श्रीमद्भगवद्गीता

भाग

 

 

 

अध्याय से १८ तक

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्रीमद्भगवद्गीता

भाग

(अध्याय से १८ तक)

 

मूल तथा अनुवाद सहित

श्रीअरविन्द की अंग्रेजी टीका के हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या सहित

 

अंग्रेजी टीका का संपादन

स्व. श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान

 

हिन्दी व्याख्या

चन्द्र प्रकाश खेतान

 

हिन्दी अनुवाद व्याख्या संपादन

पंकज बगड़िया

 

श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट झुंझुनू, राजस्थान

 

 

 

 

 

 

© श्रीअरविन्द आश्रम ट्रस्ट, २०१९

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशकः-

 

श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट

श्रीअरविन्द दिव्य जीवन आश्रम,

खेतान मोहल्ला

झुन्झुनू - ३३३००१, राजस्थान।

URL: www.sadlec.org www.resurgentindia.org

www.aurokart.com

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मुद्रकः- श्रीअरविन्द आश्रम प्रेस

पुदुच्चेरी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भगवान् श्रीकृष्ण को समर्पित

जिनकी कृपा से हमें

श्रीअरविन्द श्रीमाँ के चरण कमलों की

शरण प्राप्त हुई है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

संपादकीय नोट

 

यह पुस्तक स्वर्गीय श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान की अंग्रेजी पुस्तक ' भगवद् गीता' के हिन्दी रूपांतर के आधार पर श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट में हुए अध्ययन सत्रों के दौरान साधकों के बीच चर्चा-परिचर्चा, सहज अंतःस्फूर्णा तथा श्री चन्द्र प्रकाश जी खेतान के निजी आध्यात्मिक अनुभवों आदि के माध्यम से हुई श्रीअरविन्द श्रीमाँ के मूल शब्दों की व्याख्या का अभिलेख है। सत्रों के ध्वनिलेखों को भाषा में ढालने और उनकी एडिटिंग (संपादन), संशोधन आदि का कार्य सुश्री सुमन शर्मा श्री दीपक तुलस्यान की सहायता से संपादक द्वारा किया गया है। अनेक स्थानों पर चर्चा-परिचर्चा के दौरान श्रीमाँ-श्रीअरविन्द तथा योगी श्रीकृष्णप्रेम के संदर्भों का उल्लेख किया गया जिन्हें कि यहाँ मूल रूप से सम्मिलित कर लिया गया है जो कि पाठक के लिये पूरे विषय को अधिक स्पष्ट, सुगम और प्रभावी बना देते हैं। व्याख्या को मूल से भिन्न करने के लिए तिरछे अक्षरों (italics) में दिया गया है। प्रथम भाग में गीता के प्रथम सात अध्यायों को सम्मिलित किया गया है और इस भाग में शेष ग्यारह अध्यायों को सम्मिलित किया गया है।

 

पुस्तक में प्रस्तुत गीता पर टीका श्रीमाँ की कृतियों से लिये कुछ संदर्भों को छोड़कर शेष श्रीअरविन्द के शब्दों में है जिनकी संदर्भ सूची अंत में दी जा रही है। विचार में निरंतरता बनाए रखने के लिए कुछ स्थानों पर मूल संपादक श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान द्वारा कुछ शब्द या वाक्यांश जोड़े गए हैं जिन्हें वर्गाकार कोष्ठक में दिखाया गया है।

 

श्लोकों का अनुवाद तथा पुस्तक में दिये गये शीर्षक श्रीअरविन्द की पुस्तक 'ऐसेज ऑन गीता' पर आधारित हैं। अध्यायों के परंपरागत शीर्षक प्रत्येक अध्याय के अंत में दिये गये हैं। हासिये में दी गई संख्याएँ गीता के अध्याय श्लोक संख्या को दर्शाती हैं।

 

श्रीमाँ ने कहा है कि "श्रीअरविन्द गीता के संदेश को उस महान् आध्यात्मिक गति का आधार मानते हैं जो मानवजाति को अधिकाधिक उसकी मुक्ति की ओर, अर्थात् मिथ्यात्व और अज्ञान से निकलकर सत्य की ओर ले गई है, और आगे भी ले जाएगी। अपने प्रथम प्राकट्य के समय से ही गीता का अतिविशाल आध्यात्मिक प्रभाव रहा है; परंतु जो नवीन व्याख्या श्रीअरविन्द ने उसे प्रदान की है, उसके साथ ही उसकी प्रभावशालिता अत्यधिक

बढ़ गई है और निर्णायक बन गई है।"

 

वर्ष १९९२ में अपने प्रथम प्रकाशन के समय से ही ' भगवद्गीता' पुस्तक को पाठकों द्वारा खूब सराहा गया है। श्रीअरविन्द की अद्भुत टीका के ऊपर अब इस व्याख्या के आने से हम आशा करते हैं कि यह पुस्तक श्रीअरविन्द श्रीमाँ के आलोक में गीता को समझने, उसे व्यावहारिक रूप से जीवन में उतारने में पाठकों के लिए सहायक सिद्ध होगी।

- पंकज बगड़िया

विषय-सूची

 

 

आठवाँ अध्याय. 8

परम् ईश्वर. 8

नवाँ अध्याय. 29

I. राजगुह्य... 29

II. कर्म, भक्ति और ज्ञान. 48

दसवाँ अध्याय. 103

I. गीता का परम् वचन. 103

II. भगवान् की संभूतिशक्ति.... 123

ग्यारहवाँ अध्याय I. 144

विश्वरूपदर्शन संहारक काल. 144

II. विश्वपुरुष-दर्शन. 160

बारहवाँ अध्याय. 171

मार्ग और भक्त... 171

तेरहवाँ अध्याय. 186

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ.. 186

चौदहवाँ अध्याय. 221

गुणों से ऊपर. 221

पन्द्रहवाँ अध्याय. 252

तीन पुरुष. 252

सोलहवाँ अध्याय. 275

देव और असुर. 275

सत्रहवाँ अध्याय. 297

त्रिगुण, श्रद्धा, और कर्म. 297

अठारहवाँ अध्याय. 327

I. त्रिगुण, मन और कर्म. 327

II. स्वभाव और स्वधर्म. 348

III. परम् रहस्य की ओर. 386

IV. परम्-रहस्य... 396

परिशिष्ट.. 424

I. श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता और उनकी आध्यात्मिक यथार्थता.. 424

II. गीता तथा श्रीअरविन्द का संदेश. 430

संदर्भ सूची.. 432

श्रीकृष्ण के नाम उनके अर्थ. 440

अर्जुन के नाम उनके अर्थ. 444

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आठवाँ अध्याय

 परम् ईश्वर

 

[सातवें अध्याय के अन्तिम दो श्लोकों में] कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द आये हैं जो अपने संक्षेप रूप में जगत् में परम् ईश्वर के' आविर्भाव के प्रधान मूलभूत सत्यों को देते हैं। सभी कारणसंबंधी या उत्पत्तिसंबंधी (originative) और कार्य या प्रभावसंबंधी (effective) तत्त्व इसमें विद्यमान हैं, वे सब तत्त्व विद्यमान हैं जिनसे अपने समग्र आत्मज्ञान की ओर लौटने में जीव को प्रयोजन है। सबसे पहले है 'तद्ब्रह्म; दूसरा है 'अध्यात्म' अर्थात् प्रकृति में आत्मसत्ता का तत्त्व; इसके बाद 'अधिभूत' और 'अधिदैव' अर्थात् सत्ता के बाह्य या वस्तुनिष्ठ भाव तथा आंतरिक अथवा आत्मनिष्ठ भाव; और अंत में है 'अधियज्ञ' अर्थात् कर्म और यज्ञ के वैश्विक तत्त्व का रहस्य। यहाँ श्रीकृष्ण के कहने का आशय यह है कि इन सबके ऊपर जो 'मैं' 'पुरुषोत्तम' हूँ, उस मुझको इन सब में होकर और इन सबके परस्पर सम्बन्धों के द्वारा ढूँढ़ना और जानना होगा (मां विदुः), - यही उस मानव चेतना के लिए एकमात्र पूर्ण मार्ग है जो कि मेरे पास लौट आने का पथ खोज रही है। परन्तु अपने-आप में ये पारिभाषिक शब्द शुरू में सर्वथा स्पष्ट नहीं होते या कम-से-कम ये भिन्न-भिन्न व्याख्याओं के लिए खुले होते हैं; इसलिए उनके वास्तविक अभिप्राय को सटीक-सुनिश्चित बनाने की आवश्यकता होती है और एकाएक ही शिष्य अर्जुन उनके स्पष्टीकरण की माँग कर बैठता है।

 

अर्जुन उवाच

 

किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम

अधिभूतं किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ।। १।।

 

. अर्जुन ने कहा : हे पुरुषोत्तमा तद् ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, कर्म क्या है? और अधिभूत किसे कहा गया है, अधिदैव किसे कहा गया है?

 

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन

प्रयाणकाले कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ।। २।।

 

. हे मधुसूदना इस देह में अधियज्ञ क्या है? और भौतिक अस्तित्व से प्रयाण के संकटकाल में आत्मसंयत मनुष्य द्वारा किस प्रकार आप जाने जाते हो?

 

 

श्रीभगवान् उवाच

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते

भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ।। ३।।

 

. श्रीभगवान् ने कहाः अक्षर परम् ब्रह्म है; स्वभाव को अध्यात्म कहते हैं, सृजनात्मक प्रवृत्ति, विसर्ग; को कर्म की संज्ञा दी गई है जो समस्त भूतों को और उनके वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ भावों की उत्पत्ति करता है।

 

कृष्ण बहुत संक्षेप में इसका उत्तर देते हैं, - गीता कहीं भी किसी शुद्ध रूप से दार्शनिक व्याख्या पर बहुत अधिक देर तक नहीं ठहरती, वह उतनी ही बात और उसी ढंग से बतलाती है जो उनके सत्य को जीव के लिए ग्राह्य भर बना दे जो फिर तत्त्व को ग्रहण करके स्वानुभव की ओर आगे बढ़े। 'तद्ब्रह्म' से, जो कि ऐसा पद है जो उपनिषदों में लौकिक जीव के विपरीत ब्रह्मसत्ता या स्वयंभू सत्ता के लिए अनेक बार प्रयुक्त हुआ है, प्रतीत होता है कि गीता का अभिप्राय 'अक्षरं परमम्' अर्थात् उस अक्षर ब्रह्मसत्ता से है जो कि भगवान् की परम् आत्माभिव्यक्ति है और जिसकी अटल शाश्वतता पर शेष सभी कुछ, जो कुछ भी चल और विकसनशील है, आधारित है। अध्यात्म से इसका अभिप्राय है 'स्वभाव' अर्थात् परा प्रकृति में जीव की सत्ता का आत्मिक भाव और विधान। गीता कहती है कि 'कर्म' 'विसर्ग' का नाम है अर्थात् उस सृष्टि-प्रेरणा और शक्ति का जो इस आदि मूलगत 'स्वभाव' से सब चीजों को बाहर निकालती है और उस स्वभाव के ही प्रभाव से 'प्रकृति' में सब भूतों को उत्पत्ति, सृष्टि और पूर्णता साधित करती है।

 

यहाँ सब कुछ स्पष्ट कर दिया गया है। गीता जिस 'अक्षरं परमम्' का यहाँ उल्लेख करती है वह वह अक्षर पुरुष नहीं है जिसकी हम पूर्व में चर्चा कर आए हैं। जिस अक्षर की यहाँ बात है वह तो वह परम् अविनाशी सत्ता है जिसे हम परंब्रह्म आदि की संज्ञाएँ देते हैं जो कि सभी कुछ का आधार है। अक्षर के बाद है 'स्वभाव' हम पहले भी सतही भाव, स्वभाव और मद्भाव की चर्चा कर चुके हैं। प्रत्येक जीव के अंदर परा प्रकृति जिस विशिष्ट चीज की अभिव्यक्ति करना चाहती है वह उसका 'स्वभाव' है। हालाँकि बाहरी प्रकृति में जो अनेकानेक प्रकार की वृत्तियाँ होती हैं वे इस स्वभाव से भिन्न हैं। परंतु व्यक्ति का जो सच्चा स्वभाव है, जिसके नियत कर्म किये जाने पर गीता बल देती है और जिस पर भारतीय संस्कृति में भी सदा ही बल दिया जाता रहा है, उसे ही 'अध्यात्म' कहते हैं। अध्यात्म के बाद आता है 'कर्म' अर्थात् सहज रूप से स्वभाव के द्वारा नियत की हुई मन, प्राण और शरीर की क्रियाएँ। कर्म केवल शरीर से ही नहीं किये जाते अपितु मानसिक क्रियाकलाप, प्राणिक भावनाएँ और आवेग आदि भी कर्म ही हैं। स्वभाव और स्वभाव नियत कर्म के विषय में तथा किस प्रकार भारतीय संस्कृति में उसके आधार पर वर्णाश्रम व्यवस्था आदि का निर्माण किया गया उसकी विशद चर्चा हम पहले कर ही चुके हैं।

 

प्रश्न : धर्म क्या है?

 

उत्तर : धर्म तो बहुत सापेक्ष चीज है और यह व्यक्ति के आंतर्बाह्य विकास की अवस्था पर निर्भर करता है कि उसके लिए उपयुक्त धर्म क्या है। हालाँकि अंतर्निहित स्वभाव तो वही होगा परंतु विकास की अवस्था के अनुसार धर्म भिन्न-भिन्न होगा। ब्राह्मण के लिए एक प्रकार का धर्म है। परंतु उसी ब्राह्मण के लिए संकटकाल में धर्म बदल जाता है। इसलिए स्वभाव तो एक मूलभूत चीज है जिसका कि धर्म के द्वारा निरूपण करने का प्रयास किया जाता है क्योंकि धर्मों के द्वारा स्वभाव की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं होती इसीलिए गीता सभी धर्मों को त्याग देने और भगवान् की शरण ग्रहण करने का उपदेश करती है। पहले सभी प्रकार के ऊँचे से ऊँचे धर्मों का भी निरूपण करने के बाद, साधना, समर्पण, भक्ति आदि के धर्मों का भी निरूपण करने के बाद गीता इन सभी को छोड़कर भगवान् की शरण में जाने को कहती है। क्योंकि किसी भी धर्म के द्वारा व्यक्ति स्वभाव से ऊपर नहीं उठ सकता। और 'मद्भाव' में तो व्यक्ति प्रभु के साथ एकत्व होने पर ही जा सकता है।

 

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्वाधिदैवतम्

अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ।। ४।।

 

. हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! अधिभूत क्षर भाव है, और अधिदैव पुरुष (प्रकृतिस्थ आत्मा) है; इस देह में यज्ञ, अधियज्ञ, का प्रभु मैं स्वयं ही हूँ।

 

'अधिभूत' से तात्पर्य है 'क्षर भाव' अर्थात् परिवर्तन की क्रिया के समस्त परिणाम। 'अधिदैव' से अभिप्रेत है पुरुष, प्रकृतिस्थ आत्मा अर्थात् वह आत्मनिष्ठ (subjective) सत्ता जो अपनी मूलसत्ता के समूचे क्षरभाव को, जो प्रकृति में कर्म के द्वारा साधित हुआ करता है, अपनी चेतना के विषय-रूप से देखता और भोग करता है। 'अधियज्ञ' से, भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि, 'मैं' स्वयं अभिप्रेत हूँ – 'मैं' अर्थात् अखिल कर्म और यज्ञ के प्रभु, भगवान् परमेश्वर, पुरुषोत्तम जो यहाँ इन सब देहधारियों के शरीर में गुप्त रूप से विराजमान हैं। अतः जो कुछ है सब इसी एक सूत्र में जाता है।

 

....यहाँ जगत् की प्रणाली (विसर्ग) के संबंध में गीता का भाव दर्शाया गया है। इस क्रम में सर्वप्रथम ब्रह्म अर्थात् परम् अक्षर स्वतःसिद्ध ब्रह्मसत्ता है; देश, काल और निमित्त में होनेवाले विश्वप्रकृति के खेल के पीछे सभी भूत यह ब्रह्म ही हैं। क्योंकि उस ब्रह्मसत्ता से ही देश, काल और निमित्त अस्तित्वमान रह पाते हैं और उस अपरिवर्तनीय सर्वव्यापी परन्तु फिर भी अविभाज्य आश्रय के बिना देश, काल और निमित्त अपने विभाग, परिणाम और मान निर्माण करने में प्रवृत्त नहीं हो सकते। परन्तु अक्षर ब्रह्म स्वयं कुछ नहीं करता, किसी कार्य का कारण नहीं होता, किसी बात का विधान नहीं करता; वह निष्पक्ष, सम और सर्वालंबनकारी है, परंतु वह चुनाव या आरम्भ नहीं करता। तो फिर वह क्या है जो उत्पन्न करता है, विधान करता है, और परम् प्रभु की वह दिव्य प्रेरणा प्रदान करता है? वह क्या है जो कर्म का नियामक है और जो शाश्वत सत्ता में से 'काल' के अन्दर इस विश्वलीला को सक्रिय रूप से प्रकट करता है? यह 'स्वभाव' रूप से प्रकृति है। परम्, परमेश्वर, पुरुषोत्तम अपनी सत्ता से उपस्थित हैं और वे ही अपनी सनातन अक्षर सत्ता के आधार पर अपनी परा आत्मशक्ति के कार्य को धारण करते हैं। वे अपनी भागवती सत्ता, चेतना, संकल्प या शक्ति को प्रकट करते हैं, ययेदं धार्यते जगत्: वही परा प्रकृति है। इस परा प्रकृति के अंदर आत्मा की आत्मचेतना, आत्मज्ञान के प्रकाश में गतिशील या ऊर्जस्वी विचार को, वह जिस किसी भी चीज को अपनी सत्ता में अलग करती है और उसे स्वभाव - अर्थात् जीव की आध्यात्मिक प्रकृति - में अभिव्यक्त करती है, उसके यथार्थ सत्य को देखती है। जो प्रत्येक जीव का अंतर्निहित सत्य और आत्मतत्त्व है, जो अपने-आप को अभिव्यक्ति में लाता है, जो सबके अंदर निहित वह मूलभूत भागवत् प्रकृति है जो सब प्रकार के परिवर्तनों, विपर्ययों और पुनरावर्तनों के पीछे सदा बनी रहती है, वही स्वभाव है। स्वभाव में जो कुछ है वह उसमें से विश्व-प्रकृति में छोड़ दिया जाता है ताकि विश्वप्रकृति पुरुषोत्तम की आंतरिक दृष्टि की देख-रेख में उससे जो कर सकती हो करे। इस सतत् स्वभाव में से, प्रत्येक संभूति की मूल प्रकृति और उसके मूल आत्मतत्त्व में से भिन्न-भिन्न भेदों का निर्माण करके यह विश्वप्रकृति उसके द्वारा उस स्वभाव को अभिव्यक्त करने का प्रयास करती है। वह अपने इन सब परिवर्तनों को नाम और रूप, काल और देश तथा देश-काल के अन्दर एक अवस्था से दूसरी अवस्था के उत्पन्न होने का जो क्रम है जिसे हम लोग कारणता, 'निमित्त', कहते हैं, उसे खोलकर प्रकट किया करती है।

 

अतः, वास्तव में तो कोई कार्य-कारण नहीं है। मूलभूत कारण तो केवल जगदम्बा का संकल्प है बाकी सब तो निमित्त ही है। उदाहरण के लिए यदि हमें अमुक जगह जाना हो तो जो भी मार्ग उसके लिए हम अपनाते हैं वे निमित्त बन जाते हैं। परंतु हम उस मार्ग विशेष से बाध्य नहीं हो जाते बल्कि दूसरे मार्ग भी अपना सकते हैं। वैसे ही यदि हमें बैठना हो तो हम किसी एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं तो वह कुर्सी निमित्त बन गई। इसमें भी हम किसी कुर्सी विशेष पर बैठने को बाध्य नहीं हैं। इसी प्रकार भागवती प्रकृति का संकल्प ही है जो मूल कारण है और अपनी अभिव्यक्ति के लिए वह जिन साधनों और माध्यमों को काम में लेती हैं वे सब निमित्त बन जाते हैं। इसीलिए भगवान् अर्जुन को कहते हैं 'निमित्तमात्रं भव' क्योंकि जो होना है वह तो भागवती शक्ति द्वारा पहले ही किया जा चुका है। अर्जुन को तो उसका केवल निमित्त बनना है। और यदि वह सहर्ष निमित्त नहीं बनता तो या तो किसी अन्य को निमित्त बना लिया जाएगा या फिर परिस्थितियों की बाध्यकारी शक्ति के द्वारा अवश रूप से उसे ही निमित्त बनना पड़ेगा परंतु, भगवान् कहते हैं कि, ऐसा करने में कोई आध्यात्मिक श्रेय नहीं होता। कहने का अर्थ है कि निमित्त अपने आप में उस क्रिया का कारण नहीं है। यह कहना अयुक्तियुक्त होगा कि किसी मार्ग के कारण व्यक्ति किसी अमुक स्थान पर जाएगा या फिर किसी कुर्सी के कारण वह बैठेगा या फिर किसी साधन के कारण कोई कार्य करेगा। साधन को तो वह अपने कार्य के संकल्प को पूरा करने के लिए काम में ले सकता है।

 

xi.33

 

यहाँ स्वभाव के संबंध में जो बातें आईं हैं उनका इससे पहले गीता में निरूपण नहीं हुआ था। हमारे कर्म की नियामक बाहरी प्रकृति नहीं है। किसी भी व्यक्ति के साथ जो कुछ भी घटित होता है उसके पीछे कभी भी दूसरे लोगों की इच्छा अथवा अन्य कोई बाहरी कारण नहीं होते। वास्तव में तो व्यक्ति के साथ जो कुछ भी घटित होता है वह उसके स्वभाव के अनुसार ही होता है। क्योंकि भले ही बाहरी रूप से मनुष्यों के अंदर कुछ चीजें समान हों परंतु प्रत्येक मनुष्य अपने अलग आत्मनिष्ठ जगत् में निवास करता है। हालाँकि अन्तरात्मा में सभी एक हैं परंतु स्वभाव में सभी का पृथक् गठन होने के कारण सभी अपने अलग ही जगत् में निवास करते हैं। प्रकृति भी हमारे स्वभाव की अभिव्यक्ति के अनुसार कार्य करती है। अपने आप में बाहरी प्रकृति हमारा कुछ नहीं कर सकती। और हमारे लिए कर्म भी तभी लाभकारी होते हैं जब वे स्वभाव के अनुकूल हों अर्थात् स्वभाव नियत कर्म हों। उदाहरण के लिये यदि कोई व्यक्ति किसी रोगी के लिए दवाई लाने बाजार जाए तो उसका कर्म स्वभाव नियत तब होगा जब वह सही जगह जाकर और सही दवाई लेकर आए। वहीं, यदि वह बाजार की चकाचौंध में ही मुग्ध हो जाए या फिर किसी परिचित से निरर्थक बातचीत में लग जाए या फिर अन्य किसी ऐसे काम में लग जाए जो उसके लक्ष्य के प्रतिकूल हो, तो यह कर्म लाभकारी या उचित नहीं हुआ। इसीलिए स्वभाव नियत कर्म पर गीता इतना अधिक बल देती है और हमारी संस्कृति में भी इस पर अतिशय बल दिया जाता रहा है, क्योंकि स्वभाव नियत कर्म के द्वारा व्यक्ति सीधे उसी लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है जिसके लिए वह इस अभिव्यक्ति में आया है। परंतु हमारे वर्तमान अज्ञानमय और अवचेतन जीवन में हमें अपने स्वभाव का सचेतन बोध ही नहीं होता इसलिए हमारे कर्म सचेतन रूप से उसके अनुकूल नहीं होते। इस चीज की गंभीरता को समझते हुए ही हमारी संस्कृति में हमारे ऋषियों ने ऐसी व्यवस्था की अपरिहार्यता अनुभव की जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को शीघ्रातिशीघ्र उसके स्वभाव के प्रति सचेतन बना दिया जाए और साथ ही उसके अनुकूल कर्म करने की सहायता प्रदान की जाए ताकि वह अपने सच्चे स्वभाव को अधिकाधिक अभिव्यक्त कर सके जिसके लिए कि वह इस अभिव्यक्ति में आया है।

 

वास्तव में तो परा प्रकृति ही स्वभाव रूप से जीव में विराजमान हैं और वे ही उसे उसके स्वभाव के अनुरूप आगे ले जा रही हैं परंतु अचेतन रूप से आगे बढ़ने में कोई आनंद की अनुभूति नहीं होती। इसीलिए हमारी संस्कृति का सदा ही सारा प्रयास इस ओर रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति यथाशीघ्र अपने स्वभाव को जान जाए और सचेतन रूप से उसकी ओर आगे बढ़े। और वास्तव में तो व्यक्ति को अपने स्वभाव का पता ही भगवान् की सीधी प्रेरणा से या फिर सद्गुरु के प्राप्त होने पर चलता है। और जब व्यक्ति अपने स्वभाव के प्रति, अपने अंदर जो परमात्मा का अंश है उसके प्रति सचेतन हो जाता है तब वह अपने कर्म उसकी अभिव्यक्ति के अनुरूप करता है। अन्यथा तो वह सदा ही शंकित रहता है कि कहीं उसके कर्म गुणों से प्रभावित तो नहीं हैं। और जब तक उसके कर्म गुणों से प्रभावित रहते हैं तब तक स्वभाव नियत कर्म नहीं किये जा सकते।

 

प्रश्न : हम कहते हैं कि व्यक्ति को अपने स्वभाव के प्रति सचेतन होना होगा और अपने सतही भाव से स्वभाव की ओर जाना होगा। परंतु यह बाहरी भाव भी तो परमात्मा का ही दिया हुआ है। तो इसका क्या औचित्य है कि वे इस सतही भाव को केवल इससे बाहर निकलने के लिये ही हमारे ऊपर लादते हैं?

 

उत्तर : वास्तव में तो किसी चीज का क्या औचित्य है यह तो सच्चे रूप से केवल परमात्मा ही जानते हैं। परंतु अवश्य ही पहले तो यह कहना अयुक्तियुक्त है कि परमात्मा हमारे ऊपर इस सतही प्रकृति या भाव को लादते हैं क्योंकि यदि वे ऐसा करते हों तो ऐसा वे स्वयं अपने आप के साथ ही तो करते हैं। उनके अतिरिक्त अन्य किसी की सत्ता तो है ही नहीं। केवल अहंबोध के कारण ही हमें यह तथ्य दिखाई नहीं देता। दूसरे, यह कहना भी असंगत बात है कि चूंकि परमात्मा ने ही यह माया फैलायी है अतः हमें इसमें से निकलने का प्रयास करना ही क्यों चाहिये। क्योंकि इसके साथ ही उन्होंने इसमें से निकलने के तरीके भी तो बता रखे हैं और जो कोई भी वास्तव में इससे निकलना चाहता है उसके लिए सभी साधन जुटा देने का विधान भी बना रखा है। परंतु अधिकांशतः हम इस अयुक्तियुक्त तर्क में फंस कर निरर्थक दलीलें देने लगते हैं कि जब माया भगवान् की ही रची हुई है तो हमें इससे निकलने का प्रयास क्यों करना चाहिये। पर हम भूल जाते हैं कि ऐसी कोई चीज नहीं है जो परमात्मा से उद्भूत होती हो। माया से निकलने का सुझाव तरीके भी तो परमात्मा से ही उद्भूत हैं। इन सबके साथ ही हमें सही-गलत का भेद करने का विवेक भी तो परमात्मा ने ही दे रखा है, इसलिए हमें अपने चयन करने होते हैं। भले सभी कुछ परमात्मा ने ही बनाया है, परंतु उन्हीं परमात्मा ने हमें बुद्धि, विवेक आदि भेद करने की शक्तियाँ भी प्रदान की हैं ताकि उनका उपयोग कर जो सही हो उसका हम वरण कर रहे हैं ऐसी प्रतीति हमें हो सके। यदि हमें ऐसी प्रतीति हो तो पार्थिव जीवन में चेतना के विकास का वर्तमान ढाँचा कार्य नहीं करेगा। जीवन में सब विभ्रम की स्थिति पैदा हो जाएगी। इसे हम इस रूप में देख सकते हैं कि यह एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक पाठशाला है जहाँ अनेकानेक प्रलोभन की चीजें हमारे सम्मुख प्रस्तुत की जाती हैं परंतु हमें इन प्रलोभनों से बचते हुए अपने अंतर्निहित स्वभाव के अनुसार सही चीजों का वरण करना होता है। इसे हम लीला कह सकते हैं, आत्मा का विकास कह सकते हैं, यज्ञ का आरोहण कह सकते हैं। अब इसमें यह तर्क देना गलत होगा कि चूंकि प्रलोभन के साधन भगवान् के ही भेजे हुए हैं तो उनमें लिप्त हो जाना सही है। हो सकता है कि वे साधन किसी अन्य व्यक्ति के लिए लाभदायक हों क्योंकि यदि वे निरर्थक ही होते तब तो इस अभिव्यक्ति में उनका अस्तित्व ही नहीं होता। परंतु इसका यह अर्थ नहीं निकलता कि सभी कुछ ही हमारे लिए उपयोगी है। हमें तो सदा अपने आंतरिक गठन के अनुसार और उसके दृष्टिकोण से चयन करना ही होगा। बहुत से लोगों को हम यह कहते सुनते हैं कि आखिर अमुक काम तो करना अच्छा ही है, या फिर पांडिचेरी स्थित श्रीअरविन्द आश्रम में जाना तो हमेशा अच्छा ही है, या फिर अन्य ऐसी ही कोई चीज करना तो अच्छा ही है। परंतु यदि ये सभी चीजें सभी के लिए सदा ही अच्छी होतीं तो भगवान् स्वयं भी वैसी व्यवस्था कर सकते थे, उनकी ऐसी कोई असमर्थता नहीं है कि वे सभी को वह अच्छी चीज प्रदान नहीं कर सकते थे। परंतु प्रत्येक का गठन भिन्न है और इस कारण उसके लिए चीजों का महत्त्व और उपयोगिता भी बिल्कुल भिन्न होती है। इसलिए किसी एक के लिए अमृततुल्य वस्तु किसी दूसरे के लिए विष समान हो सकती है और जो आज हमारे लिए विषतुल्य है वही अन्य किसी काल में हमारे लिए अमृततुल्य हो सकती है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने सदा ही देश-काल-पात्र का मूल मंत्र अपनाया और उसी के आधार पर वे निर्णय किया करते थे। इसलिए भगवान् जहाँ माया के फंदे में फँसाते हैं वहाँ वे उससे निकलने के लिए योग का विधान भी तो देते हैं। इसीलिये तो स्वभाव नियत कर्म की महत्ता है। यदि चयन का विधान होता तब तो नियत कर्म या फिर अनियत कर्म का तो कोई विकल्प ही नहीं बचता। स्वभाव नियत कर्म का अर्थ यही है कि व्यक्ति सचेतन रूप से उन कर्मों का चयन करता है जो उसके अंदर परम प्रभु की होने वाली विशिष्ट अभिव्यक्ति की ओर ले जाते हैं। हालाँकि अंततः व्यक्ति पहुँचता तो उसी गंतव्य पर है परंतु साधारण जीवन बड़े ही टेढ़े-मेढ़े मार्गों से होकर वहाँ तक जाता है, वहीं श्रीमाताजी कहती हैं कि योग मार्ग सीधे ही गंतव्य तक ले जाता है। भौतिक रूप से तो हम इस बात के बेतुकेपन को समझते हैं कि चूंकि सभी मार्ग भगवान् के ही बनाए हुए हैं इसलिए हमें दाएँ या बाएँ मुड़ने में भेदभाव नहीं करना चाहिये और समान भाव अपनाकर जिस किसी में भी मुड़ जाना चाहिये। कोई स्थूल व्यक्ति भी यह समझता है कि ऐसा करने से तो व्यक्ति कभी भी अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाएगा, परंतु जब यही बात आध्यात्मिक मार्गों पर लागू की जाती है, जो कि अनंतविध हैं, अनंतस्तरीय हैं तब हम इस तर्क को इस पर लागू करने से चूक जाते हैं।

 

प्रश्न : भगवान् कहते हैं कि अधियज्ञ का प्रभु मैं स्वयं हूँ। तब अक्षर परमं और अधियज्ञ में अंतर क्या है?

 

उत्तर : वास्तव में परम सत्ता तो अपने आप में एक ही है और कहीं कोई भेद नहीं है। परंतु उनके भिन्न भावों के निरूपण के लिए भिन्न पदों का प्रयोग होता है। 'अधियज्ञ' से अभिप्रेत है अखिल कर्म और यज्ञ के प्रभु, भगवान् परमेश्वर, पुरुषोत्तम जो यहाँ इन सब देहधारियों के शरीर में गुप्त रूप से विराजमान हैं। यह सारी सृष्टि एक प्रकार का यज्ञ ही है और जिस कारण से यह यज्ञ है और परमात्मा के जिस स्रष्टा भाव को यह चरितार्थ करता है उसे अधियज्ञ कहते हैं। और परमात्मा का वह भाव जो इस सृष्टि क्रम में भाग नहीं लेता, अप्रत्यक्ष रूप से इसे केवल अवलंब प्रदान करता है उसे अक्षर परमं की संज्ञा दी जाती है। मूल रूप से दोनों भाव उसी एक परम सत्ता के ही हैं।

 

प्रश्न : इस वाक्य का क्या अर्थ है, "जो प्रत्येक जीव का अंतर्निहित सत्य और आत्मतत्त्व है, जो अपने-आप को अभिव्यक्ति में लाता है, जो सबके अंदर निहित वह मूलभूत भागवत् प्रकृति है जो सब प्रकार के परिवर्तनों, विपर्ययों और पुनरावर्तनों के पीछे सदा बनी रहती है, वही स्वभाव है।"

 

उत्तर : परमात्मा जब कोई व्यक्तित्व धारण कर अपनी कोई एक क्रियाविशेष तथा अपनी एक अभिव्यक्ति विशेष करना चाहते हैं तो उस अभिव्यक्ति का सारा प्रारूप ही स्वभाव है। प्रकृति उस प्रारूप को चरितार्थ करने के लिए आवश्यक साधन जुटाती है। स्वभाव को समझने के लिए हम उसकी तुलना किसी भवन के प्रारूप से, उसकी रूपरेखा से कर सकते हैं। अब उस रूपरेखा के आधार पर इंजीनियर सामान एकत्रित करता है। भले ही बाजार में अनेकों प्रकार की अन्य चीजें भी उपलब्ध हों परंतु वह उन्हीं का चयन करता है जो उस रूपरेखा के अनुकूल हों। उसी प्रकार भगवान् की अभिव्यक्ति की यह रूपरेखा, जो कि स्वभाव है, विश्व-प्रकृति के पास आती है और वह उसे चरितार्थ करने के लिए सभी आवश्यक साधन जुटाने का कार्य करती है। इसीलिए अंतर्निहित स्वभाव ही सबसे प्रभावी चीज है। स्वभाव नियत कर्म इसीलिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यों तो असंख्यों प्रकार के कर्म हैं परंतु व्यक्ति किन का चयन करे यह तो उसे उसके स्वभाव से ही पता लग सकता है और उस व्यक्ति के लिए वे ही सच्चे कर्म होते हैं।

 

यह सब उत्पत्ति तथा एक स्थिति से दूसरी स्थिति में निरंतर परिवर्तन ही कर्म, प्रकृति का कार्य है, उस प्रकृति की ऊर्जा है जो कर्मकर्ती है और सब क्रिया-प्रणालियों की ईश्वरी है। प्रथमतः यह स्वभाव का अपने को सृष्टिकर्म में डाल देना है, इसी को विसर्ग कहते हैं। यह सृष्टिकर्म भूतों को उत्पन्न करनेवाला, भूतकरः, है और यह सृष्टिकर्म ये भूत आत्मनिष्ठ रूप से अथवा अन्य प्रकार से जो कुछ बनते हैं उसे भी उत्पन्न करनेवाला, भावकरः, है। सब मिलकर, यह काल के अन्दर पदार्थों की सतत् उत्पत्ति या 'उद्भव' है जिसका मूलतत्त्व कर्म की सृजनात्मक ऊर्जा है। यह सारा क्षरभाव अर्थात् 'अधिभूत' प्रकृति की शक्तियों के सम्मिलन से निकल कर आता है, यह अधिभूत ही जगत् है और जीव की चेतना का विषय है। इस सब में जीव ही प्रकृतिस्थ भोक्ता और साक्षीभूत देवता है; बुद्धि, मन और इंद्रियों की जो दिव्य शक्तियाँ हैं, जीव की चेतन सत्ता की जो समस्त शक्तियाँ हैं जिनके द्वारा यह प्रकृति की इस क्रिया को प्रतिबिंबित करता है, इसके 'अधिदैव' अर्थात् अधिष्ठातृदेवता हैं। यह प्रकृतिस्थ जीव ही इस तरह क्षर पुरुष है, भगवान् का नित्य कर्म-स्वरूप हैः यही जीव प्रकृति से ब्रह्म में लौटकर अक्षर पुरुष, भगवान् का नित्य नैष्कर्म्य-स्वरूप, होता है। परंतु क्षर पुरुष के रूप और शरीर में परम् पुरुष भगवान् ही निवास करते हैं। अक्षरभाव की अचल शान्ति और क्षरभाव के कर्म का आनन्द दोनों ही भाव एक साथ अपने अन्दर रखते हुए भगवान् पुरुषोत्तम मनुष्य के अन्दर निवास करते हैं। वे हमसे दूर परे किसी परम् पद पर ही स्थित नहीं हैं, अपितु वे यहाँ प्रत्येक प्राणी के शरीर में, मनुष्य के हृदय में और प्रकृति में भी विद्यमान हैं जहाँ वे प्रकृति के कर्मों को यज्ञरूप से ग्रहण करते हैं और मानव जीव के सचेतन आत्म-दान की प्रतीक्षा करते हैंः परन्तु हर हालत में, मनुष्य की अज्ञानावस्था और अहंकारिता में भी वे ही उसके स्वभाव के स्वामी और उसके सब कर्मों के प्रभु होते हैं, जो प्रकृति और कर्म विधान पर अधिष्ठातृत्व करते हैं। उन्हीं से निकलकर जीव प्रकृति की इस क्षर-क्रीड़ा में आता है और अक्षर आत्मसत्ता से होता हुआ उन्हीं के परम धाम को प्रास होता है।

 

इस संक्षिप्त विवरण के तुरंत बाद गीता ज्ञान द्वारा परम मोक्ष के विचार के विवेचन की ओर अग्रसर होती है जिसका निर्देश पूर्वाध्याय के अन्तिम श्लोक में गीता ने किया है।

 

इस प्रकार गीता में हम विश्व के निर्माण के अनेक तरीके के वर्णन पाते हैं। वेदों में भी हम इसका एक भिन्न वर्णन पाते हैं। वेदों में वर्णन मिलता है कि शब्द से सारी सृष्टि उत्पन्न होती है। परंतु यह सारा विषय बिना अनुभव के समझ में नहीं सकता। व्यक्ति को इसका जितना ही अधिक अनुभव होगा उतनी ही अच्छी तरह वह इसे समझ सकेगा। आखिर, इस सारी सृष्टि के विषय में हम सचेतन कैसे होते हैं? हमारी इंद्रियाँ अपनी सूचना मनस् के पास भेजती हैं जहाँ सारा प्रतिबिंब बनता है। मनस् इस सारी सूचना के साथ अपने स्वयं के बोधों को जोड़कर बुद्धि के पास भेजता है। वहाँ सारा दृश्य तैयार होता है और वहीं से क्रिया-प्रतिक्रिया का निर्णय आता है। इसलिए हमारे अंदर जो मनोवैज्ञानिक तथा आत्मपरक शक्तियाँ हैं उन्हीं के प्रभाव से हमें यह सृष्टि ऐसी प्रतीत होती है। इन्हीं शक्तियों को अधिदैव कहते हैं। वास्तव में अपने आप में ऐसी कोई सृष्टि है ही नहीं। स्वयं सांख्यशास्त्र भी इसका वर्णन करते हुए हमें यह दर्शाता है कि हमारे गठन के कारण ही हमें इस प्रकार की सृष्टि दिखाई देती है। अपने आप में इसका कोई पृथक् अस्तित्व नहीं है। इसी सृष्टि को भिन्न-भिन्न जीव भिन्न-भिन्न रूप में देखते हैं। वहीं यदि किसी जीव का गठन सर्वथा भिन्न प्रकार का होगा तो उसे तो इस सृष्टि का भान एकदम भिन्न प्रकार से होगा और इसी कारण उसकी चेतना के लिए वे नियम बाध्यकारी नहीं होंगे जो हमारे लिए होते हैं। इसलिए जैसा प्रारूप प्रभु ने हमारे अंदर निहित कर रखा है वैसा ही हमें अपनी मनोवैज्ञानिक शक्तियों की सहायता से प्रतीत होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जगत् में अकेले ही निवास करता है, उसमें कोई दूसरा नहीं रहता। अवश्य ही व्यक्ति एक ऐसी चेतना में भी प्रवेश कर सकता है जहाँ उसे यह अनुभव हो कि सभी शरीरों में स्वयं वही विद्यमान है। जब तक हम इंद्रियों आदि के द्वारा बँधे होते हैं तब तक हमें दृश्य जगत् की भौतिक यथार्थता पर बहुत अधिक आग्रह रहता है। परंतु जैसे-जैसे व्यक्ति अपनी गहराइयों में प्रवेश करने लगता है, वैसे-वैसे उसका यह भ्रम टूटता जाता है। इसीलिए चमत्कार संभव हैं क्योंकि वास्तव में तो सारी संरचना ही मनोवैज्ञानिक है। ऐसी कोई भौतिक चीज तो कुछ है ही नहीं जो कि नमनीय हो। इसलिए सारी मनोवैज्ञानिक संरचना भगवान् के उस विशिष्ट भाव के अनुसार होती है जो वे प्रत्येक जीवविशेष के अंदर भिन्न-भिन्न रूप से प्रकट करना चाहते हैं। इसी कारण जीव के लिए सच्ची समझदारी तो इसी में है कि वह उस विशिष्ट भाव के प्रति सचेतन हो और अधिकाधिक उसी के अनुरूप कार्य करे। इसी को चेतना का विकास कहते हैं जिसमें व्यक्ति अधिकाधिक भीतर के उस भाव के संपर्क में आता जाता है और उसी के द्वारा अपने समस्त क्रियाकलाप को निर्धारित करता है। इस रहस्य को भली-भाँति जानने के कारण ही भारतीय संस्कृति का सारा ध्यान इसी पर था कि किस प्रकार यथाशीघ्र प्रत्येक जीव को उसके उस अंतर्निहित भाव के संपर्क में लाया जाए क्योंकि एक बार उसके संपर्क में आने पर स्वतः ही वह उसके अनुसार अपने सारे क्रियाकलाप स्वभाव नियत रूप से करने लगेगा और तब किसी भी प्रकार के बाहरी विधान की आवश्यकता मंद होती जाएगी अन्त में - जब पूर्ण रूपांतर साधित हो जाएगा तब - आवश्यकता ही नहीं रहेगी।

 

सारा खेल ही चेतना का है। जब सारा दृश्य भीतर से प्रक्षिप्त हो रहा है तब बाहरी दृश्य से विचलित होने की मूलतः तो कोई आवश्यकता हो नहीं है। और चूँकि सब कुछ भीतर ही है तो केवल बाहरी अन्वेषण-विश्लेषण से कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला है। इसीलिए श्रीअरविन्द ने कहा कि, "अतिचेतन ही वस्तुओं का सच्चा आधार है, कि अवचेतन। कमल का यथार्थ महत्त्व उस कीचड़ के रहस्यों का विश्लेषण करने से नहीं मिलेगा जिसमें से वह यहाँ उगता है; उसका रहस्य तो कमल के उस दिव्य आदिरूप में मिलेगा जो नित्य ही ऊपर प्रकाश में कुसुमित होता है।"* अब जब हम इस दृष्टिकोण से देखते हैं तब जाकर हमें समझ में आता है कि सत्य को खोजने का विज्ञान का तरीका तो सर्वथा उल्टा है। चीजों को सच्चे रूप में केवल चेतना के द्वारा ही समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए भले हम अपने किसी पालतू पशु को पूरे अमरीका की सैर करा लाएँ फिर भी वह वहाँ का क्या वर्णन कर सकता है? वहीं, कोई समझदार व्यक्ति वहाँ की एक झलक मात्र पाने के बाद भी हमें वहाँ की कुछ सूचना अवश्य दे सकता है। इस चीज को समझे बिना यदि कोई केवल जड़ भौतिक तत्त्व के आधार पर सत्य तक पहुँचने का प्रयास करे तो यह सर्वथा निरर्थक होगा। इस संदर्भ में विज्ञान के विषय में श्रीअरविन्द की यह उक्ति अत्यंत प्रकाशक है, "यदि तुम भागवत् यथार्थता या सद्वस्तु को चूक जाओ या उसकी उपेक्षा कर दो तो चीजों का कोई मूलभूत सार नहीं रह जाता; क्योंकि तुम कामचलाऊ और उपयोग करने योग्य ऊपरी दिखावे की अतिविशाल सतही परत में धँसे रहते हो। तुम दिव्य जादूगर के जादू का विश्लेषण करने की कोशिश कर रहे हो, परंतु जब तुम स्वयं जादूगर की चेतना में प्रवेश करते हो केवल तभी तुम लीला के सच्चे उद्गम, उसके अर्थ और उसके घेरों का अनुभव करना शुरू करते हो। मैं कहता हूँ 'शुरू करते हो' क्योंकि दिव्य सद्वस्तु इतनी सरल नहीं है कि पहले ही स्पर्श में तुम उसका सब कुछ जान लो या उसे किसी एक ही सूत्र में डाल दो; यह तो स्वयं अनंत है और तुम्हारे समक्ष एक अनंत ज्ञान को खोलता है जिसके आगे सारा विज्ञान कुल मिलाकर भी एक तुच्छ-सी वस्तु है।" (CWSA 28, 332) इसलिए सच्चा सार इसी में है कि व्यक्ति अपने भीतर जाए, चेतना का विकास करे, अपने सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार करे और उसी को अभिव्यक्त करे। केवल ऐसा करने से ही व्यक्ति को सच्चा सुख, सच्ची परिपूर्णता प्राप्त हो सकती है अन्यथा निजस्वरूप से भिन्न रूप में जीने से तो किसी भी प्रकार की सच्ची परिपूर्णता कभी मिल ही नहीं सकती। इसीलिए श्रीअरविन्द कहते हैं, "दिव्य जीवन की ओर आरोहण ही मानव यात्रा है, कर्मों का 'कर्म' और स्वीकार करने योग्य 'यज्ञ' है। यही जगत् में मनुष्य का एकमात्र वास्तविक कार्य तथा उसके अस्तित्व का औचित्य है, जिसके बिना वह भौतिक ब्रह्माण्ड की भयंकर विशालताओं के बीच सतही कीचड़ पानी के संयोग से अपने-आप बने एक छोटे-से कण - पृथ्वी - पर अन्य क्षणभंगुर कीटों के बीच एक रेंगता हुआ कीट मात्र ही रहेगा।" (CWSA 21, 48)

 

अन्तकाले मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्

यः प्रयाति मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ।। ५।।

 

. और जो मनुष्य अपने जीवन के अंत समय में केवल मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़ कर प्रयाण करता है, वह मेरे भाव को प्राप्त होता है; इसमें कोई संशय नहीं है।

 

यं यं वापि स्मरन्मावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ।। ६।।

 

. हे कौन्तेय! जो कोई मनुष्य अन्त समय में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़ता है, वह उस ही भाव को प्राप्त होता है जिस भाव में वह जीव अपने भौतिक जीवनकाल में निरंतर आंतरिक रूप से बढ़ रहा था।

 

मनुष्य संसार में जन्म लेकर प्रकृति और कर्म की क्रिया में लोक-परलोक के चक्कर काटता रहता है। प्रकृति में स्थित पुरुष - यही उसका सूत्र होता है: उसके अंदर उसकी आत्मा जो कुछ सोचती, मनन करती और कर्म करती है, वह सदा वही बन जाता है। वह जो कुछ पहले रहा है उसी ने उसके वर्तमान जन्म को निर्धारित किया है; और जो कुछ वह है, जो कुछ वह सोचता और इस जीवन में अपनी मृत्यु के क्षण तक करता रहता है वही निश्चित करता है कि वह मृत्यु के बाद परलोकों में और अपने भावी जीवनों में क्या बनेगा। जन्म यदि 'होना' है तो मृत्यु भी एक 'होना' ही है, किसी भी प्रकार यह समाप्ति नहीं है। शरीर छूट जाता है, परंतु जीव, 'त्यक्त्वा कलेवरम्' शरीर को छोड़कर अपने रास्ते पर आगे बढ़ता है। अतः बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि अपने प्रयाण के संधि-क्षण में वह क्या होता है। क्योंकि मृत्यु के समय संभूति के जिस भी रूप पर उसकी चेतना स्थिर होती है और मृत्यु के पूर्व जिसमें उसकी मन-बुद्धि सदा तन्मय रहती आयी है उसी रूप को वह अवश्य प्राप्त होता है; क्योंकि प्रकृति कर्म के द्वारा जीव के सब विचारों और वृत्तियों को ही कार्यान्वित किया करती है और वास्तव में यही प्रकृति का सारा कार्य-व्यापार है। इसलिए मनुष्य में स्थित जीव यदि पुरुषोत्तम-पद लाभ करना चाहता है तो उसके लिए दो आवश्यकताएँ हैं, वह संभव हो सके उससे पूर्व दो शर्तों का पूरा किया जाना आवश्यक है। एक यह कि इस पार्थिव जीवन में रहते हुए उसने अपना संपूर्ण आंतरिक जीवन उसी आदर्श की दिशा में गढ़ा हो; और दूसरी यह कि प्रयाण-काल में उसकी अभीप्सा और संकल्प उस आदर्श के प्रति सच्चे बने रहें।

 

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Sri Aurobindo to Dilip, Vol.1, 2003, p.189, Hari Krishna Mandir Trust. Pune, and Mira Aditi, Mysore

 

 

प्रश्न : इसमें बताया गया है कि मृत्यु के समय व्यक्ति की चेतना जिस भी चीज पर स्थिर होती है वह उसी रूप को प्राप्त होता है। तब फिर व्यक्ति के पूरे जीवन-काल में उसने जो कुछ भी क्रिया-कलाप किया, क्या उसका कोई महत्त्व नहीं?

 

उत्तर : सामान्यतः तो व्यक्ति अपने पूरे जीवन-काल में जो भी सोचता या जिस भी चेतना में रहता है, अंतिम समय में भी उसकी चेतना उन्हीं चीजों में फँसी रहती है। परन्तु ऐसा भी हो सकता है कि व्यक्ति अपने जीवन-काल में जो सोचता या जिस चेतना में रहता है, उससे भिन्न या विपरीत कोई चीज उसके अंतिम क्षणों में जाए, और ऐसे में वही प्रभावी होगी। उदाहरण के लिए अजामिल, जिसने कि अपने जीवन-काल में कोई सत्कर्म नहीं किया था और ही वह कभी भगवान् का स्मरण ही करता था, परन्तु अपने अंतिम क्षणों में उसने अपने पुत्र नारायण का नाम पुकारा। ऐसा उसने एकाग्र होकर भगवान् को स्मरण कर के नहीं किया क्योंकि उसे तो भगवान् से कोई सरोकार नहीं था, उसने तो मोहवश अपने पुत्र का नाम पुकारा था। परन्तु फिर भी भगवान् के पार्षद उसे लेने आए और उसे सद्गति की प्राप्ति हई। विरले ही लोगों के अंतिम क्षणों में भगवान् का नाम उनके मुख पर आता है।

 

प्रश्न : यदि अंत समय में किसी व्यक्ति की दुर्घटना से मृत्यु हो जाती है तो उसकी क्या गति होती है?

 

उत्तर : सामान्यतः तो ऐसे व्यक्तियों की कोई अच्छी गति नहीं होती, हालाँकि व्यक्ति की अंतरात्मा का, उसके चैत्य पुरुष का कभी कुछ नहीं बिगड़ता। यहाँ जिस बारे में बताया जा रहा है वह सब तो प्राणिक सत्ता के साथ होता है। जब अंतरात्मा ने एक बार मनुष्य शरीर धारण कर लिया है तब वह उस अवस्था से नीचे नहीं गिर सकती और ही उसकी कभी कोई दुर्दशा हो सकती है क्योंकि वह तो भगवान् का अंश है, जिसमें प्रकाश ही प्रकाश है। जिस प्रकार सूर्य जहाँ होता है वहाँ प्रकाश ही प्रकाश फैलता है, अंधकार उसे नहीं दबा सकता, उसी प्रकार अंतरात्मा का भी कभी कुछ नहीं बिगड़ सकता।

 

प्रश्न : अंत समय में यदि कोई बीमारी से ग्रस्त हो तो वह तो अपनी बीमारी में ही त्रस्त रहेगा, उसी पर केन्द्रित रहेगा। उसे तो भगवान् का स्मरण हो ही कैसे सकता है?

 

उत्तर : इसीलिए तो यहाँ कह रहे हैं कि यदि व्यक्ति अपने जीवन-काल में साधना नहीं करता और परमात्मा को याद नहीं करता तो अंतिम क्षणों में उसको परमात्मा की याद बनी रहना लगभग असंभव है। फिर भी यदि किसी कारण से या संयोगवश परमात्मा की याद जाए - जिसकी कि संभावना बहुत कम होती है - तो वह बहुत कारगर होती है। परन्तु यदि जीवनपर्यंत व्यक्ति साधना करता है तो अंतिम क्षणों में भगवान् का स्मरण होना एक निश्चिति हो जाती है।

 

प्रश्न : क्या प्राण छूटते ही आत्मा दूसरा शरीर धारण कर लेती है?

 

उत्तर : श्रीमाताजी के अनुसार सामान्य तौर पर चैत्य पुरुष जितना ही अधिक विकसित होता है उतना ही अधिक समय वह दूसरा जन्म ग्रहण करने में लेता है क्योंकि शरीर में रहते समय चैत्य जितने ही अधिक अनुभव ग्रहण करता है उसके बाद उतना ही समय उसे उन्हें आत्मसात् करने में लगता है। यदि चैत्य पुरुष अभी अधिक विकसित नहीं है तव तो शरीर त्याग के बाद उसका पुनर्जन्म जल्दी ही हो जाता है। श्रीमाताजी के अनुसार ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जहाँ मृत्यु के बाद वह उसी परिवार में पुनः जन्म ग्रहण कर लेता है। परंतु यह क्षेत्र या यह विषय इतना विस्तृत है कि किन्हीं सीधे-सादे नियमों में इसे नहीं बाँधा जा सकता।

 

मनुष्य जब से पैदा होता है तब से उसके मन, प्राण और शरीर की दीवारें आत्मा के सामने आकर खड़ी हो जाती हैं इसलिए व्यक्ति के सचेतन होते ही जीवन का एक ही उद्देश्य रह जाता है और वह है उन दीवारों को तोड़ना। परन्तु हमारे बाहरी भागों को इसमें कोई रुचि नहीं होती कि वे दीवारें टूटें क्योंकि इनके पीछे जो तामसिक शक्तियाँ कार्य करती हैं वे कभी नहीं चाहतीं कि कोई प्रकाश जाए और अंधकार में चलती उनकी क्रियाकलाप में कोई व्यवधान पड़े, इसलिए वे इसका विरोध करती हैं। अब जैसे किसी नाबालिग राजा के मंत्री जो अपनी मनमानी करते हैं वे कभी नहीं चाहेंगे कि वह राजा बालिग हो और उन पर अंकुश लगाए और शासन करे, वैसे ही ये शक्तियाँ भी नहीं चाहतीं कि आत्मा को धरती पर अभिव्यक्त होने का मौका मिले अन्यथा उनका निरंकुश खेल तो खत्म ही हो जाएगा। इसीलिए साधना इतनी कठिन होती है। परन्तु इसका लाभ यह है कि व्यक्ति इन शक्तियों के खेल को धीरे-धीरे समझ जाता है और तब वह अधिकाधिक आत्मा की शक्ति को अभिव्यक्ति प्रदान कर इन शक्तियों के ऊपर प्रभुत्व प्राप्त करना सीख जाता है और अंततोगत्वा अन्धकार की शक्तियों उनके क्रियाकलाप के पीछे भी जो भागवत् सत्य छिपा हुआ है उसे आत्मसात् कर पाता है।

 

गीता इस प्रसंग में मृत्यु के समय के विचार और मनःस्थिति पर बड़ा महत्त्व देती है, एक ऐसा महत्त्व जिसे समझना हमारे लिए बहुत कठिन होगा यदि हम उस चीज को स्वीकार करते हों जिसे चेतना की आत्म-सृजनात्मक शक्ति कहा जा सकता है। हमारा विचार, हमारी आंतरिक दृष्टि, हमारी श्रद्धा जिस बात पर पूर्ण और सुनिश्चित बल के साथ अपने-आप को सुस्थिर करती है, उसी (के स्वरूप) में हमारी आंतरिक सत्ता परिवर्तित होने लगती है। यह प्रवृत्ति तब एक निर्णायक शक्ति बन जाती है जब हम उन उच्चतर आध्यात्मिक और आत्म-विकसित अनुभवों को प्राप्त होते हैं जो बाह्य पदार्थों पर उतने निर्भर नहीं होते जितनी कि बाह्य प्रकृति के वशीभूत होने के कारण हमारी सामान्य मनोवृत्ति हुआ करती है। वहाँ हम अपने-आप को स्थिरतापूर्वक वह बनते हुए देख सकते हैं जिस पर हम अपने मन को स्थिर रखते हैं और जिसकी हम निरंतर अभीप्सा करते हैं। इसलिए वहाँ अपने विचार का थोड़ी देर के लिए भी छूट जाना, स्मरण में जरा-सी भी अशुद्धता के जाने का अर्थ है इस परिवर्तन की प्रक्रिया में एक गतिरोध या फिर इस परिवर्तन-क्रिया से पतन और हम जो पहले थे उसी की ओर पीछे लौटना, ऐसी आशंका तब तक रहती है जब तक कि कम-से-कम हमने अपने नवीन भाव को काफी हद तक और अटल रूप से स्थापित अथवा सुदृढ़ कर लिया हो। जब हमने यह कर लिया हो, जब हमने उसे सामान्य अनुभव बना लिया हो तब उसकी स्मृति स्वतःविद्यमान रूप से रहती है, क्योंकि अब वह हमारी चेतना का ही स्वाभाविक रूप होती है। मर्त्य जगत् से प्रयाण करने के संधि-क्षण में हमारी चेतना की तात्कालिक स्थिति का महत्त्व इससे स्पष्ट हो जाता है। परंतु यह कोई मरण-शय्या पर किया गया स्मरण नहीं है जो हमारी संपूर्ण जीवनधारा से और हमारी पूर्व मनःस्थिति से बेमेल हो या फिर जिसकी इनके द्वारा अधूरी तैयारी हुई हो। ऐसे स्मरण के अंदर कोई उद्धारक शक्ति नहीं हो सकती। यहाँ गीता का जो विचार है वह प्रचलित धर्म की रियायतों और सुविधाओं के ही समान नहीं है; इसका इन सनकों से कोई सरोकार नहीं है कि एक पूरा अपवित्र सांसारिक जीवन बिताने के बाद पादरी के द्वारा अंत में सर्वप्रायश्चित करा लेने से ही ईसाई मरण-काल में पावन हो जाता है अथवा पहले से ही ध्यान रखकर या अकस्मात् पवित्र काशीधाम में या पवित्र गंगा के तट पर मर जाने से और अंत में पंडित द्वारा अंतिम-क्रियाएँ कराने से मुक्ति मिल जाती है, गीता के अनुसार यह मोक्ष की कोई पर्याप्त प्रणाली नहीं है। जिस दिव्य भाव पर मन को प्रयाणकाल में अचल रूप से स्थिर करना होता है, 'यं स्मरन् भावं त्यजति अन्ते कलेवरम्', वह तो वही भाव होना चाहिए जिसकी ओर जीव अपने सांसारिक जीवन में प्रतिक्षण आगे बढ़ता रहा हो, सदातद्भावभावितः।

 

अंत समय के स्मरण का ही एक उदाहरण देते हुए श्रीमाताजी ने बताया कि श्रीअरविन्द आश्रम के ही एक साधक ने कुछ धार्मिक पुस्तकें आदि पढ़ रखी थीं और उसमें आए स्वर्गों आदि के वर्णन से वह प्रभावित था। इसलिए मृत्यु के उपरान्त वह ऐसे ही किसी एक मनोनिर्मित स्वर्ग में पहुँच गया। चूंकि श्रीमाताजी तो जानती थीं कि ऐसे स्वर्ग आदि की केवल सापेक्ष वास्तविकता ही होती है इसलिए वे उसे उसमें से निकाल कर किसी सत्यतर जगत् में ले जाना चाह रही थीं। परंतु वह व्यक्ति उस स्वर्ग की चकाचौंध से इतना प्रभावित था कि श्रीमाताजी को उसे उस जगत् की सापेक्षता समझाकर वहाँ से निकालने में लगभग एक वर्ष का समय लग गया। जब श्रीमाताजी इस उदाहरण का उल्लेख कर रही थीं तो किसी ने पूछा कि आखिर ये जगत् कितने वास्तविक हैं। तब उन्होंने उत्तर दिया कि ये जगत् अधिक वास्तविक तो नहीं हैं परंतु वर्तमान में