श्रीमद्भगवद्गीता

भाग

 

 

 

अध्याय से १८ तक

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्रीमद्भगवद्गीता

भाग

(अध्याय से १८ तक)

 

मूल तथा अनुवाद सहित

श्रीअरविन्द की अंग्रेजी टीका के हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या सहित

 

अंग्रेजी टीका का संपादन

स्व. श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान

 

हिन्दी व्याख्या

चन्द्र प्रकाश खेतान

 

हिन्दी अनुवाद व्याख्या संपादन

पंकज बगड़िया

 

श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट झुंझुनू, राजस्थान

 

 

 

 

 

 

© श्रीअरविन्द आश्रम ट्रस्ट, २०१९

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशकः-

 

श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट

श्रीअरविन्द दिव्य जीवन आश्रम,

खेतान मोहल्ला

झुन्झुनू - ३३३००१, राजस्थान।

URL: www.sadlec.org www.resurgentindia.org

www.aurokart.com

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मुद्रकः- श्रीअरविन्द आश्रम प्रेस

पुदुच्चेरी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भगवान् श्रीकृष्ण को समर्पित

जिनकी कृपा से हमें

श्रीअरविन्द श्रीमाँ के चरण कमलों की

शरण प्राप्त हुई है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

संपादकीय नोट

 

यह पुस्तक स्वर्गीय श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान की अंग्रेजी पुस्तक ' भगवद् गीता' के हिन्दी रूपांतर के आधार पर श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट में हुए अध्ययन सत्रों के दौरान साधकों के बीच चर्चा-परिचर्चा, सहज अंतःस्फूर्णा तथा श्री चन्द्र प्रकाश जी खेतान के निजी आध्यात्मिक अनुभवों आदि के माध्यम से हुई श्रीअरविन्द श्रीमाँ के मूल शब्दों की व्याख्या का अभिलेख है। सत्रों के ध्वनिलेखों को भाषा में ढालने और उनकी एडिटिंग (संपादन), संशोधन आदि का कार्य सुश्री सुमन शर्मा श्री दीपक तुलस्यान की सहायता से संपादक द्वारा किया गया है। अनेक स्थानों पर चर्चा-परिचर्चा के दौरान श्रीमाँ-श्रीअरविन्द तथा योगी श्रीकृष्णप्रेम के संदर्भों का उल्लेख किया गया जिन्हें कि यहाँ मूल रूप से सम्मिलित कर लिया गया है जो कि पाठक के लिये पूरे विषय को अधिक स्पष्ट, सुगम और प्रभावी बना देते हैं। व्याख्या को मूल से भिन्न करने के लिए तिरछे अक्षरों (italics) में दिया गया है। प्रथम भाग में गीता के प्रथम सात अध्यायों को सम्मिलित किया गया है और इस भाग में शेष ग्यारह अध्यायों को सम्मिलित किया गया है।

 

पुस्तक में प्रस्तुत गीता पर टीका श्रीमाँ की कृतियों से लिये कुछ संदर्भों को छोड़कर शेष श्रीअरविन्द के शब्दों में है जिनकी संदर्भ सूची अंत में दी जा रही है। विचार में निरंतरता बनाए रखने के लिए कुछ स्थानों पर मूल संपादक श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान द्वारा कुछ शब्द या वाक्यांश जोड़े गए हैं जिन्हें वर्गाकार कोष्ठक में दिखाया गया है।

 

श्लोकों का अनुवाद तथा पुस्तक में दिये गये शीर्षक श्रीअरविन्द की पुस्तक 'ऐसेज ऑन गीता' पर आधारित हैं। अध्यायों के परंपरागत शीर्षक प्रत्येक अध्याय के अंत में दिये गये हैं। हासिये में दी गई संख्याएँ गीता के अध्याय श्लोक संख्या को दर्शाती हैं।

 

श्रीमाँ ने कहा है कि "श्रीअरविन्द गीता के संदेश को उस महान् आध्यात्मिक गति का आधार मानते हैं जो मानवजाति को अधिकाधिक उसकी मुक्ति की ओर, अर्थात् मिथ्यात्व और अज्ञान से निकलकर सत्य की ओर ले गई है, और आगे भी ले जाएगी। अपने प्रथम प्राकट्य के समय से ही गीता का अतिविशाल आध्यात्मिक प्रभाव रहा है; परंतु जो नवीन व्याख्या श्रीअरविन्द ने उसे प्रदान की है, उसके साथ ही उसकी प्रभावशालिता अत्यधिक

बढ़ गई है और निर्णायक बन गई है।"

 

वर्ष १९९२ में अपने प्रथम प्रकाशन के समय से ही ' भगवद्गीता' पुस्तक को पाठकों द्वारा खूब सराहा गया है। श्रीअरविन्द की अद्भुत टीका के ऊपर अब इस व्याख्या के आने से हम आशा करते हैं कि यह पुस्तक श्रीअरविन्द श्रीमाँ के आलोक में गीता को समझने, उसे व्यावहारिक रूप से जीवन में उतारने में पाठकों के लिए सहायक सिद्ध होगी।

- पंकज बगड़िया

विषय-सूची

 

 

आठवाँ अध्याय. 8

परम् ईश्वर. 8

नवाँ अध्याय. 29

I. राजगुह्य... 29

II. कर्म, भक्ति और ज्ञान. 48

दसवाँ अध्याय. 103

I. गीता का परम् वचन. 103

II. भगवान् की संभूतिशक्ति.... 123

ग्यारहवाँ अध्याय I. 144

विश्वरूपदर्शन संहारक काल. 144

II. विश्वपुरुष-दर्शन. 160

बारहवाँ अध्याय. 171

मार्ग और भक्त... 171

तेरहवाँ अध्याय. 186

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ.. 186

चौदहवाँ अध्याय. 221

गुणों से ऊपर. 221

पन्द्रहवाँ अध्याय. 252

तीन पुरुष. 252

सोलहवाँ अध्याय. 275

देव और असुर. 275

सत्रहवाँ अध्याय. 297

त्रिगुण, श्रद्धा, और कर्म. 297

अठारहवाँ अध्याय. 327

I. त्रिगुण, मन और कर्म. 327

II. स्वभाव और स्वधर्म. 348

III. परम् रहस्य की ओर. 386

IV. परम्-रहस्य... 396

परिशिष्ट.. 424

I. श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता और उनकी आध्यात्मिक यथार्थता.. 424

II. गीता तथा श्रीअरविन्द का संदेश. 430

संदर्भ सूची.. 432

श्रीकृष्ण के नाम उनके अर्थ. 440

अर्जुन के नाम उनके अर्थ. 444

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आठवाँ अध्याय

 परम् ईश्वर

 

[सातवें अध्याय के अन्तिम दो श्लोकों में] कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द आये हैं जो अपने संक्षेप रूप में जगत् में परम् ईश्वर के' आविर्भाव के प्रधान मूलभूत सत्यों को देते हैं। सभी कारणसंबंधी या उत्पत्तिसंबंधी (originative) और कार्य या प्रभावसंबंधी (effective) तत्त्व इसमें विद्यमान हैं, वे सब तत्त्व विद्यमान हैं जिनसे अपने समग्र आत्मज्ञान की ओर लौटने में जीव को प्रयोजन है। सबसे पहले है 'तद्ब्रह्म; दूसरा है 'अध्यात्म' अर्थात् प्रकृति में आत्मसत्ता का तत्त्व; इसके बाद 'अधिभूत' और 'अधिदैव' अर्थात् सत्ता के बाह्य या वस्तुनिष्ठ भाव तथा आंतरिक अथवा आत्मनिष्ठ भाव; और अंत में है 'अधियज्ञ' अर्थात् कर्म और यज्ञ के वैश्विक तत्त्व का रहस्य। यहाँ श्रीकृष्ण के कहने का आशय यह है कि इन सबके ऊपर जो 'मैं' 'पुरुषोत्तम' हूँ, उस मुझको इन सब में होकर और इन सबके परस्पर सम्बन्धों के द्वारा ढूँढ़ना और जानना होगा (मां विदुः), - यही उस मानव चेतना के लिए एकमात्र पूर्ण मार्ग है जो कि मेरे पास लौट आने का पथ खोज रही है। परन्तु अपने-आप में ये पारिभाषिक शब्द शुरू में सर्वथा स्पष्ट नहीं होते या कम-से-कम ये भिन्न-भिन्न व्याख्याओं के लिए खुले होते हैं; इसलिए उनके वास्तविक अभिप्राय को सटीक-सुनिश्चित बनाने की आवश्यकता होती है और एकाएक ही शिष्य अर्जुन उनके स्पष्टीकरण की माँग कर बैठता है।

 

अर्जुन उवाच

 

किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम

अधिभूतं किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ।। १।।

 

. अर्जुन ने कहा : हे पुरुषोत्तमा तद् ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, कर्म क्या है? और अधिभूत किसे कहा गया है, अधिदैव किसे कहा गया है?

 

अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन

प्रयाणकाले कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ।। २।।

 

. हे मधुसूदना इस देह में अधियज्ञ क्या है? और भौतिक अस्तित्व से प्रयाण के संकटकाल में आत्मसंयत मनुष्य द्वारा किस प्रकार आप जाने जाते हो?

 

 

श्रीभगवान् उवाच

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते

भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ।। ३।।

 

. श्रीभगवान् ने कहाः अक्षर परम् ब्रह्म है; स्वभाव को अध्यात्म कहते हैं, सृजनात्मक प्रवृत्ति, विसर्ग; को कर्म की संज्ञा दी गई है जो समस्त भूतों को और उनके वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ भावों की उत्पत्ति करता है।

 

कृष्ण बहुत संक्षेप में इसका उत्तर देते हैं, - गीता कहीं भी किसी शुद्ध रूप से दार्शनिक व्याख्या पर बहुत अधिक देर तक नहीं ठहरती, वह उतनी ही बात और उसी ढंग से बतलाती है जो उनके सत्य को जीव के लिए ग्राह्य भर बना दे जो फिर तत्त्व को ग्रहण करके स्वानुभव की ओर आगे बढ़े। 'तद्ब्रह्म' से, जो कि ऐसा पद है जो उपनिषदों में लौकिक जीव के विपरीत ब्रह्मसत्ता या स्वयंभू सत्ता के लिए अनेक बार प्रयुक्त हुआ है, प्रतीत होता है कि गीता का अभिप्राय 'अक्षरं परमम्' अर्थात् उस अक्षर ब्रह्मसत्ता से है जो कि भगवान् की परम् आत्माभिव्यक्ति है और जिसकी अटल शाश्वतता पर शेष सभी कुछ, जो कुछ भी चल और विकसनशील है, आधारित है। अध्यात्म से इसका अभिप्राय है 'स्वभाव' अर्थात् परा प्रकृति में जीव की सत्ता का आत्मिक भाव और विधान। गीता कहती है कि 'कर्म' 'विसर्ग' का नाम है अर्थात् उस सृष्टि-प्रेरणा और शक्ति का जो इस आदि मूलगत 'स्वभाव' से सब चीजों को बाहर निकालती है और उस स्वभाव के ही प्रभाव से 'प्रकृति' में सब भूतों को उत्पत्ति, सृष्टि और पूर्णता साधित करती है।

 

यहाँ सब कुछ स्पष्ट कर दिया गया है। गीता जिस 'अक्षरं परमम्' का यहाँ उल्लेख करती है वह वह अक्षर पुरुष नहीं है जिसकी हम पूर्व में चर्चा कर आए हैं। जिस अक्षर की यहाँ बात है वह तो वह परम् अविनाशी सत्ता है जिसे हम परंब्रह्म आदि की संज्ञाएँ देते हैं जो कि सभी कुछ का आधार है। अक्षर के बाद है 'स्वभाव' हम पहले भी सतही भाव, स्वभाव और मद्भाव की चर्चा कर चुके हैं। प्रत्येक जीव के अंदर परा प्रकृति जिस विशिष्ट चीज की अभिव्यक्ति करना चाहती है वह उसका 'स्वभाव' है। हालाँकि बाहरी प्रकृति में जो अनेकानेक प्रकार की वृत्तियाँ होती हैं वे इस स्वभाव से भिन्न हैं। परंतु व्यक्ति का जो सच्चा स्वभाव है, जिसके नियत कर्म किये जाने पर गीता बल देती है और जिस पर भारतीय संस्कृति में भी सदा ही बल दिया जाता रहा है, उसे ही 'अध्यात्म' कहते हैं। अध्यात्म के बाद आता है 'कर्म' अर्थात् सहज रूप से स्वभाव के द्वारा नियत की हुई मन, प्राण और शरीर की क्रियाएँ। कर्म केवल शरीर से ही नहीं किये जाते अपितु मानसिक क्रियाकलाप, प्राणिक भावनाएँ और आवेग आदि भी कर्म ही हैं। स्वभाव और स्वभाव नियत कर्म के विषय में तथा किस प्रकार भारतीय संस्कृति में उसके आधार पर वर्णाश्रम व्यवस्था आदि का निर्माण किया गया उसकी विशद चर्चा हम पहले कर ही चुके हैं।

 

प्रश्न : धर्म क्या है?

 

उत्तर : धर्म तो बहुत सापेक्ष चीज है और यह व्यक्ति के आंतर्बाह्य विकास की अवस्था पर निर्भर करता है कि उसके लिए उपयुक्त धर्म क्या है। हालाँकि अंतर्निहित स्वभाव तो वही होगा परंतु विकास की अवस्था के अनुसार धर्म भिन्न-भिन्न होगा। ब्राह्मण के लिए एक प्रकार का धर्म है। परंतु उसी ब्राह्मण के लिए संकटकाल में धर्म बदल जाता है। इसलिए स्वभाव तो एक मूलभूत चीज है जिसका कि धर्म के द्वारा निरूपण करने का प्रयास किया जाता है क्योंकि धर्मों के द्वारा स्वभाव की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं होती इसीलिए गीता सभी धर्मों को त्याग देने और भगवान् की शरण ग्रहण करने का उपदेश करती है। पहले सभी प्रकार के ऊँचे से ऊँचे धर्मों का भी निरूपण करने के बाद, साधना, समर्पण, भक्ति आदि के धर्मों का भी निरूपण करने के बाद गीता इन सभी को छोड़कर भगवान् की शरण में जाने को कहती है। क्योंकि किसी भी धर्म के द्वारा व्यक्ति स्वभाव से ऊपर नहीं उठ सकता। और 'मद्भाव' में तो व्यक्ति प्रभु के साथ एकत्व होने पर ही जा सकता है।

 

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्वाधिदैवतम्

अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ।। ४।।

 

. हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! अधिभूत क्षर भाव है, और अधिदैव पुरुष (प्रकृतिस्थ आत्मा) है; इस देह में यज्ञ, अधियज्ञ, का प्रभु मैं स्वयं ही हूँ।

 

'अधिभूत' से तात्पर्य है 'क्षर भाव' अर्थात् परिवर्तन की क्रिया के समस्त परिणाम। 'अधिदैव' से अभिप्रेत है पुरुष, प्रकृतिस्थ आत्मा अर्थात् वह आत्मनिष्ठ (subjective) सत्ता जो अपनी मूलसत्ता के समूचे क्षरभाव को, जो प्रकृति में कर्म के द्वारा साधित हुआ करता है, अपनी चेतना के विषय-रूप से देखता और भोग करता है। 'अधियज्ञ' से, भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि, 'मैं' स्वयं अभिप्रेत हूँ – 'मैं' अर्थात् अखिल कर्म और यज्ञ के प्रभु, भगवान् परमेश्वर, पुरुषोत्तम जो यहाँ इन सब देहधारियों के शरीर में गुप्त रूप से विराजमान हैं। अतः जो कुछ है सब इसी एक सूत्र में जाता है।

 

....यहाँ जगत् की प्रणाली (विसर्ग) के संबंध में गीता का भाव दर्शाया गया है। इस क्रम में सर्वप्रथम ब्रह्म अर्थात् परम् अक्षर स्वतःसिद्ध ब्रह्मसत्ता है; देश, काल और निमित्त में होनेवाले विश्वप्रकृति के खेल के पीछे सभी भूत यह ब्रह्म ही हैं। क्योंकि उस ब्रह्मसत्ता से ही देश, काल और निमित्त अस्तित्वमान रह पाते हैं और उस अपरिवर्तनीय सर्वव्यापी परन्तु फिर भी अविभाज्य आश्रय के बिना देश, काल और निमित्त अपने विभाग, परिणाम और मान निर्माण करने में प्रवृत्त नहीं हो सकते। परन्तु अक्षर ब्रह्म स्वयं कुछ नहीं करता, किसी कार्य का कारण नहीं होता, किसी बात का विधान नहीं करता; वह निष्पक्ष, सम और सर्वालंबनकारी है, परंतु वह चुनाव या आरम्भ नहीं करता। तो फिर वह क्या है जो उत्पन्न करता है, विधान करता है, और परम् प्रभु की वह दिव्य प्रेरणा प्रदान करता है? वह क्या है जो कर्म का नियामक है और जो शाश्वत सत्ता में से 'काल' के अन्दर इस विश्वलीला को सक्रिय रूप से प्रकट करता है? यह 'स्वभाव' रूप से प्रकृति है। परम्, परमेश्वर, पुरुषोत्तम अपनी सत्ता से उपस्थित हैं और वे ही अपनी सनातन अक्षर सत्ता के आधार पर अपनी परा आत्मशक्ति के कार्य को धारण करते हैं। वे अपनी भागवती सत्ता, चेतना, संकल्प या शक्ति को प्रकट करते हैं, ययेदं धार्यते जगत्: वही परा प्रकृति है। इस परा प्रकृति के अंदर आत्मा की आत्मचेतना, आत्मज्ञान के प्रकाश में गतिशील या ऊर्जस्वी विचार को, वह जिस किसी भी चीज को अपनी सत्ता में अलग करती है और उसे स्वभाव - अर्थात् जीव की आध्यात्मिक प्रकृति - में अभिव्यक्त करती है, उसके यथार्थ सत्य को देखती है। जो प्रत्येक जीव का अंतर्निहित सत्य और आत्मतत्त्व है, जो अपने-आप को अभिव्यक्ति में लाता है, जो सबके अंदर निहित वह मूलभूत भागवत् प्रकृति है जो सब प्रकार के परिवर्तनों, विपर्ययों और पुनरावर्तनों के पीछे सदा बनी रहती है, वही स्वभाव है। स्वभाव में जो कुछ है वह उसमें से विश्व-प्रकृति में छोड़ दिया जाता है ताकि विश्वप्रकृति पुरुषोत्तम की आंतरिक दृष्टि की देख-रेख में उससे जो कर सकती हो करे। इस सतत् स्वभाव में से, प्रत्येक संभूति की मूल प्रकृति और उसके मूल आत्मतत्त्व में से भिन्न-भिन्न भेदों का निर्माण करके यह विश्वप्रकृति उसके द्वारा उस स्वभाव को अभिव्यक्त करने का प्रयास करती है। वह अपने इन सब परिवर्तनों को नाम और रूप, काल और देश तथा देश-काल के अन्दर एक अवस्था से दूसरी अवस्था के उत्पन्न होने का जो क्रम है जिसे हम लोग कारणता, 'निमित्त', कहते हैं, उसे खोलकर प्रकट किया करती है।

 

अतः, वास्तव में तो कोई कार्य-कारण नहीं है। मूलभूत कारण तो केवल जगदम्बा का संकल्प है बाकी सब तो निमित्त ही है। उदाहरण के लिए यदि हमें अमुक जगह जाना हो तो जो भी मार्ग उसके लिए हम अपनाते हैं वे निमित्त बन जाते हैं। परंतु हम उस मार्ग विशेष से बाध्य नहीं हो जाते बल्कि दूसरे मार्ग भी अपना सकते हैं। वैसे ही यदि हमें बैठना हो तो हम किसी एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं तो वह कुर्सी निमित्त बन गई। इसमें भी हम किसी कुर्सी विशेष पर बैठने को बाध्य नहीं हैं। इसी प्रकार भागवती प्रकृति का संकल्प ही है जो मूल कारण है और अपनी अभिव्यक्ति के लिए वह जिन साधनों और माध्यमों को काम में लेती हैं वे सब निमित्त बन जाते हैं। इसीलिए भगवान् अर्जुन को कहते हैं 'निमित्तमात्रं भव' क्योंकि जो होना है वह तो भागवती शक्ति द्वारा पहले ही किया जा चुका है। अर्जुन को तो उसका केवल निमित्त बनना है। और यदि वह सहर्ष निमित्त नहीं बनता तो या तो किसी अन्य को निमित्त बना लिया जाएगा या फिर परिस्थितियों की बाध्यकारी शक्ति के द्वारा अवश रूप से उसे ही निमित्त बनना पड़ेगा परंतु, भगवान् कहते हैं कि, ऐसा करने में कोई आध्यात्मिक श्रेय नहीं होता। कहने का अर्थ है कि निमित्त अपने आप में उस क्रिया का कारण नहीं है। यह कहना अयुक्तियुक्त होगा कि किसी मार्ग के कारण व्यक्ति किसी अमुक स्थान पर जाएगा या फिर किसी कुर्सी के कारण वह बैठेगा या फिर किसी साधन के कारण कोई कार्य करेगा। साधन को तो वह अपने कार्य के संकल्प को पूरा करने के लिए काम में ले सकता है।

 

xi.33

 

यहाँ स्वभाव के संबंध में जो बातें आईं हैं उनका इससे पहले गीता में निरूपण नहीं हुआ था। हमारे कर्म की नियामक बाहरी प्रकृति नहीं है। किसी भी व्यक्ति के साथ जो कुछ भी घटित होता है उसके पीछे कभी भी दूसरे लोगों की इच्छा अथवा अन्य कोई बाहरी कारण नहीं होते। वास्तव में तो व्यक्ति के साथ जो कुछ भी घटित होता है वह उसके स्वभाव के अनुसार ही होता है। क्योंकि भले ही बाहरी रूप से मनुष्यों के अंदर कुछ चीजें समान हों परंतु प्रत्येक मनुष्य अपने अलग आत्मनिष्ठ जगत् में निवास करता है। हालाँकि अन्तरात्मा में सभी एक हैं परंतु स्वभाव में सभी का पृथक् गठन होने के कारण सभी अपने अलग ही जगत् में निवास करते हैं। प्रकृति भी हमारे स्वभाव की अभिव्यक्ति के अनुसार कार्य करती है। अपने आप में बाहरी प्रकृति हमारा कुछ नहीं कर सकती। और हमारे लिए कर्म भी तभी लाभकारी होते हैं जब वे स्वभाव के अनुकूल हों अर्थात् स्वभाव नियत कर्म हों। उदाहरण के लिये यदि कोई व्यक्ति किसी रोगी के लिए दवाई लाने बाजार जाए तो उसका कर्म स्वभाव नियत तब होगा जब वह सही जगह जाकर और सही दवाई लेकर आए। वहीं, यदि वह बाजार की चकाचौंध में ही मुग्ध हो जाए या फिर किसी परिचित से निरर्थक बातचीत में लग जाए या फिर अन्य किसी ऐसे काम में लग जाए जो उसके लक्ष्य के प्रतिकूल हो, तो यह कर्म लाभकारी या उचित नहीं हुआ। इसीलिए स्वभाव नियत कर्म पर गीता इतना अधिक बल देती है और हमारी संस्कृति में भी इस पर अतिशय बल दिया जाता रहा है, क्योंकि स्वभाव नियत कर्म के द्वारा व्यक्ति सीधे उसी लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है जिसके लिए वह इस अभिव्यक्ति में आया है। परंतु हमारे वर्तमान अज्ञानमय और अवचेतन जीवन में हमें अपने स्वभाव का सचेतन बोध ही नहीं होता इसलिए हमारे कर्म सचेतन रूप से उसके अनुकूल नहीं होते। इस चीज की गंभीरता को समझते हुए ही हमारी संस्कृति में हमारे ऋषियों ने ऐसी व्यवस्था की अपरिहार्यता अनुभव की जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को शीघ्रातिशीघ्र उसके स्वभाव के प्रति सचेतन बना दिया जाए और साथ ही उसके अनुकूल कर्म करने की सहायता प्रदान की जाए ताकि वह अपने सच्चे स्वभाव को अधिकाधिक अभिव्यक्त कर सके जिसके लिए कि वह इस अभिव्यक्ति में आया है।

 

वास्तव में तो परा प्रकृति ही स्वभाव रूप से जीव में विराजमान हैं और वे ही उसे उसके स्वभाव के अनुरूप आगे ले जा रही हैं परंतु अचेतन रूप से आगे बढ़ने में कोई आनंद की अनुभूति नहीं होती। इसीलिए हमारी संस्कृति का सदा ही सारा प्रयास इस ओर रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति यथाशीघ्र अपने स्वभाव को जान जाए और सचेतन रूप से उसकी ओर आगे बढ़े। और वास्तव में तो व्यक्ति को अपने स्वभाव का पता ही भगवान् की सीधी प्रेरणा से या फिर सद्गुरु के प्राप्त होने पर चलता है। और जब व्यक्ति अपने स्वभाव के प्रति, अपने अंदर जो परमात्मा का अंश है उसके प्रति सचेतन हो जाता है तब वह अपने कर्म उसकी अभिव्यक्ति के अनुरूप करता है। अन्यथा तो वह सदा ही शंकित रहता है कि कहीं उसके कर्म गुणों से प्रभावित तो नहीं हैं। और जब तक उसके कर्म गुणों से प्रभावित रहते हैं तब तक स्वभाव नियत कर्म नहीं किये जा सकते।

 

प्रश्न : हम कहते हैं कि व्यक्ति को अपने स्वभाव के प्रति सचेतन होना होगा और अपने सतही भाव से स्वभाव की ओर जाना होगा। परंतु यह बाहरी भाव भी तो परमात्मा का ही दिया हुआ है। तो इसका क्या औचित्य है कि वे इस सतही भाव को केवल इससे बाहर निकलने के लिये ही हमारे ऊपर लादते हैं?

 

उत्तर : वास्तव में तो किसी चीज का क्या औचित्य है यह तो सच्चे रूप से केवल परमात्मा ही जानते हैं। परंतु अवश्य ही पहले तो यह कहना अयुक्तियुक्त है कि परमात्मा हमारे ऊपर इस सतही प्रकृति या भाव को लादते हैं क्योंकि यदि वे ऐसा करते हों तो ऐसा वे स्वयं अपने आप के साथ ही तो करते हैं। उनके अतिरिक्त अन्य किसी की सत्ता तो है ही नहीं। केवल अहंबोध के कारण ही हमें यह तथ्य दिखाई नहीं देता। दूसरे, यह कहना भी असंगत बात है कि चूंकि परमात्मा ने ही यह माया फैलायी है अतः हमें इसमें से निकलने का प्रयास करना ही क्यों चाहिये। क्योंकि इसके साथ ही उन्होंने इसमें से निकलने के तरीके भी तो बता रखे हैं और जो कोई भी वास्तव में इससे निकलना चाहता है उसके लिए सभी साधन जुटा देने का विधान भी बना रखा है। परंतु अधिकांशतः हम इस अयुक्तियुक्त तर्क में फंस कर निरर्थक दलीलें देने लगते हैं कि जब माया भगवान् की ही रची हुई है तो हमें इससे निकलने का प्रयास क्यों करना चाहिये। पर हम भूल जाते हैं कि ऐसी कोई चीज नहीं है जो परमात्मा से उद्भूत होती हो। माया से निकलने का सुझाव तरीके भी तो परमात्मा से ही उद्भूत हैं। इन सबके साथ ही हमें सही-गलत का भेद करने का विवेक भी तो परमात्मा ने ही दे रखा है, इसलिए हमें अपने चयन करने होते हैं। भले सभी कुछ परमात्मा ने ही बनाया है, परंतु उन्हीं परमात्मा ने हमें बुद्धि, विवेक आदि भेद करने की शक्तियाँ भी प्रदान की हैं ताकि उनका उपयोग कर जो सही हो उसका हम वरण कर रहे हैं ऐसी प्रतीति हमें हो सके। यदि हमें ऐसी प्रतीति हो तो पार्थिव जीवन में चेतना के विकास का वर्तमान ढाँचा कार्य नहीं करेगा। जीवन में सब विभ्रम की स्थिति पैदा हो जाएगी। इसे हम इस रूप में देख सकते हैं कि यह एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक पाठशाला है जहाँ अनेकानेक प्रलोभन की चीजें हमारे सम्मुख प्रस्तुत की जाती हैं परंतु हमें इन प्रलोभनों से बचते हुए अपने अंतर्निहित स्वभाव के अनुसार सही चीजों का वरण करना होता है। इसे हम लीला कह सकते हैं, आत्मा का विकास कह सकते हैं, यज्ञ का आरोहण कह सकते हैं। अब इसमें यह तर्क देना गलत होगा कि चूंकि प्रलोभन के साधन भगवान् के ही भेजे हुए हैं तो उनमें लिप्त हो जाना सही है। हो सकता है कि वे साधन किसी अन्य व्यक्ति के लिए लाभदायक हों क्योंकि यदि वे निरर्थक ही होते तब तो इस अभिव्यक्ति में उनका अस्तित्व ही नहीं होता। परंतु इसका यह अर्थ नहीं निकलता कि सभी कुछ ही हमारे लिए उपयोगी है। हमें तो सदा अपने आंतरिक गठन के अनुसार और उसके दृष्टिकोण से चयन करना ही होगा। बहुत से लोगों को हम यह कहते सुनते हैं कि आखिर अमुक काम तो करना अच्छा ही है, या फिर पांडिचेरी स्थित श्रीअरविन्द आश्रम में जाना तो हमेशा अच्छा ही है, या फिर अन्य ऐसी ही कोई चीज करना तो अच्छा ही है। परंतु यदि ये सभी चीजें सभी के लिए सदा ही अच्छी होतीं तो भगवान् स्वयं भी वैसी व्यवस्था कर सकते थे, उनकी ऐसी कोई असमर्थता नहीं है कि वे सभी को वह अच्छी चीज प्रदान नहीं कर सकते थे। परंतु प्रत्येक का गठन भिन्न है और इस कारण उसके लिए चीजों का महत्त्व और उपयोगिता भी बिल्कुल भिन्न होती है। इसलिए किसी एक के लिए अमृततुल्य वस्तु किसी दूसरे के लिए विष समान हो सकती है और जो आज हमारे लिए विषतुल्य है वही अन्य किसी काल में हमारे लिए अमृततुल्य हो सकती है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने सदा ही देश-काल-पात्र का मूल मंत्र अपनाया और उसी के आधार पर वे निर्णय किया करते थे। इसलिए भगवान् जहाँ माया के फंदे में फँसाते हैं वहाँ वे उससे निकलने के लिए योग का विधान भी तो देते हैं। इसीलिये तो स्वभाव नियत कर्म की महत्ता है। यदि चयन का विधान होता तब तो नियत कर्म या फिर अनियत कर्म का तो कोई विकल्प ही नहीं बचता। स्वभाव नियत कर्म का अर्थ यही है कि व्यक्ति सचेतन रूप से उन कर्मों का चयन करता है जो उसके अंदर परम प्रभु की होने वाली विशिष्ट अभिव्यक्ति की ओर ले जाते हैं। हालाँकि अंततः व्यक्ति पहुँचता तो उसी गंतव्य पर है परंतु साधारण जीवन बड़े ही टेढ़े-मेढ़े मार्गों से होकर वहाँ तक जाता है, वहीं श्रीमाताजी कहती हैं कि योग मार्ग सीधे ही गंतव्य तक ले जाता है। भौतिक रूप से तो हम इस बात के बेतुकेपन को समझते हैं कि चूंकि सभी मार्ग भगवान् के ही बनाए हुए हैं इसलिए हमें दाएँ या बाएँ मुड़ने में भेदभाव नहीं करना चाहिये और समान भाव अपनाकर जिस किसी में भी मुड़ जाना चाहिये। कोई स्थूल व्यक्ति भी यह समझता है कि ऐसा करने से तो व्यक्ति कभी भी अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाएगा, परंतु जब यही बात आध्यात्मिक मार्गों पर लागू की जाती है, जो कि अनंतविध हैं, अनंतस्तरीय हैं तब हम इस तर्क को इस पर लागू करने से चूक जाते हैं।

 

प्रश्न : भगवान् कहते हैं कि अधियज्ञ का प्रभु मैं स्वयं हूँ। तब अक्षर परमं और अधियज्ञ में अंतर क्या है?

 

उत्तर : वास्तव में परम सत्ता तो अपने आप में एक ही है और कहीं कोई भेद नहीं है। परंतु उनके भिन्न भावों के निरूपण के लिए भिन्न पदों का प्रयोग होता है। 'अधियज्ञ' से अभिप्रेत है अखिल कर्म और यज्ञ के प्रभु, भगवान् परमेश्वर, पुरुषोत्तम जो यहाँ इन सब देहधारियों के शरीर में गुप्त रूप से विराजमान हैं। यह सारी सृष्टि एक प्रकार का यज्ञ ही है और जिस कारण से यह यज्ञ है और परमात्मा के जिस स्रष्टा भाव को यह चरितार्थ करता है उसे अधियज्ञ कहते हैं। और परमात्मा का वह भाव जो इस सृष्टि क्रम में भाग नहीं लेता, अप्रत्यक्ष रूप से इसे केवल अवलंब प्रदान करता है उसे अक्षर परमं की संज्ञा दी जाती है। मूल रूप से दोनों भाव उसी एक परम सत्ता के ही हैं।

 

प्रश्न : इस वाक्य का क्या अर्थ है, "जो प्रत्येक जीव का अंतर्निहित सत्य और आत्मतत्त्व है, जो अपने-आप को अभिव्यक्ति में लाता है, जो सबके अंदर निहित वह मूलभूत भागवत् प्रकृति है जो सब प्रकार के परिवर्तनों, विपर्ययों और पुनरावर्तनों के पीछे सदा बनी रहती है, वही स्वभाव है।"

 

उत्तर : परमात्मा जब कोई व्यक्तित्व धारण कर अपनी कोई एक क्रियाविशेष तथा अपनी एक अभिव्यक्ति विशेष करना चाहते हैं तो उस अभिव्यक्ति का सारा प्रारूप ही स्वभाव है। प्रकृति उस प्रारूप को चरितार्थ करने के लिए आवश्यक साधन जुटाती है। स्वभाव को समझने के लिए हम उसकी तुलना किसी भवन के प्रारूप से, उसकी रूपरेखा से कर सकते हैं। अब उस रूपरेखा के आधार पर इंजीनियर सामान एकत्रित करता है। भले ही बाजार में अनेकों प्रकार की अन्य चीजें भी उपलब्ध हों परंतु वह उन्हीं का चयन करता है जो उस रूपरेखा के अनुकूल हों। उसी प्रकार भगवान् की अभिव्यक्ति की यह रूपरेखा, जो कि स्वभाव है, विश्व-प्रकृति के पास आती है और वह उसे चरितार्थ करने के लिए सभी आवश्यक साधन जुटाने का कार्य करती है। इसीलिए अंतर्निहित स्वभाव ही सबसे प्रभावी चीज है। स्वभाव नियत कर्म इसीलिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यों तो असंख्यों प्रकार के कर्म हैं परंतु व्यक्ति किन का चयन करे यह तो उसे उसके स्वभाव से ही पता लग सकता है और उस व्यक्ति के लिए वे ही सच्चे कर्म होते हैं।

 

यह सब उत्पत्ति तथा एक स्थिति से दूसरी स्थिति में निरंतर परिवर्तन ही कर्म, प्रकृति का कार्य है, उस प्रकृति की ऊर्जा है जो कर्मकर्ती है और सब क्रिया-प्रणालियों की ईश्वरी है। प्रथमतः यह स्वभाव का अपने को सृष्टिकर्म में डाल देना है, इसी को विसर्ग कहते हैं। यह सृष्टिकर्म भूतों को उत्पन्न करनेवाला, भूतकरः, है और यह सृष्टिकर्म ये भूत आत्मनिष्ठ रूप से अथवा अन्य प्रकार से जो कुछ बनते हैं उसे भी उत्पन्न करनेवाला, भावकरः, है। सब मिलकर, यह काल के अन्दर पदार्थों की सतत् उत्पत्ति या 'उद्भव' है जिसका मूलतत्त्व कर्म की सृजनात्मक ऊर्जा है। यह सारा क्षरभाव अर्थात् 'अधिभूत' प्रकृति की शक्तियों के सम्मिलन से निकल कर आता है, यह अधिभूत ही जगत् है और जीव की चेतना का विषय है। इस सब में जीव ही प्रकृतिस्थ भोक्ता और साक्षीभूत देवता है; बुद्धि, मन और इंद्रियों की जो दिव्य शक्तियाँ हैं, जीव की चेतन सत्ता की जो समस्त शक्तियाँ हैं जिनके द्वारा यह प्रकृति की इस क्रिया को प्रतिबिंबित करता है, इसके 'अधिदैव' अर्थात् अधिष्ठातृदेवता हैं। यह प्रकृतिस्थ जीव ही इस तरह क्षर पुरुष है, भगवान् का नित्य कर्म-स्वरूप हैः यही जीव प्रकृति से ब्रह्म में लौटकर अक्षर पुरुष, भगवान् का नित्य नैष्कर्म्य-स्वरूप, होता है। परंतु क्षर पुरुष के रूप और शरीर में परम् पुरुष भगवान् ही निवास करते हैं। अक्षरभाव की अचल शान्ति और क्षरभाव के कर्म का आनन्द दोनों ही भाव एक साथ अपने अन्दर रखते हुए भगवान् पुरुषोत्तम मनुष्य के अन्दर निवास करते हैं। वे हमसे दूर परे किसी परम् पद पर ही स्थित नहीं हैं, अपितु वे यहाँ प्रत्येक प्राणी के शरीर में, मनुष्य के हृदय में और प्रकृति में भी विद्यमान हैं जहाँ वे प्रकृति के कर्मों को यज्ञरूप से ग्रहण करते हैं और मानव जीव के सचेतन आत्म-दान की प्रतीक्षा करते हैंः परन्तु हर हालत में, मनुष्य की अज्ञानावस्था और अहंकारिता में भी वे ही उसके स्वभाव के स्वामी और उसके सब कर्मों के प्रभु होते हैं, जो प्रकृति और कर्म विधान पर अधिष्ठातृत्व करते हैं। उन्हीं से निकलकर जीव प्रकृति की इस क्षर-क्रीड़ा में आता है और अक्षर आत्मसत्ता से होता हुआ उन्हीं के परम धाम को प्रास होता है।

 

इस संक्षिप्त विवरण के तुरंत बाद गीता ज्ञान द्वारा परम मोक्ष के विचार के विवेचन की ओर अग्रसर होती है जिसका निर्देश पूर्वाध्याय के अन्तिम श्लोक में गीता ने किया है।

 

इस प्रकार गीता में हम विश्व के निर्माण के अनेक तरीके के वर्णन पाते हैं। वेदों में भी हम इसका एक भिन्न वर्णन पाते हैं। वेदों में वर्णन मिलता है कि शब्द से सारी सृष्टि उत्पन्न होती है। परंतु यह सारा विषय बिना अनुभव के समझ में नहीं सकता। व्यक्ति को इसका जितना ही अधिक अनुभव होगा उतनी ही अच्छी तरह वह इसे समझ सकेगा। आखिर, इस सारी सृष्टि के विषय में हम सचेतन कैसे होते हैं? हमारी इंद्रियाँ अपनी सूचना मनस् के पास भेजती हैं जहाँ सारा प्रतिबिंब बनता है। मनस् इस सारी सूचना के साथ अपने स्वयं के बोधों को जोड़कर बुद्धि के पास भेजता है। वहाँ सारा दृश्य तैयार होता है और वहीं से क्रिया-प्रतिक्रिया का निर्णय आता है। इसलिए हमारे अंदर जो मनोवैज्ञानिक तथा आत्मपरक शक्तियाँ हैं उन्हीं के प्रभाव से हमें यह सृष्टि ऐसी प्रतीत होती है। इन्हीं शक्तियों को अधिदैव कहते हैं। वास्तव में अपने आप में ऐसी कोई सृष्टि है ही नहीं। स्वयं सांख्यशास्त्र भी इसका वर्णन करते हुए हमें यह दर्शाता है कि हमारे गठन के कारण ही हमें इस प्रकार की सृष्टि दिखाई देती है। अपने आप में इसका कोई पृथक् अस्तित्व नहीं है। इसी सृष्टि को भिन्न-भिन्न जीव भिन्न-भिन्न रूप में देखते हैं। वहीं यदि किसी जीव का गठन सर्वथा भिन्न प्रकार का होगा तो उसे तो इस सृष्टि का भान एकदम भिन्न प्रकार से होगा और इसी कारण उसकी चेतना के लिए वे नियम बाध्यकारी नहीं होंगे जो हमारे लिए होते हैं। इसलिए जैसा प्रारूप प्रभु ने हमारे अंदर निहित कर रखा है वैसा ही हमें अपनी मनोवैज्ञानिक शक्तियों की सहायता से प्रतीत होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जगत् में अकेले ही निवास करता है, उसमें कोई दूसरा नहीं रहता। अवश्य ही व्यक्ति एक ऐसी चेतना में भी प्रवेश कर सकता है जहाँ उसे यह अनुभव हो कि सभी शरीरों में स्वयं वही विद्यमान है। जब तक हम इंद्रियों आदि के द्वारा बँधे होते हैं तब तक हमें दृश्य जगत् की भौतिक यथार्थता पर बहुत अधिक आग्रह रहता है। परंतु जैसे-जैसे व्यक्ति अपनी गहराइयों में प्रवेश करने लगता है, वैसे-वैसे उसका यह भ्रम टूटता जाता है। इसीलिए चमत्कार संभव हैं क्योंकि वास्तव में तो सारी संरचना ही मनोवैज्ञानिक है। ऐसी कोई भौतिक चीज तो कुछ है ही नहीं जो कि नमनीय हो। इसलिए सारी मनोवैज्ञानिक संरचना भगवान् के उस विशिष्ट भाव के अनुसार होती है जो वे प्रत्येक जीवविशेष के अंदर भिन्न-भिन्न रूप से प्रकट करना चाहते हैं। इसी कारण जीव के लिए सच्ची समझदारी तो इसी में है कि वह उस विशिष्ट भाव के प्रति सचेतन हो और अधिकाधिक उसी के अनुरूप कार्य करे। इसी को चेतना का विकास कहते हैं जिसमें व्यक्ति अधिकाधिक भीतर के उस भाव के संपर्क में आता जाता है और उसी के द्वारा अपने समस्त क्रियाकलाप को निर्धारित करता है। इस रहस्य को भली-भाँति जानने के कारण ही भारतीय संस्कृति का सारा ध्यान इसी पर था कि किस प्रकार यथाशीघ्र प्रत्येक जीव को उसके उस अंतर्निहित भाव के संपर्क में लाया जाए क्योंकि एक बार उसके संपर्क में आने पर स्वतः ही वह उसके अनुसार अपने सारे क्रियाकलाप स्वभाव नियत रूप से करने लगेगा और तब किसी भी प्रकार के बाहरी विधान की आवश्यकता मंद होती जाएगी अन्त में - जब पूर्ण रूपांतर साधित हो जाएगा तब - आवश्यकता ही नहीं रहेगी।

 

सारा खेल ही चेतना का है। जब सारा दृश्य भीतर से प्रक्षिप्त हो रहा है तब बाहरी दृश्य से विचलित होने की मूलतः तो कोई आवश्यकता हो नहीं है। और चूँकि सब कुछ भीतर ही है तो केवल बाहरी अन्वेषण-विश्लेषण से कोई विशेष लाभ नहीं होने वाला है। इसीलिए श्रीअरविन्द ने कहा कि, "अतिचेतन ही वस्तुओं का सच्चा आधार है, कि अवचेतन। कमल का यथार्थ महत्त्व उस कीचड़ के रहस्यों का विश्लेषण करने से नहीं मिलेगा जिसमें से वह यहाँ उगता है; उसका रहस्य तो कमल के उस दिव्य आदिरूप में मिलेगा जो नित्य ही ऊपर प्रकाश में कुसुमित होता है।"* अब जब हम इस दृष्टिकोण से देखते हैं तब जाकर हमें समझ में आता है कि सत्य को खोजने का विज्ञान का तरीका तो सर्वथा उल्टा है। चीजों को सच्चे रूप में केवल चेतना के द्वारा ही समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए भले हम अपने किसी पालतू पशु को पूरे अमरीका की सैर करा लाएँ फिर भी वह वहाँ का क्या वर्णन कर सकता है? वहीं, कोई समझदार व्यक्ति वहाँ की एक झलक मात्र पाने के बाद भी हमें वहाँ की कुछ सूचना अवश्य दे सकता है। इस चीज को समझे बिना यदि कोई केवल जड़ भौतिक तत्त्व के आधार पर सत्य तक पहुँचने का प्रयास करे तो यह सर्वथा निरर्थक होगा। इस संदर्भ में विज्ञान के विषय में श्रीअरविन्द की यह उक्ति अत्यंत प्रकाशक है, "यदि तुम भागवत् यथार्थता या सद्वस्तु को चूक जाओ या उसकी उपेक्षा कर दो तो चीजों का कोई मूलभूत सार नहीं रह जाता; क्योंकि तुम कामचलाऊ और उपयोग करने योग्य ऊपरी दिखावे की अतिविशाल सतही परत में धँसे रहते हो। तुम दिव्य जादूगर के जादू का विश्लेषण करने की कोशिश कर रहे हो, परंतु जब तुम स्वयं जादूगर की चेतना में प्रवेश करते हो केवल तभी तुम लीला के सच्चे उद्गम, उसके अर्थ और उसके घेरों का अनुभव करना शुरू करते हो। मैं कहता हूँ 'शुरू करते हो' क्योंकि दिव्य सद्वस्तु इतनी सरल नहीं है कि पहले ही स्पर्श में तुम उसका सब कुछ जान लो या उसे किसी एक ही सूत्र में डाल दो; यह तो स्वयं अनंत है और तुम्हारे समक्ष एक अनंत ज्ञान को खोलता है जिसके आगे सारा विज्ञान कुल मिलाकर भी एक तुच्छ-सी वस्तु है।" (CWSA 28, 332) इसलिए सच्चा सार इसी में है कि व्यक्ति अपने भीतर जाए, चेतना का विकास करे, अपने सच्चे स्वरूप का साक्षात्कार करे और उसी को अभिव्यक्त करे। केवल ऐसा करने से ही व्यक्ति को सच्चा सुख, सच्ची परिपूर्णता प्राप्त हो सकती है अन्यथा निजस्वरूप से भिन्न रूप में जीने से तो किसी भी प्रकार की सच्ची परिपूर्णता कभी मिल ही नहीं सकती। इसीलिए श्रीअरविन्द कहते हैं, "दिव्य जीवन की ओर आरोहण ही मानव यात्रा है, कर्मों का 'कर्म' और स्वीकार करने योग्य 'यज्ञ' है। यही जगत् में मनुष्य का एकमात्र वास्तविक कार्य तथा उसके अस्तित्व का औचित्य है, जिसके बिना वह भौतिक ब्रह्माण्ड की भयंकर विशालताओं के बीच सतही कीचड़ पानी के संयोग से अपने-आप बने एक छोटे-से कण - पृथ्वी - पर अन्य क्षणभंगुर कीटों के बीच एक रेंगता हुआ कीट मात्र ही रहेगा।" (CWSA 21, 48)

 

अन्तकाले मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्

यः प्रयाति मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ।। ५।।

 

. और जो मनुष्य अपने जीवन के अंत समय में केवल मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़ कर प्रयाण करता है, वह मेरे भाव को प्राप्त होता है; इसमें कोई संशय नहीं है।

 

यं यं वापि स्मरन्मावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ।। ६।।

 

. हे कौन्तेय! जो कोई मनुष्य अन्त समय में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़ता है, वह उस ही भाव को प्राप्त होता है जिस भाव में वह जीव अपने भौतिक जीवनकाल में निरंतर आंतरिक रूप से बढ़ रहा था।

 

मनुष्य संसार में जन्म लेकर प्रकृति और कर्म की क्रिया में लोक-परलोक के चक्कर काटता रहता है। प्रकृति में स्थित पुरुष - यही उसका सूत्र होता है: उसके अंदर उसकी आत्मा जो कुछ सोचती, मनन करती और कर्म करती है, वह सदा वही बन जाता है। वह जो कुछ पहले रहा है उसी ने उसके वर्तमान जन्म को निर्धारित किया है; और जो कुछ वह है, जो कुछ वह सोचता और इस जीवन में अपनी मृत्यु के क्षण तक करता रहता है वही निश्चित करता है कि वह मृत्यु के बाद परलोकों में और अपने भावी जीवनों में क्या बनेगा। जन्म यदि 'होना' है तो मृत्यु भी एक 'होना' ही है, किसी भी प्रकार यह समाप्ति नहीं है। शरीर छूट जाता है, परंतु जीव, 'त्यक्त्वा कलेवरम्' शरीर को छोड़कर अपने रास्ते पर आगे बढ़ता है। अतः बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि अपने प्रयाण के संधि-क्षण में वह क्या होता है। क्योंकि मृत्यु के समय संभूति के जिस भी रूप पर उसकी चेतना स्थिर होती है और मृत्यु के पूर्व जिसमें उसकी मन-बुद्धि सदा तन्मय रहती आयी है उसी रूप को वह अवश्य प्राप्त होता है; क्योंकि प्रकृति कर्म के द्वारा जीव के सब विचारों और वृत्तियों को ही कार्यान्वित किया करती है और वास्तव में यही प्रकृति का सारा कार्य-व्यापार है। इसलिए मनुष्य में स्थित जीव यदि पुरुषोत्तम-पद लाभ करना चाहता है तो उसके लिए दो आवश्यकताएँ हैं, वह संभव हो सके उससे पूर्व दो शर्तों का पूरा किया जाना आवश्यक है। एक यह कि इस पार्थिव जीवन में रहते हुए उसने अपना संपूर्ण आंतरिक जीवन उसी आदर्श की दिशा में गढ़ा हो; और दूसरी यह कि प्रयाण-काल में उसकी अभीप्सा और संकल्प उस आदर्श के प्रति सच्चे बने रहें।

 

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Sri Aurobindo to Dilip, Vol.1, 2003, p.189, Hari Krishna Mandir Trust. Pune, and Mira Aditi, Mysore

 

 

प्रश्न : इसमें बताया गया है कि मृत्यु के समय व्यक्ति की चेतना जिस भी चीज पर स्थिर होती है वह उसी रूप को प्राप्त होता है। तब फिर व्यक्ति के पूरे जीवन-काल में उसने जो कुछ भी क्रिया-कलाप किया, क्या उसका कोई महत्त्व नहीं?

 

उत्तर : सामान्यतः तो व्यक्ति अपने पूरे जीवन-काल में जो भी सोचता या जिस भी चेतना में रहता है, अंतिम समय में भी उसकी चेतना उन्हीं चीजों में फँसी रहती है। परन्तु ऐसा भी हो सकता है कि व्यक्ति अपने जीवन-काल में जो सोचता या जिस चेतना में रहता है, उससे भिन्न या विपरीत कोई चीज उसके अंतिम क्षणों में जाए, और ऐसे में वही प्रभावी होगी। उदाहरण के लिए अजामिल, जिसने कि अपने जीवन-काल में कोई सत्कर्म नहीं किया था और ही वह कभी भगवान् का स्मरण ही करता था, परन्तु अपने अंतिम क्षणों में उसने अपने पुत्र नारायण का नाम पुकारा। ऐसा उसने एकाग्र होकर भगवान् को स्मरण कर के नहीं किया क्योंकि उसे तो भगवान् से कोई सरोकार नहीं था, उसने तो मोहवश अपने पुत्र का नाम पुकारा था। परन्तु फिर भी भगवान् के पार्षद उसे लेने आए और उसे सद्गति की प्राप्ति हई। विरले ही लोगों के अंतिम क्षणों में भगवान् का नाम उनके मुख पर आता है।

 

प्रश्न : यदि अंत समय में किसी व्यक्ति की दुर्घटना से मृत्यु हो जाती है तो उसकी क्या गति होती है?

 

उत्तर : सामान्यतः तो ऐसे व्यक्तियों की कोई अच्छी गति नहीं होती, हालाँकि व्यक्ति की अंतरात्मा का, उसके चैत्य पुरुष का कभी कुछ नहीं बिगड़ता। यहाँ जिस बारे में बताया जा रहा है वह सब तो प्राणिक सत्ता के साथ होता है। जब अंतरात्मा ने एक बार मनुष्य शरीर धारण कर लिया है तब वह उस अवस्था से नीचे नहीं गिर सकती और ही उसकी कभी कोई दुर्दशा हो सकती है क्योंकि वह तो भगवान् का अंश है, जिसमें प्रकाश ही प्रकाश है। जिस प्रकार सूर्य जहाँ होता है वहाँ प्रकाश ही प्रकाश फैलता है, अंधकार उसे नहीं दबा सकता, उसी प्रकार अंतरात्मा का भी कभी कुछ नहीं बिगड़ सकता।

 

प्रश्न : अंत समय में यदि कोई बीमारी से ग्रस्त हो तो वह तो अपनी बीमारी में ही त्रस्त रहेगा, उसी पर केन्द्रित रहेगा। उसे तो भगवान् का स्मरण हो ही कैसे सकता है?

 

उत्तर : इसीलिए तो यहाँ कह रहे हैं कि यदि व्यक्ति अपने जीवन-काल में साधना नहीं करता और परमात्मा को याद नहीं करता तो अंतिम क्षणों में उसको परमात्मा की याद बनी रहना लगभग असंभव है। फिर भी यदि किसी कारण से या संयोगवश परमात्मा की याद जाए - जिसकी कि संभावना बहुत कम होती है - तो वह बहुत कारगर होती है। परन्तु यदि जीवनपर्यंत व्यक्ति साधना करता है तो अंतिम क्षणों में भगवान् का स्मरण होना एक निश्चिति हो जाती है।

 

प्रश्न : क्या प्राण छूटते ही आत्मा दूसरा शरीर धारण कर लेती है?

 

उत्तर : श्रीमाताजी के अनुसार सामान्य तौर पर चैत्य पुरुष जितना ही अधिक विकसित होता है उतना ही अधिक समय वह दूसरा जन्म ग्रहण करने में लेता है क्योंकि शरीर में रहते समय चैत्य जितने ही अधिक अनुभव ग्रहण करता है उसके बाद उतना ही समय उसे उन्हें आत्मसात् करने में लगता है। यदि चैत्य पुरुष अभी अधिक विकसित नहीं है तव तो शरीर त्याग के बाद उसका पुनर्जन्म जल्दी ही हो जाता है। श्रीमाताजी के अनुसार ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जहाँ मृत्यु के बाद वह उसी परिवार में पुनः जन्म ग्रहण कर लेता है। परंतु यह क्षेत्र या यह विषय इतना विस्तृत है कि किन्हीं सीधे-सादे नियमों में इसे नहीं बाँधा जा सकता।

 

मनुष्य जब से पैदा होता है तब से उसके मन, प्राण और शरीर की दीवारें आत्मा के सामने आकर खड़ी हो जाती हैं इसलिए व्यक्ति के सचेतन होते ही जीवन का एक ही उद्देश्य रह जाता है और वह है उन दीवारों को तोड़ना। परन्तु हमारे बाहरी भागों को इसमें कोई रुचि नहीं होती कि वे दीवारें टूटें क्योंकि इनके पीछे जो तामसिक शक्तियाँ कार्य करती हैं वे कभी नहीं चाहतीं कि कोई प्रकाश जाए और अंधकार में चलती उनकी क्रियाकलाप में कोई व्यवधान पड़े, इसलिए वे इसका विरोध करती हैं। अब जैसे किसी नाबालिग राजा के मंत्री जो अपनी मनमानी करते हैं वे कभी नहीं चाहेंगे कि वह राजा बालिग हो और उन पर अंकुश लगाए और शासन करे, वैसे ही ये शक्तियाँ भी नहीं चाहतीं कि आत्मा को धरती पर अभिव्यक्त होने का मौका मिले अन्यथा उनका निरंकुश खेल तो खत्म ही हो जाएगा। इसीलिए साधना इतनी कठिन होती है। परन्तु इसका लाभ यह है कि व्यक्ति इन शक्तियों के खेल को धीरे-धीरे समझ जाता है और तब वह अधिकाधिक आत्मा की शक्ति को अभिव्यक्ति प्रदान कर इन शक्तियों के ऊपर प्रभुत्व प्राप्त करना सीख जाता है और अंततोगत्वा अन्धकार की शक्तियों उनके क्रियाकलाप के पीछे भी जो भागवत् सत्य छिपा हुआ है उसे आत्मसात् कर पाता है।

 

गीता इस प्रसंग में मृत्यु के समय के विचार और मनःस्थिति पर बड़ा महत्त्व देती है, एक ऐसा महत्त्व जिसे समझना हमारे लिए बहुत कठिन होगा यदि हम उस चीज को स्वीकार करते हों जिसे चेतना की आत्म-सृजनात्मक शक्ति कहा जा सकता है। हमारा विचार, हमारी आंतरिक दृष्टि, हमारी श्रद्धा जिस बात पर पूर्ण और सुनिश्चित बल के साथ अपने-आप को सुस्थिर करती है, उसी (के स्वरूप) में हमारी आंतरिक सत्ता परिवर्तित होने लगती है। यह प्रवृत्ति तब एक निर्णायक शक्ति बन जाती है जब हम उन उच्चतर आध्यात्मिक और आत्म-विकसित अनुभवों को प्राप्त होते हैं जो बाह्य पदार्थों पर उतने निर्भर नहीं होते जितनी कि बाह्य प्रकृति के वशीभूत होने के कारण हमारी सामान्य मनोवृत्ति हुआ करती है। वहाँ हम अपने-आप को स्थिरतापूर्वक वह बनते हुए देख सकते हैं जिस पर हम अपने मन को स्थिर रखते हैं और जिसकी हम निरंतर अभीप्सा करते हैं। इसलिए वहाँ अपने विचार का थोड़ी देर के लिए भी छूट जाना, स्मरण में जरा-सी भी अशुद्धता के जाने का अर्थ है इस परिवर्तन की प्रक्रिया में एक गतिरोध या फिर इस परिवर्तन-क्रिया से पतन और हम जो पहले थे उसी की ओर पीछे लौटना, ऐसी आशंका तब तक रहती है जब तक कि कम-से-कम हमने अपने नवीन भाव को काफी हद तक और अटल रूप से स्थापित अथवा सुदृढ़ कर लिया हो। जब हमने यह कर लिया हो, जब हमने उसे सामान्य अनुभव बना लिया हो तब उसकी स्मृति स्वतःविद्यमान रूप से रहती है, क्योंकि अब वह हमारी चेतना का ही स्वाभाविक रूप होती है। मर्त्य जगत् से प्रयाण करने के संधि-क्षण में हमारी चेतना की तात्कालिक स्थिति का महत्त्व इससे स्पष्ट हो जाता है। परंतु यह कोई मरण-शय्या पर किया गया स्मरण नहीं है जो हमारी संपूर्ण जीवनधारा से और हमारी पूर्व मनःस्थिति से बेमेल हो या फिर जिसकी इनके द्वारा अधूरी तैयारी हुई हो। ऐसे स्मरण के अंदर कोई उद्धारक शक्ति नहीं हो सकती। यहाँ गीता का जो विचार है वह प्रचलित धर्म की रियायतों और सुविधाओं के ही समान नहीं है; इसका इन सनकों से कोई सरोकार नहीं है कि एक पूरा अपवित्र सांसारिक जीवन बिताने के बाद पादरी के द्वारा अंत में सर्वप्रायश्चित करा लेने से ही ईसाई मरण-काल में पावन हो जाता है अथवा पहले से ही ध्यान रखकर या अकस्मात् पवित्र काशीधाम में या पवित्र गंगा के तट पर मर जाने से और अंत में पंडित द्वारा अंतिम-क्रियाएँ कराने से मुक्ति मिल जाती है, गीता के अनुसार यह मोक्ष की कोई पर्याप्त प्रणाली नहीं है। जिस दिव्य भाव पर मन को प्रयाणकाल में अचल रूप से स्थिर करना होता है, 'यं स्मरन् भावं त्यजति अन्ते कलेवरम्', वह तो वही भाव होना चाहिए जिसकी ओर जीव अपने सांसारिक जीवन में प्रतिक्षण आगे बढ़ता रहा हो, सदातद्भावभावितः।

 

अंत समय के स्मरण का ही एक उदाहरण देते हुए श्रीमाताजी ने बताया कि श्रीअरविन्द आश्रम के ही एक साधक ने कुछ धार्मिक पुस्तकें आदि पढ़ रखी थीं और उसमें आए स्वर्गों आदि के वर्णन से वह प्रभावित था। इसलिए मृत्यु के उपरान्त वह ऐसे ही किसी एक मनोनिर्मित स्वर्ग में पहुँच गया। चूंकि श्रीमाताजी तो जानती थीं कि ऐसे स्वर्ग आदि की केवल सापेक्ष वास्तविकता ही होती है इसलिए वे उसे उसमें से निकाल कर किसी सत्यतर जगत् में ले जाना चाह रही थीं। परंतु वह व्यक्ति उस स्वर्ग की चकाचौंध से इतना प्रभावित था कि श्रीमाताजी को उसे उस जगत् की सापेक्षता समझाकर वहाँ से निकालने में लगभग एक वर्ष का समय लग गया। जब श्रीमाताजी इस उदाहरण का उल्लेख कर रही थीं तो किसी ने पूछा कि आखिर ये जगत् कितने वास्तविक हैं। तब उन्होंने उत्तर दिया कि ये जगत् अधिक वास्तविक तो नहीं हैं परंतु वर्तमान में हम जिस जगत् में निवास कर रहे हैं, जिसमें हमें इंद्रियों आदि के माध्यम से स्पर्श-बोध आदि प्राप्त होते हैं और जिसे हम बिल्कुल वास्तविक मानते हैं, उससे ये कुछ अधिक वास्तविक हैं। अब इस कथन से हमें अपने वर्तमान जगत् की घोर अवास्तविकता का और इसकी सापेक्षता का भान होता है जिसे कि वास्तविक मानकर हम पूरे जीवन इससे अभिभूत रहते हैं और जीवन में कभी किसी गहरे और सार्थक उद्देश्य के विषय में सोचते तक नहीं।

 

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ।। ७।।

 

. इसलिए सभी समय मेरा स्मरण कर और युद्ध कर; क्योंकि यदि तेरा मन और तेरी बुद्धि सदा मुझमें स्थिर और मेरे प्रति अर्पित होगी, तो निःसंदेह ही तू मुझे प्राप्त होगा।

 

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना

परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ।। ८।।

 

. हे पार्थ! निरन्तर अभ्यासरूप योग के द्वारा, भगवान् के साथ युक्त हुई और अन्यत्र कहीं विचलित होनेवाली चेतना से, सर्वदा भगवान् का चिन्तन करता हुआ मनुष्य दिव्य और परम् पुरुष को प्राप्त होता है।

 

कविं पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः

सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।। ९।।

 

प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव

ध्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।। १० ।।

 

-१०. ये परम् पुरुष द्रष्टा (कवि), पुरातन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, समस्त भूतों के प्रभु और शासक तथा पालक हैं; उनका रूप अचिंत्य है। तम अथवा अंधकार से परे, वे सूर्य के समान ज्योतिर्मय हैं। जो प्रयाण के समय अचल मन से, योग बल से संपन्न और भक्तियुक्त' होता है, जिसने प्राण-शक्ति को पूरी तरह से ले जाकर ध्रुवों के बीच में स्थिर कर दिया है, वह इस परम् पुरुष को प्राप्त होता है।

 

यहाँ हम इन परम् पुरुष भगवान् के सर्वप्रथम वर्णन पर पहुँचते हैं, - उन परम देव के वर्णन पर पहुँचते हैं जो अक्षर ब्रह्म से भी उत्तम और महान् हैं और जिन्हें गीता आगे चलकर पुरुषोत्तम की संज्ञा देती है। ये भगवान् भी अपनी कालातीत शाश्वत सत्ता में अक्षर हैं और इस समस्त अभिव्यक्ति से अत्यंत परे हैं और यहाँ काल के अन्दर हमें उन 'अव्यक्त अक्षर' की सत्ता की केवल अस्पष्ट झलकियाँ उनके विविध प्रतीकों और छद्मवेशों के द्वारा प्राप्त होती हैं। फिर भी वे केवल निर्गुण-निराकार अथवा अलक्षण, 'अनिर्देश्यम्' ही नहीं हैं; या यह कहिये कि वे अनिर्देश्य केवल इसलिए हैं क्योंकि मनुष्य की बुद्धि को जिस अत्यंत सूक्ष्मातिसूक्ष्म का बोध है वे उससे भी अधिक सूक्ष्म हैं और इसलिए भी कि भगवान् का स्वरूप अचिंत्य है...

 

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ।। ११ ।।

 

११. जिसे वेद के जाननेवाले अक्षर ब्रह्म कहते हैं, जिसमें तपस्वी तब प्रवेश करते हैं जब वे (काम-क्रोधादि) आवेगों से परे जा चुके होते हैं और जिसे प्राप्त करने की इच्छा से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं, उस पद या स्थिति को मैं तुझे संक्षेप में कहूँगा।

 

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य

मूर्ध्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ।। १२।।

 

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्

यः प्रयाति त्यजन्देहं याति परमां गतिम् ।। १३ ।।

 

१२-१३. इन्द्रियों के समस्त द्वारों को संयत करके, मन को हृदय में निरुद्ध करके, अपनी प्राण-शक्ति को मूर्धा (सिर) में ले जाकर स्थिर करके, जो व्यक्ति योग के द्वारा चित्त की एकाग्रता में स्थित हो, एकाक्षर पवित्र शब्द का उच्चारण करता है, और प्रयाणकाल में मुझे स्मरण करता हुआ देह त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

 

 

[यही] प्रयाण की प्रचलित यौगिक पद्धति है, संपूर्ण सत्ता को शाश्वत, परात्पर के प्रति अंतिम रूप से भेंट करना। परंतु फिर भी यह केवल एक पद्धति है; मूलभूत स्थिति है जीवन में, कर्म और युद्ध तक मेंमामनुस्मर युद्धय - भगवान् का सतत् अचल स्मरण करना और संपूर्ण जीवन को निरंतर योग अर्थात् 'नित्ययोग' बना देना। जो कोई भी ऐसा करता है, भगवान कहते हैं कि, वह मुझे अनायास पा लेता है; वही महात्मा है जो परम सिद्धि या पूर्णता लाभ करता है।

 

 

 

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...यहाँ ज्ञान के द्वारा निर्गुण निराकार ऐक्य ने प्रेम-भक्ति के द्वारा भगवान् से ऐक्य का स्थान नहीं ले लिया है, अपितु यह भक्तियोग अंत तक परम योगशक्ति का एक अंग बना रहता है

 

 

 

 

viii.7

 

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः

तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ।। १४।।

 

१४. हे पार्थ! जो योगी अन्य किसी का चिंतन करता हुआ, अनवरत और सतत् रूप से मेरा स्मरण करता है, वह मुझसे नित्य युक्त रहता है और मुझे सुलभता से प्राप्त कर लेता है।

 

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्

नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ।। १५।।

 

१५. मेरे पास आने के बाद, ये महात्मा पुनर्जन्म को, मर्त्य प्राणी की इस अनित्य और दुःखमय स्थिति को, पुनः प्राप्त नहीं करते; वे परम गति को प्रास होते हैं।

 

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म विद्यते ।। १६ ।।

 

१६. हे कौन्तेया जगत् परंपरा में ब्रह्मलोक तक जितने भी लोक हैं उन सबसे पुनरावृत्ति (अर्थात् पुनः जन्मग्रहण की क्रिया) होती है, किन्तु उस जीव पर पुनर्जन्म बाध्य नहीं होता जो मुझे प्राप्त कर लेता है।

 

इस प्रकार ऐहिक जीवन से प्रयाण करके जीव जिस स्थिति में पहुँचता है वह विश्वातीत स्थिति है। इस लोकपरंपरा के अन्दर जो उत्तमोत्तम स्वर्गलोक हैं वे सब पुनरावृत्ति के अधीन हैं; परंतु जो जीव पुरुषोत्तम को प्राप्त होता है उस पर पुनर्जन्म बाध्य नहीं होता। अतः अनिर्देश्य ब्रह्म को प्राप्त करने की ज्ञानाभीप्सा से जो कुछ फल प्राप्त हो सकता है वही इन स्वतःसिद्ध परम् पुरुष को, जो सब कर्मों के अधीश्वर तथा सब मनुष्यों और प्राणियों के सुहृद् हैं, ज्ञान, कर्म और भक्ति (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने की अभीप्सा के इस दूसरे और व्यापक मार्ग से भी प्राप्त होता है। उन भगवान् को इस प्रकार जानना और इस प्रकार उनकी खोज करना पुनर्जन्म से या कर्म-श्रृंखला से नहीं बाँधता; जीव इस मर्त्य जीवन की क्षणभंगुर और क्लेशदायिनी स्थिति से सदा के लिए मुक्त होने की अपनी इच्छा को पूर्ण कर सकता है। और, गीता इस जन्मचक्र तथा इससे छूटने की बात को बुद्धि के लिए और भी अधिक सटीक बनाने के लिए विश्व के (सृष्टि और लय संबंधी) चक्रों के उस प्राचीन सिद्धांत को स्वीकार कर लेती है, जो कि विश्वप्रपंचसंबंधी भारतीय धारणाओं का एक स्थायी अंग बन गया था।

v.29

 

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद् ब्रह्मणो विदुः

रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ।। १७।।

 

१७. जो लोग, ब्रह्मा का एक दिन जो कि एक सहस्र युगी तक रहता है, और रात्रि जो एक सहस्र युगांत तक रहती है, ऐसा जानते हैं, वे दिन और रात को जाननेवाले हैं।

 

अव्यक्ताद्वयक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे

रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके १८॥

 

१८. ब्रह्मा के दिन के आने पर अव्यक्त में से समस्त चराचर उत्पन्न होते हैं और रात्रि के आने पर सभी उस अव्यक्त में लय हो जाते हैं।

 

भूतग्रामः एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते रा

त्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ।। १९।।

 

१९. हे पार्थ! यह समस्त चराचर भूतों का समूह असहाय रूप से बार-बार अभिव्यक्ति में आता है, रात्रि आने पर लय हो जाता है और दिन आने पर उत्पन्न हो जाता है।

 

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः

यः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु विनश्यति २०॥

 

२०. किन्तु इस (वैश्विक) अव्यक्त से परे, सत्ता का एक दूसरा विश्वातीत अव्यक्त सनातन स्वरूप है, जो समस्त भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता है।

 

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्

यं प्राप्य निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।। २१ ।।

 

२१. वह 'अव्यक्त अक्षर' कहा जाता है, उसे परम-आत्मा, परम-पद कहते हैं, जो उसे प्रास कर लेते हैं वे लौटकर नहीं आते; वह मेरा परम धाम है।

 

चाहे हम विश्व की उत्पत्ति-प्रलय संबंधी इस धारणा को ग्रहण करें या रद्द कर दें, - क्योंकि यह इस पर निर्भर है कि हम 'दिन और रात के जाननेवालों' के ज्ञान को कितना महत्त्व प्रदान करते हैं, पर महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि गीता इसे क्या मोड़ देती है। सहज ही कोई समझ सकता है कि यह शाश्वत रूप से अव्यक्त सत्ता, जिसका इस व्यक्त-अव्यक्त जगत् के साथ कुछ भी संबंध नहीं प्रतीत होता, वह अवश्य ही नित्य अलक्षित अनिर्वचनीय निरपेक्ष सत्ता होनी चाहिये, और उस तक पहुँचने का उचित मार्ग होगा कि जो कुछ हम अभिव्यक्ति में बन गए हैं उस सबसे छुटकारा पा लें, यह नहीं कि अपनी बुद्धि के ज्ञान को, हृदय की प्रेम-भक्ति को, योगसंकल्प को और प्राण की प्राणशक्ति को एक साथ एकाग्र करके संपूर्ण अंतश्चेतना को उसकी ओर ले जाएँ। विशेषतः, भक्ति तो उस परम निरपेक्ष के संबंध में अनुपयुक्त ही प्रतीत होती है जो कि सभी संबंधों से रिक्त है, 'अव्यवहार्य' है। 'परन्तु' गीता आग्रहपूर्वक कहती है कि यद्यपि यह स्थिति विश्वातीत और यह सत्ता सदा अव्यक्त है, तथापि 'उन परम् पुरुष को... भक्ति के द्वारा ही प्राप्त करना होता है।...'

 

पुरुषः परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया

यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ।। २२ ।।

 

२२. हे पार्थी परन्तु उस परम् पुरुष को, जिसके भीतर समस्त भूत रहते हैं, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् विस्तृत हुआ है, अनन्य भक्ति से प्राप्त किया जाता है।

 

vii. 19

 

दूसरे शब्दों में कहें तो, वे परम् पुरुष हमारी मिथ्या-माया से उदासीन सर्वथा संबंधरहित निरपेक्ष नहीं हैं, अपितु जगतों के द्रष्टा (कवि), स्रष्टा और शासक हैं, 'कविं, अनुशासितारं, धातारं', और उन्हीं को 'एक' और 'सर्व', वासुदेवः सर्वमिति, के रूप में जानकर और उन्हीं की भक्ति करके हमें अपनी संपूर्ण सचेतन सत्ता से सब पदार्थों, सब शक्तियों, सब कर्मों में उनके साथ ऐक्य के द्वारा परम चरितार्थता, पूर्ण सिद्धि, परम मुक्ति खोजनी चाहिए।

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* यदि परम् पुरुष हमारे साथ सम्बन्ध रखने में समर्थ भी होते, पर केवल निर्वैयक्तिक सम्बन्ध ही, तो धर्म मानव प्राणसत्ता के लिए अपना महत्त्व खो बैठता और भक्तिमार्ग भी फलदायक या यहाँ तक कि सम्भव ही नहीं रहता। अवश्य ही हम उसके प्रति अपने मानवीय भावों का प्रयोग कर सकते हैं, पर अनिश्चित एवं अयथार्थ ढंग से तथा किसी मानवोचित उत्तर की आशा के बिना : केवल जिस तरीके से वह हमें उत्तर दे सकता है, वह है हमारे संवेदनों को निःस्तब्ध करके और हमें अपनी निर्वैयक्तिक शान्ति एवं निर्विकार समता से आच्छादित करके; और ऐसा ही वस्तुतः होता है जब हम ईश्वर की शुद्ध निर्वैयक्तिकता के पास जाते हैं। हम एक दैवी विधान के रूप में उसकी आज्ञा का पालन कर सकते हैं, उसकी शान्त सत्ता के प्रति अभीप्सा में अपनी आत्माओं को उसकी ओर ऊपर उठा सकते हैं, अपनी भावुक प्रकृति को अपने से दूर कर के उस निर्वैयक्तिकता में विकसित हो सकते हैं; हमारे अन्दर का मानव-जीव तृप्त तो नहीं होता पर वह शान्त, संतुलित और स्थिर हो जाता है। परन्तु भक्तियोग, जो इस विषय में धर्म से एकमत है, इस निर्वैयक्तिक अभीप्सा की अपेक्षा अधिक घनिष्ठ एवं स्नेहसिक्त पूजा का आग्रह करता है। यह हमारे अंदर की मानवता की तथा हमारी सत्ता के निर्वैयक्तिक भाग की एक ही साथ दिव्य परिपूर्ति का लक्ष्य रखता है; यह मनुष्य की भावमय प्रकृति की दिव्य परितृप्ति का लक्ष्य रखता है। परम देव से यह हमारे प्रेम को स्वीकार करने की और उसके अनुरूप उत्तर की माँग करता है; जैसे हम उनमें आनन्द लेते तथा उन्हें खोजते हैं वैसे ही, इसका विश्वास है कि, वे भी हममें आनन्द लेते और हमें खोजते हैं! और ही इस माँग को बुद्धिविरुद्ध कहकर इसकी निन्दा ही की जा सकती है, क्योंकि यदि परम और विश्वमय पुरुष हममें किसी प्रकार का रस लेते तो यह समझना कठिन है कि हमारा उद्भव सम्भव ही कैसे होता या हम अस्तित्वमान कैसे रह सकते थे, और यदि वे हमें अपनी ओर बिल्कुल भी खींचते नहीं, - यदि भगवान् हमें खोजते ही नहीं, तो प्रकृति में कोई भी ऐसा कारण नहीं दिखता कि क्यों हम उसे खोजने के लिये अपनी सामान्य सत्ता के चक्र से मुँह फेरकर उसकी ओर मुड़ें।

 

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः

प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ।। २३ ।।

 

२३. और हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस समय में देह त्याग कर प्रयाण करने पर योगी इस पृथ्वी लोक में फिर जन्म ग्रहण करने और फिर जन्म ग्रहण करने-रूप गति को प्राप्त करते हैं उस काल को मैं तुम्हें बतलाता हूँ।

 

[यहाँ] एक अधिक अनोखी बात आती है जिसे गीता ने प्राचीन वेदान्त के रहस्यवादियों से ग्रहण किया है। यहाँ यह उन भिन्न-भिन्न कालों का निर्देश करती है जिन कालों में योगी को अपनी इच्छानुसार, यह चुनाव करके कि वह पुनर्जन्म चाहता है या उसे टालना चाहता है, देह त्याग करनी होती है।

 

अग्निज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्

तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ।। २४ ।।

 

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्

तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ।। २५ ।।

 

 

२४-२५. अग्नि एवं प्रकाश तथा धुँआ अथवा धुँध, दिन एवं रात, महीने का शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष, उत्तरायण एवं दक्षिणायन ये परस्पर विलोम चीजें हैं। इन विपर्ययों में प्रत्येक में से प्रथम विपर्यय के द्वारा ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म को प्राप्त होते हैं; परंतु दूसरे विपर्ययों के द्वारा योगी 'चंद्र के प्रकाश' को प्राप्त करता है और उसके बाद पुनः मानव जन्म में लौट आता है।

 

शुक्लकृष्णे गती होते जगतः शाश्वते मते

एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ।। २६ ।।

 

 

२६. ये दो चिरस्थायी प्रकाशमय और अंधकारमय मार्ग हैं; इनमें से एक के द्वारा वह प्रयाण करता है जो पुनः लौट कर नहीं आता, और दूसरे से वह जो पुनः लौटता है।

 

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन

तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ।। २७ ।।

 

२७. हे पृथापुत्र! जो योगी इन दोनों मार्गों को जाननेवाला है वह कभी भ्रमित नहीं होता। इसलिये हे अर्जुन सभी कालों में (हर समय) योगयुक्त हो।

 

(शुक्ल-कृष्ण गति की धारणा' के पीछे) चाहे जो मानस-भौतिक वास्तविकता हो या कोई प्रतीक हो - यह धारणा उन गुह्यवादियों के युग से चली रही है जो प्रत्येक भौतिक पदार्थ में आंतरिक तत्त्व के प्रभावशाली प्रतीक को देखते थे और जो सर्वत्र ही बाह्य और आभ्यंतर, प्रकाश और ज्ञान, अग्नि-तत्त्व और आध्यात्मिक ऊर्जा के बीच परस्पर क्रिया तथा एक प्रकार की समरूपता देखते थे, - हमें तो केवल उस मोड़ को देखने की आवश्यकता है जिससे गीता इन श्लोकों का उपसंहार करती है: 'अतएव, सभी समय योगयुक्त रहो।'

 

क्योंकि अंततः यही मूलभूत बात है, संपूर्ण सत्ता को भगवान् के साथ एकात्म कर देना, इतने पूर्ण रूप से और सभी तरह से एकात्म कर देना कि यह स्वाभाविक और सतत् रूप से ऐक्य अवस्था में स्थित हो जाए, और इस प्रकार संपूर्ण जीवन, केवल विचार और ध्यान ही नहीं, अपितु कर्म, श्रम, युद्ध सब कुछ भगवान् का ही स्मरण बन जाए। 'मामनुस्मर युद्धय ', 'मेरा स्मरण कर और युद्ध कर', अर्थात् इस अनित्य पार्थिव संघर्ष में, जो सामान्यतः हमारे मन को ग्रसित किये रहता है, क्षण भर के लिए भी शाश्वत के सतत् चिंतन को छोड़ देना; और यह बात बहुत ही कठिन, प्रायः असंभव ही प्रतीत होती है। वस्तुतः यह सर्वथा संभव तभी होती है जब इसके साथ अन्य शर्तें भी पूरी हों।

 

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योग का अनुभव वस्तुतः यह दिखाता है कि इस धारणा के पीछे एक यथार्थ मनोभौतिक सत्य है, अवश्य ही यह हर जगह पूर्ण या निरपेक्ष रूप से व्यवहार्य नहीं है, इस धारणा के पीछे की युक्ति यह है कि, प्रकाश और अंधकार की शक्तियों के बीच जो आंतरिक युद्ध होता है उसमें प्रकाश की शक्तियों का दिन या वर्ष के प्रकाशमय समयों में स्वाभाविक प्राधान्य रहता है और अंधकार की शक्तियों का अंधकारमय समयों में, और यह संतुलन तब तक चलता रह सकता है जब तक कि अंतिम विजय प्राप्त नहीं हो जाती।

 

हमारे शाखों में जगह-जगह ऐसा वर्णन आता है कि रात्रि के समय राक्षसों की, आसुरी शक्तियों की ताकत बढ़ जाती है। और ब्रह्म मुहूर्त में देवताओं की ताकत बढ़ जातो है। हमारा सारा ज्योतिषशास्त्र, शकुन शास्त्र आदि इन्हीं भौतिक, सूक्ष्म भौतिक और मनो-भौतिक संकेतों, प्रतीकों आदि पर आधारित हैं। पशु-पक्षियों की, कीड़े-मकोड़ों की आवाजें, व्यवहार आदि के आधार पर भी पूरा शास्त्र आधारित है क्योंकि उनके व्यवहार आदि से बहुत से भौतिक तथा सूक्ष्म संकेत प्राप्त होते हैं। हालांकि इन सब में सदा ही कोई अप्रत्याशित तत्त्व तो रहता ही है परंतु फिर भी ये सारे संकेत बहुत हद तक हमें चीजों के विषय में निश्चित पूर्वाभास प्रदान करते हैं। पूर्वकाल में हम राजा-महाराजाओं की कथाओं में देखते हैं कि किस प्रकार जन्म के समय ही राजज्योतिषी बच्चे का लगभग सटीक भविष्य बता देते थे। और कुछ मामलों में तो वह भविष्यकथन अक्षरशः सही होता था।

 

यदि हम अपनी चेतना में सबके साथ एक आत्मा हो चुके हैं - वह एक आत्मा जो सदा हमारी बुद्धि में स्वयं भगवान् हैं, और यहाँ तक कि हमारे नेत्र तथा अन्य इन्द्रियाँ इन्हीं भगवान् को सर्वत्र इस प्रकार देखती और अनुभव करती हैं कि किसी भी समय किसी भी पदार्थ को हम वैसा नहीं अनुभव करते या समझते जैसा कि असंस्कृत बुद्धि और इन्द्रियाँ अनुभव करती हैं, अपितु उसे उस रूप में छिपे हुए तथा साथ-ही-साथ उस रूप में प्रकट होनेवाले भगवान् ही जानते हैं, और यदि हमारी इच्छा भगवदिच्छा के साथ चेतना में एक हो चुकी है और हमें अपनी इच्छा, अपनी मन-बुद्धि और शरीर का प्रत्येक कर्म उसी भगवदिच्छा से निःसृत, उसी का एक प्रवाह, उसी से भरा हुआ या उसके साथ एकीभूत प्रतीत होता है तो गीता की जो माँग है उसे सर्वांगीण रूप से किया जा सकता है। अब भगवत्स्मरण मन की रुक-रुक कर होनेवाली कोई विशेष क्रिया नहीं होती, अपितु हमारे क्रियाकलापों की सहज स्थिति और एक तरीके से चेतना का सारतत्त्व मात्र ही बन जाता है। अब जीव पुरुषोत्तम के साथ अपना यथार्थ, स्वाभाविक एवं आध्यात्मिक संबंध प्राप्त कर चुका होता है और हमारा संपूर्ण जीवन एक योग बन गया है, वह योग जो सिद्ध होने पर भी शाश्वत रूप से और अधिक आत्म-सिद्ध होती एकता बनता जाता है।

 

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्

अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ।। २८ ।।

 

२८. वेदों में, यज्ञानुष्ठानों में, तपों में तथा दानों में जो पुण्यकमर्मों का फल बताया गया है, इसको जानकर योगी इन सबसे परे चला जाता है और परम् और नित्य पद प्राप्त करता है।

 

इस प्रकार आठवाँ अध्याय 'अक्षरब्रह्मयोग' समाप्त होता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नवाँ अध्याय

 

I. राजगुह्य

 

समस्त सत्य जिसने अपने-आप को यहाँ तक क्रमशः विकसित किया है, जो प्रत्येक सोपान पर समग्र ज्ञान के किसी नवीन पहलू को प्रस्तुत करता आया है और उस पर आध्यात्मिक अवस्था और कर्म के किसी--किसी निष्कर्ष को स्थापित करता गया है, उसे अब एक ऐसा मोड़ लेना है जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसलिए भगवान् आगे जो कुछ कहनेवाले हैं उसके निर्णायक स्वरूप की ओर पहले ही ध्यान दिला देते हैं जिससे कि अर्जुन का मन जागृत और सतर्क हो सके। क्योंकि वे उसका मन समग्र भगवत्ता के ज्ञान और दर्शन के प्रति खोलने वाले हैं और ग्यारहवें अध्याय के उस विराट् दर्शन तक ले जाने वाले हैं, जिससे कि कुरुक्षेत्र का यह योद्धा अपनी सत्ता, कर्म और विशिष्ट कार्य के उन रचयिता और धर्ता के प्रति, मनुष्य और जगत् में व्याप्त भगवान् के प्रति सचेतन हो जाए जिन्हें मनुष्य में और संसार में कोई चीज सीमित या बद्ध नहीं करती, क्योंकि सभी कुछ उन्हीं से निःसृत है, उन्हीं की अनन्त सत्ता में एक गतिविधि है, उन्हीं की इच्छा से यह जारी रहता है और उसी के द्वारा आश्रित रहता है, उन्हीं के दिव्य आत्मज्ञान में इसकी सार्थकता सिद्ध होती है, वे ही सदा इसके आदि, सार और अंत हैं। अर्जुन को अपने बारे में यह जानना होगा कि वह केवल उन्हीं भगवान् में अस्तित्वमान रहता है और अपने अंदर केवल उन्हीं की शक्ति के द्वारा कार्य करता है, उसके समस्त क्रियाकलाप भागवत् क्रिया का एक साधनमात्र हैं, उसकी अहंपरक चेतना केवल एक आवरण है और उसके अज्ञान के लिए वह उसकी अंतःस्थित सच्ची सत्ता का, जो कि परम् पुरुष परमेश्वर का अमर स्फुल्लिंग और अंश है, मिथ्या प्रतिभास मात्र है।

 

यही सत्य सत्ता का रहस्य है जो कि अब गीता इसकी प्रचुर फलवत्ता के साथ हमारे आंतरिक जीवन और बाह्य कर्मों के लिए प्रयुक्त करने जा रही है। वह जो अब कहने जा रही है वह गुह्यतम रहस्य है। यह समग्र भगवान्, समग्र माम्, का वह ज्ञान है जिसे अर्जुन को उसकी सत्ता के प्रभु ने देने का वचन दिया है, वह मूलभूत ज्ञान जो सभी तत्त्वों में (भगवत्ता के) पूर्ण ज्ञान से युक्त है, जो फिर और कुछ जानने के लिए बाकी नहीं रख छोड़ता। अज्ञान की वह संपूर्ण ग्रंथि जिसने उसकी मानव-बुद्धि को भ्रमित किया है और जिसने उसके संकल्प को अपने भगवद्-नियत कार्य से पीछे हटा दिया है, वह (इस मूलभूत ज्ञान द्वारा) पूर्ण रूप से छिन्न-भिन्न हो चुकी होगी। यह सब ज्ञानों का ज्ञान, सब गुह्यों का गुह्य, राजविद्या, राजगुह्य है।

 

इस नवें अध्याय में भगवान् की सत्ता का मोटा-मोटा सारा निरूपण आएगा कि किस प्रकार सभी कुछ भगवान् स्वयं ही हैं। उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। उन्हीं से सभी चीजों का उद्गम है, उन्हीं से उनकी गति और उन्हीं में उनका लय है। इस निरूपण में पहले तो कुछ पहेलीनुमा बातें आती हैं जैसे कि 'मैं सभी भूतों में स्थित हूँ परंतु समस्त भूत मुझमें स्थित नहीं हैं।' चूंकि ये सभी बातें पहेलीनुमा हैं इसलिए अपने आप में स्थूल होने के कारण बुद्धि इन बातों से चकरा जाती है इसलिए उसे सूक्ष्म बनाना, परिष्कृत करना आवश्यक है।

 

श्रीभगवान् उवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे

ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।। १।।

 

. श्रीभगवान् ने कहाः तुझ दोषदृष्टि-रहित को जो / अब कहने जा रहा हूँ, वह गुह्यतम चीज है, वह मूलभूत ज्ञान है जो समस्त व्यापक ज्ञान (विज्ञान) से युक्त है, जिसे जान कर तू अशुभ से मुक्त हो जाएगा।

 

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्

प्रत्यक्षावगमं धम्यै सुसुखं कर्तुमव्ययम् ।। २।।

 

. यह राजविद्या है, राजगुह्य (सभी रहस्यों में रहस्य) है, यह पवित्र और उच्चतम कोटि का प्रकाश है जिसका आध्यात्मिक अनुभव के द्वारा सत्यापन किया जा सकता है, सत्ता का सही धर्म है, जिसका अभ्यास करना सरल है और जो अविनश्वर है।

 

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप

अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवत्र्मनि ।। ३।।

 

. हे परंतप! इस धर्म में श्रद्धा प्राप्त कर पाने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त करके सामान्य मर्त्य जीवनपथ में लौट आते हैं।

 

....यदि श्रद्धा हो, यदि व्यक्ति उस तार्किक बुद्धि का ही भरोसा करता हो जो बाह्य तथ्यों के आधार पर चलती है और शंकालु दृष्टि से अन्तर्दृष्ट ज्ञान पर इस कारण संदेह करती है क्योंकि वह बाह्य प्रकृति के विभाजनों और अपूर्णताओं के साथ मेल नहीं खाता और उससे परे की चीज प्रतीत होता है तथा कोई ऐसी चीज व्यक्त करता प्रतीत होता है जो हमें हमारे वर्तमान जीवन के प्रथम व्यावहारिक तथ्यों से, इसके दुःख-दर्द से, पाप, दोष, भगवद्-विरुद्ध प्रमाद स्खलन, अशुभ, से परे ले जाता है, तो फिर उस महत्तर ज्ञान से युक्त जीवन बिताने की कोई संभावना नहीं है। जो जीव उच्चतर सत्य और विधान में श्रद्धा नहीं ला पाता उसे अवश्य ही मृत्यु, दोष और अशुभ के अधीन सामान्य मर्त्य जीवनपथ में लौट आना पड़ता है: वह उन परमेश्वर के स्वरूप में विकसित नहीं हो सकता जिनकी सत्ता को वह नकारता है। क्योंकि यह एक ऐसा सत्य है जिसे जीना होता है, - और आत्मा के विकसित होते प्रकाश में जीना होता है, कि मन के अंधकार में उसे तर्क द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

 

यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात है। यदि व्यक्ति को भगवान् के वचनों में श्रद्धा गई है तो वह उन्हें जीने का प्रयास करेगा ही, जबकि जिसे उनके वचनों में श्रद्धा नहीं आई है वह तो अपनी सामान्य जीवनचर्या में ही निरंतर चलता रहेगा। हालाँकि श्रद्धा आने पर भी मन, बुद्धि आदि भाग तो सक्रिय ही रहते हैं, एकाएक ही वे परिवर्तित नहीं हो जाते। वे पूर्ववत् ही अपनी क्रिया करते रहते हैं और मन-बुद्धि की किसी भी क्रिया से, हमारे किन्हीं भी भौतिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक नियमों आदि से भगवान् के स्वरूप को नहीं जाना जा सकता और ही वे हमें भगवान् की ओर जाने के मार्ग में अग्रसर ही कर सकते हैं। श्रद्धा के आधार पर व्यक्ति मार्ग पर आरंभ तो कर सकता है परंतु कदम-कदम पर उसे जो व्यावहारिक निर्णय लेने होते हैं उनके लिए वही पुराना दृष्टिकोण, वही पुराने मन-बुद्धि और अधिक सहायक नहीं रहते। तब फिर व्यावहारिक निर्णय कैसे किये जाएँ? इसके लिए श्रीअरविन्द कहते हैं, "यह एक ऐसा सत्य है जिसे जीना होता है, - और आत्मा के विकसित होते प्रकाश में जीना होता है, कि मन के अंधकार में उसे तर्क द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।" इसलिए व्यक्ति जब इस मार्ग पर चलता है और इस पर उसे जो भी कोई अनुभव प्राप्त होते हैं, भले कोई छोटा ही अनुभव क्यों प्राप्त हुआ हो, तब वह अनुभव या वे अनुभव व्यक्ति को मस्तिष्क के समस्त क्रियाकलापों से, विज्ञान के सभी नियमों से, सभी दर्शनों से, साधना के सभी नियमों से कहीं अधिक प्रकाश प्रदान करते हैं। इसलिए इस अध्याय के आरंभ में ही गीता श्रद्धा के ऊपर और आध्यात्मिक अनुभव के आधार पर सत्य के सत्यापन पर बल देती है क्योंकि अन्य किन्हीं भी साधनों से इस सत्य का सत्यापन नहीं हो सकता। अतः जैसे-जैसे व्यक्ति को अधिकाधिक अनुभव प्राप्त होते जाएँगे वैसे-वैसे उसे और अधिक मार्गदर्शन प्राप्त होता जाएगा। यदि मानसिक स्तर पर ही गहरे सत्यों के रहस्य को समझा जा सकता हो तब तो बुद्धिजीवियों द्वारा बहुत पहले ही इस रहस्य को समझा जा चुका होता। परंतु यह राजगुह्य है जिसकी ओर व्यक्ति को श्रद्धा के आधार पर चलना होता है जो कि अनुभव लाती है और उस अनुभव से आगे का मार्ग प्रशस्त होता है। इसी कारण आध्यात्मिक पथ पर गुरु के मार्गदर्शन की परम आवश्यकता रहती है क्योंकि विरला ही कोई होता है जो अपनी निज शक्ति-सामर्थ्य से इस निम्न क्रियाकलाप से, अपरिष्कृत बुद्धि की क्रिया से ऊपर उठ सके। हालाँकि ज्यों-ज्यों व्यक्ति पथ पर अग्रसर होता है त्यों-त्यों उसकी बुद्धि भी अधिक परिष्कृत होती जाती है और अभिव्यक्ति में उसकी सहायता करती है। चूंकि व्यक्ति को आगे से आगे अनुभव प्राप्त होते जाते हैं तो उनकी सहायता से मनुष्य की बुद्धि, उसके भाव, उसका दृष्टिकोण आदि सब बदलते जाते हैं। यह नवाँ अध्याय बहुत ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भगवान् इसमें अपने गुह्य तत्त्व का, अपने भगवत्तत्त्व का निरूपण करते हैं।

 

व्यक्ति को उसी में विकसित होना होता है, वही हो जाना होता है, - उसकी सत्यता परखने का या सिद्ध करने का केवल यही तरीका है। केवल निम्नतर सत्ता को अतिक्रम करके ही कोई सच्ची दिव्य सत्ता बन सकता है और आत्मिक जीवन के सत्य को जी सकता है। सत्य के जितने भी आभास इसके विरोध में प्रस्तुत किये जाएँ, वे सब निम्न प्रकृति की ही प्रतीतियाँ हैं। निम्न प्रकृति के इस अशुभ से मुक्ति उस उच्चतर ज्ञान को ग्रहण करने से ही सकती है जिसमें यह प्रत्यक्ष या भासमान अशुभ अपने स्वरूप की चरम अयथार्थता स्वीकार कर लेता है, यह स्पष्ट हो जाता है कि यह हमारे अंधकार की सृष्टि थी। पर इस प्रकार दिव्य 'प्रकृति' के मुक्त भाव की ओर विकसित होने के लिए हमें हमारी वर्तमान सीमित प्रकृति में निगूढ़ परमेश्वर की सत्ता को स्वीकार करना होगा उसमें विश्वास करना होगा। क्योंकि जिस कारण से यह योग संभव और सहज हो जाता है वह यह है कि इसे साधने में हम जो स्वाभाविक रूप से हैं उस सब की क्रियाओं को उन अंतःस्थ दिव्य पुरुष के हाथों में सौंप देते हैं। भगवान् हमारी सत्ता अपनी सत्ता में मिलाकर और उसे अपने ज्ञान और शक्ति से परिपूर्ण कर, 'ज्ञानदीपेन भास्वता', सहज, अचूक  रीति से हमारे अन्दर उत्तरोत्तर दिव्य जन्म साधित कराते हैं: वे हमारी तमसाच्छा अज्ञानमयी प्रकृति को अपने हाथों में ले लेते हैं और अपने प्रकाश व्यापक भाव में रूपान्तरित कर देते हैं। हम जिस पर पूर्ण श्रद्धा के साथ अहंकार-रहित होकर दृढ़ विश्वास करते हैं और उनके द्वारा प्रेरित होकर होन चाहते हैं, उसे अंतःस्थ भगवान् निश्चय ही सिद्ध कर देंगे। परंतु पहले अहंभावापर मन और प्राण को, जो कि हम वर्तमान में हैं और बाह्यतः प्रतीत होते हैं, अपने रूपांतरण हेतु स्वयं को हमारे अंतःस्थ अंतरतम गूढ़ भगवत्ता के हाथों में समर्पित करना होगा।

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तीसरे श्लोक में भगवान् कहते हैं कि, "हे परंतप ! इस धर्म में श्रद्धा प्राप्त कर पाने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त करके सामान्य मर्त्य जीवनपथ में लौट आते हैं।" यह उक्ति परम महत्त्व की है। क्योंकि सभी कुछ उस मूलभूत श्रद्धा पर निर्भर करता है। सामान्यतः हम सुनते ही हैं कि हमें भगवान् पर विश्वास है। परंतु वास्तव में वह विश्वास भी हमारी सत्ता के किसी-किसी भाग में ही होता है और वह भी इतने क्षीण रूप से होता है कि उसमें हमारी सत्ता की ऊर्जाओं को, उसकी वृत्तियों को भगवान् की ओर मोड़ने की शक्ति नहीं होती। हालाँकि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होता जिसमें कि कोई गहरी चीज हो, परंतु महत्त्व इस बात का है कि उसकी बाहरी सक्रिय प्रकृति पर उसका कितना प्रभाव है। इसी कारण सत्संग का, धर्मग्रंथों का, भजन-कीर्तन आदि का, सत्पुरुषों के पास जाने का, तीर्थों में जाने का इतना भारी महत्त्व है। क्योंकि यों तो सभी कुछ होता तो परमात्मा की ही इच्छा से है परंतु व्यक्ति की बाहरी प्रकृति का गठन जिस प्रकार का है, उसमें ये सभी बाहरी साधन अन्दर की श्रद्धा को जागृत करने में सहायता प्रदान करते हैं। ऐसी चीजों के संपर्क में भीतरी श्रद्धा को जागृत होने का अधिकतम सुअवसर प्राप्त होता है। और जब वह श्रद्धा बाहरी प्रकृति तक भी अपना प्रभाव डालने में, व्यक्ति के व्यावहारिक जीवन को भी नियोजित करने में समर्थ होती है तब व्यक्ति योग की ओर उन्मुख हो जाता है अन्यथा तो वह साधारण जीवन ही व्यतीत करता रहता है। अतः जो इस श्रद्धा को प्राप्त नहीं कर सकता वह भगवान् की ओर नहीं जा सकता। भले व्यक्ति कितने भी तकों से भगवान् की सत्ता को मंडित करने का या उसे अस्वीकार करने का प्रयास करे, परंतु केवल श्रद्धा के द्वारा और उसके प्रभाव से मार्ग पर होने वाले सतत् वर्धित होते अनुभवों के द्वारा ही वह वास्तव में उस ओर बढ़ सकता है और केवल तभी मार्ग पर आने वाली समस्याओं का, सभी प्रकार के संशयों आदि का सच्चे रूप से समाधान हो सकता है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या संदेह, संशय आदि निरर्थक हैं? परंतु सृष्टि में ऐसी कोई चीज नहीं है जिसकी कि अपने सही समय और स्थान पर उपयोगिता हो। श्रद्धा जब अपने आप को विभिन्न भागों के द्वारा प्रकट करती है तब हमारे मन, प्राण और शरीर आदि भाग इतने सक्षम नहीं होते कि वे सही रूप में, बिना किसी प्रकार की त्रुटि या विकृति के उसे ग्रहण कर सकें और अभिव्यक्त कर सकें। हमारी बाह्य प्रकृति आरंभ में बहुत ही अपरिष्कृत, तुच्छ, अनमनीय और क्षुद्र होती है और बड़े ही सतत् अभ्यास के द्वारा उसका विकास होता है। और ज्यों-ज्यों उसका विकास होता है त्यों-त्यों वह उस श्रद्धा को अधिकाधिक सही रूप में ग्रहण कर सकती है और अभिव्यक्त कर सकती है। इसलिए हमारी बाह्य चेतना अपरिपक्व होने के कारण उसमें श्रद्धा का प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं बन पाता इसलिए उसमें संशय और संदेह उपयोगी होते हैं ताकि हम श्रद्धा के उस अपूर्ण प्रतिबिंब को ही अंतिम मान बैठें और उसी में रूढ़ हो जाएँ। यदि व्यक्ति में संशय उठते तब तो वह अपनी किसी भी प्रकार की धारणा को, सनक को, पूर्वाग्रह को ही सही मानकर उसी के अनुसार चलने लगेगा जिसका परिणाम बहुत ही भयंकर हो सकता है। और यह चीज इतनी आम है कि प्रायः ही हम लोगों को प्रेरणा के नाम पर, भीतरी श्रद्धा के नाम पर अतियों में लिप्त होते देखते हैं। इसलिए अपने आप में श्रद्धा पर नहीं बल्कि मन-बुद्धि आदि भागों में उसके निरूपण पर संदेह अत्यंत आवश्यक है। इस बात में संशय नहीं करना है कि गंतव्य तो परम प्रभु ही हैं, क्योंकि यह तो आत्मा का सहज सत्य है, सच्ची श्रद्धा है, परंतु यह श्रद्धा व्यावहारिक जीवन में अपने आप को किस रूप में अभिव्यक्त करती है उन रूपों पर मनुष्य को संशय या संदेह होना आवश्यक है ताकि वह बाहरी भागों की त्रुटियों, विकृतियों आदि की रोकथाम कर सके जिससे कि उस श्रद्धा को अधिक शुद्ध रूप में अभिव्यक्त किया जा सके। और श्रद्धा एक इतना महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जो व्यक्ति को भगवान् की ओर ले जाता है। इसीलिए गीता आर्त्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु आदि सभी भक्तों को श्रेष्ठ बतलाती है क्योंकि महत्त्वपूर्ण चीज है किसी भी प्रकार भगवान् की ओर चलना, उनसे संबंध स्थापित करना और अधिकाधिक उन्हें जीवन में अभिव्यक्त करना। और जब एक बार व्यक्ति किसी भी भाव से भगवान् की ओर चल पड़ता है तब उसके अशुभ नष्ट हो जाते हैं।

 

प्रश्न : भगवान् कहते हैं कि, "इस धर्म में श्रद्धा प्राप्त कर पाने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त करके सामान्य मर्त्य जीवनपथ में लौट आते हैं।" तो वह किस धर्म के विषय में है?

 

उत्तर : सामान्य अर्थ में जिसे हम धर्म समझते हैं उससे इसका कोई संबंध नहीं है। भगवान् कहते हैं कि यह राजगुह्य, जिसका कि आध्यात्मिक अनुभव से ही सत्यापन किया जा सकता है, सत्ता का सही धर्म है। और राजगुह्य और कुछ नहीं केवल यह रहस्य है कि भगवान् ही सब कुछ हैं और जीवन में उन्हें चरितार्थ करना ही एकमात्र सच्चा उद्देश्य है, यही सच्चा धर्म है। और जिसे इस धर्म में, इस राजगुह्य में श्रद्धा गई है वह तो अवश्य ही अपने गंतव्य की ओर चला जाएगा। इसलिए भले तकलीफ में ही सही, भले किसी स्वार्थ के कारण या फिर जिज्ञासावश ही सही, पर यदि किसी प्रकार भी व्यक्ति को भगवान् की सत्ता में विश्वास गया कि उन्हीं के पास जाना चाहिये, तब व्यक्ति बिल्कुल सही भाव में है। और बिना इस विश्वास के तो भक्ति का कोई आधार ही नहीं है। जिसकी सत्ता मात्र को व्यक्ति स्वीकार करता हो उसको भक्ति वह कर ही कैसे सकता है। इसलिए यह विश्वास भक्ति का प्राथमिक आधार बन जाता है।

 

प्रश्न : पहले श्लोक में भगवान् कहते हैं कि तू अशुभ से मुक्त हो जाएगा। तो अशुभ क्या है?

 

उत्तर : जो कुछ हमें परमात्मा की ओर जाने से रोकता है वही अशुभ है। अपने आप में कोई चीज शुभ या अशुभ नहीं होती। यह तो देश-काल और पात्र पर निर्भर करता है कि कौनसी चीज भगवान् की ओर जाने में सहायक हो जाती है और कौनसी बाधक। किसी अमुक अनुभव से व्यक्ति भगवान् को ओर जा सकता है और किसी अमुक अनुभव में व्यक्ति फँस भी सकता है। हालाँकि सामान्यतया कुछ चीजें शुभ ही मानी जाती हैं, जैसे कि भगवान् के प्रेमीजनों का संग, सत्पुरुषों का संग। इसमें यह अपवाद अवश्य हो सकता है कि यदि स्वयं उस व्यक्तिविशेष की अवस्था ही इतनी ऊँची हो कि उसे उन तथाकथित सत्पुरुषों के साथ मेलजोल करने में सतर्क भी रहना पड़े। परतु यह तो अत्यंग विरले प्रसंगों में ही होता है। स्वयं श्रीअरविन्द ने कहा कि उन्हें श्रीमाताजी के आने से पूर्व पांडिचेरी में अन्य किसी से कभी कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई। इसलिए भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न चीजें होती है। परंतु मुख्न बात है कि यदि भगवान् के प्रति वह श्रद्धा जाए तो व्यक्ति उनकी ओर गति करना आरंभ कर देता है पर यदि वह जागृत हो तो केवल परिश्रम ही हाथ लगता है, वास्तविक कोई गति होती नहीं। पर एक बार जब भगवान् को ओर कदम बढ़ जाएँ तो फिर देर-सवेर, कितने भी उतार-चढ़ावों से होते हुए व्यक्ति अंततः गंतव्य तक पहुँच ही जाता है। इसीलिए भगवान् कहते हैं कि 'सन्मुख होई जीव मोहिं जबहि, जनम कोटि अघ नासहिं तबहिं।'

 

प्रश्न : जब एक बार व्यक्ति उस राह पर कदम बढ़ा देता है तब क्या पीछे जाने की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है?

 

उत्तर : हमारे प्राण का खेल बड़ा ही भयंकर और खतरनाक है। इसीलिए तो गीता छठे अध्याय के तेईसवें श्लोक में कहती है कि 'इस योग का चित्त में किसी भी प्रकार के अनुत्साह अथवा विषाद में डूबे बिना दृढ़तापूर्वक निरंतर अनुष्ठान करना चाहिए।' इसी पर टिप्पणी करते हुए श्रीअरविन्द कहते हैं, "...हृदय तथा मन की अधीरता और हमारी राजस प्रकृति की उत्सुक पर स्खलनशील इच्छा-शक्ति के कारण योग के विषम तथा संकीर्ण पथ पर इस श्रद्धा तथा धैर्य की प्राप्ति करना अथवा उसका अभ्यास करना कठिन होता है। मनुष्य की प्राणिक प्रकृति सदा ही अपने परिश्रम के फल के लिये तरसती है और यदि उसे ऐसा लगता है कि फल देने से इंकार किया जा रहा है या इसमें बहुत देर लगायी जा रही है तो वह आदर्श तथा नेतृत्व में विश्वास खो बैठती है। क्योंकि, उसका मन सदा ही पदार्थों की बाह्य प्रतीति के द्वारा ही निर्णय करता है, क्योंकि यह उस बौद्धिक तर्क की पहली सबसे भारी गहराई तक जमी हुई आदत है जिसमें वह इतने अतिशय रूप से विश्वास करता है। जब हम चिरकाल तक कष्ट भोगते या अन्धेरे में ठोकरें खाते हैं तब अपने हृदयों में भगवान् को कोसने से अथवा जो आदर्श हमने अपने सामने रखा है उसे त्याग देने से अधिक आसान हमारे लिये और कुछ नहीं होता।...ऐसी घड़ियों में - और कभी-कभी ये बारम्बार आती हैं और दीर्घकालिक होती हैं समस्त उच्चतर अनुभव विस्मृत हो जाता है और हृदय अपनी कटुता में डूब जाता है, उसी पर केंद्रित हो जाता है। इन्हीं अंधकारमय कालों में यह आशंका रहती है कि हम सदा के लिये पतित हो सकते हैं अथवा दिव्य कार्य या श्रम से पराङ्गमुख हो सकते हैं।" (CWSA 23, 244) श्रीमाताजी इस विषय में चेतावनी देती हुई कहती हैं कि, "...जब तुम पथ पर होते हो, तो कभी भी उसका परित्याग करो। कुछ प्रतीक्षा करो, पथ को स्वीकार करने से पूर्व तुम चाहो उतनी देर सकुचा सकते हो; परंतु जिस क्षण से तुम उस पर पदार्पण करो, तो बस, उसे छोड़ो मत। क्योंकि इसके परिणाम हैं जो अनेक जन्मों तक असर डाल सकते हैं। यह बहुत ही गंभीर है। इसीलिए सब कुछ के बावजूद योग पथ पर प्रवेश करने के लिए मैं कभी किसी को बाध्य नहीं करती।"

(CWM 4, 444)

 

योगी श्रीकृष्णप्रेम ने भी संदेह के कालों का वर्णन करते हुए बताया है कि किस प्रकार उन कालों में हमारे विभिन्न भाग श्रद्धा में विश्वास खो बैठते हैं और स्वयं अपने उस आधार तक को ही नष्ट-भ्रष्ट करने पर आमादा हो जाते हैं जो उन्हें थामकर आगे ले जा रहा था। श्रीकृष्णप्रेम ने इसका एक रूपक कथा के रूप में जो चित्रण किया है वह बड़ा ही हृदयस्पर्शी है। वे लिखते हैं, "मैंने कुंठित कामना के गहरे मंद स्वर को मानसिक समुद्र में प्रचण्ड रूप से दौड़ते देखा। विशाल लहरों में उसे मैंने सतह पर आते देखा, और मन के जहाज को, जिसके तार कटे हुए थे, घनघोर हवा के सामने भागते देखा। मैंने जहाजी दल को, जिनका भय उफनती लहरों के संपर्क के कारण आतंकित क्रोध में बदल गया था, अपनी कुल्हाड़ियाँ लेते और रस्सों और खंभों को बड़ी बेरहमी से काटते देखा। मैंने उन्हें अद्भुत दिशासूचक (compass) पर प्रहार करते देखा जो कि जहाज के बीचों-बीच प्रकाश से जगमग कर रहा था, यद्यपि उन्होंने दिशासूचक के कार्ड को तो नष्ट कर दिया था परंतु उसके प्रकाशपूर्ण काँटे को छू नहीं पाए। और अंत में वे अत्यंत उत्तेजित और क्रोधित हो गए और जहाज के लट्टे तक को ही चीर दिया और जब वह पानी में डूब गया तो वे भी कोसते और सुबकते हुए डूबने लगे। और फिर भी दिशासूचक चमक रहा था, एक आग्नेय काँटा जो समुद्र के ऊपर अंधेरे शून्य में बड़े शांत-स्थिर भाव से बना हुआ था। और जब उन्होंने उसे देखा तो वे उसकी ओर तैर कर गए और उसे पकड़ा, और तब मैंने देखा कि उनके चारों ओर एक बार फिर वह जहाज था, अपने सभी खंभों और लट्ठों के साथ यथावत् और अंधकारमय तूफान कहीं दूर गर्मियों के-से समुद्र के तले लुप्त हो गया था। परंतु दल के हृदयों में शर्मिंदगी भरी थी।" (योगी श्रीकृष्णप्रेम, लेखक दिलीप कुमार राय, प्रकाशक श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट, पृष्ठ ३६)

 

श्रीअरविन्द इसे विस्तार से समझाते हुए कहते हैं कि जब व्यक्ति साधना के मार्ग पर कदम रखता है तब श्रद्धा को कुछ राशि के साथ ही साथ उसके अपने विचार, अपने दृष्टिकोण, अपनी जानकारियों की राशि आदि होते हैं। परंतु साधना में ऐसे समय आते हैं जब व्यक्ति को लगता है कि जिस श्रद्धा से उसने आरंभ किया था, जिस इष्ट या उद्देश्य के प्रति उसने अपने जीवन को अर्पित कर दिया था, उसने उसे संकट में अकेला छोड़ दिया है और उसने वृथा ही अपना जीवन किसी ऐसी चीज के पीछे लगा दिया जिसे उसको कोई परवाह ही नहीं है या जो संकटकाल में उसकी कोई सहायता नहीं करती, उसकी करुण पुकार नहीं सुनती। बहुत से ऐसे आस्तिक लोगों के हमें उदाहरण पढ़ने-सुनने को मिलते हैं जो आरंभ में बहुत अधिक धर्मपरायण थे और बहुत पूजा-पाठ आदि करते थे, परंतु किसी अत्यंत अप्रिय घटना के बाद वे भगवान् में अपना विश्वास खो बैठे। साधनामार्ग में भी हमें ऐसे लोगों के उदाहरण मिलते हैं जो कहते हैं कि उन्होंने अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दिया तो भी अंततः उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इसलिए साधना मार्ग की बजाय तो संसार के तौर तरीकों से चला जाए वही समझदारी है। इसी प्रकार जब हमारी रूपक कथा का जहाजी बेड़ा संकट में आता है तब उसे अपने जहाज पर विश्वास समाप्त हो जाता है और वह उसे नष्ट कर देना चाहता है। परंतु ऐसे ही कालों में पुराने मूल्य, पुरानी धारणाएँ आदि तो टूट जाती हैं और व्यक्ति पाता है कि एक कहीं अधिक विशाल धरातल - एक छोटे जहाज की अपेक्षा एक विशाल जहाज - उभर कर आता है जिसके आधार पर वह अपनी यात्रा को जारी रख सकता है। इसी प्रकार यह यात्रा आगे से आगे बढ़ती रहती है जिसमें समय-समय पर हमारे अंदर संशय उत्पन्न हो जाते हैं और यदि साधक उन कालों में से विजयी रूप से बाहर निकल आता है तो वह पाता है कि उसकी श्रद्धा पहले से कहीं अधिक विशाल हो जाती है, उसकी मनोवैज्ञानिक तथा प्राणिक संरचना कहीं अधिक लचीली, विशाल तथा अधिक समावेशी हो जाती है। ऐसे काल अधिकांश साधकों के जीवन में आते हैं। हालाँकि व्यक्ति के गठन पर निर्भर करता है कि उसके लिए ये काल कितने लंबे चलते हैं और कितने प्रायः आते हैं। परंतु वास्तव में तो भले ही हमारा विश्वास कितना भी क्यों डगमगाए, परंतु भगवान् सदा ही हमारी सहायता करते रहते हैं। यही दृढ़ आश्वासन प्रदान करने के लिए तो भगवान् अर्जुन को कहते हैं कि,

 

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो विद्यते

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।।२:४०।।

 

इस मार्ग पर कोई भी प्रयास नष्ट नहीं होता, ही कोई प्रत्यागमन ही होता है, इस धर्म का थोड़ा-सा अनुष्ठान भी महान् भय से मुक्त कर देता है।

 

इसलिए परमात्मा की ओर बढ़ाया हुआ एक कदम भी कभी व्यर्थ नहीं जाता। वहीं यदि कोई भगवान् के लिए कोई श्रम करता है, उनके निमित्त कोई कष्ट या पीड़ा उठाता है तब तो उसका कल्याण सुनिश्चित है। व्यक्ति अपने अहं की पुष्टि के लिए, कामनाओं-वासनाओं की पूर्ति के लिए, अपने सगे-संबंधी, रिश्तेदारों के लिए तो सारे दिन अनेकानेक तकलीफें उठाता है परंतु भगवान् के लिए थोड़ा भी कष्ट उठाने का परम सुअवसर केवल किसी सौभाग्यशाली को ही मिलता है।

 

इसके बाद गीता परम और समग्र रहस्य को, उस एकमात्र चिंतन सत्य को जिसमें पूर्णता तथा मुक्ति के जिज्ञासू को रहना सीखना होगा, तथ उस रहस्य के सब आध्यात्मिक अंगों और उनके समस्त क्रिया-व्यापारों पूर्णता के एकमात्र विधान को प्रकट करने की ओर अग्रसर होती है। यह पाय रहस्य उन परात्पर परमेश्वर का गूढ़ रहस्य है जो सब कुछ हैं और सर्वत्र हैं, श्री फिर भी जगत् तथा उसके नाना रूपों से इतने महत्तर और भिन्न हैं कि यह की कोई वस्तु उन्हें अपने में समाहित नहीं रखती, कोई वस्तु उन्हें वास्तविक रूप में व्यक्त नहीं करती, और कोई भी भाषा, जो देश और काल और उनके परस्पर सम्बन्धों से निर्मित पदार्थों के बाह्य रूपों से ली गई हो, उनके अचिन्त स्वरूप का किसी प्रकार संकेत नहीं कर सकती। परिणामतः, हमारी पूर्णता का विधान है हमारी संपूर्ण प्रकृति की उसके दिव्य स्रोत और स्वामी के प्रति आराधना और उन्हीं को आत्मसमर्पण। हमारा एकमात्र चरम मार्ग यही है कि जगत् में हमारे संपूर्ण अस्तित्व को, केवल किसी इस या उस अंश को हो नहीं, शाश्वत पुरुष की ओर एकांतिक गति में मोड़ दिया जाए। दिव्य योग को शक्ति और उसके गूढ़ रहस्य के द्वारा हम उनकी अनिर्वचनीय गुह्यताओं से निकल कर लौकिक पदार्थों की इस बद्ध प्रकृति में गये हैं। उसी योग की एक विपरीत गति के द्वारा हमें अवश्य बाह्य प्रकृति की सीमाओं को अतिक्रम करना होगा और उस महत्तर चेतना को फिर से प्राप्त करना होगा जिसके द्वारा हम भगवान् में और परम शाश्वत में निवास कर सकें।

 

अतः, कोई भी विचार, कोई भाव, कोई सूत्र भगवान् के अचिन्त्य स्वरूप को कभी भी प्रकट नहीं कर सकता। इसलिए एकमात्र करने योग्य कार्य है उनके प्रति आत्मसमर्पण। आत्मसमर्पण के द्वारा ही इसकी कोई संभावना है कि हम उनके स्वरूप के किसी अंश को कुछ समझ पाएँ, अन्य किसी तरीके से तो यह संभव ही नहीं है। इसलिए एकमात्र करने योग्य कार्य है कि किसी भी प्रकार अपने पूरे अस्तित्व को, अपनी संपूर्ण सत्ता को भगवान् की ओर मोड़ कर उनके हाथों में सौंप दिया जाए।

 

....भगवान् यह सारा जगत् जो कुछ है वह सब, और इस जगत् में जो कुछ है वह सब और इस जगत् से अधिक भी जो कुछ है वह सब हैं। गीता सर्वप्रथम भगवान् की विश्वातीत सत्ता पर बल देती है। क्योंकि, अन्यथा बुद्धि अपने सर्वोच्च लक्ष्य को चूक जाएगी और केवल विश्वमय सत्ता की ओर हो मुड़ी रहेगी या फिर जगत् में स्थित भगवान् की किसी आंशिक अनुभूति से हो आसक्त रहेगी। इसके बाद गीता भगवान् की उस विश्वसत्ता पर बल देती है जिसमें सब कुछ गति और कर्म करता है। क्योंकि यही जगत्प्रपंच का औचित्य है और वही विस्तृत आध्यात्मिक आत्म-बोध की स्थिति है जिसमें भगवान् अपने-आप को काल-पुरुष के रूप में देखते हुए अपना जगत्कर्म करते हैं। इसके बाद, गीता ने कुछ तीव्र बल के साथ भगवान् को मानव शरीर में दिव्य निवासी के रूप में स्वीकार करने का आग्रह किया है। क्योंकि, वे सब भूतों में अंतर्यामी पुरुष हैं, और यदि अंतर्व्याप्त भगवत्ता को स्वीकार किया जाए तो केवल वैयक्तिक जीवन का भागवत् अभिप्राय ही समझ में नहीं आएगा, अपितु अपनी परम आध्यात्मिक भवितव्यता की ओर हमारी तीव्र इच्छा अपनी महत्तम शक्ति ही खो बैठेगी, और मानवता के अंदर आत्मा का आत्मा से परस्पर-सम्बन्ध क्षुद्र, अतिसीमित और अहंकारमय ही बना रहेगा। अन्ततः, गीता विस्तारपूर्वक विश्व में सभी पदार्थों में दिव्य अभिव्यक्ति पर बल देती है और जो कुछ भी है उस सब की उन्हीं एकमेव भगवान् की प्रकृति, शक्ति और ज्योति से उद्भूत होने की पुष्टि करती है। क्योंकि भगवद्-ज्ञान हेतु ऐसी दृष्टि भी अत्यंत आवश्यक है; इसी के ऊपर संपूर्ण सत्ता का और समस्त प्रकृति का भगवान् की ओर पूर्ण रूप से मुड़ना आधारित है...

 

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परम् पुरुष परमेश्वर, विश्वचेतना के पीछे अक्षर आत्मा, मानव आधार में स्थित व्यष्टिगत-ईश्वर और विश्व-प्रकृति तथा उसके सब कर्मों और प्राणियों में गुप्त रूप से चेतन अथवा अंशतः आविर्भूत ईश्वर, ये सब एक ही सद्वस्तु, एक ही भगवान् हैं। परन्तु इस एक ही भगवद् सत्ता के ये जो विभिन्न भाव हैं इनमें से किसी भी एक भाव का जो यथार्थ वर्णन हम पूर्ण विश्वास के साथ कर सकते हैं उसे जब भगवद् सत्ता के अन्य भावों पर घटाने का प्रयत्न करते हैं तब वह वर्णन उलट जाता या उसका अभिप्राय बदल जाता है।... यह एक ऐसी बात है जिसे हमें गीता में स्पष्टतया देखनी होगी; एक ही सत्य के ये जो विभिन्न भाव सम्बन्ध-भेद और उसके प्रयोग-भेद से हुआ करते हैं, इनके लिए अपने विचार में अवकाश रखना होगा। अन्यथा हमें परस्पर विरोध' और विसंगति ही दिखाई पड़ेगी जहाँ कि ऐसी कोई विषमता है ही नहीं अथवा दिखने में पहेलीनुमा वचन लगते हैं उनसे अर्जुन की तरह हम भी भ्रमित है जाएँगे।

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना

मत्स्थानि सर्वभूतानि चाहं तेष्ववस्थितः ।। ४।।

 

. मेरे द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् मेरी सत्ता की अकथनीय गुह्यता में विस्तृत हुआ है; समस्त भूत मेरे भीतर स्थित हैं किंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

 

भगवान् की परम् सत्ता अभिव्यक्ति के परे हैः उनकी सच्ची नित्य मूर्ति जड़तत्त्व में व्यक्त नहीं होती, ही वह प्राण की पकड़ में आती है, वह मन के द्वारा संज्ञेय या चिन्त्य है, अचिन्त्यरूप, अव्यक्तमूर्ति। हम जो देखते हैं वह तो केवल एक स्वरचित 'रूप' है, वह भगवान् का सनातन 'स्वरूप' नहीं है। जगत् से भिन्न ऐसा कोई या ऐसा कुछ है, जो व्यक्त नहीं किया जा सकता, जो कल्पनातीत, अनिर्वचनीय रूप से अनन्त भगवत्ता है जो अनन्तता के विषय में हमारे विशालतम अथवा सूक्ष्मतम विचार लेशमात्र भी आभास प्राप्त कर सकें उससे भी परे है। पदार्थों का यह समस्त ताना-बाना जिसे हम जगत् का नाम दे देते हैं, गति की यह समस्त अतिविशाल राशि जिसकी हम कोई सीमाएँ नहीं बाँध सकते... उसे अपनी अनिर्वचनीय विश्वातीत गुह्यता पर प्रतिष्ठित इसी सर्वोच्च अनन्त सत्ता ने बुना है, रूप दिया है और विस्तारित किया है। यह एक ऐसे आत्म-निरूपण या आत्म-रूपायन पर प्रतिष्ठित है जो स्वयं अव्यक्त और अचिंत्य है। यह सदा परिवर्तनशील और गतिशील संभूति का समूह, ये सब जीव, भूत, पदार्थ, साँस लेते और जीवित रूप, ये सभी समूहगत रूप से या फिर अपनी पृथक् पृथक् सत्ता में भी उन भगवान् को समाहित नहीं कर सकते। वे (भगवान्) उनमें नहीं हैं; उनके अन्दर या उनके द्वारा नहीं जीते, चलते या अस्तित्वमान बने रहते हैं - भगवान् संभूति नहीं हैं। अपितु वे भूत आदि ही उनके अन्दर हैं, वे ही उनके अन्दर जीते, चलते और उन्हीं से अपने स्वरूप का सत्य प्राप्त करते हैं; भूत उनकी संभूति हैं और वे उनकी आत्मसत्ता हैं। अपनी सत्ता को अचिंत्य देश-कालातीत अनंतता में उन्होंने एक असीम देश और काल में एक असीम संसार का यह छोटा-सा दृश्य फैलाया है।

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यह जगत् एक आध्यात्मिक विरोधाभास है,

जो 'अदृष्ट' के अंदर एक आवश्यकता द्वारा रचा गया है,

जो प्राणी के इन्द्रियबोध के लिए उस 'तत्' का

विरूपित रूप है, जो सदा विचार और वाणी से परे है,

उसका प्रतीक है जिसे कभी प्रतीक में व्यक्त नहीं किया जा सकता,

एक ऐसी भाषा जो अशुद्ध-उच्चारित, अशुद्ध-वर्तनी है,

परंतु है फिर भी सत्य।

 

 

जब भगवान् कहते हैं कि भूत उनमें स्थित हैं परंतु वे भूतों में स्थित नहीं हैं तो इसका वास्तव में अर्थ क्या है? हमारे वैदिक ऋषियों को इस बात का भली-भाँति ज्ञान था कि जो कुछ भी गोचर होता है वह आया तो परमात्मा से ही है अतः जिस प्रकार हम किसी धागे को उसके किसी एक छोर से पकड़ कर चलें तो दूसरे छोर तक पहुँच सकते हैं, उसी प्रकार यदि हम इस जड़ तत्त्व को पकड़ कर चलें तो इसके मूलस्रोत तक पहुँचा जा सकता है। यह तो एक तर्कसम्मत बात है कि चूँकि परमात्मा ने ही अधिकाधिक स्थूल बनते-बनते हमारा यह वर्तमान रूप धारण किया है इसलिए अवश्य ही इसके अधिकाधिक सूक्ष्म स्तरों पर जाने से हम पुनः स्रोत तक पहुँच सकते हैं। अतः सभी चीजें भगवान् में ही हैं। परंतु भगवान् उनमें नहीं हैं, इस बात को कैसे समझा जाए? इसका अर्थ है कि भगवान् की अभिव्यक्ति का हम जितना गहरे से गहरा, विशाल से विशाल अर्थ भी लगाएँ तो भी भगवान् का स्वरूप उसकी पकड़ में नहीं सकता। ऐसा नहीं है कि भगवान् इस सब में नहीं हैं, परंतु हम इसको जो कुछ भी समझते हैं, ऊँची से ऊँची चेतना के द्वारा भी हम इसका जो भी अर्थ लगा सकते हैं उसमें परमात्मा का एक क्षुद्र अंश भी पकड़ में नहीं आता। उनका स्वरूप तो अचिंत्य है। इसीलिए सारा निरूपण करने के बाद भी हमारे सद्ग्रंथ उनके स्वरूप के विषय में 'नेति नेति' ही कहते हैं। गीता भी उसी वैदिक सत्य को प्रतिध्वनित करती है कि भले ही सभी कुछ परमात्मा से ही निःसृत हुआ है, यही नहीं, बल्कि सभी कुछ परमात्मा स्वयं ही हैं परंतु फिर भी उससे परमात्मा को सीमित नहीं किया जा सकता। भले ही परमात्मा उस पदार्थ में हैं परंतु जिस दृष्टि से हम उन्हें उसमें देखते हैं उस दृष्टि से वे सीमित नहीं हो जाते। इस तरह से देखने से हमें दोनों विरोधाभासी प्रतीत होने वाली बातों के पीछे का औचित्य समझ में आने लगता है।

 

मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्

भूतभृन्न भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ।। ५।।

 

. और फिर भी समस्त भूत मुझ में स्थित नहीं हैं, मेरे दिव्य योग को देख; मेरा आत्मा समस्त भूतों का सृष्टिकर्ता और उनका धारक है, किन्तु उनमें स्थित नहीं है।

 

विश्वातीत परमेश्वर के नाते भगवान् भूतों में नहीं हैं, और भूत उनमें हैं; क्योंकि आत्मसत्ता और भूतभाव में हम जो भेद करते हैं वह केवल दृश्य जगत् के अंदर अभिव्यक्ति पर ही लागू होता है। विश्वातीत सत्ता में सब कुछ शाश्वत आत्मसत्ता है और यदि वहाँ भी कोई बहुत्व हुआ तो, वे सब भी शाश्वत आत्मसत्ताएँ हैं। और ही वहाँ देश में निवास करने का विचार ही उत्पन्न हो सकता, क्योंकि विश्वातीत निरपेक्ष सत्ता देश और काल की धारणाओं से, जो कि यहाँ प्रभु की योगमाया द्वारा रचे गए हैं, प्रभावित नह होती। कोई देश-काल मर्यादित नहीं अपितु एक आध्यात्मिक सह-अस्तिल एक आध्यात्मिक सारूप्य और सहस्थिति ही वहाँ मूल आधार होने चाहिए। परन्तु इसके विपरीत, वैश्विक अभिव्यक्ति में परम अव्यक्त विश्वातीत पुरुष के द्वारा देश और काल के अन्दर विश्व का विस्तार है, और उस विस्तार में पहले एक आत्मतत्त्व के रूप में प्रकट होते हैं जो 'भूतभृत्' है अर्थात् सर भूतों को धारण करता है, वह उन्हें अपनी सर्वव्यापक आत्मसत्ता में धारण करता है। और यहाँ तक कि, इस सर्वत्रव्यापी आत्मा के द्वारा परम् पुरुष परमात्मा भी इस जगत् को धारण किये हुए हैं ऐसा कहा जा सकता है, वे इसके अदृश्य आध्यात्मिक मूल और सब भूतों की अभिव्यक्ति के गुप्त आध्यात्मिक कारण हैं। वे जगत् को उसी प्रकार वहन किये हुए हैं जिस प्रकार हमारे अंदर की गुप्त आत्मा हमारे विचारों, कर्मों और गतिविधियों को वहन करती है। वे मन, प्राण और शरीर में व्याप्त होते और इन्हें अपने में समाहित रखते, उन्हें अपनी उपस्थिति से धारण करते हुए प्रतीत होते हैं: परन्तु स्वयं यह व्याप्ति चेतना की एक क्रिया है, भौतिक की नहीं; स्वयं शरीर केवल आत्मा की चेतना की ही एक सतत् क्रिया है।

 

प्रश्न : प्रभु की योगमाया का क्या अर्थ है?

 

उत्तर : जब हम कहते हैं कि प्रभु की सत्ता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है और केवल उन्हीं का ही अस्तित्व है और फिर भी हमें अपनी इंद्रियों आदि के माध्यम से बाहरी चीजों की जो प्रतीति होती है वही तो माया है। उदाहरण के लिए, यदि बहुत सारे समानांतर दर्पणों में किसी एक ही व्यक्ति के बहुत सारे प्रतिबिंब दिखने लगें और जिस व्यक्ति को दर्पण का ज्ञान हो वह तो उन सब प्रतिबिंबों को देखकर भ्रमित ही हो जाएगा। कितने ही पशु-पक्षियों को हम देखते हैं जिन्हें दर्पण का ज्ञान नहीं होता और वे अपने ही प्रतिबिंब से लड़ते-लड़ते स्वयं को क्षति पहुँचाते हैं। वैसे ही, यदि व्यक्ति परमात्मा के अतिरिक्त अपने परिवार, भाई-बहन, मित्र, आदि के मोह में फंसकर उनको यथार्थ समझ लेता है तो यह माया ही है। हमारे सारे शास्त्र यही बात कहते हैं कि परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ भी देखना माया है। इसीलिये भगवान् कहते हैं कि 'मम माया दुरत्यया' अर्थात् मेरी माया को कोई अतिक्रम नहीं कर सकता। केवल जो भगवान् की भक्ति करके उन्हें प्राप्त करते हैं वे ही उस माया से बच सकते हैं। यदि व्यक्ति यह सोचे कि वह किसी तरकीब से इस माया से बच जाएगा तो वह और भी अधिक माया में फँस जाता है इसलिए बिना भगवान् की भक्ति किए माया को कभी नहीं जीता जा सकता। एक कथा में ऐसा वर्णन आता है कि एक बार अर्जुन ने भगवान् से उनकी माया दिखाने का आग्रह किया तो उन्होंने उसे अवसर की प्रतीक्षा करने के लिए कहा। एक बार जब दोनों यमुना जी में स्नान करने के लिए गए तो अर्जुन ने पहले भगवान् को स्नान करने के लिए कहा। भगवान् ने स्नान किया और ऊपर आकर अपनी धोती बाँधते हुए उन्होंने अर्जुन को भी स्नान करने के लिए भेज दिया। अर्जुन जैसे ही जल के भीतर गया वैसे ही उसे महसूस हुआ कि कुछ लोग उसे पकड़कर ले गए हैं और यमुना जी में ही उसे किसी देश का राजा बना कर उसका विवाह कर दिया है। इसके बाद अर्जुन ने वहीं सारे भोग-विलास किए और उसके भरा पूरा परिवार हो गया। और इस बीच उसने अन्य कई राजाओं से युद्ध कर उन्हें पराजित भी किया। इस तरीके से वह बहुत बड़ा शासक बन गया, और उसने अनेक यज्ञ आदि भी किए। एक दिन अचानक जब उसे भगवान् की याद आई तो वह यमुना जी से ऊपर आया और उसने देखा कि भगवान् तो अभी अपनी धोती ही बाँध रहे थे। तब भगवान् ने उसे समझाया कि यही माया है। न्यूनाधिक हम सभी के साथ भी यही है। हम अपने मूल स्वरूप को भूल बैठे हैं और इन प्रतीतियों को ही सत्य मानकर इन्हें अपना परिवार आदि कहकर इन्हीं में अतिशय रूप से आसक्त रहते हैं।

 

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्

तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ।। ६॥

 

. जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त महान् वायुतत्त्व आकाशतत्त्व में रहता है, उसी प्रकार समस्त भूत मुझमें रहते हैं, इसको तुम्हें इस प्रकार समझना है।

 

यह दिव्य परमात्मा सभी भूतों को समाविष्ट रखता है; सभी उनमें अवस्थित हैं, वस्तुतः जड़ रूप से नहीं, अपितु आत्मसत्ता के उस विस्तृत आध्यात्मिक आधान के रूप में जिसके संबंध में एक भौतिक और आकाशीय विस्तार की हमारी अत्यंत सख्त या संकुचित धारणा उस तत्त्व का केवल भौतिक मन और इन्द्रियों की भाषा में अर्थ लगाना है। वास्तव में यहाँ भी सभी कुछ आध्यात्मिक सह-अस्तित्व, सारूप्य और सहस्थिति है; पर वह एक ऐसा मूलभूत सत्य है जिसे हम तब तक लागू नहीं कर सकते जब तक कि हम उस परम चेतना तक पुनः नहीं जा पाते। तब तक ऐसा विचार केवल एक ऐसी बौद्धिक अवधारणा ही रहेगा जिससे हमारे व्यावहारिक अनुभव का मेल नहीं होता। अतः देश-काल में परस्पर संबंध के इन शब्दों का प्रयो मेल नहुए हमें कहना होगा कि यह जगत् और इसके सब प्राणी कि स्वतःस्थित सत्ता में वैसे ही रहते हैं जैसे अन्य सभी कुछ आकाश के के स्वतःरिश में रहता है.. आत्मा इन सब भूतों में या इनमें से किसी में भी का नहीं करती: कहने का अभिप्राय है कि, वह किसी पदार्थ द्वारा समाविष्ट से है, - ठीक वैसे ही जैसे आकाश यहाँ किसी रूप में समाविष्ट नहीं है, पद्म सभी रूप मूलभूत रूप से आकाश से ही उत्पन्न होते हैं। और ही वह सर्व भूतों के सम्मिलित रूप के द्वारा ही उनमें समाविष्ट या उनसे संघटित होती है। - ठीक वैसे ही जैसे आकाश वायुतत्त्व के गतिमान विस्तार के अन्दर समाचि नहीं होता वायु के सब रूप या शक्तियाँ आकाश को संघटित ही का सकती हैं।

 

यहाँ बुद्धि के लिए उन विरोधाभासी बातों की गुत्थी को खोल दिया गया है। जैसे किसी चित्रकार की चेतना में अनंत चित्र एक ही साथ विद्यमान हो सकते हैं उसी प्रकार दिव्य परमात्मा में सभी भूतों का, सभी कुछ का आध्यात्मिक सह-अस्तित्व, सारूप्य और सहस्थिति है। सभी उनमें एक ही साथ अस्तित्वमान हैं और उन्हीं के स्वरूप के हैं। परंतु देश-काल से बद्ध होने के कारण हम देश-काल से परे किस प्रकार सभी चीजें सह-अस्तित्व में रह सकती हैं इसकी कल्पना तक भी नहीं कर सकते। जैसे कि, मानसिक स्तर पर भी हम समझ सकते हैं कि किसी कवि के मस्तिष्क में असंख्यों कविताएँ सह-अस्तित्व में हो सकती हैं, किसी चित्रकार के मस्तिष्क में अनेकानेक चित्र एक-साथ हो सकते हैं, परंतु जिसे इसका भान हो वह तो यही सोचेगा कि सभी भिन्न-भिन्न कविताओं या चित्रों के लिए कवि या कलाकार के मस्तिष्क में भिन्न-भिन्न हिस्से बने हुए होंगे। परंतु मानसिक स्तर पर भी हम इस बात का बेतुकापन समझ सकते हैं क्योंकि हमें एक ऐसी मानसिक चेतना का अनुभव है जिसमें कि अनेकानेक चित्र या कविताएँ या अन्य रचनाएँ पूरी की पूरी एक साथ विद्यमान रह सकती हैं, उसी प्रकार दिव्य परमात्मा को चेतना में सभी कुछ का सहज रूप से आध्यात्मिक सह-अस्तित्व, सारूप्य और सहस्थिति है।

 

इसी को समझाने के लिए वर्तमान संदर्भ में आकाश-तत्त्व का उदाहरण दिया गया है। यदि हम आत्म-तत्त्व को आकाश-तत्व मानें तो उस आकाश तत्त्व के बिना तो किसी चीज का कोई अस्तित्व हो ही नहीं सकता। सारी ही चीजों का अस्तित्व आकाश के अन्दर होता है। पर उन चीजों में स्वयं में भी खाली जगह या फिर आकाश तत्त्व होता है। हमारे शरीर के अंदर और बाहर भी आकाश तत्त्व है, वैसे ही जैसे कि घट आकाश तत्त्व में है और उसके अंदर भी आकाश तत्त्व विद्यमान है। जब हम कहते हैं कि मनुष्य के अंदर परमात्मा व्याप्त हैं तो वे उसी तरह उसमें व्याप्त हैं जिस प्रकार घट में आकाश तत्त्व विद्यमान होता है। परंतु जिस प्रकार वह आकाश तत्त्व घट से सीमित नहीं हो जाता और सारे घट मिलकर भी आकाश तत्त्व को अपने में समाहित नहीं कर सकते उसी प्रकार परमात्मा हमारे अंदर व्याप्त होते हुए भी हमसे सर्वथा परे हैं। और जिस प्रकार घट से आकाश तत्त्व का निर्माण नहीं हो सकता, वह तो घट में व्याप्त होते हुए भी उससे एक स्वतंत्र तत्त्व होता है उसी प्रकार हममें व्याप्त होने पर भी परमात्म तत्त्व हमसे सर्वथा परे और स्वतंत्र होता है। इस प्रकार, घट और आकाश सर्वथा भिन्न-भिन्न तत्त्व हैं। इसी उदाहरण को हम परमात्म तत्त्व और हमारे बीच लागू कर के समझ सकते हैं कि भले ही हम उस तत्त्व से बने हैं और उसी में निवास कर रहे हैं और हमारे अंदर वह तत्त्व विद्यमान है, तो भी वह तत्त्व हमसे सर्वथा भिन्न, स्वतंत्र और परे भी है। इसीलिए हम कितना भी ऊँचे से ऊँचा अनुमान क्यों लगाएँ, तो भी उससे परमात्मा कभी सीमित नहीं हो जाते और ही यह सृष्टि उन्हें पूर्ण रूप से कभी अभिव्यक्त ही कर सकती है। और चूंकि यह कभी पूर्ण रूप से उन्हें अभिव्यक्त नहीं कर सकती इसी कारण यह उत्तरोत्तर विकसित होती रहती है, अधिकाधिक पूर्ण बनती रहती है। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि परमात्मा को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त किया जा सके। पराप्रकृति अपनी पूरी सामर्थ्य लगाती है कि परमात्मा को अभिव्यक्त कर दे और इसके लिए वह असंख्यों ब्रह्माण्डों का निर्माण करती है, अनेकानेक स्तरों का सृजन करती है, नानाविध आयामों का निर्माण करती है तो भी परमात्मा उन सब में से बच निकलते हैं। इसी कारण हमें इस प्रकार की अद्भुत सृष्टि गोचर होती है जिसमें रूप तो सारे परमात्मा के ही हैं परंतु फिर भी परमात्मा उनसे सर्वथा परे हैं।

 

अब यदि हम परमात्मा की किसी ऐसे अनंत आयामी तत्त्व के रूप में परिकल्पना करें जिनके आयामों का कोई अंत नहीं है तो अभिव्यक्ति में तो वे किसी भी आयाम को मनचाहे क्रम से अभिव्यक्त कर सकते हैं और इस क्रम को हम काल की संज्ञा दे देते हैं जबकि अपने आप में तो उस तत्त्व में सभी आयाम साथ-साथ ही विद्यमान होते हैं। अतः देश और काल के अंदर शाश्वत के भिन्न-भिन्न गुण, भिन्न-भिन्न रूप अपने आप को प्रकट करते रहते हैं और जिसका जिस प्रकार का इंद्रिय-गठन होगा वैसा ही लोक उसके लिए प्रकट हो जाएगा। मनुष्यों की इंद्रियों से एक प्रकार को सृष्टि गोचर होती है, देवताओं, गंधर्वो, यक्षों आदि की भिन्न-भिन्त्र इंद्रियों से उनके अनुसार सृष्टि और लोक गोचर होते हैं, जबकि वास्तव में सभी एक ही तत्त्व को तो देख रहे होते हैं। यह तो वैसे ही है जैसे भगवान् श्रीरामचन्द्रजी को स्वयंवर के समय सब भिन्न-भिन्न भाव और रूप में देख रहे थे। जानकी जी उन्हें एक रूप में देख रही थीं, जनक जी दूसरे रूप में देख रहे थे, अन्य राजागण उन्हें बिल्कुल दूसरे ही रूप में देख रहे थे। अतः जिसकी जैसी भावना थी उसे वैसा ही रूप गोचर हो रहा था। इसी प्रकार परम सद्वस्तु 'एकमेवाद्वितीयम्' है और सभी उसी का दर्शन कर रहे हैं परंतु कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि स्वयं उसी का दर्शन ही पूर्ण है। सभी के दर्शनों को मिलाकर भी उस सद्वस्तु को पकड़ा नहीं जा सकता। यही बात भगवान् गीता में कह रहे हैं कि वे सब के अंदर स्थित भी हैं और किसी में भी स्थित नहीं है और सब कुछ से परे भी हैं। क्योंकि अपने आप में वह परमात्म तत्त्व तो सब कुछ से सर्वथा परे है और हम उस तत्त्व के क्या-क्या रूपक बनाते हैं उससे उसकी सत्ता को कोई फर्क नहीं पड़ता। जब निश्चेतन से लेकर अतिचेतन तक चेतना की अनंत श्रेणियाँ हैं और उन सब पर नानाविध अभिव्यक्तियाँ हैं और सभी दर्शन उन्हीं एक परमात्मा का ही करते हैं तो भी सभी दर्शनों में कितना अनंत वैविध्य हो गया है। साथ ही, जिस रूप का वे दर्शन करते हैं वह भी नित परिवर्तनशील, विकसनशील है जो कभी अपने आप को उसी रूप में पुनरावर्तित नहीं करता। इस प्रकार इस सब अनंत विविधता की तो हमारी चेतना में कल्पना करना भी संभव नहीं है।

 

अब इस विषय में एक अन्य आयाम का समावेश करते ही यह सारा परिदृश्य और भी जटिल बन जाता है। जिन अनंत श्रेणियों पर हम अनेकानेक अभिव्यक्तियों की बात कर रहे हैं वे सब परमात्मा स्वयं ही बने हैं और स्वयं ही अपना दर्शन या अवलोकन कर रहे हैं। इसीलिए हमारे वैदिक ऋषि कहते थे कि वास्तव में किसी चीज का सृजन नहीं होता। इसलिए वे इस सृष्टि को लोक कहते थे अर्थात् जैसा अवलोकन होगा वैसा ही हमें गोचर होगा। वही सृष्टि जिस रूप में किसी एक मनुष्य को गोचर होगी वैसी किसी कीट-पतंगे को नहीं होगी। और विभिन्न मनुष्यों को भी उनकी चेतना के अनुसार वह भिन्न-भिन्न गोचर होगी। साथ ही, किसी व्यक्ति-विशेष को भी उसकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न प्रतीत होगी। सांख्य इसका बड़े ही सटीक रूप से कारण बताता है कि क्यों हमें अपने मनोवैज्ञानिक गठन के अनुसार भिन्न-भिन्त्र चीज गोचर होती है। देवताओं का मनोवैज्ञानिक गठन भिन्न प्रकार का होने के कारण उन्हें जगत् भिन्न प्रकार का प्रतीत होता है। इसलिए, सभी केवल देखने के तरीके मात्र ही रह जाते हैं, उससे अधिक कुछ नहीं।

 

भौतिक रूप से लगभग समान ही इंद्रियाँ होने पर भी प्रत्येक मनुष्य को एक भिन्न जगत् दिखाई देता है क्योंकि इंद्रियाँ मनस् को और मनस् बुद्धि को सूचना प्रदान करता है और वहीं से पूरे दृश्य का निर्माण होता है। यह चीज तब बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है जब हम किसी एक ही घटना का वृत्तांत दो विपरीत दृष्टिकोण के व्यक्तियों से सुनते हैं या किन्हीं दो बालकों की लड़ाई का ब्यौरा उनकी अपनी-अपनी माताओं के द्वारा सुनते हैं। अब भले दोनों ही माताओं की भौतिक इंद्रियाँ उन्हें लगभग समान ही सूचना देती हों परंतु उस सूचना का उनका मनस् और उनकी बुद्धि जो बना देते हैं वह तो बिल्कुल ही भिन्न होता है। हमारे चित्त में अनेकानेक वृत्तियाँ जमा होती हैं। पहले तो स्वयं के अनेक जन्मों की संचित वृत्तियाँ या संस्कार होते हैं, फिर अपने जातिगत, राष्ट्रगत आदि संस्कार भी होते हैं। हमारा जो भी निर्णय होता है उसमें इन सभी चीजों का हस्तक्षेप रहता है और इसी कारण सब का अपना-अपना जगत् होता है। इस सब चर्चा से यह निष्कर्ष निकलता है कि भले ही हमें इतने अनंतविध रूप दिखाई देते हों परंतु हम निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते कि इनमें से कोई एक ही परमात्मा का सच्चा स्वरूप है। ये सारे ही रूप परमात्मा के होने के बावजूद भी कोई भी उन्हें पकड़ नहीं पाता और वे सदा इन सभी से सर्वथा परे रहते हैं। अब चूंकि परमात्मा किसी एक रूप से नहीं बंध जाते इसलिए भारतीय संस्कृति में पूजा-पद्धति के किसी भी रूप को कभी अस्वीकार नहीं किया गया। सभी को परमात्मा तक पहुँचने के संभव मार्गों के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है।

 

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्

कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ।। ७।।

 

. हे कौन्तेय! कल्प के अन्त में समस्त भूत मेरी दिव्य प्रकृति में लौट जाते हैं; कल्प के आदि में उन्हें मैं फिर सृष्ट (उत्पन्न) कर देता हूँ।

 

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः

भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ८॥

 

. अपनी स्वयं की प्रकृति पर आश्रित होकर (उसे बाध्य करके), मैं अनेकानेक भूतों को, जो असहाय रूप से 'प्रकृति' के नियन्त्रण के वशीपुर हैं, बार-बार सृष्ट करता हूँ।

 

गीता में भगवान् ने भूतों को उत्पन्न करने की और स्वयं के जन्म ग्रहण की प्रणाली बताई है। चौथे अध्याय के छठे श्लोक में वे कहते हैं कि "यद्यपि मैं अजन्मा हूँ, यद्यपि मैं अपनी आत्म-सत्ता में अविनाशी हूँ, यद्यपि मैं समस्त भूतों का ईश्वर हूँ, तथापि मैं अपनी प्रकृति के ऊपर अधिष्ठित होकर अपनी माया के द्वारा जन्म ग्रहण करता हूँ।" अपनी टीका में इस भेद को स्पष्ट करते हुए श्रीअरविन्द ने चौथे अध्याय में कहा था कि, "अब यह बात ध्यान देने योग्य है कि भाषा के एक हल्के से किन्तु फिर भी बड़े महत्त्वपूर्ण अंतर से गीता, समान ही रीति से, प्राणियों के सामान्य जन्म और एक अवतार के रूप में स्वयं के जन्म ग्रहण में भगवान् की क्रिया का वर्णन करती है। 'अपनी प्रकृति को वश में करके, प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य,' और बाद में कहते हैं, 'मैं इन प्राणियों के समूह को जो प्रकृति के वश में हैं अवशं प्रकृतेर्वशात्, उत्पन्न करता हूँ, विसृजामि ' और यहाँ कहते हैं कि, 'अपनी प्रकृति के ऊपर अधिष्ठित होकर मैं अपनी स्वयं की माया से जन्म लेता हूँ, प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय आत्ममायया, मैं अपने-आपको उत्पन्न करता हूँ, आत्मानम् सृजामि।

 

इसी दिव्य प्रकृति (प्रकृतिं मामिकाम्) की क्रिया में, भगवान् की निज प्रकृति (स्वां प्रकृतिम्) की क्रिया में जीव अपने भूतभाव के चक्र का अनुवर्तन करता है। उस प्रकृति के प्रगतिक्रम में होनेवाले दौरों या परिवर्तनों में जीव यह या वह व्यक्तित्व हो जाता है; उस दिव्य प्रकृति की एक अभिव्यक्ति के रूप में, चाहे उस प्रकृति की उच्चतर और प्रत्यक्ष गति में हो या उसकी निम्नतर और अप्रत्यक्ष गति में, चाहे अज्ञान में हो या ज्ञान में, जीव सदा ही अपने विशिष्ट स्वधर्म का पालन करता है; चक्र की गति पूरी होने पर प्रकृति अपनी प्रवृत्ति से निवृत्त होकर निश्चलता और निस्तब्धता को लौट जाती है। अज्ञान की दशा में प्रकृति के घूमते चक्रों के अधीन होता है, अपना स्वामी स्वयं नहीं होता अपितु प्रकृति के प्रभुत्व में रहता है, अवशः प्रकृतेर्वशात्, केवल दिव्य चेतना में सीटकर ही वह प्रभुता और मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

 

मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय

उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ।। ९।।

 

. और हे धनञ्जय! ये कर्म मुझे नहीं बाँधते क्योंकि इन कर्मों से अनासक्त हुआ मैं मानो उदासीनवत् इनके ऊपर स्थित हूँ।

 

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्

हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ।। १०।।

 

१०. हे कौन्तेय! मेरी अध्यक्षता के अंतर्गत प्रकृति समस्त चराचर भूतों को उत्पन्न करती है; और इसके कारण जगत् आवर्तनों में चलता रहता है।

 

भगवान् भी प्रकृति के इस आवर्तन का पालन करते हैं, उसके अधीन होकर नहीं अपितु उसकी अंतर्व्याप्त आत्मा तथा मार्गदर्शक के रूप में, उनकी सारी सत्ता इसमें सम्मिलित होती है, अपितु उनकी आत्मशक्ति प्रकृति का साथ देती और उसे आकार देती है। वे अपने ही प्रकृति-कर्म के अध्यक्ष होते हैं, - वे ऐसे जीव नहीं होते जो प्रकृति में जन्में हों अपितु वह सृजनशील आत्मा होते हैं जो प्रकृति से वह सब उत्पन्न करवाते हैं जो अभिव्यक्ति में नजर आता है। यदि अपनी आत्मशक्ति में वे प्रकृति के साथ-साथ होते हैं और उसकी सारी क्रियाएँ उससे कराते हैं, तो साथ ही वे उसके परे भी रहते हैं, मानो प्रकृति के सारे विश्वकर्म के ऊपर कोई अपने विश्वातीत प्रभुत्व में स्थित हो, किसी लिप्त करने वाली या वशीभूत करने वाली कामना के द्वारा वे प्रकृति से आसक्त नहीं हैं और इसलिए प्रकृति के कर्मों से बद्ध भी नहीं हैं, क्योंकि वे इन सब कर्मों से अनन्त रूप से परे हैं और उनसे श्रेष्ठ हैं, कालचक्रों में उनकी समस्त गति में उसके पहले, उसके मध्य में और अंत में वे समान ही रहते हैं। कालचक्रों के सभी परिवर्तनों से उनकी अक्षर सत्ता को कोई फर्क नहीं पड़ता। जो मौन आत्मा विश्व को व्याप्त और धारण करती है वह वैश्विक परिवर्तनों से प्रभावित नहीं होती; क्योंकि, यद्यपि वह इन्हें धारण करती है पर इनमें भाग नहीं लेती। यह महत्तम परम विश्वातीत आत्मा भी प्रभावित नहीं होती क्योंकि वह इनको अतिक्रम किये है और शाश्वत रूप से इनके परे है।

 

इसमें यह अक्षर पुरुष के भाव का वर्णन है। परंतु क्षर भाव और अक्षर भाव दोनों ही का संचालन भगवान् की पराप्रकृति करती है जो स्वयं ही जीव की अंतरात्मा के रूप में आविर्भूत होती है जो निम्न प्रकृति और पराप्रकृति के बीच की कड़ी का काम करती है। इस प्रकार की व्यवस्था हमें गोचर होती है। इस जगत् का निर्माण दो पक्षों के समागम से ही होता है - एक है पुरुष पक्ष जो कि अवलोकन करता है और दूसरी है प्रकृति जिसका कि पुरुष साक्षित्व करता है। इन दो के बिना कोई भी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। इनमें पुरुष तत्त्व को आत्म-तत्त्व का प्रतिनिधि कह सकते हैं और प्रकृति भगवान् की दिव्य प्रकृति की प्रतिनिधि है। इन दो के मिलन से ही कोई अभिव्यक्ति हो सकती है। यद्यपि हमारे इस सब वर्गीकरण से भगवान् बाध्य नहीं हो जाते, फिर भी इससे हमारी बुद्धि को कुछ सहारा मिल जाता है कि वह चीजों को कुछ अधिक समझ सके। अन्यथा भगवान् के विषय में तो निश्चयपूर्वक हम कह ही क्या सकते हैं।

 

परंतु इसके साथ ही, चूँकि यह कर्म भागवत् प्रकृति, स्वा प्रकृतिः, का कर्म है और भागवत् प्रकृति भगवान् से कभी पृथक् नहीं हो सकती, इसलिए जो कुछ भी वह सृष्टि करती है, भगवान् उसमें अवश्य अंतर्निहित होंगे। यह एक ऐसा सम्बन्ध है जो भगवान् की सत्ता का संपूर्ण सत्य नहीं है, परंतु यह कोई ऐसा सत्य भी नहीं है जिसकी हम उपेक्षा कर सकते हों। वे मानव शरीर में बसे हैं। जो उनकी उस उपस्थिति को अनदेखा करते हैं, जो उसके बाहर मुखौटों के कारण मानवरूप में स्थित भगवत्ता की अवमानना करते हैं, वे प्रकृति की बाह्य प्रतीतियों के द्वारा भ्रमित और विमूढ़ होते हैं और वे यह अनुभव नहीं कर सकते कि हमारे अंदर गुप्त रूप से भगवान् स्थित हैं, चाहे वे मानवता में सचेतन हों जैसे कि एक अवतार में या फिर अपनी माया द्वारा प्रच्छन्न हों। जो महात्मा हैं, जो अपने अहं के भाव के अन्दर कैद नहीं हैं, जो अपने-आप को अंतर्यामी भगवान् के प्रति उद्घाटित करते हैं, वे जानते हैं कि मनुष्य में निहित गूढ़ आत्मा, जो यहाँ सीमित मानव-प्रकृति से बद्ध प्रतीत होती है, वह वही अनिर्वचनीय ज्योति या तेज है जिसे हम इस मानव रूप के परे परम परमेश्वर के रूप में पूजते हैं। वे भगवान् की उस परम स्थिति के बारे में सचेतन हो जाते हैं जिसमें वे सब भूतों के स्वामी और प्रभु हैं और फिर भी वे प्रत्येक भूत में देखते हैं कि वे ही प्रत्येक के परम देव और अंतःस्थित भगवान् भी हैं। बाकी जो कुछ है वह विश्व में प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों को अभिव्यक्त करने के लिए आत्म-परिसीमन है। वे यह भी देखते हैं कि यह उन्हीं भगवान् की प्रकृति है जो विश्व में जो कुछ भी है वह सब कुछ वही बनी हुई है, इसलिए यहाँ जो कुछ है, आंतरिक यथार्थता में और कुछ नहीं केवल वही एक भगवान् हैं, सब कुछ वासुदेव हैं, और वे उन्हें केवल विश्व के परे रहनेवाले परमेश्वर के रूप में ही नहीं पूजते अपितु यहाँ इस जगत् में, उनके एकात्म सत्वा अखण्ड रूप में तथा प्रत्येक पृथक् पृथक् जीव में भी पूजते हैं। वे इस सत्य को देखते हैं, और इसी सत्य में रहते और कर्म करते हैं; वे उन्हीं को सब पदार्थों के परे स्थित परम तत्त्व के रूप में तथा जगत् में स्थित ईश्वर के रूप में, और जो कुछ है उसके अधीश्वर के रूप में पूजते हैं, उन्हीं में निवास करते और उन्हीं की सेवा करते हैं, उनकी वे यज्ञकर्मों के द्वारा सेवा करते हैं, ज्ञान के द्वारा उनकी खोज करते हैं और उनके अतिरिक्त और कुछ नहीं केवल उन्हें ही सर्वत्र देखते हैं और अपने जीवभाव में तथा अपनी बाह्य और आंतर प्रकृति में, दोनों ही प्रकार से अपनी सम्पूर्ण सत्ता को उन्हीं की ओर ऊपर उठाते हैं। इसे ही वे व्यापक, और बिल्कुल सही मार्ग मानते हैं; क्योंकि यही एकमेव परम तथा विश्वगत और व्यष्टिगत परमेश्वर के समग्र सत्य का मार्ग है।

 

महात्मा जन इसीलिए महात्मा कहे जाते हैं क्योंकि वे भगवान् के सत्स्वरूप को जानते हैं इसलिए भगवान् चाहे जिस किसी भी भेष में क्यों आएँ, वे बाहरी आवरण से विमोहित हुए बिना उनके वास्तविक स्वरूप को कुछ हद तक पहचान जाते हैं। चूंकि उनका माया का पर्दा हट चुका होता है इसलिए उन्हें परमात्मा के अचिंत्य रूप का भी आभास होता है और साथ ही हर छोटे से छोटे प्राणी में, यहाँ तक कि भौतिक पदार्थों में भी उन्हें प्रकट रूप में यह दिखाई देता है कि परमात्मा स्वयं ही उन सब रूपों में प्रकट हो रहे हैं इसलिए उन रूपों को वे अनदेखा नहीं करते और ही वे उन रूपों के आवरण से भ्रमित ही होते हैं जो प्रभु ने स्वयं के ऊपर डाल रखा है क्योंकि उस आवरण के पीछे वे उन परमात्मा का दर्शन कर लेते हैं और केवल वे उनका दर्शन ही करते हैं अपितु उनसे प्रेम भी करते हैं। और जो कोई चेतना की इस अवस्था में होगा वह तो 'सर्वभूतहितेरताः' सभी भूतों के हित में रत रहेगा ही, इसके अतिरिक्त तो वह और कुछ कर ही नहीं सकता। इसीलिये छठे अध्याय के इकतीसवें श्लोक में भगवान् कहते हैं कि जो योगी एकत्व भाव में स्थित होकर समस्त भूतों में मुझसे प्रेम करता है वह योगी चाहे जिस प्रकार रहे और कर्म करे मुझमें ही रहता और कर्म करता है। इस प्रकार यहाँ महात्माओं और ऋषियों की स्थिति का वर्णन है। वे परमात्मा का उनके सत्स्वरूप में भी दर्शन करते हैं और इस प्रकृति के अंदर जो अभिव्यक्त रूप उन्होंने धारण किये हैं उनमें भी वे उन्हीं परमात्मा का ही दर्शन करते हैं। वास्तव में तो परमात्मा स्वयं को ही तो देख रहे हैं क्योंकि उनके अतिरिक्त तो अन्य कोई सत्ता है ही नहीं। वे स्वयं ही प्रकृति हैं और स्वयं ही पुरुष हैं जो स्वयं का ही साक्षित्व करते हैं। परंतु हमारा जिस प्रकार का ताना-बाना बना हुआ है उसमें हमारी इंद्रियाँ हमें इतने सारे रूप दिखाती हैं और उन रूपों के पीछे के एकत्व को, उन परमात्मा को चूक जाती हैं। परंतु महात्मा जन अपनी इन इंद्रिय सीमाओं को तोड़कर बाह्य प्रतीतियों के पीछे प्रभु की झलक पा लेते हैं। वे अपने परम् प्रिय को सर्वत्र देखते हैं इसलिए उन्हें कोई भय नहीं रहता।

vi.31

 

गीता वर्तमान प्रसंग में जिस चीज का वर्णन कर रही है वह कोई केवल एक दार्शनिक या तत्त्वसंबंधी बात ही नहीं अपितु भावात्मक बात भी है। इससे तो सारे जीवन का स्वरूप ही बदल जाता है। गीता इन्हीं भावात्मक तत्त्वों का अधिकाधिक निरूपण करती जाएगी क्योंकि अब वह भक्तियोग की ओर मुड़ती जा रही है। पहले छः अध्यायों में कर्म और ज्ञान का समन्वय और उसके बाद सातवें अध्याय में ज्ञान और भक्ति का समन्वय साधने के बाद अब आगे गीता कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों का समन्वय साधने की ओर अग्रसर हो रही है। भगवान् कहते हैं कि जो कर्म उनके लिए और उनकी भक्ति के रूप में किये जाते हैं वे ही सच्चे कर्म हैं बाकी सारे तो अकर्म हैं। जब व्यक्ति अपने आप को पृथक् समझकर अहमात्मक चेतना से कर्म करता है तब वह कर्म करके अकर्म ही करता है। कर्मयोग तो केवल वही है जो प्रभु से प्रेम के कारण किया जाता है। हमारे श्रीअरविन्द आश्रम का आधार ही यही है कि श्रीमाताजी से प्रेम के वशीभूत हो कार्य करना।

 

अतः, यही पूर्ण सत्य, उच्चतम और विस्तृततम ज्ञान है। भगवान् विश्वातीत हैं, सनातन परब्रह्म हैं, जो अपनी देशकालातीत सत्ता से, अपनी स्वयं को सत्ता और प्रकृति से इस सारी वैश्विक अभिव्यक्ति को देश और काल के अन्दर धारण करते हैं। वे ही वे परमात्मन् हैं जो जगत् के रूपों और गतियों को अंतरीय आत्मा हैं। वे ही पुरुषोत्तम हैं जिनका कि सब जीवात्मा और प्रकृति, सारा आत्मभाव और इस जगत् का या किसी भी जगत् का सारा भूतभाव आत्म-संकल्पन (self-conception) और आत्म-स्फूर्तिकरण (self- energising) है। वे ही सब भूतों के अनिर्वचनीय परमेश्वर हैं, जो प्रकृति में आविर्भूत हुई निज शक्ति को अपने आत्मिक नियंत्रण के द्वारा जगत् के चक्रों और उन चक्रों में प्राणियों के प्राकृत विकास में उद्घाटित करते रहते हैं। जीव. व्यष्टि पुरुष, प्रकृतिस्थ आत्मा, उन्हीं की सत्ता से अस्तित्वमान है, उन्हीं की चेतना के प्रकाश से सचेतन है, उन्हीं के संकल्प और शक्ति से जिसमें ज्ञान-शक्ति, इच्छाशक्ति और क्रियाशक्ति है, उन्हीं के दिव्य विश्वभोग से जो अस्तित्व का भोग करता है, और उन्हीं से इन विश्वचक्रों में आया है।

 

परमात्मा के ये चार रूप हैं : परंब्रह्म, परमात्मा, पुरुषोत्तम, परमेश्वर। हालाँकि ये सब हैं एक ही परंतु चार भिन्न क्रियाओं के अनुसार देखने के कारण हम उन्हें चार नाम दे देते हैं। जब उन्हें आत्मा के दृष्टिकोण से देखें तो वे परमात्मा हैं। जब सर्वस्थित ब्रह्म के रूप में जगत् की व्याख्या करें तो वे परंब्रह्म हैं। सबके नियंता ईश्वर के रूप में देखें तो वे परमेश्वर हैं और यदि सब कुछ का साक्षित्व करने वाले पुरुष के रूप में जगत् की व्याख्या करें तो वे पुरुषोत्तम हैं। इन्हीं की ओर समग्र रूप से चलने के लिए अब कर्म, ज्ञान और भक्ति के समन्वय को साधने का सूत्र दिया जा रहा है।

 

II. कर्म, भक्ति और ज्ञान

 

मनुष्य की अंतरात्मा यहाँ भगवान् का ही आंशिक आत्मप्राकट्य है, जो जगत् में भगवान् की प्रकृति के कर्मों के लिये स्वतः-सीमित हुई है, प्रकृतिर्जीवभूता। अपने आत्मतत्त्व में व्यक्ति भगवान् के साथ एक है।... प्रकृति की निम्नतर बाह्य-प्रतीति में एक प्रकार के अज्ञान और अहंकारमय पार्थक्य के कारण यह जीव 'एकमेव' से सर्वथा भिन्न प्रतीत होता है और इस पृथकात्मक चेतना में रहते हुए अपने अहंपरक सुख-भोग और जगत् में अपने व्यक्तिगत अस्तित्व और अन्य देहधारी मनों और प्राणों के साथ अपने बाह्य संबंधों की प्रयोजनसिद्धि के लिए ही चिंतन, इच्छा, कर्म करता और उसी में सुख-भोग लेता प्रतीत होता है। परन्तु वास्तव में उसकी सारी सत्ता, उसका सारा चिंतन, उसकी सारी इच्छा, कर्म और भोग भगवान् की सत्ता, भगवान् के विचार, संकल्प, कर्म और प्रकृति के भोग का ही एक प्रतिबिम्ब मात्र होता है - ऐसा प्रतिबिम्ब जो तब तक अहंकारमय और विकृत ही रहता है जब तक जीव अज्ञान में रहता है। अपने-आप के इस सत्य पर लौटना, इसे पुनः प्राप्त कर लेना ही उसकी मुक्ति का सीधा साधन है, अज्ञान की दासता से छूट निकलने का उसके लिए यही सबसे विशालतम और निकटतम द्वार है। चूँकि वह एक आत्मा है, एक ऐसी अंतरात्मा जो मन और तर्कशक्ति की, इच्छाशक्ति और ऊर्जस्वी कर्म की, भावना और संवेदना की तथा अस्तित्व का आनन्द पाने की प्राण की कामना की प्रवृत्ति से युक्त है, अतः इन्हीं सब शक्तियों को भगवन्मुखी कर देने से उसके लिए अपने परम सत्य पर पुनः लौटना पूर्णतया संभव हो सकता है। उसे परमात्मा और ब्रह्म के ज्ञान से जानना होगा; उसे अपनी प्रेम-भक्ति और आराधना परम् पुरुष की ओर मोड़ देनी होगी; उसे अपने संकल्प और कर्मों को परम जगदीश्वर के अधीन करना होगा। तब वह निम्न प्रकृति से दिव्य प्रकृति की ओर अग्रसर होता है

vii-5

 

प्रश्न : मन और प्राण के बाह्य संपकों और संबंधों को किस प्रकार त्यागा जाए जिनमें कि हम सब समय लिप्त रहते हैं और जिसके कारण हम वास्तविक चीज को अनदेखा कर देते हैं?

 

उत्तर : इन्हें छोड़ा नहीं जा सकता अपितु दूसरी दिशा में मोड़ना पड़ता है। कर्मप्रधान व्यक्ति अपने कर्मों को अधिकाधिक भगवान् के निमित्त करने का प्रयास करता है। ज्ञानमार्गी ध्यान-चिंतन, ब्रह्म की कल्पना, धारणा, तत्त्वचिंतन आदि अनेकानेक पद्धतियों का सहारा लेकर उन्हीं में लीन होने का प्रयास करता है और उस ओर अपनी सारी वृत्तियों को मोड़ने का प्रयास करता है। भावप्रधान व्यक्ति अपने भावों को उस ओर मोड़ने का प्रयास करता है। अपने गठन के अनुसार व्यक्ति किसी भी एक के सहारे अपनी गतियों को उस ओर मोड़ने का प्रयास करता है और धीरे-धीरे अन्य हिस्सों पर उसका प्रभाव फैलता जाता है जिससे कि अन्य हिस्से भी उस ओर मुड़ने लगते हैं। गीता सभी भागों को भगवान् की ओर मोड़ने की माँग करती है। गीता ने अपनी शिक्षा का आरंभ कर्मों को भगवन्मुख करने से किया और कर्मयोग का निरूपण किया। कर्म का निरूपण करते-करते गीता उसमें यह कहते हुए ज्ञान का समावेश करती है कि ज्ञान कर्मों से श्रेष्ठ है और उसी के द्वारा सच्चे कर्म किये जा सकते हैं। इस प्रकार गीता कर्म और ज्ञान का समन्वय साधती है। इनका निरूपण करते-करते वह इस बिन्दु तक पहुँचती है कि ज्ञानियों में भी जो भगवान् का भक्त है वही श्रेष्ठ है। इस प्रकार ज्ञान और कर्म में एक नए तत्त्व - भक्ति - का समावेश कर वह इन तीनों का समन्वय साधती है। मन की प्रवृत्ति है ज्ञान अर्जित करने की, इच्छा शक्ति की प्रवृत्ति है कुछ संसिद्ध करने की, अपने आप को परिपुष्ट करने की, और भावात्मक पक्ष की प्रवृत्ति है भावना के द्वारा आनंद प्राप्त करने की। पर इन सभी भागों में प्राण का प्रवेश होता है और वह इन सभी के माध्यम से सुख बटोरने की कोशिश करता है। आरंभ में जब व्यक्ति कुछ आस्तिक होता है और अपने से अतिरिक्त किसी उच्चतर विधान या किसी उच्चतर सत्ता को स्वीकार करता है तब वह अपने सुख की पुष्टि के लिए उसकी सहायता लेने के लिए उसकी ओर मुड़ता है। उसकी ओर मुड़ने में उसके अनेक हेतु हो सकते हैं। या तो वह अपने किसी संकट या समस्या के समाधान के लिए, अपने किसी हेतु या उद्देश्य की पूर्ति या सिद्धि के लिए या फिर किसी प्रकार की जिज्ञासा को शांत करने के लिए उसकी ओर मुड़ सकता है। आरंभ में इन किन्हीं भी हेतुओं से व्यक्ति भगवान् की ओर मुड़ता है और इस प्रकार यह आदान-प्रदान आरंभ हो जाता है और तब तक चलता रहता है जब तक कि व्यक्ति को यह अनुभव नहीं हो जाता कि भगवान् केवल किसी स्वार्थ सिद्धि हेतु ही निकट जाने योग्य नहीं हैं अपितु उनकी स्वयं की चाह रखना और उन्हें प्राप्त करना तो इन सब निम्न हेतुओं से अनंततः श्रेष्ठ, आनंददायक और तुष्टिप्रद है। इस प्रकार यह एक विकासक्रम है जिसमें आरंभ में व्यक्ति अपने अहं के अतिरिक्त अन्य किसी सत्ता को स्वीकार नहीं करता और केवल अपने पुरुषार्थ को ही अपने अहं की तुष्टि का एकमात्र साधन मानता है। उस अवस्था से कुछ विकसित होकर वह कुछ आस्तिक बनता है और अपने पुरुषार्थ के साथ ही साथ किसी अन्य विधान और सत्ता को भी स्वीकार करने लगता है और अपनी तुष्टि के लिए उसकी सहायता की पुकार करता है। धीरे-धीरे जब उसका आदान प्रदान उस सत्ता के साथ, भगवान् के साथ बढ़ता है तब वह उनके स्वरूप के विषय में कुछ अधिक सज्ञान होता है। और तब वह उनसे सुख खोजने की बजाय उन्हीं की सत्ता में आनंद लेने लगता है। उसे अपने सभी भागों की परिपूर्ति उन्हीं में अनुभव होने लगती है और वह यह जान जाता है कि सभी सुखों के मूलस्रोत केवल वे ही हैं इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि किन्हीं भी परोक्ष साधनों के माध्यम से सुख खोजने की चेष्टा करने की बजाय जो सच्चे आनंद के निधान हैं उन्हीं के पास जाया जाए, उन्हीं की सत्ता में गोता लगाया जाए। इसे ही सत्ता का समग्र रूप से भगवान् की ओर मुड़ना कहते हैं। परंतु यह समग्र मुड़ाव आरंभ में ही संभव नहीं होता क्योंकि हमारे अंदर अनेकानेक ऐसे भाग होते हैं जिनके अपने-अपने निहित निम्न उद्देश्य होते हैं और वे उन्हीं को पूरा करने की चेष्टा करते रहते हैं। परंतु यदि एक बार व्यक्ति में यह संकल्प जाए कि सब कुछ के बावजूद उसे अपने आप को भगवान् की ओर मोड़ना है तब फिर धीरे-धीरे आरोहण का मार्ग खुल जाता है। अतः एक बार जब व्यक्ति को भगवान् की सत्ता का कुछ स्पर्श प्राप्त हो जाए, उनका कुछ आस्वादन प्राप्त हो जाए तब फिर वह अधिकाधिक उन्हीं की ओर अपने सभी भागों को मोड़ने का प्रयास करने लगता है क्योंकि उनके अंदर उसे जो सुख, शांति, प्रकाश, प्रेम, आनंद, परिपूर्ति आदि प्राप्त होते हैं वे तो अन्य कहीं किसी चीज से उसे प्राप्त ही नहीं होते। परंतु इस अवस्था के बाद भी एक अवस्था है जहाँ व्यक्ति भगवान् में आनंद खोजने की बजाय उन्हीं का हो जाना चाहता है और अपनी संपूर्ण सत्ता को उन्हीं को समर्पित कर देता है ताकि वे उसका अपने संकल्प की अभिव्यक्ति के लिए जैसा चाहे वैसा उपयोग करें। यही पराभक्ति है। इसलिए जब कहते हैं कि 'योग भगवान् के हित किया जाता है' तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि हमें भगवान् प्राप्त हो जाएँ, अपितु यह होता है कि हम पूर्ण रूप से भगवान् के हो जाएँ और वे हमारी सत्ता का उपभोग करें। पराभक्ति में तो इतना शुद्ध भाव होता है कि वह अपनी निजी तुष्टि के विषय में तो कुछ सोच ही नहीं सकती। उसका भाव तो एकमात्र यह होता है कि उसके प्रेमास्पद उसका उपभोग करें और उसी में उसे परम आनंद की अनुभूति होती है। इस प्रकार ये सभी आरोहण की विभिन्न अवस्थाएँ हैं। परंतु वर्तमान में गीता हमारे सभी भागों को भगवान् की ओर मोड़ने की माँग करती है क्योंकि इसी मुड़ाव के द्वारा अज्ञान से मुक्ति हो सकती है।

 

जीव का भगवान् की ओर इस प्रकार सर्वभाव से मुड़ना ही गीता के ज्ञान, कर्म और भक्ति के समन्वय को शानदार ढंग से स्थापित करता है। इस प्रकार भगवान् को सर्वभावेन जानना उन्हें इस रूप में जानना है कि वे हो 'एकमेव भगवान्' आत्मा में हैं, समस्त अभिव्यक्ति में हैं और समस्त अभिव्यक्ति के परे हैं, - और यह सब वे एक ही साथ और एक ही समय में हैं। परन्तु फिर भी, उन्हें इस प्रकार जानना भी पर्याप्त नहीं होता जब तक कि उसके साथ-ही-साथ हृदय और अंतःकरण का तीव्र रूप से भगवन्मुख उत्थान हो जब तक कि वह एकनिष्ठ और साथ-ही-साथ सर्वसमावेशी प्रेम, भक्ति और अभीप्सा को प्रज्ज्वलित कर दे। निश्चय ही वह ज्ञान जो किसी अभीप्सा से युक्त हो, जो किसी उन्नयन से अनुप्राणित नहीं होता, वह कोई सच्चा ज्ञान नहीं है, क्योंकि वह तो केवल बौद्धिक रूप से देखने की क्रिया और व्यर्थ ज्ञान-संबंधी प्रयास मात्र ही हो सकता है। भगवान् का दर्शन अनिवार्य रूप से भगवान की भक्ति और उन्हें ढूँढ़ने की सच्ची लगन ले आता है, - अपने स्वयं-सिद्ध स्वरूप में ही भगवान् के लिए लगन नहीं अपितु उन भगवान् के लिए भी जो हमारे अन्दर हैं और उन भगवान् के लिए भी जो कि जो कुछ भी है उस सबके अन्दर हैं। बुद्धि से जानना केवल समझना है और यह एक कारगर आरंभ-बिंदु हो सकता है, - पर साथ ही, हो सकता है ऐसा हो. और अवश्य ही ऐसा नहीं होगा यदि उस ज्ञान में कोई सच्चाई हो, संकल्प में इसकी आंतरिक अनुभूति के लिए कोई उत्कण्ठा हो, अंतर्भाव में कोई शति हो, आत्मा के अन्दर कोई पुकार होः क्योंकि तब उसका अर्थ होगा कि मस्तिष्क ने केवल बाहरी रूप से ही समझा है, परंतु आंतरिक रूप से आत्मा ने कुछ नहीं देखा है। वास्तव में यदि हम अपनी स्थिति देखें तो हम पाएँगे कि हम अधिकांशतः अपने कामपुरुष की तुष्टियों में ही लगे रहते हैं और चूंकि उसी भाग को अधिकांश पोषण मिलता है इसलिए वही हृष्ट-पुष्ट होता है जबकि दूसरे भाग कुपोषित और तिरस्कृत रहते हैं। इसलिए यदि मस्तिष्क, बुद्धि आदि भागों में छोटा-मोटा ज्ञान हो भी तो वह कामनाओं आदि के नीचे दबे होने के कारण प्रभावी नहीं होता। उसमें इतनी शक्ति नहीं होती कि वह जीवन पर कोई प्रभाव डाल सके, हमारे कर्मों को संचालित कर सके। इसलिए भले ही बुद्धि में किसी प्रकार का कोई क्षीण आदर्श या ज्ञान हो तो भी हमारे कर्म तो केवल प्राणिक इच्छाओं-कामनाओं की सेवा में ही लगे रहते हैं। हमारी आत्मा को पोषण तो तब प्राप्त होता है जब व्यक्ति परमात्मा की ओर अभिमुख हो तथा उन्हें अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान करे। हमारे हृदय की गहरी अभीप्सा को अभिव्यक्ति का जितना ही अधिक अवसर प्राप्त होगा उतना ही पोषण हमारी अंतरात्मा को मिलेगा और वह सुदृढ़ होती जाएगी। वर्तमान में तो अधिकांशतः कामपुरुष को ही अपनी अभिव्यक्ति का मौका मिल रहा है। पूरे विश्व में केवल इसी की तुष्टि पर अधिकाधिक ध्यान दिया जा रहा है। वर्तमान सभ्यता तो प्रधानतः इसी पर केंद्रित है कि किस प्रकार अधिकाधिक प्राणिक सुख-भोग की पूर्ति हो सके। हमारी सारी व्यवस्थाएँ, संस्थाएँ, शिक्षा आदि लगभग सभी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एकमात्र इसी उद्देश्य की पूर्ति के साधन जुटाने में लगी हैं। सामान्यतः हमारी तथाकथित ऊँची से ऊँची चीजें भी केवल एक भिन्न रंग-रूप में इसी की पूर्ति में लगी हैं। और चूंकि हम चेतना की एक ऐसी अवस्था में रहते हैं जहाँ हमें केवल सुख-भोग की तुष्टि ही नजर आती है, इसलिए कोई भी गंभीर ज्ञान, अंतर्बोध, गहरी अभीप्सा आदि हमसे दूर रहते हैं और हमें उनका जरा भी स्वाद प्राप्त नहीं होता।

 

अंतःसत्ता से जानना ही सच्चा ज्ञान है, और जब अंतःसत्ता प्रकाश द्वारा स्पर्श की जाती है तब जिस चीज को उसने देखा है उसे आलिंगन करने, ग्रहण करने के लिए वह उठ खड़ी होती है, उसे अधिकृत करने के लिए वह लालायित हो उठती है, उसे अपने अन्दर और अपने-आप को उसके अन्दर रूपान्वित करने के लिए अथक प्रयास करती है, उसने जो दर्शन किया है उसके वैभव के साथ एक होने के लिए परिश्रम करती है। इस अर्थ में ज्ञान अभिन्नता या तादात्म्य की ओर जागृति है, और चूँकि अंतःसत्ता चेतना और आनन्द के द्वारा, प्रेम के द्वारा, निजस्वरूप का जो कुछ दर्शन उसे हुआ है उसकी प्रि और उसके साथ एकत्व के द्वारा आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करती है, इसलि ज्ञान जागृत होने पर अवश्य ही इस सच्चे और एकमात्र पूर्ण साक्षात्कार की दिशा में एक सर्वातिशयी अंतःप्रेरणा ले आता है। यहाँ जिस तत्त्व का ज्ञा होता है, वह कोई बाह्य विषय नहीं, अपितु दिव्य पुरुष का, हम जो कुछ भी। उसकी आत्मा और प्रभु का ज्ञान होता है। उनमें एक सर्वग्राही आनंद उनके प्रति एक गंभीर और द्रवित प्रेम और भक्ति ही इस ज्ञान का अवश्यंभाने परिणाम और इसकी स्वयं आत्मा ही है। और यह भक्ति हृदय की ही कोर एकांगी खोज नहीं, अपितु संपूर्ण सत्ता का ही अर्पण है। इसलिए अवश्य है यह एक यज्ञ का रूप भी ले लेगा; क्योंकि इसमें हमारे सभी कर्मों का ईश्वर के प्रति दान होता है, हमारी सारी सक्रिय अंतर्बाह्य प्रकृति का उसकी प्रत्येक आत्मनिष्ठ और प्रत्येक वस्तुनिष्ठ क्रिया में अपने प्रिय भगवान् के प्रति समर्पण होता है। हमारी समस्त आत्मनिष्ठ क्रियाएँ उन्हीं में गति करती हैं और उन्हों प्रभु और आत्मा को अपनी शक्ति और प्रयास के मूलस्रोत और लक्ष्य के रूप में खोजती हैं। हमारी समस्त बाह्य अथवा वस्तुनिष्ठ क्रियाएँ जगत् में उन्हीं की ओर गतिमान होती हैं और उन्हीं को अपना लक्ष्य बनाती हैं, भगवत्सेवा के कार्य का ऐसे जगत् में आरंभ कराती हैं जिसकी नियामक शक्ति हमारे वे अंतःस्थ भगवान् हैं जिनके अन्दर हम जगत् और उसके प्राणियों के साथ एकात्मा हैं। क्योंकि, जगत् और आत्मा, प्रकृति और प्रकृतिस्थ पुरुष दोनों उसी 'एक' की चेतना से प्रकाशमान हैं और दोनों ही उन्हीं परात्पर पुरुषोत्तम के हो आन्तर और बाह्य विग्रह हैं। इस प्रकार एकमेव आत्मा और आत्मभाव के अन्दर बुद्धि, हृदय और संकल्प का समन्वय साधित होता है और इसके साथ इस पूर्ण मिलन में, इस सर्वसमावेशी भगवत्साक्षात्कार में, इस दिव्य योग में ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय साधित होता है।

 

परन्तु इस स्थिति तक किंचित्मात्र भी पहुँचना अहंबद्ध प्रकृति के लिये कठिन है। और इस स्थिति की विजयी और समस्वर पूर्णता पर पहुँचना तो तब भी सुगम नहीं होता जब हमने अन्ततः और सदा के लिए इस मार्ग पर कदम रख दिये होते हैं।

 

प्रश्न : क्या हम कह सकते हैं कि भक्ति का स्रोत ज्ञान है?

 

उत्तर : भक्ति का स्रोत ज्ञान नहीं है। हम कह सकते हैं कि ज्ञान आने से भक्ति के मार्ग का रोड़ा हटता है अन्यथा तो ज्ञान अपने आप में अधूरा रहता है जो कि भक्ति के मार्ग में बाधक होता है। जब सच्चा ज्ञान जाता है तब वह भक्ति के मार्ग में बाधक नहीं अपितु सहायक हो जाता है। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि भक्ति का स्रोत ज्ञान है। अपने आप में भक्ति ही है जो ज्ञान और कर्म को अपने साथ समन्वित कर सकती है। ज्ञान का सामान्यतया जो अर्थ लगाया जाता है वास्तव में वह ज्ञान नहीं है। सामान्यतया ज्ञान से हम अर्थ लगाते हैं कि प्रकृति-पुरुष के भेद का पता लग जाना, ब्रह्म के विषय में कुछ पता लग जाना, संसार माया का खेल नजर आना, आदि-आदि। परंतु इसी अध्याय के तीसवें श्लोक में स्वयं गीता ही कहती है कि यदि बहुत दुराचारी मनुष्य भी अनन्य और पूर्ण प्रेम के साथ भगवान् की ओर मुड़ता है तो वह साधु मानने योग्य है। अतः, जिसके यह समझ में गया कि संसार में परमात्मा ही एकमात्र वरण करने योग्य हैं, वही सच्चा ज्ञानी है बाकी सब तो केवल व्यर्थ की चेष्टाएँ या प्रयास मात्र ही हैं। उदाहरण के लिए, भले ही कोई व्यक्ति किसी अमुक व्यक्ति से पहली बार ही मिला हो और उसके विषय में कुछ भी जानता हो परंतु फिर भी उसे अंदर से यह महसूस हो सकता है कि वही व्यक्ति उसका आराध्य है, उसी की सेवा करना उसके संपूर्ण जीवन का लक्ष्य है, उसी के चरणों में वह अपना सर्वस्व अर्पित कर सकता है। भले ही अनेकों लोग उस व्यक्ति के पास जाते हों और उसके प्रति मन में बड़ा आदर भाव भी रखते हों परंतु कोई सच्चा शिष्य ही है जो उसे तत्क्षण पहचान जाएगा और उसके प्रति आत्मसमर्पण के द्वारा भगवान् को प्राप्त कर लेगा जबकि दूसरों को उसी व्यक्ति के सान्निध्य से संभवतः कुछ भी प्राप्त हो। यह पहचान ही सच्चा ज्ञान है। यही सच्ची समझ है। यह एक बिल्कुल भिन्न गति है, भिन्न भाव है। व्यक्ति तब यह नहीं सोचता कि अब उसे ज्ञान प्राप्त हो गया है इसलिए उसे परमात्मा की ओर चलना चाहिये। सच्चे ज्ञान का तो अर्थ ही यही है कि व्यक्ति अनायास ही परमात्मा की ओर चल पड़ता है। हालाँकि ऐसा नहीं है कि परमात्मा की इस यात्रा में मार्ग निष्कंटक होगा। जो भी इस मार्ग पर गए हैं वे सभी एक स्वर से यही कहते हैं कि यह मार्ग अत्यंत कठिन मार्ग है जिस पर कदम-कदम पर धोखे हैं, जाल-घात हैं। परंतु फिर भी जिसे एक बार भी भीतर से सच्चा संस्पर्श प्राप्त हो गया है वह तो कितनी भी तकलीफों के बावजूद भी उस मार्ग पर आगे बढ़े बिना नहीं रह सकता। सच्चे ज्ञान में निश्चयात्मकता होती है। गोपियों को सच्चा ज्ञान था इसीलिए उद्धव की सारी ज्ञान सरीखी बातों का उन पर जरा भी प्रभाव नहीं हुआ। सभी सच्चे आध्यात्मिक महापुरुषों के जीवन में हम यह बात देख सकते हैं कि उनकी निष्ठा अनन्य होती है और वे अपने इष्ट के प्रति बड़े निश्चयात्मक होते हैं, इस विषय में उनमें कोई भ्रम नहीं होता। आंतरिक ज्ञान और अनुभव निश्चयात्मकता लाते हैं। यदि ऐसा होता तो किस प्रकार या किस आधार पर एक क्षण में ही व्यक्ति अपना सर्वस्व किसी पूजा के पात्र पर सहर्ष न्यौछावर कर सकता था। इस निश्चयात्मकता के अभाव में ही तो बहुत से व्यक्ति जीवन भर यह तय नहीं कर पाते कि वास्तव में करना क्या चाहिये और इसी भ्रमपूर्ण स्थिति में जीवन बीत जाता है। परंतु ज्यों ही व्यक्ति को भीतरी स्पर्श प्राप्त होता है त्यों ही निश्चयात्मकता जाती है कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये। इस अनुभव को हम केवल मानसिक रूप से कभी भी नहीं समझ सकते।

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* उनकी सत्ता मन के परे का एक रहस्य है,

उसके तौर-तरीके मर्त्य अज्ञानता को चकरा देते हैं;

सीमित' अपने नन्हें विभागों में स्थित,

चकित, भगवान् के सामर्थ्य को श्रेय नहीं देता

जो अकल्पित 'सर्वं' बनने का साहस करता है,

और एक अनन्त की भाँति सदा देखता और कार्य करता है।

मानव के तर्क के विरुद्ध उनका यह अपराध है,

ज्ञात होकर भी नित्य अज्ञेय बने रहना,

सब कुछ होकर भी फिर इस गुह्य समग्रता को लाँघ जाना,

'निरपेक्ष' होकर 'काल' के एक सापेक्ष जगत् में निवास करना,

शाश्वत और सर्वज्ञ होकर जन्म का कष्ट उठाना,

सर्वशक्तिशाली होकर 'दैवयोग' और 'नियति' से खेल करना,

'आत्मा' होकर भी जड़ और शून्य बनना,

असीम, नामरूपातीत होकर,

एक देह में निवास करना, एकमेव और परम होकर

पशु एवं मानव एवं देव बनना

 

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ।। ११ ।।

 

११. मूढ़ मनुष्य मुझे मानव देह में आश्रित या आवासित जानकर मेरी उपेक्षा करते हैं क्योंकि वे मेरे समस्त भूतों के ईश्वर स्वरूप, मेरे परं भाव , को नहीं जानते।

 

मर्त्य मन आवरणों और बाह्य प्रतीतियों पर अपने अज्ञ भरोसे के कारण संभ्रमित हो जाता है; वह केवल बाह्य मानव शरीर, मानव मन, मानव जीवनचर्या ही देखता है और उन भगवान् की कोई मुक्तिदायी झलक नहीं पकड़ पाता जो प्राणी में निवास करते हैं। वह स्वयं अपने अन्दर के भगवत्तत्व की उपेक्षा कर देता है और दूसरे मनुष्यों में भी उसे नहीं देख पाता, और तब भी जब मानवजाति के अंदर भगवान् अपने-आप को अवतार और विभूति के रूप में प्रकट करते हैं, वह फिर भी अंधा ही बना रहता है और प्रच्छन्न भगवान् की उपेक्षा या अवहेलना करता है, अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। और, जब वह जीवित प्राणी के अन्दर उनकी उपेक्षा करता है तब उस बाह्य जगत् में तो वह उन्हें देख ही क्या सकता है जिसे वह अपने पृथक्कारी अहंकार की कैद के कारण सीमित मन-बुद्धि के बन्द झरोखों से झाँकता है। वह ईश्वर को जगत् में नहीं देखता; उन परमेश्वर के बारे में वह कुछ भी नहीं जानता जो इन विविध भूतों से परिपूर्ण लोकों के स्वामी हैं और उन भूतों में निवास करते हैं; वह उस दृष्टि के प्रति अंधा है जिसके द्वारा संसार में सभी कुछ दिव्य हो उठता है और जीव स्वयं अपने अंतर्निहित भगवान् के प्रति जाग उठता है और भगवान् का हो जाता है, भगवत्सदृश हो जाता है।

 

मोघाशा मोषकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ।। १२।।

 

१२. वे व्यर्थ की आशाओं, व्यर्थ कर्मों और व्यर्थ ज्ञान वाले होते हैं। सच्ची चेतना से शून्य वे भ्रमित करने वाली राक्षसी और आसुरिक प्रकृति में निवास करते हैं।

 

जिन लोगों ने सीमित चीजों के लिए और बुद्धि, देह इंद्रियों की पार्थिव लालसा की तुष्टि के लिए स्वयं को अतिशय पूर्ण रूप से अहंमय जीवन में झोंक दिया है... वे निम्न प्रकृति के हाथों में जा गिरते हैं... वे लोग मनुष्य के अन्दर उस राक्षस की प्रकृति के शिकार हो जाते हैं जो अपने पृथक् प्राणमय अहंकार की उग्र और अदम्य भोग-लालसा पर सब कुछ न्यौछावर कर देता है और उस (प्राणमय अहंकार) को ही अपनी इच्छा, चिंतन, कर्म और भोग का अंधकारमय देव बना लेता है। अथवा वे आसुरी प्रकृति की अहंकारी स्वेच्छा, स्वतःसंतुष्ट विचार, स्वार्थांध कर्म, स्वतः-संतुष्ट पर फिर भी सदा असंतुष्ट रहनेवाली बौद्धिकभावापन्न भोग-तृष्णा के द्वारा व्यर्थ के चक्कर में घसीट लिए जाते हैं। परन्तु दुराग्रहपूर्वक सदा इस पृथक्कारी अहं-चेतना में जीना और उसे ही अपने सारे क्रियाकलापों का केन्द्र बना लेना अपने सच्चे आत्म-बोध से सर्वथा वंचित हो जाना है। जो मोह-जाल यह आत्मा के पथभ्रष्ट उपकरणों पर डालता है वह एक ऐसा सम्मोहन है जो जीवन को एक फलहीन चक्कर से बाँध देता है। भगवदीय और सनातन मापदण्ड से आँकलन करने पर उसकी समस्त आशा, कर्म, ज्ञान व्यर्थ चीजें दिखाई देती हैं, क्योंकि यह महान् आशा के लिए द्वार बंद कर देता है, मुक्तिदायी कर्म को वर्जित कर देता है, प्रबोधनकारी ज्ञान को बाहर कर देता है। यह एक मिथ्याज्ञान है जो दृश्य जगत् को देखता है पर उस दृश्य जगत् के सत्य को चूक जाता है, एक ऐसी अंधी आशा है जो क्षणभंगुर का पीछा करती है पर सनातन को नहीं देख पाती, एक ऐसा निष्फल कर्म है जिसके प्रत्येक लाभ को उससे होनेवाली हानि लुस कर देती है और जिसका कुल योग केवल सिसिफस (sisyphus) के उस अनंतकालीन परिश्रम के जैसा होता है जिससे हाथ कुछ नहीं लगता है।

 

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः

भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ।। १३ ।।

 

१३. हे पार्थ! महात्मा, जो दैवी प्रकृति में निवास करते हैं, मुझे उस अविनाशी के रूप में जानते हैं जिससे समस्त भूत उत्पन्न होते हैं, और इस प्रकार जानकर वे अनन्य और पूर्ण प्रेम-भक्ति से मेरी ओर मुड़ते हैं।

 

जो महात्मा अपने-आप को उस दिव्यतर प्रकृति के प्रकाश और विशालता की ओर खोलते हैं, जिसका सामर्थ्य मनुष्य में होता है, वे ही एकमात्र उस पथ पर होते हैं जो आरंभ में बहुत ही सँकरा पर अंत में अत्यंत विशाल होता हुआ मुक्ति और पूर्णता की ओर ले जाता है। मनुष्य के अन्दर निहित देव की वृद्धि करना ही मनुष्य का यथार्थ कर्त्तव्य है; इस निम्नतर आसुरी और राक्षसी प्रकृति का दृढ़ तथा निरंतर भागवत् प्रकृति में परिवर्तन ही मानव जीवन का सतर्कतापूर्वक छिपाया हुआ प्रयोजन है। जैसे-जैसे यह वृद्धि होती जाती है, वैसे-वैसे आवरण हटता जाता है और जीव कर्म के महत्तर अभिप्राय को तथा जीवन के यथार्थ सत्य को देखने-समझने लगता है। मनुष्य में निहित भगवान् की ओर, जगत् में निहित भगवान् की ओर दृष्टि खुल जाती है; वह आंतरिक रूप से देखती बाह्य रूप से जानने लगती है उस अनन्त आत्मा को, उस अविनाशी को जिससे सारे भूत उत्पन्न होते हैं और जो सब भूतों के अन्दर रहता है और जिसके द्वारा और जिसके अन्दर यह सब कुछ सदा अस्तित्वमान रहता है। अतः जब यह दर्शन और यह ज्ञान अंतरात्मा को अधिग्रहीत कर लेता है तब उसकी सारी जीवन-अभिलाषा भगवान् और अनन्त के प्रति अतिशय प्रेम और अथाह भक्ति बन जाती है। तब मन अपने-आप को अनन्य रूप से शाश्वत, अध्यात्मसत्ता, चिरजीवी, विश्वव्यापी, सत् तत्त्व से संबद्ध कर देता है; उसके लिये किसी भी चीज का मूल्य उसी के नाते होता है अन्यथा नहीं, और वह उस सर्वानन्दमय पुरुष में ही आनन्द लेता है।

 

इसमें मुख्य बात यह है कि भगवान् ही सब कुछ हैं और वे ही सत्य हैं इसलिए उनकी अनन्य रूप से भक्ति करनी चाहिये। और जो उनकी भक्ति नहीं करता वह आसुरिक प्रकृति का है।

 

प्रश्न : यहाँ उल्लेख है कि पथ आरंभ में बहुत सँकरा होता है, इसका वास्तव में अर्थ क्या है?

 

उत्तर : हमारे पुराने साहित्यों में भी इसका उल्लेख आता है और श्रीअरविन्द भी उसी बात को यहाँ दोहरा रहे हैं कि पथ आरंभ में बहुत सँकरा और बाद में बहुत विशाल होता जाता है। एक बड़े ही सरल रूपक की सहायता से इसे हम यों समझ सकते हैं कि जब हम अपने निवासस्थान से किसी राजमार्ग के लिए जाते हैं तो प्रायः पहले हमारे घर के सामने मार्ग कुछ सँकरा होगा जो हमें किसी अधिक विशाल मार्ग तक ले जाता है और उससे आगे फिर हम एक अधिक विशाल मार्ग पर या फिर राजमार्ग पर जाते हैं। इसी प्रकार साधना मार्ग भी प्रत्येक व्यक्ति के लिए किसी सीमा तक बहुत ही विशिष्ट प्रकार का होता है। प्रत्येक की एक विशिष्ट प्रकार की अभीप्सा होती है। किसी को भगवान् शिव के प्रति अनुराग होता है तो किसी को विष्णु के प्रति। विष्णु के प्रति जिन्हें अनुराग है उनमें भी किसी को उनके किसी रूप विशेष से विशेष लगाव होता है तो किसी दूसरे को उनके किसी दूसरे रूप से। उस रूप विशेष में भी लगाव रखने वालों में यदि हम देखें तो प्रत्येक अपने भिन्न गठन के अनुसार भिन्न-भिन्न तरीके से उसे पूजता है, भिन्न तरीके से उसके पास जाता है। इसलिए जब हम साधना आरंभ करते हैं तो क्या करें और क्या करें ये नियम बड़े ही सुनिर्धारित, सख्त और बाध्यकारी प्रकार के होते हैं क्योंकि जब हम आरंभ करते हैं तब चेतना इतनी पर्याप्त नमनीय और विशाल नहीं होती कि उसे अधिक छूट दी जा सके। परंतु ज्यों-ज्यों व्यक्ति इन नियमों का पालन करते हुए मार्ग पर अग्रसर और विकसित होता जाता है त्यों-ही-त्यों उसके लिए वे नियम फिर उतने कठोर और बाध्यकारी नहीं रह जाते बल्कि अधिक नमनीय होते जाते हैं।

 

यदि हम अपने मूल स्रोत सच्चिदानंद को देखें तो वहाँ चेतना का अनंत विस्तार है परंतु ज्यों-ज्यों चेतना नीचे उतरती है त्यों-त्यों वह संकीर्ण होती जाती है। जड़-भौतिक तक आते-आते तो वह इतनी संकीर्ण हो जाती है कि लगभग चेतना का विलोम ही प्रतीत होने लगता है। इसलिए जब हम चेतना के इस निचले छोर से अपने मूल स्रोत तक पुनः लौटने की यात्रा आरंभ करते हैं तो स्वाभाविक ही है कि रास्ता आरंभ में सँकरा ही होगा। यह एक देखने का तरीका है। इसे वैदिक रूपक के अनुसार भी देखा जा सकता है। आरंभ में हमारे अंदर मनोवैज्ञानिक शक्तियाँ सुषुप्त अवस्था में होती हैं, कहने का अर्थ है कि हमारे अंदर दैवीय शक्तियों की क्रिया बड़ी ही क्षीण रहती है, परंतु ज्यों-ज्यों वह क्रिया बढ़ती जाती है त्यों-ही-त्यों हमारी चेतना विशाल होती जाती है और हमारा कार्यक्षेत्र और प्रभावक्षेत्र अधिकाधिक विशाल होते जाते हैं। इस बात को हम योगी श्रीकृष्णप्रेम के जीवन के उदाहरण से भी समझ सकते हैं। अपनी साधना के आरंभिक समय में उन्होंने वैष्णव उपासना पद्धति और तंत्र के सारे नियमों को अक्षरशः अपनाया और बिल्कुल सख्त रूप से उनका पालन किया। उन्होंने कठोर रूप से शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक शुद्धता का पालन किया। जब एक बार उपहासवश छेड़खानी करते हुए किसी ने उनसे कहा कि, "यदि मेरी विधवा दादी इन सब क्रिया-विधि का पालन करती तब तो मैं समझ सकता था, परंतु आपका तो इतना भिन्न अतीत रहा है। पीछे आपके कैम्ब्रीज के दिनों में आपने खूब गोमांस तक भी अवश्य ही खाया होगा! तो आप ये सब शास्त्रसम्मत संयमों का पालन कैसे कर पाते हैं?" इसका उन्होंने जो उत्तर दिया वह बड़ा ही मार्मिक था। उन्होंने कहा, "...मुझे लगता है कि कोई भी आत्म-आरोपित अनुशासन, चाहे वह बाहरी हो या आंतरिक, आज के समय में एक बहुत अच्छी चीज है जब कि हर प्रकार का सामाजिक या व्यक्तिगत अंकुश या संयम खिड़की से बाहर फेंक दिये जाने की प्रक्रिया में है। और साथ ही इसलिए क्योंकि बस यही वह पथ है जो उनके द्वारा तैयार किया गया है जो मेरे से पहले जा चुके हैं और लक्ष्य तक पहुँच चुके हैं। अभी-अभी पथ पर प्रवेश किया हुआ मैं यह कहने वाला होता कौन हूँ कि 'मैं यह करूँगा और वह नहीं, यह अनुशासन तो स्वीकार करूंगा परंतु वह नहीं?' मैं तो पूरे का पूरा ही स्वीकार करता हूँ।"* और वास्तव में उनका पूरा जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण था। उन्हीं के जीवन वृत्तांत में हम पाते हैं कि किस प्रकार बाद के समय में उन्होंने अपने बाह्य अनुशासनात्मक नियमों को बहुत कुछ नमनीय और सर्वसमावेशी बना दिया। इसी से हमें इस बात का पता लगता है कि किस प्रकार पथ आरंभ में संकीर्ण होता है पर बाद में अत्यधिक विशाल बन जाता है।

 

योग की विभिन्न विचारधाराओं में हम पाते हैं कि उनमें से अधिकांश कुछ संकीर्ण या एकांगी विषय पर आकर रुक जाती हैं परंतु गीता के निरूपण में हम पाते हैं कि वह सभी विचारधाराओं और पद्धतियों को प्रतिध्वनित करती हुई उन सभी का समन्वय साध देती है और अन्त में उन सबकी सीमाओं को तोड़ कर 'सर्वधर्मान्परित्यज्य' का उपदेश करती है। गीता के ऐसे विकासक्रम के विषय में जब किसी ने श्रीअरविन्द से पूछा कि गीता ने अपना परम रहस्य 'सर्वधर्मान्परित्यज्य' आरंभ में ही क्यों नहीं दे दिया, तब इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि धर्मों को त्यागने के लिए पहले व्यक्ति के पास कोई धर्म तो होने चाहिये। इसीलिए व्यक्ति को पहले विभिन्न धर्मों की सहायता से, अर्थात् विभिन्न मानसिक, मनोवैज्ञानिक आधारों पर अपने आपको विकसित करना होता है और जब एक बार उसका भली-भाँति विकास हो जाए तभी तो वह उनका त्याग करने की स्थिति में होगा। अन्यथा बिना पहले उन धर्मों को अपनाए वह उनका त्याग कर ही कैसे सकता है। इसी प्रकार, श्रीअरविन्द कहते हैं कि मनुष्य के विकास में अहं पहले सहायक होता है और फिर जब उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है तब उससे ऊपर उठा जा सकता है।

 

चेतना के विकासक्रम में भी हम देख सकते हैं कि जड़भौतिक पदार्थ पूर्ण रूप से नियमों से बँधा हुआ है और ज्यों-ज्यों हम चेतना के उच्चतर स्तरों पर आरोहण करते हैं त्यों-त्यों अधिक स्वतंत्रता आती जाती है। जड़भौतिक से अधिक स्वतंत्रता प्राण में होती है और उससे अधिक मन में होती है। इस प्रकार इन सभी तरीकों से हम देख सकते हैं कि आरंभ में चेतना संकीर्ण होती है और उत्तरोत्तर विकास के साथ वह अधिकाधिक विशाल होती जाती है।

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः

नमस्यन्तश्व मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ।। १४।।

 

१४. मेरी दिव्य कीर्ति का सतत् स्तवन करते हुए, आध्यात्मिक यत्न में दृढ़ स्थित होकर, मेरे आगे नतमस्तक होकर, नित्य योग युक्त होकर वे भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।

 

समस्त वाणी और संपूर्ण चिंतन उस विश्वव्यापी महत्ता, प्रकाश, सौन्दर्य, शक्ति और सत्य का एक स्तुति-गान बन जाता है जिसने अपनी महिमा सहित अपने-आप को उस मानव-आत्मा के समक्ष प्रकट किया है और यही उसकी उन एकमेव परम् आत्मा और अनन्त पुरुष की उपासना होती है। बाह्य प्रस्फुटन के लिए अंतःसत्ता का सुदीर्घ काल से चला रहा दबाव अब अंतरात्मा में भगवान् को प्राप्त करने और प्रकृति में भगवान् को सिद्ध करने की एक आध्यात्मिक चेष्टा और अभीप्सा का रूप धारण कर लेता है। संपूर्ण जीवन उन भगवान् और इस मानव-आत्मा का सतत् योग और एकीकरण बन जाता है। यही सर्वांगीण भक्ति का कार्य-स्वरूप है; समर्पित हृदय से शाश्वत पुरुषोत्तम के प्रति यज्ञ के द्वारा यह हमारी समस्त सत्ता और प्रकृति का एक साथ उत्थान साधित कर देता है।

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* योगी श्रीकृष्णप्रेम, पृष्ठ xviii

इसी कारण हमारे पुराणों में जिस रूप में वैदिक सत्य का निरूपण हुआ है वह मानव सत्ता के विभिन्न भागों के लिए उस सत्य को ग्राह्य बना देता है। वेदों में जिस रूप में उसका निरूपण हुआ है वह तो बिना अंतर्बोध के सुगम नहीं है। परंतु पुराणों में कथाओं, रूपकों आदि अनेक माध्यमों से उसी सत्य का निरूपण हुआ है जिसका कि पठन, श्रवण, चिंतन, गायन आदि करने से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वह हमारे विभिन्न भागों पर अपना प्रभाव डालता है। इसीलिए कथा-श्रवण, सप्ताह यज्ञ आदि का इतना भारी महत्त्व रहा है। क्योंकि भले ही कोई बौद्धिक रूप से समझे या समझे, पर व्यक्ति उससे भावनात्मक रूप से अवश्य ही कुछ कुछ ग्रहण करता है। इसी कारण यह प्रसंग आता है कि वेद, उपनिषद् अन्य पुराणों की रचना करने के बाद भी जब वेदव्यासजी असंतुष्ट थे तब नारद जी ने उन्हें श्रीमद्भागवत की रचना करने को कहा क्योंकि उसी के द्वारा हृदय, भावनात्मक भाग तथा हमारे अन्य भाग अपने-अपने तरीके से भगवान् के संपर्क में आकर परिपुष्ट हो सकते हैं अन्यथा केवल कोरे ज्ञान की बातों में उन्हें कोई रस नहीं आता और ही उससे उनकी पुष्टि होती है। जब तक भगवान् की लीला-कथाओं का वर्णन हो, उनका गान हो तब तक हमारी क्रियात्मक, भावात्मक, सौंदर्यग्राही, सुखभोगवादी प्रकृति को प्रभावित नहीं किया जा सकता। केवल कोरे ज्ञान से हमारी प्रकृति के इन भागों को सक्रिय नहीं किया जा सकता। इसीलिए हमें किसी चीज के विषय में ज्ञान होने पर भी व्यवहार में हम उस दिशा में अधिक कुछ कर नहीं पाते। वहीं एक बार जब हमारे हृदय को छू दिया जाता है तब हम पूरे मनोयोग से किसी उद्देश्य के लिए परिश्रम करने को, अपनी ऊर्जा लगाने को सहर्ष तैयार हो जाते हैं। और जब एक बार हमारे कुछ भाग उन लीला कथाओं में आनंद अनुभव करने लगते हैं तब निम्न वृत्तियों की निरंकुश क्रीड़ा पर इससे बहुत कुछ अंकुश और अनुशासन आने लगता है। केवल मानसिक समझ से यह संभव नहीं है। यहाँ तक कि अनेक वर्षों तक साधना करते रहने पर भी हमारे अंदर ऐसे हिस्से छिपे रह सकते हैं जिन्हें साधना से, भगवान् से, अपने इष्ट से कोई मतलब नहीं होता। वे तो अपने ही सुख के साधनों को खोजने में लगे रहते हैं। किसी को परिवार में सुख मिलता है, किसी को अपनी पद-प्रतिष्ठा में सुख मिलता है, किसी को जीभ के स्वाद की तथा अन्य शारीरिक विलासिता के साधनों की पूर्ति में सुख मिलता है। ऐसा कौन साधक होगा जिसमें कि ये हिस्से बहुत दीर्घ काल तक भी अंदर छिपे रहते होंगे और साधना में कदम-कदम पर उसे अपने उद्देश्य से विभ्रमित और विचलित करने का प्रयास करते होंगे। इन सभी हिस्सों को प्रत्येक साधक अपने-अपने तरीके से संयमित करने का प्रयास करता है। परंतु यह प्रकृति ऐसी दुःसाध्य है कि साधनापथ में यह आम बात है कि व्यक्ति का पतन हो जाता है। इसलिए यदि मन परमात्मा के कीर्तन में, उनके स्तवन में लग जाए तो यह एक बहुत ही श्रेष्ठ स्थिति है। सामान्यतः तो हमें यह देखने को ही नहीं मिलता कि व्यक्ति को भगवान् की लीला कथाओं में, उनके स्तवन आदि में ही रस आता हो। ऐसे बहुत लोग हैं जो कहते हैं और वास्तव में ही उन्हें लगता भी है कि उनका मन भगवान् में लग रहा है और वे उनका भजन-कीर्तन करना चाहते हैं, परंतु एक निश्चित समय सीमा के बाद वे उस सब से ऊब जाते हैं और तब उन्हें अन्य वे सब साधन चाहिये जिनमें उनका मन वास्तव में लगता है। अधिकांश को लगता है कि भगवान् का भजन करना भले ही एक अच्छी चीज है परंतु वह भी मर्यादित समय सीमा में ही अच्छा है क्योंकि व्यावहारिक जीवन में अन्य दायित्व भी हैं जिनका उन्हें निर्वाह करना पड़ता है। इस प्रकार की मानसिकता में तो व्यक्ति को यह आभास ही नहीं होता कि उसका मन वास्तव में भगवान् के स्तवन में लगता ही नहीं है। जब इस दृष्टिकोण से हम गीता की बात को समझें तब हमें अनुभव होगा कि गीता कितनी गंभीर बात कर रही है। गीता जिस चिंतन की बात करती है वह सतत् चिंतन की बात है। वह कोई समय विशेष का ध्यान, पूजा, अनुष्ठान आदि नहीं है। अतः यदि किसी के अंदर यह सतत् चिंतन सक्रिय हो जाए तो यह एक बहुत बड़ा रूपांतर साधित हो जाता है। यदि इस दृष्टिकोण से इसे देखें तो हम भ्रमित हो सकते हैं कि अक्षर ब्रह्म के ज्ञान की बात करने के बाद अब गीता ऐसे कनिष्ठतर विषयों की बात क्यों कर रही है। परंतु जब सही परिप्रेक्ष्य में हम इस बात को समझेंगे तब हम पाएँगे कि यह एक बहुत ही गंभीर विषय है। इस सतत् चिंतन के आने पर ही वास्तव में ज्ञानयज्ञ हो सकता है।

 

अधिकांशतः तो व्यक्ति जिसे ज्ञान कहता है उसे इसीलिए चाहता है कि उसके द्वारा उसकी साधना हो जाए, उससे सुख प्राप्त हो जाए, उसका कल्याण हो जाए, आदि-आदि। परंतु यह ज्ञानयज्ञ नहीं है। ऐसे मनोभाव में तो यज्ञ का आरंभ ही नहीं हुआ होता। ज्ञानयज्ञ तो तब आरंभ होता है जब व्यक्ति जानना केवल इसलिए चाहता है कि उससे वह भगवान् की सेवा अधिक अच्छे ढंग से कर सके। उससे अधिक जानने से उसे कोई सरोकार नहीं होता। अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए उसे ज्ञान की कोई चाह नहीं होती। यदि कहने को व्यक्ति वेद-वेदांत आदि में पारंगत भी हो जाए परंतु उसकी सहायता से वह एक कदम भी परमात्मा की ओर गति कर सकता हो तो ऐसे ज्ञान का कोई लाभ नहीं है। ज्ञानयज्ञ का अर्थ है कि व्यक्ति का संपूर्ण ज्ञान भगवान् की, श्रीमाताजी की सेवा में अर्पित हो जाता है। सच्चा ज्ञान इस भाव में निहित है कि भगवान् जो कराएँ, जैसा ज्ञान दें, जैसे भी रखें वही सही है बाकी सब निरर्थक है। अन्यथा तो ज्ञान के नाम पर केवल अहं का ही पोषण होता है। यही नहीं, जितना ही वह बढ़ता है उतनी ही अहंकेंद्रितता भी बढ़ती जाती है क्योंकि व्यक्ति उस ज्ञानाभिमान के दंभ से अधिकाधिक फूलने लगता है। यज्ञ का अर्थ है पवित्र बनाना। साधना, ज्ञान, भक्ति, कर्म आदि सभी बातें तब तक बिल्कुल बेकार और अपवित्र हैं जब तक कि वे प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाएँ। अधिक से अधिक केवल यह संभव है कि ये सब चीजें मनुष्य को सत्त्व की ओर ले जाएँ, परंतु इससे कोई सच्ची उपलब्धि नहीं हो जाती क्योंकि सत्त्व भी तो एक जंजीर ही है। आत्मज्ञान आदि का प्रयास तो व्यक्ति को सात्त्विक ही बना सकता है, परंतु, जैसा कि श्रीकृष्णप्रेम कहते थे, मुकुंद की सेवा ही है जो निखैगुण्य है। और ऐसे सच्चे सेवा के मनोभाव में ही सच्चा ज्ञान सकता है। यदि यह मनोभाव हो तो व्यक्ति में केवल भेदबुद्धि ही बनी रहती है और वह अहं पर ही केंद्रित रहता है। परंतु इस मनोभाव के आने में सबसे बड़ी बाधाएँ हैं हमारे मन, प्राण और शरीर की वृत्तियाँ। किसी को परिवार में सुख मिलता है और वह उसे छोड़ नहीं सकता, किसी को संपत्ति से लगाव है, किसी को अपनी यश-कीर्ति, बड़ाई, पद-प्रतिष्ठा में रुचि है, वहीं किसी को अपनी भोग-विलासिता में ही आनंद आता है। कोई विरला ही है जो वास्तव में इनके पाश से छूट कर किसी सच्ची चीज की ओर चल पाए। इन सबकी माया ऐसी सम्मोहित कर देती है कि इनकी पाश में बंधे होकर भी व्यक्ति को ऐसा भ्रम हो सकता है कि उसका मन तो भगवान् में लगता है, कि वह साधना कर रहा है, या ऐसे ही अन्य कोई विचार। इसलिए गीता अब जिस चीज का निरूपण कर रही है वह एकांगी कर्मयोग, ज्ञानयोग आदि से भी बड़ी श्रेष्ठतर स्थिति है जिसमें व्यक्ति का मन भगवान् के सतत् स्तवन में लग जाता है।

 

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते

एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ।। १५।।

 

१५. और अन्य दूसरे जन मुझे मेरे एकत्व भाव में, प्रत्येक पृथक् जीव में (पृथक् भाव में) और मेरे समस्त असंख्य वैश्व चेहरों में ज्ञानयज्ञ के द्वारा खोजते हैं (मेरा यजन करते हैं) और मेरी उपासना करते हैं।

 

जो लोग ज्ञान पर ही अधिक बल देते हैं, वे भी अंतरात्मा और प्रकृति पर होनेवाले भगवान् के दर्शन की निरंतर बढ़नेवाली, अपने अन्दर लीन करनेवाली और अपने रास्ते पर चलानेवाली शक्ति के द्वारा उसी बिंदु पर पहुँचते हैं। उनका यज्ञ ज्ञान-यज्ञ होता है और ज्ञान के ही एक अनिर्वचनीय आनंद के द्वारा वे पुरुषोत्तम की भक्ति पर पहुँच जाते हैं, ज्ञानयज्ञेन यजन्तो मामुपासते। यह वह ज्ञान है जो भक्ति से परिपूर्ण है, क्योंकि यह अपने साधनों में पूर्ण है, अपने लक्ष्य में पूर्ण है। यह परमोच्च को मात्र एक अमूर्त एकत्व अथवा अनिर्धार्य या बुद्धि से अग्राह्य निरपेक्ष सत्ता के रूप में मान कर उसकी खोज करना नहीं है। यह तो परमोच्च की और वैश्वसत्ता की हार्दिक खोज और उन्हें अधिकृत करना है; यह अनन्त को उनकी अनन्तता में, और अनन्त को जो कुछ सीमित है उस सब में ढूँढ़ना है; यह उन 'एक' को उनके एकत्व में और उन्हीं 'एक' को उनके अनेकविध तत्त्वों में, उनकी असंख्य छवियों, शक्तियों और रूपों में, यत्र-तत्र-सर्वत्र, कालातीतता में और काल में, गुणन में, विभाजन में, उनके ईश्वरभाव के अनन्त पहलुओं में, असंख्य जीवों में, उनके उन करोल विश्वरूपों में जो जगत् और उसके प्राणियों के रूप में हमारे सामने हैं, एकक्क पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्, देखना और आलिंगन करना है। यह जार सहज ही एक आराधन, एक व्यापक भक्ति, एक विशाल आत्मदान, एक सर्वांगीण आत्मोत्सर्ग बन जाता है क्योंकि यह उस आत्मा का ज्ञान है, उस आत्मसत्ता का संस्पर्श है, उस परम और विराट् पुरुष का आलिंगन है जो हमें हम जो कुछ भी हैं उसे, अपना बना लेता है और साथ ही जब हम उसके समी पहुँचते हैं तो हमारे ऊपर सत्स्वरूप के अनन्त आनन्द की निधियाँ बरसाता है।

 

ज्यों-ज्यों व्यक्ति को भक्तिपूरित ज्ञान होता है वह सर्वत्र ही ईश्वर के दर्शन करने लगता है और उनसे प्रेम करने लगता है। और जब व्यक्ति सर्वत्र उनसे प्रेम करता है तब वे भी उसके समक्ष अपने विभिन्न रूप, अपने विभिन्न पहलू प्रकट करना आरंभ करते हैं। परंतु यह ज्ञान, यह प्राकट्य केवल भक्ति के प्रभाव से ही आता है। इस प्रकार भक्ति के प्रभाव से हमारे कर्म, हमारा ज्ञान, हमारे सभी भाव एकांगी रहकर समग्र और व्यापक स्वरूप धारण कर लेते हैं और इस समग्रता में उत्तरोत्तर पराभक्ति की ओर वृद्धि करते हैं। पराभक्ति का अर्थ है 'सर्वभावेन' अर्थात् व्यक्ति अपने सभी भावों को अनन्य रूप से भगवान् की भक्ति में परिणत कर देता है। तब कर्म, ज्ञान आदि सभी केवल प्रभु के प्रीत्यर्थ निवेदित होते हैं और वे सभी अहं की तुष्टि की बजाय भगवान् की भक्ति के साधन बन जाते हैं। तब व्यक्ति को स्वयं के लिए या उनके अपने लिए ज्ञान से या कर्म से कोई रुचि नहीं रहती अपितु ये तो उस भक्ति से ही उद्भूत होते हैं। कर्म भी उस भक्ति के अनुरूप ही उद्भूत होते हैं और ज्ञान भी उसी के अनुरूप प्रस्फुटित होता है। तब ये सभी भाग भिन्न स्वर रहकर समस्वर बन जाते हैं।

 

सच्चे ज्ञान और सच्चे कर्म का उद्भव भगवान् के प्रति समर्पित हृदय के द्वारा ही हो सकता है अन्यथा अन्य किसी तरीके से वे पूरी तरह प्रस्फुटित हो ही नहीं सकते। जब पराभक्ति जाती है तभी दिव्य कर्म और दिव्य ज्ञान संभव हैं अन्यथा नहीं। यही चेतना की वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति यदि घोर से घोर कर्म भी करे तो भी वे उसे बाँधते नहीं और ही वह ज्ञान बंधनकारी होता है क्योंकि व्यक्ति को अपने आप में तो उस कर्म से कुछ हेतु सिद्ध करना होता है और ही उस ज्ञान से। यदि भक्ति हो तो कर्म और ज्ञान के बाहरी स्वरूप भले जो भी क्यों हों, चाहे कितने भी सूक्ष्म रूप से ही क्यों हों परंतु वे रहते हैं केवल अहं की तुष्टि के साधन ही। इसीलिए भक्ति आने पर सच्चा ज्ञान तो स्वयमेव ही जाता है क्योंकि भक्ति तो ज्ञान की परिणति है और संपूर्ण कर्मों का आधार है। अन्यथा जिसे हम भक्ति कहते हैं वह तो भगवान् की नहीं अपितु अपने अहं की ही भक्ति होती है जिसे हम अनेक सुंदर-सुंदर नामों से सजा देते हैं। परंतु जब व्यक्ति अपने आप को पूरी तरह श्रीमाताजी के हाथों में सौंप देता है तब वे ही उसके लिए ज्ञान, कर्म आदि जो भी सच्चे रूप से आवश्यक हैं वे स्वयं ही उत्पन्न कर देती हैं और उसे मार्ग पर आगे ले चलती हैं। जब एक बार व्यक्ति को यह सच्ची समझ गई कि एकमात्र श्रीमाताजी ही जीवन में अनुगमन करने योग्य हैं और बाकी सब तो निरर्थक है, तो यही परम ज्ञान है। इसके बाद तो केवल व्यावहारिक तौर पर इस ज्ञान को मन, प्राण आदि के माध्यम से अभिव्यक्त करने का विषय रह जाता है, वास्तव में जो मूलभूत काम है वह तो हो ही जाता है। हालाँकि शुद्ध रूप से इसे अभिव्यक्त करने में भी अपनी भीषण चुनौतियाँ हैं, परंतु वे सभी चुनौतियाँ एक सही दिशा में होती हैं अन्यथा तो व्यक्ति को दिशा ही प्राप्त नहीं होती और जीवन निरुद्देश्य ही बीत जाता है। इसलिए इस सब का हमारे लिए व्यावहारिक संदेश यही है कि हम अपनी सारी शक्ति-सामर्थ्य, हमारे सारे गुण-अवगुण, अपना सर्वस्व अपने अहं की बजाय श्रीमाताजी की सेवा में समर्पित कर दें, अन्यथा तो साधना भी अपने आप में एक बोझ ही है जो कि जितना एक सामान्य मनुष्य स्वयं पर केंद्रित नहीं होता उससे अधिक एक साधक को स्व-केंद्रित बना देती है। सामान्यतः साधनामय जीवन व्यतीत करने के नाम पर प्राण अपने व्यापार का और अधिक प्रसार कर देता है क्योंकि तब व्यक्ति पहले की अपेक्षा और अधिक आत्माभिमान से फूल उठता है कि वह दूसरों से श्रेष्ठ है। गुरु के पास भी यदि वह जाता है तो इस भाव से कि उसे गुरु से क्या आत्मिक, मनोवैज्ञानिक, प्राणिक लाभ प्राप्त हो सकता है। इसके अतिरिक्त तो कोई अहंकेंद्रित व्यक्ति कुछ सोच ही नहीं सकता। इसमें कोई दोष की बात भी नहीं है क्योंकि हमारा प्राकृत गठन ही इस प्रकार का होता है कि प्रारंभ में बिना लेन-देन, लाभ-हानि या स्वकेंद्रितता के भाव के हम और कुछ कर या सोच ही नहीं सकते। इसीलिए जो साधना पथ पर जाते हैं ऐसे हजारों व्यक्तियों में से भी कोई विरला ही वास्तव में किसी सच्ची स्थिति तक पहुँचता है।

 

अब ज्ञान को आधार प्रदान करने के लिए श्रीभगवान् घोषित करते हैं कि वे ही सब कुछ हैं। एक सच्चे दृष्टिकोण से देखें तो जब तक व्यक्ति को दूसरे के अंदर भगवान् के या फिर अपने इष्ट के दर्शन नहीं होते तर तक तो वह केवल भ्रम में ही है क्योंकि प्रभु के अतिरिक्त तो अन्य किय की कोई स्वतंत्र सत्ता है ही नहीं। इसलिए किसी दूसरे का भला करने का भी एकमात्र जो सच्चा तरीका है और वह है अपने आप को पूर्ण रूप से भगवान् को, अपने गुरु को समर्पित कर देना। यदि व्यक्ति सब में परमात्मा का दर्शन कर के अपने से भिन्न सत्ता देखता है तो यह तो स्वयं की सत्ता के मूलभूत सत्य का ही निषेध है, खंडन है। हालाँकि सर्वत्र परमात्मा के दर्शन होने का अर्थ यह नहीं है कि तब कोई पृथक्ता का बोध हो नहीं रहता और सभी कुछ आपस में इस प्रकार घुल-मिल जाता है मानो कोई वैविध्य ही रहा हो। सर्वत्र परमात्मा के दर्शन होने की बात का हमारी बुद्धि सामान्यतः ऐसा ही अर्थ लगाती है। वास्तव में तो जब व्यक्ति को सर्वत्र वह दर्शन प्राप्त होता है तभी वह सच्चे रूप से हर चीज के साथ व्यवहार और क्रिया कर सकता है। और इसीलिए ऐसा व्यक्ति सर्वभूतों के सच्चे हित में रत रह सकता है। चूंकि भगवान् ही सभी कुछ के आधार हैं इसलिए जब व्यक्ति अपने आप को उन्हें समर्पित कर देता है और उन्हीं की सेवा में रत रहता है तो स्वतः ही वह तो सभी कुछ के कल्याण में रत है।

 

प्रश्न : इसका अर्थ है कि गृहस्थ व्यक्ति तो कभी भक्ति कर ही नहीं सकता?

 

उत्तर : क्या नरसी मेहता, मीराबाई, गुरु नानक देव आदि के परिवार नहीं थे? श्री रामकृष्ण परमहंस के परिवार नहीं था? परंतु जो परिवार में हो लिप्त रहता है उसकी तो भक्ति परिवार के प्रति ही हुई। अब ऐसा कौन व्यक्ति है जो बिना परिवार का हो। हम अनेकानेक ऐसे उदाहरण पाते हैं जो कि परिवार में रहते हुए भी भगवान् के भक्त हुए हैं। यह चीज इस पर निर्भर नहीं करती कि व्यक्ति का परिवार है या नहीं, या फिर वह किस प्रकार की बाहरी क्रियाकलाप करता है, परंतु सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि चेतना का स्तर और उसकी स्थिति क्या है, परिवार के प्रति उसका दृष्टिकोण क्या है। इसलिए जो भगवान् के भक्त होते हैं उनकी चेतना परिवार में रहते हुए भी परमात्मा से जुड़ी होती है। क्या हम गुरु नानक की चेतना परिवार से बंधी हुई कह सकते हैं या फिर मीराबाई की चेतना की तुलना किसी सामान्य घरेलू स्त्री की चेतना से कर सकते हैं।

 

प्रश्न : परंतु चेतना की वह स्थिति भी तो तभी होगी जब परमात्मा की कृपा होगी। अपने आप तो वह चेतना नहीं जाती।

 

उत्तर : इस कृपा शब्द की आड़ में हम अपनी अकर्मण्यता को ही उचित ठहराने का प्रयास करते हैं। अब व्यक्ति कहेगा कि उसके ऊपर तो भगवान् की कृपा नहीं है इसलिए वह भक्ति किस प्रकार करे। यह तो भगवान् के प्रति दुर्भावना की बात हुई। यदि व्यक्ति में इतनी सच्चाई हो कि बुद्धि से उसे जो कुछ समझ में जाता है उसे वह अपनी यथाशक्ति चरितार्थ करने का प्रयास करता है पर अभी तक भक्ति का उदय होने के कारण वह नहीं जानता कि उसका अनुसरण किस प्रकार करे, तो यह एक अलग विषय हो सकता है। परंतु कोई एक व्यक्ति भी यह नहीं कह सकता कि उसे बुद्धि से जो चीज समझ गई है उसे चरितार्थ करने के लिए वह प्रयत्न नहीं कर सकता। यदि एक बार उसके समझ में जाए कि अमुक काम करने योग्य है तो उसे उसकी चरितार्थता के लिए आवश्यक संकल्प और साधन आदि जुटाने चाहिये। सच्चाई इसमें है कि जब एक बार व्यक्ति को कुछ समझ में जाए तब उसे करने का वह यथाशक्ति प्रयास करे। यदि शिक्षक विद्यार्थी को हल करने के लिए गणित का कोई सवाल दें परंतु वह यह कह कर प्रयास करने से ही इंकार कर दे कि गुरुजी की कृपा होगी तो प्रश्न स्वयं ही हल हो जाएगा तो यह एक बिल्कुल बेतुकी बात होगी। इसलिए सामान्यतः ये जो आम प्रचलन की बातें हैं वे केवल ऐसे बहाने मात्र हैं जिनकी आड़ में हम अपनी दुर्भावना और अपने आलस्य को और अपनी अकर्मण्यता की वृत्ति को छिपाते हैं। यदि हमारा कोई प्रिय या सगा-संबंधी गंभीर रूप से बीमार होता है तब हम उसे बचाने के यथासंभव प्रयास करते हैं, और तब हम कृपा शब्द का दुरुपयोग करते हुए यह नहीं कहते कि भगवान् की कृपा होगी तो वह स्वयं ही स्वस्थ हो जाएगा। इसी प्रकार जहाँ कहीं हमारे निजी लाभ या हानि निहित होते हैं उन सब चीजों में हम अपना पूरा मनोयोग लगा देते हैं। ऐसे मामलों में हम कभी किसी को कृपा के सहारे चीजों को छोड़ते नहीं देखते। परंतु जहाँ कहीं व्यक्ति आवश्यक श्रम से बचना चाहता है वहीं अधिकांशतः वह इस शब्द का दुरुपयोग करता है। भगवान् तो हर स्थिति में कृपा ही करते हैं। हमारे लिए जो लाभदायक होता है उसमें भी उनकी उतनी ही कृपा होती है जितनी की उसमें जो हमें हानिकारक प्रतीत होता है। इसलिए कृपा तो एक ऐसी मूलभूत चीज है जो हमारी किन्हीं भी बाहरी अवस्थाओं पर निर्भर नहीं करती। वह तो हर हालत में, हर चीज के पीछे, हर घटना के पीछे स्वतः विद्यमान है। इसलिए हमारे सभी ग्रंथों में हम देखते हैं कि भगवान् के तो अनुग्रह में भी उतनी ही कृपा होती है जितनी कि संहार में। भगवान् जिसका संहार करते हैं उसकी जैसी सद्गति होती है वैसी तो योगियों-तपस्वियों के लिए भी दुर्लभ है। इसलिए भगवान् की कृपा तो निर्विवाद रूप से हर हालात में है ही क्योंकि वे स्वयं ही तो विद्यमान हैं इसलिए वे अपने आप के ऊपर कृपा के अतिरिक्त और कुछ कर भी क्या सकते हैं। वास्तव में तो हमारे चारों ओर कृपा के समुद्र भरे हुए हैं परंतु हमने अपने आप को सतर्कतापूर्वक इतना बंद कर रखा है कि कहीं से कृपा की कोई बूँद प्रवेश करने पाए। इसलिए करने का काम केवल एक ही है कि हमने अहं पर केंद्रित होकर जो द्वार बंद कर रखे हैं उन्हें खोलें ताकि कृपा और प्रकाश हमारे अंदर प्रवेश कर सकें।

 

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्

मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ।। १६ ।।

 

१६. मैं यज्ञकर्म हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही अन्न की भेंट (स्वधा) हूँ, मैं हो अग्निदायी औषधि हूँ, मैं ही मंत्र हूँ, मैं ही घृत हूँ, मैं ही अग्नि हूँ और मैं हो आहुति हूँ।

 

कर्म का मार्ग भी आत्मनिवेदनरूपी उपासना और भक्ति में परिणत हो जाता है क्योंकि यह हमारे संकल्प और उसकी सारी क्रियाओं का उन एकमेव पुरुषोत्तम के प्रति पूर्ण यज्ञ अर्थात् समर्पण होता है। बाह्य वैदिक यज्ञ-अनुष्ठान एक शक्तिशाली प्रतीक है, जो हो भले ही अल्प उद्देश्य के लिए पर फिर भी स्वर्गमुखी उद्देश्य की ओर कारगर है; परंतु वास्तविक यज्ञ तो वह आंतरिक होम है जिसमें 'समय भगवान्' स्वयं ही यज्ञ-क्रिया, यज्ञ और यज्ञ को प्रत्येक बस्तु और घटना बन जाते हैं। इस आंतर यज्ञविधि की सारी क्रियाएँ और अनुष्ठान हमारे अन्दर उन्हीं की शक्ति का आत्म-विधान और आत्माभिव्यक्ति होते हैं। यह शक्ति हमारी अभीप्सा के द्वारा अपनी ऊर्जा के स्रोत की ओर ऊपर बढ़ती जाती है। दिव्य अंतःवासी स्वयं यज्ञ की अग्नि और हवि बनते हैं. कोल हैं। अनि भगवन्मुखी संकल्प है और स्वयं भगवान् ही हमारे यह संकल्प होते हैं। और, हथि भी हमारी प्रकृति तथा सत्ता के अन्तःस्थ भगवान् का ही रूप और शक्ति है; जो कुछ उनसे प्राप्त हुआ है वह उन्हीं के सत्स्वरूप, उन्हीं के परम सत्य और मूलस्रोत की सेवा और पूजा में भेंट चढ़ाया जाता है। दिव्य मनीषी-कवि स्वयं ही पवित्र मंत्र बन जाते हैं; यह उन्हीं की सत्ता की ज्योति है जो भगवन्मुखी विचार के रूप में अपने-आप को अभिव्यक्त करती है और उस प्रकटनकारी तेजोदीप्त शब्द (मंत्र) में प्रभावी होती है जो कि विचार के गूढ़ रहस्य को मंडित किये रहता है...

 

यह सारा तो वैदिक प्रतीक है कि किस प्रकार हमारा समस्त कर्म यज्ञ रूप होकर भगवान् को समर्पित हो जाता है। 'अग्नि' भागवत् संकल्प का प्रतीक है। अग्नि में हवि समर्पित करने का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी इच्छाओं-कामनाओं आदि को उस भागवत् संकल्प के अंदर समर्पित करता है। कुछ सामग्री ऐसी होती है जो अग्नि में डालने पर धुँआ पैदा करती है। हमारे आवेग और अंध संवेग ही यह धुँआ है। इसलिए ऐसी सामग्री को भली-भाँति जलाने के लिए घृत की आवश्यकता होती है। घृत है विशुद्धिकृत बुद्धि। घृत हमें मिलता है 'गो' अर्थात् प्रकाश से। जब विशुद्ध बुद्धि होगी तभी हमारी अंध वृत्तियों का भगवतोन्मुख हवन हो सकता है अन्यथा तो ये अंध वृत्तियाँ अपने-अपने निहित हेतुओं को छोड़ने के लिए कभी तैयार नहीं होतीं और सदा अपने ही तरीके से चीजों को चाहती हैं और केवल अपनी ही तुष्टि चाहती हैं। जब विशुद्ध बुद्धि आती है तब इन अंध वृत्तियों पर अंकुश लगने लगता है और वह बुद्धि इन सब को उस भागवत् संकल्प में होम कर देती है जो यहाँ अभिव्यक्त होना चाह रहा है। हमारा सच्चा विकास, हमारी सच्ची शुद्धि तभी होगी जब हमारी सत्ता अग्नि में हवन - अर्थात् भागवत् संकल्प के प्रति समर्पित - होगी। इसी से कर्म योग बन सकता है।

 

भगवान् को समर्पित होने पर ही हमारे कर्म योग का रूप लेते हैं अन्यथा तो वे योग नहीं अपितु रोग होते हैं। अधिकांशतः तो हमारे कर्म केवल हमारे कामपुरुष की तुष्टि और उसी की अभिव्यक्ति होते हैं। हमारे सभी कर्म सामान्यतः किसी कामना की पूर्ति के लिए, अपने अहं की तुष्टि के लिए, या अधिक से अधिक किसी सात्त्विक चेष्टा को पूरा करने के लिए किये जाते हैं। इनमें से कोई भी कर्म हमें ऊपर नहीं लेकर जाते। इन सब की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं और ये उन्हीं सीमाओं के भीतर रहते हैं। यज्ञ रूप से, परमात्मा की ओर जाने के साधन के रूप में जब कर्म किया जाता है तब वह सच्चा कर्म होता है। पर कर्म की मुख्य ग्रंथि है कामना, और जब तक उस ग्रंथि को सुलझाया नहीं जाता तब तक सच्चा कर्म संभव नहीं है।

 

प्रश्न : पर ये कामना के विचार आते कहाँ से हैं जबकि कई चीजें के विषय में तो हम सोचते ही नहीं हैं और फिर भी व्यवहार में हम वैर्मी चीजें कर बैठते हैं?

 

उत्तर : जब सामान्यतः हम कहते हैं कि 'हम ऐसा नहीं सोचते' तो वह हम अपनी बुद्धि के बारे में कहते हैं, क्योंकि वास्तव में ही हम बुद्धि से वैसी चीजें नहीं सोच रहे होते। परंतु हमारी बुद्धि क्या सोचती है उससे हमारी प्राणिक सत्ता को कोई विशेष सरोकार नहीं है। उसके अपने निहित हेतु होते हैं जिन्हें पूरा करने के लिए वह हमारी इंद्रियों को, भावों, संवेदनों आदि पर अधिकार करके उन्हें अपने हेतु सिद्ध करने के काम में लेती है। इसी कारण व्यक्ति सोचता एक चीज है परंतु वास्तव में करता कुछ और है। इसलिए तीसरे अध्याय में भगवान् अर्जुन को कहते हैं कि 'महत्तर आत्मा के द्वारा निम्नकोटि के स्व को स्थिर निश्चल कर के कठिनाई से पकड़ में आने वाले कामनारूप शत्रु को मार डाल।' अहं के बिना कामना नहीं हो सकती। अतः जब अहं, कामना, गुण और द्वंद्व रूपी प्रपंच चल रहा होता है तब ऐसे में यदि बुद्धि किसी चीज का निषेध करती है, किसी चीज के प्रति अपनी असहमति व्यक्त करती भी है तो भी उसकी कोई सुनवाई नहीं होती। ऐसे कितने ही लोग हैं जो अपनी बुद्धि में तो इस विषय में बिल्कुल स्पष्ट होते हैं कि भगवान् की ओर जाना ही श्रेष्ठ है परंतु फिर भी व्यावहारिक रूप से उस ओर एक कदम भी नहीं उठा पाते।

 

प्रश्न : तो जब व्यक्ति में दृढ़-संकल्प हो तब क्या इस तरह के कामना आदि के विचार नहीं उठते?

 

उत्तर : विचार तो उठते ही हैं क्योंकि जब तक उपद्रवी तत्त्व हमारी सत्ता में होंगे तब तक कोलाहल, उपद्रव आदि तो होंगे ही। परंतु संकल्प की शक्ति से व्यक्ति उन्हें धीरे-धीरे अनदेखा करता है। यदि व्यक्ति उन्हें अपने से विजातीय तत्त्व समझ कर दूर धकेलता है तब तो वे उसके ऊपर अधिक हावी नहीं हो पाते, परंतु यदि वह उन इच्छाओं, कामनाओं आदि को अपनी निजी चीजें समझ कर उनमें रस लेने लगता है तो वे हावी हो जाती हैं। कामना आदि के विषय में तो श्रीमाताजी कहती हैं कि भले हो व्यक्ति को ऐसा लगता है कि वे उसके अपने अंदर उत्पन्न होती हैं परंतु वास्तव में तो बाहर उनका एक समुद्र होता है जिसमें से वे उठती हैं और अपनी तुष्टि के माध्यम ढूँढ़ती हैं। यदि व्यक्ति उनको अभिव्यक्ति प्रदान करने से इंकार करे तो एक बार तो वे अपनी अभिव्यक्ति के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाती हैं परंतु अभिव्यक्ति का अवसर मिलने पर एक समय के बाद निराश हो जाती हैं और उस व्यक्ति को छोड़ देती हैं।

 

प्रश्न : परंतु ऐसे कुछ विचार होते हैं जिनके विषय में हम तो सोचते हैं कल्पना ही करते हैं, वे कहाँ से आते हैं?

 

उत्तर : वे सब हमारे चित्त में जमा हुई वृत्तियाँ हैं जो कि हमारे जन्म-जन्मांतरों से अंदर जमा हुई हैं। इसीलिए तो कहते हैं कि चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है, क्योंकि यह एक ऐसा भण्डार है जिसके अंदर से हमारे पास कभी भी, कुछ भी उठ आता है। इसलिए जब तक इस प्रकार हमारे भवन में कोई भी व्यक्ति कभी भी घुस कर उपद्रव कर सकता है तब तक किसी प्रकार की शांति की और किसी विकासकार्य की तो कोई संभावना ही नहीं है। यह तो एक आम अनुभव है कि जब हम किसी समस्या के समाधान पर एकाग्र होने का प्रयास कर रहे होते हैं तब ऐसे-ऐसे विचार आदि उठ खड़े होते हैं जिनसे हमारा उस क्षण दूर-दूर तक भी कोई सरोकार नहीं होता। और हम स्वयं भी ऐसे अनचाहे आगंतुकों से परेशान हो जाते हैं। ये सब यांत्रिक वृत्तियाँ हैं जिन्हें हमारी अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। इसी कारण चित्त किसी भी गंभीर कार्य में एक बहुत बड़ा बाधक बन जाता है। हालाँकि चित्त का अपना एक औचित्य है और हम यह नहीं कह सकते कि चूंकि वह बाधक बन जाता है इसलिए यदि संभव हो तो उसे किसी भी प्रकार निकाल कर बाहर कर देना चाहिये। परमात्मा का विधान इतना अनंतविध है कि वह हमारे किन्हीं भी मानसिक सूत्रों की पकड़ में नहीं आता। हमारा मन तो केवल एक सीधी रेखा खींचना जानता है जबकि भगवान् का सत्य तो इतना अनंत आयामी और अनंतविध है कि वह हमारे मन की किन्हीं भी रेखाओं की पकड़ में नहीं सकता। इसलिए चित्त हमें किसी भी एक रेखा या सूत्र को पकड़ कर आगे बढ़ने से रोक देता है। यदि वह हमें ऐसा करने से रोकता तो हम किसी एक ही सूत्र को पकड़ कर निःशंक रूप से बेरोकटोक किसी एक ही दिशा में चल पड़ते और समग्र सत्य से बहुत दूर निकल जाते। इसलिए चित्त द्वारा बार-बार बाधा डाले जाने के कारण हमारे हृदय, बुद्धि आदि भागों में कुछ अधिक परिपक्वता आती है जिसके कारण हम कुछ आगे का मार्ग तय कर पाते हैं। और यह प्रक्रिया उत्तरोत्तर चलती रहती है। चित्त की क्रिया के बाद भी हम देख सकते हैं कि किस प्रकार एकांगी और असहिष्णु प्रकार के विचार भारी विनाश का कारण बने हैं। और यदि उसकी क्रिया होती तब तो उस विनाश की कोई सीमा ही होती। सारा इतिहास हमें इस बात के साक्ष्य देता है। कितनी-कितनी एकांगी विचारधाराएँ, कितने-कितने असहिष्णु धर्म, मत, संप्रदाय आदि हुए हैं जिन्होंने इतिहास में अपने काले धब्बे छोड़े हैं। इसलिए जिस प्रकार का हमारा गठन है उसमें आवश्यक ही है कि हमें अपनी किसी भी छोटी सी मानसिक संरचना को ही सब कुछ मान बैठने और उसे सभी पर थोपने के लिए स्वतंत्र नहीं होना चाहिये। इसीलिए चित्त कदम-कदम पर उसमें अपनी बाधा डालता है। हो सकता है कि व्यक्ति किसी एक प्रकार के सूत्र में ही अपने आप को बाँधना पसंद करे, परंतु जो परमात्मा स्वयं ही यह जीव बना है उसे ऐसी कोई भी कैद कैसे रास सकती है, वे इससे संतुष्ट कैसे हो सकते हैं। इसीलिए जब वे हमारी संरचनाओं को तोड़ते हैं तो हम उसका विरोध करते हैं, प्रतिक्रियाएँ करते हैं। अतः, इस विषय को इस दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है।

 

प्रश्न : गीता ने यहाँ यज्ञ का प्रतीक दिया है। यदि यह एक अध्यात्मपरक प्रतीक है तब फिर बाह्य यज्ञ-अनुष्ठान का क्या महत्त्व है?

 

उत्तर : यज्ञ के आंतरिक प्रतीक और उसके बाह्य अनुष्ठान के पीछे श्रीअरविन्द ने बहुत सी चीजें बतलाई हैं। विशद चर्चा के लिए तो यह एक बहुत ही विशाल क्षेत्र होगा परंतु कुछ बिंदुओं पर हम अवश्य ध्यान दे सकते हैं। जिस समय वेदों की रचना हुई वह एक अंतर्बोधात्मक काल था जब सामान्य मनुष्य मानसिक विकास में से नहीं गुजरा था। इसलिए जैसा कि श्रीअरविन्द बताते हैं कि ऋषियों ने परम सत्यों को वेदों में एक ऐसी भाषा में रखा जो प्रतीकात्मक थी और जिसे केवल कोई दीक्षित हो समझ सकता था जबकि किसी सामान्य सांसारिक व्यक्ति के लिए तो वह केवल बाह्य अनुष्ठान या फिर केवल बाहरी विषयों की ही चर्चा थी। यह तो एक बात हो गई। परंतु यदि केवल अध्यात्मपरक अर्थ ही एकमात्र चीज होती तब तो हमारी संस्कृति में वैदिक काल से ही बाह्य अनुष्ठान आदि को जो महत्त्व दिया जाता रहा है उसका कोई औचित्य ही नहीं होता। यहाँ तक कि वेदमंत्रों के उच्चारण की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए पूरे भारत में लाखों लोग लगे थे ताकि एक मात्रा या स्वर तक में भी कोई त्रुटि होने पाए। साथ ही पूरे के पूरे ग्रंथ केवल इन विषयों पर रखेंचे गए थे कि किस प्रकार बिल्कुल सटीक रूप से बाह्य अनुष्ठानों को किया जाए। बाह्य यज्ञ-कर्म के छोटे से छोटे ब्यौरों तक के लिए नियम-विधानों की रचना की गई और जो उस क्षेत्र में आगे जाना चाहता था उसे अनेकों वर्षों तक सतर्कतापूर्वक उन सब नियम-विधानों की शिक्षा दी जाती थी और यह सुनिश्चित किया जाता था कि वह कभी कोई त्रुटि करने पाए। एक अर्थ में ज्ञानकाण्ड की बजाय कर्मकाण्ड पर अधिक बारीकी से ध्यान दिया जाता था। इसके पीछे एक बहुत ही गूढ़ कारण है। परमात्मा का सत्य इतना विशाल है कि वह हमारे ऊँचे से ऊँचे ज्ञान की पकड़ में नहीं सकता। यदि ज्ञान से ही वह सत्य पूर्णतया गम्य होता तब तो कर्म की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। सारा कर्मकाण्ड अपने आप में भीतरी क्रिया का प्रतीक है। और जब हम कोई अनुष्ठान, कोई क्रिया आदि करते हैं तो हमारे मस्तिष्क के अतिरिक्त अन्य बहुत से भाग हैं जो जाने-अनजाने उस सत्य के संपर्क में आते हैं। साथ ही मंत्रोच्चार, यज्ञ-अनुष्ठान आदि सृष्टि-क्रिया की प्रतीकात्मक रूप से आवृत्ति करते हैं इसीलिए इन क्रियाओं से हमारी सत्ता का सत्य सुदृढ़ होता है। यही एक कारण है कि भले हम अनुष्ठानों को मानसिक रूप से समझते हों और यहाँ तक कि उन्हें असभ्य या निरर्थक चीजें बताते हों फिर भी आज तक हमारे हर उपलक्ष्य पर किसी किसी रूप में हम उनका अनुष्ठान अवश्य करते हैं। इन सबके पीछे एक बहुत ही गहरा सत्य निहित है जो हमारी बुद्धि के परे है इसलिए भले हम इन्हें मानसिक रूप से समझकर इन्हें तिरस्कार की दृष्टि से देखते हों, तब भी इन सभी क्रियाओं का अपना बड़ा भारी महत्त्व है और किसी किसी रूप में ये हमें हमारी सत्ता के सत्य के साथ जोड़ देती हैं। वेदों की रचना किसी मानसिक उपकरण के द्वारा नहीं हुई। श्रीमाताजी अपने अनुभव के आधार पर बताती हैं कि किस प्रकार कोई भागवत् शक्ति हमारी भौतिक सत्ता तक को पूरी तरह से अधिग्रहीत कर सकती है और अपनी क्रिया संपन्न करा सकती है। परंपरागत भारतीय धारणा यही रही है कि सृष्टि के आरंभ में इसी प्रक्रिया से वेद ऋषियों के माध्यम से आए हैं। इसलिए उनमें जो सत्य निहित है वह आज भी उतना ही प्रयोजनीय है।

 

सारा ब्रह्माण्ड भी परमात्मा का एक प्रतीक है और जिस तत्त्व का यह प्रतीक है उसे हमारी चेतना के अनुसार प्रकट कर देता है। जिसकी चेतना जितनी विकसित होगी उतना ही तत्त्व उसके समक्ष प्रकट हो जाएगा। वेद परमात्मा की अभिव्यक्ति को समग्र रूप से प्रतीकात्मक भाषा में निरूपित करते हैं। इसलिए यदि कोई उन मंत्रों और उन ध्वनियों के माध्यम से उसमें निहित सत्य के साथ संपर्क साध सके तो उसे अपने मनोविज्ञान के पीछे स्थित विभिन्न शक्तियों का भी रहस्य प्रकट हो जाएगा और इस अस्तित्व की गुत्थी समझ में जाएगी और तब व्यक्ति अधिकाधिक आरोहण कर सकेगा। सत्य पर बुद्धि का एकाधिकार नहीं है। हमारी सत्ता का हर भाग अपने तरीके से उसे अभिव्यक्त करता है।

 

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः

 वेद्यं पवित्रमर्मोकार ऋक्साम यजुरेव ।। १७।।

 

१७. मैं इस जगत् का पिता, माता, विधाता, पितामह (आदिस्रष्टा) हूँ, समस्त वेदों का ज्ञेय-विषय, पवित्र प्रणवाक्षर , और ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेर हूँ।

 

 

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* - स्थूल और बाह्य जगत् का आत्मा 'विराट्' है, सूक्ष्म और आन्तर तुरीय है। आत्मा 'तैजस' है, म् गुह्य परमचेतन सर्वशक्तिमत्ता का आत्मा प्राज्ञ' है, परम,

 

- माण्डूक्य उपनिषद्

 

 

ज्योतिर्मय भगवान् स्वयं ही वेद हैं और वेदों के प्रतिपाद्य भी। वे ज्ञान और ज्ञेय दोनों ही हैं। ऋक्, यजुर्, साम - अर्थात् वह प्रकाशमय शब्द (मंत्र) जो बुद्धि को ज्ञान की किरणों से उद्बुद्ध कर देता है, कर्म के उचित विधान के लिए शक्तिमय शब्द (मंत्र), आत्मा की दिव्य कामना को चरितार्थ करने के लिए शान्त और सामंजस्यपूर्ण प्राप्ति का शब्द (मंत्र), - स्वयं ही ब्रह्म हैं, अधीश्वर हैं। दिव्य चेतना का मंत्र अपना प्रकटनकारी प्रकाश ले आता है, दिव्य शक्ति का मंत्र अपना कार्यसिद्धि का संकल्प ले आता है और दिव्य आनन्द का मंत्र समान ही रूप से अस्तित्व के आध्यात्मिक आनंद की परिपूर्णता ले आता है। समस्त शब्द और विचार महान् से ही पुष्पित हुए हैं - , महामंत्र, सनातन। , जो इन्द्रियगम्य पदार्थों के रूपों में व्यक्त है, जो सृजनशील आत्म-संकल्पन की उस सचेतन क्रीड़ा के रूप में व्यक्त है जिसके कि बाह्य रूप और पदार्थ रूपक हैं, जो पीछे अनन्त की आत्म-संयमित धीर अतिचेतन शक्ति में व्यक्त है, वह वस्तु और विचार, रूप और नाम का परम मूल, बीज और गर्भस्थान है, - वह स्वयं ही, पूर्ण रूप से, परम इन्द्रियातीत अथवा अग्राह्य है, मूल एकत्व है, वह कालातीत रहस्य है जो समस्त अभिव्यक्ति से ऊपर पुरुषोत्तम' में स्वतः-सिद्ध है। अतः यह यज्ञ एक साथ ही कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों है।

 

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्

प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ।। १८ ।।

 

१८. मैं पथ और लक्ष्य हूँ, मैं ही धारण करनेवाला, स्वामी, साक्षी, निवास-स्थान और आश्रय या शरण हूँ, मैं ही हितकारी मित्र, उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय हूँ, मैं ही विश्रामस्थल और सभी का अविनाशी बीज हूँ।

 

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि

अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ।। १९।।

 

१९. हे अर्जुन! मैं ऊष्णता प्रदान करता हूँ, मैं वृष्टि करता हूँ और उसे रोकता हूँ मैं ही अमरता हूँ और मृत्यु भी हूँ, और मैं ही सत् और असत् हूँ।

 

जो जीव इस प्रकार जानता, भक्ति करता और अपने सारे कर्म अपनी सत्ता के महत् आत्म-समर्पण में शाश्वत को अर्पण कर देता है उसके लिये ईश्वर सब कुछ है और सब कुछ ईश्वर है।.... जिसने अपने-आप को शाश्वत को समर्पित कर दिया है उसे जगत्, दैव और अनिश्चित घटना-चक्र डरा नहीं सकता और इसका दुःख-संताप और अशुभ का पक्ष उसे व्याकुल ही कर सकता है। जो जीव इस प्रकार देखता है उसकी दृष्टि में ईश्वर ही मार्ग हैं और ईश्वर ही उसकी यात्रा का लक्ष्य हैं, एक ऐसा मार्ग जिसमें कोई आत्म-नाश नहीं होता और एक ऐसा लक्ष्य जिस तक उसके उचित रूप में मार्गदर्शित चरण निश्चय ही प्रतिक्षण पहुँच रहे हैं। वह ईश्वर को अपनी और सारी सत्ता का स्वामी, अपनी प्रकृति का धारक, प्रकृतिस्थ आत्मा का पति, उसका प्रेमी और पोषक, अपने सब विचारों और कर्मों का अंतःसाक्षी जानता है। ईश्वर ही उसका घर और देश है, उसकी सब वासना-कामनाओं का आश्रय-स्थान है, सब प्राणियों का घनिष्ठ तथा हितकारी ज्ञानी मित्र है। दृश्य जगत् के सारे रूपों की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय उसकी दृष्टि और अनुभूति में वही एकमेव ईश्वर है जो अपने कालगत आत्माविर्भाव को उसकी निरंतर पुनरावर्तन की पद्धति से बाहर ले आता, बनाए रखता और फिर अपने अन्दर खींच लेता है। जो कुछ भी संसार में उत्पन्न होता और नष्ट होता दिखाई देता है उसका अविनश्वर बीज और मूल वही है और वही उस सबके अव्यक्त भाव का चिरंतन विश्रांति-स्थान है।.... वह सब जिसे हम 'सत्' कहते हैं, वही है और वह सब जिसे सभी 'असत्' मानते हैं, वह भी अनन्त के अन्दर छिपा हुआ है और उस परम अनिर्वचनीय की रहस्यमयी सत्ता का एक भाग है।

 

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्या स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते

ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ।। २० ।।

 

२०. तीनों वेदों को जाननेवाले, सोमपान करनेवाले, निष्पाप मनुष्य यज्ञों के द्वारा मेरी पूजा करके स्वर्ग को प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं; वे अपने पुण्यों के द्वारा इन्द्र के दिव्य लोकों को प्राप्त करके स्वर्ग में देवताओ के दिव्य भोगों को भोगते हैं।

 

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति

 एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ।। २१ ।।

 

२१. वे उस पृथ्वी की अपेक्षा विशालतर सुखप्रद स्वर्गलोक को भोगकर अपने पुण्यों का फल क्षीण हो जाने पर मर्त्यलोक में लौट आते हैं। इस प्रकार वेदत्रय में प्रतिपादित सद्गुणों का आश्रय लेकर, अपनी कामना की तृत्ति को खोजते हुए वे जन्म-मरण के चक्र में गति करते हैं।

 

एकमात्र परम ज्ञान और भक्ति के अतिरिक्त कोई भी चीज, समा आत्म-निवेदन और समर्पण के अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग हमें उन परम तक नहीं ले जाएँगे, जो कि सब कुछ हैं। अन्य धर्म, अन्य भजन-पूजन, अन्य ज्ञान, और साधन भी अवश्य ही अपने-अपने फल देनेवाले हैं, पर वे फल अल्पकालीन होते हैं और केवल दैवी प्रतीकों और रूपों के भोग देकर हो समाप्त हो जाते हैं।.... इसलिए प्राचीन समय के कर्मकाण्डी वेदत्रयी के बाह्यार्थ को सीखता, स्वयं को पापों से मुक्त कर पवित्र करता, देवताओं के संपर्कजनित सुधा का पान करता और यज्ञ-यागादि तथा पुण्य कर्मों द्वारा स्वर्ग के भोगों को पाने का प्रयत्न करता था। जगत् के परे किसी परम वस्तु में यह दृढ विश्वास और किसी दिव्यतर लोक का यह अन्वेषण मरणोपरान्त जीव को स्वर्ग के सुख-भोगों को प्राप्त करने की सामर्थ्य प्रदान करता है, जिस पर उसकी श्रद्धा और उसकी चेष्टा केंद्रित थेः परन्तु वहाँ से जीव को फिर से मर्त्यलोक में आना पड़ता है, क्योंकि जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पाया और उसे चरितार्थ नहीं किया गया होता है। अन्यत्र नहीं, इसी लोक में, परमोच्च ईश्वर को पाना होता है, जीव की अपूर्ण भौतिक मानव-प्रकृति में से उसकी दैवी प्रकृति का विकास करना होता है और ईश्वर, मनुष्य और जगत् के साथ एकत्व के द्वारा सत्ता के समग्र व्यापक सत्य को ढूँढ़ निकालना, उसे जीना और उससे जीवन को प्रत्यक्ष रूप से विलक्षण और अद्भुत बनाना होता है। उसी से हमारे जन्म-मरण का लंबा चक्कर पूरा होकर हम परम फल पाने के अधिकारी बनते हैं; मानव जन्म के द्वारा जीव को यही सुअवसर प्रदान किया जाता है, जब तक इसका प्रयोजन पूर्ण नहीं होता तब तक जन्म-मरण का चक्कर रुक नहीं सकता।

 

जब तक इस पार्थिव जगत् में प्रभु का प्रयोजन पूर्ण नहीं होता तब तक जन्म-मरण रुक नहीं सकता। व्यक्ति चूँकि अपने अहं के दृष्टिकोण से देखता है इसलिए इस चक्कर से छूट निकलना चाहता है, परंतु जब स्वयं परम प्रभु ही जीव रूप से इस विकासक्रम में किसी प्रयोजन सिद्धि हेतु आए हैं तो वे अधूरे कार्य से संतुष्ट कैसे हो सकते हैं। अहमात्मक चेतना को यह विश्व-प्रपंच जैसा लगता है वैसा अवश्य ही परम प्रभु को बिल्कुल भी नहीं लगता, इसलिए उन्हें इसमें से किसी प्रकार निकल भागने की कोई अधीरता नहीं है।

 

अनन्याश्विन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।। २२ ।।

 

२२. जो मनुष्य अनन्य रूप से मुझे अपने चिंतन का संपूर्ण विषय बनाकर मेरी उपासना करते हैं, मेरे साथ सदा योगयुक्त रहनेवाले उन मनुष्यों का मैं स्वतः ही सर्वविध कल्याण करता हूँ और उनके सभी अंतर्बाह्य योग और क्षेम को मैं पूर्ण करता हूँ।

 

ईश्वर-प्रेमी जगत्-व्यवस्था में हमारे जन्म के इस परम प्रयोजन की ओर अनन्य प्रेम और भक्ति के द्वारा सतत् आगे बढ़ता रहता है, जिसके द्वारा वह परमेश्वर और जगदीश्वर को कि अपनी अहंपरक पार्थिव तुष्टि को और ही स्वर्गीय लोकों के भोगों को अपने जीवन का, अपने चिंतन और अपने दर्शन का संपूर्ण लक्ष्य बना लेता है। अन्य कुछ नहीं, केवल भगवान् को ही देखना, प्रतिक्षण उन्हीं के साथ एकत्व में रहना, सब प्राणियों में उन्हीं से प्रेम करना और सब पदार्थों में उन्हीं का आनन्द लेना - यही उसके आध्यात्मिक जीवन की संपूर्ण दशा होती है। उसका भगवद्दर्शन उसे जीवन से विच्छिन्न नहीं करता, और ही जीवन की परिपूर्णता का कोई अंश वह खोता है; क्योंकि भगवान् स्वयं उसका सहज ही सर्वविध कल्याण साधित करने वाले और उसका अंतर्बाह्य सारा योग और क्षेम वहन करने वाले बन जाते हैं, योगक्षेमं वहाम्यहम्। स्वर्ग-सुख और पार्थिव सुख तो उसकी निधियों की केवल एक छोटी छायामात्र है; क्योंकि ज्यों-ज्यों वह भगवान् में विकसित होता जाता है, त्यों-त्यों भगवान् भी अपनी अनन्त सत्ता की सारी ज्योति, शक्ति और आनन्द के साथ उसके ऊपर प्रवाहित होने लगते हैं।

 

अधिकांशतः इसका अर्थ यह लगाया जाता है कि भगवान् व्यक्ति के बाहरी साधनों की आपूर्ति करते हैं, उसके खाने-पीने की, रहने-सहने

 

आदि की व्यवस्था करते हैं। परंतु क्या हम बुद्धि से वास्तव में जानते हैं कि हमारे योग के निर्वहन के लिए क्या-क्या आवश्यक है? यदि हमारे योग के लिए हमें कष्टों की, थपेड़ों की, अपयश आदि की आवश्यकता हो तो भगवान् हमारे लिए बेझिझक उनकी व्यवस्था कर देंगे क्योंकि वे बड़े ही कृपालु हैं। परंतु इन सब चीजों को हम योगक्षेम नहीं मानते। जिस भी चीज की हमारे योग के लिए आवश्यकता है भगवान् उस सब की पूर्ति अवश्य करते हैं, परंतु हमें किस चीज की वास्तव में आवश्यकता है यह निर्णय हमारे अनुसार नहीं अपितु दिव्य विधान के अनुसार होता है। अन्यथा इस बात का व्यक्ति दुरुपयोग करते हुए सोच सकता है कि उसे कोई भी पुरुषार्थ करने की कोई आवश्यकता नहीं।

 

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः

तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ।। २३ ।।

 

२३. हे कुन्ती पुत्र! जो भक्त श्रद्धा से युक्त होकर अन्य देवताओं के लिये यज्ञ करते हैं वे भी मेरे ही लिये यज्ञ करते हैं; किंतु उनका यह यज्ञ यथार्थ विधि के अनुसार नहीं होता।

 

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता प्रभुरेव

तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनात श्वयवन्ति ते ।। २४।।

 

२४. स्वयं मैं ही हूँ जो समस्त यज्ञों का भोक्ता और प्रभु हूँ, किन्तु वे मुझे यथार्थ तत्त्वों में नहीं जानते और इस कारण च्युत हो जाते हैं।

 

सभी सच्चे धार्मिक विश्वास और अभ्यास अथवा साधना यथार्थ में एकमेव परम और वैश्विक ईश्वर की खोज हैं; क्योंकि वे सदा ही मनुष्य के यज्ञ और तप के एकमात्र स्वामी हैं और उसके प्रयास और उसकी अभीप्सा के अनन्त भोक्ता हैं। पूजा-अर्चना का रूप चाहे कितना ही छोटा या नीचा क्यों हो, परमेश्वर की कल्पना चाहे कितनी ही सीमित क्यों हो, आत्मदान, श्रद्धा-विश्वास, अपने ही अहंकार की पूजा के आवरण और जड़-प्रकृति के प्रतिबंधों के परे पहुँचने का प्रयास चाहे कितना ही संकुचित क्यों हो, फिर भी यह मनुष्य की आत्मा और सर्वात्मा के बीच एक संपर्क-सूत्र बन जाता है और प्रत्युत्तर मिलता ही है। तथापि यह प्रत्युत्तर, आराधना और अर्पण से मिलनेवाला प्रतिफल ज्ञान, श्रद्धा और कर्म के अनुसार ही होता है, इनकी मर्यादाओं का वह अतिक्रम नहीं कर सकता, और इसलिए उस महत्तर ईश्वर-ज्ञान की दृष्टि सेकेवल वही जो सत्ता और भूतभाव के समग्र सत्य को प्रदान कर सकता है - यह निम्न कोटि का आत्मोत्सर्ग, आत्मोत्सर्ग के सच्चे और परम विधान के अनुसार नहीं होता। यह आत्मोत्सर्ग या यज्ञ परम् पुरुष परमेश्वर के समग्र स्वरूप और उनके आत्माविर्भाव के सच्चे तत्त्वों के ज्ञान पर प्रतिष्ठित नहीं होता, अपितु अपने-आप को बाह्य और आंशिक रूपों से ही संलग्न कर लेता है, माम् अभिजानन्ति तत्त्वेन अतः इसके द्वारा होनेवाला आत्मदान (यज्ञ) भी अपने लक्ष्य में सीमित, हेतु में भारी रूप से अहंभावयुक्त, कर्म और दान-क्रिया में आंशिक और अशुद्ध या अविधिपूर्वक होता है, यजन्ति अविधिपूर्वकम्।

 

यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः

भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।। २५।।

 

२५. जो देवताओं की पूजा करते हैं वे देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों की पूजा करनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों के लिये यज्ञ करनेवाले भूतों को प्राप्त होते हैं; किन्तु मेरे उपासक मुझे प्राप्त होते हैं।

 

भगवान् का समग्र दर्शन एक समग्र सचेतन आत्म-समर्पण द्वारा ही साधित होता है; शेष सब तो उन चीजों को प्राप्त करता है जो अपूर्ण और आंशिक हैं और उसे उन्हें प्राप्त करने के बाद वहाँ से पुनः पतित होकर महत्तर खोज और विशालतर ईश्वर-अनुभव में अपने-आप को अधिक विशाल बनाने के लिए लौट आना पड़ता है। परन्तु परम् पुरुष और विश्वात्मपुरुष को ही अनन्य रूप से और संपूर्ण रूप से प्राप्त करने का यत्न करना उस सब ज्ञान और फल को प्राप्त होना है जिसे अन्य मार्ग प्राप्त कराते हैं जब कि यहाँ साधक किसी एक ही पहलू से सीमित नहीं रहता, तथा वह भगवान् के सत्य को सभी पहलुओं में अनुभव करता है। इस प्रकार का यत्न परम् पुरुषोत्तम की ओर आगे बढ़ता हुआ भगवद्-सत्ता के सभी रूपों को अंतर्निहित करता है।

 

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति

तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ।। २६।।

 

२६. एक पत्र, एक पुष्प, एक फल, जल, जो कुछ भी व्यक्ति भक्तिपूर्वक मुझे अर्पण करता है, उस यत्नशील आत्मा के द्वारा वह प्रेम-भक्ति युक्त भेंट मुझे स्वीकार है।

 

.....केवल कोई समर्पित बाहरी भेंट ही नहीं है जो इस प्रकार प्रेम और भक्तिपूर्वक दी जा सकती है, अपितु हमारे सब विचार, हमारी सभी भावनाएँ और संवेदन, हमारी सब बाह्य क्रियाएँ और उनके रूप एवं विषय भी शाश्वत के प्रति ऐसी भेंट हो सकते हैं। यह सच है कि एक विशिष्ट कार्य का या का के किसी विशेष रूप का अपना महत्त्व होता है. यहाँ तक कि अत्यधिक महत्त्व होता है, परंतु कार्य में निहित भाव ही है जो मुख्य तत्त्व है; वह भाव ही जिसका कि वह कार्य प्रतीक या मूर्त अभिव्यक्ति होता है, इस कार्य को इसका संपूर्ण मूल्य और इसका औचित्यपूर्ण महत्त्व प्रदान करता है। अथवा प्रेम और पूजा के पूर्ण कर्म में तीन होते हैं जो एक ही अखंड समग्र की अभिव्यक्तियाँ होते हैं, - कर्म में भगवान की क्रियात्मक पूजा, कर्म के बाह्य रूप में किसी दिव्य दर्शन एवं अन्वेषण को या भगवान् के साथ किसी संबंध को प्रकट करने वाला पूजा-प्रतीक, तीसरा, हृदय, अंतरात्मा और आत्मा में एकत्व या एकत्वानुभूति के लिये आंतरिक आराधन एवं उत्कंठा। इस तरीके से ही जीवन को पूजा में परिवर्तित किया जा सकता है, - इसके पीछे परात्पर तथा सार्वभौम प्रेम का भाव और एकत्व की उत्कण्ठा एवं एकत्व के बोध को प्रतिष्ठित करके; प्रत्येक क्रिया को एक प्रतीक बनाकर, ईश्वरोन्मुख भाव की या भगवान् के साथ सम्बन्ध की अभिव्यक्ति बनाकर; जो कुछ हम करते हैं - मन की समझ, प्राण के आज्ञापालन और हृदय के समर्पण - इस सब को पूजाकार्य में तथा आत्मा के अन्तर्मिलन में परिवर्तित करके।

 

यह पूर्ण आत्मोत्सर्ग, यह एकनिष्ठ समर्पण ही वह भक्ति है जिसे गीता अपने समन्वय का शीर्ष बनाती है। सारा कर्म और प्रयास इस भक्ति के द्वारा उस परम-पुरुष जगदीश्वर के प्रति एक भेंट के रूप में परिणत हो जाता है।

 

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* कर्म का एक निरा भौतिक रूप होता है, पूजा-पद्धतियों के उन रूपों के जैसा जिनमें कोई विशेष भाव-भंगिमा, कोई विशेष क्रिया आत्मोत्सर्ग के भाव को अभिव्यत करने के उद्देश्य से प्रयुक्त होती है। वह विशुद्ध रूप में भौतिक होता है, उदाहरणार्थ, धूपबत्ती जलाना, पूजा-सामग्री को सजाकर रखना, यहाँ तक कि मंदिर की देख-भाल करना, मूर्ति को सजाना आदि, इस प्रकार की सब विशुद्ध भौतिक क्रियाएँ।

 

दूसरा भाग होता है एक प्रकार का मानसिक आत्मोत्सर्ग-भाव जो किये जाने वाले कर्म को एक प्रतीक बना देता है। तब मनुष्य धूपबत्ती मात्र जलाने से ही संतुष्ट नहीं हो जाता, अपितु धूपबत्ती जलाते समय वह इस क्रिया को प्रतीकात्मक बना देता है जो, उदाहरणार्थ, शरीर में जलती हुई अभीप्सा का अथवा आत्म-विलोपन के लिये, अग्नि के शुद्धिकरण के लिये किये गये आत्म-दान का प्रतीक होता है। अर्थात्, पहले तो बाह्य क्रिया होती है, फिर इस क्रिया में निहित प्रतीक, और जो कुछ किया जाता है उसका प्रतीकात्मक ज्ञान।

 

और अंत में, इन दोनों के पीछे, एकत्व की अभीप्सा होती है; कि यह सब, ये क्रियाएँ तथा इनके साथ वह प्रतीकात्मक स्वरूप जो तुम इन्हें प्रदान करते हो, ये सब भगवान् के क्रमशः अधिकाधिक समीप जाने तथा अपने-आप को उनके साथ युक्त होने के उपयुक्त बनाने के साधनमात्र बन सकते हैं।

 

क्रिया को पूर्ण बनाने के लिए ये तीनों चीजें अवश्य विद्यमान होनी चाहिए: अर्थात कोई शुद्ध भौतिक वस्तु, कोई मानसिक वस्तु, और कोई आंतरात्मिक वस्तु, चैत्य अभीप्सा यदि तीनों में से बाकी दोनों के बिना कोई एक वस्तु हो तो वह क्रिया अपूर्ण होगी। सामान्यतया कदाचित् ही ये तीनों सचेतन रूप में संयुक्त होती हैं। यही बात विलक्षण मैं, वाई एवं आत्म-दान से उस क्रिया में भाग लेती है।

 

 

जब व्यक्ति भगवान् से प्रेम करता है तब उसकी क्रिया उस प्रेम के अनुसार होती है कि उसके अपने अहं के अनुसार। हालाँकि चेतना के इस प्रकार के परिवर्तन में सामान्यतया बहुत लंबा समय लगता है परंतु इस परिवर्तन के होने के बाद इसकी क्रिया सबसे तेज और सबसे अधिक शक्तिशाली होती है। जब हमारी बुद्धि में किसी कार्य को करने का विचार उठता है तब उसमें उसे चरितार्थ कर पाने के लिए पर्याप्त शक्ति नहीं होती इसलिए उसे चरितार्थ करने के लिए बहुत श्रम करना पड़ता है। वहीं यदि हमारा हृदय किसी चीज के लिए द्रवित हो उठता है तब व्यक्ति को उसकी ओर चलने से कोई नहीं रोक सकता। बिना हृदय के द्रवित हुए किसी प्रकार का समर्पण कभी नहीं हो सकता। इस संदर्भ में दिलीप कुमार रॉय द्वारा पूछे एक प्रश्न के उत्तर में श्री कृष्णप्रेम का बड़ा ही मार्मिक उत्तर है।

 

दिलीप कुमार रॉय ने पूछा, "एक और प्रश्न है जो मैं तुम्हें पूछना चाहता हूँ यदि तुम बुरा मानो तो.... तुम देखो, इस बात पर मुझे कभी-कभी संशय हुआ है कि क्या जिस विजय की तुम बात करते हो वह केवल घोर परिश्रम करके अपनी स्वेच्छा को संकल्प-शक्ति से बदल देने मात्र से साधित नहीं हो सकती? क्या तुम्हें प्रेम पर आग्रह करने की आवश्यकता है? ....मेरा मतलब है कि यदि इस प्रकार की परिणति की निष्ठापूर्वक इच्छा रखी जाए, तो क्या प्रेम का समाविष्ट होना या उसका हस्तक्षेप आवश्यक है, और ऐसी स्थिति में एक अपरिहार्य प्रश्न उठता है: प्रेम का आह्वान किया कैसे जाए? तुम इच्छा पर तो अधिकार रख सकते हो, परंतु प्रेम पर नहीं, क्या कर सकते हो? प्रेम तो जब आता है तभी आता है - क्या हम सभी नहीं जानते?"

 

उन्होंने मुझ पर एक व्यंग्यमिश्रित दृष्टि से देखा और फिर दृढ़तापूर्वक अपना सिर हिलाया।

 

"नहीं दिलीप, इससे काम नहीं चलेगा। मैं जानता हूँ कि तुम्हारा इरादा क्या है और क्यों प्रेम के आह्वान को तुम अव्यावहारिक बताकर इसे टालकर इससे बचना चाहते हो, जी चुराना चाहते हो। परंतु वहाँ तुम गलत हो, क्योंकि तुम एकमात्र अपनी संकल्प-शक्ति के सहारे ही अपनी स्वेच्छा को कम नहीं कर सकते। जब तक कि प्रेम का समर्थन प्राप्त नहीं होता तब तक यह नहीं किया जा सकता। क्योंकि केवल प्रेम ही समर्पण को एक हर्ष का विषय बना सकता है। यदि प्रेम हो तो अहंकार कभी भी समर्पण के निरंतर कष्ट से गुजर नहीं सकता। केवल प्रेम का ऊर्जा-स्रोत (पावर-हाउस) ही वह विद्युत उत्पन्न करने में सक्षम है जिसके द्वारा योग की चक्की या कारखाने को चलाया जा सकता है। ...सच्चे प्रेम का सार-रूप सामने नहीं सकता जब तक कि तुमने अहं के बाहरी खोल को तोड़ दिया हो, अर्थात् तुम्हारी स्व-इच्छा को। यहाँ एकमात्र कठिनाई यह है कि जब तक प्रेम अग्रणी नहीं होता - या फिर जैसा कि तुम्हारे गुरुदेव कहते हैं, चैत्य पुरुष सामने नहीं जाता - तब तक अहं का कठोर खोल बिल्कुल तोड़ा ही नहीं जा सकता और वहाँ फिर तुम दुष्वक्र में फँस जाते हो, क्योंकि जब तक अहं की दीवारों को गिरा नहीं दिया जाता तब तक प्रेम भीतर प्रवेश नहीं कर सकता। परंतु वास्तव में ही ये आत्मा की गहनतम पहेलियाँ हैं और तब तक असमाधेय ही बनी रहेंगी जब तक कि इन्हें शुद्ध-बुद्धि के प्रकाश द्वारा पुनः अनावृत नहीं कर दिया जाता..." (योगी श्रीकृष्णप्रेम, श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट, पृष्ठ ८८)

 

पत्र, पुष्प, फल आदि भेंट करने से वास्तव में अर्थ है कि अपनी से छोटी चीज को अर्पित कर देना। और भगवान् कहते हैं कि वे तो छोटी छोटी से छोटी चीज को भी स्वीकार कर लेते हैं। आरंभ में ही ऐसा संभव नहीं होता कि व्यक्ति अपने सभी भाव अर्पित कर पाए। कुछ भावों को व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक सहजता से अर्पित कर सकता है परंतु कुछ ऐसे भाव हैं जिनमें व्यक्ति गहराई तक आसक्त रहता है और उन्हें अर्पित करना उसके लिए अधिक मुश्किल होता है। उदाहरण के लिए, साधना के लिए कदम बढ़ा लेने पर भी व्यक्ति की अपने परिवार में, या परिवार के किसी सदस्य में, किसी छोटे बच्चे में या फिर अन्य किसी वस्तु में गहरी आसक्ति बनी रह सकती है जिसे छोड़ने में उसे बहुत कष्ट का अनुभव होता है। परंतु यदि मन में परमात्मा के प्रति थोड़ा-बहुत भी संकल्प गया है तो उसके सहारे यज्ञ का आरंभ हो जाता है और धीरे-धीरे वह अन्य भागा को भी यज्ञ में सम्मिलित कर लेता है। कहने का अर्थ है कि छोटे से छोटा काम भी यदि व्यक्ति अपने अहं की बजाय परमात्मा के निमित्त करता है तो उसका बड़ा भारी महत्त्व है। और वास्तव में तो आरंभ होता ही इसी प्रकार है, क्योंकि आरंभ में ही व्यक्ति सभी कुछ समर्पित कर दे ऐसा संभव नहीं होता। आरंभ में तो कोई केंद्रीय संकल्प जागृत होता है जो व्यक्ति को परमात्मा की ओर मोड़ देता है। परंतु व्यावहारिक जीवन में उस संकल्प को चरितार्थ करना ही तो साधना है। और यह व्यक्ति की अभीप्सा और उसके संकल्प की तीव्रता पर निर्भर करता है कि साधना पथ पर वह किस गति से आगे बढ़ता है। इसलिए जब भगवान् पत्र, पुष्प आदि जैसी छोटी सी भेंट की बात करते हैं तब वह इस बात का प्रतीक है कि भक्तिपूर्वक छोटी से छोटी भेंट का भी हमें बड़ा भारी प्रतिफल प्राप्त होता है। हमारे अंदर ऐसे-ऐसे भाग होते हैं जो हमारे साधना पथ पर बहुत आगे जाने पर भी अपनी स्व-इच्छा बनाए रख सकते हैं। हम देख सकते हैं कि किस प्रकार हमारे अंदर ऐसे अनगिनत छोटे-छोटे हिस्से छिपे होते हैं जिन्हें हमारे समर्पण से कोई सरोकार नहीं होता। हमारी बाह्य सत्ता के इस प्रकार के गठन के कारण ही कोई भी छोटी से छोटी सच्ची भेंट भी इतनी महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि वास्तव में ये भाग भगवान् को कुछ भी भेंट करना चाहते ही नहीं। इसीलिए जो कोई जिस किसी भी भाव से भगवान् की ओर मुड़ता है, चाहे तकलीफ के कारण हो, किसी स्वार्थपूर्ति के लिए हो या फिर किसी जिज्ञासावश हो, गीता सभी को ही श्रेष्ठ बताती है क्योंकि वे जिस किसी भी कारण से हो, पर भगवान् की ओर मुड़ तो जाते हैं, और वही सबसे महत्त्वपूर्ण बात है।

 

ज्यों-ज्यों व्यक्ति परमात्मा की ओर बढ़ता जाएगा त्यों-त्यों उसमें अधिकाधिक समता आती जाएगी क्योंकि तब सभी चीजों के पीछे उसे प्रभु की क्रिया गोचर होने लगेगी। और जब सभी चीजों के पीछे उन्हीं का हाथ दिखेगा तब कौनसी चीज है जिससे कि व्यक्ति विचलित हो पाए। पहले यह समता उन चीजों के विषय में होगी जिनसे व्यक्ति अधिक विचलित नहीं होता। धीरे-धीरे यह समता उन भागों में भी आती जाएगी जिनमें हम अतिशय रूप से आसक्त रहते हैं। कहने का अर्थ है कि व्यक्ति के अंदर ज्यों-ज्यों भगवान् के प्रति प्रेम का यह भाव बढ़ता जाता है त्यों-त्यों दुनिया के विषय में उसका दृष्टिकोण बिल्कुल बदलता जाता है। यदि यह प्रेम का भाव आए तो व्यक्ति केवल अपने अहं की, मन, प्राण और शरीर की क्षुद्र संतुष्टियों की पूर्ति में ही लगा रहता है। श्री अरविन्द भक्ति के इसी तत्त्व को विकसित करेंगे।

 

प्रश्न : यहाँ पाद-टिप्पणी में उल्लेख है कि कर्म का एक निरा भौतिक रूप होता है और दूसरा भाग होता है एक प्रकार का मानसिक आत्मोत्सर्ग-भाव जो किये जाने वाले कर्म को एक प्रतीक बना देता है। तो इसका क्या अर्थ है कि वह कर्म को एक प्रतीक बना देता है?

 

उत्तर : किसी भी कर्म को पूर्ण बनाने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है : शुद्ध भौतिक कर्म, उसके पीछे कोई मानसिक भाव, और उसके साथ ही एकत्व के लिए चैत्य अभीप्सा। सामान्यतया हम सुनते हैं कि वास्तव में तो कर्म के पीछे के भाव का महत्त्व है, बाड़ा पूजा तो बड़ी अधम चीज है। जब दिलीप कुमार रॉय ने स्वामी ब्रह्मानंद द्वारा अपनी पुस्तक में उद्धृत किये एक श्लोक का श्रीकृष्णप्रेम के सामने उल्लेख करते हुए कहा कि, 'उच्चतम पूजा उस चेतना या भाव में स्थित होती है जिसमें तुम प्रभु को सभी चीजों में देखते हो। उससे निचले दर्जे का है ध्यान। उससे भी निम्नंतर है स्तुतिगान या नाम जप और सबसे ही निम्न है बाह्य पूजा, औपचारिक सेवा', तब श्रीकृष्णप्रेम ने तीव्र रूप से इस बात पर अपनी आपत्ति जताई और कहा कि, "इस प्रकार के उद्धरण बहुत भारी क्षति पहुँचाते हैं यदि उनका अर्थ अपनी संपूर्णता से अलग करके खंड-खंड में आँका जाता है और फिर उन्हें सत्य की दीपशिखाओं में विकसित कर दिया जाता है जो प्रकाशित करने की बजाय छाया अधिक डालती हैं।" (योगी श्रीकृष्णप्रेम, पृष्ठ ७८)

 

श्रीकृष्णप्रेम ने तो अक्षरशः वैष्णव तंत्र का पालन किया था और उसके सभी बाहरी निषेधाज्ञाओं का नैष्ठिक रूप से पालन किया था। और अपने जीवन के द्वारा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया कि किस प्रकार एक पूर्ण कर्म, जिसमें बाहरी क्रिया, उसके पीछे का भाव और चैत्य अभीप्सा साथ मिलने पर भगवान् की जीवंत उपस्थिति ले आता है। अतः किसी भी कर्म को पूर्ण बनाने के लिए उसमें तीन चीजों का होना आवश्यक है। सबसे पहला है पूजा का एक भौतिक रूप जैसे कि शिवजी को जल या दूध अर्पित करना, या फिर धूपबत्ती जलाना या अन्य कुछ, उसके बाद, उस बाह्य कर्म के पीछे यह मानसिक भाव या कल्पना कि किस प्रकार भगवान् को यह दूध अर्पण करना आत्मा को पुष्ट करना है। और अंत में यह भाव कि जो कुछ पूजा हम कर रहे हैं वह हमें परमात्मा के साथ युक्त कर दे। इन तीनों में से कोई भी एक छूट जाये तो कर्म पूर्ण नहीं हो सकता।

 

श्रीअरविन्द ने अपने योग में भौतिक कर्म को अत्यावश्यक बताया है क्योंकि इसी के द्वारा हमारी भौतिक चेतना को भगवान् के लिए कार्य करने का आनंद और उनके संपर्क में आने का सुअवसर प्राप्त हो सकता है। साथ ही भौतिक कर्म करने से व्यक्ति का सही संतुलन बना रहता है। यदि व्यक्ति भौतिक कर्म करे और केवल ध्यान आदि में ही लगा रहे तो अधिकांशतः व्यक्ति का संतुलन बिगड़ने की आशंका रहती है। इसकी बहुत कुछ संभावना रहती है कि व्यक्ति स्वयं अपने ही किन्हीं मनोनिर्मित जगतों में निवास करने लगे जिनसे निकल पाना उसके लिए अत्यंत कठिन हो जाय। परमहंस योगानन्द जी की शिष्या दया माता भी कर्मयोग को अत्यंत महत्त्व प्रदान करती थीं। वे कहती थीं कि आध्यात्मिक पथ पर संतुलन बनाए रखने के लिए भौतिक कर्म करना अत्यावश्यक है। श्रीअरविन्द भी कहते हैं कि भौतिक कर्म के बिना भौतिक रूपांतर का कार्य सिद्ध नहीं हो सकता।

 

भारतीय संस्कृति ने सदा ही भगवान् के प्रति निवेदित कर्म को महत्त्व दिया है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने कर्म में आनन्द का अनुभव होता था और चूंकि प्रत्येक को अपने कर्म में अत्यंत आनंद आता था इसीलिए भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता के उदाहरण आज भी प्रचलित हैं। अब यदि कर्म अपने आप में कोई बाध्यता या बोझ रहकर आनन्द का साधन बन जाए, अपनी आत्म-अभिव्यक्ति का साधन बन जाए, परमात्मा से मिलने का, उनसे संपर्क साधने का माध्यम बन जाए तब तो कोई भी व्यक्ति कर्म किये बिना कैसे रह सकता है। इसी कारण ऐसा कौनसा क्षेत्र रहा है जिसमें भारत ने विपुल रूप से और सर्वोत्कृष्ट गुणवत्ता की रचना की हो। वहीं यदि व्यक्ति को कर्म बोझ लगने लगे तब तो वह स्वयं भी उसे करने से पीड़ित रहेगा, अपने सहयोगियों को और सहकर्मियों को पीड़ित करेगा और उसका कर्म भी गुणवत्ता की दृष्टि से अधिक से अधिक केवल कोई औसत दर्जे का ही होगा। परंतु जब भावना को भगवान् की ओर मोड़ दिया जाता है और कर्म में आनन्द की अनुभूति होने लगती है तब तो जिस मात्रा और गुणवत्ता की रचना की जाती है वह तो अतुलनीय होती है। आज भी विध्वंस की अनेकों शताब्दियाँ बीत जाने के बाद भी भारतीय रचनाओं का जो कुछ भी अंश हमारे पास शेष बचा रहता है उसका भी कोई सानी नहीं है और उसे भी हम आश्चर्य की दृष्टि से देखते हैं कि वह संभव कैये हो पाया।

 

"सबसे पहले गीता ने कर्मयोग की चर्चा की, उसके बाद ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ बताया, अब यहाँ गीता उनमें भक्ति तत्त्व को जोड़ रही है। तात्पर्य यह है कि समग्र रूप से कर्म तभी होंगे जब तीनों चीजें सम्मिलित हो। हमारे कर्मों के पीछे भाव और आत्मा हो तो कर्म भक्ति प्रधान हो जायेंगे और हमारे उत्थान का एक सशक्त साधन बन जाएँगे और ऐसा कोई कर्म नहीं है जिसे हम परमात्मा से जोड़ सकें।

 

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासियत्

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ।। २७।।

 

२७. हे कौन्तेय! तू जो कुछ करता है, जो कुछ भोग करता है, जो कुछ यह (उत्सर्ग) करता है, जो कुछ दान करता है, तपस्या की ऊर्जा, आत्मा का संकल्प अथवा प्रयास जो तू करता है, उसे मेरे प्रति एक भेंट बना दे।

 

यह समग्र भक्ति का स्वरूप है। इससे पिछले श्लोक में गीता भौतिक चीजों को भेंट करने की बात कहती है। अब गीता इन सब प्राणिक, मानसिक ऊर्जा, संकल्प आदि को भी भेंट करने की बात कर रही है। इस प्रकार गीता हमारी सत्ता की सभी क्रियाओं, सभी मनोवैज्ञानिक शक्तियों, मानसिक, प्राणिक संकल्पों, ऊर्जाओं आदि में भी भक्ति को प्रविष्ट कर रही है। इसी बात का श्रीअरविन्द यहाँ विवेचन कर रहे हैं।

 

यहाँ छोटी-से-छोटी चीज, जीवन की सामान्य-से-सामान्य घटना, हम जो कुछ हैं या हमारे पास जो कुछ है उसका किंचित्मात्र भी दान, छोटे-से-छोटा कर्म दिव्य महत्त्व प्राप्त कर लेता है और भगवान् के लिए ग्रहण कर सकने योग्य भेंट बन जाता है जो इसे ईश्वर-प्रेमी की आत्मा और उसके जीवन पर अधिकार पाने का एक माध्यम बना लेते हैं।

 

यह बहुत महत्त्वपूर्ण बात है। हम जो कुछ हैं और जो कुछ हमारे पास है उसका किंचित् मात्र भी दान एक दिव्य महत्त्व प्राप्त कर लेता है। परन्तु यहाँ भगवान् हमसे हम जो कुछ भी हैं अथवा जो कुछ भी हमारे पास है, उस सब की माँग कर रहे हैं। वर्तमान में तो हम अपना सर्वस्व अपने अहंकार की सेवा में अर्पित करते हैं जहाँ कि अहंकार राजा के रूप में अपने आसन पर विराजमान है और मिथ्यात्व उसकी रानी के रूप में उसके साथ विराजमान है। वर्तमान में तो अहं का साम्राज्य इतना फैला है कि हम यह मानने को भी वास्तव में तैयार नहीं होते कि हम अहं के वशीभूत होकर कार्य कर रहे हैं। ऐसे में यदि हम इस चीज के लिए आश्वस्त हो जाएँ कि हम अहं से मुक्त हो गए हैं तब तो उससे मुक्त होने की तो हमारी कोई संभावना भी नहीं रहती। इसलिए व्यक्ति को यह मानकर चलना चाहिये कि अहं की पाश में तो वह अवश्य ही है, ऐसे में करने का काम केवल यह है कि यह ढूँढ़े कि वह पाश कहाँ है और वहाँ उसे कुछ ढीला करने का प्रयास करे। आम तौर पर समाज में हम कुछ ऐसे लोगों को देखते हैं जो परोपकारिता के कार्यों में अपना समय, अपना धन आदि लगाते हैं, जैसे कि गरीबों की सेवा करना, गोशाला में दान करना, पीड़ितों के इलाज आदि के लिए धन देना, आदि-आदि। इन सब कार्यों में व्यक्ति को सच में ऐसा प्रतीत होता है कि वह तो अहं से मुक्त होकर सबकी निःस्वार्थ रूप से सेवा कर रहा है और गीता का कर्मयोग ही कर रहा है। इस विषय पर श्रीमाताजी के वचन बहुत ही मार्मिक और उद्बोधक हैं। वे कहती हैं,

 

"... यदि तुम मानवजाति की सहायता करना चाहते हो तो एक ही काम करने लायक है। अपने-आपको, जितना संभव हो, पूरी तरह से भगवान् के अर्पण कर दो। यही समाधान है। ...

 

...तुम क्या हो? तुम बस जरा सी चेतना और जरा से भौतिक पदार्थ के प्रतिनिधि हो। बस, उसी को तुम 'मैं' कहते हो। यदि तुम मानवजाति की, संसार या विश्व की सेवा करना चाहते हो तो करने लायक यही है कि उस छोटे से टुकड़े को पूरी तरह भगवान् को अर्पण कर दो। ... जो कुछ तुम्हारा है उसे दे दो। उसे पूरी तरह, समग्र रूप में भगवान् को दे दो...इससे अच्छा कोई समाधान नहीं है। तुम मानवजाति की सहायता कैसे करना चाहते हो? तुम्हें तो यह भी नहीं पता कि उसे क्या चाहिये ...

 

...यदि यही लोग जो विद्यालयों के लिये पैसा देने को तैयार होते हैं, उनसे कहा जाय कि कोई भगवान् का काम है जिसे भगवान् ने अमुक तरीके से करने का निश्चय किया है, और यदि उन्हें विश्वास भी हो कि यह सचमुच भगवान् का कार्य है, तो भी वे कुछ देने से इंकार करते हैं, क्योंकि यह सर्वसम्मत परोपकार का काम नहीं है - यह करके कुछ अच्छा करने का संतोष नहीं होता! मैं एक विनोदप्रिय व्यक्ति को जानती थी जो कहा करता था : 'भगवान् का राज्य बहुत जल्दी नहीं आयेगा क्योंकि तब इन बेचारे परोपकारियों के लिये क्या बचा रहेगा? यदि मानवजाति दुःख भोगती रहे तो बेचारे परोपकारी लोग बेकार हो जायेंगे।' इसमें से निकलना मुश्किल है। फिर भी यह तथ्य है कि दुनिया इस स्थिति में से तब तक बाहर नहीं निकल सकती जब तक कि वह अपने-आप को भगवान् को सौंप दे। सभी सद्गुणतुम उनकी चाहे जितनी महिमा गाओ तुम्हारी आत्म-संतुष्टि को, यानी, अहं को बढ़ाते हैं। वे तुम्हें सचमुच भगवान् के बारे में सचेतन होने में सहायता नहीं देते। दुनिया के बुद्धिमान् और उदार लोगों को बदलना सबसे कठिन होता है। वे अपने जीवन से बहुत संतुष्ट होते हैं। एक गरीब व्यक्ति जिसने जीवन में सब प्रकार की बेवकूफियाँ की हैं तुरंत दुःखी हो उठता है और कहता है : मैं कुछ नहीं हूँ, मैं कुछ नहीं कर सकता। मुझे तुम जो बनाना चाहो बना लो।" यह व्यक्ति ज्यादा ठीक है और यह भगवान् के, उस व्यक्ति की अपेक्षा बहुत अधिक निकट है जो बुद्धिमान् है तथा अपनी बुद्धिमत्ता और गर्व से भरा है। यह अपने-आप को वैसा ही देखता है जैसा कि वह है।" (CWM 5, 12-14)

 

अब प्रश्न यह उठता है कि यह भेंट हो किस प्रकार से? क्योंकि गीता में आरंभ से ही हमने देखा है कि जो प्रसंग हमें सतही भी प्रतीत होते हैं वे भी अपने वास्तविक स्वरूप में अत्यंत गंभीर होते हैं। इसलिए गीता जिस भेंट की बात कर रही है वह यदि कोई सतही प्रकार की होती तब तो सभी अपने-अपने तरीके से भेंट कर ही रहे हैं। और फिर श्रीअरविन्द की टीका से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि जिस स्थिति की गीता बात कर रही है वह तो एक ऐसी आध्यात्मिक अवस्था है जहाँ तक सहज ही नहीं पहुँचा जा सकता।

 

श्रीअरविन्द और श्रीमाताजी के आलोक में यदि हम इसे देखें तो व्यावहारिक रूप से इस भेंट की कहीं किसी भाग में थोड़ी शुरुआत होती है। और फिर वह धीरे-धीरे हमारी सत्ता को, हमारे सारे क्रिया-कलापों को अपने में समाविष्ट करती जाती है। यह प्रक्रिया प्रत्येक के लिए भिन्न-भिन्न स्तर पर जाकर रुक जाती है। लाखों में से कोई एक विरली आत्मा ही इस आदर्श स्थिति के कुछ समीप जा पाती है। अब यह शुरुआत होती किस प्रकार है? यह एक बहुत ही विस्तृत विषय है और प्रत्येक के लिए विशिष्ट होता है। पर फिर भी इसमें कुछ सामान्य बातें हैं जिनके विषय में हम चर्चा कर सकते हैं।

 

जब व्यक्ति को किसी प्रकार सच्चे रूप से यह समझ में जाए कि वर्तमान जीवन तो स्वार्थमय है जहाँ सारे दिन वह केवल मन, प्राण और शरीर की संतुष्टियों की पूर्ति में ही लगा रहता है, तब वह समझ जाता है कि केवल प्रभु को निवेदित जीवन ही जीने योग्य है। ऐसी समझ उसे पूर्वजन्म के संस्कारों के द्वारा, किसी सत्संग के द्वारा, किसी पुस्तक के अध्ययन के द्वारा, जीवन में घटी किसी अकस्मात् घटना के माध्यम से या फिर अन्य माध्यमों से सकती है। हालाँकि अभी भी व्यक्ति अनेकानेक तरीके के भावों, विचारों, अपने कर्तव्यों, प्रतिबद्धताओं आदि से जकड़ा रहता है इसलिए आरंभ में अधिक कुछ नहीं कर पाता, परंतु फिर भी, जिस भी तरह हो, जब यह बात समझ में जाती है तो उसकी कुछ कुछ छाप उसके जीवन पर अवश्य लग जाती है। इसलिए अन्य सभी कुछ के होते हुए भी व्यक्ति कहीं--कहीं यह प्रयास करना आरंभ करता है कि यह तत्त्व भी जीवन में प्रवेश करे। अब चूँकि इस चीज का अपना आकर्षण ही ऐसा है कि उसके हृदय में, उसकी बुद्धि में उसे महसूस होता है कि यही चीज करने लायक है। पर इसके साथ ही साथ अधिकांशतः व्यक्ति को लगभग यह पूरा विश्वास हो जाता है कि वह तो भगवान् का हो चुका है। हालाँकि यह बात सत्ता के किसी एक भाग का सत्य अवश्य होता है परंतु फिर भी अभी भी व्यक्ति इस स्थिति से तो बहुत दूर होता है जहाँ वह वास्तव में ही भगवान् का हो चुका हो। पर यह बात भी व्यक्ति को तब समझ में आती है जब उसे जीवन में अनेक बार ठोकरें लगती हैं और उसकी सच्चाई कसौटी पर उतारी जाती है। ऐसे लोग जिन्होंने साधना-पथ अपना लिया है और जो अपना सर्वस्व श्रीमाताजी की सेवा में अर्पित करने का संकल्प कर चुके हैं और जो वास्तव में भीतर से ऐसा करना चाहते भी हैं उन्हें भी कदम-कदम पर अपनी निम्न प्रकृति के धोखों से गुजरना होता है। क्योंकि यह बात तो बहुत देर से समझ में आती है कि हमारे बाहरी भागों को हमारे आंतरिक भाव से विशेष कोई सरोकार नहीं होता। इसलिए भीतर तो हमारे अंदर अपने आप को भगवान् को दे देने का भाव होता है परंतु बाहरी भागों के अपने निहित हेतु होते हैं इसलिए बाहरी अभिव्यक्ति के अंदर तो इन बाहरी भागों की ही प्रधानता रहती है। इतना अवश्य है कि यह भाव जीवन को कुछ रंग दे देता है। परंतु इस अवस्था में और पूर्ण समर्पण की अवस्था में एक बड़ा भारी अंतर होता है। हालाँकि सामान्य व्यक्ति को तो यह रंगत भी बड़ी प्रभावी प्रतीत होती है। ऐसा व्यक्ति अपने मित्र के लिए, देश के लिए अपने प्राणों तक की भी परवाह नहीं करता, अपने आदर्श के लिए प्राण भी दे सकता है। परंतु एक दृष्टिकोण से किसी आदर्श के लिए अपने प्राण दे देना अवश्य ही श्रेष्ठ तो है परंतु उसके लिए जीना और आवश्यक कष्ट सहन करना अधिक मुश्किल है। और सच्चा मूल्य तो ऐसे ही जीवन का है। सामान्यतया कुछ व्यक्ति दंभ भरते हुए या अपने प्रेम की प्रगाढ़ता दिखाते हुए कहते हैं कि वे श्रीमाताजी के लिए अपने प्राण भी दे सकते हैं। पर वास्तव में तो श्रीमाताजी के लिए अपने सर्वस्व की आहुति देना कहीं अधिक महत् और कष्टकर है अन्यथा प्राण तो बिना कुछ किये भी अपने समय से चले जाते हैं। अवश्य ही श्रीमाताजी के लिए प्राण देने के भाव का अपना मूल्य है, परंतु उनके हेतु संपूर्ण जीवन को रूपांतरित कर दिया जाए और उनका सच्चा यंत्र बना दिया जाए, यह बेहतरं चीज है।

 

जब व्यक्ति के अंदर यह भाव हो कि वह भगवान् के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए भी तैयार है तब तो सामान्यतः वह पूरी तरह आश्वस्त हो जाता है कि अब वह पूरी तरह से भगवान् का हो चुका है। और इसके साथ ही साथ अपने विषय में व्यक्ति में बड़ी ही आत्म-तुष्टि और अपनी श्रेष्ठता का भान आए बिना नहीं रहता। और इस कारण व्यक्ति अपनी कमियों को देखने में असमर्थ हो जाता है जबकि दूसरों की कमियों को खूब देख लेता है। परंतु चूँकि अंदर कहीं कहीं कुछ सच्चाई भी होती है इसलिए जब भगवान् की कृपा से वह अपनी अवस्था के विषय में कुछ अधिक सचेतन होता है तो वह उसके अनुसार यथासंभव अपने दृष्टिकोण आदि में परिवर्तन करता है। कुछ समय बाद वह पाता है कि पहले जिन धोखों के प्रति वह सचेतन हुआ था और जिन्हें उसने निकाल बाहर करने का प्रयास किया था उनका केवल रूप ही बदला है और वे कुछ अधिक सूक्ष्म बन गए हैं परंतु वे फिर भी उसके अंदर विद्यमान हैं। इस प्रकार व्यक्ति इन जाल-घातों की खोज करता रहता है, इनके प्रति सचेतन होकर इनका निराकरण करने का प्रयास करता रहता है और अपने पथ पर अग्रसर होता रहता है। परंतु यह निश्चित है कि प्रत्येक के साथ उसके अपने निम्न भागों की क्रीड़ा लगी रहती है जो उसे उसके गठन के अनुसार धोखे में रखती है। भगवान् का सत्य अनंत आयामी है अतः मानवीय चेतना का उसकी तरफ बढ़ना कठिनाईयों, अर्ध-सत्यों प्रतीतियों से भरा होता है। धोखा शब्द यही इंगित करता है। इसलिए एक साधक यह निश्चित मान कर चले कि उसके साथ कहीं कहीं धोखा अवश्य हो रहा है और इसलिए समझदारी इसी में है कि यह खोजे कि वह धोखा कहाँ खा रहा है और उससे बचने का प्रयास करे।

 

यहाँ गीता जिस भेंट की बात करती है उसे जब व्यक्ति व्यवहार में उतारता है तब वह पाता है कि इसके साथ ही साथ ऐसे भागों की क्रिया भी चलती रहेगी जो उसे जगह-जगह धोखा देते रहेंगे। परंतु अपनी केंद्रीय सच्चाई के आधार पर यदि व्यक्ति सभी लड़खड़ाहटों के बावजूद भी चलता रहे तब धीरे-धीरे वे धोखे कम होते जाते हैं। हालाँकि इन धोखों को हम इस रूप में ले सकते हैं कि ये हमें हमारी कमियों के बारे में सचेतन बनाते हैं। एक समय के बाद जब व्यक्ति अपने निम्न भागों पर कुछ-कुछ अंकुश लगा देता है तब वे भाग उठ खड़े होने की प्रतीक्षा करते रहते हैं क्योंकि सचेतन रूप से तो व्यक्ति उन्हें अभिव्यक्ति का उतना अवसर नहीं देता। और जब कोई संकटकाल आता है, या किसी आकस्मिक घटना के कारण कोई आघात लगता है या अन्य किसी कारण से कोई मर्मांतक पीड़ा होती है तब इन भागों को सिर उठाने का मौका मिल जाता है। और श्रीमाताजी के अनुसार तभी सही समय होता है जब व्यक्ति इन्हें पकड़कर बाहर कर सकता है क्योंकि अन्य समय तो ये सभी भाग अँधेरे में छिपे रहते हैं और दिखाई नहीं देते। पर जब ये अपना सिर उठाएँ तब व्यक्ति को इनसे हताश या परेशान होने की बजाय इसे एक सुअवसर के रूप में देखना चाहिये क्योंकि तभी वह इनका सामना कर इनका सफाया कर सकता है। परंतु यह इतना आसान काम नहीं है और इसके लिए बड़े भारी विवेक, साहस और आत्मा की ताकत की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, रामायण में उल्लेख आता है कि जब भगवान् श्रीराम नागपाश में बंध गए तब विभीषण से उसका उपाय पूछने पर उसने कहा कि उसका कोई तोड़ नहीं है। ऐसे समय में लक्ष्मण जी के अंदर एक दबा हुआ भाव फूट पड़ा और उन्होंने श्री रामजी से कहा कि जब कैकेयी की बुद्धि भ्रष्ट हुई थी तभी उन्होंने उन्हें चेताया था कि कैकेयी की बात सुनने की कोई आवश्यकता नहीं है। परंतु तब तो उन्होंने उनके इस परामर्श को अनसुना कर दिया था, इसलिए आज वे सब ऐसे भीषण संकट में फंस गए हैं। हालाँकि गरुड़ के आने पर जब वे नागपाश से मुक्त हो गए तब लक्ष्मण जी को अपने भाव पर शर्मिंदा नागपारा से सकार तो जो भाव उनके अंदर लंबे समय से दवा था यह बाहर ही गया। इसी प्रकार हमारे अंदर भी ऐसी असंख्यों चीजें छिपी रहती हैं जो अपने समय की प्रतीक्षा करती हैं। इसीलिए साधना पथ पर ज्यों-ज्यों व्यक्ति आगे बढ़ता है त्यों-ही-त्यों अपने अंदर छिपी अनेकानेक चीजों की वह खोज करता है। और इसका एक परम लाभ यह है कि व्यक्ति अपने आप को अधिक सचेतन रूप से जानने लगता है तो कम