श्रीमद्भगवद्गीता

भाग

 

 

अध्याय से तक

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्रीमद्भगवद्गीता भाग

 

(अध्याय से तक)

 

मूल तथा अनुवाद सहित

श्रीअरविन्द की अंग्रेजी टीका के हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या सहित

 

 

अंग्रेजी टीका का संपादन

स्व. श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान

 

 

हिन्दी व्याख्या

चन्द्र प्रकाश खेतान

 

हिन्दी अनुवाद व्याख्या संपादन

पंकज बगड़िया

 

श्रीअरविन्द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट

झुंझनू, राजस्थान

 

 

 

© श्रीअरविन् आश्रम ट्रस्, २०१९

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

 

 

 

 

श्रीअरविन् डिवाइन लाइफ ट्रस्ट

श्री अरविन् दिव् जीवन आश्रम

खेतान मोहल्ला

झून्झून-३३३००१, राजस्थान

 

 

 

 

 

 

 

URL: www.sadlec.org

www.resurgentindia.org

www.aurokart.com

 

 

 

 

 

 

मुद्रक :-

श्रीअरविन् आश्रम प्रेस

पुदुच्चेरी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भगवान् श्रीकृष्ण को समर्पित

 

जिनकी कृपा से हमें

 

श्रीअरविन्द श्रीमाँ के चरण कमलों की

 

शरण प्राप्त हुई है।

संपादकीय नोट

यह पुस्तक स्वर्गीय श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान द्वारा संपादित अंग्रेजी पुस्तक ' भगवद् गीता' के हिन्दी रूपांतर के आधार पर श्रीअरविन्द दिव्य जीवन शिक्षा केन्द्र में हुए अध्ययन सत्रों में साधकों के बीच हुई चर्चा-परिचर्चा, सहज अंतःस्फूणा तथा श्री चन्द्र प्रकाश जी खेतान के निजी आध्यात्मिक अनुभवों आदि के माध्यम से हुई श्रीअरविन्द श्रीमाँ के मूल शब्दों की व्याख्या का अभिलेख है। सत्रों के ध्वनिलेखों को भाषा में ढालने और उनकी एडिटिंग (संपादन), संशोधन आदि का कार्य सुश्री सुमन शर्मा श्री दीपक तुलस्यान की सहायता से मेरे द्वारा किया गया है। अनेक स्थानों पर चर्चा-परिचर्चा के दौरान श्रीमाँ-श्रीअरविन्द तथा योगी श्रीकृष्णप्रेम के जिन संदर्भों का हवाला दिया गया था उन्हें यहाँ मूल रूप से सम्मिलित कर लिया गया है जो कि पाठक के लिये पूरे विषय को अधिक स्पष्ट, सुगम और प्रभावी बना देते हैं। व्याख्या को मूल से पृथक् करने के लिए तिरछे अक्षरों (italics) का प्रयोग किया गया है। प्रथम भाग में गीता के प्रथम सात अध्यायों को सम्मिलित किया गया है और दूसरे भाग में शेष ग्यारह अध्यायों को सम्मिलित किया गया है।

 

पुस्तक में प्रस्तुत गीता पर टीका श्रीमाँ की कृतियों से लिये कुछ संदर्भों को छोड़कर शेष श्रीअरविन्द के शब्दों में है जिनकी संदर्भ सूची अंत में दी जा रही है। विचार में निरंतरता बनाए रखने के लिए कुछ स्थानों पर मूल संपादक श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान द्वारा कुछ शब्द या वाक्यांश जोड़े गए हैं जिन्हें वर्गाकार कोष्ठक में दिखाया गया है।

 

मूल संस्कृत श्लोकों का अनुवाद तथा पुस्तक में दिये गये शीर्षक श्रीअरविन्द की पुस्तक 'ऐसेज ऑन गीता' पर आधारित हैं। अध्यायों के परंपरागत शीर्षक प्रत्येक अध्याय के अंत में दिये गये हैं। हासिये में दी गई संख्याएँ गीता के अध्याय श्लोक संख्या को दर्शाती हैं।

 

जैसा कि श्रीमाँ ने कहा "श्रीअरविन्द गीता के संदेश को उस महान् आध्यात्मिक गति का आधार मानते हैं जो मानवजाति को अधिकाधिक उसकी मुक्ति की ओर, अर्थात् मिथ्यात्व और अज्ञान से निकलकर सत्य की ओर ले गई है, और आगे भी ले जाएगी। अपने प्रथम प्राकट्य के समय से हो गीता का अतिविशाल आध्यात्मिक प्रभाव रहा है; परंतु जो नवीन व्याख्या श्रीअरविन्द ने उसे प्रदान की है, उसके साथ ही उसकी प्रभावशालिता अत्यधिक बढ़ गई है और निर्णायक बन गई है।"

वर्ष १९९२ में अपने प्रथम संस्करण के समय से ही स्व. श्री परमेश्वरी प्रसाद खेतान द्वारा संपादित ' भगवद्गीता' पुस्तक को पाठकों द्वारा खूब सराहा गया है। श्रीअरविन्द की अद्भुत टीका के तीसरे संस्करण के ऊपर अब इस व्याख्या के आने से हम आशा करते हैं कि यह पुस्तक श्रीअरविन्द श्रीमाँ के आलोक में गीता को समझने, उसे व्यावहारिक रूप से जीवन में उतारने में पाठकों के लिए और अधिक सहायक सिद्ध होगी।

- पंकज बगड़िया

 

विषय-सूची

 

संपादकीय नोट. 5

प्रस्तावना.. 7

I. अन्वेषण का भाव. 7

II. उपदेश का सारमर्म. 16

पहला अध्याय. 22

कुरुक्षेत्र. 22

दूसरा अध्याय. 40

I. आर्य-क्षत्रिय का धर्ममत. 40

II. सांख्य और योग. 58

III. बुद्धि योग. 71

तीसरा अध्याय. 98

I. कर्म और यज्ञ.. 98

II. दिव्य कर्मों का सिद्धान्त... 124

III. प्रकृति का नियतिवाद. 140

चौथा अध्याय. 178

I.अवतार-तत्त्व की सम्भावना, उसका उद्देश्य और उसकी प्रक्रिया.. 178

II. दिव्य कार्यकर्त्ता.. 228

III. यज्ञ का महत्त्व... 251

IV. ज्ञान एवं कर्मयोग. 275

पाँचवा अध्याय. 284

I. ज्ञान, समता और कर्मयोग. 284

II. निर्वाण तथा संसार में कर्म. 318

छठा अध्याय. 328

निर्वाण, समता एवं संसार में कर्म. 328

सातवाँ अध्याय. 382

I. दो प्रकृतियाँ.. 382

II. भक्ति और ज्ञान का समन्वय. 410

परिशिष्ट.. 438

भागवत् अवतारों का रहस्य... 438

संदर्भ सूची.. 442

श्रीअरविन्द गीता.. 450

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रस्तावना

I. अन्वेषण का भाव

 

...वेद, उपनिषद् अथवा गीता जैसे किसी प्राचीन सग्रंथ के अन्वेषण में आरंभ में ही ठीक-ठीक यह स्पष्ट कर देना बहुत उपयोगी होगा कि हम किस विशिष्ट भाव से इस अन्वेषण में प्रवृत्त हो रहे हैं और वास्तव में हम क्या समझते हैं कि इससे वह कौनसी चीज प्राप्त करेंगे जो मानवजाति और उसके भविष्य के लिए महत्त्व की होगी। सर्वप्रथम, निःसंदेह हम एक ऐसे परम सत्य की खोज कर रहे हैं जो एकमेव सनातन हो, जिससे अन्य सभी सत्य प्रादुर्भूत होते हों, जिसके प्रकाश से अन्य सभी सत्य ज्ञान की योजना में अपना उचित स्थान, अपनी व्याख्या अथवा निरूपण तथा अपना परस्पर संबंध पाते हैं। परंतु ठीक इसी कारण वह परम सत्य किसी एक तीक्ष्ण या एकांगी सूत्र के अंदर बंद नहीं किया जा सकता, कदाचित् ही वह हमें समग्रता में तथा संपूर्ण आशय सहित किसी एक दर्शन में या किसी एक सग्रंथ में, या फिर किसी एक गुरु, मनीषी, पैगम्बर या अवतार के मुख से पूर्ण रूप में तथा सदा के लिए पूर्णतः अभिव्यक्त हुआ मिले। और यदि उस सत्य के प्रति हमारा दृष्टिकोण या भाव उसे छोड़कर अन्य प्रणालियों अथवा पद्धतियों में निहित सत्यों के असहिष्णु बहिष्कार को आवश्यक बताता हो तब भी इसका अर्थ है कि वह सत्य अपनी समग्रता में हमारे द्वारा खोजा नहीं गया है; क्योंकि जब हम आवेश में आकर अथवा तीक्ष्ण रूप से निषेध करते हैं तो सीधे-सीधे इसका अर्थ होता है कि इस सत्य को समझने अथवा सराहने में तथा इसे निरूपित करने में हम समर्थ नहीं हैं। दूसरे, यद्यपि यह सत्य एकमेव तथा सनातन है, तो भी यह अपने-आप को काल में और मनुष्य की मन-बुद्धि द्वारा अभिव्यक्त करता है; अतः प्रत्येक सग्रंथ में आवश्यक रूप से दो तत्त्व होते हैं, एक अस्थायी या सामयिक, नश्वर तथा उस देश और काल विशेष के विचारों से संबद्ध जिसमें वह उत्पन्न हुआ था, और दूसरा तत्त्व होता है सनातन अविनश्वर तथा सभी कालों देशों में प्रयोज्य या व्यवहार्य। इसके अतिरिक्त परम सत्य की अभिव्यक्ति अथवा वर्णन में उसे जो वर्तमान रूप दिया जाता है, जिस पद्धति तथा योजना से, जिस तात्त्विक बौद्धिक साँचे में ढालकर और जिस विशिष्ट वाक्य रचना का प्रयोग कर उसको अभिव्यक्ति की जाती है वे सब अधिकांशतः काल के परिवर्तनों के अधीन होते हैं और इस कारण (कालांतर से) वैसी ही शक्ति नहीं रख पाते; क्योंकि मानव-बुद्धि सदा अपने-आप में बदलाव लाती रहती है; निरंतर ही विभाजन करती और संयोजन करती हुई यह निरंतर ही अपने विभाजनों को बदलने और अपने समन्वयों को नए क्रम से रखने को बाध्य होती है; यह नवीन वाक्य-रचनाओं अथवा अभिव्यक्तियों तथा प्रतीकों हेतु पुरातन का त्याग करती जाती है, या फिर यदि वह पुरातन प्रयोगों का पुनः उपयोग करती भी है तो भी उसके संकेतार्थ या गूढार्थ को या कम-से-कम उसकी वास्तविक अंतर्वस्तु तथा अर्थ-संगतियों को इस प्रकार इतना बदल देती है कि हम इस प्रकार की प्राचीन पुस्तक को पढ़ते समय इस विषय में कभी भी सर्वथा सुनिश्चित नहीं हो सकते कि उसे हम उसी आशय और भाव में समझ पा रहें हैं जैसा आशय भाव वह पुस्तक अपने समकालीन लोगों के लिए रखती थी। अतः ऐसे सग्रंथ में जो तत्त्व चिरंतन महत्त्व का है वह वह तत्त्व है जो सार्वलौकिक होने के साथ ही अनुभूत किया गया हो, जीया गया हो और बौद्धिक दृष्टि की अपेक्षा उच्चतर दृष्टि से देखा गया हो।

 

भगवान् का पूर्ण सत्य तो कभी अभिव्यक्त किया जा ही नहीं सकता। इसलिए जब यह अभिव्यक्ति में आता है तो सीमित हो जाता है। कोई अनुभव, चाहे वह कितना भी गहरा क्यों हो, बहुत आन्तरात्मिक जगत् का ही क्यों हो, तो भी उसके लिए हम यह नहीं कह सकते कि वह चरम अनुभव है। अवश्य ही वह बहुत गंभीर हो सकता है, सत्य हो सकता है। पहली चीज तो यह है कि भगवान् के सत्य की पूर्ण अभिव्यंजना हो ही नहीं सकती। परंतु जगज्जननी ऐसी ही असंभव चीज को साधित करने का प्रयत्न कर रही हैं अन्यथा ये ऐसे ब्रह्माण्ड अभिव्यक्ति में आते ही नहीं। यदि व्यक्ति का उस परम् का अनुभव बहुत गहन भी हो, तो किसी अर्थ में वह उसे समझ तो सकता है, पर जब वह उसकी अभिव्यक्ति करना चाहता है तो जो मानसिक चेतना है, जो बुद्धि है, उसमें वह पाता है कि वास्तव में इसे समुचित रूप से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। हमारे वैदिक ऋषियों ने पाया कि तर्कबुद्धि की भाषा में इसे अभिव्यक्त करना संभव नहीं है। इसकी अभिव्यक्ति के लिए प्रतीकात्मक भाषा को ही उन्होंने सबसे अच्छा माध्यम पाया। यदि व्यक्ति अंतर्बोधात्मक चेतना में हो तो वे प्रतीक उसके लिए जीवित-जागृत होंगे, सजीव होंगे। उसके लिए वे कोई मृत पर्यायवाची नहीं होगे, जैसे कि एक पहाड़ का अर्थ अभीप्सा से लगा लिया जाए, या फिर नदी का अर्थ चेतना से लगा लिया जाए। ऐसे प्रतीकों की भाषा में हम उस सत्य को थोड़ा-बहुत अभिव्यक्त कर सकते हैं। वेदों में जो अभिव्यक्ति हुई है वह इसी प्रकार की है। परंतु अब चूंकि हम उन प्रतीकों के पीछे के गूढ़ार्थ तक नहीं जा पाते इसलिए उनमें निहित सत्य हमारे लिए अगम हो गया है। उपनिषदों में उसे कुछ अधिक मानसिक भाषा में अभिव्यक्त किया गया है, गीता उनसे भी अधिक मानसिक भाषा में उसका निरूपण कर रही है। पर यहाँ भी जो निरूपण-पद्धति है, जो प्रतीक प्रयोग में लाए गए हैं, वे उस समय अभिव्यक्ति के लिए जो उचित महसूस हुए उस अनुसार प्रयोग में लाए गए हैं। परंतु यह सब होने के बावजूद भी जब उस सत्य की अभिव्यक्ति होती है, तब यदि हममें क्षमता हो, अंतर्ज्ञान हो, आंतरिक समझ हो तो हम शब्दों के परे भी उस सत्य को पकड़ सकते हैं, ग्रहण कर सकते हैं। तब शब्द हमारे लिए केवल एक पारदर्शी पर्दा-मात्र रह जाते हैं। इसी कारण हमारे ऋषियों ने जिस प्रकार की शब्दाभिव्यक्ति की है, जिस रीति से उन्होंने उस सत्य की अभिव्यक्ति की है वह हमें उस सत्य तक पहुँचने में अधिक रोकती नहीं है और हमें उस सत्य के दर्शन हो जाते हैं। जिस पुस्तक में वह पर्दा बहुत झीना होता है, पारदर्शी होता है उसमें उस सत्य को देखना अधिक आसान होता है। और गीता ऐसी ही पुस्तकों में से एक है जिसमें उस सत्य की अभिव्यक्ति बड़ी अच्छी तरह से हुई है और आवरण बहुत ही कम है, इसलिए यह शाश्वत रहती है क्योंकि कोई भी मनुष्य जो थोड़ी-बहुत भी गहराई में स्थित है उसके लिए इसमें से कुछ ग्रहण करना अधिक आसान है। यदि कोई अधिक गहराई में निवास भी कर रहा हो तो भी वह इससे इतना तो अवश्य ही ग्रहण कर सकेगा जो उसके लिए उपयोगी होगा। इसलिए गीता की यह विशिष्टता है कि इसमें सबके लिए कुछ--कुछ अवश्य ही मिल जाता है। यह जो शाब्दिक अभिव्यक्ति का बाहरी तत्त्व है उसी पर अधिक आग्रह रखने की अपेक्षा हम उससे आगे जा सकते हैं। ऐसा भी संभव है कि गीता जो बता रही है हम उससे शुरू करें और उससे भी परे चले जाएँ।

 

श्रीअरविन्द की 'एसेज ऑन गीता' की सारी टीका यही तो दर्शाती है। ऐसा संभव है कि गीतोपदेश में जिन चीजों के बारे में स्वयं श्रीकृष्ण भी बोलने में सचेतन रहे हों, चूंकि तब वे योगारूढ़ थे और उनके द्वारा वह उपदेश प्रवाहित हो रहा था, उसे भी श्रीअरविन्द अब सामने ला रहे हों। ऐसा नहीं है कि जो सत्य उसमें निहित हैं वे उस अभिव्यक्ति से सीमित हैं। हम उससे आगे जा सकते हैं, कितना भी आगे जा सकते हैं। वेदों की विवेचना में यह संभव है कि वैदिक ऋषि जितना समझते थे हम उससे भी आगे जा सकते हैं क्योंकि आखिर यही तो इस सत्य की विलक्षणता है। हमारी चेतना के द्वारा यह काम किया जाना संभव है। इसलिए ऐसी पुस्तकें अपने-आप में आध्यात्मिक ऊर्जा-स्रोत के समान होती हैं। जिस प्रकार चित्र, चित्रकारियाँ, स्थापत्य आदि भी ऊर्जा-स्रोत हो सकते हैं जो किसी पात्र के समक्ष किसी गहन अंतर्दर्शन को प्रकट कर सकते हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा के संचार का माध्यम बन सकते हैं, उसी प्रकार ये सद्ग्रंथ हैं। गीता भी इसी प्रकार की एक पुस्तक है। इसलिए श्रीअरविन्द कह रहे हैं कि यह जानने का महत्त्व कम है कि तात्कालिक लोगों ने इसे किस प्रकार समझा था। हमारे लिए आवश्यक यह है कि हम स्वयं इसे जानें और साथ ही यह जानें कि इसे अभिव्यक्त कैसे करें ताकि अधिक-से-अधिक लोग उससे जुड़कर, इसके ज्ञान पर सवार होकर उत्तरोत्तर आरोहण कर सकें। इसी प्रयोजन से श्रीअरविन्द ने 'गीता प्रबंध' लिखी। गीता में यदि उन्हें वह सूत्र मिला होता, प्रचुर रूप से वह शाश्वत् तत्त्व मिला होता, जो आज भी उतना ही नूतन तथा सत्य है - चूँकि गीता की नवीनता जितनी अपनी शुरुआत में थी उतनी ही आज भी है तो वे कहते हैं कि इसमें वे अपना समय नष्ट नहीं करते। जो भी भगवान् के और जगत् के रहस्य को जानना चाहता है वह गीता को अनदेखा नहीं कर सकता। सभी वाद-विवादियों की इस विषय में मत-भिन्नता है कि श्रीकृष्ण के कथन का तात्पर्य क्या था। परन्तु इसकी बजाय देखना तो यह चाहिये कि आज के समय में उसका अर्थ क्या हो सकता है। अभिव्यक्ति में तो वह सत्य पूर्णतः ही नहीं सकता। और यदि कहीं किसी ने उसे अभिव्यक्त किया भी हो तो वह अंतिम नहीं हो सकता। हमेशा ही व्यक्ति उससे अधिक ऊँचाई पर जा सकता है तथा उसी चीज की अभिव्यक्ति को और अधिक समृद्ध बना सकता है। जैसे कि बुद्ध की प्रतिमा के चेहरे के भाव को देखकर योगी श्रीकृष्णप्रेम ने कहा कि 'अवश्य ही वैसा भाव कहीं विद्यमान होना चाहिये अन्यथा वह अभिव्यक्त ही कैसे हो पाता।' आवश्यक नहीं कि स्वयं वह मूर्तिकार भी उस भाव के विषय में सचेतन रहा हो परंतु अवश्य ही कोई दूसरी शक्ति उसके हाथों को काम में ले रही थी क्योंकि (जैसा कि श्रीअरविन्द अपने 'सावित्री' महाकाव्य में लिखते हैं) 'अदर्शक हाथ अदृष्ट की आज्ञा पालन करते हैं' (p. 460) बुद्ध के चेहरे पर जो करुणा का भाव अभिव्यक्त हुआ है, उनकी आँखों में जो शांति है, वह कहीं कहीं तो अवश्य ही विद्यमान है और उन्हें उसी की खोज करनी है। उन्होंने कहा कि उस मूर्ति ने उनके समक्ष जिन चीजों को प्रकट किया वैसा तो कदाचित् वे पाली में सारे बौद्ध साहित्य का अध्ययन कर के भी नहीं समझे होंगे।' अतः परमात्मा का सत्य एक ऐसी विलक्षण चीज है जिस पर किसी का कोई एकाधिकार नहीं है। अपने-अपने दृष्टिकोण से सभी उसे भिन्न-भिन्न रूप से समझते हैं। उसे हम अपने मन में, प्राण में, भौतिक सत्ता में जिस भी प्रकार से समझेंगे उसी प्रकार से उसे अभिव्यक्त करेंगे। और चूंकि उस वैयक्तिक अभिव्यक्ति का इतना भारी मूल्य है इसीलिए सृष्टि इतनी जटिल है। यदि मनुष्य, प्राणी, पशु-पक्षी, पत्थर आदि सभी अपने-अपने तरीके से परमात्मा के निरपेक्ष सत्य को अभिव्यक्त कर रहे होते तो वे अस्तित्व में ही नहीं सकते थे। असत्य का कोई अस्तित्व नहीं होता क्योंकि असत्य का अस्तित्वमान होना तो एक अतात्त्विक बात है। सभी चीजें सत्य के किसी--किसी पहलू को अवश्य ही अभिव्यक्त करती हैं। एक बार जब यदि हमें इस बात का बोध हो जाए कि सभी अपने-अपने तरीके से उस सत्य को अभिव्यक्त कर रहे हैं, तो हम घोर संकीर्णता से कुछ बच सकते हैं और चीजों के प्रति एक अधिक सहिष्णु और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपना सकते हैं। प्रस्तुत प्रस्तावना में श्रीअरविन्द ने इस बिंदु को बहुत सुंदर ढंग से रखा है कि सग्रंथों के प्रति उचित दृष्टिकोण क्या होना चाहिये। अन्यथा व्यक्ति इनके विषय में अंध श्रद्धा रखने का दकियानूसी दृष्टिकोण अपना लेता है और हठपूर्वक इस पर आग्रह करने लगता है कि पुस्तक में इसने या उसने वैसी ही बात कही है जैसा उसने स्वयं समझा है। परंतु इसमें व्यक्ति को समझना होगा कि समस्या उस कही हुई बात में नहीं अपितु वह उसे जिस रूप में समझता है उसमें है, क्योंकि जो कहा गया है उसके बारे में वह निश्चित कैसे हो सकता है कि वह उसे वैसा ही समझ रहा है। और फिर केवल वही अन्तिम सत्य हो यह भी आवश्यक नहीं है।

 

अतः गीता के उस बिल्कुल सटीक तात्त्विक गूढार्थ को वैसे ही जानना जैसा कि उस समय के लोगों द्वारा समझा गया था, - यदि ऐसा सही-सही करना संभव भी होता - तो भी इसे मैं गौण महत्त्व का मानता हूँ। और यह संभव भी नहीं है जैसा कि गीता पर लिखे गए और अभी भी लिखे जा रहे मूलभाष्यों की परस्पर मत-भिन्त्रता से स्पष्ट हो जाता है; क्योंकि ये सभी एक दूसरे से असहमत होने में ही एकमत हैं, प्रत्येक ही गीता में अपनी ही तत्त्वज्ञान की पद्धति तथा धार्मिक विचारधारा खोज निकालता है और यहाँ तक कि अत्यंत श्रमसाध्य निष्पक्ष विद्वत्ता तथा भारतीय दर्शन के ऐतिहासिक विकासक्रम के विषय में अत्यंत प्रकाशमान सिद्धांत भी हमें इस अपरिहार्य भूल से नहीं बचा सकते। परंतु लाभकारी रूप से जो हम कर सकते हैं वह यह है कि गीता में निहित उन यथार्थ जीवंत सत्यों को खोजें, भले ही उनके तत्त्वविज्ञानसंबंधी रूप जो भी हों, और इसमें से वह तत्त्व निकालें जो हमें अथवा व्यापक रूप से संसार को सहायता पहुँचा सकता है और फिर यथासंभव ऐसे अत्यंत स्वाभाविक तथा जीवंत रूप शब्द-अभिव्यक्ति में उसे व्यक्त करें जो हमारी वर्तमान मनुष्यजाति की मानसिकता के अनुरूप तथा उसकी आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक हो... यदि हम इस महान् सग्रंथ के भाव में अपने-आप को तल्लीन कर दें और विशेषकर यदि हमने उस भाव में जीने का प्रयास किया हो तो हम उसके अंदर उतना यथार्थ सत्य प्राप्त करने के लिए आश्वस्त हो सकते हैं जितने को ग्रहण करने के हम पात्र हैं और साथ ही व्यक्तिगत तौर पर इससे हम उतना आध्यात्मिक प्रभाव और वास्तविक सहायता प्राप्त कर सकते हैं जितना इसमें से प्राप्त करना हमारे लिए अभिप्रेत था। और, अंततः, यही देने के लिए तो ये सग्रंथ लिखे गए थे; शेष सब केवल शास्त्रीय वाद-विवाद और धार्मिक मत-मतांतर है। केवल वे ही सद्ग्रंथ, धर्म तथा दर्शन मनुष्यजाति के लिए जीवंत महत्त्व के बने रहते हैं जो कि इस प्रकार सतत् ही नवीकृत हो सकते हों, पुनः जीये जा सकते हों, तथा उनमें निहित सनातन सत्य के तत्त्व को सतत् ही नए रूपों में गढ़कर एक विकसनशील मनुष्यजाति के अंतःविचार तथा आध्यात्मिक अनुभव में विकसित किया जा सकता हो। शेष सब अतीत के स्मारकों के रूप में बचे रहते हैं परंतु उनमें भविष्य के लिए कोई यथार्थ शक्ति या सजीव प्रेरणा नहीं होती।

 

इस अंश में जो नया बिंदु है वह यह है कि, हमारे वैदिक ऋषियों ने जिन प्रतीकों में अभिव्यक्ति की है वे प्रतीक नित-नूतन, चिन्मय और जीवंत हैं। उन प्रतीकों की व्याख्या हम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार कर सकते हैं और उस रूप में उन्हें समझ सकते हैं। पर जब वह अभिव्यक्ति ऐसे शब्दों में, ऐसे प्रतीकों में होती है जो बहुत अधूरे हैं, जैसे कि अमूर्त मानसिक भाषा या मानसिक प्रतीक, तब फिर समय के साथ वे प्रासंगिक नहीं रह पाते, और अपने को देश-काल के अनुसार नमनीय रह पाने के कारण क्षणिक या अस्थायी विषय बनकर रह जाते हैं। कितनी ही बौद्धिक पुस्तकें आती हैं जो कुछ समय प्रचलन में रहने के बाद प्रचलन से बाहर हो जाती हैं। कुछ में यदि कुछ अधिक अंतर्वस्तु होती है तो वे कुछ अधिक समय तक टिक जाती हैं। जहाँ सत्य को शक्तिशाली रूप से अभिव्यक्त किया हुआ नहीं होता, जीवंत प्रतीक की भाषा के अन्दर यदि सत्य की संवेदनशील अभिव्यक्ति नहीं हुई होती या फिर यदि व्यक्ति के अन्दर धर्मांधता है जिस कारण वह उस पर आवश्यकता से ज्यादा या कम महत्त्व देता है तो वे अभिव्यक्तियाँ अपना मूल्य खो बैठती हैं, और ऐसी पुस्तकें अपने बने रहने की शक्ति खो बैठती हैं। हो सकता है व्यक्ति ने सत्य के कुछ अंश को देखा हो पर उसकी अभिव्यक्ति बड़ी भौंडी होने के कारण वह निरंतर नहीं रह पाती। परंतु इस सब के साथ ही साथ यह भी एक तथ्य है कि जिन सत्यों को बहुत गहराई में देखा जाता है वे अपनी अभिव्यक्ति की शक्ति अपने साथ ले आते हैं, जैसा कि गीता में हुआ है, वेदों में हुआ है। ये पुस्तकें सदा नूतन बनी रहती हैं। क्योंकि उनके अनुभव को सदा ही अनुभूति में पुनः जीया जा सकता है। और फिर गीता के कुछ तत्त्व जो देश-काल मर्यादित प्रतीत होते हैं - जैसे कि जाति-प्रथा, यज्ञ-अनुष्ठान आदि तात्कालिक विषय- उन्हें भी श्रीअरविन्द कहते हैं कि जिस निहित गहरे अर्थ में गीता उनका प्रयोग करती है उस रूप में ले लिया जाए तो उनके अर्थ की वह सीमितता भी लुप्त हो जाती है। जैसे कि गीता में यज्ञ का जो विचार अंतर्निहित है तीसरे अध्याय में तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह बिल्कुल ही अपूर्ण और अपरिपक्व है, मानो वह समय-विशेष और समुदाय विशेष के लिए ही प्रयोजनीय हो, परन्तु चौथे अध्याय में गीता ने उस सारी सीमितता को यह कह कर तोड़ दिया कि ब्रह्म ही यज्ञ है, ब्रह्म ही अभीप्सा है, सब कर्म ब्रह्म ही हैं। इसलिए हर प्रतीक को यदि हम गहराई में देखें तो वह उस देश और काल से सीमित नहीं रहता अपितु शाश्वत रूप ग्रहण कर लेता है। अतः गीता में ऐसा बहुत ही कम है जो हमें परिसीमित करता हो। इसीलिए यह बहुत मूल्यवान् है।

(iv.24)

 

गीता में ऐसा विषय बहुत ही कम है जो देश से सीमित और सामयिक अथवा अस्थायी हो और इसका भाव और विचारधारा इतनी उदार, गंभीर और व्यापक है कि उस थोड़े बहुत को भी सरलतापूर्वक, इसकी शिक्षा का जरा भी हास या अतिक्रम किये बिना, व्यापक रूप दिया जा सकता है; यही नहीं, उसे देश या काल से संबद्ध रखने की बजाय ऐसा व्यापक रूप देने पर उसकी शिक्षा की गहराई, उसके सत्य और उसकी शक्ति में वृद्धि होती है। वास्तव में, स्वयं गीता ही बारंबार उस व्यापक रूप का संकेत करती है जो किसी विचार को दिया जा सकता है भले ही वह विचार अपने-आप में देशकालमर्यादित हो। जैसे कि 'यज्ञ' संबंधी प्राचीन भारतीय विधि और विचार को गीता देवताओं और मनुष्यों के पारस्परिक आदान-प्रदानस्वरूप मानती है - जबकि यह विधि और भाव स्वयं भारतवर्ष में ही दीर्घ काल से लगभग लुप्त हो गए हैं और सर्वसाधारण मानव-मन को और अधिक यथार्थ प्रतीत नहीं होते; परन्तु गीता में इस 'यज्ञ' शब्द को हम इतना संपूर्ण रूप से सूक्ष्म, आलंकारिक और प्रतीकात्मक अर्थ दिया गया पाते हैं तथा देवता-संबंधी धारणा देशकालमर्यादा और किंवदंती से के बराबर ही बँधी हुई अथवा इतनी मुक्त और इतनी पूर्ण रूप से सार्वभौमिक और दार्शनिक है कि हम यज्ञ और देवता दोनों को मनोविज्ञान और प्रकृति के साधारण विधान के व्यावहारिक तथ्य के रूप में सहज ही ग्रहण कर सकते हैं और इन्हें, प्राणियों में परस्पर होनेवाले आदान-प्रदान, एक-दूसरे के हितार्थ होनेवाले बलिदान और आत्मदान के विषय में जो आधुनिक विचार हैं, उन पर इस तरह प्रयुक्त कर सकते हैं कि इनके अर्थ और भी अधिक उदार और गम्भीर हो जाएँ, ये अधिक आध्यात्मिक स्वरूप वाले और गंभीरतर तथा अधिक विस्तीर्ण सत्य के प्रकाश से प्रकाशित हो जाएँ। इसी प्रकार शास्त्र-सम्मत कर्म करने का विचार, समाज की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था, चारों वर्णों की परस्पर स्थिति का, या दूसरों की तुलना में शूद्रों और स्त्रियों के आध्यात्मिक अनधिकार का उल्लेख, ये सब प्रथम दृष्ट्या देश या काल-विशेष से संबद्ध प्रतीत होते हैं और यदि इनके शाब्दिक अर्थ पर ही अतिशय बल दिया जाए तो कम-से-कम ये गीता की शिक्षा को उतने अंश में संकीर्ण बना देते हैं, गीता को उसके उपदेश की व्यापकता और आध्यात्मिक गंभीरता से वंचित कर देते हैं और, अधिक व्यापक रूप से, समस्त मनुष्य जाति के लिए उसकी प्रामाणिकता को सीमित कर देते हैं। परन्तु यदि हम इसके पीछे के आन्तरिक भाव और अर्थ को देखें, कि केवल देश-विशिष्ट नाम और काल-विशिष्ट रूप को, तो हम देखते हैं कि यहाँ भी अर्थ गहरा और यथार्थ है और इसका आन्तरिक भाव दार्शनिक, आध्यात्मिक और सार्वभौमिक है। शास्त्र शब्द से प्रतीत होता है कि गीता का तात्पर्य उस विधान से है जिसे मनुष्य जाति ने स्वयं के ऊपर उस प्राकृत असंस्कृत मनुष्य के निरे अहंभावापन्न कर्म के स्थान पर, तथा अपनी वासनाओं की तृप्ति को ही अपने जीवन का मानक और उद्देश्य बना लेने की प्रवृत्ति पर एक अंकुश के रूप में आरोपित किया है। ऐसे ही हम देखते हैं कि समाज को चातुर्वर्ण्य व्यवस्था भी एक आध्यात्मिक तथ्य का ही महज एक स्थूल रूप है, जो स्वयं उस स्थूल रूप से स्वतंत्र है; यह स्वभाव नियत कर्म की उस अवधारणा पर आश्रित है जिसमें कि कर्म, उस कर्ता के स्वभाव की सम्यक् क्रमानुगत अभिव्यक्ति के अनुसार निष्पादित हों, और वह स्वभाव नैसर्गिक गुण और आत्माभिव्यक्तिकारी वृत्ति के अनुसार उसके जीवन की धारा और क्षेत्र को निर्धारित करे। चूँकि गीता अपने अत्यंत स्थानिक और सामयिक दृष्टांतों को इसी (गंभीर और व्यापक) भाव से प्रस्तुत या विकसित करती है, अतः सर्वत्र ही हमारा इसी सिद्धांत का अनुसरण करना और सर्वत्र ही उस गंभीरतर सामान्य सत्य को ढूँढ़ना औचित्यपूर्ण ही होगा जो कि अवश्य ही उन सब प्रथम दृष्ट्या दिखने में स्थानिक और सामयिक बातों के पीछे छिपा होता है। क्योंकि हम सदा ही ऐसा पाएँगे कि वह गंभीरतर सत्य और सिद्धांत चिंतन के स्वभाव मात्र में ही तब भी निहित होता है जब वह स्पष्ट शब्दों में व्यक्त नहीं किया गया होता है।

 

और ही हमें उन दर्शनसंबंधी मतों या धर्म संबंधी मान्यताओं के साथ अन्य किसी भाव से व्यवहार करना चाहिए, जो कि गीता में सामयिक दार्शनिक शब्दों के या धार्मिक प्रतीकों के प्रयोग के कारण प्रवेश कर जाते हैं या फिर किसी प्रकार इससे संबद्ध हो गए हैं... ही हमें उन मत-मतांतरों पर चर्चा करने की आवश्यकता है जो गीता को किसी धार्मिक संप्रदाय या परंपरा-विशेष का फल मानते हैं। गीता का उद्गम जो भी रहा हो, परंतु इसका उपदेश सार्वभौमिक अथवा व्यापक है।

 

गीता की दार्शनिक पद्धति, इसमें सत्य का जो व्यवस्थापनक्रम है वह इसके उपदेश का वह भाग नहीं है जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण, गहन तथा चिरस्थायी हो; किन्तु इसकी रचना का अधिकांश विषय, इसके सांकेतिक और मर्मस्पर्शी प्रधान विचार जो इस ग्रंथ के जटिल सामंजस्य में पिरोये गये हैं, वे चिरंतन रूप से मूल्यवान् तथा प्रामाणिक हैं, क्योंकि, वे महज एक दार्शनिक बुद्धि के चमकदार विचार या चकित करनेवाली परिकल्पनाएँ नहीं हैं, अपितु आध्यात्मिक अनुभव के चिरस्थायी सत्य हैं, हमारी उच्चतम अध्यात्मपरक संभावनाओं के प्रमाणयोग्य तथ्य हैं, जिन्हें इस जगत् के रहस्य की तह तक पहुँचने के प्रयास में कदापि उपेक्षित नहीं किया जा सकता। इसकी विवेचन पद्धति जो भी हो, जैसा कि भाष्यकार प्रमाणित करने की चेष्टा करते हैं, परंतु इसका गठन तो किसी दार्शनिक मत विशेष का समर्थन करने हेतु या फिर किसी एक विशिष्ट योग पद्धति के दावों को ही मुख्य रूप से प्रतिपादित करने हेतु हुआ है और ही ऐसा करने के लिए यह अभिप्रेत या नियत है। गीता की भाषा, विचार की संरचना, विविध विचारों का इसमें संयोजन और उनका संतुलन, तो किसी सांप्रदायिक आचार्य की मनोवृत्ति से संबंध रखते हैं, और ही वह किसी ऐसे सख्त विश्लेषणात्मक तर्कशास्त्री की प्रकृति से जो सत्य के किसी एक पहलू को काट-छाँटकर बाकी सबको अलग कर देने की प्रवृत्ति रखती हो, अपितु इसकी अपेक्षा इसमें तो विचारों की एक विस्तृत, तरंगित और सर्वालिंगनकारी गति है जो एक विशाल समन्वयात्मक बुद्धि और सुसंपन्न समन्वयात्मक अनुभूति की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। यह उन महान् समन्वयों में से एक है जिनकी सृष्टि करने में भारत की आध्यात्मिकता उतनी ही समृद्ध रही है जितनी कि ज्ञान की उन अत्यंत प्रगाढ़ और अनन्य क्रियाओं तथा धार्मिक साक्षात्कारों की सृष्टि करने में, जो परम एकाग्रता के साथ किसी एक ही सूत्र को अथवा एक ही मार्ग को उसकी पराकाष्ठा तक अनुसरण करते हैं। गीता की विचारधारा] काटकर पृथक् पृथक् नहीं करती, अपितु सामंजस्य और ऐक्य साधित करती है।

 

गीता का विचार अथवा सिद्धांत शुद्ध रूप से केवल अद्वैतवाद नहीं है यद्यपि इसकी दृष्टि में एक ही अव्यय, विशुद्ध, सनातन आत्मतत्त्व अखिल ब्रह्माण्ड की स्थिति का आश्रय है; मायावाद ही है यद्यपि यह सृष्ट जगत् में त्रिगुणात्मिका प्रकृति की सर्वव्यापी माया की चर्चा करती है; यह विशिष्टाद्वैत ही है यद्यपि यह उस एकमेवाद्वितीय परब्रह्म में उसकी सनातन परा प्रकृति को स्थित बताती है जो कि जीव के रूप में अभिव्यक्त होती है और साथ ही (गीता) आध्यात्मिक चेतना की परम स्थिति के रूप में परब्रह्म में लय की अपेक्षा उसमें निवास करने पर ही अत्यधिक बल देती है; यह सांख्य ही है यद्यपि यह सृष्ट जगत् की व्याख्या प्रकृति-पुरुष के द्विविध तत्त्व के द्वारा करती है; यह वैष्णव ईश्वरवाद ही है यद्यपि यह पुराण प्रतिपादित श्रीविष्णु के ही अवतारस्वरूप श्रीकृष्ण को हमारे समक्ष परमाराध्य देवाधिदेव के रूप में निरूपित करती है, और ही इन भूतेश में जो कि जगत्पति तथा समस्त प्राणियों के परम सखा हैं तथा उस अनिर्देश्य निर्विशेष ब्रह्म में कोई तात्त्विक भेद करती है और ही उस ब्रह्म के पद में इन कृष्ण से कोई वास्तविक श्रेष्ठता को ही स्वीकार करती है। गीता के पूर्व उपनिषदों में जैसा समन्वय हुआ है वैसा ही गीता का समन्वय है जो कि आध्यात्मिक होने के साथ-ही-साथ बौद्धिक भी है और इसलिए स्वाभाविक रूप से ऐसे किसी भी अनुदार मत को परिवर्जित कर देता है जो इसकी सार्वलौकिक व्यापकता को क्षति पहुँचाए। इसका उद्देश्य उन खण्डनात्मक भाष्यकारों के उद्देश्य से ठीक विपरीत है जिन्होंने इस सद्ग्रंथ को सर्वाधिक प्रामाणिक तीन वेदान्तिक ग्रंथों में से एक के रूप में प्रतिष्ठित पाया और इसे स्वमत के मंडन तथा अन्य मतों और संप्रदायों के खण्डन के लिए शस्त्र के रूप में प्रयुक्त करने का प्रयास किया। गीता कोई तर्कशास्त्रीय युद्ध का अत्र नहीं है; यह एक ऐसा महाद्वार है जो समस्त आध्यात्मिक सत्य और अनुभूति के जगत् की ओर खुलता है और जो झाँकी यह हमें प्रदान करता है वह उस परम दिव्य धाम के सभी क्षेत्रों को अपने में समाविष्ट कर लेती है। गीता इन क्षेत्रों को योजनाबद्ध तो करती है, पर कहीं भी यह [एक से दूसरे क्षेत्र को] विच्छिन्न नहीं करती, किसी प्रकार की दीवारें या घेरा खड़ा करती है जो कि हमारी दृष्टि को परिरुद्ध कर दे।

 

मानव-मन सदा आगे की ही ओर बढ़ता है, अपने दृष्टिकोण को बदलता तथा अपने विचार के विषयों को विस्तृत करता है, और इन परिवर्तनों का परिणाम होता है चिंतन की पुरातन प्रणालियों को अप्रचलित या लुप्तप्राय बना देना अथवा, जब उन्हें सुरक्षित रखा भी जाए तब भी, उन्हें विस्तृत और संशोधित करना तथा सूक्ष्मतया या प्रत्यक्ष रूप में उनका मूल्य बदल देना। किसी प्राचीन सिद्धान्त की प्राणवंतता उसी हद तक होती है जिस हद तक वह ऐसे परिवर्तन के लिए स्वाभाविक रूप से अपने-आपको अनुकूल बना लेता है; क्योंकि उसका अर्थ यह होता है कि उसके विचार के रूप की सीमाएँ या अव्यवहार्यताएँ जो भी रही हों, फिर भी इसके अंतर्तत्त्व का सत्य, जीवंत दृष्टि एवं अनुभूति का सत्य, जिसके आधार पर इसकी प्रणाली का निर्माण हुआ था, वह अब तक भी अक्षुण्ण है और एक स्थायी सत्यता अथवा प्रामाणिकता तथा सार्थकता रखता है। गीता एक ऐसी पुस्तक है जो असाधारण रूप से दीर्घ काल से बनी हुई है और यह आज भी प्रायः उतनी ही नूतन है और अपने वास्तविक सार-तत्त्व में अभी भी बिल्कुल उतनी ही नवीन है - क्योंकि इसे अनुभूति में सदा ही पुनः साक्षात् किया जा सकता है जितनी कि यह तब थी जब यह पहले-पहल महाभारत में प्रकाशित हुई थी या उसकी रूपरेखा के अंदर लिखी गयी थी। भारत में अभी भी यह उन महान् शास्त्रों में से एक के रूप में स्वीकार की जाती है जो अत्यंत प्रामाणिक अथवा अधिकारपूर्ण रूप से धार्मिक चिंतन को नियंत्रित करते हैं और इसकी शिक्षा को भी, वह पूर्ण रूप से स्वीकृत हो तब भी, सभी संप्रदायों द्वारा उसे परम मूल्यवान् माना जाता है। इसका प्रभाव केवल दर्शनसंबंधी या विद्याध्ययन संबंधी अथवा सैद्धांतिक ही नहीं है अपितु प्रत्यक्ष एवं जीवंत है, एक ऐसा प्रभाव जो चिंतन और कर्म दोनों पर हो, और इसके विचार वास्तविक रूप से एक जाति और संस्कृति के पुनरुज्जीवन एवं नव-जागरण में एक प्रबल निर्माणकारी शक्ति के रूप में कार्य कर रहे हैं। यहाँ तक कि हाल ही में एक महान् वाणी [व्यक्तित्व] द्वारा यह भी कहा गया है कि आध्यात्मिक जीवन के लिए हमें जिन किन्हीं भी आध्यात्मिक सत्यों की आवश्यकता है वे सभी गीता में प्राप्त हो सकते हैं। उस उक्ति को अत्यन्त शाब्दिक अर्थ में लेना इस ग्रंथ के विषय में अंध-विश्वास को प्रोत्साहित करना होगा। आत्मा का सत्य अनंत है और उसे इस प्रकार से परिसीमित नहीं किया जा सकता। तथापि यह कहा जा सकता है कि अधिकतर प्रधान सूत्र इसमें विद्यमान हैं और आध्यात्मिक अनुभूति एवं उपलब्धि के समस्त परवर्ती विकास के होते हुए भी हम अब भी एक विशाल अनुप्रेरणा एवं मार्गदर्शन हेतु इसकी ओर मुड़ सकते हैं।

 

अतः, गीता के इस अध्ययन में हमारा उद्देश्य इसके विचारों की पांडित्यपूर्ण या शास्त्रीय आलोचना अथवा इसके दार्शनिक सिद्धांत को आत्मतत्त्वसंबंधी अनुसंधान के इतिहास के अन्दर ले आना होगा, ही हम इसके साथ विश्लेषणात्मक तर्कशास्त्री की रीति से ही व्यवहार करेंगे। हम इसके पास सहायता और प्रकाश पाने के लिये आते हैं और इसमें हमारा उद्देश्य होना चाहिए कि इसमें से इसका वह सारभूत और जीवंत संदेश खोज निकालें, जिसे मनुष्य जाति को अपनी पूर्णता और अपनी उच्चतम आध्यात्मिक भवितव्यता के लिए ग्रहण करना है।

II. उपदेश का सारमर्म

 

यहाँ एक ऐसी सुस्पष्ट धारणा की विशेष रूप से आवश्यकता है जो गीता के सारभूत विचार, उसकी शिक्षा के केंद्रीय मर्म को पकड़े रहे, क्योंकि अपने समृद्ध और बहुमुखी विचार से संपन्न होने के कारण तथा आध्यात्मिक जीवन के नानाविध पहलुओं का समालिंगन करने तथा प्रतिपादन की धाराप्रवाह घुमावदार गति से युक्त होने के कारण, अन्य सद्ग्रंथों की अपेक्षा अधिक रूप में, गीता अपने-आप को एक पक्षपातपूर्ण बुद्धि से पैदा हुए एकपक्षीय भ्रांत निरूपण के प्रति खोल देती है।.....

 

इस प्रकार, ऐसे लोग हैं जिनके अनुसार गीता कर्म-योग का प्रतिपादन बिल्कुल भी नहीं करती, अपितु जीवन को और सब कर्मों को संन्यास के लिये तैयार करनेवाली एक साधना का उपदेश करती है: नियत कर्मों को अथवा जो कोई कर्म सामने पड़े उसका तटस्थ अथवा उदासीन निष्पादन ही साधन या साधना है; जीवन और सब कर्मों से अंततः संन्यास ही एकमात्र वास्तविक लक्ष्य है। गीता से ही उद्धरण लेकर और गीता की ही चिंतन-पद्धति में यत्र-तत्र विशिष्ट रीति से बल देकर इस मत को प्रमाणित करना सर्वथा सरल हो जाता है, विशेषकर तब जब संन्यास जैसे शब्द के उस विशेष प्रयोग की ओर से हम अपनी आँखें मूँद लेते हैं जिस विशेष अर्थ में गीता इसका प्रयोग करती है। परन्तु ऐसे मत पर और अधिक डटे रहना तब सर्वथा असंभव हो जाता है जब पक्षपातरहित होकर व्यक्ति देखता है कि ग्रंथ में अंत तक बारंबार इसी पर बल दिया गया है कि अकर्म की अपेक्षा कर्म ही श्रेष्ठ है और समत्व के द्वारा कामना का सच्चा और आंतरिक त्याग कर के कर्मों को परमपुरुष को अर्पण करने में ही वरीयता है।

 

फिर कुछ अन्य लोग इसका वर्णन इस रूप में करते हैं मानो भक्ति-तत्त्व का प्रतिपादन ही गीता की संपूर्ण शिक्षा हो और ऐसा बताकर गीता के अद्वैत तत्त्वों को, और सभी कुछ के एकमेव ब्रह्म में शांत भाव से निवास करने की स्थिति को इसमें जो ऊँचा स्थान दिया गया है उसको पृष्ठभूमि में डाल देते हैं अर्थात् उसकी अवहेलना करते हैं। और निस्संदेह गीता का भक्ति पर दिया बल, इसके द्वारा भगवान् के इस पहलू पर आग्रह कि वे ईश्वर और पुरुष हैं, और फिर इसका पुरुषोत्तम सिद्धान्त जो परम् पुरुष को क्षर और अक्षर पुरुष दोनों से ही श्रेष्ठ सिद्ध करता है और जो कि वही हैं जिन्हें जगत् के सम्बन्ध से हम ईश्वर कहते हैं, ये सब गीता के अत्यंत विलक्षण तथा इसके अत्यंत प्रधान तत्त्वों में से हैं। तो भी, ये ईश्वर ही वह आत्मा हैं, जिनमें संपूर्ण ज्ञान की परिणति होती है, और [ये ही] यज्ञ के प्रभु हैं, सभी कर्म जिनकी ओर ले जाते हैं, और ये ही प्रेममय स्वामी हैं जिनकी सत्ता में भक्तिमय हृदय प्रवेश पाता है। और गीता [इन तीनों में] पूर्ण रूप से उचित संतुलन बनाए रखती है, कहीं ज्ञान पर बल देती है, कहीं कर्म पर और कहीं भक्ति पर, परन्तु वह बल उसके तात्कालिक विचार-प्रसंग के प्रयोजन से होता है, कि इनमें से किसी एक को दूसरों से पृथक् पूर्ण वरीयता देने के लिए होता है। जिनमें इन तीनों का समागम होता है और मिलकर एक हो जाते हैं, वे ही परम् पुरुष पुरुषोत्तम हैं।

 

परन्तु वर्तमान में, वस्तुतः जबसे आधुनिक बुद्धि ने गीता को मानना और उस पर थोड़ा-बहुत विचार करना आरम्भ किया है, तब से लोगों की प्रवृत्ति गीता के ज्ञानतत्त्व और भक्तितत्त्व को गौण मानकर, उसके कर्म पर दिये निरंतर आग्रह का फायदा उठाकर उसे एक कर्मयोग-शास्त्र, कर्म-मार्ग में ले जानेवाला प्रकाश, कर्म-विषयक शास्त्र ही मानने की ओर दिखायी देती है। निस्संदेह गीता एक कर्म-योग-शास्त्र है, परंतु उन कर्मों का जिनकी परिसमाप्ति ज्ञान में अर्थात् आध्यात्मिक सिद्धि में और शांति में होती है, उन कर्मों का जो भक्ति-प्रेरित हैं, अर्थात् अपनी समग्र सत्ता का पहले परम् पुरुष के हाथों में और फिर उनकी सत्ता में सचेतन समर्पण, और यह किसी भी प्रकार उन कर्मों का शास्त्र नहीं है जैसा कि आधुनिक मन कर्मों से समझता है, उन कर्मों का बिल्कुल नहीं जो अहंकार और परोपकार के भाव से किये जाते हैं या जो वैयक्तिक, सामाजिक और मानवतावादी प्रयोजनों, सिद्धान्तों और आदर्शों से प्रेरित होते हैं। फिर भी आधुनिक टीकाएँ गीता का यही अभिप्राय दिखाने की चेष्टा करती हैं। कितनी ही प्रामाणिक वाणियों या सत्ताओं द्वारा हमें बारंबार यह बताया जाता है कि भारतीय विचार और आध्यात्मिकता की जो सामान्य तपश्चर्यात्मक और निवृत्तिमार्गी प्रवृत्ति है, उसका खण्डन करते हुए गीता बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में मानव कर्म के सिद्धान्त की, सामाजिक कर्तव्यों का निःस्वार्थ भाव से निर्वाह करने के आदर्श की, इतना ही नहीं, अपितु (ऐसा लगता है कि) समाजसेवा के सर्वथा आधुनिक आदर्श की भी घोषणा करती है। इन सब बातों का उत्तर मेरे पास इतना ही है कि गीता में, स्पष्ट ही, और केवल इसका ऊपरी अर्थ ग्रहण करते हुए भी, इस तरह की कोई बात नहीं है, यह केवल आधुनिकों द्वारा गलत अर्थ लगाया जाना है, यह एक प्राचीन ग्रंथ का आधुनिक बुद्धि के अनुसार अर्थ लगाना है, एक सर्वथा पुरातन, सर्वथा प्राच्य और भारतीय शिक्षा को वर्तमान यूरोपीय या यूरोपीय रंग में रंगी बुद्धि के अनुरूप पढ़ने की चेष्टा करना है। गीता जिस कर्म का प्रतिपादन करती है वह कोई मानवीय नहीं अपितु दिव्य कर्म है; कोई सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन नहीं अपितु कर्त्तव्य अथवा आचरण के अन्य सभी मानदण्डों को त्याग कर भागवत् संकल्प का निष्काम पालन है जो कि हमारी प्रकृति के द्वारा क्रिया करता है; कोई समाजसेवा नहीं, अपितु सर्वश्रेष्ठ, भगवताविष्टों, महापुरुषों का कर्म है जो निर्वैयक्तिक अथवा अनासक्त भाव से संसार के लिये, तथा उन भगवान् के प्रति यज्ञ-रूप से किया जाता है जो मनुष्य और प्रकृति के पीछे अवस्थित हैं।...

 

अतः आज की मनोवृत्ति के दृष्टिकोण से गीता की व्याख्या करना और गीता से सर्वोच्च और सर्वसंपूर्ण धर्म के रूप में हमें निःस्वार्थ कर्तव्यपालन की बलपूर्वक शिक्षा दिलाना, एक त्रुटि है। जिस प्रसंग से गीतोपदेश हुआ है उसका किंचिन्मात्र विचार करने से ही यह स्पष्ट हो जायेगा कि गीता का ऐसा अभिप्राय हो ही नहीं सकता था। क्योंकि, इस उपदेश का संपूर्ण कारण, जिस प्रसंग से इसका आविर्भाव हुआ है और जिस कारण से शिष्य को गुरु की शरण लेनी पड़ी उसका मूल तो कर्तव्य की परस्पर संबद्ध विविध भावनाओं का जटिल रूप से उलझा हुआ वह संघर्ष है जिसका अंत मानव-बुद्धि के द्वारा खड़े किये गए सारे उपयोगी बौद्धिक और नैतिक भवन के ढहने में होता है। मनुष्य-जीवन में किसी--किसी प्रकार का संघर्ष प्रायः ही उत्पन्न हुआ करता है, जैसे कभी गार्हस्थ्य-धर्म के और देश-धर्म या किसी उद्देश्य या अभियान की पुकार के बीच दुविधा, कभी स्वदेश के दावे और मानव जाति की भलाई या किसी बृहत्तर धार्मिक या नैतिक सिद्धांत के बीच संघर्ष। यहाँ तक कि एक आन्तरिक संकट या समस्या भी उत्पन्न हो सकती है, जैसी कि गौतम बुद्ध के जीवन में उपस्थित हुई थी, जिसमें अंतःस्थित भगवान् के आदेश का पालन करने के लिए सभी कर्त्तव्यों को त्याग देना, कुचल डालना और एक ओर फेंक देना होता है। मैं नहीं समझता कि गीता इस प्रकार के आंतरिक संकटकाल का समाधान बुद्ध को पुनः अपनी पत्नी और पिता के पास भेजकर और उन्हें पुनः शाक्य राज्य की बागडोर हाथ में देकर करेगी; ही यह एक रामकृष्ण को किसी स्वदेशी पाठशाला में पंडित बनकर छोटे बालकों को निष्काम भाव से पाठ पढ़ाने का निर्देश करेगी; ही यह एक विवेकानन्द को अपने परिवार के भरण-पोषण करने के लिए बाध्य करेगी और इसके लिए वीतराग होकर वकालत या चिकित्सा या पत्रकारिता का पेशा अपनाने को कहेगी। गीता निःस्वार्थ कर्त्तव्य पालन की नहीं अपितु दिव्य जीवन के अनुकरण की शिक्षा देती है, 'सर्वधर्मान्', सभी धर्मों का परित्याग कर के, एकमात्र परमात्मा का ही आश्रय ग्रहण करने की शिक्षा देती है; और एक बुद्ध, रामकृष्ण या विवेकानन्द का भगवद्-कर्म गीता की इस शिक्षा से पूर्णतः समस्वर अथवा अनुरूप है। यही नहीं, यद्यपि गीता कर्म को अकर्म से श्रेष्ठ मानती है, परंतु कर्म-संन्यास का निषेध नहीं करती, अपितु इसे भी भगवान् तक पहुँचने के अनेक मार्गों में से एक के रूप में स्वीकार करती है। यदि उसकी प्राप्ति केवल कर्म तथा जीवन तथा सभी कर्त्तव्यों के त्याग करने से ही होती हो और भीतर से पुकार प्रबल हो तो इन सबको अग्नि में होम कर ही देना होगा, इसमें किसी का कोई वश नहीं चल सकता। भगवान् की पुकार अलंघ्य है, और अन्य किन्हीं भी हेतुओं के सामने इसकी तुलना नहीं की जा सकती।

 

इसके सदृश अन्य किसी भी महान् ग्रंथ की तरह ही गीता को इसकी संपूर्णता में पढ़कर तथा एक उत्तरोत्तर विकसनशील विचार के रूप में इसका अध्ययन करने पर ही समझना सम्भव है। परन्तु आधुनिक टीकाकारों ने, बंकिमचंद्र चटर्जी जैसे उच्च कोटि के लेखक से आरंभ कर, जिन्होंने पहले-पहल गीता को, इस नए अर्थ में, कर्त्तव्य निष्पादन का अर्थ प्रदान किया, गीता के पहले तीन या चार अध्यायों पर ही प्रायः पूर्ण बल दिया है, और उनमें भी समता के विचार पर और 'कर्तव्यं कर्म' की उक्ति पर, जिसका अभिप्राय वही है जो आधुनिक दृष्टि में कर्त्तव्य शब्द से समझा जाता है, और इस उक्ति पर बल दिया जाता है कि 'कर्म में ही तेरा अधिकार है, कर्मफल में जरा भी नहीं' जिसे कि गीता के महावाक्य के रूप में प्रचलित तौर पर उद्धृत किया जाता है। और उच्च दर्शन अथवा तत्त्वज्ञानसंपन्न शेष अठारह अध्यायों को गौण महत्त्व प्रदान किया जाता है, हाँ, अवश्य ही ग्यारहवें अध्याय के विश्वरूप-दर्शन को छोड़कर। आधुनिक बुद्धि के लिए ऐसा बिल्कुल स्वाभाविक है जो कि तत्त्वसंबंधी सूक्ष्मताओं तथा अतिदूरवर्ती आध्यात्मिक अनुसंधानों के प्रति असहिष्णु होती है या अभी कल तक भी असहिष्णु रही है, और अर्जुन के समान ही कर्म में रत होने को आतुर रहती है तथा मुख्य रूप से कर्म के किसी व्यवहार्य विधान 'धर्म' से ही प्रयोजन रखती है। परंतु गीता जैसे ग्रंथ से व्यवहार करने का यह अनुचित तरीका है।

(ii.47)

 

xviii 66

 

प्रश्न : जबकि गीता का महावाक्य है: 'सर्वधर्मान् परित्यज्य....' फिर भी आम तौर पर जब भी गीता की चर्चा होती है तब अधिकांश लोग 'कर्मण्येवाधिकारस्तु...', कि तुम्हारा केवल कर्म का अधिकार है, फल का नहीं, ऐसे ही विचारों पर विशेष बल क्यों देते हैं और जो महावाक्य है उस पर विशेष ध्यान नहीं देते?

 

उत्तर : स्वयं गीता में तीसरे ही अध्याय में भगवान् कहते हैं कि 'कर्म तो मेरी ही प्रकृति करती है, केवल मूढ़जन ऐसा समझते और कहते हैं कि वे स्वयं कर्मों के कर्ता हैं।' परंतु जिन टीकाकारों को इस बात का कोई गहरा अनुभव नहीं होता वे ही इस प्रकार की उक्ति कर सकते हैं कि गीता कर्म को ही प्रधान बता रही है। और फिर विभिन्न प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा गीता पर लिखी टीकाओं में इस विचार पर बल देने के कारण ही यह आम प्रचलन में इस तरह समझा जाता है। परंतु फल की इच्छा रखे बिना किये जाना वाला यह निष्काम कर्म वास्तव में तो हम जीवन में लागू हो कैसे कर सकते हैं, क्योंकि कामना-रहित कर्म करना क्या हमारे वश में है? इस कर्म की विषमता को देखकर ही तो अर्जुन यह पूछता है कि ऐसा कर्म संभव ही कैसे हो सकता है। यदि कामना हो तो व्यक्ति कर्म करेगा ही क्यों और यदि करेगा भी तो विभिन्न कर्मों विकल्पों के बीच उसके लिए चुनाव करने का आधार ही क्या होगा? इसी के उत्तरस्वरूप भगवान् यज्ञरूप से कर्म करने के विचार का निरूपण करते हैं कि 'सारा जीवन यज्ञमय बनाओ, 'मेरी' प्रसन्नता के निमित्त कर्म करो। इसी से तुम्हारी समस्या का हल होगा।' श्रीअरविन्द की गीता के ऊपर टीका से प्रभावित होकर ही योगी श्रीकृष्णप्रेम ने दिलीप कुमार रॉय को कहा था कि हर हिन्दुस्तानी को इसे पढ़ना चाहिए क्योंकि इसमें जिन तत्त्वों का निरूपण हुआ है, वे और कहीं नहीं मिल सकते। इसी से प्रभावित होकर श्री दिलीप कुमार श्रीअरविन्द के संपर्क में आए उनके शिष्य बने।

 

प्रश्न : क्या ऐसा कह सकते हैं कि श्रीअरविन्द के पूर्ण योग में सभी योग-पद्धतियों के समन्वय होने के पूर्व गीता ही एक सर्वाधिक समन्वयकारी पुस्तक रही है जो सभी योग-पद्धतियों को लेकर उनका समन्वय साधते हुए उन्हें अतिक्रम कर जाती है?

 

उत्तर : अवश्य ही, इसीलिए इसे सर्वोच्च ग्रंथ, हिन्दु धर्म की बाइबल के रूप में माना जाता है। ऐसा नहीं था कि श्रीअरविन्द की टीका से पहले किसी को गीता के ऐसे समन्वयात्मक स्वरूप की समझ हो। परंतु आधुनिक मानसिकता के लिये इसे समझ पाना कठिन है। जिस तरह के कर्म की