योगवासिष्ठ की कथाएँ

STORIES FROM YOGA-VASISHTHA

का हिन्दी अनुवाद

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादिका

श्री स्वामी विष्णुशरणानन्द सरस्वती

(पूर्वाश्रम-नाम : डा. स्वर्णलता अग्रवाल)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय: शिवानन्दनगर - २४९१९२

जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

 

 

 

 

प्रथम हिन्दी संस्करण २००९

द्वितीय हिन्दी संस्करण : ? २०१३

तृतीय हिन्दी संस्करण : २०१५

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

HS16

 

PRICE: 90/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा

प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पो. शिवानन्दनगर-२४९१९२, जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड' में मुद्रित।

For online orders and Catalogue visit: dlsbooks.org

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सन्त वसिष्ठ

 

और

 

महर्षि वाल्मीकि को

 

समर्पित !

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शिवानन्दनगर

२४ दिसम्बर १९५८

 

प्रिय जिज्ञासु,

 

 

योगवासिष्ठ इस विश्व की एक उत्कृष्ट पुस्तक है। केवल अद्वैत ब्रह्म का ही अस्तित्व है। यह विश्व तीनों कालों में नहीं है। केवल आत्मज्ञान ही मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करेगा।

 

वासनाओं का नाश ही मोक्ष है। मन ही संकल्प से इस सृष्टि को उत्पन्न करता है।

 

क्षुद्र अहं 'मैं', वासनाओं और संकल्पों का नाश करो।

 

आत्म-तत्त्व का ध्यान करो और जीवन्मुक्त बनो। यही योगवासिष्ठ का सार है।

 

-- स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशकीय

 

योगवासिष्ठ अथवा वासिष्ठ महारामायण संस्कृत भाषा में वेदान्त पर लिखा गया सर्वोत्कृष्ट कोटि का ग्रन्थ है। यह विशाल ग्रन्थ संस्कृत साहित्य का अद्वितीय ग्रन्थ है। महान् सन्त वसिष्ठ ने अपने शिष्य श्री राम, जो रावणजयी हैं और रामायण महाकाव्य के नायक हैं, को वेदान्त के सिद्धान्तों की शिक्षा दी। उन्होंने उन सिद्धान्तों के स्पष्टीकरण के लिए सुन्दर एवं रोचक कथाएँ कही। यह ग्रन्थ सन्त वाल्मीकि द्वारा भाषाबद्ध किया गया है।

 

यह वेदान्त पर लिखे गये सभी ग्रन्थों का चूड़ामणि है। यह सर्वश्रेष्ठ कृति है। इसका अध्ययन मनुष्य को दिव्य वैभव एवं आनन्द की उच्चावस्था तक पहुँचा देता है। यह ज्ञान का भण्डार है। जो आत्म-चिन्तन अथवा ब्रह्म अभ्यास अथवा वेदान्तिक ध्यान का अभ्यास करते हैं, वे इस अद्भुत ग्रन्थ में अमूल्य निधि पायेंगे। जो मनुष्य एकाग्र चित्त हो कर एवं अत्यधिक रुचिपूर्वक इसका अध्ययन करता है, वह निश्चित ही आत्मज्ञान प्राप्त करेगा। साधना से सम्बन्धित व्यावहारिक निर्देश अद्वितीय हैं। अत्यधिक सांसारिक मनुष्य भी वैराग्यवान् बनेगा और मन की शान्ति, उपशम और सान्त्वना प्राप्त करेगा।

 

योगवासिष्ठ के अनुसार, मोक्ष आत्मज्ञान द्वारा ब्रह्मानन्द की प्राप्ति है। यह जन्म मृत्यु से मुक्ति है। यह वह निर्मल और अविनाशी ब्रह्म-पद है जहाँ तो संकल्प हैं और वासनाएँ। मन यहाँ शान्ति प्राप्त कर लेता है। मोक्ष के अनन्त आनन्द के समक्ष संसार के समस्त सुख मात्र एक बूंद हैं।

 

आप सभी योगवासिष्ठामृत का पान करें ! आप सभी आत्मज्ञान-रूपी मधु का आस्वादन करें! आप सभी इसी जन्म में जीवन्मुक्त बन जायें! आपको सन्त वसिष्ठ, सन्त वाल्मीकि एवं अन्य ब्रह्मविद्या-गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त हो! आप सभी ब्रह्मानन्द-रस का आनन्द प्राप्त करें!

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिचय

 

योगवासिष्ठ अथवा वासिष्ठ महारामायण संस्कृत भाषा में वेदान्त पर लिखा गया सर्वोत्कृष्ट कोटि का ग्रन्थ है। यह विशाल ग्रन्थ संस्कृत साहित्य का अद्वितीय ग्रन्थ है। महान् सन्त वसिष्ठ ने अपने शिष्य श्री राम, जो रावणजयी हैं और रामायण महाकाव्य के नायक हैं, को वेदान्त के सिद्धान्तों की शिक्षा दी। उन्होंने उन सिद्धान्तों के स्पष्टीकरण के लिए सुन्दर एवं रोचक कथाएँ कहीं। यह ग्रन्थ सन्त वाल्मीकि द्वारा भाषाबद्ध किया गया है।

 

यह वेदान्त पर लिखे गये सभी ग्रन्थों का चूड़ामणि है। यह सर्वश्रेष्ठ कृति है। इसका अध्ययन मनुष्य को दिव्य वैभव एवं आनन्द की उच्चावस्था तक पहुँचा देता है। यह ज्ञान का भण्डार है। जो आत्म-चिन्तन अथवा ब्रह्म अभ्यास अथवा वेदान्तिक ध्यान का अभ्यास करते हैं, वे इस अद्भुत ग्रन्थ में अमूल्य निधि पायेंगे। जो मनुष्य एकाग्र चित्त हो कर एवं अत्यधिक रुचिपूर्वक इसका अध्ययन करता है, वह निश्चित ही आत्मज्ञान प्राप्त करेगा। साधना से सम्बन्धित व्यावहारिक निर्देश अद्वितीय हैं। अत्यधिक सांसारिक मनुष्य भी वैराग्यवान् बनेगा और मन की शान्ति, उपशम और सान्त्वना प्राप्त करेगा।

 

एक समय भारत में योगवासिष्ठ का अध्ययन बहुत व्यापक स्तर पर किया जाता था। इसने सामान्य दार्शनिक विचारधारा को अत्यन्त प्रभावित किया। बनारस के स्वर्गीय पण्डित वृन्दावन सरस्वती ने एक सौ पैंसठ बार योगवासिष्ठ का अध्ययन किया। यह प्राचीन भारत की एक विस्तृत, गम्भीर, व्यवस्थित साहित्यिक एवं दार्शनिक कृति है।

 

इसका नाम सन्त वसिष्ठ से व्युत्पन्न है। यद्यपि यह ग्रन्थ योगवासिष्ठ कहा जाता है, परन्तु यह केवल 'ज्ञान' से सम्बन्धित है। केवल दो कथाएँ ही क्रियायोग से सम्बन्धित हैं। ग्रन्थ के शीर्षक में प्रयुक्त योग शब्द का व्यापक अर्थ लिया गया है। यह 'ज्ञानवासिष्ठम्' नाम से भी प्रसिद्ध है।

 

ऋषि वाल्मीकि, रामायण के रचयिता, ने इस असाधारण ग्रन्थ का संकलन किया। उन्होंने सम्पूर्ण 'योगवासिष्ठ ऋषि भारद्वाज को सुनाया जैसा कि सन्त वसिष्ठ ने श्री राम को वर्णन किया।

 

बृहत् योगवासिष्ठ एवं लघु योगवासिष्ठ नामक दो पुस्तकें हैं। पहली पुस्तक अत्यन्त विशाल है। इसमें ३२,००० ग्रन्थ अथवा श्लोक अथवा ६४,००० पंक्तियाँ हैं। बृहत् अर्थात् विशाल। दूसरी पुस्तक में ६००० ग्रन्थ हैं। लघु अर्थात् छोटा।

 

योगवासिष्ठ में प्राचीन दार्शनिक विचारधारा की एक अद्वितीय पद्धति समाहित है। यह ग्रन्थ इस पवित्र भूमि, जो कि भारतवर्ष अथवा आर्यावर्त नाम से जानी जाती है, के उज्ज्वल अतीत की मूल्यवान् धरोहर है। इस ग्रन्थ में प्रस्तुत विचार-पद्धति केवल भारतीय दार्शनिक विचारधारा, अपितु विश्व की दार्शनिक विचारधारा के प्रति एक अत्यन्त मूल्यवान् योगदान है।

 

वे मनुष्य, जिनके चित्त संसार से विमुख हो गये हैं, जो सांसारिक पदार्थों के प्रति उदासीन हो गये हैं और जो मुमुक्षु हैं, इस बहुमूल्य ग्रन्थ के अध्ययन से यथार्थतः लाभान्वित होंगे। वे इस ग्रन्थ में अपने दैनिक जीवन में मार्गदर्शन हेतु ज्ञान एवं व्यावहारिक आध्यात्मिक निर्देशों का भण्डार पायेंगे। योगवासिष्ठ प्रथमतः एक सिद्धान्त का विविध रूपों में प्रतिपादन करता है और तत्पश्चात् रुचिकर कथाओं के माध्यम से इसे अत्यन्त सरल बोधगम्य बना देता है। यह ग्रन्थ निरन्तर तथा बारम्बार अध्ययन करने योग्य है। इसका पुनः पुनः अध्ययन किया जाना चाहिए और दक्षता प्राप्त की जानी चाहिए।

 

जीवन के समस्त कष्टों एवं विपत्तियों के मध्य जीवात्मा का परमात्मा से योग करवाना ही योगवासिष्ठ का प्रतिपाद्य विषय है। यह जीवात्मा के परमात्मा से योग के लिए विविध दिशा-निर्देश देता है।

 

इस ग्रन्थ में ब्रह्म अर्थात् सत् के स्वरूप एवं आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने की विविध विधियों का सुस्पष्ट वर्णन किया गया है। परमानन्द अथवा परमार्थ-प्राप्ति से सम्बन्धित मुख्य परिपृच्छा का सुन्दर रूप से वर्णन किया गया है। इस ग्रन्थ में सत्तामीमांसा विज्ञान, आत्मज्ञान, मनोविज्ञान के सिद्धान्त, मनोभाव विज्ञान, नीतिशास्त्र, व्यावहारिक नैतिकता के नियम एवं धर्मशास्त्र पर व्याख्यान आदि समाहित हैं। योगवासिष्ठ का दर्शन उत्कृष्ट एवं अद्वितीय है।

 

इस ग्रन्थ में छह प्रकरण हैं- () वैराग्य-प्रकरण, () मुमुक्षु-प्रकरण, () उत्पत्ति-प्रकरण, () स्थिति-प्रकरण, () उपशान्ति-प्रकरण, और () निर्वाण-प्रकरण। योगवासिष्ठ के अनुसार विभिन्न पदार्थों, देश, काल, नियम सहित यह अनुभवगम्य संसार मन की ही उत्पत्ति है अर्थात् एक विचार अथवा कल्पना है। जिसप्रकार स्वप्नावस्था में मन ही पदार्थों की उत्पत्ति करता है, उसी प्रकार जाग्रतावस्था में भी मन द्वारा ही सब-कुछ उत्पन्न होता है। मन का विस्तार ही संकल्प है। संकल्प अपनी भेद-शक्ति के द्वारा इस सृष्टि को उत्पन्न करता है। देश एवं काल केवल मानसिक सृष्टि हैं। पदार्थों के साथ मन के खेल के कारण ही समीपता अत्यन्त दूरी प्रतीत होती है और दूरी समीपता। मन की शक्ति के कारण एक कल्प एक क्षण के समान प्रतीत होता है और क्षण कल्प के समान। जाग्रतावस्था के अनुभव के एक क्षण को स्वप्नावस्था में वर्षों के रूप में अनुभव किया जा सकता है। मन अल्पावधि में ही मीलों का और कई मीलों का एक बालिश्त के रूप में भी अनुभव कर सकता है। मन ब्रह्म से भिन्न और पृथक् नहीं है। ब्रह्म ही स्वयं को मन के रूप में प्रकट करता है। मन सृजनात्मक शक्ति से युक्त है। मन ही बन्धन एवं मोक्ष का कारण है।

 

योगवासिष्ठ में 'दृष्टि-सृष्टिवाद' का प्रतिपादन किया गया है। कुछ स्थानों पर वसिष्ठ, श्री शंकर के महान् गुरु श्री गौडपादाचार्य के अजातवाद के विषय में बतलाते हैं। आप देखना प्रारम्भ करते हो और सृष्टि की उत्पत्ति हो जाती है। यही दृष्टि-सृष्टिवाद है। तीनों कालों में इस विश्व का अस्तित्व नहीं है। यह सृष्टि का 'अजातवाद' है।

 

यह अत्यन्त प्रेरणादायी ग्रन्थ है। वेदान्त का प्रत्येक विद्यार्थी इस ग्रन्थ को निरन्तर अध्ययनार्थ अपने पास रखता है। ज्ञानयोग-पथ के साधक के लिए यह ग्रन्थ सतत सहचर है। यह प्रक्रिया ग्रन्थ नहीं है। यह वेदान्त की प्रक्रियाओं से सम्बन्धित नहीं है। केवल उच्च स्तर के विद्यार्थी ही इस ग्रन्थ का अध्ययन कर सकते हैं। प्रारम्भिक स्तर के विद्यार्थियों को योगवासिष्ठ के अध्ययन से पहले श्री शंकर विरचित आत्मबोध, तत्त्वबोध, आत्मानात्मविवेक तथा पंचीकरण का अध्ययन करना चाहिए।

 

योगवासिष्ठ के अनुसार, मोक्ष आत्मज्ञान द्वारा ब्रह्मानन्द की प्राप्ति है। यह जन्म मृत्यु से मुक्ति है। यह वह निर्मल और अविनाशी ब्रह्म-पद है जहाँ तो संकल्प हैं और वासनाएँ। मन यहाँ शान्ति प्राप्त कर लेता है। मोक्ष के अनन्त आनन्द के समक्ष संसार के समस्त सुख मात्र एक बूंद हैं।

 

यह जो मोक्ष कहा जाता है, वह तो देवलोक और पाताल में और ही पृथ्वी पर है। जब समस्त कामनाएँ नष्ट हो जाती हैं, प्रसरणशील मन का उन्मूलन हो जाता है, वही मोक्ष है। मोक्ष में देश एवं काल नहीं है; ही कोई आन्तरिक अथवा बाहरी अवस्था है। जब 'मैं' का मिथ्या विचार अथवा अहंकार नष्ट हो जाता है, विचारों (जो कि माया है) के नाश का अनुभव होता है, वही मोक्ष है। समस्त वासनाओं का उन्मूलन ही मोक्ष है। संकल्प ही संसार है; इसका नाश ही मोक्ष है। संकल्प का पूर्ण नाश हो जायेऔर उनके पुनरुत्थान की सम्भावना हो, यही मोक्ष अथवा निर्मल ब्रा-पर भी की और उनके पबहुत्खनिवृत्ति और परमानन्द-प्राप्ति है। दुःख का अर्थ है- चौड़ा। जन्म और मृत्यु ही सर्वाधिक कष्ट का कारण है। जन्म और मृत्यु से मुक्ति होकर प्रकार के कष्टों से मुक्ति है। ब्रह्मज्ञान अथवा आत्मज्ञान ही मोक्ष प्रदान करेगा। पदायों के लिए बासनाओं के अभाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न मन की शान्ति ही मोक्ष है।

 

मोक्ष प्राप्त करने योग्य कोई पदार्थ नहीं है। यह पूर्वतः यहीं विद्यमान है। वास्तव में बद्ध नहीं हो। आप नित्य-शुद्ध और नित्य-मुक्त हो। यदि आप वास्तव में बद्ध होते, तो कभी मुक्त नहीं हो सकते थे। आपको यह जानना है कि आप अपा, सर्वव्यापक आत्म-तत्त्व हो। उसे जानना, वही हो जाना है। यही मोक्ष है। यही जीवस का उद्देश्य है। यह अस्तित्व का परम अर्थ है। मन की अनासक्त अवस्था को ही मोक्ष-पथ जानना चाहिए, जब तो 'मैं' और अन्य किसी का अस्तित्व है और जब मन संसार के समस्त सुखों का त्याग कर देता है।

 

योगवासिष्ठ के अनुसार पूर्ण सच्चिदानन्द परब्रह्म अद्वय, अखण्ड, अनन्त, स्वयंप्रकाशवान्, निर्विकार एवं शाश्वत है। वह अस्तित्व का सागर है, जिसमें हम सभी रहते हैं और गति करते हैं। वह मन इन्द्रियों की पहुँच से परे है। वह अन्तिम सारतत्व है। अनुभवकर्ता और अनुभव-विषय दोनों के पीछे वही एक तत्त्व है। वह समरूप तत्त्व है। वह सर्वव्यापक है। वह वर्णनातीत है। वह नाम, वर्ण, गन्ध, स्वाद, देश, काल, जन्म और मृत्यु रहित है।

 

जिसका मन शान्त है, जो मोक्ष के चतुष्टय साधनों से सम्पन्न है, दोषों और अशुद्धियों से मुक्त है, वह मनुष्य ध्यान के द्वारा अन्तर्दृष्टि से आत्म-साक्षात्कार कर सकता है। शास्त्र एवं आध्यात्मिक गुरु हमें ब्रह्म-साक्षात्कार नहीं करा सकते। वे केवल हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं और दृष्टान्तों एवं उदाहरणों के माध्यम से संकेत दे सकते हैं।

 

शान्ति, सन्तोष, सत्संग और विचार-ये मोक्ष-द्वार के चार प्रहरी हैं। यदि आप इनसे मित्रता करेंगे, तो सरलता से मोक्ष-साम्राज्य में प्रवेश पा लेंगे। यदि आप इनमें से एक का भी संग करेंगे, तो वह अपने अन्य तीन साथियों से आपको अवश्य ही परिचित करवा देगा।

 

एक साधक को यह अचल आस्था होनी चाहिए कि ब्रह्म ही केवल सत्य है, सब-कुछ ब्रह्म ही है, ब्रह्म ही सभी प्राणियों की आत्मा है। तत्पश्चात् उसे इस सत्य का अपरोक्षानुभव प्राप्त करना चाहिए। ब्रह्म का प्रत्यक्ष ज्ञान ही मुक्ति का साधन है।

 

जाग्रतावस्था और स्वप्नावस्था के अनुभवों के बीच कोई अन्तर है। जाग्रतावस्था एक दीर्घ-स्वप्न है। ज्यों-ही मनुष्य जाग्रतावस्था में आता है, स्वप्न का अनुभव मिथ्या हो जाता है। उसी प्रकार एक आत्म-साक्षात्कार प्राप्त सन्त के लिए जाग्रतावस्था मिथ्या हो जाती है। स्वप्नावस्था वाले मनुष्य के लिए जाग्रतावस्था मिथ्या हो जाती है।

 

एक जीवन्मुक्त आनन्दपूर्वक विचरण करता है। उसमें तो आकर्षण हैं ही आसक्तियाँ हैं। उसके लिए तो कुछ प्राप्तव्य है और ही त्याज्य। वह विश्व-कल्याण के लिए कार्य करता है। वह कामनाओं, अहंकार और लोभ से मुक्त है। नगर के व्यस्ततम भाग में कार्य करता हुआ भी वह एकान्त में ही है।

 

आप सभी योगवासिष्ठामृत का पान करें! आप सभी आत्मज्ञान-रूपी मधु का आस्वादन करें! आप सभी इसी जन्म में जीवन्मुक्त बन जायें! आपको सन्त वसिष्ठ, सन्त वाल्मीकि एवं अन्य ब्रह्मविद्या-गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त हो! आप सभी ब्रह्मानन्द-रस का आनन्द प्राप्त करें!

 

 

 

 

 

 

 

हस्तामलक स्तोत्र

स्तोत्र की भूमिका

 

दक्षिण भारत के श्रीवली नामक ग्राम में प्रभाकर नाम के ब्राह्मण के यहाँ पुत्र रूप में हस्तामलक का जन्म हुआ। किशोरावस्था से ही वह सांसारिक विषयों के प्रति अत्यन्त उदासीन था। उसका व्यवहार एक मूक बधिर के समान था। एक बार, जब श्री शंकर अपने अनुयायियों सहित उस स्थान पर आये, प्रभाकर अपने पुत्र को उनके पास ले कर गया और उनके चरणों में प्रणाम किया। श्री शंकर ने पिता-पुत्र दोनों को उठाया और प्रभाकर से पूछा।

 

प्रभाकर ने कहा- "हे पूज्य महात्मन् ! यह मेरा पुत्र मूक है और किशोरावस्था से ही सभी विषयों के प्रति उदासीन है। अभी यह तेरह वर्ष का है। यह तो हमारे वार्तालाप को समझता है और ही उसमें रुचि लेता है। इसने तो किसी शास्त्र का और ही वेदों का अध्ययन किया है जो कि एक ब्राह्मण द्वारा अवश्य पठनीय है। यह तो वर्णमाला भी नहीं जानता है। मैंने बहुत ही कठिनाई से इसका यज्ञोपवीत संस्कार किया है। यह अपने मित्रों के साथ कभी खेलने नहीं जाता है। इसकी उदासीन प्रकृति को देख कर, कभी-कभी इसके मित्र इसे मारते हैं, परन्तु यह कभी क्रोधित नहीं होता। यह कभी भोजन लेता है और कभी नहीं। परन्तु यह हमेशा प्रसन्न एवं आनन्दित रहता है। इसकी इस जड़ता का क्या कारण है? कृपया मेरे बालक की रक्षा कीजिए।"

 

प्रत्युत्तर में, श्री शंकर ने उस बालक से निम्नांकित प्रश्न पूछे। बालक के द्वारा दिये गये उत्तरों को स्तोत्र रूप में संकलित कर इसे 'हस्तामलक स्तोत्र' नाम दिया गया। वास्तव में, वह तो मूक था और ही बधिर, अपितु वह एक पूर्ण ज्ञानी था- जीवन्मुक्त था।

 

कस्त्वं शिशो कस्य कुतोऽसि गन्ता

किं नाम ते त्वं कुत आगतोऽसि

एतन्मयोक्तं वद चार्भक त्वं

मत्प्रीतये प्रीतिविवर्धनोऽसि ।।१ ।।

 

श्री शंकर ने बालक से पूछा -

 

हे प्रिय बालक! तुम कौन हो? किसके पुत्र हो? कहाँ जाओगे? तुम्हारा नाम क्या है? कहाँ से आये हो? मेरी प्रसन्नता के लिए मेरे इन प्रश्नों का उत्तर दो। तुम मुझे अत्यन्तप्रिय हो।

 

नाऽहं मनुष्यो देवयक्षो

ब्रह्मचारी गृही वनस्थो

ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राः

भिक्षुर्न चाहं निजबोधरूपः ॥२॥

 

हस्तामलक ने उत्तर दिया-

 

मैं मनुष्य नहीं हूँ, देव और यक्ष भी नहीं हूँ; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र भी नहीं हूँ। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यासी भी नहीं हूँ। मैं स्वयं शाश्वत ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ।

 

निमित्तं मनश्चक्षुरादिप्रवृत्तौ

निरस्ताखिलोपाधिराकाशकल्पः

रविर्लोकचेष्टानिमित्तं यथा यः

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।३।।

 

मैं शाश्वत ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ। आकाशादि सीमित उपाधियों से मुक्त हूँ, मन एवं चक्षुरादि इन्द्रियों की प्रवृत्ति का कारण हूँ, जिस प्रकार सूर्य सब लोकों की प्रवृत्ति का कारण है।

 

यमग्न्युष्णवन्नित्यबोधस्वरूपं

मनश्चक्षुरादीन्यबोधात्मकानि

प्रवर्तन्त आश्रित्य निष्कम्पमेकं

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।४।।

 

जिस प्रकार अग्नि की उष्णता है, उसी प्रकार उस अपरिवर्तनीय शाश्वत ज्ञानस्वरूप आत्मा की प्रकृति शुद्ध चैतन्य और उसी का आश्रय ले कर जड़ मन एवंचक्षुरादि इन्द्रियाँ अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, मैं वही नित्य ज्ञानस्वरूपआत्मा हूँ।

 

मुखाभासको दर्पणे दृश्यमानो

मुखत्वात्पृथक्त्वेन नैवास्तु वस्तु।

चिदाभासको धीषु जीवोऽपि तद्वत्

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।५।।

 

जिस प्रकार दर्पण में दिखता हुआ मुख का प्रतिबिम्ब वस्तुतः बिम्ब-रूप मुख से पृथक् नहीं है, उसी प्रकार बुद्धि-रूपी दर्पण में जीव-रूप से प्रतीयमान चैतन्य का प्रतिबिम्ब, बिम्ब-रूप चैतन्य से पृथक् नहीं है, चैतन्य-रूप ही है, वही नित्यज्ञानस्वरूप आत्मा मैं हूँ।

 

यथा दर्पणाभाव आभासहानौ

मुखं विद्यते कल्पनाहीनमेकम्

तथा धीवियोगे निराभासको यः

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।६।।

 

जिस प्रकार दर्पण-रूपी उपाधि के रहने पर उसमें पड़ा हुआ मुख का प्रतिबिम्ब नहीं रहता है; परन्तु मुख तो परिशिष्ट रहता ही है, उसी प्रकार बुद्धि-रूपी उपाधि के रहने पर भी नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा ही रहता है, वही मैं हूँ।

 

मनश्चक्षुरादेर्वियुक्तः स्वयं यो

मनश्चक्षुरादेर्मनश्चक्षुरादिः

मनश्चक्षुरादेरगम्यस्वरूपः

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।। ।।

 

जो आत्मा मन एवं चक्षुरादि इन्द्रियों से परे है, जो मन का मन, चक्षु का चक्षु है और जो इन मन, इन्द्रियादि के द्वारा नहीं जाना जा सकता है, मैं वही नित्य ज्ञान स्वरूप आत्मा हूँ।

 

एको विभाति स्वतः शुद्धचेताः

प्रकाशस्वरूपोऽपि नानेव धीषु

शरावोदकस्थो यथा भानुरेकः

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।८ ।।

 

जिस प्रकार जल से भरे अनेक पात्रों में एक ही सूर्य अनेक रूपों से भासता है, उसी प्रकार मैं एक ही, स्वयंज्योति आत्मा, अनेक बुद्धियों को प्रकाशित करने वाला नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ।

 

 

यथाऽनेकचक्षुःप्रकाशो रविर्न

क्रमेण प्रकाशीकरोति प्रकाश्यम्

अनेका धियो यस्तथैकप्रबोधः ।।

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥९ ।।

जिस प्रकार सूर्य अनेक नेत्रों को क्रम से प्रकाशित करता हुआ एक साथ ही प्रकाश करता है, उसी प्रकार समस्त बुद्धियों को एक ही साथ प्रकाशित करने वाला नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा मैं हूँ।

 

विवस्वत्प्रभातं यथारूपमक्ष

प्रगृह्णाति नाभातमेवं विवस्वान्

यदाभात आभासयत्यक्षमेकः

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥१०

 

मैं वही नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ जिसके प्रकाश से ही नेत्र अन्य पदार्थों को देखने की क्षमता पाते हैं, जिस प्रकार सूर्योदय होने पर ही हम पदार्थों को देख सकते हैं अन्यथा नहीं।

 

यथा सूर्य एकोऽप्स्वनेकश्चलासु

स्थिरास्वप्यनन्यद्विभाव्यस्वरूपः

चलासु प्रभिन्नः सुधीष्वेक एव

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥११ ।।

 

जैसे चंचल एवं स्थिर जल में एक ही सूर्य अनेक रूप से भिन्न दिखायी देता है, तथापि वह भिन्न नहीं हो सकता। उसी प्रकार चंचल एव स्थिर विभिन्न बुद्धियों कोप्रकाशित करने वाला आत्मा एक ही है, ऐसा अद्वैत स्वरूप, नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा मैं हूँ।

 

घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्क

यथा निष्प्रभं मन्यते चातिमूढः।

तथा बद्धवद्भाति यो मूढदृष्टेः

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।१२।।

 

जैसे मूर्ख मनुष्य मेघ से आच्छादित सूर्य को प्रभा हीन एवं दीप्ति रहित मानता है, उसी प्रकार मूढ़ बुद्धि मानव को जो नित्य-मुक्त आत्मा बद्ध प्रतीत होता है, मैं वही शाश्वत ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ।

 

समस्तेषु वस्तुष्वनुस्यूतमेकं

समस्तानि वस्तूनि यं स्पृशन्ति

वियद्वत्सदा शुद्धमच्छस्वरूपः

नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ।।१३ ।।

 

मैं वही नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ जो आकाश के समान सर्वदा शुद्ध और निर्मल है, समस्त पदार्थों में व्याप्त है, पदार्थ उसका स्पर्श नहीं कर सकते और ही अपने संसर्ग से उसे मलिन कर सकते हैं।

 

उपाधौ यथा भेदता सन्मणीनां

तथा भेदता बुद्धिभेदेषु तेऽपि

यथा चन्द्रिकाणां जले चंचलत्वं

तथा चंचलत्वं तवापीह विष्णो ॥१४।।

 

जिस प्रकार वर्ण एवं आकृति की भिन्नता के कारण मणियों में भेद का ज्ञान होता है, उसी प्रकार उपाधियों की विभिन्नता के कारण आत्मा अनेक रूप हुआ प्रतीत होता है। जिस प्रकार चंचल जल के सम्बन्ध से स्थिर चन्द्रमा चंचल और अनेक रूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार हे विष्णो! आप अनेक रूप प्रतीत होते हो (विभिन्न उपाधियों के कारण) (यथार्थतः आप एक, नित्य-शुद्ध और निर्विकार हो।)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परा-पूजा

 

अखण्डे सच्चिदानन्दे निर्विकल्पैकरूपिणि

स्थितेऽद्वितीयभावेस्मिन् कथं पूजा विधीयते ।।१।।

 

जो अखण्ड, सच्चिदानन्द, निर्विकल्प और अद्वैत है, उसकी पूजा कैसे की जाए?

 

पूर्णस्याऽऽवाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चाऽऽसनम्

स्वच्छस्य पाद्यमर्घ्य शुद्धस्याऽऽचमनं कुतः ॥२॥

 

उस परिपूर्ण परमात्मा का आवाहन कहाँ हो? जो सभी का आधार है, उस सर्वाधार को कौन-सा आसन दिया जाये ? जो सर्वदा शुद्ध-पवित्र है, उसे अर्घ्य, पाद्य और आचमन से क्या प्रयोजन?

 

निर्मलस्य कुतः स्नानं वस्त्रं विश्वोदरस्य च।

अगोत्रस्य त्ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम् ।।३।।

 

जो सर्वदा निर्मल है, उसके लिए स्नान अनावश्यक है; जिसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आच्छादित कर रखा है, उसे वस्त्र से क्या प्रयोजन? जो गोत्र एवं वंश से रहित है, उसे यज्ञोपवीत की क्या आवश्यकता है?

 

निर्लेपस्य कुतो गन्धः पुष्पं निर्वासनस्य

निर्विशेषस्य का भूषा कोऽलंकारो निराकृतेः ॥४॥

 

जो निर्लेप है, सदा आनन्दित है और सर्व-अभिलाषाओं से रहित है, उसको गन्ध एवं पुष्प सेवन से क्या लाभ ? निराकार को वेशभूषा कैसे धारण करवायें? निर्गुण-निराकार को अलंकार से क्या प्रयोजन?

 

निरंजनस्य किं धूपैर्दीपैर्वा सर्वसाक्षिणः

निजानन्दैकतृप्तस्य नैवेद्यं किं भवेदिह ॥५॥

 

जो निरंजन है, उसे धूप से क्या प्रयोजन? जो स्वयं सभी ज्योतियों की ज्योति है, उसे किस प्रकार दीप-ज्योति अर्पण की जाये ? जो नित्य आत्म-तृप्त एवं निजानन्द में मप्न है, उसे क्या नैवेद्य अर्पित किया जा सकता है?

 

विश्वानन्दयितुस्तस्य किं ताम्बूलं प्रकल्प्यते

स्वयंप्रकाशश्चिद्रूपो योऽसावर्कादिभासकः ।।६

 

जो सभी प्राणियों को आनन्द देने वाला है, जो आत्म-दीप्त एवं चैतन्य स्वरूप है और सूर्यादि समस्त ज्योतियों का भासक है, उसको ताम्बूल (पान) कैसे अर्पित किया जाये?

 

प्रदक्षिणा ह्यानन्तस्य ह्यद्वयस्य कुतो नतिः

वेदवाक्यैरवेद्यस्य कुतः स्तोत्रं विधीयते ।।७।।

अनन्त की प्रदक्षिणा कैसे हो सकती है? उस एक और अद्वय को नमस्कार कैसे हो? चतुर्वेद जिसके वर्णन में स्वयं को असमर्थ पाते हैं, उसकी स्तुति कैसे हो?

 

स्वयं प्रकाशमानस्य कुतो नीराजनं विभोः

अन्तर्बहिश्च पूर्णस्य कथमुद्वासनं भवेत् ।।८।।

 

स्वयंप्रकाश-तत्त्व का नीराजन (दीपक, कर्पूर से आरती) कैसे हो? जो पूर्ण है, सर्वव्यापक है, उसका उद्वासन (विसर्जन) किस प्रकार हो?

 

एवमेव परा पूजा सर्वावस्थासु सर्वदा

एकबुद्ध्या तु देवेशे विधेया ब्रह्मवित्तमैः ।।९।।

 

सभी ब्रह्मान्वेषी साधकों द्वारा भक्तियुक्त एवं एकाग्र चित्त से यह परा-पूजा सब अवस्थाओं में सदैव की जानी चाहिए।

 

विशेष-   आवाहन, आसन, पाद्य, अर्ध्यादि देवोपासना की विभिन्न क्रियाएँ हैं, जो कर्मकाण्डीय उपासना के

नियमानुसार सम्पन्न की जाती हैं। इस स्तोत्र का उद्देश्य यह निर्देशित करना है कि ये सब क्रियाएँ एक अद्वितीय ब्रह्म के प्रति सम्भव नहीं हैं। सभी ब्रह्मान्वेषी साधकों द्वारा इसी स्तोत्र के प्रकाश में उस परम तत्त्व के स्वरूप को समझा जाना चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

योगवासिष्ठ-सार

 

यदि मोक्ष-द्वार के चार प्रहरियों-शान्ति, विचार, सन्तोष और सत्संग से मित्रता कर ली जाये, तो अन्तिम निर्वाण प्राप्ति में कोई बाधा नहीं सकती। यदि इनमें से एक से भी मित्रता हो जाये, तो वह अपने शेष साथियों से स्वयं ही मिला देगा।

 

यदि तुम्हें आत्मा का ज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान हो जाता है, तो तुम जन्म-मरण के बन्धन से छूट जाओगे। तुम्हारे सब संशय दूर हो जायेंगे और सारे कर्म नष्ट हो जायेंगे। केवल अपने ही प्रयत्नों से अमर, सर्वानन्दमय ब्रह्म-पद प्राप्त किया जा सकता है।

 

आत्मा को नष्ट करने वाला केवल मन है। मन का स्वरूप मात्र संकल्प है। मन की यथार्थ प्रकृति वासनाओं में निहित है। मन की क्रियाएँ ही वस्तुतः कर्म नाम से विहित होती हैं। सृष्टि ब्रह्म-शक्ति के माध्यम से मन की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं है। मन शरीर का चिन्तन करता हुआ शरीर-रूप ही बन जाता है, फिर उसमें लिप्त हुआ उसके द्वारा कष्ट पाता है।

 

मन ही सुख अथवा दुःख की आकृति में बाहरी संसार के रूप में प्रकट होता है। कर्तृत्व-भाव में मन चेतना है। कर्म-रूप में यह सृष्टि है। अपने शत्रु विवेक के द्वारा मन ब्रह्म की निश्चल शान्त स्थिति प्राप्त कर लेता है। यथार्थ आनन्द वह है, जो शाश्वत ज्ञान के द्वारा मन के वासना रहित हो कर अपना सूक्ष्म रूप खो देने पर उदय होता है। संकल्प और वासनाएँ जो तुम उत्पन्न करते हो, वे तुम्हें जंजाल में फँसा लेती हैं। परब्रह्म का आत्म-प्रकाश ही मन अथवा इस सृष्टि के रूप में प्रकट हो रहा है।

 

आत्म-विचार से रहित मनुष्यों को यह संसार सत्य प्रतीत होता है, जो संकल्पों की प्रकृति के सिवाय कुछ नहीं है। इस मन का विस्तार ही संकल्प है। अपनी भेद-शक्ति के द्वारा संकल्प इस सृष्टि को उत्पन्न करता है। संकल्पों का नाश ही मोक्ष है।

 

आत्मा का शत्रु यही अशुद्ध मन है, जो अत्यधिक भ्रम और सांसारिक विचारों के समूह से भरा रहता है। इस विरोधी मन पर नियन्त्रण करने के अतिरिक्त पुनर्जन्म-रूपी महासागर से पार ले जाने वाला पृथ्वी पर कोई जहाज (बेड़ा) नहीं है।

 

पुनर्जन्मों के कोमल तनों सहित, इस दुःखदायी अहंकार के मूल अंकुर 'तेरा-मेरा' की लम्बी शाखाओं सहित सर्वत्र फैल जाते हैं और मृत्यु, रोग, वृद्धावस्था एवं क्लेश-रूपी अपक्व फल देते हैं। ज्ञानाग्नि से यह वृक्ष समूल नष्ट किया जा सकता है।

 

इन्द्रियों के माध्यम से दिखायी देने वाले समस्त विभिन्न प्रकार के दृश्य पदार्थ मिथ्या हैं; जो सत्य है, वह परब्रह्म अथवा परम आत्मा है।

 

यदि मोहित करने वाले सारे पदार्थ आँख की किरकिरी (पीड़ाकारक) बन जायें और पूर्व-भावना के विपरीत प्रतीत होने लगें, तो मनोनाश हो जाये। तुम्हारी सारी सम्पत्ति व्यर्थ है। सारी धन-दौलत तुम्हें खतरे में डालने वाली है। वासनाओं से मुक्ति तुम्हें शाश्वत, आनन्दपूर्ण धाम पर ले जायेगी।

 

वासनाओं और संकल्पों को नष्ट करो। अहंकार को मार डालो। इस मन का नाश कर दो। अपने-आपको 'साधन-चतुष्टय' से सम्पन्न करो। शुद्ध, अमर, सर्वव्यापक आत्मा का ध्यान करो। आत्मा का ज्ञान प्राप्त करके अमरता, अनन्त शान्ति, शाश्वत सुख, स्वतन्त्रता और पूर्णता प्राप्त करो।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय. 5

परिचय. 6

हस्तामलक स्तोत्र. 10

स्तोत्र की भूमिका.. 10

परा-पूजा.. 15

योगवासिष्ठ-सार. 17

भूमिका.. 20

.वैराग्य-प्रकरण.. 21

विरक्ति.... 21

शुकदेव की कथा.. 27

.मुमुक्षु-प्रकरण.. 30

मुमुक्षुत्व... 30

.उत्पत्ति-प्रकरण.. 35

सृष्टि... 35

कर्कटी की कथा.. 36

इन्द्र और अहल्या की कथा.. 42

बालक के लिए एक कथा.. 43

एक सिद्ध की कथा.. 46

.स्थिति-प्रकरण.. 49

स्थिति.. 49

शुक्र की कथा.. 50

भीम, भास और दृढ़ की कथा.. 55

.उपशान्ति-प्रकरण.. 58

लय. 58

राजा जनक की कथा.. 60

गाधि की कथा.. 64

उद्दालक की कथा.. 70

भास और विलास की कथा.. 74

वीतहव्य की कथा.. 80

.निर्वाण-प्रकरण.. 84

मुक्ति.... 84

बिल्वफल की कथा.. 85

शिखिध्वज की कथा.. 86

इक्ष्वाकु की कथा.. 103

परिशिष्ट . 110

श्री सत्यनारायण व्रत. 110

तृतीय भाग. 115

परिशिष्ट . 122

परम सत्य का साक्षात्कार. 122

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भूमिका

 

हरि ! उस सच्चिदानन्द परब्रह्म को प्रणाम है, जिससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है, जिसके द्वारा सभी प्रकट हैं, जिस पर सभी निर्भर हैं और सृष्टि के प्रलय के समय जिसमें सभी समा जाते हैं।

 

योगवासिष्ठ को पढ़ने के अधिकारी तो अज्ञानी हैं जो संसार-रूपी दलदल में पूर्णतया डूबे हुए हैं और ही जीवन्मुक्त अथवा मुक्त सन्त हैं जिन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है, केवल वही इसके अध्ययन के अधिकारी हैं जो यह अनुभव करते हैं कि वे बन्धन में हैं और जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्ति की इच्छा करते हैं।

 

ऋषि भारद्वाज ने कहा- "हे श्रद्धेय गुरुदेव! मुझे पहले राम के विषय में बताइए और तत्पश्चात् यह बताइए कि मैं किस प्रकार मोक्ष प्राप्त कर सकता हूँ।" सन्त वाल्मीकि ने उत्तर दिया

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

.वैराग्य-प्रकरण

विरक्ति

 

हे भारद्वाज! मुनि वसिष्ठ द्वारा राम को निर्दिष्ट मार्ग का चिन्तन करके जन्म-मरण से मुक्त हो जाओ; राम ने अपने गुरु के अमूल्य उपदेशों का अनुपालन करके ही आत्मज्ञान प्राप्त किया था।

 

राम सभी पवित्र तीर्थस्थानों के दर्शन करना चाहते थे। उन्होंने अपने गुरु एवं पिताश्री की आज्ञा प्राप्त की और तीर्थयात्रा हेतु प्रस्थान किया। सारे पवित्र स्थानों का दर्शन करके वह अयोध्या वापस लौटे। उस समय राम पन्द्रह वर्ष के थे। उनकी देह शनैः-शनैः दुर्बल पड़ने लगी। उनका दमकता चेहरा पीला पड़ गया। वह पद्मासन लगा कर निष्कम्प बैठ जाते और चिन्तन में लीन रहते थे। वह अपने नित्य-कर्तव्य भी करना भूल जाते थे। राजा दशरथ ने राम से पूछा कि वह उन्हें अपने दुःख और अन्यमनस्कता का कारण बतायें; परन्तु राम ने कोई उत्तर नहीं दिया।

 

उसी समय मुनि विश्वामित्र ने राजा के दरबार में प्रवेश किया।

 

दशरथ ने मुनि को सम्मानपूर्वक अभिवादन करके पूछा- "हे अभिनन्दनीय मुनिवर! कृपया आप मुझे अपने आने का उद्देश्य बतायें। आप मुझसे जो चाहते हैं, मैं ऐसे किसी भी पदार्थ को अपने से विलग कर सकता हूँ अर्थात् आपको प्रदान कर सकता हूँ।"

 

इस पर विश्वामित्र जी बोले- "मैं एक महान् यज्ञ सम्पन्न कर रहा हूँ। राक्षस मुझे बहुत परेशान करते हैं। कृपया अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को मेरे साथ जाने की अनुमति दें। वह इन सब भयंकर राक्षसों को नष्ट कर देगा।"

 

दशरथ ने उत्तर दिया-"राम बहुत छोटा है। वह राक्षसों से युद्ध नहीं कर सकेगा। इसके अतिरिक्त, मैं क्षण-भर के लिए भी उसका वियोग सहन नहीं कर सकता। मैं वृद्ध हूँ।"

 

विश्वामित्र ने कुद्ध हो कर कहा- "तुमने मुझे किसी भी वस्तु से वियुक्त होने का निश्चय वचन दिया था। अब तुम अपना वचन पूरा नहीं करना चाहते हो। तुम सज्जन नृप नहीं हो।" तब वसिष्ठ जी ने मध्यस्थता की और दशरथ से कहा- "हे राजन्! तुम्हें अपना वचन पूरा करना चाहिए। मुनि विश्वामित्र राम की रक्षा करेंगे।"

 

राजा दशरथ ने राम के अनुचरों की ओर अभिमुख हो कर निर्देश दिया- "शीघ्र ही राम को यहाँ बुला कर लाओ।"

 

अनुचरों ने उत्तर दिया- "जब से वे तीर्थयात्रा से लौटे हैं, वे अपनी दैनिक क्रियाएँ ही नहीं कर रहे हैं। स्नान, भोजन और अच्छे वस्त्रों के प्रति उनका उपेक्षा भाव है। वे कहते हैं कि उनका जीवन व्यर्थ जा रहा है और यह संसार मिथ्या है। वे एक संन्यासी का सा जीवन-यापन कर रहे हैं। संसार के पदार्थों में उन्हें कोई आकर्षण प्रतीत नहीं होता। वे उस जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त करने के इच्छुक प्रतीत होते हैं- जहाँ कोई दुःख और चिन्ताएँ नहीं हैं।"

 

वसिष्ठ जी ने सेवकों से कहा कि वे राम को राजदरबार में लायें। फिर उन्होंने इस प्रकार राजसभा को सम्बोधित किया- "राम में वैराग्य विकसित हो गया है। वह शीघ्र ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लेंगे और फिर वह सारे कार्य आनन्दपूर्वक करेंगे।"

 

तब राम ने राजदरबार में कर अपने गुरु वसिष्ठ जी, मुनि विश्वामित्र जी और अपने पिता को प्रणाम किया।

विश्वामित्र जी ने राम से कहा- "मुझे अपने मन की स्थिति बताओ, तुम्हारे दुःख का कारण क्या है?"

 

राम ने उत्तर दिया- "हे पूज्य मुनि विश्वानित्र जी! मैं ऐसा ही करूँगा। कृपया सुनिए :

 

संसार

 

"यह संसार मिथ्या है। इस संसार में लेशमात्र भी सुख नहीं है। मनुष्य मरने के लिए उत्पन्न होते हैं और फिर जन्म लेने हेतु मृत्यु को प्राप्त होते हैं। अतएव, इस संसार में सब-कुछ मिथ्या है। मैंने विवेक विकसित कर लिया है, इसलिए मैंने ऐन्द्रिक सुखों के समस्त विचार बिलकुल त्याग दिये हैं। मनुष्य को मन की छलपूर्ण प्रकृति का ज्ञान होना चाहिए। मन ही संसार के अस्तित्व को सत्य के रूप में चित्रित करता है। केवल आत्मा ही सत्य है। मैं इस मिथ्या संसार से ऊब गया हूँ। मैं इस विकट संसार के कष्टों और दुःखों से मुक्त होने का उपाय खोजने की चेष्टा कर रहा हूँ। यह विचार मुझे दावानल की भाँति दग्ध कर रहा है।

 

धन-सम्पत्ति

 

"धन-सम्पत्ति सुख नहीं दे सकती। यह विपत्ति का स्रोत है। यह अनित्य होती है। यह कभी स्थिर नहीं रहती। यह हमेशा एक से दूसरे के पास जाती रहती है। यह बुराई को जन्म देती है। यह लोगों को भ्रामक मृगमरीचिका की भाँति प्रलोभन देती है। यह मनुष्य के हृदय को कठोर बना देती है। यह दूषित साधनों से प्राप्त की जाती है। यह मनुष्य में अभिमान उत्पन्न करके ईश्वर को विस्मृत करा देती है।

 

जीवन

 

"जीवन क्षणिक है। यह पानी के बुलबुले के समान है। यह विपत्तियों, दुःखों और आघातों से पूर्ण होता है; फिर भी मूर्ख, अज्ञानी मनुष्य इस सांसारिक जीवन से चिपका रहता है। यह शरीर एक भारी बोझ है। इस संसार में जीवन श्रम और दुःखों से व्याप्त है। मृत्यु निरन्तर हमारी ओर ताकती रहती है। अनेक प्रकार के रोग इस शरीर में उपद्रव मचाते रहते हैं। युवावस्था शीघ्रता से हमें छोड़ देती है और दुर्बलता तथा शरीर-विनाश के साथ वृद्धावस्था हमें घेरती है। सतत आत्म-विचार का अभ्यास करने वाला ही सात्त्विक जीवन-यापन करता है। जो आत्मज्ञान लाभ करके पुनर्जन्मों से मुक्त हो गया है, वही यथार्थ में सत्य एवं श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करता है। अन्य जनों के जीवन तो वृद्ध गर्दभों के जीवन जैसे हैं। इस प्रकार इस जीवन के समान निरर्थक कुछ भी नहीं है, जो सब प्रकार के गुणों से रहित है और मृत्यु, रोग एवं विपत्तियों का स्थान है।

 

अहंकार

 

"मैं इस विनाशक अहंकार से अत्यन्त भयभीत हूँ जो क्रियाओं, वासनाओं एवं कष्टों का जनक और समस्त बुराइयों का स्रोत है। यह भ्रामक है। यह लोगों को भ्रमित करता है। यद्यपि यह कुछ नहीं है, किन्तु सांसारिक जनों के लिए सब-कुछ है। 'मेरे' पन से इसका संसर्ग है। यह अविद्या से उत्पन्न है। यह दम्भ से उद्भूत है। अभिमान इसका पोषण करता है। यह सबसे बड़ा शत्रु है। यदि कोई इस अहंकार का त्याग कर दे, तो वह सुखी हो जायेगा। त्याग का रहस्य अहं के त्याग में है।

 

"अहंकार का स्थान मन में है। इसी प्रभाव में कर मनुष्य बुराई और दृष्कृत्य करता है। यह गहरी जड़ पकड़े हुए है। चिन्ताएँ और परेशानियाँ अहं-भाव से ही उत्पन्न होती हैं। अहंकार एक वास्तविक रोग है। अभिमान, क्रोध, मोह, काम, लोभ, लालच, ईर्ष्या और राग-द्वेष-ये सभी अहंकार के ही अनुचर हैं। अहंकार हमारे गुणो को और चित्त की शान्ति को नष्ट करता है। यह हमें फँसाने के लिए प्रेम का जाल बिछाता है। जो अहंकार से मुक्त है, वह सदा सुखी और शान्त रहता है। अहंकार के कारण वासनाएँ बढ़ती और फैलती जाती हैं। इस चिरकालिक शत्रु ने स्त्री-बच्चों और मित्रों के प्रलोभन हमारे चतुर्दिक् फैलाये हुए हैं, जिनके जादू को तोड़ना बहुत कठिन है। अहंकार से बड़ा कोई शत्रु नहीं है। हे परम ज्ञानी मुनि! मुझ पर अनुकम्पा करो, जिससे मैं इस विनाशक अहंकार से अपने को मुक्त कर सकूँ।

मन

 

"यह भयानक मन केवल अहंकार से उत्पन्न होता है। यह चंचल मन सड़क के कुत्ते की भाँति एक पदार्थ से दूसरे की ओर दौड़ता रहता है। यह सदैव बेचैन रहता है। यह इन्द्रिय-भोगों की ओर प्रवृत्त रहता है। यह अस्थिर प्रकृति का है। यह दुष्कामनाओं में सदा फँसा रहता है। समुद्र के जल-प्रवाह को पी जाना, मेरुपर्वत को उखाड़ फेंकना अथवा जलती हुई अग्नि को निगल जाना सम्भव है; परन्तु इस भयंकर मन पर नियन्त्रण करना असम्भव है। यह विश्व केवल इस मन के कारण प्रकट होता है। सारे कष्ट इस मन से उत्पन्न होते हैं। यदि विवेक और आत्मा की खोज के द्वारा इस मन का नाश कर दिया जाये, तो इस विश्व सहित सारे कष्टों का लोप हो जायेगा।

 

कामना

 

"कामना शान्ति की शत्रु है। यह एक उल्लू के समान है जो हमारे मोह-रूपी अन्धकार और लोभ-रूपी रात्रि में हमारे मनों के आस-पास मँडराती रहती है। यह हमारे समस्त सद्गुणों को नष्ट कर देती है। जिस प्रकार चिड़िया जाल में फँस जाती है, उसी प्रकार हम इच्छाओं के जाल में फँसे रहते हैं। कामनाओं की अग्नि ने हमें भस्म कर दिया है। अमृत में स्नान करना भी हमें शीतल नहीं कर सकता। कामना ही पुनर्जन्मों का और सब प्रकार के कष्टों, विपत्तियों तथा दुःखों का कारण है। यह एक नुकीली तलवार है। यह मनुष्यों के हृदयों tilde 7 चुभ कर अकारण ही उन्हें दुःख देती है।

 

शरीर

 

"यह शरीर मांस, चर्बी, हड्डी, नसों, तन्तुओं और रक्त से बना है। यह रोगों का घर है। यह विकारों से परिपूर्ण है। इसमें सड़ने की प्रवृत्ति है। इस शरीर में अहंकार स्वामी बन कर वास करता है और लोभ स्वामिनी। इसके दस उपद्रवी गायें (इन्द्रियाँ) हैं। मन इसका सेवक है। यह शरीर बुलबुले की भाँति है, जो क्षण-भर में विलीन हो जायेगा। यह एक हवा-भरे हुए गुब्बारे की भाँति है, जो कभी भी फट जायेगा। यह एक गन्दगी से भरे बर्तन की भाँति है, जो किसी भी क्षण टूट जायेगा। चमकीली चर्म वृद्धावस्था में मुरझाने वाली है, सिकुड़ने वाली है। उन मनुष्यों को धिक्कार है, जो इस शरीर को अमर आत्मा समझ कर अपने सुख और शान्ति को इस पर निर्भर मानते हैं। जिन्हें बादलों में चमकने वाली बिजली के स्थायित्व और गन्धर्व नगर में विश्वास है, वे ही इस शरीर को सत्य मान कर इसमें आसक्त होंगे।

 

बाल्यावस्था

 

"बालक असहाय स्थिति में होता है। वह अपने विचार प्रकट नहीं कर सकता। वह गूँगा है। वह मिट्टी और कूड़ा खा लेता है। बिना कारण रोने लगता है। वह अज्ञानी है। इस अवस्था में अग्नि, पानी आदि से सर्वदा खतरा हो सकता है। वह बड़ा क्षोभशील है। इस निरर्थक बाल्यावस्था को जीवन की सुखमयी स्थिति कैसे कहा जा सकता है?

 

युवावस्था

 

"जीवन की इस अवधि में युवक कामुकता का दास होता है। उसका मन दुर्विचारों से भरा रहता है। वह विभिन्न प्रकार के दुष्कृत्य करता है। उसके सद्गुणों का लोप हो जाता है। उसकी मुखाकृति वासनाओं से विकृत हो जाती है। युवावस्था का काल तीव्र गति से समाप्त हो जाता है। युवावस्था का आकर्षण बिजली की चमक की भाँति त्वरित फीका पड़ जाता है। वह मूर्ख व्यक्ति, जो अज्ञानतावश अपने क्षणिक यौवन पर आनन्दित होता है, पशु-मानव अर्थात् मनुष्य-रूप में पशु ही है। वह अल्प काल में ही अपनी मूर्खता पर पश्चात्ताप करता है। ऐसा युवक मिलना दुर्लभ है जो विनम्र हो, जो सन्तों के संसर्ग और सेवा में समय बिताता हो, जो सहानुभूतिपूर्ण एवं दयालु हो और जो सद्गुणों से विभूषित हो। यद्यपि वह धर्मग्रन्थों के अध्ययन में निपुण हो, तब भी वह वासना का दास हो जाता है। जिसने युवावस्था के समस्त अवरोधों पर विजय पा कर आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया हो, वह युवा होते हुए भी सबके द्वारा सम्मान का पात्र है। वह यथार्थ में बुद्धिमान् है।

 

कामुकता

 

"जिसका शरीर मांस, हड्डी, चर्बी, नसों और रक्त से बना है, उस स्त्री में क्या सौन्दर्य है? स्त्री में सौन्दर्य अल्पकालीन होता है। वह भ्रान्ति का कारण है। सिकुड़नों से पूर्ण चर्म वाली वृद्धा में सौन्दर्य कहाँ है ? स्त्रियाँ दुर्गुणों की लपटें हैं। वे पुरुषों को उसी प्रकार भस्म कर देती हैं, जिस प्रकार अग्नि तिनके को। वे उन्हें दूर से जला देती हैं; इसीलिए वे अग्नि से भी अधिक भयंकर हैं। किस प्रकार उनकी मधुर क्रीड़ाएँ पौरा शक्ति का नाश करती हैं और किस प्रकार उनके आलिंगन - चुम्बन पुरुषों की सुबुद्धि को पराजित कर देते हैं! सुन्दर स्त्री एक विषपूर्ण नशीले पदार्थ के समान है जो आकर्षक नशा उत्पन्न कर और विवेक-शक्ति को आवृत करके जीवन को नष्ट कर देता है। एक अज्ञानी, कामुक पुरुष स्त्री के प्रलोभन में फँस कर विकृत वासना-रूपी धागे से घसीट लिया जाता है। यह रहस्यमय संसार स्त्री से ही प्रारम्भ हुआ है और अपनी अवस्थिति के लिए उसी पर निर्भर है। वह हमारे अनन्त दुःखों की श्रृंखला का कारण है। मुझे उसके वक्षःस्थल, नेत्रों, नितम्बों और भौहों से क्या प्रयोजन-जिनका सार-तत्त्व मांस ही है और जो पूर्णतया असार हैं। यदि स्त्री का आकर्षण समाप्त हो जाये, तो सभी सांसारिक बन्धनों का अन्त हो जायेगा। उसका त्याग किये बिना, मैं शाश्वत ब्रह्मानन्द की प्राप्ति की आशा किस प्रकार कर सकता हूँ? काले नेत्रों वाली स्त्रियाँ, अज्ञानी कामुक पुरुषों को फँसाने के लिए कामदेव द्वारा बिछाये हुए जाल हैं। उन सुन्दर स्त्रियों के शरीर, जो मूर्ख पुरुषों द्वारा दुलारे जाते हैं, प्राण-विसर्जन के पश्चात् श्मशान-गृह में ले जाये जाते हैं। पशु और कीड़े उनके मांस का भक्षण करते हैं, गीदड़ उनके चर्म और मांस को फाड़ डालते हैं। मैं इस भ्रामक, क्षणिक ऐन्द्रिय सुख को नहीं भोगना चाहता। मैं केवल उस परमानन्द की स्थिति को प्राप्त करना चाहता हूँ जो जन्म-मरण के चक्र का अन्त कर दे।

 

वृद्धावस्था

 

"वृद्धावस्था देह को दुर्बल बना कर उसका सौन्दर्य समाप्त कर देती है। वृद्ध मनुष्य के साथ परिवार के सदस्य घृणा का व्यवहार करते हैं। वह असहाय अवस्था में होता है। उसकी इन्द्रियाँ शक्तिहीन हो जाती हैं। वह अपनी इच्छाओं को तुष्ट नहीं कर पाता। उसकी स्मरण-शक्ति ठीक नहीं रहती। वह अनेक असाध्य रोगों से पीड़ित हो जाता है। भोगों के लिए अतोषणीय (तृप्त होने वाली) कामना रहती है; परन्तु भोगने की सामर्थ्य नहीं है। इच्छाएँ (कामनाएँ) उसके हृदय को दग्ध करती हैं; परन्तु वह उन्हें सन्तुष्ट करने में असमर्थ है। मृत्यु मनुष्य के श्वेत मस्तक को एक पके हुए काशीफल की भाँति, जिसे वृद्धावस्था-रूपी नमक ने और स्वादिष्ट बना दिया है, आनन्दपूर्वक निगल जाती है। इस संसार में वृद्धावस्था अनिवार्य है। ऐसे कष्टपूर्ण सांसारिक जीवन से क्या लाभ, जो नाश और वृद्धावस्था के अधीन है?

 

काल

 

"काल इस पृथ्वी पर जीवन-रूपी धागे को काटने वाला चूहा है। इस विश्व में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो इस सब-कुछ हड़प करने वाले काल से बच सके। काल सर्वाधिक महान् मनुष्य को भी क्षण-भर के लिए नहीं छोड़ता। काल सारी वस्तुओं पर छाया हुआ है। इसका अपना दृश्यवान् रूप कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि दिन, महीने, वर्ष और युगों के नामों से अपूर्ण रूप से जाना जाता है। काल गर्दन से पाँव तक लटकती हुई मृतकों की हड्डियों की लम्बी जंजीर बाँधे हुए नाचता है। वह प्रलय के समय भयंकर अग्नि का रूप धारण करके सारे संसार को भस्मीकृत कर देता है। उसके मार्ग में कोई नहीं सकता। प्रलय के अन्त में यह स्वयं अपना अस्तित्व खो कर शाश्वतता में विलीन हो जाता है। थोड़े विश्राम के पश्चात् यह फिर सबका रचयिता, पालनकर्ता, संहारक और स्मरणकर्ता बन कर प्रकट होता है। इस प्रकार काल विस्तार करता है, परिपालन करता है और अन्त में सारी वस्तुओं को क्रीड़ावत् नष्ट कर देता है।

 

"यह मन स्त्रियों के संसर्ग में अपना विनाश कर लेता है। फिर शरीर वृद्धावस्था के भार से झुक जाता है। मनुष्य मृत्यु के समय अपनी मूर्खता पर दुःखी होता है। जो शरीर आज रेशमी वस्त्रों और मालाओं से सुसज्जित किया जाता है, वह कल को भस्म किया जाने वाला है अथवा गहरी कब्र में गाड़ दिया जाने वाला है। भयंकर विष विष नहीं है; परन्तु भोग-पदार्थ अत्यन्त भयंकर विष हैं। विष तो केवल एक शरीर को नष्ट करता है; किन्तु भोग-पदार्थों का विष एक के बाद एक, कई जन्मों तक फैल कर अनेकों शरीरों को नष्ट करता है। यहाँ जीवन जल के ऊपर बुलबुलों की भाँति अनिश्चित है। विषय-भोग बिजली की चमक की तरह अस्थिर हैं। युवावस्था के आनन्द क्षणभंगुर हैं।

 

"हे सम्माननीय मुनि! मुझे ऐसा उपदेश दीजिए, जिससे मैं शीघ्र दुःख, भय और सांसारिक कष्टों से मुक्त हो कर सत्य की ज्योति प्राप्त कर सकूँ। मुझे कष्टों, दुर्बलताओं, संशयों और भ्रमों से रहित शाश्वत पद निर्दिष्ट कीजिए। हे महात्मन् ! जीवन की वह कौन-सी अवस्था है, जन्म और मृत्यु लाने वाले कष्टों से जिसका सम्बन्ध हो? मुझे शाश्वत शान्ति, शाश्वत सुख और अमरता प्राप्त करने का उपाय बताइए।" दशरथ जी के दरबार में एकत्रित मुनियों के समक्ष राम इस प्रकार बोले

शुकदेव की कथा

 

तब विश्वामित्र ने कहा- "हे राम! तुम विवेक, वैराग्य, शुद्ध मति, बुद्धिमत्ता और स्पष्ट बोध से सम्पन्न हो। तुम्हारे लिए अधिक सीखने को कुछ नहीं है। तुम्हारे पास महर्षि व्यास के पुत्र शुक-जैसा आध्यात्मिक ज्ञान है। यद्यपि शुक को अन्तर्प्रज्ञा से ज्ञान हुआ था; फिर भी उन्हें अपने आध्यात्मिक अनुभवों के पुष्टिकरण के लिए कुछ निर्देश अपेक्षित थे।"

 

राम बोले- "हे मुनि! मुझे बतलाइए कि शुक, जिन्हें पहले अपने ज्ञान के विषय में निश्चय नहीं था, किस प्रकार बाद में वे अपने विश्वासों में स्थिर हुए।"

 

विश्वामित्र जी बोले- "हे राम ! मैं तुम्हें शुकदेव की कथा सुनाता हूँ, जिनका मामला ठीक तुम्हारे-जैसा है। उनमें महान् आध्यात्मिक ज्ञान था। वे इस संसार की मिथ्या प्रकृति पर गम्भीरता से चिन्तन करते थे और तुम्हारी ही भाँति इसके सारे सम्बन्धों से उदासीनता का भाव रखते थे। यद्यपि वे अध्यात्म-ज्ञान से सम्पन्न थे, फिर भी उनके मन में अस्थिरता थी। उन्हें अपने ज्ञान की निश्चितता में दृढ़ विश्वास नहीं था; फि अतः उनके मन में शान्ति नहीं थी। उन्होंने अपने पिता के पास जा कर निम्नांकित प्रश्नों का समाधान पूछा- 'कष्ट उत्पन्न करने वाली माया कहाँ से आयी? किस प्रकार इसका निराकरण होता है? इसका क्या कारण है? यह कहाँ तक फैलती है? कहाँ इसका अन्त होता है? संसार की उत्पत्ति कब हुई ?'

 

"व्यास जी ने इस विषय में सब-कुछ स्पष्ट रूप से समझाया। शुक को सन्तोष नहीं हुआ। यह सब-कुछ वे स्वयं जानते थे। तब व्यास जी ने अपने पुत्र को उसके प्रश्नों का हल प्राप्त करने हेतु जनक जी के पास भेजा। शुक विदेहनगरी में गये। दरबान ने व्यास जी के पुत्र शुक के आने का समाचार राजा को दिया; परन्तु वे उनके स्वागतार्थ आगे नहीं आये, क्योंकि वे उनकी समचित्तता की परीक्षा करना चाहते थे। शुक को सात दिन तक बिना भोजन के ड्यौढ़ी पर प्रतीक्षा करनी पड़ी और फिर भी उनका मन किंचित् अशान्त नहीं हुआ। फिर उन्हें और सात दिन तक बाहर के अहाते में रोका गया। तत्पश्चात् उन्हें राजभवन के अन्तर कक्ष में ले जाया गया। यहाँ उन्हें भली प्रकार से स्वादिष्ट भोजन परोसा गया और सुन्दर स्त्रियों द्वारा पुष्प, सुगन्धित द्रव्य और चन्दन आदि से सम्मानित किया गया। परन्तु शुक बिलकुल उदासीन रहे। वे कष्ट, ये मनोरंजन शुक के मन की दशा को प्रभावित कर सके, जो हवा के झोंकों के सामने चट्टान की भाँति स्थिर था। इन परीक्षणों से जनक समझ गये कि शुक ने परम शाश्वत शान्ति प्राप्त कर ली है।

 

"जनक जी उठे और ब्रह्मर्षि को नमस्कार करके बोले- 'तुमने जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। विश्व के सारे सम्बन्धों को त्याग कर तुमने परमोच्च फल प्राप्त कर लिया है। कृपया बताओ कि अब तुम यहाँ क्यों आये हो? हे महात्मन्! मैं सदैव तुम्हारी सेवा में