श्रीमद्भगवद्गीता

 

मूल संस्कृत पाठ, शब्दार्थ, अनुवाद और व्याख्या

 

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

अनुवादिका

श्रीमती गुलशन सचदेव

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण : २००५

द्वितीय हिन्दी संस्करण : २०१६

(१००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

ISBN 81-7052-175-0

HS 25

 

 

 

 

 

 

 

PRICE: 425/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर, जि. टिहरी-गढ़वाल,

उत्तराखण्ड, पिन २४९१९२' में मुद्रित

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समर्पित

भगवान् व्यास

एवं

भगवान् कृष्ण को

भगवान् विष्णु के अवतार वृन्दावन के

मुरलीमनोहर देवकीनन्दन राधावल्लभ

पतितोद्धारक अर्जुन के मित्र

भक्तों के आदर्श

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आमुख

 

 

भगवान् कृष्ण और अर्जुन के मध्य शुभ संवाद अथवा उपदिष्ट जीवन की परिभाषा ही भगवद्गीता है। इस अपूर्व ग्रन्थ का अनुवाद लगभग सभी भाषाओं में हो चुका है। विश्व-भर के दार्शनिक (तत्त्ववेत्ता), सन्तगण और अध्यात्मवादी इस ग्रन्थ से आकृष्ट हुए हैं। मानवता पर सम्भावित सभी कालों की समस्याओं का समाधान इसमें निहित है, यही भगवद्गीता की महिमा है। परम पूज्य श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज दर्शन, धर्म और भगवद्गीता पद्धति के महान् अर्थप्रदर्शक हैं। सर्वाधिक आधिकारिक उपलब्ध टीकाओं में ही उनकी टीका को प्रशस्य स्थान प्राप्त है।

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी के प्रारम्भिक काल में यह ग्रन्थ छह भागों की श्रृंखला में प्रकाशित हुआ जिसके समस्त खण्ड पृथक् पृथक् थे। योग-साधकों का हितचिन्तन करते हुए पश्चात् काल में इस ग्रन्थ को एक समग्र, बृहत् स्वरूप दिया गया। अनेक संस्करण मुद्रित होने के पश्चात् कुछ काल के लिए यह ग्रन्थ अनुपलब्ध रहा। साधकों के कल्याण हेतु इसे पुनः प्रकाशित किया गया है। इसे यथासम्भव शुद्ध स्वरूप देने का हमारा पूर्ण प्रयास रहा है। हमें पूर्ण विश्वास है कि साधक और सामान्य पाठकवृन्द इससे प्रशस्य रूप में लाभान्वित होंगे।

 

जुलाई १२, १९९५                                                                                     - डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विश्व-प्रार्थना

 

हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव!

तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है।

तुम सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ हो

तुम सच्चिदानन्दघन हो तुम सबके अन्तर्वासी हो

 

हमें उदारता, समदर्शिता और मन का समत्व प्रदान करो।

श्रद्धा, भक्ति और प्रज्ञा से कृतार्थ करो

हमें आध्यात्मिक अन्तःशक्ति का वर दो,

जिससे हम वासनाओं का दमन कर मनोजय को प्राप्त हों

हम अहंकार, काम, लोभ, घृणा, क्रोध और द्वेष से रहित हों।

हमारा हृदय दिव्य गुणों से परिपूरित करो

 

हम सब नाम-रूपों में तुम्हारा दर्शन करें।

तुम्हारी अर्चना के ही रूप में इन नाम-रूपों की सेवा करें।

सदा तुम्हारा ही स्मरण करें।

सदा तुम्हारी ही महिमा का गान करें।

तुम्हारा ही कलिकल्मषहारी नाम हमारे अधर-पुट पर हो

सदा हम तुममें ही निवास करें।

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रार्थनाएँ

व्यास-वन्दना

 

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्रनेत्र

येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः ।।

 

हे व्यास! भगवन्! आपको प्रणाम ! आपकी बुद्धि विशाल है। आपके नेत्र पूर्ण विकसित कमल की पंखुड़ियों के समान बृहत् हैं। आपने महाभारत रूपी तेल से पूर्ण ज्ञान का दीपक प्रज्वलित किया।

 

गुरु-वन्दना

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

 

गुरु सृष्टिकर्ता ब्रह्मा है, गुरु पालनकर्ता विष्णु है, गुरु संहारकर्ता महेश्वर है। निश्चित रूप से गुरु साक्षात् ब्रह्मस्वरूप है। गुरु को प्रणाम

 

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्

मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।

 

गुरु की मूर्ति ध्यान का मूल है, गुरु के चरण पूजार्ह हैं, गुरु की वाणी मन्त्र रूप है और गुरु की कृपा मोक्षप्रदा है।

 

कृष्ण-वन्दना

 

कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च।

नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ।।

 

गो-रक्षक, नन्द गोप के प्रिय, देवकी को आह्लादित करने वाले वसुदेव-पुत्र श्री कृष्ण को पुनः-पुनः साष्टाङ्ग प्रणाम !

 

हे कृष्ण ! अब तुम मेरे प्रिय सखा हो। आपके हृदय में मेरे लिए दया का भाव है। अब मुझे अपनी दिव्य लीलाओं और वेदान्त के रहस्यों का बोध कराओ। आपने गीता में कहा है- "मैं वेदान्तकृत् और वेदवित् हूँ।" आप मेरे सर्वोच्च गुरु हो। वेदान्त की दुर्बोध समस्याओं को मेरे लिए स्पष्ट करो। मुझे सरल पाठ पढ़ाओ कृपया बताओ-सर्वोच्च अद्वैत स्थिति, अद्वैत समाधि में स्थित, ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मज्ञानी शुकदेव ने परीक्षित को 'भागवत' का उपदेश क्यों दिया? सायुज्य अवस्था का आनन्द लेने वाले भक्त, असम्प्रज्ञात समाधि में स्थित योगी और अद्वैत-अवस्थारूप-समाधि में लीन ज्ञानी के अनुभवों में क्या अन्तर है? जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति, तुरीया और तुरीयातीत, क्षरपुरुष और अक्षरपुरुष एवं पुरुषोत्तम-इनमें क्या अन्तर है?

 

हे कृष्ण, आप मेरे हृदय में निवास करते हो, मेरे मन के साक्षी हो और मेरे प्राणों के स्वामी हो; अतः मैं विमलात्मन् हो कर आपसे स्पष्ट बात करता हूँ। मैं आपसे कुछ भी नहीं छिपा सकता; क्योंकि मेरे मन से प्रभूत सभी विचारों के आप साक्षी हो मुझे आपसे कोई भय नहीं। अब मेरे सखा हो आप मेरे साथ अर्जुन की भाँति आचार करो। मैं गाऊँगा, नृत्य करूँगा। आप वंशी बजाओ आओ! मिल कर माखन-मिश्री खायें। आओ! गीत गायें। मुझे गीता का ज्ञान दो। पुनः आपके मुखारविन्द से मुझे साक्षात् श्रवण करने दो।

 

हे दर्शनातीत प्रभो! मेरे आराध्य देव! इस विशाल ब्रह्माण्ड में अनन्त आकाश से ले कर मेरे पग तले की क्षुद्र घास पर्यन्त आपकी व्याप्ति और सूक्ष्म प्रवेशन है। इन सब नाम-रूपों के आप आधार हैं। आप मेरी आँख के तारे हृदय के दिव्य प्रेम हैं। आप मेरे प्राणों के प्राण, मेरे आत्मा के आत्मा, इन्द्रिय और बुद्धि के प्रकाशक, हृदय के मधुर संगीत-अनहत नाद और स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीरों के सारतत्त्व हैं।

 

मैं तो केवल आपको ही इस सृष्टि के स्वामी और मेरे तीनों शरीरों के नियन्ता के रूप में जानता हूँ। भगवन् ! बारम्बार आपको प्रणाम करता हूँ। आप ही मेरे केवल आधार हो। हे प्रेम और करुणा के सागर! आपके प्रति मेरी पूर्ण श्रद्धा है। उत्थान करो। उद्भासित करो। ज्ञानोद्दीप्त करो। पथ-प्रदर्शन करो। रक्षा करो। मेरे आध्यात्मिक पथ की बाधाओं को दूर करो। अज्ञान रूपी अविद्या का आवरण हटा दो। हे जगद्गुरु ! इस संसार के, इस जीवन के और इस शरीर के कष्ट अब और अधिक सहन नहीं होते, क्षण-भर को भी नहीं ! मुझे शीघ्र मिलो, प्रभो! मैं आपसे मिलने को लालायित हो रहा हूँ, द्रवित हो रहा हूँ, सुनो भगवन् सुनो, मेरी उत्कट आन्तरिक पुकार को सुनो। अत्याचारी मत बनो प्रभो! दीनबन्धु हो आप तो ! अधम-उद्धारक हो! पतित पावन हो !

 

हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव ! हे ज्ञान और आनन्द के मूल स्रोत! आप हमारे नेत्र के नेत्र हो, श्रोत्र के श्रोत्र हो, प्राण के प्राण हो, मन के मन हो, आत्मा के आत्मा हो। आप दृग्गोचर द्रष्टश हो, अश्रुत श्रोता हो, अचिन्त्य चिन्तक हो और अविदित वेत्ता हो आपसे प्रार्थना है-हमें सब आसक्तियों से मुक्त कर दो, हमें ज्ञान दो, पवित्रता दो, प्रकाश दो।

 

प्रिय प्रभो! प्राणनाथ! विभु विश्वनाथ ! हमारी प्रार्थना स्वीकार करो। हमारा मार्ग प्रशस्त करो। इस संसार के दलदल से हमें उबारो। हमें तेजस्वी बनाओ। हमारी रक्षा करो। हम केवल आपकी ही आराधना करते हैं, आपकी पूजा करते हैं, आपका ही ध्यान करते हैं और आपके ही शरणागत हैं।

 

 

प्रस्तावना

गीता की महिमा

 

श्रीमद्भगवद्गीता भगवान् कृष्ण और अर्जुन के मध्य संवाद रूप में महाभारत के भीष्म पर्व में निरूपित है। इस ग्रन्थ में अठारह अध्याय और सात सौ संस्कृत श्लोक समाविष्ट हैं। इन श्लोकों में महत्त्वपूर्ण (विचार्य) विषय संक्षेप में संवृत किया गया है। कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में भगवान् कृष्ण ने अर्जुन के साथ अत्यन्त मनोहारी, उपदेशात्मक संलाप में निगूढ़, उत्कृष्ट, आत्मोद्धारक आध्यात्मिक सत्यों को अनावृत किया और अर्जुन को योग, वेदान्त, भक्ति और कर्म के विरल रहस्यों का ज्ञान दिया। भगवान् कृष्ण के सभी उपदेश विस्तरशः मानव-कल्याण हेतु पश्चात्काल में भगवद्गीता के रूप में भगवान् वेदव्यास द्वारा लिपिबद्ध किये गये। जीवन में दैनिक आचार-व्यवहार, आध्यात्मिक उत्कर्ष तथा आत्म-साक्षात्कार हेतु मानवता, श्री व्यास जी की अत्यन्त ऋणी है जिन्होंने इस दिव्य गीत को उनके समक्ष प्रस्तुत किया श्रद्धायुक्त संयत मनुष्य ही 'गीता' का पूर्ण लाभ उठा सकते हैं जो कि आत्मा का विज्ञान है।

 

हिन्दू पंचाङ्ग के अनुसार मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को समस्त भारत में इस अद्भुत ग्रन्थ के प्रशंसकों और प्रेमियों द्वारा गीता-जयन्ती मनायी जाती है। इसी दिन संसार के समक्ष सञ्जय ने इस ग्रन्थ को प्रकाशित किया

 

विश्व के साहित्य में गीता के समान प्रेरक एवं उत्कृष्ट ग्रन्थ अन्य नहीं है। हिन्दू धर्म के सारभूत प्रधान नियम अत्यन्त स्पष्ट रूप से गीता में वर्णित हैं। यह प्रज्ञा का स्रोत है। आपका पथ-प्रदर्शक है। परम गुरु है। अक्षय आध्यात्मिक कोष है। आनन्द का निर्झर है। ज्ञान का रत्नाकर है। यह ग्रन्थ दिव्य कान्ति और विभूति से परिपूर्ण है।

 

गीता वेदों का सार है। उपनिषदों का निष्कर्ष है। सभी कालों में सभी प्रकार के लोगों के लिए यह एक सार्वभौम शास्त्र है। उन्नत विचारों और योग, भक्ति, वेदान्त तथा कर्म के व्यावहारिक आदेशों से युक्त यह अद्वितीय ग्रन्थ है। निगूढ़ विचारों और अन्तर्दृष्टि के सर्वोच्च शिखर का स्पर्शबोध है यह अद्भुत ग्रन्थ। इस संसार के त्रिविध तापों से क्लिष्ट आत्माओं को यह ग्रन्थ शान्ति और समाश्वासन प्रदान करता है अर्थात् आध्यात्मिक (शरीर से उत्पन्न होने वाली पीड़ा), आधिभौतिक (प्राणियों से उत्पन्न) एवं आधिदैविक (देवकृत्) पीड़ा

 

भगवद्गीता दिव्य सुधा है। यह चिन्तामणि (चिन्तन मात्र से कामनापूर्ति करने वाली मणि) है, कल्पतरु और कामधेनु है जो कल्पना मात्र से इच्छापूर्ति करती है। आप इसमें से मनोवांछित वस्तु ले सकते हैं। यह आनन्त्य शास्त्र है। यह मशरूम की भाँति अल्पकालिक नहीं है। मैं गीता को सदा अपने पास रखता हूँ। यह सबके लिए सहचरी (vade mecum) पुस्तिका है। शान्ति, आनन्द, सुख, प्रज्ञा, आत्मा, ब्रह्म, पुरुष, धाम, निर्वाण, परम पद, गीता-ये सभी पर्यायवाची हैं।

 

गीता अमृत का महापयोधि है। यह उपनिषदोपम वृक्ष का दिव्य अमर फल है। इस अलौकिक ग्रन्थ में कर्म, भक्ति और ज्ञान दर्शन का तथा इनके संयोगात्मक विवरण का निष्पक्ष स्पष्टीकरण मिलता है। भगवद्गीता विश्व-भर में मंजुल सुगन्धि विकीर्ण करने वाला विरल और अतिशोभन पुष्प है। सभी उपनिषद् मानो गाय हैं, श्री कृष्ण उपनिषद् रूपी गायों के दोग्धा हैं, अर्जुन बछड़ा है जिसने आत्म-ज्ञान रूपी दुग्ध का सर्वप्रथम पान किया जो समस्त मानवता और अर्जुन के कल्याणार्थ दिव्य 'गोपाल' श्री कृष्ण द्वारा 'गीता' के रूप में दुहा गया। गीता द्वारा केवल अर्जुन प्रत्युत् प्रत्येक व्यक्ति की शंकाओं और समस्याओं का समाधान होता है। देवकीनन्दन, गोकुल के गोप-मित्र भगवान् कृष्ण की जय हो! हृदय की पवित्रता और ध्यान द्वारा जो गीतामृत पान करता है वह अमृतत्व, शाश्वत आनन्द, चिर-शान्ति और अक्षय्य सुख का अनुभव करता है।

 

जिस प्रकार सघन अगाध सागर की गहराई अमूल्य रत्नों का भण्डार है उसी प्रकार गीता में अगणित आध्यात्मिक रत्न निहित हैं। श्रद्धा और विश्वास के साथ आपको गीता रूपी रत्नाकर में गहन अवगाहन करना होगा। तभी तो आप आध्यात्मिक मुक्ता-मणियाँ चयन कर पायेंगे। गीता के सूक्ष्म गहन ज्ञान को भी तभी आप समझ पायेंगे।

 

सभी कालों के लिए गीता एक अनुपम शास्त्र है। हिन्दू धर्म के प्रामाणिक शास्त्र 'प्रस्थानत्रयी' की श्रेणी में गीता को माना जाता है। गीता, जीवन की महत्ता को दर्शाने वाला आत्मा का अमर गीत है। भगवान् कृष्ण द्वारा दिये गये गीता के उपदेश समस्त संसार के लिए अनुकरणीय हैं। यह योग का विशिष्ट ग्रन्थ है। इसकी भाषा अत्यन्त सरल है। संस्कृत भाषा का प्रारम्भिक ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी इसका अध्ययन कर सकता है। इसमें चार प्रकार के योग निरूपित हैं-कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग और ज्ञानयोग

 

आज तक गीता पर असंख्य टीकायें उपलब्ध हैं। प्रत्येक श्लोक पर एक खण्ड लिखा जा सकता है। कर्म में आस्था रखने वाला व्यस्त व्यक्ति श्री बालगङ्गाधर तिलक की टीका (गीता-रहस्य) से लाभान्वित हो सकता है, भक्ति भाव से पूर्ण व्यक्ति श्रीधर की टीका पढ़े और तर्कशील व्यक्ति श्री शंकराचार्य की टीका से लाभ उठा सकता है।

 

इस अलौकिक ग्रन्थ पर सैकड़ों टीकायें उपलब्ध हैं। गीता एक सागर है। श्री शंकर, श्री रामानुज और श्री मध्वाचार्य ने गीता पर अपनी-अपनी व्याख्या की है और इस प्रकार दर्शन के अपने मत प्रतिपादित किये। कोई भी व्यक्ति गीता-सिन्धु में गहन अवगाहन कर के दिव्य ज्ञान रूपी अमूल्य मोती ला सकता है और व्याख्या रूप में प्रस्तुत कर सकता है। गीता का स्तवन हो ! गीता के भगवान् का स्तवन हो!

 

गीता के उपदेश उदार, सार्वभौमिक और उत्कृष्ट हैं। इसके उपदेश किसी विशेष जाति, मत, धर्म, आयु, स्थान अथवा देश के लिए नहीं प्रत्युत् समस्त विश्व के लिए हैं। उपनिषदों पर आधारित ये उपदेश ऋषियों के सनातन ज्ञान का कोष हैं। इसकी विधा (पद्धति) सबके लिए बोधगम्य है। मानव मात्र के लिए इसमें सान्त्वना, शान्ति, स्वाधीनता, मोक्ष और पूर्णत्व का सन्देश है।

 

परमहंसों (यति, संन्यासी) के लिए गीता मानसरोवर झील है और पिपासु साधकों के लिए क्रीड़ा का विषय है यह आनन्द-पयोधि है जिसमें सत्यान्वेषक हर्षोल्लास और मस्ती में प्लवन (तरण) करते हैं। यदि स्पर्शमणि (पारस) किसी लोहे के टुकड़े को एक कोण से भी स्पर्श कर ले तो पूर्ण लौह-खण्ड स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है। इसी भाँति आप किसी एक श्लोक के भाव में भी मग्न रहेंगे, तो निस्सन्देह आप दिव्यत्व में रूपान्तरित हो जायेंगे।

 

दैनिक स्वाध्याय हेतु केवल गीता का अध्ययन ही पर्याप्त है। इसमें सभी समस्याओं का समाधान आपको मिलेगा। जितना अधिक श्रद्धा और विश्वास से आप इसका अध्ययन करेंगे उतना ही अधिक गूढ़ ज्ञान, सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि और स्पष्ट, यथार्थ चिन्तन आपका होगा। गीता के एक श्लोक के भाव में लीन रहने पर भी आपके समस्त दुःखों का अन्त होगा, आप जीवन के लक्ष्य-अमरत्व और शाश्वत शान्ति प्राप्त करेंगे।

 

गीता का संवाद सम्पूर्ण विश्व के लिए है। मनुष्य-जाति के प्रधान भाग के लिए है। कुरुक्षेत्र के मैदान में यह ज्ञान भगवान् कृष्ण द्वारा अर्जुन को आज से पाँच सहस्र वर्ष पूर्व दिया गया था।

 

भगवान् के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसे अभूतपूर्व, अद्भुत ग्रन्थ को प्रकाश में नहीं ला सकता। पाठकों का पथ प्रशस्त करने वाला, परमानन्द की प्राप्ति में उन्नायक, सहायक और शान्तिप्रद यह ग्रन्थ आज भी जीवन्त है। ज्ञान-स्वरूप, मोक्षदायक परमात्मा के अस्तित्व का यह साक्षात् प्रमाण है।

 

सम्पूर्ण विश्व ही एक युद्धक्षेत्र है। वास्तविक कुरुक्षेत्र तो आपके भीतर है। महाभारत का युद्ध अभी भी आपके भीतर पूर्ण उग्रता से चल रहा है। अविद्या धृतराष्ट्र है। जीवात्मा अर्जुन है। हृदय-गुहा में विराजित भगवान् कृष्ण सारथि हैं। शरीर आपका रथ है। इन्द्रियाँ अश्व हैं। मन, अहंभाव, इन्द्रियाँ,

 

संस्कार, वासनायें, इच्छायें, राग-द्वेष, काम, ईर्ष्या, लोभ, अभिमान और दम्भ (कपट) आपके घोर शत्रु हैं।

 

अध्ययनार्थ प्रकाशदीप

 

गीता में सूक्ष्म गूढ़ ज्ञान निहित है, अतः आपको महती श्रद्धा, अनन्य भक्ति और अत्यन्त शुचिता से किसी पारंगत विद्वान् अथवा ब्रह्म-निष्ठ गुरु के सान्निध्य में इसका अध्ययन करना चाहिए। गीता के सत्यार्थ करतल पर रखे फल की भाँति तभी प्रकट होंगे। स्वामी मधुसूदन सरस्वती, स्वामी शंकरानन्द और श्री शंकराचार्य जैसे प्रबुद्ध ज्ञानियों की टीकायें आपके लिए अतीव उपयोगी रहेंगी।

 

सांसारिक लोग कितने ही बुद्धिमान् क्यों हों, गीता के मूल उपदेश को ग्रहण नहीं कर सकते। वे अनावश्यक वाद-विवाद और निरर्थक तर्क में फँस जाते हैं। वे मिथ्यावाद और उपदेशों के छिद्रान्वेषण में लग जाते हैं। अज्ञानी पुरुष यही कहेंगे-“श्लोकों में अन्तरंग सम्बन्ध नहीं है। वे अव्यवस्थित रूप से संहत किये गये हैं। उनमें पुनरावृत्ति है।" यदि वे किसी विद्वान् से श्रद्धा और विश्वास के साथ गीता का अध्ययन करें, तो उनके समस्त सन्देह नष्ट हो जायेंगे। उन्हें यह ज्ञान भी हो जायेगा कि सभी अध्यायों में सभी श्लोकों का अन्योन्य निकट सम्बन्ध है। उपनिषदों में और गीता में पुनरावृत्ति उपयुक्त है। मन पर गम्भीर स्थायी प्रभाव डालने के लिए ऐसा किया जाता है।

 

भगवान् कृष्ण चेतना के विभिन्न स्तरों से वचन कहते हैं। गीता में 'अव्यक्त' शब्द कहीं तो मूल प्रकृति के भाव में आया है और कहीं-कहीं परब्रह्म के अर्थ में भी प्रयोग किया गया है। अतः श्लोकों का वास्तविक अर्थ जानने के लिए मनीषी शिक्षक की सहायता आवश्यक है। कठोपनिषद् में 'इष्टकाः' शब्द का अर्थ देवता है। हठ योग में कहा है- “गङ्गा और यमुना के संगम पर एक युवती कन्या है।" इसका विशिष्ट अर्थ है- “इड़ा और पिंगला के मध्य सुषुम्ना नाड़ी है।" गुरु के बिना ऐसे शब्दों का अर्थ समझना कठिन है। इसी प्रकार से गुरु के बिना गीता के श्लोकों का अर्थ-बोध दुर्गम है। अन्यथा आप उस व्यक्ति के समान ही रहेंगे जो भोजन करने वाले व्यक्ति द्वारा 'सैन्धव' माँगने पर घोड़ा ले आया; क्योंकि सैन्धव शब्द का अर्थ घोड़ा भी है और नमक भी।

 

गीता में समन्वय

 

मनुष्य तीन मूल घटकों का योग है-संज्ञान, भाव और इच्छा। मानव-प्रकृति त्रिविध है-क्रियाशील, भावुक और ज्ञानशक्ति सम्पन्न अतः तीन प्रकार के योग आचक्षित हैं-ज्ञानयोग जो आत्म-विश्लेषण करने वाले चिन्तनशील प्रकृति के मनुष्य के लिए है। भक्तियोग भावुक लोगों के लिए और कर्मयोग क्रियाशील (राजसिक) व्यक्तियों के लिए है। एक योग अन्य योग की भाँति ही प्रभावपूर्ण है।

 

गीता में तीन मार्गों के सिद्धान्त के निर्देशन हैं, वे हैं-ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग और कर्म मार्ग गीता के उपदेशों के अनुसार तीनों में कोई विरोध नहीं है। कर्म, भक्ति और ज्ञान दर्शन को गीता अद्भुत रूप से सूत्रबद्ध करती है। पूर्णत्व की प्राप्ति हेतु तीनों में अनुरूपता लाना अत्यन्त आवश्यक है। तदर्थ आपके पास श्री शंकर का मस्तिष्क, भगवान् बुद्ध का हृदय और राजा जनक का हस्त होना आवश्यक है। इस शरीर रूपी रथ के तीन घोड़े-कर्म, भाव और बुद्धि में सामञ्जस्य हो, तभी यह रथ सहज रूप से चलेगा और आप अपने लक्ष्य तक अचिरेण सुरक्षित पहुँच सकते हैं। अपनी अन्तरात्मा में तभी आप आनन्दित हो सकते हैं। केवल तभी आप 'सोऽहम्' का गीत गा सकते हैं। केवल तभी आप 'अनन्त' के साथ समस्वर हो सकते हैं। केवल तभी आप आत्मा का अनहत नाद श्रवण कर सकते हैं और आत्मा के मधुर सङ्गीत का रसपान कर सकते हैं। स्वधर्म का पालन करते हुए पूर्णत्व, मोक्ष अथवा चरम लक्ष्य की प्राप्ति ही गीता का प्रमुख उपदेश है। भगवान् कृष्ण अर्जुन से कहते हैं-अतः अनासक्त भाव से कर्तव्य कर्म करो; क्योंकि आसक्ति रहित हो कर कर्म करने से मनुष्य परब्रह्म को प्राप्त होता है।

 

सामवेद के महावाक्य 'तत्-त्वम्-असि' (तत्त्वमसि) अर्थात् 'वह तुम हो' की व्याख्या के आधार पर गीता तीन भागों में विभक्त है। इस विचारधारा के अनुसार प्रथम छह अध्याय कर्मयोग और 'त्वम्' पद की प्रकृति का निरूपण करते हैं। इसके पश्चात् के छह अध्याय भक्तियोग और 'तत्' पद का दर्शन कराते हैं। अन्तिम छह अध्याय ज्ञानयोग और 'असि' पद का ज्ञान कराते हैं जो 'जीव-ब्रह्म-ऐक्य' संस्थापन करने में समर्थ है।

 

गीता के अठारह अध्याय असमन्वित रूप से सूत्रबद्ध नहीं हैं। एक अध्याय का दूसरे के साथ निकट का सम्बन्ध है। अर्जुन की विषादपूर्ण अवस्था में दूसरे अध्याय के उपदेशों से उसके नेत्र खुले और आत्मा की नित्यता को प्रदीप्त करने वाले वचनों से उसे पुनः शक्ति और साहस मिला। तब अर्जुन ने कर्मयोग और कर्मफल-त्याग का अवबोध किया। उसने इन्द्रियों और मन का संयम तथा एकाग्रता और ध्यान की विधियों को सीखा तदुपरान्त भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को विश्व-रूप-दर्शनार्थ तैयार करने के लिए उसके समक्ष विविध विभूतियों का विवरण दिया। अर्जुन ने अतिशोभन (देदीप्यमान) विश्व दर्शन का अनुभव किया। तब उसने जीवन्मुक्त की प्रकृति को समझा। उसे क्षेत्र ज्ञान, तीन गुणों के ज्ञाता और पुरुषोत्तम का ज्ञान हुआ। इसके पश्चात् अर्जुन ने दिव्य विभूतियों, तीन प्रकार की श्रद्धा और अन्त में संन्यासयोग के सार का ज्ञान ग्रहण किया। जिस प्रकार किसी विद्यार्थी को विश्वविद्यालय में ज्ञान दिया जाता है, उसी प्रकार भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को आध्यात्मिक विश्वविद्यालय में आत्म-ज्ञान प्रदान किया। अर्जुन की विभिन्न शंकायें थीं। भगवान् कृष्ण ने उसकी सभी शंकाओं का एक-एक करके निवारण किया। योग के एक सोपान से दूसरे सोपान तक आरोहण हेतु उन्होंने अर्जुन को प्रेरित किया। अन्ततः अर्जुन ने सर्वोच्च सोपान पर अपना पग रखा, आत्म-ज्ञान प्राप्त किया और हर्षित हो कर बोला-"हे मेरे प्रभो! मेरा मोह नष्ट हो गया है। आपकी कृपा से मुझे ज्ञान हो गया है। अब मैं कृतसंकल्प हूँ। मेरे सन्देह पूर्णतया नष्ट हो गये हैं। अब मैं आपके वचन का परिपालन करूँगा।"

 

राग-द्वेष और अहंभाव का विनाश करके आप जीवन्मुक्त हो सकते हैं। इच्छाओं, तृष्णाओं, अवशिष्ट संस्कारों और संकल्पों का विनाश करके आप मुक्त संन्यासी हो सकते हैं। एवंविध, निज सच्चिदानन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हुए आप राजा जनक की भाँति संसार के क्रिया-कलापों में रत भी रह सकते हैं। आप तब कर्म-बन्धन में नहीं पड़ेंगे और कर्म आपको दूषित नहीं करेंगे; क्योंकि ब्रह्मज्ञान से कर्तापन का भाव नष्ट हो चुका है। यही गीता का सार है।

 

 

दो विधाएँ

 

उपनिषदों के ऋषि गौरव से घोषणा करते हैं कि वास्तविक पुरुष सर्वव्याप्त, अमर आत्मा है जो इस शरीर, मन और जगत् का आधार है और पाँच कोषों-अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनन्दमय कोष का भी आश्रय है।

 

दुग्ध में नवनीत और काष्ठ में अग्नि की भाँति इस शरीर में निहित स्वयंज्योतित आत्मा का साक्षात्कार ही इस जीवन का लक्ष्य है। आत्मा अन्तर्यामी है। शरीर रूपी भवन का वह अदृश्य शासक अथवा गुप्त स्वामी है।

 

सतत गहन ध्यान द्वारा उस अक्षय्य, अमर्त्य, भावातीत आत्म तत्त्व की प्राप्ति ही सत्य धर्म है। शाश्वत आत्मा में जीवन ही वास्तविक जीवन है। भूत, भविष्य और वर्तमान से अतीत, आदि, अन्त और मध्य से परे उस आत्म तत्त्व के तो खण्ड हैं और ही अवयव, वह स्थूल है, सूक्ष्म, ऐसे परम तत्त्व के साथ ऐक्य भाव पूर्ण जीवन ही वास्तविक जीवन है।

 

पुरातन ऋषियों ने इस रहस्यमय अलौकिक आत्म तत्त्व को दिव्य ज्ञानचक्षुओं से आत्मसात् किया और उसी आत्म-ज्ञान की ज्योति से संसार के पदार्थों को उजागर किया। यह आत्म-बोध की साक्षात् प्रमाण की विधि है।

 

संगीत, प्रकृति, कला और विज्ञान के द्वारा आप ज्ञान-गिरि-शिखर तक आरोहण कर सकते हैं। यह अप्रत्यक्ष विधि है। आप कार्य से कारण तथा अन्ततः कारण रहित कारण परब्रह्म इन्द्रियातीत सत्य को प्राप्त कर सकते हैं। हमारे पाश्चात्य वैज्ञानिकों का प्रयोजन यदि मनुष्य को भौतिक सुख प्रदान करना ही है तो वे मानो अन्धकार में कुछ टटोलने का प्रयास कर रहे हैं। विज्ञान का लक्ष्य अन्वेषण, परीक्षण, निरूपण, विश्लेषण और अध्ययन द्वारा प्रकृति के नियमों तथा अणु, परमाणु ऊर्जा, गति तथा शारीरिक और मानसिक प्रपंच (दृश्य जगत्) के आत्यन्तिक सत्य का आधार खोजना है। सच्चा वैज्ञानिक तो केवल वेदान्ती है। सत्य के प्रति उसकी खोज की विधा पृथक् है। जो वैज्ञानिक पहले यह कहते थे-"इस संसार से परे कुछ नहीं है", आज वही घोषणा करते हैं- "जितना अधिक मैं इस दृश्य जगत् का ज्ञान करता हूँ, उतना अधिक मैं भ्रमित होता हूँ। बुद्धि प्रमेय और भावशून्य है। इस परिवर्तनशील प्रपंच से परे कूटस्थ बोधगम्य शक्ति है। चक्रावर्तिन् जीवन्त विद्युत् कणों के पीछे स्थिर, गतिशून्य शक्ति है जो बुद्धि और जगत् से अतीत है।" उपनिषदों का ब्रह्म वेदान्त का आत्मा है जो प्रकृति के नियमों का अधिष्ठाता है।समुपगमन (approach) की मेरी विधा उत्तरकालीन है अर्थात् कार्य से कारण की ओर। वेदान्ती विधा पूर्वकालीन है अर्थात् कारण से कार्य की ओर उपगमन दोनों का लक्ष्य एक है।"

 

 

दो मार्गों का सन्धान

 

विष्णु पुराण में भगवान् विष्णु की उत्कृष्ट रूप से गुणस्तुति की गयी है और भगवान् शिव को गौण स्थान दिया गया है। शिव पुराण में भगवान् शिव का स्तवन मुख्य है और भगवान् हरि का गौण देवी भागवतम् में देवी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है और भगवान् शिव तथा भगवान् हरि को गौण साधक के हृदय में अपने इष्टदेव के प्रति प्रगाढ़, अटूट श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए ऐसा किया जाता है। शिव, हरि और देवी एक ही हैं। वे तो भगवान् के विभिन्न स्वरूप हैं। शिव को हरि से और हरि को शिव से गौण समझना मूर्खता है।

 

एवंविध, एक स्थान पर भगवान् कृष्ण कर्मयोग की श्लाघा करते हैं-"कर्म संन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते"-"निश्चित रूप से कर्मयोग कर्म-संन्यास से श्रेष्ठतर है" (/) अन्य स्थान पर वे योग को सर्वोच्च स्थान देते हुए कहते हैं-"योगी तपस्वी से श्रेष्ठ है, वह ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना जाता है; कर्मयोगी से भी श्रेष्ठ है। अतः हे अर्जुन ! तू योगी बन जा" (/४६) एक अन्य स्थान पर भगवान् भक्तियोग की प्रशंसा करते हुए कहते हैं- "वह परम पुरुष तो हे पार्थ, केवल अनन्य भक्ति द्वारा ही प्राप्य है" (L / R * R) एक अन्य स्थान पर वे ज्ञानयोग की स्तुति में कहते हैं- "यह सभी उदार हैं; किन्तु ज्ञानी तो मेरा आत्म-स्वरूप है, आत्मवत् वह मुझमें स्थित है जो कि अन्तिम लक्ष्य है" (/२२)

 

अनभ्यस्त नव-साधक इन श्लोकों को पढ़ कर भ्रमित हो जायेगा; किन्तु गहन चिन्तन किया जाये, तो भ्रम के लिए कोई स्थान नहीं रहता। साधक के हृदय में निज मार्ग-विशेष के प्रति आस्था जागृत करने के लिए भगवान् कृष्ण ने प्रत्येक योग की प्रशंसा की है। स्मरण रहे, गीता समस्त विश्व के लिए पठनीय ग्रन्थ है। यह केवल अर्जुन के लिए ही नहीं सुनायी गयी। प्रत्येक योग समान रूप से प्रभावपूर्ण और प्रबल है।

 

गीता का सार

 

गीता पुनः-पुनः साधक को अनासक्त वृत्ति अंकुरित करने का प्रबल उपदेश देती है। बारम्बार गीता का यही सन्देश मिलता है कि संसार में ऐसे रहना चाहिए जैसे जल में कमल-पत्र-जल से सर्वथा अप्रभावित। जो मनुष्य अनासक्त भाव से सभी कर्म प्रभु को समर्पित करके करता है, वह जल में कमल-पत्र की भाँति पाप से अप्रभावित रहता है, "पद्मपत्रमिवाम्भसा" (/२२)

 

मोह आसक्ति का कारण है। आसक्ति रजस् गुण का प्रतिफल है। अनासक्ति सत्त्व से उत्पन्न होती है। आसक्ति आसुरी सम्पदा है। अनासक्ति दैवी सम्पदा है। आसक्ति अज्ञान, स्वार्थ और मोह से होती है। आसक्ति मृत्यु का कारण है। अनासक्ति ज्ञान है। अनासक्ति से मोक्ष-प्राप्ति होती है। वस्तुतः अनासक्ति का अभ्यास कठोर अनुशासन है। इसका अभ्यास पुनः-पुनः करना होगा। सम्भव है चलना सीखते हुए शिशु की भाँति आप गिर पड़े; किन्तु प्रफुल्ल हृदय से, मुस्कराते हुए आपको पुनः उठना पड़ेगा। असफलतायें अवरोध नहीं हैं, वे तो सोपान हैं सफलता के। आत्मस्थ होने का प्रयास करो अपनी ही आत्मा में स्थित रहो। अपनी परिधि में रहो। सतत आत्म-चिन्तन करो। स्वभावतः ही सभी आसक्तियाँ नष्ट हो जायेंगी। भौतिक आसक्तियों के विनाश हेतु आत्मा अथवा परमात्मा से आसक्ति प्रबल प्रतिकारक का कार्य करती है। अनासक्त व्यक्ति ही दूसरों से प्रेम कर सकता है। उसके पास दिव्य प्रेम है। अतः आसक्ति रहित हो कर निरन्तर कर्म में रत रहना कर्तव्य है; क्योंकि आसक्ति रहित हो कर कर्म करने से मनुष्य परमात्मा को प्राप्त होता है।

 

अध्याय तेरह, चौदह और पन्द्रह ज्ञानयोग को प्रतिपादित करते हैं। जिसे प्रकृति और पुरुष का ज्ञान है, तीन गुण और उनके व्यापार का ज्ञान है और माया रूपी अद्भुत संसार-वृक्ष का ज्ञान है, वह प्रकृति और उसके गुणों का अतिक्रमण कर के अनासक्ति और आत्म ज्ञान के खड्ग से इस अनोखे बद्धमूल (संसार) वृक्ष को काट कर जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त करने वाले आत्म-साक्षात्कार की सद्यः अनुभूति कर सकता है। अध्याय पन्द्रह आत्मा को प्रेरित करने वाला है। इसमें वेदान्त का सार निहित है। इस प्रवचन को अवधारण करने वाला व्यक्ति अचिरेण मोक्ष-प्राप्ति करता है। वह परब्रह्म के अनश्वर धाम को पहुँचता है। इन बीस श्लोकों को कण्ठस्थ करो और भोजन से पूर्व इनका उच्चारण करो। भोजन ग्रहण करने से पूर्व सभी संन्यासी इसका गान करते हैं।

 

अध्याय अठारह पुनः-पुनः पढ़ने योग्य है। सम्पूर्ण गीता शास्त्र का सार इसमें निहित है। गीता-ज्ञान रूपी अनुपम शैल-पाद का यह सर्वोच्च शिखर है। यह अमूल्य हार का मुकुट मणि है। इसी में प्रथम सत्रह अध्यायों के उपदेशों के सार संक्षेप में आचक्षित हैं।

 

दूसरे अध्याय के श्लोकों में १९,२०,२३ और २४ नम्बर के श्लोकों की अनवरत स्मृति और अभ्यास आप पर अमरत्व की वृष्टि करेंगे और भय तथा देहाध्यास (शरीर और आत्मा में ऐक्य भाव) का निवारण करेंगे।

 

'ये हि संस्पर्शजा भोगा...' ( /२२) , 'इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम्..." (१३/ ) और 'विषयेन्द्रिय संयोगात्...' (१८/३८) की शिक्षाओं का सतत अभ्यास और स्मृति वैराग्य लाने में सक्षम हैं।

 

अध्याय के श्लोक ७१ और अध्याय के श्लोक ३९ परम शान्ति के देने वाले हैं। अध्याय के श्लोक २७ और २८, अध्याय के श्लोक ११ से १४ और २६, अध्याय के श्लोक ,१२,१३ और १४, अध्याय को श्लोक ३४, अध्याय १२ के श्लोक से १० और अध्याय १८ के श्लोक ५१ से ५३ आत्म-साक्षात्कार हेतु अध्यात्म-साधना-योग-साधना में पथ प्रदर्शित करते हैं। अध्याय श्लोक ११ से गीता-दर्शन प्रारम्भ होता है। अध्याय १८ का श्लोक ६६ गीता में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है- "सब धर्मों को त्याग कर एक मेरी शरण में जाओ, शोक मत करो, मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त करूँगा।" भगवान् कृष्ण से अर्जुन कहते हैं- "मेरा हृदय लघुता से आहत है, मेरा मन किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया है। मैं आपसे पूछता हूँ-निश्चित रूप से मेरे लिए जो श्रेयस्कर हो, वह बात कहिए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, मुझे उपदेश दीजिए।" अध्याय के श्लोक में अर्जुन द्वारा पूछे गये इस प्रश्न का उत्तर भगवान् कृष्ण अध्याय १८ के श्लोक ६६ में देते हैं। सम्पूर्ण गीता का सार अध्याय १८ के श्लोक ६५ और ६६ में अन्तर्निहित है।

 

अध्याय १८ के श्लोक ६५ में 'नवधा भक्ति' का सार निहित है। मनोवृत्तियों के दमन की साधना यही है। पुनः पुनः भगवान् पर मन एकाग्रित करने से सभी सांसारिक विचार नष्ट हो जाते हैं। भक्तियोग को कदाचित् ही राजयोग से पृथक् किया जा सकता है। ये दोनों योग एकरूप हैं। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि भगवान् के प्रति भक्ति से ही समाधि की अवस्था प्राप्त हो सकती है- 'ईश्वरप्रणिधानाद्वा' अर्थात् आत्म-समर्पण से। क्रियायोग और राजयोग के नियम में ईश्वर के प्रति समर्पण भाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। 'मन्मना भव' का अभिप्राय है-मन को लीन करना। यह राजयोग साधना है। भक्तियोग कहाँ समाप्त होता है और राजयोग कहाँ प्रारम्भ होता है, यह कहना कठिन है। राजयोग भक्तियोग का पूरक है। भक्तियोग और राजयोग के मध्य कोई सीमारेखा अथवा दृढ़ नियम नहीं है। राजयोगी एक भक्त भी है और भक्त एक राजयोगी है। केवल नाम भिन्न हैं। भ्रमित और निराश अवस्था से ग्रस्त अर्जुन को प्रोत्साहित करने के लिए भगवान् कृष्ण अर्जुन को आश्वस्त करने के लिए ये वचन कहते हैं- “तुम मुझे प्राप्त होओगे। मैं तुम्हें सत्य वचन कहता हूँ, तुम मुझे प्रिय हो।" अध्याय अठारह के श्लोक ६५ के इन उपदेशों का पालन करो। जिसने इन चार महान् उपदेशों का पालन कर लिया, वह असमय अप्रतिज्ञ समर्पण भाव लाने में सक्षम होगा।

 

अगला श्लोक आत्म-समर्पण का भाव दर्शाता है। अद्वैत वेदान्ती के अनुसार इसकी व्याख्या इस प्रकार होगी- "व्यष्टिभाव को त्याग दो। तुम मोक्ष प्राप्त करोगे तुम जीवन्मुक्त हो जाओगे।" भक्तिपन्थ का आचार्य इस प्रकार व्याख्या करेगा - "सभी कर्म और कर्मफल भगवान् के चरणों में अर्पित कर दो। भगवान् तुम्हें मुक्त करेंगे।" यहाँ धर्म का अर्थ इन्द्रिय-धर्म से नहीं है; क्योंकि जीवन्मुक्त भी देखता है, सुनता है, स्वाद लेता है और इसी प्रकार अन्य कार्य करता है, किन्तु वह ये सब साक्षीभाव में (द्रष्टा बन कर) करता है। इन्द्रियों के कर्म में वह स्वयं को एकरूप नहीं कर लेता। अर्जुन की जिज्ञासा का नियत उत्तर भगवान् कृष्ण इस श्लोक में देते हैं।

 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।।

 

और अर्जुन की जिज्ञासा थी- “मेरा हृदय लघुता से आहत है। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया हूँ। मैं आपसे पूछता हूँ, निश्चित रूप से मेरे लिए जो श्रेयस्कर हो, उसे कहिए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, मुझे उपदेश दीजिए।"

 

योग-वेदान्त पर अधिक पुस्तकों के अध्ययन की आवश्यकता नहीं है। यदि उन दो श्लोकों के भाव में आप लीन रह सकते हैं तो अमृतत्व, शाश्वत आनन्द और आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होगी।

 

अहंभाव त्याग कर निष्काम भाव से कर्म करो। कर्म और उसके फल भगवान् की सन्तति मान कर उन्हें समर्पित कर दो। मन और अहंता भगवान् को दे कर जीवन को दिव्य बनाओ। मन और बुद्धि उन्हें दे कर जीवन को आध्यात्मिक बना लो (मच्चित, युक्त, मत्परः) भगवान् पर मन एकाग्र करो उनके प्रति भक्तिभाव अर्जित करो। सब प्राणियों के कल्याण में लग जाओ (सर्वभूत हिते रतः) सर्वस्व भगवान् को अर्पित कर दो, तभी उनकी सत्ता में प्रवेश पा सकोगे।" सम्पूर्ण गीता में यही स्वर झंकृत हो रहा है।

 

गीता में साधना निम्न श्लोकों में निरूपित है :

 

कर्मयोग-/४८; /२०,२१, २२ और २४

 

भक्तियोग -/२७,३४; १२/; १८/५२,५३ और ५४

 

जपयोग-/१४

 

अभ्यासयोग - १२/

 

हठयोग-/१० और १२

 

राजयोग-/२५ और २६

 

ज्ञानयोग-/२८; / और

 

रक्षण

 

गीता का अध्ययन, कुछ लोग उसमें निहित उपदेशों में छिद्रान्वेषण अथवा आलोचनात्मक दृष्टिकोण ले कर करते हैं। किन्तु प्रगाढ़ श्रद्धा और विश्वास के साथ यदि अध्ययन किया जाये, तो गीता के उपदेश बोधगम्य हो सकते हैं।

 

एक व्यक्ति ने समाचार-पत्र में आलोचनात्मक आक्षेप इस प्रकार दिया- "गीता पावन ग्रन्थ कदापि नहीं है। यह तो हिंसा का पाठ पढ़ाती है। भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को अपने सम्बन्धियों और गुरुजनों की हिंसा के लिए आज्ञा दी '' ऐसा प्रतीत होता है, इस समालोचक को गीता का ज्ञान ही नहीं था। वह विरोचन की भाँति है जिसने प्रजापति से आध्यात्मिक शिक्षा तो ग्रहण की, परन्तु अपनी कुटिल मति के कारण शरीर को ही आत्मा मान लिया। निश्चित रूप से वह आमिष (दैहिक) दर्शन का अनुयायी होगा। वह गीता के दार्शनिक पक्ष की गम्भीरता को समझने में सक्षम नहीं है; क्योंकि उसकी बुद्धि स्थूल और दुर्भेद्य होने के कारण सत्य को ग्रहण नहीं कर सकती आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति हेतु उसने गीता नहीं पढ़ी, प्रत्युत् आक्रामक दृष्टिकोण से उसका अध्ययन किया है। यदि वास्तव में उसने इन निम्न तीन श्लोकों का महत्त्व जान लिया होता तो व्यर्थ की आलोचना की होती वे श्लोक हैं-

 

"जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मान लेता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं; क्योंकि तो वह मारता है और ही मरता है (/१९)

 

"अतः उठो वे मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। तुम तो मात्र बाह्य निमित्त बन जाओ।" (११/३३)

 

"जो व्यक्ति अहंभाव (कर्तृत्वभाव) से मुक्त है, इन लोगों को मार कर भी जिसकी बुद्धि प्रभावित नहीं होती, वह तो मारता ही है और ही कर्म-बन्धन में आता है।" (१८/१७) सार्वभौम सत्ता इन संकीर्ण मूल्यों से अतीत है।

 

साधक यदि आप्तकाम है, उसे भौतिक सुखों की अब कामना नहीं है, उसका चित्त शान्त है, उसके मन की अशुद्धि नष्ट हो चुकी है और वह निर्मल मन हो गया है, तो किसी भी सन्त पुरुष की शिक्षायें उसके हृदय को भेद कर ऐसे प्रभावित करती हैं जैसे शुद्ध, स्वच्छ और श्वेत वस्त्र को रंगीन जल यही कारण है कि श्रवण, निदिध्यासन और ध्यान से पूर्व साधक से विवेक, वैराग्य, शम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रियनिग्रह), उपरति (विषयभोग से उदासीनता) का अभ्यास अपेक्षित है। सत्य और भगवत्साक्षात्कार के पथ पर चलने वाले साधकों से अनुशासन और मानस-शुद्धि पूर्वापेक्षित हैं।

 

परमात्मा के स्वभाव का जब कहीं वर्णन किया जाता है वहाँ भी वे लोग जिनकी बुद्धि पाप रहित और पवित्र नहीं होती, अविश्वास और आशंका के शिकार हो जाते हैं जैसा कि इन्द्र और विरोचन के साथ हुआ। इसलिए उपदिष्ट ज्ञानोदय तो केवल उसी व्यक्ति में होता है जिसने इसी जन्म में अथवा पूर्व-जन्म में तपश्चर्या से अघमर्षण कर लिया हो। श्रुति कहती है-"जिस महान् पुरुष की गुरु-भक्ति उतनी ही अधिक है जितनी भगवान् के प्रति, उसको यह सब ज्ञान निजात्मा में ही प्रकाशित हो जाता है।"

 

कुछ लोग अपनी रसना को शान्त करने के लिए गङ्गा नदी में मछली पकड़ते हैं और अपना बुरा कर्म उचित सिद्ध करने के लिए गीता का सहारा लेते हैं-"उसे शस्त्र काट नहीं सकते और अग्नि जला नहीं सकता" (/२३) कैसा अद्भुत दर्शन है! असुर भी शास्त्र को उद्धृत कर सकते हैं। ये लोग विरोचन के मतानुयायी हैं। वे अधम, मोहग्रस्त निकृष्ट मनुष्य हैं। वे गीता का ज्ञान नहीं समझ सकते; क्योंकि उनका विवेक आसुरी वृत्तियों को अपनाने के कारण भ्रमित हो गया है। भगवान् करे, उन्हें सूक्ष्म और पवित्र (निर्मल) बुद्धि प्राप्त हो! गीता के उपदेशों को सम्यक् प्रकार से समझने और उसी भाव में जीवन यापन करने के लिए उन्हें आभ्यन्तर, आध्यात्मिक शक्ति और विवेक प्राप्त हो!

 

कुछ अज्ञानी मनुष्यों का कथन है-"कृष्ण भगवान् नहीं हैं। वे अवतार नहीं हैं। वे वासनायुक्त गोपालक थे जिन्होंने काम-वासना में गोपियों के साथ क्रीड़ा की।" भगवान् कृष्ण की उस समय आयु क्या थी? क्या वे सात वर्ष के बालक नहीं थे? लेशमात्र भी काम-वासना उनमें हो सकती थी क्या? रासलीला और माधुर्यभाव (भक्त और भगवान् के मध्य प्रेम भाव), सर्वोच्च भक्ति की पराकाष्ठा, आत्म-निवेदन अथवा भगवान् के प्रति पूर्ण आत्म-समर्पण के रहस्य को कौन जान सकता है? नारद, शुकदेव, चैतन्य, मीरा, हफ़ीज़, रामानन्द, सखियाँ अथवा गोपियाँ ही इस रासलीला की महिमा और रहस्य को जान सके तदर्थ सखियाँ ही प्रशिक्षित थीं। क्या बालावस्था में भगवान् कृष्ण ने चमत्कार नहीं दिखाये ? क्या उन्होंने यह नहीं दर्शाया कि वे स्वयं ही भगवान् विष्णु के अवतार थे? क्या शैशव काल में उन्होंने अपनी माताश्री को अपना अलौकिक रूप नहीं दिखाया ? क्या उन्होंने कालिय नाग के फण पर खड़े हो कर उसे वशीभूत नहीं किया? क्या उन्होंने स्वयं को अगणित कृष्ण रूपों में गुणित नहीं किया ? गोपियाँ कौन थीं? कृष्ण को सर्वत्र देखने वाली और स्वयं में कृष्ण के दर्शन करने वाली वे गोपियाँ भगवदुन्मत्त नहीं थीं? मुरली की धुन उन्हें दिव्य आनन्द अथवा पावन तादात्म्यता में पहुँचा देती थी। वे देहाध्यास से अतीत थीं।

 

भगवान् के लिए मिथ्या अपवाद करने और दोषदृष्टि रखने वालों की नियति क्या होगी? "मेरी अनुत्तम, अविनाशी, परा प्रकृति को जानते हुए बुद्धिहीन मनुष्य मुझ अव्यक्त को व्यक्त भाव में आया समझते हैं" (/२४)

 

समस्त प्राणियों के महान् स्वामी अर्थात् मुझको मनुष्य रूप में अवतरित देख कर मेरी परात्पर प्रकृति से अनभिज्ञ मंदधी मनुष्य मेरा उपहास करते हैं। आशाशून्य, कर्मशून्य, ज्ञानशून्य वे लोग विक्षिप्त हो कर छाद्मिक, क्रूर (पशुतुल्य) और आसुर प्रकृति वाले हो जाते हैं" (/११,१२) अज्ञानान्धकार से आवृत वे असत्य को सत्य मान कर पदार्थों को विपरीत भाव में देखते हैं। ऐसे आसुरी वृत्ति वाले तो कर्म की परिभाषा जानते हैं, त्याग की, शुचिता की, सदाचार की और ही वे सत्य को जानते हैं, ऋजुता को। किंकर्तव्यविमूढ़ ऐसे मनुष्यों को मैं आसुरी योनियों में डालता हूँ। मुझे प्राप्त हो कर वे आवागमन के चक्र में फँस जाते हैं और निम्न योनियों को प्राप्त होते हैं" (१६/१९,२०)

 

अनेक विचारशून्य व्यक्ति यह शंका करते हुए कहते हैं-"इतने अल्प समय में भगवान् ने समर भूमि में अर्जुन को गीता कैसे सुना दी? असम्भव, ऐसा नहीं हो सकता?" यह शंका अनुचित है। यह सब तो अर्जुन को श्रुति-प्रकाश हुआ भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को सहजावबोध हेतु दिव्य चक्षु प्रदान किया। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् प्रभु कुछ भी करने में समर्थ हैं। उनकी कृपा हो तो मूक वाचाल बन जाये और पंगु पहाड़ पर चढ़ जाये

 

विप्रतिपन्न (विरुद्ध) श्लोकों का समाधान

 

एक विपक्षी लिखता है- "गीता के तीसरे अध्याय के ३३वें श्लोक में कहा गया है-'एक ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुरूप ही कार्य करता है। सभी प्राणी प्रकृति का अनुसरण करते हैं। संयम क्या करेगा?' जब प्रकृति ही सर्वेसर्वा है, तो हमें मन तथा इन्द्रियों को वश में करने के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता ही क्या है? जब प्रकृति ही सर्वाधिक शक्तिशाली है, पराजित करने में समर्थ है, तो साधना उसे पराभूत कैसे कर सकती है?"

 

अगले श्लोक में भगवान् कृष्ण विशेष रूप से राग-द्वेष पर विजय पाने का उपदेश देते हैं। साधना से प्रकृति को संयत किया जा सकता है। गीताध्ययन करते समय केवल एक श्लोक के अर्थ में ही नहीं अटक जाना चाहिए इसे तो केवल उसी अध्याय के पूर्व और पश्चात् के श्लोकों से सम्बद्ध करना होगा, प्रत्युत् पूर्व के अध्याय भी ध्यान में रखने होंगे। विरुद्ध विषयों का सम्बन्ध बनाना होगा। तभी आपको समुचित उत्तर प्राप्त होगा।

 

भगवान् के आदेश की अवहेलना करके जो लोग कर्तव्य कर्म को त्याग कर शान्त बैठ जाते हैं, वे ऐसे त्याग से लाभान्वित नहीं हो सकते। तीसरे अध्याय ३०वें श्लोक में भगवान् का आदेश है-“सर्व कर्म मेरे समर्पण करके, आत्मस्थ (एकाग्रचित्त) हो कर, आशा और ममत्व को त्याग कर, मानसिक तनाव से मुक्त हो कर (हे अर्जुन), तुम युद्ध करो अर्थात् अपने कर्तव्य का पालन करो।" यह माया तो ज्ञानी पुरुषों के लिए भी अजेय है; फिर सांसारिक मनुष्य के लिए तो इसे जीतना और भी दुष्कर है। उनके लिए बिना ज्ञान प्राप्त किये कर्म-त्याग अपेक्षित नहीं है। वे माया के भँवर में फँस जायेंगे। उनके लिए इन्द्रियनिग्रह अथवा संयम का कोई प्रयोजन नहीं। सांसारिक मनुष्य राग-द्वेष से दूर नहीं रह सकते।

 

ज्ञानियों में अवशिष्ट सात्त्विक वासनायें भी, जो शरीर को स्थिर रखती हैं, प्रकृति के गुण-त्रय-सत्त्व, रजस् और तमस् के अनुरूप ही कार्य करते हैं। समाधि की यथार्थ अवस्था में होने पर ये तीन गुण ज्ञानियों को भी प्रभावित करते हैं। उन्हें इस शरीर से अथवा अन्य भोग-विषयों में आसक्ति नहीं होती; अतः वे मानसिक रूप से प्रभावित नहीं होते। वे अपनी आत्मा में ही परितुष्ट और प्रशान्त होंगे। अनवाप्त विषयों को प्राप्त करने की उनमें आकाङ्क्षा नहीं होगी और ही वे प्राप्त की हानि (लोप) पर शोक करेंगे।

 

आलोचक कहता है- "गीता के १८वें अध्याय के ६१वें श्लोक में भगवान् कृष्ण कहते हैं- 'हे अर्जुन! भगवान् सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं और कुम्हार के चक्र पर आरूढ़ पात्र की भाँति अपनी माया से सबको भ्रमित करते हैं।' तो क्या मनुष्य पूर्ण रूप से परतन्त्र है? क्या वह तिनके की भाँति इधर से उधर ठुकरा दिया जाता है? क्या उसे कर्म की कोई स्वतन्त्रता नहीं है?"

 

भगवान् कृष्ण अर्जुन को अनुनीत करने का और उसकी शंकानिवारण का यथोचित प्रयास करते हैं जिससे कि वह अपने कर्म में संलग्न हो जाये। वे अर्जुन से काम लेना चाहते हैं; इसीलिए नितान्त असहाय अवस्था में वे उपदेश देते हैं। छठे अध्याय के ५वें श्लोक में भगवान् कृष्ण पुरुषार्थ का उपदेश देते हुए कहते हैं- “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्-आत्मा से आत्मा का उद्धार करना है। आत्मा को अवसाद की स्थिति में नहीं ले जाना।"

 

प्रकृति के वश में होने के कारण स्वाभाविक गुणों का परित्याग नहीं हो सकता। कभी भी कर्तव्य-कर्म की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। भगवान्, अन्तःकरण के स्वामी, व्यष्टि आत्मा के अनुशासक हैं। अविद्या के नाश होने पर्यन्त मनुष्य अपने धर्म (कर्तव्य-कर्म) से बँधा रहता है। अर्जुन क्षत्रिय है; अतः भगवान् चाहते हैं कि वह युद्ध में प्रवृत्त हो अन्यत्र भगवान् कहते हैं : "श्रेयान् स्वधर्मः" -अपना कर्तव्य ही कल्याणप्रद है (१८/४७)

 

एक आलोचक का कथन १५वें  अध्याय के ७वें श्लोक में भगवान् कृष्ण कहते हैं- 'इस जीव-जगत् में अमर आत्मा मेरा ही अंश है जो प्रकृति में अवगुंठित मन सहित छह इन्द्रियों को आकृष्ट करता है।' यह स्पष्ट है कि जीव ब्रह्म का अंश है, तो हम जीव को ब्रह्म का तद्रूप कैसे कह सकते हैं? अद्वैत सिद्धान्त त्रुटिपूर्ण है।"

 

७वें अध्याय के १७वें श्लोक में भगवान् कहते हैं- "निश्चित रूप से ज्ञानी मेरे समान है।" यहाँ वे तद्रूपता की बात कर रहे हैं। अद्वैत सिद्धान्त समुचित ही है। सर्वोच्च साक्षात्कार अद्वैत स्थिति है। अधिकारी के अनुरूप ही भगवान् उपदेश करते हैं। अद्वैत दर्शन कतिपय सूक्ष्म बुद्धि वाले ही ग्रहण कर सकते हैं। अन्य साधकों की रुचि का ध्यान रखते हुए अन्य दर्शनों की व्याख्या वे अन्य स्थानों पर करते हैं। पूर्णत्व के दृष्टिकोण से तो जीव की सत्ता है और साक्षात्कार की। वस्तुतः एक ब्रह्म ही का केवल अस्तित्व है। द्वैत (dualism), विशिष्टाद्वैत (qualified monism), शुद्ध अद्वैत (pure monism) साक्षात्कार की सीढ़ी के पृथक् पृथक् सोपान हैं। सत्य यही है कि साररूप में जीव और ब्रह्म एक हैं। द्वैतवादी और विशिष्टाद्वैतवादी अन्ततः अद्वैत के लक्ष्य अथवा एकत्व के साक्षात्कार को ही प्राप्त करते हैं। भ्रम में पड़ें। विचारों को स्पष्ट करें और समुचित विचारधारा के प्रकाश में ज्ञान प्राप्त करें।

 

उपसंहार

 

पाश्चात्य देशवासियों द्वारा भारत देश को गीता के कारण महान् गौरव प्राप्त हुआ है। एक बार महात्मा गान्धी लन्दन के एक बड़े पुस्तकालय में गये और ग्रन्थाध्यक्ष से पूछा- "कौन-से आध्यात्मिक ग्रन्थ का सर्वाधिक निष्कासन होता है?" अध्यक्ष ने कहा- "गीता।" संसार भर में गीता को ख्याति प्राप्त है। सभी साधकों को इस विश्वविख्यात ग्रन्थ के सम्पूर्ण अठारह अध्याय कण्ठस्थ कर लेने चाहिए। नित्य स्वाध्याय और प्रतिदिन दो श्लोक कण्ठस्थ कर लेने से लगभग दो वर्षों में यह कार्य सम्पन्न हो सकता है।

 

भारत ही नहीं प्रत्युत् विश्व की समस्त पाठशालाओं और विश्वविद्यालयों में गीता का अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए। समस्त विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में गीता को पाठ्यपुस्तक (Textbook) का स्थान मिलना चाहिए। उनके अध्ययन क्रम (curriculum) में इसे प्रतिष्ठित करना चाहिए। शिक्षा की प्रत्येक प्रणाली में इसे महत्त्वपूर्ण स्थान उपलब्ध होना चाहिए। लौकिक ज्ञान के साथ-साथ जिसमें नैतिक और आध्यात्मिक ज्ञान भी दिया जाता है, वही शिक्षा-पद्धति सुदृढ़, व्यावहारिक, विषयबोधगम्य और पूर्ण मानी जाती है।

 

आपमें से प्रत्येक को इस उत्कृष्ट, मार्मिक ग्रन्थ का अध्ययन सावधानी से करना चाहिए। यह परम शान्ति, अमृतत्व और शाश्वत आनन्द की वृष्टि करने वाला ग्रन्थ है।

 

विश्वास का दीप जलाओ शान्ति की इस अद्भुत पताका को वायु में ऊँचा लहराने दो। अनासक्ति का महान् कवच धारण करो। विवेक का अलौकिक शस्त्र उठाओ। 'सोऽहम्', 'शिवोऽहम्', किंवा 'राधेश्याम', 'सीताराम' का अमर गीता गाओ के प्रणव बैण्ड के साथ वीरतापूर्वक आगे बढ़ो साहस का अनोखा शंख बजाओ शंका, अविद्या, आसक्ति, अहं आदि शत्रुओं का विनाश करके आत्मा के अनन्त साम्राज्य में प्रवेश करो। दिव्य अमृतरस का आस्वादन करो। अमृतत्व का सुधारस पान करो।

 

भगवान् गणेश, भगवान् सुब्रह्मण्यम्, भगवान् राम, देवी सीता, श्री सरस्वती, श्री भगवान् व्यास, श्री आदि शंकराचार्य, पद्मपादाचार्य, हस्तामलकाचार्य, त्रोटकाचार्य, सुरेश्वराचार्य, श्री ज्ञानदेव, श्री स्वामी विश्वानन्द, श्री स्वामी विष्णुदेवानन्द, ब्रह्मविद्या के समस्त गुरुओं, सन्तों, आचायर्यों, भगवद्गीता के समस्त टीकाकारों को मेरा मौन प्रणाम, जिनकी अहेतुकी कृपा और आशीर्वाद के कारण ही मैं भगवद्गीता पर टीका लिखने में समर्थ हुआ। आप सबको उनका आशीर्वाद प्राप्त हो!

 

भगवद्रीता की जय हो! भगवान् कृष्ण की जय हो जिन्होंने मनुष्यों के कल्याणार्थ अथवा उन्हें मोक्ष दिलाने के लिए गीता का ज्ञान विश्व के समक्ष रखा ! आप सब पर उनकी कृपा-वृष्टि हो ! गीता तुम्हारा लक्ष्य, आदर्श और केन्द्र हो ! गीता का नित्य अध्ययन करने वाला पुरुष धन्य है ! दुगना धन्य वह पुरुष है जो गीता के भाव में जीता है ! तिगुना धन्य वह है जिसने गीता-ज्ञान का साक्षात्कार कर आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लिया है !

 

तत् सत्!

शान्तिः ! शान्तिः ! शान्तिः !

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

आमुख.. 5

विश्व-प्रार्थना.. 6

प्रार्थनाएँ. 7

प्रस्तावना.. 9

अध्‍याय-1

अर्जुनविषादयोगः.. 28

अध्‍याय-2

सांख्ययोगः.. 43

अध्‍याय-3

कर्मयोगः.. 77

अध्‍याय-4

ज्ञानविभागयोगः.. 98

अध्‍याय-5

कर्मसंन्यासयोगः.. 120

अध्‍याय-6

ध्यानयोगः.. 136

अध्‍याय-7

ज्ञानविज्ञानयोगः.. 166

अध्‍याय-8

अक्षरब्रह्मयोगः.. 183

अध्‍याय-9

राजविद्याराजगुह्ययोगः.. 204

अध्‍याय-10

विभूतियोगः.. 231

अध्‍याय-11

विश्वरूपदर्शनयोगः.. 256

अध्‍याय-12

भक्तियोगः.. 289

अध्‍याय-13

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः.. 305

अध्‍याय-14

गुणत्रयविभागयोगः.. 340

अध्‍याय-15

पुरुषोत्तमयोगः.. 361

अध्‍याय-16

दैवासुरसम्पद्विभागयोगः.. 384

अध्‍याय-17

श्रद्धात्रयविभागयोगः.. 407

अध्‍याय-18

मोक्षसंन्यासयोगः.. 431

परिशिष्ट.. 488

.गीता में भगवान् के आदेश. 488

.उद्बोधक उपदेश. 493

.सप्तश्लोकी गीता.. 495

. एकश्लोकी गीता.. 496

. प्रतिज्ञा गीता.. 496

. गीता-अनुष्ठान. 498

जप हेतु मंत्र. 500

सम्पुट श्लोकों की सूची.. 502

अनुक्रमणिकाएँ. 504

.श्लोकानुक्रमणिका... 504

() 504

() 509

() 510

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() 536

() 537

() 538

() 539

() 542

. विषयानुक्रमणिका.. 543

आरती.. 547

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती.. 548

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्लोक में सज्जित शब्दों के

अर्थ उसी क्रम में दिये गये हैं और

अनुवाद में सहज गद्य-पद्यति अपनायी गयी है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्री परमात्मने नमः

अथ प्रथमोऽध्यायः

अर्जुनविषादयोगः

 

धृतराष्ट्र उवाच

 

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ।। ।।

 

शब्दार्थ : धर्मक्षेत्रे -धर्मभूमि में, कुरुक्षेत्रे-कुरुक्षेत्र में, समवेताः- एकत्रित, युयुत्सवः-युद्ध की इच्छा वाले, मामकाः- मेरे (पक्ष के), पाण्डवाः- पाण्डु पुत्रों ने, -और, एव-ही, किम् -क्या, अकुर्वत-किया, सञ्जय-हे सञ्जय

 

धृतराष्ट्र ने कहा

 

अनुवाद : हे सञ्जय, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?

 

व्याख्या : धर्मक्षेत्र-वह क्षेत्र अथवा स्थान, जहाँ धर्म की रक्षा होती है

 

कुरुक्षेत्र-कौरवों के राज्य में होने के कारण यह स्थल  कुरुक्षेत्र कहलाया।

 

सञ्जय वह है, जिसने इच्छा-अनिच्छा आदि द्वन्द्वों को जीत लिया है और निष्पक्ष है।

 

सञ्जय उवाच

 

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा

आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ।।२ ।।

 

शब्दार्थ : दृष्ट्वा-देख कर, तु-निश्चित रूप से, पाण्डवानीकम् -पाण्डवों की सेना को, व्यूढम् - व्यूह रचना, दुर्योधनः दुर्योधन, तदा-तब, आचार्यम्-आचार्य, उपसङ्गम्य-समीप जा कर, राजा-राजा, वचनम्-वचन (शब्द), अब्रवीत् -बोला।

 

सञ्जय ने कहा

 

अनुवाद : पाण्डवों की सेना को व्यूह (सेना का विन्यास विशेष) में खड़ा देख कर राजा दुर्योधन आचार्य के समीप जा कर यह वचन बोला।

 

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्

न्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।।३ ।।

 

शब्दार्थ : पश्य-देखो, एताम् - इसे, पाण्डुपुत्राणाम् -पाण्डुपुत्रों की, आचार्य-हे आचार्य, महतीम् -महान्, चमूम् -सेना, व्यूढाम्-व्यूढाकार में व्यवस्थित, द्रुपदपुत्रेण -द्रुपद के पुत्र द्वारा, तव शिष्येण - आपके शिष्य के द्वारा, धीमता-बुद्धिमान्

 

अनुवाद : हे आचार्य, आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपद के पुत्र (धृष्टद्युम्न) द्वारा व्यूह रचना में खड़ी की गयी पाण्डु पुत्रों की इस विशाल सेना को देखो।

 

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि

युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ।।४।।

 

शब्दार्थ : अत्र-यहाँ, शूराः-वीर, महेष्वासाः - महान् धनुर्धर, भीमार्जुनसमाः - भीम और अर्जुन के समान, युधि-युद्ध में, युयुधानः - युयुधान, विराटः-विराट, -और, द्रुपदः द्रुपद, -और, महारथः - महारथी।

 

अनुवाद : "यहाँ (इस सेना में) भीम और अर्जुन के समान महान् योद्धा और धनुर्धर हैं। युयुधान (सात्यकि), विराट् और द्रुपद जैसे महारथी हैं।

 

व्याख्या : महारथः - परिभाषा की दृष्टि से इसका अर्थ है वह योद्धा जो युद्धविज्ञान में कुशल हो और अकेला ही दश सहस्र धनुर्धरों से लड़ने की क्षमता रखता हो

 

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्

पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ।।५ ।।

 

शब्दार्थ : धृष्टकेतुः- धृष्टकेतु, चेकितानः- चेकितान, काशिराजः-काशी नरेश, -और, वीर्यवान् वीर, पुरुजित् -पुरुजित, कुन्तिभोजः-कुन्तिभोज, -और, शैब्यः-शिवि का पुत्र, -और, नरपुङ्गवः- मनुष्यों में श्रेष्ठ

 

अनुवाद : "धृष्टकेतु, चेकितान और बलशाली काशी नरेश, पुरुजित् और कुन्तिभोज तथा नरश्रेष्ठ शैब्य

 

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ।।६ ।।

 

शब्दार्थ : युधामन्युः युधामन्यु, -और, विक्रान्तः-शक्तिशाली, उत्तमौजाः उत्तमौजस्, -और, वीर्यवान् वीर, सौभद्रः सुभद्रा का पुत्र, द्रौपदेयाः द्रौपदी के पुत्र, -और, सर्वे-सभी, एव-ही, महारथाः- महान् योद्धा

 

अनुवाद : "शक्तिशाली युधामन्यु और वीर उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र (अभिमन्यु) तथा द्रौपदी के पाँचों पुत्र-यह सब महारथी हैं।

 

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम

नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ।।७ ।।

 

शब्दार्थ : अस्माकम् -हमारे, तु-भी, विशिष्टाः-सर्वश्रेष्ठ, ये-जो, तान्-उनका, निबोध-जानलो, द्विजोत्तम-ब्राह्मण श्रेष्ठ, नायकाः-नायक, मम-मेरी, सैन्यस्य-सेना के, संज्ञार्थम् -सूचना के लिए, तान् उनको, ब्रवीमि बताता हूँ, ते-आपको

 

अनुवाद : "हे ब्राह्मण श्रेष्ठ ! हमारी सेना में भी जो उत्कृष्ट नायक हैं उन्हें आप जान लीजिए, आपकी सूचना के लिए मैं उनके नाम बताता हूँ।

 

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः

अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव ।।८ ।।

 

शब्दार्थ : भवान् - आप, भीष्मः-भीष्म, -और, कर्ण:-कर्ण, -और, कृपः -कृपाचार्य, -और, समितिञ्जयः - युद्ध में विजयी, अश्वत्थामा-अश्वत्थामा (द्रोणाचार्य का पुत्र), विकर्णः - विकर्ण, -और, सौमदत्तिः सोमदत्त का पुत्र, तथा- इस प्रकार, एव-ही, -और।

 

अनुवाद : "आप और भीष्म, कर्ण और संग्राम-विजेता कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा

 

अन्ये बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः

नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ।।९ ।।

 

शब्दार्थ : अन्ये-अन्य (दूसरे), और, बहवः अनेक, शूराः शूरवीर, मदर्थे -मेरे लिए, त्यक्तजीविताः- जीवनोत्सर्ग करने को उद्यत, नानाशस्त्रप्रहरणाः -नाना प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित, सर्वे-सब, युद्धविशारदाः - युद्ध कला में निपुण।

 

अनुवाद : "और भी अनेक ऐसे योद्धा हैं जो युद्धकला में निपुण तथा नाना प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित हैं। वे सब मेरे लिए प्राण त्यागने को तैयार हैं।

 

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्

पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ।।१० ।।

 

शब्दार्थ : अपर्याप्तम् - अपर्याप्त, तत्-वह, अस्माकम् -हमारी, बलम् -सेना, भीष्माभिरक्षितम् - भीष्मपितामह द्वारा रक्षित, पर्याप्तम् - पर्याप्त, तु-जब कि, इदम् यह, एतेषाम् - उनकी, बलम् -सेना, भीमाभिरक्षितम् - भीम द्वारा रक्षित

 

अनुवाद : "भीष्मपितामह के संरक्षण में हमारी सेना अपर्याप्त (अप्रचुर) है जब कि भीम द्वारा रक्षित उनकी सेना पर्याप्त (प्रचुर) है।

 

व्याख्या : टीकाकारों ने इस श्लोक की व्याख्या भिन्न-भिन्न रूप से की है। श्रीधर स्वामी के अनुसार 'अपर्याप्तम्' का अर्थ है- अप्रचुर अथवा अल्प जब कि आनन्दगिरि इस शब्द को 'असीमित' भाव में लेते हैं।

 

अयनेषु सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ।।११ ।।

 

शब्दार्थ : अयनेषु -चक्रव्यूहों में (सेना के), -और, सर्वेषु सभी, यथाभागम् - अपने-अपने भाग (स्थान और दल) के अनुरूप, अवस्थिताः -खड़े रह कर, भीष्मम् -भीष्म की, एव-केवल, अभिरक्षन्तु-रक्षा करें, भवन्तः - आप सब, सर्वे-सभी, एव-ही, हि-निश्चित रूप से।

 

अनुवाद : "इसलिए आप सब अपने-अपने स्थान पर स्थित रह कर सेना के सभी व्यूहों में सब ओर से केवल भीष्मपितामह की ही रक्षा करें।"

 

तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः

सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखंदध्मौ प्रतापवान् ।।१२ ।।

 

शब्दार्थ : तस्य-उसका (दुर्योधन का), संजनयन् -बढ़ाते हुए, हर्षम् -हर्ष, कुरुवृद्धः-कौरवों में वयोवृद्ध, पितामहः-पितामह, सिंहनादम् - सिंह की गर्जना, विनद्य -गरज कर, उच्चैः- उच्च स्वर से, शंखम् -शंख, दध्मौ-बजाया, प्रतापवान् - प्रतापी

 

अनुवाद : कुरुवृद्ध महातेजस्वी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करने के लिए सिंह के समान गरज कर उच्च स्वर से अपना शंख बजाया।

 

ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः

सहसैवाभ्यहन्यन्त शब्दस्तुमुलोऽभवत् ।।१३ ।।

 

शब्दार्थ : ततः-तत्पश्चात्, शंखाः-शंख, -और, भेर्यः भेरी (दुंदुभि), -और, पणवानकगोमुखाः-ढोल, मृदङ्ग और सींग (शृङ्ग), सहसा एव-अकस्मात् ही, अभ्यहन्यन्त-उद्घोष हुआ, सः- वह, शब्दः- ध्वनि, तुमुलः- भयंकर, अभवत् था

 

अनुवाद : तत्पश्चात् (भीष्म का अनुसरण करते हुए), शंख, दुंदुभि, ढोल, मृदङ्ग और शृङ्ग बाजों का सहसा ही उद्घोष हुआ। वह नाद अत्यन्त भयंकर था।

 

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ

माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः ।।१४।।

 

शब्दार्थ : ततः-तत्पश्चात्, श्वेतैः- श्वेत, हयैः-घोड़ों से, युक्ते युक्त, महति-विशाल, स्यन्दने-रथ में, स्थितौ-बैठे हुए, माधवः- माधव (कृष्ण), पाण्डवः-पाण्डव (पाण्डुपुत्र), -और, एव-ही, दिव्यौ-दिव्य, शंखौ शंख, प्रदध्मतुः बजाये

 

अनुवाद : तदुपरान्त, श्वेत घोड़ों से युक्त अतिशोभन (विशाल) रथ में विराजित माधव (कृष्ण) और पाण्डुपुत्र (अर्जुन) ने अपने-अपने दिव्य शंखों से नाद किया।

 

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः

पौण्डूं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदरः ।।१५।।

 

शब्दार्थ : पाञ्चजन्यम् -पाञ्चजन्य नामक शंख, हृषीकेशः इन्द्रियों के स्वामी (कृष्ण), देवदत्तम् - देवदत्त (शंख का नाम), धनञ्जयः-कुबेर को जीतने वाले (अर्जुन), पौण्ड्रम् -पौण्ड्र नामक शंख, दध्मौ-बजाया, महाशंखम् -महान् शंख, भीमकर्मा-भयंकर कार्य करने वाले, वृकोदरः- भीम (भेड़िये के समान उदर वाला)

 

अनुवाद : भगवान् कृष्ण ने पाञ्चजन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त और भयानक कर्म करने वाले, अति भोजी भीम ने पौण्ड्र शंख बजाया

 

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः

नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ।।१६ ।।

 

शब्दार्थ : अनन्तविजयम् - अनन्तविजय नामक शंख, राजा-राजा, कुन्तीपुत्रः कुन्तीपुत्र, युधिष्ठिरः- युधिष्ठिर, नकुलः- नकुल, सहदेवः सहदेव, -और, सुघोषमणिपुष्पकौ-सुघोष और मणिपुष्पक (शंख)

 

अनुवाद : कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक शंख बजाये।

 

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी महारथः

धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ।।१७ ।।

 

शब्दार्थ : काश्यः-काश्य (काशी नरेश), -और, परमेष्वासः-उत्कृष्ट धनुर्धर, शिखण्डी-शिखण्डी, -और, महारथः महान् योद्धा, धृष्टद्युम्नः- धृष्टद्युम्न, विराटः-विराट, -और, सात्यकिः-सात्यकि (युयुधान, श्रीकृष्ण का सारथी), -और, अपराजितः - अजेय

 

अनुवाद : महान् धनुर्धर काश्य (काशी नरेश), महान् योद्धा शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट और अजेय सात्यकि ने,

 

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते

सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक् ।।१८ ।।

 

शब्दार्थ : द्रुपदः द्रुपद, द्रौपदेयाः - द्रौपदी के पुत्र, और, सर्वशः-सब, पृथिवीपते-हे पृथिवीपति, सौभद्रः-सुभद्रा का पुत्र (अभिमन्यु), -और, महाबाहुः-विशाल भुजाओं वाला, शंखान्-शंख, दध्मुः बजाये, पृथक् पृथक् अलग-अलग।

 

अनुवाद : हे वसुन्धरा के स्वामी! द्रुपद और द्रौपदी के सभी पुत्रों ने तथा महाबाहु अभिमन्यु ने पृथक् पृथक् शंख बजाये

 

व्याख्या : इस शंखनाद ने युद्ध के आरम्भ होने की घोषणा की।

 

घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्

नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ।।१९

 

शब्दार्थ : सः-उस, घोषः -नाद ने, धार्तराष्ट्राणाम् - धृतराष्ट्र के पुत्रों के, हृदयानि-हृदय, व्यदारयत्-विदीर्ण कर दिये, नभः- आकाश, -और, पृथिवीम् -पृथिवी को, -और, एव-भी, तुमुलः- भयानक, व्यनुनादयन् - प्रतिध्वनित करते हुए।

 

अनुवाद : पृथिवी लोक और द्युलोक को प्रतिध्वनित करते हुए उस भयानक शंखनाद ने धृतराष्ट्र के पक्ष के सैनिकों के हृदय विदीर्ण कर दिये।

 

 

अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः

प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ।।२० ।।

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते

 

शब्दार्थ : अथ-अब, व्यवस्थितान् - व्यूह में खड़े हुए, दृष्ट्वा देख कर, धार्तराष्ट्रान् - धृतराष्ट्र के पक्ष को, कपिध्वजः- हनुमान् जी के चित्र से चित्रित पताका, प्रवृत्ते-प्रारम्भ करने को उद्यत, शस्त्रसंपाते-शस्त्र चलाने के लिए, धनुः- धनुष, उद्यम्य-उठा कर, पाण्डवः -पाण्डुपुत्र, हृषीकेशम् -हृषीकेश (कृष्ण) को, तदा-तब, वाक्यम्-वचन, इदम्-यह, आह-कहा, महीपते- हे राजन्।

 

अनुवाद : कपिध्वज से सुशोभित रथ पर आसीन अर्जुन धृतराष्ट्र के पक्ष की सेना को व्यूह में खड़ा देख कर शस्त्रास्त्र चलाने को उद्यत हुआ और अपने धनुष को उठा कर भगवान् कृष्ण से बोला- हे महीपते!

 

अर्जुन उवाच

 

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।।२१ ।।

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धकामानवस्थितान्

 कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ।।२२ ।।

 

शब्दार्थ : सेनयोः सेनाओं के, उभयोः दोनों, मध्ये-बीच में, रथम् रथ को, स्थापय-खड़ा करें, मे-मेरे, अच्युत-अच्युत (सदा एकरस, कृष्ण), यावत् जब तक, एतान् - इन्हें, निरीक्षे-देख लूँ, 3784 - 4 योद्धकामान् युद्ध की इच्छा वाले, अवस्थितान् -स्थित, कै:-किन के साथ, मया-मेरे द्वारा, सह-साथ, योद्धव्यम् - युद्ध करना है, अस्मिन् - इसमें, रणसमुद्यमे-रण के प्रयास में अथवा युद्ध प्रारम्भ होने की तैयारी में।

 

अर्जुन ने कहा

 

अनुवाद : हे कृष्ण ! कृपया मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कर दें जिससे मैं युद्ध प्रारम्भ होने की इस वेला में युद्ध की आकाङ्क्षा वाले लोगों को देख सकूँ और जान सकूँ कि मुझे किन के साथ युद्ध करना है।

 

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं एतेऽत्र समागताः

धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ।।२३ ।।

 

शब्दार्थ : योत्स्यमानान् - युद्ध की इच्छा वालों को, अवेक्षे-देख लूँ, अहम् -मैं, ये जो, एते-वे, अत्र-यहाँ (कुरुक्षेत्र में), समागताः- एकत्रित, धार्तराष्ट्रस्य-धृतराष्ट्र के पुत्र, दुर्बुद्धेः- दुष्ट बुद्धि वाले, 46 - 9% प्रियचिकीर्षवः- हित चाहने वाले

 

अनुवाद : दुष्ट बुद्धि दुर्योधन का हित चाहने वाले युद्ध की कामना से यहाँ आये हुए लोगों को देख लूँ।

 

सञ्जय उवाच

 

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत

सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ।।२४ ।।

 

शब्दार्थ : एवम् - इस प्रकार, उक्तः-कहे गये, हृषीकेशः-कृष्ण, गुडाकेशेन-गुडाकेश के द्वारा (अर्जुन, जिसने निद्रा को वश में कर लिया), भारत-है भारत (भरतवंशी धृतराष्ट्र), सेनयोः - सेनाओं के, उभयोः - दोनों, मध्ये-बीच में, स्थापयित्वा खड़ा करके, रथोत्तमम् -सर्वोत्कृष्ट रथ को

 

सञ्जय ने कहा

 

अनुवाद : हे भारत! अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भगवान् कृष्ण ने उस सर्वोत्कृष्ट रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कर के-

 

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां महीक्षिताम्

उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान्कुरूनिति ।। २५ ।।

 

शब्दार्थ : भीष्मद्रोणप्रमुखतः - भीष्म और द्रोण के समक्ष, सर्वेषाम् -सब के, -और, महीक्षिताम् - राजाओं के, उवाच-कहा, पार्थ-हे अर्जुन, पश्य-देखो, एतान् -इन्हें, समवेतान् - एकत्रित हुए, कुरून् कुरुवंशियों को, इति-इस प्रकार

 

अनुवाद : भीष्म, द्रोण और सभी राजाओं के समक्ष कहा- हे अर्जुन (पृथापुत्र), यहाँ एकत्रित कुरुवंशियों को देखो

 

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान्

आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ।। २६ ।।

 

शब्दार्थ : तत्र-वहाँ, अपश्यत्-देखा, स्थितान् -स्थित, पार्थः-अर्जुन ने, पितृन् -पितरों को, अथ-भी, पितामहान् -पितामहों को, आचार्यान् - गुरुजनों को, मातुलान् मामाओं को, भ्रातृन् - भाइयों को, पुत्रान् -पुत्रों को, पौत्रान् -पौत्रों को, सखीन् -मित्रों को, तथा और।

 

अनुवाद : अर्जुन ने वहाँ (सेनाओं के मध्य) पिता, पितामह, गुरुजन, मामा, भ्राता, पुत्र, पौत्र तथा मित्रगणों को देखा।

 

श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि

तान्समीक्ष्य कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ।। २७ ।।

कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्

 

शब्दार्थ : श्वशुरान् -श्वसुरों को, सुहृदः-शुभचिन्तक (मित्र), -और, एव-भी, सेनयोः सेनाओं में, उभयोः दोनों (में), अपि-भी, तान् उन्हें, समीक्ष्य-देख कर, सः वह, कौन्तेयः कुन्ती पुत्र अर्जुन, सर्वान् सभी, बन्धून् सम्बन्धी, अवस्थितान् - व्यूह में खड़े हुए, कृपया-दया भाव से, परया-गहन, आविष्टः- अभिभूत, विषीदन्-व्याकुल हो कर, इदम् यह, अब्रवीत् कहा।

 

अनुवाद : (अर्जुन ने) श्वसुरों और शुभचिन्तकों को भी दोनों सेनाओं के मध्य देखा। उन सभी बन्धु-बान्धवों (सम्बन्धियों) को (समक्ष) खड़ा देख कर अर्जुन का हृदय द्रवित हो उठा और वह व्याकुल हो कर बोला-

 

अर्जुन उवाच

 

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।।२८ ।।

 

शब्दार्थ : दृष्ट्वा -देख कर, इमम्-इन्हें, स्वजनम् -स्वजनों को, कृष्ण-हे कृष्ण (श्याम वर्ण, जो आकृष्ट करता है), युयुत्सुम-लड़ने को आतुर, समुपस्थितम् - खड़े हुए।

 

अनुवाद : युद्ध की इच्छा से आये हुए इन सम्बन्धियों को देख कर हे कृष्ण,

 

अर्जुन ने कहा

 

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं परिशुष्यति

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ।।२९ ।।

 

शब्दार्थ : सीदन्ति-शिथिल हो रहे हैं, मम-मेरे, गात्राणि-अङ्ग, मुखम् -मुख, -और, परिशुष्यति-सूख रहा है, वेपथुः कम्पन, -और, शरीरे शरीर में, मे मेरे, रोमहर्ष:-रोमांच, -और, जायते-हो रहा है।

 

अनुवाद : मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर काँप रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।

 

गाण्डीवं संसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते

शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव मे मनः ।। ३० ।।

 

शब्दार्थ : गाण्डीवम् - गाण्डीव, संसते-गिरा जा रहा है, हस्तात् - हाथ से, त्वक् त्वचा, -और, एव-भी, परिदह्यते-जल रही है, नहीं, -और, शक्नोमि-समर्थ हूँ, अवस्थातुम् - खड़े होने में, भ्रमति इव-भ्रमित सा हो रहा है, -और, मे मेरा, मनः मन

 

अनुवाद : गाण्डीव (धनुष) हाथ से छूटा जा रहा है, सारी त्वचा भी जल रही है, मन भ्रमित सा हो रहा है और अब मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हूँ।

 

निमित्तानि पश्यामि विपरीतानि केशव

श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।। ३१ ।।

 

शब्दार्थ : निमित्तानि-लक्षण (शुभाशुभ), -और, पश्यामि देखता हूँ, विपरीतानि-अशुभ, केशव-हे केशव, -नहीं, -और, श्रेयः-कल्याण, अनुपश्यामि -देखता हूँ, हत्वा-मार कर, स्वजनम्-अपने लोगों को, आहवे- युद्ध में।

 

अनुवाद : हे केशव ! इस युद्ध में अपने ही सम्बन्धियों को मार कर मुझे किसी का कल्याण होता तो दृष्टिगत नहीं हो रहा, प्रत्युत् मुझे अपशकुन (अशुभ लक्षण) दिखायी दे रहे हैं।

 

व्याख्या : केशव का अर्थ है-सुन्दर, संवर्धित बालों वाला।

 

काङ्क्षे विजयं कृष्ण राज्यं सुखानि

किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ।। ३२ ।।

 

शब्दार्थ : -नहीं, काङ्क्ष-कामना करता हूँ, विजयम् - विजय, कृष्ण-हे कृष्ण, -नहीं, -और, राज्यं -राज्, सुखानि -सुख, -और, किम् -क्या, नः- हमें, राज्येन-राज्य से, गोविन्द- हे गोविन्द, किम् -क्या, भोगैः- भोगों से, जीवितेन-जीवन से, वा-अथवा

 

अनुवाद : हे कृष्ण ! तो मुझे विजय की अभिलाषा है, राज्य की और ही सुखों की। हे गोविन्द ! हमें राज्य से अथवा सुख-भोग से क्या लाभ ? पुनश्च इस जीवन से भी क्या प्रयोजन ?

 

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि

इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि ।। ३३ ।।

 

शब्दार्थ : येषाम् -जिनके, अर्थे-लिए, काङ्क्षितं - इच्छित, नः- हमारे द्वारा, राज्यम् -राज्य, भोगाः-सुख-भोग, सुखानि-समस्त सुख, -और, ते-वे, इमे-ये, अवस्थिताः-खड़े हैं, युद्धे -रणक्षेत्र में, प्राणान् - प्राणों को, त्यक्त्वा-त्याग कर, धनानि-सम्पत्ति, -और।

 

अनुवाद : जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुखों की आकाङ्क्षा करते हैं, वे सब अपने जीवन और सम्पत्ति का मोह त्याग कर युद्ध में खड़े हैं।

 

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव पितामहाः

मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ।।३४ ।।

 

शब्दार्थ : आचार्याः -गुरुजन, पितरः-पितृगण, पुत्राः-पुत्र, तथा-तथा, एव-ही, -और, पितामहाः-पितामह, मातुला:-मामा, श्वशुराः -श्वशुर, पौत्राः-पौत्र, श्यालाः-साले, सम्बन्धिनः-सम्बन्धी, तथा-और, अन्य।

 

अनुवाद : गुरुजन, पितृगण, पुत्र, पितामह, मामा, श्वशुर, पौत्र, श्याले (साले) और अन्य सम्बन्धी-

 

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ।। ३५ ।।

 

शब्दार्थ : एतान् -इन्हें, -नहीं, हन्तुम्-मारने के लिए, इच्छामि -इच्छा करता हूँ, घ्नतः अपि-मारे जाने पर भी, मधुसूदन-हे मधुसूदन (मधु राक्षस का वध करने वाले), अपि-भी, त्रैलोक्यराज्यस्य-तीनों लोकों के राज्य, हेतोः के लिए, किम् -कैसे, नु-फिर, महीकृते-धरा (के राज्य) के लिए।

 

अनुवाद : हे मधुसूदन! मैं इन्हें मारने की इच्छा नहीं रखता, भले ही वे मुझे मार डालें। तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं ऐसी इच्छा नहीं कर सकता फिर इस धरती के साम्राज्य की तो बात ही क्या?

 

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन

पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ।।३६ ।।

 

शब्दार्थ : निहत्य-मार कर, धार्तराष्ट्रान् - धृतराष्ट्र के पुत्रों को, नः हमें, का-क्या, प्रीतिः -सुख, स्यात् -होगा, जनार्दन- हे जनार्दन, पापम् -पाप, एव--केवल, आश्रयेत् - लगेगा, अस्मान् -हमें, हत्वा-मार कर, एतान् -इनको, आततायिनः - दुष्टों को

 

अनुवाद : धृतराष्ट्र के पुत्रों को मार कर हे जनार्दन, हमें कौन से सुख की प्राप्ति होगी? इन दुष्टों की हत्या से तो हम केवल पाप के ही भागी बनेंगे।

 

व्याख्या : जनार्दन-ऐश्वर्य-समृद्धि और मोक्ष के लिए जो सबका आराध्य है-कृष्ण

 

आततायी-जो दूसरों के घर को आग लगा देता है, दूसरों को विष देता है, खड्ग ले कर मारने को उद्यत रहता है, धन लूटता है, भूमि का अपहरण करता है, और जो दूसरे की पत्नी पर अधिकार जमाता है। दुर्योधन ने ये सभी दुष्कर्म किये थे।

 

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्

स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ।। ३७ ।।

 

शब्दार्थ : तस्मात् - इसलिए, -नहीं, अर्हाः- युक्त, वयम् -हम सब, हन्तुम् -मारने के लिए, धार्तराष्ट्रान् - धृतराष्ट्र के पुत्रों को, स्वबान्धवान्-अपने सम्बन्धियों को, स्वजनम् -सम्बन्धी (मित्रगण), हि-निश्चय से, कथम् -किस प्रकार, हत्वा -मार कर, सुखिनः-सुखी, स्याम-होंगे, माधव- हे माधव

 

अनुवाद : अतः अपने ही भाई-बन्धु, धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारना हमारे लिए युक्त नहीं है; क्योंकि हे माधव, अपने ही लोगों (प्रियजनों) को मार कर हम सुखी कैसे हो सकते हैं?

 

यद्यप्येते पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः

कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे पातकम् ।।३८ ।।

 

शब्दार्थ : यद्यपि -यद्यपि (यदि+अपि), एते-ये, -नहीं, पश्यन्ति- देखते हैं, लोभोपहतचेतसः- लोभ के वशीभूत चित्त वाले, कुलक्षयकृतम् -कुल के नष्ट होने पर, दोषम् -पाप को, मित्रद्रोहे-मित्र के साथ द्रोह करने में, -और, पातकम् -पाप को।

 

अनुवाद : यद्यपि लोभ से अभिभूत चित्त वाले ये लोग तो कुल के विनाश में कोई दोष देख रहे हैं और ही मित्रद्रोह में कोई पाप मान रहे हैं।

 

कथं ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्

कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।।३९ ।।

 

शब्दार्थ : कथम् -क्यों, -नहीं , ज्ञेयम्-समझना चाहिए, अस्माभिः- हमें (हमारे द्वारा), पापात् -पाप से, अस्मात् - इस, निवर्तितुम् - निराकरण हेतु, कुलक्षयकृतम् -कुल के विनाश से उद्भूत, दोषम् -बुराई, प्रपश्यद्भिः-स्पष्ट देखते हुए, जनार्दन-हे जनार्दन

 

अनुवाद : किन्तु हे जनार्दन, कुल के विनाश से उत्पन्न होने वाली बुराइयों को हम तो स्पष्ट देख रहे हैं तो इस पाप को दूर करने का ज्ञान हमें तो होना चाहिए।

 

व्याख्या : नियम का अज्ञान कोई व्यपदेश (बहाना) नहीं है; किन्तु विलासवत् पापी चरित्र महान् अपराध है, हमें ऐसा करना उचित नहीं है जो कि उनसे अधिक बुद्धिमान् हैं।

 

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः

धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ।।४० ।।

 

शब्दार्थ : कुलक्षये-कुल के विनाश में, प्रणश्यन्ति-नष्ट हो जाते हैं, कुलधर्माः-पारिवारिक धार्मिक परम्परायें, सनातनाः-शाश्वत, धर्म-धर्म, नष्टे -नष्ट होने पर, कुलं कृत्स्नम् -समस्त कुल, अधर्मः-अधर्म, अभिभवति-हावी हो जाता है, उत-निश्चित रूप से

 

अनुवाद : कुल का विनाश होने पर उस कुल के शाश्वत धार्मिक विधि-विधान नष्ट हो जाते हैं। धर्म नष्ट होने पर समस्त कुल में अधर्म का साम्राज्य हो जाता है।

 

व्याख्या : शास्त्र की आज्ञा के अनुरूप परिवार में किया जाने वाला यज्ञादि कर्तव्य कर्म ही धर्म है।

 

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः

स्त्रीषु दुष्टासु वाष्र्णेय जायते वर्णसंकरः ।।४१ ।।

 

शब्दार्थ : अधर्माभिभवात् - (अधर्म+अभिभवात्) अधर्म का प्रसार होने से, कृष्ण-हे कृष्ण, प्रदुष्यन्ति-दूषित हो जायेंगी, कुलस्त्रियः-कुल की स्त्रियाँ, स्त्रीषु-स्त्रियों में, दुष्टासु-दुष्ट होने पर, वार्णेय - हे वाष्र्णेय, जायते-उत्पन्न होता है, वर्णसंकरः जाति-मिश्रण।

 

अनुवाद : हे कृष्ण! अधर्म के प्रसार से कुलीन स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जायेंगी और स्त्रियों के भ्रष्ट होने पर हे वाष्र्णेय (वृष्णी वंशी), पृथक् जातियों का मिश्रण हो जायेगा।

 

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य

पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ।।४२ ।।

 

शब्दार्थ : संकरः- जाति-मिश्रण, नरकाय-नरक के लिए, एव-ही, कुलघ्नानाम् -कुलघातियों के, कुलस्य-परिवार के, -और, पतन्ति-गिर जाते हैं, पितरः-पूर्वज, हि-निश्चय से, एषाम् -इनके, लुप्तपिण्डोदकक्रियाः- (श्राद्ध में पितरों को दिया जाने वाला) चावल के पिण्ड का दान और जल के अर्पण की क्रिया का लुप्त होना।

 

अनुवाद : वर्णसंकर कुल तथा कुल को नष्ट करने वालों के लिए नरक का द्वार है; क्योंकि उनके पूर्वजों की आत्मायें पिण्डदान और जल-तर्पण की क्रिया लुप्त होने पर अन्न-जल से वंचित हो कर गिर पड़ती हैं।

 

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः

उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ।।४३ ।।

 

शब्दार्थ : दोषैः -दोषों (बुराइयों) से, एतैः-इन (के कारण), कुलघ्नानाम् -कुल को नष्ट करने वालों के, वर्णसंकरकारकैः- जाति-मिश्रण के हेतुक, उत्साद्यन्ते-नष्ट हो जाते हैं, जातिधर्माः- जातिधर्म, कुलधर्माः-कुल में होने वाले धर्मिक अनुष्ठान, -और, शाश्वताः- सनातन

 

अनुवाद : कुलघातियों के द्वारा किये गये, वर्णसंकर के हेतुक, दोषों से, सनातन जातिधर्म और कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं।

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन

नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ।।४४

 

शब्दार्थ : उत्सन्नकुलधर्माणाम् -जिनके कुलधर्म (पारम्परिक अनुष्ठान) नष्ट हो चुके हों, मनुष्याणाम् - मनुष्यों के, जनार्दन-हे जनार्दन, नरके-नरक में, अनियतम् -चिरकाल तक, वासः - निवास, भवति - होता है, इति-इस प्रकार, अनुशुश्रुम-हमने सुना है।

 

अनुवाद : हे जनार्दन ! हमने सुना है कि जिनके परिवारों में कुलधर्म विनष्ट हो जाते हैं, उनका चिरकाल पर्यन्त नरक में वास होता है।

 

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्

यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ।।४५ ।।

 

शब्दार्थ : अहो बत-हा, आश्चर्य, महत्-महान्, पापम् -पाप, कर्तुम् -करने के लिए, व्यवसिताः-तैयार, वयम् -हम, यत् - कि, राज्यसुखलोभेन राज्य के सुख के लोभवश, हन्तुम्-मारने के लिए, स्वजनम् -अपने लोगों को, उद्यताः-उद्यत्

 

अनुवाद : आश्चर्य! कितने दुःख की बात है कि राज्यसुख भोग के लोभवश हम अपने इष्ट-बन्धुओं को मारने का इतना बड़ा पाप करने को तैयार हैं।

 

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः

धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ।।४६ ।।

 

शब्दार्थ : यदि यदि, माम् -मुझे, अप्रतीकारम् - विरोध का भाव रखने वाला (मुझको), अशस्त्रम् -बिना शस्त्र के, शस्त्रपाणयः- हाथ में शस्त्र ले कर, धार्तराष्ट्राः धृतराष्ट्र के पुत्र, रणे समरभूमि में, हन्युः- मार डालें, तत्-वह, मेमेरे लिए, क्षेमतरम् - अधिक कल्याणकारी, भवेत् -होगा।

 

अनुवाद : यदि धृतराष्ट्र के शस्त्रधारी पुत्र रण में मुझ अप्रतीकारी (अविरोधी) और निःशस्त्र को मार भी डालें, तो वह भी मेरे लिए अधिक श्रेयस्कर होगा।

 

सञ्जय उवाच

 

एवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्

विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ।।४७

 

शब्दार्थ : एवम् - इस प्रकार, उक्त्वा-कह कर, अर्जुनः-अर्जुन, संख्ये-रण में, रथोपस्थे-रथ पर, उपाविशत्-बैठ गया, विसृज्य-छोड़ कर, सशरम् - बाण सहित, चापम् - धनुष को, शोकसंविग्नमानसः - शोकसंतप्त मन से

 

सञ्जय ने कहा

 

अनुवाद : रणक्षेत्र में इस प्रकार कह कर अपने धनुष-बाण को एक ओर रख कर अर्जुन, शोकाकुल मन से रथ के पृष्ठ भाग में बैठ गया।

तत्सत् इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु

ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे

अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ।।

।। इति अर्जुनविषादयोगः ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्री परमात्मने नमः

अथ द्वितीयोऽध्यायः

 सांख्ययोगः

 

सञ्जय उवाच

 

तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्

विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ।।१ ।।

 

शब्दार्थ : तम्-उसे, तथा- इस प्रकार, कृपया करुणा से, आविष्टम् वशीभूत, अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् - अश्रुपूर्ण नेत्रों से और आकुल, विषीदन्तम्-शोकातुर, इदम् - यह, वाक्यम्-वचन, उवाच-कहा, मधुसूदनः- मधुसूदन ने

 

सञ्जय ने कहा

 

अनुवाद : करुणार्द्र, विषादयुक्त (शोकातुर) और अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले अर्जुन से मधुसूदन (मधु राक्षस का वध करने वाले कृष्ण) ने इस प्रकार कहा

 

श्री भगवानुवाच

 

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्

अनार्यजुष्टमस्वर्ण्यमकीर्तिकरमर्जुन ।।२।।

 

शब्दार्थ : कुतः कहाँ से, त्वा-तुम्हें, कश्मलम्-अवसाद (मन की खिन्नता), इदम्-यह , विषमे संकट काल में, समुपस्थितम्- गया, अनार्यजुष्टम् - अनार्य द्वारा आचरित, अस्वर्ण्यम् -स्वर्ग में ले जाने वाला, अकीर्तिकरम् -अपयश देने वाला, अर्जुन-हे अर्जुन

 

अनुवाद : हे अर्जुन, इस संकट काल में तुम्हारे मन में यह अवसाद कहाँ से उत्पन्न हो गया है? तो यह आर्यजनों का आचरण है, स्वर्ग को देने वाला है और ही यश की प्राप्ति कराने वाला है

 

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ।।३।।

 

शब्दार्थ : क्लैब्यम् -नपुंसकता, मा स्म गमः मत प्राप्त करो, पार्थ-अर्जुन, -नहीं, एतत्-यह, त्वयि-तुम्हें, उपपद्यते-उचित, क्षुद्रम् - अधम, हृदयदौर्बल्यम् -हृदय की दुर्बलता को, त्यक्त्वा त्याग कर, उत्तिष्ठ-खड़े हो जाओ, परन्तप - हे शत्रुदमन करने वाले।

 

अनुवाद : (इस समय) हे पार्थ, नपुंसकता को प्राप्त होना तुम्हारे लिए शोभनीय नहीं है। हे शत्रु को संतप्त करने वाले (अर्जुन), हृदय की इस क्षुद्र दुर्बलता को त्याग कर खड़े हो जाओ।

 

अर्जुन उवाच

 

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं मधुसूदन

इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ।।४

 

शब्दार्थ : कथम् -कैसे, भीष्मम् - भीष्म को, अहम् -मैं, संख्ये-युद्ध में, द्रोणम् द्रोण को, -और, मधुसूदन-मधुसूदन, इषुभिः बाणों से, प्रतियोत्स्यामि -विरुद्ध युद्ध करूँगा, पूजाहौँ-आराध्य, अरिसूदन-शत्रु का नाश करने वाले (कृष्ण)

 

अर्जुन ने कहा

 

अनुवाद : हे मधुसूदन, मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण के विरुद्ध कैसे लड़ सकता हूँ क्योंकि हे अरिसूदन ! वे दोनों ही मेरे लिए वन्दनीय हैं।

 

गुरूनहत्वा हि महानुभावान्

श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके

हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव

भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ।।५ ।।

 

शब्दार्थ : गुरून् गुरुजनों को, अहत्वा- मार कर, हि-निश्चयेन, महानुभावान् -महापुरुषों को, श्रेयः-कल्याणकारी, भोक्तुम् - भोग करना, भैक्ष्यम् -भिक्षा, अपि-भी, इह-यहाँ, लोके-लोक में, हत्वा-मार कर, अर्थकामान् अर्थ (धन) की कामना वाले, तु-निश्चित रूप से, गुरून् - गुरुजनों को, इह -यहाँ, एव-ही, भुञ्जीय-भोगना, भोगान् - भोगों को (सुखों को), रुधिरप्रदिग्धान् रक्तरंजित

 

अनुवाद : इन प्रशस्त वन्दनीय आचार्यों का हनन करने की अपेक्षा तो भिक्षा का अन्न स्वीकार करना निश्चित रूप से श्रेयस्कर है। वित्तैषणावश (ऐश्वर्य भोग की इच्छा से) गुरुजनों का वध कर के इस लोक में भी तो मैं रक्तरंजित भोगों का ही भोग करूँगा।

 

चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो

यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः

यानेव हत्वा जिजीविषाम-

स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ।।६

 

शब्दार्थ : -नहीं, -और, एतत्-यह, विद्यः- (हम) जानते हैं, कतरत् क्या, नः- हमारे लिए, गरीयः - श्रेष्ठतर, यत्-जो, वा-अथवा, जयेम-हम जीतें, यदि-यदि, वा-अथवा, नः- हमें, जयेयुः वे जीतें, यान् -जिन्हें, एव-ही, हत्वा-मार कर, -नहीं, जिजीविषामः- जीवित नहीं रहना चाहते, ते-वे, अवस्थिताः -खड़े हैं, प्रमुखे-समक्ष, धार्तराष्ट्राः- धृतराष्ट्र के पुत्र

 

अनुवाद : हम उन पर विजय प्राप्त करें अथवा वे हमें जीत लें-इन दोनों में श्रेष्ठतर क्या है, हम तो यह भी नहीं जानते। पुनरपि, जिन्हें मारकर हम जीव्रित रहने की अभिलाषा नहीं रखते, वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे समक्ष खड़े हैं।

 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः

यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।।७ ।।

 

शब्दार्थ : कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः- (भावुकता में) करुणा दोष से अभिभूत स्वभाव वाला, पृच्छामि-पूछता हूँ, त्वाम्-आपको, धर्मसंमूढचेताः कर्तव्य के प्रति भ्रमित चित्त वाला, यत्-जो, श्रेयः-कल्याणकारी, स्यात् -हो, निश्चितम् - निश्चय से, ब्रूहि-कहें, तत्-वह, मेमेरे लिए, शिष्यः-शिम, ते-आपका, अहम् -मैं, शाधि-शिक्षा दें, माम्-मुझे, त्वाम् आपकी, प्रपन्नम् - शरणागत हूँ।

 

अनुवाद : मेरा हृदय करुणा रूपी दुर्बलता से ग्रस्त है, कर्तव्य के प्रति मेरा मन भ्रान्त है (मूढ़ है), मैं आपसे पूछता हूँ, निश्चित रूप से जिसमें मेरा कल्याण निहित हो, वही उपदेश मुझे दीजिए। मैं आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण में आया हूँ।

 

हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-

द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्

अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं

राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ।।८ ।।

 

 

शब्दार्थ : हि-नहीं, प्रपश्यामि-देखता हूँ, मम-मेरा, अपनुद्यात् -दूर करें, यत्-जो, शोकम्-शोक, उच्छोषणम् -सुखाने वाला, इन्द्रियाणाम् - इन्द्रियों को, अवाप्य-प्राप्त करके, भूमौ धरा पर, असपत्नम् -निर्द्वन्द्व, ऋद्धम् -समृद्ध, राज्यम् राज्य, सुराणाम् - देवताओं का, अपि-भी, -और, आधिपत्यम् स्वामित्व

 

अनुवाद : मैं इस धरा का निर्द्वन्द्व राज्य और देवों पर स्वामित्व भी क्यों प्राप्त कर लूँ; परन्तु मुझे ऐसा कोई लक्षण नहीं दिखायी दे रहा, जिससे इन्द्रियों को सुखाने वाला मेरा यह शोक दूर हो सके।

 

सञ्जय उवाच

 

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप

योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ।।९।।

 

शब्दार्थ : एवम् - इस प्रकार, उक्त्वा-कह कर, हृषीकेशम् -कृष्ण को, गुडाकेशः अर्जुन (नींद को जीतने वाला), परन्तप-शत्रु का नाश करने वाला, -नहीं, योत्स्ये-लडूंगा, इति-ऐसा, गोविन्दम् - गोविन्द को, उक्त्वा-कह कर, तूष्णीम् -मौन, बभूव - हो गया।

 

सञ्जय ने कहा

 

अनुवाद : हृषीकेश (इन्द्रियों के स्वामी कृष्ण) को परन्तप (शत्रु का नाश करने वाले), गुडाकेश (निद्रा को जीतने वाला) अर्जुन ने इस प्रकार कहा- "हे गोविन्द, मैं युद्ध नहीं करूँगा", और मौन हो गया।

 

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत

सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ।।१० ।।

 

शब्दार्थ : तम् - उसे, उवाच-कहा, हृषीकेशः - कृष्ण ने, प्रहसन् -हँसते हुए, इव-मानो, भारत-हे भारत, सेनयोः सेनाओं के, उभयोः दोनों, मध्ये मध्य में, विषीदन्तम् -निराश (शोकाकुल), इदम् - यह, वचः- वचन

 

अनुवाद : हे भरतवंशी (धृतराष्ट्र), दोनों सेनाओं के मध्य शोकनिमग्न अर्जुन से भगवान् कृष्ण ने, मानो हँसते हुए, ये शब्द कहे।

 

श्री भगवानुवाच

 

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे

गतासूनगतासुंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ।।११ ।।

 

शब्दार्थ : अशोच्यान् - जिनके लिए शोक नहीं करना चाहिए, अन्वशोचः-शोक किया, त्वम्-तुमने, प्रज्ञावादान् - ज्ञानपूर्ण वचन, -और, भाषसे-कहते हो, गतासून् -मृत, अगतासून्-जीवित, -और, नहीं, अनुशोचन्ति-शोक करते हैं, पण्डिताः - बुद्धिमान्

 

श्री भगवान् ने कहा

 

अनुवाद : तुमने उनके लिए शोक किया जो शोक करने के योग्य नहीं हैं। पुनरपि, तुम बुद्धिमानों जैसी बातें करते हो विद्वान् लोग जीवित अथवा मृत के लिए शोक नहीं करते।

 

व्याख्या : इस श्लोक से गीता-दर्शन प्रारम्भ होता है।

 

भीष्म और द्रोण के लिए चिन्ता करना उचित नहीं है; क्योंकि वे अपनी वास्तविक प्रकृति से शाश्वत हैं और गुणवान् तथा सच्चरित्र हैं। यद्यपि तुम पाण्डित्यपूर्ण वचन बोल रहे हो, तथापि तुम अज्ञान में हो; क्योंकि तुम उनके लिए शोक कर रहे हो, जो नित्य होने के कारण शोक करने योग्य नहीं हैं। आत्मज्ञान से युक्त व्यक्ति ही विद्वान् कहलाते हैं। वे मृत अथवा जीवित व्यक्ति के लिए शोक नहीं करते; क्योंकि वे जानते हैं कि आत्मा अजर, अमर और अजन्मा है। वे यह भी जानते हैं कि मृत्यु का तो अस्तित्व ही नहीं है; क्योंकि सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से पृथक् होना ही मृत्यु कहलाता है। पंचभूतों से निर्मित शरीर से पदार्थों का विश्लेषण और पंचतत्त्वों का अपने मूल स्रोत को जाना ही मृत्यु है। शरीर की परिवर्तनशील प्रकृति और आत्मा की नित्य प्रकृति को अर्जुन भूल गया था। अज्ञानवश वह अपने गुरुजनों और सम्बन्धियों के साथ अपने सम्बन्ध को नित्य मान बैठा था। वह भूल गया था कि वर्तमान जीवन के यह जागतिक सम्बन्ध पूर्वकृत् कर्मों के परिणाम स्वरूप थे। इन कर्मों के क्षय होने पर सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं और दूसरा शरीर धारण करने पर नये कर्म अंकुरित होते हैं।

 

पूर्वकृत् कार्य कर्म कहलाता है और कर्म के जिस भाग ने वर्तमान अवतरण को जन्म दिया, वह प्रारब्ध कर्म कहा जाता है।

 

त्वेवाहं जातु नासं त्वं नेमे जनाधिपाः

चैव भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।।१२।।

 

शब्दार्थ : -नहीं, तु-निश्चित रूप से, एव-ही, अहम् मैं, जातु-किसी काल में, -नहीं, आसम्-था, नहीं, त्वम्-तुम, ननहीं, इमे-ये, जनाधिपाः-शासक (राजा), -नहीं, -और, एव-ही, ननहीं, भविष्यामः- होंगे, सर्वे-सब, वयम् -हम, अतः- अब से आगे, परम् बाद में।

 

अनुवाद : ऐसा नहीं है कि किसी काल में मैं नहीं था, तुम नहीं थे अथवा ये राजा नहीं थे और ऐसा समय भी नहीं आयेगा, जब हम सब पुनः नहीं होंगे।

 

व्याख्या : यहाँ भगवान् कृष्ण आत्मा की अमरता अथवा आत्मा की नित्य प्रकृति का वर्णन कर रहे हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में आत्मा का अस्तित्व रहता है। भौतिक शरीर को त्यागने के उपरान्त भी मनुष्य की सत्ता रहती है। इससे परे भी जीवन है।

 

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र मुह्यति ।।१३ ।।

 

शब्दार्थ : देहिनः देहधारी (आत्मा) का, अस्मिन् - इसमें, यथा-जैसे, देहे शरीर में, कौमारम् -कुमारावस्था (बाल्यावस्था), यौवनम् - यौवन, जरा-वृद्धावस्था, तथा-वैसे ही, देहान्तरप्राप्तिः अन्य शरीर की प्राप्ति, धीरः- धैर्यवान्, तत्र-उस पर, -नहीं, मुह्यति-शोक करता है।

 

अनुवाद : जिस प्रकार से जीवात्मा इस शरीर से कुमार, यौवन और वृद्धावस्था की ओर अग्रसर होता है, उसी प्रकार से (परिवर्तन क्रम में) नव-देह की प्राप्ति करता है। धीर पुरुष इस पर मोह नहीं करते।

 

व्याख्या : इस शरीर में जैसे बाल्यावस्था से युवावस्था और युवावस्था से वृद्धावस्था आने में कोई बाधा नहीं आती, वैसे ही 'अहम्' के सातत्य में मृत्यु से कोई बाधा नहीं पड़ती। बाल्यावस्था के अवसान (समाप्ति) काल में आत्मा मृत नहीं हो जाता। निश्चित रूप से, ऐसा भी नहीं कि युवावस्था में इसका पुनर्जन्म होता हो। जिस प्रकार से आत्मा बाल्यकाल से युवा और युवा से वृद्धावस्था पर्यन्त अपरिवर्तित रूप से आगे बढ़ता है, उसी प्रकार से एक से दूसरे शरीर में स्थानान्तरण भी अपरिवर्तित रूप से होता है। अतः बुद्धिमान् इसके लिए शोक नहीं करता।

 

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ।।१४ ।।

 

शब्दार्थ : मात्रास्पर्शाः- इन्द्रिय-विषय-संयोग, तु-निश्चयेन, कौन्तेय-हे अर्जुन, शीतोष्णसुखदुःखदाः-सरदी, गरमी और सुख-दुःख देने वाले, आगमापायिनः आने-जाने वाले (जिनका आदि भी है और अन्त भी), अनित्याः- अनित्य (क्षणभङ्गुर), तान् - उन्हें, तितिक्षस्व-सहन करो, भारत-हे भारत !

 

अनुवाद : हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रिय-विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील तथा अनित्य हैं और सरदी-गरमी एवं सुख-दुःख के देने वाले हैं। इन्हें सहन करो।

 

व्याख्या : शीत एक काल में सुखद है, तो दूसरे काल में दुःखद उष्णता शीतकाल में सुखद है; किन्तु ग्रीष्मर्तु में दुःखद वही विषय एक समय में सुख प्रदान करता है और दूसरे समय में दुःखद हो जाता है। इसलिए सुख-दुःख और सरदी-गरमी देने वाले इन्द्रिय-संयोग तो बनते-बिगड़ते रहते हैं। अतः वे प्रकृति से ही अनित्य हैं। विषयों का सम्बन्ध नेत्र, कर्ण, नासिका, त्वचा आदि इन्द्रियों से होता है और (इनसे प्राप्त) प्रत्यक्ष ज्ञान (sensations), शिराओं द्वारा मन तक पहुँचाया जाता है जिसका स्थान मस्तिष्क अथवा बुद्धि में है। सुख-दुःख की अनुभूति मन को होती है। सुख-दुःख और शीत-उष्णता को सहन कर के मनुष्य को मन की सन्तुलित अवस्था का विकास करना चाहिए। (निरूपण-V.22)

 

यं हि व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।१५ ।।

 

शब्दार्थ : यम्-जिसको, हि-निश्चित रूप से, व्यथयन्ति - विचलित सः वह, नहीं करते, एते-ये, पुरुषम् -मनुष्य को, पुरुषर्षभ-हे पुरुषश्रेठ, समदुःखसुखम् -सुख-दुःख में समान, धीरम् - धीर पुरुष को, अमृतत्वाय-अमृतत्व के लिए, कल्पते-योग्य है।

 

अनुवाद : हे पुरुषश्रेष्ठ (अर्जुन), जिस धीर पुरुष को सुख और दुःख विचलित नहीं करते, वही निश्चित रूप से मोक्ष का अधिकारी है।

 

व्याख्या : देहाध्यास अथवा आत्मा का शरीर के साथ एकत्व ही सुख-दुःख का हेतु है। सर्वव्यापक अमृत स्वरूप आत्मा तत्त्व से अभिन्नता स्थापित करने पर मनुष्य सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है (उनसे प्रभावित नहीं होता)

 

तितिक्षा अथवा सहनशीलता से आत्मशक्ति का विकास होता है। सुख-दुःख अथवा शीत-उष्म (ताप) को शान्त भाव से सहन करना ज्ञान-मार्ग के साधक के लक्षण हैं। यह षट्सम्पत् में से एक है। यह सम्यक्-ज्ञान की अवस्था है। तितिक्षा स्वयं में तो मोक्षप्रद नहीं है; किन्तु विवेक और अनासक्ति के संयोग से यह आत्म-ज्ञान अथवा अमृतत्व प्रदान करने का कारण बन जाती है। (निरूपण –XVIII.53)

 

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ।।१६ ।।

 

शब्दार्थ : -नहीं, असतः-असत् का, विद्यते-है, भावः - अस्तित्व, -नहीं, अभावः अभाव, विद्यते-है, सतः-सत् का, उभयोः दोनों का, अपि-भी, दृष्टः देखा गया, अन्तः- अन्तिम सत्य, तु-निश्चय से, अनयोः इन दोनों का, तत्त्वदर्शिभिः सत्य का दर्शन करने वालों के द्वारा।

 

अनुवाद : असत् का अस्तित्व नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। दोनों की वास्तविकता तत्त्वदर्शियों (ज्ञानियों) द्वारा देखी गयी है।

 

व्याख्या : अपरिवर्तनशील एक-रस आत्मा नित्य वर्तमान है। सार-रूप में सत्य केवल यही है। नाम-रूप का यह क्षणिक जगत् नित्य परिवर्तशील है। अतः असत्य है। जीवन्मुक्त इस संसार रूप मृग-मरीचिका और आत्मा की शाश्वत सत्ता के प्रति सदा जागरूक रहता है। अपने ज्ञान-चक्षुओं से वह आत्मा का प्रत्यक्ष-ज्ञान करता है। रज्जु रूपी सत्य का ज्ञान होने पर रज्जु में सर्प की भाँति यह संसार उसके लिए विलुप्त हो जाता है। सब नाम-रूपों में अब वह अन्तर्निहित सार-तत्त्व का दर्शन करता है अर्थात् अस्ति-भाति-प्रिय अथवा सत्-चित्-आनन्द (सच्चिदानन्द) को ही सर्वत्र देखता है। इसीलिए उसे तत्त्वदर्शी अथवा सत्य का ज्ञाता कहा जाता है।

 

परिवर्तनशील पदार्थ अनित्य हैं और सदा सम रस नित्य हैं।

 

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्

विनाशमव्ययस्यास्य कश्चित् कर्तुमर्हति ।।१७

 

शब्दार्थ : अविनाशि-विनाश रहित, तु-निश्चयेन, तत्-उसे, विद्धि- जानो, येन-जिसके द्वारा, सर्वम्-समस्त, इदम् - यह, ततम्-व्याप्त, विनाशम् -विनाश, अव्ययस्य अस्य-इस अविनाशी का, -नहीं, कश्चित्-कोई, कर्तुम् -करने के लिए, अर्हति-समर्थ है।

 

अनुवाद : जिससे यह सारा (जगत्) व्याप्त है, केवल उसे ही तुम विनाश रहित जानो। उस अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नहीं है।

 

व्याख्या : ब्रह्मन् अथवा आत्मन् आकाश की भाँति सर्वत्र सभी पदार्थों में व्याप्त है। पात्र को यदि तोड़ दिया जाये, तो उसके भीतर अथवा बाहर के आकाश का विनाश करना असम्भव है। इसी भाँति सभी पदार्थ अथवा शरीर नष्ट भी हो जायें, तब भी उनमें व्याप्त ब्रह्मन् अथवा आत्मन् को नष्ट नहीं किया जा सकता। यह जीवन्त सत्य है-सत्

 

ब्रह्मन् के खण्ड नहीं हो सकते। वह न्यूनाधिक नहीं हो सकता सम्पत्ति क्षय हो जाने पर लोग गतश्रीक (बरबाद) हो जाते हैं। परन्तु ब्रह्मन् के विषय में ऐसा कुछ नहीं होता, वह तो अव्यय है, क्षय रहित है। इसलिए आत्मा का विनाश कोई नहीं कर सकता। यह नित्य विद्यमान है। सर्वदा पूर्ण है। आप्तकाम है। पूर्ण सत् है। अनिर्वचनीय है।

 

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः

अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ।।१८ ।।

शब्दार्थ : अन्तवन्तः नश्वर, इमे-ये, देहाः-शरीर, नित्यस्य - शाश्वत के, उक्ताः-कहे गये हैं, शरीरिण:-जीवात्मा के, अनाशिनः अविनाशी के, अप्रमेयस्य-परिमाण रहित, तस्मात् - इसलिए, युध्यस्व-युद्ध करो, भारत- है भारत

 

अनुवाद : नित्य, अविनाशी, अप्रमेय शरीरधारी जीवात्मा के ये शरीर नश्वर हैं, ऐसा कहा जाता है। इसलिए हे अर्जुन, तुम युद्ध करो।

 

व्याख्या : भगवान् कृष्ण अर्जुन को सर्वव्याप्त, शाश्वत आत्मा की प्रकृति को अनेक प्रकार से समझाते हुए उसके अज्ञान से उत्पन्न शोक, मोह और भ्रम को दूर करते हुए उसे युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं।

 

एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्

उभौ तौ विजानीतो नायं हन्ति हन्यते ।।१९ ।।

 

शब्दार्थ : यः जो, एनम्-इसे, वेत्ति-जानता है, हन्तारम् - मारने वाला, यः जो, चऔर, एनम्-इसे, मन्यते-मानता है, हतम् - मरा हुआ, उभौ वे दोनों, तौ वे दोनों, ननहीं, विजानीतः- जानते, नहीं, अयम्-यह, हन्ति-मारता है, -नहीं, हन्यते - मारा जाता है।

 

अनुवाद : जो व्यक्ति इस जीवात्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मृत समझता है, वे दोनों इसे नहीं जानते; क्योंकि जीवात्मा तो मारता है, ही मरता है।

 

व्याख्या : जीवात्मा अकर्ता है, निर्विकार है। मरने के कर्म का तो यह हेतु (कर्ता) है और ही विषय देहाध्यास अथवा अहं के कारण जो स्वयं को 'मारने वाला' अथवा 'मृत' समझता है, वह वास्तव में आत्मा की वास्तविक प्रकृति से अनभिज्ञ है। आत्मा अविनाशी है। यह तीनों कालों में विद्यमान है। यह सत् (Existence) है। शरीर का विनाश होने पर आत्मा का विनाश नहीं होता। किसी भी अवस्था में शरीर तो परिवर्तनशील है। इसे (आत्मा को) तो दूसरा शरीर धारण करना है। यह अनिवार्य सत्य है। किन्तु आत्मतत्त्व इससे प्रभावित नहीं होता। श्लोक १९, २०, २१, २३ और २४ आत्मा की नित्यता का वर्णन करते हैं। (निरूपण-XVIII.17)

 

जायते प्रियते वा कदाचि-

न्नायं भूत्वा भविता वा भूयः

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।२० ।।

 

शब्दार्थ : -नहीं, जायते-जन्म लेता है, म्रियते-मरता है, वा-अथवा, कदाचित् कभी भी, -नहीं, अयम्-यह (आत्मा), भूत्वा हो कर, भविता-होगा, वा-अथवा, ननहीं, भूयः पुनः, अजः- जन्म रहित, नित्यः- शाश्वत, शाश्वतः - अपरिवर्तनशील, अयम्-यह, पुराणः- पुरातन, नहीं, हन्यते-मारा जाता है, हन्यमाने-मारा जाने पर, शरीरे-शरीर में।

 

अनुवाद : जन्म-मरण से रहित यह आत्मा तो कभी जन्म लेता और ही कभी मरता है। ऐसा भी नहीं कि एक बार उत्पन्न हो कर इसका पुनः अस्तित्व होगा। यह तो अजन्मा, अनादि, सनातन और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर आत्मा नहीं मरता

 

व्याख्या : यह आत्मा जन्म, भाव (अस्तित्व), विकास, परिवर्तन, क्षय और मृत्यु, इन छह भाव-विकारों से शून्य है। अखण्ड होने के कारण यह परिमाण में लघु नहीं होता। यह बढ़ता है, घटता है। यह सदा सम रहता है। जन्म-मृत्यु तो भौतिक शरीर के ही गुण हैं। सर्वव्यापक शाश्वत आत्मा का तो जन्म और मृत्यु स्पर्श भी नहीं कर सकते

 

वेदाविनाशिनं नित्यं एनमजमव्ययम्

कथं पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ।।२१ ।।

 

शब्दार्थ : वेद-जानता है, अविनाशिनम् - विनाश रहित को, नित्यम् - शाश्वत, यः जो, एनम्-इसको, अजम् - जन्म रहित, अव्ययम् - अपरिवर्तनशील, कथम् -कैसे, सः-वह, पुरुषः- मनुष्य, पार्थ-अर्जुन, कम् - किसे, घातयति-मरवाता है, हन्ति-मारता है, कम् - किसे

 

अनुवाद : जो मनुष्य इसे विनाश रहित, नित्य, अजन्मा और निर्विकारी मानता है, वह मनुष्य हे अर्जुन, कैसे किसी को मरवा सकता है अथवा मार सकता है?

 

व्याख्या : ज्ञानोद्दीप्त साधु प्रत्यक्ष ज्ञान अथवा आध्यात्मिक अनुभव द्वारा अविकारी, अविनाशी आत्मा का बोध कर लेता है। वह तो मारने का कर्म कर सकता है और ही मरवा सकता है।

 

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-

न्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।२२ ।।

 

शब्दार्थ : वासांसि-वस्त्र, जीर्णानि-जीर्ण-शीर्ण (फटे-पुराने), यथा-जैसे, विहाय-त्याग कर, नवानि-नये, गृह्णाति-धारण करता है, नरः मनुष्य, अपराणि-अन्य, तथा-वैसे, शरीराणि-शरीर, विहाय-त्याग कर, जीर्णानि-पुराने, अन्यानि-अन्य, संयाति-धारण करता है, नवानि-नयेदेही-देहधारी आत्मा

 

अनुवाद : जिस प्रकार से कोई व्यक्ति जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों को उतार कर नवीन वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार यह देहधारी आत्मा पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर धारण करता है।

 

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः

चैनं क्लेदयन्त्यापो शोषयति मारुतः ।।२३

 

शब्दार्थ : -नहीं, एनम् -इसे (आत्मा को), छिन्दन्ति-काट सकते हैं, शस्त्राणि-शस्त्र, -नहीं, एनम्-इसे, दहति-जलाता है, पावकः- अग्नि,-नहीं, -और, एनम्-इसे, क्लेदयन्ति-भिगो सकता है, आपः- जल, -नहीं, शोषयति-सुखा सकता है, मारुतः - वायु

 

अनुवाद : शस्त्र इसे काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल इसे भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकता।

 

व्याख्या : आत्मा अखण्ड है। इसके खण्ड नहीं हैं। यह अतीव सूक्ष्म है। यह अनन्त है, अतः तलवार इसे काट नहीं सकती, अग्नि जला नहीं सकती, जल इसे गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकता।

 

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ।।२४ ।।

 

शब्दार्थ : अच्छेद्यःन कटने वाला (जिसे छेदा जा सके), अयम् - यह (आत्मा), अदाह्यः- जिसे जलाया जा सके, अयम्-यह, अक्लेद्यः गीला किया जा सके, अशोष्यः सुखाया जा सके, एव-ही, - और, नित्यः-नित्य, सर्वगतः सर्वव्यापक, स्थाणुः-अपरिवर्तनशील, अचलः-अचल (गतिहीन), अयम्-यह, सनातनः शाश्वत

 

अनुवाद : तो यह आत्मा कटने योग्य है, इसे जलाया जा सकता है, भिगोया जा सकता है और ही इसे सुखाया जा सकता है। यह नित्य, सर्वव्याप्त, स्थिर, अचल और शाश्वत है।

 

व्याख्या : आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म है। यह मन और वाणी की पहुँच (उपगमन) से परे है। इस सूक्ष्म आत्मा का बोध अतीव दुष्कर है। अमर आत्मा की प्रकृति का व्याख्यान और विश्लेषण भगवान् कृष्ण अनेक प्रकार के दृष्टान्तों से करते हैं, ताकि समान्य जन इस ज्ञान को ग्रहण कर सकें।

 

इस आत्मा को तलवार काट नहीं सकती, अतः यह शाश्वत है। क्योंकि यह शाश्वत है, इसलिए यह सर्वव्यापक भी है। सर्वव्यापक होने के कारण यह मूर्तिवत् स्थिर है। स्थिर है, इसलिए अचल है। अचल है, इसी कारण नित्य विद्यमान है। इसीलिए इसका कोई कारण नहीं है (यह स्वयंभू है) नवीन भी नहीं है। यह सनातन है, पुरातन है, शाश्वत है।

 

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ।। २५ ।।

 

शब्दार्थ : अव्यक्तः- अप्रकट, अयम् - यह (आत्मा), अचिन्त्यः - कल्पनातीत, अयम् - यह, अविकार्यः - अपरिवर्तनशील, अयम् - यह, उच्यते- कहा जाता है, तस्मात् - इसलिए, एवम् - इस प्रकार, विदित्वा-जान कर, एनम् इसको, ननहीं, अनुशोचितुम् - शोक करने के लिए, अर्हसि योग्य हो

 

अनुवाद : यह आत्मा अव्यक्त है, अचिन्त्य और अविकारी है। इस प्रकार से इसे जान कर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

 

व्याख्या : आत्मा दृग्विषय (दृष्टि का विषय) नहीं है। भौतिक चक्षु से इसका दर्शन असम्भव है। अतः यह आत्मा अप्रकट है। नेत्रों से दर्शनीय विषय चिन्तन का विषय बन जाता है; किन्तु इसे नेत्रों से नहीं देखा जा सकता। अतः यह अचिन्त्य है। दूध को छाछ में मिला दिया जाये, तो उसका स्वरूप परिवर्तित हो जायेगा। किन्तु दुग्ध की भाँति इस आत्मा का स्वरूप नहीं बदलता इसीलिए यह अविकारी और अपरिवर्तनशील है। अतः इस प्रकार से आत्मा को समझ कर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। वह भी तुम्हारे लिए सोचना उचित नहीं कि तुम उनको मारने वाले हो और वे तुम्हारे द्वारा मारे गये हैं।

 

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्

तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ।। २६ ।।

 

शब्दार्थ : अथ-अब, -और, एनम्- इसे (आत्मा को), नित्यजातम् - नित्य जन्म लेने वाला, नित्यम्-सदा, वा-यदि, मन्यसे मानते हो, मृतम्-मरा हुआ, तथापि-फिर भी, त्वम्-तुम, महाबाहो -शूरवीर, -नहीं, एवम् - इस प्रकार, शोचितुम्-शोक के लिए, अर्हसि-योग्य हो

 

अनुवाद : पुनरपि, हे अर्जुन, यदि तुम इसे नित्य जन्म लेने और मरने वाला समझते हो, तब भी तुम्हें शोक करना उचित नहीं है।

 

व्याख्या : तर्क के लिए भगवान् कृष्ण यहाँ लोकप्रिय सम्भावना का आलम्बन लेते हैं। मान लो, शरीर के अस्तित्व में आने पर आत्मा पुनः-पुनः जन्म लेता है और शरीर के मरने पर पुनः-पुनः मरता है, तथापि हे महाबाहो (शूरवीर अर्जुन), तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए; क्योंकि मृतक के लिए जन्म लेना अनिवार्य है और जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु अपरिहार्य है। यह सृष्टि का अटल एवं कठोर नियम है।

 

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य

तस्मादपरिहार्येऽर्थे त्वं शोचितुमर्हसि ।।२७

 

शब्दार्थ : जातस्य-जन्म लेने वाले की, हि-निश्चित रूप से, ध्रुवः-निश्चित, मृत्युः मृत्यु, ध्रुवम् -निश्चित, जन्म-जन्म, मृतस्य-मृत का, -और, तस्मात् - इसलिए, अपरिहार्ये-जो टल सके, अर्थ-के लिए, -नहीं, त्वम् -तुम, शोचितुम्-शोक करने के लिए, अर्हसि योग्य हो।

 

अनुवाद : जन्म लेने वाले की मृत्यु सुनिश्चित है और मरने वाले का जन्म सुनिश्चित है। जिसका कोई निराकरण ही नहीं है अर्थात् जो बात टल नहीं सकती, उसके लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

 

व्याख्या : मृत का जन्म निश्चित और जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है। जन्म और मृत्यु तो अपरिहार्य (अटल) है। अतः अपरिहार्य के लिए शोक उचित नहीं

 

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत

अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ।।२८ ।।

 

शब्दार्थ : अव्यक्तादीनि-जन्म से पूर्व अप्रकट, भूतानि-समस्त प्राणी, व्यक्तमध्यानि-मध्य में प्रकट, भारत-हे अर्जुन, अव्यक्तनिधनानि-अन्त में भी अप्रकट, एव-ही, तत्र-वहाँ, का-क्या, परिदेवना-शोक

 

अनुवाद : समस्त प्राणी (सृष्टि के) आदि में अप्रकट रहते हैं और मध्य में प्रकट रूप में होते हैं। अन्त में हे अर्जुन, पुनः अप्रकट हो जाते हैं। इस प्रकार से शोक करने का कोई कारण ही नहीं है।

 

व्याख्या : भौतिक शरीर पंचतत्त्वों का संघात (संयोग) है। पंचतत्त्वों का एवंविध संघात होने पर ही यह भौतिक नेत्रों द्वारा दर्शनीय है। मृत्यूपरान्त शरीर के पंचतत्त्व विघटित हो जाते हैं और अपने-अपने मूल स्रोत की ओर उपगमन करते हैं। तब यह अदृश्य होता है। अतः मध्य काल में शरीर दृष्टिगोचर हो जाता है। मोहवश ही पुत्र, मित्र, आचार्य, पिता, माता, पत्नी, भ्राता और स्वसा (बहन) आदि सम्बन्ध बनते हैं। जिस प्रकार एक नदी में शिलाखण्ड मिलते और बिछुड़ते रहते हैं, इसी प्रकार माता-पिता, पुत्र और बन्धुजनों का इस संसार में संयोग-वियोग होता रहता है। यह संसार तो एक बहुत बड़ा पथिकाश्रम है। पथिकों का संयोग-वियोग तो यहाँ होता रहता है।

 

प्रारम्भ और अन्त में पात्र की सत्ता नहीं होती प्रारम्भ और अन्त में देखने पर विचार करना चाहिए कि यह पात्र तो मात्र भ्रान्ति है, इसका अस्तित्व क्षणिक है। एवंविध आदि और अन्त में शरीरों का अस्तित्व नहीं होता और जो आदि और अन्त में नहीं है, मध्य में भी वह भ्रम हो सकता है। विचार कर के अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए कि वस्तुतः मध्य में भी शरीर का अस्तित्व नहीं है।

 

शरीर की इस प्रकृति और इस पर आधारित सभी सम्बन्धों को समझने वाला व्यक्ति शोक नहीं करेगा।

 

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-

माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः

आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति

श्रुत्वाप्येनं वेद चैव कश्चित् ।।२९ ।।

 

शब्दार्थ : आश्चर्यवत् - आश्चर्य की भाँति, पश्यति-देखता है, कश्चित् -कोई, एनम् - इसे (आत्मा को), आश्चर्यवत्-आश्चर्य की भाँति, वदति-बोलता है, तथा-वैसे, एव-ही, -और, अन्यः- अन्य, आश्चर्यवत् - आश्चर्य की भाँति, -और, एनम्-इसे, अन्यः - अन्य, शृणोति-सुनता है, श्रुत्वा-सुन कर, अपि-भी, एनम्-इसे, वेद-जानता है, -नहीं, -और, एव-ही, कश्चित् -कोई।

 

अनुवाद : इस आत्मा को कोई (पुरुष) तो आश्चर्य की भाँति देखता है, अन्य इसके लिए आश्चर्य की भाँति वचन कहता है, कोई और आश्चर्य की भाँति इसका श्रवण करता है और श्रवण कर के भी इसे कोई समझ नहीं पाता

 

व्याख्या : इस श्लोक की विवेचना इस प्रकार भी की जा सकती है। जो इस आत्मा का दर्शन, वाचन और श्रवण करता है, वह अद्भुत व्यक्ति है। ऐसा व्यक्ति विरल ही होता है। सहस्रों में कोई एक ही ऐसी निष्ठा वाला होता है। अतः उचित ही कहा है कि आत्मा को समझना अत्यन्त दुष्कर है।

 

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत

तस्मात्सर्वाणि भूतानि त्वं शोचितुमर्हसि ।। ३० ।।

 

शब्दार्थ : देही-अन्तर्निवसित (आत्मा), नित्यम् सदा, अवध्यः- अवध्य (जिसे मारा जा सके), अयम्-यह, देहे-शरीर में, सर्वस्य-सबके, भारत-हे भारत, तस्मात्-इसलिए, सर्वाणि-समस्त, भूतानि-प्राणी, -नहीं, त्वम् -तुम, शोचितुम् - शोक करने के लिए, अर्हसि -योग्य हो

 

अनुवाद : प्रत्येक प्राणी का अन्तःस्थ आत्मा नित्य अवध्य है; इसलिए हे अर्जुन, तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

 

व्याख्या : किसी भी प्राणी का शरीर तो नष्ट हो सकता है; पर आत्मा का विनाश नहीं हो सकता। अतः तुम्हें किसी के लिए भी शोक नहीं करना है, चाहे वे भीष्मपितामह हों अथवा कोई अन्य भी क्यों हो।

 

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य विकम्पितुमर्हसि

धर्माद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य विद्यते ।। ३१ ।।

 

शब्दार्थ : स्वधर्मम् - अपने कर्तव्य को, अपि भी, -और, अवेक्ष्य-देख कर, -नहीं, विकम्पितुम् - विचलित होना, अर्हसि चाहिए, धर्मात् -धर्म से, हि-निश्चय से, युद्धात् - युद्ध की अपेक्षा से, श्रेयः-कल्याणप्रद, अन्यत् अन्य, क्षत्रियस्य-क्षत्रिय का, विद्यते-नहीं है।

 

अनुवाद : अपने कर्तव्य को देखते हुए भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़ कर कोई और श्रेष्ठतर कार्य नहीं है।

 

व्याख्या : अब भगवान् कृष्ण अर्जुन को युद्ध में प्रेरित करने के लिए सांसारिक तर्क देते हैं। अभी तक तो भगवान् कृष्ण अर्जुन को आत्मा की अमरता के विषय में उपदेश करते हुए उसे दार्शनिक तर्क दे रहे थे। अब वे अर्जुन से कहते हैं-"हे अर्जुन, युद्ध तो क्षत्रिय का प्रथम कर्तव्य है। उस कर्तव्य से तुम्हें विमुख नहीं होना चाहिए। एक क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़ कर और कुछ भी प्रशस्य नहीं है। योद्धा को तो (युद्ध में) लड़ना ही शोभा देता है।

 

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्

सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ।। ३२

 

शब्दार्थ : यदृच्छया-स्वेच्छया (स्वयं ही), -और, उपपन्नम् - प्राप्त हुए, स्वर्गद्वारम् स्वर्गलोक का द्वार, अपावृतम्-खुला हुआ, सुखिनः सुखी, क्षत्रियाः-क्षत्रिय लोग, पार्थ-हे अर्जुन, लभन्ते-प्राप्त करते हैं, युद्धम् - युद्ध, ईदृशम् - इस प्रकार का

 

अनुवाद : हे अर्जुन, स्वर्ग लोक के खुले द्वार की भाँति स्वयं-प्राप्त युद्ध के इस प्रकार के संयोग को प्राप्त कर क्षत्रिय धन्य हो जाते हैं।

 

व्याख्या : शास्त्र का कथन है कि यदि कोई क्षत्रिय धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करता हुआ प्राण त्याग देता है, तो सद्यः स्वर्ग को प्राप्त करता है।

 

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्य संग्रामं करिष्यसि

ततः स्वधर्म कीर्तिं हित्वा पापमवाप्स्यसि ।। ३३ ।।

 

शब्दार्थ : अथ-अतः, चेत्-यदि, त्वम्-तुमइमम् -इस, धर्म्यम् - धर्म के, संग्रामम् - युद्ध को, -नहीं, करिष्यसि करोगे, ततः-तब, स्वधर्मम् - अपने कर्तव्य को, कीर्तिम्-यश को, -और, हित्वा-खो कर, पापम् -पाप को, अवाप्स्यसि-प्राप्त करोगे

 

अनुवाद : किन्तु यदि तुम इस धर्मयुद्ध में प्रवृत्त नहीं होते, तो अपने कर्तव्य और यश से च्युत हो कर पाप के भागी बनोगे

 

व्याख्या : भगवान् कृष्ण अर्जुन को उसके द्वारा अर्जित कीर्ति का स्मरण कराते हुए कह रहे हैं कि यदि इस समय वह युद्ध नहीं करेगा, तो कीर्ति खो देगा भगवान् शिव से युद्ध कर के अर्जुन ने यश पाया था। एक बार अर्जुन यात्रा के लिए हिमालय की ओर बढ़ा। पर्वतारोही (किरात) के रूप में आये भगवान् शिव से उसने युद्ध किया और उनसे स्वर्गीय दिव्यास्त्र 'पशुपतास्त्र' प्राप्त किया।

 

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्

सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ।। ३४ ।।

 

शब्दार्थ : अकीर्तिम् -अपयश, -और, अपि-भी, भूतानि सब लोग, कथयिष्यन्ति-कहेंगे, ते-तेरे लिए, अव्ययाम् -सदा के लिए, सम्भावितस्य-यशस्वी का, -और, अकीर्तिः-अपयश, मरणात् मरने से, अतिरिच्यते-बढ़ कर है।

 

अनुवाद : चिरकाल पर्यन्त सभी लोग तेरे अपयश का वर्णन करेंगे और एक सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़ कर है।

 

व्याख्या : संसार भी तेरी अकीर्ति का स्मरण कर तुम्हें सदा (स्मृतियों में) जीवित रखेगा। एक सम्मानित शूरवीर और सद्गुणों से युक्त महान् योद्धा के लिए अपमानित जीवन जीने से तो मृत्यु अधिक श्रेयस्कर है।

 

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः

येषां त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ।। ३५ ।।

 

शब्दार्थ : भयात् - भय से, रणात् - युद्धक्षेत्र से, उपरतम् -विमुख, मंस्यन्ते-मानेंगे, त्वाम् - तुम्हें, महारथाः- महान् योद्धा, येषाम् - जिनके लिए, -और, त्वम् तुम, बहुमतः आदरणीय, भूत्वा-हो कर, यास्यसि-पाओगे, लाघवम् लघुता को।

 

अनुवाद : महान् योद्धा सोचेंगे कि तुम भय के कारण युद्ध से विमुख हो गये हो। जिनके लिए तुम आदर के योग्य थे, वही योद्धा अब तुम्हें क्षुद्र समझेंगे

 

व्याख्या : दुर्योधन तथा अन्य योद्धा निश्चित रूप से यही सोचेंगे कि तुम कर्ण तथा अन्य वीरों के भय से युद्ध से भागे हो। गुरु जनों के प्रति आदर और दया के भाव से तुम युद्ध से विमुख हो रहे हो, ऐसा वे नहीं सोच सकते तुम्हारे पौरुष, शौर्य और अन्य सद्गुणों के कारण दुर्योधन सहित अन्य योद्धाओं ने जो तुम्हें सम्मान दिया है, वह लघुता को प्राप्त होगा; क्योंकि वे तुम्हें रण से भागने के कारण तुच्छ समझ कर तुम्हारा अपमान करेंगे।

 

अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः

निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुःखतरं नु किम् ।। ३६ ।।

 

शब्दार्थ : अवाच्यवादान् -कटु शब्द, -और, बहून् बहुत, वदिष्यन्ति-बोलेंगे, तव-तुम्हारे, अहिताः-शत्रु, निन्दन्तः - निन्दा करते हुए, तव-तुम्हारे, सामर्थ्यम् -शक्ति, ततः- उसकी अपेक्षा, दुःखतरम् - अधिक दुःखद, नु-निश्चित रूप से, किम्-क्या है।

 

अनुवाद : तुम्हारे शत्रु भी अनेक प्रकार से तुम्हारी क्षमता की निन्दा करते हुए कटु वचन कहेंगे। इससे और अधिक दुःखद स्थिति क्या हो सकती है?

 

व्याख्या : वास्तव में ऐसे अपभाषण की अपेक्षा कोई और कष्ट इतना असह्य और वेदनाशील नहीं हो सकता।

 

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्

तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ।। ३७ ।।

 

शब्दार्थ : हतः मारा जाने पर, वा-अथवा, प्राप्स्यसि-प्राप्त करोगे, स्वर्गम् -स्वर्ग को, जित्वा-जीत कर, वा-अथवा, भोक्ष्यसे-भोगोगे, महीम् - पृथ्वी को, तस्मात् - इसलिए, उत्तिष्ठ-उठो, कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, युद्धाय-युद्ध के लिए, कृतनिश्चयः - निश्चय कर के।

 

अनुवाद : मारे जाने पर स्वर्गलोक को प्राप्त करोगे और विजय प्राप्त करने पर धरती का राज्य भोगोगे। अतः हे कुन्तीपुत्र, उठो, युद्ध के लिए संकल्प करो।

 

व्याख्या : किसी भी अवस्था में हित तो तुम्हारा ही होगा। इसलिए दृढ़संकल्प के साथ खड़े हो जाओ -"या तो मैं शत्रु को जीत लूँगा, अन्यथा (लड़ते हुए) प्राण त्याग दूँगा।"

 

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।। ३८ ।।

 

शब्दार्थ : सुखदुःखे-सुख और दुःख में, समे-समभाव, कृत्वा कर के (रह कर), लाभालाभौ-लाभ और हानि में, जयाजयौ-जीत और हार में, ततः-तत्पश्चात्, युद्धाय-युद्ध के लिए, युज्यस्व-संलग्न हो जाओ, ननहीं, एवम् - इस प्रकार, पापम् -पाप को, अवाप्स्यसि-प्राप्त करोगे

 

अनुवाद : सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समभाव रह कर अब तुम युद्ध के लिए तैयार हो जाओ, ऐसा करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।

 

व्याख्या : यह समता योग अथवा कर्म समीकरण (समचित्तभाव) का सिद्धान्त है। मन की साम्यावस्था में कर्म करने से मनुष्य उसके फल का भागी नहीं बनता। ऐसा कर्म जो मनोभावों से ऊपर रह कर अर्थात् भावुकतापूर्ण उतार-चढ़ावों से पृथक् रह कर किया जाता है, मन-हृदय को पवित्र करता है और भवबन्धन से मुक्त करने वाला होता है। जागृत प्रयासों और सतत संघर्ष के द्वारा मन की इस साम्यावस्था को विकसित किया जा सकता है।

 

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु

बुद्धयायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ।।३९ ।।

 

शब्दार्थ : एषा यह, ते तुम्हारे लिए, अभिहिता-कही गयी, सांख्ये सांख्य में, बुद्धिः ज्ञान, योगे-योग में, तु-निश्चय से, इमाम् इसको, शृणु-सुनो, बुद्धया बुद्धि से, युक्तः - युक्त हो कर, यया-जिससे, पार्थ-हे पार्थ, कर्मबन्धम् -कर्म के बन्धन को, प्रहास्यसि -त्याग दोगे।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, अभी मैंने सांख्य का ज्ञान तुम्हें दिया है। अब योग के विषय में सुनो, जिस ज्ञान का श्रवण कर तुम कर्म के बन्धन से मुक्त हो जाओगे।

 

व्याख्या : अब तक भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान दिया (सांख्य योग, वेदान्त अथवा ज्ञानयोग का मार्ग है जो विधानों को और आत्म-साक्षात्कार के अन्य विधि-विधानों को प्रशस्त करता है। यह कपिल मुनि का सांख्य योग नहीं है) अब वे अर्जुन को कर्मयोग का रहस्य बताने लगे हैं, जिसे जान कर वह अथवा अन्य कोई भी व्यक्ति कर्मबन्धन तोड़ कर मुक्त हो सकता है।

 

कर्मयोगी को कर्मफल की आशा त्याग कर और कर्ताभाव से ऊपर उठ कर कर्म करना चाहिए। उसका कर्म सभी प्रकार के द्वन्द्वों-जैसे जय-पराजय, हानि-लाभ और सुख-दुःख आदि से परे रह कर आसक्तिभाव से रहित होना चाहिए। अहंभाव से शून्य और अनासक्त रह कर कर्म करने वाले का, धर्म-अधर्म और पाप-पुण्य स्पर्श भी नहीं कर सकते। कर्मयोगी अपने समस्त कर्म ईश्वरार्पण करके ईश्वर-प्रसाद ग्रहण करता है।

 

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो विद्यते

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।।४० ।।

 

शब्दार्थ : -नहीं, इह-यहाँ (इस योग में), अभिक्रमनाशः - प्रयत्न का विनाश, अस्ति-है, प्रत्यवायः - विपरीत परिणाम की उत्पत्ति, -नहीं, विद्यते-है, स्वल्पम् -थोड़ा, अपि-भी, अस्य-इस, धर्मस्य कर्तव्य का, त्रायते-रक्षा करता है, महतः महान् (से), भयात् भय से

 

अनुवाद : इस योग में कोई भी प्रयास विफल नहीं होता और ही कोई बाधा आती है (अर्थात् विपरीत परिणामों की उत्पत्ति अथवा उल्लंघन नहीं होते) इस ज्ञान का थोड़ा-सा पालन भी महान् भय से रक्षा करता है।

 

व्याख्या : यदि कोई धार्मिक अनुष्ठान अधूरा छोड़ दिया जाये, तो वह अनुष्ठान व्यर्थ है; क्योंकि कर्ता उसके फल से वंचित रह जाता है। किन्तु कर्मयोग में ऐसा नहीं है; क्योंकि प्रत्येक कर्म हृदय की तत्काल शुद्धि करता है।

 

कृषि में सन्दिग्धता है। कृषक भूमि जोतेगा, हल चलायेगा, बीज बोयेगा और यदि वर्षा हो, तो फसल प्राप्त नहीं कर सकता कर्मयोग में ऐसा नहीं है। अनिश्चितता इसमें कदापि नहीं है। और भी, किसी प्रकार की कोई हानि होने का भी कोई प्रयोजन नहीं है। औषध-उपचार में चिकित्सक द्वारा अयुक्त औषध मिलने पर विपरीत परिणाम हो सकते हैं; किन्तु कर्मयोग में ऐसा नहीं है। कर्मयोग के इस मार्ग में अल्पमात्र भी किया गया प्रयास जन्म-मृत्यु के महान् बन्धन से छुटकारा दिला सकता है। भगवान् कृष्ण यहाँ अर्जुन में इस योग के प्रति आस्था उत्पन्न करने के लिए, उसे इसमें प्रेरित करने के लिए कर्मयोग की प्रशंसा कर रहे हैं।

 

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।।४१ ।।

 

शब्दार्थ : व्यवसायात्मिका-दृढ़ संकल्प वाली, बुद्धिः बुद्धि, एका-एक, इह-यहाँ, कुरुनन्दन- हे कुरु वंश के प्रिय, बहुशाखाः- अनन्त शाखाओं वाली (विकीर्ण), हि-निश्चित रूप से, अनन्ताः- अनन्त, -और, बुद्धयः-विचार, अव्यवसायिनाम् -संकल्पशून्य व्यक्तियों के।

 

अनुवाद : हे कुरुनन्दन, यहाँ (इस कर्मयोग मार्ग में) दृढ़संकल्प बुद्धि एक ही है; किन्तु अनिश्चित (चंचल) मन वालों के विचार विकीर्ण और अनन्त होते हैं।

 

व्याख्या : इह लोक में, आनन्द सागर में अवगाहन हेतु सुनिश्चित संकल्प एक ही है, वह है एकचित् (अनन्य-मनस्क) संकल्प। यह अद्वितीय विचार ज्ञान के सम्यक् स्रोत से उदित होता है। योग का साधक मन की विकीर्ण रश्मियों (विचारों) को संहत (एकत्र) करता है। एकाग्रता, अनासक्ति और विवेक से वह इन्हें एकस्थ करता है। वह मन की अस्थिर और चंचल वृत्ति से मुक्त होता है।

 

संसार रूपी पंक में डूबे हुए सांसारिक मनुष्य के पास एकाग्र वृत्ति नहीं होती। वह अनन्त विचारों का सत्कार करता है। उसका मन सदा चंचल और अस्थिर रहता है।

 

यदि विचार रहें, तो संसार भी नहीं रहेगा। मन से अगणित विचारों का उद्भव होता है और इसी से संसार अस्तित्व में आता है। विचार, नाम और रूप अभिन्न हैं, इन्हें पृथक् नहीं किया जा सकता। यदि विचारों को संयत कर लिया जाये, तो मन संयत हो जाता है और योगी मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

 

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः

वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ।।४२ ।।

 

शब्दार्थ : याम् -जिस, इमाम्-इस, पुष्पिताम् -पुष्पों जैसी आकर्षक, वाचम् वाणी, प्रवदन्ति-कहते हैं, अविपश्चितः- अविवेकी, वेदवादरताः- वेद के कथन में आनन्द लेने वाले, पार्थ- हे अर्जुन, -नहीं, अन्यत् - अन्य, अस्ति-है, इति-इस प्रकार, वादिनः-कहने वाले

 

अनुवाद : हे अर्जुन, अविवेकी जन वेदों की पुष्पिता (आकर्षक) वाणी बोलते हुए वेदों के गुण-स्तुतिमय वाक्यों में आनन्द लेते हैं और कहते हैं- 'इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है।'

 

व्याख्या : विवेकशून्य व्यक्ति वेदों के कर्मकाण्ड में अधिक आस्था रखते हैं, जिसमें किसी विशेष फल-प्राप्ति हेतु विशेष विधि-विधानों की कर्मविधि और स्तुति का वर्णन है। स्वर्ग के आनन्द का वर्णन करने वाले इन वेदवाक्यों में वे अत्यधिक अनुरक्त हो जाते हैं। उनके अनुसार कर्मकाण्ड के अनुष्ठानों से प्रापणीय स्वर्गिक सुखों से परे अन्य कुछ भी नहीं है।

 

वेदों के दो भाग हैं-कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड। ब्राह्मण ग्रन्थ और संहिता कर्मकाण्ड से सम्बद्ध हैं। जैमिनी का पूर्व मीमांसा मत इसी पर आधारित है। इस मत के अनुयायी इहलोक के ऐश्वर्य और स्वर्ग-सुख की प्राप्ति हेतु इस प्रकार के अनेक यज्ञादि कर्मों का प्रतिपादन करते हैं। वे इसे ही मनुष्य-जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानते हैं। सामान्य जन तो इसके स्तवन-पाठ से ही आकृष्ट हो जाते हैं। उपनिषद् और आरण्यक ग्रन्थ परब्रह्म की प्रकृति का वर्णन करते हैं और ज्ञान काण्ड के अन्तर्गत हैं।

 

स्वर्ग का जीवन भी अस्थायी है। पुण्य कर्म क्षीण होने पर मनुष्य को धरालोक पर लौटना पड़ता है। सहस्रों यज्ञ करने पर भी आत्म-ज्ञान के बिना मोक्ष-प्राप्ति असम्भव है।

 

भगवान् कृष्ण, धरती का प्रभुत्व दिलाने वाले और स्वर्ग तथा अन्य शक्तियाँ प्रदान करने वाले वैदिक अनुष्ठानों के प्रशंसक, मीमांसा सिद्धान्त को अपेक्षाकृत गौण बताते हैं; क्योंकि वे आत्यन्तिक मोक्ष प्रदान करने वाले नहीं हैं।

 

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ।।४३ ।।

 

शब्दार्थ : कामात्मानः- इच्छाओं से पूर्ण, स्वर्गपराः-स्वर्ग-प्राप्ति ही जिनका लक्ष्य हो, जन्मकर्मफलप्रदाम् -कर्मों के परिणामस्वरूप नव-जन्म की ओर ले जाने वाला, क्रियाविशेषबहुलाम् - विविध प्रकार की प्रचुर क्रियाएँ, भोगैश्वर्यगतिं प्रति-इन्द्रियतुष्टि, ऐश्वर्य और स्वामित्व-प्राप्ति के लिए।

 

अनुवाद : इच्छाओं से पूर्ण, स्वर्ग को अपना आत्यन्तिक लक्ष्य मान कर (वे ऐसी वाणी बोलते हैं जो कर्मफल प्रदान करने वाली है), कर्मों के फलस्वरूप नया जन्म प्रदान करने वाली है। इस प्रकार वे विविध विधियाँ विशेष कर्मकाण्डों में अपनाते हैं जो भौतिक सुख, साम्राज्य और प्रभुत्व देने वाली हैं।

 

 

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ विधीयते ।।४४

 

शब्दार्थ : भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम् - इन्द्रिय-सुख और ऐश्वर्य में आसक्त लोगों की, तया-उसके द्वारा, अपहृतचेतसाम् - जिनका चित्त मोहग्रस्त हो गया हो, व्यवसायात्मिका-दृढ़ निश्चय वाली, बुद्धिः - बुद्धि, समाधौ-समाधि में, -नहीं, विधीयते-स्थिर रहती है।

 

अनुवाद : (वेद की) इस शिक्षा के द्वारा जो लोग सांसारिक भोगों में आसक्त हो कर मोहग्रस्त हो गये हैं, उनकी निश्चयात्मिका (भले-बुरे का विवेक करने वाली) बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं हो सकती

 

व्याख्या : प्रभुत्व और सुख-समृद्धि के इच्छुक मन की एकाग्रता नहीं प्राप्त कर सकते। वे एकाग्रचित्त हो कर ध्यान में नहीं बैठ सकते। वे तो अर्थ और सामर्थ्य-प्राप्ति की योजनाएँ बनाते रहते हैं। उनके मन सदा व्याकुल रहते हैं। उनमें तुलनात्मक बुद्धि का अभाव रहता है।

 

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ।।४५ ।।

 

शब्दार्थ : त्रैगुण्यविषयाः-तीन गुणों से सम्बन्धित, वेदाः वेद, निखैगुण्यः-तीन गुणों से परे, भव-हो जाओ, अर्जुन-हे अर्जुन, निर्द्वन्द्वः - द्वन्द्वों से परे, नित्यसत्त्वस्थः - नित्य सत्त्व भाव में स्थित रहने वाले, निर्योगक्षेम: लाभ और संचय के भाव से मुक्त, आत्मवान्-आत्मा में स्थित।

 

अनुवाद : वेद (प्रकृति के) तीन गुणों का वर्णन करते हैं। तुम इन तीनों गुणों से ऊपर उठ जाओ। हे अर्जुन, अर्जन (लाभ) और रक्षण (संचित अथवा अर्जित धन की रक्षा) के भाव से तथा द्वन्द्वों से मुक्त हो कर सत्त्व में विचरण करो तथा आत्मस्थ हो जाओ।

 

व्याख्या : गुण द्रव्य भी हैं और गुण भी। प्रकृति त्रिगुणात्मक है। सत्त्व गुण शुद्धता, प्रकाश और समन्वय का परिचायक है। रजस्, मोह और गति (क्रियाशीलता) है। तमस् अन्धकार जड़ता की ओर संकेत करता है। मान-अपमान, आदर-अनादर, जय-पराजय, हानि-लाभ, सुख-दुःख और शीतोष्ण यह द्वन्द्वों के जोड़े हैं। जो मनुष्य अप्राप्त की प्राप्ति अथवा प्राप्त की सुरक्षा में संलग्न रहता है, वह मन की शान्ति नहीं प्राप्त कर सकता। वह सदा अशान्त रहता है। उसके लिए आत्मकेन्द्रित होना अथवा ध्यान में लगना असम्भव है। वह सत्त्वगुण का अभ्यास नहीं कर सकता अतः भगवान् कृष्ण अर्जुन को अर्जन-रक्षण के विचार से मुक्त हो कर शाश्वत सत्य में स्थित होने का उपदेश करते हैं। (निरूपण -IX.20, 21)

 

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके

तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ।।४६ ।।

 

शब्दार्थ : यावान् -जितना, अर्थ:-प्रयोजन, उदपाने जलाशय में, सर्वतः सर्वत्र (सब ओर), संप्लुतोदके बाद में (सब ओर जल ही जल), तावान् -उतना, सर्वेषु सब, वेदेषु वेदों में, ब्राह्मणस्य-ब्राह्मण का, विजानतः ज्ञानी का

 

अनुवाद : सब ओर जल ही जल होने पर एक जलाशय का जितना महत्त्व रह जाता है, उतना ही महत्त्व अथवा प्रयोजन एक ज्ञानी ब्राह्मण का वेदों से होता है।

 

व्याख्या : आत्म-साक्षात्कार के उपरान्त किसी भी ऋषि-मुनि को वेदों से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता; क्योंकि उन्होंने आत्मा का अनन्त ज्ञान प्राप्त कर लिया है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वेद निरर्थक हैं। आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने के लिए नये साधकों के लिए वेदों का विशेष महत्त्व है।

 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।।४७ ।।

 

शब्दार्थ : कर्मणि-कर्म में, एव-ही, अधिकारः अधिकार, ते तुम्हारा, मा-नहीं, फलेषु-फल में, कदाचन-कभी, मा कर्मफलहेतुः भूः-कर्मफल तुम्हारा उद्देश्य हो, मा-नहीं, ते तुम्हारा, सङ्गः- आसक्ति, अस्तु-हो, अकर्मणि अकर्म में।

 

अनुवाद : तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने का है, फल की इच्छा करने का कदापि नहीं। तुम्हारा उद्देश्य कर्म-फल की प्राप्ति हो और ही कर्म के त्याग (अकर्म) में तुम्हारा अनुराग हो।

 

व्याख्या : किसी भी स्थिति में कृत कर्मों के फल की आकाङ्क्षा मत करो। यदि तुम ऐसा करते हो, तो फल भोगने के लिए आवागमन के चक्र में फँसना पड़ेगा। फल की इच्छा से किया गया कर्म बन्धन में डालने वाला होता है। अनासक्त कर्म से हृदय परिमार्जित होता है। हृदय-शुद्धि से आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है और आत्म-ज्ञान जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त कराता है।

 

ऐसा भी हो कि तुम कर्म का त्याग इस भावना से करो कि जब फल ही नहीं लेना, तो कर्म कर के क्या करें।

 

उदार भाव में, कर्म का अभिप्राय है क्रिया जाति अथवा जीवन में वर्ण-व्यवस्था है और आश्रम-व्यवस्था के अनुरूप कर्तव्य भी कर्म संज्ञक है। वेदों के कर्मकाण्ड के अनुयायियों (मीमांसकों) के अनुसार वेद-विहित यज्ञादि कर्म भी 'कर्म' कहलाते हैं। कर्म का रहस्य गहन है। मनुष्य की संचित वृत्तियों की नियति के आधार पर उसका भावी जन्म निर्धारित होता है।

 

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय

सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।।४८ ।।

 

शब्दार्थ : योगस्थः योग में स्थित, कुरु-करो, कर्माणि-कर्म, सङ्गम् आसक्ति, त्यक्त्वा-त्याग कर, धनञ्जय-अर्जुन, सिद्ध्यसिद्धयोः- सफलता-विफलता में, समः समभाव, भूत्वा - हो कर, समत्वम् समता, योग: योग, उच्यते-कहा जाता है।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, जय-पराजय की आसक्ति त्याग कर योग में स्थित हो कर कर्म करो। मन का समत्व ही योग कहलाता है।

 

व्याख्या : परम देव के साथ योग में स्थित रह कर, सफलता और विफलता से ऊपर उठ कर समभाव से उसी परमात्मा के लिए कर्म करो समत्व ही योग है। कर्मफल की इच्छा के त्याग द्वारा परिमार्जित हृदय से प्राप्त आत्म-ज्ञान ही सफलता (सिद्धि) है। कर्मफल की इच्छा से कृत कर्म द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होना विफलता है। (निरूपण - III.9; IV, 14, 20.)

 

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ।।४९ ।।

 

शब्दार्थ : दूरेण-दूर से, हि-निश्चय से, अवरम् - निम्न श्रेणी को, कर्म-कर्म (कार्य), बुद्धियोगात् - बुद्धियोग की अपेक्षा, धनञ्जय - हे धनञ्जय, बुद्धौ-बुद्धि में, शरणम् - शरण (आश्रय), अन्विच्छ इच्छा करो, कृपणाः दयनीय, फलहेतवः-फल की आकाङ्क्षा वाले।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, बुद्धियोग की अपेक्षा केवल कर्म कहीं अधिक निम्नश्रेणी का माना जाता है। तुम बुद्धि की शरण लो। फल की इच्छा रखने वाले तो कृपण हैं।

 

व्याख्या : समन्वित मन से किया गया कर्म बुद्धियोग है। बुद्धियोग में स्थित महात्मा जय-पराजय से प्रभावित नहीं होता। वह कर्मफल की कामना नहीं करता। वह युक्त (सम बुद्धि) हो गया है। उसकी बुद्धि आत्मस्थ हो गयी है। जहाँ किसी प्रकार के कर्म के परिणाम स्वरूप किसी भी फल की कामना नहीं होती, ऐसे बुद्धियोग की अपेक्षा सकाम कर्म अत्यन्त गर्हित है; क्योंकि यह जन्म-बन्धन का कारण है। (निरूपण - VIII.18)

 

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।। ५० ।।

 

शब्दार्थ : बुद्धियुक्तः बुद्धिमान्, जहाति-त्याग देता है, इह-इस जीवन में, उभे दोनों, सुकृतदुष्कृते-अच्छे-बुरे कर्म, तस्मात्-इसलिए, योगाय-योग के लिए, युज्यस्व-संलग्न हो जाओ, योग:-योग, कर्मसु कर्मों में, कौशलम् - कुशलता, निपुणता

 

अनुवाद : बुद्धिमान् मनुष्य इसी जन्म में अच्छे और बुरे कर्मों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। इसलिए हे अर्जुन, योग-मार्ग का अनुसरण करो। योग में संलग्न हो जाओ। कर्म में कुशलता ही योग है।

 

व्याख्या : कर्मफल के उद्देश्य से किये गये कर्म बन्धन का कारण होते हैं; क्योंकि कर्मफल भोगने के लिए मनुष्य को पुनः जन्म लेना पड़ेगा समभाव में किया गया कर्म अर्थात् बुद्धियोग में आत्मस्थ हो कर कृत कर्म बन्धन का कारण नहीं होता; क्योंकि परमात्मा में स्थित बुद्धि के कारण वह कर्म फल के भाव से मुक्त है और वस्तुतः वह कर्म, कर्म ही नहीं है। बन्धन में लाने वाले कर्म मन की साम्यावस्था में किये जाने पर अपनी प्रकृति त्याग देते हैं। समत्व योग में निपुण योगी सभी कर्म दिव्य अभिनेता ईश्वर को समर्पित कर देता है।

 

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः

जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ।।५१ ।।

 

शब्दार्थ : कर्मजम् -कर्म-जनित, बुद्धियुक्ताः- ज्ञानी, हि-निश्चय से, फलम् फल को, त्यक्त्वा-त्याग कर, मनीषिणः- बुद्धिमान्, जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः- जन्म-बन्धन से मुक्त, पदम् -धाम, गच्छन्ति-जाते हैं, अनामयम् - दुःख रहित (सुखद)

 

अनुवाद : बुद्धिमान् मनुष्य, ज्ञान प्राप्त कर के, कर्मफल का त्याग कर देते हैं और इस प्रकार जन्म-बन्धन से विमुक्त हो कर दुःखों से परे परम धाम को प्राप्त होते हैं।

 

व्याख्या : कर्मफल के प्रति आसक्ति पुनर्जन्म का कारण है। कृत कर्मों का शुभाशुभ फल भोगने के लिए मनुष्य पुनः शरीर धारण करता है। यदि कोई मनुष्य कर्मफल की इच्छा त्याग कर परमात्मा के लिए अथवा उसी के ही किसी प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए कर्म करता है, वह कर्म-बन्धन से मुक्त हो कर जन्म के बन्धन से भी मुक्त हो जाता है और शाश्वत धाम, आनन्दमयी अवस्था का अधिकारी बनता है।

 

मन की साम्यावस्था में रहने वाले महात्मा कर्मफल का मोह त्याग कर शुभ-अशुभ कर्मों से बच जाते हैं।

 

श्लोक ४९, ५०, ५१ में बुद्धि शब्द का संकेत सांख्य (ज्ञान) योग से है। इस आत्म-ज्ञान का सूर्य तब उदित होता है, जब मन कर्मयोग से परिमार्जित हो जाता है।

 

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य ।। ५२ ।।

 

शब्दार्थ : यदा-जब, ते-तुम्हारी, मोहकलिलम् -मोह रूपी कीचड़ को, बुद्धिः बुद्धि, व्यतितरिष्यति-तर जायेगी, तदा-तब, गन्तासि-प्राप्त करोगे, निर्वेदम् - विरक्त भाव को, श्रोतव्यस्य-सुनने योग्य के प्रति, श्रुतस्य-सुने हुए के प्रति, -और।

 

अनुवाद : जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी कलुषता को पार कर जायेगी, तब तुम श्रवण करने योग्य के प्रति और श्रवण किये हुए के प्रति मुक्तसङ्ग (उदासीन) हो जाओगे।

 

व्याख्या : आत्म-तत्त्व का अनात्मा में एकीकरण मोहकलिल है। विवेक-बुद्धि आत्मा-अनात्मा में अभेद के कारण मोह-माया में फँस जाती है और मन इन्द्रिय-विषयों की ओर भागता है। ऐसी अवस्था में मनुष्य शरीर को ही आत्मा समझने की भूल कर बैठता है। मन पवित्र होने पर मनुष्य श्रुत और अश्रुत के प्रति उदासीन हो जाता है। इसका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। उन सबके प्रति अर्थात् शास्त्रों के प्रति उसमें उदासीनता जाती है। (निरूपण-XVI.24)

 

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ।।५३ ।।

 

शब्दार्थ : श्रुतिविप्रतिपन्ना-सुने हुए के प्रति किंकर्तव्यविमूढ़, ते तुम्हारी, यदा-जब, स्थास्यति-स्थिर हो जायेगी, निश्चला-एकनिष्ठ, समाधौ-आत्मा में, अचला-स्थिर, बुद्धिः बुद्धि, तदा-तब, योगम्-योग को, अवाप्स्यसि-प्राप्त करोगे।

 

अनुवाद : वेद-शास्त्रों के श्रवण से किंकर्तव्यविमूढ़ हुई तुम्हारी बुद्धि जब स्थिर और आत्मस्थ हो जायेगी, तभी तुम्हें अन्तर्ज्ञान आत्म-साक्षात्कार होगा।

 

व्याख्या : प्रवृत्ति-मार्ग और निवृत्ति-मार्ग में विचारों के विरोधाभास के कारण जो तुम्हारी बुद्धि भ्रमित हो गयी है, उसके विक्षेप और शंका समाप्त होने पर तथा बुद्धि के आत्मा में स्थिर होने पर तुम्हें आत्म-ज्ञान होगा।

 

अर्जुन उवाच

 

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव

स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ।।५४ ।।

 

शब्दार्थ : स्थितप्रज्ञस्य-अचल बुद्धि वाले (महात्मा की), का-क्या, भाषा-भाषा (लक्षण), समाधिस्थस्य-परा चेतना में लीन पुरुष की, केशव-हे कृष्ण, स्थितधीः - स्थिर बुद्धि वाले, किम् -कैसे, प्रभाषेत-बोलता है, किम् -कैसे, आसीत-बैठता है, व्रजेत-चलता है, किम् -कैसे।

 

अर्जुन ने कहा

 

अनुवाद : हे केशव, स्थिर बुद्धि वाले समाधि (परा चेतना) में स्थित महात्मा के क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे विचरण करता है?

 

व्याख्या : अर्जुन भगवान् कृष्ण से यह जानने का इच्छुक है कि स्थिरधीः पुरुष जो आत्मस्थ है, उसके लक्षण क्या हैं। वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है।

 

अचल मति पुरुष के लक्षण और आत्मा के उस स्थिर ज्ञान को प्राप्त करने के उपाय इस अध्याय के श्लोक ५५ से ७२ तक वर्णित हैं।

 

स्थिर बुद्धि का ज्ञान भगवत्साक्षात्कार अथवा ब्रहौक्य द्वारा प्रतिष्ठित ज्ञान है। (निरूपण-XIV.21, 27)

 

श्री भगवानुवाच

 

प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्

आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।। ५५ ।।

 

शब्दार्थ : प्रजहाति-त्याग देता है, यदा-जब, कामान् इच्छाओं को, सर्वान् सभी, पार्थ- हे पार्थ, मनोगतान् - मन की, आत्मनि-आत्मा में, एव-ही, आत्मना आत्मा से, तुष्टः सन्तुष्ट, स्थितप्रज्ञः - स्थिर बुद्धि वाला, तदा-तब, उच्यते-कहा जाता है।

 

श्री भगवान् ने कहा

 

अनुवाद : हे पार्थ, जब मनुष्य मन की सर्व कामनाओं का त्याग कर देता है और आत्मा के द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ अर्थात् स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है।

 

व्याख्या : इस श्लोक में भगवान् कृष्ण अर्जुन के प्रश्न के प्रथम भाग का उत्तर देते हैं।

 

यदि किसी व्यक्ति को मिश्री मिल जाये, तो क्या वह गुड़ की चाह करेगा ? कदापि नहीं। यदि कोई आत्मा का आनन्द प्राप्त कर सकता है, तो क्या वह ऐन्द्रिक सुखों की लालसा करेगा? नहीं, कदापि नहीं। आत्मा में ही सन्तुष्ट महात्मा को, जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है, संसार के समस्त ऐश्वर्य भी व्यर्थ लगेंगे।

 

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।।५६ ।।

 

शब्दार्थ : दुःखेषु दुःखों में, अनुद्विममनाः-अविचलित मन वाला, सुखेषु सुखों में, विगतस्पृहः- लालसा रहित, वीतरागभयक्रोधः राग, भय, क्रोध से मुक्त, स्थितधी:- स्थिर बुद्धि वाला, मुनिः - मुनि, उच्यते-कहा जाता है।

 

अनुवाद : जिसका मन कष्टों से विचलित नहीं होता, जो ऐन्द्रिक सुखों की लालसा से मुक्त है, जो आसक्ति, भय और क्रोध से भी मुक्त है, वह मुनि स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है।

 

व्याख्या : भगवान् कृष्ण स्थिर बुद्धि वाले मुनि के लक्षण बताते हुए अर्जुन के प्रश्न के दूसरे भाग का उत्तर देते हैं।

 

स्थितधी मुनि का मन विपत्ति काल में अधीर नहीं होता। वह आध्यात्मिक ताप (शरीर में होने वाले रोगों से), अधिदैविक ताप (मेघगर्जन, विद्युत, तूफान, बाढ़ आदि) और अधिभौतिक ताप (शेर, चीता, सर्प, बिच्छू आदि) से अर्थात् तीनों तापों से प्रभावित नहीं होता समृद्ध अवस्था में वह इन्द्रिय-सुख की कामना नहीं करता। (निरूपण-IV.10)

 

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्

नाभिनन्दति द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।५७ ।।

 

शब्दार्थ : यः जो, सर्वत्र-सभी स्थान, अनभिस्नेहः अनासक्त, तत्-तत्-वह-वह, प्राप्य-प्राप्त कर के, शुभाशुभम् - शुभ और अशुभ, नहीं, अभिनन्दति-प्रसन्न होता है, -नहीं, द्वेष्टि-द्वेष करता है, तस्-उसकी , प्रज्ञा-बुद्धि, प्रतिष्ठिता- स्थिर है।

 

अनुवाद : जो सर्वत्र, सब स्थान पर आसक्ति रहित है, शुभ अथवा अशुभ फल मिलने पर जो तो प्रसन्न होता है और ही दुःखी होता है, उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है (स्थिर है)

 

व्याख्या : मुनि के पास मन का समत्व होता है। तो सुख आने पर वह प्रसन्न होता है और ही दुःख आने पर विचलित होता है। आत्मा में प्रतिष्ठित होने के कारण वह (संसार से) उदासीन रहता है। उसे अपने शरीर अथवा जीवन से भी अनुराग नहीं होता, क्योंकि वह तो ब्रह्म में स्थित रहता है। कोई उसके लिए अच्छा करे, तो वह उसकी प्रशंसा नहीं करता और बुरा करने वाले से वह द्वेष भी नहीं करता। "स्थितधी मुनि कैसे बोलता है", अर्जुन के प्रश्न का भगवान् ने इस प्रकार उत्तर दिया।

 

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।५८ ।।

 

शब्दार्थ : यदा-जब, संहरते-संहरण कर लेता है (समेट लेता है), -और, अयम्यह, कूर्म:-कछुआ, अङ्गानि अङ्गों को, इव-समान, सर्वशः सब ओर से, इन्द्रियाणि-इन्द्रियाँ, इन्द्रियार्थेभ्यः - विषयों से, तस्य-उसकी, प्रज्ञा-बुद्धि, प्रतिष्ठिता-स्थिर

 

अनुवाद : चारों ओर से अपने अङ्गों का संहरण कर लेने वाले कछुए की भाँति जब कोई पुरुष इन्द्रियों के विषयों से अपनी इन्द्रियों को विमुख कर लेता है, तब वह स्थिर बुद्धि वाला, प्रतिष्ठित प्रज्ञा वाला कहलाता है।

 

व्याख्या : इन्द्रियों का संहरण प्रत्याहार है। बाह्य विषयों की ओर भागना मन की स्वाभाविक वृत्ति है। योगी पुनः पुनः मन को उसके विषयों से हटा कर आत्मा में स्थिर करता है। प्रत्याहार की शक्ति से युक्त योगी किसी सामूहिक स्थान पर भी इन्द्रियों को अन्तर्मुख कर के पलक झपकते ही समाधि में प्रवेश कर सकता है। वह किसी भी प्रकार के कोलाहल अथवा ध्वनियों से विचलित नहीं होता। युद्धक्षेत्र में भी प्रत्याहार द्वारा वह अपने केन्द्र, आत्मा में विश्राम ले सकता है। प्रत्याहार का अभ्यासी संसार के लिए मृत है। बाह्य ऊर्मियों (तरङ्गों) से वह प्रभावित नहीं होगा। आत्म-शक्ति से वह किसी भी समय अपनी इन्द्रियों को पूर्ण रूप से वशीभूत करने में समर्थ है। वे तो मानो उसकी आज्ञाकारी सेविकाएँ हैं अथवा साधन मात्र हैं।

 

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः

रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ।।५९ ।।

 

शब्दार्थ : विषयाः - इन्द्रियों के विषय, विनिवर्तन्ते-विमुख हो जाते हैं, निराहारस्य-जितेन्द्रिय के, देहिनः-उस पुरुष के, रसवर्जम् - आसक्ति को पीछे छोड़ते हुए (रस का त्याग), रस:-रस (आनन्द), अपि-भी, अस्य-उसके, परम् - उत्कृष्ट, दृष्ट्वा-देख कर, निवर्तते-समाप्त हो जाता है।

 

अनुवाद : जितेन्द्रिय पुरुष के विषय तो निवृत हो जाते हैं; किन्तु उन विषयों में आसक्ति बनी रहती है। स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी ब्रह्मसाक्षात्कार कर के निवृत्त हो जाती है।

 

व्याख्या : आत्म-ज्ञान ही सूक्ष्म वासनाओं (सुप्त वृत्तियों) को पूर्ण रूप से नष्ट कर सकता है। सूक्ष्म कामनाओं, आसक्तियों और विषयों की लालसा भी आत्म-ज्ञान होने पर शून्य हो जाती है। कठोर तप द्वारा इन्द्रियों के विषय परावर्ती हो जाते हैं; परन्तु महात्मा के हृदय में सुप्त रूप से उनका स्वाद, उनकी आकाङ्क्षा पुनरपि रह ही जाती है।

 

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ।।६० ।।

 

शब्दार्थ : यततः यत्न करते हुए, हि-निश्चित रूप से, अपि-भी, कौन्तेय-हे कुन्तीपुत्र, पुरुषस्य मनुष्य की, विपश्चितः बुद्धिमान् की, इन्द्रियाणि-इन्द्रियाँ, प्रमाथीनि-प्रबल, हरन्ति-हर लेती हैं, प्रसभम् बलपूर्वक, मनः मन

 

अनुवाद : हे अर्जुन, सतत यत्न करते रहने पर भी ये चंचल इन्द्रियाँ बुद्धिमान् पुरुष के मन को हठात् हर लेती हैं।

 

व्याख्या : साधक को चाहिए कि प्रथम तो वह अपनी इन्द्रियों को संयत करे इन्द्रियों को घोड़े की संज्ञा दी जाती है। घोड़े को अपने पूर्ण वश में करने की सामर्थ्य होने पर ही तुम अपने गन्तव्य तक पहुँच सकते हो। असंयत घोड़े तो तुम्हें मार्ग में ही नीचे गिरा देंगे। इसी प्रकार से चंचल इन्द्रियाँ तुम्हें इन्द्रिय-विषयों के भँवर में फँसा कर तुम्हारे आध्यात्मिक लक्ष्य-मोक्ष और शाश्वत शान्ति के परम धाम से पतन करा देंगी। (निरूपण -III.33; V.14)

 

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।६१ ।।

 

शब्दार्थ : तानि-उन, सर्वाणि-सब को, संयम्य-वशीभूत कर के, युक्तः लगा कर, आसीत -बैठना चाहिए, मत्परः- मुझ में ध्यान लगा कर, वशे-वश में, हि-निश्चयेन, यस्य-जिसकी, इन्द्रियाणि-इन्द्रियाँ, तस्य-उसकी, प्रज्ञा-बुद्धि, प्रतिष्ठिता- स्थिर है।

 

अनुवाद : इन्द्रियों को वश में कर के मुझ में ध्यान लगा कर स्थिरतापूर्वक बैठना चाहिए; क्योंकि बुद्धि उसी की स्थिर होती है जिसकी इन्द्रियाँ संयत हैं।

 

व्याख्या : जितेन्द्रिय बन कर शान्त मन से मुझ में चित्त एकाग्र कर के आसन में बैठना चाहिए। इस प्रकार प्रतिष्ठित योगी जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, निस्सन्देह अत्यन्त स्थिर है। वह आत्मा में स्थित है। श्री शंकराचार्य ने 'आसीत मत्परः' की व्याख्या इस प्रकार की है- "उसे यह ध्यान करते हुए बैठना चाहिए कि 'मैं उस (परमात्मा) से पृथक् नहीं हूँ।" (निरूपण -11.64)

 

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते

सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ।।६२ ।।

 

शब्दार्थ : ध्यायतः-चिन्तन करते हुए, विषयान् - विषयों का, पुंसः मनुष्य का, सङ्गः- आसक्ति, तेषु उनमें, उपजायते-उत्पन्न होती है, सङ्गात् आसक्ति से, सञ्जायते-जन्म लेती है, काम:-इच्छा, कामात् इच्छा से, क्रोधः क्रोध, अभिजायते - प्रकट होता है।

 

अनुवाद : विषयों का चिन्तन करने पर उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से इच्छा विकसित होती है और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है।

 

व्याख्या : जब कोई मनुष्य किसी सुन्दर, सुखद, मनोहारी वस्तु का चिन्तन करता है, तो उसके प्रति उसके मन में आसक्ति उत्पन्न होती है और उसे प्राप्त करने योग्य समझ कर वह उसे पाने की स्पृहा (अभिलाषा) करता है। उस पर अधिकार पाने का पूर्ण प्रयास कर के वह उसकी प्राप्ति हेतु संघर्ष करता है। किसी कारणवश इच्छा पूर्ण होने पर वह क्रोधित हो उठता है। वस्तु-प्राप्ति में कोई उसकी राह में बाधा डाले, तो वह उत्तेजित हो उठता है, उससे द्वन्द्व करता है और उसका वैरी हो जाता है। (निरूपण - 11.64)

 

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।६३ ।।

 

शब्दार्थ : क्रोधात् -क्रोध से, भवति-होता है, सम्मोहः मोह, सम्मोहात् -मोह से, स्मृतिविभ्रमः स्मृतिनाश, स्मृतिभ्रंशात् स्मृतिनाश से, बुद्धिनाशः-विवेक का नाश, बुद्धिनाशात् - विवेक नष्ट होने पर, प्रणश्यति नष्ट हो जाता है।

 

अनुवाद : क्रोध से मूढ़भाव (मोह) उत्पन्न होता है, मोह से स्मृतिलोप होता है, स्मृतिलोप से बुद्धिनाश और बुद्धिनाश से मनुष्य का ही विनाश हो जाता है।

 

व्याख्या : क्रोध मोह का कारण है। क्रोध आने पर व्यक्ति सदसद विवेक खो बैठता है। वह अपनी इच्छा के अनुरूप बोलेगा और कार्य करेगा। भावुकता और आसक्ति उसके विनाश का कारण बन जायेंगी और वह अज्ञानी जैसा व्यवहार करेगा।

 

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ।।६४ ।।

 

शब्दार्थ : रागद्वेषवियुक्तैः राग (आसक्ति) और द्वेष से मुक्त, तु-किन्तु, विषयान् विषयों को, इन्द्रियैः इन्द्रियों के द्वारा, चरन् -विचरण करता हुआ (भोगता हुआ), आत्मवश्यैः संयत, विधेयात्मा संयमी पुरुष, प्रसादम् -शान्ति, अधिगच्छति-प्राप्त करता है।

 

अनुवाद : किन्तु संयमी पुरुष अपनी इन्द्रियों को वश में कर के, आसक्ति और विरक्ति से मुक्त रह कर विषयों में विचरण करता हुआ भी अर्थात् विषयों को भोगता हुआ भी परमात्मा के प्रसाद को प्राप्त करता है।

 

व्याख्या : मन और इन्द्रियाँ प्रकृतिवश ही आसक्ति और विरक्ति की दो धाराओं से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि मन और इन्द्रियों को कुछ विषयों से तो लगाव है और अन्य कतिपय विषयों के प्रति विरक्त भाव है। किन्तु एक अनुशासित मनुष्य अपने मन और इन्द्रियों को वशीभूत कर के ही विषयों में विचरता है। राग-द्वेष से ऊपर उठ कर आत्मा के प्रभुत्व में वह शाश्वत शान्ति प्राप्त करता है। अनुशासित आत्मा की इच्छा-शक्ति प्रबल होने के कारण मन और इन्द्रियाँ उसके आधिपत्य में रहती हैं। अनुशासित आत्मा, प्रेम और घृणा को त्याग कर केवल उन्हीं विषयों का भोग करता है जो शरीर को चलाने के लिए अनिवार्य है। वह शास्त्र द्वारा निषिद्ध विषयों का उपभोग नहीं करता।

 

इस श्लोक में भगवान् कृष्ण अर्जुन के चतुर्थ प्रश्न का उत्तर देते हैं-"स्थितप्रज्ञ कैसे विचरण करता है?" (निरूपण-III.7, 19, 25; XVIII.9)

 

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते

प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ।।६५ ।।

 

शब्दार्थ : प्रसादे-शान्ति में, सर्वदुःखानाम् -सब दुःखों का, हानिः-विनाश, अस्य-उसके, उपजायते-हो जाता है, प्रसन्नचेतसः-प्रसन्न मन वाले, हि-क्योंकि, आशु-शीघ्र, बुद्धिः - बुद्धि, पर्यवतिष्ठते-स्थिर हो जाती है।

 

अनुवाद : उस शान्ति में सब दुःख नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि प्रशान्त मन वाले की बुद्धि शीघ्र ही आत्मस्थ (आत्मा में स्थिर) हो जाती है।

 

व्याख्या : मन की शान्ति होने पर विषयों के पीछे भाग-दौड़ समाप्त हो जाती है। योगी को अपनी विवेक-बुद्धि पर पूर्ण अधिकार (प्रभुत्व) होता है। बुद्धि आत्मा में स्थित हो जाती है। यह अत्यन्त स्थिर हो जाती है। शरीर और मन के कष्ट समाप्त हो जाते हैं।

 

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य चायुक्तस्य भावना

चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ।। ६६ ।।

शब्दार्थ : -नहीं, अस्ति-है, बुद्धिः बुद्धि, अयुक्तस्य-अस्थिर पुरुष की, ननहीं, -और, अयुक्तस्य-अस्थिर की, भावना-ध्यान, ननहीं, -और, अभावयतः- भावना रहित (मनुष्य को), शान्तिः शान्ति, अशान्तस्य-जिसे शान्ति हो, कुतः-कहाँ से, सुखम् -सुख

 

अनुवाद : अयुक्त मनुष्य में बुद्धि और भावना का अभाव होता है। भाव के अभाव में तो ध्यान एकाग्र हो सकता है और ही शान्ति मिल सकती है। शान्ति के अभाव में सुख की कामना कैसे कर सकते हैं?

 

व्याख्या : ध्यानस्थ हुए बिना व्यक्ति आत्म-ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता अनिश्चयात्मिका बुद्धि से युक्त मनुष्य ध्यानाभ्यास नहीं कर सकता। तो उसमें आत्म-ज्ञान की तड़प होती है और ही मोक्ष के लिए उत्कट आकाङ्क्षा ध्यान करने वाला व्यक्ति शान्ति प्राप्त नहीं कर सकता और अशान्त व्यक्ति सुख प्राप्त नहीं कर सकता।

 

इच्छा और तृष्णा (ऐन्द्रिक विषयों की पिपासा) शान्ति की शत्रु है। भौतिक सुखों की लालसा करने वाला किंचिन्मात्र भी सुख की अभिलाषा नहीं कर सकता मन तो सदा अशान्त है, विषयों की ओर दौड़ रहा है। केवल इस तृष्णा के शान्त होने पर ही वास्तविक शान्ति का सुख प्राप्त किया जा सकता है। तभी मन एकाग्र होगा, ध्यान में आनन्द आयेगा और आत्मा में स्थिति होगी।

 

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।६७ ।।

 

शब्दार्थ : इन्द्रियाणाम् - इन्द्रियों में, हि-निश्चय से, चरताम् - विचरण करते हुए, यत्-जो, मनः-मन, अनुविधीयते-अनुसरण करता है, तत् - उसे, अस्य-उसकी, हरति-हर लेती है, प्रज्ञाम् - विवेक-शक्ति को, वायुः- वायु, नावम् नाव को, इव-समान, अम्भसि-जल में।

 

अनुवाद : इतस्ततः भटकती इन्द्रियों का अनुगामी मन (मनुष्य की) बुद्धि का उसी प्रकार हरण कर लेता है जैसे जल में पड़ी नौका को वायु (बहा) ले जाता है।

 

व्याख्या : इन्द्रियों के सङ्ग रमण करने वाला और सतत विषय-वासनाओं का चिन्तन करने वाला मन मनुष्य के विवेक को पूर्णतया नष्ट कर देता है। जिस प्रकार वायु नाव को अपने मार्ग से दूर ले जाता है, उसी प्रकार मन साधक को आध्यात्मिक पथ से विचलित कर के भौतिक विषयों की ओर उन्मुख कर देता है।

 

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।। ६८ ।।

 

शब्दार्थ : तस्मात् - इसलिए, यस्य-जिसकी, महाबाहो -पराक्रमी अर्जुन, निगृहीतानि-संयत कर ली गयी हों, सर्वशः- पूर्णतया, इन्द्रियाणि-इन्द्रियाँ, इन्द्रियार्थेभ्यः- इन्द्रिय-विषयों से, तस्य-उसकी, प्रज्ञा-ज्ञान, प्रतिष्ठिता-स्थिर

 

अनुवाद : अतः हे अर्जुन, ज्ञान उसका ही स्थिर है जिसकी इन्द्रियाँ विषयों से पराङ्मुख और संयत हैं।

 

व्याख्या : इन्द्रियाँ पूर्ण रूप से संयत हों, तो मन वासनाओं के घने जंगल में उन्मत्त हो कर विचरण नहीं करता वात रहित स्थान पर दीपक की भाँति यह स्थिर हो जाता है। तब योगी आत्मस्थ हो जाता है और उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। (निरूपण-III.7)

 

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ।।६९ ।।

 

शब्दार्थ : या जो, निशा-रात्रि, सर्वभूतानाम् -सब प्राणियों की, तस्याम् उसमें, जागर्ति-जागता है, संयमी-संयत पुरुष, यस्याम् - जिसमें, जाग्रति-जागते हैं, भूतानि-प्राणी, सा-वह, निशा-रात्रि, पश्यतः क्रान्तदर्शी (तत्त्वदर्शी) के लिए, मुनेः मुनि के लिए।

 

अनुवाद : समस्त प्राणियों के लिए जो रात्रि है, उसमें जितेन्द्रिय पुरुष जागता है। जिसमें और प्राणी जागते हैं, वह आत्म-निरीक्षण करने वाले मुनि के लिए रात्रि है।

 

व्याख्या : सांसारिक प्रपंच में उलझे हुए व्यक्ति के लिए जो वास्तविकता है, वह मुनि के लिए भ्रम है और जो मुनि के लिए वास्तविकता है, वह संसारी के लिए भ्रम है। मुनि आत्म-निष्ठ होता है। यही उसका दिन है अर्थात् आत्मा में स्थिति। वह भौतिक परिवेश से अनभिज्ञ रहता है। वह उसके लिए रात्रि है। सामान्य व्यक्ति अपनी सत्य प्रकृति से अनभिज्ञ है। आत्मा में स्थिति उसकी रात्रि है। वह तो ऐन्द्रिक विषयों का सुख-भोग करता रहता है। यही उसका दिन है। उसके लिए आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। मुनि के लिए विश्व का कोई अस्तित्व नहीं है।

 

आत्म-ज्ञान से शून्य होने के कारण भौतिक जगत् के लोग घोर अन्धकार में पड़े हैं। उनके लिए जो अन्धकार है, जितेन्द्रिय के लिए वह प्रकाश है। आत्मा और ब्रह्म संसार के लिए रात्रि के समान हैं; किन्तु ज्ञानी तो उसमें पूर्णतः जागृत है। वह प्रकाशों के प्रकाश का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर रहा है। वह ज्योतिर्मय हो गया है। आत्मज्ञानी हो गया है।

 

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं

समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे

शान्तिमाप्नोति कामकामी ।।७० ।।

 

शब्दार्थ : आपूर्यमाणम् -सर्वतः परिपूर्ण, अचलप्रतिष्ठम् -मर्यादित, स्थिर, समुद्रम् -सागर, आपः- जल, प्रविशन्ति-प्रवेश करते हैं, यद्वत्-जैसे, तद्वत्-वैसे, कामाः इच्छाएँ, यम् - जिसमें, प्रविशन्ति-प्रवेश करती है सर्वे-सब, सः वह, शान्तिम् - शान्ति को, आप्नोति - प्राप्त करता है,-नहीं, कामकामी-कामनाओं का इच्छुक

 

अनुवाद : जिस प्रकार सब ओर से परिपूर्ण अचल, स्थिर सागर में जला (उसे क्षुब्ध किये बिना) प्रवेश कर जाते हैं, उसी प्रकार जिस मनुष्य में सब कामनाएँ उसे विचलित किये बिना प्रवेश कर जाती हैं, वह शान्ति को प्राप्त करता है, कामनाओं का इच्छुक नहीं।

 

व्याख्या : सब ओर से जल से परिपूर्ण समुद्र जिस प्रकार मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, स्थिर, शान्त बना रहता है, उसी प्रकार स्व-स्वरूप में स्थित पुरुष उसमें सब ओर से प्रवेश करने वाली कामनाओं से प्रभावित नहीं होता। ऐसा स्थितप्रज्ञ पुरुष ही शान्ति और मोक्ष को प्राप्त करता है। विषयों के भोग में आनन्द लेने वाला अथवा कामेच्छुक व्यक्ति कदापि शान्ति प्राप्त करने का स्वप्न नहीं देख सकता। (निरूपण-XVIII. 53, 54)

 

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः

निर्ममो निरहंकारः शान्तिमधिगच्छति ।।७१ ।।

 

शब्दार्थ : विहाय-त्याग कर, कामान्-इच्छाओं को, यः जो, सर्वान् -सब, पुमान् मनुष्य, चरति- विचरण करता है, निःस्पृहः-कामना रहित, निर्ममः अहंभाव से शून्य, निरहंकारः- अभिमान रहित, सः- वह, शान्तिम् - शान्ति (को), अधिगच्छति-प्राप्त करता है

 

अनुवाद : समस्त इच्छाओं का परित्याग कर के, लालसा रहित, ममत्व भाव से रहित अहंकारशून्य मनुष्य ही शान्ति प्राप्त कर सकता है।

 

व्याख्या : आप्तकाम पुरुष जिसने सब इच्छाएँ त्याग दी हैं, जो 'मैं' और 'मेरा' भाव से ऊपर उठ गया है, जो जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं में ही सन्तुष्ट है और उनकी भी चिन्ता नहीं करता अथवा उन आवश्यकताओं के प्रति भी पूर्ण रूप से अनासक्त हो जाता है, वह शाश्वत शान्ति अथवा मोक्ष का अधिकारी होता है। (निरूपण—II.55)

 

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति

स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ।।७२ ।।

 

शब्दार्थ : एषा-यह, ब्राह्मी-ब्राह्निक (आध्यात्मिक), स्थितिः- अवस्था, पार्थ-हे पार्थ, नहीं, एनाम्-इसे, प्राप्य-प्राप्त कर के, विमुह्यति-मोहित होता है, स्थित्वा-स्थित हो कर, अस्याम् - इसमें, अन्तकाले-मृत्यु के समय, अपि-भी, ब्रह्मनिर्वाणम् -ब्रह्म के साथ एकत्व, ऋच्छति -प्राप्त करता है।

 

अनुवाद : हे पार्थ (अर्जुन), यही ब्राह्मी स्थिति (शाश्वत दिव्य अवस्था) है। इसे प्राप्त करने पर कोई मोह में नहीं फँसता इसमें प्रतिष्ठित हो कर मनुष्य अन्त काल (मृत्यु के समय) में ब्रह्मैक्य (निर्वाण) प्राप्त करता है।

 

व्याख्या : पूर्व श्लोक में वर्णित अवस्था-सर्वस्व त्याग और ब्रह्म में स्थिति ही ब्राह्मी स्थिति है। इस अवस्था को प्राप्त करने के उपरान्त व्यक्ति मोहित नहीं होता मृत्यु के समय भी यदि वह इसी अवस्था में रहता है, तो मोक्ष प्राप्त करता है। यह कहना अनिवार्य नहीं कि जीवन-भर ब्रह्मभाव में स्थित रहने वाला व्यक्ति ब्राह्मी स्थिति अथवा ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति करता है। (निरूपण-VIII.5, 6)

 

विद्यारण्य मुनि पंचदशी में कहते हैं कि यहाँ 'अन्तकाल' का अभिप्राय उस क्षण से है जो अविद्यानाश अथवा देह और देही के परस्पर न्यास की समाप्ति का है।

 

तत्सत् इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु

ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे

सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ।।

।। इति सांख्ययोगः ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  श्री परमात्मने नमः

अथ तृतीयोऽध्यायः

कर्मयोगः

 

अर्जुन उवाच

 

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन

तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ।।१ ।।

 

शब्दार्थ : ज्यायसी-श्रेष्ठतर, चेत्-यदि, कर्मणः-कर्म से, ते-आपके द्वारा, मता-समझी जाती है, बुद्धिः बुद्धि, जनार्दन-हें जनार्दन, तत्-फिर, किम् -क्यों, कर्मणि-कर्म में, घोरे-भयंकर, माम्-मुझे, नियोजयसि लगाते हो, केशव-हे केशव

 

अर्जुन ने कहा

 

अनुवाद : हे कृष्ण, यदि आप सोचते हैं कि कर्म से ज्ञान श्रेष्ठतर है तो हे केशव, मुझे इस भयानक कर्म के लिए क्यों प्रेरित कर रहे हैं?

 

व्याख्या : अध्याय के श्लोक ४९, ५० और ५१ में भगवान् कृष्ण ने ज्ञानयोग के सन्दर्भ में उत्कृष्ट वचन कहे हैं। वे पुनः अर्जुन को युद्ध के लिए कह रहे हैं। इसी कारण से अर्जुन भ्रमित हो रहा है।

 

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे

तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ।।२ ।।

 

शब्दार्थ : व्यामिश्रेण-सम्भ्रमित करने वाली, इव-मानो, वाक्येन-वाणी के द्वारा, बुद्धिम् बुद्धि को, मोहयसि-मोहित कर रहे हो, इव-मानो, मेमेरी, तत्-वह, एकम् - एक, वद-बोलो, निश्चित्य-निश्चय करके, येन-जिससे, श्रेयः आनन्द (कल्याण), अहम् -मैं, आप्नुयाम् - प्राप्त करूँ

 

अनुवाद : भ्रमित करने वाली आपकी इस प्रकट वाणी से मानो आप मेरी बुद्धि को भ्रम में डाल रहे हैं। इसलिए निश्चित रूप से उस एक वचन को मेरे लिए कहें जो मेरे लिए कल्याणप्रद हो, जिससे मैं आनन्दमग्न हो सकूँ।

 

व्याख्या : अर्जुन भगवान् कृष्ण से कहते हैं- "ज्ञान अथवा कर्म, इन दोनों में से मुझे एक का उपदेश दीजिए, जिससे मैं सर्वोच्च कल्याण, आनन्द अथवा मोक्ष का अधिकारी बन सकूँ।" (निरूपण-V.1)

 

श्री भगवानुवाच

 

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ

ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ।।३ ।।

 

शब्दार्थ : लोके-लोक में, अस्मिन् - इस (में), द्विविधा-दो प्रकार की, निष्ठा-आस्था, पुरा-पूर्वकाल में, प्रोक्ता-कही गयी, मया-मेरे द्वारा, अनघ हे निष्पाप, ज्ञानयोगेन -ज्ञानयोग के द्वारा, सांख्यानाम् - ज्ञानियों की, कर्मयोगेन कर्मयोग के द्वारा, योगिनाम् - योगियों की।

 

श्री भगवान् ने कहा

 

अनुवाद : हे अनघ (निष्पाप), इस लोक में, पूर्वकाल में मैंने दो प्रकार की निष्ठा का उपदेश दिया था। उनमें सांख्य जनों (ज्ञानी अथवा चिन्तनशील) की निष्ठा तो ज्ञान-मार्ग में है और योगियों की निष्ठा कर्म-मार्ग में है।

 

व्याख्या : सांख्यों का ज्ञानयोग भगवान् कृष्ण के द्वारा अध्याय के श्लोक ११ से ३८ और कर्मयोग ४० से ५३ में वर्णित है।

 

पुरा प्रोक्ता का यह अभिप्राय भी हो सकता है कि 'सृष्टि के आदिकाल में मैंने इन दोनों प्रकार के योगों का ज्ञान संसार को दिया था।

 

साधन चतुष्टय और तीव्र सूक्ष्म बुद्धि तथा साहसिक मेधा से युक्त व्यक्ति ही ज्ञान-मार्ग (योग) का अनुसरण कर सकते हैं। कर्मशील व्यक्ति कर्मयोग के लिए उपयुक्त है।

 

साधन चतुष्टय हैं-विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत् और मुमुक्षुत्व षट् सम्पत् हैं-शम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रियनिग्रह), तितिक्षा (सहनशीलता), उपरति (विषयों से विमुखता), श्रद्धा और समाधान

एक काल में दो योगों का अभ्यास सम्भव नहीं है। कर्मयोग किसी लक्ष्य की प्राप्ति का साधन है। यह हृदय को पवित्र करके साधक को ज्ञान-प्राप्ति के योग्य बनाता है। हृदय पवित्र होते ही कर्मयोगी को ज्ञानयोग अपना लेना चाहिए। किसी भी प्रकार की बाह्य सहायता के बिना ज्ञानयोग साधक को सीधा उसके लक्ष्य तक पहुँचाता है। (निरूपण - V.5)

 

कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुषोऽश्नुते

संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ।।४।।

 

शब्दार्थ : -नहीं, कर्मणाम् -कर्मों के, अनारम्भात् - प्रारम्भ करने से, नैष्कर्म्यम् -कर्म से मुक्ति, पुरुषः- मनुष्य, अश्नुते-प्राप्त करता है, -नहीं, -और, संन्यसनात् - त्याग से, एव-ही, सिद्धिम् -सिद्धि (पूर्णता), समधिगच्छति -प्राप्त करता है।

 

अनुवाद : कोई भी मनुष्य कर्म के करने से नैष्कर्म्यता (जिसमें मनुष्य पर कर्म का कोई प्रभाव ही पड़े, ऐसी अवस्था) को प्राप्त नहीं हो सकता और ही कर्म से संन्यास ले कर अर्थात् कर्म का त्याग कर के वह पूर्णत्व को प्राप्त कर सकता है।

 

व्याख्या : नैष्कर्म्यम् और सिद्धि पर्यायवाची शब्द हैं। नैष्कर्म्यता अथवा पूर्णत्व को प्राप्त करके ज्ञानी पुरुष अपनी वास्तविक प्रकृति सच्चिदानन्द (सत्-चित्-आनन्द) स्वरूप में स्थित होता है। किसी लक्ष्य की पूर्ति हेतु कर्म की तो उसकी कोई कामना होती है और आवश्यकता। वह आप्तकाम होता है।

 

आत्म-ज्ञान के द्वारा मनुष्य निष्कर्मण्यता की अवस्था को प्राप्त करता है। कर्मत्याग कर के कोई मनुष्य केवल शान्त हो कर बैठ जाये, तो ऐसा नहीं है कि उसने इस उत्कृष्ट अवस्था को प्राप्त कर लिया है। प्रपंचानुराग में फँसा उसका मन तो कई प्रकार की योजनाएँ बना रहा होगा। विचार ही वास्तव में कर्म है। सकारात्मक विचार, तृष्णा, इच्छा-अनिच्छा से मुक्त ज्ञानी पुरुष ही नैष्कर्म्यता की अवस्था को पा सकता है।

 

आत्म-ज्ञान के बिना मात्र कर्म के त्याग द्वारा पूर्णता अथवा मोक्ष-प्राप्ति असम्भव है। (निरूपण - XVIII.49)

 

हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्

कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ।।५।।

 

शब्दार्थ : हि-नहीं, कश्चित् -कोई, क्षणम् -क्षण, अपि-भी, जातु-निश्चित रूप से, तिष्ठति-रहता है, अकर्मकृत्-बिना कर्म किये, कार्यते-किया जाता है, हि-क्योंकि, अवशः - विवश हो कर, कर्म-कर्म, सर्वः-सब, प्रकृतिजैः - प्रकृति से उत्पन्न, गुणैः- गुणों के द्वारा।

 

अनुवाद : निश्चित रूप से कोई भी मनुष्य बिना कर्म किये एक क्षण भी नहीं रह सकता; क्योंकि प्रत्येक मनुष्य को प्रकृति से उत्पन्न गुणों के कारण विवश हो कर कर्म करना ही पड़ता है।

 

व्याख्या : सत्त्व, रजस् और तमस् प्रकृति के तीन गुण हैं। सत्त्व- समन्वय, शुचिता अथवा प्रकाश का प्रतीक है। रजस्-आसक्ति अथवा क्रियाशीलता का प्रतीक है। तमस् - अन्धकार अथवा जड़ता है। सात्त्विक कर्म मोक्ष-प्राप्ति में सहायक होते हैं। राजसिक और तामसिक कर्म मनुष्य को संसार के बन्धन में डालते हैं।

 

आत्म-ज्ञानी को ये गुण प्रभावित नहीं करते। वह इन गुणों से परे हो जाता है, गुणातीत हो जाता है। अज्ञानान्धकार में पड़ा व्यक्ति जिसके पास स्व-आत्मा का प्रकाश नहीं है अथवा जो आत्म-ज्ञान से शून्य है और अविद्या द्वारा अनुशासित है, असहाय रूप से गुणों में विचरण करने को बाध्य होता है। (निरूपण - IV.16; XVIII.11)

 

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य आस्ते मनसा स्मरन्

इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः उच्यते ।।६ ।।

 

शब्दार्थ : कर्मेन्द्रियाणि-कर्मेन्द्रियों को, संयम्य-वशीभूत करके, यः-जो, आस्ते-रहता है, मनसा-मन से, स्मरन्-स्मरण करता हुआ, इन्द्रियार्थान् - इन्द्रियों के विषयों को, विमूढात्मा-भ्रमित बुद्धि वाला, मिथ्याचार:- दम्भी, सः- वह, उच्यते-कहा जाता है।

 

अनुवाद : जो मनुष्य (पाँच) कर्मेन्द्रियों को तो नियन्त्रित कर लेता है; परन्तु मन से कर्मेन्द्रियों के विषयों में रमण करता रहता है, उनका चिन्तन करता है. ऐसा मनुष्य मिथ्या आचरण वाला कहलाता है, क्योंकि वह भ्रम में पड़ा हुआ है।

 

व्याख्या : पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं-वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ और गुदा। ये सूक्ष्म तत्त्वों अथवा राजसिक गुण के पाँच तन्मात्राओं से अंकुरित होती हैं। वाक् (शब्द) आकाश तन्मात्रा से, पाणि-वायु तन्मात्रा से, पाद-अधि तन्मात्रा से, उपस्थ-आपस् (जल) तन्मात्रा से और गुदा-पृथ्वी तन्मात्रा से उद्भुत है। वह मनुष्य पापाचारी है जो शान्त बैठ कर मन से इन्द्रिय-विषयों का चिन्तन करता रहता है। वह स्वयं में भ्रमित है। निश्चित रूप से सम्मोहित है।

 

कर्मेन्द्रियों को संयत कर के विचारों को नियन्त्रित करना भी अनिवार्य है। मन को भगवान् में लगाना चाहिए। एकाग्रता से ही मनुष्य सच्चा योगी बन सकता है और तभी आत्मानुभूति सम्भव है।

 

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन

कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः विशिष्यते ।।७ ।।

 

शब्दार्थ : यः -जो, तु-किन्तु, इन्द्रियाणि-इन्द्रियों को, मनसा-मन से, नियम्य-संयत कर के, आरभते-प्रारम्भ करता है, अर्जुन-हे अर्जुन, कर्मेन्द्रियैः- कर्मेन्द्रियों से, कर्मयोगम् -कर्मयोग को, असक्तः - अनासक्त, सः- वह, विशिष्यते-उत्कृष्ट है।

 

अनुवाद : इन्द्रियों को संयत कर के जो मनुष्य अनासक्त हो कर कर्मेन्द्रियों को कर्म में लगा कर स्वयं कर्मयोग में प्रतिष्ठित होता है, वह श्रेष्ठ है।

 

व्याख्या : हस्त, पाद, वाक् आदि कर्मेन्द्रियों से कर्म करते हुए ज्ञानेन्द्रियों को मन से वशीभूत कर के, कर्मफल त्याग कर और अहंकारशून्य हो कर जो मनुष्य कर्म करता है, वह निस्सन्देह मिथ्याचारी (दम्भी) से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। (निरूपण-II. 64, 68; IV.21.)

 

नेत्र, कर्ण, नासिका, त्वचा और रसना पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं।

 

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः

शरीरयात्रापि ते प्रसिद्धयेदकर्मणः ।।८ ।।

 

शब्दार्थ : नियतम् - शास्त्रविहित, कुरु-करो, कर्म-कर्म, त्वम् तुम, कर्म-कर्म, ज्यायः-श्रेष्ठतर, हि-क्योंकि, अकर्मणः-कर्म करने की अपेक्षा, शरीरयात्रा-शरीर का निर्वाह, अपि-भी, -और, ते-तुम्हारा, -नहीं, प्रसिद्धयेत् सम्भव, अकर्मणः - बिना कर्म के।

 

अनुवाद : तुम अपने नियत कर्म करो; क्योंकि अकर्म की अपेक्षा कर्म करना अधिक अच्छा है। और फिर, बिना कर्म किये इस शरीर की यात्रा भी तो पूर्ण नहीं होती अर्थात् शरीर का निर्वाह करने के लिए कर्म करना अनिवार्य है।

 

व्याख्या : नियत कर्म वह आवश्यक कर्तव्य है जिसका पालन करना मनुष्य का धर्म है। विहित कर्म करने पर दोष होता है। विहित कर्मों का पालन करने से किसी परिणाम-विशेष की प्राप्ति नहीं होती और इसके पालन से पुण्य मिलता हो, ऐसा भी नहीं है।

 

जीवन-निर्वाह के लिए ही सबको अनेक स्वाभाविक और अनिवार्य कर्म करने पड़ते हैं। "मैं बिना कोई कर्म किये रह सकता हूँ", ऐसा कहना अज्ञान है।

 

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः

तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ।।९ ।।

 

शब्दार्थ : यज्ञार्थात् - यज्ञ के लिए, कर्मणः-कर्म का, अन्यत्र-अन्यथा, लोकः-संसार, अयम्-यह, कर्मबन्धनः-कर्मबन्धन, तदर्थम् - उसके लिए, कर्म-कर्म, कौन्तेय हे कुन्तिपुत्र, मुक्तसङ्गः- अनासक्त हो कर, समाचर-आचरण करो।

 

अनुवाद : यज्ञ के भाव से किये जाने वाले कर्मों को छोड़ कर अन्य सभी कर्म भवबन्धन में डालने वाले हैं। इसलिए हे अर्जुन, तुम अनासक्त हो कर यज्ञ के रूप में अपना कर्म करो।

 

व्याख्या : शुद्ध भाव से किया गया कोई भी निष्काम और धार्मिक अनुष्ठान यज्ञ कहलाता है। वेद की तैत्तिरीय संहिता में विहित है : "यज्ञो वै विष्णु"-"यज्ञ ही विष्णु  है''(१.७.४)। भगवान् के लिए किया गया कोई भी कर्म बन्धन से मुक्त करने वाला है। विष्णु के निमित्त कर्म करने से मन निर्मल होता है। इस भाव का अभाव होने पर कर्म संसार-बन्धन में डालने वाला हो जाता है, वह कर्म अच्छा हो या बुरा। शुभ और अशुभ दोनों ही कर्म बन्धन के कारण हैं। (निरूपण-ІІ.48)

 

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ।।१०।।

 

शब्दार्थ : सहयज्ञाः -यज्ञों सहित, प्रजा:-मनुष्यों को, सृष्ट्वा उत्पन्न करके, पुरा-पूर्वकाल में, उवाच-कहा, प्रजापतिः-प्रजापति ने, अनेन-इसके द्वारा, प्रसविष्यध्वम् सन्तान वृद्धि करो, एषः यह, वः तुम्हारी, अस्तु हो, इष्टकामधुक् - अभीष्ट-सिद्धि वाली कामधेनु

 

अनुवाद : (सृष्टि के) आदि काल में प्रजापति ने मनुष्यों को यज्ञ सहित उत्पन्न करके कहा- "इसके द्वारा तुम फलो, फूलो। सन्तान वृद्धि करो। यह यज्ञ तुम्हारे लिए समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली कामधेनु स्वरूप होगा।"

 

व्याख्या : प्रजापति सृष्टिकर्ता (ब्रह्मा) हैं। कामधुक्, कामधेनु का ही दूसरा नाम है। कामधेनु इन्द्र की गाय है जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपनी अभीष्ट इच्छा की पूर्ति कर सकता है। (निरूपण - VIII.4; IX.24, 27; X.25)

 

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।।११ ।।

 

शब्दार्थ : देवान् -देवताओं को, भावयत-पोषण करो, अनेन-इसके द्वारा, ते वे, देवाः देव, भावयन्तु-पोषण करें, वः तुम्हारा, परस्परम् -एक-दूसरे का, भावयन्तः-पोषण करते हुए, श्रेयः-कल्याण, परम् सर्वोच्च, अवाप्स्यथ-प्राप्त करो।

 

अनुवाद : इसके द्वारा तुम देवताओं का पोषण करो और वे देव तुम्हारा पोषण करें। इस प्रकार परस्पर, एक-दूसरे का सम्पोषण करते हुए तुम सर्वोच्च कल्याण को प्राप्त करोगे।

 

व्याख्या : देव का अर्थ है-दिव्य, ज्योतिर्मय इस यज्ञ से तुम इन्द्र आदि देवताओं को प्रसन्न करो और देव गण वर्षा आदि के द्वारा तुम्हें प्रसन्न रखेंगे। सर्वोच्च कल्याणप्रद तो भव-बन्धन से मुक्त करने वाला आत्म-ज्ञान है। स्वर्गलोक की प्राप्ति भी परम कल्याण से अभिहित हो सकती है। फल तो साधक की भावना पर निर्भर करता है।

 

 

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः

तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ।।१२ ।।

 

शब्दार्थ : इष्टान् -वांछित, भोगान् -पदार्थ, हि-निश्चित रूप से, वः-तुम्हें, देवाः देवगण, दास्यन्ते-देंगे, यज्ञभाविताः यज्ञ से प्रसन्न, तैः उनके द्वारा, दत्तान् दिये गये, अप्रदाय-बिना अर्पण (भेंट) किये, एभ्यः- उनके लिए, यः जो, भुङ्क्ते-भोग करता है, स्तेनः-चोर, एव-निश्चित रूप से, सः वह

 

अनुवाद : यज्ञ से प्रसन्न हो कर देव गण तुम्हें इच्छित पदार्थ प्रदान करेंगे। अतः उनके लिए अर्पण किये बिना जो मनुष्य उनके द्वारा प्रदत्त पदार्थों का भोग करता है, वह निश्चित रूप से चोर है।

 

व्याख्या : जब देवता तुम्हारे यज्ञ से प्रसन्न होते हैं, वे तुम पर सर्व सुख अर्थात् धन-ऐश्वर्य-समृद्धि, पशुधन और सन्तान आदि की वृष्टि करते हैं।

 

देवताओं द्वारा दिये गये भोगों को जो स्वयं भोगता है अर्थात् जो बदले में उन्हें अर्पित किये बिना अपने ही शरीर और इन्द्रियों की तृष्णाओं की पूर्ति करता है, वह निस्सन्देह चोर है। वह तो देवों की सम्पत्ति का डाकू है।

 

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ।।१३ ।।

 

शब्दार्थ : यज्ञशिष्टाशिनः - यज्ञ के अवशेष का भोग करने वाले, सन्तः सन्त, मुच्यन्ते-मुक्त हो जाते हैं, सर्वकिल्बिषैः-सब पापों से, भुञ्जते-उपभोग करते हैं, ते-वे, तु-निश्चय से, अघम् -पाप, पापा:-पापी जन, ये-जो, पचन्ति-पकाते हैं, आत्मकारणात्-अपने लिए।

 

अनुवाद : यज्ञावशेष का उपभोग करने वाले सन्त जन सब प्रकार के पापों से मुक्त हो जाते हैं; किन्तु जो पापी जन केवल अपने लिए ही पकाते हैं, वे पाप खाते हैं।

 

व्याख्या : पञ्चमहायज्ञ करने के उपरान्त जो मनुष्य यज्ञावशेष का उपभोग करते हैं, वे इन पाँच प्रकार के पापों से बच जाते हैं जो पाप ज्ञान-अज्ञान में पाँच प्रकार के कीट आदि की हिंसा से लगते हैं, वे हैं- () ओखल-मूसल, () चक्की, () 37sqrt(17) -स्थान, () वह स्थान जहाँ पेय जल रखा जाता है, () झाडू का स्थान। ये पाँच स्थान हैं, जहाँ प्रतिदिन जीवन-हिंसा होती ही है। पंच महायज्ञों के अनुष्ठान से ये पाप क्षीण हो जाते हैं। प्रत्येक द्विज (हिन्दू संस्कृति के अनुसार प्रथम तीन वर्ण, विशेषकर ब्राह्मण) को ये यज्ञ अवश्य करने चाहिए।

 

() देव-यज्ञ-देव गणों के लिए यज्ञ में आहुति देना जो उन्हें सन्तुष्ट करेगी।

 

() ब्रह्म-यज्ञ अथवा ऋषि-यज्ञ-ऋषियों और ब्रह्म को सन्तुष्ट करने के लिए शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन।

 

() पितृ-यज्ञ-पितरों को सन्तुष्ट करने हेतु उन्हें जल की आहुति (अर्घ्य) देना

 

() नृ-यज्ञ (अतिथि-यज्ञ) - अतिथि और भूखे को भोजन कराना।

 

() भूत-यज्ञ-पशु-पक्षियों को भोजन देना

 

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ।।१४।।

 

शब्दार्थ : अन्नात् -अन्न से, भवन्ति - (उत्पन्न) होते हैं, भूतानि-भौतिक प्राणी, पर्जन्यात् वर्षा से, अन्नसम्भवः-अन्न की उत्पत्ति, यज्ञात्-यज्ञ से, भवति -होती है, पर्जन्यः- वृष्टि, यज्ञः -यज्ञ, कर्मसमुद्भवः-कर्म से उत्पन्न

 

अनुवाद : अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं। अन्न वृष्टि से उत्पन्न होता है। वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्म से होता है।

 

व्याख्या : यहाँ यज्ञ का अर्थ है-अपूर्व अथवा सूक्ष्म तत्त्व अथवा अव्यक्त स्वरूप जो परिणाम की अभिव्यक्ति और अनुष्ठान के मध्यकाल में यज्ञ धारण करता है। (कोई भी यज्ञ, अनुष्ठान के समय अथवा परिणाम काल में जो अदृश्य रूप धारण करता है, वह अपूर्व है।)

 

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्

 तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ।।१५ ।।

 

शब्दार्थ : कर्म-कर्म, ब्रह्मोद्भवम् - ब्रह्म से उत्पन्न, विद्धि-जानो, ब्रह्म-ब्रह्म, अक्षरसमुद्भवम् - अक्षर सर्वगतम् सर्वव्यापक, ब्रह्म-ब्रह्म, प्रतिष्ठितम् - विद्यमान रहता है। से उत्पन्न, तस्मात् - इसलिए, नित्यम् -सदा, यज्ञे-यज्ञ में,

 

अनुवाद : यह जान लो कि कर्म का उद्भव ब्रह्म से है और ब्रह्म अक्षर (अनश्वर) से उद्भूत है। अतः सर्वव्यापक ब्रह्म सदा यज्ञ में ही प्रतिष्ठित रहता है।

 

व्याख्या : ब्रह्म का अर्थ है-वेद। जिस प्रकार श्वास मनुष्य के मुख से निकसित होता है, उसी प्रकार वेद अविनाशी, सर्वज्ञ परमात्मा का श्वास है। वेद सदा यज्ञ में विद्यमान रहता है अर्थात् मुख्यतः यह यज्ञ और उसके अनुष्ठान के विधि-विधान का निरूपण करता है। (निरूपण - IV. 24 से 32)

 

कर्म-कर्म, ब्रह्मोद्भवम् वेदों के आदेशों से उत्पन्न

 

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः

अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ जीवति ।।१६ ।।

 

शब्दार्थ : एवम् - इस प्रकार, प्रवर्तितम् -घुमाये जाते हुए, चक्रम् -चक्र का, -नहीं, अनुवर्तयति - अनुसरण करता है, इह-यहाँ, यः जो, अघायुः-पापी, इन्द्रियारामः - इन्द्रियों में रमण करने वाला, मोघम् - व्यर्थ ही, पार्थ पार्थ, सः वह, जीवति-जीता है।

 

अनुवाद : हे पार्थ, जो मनुष्य इस प्रवर्तित सृष्टिचक्र के अनुकूल व्यवहार नहीं करता, वह इन्द्रियों में रमण करने वाला व्यर्थ ही जीता है।

 

व्याख्या : यह कर्म का चक्र है जिसे यज्ञ और वेद के आधार पर सृष्टिकर्ता ने गति प्रदान की है। उसका जीवन व्यर्थ है जो यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म और वेद-विहित आदेश का पालन करते हुए ऐन्द्रिक विषयों में लिप्त रहता है। वह अपना जीवन ही व्यर्थ गँवा रहा है। वस्तुतः वह निरर्थक जीवन व्यतीत कर रहा है।

 

जो भी व्यक्ति इस नियम का अनुसरण नहीं करता और स्वार्थी है, वह मानो पाप-कर्म कमा रहा है। परमात्मा के नियम के विरुद्ध चलना सबसे बड़ा अपराध है।

 

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः

आत्मन्येव सन्तुष्टस्तस्य कार्यं विद्यते ।।१७ ।।

 

शब्दार्थ : यः-जो, तु-किन्तु, आत्मरतिः- आत्मा में आनन्द लेने वाला, एव-ही, स्यात् -हो, आत्मतृप्तः- आत्मा में सन्तुष्ट, -और, मानवः मनुष्य, आत्मनि-आत्मा में, एव-ही, -और, सन्तुष्टः सन्तुष्ट, तस्य-उसका, कार्यम् कार्य, -नहीं, विद्यते- है।

 

अनुवाद : किन्तु उस मनुष्य के लिए कोई और कर्तव्य करने को शशेष नहीं रहता जो आत्मा में सन्तुष्ट है, आत्मा से तृप्त है और आत्मा में ही आनन्द की अनुभूति करता है।

 

व्याख्या : सुख-प्राप्ति हेतु ज्ञानी या मुनि बाह्य विषयों पर निर्भर नहीं रहता। वह अपने में ही सन्तुष्ट रहता है, अपनी ही आत्मा में वह सुख, सन्तोष और आनन्द की खोज करता है। ऐसे योगी के लिए, जिसे आत्म-ज्ञान हो गया है, कुछ अन्य कर्तव्य कर्म शेष नहीं रहता। वह कर्मभाव से मुक्त हो कर, कर्म की पूर्णता को प्राप्त कर चुका है। वह आप्तकाम है, पूर्णतया आत्म-सन्तुष्ट है। (निरूपण -11.55)

 

 

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन

चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ।।१८ ।।

 

शब्दार्थ : -नहीं , एव-ही, तस्य-उसके, कृतेन-कर्म से, अर्थ:- अभिप्राय, ननहीं, अकृतेन-कर्म करने से, इह-यहाँ, कश्चन-कोई, -नहीं, -और, अस्य-इसका, सर्वभूतेषु सब प्राणियों में, कश्चित् -कोई, अर्थव्यपाश्रयः विषय पर निर्भरता।

 

अनुवाद : ऐसे महान् पुरुष का इस संसार में तो कर्म करने का ही कोई प्रयोजन रहता है और ही कर्म करने का। वह किसी विषय के लिए किसी प्राणी पर निर्भर नहीं रहता।

 

व्याख्या : एवंविध, आत्मा में ही सन्तुष्ट महात्मा को कर्म से कोई प्रयोजन नहीं रहता कर्म से उसका वस्तुतः कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं होता। अकर्म से उसको प्रत्यवाय दोष छू भी नहीं सकता। कर्म करने से उसे कोई हानि नहीं होती। वस्तु-विशेष की प्राप्ति हेतु उसे किसी पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं। ही किसी प्राणी का अनुग्रह उसे चाहिए।

 

तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर

असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ।।१९ ।।

 

शब्दार्थ : तस्मात् - इसलिए, असक्तः - बिना आसक्ति, सततम् -निरन्तर, कार्यम् -कर्तव्य कर्म, कर्म-कर्म, समाचर-करो, असक्तः - बिना आसक्ति, हि-क्योंकि, आचरन् करते हुए, कर्म-कर्म, परम् - परमात्मा को, आप्नोति-प्राप्त करता है, पूरुषः-पुरुष

 

अनुवाद : इसलिए आसक्ति रहित हो कर तुम कर्तव्य कर्म को करो; क्योंकि आसक्ति का त्याग कर के कर्म करने से मनुष्य परमात्मा को प्राप्त करता है।

 

व्याख्या : आसक्ति रहित हो कर यदि तुम भगवदर्थ (भगवान् के लिए) कर्म करोगे, तो हृदय की शुचिता से आत्म-साक्षात्कार करोगे। (निरूपण- II.64, IV.19, 23; XVIII.49)

 

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः

लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ।।२० ।।

 

शब्दार्थ : कर्मणा-कर्म के द्वारा, एव-ही, हि-निश्चय से, संसिद्धिम् पूर्णत्व, आस्थिताः- प्राप्त किया, जनकादयः- जनकादि ने, लोकसंग्रहम् लोककल्याण, एव-ही, अपि-भी, संपश्यन् - देखते हुए, कर्तुम् -करने के लिए, अर्हसि योग्य हो।

 

अनुवाद : जनक तथा अन्य लोग निश्चित रूप से कर्म के द्वारा ही सिद्धि को प्राप्त कर सके। लोकसंग्रह अर्थात् सामान्य जनों का पथ-प्रदर्शन करने के दृष्टिकोण से भी तुम्हें कर्म करना चाहिए।

 

व्याख्या : संसिद्धि का अर्थ है मोक्ष जनक, अश्वपति तथा अन्य राजाओं को आत्मा का पूर्ण ज्ञान था। पुनरपि जनगण के समक्ष उदाहरण रखने के लिए उन्होंने कर्म किया। लोगों को मार्ग-दर्शन कराने के लिए उन्होंने कर्म किया।

 

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः

यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।२१ ।।

 

शब्दार्थ : यद्यत्-जो-जो, आचरति-आचरण करता है, श्रेष्ठः - श्रेष्ठ मनुष्य, तत्-तत्-वही-वही, एव-ही, इतरः-अन्य, जनः लोग, सः वह (महापुरुष), यत्-जो, प्रमाणम् - आदर्श उपस्थित करना, कुरुते-करता है, लोकः संसार (लोग), तत्-उसका, अनुवर्तते-अनुसरण करता है।

 

अनुवाद : श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, अन्य लोग भी वैसा करते हैं। वे जो प्रमाणित कर देते हैं अर्थात् जो भी आदर्श प्रस्तुत करते हैं, अन्य लोग उसका अनुगमन करते हैं।

 

व्याख्या : मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अनुकारक भी है। अपने शुभ-अशुभ विचारों का निर्णय वह उनसे लेता है जो नैतिकता में उससे श्रेष्ठतर हैं। जैसा आचरण एक महापुरुष करता है, उसके अनुयायी उसका अनुसरण करने का प्रयास करते हैं। उसके चरणचिह्नों का अनुसरण उनका प्रयत्न होता है।

 

मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन

नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव कर्मणि ।। २२ ।।

 

शब्दार्थ : -नहीं, मे-मेरे लिए, पार्थ-पार्थ (अर्जुन), अस्ति-है, कर्तव्यम् -करने योग्य कर्म, त्रिषु लोकेषु-तीनों लोकों में, किश्चन-कुछ भी, -नहीं, अनवाप्तम् - अप्राप्त, अवाप्तव्यम् -प्रापणीय, वर्ते-लगा रहता हूँ, एव-ही, चऔर, कर्मणि-कर्म में।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, तीनों लोकों में तो मेरा कोई कर्तव्य है और ही ऐसी कोई वस्तु है जो मुझे अप्राप्त हो और प्राप्त करनी हो पुनरपि मैं स्वयं को कर्म में संलग्न रखता हूँ।

 

व्याख्या : मैं विश्व-नियन्ता हूँ; इसलिए व्यक्तिगत क्षेत्र में मेरा कोई कर्तव्य कर्म नहीं है। मुझे कुछ प्राप्त नहीं करना है; क्योंकि मेरे पास दैवी सम्पदा है, समस्त ब्रह्माण्ड का ऐश्वर्य मेरे पास है, फिर भी मैं कर्म में बरतता हूँ।

 

तुम मेरा अनुसरण क्यों नहीं करते? अपना दृष्टान्त दूसरों के समक्ष रख कर तुम सामान्य लोगों को अनुचित मार्ग पर चलने से रोकने का साहस क्यों नहीं करते ? तुम यदि कोई आदर्श स्थापित करोगे, तो लोग तुम्हारा अनुसरण करेंगे; क्योंकि तब तुम सद्गुण-सम्पन्न एक अग्रणी नेता बन जाओगे

 

यदि ह्यहं वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः

मम वर्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।।२३ ।।

 

शब्दार्थ : यदि-यदि, हि-निश्चित रूप से, अहम् मैं, -नहीं, वर्तेयम् - (कर्म में) व्यस्त रहूँ, जातु-कभी, कर्मणि-कर्म में, अतन्द्रितः-निरालस्य, मम-मेरे, वत्र्म-पथ, अनुवर्तन्ते-अनुसरण करते हैं, मनुष्याः- लोग, पार्थ- पार्थ, सर्वशः -सब प्रकार से।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, यदि मैं सावधान हो कर कर्म में व्यस्त रहूँ, तो सब मनुष्य भी सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरण करेंगे।

 

व्याख्या : यदि मैं आलसी (अकर्मी) हो जाऊँ, तो सब लोग मेरा अनुवर्तन कर के मौन बैठ जायेंगे। वे तामसिक हो कर जड़ता को प्राप्त करेंगे।

 

उत्सीदेयुरिमे लोका कुर्या कर्म चेदहम्

संकरस्य कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ।।२४ ।।

 

शब्दार्थ : उत्सीदेयुः नष्ट हो जायें, इमे-ये, लोकाः लोक, ननहीं, कुर्याम् -करूँ, कर्म-कर्म, चेत्-यदि, अहम् - मैं, संकरस्य-जातियों के अन्तर्मिश्रण का, -और, कर्ता-बनाने वाला, स्याम् - बनूँ, उपहन्याम् नष्ट करूँ, इमाः ये सब, प्रजाः प्राणी।

 

अनुवाद : यदि मैं कर्म करूँ, तो इस संसार को नष्ट करने वाला बनूँ। संकर (अव्यवस्था) को उत्पन्न करने वाला और प्रजा का हनन करने वाला बन जाऊँ।

 

व्याख्या : यदि मैं कर्म में निरत होता, तो लोक भी निष्क्रिय हो जाते। वे वर्णाश्रम धर्म का पालन करते जो उन्हें अपने-अपने जीवन की चार अवस्थाओं में क्रमशः करना होता अतः जाति भ्रम उत्पन्न होता और मुझे उन्हें नष्ट करना पड़ता

 

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत

कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ।।२५

 

शब्दार्थ : सक्ताः- आसक्त, कर्मणि-कर्म में, अविद्वांसः-अज्ञानी, यथा-जैसे, कुर्वन्ति-करते हैं, भारत-हे भारत, कुर्यात् -करे, विद्वान् -विद्वान्, तथा वैसे, असक्तः अनासक्त, लोकसंग्रहम्-लोककल्याण की चिकीर्षुः कामना करते हुए,

 

अनुवाद : हे भारत (अर्जुन), जिस प्रकार से एक अज्ञानी पुरुष कर्म में आसक्त हो कर कर्म करता है उसी प्रकार से एक विद्वान् पुरुष लोककल्याणार्थ आसक्तिरहित हो कर कर्म करे।

 

व्याख्या : फल की कामना से अविद्वान् कार्य करता है। वह कहता है-"अमुक कार्य करके मैं अमुक फल की प्राप्ति करूँगा"; किन्तु विद्वान् पुरुष जो आत्मज्ञानी है, अपने लिए कर्म नहीं करता। उसे तो ऐसा कर्म करना चाहिए कि वह दूसरों के लिए दृष्टान्त बन जाये और लोग उससे शान्ति, समन्वय, हृदय की शुचिता, दिव्य प्रकाश और ज्ञान प्राप्त करें। आत्मज्ञानी ही विद्वान् है। (निरूपण - II 64; III 19; XVIII.49)

 

बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्

जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ।। २६ ।।

 

शब्दार्थ : -नहीं, बुद्धिभेदम् -मन का विचलित होना, जनयेत्-उत्पत्र करे, अज्ञानाम् अज्ञानियों के, कर्मसङ्गिनाम् -कर्म में आसक्त मनुष्यों के जोषयेत् लगाये, सर्वकर्माणि-सब कर्म, विद्वान् बुद्धिमान्, युक्तः - युक्त- समाचरन् आचरण करते हुए।

 

अनुवाद : विद्वान् पुरुष को चाहिए कि वह कर्म में आसक्त अज्ञान व्यक्तियों के मन को विचलित करे। स्वयं भक्तिभाव से परिपूर्ण हो कर वह युक्त पुरुष दूसरों को सभी कर्मों के करने में प्रेरणा दे।

 

व्याख्या : एक अज्ञानी मनुष्य स्वयं से कहता है- "मैं यह काम करूँगा और इसका फल भोगूँगा।" विद्वान् मनुष्य उसके विश्वास को तोड़े उससे अपेक्षा यही है कि वह अनासक्त भाव से कर्म कर के उसके समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करे। उसे चाहिए कि वह अज्ञानी को अनुशासित करे और उसे कर्म की उपेक्षा करने का ज्ञान दे। आवश्यकता पड़ने पर उसे इस प्रकार (अनास कर्म) से प्राप्त सुख के इस लोक और परलोक के विविध रङ्ग बताये। समय साथ हृदय पवित्र होने पर विद्वान् उनमें निष्काम कर्मयोग के बीज बो सकता है।

 

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः

अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ।।२७ ।।

 

शब्दार्थ : प्रकृतेः-प्रकृति के, क्रियमाणानि-किये जा रहे, गुणैःगु के द्वारा, कर्माणि-कर्म, सर्वशः-सब प्रकार से, अहंकारविमूढात्मा-अहंकार भ्रमित (मोहित) मन वाला, कर्ता-करने वाला, अहम् -मैं, इति-ऐस मन्यते मानता है।

 

अनुवाद : सभी प्रकार से समस्त कर्म वस्तुतः प्रकृति के गुणों से सम् होते हैं; किन्तु अहंभाव से मोहित अथवा मूढ़ हुआ व्यक्ति स्वयं को ही मान बैठता है।

 

व्याख्या : प्रकृति अथवा प्रधान वह अवस्था और तमस्-ये तीनों गुण साम्यावस्था में रहते हैं। इस साम्यावस्था के है जिसमें सत्त्व, रजस् असन्तुलन से सृष्टि प्रारम्भ होती है। शरीर, मन, इन्द्रियाँ आदि बनते हैं। अहंकार से भ्रमित व्यक्ति शरीर, मन, इन्द्रियों और प्राण का आत्मा के साथ एकत्व मानने लगता है और शरीर तथा इन्द्रियों की उपाधि का आत्मा में अध्यारोपण (निक्षेप) करता है। अतः अज्ञानवश वह सोचता है- “मैं कर्ता हूँ।" वस्तुतः प्रकृति के गुण ही सब कर्म करते हैं। (निरूपण - III.29; V.9; IX.9, 10; XIII.21, 24, 30, 32; XVIII.13, 14)

 

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा सज्जते ।।२८ ।।

 

शब्दार्थ : तत्त्ववित् सत्य को जानने वाला, तु-लेकिन, महाबाहो-हे महाबाहु (अर्जुन), गुणकर्मविभागयोः- गुण और कर्म के विभाग के, गुणाः गुण (इन्द्रियों के रूप में), गुणेषु गुणों में, वर्तन्ते-रहते हैं, इति-ऐसा, मत्वा-मान कर, -नहीं, सज्जते आसक्त होता है।

 

अनुवाद : किन्तु हे विशाल भुजा वाले अर्जुन, गुण और कर्मविभाग के तत्त्व को जानने वाला तत्त्वविद्, गुण (इन्द्रियाँ) गुणों (विषयों) में ही बरत रहे हैं, कार्य कर रहे हैं, ऐसा जान कर उनमें आसक्त नहीं होता।

 

व्याख्या : आत्मा तीन गुणों और कर्मों से सर्वथा पृथक् है, इस तत्त्व को जानने वाला कर्म में आसक्त नहीं होता। गुण-विभाग और कर्म-विभाग का मर्म जान लेने के पश्चात् (गुण-कर्म के अन्योन्य क्रियाकलाप जानने के पश्चात्) ज्ञानी भलीभाँति समझ लेता है कि गुण स्वरूप इन्द्रियाँ गुण रूप विषयों में विचरण करती हैं। अतः उसकी कर्म में आसक्ति नहीं होती। वह जानता है-“मैं अकर्ता हूँ, मैं कर्ता नहीं हूँ" (निरूपण-XIV.23)

 

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु

तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ।।२९ ।।

 

शब्दार्थ : प्रकृतेः - प्रकृति के, गुणसम्मूढाः गुणों से मोहित, सज्जन्ते-आसक्त होते हैं, गुणकर्मसु गुणों के कार्यों में, तान्-उन, अकृत्स्नविदः-अल्प ज्ञानी, मन्दान् -मूढ़, कृत्स्नवित्-पूर्ण ज्ञानी, -नहीं, विचालयेत् - विचलित करे।

 

अनुवाद : प्रकृति के गुणों के कारण सम्भ्रान्त व्यक्ति उन गुणों से उत्पन्न कर्मों में आसक्त होते हैं। एक ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह उन मूढ़ व्यक्तियों को विचलित करे जो अल्प ज्ञान वाले हैं अथवा जो प्रकृति की प्रेरणा से सकाम कर्म करते हैं।

 

व्याख्या : अज्ञानी लोग फल की आकाङ्क्षा से कर्म करते हैं; किन्तु आत्मा का ज्ञान रखने वाले बुद्धिमान् पुरुष से यह अपेक्षित है कि वह अज्ञानी व्यक्तियों के श्रद्धा, विश्वास और विचारधारा को विचलित करे, क्योंकि ऐसा करने से वे (अज्ञानी व्यक्ति) कर्म को त्याग कर तमस् का शिकार हो जायेंगे। वे आलसी, निष्प्रयोजन जीवन यापन करेंगे। प्रारम्भ में उन्हें सकाम कर्म में प्रवृत्त करना चाहिए। धीरे-धीरे ज्ञानी पुरुष उन्हें निष्काम कर्मयोग में प्रवृत्त करें, उन्हें इच्छा रहित कर्म के लाभों से अवगत करायें जैसे आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाली हृदय की पवित्रता

 

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा

निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ।। ३० ।।

 

शब्दार्थ : मयि-मुझ में, सर्वाणि-सब, कर्माणि-कर्म, संन्यस्य-त्याग कर, अध्यात्मचेतसा आत्म-केन्द्रित मन से, निराशी:- निष्काम भाव से, निर्ममः- अहंकारशून्य, भूत्वा हो कर, युध्यस्व-युद्ध करो, विगतज्वरः- उद्वेग रहित हो कर

 

अनुवाद : समस्त कर्म मुझे समर्पित कर के, चेतना को आत्मा में स्थिर कर के, आशा (इच्छा) और अहंकारशून्य हो कर, निरुद्वेग हो कर तुम युद्ध करो।

 

व्याख्या : समस्त कर्म मेरे अर्पण कर दो।मैं सब कर्म भगवान् के लिए करता हूँ", ऐसा चिन्तन करो।

 

ज्वर का अर्थ है-दुःख, सन्ताप (निरूपण - V.10; XVIII.66)

 

 

 

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः

श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ।।३१ ।।

 

शब्दार्थ : ये जो, मे मेरी, मतम् -शिक्षा, इदम्-इस, नित्यम् -सदा, अनुतिष्ठन्ति-अभ्यास (अनुपालन) करते हैं, मानवाः मनुष्य, श्रद्धावन्तः श्रद्धापूर्ण हो कर, अनसूयन्त:-ईर्ष्या रहित हो कर, मुच्यन्ते-मुक्त हो जाते हैं, ते-वे, अपि-भी, कर्मभिः कर्मों से।

 

अनुवाद : स्पृहा रहित हो कर, श्रद्धा युक्त हो कर जो मनुष्य नित्य मेरे इस उपदेश का अनुपालन करते हैं, वे कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।

 

व्याख्या : श्रद्धा, एक मानसिक वृत्ति है, विश्वास के अर्थ में। यह विश्वास है अपनी आत्मा में, शास्त्रों में और आध्यात्मिक गुरु के उपदेशों में। यह श्रद्धा, सम्मान और नम्रता का उच्च भाव में सम्मिश्रण है।

 

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्

सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ।।३२ ।।

 

शब्दार्थ : ये-जो, तु-किन्तु, एतत् - यह, अभ्यसूयन्तः- दोषदृष्टि रखते हुए, -नहीं, अनुतिष्ठन्ति-अभ्यास करते हैं, मे-मेरे, मतम् उपदेश, सर्वज्ञानविमूढान् सब ज्ञान के प्रति मूढ़ (भ्रमित), तान् उन्हें, विद्धि-जानो, नष्टान् नष्ट हुए, अचेतसः - विवेकशून्य

 

अनुवाद : किन्तु वे लोग जो मेरे उपदेशों में दोषदृष्टि रखते हैं और उनका पालन नहीं करते, ऐसे विवेकशून्य और सभी प्रकार के ज्ञान में भ्रमित लोगों को नष्ट हुआ जानो अर्थात् उनका विनाश अपरिहार्य है।

 

व्याख्या : दुराग्रही और स्थूलधी मनुष्य जो भगवान् के उपदेशों में दोषदृष्टि रखते हैं और उनकी शिक्षाओं को आचरण में नहीं लाते, निश्चित रूप से विनाश के अधिकारी हैं। वे अशोच्य हैं, शिक्षातीत हैं और वास्तव में मूढ़ ही हैं।

 

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्शानवानपि

प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ।। ३३ ।।

 

शब्दार्थ : सदृशम् अनुसार (अनुरूप), चेष्टते-चेष्टा करता है, स्वस्याः-अपने, प्रकृतेः-प्रकृति (स्वभाव) के, ज्ञानवान् बुद्धिमान्, अपि-भी, प्रकृतिम् - प्रकृति को, यान्ति-अनुसरण करते हैं, भूतानि-प्राणी, निग्रहः संयम, किम् -क्या, करिष्यति-करेगा

 

अनुवाद : एक ज्ञानी पुरुष भी अपने स्वभाव के अनुरूप चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति के वशीभूत हो कर ही कार्य करते हैं। इसमें निग्रह (संयम) क्या करेगा?

 

व्याख्या : इस श्लोक को पढ़ कर ऐसा प्रतीत होता है मानो मनुष्य के व्यक्तिगत प्रयास का कोई आशय ही नहीं है। किन्तु ऐसा नहीं है। निम्न श्लोक पढ़ो। इसमें स्पष्ट संकेत है कि राग-द्वेष से ऊपर उठ कर मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है।

 

एक अज्ञानी और मोहग्रस्त व्यक्ति ही अपनी निम्न प्रकृति और स्वाभाविक प्रवृत्तियों के प्रवाह में बहने लगता है। तो उसे अपनी इन्द्रियों पर संयम है और ही इच्छा-अनिच्छा की दो धाराओं पर पुरुषार्थ चतुष्टय से समन्वित एक सत्यान्वेषक, जो सतत ध्यानाभ्यास में रत है, सहज रूप से अपनी प्रकृति को संयत कर सकता है। (निरूपण - II.60; V.14; XVIII.59)

 

 

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ

तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ।। ३४ ।।

 

शब्दार्थ : इन्द्रियस्य इन्द्रियस्य-प्रत्येक इन्द्रिय के, अर्थ-विषय में, रागद्वेषौ राग और द्वेष, व्यवस्थितौ - स्थित हैं, तयोः-उन दोनों के, -नहीं, वशम् वश में, आगच्छेत् - आना चाहिए, तौ-वे दोनों, हि-निश्चित रूप से, अस्य-इसके, परिपन्थिनौ-शत्रु हैं।

 

अनुवाद : ऐन्द्रिक विषयों के प्रति राग और द्वेष इन्द्रियों में ही समाया रहता है। अतः मनुष्य को इन दोनों के वशीभूत नहीं होना चाहिए; क्योंकि वे इसके शत्रु हैं।

 

व्याख्या : सुखद विषय के लिए प्रत्येक इन्द्रिय का आकर्षण होता है और इसके विपरीत दुःखद अथवा प्रतिकूल विषय के प्रति इन्द्रिय का विकर्षण होता है। राग-द्वेष की वृत्तियों को संयत कर लेने पर, मनुष्य पर उनका प्रभाव नहीं रहता यहाँ व्यक्तिगत पुरुषार्थ की आवश्यकता है। पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों से स्वयं उद्भूत सुप्त वृत्तियाँ अथवा सम्पूर्ण संस्कार जो मनुष्य की प्रकृति (स्वभाव) के लिए उत्तरदायी हैं, मनुष्य को राग और द्वेष के दो वेगों से उसके मार्ग की ओर प्रेरित करती हैं। यदि कोई इन दो वेगों को वश में कर ले; विवेक, विचार और आत्मान्वेषण से प्रेम और घृणा से ऊपर उठ जाये, तो वह प्रकृति पर विजयी हो कर अमृतत्व और शाश्वत आनन्द का आनन्द ले सकता है। अब वह अपनी प्रकृति के अधिकार में नहीं होगा। अतः इन्द्रिय-विषयों में राग-द्वेष की भावना से स्वयं को मुक्त करने का उपाय करना चाहिए।

 

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।।३५ ।।

 

शब्दार्थ : श्रेयान् -श्रेष्ठ, स्वधर्मः - अपना धर्म (कर्तव्य), विगुणः गुण रहित, परधर्मात् -दूसरे के धर्म से, स्वनुष्ठितात्-भलीभाँति किये हुए, स्वधर्मे-अपने धर्म में, निधनम् -मृत्यु, श्रेयः-कल्याणप्रद, परधर्मः -दूसरे का धर्म, भयावहः भयप्रद

 

अनुवाद : भली प्रकार से पालन किये जा रहे दूसरे के धर्म की अपेक्षा अपना धर्म दोषयुक्त अथवा अपूर्ण रूप से पालन किया जा रहा भी श्रेयस्कर है। अपने धर्म के लिए मृत्यु (का वरण) भी कल्याणकारी है; किन्तु दूसरे का धर्म भय प्रदान करने वाला है।

 

व्याख्या : दूसरे के धर्म का उत्कृष्ट रूप से पालन करते हुए जीवित रहने की अपेक्षा दोषयुक्त अपने धर्म के लिए प्राण त्यागना कहीं अधिक श्रेयस्कर है। दूसरे के धर्म में भय बना रहता है (वह मानो अन्धकूप है) क्षत्रिय का धर्म (कर्तव्य) न्यायपरायण युद्ध करना है। अर्जुन को युद्ध करना ही है। यह उसका धर्म है। अपने धर्म को निभाते हुए वह प्राणों से हाथ भी धो बैठे, तो उसके लिए यही कल्याणकारी है। वह स्वर्ग लोक प्राप्त करेगा। उसे किसी अन्य धर्म का पालन उचित नहीं है। इससे उसके अन्तर्मन में शंका उत्पन्न होगी। युद्ध को त्याग कर संन्यास-मार्ग का वरण उसके लिए हितकर नहीं है। (निरूपण-XVIII.47)

 

अर्जुन उवाच

 

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः

अनिच्छन्नपि वार्णेय बलादिव नियोजितः ।।३६ ।।

 

शब्दार्थ : अथ-अब, केन-किसके द्वारा, प्रयुक्तः -प्रेरित हो कर, अयम् - यह, पापम् -पाप, चरति-करता है, पूरुषः- मनुष्य, अनिच्छन् - इच्छा होते हुए, अपि भी, वाष्र्णेय-हे वाष्र्णेय (कृष्ण), बलात् -हठपूर्वक, इव-मानो, नियोजितः- नियुक्त

 

 

अर्जुन ने कहा

 

अनुवाद : हे कृष्ण, इच्छा के विरुद्ध मनुष्य को पाप कर्म करने के लिए कौन प्रेरित करता है, मानो उससे बलपूर्वक करवाया जा रहा हो ?

 

व्याख्या : वृष्णि वंश में उत्पन्न वार्णेय कहलाता है। यह भगवान् कृष्ण का एक नाम है।

 

श्री भगवानुवाच

 

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः

महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ।। ३७ ।।

 

शब्दार्थ : कामः इच्छा, एषः- यह, क्रोधः क्रोध, एषः- यह, रजोगुणसमुद्भवः रजोगुण से उत्पन्न, महाशनः सर्वभक्षक, महापाप्मा-महापापी, विद्धि-जानो, एनम् -इसे, इह-यहाँ, वैरिणम्-शत्रु

 

श्री भगवान् ने कहा

 

अनुवाद : रजोगुण से उत्पन्न यह क्रोध और इच्छा ही सर्वभक्षक और सर्वपापमय हैं। इस लोक में इन्हें ही शत्रु मानो

 

व्याख्या : भगवान्-भग शब्द छह उपाधियों से युक्त है, वे हैं-ज्ञान, वैराग्य, कीर्ति, ऐश्वर्य, श्री और बल। इन छह गुणों से युक्त पुरुष, जिसे सृष्टि के आदि और अन्त का भी ज्ञान है 'भगवान्' संज्ञा से विहित है।

 

इस संसार में पाप और दुष्कर्म की जननि इच्छा है। क्रोध इच्छा का ही मूर्त रूप है। इच्छापूर्ति में बाधा डालने वालों के प्रति मनुष्य क्रोधित होता है, जब उसकी इच्छा अपूर्ण रह जाती है। इच्छा रजोगुण से उत्पन्न है। इच्छा उत्पन्न होने पर रजोगुण अंकुरित होता है जो मनुष्य को वस्तु-विशेष की प्राप्ति हेतु कर्म में प्रेरित करता है। अतः यह जान लो कि इस धरा पर इच्छा ही मनुष्य की शत्रु है। (निरूपण-XVI.21)

 

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन

यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ।।३८ ।।

 

शब्दार्थ : धूमेन धुएँ से, आव्रियते-ढक जाता है, वह्निः- अग्नि, यथा-जैसे, आदर्शः दर्पण, मलेन -धूल से, -और, यथा-जैसे, उल्बेन-ज़ेर से, आवृतः ढका रहता है, गर्भः- गर्भ, तथा-उसी प्रकार, तेन-उसके द्वारा, इदम् - यह, आवृतम् ढका है।

 

अनुवाद : जिस प्रकार अग्नि धुएँ से, दर्पण धूल से और गर्भ ज़ेर से ढके रहते हैं, उसी प्रकार यह (ज्ञान) उससे (रजोगुण से) ढका रहता है।

 

व्याख्या : 'इदम्' का अभिप्राय ब्रह्माण्ड अथवा ज्ञान से है और 'तेन' का प्रयोग रजोगुण (इच्छा) के लिए हुआ है।

 

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा

कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन ।। ३९ ।।

 

शब्दार्थ : आवृतम् -ढका हुआ है, ज्ञानम्-ज्ञान, एतेन-इसके द्वारा, ज्ञानिनः- ज्ञानियों का, नित्यवैरिणा - चिरशत्रु से, कामरूपेण-कामरूप, कौन्तेय-हे कुन्तीपुत्र, दुष्पूरेण-कभी शान्त होने वाली, अनलेन-आग के द्वारा, - और।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, कभी शान्त होने वाली अग्नि स्वरूप इच्छा से (जो कभी तृप्त नहीं होती) ज्ञानी का ज्ञान आवृत रहता है। यही उसकी चिरशत्रु है।

 

व्याख्या : मनु कहते हैं-विषय-भोग द्वारा इच्छाएँ तो कभी पूर्ण होती हैं और ही शान्त होती हैं। आग में घी और समिधा डालने पर जैसे वह और अधिक प्रज्वलित हो उठती है, वैसे ही भोग्य-पदार्थों द्वारा इच्छा-पूर्ति करने पर तृष्णाएँ और अधिक जागृत होती हैं। धरती की समग्र भोग्य-सामग्री, समस्त अमूल्य धातुएँ, सारे पशु और सब सुन्दरियाँ यदि इच्छा करने वाले मनुष्य को उपलब्ध हो जायें, तब भी वे सब उसे सन्तोष नहीं दे सकते तृष्णा जाग्रत होने पर अज्ञानी मनुष्य उसे अपना मित्र समझता है। इन्द्रियों की सन्तुष्टि हेतु वह इच्छाओं की पूर्ति करता है। किन्तु ज्ञानी मनुष्य परिणाम भोगने से पूर्व ही अनुभव से जान लेता है कि इच्छाएँ तो उसे दुःख और विपत्ति में डाल सकती हैं। अतः ज्ञानी के लिए तो ये नित्य वैरी के समान हैं और अज्ञानी के लिए मित्र हैं।

 

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते

एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ।।४० ।।

 

शब्दार्थ : इन्द्रियाणि-इन्द्रियाँ, मनः- मन, बुद्धिः बुद्धि, अस्य-इसका, अधिष्ठानम् वास-स्थान, उच्यते-कहा जाता है, एतैः- इनके द्वारा, विमोहयति-भ्रान्त करती है, एषःयह, ज्ञानम्-ज्ञान को, आवृत्य ढक कर, देहिनम् - देहधारी (आत्मा को)

 

अनुवाद : इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके आधार (वास-स्थान) कहे गये हैं। इन्हीं के द्वारा यह (इच्छा) देहधारी के ज्ञान को आवृत करती है और उसे भ्रमित करती है।

 

व्याख्या : शत्रु के आश्रय-स्थल का ज्ञान हो जाये, तो उसे मारना सहज हो जाता है। एक बुद्धिमान् सेनानायक की भाँति भगवान् कृष्ण अर्जुन को इच्छाओं के आश्रय का संकेत देते हैं, जिससे वह उन पर आक्रमण कर अति-शीघ्र उनका विनाश कर सके।

 

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ

पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ।।४१ ।।

 

शब्दार्थ : तस्मात् - इसलिए, त्वम्-तुम, इन्द्रियाणि-इन्द्रियों को, आदौ-आरम्भ में, नियम्य-संयत कर के, भरतर्षभ - हे भरतश्रेष्ठ, पाप्मानम् -विनाशकारी, प्रजहि-मार डालो, हि-निश्चित रूप से, एनम्-इसे, ज्ञानविज्ञाननाशनम् - ज्ञान और विज्ञान को नष्ट करने वाले

 

अनुवाद : अतः, हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ (अर्जुन), पहले इन्द्रियों को वश में करो तत्पश्चात् ज्ञान और विज्ञान को नष्ट करने वाले इस पापी काम को मार डालो।

 

व्याख्या : शास्त्राध्ययन से प्राप्त ज्ञान, ज्ञान है। यह परोक्ष ज्ञान (indirect knowledge) है। विज्ञान अपरोक्ष ज्ञान (direct knowledge) है जो व्यक्तिगत अनुभव आत्म-साक्षात्कार से प्राप्त होता है। इन्द्रियों को वशीभूत कर के इच्छा को मार डालो।

 

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः

मनसस्तु परा बुद्धियों बुद्धेः परतस्तु सः ।।४२

 

शब्दार्थ : इन्द्रियाणि-इन्द्रियों को, पराणि-श्रेष्ठतर, आहुः-कहते हैं, इन्द्रियेभ्यः इन्द्रियों से, परम्-श्रेष्ठ, मनः-मन, मनसः मन से, तु-किन्तु, परा-श्रेष्ठ, बुद्धिः बुद्धि, यः- जो, बुद्धेः बुद्धि की अपेक्षा, परतः -श्रेष्ठ, तु-किन्तु, सः- वह (आत्म-तत्त्व है)

अनुवाद : कहा जाता है कि इन्द्रियाँ (शरीर से) श्रेष्ठ हैं, मन इन्द्रियों से श्रेष्ठ है, बुद्धि मन से श्रेष्ठ है; किन्तु बुद्धि से भी श्रेष्ठ वह (आत्मा) है।

 

व्याख्या : ससीम, बाह्य, स्थूल, भौतिक शरीर की अपेक्षा इन्द्रियाँ सूक्ष्म, आन्तरिक और क्रिया की विपुल क्षेत्र वाली होने के कारण अधिक श्रेष्ठ हैं। मन इन्द्रियों की तुलना में अधिक श्रेष्ठ है; क्योंकि मन की सहायता के बिना स्वतन्त्र रूप से इन्द्रियाँ कुछ भी नहीं कर सकतीं। पाँचों इन्द्रियों के क्रियाकलाप मन के आधीन होते हैं। विवेक-शक्ति से सम्पन्न होने के कारण बुद्धि मन से श्रेष्ठ है। सन्दिग्धावस्था में बुद्धि ही मन की सहायता करती है। साक्षी आत्मा बुद्धि से भी श्रेष्ठ है; क्योंकि बुद्धि आत्मा से ही प्रकाश प्राप्त करती है।

 

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ।।४३ ।।

 

शब्दार्थ : एवम् - इस प्रकार, बुद्धेः- बुद्धि की अपेक्षा, परम् - श्रेष्ठ, बुद्ध्वा जान कर, संस्तभ्य-स्थिर कर के, आत्मानम् - आत्मा को, आत्मना-आत्मा से, जहि-मार डालो, शत्रुम्-शत्रु को, महाबाहो - हे महाबाहु, कामरूपम् इच्छा रूपी, दुरासदम् दुर्जेय

 

अनुवाद : एवंविध, हे अर्जुन, उसे जान कर, जो बुद्धि से भी श्रेष्ठ है और आत्मा से आत्मा को संयत कर के, हे महाबाहु, तुम दुर्जेय काम रूपी शत्रु को जीत लो।

 

व्याख्या : निम्न आत्मा को उच्च आत्मा से वश में करो। निम्न मन को उच्च मन से जीत लो। काम को जीतना दुष्कर है, क्योंकि यह अत्यन्त जटिल और दुर्जेय है; किन्तु सतत घोर साधना में रत विवेकी और अनासक्त व्यक्ति इसे सुगमता से जीत सकता है। काम रजस् का गुण है। यदि तुम अपने भीतर सत्त्व गुण की वृद्धि करो, तो काम पर विजय प्राप्त कर सकते हो। सत्त्व के समक्ष रजस् नहीं टिक सकता। यद्यपि काम को जीतना कठिन है; परन्तु असम्भव कदापि नहीं है। इसकी सहज और सरल विधि है-जप और प्रार्थना द्वारा अन्तर्यामी परमात्मा से विनय करना।

 

तत्सत् इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु

ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे

कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ।।

।। इति कर्मयोगः ।।

 

 

 

 

 

 

श्री परमात्मने नमः

अथ चतुर्थोऽध्यायः

ज्ञानविभागयोगः

 

श्री भगवानुवाच

 

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।१ ।।

 

शब्दार्थ : इमम्-इस, विवस्वते-विवस्वान् (सूर्यदेव) के लिए, योगम् योग को, प्रोक्तवान् -उपदेश दिया, अहम् -मैंने, अव्ययम् - अविनाशी, विवस्वान् - विवस्वान् ने, मनवे-मनु के लिए, प्राह-उपदेश दिया, मनुः मनु, इक्ष्वाकवे इक्ष्वाकु को, अब्रवीत् -कहा

 

श्री भगवान् ने कहा

 

अनुवाद : मैंने इस अविनाशी योग का ज्ञान विवस्वान् को दिया। विवस्वान् ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को इस योग का ज्ञान दिया।

 

व्याख्या : विवस्वान् सूर्य का पर्याय है। इक्ष्वाकु मनु के पुत्र थे और वे सूर्यवंशी क्षत्रियों के पूर्वज थे।

 

योग अविनाशी कहा जाता है; क्योंकि इसका फल अर्थात् मोक्ष (योग से प्राप्त) अविनाशी है।

 

यदि राज्यों के शासक पिछले दो अध्यायों में उपदिष्ट योग का अनुसरण करें, तो वे राज्य को न्यायपूर्वक चला सकते हैं और ब्राह्मणों की रक्षा करने में समर्थ हो सकते हैं। इसीलिए सृष्टि के आदि काल में मैंने यह योग सूर्यदेव को सिखाया

 

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः

कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।।२

 

शब्दार्थ : एवम् -इस प्रकार, परम्पराप्राप्तम्-परम्परा से प्राप्त, इमम् -इस (योग को), राजर्षयः राज-ऋषियों ने, विदुः -जाना, सः-वह, कालेन समय के साथ, इह-यहाँ, महता महान्, योग:- योग, नष्टः- नष्ट हो गया, परन्तप है परन्तप

 

अनुवाद : इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस ज्ञान को राजर्षियों ने जाना वही योग का ज्ञान हे अर्जुन, समय बीतने पर लुप्तप्राय-सा हो गया है।

 

व्याख्या : राजर्षि-राजा होते हुए ऋषि-पद को भी प्राप्त किया और इस योग को सीखा।

 

परन्तप-सूर्य की भाँति अपने पराक्रम और शक्ति से अर्जुन अपने शत्रु का विनाश करने में समर्थ था; इसलिए उसका नाम 'परन्तप' पड़ा।

 

एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।। ।।

 

शब्दार्थ : सः-वह, एव-ही, अयम्-यह, मया-मेरे द्वारा, ते तुम्हारे लिए, अद्य-आज, योग: योग, प्रोक्तः-कहा गया, पुरातनः पुरातन, भक्तः - भक्त, असि-हो, मे-मेरे, सखा-मित्र, -और, इति-इस प्रकार, रहस्यम् -रहस्य, हि-क्योंकि, एतत्-इस, उत्तमम् - श्रेष्ठ

 

अनुवाद : उसी पुरातन योग का ज्ञान आज मैंने तुम्हें दिया है; क्योंकि तुम मेरे भक्त हो और सखा हो। यह (योग) एक परम रहस्य है।

 

व्याख्या : इस योग में सूक्ष्म और गहन उपदेश निहित हैं। अतः यह परम (श्रेष्ठ) रहस्य है जिसे भगवान् ने उद्घाटित किया

 

अर्जुन उवाच

 

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ।।४।।

 

शब्दार्थ : अपरम् अर्वाचीन (पश्चात् काल का), भवतः - आपका, जन्म-जन्म, परम् -पूर्व, जन्म-जन्म, विवस्वतः-विवस्वान् का, कथम् -कैसे, एतत्-यह, विजानीयाम् समझ लूँ, त्वम्-आपने, आदौ-आदिकाल में, प्रोक्तवान् उपदेश किया, इति-इस प्रकार

 

अर्जुन ने कहा

 

अनुवाद : आपका जन्म तो सूर्यदेव (विवस्वान्) के जन्म के पश्चात् हुआ। मैं कैसे यह मान लूँ कि आपने यह योग (सूर्य को) आदिकाल में दिया था।

 

व्याख्या : आपका जन्म तो उत्तरकाल में वसुदेव के घर में हुआ। विवस्वान् सृष्टि के आदि में उत्पन्न हुआ। मैं कैसे मान जाऊँ कि प्रारम्भ में आपने यह विद्या सूर्यदेव को प्रदान की। और यह भी किस प्रकार जानूँ कि आपने जो सूर्य को विद्या दी, वही (भगवान्) मुझे आज यह विद्या दे रहे हैं। इसे समझना कठिन है। भगवन्, कृपा कर के मेरी इस जिज्ञासा को शान्त करें और सत्य को प्रकाशित करें।

 

श्री भगवानुवाच

 

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन

तान्यहं वेद सर्वाणि त्वं वेत्थ परन्तप ।।५ ।।

 

शब्दार्थ : बहूनि बहुत, मेमेरे, व्यतीतानि-बीत गये हैं, जन्मानि-जन्म, तव-तुम्हारे, -और, अर्जुन-हे अर्जुन, तानि-उन सबको, अह्म - मैं , वेद-जानता हूँ, सर्वाणि-सब, -नहीं, त्वम् -तुम, वेत्थ-जानते, परन्तप हे परन्तप

 

श्री भगवान् ने कहा

 

अनुवाद : हे परन्तप (अर्जुन), तुम्हारे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबका ज्ञान मुझे है; पर तुम्हें नहीं।

 

व्याख्या : तुम्हें अन्तर्ज्ञान (intuitional knowledge) नहीं है। तुम्हारे पूर्व कर्मोवश तुम्हारा दिव्य चक्षु अभी खुला नहीं है। इसलिए तुम्हारी दर्शन-शक्ति सीमित है और तुम्हें अपने पूर्व-जन्मों की स्मृति नहीं है। किन्तु मैं उन्हें जानता हूँ; क्योंकि मैं सर्वज्ञ हूँ।

 

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ।। ।।

 

शब्दार्थ : अजः-अजन्मा, अपि-भी, सन् -होते हुए, अव्ययात्मा-अविनाशी प्रकृति का, भूतानाम् -प्राणियों का, ईश्वरः ईश्वर (स्वामी), अपि - भी, सन् -होते हुए, प्रकृतिम् -प्रकृति को, स्वाम्-अपनी, अधिष्ठाय-स्थित हो कर, संभवामि - प्रकट होता हूँ, आत्ममायया-अपनी माया से

 

अनुवाद : यद्यपि मैं अजन्मा हूँ, अविनाशी हूँ, सब प्राणियों का स्वामी हूँ; पुनरपि अपनी प्रकृति में स्थित हो कर मैं अपनी माया से प्रकट होता हूँ।

 

व्याख्या : कर्म के बन्धन में कर मनुष्य जन्म धारण करता है। वह प्रकृति के वश में है। वह प्रकृति के तीन गुणों से भ्रमित है, जब कि भगवान् ने माया को पूर्णरूपेण अपने वश में कर रखा है। वे प्रकृति के शासक हैं; इसलिए वे प्रकृति के गुणों के आधीन नहीं हैं। माया-शक्ति के कारण यह आभास होता है कि उन्होंने जन्म लिया और शरीर धारण किया; किन्तु वास्तविकता कुछ और है। उनका शरीर धारण करना एक आविर्भाव (अभिव्यक्ति) है। उनकी सत्य प्रकृति अथवा दिव्यता पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता (निरूपण-IX.8)

 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ।।७ ।।

 

शब्दार्थ : यदा यदा-जब-जब, हि-निश्चित रूप से, धर्मस्य-धर्म की, ग्लानिः- हानि, भवति होती है, भारत- हे भारत, अभ्युत्थानम् - उत्थान (वृद्धि), अधर्मस्य अधर्म का, तदा-तब, आत्मानम् -स्वयं को, सृजामि-प्रकट करता हूँ, अहम् मैं।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, (संसार में) जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ।

 

व्याख्या : धर्म, आलम्बन और संवर्धन दोनों एक ही बार में प्रदान करता है। धर्म के लिए कोई दूसरा पर्यायवाची शब्द नहीं है। मोक्ष प्रदान करने में सहायक धर्म है। मनुष्य को जो अनाचारी और धर्मविरुद्ध बनाता है, वह अधर्म है। मनुष्य का ऊर्ध्वारोहण कर के ज्ञान और लक्ष्य की प्राप्ति धर्म कराता है। मनुष्य को आकृष्ट कर के सांसारिकता और अज्ञान के गम्भीर गर्त में अधर्म ही गिराता है।

 

परित्राणाय साधूनां विनाशाय दुष्कृताम्

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।८ ।।

 

शब्दार्थ : परित्राणाय-रक्षा के लिए, साधूनाम् सज्जनों की, विनाशाय-विनाश के लिए, -और, दुष्कृताम् दुर्जनों के, धर्मसंस्थापनार्थाय-धर्म की स्थापना करने के लिए, संभवामि -(मैं) जन्म लेता हूँ, युगे युगेयुग-युग में।

 

अनुवाद : सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की संस्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

 

व्याख्या : साधूनाम् साधु वे हैं जो धर्म के अनुरूप अपना जीवन व्यतीत करते हैं, शरीर से मानवता की सेवा करते हैं; स्वार्थ, काम और लोभ से परे हैं और परमात्मा के दिव्य ध्यान में भक्तिभाव से संलग्न रहते हैं।

 

दुष्कृताम् दुष्कृत् अथवा दुष्ट वे हैं जो अधर्म का जीवन यापन करते हैं, समाज के नियमों का उल्लंघन करते हैं, जो व्यर्थ हैं, कुटिल हैं, लोभी हैं, हिंसापरायण हैं, बलात् दूसरों की सम्पत्ति पर अधिकार करते हैं और विभिन्न प्रकार के वीभत्स कुकृत्य करते हैं।

 

जन्म कर्म मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।।९।।

 

शब्दार्थ : जन्म-जन्म, कर्म-कर्म, -और, मे-मेरे, दिव्यम् -दिव्य, एवम् इस प्रकार, यः-जो, वेत्ति-जानता है, तत्त्वतः - तत्त्व से (वास्तव में), त्यक्त्त्वा-त्याग कर, देहम्-शरीर को, पुनः-फिर, जन्म-जन्म, ननहीं, एति-प्राप्त करता है, माम् -मुझे, एति-प्राप्त करता है, सः- वह, अर्जुन-हे अर्जुन

 

अनुवाद : हे अर्जुन, जो मनुष्य मेरे दिव्य जन्म और कर्म को तथ्य रूप में जान लेता है, वह प्राण त्यागने के उपरान्त पुनः जन्म नहीं लेता, प्रत्युत् मुझे प्राप्त होता है।

 

व्याख्या : जन्म की अभिव्यक्ति का आभास होने पर भी भगवान् जन्म-मरण से परे हैं। प्रकट रूप में दृढ़तापूर्वक धर्म की संस्थापना में क्रियाशील होते हुए भी वे सब प्रकार के कर्म से परे हैं। इस सत्य को जान लेने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता आत्मज्ञान प्राप्त कर के वह जीवन्मुक्त हो जाता है।

 

भगवान् का जन्म तो माया का एक खेल है। यह अप्राकृत है, दिव्य है, भगवान् की लीला है। मनुष्य रूप में दृष्टिगत होते हुए भी उनका शरीर चिन्मय होता है अर्थात् चेतन-स्वरूप होता है, पंचतत्त्वों से निर्मित मानव-शरीर की भाँति जड़ पदार्थ-सा नहीं होता।

 

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ।।१०।।

 

शब्दार्थ : वीतरागभयक्रोधाः-अनुराग, भय और क्रोध से मुक्त, मन्मयाः- मुझ में अनुरक्त, माम्-मुझ में, उपाश्रिताः- आश्रित, बहवः बहुत, ज्ञानतपसा-ज्ञान रूपी अग्नि से, पूताः - परिमार्जित (पवित्र हुए), मद्भावम् -मेरे भाव को, आगताः-प्राप्त हुए।

 

अनुवाद : राग, भय और क्रोध से मुक्त हो कर, मुझमें लीन हो कर, मेरी शरण में कर, ज्ञान रूपी अग्नि में पवित्र हो कर अनेक भक्तों ने मेरे भाव को प्राप्त कर लिया है।

 

व्याख्या : आत्मज्ञान का सूर्य उदित होने पर ऐन्द्रिक विषयों के प्रति आसक्ति समाप्त हो जाती है। यह ज्ञान होने पर कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप नित्य, अविनाशी और शाश्वत आत्म-तत्त्व है तथा परिवर्तन मात्र शरीर का गुण है, वह (मनुष्य) अभय हो जाता है। सर्वथा आप्तकाम (इच्छाशून्य), स्वार्थ भाव से मुक्त और सर्वत्र आत्म-दर्शन करने वाला भला क्रोध का शिकार कैसे हो सकता है?

 

परब्रह्म में आश्रित पुरुष उसी ब्रह्म का भक्त हो जाता है। वह उसी में लीन हो जाता है अर्थात् ब्रह्मलीन अथवा ब्रह्मनिष्ठ हो जाता है।

 

ज्ञानतपस्-ज्ञान की अग्नि जिस प्रकार अग्नि रूई को जला देता है, उसी प्रकार ज्ञानतपस् समस्त सुप्त वृत्तियों, वासनाओं, तृष्णाओं, संस्कारों, पापों और समस्त कर्मों को जला कर साधकों को पवित्र कर देता है। (निरूपण - II.56; IV.19 से 37 तक)

 

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्

मम वर्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।।११।।

 

शब्दार्थ : ये-जो, यथा-जिस प्रकार, माम् -मुझे, प्रपद्यन्ते-भजते हैं, तान् उनको, तथा उसी प्रकार से, एव-ही, भजामि भजता हूँ, अह्म - मैं, मम-मेरे, वर्म-मार्ग का, अनुवर्तन्ते-अनुसरण करते हैं, मनुष्याः मनुष्य, पार्थ-हे पार्थ, सर्वशः सब प्रकार से।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, भक्तगण जिस प्रकार से भी मेरा भजन करते हैं, मैं उसी प्रकार से उन्हें भजता हूँ अर्थात् वैसा ही फल प्रदान करता हूँ। सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरा ही अनुसरण करते हैं।

 

व्याख्या : जिस किसी भाव अथवा फल की आकाङ्क्षा से मनुष्य मेरा भजन करते हैं, उसी के अनुरूप मैं उन पर कृपा-दृष्टि करता हूँ। सकाम भाव से यदि कोई मुझे स्मरण करता है, तो उसको अभीष्ट पदार्थ प्रदान करता हूँ। यदि कोई ज्ञान की इच्छा से निष्काम भाव से मेरी आराधना करता है, तो उसे मोक्ष प्रदान करता हूँ। मैं किसी के साथ भी पक्षपात नहीं करता (निरूपण—VII.21 और IX.23)

 

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः

क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ।।१२।।

 

शब्दार्थ : काङ्क्षन्तः इच्छा करते हुए, कर्मणाम् -कर्मों की, सिद्धिम् -सफलता, यजन्ते-यज्ञ करते हैं, इह-इस लोक में, देवताः- देवता, क्षिप्रम् - शीघ्र, हि-क्योंकि, मानुषे लोके-मनुष्य लोक में, सिद्धिः-सफलता, भवति होती है, कर्मजा-कर्म से उत्पन्न

 

अनुवाद : इस लोक में फल की इच्छा वाले मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं; क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों का फल शीघ्र मिलता है।

 

व्याख्या : आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। इसके लिए पूर्ण त्याग आवश्यक है। साधक को पुरुषार्थ-चतुष्टय (अध्याय का श्लोक देखें) और अन्य अनेक गुणों से युक्त होने पर भी सतत घोर ध्यान का अभ्यास आवश्यक होता है; किन्तु सांसारिक (लौकिक) सिद्धि शीघ्र और सहज ही प्राप्त हो जाती है।

वर्णाश्रम और जाति पर आधारित वैदिक अनुष्ठान लौकिक मनुष्यों के लिए ही है।

 

 

चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः

तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम् ।।१३ ।।

 

शब्दार्थ : चातुर्वर्ण्यम् - चार वर्ण, मया-मेरे द्वारा, सृष्टम्-बनाये गये हैं, गुणकर्मविभागशः गुण और कर्म के भेद से, तस्य-उसका, कर्तारम् -कर्ता, अपि-भी, माम् मुझको, विद्धि-जानो, अकर्तारम्-अकर्ता, अव्ययम् - अविनाशी, अपरिवर्तनशील

 

अनुवाद : गुण और कर्म के आधार पर मैंने चार वर्णों की रचना की। इस (वर्ण-व्यवस्था) का सृजनकर्ता होने पर भी तुम मुझे अकर्ता ही जानो

 

व्याख्या : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-ये चार वर्ण गुण और कर्मों के अनुरूप बनाये गये हैं। ब्राह्मण में सत्त्व गुण की प्रधानता होती है। वह संयम, शुचिता, ऋजुता, सरलता, भक्ति आदि गुणों से सम्पन्न होता है। क्षत्रिय में रजोगुण की अधिकता होती है। वह पराक्रम, तेज, दृढ़ता, चातुर्य, उदारता और शासक स्वभाव से सम्पन्न होता है। वैश्य में रजोगुण मुख्य और तमोगुण गौण होता है। वह खेती-बाड़ी, पशुपालन और व्यापार आदि के अनुरूप गुणों से युक्त होता है। शूद्र में तमोगुण की प्रधानता रहती है और रजोगुण गौण रहता है। शूद्र अन्य तीन वर्णों की सेवा करता है। मानव-स्वभाव और वृत्ति गुणों की विभिन्नता से परिवर्तित होते हैं।

 

भगवान् कृष्ण वर्ण-व्यवस्था के सृष्टा होने पर भी अकर्ता होने से सृष्टा नहीं हैं। वे संसार में लिप्त नहीं हैं। वस्तुतः कर्तृत्वभाव तो माया वश है। माया ही सब-कुछ करती है। समाज में सुख-समृद्धि का राज्य हो, इसके लिए आवश्यक है कि चारों वर्ण अपना-अपना कर्म दक्षतापूर्वक करें, अन्यथा सर्वत्र लड़ाई-झगड़ा, कलह, भेद-भाव और संकीर्णता का साम्राज्य हो जाये। (निरूपण-XVIII.41)

 

मां कर्माणि लिम्पन्ति मे कर्मफले स्पृहा

इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न बध्यते ।।१४ ।।

शब्दार्थ : -नहीं, माम् -मुझे, कर्माणि-कर्म, लिम्पन्ति-लिप्त करते हैं, -नहीं, मेमेरी, कर्मफले-कर्मफल में, स्पृहा-लालसा, इति-इस प्रकार, माम् -मुझे, यः-जो, अभिजानाति-जानता है, कर्मभिः-कर्मों से, -नहीं, सः वह, बध्यते-बँधता है।

 

अनुवाद : कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और ही मुझे किसी कर्मफल की कामना है। जो मुझे इस प्रकार से जान लेता है, वह बन्धन में नहीं आता।

 

व्याख्या : क्योंकि तो मुझमें अहंभाव है और ही कर्मफल की स्पृहा; अतः मैं कर्म के बन्धन में नहीं आता। सांसारिक लोग सोचते हैं कि वे तो प्रतिनिधि हैं और वे कर्म करते हैं। फिर कर्म के फल की भी कामना करते हैं। इसीलिए उन्हें पुनः पुनः जन्म लेना पड़ता है। यदि वे अनासक्त हो कर अहंभाव और फल की आकाङ्क्षा का त्याग कर के कर्म करें, तो वे बन्धन में नहीं आयेंगे। वे जन्म-मरण से मुक्त हो जायेंगे। (निरूपण - IX.9)

 

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः

कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ।।१५ ।।

 

शब्दार्थ : एवम् - इस प्रकार, ज्ञात्वा-जान कर, कृतम् - किया गया, कर्म-कर्म, पूर्वैः- पूर्वजों द्वारा, अपि-भी, मुमुक्षुभि: -मोक्ष के जिज्ञासु साधकों द्वारा, कुरु-करो, कर्म-कर्म, एव-ही, तस्मात् - इसलिए, त्वम्-तुम, पूर्वैः- पूर्वजों द्वारा, पूर्वतरम् -पूर्वकाल में, कृतम् - किया गया।

 

अनुवाद : इस दिव्य ज्ञान को पा कर ही पुरातन काल में मुमुक्षु जनों ने कर्म किये; इसलिए तुम भी अपने पूर्वकाल के पूर्वजों की भाँति अनासक्त भाव से कर्म करो और अपने कर्तव्य का पालन करो।

 

व्याख्या : (हे अर्जुन), तुम इस सत्य को जान कर ही अपने कर्तव्य का पालन करो कि कर्मों के फल की स्पृहा आत्मा में नहीं हो सकती और ही आत्मा इसमें लिप्त होती है और कोई भी व्यक्ति निष्काम भाव से अहंकार और आसक्तिशून्य हो कर कर्म करेगा, वह बन्धन में नहीं आयेगा।

 

यदि तुम्हारा हृदय अशुद्ध है, तो इसकी शुद्धि के लिए कर्म करो। यदि तुमने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है, तो संसार में पर-कल्याण हेतु कर्म करो। ऐसे ही कर्म प्राचीन काल में जनक आदि ने किये। अतः तुम भी कर्तव्य कर्म करो

 

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।१६ ।।

 

शब्दार्थ : किम् -क्या, कर्म-कर्म, किम् -क्या, अकर्म-अकर्म, इति-इस प्रकार, कवयः बुद्धिमान्, अपि-भी, अत्र-इसमें, मोहिताः- भ्रमित, तत्-वह, ते तुम्हें, कर्म-कर्म, प्रवक्ष्यामि बताऊँगा, यत्-जो, ज्ञात्वा-जान कर, मोक्ष्यसे- (तुम) मुक्त हो जाओगे, अशुभात्-दोषों से।

 

अनुवाद : कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में तो ज्ञानी जन भी भ्रमित हैं। मैं तुम्हें कर्म के विषय में ज्ञान दूँगा अर्थात् कर्म और अकर्म विषय को समझाऊँगा कर्म की प्रकृति को जान कर तुम सब प्रकार के दोषों से मुक्त हो जाओगे (संसार के आवागमन के चक्र से छूट जाओगे)

 

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं विकर्मणः

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ।।१७ ।।

 

शब्दार्थ : कर्मणः-कर्म का, हि-निश्चित रूप से, अपि -भी, बोद्धव्यम् बोध (ज्ञान) होना चाहिए, बोद्धव्यम्-बोध होना चाहिए, -और, विकर्मणः - निषिद्ध कर्म का, अकर्मणः-अकर्म का, -और, बोद्धव्यम् बोध होना चाहिए, गहना गहन, कर्मणः-कर्म की, गतिः गति

 

अनुवाद : निश्चित रूप से (शास्त्रविहित) कर्म की यथार्थ प्रकृति (रहस्य) का ज्ञान होना चाहिए। निषिद्ध कर्म और अकर्म का ज्ञान होना चाहिए। कर्म की गति को समझना अत्यन्त कठिन है (कर्मन् की गति न्यारी)

 

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि कर्म यः

बुद्धिमान् मनुष्येषु युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ।।१८ ।।

 

शब्दार्थ : कर्मणि-कर्म में, अकर्म - अकर्म, यः जो, पश्येत् देखे, अकर्मणि-अकर्म में, -और, कर्म-कर्म, यः जो, सः वह, बुद्धिमान् बुद्धिमान्, मनुष्येषु मनुष्यों में, सः-वह, युक्तः योगी, कृत्स्नकर्मकृत् -सब कर्मों का कर्ता।

 

अनुवाद : कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखने वाला, मनुष्यों में ज्ञानी है। वह योगी है और सब कर्मों को करने वाला है।

 

व्याख्या : साधारण संभाषण की भाषा में हाथ-पैर और शरीर की गति (क्रिया) को कर्म कहा जाता है और शान्त हो कर निष्क्रिय बैठना अकर्म कहलाता है।

 

यह तो कारक का विचार है कि मैं कर्ता हूँ, जो मनुष्य को संसार के बन्धन में डालता है। यदि यह विचार रहे, तो कर्म कर्म नहीं रह जाता। यह मनुष्य को बन्धन में नहीं डालेगा। यह कर्म में अकर्म है। यदि तुम प्रकृति की गतिविधियों को साक्षी भाव से देखो और यह अनुभव करो कि 'प्रकृति द्वारा ही सब कार्य हो रहे हैं, मैं तो अकर्ता हूँ', निष्काम आत्मा से (आत्मा में कोई क्रिया नहीं होती) एकत्व स्थापित करो तो बस, कर्म चाहे कैसा और कितना ही क्यों करो, तब कर्म कर्म नहीं होता। यह अकर्म है, कर्म में। इस प्रकार के अभ्यास से और भाव से कर्म अपनी बन्ध प्रकृति को त्याग देता है।

 

कोई मनुष्य शान्त बैठा रहे, निष्क्रिय बैठा रहे; किन्तु यदि उसमें कर्तापन का भाव रहता है, तो शान्त रहते हुए भी वह कर्म कर रहा है। यह अकर्म में कर्म है। चंचल मन सदा सक्रिय रहता है। यद्यपि मनुष्य चुपचाप बैठा हो, मन क्रियाशील है, तो कर्म हो रहा है। मन के कर्म ही वास्तविक कर्म हैं। क्षण-भर के लिए भी मनुष्य बिना कर्म किये नहीं रह सकता; क्योंकि प्रकृतिवश हो कर वह कर्म करने के लिए बाध्य हो जाता है। (निरूपण – III.5)

 

अकर्म, अहंभाव को भी प्रेरित करता है। निष्क्रिय व्यक्ति कहता है-“मैं शान्त बैठा हूँ, मैं कुछ नहीं कर रहा", कर्म की भाँति अकर्म भी आत्मा पर मिथ्या रूप से आरोपित है।

 

इस सत्य को जानने वाला सब कर्मों का कर्ता है। उसने सब कर्मों का अन्त अर्थात् मोक्ष, ज्ञान अथवा पूर्णत्व को प्राप्त कर लिया है।

 

जब एक अग्नि नौका (steamer) चलती है, तो तट पर लगे गतिहीन वृक्ष मानो विपरीत दिशा में चलते हुए दिखायी देते हैं। नौका में बैठे व्यक्ति को ऐसा आभास होता है। इसके विपरीत सुदूर दिशा में गतिशील पदार्थ जड़ अथवा गतिहीन से दृष्टिगोचर होते हैं। आत्मा के विषय में भी इसी भाँति कर्म को अकर्म में और अकर्म को कर्म में देखा जाता है।

 

आत्मा अकर्ता है, निष्क्रिय है। शरीर और इन्द्रियाँ कर्म करती हैं। अज्ञानी व्यक्ति शरीर और इन्द्रियों के कर्म को मिथ्या रूप से अकर्ता आत्मा में ही आरोपित करते हैं। इसीलिए अज्ञानी सोचता है-"मैं कर्ता हूँ।" वह आत्मा को कर्म का कर्ता अथवा प्रतिनिधि समझता है। यह भूल है, अज्ञान है।

 

जिस प्रकार से नौका में बैठे व्यक्ति को तट पर खड़े वृक्ष विपरीत दिशा में गति करते आभासित होते हैं, यद्यपि वे गतिहीन हैं, उसी प्रकार वस्तुतः कर्म आत्मा में नहीं होता।

 

आत्म-साक्षात्कार होने पर जन्म-मरण के कारक इस अज्ञान का विनाश हो जाता है।

 

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ।।१९ ।।

 

शब्दार्थ : यस्य-जिसके, सर्वे-समस्त, समारम्भाः-शास्त्रविहित कर्म, कामसंकल्पवर्जिताः- इच्छा और संकल्प से रहित, ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम् - जिसके कर्म ज्ञान रूपी अग्नि में जल गये हैं तम् -उसे, आहु: -कहते हैं , पण्डितम् - ज्ञानी, बुधाः-विद्वान्

 

अनुवाद : जिसके समस्त कर्म कामनाशून्य और संकल्पशून्य हैं और जिसके कर्म ज्ञान रूप अग्नि में भस्म हो चुके हैं, ऐसे साधु पुरुष को विद्वान् लोग भी पण्डित कहते हैं।

 

व्याख्या : जनगण के समक्ष दृष्टान्त प्रस्तुत करने के भाव से ज्ञानी कर्म करता है। कर्म करते हुए भी वह कर्म नहीं करता; क्योंकि वह निःस्वार्थ है, क्योंकि आत्मज्ञान के द्वारा उसने कर्म में अकर्म का ज्ञान प्राप्त कर लिया है और उसके समस्त कर्म ज्ञानाग्नि में दग्ध हो चुके हैं। ब्रह्मज्ञान विशाल आध्यात्मिक अग्नि है जो शुभ-अशुभ सब प्रकार के कर्मफल का भक्षण करती है और तेजोद्दीप्त साधक को कर्म-बन्धन से मुक्त करता है। पूर्ण त्यागमय जीवन यापन करने वाला मुनि शरीर के निर्वाह के लिए अनिवार्य कर्म ही करता है। (निरूपण -III.19; IV.10, 37)

 

 

 

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किश्चित्करोति सः ।।२० ।।

 

शब्दार्थ : त्यक्त्वा-त्याग कर, कर्मफलासङ्गम् -कर्मफल के प्रति आसक्ति, नित्यतृप्तः - सदा सन्तुष्ट, निराश्रयः - आश्रय रहित, कर्मणि-कर्म में, अभिप्रवृत्तः - प्रवृत्त, अपि - भी, -नहीं, एव-ही, किञ्चित् -कुछ भी, करोति-करता है, सः- वह

 

अनुवाद : कर्मफल के प्रति आसक्ति को त्याग कर, सर्वदा तृप्त रह कर और किसी का आश्रय ले कर वह क्रियाशील होते हुए भी कुछ नहीं करता।

 

व्याख्या : साधक के मन में, कर्म में अकर्म के भाव को दृढ़ करने के लिए उसी तथ्य की पुनरावृत्ति की गयी है। वह जो विश्व में दूसरों के कल्याण में लगा है, फलासक्तिशून्य और अहंकारशून्य हो कर कर्म करता है, जनगण के समक्ष दृष्टान्त स्थापित करने के लिए कार्य करता है, वह सदा कर्म में रत रहते हुए भी वस्तुतः कुछ नहीं करता; क्योंकि वह आत्मज्ञानी है। उसने उस आत्मा से एकत्व स्थापित कर लिया जो कर्म से परे है।

 

क्योंकि ब्रह्मन्, परम पिता परमात्मा, स्वयंभू है, समस्त कामनाएँ स्वतः ही शान्त हो जाती हैं, जब उसका ज्ञान हो जाता है। जिस प्रकार से एक राजा का अनुग्रह प्राप्त होने पर किसी मनुष्य को किसी भी वस्तु के लिए मन्त्री अथवा सरकारी कार्यकर्ता पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, उसी प्रकार परमात्मा पर निर्भर रहने वाला व्यक्ति सर्वदा तृप्त रहता है, उसे किसी अन्य पर निर्भर नहीं रहना पड़ता (निरूपण-IV.41)

 

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः

शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ।।२१ ।।

 

शब्दार्थ : निराशीः- आशा रहित (आप्तकाम), यतचित्तात्मा-मन और बुद्धि को वश में करने वाला, त्यक्तसर्वपरिग्रहः-परिग्रह (स्वामित्व) का त्याग करने वाला, शारीरम् - शरीर के, केवलम् -केवल, कर्म-कर्म, कुर्वन् -करता हुआ, -नहीं, आप्नोति -प्राप्त करता है, किल्बिषम् -पाप (दोष) को।

 

अनुवाद : किसी प्रकार की आकाङ्क्षा रखते हुए, मन और बुद्धि को संयत कर के सब प्रकार के परिग्रह (लोभ लालच-स्वामित्व) का त्याग करने वाला व्यक्ति शरीर से कर्म करते हुए भी पाप का भागी नहीं बनता, उसे (कर्मफल का) दोष नहीं लगता।

 

व्याख्या : जीवन्मुक्त महापुरुष शरीर के निर्वाह के लिए अनिवार्य कर्म ही करता है, शेष समस्त कर्मों का त्याग कर देता है। वह समस्त भोग-सामग्री का भी त्याग कर देता है। अशुभ फल देने वाला वह कोई पाप कर्म नहीं करता मुमुक्षु के लिए तो धर्म-कर्म भी पाप है; क्योंकि वह भी उसे संसार के बन्धन में डालेगा। धर्म एक स्वर्ण-पाश है। स्वर्ण-पाश भी तो पाश (बन्धन) ही है। ज्ञानी पुरुष धर्म और अधर्म, शुभ और अशुभ तथा पाप और पुण्य से मुक्त होता है। (निरूपण-III.7)

 

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः

समः सिद्धावसिद्धौ कृत्वापि निबध्यते ।। २२ ।।

 

 

 

शब्दार्थ : यदृच्छालाभसन्तुष्टः- स्वतः प्राप्त वस्तु से सन्तुष्ट, द्वन्द्वातीतः सुखदुःखादि द्वन्द्वों से परे, विमत्सरः- द्वेष रहित, समः समान, सिद्धौ-सफलता में, असिद्धौ-विफलता में, -और, कृत्वा कर के, अपि-भी, -नहीं, निबध्यते-बँधता

 

अनुवाद : जो मनुष्य स्वतःप्राप्त लाभ में सन्तुष्ट रहता है, जो द्वन्द्वों से परे है और ईर्ष्या रहित है, सिद्धि और असिद्धि अर्थात् सफलता और विफलता में सम (स्थिरधी) है, वह कर्म करते हुए भी उसके बन्धन में नहीं आता।

 

व्याख्या : स्वतःप्राप्त वस्तु में ज्ञानी पुरुष आनन्द में रहता है। चतुर्थ अध्याय के श्लोक १८ से २३ तक आत्म-ज्ञान के फल की पुनरुक्ति है, जो (ज्ञान) कर्म से अतीत है। 'कर्म रहित' आत्म-तत्त्व से एकत्व स्थापित करने वाला योगी बन्धन में नहीं आता; क्योंकि जन्म-मृत्यु के बन्धन में डालने वाले उनके कर्म और उसके कारण ब्रह्म-ज्ञान की अग्नि में भस्म हो जाते हैं। आग में भस्म हो चुके बीज जिस प्रकार अंकुरित नहीं होते, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि में भस्म हुए कर्म भावी जन्म लाने में असमर्थ होते हैं।

 

सामान्य लोग एक ज्ञानी को कर्म करते देख कर उसे कर्ता, प्रतिनिधि, क्रियाशील और बन्धन में पड़ा हुआ मान लेते हैं। यह उनकी भूल है। अपनी ही दृष्टि में वह यथार्थतः प्रतिनिधि कदापि नहीं है। वह वास्तव में कोई कर्म नहीं करता। वह अनुभव करता है और कहता है- "मैं तो कुछ भी नहीं करता प्रकृति करती है अथवा प्रकृति के तीन गुण ही सब-कुछ करते हैं।

 

वह सदा स्थिर रहता है; अतः शीत-उष्णता (सरदी-गरमी) सुख-दुःख, सफलता-विफलता उसे प्रभावित नहीं करते। शरीर के निर्वाह के लिए अनिवार्य सामग्री में भी उसकी आसक्ति नहीं रहती। शरीर के पोषण के लिए भोजन अथवा अन्य वस्तुएँ प्राप्त होने पर वह प्रसन्न नहीं होता और अप्राप्ति पर दुःखी नहीं होता। उसका कारण है कि वह अपनी मूल प्रकृति सत्-चित्-आनन्द (सच्चिदानन्द स्वरूप) में स्थित है। वह आनन्द के सागर में हिलोरें ले रहा है; इसीलिए वह शरीर और इसकी आवश्यकताओं के प्रति उदासीन रहता है।

 

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः

यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ।। २३ ।।

 

शब्दार्थ : गतसङ्गस्य-जिसकी आसक्ति समाप्त हो चुकी है, मुक्तस्य-मुक्त पुरुष का, ज्ञानावस्थितचेतसः- जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है, यज्ञाय-यज्ञ के लिए, आचरतः - आचरण करते हुए, कर्म-कर्म, समग्रम् -समस्त, प्रविलीयते-विलीन हो जाता है।

 

अनुवाद : उस व्यक्ति के समस्त कर्म विलीन हो जाते हैं जो यज्ञ (परमात्मा) के लिए कर्म करता है, आसक्ति रहित है, मुक्त है और जिसका चित्त ज्ञान में स्थित हो गया है।

 

व्याख्या : आसक्ति रहित, कर्म-बन्धन से मुक्त, ज्ञान में केन्द्रित चित्त वाले और केवल परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति के सम्पूर्ण कर्म फल-सहित विलीन हो जाते हैं, शून्य हो जाते हैं। वस्तुतः वे कर्म होते ही नहीं हैं।

 

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ।।२४ ।।

 

शब्दार्थ : ब्रह्म-ब्रह्म, अर्पणम्-आहुति, ब्रह्म-ब्रह्म, हविः- हवि (घृति), ब्रह्माग्नौ-ब्रह्म रूप अग्नि में, ब्रह्मणा-ब्रह्म के द्वारा, हुतम् - अर्पित किया गया, ब्रह्म-ब्रह्म, एव-ही, तेन-उसके द्वारा, गन्तव्यम् - प्राप्त किया जाता है, ब्रह्मकर्मसमाधिना-ब्रह्म रूपी कर्म में लीन व्यक्ति के द्वारा।

 

अनुवाद : ब्रह्म ही हव्य (आहुति) है, ब्रह्म ही घृत है, ब्रह्म रूप अग्नि में अर्पित किया जा रहा हव्य भी ब्रह्म है, वह सदा निश्चित रूप से ब्रह्म को ही प्राप्त होता है जो प्रत्येक कर्म में ब्रह्म को ही देखता है।

 

व्याख्या : यह ज्ञान-यज्ञ (wisdom-sacrifice) है जिसमें कर्म के साधन और सामग्री के भाव में ब्रह्मभाव का आदेश दिया गया है। इसमें कर्म भी ब्रह्म है और कर्म-फल भी ब्रह्म है। ऐसे भाव में प्रवेश पा लेने के पश्चात्, जैसा कि पूर्व-श्लोक (२३) में कहा है, सभी कर्म क्षीण हो जाते हैं।

 

आत्म-साक्षात्कार होने पर सम्पूर्ण जीवन मानो एक ज्ञान-यज्ञ हो जाता है जिसमें हव्य सामग्री, घृत, यज्ञकर्ता, कर्म और लक्ष्य सभी ब्रह्म हैं। जो ब्रह्म पर इस विधि से पूर्ण ध्यान एकाग्रित करेगा, निश्चित रूप से ब्रह्म को प्राप्त होगा।

 

आत्म-ज्ञानी जानता है कि हव्य, अग्नि, उपकरण जिसके द्वारा घृत अग्नि में डाला जाता है और वह स्वयं, इन सबका ब्रह्म के अतिरिक्त स्व-अस्तित्व नहीं है। अपरोक्षानुभव में ब्रह्म का ज्ञान होने पर योगी कर्म करते हुए भी मानो कर्ता नहीं है। ज्ञानी के लिए सब कर्मों का अभाव ही हो जाता है। (निरूपण-III.15)

 

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते

ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ।। २५ ।।

 

शब्दार्थ : दैवम् -देवताओं से सम्बन्धित, एव-ही, अपरे अन्य, यज्ञम् यज्ञ, योगिनः-योगी, पर्युपासते-पूजा करते हैं, ब्रह्माग्नौ-ब्रह्म रूप अग्नि में, अपरे अन्य, यज्ञम्-यज्ञ, यज्ञेन-यज्ञ के द्वारा, एव-निश्चित रूप से, उपजुह्वति-अर्पित करते हैं।

 

अनुवाद : कुछ योगी जन देवाराधना रूप यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, अन्य योगी, जिन्होंने आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लिया है, ब्रह्म रूपी अग्नि में आत्मा के द्वारा आत्मा को ही अर्पित कर दिया करते हैं।

 

व्याख्या : कर्मयोग में भक्तिभाव रखने वाले योगी देवताओं के लिए यज्ञ आदि अनुष्ठान किया करते हैं। दूसरा यज्ञ है 'ज्ञान-यज्ञ' (wisdom-sacrifice) जो ज्ञानियों द्वारा किया जाता है। इस यज्ञ में आहुति आत्मा की दी जाती है। यहाँ यज्ञ का अभिप्राय आत्मा से है। उपाधियाँ अथवा मर्यादित अनुबन्ध जैसे भौतिक शरीर, मन, बुद्धि आदि, जिनका ब्रह्म में अज्ञानवश अध्यारोपण किया जाता है, बोधातीत हो जाते हैं अर्थात् समाधि की अवस्था प्राप्त करने पर इन सबका बोध नहीं रह जाता और जीवात्मा परमात्मा से एकरूप हो जाता है। आत्मा को ब्रह्म में अर्पण करने का अभिप्राय है अपरोक्षानुभूति करना कि 'आत्मा ब्रह्म से पृथक् नहीं है, एक है।' यह सर्वोच्च ज्ञान है। ब्रह्मनिष्ठ योगी ऐसा ही यज्ञ करते हैं। अन्य सभी यज्ञों से यह यज्ञ उत्कृष्ट है।

 

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति

शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ।। २६ ।।

 

शब्दार्थ : श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि-श्रवणेन्द्रिय तथा अन्य इन्द्रियाँ, अन्ये-अन्य, संयमाग्निषु-संयम रूप अग्नि में, जुह्वति-हवन करते हैं, शब्दादीन् विषयान् - शब्दादि इन्द्रिय-विषय, अन्ये-अन्य, इन्द्रियाग्निषु-इन्द्रियों की अग्नि में, जुद्धति-यजन करते हैं।

 

अनुवाद : अन्य योगी जन संयम की अग्नि में श्रवणादि इन्द्रियों का हवन करते हैं, जब कि और योगी इन्द्रियों की अग्नि में शब्दादि विषयों का यजन करते हैं।

 

व्याख्या : कुछ योगी सतत इन्द्रिय-संयम में लगे रहते हैं। वे आत्मा के प्रकाश में इन्द्रियों को संहृत करके उन्हें उनके विषयों के सम्पर्क से रोकते हैं। यह भी एक प्रकार का यज्ञ है। अन्य योगी अपनी इन्द्रियों को पावन और अनिषिद्ध विषयों की ओर उन्मुख करते हैं। यह भी एक यज्ञ है।

 

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे

आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ।।२७ ।।

 

शब्दार्थ : सर्वाणि-सब, इन्द्रियकर्माणि-इन्द्रियों के कर्म, प्राणकर्माणि- प्राणों के कर्म, चऔर, अपरेअन्य, आत्मसंयमयोगाग्नौ-आत्मसंयम रूप योग की अग्नि में, जुद्धति-आहुति देते हैं, ज्ञानदीपिते-जो ज्ञान द्वारा जलायी जाती है।

 

अनुवाद : अन्य साधक ज्ञान से उद्दीप्त आत्म-संयम की अग्नि में अन्य इन्द्रियों और प्राण की समस्त क्रियाओं को समर्पित करते हैं।

 

व्याख्या : जिस प्रकार तेल से दीप जलाया जाता है, उसी प्रकार आत्मसंयम की योगाग्नि ज्ञान से प्रज्वलित की जाती है। योगी जब अपने मन को आत्मा अथवा ब्रह्म पर एकाग्र करता है, तब इन्द्रियाँ और प्राण अपनी क्रिया त्याग कर शिथिल हो जाते हैं। इन्द्रियाँ और प्राण अपने कारण में विलीन हो जाते हैं।

 

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे

स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ।।२८ ।।

 

शब्दार्थ : द्रव्ययज्ञाः- वे लोग जो अपनी सम्पत्ति को यज्ञ में समर्पित करते हैं (सम्पत्ति का यज्ञ करने वाले लोग), तपोयज्ञाः- तपों का यज्ञ करने वाले, योगयज्ञाः योग का हवन करने वाले, तथा- इस प्रकार, अपरे अन्य, स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः स्वाध्याय और ज्ञान का यज्ञ करने वाले, -और, यतयः यति (वानप्रस्थी) अथवा आत्म-संयत, संशितव्रताः-कठोर व्रतधारी

 

अनुवाद : अन्य अपनी भौतिक सम्पत्ति को, तपस्या को, योग को यज्ञ के रूप में समर्पित करते हैं, जब कि दृढ़ व्रतधारी और आत्म-संयमी मुनि जन अपने अध्ययन और ज्ञान का यजन करते हैं।

 

व्याख्या : दान के रूप में सुपात्र को सम्पत्ति दे कर कुछ लोग यज्ञ करते हैं। कुछ तपस्या में लीन हो जाते हैं, यही उनका यज्ञ है। अन्य कुछ अष्टाङ्गयोग अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का समर्पण करते हैं। कुछ शास्त्राध्ययन करते हैं और इसे यज्ञ रूप में अर्पित करते हैं।

 

नोट : यम-पाँच महान् व्रत, नियम-सदाचार के पाँच नियम, आसन मुद्रा, प्राणायाम-श्वास पर नियन्त्रण, प्रत्याहार-इन्द्रियों को वश में करना, धारणा एकाग्रता, ध्यान-ध्यान, समाधि-तुर्यावस्था

 

 

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे

प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ।।२९ ।।

 

शब्दार्थ : अपाने-अपान वायु में (निम्नगामी श्वास में), जुद्धति-अर्पित करते हैं, प्राणम् -प्राण को, प्राणे-भीतर आने वाले श्वास में, अपानम्-अपान को (बाह्य जाने वाले श्वास को), तथा- इस प्रकार, अपरे -अन्य, प्राणापानगती-बाहर और भीतर की वायु अर्थात् अपान और प्राण की गतियों को, रुद्ध्वा-रोक कर, प्राणायामपरायणाः केवल प्राणायाम में संलग्न अर्थात् श्वास-प्रश्वास पर संयम रखने का अभ्यास करने वाले

 

अनुवाद : अन्य योगी अपान वायु में प्राण वायु का हवन करते हैं और अन्य कोई प्राण में अपान का हवन करते हैं अर्थात् पूरक और रेचक प्राणायाम करते हैं। इस प्रकार श्वास-प्रश्वास की प्रक्रियाओं को रोक कर अन्य प्राणायाम-परायण योगी जन (कुम्भक द्वारा) श्वास को संयत करते हैं।

 

व्याख्या : कुछ योगी पूरक (श्वास भीतर खींचना) का अभ्यास करते हैं। अन्य रेचक (श्वास बाहर रोकना) का अभ्यास करते हैं और कुछ योगी कुम्भक (श्वास को रोकना) का अभ्यास करते हैं।

 

पाँच उप-प्राण एवम् अन्य प्राण, प्राणायाम के अभ्यास से मुख्य प्राण में लीन हो जाते हैं। प्राण का निग्रह होने पर मन भी इतस्ततः भागना त्याग कर स्थिर हो जाता है। इन्द्रियाँ भी सूक्ष्म हो कर प्राण में विलीन हो जाती हैं। प्राण के स्फुरण मात्र से मन और इन्द्रियों की प्रक्रियाओं को वश में रखा जाता है। प्राण संयत हो जाये, तो मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ अपना कार्य छोड़ देती हैं।

 

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति

सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ।।३० ।।

 

शब्दार्थ : अपरे -अन्य लोग, नियताहाराः- आहार को नियमित करने वाले, प्राणान् -प्राणों को, प्राणेषु-प्राणों में, जुह्वति-अर्पित करते हैं, सर्वे-सब, अपि-भी, एते-ये, यज्ञविदः-यज्ञ के ज्ञाता, यज्ञक्षपितकल्मषाः - जिनके पाप यज्ञ से नष्ट हो चुके हैं।

 

अनुवाद : अन्य लोग अपना आहार नियमित कर के प्राणों का प्राणों में हवन करते हैं। ये सब यज्ञ के ज्ञाता हैं जिनके समस्त पाप यज्ञ द्वारा नष्ट हो चुके हैं।

 

व्याख्या : 'नियताहाराः' का अभिप्राय है-नियमित अथवा अल्पाहार करने वाले वे सन्तुलित भोजन करते हैं। आहार में कठोर नियमों का पालन कर के वे कर्मेन्द्रियों की प्रक्रियाओं को शिथिल कर के क्षुधा और वासना पर विजय प्राप्त करते हैं।

 

योगी अपनी प्राणवायु को वशीकृत (निग्रहीत) प्राण में डाल देते हैं। इस प्रकार प्राण मुख्य प्राण में विलीन हो जाता है।

 

उपर्युक्त यज्ञ के अनुष्ठान से मन परिमार्जित (शुद्ध) होता है और पापों का विनाश होता है।

 

 

 

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्

नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ।।३१

 

शब्दार्थ : यज्ञशिष्टामृतभुजः- यज्ञावशेष रूप अमृत का पान करने वाले, यान्ति-प्राप्त होते हैं, ब्रह्म-ब्रह्म को, सनातनम् -सनातन, -नहीं, अयम् यह, लोकः-लोक, अस्ति- है, अयज्ञस्य-यज्ञ करने वाले का, कुतः कहाँ से, अन्यः-अन्य, कुरुसत्तम-कुरुश्रेष्ठ

 

अनुवाद : हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन, अमृत समान यज्ञावशेष का सेवन करने वाले शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ करने वाले के लिए तो यह संसार ही (सुखद) नहीं है, फिर परलोक की तो बात ही क्या?

 

व्याख्या : ऊपर वर्णित शास्त्रविहित यज्ञों का अनुष्ठान कर के मन शुद्ध होने पर आत्म-ज्ञान प्राप्त कर के समय के साथ योगी जन सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। उनमें से किसी भी यज्ञ का पालन करने वाला इस दुःखमय लोक के लिए भी उपयुक्त नहीं है, फिर इससे श्रेष्ठतर लोक की वह कामना भी कैसे कर सकता है? (निरूपण-III.13)

 

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे

कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ।।३२

 

शब्दार्थ : एवम् - इस प्रकार, बहुविधाः- अनेक प्रकार के, यज्ञाः यज्ञ, वितताः - विस्तीर्ण हैं (बताये गये हैं), ब्रह्मणः - ब्रह्म अथवा वेद के, मुखे-मुख में, कर्मजान् -कर्म से उत्पन्न, विद्धि-जानो, तान्-उन, सर्वान् -सबको, एवम् - इस प्रकार, ज्ञात्वा-जान कर, विमोक्ष्यसे मुक्त हो जाओगे।

 

अनुवाद : इस प्रकार वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है। उन्हें कर्म से उत्पन्न हुआ जानो ऐसे ज्ञान प्राप्त कर के तुम बन्धन-मुक्त हो जाओगे

 

व्याख्या : 'ब्रह्मणः' का अर्थ वेदों में ऐसा भी निरूपित किया गया है।

 

अनेक प्रकार के यज्ञ ब्रह्म के मुख में विस्तृत हैं अर्थात् वेदों में आचक्षित हैं। उन्हें कर्म से उत्पन्न हुआ ही जानो; क्योंकि आत्मा कर्म से परे है। यदि तुम्हें यह ज्ञान हो जाये कि इन कर्मों का तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं, वे कर्म तुम्हारे नहीं हैं और तुम कर्म रहित (निष्काम) हो, तो इस सम्यक् ज्ञान को प्राप्त कर निश्चित रूप से तुम संसार के बन्धन से मुक्त हो जाओगे। (निरूपण - IX.27; XIII.15)

 

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप

सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ।। ३३ ।।

 

शब्दार्थ : श्रेयान् - अधिक अच्छा, द्रव्यमयात् द्रव्यमय (से), यज्ञात् यज्ञ से, ज्ञानयज्ञः- ज्ञान-यज्ञ, परन्तप - हे शत्रुओं को सताने वाले, सर्वम् सर्व, कर्म-कर्म, अखिलम् -पूर्ण रूप से, पार्थ-अर्जुन, ज्ञाने-ज्ञान में, परिसमाप्यते समाप्त होते हैं।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, द्रव्य (सामग्री) द्वारा किये जाने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान-यज्ञ अधिक अच्छा है; क्योंकि अन्ततोगत्वा सब कर्म पूर्णतया ज्ञान में ही समाप्त होते हैं।

 

व्याख्या : भौतिक पदार्थों से किये जाने वाले यज्ञ भौतिक कार्यों (effects) के कारण (cause) बनते हैं और उसका फल भोगने के लिए यज्ञकर्ता को इस भौतिक जगत् में पुनः अवतरित होना पड़ता है। ज्ञान-यज्ञ मोक्षप्रद होता है। जैसे नदियाँ समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार समस्त कर्मों का अन्तर्भाव ज्ञान में होता है। समस्त कर्म हृदय को परिमार्जित करते हुए ज्ञानोदय की ओर अग्रसर करते हैं। आत्म-ज्ञान में ही कर्मों का अन्त है।

 

परमात्मा को समर्पित किये गये फल सहित सारे कर्म ब्रह्मज्ञान में निहित हैं। (निरूपण-IX.15; X.25; XVIII.70)

 

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।। ३४ ।।

 

शब्दार्थ : तत् -वह, विद्धि-जानो, प्रणिपातेन-दण्डवत् प्रणाम द्वारा, परिप्रश्नेन-प्रश्न द्वारा, सेवया-सेवा के द्वारा, उपदेक्ष्यन्ति-उपदेश देंगे, ते-तुम्हें, ज्ञानम् ज्ञान, ज्ञानिनः- ज्ञानी जन, तत्त्वदर्शिनः सत्य को जानने वाले

 

अनुवाद : उस ज्ञान का उपदेश तुम्हें तत्त्वदर्शी (ज्ञानी) लोग देंगे। उसे तुम दण्डवत् प्रणाम द्वारा, प्रश्नोत्तर द्वारा और सेवा से प्राप्त करो।

 

व्याख्या : शास्त्रों में पारंगत ब्रह्मश्रोत्रिय अथवा ब्रह्मनिष्ठ गुरु के समीप जाओ। पूर्ण भक्तिभाव से सविनय दण्डवत् प्रणाम करो। प्रश्न पूछो-"हे समादरणीय गुरुदेव ! बन्धन का कारण क्या है? मैं मुक्त कैसे हो सकता हूँ? अज्ञान की प्रकृति क्या है? ज्ञान की प्रकृति क्या है? आत्म-साक्षात्कार हेतु अन्तरङ्ग साधना क्या है?" श्रद्धाभाव से गुरु की सेवा करो। शास्त्र में निपुण होने पर भी आत्म-ज्ञानी होने पर गुरु तुम्हें आत्म-ज्ञान नहीं दे सकता। उस ज्ञान को प्राप्त करने अथवा ब्रह्मज्ञानी बनने के लिए तुम्हें ऐसे गुरु के पास ही जाना होगा जो शास्त्र-निपुण भी हो और ब्रह्मज्ञानी भी हो। मात्र प्रणिपात से ज्ञान नहीं मिलेगा। उसमें दम्भ का आभास हो सकता है। गुरु में अपूर्व श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए श्रद्धा और भक्तिभाव से गुरु की सेवा करनी चाहिए, तब दम्भ के लिए स्थान नहीं रहेगा।

 

 

यज्ज्ञात्वा पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव

येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ।।३५ ।।

 

शब्दार्थ : यत्-जो, ज्ञात्वा-जान कर, -नहीं, पुनः -पुनः, मोहम् -मोह को, एवम् - इस प्रकार, यास्यसि-प्राप्त करोगे, पाण्डव- हे पाण्डव, येन-जिसके द्वारा, भूतानि-प्राणी, अशेषेण-सभी, द्रक्ष्यसि देखोगे, आत्मनि-(निज) आत्मा में, अथो-भी, मयि - मुझमें।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, उस ज्ञान को प्राप्त करने पर तुम पुनः भ्रम में नहीं पड़ोगे। उस ज्ञान से तुम समस्त प्राणियों को अपने भीतर और फिर मुझमें भी देखोगे

 

व्याख्या: पूर्व श्लोक में निर्दिष्ट आत्म-ज्ञान, जो प्रणिपात, परिप्रश्न और सेवा द्वारा ब्रह्मनिष्ठ गुरु से प्राप्त करना है, उस ज्ञान को प्राप्त कर लेने पर तुम पुनः भ्रमित नहीं होओगे। तुम तो उस मूल एकत्व का दर्शन करोगे। अपरोक्षानुभूति में, अथवा अपनी आत्मा के आलोक में अथवा भावातीत ज्ञान में तुम अनुभव करोगे कि सृष्टिकर्ता से ले कर तृण पर्यन्त समस्त प्राणी तुम्हारे भीतर हैं और मुझमें भी हैं। (निरूपण - IX.15; XVIII.20)

 

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः

सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ।। ३६ ।।

 

शब्दार्थ : अपि-भी, चेत्-यदि, असि-हो, पापेभ्यः -पापियों से, सर्वेभ्यः सभी (से), पापकृत्तमः-सर्वाधिक पापी, सर्वम् -सब, ज्ञानप्लवेन-ज्ञान रूपी नौका से, एव-ही, वृजिनम् -पाप, सन्तरिष्यसि-पार कर जाओगे।

 

अनुवाद : यदि तुम अन्य पापियों से भी अपेक्षाकृत अधिक पापी हो, तो भी निश्चित रूप से ज्ञान रूपी नौका द्वारा पाप के सागर से तर जाओगे।

 

व्याख्या : तुम आत्म-ज्ञान की नाव से पाप के सागर के पार पहुँच सकते हो। (निरूपण-IX.30)

 

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते ऽर्जुन

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ।। ३७ ।।

 

शब्दार्थ : यथा-जैसे, एधांसि-ईंधन को, समिद्धः जलती हुई, अग्निः-अग्नि, भस्मसात्कुरुते-भस्म कर देता है, अर्जुन-हे अर्जुन, ज्ञानाग्निः- ज्ञान रूपी अग्नि, सर्वकर्माणि-सब कर्मों को, भस्मसात्कुरुते-भस्म कर देता है, तथा-वैसे ही।

 

अनुवाद : हे अर्जुन, जिस प्रकार से प्रज्ज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देता है, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त कर्मों को भस्म कर देता है।

 

व्याख्या : जले हुए बीज जिस प्रकार अंकुरित नहीं हो सकते, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि में दग्ध कर्म भी फल नहीं दे सकते अर्थात् कर्म-फल को भोगने के लिए तब मनुष्य को इस संसार में पुनः नहीं आना पड़ेगा। कर्म को भस्मसात् करना यही है। ज्ञानाग्नि में दग्ध हो कर कर्म अपनी शक्ति खो देते हैं। ज्ञानोदय होने पर अग्नि में ईंधन की भाँति ज्ञान में कर्म भस्म हो जाते हैं। जब अहंभाव शून्य को प्राप्त हो गया, कामनाएँ नहीं रहीं, फल की इच्छा शून्य हो गयी तो कर्म नहीं रहा इसकी शक्ति समाप्त हो गयी। जिन प्रारब्ध कर्मों के कारण यह शरीर सत्ता में आया है और प्रारब्ध कर्म का फल भोग रहा है, उन प्रारब्ध कर्मों को छोड़ कर अन्य सभी कर्मों को ज्ञानाग्नि भस्म करने में समर्थ है। शंकराचार्य अपनी अपरोक्षानुभूति में तो प्रारब्ध कर्मों के भी भस्म होने की बात लिखते हैं।

 

वेद में भी स्पष्ट रूप से कर्मों के नष्ट होने का तथ्य बहुवचन में वर्णित है-"उसके कर्म नष्ट हो जाते हैं, जब परमात्मा का ज्ञान हो जाता है", स्वाभाविक है, यहाँ प्रारब्ध कर्म से भी वेद का तात्पर्य रहा है।

 

पूर्वकृत् कर्मों के फल, प्रतिक्रिया अथवा कर्म तीन प्रकार के हैं। प्रारब्ध कर्म वे कर्म हैं जिनके कारण यह शरीर मिला है। संचित कर्म वे अवशिष्ट कर्म हैं जो भावी जन्म प्रदान करेंगे, वे हमारे ही द्वारा संचित किये गये हैं। आगामी अथवा क्रियमाण वे कर्म हैं जो इस जन्म में हम कर रहे हैं। यदि दिव्य आत्म-ज्ञान से संचित और क्रियमाण कर्म ही नष्ट होने की बात होती तो द्विवचन का प्रयोग होता, बहुवचन का नहीं (संस्कृत व्याकरण में वचन तीन हैं-एक वचन, द्विवचन और बहुवचन) (निरूपण - IV. 10-19)

 

हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते

तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ।। ३८ ।।

 

शब्दार्थ : -नहीं, हि-निस्सन्देह, ज्ञानेन-ज्ञान की अपेक्षा, सदृशम् -समान, पवित्रम् - पवित्र, इह-यहाँ (इस लोक में), विद्यते-है, तत्-वह, स्वयम् स्वयम्, योगसंसिद्धः- योग में पारंगत (योगी), कालेन समय के साथ, आत्मनि-आत्मा में, विन्दति-प्राप्त करता है।

 

अनुवाद : निःसन्देह, ज्ञान सदृश पवित्र करने वाली इस संसार में दूसरी वस्तु नहीं है। योग में पारंगत होने पर मनुष्य स्वयं ही उस ज्ञान को समय आने पर अपने भीतर प्राप्त कर लेता है।

 

व्याख्या : आत्म-ज्ञान के समान पवित्र करने वाली अन्य कोई वस्तु नहीं है। कर्मयोग और ध्यानयोग में पूर्णत्व प्राप्त कर लेने पर मनुष्य समय के साथ स्वयं ही उस आत्म-ज्ञान की अनुभूति करता है।

 

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ।। ३९ ।।

 

शब्दार्थ : श्रद्धावान्-श्रद्धायुक्त, लभते - प्राप्त करता है, ज्ञानम् - ज्ञान को, तत्परः-तत्पर, संयतेन्द्रियः - इन्द्रियों को वश में करने वाला, ज्ञानम्-ज्ञान, लब्ध्वा-प्राप्त करके, पराम् -परम, शान्तिम् - शान्ति को, अचिरेण-शीघ्र ही, अधिगच्छति -प्राप्त करता है।

 

अनुवाद : ज्ञान वही प्राप्त कर सकता है जो विजितेन्द्रिय है अर्थात् जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, जो तत्पर (भक्तिभाव से पूर्ण है) है और श्रद्धा युक्त है। ज्ञान प्राप्त कर लेने पर वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त करता है।

 

व्याख्या : श्रद्धा-विश्वास से युक्त व्यक्ति जो सतत गुरु की सेवा में संलग्न है और उनके उपदेशों का श्रवण करता है तथा जिसने अपनी इन्द्रियों को वशीभूत कर लिया है, वह निश्चित रूप से ज्ञान प्राप्त करता है और परम शान्ति की अथवा मोक्ष की अनुभूति करता है। अचिरेण परम शान्ति प्राप्त्यर्थ ऊपर वर्णित तीनों गुणों की महत्वाकांक्षा अनिवार्य है। मात्र एक ही गुण पर्याप्त नहीं है। (निरूपण-X.10,11)

 

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति

नायं लोकोऽस्ति परो सुख्खं संशयात्मनः ।।४० ।।

 

शब्दार्थ : अज्ञः- अज्ञानी, -और, अश्रद्दधानः-श्रद्धा रहित, -और, संशयात्मा-संशय युक्त, विनश्यति - नष्ट हो जाता है, -नहीं, अयम्-यह, लोकः लोक, अस्ति-है, -नहीं, परः-परलोक, -नहीं, सुख्खम् -सुख, संशयात्मनः-संशयालु का।

 

अनुवाद : अज्ञानी (विवेक रहित), श्रद्धा रहित, संशय युक्त व्यक्ति तो विनाश को ही प्राप्त होता है। संशय करने वाले के लिए तो यह लोक है, परलोक है और कहीं सुख ही है।

 

व्याख्या : आत्म-ज्ञान से शून्य व्यक्ति अज्ञानी है, श्रद्धारहित वह है जिसे तो अपनी आत्मा में विश्वास है, शास्त्रों में, ही गुरु के उपदेशों में विश्वास है।

 

संशय युक्त व्यक्ति संसार में सर्वाधिक पापी है। उसकी दशा तो शोचनीय है। परलोक के विषय में भी वह तो शंका से पूर्ण है। संशय-बुद्धि होने के कारण वह इस लोक में प्रमुदित नहीं हो सकता। वह सुखी नहीं है।

 

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्

आत्मवन्तं कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।।४१ ।।

 

शब्दार्थ : योगसंन्यस्तकर्माणम् - जिसने योग की विधि से सारे कर्मों का त्याग कर दिया है, ज्ञानसंछिन्नसंशयम् - विवेक द्वारा जिसके संशय नष्ट हो चुके हैं, आत्मवन्तम् - आत्म-परायण, -नहीं, कर्माणि-कर्म, निबध्नन्ति-बाँधते हैं, धनञ्जय-हे धनञ्जय

 

अनुवाद : हे धनञ्जय (अर्जुन), जिसने योग-विधि से कर्मों से संन्यास ले लिया है, (आत्म) ज्ञान से जिसके संशय समाप्त हो गये हैं और जो आत्म-परायण हो गया है, उसे कर्म-बन्धन नहीं होता।

 

व्याख्या : मधुसूदन सरस्वती 'आत्मवन्तम्' का अर्थ 'सदा जागरूक' (always watchful) करते हैं।

 

आत्म-ज्ञानी योग-विधि से कर्मों का त्याग करता है अर्थात् समस्त कर्म परमात्मा को समर्पित कर के करता है। आत्म-तत्त्व का परमात्म-तत्त्व में एक होने का अनुभव प्राप्त कर लेने पर उसके समस्त संशय नष्ट हो जाते हैं। अब कर्म उसे बाँधते नहीं; क्योंकि वे ज्ञानाग्नि में दग्ध हो चुके हैं और अब वह सदा आत्म-जागृति में आनन्द लेता है। (निरूपण - II.48; III.9; IV.20)

 

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः

छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ।।४२ ।।

 

शब्दार्थ : तस्मात् - इसलिए, अज्ञानसंभूतम् - अज्ञान से उत्पन्न, हत्स्थम् -हृदय में निहित, ज्ञानासिना- ज्ञान की तलवार से, आत्मनः- आत्मा का, छित्त्वा काट कर, एनम्-इस, संशयम्सन्देह, योगम् - योग का, आतिष्ठ-शरण लो, उत्तिष्ठ-उठो, भारत- हे अर्जुन।

 

अनुवाद : इसलिए हे अर्जुन, उठो, योग की शरण लो और अज्ञानवश हृदय में उत्पन्न सन्देह को आत्म-ज्ञान की तलवार से छिन्न-भिन्न कर दो।

 

व्याख्या : संशय मानसिक पीड़ा को जन्म देता है। यह अत्यन्त पापी है। यह अज्ञान से उत्पन्न है। इसे ज्ञान रूपी खड्ग से निर्दयतापूर्वक मार डालो हे अर्जुन, अब उठो और युद्ध करो।

 

(यह अध्याय ज्ञानयोग, अभ्यासयोग अथवा ज्ञानकर्मसंन्यासयोग से भी अभिहित है।)

 

तत्सत् इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु

ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे

ज्ञानविभागयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ।।

।। इति ज्ञानविभागयोगः ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्री परमात्मने नमः

अथ पञ्चमोऽध्यायः

कर्मसंन्यासयोगः

 

अर्जुन उवाच

 

संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं शंससि

यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ।।१ ।।

 

शब्दार्थ : संन्यासम् -संन्यास, कर्मणाम् -कर्मों का, कृष्ण-हे कृष्ण, पुनः पुनः, योगम् योग, -और, शंससिप्रशंसा करते हो, यत्-जो, श्रेयः-कल्याणकारी, एतयो:- इन दोनों में, एकम् -एक, तत्-वह, मे-मुझे, ब्रूहि-बतायें, सुनिश्चितम् - निश्चित रूपेण

 

अर्जुन ने कहा

 

अनुवाद : हे कृष्ण, आप कर्मों के त्याग की प्रशंसा करते हैं और पुनः योग की प्रशंसा करते हैं। मुझे निश्चित रूप से बताएँ, इन दोनों में अधिक श्रेयस्कर क्या है।

 

व्याख्या : आप कर्मों के संन्यास का और फिर उनके अनुष्ठान का उपदेश करते हैं। इससे मैं भ्रमित हो रहा हूँ। दोनों में से जो अधिक श्रेयस्कर हो, वह मार्ग मुझे प्रशस्त करें। एक ही समय में दोनों का आश्रय लेना मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है। योग का अभिप्राय यहाँ कर्मयोग से है। (निरूपण - III.2)

 

श्री भगवानुवाच