श्रीमद्भगवद्गीता

 

मूल संस्कृत पाठ, शब्दार्थ, अनुवाद और व्याख्या

 

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

अनुवादिका

श्रीमती गुलशन सचदेव

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण : २००५

द्वितीय हिन्दी संस्करण : २०१६

(१००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

ISBN 81-7052-175-0

HS 25

 

 

 

 

 

 

 

PRICE: 425/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर, जि. टिहरी-गढ़वाल,

उत्तराखण्ड, पिन २४९१९२' में मुद्रित

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समर्पित

भगवान् व्यास

एवं

भगवान् कृष्ण को

भगवान् विष्णु के अवतार वृन्दावन के

मुरलीमनोहर देवकीनन्दन राधावल्लभ

पतितोद्धारक अर्जुन के मित्र

भक्तों के आदर्श

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आमुख

 

 

भगवान् कृष्ण और अर्जुन के मध्य शुभ संवाद अथवा उपदिष्ट जीवन की परिभाषा ही भगवद्गीता है। इस अपूर्व ग्रन्थ का अनुवाद लगभग सभी भाषाओं में हो चुका है। विश्व-भर के दार्शनिक (तत्त्ववेत्ता), सन्तगण और अध्यात्मवादी इस ग्रन्थ से आकृष्ट हुए हैं। मानवता पर सम्भावित सभी कालों की समस्याओं का समाधान इसमें निहित है, यही भगवद्गीता की महिमा है। परम पूज्य श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज दर्शन, धर्म और भगवद्गीता पद्धति के महान् अर्थप्रदर्शक हैं। सर्वाधिक आधिकारिक उपलब्ध टीकाओं में ही उनकी टीका को प्रशस्य स्थान प्राप्त है।

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी के प्रारम्भिक काल में यह ग्रन्थ छह भागों की श्रृंखला में प्रकाशित हुआ जिसके समस्त खण्ड पृथक् पृथक् थे। योग-साधकों का हितचिन्तन करते हुए पश्चात् काल में इस ग्रन्थ को एक समग्र, बृहत् स्वरूप दिया गया। अनेक संस्करण मुद्रित होने के पश्चात् कुछ काल के लिए यह ग्रन्थ अनुपलब्ध रहा। साधकों के कल्याण हेतु इसे पुनः प्रकाशित किया गया है। इसे यथासम्भव शुद्ध स्वरूप देने का हमारा पूर्ण प्रयास रहा है। हमें पूर्ण विश्वास है कि साधक और सामान्य पाठकवृन्द इससे प्रशस्य रूप में लाभान्वित होंगे।

 

जुलाई १२, १९९५                                                                                     - डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विश्व-प्रार्थना

 

हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव!

तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है।

तुम सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ हो

तुम सच्चिदानन्दघन हो तुम सबके अन्तर्वासी हो

 

हमें उदारता, समदर्शिता और मन का समत्व प्रदान करो।

श्रद्धा, भक्ति और प्रज्ञा से कृतार्थ करो

हमें आध्यात्मिक अन्तःशक्ति का वर दो,

जिससे हम वासनाओं का दमन कर मनोजय को प्राप्त हों

हम अहंकार, काम, लोभ, घृणा, क्रोध और द्वेष से रहित हों।

हमारा हृदय दिव्य गुणों से परिपूरित करो

 

हम सब नाम-रूपों में तुम्हारा दर्शन करें।

तुम्हारी अर्चना के ही रूप में इन नाम-रूपों की सेवा करें।

सदा तुम्हारा ही स्मरण करें।

सदा तुम्हारी ही महिमा का गान करें।

तुम्हारा ही कलिकल्मषहारी नाम हमारे अधर-पुट पर हो

सदा हम तुममें ही निवास करें।

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रार्थनाएँ

व्यास-वन्दना

 

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र

येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः ।।

 

हे व्यास! भगवन्! आपको प्रणाम ! आपकी बुद्धि विशाल है। आपके नेत्र पूर्ण विकसित कमल की पंखुड़ियों के समान बृहत् हैं। आपने महाभारत रूपी तेल से पूर्ण ज्ञान का दीपक प्रज्वलित किया।

 

गुरु-वन्दना

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

 

गुरु सृष्टिकर्ता ब्रह्मा है, गुरु पालनकर्ता विष्णु है, गुरु संहारकर्ता महेश्वर है। निश्चित रूप से गुरु साक्षात् ब्रह्मस्वरूप है। गुरु को प्रणाम

 

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्

मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।

 

गुरु की मूर्ति ध्यान का मूल है, गुरु के चरण पूजार्ह हैं, गुरु की वाणी मन्त्र रूप है और गुरु की कृपा मोक्षप्रदा है।

 

कृष्ण-वन्दना

 

कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च।

नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ।।

 

गो-रक्षक, नन्द गोप के प्रिय, देवकी को आह्लादित करने वाले वसुदेव-पुत्र श्री कृष्ण को पुनः-पुनः साष्टाङ्ग प्रणाम !

 

हे कृष्ण ! अब तुम मेरे प्रिय सखा हो। आपके हृदय में मेरे लिए दया का भाव है। अब मुझे अपनी दिव्य लीलाओं और वेदान्त के रहस्यों का बोध कराओ। आपने गीता में कहा है- "मैं वेदान्तकृत् और वेदवित् हूँ।" आप मेरे सर्वोच्च गुरु हो। वेदान्त की दुर्बोध समस्याओं को मेरे लिए स्पष्ट करो। मुझे सरल पाठ पढ़ाओ कृपया बताओ-सर्वोच्च अद्वैत स्थिति, अद्वैत समाधि में स्थित, ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मज्ञानी शुकदेव ने परीक्षित को 'भागवत' का उपदेश क्यों दिया? सायुज्य अवस्था का आनन्द लेने वाले भक्त, असम्प्रज्ञात समाधि में स्थित योगी और अद्वैत-अवस्थारूप-समाधि में लीन ज्ञानी के अनुभवों में क्या अन्तर है? जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति, तुरीया और तुरीयातीत, क्षरपुरुष और अक्षरपुरुष एवं पुरुषोत्तम-इनमें क्या अन्तर है?

 

हे कृष्ण, आप मेरे हृदय में निवास करते हो, मेरे मन के साक्षी हो और मेरे प्राणों के स्वामी हो; अतः मैं विमलात्मन् हो कर आपसे स्पष्ट बात करता हूँ। मैं आपसे कुछ भी नहीं छिपा सकता; क्योंकि मेरे मन से प्रभूत सभी विचारों के आप साक्षी हो मुझे आपसे कोई भय नहीं। अब मेरे सखा हो आप मेरे साथ अर्जुन की भाँति आचार करो। मैं गाऊँगा, नृत्य करूँगा। आप वंशी बजाओ आओ! मिल कर माखन-मिश्री खायें। आओ! गीत गायें। मुझे गीता का ज्ञान दो। पुनः आपके मुखारविन्द से मुझे साक्षात् श्रवण करने दो।

 

हे दर्शनातीत प्रभो! मेरे आराध्य देव! इस विशाल ब्रह्माण्ड में अनन्त आकाश से ले कर मेरे पग तले की क्षुद्र घास पर्यन्त आपकी व्याप्ति और सूक्ष्म प्रवेशन है। इन सब नाम-रूपों के आप आधार हैं। आप मेरी आँख के तारे हृदय के दिव्य प्रेम हैं। आप मेरे प्राणों के प्राण, मेरे आत्मा के आत्मा, इन्द्रिय और बुद्धि के प्रकाशक, हृदय के मधुर संगीत-अनहत नाद और स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीरों के सारतत्त्व हैं।

 

मैं तो केवल आपको ही इस सृष्टि के स्वामी और मेरे तीनों शरीरों के नियन्ता के रूप में जानता हूँ। भगवन् ! बारम्बार आपको प्रणाम करता हूँ। आप ही मेरे केवल आधार हो। हे प्रेम और करुणा के सागर! आपके प्रति मेरी पूर्ण श्रद्धा है। उत्थान करो। उद्भासित करो। ज्ञानोद्दीप्त करो। पथ-प्रदर्शन करो। रक्षा करो। मेरे आध्यात्मिक पथ की बाधाओं को दूर करो। अज्ञान रूपी अविद्या का आवरण हटा दो। हे जगद्गुरु ! इस संसार के, इस जीवन के और इस शरीर के कष्ट अब और अधिक सहन नहीं होते, क्षण-भर को भी नहीं ! मुझे शीघ्र मिलो, प्रभो! मैं आपसे मिलने को लालायित हो रहा हूँ, द्रवित हो रहा हूँ, सुनो भगवन् सुनो, मेरी उत्कट आन्तरिक पुकार को सुनो। अत्याचारी मत बनो प्रभो! दीनबन्धु हो आप तो ! अधम-उद्धारक हो! पतित पावन हो !

 

हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव ! हे ज्ञान और आनन्द के मूल स्रोत! आप हमारे नेत्र के नेत्र हो, श्रोत्र के श्रोत्र हो, प्राण के प्राण हो, मन के मन हो, आत्मा के आत्मा हो। आप दृग्गोचर द्रष्टश हो, अश्रुत श्रोता हो, अचिन्त्य चिन्तक हो और अविदित वेत्ता हो आपसे प्रार्थना है-हमें सब आसक्तियों से मुक्त कर दो, हमें ज्ञान दो, पवित्रता दो, प्रकाश दो।

 

प्रिय प्रभो! प्राणनाथ! विभु विश्वनाथ ! हमारी प्रार्थना स्वीकार करो। हमारा मार्ग प्रशस्त करो। इस संसार के दलदल से हमें उबारो। हमें तेजस्वी बनाओ। हमारी रक्षा करो। हम केवल आपकी ही आराधना करते हैं, आपकी पूजा करते हैं, आपका ही ध्यान करते हैं और आपके ही शरणागत हैं।

 

 

प्रस्तावना

गीता की महिमा

 

श्रीमद्भगवद्गीता भगवान् कृष्ण और अर्जुन के मध्य संवाद रूप में महाभारत के भीष्म पर्व में निरूपित है। इस ग्रन्थ में अठारह अध्याय और सात सौ संस्कृत श्लोक समाविष्ट हैं। इन श्लोकों में महत्त्वपूर्ण (विचार्य) विषय संक्षेप में संवृत किया गया है। कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में भगवान् कृष्ण ने अर्जुन के साथ अत्यन्त मनोहारी, उपदेशात्मक संलाप में निगूढ़, उत्कृष्ट, आत्मोद्धारक आध्यात्मिक सत्यों को अनावृत किया और अर्जुन को योग, वेदान्त, भक्ति और कर्म के विरल रहस्यों का ज्ञान दिया। भगवान् कृष्ण के सभी उपदेश विस्तरशः मानव-कल्याण हेतु पश्चात्काल में भगवद्गीता के रूप में भगवान् वेदव्यास द्वारा लिपिबद्ध किये गये। जीवन में दैनिक आचार-व्यवहार, आध्यात्मिक उत्कर्ष तथा आत्म-साक्षात्कार हेतु मानवता, श्री व्यास जी की अत्यन्त ऋणी है जिन्होंने इस दिव्य गीत को उनके समक्ष प्रस्तुत किया श्रद्धायुक्त संयत मनुष्य ही 'गीता' का पूर्ण लाभ उठा सकते हैं जो कि आत्मा का विज्ञान है।

 

हिन्दू पंचाङ्ग के अनुसार मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को समस्त भारत में इस अद्भुत ग्रन्थ के प्रशंसकों और प्रेमियों द्वारा गीता-जयन्ती मनायी जाती है। इसी दिन संसार के समक्ष सञ्जय ने इस ग्रन्थ को प्रकाशित किया

 

विश्व के साहित्य में गीता के समान प्रेरक एवं उत्कृष्ट ग्रन्थ अन्य नहीं है। हिन्दू धर्म के सारभूत प्रधान नियम अत्यन्त स्पष्ट रूप से गीता में वर्णित हैं। यह प्रज्ञा का स्रोत है। आपका पथ-प्रदर्शक है। परम गुरु है। अक्षय आध्यात्मिक कोष है। आनन्द का निर्झर है। ज्ञान का रत्नाकर है। यह ग्रन्थ दिव्य कान्ति और विभूति से परिपूर्ण है।

 

गीता वेदों का सार है। उपनिषदों का निष्कर्ष है। सभी कालों में सभी प्रकार के लोगों के लिए यह एक सार्वभौम शास्त्र है। उन्नत विचारों और योग, भक्ति, वेदान्त तथा कर्म के व्यावहारिक आदेशों से युक्त यह अद्वितीय ग्रन्थ है। निगूढ़ विचारों और अन्तर्दृष्टि के सर्वोच्च शिखर का स्पर्शबोध है यह अद्भुत ग्रन्थ। इस संसार के त्रिविध तापों से क्लिष्ट आत्माओं को यह ग्रन्थ शान्ति और समाश्वासन प्रदान करता है अर्थात् आध्यात्मिक (शरीर से उत्पन्न होने वाली पीड़ा), आधिभौतिक (प्राणियों से उत्पन्न) एवं आधिदैविक (देवकृत्) पीड़ा

 

भगवद्गीता दिव्य सुधा है। यह चिन्तामणि (चिन्तन मात्र से कामनापूर्ति करने वाली मणि) है, कल्पतरु और कामधेनु है जो कल्पना मात्र से इच्छापूर्ति करती है। आप इसमें से मनोवांछित वस्तु ले सकते हैं। यह आनन्त्य शास्त्र है। यह मशरूम की भाँति अल्पकालिक नहीं है। मैं गीता को सदा अपने पास रखता हूँ। यह सबके लिए सहचरी (vade mecum) पुस्तिका है। शान्ति, आनन्द, सुख, प्रज्ञा, आत्मा, ब्रह्म, पुरुष, धाम, निर्वाण, परम पद, गीता-ये सभी पर्यायवाची हैं।

 

गीता अमृत का महापयोधि है। यह उपनिषदोपम वृक्ष का दिव्य अमर फल है। इस अलौकिक ग्रन्थ में कर्म, भक्ति और ज्ञान दर्शन का तथा इनके संयोगात्मक विवरण का निष्पक्ष स्पष्टीकरण मिलता है। भगवद्गीता विश्व-भर में मंजुल सुगन्धि विकीर्ण करने वाला विरल और अतिशोभन पुष्प है। सभी उपनिषद् मानो गाय हैं, श्री कृष्ण उपनिषद् रूपी गायों के दोग्धा हैं, अर्जुन बछड़ा है जिसने आत्म-ज्ञान रूपी दुग्ध का सर्वप्रथम पान किया जो समस्त मानवता और अर्जुन के कल्याणार्थ दिव्य 'गोपाल' श्री कृष्ण द्वारा 'गीता' के रूप में दुहा गया। गीता द्वारा केवल अर्जुन प्रत्युत् प्रत्येक व्यक्ति की शंकाओं और समस्याओं का समाधान होता है। देवकीनन्दन, गोकुल के गोप-मित्र भगवान् कृष्ण की जय हो! हृदय की पवित्रता और ध्यान द्वारा जो गीतामृत पान करता है वह अमृतत्व, शाश्वत आनन्द, चिर-शान्ति और अक्षय्य सुख का अनुभव करता है।

 

जिस प्रकार सघन अगाध सागर की गहराई अमूल्य रत्नों का भण्डार है उसी प्रकार गीता में अगणित आध्यात्मिक रत्न निहित हैं। श्रद्धा और विश्वास के साथ आपको गीता रूपी रत्नाकर में गहन अवगाहन करना होगा। तभी तो आप आध्यात्मिक मुक्ता-मणियाँ चयन कर पायेंगे। गीता के सूक्ष्म गहन ज्ञान को भी तभी आप समझ पायेंगे।

 

सभी कालों के लिए गीता एक अनुपम शास्त्र है। हिन्दू धर्म के प्रामाणिक शास्त्र 'प्रस्थानत्रयी' की श्रेणी में गीता को माना जाता है। गीता, जीवन की महत्ता को दर्शाने वाला आत्मा का अमर गीत है। भगवान् कृष्ण द्वारा दिये गये गीता के उपदेश समस्त संसार के लिए अनुकरणीय हैं। यह योग का विशिष्ट ग्रन्थ है। इसकी भाषा अत्यन्त सरल है। संस्कृत भाषा का प्रारम्भिक ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी इसका अध्ययन कर सकता है। इसमें चार प्रकार के योग निरूपित हैं-कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग और ज्ञानयोग

 

आज तक गीता पर असंख्य टीकायें उपलब्ध हैं। प्रत्येक श्लोक पर एक खण्ड लिखा जा सकता है। कर्म में आस्था रखने वाला व्यस्त व्यक्ति श्री बालगङ्गाधर तिलक की टीका (गीता-रहस्य) से लाभान्वित हो सकता है, भक्ति भाव से पूर्ण व्यक्ति श्रीधर की टीका पढ़े और तर्कशील व्यक्ति श्री शंकराचार्य की टीका से लाभ उठा सकता है।

 

इस अलौकिक ग्रन्थ पर सैकड़ों टीकायें उपलब्ध हैं। गीता एक सागर है। श्री शंकर, श्री रामानुज और श्री मध्वाचार्य ने गीता पर अपनी-अपनी व्याख्या की है और इस प्रकार दर्शन के अपने मत प्रतिपादित किये। कोई भी व्यक्ति गीता-सिन्धु में गहन अवगाहन कर के दिव्य ज्ञान रूपी अमूल्य मोती ला सकता है और व्याख्या रूप में प्रस्तुत कर सकता है। गीता का स्तवन हो ! गीता के भगवान् का स्तवन हो!

 

गीता के उपदेश उदार, सार्वभौमिक और उत्कृष्ट हैं। इसके उपदेश किसी विशेष जाति, मत, धर्म, आयु, स्थान अथवा देश के लिए नहीं प्रत्युत् समस्त विश्व के लिए हैं। उपनिषदों पर आधारित ये उपदेश ऋषियों के सनातन ज्ञान का कोष हैं। इसकी विधा (पद्धति) सबके लिए बोधगम्य है। मानव मात्र के लिए इसमें सान्त्वना, शान्ति, स्वाधीनता, मोक्ष और पूर्णत्व का सन्देश है।

 

परमहंसों (यति, संन्यासी) के लिए गीता मानसरोवर झील है और पिपासु साधकों के लिए क्रीड़ा का विषय है यह आनन्द-पयोधि है जिसमें सत्यान्वेषक हर्षोल्लास और मस्ती में प्लवन (तरण) करते हैं। यदि स्पर्शमणि (पारस) किसी लोहे के टुकड़े को एक कोण से भी स्पर्श कर ले तो पूर्ण लौह-खण्ड स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है। इसी भाँति आप किसी एक श्लोक के भाव में भी मग्न रहेंगे, तो निस्सन्देह आप दिव्यत्व में रूपान्तरित हो जायेंगे।

 

दैनिक स्वाध्याय हेतु केवल गीता का अध्ययन ही पर्याप्त है। इसमें सभी समस्याओं का समाधान आपको मिलेगा। जितना अधिक श्रद्धा और विश्वास से आप इसका अध्ययन करेंगे उतना ही अधिक गूढ़ ज्ञान, सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि और स्पष्ट, यथार्थ चिन्तन आपका होगा। गीता के एक श्लोक के भाव में लीन रहने पर भी आपके समस्त दुःखों का अन्त होगा, आप जीवन के लक्ष्य-अमरत्व और शाश्वत शान्ति प्राप्त करेंगे।

 

गीता का संवाद सम्पूर्ण विश्व के लिए है। मनुष्य-जाति के प्रधान भाग के लिए है। कुरुक्षेत्र के मैदान में यह ज्ञान भगवान् कृष्ण द्वारा अर्जुन को आज से पाँच सहस्र वर्ष पूर्व दिया गया था।

 

भगवान् के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसे अभूतपूर्व, अद्भुत ग्रन्थ को प्रकाश में नहीं ला सकता। पाठकों का पथ प्रशस्त करने वाला, परमानन्द की प्राप्ति में उन्नायक, सहायक और शान्तिप्रद यह ग्रन्थ आज भी जीवन्त है। ज्ञान-स्वरूप, मोक्षदायक परमात्मा के अस्तित्व का यह साक्षात् प्रमाण है।

 

सम्पूर्ण विश्व ही एक युद्धक्षेत्र है। वास्तविक कुरुक्षेत्र तो आपके भीतर है। महाभारत का युद्ध अभी भी आपके भीतर पूर्ण उग्रता से चल रहा है। अविद्या धृतराष्ट्र है। जीवात्मा अर्जुन है। हृदय-गुहा में विराजित भगवान् कृष्ण सारथि हैं। शरीर आपका रथ है। इन्द्रियाँ अश्व हैं। मन, अहंभाव, इन्द्रियाँ,

 

संस्कार, वासनायें, इच्छायें, राग-द्वेष, काम, ईर्ष्या, लोभ, अभिमान और दम्भ (कपट) आपके घोर शत्रु हैं।

 

अध्ययनार्थ प्रकाशदीप

 

गीता में सूक्ष्म गूढ़ ज्ञान निहित है, अतः आपको महती श्रद्धा, अनन्य भक्ति और अत्यन्त शुचिता से किसी पारंगत विद्वान् अथवा ब्रह्म-निष्ठ गुरु के सान्निध्य में इसका अध्ययन करना चाहिए। गीता के सत्यार्थ करतल पर रखे फल की भाँति तभी प्रकट होंगे। स्वामी मधुसूदन सरस्वती, स्वामी शंकरानन्द और श्री शंकराचार्य जैसे प्रबुद्ध ज्ञानियों की टीकायें आपके लिए अतीव उपयोगी रहेंगी।

 

सांसारिक लोग कितने ही बुद्धिमान् क्यों हों, गीता के मूल उपदेश को ग्रहण नहीं कर सकते। वे अनावश्यक वाद-विवाद और निरर्थक तर्क में फँस जाते हैं। वे मिथ्यावाद और उपदेशों के छिद्रान्वेषण में लग जाते हैं। अज्ञानी पुरुष यही कहेंगे-“श्लोकों में अन्तरंग सम्बन्ध नहीं है। वे अव्यवस्थित रूप से संहत किये गये हैं। उनमें पुनरावृत्ति है।" यदि वे किसी विद्वान् से श्रद्धा और विश्वास के साथ गीता का अध्ययन करें, तो उनके समस्त सन्देह नष्ट हो जायेंगे। उन्हें यह ज्ञान भी हो जायेगा कि सभी अध्यायों में सभी श्लोकों का अन्योन्य निकट सम्बन्ध है। उपनिषदों में और गीता में पुनरावृत्ति उपयुक्त है। मन पर गम्भीर स्थायी प्रभाव डालने के लिए ऐसा किया जाता है।

 

भगवान् कृष्ण चेतना के विभिन्न स्तरों से वचन कहते हैं। गीता में 'अव्यक्त' शब्द कहीं तो मूल प्रकृति के भाव में आया है और कहीं-कहीं परब्रह्म के अर्थ में भी प्रयोग किया गया है। अतः श्लोकों का वास्तविक अर्थ जानने के लिए मनीषी शिक्षक की सहायता आवश्यक है। कठोपनिषद् में 'इष्टकाः' शब्द का अर्थ देवता है। हठ योग में कहा है- “गङ्गा और यमुना के संगम पर एक युवती कन्या है।" इसका विशिष्ट अर्थ है- “इड़ा और पिंगला के मध्य सुषुम्ना नाड़ी है।" गुरु के बिना ऐसे शब्दों का अर्थ समझना कठिन है। इसी प्रकार से गुरु के बिना गीता के श्लोकों का अर्थ-बोध दुर्गम है। अन्यथा आप उस व्यक्ति के समान ही रहेंगे जो भोजन करने वाले व्यक्ति द्वारा 'सैन्धव' माँगने पर घोड़ा ले आया; क्योंकि सैन्धव शब्द का अर्थ घोड़ा भी है और नमक भी।

 

गीता में समन्वय

 

मनुष्य तीन मूल घटकों का योग है-संज्ञान, भाव और इच्छा। मानव-प्रकृति त्रिविध है-क्रियाशील, भावुक और ज्ञानशक्ति सम्पन्न अतः तीन प्रकार के योग आचक्षित हैं-ज्ञानयोग जो आत्म-विश्लेषण करने वाले चिन्तनशील प्रकृति के मनुष्य के लिए है। भक्तियोग भावुक लोगों के लिए और कर्मयोग क्रियाशील (राजसिक) व्यक्तियों के लिए है। एक योग अन्य योग की भाँति ही प्रभावपूर्ण है।

 

गीता में तीन मार्गों के सिद्धान्त के निर्देशन हैं, वे हैं-ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग और कर्म मार्ग गीता के उपदेशों के अनुसार तीनों में कोई विरोध नहीं है। कर्म, भक्ति और ज्ञान दर्शन को गीता अद्भुत रूप से सूत्रबद्ध करती है। पूर्णत्व की प्राप्ति हेतु तीनों में अनुरूपता लाना अत्यन्त आवश्यक है। तदर्थ आपके पास श्री शंकर का मस्तिष्क, भगवान् बुद्ध का हृदय और राजा जनक का हस्त होना आवश्यक है। इस शरीर रूपी रथ के तीन घोड़े-कर्म, भाव और बुद्धि में सामञ्जस्य हो, तभी यह रथ सहज रूप से चलेगा और आप अपने लक्ष्य तक अचिरेण सुरक्षित पहुँच सकते हैं। अपनी अन्तरात्मा में तभी आप आनन्दित हो सकते हैं। केवल तभी आप 'सोऽहम्' का गीत गा सकते हैं। केवल तभी आप 'अनन्त' के साथ समस्वर हो सकते हैं। केवल तभी आप आत्मा का अनहत नाद श्रवण कर सकते हैं और आत्मा के मधुर सङ्गीत का रसपान कर सकते हैं। स्वधर्म का पालन करते हुए पूर्णत्व, मोक्ष अथवा चरम लक्ष्य की प्राप्ति ही गीता का प्रमुख उपदेश है। भगवान् कृष्ण अर्जुन से कहते हैं-अतः अनासक्त भाव से कर्तव्य कर्म करो; क्योंकि आसक्ति रहित हो कर कर्म करने से मनुष्य परब्रह्म को प्राप्त होता है।

 

सामवेद के महावाक्य 'तत्-त्वम्-असि' (तत्त्वमसि) अर्थात् 'वह तुम हो' की व्याख्या के आधार पर गीता तीन भागों में विभक्त है। इस विचारधारा के अनुसार प्रथम छह अध्याय कर्मयोग और 'त्वम्' पद की प्रकृति का निरूपण करते हैं। इसके पश्चात् के छह अध्याय भक्तियोग और 'तत्' पद का दर्शन कराते हैं। अन्तिम छह अध्याय ज्ञानयोग और 'असि' पद का ज्ञान कराते हैं जो 'जीव-ब्रह्म-ऐक्य' संस्थापन करने में समर्थ है।

 

गीता के अठारह अध्याय असमन्वित रूप से सूत्रबद्ध नहीं हैं। एक अध्याय का दूसरे के साथ निकट का सम्बन्ध है। अर्जुन की विषादपूर्ण अवस्था में दूसरे अध्याय के उपदेशों से उसके नेत्र खुले और आत्मा की नित्यता को प्रदीप्त करने वाले वचनों से उसे पुनः शक्ति और साहस मिला। तब अर्जुन ने कर्मयोग और कर्मफल-त्याग का अवबोध किया। उसने इन्द्रियों और मन का संयम तथा एकाग्रता और ध्यान की विधियों को सीखा तदुपरान्त भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को विश्व-रूप-दर्शनार्थ तैयार करने के लिए उसके समक्ष विविध विभूतियों का विवरण दिया। अर्जुन ने अतिशोभन (देदीप्यमान) विश्व दर्शन का अनुभव किया। तब उसने जीवन्मुक्त की प्रकृति को समझा। उसे क्षेत्र ज्ञान, तीन गुणों के ज्ञाता और पुरुषोत्तम का ज्ञान हुआ। इसके पश्चात् अर्जुन ने दिव्य विभूतियों, तीन प्रकार की श्रद्धा और अन्त में संन्यासयोग के सार का ज्ञान ग्रहण किया। जिस प्रकार किसी विद्यार्थी को विश्वविद्यालय में ज्ञान दिया जाता है, उसी प्रकार भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को आध्यात्मिक विश्वविद्यालय में आत्म-ज्ञान प्रदान किया। अर्जुन की विभिन्न शंकायें थीं। भगवान् कृष्ण ने उसकी सभी शंकाओं का एक-एक करके निवारण किया। योग के एक सोपान से दूसरे सोपान तक आरोहण हेतु उन्होंने अर्जुन को प्रेरित किया। अन्ततः अर्जुन ने सर्वोच्च सोपान पर अपना पग रखा, आत्म-ज्ञान प्राप्त किया और हर्षित हो कर बोला-"हे मेरे प्रभो! मेरा मोह नष्ट हो गया है। आपकी कृपा से मुझे ज्ञान हो गया है। अब मैं कृतसंकल्प हूँ। मेरे सन्देह पूर्णतया नष्ट हो गये हैं। अब मैं आपके वचन का परिपालन करूँगा।"

 

राग-द्वेष और अहंभाव का विनाश करके आप जीवन्मुक्त हो सकते हैं। इच्छाओं, तृष्णाओं, अवशिष्ट संस्कारों और संकल्पों का विनाश करके आप मुक्त संन्यासी हो सकते हैं। एवंविध, निज सच्चिदानन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हुए आप राजा जनक की भाँति संसार के क्रिया-कलापों में रत भी रह सकते हैं। आप तब कर्म-बन्धन में नहीं पड़ेंगे और कर्म आपको दूषित नहीं करेंगे; क्योंकि ब्रह्मज्ञान से कर्तापन का भाव नष्ट हो चुका है। यही गीता का सार है।

 

 

दो विधाएँ

 

उपनिषदों के ऋषि गौरव से घोषणा करते हैं कि वास्तविक पुरुष सर्वव्याप्त, अमर आत्मा है जो इस शरीर, मन और जगत् का आधार है और पाँच कोषों-अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनन्दमय कोष का भी आश्रय है।

 

दुग्ध में नवनीत और काष्ठ में अग्नि की भाँति इस शरीर में निहित स्वयंज्योतित आत्मा का साक्षात्कार ही इस जीवन का लक्ष्य है। आत्मा अन्तर्यामी है। शरीर रूपी भवन का वह अदृश्य शासक अथवा गुप्त स्वामी है।

 

सतत गहन ध्यान द्वारा उस अक्षय्य, अमर्त्य, भावातीत आत्म तत्त्व की प्राप्ति ही सत्य धर्म है। शाश्वत आत्मा में जीवन ही वास्तविक जीवन है। भूत, भविष्य और वर्तमान से अतीत, आदि, अन्त और मध्य से परे उस आत्म तत्त्व के तो खण्ड हैं और ही अवयव, वह स्थूल है, सूक्ष्म, ऐसे परम तत्त्व के साथ ऐक्य भाव पूर्ण जीवन ही वास्तविक जीवन है।

 

पुरातन ऋषियों ने इस रहस्यमय अलौकिक आत्म तत्त्व को दिव्य ज्ञानचक्षुओं से आत्मसात् किया और उसी आत्म-ज्ञान की ज्योति से संसार के पदार्थों को उजागर किया। यह आत्म-बोध की साक्षात् प्रमाण की विधि है।

 

संगीत, प्रकृति, कला और विज्ञान के द्वारा आप ज्ञान-गिरि-शिखर तक आरोहण कर सकते हैं। यह अप्रत्यक्ष विधि है। आप कार्य से कारण तथा अन्ततः कारण रहित कारण परब्रह्म इन्द्रियातीत सत्य को प्राप्त कर सकते हैं। हमारे पाश्चात्य वैज्ञानिकों का प्रयोजन यदि मनुष्य को भौतिक सुख प्रदान करना ही है तो वे मानो अन्धकार में कुछ टटोलने का प्रयास कर रहे हैं। विज्ञान का लक्ष्य अन्वेषण, परीक्षण, निरूपण, विश्लेषण और अध्ययन द्वारा प्रकृति के नियमों तथा अणु, परमाणु ऊर्जा, गति तथा शारीरिक और मानसिक प्रपंच (दृश्य जगत्) के आत्यन्तिक सत्य का आधार खोजना है। सच्चा वैज्ञानिक तो केवल वेदान्ती है। सत्य के प्रति उसकी खोज की विधा पृथक् है। जो वैज्ञानिक पहले यह कहते थे-"इस संसार से परे कुछ नहीं है", आज वही घोषणा करते हैं- "जितना अधिक मैं इस दृश्य जगत् का ज्ञान करता हूँ, उतना अधिक मैं भ्रमित होता हूँ। बुद्धि प्रमेय और भावशून्य है। इस परिवर्तनशील प्रपंच से परे कूटस्थ बोधगम्य शक्ति है। चक्रावर्तिन् जीवन्त विद्युत् कणों के पीछे स्थिर, गतिशून्य शक्ति है जो बुद्धि और जगत् से अतीत है।" उपनिषदों का ब्रह्म वेदान्त का आत्मा है जो प्रकृति के नियमों का अधिष्ठाता है।समुपगमन (approach) की मेरी विधा उत्तरकालीन है अर्थात् कार्य से कारण की ओर। वेदान्ती विधा पूर्वकालीन है अर्थात् कारण से कार्य की ओर उपगमन दोनों का लक्ष्य एक है।"

 

 

दो मार्गों का सन्धान

 

विष्णु पुराण में भगवान् विष्णु की उत्कृष्ट रूप से गुणस्तुति की गयी है और भगवान् शिव को गौण स्थान दिया गया है। शिव पुराण में भगवान् शिव का स्तवन मुख्य है और भगवान् हरि का गौण देवी भागवतम् में देवी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है और भगवान् शिव तथा भगवान् हरि को गौण साधक के हृदय में अपने इष्टदेव के प्रति प्रगाढ़, अटूट श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए ऐसा किया जाता है। शिव, हरि और देवी एक ही हैं। वे तो भगवान् के विभिन्न स्वरूप हैं। शिव को हरि से और हरि को शिव से गौण समझना मूर्खता है।

 

एवंविध, एक स्थान पर भगवान् कृष्ण कर्मयोग की श्लाघा करते हैं-"कर्म संन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते"-"निश्चित रूप से कर्मयोग कर्म-संन्यास से श्रेष्ठतर है" (/) अन्य स्थान पर वे योग को सर्वोच्च स्थान देते हुए कहते हैं-"योगी तपस्वी से श्रेष्ठ है, वह ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना जाता है; कर्मयोगी से भी श्रेष्ठ है। अतः हे अर्जुन ! तू योगी बन जा" (/४६) एक अन्य स्थान पर भगवान् भक्तियोग की प्रशंसा करते हुए कहते हैं- "वह परम पुरुष तो हे पार्थ, केवल अनन्य भक्ति द्वारा ही प्राप्य है" (L / R * R) एक अन्य स्थान पर वे ज्ञानयोग की स्तुति में कहते हैं- "यह सभी उदार हैं; किन्तु ज्ञानी तो मेरा आत्म-स्वरूप है, आत्मवत् वह मुझमें स्थित है जो कि अन्तिम लक्ष्य है" (/२२)

 

अनभ्यस्त नव-साधक इन श्लोकों को पढ़ कर भ्रमित हो जायेगा; किन्तु गहन चिन्तन किया जाये, तो भ्रम के लिए कोई स्थान नहीं रहता। साधक के हृदय में निज मार्ग-विशेष के प्रति आस्था जागृत करने के लिए भगवान् कृष्ण ने प्रत्येक योग की प्रशंसा की है। स्मरण रहे, गीता समस्त विश्व के लिए पठनीय ग्रन्थ है। यह केवल अर्जुन के लिए ही नहीं सुनायी गयी। प्रत्येक योग समान रूप से प्रभावपूर्ण और प्रबल है।

 

गीता का सार

 

गीता पुनः-पुनः साधक को अनासक्त वृत्ति अंकुरित करने का प्रबल उपदेश देती है। बारम्बार गीता का यही सन्देश मिलता है कि संसार में ऐसे रहना चाहिए जैसे जल में कमल-पत्र-जल से सर्वथा अप्रभावित। जो मनुष्य अनासक्त भाव से सभी कर्म प्रभु को समर्पित करके करता है, वह जल में कमल-पत्र की भाँति पाप से अप्रभावित रहता है, "पद्मपत्रमिवाम्भसा" (/२२)

 

मोह आसक्ति का कारण है। आसक्ति रजस् गुण का प्रतिफल है। अनासक्ति सत्त्व से उत्पन्न होती है। आसक्ति आसुरी सम्पदा है। अनासक्ति दैवी सम्पदा है। आसक्ति अज्ञान, स्वार्थ और मोह से होती है। आसक्ति मृत्यु का कारण है। अनासक्ति ज्ञान है। अनासक्ति से मोक्ष-प्राप्ति होती है। वस्तुतः अनासक्ति का अभ्यास कठोर अनुशासन है। इसका अभ्यास पुनः-पुनः करना होगा। सम्भव है चलना सीखते हुए शिशु की भाँति आप गिर पड़े; किन्तु प्रफुल्ल हृदय से, मुस्कराते हुए आपको पुनः उठना पड़ेगा। असफलतायें अवरोध नहीं हैं, वे तो सोपान हैं सफलता के। आत्मस्थ होने का प्रयास करो अपनी ही आत्मा में स्थित रहो। अपनी परिधि में रहो। सतत आत्म-चिन्तन करो। स्वभावतः ही सभी आसक्तियाँ नष्ट हो जायेंगी। भौतिक आसक्तियों के विनाश हेतु आत्मा अथवा परमात्मा से आसक्ति प्रबल प्रतिकारक का कार्य करती है। अनासक्त व्यक्ति ही दूसरों से प्रेम कर सकता है। उसके पास दिव्य प्रेम है। अतः आसक्ति रहित हो कर निरन्तर कर्म में रत रहना कर्तव्य है; क्योंकि आसक्ति रहित हो कर कर्म करने से मनुष्य परमात्मा को प्राप्त होता है।

 

अध्याय तेरह, चौदह और पन्द्रह ज्ञानयोग को प्रतिपादित करते हैं। जिसे प्रकृति और पुरुष का ज्ञान है, तीन गुण और उनके व्यापार का ज्ञान है और माया रूपी अद्भुत संसार-वृक्ष का ज्ञान है, वह प्रकृति और उसके गुणों का अतिक्रमण कर के अनासक्ति और आत्म ज्ञान के खड्ग से इस अनोखे बद्धमूल (संसार) वृक्ष को काट कर जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त करने वाले आत्म-साक्षात्कार की सद्यः अनुभूति कर सकता है। अध्याय पन्द्रह आत्मा को प्रेरित करने वाला है। इसमें वेदान्त का सार निहित है। इस प्रवचन को अवधारण करने वाला व्यक्ति अचिरेण मोक्ष-प्राप्ति करता है। वह परब्रह्म के अनश्वर धाम को पहुँचता है। इन बीस श्लोकों को कण्ठस्थ करो और भोजन से पूर्व इनका उच्चारण करो। भोजन ग्रहण करने से पूर्व सभी संन्यासी इसका गान करते हैं।

 

अध्याय अठारह पुनः-पुनः पढ़ने योग्य है। सम्पूर्ण गीता शास्त्र का सार इसमें निहित है। गीता-ज्ञान रूपी अनुपम शैल-पाद का यह सर्वोच्च शिखर है। यह अमूल्य हार का मुकुट मणि है। इसी में प्रथम सत्रह अध्यायों के उपदेशों के सार संक्षेप में आचक्षित हैं।

 

दूसरे अध्याय के श्लोकों में १९,२०,२३ और २४ नम्बर के श्लोकों की अनवरत स्मृति और अभ्यास आप पर अमरत्व की वृष्टि करेंगे और भय तथा देहाध्यास (शरीर और आत्मा में ऐक्य भाव) का निवारण करेंगे।

 

'ये हि संस्पर्शजा भोगा...' ( /२२) , 'इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम्..." (१३/ ) और 'विषयेन्द्रिय संयोगात्...' (१८/३८) की शिक्षाओं का सतत अभ्यास और स्मृति वैराग्य लाने में सक्षम हैं।

 

अध्याय के श्लोक ७१ और अध्याय के श्लोक ३९ परम शान्ति के देने वाले हैं। अध्याय के श्लोक २७ और २८, अध्याय के श्लोक ११ से १४ और २६, अध्याय के श्लोक ,१२,१३ और १४, अध्याय को श्लोक ३४, अध्याय १२ के श्लोक से १० और अध्याय १८ के श्लोक ५१ से ५३ आत्म-साक्षात्कार हेतु अध्यात्म-साधना-योग-साधना में पथ प्रदर्शित करते हैं। अध्याय श्लोक ११ से गीता-दर्शन प्रारम्भ होता है। अध्याय १८ का श्लोक ६६ गीता में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है- "सब धर्मों को त्याग कर एक मेरी शरण में जाओ, शोक मत करो, मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त करूँगा।" भगवान् कृष्ण से अर्जुन कहते हैं- "मेरा हृदय लघुता से आहत है, मेरा मन किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया है। मैं आपसे पूछता हूँ-निश्चित रूप से मेरे लिए जो श्रेयस्कर हो, वह बात कहिए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, मुझे उपदेश दीजिए।" अध्याय के श्लोक में अर्जुन द्वारा पूछे गये इस प्रश्न का उत्तर भगवान् कृष्ण अध्याय १८ के श्लोक ६६ में देते हैं। सम्पूर्ण गीता का सार अध्याय १८ के श्लोक ६५ और ६६ में अन्तर्निहित है।

 

अध्याय १८ के श्लोक ६५ में 'नवधा भक्ति' का सार निहित है। मनोवृत्तियों के दमन की साधना यही है। पुनः पुनः भगवान् पर मन एकाग्रित करने से सभी सांसारिक विचार नष्ट हो जाते हैं। भक्तियोग को कदाचित् ही राजयोग से पृथक् किया जा सकता है। ये दोनों योग एकरूप हैं। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि भगवान् के प्रति भक्ति से ही समाधि की अवस्था प्राप्त हो सकती है- 'ईश्वरप्रणिधानाद्वा' अर्थात् आत्म-समर्पण से। क्रियायोग और राजयोग के नियम में ईश्वर के प्रति समर्पण भाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। 'मन्मना भव' का अभिप्राय है-मन को लीन करना। यह राजयोग साधना है। भक्तियोग कहाँ समाप्त होता है और राजयोग कहाँ प्रारम्भ होता है, यह कहना कठिन है। राजयोग भक्तियोग का पूरक है। भक्तियोग और राजयोग के मध्य कोई सीमारेखा अथवा दृढ़ नियम नहीं है। राजयोगी एक भक्त भी है और भक्त एक राजयोगी है। केवल नाम भिन्न हैं। भ्रमित और निराश अवस्था से ग्रस्त अर्जुन को प्रोत्साहित करने के लिए भगवान् कृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करने के लिए ये वचन कहते हैं- “तुम मुझे प्राप्त होओगे। मैं तुम्हें सत्य वचन कहता हूँ, तुम मुझे प्रिय हो।" अध्याय अठारह के श्लोक ६५ के इन उपदेशों का पालन करो। जिसने इन चार महान् उपदेशों का पालन कर लिया, वह असमय अप्रतिज्ञ समर्पण भाव लाने में सक्षम होगा।

 

अगला श्लोक आत्म-समर्पण का भाव दर्शाता है। अद्वैत वेदान्ती के अनुसार इसकी व्याख्या इस प्रकार होगी- "व्यष्टिभाव को त्याग दो। तुम मोक्ष प्राप्त करोगे तुम जीवन्मुक्त हो जाओगे।" भक्तिपन्थ का आचार्य इस प्रकार व्याख्या करेगा - "सभी कर्म और कर्मफल भगवान् के चरणों में अर्पित कर दो। भगवान् तुम्हें मुक्त करेंगे।" यहाँ धर्म का अर्थ इन्द्रिय-धर्म से नहीं है; क्योंकि जीवन्मुक्त भी देखता है, सुनता है, स्वाद लेता है और इसी प्रकार अन्य कार्य करता है, किन्तु वह ये सब साक्षीभाव में (द्रष्टा बन कर) करता है। इन्द्रियों के कर्म में वह स्वयं को एकरूप नहीं कर लेता। अर्जुन की जिज्ञासा का नियत उत्तर भगवान् कृष्ण इस श्लोक में देते हैं।

 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।।

 

और अर्जुन की जिज्ञासा थी- “मेरा हृदय लघुता से आहत है। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया हूँ। मैं आपसे पूछता हूँ, निश्चित रूप से मेरे लिए जो श्रेयस्कर हो, उसे कहिए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, मुझे उपदेश दीजिए।"

 

योग-वेदान्त पर अधिक पुस्तकों के अध्ययन की आवश्यकता नहीं है। यदि उन दो श्लोकों के भाव में आप लीन रह सकते हैं तो अमृतत्व, शाश्वत आनन्द और आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होगी।

 

अहंभाव त्याग कर निष्काम भाव से कर्म करो। कर्म और उसके फल भगवान् की सन्तति मान कर उन्हें समर्पित कर दो। मन और अहंता भगवान् को दे कर जीवन को दिव्य बनाओ। मन और बुद्धि उन्हें दे कर जीवन को आध्यात्मिक बना लो (मच्चित, युक्त, मत्परः) भगवान् पर मन एकाग्र करो उनके प्रति भक्तिभाव अर्जित करो। सब प्राणियों के कल्याण में लग जाओ (सर्वभूत हिते रतः) सर्वस्व भगवान् को अर्पित कर दो, तभी उनकी सत्ता में प्रवेश पा सकोगे।" सम्पूर्ण गीता में यही स्वर झंकृत हो रहा है।

 

गीता में साधना निम्न श्लोकों में निरूपित है :

 

कर्मयोग-/४८; /२०,२१, २२ और २४

 

भक्तियोग -/२७,३४; १२/; १८/५२,५३ और ५४

 

जपयोग-/१४

 

अभ्यासयोग - १२/

 

हठयोग-/१० और १२

 

राजयोग-/२५ और २६

 

ज्ञानयोग-/२८; / और

 

रक्षण

 

गीता का अध्ययन, कुछ लोग उसमें निहित उपदेशों में छिद्रान्वेषण अथवा आलोचनात्मक दृष्टिकोण ले कर करते हैं। किन्तु प्रगाढ़ श्रद्धा और विश्वास के साथ यदि अध्ययन किया जाये, तो गीता के उपदेश बोधगम्य हो सकते हैं।

 

एक व्यक्ति ने समाचार-पत्र में आलोचनात्मक आक्षेप इस प्रकार दिया- "गीता पावन ग्रन्थ कदापि नहीं है। यह तो हिंसा का पाठ पढ़ाती है। भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को अपने सम्बन्धियों और गुरुजनों की हिंसा के लिए आज्ञा दी '' ऐसा प्रतीत होता है, इस समालोचक को गीता का ज्ञान ही नहीं था। वह विरोचन की भाँति है जिसने प्रजापति से आध्यात्मिक शिक्षा तो ग्रहण की, परन्तु अपनी कुटिल मति के कारण शरीर को ही आत्मा मान लिया। निश्चित रूप से वह आमिष (दैहिक) दर्शन का अनुयायी होगा। वह गीता के दार्शनिक पक्ष की गम्भीरता को समझने में सक्षम नहीं है; क्योंकि उसकी बुद्धि स्थूल और दुर्भेद्य होने के कारण सत्य को ग्रहण नहीं कर सकती आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति हेतु उसने गीता नहीं पढ़ी, प्रत्युत् आक्रामक दृष्टिकोण से उसका अध्ययन किया है। यदि वास्तव में उसने इन निम्न तीन श्लोकों का महत्त्व जान लिया होता तो व्यर्थ की आलोचना की होती वे श्लोक हैं-

 

"जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मान लेता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं; क्योंकि तो वह मारता है और ही मरता है (/१९)

 

"अतः उठो वे मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। तुम तो मात्र बाह्य निमित्त बन जाओ।" (११/३३)

 

"जो व्यक्ति अहंभाव (कर्तृत्वभाव) से मुक्त है, इन लोगों को मार कर भी जिसकी बुद्धि प्रभावित नहीं होती, वह तो मारता ही है और ही कर्म-बन्धन में आता है।" (१८/१७) सार्वभौम सत्ता इन संकीर्ण मूल्यों से अतीत है।

 

साधक यदि आप्तकाम है, उसे भौतिक सुखों की अब कामना नहीं है, उसका चित्त शान्त है, उसके मन की अशुद्धि नष्ट हो चुकी है और वह निर्मल मन हो गया है, तो किसी भी सन्त पुरुष की शिक्षायें उसके हृदय को भेद कर ऐसे प्रभावित करती हैं जैसे शुद्ध, स्वच्छ और श्वेत वस्त्र को रंगीन जल यही कारण है कि श्रवण, निदिध्यासन और ध्यान से पूर्व साधक से विवेक, वैराग्य, शम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रियनिग्रह), उपरति (विषयभोग से उदासीनता) का अभ्यास अपेक्षित है। सत्य और भगवत्साक्षात्कार के पथ पर चलने वाले साधकों से अनुशासन और मानस-शुद्धि पूर्वापेक्षित हैं।

 

परमात्मा के स्वभाव का जब कहीं वर्णन किया जाता है वहाँ भी वे लोग जिनकी बुद्धि पाप रहित और पवित्र नहीं होती, अविश्वास और आशंका के शिकार हो जाते हैं जैसा कि इन्द्र और विरोचन के साथ हुआ। इसलिए उपदिष्ट ज्ञानोदय तो केवल उसी व्यक्ति में होता है जिसने इसी जन्म में अथवा पूर्व-जन्म में तपश्चर्या से अघमर्षण कर लिया हो। श्रुति कहती है-"जिस महान् पुरुष की गुरु-भक्ति उतनी ही अधिक है जितनी भगवान् के प्रति, उसको यह सब ज्ञान निजात्मा में ही प्रकाशित हो जाता है।"

 

कुछ लोग अपनी रसना को शान्त करने के लिए गङ्गा नदी में मछली पकड़ते हैं और अपना बुरा कर्म उचित सिद्ध करने के लिए गीता का सहारा लेते हैं-"उसे शस्त्र काट नहीं सकते और अग्नि जला नहीं सकता" (/२३) कैसा अद्भुत दर्शन है! असुर भी शास्त्र को उद्धृत कर सकते हैं। ये लोग विरोचन के मतानुयायी हैं। वे अधम, मोहग्रस्त निकृष्ट मनुष्य हैं। वे गीता का ज्ञान नहीं समझ सकते; क्योंकि उनका विवेक आसुरी वृत्तियों को अपनाने के कारण भ्रमित हो गया है। भगवान् करे, उन्हें सूक्ष्म और पवित्र (निर्मल) बुद्धि प्राप्त हो! गीता के उपदेशों को सम्यक् प्रकार से समझने और उसी भाव में जीवन यापन करने के लिए उन्हें आभ्यन्तर, आध्यात्मिक शक्ति और विवेक प्राप्त हो!

 

कुछ अज्ञानी मनुष्यों का कथन है-"कृष्ण भगवान् नहीं हैं। वे अवतार नहीं हैं। वे वासनायुक्त गोपालक थे जिन्होंने काम-वासना में गोपियों के साथ क्रीड़ा की।" भगवान् कृष्ण की उस समय आयु क्या थी? क्या वे सात वर्ष के बालक नहीं थे? लेशमात्र भी काम-वासना उनमें हो सकती थी क्या? रासलीला और माधुर्यभाव (भक्त और भगवान् के मध्य प्रेम भाव), सर्वोच्च भक्ति की पराकाष्ठा, आत्म-निवेदन अथवा भगवान् के प्रति पूर्ण आत्म-समर्पण के रहस्य को कौन जान सकता है? नारद, शुकदेव, चैतन्य, मीरा, हफ़ीज़, रामानन्द, सखियाँ अथवा गोपियाँ ही इस रासलीला की महिमा और रहस्य को जान सके तदर्थ सखियाँ ही प्रशिक्षित थीं। क्या बालावस्था में भगवान् कृष्ण ने चमत्कार नहीं दिखाये ? क्या उन्होंने यह नहीं दर्शाया कि वे स्वयं ही भगवान् विष्णु के अवतार थे? क्या शैशव काल में उन्होंने अपनी माताश्री को अपना अलौकिक रूप नहीं दिखाया ? क्या उन्होंने कालिय नाग के फण पर खड़े हो कर उसे वशीभूत नहीं किया? क्या उन्होंने स्वयं को अगणित कृष्ण रूपों में गुणित नहीं किया ? गोपियाँ कौन थीं? कृष्ण को सर्वत्र देखने वाली और स्वयं में कृष्ण के दर्शन करने वाली वे गोपियाँ भगवदुन्मत्त नहीं थीं? मुरली की धुन उन्हें दिव्य आनन्द अथवा पावन तादात्म्यता में पहुँचा देती थी। वे देहाध्यास से अतीत थीं।

 

भगवान् के लिए मिथ्या अपवाद करने और दोषदृष्टि रखने वालों की नियति क्या होगी? "मेरी अनुत्तम, अविनाशी, परा प्रकृति को जानते हुए बुद्धिहीन मनुष्य मुझ अव्यक्त को व्यक्त भाव में आया समझते हैं" (/२४)

 

समस्त प्राणियों के महान् स्वामी अर्थात् मुझको मनुष्य रूप में अवतरित देख कर मेरी परात्पर प्रकृति से अनभिज्ञ मंदधी मनुष्य मेरा उपहास करते हैं। आशाशून्य, कर्मशून्य, ज्ञानशून्य वे लोग विक्षिप्त हो कर छाद्मिक, क्रूर (पशुतुल्य) और आसुर प्रकृति वाले हो जाते हैं" (/११,१२) अज्ञानान्धकार से आवृत वे असत्य को सत्य मान कर पदार्थों को विपरीत भाव में देखते हैं। ऐसे आसुरी वृत्ति वाले तो कर्म की परिभाषा जानते हैं, त्याग की, शुचिता की, सदाचार की और ही वे सत्य को जानते हैं, ऋजुता को। किंकर्तव्यविमूढ़ ऐसे मनुष्यों को मैं आसुरी योनियों में डालता हूँ। मुझे प्राप्त हो कर वे आवागमन के चक्र में फँस जाते हैं और निम्न योनियों को प्राप्त होते हैं" (१६/१९,२०)

 

अनेक विचारशून्य व्यक्ति यह शंका करते हुए कहते हैं-"इतने अल्प समय में भगवान् ने समर भूमि में अर्जुन को गीता कैसे सुना दी? असम्भव, ऐसा नहीं हो सकता?" यह शंका अनुचित है। यह सब तो अर्जुन को श्रुति-प्रकाश हुआ भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को सहजावबोध हेतु दिव्य चक्षु प्रदान किया। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् प्रभु कुछ भी करने में समर्थ हैं। उनकी कृपा हो तो मूक वाचाल बन जाये और पंगु पहाड़ पर चढ़ जाये

 

विप्रतिपन्न (विरुद्ध) श्लोकों का समाधान

 

एक विपक्षी लिखता है- "गीता के तीसरे अध्याय के ३३वें श्लोक में कहा गया है-'एक ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुरूप ही कार्य करता है। सभी प्राणी प्रकृति का अनुसरण करते हैं। संयम क्या करेगा?' जब प्रकृति ही सर्वेसर्वा है, तो हमें मन तथा इन्द्रियों को वश में करने के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता ही क्या है? जब प्रकृति ही सर्वाधिक शक्तिशाली है, पराजित करने में समर्थ है, तो साधना उसे पराभूत कैसे कर सकती है?"

 

अगले श्लोक में भगवान् कृष्ण विशेष रूप से राग-द्वेष पर विजय पाने का उपदेश देते हैं। साधना से प्रकृति को संयत किया जा सकता है। गीताध्ययन करते समय केवल एक श्लोक के अर्थ में ही नहीं अटक जाना चाहिए इसे तो केवल उसी अध्याय के पूर्व और पश्चात् के श्लोकों से सम्बद्ध करना होगा, प्रत्युत् पूर्व के अध्याय भी ध्यान में रखने होंगे। विरुद्ध विषयों का सम्बन्ध बनाना होगा। तभी आपको समुचित उत्तर प्राप्त होगा।

 

भगवान् के आदेश की अवहेलना करके जो लोग कर्तव्य कर्म को त्याग कर शान्त बैठ जाते हैं, वे ऐसे त्याग से लाभान्वित नहीं हो सकते। तीसरे अध्याय ३०वें श्लोक में भगवान् का आदेश है-“सर्व कर्म मेरे समर्पण करके, आत्मस्थ (एकाग्रचित्त) हो कर, आशा और ममत्व को त्याग कर, मानसिक तनाव से मुक्त हो कर (हे अर्जुन), तुम युद्ध करो अर्थात् अपने कर्तव्य का पालन करो।" यह माया तो ज्ञानी पुरुषों के लिए भी अजेय है; फिर सांसारिक मनुष्य के लिए तो इसे जीतना और भी दुष्कर है। उनके लिए बिना ज्ञान प्राप्त किये कर्म-त्याग अपेक्षित नहीं है। वे माया के भँवर में फँस जायेंगे। उनके लिए इन्द्रियनिग्रह अथवा संयम का कोई प्रयोजन नहीं। सांसारिक मनुष्य राग-द्वेष से दूर नहीं रह सकते।

 

ज्ञानियों में अवशिष्ट सात्त्विक वासनायें भी, जो शरीर को स्थिर रखती हैं, प्रकृति के गुण-त्रय-सत्त्व, रजस् और तमस् के अनुरूप ही कार्य करते हैं। समाधि की यथार्थ अवस्था में होने पर ये तीन गुण ज्ञानियों को भी प्रभावित करते हैं। उन्हें इस शरीर से अथवा अन्य भोग-विषयों में आसक्ति नहीं होती; अतः वे मानसिक रूप से प्रभावित नहीं होते। वे अपनी आत्मा में ही परितुष्ट और प्रशान्त होंगे। अनवाप्त विषयों को प्राप्त करने की उनमें आकाङ्क्षा नहीं होगी और ही वे प्राप्त की हानि (लोप) पर शोक करेंगे।

 

आलोचक कहता है- "गीता के १८वें अध्याय के ६१वें श्लोक में भगवान् कृष्ण कहते हैं- 'हे अर्जुन! भगवान् सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं और कुम्हार के चक्र पर आरूढ़ पात्र की भाँति अपनी माया से सबको भ्रमित करते हैं।' तो क्या मनुष्य पूर्ण रूप से परतन्त्र है? क्या वह तिनके की भाँति इधर से उधर ठुकरा दिया जाता है? क्या उसे कर्म की कोई स्वतन्त्रता नहीं है?"

 

भगवान् कृष्ण अर्जुन को अनुनीत करने का और उसकी शंकानिवारण का यथोचित प्रयास करते हैं जिससे कि वह अपने कर्म में संलग्न हो जाये। वे अर्जुन से काम लेना चाहते हैं; इसीलिए नितान्त असहाय अवस्था में वे उपदेश देते हैं। छठे अध्याय के ५वें श्लोक में भगवान् कृष्ण पुरुषार्थ का उपदेश देते हुए कहते हैं- “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्-आत्मा से आत्मा का उद्धार करना है। आत्मा को अवसाद की स्थिति में नहीं ले जाना।"

 

प्रकृति के वश में होने के कारण स्वाभाविक गुणों का परित्याग नहीं हो सकता। कभी भी कर्तव्य-कर्म की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। भगवान्, अन्तःकरण के स्वामी, व्यष्टि आत्मा के अनुशासक हैं। अविद्या के नाश होने पर्यन्त मनुष्य अपने धर्म (कर्तव्य-कर्म) से बँधा रहता है। अर्जुन क्षत्रिय है; अतः भगवान् चाहते हैं कि वह युद्ध में प्रवृत्त हो अन्यत्र भगवान् कहते हैं : "श्रेयान् स्वधर्मः" -अपना कर्तव्य ही कल्याणप्रद है (१८/४७)

 

एक आलोचक का कथन १५वें  अध्याय के ७वें श्लोक में भगवान् कृष्ण कहते हैं- 'इस जीव-जगत् में अमर आत्मा मेरा ही अंश है जो प्रकृति में अवगुंठित मन सहित छह इन्द्रियों को आकृष्ट करता है।' यह स्पष्ट है कि जीव ब्रह्म का अंश है, तो हम जीव को ब्रह्म का तद्रूप कैसे कह सकते हैं? अद्वैत सिद्धान्त त्रुटिपूर्ण है।"

 

७वें अध्याय के १७वें श्लोक में भगवान् कहते हैं- "निश्चित रूप से ज्ञानी मेरे समान है।" यहाँ वे तद्रूपता की बात कर रहे हैं। अद्वैत सिद्धान्त समुचित ही है। सर्वोच्च साक्षात्कार अद्वैत स्थिति है। अधिकारी के अनुरूप ही भगवान् उपदेश करते हैं। अद्वैत दर्शन कतिपय सूक्ष्म बुद्धि वाले ही ग्रहण कर सकते हैं। अन्य साधकों की रुचि का ध्यान रखते हुए अन्य दर्शनों की व्याख्या वे अन्य स्थानों पर करते हैं। पूर्णत्व के दृष्टिकोण से तो जीव की सत्ता है और साक्षात्कार की। वस्तुतः एक ब्रह्म ही का केवल अस्तित्व है। द्वैत (dualism), विशिष्टाद्वैत (qualified monism), शुद्ध अद्वैत (pure monism) साक्षात्कार की सीढ़ी के पृथक् पृथक् सोपान हैं। सत्य यही है कि साररूप में जीव और ब्रह्म एक हैं। द्वैतवादी और विशिष्टाद्वैतवादी अन्ततः अद्वैत के लक्ष्य अथवा एकत्व के साक्षात्कार को ही प्राप्त करते हैं। भ्रम में पड़ें। विचारों को स्पष्ट करें और समुचित विचारधारा के प्रकाश में ज्ञान प्राप्त करें।

 

उपसंहार

 

पाश्चात्य देशवासियों द्वारा भारत देश को गीता के कारण महान् गौरव प्राप्त हुआ है। एक बार महात्मा गान्धी लन्दन के एक बड़े पुस्तकालय में गये और ग्रन्थाध्यक्ष से पूछा- "कौन-से आध्यात्मिक ग्रन्थ का सर्वाधिक निष्कासन होता है?" अध्यक्ष ने कहा- "गीता।" संसार भर में गीता को ख्याति प्राप्त है। सभी साधकों को इस विश्वविख्यात ग्रन्थ के सम्पूर्ण अठारह अध्याय कण्ठस्थ कर लेने चाहिए। नित्य स्वाध्याय और प्रतिदिन दो श्लोक कण्ठस्थ कर लेने से लगभग दो वर्षों में यह कार्य सम्पन्न हो सकता है।

 

भारत ही नहीं प्रत्युत् विश्व की समस्त पाठशालाओं और विश्वविद्यालयों में गीता का अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए। समस्त विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में गीता को पाठ्यपुस्तक (Textbook) का स्थान मिलना चाहिए। उनके अध्ययन क्रम (curriculum) में इसे प्रतिष्ठित करना चाहिए। शिक्षा की प्रत्येक प्रणाली में इसे महत्त्वपूर्ण स्थान उपलब्ध होना चाहिए। लौकिक ज्ञान के साथ-साथ जिसमें नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान भी दिया जाता है, वही शिक्षा-पद्धति सुदृढ़, व्यावहारिक, विषयबोधगम्य और पूर्ण मानी जाती है।

 

आपमें से प्रत्येक को इस उत्कृष्ट, मार्मिक ग्रन्थ का अध्ययन सावधानी से करना चाहिए। यह परम शान्ति, अमृतत्व और शाश्वत आनन्द की वृष्टि करने वाला ग्रन्थ है।

 

विश्वास का दीप जलाओ शान्ति की इस अद्भुत पताका को वायु में ऊँचा लहराने दो। अनासक्ति का महान् कवच धारण करो। विवेक का अलौकिक शस्त्र उठाओ। 'सोऽहम्', 'शिवोऽहम्', किंवा 'राधेश्याम', 'सीताराम' का अमर गीता गाओ के प्रणव बैण्ड के साथ वीरतापूर्वक आगे बढ़ो साहस का अनोखा शंख बजाओ शंका, अविद्या, आसक्ति, अहं आदि शत्रुओं का विनाश करके आत्मा के अनन्त साम्राज्य में प्रवेश करो। दिव्य अमृतरस का आस्वादन करो। अमृतत्व का सुधारस पान करो।

 

भगवान् गणेश, भगवान् सुब्रह्मण्यम्, भगवान् राम, देवी सीता, श्री सरस्वती, श्री भगवान् व्यास, श्री आदि शंकराचार्य, पद्मपादाचार्य, हस्तामलकाचार्य, त्रोटकाचार्य, सुरेश्वराचार्य, श्री ज्ञानदेव, श्री स्वामी विश्वानन्द, श्री स्वामी विष्णुदेवानन्द, ब्रह्मविद्या के समस्त गुरुओं, सन्तों, आचायर्यों, भगवद्गीता के समस्त टीकाकारों को मेरा मौन प्रणाम, जिनकी अहेतुकी कृपा और आशीर्वाद के कारण ही मैं भगवद्गीता पर टीका लिखने में समर्थ हुआ। आप सबको उनका आशीर्वाद प्राप्त हो!

 

भगवद्रीता की जय हो! भगवान् कृष्ण की जय हो जिन्होंने मनुष्यों के कल्याणार्थ अथवा उन्हें मोक्ष दिलाने के लिए गीता का ज्ञान विश्व के समक्ष रखा ! आप सब पर उनकी कृपा-वृष्टि हो ! गीता तुम्हारा लक्ष्य, आदर्श और केन्द्र हो ! गीता