
श्रीमद्भगवद्गीता
भाग १
अध्याय १ से ७ तक
श्रीमद्भगवद्गीता भाग १
(अध्याय १ से ७ तक)
मूल तथा अनुवाद सहित
श्रीअरविन्द की अंग्रेजी टीका के हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या सहित
अंग्रेजी टीका का संपादन
स्व. श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान
हिन्दी व्याख्या
चन्द्र प्रकाश खेतान
हिन्दी अनुवाद व व्याख्या संपादन
पंकज बगड़िया
श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट
झुंझनू, राजस्थान
© श्रीअरविन्द आश्रम ट्रस्ट, २०१९
प्रकाशक
श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट
श्री अरविन्द दिव्य जीवन आश्रम
खेतान मोहल्ला
झून्झून-३३३००१, राजस्थान
URL: www.sadlec.org
www.aurokart.com
मुद्रक :-
श्रीअरविन्द आश्रम प्रेस
पुदुच्चेरी
भगवान् श्रीकृष्ण को समर्पित
जिनकी कृपा से हमें
श्रीअरविन्द व श्रीमाँ के चरण कमलों की
शरण प्राप्त हुई है।
यह पुस्तक स्वर्गीय श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान द्वारा संपादित अंग्रेजी पुस्तक 'द भगवद् गीता' के हिन्दी रूपांतर के आधार पर श्रीअरविन्द दिव्य जीवन शिक्षा केन्द्र में हुए अध्ययन सत्रों में साधकों के बीच हुई चर्चा-परिचर्चा, सहज अंतःस्फूणा तथा श्री चन्द्र प्रकाश जी खेतान के निजी आध्यात्मिक अनुभवों आदि के माध्यम से हुई श्रीअरविन्द व श्रीमाँ के मूल शब्दों की व्याख्या का अभिलेख है। सत्रों के ध्वनिलेखों को भाषा में ढालने और उनकी एडिटिंग (संपादन), संशोधन आदि का कार्य सुश्री सुमन शर्मा व श्री दीपक तुलस्यान की सहायता से मेरे द्वारा किया गया है। अनेक स्थानों पर चर्चा-परिचर्चा के दौरान श्रीमाँ-श्रीअरविन्द तथा योगी श्रीकृष्णप्रेम के जिन संदर्भों का हवाला दिया गया था उन्हें यहाँ मूल रूप से सम्मिलित कर लिया गया है जो कि पाठक के लिये पूरे विषय को अधिक स्पष्ट, सुगम और प्रभावी बना देते हैं। व्याख्या को मूल से पृथक् करने के लिए तिरछे अक्षरों (italics) का प्रयोग किया गया है। प्रथम भाग में गीता के प्रथम सात अध्यायों को सम्मिलित किया गया है और दूसरे भाग में शेष ग्यारह अध्यायों को सम्मिलित किया गया है।
पुस्तक में प्रस्तुत गीता पर टीका श्रीमाँ की कृतियों से लिये कुछ संदर्भों को छोड़कर शेष श्रीअरविन्द के शब्दों में है जिनकी संदर्भ सूची अंत में दी जा रही है। विचार में निरंतरता बनाए रखने के लिए कुछ स्थानों पर मूल संपादक श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान द्वारा कुछ शब्द या वाक्यांश जोड़े गए हैं जिन्हें वर्गाकार कोष्ठक में दिखाया गया है।
मूल संस्कृत श्लोकों का अनुवाद तथा पुस्तक में दिये गये शीर्षक श्रीअरविन्द की पुस्तक 'ऐसेज ऑन द गीता' पर आधारित हैं। अध्यायों के परंपरागत शीर्षक प्रत्येक अध्याय के अंत में दिये गये हैं। हासिये में दी गई संख्याएँ गीता के अध्याय व श्लोक संख्या को दर्शाती हैं।
जैसा कि श्रीमाँ ने कहा "श्रीअरविन्द गीता के संदेश को उस महान् आध्यात्मिक गति का आधार मानते हैं जो मानवजाति को अधिकाधिक उसकी मुक्ति की ओर, अर्थात् मिथ्यात्व और अज्ञान से निकलकर सत्य की ओर ले गई है, और आगे भी ले जाएगी। अपने प्रथम प्राकट्य के समय से हो गीता का अतिविशाल आध्यात्मिक प्रभाव रहा है; परंतु जो नवीन व्याख्या श्रीअरविन्द ने उसे प्रदान की है, उसके साथ ही उसकी प्रभावशालिता अत्यधिक बढ़ गई है और निर्णायक बन गई है।"
वर्ष १९९२ में अपने प्रथम संस्करण के समय से ही स्व. श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान द्वारा संपादित 'द भगवद्गीता' पुस्तक को पाठकों द्वारा खूब सराहा गया है। श्रीअरविन्द की अद्भुत टीका के तीसरे संस्करण के ऊपर अब इस व्याख्या के आने से हम आशा करते हैं कि यह पुस्तक श्रीअरविन्द व श्रीमाँ के आलोक में गीता को समझने, उसे व्यावहारिक रूप से जीवन में उतारने में पाठकों के लिए और अधिक सहायक सिद्ध होगी।
- पंकज बगड़िया
विषय-सूची
I.अवतार-तत्त्व की सम्भावना, उसका उद्देश्य और उसकी प्रक्रिया
II. निर्वाण तथा संसार में कर्म
निर्वाण, समता एवं संसार में कर्म
...वेद, उपनिषद् अथवा गीता जैसे किसी प्राचीन सग्रंथ के अन्वेषण में आरंभ में ही ठीक-ठीक यह स्पष्ट कर देना बहुत उपयोगी होगा कि हम किस विशिष्ट भाव से इस अन्वेषण में प्रवृत्त हो रहे हैं और वास्तव में हम क्या समझते हैं कि इससे वह कौनसी चीज प्राप्त करेंगे जो मानवजाति और उसके भविष्य के लिए महत्त्व की होगी। सर्वप्रथम, निःसंदेह हम एक ऐसे परम सत्य की खोज कर रहे हैं जो एकमेव व सनातन हो, जिससे अन्य सभी सत्य प्रादुर्भूत होते हों, जिसके प्रकाश से अन्य सभी सत्य ज्ञान की योजना में अपना उचित स्थान, अपनी व्याख्या अथवा निरूपण तथा अपना परस्पर संबंध पाते हैं। परंतु ठीक इसी कारण वह परम सत्य किसी एक तीक्ष्ण या एकांगी सूत्र के अंदर बंद नहीं किया जा सकता, कदाचित् ही वह हमें समग्रता में तथा संपूर्ण आशय सहित किसी एक दर्शन में या किसी एक सग्रंथ में, या फिर किसी एक गुरु, मनीषी, पैगम्बर या अवतार के मुख से पूर्ण रूप में तथा सदा के लिए पूर्णतः अभिव्यक्त हुआ मिले। और यदि उस सत्य के प्रति हमारा दृष्टिकोण या भाव उसे छोड़कर अन्य प्रणालियों अथवा पद्धतियों में निहित सत्यों के असहिष्णु बहिष्कार को आवश्यक बताता हो तब भी इसका अर्थ है कि वह सत्य अपनी समग्रता में हमारे द्वारा खोजा नहीं गया है; क्योंकि जब हम आवेश में आकर अथवा तीक्ष्ण रूप से निषेध करते हैं तो सीधे-सीधे इसका अर्थ होता है कि इस सत्य को समझने अथवा सराहने में तथा इसे निरूपित करने में हम समर्थ नहीं हैं। दूसरे, यद्यपि यह सत्य एकमेव तथा सनातन है, तो भी यह अपने-आप को काल में और मनुष्य की मन-बुद्धि द्वारा अभिव्यक्त करता है; अतः प्रत्येक सग्रंथ में आवश्यक रूप से दो तत्त्व होते हैं, एक अस्थायी या सामयिक, नश्वर तथा उस देश और काल विशेष के विचारों से संबद्ध जिसमें वह उत्पन्न हुआ था, और दूसरा तत्त्व होता है सनातन व अविनश्वर तथा सभी कालों व देशों में प्रयोज्य या व्यवहार्य। इसके अतिरिक्त परम सत्य की अभिव्यक्ति अथवा वर्णन में उसे जो वर्तमान रूप दिया जाता है, जिस पद्धति तथा योजना से, जिस तात्त्विक व बौद्धिक साँचे में ढालकर और जिस विशिष्ट वाक्य रचना का प्रयोग कर उसको अभिव्यक्ति की जाती है वे सब अधिकांशतः काल के परिवर्तनों के अधीन होते हैं और इस कारण (कालांतर से) वैसी ही शक्ति नहीं रख पाते; क्योंकि मानव-बुद्धि सदा अपने-आप में बदलाव लाती रहती है; निरंतर ही विभाजन करती और संयोजन करती हुई यह निरंतर ही अपने विभाजनों को बदलने और अपने समन्वयों को नए क्रम से रखने को बाध्य होती है; यह नवीन वाक्य-रचनाओं अथवा अभिव्यक्तियों तथा प्रतीकों हेतु पुरातन का त्याग करती जाती है, या फिर यदि वह पुरातन प्रयोगों का पुनः उपयोग करती भी है तो भी उसके संकेतार्थ या गूढार्थ को या कम-से-कम उसकी वास्तविक अंतर्वस्तु तथा अर्थ-संगतियों को इस प्रकार इतना बदल देती है कि हम इस प्रकार की प्राचीन पुस्तक को पढ़ते समय इस विषय में कभी भी सर्वथा सुनिश्चित नहीं हो सकते कि उसे हम उसी आशय और भाव में समझ पा रहें हैं जैसा आशय व भाव वह पुस्तक अपने समकालीन लोगों के लिए रखती थी। अतः ऐसे सग्रंथ में जो तत्त्व चिरंतन महत्त्व का है वह वह तत्त्व है जो सार्वलौकिक होने के साथ ही अनुभूत किया गया हो, जीया गया हो और बौद्धिक दृष्टि की अपेक्षा उच्चतर दृष्टि से देखा गया हो।
भगवान् का पूर्ण सत्य तो कभी अभिव्यक्त किया जा ही नहीं सकता। इसलिए जब यह अभिव्यक्ति में आता है तो सीमित हो जाता है। कोई अनुभव, चाहे वह कितना भी गहरा क्यों न हो, बहुत आन्तरात्मिक जगत् का ही क्यों न हो, तो भी उसके लिए हम यह नहीं कह सकते कि वह चरम अनुभव है। अवश्य ही वह बहुत गंभीर हो सकता है, सत्य हो सकता है। पहली चीज तो यह है कि भगवान् के सत्य की पूर्ण अभिव्यंजना हो ही नहीं सकती। परंतु जगज्जननी ऐसी ही असंभव चीज को साधित करने का प्रयत्न कर रही हैं अन्यथा ये ऐसे ब्रह्माण्ड अभिव्यक्ति में आते ही नहीं। यदि व्यक्ति का उस परम् का अनुभव बहुत गहन भी हो, तो किसी अर्थ में वह उसे समझ तो सकता है, पर जब वह उसकी अभिव्यक्ति करना चाहता है तो जो मानसिक चेतना है, जो बुद्धि है, उसमें वह पाता है कि वास्तव में इसे समुचित रूप से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। हमारे वैदिक ऋषियों ने पाया कि तर्कबुद्धि की भाषा में इसे अभिव्यक्त करना संभव नहीं है। इसकी अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकात्मक भाषा को ही उन्होंने सबसे अच्छा माध्यम पाया। यदि व्यक्ति अंतर्बोधात्मक चेतना में हो तो वे प्रतीक उसके लिए जीवित-जागृत होंगे, सजीव होंगे। उसके लिए वे कोई मृत पर्यायवाची नहीं होगे, जैसे कि एक पहाड़ का अर्थ अभीप्सा से लगा लिया जाए, या फिर नदी का अर्थ चेतना से लगा लिया जाए। ऐसे प्रतीकों की भाषा में हम उस सत्य को थोड़ा-बहुत अभिव्यक्त कर सकते हैं। वेदों में जो अभिव्यक्ति हुई है वह इसी प्रकार की है। परंतु अब चूंकि हम उन प्रतीकों के पीछे के गूढ़ार्थ तक नहीं जा पाते इसलिए उनमें निहित सत्य हमारे लिए अगम हो गया है। उपनिषदों में उसे कुछ अधिक मानसिक भाषा में अभिव्यक्त किया गया है, गीता उनसे भी अधिक मानसिक भाषा में उसका निरूपण कर रही है। पर यहाँ भी जो निरूपण-पद्धति है, जो प्रतीक प्रयोग में लाए गए हैं, वे उस समय अभिव्यक्ति के लिए जो उचित महसूस हुए उस अनुसार प्रयोग में लाए गए हैं। परंतु यह सब होने के बावजूद भी जब उस सत्य की अभिव्यक्ति होती है, तब यदि हममें क्षमता हो, अंतर्ज्ञान हो, आंतरिक समझ हो तो हम शब्दों के परे भी उस सत्य को पकड़ सकते हैं, ग्रहण कर सकते हैं। तब शब्द हमारे लिए केवल एक पारदर्शी पर्दा-मात्र रह जाते हैं। इसी कारण हमारे ऋषियों ने जिस प्रकार की शब्दाभिव्यक्ति की है, जिस रीति से उन्होंने उस सत्य की अभिव्यक्ति की है वह हमें उस सत्य तक पहुँचने में अधिक रोकती नहीं है और हमें उस सत्य के दर्शन हो जाते हैं। जिस पुस्तक में वह पर्दा बहुत झीना होता है, पारदर्शी होता है उसमें उस सत्य को देखना अधिक आसान होता है। और गीता ऐसी ही पुस्तकों में से एक है जिसमें उस सत्य की अभिव्यक्ति बड़ी अच्छी तरह से हुई है और आवरण बहुत ही कम है, इसलिए यह शाश्वत रहती है क्योंकि कोई भी मनुष्य जो थोड़ी-बहुत भी गहराई में स्थित है उसके लिए इसमें से कुछ ग्रहण करना अधिक आसान है। यदि कोई अधिक गहराई में निवास न भी कर रहा हो तो भी वह इससे इतना तो अवश्य ही ग्रहण कर सकेगा जो उसके लिए उपयोगी होगा। इसलिए गीता की यह विशिष्टता है कि इसमें सबके लिए कुछ-न-कुछ अवश्य ही मिल जाता है। यह जो शाब्दिक अभिव्यक्ति का बाहरी तत्त्व है उसी पर अधिक आग्रह रखने की अपेक्षा हम उससे आगे जा सकते हैं। ऐसा भी संभव है कि गीता जो बता रही है हम उससे शुरू करें और उससे भी परे चले जाएँ।
श्रीअरविन्द की 'एसेज ऑन द गीता' की सारी टीका यही तो दर्शाती है। ऐसा संभव है कि गीतोपदेश में जिन चीजों के बारे में स्वयं श्रीकृष्ण भी बोलने में सचेतन न रहे हों, चूंकि तब वे योगारूढ़ थे और उनके द्वारा वह उपदेश प्रवाहित हो रहा था, उसे भी श्रीअरविन्द अब सामने ला रहे हों। ऐसा नहीं है कि जो सत्य उसमें निहित हैं वे उस अभिव्यक्ति से सीमित हैं। हम उससे आगे जा सकते हैं, कितना भी आगे जा सकते हैं। वेदों की विवेचना में यह संभव है कि वैदिक ऋषि जितना समझते थे हम उससे भी आगे जा सकते हैं क्योंकि आखिर यही तो इस सत्य की विलक्षणता है। हमारी चेतना के द्वारा यह काम किया जाना संभव है। इसलिए ऐसी पुस्तकें अपने-आप में आध्यात्मिक ऊर्जा-स्रोत के समान होती हैं। जिस प्रकार चित्र, चित्रकारियाँ, स्थापत्य आदि भी ऊर्जा-स्रोत हो सकते हैं जो किसी पात्र के समक्ष किसी गहन अंतर्दर्शन को प्रकट कर सकते हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा के संचार का माध्यम बन सकते हैं, उसी प्रकार ये सद्ग्रंथ हैं। गीता भी इसी प्रकार की एक पुस्तक है। इसलिए श्रीअरविन्द कह रहे हैं कि यह जानने का महत्त्व कम है कि तात्कालिक लोगों ने इसे किस प्रकार समझा था। हमारे लिए आवश्यक यह है कि हम स्वयं इसे जानें और साथ ही यह जानें कि इसे अभिव्यक्त कैसे करें ताकि अधिक-से-अधिक लोग उससे जुड़कर, इसके ज्ञान पर सवार होकर उत्तरोत्तर आरोहण कर सकें। इसी प्रयोजन से श्रीअरविन्द ने 'गीता प्रबंध' लिखी। गीता में यदि उन्हें वह सूत्र न मिला होता, प्रचुर रूप से वह शाश्वत् तत्त्व न मिला होता, जो आज भी उतना ही नूतन तथा सत्य है - चूँकि गीता की नवीनता जितनी अपनी शुरुआत में थी उतनी ही आज भी है तो वे कहते हैं कि इसमें वे अपना समय नष्ट नहीं करते। जो भी भगवान् के और जगत् के रहस्य को जानना चाहता है वह गीता को अनदेखा नहीं कर सकता। सभी वाद-विवादियों की इस विषय में मत-भिन्नता है कि श्रीकृष्ण के कथन का तात्पर्य क्या था। परन्तु इसकी बजाय देखना तो यह चाहिये कि आज के समय में उसका अर्थ क्या हो सकता है। अभिव्यक्ति में तो वह सत्य पूर्णतः आ ही नहीं सकता। और यदि कहीं किसी ने उसे अभिव्यक्त किया भी हो तो वह अंतिम नहीं हो सकता। हमेशा ही व्यक्ति उससे अधिक ऊँचाई पर जा सकता है तथा उसी चीज की अभिव्यक्ति को और अधिक समृद्ध बना सकता है। जैसे कि बुद्ध की प्रतिमा के चेहरे के भाव को देखकर योगी श्रीकृष्णप्रेम ने कहा कि 'अवश्य ही वैसा भाव कहीं विद्यमान होना चाहिये अन्यथा वह अभिव्यक्त ही कैसे हो पाता।' आवश्यक नहीं कि स्वयं वह मूर्तिकार भी उस भाव के विषय में सचेतन रहा हो परंतु अवश्य ही कोई दूसरी शक्ति उसके हाथों को काम में ले रही थी क्योंकि (जैसा कि श्रीअरविन्द अपने 'सावित्री' महाकाव्य में लिखते हैं) 'अदर्शक हाथ अदृष्ट की आज्ञा पालन करते हैं' (p. 460)। बुद्ध के चेहरे पर जो करुणा का भाव अभिव्यक्त हुआ है, उनकी आँखों में जो शांति है, वह कहीं न कहीं तो अवश्य ही विद्यमान है और उन्हें उसी की खोज करनी है। उन्होंने कहा कि उस मूर्ति ने उनके समक्ष जिन चीजों को प्रकट किया वैसा तो कदाचित् वे पाली में सारे बौद्ध साहित्य का अध्ययन कर के भी नहीं समझे होंगे।' अतः परमात्मा का सत्य एक ऐसी विलक्षण चीज है जिस पर किसी का कोई एकाधिकार नहीं है। अपने-अपने दृष्टिकोण से सभी उसे भिन्न-भिन्न रूप से समझते हैं। उसे हम अपने मन में, प्राण में, भौतिक सत्ता में जिस भी प्रकार से समझेंगे उसी प्रकार से उसे अभिव्यक्त करेंगे। और चूंकि उस वैयक्तिक अभिव्यक्ति का इतना भारी मूल्य है इसीलिए सृष्टि इतनी जटिल है। यदि मनुष्य, प्राणी, पशु-पक्षी, पत्थर आदि सभी अपने-अपने तरीके से परमात्मा के निरपेक्ष सत्य को अभिव्यक्त न कर रहे होते तो वे अस्तित्व में आ ही नहीं सकते थे। असत्य का कोई अस्तित्व नहीं होता क्योंकि असत्य का अस्तित्वमान होना तो एक अतात्त्विक बात है। सभी चीजें सत्य के किसी-न-किसी पहलू को अवश्य ही अभिव्यक्त करती हैं। एक बार जब यदि हमें इस बात का बोध हो जाए कि सभी अपने-अपने तरीके से उस सत्य को अभिव्यक्त कर रहे हैं, तो हम घोर संकीर्णता से कुछ बच सकते हैं और चीजों के प्रति एक अधिक सहिष्णु और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपना सकते हैं। प्रस्तुत प्रस्तावना में श्रीअरविन्द ने इस बिंदु को बहुत सुंदर ढंग से रखा है कि सग्रंथों के प्रति उचित दृष्टिकोण क्या होना चाहिये। अन्यथा व्यक्ति इनके विषय में अंध श्रद्धा रखने का दकियानूसी दृष्टिकोण अपना लेता है और हठपूर्वक इस पर आग्रह करने लगता है कि पुस्तक में इसने या उसने वैसी ही बात कही है जैसा उसने स्वयं समझा है। परंतु इसमें व्यक्ति को समझना होगा कि समस्या उस कही हुई बात में नहीं अपितु वह उसे जिस रूप में समझता है उसमें है, क्योंकि जो कहा गया है उसके बारे में वह निश्चित कैसे हो सकता है कि वह उसे वैसा ही समझ रहा है। और फिर केवल वही अन्तिम सत्य हो यह भी आवश्यक नहीं है।
अतः गीता के उस बिल्कुल सटीक तात्त्विक गूढार्थ को वैसे ही जानना जैसा कि उस समय के लोगों द्वारा समझा गया था, - यदि ऐसा सही-सही करना संभव भी होता - तो भी इसे मैं गौण महत्त्व का मानता हूँ। और यह संभव भी नहीं है जैसा कि गीता पर लिखे गए और अभी भी लिखे जा रहे मूलभाष्यों की परस्पर मत-भिन्त्रता से स्पष्ट हो जाता है; क्योंकि ये सभी एक दूसरे से असहमत होने में ही एकमत हैं, प्रत्येक ही गीता में अपनी ही तत्त्वज्ञान की पद्धति तथा धार्मिक विचारधारा खोज निकालता है और यहाँ तक कि अत्यंत श्रमसाध्य निष्पक्ष विद्वत्ता तथा भारतीय दर्शन के ऐतिहासिक विकासक्रम के विषय में अत्यंत प्रकाशमान सिद्धांत भी हमें इस अपरिहार्य भूल से नहीं बचा सकते। परंतु लाभकारी रूप से जो हम कर सकते हैं वह यह है कि गीता में निहित उन यथार्थ जीवंत सत्यों को खोजें, भले ही उनके तत्त्वविज्ञानसंबंधी रूप जो भी हों, और इसमें से वह तत्त्व निकालें जो हमें अथवा व्यापक रूप से संसार को सहायता पहुँचा सकता है और फिर यथासंभव ऐसे अत्यंत स्वाभाविक तथा जीवंत रूप व शब्द-अभिव्यक्ति में उसे व्यक्त करें जो हमारी वर्तमान मनुष्यजाति की मानसिकता के अनुरूप तथा उसकी आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक हो... यदि हम इस महान् सग्रंथ के भाव में अपने-आप को तल्लीन कर दें और विशेषकर यदि हमने उस भाव में जीने का प्रयास किया हो तो हम उसके अंदर उतना यथार्थ सत्य प्राप्त करने के लिए आश्वस्त हो सकते हैं जितने को ग्रहण करने के हम पात्र हैं और साथ ही व्यक्तिगत तौर पर इससे हम उतना आध्यात्मिक प्रभाव और वास्तविक सहायता प्राप्त कर सकते हैं जितना इसमें से प्राप्त करना हमारे लिए अभिप्रेत था। और, अंततः, यही देने के लिए तो ये सग्रंथ लिखे गए थे; शेष सब केवल शास्त्रीय वाद-विवाद और धार्मिक मत-मतांतर है। केवल वे ही सद्ग्रंथ, धर्म तथा दर्शन मनुष्यजाति के लिए जीवंत महत्त्व के बने रहते हैं जो कि इस प्रकार सतत् ही नवीकृत हो सकते हों, पुनः जीये जा सकते हों, तथा उनमें निहित सनातन सत्य के तत्त्व को सतत् ही नए रूपों में गढ़कर एक विकसनशील मनुष्यजाति के अंतःविचार तथा आध्यात्मिक अनुभव में विकसित किया जा सकता हो। शेष सब अतीत के स्मारकों के रूप में बचे रहते हैं परंतु उनमें भविष्य के लिए कोई यथार्थ शक्ति या सजीव प्रेरणा नहीं होती।
इस अंश में जो नया बिंदु है वह यह है कि, हमारे वैदिक ऋषियों ने जिन प्रतीकों में अभिव्यक्ति की है वे प्रतीक नित-नूतन, चिन्मय और जीवंत हैं। उन प्रतीकों की व्याख्या हम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार कर सकते हैं और उस रूप में उन्हें समझ सकते हैं। पर जब वह अभिव्यक्ति ऐसे शब्दों में, ऐसे प्रतीकों में होती है जो बहुत अधूरे हैं, जैसे कि अमूर्त मानसिक भाषा या मानसिक प्रतीक, तब फिर समय के साथ वे प्रासंगिक नहीं रह पाते, और अपने को देश-काल के अनुसार नमनीय न रह पाने के कारण क्षणिक या अस्थायी विषय बनकर रह जाते हैं। कितनी ही बौद्धिक पुस्तकें आती हैं जो कुछ समय प्रचलन में रहने के बाद प्रचलन से बाहर हो जाती हैं। कुछ में यदि कुछ अधिक अंतर्वस्तु होती है तो वे कुछ अधिक समय तक टिक जाती हैं। जहाँ सत्य को शक्तिशाली रूप से अभिव्यक्त किया हुआ नहीं होता, जीवंत प्रतीक की भाषा के अन्दर यदि सत्य की संवेदनशील अभिव्यक्ति नहीं हुई होती या फिर यदि व्यक्ति के अन्दर धर्मांधता है जिस कारण वह उस पर आवश्यकता से ज्यादा या कम महत्त्व देता है तो वे अभिव्यक्तियाँ अपना मूल्य खो बैठती हैं, और ऐसी पुस्तकें अपने बने रहने की शक्ति खो बैठती हैं। हो सकता है व्यक्ति ने सत्य के कुछ अंश को देखा हो पर उसकी अभिव्यक्ति बड़ी भौंडी होने के कारण वह निरंतर नहीं रह पाती। परंतु इस सब के साथ ही साथ यह भी एक तथ्य है कि जिन सत्यों को बहुत गहराई में देखा जाता है वे अपनी अभिव्यक्ति की शक्ति अपने साथ ले आते हैं, जैसा कि गीता में हुआ है, वेदों में हुआ है। ये पुस्तकें सदा नूतन बनी रहती हैं। क्योंकि उनके अनुभव को सदा ही अनुभूति में पुनः जीया जा सकता है। और फिर गीता के कुछ तत्त्व जो देश-काल मर्यादित प्रतीत होते हैं - जैसे कि जाति-प्रथा, यज्ञ-अनुष्ठान आदि तात्कालिक विषय- उन्हें भी श्रीअरविन्द कहते हैं कि जिस निहित गहरे अर्थ में गीता उनका प्रयोग करती है उस रूप में ले लिया जाए तो उनके अर्थ की वह सीमितता भी लुप्त हो जाती है। जैसे कि गीता में यज्ञ का जो विचार अंतर्निहित है तीसरे अध्याय में तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह बिल्कुल ही अपूर्ण और अपरिपक्व है, मानो वह समय-विशेष और समुदाय विशेष के लिए ही प्रयोजनीय हो, परन्तु चौथे अध्याय में गीता ने उस सारी सीमितता को यह कह कर तोड़ दिया कि ब्रह्म ही यज्ञ है, ब्रह्म ही अभीप्सा है, सब कर्म ब्रह्म ही हैं। इसलिए हर प्रतीक को यदि हम गहराई में देखें तो वह उस देश और काल से सीमित नहीं रहता अपितु शाश्वत रूप ग्रहण कर लेता है। अतः गीता में ऐसा बहुत ही कम है जो हमें परिसीमित करता हो। इसीलिए यह बहुत मूल्यवान् है।
(iv.24)
गीता में ऐसा विषय बहुत ही कम है जो देश से सीमित और सामयिक अथवा अस्थायी हो और इसका भाव और विचारधारा इतनी उदार, गंभीर और व्यापक है कि उस थोड़े बहुत को भी सरलतापूर्वक, इसकी शिक्षा का जरा भी हास या अतिक्रम किये बिना, व्यापक रूप दिया जा सकता है; यही नहीं, उसे देश या काल से संबद्ध रखने की बजाय ऐसा व्यापक रूप देने पर उसकी शिक्षा की गहराई, उसके सत्य और उसकी शक्ति में वृद्धि होती है। वास्तव में, स्वयं गीता ही बारंबार उस व्यापक रूप का संकेत करती है जो किसी विचार को दिया जा सकता है भले ही वह विचार अपने-आप में देशकालमर्यादित हो। जैसे कि 'यज्ञ' संबंधी प्राचीन भारतीय विधि और विचार को गीता देवताओं और मनुष्यों के पारस्परिक आदान-प्रदानस्वरूप मानती है - जबकि यह विधि और भाव स्वयं भारतवर्ष में ही दीर्घ काल से लगभग लुप्त हो गए हैं और सर्वसाधारण मानव-मन को और अधिक यथार्थ प्रतीत नहीं होते; परन्तु गीता में इस 'यज्ञ' शब्द को हम इतना संपूर्ण रूप से सूक्ष्म, आलंकारिक और प्रतीकात्मक अर्थ दिया गया पाते हैं तथा देवता-संबंधी धारणा देशकालमर्यादा और किंवदंती से न के बराबर ही बँधी हुई अथवा इतनी मुक्त और इतनी पूर्ण रूप से सार्वभौमिक और दार्शनिक है कि हम यज्ञ और देवता दोनों को मनोविज्ञान और प्रकृति के साधारण विधान के व्यावहारिक तथ्य के रूप में सहज ही ग्रहण कर सकते हैं और इन्हें, प्राणियों में परस्पर होनेवाले आदान-प्रदान, एक-दूसरे के हितार्थ होनेवाले बलिदान और आत्मदान के विषय में जो आधुनिक विचार हैं, उन पर इस तरह प्रयुक्त कर सकते हैं कि इनके अर्थ और भी अधिक उदार और गम्भीर हो जाएँ, ये अधिक आध्यात्मिक स्वरूप वाले और गंभीरतर तथा अधिक विस्तीर्ण सत्य के प्रकाश से प्रकाशित हो जाएँ। इसी प्रकार शास्त्र-सम्मत कर्म करने का विचार, समाज की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था, चारों वर्णों की परस्पर स्थिति का, या दूसरों की तुलना में शूद्रों और स्त्रियों के आध्यात्मिक अनधिकार का उल्लेख, ये सब प्रथम दृष्ट्या देश या काल-विशेष से संबद्ध प्रतीत होते हैं और यदि इनके शाब्दिक अर्थ पर ही अतिशय बल दिया जाए तो कम-से-कम ये गीता की शिक्षा को उतने अंश में संकीर्ण बना देते हैं, गीता को उसके उपदेश की व्यापकता और आध्यात्मिक गंभीरता से वंचित कर देते हैं और, अधिक व्यापक रूप से, समस्त मनुष्य जाति के लिए उसकी प्रामाणिकता को सीमित कर देते हैं। परन्तु यदि हम इसके पीछे के आन्तरिक भाव और अर्थ को देखें, न कि केवल देश-विशिष्ट नाम और काल-विशिष्ट रूप को, तो हम देखते हैं कि यहाँ भी अर्थ गहरा और यथार्थ है और इसका आन्तरिक भाव दार्शनिक, आध्यात्मिक और सार्वभौमिक है। शास्त्र शब्द से प्रतीत होता है कि गीता का तात्पर्य उस विधान से है जिसे मनुष्य जाति ने स्वयं के ऊपर उस प्राकृत असंस्कृत मनुष्य के निरे अहंभावापन्न कर्म के स्थान पर, तथा अपनी वासनाओं की तृप्ति को ही अपने जीवन का मानक और उद्देश्य बना लेने की प्रवृत्ति पर एक अंकुश के रूप में आरोपित किया है। ऐसे ही हम देखते हैं कि समाज को चातुर्वर्ण्य व्यवस्था भी एक आध्यात्मिक तथ्य का ही महज एक स्थूल रूप है, जो स्वयं उस स्थूल रूप से स्वतंत्र है; यह स्वभाव नियत कर्म की उस अवधारणा पर आश्रित है जिसमें कि कर्म, उस कर्ता के स्वभाव की सम्यक् क्रमानुगत अभिव्यक्ति के अनुसार निष्पादित हों, और वह स्वभाव नैसर्गिक गुण और आत्माभिव्यक्तिकारी वृत्ति के अनुसार उसके जीवन की धारा और क्षेत्र को निर्धारित करे। चूँकि गीता अपने अत्यंत स्थानिक और सामयिक दृष्टांतों को इसी (गंभीर और व्यापक) भाव से प्रस्तुत या विकसित करती है, अतः सर्वत्र ही हमारा इसी सिद्धांत का अनुसरण करना और सर्वत्र ही उस गंभीरतर सामान्य सत्य को ढूँढ़ना औचित्यपूर्ण ही होगा जो कि अवश्य ही उन सब प्रथम दृष्ट्या दिखने में स्थानिक और सामयिक बातों के पीछे छिपा होता है। क्योंकि हम सदा ही ऐसा पाएँगे कि वह गंभीरतर सत्य और सिद्धांत चिंतन के स्वभाव मात्र में ही तब भी निहित होता है जब वह स्पष्ट शब्दों में व्यक्त नहीं किया गया होता है।
और न ही हमें उन दर्शनसंबंधी मतों या धर्म संबंधी मान्यताओं के साथ अन्य किसी भाव से व्यवहार करना चाहिए, जो कि गीता में सामयिक दार्शनिक शब्दों के या धार्मिक प्रतीकों के प्रयोग के कारण प्रवेश कर जाते हैं या फिर किसी प्रकार इससे संबद्ध हो गए हैं... न ही हमें उन मत-मतांतरों पर चर्चा करने की आवश्यकता है जो गीता को किसी धार्मिक संप्रदाय या परंपरा-विशेष का फल मानते हैं। गीता का उद्गम जो भी रहा हो, परंतु इसका उपदेश सार्वभौमिक अथवा व्यापक है।
गीता की दार्शनिक पद्धति, इसमें सत्य का जो व्यवस्थापनक्रम है वह इसके उपदेश का वह भाग नहीं है जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण, गहन तथा चिरस्थायी हो; किन्तु इसकी रचना का अधिकांश विषय, इसके सांकेतिक और मर्मस्पर्शी प्रधान विचार जो इस ग्रंथ के जटिल सामंजस्य में पिरोये गये हैं, वे चिरंतन रूप से मूल्यवान् तथा प्रामाणिक हैं, क्योंकि, वे महज एक दार्शनिक बुद्धि के चमकदार विचार या चकित करनेवाली परिकल्पनाएँ नहीं हैं, अपितु आध्यात्मिक अनुभव के चिरस्थायी सत्य हैं, हमारी उच्चतम अध्यात्मपरक संभावनाओं के प्रमाणयोग्य तथ्य हैं, जिन्हें इस जगत् के रहस्य की तह तक पहुँचने के प्रयास में कदापि उपेक्षित नहीं किया जा सकता। इसकी विवेचन पद्धति जो भी हो, जैसा कि भाष्यकार प्रमाणित करने की चेष्टा करते हैं, परंतु इसका गठन न तो किसी दार्शनिक मत विशेष का समर्थन करने हेतु या फिर किसी एक विशिष्ट योग पद्धति के दावों को ही मुख्य रूप से प्रतिपादित करने हेतु हुआ है और न ही ऐसा करने के लिए यह अभिप्रेत या नियत है। गीता की भाषा, विचार की संरचना, विविध विचारों का इसमें संयोजन और उनका संतुलन, न तो किसी सांप्रदायिक आचार्य की मनोवृत्ति से संबंध रखते हैं, और न ही वह किसी ऐसे सख्त विश्लेषणात्मक तर्कशास्त्री की प्रकृति से जो सत्य के किसी एक पहलू को काट-छाँटकर बाकी सबको अलग कर देने की प्रवृत्ति रखती हो, अपितु इसकी अपेक्षा इसमें तो विचारों की एक विस्तृत, तरंगित और सर्वालिंगनकारी गति है जो एक विशाल समन्वयात्मक बुद्धि और सुसंपन्न समन्वयात्मक अनुभूति की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। यह उन महान् समन्वयों में से एक है जिनकी सृष्टि करने में भारत की आध्यात्मिकता उतनी ही समृद्ध रही है जितनी कि ज्ञान की उन अत्यंत प्रगाढ़ और अनन्य क्रियाओं तथा धार्मिक साक्षात्कारों की सृष्टि करने में, जो परम एकाग्रता के साथ किसी एक ही सूत्र को अथवा एक ही मार्ग को उसकी पराकाष्ठा तक अनुसरण करते हैं। । गीता की विचारधारा] काटकर पृथक् पृथक् नहीं करती, अपितु सामंजस्य और ऐक्य साधित करती है।
गीता का विचार अथवा सिद्धांत शुद्ध रूप से केवल अद्वैतवाद नहीं है यद्यपि इसकी दृष्टि में एक ही अव्यय, विशुद्ध, सनातन आत्मतत्त्व अखिल ब्रह्माण्ड की स्थिति का आश्रय है; न मायावाद ही है यद्यपि यह सृष्ट जगत् में त्रिगुणात्मिका प्रकृति की सर्वव्यापी माया की चर्चा करती है; न यह विशिष्टाद्वैत ही है यद्यपि यह उस एकमेवाद्वितीय परब्रह्म में उसकी सनातन परा प्रकृति को स्थित बताती है जो कि जीव के रूप में अभिव्यक्त होती है और साथ ही (गीता) आध्यात्मिक चेतना की परम स्थिति के रूप में परब्रह्म में लय की अपेक्षा उसमें निवास करने पर ही अत्यधिक बल देती है; न यह सांख्य ही है यद्यपि यह सृष्ट जगत् की व्याख्या प्रकृति-पुरुष के द्विविध तत्त्व के द्वारा करती है; न यह वैष्णव ईश्वरवाद ही है यद्यपि यह पुराण प्रतिपादित श्रीविष्णु के ही अवतारस्वरूप श्रीकृष्ण को हमारे समक्ष परमाराध्य देवाधिदेव के रूप में निरूपित करती है, और न ही इन भूतेश में जो कि जगत्पति तथा समस्त प्राणियों के परम सखा हैं तथा उस अनिर्देश्य निर्विशेष ब्रह्म में कोई तात्त्विक भेद करती है और न ही उस ब्रह्म के पद में इन कृष्ण से कोई वास्तविक श्रेष्ठता को ही स्वीकार करती है। गीता के पूर्व उपनिषदों में जैसा समन्वय हुआ है वैसा ही गीता का समन्वय है जो कि आध्यात्मिक होने के साथ-ही-साथ बौद्धिक भी है और इसलिए स्वाभाविक रूप से ऐसे किसी भी अनुदार मत को परिवर्जित कर देता है जो इसकी सार्वलौकिक व्यापकता को क्षति पहुँचाए। इसका उद्देश्य उन खण्डनात्मक भाष्यकारों के उद्देश्य से ठीक विपरीत है जिन्होंने इस सद्ग्रंथ को सर्वाधिक प्रामाणिक तीन वेदान्तिक ग्रंथों में से एक के रूप में प्रतिष्ठित पाया और इसे स्वमत के मंडन तथा अन्य मतों और संप्रदायों के खण्डन के लिए शस्त्र के रूप में प्रयुक्त करने का प्रयास किया। गीता कोई तर्कशास्त्रीय युद्ध का अत्र नहीं है; यह एक ऐसा महाद्वार है जो समस्त आध्यात्मिक सत्य और अनुभूति के जगत् की ओर खुलता है और जो झाँकी यह हमें प्रदान करता है वह उस परम दिव्य धाम के सभी क्षेत्रों को अपने में समाविष्ट कर लेती है। गीता इन क्षेत्रों को योजनाबद्ध तो करती है, पर कहीं भी यह [एक से दूसरे क्षेत्र को] विच्छिन्न नहीं करती, न किसी प्रकार की दीवारें या घेरा खड़ा करती है जो कि हमारी दृष्टि को परिरुद्ध कर दे।
मानव-मन सदा आगे की ही ओर बढ़ता है, अपने दृष्टिकोण को बदलता तथा अपने विचार के विषयों को विस्तृत करता है, और इन परिवर्तनों का परिणाम होता है चिंतन की पुरातन प्रणालियों को अप्रचलित या लुप्तप्राय बना देना अथवा, जब उन्हें सुरक्षित रखा भी जाए तब भी, उन्हें विस्तृत और संशोधित करना तथा सूक्ष्मतया या प्रत्यक्ष रूप में उनका मूल्य बदल देना। किसी प्राचीन सिद्धान्त की प्राणवंतता उसी हद तक होती है जिस हद तक वह ऐसे परिवर्तन के लिए स्वाभाविक रूप से अपने-आपको अनुकूल बना लेता है; क्योंकि उसका अर्थ यह होता है कि उसके विचार के रूप की सीमाएँ या अव्यवहार्यताएँ जो भी रही हों, फिर भी इसके अंतर्तत्त्व का सत्य, जीवंत दृष्टि एवं अनुभूति का सत्य, जिसके आधार पर इसकी प्रणाली का निर्माण हुआ था, वह अब तक भी अक्षुण्ण है और एक स्थायी सत्यता अथवा प्रामाणिकता तथा सार्थकता रखता है। गीता एक ऐसी पुस्तक है जो असाधारण रूप से दीर्घ काल से बनी हुई है और यह आज भी प्रायः उतनी ही नूतन है और अपने वास्तविक सार-तत्त्व में अभी भी बिल्कुल उतनी ही नवीन है - क्योंकि इसे अनुभूति में सदा ही पुनः साक्षात् किया जा सकता है जितनी कि यह तब थी जब यह पहले-पहल महाभारत में प्रकाशित हुई थी या उसकी रूपरेखा के अंदर लिखी गयी थी। भारत में अभी भी यह उन महान् शास्त्रों में से एक के रूप में स्वीकार की जाती है जो अत्यंत प्रामाणिक अथवा अधिकारपूर्ण रूप से धार्मिक चिंतन को नियंत्रित करते हैं और इसकी शिक्षा को भी, वह पूर्ण रूप से स्वीकृत न हो तब भी, सभी संप्रदायों द्वारा उसे परम मूल्यवान् माना जाता है। इसका प्रभाव केवल दर्शनसंबंधी या विद्याध्ययन संबंधी अथवा सैद्धांतिक ही नहीं है अपितु प्रत्यक्ष एवं जीवंत है, एक ऐसा प्रभाव जो चिंतन और कर्म दोनों पर हो, और इसके विचार वास्तविक रूप से एक जाति और संस्कृति के पुनरुज्जीवन एवं नव-जागरण में एक प्रबल निर्माणकारी शक्ति के रूप में कार्य कर रहे हैं। यहाँ तक कि हाल ही में एक महान् वाणी [व्यक्तित्व] द्वारा यह भी कहा गया है कि आध्यात्मिक जीवन के लिए हमें जिन किन्हीं भी आध्यात्मिक सत्यों की आवश्यकता है वे सभी गीता में प्राप्त हो सकते हैं। उस उक्ति को अत्यन्त शाब्दिक अर्थ में लेना इस ग्रंथ के विषय में अंध-विश्वास को प्रोत्साहित करना होगा। आत्मा का सत्य अनंत है और उसे इस प्रकार से परिसीमित नहीं किया जा सकता। तथापि यह कहा जा सकता है कि अधिकतर प्रधान सूत्र इसमें विद्यमान हैं और आध्यात्मिक अनुभूति एवं उपलब्धि के समस्त परवर्ती विकास के होते हुए भी हम अब भी एक विशाल अनुप्रेरणा एवं मार्गदर्शन हेतु इसकी ओर मुड़ सकते हैं।
अतः, गीता के इस अध्ययन में हमारा उद्देश्य इसके विचारों की पांडित्यपूर्ण या शास्त्रीय आलोचना अथवा इसके दार्शनिक सिद्धांत को आत्मतत्त्वसंबंधी अनुसंधान के इतिहास के अन्दर ले आना न होगा, न ही हम इसके साथ विश्लेषणात्मक तर्कशास्त्री की रीति से ही व्यवहार करेंगे। हम इसके पास सहायता और प्रकाश पाने के लिये आते हैं और इसमें हमारा उद्देश्य होना चाहिए कि इसमें से इसका वह सारभूत और जीवंत संदेश खोज निकालें, जिसे मनुष्य जाति को अपनी पूर्णता और अपनी उच्चतम आध्यात्मिक भवितव्यता के लिए ग्रहण करना है।
यहाँ एक ऐसी सुस्पष्ट धारणा की विशेष रूप से आवश्यकता है जो गीता के सारभूत विचार, उसकी शिक्षा के केंद्रीय मर्म को पकड़े रहे, क्योंकि अपने समृद्ध और बहुमुखी विचार से संपन्न होने के कारण तथा आध्यात्मिक जीवन के नानाविध पहलुओं का समालिंगन करने तथा प्रतिपादन की धाराप्रवाह घुमावदार गति से युक्त होने के कारण, अन्य सद्ग्रंथों की अपेक्षा अधिक रूप में, गीता अपने-आप को एक पक्षपातपूर्ण बुद्धि से पैदा हुए एकपक्षीय भ्रांत निरूपण के प्रति खोल देती है।.....
इस प्रकार, ऐसे लोग हैं जिनके अनुसार गीता कर्म-योग का प्रतिपादन बिल्कुल भी नहीं करती, अपितु जीवन को और सब कर्मों को संन्यास के लिये तैयार करनेवाली एक साधना का उपदेश करती है: नियत कर्मों को अथवा जो कोई कर्म सामने आ पड़े उसका तटस्थ अथवा उदासीन निष्पादन ही साधन या साधना है; जीवन और सब कर्मों से अंततः संन्यास ही एकमात्र वास्तविक लक्ष्य है। गीता से ही उद्धरण लेकर और गीता की ही चिंतन-पद्धति में यत्र-तत्र विशिष्ट रीति से बल देकर इस मत को प्रमाणित करना सर्वथा सरल हो जाता है, विशेषकर तब जब संन्यास जैसे शब्द के उस विशेष प्रयोग की ओर से हम अपनी आँखें मूँद लेते हैं जिस विशेष अर्थ में गीता इसका प्रयोग करती है। परन्तु ऐसे मत पर और अधिक डटे रहना तब सर्वथा असंभव हो जाता है जब पक्षपातरहित होकर व्यक्ति देखता है कि ग्रंथ में अंत तक बारंबार इसी पर बल दिया गया है कि अकर्म की अपेक्षा कर्म ही श्रेष्ठ है और समत्व के द्वारा कामना का सच्चा और आंतरिक त्याग कर के कर्मों को परमपुरुष को अर्पण करने में ही वरीयता है।
फिर कुछ अन्य लोग इसका वर्णन इस रूप में करते हैं मानो भक्ति-तत्त्व का प्रतिपादन ही गीता की संपूर्ण शिक्षा हो और ऐसा बताकर गीता के अद्वैत तत्त्वों को, और सभी कुछ के एकमेव ब्रह्म में शांत भाव से निवास करने की स्थिति को इसमें जो ऊँचा स्थान दिया गया है उसको पृष्ठभूमि में डाल देते हैं अर्थात् उसकी अवहेलना करते हैं। और निस्संदेह गीता का भक्ति पर दिया बल, इसके द्वारा भगवान् के इस पहलू पर आग्रह कि वे ईश्वर और पुरुष हैं, और फिर इसका पुरुषोत्तम सिद्धान्त जो परम् पुरुष को क्षर और अक्षर पुरुष दोनों से ही श्रेष्ठ सिद्ध करता है और जो कि वही हैं जिन्हें जगत् के सम्बन्ध से हम ईश्वर कहते हैं, ये सब गीता के अत्यंत विलक्षण तथा इसके अत्यंत प्रधान तत्त्वों में से हैं। तो भी, ये ईश्वर ही वह आत्मा हैं, जिनमें संपूर्ण ज्ञान की परिणति होती है, और [ये ही] यज्ञ के प्रभु हैं, सभी कर्म जिनकी ओर ले जाते हैं, और ये ही प्रेममय स्वामी हैं जिनकी सत्ता में भक्तिमय हृदय प्रवेश पाता है। और गीता [इन तीनों में] पूर्ण रूप से उचित संतुलन बनाए रखती है, कहीं ज्ञान पर बल देती है, कहीं कर्म पर और कहीं भक्ति पर, परन्तु वह बल उसके तात्कालिक विचार-प्रसंग के प्रयोजन से होता है, न कि इनमें से किसी एक को दूसरों से पृथक् पूर्ण वरीयता देने के लिए होता है। जिनमें इन तीनों का समागम होता है और मिलकर एक हो जाते हैं, वे ही परम् पुरुष पुरुषोत्तम हैं।
परन्तु वर्तमान में, वस्तुतः जबसे आधुनिक बुद्धि ने गीता को मानना और उस पर थोड़ा-बहुत विचार करना आरम्भ किया है, तब से लोगों की प्रवृत्ति गीता के ज्ञानतत्त्व और भक्तितत्त्व को गौण मानकर, उसके कर्म पर दिये निरंतर आग्रह का फायदा उठाकर उसे एक कर्मयोग-शास्त्र, कर्म-मार्ग में ले जानेवाला प्रकाश, कर्म-विषयक शास्त्र ही मानने की ओर दिखायी देती है। निस्संदेह गीता एक कर्म-योग-शास्त्र है, परंतु उन कर्मों का जिनकी परिसमाप्ति ज्ञान में अर्थात् आध्यात्मिक सिद्धि में और शांति में होती है, उन कर्मों का जो भक्ति-प्रेरित हैं, अर्थात् अपनी समग्र सत्ता का पहले परम् पुरुष के हाथों में और फिर उनकी सत्ता में सचेतन समर्पण, और यह किसी भी प्रकार उन कर्मों का शास्त्र नहीं है जैसा कि आधुनिक मन कर्मों से समझता है, उन कर्मों का बिल्कुल नहीं जो अहंकार और परोपकार के भाव से किये जाते हैं या जो वैयक्तिक, सामाजिक और मानवतावादी प्रयोजनों, सिद्धान्तों और आदर्शों से प्रेरित होते हैं। फिर भी आधुनिक टीकाएँ गीता का यही अभिप्राय दिखाने की चेष्टा करती हैं। कितनी ही प्रामाणिक वाणियों या सत्ताओं द्वारा हमें बारंबार यह बताया जाता है कि भारतीय विचार और आध्यात्मिकता की जो सामान्य तपश्चर्यात्मक और निवृत्तिमार्गी प्रवृत्ति है, उसका खण्डन करते हुए गीता बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में मानव कर्म के सिद्धान्त की, सामाजिक कर्तव्यों का निःस्वार्थ भाव से निर्वाह करने के आदर्श की, इतना ही नहीं, अपितु (ऐसा लगता है कि) समाजसेवा के सर्वथा आधुनिक आदर्श की भी घोषणा करती है। इन सब बातों का उत्तर मेरे पास इतना ही है कि गीता में, स्पष्ट ही, और केवल इसका ऊपरी अर्थ ग्रहण करते हुए भी, इस तरह की कोई बात नहीं है, यह केवल आधुनिकों द्वारा गलत अर्थ लगाया जाना है, यह एक प्राचीन ग्रंथ का आधुनिक बुद्धि के अनुसार अर्थ लगाना है, एक सर्वथा पुरातन, सर्वथा प्राच्य और भारतीय शिक्षा को वर्तमान यूरोपीय या यूरोपीय रंग में रंगी बुद्धि के अनुरूप पढ़ने की चेष्टा करना है। गीता जिस कर्म का प्रतिपादन करती है वह कोई मानवीय नहीं अपितु दिव्य कर्म है; कोई सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन नहीं अपितु कर्त्तव्य अथवा आचरण के अन्य सभी मानदण्डों को त्याग कर भागवत् संकल्प का निष्काम पालन है जो कि हमारी प्रकृति के द्वारा क्रिया करता है; कोई समाजसेवा नहीं, अपितु सर्वश्रेष्ठ, भगवताविष्टों, महापुरुषों का कर्म है जो निर्वैयक्तिक अथवा अनासक्त भाव से संसार के लिये, तथा उन भगवान् के प्रति यज्ञ-रूप से किया जाता है जो मनुष्य और प्रकृति के पीछे अवस्थित हैं।...
अतः आज की मनोवृत्ति के दृष्टिकोण से गीता की व्याख्या करना और गीता से सर्वोच्च और सर्वसंपूर्ण धर्म के रूप में हमें निःस्वार्थ कर्तव्यपालन की बलपूर्वक शिक्षा दिलाना, एक त्रुटि है। जिस प्रसंग से गीतोपदेश हुआ है उसका किंचिन्मात्र विचार करने से ही यह स्पष्ट हो जायेगा कि गीता का ऐसा अभिप्राय हो ही नहीं सकता था। क्योंकि, इस उपदेश का संपूर्ण कारण, जिस प्रसंग से इसका आविर्भाव हुआ है और जिस कारण से शिष्य को गुरु की शरण लेनी पड़ी उसका मूल तो कर्तव्य की परस्पर संबद्ध विविध भावनाओं का जटिल रूप से उलझा हुआ वह संघर्ष है जिसका अंत मानव-बुद्धि के द्वारा खड़े किये गए सारे उपयोगी बौद्धिक और नैतिक भवन के ढहने में होता है। मनुष्य-जीवन में किसी-न-किसी प्रकार का संघर्ष प्रायः ही उत्पन्न हुआ करता है, जैसे कभी गार्हस्थ्य-धर्म के और देश-धर्म या किसी उद्देश्य या अभियान की पुकार के बीच दुविधा, कभी स्वदेश के दावे और मानव जाति की भलाई या किसी बृहत्तर धार्मिक या नैतिक सिद्धांत के बीच संघर्ष। यहाँ तक कि एक आन्तरिक संकट या समस्या भी उत्पन्न हो सकती है, जैसी कि गौतम बुद्ध के जीवन में उपस्थित हुई थी, जिसमें अंतःस्थित भगवान् के आदेश का पालन करने के लिए सभी कर्त्तव्यों को त्याग देना, कुचल डालना और एक ओर फेंक देना होता है। मैं नहीं समझता कि गीता इस प्रकार के आंतरिक संकटकाल का समाधान बुद्ध को पुनः अपनी पत्नी और पिता के पास भेजकर और उन्हें पुनः शाक्य राज्य की बागडोर हाथ में देकर करेगी; न ही यह एक रामकृष्ण को किसी स्वदेशी पाठशाला में पंडित बनकर छोटे बालकों को निष्काम भाव से पाठ पढ़ाने का निर्देश करेगी; न ही यह एक विवेकानन्द को अपने परिवार के भरण-पोषण करने के लिए बाध्य करेगी और इसके लिए वीतराग होकर वकालत या चिकित्सा या पत्रकारिता का पेशा अपनाने को कहेगी। गीता निःस्वार्थ कर्त्तव्य पालन की नहीं अपितु दिव्य जीवन के अनुकरण की शिक्षा देती है, 'सर्वधर्मान्', सभी धर्मों का परित्याग कर के, एकमात्र परमात्मा का ही आश्रय ग्रहण करने की शिक्षा देती है; और एक बुद्ध, रामकृष्ण या विवेकानन्द का भगवद्-कर्म गीता की इस शिक्षा से पूर्णतः समस्वर अथवा अनुरूप है। यही नहीं, यद्यपि गीता कर्म को अकर्म से श्रेष्ठ मानती है, परंतु कर्म-संन्यास का निषेध नहीं करती, अपितु इसे भी भगवान् तक पहुँचने के अनेक मार्गों में से एक के रूप में स्वीकार करती है। यदि उसकी प्राप्ति केवल कर्म तथा जीवन तथा सभी कर्त्तव्यों के त्याग करने से ही होती हो और भीतर से पुकार प्रबल हो तो इन सबको अग्नि में होम कर ही देना होगा, इसमें किसी का कोई वश नहीं चल सकता। भगवान् की पुकार अलंघ्य है, और अन्य किन्हीं भी हेतुओं के सामने इसकी तुलना नहीं की जा सकती।
इसके सदृश अन्य किसी भी महान् ग्रंथ की तरह ही गीता को इसकी संपूर्णता में पढ़कर तथा एक उत्तरोत्तर विकसनशील विचार के रूप में इसका अध्ययन करने पर ही समझना सम्भव है। परन्तु आधुनिक टीकाकारों ने, बंकिमचंद्र चटर्जी जैसे उच्च कोटि के लेखक से आरंभ कर, जिन्होंने पहले-पहल गीता को, इस नए अर्थ में, कर्त्तव्य निष्पादन का अर्थ प्रदान किया, गीता के पहले तीन या चार अध्यायों पर ही प्रायः पूर्ण बल दिया है, और उनमें भी समता के विचार पर और 'कर्तव्यं कर्म' की उक्ति पर, जिसका अभिप्राय वही है जो आधुनिक दृष्टि में कर्त्तव्य शब्द से समझा जाता है, और इस उक्ति पर बल दिया जाता है कि 'कर्म में ही तेरा अधिकार है, कर्मफल में जरा भी नहीं' जिसे कि गीता के महावाक्य के रूप में प्रचलित तौर पर उद्धृत किया जाता है। और उच्च दर्शन अथवा तत्त्वज्ञानसंपन्न शेष अठारह अध्यायों को गौण महत्त्व प्रदान किया जाता है, हाँ, अवश्य ही ग्यारहवें अध्याय के विश्वरूप-दर्शन को छोड़कर। आधुनिक बुद्धि के लिए ऐसा बिल्कुल स्वाभाविक है जो कि तत्त्वसंबंधी सूक्ष्मताओं तथा अतिदूरवर्ती आध्यात्मिक अनुसंधानों के प्रति असहिष्णु होती है या अभी कल तक भी असहिष्णु रही है, और अर्जुन के समान ही कर्म में रत होने को आतुर रहती है तथा मुख्य रूप से कर्म के किसी व्यवहार्य विधान 'धर्म' से ही प्रयोजन रखती है। परंतु गीता जैसे ग्रंथ से व्यवहार करने का यह अनुचित तरीका है।
(ii.47)
xviii 66
प्रश्न : जबकि गीता का महावाक्य है: 'सर्वधर्मान् परित्यज्य....' फिर भी आम तौर पर जब भी गीता की चर्चा होती है तब अधिकांश लोग 'कर्मण्येवाधिकारस्तु...', कि तुम्हारा केवल कर्म का अधिकार है, फल का नहीं, ऐसे ही विचारों पर विशेष बल क्यों देते हैं और जो महावाक्य है उस पर विशेष ध्यान नहीं देते?
उत्तर : स्वयं गीता में तीसरे ही अध्याय में भगवान् कहते हैं कि 'कर्म तो मेरी ही प्रकृति करती है, केवल मूढ़जन ऐसा समझते और कहते हैं कि वे स्वयं कर्मों के कर्ता हैं।' परंतु जिन टीकाकारों को इस बात का कोई गहरा अनुभव नहीं होता वे ही इस प्रकार की उक्ति कर सकते हैं कि गीता कर्म को ही प्रधान बता रही है। और फिर विभिन्न प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा गीता पर लिखी टीकाओं में इस विचार पर बल देने के कारण ही यह आम प्रचलन में इस तरह समझा जाता है। परंतु फल की इच्छा रखे बिना किये जाना वाला यह निष्काम कर्म वास्तव में तो हम जीवन में लागू हो कैसे कर सकते हैं, क्योंकि कामना-रहित कर्म करना क्या हमारे वश में है? इस कर्म की विषमता को देखकर ही तो अर्जुन यह पूछता है कि ऐसा कर्म संभव ही कैसे हो सकता है। यदि कामना न हो तो व्यक्ति कर्म करेगा ही क्यों और यदि करेगा भी तो विभिन्न कर्मों व विकल्पों के बीच उसके लिए चुनाव करने का आधार ही क्या होगा? इसी के उत्तरस्वरूप भगवान् यज्ञरूप से कर्म करने के विचार का निरूपण करते हैं कि 'सारा जीवन यज्ञमय बनाओ, 'मेरी' प्रसन्नता के निमित्त कर्म करो। इसी से तुम्हारी समस्या का हल होगा।' श्रीअरविन्द की गीता के ऊपर टीका से प्रभावित होकर ही योगी श्रीकृष्णप्रेम ने दिलीप कुमार रॉय को कहा था कि हर हिन्दुस्तानी को इसे पढ़ना चाहिए क्योंकि इसमें जिन तत्त्वों का निरूपण हुआ है, वे और कहीं नहीं मिल सकते। इसी से प्रभावित होकर श्री दिलीप कुमार श्रीअरविन्द के संपर्क में आए व उनके शिष्य बने।
प्रश्न : क्या ऐसा कह सकते हैं कि श्रीअरविन्द के पूर्ण योग में सभी योग-पद्धतियों के समन्वय होने के पूर्व गीता ही एक सर्वाधिक समन्वयकारी पुस्तक रही है जो सभी योग-पद्धतियों को लेकर उनका समन्वय साधते हुए उन्हें अतिक्रम कर जाती है?
उत्तर : अवश्य ही, इसीलिए इसे सर्वोच्च ग्रंथ, हिन्दु धर्म की बाइबल के रूप में माना जाता है। ऐसा नहीं था कि श्रीअरविन्द की टीका से पहले किसी को गीता के ऐसे समन्वयात्मक स्वरूप की समझ न हो। परंतु आधुनिक मानसिकता के लिये इसे समझ पाना कठिन है। जिस तरह के कर्म की शिक्षा तथाकथित आधुनिक बुद्धिजीवी गीता के द्वारा दिलवाना चाहते हैं वैसी किसी चीज पर गीता का कोई बल नहीं है। वह तो ईश्वर के निहित कर्म करने की बात करती है। इसमें भगवान् बड़े ही स्पष्ट रूप से अर्जुन को अपनी शरण में आने का निर्देश करते हैं। स्वयं श्रीअरविन्द के योग का आधार भी यह पूर्ण आत्म-समर्पण ही है। इन सब विषयों को श्रीअरविन्द पर्याप्त रूप से प्रकट करेंगे।
गीता कर्मयोग से आरंभ करती है और कर्मयोग के चलते-चलते ज्ञानयोग को समाविष्ट कर लेती है। और फिर उन दोनों के साथ भक्तियोग में प्रवेश कर जाती है। भगवान् के प्रति पूर्ण समर्पण ही योग की इस संपूर्ण गति की परिणति है। पर गीता का महावाक्य तो असंदिग्ध रूप से एक ही है – सर्वधर्मान् परित्यज्य - और स्वयं गीता ही यह बता रही है। इसलिए इसमें कोई विवाद नहीं हो सकता कि गीता का महावाक्य क्या है। जैसे कि श्रीअरविन्द जब स्वयं कहते हैं कि उन्होंने अपने योग में भक्ति को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है तो यदि कोई कहे कि श्रीअरविन्द के योग में कर्म को ही प्रधानता दी गई है तो यह एक बेतुकी बात होगी। और वास्तव में अपने-आप में ये परस्पर भिन्न चीजें भी नहीं हैं। यदि व्यक्ति के अंदर भक्ति हो तो वह भगवान् के लिए कर्म भी करेगा। यदि कोई कहे कि वह भगवान् का भक्त तो है पर उनके लिए कर्म नहीं करता, तो इसका अर्थ है कि उसकी भक्ति पूर्ण नहीं है। इनके साथ ही साथ उसमें ज्ञान भी आ जाएगा, क्योंकि यदि ज्ञान न हो तो भक्ति अपूर्ण रहती है जिसके बिना सच्चा कर्म भी नहीं हो सकता। इसलिए यदि समग्र भक्ति होगी तो ज्ञान भी अवश्य ही आ जाएगा।
जिस समता का गीता उपदेश करती है वह उदासीनता नहीं है, गीता के उपदेश की आधारशिला रखे जाने और उस पर उपदेश की प्रधान संरचना के निर्मित होने के पश्चात्, अर्जुन को दिये इस महान् आदेश कि, "उठ, शत्रुओं का संहार कर और एक समृद्ध राज्य का भोग कर", में किसी अटल परोपकारवाद की या किसी विशुद्ध विकार-रहित आत्म-त्याग के भाव की ध्वनि तक नहीं है; गीता की समता एक आंतरिक संतुलन और विशालता की स्थिति है, जो कि आध्यात्मिक मुक्ति की आधारशिला है। इस संतुलन से युक्त होकर और इस मुक्तावस्था में हमें उस 'कर्तव्यं कर्म' को करना है, यह एक ऐसी उक्ति है जिसे गीता अत्यंत व्यापकता के साथ प्रयोग करती है जिसमें 'सर्वकर्माणि', सभी कर्मों का समावेश है, और जो भले ही सामाजिक कर्त्तव्यों या नैतिक दायित्वों को अपने अंदर समाविष्ट रखती हो पर उनका अतिशय रूप से अतिक्रम कर जाती है। वह कर्तव्यं कर्म क्या है, इसका निर्धारण व्यक्तिगत पसंद से नहीं होना है; और न कर्म का अधिकार और कर्मफल का त्याग ही गीता का महावाक्य है, अपितु यह एक आरंभिक उपदेश है जो योगपर्वत पर चढ़ना आरम्भ करने वाले शिष्य की प्राथमिक अवस्था पर लागू होता है। इसकी आगामी अवस्था में इस उपदेश का लगभग अधिक्रमण ही कर दिया जाता है। क्योंकि इससे आगे गीता प्रभावपूर्ण रूप से इसकी स्थापना करती है कि मनुष्य कर्म का कर्ता नहीं है, कर्म की कर्जी तो (दिव्य) प्रकृति है, कर्म के त्रिगुणमय रूपों से संपन्न महान् शक्ति है जो उसके द्वारा कार्य करती है, और मनुष्य को यह देख लेना सीखना होगा कि कर्म का कर्ता वह नहीं है। इसलिए 'कर्मण्येवाधिकारः' का भाव तभी तक लागू होता है जब तक कि हम कर्त्तापन के भ्रम में हैं, और जैसे ही हम स्वयं अपनी चेतना के लिए अपने कर्मों के कर्तापन का भाव त्याग देते हैं वैसे ही कर्मफलाधिकार के समान ही कर्माधिकार भी मन-बुद्धि से निश्चय ही तिरोहित हो जाता है। तब समस्त कर्म-विषयक अहंकार, चाहे वह फलाधिकार का हो या कर्माधिकार का, समाप्त हो जाता है।
परन्तु प्रकृति का नियतिवाद गीता का अंतिम वचन नहीं है। मन, हृदय और बुद्धि के साथ भगवच्चेतना में प्रवेश करने और उसमें निवास करने के लिए बुद्धि की समता और फल का त्याग तो केवल साधनमात्र हैं; और गीता ने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा है कि इन्हें साधनस्वरूप तब तक प्रयोग में लाना होगा जब तक कि साधक इस योग्य नहीं हो जाता है कि वह इस भगवच्चेतना में रह सके या कम-से-कम अभ्यास के द्वारा इस उच्चतर अवस्था को स्वयं में क्रमशः विकसित करने का प्रयास न कर ले। और यह भगवान् क्या है जो कि श्रीकृष्ण स्वयं होने की घोषणा करते हैं? ये पुरुषोत्तम हैं, जो अकर्ता पुरुष के परे हैं, जो कर्नी प्रकृति के परे हैं, जो एक के आधार हैं और दूसरे के स्वामी, ये वे प्रभु हैं जिनका यह सारा प्राकट्य है, जो हमारी वर्तमान मायावशता की अवस्था में भी प्रकृति के नियमों का नियमन करते हुए अपने जीवों के हृदय में विराजमान हैं, ये वे हैं जिनके द्वारा कुरुक्षेत्र की समरभूमि की सेनाएँ जीवित होती हुई भी पहले ही मारी जा चुकी हैं और जो अर्जुन को इस भीषण संहारकर्म का केवल यंत्र या निमित्त मात्र बनाए हुए हैं। प्रकृति उनकी केवल कार्यकारिणी शक्ति है। साधक को इस प्रकृति-शक्ति और उसके त्रिविध गुणों से ऊपर उठना होगा, उसे त्रिगुणातीत होना होगा। उसे अपने कर्म प्रकृति को नहीं समर्पित करने होंगे, जिन पर कि अब उसका कुछ भी दावा या 'अधिकार' नहीं है, अपितु उन परम् पुरुष की सत्ता में समर्पित करने होंगे। अपना मन, बुद्धि, हृदय, तथा संकल्प उन्हीं में आश्रित कर, आत्म-ज्ञान के साथ, भगवद्-ज्ञान के साथ, जगत्-संबंधी ज्ञान के साथ, पूर्ण समता, अनन्य भक्ति और पूर्ण आत्म-दान के साथ उसे अपने कर्म उन प्रभु की भेंट-स्वरूप करने होंगे जो सारे तपों और समस्त यज्ञों के स्वामी हैं। उनके संकल्प के साथ एकसंकल्प और उनकी चेतना से सचेतन होना होगा और वे 'तत्' पुरुष ही कर्म का निर्णय और प्रारंभ करेंगे। यही वह समाधान है जो भगवान् गुरु अपने शिष्य को प्रदान करते हैं।
गीता का महान्, परम वचन, इसका महावाक्य क्या है हमें उसे ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि स्वयं गीता ही अपने अंतिम श्लोकों में उस महान् संगीत का परम स्वर घोषित करती है। "अपने हद्देशस्थित भगवान् की, सर्वभाव से, शरण ले, उन्हीं के प्रसाद से तू पराशांति और शाश्वत पद को लाभ करेगा। मैंने तुझे गुह्य से भी गुह्यतर ज्ञान बताया है। अब उस गुह्यतम ज्ञान को, उस परम वचन को सुन जो मैं अब बतलाता हूँ। मेरे मन वाला (मन्मना) हो जा, मेरा भक्त बन, मेरे प्रति यज्ञ कर, और मेरी अर्चना कर; तू निश्चय ही मेरे पास आयेगा, क्योंकि तू मेरा प्रिय जो है। सभी धर्मों का परित्याग कर के केवल मेरी शरण ग्रहण कर। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा; शोक मत कर।"
गीता का प्रतिपादन अपने-आपको तीन महान् सोपानों में बाँट लेता है, जिनके द्वारा कर्म मानव-स्तर से ऊपर उठकर दिव्य स्तर तक पहुँच जाता है और वह उच्चतर धर्म की मुक्तावस्था के लिए निम्नतर धर्म-बंधनों को नीचे ही छोड़ जाता है। पहले सोपान में, मनुष्य द्वारा कामना का त्याग कर, पूर्ण समता के साथ कर्ताभाव से यज्ञ-स्वरूप कर्म किया जाता है, यह यज्ञ उन ईश्वर के लिए किया जाता है जो परम हैं और एकमात्र आत्मा हैं, यद्यपि अभी तक इनको व्यक्ति द्वारा स्वयं अपनी सत्ता में अनुभव नहीं किया गया है। यह आरंभिक सोपान है। दूसरा सोपान है केवल फलेच्छा का ही त्याग नहीं, अपितु कर्मों के कर्तापन के भाव का भी त्याग इस अनुभूति में करना होता है कि आत्मा सम, अकर्ता, अक्षर तत्त्व है और सब कर्म विश्व-शक्ति के, परं प्रकृति के हैं जो विषम, कर्ती और क्षर शक्ति है। अंतिम सोपान में, परम् आत्मा को ऐसे परम-पुरुष के रूप में जान लेना होगा जो प्रकृति के नियामक हैं, जिनके कि प्रकृतिगत जीव आंशिक अभिव्यक्ति हैं, और जिनके द्वारा अपनी पूर्ण परात्पर स्थिति में रहते हुए प्रकृति के द्वारा सारे कर्म कराए जाते हैं। उन्हें ही प्रेम, आराधना और कर्मों का यजन अर्पित करना होगा; सारी सत्ता उन्हीं को समर्पित करनी होगी और संपूर्ण चेतना को ऊपर उठाकर इस भागवत् चेतना में निवास करना होगा जिससे कि जीव भगवान् की प्रकृति और कर्मों से परे उनकी दिव्य परात्परता में भागी हो सके और पूर्ण आध्यात्मिक मुक्ति की अवस्था में रहते हुए कर्म कर सके।
प्रथम सोपान है कर्मयोग, (भगवत्प्रीत्यर्थ) निष्काम कर्मों का यज्ञ; और यहाँ गीता का आग्रह कर्म पर है। द्वितीय है ज्ञानयोग, आत्मा और जगत् के सत्स्वरूप का ज्ञान तथा आत्म-उपलब्धि; यहाँ आग्रह ज्ञान पर है; पर साथ-साथ निष्काम कर्म भी चलता रहता है, यहाँ कर्ममार्ग ज्ञानमार्ग के साथ एक हो जाता है पर उसमें घुल-मिलकर अपना अस्तित्व नहीं खो देता। तृतीय अथवा अंतिम सोपान है भक्तियोग, परमात्मा की भगवान् अथवा दिव्य पुरुष के रूप में उपासना और खोज; यहाँ आग्रह भक्ति पर है; पर ज्ञान को गौण नहीं बनाया गया है, अपितु वह उन्नत हो जाता है, अनुप्राणित अथवा सशक्त हो जाता है और परिपूर्ण हो जाता है, और कर्मों का यज्ञ अब भी जारी रहता है; द्विविध मार्ग अब ज्ञान, कर्म और भक्ति का त्रिविध मार्ग बन जाता है। और, यज्ञ का फल, एकमात्र फल जो साधक के सामने ध्येयरूप से अभी तक रखा हुआ है, प्राप्त हो जाता है, अर्थात् भगवान् के साथ ऐक्य और परम् दिव्य प्रकृति के साथ एकत्व साधित हो जाता है।
संसार के अन्य महान् धर्मग्रंथों के बीच गीता की विलक्षणता यह है कि वह अपने-आप में एक स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में स्थित नहीं है; न यह बुद्ध, ईसा या मुहम्मद जैसे किसी मौलिक अथवा सृजनशील व्यक्तित्व के आध्यात्मिक जीवन का या फिर वेदों और उपनिषदों के समान किसी विशुद्ध आध्यात्मिक अनुसंधान के युग का ही फल है, अपितु यह राष्ट्रों और उनके संग्रामों तथा मनुष्यों तथा उनके पराक्रमों के ऐतिहासिक महाकाव्य के अन्दर एक उपाख्यान है जिसका प्रसंग इसके एक प्रमुख पात्र के जीवन में उपस्थित एक विकट संकट-काल से पैदा हुआ है जिसमें कि उस पात्र के समक्ष उसके जीवन का ऐसा कर्म उपस्थित है जिसमें अन्य कर्मों की परिपूर्णता होने वाली है; एक ऐसा कर्म जो भयंकर, अति प्रचंड और रक्तपातपूर्ण है, और एक ऐसा क्षण या ऐसी निर्णायक घड़ी उपस्थित है जब उसे या तो इस कर्म से विल्कुल परावर्तन करना होगा या इसे (इन सब रक्तपातों में से होते हुए) इसकी निर्दय पूर्णाहुति तक पहुँचाना होगा। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता - जैसा कि आधुनिक समालोचकों का मानना है कि ऐसा ही है कि गीता महाभारत के बाद की रचना है या नहीं, जिसे इसके रचयिता ने इसे महाभारत में इसलिए मिला दिया कि इसकी शिक्षा को भी इस महान् राष्ट्रीय महाकाव्य की प्रामाणिकता और लोकप्रियता का लाभ मिल जाए। मुझे लगता है कि इस धारणा के विपक्ष में बड़े प्रबल प्रमाण हैं और इस पक्ष में भीतरी बाहरी जो कुछ प्रमाण हैं वे अत्यंत अपर्याप्त और स्वल्प हैं। परन्तु यदि यह मत सही अथवा यथेष्ट भी हो तो भी यह तथ्य तो शेष रहता है कि ग्रंथकार ने न केवल अपने इस ग्रंथ को महाभारत की बुनावट में इस प्रकार जटिलता से बुनकर घुला-मिला देने का अथक श्रम किया है कि इसके ताने-बाने को महाभारत से अलग नहीं किया जा सकता, अपितु वह हमें बार-बार वह प्रसंग भी याद दिलाने में सावधान है जिस प्रसंग से यह गीतोपदेश किया गयाः और यह प्रसंग की ओर लौटने का कार्य वह प्रकट रूप से केवल उपसंहार के समय ही नहीं करता, अपितु अपने गंभीरतम तत्त्वनिरूपण के बीच में भी करता है। हमें ग्रंथकार का यह आग्रह मानना ही होगा और इस गुरु-शिष्य-संवाद में गुरु और शिष्य दोनों का ही यह जिस प्रसंग की ओर बारंबार ध्यान खींचता है उसे उसका पूर्ण महत्त्व प्रदान करना ही होगा। इसलिए अवश्य ही गीता के सिद्धान्त को मात्र किसी सामान्य अध्यात्मदर्शन या नीतिशास्त्र के रूप में न देखकर नीतिशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र को मानव जीवन पर प्रत्यक्षतः प्रयुक्त करने पर व्यवहार में जो संकट उपस्थित होता है उसे दृष्टिगत रखते हुए इस ग्रंथ पर विचार करना होगा।
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १॥
१. धृतराष्ट्र ने कहाः हे सञ्जय । धर्म की भूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुए मेरे तथा पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?'
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ।।२।।
२. सञ्जय ने कहाः पांडवों की सेना को व्यूह रचना में खड़ी देखकर राजा दुर्योधन ने अपने आचार्य (द्रोणाचार्य) के समीप जाकर ये वचन कहे :
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।।३।।
३. हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न के द्वारा व्यूह रचना में खड़ी की गयी पांडुपुत्रों की इस विशाल सेना को देखिये।
-----------------------
'गीता की व्याख्या की एक ऐसी पद्धति भी है जिससे न केवल यह उपाख्यान ही अपितु संपूर्ण महाभारत ही मनुष्य के आंतरिक जीवन का एक रूपकमात्र बन जाता है, और फिर उसका हमारे इस बाह्य मानवीय जीवन तथा कर्म से कोई संबंध नहीं रहता, अपितु इसका संबंध केवल अंतरात्मा और हमारे अन्दर अधिकार जमाने के लिये लड़नेवालो शक्तियों के बीच युद्ध से रह जाता है। यह एक ऐसा मत है जिसकी पुष्टि इस महाकाव्य के सामान्य स्वरूप और इसकी वास्तविक भाषा से नहीं होती, और यदि इस विचार पर बहुत अधिक जोर दिया जाए, तो गीता को सीधी-सादी दार्शनिक भाषा आदि से अंत तक क्लिष्ट, कुछ-कुछ निरर्थक दुर्बोधता में बदल जाएगी। वेद की और कम-से-कम पुराणों के कुछ अंश की भाषा स्पष्ट रूप से रूपकात्मक है, जो कि अलंकारों और स्थूल दृष्यमान जगत् के आवरण के पीछे रहनेवाली वस्तुओं के मूर्त प्रतिरूपों के वर्णन से भरी पड़ी है, परंतु गोता तो विल्कुल स्पष्ट शब्दावली में लिखी गई है और मनुष्य के जीवन में जो बड़ी-बड़ी नैतिक और आध्यात्मिक कठिनाइयाँ उपस्थित होती हैं उन्हीं को हल करने का दावा करती है, अतः यह अनुचित होगा कि इस स्पष्ट भाषा और सुस्पष्ट विचारों के पीछे जाकर और अपनी कल्पनाओं को संतुष्ट करने हेतु मन के अनुसार तोड़-मरोड़कर उनका अर्थ लगाया जाए।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्व महारथः ।।४।।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ।।५।।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्व वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ।।६।।
४-६. इस विशाल सेना में महाधनुर्धारी शूरवीर हैं जो लड़ने में भीम और अर्जुन के समान हैं; जैसे युयुधान (सात्यकि) और विराट और महारथी राजा द्रुपद। धृष्टकेतु, चेकितान और बलवान् काशिराज, पुरुजित्, और कुन्तिभोज, मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य और पराक्रमी युधामन्यु और बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र (अभिमन्यु) और द्रौपदी के (पाँचों) पुत्र; ये सब ही महारथी हैं।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ।।७।।
७. हे द्विजश्रेष्ठ! अब हमारे पक्ष में जो विशिष्टगण हैं, मेरी सेना के नायक हैं, आपकी जानकारी के लिये उनके नाम कहता हूँ, उन्हें जान लीजिये।
भवान्भीष्मश्च कर्णश्व कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्व सौमदत्तिस्तथैव च ॥८॥
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशखप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ।।९।।
८-९. आप तथा (पितामह) भीष्म और कर्ण, संग्रामविजयी कृपाचार्य और वैसे ही अश्वत्थामा और विकर्ण, सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा; इनके अतिरिक्त और भी बहुत से शूरवीर हैं जिन्होंने मेरे लिये जीवन का उत्सर्ग कर दिया है, अनेक प्रकार के शखाखों से सुसज्जित, ये सभी युद्ध करने में निपुण हैं।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ।।१०।।
१०. भीष्म के द्वारा रक्षित हमारी यह सेना अपरिमित है। किंतु भीम के द्वारा रक्षित इनकी यह सेना परिमित (परिमाण और बल में कम) है।
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ।।११।।
११. इसलिये युद्ध के सब प्रवेश-द्वारों पर अपने-अपने यथा निर्धारित स्थानों (मोचौं) पर खड़े रहकर आप सब के सब ही भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें।
तस्य सञ्जनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्ख दध्मौ प्रतापवान् ।।१२।।
१२. तब महाप्रतापी कुरुवंश के वृद्ध भीष्मपितामह ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष को उत्पन्न करते हुए ऊँचे स्वर से सिंह के समान गर्जना करते हुए अपना शङ्ख बजाया।
ततः शङ्खाश्व भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ।।१३।।
१३. तदनंतर शङ्ख और नगारे और ढोल, मृदंग और रणशृङ्गी सहसा ही बज उठे, उनका वह शब्द महाप्रचंड हुआ।
ततः श्वेतैहयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शड्डौ प्रदध्मतुः ।।१४।।
१४. इसके अनंतर श्वेत घोड़ों से जुते हुए विशाल रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी अपने-अपने दिव्य शङ्खों को बजाया।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्डूं दध्मौ महाशङ्ख भीमकर्मा वृकोदरः ।।१५।।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्व सुघोषमणिपुष्पकौ ।।१६।।
१५-१६. हृषीकेश (श्रीकृष्ण) ने पाञ्जजन्य नामक शङ्ख को, धनञ्जय (अर्जुन) ने देवदत्त नामक शङ्ख को और भयंकर कर्म करने वाले वृकोदर (भीमसेन) ने पौण्ड्र नामक महाशङ्ख को बजाया । कुन्ती के पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय नामक शङ्ख को तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शङ्खों को बजाया।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्वापराजितः ।।१७।।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्व सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ।।१८।।
१७-१८. हे राजन् ! महा-धनुर्धारी काशिराज और महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न और विराट और अजेय सात्यकि, द्रुपद और द्रौपदी के पुत्र और महाबाहु सुभद्रातनय अभिमन्यु इन सबने चारों ओर से पृथक् पृथक् अपने शङ्खों को बजाया।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ।।१९।।
१९. उस महाप्रचंड शब्द ने आकाश और पृथ्वी को गुंजायमान करते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को विदीर्ण कर दिया।
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ।।२०।।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
२०-२१. हे राजन् ! इसके अनंतर कपिध्वज वाले पांडुपुत्र अर्जुन ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यवस्थित रूप में खड़े देखकर शस्त्र प्रहार के प्रारंभ होने का समय आने पर उस समय अपने धनुष को उठाकर हृषीकेश (श्रीकृष्ण) से ये वचन कहे।
अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत । ॥२१॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ।।२२।।
२१-२२. अर्जुन ने कहाः हे अच्युत! (अनघ, अचल श्रीकृष्ण !) मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में स्थित करो, जिससे कि मैं युद्ध की इच्छा से खड़े हुए इन विपक्षियों का निरीक्षण कर लूँ और यह जान सकूँ कि इस रणरूपी महोत्सव में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना है।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ।।२३।।
२३. धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा से जो यहाँ आये हुए हैं उन युद्ध करने वालों को मैं देख लूँ।
कोरे फलमूलक अथवा व्यावहारिक मनुष्य की यह विशेषता है कि वह अपने संवेदनों के द्वारा ही अपने कर्म के आशय के प्रति सचेत होता है। अर्जुन ने अपने सखा और सारथी से अपने को दोनों सेनाओं के बीच में अवस्थित करने को कहा, किसी गंभीर विचार से नहीं, अपितु उन असंख्यों मनुष्यों का मुँह एक निगाह में देख लेने की उस दंभयुक्त मंशा से जो अधर्म का पक्ष लेकर आये हैं और जिनका अर्जुन को इस रण रूपी महोत्सव में सामना करना है, जिन्हें उसे धर्म की विजय के लिये जीतना और मारना है।
सञ्जय उवाच
एवमुक्तो इषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ।।२४ ।।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ॥२५॥
२४-२५. सञ्जय ने कहाः हे घृतराष्ट्र ! गुडाकेश (निद्राविजयी अर्जुन) द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर इषीकेश (इन्द्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण) ने दोनों सेनाओं के बीच भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने और संपूर्ण राजाओं के सामने उस उत्तम रथ को खड़ा कर के ऐसा कहा कि "हे पार्थ! इन एकत्रित हुए कौरवों को देख।"
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्ध्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥२६॥
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
२६-२७. तब अर्जुन ने वहाँ दोनों ही सेनाओं में उपस्थित पिता के सदृशों (चाचाओं-ताऊओं) को, पितामहों, आचायाँ, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और संगी-साथियों को, श्वसुरों को और स्नेहियों को देखा।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान् ।।२७।।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
२७-२८. उन सब अपने संबंधियों को इस प्रकार युद्ध के लिये तैयार खड़े देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुन अतिशय विषाद से अभिभूत हो, विषाद और संताप से ग्रस्त हो इस प्रकार बोलाः
जैसे ही वह उस दृश्य को देखता है वैसे ही इस गृह-युद्ध और वंश-युद्ध का अर्थ उसकी समझ में आ जाता है- एक ऐसा युद्ध जिसमें न केवल एक ही जाति, एक ही राष्ट्र, एक ही वंश के, अपितु एक ही कुल और एक हो परिवार के लोग एक-दूसरे के विरुद्ध आमने-सामने खड़े हैं। वे सब जिन्हें सामाजिक मनुष्य परम प्रिय और पूज्य मानता है उन्हीं लोगों का उसे शत्रु के नाते सामना करना और वध करना होगा- पूज्यपाद गुरु और आचार्य, पुराने संगी-साथी, मित्र, सहयोद्धा, दादा, चाचा, और वे लोग जो रिश्ते में पिता के समान, पुत्र के समान, पौत्र के समान हैं, वे लोग जिनके साथ रक्त का संबंध है या जो साले-संबंधी हैं, इन सभी सामाजिक बंधनों को तलवार के द्वारा काटना होगा।
यहाँ श्रीअरविन्द अर्जुन की प्रकृति को जिस रूप में प्रकट कर रहे हैं वैसा वर्णन हमें कदाचित ही अन्य किसी टीका में मिलता है। ऐसा नहीं था कि अर्जुन यह नहीं जानता था कि कौन-कौन उनके पक्ष में हैं और कौन-कौन उनके विपक्ष में हैं। इस विषय में वह पूर्णतः अभिज्ञ था। अतः श्रीअरविन्द उसकी प्रकृति को सामने लाकर बता रहे हैं कि अर्जुन एक संवेदन-प्रधान व्यक्ति था न कि विचार-प्रधान। उसकी बुद्धि में संवेदनों के द्वारा ही प्रकाश आ सकता था। इसीलिए जब युद्ध के मैदान में वह पूरा दृश्य उसके सामने आया, वे लोग उसके सामने आए तब उसे यह अनुभव हुआ कि इस युद्ध का वास्तव में अर्थ क्या है। गीता के विचार के निरूपण का क्रम एक ऐसे व्यक्ति के अनुसार है जो व्यावहारिक स्वभाव वाला है, जिसके विचार और धर्म बड़े सुनिर्धारित हैं और सूक्ष्म चीजों में जिसका अधिक प्रवेश नहीं है। इसी कारण अर्जुन को बार-बार प्रश्न पूछने पड़ते हैं। तो ऐसा है अर्जुन का स्वभाव। श्रीअरविन्द ने 'गुरु और शिष्य' शीर्षक से पूरा अध्याय ही इस विषय पर लिखा है।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।।२८।।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्व शरीरे मे रोमहर्षश्व जायते ।।२९।।
२८-२९. अर्जुन ने कहा : हे कृष्ण ! अपने इन स्वजनों को यहाँ युद्ध के लिये समुपस्थित देखकर मेरे शरीर के सभी अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुख सूखा जा रहा है, मेरे शरीर में कंप और रोमांच हो रहा है।
ऐसा नहीं है कि इन बातों का अर्जुन को पहले पता नहीं था, पर उसको उन सबका जीवंत अनुभव नहीं हुआ था; उसे तो धुन सवार थी अपने अधिकार के दावों की, अपने ऊपर हुए अत्याचारों के बदले की, अपने जीवन के सिद्धांतों और सही के लिये लड़ने की, न्याय और धर्म की रक्षा कर के तथा अधर्म और अत्याचार से युद्ध कर के उनको मार भगाकर क्षत्रिय-धर्म का पालन करने की। इन सब की धुन में उसने युद्ध के इस पहलू के बारे में न तो कभी गहराई के साथ सोचा न अपने हृदय के अंदर और जीवन के मर्मस्थल में अनुभव ही किया। और अब दिव्य सारथी यह उसकी दृष्टि के सामने लाते हैं, उसकी आँखों के आगे सनसनीखेज तरीके से उपस्थित करते हैं और इससे उसकी संवेदनात्मक, प्राणमय और भावमय सत्ता के मर्म-स्थल पर एक गहरा आघात-सा लगता है।
गाण्डीवं संसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ।॥३०॥
३०. गाण्डीव (अर्जुन का धनुष) मेरे हाथ से गिरा जा रहा है और त्वचा मानो जली जा रही है। और मैं खड़ा होने में भी असमर्थ हो रहा हूँ और मेरा मन मानो चक्कर खा रहा है।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।।३१॥
३१. और हे केशव । मुझे विपरीत लक्षण भी दिखाई दे रहे हैं। युद्ध में अपने आत्मीय जनों को मारने में मुझे कोई कल्याण भी नहीं दिखाई देता।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ।।३२।।
३२. हे कृष्ण ! (ऐसी) विजय को मैं नहीं चाहता और न राज्य को चाहता हूँ, न सुखों को ही चाहता हूँ। हे गोविन्द ! बतलाओ हमें राज्य से क्या लाभ है, भोगों से क्या लाभ है अथवा जीवन धारण करने से भी क्या प्रयोजन है?
पहला परिणाम होता है एक भाव-संवेदनात्मक और शारीरिक संकटावस्था जो उपस्थित कर्म और उसके भौतिक फलों से और फिर स्वयं जीवन के प्रति ही जुगुप्सा का भाव पैदा कर देती है। वह उस प्राणिक उद्देश्य - सुख और भोग - से अपना मुँह फेर लेता है जिसके अहंभावयुक्त मानव जाति पीछे पड़ी रहती है; वह क्षत्रियों के उस प्राणिक उद्देश्य - विजय, राज्य, अधिकार और मनुष्यों पर शासन करने की (प्रबल लालसा) - से भी अपना मुँह मोड़ लेता है। यदि इसे इसके व्यावहारिक अर्थ में विचारा जाए तो यह धर्मयुद्ध आखिर है किसलिए, सिवाय स्वयं अपने, अपने भाइयों और अपने दलवालों के स्वार्थ अथवा हेतु सिद्ध करने के लिए, अधिकार करने, भोग करने और राज्य करने के लिए? परंतु इतनी बड़ी कीमत पर तो ये प्राप्त करने योग्य ही नहीं हैं, व्यर्थ हैं। इन चीजों का स्वयं अपने में कोई मूल्य भी नहीं है, ये तो केवल सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन को सुसंपन्न बनाये रखने के साधनमात्र हैं और अपने परिवार और जाति (race) के लोगों का संहार कर के ठीक इन्हीं उद्देश्यों को ही उसे अभी नष्ट करना होगा। और तब भावनाएँ पुकार उठती हैं।
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ।। ३३ ।।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४॥
३३-३४. जिनके लिये हमें राज्य, भोग और सुख की आकांक्षा हो सकती है, वे ये आचार्यगण, पिता वर्ग (ताऊ-चाचा आदि), पुत्रगण, तथा पितामह, मामा, श्वसुर लोग, पोते, साले, और भी दूसरे संबंधी लोग अपने प्राण और धनों (की आशा) का त्याग कर के युद्ध में उपस्थित हैं।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ।।३५।।
३५. हे मधुसूदन! (श्रीकृष्ण) भले इनके द्वारा मेरा वध हो जाए पर मैं त्रिलोकी के राज्य के लिये भी इन्हें मारने की इच्छा नहीं करता, पृथ्वी के आधिपत्य की तो बात ही क्या है?
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ।।३६।।
३६. हे जनार्दन । (श्रीकृष्ण) इन धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) को मारने पर हमें कौन-सा सुख मिल सकता है? यद्यपि ये आततायी हैं तथापि इन्हें मारने पर हम पाप के ही भागी होंगे।
यह सारा प्रकरण ही भयंकर पाप है- क्योंकि अब संवेदनों और भावावेगों के विद्रोह का समर्थन करने के लिये नैतिक बोध जाग उठता है। यह एक पाप है, आपस के लोगों की मार-काट में न कोई धर्मसम्मतता है, न न्यायोचितताः विशेषतः जब कि मारे जानेवाले स्वभावतः ही पूजा और प्रेम के भाजन हैं, जिनके बिना व्यक्ति जीना ही नहीं चाहेगा, और इन पवित्र भावनाओं को भंग करने में कोई पुण्यकर्म नहीं हो सकता, और यह और कुछ नहीं बस घोर पाप हो सकता है।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ।। ३७ ।।
३७. अतः हमारे लिये अपने ही बांधव धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) को मारना उचित नहीं है। क्योंकि हे माधव! हमारे अपने जनों की हत्या कर के हम किस प्रकार सुखी हो सकते हैं?
श्रीअरविन्द इसका सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं कि विषम परिस्थिति उपस्थित होने पर मनुष्य की प्रकृति किस प्रकार प्रतिक्रिया करने लगती है। सबसे पहले तो मन उचट जाता है, भावनाओं को चोट पहुँचती है। युद्ध का एक व्यावहारिक संकट है, और उससे संकुचन को उचित-अनुचित ठहराने के लिए नैतिकता, पाप-पुण्य का बोध आगे आता है। इस तरह व्यक्ति का स्वभाव किसी भी चीज को उचित-अनुचित ठहरा सकता है। इसका मुख्य कारण है कि अर्जुन की प्रकृति इन भावावेगों को सहन करने के लिए तैयार नहीं है और इससे अपना मुँह मोड़ लेना चाहती है। इसके लिए उसका सारा नैतिक बोध, मन, बुद्धि, धर्म-अधर्म संबंधी उसकी धारणाएँ उसके समर्थन में उतर आते हैं। हम स्वयं भी सारे दिन इसी प्रकार की क्रिया-प्रतिक्रिया करते रहते हैं। वास्तव में तो, हमारी शारीरिक और प्राणिक प्रकृति को जो अनुकूल नहीं लगता उसे मन नैतिकता से, पुराण-कथाओं आदि के माध्यम से उचित ठहराने का प्रयास करता है, और हमें यह आभास ही नहीं होता कि हम धोखा खा रहे हैं। गीता इसी से आरंभ करती है कि जिन भावावेगों को अर्जुन सहन नहीं कर पाता है, और उनसे अपने पलायन के समर्थन में जो-जो दलीलें देता है, वे सब किस प्रकार अनुचित और अपर्याप्त हैं। अर्जुन सरीखा भौतिक संवेदनों से चालित व्यक्ति नहीं जानता कि इस तरह की विकट समस्या को कैसे हल करे। वह नहीं जानता कि इसे नैतिक आधार पर, व्यावहारिक आधार पर, या उसे ज्ञात अन्य किसी भी आधार पर उसे कैसे हल किया जा सकता है। इसीलिए वह कहता है कि, "चाहे मेरा सब कुछ नष्ट क्यों न हो जाए, तो भी मुझे ये सब रक्तरंजित सुख-भोग नहीं चाहिए, इसलिए मैं इसके लिए लडूं ही क्यों?" अर्जुन की इन बातों का मानसिक स्तर पर कोई उत्तर हो भी नहीं सकता। इस तरह की परिस्थिति उसके सामने लायी गयी है और इसके समाधान के तौर पर सबसे पहले उसे उसके क्षत्रिय स्वभाव के अनुसार कर्तव्यों की तथा अन्य दायित्वों की याद दिलाई गई है जिन्हें अर्जुन स्वीकार करने वाला नहीं है।
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ।।३८ ।।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ।।३९।।
३८-३९. यद्यपि लोभ के द्वारा इनकी बुद्धि के भ्रष्ट (आच्छादित) हो जाने के कारण ये लोग कुल के क्षय होने से उत्पन्न होनेवाले दोष को और मित्र का अनिष्ट करने में होनेवाले पाप को नहीं देखते हैं, परंतु हे जनार्दन! हम लोग तो कुल के क्षय होने से उत्पन्न होनेवाले दोष को देखते हैं (समझते हैं) तब फिर इस पापकर्म से हटने के लिए हमें अपना विवेक क्यों न काम में लेना चाहिए?
गीता की शिक्षा में हम देखते हैं कि अहंभाव से मुक्ति की जो माँग की जाती है वह कितनी सूक्ष्म वस्तु है। अर्जुन शक्ति के अहंकार एवं क्षत्रिय के अहंकार द्वारा लड़ने के लिये प्रवृत्त होता है; इससे विपरीत उसकी दुर्बलता के अहंकार द्वारा, उसके संकुचन द्वारा, अरुचि के भाव द्वारा तथा मन, स्नायविक सत्ता और इन्द्रियों को अभिभूत करनेवाली मिथ्या 'करुणा' द्वारा उसे युद्ध से पराङ्गमुख कर दिया जाता है, यह वह 'दिव्य करुणा' नहीं जो भुजाओं को सुदृढ़ बनाती है तथा ज्ञान को सुस्पष्ट बना देती है। परन्तु उसकी यह दुर्बलता त्याग का तथा पुण्य का बाना पहनकर आती है: "इन रुधिरलिप्त भोगों को भोगने से तो भिक्षुक का जीवन व्यतीत करना कहीं अच्छा है; मुझे समस्त पृथ्वी का राज्य भी नहीं चाहिये, न देवताओं का ही राज्य चाहिए।" हम कह सकते हैं कि गुरु की कितनी बड़ी मूर्खता है कि उसकी इस वृत्ति का समर्थन नहीं किया, संन्यासियों की सेना में एक और महान् आत्मा की वृद्धि करने तथा संसार के सामने पावन त्याग का एक और उज्ज्वल दृष्टान्त उपस्थित करने का यह भव्य अवसर खो दिया। परन्तु दिव्य पथप्रदर्शक, ऐसे पथप्रदर्शक जिन्हें शब्द-आडंबर द्वारा छला नहीं जा सकता, इसे किसी और ही रूप में देखते हैं, "ये दुर्बलता, विभ्रम-मति और अहंकार है जो तेरे अन्दर बोल रहे हैं। आत्मतत्त्व को देख, अपनी आँखें ज्ञान की ओर खोल, अपनी अहंबद्ध आत्मा को शुद्ध कर।" और, उसके बाद? "युद्ध कर, विजय प्राप्त कर, एक समृद्ध राज्य का उपभोग कर।" अथवा प्राचीन भारतीय परंपरा से एक अन्य दृष्टान्त लें। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यह अहंकार ही था जिसने अवतारी पुरुष राम को लंका के राजा से अपनी पत्नी को पुनः प्राप्त करने के लिये एक सेना खड़ी करने तथा एक राष्ट्र का विनाश करने को उद्यत किया। परन्तु क्या यह इससे कम अहंकार होता यदि वे उदासीनता का जामा पहन ज्ञान के प्रचलित शब्दों का दुरुपयोग करते हुए कहते, "मेरी कोई पत्नी नहीं, कोई शत्रु नहीं, कोई कामना नहीं; ये तो इन्द्रियों के भ्रम हैं, मुझे तो ब्रहा-ज्ञान का संवर्द्धन करना चाहिये और जनक की पुत्री के साथ रावण जो चाहे करे।"
जैसा कि गीता बलपूर्वक कहती है, इसकी कसौटी भीतर है। वह यह कि अन्तरात्मा को लालसा और आसक्ति से मुक्त रखा जाये, परंतु साथ ही इसे अकर्म के प्रति आसक्ति से तथा कर्म करने के अहंपूर्ण आवेग से भी मुक्त रखा जाए, पुण्य के बाह्य रूपों के प्रति आसक्ति तथा पाप के प्रति आकर्षण - दोनों से ही एक समान मुक्त रखा जाये। एकमेव आत्मतत्त्व में निवास करने तथा उस एकमेव आत्मतत्त्व में कर्म करने के लिये 'मैं-पन' और 'मेरा-पन' से मुक्त होना होगा; विराट् (वैश्विक) पुरुष के किसी व्यक्ति-विशिष्ट केन्द्र के द्वारा कर्म करने से इंकार करने के अहंकार का त्याग करना और साथ ही सब कुछ को छोड़कर केवल अपने वैयक्तिक मन, प्राण और शरीर की सेवा करने के अहंकार का भी त्याग करना होगा। आत्मा में निवास करने का अर्थ यह नहीं कि निर्व्यक्तिक आत्मानन्द के उस महासागर में निमग्न हो सब वस्तुओं से बेखबर एकमात्र अपने हित उस अनन्त के अंदर निवास किया जाए; अपितु इसका अर्थ है उस (परम) आत्मा की तरह और उस आत्मा में निवास करना जो इस देह में तथा सब देहों में और साथ ही सब देहों से परे भी समान रूप से विद्यमान है। यही पूर्णज्ञान है।
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मो ऽभिभवत्युत ।॥४०॥
४०. कुल का क्षय होने से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाता है; और धर्म के नष्ट हो जाने पर अधर्म संपूर्ण कुल को अभिभूत कर लेता है।
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
खीषु दुष्टासु वाष्र्णेय जायते वर्णसङ्करः ।।४१।।
४१. हे कृष्ण ! अधर्म की अभिवृद्धि हो जाने से कुल की स्त्रियाँ दुश्चरित्र हो जाती हैं। है वार्णेय (श्रीकृष्ण) । स्त्रियों के दुश्चरित्र होने पर वणाँ का सांकर्य उत्पन्न होता है।
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ।।४२।।
४२. वर्णसांकर्य कुलनाशक लोगों को और स्वयं कुल को भी नरक में ले जाने का कारण बनता है; क्योंकि पिण्ड और जल की क्रिया के लुप्त हो जाने से इनके पितर (पितृलोक से) गिर जाते हैं।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्व शाश्वताः ।।४३।।
४३. कुलघातियों के इन वर्णसांकर्य के उत्पादक दोषों से सनातन जातिधर्म और कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ।।४४।।
४४. हे जनार्दन ! जिनके कुलधर्म नष्ट हो गये हैं उन मनुष्यों का नरक में निश्चय ही निवास होता है। ऐसा हमने सुना है।
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ।।४५।।
४५. अहो ! खेद की बात है कि हम लोगों ने बहुत बड़े पाप (के) करने का निश्चय किया है जो हम राज्यसुख के लोभ से अपने आत्मीय जनों का वध करने के लिये तैयार हुए हैं।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शत्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ।।४६।।
४६. इसकी अपेक्षा यदि शस्त्रों से रहित और कुछ भी प्रतिकार न करते हुए मुझको शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में मार डालें तो यह मेरे लिये अधिक कल्याणकारी होगा।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः । ॥४७॥
४७. सञ्जय ने कहाः युद्धभूमि में ऐसा कहकर अर्जुन शोक से व्यथित-चित्त हो गया और बाणसहित धनुष को परित्याग कर के रथ के पिछले भाग में अपने स्थान पर बैठ गया।
.....यद्यपि अर्जुन को केवल अपनी ही परिस्थिति से, अपने ही आंतरिक संघर्ष और कर्म-विधान से मतलब है, तथापि जैसा कि हम देख चुके हैं, जो विशेष प्रश्न अर्जुन ने उठाया है और जिस ढंग से उठाया है वह वास्तव में मनुष्य-जीवन और कर्म के सारे ही प्रश्न को सामने ले आता है। यह संसार क्या है और क्यों है और जैसा यह है उसमें इस सांसारिक जीवन का आत्मजीवन के साथ कैसे मेल बैठे? इस समस्त गहरे और कठिन विषय का दिव्य गुरु ठीक उस आधारशिला के स्थापन के रूप में हल करना चाहते हैं जिस पर वे उस कर्म का आदेश देते हैं जिसे सत्ता के एक नवीन सन्तुलन से और एक मोक्षप्रद ज्ञान के प्रकाश द्वारा करना होगा।
तब फिर वह कौन-सी चीज है जो उस मनुष्य के लिए कठिनाई उपस्थित करती है जिसे इस संसार को, जैसा यह है, वैसा ही स्वीकार करना है और इसमें कर्म करना है और साथ ही अपने अन्दर की सत्ता में, आध्यात्मिक जीवन में निवास करना है। संसार का यह पहलू क्या है जो उसके जागृत मन को व्याकुल कर देता है और ऐसी अवस्था ला देता है जिसके कारण गीता के प्रथम अध्याय का नाम 'अर्जुन-विषादयोग' सार्थक हुआ; वह विषाद और निरुत्साह जो मानव-जीव को तब अनुभूत होता है जब यह संसार जैसा है ठीक वैसा ही, अपने असली रूप में उसके सामने आता है और उसे इसका सामना करना पड़ता है, जब आचार और नेकी के भ्रम का परदा आँखों के सामने से, और किसी बड़ी चीज के साथ उसका मेल होने से पहले ही, फट जाता है? यह वह पहलू है जिसने बाह्य रूप से कुरुक्षेत्र के नर-संहार और रक्तपात के रूप में आकार ग्रहण किया है और आध्यात्मिक रूप से समस्त वस्तुओं के स्वामी के कालरूप-दर्शन के रूप में जो उन प्राणियों का भक्षण करने और नष्ट करने के लिये प्रकट हुए हैं जिन्हें स्वयं उन्होंने रचा है।.... जीवन एक युद्ध और एक संहारक्षेत्र है, यही कुरुक्षेत्र है; ये भगवान् महाभयंकर हैं, यही दर्शन अर्जुन को उस समर भूमि पर दृष्टिगोचर होता है।
....यदि हम जरा भी भगवान् की सत्ता को स्वीकार करते हैं, जैसा कि गीता स्वीकार करती है, कहने का तात्पर्य है कि यदि वे ऐसे सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं फिर भी सदा परात्पर-पुरुष हैं जो जगत् को प्रकट कर के स्वयं भी उसमें प्रकट होते हैं, जो अपनी माया, प्रकृति या शक्ति के दास नहीं, अपितु प्रभु हैं, जो अपनी जगत्-संकल्पना या रूपरेखा में अपने ही बनाए जीव-जन्तुओं, मानव-दानव द्वारा बाधित या कुंठित नहीं किये जा सकते, जिन्हें अपनी सृष्टि या अभिव्यक्ति के किसी भाग के उत्तरदायित्व को अपने सृष्ट या अभिव्यक्त प्राणियों के ऊपर लादकर स्वयं उससे मुक्त होने अथवा अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है; (यदि हम ऐसा स्वीकार करते हैं) तब तो मानव को एक महान् और दुःसाध्य श्रद्धा धारण कर के ही आगे बढ़ना होगा। जब मानव अपने-आपको एक ऐसे जगत् में पाता है जो देखने में युद्धरत शक्तियों की एक भीषण विश्रृंखलता, विशाल और अंधकारमय शक्तियों का संग्राम प्रतीत होता है, जहाँ जीवन सतत् परिवर्तन और मृत्यु द्वारा ही टिका हुआ है, और जो व्यथा, यंत्रणा, अमंगल और विनाश की विभीषिका द्वारा चारों ओर से घिरा हुआ है, और जब ऐसे जगत् के अन्दर उसे सभी में सर्वव्यापी ईश्वर को देखना होता है और इस बात के प्रति सचेतन होना होता है कि इस पहेली का कोई हल अवश्य है और यह कि जिस अज्ञान में वह अभी निवास करता है उसके परे कोई ऐसा ज्ञान है जो इन विरोधों में सामंजस्य स्थापित कर देता है, तो उसे इस श्रद्धा के आधार पर खड़ा होना होगा कि, 'भले तुम मुझे मार भी डालो, फिर भी मैं तुम्हारा भरोसा ही करूंगा।' समस्त मानव चिंतन अथवा श्रद्धा जो सक्रिय और निश्चयात्मक होती है, चाहे वह ईश्वरवादी हो, सर्वेश्वरवादी हो या अनीश्वरवादी हो, वह निश्चित तौर पर न्यूनाधिक स्पष्टता और पूर्णता के साथ इस प्रकार के किसी भाव को अपने में रखती है। यह स्वीकार करती है और विश्वास करती है : स्वीकार करती है जगत् को विसंगतियों को, और विश्वास करती है भगवान्, वैश्विक सत्ता या 'प्रकृति' के किसी उच्चतम तत्त्व में जो हमें इन विसंगतियों को अतिक्रम करने, अतिक्रांत या विजित करने तथा समस्वर करने में समर्थ बनाएगा, और कदाचित् ये तीनों ही क्रियाएँ एक साथ करने में समर्थ बनाएगा कि अतिक्रम और अतिक्रांत करने के द्वारा समस्वरता चरितार्थ करें।
यहाँ उपस्थित प्रश्न एक बड़ा ही मूलभूत प्रश्न है। सारी मनुष्यजाति के लिए सदा से ही यह बड़ी विकट समस्या रही है। श्रीअरविन्द कहते हैं कि यद्यपि अन्य कुछ ने इसका अपने तरीके से समाधान करने का प्रयास किया है परंतु हिन्दुस्तान ने ही मूलभूत रूप से इसका हल किया है। गीता उसी प्रश्न को सामने ला रही है, यही कुरुक्षेत्र है, कि हमारे समाज में सब जगह एक प्रचलित धारणा यह है कि परमात्मा, अल्लाह, गॉड – भले हम जिस भी नाम से उन्हें पुकारें - बड़े ही दयालु हैं। और वेदान्त तो यहाँ तक कहता है कि वे स्वयं ही इन सब रूपों को धारण किए हुए हैं। इसलिए यह तो प्रश्न ही नहीं उठता कि वे स्वयं के साथ कोई अनुचित व्यवहार करेंगे। उनकी प्रवृत्ति स्वयं को पीड़ित करने में आनंद लेने की या फिर दूसरों को सताने में आनंद लेने की नहीं है। कोई भी धर्म इस पर विश्वास नहीं करता। अब यदि हम चीटियों के दृष्टिकोण से इस संसार को देखें तो उन्हें कदाचित् ही यह रास आता होगा? उसी प्रकार जब हम कमजोरों पर अत्याचार, प्रकृति का दोहन, आपसी लड़ाई-झगड़ा, स्त्रियों पर अत्याचार, निर्दोष व्यक्तियों की हत्या, बुरे लोगों को शासन आदि करते देखते हैं तो हमारा नैतिक बोध, सौंदर्यात्मक बोध आहत होता है और तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि परमात्मा ऐसा क्यों करते हैं? जब धर्म का काम है मानव को भगवान् की ओर अभिमुख करना, तो इस समस्या का समाधान करना उसके लिये पहली आवश्यकता बन जाती है।
इस समस्या के समाधान हेतु भिन्न तर्क दिये जाते हैं। एक कहता है कि परमात्मा की बात न मानकर मनुष्य ने त्रुटि की और उसका दण्ड तो उसे भोगना ही पड़ेगा। दूसरा कहता है कि व्यक्ति ने पूर्वजन्म में कोई पाप किये हैं इसलिए उन कर्मों का परिणाम तो भोगना ही पड़ेगा। वहीं तीसरा कहता है कि परमात्मा तो दयालु हैं परंतु एक शैतान भी है जो ये सब काम करवाता है। यदि व्यक्ति परमात्मा के विधान के अनुसार चलेगा तो वह शैतान से बच जाएगा अन्यथा शैतान के हाथों में जा गिरेगा और फिर अनेक तरीकों से यंत्रणाएँ पाएगा। इसलिए ये सारे बुरे काम शैतान के कराए हुए हैं। जगत् की विषमताओं के स्पष्टीकरण लिए इस प्रकार के भिन्न-भिन्न तर्क दिये जाते हैं।
परन्तु श्रीअरविन्द यहाँ अपनी टीका में कह रहे हैं कि जो परमात्मा स्वयं ही सभी जगह अभिव्यक्त हो रहे हैं, उन्हें इस सबके लिए मनुष्यों को या उन शक्तियों को जिम्मेदार ठहराने की आवश्यकता नहीं है जिन्हें उन्होंने स्वयं ही रचा है। वे कमजोर नहीं हैं कि अन्य कोई शक्ति आकर उन्हें सीमित कर सके या उनकी इच्छा को विफल कर सके। भारतीय संस्कृति के अंदर इस विषय में सदा ही स्पष्ट बोध रहा है कि परमात्मा की इच्छा ही एकमात्र प्रभावी होती है। तब फिर कुरुक्षेत्र का जैसा भयंकर स्वरूप है और जिस प्रकार का परम दयालु स्वरूप परमात्मा का बताया जाता है, इन दोनों में मेल कैसे बैठाया जाए? बाह्य प्रतीतियों के स्तर पर इस समस्या का हल नहीं किया जा सकता। इसलिये जो ईश्वर की सत्ता को मानने वाला है, सद्भाव वाला, सहृदय व्यक्ति है उसे तो इस सुदृढ़ श्रद्धा का आश्रय लेना ही पड़ेगा कि भले ही प्रतीति में बुराई शासन करती है, निर्दोष व्यक्तियों की हत्या होती है, और यद्यपि वह स्वयं भी इससे ग्रस्त है और स्वयं तकलीफ में आ सकता है तो भी परमात्मा तो सदा कल्याण ही करते हैं।
अतः इसके समाधान हेतु दूसरा तर्क दिया जाता है कि जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों का भला ही चाहते हैं परन्तु कई बार बच्चों को उनका किया हुआ समझ न आने के कारण बहुत बुरा लगता है उसी प्रकार परमात्मा तो हमारे भले के लिए ही सब कुछ करते हैं किन्तु हम उसे नहीं समझ पा रहे हैं और जिस दिन हमारे अन्दर चेतना जागृत होगी उस दिन हम इसका अर्थ समझ जाएँगे, और जब हम समझ जाएँगे तो भगवान् के सहयोग से इससे ऊपर उठ जाएँगे और ऐसी भव्यताओं में प्रवेश करेंगे जो कि परमात्मा हमारे लिए संजोए हुए हैं पर जिनकी हम अब कल्पना भी नहीं कर सकते। यह सकारात्मक आध्यात्मिकता है। इसमें व्यक्ति देखेगा कि परमात्मा केवल करालवदना काली ही नहीं हैं, वे उदार माता भी हैं। अतः अर्जुन को हल तब मिलेगा जब वह इस कुरुक्षेत्र को एक कम भयाक्रांत दृष्टि से देखेगा, जो कि मानव दृष्टि की एक मूलभूत समस्या है।
प्रश्न : तो फिर कर्म-विधान और संस्कार का आधार क्या है?
उत्तर : यह तो केवल एक स्पष्टीकरण है, एक व्याख्या करने का तरीका मात्र है। अन्यथा इस सब प्रपंच की, घोर प्रतीतियों की व्याख्या कैसे की जाए। क्योंकि हमारे नैतिक बोध के अनुसार यदि कोई अच्छे काम करे और उसके साथ भी बुरा बर्ताव हो या बुरे परिणाम आएँ, तो इसकी व्याख्या कैसे की जाए। अतः या तो इसके लिए भगवान् पर दोष मँढ़ा जाए या फिर पिछले जन्मों में किये कर्म-विधान का तरीका निकाला जाए।
[क्योंकि] भगवान् केवल संहारकर्ता ही नहीं अपितु सब प्राणियों के परम सुहृद् भी हैं; केवल वैश्विक त्रिदेव ही नहीं अपितु परात्पर पुरुष भी हैं; जो करालवदना काली हैं वे स्नेहमयी मंगलकारिणी माता भी हैं; कुरुक्षेत्र के प्रभु दिव्य सखा और सारथी भी हैं, सब प्राणियों के मनमोहन हैं, साक्षात् (अवतारी) श्रीकृष्ण हैं। और इस संग्राम, संघर्ष और विश्रृंखला में से होकर वे हमें जहाँ कहीं भी ले जा रहे हों, जिस भी लक्ष्य या देवत्व तक वे हमें आकृष्ट कर रहे हों, परंतु इसमें संदेह नहीं कि वे हमें इन सभी पहलुओं की किसी परात्परता तक ले जा रहे हैं...पर कहाँ, कैसे, किस प्रकार की परात्परता से, किन परिस्थितियों से, यह हमें ढूँढ़ना होगा, और इसे ढूँढ़ने के लिये पहली आवश्यकता है कि इस जगत् को जैसा यह है वैसा देखें, और उनकी क्रिया आरम्भ में और अब जैसे-जैसे अपने-आप को प्रकट करती जाए वैसे-वैसे उसका अवलोकन करते जाएँ और उसका उचित मूल्यांकन करते जाएँ, इसके बाद उनका मार्ग और लक्ष्य बेहतर रूप में स्वयं प्रत्यक्ष हो जाएँगे। इससे पूर्व कि हम अमर जीवन की ओर हमारे मार्ग को खोज सकें, हमें कुरुक्षेत्र को स्वीकार करना होगा, हमें मृत्यु के द्वारा जीवन का जो विधान है उसे स्वीकार करना होगा। हमें अवश्य ही अपनी आँखें खोलकर, अर्जुन की अपेक्षा कम व्यथित दृष्टि से, काल और मृत्यु के हमारे स्वामी का दर्शन करना होगा और इस वैश्विक संहारकर्ता* को अस्वीकार करने, इससे घृणा करने या इससे भयभीत होने की वृत्ति को छोड़ देना होगा।....केवल कुछ ही ऐसे धर्म रहे हैं जिन्होंने भारत के सनातन धर्म के समान निःसंकोच रूप से यह कहने का साहस किया है कि यह रहस्यमय विश्व-शक्ति एक भगवत्तत्त्व है, एक त्रिमूर्ति है; जिसने कि इस जगत् में क्रियारत शक्ति के स्वरूप को न केवल परोपकारी दुर्गा के रूप में ही ऊँचा नहीं उठाया अपितु रक्तरंजित संहार-नृत्य करनेवाली, करालवदना काली के रूप में भी प्रतिष्ठित करने और यह कहने का साहस किया है कि "यह भी परम माता है; इन्हें भी परमेश्वरी जानो और यदि तुममें सामर्थ्य हो तो इनका भी पूजन करो।" यह बड़ी महत्त्वपूर्ण बात है कि जिस धर्म में ऐसी अचल सत्यनिष्ठा और ऐसा प्रचण्ड साहस रहा था वही ऐसी गंभीर और व्यापक आध्यात्मिकता का निर्माण करने में सफल हो सका, जिसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता। क्योंकि सत्य ही वास्तविक आध्यात्मिकता का आधार है और साहस उसकी आत्मा।
जो चर्चा हम पहले कर चुके हैं यह उसी का विस्तार है। परमात्मा के रचनात्मक और विनाशकारी दोनों ही रूपों को स्वीकार करना होगा। कुरुक्षेत्र को इस दृष्टि से देखना होगा कि इसके पीछे भी प्रभु की लीला है, जिसे हम भले ही समझ तो नहीं सकते परन्तु फिर भी जिसके पीछे कुछ-न-कुछ शुभ अवश्य है। हिन्दुस्तान ने कभी ऐसा नहीं माना कि भगवान् कुछ गलत करते हैं या उनका कोई विरोधी है जो ऐसा करता है, या फिर उनका विनाशकारी पक्ष तो बहुत खराब है और सृजनात्मक पक्ष बहुत अच्छा है। उन्होंने तो काली को भी माता माना है। और जिसमें यह साहस नहीं है कि इस दृश्य का सामना कर सके उसके लिए वास्तव में आध्यात्मिकता का कोई मूल्य नहीं है। अब अर्जुन के लिए आवश्यक है कि कुरुक्षेत्र को जिस आक्रोश से, जिस भाव से वह देखता है उसकी बजाय अधिक गहरे दृष्टिकोण से देखे, इस श्रद्धा के साथ देखे कि इस सब के पीछे कोई शुभ छिपा है। इसी स्थिति तक ले जाने के लिए और उसे समझाने के लिए कि इसका क्या अर्थ है श्रीकृष्ण, जब अर्जुन ने वह रूप देखने की इच्छा प्रकट की तब, ग्यारहवें अध्याय में उसे वह दिखाते हैं और फिर सारी चीजें समझाते हैं।
अभी यह गीता का आरम्भ है कि वास्तव में जगत् जैसा दृश्यमान होता है उसमें किस तरह एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण या भाव रखा जा सकता है, और उसे रखते हुए व्यावहारिक जीवन में क्रिया की जा सकती है। इस प्रश्न का हल यही है कि इस सबको हमें इस श्रद्धा के साथ देखना होगा कि इसके पीछे भगवान् का कल्याणकारी हाथ है भले हम इसे समझ न पाते हों। इसे समझने के लिए हमें उस चेतना में जाना होगा जहाँ हम इसे समझ सकते हैं कि जहाँ भगवान् का रूप भयंकर महाकाली का है, तो वहीं महालक्ष्मी का भी है, श्रीकृष्ण का रूप जहाँ विनाशक कालपुरुष का है, तो वहीं सखा, प्रिय, मधुर बोलने वाले का भी है और साथ ही चार हाथों वाले विष्णु का अभयदान देने वाला रूप भी है और जहाँ इन सबका समन्वय हो सकता है।
यहाँ हमें स्मरण रखना होगा कि गीता की रचना ऐसे समय में हुई थी जब युद्ध मानव क्रियाकलाप का आज से भी अधिक आवश्यक अंग था और जीवन की व्यवस्था से उसके बहिष्कार का विचार तब एक पूर्ण रूप से असंभाव्य अथवा काल्पनिक बात होती। विश्व-शांति और मनुष्यों में पूर्ण सद्भाव का सिद्धांत - क्योंकि बिना एक विश्वव्यापी और पूर्ण पारस्परिक सद्भाव के कोई सच्ची और स्थायी शान्ति नहीं हो सकती हमारी क्रमोन्नति
----------------
* मानव की दृष्टि को भले शुभ लगे अथवा अशुभ, केवल शुभ के लिए ही गुप्त संकल्प कार्य कर सकता है। हमारी नियति दोहरे अर्थों में लिखित हैः 'प्रकृति' के द्वंद्वों द्वारा हम भगवान् के सन्निकट पहुँचते हैं, अंधकार से निकले हैं पर फिर भी प्रकाश की ओर बढ़ते हैं। मृत्यु तो अमरता की ओर हमारा पथ है।
'त्राहि-त्राहि' जगत् की अभिशप्त वाणियाँ पुकारती हैं, फिर भी अंततः शाश्वत 'शिव' विजयी होता है।
के इतिहास में एक क्षण के लिये भी मानवजीवन को अधिकृत करने में सफल नहीं हुआ है, क्योंकि नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से जाति इसके लिए तैयार नहीं थी और अपने विकासक्रम में प्रकृति का संतुलन या उसकी स्थिति ऐसे किसी भी अतिक्रमण हेतु अपने को आकस्मिक रूप से तैयार करने की स्वीकृति नहीं देती। अभी तक भी हम लोगों ने वास्तव में किसी ऐसी व्यवस्था की संभावना से परे विकास नहीं किया है जहाँ परस्पर विरोधी स्वार्थों के बीच यथासंभव कोई समझौता कर लेने की प्रवृत्ति न हो, जिससे कि घोर-संघर्षों की पुनरावृत्ति को कुछ कम किया जा सके।.... संभवतः एक दिन आ सकता है, हम तो कहेंगे, निश्चय ही आयेगा, जब मनुष्य-जाति आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक रूप से सर्वव्यापी शांति के राज्य के लिए तैयार होगी; किंतु तब तक किसी भी व्यावहारिक तत्त्वज्ञान और धर्म को, युद्ध के पहलू को और मनुष्य के योद्धा-रूप स्वभाव और कर्तव्य को स्वीकार कर उसका समाधान करना ही होगा। जीवन को अपने वर्तमान स्वरूप में ही लेते हुए, न कि केवल इस रूप में कि किसी सुदूर भविष्य में उसका स्वरूप क्या होगा, गीता यह प्रश्न करती है कि जीवन के इस पहलू तथा क्रिया को, जो कि वास्तव में मनुष्य की सर्वसाधारण गतिविधि का ही अंग और स्वभाव है, किस प्रकार आध्यात्मिक जीवन के साथ सुसमंजस किया जा सकता है।
मानव की न्यायनिष्ठता के लिए यह उसका वैश्विक अपराध है,
उस सर्वशक्तिमान् का शुभ और अशुभ से परे रहना
पुण्यात्मा को इस दुष्ट जगत् में उनके भाग्य के भरोसे छोड़
इस भयंकर दृश्य में पापात्मा को राज करने देना।
सब कुछ प्रतीत होता है विरोध और संघर्ष और संयोग,
एक निरुद्देश्य श्रम और बहुत अल्प अर्थ,
उन आँखों के लिए जो एक अंश देखती हैं, और समग्र को चूक जाती हैं...
इस प्रकार पहला अध्याय 'अर्जुनविषादयोग' समाप्त होता है।
सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ।।१।।
१. सञ्जय ने कहाः इस प्रकार विषाद से भरे हुए, आँसुओं से भरपूर और व्याकुल नेत्रोंवाले, निरुत्साह और शोक से अभिभूत हृदय वाले अर्जुन से मधुसूदन (श्रीकृष्ण) ने ये वचन कहेः
अर्जुन की प्रथम आवेशपूर्ण अहंपरक शंकाओं की बाढ़ के लिए, संहार कर्म से पीछे हटने, उसके दुःख और पाप के बोध, एक रिक्त और निःसार जीवन के लिए शोक-संताप और पाप कर्म से होने वाले पापमय परिणामों के पूर्वानुमान के लिए, दिव्य गुरु का उत्तर है एक कड़े शब्दों में फटकार।
श्रीभगवान् उवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ण्यमकीर्तिकरमर्जुन ।।२।।
२. श्रीभगवान् ने कहाः हे अर्जुन। इस कठिनाई एवं संकट की घड़ी में यह विषाद (कश्मल) तेरे में कहाँ से आ गया है? यह आर्य (श्रेष्ठ) जनों के द्वारा पसंद नहीं किया जाता; न यह स्वर्ग की प्राप्ति कराता है और न ही कीर्ति की।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ।।३।।
३. हे पार्थ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो; यह तेरे योग्य नहीं है। हे परंतप! (शत्रुओं का दमन करने वाले) अपने हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता का परित्याग कर के (युद्ध के लिये) खड़ा हो।
क्या हम कहेंगे कि यह तो एक वीर का दूसरे वीर को वीरोचित उत्तर है, किन्तु वह नहीं जिसकी हम दिव्य गुरु से आशा करते हैं; इसके विपरीत उनसे क्या यह आशा नहीं की जानी चाहिये कि वे सदा मृदुता, साधुता एवं आत्मत्याग के भावों को तथा सांसारिक ध्येयों से पीछे हटने और संसार की रीतियों से छूट निकलने को ही प्रोत्साहित करेंगे? गीता स्पष्ट रूप से कहती है कि अर्जुन अवीरोचित दुर्वलता में जा पड़ा है... क्योंकि वह करुणा से आक्रांत, 'कृपयाविष्टम्', हो गया है। तो क्या यह दैवी दुर्बलता नहीं है? क्या करुणा एक दिव्य भावावेग नहीं है, जिसे इस प्रकार की कड़ी फटकार के साथ निरुत्साहित नहीं किया जाना चाहिए? अथवा क्या हम किसी ऐसी शिक्षा के समक्ष तो नहीं हैं जो केवल युद्ध और वीर कर्म का ही उपदेश देती हो...स्वयं परम गुरु ही आगे के एक अध्याय में दैवी सम्पदा के गुणों को गिनाते हुए प्राणीमात्र पर दया, मृदुता, क्रोध से तथा हिंसा और कष्ट देने की कामना से मुक्ति आदि को निर्भयता, ओज और तेज के बराबर ही आवश्यक बतलाते हैं। क्रूरता, कठोरता, भयानकता और शत्रुओं के वध में हर्ष, धन-संचय और अन्यायपूर्ण भोग आसुरी सम्पदाएँ हैं, इनकी उत्पत्ति उस प्रचण्ड आसुरी प्रकृति से होती है जो जगत् में और मनुष्य में भगवान् की सत्ता को अस्वीकार करती है और केवल कामना को ही अपना आराध्यदेव जानकर पूजती है। तो फिर ऐसे किसी दृष्टिकोण से तो अर्जुन की दुर्बलता फटकारी जाने योग्य नहीं है...
एक दैवी करुणा है जो हमारे पास ऊपर से उतरती है...यह करुणा युद्ध और संघर्ष को, मनुष्य के बल और उसकी दुर्बलता को, उसके पुण्यों और पापों को, उसके हर्ष और संताप को, उसके ज्ञान और अज्ञान को, उसकी बुद्धिमत्ता और मूर्खता को, उसकी अभीप्सा और उसकी असफलता (आदि द्वंद्वों) को एक प्रेम, ज्ञान और शांत स्थिर सामर्थ्य की दृष्टि से देखती है और उनमें प्रवेश कर के सबकी सहायता करती और सबके क्लेश का निवारण करती है। साधु और परोपकारी में यह अपने-आप को प्रेम या उदारता की बहुलता के रूप में मूर्तिमान कर सकती है; विचारक और वीर में यह उपकारी प्रज्ञा एवं बल की विशालता तथा शक्ति का रूप धारण करती है। यही आर्य योद्धा की वह करुणा, उसके शौर्य का प्राण है जो किसी घायल अथवा क्षत-विक्षत को नहीं मारा करती, अपितु दुर्बल की, दलित की, आहत और पतित की सहायता और रक्षा करती है। परन्तु वह भी दिव्य करुणा ही है जो बलिष्ठ आततायी और घृष्ट अत्याचारी को मार गिराती है, किसी प्रकार की घृणा तथा प्रचंड क्रोध के कारण नहीं, क्योंकि ये कोई उच्च दिव्य गुण नहीं हैं, पापियों पर ईश्वर का कोप, दुष्टों से ईश्वर की घृणा इत्यादि बातें अर्द्ध-प्रबुद्ध संप्रदायों की वैसी ही कल्पित कहानियाँ हैं जैसे कि उनके द्वारा आविष्कृत नरकों की अनंत काल तक चलती यातनाओं की कथाएँ – अपितु, जैसा कि प्राचीन आध्यात्मिकता ने स्पष्ट रूप से देखा, कि जब वह बल के मद से मत्त पापी दैत्य का संहार करती है तो ऐसा वह उतनी ही प्रेम और अनुकंपा के साथ करती है जितनी प्रेम और अनुकंपा वह उन दीन-दुखियों और पीड़ितों पर करती है जिन्हें उस दैत्य की हिंसावृत्ति और अन्याय से इसे बचाना होता है।
परन्तु जो अर्जुन को उसके कर्म और लक्ष्य अथवा अभियान का परित्याग करने के लिये उकसा रही है वह कोई इस प्रकार की करुणा नहीं है। वह करुणा नहीं अपितु दुर्बल आत्मदया से परिपूर्ण नपुंसकता है, उस मानसिक यंत्रणा से पीछे हटना या ठिठकना है जो उसके कर्म के फलस्वरूप उसे भोगनी पड़ेगी... और अन्य सभी मनोदशाओं में यह आत्मदया अत्यंत अधम और अनार्य मनोदशाओं में से है। इसका जो दूसरों के प्रति दया का भाव है वह भी आत्म-तुष्टि का ही एक रूप है, यह स्नायुओं का संहारकर्म से भौतिक संकुचन या कातरता है, धार्तराष्ट्रों के विनाश से हृदय का अहंपरक भावावेगमय संकुचन है, क्योंकि 'ये हमारे स्वजन हैं' और इनके बिना तो जीवन ही शून्य हो जाएगा। यह दया मन और इन्द्रियों की एक दुर्बलता है, - ऐसी दुर्बलता उन लोगों के लिये हितकर हो सकती है जो अभी अपने विकासक्रम के निचले स्तर पर हैं, जिन्हें दुर्बल होना ही चाहिये अन्यथा वे क्रूर और कठोर बन जाएँगे; उन्हें अपने कठोरतर रूपों को अपने संवेदनात्मक अहंकार के मृदुतर रूपों के द्वारा सुधारना होगा, उन्हें उस अशक्त तत्त्व, तमोगुण का आवाहन करना पड़ेगा जिससे कि उनके राजसिक आवेशों की उग्रता और अतियों का दमन करने में उस प्रकाशमय तत्त्व, सत्त्वगुण, की सहायता की जा सके। परंतु यह मार्ग उस उन्नत आर्य पुरुष का नहीं है जिसे दुर्बलता के द्वारा नहीं, अपितु शक्ति से और अधिक शक्ति के द्वारा आरोहण करना है। अर्जुन देवमानव है, नरश्रेष्ठ बनने की प्रक्रिया में है और इसलिए वह देवताओं द्वारा चुना गया है। उसे एक कार्य सौंपा गया है, उसके पास उसके रथ पर स्वयं भगवान् विराजमान हैं, उसके हाथों में दिव्य गांडीव धनुष है और अधर्म के महारथी, संसार में भगवान् के नेतृत्व के विरोधी उसके सामने खड़े हैं। यह निर्णय करने का उसे अधिकार नहीं है कि अपने भावावेगों और आवेशों के अनुसार क्या करेगा और क्या नहीं करेगा, या अपने अहंपरायण हृदय और बुद्धि की बात मानकर एक आवश्यक विनाश से हट जाए, अथवा इस कारण अपने कर्म से विरत हो जाए कि यह उसके जीवन में दुःख और रिक्तता ला देगा या चूँकि जिन हजारों-हजार (प्राणियों) को अवश्य इसमें नष्ट होना है उनके वियोग की तुलना में इस (कृत्य) के लौकिक परिणाम का उसकी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं। यह सब उसका अपने उच्चतर स्वभाव से दुर्बलतावश अधःपतन है। उसे तो केवल अपने 'कर्तव्यं कर्म' को देखना होगा, केवल भगवान् के उस आदेश को सुनना होगा जो उसके क्षात्र स्वभाव में से होकर दिया जा रहा है, उसे केवल जगत् और मानव जाति की भवितव्यता के लिए महसूस करना होगा जो उसे अपना देव-प्रेषित मनुष्य जानकर पुकार रहे हैं कि वह जगत् और मानव जाति के प्रयाण में सहायक हो और उसे आक्रांत करने वाली अंधकार की सेनाओं को मारकर उसके पथ को निष्कंटक करे।
यहाँ ध्यान देने की बात यह है, हालाँकि उसका सीधा संबंध इस संदर्भ से तो नहीं है पर वह है महत्त्वपूर्ण, कि मनुष्य की बुद्धि के तर्क बहुत ही सतही प्रकार के होते हैं। हमारी बुद्धि अर्जुन के पक्ष में बड़े अच्छे-अच्छे तर्क दे सकती है क्योंकि हमारे नैतिक दृष्टिकोण, हमारी पसंद के अनुसार हम देखते हैं कि लड़ाई-झगड़े से तो सामंजस्य बेहतर है, पर ऐसे दृष्टिकोणों से देखने पर मनुष्य के निर्णय सौ में से निन्यानवे बार गलत ही होंगे। जीवन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारी सोच, धारणाओं, दृष्टिकोणों आदि का जैसा स्वरूप है वे अपने-आप में विश्वास के योग्य नहीं हैं। अगर ऐसा न होता तब तो हम आध्यात्मिकता में सहज ही आगे चल पड़ते और हमें मार्गदर्शन की आवश्यकता ही न होती। परंतु ये चीजें हमें धोखा देती हैं और इनमें से किसी भी चीज का कोईविश्वास नहीं किया जा सकता। यदि व्यक्ति को श्रीमाताजी का गहरा स्पर्श प्राप्त नहीं है तो उसकी कोई सुरक्षा नहीं है। अन्यथा तो वह केवल अपनी ही चीजों और विचारों को उचित ठहराता रहेगा और इधर-उधर भटकता रहेगा। परंतु ये सभी विषय सतही नहीं हैं, अपितु भीतर से अनुभव करने के हैं। इसका कोई मूल्य नहीं कि हमारे सिद्धांत, हमारे नैतिक मूल्य, हमारे तौर-तरीके क्या हैं, ये सब हमारे कर्म को सच्चे रूप में उचित-अनुचित नहीं ठहरा सकते और कर्म का निर्देशन नहीं कर सकते। कर्म का निर्देशन तो इससे होना चाहिये कि श्रीमाताजी की (भगवान् की) इच्छा क्या है। और गीता के वर्तमान संदर्भ में भी यही बात है। साधना पथ में हम जितना अधिक इस बात को समझ लें कि हमारी अन्तःप्रज्ञा की तुलना में बुद्धि और उसके विचार बड़े ही अपूर्ण, अपर्याप्त तथा निष्प्रभावी हैं, और जितना ही हम इन पर आग्रह रखना बंद कर दें, उतना ही हमारे लिए बेहतर है और मार्ग सुरक्षित हो जाता है। जब तक जीवन में गहरी दृष्टि न हो तब तक कुछ भी सार्थक नहीं किया जा सकता। अन्यथा हम जिस स्थिति में रहते हैं, उसे ही उचित ठहराने वाले तर्क देते रहते हैं और इससे कभी भी हम मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकते। इसलिए, यदि हमारे अंदर सच्चा विवेक नहीं है तो हमें कम-से-कम उनका अनुसरण करना चाहिये जिनमें यह है, अन्यथा इस मार्ग में हमारी कोई भी गति नहीं है।
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ।।४।।
४. अर्जुन ने कहाः हे मधुसूदन (श्रीकृष्ण) ! मैं किस प्रकार युद्ध में भीष्म और द्रोण के विरुद्ध (शत्रों) बाणों से युद्ध करूँगा? हे अरिसूदन (शत्रुनाशक)! वे दोनों ही परम पूजनीय हैं।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ।। ५।।
५. क्योंकि इन महानुभाव गुरुजनों की हत्या की अपेक्षा इस लोक में भिक्षा माँगकर पेट भरना भी श्रेयस्कर है। क्योंकि इन गुरुजनों की हत्या करने पर भी मैं इस लोक में रक्त से सने हुए धन और दूसरे कमनीय पदार्थ-रूप भोगों को ही तो भोगूँगा।
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ।। ६।।
६. और हम यह भी नहीं जानते कि इन दोनों में से कौन-सा हमारे लिये श्रेष्ठ है, कि हम उन पर जय प्राप्त करें अथवा वे हम पर विजयी हों;- हमारे सामने धृतराष्ट्र के पुत्र (पक्ष के लोग) खड़े हैं जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे।
यह उस मनुष्य का संवेदनात्मक, भावावेगात्मक तथा नैतिक विद्रोह है जो अब तक कर्म और उसके प्रचलित मानदंड से संतुष्ट रहा है; पर जो अपने-आप को इन मानदंड और इन कर्मों द्वारा ऐसे भीषण विप्लव में झोंका गया पाता है जहाँ वे एक-दूसरे से और स्वयं के साथ भी भीषण संघर्ष में रत हैं, और खड़े होने के लिए नैतिक आचार-व्यवहार का कोई आधार ही नहीं रह गया है, ऐसा कोई सहारा नहीं बचा जिसे थामकर चला जा सके, कोई धर्म ही नहीं रहा। मानसिक सत्ता में जो कर्म तत्त्व अथवा कर्म-पुरुष है उसके लिए यह सबसे भयंकर संकटावस्था, विफलता तथा पराभव है। स्वयं यह विद्रोह अत्यंत सहज और स्वाभाविक है; संवेदनात्मक रूप से विद्रोह ऐसे कि, इसमें भय, दया और जुगुप्सा के बिल्कुल सामान्य भाव हैं, प्राणिक रूप से विद्रोह ऐसे कि, जीवन के उद्देश्यों और कर्म के सर्वस्वीकृत एवं सुपरिचित हेतुओं में आकर्षण और श्रद्धा न रहना, भावावेगात्मक रूप से विद्रोह ऐसे कि, सामाजिक मानव की सामान्य भावनाओं जैसे स्नेह, आदर-सत्कार, सम्मिलित प्रसत्रता व संतुष्टि की कामना - का एक निर्मम कर्तव्य से पीछे हटना जो उन सभी भावनाओं का उल्लंघन करने वाला है; नैतिक रूप से ऐसे कि, पाप और नरक का अतिसामान्य भाव तथा 'रक्तरंजित भोगों' के निषेध का 'भाव; व्यावहारिक रूप से, यह बोध कि कर्म के मानदण्ड एक ऐसे परिणाम तक ले आए हैं जो कर्म के व्यावहारिक उद्देश्यों को ही नष्ट कर देता है।
इसमें बात बड़ी स्पष्ट है। जब तक मनुष्य के जीवन में परस्पर-विरोधी कर्तव्य-अकर्तव्य की स्थिति पैदा नहीं हो जाती, तब तक जो भी भाव प्रधान रूप से प्रभावी रहता है उसी के अनुसार सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहता है। परन्तु संकट तो तब पैदा होता है जब ऐसी परिस्थिति आ खड़ी होती है जिसमें परस्पर विरोधी कर्त्तव्य उपस्थित हो जाते हैं और दोनों का ही दावा शक्तिशाली होता है। अब यहाँ अर्जुन के समक्ष अनेक धर्म एक दूसरे के विरोध में आ खड़े हुए हैं- अधर्म पर विजय के लिए लड़े, क्षत्रिय धर्म का पालन करे, या अपने गुरुओं के प्रति कर्त्तव्य का पालन करे या उनका संहार करने का पाप करे। ऐसी परिस्थिति में कौन से कर्तव्य का पालन करे। ऐसे में जो मनुष्य मानसिक आदर्शों के अनुसार कर्म करता है वह स्वाभाविक रूप से इस चयन में दुविधा अनुभव करेगा कि कौनसे आदर्श का अनुसरण करे। यही अर्जुन के साथ हो रहा है। उसका इन्द्रियबोध एक बात कहता है, भावात्मकता दूसरी बात, नैतिकता तीसरी बात और कर्त्तव्य कर्म की भावना एक अलग ही बात कहती है। और इसी संकटावस्था से गीता का जन्म होता है। इसके समाधान के रूप में गीता हमें उस उच्च स्थल तक ले जाएगी जहाँ इन सब प्रश्नों का महत्त्व ही नहीं रहेगा, जहाँ इस तरह के भिन्न कर्तव्यों का अंतर्विरोध समाप्त हो जाएगा और बुद्धि में स्पष्टता आ जाएगी। जब कोई योग मार्ग में चलता है तो उसके लिए केवल एक ही कर्तव्य रह जाता है और वह है वही कर्म करना जिसमें श्रीमाताजी (या भगवान्) की प्रसन्नता निहित हो। किंतु चूंकि इस विषय में अंधकार रहता है कि 'उन्हें' कौनसी चीज प्रसन्न करेगी, इसलिए व्यक्ति कर्तव्यबोध का सहारा लेता है। परंतु ऐसे में यात्रा कभी भी अपनी पूर्णाहुति तक नहीं पहुँच सकती क्योंकि यात्रा में व्यक्ति कभी सही मोड़ ले लेता है तो कभी गलत। सामान्यतः साधना में ऐसा ही होता है और इस कारण अधिकतर लोग एक ही जगह पर चक्कर काटते रहते हैं। इस सब से हमें यह सबक लेना चाहिये कि बिना सच्चे मार्गदर्शन के साधना में सफलता संभव नहीं है।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्वितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।।७।।
७. कार्पण्य दोष (दुर्बलता) ने मुझसे मेरा (सच्चा वीरोचित) क्षत्रिय स्वभाव छीन लिया है, धर्म-अधर्म (कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य) के निर्णय करने में मेरी संपूर्ण चेतना विमूढ़ हो गयी है, इसलिये मैं आपसे पूछता हूँ कि जो मेरे लिये श्रेयस्कर हो उसे निश्चित रूप से मुझे बतलाइये; मैं आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण में आया हूँ, मुझे ज्ञानोद्दीप्त कीजिये।
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ।।८।।
८. क्योंकि पृथ्वी पर समृद्ध और निष्कंटक राज्य अथवा देवताओं के ऊपर आधिपत्य (स्वर्ग के ऊपर राज्य) के प्राप्त हो जाने पर भी मैं ऐसा कोई साधन नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा इषीकेशं गुडाकेशः परंतप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ।९।।
९. सञ्जय ने कहाः हे परंतप (घृतराष्ट्र), इषीकेश से इस प्रकार कह देने के बाद, गुडाकेश (निद्राजयी अर्जुन) उन गोविन्द से "मैं युद्ध नहीं करूंगा" इस प्रकार कह कर चुप हो गया।
अर्जुन श्रीकृष्ण को दिये अपने उत्तर में फटकार को स्वीकार करता है, जबकि अभी भी वह उनके आदेश पालन में आनाकानी करता है और इन्कार कर देता है। वह अपनी दुर्बलता को जानता है, फिर भी उसकी अधीनता स्वीकार करता है। उसकी कार्पण्यता (दुर्बलता) ने उससे उसके सच्चे वीर स्वभाव को छीन लिया है, उसकी सारी चेतना धर्मसंमूढ़ (किंकर्तव्यविमूढ़) हो गयी है और वह अपने दिव्य सखा को अपने गुरु के रूप में स्वीकार करता है; परन्तु जिन भावावेगमय और बौद्धिक आधारों पर उसने अपनी धर्मपरायणता के बोध को आश्रित किया था, उन्हें सर्वथा गिरा दिया गया है और वह एक ऐसे आदेश को स्वीकार नहीं कर सकता जो उसके अनुसार उसके पुराने दृष्टिकोण के जैसा ही है और कर्म करने के लिए कोई नया आधार प्रदान नहीं करता। इसलिए अभी भी वह प्रस्तुत कर्म के लिए अपनी अस्वीकृति को उचित ठहराने की चेष्टा करता है और उसके समर्थन में अपनी स्नायवीय और संवेदनात्मक सत्ता के दावे को प्रस्तुत करता है जो इस संहारकर्म से और इसके परिणाम के रूप में रक्त से सने हुए भोगों से काँपती है, अपने हृदय के दावे को प्रस्तुत करता है जो उसके इस कृत्य के बाद आने वाले शोक और जीवन की रिक्तता से काँपता है, अपने प्रचलित नैतिक धारणाओं के दावे को प्रस्तुत करता है जो भीष्म और द्रोणाचार्य सरीखे गुरुजनों का वध करने की अनिवार्यता से भयभीत अथवा स्तंभित हैं, अपनी तर्कबुद्धि के दावे को प्रस्तुत करता है जो उसको सौंपे गये भीषण और प्रचण्ड कर्म में कोई भी भलाई नहीं देखती, अपितु जिसमें उसे अशुभ अथवा बुरे परिणाम ही नजर आते हैं। वह दृढ़-प्रतिष्ठ है कि (युद्धसंबंधी) विचार और हेतु के पुराने आधार पर वह नहीं लड़ेगा और फिर वह अपनी आपत्तियों के उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा, जिनका कि (उसकी समझ में) कोई उत्तर नहीं हो सकता। अर्जुन की अहंपरक सत्ता के इन्हीं दावों को श्रीकृष्ण सर्वप्रथम नष्ट करना शुरू करते हैं ताकि उस उच्चतर धर्म के लिये स्थान बनाया जा सके जो कर्म के समस्त अहंपरक हेतुओं का अतिक्रमण करेगा।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ।।१०।।
१०. हे भारत (धृतराष्ट्र) ! दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए अर्जुन से श्रीकृष्ण ने मानो हँसते हुए ये वचन कहे।
श्रीगुरु का उत्तर दो विभिन्न धाराओं पर चलता है। पहला संक्षिप्त उत्तर उस सामान्य आर्य-संस्कृति की उच्चतम धारणाओं पर आधारित है जिसमें कि अर्जुन पला-बढ़ा है, उसने शिक्षा-दीक्षा ली है, दूसरा, सर्वथा भिन्न प्रकार का और अधिक व्यापक है, जो कि एक अधिक अंतरंग ज्ञान पर आधारित है जो कि हमारी सत्ता के गंभीरतर सत्यों की ओर खुलता है, और वही ज्ञान गीता की शिक्षा का वास्तविक आरंभ-बिंदु है। पहला उत्तर वेदांत दर्शन की दार्शनिक और नैतिक धारणाओं पर तथा कर्त्तव्य और स्वाभिमान-संबंधी उस सामाजिक भाव पर आश्रित है जिससे आर्यों के समाज का नैतिक आधार बना था।
श्रीभगवान् उवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्व भाषसे ।
गतासूनगतासुंश्व नानुशोचन्ति पण्डिताः ।।११।।
११. श्रीभगवान् ने कहाः जिनके लिये शोक करना उचित नहीं है उनके लिये तू शोक करता है और फिर भी ज्ञानी के जैसी बातें कहता है, किंतु जो ज्ञानी है वह न तो जीवित के लिए और न ही मृत के लिए शोक करता है।
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।।१२।।
१२. मैं किसी भी समय नहीं था ऐसा नहीं है, तू नहीं था ऐसा भी नहीं है, ये राजा लोग नहीं थे यह भी सही नहीं है; और हम सब लोग यहाँ से प्रयाण करने पर नहीं रहेंगे यह भी नहीं है।
देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्षीरस्तत्र न मुह्यति ।।१३।।
१३. जिस प्रकार देहधारी आत्मा इस देह में कौमार, यौवन और वृद्धावस्था से गुजरती है, उसी प्रकार उसे इस देह से दूसरे देह की प्राप्ति होती है; इस विषय में धीर और विवेकी मनुष्य मोह को प्राप्त नहीं होता।
अर्जुन ने अपनी अस्वीकृति को नैतिक और यौक्तिक आधारों पर उचित ठहराने की चेष्टा की है, परंतु इसमें उसने महज अपने अज्ञानी और अशुद्ध भावावेगों के विद्रोह को युक्तियुक्त प्रतीत होने वाले शब्दाडंबर से ढका भर है। उसने भौतिक जीवन और शरीर की मृत्यु के संबंध में इस प्रकार कहा है मानो ये ही प्रमुख यथार्थताएँ हों; परन्तु ज्ञानी और पंडितों की दृष्टि में इनका ऐसा कोई मूलभूत महत्त्व नहीं है। अपने मित्रों और बंधुओं की शारीरिक मृत्यु का दुःख एक ऐसा शोक है जिसे प्रज्ञा अथवा विवेक और जीवन का सच्चा ज्ञान कोई स्वीकृति नहीं प्रदान करते। ज्ञानी पुरुष किसी जीवित अथवा मृत के लिए शोक नहीं किया करता, क्योंकि वह जानता है कि दुःख और मृत्यु आत्मा के इतिहास में घटनाएँ मात्र हैं। आत्मा, न कि शरीर, ही यथार्थता है। ये सब मनुष्यों के राजागण, जिनकी आनेवाली मृत्यु के लिए अर्जुन शोक कर रहा है, इस जीवन के पहले भी जीये हैं और आगे भी मानव-देह में जीयेंगे; क्योंकि जैसे आत्मा शारीरिक रूप से कौमार, यौवन तथा वार्द्धक्य की अवस्था से गुजरती है वैसे ही वह शरीर-परिवर्तन करती है। शांत तथा विवेकी बुद्धि से युक्त, जो धीर है, विचारक है, जो जीवन को स्थिरतापूर्वक देखता है और अपने-आप को इन्द्रियानुभवों और भावावेगों से विक्षुब्ध और अंधा नहीं होने देता, वह भौतिक प्रतीतियों से धोखा नहीं खाता; वह अपने खून के, अपनी स्नायुओं के तथा अपने हृदय के कोलाहल को अपने निर्णय का आच्छादन अथवा अपने ज्ञान का खण्डन नहीं करने देता। वह शरीर और इन्द्रियों के जीवन के बाह्य तथ्यों के परे जाकर अपनी सत्ता के वास्तविक तथ्य को देखता है और अपनी अज्ञानमय प्रकृति की भावावेगमय और भौतिक कामनाओं से ऊपर उठकर मानव-जीवन के सच्चे और एकमात्र ध्येय में पहुँच जाता है।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ।।१४।।
१४. हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! भौतिक पदार्थों के (इन्द्रियों के साथ) जो स्पर्श (संयोग) होते हैं वे शीत ऊष्ण, सुख और दुःख देनेवाले हैं, और वे अनित्य होते हैं, वे आते हैं और चले जाते हैं; हे भारत उनको तू सहन करना सीख ।
इन चीजों को तब तक सहन करना होगा जब तक इन पर विजय न प्राप्त कर ली जाए, जब तक कि ये मुक्त पुरुष को कोई दुःख न दे सकें, जब तक कि संसार की सब पार्थिव घटनाओं को, चाहे सुखद हों या दुःखद, वह ज्ञानयुक्त और स्थिर समता से वैसे ही ग्रहण न कर सके जैसे हमारे अन्दर गूढ़ शांत सनातन आत्मा उन्हें ग्रहण करती है। शोक और भय से विचलित होना, जैसे अर्जुन हुआ है, और अपने गंतव्य पथ से भ्रष्ट हो जाना, तथा दैन्य और दुःखभार से दबकर शारीरिक मृत्यु की अनिवार्य और अतिसामान्य घटना का सामना करने से पीछे हटना 'अनार्यजुष्टं' अनार्य अज्ञान है। यह उस आर्य का मार्ग नहीं है जो धीर शक्ति के साथ अमर जीवन की ओर ऊपर चढ़ता रहता है।
ⅱ.2
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।१५।।
१५. हे पुरुषों में श्रेष्ठ (अर्जुन)! जिस मनुष्य को ये स्पर्श व्यथित नहीं करते, जो धीर-स्थिर विवेकी मनुष्य दुःख और सुख में समान रहने वाला है वह अपने-आप को अमृतत्व के योग्य बना लेता है।
...जगत् के महान् चक्रों के भीतर युगों-युगों के द्वारा पुनरावर्तित होते मनुष्य के जीवन और मरण केवल एक ऐसी दीर्घ कालव्यापी प्रगति हैं जिनके द्वारा मानव-प्राणी अपने-आपको तैयार करता है और अमृतत्व के लिये योग्य बनाता है। और वह अपने-आपको कैसे तैयार करे? कौन-सा मनुष्य योग्य होता है? वह व्यक्ति जो अपने-आपको प्राण और शरीर समझने वाली धारणा से ऊपर उठ जाता है, जो संसार के भौतिक और संवेदनात्मक संपकों को उनके अपने मूल्य पर, अथवा देहात्मबुद्धि वाले लोग उसे जो मूल्य प्रदान करते हैं उस पर, उन्हें स्वीकार नहीं करता, जो स्वयं को और सभी को आत्मा जानता है, जो अपने-आप को अपने शरीर में नहीं, अपितु आत्मा में निवास करने का अभ्यासी बना लेता है और दूसरों के साथ भी आत्मा के रूप में, न कि उन्हें मात्र दैहिक प्राणी जानकर, व्यवहार करता है। क्योंकि अमृतत्व का अर्थ मृत्यु से बचे रहना नहीं है - वह तो एक मन से युक्त होकर जन्मे प्रत्येक प्राणी को पहले से ही प्राप्त है, अपितु जीवन और मरण को अतिक्रम करना, उनके परे चले जाना है। इसका अभिप्राय उस आरोहण या ऊर्ध्व-गति से है जिससे मनुष्य मन से अनुप्राणित शरीर के रूप में न रहकर अंततः एक आत्मा के रूप में और 'आत्मा' के अंदर निवास करता है। जो कोई शोक और दुःख के अधीन है, इन्द्रियानुभवों और भावावेगों का दास है, क्षणभंगुर और अनित्य पदार्थों के स्पर्शों में लिप्त रहता है, वह अमृतत्व का अधिकारी नहीं हो सकता।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ।।१६।।
१६. जो वस्तुतः सत् है उसका अभाव नहीं हो सकता, वैसे ही जैसे जो असत् है उसकी विद्यमानता नहीं हो सकती। तथापि इन दोनों सत् और असत् के विरोधों का ही अंत तत्त्वदर्शियों द्वारा देखा गया है।
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्वित्कर्तुमर्हति ।।१७।।
१७. किंतु जिस आत्मा से यह संपूर्ण विश्व व्याप्त है उसे तू अविनाशी समझ। इस अविनाशी आत्मा का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ।।१८ ।।
१८. उस शरीरधारी आत्मा के, जो नित्य, अविनाशी और अपरिमेय है, ये समस्त शरीर अंतवंत अर्थात् विनाशवान कहे गये हैं; इसलिये हे भारत (अर्जुन) ! युद्ध कर।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ।१९।।
१९. जो मनुष्य इसे (आत्मा को) हत्या करने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है वे दोनों ही सत्य को नहीं देख पाते। न यह किसी की हत्या करता है न हत ही होता है।
न जायते नियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।२०।।
२०. यह (आत्मा) कभी उत्पन्न नहीं होता और न मरता ही है, और न यह कोई ऐसा पदार्थ ही है जो एक बार अस्तित्व धारण कर के (चले जाने पर) फिर कभी भी अस्तित्व न धारण कर सकता हो। यह अजन्मा, नित्य, सनातन, पुरातन है, शरीर की हत्या होने के साथ यह हत नहीं होता।
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ।।२१।।
२१. हे पार्थ ! जो मनुष्य इस (आत्मा) को अजन्मा, अव्यय, नित्य, अविनाशी जानता है वह मनुष्य किस प्रकार किसी की हत्या करता है अथवा किसी की हत्या का कारण बनता है?
वासांसि जीर्णानि यथा विहायनवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥२२॥
२२. जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों का परित्याग कर के दूसरे नवीन वलों को ग्रहण करता है वैसे ही आत्मा पुराने शरीरों का परित्याग कर के दूसरे नवीन शरीरों को धारण करता है।
नैनं छिन्दन्ति शखाणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।॥२३॥
२३. इस आत्मा को शत्र काट नहीं सकते, न ही अग्नि जला सकती है, और न इसे जल गीला कर सकते हैं, और न हवा इसे सुखा सकती है।
अच्छेद्यो ऽयमदाह्यो ऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ।।२४।।
२४. यह आत्मा कभी भी न कट सकने वाला, न जल सकने योग्य, न गीला हो सकने वाला और कभी भी न सुखाया जा सकने वाला है; यह शाश्वत रूप से नित्य, अचल, सर्वव्यापी और सनातन है।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्यो ऽयमविकार्यो ऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ।।२५।।
२५. यह आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य, अविकारी है, ऐसा (श्रुतियों द्वारा) इसका वर्णन है; इसलिये इस आत्मा को इस प्रकार के स्वरूप वाला जानकर तुझे शोक नहीं करना चाहिये।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ।।२६।।
२६. और यदि तू इस आत्मा को सदा जन्म ग्रहण करने वाला और निरंतर मरणशील (ही) मानता है तब भी हे महाबाहो अर्जुन ! तेरा इसके विषय में शोक करना उचित नहीं है।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ।।२७॥
२७. क्योंकि पैदा हुए का मरण निश्चित है और मृत का फिर जन्म ग्रहण करना निश्चित है; इसलिये जो अपरिहार्य है उसके विषय में तेरा शोक करना उचित नहीं है।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना । ॥२८॥
२८. हे भारत! समस्त प्राणी आदि में अव्यक्त होते हैं, मध्य में व्यक्त होते हैं, निधनोपरान्त वे फिर अव्यक्त हो जाते हैं, इसलिये इसमें शोक करने की क्या बात है?
भौतिक मन और इन्द्रियों द्वारा मृत्यु के विषय में तथा मृत्यु के भय में, चाहे वह मृत्यु रोग-शय्या पर हो या रणक्षेत्र में, जो रोना-पीटना होता है वह प्राण की चीत्कारों में सबसे अधिक अज्ञानमय है। मनुष्यों की मृत्यु के प्रति हमारा शोक उन लोगों के लिये अज्ञानी रूप से दुःख करना है जिनके लिये दुःख करने का कोई कारण नहीं, क्योंकि न तो वे अस्तित्व से बाहर गये हैं न उनकी अवस्था में कोई दुःखद या भयानक परिवर्तन ही हुआ है क्योंकि मृत्यु के परे वे कोई कम सत्ता में नहीं हैं और उस अवस्था में जीवन की अपेक्षा कोई अधिक दुःखी नहीं हैं।
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ।।२९।।
२९. कोई मनुष्य इसे (आत्मा को) आश्चर्यमय रूप में देखता है, कोई दूसरा मनुष्य आश्चर्यवत् इसका वर्णन करता है; और कोई दूसरा आश्चर्यमय रूप में इसका श्रवण करता है और सुनने के पश्चात् भी इसे (आत्मा को) कोई नहीं जानता।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ।।३०।।
३०. हे भारत! सबकी देहों में यह आत्मा नित्य है और अवध्य है; इसलिये तुझे किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
केवल एक ही चीज सत्य है जिसमें हमें रहना होगा, (वह है) अपनी यात्रा के महान् चक्र में मानव-आत्मा (जीव) के रूप में उस शाश्वत पुरुष का स्वयं को प्रकट करना, जिस यात्रा में जन्म और मृत्यु मार्ग में मील के पत्थर हैं (महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हैं), जहाँ परलोक विश्राम-स्थल-स्वरूप हैं, जिसमें जीवन की सारी अवस्थाएँ, चाहे सुखद हों या दुःखद, हमारी प्रगति, संग्राम और विजय के साधन हैं तथा अमरत्व हमारा धाम है जिसके लिये आत्मा यात्रा करती है...
यह उच्च और महान् ज्ञान, मन और आत्मा का यह कठोर स्व-अनुशासन जिसके द्वारा उसे भावावेगों की चीत्कार और इन्द्रियों के धोखों के परे सच्चे आत्मज्ञान में ऊपर उठना है, जो हमें शोक और भ्रम से मुक्त कर सकता है...हमें भली प्रकार जीवन के भयंकर थपेड़ों को अक्षुब्ध अथवा अविचल भाव से देखना और शरीर की मृत्यु को एक तुच्छ या नगण्य घटना के तौर पर देखना सिखा सकता है... परंतु इससे अर्जुन से जिस कर्म की माँग की जा रही है, तथा कुरुक्षेत्र का जो संहारकर्म है, उसे कैसे न्यायोचित ठहराया जा सकता है? इसका उत्तर यह है कि अर्जुन को जिस पथ पर चलना है वह पथ इस कर्म की माँग करता है; यह कर्म उसके अपने स्वधर्म सामाजिक कर्तव्य, जीवनधर्म और अपनी सत्ता के धर्म द्वारा अपेक्षित कर्त्तव्य के निर्वाह में अपरिहार्य रूप से आ पड़ा है।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्माद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ।।३१।।
३१. और फिर, अपने स्वधर्म को देखते हुए भी तुम्हें (अपने युद्धरूप कर्म से) विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि क्षत्रिय के लिये धर्मयुद्ध से बढ़कर अन्य कोई चीज श्रेष्ठ नहीं है।
इसके बाद गुरु क्षण भर के लिये विषय से अलग हटकर आत्मीय-स्वजनों की मृत्यु से होनेवाले उस दुःख संबंधी विलाप का एक और उत्तर देते हैं, (अर्जुन के अनुसार) जिनकी मृत्यु उसके जीवन को जीने के कारणों और हेतुओं से ही रिक्त कर देगी। क्षत्रिय के जीवन का सच्चा उद्देश्य क्या है और उसका सच्चा सुख क्या है? यह अपने-आपको खुश करना, पारिवारिक सुख देखना और मित्रों और सगे-संबंधियों के साथ सुखकर और शांत हर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करना नहीं है अपितु धर्म के लिये लड़ना ही उसके जीवन का सच्चा उद्देश्य है, और उसका महत्तम सुख होगा कोई ऐसा महत्-कार्य या उद्देश्य खोज निकालना जिसके लिए वह अपना जीवन उत्सर्ग कर सके या फिर विजयी होकर राज्य तथा वीरोचित जीवन का यश और गौरव प्राप्त करे।
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ।।३२॥
३२. हे पार्थ। वे क्षत्रिय सुखी (भाग्यशाली) होते हैं जब ऐसा युद्ध स्वयं उनके पास स्वर्ग के खुले हुए द्वार के समान चला आता है।
अथ चेत्त्वमिमं धम्यै संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्म कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि ।। ३३ ।।
३३. किन्तु यदि तू इस युद्ध को धर्म के हेतु नहीं करेगा, तो स्वधर्म को और अपनी कीर्ति को खो बैठेगा और पाप का भागी बनेगा।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥३४॥
३४. इसके अतिरिक्त, मनुष्य तेरी दीर्घ काल तक रहने वाली अपकीर्ति को भी कहेंगे, और महिमान्वित मनुष्य के लिये अपकीर्ति मरने से भी अधिक बुरी है।
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ।।३५।।
३५. महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से भागा हुआ मानेंगे और तू जो अभी तक उनकी दृष्टि में बहुत अधिक माननीय रहा है अब उनकी दृष्टि में लघुता को प्राप्त हो जाएगा।
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ।।३६।।
३६. तेरे शत्रु तेरे बल की निंदा करते हुए बहुत से न कहने योग्य वचनों को कहेंगे; इससे अधिक दुःखदायी और क्या हो सकता है?
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ।॥३७॥
३७. यदि तू मारा जाता है तो स्वर्ग को प्राप्त करेगा; यदि विजयी होता है तो पृथ्वी का भोग करेगा; इसलिये हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)! युद्ध करने का निश्चय कर के खड़ा हो।
यह वीरोचित आग्रह इससे पूर्व चर्चा की गई निस्पृह आध्यात्मिकता से तथा आगे आने वाली गंभीरतर आध्यात्मिकता से निचले स्तर का प्रतीत हो सकता है; क्योंकि अगले ही श्लोक में श्रीगुरु अर्जुन को सुख-दुःख, लाभ-अलाभ और जय-पराजय में समता बनाये रखकर युद्ध करने का निर्देश देते हैं और यही गीता का वास्तविक उपदेश है। परन्तु भारतीय नीतिशास्त्र ने मनुष्य के विकासोन्मुख नैतिक और आध्यात्मिक जीवन के लिए क्रमोन्नत आदर्शों की व्यावहारिक आवश्यकता को सदा ही अनुभव किया है। यहाँ क्षत्रिय का जो आदर्श सामने रखा गया है वह चातुर्वर्ण्य के अनुसार सामाजिक दृष्टि से रखा गया है, इसकी जो आध्यात्मिक दृष्टि आगे चलकर दिखायी गयी है उस दृष्टि से नहीं। श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन से वास्तव में यही कह रहे हैं कि 'यदि तू सुख और दुःख और कर्म के परिणाम को ही अपने कर्म के हेतु के रूप में मानने पर आग्रह रखता है तो मेरा तुझे यही उत्तर है। मैं पहले ही दिखा चुका हूँ कि आत्मा और जगत् का जो उच्चतर ज्ञान है वह तुझे किस दिशा में प्रवृत्त करता है; और अब मैंने यह भी दिखाया है कि तेरा सामाजिक कर्त्तव्य और तेरी जाति या वर्ण का अपना नैतिक आदर्श तुझे किस दिशा में प्रवृत्त करता है; 'स्वधर्ममपि चावेक्ष्य।' तू जिस किसी भी पहलू से देख, परिणाम एक ही है। परन्तु, यदि तू अपने सामाजिक कर्तव्य और वर्णधर्म से संतुष्ट न होता हो, और समझता हो कि उससे तू दुःख और पाप का भागी बनेगा तो मेरा आदेश है कि किसी हीन आदर्श की ओर नीचे गिरने की अपेक्षा किसी ऊँचे आदर्श की ओर ऊपर उठ ।'
इसमें श्रीअरविन्द ने अपनी टीका में जो तर्क दिया है उसमें तीन बातें हैं। इसके अंदर अर्जुन यह तर्क देता है कि 'माना कि विरोधी पक्ष के लोग तो भ्रमित हैं, मूढ़ हैं, परन्तु हमें तो समझ है। आखिर इस युद्ध से क्या होगा? सभी लोग नष्ट हो जाएँगे। मेरे गुरुजन और पितामह, जिन्होंने मुझे इतनी शिक्षा, इतना ज्ञान दिया है, उनके प्रति युद्ध करके तो मुझे रक्त में सने हुए भोगों के अतिरिक्त और क्या मिलने वाला है? तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन्हें नहीं मारना चाहता। तो फिर ये सुख-भोग तो तुच्छ-सी चीजें हैं, इनके लिए तो मेरा इन्हें मारने का प्रश्न ही नहीं उठता। इससे हमारा कुलधर्म नष्ट हो जाएगा, हमारे पितरों का तर्पण नहीं होगा और सब अनिष्ट हो जाएगा।' इस सब तर्क पर श्रीकृष्ण ने जो उत्तर दिया उसे कहते हैं 'आर्य-क्षत्रिय का धर्ममत।' जिस रूप में हिन्दुस्तान के घर-घर में वेदान्त के विचार प्रचलित हैं कि भगवान् सब जगह हैं, आत्मा सर्वत्र व्याप्त है, वह अमर है, आदि-आदि, ऐसे ही प्रचलित विचारों के सहारे उसे उत्तर दिया जा रहा है कि 'वह बातें तो पण्डितों के समान करता है कि हमें यह करना चाहिये अथवा यह नहीं करना चाहिये, परन्तु पण्डित-जन तो जो जीवित हैं या जो मर गए हैं, उनमें से किसी के लिए शोक नहीं करते। उनकी दृष्टि में जीवित और मृत के बीच में कोई अन्तर नहीं होता। आत्मा तो अमर है, न कभी ये मरती है, न कभी इसका कुछ बिगड़ सकता है। संसार तो अनित्य है और ऐसा नहीं है कि ये लोग पहले नहीं थे और महाभारत के बाद नहीं रहेंगे, इसलिए वह किसके लिए शोक करता है।' हालाँकि अर्जुन अपने मुँह से यह प्रश्न नहीं करता, किन्तु यहाँ प्रश्न उठता है कि माना कि ये सब अनित्य हैं, इनकी मृत्यु तो होनी ही है और आत्मा अमर है, परन्तु इसका यह अर्थ तो नहीं कि इन सब को वह मार डाले। यह बात तो आध्यात्मिकता नहीं कहती कि चूंकि शरीर अनित्य है इसलिए इन्हें मार डालना चाहिये। आर्य क्षत्रियों के धर्म की बात तो उचित है परन्तु संहार-कर्म को यहाँ उचित कैसे ठहराया जाए? इसका उत्तर यह है कि भले आध्यात्मिकता के अनुसार तो जन्म और मृत्यु समान ही हैं, इसलिए मारो या नहीं मारो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता, परंतु चूँकि यह परिस्थिति उसके सामने उपस्थित हुई है इसलिए उसे अपने क्षात्र-धर्म का पालन करना चाहिये क्योंकि क्षत्रिय अपने निजी सुख-दुःख से प्रेरित होकर कर्म नहीं करता। उसे तो सदा ही सही के लिए लड़ना चाहिए और सत्य के लिए अपने जीवन को न्यौछावर कर देना चाहिये। और ऐसा ही एक अवसर आज उसके सामने उपस्थित है। ऐसे युद्ध में यदि वह जीतता है तो राज्य करेगा और मृत्यु को प्राप्त होता है तो स्वर्ग को प्राप्त करेगा। और यदि वह इस युद्ध में प्रवृत्त नहीं होता है तो यह उसके क्षत्रिय धर्म के अनुरूप कर्म नहीं होगा। इसलिये यदि वह यह तर्क देता है कि युद्ध करने से उसे तकलीफ होगी, तो उसे यह भी विचार करना चाहिये कि युद्ध से परे हटने के कारण लोग उसे कायर कहेंगे और उससे जो उसकी अपकीर्ति होगी वह तो उसके लिए मृत्यु से भी अधिक पीड़ादायक होगी। इससे तो वह वीरतापूर्वक युद्ध करके वीरगति को प्राप्त हो तो ज्यादा अच्छा है। और यदि वह आध्यात्मिकता की बात करता है, कि आत्मा अमर है, शरीर अनित्य है, तो भी उसके लिए यही कर्म करना सही है। किसी भी तरह से उसके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है। इसलिए उसे जय-पराजय को समान मानकर युद्ध करना चाहिये। परंतु अर्जुन कहता है कि 'यदि मैं इन्हें समान ही मानूँ, और इनसे अप्रभावित रहूँ तो फिर मैं लडूं ही क्यों? आखिर मुझे लड़ना ही क्यों चाहिये?' और सतही तौर पर इस तर्क का क्या समाधान हो सकता है? भगवान् इसका बिल्कुल सीधा उत्तर देते हैं कि क्योंकि 'मैं ऐसा करने को कह रहा हूँ और ऐसी मेरी इच्छा है' और 'मैं ही एकमात्र हूँ जिसका कि अस्तित्व है इसलिए मेरी इच्छा पूरी करना ही तेरा काम है, अतः यज्ञ के रूप में कर्म कर।' वास्तव में इसके अतिरिक्त और कोई उत्तर हो भी नहीं सकता। श्रीअरविन्द ने अपनी टीका में जिस तरीके से इस तर्क को विकसित किया है वैसा हमें सामान्यतः देखने को नहीं मिलता। उसके बिना तो हम इससे चूक ही जाते हैं कि इसमें तीन तरीके के तर्क भी हैं। अब अर्जुन निरुत्तर हो जाता है। पर वह पूछता है कि जय-पराजय, सुख-दुःख सबको समान मानकर निष्काम कर्म करना संभव ही कैसे है? बिना किसी कामना के या ऐसा भाव अपनाकर व्यक्ति किस आधार पर कर्म का चुनाव कर सकता है? उसी के उत्तरस्वरूप श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'यज्ञ के रूप में और मेरी प्रसन्नता के निमित्त कर्म कर।' तब फिर अर्जुन पूछता है कि 'आप कौन हैं।' और इसी का उत्तर उन्होंने नौंवें, दसवें और ग्यारहवें अध्याय में दे दिया कि वे कौन हैं, उनका स्वरूप क्या है। यही गीता का इस सारी समस्या का समाधान है, कि समस्या कर्तव्य या अकर्त्तव्य की नहीं है, सारी बात तो यह है कि भगवान् ही सब कुछ हैं, और वे जो कहें वही सही है। इसमें व्यक्ति के तर्क, उसके धर्म-अधर्म, दर्शन आदि के सिद्धांतों को उचित-अनुचित की क्या समझ है? इसकी वास्तविक समझ तो केवल भगवान् को ही है।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।। ३८ ।।
३८. सुख-दुःख, लाभ-अलाभ और जय-पराजय में समता रख और तब युद्ध कर; इससे तू पाप को प्राप्त नहीं होगा।
इस प्रकार अर्जुन की जो विषादजनित दलीलें थीं, संहारकर्म से पीछे हटने की जो दलीले थीं, पापबोधजन्य दलीलें तथा कर्म के दुष्परिणाम की आशंका की दलीलें थीं उन सबका उत्तर, अर्जुन की जाति और युग के उच्चतम ज्ञान और श्रेष्ठ नैतिक आदर्श के अनुसार दिया जा चुका है।
अब हमें देखना है कि अर्जुन की कठिनाई और इन्कार के मूल में जो समस्या है उसके दृष्टिकोण से तथा अत्यंत स्पष्ट और निश्चयात्मक शब्दों में इस समाधान का क्या अभिप्राय है। एक मनुष्य तथा सामाजिक प्राणी के रूप में उसका कर्त्तव्य क्षत्रिय के उच्च धर्म का पालन करना है जिसके बिना समाज के ढाँचे की रक्षा नहीं की जा सकती, जाति के आदर्शों को न्यायसंगत सिद्ध नहीं किया जा सकता, और अत्याचार, पाप और अन्याय के अराजक उत्पात के विरुद्ध धर्म और न्याय की सुसमंजस व्यवस्था को धारण नहीं किया जा सकता। और फिर भी कर्तव्य का आह्वान अपने-आप में युद्ध के नायक को अब पहले की तरह संतुष्ट नहीं कर सकता क्योंकि कुरुक्षेत्र की भीषण यथार्थता के बीच वह आह्वान अपने-आप को अति कठोर, विमूढ़कारी और अस्पष्ट रूप में प्रस्तुत करता है। अपने सामाजिक कर्त्तव्य का निर्वाह उसके लिए सहसा ही उस अर्थ का द्योतक हो गया है कि वह अपरिमित पाप तथा दुःख-कष्टरूपी परिणाम के लिए अपनी सहमति दे, सामाजिक व्यवस्था और न्याय को बनाए रखने के परंपरागत साधन उल्टे बड़ी भारी अव्यवस्था और अराजकता की ओर ले जाने वाले हो रहे हैं। न्यायोचित दावों और अधिकार का नियम, जिसे न्याय्य अधिकार कहते हैं, यहाँ उसकी कोई सहायता नहीं करेगा; क्योंकि जो राज्य उसे अपने लिए, अपने बंधु-बांधवों तथा युद्ध में अपने पक्ष के लोगों के लिए जीतना है उस पर वास्तव में न्यायपूर्वक उन्हीं का अधिकार है तथा उस अधिकार की बलपूर्वक स्थापना करने का अर्थ आसुरी अत्याचार का उन्मूलन और न्याय का प्रतिष्ठापन करना है, परंतु वह न्याय रक्त-रंजित न्याय होगा और वह राज्य एक ऐसा राज्य होगा जो शोकाकुल हृदय के साथ अधिकृत होगा जिस पर एक महापाप, समाज की भयंकर हानि और जाति के प्रति ज्वलंत अपराध का कलंक होगा। और न ही धर्म, अर्थात् नैतिक धर्म, का विधान ही कोई सहायता करने वाला है; क्योंकि यहाँ धर्मों का परस्पर विरोध उपस्थित है। इस समस्या के समाधान के लिए एक नवीन तथा महत्तर परंतु अब तक के किसी भी अनुमान से परे के विधान की आवश्यकता है, परन्तु वह विधान है क्या?
क्योंकि अपने कर्म से अलग हट जाना, साधुओं के जैसी अकर्मण्यता का सहारा ले लेना तथा असंतोषकर तरीकों और हेतुओं से युक्त इस अपूर्ण संसार को उसके अपने ही साधनों के भरोसे त्याग देना इस समस्या का एक सहज ही कल्पनीय संभव समाधान है, जिसे लागू करना भी आसान है परंतु यह तो ठीक उस ग्रंथिमात्र को ही काट देना होगा जिसकी श्रीगुरु ने बलपूर्वक मनाही की है। किन्तु इस जगत् के स्वामी, जो मनुष्य के सब कमर्मों के स्वामी हैं और यह जगत् जिनकी एक कर्मभूमि है, द्वारा मनुष्य से कर्म की माँग की जाती है, भले वह कर्म अहंभाव के द्वारा तथा सीमित मानव बुद्धि के अज्ञान या आंशिक प्रकाश में किया जाए या फिर यह अंतर्दर्शन तथा प्रेरणा के एक अधिक उच्च तथा अधिक व्यापक दृष्टि वाले स्तर से प्रवर्तित हो। और फिर, इस (संहार) कर्म विशेष को अमंगलकारी बताकर इसका परित्याग कर देना एक दूसरे प्रकार का समाधान होगा जो कि अदूरदर्शी नैतिकतावादी अथवा उपदेशात्मक मन का बना-बनाया उपाय है, परंतु इस प्रकार की टाल-मटोल के लिए भी श्रीगुरु अपनी सहमति अस्वीकार कर देते हैं। अर्जुन की कर्म से निवृत्ति एक और अधिक बड़े पाप और बुराई का कारण बनेगी: यदि इसका कुछ परिणाम हुआ भी तो वह होगा अन्याय और अनाचार की विजय तथा भगवत्कार्यों के यंत्ररूप बने रहने के उसके अपने ही महाव्रत का परित्याग। जाति की भवितव्यताओं में जो प्रचंड संकट उत्पन्न हो गया है वह शक्तियों की कोई अंध गति या मात्र मानवीय विचारों, स्वार्थों, आवेगों तथा अहंकारों के अस्तव्यस्त संघर्ष के कारण नहीं उत्पन्न हुआ है अपितु एक भगवदिच्छा द्वारा लाया गया है जो इन बाह्य प्रतीतियों के पीछे कार्य कर रही है। अर्जुन को अवश्य ही इस सत्य का साक्षात्कार करा देना होगा; उसे अपनी क्षुद्र व्यक्तिगत कामनाओं तथा दुर्बल मानवीय जुगुप्साओं के यंत्र के रूप में नहीं अपितु एक बृहत्तर तथा अधिक ज्योतिर्मयी शक्ति, एक महत्तर सर्वज्ञ, दिव्य और वैश्व संकल्प के यंत्र के रूप में, निर्वैयक्तिक तथा अविचलित भाव से कर्म करना सीखना होगा।
आर्य योद्धा का यही धर्म है। यह कहता है कि "ईश्वर को जान, अपने-आपको जान, मनुष्य की सहायता कर; धर्म की रक्षा कर, बिना भय, दुर्बलता और हिचकिचाहट के संसार में अपना युद्ध-कर्म कर। तू शाश्वत अविनाशी आत्मा है, तेरी आत्मा अमृतत्व के ऊर्ध्वगामी मार्ग पर चलती हुई इस संसार में आयी है; जीवन और मरण कुछ भी नहीं हैं, दुःख और क्लेश और कष्ट कुछ भी नहीं हैं, इन सबको जीतना और वश में करना होगा। अपने ही सुख, प्राप्ति और लाभ की ओर मत देख, अपितु ऊपर की ओर और चारों ओर देख, ऊपर उस प्रकाशमय शिखर को देख जिसकी ओर तू चढ़ रहा है, और अपने चारों ओर इस संग्राममय और संकटपूर्ण जगत् को देख जिसमें शुभ और अशुभ, उन्नति और अवनति परस्पर घोर संघर्ष में जकड़े हुए हैं। लोग तुझे सहायता के लिये पुकारते हैं, तू उनका लौह पुरुष है, लोकनायक है; तो सहायता कर, युद्ध कर। संहार कर यदि संहार के द्वारा ही जगत् की प्रगति हो, किन्तु जिसका संहार करे उससे घृणा न कर और न उन सब मरे हुए लोगों के लिये शोक ही कर। सर्वत्र उस एक ही आत्मा को जान, सब प्राणियों को अमर आत्माएँ समझ और शरीर को तो और कुछ नहीं बस मिट्टी समझ । अपना कर्म स्थिर, दृढ़ और सम भाव से कर, लड़ और शान से वीरगति को प्राप्त हो, या फिर पराक्रमी रूप से विजयी हो। क्योंकि भगवान् ने और तेरे स्वभाव ने तुझे यही काम पूरा करने के लिये दिया है।"
यहाँ हम देखते हैं कि आर्य पद्धति में किस प्रकार क्षत्रियों के अति उच्च आदर्श स्थापित किये जाते थे, और इसी प्रकार ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र के लिए भी उनके अपने-अपने उच्च आदर्श स्थापित किये जाते थे, उन्हें उन आदर्शों में ढाला जाता था ताकि निम्न प्रकृति किसी हद तक उन आदर्शों के अनुरूप वश में रहे। अपने शरीर के सुख-आराम के लिए जीना तो आर्य पद्धति के आदर्श में था ही नहीं।
परंतु प्रस्तुत प्रसंग में, जिन भिन्न-भिन्न आदशौं से व्यक्ति स्वयं को संचालित करता है वे एक दूसरे के अंतर्विरोध में आ खड़े हुए हैं, और भयानक बन गए हैं। ऐसे में जहाँ तक अपने कर्तव्य निर्वाह का प्रश्न उठता है, तो समझ नहीं आता कि गुरु के प्रति कर्त्तव्य, पितामह के प्रति कर्तव्य, अपने भाई-बंधुओं के प्रति कर्तव्य, या फिर अपने क्षत्रिय धर्म के कर्तव्य में से कौनसे का निर्वाह किया जाए क्योंकि ये सभी कर्तव्य तो परस्पर विरोध में आ खड़े हुए हैं तथा किसी के भी निर्वाह करने से तो अवश्य ही कष्ट होने वाला है। और आखिर इस सबका परिणाम क्या होगा? यदि क्षत्रिय धर्म का पालन करे तो महाविनाश निश्चित है, सारी जाति ही नष्ट हो जाएगी और जो राज्य भोगने को मिलेगा वह खून से रंगा होगा। वहीं, यदि युद्ध न करे तो अधर्म की विजय होगी और यह तो उससे भी बुरी बात होगी। इसलिए इसमें से बचाव का कोई रास्ता ही नहीं है। और फिर इस आध्यात्मिक मनोभाव से भी, कि आत्मा अमर है और सभी में एक ही है, करना क्या चाहिये इसकी स्पष्टता नहीं होती। ऐसी स्थिति में कोई भी नैतिक युक्ति, या आदर्श या क्षत्रिय धर्म के पालन की युक्ति इसका कोई ऐसा उत्तर नहीं दे सकते जो कि उसकी आत्मा को संतुष्ट कर सके। क्योंकि यदि इसका समाधान इसी स्तर पर हो पाता तब तो गीता को और आगे विकसित करने की आवश्यकता ही नहीं थी। यह एक ऐसी परिस्थिति है जहाँ व्यक्ति जीवन के मूल पर ही प्रश्न खड़ा कर देता है कि स्वयं इन नैतिक आधारों, मूल्यों में कोई न कोई मूलभूत त्रुटि है। इसीलिए गीता इस सारी समस्या को एक दूसरे ही स्तर पर ले जाकर इसका समाधान करती है जो कि निचले स्तर पर करना संभव नहीं है अन्यथा गीता के आगे के अध्यायों के निरूपण की आवश्यकता ही नहीं 8 hat pi साथ ही, श्रीअरविन्द का स्पर्श पाकर इन सारी ही समस्याओं का समाधान एक भव्य स्वरूप ग्रहण कर लेता है और इसी कारण श्रीमाताजी कहती हैं कि श्रीअरविन्द की टीका के कारण गीता का संदेश बिल्कुल निश्चयात्मक बन गया है और वह सारी मनुष्यजाति का उद्धार कर सकता है। श्रीअरविन्द तो इसे अतिमानस के छोर तक ले जाते हैं।
अर्जुन की समस्याओं के इस प्रथम और संक्षिप्त उत्तर से (दूसरे उत्तर की ओर) मुड़ते क्षण तथा अपने प्रारंभिक शब्दों में ही जो एक आध्यात्मिक समाधान के प्रधान बिन्दु का संकेत करते हैं, श्रीगुरु एकाएक एक ऐसा भेद सांख्य और योग का भेद- प्रस्तुत कर देते हैं जो गीता को समझने हेतु चरम महत्त्व का है।
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोंगे त्विमां शृणु ।
बुद्धया युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥३९॥
३९. हे पार्थी यह तुझे सांख्यशास्त्र के अनुसार बुद्धि (वस्तुओं का बुद्धियुक्त ज्ञान तथा इच्छाशक्ति) कही गयी है, अब तू योगविषयिणी इस बुद्धि को सुन, कारण इस बुद्धि के द्वारा योगयुक्त हो जाने पर तू कर्मों के बंधन को छोड़ देगा।
गीता के प्रथम छः अध्यायों का संपूर्ण उद्देश्य सांख्य और योग, इन दो प्रणालियों को, जिन्हें सामान्यतः एक-दूसरे से भिन्न और यहाँ तक कि विरोधी समझा जाता है, वेदांतिक सत्य की विशाल रूपरेखा में समन्वित करना है। सांख्य को ही आरंभबिंदु और आधार के रूप में लिया गया है; परंतु इसे आरंभ से ही, और उत्तरोत्तर बढ़ते हुए बल अथवा प्रभाव के साथ योग के भावों और प्रणालियों से व्याप्त अथवा परिपूर्ण किया गया है और उसे योग के ही भाव में एक नया रूप दे दिया गया है। सांख्य और योग में जो वास्तविक भेद था, जिस प्रकार से प्रतीत होता है कि उस समय की धर्म-बुद्धि के समक्ष इसने अपने-आप को प्रस्तुत किया था, वह प्रथमतः यह था कि सांख्य अग्रसर हुआ ज्ञान के द्वारा तथा बुद्धियोग द्वारा जबकि योग अग्रसर हुआ कर्म द्वारा तथा क्रियाशील चेतना के रूपांतर के द्वारा। दूसरा भेद – जो प्रथम भेद का ही स्वाभाविक परिणाम 41 - 45 था कि, सांख्य पूर्ण निष्क्रियता और संन्यास की ओर ले जाने वाला माना जाता था जब कि योग को पर्याप्त रूप से कामना का आंतरिक त्याग, आत्मगत तत्त्वों का पवित्रीकरण माना जाता था जो कि कर्म की ओर और कर्मों को भगवान् की ओर मोड़ कर दिव्य अस्तित्व और मुक्ति की ओर ले जाता था। फिर भी दोनों का उद्देश्य एक समान ही था, जन्म और इस पार्थिव अस्तित्व का अतिक्रमण तथा मानव-आत्मा का परमात्मा के साथ ऐक्य। तो कम-से-कम सांख्य और योग के बीच यह भेद तो है जैसा कि गीता उसे हमारे समक्ष प्रस्तुत करती है।
गीता अपने मूल में एक वेदांतिक-ग्रंथ है; वेदांत के जो तीन सर्वमान्य प्रमाणग्रंथ हैं उनमें यह भी एक है।.. परन्तु फिर भी इसके वेदांतिक विचार सर्वत्र ही और पूर्ण रूप से सांख्य और योग की चिंतन पद्धति द्वारा रंगे हुए हैं, प्रभावित हैं और इस रंग या प्रभाव के कारण इसका दर्शन एक विशिष्ट समन्वयात्मक स्वरूप ग्रहण कर लेता है।.....
तब फिर, गीता द्वारा कहे गये ये सांख्य और योग क्या हैं? ये अवश्य ही वे प्रणालियाँ नहीं हैं जो हमें इन नामों से यथाक्रम ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका और पतंजलि के योगसूत्रों में निरूपित हुई प्राप्त होती हैं। यह सांख्यकारिका का सांख्य नहीं 3 - 34 - 7 -कम सांख्य शब्द से जो सामान्य धारणा होती है, वह नहीं है; क्योंकि गीता कहीं भी क्षण भर के लिये भी सत्ता के मूल सत्य के रूप में पुरुषों की अनेकता को स्वीकार नहीं करती, अपितु सांख्य-परंपरा जिसका जोरदार शब्दों में इन्कार करती है उसी 'एक' को गीता दृढ़ता के साथ 'आत्मा' और 'पुरुष', फिर उसी 'एक' को 'परमेश्वर', 'ईश्वर' या 'पुरुषोत्तम' तथा 'ईश्वर' को जगत् का आदि कारण घोषित करती है। आधुनिक परिभाषा में कहें तो, परंपरागत सांख्य अनीश्वरवादी है, पर गीता का सांख्य जगत्-विषयक ईश्वरवादी, बहुदेववादी और अद्वैतवादी मतों को स्वीकार करता है और सूक्ष्मतया समन्वित करता है।
न ही यह योग पतंजलि की योग-प्रणाली ही है; क्योंकि वह (पतंजलि का योगदर्शन) तो राजयोग की केवल एक शुद्ध रूप से आत्मनिष्ठ प्रणाली है, एक आंतरिक अनुशासन है, जो सीमित, अनम्य रूप से निर्धारित, कठोर और शास्त्रीय अथवा वैज्ञानिक रीति से क्रमबद्ध है, जिसके द्वारा मन को उत्तरोत्तर स्थिर-निस्तब्ध कर के समाधि में पहुँचाया जाता है जिससे हम आत्म-अतिक्रमण के लौकिक और पारलौकिक, दोनों फल प्राप्त कर सकें; लौकिक, आत्मा के ज्ञान और शक्तियों के महान् विस्तार द्वारा और पारलौकिक, भगवान् के साथ गए पारंपरिक शब्दों के प्रयोग से हमें भ्रमित नहीं होना चाहिए। इसी तरह से योग के विषय में है। पतंजलि का योग तो एक विशिष्ट पद्धति है जिससे मन को शुद्ध करने से उसके अंदर शक्तियाँ जागृत होती हैं, अनुभूतियाँ प्राप्त होती हैं और समाधि की अवस्था प्राप्त होती है। योग का अर्थ तो है भगवान् के साथ युक्त होना। आजकल आम तौर पर योग का अर्थ हठयोग या पतंजलि के योग से ही लगाया जाता है, और वह भी बड़े ही सीमित रूप में। परन्तु गीता का योग तो बहुत विशाल एवं व्यापक है, जिसमें हजारों तरीकों से परमात्मा से एकत्व प्राप्त किया जा सकता है। तो इस प्रकार, गीता का योग उस विशाल दृष्टिकोण से योग है और उसी लचीले दृष्टिकोण से इसका सांख्य है।
पर सांख्य के सत्य क्या हैं? इस दर्शन ने अपना यह नाम अपनी विश्लेषणात्मक पद्धति के कारण प्राप्त किया है। सांख्य हमारी सत्ता के तत्त्वों का विश्लेषण, गणना, विभाजन और विवेचनात्मक विन्यास है, जिनके संयोजनों तथा उन संयोजनों के परिणामों को ही मनुष्य की साधारण बुद्धि देख पाती है। सांख्य दर्शन ने समन्वय साधन की कोई चेष्टा नहीं की। इस दर्शन का मूलभूत सिद्धांत वस्तुतः द्वैतवादी है, ठीक वेदांतिक मतों का वह सापेक्षिक (relative) द्वैत नहीं जो वे अपने-आप को उस 'द्वैत' नाम से पुकारते हैं, अपितु एक परम निरपेक्ष और तीक्ष्ण अथवा सुस्पष्ट रीति का द्वैत है। क्योंकि यह अस्तित्व या सत्ता का वर्णन केवल एक मूल तत्त्व के द्वारा नहीं अपितु दो मूल तत्त्वों के द्वारा करता है जिनका संयोग ही इस जगत् का कारण है- एक है पुरुष जो अकर्ता (निष्क्रिय तत्त्व) है और दूसरी है प्रकृति जो कीं (सक्रिय तत्त्व) है। पुरुष आत्मा है, आत्मा शब्द के साधारण और प्रचलित अर्थ में नहीं, अपितु उस विशुद्ध सचेतन सत्ता (पुरुष) के अर्थ में जो अचल, अक्षर और स्वयं-प्रकाशमान है। प्रकृति है ऊर्जा और उसकी प्रक्रिया। पुरुष स्वयं कुछ नहीं करता, पर वह प्रकृति और उसकी प्रक्रियाओं को प्रतिबिंबित करता है; प्रकृति जड़-यांत्रिक है परंतु पुरुष में प्रतिबिंबित होकर वह अपने कर्म में चेतना का रूप धारण कर लेती है और इस प्रकार सृष्टि, स्थिति और संहार अर्थात् जन्म, जीवन और मरण, चेतना और अवचेतना, इन्द्रियगम्य ज्ञान और बुद्धिगम्य ज्ञान तथा अज्ञान, कर्म और अकर्म, सुख और दुःख, ये सब विषय उत्पन्न होते हैं और पुरुष प्रकृति के प्रभाव में आकर इन सबको अपने ऊपर आरोपित कर लेता है जबकि वास्तव में ये बिल्कुल भी उससे संबद्ध नहीं हैं अपितु एकमात्र प्रकृति की क्रिया अथवा उसकी गति से संबंधित हैं।
चूंकि प्रकृति तीन गुणों अर्थात् ऊर्जा की तीन मूलभूत अवस्थाओं से निर्मित है; सत्त्व, जो ज्ञान का मूल है, ऊर्जा की क्रियाओं की स्थिति बनाए रखता है; रजस्, जो शक्ति और कर्म का मूल है, ऊर्जा की क्रियाओं की सृष्टि करता है; तमस्, जो जड़ता और अज्ञान का मूल है, और जो सत्त्व और रजस् का निषेध या विपर्यय है, उस सबका संहार या विध्वंस करता है जिसकी वे सृष्टि करते तथा स्थिति रखते हैं। प्रकृति के ये तीन गुण जब साम्यावस्था में होते हैं तब सब कुछ ठहरा हुआ स्थिर पड़ा रहता है, कोई गति, कर्म या सृष्टि नहीं होती और इसलिए चेतन 'आत्मा' की अक्षर ज्योतिर्मयी सत्ता में आभासित या प्रतिबिंबित होनेवाली भी कोई वस्तु नहीं होती। परंतु जब इस साम्यावस्था में भंग होता है तब तीनों गुण विषमता की अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं जिसमें कि वे एक-दूसरे से संघर्ष करते और एक-दूसरे पर अपना प्रभाव जमाने का प्रयत्न करते हैं, और उसी से विश्व को प्रकट करने वाला यह सृष्टि, स्थिति और संहार का विरामरहित व्यापार आरम्भ होता है। ऐसा तब तक चलता रहता है जब तक पुरुष अपने अन्दर इस वैषम्य को, जो उसके सनातन स्वभाव को ढक देता और उस पर प्रकृति' के स्वभाव को आरोपित करता है, प्रतिभासित होने देता है।
-----------------
• जगत् के क्रमविकास के मूल में प्रकृति अपने तीनों गुणों सहित पदार्थों के मूलतत्त्व के रूप में अव्यक्त अचेतन अवस्था में रहती है, जिसमें से क्रमशः ऊर्जा या जड़तत्त्व की पाँच मूलभूत अवस्थाओं का विकास होता है... प्राचीन शास्त्रानुसार पंचमहाभूत हैं आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी पर यह स्मरण रखना होगा कि ये आधुनिक विज्ञान के अर्थ में ईमें मूलतत्त्व नहीं हैं, अपितु ये भौतिक ऊर्जा की ऐसी अति सूक्ष्म अवस्थाएँ हैं जिनका विशुद्ध स्वरूप इस स्थूल जगत् में कहीं भी प्राप्य नहीं है। सभी पदार्थ इन्हीं पाँच सूक्ष्म अवस्थाओं या तत्त्वों के संयोगों से सृष्ट होते हैं। और फिर, इन पाँचों महाभूतों में से, प्रत्येक महाभूत ऊर्जा या जड़तत्त्व के पाँच सूक्ष्म लक्षणों में से किसी एक लक्षण (तन्मात्रा) का आधार होता है। ये पंचतन्मात्राएँ हैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। इन्हीं के द्वारा ज्ञानेन्द्रियों को विषयों का ज्ञान होता है। इस प्रकार मूल प्रकृति से उत्पन्न इन पंचमहाभूतों और उनकी इन पंचतन्मात्राओं से, जिनके द्वारा स्थूल का बोध होता है, उसका विकास होता है जिसे आधुनिक भाषा में विश्व-सत्ता का वस्तुनिष्ठ पक्ष कहते हैं।
तेरह तत्त्व और हैं जिनसे विश्व ऊर्जा का आत्मनिष्ठ पक्ष निर्मित होता है- बुद्धि या महत्, अहंकार, मनस् और उसकी दस इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ)। मन मूल इन्द्रिय है जो सभी बाह्य पदार्थों का बोध करता और उन पर प्रतिक्रिया करता है; क्योंकि इसमें अंतर्मुखी (अनुमान, निष्कर्ष, आकलन आदि आत्मपरक क्रिया) और बहिर्मुखी (स्नायुओं की संवेदनादि क्रिया) दोनों क्रियाएँ साथ-साथ होती रहती हैं: इन्द्रियानुभव के द्वारा यह उन विषयों को ग्रहण करता है जिन्हें गीता 'बाह्य स्पर्श' कहती है और उनके द्वारा जगत् के विषय में अपना विचार बनाता है और सक्रिय प्राणशक्ति द्वारा उस पर अपनी प्रतिक्रियाएँ करता है। परन्तु पाँच ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध (पंच तन्मात्राएँ) जिनके विषय हैं यह अपनी ग्रहण करने की अति सामान्य क्रियाओं में विशिष्टता या समुन्नतता प्राप्त करता है (अर्थात् उन्हें भली भाँति चलाता है। इसी प्रकार पाँच कर्मेन्द्रियों की सहायता से वाणी, गति, वस्तुओं के ग्रहण, विसर्जन और प्रजनन के द्वारा यह प्रतिक्रिया करनेवाली प्राणी की कुछ अत्यावश्यक मूलभूत क्रियाओं को विशेष रूप से चलाता है। बुद्धि जो विवेक-तत्त्व है, वह साथ-ही-साथ बोध और संकल्प दोनों है, यह प्रकृति की वह शक्ति है जो विवेक के द्वारा पदार्थों में (उनके गुणधर्मानुसार) भेद करती है और समन्वय साधित करती है। अहंकार, अहं-बोध, बुद्धि में निहित आत्मपरक तत्त्व है जिससे पुरुष प्रकृति और उसकी क्रियाओं के साथ अपने-आप को तदात्म करने के लिए प्रेरित होता है। परन्तु ये आत्मनिष्ठ तत्त्व स्वयं उतने ही जड़, निश्चेतन प्रकृति के उतने हो अंश हैं जितने कि वे तत्त्व जो उसकी वस्तुनिष्ठ क्रियाओं का गठन करते हैं। यदि यह समझने में हम कठिनाई अनुभव करते हों कि किस प्रकार बुद्धि और मन जड़ निश्चेतन प्रकृति के ही गुण या लक्षण तथा स्वयं भी जड़ हो सकते हैं तो हमें इतना भर स्मरण रखना चाहिये कि स्वयं आधुनिक विज्ञान भी (अपने सभी विश्लेषणों के पश्चात्) इसी निष्कर्ष पर पहुँचा है। यहाँ तक कि परमाणु की अचेतन जड़ क्रिया में भी एक शक्ति होती है जिसे निश्चेतन इच्छाशक्ति ही कह सकते हैं तथा प्रकृति के सभी कार्यों में यही व्यापक इच्छाशक्ति निश्चेतन रूप से बुद्धि के कार्य करती है। जिसे हम मानसिक बुद्धि कहते हैं वह तत्त्वतः ठीक वही चीज है जो इस जड़-भौतिक विश्व को सभी क्रियाओं में अवचेतन रूप से विवेक (गुणधर्मानुसार भेद) करने और समन्वित करने का काम करती है, और आधुनिक विज्ञान यह दिखलाने का यत्न करता है कि स्वयं सचेतन मन भी निश्चेतन प्रकृति को जड़ क्रिया का ही परिणाम और प्रतिलिपि है। परन्तु आधुनिक विज्ञान जिस विषय को अँधेरे में छोड़ देता है अर्थात् किस प्रकार जड़ और निश्चेतन सचेतन का रूप धारण करता है, सांख्यशास्त्र उसको भी व्याख्या कर देता है।
सारी प्रकृति वस्तुतः आत्मगत (subjective) अर्थात् चेतना-संबंधी है। यह आत्मगत दृष्टि से ही विकसित होती है। क्योंकि दो तरह के विभाजन हैं - एक है मूल प्रकृति और दूसरा है पुरुष, अर्थात् एक तो है मूल तत्त्व जिसका साक्षित्व किया जाता है और दूसरा है साक्षी तत्त्व या द्रष्टा जो उसे देखता है। इन दोनों के बिना सृष्टि हो ही नहीं सकती। यदि ऐसी कोई सृष्टि है जिसका कभी किसी ने साक्षित्व या अवलोकन न किया हो तो उसके अस्तित्व का कोई अर्थ ही नहीं है। और यदि साक्षी पक्ष तो है पर कोई सृष्टि नहीं तो इसका भी कोई अर्थ नहीं निकलता। सृष्टि होने के लिए दोनों का समामेलन आवश्यक है। सृष्टि की जो यह सारी प्रतीति या प्रकटन है वह मूल प्रकृति से आरम्भ होता है। मूल प्रकृति के अन्दर परमात्मा की सारी संभावनाएँ निहित हैं। वर्तमान सृष्टि का सारा प्रयास एकमेवाद्वितीय के सूत्र को - जो कि सभी कुछ के मूल में अंतर्निहित है - बहुलता में प्रकट करना है। इस बहुलता को प्रकट करने के लिए जब तक पृथक्ता का भान न हो तब तक बहुलता का बोध नहीं होता। इसलिए इसमें 'अहं' सबसे पहले आता है - पुरुष, मूल प्रकृति और अहंकार। अहंकार आने के बाद समस्या यह आती है कि व्यक्ति दूसरों के साथ, अर्थात् जो निज-सत्ता से पृथक् हैं उनके साथ किस प्रकार क्रिया-व्यापार करे क्योंकि जब व्यक्ति एकमेव ही रहता है तब तक तब स्वयं और दूसरे जैसा कोई भेद ही नहीं होता, परन्तु पृथक्ता के बोध के साथ परस्पर क्रिया-व्यापार का बोध भी आता है। इसके लिए फिर आती है 'बुद्धि' - विवेक या भेद दृष्टि - जो यह पता लगाती है कि क्या करना चाहिये और कैसे करना चाहिये। यदि 'अहंकार' होगा तो वह 'बुद्धि' को प्रक्षिप्त करेगा। 'अहंकार' मूल प्रकृति से प्रक्षिप्त होता है। अब जब बुद्धि इस परिदृश्य में शामिल हो जाती है तो उसे निरंतर सूचना की आवश्यकता होती है जिसके आधार पर वह सही-गलत, उचित-अनुचित का निर्णय कर सके, और जब उसे सूचना के घटकों का पता चल जाए तब यह निर्णय करे सके कि उनके साथ कैसा व्यवहार करे। इस हेतु के लिए बुद्धि अपने-आप को प्रक्षिप्त करती है मनस् के रूप में। वस्तुतः मनस् ही एक मौलिक इंद्रिय है बाकी तो सब भौतिक जड़ सृष्टि है। मनस् में यह क्षमता होती है कि वह देश-काल की सीमा से परे भी जान सकता है, भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों जान सकता है और वह देश से भी सीमित नहीं होता, वह कितनी भी दूरी की चीजों को जान सकता है। ये सारी क्षमताएँ मनस् में निहित हैं। यदि मानव मनस् की ये सारी क्षमताएँ काम में लेते तो सारी सृष्टि बिल्कुल भिन्न प्रकार की होती और जैसा भौतिक निर्माण हमें गोचर होता है वैसा कदाचित् ही हमें दिखाई देता क्योंकि मनस् में तो देश और काल की सीमाएँ भी लचीली होती हैं। परंतु इस सृष्टि को बनाने के लिए मनस् के पंख काट दिये गये, या यों कहें कि उन्हें कुछ हद तक बाँध दिया गया। इसलिए किन्हीं मनुष्यों में वह अपनी क्षमताओं को अधिक काम में लेता है जबकि दूसरों में अपनी क्षमताओं को उतना काम में नहीं लेता। उदाहरण के लिए समान ही दृश्य को देखकर भिन्न-भिन्न व्यक्ति भिन्न-भिन्न निष्कर्ष निकालते हैं क्योंकि उनमें मनस् की योग्यता में अन्तर होता है। भले ही उन सब में इन्द्रियाँ तो लगभग समान ही सूचना दे रही होती हैं परन्तु वह सूचना जाती है मनस् के पास जो कि उस अनुपात में और उस तरीके से उन सूचनाओं की भिन्न-भिन्न व्याख्या करता है जैसी उसकी भिन्न-भिन्न क्षमताएँ या शक्ति-सामर्थ्य होते हैं। उदाहरण के लिए एक सामान्य मनुष्य की अपेक्षा एक कलाकार की क्षमताएँ अधिक विकसित होती हैं इसलिए वह इंद्रियों से मिली सूचना के आधार पर सामान्य मनुष्य से सर्वथा भिन्न तरीके से निष्कर्ष निकालता है। इस प्रकार मनस् एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। वास्तव में तो केवल मनस् ही एकमात्र इंद्रिय है बाकी तो सब उसके अधीनस्थ सहायक हैं। परंतु इंद्रियों के कारण मनस् की क्षमताओं पर तथा उसकी क्रिया पर अंकुश लग जाता है। इन इंद्रियों की सहायता से वह कुछ चीजें तो स्पष्ट रूप से जान लेता है परंतु अधिकांश चीजों में ये इंद्रियाँ उसकी सहज शक्ति को सीमित कर देती हैं। ये उसे इस रूप में सीमित कर देती हैं कि स्वयं अपने-आप में पर्याप्त होते हुए भी वह अपने-आप को पाँच ज्ञानेंद्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों में प्रक्षिप्त करता है और उनकी सहायता से क्रिया करता है। ज्ञानेन्द्रियाँ बुद्धि को सूचना देती हैं। बुद्धि निर्णय करती है और साथ ही अपना स्वयं का मंतव्य भी जोड़ती है और तब जो कुछ करना है उस बारे में सूचना कर्मेन्द्रियों तक पहुँचा दी जाती है। इस प्रकार मनस् ने पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों में अपना पसारा कर रखा है। अब, ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञान प्राप्त करने के लिए तन्मात्राओं की आवश्यकता होती है। आँखों को दृष्टि की, कानों को श्रवण शक्ति की आवश्यकता होती है। इस प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध, ये पाँच तन्मात्राएँ हैं। इन पाँच तन्मात्राओं के माध्यम से इन्द्रियाँ जानने का प्रयास करती हैं। ये पाँच तन्मात्राएँ पंच महाभूतों को जन्म देती हैं। वास्तव में, अपने-आप में कोई जड़-तत्त्व नहीं है परंतु जो कुछ भी है उसे ये तन्मात्राएँ अपने अनुसार परिवर्तित कर के पाँच महाभूतों के रूप में प्रकट करती हैं। इसीलिए श्रीअरविन्द कहते हैं कि विज्ञान जितना ही अधिक आगे जाएगा उतना ही उसे यह पता लग जाएगा कि जड़-तत्त्व जैसी कोई चीज है ही नहीं, और यही बात तो हमारा सांख्य-शास्त्र पहले ही घोषित कर चुका है। सभी कुछ केवल ऊर्जा ही है। ये तन्मात्राएँ भी एक सूक्ष्म ऊर्जा का रूप हैं जो कि पंचमहाभूतों के दिखावे को प्रकट करती हैं। इन पंच महाभूतों का बोध इंद्रियाँ पंच तन्मात्राओं के माध्यम से करती हैं। इन्द्रियाँ मनस् का ही विस्तार, उसी का प्रक्षेपण हैं। मनस् इनकी सूचना को बुद्धि के पास भेजता है जिसका कि विवेक-बुद्धि विश्लेषण करती है। परंतु इसमें समस्या यह है कि हमारा क्रियाशील मन क्रिया-प्रतिक्रिया करने के लिए बहुत उतावला रहता है जिससे प्रायः बुद्धि को विवेक के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। बुद्धि के कार्य करने से पहले ही वह हस्तक्षेप कर बैठता है। इन्द्रियों से मिली सूचनाओं पर वह बीच में ही तुरंत क्रिया करना आरम्भ कर देता है। बिना सोचे-विचारे ही वह लड़ाई-झगड़े में, गाली-गलौच तक में संलग्न हो जाता है। इसीलिए श्रीमाताजी कहती हैं कि थोड़ा पीछे हटो, और विवेकपूर्वक विचार करो और तब कार्य करो। यदि हम पीछे हटकर कुछ विचार करेंगे तो बुद्धि को हस्तक्षेप करने का कुछ मौका मिलेगा और इससे फिर एक हद से अधिक मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया पर कुछ अंकुश लग जाएगा। और ज्यों ही बुद्धि से विवेक आएगा, वह व्यक्ति की कर्मेन्द्रियों को काम में लेगा। उस विवेक की अभिव्यक्ति के लिए जिस किसी भी कर्मेन्द्रिय की आवश्यकता होगी वैसी काम में ले ली जाएगी - जैसे कि वाणी की आवश्यकता होगी तो बोल कर क्रिया होगी, हाथों से क्रिया की आवश्यकता होगी तो तदनुरूप क्रिया होगी। इस तरह से सृष्टि का यह सारा ही व्यापार चालू हो जाता है। हमारे लगभग सभी शास्त्र इस बात को स्वीकार करते हैं कि जहाँ तक सृष्टि की प्रतीति की व्याख्या की बात है, इसके तत्त्वों के परिगणन की बात है, तो सांख्य का वर्णन लगभग सही है। तो इस प्रकार ये चौबीस तत्त्व हुए और पच्चीसवाँ तत्त्व है अवलोकन करने वाला साक्षी तत्त्व। यदि वह न हो तो किसी चीज का कोई अर्थ ही न होगा, उसके अवलोकन से ही सारी सृष्टि का अर्थ है।
अपनी एकमेव की चेतना के अंदर यह अहंकार या फिर पृथक्ता का बोध तब आएगा जब मूल प्रकृति के अंदर कोई क्षोभ उत्पन्न होगा। यदि वह साम्यावस्था में ही रहे, तो पुरुष और प्रकृति दोनों एक ही होंगे और इस कारण सृष्टि-क्रम नहीं होगा। परन्तु उसमें यदि क्षोभ होगा तो उनमें विच्छेद उत्पन्न हो जाएगा। साम्यावस्था में तीन गुणों का क्षोभ प्रकट नहीं होता। अहंकार भी तीन प्रकार का है - सात्त्विक, राजसिक, तामसिक । यदि ये तीनों नहीं होंगे तो अहंकार रहेगा ही नहीं, सृष्टि का निर्माण ही नहीं होगा। अब चूँकि जड़-तत्त्व जैसी कोई चीज नहीं है और सब कुछ केवल आत्मपरक चेतना के अनुसार दिखाई देता है इसीलिये इसे 'लोक' कहते हैं, अर्थात् अवलोकनकारी चेतना के अनुसार ही प्रतीति होती है। यदि इन्द्रियों की संरचना दूसरे ही तरीके की होगी तो हमें बिल्कुल भिन्न प्रतीति होगी। इसीलिए यदि हम सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो सूक्ष्म जगतों में हम पाएँगे कि वहाँ चीजें बहुत अधिक सुन्दर हैं, क्योंकि यहाँ भौतिक स्तर तक आते-आते बहुत प्रतिरोध उत्पन्न हो जाता है और उनका उतना सौंदर्य अभिव्यक्त नहीं हो पाता है। वहाँ वे अपने अधिक सच्चे रूप में विद्यमान हैं। इसलिए जो यहाँ भद्दा दिखाई देता है उसी का रूप वहाँ बहुत सुन्दर है, और जो कुछ यहाँ सुन्दर दिखाई देता है उसका मूल रूप तो वहाँ दिव्य है, अपूर्व है। अतः ये सभी 'लोक' हैं अर्थात् जिस चेतना के स्तर से हम देखते हैं ये वैसे ही दिखाई देते हैं। सारे लोकों में ही पुरुष और प्रकृति का खेल है। जिस तरह की हमारी इन्द्रियाँ होंगी उसी तरीके का हमें अनुभव होगा। और वास्तव में तो क्या है या क्या नहीं इस विषय में कुछ भी कहा नहीं जा सकता। आखिर परमात्मा को जाना ही कैसे जा सकता है। यह तो हमारा केवल देखने का एक तरीका-मात्र है। सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि हमारी चेतना कैसी है। वह जिस प्रकार की होगी उसी प्रकार के जगत् का अनुभव हमें होगा। पशुओं में भी कुछ को मनुष्यों से अधिक रंग दिखाई देते हैं, कुछ को रंग दिखते ही नहीं। मनुष्यों की अपेक्षा कुत्तों में घ्राण-शक्ति बहुत अधिक विकसित होती है। इस प्रकार इन्द्रियों के विकास का कोई अन्त नहीं है। अतः जगत् हमें किस रूप में दिखाई देगा यह इस पर निर्भर करेगा कि इंद्रियों ने अपना केंद्र किस चेतना पर स्थापित कर रखा है। ये सारा जगत् एक 'लोक' है, परमात्मा को देखने का एक तरीका है। चूंकि अपने-आप में उस एक ही सद्वस्तु के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है अतः कसी निश्चित स्तर से देखने पर ही जड़-तत्त्व नजर आता है, अन्यथा नहीं। बहुत-सी ऐसी सृष्टियाँ हैं जिन्हें जड़-तत्त्व का आभास तक नहीं है। भौतिक जगत् में हमें बीच में रिक्तता या शून्यता नजर आती है, परंतु श्रीमाँ कहती हैं कि कहीं कोई रिक्तता है ही नहीं, सभी कुछ में प्रचुर रूप से सृष्टि भरी हुई है, बस केवल हमारी चेतना को, हमारी इंद्रियों को वह गोचर नहीं होता।
श्रीअरविन्द यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि गीता ने सांख्य को किस प्रकार अपनाया है जिससे कि हम उसे एक उचित परिप्रेक्ष्य में समझ सकते हैं और किसी अनावश्यक भ्रांति से बच सकते हैं।
परंतु जब वह अपनी इस अनुमति को हटा लेता है तब तीनों गुण फिर साम्यावस्था को प्राप्त हो जाते हैं और पुरुष अपने सनातन अविकार्य अचल स्वरूप में लौट आता है; वह विश्व-प्रपंच से मुक्त हो जाता है। ऐसा लगता है कि अपने अन्दर प्रकृति को आभासित होने देना और यह अनुमति देना या लौटा लेना ही पुरुष के एकमात्र अधिकार हैं; प्रकृति को अपने अन्दर आभासित देखने के नाते पुरुष गीता की भाषा में साक्षी और अनुमति देने के नाते अनुमंता है, परंतु सक्रिय या प्रभावी रूप से ईश्वर नहीं है। यहाँ तक कि उसका अनुमति देना भी निष्क्रिय है। कर्ममात्र ही, चाहे वह आत्मनिष्ठ हो या वस्तुनिष्ठ, आत्मा का स्वधर्म नहीं, उसके लिए विजातीय है, उसमें न कोई सक्रिय संकल्प है न कोई सक्रिय बुद्धि अथवा ज्ञान...
सांख्य के अनुसार यह बुद्धि और संकल्प सर्वथा प्रकृति की यांत्रिक ऊर्जा के अंग हैं, पुरुष के गुणधर्म नहीं हैं; ये दोनों ही बुद्धि-तत्त्व हैं जो कि जगत् के चौबीस तत्त्वों में से एक तत्त्व है।... बुद्धि जो विवेक तत्त्व है, वह एक ही साथ बोध और संकल्प दोनों है, यह प्रकृति की वह शक्ति है जो विवेक के द्वारा पदार्थों को उनके गुणधर्मानुसार पृथक् करती और उनमें संगति बैठाती है। अहंकार बुद्धि का आत्मगत या अहंगत वह तत्त्व है जिससे पुरुष प्रकृति और उसकी क्रियाओं के साथ तादात्म्य को प्राप्त होता है।...
अवश्य ही हमारे इस जगत् में बहुत-सी चीजें हैं जिन्हें सांख्यशास्त्र बिल्कुल भी निरूपित नहीं करता और करता भी है तो संतोषप्रद रूप से नहीं, परन्तु यदि हमें उसके तत्त्वों में वैश्विक प्रक्रियाओं की केवल एक बौद्धिक या तर्कसंगत व्याख्या ही चाहिए जो कि सभी प्राचीन दर्शनों के समान ही लक्ष्य - लक्ष्य है विश्व-प्रकृति से ग्रसित आत्मा की मुक्ति की ओर अग्रसर होने में एक आधार के रूप में हो, तब तो सांख्य का जगत्-निरूपण और मुक्ति का मार्ग उतना ही उत्तम और प्रभाषकारी है जितना कि अन्य कोई मार्ग। यहाँ जो बात पहले समझ में नहीं आती वह यह है कि सांख्यदर्शन प्रकृति को एक, और पुरुष को अनेक बताकर अपने द्वैत सिद्धांत में बहुत्व के तत्त्व का प्रवेश क्यों कराता है।... परन्तु पदार्थों के मूल तत्त्वों के निरीक्षण की कठोर विश्लेषण-पद्धति के फलस्वरूप पुरुष-बहुत्व के सिद्धांत का प्रतिपादन करना सांख्य के लिये अनिवार्य था।... विश्व और उसकी प्रक्रिया को एक पुरुष और एक प्रकृति के व्यापार के रूप में समझाया जा सकता है, किन्तु इससे विश्व में सचेतन जीवों की बहुलता का समाधान नहीं होता।
फिर इतनी ही विकट एक और कठिनाई है। अन्य दर्शनों की ही तरह सांख्य ने भी 'मोक्ष' को अपना लक्ष्य रखा है। यह मोक्ष... पुरुष द्वारा प्रकृति के कर्मों से अपनी अनुमति हटा लेने से प्राप्त होता है... तब अवश्य ही उसके गुणों को साम्यावस्था में आना ही होगा, विश्व-प्रपंच अवश्य ही बंद हो जाएगा और पुरुष को अपनी अचल शांति में लौट जाना होगा। परन्तु यदि पुरुष एक ही होता और विवेक तत्त्व (बुद्धि और संकल्प) अपने भ्रम से निवृत्त हो जाता तो सारा विश्व-प्रपंच ही बन्द हो जाता। परंतु जैसा यह है, इसमें हम देखते हैं कि ऐसा नहीं होता। असंख्य प्राणियों में से कुछ ही मोक्ष को प्राप्त होते या इसकी ओर अग्रसर होते हैं; शेष सब इससे किसी भी प्रकार प्रभावित नहीं होते, और न ही विश्व प्रकृति की जो क्रीड़ा उनके साथ हो रही है उसमें इस छोटे-मोटे त्याग से रत्ती भर भी असुविधा ही होती है जब कि उसकी सारी प्रक्रियाओं का ही अंत हो जाना चाहिये था। केवल अनेक स्वतंत्र पुरुषों के सिद्धांत द्वारा ही इस तथ्य की व्याख्या की जा सकती है। वेदांतिक अद्वैतवाद के दृष्टिकोण से यदि इसकी कोई न्याय-संगत व्याख्या हो सकती है तो वह है मायावाद। परंतु मायावाद को मान लेने पर तो यह सारा प्रपंच एक स्वप्नमात्र हो जाता है, तब बंधन और मुक्ति दोनों ही अवास्तविकता (अथवा माया) की अवस्थाएँ, माया की अनुभवजन्य भ्रांतिमात्र हो जाती हैं; वास्तविकता में न कोई मुक्त है, न कोई बद्ध। वस्तुओं का अधिक यथार्थवादी सांख्य दृष्टिकोण सृष्टि-विषयक इस भ्रांतिजनक विचार को स्वीकार नहीं करता (कि यह सब दृष्टिभ्रम है) और इसलिए वह वेदांत के इस समाधान को ग्रहण नहीं कर सकता। इस प्रकार यहाँ भी हम देखेंगे कि जगत् के सांख्य विश्लेषण से प्राप्त तथ्यों का बहु पुरुष का सिद्धांत एक अपरिहार्य निष्कर्ष है।
गीता सांख्य के इस विश्लेषण से आरंभ करती है और जहाँ वह योग का निरूपण कर रही होती है वहाँ भी पहले तो सांख्य के इस विचार को ही लगभग पूर्णतया स्वीकार करती प्रतीत होती है। वह प्रकृति, उसके तीन गुणों और चौबीस तत्त्वों को स्वीकार करती है; प्रकृति पर समस्त कर्मों के आरोपण को और पुरुष के अकर्तापन को भी गीता स्वीकार करती है; विश्व में सचेतन प्राणियों की बहुलता होने को भी स्वीकार करती है, तादात्म्यकारी अहं-भाव के तथा बुद्धि की भेदभाव करनेवाली क्रिया के लय को और प्रकृति के तीनों गुणों की क्रिया के अतिक्रमण को मोक्ष के साधन के रूप में स्वीकार करती है। आरंभ से ही अर्जुन से जिस योग की साधना करने को कहा जा रहा है, वह बुद्धि द्वारा योग है। परन्तु इसमें एक महत्त्वपूर्ण भिन्नता या भेद है, - यहाँ पुरुष को एक माना गया है, अनेक नहीं।... इससे वह बड़ी कठिनाई उपस्थित होती है जिसको सांख्य का बहुपुरुषवाद टाल जाता है, और किसी सर्वथा नये समाधान की आवश्यकता खड़ी हो जाती है। गीता यह समाधान, अपने वेदांतिक सांख्य में वेदांतिक योग के सिद्धांतों और तत्त्वों को लाकर करती है।
जो पहला महत्त्वपूर्ण नया सिद्धांत हमें देखने को मिलता है वह स्वयं पुरुषसंबंधी धारणा में है।... कठोर सांख्य-विश्लेषण में... 'पुरुष' साक्षी है, अनुमति का स्रोत है, आभास या प्रतिबिंबन के द्वारा प्रकृति के कर्म को धारण करनेवाला है, - साक्षी, अनुमंता और भर्ता है, इसके अतिरिक्त और अधिक कुछ नहीं। परन्तु गीता-प्रतिपादित पुरुष प्रकृति का प्रभु भी है, वह ईश्वर है।... जहाँ 'संकल्पात्मक' बुद्धि की क्रिया प्रकृति की क्रिया है (के हाथ में है), वहाँ बुद्धि को आधार और प्रकाश पुरुष द्वारा सक्रिय रूप से प्रदान किये जाते हैं, वह केवल साक्षी ही नहीं, अपितु ज्ञाता और ईश्वर भी है, ज्ञान और संकल्प का स्वामी भी है। प्रकृति की कर्म में प्रवृत्ति का वही परम कारण है और वही उसकी कर्म से निवृत्ति का भी परम कारण है। सांख्य-विश्लेषण में पुरुष और प्रकृति अपने द्वैत भाव में विश्व (उत्पत्ति) के कारण हैं; और इस समन्वयात्मक सांख्य में पुरुष, अपनी प्रकृति के द्वारा, विश्व का एकमात्र कारण है। एकाएक हम देख सकते हैं कि सांख्य की कठोर अतिविशुद्धतावादी या कट्टरपंथी पारंपरिक विश्लेषण-प्रणाली से हम कितनी दूर निकल आये हैं...
तो फिर विश्व में जो अनेक सचेतन प्राणी हैं, उनका क्या? वे तो ईश नहीं प्रतीत होते, उल्टे बहुत हद तक अनीश ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि ये त्रिगुण की क्रिया और अहं-भाव की भ्रांति के अधीन हैं, और यदि ये सब एक ही आत्मा हैं, जैसा कि गीता का आशय प्रतीत होता है, तो यह प्रकृति में लीनता, वश्यता और भ्रांति कहाँ से उत्पन्न हो गई, अथवा इसका सिवाय यह कहने के कि पुरुष सर्वथा निष्क्रिय है, दूसरा क्या समाधान है? और, फिर पुरुष का यह बहुत्व कहाँ से आया? अथवा यह क्या बात है कि जहाँ उस एक, अद्वितीय पुरुष की किसी एक शरीर और मन में तो मुक्ति होती है, वहीं अन्य शरीरों और मनों में वह बंधन के भ्रम में बना रहता है? ये ऐसी शंकाएँ हैं जिनका समाधान किये बिना यों ही आगे नहीं जाया जा सकता।
गीता अपने बाद के अध्यायों में इन सब शंकाओं का प्रकृति और पुरुष के एक विश्लेषण द्वारा उत्तर देती है, जो विश्लेषण कुछ ऐसे नवीन तत्त्वों को सम्मिलित कर लेता है जो एक वेदांतिक योग के लिए तो बिल्कुल संगत हो हैं किन्तु परंपरागत सांख्य के लिये विजातीय हैं। यह तीन पुरुषों या यों कहें एक पुरुष की तीन अवस्थाओं का उल्लेख करती है.... क्षर, अक्षर और उत्तम। क्षर है प्रकृति, 'स्वभाव', जो गतिशील, परिवर्तनशील (क्षरणशील) है, यह जीव (आत्मा) की बहुविध अभिव्यक्ति या रूप धारण करना है, यहाँ पर जो पुरुष है वह दिव्य सत्ता (पुरुष) की बहुरूपता या विविधता है; यही बहुपुरुष है, यह पुरुष प्रकृति से स्वतंत्र नहीं है, अपितु यह 'प्रकृतिस्थ पुरुष' है। अक्षर, कूटस्थ, अविकार्य पुरुष निश्चल-नीरव और निष्क्रिय आत्मा है, यह दिव्य सत्ता (पुरुष) की एकरूपता या एकत्वावस्था है, यहाँ पुरुष प्रकृति का साक्षी है, पर प्रकृति के कार्यों में लिप्त नहीं; यह प्रकृति और उसके कर्मों से मुक्त, अकर्ता पुरुष है। उत्तम पुरुष परमेश्वर, परंब्रह्म, परमात्मा है, जिसमें अक्षर का एकत्व और क्षर का बहुत्व, दोनों ही अवस्थाएँ सन्निविष्ट हैं। वह अपनी प्रकृति की विशाल गतिशीलता और कर्म के द्वारा, अपनी (कर्ती) शक्ति, अपने संकल्प और सामर्थ्य के द्वारा जगत् में अपने-आपको व्यक्त करता है, और अपनी सत्ता की महत्तर निस्तब्धता और अचलता के द्वारा उससे अलग रहता है; फिर भी वह अपने पुरुषोत्तम-रूप में, प्रकृति से अलगाव और प्रकृति से आसक्ति, इन दोनों अवस्थाओं के ही परे है। पुरुषोत्तम की यह धारणा यद्यपि उपनिषदों में निरंतर ही अभिप्रेत है, तथापि इसे अलग कर के सुस्पष्ट और सुनिश्चित रूप से गीता द्वारा ही सामने रखा गया है और इसने भारतीय धार्मिक चेतना के उत्तरवर्ती नए विकासों पर बड़ा भारी प्रभाव डाला है। अद्वैतवाद की कठोर सूत्रबद्ध परिभाषाओं का अतिक्रम कर जाने का दावा करने वाले उच्चतम भक्तियोग का आधार यही पुरुषोत्तमसंबंधी धारणा है और भक्ति-प्रधान पुराणों के पीछे भी यही है।
यदि अनेक पुरुष नहीं होंगे और केवल एक ही पुरुष होगा तो उसके लय के साथ ही सारी सृष्टि का भी अंत हो जाएगा। अतः, गीता कहती कि पुरुष तो एक ही है परन्तु उसकी तीन अवस्थाएँ होती हैं। हमें जो बहुत्व गोचर होता है वह तो अहं के कारण है, वास्तव में बहुत्व नहीं है। सारे जगत् के निर्माण में पुरुष और प्रकृति दोनों एक ही हैं, वे केवल रूप दो धारण करते हैं। इसमें जिसे हम पुरुष या ईश्वर पक्ष कहते हैं वह सब कुछ का संचालन करता है। और जो प्रकृति पक्ष है वह उस पुरुष की प्रसन्नता के निमित्त ही सब कुछ करता है। वही सभी कुछ का निर्माता है। पुरुषोत्तम ही सभी कुछ का नियंता है। इसलिए जब किसी प्रकृति के साथ तादात्म्य के अंदर वह एक केंद्र (क्षर-भाव) से हटकर अक्षर की निर्लिप्त अवस्था अपना लेता है तब वह उसमें निवास करने लगता है, और ऐसा करने से अन्य किसी चीज में कोई फर्क नहीं पड़ता, अन्य सभी अपने उसी क्षर भाव में चलते रहेंगे। क्योंकि यह सब सृष्टि या निर्माण कोई अकस्मात् संयोग के द्वारा नहीं हुआ, यह तो पुरुष की सोची-समझी क्रिया है। वह स्वयं तो ईश्वर है, इसलिए उसके द्वारा एक अहंकारमय चेतना के अंदर अपना क्षर से भाव बदलकर अक्षर अपना लेने से उसकी यह सोची-समझी क्रिया क्यों प्रभावित होगी? किसी एक अहं चेतना में वह क्षर से मुक्त होकर अक्षर भाव में निवास करने लगेगा, क्योंकि पुरुषोत्तम तो सदा ही क्षर और अक्षर दोनों ही है और उनसे परे भी है। इसलिए इस पद्धति में अनेक पुरुषों की आवश्यकता नहीं रहती। और फिर, शंकराचार्य आदि का एक अन्य मत भी है जिसके अनुसार केवल दो ही भाव हैं - क्षर और अक्षर। या तो व्यक्ति क्षर भाव में लिप्त रहता है, या फिर उससे मुक्त होकर अक्षर भाव में चला जाता है, और तब प्रकृति शांत हो जाती है और तब कोई प्रपंच नहीं रहता। परंतु इसमें भक्ति की तो कोई संभावना ही नहीं रहती। आखिर अक्षर भाव में व्यक्ति किसकी भक्ति करेगा? इसलिए जब हम पुरुषोत्तम की बात करते हैं तो उनकी भक्ति की जा सकती है जो सारी सृष्टि के नियामक हैं, सब कुछ को उत्पन्न करने वाले हैं। तब भक्तियोग संभव होता है। गीता भी इस तत्त्व को निर्णायक रूप से पन्द्रहवें अध्याय में प्रतिपादित करती है, उससे पहले तो वह 'अहम्', 'माम्' आदि पदों का प्रयोग करती है। पहले के अध्यायों में भगवान् यह कहते अवश्य हैं कि 'मैं यह हूँ' या फिर 'मेरे निमित्त कार्य करो' आदि-आदिः परंतु इस बात का बौद्धिक प्रतिपादन तो वे पन्द्रहवें अध्याय में ही करते हैं कि उनका सत्स्वरूप क्या है, वे वास्तव में कौन हैं, और यह कि वे क्षर और अक्षर दोनों से परे हैं। और उन्हीं के प्रति भक्ति को अर्पित करना होगा। गीता के इसी प्रकार के पुरुषोत्तम तत्त्व के प्रतिपादन के कारण ही पुराणों आदि में भक्ति की इतनी संभावना बनती है। सांख्य में तो भक्ति की कोई संभावना नहीं है, अद्वैतवाद में भी क्षर और अक्षर दो ही पुरुषों को माना गया है, इसलिये उसमें भी भक्ति के लिए कोई स्थान नहीं है। परंतु यहाँ श्रीकृष्ण अवतार के रूप में कहते हैं कि 'मैं पुरुषोत्तम हूँ। मैं क्षर-अक्षर दोनों से परे हूँ। सब कुछ मेरी इच्छा से ही होता है।' इसलिए उनके प्रति भक्ति और एकत्व प्राप्त करना उद्देश्य हो सकता है। इस प्रकार पुरुषोत्तम तत्त्व के प्रतिपादन से गीता इस समस्या का समाधान करती है। प्रकृति को भी यह दो प्रकार की मानती है। यह जो गोचर हो रही है वह अपरा प्रकृति है, जो कि त्रिगुणमयी है, जबकि एक उच्चतर, परा प्रकृति भी है जो इस अपरा से परे है – 'परा प्रकृतिर्जीवभूता', जो कि जीव के रूप में भी प्रकट होती है, वह भगवान् की परा प्रकृति है। और जब भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं, तब वे अपनी परा प्रकृति को अधीन करके जन्म ग्रहण करते हैं। वे इस अपरा प्रकृति के अधीन नहीं हैं। उन्हें अपने कार्य के लिए इसका जितना अंश आवश्यक होता है उतने अंश को वे स्वीकार करके धारण करते हैं बाकी को नहीं।
इस प्रकार इन सभी चीजों का स्पष्टीकरण कर दिया गया है कि गीता के सांख्य और योग आम तौर पर इन नामों से जो समझे जाते हैं उनसे भिन्न हैं। इन चीजों को स्पष्टतः समझ लेना चाहिए ताकि कोई अयौक्तिक, परस्पर विरोधी तरीके की अदार्शनिक बातें न हों। वास्तव में देखा जाए तो, केवल परा प्रकृति ही कार्य करती है, अपरा प्रकृति तो कुछ है ही नहीं, वह तो केवल ऊपरी दिखावा-मात्र है वैसे ही जैसे कि परम् प्रभु ही सब कुछ करते हैं और उनके अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं परंतु फिर भी हमारी चेतना पर इन्द्रियों और मन की बेड़ियों के कारण हमें ऐसा जगत् दिखाई देता है। जैसी हमारी चेतना होती है, वैसा ही जगत् हमें दिखाई देता है।
प्रश्न : सांख्य का जो वर्णन है वह क्या अपरा प्रकृति को लेकर ही है?
उत्तर : सांख्य परा या अपरा प्रकृति को नहीं मानता। वह तो एक ही प्रकृति को मानता है, जिसमें पुरुष है और बाकी उसकी विषय-वस्तु है जिसका वह साक्षित्व करता है। उसके अनुसार ईश्वर नाम की कोई चीज है ही नहीं। बौद्ध धर्म भी यही कहता है कि इस गोचर प्रकृति को मिटा दो तो सब शून्य ही रह जाता है। वह तो पुरुष को भी नहीं मानता, उसे भी वह तो केवल प्रतीति या भ्रम ही बताता है, बाकी तो सब शून्य ही है। परंतु, ये सभी तो भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुभव हैं, और इन्हें ही संपूर्ण नहीं मान बैठना चाहिये। श्रीअरविन्द अपने पत्रों में इसकी पुष्टि करते हैं कि उन्हें स्वयं ये सभी और इनके अतिरिक्त भी अन्य उच्च अनुभव प्राप्त हुए, इसलिए उस समग्र सत्य को वे इन आंशिक अनुभवों से कैसे सीमित कर सकते हैं। गीता के इसी समन्वयात्मक स्वरूप के कारण श्रीअरविन्द ने इसे इतना महत्त्वपूर्ण मानकर इस पर अपनी टीका लिखी है। इसी कारण उन्होंने वेद और उपनिषदों पर अपनी टीका लिखी है। उनका अनुभव अतिशय रूप से विशाल था। और सच कहें तो, वेद, उपनिषद् और गीता आदि में क्या तत्त्व निहित है या उनका अपने-आप में क्या महत्त्व है, यह तो हम नहीं जानते परंतु हमारे अपने लिये इनका महत्त्व श्रीअरविन्द की दृष्टि से इनकी झाँकी प्राप्त करने के कारण, उन्हीं के शब्दों से इनमें जो प्राण का संचार हुआ है उसका रसास्वादन कर पाने के कारण है।
गीता सांख्यशास्त्र के प्रकृति-विश्लेषण के ही अंतर्गत बने रहने से संतुष्ट नहीं होती; क्योंकि यह विश्लेषण तो प्रकृति में केवल अहंभाव को ही स्थान देता है, बहु-पुरुष को नहीं - वहाँ वह प्रकृति का कोई अंग नहीं, अपितु प्रकृति से पृथक् है। इसके विपरीत गीता दृढ़तापूर्वक ऐसा स्थापित करती है कि परमेश्वर ही अपनी प्रकृति से जीव बनते हैं। यह कैसे संभव है जब विश्व-प्रकृति के केवल चौबीस तत्त्व हैं, अन्य और नहीं? दिव्य गुरु कहते हैं कि हाँ, वैश्व त्रिगुणात्मिका प्रकृति के बाह्य कर्म का यही सही विवरण है और इस विवरण में पुरुष और प्रकृति का जैसा संबंध बताया गया है, वह भी बिल्कुल प्रामाणिक है और प्रवृत्ति या निवृत्ति के व्यावहारिक प्रयोगों में भारी उपयोग का भी है। परन्तु यह केवल त्रिगुणात्मिका अपरा प्रकृति है जो अवचेतन और बाह्य है; इसके परे एक उच्चतर, परम, चैतन्य तथा दिव्य परा प्रकृति है, यही परा प्रकृति व्यष्टिगत आत्मा, जीव, बनी है। अपरा प्रकृति में प्रत्येक जीव अहंभावापन्न प्रतीत होता है, परा प्रकृति में प्रत्येक जीव व्यष्टिरूप पुरुष है। दूसरे शब्दों में बहुत्व उस 'एक' के ही आध्यात्मिक स्वभाव का एक अंग है। यह व्यष्टि-पुरुष, भगवान् कहते हैं कि, स्वयं मैं हूँ, इस सृष्टि में मेरी ही आंशिक अभिव्यक्ति है, 'ममैवांशः', और इसमें मेरी सब शक्तियाँ निहित हैं; यह साक्षी है, अनुमंता है, भर्ता है, ज्ञाता है, ईश्वर है। यह अपरा प्रकृति में उतर आता है और स्वयं को कर्म से बँधा मान लेता है, जिससे कि निम्न सत्ता को भोग सके : यह इससे निवृत्त होकर अपने को सभी कर्म-बंधन से सर्वथा विनिर्मुक्त अकर्ता पुरुष जान सकता है। यह तीनों गुणों से ऊपर उठ सकता है और, कर्म-बंधन से मुक्त हुआ भी कर्म कर सकता है, जैसे भगवान् कहते हैं कि मैं स्वयं करता हूँ, और पुरुषोत्तम की भक्ति के द्वारा और उनसे युक्त होकर पूर्ण रूप से उनकी दिव्य प्रकृति का आनन्द ले सकता है।
xv.7 , xiii 23
ऐसा है गीता का विश्लेषण जो अपने-आप को बाह्य (दृश्यमान) सृष्टि-क्रम या वैश्व-प्रणाली से ही बद्ध न कर के परा प्रकृति के 'उत्तमं रहस्यं' तक में भीतर प्रविष्ट हो जाता है। उसी उत्तम रहस्य के आधार पर गीता अपने वेदांत, सांख्य और योग के समन्वय को, ज्ञान, कर्म और भक्ति के समन्वय को स्थापित करती है। एकमात्र शुद्ध सांख्य के द्वारा ही कर्म और मुक्ति का संयोजन परस्पर-विरोधात्मक है और असंभव है। एकमात्र शुद्ध अद्वैत के आधार पर योग के एक अंग के रूप से कर्मों की स्थायी निरंतरता तथा पूर्ण ज्ञान, मुक्ति और सायुज्य प्राप्त होने के बाद भी भक्ति में अनुरक्ति असंभव हो जाती है या कम-से-कम युक्ति-विरुद्ध और निष्प्रयोजन हो जाती है। गीता का सांख्य-ज्ञान इन सब बाधाओं को दूर करता है और गीता की योग-प्रणाली इन सब पर विजय लाभ करती है।
[उपर्युक्त चर्चा के प्रकाश में] हम इस बात को समझ सकते हैं कि गीता क्यों उस विशिष्ट प्रतिपादन-शैली का अनुसरण करती है जो उसने अपनायी है। (वह शैली यह है कि) पहले किसी आंशिक सत्य का, उसके गंभीर अर्थ के कुछ मृदु-मंद संकेतों के साथ, निरूपण कर देना, और फिर आगे चलकर अपने इन संकेतों की ओर लौटना और उनके मर्म को अथवा गुढ़ार्थ को प्रकट करना, और ऐसा करते रहना जब तक कि वह इन सबके ऊपर उठकर अपने उस अंतिम महान् संकेत में, अपने उस परम रहस्य में नहीं पहुँच जाती जिसका वह स्वयं बिल्कुल भी निरूपण नहीं करती, अपितु उसको मनुष्य जीवन में अनुभूत होने के लिये छोड़ देती है, जैसे कि भारतीय आध्यात्मिकता के उत्तर युगों में प्रेम की, आत्मसमर्पण की और आनन्द की महान् लहरों में इसे अनुभूत करने का प्रयास किया गया। गीता की दृष्टि सदा अपने समन्वय पर है और उसमें जो विभिन्न विचारधाराओं का वर्णन है वह मानव-मन की उस अन्तिम परम वचन के लिये क्रमिक या उत्तरोत्तर तैयारी है।
यहाँ जो मुख्य बात है वह यह है कि जो पच्चीसवाँ तत्त्व है वह गीता में प्रकृति के अंदर ही आ जाता है। 'पराप्रकृतिर्जीवभूता' – एक है निम्न प्रकृति जो अपरा प्रकृति है, और दूसरी है परा प्रकृति। यह परा प्रकृति ही जीव बनती है। परंतु परा प्रकृति केवल जीव ही नहीं है, वह उससे भी अधिक बहुत कुछ है, वही पुरुष का रूप भी धारण करती है। ईश्वर की सारी अभिव्यक्ति उनकी परा प्रकृति में ही है। जबकि सांख्य में तो 'अहंकार' को ही पुरुष का रूप दे देते हैं। 'पराप्रकृतिर्जीवभूता' के अंदर अहंभाव तो प्रकृति का ही खेल है, वह पुरुष का रूप नहीं है। सच्चा पुरुष तो केवल एक ही है और वह कोई भी भाव ग्रहण कर सकता है – क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम। इसलिए पारंपरिक सांख्य से अलग गीता ने एक के अंदर ही सारे को एकीभूत कर दिया है। हमें मूलतः जो बात समझने की है वह यह है कि गीता का योग न तो पतंजलि के समान ही कोई पारंपरिक योग है और न ही उसका सांख्य आम तौर पर समझे जाने वाला सांख्य ही है। गीता की अपनी ही एक अनूठी पद्धति है जो कि आगे चलकर तो बिल्कुल स्पष्ट ही हो जाएगी। क्योंकि पारंपरिक सांख्य और योग के आधार पर तो ऐसे भक्ति, कर्म तथा ज्ञानयोग संभव हो ही नहीं सकते जिनका प्रतिपादन गीता कर रही है। सांख्य-योग के अनुसार तो कर्मयोग संभव नहीं है और भक्तियोग भी संभव नहीं है। अतः ज्ञान और भक्तियोग का समन्वय भी नहीं हो सकता। परन्तु गीता का जो सांख्य और योग है वह इन सबका अतिक्रमण कर जाता है। उस सब को पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण में केंद्रीभूत कर दिया जाता है। ये सभी एकीभूत होकर उन्हीं में जा मिलते हैं।
दिव्य गुरु अर्जुन से कहते हैं कि सांख्यों में आत्म-मुक्तिदायी बुद्धि की जो संतुलित अवस्था है वह, मैंने तुझे बता दी है। अब मैं योग में जो दूसरी संतुलित अवस्था या स्थिति है उसका वर्णन करूँगा। तू अपने कर्मों के फलों से भयवश सकुचा रहा है, तू कोई दूसरे ही फल चाहता है और अपने जीवन के सच्चे कर्म-पथ से हट रहा है क्योंकि यह पथ तुझे तेरे वांछित फलों की ओर नहीं ले जाता। परन्तु कर्मों और उनके फल का विचार, फल की कामना ही कर्म का हेतु होना, कामना की पूर्ति के साधन के रूप में कर्म करना उन अज्ञानियों का बंधन है जो यह नहीं जानते कि कर्म क्या हैं, न उनके सच्चे स्रोत को जानते हैं, न उनकी वास्तविक कार्यविधि, और न उनकी श्रेष्ठ उपयोगिता को ही जानते हैं। मेरा योग तुझे आत्मा के अपने कर्मों के समस्त बंधनों से मुक्त कर देगा.....
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।।४०॥
४०. इस मार्ग पर कोई भी प्रयास नष्ट नहीं होता, न ही कोई प्रत्यागमन ही होता है, इस धर्म का थोड़ा-सा अनुष्ठान भी महान् भय से मुक्त कर देता है।
तू बहुत-सी चीजों से भयभीत है, पाप से भयभीत है, दुःख से भयभीत है, नर्क और दंड से भयभीत है, ईश्वर से भयभीत है और इस लोक से और परलोक से भयभीत है तथा अपने-आप से भयभीत है। ऐसी कौन-सी चीज है जिससे, हे आर्य योद्धा, जगत् के वीरशिरोमणि, तू भयभीत नहीं है? परन्तु यह महाभय ही तो मानव जाति को घेरे रहता है- लोक और परलोक में पाप और दुःख का भय, जिस संसार के सत्य स्वभाव को वह नहीं जानती उस संसार में भय, उस ईश्वर का भय जिसकी सत्य सत्ता को भी उसने नहीं देखा है और न जिसकी विश्वलीला के अभिप्राय को ही समझती है। मेरा योग तुझे इस महाभय से तार देगा और इस योग का स्वल्प-सा साधन भी तुझे मुक्ति दिला देगा। जब एक बार तूने इस मार्ग पर यात्रा शुरू कर दी तो तू देखेगा कि कोई कदम व्यर्थ नहीं रखा गया; प्रत्येक छोटी-से-छोटी गति भी एक वृद्धि अथवा प्राप्ति होगी; तुझे ऐसी कोई बाधा नहीं मिलेगी जो तेरी प्रगति में रुकावट पैदा कर सके। कितना निर्भीक और निरपेक्ष आश्वासन है। परन्तु एक ऐसा वचन जिस पर आक्रांत और सभी मार्गों में लड़खड़ाता भयभीत और शंकित मन सहसा ही अपना पूर्ण भरोसा नहीं रख सकता; और न ही इस प्रतिज्ञा का व्यापक और पूर्ण सत्य तब तक प्रत्यक्ष ही होता है जब तक गीता के प्रारंभिक वचनों के साथ उसका यह अंतिम वचन मिलाकर न पढ़ा जाएः
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।। xviii.66
'सभी धर्मों का परित्याग कर के केवल एक मेरी ही शरण ग्रहण कर; मैं तुझे सब पापों और अशुभों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।'
परन्तु भगवान् द्वारा मनुष्य को कहे इस गंभीर और हृदयस्पर्शी शब्द के साथ गीता का प्रतिपादन आरम्भ नहीं होता, अपितु आरंभ तो मार्ग पर चलने के लिये प्राथमिक रूप से आवश्यक कुछ प्रकाश की किरणों से होता है और वे भी आत्मा को लक्ष्य कर के निर्देशित नहीं की गई हैं अपितु बुद्धि को लक्ष्य कर के निर्देशित की गई हैं। शुरू में मनुष्य के सुहृद् और प्रेमी भगवान् नहीं बोलते हैं, अपितु वे भगवान् बोलते हैं जो उसके पथ-प्रदर्शक और गुरु हैं, जिन्हें शिष्य से उसकी सच्ची आत्मा, जगत् के स्वभाव अथवा स्वरूप तथा उसके अपने कर्म के उद्गमों के विषय में अज्ञान को दूर करना है। चूंकि मनुष्य अज्ञानपूर्वक और अशुद्ध बुद्धि के साथ और इस (अशुद्ध बुद्धि) के कारण से इन विषयों में अशुद्ध संकल्प के साथ कर्म करता है इसलिए वह अपने कर्मों से बंध जाता है या बद्ध प्रतीत होता है; अन्यथा मुक्त आत्मा के लिए कर्म कोई बंधन नहीं होते। इस अशुद्ध बुद्धि के कारण ही मनुष्य को आशा, भय, क्रोध और शोक तथा क्षणिक सुख होता है; अन्यथा पूर्ण शांति और स्वतंत्रता के साथ भी कर्म किये जा सकते हैं। इसलिए बुद्धि का योग ही है जो अर्जुन को बताया गया है। शुद्ध बुद्धि और फलतः शुद्ध संकल्प के साथ उस एक परमात्मा में स्थित होकर, सब में उस एक आत्मा को जानते हुए तथा उसको सम शांति से कार्य करते हुए और सतही मनोमय पुरुष की हजारों उमंगों के वश इधर-उधर भटके बिना कर्म करना ही बुद्धियोग है।
गीता ने एक ऐसी चीज का प्रतिपादन किया है जो सहज ही सामान्य बुद्धि की समझ में नहीं आ सकती। हमारी बुद्धि जिस तरह का संसार देखती है, जिस तरह के क्रिया-कलाप देखती है, उसमें सारे दिन अच्छी चीजों के बाद बुरे परिणाम आते दिखाई देते हैं, ऐसे में व्यक्ति इस बात पर कैसे विश्वास कर सकता है कि वह हमेशा आगे ही बढ़ता जाएगा और कभी प्रत्यावर्तन नहीं होगा क्योंकि जिन्हें शुभ या धार्मिक कार्य कहा जाता है उनमें भी बाधा आ जाती है, विनाश हो जाता है, और तब उसके लिए इस कथन पर विश्वास करना आसान नहीं है। हालाँकि इस पर विश्वास किए बिना आगे चलने का अन्य कोई रास्ता भी नहीं है। परंतु विश्वास करने में समस्या यह है कि भले ही हमारी आत्मा तो इस बात को जानती है, विश्वास कर सकती है, पर अभी वह ऐसी बुद्धि द्वारा आच्छादित होती है जो अशुद्ध है और अशुद्ध बुद्धि के कारण आत्मा की क्रिया भी दूषित हो जाती है। इसलिए गीता उस बुद्धि के भ्रम को दूर करने के प्रयास से आरंभ करती है जो बाह्य प्रतीतियों से भ्रमित हो जाती है और उस कारण विश्वास नहीं कर पाती। बुद्धि के लिए कैसे संभव है कि वह इस वाक्य पर विश्वास कर पाए कि 'इस मार्ग पर रखे कोई भी कदम व्यर्थ नहीं जाते और सदा उत्तरोत्तर वृद्धि ही होती है।' इसलिए गीता सर्वप्रथम बुद्धि की गाँठों को खोलना आरंभ करती है, जो कि सहज नहीं है। दूसरे अध्याय से ये गाँठें खुलनी आरम्भ हो जाती है। उसके बाद आगे से आगे प्रश्नों और शंकाओं का समाधान होता जाएगा। एक पड़ाव पर आकर अर्जुन बुद्धि से तो समझ जाता है परंतु जब तक उस ज्ञान का उसे सजीव अनुभव न हो तब तक उसमें वह शक्ति नहीं आ पाती। तब फिर वह उसके अनुभव प्राप्त करने की चाह करता है। अब गीता बुद्धियोग का निरूपण करेगी क्योंकि ये संदेश केवल आत्मा ही समझ सकती है। वास्तव में तो सारी गीता का चलन केवल इसी तरह है कि एक गुरु के रूप में शिष्य को दिये जा रहे संदेश की अपेक्षा एक प्रेमी के रूप में दिये जाने वाले संदेश 'सर्वधर्मान् परित्यज्य' को सुनने के लिए और उसे आत्मसात् करने के लिए अर्जुन को तैयार किया जा सके। सारी गीता की तैयारी ही इस बात की है कि अर्जुन की बुद्धि को तथा अन्य अंगों को इतना तैयार कर दिया जाए कि और कोई आवरण न रह जाए और यह संदेश उसे दिया जा सके। अपने जीवन में भी हम यही चीज देख सकते हैं। प्रभु की लीला को हम समझ नहीं सकते। हम कल्पना करते हैं कि हमें भली-भाँति समझ में आ गया है कि हमारे इष्ट के अतिरिक्त, श्रीमाँ-श्रीअरविन्द के अतिरिक्त सब कुछ व्यर्थ है और उनका अनुकरण करना ही एकमात्र करने योग्य कार्य है। हमारा नैतिकता का बोध भी इसे ही सही ठहराता है। परन्तु समस्या यह है कि ये सभी भाव अधिकांशतः हमारे मानसिक रूपण मात्र होते हैं। हालाँकि आत्मा इन सबके द्वारा कार्य कर रही होती है, परंतु हमारे विकास को तब तक गति नहीं मिलती जब तक कि हमें इसका जीवंत अनुभव नहीं आ जाता कि इसमें किस प्रकार का आकर्षण है। जैसे पतंगा स्वयं जल भले ही जाए, फिर भी रुक नहीं सकता और आग की ओर अनायास ही चला जाता है, वैसे ही हमारे अंदर इस प्रकार का प्रवाह आता है कि हम उसे रोक ही नहीं सकते। परंतु परमात्मा का प्रेम तो इससे भी सर्वथा भिन्न प्रकार का होता है। वह तो नित्य-निरंतर है, अहैतुक है, जिसका कोई कारण नहीं है। वहीं, यदि व्यक्ति अपने किन्हीं भागों में तो कुछ-कुछ समझा है कि उसे अपने इष्ट का अनुकरण करना है, या फिर उसे किसी उद्देश्य के प्रति कोई आकर्षण प्राप्त हुआ है - हो सकता है कि प्राण ज्वलंत रूप से किसी उद्देश्य के लिए अभिप्रेरित हो जाए, मन किसी आदर्श के प्रति आकृष्ट हो जाए - तो भी इन सब में उस दिव्य प्रेम के सहज आकर्षण का गुण नहीं होता। और जब तक वह जागृत नहीं होता तब तक हमारे अहम् आदि सभी स्थूल या सूक्ष्म रूप से हावी रहते हैं, और परमात्मा से सच्चा एकत्व स्थापित नहीं हो सकता और न ही व्यक्ति को अपनी सच्ची आंतरिक शक्ति का भान हो सकता है। जब वह स्थापित हो जाता है तब फिर विशेष कुछ व्यक्तिगत प्रयास की आवश्यकता नहीं रह जाती, वह तो स्वयं ही सभी प्रतिकूल चीजों को जला कर भस्म कर देता है। गीता उसी की ओर ले जाती है और वहाँ तक ले जाकर छोड़ देती है। जब आत्मा की वह प्रवृत्ति अन्दर जागृत हो गई तब कोई चीज हमें विचलित कर सके यह तो संभव ही नहीं है। हमारे ऋषि भी, जिन्होंने आध्यात्मिक जीवन का अनुभव किया, यही बात कहते हैं कि साधना आदि तो सब तैयारी मात्र हैं। एक बार जब वह गति आरंभ हो जाए तब फिर अन्य कोई पद्धति या प्रणाली उसमें कुछ नहीं कर सकती और उनकी उपयोगिता भी नहीं रह जाती। जिस प्रकार चुंबक की प्रकृति मात्र ही है लोहे को अपनी ओर आकृष्ट करना और लोहे की प्रकृति है अनायास ही उसकी ओर खिंचे चले जाना, इसमें किसी पद्धति की कोई आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार आत्मा की वह गति चालू होने के बाद तो अन्य किन्हीं भी पद्धतियों की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती। इसलिए वास्तव में तो गीता की सारी व्यवस्था ही पहले वचन से लेकर अन्ततः 'सर्वधर्मान्परित्यज्य' तक ले जाने का आरोहण-क्रम मात्र है। और वास्तविक कार्य तो उसके बाद शुरू होता है। श्रीअरविन्द कहते हैं कि सारी गीता मनुष्य की आत्मा को उसी के लिए तैयार करने के लिए है ताकि उस पर पड़े बुद्धि के, भ्रम के, अनुभवों के आवरणों को हटाकर उसे उस स्तर तक ले जाया जा सके। इस प्रकार गीता के पूरे क्रम को देखने का यह एक दृष्टिकोण है।
अब, बुद्धि के अंदर, इच्छा-शक्ति के अंदर कुछ प्रवृत्तियाँ रहती हैं कि यह प्राप्त कर लिया जाए, वह प्राप्त कर लिया जाए। इन सबके विषय में भगवान् अर्जुन को समझाने वाले हैं, परंतु ये बातें सहज ही उसे समझ में नहीं आएँगी जिस कारण प्रश्न भी उठेंगे, क्योंकि केवल बताने भर से ही ये बातें समझ में नहीं आ जातीं। आध्यात्मिक जीवन में केवल पुस्तक पढ़ने से और प्रवचन सुनने से बातें समझ में नहीं आ जातीं। हमारी बुद्धि में बहुत तरह की मानसिक संरचनाएँ तथा वृत्तियाँ जमी बैठी होती हैं। इन सबको नष्ट करना होगा। तब धीरे-धीरे अनुभव आता है, और श्रद्धा ऊपर आती है। साधना में इसीलिए इतना समय लगता है। पर कुछ ऐसे परिपक्व लोग भी होते हैं जिनका वह भाव पहले से ही तैयार होता है और जब उसे उद्घाटित कर दिया जाता है तब फिर उनकी साधना त्वरित रूप से संपन्न हो जाती है। वास्तविक समझ भी तभी आती है।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्व बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।।४१।।
४१. हे कुरुनन्दन (अर्जुन)! इस मार्ग में निश्चयात्मिका बुद्धि एकनिष्ठ होती है; परंतु अनिश्चित चित्तवाले मनुष्यों की बुद्धि अनेक शाखाओं वाली और अनंत होती है।
गीता कहती है कि मनुष्य में दो प्रकार की बुद्धि होती है। पहली होती है एकाग्र, संतुलित, एकनिष्ठ, समरस, केवल परम सत्य की ओर ही लक्षित; एकत्व उसकी विशिष्टता है और एकाग्र स्थिरता उसका स्वरूपमात्र। दूसरी में कोई एकनिष्ठ संकल्प नहीं होता, कोई एकीकृत बुद्धि नहीं, अपितु केवल अनेक शाखा-प्रशाखायुक्त असंख्य विचार हैं जो भाग-दौड़ कर रहे हैं, अर्थात् जीवन और परिवेशजन्य इच्छाओं की तुष्टि के पीछे इधर-उधर भटक रहे हैं। जिस बुद्धि शब्द का यहाँ प्रयोग हुआ है, शुद्ध अर्थ में उसका आशय है समझने-बूझने की मानसिक शक्ति, किन्तु स्पष्ट रूप से गीता में बुद्धि शब्द का प्रयोग व्यापक दार्शनिक अर्थ में उस मन की समस्त विवेकात्मक और निर्णयकारी क्रिया हेतु हुआ है जो (मन) हमारे विचारों की दिशा और उनके प्रयोग तथा हमारे कर्मों की दिशा और उनके प्रयोग, इन दोनों बातों का निर्धारण करता है; विचार, समझ-बूझ, निर्णय, बोधयुक्त चयन और लक्ष्य-साधन ये सब बुद्धि की क्रिया में सम्मिलित हैं : क्योंकि एकीकृत बुद्धि का लक्षण केवल बोधयुक्त मन का केंद्रीकरण ही नहीं है, अपितु उस मन का भी केंद्रीकरण है जो निर्णय करने वाला और उस निर्णय अर्थात् व्यवसाय पर अटल रहने वाला है, दूसरी ओर अव्यवसायात्मिका बुद्धि का लक्षण उसके विचारों और बोधों की असंबद्धता या भटकाव उतना नहीं है जितना उसके लक्ष्यों और उसकी इच्छाओं का और फलतः उसके संकल्प की असंबद्धता या इधर-उधर भटकाव है। अतः संकल्प और ज्ञान, बुद्धि की ये दो क्रियाएँ हैं।
गीता यहाँ दो भेदों का निरूपण करती है। बुद्धि सही तभी है जब उसने सोच-विचार कर अपने विवेक से एक निर्णय कर लिया और उस पर चलती है अन्यथा तो बुद्धि है ही नहीं, वह तो केवल एक भटकाव है क्योंकि किसी भी समय भिन्न-भिन्न इच्छाएँ और विचार आकर उस पर अधिकार कर लेते हैं। ऐसे में यदि व्यक्ति को यह बोध हो भी कि केवल श्रीमाताजी की सेवा ही करनी है तो भी जो कोई भी अन्य भाव या प्रवृत्ति उठती है वही उस पर अधिकार जमा लेती है। इसलिए बोध तो सही होता है परंतु इच्छा-शक्ति में भटकाव रहता है। यह है अव्यवसायात्मिका बुद्धि। उससे मनुष्य एक कदम भी आगे नहीं चल सकता। क्योंकि उसका संकल्प विचलित होता रहता है, और ऐसे में जितना वह आगे जाता है उतना ही लौट कर पुनः पीछे आ जाता है। बीच में ही संदेह घुस आता है, क्योंकि मार्ग कोई भौतिक चीज तो है नहीं, यह तो श्रद्धा का विषय है। व्यक्ति की श्रद्धा जितनी ही अक्षुण्ण बने रहेगी उतना ही मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है। जब उसमें भटकाव आता है तब फिर वह पथभ्रष्ट करके किसी अन्य दिशा में ले जाता है और ऐसे में व्यक्ति कभी भी लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता। इसलिए अव्यवसायात्मिका बुद्धि वह है जो हमारी संकल्प-शक्ति को एक स्थान पर नियत नहीं रख सकती। उचित क्या है केवल इसका बोध होना ही पर्याप्त नहीं है - हालाँकि बोध भी नहीं हो तो इसका अर्थ है कि व्यक्ति मार्ग पर है ही नहीं - परन्तु बोध होने पर भी यदि संकल्प-शक्ति में भटकाव हो तो कुछ भी संसिद्ध नहीं किया जा सकता।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ।॥४२॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ।।४३।।
४२-४३. हे पार्थ! अविवेकी, वेद के मतवाद में रत, ऐसा मानने वाले कि इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, कामनायुक्त चित्तवाले, स्वर्ग को प्राप्त करने के लिये परिश्रम करने वाले मनुष्य कर्मों के जन्मरूप फल को देनेवाली, भोग और ऐश्वर्य को लक्ष्य में रखनेवाली, विशिष्ट प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं वाली इस प्रकार की सुनने में रोचक वाणी को कहते हैं।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ।।४४।॥
४४. इस वाणी के द्वारा जिनका चित्त हरा गया (भ्रांत कर दिया गया) है और जो भोग एवं ऐश्वर्य में आसक्त हैं, उनकी बुद्धि एकाग्रचित्तता के साथ (समाधिस्थ हो) आत्मा में प्रतिष्ठत नहीं होती।
त्रैगुण्यविषया वेदा निखैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ।।४५।।
४५. हे अर्जुन! समस्त वेदों का विषय तीन गुणों का कार्य-व्यवहार है; परंतु तू तीन गुणों से मुक्त (त्रिगुणातीत), द्वन्द्वों से रहित (निर्द्वन्द्व), सदा अपने सच्चे आत्मा में स्थित, पदार्थों की प्राप्ति और उन्हें अधिकार में सुरक्षित रखने की चिंता से रहित हो, आत्मा को प्राप्त कर।
---------------------
* सांख्य प्रणाली में ये तीन स्थितियाँ अथवा गुण दिये गये हैं... ये तीन नाम हैं, सत्त्व, रजस्, और तमस्। तमस् जड़त्व अथवा निष्क्रियता का तत्त्व एवं उसकी शक्ति है, रजस् गति अथवा क्रिया, आवेश, प्रयत्न, संघर्ष और आरम्भ का तत्त्व है; सत्त्व समावेशीकरण, सन्तुलन और सामंजस्य का तत्त्व है। हमारे अन्दर होनेवाले कर्म और अनुभव का समस्त स्वरूप प्रकृति के इन तीन गुर्गों या स्थिति में से किसी एक को प्रधानता एवं इनको आनुपातिक परस्पर प्रतिक्रिया के द्वारा निर्धारित होता है। व्यष्टिभावापन्न आत्मा इनके साँचे में ढलने के लिये मानो बाध्य होती है; साथ ही इन पर किसी प्रकार का स्वतन्त्र नियन्त्रण रखने की अपेक्षा अधिकांशतः वह इनके नियन्त्रण में ही रहती है। वह मुक्त तभी हो सकती है जब वह इनकी विषम क्रिया तथा इनके अपर्याप्त मेल-मिलापों एवं अनिश्चित सामंजस्यों के कष्टप्रद कलह की स्थिति से ऊपर उठकर उसका परित्याग कर दे...
* निम्न प्रकृति में द्वंद्व सात्त्विक, राजसिक और तामसिक अहं की रचनाओं से अभिभूत आत्मा पर गुणों की क्रीड़ा का अनिवार्य प्रभाव हैं। इस द्वंद्व को ग्रन्थि है अज्ञान जो पदार्थों के आध्यात्मिक सत्य को पकड़ पाने में असमर्थ है और अपूर्ण बाह्य रूपों पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है, पर उनके आन्तरिक सत्य पर प्रभुत्व रखते हुए उनका सामना या उनसे व्यवहार नहीं करता अपितु आकर्षण और विकर्षण, सामर्थ्य और असामर्थ्य, राग और द्वेष, सुख और दुःख, हर्ष और शोक, स्वीकृति और घृणा के बीच संघर्ष और एक-दूसरे में बदलते हुए सन्तुलन के साथ उनके सम्पर्क में आता है: समस्त जीवन हमारे सामने इन वस्तुओं अर्थात् प्रिय और अप्रिय, सुन्दर और असुन्दर, सत्य और असत्य, सौभाग्य और दुर्भाग्य, सफलता और विफलता, शुभ और अशुभ की विषम ग्रन्थि या प्रकृति के दुहरे जटिल जाल के रूप में उपस्थित होता है। अपनी रुचियों और अरुचियों के प्रति आसक्ति अन्तरात्मा को शुभ और अशुभ तथा हर्षों और शोकों के इस जाल में बाँधे रखती है। मुक्ति का अन्वेषक अपने-आपको आसक्ति से मुक्त कर लेता है, द्वंद्वों को अपनी अन्तःसत्ता से दूर फेंक देता है..
* क्योंकि मुक्त पुरुष के लिए (योगक्षेम) प्राप्ति और अधिकारोक्ति क्या हैं? जहाँ एकबार हम आत्मवान् हुए वहीं सब कुछ तो प्राप्त हो जाता है।
कर्म और ज्ञान के समन्वय का लगभग पहला ही कथन, वेदवाद की एक कठोर, और प्रायः एक प्रचंड निन्दा और खण्डन है।.. यहाँ तक कि गीता स्वयं वेद पर आक्रमण करती प्रतीत होती है, जिसका यद्यपि भारतीय समाज के व्यवहार में इस समय लोप ही हो गया है, तो भी भारतीय समाज की भावना में वेद अब भी समस्त भारतीय दर्शन-शास्त्रों और धर्मों के अप्रत्यक्ष, अनुल्लंघनीय, अत्यंत पवित्र और स्वतःसिद्ध प्रमाण और मूल हैं।... सब वेद उस मनुष्य के लिये निष्प्रयोजन बताये गये हैं जो ज्ञानी है। यहाँ वेदों, 'सर्वेषु वेदेषु', में उपनिषदों का भी समावेश माना जा सकता है और कदाचित् है भी, क्योंकि आगे चलकर वेद और उपनिषद्, दोनों के सामान्य वाचक श्रुति शब्द का ही प्रयोग हुआ है।
यहाँ प्रश्न यह है कि सत्त्व, रजस् और तमस् किस तरीके से आत्मा को बाँधते हैं, और अपने-आप में इनका स्वरूप क्या है? इसे देखने का एक दृष्टिकोण तो यह है कि बद्ध जीव को, जो सारे दिन यंत्रवत् चालित है, तो यह अंदेशा तक भी नहीं होता कि आत्मा जैसी किसी चीज का अस्तित्व भी है, तो बँधे होने के बोध की बात तो उठती ही नहीं। पहले ऐसी किसी ऐसी चीज का भान होना आवश्यक है जिसे कि सत्त्व, रजस् और तमस् तीनों ने बाँध रखा हो। एक विशालतर परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम किस हद तक बँधे हुए हैं इस बात का पता तो इसी से लग जाता है कि आत्मा के होने के बावजूद भी हम वस्तुओं को उनके आत्म-स्वरूप में न देखकर कितने भिन्न या फिर उनके विपरीत रूप में देख रहे हैं। यदि गुरु की कृपा हो या जीवन में कोई ऐसी घटना घटित हो जो हमें इसका भान करा दे कि आत्मा जैसी किसी चीज की सत्ता है, और हम उसके संपर्क में आ जाएँ तब यदि हम ध्यान से देखें तो पता चल सकता है कि किस प्रकार सारे क्रिया-कलाप में तमस् अपना प्रभाव डालता है, रजस् अपना रंग चढ़ा देता है और सत्त्व अपना प्रभाव डाल देता है। तमस् अपनी निष्क्रियता, भारीपन, किसी कार्य में उत्साह के अभाव का रंग डाल देता है। रजस् अपनी क्रियाशील प्रकृति को, अपनी इच्छाओं, वासनाओं, अधिकार जमाने के रंगों को उसके अन्दर डाल देता है। सत्त्व अपने विचारों को और जैसा भी उसका अपना स्वरूप है उस अनुसार सभी कुछ को रंग देता है। ऐसे में हम वैसा आचरण करने लगते हैं जो हमारे निजस्वरूप से भिन्न या विपरीत होता है। सारे समय हम अपने शारीरिक सुख-भोगों को भोगने का प्रयत्न करते हैं, अपनी इच्छाओं, कामनाओं की पूर्ति करने का प्रयत्न करते हैं या फिर अपने विचारों आदि को थोपने की तथा पोषित करने की कोशिश करते हैं। तो यदि यह विचार लें कि जीव इस अभिव्यक्ति में शरीर धारण कर के आया है, भले उसका जो भी गहरा कारण रहा हो, परंतु फिर भी वर्तमान में जो प्रतीति है उसमें तो हम अपने सच्चे स्वरूप से बिल्कुल विपरीत हो गए हैं। और इसी को कहा जा सकता है कि सत्त्व, रजस् और तमस् ने हमें इससे बाँध दिया है।
यह सब वर्णन तो इस संबंध में हुआ कि किस प्रकार ये हमारी आत्मा को बाँधते हैं। अब जो दार्शनिक प्रश्न रह जाता है वह यह है कि ये तीन गुण वास्तव में क्या हैं? और अभिव्यक्ति में ये आए कैसे? श्रीअरविन्द ने लिखा है कि बहुत अधिक सूक्ष्म निरीक्षण करने पर इनका बोध होता है, अन्यथा तो इनका बोध ही नहीं होता। तब फिर सत्त्व, रजस् और तमस् की परिकल्पना या यह विचार आया कहाँ से? इसके बारे में श्रीअरविन्द परोक्ष रूप से या कहीं-कहीं प्रसंगवश थोड़ा-सा संकेत करते हैं। परन्तु अपने अनुभव से हम इनके स्वरूप को अधिक जान सकते हैं। समझने के इस प्रयत्न का लाभ इतना ही है कि इस पूरी प्रक्रिया में हम इनके विषय में कुछ अधिक सचेतन होंगे और अधिक बेहतर तरीके से इनके ऊपर नियंत्रण और क्रिया कर सकेंगे।
भगवान् के अनन्त गुण हैं, एक अतिमानसिक सत्य है जो इस क्रमविकासमय अभिव्यक्ति के अंदर अपने को अभिव्यक्त करना चाह रहे हैं। हालाँकि हम तो भगवान् के केवल कुछ ही गुणों के विषय में सचेतन हैं, परंतु प्रकृति में तो अन्य सभी गुणों को भी अभिव्यक्त करने का प्रयास चल रहा है। अंततः तो ये सारे ही गुण, जो कि इस जगत् के मूल में निहित हैं, एक निश्चित संतुलन में इस जगत् में अभिव्यक्त होने ही चाहिये। दूसरे जगतों की या ब्रह्माण्डों की क्या प्रणाली होगी इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि इस व्यवस्था में गुणों का हमें इस प्रकार बोध होता है, अन्य व्यवस्थाओं में यह कैसा होता होगा यह हम नहीं जानते। यदि अनन्त गुणों को देखा जाए और यह देखा जाए कि कौन से मनुष्य में कौन से गुण प्रभावी हैं तो इतनी व्यापक दृष्टि से देख पाना तो असंभव-सा होगा। इसलिए इन गुणों के खेल को तीन श्रेणियों में बाँट दिया गया। अब ये श्रेणियाँ कहाँ से आईं? भगवान् की चेतना मनुष्य में उन गुणों को लाकर उन्हें आविर्भूत करने का प्रयास करती है। जब वह जड़-भौतिक तत्त्व में अपना प्रभाव डालती है तब उसके प्रति जड़-तत्त्व की प्रतिक्रिया अपने तरीके की होती है। उसे तमस् की संज्ञा दे दी जाती है। परंतु केवल जड़-तत्त्व में ही नहीं, उस चेतना को तो मन, प्राण और शरीर तीनों के ही द्वारा अभिव्यक्त होना होता है। अतः जब वह प्राण के द्वारा अभिव्यक्त होती है तो प्राण की प्रतिक्रिया से उसमें गतिशीलता या क्रियाशीलता का तत्त्व आ जाता है। इसमें जड़त्व की स्थिरता का गुण कम रहता है। जब वह चेतना मन में प्रभाव डालती है तो मन चीजों में संतुलन को देखता है। यह सत्त्व का तत्त्व होता है। पर ये सभी कोई नियत-निर्धारित चीजें नहीं हैं। किसी एक व्यक्ति का तमस् दूसरे व्यक्ति के तमस् से भिन्न होता है। हमारे कोष भिन्न-भिन्न हैं, क्षमताएँ भिन्न-भिन्न हैं। कुछ में गुण इतने सक्रिय होते हैं कि उनके भौतिक में भी वे अभिव्यक्ति पाते हैं जबकि दूसरों में वे अंधकार में सुषुप्त रहते हैं। इसी प्रकार की बात मन पर भी लागू होती है। जैसी संरचना होगी वैसा ही आधान या प्रतिबिंब उस चेतना का या उस प्रकाश का होगा। गुणों का परस्पर सम्मिश्रण भी उसी के अनुसार रहेगा। परंतु यह तो देखने और समझने का केवल एक तरीका मात्र है। तो इन तीनों का क्रियाकलाप इस प्रकार का है। इन सब गुणों का जिस प्रकार हमें बोध होता है, हमें ये जिस प्रकार या जिस रूप में दिखाई देते हैं वह केवल इसलिए है क्योंकि हमारी चेतना मानसिक चेतना है। वस्तुतः अपने-आप में तो ऐसी कोई चीज है ही नहीं। वास्तव में तो यह सारा परा-प्रकृति का, दिव्य जननी का ही खेल है, अपरा प्रकृति है ही नहीं, अपरा प्रकृति तो हमें हमारे वर्तमान गठन के कारण प्रतीत होती है, अन्यथा गुणों का अस्तित्व ही नहीं है। चूंकि परा-प्रकृति की क्रिया को हमारा मन और अधिक समझ नहीं सकता, वह उसे केवल अपरा प्रकृति की प्रत्यक्ष क्रीड़ा या कार्य-व्यवहार के रूप में ही देख सकता है और उसका बोध प्राप्त कर सकता है, वैसे ही जैसे कि किसी बच्चे को कही किसी बात का वास्तविक अर्थ बच्चा क्या समझता है उससे सर्वथा भिन्न हो सकता है। वैसे ही यह सारा खेल परा प्रकृति का ही है परन्तु हमारे मन के अन्दर इसका जिस प्रकार का बिंब बनता है वैसा ही हमें यह समझ में आता है। और चूंकि परा-प्रकृति के पीछे तो स्वयं भगवान् की जो समस्त क्षमताएँ हैं, उनका व्यक्तित्व है, अतः उनकी अभिव्यक्ति को मनुष्य का मन समझ ही क्या सकता है, इसी कारण वह इस प्रकार के बिंब, इस प्रकार के रूपण तैयार करता है। परन्तु अपरा प्रकृति के अन्दर हमारे शरीर, प्राण और मन के अपने-अपने जो गुण 3-79^ 4pi , क्रियाशीलता और समता या विवेक - वे भगवान् के सच्चिदानंद स्वरूप से ही आए हैं, सत् जड़-तत्त्व बन जाता है, चित् के अंदर चित् और तापस दो पहलू हैं जिनमें तपस् प्राण बन जाता है और चेतना या ज्ञान पक्ष मन बन जाता है, आनंद आत्मा का गुण बन जाता है। ये चारों ही अभिव्यक्त हुए हैं। सच्चिदानंद के ये तीनों गुण अतिमानस में भी प्रक्षिप्त होते हैं तो वहाँ ये अलग-अलग रूप ले लेते हैं। स्थिरता का जो तत्त्व है वह बन जाता है 'समता'। प्राण बन जाता है तपस् और तीसरा तत्त्व बन जाता है ज्योति। वे ही चीजें यहाँ मन, प्राण और शरीर में इस रूप में प्रतिबिंबित होती हैं। परंतु इन सब के पीछे अनन्त क्षमताएँ हैं। और भगवान् के व्यक्तित्व की, उनके सत्य की अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न मनुष्यों में भिन्न-भिन्न तत्त्वों के अनुसार होती है। उसी के आधार पर उसकी क्रियाकलाप का आकलन किया जा सकता है।
परंतु अब प्रश्न यह है कि निसैगुण्य होने की क्या आवश्यकता है? शंकराचार्य आदि का यह तर्क है कि यद्यपि भगवान् निसैगुण्य होने के लिए उपदेश कर रहे हैं परंतु जब भगवान् स्वयं भी अवतरित होते हैं तब उनके कर्म भी गुणों के अंतर्गत ही होते हैं, इसलिए मायावाद का निष्कर्ष यही है कि कर्म तो तैयारी करने के साधन मात्र हैं। और जब वह तैयारी पूरी हो जाती है तब उनकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है। परंतु जब तक ऐसा नहीं हो जाता तब तक भगवान् को भी अवतार लेकर क्रिया करने के लिये गुणों का, अज्ञान का बाना पहनना ही पड़ेगा। परंतु इसमें श्रीअरविन्द का मत इससे भिन्न है। भले ही हमें अवतार की क्रियाएँ भी त्रिगुणों से बद्ध नजर आएँगी, श्रीमाताजी की क्रियाएँ भी त्रिगुणों से बद्ध प्रतीत होंगी परंतु ऐसा तो हमें हमारी इंद्रियों के कारण प्रतीत होता है। वास्तव में तो उनमें दिव्य पराप्रकृति ही क्रिया कर रही होती है। चूंकि हमारी आँखों पर अज्ञान का आवरण चढ़ा होता है इसलिए हमें उनकी क्रियाएँ गुणों से बंधी हुई दिखाई देती हैं, जबकि वास्तव में ऐसा है ही नहीं। वैसे ही अवतारों का इन गुणों से कोई सरोकार नहीं, भले उनकी क्रियाएँ गुणों की क्रीड़ा के वशीभूत प्रतीत होती हों। गुणों से अतीत होने का अर्थ है कि हम अपनी चेतना को इतनी विकसित कर लें कि हम सत्य को देख सकें। हम यह देख सकेंगे कि ये अनंत गुण किस प्रकार अभिव्यक्त हो रहे हैं और इनकी क्या व्यवस्था है, तब हम इनमें लिप्त नहीं होंगे क्योंकि हम सर्वत्र ही दिव्य परा-प्रकृति की क्रिया को ही देखेंगे। तब इन तीन गुणों का भ्रम नहीं रहेगा, क्योंकि वास्तव में तो गुणों का अस्तित्व ही नहीं है। यह तो दिव्य ऊर्जा की क्रिया को बोध करने का हमारा एक तरीका मात्र ही तो है। अतः इस प्रकार के बोध को जाना चाहिये और इसके स्थान पर स्पष्ट रूप में हमें महाशक्ति की क्रिया दिखाई देनी चाहिये। तब सारा परिदृश्य ही पूर्णतः बदल जाता है और एक नवीन रूप धारण कर लेता है। तब फिर प्रकाश, तपस् और समता, ये तीनों ही हमारे अन्दर आ जाएँगी। भगवान् इनके द्वारा अपनी क्रिया करेंगे। पर आखिर यह भी देखने का एक तरीका मात्र ही है, क्योंकि वास्तव में तो वे इन सभी से सर्वथा परे हैं।
दूसरा, जब चेतना विकसित नहीं होती तब हम द्वन्द्वों के द्वारा क्रिया करते हैं। यदि पसंदीदा और नापसंदीदा, अच्छी-बुरी जैसी चीज न हो तो हमारे पास कर्म के चयन का आधार नहीं रहता। क्योंकि सामान्यतः इन्हीं के आधार पर तो हम चीजों का चयन करते हैं। जबकि चयन करने का आधार होना चाहिए करणीय और अकरणीय का बोध। वह विवेक तो हमारे अंदर प्रायः होता ही नहीं और हम पसंद-नापसंद आदि द्वंद्वों के द्वारा ही प्रतिक्रिया करते हैं। एक पशु को भी हम अपनी सहजवृत्ति के द्वारा अपने-आप को पोड़ा से बचाते हुए देखते हैं और उसी के अनुसार वह अपनी प्रतिक्रियाएँ करता है। परंतु इस प्रकार की प्रतिक्रिया ही अंतिम हो, या चरम हो ऐसा नहीं है। हमारी प्रतिक्रिया अज्ञानमय नहीं अपितु सज्ञान होनी चाहिये। उदाहरण के लिये, यदि किसी नाटक में हम अपना भाग निभा रहे हैं तो हमारी क्रियाएँ तथा प्रतिक्रियाएँ वैसी होनी चाहिये जैसी उस नाटक की कथावस्तु के अनुकूल हों। जब तक हम द्वंद्वों के वशीभूत होकर कर्म करते हैं तब तक समुचित रूप से कर्म नहीं कर सकते। समुचित रूप से कर्म तभी हो सकता है जब हम इन द्वंद्वों के प्रति समान भाव रखें, और जिस समय जैसा आवश्यक हो वैसा कर पायें। मूलभूत रूप से तो यदि हम पसंद-नापसंद से ऊपर हों तभी सही क्रिया का चयन कर पाएँगे अन्यथा तो हम जो पसंदीदा होगा वह करेंगे और जो नापसंद होगा उसे नहीं कर पाएँगे, और जो पसंदीदा है उसे भी हम तटस्थ रूप से नहीं निभा पाएँगे। जगदम्बा या दिव्य पराप्रकृति की क्रिया के प्रति हमारी सच्ची प्रतिक्रिया तभी होगी जब हम इन द्वन्द्वों के बारे में उदासीन हों, द्वन्द्वातीत हों। यदि अवतार द्वन्द्वों से बँधकर कर्म करे तब तो उसे हम प्रकृति के अधीन की कहेंगे, जबकि वास्तव में वह उससे ऊपर होता है।
यदि हमें भगवान् की ओर जाना है तो वे कहते हैं कि मैं इसलिए अवतार लेता हूँ ताकि मनुष्य मेरे उदाहरण को देखें। और उदाहरण यह है कि वे द्वन्द्वातीत हैं और गुणातीत हैं। अतः हमें भी अपरा को छोड़ कर दिव्य परा प्रकृति में क्रिया करने के लिए इनसे परे उठना पड़ेगा। अन्यथा कार्य का चयन सुख-दुःख, अच्छा-बुरा, श्रेष्ठ-निम्न आदि द्वन्द्वों के अनुसार होगा और ये सब मानदंड सीमित हैं। यदि परम मानदंड से कार्य करना हो तो इन सब से ऊपर उठना आवश्यक है। यह देखने का एक तरीका है। और यह सारी गुण आदि की शब्दावली भारत ने ही उत्पन्न की है, अन्यत्र कहीं तो यह है ही नहीं। हमारे ऋषियों ने भगवान् के अनन्त गुणों का बोध किया और देखा कि उसका वर्गीकरण, उसका प्रणालीकरण या उसका व्यवस्थापन किस प्रकार किया जाए। इसलिए सत्त्व, रजस् और तमस्, ये तीन मोटे विभाग बाँट दिये गये। उस चेतना के प्रति भौतिक जिस प्रकार की प्रतिक्रिया करता है उसे तमस् की, प्राण-शक्ति जिस प्रकार की प्रतिक्रिया करती है उसे रजस् की, और मन जिस प्रकार की प्रतिक्रिया देता है उसे सत्त्व की संज्ञा दे दी गई। तीनों के अलग-अलग स्वरूप हैं। एक में स्थिरता या निष्क्रियता है, दूसरे में गतिशीलता या सक्रियता है और तीसरे में सामंजस्य का तत्त्व है। सत्त्व के आविर्भाव से हम क्रिया को व्यापक रूप से देख सकते हैं। इसी के अंदर तर्कशक्ति, बुद्धि आदि निहित हैं। इसलिए यह एक ऐसी क्षमता है जिसके माध्यम से क्रियाओं से दूर हटकर उन पर नजर डाली जा सकती है और फिर उन पर क्रिया की जा सकती है।
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ।।४६।।
४६. सब ओर से पानी की बाढ़ आ जाने पर कुएँ में जितना प्रयोजन रह जाता है, उतना ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त किये हुए मनुष्य का समस्त वेदों में रह जाता है।
यही नहीं, अपितु शास्त्र-वचन तो बाधक भी होते हैं; क्योंकि शास्त्र के शब्द - कदाचित् इसके मूलपाठों के बीच भिन्नता और उनकी विविध और परस्पर विसम्मत व्याख्याओं के कारण बुद्धि को भ्रमित कर देते हैं, जो केवल अंदर की ज्योति से ही निश्चित मति और एकाग्र चित्तता प्राप्त कर सकती है।... यह सब परम्परागत धार्मिक भावना के लिये इतना अप्रिय या आपत्तिजनक होता है कि अपनी सुविधा देखनेवाली और अवसर से लाभ उठानेवाली मानव-प्रवृत्ति का गीता के कुछ श्लोकों के अर्थ को तोड़-मरोड़ कर उनका कुछ और अर्थ करने का प्रयास करना स्वाभाविक ही था, किन्तु इन श्लोकों का अर्थ अपने-आप में सुस्पष्ट है और आद्योपांत सुसंबद्ध है। शास्त्र-वचन-संबंधी यह भाव आगे चलकर एक और श्लोक में मंडित और सुनिर्दिष्ट हुआ है जहाँ यह कहा गया है कि ज्ञानी का ज्ञान 'शब्दब्रह्म' को अर्थात् वेद और उपनिषद् को पार कर जाता है, 'शब्दब्रह्मातिवर्तते।
vi. 44
जो भी हो, देखते हैं कि इस सब का अर्थ क्या है; क्योंकि इस विषय में तो हम सुनिश्चित हो सकते हैं कि गीता जैसे समन्वयात्मक और उदार शास्त्र में आर्य-संस्कृति के इन महत्त्वपूर्ण अंगों का विचार केवल इन्हें अस्वीकार करने या इनका खंडन करने की दृष्टि से नहीं किया गया है।*...इसलिए चलते-चलते यहाँ पर यह गौर किया जा सकता है कि, वेद और उपनिषदों के मंत्र ही जिनके आधार हैं ऐसे इन नानाविध दार्शनिक संप्रदायों में जब इतना विरोध है तब गीता का यह कहना कि श्रुति बुद्धि को घबरा और चकरा देती है, उसे कई दिशाओं में घुमा देती है, 'श्रुतिविप्रतिपन्ना', कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आज भी भारत के पंडितों और दार्शनिकों के बीच इन प्राचीन वचनों के अर्थों के संबंध में कितने बड़े-बड़े शास्त्रार्थ और झगड़े हो जाते हैं और वे सभी कितने विभिन्न निष्कर्षों तक पहुँचते हैं! इनसे बुद्धि खिन्न और उदासीन होकर, 'गन्तासि निर्वेदं', नवीन और प्राचीन शास्त्र वचनों को, 'श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च', सुनने से इन्कार कर के स्वयं ही गूढ़तर, आंतर और प्रत्यक्ष अनुभव के सहारे सत्य का अन्वेषण करने के लिये अपने अन्दर प्रवेश कर सकती है।
ⅱ.52 , ii.53
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।॥४७॥
४७. कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, परंतु केवल कर्म करने का, कर्मफल का कभी भी नहीं है; कर्मों के फलों को कमाँ का उद्देश्य न बना, अकर्म (कर्म परित्याग) में भी तेरी आसक्ति न हो।
कर्मफल तो अनन्य रूप से सभी कर्मों के स्वामी का ही है; हमारा इससे इतना ही प्रयोजन है कि सच्चे और सावधान कर्म के द्वारा उसका फल तैयार करें और यदि यह प्राप्त होता है तो इसे इसके दिव्य स्वामी को सौंप दें। तत्पश्चात् जैसे हमने फल के प्रति आसक्ति का त्याग किया है वैसे ही हमें कर्म के प्रति आसक्ति भी त्यागनी होगी। किसी भी क्षण हमें किसी काम, किसी कार्यक्रम या किसी कार्यक्षेत्र के स्थान पर दूसरे को ग्रहण करने अथवा, यदि प्रभु का स्पष्ट आदेश हो, तो सब कर्मों को छोड़ देने के लिये भी तैयार रहना होगा। अन्यथा हम कर्म प्रभु हितार्थ नहीं कर रहे होते, अपितु कर्म से मिलनेवाली निजी सन्तुष्टि एवं प्रसन्नता के लिये अथवा राजसिक प्रकृति को कर्म की आवश्यकता होने के कारण या अपनी रुचियों की पूर्ति के लिये कर रहे होते हैं; परंतु ये सब तो अहं के पड़ाव और अड्डे हैं।.... अन्त में, जैसे कर्मफल तथा कर्म के प्रति आसक्ति को हृदय से बाहर निकाल दिया गया है, वैसे ही अपने कर्त्ता होने के विचार तथा भाव के प्रति अन्तिम दृढ़ आसक्ति को भी छोड़ना होता है; भगवती शक्ति को अपने ऊपर तथा भीतर सच्ची तथा एकमात्र कर्नी के रूप में जानना एवं अनुभव करना होता है।
'कर्मण्येवाधिकारस्ते' यह एक बहुत प्रसिद्ध श्लोक है और सामान्यतया इसी को गीता का परम वचन मान लिया जाता है। यहाँ श्रीअरविन्द ने इसका संकेत कर ही दिया है कि प्राणिक सत्ता कर्म के पीछे अपने निहित हेतु रखती है कि उससे उसे यह या वह अभीष्ट फल प्राप्त होगा जबकि भगवान् कह रहे हैं कि फल की आशा का परित्याग करके कर्म करो। परंतु सामान्य मनुष्य तो लाभ-अलाभ, सुख-दुःख आदि आधारों पर ही कर्म करता है और इनके बिना तो उसके कर्म का आधार ही नहीं रहेगा और वह कर्म करेगा ही नहीं, क्योंकि मनुष्य के कर्म का आधार है कामना, अन्य तो उसके लिए कोई आधार ही नहीं है। गीता सबसे पहले मनुष्य की प्राण शक्ति के ऊपर अंकुश लगाने का प्रयास करती है क्योंकि उसकी अन्य सत्ताओं में वही सबसे अधिक प्रबल है। दूसरे श्लोक में भगवान् कहते हैं कि कर्मों के फलों को कमाँ का उद्देश्य न बना, अकर्म (कर्म परित्याग) में भी तेरी आसक्ति न हो।
-------------------------------------------
"गीता बाद के अध्यायों में वेदों और उपनिषदों की बड़ी भारी प्रशंसा करती है। वहाँ कहा गया है कि वे ईश्वर-प्रणीत शास्त्र हैं, शब्दब्रह्म हैं। स्वयं भगवान् ही वेदों के ज्ञाता और वेदांत के प्रणेता हैं, 'वेदविद् वेदान्तकृत'। सब वेदों के वे ही एकमात्र ज्ञातव्य विषय हैं, 'सर्वैः वेदैः अहमेव वेद्यः', इस भाषा का फलितार्थ यह होता है कि वेद शब्द का अर्थ है ज्ञान का ग्रंथ और इन ग्रंथों के नाम इनके उपयुक्त ही हैं।
xv.15
अब यदि प्राणिक सत्ता को कर्म फल की चाह न दी जाए तब भी वह सूक्ष्म रूप से स्वयं उस कर्म में ही रस लेने लग जाती है और उसे ही ऊँचा कर्म बताने लगती है। इस बात में ही प्राण बहुत रस लेने लगता है कि उसे फल की परवाह नहीं है और गर्वित होकर कहता है कि वह लाभ-हानि नहीं देखता, वह तो तटस्थ है, श्रीमाताजी के प्रति, अपने इष्ट के प्रति समर्पित है। इस प्रकार वह उसमें भी रस लेने लग जाता है। उसे तो जो कुछ भी मिलता है वह उसी में रस लेने लग जाता है। इसलिए गीता कहती है कि कर्म करने या न करने में भी रुचि न रखो, किसी कर्म के प्रति यदि आसक्ति है तो उसे तुरन्त ही छोड़ने के लिए तैयार रहो। इसके बाद, यह भाव कि मैं निष्काम कर्म करता हूँ, किसी वासना से नहीं करता, यह कर्त्तापन का अभिमान बना रहता है। इसलिए वास्तव में तो प्राण के सारे प्रसार पर, उसके इस प्रकार के व्यापार पर ही लगाम लगानी होगी, उसे बंद कर देना होगा। इसीलिये गीता में भगवान् तीसरे अध्याय में कहते हैं कि 'जो लोग समझते हैं कि वे स्वयं कर्मों के कर्ता हैं वे महामूर्ख हैं और यदि वे नहीं समझ पाते तो उन्हें अपने हाल पर छोड़ दो। परन्तु वास्तव में कर्म तो मेरे अधीन होकर मेरी प्रकृति ही करती है।' तब भी मनुष्य तो इन सब कर्मों को अपनी अहं चेतना के कारण स्वयं पर आरोपित करता है और फिर उनका प्राण कर्म के फल की इच्छा करता है। यहाँ गीता का सारा प्रयास एक ऐसा मानसिक अंकुश तैयार करने का है जिसमें प्राण की सब वृत्तियों के दरवाजे बंद कर दिये जाएँ, हालाँकि इस प्रयास में सफल होने की तो लगभग कोई संभावना ही नहीं है परंतु फिर भी कोई संरचना तो निर्मित करनी ही होगी जिसके सहारे व्यक्ति आगे बढ़ सके अन्यथा गीता आगे विकास करे ही कैसे। इसीलिए धीरे-धीरे ऐसी संरचनाएँ तैयार की जा रही हैं जिनके आधार पर बढ़ा जा सके और फिर यथासमय उन्हें उच्चतर ज्ञान के द्वारा अतिक्रम कर दिया जाए। केवल श्रीअरविन्द ने ही इस ओर ध्यान दिलाया है कि गीता का यह एक ऐसे निष्कर्ष तक ले जाने का तरीका है जहाँ यह समझ आ जाएगा कि समस्या का ऐसे किन्हीं भी तरीकों से समाधान नहीं किया जा सकता। क्योंकि यदि यही बात होती और इसी उपदेश से निष्काम कर्म साधित हो जाता तब तो फिर पूर्ण सिद्धि पहले ही सिद्ध हो जाती और इससे आगे गीता का उपदेश करने की आवश्यकता ही नहीं थी। इसलिए, जब तक वर्तमान कर्म के हेतु की सारी जड़, अहं, को ही नहीं निकाल दिया जाता, जब तक दूसरों से पृथक् होने का बोध रहेगा, तब तक निष्काम कर्म संभव ही नहीं है। अवश्य ही, धीरे-धीरे यह सूक्ष्म होता जाता है, इसके रंग बदलते जाते हैं। परंतु ऐसा होने पर भी व्यक्ति साधना की संसिद्धि या फिर भगवान् की प्राप्ति की अपनी आसक्ति से तो ऊपर नहीं उठ सकता क्योंकि इस अवस्था में व्यक्ति का यही निहित हेतु है कि किस प्रकार उसे भगवान् की उपलब्धि हो जाए। परंतु यह सिद्ध हो जाए ऐसा संभव नहीं है और वर्तमान में गीता का यह उद्देश्य भी नहीं है। यह तो अर्जुन की तैयारी चल रही है, धीरे-धीरे उसे संवर्धित किया जा रहा है। इसीलिए सबसे पहले अर्जुन को कहा गया है कि जय-पराजय को समान मानकर कर्म कर। पर अर्जुन पूछता है कि जब जय और पराजय मेरे लिए समान ही हों तो फिर कर्म करना ही क्यों चाहिये। इसीलिए गीता कहती है कि भगवान् की प्रसन्नता के निमित्त यज्ञ रूप से कर्म कर। हालाँकि यह नहीं है कि ऐसा कह देने भर से ही वह ऐसा कर्म कर सकता है, परंतु इस प्रकार एक मानसिक विचार तो आगे विकसित होता है। उदाहरण के लिये, यदि यह बोध रखकर हम कर्म करें कि कौनसा कर्म श्रीमाताजी को प्रसन्न करेगा और कौनसा नहीं तो इससे हम बहुत से कर्मों से बच सकते हैं। और जो कर्म करेंगे उनमें भद्देपन से, निम्न वृत्तियों आदि से कुछ हद तक बच जाएँगे। भगवान् की प्रसन्नता के निमित्त यज्ञ रूप से कर्म करना ऐसी चीज नहीं है जो सोचने मात्र से ही साधित हो जाए। यह यज्ञ का आरोहण तो जीवनपर्यंत का आरोहण है। सारा वेद इसी यज्ञ के विचार पर आधारित है कि एक बार जब यह भाव आ जाए कि समस्त क्रियाएँ आत्मा की प्रसन्नता के लिए की जानी चाहिये तब हमारी यात्रा भौतिक, प्राणिक तथा मानसिक स्तरों व उनके व्यवधानों से होकर लक्ष्य की ओर आगे चलने लगती है। हालाँकि तीसरे अध्याय में तो ऐसा प्रतीत होता है कि गीता केवल बाहरी यज्ञ की ही बात कर रही है। परंतु चौथे अध्याय में भगवान् स्पष्ट कर देते हैं कि कर्म ब्रह्म रूप हैं और इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सब वर्णन तो प्रतीकात्मक था जबकि गीता का वास्तविक लक्ष्य तो इससे भी महत्तर है। इस प्रकार गीता की सारी शिक्षा का आधार यहीं से निर्मित होना आरंभ हो गया है और हमें इसी परिप्रेक्ष्य में इसे समझना चाहिए। इस प्रकार सबसे पहले कर्मफल के प्रति आसक्ति के त्याग, फिर कर्मों के प्रति आसक्ति के त्याग और तत्पश्चात् कर्त्तापन के अभिमान के त्याग का प्रतिपादन कर के कम-से-कम हमारी बुद्धि को तो इस विषय पर स्पष्ट बोध प्रदान कर दिया गया है। और इस प्रश्न के उत्तर में कि ऐसा कर्म संभव ही कैसे है, यज्ञ-रूप कर्म की बात बता दी गई है कि सभी कर्मों को उत्तरोत्तर यज्ञ के रूप में किया जाना होगा।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।।४८।।
४८. हे धनञ्जय! आसक्ति का परित्याग कर के, सफलता और असफलता में सम-भाव रखते हुए, योग में स्थित रहते हुए अपने समस्त कर्मों को कर; क्योंकि योग का अर्थ इस समता से ही है।
आत्मा, मन और हृदय में पूर्ण समता प्राप्त कर के हम अपनी उस सच्ची एकात्म्य आत्मा को अनुभव कर लेते हैं जो सभी सत्ताओं के साथ एकीभूत है, उसके साथ भी एकीभूत है जो अपने-आपको इन सब सत्ताओं में तथा उस सब में प्रकट करता है जिसे हम देखते और अनुभव करते हैं। यह समता और एकता एक अनिवार्य दोहरी नींव है जो हमें दिव्य सत्ता, दिव्य चेतना और दिव्य कर्म के लिये स्थापित करनी होगी। यदि हम सबके साथ एकाकार नहीं हैं तो आध्यात्मिक दृष्टि से हम दिव्य नहीं हैं। सब वस्तुओं, घटनाओं और प्राणियों के प्रति आत्मिक समता रखे बिना हम दूसरों को आध्यात्मिक रूप से नहीं देख सकते, न हम उन्हें दिव्य रूप से जान सकते हैं और न उनके प्रति दिव्य रीति से सहानुभूति ही रख सकते हैं। एकमेव शाश्वत एवं अनन्त परम शक्ति सब पदार्थों और सब प्राणियों के प्रति 'सम' है, और क्योंकि वह 'सम' है, वह अपने कर्मों और अपनी शक्ति के सत्य के अनुसार और प्रत्येक पदार्थ और प्रत्येक प्राणी के सत्य के अनुसार पूर्ण ज्ञान के साथ कार्य कर सकती है।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ।।४९।।
४९. हे धनञ्जय! बुद्धियोग की अपेक्षा (फलेच्छा से किये जानेवाले) कर्म निश्चय ही अत्यंत निकृष्ट हैं; इसलिये तू इस बुद्धि का आश्रय ग्रहण करने की कामना कर (इसे प्राप्त कर), जो मनुष्य अपने कर्मों के फल को कर्म का उद्देश्य बनाते हैं वे दीन-हीन, अधम (कृपण) होते हैं।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥५०।।
५०. जिसने अपनी बुद्धि को भगवान् के साथ युक्त कर दिया है वह इस द्वंद्वमय लोक में ही शुभ कर्म और अशुभ कर्म इन दोनों का परित्याग कर देता है; इसलिये योगस्थ होने के लिये प्रयत्न कर; योग कर्मों में कुशलता है।
गीता कहती है कि योग कर्मों में कुशलता है, और इस उक्ति से इस प्राचीन सद्ग्रंथ का अभिप्राय यह है कि मन और सत्ता का रूपांतर, जिसे इसने योग की संज्ञा