिषद् में आप पायेंगे : "तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति", जिसका अर्थ इस प्रकार है-मातरिश्वान (वायु) सभी जीवित प्राणियों की गतिविधियों को सहारा देती है। प्रश्नोपनिषद् के द्वितीय प्रश्न में आप पायेंगे : "तान् वरिष्ठः प्राण उवाच... अवष्टभ्य विधारयामीति", प्राण उनमें से सबसे बड़ा कहा गया है।भ्रमित हों, मैंने इस शरीर को अवलम्बन प्रदान करने के लिए स्वयं को पाँच भागों में विभाजित किया है।" पुनः यही विचार आप बृहदारण्यक उपनिषद् (. , श्लोक ) में पायेंगे।

 

किसी भी जीव के लिए प्राण अथवा जीवन शक्ति के बिना कोई कार्य करना सम्भव नहीं है। एक तरफ जीव के अहंभाव का अस्तित्व है तथा दूसरी तरफ इसके वाहन शरीर-स्थूल अथवा सूक्ष्म का अस्तित्व है। सम्पर्क में आने वाली प्रत्येक वस्तु से सम्पर्क में आने पर अहंभाव एक हो जाता है और सोचता है कि मैं ही यह शरीर हूँ। इसके अगले ही क्षण यदि शरीर के श्वसन-संस्थान में कुछ गड़बड़ होती है, तो यह उससे जुड़ जाता है। लेकिन सत्य तो यह है कि वह इन सबसे परे है और वह तो इस भौतिक शरीर और प्राण के कार्यों के विश्लेषणात्मक अध्ययन हेतु इस सबको नियन्त्रित करने की स्थिति में है।

 

यदि एक बार मनुष्य इस प्राण का प्रबन्धन किस प्रकार किया जाये, यह सीख जाता है तो वह जीवन के प्रश्न को सरलता से हल कर लेगा और जीवन पर स्वामित्व प्राप्त कर लेगा तथा अनन्त वर्षों तक निरोग जीवन व्यतीत कर सकेगा। तब वह उस स्थिति में होगा, जब वह मन के विचार मात्र से ही ब्रह्माण्ड से अधिकाधिक मात्रा में यह ऊर्जा तत्त्व, जीवन शक्ति खींच सकेगा। वह ब्रह्माण्ड से ऊर्जा के दोहन के रहस्य तथा जीवन का किस प्रकार उपयोग किया जाये और उसे किस प्रकार बनाये रखा जाये, यह जानने के बाद वह सदा युवा रह सकता है। यही समय को छलने का, दिन के चौबीसों घण्टे काम कर सकने का, सदैव ताजगी और ऊर्जा तथा यौवन से परिपूर्ण रहने का यौगिक मार्ग है।

सच्चा च्यवनप्राश

 

बाजार में आयुर्वेदिक च्यवनप्राश प्राप्त होता है। इसका नाम च्यवन ऋषि के नाम पर रखा गया है। च्यवन ऋषि की पौराणिक कथा से हमें ज्ञात होता है कि किस प्रकार उन्होंने देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों को प्रसन्न किया और पुन: यौवन प्राप्त किया। च्यवनप्राश का प्रयोग यौवन और ऊर्जा को अक्षुण बनाये रखने हेतु होता है

 

च्यवन ऋषि की कहानी का गुप्त अर्थ विशेष महत्त्वपूर्ण है। च्यवन ऋषि इस मानव-शरीर को व्यक्त करते हैं। च्यवन की उत्पत्ति मूल संस्कृत शब्द च्यु से हुई है। इसका अर्थ है-जाने के लिए। यह शरीर कभी एक जगह नहीं ठहरता, वरन् सदैव एक अवस्था से दूसरी में जाता रहता है। इस प्रकार यह बचपन से वृद्धावस्था तक विकसित होता है और फिर नष्ट हो जाता है। शरीर की ज्ञानेन्द्रियाँ देव हैं। ये प्राण की शक्ति से सदा युवा और ऊर्जावान् बने रहते हैं। जिस प्रकार शारीरिक रोगों के लिए हम चिकित्सक के पास जाते हैं, उसी प्रकार उनकी ऊर्जा एवं जीवन शक्ति के लिए वे प्राण पर निर्भर हैं। प्राण और अपान अश्विनीकुमार हैं। इन्हें अश्विनीकुमार इसलिए कहा गया है; क्योंकि वे दो घोड़ों की भाँति बिना एक क्षण भी विश्राम किये निरन्तर दौड़ते रहते हैं। ये अविभेद्य हैं, इसलिए इन्हें जुड़वाँ कहते हैं। च्यवन ऋषि ने इनका अनुग्रह प्राप्त किया अर्थात् प्राण तथा अपान पर नियन्त्रण प्राप्त किया और यौवन, ओज तथा ऊर्जा के आनन्द उपभोग के लिए उनका उपयोग किया।

 

इस प्रकार च्यवन ऋषि की औषधि सच्चा च्यवनप्राश का चिर-यौवन प्राप्त करने हेतु प्रयोग करने का अर्थ है-योग के द्वारा श्वास पर नियन्त्रण और उसका उपयोग। और यही रामबाण शक्तिवर्धक तथा शक्तिप्रदाता है। इसलिए यह प्रत्येक उस व्यक्ति की अनिवार्य आवश्यकता है जो दीर्घायु, शक्ति, उत्साह, स्फूर्ति एवं ओज से पूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहता हो।

स्वास्थ्य और दीर्घायु

 

आयु में वृद्धि के साथ शरीर में क्षीणता आना अवश्यम्भावी है। यदि इस क्षीणता को रोका जा सके, तो वृद्धावस्था के कारण आने वाली दुर्बलता से बचा जा सकता है। यह कार्य निम्न क्रियाओं को दैनिक दिनचर्या में संयुक्त करके किया जा सकता है :

 

विपरीत करणी प्रातः-सायं दोनों समय एक-एक घण्टे

 

सरस्वती चालन प्रातः-सायं दोनों समय ४५-४५ मिनट

 

सरस्वती चालन के तत्काल पश्चात् भस्त्रिका करना चाहिए।

 

और निम्न क्रमानुसार बन्ध त्रय का अभ्यास किया जाये :

 

प्रथम-सरस्वती चालन, द्वितीय-जालन्धर बन्ध, तृतीय- उड्डियान बन्ध, चतुर्थ-मूल बन्ध

यदि उपरोक्त के साथ केवल कुम्भक संयुक्त कर दिया जाये, तो वृद्धावस्था को रोका जा सकता है।

स्वर योग

 

स्वर योग प्राचीन हिन्दू विज्ञान तथा कला है जिसने इस शरीर में जीवन-तत्त्व, प्राण की गतिविधि और जीवन के कार्य-सम्पादन का पूर्ण विश्लेषण किया है। यह विभिन्न नाड़ियों के बारे में व्यवहत है जिनके साथ यह प्राण इस शरीर में स्पन्दित होता है, इसे जीवन देता है तथा यह उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु को स्थिर करने हेतु प्राण के प्रवाह को नियमित करने हेतु साधनों का निर्देश देता है। यह विज्ञान या स्वर योग प्राणायाम-साधना की अपेक्षा अधिक सरल और सरलता से समझा जा सकता है। यदि प्राणायाम से स्वर योग की तुलना की जाये, तो प्राणायाम स्वर योग की बाहरी सीमा मात्र है। स्वर योग में हमें रोग तथा मृत्यु को रोकने की विभिन्न प्रभावकारी विधियाँ प्राप्त होती हैं। स्वर योग की साधना पूर्ण योगी (स्वर योग में प्रवीण) के प्रत्यक्ष निर्देशन में की जानी चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय

स्वर एवं योग

स्वर

 

स्वर अर्थात् वायु जो नासिका-रन्ध्रों से श्वास द्वारा तथा घुरटि द्वारा ली जाती है। यह शब्द मूल स्वर शब्द से लिया गया है। स्वर का अर्थ है-'आवाज' तथा इसका दूसरा अर्थ है- 'श्वास लेना'

 

श्वास दोनों नासा-रन्ध्रों से एक-समान नहीं आती। जब एक नासा-रन्ध्र से श्वास बन्द हो जाती है, तो दूसरे से प्रारम्भ हो जाती है। किसी भी नासा-रन्ध्र से श्वास के प्रारम्भ होने को 'स्वरोदय' कहते हैं।

 

प्राचीन ऋषियों ने दोनों नासा-रन्ध्रों में से प्रत्येक में श्वास के प्रारम्भ होने (स्वरोदय) तथा बन्द होने पर कुछ विशेष बातों को देखा, जो उनकी विभिन्न गतिविधियों पर प्रभाव ही नहीं डालती, वरन् उन पर शासन करती थीं। इस शरीर में जीवन की उपस्थिति, विभिन्न आन्तरिक अंगों के कार्य, स्वास्थ्य की पूर्णता अथवा रोगों का प्राकट्य, मन का सन्तुलन अथवा विचलन-सभी किसी भी एक नासा-रन्ध्र में श्वास के प्रवाह पर निर्भर करते हैं।

 

इन ऋषियों ने श्वास की गति के विश्लेषणात्मक अध्ययन के अपने अनुभवों को लिपिबद्ध किया तथा इसे विभिन्न नामों जैसे स्वरोदय, स्वर विज्ञान, स्वर शास्त्र आदि से सम्बोधित किया।

 

स्वर या श्वास सभी प्राणियों का प्रथम कारण है; क्योंकि बिना इसके कोई कार्य सम्भव नहीं है। स्वर इस शरीर में बिलकुल शुद्ध होते हैं; लेकिन ये उन नाड़ियों पर निर्भर करते हैं, जिनमें इनका प्रवाह होता है। लिंग शरीर ( स्वर तथा नाड़ियों द्वारा निर्मित है।

 

स्वर मात्र एक है। यह पहले स्वयं को तीन भागों में विभाजित करता है तथा यह पाँच गुणा काम करता है और इस प्रकार यह अपनी पूर्णता को खोये बिना विभिन्न पच्चीस प्रकारों में प्रकट होता है।

 

स्वर ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है। स्वर योग से गुप्त ज्ञान तथा स्वर योग से अधिक उपयोगी सम्पत्ति कोई हो ही नहीं सकती। स्वर में ही सारे वेद और शास्त्र हैं। यह रहस्यों का रहस्य गुप्त से भी गुप्त, ब्रह्म अथवा परमात्मा को प्रकट करने वाला तथा परम शान्ति और परमानन्द को देने वाला है।

 

अन्तःश्वसन और उच्छ्वसन की प्रकृति का ज्ञान होने से, स्वर योग को व्यावहारिक रूप से और सैद्धान्तिक रूप से अच्छी तरह समझने पर वर्तमान काल, भूत काल और भविष्य काल का ज्ञान हो जाता है, चमत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं तथा काल पर नियन्त्रण प्राप्त होता है। स्वर योग की शक्ति से मनुष्य मृत्यु से परे हो जाता है और उसे इच्छा-मृत्यु अथवा इस शरीर को अत्यधिक दीर्घ काल तक बनाये रखने की शक्ति प्राप्त होती है।

योग

 

योग शब्द की व्युत्पत्ति मूल युज शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है- योग करना या जोड़ना। इसके उच्च अर्थ में इसका मतलब है-जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ना, अंश का सम्पूर्ण से एक होना, मनुष्य का ब्रह्माण्ड में विलय। यह एक उत्कृष्ट विज्ञान है जो विभिन्न लोकों, भौतिक, तारालोक, मानसिक बुद्धि, अन्तर्ज्ञान आदि से सम्बद्ध है, और यह सभी में समन्वय लाता है।

 

कई लोग ऐसा सोचते हैं कि योग व्यक्ति के सामान्य जीवन से भिन्न कुछ और है अथवा यह उनसे सम्बन्धित है जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार अथवा ईश्वर-साक्षात्कार हेतु सांसारिक जीवन को त्याग दिया है। लेकिन ऐसा नहीं समझना चाहिए।

 

योगाभ्यास वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता है। कोई भी वह विज्ञान जो व्यक्ति की आन्तरिक शक्तियों के समन्वयपूर्ण विकास हेतु प्रेरित करे, जो जीवन की पूर्णता हेतु प्रेरित करे और जो व्यक्ति को स्वास्थ्य, दीर्घायु, आनन्द, चहुँओर सफलता, मानसिक सन्तुलन, शान्ति तथा अन्तिम रूप से अमरत्व प्रदान करे, वह योग कहलाता है।

 

सन्तुलित विकास, चहुँओर सफलता, स्वास्थ्य एवं जीवन की पूर्णता योग से प्राप्त होने वाले मुख्य लाभ हैं।

 

किसी भी योग की साधना नियमित तथा क्रमबद्ध रूप से की जानी चाहिए तथा इसे सांसारिक प्रलोभनों से पूर्ण विरक्ति के साथ करना चाहिए।

 

योग कई प्रकार के हैं और ये व्यक्ति के व्यक्तित्व के भिन्न-भिन्न पहलुओं के विकास में सहायता करते हैं। हठ योग और प्राणायाम स्वास्थ्य और शरीर की पूर्णता की प्राप्ति हेतु सहायक होते हैं। लेकिन स्वर योग जीवन के मूल रहस्यों की गहराई में जाता है और व्यक्ति को प्रत्येक कार्य में पथ-प्रदर्शन करता है तथा कई मामलों में पूर्व से सावधान भी करता है।

 

जीवन में सफलता, सम्पत्ति का संग्रह तथा मानसिक शान्ति की प्राप्ति व्यक्ति के स्वास्थ्य और कर्मों पर निर्भर है। स्वर योग इन दोनों को ही नियन्त्रित करता है। यह भविष्य में होने वाले रोगों से सावधान करता है तथा व्यक्ति के भीतर छिपे रोगों की औषधि भी बतलाता है। यह नये कार्य के सम्पादन हेतु सही समय भी बताता है जिससे उस कार्य में अधिकतम सफलता प्राप्त की जा सके। अतः स्वर योग स्वास्थ्य एवं दीर्घायुष्य, सफलता और सम्पत्ति, अनन्त शान्ति एवं अमरत्व का रहस्यमय विज्ञान है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय

प्राण और इसके विभाग

 

प्राण वह नाम है, जो विश्व के मूल आधार को प्रदान किया गया है, जो कि सभी क्रियाकलापों और ऊर्जा का अवलम्बन है। हम जो वायु श्वास के साथ भीतर लेते हैं, प्राण इस वायु के साथ भीतर भ्रमण करता है; लेकिन तो यह वायु है और ही वह इसका कोई घटक है।

 

प्रत्येक बार भीतर ली गयी श्वास के साथ मनुष्य अपने संस्थान में प्रचुर मात्रा में प्राण खींचता है। मात्र चूँकि इसमें प्राणवायु होती है, इसलिए यह जीवन को अवलम्बन प्रदान नहीं कर सकती, ही इसके द्वारा यह स्थूल भौतिक शरीर को बनाये रख सकती है। इन कार्यों के लिए इसमें प्रचुर मात्रा में प्राण होना चाहिए। यदि वायु में उपस्थित प्राणवायु इस स्थूल भौतिक शरीर को बनाये रखने में सहायता और अवलम्बन प्रदान करती है, तो वह इसमें उपस्थित प्राण के कारण। वह प्राण जो वैज्ञानिकों की पकड़ से बाहर है, वह सूक्ष्म शरीर तथा ज्ञानेन्द्रियों को पोषण देता है। लिंग शरीर डाक्टरों के परीक्षणों से बाहर है।

 

रोग का मूल अनिवार्यतः सूक्ष्म शरीर में होता है। इसी कारण चिकित्सक इसकी पहचान करने में असमर्थ रहते हैं। लेकिन प्राण सूक्ष्म चक्रों में गहरे जा सकते हैं और रोग का इस प्रकार उपचार करके स्वास्थ्य के निम्न स्तर को उठा कर उसके वास्तविक स्तर पर ले आते हैं।

 

प्राण भौतिक शरीर के नाड़ी-संस्थान का पोषण करते हैं और मन द्वारा इसका उपयोग किया जाता है तथा संकल्प शक्ति और विचार आदि द्वारा इसका उपभोग किया जाता है। यहाँ तक कि हमारी शारीरिक क्रियाओं, मांसपेशियों तथा अंगों के संचालन हेतु नाड़ी शक्ति, जो कि प्राण ही है, के कुछ अंश की आवश्यकता होती है। इस तथ्य को दृष्टि में रखते हुए कि हम ब्रह्माण्ड से अपने प्राण की आपूर्ति श्वसन-संस्थान द्वारा करते हैं- हमें यह जानना चाहिए कि हम अपने श्वसन-संस्थान को किस प्रकार स्वस्थ रखें तथा यह कि किस प्रकार प्राण हमारे कार्यों में सहायता करता है और हमारे शरीर में किस प्रकार परिभ्रमण करता है।

नाड़ियाँ

 

नाड़ी प्राण हेतु वाहन है। जिस प्रकार रक्त का संचरण छोटी तथा बड़ी रक्त-वाहिनियों में होता है, उसी प्रकार नाड़ियों द्वारा प्राण हमारे शरीर के विभिन्न भागों में ले जाया जाता है।

 

मानव-शरीर में ७२,००० नाड़ियाँ हैं। वे सूक्ष्म शरीर से सम्बन्धित हैं तथा हम उन्हें भौतिक नेत्रों से नहीं देख सकते। तो भी हम सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि द्वारा इन नाड़ियों में प्राण के आवागमन का अनुभव कर सकते हैं। ये आन्तरिक अथवा सूक्ष्म शरीर में व्याप्त हैं और प्राण के संचरण पर निर्भर हैं। उनका उद्भव नाभि-क्षेत्र कन्द-स्थान से होता है।

 

मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी, सर्प शक्ति के स्थान पर एक नाड़ी है जो सर्प की भाँति कुण्डली मारे हुए है। यहाँ से २० नाड़ियों का उद्भव होता है। इनमें से दस ऊपर की ओर जाती हैं और दस नीचे की ओर।

 

यहाँ एक चक्र है जो दस नाड़ियों से निर्मित है। ये हैं-इडा, पिंगला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, अलम्बुषा, कुहू, शाकिनी तथा शारदा।

 

उपरोक्त दस में से इडा, पिंगला तथा सुषुम्ना अपने भीतर मरुत अथवा जीवन की श्वास ले कर जाती हैं।

 

सुषुम्ना का पथ काल का पथ कहलाता है और यह ब्रह्मरन्ध्र को जाता है। ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् वह द्वार जो चिदाकाश अथवा ब्रह्मलोक, परम चेतना जो अद्वैत है, को जाता है।

 

पूषा तथा अलम्बुषा नेत्र से, गान्धारी तथा हस्तिजिह्वा कर्ण से, शाकिनी पीनियल ग्रन्थि के ऊपर स्थित छिद्र से, कुहू गुदा से तथा शारदा मुख से सम्बन्धित है।

श्वास के विभाग

 

हम श्वास लेने के द्वारा वायु के साथ जिस प्राण अथवा जीवन शक्ति को पुनः दस विभागों में बाँटा गया है, लेकिन इनमें विभाजित करने के बाद भी उसकी पूर्णता बनी रहती है। ये विभाग जीव के क्रियाकलापों के अनुसार किये गये हैं जिनका संचालन जीव प्राण के द्वारा संचालित करता है। ये हैं-प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनंजय

 

प्राण इनमें सर्वोच्च है और यह निम्न अंगों में कार्य करता है-मुख सम्बन्धी क्षेत्र, नासा-रन्ध्रों, नाभि तथा हृदय-कमल। यह ध्वनि उच्चारण, श्वास, श्वास की अल्पता तथा कफ हेतु कारण है।

 

अपान गुदा, शिश्न तथा उसके आसपास कार्य करता है। यह जाँघों, अण्डकोष तथा नाभि-गुहा के नीचे के भाग में भी विचरण करता है। यह जाँघों, अण्डकोष में तथा नाभि-गुहा के नीचे स्पन्दित होती है। यह शरीर के भागों तथा ऊपरी अंगों को सक्रिय करता है तथा मूल-मूत्र के विसर्जन तथा बाह्य निष्कासन में सहायता करता है।

जो कार्य प्राण और अपान अपने सम्बन्धित क्षेत्रों में सम्पादित नहीं करते, उनका नियन्त्रण व्यान करता है। यह नेत्रों, कर्ण, कमर, नासा-रन्ध्रों तथा गुप्तांग-क्षेत्र में विचरण करता है।

 

समान सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है तथा यह समस्त ७२,००० नाड़ियों में परिभ्रमण करता है और अपने साथ जठराग्नि ले कर जाता है। यह मनुष्य द्वारा ग्रहण किये गये भोजन के पाचन में तथा लिये गये सम्पूर्ण भोजन के उपयोग में सहायता करता है। उदान का कार्यक्षेत्र सभी जोड़ एवं गला है। यह विभिन्न अवयवों को कार्य करने में सहायता करता है।

 

नाग वाणी पर नियन्त्रण करता है, जब कि कूर्म पलक झपकने हेतु उत्तरदायी है। कृकल भूख और प्यास का कारण है। देवदत्त विस्तार जैसे-जंभाई आदि से सम्बन्धित है। धनंजय कान बन्द करने पर भी जो ध्वनि सुनायी देती है, उसका कारण है।

शरीर की स्वच्छता

ऊपर हमने देखा कि प्राण के हमारे प्रत्येक क्रियाकलाप से जुड़े होने के गुण के कारण प्राण का उचित प्रकार से कार्य करना कितना महत्त्वपूर्ण है। इसलिए हमें इस भौतिक तथा सूक्ष्म शरीर को सदैव स्वच्छ रखना चाहिए तथा नाड़ियों में प्राण के प्रवाह में सहायता करनी चाहिए, अन्यथा इनसे सम्बन्धित कार्यों में बाधा पड़ेगी और शरीर रोगी हो जायेगा।

 

प्राण की सहायता से शरीर और मन को स्वच्छ रखने की कला तीन अवस्थाओं-पूरक, रेचक और कुम्भक से निर्मित है।

 

प्रारम्भ करते समय इडा नाड़ी (चन्द्र नाड़ी, बायाँ नासा-रन्ध्र) से श्वास भीतर लें और पिंगला नाड़ी (सूर्य नाड़ी अथवा दाहिना नासा-रन्ध्र) से श्वास बाहर छोड़ें। सर्वप्रथम यह अभ्यास दिन में तीन बार-प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकाल एक माह तक करें। इसे २० बार से धीरे-धीरे १०० बार तक दिन-प्रतिदिन बढ़ायें प्रत्येक बार १०० तक हो जाने पर आगे बढ़ना है। एक माह तक मात्र यही अभ्यास करना है।

 

पद्मासन में बैठ कर उड्डियान बन्ध लगायें। सहज रूप से श्वास बाहर निकाल दें। किसी प्रकार की आवाज करें और ही बलपूर्वक करें। श्वास को बाहर निकालते समय धीरे-धीरे बिना झटके के रेचक करें और लक्ष्य पाँचवाँ निलय अथवा सोलहवीं कला को रखें। यह रेचक है। यह सभी पापों को भस्मीभूत करता और आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करता है।

 

पूरक का अर्थ है-भरना। पूरक करते समय श्वास भीतर लेते हुए सम्पूर्ण शरीर को जीवन अथवा जीवन शक्ति से भरना चाहिए। यह ध्यान रखें कि इस क्रिया में शरीर का प्रत्येक अंग प्राण अथवा जीवन शक्ति से परिपूर्ण हो जाये। पूरक भी बिना शीघ्रता के, बिना झटके के किया जाना चाहिए।

 

पूरक तब तक किया जाना चाहिए, जब तक हमें सिर के शीर्ष में इसका अनुभव होने लगे। यह पौरुष, साहस, शक्ति, वृद्धि, पूर्णता तथा व्यक्तित्व में दिव्य कान्ति प्रदान करता है।

 

इसके पश्चात् तीसरी क्रिया है-ली गयी श्वास को रोक कर रखना। शरीर को हिलाये-डुलाये बिना श्वास को रोकने का प्रयत्न करें। इसे कुम्भक कहते हैं। यदि आपको कष्ट होने लगे, तो बिना किसी भय अथवा चिन्ता के श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। श्वास भीतर रोकने में अपनी संकल्प शक्ति का प्रयोग करें। कुम्भक के समय निरन्तर श्वास भीतर ले कर बल-प्रयोग करें। कुम्भक से शरीर के भीतर उपस्थित समस्त विष जल जाते हैं, भोजन का पाचन होता है तथा यह सभी दुर्गुणों का नाश करता है।

 

कुम्भक का अभ्यास दूसरे माह से प्रारम्भ करना चाहिए, इससे पूर्व नहीं। सम्पूर्ण प्रथम माह श्वास भीतर लेने (पूरक) और बाहर छोड़ने (रेचक) में ही लगाया जाना चाहिए। इससे नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं और कुम्भक हेतु तैयार हो जाती हैं।

प्राणायाम हेतु नियम

 

जो प्राणायाम का अभ्यास करते हैं, उन्हें अपने गुरु से प्राप्त निर्देशों के साथ-साथ निम्न नियमों का पालन करना चाहिए :

 

.            सात्त्विक आहार लें जिसमें मिर्च, नमक, खट्टे तथा तीखे पदार्थ हों।

 

.            शराब, मांस, तम्बाकू आदि से परहेज रखें तथा ब्रह्मचर्य का पालन करें।

 

.            कभी भी ठण्ढे पानी से तथा नदी अथवा तालाब में स्नान करें। गुनगुने पानी से स्नान करें। चूँकि

प्राणायाम से आन्तरिक रूप से अत्यधिक उष्णता उत्पन्न होती है; इसलिए ठण्डे पानी से स्नान करने पर सर्दी-खाँसी हो सकती है।

 

.            कुम्भक का अभ्यास सामान्यतया प्रातःकाल शीघ्र एवं सन्ध्या को करना चाहिए, जब वातावरण

सामान्यतया शीतल होता है।

 

.            यह अधिक अच्छा होगा, यदि प्राणायाम का अभ्यास नदी के किनारे, बगीचे में अथवा योगियों द्वारा

बताये गये एकान्त स्थान में किया जाये।

 

.            प्राणायाम का अभ्यास तब करना चाहिए, जब शुद्ध और ताजी वायु बह रही हो तथा यह शहर के

प्रदूषण से मुक्त हो, अन्यथा आप अपने संस्थान में वायु में उपस्थित अशुद्धियों को लेंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय

सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि

 

पिछले अध्याय में हमने श्वास तथा नाड़ियों के विभिन्न विभागों को देखा। नाभि से ऊपर की ओर जाने वाली दस नाड़ियों में से तीन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं-इडा, पिंगला तथा सुषुम्ना। दीर्घायु और शान्ति से पूर्ण स्वस्थ जीवन जीना, जो हमें अमरत्व प्रदान करता है, वह इन तीनों नाड़ियों में श्वास के प्रवाह की प्रकृति तथा जिस लय और सहजता से श्वास प्रवाहित होती है, उस पर निर्भर करता है।

 

इडा अथवा चन्द्र नाड़ी बायें नासा-रन्ध्र में श्वास के प्रवाह से पहचानी जाती है तथा पिंगला अथवा सूर्य नाड़ी दाहिने नासा-रन्ध्र में श्वास के प्रवाह से पहचानी जाती है।

 

ये दोनों नाड़ियाँ बारी-बारी से कार्य करती हैं। एक नाड़ी से दूसरी नाड़ी में प्रवाह के परिवर्तन के समय को विषवत् कहते हैं। परिवर्तन का यह समय बड़ा ही अशुभ होता है। विषवत् के समय कोई भी अच्छा अथवा बुरा कार्य नहीं करना चाहिए।

 

प्रवाह-परिवर्तन के समय यदि नयी नाड़ी में कोई अवरोध होता है, तो स्वाभाविक रूप से यह अवरोधक पदार्थ बलपूर्वक बाहर आता है और हलके अथवा जोर से छींक होती है और वह नासा-रन्ध्र स्वच्छ हो जाता है। इसी कारण छींक को अशुभ मानते हैं; क्योंकि यह विषवत् की ओर संकेत करती है।

 

दोनों नाड़ियों में से प्रत्येक बारी-बारी से एक-एक घण्टा अथवा ढाई घटिका तक कार्य करती है। यह क्रम सूर्योदय से प्रारम्भ होता है।

 

इडा तथा पिंगला संवेदना की कड़ियाँ नहीं हैं। भौतिक शरीर में ये प्रायोगिक रूप से बायीं और दायीं संवेदनात्मक श्रृंखलाओं के सदृश हैं।

 

इडा दाहिने अण्डकोष से तथा पिंगला बायें अण्डकोष से प्रारम्भ होती है। ये मूलाधार में जा कर सुषुम्ना में मिलती हैं और एक ग्रन्थि बनाती हैं। इन तीनों नाड़ियों के मिलन-स्थल को मुक्तात्रिवेणी कहा जाता है। गंगा, यमुना और सरस्वती क्रमशः पिंगला, इडा तथा सुषुम्ना में मिलती हैं। इनके मिलन-स्थल को ब्रह्म ग्रन्थि कहा जाता है। ये अनाहत चक्र तथा आज्ञा चक्र में पुनः मिलती हैं।

सुषुम्ना

 

जिन तीन मुख्य नाड़ियों के बारे में हम विचार कर रहे हैं, उनमें से सुषुम्ना सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। जब श्वास का प्रवाह प्रत्येक श्वास के पश्चात् दोनों नासा-रन्ध्रों में शीघ्र परिवर्तित हो, तो उसे सुषुम्ना कहते हैं। यह सभी कार्यों के लिए अशुभ होती है। प्रवाह की इस स्थिति को विषवत् अर्थात् सभी कर्मों को नष्ट करने वाली कहते हैं।

 

यह मन के विचलन अथवा विक्षेप, बेचैनी, शीघ्रता, अस्थिरता, दुविधा तथा शरीर की दोषपूर्ण स्थिति को बताती है। इस स्थिति में व्यक्ति को सलाह दी जाती है कि वह विश्राम करे और मन का सन्तुलन प्राप्त करे। इस समय कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए; क्योंकि यह इस बात का संकेत है कि मन अपने लक्ष्य पर स्थिर अथवा दृढ़ नहीं है तथा मन में संशय अथवा दुविधा है। जल्दबाजी में किये गये कार्य पर सदैव बाद में पछताना पड़ता है।

 

एक दूसरी प्रकार की सुषुम्ना भी है जिसमें श्वास का प्रवाह दोनों नासा-रन्ध्रों से निरन्तर होता रहता है। इसे एक और तरीके से भी पहचाना जाता है। इसमें बिना झटके के एक-समान प्रवाह होता रहता है और मन की एकाग्रता षट् चक्रों में से किसी एक पर केन्द्रित होती है।

 

सुषुम्ना के समय ईश्वर की धारणा और ध्यान करने का बहुत ही अच्छा सुअवसर है; क्योंकि इस समय मन स्वाभाविक रूप से शान्त और स्थिर होता है। इस समय कोई अन्य कार्य नहीं करना चाहिए।

 

सुषुम्ना में श्वास के प्रवाह को निरन्तर बनाये रखना अत्यन्त कठिन है; इसलिए यदि थोड़े समय के लिए भी सुषुम्ना का प्रवाह हो, तो उसका सदुपयोग अच्छे कार्य हेतु किया जाना चाहिए।

नाड़ियों के लक्षण

 

इडा शीतल है और पिंगला उष्ण है। पिंगला भोजन का पाचन करती है। इडा पीले रंग की शक्ति रूपा है। पिंगला लाल रंग की रुद्र रूपा है। इडा और पिंगला काल को बताती हैं, जब कि सुषुम्ना काल का भक्षण करती है। इडा में श्वास अमृत की भाँति होती है। यह संसार की महान् पोषक है। शुक्ल पक्ष में इडा शक्तिशाली होती है तथा कृष्ण पक्ष में पिंगला। दायें भाग में सदैव संसार का जन्म होता है।

 

चन्द्र नाड़ी को स्त्रीलिंग की तरह माना जाता है। यह काले रंग तथा राशि-चक्र के स्थिर चिह्नों से संयुक्त है। सूर्य नाड़ी को पुल्लिंग की तरह माना जाता है तथा यह श्वेत रंग और राशि-चक्र के चलायमान चिह्नों से संयुक्त है। अग्नि नाड़ी (सुषुम्ना) को नपुंसक माना जाता है तथा यह राशि-चक्र के सामान्य प्रतीकों से संयुक्त है।

 

चन्द्र नाड़ी का प्रभाव पश्चिमी तथा दक्षिणी भागों पर होता है। सूर्य नाड़ी पूर्वी और उत्तरी भागों पर प्रभाव डालती है।

 

चन्द्र अथवा इडा तृतीय निलय के ठीक ऊपर है तथा सूर्य अथवा पिंगला सूर्य तन्त्र के ठीक नीचे है।

 

जब प्राण स्वतः सुषुम्ना में प्रवाहित होते हैं, तो व्यक्ति बाह्य जगत् को भूल जाता है। यह समाधि हेतु तैयारी है और यह सर्वश्रेष्ठ है।

काल पर विजय

 

वह मनुष्य जो तीनों नाड़ियों पर नियन्त्रण करने में प्रवीण है तथा जो सुषुम्ना में प्राण को स्थिर कर सकता है, वह मन को शुद्ध कर लेता है और ऐसा मनुष्य ही काल पर विजय प्राप्त कर लेता है।

 

वह मनुष्य जिसने इस प्रकार प्राण को सुषुम्ना में स्थिर कर लिया हो, उसे इसे ब्रह्मरन्ध्र की ओर ले जाने का प्रयत्न करना चाहिए। तभी वह समाधि अथवा परम चेतनावस्था का अनुभव कर सकेगा।

 

योगी को अपनी मृत्यु के समय का ज्ञान होता है। वह इस समय अपने प्राणों को सुषुम्ना में ले जाता है और यहाँ से उन्हें ब्रह्मरन्ध्र में ले जाता है तथा काल या मृत्यु पर विजय पा लेता है।

 

मृत्यु अथवा समय को काल कहते हैं। बहुत-सी घटनाएँ काल से जुड़ी हैं। इसलिए इसे 'कालयति इति काल:' कहते हैं। जन्म तथा मृत्यु काल में ही हैं। समय का अतिक्रमण करना अर्थात् अमरत्व-प्राप्ति हेतु जन्म तथा मृत्यु से परे जाना।

 

सूर्य तथा चन्द्र-ये दोनों नाड़ियाँ समस्त प्राणियों के लिए दिन तथा रात्रि का निर्धारण करती हैं। जब वे कार्य करती हैं, तो दिन-रात एक के बाद एक करके आते-जाते हैं और इस प्रकार जीवन समाप्त हो जाता है। प्रत्येक बार जब आप श्वास बाहर छोड़ते हैं, आप अंगुल श्वास खो देते हैं; क्योंकि श्वास भीतर लेते समय आप अंगुल श्वास भीतर लेते हैं, जब कि छोड़ते समय १२ अंगुल श्वास बाहर निकालते हैं। नश्वरों में मुख्यतः चन्द्र नाड़ी कार्य करती है। चन्द्र नाड़ी के प्रवाह पर नियन्त्रण करके व्यक्ति अधिक जी सकता है। दोनों ही नाड़ियों सूर्य, चन्द्र पिंगला और इडा के प्रवाह को रोकने के द्वारा व्यक्ति बहुत अधिक काल तक जीवित रह सकता है।

 

सुषुम्ना काल का भक्षण करती है। यह महान् यौगिक रहस्य है। श्वास को सुषुम्ना में रोक कर व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य का उपभोग करता है और

 

अपने जीवन-काल में अनन्त काल तक की वृद्धि कर लेता है। श्वास को सुषुम्ना से शीर्ष में ले जाने के द्वारा व्यक्ति अमरत्व को प्राप्त करता है और अमृत का पान करता है।

 

जब आप मृत्यु से बचना चाहते हों, तो अपनी श्वास को सुषुम्ना में रोके रहें। मृत्यु आपसे दूर चली जायेगी।

 

इस प्रकार आप मृत्यु से बच सकते हैं और अच्छे स्वास्थ्य का उपभोग कर सकते हैं तथा अपने जीवन में अनन्त काल की वृद्धि कर सकते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय

स्वर विज्ञान

 

हमारे स्वस्थ जीवन एवं गतिविधि हेतु इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों में श्वास का प्रवाह विशेष महत्त्व रखता है। इस अध्याय में हम उपरोक्त नाड़ियों में श्वास के प्रवाह से सम्बन्धित कुछ और तथ्यों के बारे में पढ़ेंगे।

स्वर (प्रवाह) की अवधि

 

इडा और पिंगला-दोनों में से प्रत्येक सूर्योदय से प्रारम्भ हो कर एक घण्टे (ढाई घटिका) की अवधि तक चलती है। इस प्रकार एक दिन (२४ घण्टे) में श्वास १२ बार इडा से प्रवाहित होती है और १२ बार पिंगला से। यह श्वास और नाड़ियों की सामान्य क्रिया और साथ ही अच्छे स्वास्थ्य को भी इंगित करती है।

 

सामान्यतया जब व्यक्ति शारीरिक अथवा मानसिक कार्यों में व्यस्त रहता है, तो सुषुम्ना नहीं चलती है। सुषुम्ना मात्र तभी चलती है, जब मन एकाग्र होता है और अपनी गुप्त वृत्तियों द्वारा नियन्त्रित होता है। यदि इसके विपरीत प्रकार की सुषुम्ना (झटके के साथ तेजी से श्वास के प्रवाह में परिवर्तन) उस समय चले, जब व्यक्ति का मन ध्यान करने की स्थिति में हो तथा वह जाग्रत अवस्था में हो, तो यह श्वास के प्राकृतिक प्रवाह में किसी बाधा का सूचक है।

स्वस्थ प्रवाह (स्वर)

 

इडा और पिंगला में श्वास के प्रवाह को नियन्त्रित करने वाले नियमों के साथ-साथ चन्द्र दिवस भी नाड़ियों के कार्य को प्रभावित करते हैं; लेकिन इनसे उनकी अवधि में परिवर्तन नहीं होता।

 

इससे यह समझ में आता है कि चन्द्रमा मानव-मन पर बड़ा ही शक्तिशाली प्रभाव डालता है। पुरुषसूक्त में लिखा है: "चन्द्रमा मनसो जातः" -चन्द्रमा मन से (विराट् पुरुष के मन से) जन्मा है। ब्रह्माण्ड में चन्द्रमा विराट् पुरुष के मन से नियन्त्रित है। जीवात्मा का मन विराट् पुरुष के मन का सूक्ष्म अंश है; इसलिए चन्द्रमा का मन के साथ सम्बन्ध है। इस कारण जीवात्मा स्वयं को चन्द्रमा द्वारा नियन्त्रित अनुभव करता है।

 

जब चन्द्रमा बढ़ता और घटता है, तो इसका मन से सम्बन्ध भी घटता-बढ़ता रहता है और इस प्रकार मन में एक संवेदनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। इसी कारण श्वास के प्रवाह और चन्द्र दिवस के मध्य सम्बन्ध है।

 

शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन इडा या चन्द्र नाड़ी या बायाँ स्वर (बायें नासा-रन्ध्र से श्वास का प्रवाह) प्रारम्भ होता है और यह प्रत्येक घण्टे पश्चात् इडा से पिंगला (दाहिना स्वर) और पिंगला से इडा में बदलता रहता है। यह क्रम तीन दिनों तक निरन्तर इसी प्रकार चलता रहता है। चौथे दिन (शुक्ल पक्ष की चतुर्थी) सूर्योदय के समय पिंगला नाड़ी (दाहिना स्वर) या सूर्य नाड़ी से श्वास का प्रवाह प्रारम्भ होता है और ऊपर बताये अनुसार इसमें क्रमशः परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार प्रत्येक पक्ष के चौथे दिन प्रातःकाल स्वर में परिवर्तन होता है। यदि किसी दिन प्रातःकाल इडा नाड़ी अथवा बायाँ स्वर चले, तो इसके चौथे दिन आप देखेंगे कि प्रात:काल सूर्योदय के समय दायाँ स्वर अथवा पिंगला नाड़ी चलेगी।

 

कृष्ण पक्ष में स्थिति इसके ठीक विपरीत होगी। कृष्ण पक्ष की प्रथमा को सूर्योदय के समय दायाँ स्वर अथवा पिंगला नाड़ी चलेगी तथा प्रत्येक घण्टे से यह ऊपर बताये अनुसार बदलता रहता है और चौथे दिन से सूर्योदय के समय इडा नाड़ी अथवा बायाँ स्वर चलता है।

 

संक्षेप में इडा और पिंगला का प्रवाह निम्नानुसार होता है :

 

शुक्ल पक्ष में इडा निम्न तिथियों को सूर्योदय के समय चलती है- प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमा।

 

कृष्ण पक्ष में इडा निम्न तिथियों को सूर्योदय के समय चलती है- चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी तथा द्वादशी।

 

पिंगला निम्न दिनों में सूर्योदय के समय से प्रारम्भ होती है :

 

कृष्ण पक्ष-प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और अमावास्या

 

शुल्क पक्ष-चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी और द्वादशी।

 

उपरोक्त प्रकार से यदि नाड़ी का प्रवाह होता है, तो यह स्वस्थ मनुष्य के श्वास के स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रवाह को इंगित करता है। यदि स्थिति इसके विपरीत है, तो यह शरीर में किसी दोष की ओर संकेत करता है। ये दोष अथवा रोग विकसित हों और गम्भीर रूप लें, इससे पहले ही इन्हें श्वास का प्रवाह (स्वर) बदल कर ठीक किया जा सकता है। यह कार्य बिना औषधियों की सहायता के प्राण के सहयोग से किया जाता है।

स्वर का महत्त्व

 

सूर्योदय के समय इडा नाड़ी अथवा बायाँ स्वर चलना तथा सूर्यास्त के समय पिंगला नाड़ी अथवा दायाँ स्वर चलना शुभ है। यदि स्वर इसके विपरीत चले, तो अस्वस्थता और हानिकारक परिणाम होते हैं।

 

यदि सारे दिन इडा चले और सारी रात पिंगला, तो यह मनुष्य को महान् योगी बनाती है।

 

यदि शुक्ल पक्ष में सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार को चन्द्र नाड़ी अथवा बायाँ स्वर चले, तो सभी कार्यों में सफलता मिलती है।

 

इसी प्रकार कृष्ण पक्ष में रविवार, मंगलवार और शनिवार को सूर्य नाड़ी अथवा दायाँ स्वर चल रहा हो, तो यह चतुर्दिक् सफलता का द्योतक है।

 

निम्न स्वर भी अच्छे हैं जैसे प्रात:काल एवं मध्याह्न में इडा (बायाँ स्वर) तथा सन्ध्याकाल में पिंगला नाड़ी (दायाँ स्वर) का चलना

 

पुनः इडा और पिंगला में श्वास का प्रवाह पूर्व दिशा में उदित होने वाली राशियों से सम्बन्धित है। जब वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर, मीन राशियाँ पूर्व में उदित हों, तो इडा (बायाँ स्वर) चलना श्रेष्ठ है और जब शेष छह राशियाँ पूर्व में उदित हों, तो पिंगला (दायाँ स्वर) चलना श्रेष्ठ है।

स्वर-परिवर्तन

ऊपर शुभ तथा अशुभ स्वरों के बारे में बताया गया है, जिससे कि व्यक्ति उचित स्वर को चला कर अपने सभी कामों में सफलता प्राप्त कर सके। इस हेतु स्वर-परिवर्तन की विभिन्न विधियाँ जानना आवश्यक है। इनमें से कुछ निम्न हैं :

 

.            जिस नासा-रन्ध्र में श्वास का प्रवाह बन्द करना हो, उसे नरम रुई की गोली से बन्द कर दें। जैसे यदि

आपका बायाँ स्वर चल रहा हो और आप दायाँ स्वर चलाना चाहते हैं, तो आप बायें नासा-रन्ध्र को रुई की गोली डाल कर उसे बन्द कर दें। थोड़ी देर बाद आपका स्वर बदल जायेगा। दायें स्वर के लिए इसके विपरीत करें।

 

.            जिस नासा-रन्ध्र में श्वास का प्रवाह हो रहो हो, उसे अँगूठे से बन्द कर दें। कुछ देर पश्चात् श्वास का

प्रवाह अन्य नासा-रन्ध्र से होने लगेगा।

 

.            जब इडा (बायाँ स्वर) प्रवाहित हो रहा हो, सुखासन अथवा पद्मासन में बैठ कर बायीं हथेली को भूमि पर

रखें और बायीं कोहनी को पसलियों के ठीक नीचे बायीं ओर हलके दबाव से दबायें। इससे श्वास का प्रवाह बायें नासा-रन्ध्र से दाहिने नासा-रन्ध्र में होने लगेगा। ऐसा ही पिंगला के प्रवाह के समय भी करें। बस, उस समय दायें हाथ को भूमि पर रख कर दायीं कोहनी से दबाव डालना होगा।

 

.            आप योगदण्ड (यह लगभग हाथ-भर लम्बा होता है और इसका हत्था 'यू' के आकार का होता है) का भी

प्रयोग कर सकते हैं। अपनी बगल से थोड़ा नीचे योगदण्ड के 'यू' के आकार वाले भाग से थोड़ा दबाव डालें और थोड़ा उस ओर झुकें। श्वास का प्रवाह दूसरी ओर से होने लगेगा। यही कार्य लम्बे दण्ड से या चलते हुए अथवा खड़े रह कर किया जा सकता है।

 

.            मन को भी स्वर-नियन्त्रण हेतु प्रशिक्षित किया जा सकता है। जिस प्रकार मात्र मन के विचार से शरीर

की पेशियों को नियन्त्रित करते हैं, उसी प्रकार एक नासा-रन्ध्र से दूसरे नासा-रन्ध्र में स्वर का प्रवाह भी परिवर्तित किया जा सकता है।

 

.            यदि आप बायीं करवट लेट जायें, तो दायाँ स्वर चलने लगेगा और यदि आप दायीं करवट लेट जायें, तो

बायाँ स्वर चलने लगेगा।

 

जब भी आवश्यकता हो, आपको स्वर-परिवर्तित कर लेना चाहिए।

 

सुषुम्ना के प्रवाह को परिवर्तित करना थोड़ा कठिन है और इसमें प्रवाह को निरन्तर बनाये रखना भी कठिन है।

सुषुम्ना नाड़ी में श्वास-प्रवाह

 

किसी भी नाड़ी का प्रवाह सुषुम्ना में परिवर्तित करने हेतु निम्न विधियाँ सहायक होंगी :

 

.            पीठ के बल भूमि पर लेट जायें। तकिये का प्रयोग करें। नासिका के अग्रभाग अथवा भ्रूमध्य

(त्रिकुटी) पर ध्यान करें। सुषुम्ना चलने लगेगी।

 

.            सुखासन, पद्मासन अथवा सिद्धासन में मेरुदण्ड सीधा रख कर बैठें। कुछ चक्र भस्त्रिका करें। ऊपर

बताये अनुसार ध्यान का अभ्यास करें। सुषुम्ना प्रवाहित होने लगेगी।

 

.            षट् चक्रों में से किसी एक पर धारणा करने से भी सुषुम्ना के प्रवाह मैं सहायता मिलती है।

 

मेरुदण्ड एकदम सीधा और स्थिर होना, ध्यान की तीव्रता तथा विचारों में स्थिरता-ये तीनों ही सुषुम्ना में श्वास के प्रवाह को सुनिश्चित करते हैं। ये तीनों ही मात्र इस प्रवाह को निरन्तर बनाये रखने में सहायक हैं। यदि उपरोक्त तीनों में से एक भी बाधित हो, तो श्वास बायें अथवा दायें नासा-रन्ध्र से प्रवाहित होने लगती है।

स्वर का उपयोग

 

सूर्य नाड़ी के प्रवाह के समय शक्ति, जीवन शक्ति और अच्छा पाचन सुनिश्चित होता है। चन्द्र नाड़ी के समय पाचन तो होता है; लेकिन संस्थान में विष बनता है। सुषुम्ना मोक्ष की दाता है।

 

सोते समय बायीं करवट लेटने से सूर्य नाड़ी कार्य करती है और मन को पूर्ण विश्राम प्राप्त होता है; क्योंकि चन्द्र नाड़ी को इस समय विश्राम मिल जाता है। यदि सोते समय चन्द्र नाड़ी काम करे, तो निद्रा बाधित होती है और स्वप्न दिखायी देते हैं।

 

हिता नाड़ी (जिसमें मन गहन निद्रा के समय विश्राम करता है) थोड़ी बायीं ओर है और मनुष्य की निद्रा के समय चन्द्र नाड़ी के प्रवाह से इसमें बाधा पड़ती है, तो स्वप्न दिखायी देते हैं। इसलिए इसमें सोते समय रुकावट नहीं आनी चाहिए।

 

इसलिए आपको सदैव बायीं करवट सोना चाहिए, जिससे सूर्य नाड़ी (दायाँ स्वर) काम करें। इस प्रकार आपको दो लाभ प्राप्त होंगे गहरी नींद तथा आदर्श पाचन, जिससे आपको स्वास्थ्य, शक्ति तथा स्फूर्ति प्राप्त होगी।

 

यदि आप दायीं करवट सोयेंगे, तो आप अपने निम्न मन को जाग्रत रख कर अपनी चेतना को जाग्रत रख सकते हैं। लेकिन ऐसा आप तभी कर सकते हैं, जब आप मन के विचलन और कामनाओं से मुक्त होंगे और तब आपको निश्चय ही कोई स्वप्न नहीं आयेगा।

 

जब आप व्यक्तिगत अथवा समाज के कल्याण हेतु किसी कार्य का आरम्भ करें, तो यह ध्यान रखें कि उस समय इडा (बायाँ स्वर) चल रही हो। ऐसे कुछ कार्य नीचे दिये जा रहे हैं :

 

जीवन के नये क्षेत्र में प्रवेश करना, शास्त्रीय अध्ययन प्रारम्भ करना, यात्रा प्रारम्भ करना; मित्रों, सम्बन्धियों तथा