श्रीमद्भागवत रहस्य

 

 

 

 

 

महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारसमिति

आत्मवित् शोकं तरतिं

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

महर्षि मुक्त

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्रीमद्भागवत रहस्य

 

प्रणेता                     :                               महर्षि मुक्त

 

प्रकाशक                :                               महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचार समिति

केन्द्र दुर्ग (..) पंजीयन क्रमांक 2093/94,

रायपुर (सर्वाधिकार सुरक्षित प्रकाशकाधीन)

 

फोटोटाईप सेटिंग :                              नेचर ग्राफिक्स शांति चौक, पुरानी बस्ती,

रायपुर (..) मो.: 93022-30478

 

मुद्रक महावीर      :                               आफसेट गीता नगर, चौबे कॉलोनी, रायपुर (..)

मो.: 93036-08080

 

संस्करण                               :                               द्वितीय

 

प्रति                        :                               1000 (एक हजार)

 

दिनांक                   :                               19 जुलाई 2016

 

पुस्तक मिलने का पता-                     डॉ. सत्यानंद त्रिपाठी 61/152, बंधवापारा,

रायपुर (..) मो.: 99261-30014

 

प्रकाशन क्रमांक   :                               3

 

मूल्य                      :                               150/-

 

 

 

 

 

श्रीमद्भागवत रहस्य

 

आख्यान सूची क्रमांक

 

आरती.. 4

श्रीमद्भागवत रहस्य... 6

नारायणोपनिषत्. 8

प्रथम दिवस. 9

भूमिका, महिमा एवं चतु:श्लोकी भागवत. 9

द्वितीय दिवस. 47

भगवान नारद एवं राजा प्राचीनबर्हि संवाद द्वारा कर्मो का विश्लेषण, राजा पुरंजनोपाख्यान के माध्यम से जीव ईश्वर एकता का विश्लेषण   47

तृतीय दिवस. 89

प्रह्लादोख्यान जीवन का लक्ष्, आनंद की प्राप्ति गृहस्थाश्रम आत्मपात एवं अंधकूप है, उपासना ज्ञान भक्ति.... 89

चतुर्थ दिवस. 140

गजेन्द्रोपाख्यान के माध्यम से अस्तित् निरुपण श्री कृष् जन्मकथा.. 140

पंचम दिवस. 183

भगवान कृष् की बाललीला, ब्रह्मस्तुति, चीरहरण, उद्वव गोपी संवार, भ्रमर गीत. 183

षष्ठम दिवस. 224

यदुवंशियों को ऋृषियों का शाप, भगवान कृष् का उद्वव को उपदेश हंसोपाख्यान. 224

सप्तम दिवस. 259

परीक्षित मोक्ष.. 259

महर्षि मुक्त. 266

 

 

 

 

 

 

 

आरती

 

आरती सद्गुरुदेव नमामी पार ब्रह्म-प्रभु अन्तर्यामी ।।

अगुण अपार अलख अविनाशी। अचल विमल प्रभु सब उरवासी ।।

निर्गुण निर्विकार सुखरासी एक अरूप अलेख अनामी ।। 1 ।।

 

महिमा नेति नेति श्रुति गावें नित्य निरंजन सब बतलावें ।।

शेष शारदा पार पावें जय सच्चिदानंद अभिरामी ।। 211

 

वचन किरण तम मोह विनाशक ज्ञान सूर्य माया के शासक ।।

दिव्य दृष्टि के परम प्रकाशक ब्रह्मादिक सुर सेव्य नमामी ।। 3 ।।

 

जब तक कृपा तुम प्रभु करते। विधि हरिहर क्या भव से तरते ।।

असविचारि गुरु भक्ति जो करते। मिलते राम उन्हें सुखधामी ।। 4 ।।

 

गुरूवर चरण कमल की छाया। करती दूर ताप त्रय माया ।।

जब तक पूर्ण होवे दाया। मिलत नहीं शिव अन्तर्यामी ।। 5 ।।

 

भक्ति ज्ञान वैराग्य नियम के। रूप सकल इंद्रिय संयम के ।।

भूषण शम दम पंच सुयम के श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ मम स्वामी ।। 6 ।।

 

जीवन धन मंजुल निज जन के। अंकुश मद मतंग जन मन के ।।

शुचि पथ परमारथ पथिकन के। इक रस आनंद रूप नमामी ।। 7 ।।

 

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

 

शान्तिः शान्तिः शान्तिः

 

।। बोलो सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

 

 

 

 

 

 

 

श्रीमद्भागवत रहस्य

 

महर्षि मुक्त द्वारा श्रीमद्भागवत परमहंस संहिता के साक्षित्व में सप्तदिवसीय अध्यात्म निरूपण दिनांक 8 फरवरी 1969 से 24 फरवरी 1969 तक स्थान- झंडापुर, पोस्ट-बिहार, तहसील-कुंडा, जिला-प्रतापगढ़ (.प्र.) पर आधारित यह अनुपमेय और विलक्षण कृति महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचार समिति की अन्यतम उपलब्धि है।

 

भागवत का अर्थ होता है-भगवान। चूँकि इसमें भागवत के रहस्यों का उद्घाटन किया गया है, इसलिए प्रस्तुत साहित्य को श्रीमद् भागवत रहस्य नाम से अलंकृत किया गया है। भगवान के चार रहस्य हैं

 

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुण कर्मकः

तथैव तत्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।

 

यावानहं (मैं जैसा हूँ) - भगवान। मैं जैसा हूँ का भाव, मैं जैसा हूँ का रूप, मैं जैसा हूँ का गुण और मैं जैसा हूँ का कर्म। ये चार रहस्य-भगवान-के। इन रहस्यों को उजागर करना सिवाय संतों के अन्य किसी विद्वान या साधु संन्यासी के वश की बात नहीं है। इन रहस्यों का सम्यक् रूप से अपरोक्ष अनुभूति इस पुस्तक का प्राण है, इसलिए यह चेतन साहित्य है।

 

चतुःश्लोकी भागवत के माध्यम से इस तरह का निरुपण पहले कभी ना हुआ है और ना ही आगे होने की संभावना है। इसके अतिरिक्त इसमें भगवान नारद एवं राजा प्राचीनबर्हि संवाद पुरञ्जनोपाख्यान, गजेन्द्रोपाख्यान, ब्रह्मा स्तुति, उद्धव गोपी संवाद, हंसोपाख्यान आदि प्रसंगों के माध्यम से जीव-ईश्वर की एकता, कर्म, उपासना, ज्ञान, भक्ति, मन-माया-जगत आदि का चारों प्रमाणों से संसिद्ध निरुपण की अलौकिक छटा देखते ही बनती है जो कि कहीं और देखने-सुनने में नहीं आता। निरुपण शैली की सहजता एवं अकाट्य प्रमाणों से वेदान्त जैसे क्लिष्ट विषय भी जनसाधारण को हृदयंगम हो जाता है। यह प्रवक्ता का तपोबल एवं संयम है। यह एक चमत्कार है।

 

मैं इस सांगोपांग अनुपम कृति के प्रवक्ता महर्षि मुक्त के संबंध में इतना ही कहूँगा कि- 'आप प्रकट भये विधि बनाये।' ये अनिकेत अवधूत थे। किसी पंथ, सम्प्रदाय से सर्वथा निर्लिप्त। अविरल रूप से सत्य के सार्वभौम प्रचारक महर्षि मुक्त की साधना-तपस्या का साक्षी, इनका साहित्य ही है, जीवन पर्यन्त, भेद बुद्धि का त्याग करके सत्य का ही प्रचार-प्रसार किये। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की धारणा को धारण करके अपने लिये एक घास-फूस की कुटिया भी नहीं बनाई उन्होंने।

 

वे कहा करते थे कि फकीरी हमारी जागीर है और हमेशा हमारी मुट्ठी में है। इनका विश्वास था कि पंथ, सम्प्रदाय में आने से व्यक्ति की स्वतंत्रता छिन जाती है और वह अध्यात्म से कोसों दूर हो जाता है।

 

आज भी इनके लाखों की संख्या में समर्पित अनुयायी हैं लेकिन सभी पंथ, सम्प्रदाय से अलग-थलग एकदम स्वतंत्र

 

इनकी कृतियों में मुक्तानुभव भजन माला, भजन मुक्त लहरी, मुक्त दोहावली, मुक्तोद्गार, पैगाम--मुक्त आदि मौलिक रचनायें हैं। इन सभी रचनाओं में महर्षि मुक्त सूत्रावली अनुपम एवं अद्वितीय कृति है। इसमें उपनिषद्, श्रीमद्भागवत परमहंस संहिता, श्रीमद्भागवत गीता एवं रामायण के तत्वपरक आध्यात्मिक प्रसंगों की रचना की गई है, जिनकी संख्या लगभग पच्चीस हजार के करीब होगी जो विश्व मानव के लिए अनुपम धरोहर है। इन्हें प्रकाशित कराकर आप तक पहुँचाने का प्रयास जारी है।

 

श्रीमद्भागवत रहस्य का द्वितीय संस्करण आपको सौंपते हुए हमें अपार प्रसन्नता है। प्रकाशन में विलम्ब के लिए हमें खेद है। इस पुस्तक के प्रथम संस्करण में चौथे दिन के द्वितीय प्रहर की कथा कृष्ण जन्म का अंश अप्राप्त होने के कारण छूट गया था किन्तु अब वह प्राप्त हो गया है और उसे जोड़ दिया गया है जिससे पुस्तक की कमी पूरी होकर अब एक सांगोपांग कृति बन चुकी है।

 

प्रथम संस्करण में जिन महानुभावों का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यज्ञ रुप से सहयोग मिला है, उनकी लगन, श्रम और सहयोग स्तुत्य है। यह उन्हीं के भगीरथ प्रयास का सुफल है कि देव दुर्लभ सदुपदेश से परिपूर्ण कृति हम आपके समक्ष प्रस्तुत करने में समर्थ हुए हैं। वे सभी महानुभाव साधुवाद के पात्र हैं। समिति उनकी आभारी है।

द्वितीय संस्करण के संशोधन में श्री रूपेन्द्रनाथ तिवारी जी, एम.. (दर्शनशास्त्र, हिन्दी) का सहयोग अत्यंत प्रशंसनीय एवं सराहनीय रहा है। समिति के संरक्षक डॉ. सत्यानंदजी महाराज, जिनकी प्रेरणा एवं आशीर्वाद स्वरुप इस श्रम साध्य कार्य को हम साकार कर सके, समिति उनका चिर आभारी है।

 

नेचर ग्राफिक्स के संचालक भाई नितिन कुमार झा जी जिन्होंने ऐसे कठिन साहित्य को बड़ी लगन एवं सावधानीपूर्वक टंकण करके इसकी भाषा को शुद्ध एवं सुवाच्य बनाया है वे साधुवाद के पात्र हैं। हम उनके आभारी हैं।

 

हमारा पूरा-पूरा प्रयास रहा है कि कृति के प्रकाशन में त्रुटि अथवा अशुद्धि रह जाये फिर भी यदि कोई त्रुटि रह गई हो तो हमें क्षमा करें। समिति के इस प्रयास को विद्वतजन सराहेंगे और भक्त साधुजन मान्यता देंगे एवं जिज्ञासुगण अवगाहन करेंगे इन्हीं आशाओं के साथ, अलं !

 

आपका अभिन्न

 

(डॉ. प्रीतम मिश्रा)

   अध्यक्ष

महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति

केन्द्र-दुर्ग (..)

 

स्थान : रायपुर

दिनांक : 19 जुलाई 2016 आषाढ़, गुरु पूर्णिमा

 

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।। श्री गणेशायनमः ।।

।। श्री गुरुवेनमः ।।

 

नारायणोपनिषत्

 

अथ पुरुषो वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति गुनारायणात् प्राणो जायते। मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी। नारायणाद् ब्रह्मा जायते। नारायणात् रुद्रो जायते। नारायणाद् इन्द्रो जायते नारायणात् प्रजापतिः प्रजायते

 

नारायणाद्वादशादित्या सर्वे रुद्रा सर्वे वसवः सर्वाणि भूतानि सर्वाणि छन्दांसि नारायणादेव समुत्पद्यन्ते नारायणात्प्रवर्तन्ते नारायणे प्रलीयन्ते

 

अथ नित्यो नारायणः ब्रह्मा नारायणः शिवश्च नारायणः। शक्रश्च नारायणः। कालश्च नारायणः दिशश्च नारायणः विदिशश्च नारायणः। ऊर्ध्वं नारायणः अधश्च नारायणः। अन्तर्बहिश्च नारायणः।

 

नारायण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् निष्कलंको निरञ्जनो निर्विकल्पो निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो द्वितीयोऽस्ति कश्चित्। एवं वेद विष्णुरेव भवति विष्णुरेव भवति।

 

शांतिः ! शांतिः !! शांतिः !!!

 

 

 

 

प्रथम दिवस

भूमिका, महिमा एवं चतु:श्लोकी भागवत

 

18-2-1969, प्रातः 10.00 से 12.00 बजे तक

 

अनन्त नाम रूपों में अभिव्यक्त, अहमत्वेन प्रस्फुरित, महामहिम, स्वात्मस्वरूप सकल चराचर एवं समुपस्थित आत्मजिज्ञासुगण !

 

'उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्यवरान्निबोधत '

(कठो..)

 

अनादिकाल से अविद्या के घोर अंधकार में सोने वालों भव्य जीवो। 'उत्तिष्ठत'-उठो स्वस्वरूप भगवान आत्मा में जागो। किसी श्रेष्ठ महापुरुष श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु की शरण होकर अपना आत्म-कल्याण करो।

 

अनन्त जन्मों के पूर्वार्जित पुण्यों के उदय होने पर आज से यहाँ पर श्रीमद् भागवत, महापुराण परमहंस संहिता के आधार पर अध्यात्म निरूपण होने जा रहा है। जिस प्रकार मंदिरों में किसी मूर्ति की अध्यक्षता में भगवान की आराधना होती है उसी प्रकार श्रीमद् भागवत, उपनिषत, श्रीमद्भगवत गीता, श्री रामायण आदि शास्त्रों की अध्यक्षता में, उनके साक्षित्व में, सिद्धांतों द्वारा अध्यात्म निरूपण होता है।

 

आत्मजिज्ञासुओं ! आज इस पावन बेला में जो कुछ अध्यात्म निरूपण होगा वह सब श्रीमद्भागवत परमहंस संहिता के साक्षित्व में होगा। भागवत पुराण के माध्यम से होगा अर्थात् जो कुछ भी यहाँ कहा जायेगा उसे श्रीमद् भागवत पुराण समर्थन करेगा। इस पुराण की अलौकिक महिमा है। एक जन्म नहीं अनन्त जन्मों के जब पुण्य होते हैं तभी श्रीमद् भागवत पुराण अध्यात्म तत्व श्रवण करने का अवसर आता है। इसमें स्वस्वरूप स्थित श्री परमहंस स्वामी शुकदेव जी राजा परीक्षित की आत्म तत्व का दर्शन कराते हैं। इस पुराण में अनेक वेद मंत्रों सहित उनके तत्वों की सुंदर-सुंदर कथा, आख्यानों द्वारा प्रतिपादन एवं उपदेश हुआ है।

 

एवेद्ꣲ᳭  सर्वम् नारायणेवेद्ꣲ᳭  सर्वम् आत्मैवेद् सर्वम् ꣲ᳭  अहमेवेद् सर्वम। वासुदेवः सर्वमिति इत्यादि मंत्रों का उपदेश श्री स्वामी शुकदेव जी राजा परीक्षित को किए हैं।

 

 

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराष्ट्

तेने ब्रह्म हृदाय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः

तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा,

धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ।।

(श्रीमद्भागवत 1/1/1)

 

धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां

वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्

श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीस्वरः

सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रुषुभिस्तत्क्षणात् ।।

(श्रीमद्भागवत 1/1/2)

 

निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्

पिवत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ।।

(श्रीमद्भागवत 1/1/3)

 

ये तीनों श्लोक श्रवण, मनन, निदिध्यासन के रूप में महर्षि व्यास जी प्रतिपादित किए गये हैं।

 

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।।

(वृहदा 4-5-6)

 

श्री भगवान व्यास जी श्रुति के इसी मंत्र को छंद के रूप में छंदबद्ध कर दिये हैं। यह आत्मा द्रष्टव्यः (देखने योग्य) अनुभव करने योग्य, श्रोतव्य:' सुनने योग्य एवं निदिध्यासितव्यः- निदिध्यासन करने योग्य है इसीलिए इस आत्म तत्व का विवेचन श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के सामीप्य में ग्रहण करना चाहिए।

 

हाँ जी-श्रवण, मनन, निदिध्यासन का इन श्लोकों में निरूपण हुआ है। तो इनका स्वरूप क्या है? देखो किसी भी मंत्र को समुचित ज्ञान के लिए मंत्र समझने के लिए, मंत्र को तीन तरह से परखना चाहिए। अर्थानुसंधान द्वारा भावानुसंधान द्वारा और लक्ष्यानुसंधान द्वारा। वृत्ति कहो या मन कहो ये दोनों परस्पर एक ही भाव के द्योतक हैं। संत समाज में इसी को 'सुरति' कहते हैं साधारण भाव में मन कहते हैं। देखो समझो विषय (डंडे का उदाहरण देकर विषय समझते हैं।) डंडे का जो आकार है यह हुआ डंडे का अर्थ और इसमें जो वृत्ति की एकाग्रता, उसे कहते हैं अर्थानुसंधान। लकड़ी जो है वह डंडे का भाव है। इसमें जो वृत्ति की एकाग्रता, उसे कहते हैं भावानुसंधान और इसका लक्ष्य क्या है? चेतन तत्व भगवान आत्मा। इसमें जब वृत्ति एकाग्र हो जाय तो उसे कहते हैं लक्ष्यानुसंधान

 

श्रवणं शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि

निदिध्यासं लक्षगुणमनन्तं निर्विकल्पकम् ।।

(विवेक चूड़ामणि .नि. 365)

 

श्रवण की अपेक्षा मनन करने में सौ गुना अधिक फल होता है। मनन की अपेक्षा निदिध्यासन करने में एक लाख गुना फल होता है। निदिध्यासन की अपेक्षा चित्त का निर्विकल्प हो जाना-इसका फल अनन्त गुना होता है।

 

धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां

वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् ।।

श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः

सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ।।2।।

 

यह मनन है।

 

निगम कल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्

पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ।।3।।

 

यह निदिध्यासन है।

 

देखो-बालक श्रृंगी ऋषि ने अपने पिता के गले में सर्प डालने के अपराध में राजा परीक्षित को श्राप दिया कि आज के सातवें दिन तक्षक जाति का सर्प आकर तुझे डस लेगा। राजा परीक्षित राज्य एवं प्राण का मोह त्याग कर उत्तराभिमुख हो (उत्तर दिशा की ओर मुँह करके) व्याकुल दशा में बैठ गया और उसे यह निश्चय हो गया कि आज के सातवें दिन अवश्यमेव मृत्यु हो जायेगी। इसी कारण उसके हृदय में पूर्ण वैराग्य जाग्रत हो गया। मछली की तड़प की नाई उसका मन आत्म तत्व को जानने के लिए उत्कंठित हो गया कि मेरा आत्म कल्याण कैसे हो? और यह भी सात ही दिन में। कारण? अब उसे सात ही दिन जीना है।

 

 

अत्रिर्वसिष्ठश्च्यवनः शरद्वानरिष्टनेमिभृगुरङ्किराश्च

पराशरौ गाधिसुतोऽथ राम उतध्य इंद्रप्रमदेध्मवाहौ ।।

मेधातिथिर्देबल आष्टिषेणो भारद्वाजो गौतमः पिप्लादः

मैत्रेय और्वः कवषः कुम्भयोनिद्वैपायनो भगवान्नारदश्च

अन्ये देवर्षिब्रह्मर्षिवर्या राजर्षिवर्या अरुणादयश्च

नानार्षेयप्रवरान्समेतानभ्यर्च्य राजा शिरसा ववन्दे ।।

(श्रीमद् भागवत 1/19/9-10-11)

 

उस समय बड़े-बड़े देवर्षि, ब्रह्मर्षि, राजर्षियों का शुभागमन, जहाँ राजा परीक्षित बैठे थे हुआ। यह निर्विवाद सिद्धांत है, यह ईश्वरीय विधान है कि जिस समय आत्म जिज्ञासु को मछली के समान तड़प यानी आत्म जिज्ञासा जागृत होती है अर्थात् उसे आत्मतत्व जानने की व्याकुलता होती है, उसका चित्त जब संसार से पूर्णतया उपराम हो जाता है तब महापुरुषों का दर्शन स्वयमेव होता है। स्वयं वे दर्शन देंगे, उसका कल्याण करने हेतु जाते हैं और इस तरह का समागम संसार से तरने का नोटिस है। श्रीमद् भागवत के दसवें स्कन्ध के उत्तरार्द्ध में महाराजा मुचकुंद जी भगवान की स्तुति करते हैं-

 

भवापवर्गोभ्रमतो सदा भवेज्जनस्य तहांत्त्युत सत्समागमः

सत्सङ्गगमो यर्हि तदैव सद्गतौ परावेरेरो त्वयि जायते मतिः

(श्रीमद् भागवत 10/51/54)

 

हे अच्युत ! हे प्रभो ! भगवान ! जब जीवों के अपवर्ग अर्थात् मोक्ष होने को होता है, जब आप संसार से उनके उद्धार की इच्छा करते हैं तो अपने भागवत (संतों) का दर्शन, उनका समागम उन्हें आप स्वयं ही करा देते हैं। अपवर्ग का अर्थ मोक्ष होता है।

 

का अर्थ हुआ नहीं, वर्ग का अर्थ हुआ

 

जानते ही हो व्याकरण में वर्ग अर्थात्

 

वर्ग अर्थात् इसी तरह वर्ग का अर्थ हुआ

 

हाँ जी, का अर्थ पापं नास्ति। जब पाप नहीं तो फिर पुण्य भी नहीं। पुण्य पाप दोनों गए। पुण्यं पापं नास्ति

 

का अर्थ फलं नास्ति। फल की आकांक्षा नहीं।

 

का अर्थ बंधनं नास्ति। जब फल की आकांक्षा नहीं तो फिर बंधन कैसे? किए कर्मफल कहाँ।

 

का अर्थ - भयं नास्ति। कर्म फल ही तो बंधन का कारण है, जिससे सुख-दुःख मिलता है। जब बंधन ही नहीं तो भय किसका

 

का अर्थ- मानं नास्ति। मान नहीं। जब मान नहीं तो अपमान भी नहीं। तो जहाँ वर्ग हो उसे कहते हैं अपवर्ग।

 

अरे भाई ! बंधन के ही अंदर मान-अपमान है। जहाँ पुण्य पाप नहीं वहाँ उसका फल क्या होगा और जब फल ही नहीं तो बंधन किसका होगा? और जब बंधन नहीं तो फिर भय किसका। इसी को कहते हैं अपवर्ग अर्थात् मोक्ष। जिस समय किसी को अतीव आत्म जिज्ञासा, आत्म कल्याण की भूख प्रज्ज्वलित हो जाती है तो सर्वप्रथम संतों का दर्शन होता है और संत समागन से उसका मोक्ष हो जाता है।

 

जिस समय राजा परीक्षित अपने आत्म कल्याण की भावना में ध्यान मग्न था उसी समय ध्यान टूटते ही देखता है कि झुण्ड के झुण्ड महात्मागण रहे हैं, जिससे कि राजा परीक्षित का आत्म कल्याण हो। महात्मागण जब राजा परीक्षित के पास गए तब राजा उठा और उन सबको अभिवादन, दण्ड का प्रणाम किया तथा सबका पूजन किया और सबके सन्मुख हो प्रार्थना किया का राजा निवेदन करता है कि हे प्रभो! मेरा जीवन सात ही दिन शेष है। थोड़ा का समय है। इस थोड़े समय में मेरा आत्म कल्याण कैसे होगा? मुझसे अज्ञानतावश अनिष्ट हो चुका है। पंच वर्षीय बालक श्रृंगी ऋषि के श्राप से आज से सातवें दिन तक्षक जाति का सर्प आकर मुझे डस लेगा। मेरी मृत्यु तो सामने खड़ी है। कि मुझे उपदेश करिये जिससे कि मेरा आत्म कल्याण हो।

 

राजा परीक्षित ने अपने आत्म कल्याण की जिज्ञासा भगवान व्यास, वामदेव, जा वसिष्ठ महर्षिगणों के समक्ष रखी, परन्तु उस समय ऋषियों को कोई उपायको नहीं सूझा। किसी की बुद्धि काम नहीं आई। उसी समय सोलह वर्षीय व्यासनंदन श्री शुकदेव स्वामी दिगम्बर रूप में, अवधूत वेश में, श्याम रंग, प्रकीर्ण जटाएँ, लम्बी-लम्बी भुजाएँ आजानुबाहु निजानंद में मस्त स्वरूप आत्मा में लीन, मुस्कराते हुए उस सभा में जहाँ ये महर्षिगण बैठे थे, आए। राजा परीक्षित ने यही जिज्ञासा पूर्ण प्रश्न भगवद्धर्म के परिज्ञाता भगवान वादरायणि स्वामी शुकदेवजी के समक्ष रखा कि हे प्रभो! मेरा उद्धार कैसे हो? मैं आर्त हूँ। आज से सातवें दिन ऋषि कुमार के शाप से तक्षक मुझे डस लेगा। मैं मृत्यु के निकट हूँ। इस दशा में मेरा आत्म कल्याण कैसे होगा? इस संसार सागर से मेरा उद्धार कैसे होगा? यहीं से श्री स्वामी शुकदेवजी और राजा परीक्षित का संवाद शुरू होता है।

 

एवमाभाषितः पृष्टः राज्ञा श्लक्ष्णया गिरा

प्रत्यभाषत धर्मज्ञो भगवान बादरायणिः ।।

(श्रीमद्भागवत 1/19/40)

 

इस प्रकार सम्राट परीक्षित की जिज्ञासा देखकर भगवद्धर्म के परिज्ञाता भगवान बादरायणि श्री स्वामी शुकदेवजी बोले-

 

वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितो नृप

आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ।।

(श्रीमद् भागवत 21/1 / 1)

 

हे राजन! एष ते प्रश्नः वरीयान् जगत के जीवमात्र के कल्याण के लिए यह तुम्हारा प्रश्न महान श्रेष्ठ एवं आत्म वित्सम्मत है। यानी बड़े से बड़े आत्मवेत्ता पुरुष भी तुम्हारे इस प्रश्न का समर्थन करते हैं। राजा परीक्षित का यह आत्मपरक प्रश्न कि किस तरह संसार सागर से उद्धार हो, जीवमात्र का कल्याण कैसे हो? श्री स्वामी शुकदेवजी के समक्ष रखा गया।

 

बड़े-बड़े आत्मनैष्ठिक विद्वान महात्माओं के समक्ष यदि कोई प्रश्न करना हो तो यही एकमात्र प्रश्न करना चाहिए कि प्रभो! मैं कौन हूँ? यथार्थ में यह प्रश्न सुंदर एवं मौलिक है। हालांकि यह प्रश्न सूक्ष्म है और जैसी आशा की जाती है कि इसका उत्तर भी छोटा होगा, परन्तु ऐसा नहीं है। उत्तर इतना विस्तृत है कि जीवन पर्यन्त भी इस प्रश्न पर विवेचन हो फिर भी वह अनंत है। इस छोटे से प्रश्न में अनेक सारगर्भित समाधान निहित हैं। इस संदर्भ में एक वृद्धा कुमारी का दृष्टांत सुनो- कैसे एक छोटे से प्रश्न में अनेक समस्याएँ भरी रहती हैं।

 

किसी समय एक ब्राह्मण कुमारी के शादी योग्य होने पर उसके विवाह हेतु वर ढूँढ़ा गया। दैवयोग-कन्या का अभाग्य, विवाह के पूर्व ही चुना हुआ वर मर गया। तब गाँव के लोग उसके लिए दूसरा उपयुक्त वर ढूँढ़ने लगे, परन्तु अभाग्य कन्या का कि कोई भी ढूँढ़ा गया वर उसे प्राप्त हुआ। विवाह के पूर्व ही वह मर जाता था। समय बीत गया, वह कुमारी अब कुमारी रही, चालीस वर्ष की वृद्धा हो गई। अब कौन शादी करे। विवाह हुआ। एक बार कोई महात्मा उसे उपदेश कर गए कि तू इन्द्रदेव की आराधना कर, तेरे भाग्य फिर सकते हैं। आराधना से इन्द्रदेव प्रसन्न होकर जब वरदान देने के लिए प्रगट होंगे तो उनसे वरदान मांगना कि 'मे पुत्राः स्वर्णपात्रे भुञ्जीरन्।' मेरे पुत्र स्वर्ण पात्र में खीर का भोजन करें।

 

वह वृद्धा कुमारी श्री इन्द्रदेव की बड़ी भक्ति भाव से आराधना की। कुछ साल बाद उसकी तपस्या फलवती हुई। इन्द्रदेव प्रगट हुए और कहे कि देवि ! वर वृणीश्व-वर मांगो। वह ब्राह्मणी कहती है कि 'मे पुत्राः स्वर्णपात्रे भुञ्जीरन् ' मेरे पुत्र स्वर्णथाल में भोजन करें और यहाँ यह हाल कि वृद्धा कुमारी के विवाह का ही पता नहीं, फिर पुत्र कहाँ, धन कहाँ। इन्द्रदेव भी चक्कर में पड़े। वृद्धा कुमारी के विवाह का ही पता नहीं, परन्तु सब कुछ मांग लिया। इन्द्रदेव तथास्तु कहकर अन्तर्द्धान हो गए। इन्द्रदेव की कृपा से वृद्धाकुमारी को कौमार्यपन, सुंदर षोडसी रूप मिला। शादी हुई, धनधान्य से सम्पन्न हुई और पुत्र लाभ हुआ क्योंकि वर ही ऐसा मांगा गया था। कहीं कंगाल का पुत्र भी सोने की थाली में भोजन करेगा? इन्द्रदेव को उन्हें सम्पन्न परिवार बनाना पड़ा। तब यह वरदान सत्य हुआ। इसी प्रकार प्रश्न तो छोटा-सा है कि 'मैं कौन हूँ?'

 

'अतः पृच्छामि संसिद्धिं योगिनां परमं गुरुम्

पुरुषस्येह यत्कार्यं म्रियमाणस्य सर्वथा ।।

(श्रीमद् भागवत 1/19/37)

 

श्री चरणों के सान्निध्य में पड़े शिष्य को गुरुओं से यही उपदेश, यही गुप्त ज्ञान प्राप्त करना चाहिए कि प्रभो! मेरा आत्म कल्याण कैसे हो?

 

वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितो नृप

आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ।।

 

राजन् ! तुम्हारा प्रश्न बहुत सुंदर सारगर्भित एवं मौलिक है। इससे तो तुम्हारा ही नहीं वरन् जीवमात्र का कल्याण होगा। तुम चिंता करो। तुम्हें तो अभी सात दिन जीना है। वस्तुतः जब आत्मतत्व को जानने की प्रबल इच्छा हो तो सात दिन का भी समय बहुत अधिक है। इसके लिए तो दो घड़ी का ही समय पर्याप्त है और यदि आत्म कल्याण की जिज्ञासा प्रबल नहीं है तो सात दिन क्या एक हजार वर्षों का समय भी अधिक नहीं है। आत्म जिज्ञासा विहीन पुरुषों का उद्यम वैसा ही है जैसे कुत्ते की पूँछ। कुत्ते की पूँछ उसके भी काम की नहीं और उसे काट दो तो हानि भी नहीं। इसी तरह बकरी के गले की निर्दुग्ध स्तन, उससे दूध तो निकलता नहीं व्यर्थ ही लटकता रहता है। आत्म जिज्ञासा के बिना वेदों का अध्ययन भी ऐसा ही प्रयास है। यदि आत्म जिज्ञासा प्रबल है तो दो घड़ी जीवन ही पर्याप्त है। जैसे राजा खट्वांग को जिन्हें दो घड़ी के उपदेश से ही आत्मलाभ हुआ था। वे राजर्षि सूर्यवंश में हुए थे। उनका सारा जीवन ऐश-आराम, आमोद-प्रमोद आदि विषयों में ही बीत गया। जब जीवन सिर्फ दो घड़ी शेष रहा तो उन्हें ब्रह्म ज्ञान की उत्कट अभिलाषा हुई। श्री भगवान वामदेव की कृपा से राजा को बोध हुआ और वह संसार सागर से तर गया। इससे सिद्ध है कि आत्म कल्याण के जिज्ञासुओं के लिए समय का प्रतिबंध नहीं है। बशर्ते कि आत्म कल्याण की भावना, जिज्ञासा प्रबल हो। राजा परीक्षित की प्रबल जिज्ञासा थी कि मेरा आत्म कल्याण कैसे हो? इसलिए श्री शुकदेव स्वामी के प्रसाद से उसका आत्म कल्याण हुआ।

 

श्रीमद् भागवत के द्वितीय स्कंध में भगवान के विराट स्वरूप का वर्णन है। साथ ही साथ सृष्टि के सृजन का और भगवान के अवतार आदि का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। द्वितीय स्कंध के नवें अध्याय में ब्रह्माजी को भगवान नारायण द्वारा ब्रह्मतत्व के उपदेश का वर्णन है जिसे चतुः श्लोकी भागवत कहते हैं। यही परम उपदेश बीज मंत्र है। यह पावन कथा अब प्रेम से सुनो। आत्म जिज्ञासुओं! दोनों समाज प्रकृति एवं पुरुष जो जहाँ बैठे हो ध्यान से सुनो- आनंद लो।

 

सृष्टि के आदि में श्री शेषशायी भगवान नारायण के नाभि से कमल उत्पन्न हुआ और उस कमल में श्री ब्रह्माजी हुए। इसी से इनका नाम कमलोद्भव है- कमल से पैदा हुए हैं। श्री ब्रह्माजी ने दृष्टि फैलायी, कमल के चारों तरफ उन्हें सिर्फ जल ही जल दिखा। जल ही जल अपने चारों तरफ देख के कुछ निश्चय कर सके कि वे कहाँ हैं। उनको जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि मैं कौन हूँ, कहाँ से उत्पन्न हुआ हूँ? तो वे कमलनाल में चक्कर लगाने लगे, परन्तु वर्षों बीतने पर भी जब वे अपने आधार का पता लगा सके तो हारकर कमल में बैठकर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए? एकाएक उन्हें प्रणव () नाद (शब्द) सुनाई पड़ा और '', '' ये दो अक्षर तीन बार सुनाई पड़ा-तप, तप, तप सुने तो वे कमल में ही आसन जमा हजारों वर्ष तपस्या किए। उस तप से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी के समक्ष भगवान नारायण प्रगट हुए। ब्रह्माजी ने स्तुति की। उससे प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने ब्रह्माजी के प्रति आत्म तत्व का उपदेश किया। वस्तुतः इसी चतुःश्लोकी भागवत में भगवान नारायण द्वारा ब्रह्माजी को जो उपदेश हुआ है यही सम्पूर्ण भागवत है। इसी की व्याख्या, उपदेश श्री स्वामी शुकदेवजी राजा परीक्षित को किए हैं। बाद में श्री स्वामी शुकदेवजी के पिता महर्षि व्यासजी ने चतुःश्लोकी भागवत को आधार मानकर श्रीमद् भागवत पुराण बड़े ग्रंथ का निर्माण किया है।

 

वेदान्तवेदसुस्नाते गीताया अपि कर्तरि

परितापवति व्यासे मुह्यत्यज्ञानसागरे ।।

(श्रीमद् भागवत महा. 2/72)

 

तदा त्वया पुरा प्रोक्तं चतुः श्लोकसमन्वितम्

तदीयश्रवणात्सद्यो निर्बाधो बादरायणः ।।

(श्रीमद् भागवत महा. 2/73 )

 

महर्षि व्यासजी वेदों की संहिता बनाए, ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थों की भी रचना किए, ऋचायें लिखी, श्री महाभारत ग्रन्थ जिसमें सवा लाख श्लोक हैं, बनाया। इसमें गीता भी जाती है। इन सब संहिताओं का निर्माण किया और अपने शिष्यों को पढ़ाते रहे, परन्तु इतने पर भी उनके चित्त को शांति मिली। चित उपराम हुआ। वे बोधवान नहीं हुए। अज्ञान सागर में डूबे रहे।

 

भैया ! बुद्धि का व्यापार दूसरी चीज है! वेदों का सुनना सुनाना दूसरी बात है। परन्तु बोध प्राप्त करना, आत्म तत्व प्राप्त करना अलग चीज है। दर्शन, ब्रह्मसूत्र आदि की रचना करने पर भी जब श्री व्यासजी का चित्त शांत हुआ तो वे सरस्वती नदी (शम्याप्रास) के तट पर (यह नदी हिमालय प्रदेश में है) खिन्न चित्त से बैठ गए। श्री व्यास जी ने अपनी इस अशांति को नारदजी के समक्ष रखा। उस समय देवर्षि नारद ने श्री व्यास जी के समक्ष इसी चतुःश्लोकी भागवत का प्रतिपादन किया। जिसे सुनकर महर्षि व्यास जी का चित्त प्रशांत हुआ, अज्ञान का नाश हुआ एवं वे निर्बाध हो गए।

 

तदा त्वया पुरा प्रोक्तं चतुःश्लोकसमन्वितम्

तदीयश्रवणात्सद्यो निर्बाधो बादरायणः ।।

 

जब भगवान नारद ने बादरायण (व्यासजी) को चतुःश्लोकी भागवत सुनाया, तब 'तदीय श्रवणात्सद्यो' अरे ! सुनते ही महर्षि व्यास जी निर्बाध अर्थात् संशय-विपर्यय रहित हो गए। निस्संकल्प हो गए अज्ञान का मूलोच्छेद हो गया। चित्त को परम शांति मिली। श्री शुकदेव जी ने यही चतुःश्लोकी भागवत। राजा परीक्षित को सुनाया था। यही विस्तार होने से अट्ठारह हजार श्लोकों का महापुराण ग्रन्थ बना। यही इसका प्रसंग है। अब हम सबसे यही कहते हैं कि आत्म कल्याण चाहो तो बिना कान के सुनो और बिना बुद्धि के समझो। स्वामी जी ! आप तो बड़ी अटपट बात बताते हैं, कहीं बिना कान के सुना जाएगा और बिना बुद्धि के समझा जाएगा? हाँ भाई ! यही तो हम बता रहे हैं। कान से जो सुनाई पड़ता है और जो कान से सुनाई नहीं पड़ता, कान के सुनने और सुनने को जो सुनता है, वह किस कान से सुनता है? बुद्धि के समझने और समझने दोनों को जो समझता है वह किस बुद्धि से समझता है? जो कान का कान है, बुद्धि की बुद्धि है, यारों! उसे कान क्या सुनेगा, बुद्धि क्या समझेगी। हाँ, चीज यही है। जो मन, बुद्धि, वाणी से परे है, उसको मन, बुद्धि वाणी से कैसे समझोगे? तो बस, जैसे बैठे हो, मस्त रहो।

 

कोई भी विद्वान संन्यासी जब अपने शिष्य मंडल को वेदांत का पाठ पढ़ाते हैं, उस समय गुरु परम्परा से गुरुओं का स्मरण करके वेदाध्ययन (वेदांत पाठ) कराते हैं। हम भी इसी गुरु परम्परा से आदि गुरुओं का स्मरण करते हुए वेदांत का निरूपण करेंगे।

 

नारायणं पद्मभवं वसिष्ठं शक्तिं तत्पुत्र पराशरंच,

व्यासं शुकं गौड़पदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यम्

श्री शंकराचार्यमथास्य पद्यपादं हस्तामलकं शिष्यम्

तं त्रोटकं वार्तिककारमन्यानस्मद् गुरुन सन्ततमानतोऽस्मि ।।

 

आत्मज्ञान के प्रथम आचार्य भगवान नारायण हैं। इनके बाद पद्मोद्भव (श्री ब्रह्मा जी) हुए। उनके शिष्य हुए श्री गुरुदेव वसिष्ठ। उनके शिष्य हुए महर्षि शक्ति और उनके शिष्य हुए पराशर। फिर इनके शिष्य हुए श्री व्यासजी और फिर शुकदेव स्वामी। जिनके शिष्य श्री गौड़पादाचार्य। उनके शिष्य श्री गोविंदपादाचार्य और इनके श्री आद्य जगद्गुरु भाष्यकार शंकराचार्य। उनके चार प्रधान शिष्य हुए हैं- पद्मपादाचार्य, हस्तामलकाचार्य, सुरेश्वराचार्य और त्रोटकाचार्य। इसी तरह गुरु परम्परा से अन्यान्य अध्यात्मतत्व के ज्ञाता श्रेष्ठ गुरु हुए हैं वे सभी आत्मरत, आत्मवित्, कृतकृत्य पद प्राप्त आनंदस्वरूप हुए हैं। भगवान नारायण से आदि लेकर जितने भी आज तक गुरु हुए हैं और भविष्य में होंगे, इन सब गुरुओं को हम अपने हृदय से स्मरण कर वेदांत का पाठ आरंभ करते हैं।

 

श्री भगवनानुवाच -

 

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदङ्गं गृहाण गदितं मया ।।

 

विज्ञान संयुक्तं तदङ्गं सरहस्यं मे परमगुह्य ज्ञान गृहाण ।।

 

हे ब्रह्मन् ! विज्ञान संयुक्त साङ्गोपाङ्ग क्या है? रहस्य क्या है? परम गुह्य क्या है। सूत्र रूप में इन सबकी व्याख्या की गई है।

 

'मैं' शरीर नहीं, आत्मा हूँ-यह है ज्ञान।

 

'मैं' सर्व हूँ-यह है विज्ञान

 

'मैं' हूँ-यह है परमगुह्य ज्ञान।

 

शरीर नहीं, मैं आत्मा हूँ, इसका बोध होना ज्ञान और 'मैं' हूँ यह परमगुह्य ज्ञान है। देखो-जिस शब्द के साथ परम लगता है वह अपेक्षा रहित होता है। परम वैराग्य, परम पद, परम स्नेह, परम समाधि, परमानंद, परम सुख ये सब अपेक्षा रहित हैं।

 

ज्ञानं परमगुह्यं में यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदङ्ग गृहाण गदितं मया ।।

 

भगवान कहते हैं- यह जो मेरा परमगुह्य ज्ञान है इसको ग्रहण करो। अरे ! मैं जो कहता हूँ उसको जानो, आत्मतत्व का अनुभव करो। यह अनुपम है। सम्पूर्ण अंगों के सहित ग्रहण करो। साङ्गोपाङ्ग क्या है? वेदांत के छः अंग हैं।

 

उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फले

अर्थवादपपत्तिं लिंङ्गं तात्पर्य निर्णये ।।

 

उपक्रमोपसंहार, अपूर्वता, अभ्यास, फल, अर्थवाद और उपपत्ति

 

1. उपक्रमोपसंहार- जिस ब्रह्मतत्व का प्रपिादन किसी ग्रन्थ के अथवा विद्वान महान पुरुषों के भाषण आदि में किया गया है उसी का प्रतिपादन अंत में किया जाए। उसे उपक्रमोपसंहार कहते हैं।

 

2. अपूर्वता- 'नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।' नहीं है ज्ञान के समान पवित्र कोई दूसरा पदार्थ। यह अपूर्वता है।

 

3. अभ्यास- अनेकानेक सुंदर-सुंदर युक्तियों द्वारा प्रतिपाद्य विषय के पुनः-पुनः निरूपण करने का नाम अभ्यास है।

 

4. फल- 'ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ' देव को जानकर पंचक्लेश और अष्टपाश से जीव छूट जाता है। यह फल है।

 

5. अर्थवाद-

 

कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुंधरा पुण्यवती येन

अपार संवित्सुखगारेऽस्मिन् लीने परे ब्रह्मणियस्य चेतः ।।

स्नातं तेन समस्त तीर्थ सलिले दत्तापिसर्वावनिर्यज्ञानां

कृतं सहस्त्रमखिलं देवाश्च संपूजिताः

संसाराच्च समुद्धता स्वपितरस्त्रैलोक्य पूज्योऽप्यसौ

यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि स्थैर्यं मनः प्राप्नुयात् ।।

 

यह अर्थवाद है।

 

6. उपपत्ति - वासुदेवः सर्वमिति। यह उपपत्ति है।

 

जिस विद्वान महात्मा के उपदेशों में छः अंग नहीं रहेंगे तो जिज्ञासु को संशय-विपर्यय रहित पूर्ण रूप से आत्मतत्व का बोध नहीं होगा। इसीलिए यहाँ की कथा में इन छः अंगों का ध्यान रखा जाता है। ज्ञान निरूपण में छह अंगों का समावेश यथास्थान होता रहता है। जिसने अपने आपको जान लिया, आत्मतत्व का साक्षात्कार कर लिया। वह अष्टपाश, पंचक्लेश से छुटकारा पा जाता है। यह वेदांत का फल है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश ये जीव के पंच क्लेश हैं और घृणा, शंका, भय, लज्जा, निंदा, कुल, शील तथा जाति ये जीव के अष्टपाश हैं। असत को सत, चेतन को जड़ और दुःख को सुख यानी साढ़े तीन हाथ के शरीर को आत्मा मानना, यही अविद्या है। द्रष्टा और दृश्य के धर्मों को एक मानना यही अस्मिता है। इष्ट पदार्थ और वह जिसके द्वारा प्राप्त हों, दोनों के प्रति जो आसक्ति है, यही राग है और दोनों के प्रति जो घृणा है, यही द्वेष है। अनादिकालीन परम्परा से जिस मृत्यु प्रवाह से बड़े-बड़े विद्वान भी डरते हैं यही अभिनिवेश है। पंच क्लेश एवं अष्ट पाश से वही छुटकारा पा सकता है, जिसने अपने आप भगवान को पहिचाना है। यही वेदांत का फल है।

 

आत्मतत्व के विचार में यदि एक क्षण भी मन लग जाए, स्थिर हो जाए तो समस्त तीर्थों का स्नान उसने कर लिया। हजारों गौवों के दान का फल प्राप्त कर लिया, उसके पितरों का उद्धार हो गया। हजारों बार अश्वमेधादिक यज्ञ कर चुका, त्रैलोक्य का पूज्य हो चुका। अब जिसका चित्त परब्रह्म में लीन हो गया है उसका क्या फल है, उसकी क्या महिमा है? उसका कुल पवित्र हो गया। जननी जो माता है वह कृतार्थ हो गई, वसुंधरा जो पृथ्वी है वह ऐसे आत्मदर्शी को पाकर पुण्य रूप हो गई। इसको कहते हैं अर्थवाद। और उपपत्ति- 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन।' 'वासुदेवः सर्वमिति ' भगवान आत्मदेव से एक तिल भर भी भिन्न नहीं है। एक ही चेतन परमात्मा है। इसके सिवाय कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं। वेदांत के चार अनुबंध होते हैं- अधिकारी, विषय, संबंध और प्रयोजन।

 

जिसको अपने आत्म कल्याण के लिए मछली के समान तड़प हो, आत्म तत्व को जानने की, प्राप्त करने की प्रबल जिज्ञासा हो वही ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी है। सर्व भगवान है, एक तृण भी भगवान से विलग नहीं, यही प्रतिपाद्य विषय है। प्रतिपादित विषय और उसका प्रतिपादक ग्रन्थ यही प्रतिपाद्य प्रतिपादक भाव संबंध है। आत्मतत्व का पूर्ण रूपेण साक्षात्कार करा देना यही वेदांत ग्रन्थ का प्रयोजन है। हाँ, जी! चलो आगे-

 

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदङ्ग गृहाण गदितं मया ।।

 

भैया ! परमगुह्य ज्ञान पर पहले प्रकाश डालेंगे नहीं तो विषय समझ में नहीं आवेगा।

 

कोई व्यक्ति जब कभी किसी महापुरुष के पास जाता है तो (चाहे शिष्टाचार के ही नाते कहता हो) कहता है कि भगवान! आप तो परम ज्ञानी हैं और में अज्ञानी हूँ, तो महात्मा कहते हैं कि प्यारे ! यदि तू वस्तुतः अज्ञानी होता अपने को अज्ञानी और मुझे ज्ञानी कैसे कहता? जैसे कोई व्यक्ति कहे कि हर जा, मैं पागल हूँ तो क्या हम-तुम उसे पागल कहेंगे? जबकि उसे अपन पागलपन का ज्ञान है तो फिर वह पागल कैसे? इसी तरह जब वह व्यकि अपने को अज्ञानी कहता है तो वस्तुतः क्या वह अज्ञानी हुआ? अपने आपक अज्ञानी कहता है इससे यही सिद्ध होता है कि ज्ञान का स्वरूप जानकर अपने 'मैं' में अज्ञान को आरोपित करता है। वास्तव में तू अज्ञानी नहीं जबकि तुझे ज्ञान और अज्ञान दोनों का ज्ञान है। इसलिए तू स्वयं ज्ञान स्वर भगवान आत्मा है। अच्छा, ज्ञान, अज्ञान और इससे परे परम गुह्य ज्ञान।

 

मैं अमुक हूँ-अज्ञान, 'मैं' हूँ-ज्ञान, दोनों को जो जानता है उसे कहते परमगुह्य ज्ञान। नोट करो-

 

मैं अमुक हूँ-प्रगट ज्ञान, 'मैं' हूँ, गुप्त ज्ञान, इन दोनों प्रगट ज्ञान और गु ज्ञान के परिज्ञाता (जानने वाले) को परम गुह्य ज्ञान कहते हैं।

 

ये सब चीजें नारायण भाव में, नारायण द्वारा ही निकल रही है। अब कसर तो नहीं रही, हृदय देश के भाव का हृदय देश से ही अनुभव हो सक है। जहाँ समझने की कोशिश किया तो सिर्फ साहित्य ही हाथ लगेगा। यहाँ आत्मतत्व का निरूपण, तत्व दर्शन हृदय से प्रवाहित हो रहा है और इसे से ही ग्रहण करो। यहाँ पर नारायण तत्व का निरूपण हो रहा, साहित्य निरूपण नहीं। समझो विषय- वेदांत का क्या स्वरूप है? वेद का अर्थ होता जानना। जिसको जानकर फिर जानना बाकी रहे, उसे कहते हैं वेदांत। जान का अंत हो जाना, यही वेदांत है।

 

आत्म तत्व 'मैं' हूँ के स्वरूप का वर्णन किया जा रहा है। उसी तत्व का प्रतिपादन हो रहा है। भैया! यह बुद्धि का विषय नहीं है। यह जो वेदांत्त है वस्तुतः भगवान आत्मा का ही कथन है। इसको वही कह रहा है और वही अनेकानेक रूप से सुन रहा है। यह तत्व बुद्धिगम्य नहीं है। यदि ' श्री भगवानुवाच' को 'अहं उवाच' कहें तो गलत होगा। बस ! मैं अमुक हूँ, यह प्रगट ज्ञान है और 'मैं' हूँ, यह गुप्त ज्ञान है। अब इन दोनों का जो ज्ञान, वही परम गुह्य ज्ञान है। देखो-अभी अनुभव करो- समझो विषय को, मैं अमुक हूँ, इस अमुक भाव को जानकर ही तो कहोगे कि वैसे ही बिना मतलब फालतू कह दोगे। बिना जाने कैसे कहोगे। अजी! जब वह अपने 'मैं' पर अमुक थोपेगा तो उसे जानकर ही तो कहोगे कि मैं देह हूँ आदि। उसे समझा है, परखा है, माना है तभी कहता है कि मैं देह हूँ, मैं संसारी जीव हूँ। अब देखो-इसमें 'मैं' अछूता है, अलग है, 'मैं' पर कोई कलङ्क नहीं है।

 

जितने यहाँ पर बैठे हो, इसे ठीक तरह से हृदयङ्गम कर लो। यहाँ पर कोई पंथ-पंथाई, मजहब या सभा सोसायटी की बात नहीं है। इनके दायरे के बाहर आओ। यहाँ पर कोई साम्प्रदायिक चीज नहीं बताई जा रही है। हम तो हिन्दुओं को ही नहीं, वरन् मुसलमान, जैन, ईसाई, वैष्णव, शैव सभी को उपदेश करते हैं। इन दायरों में क्यों पड़े हो? अरे ! मैं स्वयं अपने को कुछ मानकर ही तो इन दायरों में पड़ा हूँ। अरे राम, राम! बाहर जगत से संबंध तोड़कर आत्म जगत में आओ। बाह्य जगत को छोड़कर मैदान में आओ। युनिव्हर्सल टुथ (सार्वभौम सिद्धांत) सारे विश्व का एक होता है। इसमें कोई शंका नहीं। यदि अपना कल्याण चाहो, अपने कल्याण की तुम्हें भावना है और यहाँ से कुछ ले जाना चाहते हो तो विषय को हृदय से समझो। अपने व्यक्तित्व को अपने आपको जो माना है, उसका लोप करो। व्यक्तित्व को रखकर समझना चाहोगे तो तुम्हारे पल्ले कुछ पड़ेगा। कुछ भी समझ में नहीं आएगा। व्यक्तित्व को लोप करके ही आत्म तत्व जान सकते हो। तो मैं अमुक हूँ, यह प्रगट ज्ञान है। मैं जानता हूँ कि मैं देह हूँ, जीव हूँ, इसलिए यह प्रगट ज्ञान है। तो क्या जानने वाला भी जीव है? जरा होश में आकर समझो। 'मैं' का आधार क्या जीव है? मैं देह हूँ, मैं जीव हूँ, मैं ब्रह्म हूँ यहाँ तक सब प्रगट ज्ञान है और 'मैं' हूँ यह गुप्त ज्ञान है और 'मैं' अर्थात् आत्मतत्व यही ब्रह्म ज्ञान है। इसको ग्रहण करो। इसका अनुभव करो।

 

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदङ्गं गृहाण गदितं मया ।।

 

आत्मतत्व का क्या रहस्य है? 'मैं' के रहस्य चार हैं। 'मैं' (आत्मा) का भाव। 'मैं' (आत्मा) का रूप। 'मैं' (आत्मा) का गुण और 'मैं' (आत्मा) का कर्म। आगे श्लोक में भगवान नारायण कहते हैं-

 

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः

तथैव तत्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।

(श्रीमद् भा. 2/9/31)

 

जैसा मैं हूँ 'मैं' का जैसा भाव, 'मैं' का जैसा रूप, 'मैं' का जैसा गुण और 'मैं' का जैसा कर्म, इन्हीं विषयों का ज्ञान 'मैं' आत्मा (आत्मतत्व) का रहस्य है। मेरी कृपा से इन तत्वों का अनुभव करो। अच्छा, विषय को पूर्णतया हृदयङ्गम करने के लिए प्रक्रिया सुनो। जो सत्संगी गण बाहर से आए हैं (छत्तीसगढ़ से) उनके लिए प्रक्रिया समझाने की जरूरत नहीं है। तुम लोग तो प्रक्रिया कहने से ही समझ लेते हो, परन्तु यह (झंडापुर स्थान) नवीन क्षेत्र है और नवीन क्षेत्र होने के कारण प्रक्रिया समझा देना आवश्यक हो जाता है। इसलिए पहिले जरा प्रक्रिया समझा दूं तब बाद में आत्म तत्व के भाव, रूप, गुण और कर्म का निरूपण करूँगा। साधारणतया 'मैं' का मतलब साढ़े तीन हाथ का शरीर ही मान रहे हैं, दिखाई तो ऐसा ही दे रहा है। जिस तरह मक्खन दूध में व्याप्त है, परन्तु दूध में व्यापक होते हुए भी स्पर्श करने पर नहीं मिलता और जब उसी दूध का मन्थन किया जाता है तो मक्खन ऊपर जाता है। मक्खन की प्राप्ति दूध के मन्थन से होती है। इसी तरह विचार रूपी मथानी से इस मान्यता का मन्थन करें।

 

कोई अपने आपको साढ़े तीन हाथ का शरीर मानता है, कोई अपने आप को जीव मानता है तो कोई अपने आप को ब्रह्म मानता है। सभी अपने को एक ही विशिष्ट शरीर, जीव या ब्रह्म नहीं मानते। सभी मान्यताएँ विभिन्न-विभिन्न प्रकार की हैं। इन मान्यताओं को अलग करके समझा दूं। सुनो, ध्यान दो, पहले ये दो शब्द 'मैं' और 'मेरा' समझ लो। 'मैं' कर्तृवाचक है और 'मेरा' संबंध वाचक है। अपने आप के लिए, खुद के लिए 'मैं' कहा जाता है और अपने से संबंधित सम्बन्ध वाचक है। अपने आप के लिए, खुद के लिए 'मैं' कहा जाता है और अपने से संबंधित के लिए 'मेरा' का प्रयोग होता है। इस तरह मैं का अर्थ मेरा नहीं होता और मेरा का अर्थ मैं होता है। अच्छा, यदि किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि तेरा नाम क्या है? वह कहता है मेरा नाम जगदीश है। भैया ! यह तो बताओ कि तुम्हारा नाम जगदीश कब रखा गया? तुम्हारे जन्म होने के पूर्व रखा गया था या तुम्हारे जन्म लेने के बाद? यदि तुम्हारा नाम जन्म लेने के पहले ही जगदीश होता तो जब तुम्हारा जन्म हुआ तभी तुम्हारी माँ पुकारती कि देखो जगदीश पैदा हो गया है। परन्तु, ऐसा कोई नहीं कहता। यह तो मौलिक बात है। तो नाम जन्म लेने के बाद ही रखा जाता है और कहते भी हो कि मेरा नाम, नाम 'में' मेरा शब्द लगा है। इसलिए यह स्वयं सिद्ध है कि मेरा कहने वाला नाम से अलग है। कुछ तुम्हें नई बात नहीं बताई जा रही है। साधारणतया सभी कहते हैं कि मेरा नाम, मेरा सिर, मेरी आँख, मेरी नाक, मेरा मुँह, मेरा हाथ, मेरा पाँव, मेरा शरीर। ऐसा कहने से ही सिद्ध होता है कि नाम से लेकर शरीर तक 'मैं' नहीं हूँ। हाँ जी, यदि मेरा का अर्थ मैं लगाऊँ तो?

 

किसी शहर में एक बड़े अच्छे पढ़े-लिखे धनवान व्यक्ति जमींदार साहब रहते थे। किसी दिन उसका पुत्र बीमार पड़ा। उसे डबल निमोनियो हो गया। उन्होंने अपने नौकर को आज्ञा दी कि फौरन अमुक डॉ. साहब को बुलाकर लावो। नौकर थोड़ी दूर जाकर कहता है कि सरकार ! यदि डॉ. साहब घर पर हों तो? मालिक ने कहा जल्दी जाता है कि नहीं? हुजूर, मैं यह चला। फिर बाहर जाकर वापस आकर कहता है कि सरकार! डॉ. मिल भी गए और और दवाई हुई तो? मालिक गुस्सा होकर कहता है कि अबे, जाता है कि नहीं? नहीं सरकार, चला जाता हूँ, ऐसी बात नहीं है। परन्तु, फिर वापस आकर कहता है कि सरकार ! यदि डॉक्टर साहब मिले भी, दवाई भी मिली, लेकिन यदि डॉक्टर साहब आने को तैयार नहीं हुए तो? जमींदार साहब गरम होकर बोले कि बेवकूफ कहीं का, जल्दी जाता है कि नहीं, बकबक कर रहा है। जल्दी ही डॉ. साहब को बुलाकर ला। हाँ सरकार अभी जाता हूँ। थोड़ी ही देर में फिर वापस कर कहता है कि यदि डॉ. साहब मिले भी, दवाई भी मिली और वे आने को तैयार भी हो गए, परन्तु उनके आने के पहले ही लड़का रहा तो? भैया। इस, 'तो', का तो कोई इलाज नहीं है। यदि मेरा का अर्थ मैं लगाऊँ तो मैं गाड़ी हो जाऊँ, क्योंकि मेरी गाड़ी कहता हूँ। मेरी टोपी कहता हूँ, तो मैं टोपी हो जाऊँगा। इसलिए मेरा का अर्थ मैं नहीं।

 

आजकल जगह जगह वेदांत के प्रचारक, वेदांत के ठेकेदार मिल सकते हैं, परन्तु ऐसे उपदेशक वेदांत का ठीक अर्थ नहीं लगाते। वे क्या भगवान की कथा करेंगे। भगवान को कभी देखे हों, उनका अनुभव किए हो तब , भगवान को वे क्या लखावेंगे। वे तो भगवान को कभी सुने भी नहीं। मैं कथा नहीं करता, मैं वेदांत का प्रचारक हूँ। भगवान को देखना हो तो हमारे पास आवो। जब चाहो, जहाँ जाहो, जिस समय चाहो हम भगवान को लखा देने का दावा करते हैं। हम उन्हें अनुभव करा देंगे कि यही भगवान है। परन्तु, उन्हें भी भगवान के दर्शन की भूख हो तब ?

 

यदि किसी व्यक्ति को जिसे धन का लोभ है, कोई कहे कि भैया ! तुम्हें कोई काम करना होगा। बिना कमाई के तुम्हें धन मिल जाएगा, तुम्हें लखपति बना देंगे, यदि तुम्हें धन की इच्छा हो तो दिला सकते हैं। तब तो सभी राजी हो जाएँगे, कहेंगे कृपा करो दादा, शीघ्रातिशीघ्र धनी बना दो। जब कोई काम ही करना पड़े और धन मिलता हो तो सभी स्त्री-पुरुष तैयार हो जाते हैं। धन लेने के लिए शायद ही कोई बचे, सब तैयार बैठे हैं। हाँ भाई ! ऐसी ही बातें हैं। परन्तु, भगवान को पाने के लिए पता नहीं क्या नुकसान हो रहा है- राम ! राम !! घोर निद्रा से उठो ! जब चाहो, जहाँ चाहो, जिस समय चाहो देखो। हम तुम्हें दिखा देंगे कि यही भगवान हैं। बस ! बाकी सब कुछ पाखंड है, गप्प बात है। हम विश्व के लिए चुनौती देते हैं। वह भगवान नहीं है, जिसे देखने के लिए तुम ज्योतिषियों से पूछकर मुहूर्त निकालकर मिलो ज्योतिषियों के पास जाकर पूछो कि हमारी जन्मकुंडली देखकर बताइये कि हमें भगवान मिलेंगे कि नहीं और यदि मिलेंगे तो कब मिलेंगे? भगवान ऐसे नहीं हैं कि इस तरह से मिलें।

 

कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही ।।

(रा. उत्तर. कां.)

 

अरे! विषय भोग तो कूकर-सूकर भी करते हैं। विषय भोग उन्हें भी मिलता है। भगवान ने मनुष्य जन्म क्यों दिया? भगवान प्राप्त करने के लिए ही भगवान ने शरीर दिया है, क्योंकि भगवान की प्राप्ति इसी शरीर से ही होती है। मेरी नाक, मेरा कान, मेरा पैर, मेरा शरीर, हम सब यही कहते हैं और अंग्रेजी में भी 'माई बॉडी' कहते हैं, 'आई एम बॉडी' ऐसा तो कोई नहीं कहता। तो नाम से लेकर शरीर तक 'मैं' नहीं हूँ, क्योंकि मेरा कहता हूँ और गौर करो तो शरीर मेरा भी नहीं है।

 

छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम शरीरा

प्रगट सो तनु तव आगे सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ।।

(रा.कि.)

 

आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन पाँचों तत्वों के पंचीकरण से इस शरीर का निर्माण हुआ है। यह शरीर मल, मूत्र का भांड है। मरने-जीने वाला है। हाँ, यह अवश्य है कि 'मैं' इसके अंदर रहता हूँ और इसी गरज से मैं कहता हूँ कि मेरा कान, मेरी नाक, मेरा शरीर, परन्तु मेरा कहने की गरज से मैं शरीर नहीं हो जाता। तो समझ गए-वाह रे मिट्टी के शेर ! जिस तरह मैं नाक, आँख नहीं इसी तरह से शरीर भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि मेरा शरीर कहता हूँ और जरा गौर से देखो तो तुम्हें पता लगेगा कि शरीर मेरा भी नहीं है। जैसा मकान मिट्टी, गारे, ईंटों से बना है। इसमें खंभे, दरवाजे, बल्लियाँ, बांस, खपरे आदि लगे हैं। इसी तरह यह शरीर रूपी मकान मांस, मज्जा, अस्थि, रक्त आदि से बना है। हाथ-पैर रूपी खंभे लगे हैं। इसके नौ दरवाजे हैं। मकान में बल्लियाँ लगती हैं, इस शरीर रूपी मकान में हड्डी रूपी बल्लियाँ लगी हैं और चमड़ी से छाया गया है। मकान जिस तरह चूना, खड़िया, मिट्टी, गेरू, नीला थोथा आदि से पोता जाता है इसी तरह यह शरीर कोई काला, कोई गोरा, कोई साँवला है। जैसा वह मकान वैसा ही यह मकान है। तो फिर शरीर मेरा भी नहीं है। मांस, हड्डी आदि से बना है। पंच तत्वों के पंचीकरण से यह शरीर बना है। चूँकि मैं इसमें रहता हूँ, इसलिए रहने की गरज से मैं इसे अपना ही मान बैठा हूँ कि यह मेरा शरीर है।

 

याद रखो कि इस समाज में बड़े-बड़े विद्वान, वकील, न्यायाधीश बैठे हैं। ताजरात हिन्द के दफा 448 का जुर्म कर रहे हो। दूसरे के मकान में जबरदस्ती कब्जा करना अपराध है। तुम यह अपराध शरीर के विषय में कर रहे हो कि यह मेरा शरीर है, जबकि यह वस्तुतः पंचतत्वों का है। तुम पर यह दफा लागू होगा। यहाँ पर आत्मतत्व का निरूपण हो रहा है। आत्मा अपना आप 'मैं' है कि शरीर। कमेटी के पंचों ने यह साढ़े तीन हाथ का मकान बनाकर तुम्हें दिया कि ले भैया इस शरीर को प्राप्त कर, इसके द्वारा प्रभु को प्राप्त करो। परन्तु, क्या इसे अपना ही समझ लिया और विषय भोग में पड़ गए। अरे! कूकर, शूकर भी विषय भोग करते हैं। तो यह मनुष्य का शरीर तुम्हें क्यों दिया गया? क्या विषय भोग के लिए? नहीं।

 

साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ जेहि परलोक संवारा ।।

एहि तन कर फल विषय भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुःखदाई ।।

 नरतन पाई विषय मन देहीं। पलटि सुधाते सठ विषलेहीं .

(.कां.)

 

शरीर मिला है भगवान को प्राप्त करने के लिए, ब्रह्म, आत्मा का साक्षात्कार करने के लिए। परन्तु, वाह रे फतह बहादुर ! इस शरीर पर अपना कब्जा कर लिया, हम जैसा चाहें इस शरीर का उपयोग करें। अरे! तुम अनजाने दफा 448 का जुर्म कर रहे हो। हमारे पास इस संत कोर्ट में यह मामला आया है। इस कोर्ट में ऐसे मामले आते रहते हैं। याद रहे, इस कोर्ट में किसी की वकालत चलेगी और यदि अभियुक्त हाजिर हुआ तो एकतरफा डिग्री ठोंक देंगे। हाँ भाई ! फिर क्या, एकतरफा डिग्री ठोंक देंगे। तो हाँ, तुम्हारा दावा खारिज कर दिया गया। यह तो संतों की अदालत है। तुम शरीर हो और तुम्हारा ही शरीर है। 'मैं' शरीर हूँ और मेरा शरीर है। तो फिर हिन्दू, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, प्रणामी, उदासी, निर्मोही, निरंजनी, रामसनेही, कबीरपंथी, घीसापंथी, गोबरपंथी, कुंडापंथी आदि। अरे! इन्हें किस पर आरोपित करोगे? आजकल पंथों का भरमार लगा हुआ है। इस संसार में इस समय दो हजार नौ सौ निन्यानबे पंथ हैं और दिन-प्रतिदिन नए-नए बनते ही जा रहे हैं। अपनी- अपनी खंजरी और अपना-अपना राग। इन सभी पंथों में इनके अनुयाइयों में राग-द्वेष भरा पड़ा है। एक-दूसरे को पावें तो खा जाएँ और ऊपर से तारीफ, कि सभी पंथी अपने-अपने पंथ को अनादि मानते हैं। ऐसा प्रदर्शन करते हैं कि इसके पंथ का जन्म आदिकाल का है। इनके जो धर्म प्रवर्तक हुए हैं वे सब आदि-अन्त वाले हैं। परन्तु दंभ तो देखो अपने पंथ को धर्म को अनादि बतलाते हैं।

 

राम-राम, तो भैया ! समझो मैं लंबा हूँ, मैं चौड़ा हूँ, नीला हूँ, लाल हूँ, धर्मी हूँ, छह विकार वाला हूँ। छह उर्मियों वाला हूँ। ये सब शरीर के धर्म हैं। 'मैं' के नहीं, इस शरीर के हैं। शरीर जन्मता मरता है 'मैं' नहीं। मरना-जीना शरीर का धर्म है। इसीलिए जब 'मैं' इसे अपने पर आरोपित कर लेता हूँ तब इससे भयभीत रहता हूँ।

 

दो मित्र एक तीसरे मित्र के यहाँ गए। वह मित्र पूछता है कि आपके साथ जो आए हैं उनकी क्या तारीफ (परिचय) है? ये कौन हैं? तो वह मित्र कहता है- मित्र! ये हमारे क्लास फेलो हैं। ये हमारे साथ प्रायमरी में पढ़े, फिर हाईस्कूल में साथ-साथ पढ़े और कॉलेज में भी हम लोग साथ ही साथ पढ़े हैं। तब यहाँ प्रश्न होता है कि भाई! जब तुम प्रायमरी में पढ़े तो क्या तुम दोनों का यह दाढ़ी-मूंछ वाला शरीर ऐसा ही रहा होगा? तो कहता है कि नहीं। तब तो हम दोनों छोटे रहे। तो अब पहले जैसा शरीर रहा, बदल गया और सोचो, जब 'मैं' शरीर होता तो 'मैं' भी बदल जाता, क्योंकि शरीर बदल गया है। जब 'मैं' भी बदल जाता तो यह याद किसको रहती कि ये हमारे सहपाठी हैं। इसलिए 'मैं' तो वही का वही हूँ, यद्यपि शरीर बदल गया है। शरीर बालक, युवा (जवान) बूढ़ा होता है और अन्त में मर जाता है, परन्तु शरीर के मर जाने से मैं आत्मा मरता नहीं हूँ। यह जो साढ़े तीन हाथ का ढ़ांचा दिख रहा है वह 'मैं' नहीं हूँ। यद्यपि 'मैं' रग-रग में बस रहा हूँ। मेरा नाम, मेरी नाक, मेरा मुँह, मेरा शरीर, यह सब मैं नहीं हूँ। अच्छा, देखो जो मैं कह रहा हूँ उसको मानना, जो 'मैं' कहूँ उसको जानना। अरे यार! ये तो मस्तों के लतीफे हैं। जो मैं कहूँ उसको मानना और जो 'मैं' कहूँ उसको जानना। यानी साढ़े तीन हाथ वाले की बात को मानना यह जो व्याख्या से परे हैं उसको जानना। वह जो जानने की चीज है, मानने की नहीं। देखो-जो मानने की चीज है वह मरणधर्मी है, उसको माना जाता है। यहाँ पर सभी समझदार बैठे हैं। दोनों तरफ प्रकृति और पुरुष सभी विद्वत् समाज है। पंथों के पंडित जो हैं, वे अपने सेवक मंडल को अपने पंथ की बातें बताते हैं। उसी की व्याख्या करते चले जाते हैं, सेवक चाहे समझे या समझे। बस, हाथ जोड़े बैठे रहते हैं, मानते चले जाते हैं। हाँ, सत् वचन महाराज। जो उनके गुरु ने बताया, वही उनके धर्म हैं। परन्तु, यहाँ पर यह नहीं कहा जा रहा है। जब तक तुम्हारे गले के नीचे उतरे, तब तक मानना, नहीं तो पंथ-पंथाई जाएगी। सब बातें ठीक समझ लो फिर जानने का प्रयत्न करो। स्वामी जी ! आपने जो अभी बताया है इसका कोई प्रमाण भी है? जी हाँ, मैं प्रमाणित बात कहूँगा, ऊटपटांग बातें नहीं। इन सबका वेदोक्त प्रमाण है। प्रमाण सहित ही बताऊँगा, जो तुम्हारे चित्त को समाधान करेगा, जो शंकाओं का मूलोच्छेद कर देगा। यदि तुम्हारे चित्त को समाधान हुआ तो स्वामीजी ठीक कह रहे हैं, यह मानना। संसार में ठगों का जाल बिछा हुआ है, सम्हल-सम्हल कर पग रखना। पंथ और मजहबी पचड़े में मत पड़ो। यह सब समाज में ठगों का जाल बिछा हुआ है और लोग गुमराह हो रहे हैं। किस- किस की बात मानें, किसे ग्रहण करें? तो भैया ! चित्त को शांति तभी मिलेगी और हृदय में बात ठीक-ठीक बैठेगी, जब बात प्रमाणयुक्त होगी। तो 'मैं' हाथ, पाँव, कान, नाक और शरीर, मेरा शरीर। अच्छा तो स्वामीजी ! क्या 'मैं' सुन रहा हूँ? नहीं। मैं कहता हूँ कि मेरा मन-तो मैं मन भी नहीं। मैं कहता हूँ-मेरी बुद्धि, तो मैं बुद्धि भी नहीं। मेरा प्राण-मेरी सांस, तो मैं प्राण भी नहीं हूँ। मैं कहता हूँ कि मेरा जी घबरा रहा है, तो मैं जी भी नहीं। यहाँ तक कभी-कभी लोग कह देते हैं कि मेरी आत्मा-हालांकि मेरी आत्मा कहना ठीक नहीं, मेरी आत्मा कहना यह युक्तिसंगत नहीं है, आत्मा तो अपना आप है, आत्मा का अर्थ खुद होता है और 'मैं' का अर्थ भी खुद होता है तो 'मैं' स्वयं आत्मा हूँ। तो यह ठीक से समझ लो कि मैं और मेरा एक नहीं है।

 

यहाँ पर जो मुस्लिम भाई हों तो इस्लाम धर्म पर गौर करो। खुदा का क्या अर्थ होता है। खुदा की तशरीह क्या है, खुदा की व्याख्या क्या है? यहाँ पर हाफिज मौलवी सभी बैठे हैं। सभी से पूछता हूँ कि खुदा की क्या व्याख्या है।

 

खे दाल पेश-खुद, अलिफ साकिन- खुदा

 

खुद के मायने 'मैं' जो दुनियाँ का खुद है, 'मैं' है वह एक है या अनेक ? एक है। अलिफ से एक लिखा जाता है। यही खुदा के मायने हैं-सारे जहान का, .खलूक का जो खुद है, अलिफ मायने एक है। 'मैं' हूँ यह स्वामी जी अपने लिए कहते हैं ऐसा समझना। अरे! कहाँ अंधेरे में भटक रहे हो। जरा प्रकाश में आओ यार ! अंधेरी ढ़ोवो ! अंधेरी ढोने की बात जरा सुना दूं, बहुत दिन हो गए बताए-

 

कहीं एक भीलों की बस्ती थी। उन भीलों में दीपक जलाने का रिवाज नहीं था, रात्रि में दिया नहीं जलते थे। वरन् जब रात्रि होती थी तो गाँव के सभी भील, स्त्री-पुरुष अंधेरी ढोते थे। सिर पर गुड़री बना बड़े-बड़े टोकरों में अँधेरी को पैर से दबा दबा कर भर लेते थे और गांव के बाहर सड़क में फेंकते रहते थे। बालक, वृद्ध सभी सिर पर टोकरी लादकर अंधेरी फेंकते, यह क्रिया रात्रि भर चलती। जब सूर्य भगवान का प्रकाश दिखता, रात्रि बीतने पर जब अंधेरा स्वयं दूर हो जाता तो वे लोग समझते कि इन लोगों ने सब अंधेरी ढो डाली।

 

एक भील के लड़के की शादी किसी अन्य गाँव में हुई। नई दुल्हन घर में आई। नई बहू के घर में अंधेरी ढोने की प्रथा नहीं थी, वहाँ केलोग दीपक जलाते थे। जब रात्रि हुई तो उसकी सास एक बड़ी-सी टोकरी नई बहू के सामने रखकर उसको भी अंधेरी ढोने को कही। नई बहू सोचने लगी कि अच्छा पागलों के यहाँ आई हूँ। क्या अंधेरी भी कोई ढोने की चीज है? वह अंधेरी ढोने को राजी नहीं हुई। बुढ़िया बिगड़ गई, कहती है-चली बड़ी आई मेरी सास, मेरी सास की सास सभी अंधेरी ढोये हैं-चल उठ। इस तरह जब वाद-विाद हो रहा था तो घर का बूढ़ा ससुर आया और बीच-बचाव किया। उसने समाधान किया कि नई बहू आज ही आई है और थकी हुई है, इसलिए इसे अंधेरी ढोने को आज कहा जाए। वरन् अपने पुत्र को कहा कि बहू के हिस्से की भी अंधेरी आज तू ही ढो देना। पुत्र आज्ञाकारी था, वह अपनी पत्नी के हिस्से की अंधेरी ढोने लगा। मुढ़ेरी बांधकर सिर में अंधेरी भरकर रात्रि भर ढोया। नई बहू दिन में पता लगा ली कि पास में बाजार कहाँ है-लोगों से मालूम किया कि चार-पाँच फर्लांग पर 'बिहार' नाम का एक गाँव है। हाँ भाई ! चश्मदीद मिशाल देनी चाहिए। नई बहू बाजार से दीपक, तेल, रूई सब ले आई और रात्रि में घर में दिवाली मनाई, घर जगमगा उठा। आगे-पीछे दशों दिशाओं में कहीं भी अंधेरी का पता नहीं। तब तो उसकी सास और सभी, बहू की पूजा करने लगे। यह तो साक्षात् जदगम्बा है। घर में जगत जननी आई है। उसका पति भी पाँव पड़ने लगा। घर में अंधेरी दूर हो गई और सभी घर में पैर फैला-फैलाकर सोये। यह बात जब गाँव के अन्य लोगों को मालूम हुई तो पूछने आए कि भाई ! आज तुम लोग अंधेरी क्यों नहीं ढोये? तब ये कहने लगे कि भैया ! घर में साक्षात् लक्ष्मी देवी आई है। बहू नहीं, साक्षात् जगदम्बा है, दिया के प्रकाश से अंधेरी का नाश बताए तो फिर गाँव का गाँव दण्ड प्रणाम करने लगे। देवी ! कृपा करो-हमारे घर की भी अंधेरी दूर कर देना। इस तरह इस गाँव से अंधेरी ढोने की प्रथा बंद हो गई। प्रकाश होने लगा।

 

यह तो एक दृष्टांत है। इसका द्राष्टांत है कि अनादिकाल से हृदय रूपी मकान में अज्ञान की अंधेरी छाई हुई है और इस अज्ञान रूपी अंधेरी दूर करने के लिए नाना प्रकार के साधन करते रहे हैं। कष्ट साध्य साधन कर रहे हैं परन्तु भैया ! जब तक कोई सद्गुरु श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ संत के शरण नहीं गए, उनकी कृपा नहीं प्राप्त किए तो अनादिकाल के साधनों में भी अज्ञानान्धकार समाप्त होने वाला नहीं। अज्ञान का नाश तो संतों की कृपा से ही होता है।

 

स्वामी जी ! यह दारुण अविद्या, जन्म-जन्म का अज्ञान, कैसे जल्दी से दूर हो! क्या कोई उपाय है कि अनादिकाल की अविद्या एक क्षण में दूर हो जाय ? कैसे होगा? इसका उत्तर सुनो-

 

किसी कन्दरा में हजारों वर्षों से अंधकार छाया हुआ है, अनादिकाल से अंधेरा है। वह अंधकार यह नहीं कहता कि हम जल्दी नहीं जाएंगे। यहाँ तो हमारा हजारों वर्षों का कब्जा है, लाखों बरसों का कब्जा है, जल्दी नहीं जाएंगे। परन्तु, ज्यों ही प्रकाश हुआ, एक दिया जलाया, त्यों ही वह हजारों वर्षों का अंधकार कहाँ चला जाता है, कितनी जल्दी अंधकार भाग जाता है, इसकी कोई सीमा नहीं। इसी प्रकार यह हृदय का अंधकार, जन्म-जन्म का अज्ञान यह नहीं कहता कि हम नहीं जाएँगे। जब भी परम ज्ञान, ब्रह्मज्ञान का बोध होगा, अज्ञान का नाश स्वयं हो जाएगा। यह अविद्या रूपी अंधकार नहीं कहेगा कि हम नहीं जाएंगे। परम ज्ञान को प्राप्त करो। परम प्रकाश का अनुभव तुम स्वयं करोगे। इसलिए इस परम ज्ञान को प्राप्त करने की उत्कट जिज्ञासा जगाओ। किसी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के समीप जाकर हाथ में पत्र, पुष्प, फल, समीधा लेकर उनके चरण में प्रणिपात होकर प्रार्थना करो। सद्गुरु के शरण में जाओ।

 

तद्विज्ञानार्थं सगुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ।।

(मुण्डक 1-2-12)

 

जिज्ञासुओं ! कान खोलकर सुन लो, नदी का बहना तब तक बंद होगा जब तक कि नदी अपने घर में नहीं पहुँच जाएगी। नदी का घर समुद्र है और जब तक वह समुद्र में नहीं पहुँच जाती तब तक वह अचल नहीं होती।

 

सरिता जल जलनिधि महुं जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई ।।

(रा.कि.)

 

लोगों की यह आम भावना हो गई है कि भैया! प्रारब्ध के बिना कुछ नहीं मिल सकता, तो फिर तकदीर के बिना भगवान को प्राप्त करना कहाँ संभव है। यह जान लो कि तकदीर के भरोसे रहो। भगवान को प्राप्त करना तुम्हारे स्वयं के उत्कट अभिलाषा पर निर्भर है। यह गलत धारणा छोड़ दो कि तकदीर से, प्रारब्ध से भगवान मिलते हैं। भगवान तो तुम्हें स्वयं मिले हुए हैं।

 

उन्हें मंज़िल नहीं मिलती, जो किस्मत के सहारे हैं

उनकी ज़िन्दगी ही मौत, जो वै हिम्मत के हारे हैं ।। 1 ।।

जो बेग़र्जी से हैं जीते, उन्हें क्या मौत से डर है।

हमेशा खुद पे जो रोशन, वही रोशन सितारे हैं ।।2।।

हु.कूमत मुल्क पर थी जिनकी, वे दर-दर के भिखारी हैं

बिगड़ना बनना दोनों ही, ये कुदरत के नज़ारे हैं ।।3।।

जीना सच में उनका ही, जो खुद मस्ती में जीते हैं

सभी से 'मुक्त' हैं हरदम ये मस्तों के इशारे हैं ।।4।।

 

कौन? जो बंध से मुक्त और मोक्ष से भी मुक्त। सर्व सकंल्पों से जो मुक्त है। इसलिए-

 

जीना सच में उनका ही, जो खुद मस्ती में जीते हैं

सभी से 'मुक्त' हैं हरदम, ये मस्तों के इशारे हैं ।।

 

अरे ! ये मस्तों के लतीफे हैं।

 

उन्हें मंजिल नहीं मिलती, जो किस्मत के सहारे हैं

उनकी जिंदगी ही मौत, जो वै हिम्मत के हारे हैं ।।

 

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदङ्गं गृहाण गदितं मया ।।30 ।।

 

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः

तथैव तत्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।31 ।।

 

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।32 ।।

 

ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत प्रतीयेत चात्मनि

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।33 ।।

 

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु

प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु तेष्वहम् ।।34 ।।

 

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः

अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ।।35 ।।

 

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना

भवान्कल्पविकल्पेषु विमुह्यति कर्हिचित् ।।36 ।।

 

(श्रीमद् भागवत 2/9/30-36)

 

 

 

प्रथम दिवस :

 

दूसरी बेला

 

दोपहर 2.00 से 4.00 बजे तक

 

प्रपन्न पारिजाताय तोत्त्रवेत्रैकपाणये

ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृत दुहे नमः ।।

वसुदेव सुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्

देवकी परमानंदं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।।

मूकं करोति वाचालं पंङ्गं लङ्घयते गिरिम् ।।

यत्कृपा तमहं वन्दे परमानंद माधवम् ।।

 

प्रसंग चल रहा है- चतुःश्लोकी भागवत-

 

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदङ्गं गृहाण गदितं मया ।।30 ।।

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः

तथैव तत्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।31 ।।

 

विज्ञान समन्वितं संयुक्तं सरहस्यं पुनः तदङ्गं मे परम गुह्यं ज्ञानम् हे ब्रह्मन् !

 

त्वं गृहाण। हे ब्रह्माजी ! विज्ञान संयुक्त यानी विज्ञान सहित साङ्गोपाङ्ग एवं रहस्य सहित मेरे परमगुह्य ज्ञान को तुम ग्रहण करो।

 

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः तथैव तत्वविज्ञानं मदनुग्रहात् ते अस्तु 'मैं' का जैसा भाव, 'मैं' का जैसा रूप, 'मैं' का जैसा गुण, 'मैं' का जैसा कर्म। हे ब्रह्माजी ! मेरी कृपा से चारों तत्वों का तुम्हें बोध वैसे ही हो जाए।'मैं' जैसा हूँ जो 'मैं' का भाव, रूप, गुण और कर्म। आओ, इन रहस्यों का अनुभव करें। भली-भाँति समझकर ग्रहण करो-अपने आप 'मैं' को शरीर से भिन्न समझो-यह पहले प्रक्रिया समझाने में बताई जा चुकी है। सूत्र रूप में जान लो कि जिन पदार्थों को मेरा कहता हूँ वह पदार्थ 'मैं' से अलग है। प्यारे ! जानों कि मेरा कहने वाला 'मैं' से अलग होता है।

 

समझो-यदि ऐसा कहा जाए कि 'मैं' ऐसा हूँ तो 'मैं' का प्रकार हो जाएगा क्योंकि यदि 'मैं' ऐसा हूँ तो ऐसा नहीं हूँ-ऐसा भी कहा जा सकता है, इसलिए 'मैं' ऐसा हूँ-ऐसा नहीं कहा जा सकता। 'मैं' जैसा हूँ वैसा ही हूँ। 'मैं' ही जानेगा कि वह कैसा है। यह दूसरी चीज है कि 'मैं' को कोई शरीर मानता है,

 

तो कोई जीव मानता है और कोई ब्रह्म मानता है, परन्तु 'मैं' तो एक ही हूँ। तो फिर इन विपरीत दृष्टि वालों को एक नहीं अनेक दिख रहा है। ये बात है मैं जैसा हूँ वैसा ही हूँ, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा 'यावानहं' की व्याख्या हो रही है।

 

जो जैसा है वैसा ही हूँ, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा ।।1।।

हूँ कौन कहाँ मैं कैसा, तशरीह नहीं तकरीर नहीं

 

हो गए मुसव्वर सब हैरां, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा ।।2।।

जितने भी वेद, पुराण, दर्शन शास्त्र हैं और उनके बनाने वाले ये सब चित्रकार हुए। ये सभी परेशान हैं 'मैं' को जानने में नेति-नेति कहते हैं, वहाँ मन, वाणी की गम नहीं।

 

अर्शे नकाब पोशीदा हूँ, दीदार चश्म पेचीदा हूँ

लग गए लबों पर चुप ताले, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा ।।3।।

 

अर्शे-आकाश, नकाब-घूंघट, पोशीदा-छुपा हुआ। मुझ भगवान आत्मा पर आकाश का पर्दा पड़ा है। 'मैं' कैसा हूँ यह दृष्टिगम्य नहीं है। आँख से तुम मुझे नहीं देख सकते। मुझे देखने में आँखें समर्थ नहीं हैं। 'मैं' पेचीदा हूँ।

 

सारी दुनियाँ का 'मैं' हूँ दुनियाँ फिर भी तलाश में फिरती है

बस यही तमाशा कुदरत का, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा ।।4।।

 

एक का नहीं सारी दुनियाँ का, जितने बैठे हो चाहे प्रकृति समाज हो या पुरुष समाज सभी अपने आपको क्या कहते हो? 'मैं' तो सारी दुनियाँ का 'मैं' हूँ फिर भी दुनियाँ तलाश में फिर रही है। जन्म-जन्मांतर अनादिकाल से उस भगवान को ढूँढ़ रही है। भैया! यही तो माया का खेल है।

 

ये अजब अनोखी तसवीरें, खिंच रही तसव्वर में हरदम

तसवीर तसव्वर दोनों को, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा ।।5।।

 

ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त सभी 'मैं' हूँ और उसकी तस्वीर खिंच रही है। अरे ! किसमें देख रहो हो? किस पर सारा संसार खिंचा हुआ है।

 

ये अजब अनोखी तसवीरें, खिंच रही तसव्वर में हरदम ओ। हो।

तसवीर तसव्वर दोनों को, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा ।।5।।

 

देखा तो सभी ने-फिर देखने वाले को भी, क्या देखा? क्योंकि तसवीर और तसव्वर एक ही है। देखने वाले अनेक हैं पर देख किस को रहे हैं? एक को। स्त्री देखती है कि यह मेरा पति है। पुत्र देखता है कि यह मेरा पिता है। बहिन देख रही है कि यह मेरा भाई है। चाचा देखता है कि यह मेरा भतीजा है। साला के लिए यह बहनोई है। शत्रु देखता है कि यह मेरा शत्रु है। मित्र देखता है कि overline 45 मेरा मित्र है। तसवीर एक ही है, परन्तु देखने वाले भिन्न-भिन्न देख रहे हैं। इस साढ़े तीन हाथ के शरीर का बँटवारा अभी तक हो सका। इसके हिस्सेदार अनेक हैं। पत्नी का पति, पुत्र का पिता, ये भाव उन्हीं के पास है। यदि यह शरीर सचमुच में पति होता तो फिर सबको ही वह पति ही दिखता। तब तो वह सबका ही पति हो जाएगा, सभी स्त्री उसे पति मानते हैं। तो बहिन का भाई बहिन के पास है।

 

तसवीर तसव्वर दोनों को, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा ।।

 

'मैं' तो आत्म तत्व तसव्वर इसको क्या देखा?

 

यं शैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनो,

बौद्धाः बुद्ध इति प्रमाण पटवः कर्तेति नैय्यायिकाः

अर्हन्नित्यथ जैन शासनरताः कर्मेति मीमांसकाः,

सोऽयं वो विदधातु वाञ्छित फलं त्रैलोक्यनाथो हरिः ।।

 

जिस 'मैं' आत्मा को शैव शिव रूप से उपासना करते हैं। किसकी? मैं आत्मा की। जिस आत्मा को बौद्ध बुद्ध नाम से उपासना करते हैं। नैयायिक जिसे कर्ता मानकर उपासना करते हैं। जैन जिसे अर्हन्तदेव कहते हैं। कर्मवादी जिसे कर्म मानकर उपासना करते हैं। इसलिए कोई कुछ देखा, कोई कुछ देखा।

 

अरे ! जो 'मैं' यही तसव्वर है। यही तुलसी का राम है। सूर का श्याम है। गोपियों का कृष्ण है, मीरा का गिरधर है। हिन्दुओं का जो ईश्वर है। मुसलमानों का जो खुदा है। ईसाइयों का ईसा है। यहूदियों का मूसा है। बौद्धों का बुद्ध है। जो आस्तिकों का 'है' है और नास्तिकों का 'नहीं' है।

 

कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा-

 

'मैं' जैसा हूँ वैसा ही हूँ, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा। देखो-अज्ञानवश अनादिकाल से मोह निद्रा में सोने वालों! क्या समझे? आत्मा को साढ़े तीन हाथ का शरीर माना है, उसे जीव माना है, भैया! यह 'मैं' क्या हूँ-इस महत्व को समझो -

 

प्रकृति विकृति भिन्नः शुद्ध बोध स्वभावः

सदसदिदमशेषं भासयन्निर्विशेषः

विलसति परमात्मा जाग्रदादिष्ववस्था,

स्वहमहमिति साक्षात् साक्षिरूपेण बुद्धेः ।।

(विवेक चूड़ामणि-137)

 

जो प्रकृति और विकृति से परे है यानी जो परमात्मा किसी का कारण है, किसी का कार्य है। परमात्मा किसी से पैदा हुआ है और परमात्मा से कुछ पैदा हुआ है। अगर मान लो कि परमात्मा किसी के द्वारा उत्पन्न हुआ है, तो फिर यह पता लगाना होगा कि वह किससे पैदा हुआ है और फिर उसका पैदा करने वाला किससे पैदा हुआ? तो यहाँ पर वेदांत का चक्रिकापत्ति दोष जाएगा और फिर जब परमात्मा पैदा हुआ तो शायद कहने वाला पुरुष तो देखा ही होगा कि वहाँ जब पैदा हुआ, पैदा होने के टाइम में मानो वहाँ खड़े हों, बुद्धि से समझो-इसलिए परमात्मा किसी से पैदा नहीं हुआ। जब परमात्मा से भी कुछ पैदा नहीं हुआ। अर्थात् संसार पैदा ही नहीं हुआ। जिज्ञासुओं ! देखो-अरे! अभी पोल खोल देते हैं-परमात्मा जन्मने वाला है, जन्म देता है। कारण, जो जन्म लेता है, वह मरता भी है।

 

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म

(तैत्त.उप.)

 

फिर उसे कैसे जन्मने वाला मानें? जो जन्म रहित है, अनन्त है वह कैसे जन्म लेगा जब सब कुछ वही है। जो स्वयं जन्म लेना नहीं जानता तो पैदा क्या करेगा? अरे भाई! हाँ-उसे क्या तमीज होगी जो जन्मना नहीं जानता, वह दूसरे को क्या पैदा करेगा? देखो-जिसने तुमको पैदा किया वह भी किसी से पैदा हुआ था-तो फिर उसका जन्म देने वाला उसका बाबा और उसका जन्म देने वाला वह भी किसी से पैदा हुआ था और इसीलिए तो तुमको भी पैदा करने की तमीज है-इसलिए इनसे कोई पैदा नहीं हुआ। इसलिए प्रकृति विकृति भिन्नः शुद्ध बोध स्वभावः-प्रकृति-विकृति से परे, शुद्ध बोध ही जिसका स्वभाव है, अशुद्ध बोध नहीं। तो क्या स्वामीजी ! अशुद्ध बोध भी होता है? हाँ, क्यों नहीं- वह भी होता है। मैं अमुक हूँ, फला हूँ-यह अशुद्ध बोध है। 'मैं' का 'मैं' ही हूँ-यह शुद्ध बोध है। ' प्रकृति विकृति भिन्नः शुद्ध बोध स्वभावः सदसदिदमशेषं भासयन् निर्विशेषः' जो सत है असत है। विलसति परमात्मा जाग्रदादिष्ववस्था- जो जाग्रत अवस्था में विलास करता है, जो स्वप्नावस्था में विलास करता है, जो सुषुप्ति अवस्था में विलास करता है। जो तीनों अवस्था में समरूप से विलास करता है। जाग्रत अवस्था में कैसे विलास करता है? जो जाग्रत अवस्था के प्रपंच को जानता है। यहाँ पर स्त्री समझ बैठी है, यहाँ पर पुरुष समझ बैठा है, इसे कौन जानता है? इसका कौन साक्षी है? इसको कौन देखता है? यही परमात्मा का जागृदादिक अवस्था का विलास है। यही परमात्मा बुद्धि का साक्षी, शरीर के अंदर अहमिति 'मैं' हूँ 'मैं' हूँ इस शब्द के द्वारा जो निरंतर अभिव्यक्त हो रहा है।

 

यहाँ पर सभी विद्वान बैठे हैं-इसका अर्थ लगाओ, भाव समझो अहमिति- निरंतर जो आवाज हो रही है- 'मैं' हूँ 'मैं' हूँ। स्वहमहमिति साक्षात् साक्षिरूपेण बुद्धेः। जो मन का साक्षी है, जो बुद्धि का साक्षी है, जो चित्त का साक्षी है।

 

प्रकृति विकृति भिन्नः शुद्ध बोध स्वभावः,

सदसदिदमशेषं भासयन् निर्विशेषः

विलसति परमात्मा जाग्रदादिष्ववस्था,

स्वहमहमिति साक्षात् साक्षिरूपेण बुद्धेः ।।

(विवेक चूड़ामणि)

 

इसलिए मैं आत्मा ही हूँ। इसी को समझ लो। बस, इतना ही। यहाँ पर सभी विद्वान, शिक्षक वर्ग बैठे हैं। हम लोग जब चौथी पढ़ते थे तो ग्रामर में पढ़ते थे-संभव है यह आजकल छठवीं में पढ़ाते हों-ग्रामर में तीन प्रकार के पुरुष पढ़े-उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष एवं अन्य पुरुष सः, त्वम्, अहम् वह, तू, मैं वह-अन्य पुरुष है, तू-मध्यम पुरुष है और मैं उत्तम पुरुष है-यह बताया गया। गुरुजी ने इसी तरह से शिक्षा दी कि बेटा! ध्यान देना, 'मैं' अधम पुरुष नहीं, उत्तम पुरुष है। मैं साढ़े तीन हाथ का पुतला मल-मूत्र का भांड-अधम पुरुष है और इसके अंदर 'मैं' हूँ वह उत्तम पुरुष है। तो भैया ! यह ज्ञान एकदेशीय नहीं वरन् व्यापक है। हाँ, भाई! वेदांत तो सभी को सिद्ध करता है।

 

उत्तम पुरुष-ठीक से पढ़ना-पुरुष जो उत्तम है वह, अपने 'मैं' को जान लिया और वह पुरुषोत्तम हो गया। पुरुषोत्तम क्यों? क्योंकि वह समझदारी से, ज्ञान से, आत्म तत्व के विचार से अपने आपको जाना। अरे ! वह जो जाग्रत का जानने वाला है, स्वप्न को जानता है, सुषुप्ति को जानता है और मूर्छा को जानता है, समाधि के आनंद का अनुभव करता है, समाधि के टूटने को जानता है, मूर्छा के बेहोशी को जो जानता है-

 

यहाँ पर बड़े-बड़े डॉक्टर बैठे हैं। वे बतावें कि जब वे कोई सीरियस बड़ा ऑपरेशन करते हैं तो वे रोगी को दो-तीन घंटे बेहोश रखते हैं। तो यह प्रश्न होता है कि श्रीमान् जी ! उस दो-तीन घंटे की बेहोशी को कौन जानता है? यदि 'मैं' बेहोश हो जाऊँ तो बेहोशी को कौन जानेगा? शरीर तो हमेशा ही बेहोश है तो फिर वह क्या जानेगा। डॉ. लोग क्लोरोफार्म सुंघाते हैं और इस तरह तुम्हें बेहोशी में लाकर शरीर का चीर-फाड़ करते हैं। हाँ, मन को ही सुख-दुःख अथवा पीड़ा होती है, इसलिए उसे ही बेहोश किया जाता है। 'मैं' तो सदैव साक्षी रूप से देख रहा हूँ, अनुभव कर रहा हूँ, इसलिए इस बेहोशी का साक्षी 'मैं' ही हूँ और कौन होगा। तो क्लोरोफॉर्म किसको सुंघाते हैं? मन को। मन बेहोश रहता है, 'मैं' बेहोश नहीं होता। कारण? मुझे आत्मा में होश-बेहोश दोनों नहीं है। 'मैं' कारण, कार्य से परे हूँ।

 

तो फिर समझ लो। समाधि के उदय अस्त को 'मैं' जानता हूँ। 'मैं' मर्यादा से विचलित नहीं होता। सब समय एक रस रहने वाला हूँ। शाश्वत हूँ। इसलिए overline 45 मैं आत्मा 'विलसति परमात्मा जाग्रदादिष्ववस्था' पुरुषोत्तम हूँ और उसी का प्रतिपादन यहाँ हो रहा है। यही वेदांत है, अध्यात्म विद्या है। तो 'मैं' जैसा है वैसा ही है-उसे किसी ने देखा नहीं-

 

वाह, जी वाह- कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा-

बेदाल लाम वाले मैं को, बेदिल होकर जिसने देखा

हो गया मुक्त जंजालों से, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा ।।6।।

 

दाल भात नहीं-

 

दाल जेर लाम-दिल, हिन्दी में जैसे , , की मात्रा ऐसे ही उर्दू में जबर, जेर, पेश है। मुझ आत्म देश में दिल गायब है। दिल नाम की कोई चीज नहीं।

 

हो गया मुक्त जंजालों से, कोई कुछ देखा कोई कुछ देखा ।।

 

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः

तथैव तत्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।

 

जैसा 'मैं' का भाव, जैसा मैं का रूप, जैसा मैं का गुण, जैसा 'मैं' का कर्म-मेरी कृपा से तुम्हें इन तत्वों का बोध हो जाए। चतुःश्लोकी भागवत के अंतर्गत कुल सात श्लोक हैं। दो श्लोक प्रस्तावना है, चार श्लोक मूल भागवत है और अन्त एक श्लोक इसकी फलश्रुति है।

 

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।

ऋतेऽर्थंयत्प्रतीयेत प्रतीयेत चात्मनि

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।

 

सुनो, आज के पहले भी 'मैं' ही था। यह नहीं कि आज ही हूँ। आज के पहले भी 'मैं' ही था और आज के बाद भी 'मैं' ही रहूँगा। यहाँ पर आत्मा की व्याख्या हो रही है। इसका विवेचन पहले शास्त्रीय पद्धति से कर लें फिर युक्तियों से बोध कराएंगे।

 

'स्थूल, सूक्ष्म, कारण देहादव्यतिरिक्तो अवस्थात्रयसाक्षी

सच्चिदानंद स्वरूपो यस्तिष्ठति सैव आत्मा ।।'

 

स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों शरीरों से परे, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी, सत्, चित्त, आनंद रूप से जो स्थित रहे वही आत्मा है। जाग्रत अवस्था में स्थूल शरीर जान लो, स्वप्न अवस्था में सूक्ष्म शरीर जान लो और सुषुप्ति अवस्था में कारण शरीर जान लो। इन सबसे परे, परे का अर्थ यह नहीं किसी तरह से अलग कहीं और। परे का अर्थ, इनके गुण, धर्म से परे आत्मा हूँ इसके अंदर होते हुए भी इनके धर्मों से परे अलग और जाग्रत, स्वप्न, सुषप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी, सत् चित् आनंद स्वरूप, इन सब अवस्थाओं का अनुभव करने वाला 'मैं' आत्मा हूँ। इसी को युक्ति द्वारा सुनो-जिसके बिना जो नहीं सिद्ध हो, जिसका अस्तित्व जिसके बिना रहे, वही उसकी आत्मा है। एक क्षण भी जिसके बिना जो नहीं रह सकता, वही उसकी आत्मा है। देखो-यह डंडा है-यदि डंडा लकड़ी से कहे कि मैं तुमसे अलग हूँ तो यह सिर्फ अभिमान होगा, क्योंकि डंडे की आत्मा लकड़ी है। सूत के बिना वस्त्र का अस्तित्व नहीं। इसलिए सूत, कपड़े की आत्मा है। आभूषण स्वर्ण के बिना नहीं इसलिए स्वर्ण आभूषण की आत्मा है। 'मैं' आत्मा सर्व का सर्व हूँ। सारे जहान का वजूद, उसकी हस्ती, उसकी सत्ता 'मैं' आत्मा ही हूँ। जी हाँ-

 

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।

 

आज के पहले भी 'मैं' ही था परन्तु 'मैं' सत् था असत् था-था जरूर। क्या प्रमाण कि आज के पहले मैं ही था? इसका प्रमाण 'मैं' के सिवाय और कौन होगा। अरे! 'मैं' ही प्रमाण हूँ। जैसे किसी ने कहा कि मेरी जिह्वा नहीं है-तो फिर भैया ! तुम बोल कैसे रहे हो? सुनो, आज के पहले 'मैं' था, 'मैं' नहीं था, 'मैं' के था और 'मैं' के नहीं था को जो था उसने देखा या जो नहीं था उसने देखा? हाँ और समझो भैया ! बिना अपने बयान के मुलजिम छुटकारा नहीं पाता। आज के पहले 'मैं' नहीं था। 'मैं' के भाव, अभाव का साक्षी 'मैं' ही तो था। ओहो ! 'मैं' के अस्तित्व की अनुभूति 'मैं' ही करता हूँ। मैं की महिमा का कथन वेद, शास्त्र सभी करते हैं, परन्तु मेरा कथन नहीं कर सकते, क्योंकि मैं मन, वाणी का विषय नहीं हूँ। भगवान कहते हैं-आज के पहले भी 'मैं' ही था और आगे भी 'मैं' ही रहूँगा। अरे भाई ! भगवान की जन्मकुंडली को क्या कोई जानता है? 'मैं' हूँ 'मैं' नहीं हूँ, 'मैं' था, 'मैं' नहीं था, 'मैं' रहूंगा, 'मैं' नहीं रहूंगा इत्यादि। का साक्षी 'मैं' ही तो हूँ। यदि 'मैं' रहूँ तो मेरी व्याख्या कौन करे? भाव को अभाव बताना यही व्याघात दोष है। यहाँ पर वेदांत का व्याघात दोष जाएगा। यदि कोई कहे कि मेरा पिता अखण्ड ब्रह्मचारी है। है तो तुम क्या आकाश से पैदा हुए हो? मेरी जिह्वा नहीं है, तो तुम कैसे बोल रहे हो? इसलिए आज के पहले भी 'मैं' था, आज के बाद भी 'मैं' ही रहूँगा और अभी भी 'मैं' ही हूँ।

 

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।

 

किसी भी पदार्थ (दृश्य) को देखकर चार कल्पनाएं पैदा होती हैं-देश, काल, वस्तु और कर्ता। वह पदार्थ कोई कोई देश में बना, किसी किसी समय में बना, किसी किसी वस्तु से बना और इसका कोई कोई बनाने वाला होगा। इसी तरह जब हम संसार को ढूँढते हैं कि संसार कब बना, इसको किसने बनाया, कैसे बना, कहाँ बना आदि तो कुछ नहीं मिलता, क्योंकि संसार एक विकल्प है।

 

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ।।

 

(योग दर्शन) शब्द सुनने में तो आवे परन्तु ढूँढ़ने पर वस्तु मिले, उसे कहते हैं विकल्प। विकल्प भाव शून्य है। विकल्प को ढूँढ़ने चलो तो हाथ कुछ लगेगा। जब डंडा विकल्प को ढूँढ़ने चलेंगे तो हाथ में लकड़ी ही स्पर्श में आती है, परन्तु डंडा कहीं नहीं मिलता। इसी प्रकार संसार सुनने में तो रहा है, परन्तु संसार कहाँ है, कैसा है, कुछ पता नहीं लगेगा। संसार को ढूँढ़ने पर इसका पता ही मिलेगा।

 

व्याकरण के अनुसार गम्लृ गतौ धातु से जगत शब्द सिद्ध होता है।

 

मैं तोहि अब जान्यौं संसार।

 ज्योंकदली तरुमध्य निहारत, कबहुंन निकसत सार ।।

(विनय पत्रिका)

 

कदली के वृक्ष के खंभे को परत-परत निकालते चलो, फिर चाहे अंत तक निकाल डालो। कुछ भी मिलेगा। एकदम पोलमपोल-कुछ भी नहीं। साधारणतया सभी पूछते हैं कि भैया! कौन गाँव से आये हो? आगन्तुक कहता है-भैया ! हम सब झंडापूर से आए हैं। समझना सभी आसपास पढ़े-लिखे बैठे हैं। हम कहते हैं कि भैया! उस झंडापुर को हमें हाथ से पकड़ा दो कि यही झंडापुर है। देखो, क्या सामने जो महुआ का वृक्ष है वह झंडापुर है? ऐसी कोई भी जगह हमें बताना जिसे झंडापुर कहकर पकड़ा सको और तारीफ यही है कि पटवारी के खाते में झंडापुर ही लिखा मिलेगा, परन्तु यदि उसे खोजने जाओ तो वह झंडापुर मिलेगा यही संसार है। इसको विकल्प कहते हैं। इसलिए झंडापुर में रहने वाले अपने आप सभी झंडापूर है। सब बड़ा गड़बड़ गड़बड़ है। यही विकल्प है। झंडापुर ढूँढ़ने पर नहीं मिलेगा।

 

('जो दिखता है वह दिखता है, मैं दिखता हूँ तब दिखता है। इस रहस्य को जान लिया तब दिखना कहाँ जो दिखता है।)' देखने वाला ही तुमको दिखता है। दिखने वाला और देखने वाला यदि वस्तुतः भिन्न-भिन्न हैं तो देखने वाले को निकाल लो तो भी दिखने वाला दिखे तब अलग-अलग मान सकते हो। परन्तु, उसका तो अस्तित्व ही नहीं रहता इसलिए दिखने वाला, देखने वाले से भिन्न नहीं है। तो देखने वाला ही दिखता है। 'मैं' देखता हूँ, तब दिखता है, क्योंकि अस्तित्ववान तो 'मैं' ही हूँ। इस रहस्य को जान लिया तो फिर दिखना कहाँ जो दिखता है।

 

क्या-क्या कह डालूँ यार! हमको इतना उत्साह है कि क्या-क्या बता दूँ- चाहे सुनने वाले को इतना उत्साह हो, परन्तु यहाँ तो उत्साह है। हाँ, जी! जिस प्रकार मेले में एक लाख व्यक्ति जमा हैं। जब कोई मेले में जाकर मेला को खोजे कि मेला कहाँ है? जिससे पूछो कि भैया ! कहाँ आए हो? तो यही उत्तर मिलता है कि मेला देखने आये हैं? बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सब मेला देखने आए हैं? यदि किसी व्यक्ति से पूछो कि महाराज ! क्या आप मेला देखने आए हैं? श्रीमान् जी जरा हमें बताना कि मेला कहाँ है? मेला में दुबे, तिवारी, चौबे, पाण्डेय सभी आये हैं, परन्तु सबकी बोलती बंद है। मेला को बताने के लिए कोई तैयार नहीं है, परन्तु बोलते सभी हैं कि मेला देखने आए हैं। तब फिर मेला कहाँ है? जिस-जिस से पूछो, वे सब के सब मेला देखने आए हैं. ऐसा कहते हैं पर वास्तव में वे सब स्वयं ही मेला हैं। इसी प्रकार संसार प्रपंच का देखने वाला मैं आत्मा स्वयं प्रपंच हूँ। जिस प्रकार मेला देखने वाले से मेले की सत्ता भिन्न नहीं है, इसी प्रकार प्रपंच का देखने वाला मुझ आत्मा से प्रपंच की सत्ता भिन्न नहीं है। यहाँ पर कोई साम्प्रदायिक बात नहीं है। यह युनिव्हर्सल टूथ (व्यापक सत्य) है, कोई बाजारु चीज नहीं है।

 

सिद्ध करना है-देश, काल, वस्तु और कर्ता। लकड़ी से डंडा, किवाड़ (दरवाजे) चौखट आदि बनते हैं, परन्तु इन सबमें व्यापक तत्व लकड़ी ही है। लकड़ी खिड़की नहीं है, कुर्सी नहीं है। अरे! जिसे अपने अस्तित्व का (लकड़ी का) ही परिज्ञान नहीं वह क्या जानेगा कि उसका वास्तविक स्वरूप क्या है।

 

यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञात् स्याद्वाचारम्भणं

विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ।।

(छा.उप 6/1/14)

 

अर्थात् जिस प्रकार एक मृत्तिका पिंड के जान लेने से मिट्टी से बने हुए समस्त घटादिक पदार्थों का ज्ञान हो जाता है, यानी सब मिट्टी ही हैं। घट आदि विकास तो केवल कथन के ही लिए हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है। मिट्टी के बर्तन को हाथ लगाओगे तो मिट्टी ही हाथ लगेगी इसलिए मृत्तिका का ज्ञान हो जाने पर जितने मिट्टी के बने हंडी, दिया, परई आदि सभी का परिज्ञान हो जाता है। रामायण तो सभी पढ़ते हैं। जब रामायण का पाठ करते हो तो इस पद पर ध्यान क्यों नहीं देते-

 

आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभवासी ।।

सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रणाम जेरि जुग पानी ।।

 

क्योंकि सभी सीय राममय है। राम व्यापक तत्व है। जितने गीता के पाठ करने वाले हो क्यों नहीं निम्न श्लोक पर ध्यान देते-

 

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय

मयि सर्वमिंदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।।

(गीता 7-7)

 

जब सभी वासुदेव है। वासुदेवः सर्वमिति जरें-जरें से यही आवाज रही है। मुसलमान भाई लाइलाह इल्लिल्लाह कहते हैं। अर्थ क्या है-नहीं है अल्लाह के सिवाय दूसरा कुछ भी।

 

नाम, रूप ही संसार है और यह वाणी का विकार है।

 

यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञात्ꣲ᳭   स्याद्वाचारभ्भणं

विकारोनामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ।।

(छा.उप. 5/1/15)

 

अर्थात् जिस प्रकार लोहे के एक टुकड़े का ज्ञान हो जाने पर लोहे से बने समस्त पदार्थों का ज्ञान हो जाता है (यानि ये सब शस्त्रादिक तो लोहा ही है), उसी प्रकार नाम, रूप तो केवल वाणी के विकार मात्र हैं, सत्य तो लोहा ही है।

 

सारे चराचर का आधार परमात्मा राम है जो सर्व का सर्व है। उससे तो तुम्हें वैराग्य हो गया है। आत्मा से तुम वैराग्य लिए बैठे हो और विषय से प्रेम, तो फिर तुम्हें कैसे समझ में आएगा। सर्व का मूल तत्व, सर्वाधार, निर्विकार, कोई भिन्न चीज नहीं है। अपना आप 'मैं' आत्मा, चाहे आत्मा कहो या परमात्मा-

 

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सद्मत्परम्

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।

 

बस, तुम्हें और कुछ नहीं करना है। शीघ्रातिशीघ्र विकल्प को हटाओ। यह जगत विकल्प है और विकल्पाभाव 'मैं' आत्मा हूँ और इसी जगत रूपी विकल्प के अभाव में भगवान है। इसलिए विकल्प का अभाव कर दो। फिर जो बाकी रहा वह आत्मा ही आत्मा है। आत्मा से यारों! भिन्न कुछ भी नहीं। क्या-क्या बताएँ। 'मैं' का भाव, 'मैं' का रूप, 'मैं' का गुण, 'मैं' का कर्म।

 

अज्ञानसंज्ञौ भवबंधमोक्षौ द्वौ नाम नान्यौ स्त ऋतज्ञभावात्

अजस्रचित्यात्मनि केवले परे विचार्यमाणे तरणाविवाहनी ।।

(श्रीमद्भा. 10/14/26)

 

प्रश्न है कि चराचर का विकल्प क्या है और विकल्प का अभाव क्या है? सुनो-विकल्प भाव जगत है और विकल्पाभाव भगवान आत्मा है। वाह जी, वाह आज इसी का बोध करा दें। भैया! हमारे यहाँ कथा नहीं होती, मैं कोई कथावाचक नहीं हूँ, यह है एक चलता-फिरता अध्यात्म विद्या का विश्वविद्यालय। यहाँ पर अध्यात्म की पढ़ाई होती है। ध्यान दो कि यदि कल की पढ़ाई समझना हो तो आज की पढ़ाई पक्की कर लेनी चाहिए। अध्यात्म (आत्म तत्व) के विद्यार्थियों को यहाँ पर बिला नागा यही लखाया जाता है। यदि तुम्हारे मन में आत्म तत्व को जानने की प्रबल जिज्ञासा है, यदि आत्म स्वरूप लखना चाहते हो, यदि तुम्हें 'मैं' का साक्षात्कार करने की उत्कट अभिलाषा है, तब हम दावे के साथ कहते हैं कि जब यहाँ से जाओगे तो अज्ञानी होकर नहीं, वरन् बोधवान होकर ही जाओगे। अच्छा तो भगवान ने सबसे प्रथम किस चीज का विकल्प किया? भगवान आत्मा पर किसका विकल्प सर्वप्रथम हुआ?

 

जीवं कल्पयते पूर्वं ततो भावान्पृथग्विधान्

वाह्यानाध्यात्मिकांश्चैव यथा विद्यस्तथा स्मृतिः ।।

(गौ.पा.मा.का.वै.प्र.-16)

 

सबसे प्रथम भगवान (परमात्मा) ने अपने आप में जीवभाव का विकल्प किया। सबसे शुरू में विकल्प किया कि मैं अज्ञानी जीव हूँ और यह सबसे बड़ा विकल्प है। जीव हूँ, इस विकल्प से छुटकारा पाना ही ब्रह्म भाव को प्राप्त होना है। जीव विकल्प के बाद अनेक विकल्पों का जाल बिछ गया। विकल्प पर विकल्प होते गए। जीव ने प्रपंच का जाल बिछा दिया। फिर संसार दिखने लगा। पुत्र, पौत्र, पुत्री, मामा, दादा, दीदी आदि भाव (विकल्प) पैदा हो गए। लकड़ी पर डंडे का विकल्प होते ही फिर अनेक विकल्पों का उद्भव होने लगा कि इस डंडे का कोई कोई बनाने वाला होगा। यह डंडा कहीं कहीं बना होगा। किसी काल में बना होगा, किसी वस्तु से बना होगा। देश, काल, वस्तु और कर्ता का विकल्प हो गया। इसी तरह विकल्पों का जाल बनते चला। इसी तरह भगवान आत्मा मैं पर जीव भाव का विकल्प होते ही इस सृष्टि को किसने बनाया, यह सृष्टि कब बनी, इस सृष्टि का कर्ता कौन है? पालन-पोषण करने वाला कौन, इसका संहार करने वाला कौन है। इत्यादि विकल्प पैदा हो गए। अस्तित्वहीन भासना ही विकल्प है।

 

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ।।

(योग दर्शन)

 

शब्द का तो ज्ञान हो, परन्तु वस्तु का अभाव हो यानी केवल शब्द ही सुनने में आवे, परन्तु ढूँढ़ने पर जिसका अस्तित्व किसी काल में मिले, उसे कहते हैं विकल्प। मतलब यह कि अस्तित्वहीन वस्तु को ही विकल्प कहते हैं। सभी प्रकार का विकल्प जीव भाव में निहित है। जीवभाव गया तो सभी विकल्पों का नाश स्वयमेव हो गया। जीवभाव के जाते ही विकल्पों का जाल सिमट गया, सब लोप हो गया। नहीं तो इन्हीं विकल्पों में पड़े रहो और इसी में बन्ठाढार है। भाई! विकल्प असत्य है। वह अस्तित्वहीन होता है। सुनो, जीववादियों ! जीव विकल्प है, अस्तित्वहीन, सोलह आने, इसमें कोई शक नहीं करना। अच्छा, क्या समझे? स्वामी जी! वही जो आपने समझाया।

 

मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा ।।

 

मेरे दर्शन का यह परम अनुपम फल है कि जीव अपने सहज स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। जीव का सहज स्वरूप क्या है? अपना आप मैं भगवान आत्मा ही जीव का सहज स्वरूप है। सहज स्वरूप किसको कहते हैं? जो स्वरूप सनातन हो, व्यापक हो, अखण्ड हो। तो जीव का सहज स्वरूप जीव नहीं है। अरे ! यह तो विकल्प है। प्रभु के दर्शन का यही फल है कि वह आत्मा 'मैं' को प्राप्त कर लेता है। मैं आत्मा को प्राप्त कर लेना ही फल है। हाँ जी, जीव का वास्तविक स्वरूप जीव नहीं है, यह तो विकल्प है। जीवभाव वैकल्पिक है, जो सत्ताहीन होता है और इसी जीवभाव में अनेकानेक विकल्प निहित हैं और आत्मभाव में सभी विकल्पों का नाश है। आनंदमानन्दकरं प्रसन्नं-

 

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्

पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।

ऋतेऽर्थंयत्प्रतीयेत प्रतीयेत चात्मनि

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।

 

ऋते-बिना, यत् अर्थ प्रतीयेत् आत्मनि प्रतीयेत् तद् आत्मनो मायां विद्यात् अर्थ के बिना जो प्रतीत होता है और जिसमें प्रतीत होता है, वास्तव में वह उसमें (आत्मा में) प्रतीत नहीं होता। हाँ भाई! समझने वाले की मौत है। देखो-समझो विषय-विषय जरा सूक्ष्म है। देखना किसको कहते हैं और प्रतीत होना किसको कहते हैं? जिसको मैं आत्मा जानता हूँ वह प्रतीति है। प्रतीति अहं गम्य है। जो इन्द्रियग्राह्य है वह दृश्य है और जो इन्द्रिय ग्राह्य है वह इदं गम्य होता है। अहं गम्य 'मैं' हूँ और इन्द्रिय गम्य जगत है। देखो, यह माइक्रोफोन है, इसे विकल्प कहें कि वस्तु ? भैया ! माइक्रोफोन विकल्प है। विकल्प सत्ताहीन होता है। वह अस्तित्ववान नहीं होता। विकल्प हटा दो... विकल्प के हटाने पर क्या यह रहेगा? कुछ नहीं... विकल्पाभाव 'मैं' हूँ और यही प्रतीति है. विकल्पभाव जगत है। अरे भाई! देखो, डंडा विकल्प है, इसे लकड़ी से हटा दो, विकल्प के हटते ही डंडा का अभाव हो गया। इसलिए पहले विकल्प का नाश करो। रामायण में क्या आप लोग नहीं पढ़ते-

 

गो गोचर जहं लगि मन जाई। सो सब माया जानेहू भाई ।।

 

इन्द्रियाँ गौवें हैं और उन गौवों के चारे पाँचों विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध हैं। तो पहले विषय का विकल्प होता है कि इन्द्रियों का? विषय का विकल्प पहले होता है, उसके बाद इन्द्रियाँ उन विषयों को ग्रहण करती हैं। यह तो साधारण सी बात है, भैया! पहले गाय खरीदते हो कि पहले चारा का बन्दोबस्त कर लेते हो तब गाय खरीदते हो, पहले क्या करते हो? चारे का बन्दोबस्त पहले करते हो और फिर गाय खरीदते हो। इसलिए विषय पहले होता है फिर इन्द्रियाँ पैदा होती हैं। यह बहुत मार्के का विषय है, ध्यान देकर सुनो-

 

(पू. श्री स्वामीजी हाथ से ताली बजाकर शब्द विषय का अनुभव कराते हैं।) प्रेम से सुनो, यह गहन तत्व है। समझो हाँ हम तो भैया! इसके ही लिए सिर मुड़ाये हैं। बाबा बनने का कारण क्या है? और समझाऊँ? इन्हीं विषयों में इन्द्रियाँ जाती हैं। जब ये विषय आते हैं तो इन्द्रियाँ उतावली होकर उन्हें प्राप्त करने के लिए दौड़ पड़ती हैं। तो सबसे पहले विषय का विकल्प होता है। (स्वामी जी ताली बजाते हैं) देखो, अभी शब्द विषय का विकल्प मत करो- तो इस अवस्था में यह शब्द विषय-विषय होकर भास रहता है, यह प्रतीति है और इसका अनुभव मैं आत्मा से ही हो रहा है। अब शब्द विषय का विकल्प करो। शब्द विषय का विकल्प होते ही कर्ण इन्द्रिय इसे ग्रहण करेगी। इस शब्द विषय को चरने के लिए पशु रूपी कर्ण इन्द्रिय प्रेरित हो जाएगी। ग्राह्य और ग्राहक इसे भी समझ लो। ग्राह्य विषय और ग्राहक इन्द्रियाँ ये दोनों एक ही काल में पैदा होते हैं और दोनों विकल्प हैं। यदि शब्द विषय नहीं तो कर्ण इन्द्रिय भी नहीं। इन्द्रियाँ खायेंगी क्या? मर जाएंगी। जब चारा नहीं तो पशु कैसे जीवित रहेंगे? जब विषय का विकल्प करते हो तब उस घास रूपी विषय को खाने के लिए इन्द्रियाँ प्रबल हो जाती हैं। यह बड़े तत्व की बात है। ये इन्द्रियाँ बड़ी बलवान हैं। किसी मैदान में चारा डाल दो तो क्या जानवरों को उसे खाने के लिए न्यौता देना होगा? अरे भाई! नहीं वे स्वयं जाते हैं, उन्हें बुलाना नहीं पड़ता। इसी प्रकार यह जगत विषय है और जगत विकल्प के अत्यन्ताभाव में इन्द्रियाँ आँख, कान, नाक, पैर आदि नहीं रहेंगे। यही तो तूष्णी पद है, अनिर्वाच्य पद है। यही 'मैं' का रूप है। अहा !!!

 

जगत (प्रपंच) किसको कहते हैं? संसार को बिना जाने-समझे हठयोगी कान में रूई दूँसते हैं कि कहीं शब्द विषय का भान होने लगे जिससे कि बाह्य जगत विषय मन में आए। उसे विकल्प से भय लग रहा है। समझो अरे भाई! विकल्प है ही नहीं। इसका नाम अध्यात्म है। और क्या देखते हैं? किससे बचने के लिए योगी ध्यान लगा रहे हैं। अरे! जो है ही नहीं। आया समझ में।

 

ऋतेऽर्थंयत्प्रतीयेत प्रतीयेत चात्मनि

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।

 

तभी तो ईशावास्योपनिषद (यह यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय है) के प्रथम मंत्र में-

 

ॐईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।। ईशा. 1।।

 

इदं सर्वम् ईशावास्यम्। यह जो कुछ है सब ईश्वर है। जो कुछ भी जगती में जगत है-जगती है-जगती का अर्थ है भास (प्रतीति) और इस भास पर जो विकल्प उसे कहते हैं जगत, वह सब भगवान आत्मा है।

 

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।

 

कस्य स्विद्धनम् - अर्थात किसी के अर्थ को ग्रहण मत करो यहाँ पर धनम् को पैसा रुपया नहीं समझना। वरन् धनम् को 'अर्थम्' समझना। एवं ज्ञात्वा भुञ्जीथा-ऐसा जानकर भोग करो। अर्थ को क्यों ग्रहण करते हो जबकि अर्थ ही लगाने में दुःख है। चलो, तुम्हें उदाहरण देकर समझाएँ कि अर्थ से ही दुःख होता है।

 

एक गाँव में कोई किसान अपने खेत को जोत रहा था और साथ ही बैलों के मालिक की लड़की को गाली भी दे रहा था। हाँ भाई! हल जोतने वाले का यह भजन है। स्वाभाविक अंड-वंड बकते रहते हैं। उसी खेत के पास से एक श्रीमान् जी निकल पड़े और गालियों को सुनकर वहाँ खड़े हो गए। किसान उन्हें खड़ा देखकर पूछा कि श्रीमान् जी क्या देख रहे हो? वह बोला कि मैं बड़ी देर से देख रहा हूँ कि तू बैलों के मालिक की लड़की को गाली दे रहा है, तो बैलों का मालिक कौन है? किसान ने कहा बैलों का मालिक तो मैं ही हूँ। तब फिर यह गालियाँ किसको पड़ती होंगी? वह तपाक से बोला-जो बेवकूफ इस गाली का अर्थ लगाता होगा उसी को गाली पड़ेगी। हम तो अपने स्वभाव में कहे जा रहे हैं।

 

तो स्वभाव भाव जगती और 'अर्थ' भाव जगत। अमुक भाव मान्यता है इसलिए अमुक भाव को त्याग करके भुञ्जीथा। भोग करो। जहाँ' अरे' है वहीं अटक है, जहाँ अटक है वहीं खटक है, जहाँ खटक है वहीं भटक है और जहाँ भटक है वहीं लटक है। 'अरे' भाव अपने हृदय से निकाल दो। तो इस श्रुति के मंत्र का भाव लगा कि नहीं। देखो, यदि कोई शंका हुई कि अरे ! ऐसा मैंने क्यों कहा-बस ! इस अरे में ही अर्थ भाव है, कि भास में (प्रतीति में) बच्चे दिन भर खेलते रहते हैं और उनसे पुण्य-पाप कार्य होते रहते हैं, परन्तु उनके मन में इस पुण्य-पाप की कोई रेखा नहीं पड़ती। 'अरे' आता ही नहीं। स्वभाव में खेल रहे हैं। बच्चे बरसात के दिन में कभी मेढ़क पा जाएँ तो उसके पैर में रस्सी बांधकर दिन-दिन भर घसीटते रहते हैं, खेल में उसे पटक भी देते हैं। अंततोगत्वा उसे मार भी डालते हैं, परन्तु बच्चों के मन में 'अरे' नहीं होता। हाँ 'अरे' उसको होते हैं जो बालक के रक्षक होते हैं। रक्षक वर्ग कहते हैं कि बच्चों ऐसा करो, तुमको पाप लगेगा, क्योंकि वे अर्थ लगाते हैं। भैया! अर्थ में 'अरे' है।

 

ॐईशावास्यमिदंꣲ᳭   सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।

 

मान्यता, अर्थ विकल्प ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। अर्थ अथवा जगत भाव-कस्य स्विद्धनम् मा गृधः-अरे! किसी के अर्थ को ग्रहण मत करो। इत्येव ज्ञात्वा भुञ्जीथा-बस, स्वभाव में रहो।

 

ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत प्रतीयेत चात्मनि

तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।

 

ऊपर के इन दो श्लोकों में 'मैं' का भाव और 'मैं' का रूप सुना। अब 'मैं' का गुण सुन लो।

 

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु

प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु तेष्वहम् ।।

 

जिस प्रकार पंच महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) सब भूतों में हैं भी और नहीं भी हैं। पंच महाभूत और उनके कार्य रूप भूतों को समझो। पांचो तत्व इसमें प्रविष्ट भी हैं और अप्रविष्ट भी। तो फिर जगत भाद में पांचों तत्व निहित हैं और यदि इन पाँचों तत्वों को इससे अलग कर लें, निकाल लें तो क्या रहेगा और किसमें रहेगा? इसलिए ये पंच महाभूत अपने कार्य में प्रविष्ट भी हैं और अप्रविष्ट भी हैं। इसी प्रकार 'मैं' आत्मा सर्व में हूँ भी और नहीं भी हूँ। अन्वय भाव से 'मैं' सर्व में हूँ और व्यतिरेक भाव से नहीं भी हूँ। यही 'मैं' का गुण है।

 

कार्येषु कारणत्वेनानुवृत्तिरन्वय

कारणावस्थायां तेभ्यो व्यतिरेकः ।।

 

कार्य में कारण की जो व्यापकता, वह अन्वय है और कारण में कार्य का जो अत्यन्ताभाव, वह व्यतिरेक है। जो हो उसे कार्य कहते हैं और जिससे हो उसे कारण कहते हैं। डंडा कार्य है और लकड़ी कारण है। कार्य रूप डंडे में कारण रूप लकड़ी व्यापक है, यह अन्वय है और कारण रूप लकड़ी में कार्य रूप डंडे का अत्यन्ताभाव है, यह व्यतिरेक है। अन्वय रूप लकड़ी में कार्य रूप डंडे का अत्यन्ताभाव है, यह व्यतिरेक है। अन्वय रूप से लकड़ी डंडे में व्याप्त है और व्यतिरेक भाव में लकड़ी में डंडा नाम की कोई चीज ही नहीं है। इसलिए डंडा कहाँ? क्योंकि डंडे का अस्तित्व तो कारण रूप लकड़ी से है। तो अपने आप 'मैं' आत्मा को जानने के लिए अन्वय और व्यतिरेक है और जगत (प्रपंच) को जानने के लिए अध्यारोप और अपवाद है। अध्यारोप और अपवाद का प्रसङ्ग पीछे कहेंगे। मैं आत्मा सर्व में व्यापक हूँ, यह अन्वय है। मुझ आत्मदेश में प्रपंच का अत्यन्ताभाव है, यह व्यतिरेक है। यानी मुझ आत्मा के अतिरिक्त दूसरी कोई चीज हो तो 'मैं' उसमें व्यापूं। जब 'मैं' परिपूर्ण हूँ तो कहाँ रहूँ? यही भाव रामायण में भी है-

 

राम ब्रह्म व्यापक जग जाना। परमानंद परेश पुराना ।।

 

यह अन्वय है।

 

व्यापक व्याप्य अखंड अनंता। अनुभवगम्य भजहिं जेहि संता ।।

 

यह व्यतिरेक है।

 

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः

अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ।।

 

एतावदेव जिज्ञास्यं-इतना ही जानना जिज्ञासुओं के लिए जिज्ञास्य है। भगवान नारायण ब्रह्माजी से कहते हैं कि हे ब्रह्मन् ! इससे अधिक कुछ नहीं जानना है। बस इतना ही जिज्ञास्य है। इसे अन्वय और व्यतिरेक द्वारा जानो। आज के पहले भी 'मैं' ही था और इसके बाद भी 'मैं' ही रहूँगा और आज भी सर्व 'मैं' ही हूँ। जो कुछ स्थावर जङ्गम चराचर है वह सर्व 'मैं' ही हूँ। बस ! इससे अधिक जानने की जरूरत आत्म जिज्ञासु को नहीं है। इतना ही जान लेना है और यही आत्मा 'मैं' का कर्म है।

 

अब यहाँ शंका होती है कि भगवान आत्मा में, जो सर्व में प्रस्फुटित, प्रस्फुरित है, सर्व में अभिव्यक्त हो रहा है, कर्म कहाँ? 'मैं' आत्मा का स्वरूप तो अक्रिय है और यहाँ पर आत्मा में कर्म भाव? यह तो आत्मा पर कलङ्क है। क्या आत्मा द्वारा भी कार्य होता है? समाधान-

 

अरे भाई ! यह आत्मा पर कलङ्क नहीं है। शिव.... जानना ही जिसका स्वरूप है-'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म-इति श्रुति प्रमाणत्वात्।' जो नित्य ज्ञान स्वरूप है। मुझ आत्मा को किसी वस्तु को जानने के लिए किसी उपकरण की आवश्यकता नहीं है। किसी उपकरण द्वारा जाना जाय तो वह कर्म कलङ्क है। सूत्र लिखो- "किसी उपकरण द्वारा कुछ भी करना यह कर्म कलङ्क रूप है और किसी उपकरण द्वारा कुछ जानना, यह भी कर्म कलङ्क रूप है। बिना उपकरण द्वारा जानना यह कर्म स्वरूप ही है।" आँख का देखना, आँख का कर्म नहीं है, स्वभाव है। देखना और आँख क्या दो हैं? जी नहीं, देखना और आँख भिन्न-भिन्न नहीं है। अब गई बात समझ में? किसी भी तरह देखो, कान के सुनने, सुनने को जो सुनता है-दोनों का अनुभव करता है, दोनो को जानता है, तो यह जानना ही मुझ आत्मा का कर्म है जो कि मुझ आत्मा का स्वरूप ही है। आँख के देखने, देखने को जो देखता है, तो वह कर्म स्वरूप ही है इसलिए कलङ्क नहीं है। यही 'मैं' आत्मा का कर्म है।

 

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः

अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ।।

 

चतुःश्लोकी भागवत के इन चार श्लोकों में पहले श्लोक में 'मैं' आत्मा का भाव दूसरे श्लोक में 'मैं' आत्मा का रूप, तीसरे श्लोक में 'मैं' आत्मा का गुण और चौथे श्लोक में 'मैं' आत्मा के कर्म की विवेचना की गई है। अन्त के श्लोक में इनकी फलश्रुति बताई गई है।

 

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना

भवान्कल्पविकल्पेषु विमुह्यति कर्हिचित् ।।

 

ब्रह्माजी ! यह जो मैंने सिद्धांत आत्मतत्व के विषय में बताया है उसमें तुम सम्यक् प्रकार से परम समाधि करके स्थित हो जाओ, टिक जाओ। सब ओर से इन्द्रियों के कर्म को त्याग कर आत्मनिष्ठ बनो-केन प्रकारेण? परम समाधिना- परम समाधि के द्वारा-इसमें टिक जाओ। परम समाधि किसको कहते हैं? देखो-हठयोग में प्राण की समाधि होती है। राजयोग में चित्त की समाधि होती है। ज्ञानयोग में वासना की समाधि होती है। ये सभी समाधियाँ जिस अवस्था में समाधिस्थ हो जाती हैं, उसे परम समाधि कहते हैं। परम समाधि को भक्तियोग कहते हैं। हाँ-यही भक्ति है। आत्मदेश का ही नाम भक्तियोग है। भगवान इसी आत्मदेश में सम्यक् प्रकार से टिकने के लिए कहते हैं। अरे ! मैं अमुक हूँ इस अमुक भाव को छोड़कर, मान्यता जगत से रहित होकर, परम समाधि में टिक जाओ। यही इसका फल है और फिर जब तुम कालान्तर में प्रपञ्च की रचना करोगे तो तुम्हें शोक, मोह नहीं होगा। मस्त रहोगे। भगवान नारायण ने परमेष्ठी ब्रह्माजी को इस प्रकार आत्म तत्व का साक्षात्कार कराया।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

द्वितीय दिवस

भगवान नारद एवं राजा प्राचीनबर्हि संवाद द्वारा कर्मो का विश्लेषण, राजा पुरंजनोपाख्यान के माध्यम से जीव ईश्वर एकता का विश्लेषण

19-2-1969, प्रातः 10.00 से 12.00 बजे तक

 

श्री नारायणोपनिषद् पाठ।

अजमपिजनियोगं प्रापदैश्वर्य योगादगतिच

गति मत्तां प्रापदेकं ह्यनेकं

विविध विषय धर्म ग्राहि मुग्धे क्षणानां

प्रणतभय विहन्तृ ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ।।

प्रपन्न पारिजाताय तोत्त्रवेत्रैक पाणये

ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृत दुहे नमः ।।

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणुरमर्दनम्

देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।।

मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्

यत्कृपा तमहं वन्दे परमानंदमाधवम् ।।

 

अनन्त नाम, रूपों में अभिव्यक्त, अहमत्वेन प्रस्फुरित, महामहिम, स्वात्मस्वरूप सकल चराचर एवं समुपस्थित आत्म जिज्ञासुगण। 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निवोधत ' अनादिकाल से अविद्या की घोर निद्रा में सोने वाले भव्य जीवो ! 'उत्तिष्ठत'- उठो स्वस्वरूप भगवान आत्मा में जागो, किसी श्रेष्ठ महापुरुष की शरण में उपसन्न होकर अपना आत्म कल्याण करो।

 

यहाँ पर श्रीमद् भागवत परमहंस संहिता के माध्यम से अध्यात्म तत्व का निरूपण हो रहा है। कल के प्रसङ्ग में राजा परीक्षित का अभिशापित होना एवं गंगा तट पर श्री स्वामी शुकदेवजी का आगमन एवं परमेश्वर नारायण द्वारा ब्रह्मा के प्रति चतुःश्लोकी भागवत का उपदेश प्रतिपादन हुआ। इस समय का प्रसङ्ग भगवान नारद एवं राजा प्राचीनवर्हि के संवाद में आत्म तत्व (विमल ज्ञान) का उपदेश है। सुनो, प्रेम से-

 

जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः

ब्रूहि मे विमलं ज्ञानं येन मुच्येय कर्मभिः ।।

(श्रीमद् भागवत 4/25 / 5 )

 

गृहेषु कूटधर्मेषु पुत्रदारधनार्थधीः

परं विन्दते मूढो भ्राम्यन्संसारवर्त्मसु ।।

(श्रीमद् भागवत 4/25/6)

 

राजा प्राचीनवर्हि भगवान नारद से प्रश्न करता है कि हे महाभाग। कर्मापविद्धधीः परं आत्मानं अहं जानामि येन ज्ञानेन कर्मभिः मुच्येयः विमलं ज्ञानं माम् प्रति ब्रूहि। अनादिकाल से कर्म-कलिल में मेरी बुद्धि सनी हु है इसलिए भगवान आत्मा को मैं नहीं जानता। आप मेरे प्रति उस विमल ज्ञान का उपदेश कीजिये जिससे कि मैं कर्मजाल से छुटकारा पा जाऊँ। आत्म जिज्ञासुओं ! कर्म काण्डी की बुद्धि आत्म तत्व का विचार नहीं कर सकती। कारण, कि कर्मकांडी देहात्मवादी होता है। वह अपने को साढ़े तीन हाथ वाला मानता है। जब वह अपने को साढ़े तीन हाथ वाला मानेगा तो उसके द्वारा कर्म नहीं होगा। कर्मकाण्डी की बुद्धि देहात्मवादी होने के कारण स्थूल होती है। उसका अन्तःकरण, उसके विचार, उसके संकल्प और उसके कार्य सभी सीमित और देहभाव में ही होते हैं। बात स्पष्ट है कि जब कर्मकाण्डी अपने को साढ़े तीन हाथ वाला मानता है तो उसकी बुद्धि, विचार, अन्तःकरण कर्मआदि सभी साढ़े तीन हाथ वाले ही तो होंगे। यह निर्विवाद सिद्धान्त है कि वह इसी शरीरी भाव तक ही सीमित होता है। तो हे महाभाग ! कर्मजाल में मेरी बुद्धि सनी हुई है इसलिए आत्म तत्व का विचार करने में मैं समर्थ नहीं हूँ। अतः आत्म तत्व का कृपया विवेचन करें। कर्मकाण्डी वेदांत की उपेक्षा करता है। क्यों ऐसा हो, वे तो वेदांत को समझते ही नहीं और यही (कारण है कि वे वेदांत के अनुयायियों की खिल्ली उड़ाते हैं, जिसकी बुद्धि सीमित है, साढ़े तीन हाथ की है वह भगवान नारायण आत्म तत्व के सूक्ष्माति सूक्ष्म भाव को क्या प्राप्त करेगा जबकि अहम् ('मैं') शब्द करके भगवान आत्मा प्रत्येक शरीरों में प्रस्फुरित प्रस्फुटित एवं अभिव्यक्त हो रहा है। जिस भगवान आत्मा के समक्ष आकाश सूक्ष्मातिसूक्ष्म होते हुए भी सुमेरु पर्वत के समान स्थूल है उसे कर्म में फँसी हुई स्थूल बुद्धि क्या समझेगी।

 

जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः

 ब्रूहि मे विमलं ज्ञानं येन मुच्येय कर्मभिः ।।

 

इसलिए राजा प्राचीनबहिं प्रश्न करता है कि जिस ज्ञान से कर्मों में फँसी हुई बुद्धि कर्मजाल से छूट जाती है, ऐसे विमल ज्ञान का प्रतिपादन कीजिए।

 

विमल ज्ञान का भाव और उसका विश्लेषण-

 

इस कथन से यह सिद्ध होता है कि कहीं कहीं मल संयुक्त ज्ञान भी होता है। हाँ, विमल की अपेक्षा मल सहित। तो मल सहित ज्ञान क्या है?

 

विमल ज्ञान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई ।।

 

देखो, जमें रहो, जहाँ के तहाँ अपने आप 'मैं' आत्मा को 'मैं' के साथ आत्मा शब्द लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि 'मैं' का भाव और आत्मा एक ही है। चाहे आत्मा कहो या 'मैं' 'मैं' का अर्थ आत्मा के सिवाय कुछ नहीं, परन्तु इसे जोड़कर कहा जाता है, क्योंकि साढ़े तीन हाथ वाले शरीर को भी मैं का संबोधन लोग करते हैं। साधारणतया मैं का अर्थ साढ़े तीन हाथ का शरीर मान लेते हैं इसलिए मैं के साथ आत्मा कह दिया जाता है। नहीं तो 'मैं' कहना काफी है। स्वस्वरूप आत्मा को मैं अमुक अमुक हूँ ऐसा मान लेना यानी अपने 'मैं' को कुछ कुछ मान लेना ही मलिन ज्ञान है। जानता तो है परन्तु विमल नहीं, मल सहित, क्योंकि माना हुआ ज्ञान है और मान्यता के हटते ही 'मैं' का 'मैं' शुद्ध भाव रह जाता है। यही विमल ज्ञान है। इसी को भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं-

 

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः

मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ।।

(गीता 7-25)

 

योगमाया समावृतः (आच्छादित) अहं आत्मा सर्वस्य प्रकाशः - मैं आत्मा योग माया करके आच्छादित यानी ढँका हुआ सबको प्रकाशित नहीं होता। सब मुझे नहीं जान सकते, क्योंकि योगमाया से ढँका हूँ। पहिले इस ढक्कन को तो समझ लो भगवान का घूंघट क्या है? योग माया। विद्वज्जनों ! माङ्-माने धातु से माया शब्द बनता है। अरे यार ! जो माना जाय वह माया। 'ममीते विश्वमिति या सा माया'- मोहित कर लिया है विश्व को जिसने, उसे कहते हैं माया।

 

गृहेषु कूटधर्मेषु पुत्रदारधनार्थधीः

परं विन्दते मूढो भ्राम्यन्संसारवर्त्मसु ।।

 

कर्मकाण्डी क्या कहते हैं? जप करो, तप करो, तीर्थ व्रत करो, दान, पुण्य करो। जब तुम्हारा यह शरीर छूट जाएगा तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। तुम स्वर्ग तो जाओगे। वस्तुतः यह सकाम कर्म का उपदेश अज्ञानियों को कर्म में प्रवृत्त करने का साधन है। इसे कूटधर्म अथवा पुष्पिता वाणी कहते हैं।

 

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः

वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ।।

(गीता 2-42)

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफल प्रदाम्

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ।।

(गीता 2-43)

 

भैया ! स्वर्ग से कुछ नहीं होता। हाँ, यदि स्वर्ग जाना हो तो तीर्थ, व्रत, यज्ञ, दानादिक करो, मरने के बाद विमान आएगा। हाँ, जी-तैयारी में बैठे रहो। आज दिन तक तो स्वर्ग गए लोग-स्वर्ग जाकर कभी किसी के नाम, इष्ट मित्रों स्वजनों के नाम चिट्ठी नहीं लिखे कि उन्हें वहाँ अच्छा मकान मिला है, घर की खबर ठीक रखना, तिल्लो, धान वगैरह ठीक से बोना और पत्र देते रहना- ऐसा कोई पत्र नहीं देता। तो कर्म से स्वर्ग की प्राप्ति भले हो, परन्तु आत्म तत्व के बोध बिना अज्ञान का नाश नहीं होता। यह स्वयं सिद्ध है-इसी को तत्व कहते हैं। यही तत्व है। मानो तब भी है, मानो तब भी है। तो-

 

जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः

 ब्रूहि मे विमलं ज्ञानं येन मुच्येय कर्मभिः ।।

(श्रीमद् भागवत 4/25/5)

 

कर्मकाण्ड-जन्म, कर्म से छुटकारा नहीं देता, जन्म, कर्म फल देने वाला है। पुण्यी, स्वर्ग को प्राप्त करते हैं और जब पुण्य क्षीण होगा तो-फिर ! वही-

 

क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।।

(गीता 9-21)

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ।।

(गीता 2-43)

 

जीवन भर दंड कसरत करते रहो। जब, तप, यज्ञ, दान, व्रत, तीर्थाटन, कूप वाटिका बनाना, मंदिर स्थापना इत्यादि का फल स्वर्ग प्राप्ति है।

 

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ विधीयते ।।

(गीता 2-44)

 

विद्वानों द्वारा जो समय-समय पर इस ओर लक्ष्य कराया जाता है, इस प्रकार का जो उपदेश देते हैं और स्वर्ग दिखाते हैं, उन्हें स्वर्ग का पासपोर्ट दे देते हैं। परन्तु चित्त की आसक्ति को नहीं मिटा सकते। अज्ञानी हृदय कभी भी निष्काम नहीं हो सकता। सुन लो कान खोलकर-अज्ञानी हृदय यदि कामना रहित हो जाए तो बन्ध्या का पुत्र हो सकता है। निराधार आकाश में पुष्प खिल सकते हैं। कछुवे की पीठ पर बाल उग सकते हैं, खरगोश के सींग हो सकते हैं, यह सब होना असंभव है। जब तक निष्काम कर्म नहीं होता तब तक वह कामनासक्त ही है। जो दारासक्त, पुत्रासक्त, वित्तासक्त है, उनके लिए विद्वान लोग सकाम कर्म का उपदेश देते हैं। अरे भाई ! क्यों नहीं-देखो यहाँ पर हम तुम्हें उपदेश दे रहे हैं और तुम सब यही तो मानोगे कि स्वामीजी जो कुछ कह रहे हैं, सब सत्य है। तो यह तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं है कि हम तुम्हें क्या कह रहे हैं, इसकी परख करें। वरन् यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम तुम्हें उचित सत्य का मार्ग निर्देश करें। यह सब विद्वानों की प्रतिष्ठा का प्रश्न है और इसीलिए इतना सब श्रम हो रहा है। इसलिए-

 

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ।।

(गीता 2-43)

 

जिनकी बुद्धि में वासनाओं का जाल बिछा है, कामनाओं से भरपूर हैं, वे इस आत्मतत्व को क्या जानेंगे। ऐसी बुद्धि को व्यवसायात्मिका बुद्धि कहते हैं। वे कोई भी मंदिर में, तीर्थ में, व्रत, दान आदि करते हैं, उनकी बुद्धि में कामना अवश्य रहती है। कामना लेकर ही करते हैं कि हम धनवान हो जाएँ, सुखी रहें, पुत्र हों, बाल बच्चे हों ऐसी कामनासक्त बुद्धि को व्यवसायात्मिका बुद्धि कहते हैं। तो-

 

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ विधीयते ।।

(गीता 2-45)

 

अर्थात् ऐसे कामनासक्त जीवों की बुद्धि समाधि (आत्मा) में संलग्न नहीं हो सकती। व्यवसायात्मिका बुद्धि वालों को आत्म तत्व का विचार अच्छा नहीं लगता। वे ज्ञान का नाम सुनकर उसमें कीचड़ उछालते हैं, छिद्रान्वेषण करते हैं। ज्ञान से दूर भागते हैं-जी हाँ, मुक्ता को इसका बड़ा अनुभव है, काफी तजुर्बा है। चालीस वर्ष से यही तो हम देख रहे हैं। श्रीमद् भागवत, श्री रामायण और श्रीमद् भगवद गीता का सदैव हर जगह कार्यक्रम होता रहता है और इसमें शिक्षित वर्ग और अपढ़ भी (जो नहीं पढ़े-लिखे हैं, वे सभी) आते हैं। परन्तु कभी भी भटककर व्यापारी वर्ग-व्यवसायात्मिका बुद्धि वाले नहीं आते, क्या मजाल जो ऐसे वर्ग जाएँ। जी हाँ! और यदि कुछ भी जाएँ तो यह अपवाद है। भैया ! यह उनका पुण्य है, तप है, कि ऐसों को भी ज्ञान में रुचि है। व्यापारी आयेगा भी तो कुछ कुछ कामना लेकर ही आएगा। कुछ कुछ अवश्य मांगेगा। धन, बेटा-बेटी, स्त्री मांगेगा, माया ही मांगेगा, भगवान लेकर क्या करेगा। हाँ-

 

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ।।

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ विधीयते ।।

(गीता)

 

यही व्यवसायात्मिका बुद्धि है और श्रीमद् भागवत में इसी को कूटधम कहते हैं। तो राजा प्राचीनवर्हि भगवान नारद से प्रश्न करता है-

 

जानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः

ब्रूहि मे विमलं ज्ञानं येन मुच्येय कर्मभिः ।।

 

मूढ़ अज्ञानी पुरुष भगवान आत्मा को नहीं प्राप्त कर सकता, क्योंकि उसका हृदय कामनाओं से भरा रहता है। जिज्ञासुओं! यहाँ पर कर्मों का विवेचन हो रहा है। कर्म कितने प्रकार के होते हैं और कर्मों के बंधन से छूटने का उपाय क्या है? सुनो-आनंद से सुनो, जो जहाँ बैठे हो। देखो यदि ऐसा कहो कि कर्म से अज्ञान का नाश होता है तो जान लो कि कर्म से अज्ञान का नाश नहीं होता। यह बात निर्विवाद सिद्धांत है। समझो-

 

सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विधातस्य ।।

 

अर्थात् जो कार्य जिस संबंध से उत्पन्न होता है वह उस संबंध के नाश का कारण नहीं हो सकता। तो कर्मों का मूल कारण अज्ञान है, पुण्य हो या पाप हो, सभी अज्ञान से उत्पन्न होते हैं, अज्ञान से पैदा हुए हैं। जो कर्म अज्ञान से उत्पन्न हुए हैं वे अज्ञान का नाश किस प्रकार कर सकते हैं। अज्ञान से उत्पन्न कर्म के द्वारा अज्ञान नष्ट नहीं हो सकता।

 

अज्ञानमेवास्य हि मूलकारणं तद्धानमेवात्र विधौ विधीयते

विद्यद्यैव तन्नाशविधौ पटीयसी कर्मतज्जं सविरोध मीरितम् ।।

(श्री रामगीता 9)

 

कर्मों का मूल कारण अज्ञान है तो अज्ञान के नाश में कर्म समर्थ नहीं है। विद्यैव यानी ज्ञान ही अज्ञान का नाश करने में समर्थ है।

 

छूटइ मल कि मलहि के धोये। घृत कि पाव कोई वारि बिलोये ।।

(.का।)

 

कीचड़ से धोने से मल का नाश नहीं होगा। इसी प्रकार अज्ञान से अज्ञान का नाश नहीं होगा। मल से मल का नाश संभव नहीं है। सुनो-यहाँ पर हम कर्म के प्रकार और उनसे छूटने का उपाय बताएँगे। कर्म दो प्रकार के होते हैं- पाप कर्म और पुण्य कर्म। वेदों में इसी को धर्म और अधर्म कहते हैं।

 

वेदप्रणिहितो धर्मोह्यधर्मस्तद्विपर्ययः

वेदो नारायणः साक्षात्स्वयम्भूरिति शुश्रुम ।।

(श्रीमद् भागवत 6/1/40)

 

वेदों में कर्म को धर्म-अधर्म कहते हैं। वेद जिनके लिए आज्ञा देते हैं वह धर्म है और जिसके लिए निषेध करते हैं वह अधर्म है। पुराणों में इसी को पुण्य और पाप कहते हैं तथा धर्मशास्त्र में इसी को शुभ और अशुभ कहते हैं। मतलब सबका एक ही है। अन्तःकरण में जब तक धारणा के रूप में है तब तक उसका नाम धर्म है और जब शरीर द्वारा बहिर्मुख होता है तो धर्म का नाम कर्म पड़ जाता है। तो धर्म का स्थूल रूप कर्म हुआ। पुण्य और पाप के पर्यायवाची धर्म और अधर्म है। वस्तुतः धर्माधर्म की यह व्याख्या तो उनके लिए तो ठीक है जो वेदों, शास्त्रों से अनभिज्ञ हैं, नहीं जानते अथवा जो वेद शास्त्रों को मानते ही नहीं हैं, जो नास्तिक हैं, ऐसे व्यक्तियों के लिए धर्माधर्म की क्या व्याख्या हो? पुण्य-पाप किस धर्म को कहें? नास्तिक तो धर्म क्या, ईश्वर को ही नहीं मानता तो वेदों की आज्ञा को क्यों कर मानेगा। इसमें वर्णित लक्षणों को नहीं मानेगा तो फिर वह कौन-सी व्याख्या हो जो सार्वभौम हो, जिसको सभी मानें, जिसे सब समझ सकें? तो सुनो-जिस कार्य के करने से हृदय में लज्जा और भय लगे। उस कार्य को धर्म या पुण्य कर्म कहते हैं और जिस कार्य को करने से हृदय में भय, लज्जा लगे वह कर्म अधर्म है, पाप है। बस, यही सार्वभौम सिद्धांत है। अब अपने आप चुन लो, दुनियाँ में कौन भय के और कौन लज्जायुक्त कर्म है। बस, अपने-अपने हृदय पर हाथ रखकर परख लो, हजारों हृदय यहाँ पर बैठे हैं-चुन लो भाई-बस, धर्माधर्म का यही अर्थ है। चलिये आगे। कर्म चार प्रकार के हैं। नित्य कर्म, नैमित्तिक कर्म, प्रायश्चित कर्म और काम्य कर्म। भैया ! कर्मों का बड़ा भारी जाल है। समझना- वेदों के मंत्रों की संख्या एक लाख है। इसमें अस्सी हजार मंत्र सिर्फ कर्मकांड के हैं। सोलह हजार मंत्र उपासना के हैं और शेष चार हजार मंत्र ज्ञान के हैं। लाखों मन रूई के ढेर को जलाने के लिए एक चिंगारी काफी होती है। देखो- यहाँ पर बहुत से ब्राह्मणों का समुदाय बैठा है और सभी यज्ञोपवीत पहनते हैं। जब ब्राह्मण जनेऊ बनाता है तो कितने चौवे का बनाता है? (चौवे- चार अंगुल का) छियान्बे चौवे का। तो भाई ! छियान्बे चौवे ही क्यों? क्यों एक सौ आठ चौवे के बनाते हो? तो इसका कारण यही है कि वेद मंत्रों के अस्सी हजार मंत्र कर्मकांड के और सोलह हजार मंत्र उपासना कांड के, इससे (80+16) छियान्बे हजार हजार मंत्रों के कारण छियान्बे चौवे का जनेऊ बनता है। ब्राह्मण को इन मंत्रों पर अधिकार है। भाई! हम पढ़े भी हैं और पढ़ाएँ भी हैं। जी हाँ- क्षत्रिय के लिए नब्बे चौवे का जनेऊ बनता है, कारण कुछ मंत्र दान प्रतिग्रह के हैं, वे क्षत्रिय जाति पर लागू नहीं होते। उन्हें दान का अधिकार नहीं है, जिसके कारण नब्बे चौवे का जनेऊ पहनते हैं। वैश्य को पच्यासी और शूद्र को अस्सी चौवे। कहीं-कहीं शूद्र को भी जनेऊ बिना मंत्र के विवाह के समय दे दिया जाता है। उनके लिए अस्सी चौवे का जनेऊ होता है। चलो क्या-क्या कहें- बड़ा भारी जाल है। तो कर्म के चार भेद-नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित और काम्य। नित्य कर्म तो जाति वर्ण के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसे ब्राह्मण को उनके वर्ण के अनुसार उनके अधिकार के अनुसार उन्हें संध्या, अग्निहोत्र, मंत्र, जाप, गायत्री आदि नित्य करना चाहिए! ये कर्म नित्य कर्म हैं। इन कर्मों के करने से कोई पुण्य नहीं है। अरे भाई ! जिसका करना तुम्हारा साधारण धर्म है, जो तुम्हें नित्य करना ही चाहिए, तो फिर ऐसे कार्यों को करने से क्या पुण्य, यह तो तुम्हारी ड्यूटी है। तुम्हें करना अनिवार्य है। यह ब्राह्मण की ड्यूटी है। हाँ-यदि करो तो पाप अवश्य लगेगा। इसलिए जो कर्म तुम्हारे लिए विहित हों उसे करने में पुण्य नहीं, पर करने से पाप है। दूसरी बात हर एक गृहस्थ चाहे वह राजा हो या भिखारी सभी गृहस्थ के यहाँ पाँच पाप नित्य होते हैं- चक्की में, चूल्हे में, ओखली में, झाडू-बुहारु लगाने में और पाँचवाँ पानी रखने की जगह में। पाँचों जगह जाने-अनजाने जीव हिंसा होती है। तो चाहे कोई गृहस्थ हो अथवा संन्यासी, जिसके यहाँ चूल्हा-चक्की, आडम्बर होगा उसके यहाँ ये पाँच पाप नित्य होंगे। अर्थात् जो साधु, संन्यासी बनते हैं और आश्रम बनाकर रहते हैं तो फिर उनके यहाँ भी तो ये पाँच पाप होते ही हैं। तो गृहस्थ हो या संन्यासी-हाँ इसीलिए तो संन्यासी को कुटी बनाने का निर्देश नहीं है। सिर ढाँकने के लिए चलो कुटी बना लें तो क्या मजाल की चूल्हे का बंदोबस्त हो। तो चूल्हा-चक्की चाहे साधु के यहाँ हो या गृहस्थ के यहाँ-हम यह सब जानते हैं, यह हमारा अनुभव है कि गृहस्थों की बात क्या कहें-आश्रमधारी साधु कुत्ते को एक टुकड़ा भी नहीं देते, मार भगाते हैं। क्योंकि, साधु तो जानते ही हैं कि वे अब साधु हो गए हैं, अब कुत्तों का क्या काम, वही प्रपंच है वहाँ भी, चाहे गुप्त हो या प्रगट वही बात। हम तो चिल्लाकर कह रहे हैं। यहाँ हमको किसका भय है। अंगूठा रखने की भी जमीन जिसके पास हो, वृक्ष के नीचे जो रहे वही यह निर्भय होकर कह सकता है। ''महत्पदं ज्ञात्वा वृक्ष मूले वसेत्।" महानपद भगवान आत्मा को प्राप्त करके वृक्ष के नीचे रहना चाहिए। अरे यार ! क्या घर-बार इसीलिए छोड़े हैं? तो फिर क्या घर छोड़कर फिर घर बसावें? यह ठगनी माया बड़ी विचित्र है। गृहस्थी बेचारे तो माया में पिरोये ही हैं, परन्तु यह ठगनी माया साधुओं के पीछे हाथ धोकर पड़ती है-कहती है हमें छोड़कर कहाँ जाओगे। इस माया से बड़ा भय है। इन पाँचों पापों से मुक्त होने के लिए शास्त्रों में पंच बलिवैश्व का विधान है। काग बलि, अग्नि बलि, गो बलि, अतिथि बलि, श्वान बलि। गृहस्थ पाँच मुट्ठी अन्न, आटा, चॉवल इनके लिए निकाल देते हैं। कोई-कोई पाँच ग्रास निकाल देते हैं। यह नित्य कर्म है। प्रश्न होता है यदि ऐसा करे तो? तो भैया! ब्याज सहित अपना-अपना भाग ले लेंगे। घर में कोई बीमार हुआ तो हजारों निकल जाएगा, तुम्हारा ब्रह्मपना निकल जाएगा। इसलिए जिस आश्रम में रहना, उसका पालन करना चाहिए।

 

सोचिय गृही जो मोहबस करइ करम पथ त्याग

सोचिय यति प्रपंचरत विगत विवेक विराग ।।

 

' सुखं दुःखं, पुण्यं पापं शिवोऽहम् शिवोऽहम्'-इससे काम चलेगा। यह तुम्हारी ड्यूटी है और इसका पालन तुम्हें करना ही होगा।

 

तीर्थ, व्रत, दान इत्यादि कर्म जब सूर्य लोक, चन्द्रलोक एवं स्वर्ग प्राप्ति के निमित्त किए जाएँ तो उसे नैमित्तिक कर्म कहते हैं। ये ही कर्म जब स्त्री, पुत्र, धन आदि की कामना से किये जाए तो उसे काम्य कर्म कहते हैं। यही कर्म जब पापों से छुटकारा पाने के लिए किये जाएँ तो उसे प्रायश्चित कर्म कहते हैं। तो कर्म चार प्रकार के-नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित और काम्य। अब कर्मों के भेद सुनो- कर्म तीन प्रकार के संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण। इनके शब्दार्थ पहिले समझ लो। संचित कर्म-जो जन्म जन्मांतर से एकत्रित हुआ हो। प्रारब्ध कर्म-जो ऊपर जमा हुआ कर्म उसमें से कुछ हिस्सा निकाल लिया। क्रियमाण कर्म-निकले हुए हिस्से से कुछ कर्म कर्ज में दे दिया। इसे पहले दृष्टान्त से समझो, बाद में इसको भाव रूप में घटा लेना। तुम्हारे मकान के अंदर गल्ला रखने का एक ऐसा स्थान बना होता है जिसे खत्ती, ढाबा अथवा बंडा कहते हैं। इस खत्ती में तुम हजारों मन गल्ला रखते हो। ध्यान दो-उस खत्ती में साल-साल भर के बचत अन्न, मोटा, पतला, महीन, नया-पुराना सभी किस्म का अन्न (गल्ला) कई वर्षों का भरा पड़ा है। इसकी कोई तादाद नहीं है। इस खत्ती में कितना अन्न मोटा, कितना महीन, कब-कब का पुराना नया सभी भरा है, इसकी तादाद नहीं है। बस यही संचित है। अब इसमें से कुछ निकाल लिया, उसमें मोटा, महीन, पुराना, नया सभी मिला हुआ है। यही प्रारब्ध होगा। अब उस निकले हुए अन्न से कुछ तुमने ब्याज में किसी को दिया, सवाया या डेढ़ी। जब लोग एक मन अन्न ले जाते हैं तो लुवाई के बाद सवा मन या डेढ़ मन वापस देते हैं। तो यहाँ पर क्या लेते हैं। सवाया। चलो भाई! कुछ तो ईमानदारी है। कहीं-कहीं डेढ़ी वसूल करते हैं। अब यदि कर्जदार साल भर में ब्याज पटा दे तो ठीक है, नहीं तो यदि वह दे सके तो साल भर में साहूकार उस ब्याज को भी मूल धन में शामिल करके उसके ऊपर भी अगले वर्ष ब्याज लेता है। इसे चक्रवृद्धि ब्याज कहते हैं। कर्ज देने वाला ऋणी को बुलाकर हिसाब करता है और उसे बताकर ब्याज को भी मूल में मिला देता है। तो भैया ! यह चक्रवृद्धि पानी सरीखे बढ़ता है। बड़ी-बड़ी रियासतें बिक जाती हैं। घर- बार सब बिक जाता है। तो जो ब्याज का अन्न आया वह भी उसी खत्ती में डाल दिया गया यह खत्ती इतनी विशाल है कि कभी भरती ही नहीं, सदैव खाली ही रहती है।

 

आगे अब दृष्टांत का द्राष्टांत समझो। मतलब यह है कि यह साढ़े तीन हाथ का शरीर ही मकान है। इसके भीतर ही खत्ती है। उसका नाम मन है, तो मन नाम की खत्ती है। एक जन्म और अनेक जन्मों के पाप-पुण्य कर्म अनादिकाल से मन रूपी खत्ती में भरे पड़े हैं। यही संचित कर्म है। जब कोई शरीर धारण किया तो इसी संचित कर्म से कुछ पुण्य-पाप कर्म को लेकर वह जन्म धारण करता है। इस जन्म के ये ही प्रारब्ध कर्म हुए। इसको प्रारब्ध कर्म कहो चाहे शरीर कहो दोनों का मतलब एक ही होता है। इस साढ़े तीन हाथ के शरीर द्वारा इस समय जो पुण्य-पाप कर्म हो रहे हैं, उन्हें क्रियामाण कर्म कहते हैं। ठीक-

 

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः

अहंकार विमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।।

(गीता 3/27)

 

इन कर्मों का कर्ता, भोक्ता मैं हूँ ऐसा जो अहंकार यही चक्रवृद्धि ब्याज है। इसी कारण जीव कर्म बंधन में स्वयं पड़ा है। तो यह कर्मजाल बड़ा भयाक है। सब गड़बड़-सड़बड़ है। भैया ! इस कर्मजाल से से निकलना चाहो तो तुम भी वही करो जो हम किए हैं। इस कर्म रूपी खत्ती में आग लगा दो, फूँक से और ब्याज लेना बंद करो। इस कर्म जाल से बचना चाहते हो तो हम बता रहे हैं-इस खत्ती को जला दो और ब्याज लेना बंद करो। इधर पूंजी भी खतम और आमदनी भी बंद। तो फिर दिवालिया हो जाएगा। हाँ भाई ! दिवालिया तो बना ही रहे हैं। रह गया यह साढ़े तीन हाथ का शरीर-प्रारब्ध कर्म। जब सभी खतम हो गए तो फिर यह भी कब तक चलने वाला है। इसलिए अपना घर फूँक दो। ऐसा क्यों? क्योंकि, जो अपना घर फूंका होगा वही ऐसा कहेगा। घर फूंकने की कला सबको थोड़े ही आती है।

 

कबीरा खड़ा बाजार में लिये लुवाठी हाथ

जो घर फूँकै आपनो चलै हमारे साथ ।।

 

लुवाठी कहते हैं अधजली लकड़ी को। तो तैयार हो जाओ, जिसको हमारे साथ चलना है। आगे आओ-आग जो लगाना है। गीता भी श्री योगेश्वर भगवान का वचन है-

 

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्

पश्यशृणवन्स्पृशञ्जिघ्घ्रन्नश्रनाच्छन्स्पश्वसन् ।।

(गीता 5-8)

 

तत्ववेत्ता पुरुष ऐसा मानता है कि 'अहम् किञ्चत् करोमि ' मैं कर्मों का कर्ता-भोक्ता नहीं हूँ। यह मान्यता क्या समझकर करता है? इस तरह किस सिद्धांत से मानता है?

 

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय करोति लिप्यते

(गीता 13-31)

 

यह निर्विवाद सिद्धांत है कि कर्म बंधन से छुटकारा पाना ही मोक्ष है। मैं आत्मा हूँ, अनादि हूँ-जन्म का पता ही नहीं, सत, रज, तम से परे हूँ। मैं अव्यय-अविनाशी हूँ, शरीर के अंदर रहते हुए भी मैं कर्मों का कर्ता-भोक्ता नहीं हूँ। लिप्यते, इस तरह मानकर कर्म के जाल में लिप्त नहीं होता, क्योंकि 'मैं' साक्षी हूँ।

 

एको देवः सर्वभूतेषु गूढ़ः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा

कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ।।

(श्वेता 6-11)

 

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमियं रविः

क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ।।

(गीता 13-33)

 

सूर्य अनेकानेक ब्रह्माण्डों में एक-सा प्रकाशित हो रहा है और जैसे इस स्थान में इसी प्रकाश में यहाँ ब्रह्म निरूपण हो रहा है, उसी तरह इसी प्रकाश में अन्यत्र घोर से घोर पाप भी हो रहा होगा-तो यहाँ का पुण्य और कहीं का घोर पाप जैसे सूर्य में नहीं होता, सूर्य में कर्ता-भोक्ता का भाव नहीं होता, सूर्य पर इस प्रकार का आरोप नहीं लग सकता चाहे जहाँ पुण्य या पाप हो। इसी प्रकार 'मैं' आत्मा पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, पंच प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान इन सब में एक रस प्रकाशित हूँ, इनको जानता हूँ। यद्यपि इनके व्यापार हो रहे हैं और 'मैं' आत्मा के साक्षित्व में हो रहे हैं, परन्तु 'मैं' पर ये आरोपित नहीं हो सकते। 'मैं' वास्तव में इन सब का ज्ञाता हूँ। 'मैं' के साक्षित्व में ही कार्य हो रहे हैं, परन्तु 'मैं' में कर्मों का कर्तापना नहीं है। 'मैं' साक्षी हूँ। साक्षी के तीन लक्षण- द्रष्टापना, ज्ञातापना और नजदीकपना। कोर्ट में जब न्यायाधीश पूछता है कि तुमने अमुक को अमुक के सिर पर लाठी मारते देखा है? गवाह कहता है- हाँ सरकार ! मैंने देखा है तो द्रष्टापना हुआ तुम जानते हो इसकी लाठी लगी है। हाँ सरकार! मैं जानता हूँ कि इसी की लाठी लगी है। यह ज्ञातापना हुआ और जब उसने लाठी मारी तो तुम कहाँ पर थे? साहब ! मैं उस समय बहुत करीब था। तो यह हुआ नजदीकपना। इस प्रकार का जो साक्षी है उसके ही बयान पर अदालत फैसला देती है। तो साक्षी स्वयं अक्रिय होता है, निर्दोष होता है, निष्कलंङ्क होता है, तटस्थ होता है। इसी तरह 'मैं' आत्मा साक्षी हूँ। मेरा मन अच्छे में जाता है या बुरे में जाता है, स्थिर होता है अथवा चंचल होता है, दुःखी या सुखी होता है, निर्विकार या सविकार होता है, इत्यादि भावों को 'मैं' आत्मा जानता हूँ। यथा प्रमाण-

 

अहं साक्षीति यो विद्यात् विवित्तयैवं पुनः पुनः

एव मुक्तः विद्वान इति वेदांत डिमडिमः ।।

 

कोई ऐसा टाईम नहीं कि मुझसे चोरी करके मेरा मन भले या बुरे में चला जाए। 'मैं' दिन-रात देखता रहता हूँ। मन के सारे व्यापारों (चेष्टाओं) को 'मैं' जानता हूँ और मन से 'मैं' इतना नजदीक हूँ कि 'मैं' स्वयं मन हूँ। हाँ, इतना नजदीक हूँ कि जिसको 'मैं' जानता हूँ, वही होकर जानता हूँ। तो मन का ज्ञाता, मन का द्रष्टा और नजदीक स्वयं 'मैं' ही मन हूँ। इसलिए 'मैं' मन का साक्षी हूँ।

 

देखो-ध्यान दो। जरा फारमूला बता दूँ-द्रष्टा जब दृश्य को देखता है, तो दृश्य के दर्शनकाल में दृश्य से भिन्न होकर देखता है या अभिन्न होकर अभिन्न होकर देखता है। देखो ऐसा कहने से हम नहीं मान लेंगे। बाप का नाम बताओ नहीं तो श्राद्ध करो। दृश्य के अनुभवकाल में द्रष्टा दृश्य से भिन्न होकर यदि देखे तो दृश्य नहीं और यदि दृश्य से अभिन्न होकरदेखे तो भी दृश्य नहीं और यदि द्रष्टा दृश्य से भिन्न है तो दृश्य नहीं अभिन्न है तो भी दृश्य नहीं। सब अनुभव करो इसको-जैसे डंडा है, यह दृश्य है बिल्कुल उसी टाईम यानी दर्शनकाल में? इसलिए 'मैं' आत्मा जिसको देखता हूँ, जिसको जानता हूँ, वही होकर देखता, जानता हूँ। तो वस्तुतः यदि कुछ द्रष्टा से दृश्य भिन्न हो तो अलग-अलग अनुभव हो, परन्तु ऐसा नहीं होता इसलिए जिसका 'मैं' अनुभव करता हूँ, वही होकर अनुभव करता हूँ।

 

समुझि सयाने करहु अब, सब मिलि संमत सोई ।।

(रा. अयो.)

 

क्या मतलब? जी हाँ, द्रष्टा होकर दृश्य का अनुभव नहीं होता, परन्तु द्रष्टय दृश्य एक होकर ही अनुभव होता है। तो द्रष्टा कहाँ गया और द्रष्टा ही नहीं, तो उसकी अपेक्षा से ही तो दृश्य था, अतः दृश्य भी नहीं और द्रष्टा दृश्य नहीं तो दर्शन किया कहाँ। बस, चेतन का चेतन तत्व रह गया 'मैं' का 'मैं' अरे! क्या यहाँ भी झगड़ा है? अभी अनुभव करो तुम्हें कुछ बुद्धि द्वारा या तर्क द्वारा नहीं कहा जा रहा है। यहाँ पर तो स्वरूप का कथन हो रहा है। जिसको देखते जानते हो, वही होकर देखते जानते हो या भिन्न-भिन्न होकर देखते जानते हो? जिसको जो देखता है वही होकर उसको देखता है। यहाँ तो नकद सौदा है। अनुभव यहीं पर कर लो। कोई उधार बात नहीं है। मजा गया।

 

इसलिए 'मैं' सर्व का साक्षी हूँ, अतः अक्रिय हूँ। साक्षी में कर्तापना, भोक्तापना नहीं होता। तो 'मैं' साक्षी भाव से सदैव सर्वदा सब के हृदय में विराजमान हूँ। अच्छा, तो फिर उस मन रूपी खत्ती में जो कर्मों का भंडार है उसमें आग लगा देनी चाहिए। तो लो यह आग लगा दो-कर्ता, भोक्ता अपने आप में अज्ञान से ही माना था। 'मैं' कर्ता, भोक्ता भूतकाल में भी नहीं था, 'मैं' कर्ता, भोक्ता अब भी नहीं हूँ और कर्ता, भोक्ता भविष्य में भी नहीं रहूँगा। इस तरह जब कर्ता, भोक्ता नहीं तो कर्तापने के अहंभाव का नाश हो गया। केवल साक्षी मात्र रह गया। अहंभाव के नाश होते ही पूंजी खत्म। खत्ती में आग लग गई। आज भी मैं कर्ता नहीं हूँ, ब्याज भी गया। क्रियमाण कर्म का नाश हो गया। तो इस तरह पूंजी भी गई और उसका बढ़ता ब्याज भी चला गया। आमदनी बंद हो गई। रह गया साढ़े तीन हाथ का शरीर- प्रारब्ध। कई विद्वान प्रारब्ध का नाश नहीं मानते- ऐसा मानने से गुरु परम्परा की हानि होती है। वे ऐसा समझते हैं कि ज्ञान से संचित और क्रियमाण का नाश होता है, परन्तु प्रारब्ध का नहीं। तो भाई ! क्योंकर प्रारब्ध का नाश नहीं होता? यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि प्रारब्ध भी अज्ञान से उत्पन्न हुआ है। इसका भी मूल कारण अज्ञान ही है। जब तीनों कर्मों का मूल कारण अज्ञान है तो प्रारब्ध क्यों नहीं जला, अज्ञान रूपी प्रारब्ध कैसे रह गया। बड़े-बड़े ब्रह्मज्ञानी प्रारब्ध का शेष रह जाना मानते हैं। जब संचित क्रियमाण एवं प्रारब्ध सभी का मूल कारण अज्ञान है और जब अज्ञान का नाश हो गया तो प्रारब्ध क्यों कर शेष रह जाएगा? क्या कारण है। तो यहाँ पर बड़े-बड़े आचार्य बैठे हैं उनसे पूछो-यहाँ पर तो बहुत सीना फुलाए बैठे हैं बतावे क्यों प्रारब्ध बच रहता है? तो उनकी यही एकमात्र दलील है कि भाई! देहधारी गुरु से ही बोध होता है। तो प्रारब्ध का नाश मानने से गुरु परम्परा का नाश हो जाएगा। देह भाव रहते गुरु शिष्य संबंध को कैसे लोप करें तो इस तरह आँसू पोंछते हैं। यह कोई प्रबल प्रमाण नहीं है। सुनो-भगवान श्री कृष्ण सीधे तो है नहीं, सदैव टेढ़ा रूप बनाते हैं। तो उनका कहना भी टेढ़ा ही होगा, कैसे जल्दी लगे-

 

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्ववित्

पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्नन्नश्ननगच्छन्स्वपश्वसन् ।।

(5 - 8)

 

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि

 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ।।

(5-9)

 

मैं कर्मों का कर्ता भोक्ता नहीं हूँ।

 

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः

लिप्यते पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ।।

(गीता 5-10)

 

इस प्रकार मैं कर्मों का कर्ता, भोक्ता नहीं हूँ। अज्ञान के कारण ही लोग अपने आपको कर्ता, भोक्ता मान लेते हैं। परन्तु संसार में ऐसे रहना चाहिए जैसे पद्मपत्रमिवाम्भसा। पानी में रहते हुए भी कमल का पत्र पानी से अलग रहता है। यहाँ पर ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान प्रारब्ध को मानते हैं। इस कथन द्वारा प्रारब्ध का शेष रहना माना है। अच्चा चलो आगे चलें।

 

यथैधांसि समिद्धोऽग्रिर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ।।

(गीता 4-37)

 

वाह रे कन्हैया ! जैसा तू है वैसा ही तेरा कथन है। अब इसको मानें कि उसको मानें? एक जगह भगवान प्रारब्ध का शेष रहना कहते हैं और एक जगह सभी कर्मों को प्रारब्ध सहित भस्मसात् करते हैं। किस अभिप्राय से? भगवान प्रारब्ध को शेष रहना आचार्य देश से मानते हैं और ज्ञानाग्नि से सर्व कर्मों का भस्म हो जाना भगवान देश से मानते हैं। भगवान वहाँ, पर-देश से बोल रहे हैं और भगवान यहाँ, स्व-देश से बोल रहे हैं। ज्ञान से समस्त कर्मों का भस्म होना स्व-देश की बात है और प्रारब्ध का नाश होना यह पर-देश की बात है। तो पर-देश और स्व-देश क्या है? मजा लो-

 

नैव किंचित् करोमीति युक्तो मन्यते तत्ववित् ।।

 

'तत्ववित् इत्येवं मन्येत तु विजानीयात् 1' तत्ववित् (तत्ववेत्ता पुरुष) ऐसा मानता है कि तत्ववित् ऐसा जानता है। अहं ब्रह्मास्मि की धारणा वाले को

 

तत्ववेत्ता कहते हैं। अहमस्मि इस निश्चय वाले को आत्मनैष्ठिक कहते हैं यानी आचार्य देश में अहं ब्रह्मास्मि की धारणा होती है और भगवान देश में अहमस्मि का निश्चय होता है। देखो, तीन प्रकार का अध्यास होता है। यहाँ पर बड़े-बड़े वेदांत ग्रन्थ को निगल कर बैठे हैं। समझो विषय-यहाँ विद्वान लुधियाना, दिल्ली आदि स्थानों से आए हुए एकत्रित बैठे हैं। कान खोलकर सुन लो- अध्यास तीन प्रकार का होता है। क्यों भाई ! चार प्रकार का क्यों नहीं होता? क्योंकि गुण भी तो तीन प्रकार के होते हैं-सत, रज, तम। अच्छा, हाँ जी- देहाध्यास, जीवाध्यास और ब्रह्माध्यास। मैं देह हूँ-यह देहाध्यास है और तमोगुणजन्य है। मैं जीव हूँ, ऐसा मानना, जीवाध्यास रजोगुणजन्य है और मैं ब्रह्म हूँ, यह ब्रह्माध्यास सतोगुणजन्य है। बिल्कुल ठीक-जब 'मैं' को तीनों से हटा लो- 'मैं' आत्मा में देह का अध्यास 'मैं' में जीव का अध्यास और 'मैं' में ब्रह्म का अध्यास, तो ये तीनों अध्यास किस पर आधारित हैं? 'मैं' पर। तो तीनों का आधार 'मैं' आत्मा ही हूँ। मैं देह हूँ-यह अध्यास मैंने माना। मैं जीव हूँ-यह अध्यास मैंने माना। 'मैं' ब्रह्म हूँ-यह भी अध्यास मैंने ही माना। इसीलिए तो भगवान कहते हैं 'मन्येत' अरें! 'मैं' पर से जीव भाव को हटाने के लिए ही तो 'मैं' ब्रह्म हूँ - यह धारणा की गई। जीव भाव का अभाव करने के लिए 'मैं' ब्रह्म हूँ-यह धारणा बनाई गई।

 

सर्व व्यापारमुत्सृज्य अहं ब्रह्मेति भावय

अहं ब्रह्मेति निश्चित्य त्वहंभावं परित्यजेत् ।।

विशेष दर्शिनिः आत्मभाव भावना विनिवृत्तिः ।।

(यो..कै. पाद)

 

भगवान वेद व्यास स्कन्धपुराण के 21वें अध्याय में कहते हैं-

 

अच्युतोऽहं अनन्तोऽहं गोविंदोऽहं अहं हरिः

आनन्दोऽहं अशेषोऽहं अजोऽहं अमृतोस्म्यहम् ।।

नित्योऽहं निर्विकल्पोऽहं निराकारोऽहमव्ययः

सच्चिदानंद रूपोऽहं परिपूर्णोऽस्मि सर्वदा ।।

ब्रह्मैवाहं संसारी मुक्तोऽहं इति भावयेत्

 

मैं अच्युत हूँ, मैं अनन्त हूँ, मैं गोविंद हूँ, मैं आनंदस्वरूप हूँ, मैं व्यापक हूँ, चैतन्य घनभूत हूँ ऐसा अपने आप में भावना करें। इति भावयेत् 'मैं' पर ऐसी भावना करे। यहाँ पर जानना नहीं कहा। देह भाव, जीव भाव को हटाकर इस प्रकार की भावना करे। भावना तो हमेशा कल्पित होती है। अहं ब्रह्मास्मि-यह भावना है। मैं ब्रह्म हूँ-यह ज्ञान माना हुआ है। कल्पित ज्ञान है। आचार्य द्वारा प्रतिपादित 'तत्वमसि' महावाक्य के श्रवण, मनन, निदिध्यासन से वृत्ति में उदय हुआ। जो ज्ञान, जिसे अहं ब्रह्मास्मि की धारणा (भावना) कहते हैं। क्षणिक ज्ञान, विशेष ज्ञान, असत्य ज्ञान, अनित्य ज्ञान, नश्वर ज्ञान, इत्यादि इसके पर्यायवाची शब्द हैं। यह बोध नहीं है। यदि तुम्हारी यही धारणा है तो इसे निकाल दो। आगे भी यदि यही धारणा रही तो पूर्ण बोध नहीं है, बल्कि भावनात्मक बोध है। पहले अपने आपको जीव मानते थे और अब अपने आपको ब्रह्म मानते हो। हाँ, पहले गरीब थे और अब कुछ अमीर बन गए। तो यह छोटा अभिमान और यह बड़ा अभिमान, यही अंतर रहा। परन्तु, मिला क्या? खाक। क्या इसी को ज्ञान कहोगे? इस तरह की मान्यता ने ही सब बरबाद कर दिया है। यहाँ पर अध्यास का प्रतिपादन नहीं हो रहा है। आत्म तत्व का निरूपण हो रहा है। तो ये अध्यास किस प्रकार आधारित है।

 

इनका आधार क्या है? देखो-तीन प्रकार के वादी होते हैं।

 

मैं देह हूँ-यह देहात्मवाद है-कर्मकांड का विवेचन करते हैं।

 

मैं जीव हूँ-यह जीवात्मवाद है-उपासना का विवेचन करते हैं।

 

मैं ब्रह्म हूँ-यह ब्रह्मात्मवाद है-ज्ञान कांड का विवेचन करते हैं।

 

यह द्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद और अद्वैतवाद। इस तरह ये तीनों वादी छँट जाते हैं। यहाँ कोई वाद नहीं है। यह निर्विवाद है। ऊपर के तीनों वाद निर्विवाद सिद्धांत नहीं हैं। कर्मवादी, कर्मकांडी अपने को मैं हूँ, कहता है। उपासक भी अपने को 'मैं' हूँ, कहता है। और ब्रह्मवादी ज्ञानी भी अपने को 'मैं' हूँ कहता है। तो फिर यदि शुद्ध तत्व 'मैं' आत्मा नहीं तो इन तीनों वादों का आधार क्या होगा? अनुभव करो-इस चीज को समझो भगवान पतञ्जलि योग दर्शन के कैवल्यपाद में सूत्र लिखते हैं- 'विशेषदर्शिनिः आत्मभाव भावना विनिवृत्तिः ।।' पूर्ण रूप से स्वरूप ज्ञान होने पर, आत्म बोध प्राप्त होने पर आत्म भाव की भावना की निवृत्ति हो जाती है। आत्मभाव की भावना क्या है?

 

अच्युतोऽहं अनन्तोऽहं गोविंदोऽहं अहं हरिः

आनन्दोऽहं अशेषोऽहं अजोऽहं अमृतोस्म्यहम् ।।

नित्योऽहं निर्विकल्पोऽहं निराकारोऽहमव्ययः

सच्चिदानंद रूपोऽहं परिपूर्णोऽस्मि सर्वदा ।।

ब्रह्मैवाहं संसारी मुक्तोऽहं इति भावयेत्

 

आत्मबोध होने पर इस आत्मभाव की भावना की निवृत्ति हो जाती है। शुद्ध तत्व रह जाता है। समझो विषय-

 

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मातकुरुते तथा ।।

(गीता 4-37)

 

जिस समय पूर्ण रूप से आत्म तत्व का बोध हो जाता है तब संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण सभी कर्म भस्म हो जाते हैं। देखो आत्मदेश के अज्ञान में शरीरादिक प्रपंच हैं ! जब शरीर ही नहीं तो शरीर से भिन्न वस्तु तो कर्म है नहीं, तो फिर प्रारब्ध कहाँ रहेगा? जब तक अज्ञान का नाश होगा तभी तक प्रारब्ध रहेगा और यदि अज्ञान का नाश हो गया और फिर भई प्रारब्ध का अस्तित्व मानते हो तो समझ लो कि अभी अज्ञान का समूल नाश नहीं हुआ है। आत्म तत्व के बोध में सभी भावनाओं की निवृत्ति हो जाती है और यही कृतकृत्य पद है। जीव यहाँ पर कृतकृत्य हो जाता है। जिज्ञासुओं ! समझना जरा, यहाँ पर बड़े-बड़े रामायणी बैठे हैं-जिंदगी बीत गई रामायण का पाठ करते-करते- उत्तर कांड के ज्ञान दीपक का प्रसङ्ग देखो ध्यान देना-सुनो-

 

एहि विधि लेसै दीप तेज रासि विज्ञानमय

जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब ।।

 

जब ज्ञान दीपक जला तो उसकी शिखा क्या है?

 

सोहमस्मि इति वृत्ति अखंडा। दीप शिखा सोइ परम प्रचंडा ।।

 

अहं ब्रह्मास्मि-यह दीप शिखा है। जब यह साधनजन्य ज्ञान प्राप्त हो गया तो इसके प्रकाश में-

 

आतम अनुभव सुख सुप्रकाशा। तब भव मूल भेद भ्रम नाशा ।।

प्रबल अविद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटै अपारा ।।

 

सब कुछ हो गया। मानस प्रेमियों! फिर उसी प्रकाश में-

 

तब सोई बुद्धि पाई उजियारा। उर गृह बैठि ग्रन्थि निरुआरा ।।

 

जब यहाँ पर मानसकार कहते हैं कि प्रकाशमय बुद्धि हृदयदेश में बैठकर ग्रन्थि खोलती है। अब मानस प्रेमियों से यह प्रश्न है कि जब प्रबल अविद्या का परिवार नष्ट हो गया तब फिर वह कौन-सी ग्रंथि बच गई जिसको खोलने के लिए बुद्धि ज्ञान के प्रकाश में हृदय देश में बैठकर प्रयत्न करती है। वह कौन- सी ग्रंथि को खोलती है? जिंदगी बरबाद हो गई पाठ करते-करते, परन्तु कभी सोचा भी कि कौन-सी ग्रन्थि बुद्धि को खोलनी बाकी रही? अब शेष क्या रह गया?

 

तब सोई बुद्धि पाई उजियारा। उर गृह बैठि ग्रन्थि निरुआरा ।।

छोरत ग्रन्थि पाव जौ सोई। तब यह जीव कृतारथ होई ।।

 

और जिसके खुलने से जीव कृतार्थ हो जाता है और आगे चलिये-

 

छोरत ग्रन्थि जानि खगराया। विघ्न अनेक करइ तब माया ।।

 

तो फिर माया को क्या पड़ी है जो विघ्न कर रही है? और हाँ-माया कौन सा विघ्न करती है?

 

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई ! बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई ।।

 

माया को उजाड़ा जा रहा है। जो विघ्न करती है, आगे बतावेंगे। अभी प्रसङ्ग पढ़ दें-

 

कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा ।।

होइ बुद्धि जो परम सयानी। तिन्ह तन चितव अनहित जानी ।।

इन्द्रिय द्वार झरोखा नाना। जहं तहं सुर बैठे करिथाना ।।

आवत देखहिं विषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी ।।

जब सो प्रभञ्जन उरगृह जाई। तबहिं दीप विग्यान बुझाई ।।

ग्रन्थि छूटि मिटा सो प्रकाशा। बुद्धि विकल भई विषय बतासा ।।

तब फिर जीव विविध विधि पावई संसृति क्लेश ।।

हरि माया अति दुस्तर तरि जाई विहगेश ।।

 

सुनो-अब यह शंका होती है कि वह कौन-सी ग्रन्थि बाकी रह गई है जिसको बुद्धि हृदयस्थान में ज्ञान के प्रकाश में खोलने बैठी है। ज्ञान के लाइट में क्या खोलने बैठती है? सोऽहमस्मि-सोऽहम् तक भी कुछ कुछ अहंकार बाकी है। अज्ञान कुछ कुछ बाकी रह गया है, वह ब्रह्म मैं हूँ-इस प्रकाश में कुछ ग्रन्थि हैं, अंधकार है। अब प्रश्न होता है कि जिस ज्ञान से अज्ञान का नाश होता है वह सत्य है कि असत्य? यदि कहो कि वह ज्ञान सत्य है तो एक तो ज्ञान सत्य है और दूसरा ब्रह्म सत्य, तो वेदांत का द्वैतापत्ति दोष जाएगा। सत्य एक ही होता है, दो नहीं। तो ब्रह्म और ज्ञान दोनों सत्य नहीं हो सकते। यदि असत्य कहें तो असत्य तो बन्ध्या का पुत्र होता है, वह है ही नहीं। तो असत्य से असत्य की निवृत्ति कैसे होगी? यदि असत्य से असत्य की निवृत्ति होती है तो प्रमाण दो। तो प्रमाण देते हैं कि स्वप्न में किसी को जंगल में शेर मिला तो उस स्वप्न के शेर को मारने के लिए क्या जाग्रत अवस्था की गोली बंदूक की आवश्यकता है? क्या जाग्रत की बंदूक से स्वप्न का शेर मरेगा? वह तो स्वप्न के ही बंदूक से मरेगा। इसी तरह असत्य से असत्य की निवृत्ति हो जाती है, तो पूर्वपक्षी कहता है कि इस तरह स्वप्न के आधार से असत्य की निवृत्ति असत्य से तो हो जाती है, यह मान लिए, परन्तु श्रीमान् जी इस तरह से अज्ञान भी असत्य और उसका नाशक ज्ञान भी असत्य हो जाएगा और फिर इस असत्य ज्ञान से तुमने जाना किसको? सत्य को जाना कि असत्य को? यदि कहो सत्य को जाना तो असत्य से सत्य का ज्ञान कैसे हो सकेगा? वह भी तो असत्य ही हुआ।

 

नाहं मन्ये सुवेदेति नो वेदेति वेद

योनस्तद्वेद तद्वेद नो वेदेति वेद ।।

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य वेद सः

अविज्ञातं विज्ञानतां विज्ञातमविजानताम् ।।

(केनोपनिषत् 2-3)

 

जो कहता है मैंने ब्रह्म को जाना, उसने नहीं जाना और जो कहता है कि मैंने ब्रह्म को नहीं जाना उसने भी नहीं जाना। आप अभी अनुभव कर लो, जिस ब्रह्म को जाना उसे भिन्न करके जाना या अभिन्न करके ? यदि भिन्न करके जाना तो ब्रह्म नहीं और अभिन्न करके जाना तो जाना किसको? और जिस ब्रह्म को जानने की इच्छा करता है वह भिन्न है तो ब्रह्म नहीं और अभिन्न है तो जानेगा किसको? यही अविद्या की ग्रन्थि है। इसी ग्रन्थि को खोलने के लिए अहं ब्रह्मास्मि इस ज्ञान के प्रकाश में बुद्धि हृदय देश में बैठती है। यह ग्रन्थि खुल गई तो जीव कृतार्थ हो जाता है। ग्रन्थि क्या है कि मैं पहले अज्ञानी था अब ज्ञानी हुआ मैं पहिले बद्ध था अब मुक्त हुआ। मैं पहिले जीव था, अब ब्रह्म हुआ। यह ठगनी माया इस समय बड़ों-बड़ों को विघ्न करती है। कहती है- यह देखो तो मेरा स्वामी (मायापति) बनने जा रहा है। जब तक ग्रन्थि नहीं खुली तब तक तो वह माया ही उसका स्वामी है और जहाँ उसको बोध हुआ तो वह अलग हो गया। वह मायापति हो गया। क्योंकि, ग्रन्थि खुलने से वह शुद्ध तत्व 'मैं' का 'मैं' भगवान आत्मा रह जाता है। तो-

 

शिव विरंचि कहं मोहई को है बपुरा आन।

अस जिय जानि भजहिं मुनि मायापति भगवान ।।

 

जी हाँ-

 

यथैधांसि समिद्धौऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसातकुरुते तथा ।।

(गीता 4/37)

 

यही ज्ञान का स्वरूप है और यही विमल ज्ञान है। इन मर्मों को ठीक तरह से जान लिए बिना बंधन नहीं छूटेगा। जब तक प्रारब्ध का अस्तित्व मान रहे हो तब तक अज्ञान बना हुआ है। जब तक अपने आप को मान रहे हो कि मैं ब्रह्म हूँ तो अज्ञान कहाँ गया है? ठीक, श्रीमान् जी ! अहं ब्रह्मास्मि से क्या समझे कि मैं देह नहीं, मैं जीव नहीं, मैं ब्रह्म हूँ। यह समझा हूँ-तो बताओ तुम अपने को देह नहीं मानते, परन्तु देह अपने देश में है तो सही, कहीं कहीं तो देह है, चाहे मैं भले अपने को देह समझें। देह की अपेक्षा से ही तो आप अपने को ब्रह्म मान बैठे हो, फिर भी अभिमान करते हो कि मैं ब्रह्म हूँ। तो श्रीमान् जी! क्या समझे-देह नहीं हूँ मैं ब्रह्म हूँ। देह तुम नहीं हो, परन्तु देह अपने देश में तो है ही और जब तक देह है तब तक देह का अस्तित्व तो रहेगा ही, यह अमिट सिद्धांत है। अज्ञान के अस्तित्व में ही देह है तो तुम्हारा अलग होने से, इससे क्या बिगड़ना है-इसलिए आगे बढ़ो और संत कृपाका भिखारी बनो। ज्ञान पढ़ने से नहीं होता। आत्म तत्व का जानना साधनजन्य नहीं यह तो कृपाजन्य है। हाँ-वेदों, शास्त्रों का ज्ञान साधनजन्य है, परन्तु भगवान अपना आप, क्या साधन से मिलेगा? हाँ- मैं ब्रह्म हूँ यहाँ तक जीव भाव से परे हुए। पहिले जीवभाव में गरीब थे, अब कुछ अमीर बन गए। हाँ भाई ! गरीब ही अमीर बनना चाहता है। तो क्या टेटकू घसीटू कहीं ब्रह्म बनेगा? मैं जीव हूँ, इस जीवभाव की अपेक्षा से ही तो मैं ब्रह्म हूँ, अमीर बन गए। पहिले अपने को गरीब समझता था और अब भावना करता है कि हम बड़े आदमी हैं। दरअसल जो ब्रह्म है वह क्यों कहता फिरेगा कि मैं ब्रह्म हूँ, ब्रह्म हूँ। देखो, हम उसको भगवान क्यों कहते हैं? क्योंकि, वह अपने आप को भगवान भी नहीं कहता। भगवान अपने आप को भगवान भी नहीं मानता। भगवान, परमात्मा, ब्रह्म यह नाम तो उपासकों ने रखा है। परमात्मा, अपने आपको भगवान थोड़े ही कहता है। तो फिर तुम क्यों अकड़ते हो-अहं ब्रह्मास्मि कहकर। इससे साफ मालूम होता है कि तुम्हारी कंगाली अभी नहीं गई है। जरा रोशनी में आओ। वाह- फिर भगवान गीता में कहते हैं-

 

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ।।

(गीता 4 - 19)

 

क्या मतलब - रामाश्रय से, गोविन्दाय नमो नमः, जो है सो-अरे, जिसने समारम्भाः माइने सब समय निःसंकल्प है, जिसके मन में कोई संकल्प- विकल्प नहीं। विकल्प के बाद ही तो मनीराम की फैक्टरी चालू हो जाती है और जब मन निःसंकल्प है तो फिर मनीराम की फैक्टरी चालू नहीं होगी। यानी में देह हूँ, मैं जीव हूँ, मैं ब्रह्म आदि भावनाएँ नहीं होंगी। इन भावनाओं का विकल्प 'मैं' के ऊपर होता है। जब भावनारहित हुआ, योगमाया का पर्दा फाड़कर बाहर फेंक दिया, योग माया का पर्दा उठ गया-अरे ! वाह रे यार ! खूब पर्दानशी है, बुरकावाली है, बुरका वाली सभी को देखती है, परन्तु दुनियाँ उसको नहीं देख पाती। योगमाया के परदे में छुपा हुआ 'मैं' आत्मा सबको देखता हूँ, इन्द्रियों को, मन को, बुद्धि, चित्त, अहंकार इत्यादि को, परन्तु सब मुझे देखने में समर्थ नहीं है। वाह-

 

यह खेल कैसा परदानशीं का, परदा उठाकर जो हमने देखा ।।

 

इस पद का भाव, अभी नहीं इस वक्त नहीं, उस वक्त सुनाएँगे आत्मजिज्ञासुओं ! ज्ञानाग्नि में सर्व कर्म-संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण सभी भस्म हो जाते हैं। यह भगवान अपने स्वरूप से बोल रहे हैं, अपने देश से कह रहे हैं और प्रारब्ध का रह जाना आचार्य देश से कहे हैं। इस प्रकार भगवान नारद राजा प्राचीनबहिं के प्रति विमल ज्ञान का उपदेश कर्मों के विषय में कर रहे हैं।

 

 

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द्वितीय दिवस : दूसरी बेला

 

दोपहर 2.00 से 4.00 बजे तक

 

उस समय के प्रसंग में कर्मों का विश्लेषण किया गया। अब प्रेम से राजा पुरञ्जन का आख्यान सुनो-

 

आसीत्पुरंजनो नाम राजा राजन्बृहच्छ्रवाः

तस्याविज्ञातनामाऽऽसीत्सखाविज्ञातचेष्टितः ।।

(श्रीमद् भागवत 4-25-10)

 

इसी पृथ्वी मंडल पर पुरञ्जन नाम का एक राजा था। उसके सखा का नाम अविज्ञात था। इसकी व्याख्या एवं सखा अविज्ञात के विषय में पीछे बतायेंगे। किसी दिन अपने प्रिय सखा अविज्ञात को छोड़कर राजा पृथ्वी मंडल में विचरण करने निकल गया। विचरण करते-करते वह जंगल में प्रवेश किया। वहाँ उसे एक बड़ी सुंदर नगरी, जिसके नौ दरवाजे थे मिली। वह राजा उसको सुरम्य देखकर उसके अंदर प्रवेश किया तो वहाँ उसे एक सुंदर रमणी बैठी हुई मिली। वह सुंदरी ग्यारह योद्धाओं से सुरक्षित थी और एक सर्प प्रहरी था जिसके पाँच सिर थे। सुंदरी के सौंदर्य से मोहित हो उस षोडशी से राजा पुरञ्जन पूछता है-

 

का त्वं कञ्जपलाशाक्षि कस्यासीह कुतः सति

 इमामुप पुरीं भीरु किं चिकीर्षसि शंस मे ।।

(श्रीमद् भागवत 4-25-26)

 

एतेऽनुपथा ये एकादश महाभटाः

एता वा ललनाः सुभ्रु कोऽयं तेऽहिः पुरः सरः ।।

 

(4 - 25 - 27)

 

राजा पुरञ्जन कहता है कि हे लोक सुंदरी ! तुम कौन हो? किस कुल की ललना हो और ये ग्यारह योद्धा कौन हैं? यह पाँच सिर वाला नाग कौन है? तो वह सुंदर बाला कहती है-

 

विदाम वयं सम्यक्कर्तारं पुरषर्षभ

परस्यापि गोत्रं नाम यत्कृतम् ।।

(4 - 25 - 33)

 

इहाद्य सन्तमात्मानं विदाम ततः परम्

येनेयं निर्मिता वीर पुरी शरणमात्मनः ।।

( 4 - 25 - 34)

 

एते सखायः सख्यो मे नरा नार्यश्च मानद

सुप्तायां मयि जागर्ति नागोऽयं पालयन्पुरीम् ।।

(4 - 25 - 35)

 

हे नर श्रेष्ठ ! यह तो मुझे विदित नहीं है कि मैं कौन हूँ, मेरा क्या गोत्र है, मैं किस कुल की हूँ? यह भी मैं नहीं जानती कि ये मेरे ग्यारह सखा कौन हैं।।। मैं जब इस नौ द्वारवाली पुरी में सो जाती हूँ तो यह पाँच फनवाला सर्प पुरी की रक्षा करता है।

प्रथम मिलन में ही दोनों एक-दूसरे पर आसक्त हो गए और राजा पुरञ्जन और वह सुंदरी दोनों प्रेमपाश में बंध गए। राजा मोहपाश में बंधकर गृहस्थ जीवन में पदार्पण किया। जब वह सुंदरी मोहित हो गई तो मोह का आदर समर्थन कैसे हो-दोनों विवाह सूत्र में बंध गए। अंततोगत्वा कालांतर में दोनों के ग्यारह सौ पुत्र और एक सौ दस कन्यायें हुईं, समय बीतते गया। अब राजा और रानी दोनों का मृत्यु काल गया।

 

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्

तं तेमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ।।

 

(गीता 8-6)

 

भगवान कृष्ण कहते हैं कि अन्तकाल में जो जिस भाव को स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है उसी भाव को वह प्राप्त होता है। मृत्यु काल में जिसका चिंतन करता है, प्राण के छूटने पर कोई भी हो, उसी भाव में स्थित हो जाता है। मृत्यु के समय में तो उसी भाव का चिंतन होगा जिस भाव में वह जीवन पर्यन्त आसक्त होगा। जीवन पर्यन्त जिस प्रिय वस्तु में उसकी आसक्ति होती है उसी का स्वरूप मरणकाल में होता है, वह उसी का स्मरण करेगा। यही तो आसक्ति का स्वरूप है। प्राप्ति में हर्ष हो और विछोह में दुःख हो। दोनों राजा पुरञ्जन और रानी पुरञ्जनी एक-दूसरे पर आसक्त थे। दोनों एक- दूसरे का चिंतन करते थे, तो मृत्यु के बाद राजा पुरञ्जन चूँकि रानी पुरञ्जनी का स्मरण करता था, उसी में वह आसक्त था इसलिए वह राजकुमारी वैदर्भी हुआ और रानी पुरञ्जनी मृत्यु के बाद मलयध्वज नामक राजकुमार हुई। मिशल उलट गई। यह अटल नियम है कि जाग्रत अवस्था में जिस विषय का चिंतन करता है स्वप्न में भी उसी का स्वप्न देखता है-उसी का स्वप्न होता है।

 

अब क्या-समय पाकर जब वे यौवनावस्था को प्राप्त हुए तो उनका फिर विवाह हो गया। राजकुमार मलयध्वज (जो पूर्वजन्म में रानी पुरञ्जनी थी) और विदर्भ राजकुमारी वैदर्भी (जो पूर्वजन्म का राजा पुरञ्जन था) दोनों प्रेम सूत्र में बंध गए। विवाह हो गया, राजा रानी पुनः बन गए और गृहस्थाश्रमोचित व्यवहार करने लगे। फिर समय पाकर वृद्धावस्था आई तो दोनों राजा मलयध्वज और रानी वैदर्भी वन में तप करने लगे। काल गति से राजा मलयध्वज की मृत्यु हो गई। (यह रानी पुञ्जनी थी पूर्वजन्म की) और राजा पुरञ्जन जो अभी वैदर्भी रानी है, मृतक के पास विलाप करने लगी।

 

इसी समय राजा पुरञ्जन का वह अविज्ञात सखा ब्राह्मण रूप से उपस्थित होकर उपदेश करता है। उसने आत्मतत्व का उपदेश किया। यह पुरञ्जनोपाख्यान् एक रूपक अलंकार है, समझो हमारे यहाँ ऋषि-मुनियों ने बड़े-बड़े महापुरुषों ने, जीव के कल्याण निमित्त सुंदर-सुंदर कथाओं के माध्यम से आत्मतत्व का निरूपण किया है। आत्मतत्व का बोध कराए हैं और जीव का आत्मकल्याण किये हैं। पुरञ्जन का अर्थ हुआ। 'स्व पुरं जनयति यः सः पुरञ्जनो जीवः।' अपने संकल्प से, वासना करके साढ़े तीन हाथ का जो शरीर है उसका स्वयमेव निर्माण करे, उसे कहते हैं पुरञ्जन (जीव), पुरञ्जन नाम जीव का है और जीव का सदैव सखा अविज्ञात है। सच्चिदानंद घनभूत परमात्मा, यह जीव का सखा है।

 

अविज्ञात-' विज्ञातः इति अविज्ञातः ' तो परमात्मा का विज्ञाता, उसका जानने वाला, उसका द्रष्टा, ज्ञाता सिवाय परमात्मा के और कौन होगा। परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं-तो कैसे नहीं? सुनो-परमात्मा है सच्चिदानंद- सत्, चित, आनंद। तो आत्मा सत् स्वरूप है, चित (चेतन) है और आनंद स्वरूप है। बिल्कुल ठीक, परमात्मा से जीव को अलग करके मानो तो परमात्मा अलग और जीव अलग हो जायेगा और परमात्मा सत्य है तो जीव सत्य से भिन्न असत्य हो जायेगा। परमात्मा चित है। यदि वस्तुतः परमात्मा से जीव भिन्न है तो चेतन से भिन्न जीव जड़ होगा और परमात्मा आनंद स्वरूप है तो जीवात्मा से यदि परमात्मा को भिन्न मानते हो तो जीव दुःखरूप होगा। भिन्न मानते ही जीव असत्य, जड़ एवं दुःखरूप हो जाएगा। इसलिए ऐसे जीव को परमात्मा के जानने में क्या अधिकार है? यदि परमात्मा से अपने आप को जीव वस्तुतः भिन्न मानकर परमात्मा को जान लेता है तो फिर बन्ध्या का पुत्र शेर का शिकार कर सकता है। यह असंभव है। जीव अपने आप को परमात्मा से भिन्न मानकर यदि परमात्मा को जान लेता है तो आकाश में उड़ते हुए चिड़ियों के चरण चिन्ह वह देख सकता है। यह असंभव है। परमात्मा का नाम अविज्ञात है, उसको वही जान सकता है, जो स्वयं वही हो। उसका परिज्ञान दूसरे को नहीं हो सकता। अरे भाई ! समुद्र को नदी जानेगी कि समुद्र को समुद्र जानेगा? समुद्र को समुद्र ही जानेगा, नदी नहीं। देखो, सब हमको देखकर कहो- समझो समुद्र को समुद्र जानेगा कि समुद्र को नदी जानेगी? अरे भाई ! देखो- दोनों समाज प्रेम से सुनो-जब नदी समुद्र को जानने के लिए चलती है तो यहाँ पर श्रुतियाँ कहती हैं-

 

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय

तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।।

 

(मुण्डप 3/2/8)

 

जब नदी समुद्र को जानने के लिये समुद्र के किनारे पहुँचती है तो नाम, रूप को परित्याग करके ही समुद्र को जानती है। समुद्र को जानकर नदियाँ समुद्र हो जाती हैं। फिर वहाँ पर गंगा, यमुना आदि नदियाँ ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलती, नदियों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। प्रवाह नदी का रूप है। जब वह समुद्र से मिली तो सब कुछ अपनापन छोड़ दिया-नाम, रूप के त्याग के बाद फिर शेष क्या रहा? नदी भी समुद्र हो गई। नदी यदि समुद्र में मिलने पर अपना अस्तित्व (वजूद) रखती है तो जान लो अभी समुद्र से दूर है और इसलिये जब वह समुद्र से मिली तो फिर नदी नहीं रह गई, स्वयं ही समुद्र हो गई। अच्छा, अब देखो-समुद्र नाम समुद्र को किसने दिया? नदी ने ही समुद्र नाम दिया-नहीं तो समुद्र कहाँ? समुद्र कहेगा कौन? तो फिर नदी नहीं रही, समुद्र। अच्छा समुद्र हो जाने पर नाम, रूप का त्याग करने पर फिर उसका अस्तित्व नहीं रहा। तो फिर नदी की अपेक्षा से समुद्र था। तो समुद्र कहेगा किसको? समुद्र में मिलने के बाद जब नदी हो तब तो समुद्र कहा जाए। आज के पहिले जब गंगा नाम, रूप छोड़कर समुद्र हो गई (यह बारीक चीज है, जरा ध्यान से समझना) तो पहिले की याद, अब की। समुद्र का परिज्ञाता हो तब तो समुद्र कहे। इसी प्रकार जीव, भगवान को प्राप्त करके जीवभाव (नाम, रूप) त्याग कर पूर्णत्व को प्राप्त हो जाता है। 'स्व' का जब बोध हो गया। बद्ध था, अब मुक्त हो गया, अज्ञानी था, ज्ञानी हुआ इत्यादि। अतीत और वर्तमान की स्मृति नहीं रहती। यदि यह याद है तो यारों! जान लो वह अभी भगवान से सैकड़ों मील दूर है। खचेडू का खचेडू ही रहा।

 

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय

तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।।

 

इसलिये मानसकार कहते हैं-

 

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाई ।।

 

श्रीराम को जानकर राम ही हो जाता है।

 

ब्रह्मवित् ब्रह्मैव भवति ।।

 

(मुण्डक 3/2/9)

 

परमात्मा को जानकर परमात्मा ही हो जाता है। याद रखो, परमात्मा को जानने का जीव की अनधिकार चेष्टा है। परमात्मा से भिन्न जीव को परमात्मा को जानने का कोई अधिकार नहीं, इसलिए परमात्मा अविज्ञात है। हाँ जी-

 

ग्यारह योद्धा कौन हैं? बुद्धि रूपी पुरञ्जनी के पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय एवं ग्यारहवाँ मन, यही वे ग्यारह योद्धा हैं। पाँच फण वाला सर्प प्राण हैं (प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान), पाँच सिर वाला (प्राण वायु) बुद्धि रूपी पुरञ्जनी जब सो जाती है तो नव द्वार वाली नगरी (शरीर) की रक्षा करता है। एक-एक इन्द्रियों के एक-एक सौ विकार बुद्धि में होते हैं, यही ग्यारह सौ पुत्र हैं और बुद्धि की एक सौ दस प्रकार की जो वृत्तियाँ, यही एक सौ दस कन्यायें हैं। इस कथा का यही सारांश है। जीव रूपी पुरञ्जन का परम सखा परमात्मा सच्चिदानंद घनभूत भगवान ही है। यही अविज्ञात सखा पुरञ्जन जीव को उपदेश करता है।

 

आनन्द कन्द श्री सच्चिदानंद घनभूत परमात्मा ब्राह्मण का रूप लेकर उपदेश करता है-

 

का त्वं कस्यासि को वायं शयानो यस्य शोचसि

जानासि किं सखायं मां येनाग्रे विचचर्थ ।।

 

(4/28/52)

 

का त्वम्, कस्य असि, अयम् कः-तू कौन है? ये कौन है? ओहो-तू विलाप किसके लिए कर रही है। तू स्वयं अपने आप को देख, समझ और इस अज्ञान को छोड़-इतना अज्ञान, इतनी महान भूल। तुमने अपने आप को साढ़े तीन हाथ का देह माना, स्त्री माना-

 

अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः

नौ पशयन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ।।

 

(4/28/62)

 

मैं जो हूँ, वही तू है। अन्यः -दूसरा नहीं। त्वमेवाहं-तू ही मैं हूँ और मैं ही तू है। मुझ परमात्मा और तुझ जीवात्मा में कवि महात्मा जन कभी छिद्रमात्र का भी अंतर नहीं देखते। अच्छी तरह समझ लिया तो आत्मभाव को प्राप्त हो जाएगा और यदि भेद माना तो जीवभाव में पड़ा रहेगा। इतना ही भेद है-

 

यथा पुरुष आत्मानमेकमादर्शचक्षुषोः

द्विधाभूतमवेक्षेत तथैवान्तरमावयोः ।।

 

(4/28/63)

 

जिस तरह कोई पुरुष हाथ में दर्पण लेकर अपना मुँह देखता है तो शीशे के भीतर उसका ही प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। इसे वेदांत में आभासवाद कहते हैं। जिस प्रकार बिम्ब और प्रतिबिम्ब का भेद है, इसी प्रकार मुझ परमात्मा और जीव का भेद है। बिम्ब और प्रतिबिम्ब का यह भेद पूर्णतया सोपाधिक है, निरुपाधिक नहीं।

 

प्रतिबिम्ब-सखे ! किस तरह? तू और है और मैं और हूँ।

 

बिम्ब कहता है-प्यारे प्रतिबिम्ब देख तू मुझसे अलग नहीं है। मैं ही तू है और तू ही मैं हूँ। सामने से शीशा हटा लेने पर यदि तू दिखाई दे तब तू भिन्न है और मैं भिन्न हूँ। मेरा और तेरा भेद शीशाकृत भेद है। यह सोपाधिक भेद है, निरुपाधिक भेद नहीं। देखो, समझो अब दो हो गए , बिम्ब और प्रतिबिम्ब, हटा लो शीशे को-तो प्रतिबिम्ब रहा और समझो तो बिम्ब भी रहा। यदि प्रतिबिम्ब नहीं तो बिम्ब भी रहा। अरे यार ! जब पुत्र होगा तभी तो पिता होगा, पुत्र बिना पिता कैसे? उसको पिता कौन कहेगा? पुत्र नहीं तो पिता कहाँ? बेटा से बाप या बाप से बेटा? सब हमारे तरफ हो गए। मौज में मौज मिला रहे हैं। भैया ! पुत्र होगा तब तो पिता कहने वाला होगा, तो पुत्र के भाव में पिता का भाव है और पुत्र के अभाव में पिता का अभाव है। अब जो शेष रह गया वह पिता है, पुत्र है। देखो यह बालक बैठा है आपके सामने, अभी तक इसका नाम पिता नहीं है। हाँ, इसी में पिता और पुत्र का भाव निहित है, क्योंकि आगे यही तो पिता होगा। पिता, पुत्र दोनों नामका आश्रय यह बालक है। यदि पुत्र रहा, तो पिता भी रहा। अब रह गया सिर्फ भास, जो बिम्ब और प्रतिबिम्ब दोनों का आधार है। इसी तरह जाग्रत और स्वप्न जिस समय मुझ आत्मा के समक्ष, मन रूपी शीशा गया, बस, जीव रूप प्रतिबिम्ब भासने लगा-इस तरह समझो कि जीव रूपी प्रतिबिम्ब और ईश्वर रूपी बिम्ब दोनों पैदा हो जाते हैं। जाग्रत अवस्था में मुझ आत्मा का जो प्रतिबिम्ब उसे जीव कहते हैं और जीव प्रतिबिम्ब की अपेक्षा से मुझ आत्मा का ही नाम बिम्ब ईश्वर हो जाता है। इसी तरह स्वप्नावस्था में भी आत्मा में मन रूपी शीशे उपाधि के कारण जीव और ईश्वर ये दोनों विकल्प भासते हैं। परन्तु, सुषुप्ति अवस्था में मन रूपी शीशा नहीं रहता, मन अज्ञान में लीन रहता है तो दोनों की कल्पना नहीं होती। दोनों विकल्पों का सुषुप्ति अवस्था में अभाव हो जाता है, परन्तु 'मैं' आत्मा रहता हूँ। उस अवस्था में यदि 'मैं' आत्मा रहूँ तो सुषुप्ति के आनंद का अनुभव कौन करेगा? इस तरह से जिस आधार पर ईश्वर और जीव की कल्पना होती है, वह आधार मन सुषुप्ति अवस्था में नहीं रहता। जो जाग्रत में वही 'मैं' स्वप्न में और जो 'मैं' जाग्रत और स्वप्न में वही 'मैं' सुषुप्ति गाढ़ी नींद में। जीव और ईश्वर दोनों का अधिष्ठान 'मैं' ही हुआ बिल्कुल स्पष्ट है। जी हाँ-

 

निरुपम नित्य निरंशकेऽप्यखण्डे मयिचिति सर्व विकल्पादि शून्ये

घटयति जगदीश जीव भेदं त्वघटित घटना पटीयसी माया 11।।

 

विद्वजनों ! सुनो-मैं आत्मा नित्य सच्चिदानंद निरुपम (उपमारहित) हूँ। 'मैं' आत्मा की मिशाल नहीं। समस्त विकल्पों से रहित, परन्तु वाह री माया, जो मुझ निरुपम, नित्य, निरंश आत्मा में जीव और ईश्वर दो की कल्पना कर लेती है। जो चीज घटने वाली वह घटा कर बता देती है।

 

निरुपम नित्य निरंशकेऽप्यखण्डे मयिचिति सर्व विकल्पादि शून्ये

घटयति जगदीश जीव भेदं त्वघटित घटना पटीयसी माया ।।1।।

 

जो सुनने में आये उसे प्रत्यक्ष करके दिखा देना माया का ही काम है।

 

श्रुति शत निगमान्त शोधकानप्यहह धनादि निदर्शनेन सद्यः

कलुषयति चतुष्पदाद्यभिन्नान् त्वघटित घटना पटीयसी माया ।।2।।

 

श्रुतिशत निगमान्त शोधकाप्यहह धनादि निदर्शनेन सद्यः अहह ! बड़े ही दुःख एवं आश्चर्य का विषय है कि बड़े-बड़े प्रज्ञावान विद्वान जो वेदों एवं वेदों के 'तत्वमसि' इत्यादि महावाक्यों का संशोधन करते हैं, वे भी धन के लोभ में ऐसे फँसते हैं कि कलुषयति चतुष्पदाद्यभिन्न त्वघटित घटना पटीयसी माया- चार पैर के पशु में और ऐसे विद्वान में कोई भेद नहीं रहता। विद्वानों पर ठगनी माया हुँमक-हुँमक कर चलती है, उन्हें बरबाद कर देती है। निगमों की व्याख्या करेंगे-कहेंगे कि संसार असार है। प्रदर्शन तो ऐसा करेंगे कि संसार मिथ्या है, नाशवान है, बन्ध्यापुत्र है, रज्जौसर्पवत् है और आसक्ति है वित्त में। कलंकित पदार्थों में मन पिरोये रहते हैं, दूषित पदार्थों में पड़ते हैं। वाह री माया, अघटित को घटित करके बता देती है। ऐसी माया ठगनी है कि विद्वानों के और चार पैर के पशु में कोई अंतर नहीं रखती। पशुवत् वृत्ति उनकी हो जाती है। अघटित घटना पटीयसी माया- घटने वाली बात को घटा कर बता देती है माया।

 

सुखचिदखण्ड विबोधमद्वितीयं वियनलादि विनिर्मिते नियोज्य

भ्रमयति भवसागरे नितान्तं त्वघटित घटना पटीयसी माया ।।३।।

 

मुझ अव्यक्त ब्रह्म में विकृत संसार की भावना कर देती है। पंच महाभूतों की कल्पना कर देती है। पंच महाभूत ही नहीं वरन तन्मात्रायें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों शरीर, चतुष्टय अन्तःकरण मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, पंच प्राण-प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान, पंच कर्मेन्द्रिय, पंच ज्ञानेन्द्रिय आदि की कल्पना कर देती हैं। यद्यपि ये मुझमें किसी काल में भी नहीं हैं, तब भी वाह री ठगनी माया ! इनकी कल्पना तू मुझ आत्मा पर कर देती है। ये मुझमें वस्तुतः नहीं है, परन्तु कालादि की भावना माया पैदा कर देती है। मुझ आत्मा में नानात्व आदि का विकल्प कर देती है। जिसके चक्कर में पड़कर जीव अनादिकाल से भ्रमित है।

 

अपगत गुण वर्ण जाति भेदे सुख चित विप्र विडाद्यहंकृतिंच

स्फुटयति सुत दार गेह मोहं त्वघटित घटना पटीयसी माया ।।4।।

 

मुझ आत्मा में वर्ण और आश्रम आदि का भेद पैदा कर देती है कि मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हूँ-मैं ब्रह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थी, संन्यासी हूँ, मैं स्त्री हूँ, मैं पुरुष हूँ आदि। आत्मा सर्व उपाधियों से रहित है, परन्तु यह सब होते हुए भी यह माया मुझ विशुद्ध निरञ्जन, अवांगमनसगोचर आत्मा में वर्णाश्रम आदि का मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थी, संन्यासी हूँ आदि की कल्पना कर देती है। ढूँढो तो उसका कहीं भी पता नहीं चलेगा।

 

विधि हरिहर भेदमप्य खंडेवतविरचरय बुधानपि प्रकामम्

भ्रमयति हरिहर विभेद भावान् त्वघटित घटना पटयसी माया ।।6।।

 

आश्चर्य है कि बड़े-बड़े विद्वानों के भी हृदय में एक अद्वितीय अखण्ड ब्रह्म में जो माया हरि, हर दो का भेद कर देती है। इसलिए जो बात नहीं घटने वाली वह भी घटा कर बता देती है।

 

जिस समय भगवान श्रीराम समुद्र तट पर रामेश्वर विजय लिंग की स्थापना लंका जाने के पेश्तर किए तो श्रीराम ने विजय लिंग का नामकरण किया-श्री रामेश्वर। अब वहाँ पर इस नाम के भाव में चख-चख पैदा हो गया कि वास्तव में श्री रामेश्वर का क्या भाव हो? इसका क्या अर्थ हो, इस विषय में चर्चा हुई।

 

रामस्तत्पुरुषं वेत्ति बहुब्रीहं शंकरः

रामेश्वरः पदे प्राप्ते कपयः कर्मधारयः

यो हरिः सः शिवः साक्षात् यः शिवः सः स्वयं हरिः

द्वयोर्भेदं यो जानाति याति नरकं प्रति ।।

 

रामस्य ईश्वरः-रामेश्वरः षष्ठी तत्पुरुष समास। श्रीराम के जो ईश्वर है रामेश्वर। इसलिए श्रीराम ने यही अर्थ किया कि जो राम के ईश्वर हैं इसलिय रामेश्वर। तो श्री शंकर भगवान ने यह अर्थ नहीं माना। रामः ईश्वरो यस्य सः रामेश्वरः-बहुब्रीहि समास-श्रीराम है ईश्वर जिसके वह रामेश्वर। तब कि किसको स्वामी कहें और किसको सेवक। वानरी सेना नल, नील, जामवन्न हनुमान, सुग्रीव, अंगद इत्यादि ने कर्मधारय समास माना। इसी अर्थ को स्वीका किया रामश्चासौ ईश्वरः, रामेश्वरः- राम ही जो ईश्वर और ईश्वर ही जो राम अर्थात् जो राम है, वही शिव है और जो शिव है, वही राम है। तो श्री हरिहा में जो भेद मानता है उसके लिए ठगनी माया ही कारण है। यह सब ठगनी माया का ही खेल है। सत्य नहीं है। तो फिर देखो-कभी-कभी लोग हमसे पूछ बैठने हैं कि स्वामी जी ! श्री शंकर जी की उपासना कैसे और श्री विष्णु की कैसे करें? अरे ! जब इनमें भेद ही नहीं तो उपासना में क्या भेद है। इसलिए कोई हमसे पूछता है तो हम यह सलाह देते हैं कि यदि तुम शंकर के उपासक हो तो श्री शंकर जी का अभिषेक इस मंत्र से करो-

 

शान्ताकारं भुजगनशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम

लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णुं भयभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ।।

 

इस मंत्र से श्री भगवान शंकर का अभिषेक स्नान कराएँ और खूब डटकर तुलसी पत्र चढ़ायें और जब भी श्री विष्णु की आराधना करें तो इस मंत्र से करें।

 

ॐनमो शम्भवाय मयोभवनाय नमः शंकराय

महेश्वराय नमः शिवाय शिवतराय

 

(यजुर्वेद 16-41)

 

और खूब बेल पत्र चढ़ायें। जब तक तुम्हारी यह दृष्टि नहीं होती, तुम्हारा कभी भी कल्याण नहीं होगा। जब तक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थी, संन्यासी आदि वर्णाश्रम का अभिमान रहेगा, तब तक भगवान की प्राप्ति होना दूर है। अरे! भगवान में भी भेद। इन भेदवादियों ने भगवान को भी अछूता नहीं छोड़ा। वर्ण, वर्ण में भेद, आश्रम, आश्रम में भेद, जाति, जाति में भेद। ठीक है भैया-मौज करो। हाँ और चलो थोड़ा बतायें। श्री रामचरित मानस के उत्तर कांड में चलें-

 

परवस जीव स्ववस भगवन्ता। जीव अनेक एक श्रीकंता ।।

 

तो इसका अर्थ क्या होगा? अरे ! वही, जो तुम करोगे। परबस जीव-वैसे तो अमूमन अर्थ है कि जीव जो है वह परवश है और भगवान स्ववश है, जीव अनेक हैं और भगवान एक है। यदि ऐसा अर्थ लगायें तो बिगड़ जायेगा? जब तक परवश है तब तक वह जीव है और इसमें जिसको शंका हो हमारे पास आयें। अपने आप 'मैं' आत्मा को जब जीव मानता है तब परवश है और अपने आप 'मैं' आत्मा को जब भगवान जानता है तब स्ववश है। जो अपने आप को स्ववश जानता है वह ईश्वर है ही, मानने का सवाल ही नहीं। ध्यान रखो-यहाँ पर जानना कहा गया है। परवश मानना ही तो जीवभाव है और अपने आपको जो स्ववश जाना वही भगवान। बस, यही सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। अब इसकी अपील ही नहीं हो सकती। यहाँ पर जीव और ईश्वर का भेद बताते हैं और फिर रामायणकार आपको आगाह करते हैं कि भैया! इस भेद को असली रूप में समझ बैठना, यह मुधा भेद है।

 

मुधा भेद यद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाय कोटि उपाया ।।

 

यहाँ पर जो भेद बताया गया है, जीवात्मा और परमात्मा में यह मिथ्या है, मायाकृत है, सत्य भेद नहीं है। अरे! यह भेद मुधा है, सोपाधिक है, निरुपाधिक नहीं। मतलब, देखो, सामने पेण्डाल के दोनों तरफ दीवाल है तो एक दीवाल से दूसरे दीवाल तक एक ही स्थान है, परन्तु जब एक रस्सी इनके बीच में बांध दी जाती है तो फिर इस पार और उस पार की कल्पना स्वयं हो जाती है। इस पार और उस पार दो नाम हो जाएगा और जब रस्सी निकाल दो तो इस पार और उस पार। भेद का पता ही नहीं रहेगा। स्वयंपाकी लोग जो होते हैं जानते हो- चूल्हे के पास एक लकीर खींच देते हैं। तब इस पार चौका हो जाता है। अब देखना, भला कोई लकीर के भीतर जाए। कोई कुछ चीज देने आएगा तो बिगड़कर कहेंगे, उधर, उधर ही रहो हो ! जमीन एक ही है, परन्तु वाह रे मनीराम, कहते हैं वहीं पर रख दो- भैया ! उधर ही रखना। जबकि उस जमीन पर स्वयं पाकीजी बैठे हैं और उसी जमीन पर वह चीज है और चीज लाने वाला भी उसी एक ही जमीन पर खड़ा है। तो रेखा से ही तो भेद पड़ा इस पार और उस पार का, परन्तु सब पढ़कर भी पृथ्वी का ज्ञान नहीं हुआ। जमीन का ज्ञान नहीं है, तभी यह भेद है। इस पार और उस पार की कल्पना होती है जबकि जमीन जगह एक ही है। तो जीव भाव और ब्रह्मभाव, जीव और ईश्वा इनका आधार 'मैं' आत्मा ही हूँ।

 

एकात्मके परे तत्वे भेदवार्ता कथं भवेत्

सुषुप्तौ सुखमात्रायां भेदः केनावलोकितः ।।

 

यदि जीवात्मा और परमात्मा में भेद है तो सुषुप्ति अवस्था (गाढ़ी-नींद) में जीव और ईश्वर का भेद विद्यमान होना चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं होता। सुबह उठने से ही भेद की प्रतीति होती है। तो फिर सुषुप्ति में जीव और ईश्वर का भेद कहाँ चला जाता है?

 

नुक्ते के हेरफेर से खुद से जुदा हुआ

नुक्ता जो देखा गौर से तो खुद ही खुदा हुआ ।।

 

उर्दू भाषा में जीम से लिखा जाता है जुदा और उस नुक्ते को उठाकर उसके सिर पर रख दो तो वह हो जाता है खे-खुदा बन जाता है। अरे यार! सिर्फ बिन्दी ही तो हटाना है-क्या कुछ करना है?

 

नुक्ते के हेरफेर से खुद से जुदा हुआ

नुक्ता जो देखा गौर से तो खुद ही खुदा हुआ ।।

 

जी हाँ, लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह कहा करते थे कि एक नुक्ता ने किया खुदा से मुझको जुदा। खुदा को कहते हैं वाहिद। वाजिद में जो नुक्ता है उसे हटा दो तो वह शब्द वाहिद बन जाता है।

 

आत्मजिज्ञासुओं ! अरे, इस पर कभी गौर किया है? चलो अब दृष्टांत द्वारा बताएँ। पंचदशीकार स्वामी विद्यारण्य जी दसवें पुरुष का दृष्टांत देते हैं। किसी स्थान से दस आदमी अपने देश को लौट रहे थे। उनका स्थान नदी के उस पार था। नदी बड़ी थी। नदी पार होकर उन्हें जाना था। जब नदी के पास दसों पहुँचे तो वहाँ पर नदी के पार जाने के लिये नाव, डोंगा, किश्ती कुछ नहीं था। नदी का पाट चौड़ा था। नदी गहरी थी, पानी भी ज्यादा था। क्या करें, नदी में सभी कूद पड़े और तैरते हुए सभी सही सलामत पार गए। दसों तैरकर उस पार नदी के किनारे खड़े हो गए। उन दसों में एक लालबुझक्कड़ था। जिसको अक्ल की बदहजमी थी। किसी-किसी को अक्ल की बदहजमी रहती है। तो वह यह सोचने लगा कि चलो पहिले ठीक तरह से देख लें कि हम दसों पार हो गए या कोई बह तो नहीं गया। लगा गिनती करने, एक-एक करके सिर पर हाथ रखकर 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 तक गिन गया और अपने को गिनना भूल गया। तो नौ ही रहे। इसी तरह दो-चार बार गिनती करने पर भी नौ ही शेष रहते थे तो वह दसवें का पता नहीं लगा पाया। नौ तक ही गिन पाता था। दूसरे साथियों ने पूछा कि क्या बार-बार गिन रहे हो क्या तुम्हें कोई शंका है? वह अक्ल की बदहजमी वाला घुड़ककर कहता है-क्या शंका? अरे ! देखते क्या हो दसवें का तो पता ही नहीं है-शायद दसवाँ डूब गया। क्या दसवाँ डूब गया। अब सब परेशान, दूसरा उठकर गिनने लगा। वह भी सब के सिर पर हाथ रखकर 1, 2, 3, नौ तक गिना और अपने को भूल गया। दसवाँ गायब, उसने भी दसवें को नहीं पाया। फिर क्या-सभी नौ आदमी एक-दूसरे के सिर पर हाथ रख गिने और नौ तक ही गिनते रहे। कारण सभी अपने को गिनने में भूल करते रहे। तो सचमुच में दसवाँ डूब गया। अब यह सभी को निश्चय हो गया कि दसवाँ सचमुच में डूब गया। यद्यपि दसों वहाँ हैं, परन्तु इस तरह अलग-अलग भूलते जाते अर्थात् दसों ही बह गए। यद्यपि सभी मूसरचंद वही हैं। फिर क्या, कोलाहल मच गया हाय रे दसवाँ, हाय रे दसवाँ, कभी पत्ते की आड़ में कभी नदी में खोजें, कहीं दसवाँ नदी में अटका हो तो मिले। खोजने वालों को उनका दसवाँ मिला, क्योंकि खोजने वालों से अगर दसवाँ भिन्न हो तो मिले। कुछ गुमा हो तो मिले। वे लोग छाती पीट-पीटकर रोने लगे। हाय रे मेरा दसवाँ कह करके। हाँ भाई, कोई किराये से रोने वाला मिले तब तो, वे ही लोग रोने लगे। उसी समय उधर के एक बूढ़ा, मुसाफिर निकला। इस तरह से उन लोगों को रोते-पीटते देख, वह पूछने लगा-भाइयों! क्यों रोते हो? क्या बात है? तो वे कहने लगे कि हम लोग दस थे, दसों नदी पार किये, परन्तु हम नौ ही बाहर आये, हमारा दसवाँ नहीं निकला, संभव है वह नदी में बह गया। हम लोग अपने दसवें के लिए रो रहे हैं। बूढ़ा मुसाफिर अक्लमंद था। वह मन में धीरे से सभी को गिन लिया और देखता है कि दस के दस मूसरचंद सभी मौजूद हैं। बेवकूफी के कारण दसवाँ-दसवाँ चिल्ला रहे हैं। वह मन ही मन गिनती लगा लिया और कहता है कि भाई! एक बार मैं भी गिनती लगाऊँ तब मालूम हो। तो वे कहते हैं कि हम अभी तक गिनती ही तो लगाए हैं तो बूढ़ा मुसाफिर कहता है कि ठीक है, तुम लोग मेरे सामने गिनती लगाओ। बूढ़े के कहने से वे गिनती जैसे पहिले लगाये थे 1, 2, 3, 4....9 की गिनती लगाए और फिर अपने को भूलकर दसवें के लिए हाथ मसलने लगे। इस तरह दसों ने गिनती लगाई और हर एक अपने को गिनना भूलते रहे। बूढ़ा समझ गया कि सभी की बुद्धि खराब है। सभी का दिमाग फेल है। तो वह कहता है कि तुम लोगों का दसवाँ तुम्हीं लोगों में है। तो वे कहने लगे कि फिर वह मिलता क्यों नहीं? अज्ञानियों की विकट खोपड़ी होती है। वह बुड्ढा कहता है कि देखो-क्या तुम दसवाँ देखना चाहते हो? मेरे पास आओ। एक-एक का कान पकड़कर, हाथ पकड़कर हाँ भाई! हाथ पकड़ना चाहिए, अरे! जो रिसीव्ह करता है हाथ मिलाता है न। देखो-एक मिनट में मैं दसवें का पता लगाता हूँ। फिर सबके सिर में हाथ रखकर 1, 2, 3... करते-करते दसवें के गाल पर तमाचा लगाया कि जिस दसवें को ढूँढ़ रहा है वह दसवाँ तू। मिला तुम्हारा दसवाँ? इसी तरह सबको पकड़-पकड़कर दसवाँ दिखा दिया। दसों को तमाचे पड़े। जब तक दसवाँ नहीं मिला था तब तक दसवें के लिए रो रहे थे और दसवाँ वे ही सब थे। दसवाँ जितना दूर था उतना ही नजदीक, इसकी भी कोई सीमा नहीं।

 

अनादिकाल से नाना प्रकार के साधनों से दुनियाँ भटक रही है। किसी की बात मानता नहीं। किसी की शिक्षा मानने को तैयार नहीं, परेशान है। जब कोई संत महात्मा महान पुरुष 'तत्वमसि' महावाक्य द्वारा (जैसा ऊपर दसवाँ दिखाया गया) स्वयं में स्वयं को परमात्मा लखा देते हैं। सभी परमात्मा को ढूँढ रहे हैं। परन्तु कभी भी विचार किया कि मैं कौन हूँ? कभी भी सोचा-विचारा कि लगे परमात्मा को ढूँढने के लिये। परमात्मा के पीछे डंडा लिए घूम रहे हैं। पहिले समझो कि मैं कौन हूँ? मैं कहाँ हूँ? मैं क्या हूँ। कभी भी अपने को समझने की कोशिश नहीं की। अब इसी की शान में एक गजल सुनाता हूँ-

 

हूँ जज्बे जलवागर सबमें इकसां, दीवाना होकर जो हमने देखा

 

जज्बे-ठसाठस, जलवागकर-प्रकाशक

गई जहन्नुम में सारी दुनियाँ बेताब होकर जो हमने देखा ।।1।।

 

वाह जी वाह-जहन्नुम में-गर्त में-भाड़ में।

 

मैं हूँ सभी का हूँ सबसे आला, तकरीर मेरी इस जहाँ में

बताने वाले खामोश बैठे, नाचीज होकर जो हमने देखा ।।2।।

 

आत्मा होने के नाते 'मैं' किसका नहीं हूँ, किसमें नहीं हूँ, क्या नहीं हूँ, कहाँ नहीं हूँ-अरे ! लकड़ी, तख्त, खिड़की, किवाड़, कुर्सी, मेज, बेंच इत्यादि किसमें नहीं है, किसकी नहीं है, क्या नहीं। बिल्कुल इसी तरह आत्मा व्याप्त है।

 

मैं हूँ सभी का हूँ सबसे आला, तकरीर मेरी इस जहाँ में

बताने वाला खामोश बैठे, नाचीज होकर जो हमने देखा ।।2।।

 

तकरीर-व्याख्यान

 

'मैं' आत्मा की कोई व्याख्या नहीं, 'मैं' पर कोई व्याख्या नहीं होता। शास्त्र, वेद, पुराण, सब भगवान आत्मा की महिमा गाते हैं। जो आत्मा शास्त्र, वाणी, मन, बुद्धि से परे हैं-तो फिर क्या वाणी 'मैं' आत्मा की व्याख्या करने में समर्थ है। 'मैं' वाणी का विषय नहीं हूँ। मन, बुद्धि का विषय नहीं हूँ। भगवान आत्मा व्यापक है, अमर है, परिपूर्ण है, उसकी व्याख्या वाणी क्या कर सकती है। शास्त्र, वेद, पुराण सब श्री भगवान आत्मा की महिमा की ही व्याख्या कर सकते हैं। जब वे स्वयं परिच्छिन्न है तो वे मुझ आत्मा की क्या व्याख्या कर सकते हैं।

 

मैं हूँ सभी का हूँ सबसे आला, तकरीर मेरी इस जहाँ में

बताने वाले खामोश बैठे, नाचीज होकर जो हमने देखा ।।2।।

 

जगत में देखते ही हैं। शिष्टाचार से जब कोई किसी के पास जाता है तो उसको पूछता है-कहिये, आपका दौलतखाना कहाँ है? तो वह कहता है-मेरा गरीबखाना लखनऊ में है, इलाहाबाद में है। हुजूर के मुकाबिले में नाचीज हूँ। तो नाचीज किसको कहते हैं? अपने आपको कुछ भी माना, तब तक वह चीज है। तब तक मैं चीज हूँ जब तक मैं अपने आपको कुछ भी मानता हूँ। जब अपने आपको कुछ नहीं मानता, अपने आप 'मैं' को 'मैं' ही जानता हूँ तब वह नाचीज हो गया। मानापमान से परे हो गया। तो तू भी नाचीज हो जा। 'मैं' आत्मा की कौन व्याख्या करेगा-आत्मा की व्याख्या नहीं हो सकती। जब कुछ कहा नहीं जा सकता तो आत्मज्ञानी संत महात्मा क्या कहें, आत्मा के लिए सब खामोश बैठे हैं। इसका रियलाइजेशन (दर्शन) कब हो? जब वह कुछ भी मानना मिटा चुका-नाचीज होकर हमने देखा-बताने वाले खामोश बैठे हैं।

 

मैं हूँ सभी का हूँ सबसे आला, तकरीर मेरी इस जहाँ में

बताने वाले खामोश बैठे, नाचीज होकर जो हमने देखा ।।2।।

 

हूँ जज्बे जलवा... वाह जी वाह-

जो कुछ भी माना खुद को ही माना मैंने ही माना ये भूल-भूलैया ।।

यह खेल कैसा पर्दानशीं का परदा उठाकर जो हमने देखा 13।।

 

और है कौन सिवाय मुझ आत्मा के- यह खेल कैसा पर्दानशीं का परदा उठाकर जो हमने देखा-वाह जी वाह- परदा के अंदर रहने वाला-क्या खूब, परदा उठाकर जो हमने देखा-विकल्प, मान्यता यह सब माया का परदा है। 'मैं' आत्मा इसके अंदर रहने वाला परदानशीं हूँ-भाई ! परदा उठाना पड़ेगा। आत्मा का दर्शन करना है तो मान्यता जगत से ऊपर उठो। विकल्प छोड़ दो-परदा फाड़दो-मान्यता परदा हैं तो उसे उठाकर फेंक दो-विकल्पों को छोड़कर परदानशीं का दर्शन हो सकता है। परदा उठाने से ही मालूम पड़ा। विकल्प का नाश हुआ-

 

हूँ जज्बे जलवागर सबमें इकसाँ, दीवाना होकर जो हमने देखा

 

अरे !

 

भटकती दुनियाँ दहरोहरम में दिले दफीना हुआ हासिल

 

अनादिकाल से जंगल, पहाड़, नदी, गुफा सब जगह ढूँढ रहे हैं। मुद्दत बीत गई, दिन पर दिन निकल गया भटकते-भटकते-हाँ भाई सभी भटक रहे हैं, परन्तु दिल के अंदर ही जो खजाना गड़ा है-दिल दफीना मन के अंदर गड़ा हुआ खजाना ('मैं' आत्मा) मिला। अनादिकाल से दुनियां परेशान है- भटकती है।

 

भटकती दुनियाँ दहरोहरम में दिले दफीना हुआ हासिल

 दिले दफीना तलाशगर खुद, नजर उठाकर जो हमने देखा ।।4।।

 

समझना जरा-दिले दफीना- 'मैं' आत्मा को तलाश करने वाला स्वयं (खुद) ही है दिले दफीना है। कैसे मिले? दुनियाँ भटक रही है, खोज रही हैं- हूँ जज्बे जलवागर सबमें इकसाँ, दीवाना होकर जो हमने देखा गई जहन्नुम में सारी दुनियां, बेताब होकर जो हमने देखा ।।

 

और क्या-

 

मेरी हुकूमत से शम्स रोशन, कमर सितारे हैं जगमगाते

 

मुझ आत्मा की हुकूमत (आज्ञा सूत्र) में सूर्य, चन्द्र, सितारे आकाश में नाच रहे हैं। इन सबका शासक कौन है?

 

आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो वेद यस्यादित्यः

शरीरं आदित्यमन्तरो यमयत्येष आत्मान्तर्याम्यमृतः ।।

 

(वृहदा 3/7/9)

 

जो आदित्य (सूर्य) के अंदर व्याप्त है। जिसको आदित्य नहीं जानता, जो आदित्य को जानता है, आदित्य ही जिसका शरीर है, आदित्य पर जो शासन करता है, जो आदित्य का नियमन करता है, वह अविनाशी अन्तर्यामी अमृत आत्मा तू है।

 

क्या मजाल है कि सूर्य, चन्द्र की गति में एक मिनट भर का भी फर्क हो जाए, घड़ी लेट हो जाए, परन्तु सूर्य की घड़ी लेट नहीं होती। जिस दिन जिस समय उसे उदय होना है, बिल्कुल ठीक टाइम पर वह उदय होता है। उसी नियम से कार्य होगा-बिल्कुल इधर-उधर नहीं, कभी सोचा कि किसकी आज्ञा से सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, तारागण कार्य कर रहे हैं? किसका शासन है?

 

मेरी हुकूमत से शम्स रोशन, कमर सितारे हैं, जगमगाते

सच में मुबारक बेमुल्कशाही, कुर्बान होकर जो हमने देखा ।।5।।

 

तो भैया ! कुरबानी है यहाँ बिना सिर के हो जाना, यही करना चाहिए। अभी, यहीं अनुभव करो, जितने यहाँ बैठे हो-जब तक तुम आत्म तत्व 'मैं' को नहीं समझे हो-जब तक तुम अपने से अलग मानते हो, तभी तक कुदरत तुम्हारा नियमन करती है, तुम्हारे ऊपर शासन करती है। प्रकृति तुम्हारा शासक है। हाँ-प्यारे ! मान्यता जगत से परे होकर आओ। अपने 'मैं' को जानो तब फिर 'मैं' ही शुद्ध तत्व रह जाएगा। रह गया शुद्ध तत्व भगवान आत्मा-बन्दर को जैसे बाजीगर नचाता है उसी प्रकार आत्म तत्व को बिना जाने प्रकृति तुम्हें नचाती है। उसके ऊपर शासन करती है। मान्यता जगत के बाहर जिस दिन प्रकाश में जाओगे तो तुम्हीं शासक हो, फिर क्या कमी है। तुम हो जाओगे शासक ! मुबारक है-मुबारक है-धन्यवाद। अरे! जिसके पास एक अंगूठा रखने भर की भी जमीन कहने के लिए नहीं है, अंगूठा टेकने की जगह नहीं है, वह बिना ताज के बादशाह बना है।

 

सच में मुबारक बेमुल्कशाही, कुर्बान होकर जो हमने देखा ।।5।।

हूँ जज्बे जलवागर सबमें इकसाँ, दीवाना होकर जो हमने देखा

हमेशा लहराता 'मुक्त' दरिया, हुआ है. गर. काब सारा आलम

पता नहीं मैं था कौन क्या हूँ, मस्ताना होकर, जो हमने देखा ।। 6 ।।

 

कब देखा? मस्ताना होकर-जब हमने देखा।

 

मस्ताना डोलत फिरै, ज्यों सरकारी साँड़

डर काहू की है नहीं, खसम बिना जस राँड़ ।।1

 

गाँवों में देखे होंगे, एक सरकारी और एक लोकल दो प्रकार के साँड़ होते हैं। लोकल साँड़ को कभी-कभी लोग हल में जोत लेते हैं, कांजी हौस में भी दे देते हैं और भैया ! जिसमें सरकारी मोहर लगी होती है, वह क्या कहीं जाए, कहीं खाये, कहीं सोये, कहीं रहे कौन टोकने वाला है। मस्ताना वही है जिसने अपने व्यक्तित्व का, मानापमान का त्याग कर दिया है। जिसे अपने आप का भान भी नहीं है। जब तक अपने आपको कुछ कुछ मानता है तब तक वह मस्ताना नहीं है। आत्म तत्व को जानने के लिये कुरबानी तो करना ही होता है। अपने व्यक्तित्व को गला देना होता है। चाहे जागे, चाहे सोवे, कोई क्या कहने वाला है।

 

खसम बिना जस राँड़, चाहे जागे चाहे सोवे

 मन माना जग मुवा, भला अब किसको रोवे ।। 2 ।।

कहता 'मुक्ता' सत्य, मान बिनु जिसने जाना

हुआ निरंकुश पुरुष दीवाना मस्ताना ।। ।।

 

बिना अपने आपको कुछ माने हुए जो आत्म तत्व को जानता है।

 

भया निरंकुश पुरुष दीवाना मस्ताना ।।

 

चलो, अब युक्ति जगत में भ्रमण करें। अभी तक शास्त्रोक्त प्रमाणों से सिद्ध किया गया और अब जरा युक्ति जगत में घूमें। देखो-शिव शिव सुनो- पहले जीववादियों का तर्क सुनो-

 

जीव अल्पज्ञ है, ईश्वर सर्वज्ञ है

 

जीव अल्पशक्तिमान है, ईश्वर सर्व शक्तिमान है।

 

जीव छोटा है, ईश्वर बड़ा है।

 

जीव मृत्यु वाला है, ईश्वर अमर है।

 

जीव परिच्छिन्न है, ईश्वर व्यापक है।

 

जीव एक देशीय है, ईश्वर सर्वदेशीय है ।।

 

बिल्कुल ठीक-सोलह आने ठीक-परन्तु भैया ! (एक-एक फूल अलग- अलग हाथों में रखकर पू. श्री स्वामीजी समजा रहे हैं।)

 

जीव अल्पज्ञ, ईश्वर सर्वज्ञ

 

जीव अनेक, ईश्वर एक

 

जीव परिच्छिन्न, ईश्वर व्यापक ।।

 

तो इन दोनों को तौलने वाला, इन सबका परिज्ञाता फिर तीसरा कौन है, जो ईश्वर और जीव का वजन कर रहा है? तब तो दिखता है कि तौलने वाले को तौलना आता ही नहीं। अरे भाई! अपने को भी तराजू में रखकर तौलता है क्या? जीव और ईश्वर-बुद्धि रूपी तराजू के पलवे पर तुल रहे हैं। यदि मानों कि जीव तौल रहा है तो ईश्वर को जीव कैसे तौलेगा। एक आकाश का और एक जमीन का रहने वाला है, तो फिर तीसरा कौन है जो तौल रहा है? 'मैं' आत्मा तीसरा तौलने वाला 'मैं' आत्मा ही हूँ। मुझमें ही ईश्वर और जीव दोनों कल्पित हैं। तो फिर यह जानता कौन है? इसका साक्षी कौन है? जीव अल्पज्ञ हैं और ईश्वर सर्वज्ञ है-इसका परिज्ञाता कौन है? 'मैं' आत्मा।

 

दूसरी युक्ति- एक जीव और दूसरा ईश्वर और तीसरा जीव और ईश्वर का भेद-बिल्कुल ठीक-भला बताओ-भेद का आधार कौन है? इस भेद को, इस तर्क को समझना है, यह लॉजिक है। यह भेद यदि ईश्वर में हो तो ईश्वर भेद रूप हो जाएगा। तो ईश्वर भेद रूप है कि अभेद रूप है? इस तर्क से ईश्वर। भेद रूप हुआ। तो बाबूजी ! भेद एक में होता है या दो में? ईश्वर एक है या दो? भेद का अस्तित्व ही दो में है और यदि ईश्वर भी दो होकर रहेगा तो यह अविनाशी नहीं। अर्थात् यदि ईश्वर भेद रूप है तो वह ईश्वर नहीं और ईश्वर यदि अभेद रूप है तो जीव और ईश्वर में भेद नहीं। ईश्वर से जीव का क्या, एक तृण का भी भेद नहीं है। यह ब्रह्मास्त्र है। इन्द्र का वज्र भले ही कुण्ठित हो जाय, परन्तु यह सिद्धांत कुण्ठित नहीं हो सकता। सब कुछ भगवान है-जीव भी भगवान है, जर्रा-जर्रा भगवान है। भगवान भेद रहित है अब कहाँ का द्वैत, विशिष्टाद्वैत-भेतवार्ता कथं भवेत्। सुनो, अब विचार करो-ध्यान दो, यहाँ कोई मजहबी, पंथ-पंथाई, साम्प्रदायिक चीज नहीं है-पंथ वाला नहीं, जो हकीकत है, सच्चाई है, सत्य है वही कही जाती है। सिद्ध करो भेद को-

 

यदि भेद रूप है तो वह ईश्वर नहीं, अभेद रूप है तो कण-कण (ईश्वर) है। सुई के अग्रभाग से भी भगवान अलग नहीं।

 

अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाह विच्क्ष्व भोः

नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ।।

 

(श्रीमद्भागवत 4-28-62)

 

जो मैं हूँ वही तू है। जीवात्मा और परमात्मा में किञ्चिन्मात्र भी भेद नहीं है।

 

तावत् गर्जन्ति शास्त्राणि जम्बुकाः विपिने यथा

गर्जति महाशक्तिर्यावद्वेदान्त केसरी ।।

 

जी हाँ- संसार रूपी जंगल के अनेकों मत मतान्तर रूपी सियार (लोमड़ी) कब तक चिल्लाते हैं जब तक कोई वेदांत रूपी सिंह की दहाड़ नहीं होती। संसार में अनेकानेक मत, पंथ-पंथाई, साम्प्रदायिकता आदि तभी तक पनपती है, भेदवादियों की चाल तभी तक चलती है, जब तक वेदांत सिंह की दहाड़ नहीं होती। तभी तक वे बोलते हैं। वेदांत केसरी, आत्मतत्व भगवान 'मैं' का रूप वेदांत रूपी तालाब में लखा देते हैं कि जानो तुम कौन हो-तुम्हें अपने आपका आत्मतत्व का, अपने 'मैं' का अनुभव करा देते हैं। यदि तुम विद्वान हो तो शास्त्रों का प्रमाण लो-उपनिषदों का, पुराणों का, स्मृतियों का, रामायण, गीता, भागवत आदि ग्रन्थों का प्रमाण लो और यदि तुम पढ़े-लिखे नहीं हो तो युक्तियों का प्रमाण लो और यदि तुम श्रद्धालु हो तो संत वाक्यों का प्रमाण लो, आप्त वाक्यों का प्रमाण लो। शरीर से भिन्न होकर, अपने आपको साढ़े तीन हाथ का मानकर जब देखोगे तो फिर 'मैं' ही हूँ दिखेगा। हाँ, इस शरीर के अंदर जरूर हूँ, परन्तु शरीर दृष्टि छोड़कर समझना तभी आत्म तत्त्व का 'मैं' का अनुभव कर सकोगे। अनादिकाल से संसृति दोष से ग्रसित हो अपने आपको शरीर माने बैठे हो, इसी से यह असाध्य रोग हो गया है। इस अज्ञान को दूर करना ही होगा और फिर तो तुम स्वयं ज्ञान स्वरूप हो ही। वेद से लेकर हनुमान चालीसा तक सभी इसी तत्व का प्रतिपादन करते हैं। हाँ वेद बड़ा और हनुमान चालीसा छोटी पुस्तक है। शरीर के अंदर रहते जो भगवान आत्मा 'मैं' अपना आप, जो जाहिर जहूर है, सब में निरंतर जो 'मैं' हूँ, 'मैं' हूँ की आवाज दे रहा है, इससे जो भिन्न है वह भगवान नहीं है। इस जिले का इस प्रान्त का यह पहला चांस है कि इस तरह अध्यात्म का प्रचार, डंका बज रहा है और यह डंका झंडापुर में ही सीमित नहीं है। झंडापुर तक ही नहीं है, वरन् सारे विश्व में गूंज रहा है। हम कथा प्रारंभ करते समय शांति पाठ के साथ ही घोषित कर देते हैं-अनन्त नाम, रूपों में अभिव्यक्त, अहमत्वेन प्रस्फुरित, महामहिम, स्वात्मस्वरूप सकल चराचर-यह ब्राडकास्ट यहीं के लिये नहीं वरन् सारे विश्व के लिए है ब्रह्मतत्व का प्रतिपादन (आत्म निरूपण) अध्यात्म विद्या है। याद रखो, वह दिन आज से दूर नहीं है, जबकि सारे विश्व में यह अध्यात्म विद्या ओतप्रोत हो जाएगी, कोना-कोना भर जाएगा। कहीं कोई स्थान खाली रहेगा। ध्यान रहे कि यह अध्यात्म विद्या कोई पंथ या मजहबी चीज नहीं है। आजकल का समय प्रेक्टिकल एवं विज्ञान युग है। यह तो सभी को मालूम है कि विज्ञान जगत में कितनी प्रगति हो चुकी है और आगे बढ़ रही है। लोग चंद्रलोक की यात्रा कर चुके, वहाँ के धरती का फोटो लेकर यहाँ आए हैं और आगे वहाँ कोठी बनाकर रहने की तैयारी हो रही है और यहाँ अभी वही पुरानी रागिनी आलापी जा रही है। प्यारे ! प्रगतिशील बनो, अंधेरी ढोते जिंदगी बरबाद हो रही है। आलोक जगत में आओ-कब तक अंधकार में पड़े रहोगे। भेदवादियों के बीच पड़कर मन संकुचित हो चुका है। यह जीव का काम नहीं, यह नारायण का काम है कि जो हम तुम्हें घंटों उपदेश दे रहे हैं। अध्यात्म तत्व का अमृत तुम्हें पिला रहे हैं। यह तो हमारी सरकारी ड्यूटी है। घंटों आप लोगों को सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्व बतला रहे हैं। हम इसलिए शरीर धारण किए हैं। हमें और कोई काम नहीं, बस एकमात्र यही चिंता है कि कितनी जल्दी तुम प्रकाश में आओ-अपने आप 'मैं' को समझ लो।

 

हाँ जी-क्या कोई कुछ पूछता है-स्वामी जी ! कहो भाई-स्वामी जी ! अगर हम जीव को ईश्वर का अंश मान लें तो क्या कोई हर्ज है? अपने आप को ईश्वर का अंश मान लें तो कोई हर्ज नहीं है और श्री गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज भी तो रामायण में यही लिखे हैं-

 

ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखरासी ।।

 

(.कां.)

 

हाँ ठीक है, लिखा तो है भाई-तो फिर क्या चौपाई गलत है? क्या जीव ईश्वर का अंश नहीं है। इस ऊपर की चौपाई से तो साफ दिखता है कि जीव ईश्वर का अंश है। मेरे आत्मन् ! पूरी तरह समझकर अर्थ करो-पूरे पद पर गौर करो-आगे श्री गोस्वामी जी क्या कहते हैं-जीव ईश्वर का अंश है और फिर अविनाशी है-ईश्वर का अंश जीव अविनाशी। जीव का नाश नहीं होता, क्योंकि अविनाशी है-जीव मरता नहीं। तो फिर समझो, जीव अजन्मा होकर नहीं मरता कि जन्म लेकर नहीं मरता? यह तो अटल सिद्धांत है कि जो जन्म लेता है वह अवश्यमेव मरता भी है। जो जन्मेगा वह मरेगा भी। तो फिर इस तरह जरा-सा विचार करते ही जीव का जन्म-मरण टल गया और जो अजन्मा अविनाशी है उसे ही सत्य कहते हैं। वही सत्य होता है और आगे समझो जीव चेतन है कि जड़? नहीं जीव चेतन है। तब तो फिर जीव अविनाशी है और चेतन है-चित है और फिर जीव अमल है, शुद्ध आनंद स्वरूप है। जीव में मल (विकार) नहीं है। सत है, चित है और आनंद स्वरूप है। जीव अमल है। सहज स्वाभाविक है, बनावटी नहीं। जीव सुख राशि है कि दुःख राशि? नहीं सुख राशि है। तो भैया ! हम अपनी तरफ से तो कुछ नहीं जोड़ रहे हैं। श्री गोस्वामी जी जो कहे हैं वही हम भी कह रहे हैं।

 

ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखरासी ।।

 

हमने अपनी तरफ से तो कुछ नहीं मिलाया है। हमारे प्रवचन में तुम यही पावोगे। हम उसी तरह से व्याख्या करेंगे जो भागवत, गीता, रामायण में दर्शाये गये हैं जो बात जैसी है, उसी तरह कहेंगे। यह बात अलग है कि गीत उसी के गाये जाते हैं जिसकी शादी होती है, चाहे दुल्हा काना हो या बहरा-आँख वाले के ही गीत गाते हैं ऐसा नहीं। तो उसी प्रसंग में प्रसंगानुसार शास्त्रों द्वारा अनुमोदित व्याख्या करता हूँ। यहाँ खींचातानी का अर्थ नहीं होता।

 

हाँ, तो विषय पर जाओ-जीव सोपाधिक है कि निरुपाधिक? जीव भाव सोपाधिक है, निरुपाधिक नहीं। अब देखो-जीव जब सत, चित, आनंद स्वरूप है तो ईश्वर अंश क्यों कहा? सुनो भैया ! यह जो अंशाशी भाव है वह सोपाधिक है, निरुपाधिक नहीं। अब जीव को सगुण ईश्वर का अंश कहें या व्यापक ईश्वर का अंश कहें। यदि जीव को सगुण का अंश मानो तो सगुण ईश्वर का अंश जीव साकार होगा, व्यापक नहीं। परिच्छिन्न होगा। साकार का टुकड़ा (जुज) भी साकार ही होगा। विज्ञान भी तो यही सिद्ध करना चाहता है, परन्तु जीव को आज तक कोई देख नहीं सका। जीव नजर नहीं आया। अरे ! यदि सूक्ष्म अंश ही मानो तो भी खुर्दबीन (माइक्रोस्कोप) से देख सकते हैं, परन्तु जीव दिखाई नहीं देता। तो फिर जीव सगुण ईश्वर का अंश नहीं और फिर जीव मानते हो अनेक। जीव अनेक हैं देखो- (पूज्य श्री स्वामी जी एक फूल लेकर एक-एक दल निकालते हैं।) जीव धड़ाधड़ निकल रहे हैं। तो कभी कभी सगुण के अंश का भी अंत हो ही जाएगा, क्योंकि सगुण परिच्छिन्न होता है, सीमित होता है। इसलिए भी जीव सगुण ईश्वर का अंश नहीं सिद्ध होता। चलो-व्यापक ब्रह्म का खंड माने तो व्यापक निराकार में अंश भाव नहीं होता। तो फिर श्री गोस्वामी जी ने जीव को अंश कैसे लिखा? तो सुनो बात-

 

आत्मा ह्याकाशवज्जीवैर्घटाकाशैरिवोदितः

घटादिवच्च संघातैर्जातावेतन्निदर्शनम् ।।

 

(माण्डू.गौ.का.अद्वै.प्र. 3)

 

देखो, थोड़ी देर के लिए मान लो यह (एक गिलास को दिखाकर कह रहे हैं।) एक घड़ा है। इसके अंदर का जो पोल है उसको कहते हैं घटाकाश। यदि दस घड़े हों तो दसों घड़ों में दस घटाकाश दिखाई देगा। आकाश की यह घटाकाश संज्ञा घट उपाधि से ही है। जैसा घट का रूप है वैसा ही उसका पोल आकाश-लम्बे में लम्बा, चौड़े में चौड़ा, गोल में गोल, दिखाई देता है। जो विस्तृत आकाश है वही आकाश इस घट में भी है। तो फिर ये आकाश दस नहीं है, एक ही है। आकाश, गोल, लम्बा, चौड़ा नहीं है। जैसा का तैसा बना बनाया है। यदि इसका खण्ड करना चाहो तो नहीं हो सकता। दरअसल में अंशाशी भाव आकाश में नहीं है। परन्तु घट मठादिक उपाधियों के कारण उसे घटाकाश मठाकाश आदि कहते हैं। इस घट उपाधि के कारण घटाकाश को आकाश का अंश मान सकते हैं। नहीं तो इसके अंदर का जो आकाश है, घटाकाश, वह कहीं से आया नहीं है और घट के फूट जाने से वह कहीं जाता नहीं।

 

घटादिवच्च संघातैर्जातावेतन्निदर्शनम् ।।

 

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार चतुष्टय अन्तःकरण, पंच कर्मेन्द्रिय, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच प्राण इन संघातों को घटादि के समान ही समझना चाहिए। भगवान आत्मा आकाशवत है और घट रूपी संघात उपाधियों के कारण वह घटाकाश रूपी जीव चेतनांश कहा जा सकता है।

 

घटादिषु प्रलीनेषु घटाकाशादयो यथा

आकाशे संप्रलीयन्ते तद्वज्जीवा इहात्मनि ।।

 

(माण्डू.गौ.का.अद्वै.प्र. 4)

 

जिस प्रकार घट के फूट जाने से घटाकाश महाकाश हो जाता है। इसी प्रकार शरीर के छूट जाने पर जीव साक्षात् परमात्मा हो जाता है। कहीं जाता है और कहीं से आया है। सच्चाई तो यह है कि घटाकाश संज्ञा घट से जब तक संबंध है तभी तक है, इसी तरह शरीरोपाधि तक ही जीवभाव है। अपने आपको ही अनेक जीव मान रहा है। जैसे दस घड़े का दस घटाकाश। परन्तु यह सब समय में ठीक नहीं है। जब तक अपने आपको साढ़े तीन हाथ का शरीर मानता है, इस मान्यता की परिधि में बंधा हुआ है, तभी तक शरीर में जीव की भिन्नता भास रही है। वस्तुतः आत्मा को शरीर से भिन्न करके जानो तभी बात समझ में आएगी, अन्यथा नहीं। इसलिए वस्तुतः जीवभाव सोपाधिक है, निरुपाधिक नहीं। काल्पनिक है, वास्तविक नहीं।

 

सो मायावश भयउ गोसांई। बंधेउ कीर मरकट की नाई ।।

 

सो मायावश, कौन? अरे ! वही सोपाधिक घटाकाश रूपी जीव मायावश भयो। कैसे? जैसे-कीर (तोता और मरकट बंदर) तोता कैसे फँसता है?

 

जंगलों में तोता फँसाने वाला बहेलिया इस झाड़ से उस झाड़ तक एक लम्बी रस्सी बांध देता है और उस रस्सी में बाँस की पोली पोंगरी (जैसे पंखों में घुमाते हो) पिरो देता है। फिर तोते को लालच देने के लिए पोंगरी के ऊपर तोते के खाने के लिए चारा रख देता है ताकि तोता उसे देखकर खाने के लिए पोंगरी पर बैठे। तोता जब खाने के लिए जाता है और पोंगरी पर बैठता है तो उसके ही वजन से पोंगरी घूम जाती है और गिरने के डर से पोंगरी को मजबूती से पकड़ा तो, तोता उल्टा लटक जाता है। तोते के पकड़ते ही पोंगरी घूम जाती है और तोता समझता है कि पोंगरी ने उसे पकड़ रखा है। ध्यान दो-पोंगरी तोते को क्या पकड़ेगी। वस्तुतः उसने ही स्वयं पोंगरी को पकड़ रखा है। पोंगरी जड़ है और तोता चेतन, उसे भला जड़ पोंगरी क्या पकड़ेगी। बस, यही मान्यता, कि पोंगरी ने उसे पकड़ लिया है, उसके बंधन का कारण है। वह लटका रह जाता है और इस तरह बहेलिए के हाथ जाता है।

 

देखो बंदर का हाल-जहाँ पर ज्यादा बंदर होते हैं, वहाँ पर बंदर पकड़ने वाले कुछ दूरी पर दस-बारह सुराही जिसमें आधे दूर तक चने भरे होते हैं, जमीन में गाड़ देते हैं। चूँकि सुराही का गला सकरा होता है बंदर की भरी मुट्ठी बाहर नहीं निकलती। (अब पू. श्री स्वामीजी बंदर का स्वांग बनाते हैं) - अब बंदर आया इधर-उधर चारों तरफ देखकर सुराही के पास धीरे से जाता है और चना देखकर खाने की लालच से चना निकालने के लिए सुराही के अंदर हाथ डाल देता है, क्योंकि सुराही के अंदर बंदर का ही हाथ जा सकता है, हमारा तुम्हारा नहीं। अब देखो, मुट्ठी में चना भरा है और हाथ बाहर निकालने के लिये वह भरसक कोशिश करता है, परन्तु सुराही का मुंह छोटा होने की वजह से ऊपर खींचने से हाथ नहीं निकलता, अटका रह जाता है। इस तरह बंदर समझता है कि सुराही ने उसे पकड़ रखा है। बंदर क्या देखता है कि हाथ नहीं निकल रहा है, अंदर से बंदर की मुट्ठी चने से भरी बंधी है-नहीं निकलती-सीधा हाथ रखता तो निकल जाता। जब हाथ नहीं निकलता तो बंदर

 

समझता है कि सुराही ने उसे पकड़ लिया है। अब सुराही जड़ है और बंदर चेतन। तो चेतन बंदर को जड़ सुराही क्या पकड़ेगी।

 

आपन तो आपन ही विसर्यो

जैसे श्वान काँच मंदिर में, भ्रमि-भ्रमि चौंकि मरयो ।।

मर्कट मूठि छाड़ि नहिं दीन्हीं, घर-घर द्वार फिर्यो

सूरदास नलिनी को सुवटा, कहु कौने पकर्यो ।।

आपन को आपन ही विसर्यो

आप भुलान्यो आपमें, बन्धेउ आप ही आप

जाको ढूँढ़त फिरत है, सो तू आप ही आप ।।

 

अपने आप फँसा हुआ है। देखो, कोई सज्जन आये हैं-प्रश्न हो रहा है- साहब! आप आये नहीं? स्वामी जी ! मैंने तो सुना जरूर है कि आपका यहाँ वेदांत पर प्रवचन हो रहा है और मेरी इच्छा भी सुनने को हुई, परन्तु क्या कहें ऐसा जंजाल है-मैं तो माया के चक्कर में पड़ा हूँ-

 

चालीस वर्ष के अनवरत प्रचार में हमने यही देखा है-लोग कहते हैं कि माया के चक्कर में पड़ा हूँ। कोई नहीं कहता कि माया राँड़ मुझे पकड़ी है, चक्कर में डाल रखी है। अरे! भीतर वाला सत्य सनातन ब्रह्म कभी झूठ नहीं बोलता। अंदर वाला सत्य ही कहता है। मैं स्वयं अपने आप माया के चक्कर में पड़ा हूँ। ऐसा नहीं कि मुझे माया के चक्कर ने डाल रखा है। तो भैया ! बताओ, किसने तुमको कहा कि तुम माया के चक्कर में पड़ो? तुम स्वयं ही माया के चक्कर में पड़े हो। तुम अपने ही संकल्प से बंधे पड़े हो। कोई तुम्हें बांधा नहीं है। तोताराम को संत यही उपदेश देते हैं कि बेटा गंगाराम ! तू चेतन है और पोंगरी जड़ है, तुझे पोंगरी क्या पकड़ेगी। तू स्वयं पोंगरी को पकड़ा है, पोंगरी तुझे नहीं पकड़ी है, उड़ जा-पोंगरी को छोड़ दे। यदि इस महामंत्र को तोता ने मान लिया तो उसका उद्धार हो गया, नहीं तो लटका तो है ही। वैसे ही बंदर के लिए यही उपदेश है कि तू स्वयं मुट्ठी बांधकर पड़ा है, सुराही तुझे नहीं पकड़ी है, मुट्ठी खोलकर भाग जा। संत महात्माओं द्वारा यही आत्मतत्व का उपदेश है कि बेटा! तू आत्मा है, देह भाव को छोड़ दे और अपने स्वरूप 'मैं' (आत्मतत्व) को जान, इस गलतफहमी देहभाव को छोड़कर स्वस्वरूप भगवान आत्मा 'मैं' को जानो, पहचानो। तीन काल में जन्म, मरण नहीं है। आवागमन के चक्र से बाहर आओ। इस भ्रमण को बंद करो और अपने नारायण स्वरूप में जागो-नहीं तो फिर पड़े रहो।

 

समझो, तुम सर्व के आधार हो, गुरुजन, विद्वज्जन, आत्मतत्व का अनुभव कराते हैं। यदि समझ गया तो फिर यही मोक्ष है। अरे! जब बंधा ही नहीं है तो उससे मोक्ष कैसा-जीव का बंधन यदि सत्य है तो इसकी निवृत्ति नहीं हो सकती और यदि असत्य है तो है ही नहीं फिर मोक्ष होगा किससे? अपने आपको जीव या कुछ भी मान लेना यही बंधन है और अपने आपको 'मैं' आत्मा जान लेना यही मोक्ष है।

 

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।।

 

(गीता 6-5)

 

संत महात्मा उपदेश देते हैं-अरे भाई ! यह उनकी ड्यूटी है। संत तो तुम्हें अपने 'मैं' का, आत्मतत्व का अनुभव करा देंगे-तुम्हें लखा देंगे-विचार करता है तो ठीक है। जानना, जानना तुम्हारा काम है।

 

नानक निदरी निदर निहाल

 

क्या देरी है, मुक्त हो जा। हृदय में भूख तो लगे, आत्म तत्व को जानने की प्रबल जिज्ञासा तो जगे वैसे तुम स्वयं आत्मस्वरूप ही हो, अपने आप को ही जीव मानकर कष्ट पा रहे हो। इस तरह उस वैदर्भी रानी जो कि पूर्वजन्म का राजा पुरञ्जन ही है, उसका अविज्ञात सखा, स्वयं सच्चिदानंद ब्रह्म प्रतिबिम्ब और बिम्ब के माध्यम से घटाकाश, मठाकाश द्वारा जीव का भ्रम मिटा देता है। जीव और परमात्मा (ब्रह्म) दोनों एक ही तो हैं।

 

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तृतीय दिवस

प्रह्लादोख्यान जीवन का लक्ष्, आनंद की प्राप्ति गृहस्थाश्रम आत्मपात एवं अंधकूप है, उपासना ज्ञान भक्ति

 

।। श्री नारायणोपनिषत्पाठ ।।

 

अजमपि जनियोगं प्रापदैश्वर्ययोगा-दगति गतिमत्तां प्रापदेकं ह्यनेकम्

विविधविषय धर्मग्राहिमुग्धेक्षणानांप्रणतभयविहन्तृ ब्रह्म यत्तन्नऽस्मि ।।

 

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम्

देवकी परमानंदं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।।

 

मूकं करोति वाचालं पङ्कलङ्घयते गिरिम्

यत्कृपा तमहं वन्दे परमानंद माधवम् ।।

 

अनन्त नाम, रूपों में अभिव्यक्त, अहमत्वेन, प्रस्फुरित, महामहिम, स्वात्मस्वरूप सकल चराचर एवं समुपस्थित आत्म जिज्ञासुगण !

 

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्यवरान्निबोधत ।।

 

अनादिकाल से अविद्या की घोर निद्रा में सोने वालों भव्य जीवों ! उत्तिष्ठत- उठो। स्वस्वरूप भगवान आत्मा में जागो, किसी श्रेष्ठ महापुरुष के सान्निध्य में उपसन्न होकर अपना आत्म कल्याण करो। यहाँ पर श्रीमद् भागवत महापुराण परमहंस संहिता के माध्यम से आत्मतत्व का निरूपण हो रहा है। कल के प्रसंग में कर्मों की विवेचना सुने हो। राजा पुरञ्जन के आख्यान में जीव और ब्रह्म की एकता प्रतिपादित की गई थी। आज का प्रसंग है प्रह्लादोपाख्यान -

 

किसी समय दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने दैत्यों की महती सभा बुलाकर उन्हें सावधान किया। उन्हें संबोधित किया कि दैत्यों ! तुम लोग मेरी बात सुनो- भगवान विष्णु ने वनचर वाराह का रूप धारण कर हमारे परम प्रिय हितैषी छोटे भाई हिरण्याक्ष का वध कर दिया है और अभी तक मैंने उसका तर्पण श्राद्ध भी नहीं किया है। अतः, मैंने निश्चय किया है कि मन्दराचल पर्वत की कन्दरा में जाकर परमेष्ठी भगवान ब्रह्माजी को कठिन से कठिन तप करके संतुष्ट करूँगा। तप सिद्ध हो जाने के बाद भगवान विष्णु से युद्ध करूँगा। युद्ध में उनका शिरच्छेदन करके उसी के रुधिर की धारा से मैं अपने परम प्रिय भाई के नाम से तर्पण करूँगा। यहाँ पर तुम लोग सावधानी से राज्य और कुटुम्बियों की रक्षा करना। हो सकता है कि मेरे तप के लिए जाने के बाद देवता लोग यहाँ आकर उपद्रव करें, तो तुम लोग डटकर उनका सामना करना। तप से उठने पर मैं उन सबको देख लूँगा। इस तरह सभी दैत्यों को सावधान करके हिरण्यकश्यप तप करने मंदराचल पर्वत की तरफ चला गया।

 

तेपे मन्दरद्रोण्यां तपः परमादारुणम्

उर्ध्वबाहुर्नभोदृष्टिः पादाङ्गुष्ठाश्रितावनिः ।।

 

(श्रीमद् भागवत 7/3/2)

 

हिरण्यकश्यप मन्दराचल पर्वत की कन्दरा में जाकर महान दारुण तप करने लगा। वह अपनी दोनों भुजाओं को ऊपर की ओर और आँख को आकाश की ओर उठाकर अपने दाहिने पैर के एक अंगूठे के भार से खड़ा होकर दारुण दुःखदाई तप करने लगा। इसी तरह बहुत समय व्यतीत हो गया। इस दारुण तपस्या से अंतरिक्ष में चारों तरफ आग की भीषण ज्वाला निकलने लगी और वह ज्वाला दसों दिशाओं में फैल गई। समुद्र का जल उबलने लगा। आकाश से तारे टूट-टूटकर गिरने लगे। पृथ्वी डगमगाने लगी। संसार में हाहाकार मच गया। जब अग्नि की ज्वाला देवलोक तक पहुँची तो देवता भी जलने लगे और वे बहुत घबरा गए। इन्द्र इस विप्लव से डर के मारे सभी देवताओं को लेकर ब्रह्माजी के पास जाकर प्रार्थना करने लगे कि प्रभो! इसके तप से स्वर्ग लोक एवं सारी पृथ्वी दग्ध हो रही है। आपकी बनाई सारी सृष्टि रहेगी। आप से हम सभी देवता प्रार्थना करते हैं कि हिरण्यकश्यप के उग्र तप को शांत कीजिये। देवताओं द्वारा इस प्रकार की प्रार्थना सुनकर परमेष्ठी ब्रह्माजी हंसवाहन पर आरुढ़ हो भृगु आदि ऋषियों को लेकर जहाँ हिरण्यकश्यप तप कर रहा था, पहुँचे। परन्तु, जहाँ हिरण्यकश्यप तप कर रहा था, वहाँ पहुँचने पर हिरण्यकश्यप कहीं दिखाई नहीं दिया।

 

ददर्श प्रतिच्छन्नं वल्मीकतृणकीचकैः

पिपीलिकाभिराचीर्णमेदस्त्वङ्गासशोणितम् ।।

 

(7/3/15)

 

वहाँ पर वल्मीक (बॉबी) में उसका शरीर छिप गया था। मिट्टी, घास, तृण आदि से हिरण्यकश्यप का शरीर आच्छादित हो गया था और अंदर से चीटियाँ उसके मेदा, त्वचा, मांस, शोणित सब चाँट गई थीं। केवल अस्थि पिञ्जर मात्र शेष रह गया था।

 

विलक्ष्य विस्मितः प्राह प्रहसन्हंसवाहनः ।।

 

(7/3/16)

 

उसको देखकर ब्रह्माजी भी महान विस्मित हो गए। उन्होंने हँसते हुए कहा-अरे !

 

उत्तिष्ठोतिष्ठ भद्रं ते तपः सिद्धोसि काश्यप

वरदोऽहमनुप्राप्तो ब्रियतामीप्सितो वरः ।।

 

(7/3/17)

 

महर्षि कश्यप के पुत्र हे काश्यप ! उठो, उठो बेटा। तुमने तो मुझे भी जीत लिया। विश्व के इतिहास में आज तक ऐसा उग्र तप किसी ने नहीं किया।

 

नैतत्पूर्वर्षयश्चकुर्न करिष्यन्ति चापरे

निरम्बुर्धारयेत्प्राणान्को वै दिव्यसमाः शतम् ।।

 

(7/3/19)

 

तुमने देवताओं के सौ वर्ष तक बिना जल के तप किया है। मनुष्य का एक वर्ष देवताओं का एक दिन होता है। इस तरह देवताओं के सौ वर्ष तक तूने उग्रतप किया है। अन्न के बिना प्राण रह सकता है, परन्तु जल के बिना नहीं रह सकता। प्राण को रोकने के लिए जल परमावश्यक है।

 

ततस्त आशिषः सर्वा ददाम्यसुरपुङ्गव

मर्त्यस्य ते अमर्त्यस्य दर्शनं नाफलं मम् ।।

 

(7 - 3 - 21)

 

उठो, उठो और अपना अभीष्ट वर मांग लो, ऐसा कहकर ब्रह्माजी ने अपने कमण्डल से दिव्य एवं अमोघ जल लेकर उस बॉबी पर मार्जन किया। छींटा दिया।

 

कमण्डलुजलेनौक्षद्दिव्येनामोघराधसा ।।

 

(7 - 3 - 22)

 

तो वह हिरण्यकश्यप उठ खड़ा हुआ। उसका शरीर सारा अंग वज्र के समान कठोर एवं तपाये हुये सोने की तरह चमकीला दिव्य हो गया। वह ब्रह्माजी की स्तुति करने लगा-

 

नम आद्याय बीजाय ज्ञानविज्ञानमूर्तये

प्राणेन्द्रियमनोबुद्धिविकारैव्र्व्यक्तिमीयुषे ।।

(7 - 3 - 28)

स्तुति के बाद वह वर मांगता है-

 

यदि दास्यस्यभिमतान्वरान्मे वरदोत्तम

भूतेभ्यस्त्वद्विसृष्टेभ्योमृत्युर्मा भून्मम प्रभो ।।

(7 - 3 - 35)

 

नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः

भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ।।

(7 - 3 - 36)

 

व्यसुभिर्वाऽसुमद्भिर्वा सुरासुरमहोरगैः

अप्रतिमद्वन्द्वतां युद्धे ऐकपत्यं देहिनाम् ।।

(7 - 3 - 37)

 

सर्वेषां लोकपालानां महिमानं यथाऽऽत्मनः

तपोयोगप्रभावाणां यन्न रिष्यति कर्हिचित् ।।

(7-3-38)

 

वह वरदान मांगता है कि हे वरदोत्तम ! यदि आप मुझे मेरा अभीष्ट वर देने आये हो तो सुनो-आपकी बनाई हुई सृष्टि में किसी से भी, मनुष्य हो या देवता मेरी मृत्यु हो-यह पहला वर मांगा। भूमौ नाम्बरै मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि। मैं पृथ्वी में मरुं आकाश में, दिन में मरूँ रात्रि में, मनुष्य से मरूँ पशु सिंह आदि से। त्रिलोकी का एकमात्र राजा होऊँ। युद्ध में मेरे सामने कोई खड़ा हो सके। भगवन् ! यदि आप मेरा अभीष्ट वर देने आये हो तो यही दो। ब्रह्माजी विचार में पड़ गए। कुछ देर सोचने लगे-बड़ा कठिन वर मांगा है।

 

ततो जगाम भगवानमोघानुग्रहो विभुः

पूजितोऽसुरवर्येण स्तूयमानः प्रजेश्वरैः ।।

(7 - 4 - 3)

 

भैया ! आज तक ऐसा कठिन वर किसी ने भी नहीं मांगा जैसा दुर्लभ वर तुमने मांगा है। अच्छा-जाओ, मैंने तुम्हें तुम्हारा अभीष्ट वर दे दिया। ब्रह्माजी वर देकर अपने ब्रह्मलोक को चले गए। हिरण्यकश्यप ऐसा उत्तम वर प्राप्त कर अपनी राजधानी को लौटकर सीधे स्वर्ग लोक (अमरावती, देवलोक, इन्द्रपुरी) को जा पहुँचा। वहाँ क्या देखता है कि देवता सभी देवलोक छोड़कर पहिले से ही भाग गए हैं, इंद्रासन खाली है। हिरण्यकश्यप इन्द्रासन पर बैठ गया और गंधर्व विश्वासु, तुम्बर, किन्नर, विद्याधर एवं अप्सरायें हिरण्यकश्यप का गुणगान करने लगे। अरे! हाँ गंधर्व, किन्नर उसका गुणगान क्यों करें, यह उसका तपोबल है, तपश्चर्या का फल है-गवर्नमेंट ही जब बदल गई। पृथ्वी उसके भय के बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करने लगी। समुद्र रत्नों को बहाकर किनारों पर ढ़ेरी लगा देने लगे। पर्वत अपनी घाटियों के सुरम्य स्थान उसके आखेट खेलने के लिए जुटा देने लगे। वृक्ष सब ऋतुओं में फूलने-फलने लगे यह सब ऐश्वर्य तप के प्रभाव के हिरण्यकश्यप को प्राप्त हो गया। इन सब ऐश्वर्यों (भोगों) को भोगकर भी, यह सब होने पर भी-

 

यथोपजोषं भुञ्जानों नातृप्यदजितेन्द्रियः ।।

(7 - 4 - 19)

 

अजितेन्द्रियः हिरण्यकशिपुः तृप्येत्। यह सब कुछ प्राप्त होने पर भी उसकी तृप्ति हुई। स्वर्ग के कल्पवृक्ष, कामधेनु, अमूल्य रत्न चिंतामणि आदि वैभव प्राप्त कर लेने पर भी, पृथ्वी और देवलोक का सारा सुख वैभव करतलगत होने पर भी तृप्ति नहीं हुई। अब विचार करना है कि इतना ऐश्वर्य (रिद्धि, सिद्धि) पाने के बाद भी तृष्णा क्यों शांत नहीं हुई? मन की भूख, मन की तृष्णा, शांत क्यों नहीं हो? कहते हैं-

 

निस्स्वोद्रव्यशतीशतं दशशताम् सोऽपीह लक्ष्येशताम्,

लक्ष्येशः क्षितिराजतां क्षितिपतिस्चक्रीधरत्वम् पुनः

चक्रीमः सुरराजतां सुरपदंब्रह्मास्पदं वाञ्छति,

ब्रह्मा विष्णुपदं हरिस्शिवपदं तृष्णावधिं को गतः ।।

 

चाहे वह सुरपद, ब्रह्मपद को भी क्यों पा ले, वह शिवपद को भी चाहे क्यों प्राप्त कर ले, तृष्णा शांत नहीं होती, वह संतुष्ट नहीं होता। किसी के पास एक भी रुपया नहीं है उसे यदि एक रुपया मिल जाए तो फिर उसे तृष्णा पैदा होती है कि उसे सौ रुपये मिल जाये। यदि उसे वह भी मिल जाता है तो वह हजार की प्राप्ति की इच्छा करता है। फिर लाख और करोड़पति बनना चाहता है। तृष्णा यहीं शांत नहीं होती। तब फिर वह राजा बनूँ, चक्रवर्ती बनूँ, सम्राट कहाऊँ, मुझे देवराज इन्द्र का सिंहासन मिले, ब्रह्म पद, शांकर पद, विष्णु पद पाने की इच्छा करता है। परन्तु, यदि वह इन्हें भी प्राप्त कर ले तो भी उसकी तृष्णा शांत नहीं होती। तो फिर देखें, इस प्रश्न पर विचार करें कि तृष्णा कैसी बलवती है और कभी तुष्ट क्यों नहीं होती। चलो, विचार वाटिका में भ्रमण करें-देखो मन क्या चाहता है? मन की भूख क्या है? मन की तृष्णा, मन की आकांक्षा क्या है। बताओ, हर एक के मन की चाह क्या है? मन अनादिकाल से क्या चाहता है? देखो दस, पाँच आदमी मनोविनाद के लिए आपस में चर्चा करते हैं कि भाई! हम लोग संसार में आये हैं तो इस संसार में हमारा क्या कर्तव्य है? हमें क्या करना चाहिए?

 

यदि उस गोष्ठी में, उस समाज (मंडल) में कोई संन्यासी बैठा हो तो वह कहेगा कि संसार असार है, मिथ्या है कहीं जंगल में जाकर भगवान का भजन करना चाहिये। वह वैराग्य की महिमा बताएगा। सब को त्याग कर संन्यास ग्रहण करना ठीक कहेगा। यदि उस समाज में कोई देशसेवक होगा तो वह कहेगा कि गरीबों की सेवा करनी चाहिए। राष्ट्र की सेवा करनी चाहिए और उसमें कोई चार्वाक का अनुयायी होगा, यदि उसका चेला होगा तो कहेगा-

 

स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिकः

नैव वर्णाश्रमादीनां क्रियाश्च फलदायिकाः ।।

यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वाघृतं पिवेत्

भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ।।

 

भारत में चार्वाक नाम का एक बड़ा भारी नास्तिक हुआ है। उसका मत चार्वाक दर्शन है। वह कहता है कि यहाँ क्या करना है, जब तक संसार में जियो सुख पूर्वक जियो। यदि पैसा हो तो ऋण लेकर घी पियो। अरे! देना तो है ही नहीं। 'ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत् भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।' शरीर के नाश होने पर कौन कहाँ आता-जाता है। नाशवान देह का कभी कहीं कोई आवागमन नहीं, वरन् शरीर मरने से नष्ट हो जाता है। ' स्वर्गो नापवर्गों वा नैवात्मा पारलौकिकः' आत्मा है परमात्मा है। इस गोष्ठी में क्या भजन, क्या भाव। खैर यह बहुमत हो गया है। मौलिक प्रश्न तो यही है कि मनुष्य मात्र का क्या कर्तव्य है? संसार में जन्म लिये हैं तो यार। मनुष्य को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? मनुष्यत्व क्या है? तो भैया! यह मौलिक एवं सार्वभौम प्रश्न है और उसका उत्तर भी मौलिक एवं सार्वभौम ही होना चाहिए। जन्म से लेकर मरण पर्यन्त मनुष्य जिस वस्तु को ढूँढ़ रहा है? उसे प्राप्त कर लेना, यही मनुष्यमात्र का कर्तव्य है। तो क्या ढूँढ़ रहा है? किसी से भी पूछो सभी एक स्वर में कहेंगे कि मनुष्य की खोज आनंद के लिए है। उसे आनंद चाहिए। किसी से भी पूछो, क्या वह आनंद का वैरागी है? नहीं, सभी को आनंद चाहिए। प्रपंच के वैरागी तो बहुत मिल जायेंगे, परन्तु सुख का वैरागी, आनंद का वैरागी तो कोई विरला ही होगा। कोई मिलेगा जिसे कि आनंद से वैराग्य हो। जिस चीज की अनादिकाल से निरंतर तलाश हो रही है वह है आनंद की प्राप्ति। यहाँ पर आप लोग इतनी दूर से क्यों आये हो? हजारों मील से यहाँ पर क्यों इकट्ठे हुए हो? इसलिए कि स्वामी जी का सत्संग होगा, दर्शन होगा-स्वामीजी के दर्शन के लिए आये हो-तो भैया! आनंद ही का लक्ष्य करके तो आये हो? लक्ष्य तो सबका एक ही है, मगर साधन में भिन्नता है।

 

मनुष्य ही आनंद चाहता हो, ऐसी बात नहीं है। पशु, पक्षी, कीट पतंग सभी आनंद चाहते हैं। सभी इसके ही लिए कार्य करते हैं कि हमें आनंद मिले। बिल्कुल ठीक। प्राणिमात्र का लक्ष्य आनंद की प्राप्ति है। संसार में सभी प्राणी नैतिक-अनैतिक कार्य आनंद की प्राप्ति के लिए ही करते हैं। मनुष्य मात्र संसार में जीवन के लिए नहीं जीता, उसे संसार जीने के लिए प्रिय नहीं है, आनंद मिलता है इसलिए प्रिय है। यही कारण है कि संसार उसे प्रिय है और आनंद नहीं मिला तो वही संसार बोझ रूप हो जाता है। प्राणिमात्र के जीवन का लक्ष्य आनंद ही है। आनंद ही उसका स्वरूप है। जिसके बिना जो एक क्षण भी रहे, वही उसका स्वरूप होता है। मनुष्य आनंद के बिना, जीवमात्र आनंद के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता। आनंद मिले तो वह जहर खा लेगा। आत्महत्या पर उतारू हो जाता है। आत्महत्या कर लेता है, मर जाता है। आनंद का वियोग क्षणभर के लिए भी नहीं सह सकता। यदि मन का स्वरूप दुःखरूप होता तो वह दुःख को ही ढूँढता। बिना आनंद के वह जिंदा रहता। मछली का आधार उसका घर, उसका स्वरूप जल ही है। मछली जल स्वरूप ही है इसलिए जल के वियोग में मछली जीवित नहीं रह सकती। इसी प्रकार मन की खुराक आनंद ही है। इसके बिना वह जी नहीं सकता। अनादिकाल से उसे आनंद ही की तलाश है। बस देखो-एक योगी पर्वत की कन्दरा में महान से महान कष्ट सहन कर घोर तप करता है, उसी आनंद को प्राप्त करने के लिए दूसरा व्यक्ति घोर पाप करता है। किसलिए? आनंद की ही प्राप्ति के लिए। हाँ, लक्ष्य तो एक ही है, साधन भिन्न अवश्य है। जिस आनंद को ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य में ढूँढ़ता है। गृहस्थी उसी आनंद को स्त्री-पुत्रादिक में खोजता है। वानप्रस्थी तप द्वारा उसी आनंद को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करता है। संन्यासी उसी आनंद को संन्यास में ढूँढ़ता है। लक्ष्य सबका एक ही है, आनंद की प्राप्ति। पिता अपने नन्हे शिशु को गोद में बिठाकर उसके कोमल कपोलों पर बार-बार चुंबन करता है, प्यार करता है। इस प्यार में उसके मूँछ और दाढ़ी के कड़े बाल बालक के कोमल कपोलों में चुभते हैं, तो बालक रोता है, परन्तु पिता को मजा आता है। यह आनंद पिता के लिए है कि पुत्र के लिए। इसी तरह जीवमात्र अनेकानेक साधनों में आनंद को ही खोजते हैं। कई एक को तो दूसरों की निंदा करने में ही मजा आता है-आनंद की प्राप्ति में यह भी एक साधन है। कभी-कभी जब लोग रोते हैं तो उसमें भी आनंद का अनुभव करते हैं। इस समाज में (प्रकृति समाज की तरफ इशारा करते हैं।) जब दो औरतें (स्त्रियां) आपस में मिलती हैं, तो तीसरी भी रहती हैं। हाँ कंधा बदलने के लिए, तो आपस में आनंदाश्रु बहाते हैं, रोते हैं। इसी तरह जब रोते भी हैं तो आनंद के लिए। आनंद आये तो रोना बंद कर दें। हाँ-रोने में भी आनंद है। गरज तो यह है कि अनादिकाल से जीवमात्र आनंद ही ढूँढ़ रहे हैं। समस्त जीव किस तरफ बह रहे हैं? आनंद सागर की तरफ। अब विचार करना है कि जब आनंद की प्राप्ति के लिए सभी व्याकुल हैं, आनंद का स्रोत क्षण भर भी बंद हो यही सबकी ख्वाहिश है, फिर भी आनंद की प्राप्ति उसे क्षणिक ही हो रही है। उसकी तृप्ति नहीं होती। जब क्षण प्रतिक्षण विषयों द्वारा आनंद मिलता ही रहता है तो फिर उस आनंद की प्राप्ति के बाद मंजिल खतम हो जानी चाहिये। मन की दौड़ खतम हो जानी चाहिए। परन्तु एक विषय के बाद दूसरे विषय में इस प्रकार नाना विषयों के तरफ मन दौड़ रहा है, अभी तक मंजिल तय कर सका। अरे। जब तृप्ति नहीं होती तो वह सुख-सुख नहीं है। समझ लो-वह सुख-सुख ही नहीं जिसमें दुःख है, डर है और रोना है। स्त्री की प्राप्ति में दुःख है, मर जाय इसका डर है और मर जाये तो रोना है। पुत्र की प्राप्ति में दुःख है, उसे कोई बीमारी जाये, इसका डर है और निधन में रोना है। धन की प्राप्ति में दुःख है, कहीं खो जाये, लुट जाये, चोरी हो जाय इसका डर है और लुट गया तो रोना है।

 

वह सुख सुख ही नहीं जिसमें दुःख है, डर है और रोना है।

मिलावट से जो है खाली उसी का नाम सोना है।

अरुण पर फेंक दो तुम धूल अंधियारा नहीं होता

करो तुम चूर्ण हीरों को मगर काला नहीं होता ।।

प्यारे ! वह सुख-सुख नहीं है, धोखे में पड़ो, जिसमें दुःख है, डर है, रोना है। यह जीवन का लक्ष्य नहीं है। तो फिर विचार करो वह कौन-सा सुख है, आनंद है जिसके लिए समस्त प्राणिवर्ग भटक रहे हैं? जिसे पाने के लिए अनादिकाल से चेष्टा हो रही है? क्या किसी को ऐसी इच्छा होती है कि 23 घंटा 59 मिनट तो आनंद भोगे, परन्तु यदि एक मिनट दुःख भोगने को मिले तो कोई बात नहीं है? ऐसी इच्छा किसी को भी नहीं होती। वह तो चौबीसों घंटे आनंद ही आनंद चाहता है। एक मिनट का भी दुःख ग्रहण करना नहीं चाहता। वह आनंद सागर चाहता है। प्रार्थना करता है कि हे भगवान ! हमारे सब दुःख दूर हो जायें, जीवन सुखमय आनंद से बीते। तो शाश्वत आनंद ही प्राणिमात्र का लक्ष्य है और शाश्वत आनंद ही प्राणि मात्र की खुराक है। जीव क्षणिक आनंद नहीं चाहता, वह नित्यानंद चाहता है। अरे भाई ! आनंद आया और चला गया, मन को तो संतोष हुआ ही नहीं। जहाँ एक विषय में मनीराम को कुछ आनंद मिला तो वह तुरंत ही दूसरे विषय में आनंद की फिराक में पड़ जाता है। तो फिर समझ लो कि यह सुख नहीं है जिसकी खोज मन को है। यह नित्यानंद ढूँढ़ रहा है। परन्तु विषयों में उसे क्षणिक आनंद ही मिल पाता है। इसलिए अनादिकाल से संसार भर में सभी की यात्रा नित्यानंद के लिए ही हो रही है। आज से नहीं, पता नहीं कब से, अनादिकाल से संसार की महान यात्रा शाश्वत आनंद नित्यानंद, ब्रह्मानंद की प्राप्ति के लिए है और समझ लो खूब ध्यान देकर कि आवागमन का चक्र मिटने वाला नहीं है जब तक कि वह अपने लक्ष्य नित्यानंद को प्राप्त कर ले लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद ही आवागमन का चक्र खतम होगा। जहाँ के लिए यात्रा हो रही है, जहाँ तुम जा रहे हो वह आखिरी मंजिल तुम्हारा घर हीहै, जहाँ तुम पहुँचना चाहते हो। यहाँ पर तू-तू, मैं-मैं, ऊँचा-नीचा, गृहस्थी-वैरागी, चोर-जुआरी का प्रश्न नहीं है। क्या संन्यासी, क्या वैरागी सभी ढूँढ़ रहे हैं। इसी की प्राप्ति के लिए पुण्यी और पापी सभी को तलाश है। सभी के जीवन का लक्ष्य आनंदसागर (नित्यानंद) की प्राप्ति है। जिस समुद्र की प्राप्ति के लिए गंगा, यमुना, गोदावरी इत्यादि समस्त नदियों की यात्रा हो रही है वहीं को गंदी नाली भी जा रही है। गंगा आदि समस्त पवित्र नदियों का जो घर है, वही घर गंदी नालियों का भी है। दोनों के घर में भेद नहीं है। इसी तरह जो नित्यानंद घर (चरम लक्ष्य) एक संन्यासी विरक्त महात्मा का, ब्राह्मण का है, वही नित्यानंद घर स्वपच, महान पापी, वज्र मूर्ख का भी है। जी हाँ-उसी को प्राप्त करना है। चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, क्रिश्चियन हो या यहूदी मनुष्य को कौन कहे, कूकर, सूकर इत्यादि सभी जीवमात्र का लक्ष्य है नित्यानंद की प्राप्ति। चाहे इसकी प्राप्ति एक जन्म में हो या अनेक जन्मों के बाद। लक्ष्य यही रहेगा। तुम्हारा जीवन, तुम्हारा लक्ष्य, तुम्हारा अभीष्ट नित्यानंद ही है। चाहे अनेकों जन्मों तक ढूँढ़ो लेकिन अंत में यही हल निकलेगा कि हम तो आनंद चाहते हैं। तब तक उसे विश्राम नहीं जब तक शाश्वत आनंद की प्राप्ति हो जाए? आनंद का कहीं भी कोई वैरागी नहीं होता। जब सभी का लक्ष्य आनंद सागर है तो आपस में छोटा बड़ा कैसा? आपस में यदि नदियाँ लड़े कि हम बड़ी हैं, तुम छोटी हो, हम पावन हैं, तुम मलिन हो तो यह उनकी नासमझी होगी। जब उन सबकी यात्रा एक ही घर की ओर है। विचार करें तो सभी सागर की ओर जा रही हैं। गंगा और गंदी नाली सभी की पहुँच समुद्र के ही लिए है। नदियाँ सागर में (अपने घर, अपने विश्राम स्थल में) पहुँचने के पहले ही नाम, रूप की मान्यताओं का त्याग कर देती हैं। सभी नाम, रूप को छोड़ जल दृष्टि से एक ही हैं। इसी प्रकार शरीरों में भेद है, कि अंतिम लक्ष्य में। भले ही हम सब शरीर दृष्टि से अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं, परन्तु आंतरिक दृष्टि से भैया। हम सब तो एक ही हैं। इस सत्य को समाज, देश एवं सारे विश्व को समझना होगा। इसके बिना एकता स्थापित नहीं की जा सकती। ध्यान रहे कि कानून से समाज में एकता स्थापित नहीं की जा सकती। समाज में एकरूपता नहीं होगी चाहे कानून राजनैतिक हो या सामाजिक। आज ऐसी क्रान्ति की अत्यधिक आवश्यकता है। ऐसी क्रान्ति होनी ही होगी। भला बताओ, अरे। शरीर की भी एकता हुई है। चाहे कुछ समय के लिए एकता भले ही हो जाए, परन्तु वह टिकाऊ होगी।

 

भाई। जो एक है वही एक होगा। जो अनेक है, उसमें तुम एकता चाहते हो? यह कैसे संभव होगा? तो जरूरत है इसी की, राष्ट्र को इसकी परम आवश्यकता है। घर-घर में इस सत्य को पहुँचाना होगा कि जीवमात्र नित्यानंद को ही ढूँढ़ रहा है। नदियाँ, समुद्र में पहुँचकर ही पूर्ण विश्राम पाती हैं। यह तो सिद्ध हुआ कि प्राणिमात्र की आखिरी मंजिल नित्यानंद की प्राप्ति है।

 

सरिता जल जलनिधि महँ जाई

होई अचल जिमि जिव हरि पाई ।।

 

देखिये, नदियों का बहना कभी बंद नहीं होता। वह बंद होता है, समुद्र की प्राप्ति के ही बाद। इसी तरह जीव कहो या मन कहो ये पर्यायवाची शब्द हैं। जीव का आवागमन ब्रह्मानंद की प्राप्ति के बिना बंद नहीं होता, भ्रमण चलता ही रहता है। सुषुप्ति अवस्था (गाढ़ी नींद) में अज्ञान में जब मन का लय हो जाता है, उस स्थिति में मैं जीव हूँ-यह भाव भी नहीं रहता। मन सुषुप्ति अवस्था में अज्ञान में लीन होता है। मूर्छावस्था में मन दुःख में लीन होता है और समाधि में चेतन आत्मा में लीन होता है। जब मन नहीं रहता तो मैं जीव हैं-यह भाव भी नहीं रहता। जब तक मन का अत्यन्ताभाव नहीं होता, अमन नहीं होता, आत्म भाव में लीन नहीं होता तब तक उसका चक्र लगा ही रहता है। आवागमन बंद नहीं होता। तो जीव का परम लक्ष्य नित्यानंद ही है। दूसरे शब्दों में भगवान की प्राप्ति कहो, परमानंद आत्मा की प्राप्ति कहो। जी हाँ- मन जब तक भगवान आत्मा नित्यानंद का दर्शन नहीं पा लेता तब तक भटकता ही रहता है। उसका भटकना बंद नहीं होता। बस !

 

लोगों का कहना है कि जब मन स्थिर हो जाता है तब आत्मा का अनुभव होता है। तो फिर लक्ष्य क्या है? सेल्फ रियलाइजेशन होने पर ही मन स्थिर होता है। आत्मदर्शन के बाद ही मन स्थिर होता है। क्या प्रमाण? सुनो हम इस पर लैला मजनूं का दृष्टांत कहते हैं। यह इश्क मिजाजी है और इश्क हकीकी का तो फिर कहना ही क्या है। इस कथानक में मजनूं का वास्तविक नाम कैश था, परन्तु लैला के प्रेम ने उसका नाम मजनूं कर दिया। यह इश्क मिजाजी की मिसाल है। उस मजनूं की दुनियाँ, सब कुछ लैला ही थी। जो इश्क मिजाजी में पागल हो तो उसे मजनूं कहते हैं और जो इश्क हकीकी में पागल हो उसे मफतूं कहते हैं। लैला एक बादशाह की लड़की थी। वस्तुतः लैला काली बदसूरत थी। संसार की निगाहों में भले ही लैला बदसूरत थी परन्तु मजनूं की निगाह में तो वह बदसूरत नहीं थी। राजा को मजनूं का लैला से प्रेम बर्दाश्त हुआ और राजा ने मजनूं को जंगलमें कैद कर दिया। मजनूं के वियोग में लैला बीमार पड़ गई। इलाज के लिए हकीमों को बुलाया गया। हकीमों ने देखा कि कोई मर्ज हो तो दवा दी जाए परन्तु, राजा के डर से हकीमों ने सलाह दी कि लैला का खून खराब हो गया है। इसका खून निकालना होगा, तो नश्तर लगाकर खून निकाला गया, परन्तु कुछ लाभ हुआ। कारण तो स्पष्ट ही था कि जब कोई बीमारी हो तो कुछ ठीक हो, अतः लैला को अच्छा करने के लिए जितनी भी दवाइयाँ की गई, सब बेकार हुई। लैला किसी भी हालत में अच्छी हुई तो बादशाह और बेगम सोच में पड़ गए कि फिर क्या करना चाहिए। तो एक रात एकांत में लैला के विषय में चिंतित हो सलाह किए कि जब लैला और मजनूं का इतना प्रेम है तो विवाह कर दिया जाये, परन्तु शर्त यह है कि पहले मजनूं का पागलपन दूर हो जाये। सुबह दरबार लगा। जब बादशाह की महफिल जुड़ी तो बादशाह सलामत ने काजियों के समक्ष बेगम साहिबा की सलाह जाहिर की कि लैला और मजनूं की शादी की बात मानी जा सकती है, बशर्ते कि मजनूं का पागलपन दूर हो जाये। उसका पागलपन मिट जाने के बाद ही शादी की जा सकती है। काजियों ने इसकी ताईद की-जी हुजूरी हुई- मगर उस महफिल में एक सफेद दाढ़ीवाला बूढ़ा काजी उठकर खड़ा हुआ- जहाँपनाह गुस्ताखी माफ हो-आपका फरमान है कि लैला से मजनूं की शादी हो बशर्ते कि मजनूं का पागलपन पहिले दूर हो जाये तो हुजूर ने यह भी कभी सोचा कि मजनूं आखिर पागल क्यों हुआ? बिना लैला के ही मजनूं पागल हुआ है। तो मजनूं का पागलपन बिना लैला के कैसे मिटेगा?

 

यही हालत मन की है यहाँ पर मानो कि लैला आत्मा भगवान है और मजनूं है मन। तो फिर मन किसकी तलाश में पागल की तरह भटक रहा है? परमानंद की फिराक में। उसे चाहिए सच्चिदानंद घनभूत, जिस स्वरूप का दर्शन जिसकी तलाश अनादिकाल से हो रही है। इस मन का जो पागलपन है, जो विक्षिप्त घूम रहा है, जुआड़ी, शराबी, दुराचारी, वैरागी, संन्यासी, ब्रह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थी आदि बनता जा रहा है। मनीराम इनमें आनंद ढूँढ़ रहा है, आनंद को प्राप्त करने के लिए पागल हुआ घूम रहा है। तो समझ लो कि उसका यह पागलपन, उसका दोष नहीं है, व्यर्थ ही मनीराम पर आरोप लगाते हो। वह क्या करे पागलपन में रात-दिन भटक रहा है। एक स्त्री मर गई तो दूसरा किया आनंद के लिए, तीसरा, चौथा, घर में बाहर में भटक रहा है। चाहे वैरागी हो या दुराचारी हो-आनंद मिले, करके ही भटक रहे हैं, परन्तु मनीराम को नित्यानंद नहीं मिला है। और अभी तक अनादिकाल से घूम रहा है, उसी की तलाश में। जब तक नित्यानंद की प्राप्ति मन को हो ले तब तक मन स्थिर होगा। यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, अब इनकी अपील नहीं। दूसरे कोर्ट के फैसले की अपील तो होती है, परन्तु सुप्रीम कोर्ट का फैसला आखरी होता है। संतों का कोर्ट अध्यात्म विषयक सुप्रीम कोर्ट है और यहाँ का फैसला सर्वमान्य होता है। इसको अब गीता द्वारा मंजित कर दें-

 

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ।।

 

(गीता 2-16)

बुध तत्वदर्शियों की वाणी भगवान को भी मान्य होती है। भगवान का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त कर लेना, यही मनीराम मजनूं के भटकने का कारण है। वह घूमेगा-जब तक 'मैं' का अनुभव कर ले। ध्यान, धारणा, समाधि आदि मन का घूमना बंद करने के लिए करते हैं, परन्तु इन उपायों (ध्यान, धारणा, समाधि, जप, तप) से भी मन स्थिर नहीं होता। उसे तो आग लगी है लैला, भगवान की। वह भगवान चाहता है। आँख मूंदने से भगवान नहीं मिल जाते, मन को तो भगवान चाहिए, उसे नित्यानंद की भूख लगी है, उसे नित्यानंद मिले। जप, तप, ध्यान, धारणा, समाधि में नित्यानंद कहाँ? हाँ, ध्यान धारणा- समाधि (साधन) से मन कुछ देर के लिए रुक जाता है, उसकी प्रवृत्ति, चंचलता रुक जाती है और क्षणिक आनंद की प्राप्ति हो जाती है। जप, तप में जब तक समाहित है, आनंद मिला परन्तु जप से उठे नहीं कि आनंद चला गया इन सब विषयों में आनंद चाहे शुभ से हो या अशुभ से हो स्वरूप वही आनंद है, परन्तु यह आनंद क्षणिक है, अविनाशी, शाश्वत आनंद नहीं है। स्वरूप भगवान आत्मा को प्राप्त करना ही शाश्वत (नित्य) आनंद है और यह आनंद साधन द्वारा प्राप्त नहीं हो सकता।

 

हठ योग में योगी प्राण को ब्रह्माण्ड में चढ़ाकर ब्रह्मरंध में स्थापित कर लेता है। फिर संसार की तरफ उसका मन नहीं भागता, नहीं दौड़ता। परन्तु, जब योग से उपरत होता है, तो उसी समय, उपरत होते ही संसार सामने आकर खड़ा हो जाता है। मन चंचल हो उठता है। अरे यार! जगह-जगह नदी में तुम बांध भले डाल दो, परन्तु क्या नदी स्थिर हो जाती है? नदी का कार्य तो स्थिर नहीं होता वह निरंतर बांध को तोड़ डालने का प्रयास करती ही रहती है और कभी कभी बांध को तोड़ डालने में समर्थ भी हो जाती है। बांध से नदी का प्रवाह बांध के मजबूत रहते तक रुका रहता है, परन्तु स्थिर नहीं होती। वह स्थिर तो समुद्र में जाकर मिलने से ही होती है। समुद्र में नदी को स्थिर करने के लिए बांध डालने की जरूरत नहीं है। अतः यह निर्विवाद है कि बांध डालने से नदी स्थिर नहीं होती, नदी तो समुद्र में ही पहुँचकर स्थिर होती है। यह तो सबको विदित ही है कि बांध टूट जाये तो सैकड़ों गाँव घर बह जाते हैं। बांध से कभी भी नदी का स्थिर होना सिद्ध नहीं है। मन रूपी नदी की कल्पना रूपी धार संकल्प-विकल्प रूपी किनारों पर निरंतर बह रही है और बिना साधन के डी (बांध के बिना ही) नित्यानंद सागर में ही लीन हो जाती है। जिस प्रकार बांध से चंद वर्ष, समय के लिए नदी की धार रुक जाती है, उसी प्रकार साधन ध्यान, धारणा इत्यादि) से कुछ समय के लिए मन रुक जाता है, परन्तु स्थिर हीं होता। नित्यानंद भगवान आत्मा को प्राप्त किए बिना मन स्थिर नहीं हो सकता। हाँ-मन रूपी नदी की कल्पना रूपी धार को भले ही समाधि द्वारा रोक दो, परन्तु उससे उठे नहीं कि मन का व्यापार चालू हो जाता है। महर्षि पतञ्जल जी योग दर्शन में कहते हैं-

 

अभ्यास वैराग्याभ्याम् तन्निरोधः ।।

 

(योगदर्शन)

 

अभ्यास और वैराग्य द्वारा उसका (चित्त का) निरोध होता है।

 

योगश्चित्तवृत्ति निरोधः ।।

 

(योगदर्शन 1/2)

 

चित्तवृत्ति का निरोध ही योग है।

 

योगश्चित्तवृत्ति निरोधः तु चित्तवृत्ति स्थिरः ।।

 

जी, योग से मन की चंचलता का निरोध कहते हैं, कि मन का स्थिा होना। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इत्यादि साधनों से मन की चंचलता का निरोध भले ही हो जाये, परन्तु नित्यानंद भगवान आत्मा की प्राप्ति के बिना मन स्थिर होगा। मन की भूख यही है। मन इसी को प्राप्त करना चाहता है, इसलिए स्थिर नहीं होता और प्राप्त कर लेने पर स्थिर हो जाता है। बाह्य साधन (समाधि) से मन का निरोध होता है। अब यह प्रश्न होता है कि साधन से मन का निरोध ही होता है, स्थिर नहीं क्या यही बात है स्वामी जी? देखो समझ लो कि मन का निरोध करने के लिए ही साधन की आवश्यकता है, परन्तु मन को स्थिर करने के लिए कोई साधन नहीं। अरे! नदी को रोकना है तो साधन (बांध) की आवश्यकता है, रोको तो वह स्वयं ही समुद्र में जाकर स्थिर हो जाएगी। भाई ! रोकोगे तो नदी क्य आसमान में जाएगी? नदी का प्रवाह स्वभावतः समुद्र की ओर है, चाहे रोक तब और रोको तब, वह समुद्र में ही जाएगी और कहाँ जाएगी? बांध सिर्फ रोकने मात्र का साधन है। परन्तु नदी के वेग को स्थिर करने के लिए कोई साधन नहीं है। इसी तरह मन की चंचलता को रोकने का साधन समाधि है समाधि द्वारा रोकी जा सकती है, परन्तु स्थिर कहाँ होगी? नित्यानंद में और नित्यानंद को प्राप्त करने के लिए कोई साधन नहीं है। नित्यानंद कृपा साध्य है। मन को नित्यानंद का दर्शन कराना चाहो तो संत कृपा प्राप्ति के लिए साधन करो, उसकी शरण में जाओ। आत्म दर्शन की प्राप्ति सद्गुरु ही कराएंगे। इसलिए उन्हीं की शरण में जाना होगा। साधनों की कमी नहीं है, परन्तु इससे मन को शांति, मन को विश्राम नहीं मिलना है। आपको इस तरह से प्रमाणों द्वारा एवं संत वाक्यों द्वारा समझाया गया