श्रीमद्भागवत रहस्य

 

 

 

 

 

महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारसमिति

आत्मवित् शोकं तरतिं

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

महर्षि मुक्त

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्रीमद्भागवत रहस्य

 

प्रणेता                     :                               महर्षि मुक्त

 

प्रकाशक                :                               महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचार समिति

केन्द्र दुर्ग (..) पंजीयन क्रमांक 2093/94,

रायपुर (सर्वाधिकार सुरक्षित प्रकाशकाधीन)

 

फोटोटाईप सेटिंग :                              नेचर ग्राफिक्स शांति चौक, पुरानी बस्ती,

रायपुर (..) मो.: 93022-30478

 

मुद्रक महावीर      :                               आफसेट गीता नगर, चौबे कॉलोनी, रायपुर (..)

मो.: 93036-08080

 

संस्करण                               :                               द्वितीय

 

प्रति                        :                               1000 (एक हजार)

 

दिनांक                   :                               19 जुलाई 2016

 

पुस्तक मिलने का पता-                     डॉ. सत्यानंद त्रिपाठी 61/152, बंधवापारा,

रायपुर (..) मो.: 99261-30014

 

प्रकाशन क्रमांक   :                               3

 

मूल्य                      :                               150/-

 

 

 

 

 

श्रीमद्भागवत रहस्य

 

आख्यान सूची क्रमांक

 

आरती.. 4

श्रीमद्भागवत रहस्य... 6

नारायणोपनिषत्. 8

प्रथम दिवस. 9

भूमिका, महिमा एवं चतु:श्लोकी भागवत. 9

द्वितीय दिवस. 47

भगवान नारद एवं राजा प्राचीनबर्हि संवाद द्वारा कर्मो का विश्लेषण, राजा पुरंजनोपाख्यान के माध्यम से जीव ईश्वर एकता का विश्लेषण   47

तृतीय दिवस. 89

प्रह्लादोख्यान जीवन का लक्ष्, आनंद की प्राप्ति गृहस्थाश्रम आत्मपात एवं अंधकूप है, उपासना ज्ञान भक्ति.... 89

चतुर्थ दिवस. 140

गजेन्द्रोपाख्यान के माध्यम से अस्तित् निरुपण श्री कृष् जन्मकथा.. 140

पंचम दिवस. 183

भगवान कृष् की बाललीला, ब्रह्मस्तुति, चीरहरण, उद्वव गोपी संवार, भ्रमर गीत. 183

षष्ठम दिवस. 224

यदुवंशियों को ऋृषियों का शाप, भगवान कृष् का उद्वव को उपदेश हंसोपाख्यान. 224

सप्तम दिवस. 259

परीक्षित मोक्ष.. 259

महर्षि मुक्त. 266

 

 

 

 

 

 

 

आरती

 

आरती सद्गुरुदेव नमामी पार ब्रह्म-प्रभु अन्तर्यामी ।।

अगुण अपार अलख अविनाशी। अचल विमल प्रभु सब उरवासी ।।

निर्गुण निर्विकार सुखरासी एक अरूप अलेख अनामी ।। 1 ।।

 

महिमा नेति नेति श्रुति गावें नित्य निरंजन सब बतलावें ।।

शेष शारदा पार पावें जय सच्चिदानंद अभिरामी ।। 211

 

वचन किरण तम मोह विनाशक ज्ञान सूर्य माया के शासक ।।

दिव्य दृष्टि के परम प्रकाशक ब्रह्मादिक सुर सेव्य नमामी ।। 3 ।।

 

जब तक कृपा तुम प्रभु करते। विधि हरिहर क्या भव से तरते ।।

असविचारि गुरु भक्ति जो करते। मिलते राम उन्हें सुखधामी ।। 4 ।।

 

गुरूवर चरण कमल की छाया। करती दूर ताप त्रय माया ।।

जब तक पूर्ण होवे दाया। मिलत नहीं शिव अन्तर्यामी ।। 5 ।।

 

भक्ति ज्ञान वैराग्य नियम के। रूप सकल इंद्रिय संयम के ।।

भूषण शम दम पंच सुयम के श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ मम स्वामी ।। 6 ।।

 

जीवन धन मंजुल निज जन के। अंकुश मद मतंग जन मन के ।।

शुचि पथ परमारथ पथिकन के। इक रस आनंद रूप नमामी ।। 7 ।।

 

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

 

शान्तिः शान्तिः शान्तिः

 

।। बोलो सद्गुरुदेव भगवान की जय ।।

 

 

 

 

 

 

 

श्रीमद्भागवत रहस्य

 

महर्षि मुक्त द्वारा श्रीमद्भागवत परमहंस संहिता के साक्षित्व में सप्तदिवसीय अध्यात्म निरूपण दिनांक 8 फरवरी 1969 से 24 फरवरी 1969 तक स्थान- झंडापुर, पोस्ट-बिहार, तहसील-कुंडा, जिला-प्रतापगढ़ (.प्र.) पर आधारित यह अनुपमेय और विलक्षण कृति महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचार समिति की अन्यतम उपलब्धि है।

 

भागवत का अर्थ होता है-भगवान। चूँकि इसमें भागवत के रहस्यों का उद्घाटन किया गया है, इसलिए प्रस्तुत साहित्य को श्रीमद् भागवत रहस्य नाम से अलंकृत किया गया है। भगवान के चार रहस्य हैं

 

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुण कर्मकः

तथैव तत्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।

 

यावानहं (मैं जैसा हूँ) - भगवान। मैं जैसा हूँ का भाव, मैं जैसा हूँ का रूप, मैं जैसा हूँ का गुण और मैं जैसा हूँ का कर्म। ये चार रहस्य-भगवान-के। इन रहस्यों को उजागर करना सिवाय संतों के अन्य किसी विद्वान या साधु संन्यासी के वश की बात नहीं है। इन रहस्यों का सम्यक् रूप से अपरोक्ष अनुभूति इस पुस्तक का प्राण है, इसलिए यह चेतन साहित्य है।

 

चतुःश्लोकी भागवत के माध्यम से इस तरह का निरुपण पहले कभी ना हुआ है और ना ही आगे होने की संभावना है। इसके अतिरिक्त इसमें भगवान नारद एवं राजा प्राचीनबर्हि संवाद पुरञ्जनोपाख्यान, गजेन्द्रोपाख्यान, ब्रह्मा स्तुति, उद्धव गोपी संवाद, हंसोपाख्यान आदि प्रसंगों के माध्यम से जीव-ईश्वर की एकता, कर्म, उपासना, ज्ञान, भक्ति, मन-माया-जगत आदि का चारों प्रमाणों से संसिद्ध निरुपण की अलौकिक छटा देखते ही बनती है जो कि कहीं और देखने-सुनने में नहीं आता। निरुपण शैली की सहजता एवं अकाट्य प्रमाणों से वेदान्त जैसे क्लिष्ट विषय भी जनसाधारण को हृदयंगम हो जाता है। यह प्रवक्ता का तपोबल एवं संयम है। यह एक चमत्कार है।

 

मैं इस सांगोपांग अनुपम कृति के प्रवक्ता महर्षि मुक्त के संबंध में इतना ही कहूँगा कि- 'आप प्रकट भये विधि बनाये।' ये अनिकेत अवधूत थे। किसी पंथ, सम्प्रदाय से सर्वथा निर्लिप्त। अविरल रूप से सत्य के सार्वभौम प्रचारक महर्षि मुक्त की साधना-तपस्या का साक्षी, इनका साहित्य ही है, जीवन पर्यन्त, भेद बुद्धि का त्याग करके सत्य का ही प्रचार-प्रसार किये। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की धारणा को धारण करके अपने लिये एक घास-फूस की कुटिया भी नहीं बनाई उन्होंने।

 

वे कहा करते थे कि फकीरी हमारी जागीर है और हमेशा हमारी मुट्ठी में है। इनका विश्वास था कि पंथ, सम्प्रदाय में आने से व्यक्ति की स्वतंत्रता छिन जाती है और वह अध्यात्म से कोसों दूर हो जाता है।

 

आज भी इनके लाखों की संख्या में समर्पित अनुयायी हैं लेकिन सभी पंथ, सम्प्रदाय से अलग-थलग एकदम स्वतंत्र

 

इनकी कृतियों में मुक्तानुभव भजन माला, भजन मुक्त लहरी, मुक्त दोहावली, मुक्तोद्गार, पैगाम--मुक्त आदि मौलिक रचनायें हैं। इन सभी रचनाओं में महर्षि मुक्त सूत्रावली अनुपम एवं अद्वितीय कृति है। इसमें उपनिषद्, श्रीमद्भागवत परमहंस संहिता, श्रीमद्भागवत गीता एवं रामायण के तत्वपरक आध्यात्मिक प्रसंगों की रचना की गई है, जिनकी संख्या लगभग पच्चीस हजार के करीब होगी जो विश्व मानव के लिए अनुपम धरोहर है। इन्हें प्रकाशित कराकर आप तक पहुँचाने का प्रयास जारी है।

 

श्रीमद्भागवत रहस्य का द्वितीय संस्करण आपको सौंपते हुए हमें अपार प्रसन्नता है। प्रकाशन में विलम्ब के लिए हमें खेद है। इस पुस्तक के प्रथम संस्करण में चौथे दिन के द्वितीय प्रहर की कथा कृष्ण जन्म का अंश अप्राप्त होने के कारण छूट गया था किन्तु अब वह प्राप्त हो गया है और उसे जोड़ दिया गया है जिससे पुस्तक की कमी पूरी होकर अब एक सांगोपांग कृति बन चुकी है।

 

प्रथम संस्करण में जिन महानुभावों का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यज्ञ रुप से सहयोग मिला है, उनकी लगन, श्रम और सहयोग स्तुत्य है। यह उन्हीं के भगीरथ प्रयास का सुफल है कि देव दुर्लभ सदुपदेश से परिपूर्ण कृति हम आपके समक्ष प्रस्तुत करने में समर्थ हुए हैं। वे सभी महानुभाव साधुवाद के पात्र हैं। समिति उनकी आभारी है।

द्वितीय संस्करण के संशोधन में श्री रूपेन्द्रनाथ तिवारी जी, एम.. (दर्शनशास्त्र, हिन्दी) का सहयोग अत्यंत प्रशंसनीय एवं सराहनीय रहा है। समिति के संरक्षक डॉ. सत्यानंदजी महाराज, जिनकी प्रेरणा एवं आशीर्वाद स्वरुप इस श्रम साध्य कार्य को हम साकार कर सके, समिति उनका चिर आभारी है।

 

नेचर ग्राफिक्स के संचालक भाई नितिन कुमार झा जी जिन्होंने ऐसे कठिन साहित्य को बड़ी लगन एवं सावधानीपूर्वक टंकण करके इसकी भाषा को शुद्ध एवं सुवाच्य बनाया है वे साधुवाद के पात्र हैं। हम उनके आभारी हैं।

 

हमारा पूरा-पूरा प्रयास रहा है कि कृति के प्रकाशन में त्रुटि अथवा अशुद्धि रह जाये फिर भी यदि कोई त्रुटि रह गई हो तो हमें क्षमा करें। समिति के इस प्रयास को विद्वतजन सराहेंगे और भक्त साधुजन मान्यता देंगे एवं जिज्ञासुगण अवगाहन करेंगे इन्हीं आशाओं के साथ, अलं !

 

आपका अभिन्न

 

(डॉ. प्रीतम मिश्रा)

   अध्यक्ष

महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति

केन्द्र-दुर्ग (..)

 

स्थान : रायपुर

दिनांक : 19 जुलाई 2016 आषाढ़, गुरु पूर्णिमा

 

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।। श्री गणेशायनमः ।।

।। श्री गुरुवेनमः ।।

 

नारायणोपनिषत्

 

अथ पुरुषो वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति गुनारायणात् प्राणो जायते। मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी। नारायणाद् ब्रह्मा जायते। नारायणात् रुद्रो जायते। नारायणाद् इन्द्रो जायते नारायणात् प्रजापतिः प्रजायते

 

नारायणाद्वादशादित्या सर्वे रुद्रा सर्वे वसवः सर्वाणि भूतानि सर्वाणि छन्दांसि नारायणादेव समुत्पद्यन्ते नारायणात्प्रवर्तन्ते नारायणे प्रलीयन्ते

 

अथ नित्यो नारायणः ब्रह्मा नारायणः शिवश्च नारायणः। शक्रश्च नारायणः। कालश्च नारायणः दिशश्च नारायणः विदिशश्च नारायणः। ऊर्ध्वं नारायणः अधश्च नारायणः। अन्तर्बहिश्च नारायणः।

 

नारायण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् निष्कलंको निरञ्जनो निर्विकल्पो निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो द्वितीयोऽस्ति कश्चित्। एवं वेद विष्णुरेव भवति विष्णुरेव भवति।

 

शांतिः ! शांतिः !! शांतिः !!!

 

 

 

 

प्रथम दिवस

भूमिका, महिमा एवं चतु:श्लोकी भागवत

 

18-2-1969, प्रातः 10.00 से 12.00 बजे तक

 

अनन्त नाम रूपों में अभिव्यक्त, अहमत्वेन प्रस्फुरित, महामहिम, स्वात्मस्वरूप सकल चराचर एवं समुपस्थित आत्मजिज्ञासुगण !

 

'उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्यवरान्निबोधत '

(कठो..)

 

अनादिकाल से अविद्या के घोर अंधकार में सोने वालों भव्य जीवो। 'उत्तिष्ठत'-उठो स्वस्वरूप भगवान आत्मा में जागो। किसी श्रेष्ठ महापुरुष श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु की शरण होकर अपना आत्म-कल्याण करो।

 

अनन्त जन्मों के पूर्वार्जित पुण्यों के उदय होने पर आज से यहाँ पर श्रीमद् भागवत, महापुराण परमहंस संहिता के आधार पर अध्यात्म निरूपण होने जा रहा है। जिस प्रकार मंदिरों में किसी मूर्ति की अध्यक्षता में भगवान की आराधना होती है उसी प्रकार श्रीमद् भागवत, उपनिषत, श्रीमद्भगवत गीता, श्री रामायण आदि शास्त्रों की अध्यक्षता में, उनके साक्षित्व में, सिद्धांतों द्वारा अध्यात्म निरूपण होता है।

 

आत्मजिज्ञासुओं ! आज इस पावन बेला में जो कुछ अध्यात्म निरूपण होगा वह सब श्रीमद्भागवत परमहंस संहिता के साक्षित्व में होगा। भागवत पुराण के माध्यम से होगा अर्थात् जो कुछ भी यहाँ कहा जायेगा उसे श्रीमद् भागवत पुराण समर्थन करेगा। इस पुराण की अलौकिक महिमा है। एक जन्म नहीं अनन्त जन्मों के जब पुण्य होते हैं तभी श्रीमद् भागवत पुराण अध्यात्म तत्व श्रवण करने का अवसर आता है। इसमें स्वस्वरूप स्थित श्री परमहंस स्वामी शुकदेव जी राजा परीक्षित की आत्म तत्व का दर्शन कराते हैं। इस पुराण में अनेक वेद मंत्रों सहित उनके तत्वों की सुंदर-सुंदर कथा, आख्यानों द्वारा प्रतिपादन एवं उपदेश हुआ है।

 

एवेद्ꣲ᳭  सर्वम् नारायणेवेद्ꣲ᳭  सर्वम् आत्मैवेद् सर्वम् ꣲ᳭  अहमेवेद् सर्वम। वासुदेवः सर्वमिति इत्यादि मंत्रों का उपदेश श्री स्वामी शुकदेव जी राजा परीक्षित को किए हैं।

 

 

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराष्ट्

तेने ब्रह्म हृदाय आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः

तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा,

धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ।।

(श्रीमद्भागवत 1/1/1)

 

धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां

वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्

श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीस्वरः

सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रुषुभिस्तत्क्षणात् ।।

(श्रीमद्भागवत 1/1/2)

 

निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्

पिवत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ।।

(श्रीमद्भागवत 1/1/3)

 

ये तीनों श्लोक श्रवण, मनन, निदिध्यासन के रूप में महर्षि व्यास जी प्रतिपादित किए गये हैं।

 

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।।

(वृहदा 4-5-6)

 

श्री भगवान व्यास जी श्रुति के इसी मंत्र को छंद के रूप में छंदबद्ध कर दिये हैं। यह आत्मा द्रष्टव्यः (देखने योग्य) अनुभव करने योग्य, श्रोतव्य:' सुनने योग्य एवं निदिध्यासितव्यः- निदिध्यासन करने योग्य है इसीलिए इस आत्म तत्व का विवेचन श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के सामीप्य में ग्रहण करना चाहिए।

 

हाँ जी-श्रवण, मनन, निदिध्यासन का इन श्लोकों में निरूपण हुआ है। तो इनका स्वरूप क्या है? देखो किसी भी मंत्र को समुचित ज्ञान के लिए मंत्र समझने के लिए, मंत्र को तीन तरह से परखना चाहिए। अर्थानुसंधान द्वारा भावानुसंधान द्वारा और लक्ष्यानुसंधान द्वारा। वृत्ति कहो या मन कहो ये दोनों परस्पर एक ही भाव के द्योतक हैं। संत समाज में इसी को 'सुरति' कहते हैं साधारण भाव में मन कहते हैं। देखो समझो विषय (डंडे का उदाहरण देकर विषय समझते हैं।) डंडे का जो आकार है यह हुआ डंडे का अर्थ और इसमें जो वृत्ति की एकाग्रता, उसे कहते हैं अर्थानुसंधान। लकड़ी जो है वह डंडे का भाव है। इसमें जो वृत्ति की एकाग्रता, उसे कहते हैं भावानुसंधान और इसका लक्ष्य क्या है? चेतन तत्व भगवान आत्मा। इसमें जब वृत्ति एकाग्र हो जाय तो उसे कहते हैं लक्ष्यानुसंधान

 

श्रवणं शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि

निदिध्यासं लक्षगुणमनन्तं निर्विकल्पकम् ।।

(विवेक चूड़ामणि .नि. 365)

 

श्रवण की अपेक्षा मनन करने में सौ गुना अधिक फल होता है। मनन की अपेक्षा निदिध्यासन करने में एक लाख गुना फल होता है। निदिध्यासन की अपेक्षा चित्त का निर्विकल्प हो जाना-इसका फल अनन्त गुना होता है।

 

धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां

वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् ।।

श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः

सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ।।2।।

 

यह मनन है।

 

निगम कल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्

पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ।।3।।

 

यह निदिध्यासन है।

 

देखो-बालक श्रृंगी ऋषि ने अपने पिता के गले में सर्प डालने के अपराध में राजा परीक्षित को श्राप दिया कि आज के सातवें दिन तक्षक जाति का सर्प आकर तुझे डस लेगा। राजा परीक्षित राज्य एवं प्राण का मोह त्याग कर उत्तराभिमुख हो (उत्तर दिशा की ओर मुँह करके) व्याकुल दशा में बैठ गया और उसे यह निश्चय हो गया कि आज के सातवें दिन अवश्यमेव मृत्यु हो जायेगी। इसी कारण उसके हृदय में पूर्ण वैराग्य जाग्रत हो गया। मछली की तड़प की नाई उसका मन आत्म तत्व को जानने के लिए उत्कंठित हो गया कि मेरा आत्म कल्याण कैसे हो? और यह भी सात ही दिन में। कारण? अब उसे सात ही दिन जीना है।

 

 

अत्रिर्वसिष्ठश्च्यवनः शरद्वानरिष्टनेमिभृगुरङ्किराश्च

पराशरौ गाधिसुतोऽथ राम उतध्य इंद्रप्रमदेध्मवाहौ ।।

मेधातिथिर्देबल आष्टिषेणो भारद्वाजो गौतमः पिप्लादः

मैत्रेय और्वः कवषः कुम्भयोनिद्वैपायनो भगवान्नारदश्च

अन्ये देवर्षिब्रह्मर्षिवर्या राजर्षिवर्या अरुणादयश्च

नानार्षेयप्रवरान्समेतानभ्यर्च्य राजा शिरसा ववन्दे ।।

(श्रीमद् भागवत 1/19/9-10-11)

 

उस समय बड़े-बड़े देवर्षि, ब्रह्मर्षि, राजर्षियों का शुभागमन, जहाँ राजा परीक्षित बैठे थे हुआ। यह निर्विवाद सिद्धांत है, यह ईश्वरीय विधान है कि जिस समय आत्म जिज्ञासु को मछली के समान तड़प यानी आत्म जिज्ञासा जागृत होती है अर्थात् उसे आत्मतत्व जानने की व्याकुलता होती है, उसका चित्त जब संसार से पूर्णतया उपराम हो जाता है तब महापुरुषों का दर्शन स्वयमेव होता है। स्वयं वे दर्शन देंगे, उसका कल्याण करने हेतु जाते हैं और इस तरह का समागम संसार से तरने का नोटिस है। श्रीमद् भागवत के दसवें स्कन्ध के उत्तरार्द्ध में महाराजा मुचकुंद जी भगवान की स्तुति करते हैं-

 

भवापवर्गोभ्रमतो सदा भवेज्जनस्य तहांत्त्युत सत्समागमः

सत्सङ्गगमो यर्हि तदैव सद्गतौ परावेरेरो त्वयि जायते मतिः

(श्रीमद् भागवत 10/51/54)

 

हे अच्युत ! हे प्रभो ! भगवान ! जब जीवों के अपवर्ग अर्थात् मोक्ष होने को होता है, जब आप संसार से उनके उद्धार की इच्छा करते हैं तो अपने भागवत (संतों) का दर्शन, उनका समागम उन्हें आप स्वयं ही करा देते हैं। अपवर्ग का अर्थ मोक्ष होता है।

 

का अर्थ हुआ नहीं, वर्ग का अर्थ हुआ

 

जानते ही हो व्याकरण में वर्ग अर्थात्

 

वर्ग अर्थात् इसी तरह वर्ग का अर्थ हुआ

 

हाँ जी, का अर्थ पापं नास्ति। जब पाप नहीं तो फिर पुण्य भी नहीं। पुण्य पाप दोनों गए। पुण्यं पापं नास्ति

 

का अर्थ फलं नास्ति। फल की आकांक्षा नहीं।

 

का अर्थ बंधनं नास्ति। जब फल की आकांक्षा नहीं तो फिर बंधन कैसे? किए कर्मफल कहाँ।

 

का अर्थ - भयं नास्ति। कर्म फल ही तो बंधन का कारण है, जिससे सुख-दुःख मिलता है। जब बंधन ही नहीं तो भय किसका

 

का अर्थ- मानं नास्ति। मान नहीं। जब मान नहीं तो अपमान भी नहीं। तो जहाँ वर्ग हो उसे कहते हैं अपवर्ग।

 

अरे भाई ! बंधन के ही अंदर मान-अपमान है। जहाँ पुण्य पाप नहीं वहाँ उसका फल क्या होगा और जब फल ही नहीं तो बंधन किसका होगा? और जब बंधन नहीं तो फिर भय किसका। इसी को कहते हैं अपवर्ग अर्थात् मोक्ष। जिस समय किसी को अतीव आत्म जिज्ञासा, आत्म कल्याण की भूख प्रज्ज्वलित हो जाती है तो सर्वप्रथम संतों का दर्शन होता है और संत समागन से उसका मोक्ष हो जाता है।

 

जिस समय राजा परीक्षित अपने आत्म कल्याण की भावना में ध्यान मग्न था उसी समय ध्यान टूटते ही देखता है कि झुण्ड के झुण्ड महात्मागण रहे हैं, जिससे कि राजा परीक्षित का आत्म कल्याण हो। महात्मागण जब राजा परीक्षित के पास गए तब राजा उठा और उन सबको अभिवादन, दण्ड का प्रणाम किया तथा सबका पूजन किया और सबके सन्मुख हो प्रार्थना किया का राजा निवेदन करता है कि हे प्रभो! मेरा जीवन सात ही दिन शेष है। थोड़ा का समय है। इस थोड़े समय में मेरा आत्म कल्याण कैसे होगा? मुझसे अज्ञानतावश अनिष्ट हो चुका है। पंच वर्षीय बालक श्रृंगी ऋषि के श्राप से आज से सातवें दिन तक्षक जाति का सर्प आकर मुझे डस लेगा। मेरी मृत्यु तो सामने खड़ी है। कि मुझे उपदेश करिये जिससे कि मेरा आत्म कल्याण हो।

 

राजा परीक्षित ने अपने आत्म कल्याण की जिज्ञासा भगवान व्यास, वामदेव, जा वसिष्ठ महर्षिगणों के समक्ष रखी, परन्तु उस समय ऋषियों को कोई उपायको नहीं सूझा। किसी की बुद्धि काम नहीं आई। उसी समय सोलह वर्षीय व्यासनंदन श्री शुकदेव स्वामी दिगम्बर रूप में, अवधूत वेश में, श्याम रंग, प्रकीर्ण जटाएँ, लम्बी-लम्बी भुजाएँ आजानुबाहु निजानंद में मस्त स्वरूप आत्मा में लीन, मुस्कराते हुए उस सभा में जहाँ ये महर्षिगण बैठे थे, आए। राजा परीक्षित ने यही जिज्ञासा पूर्ण प्रश्न भगवद्धर्म के परिज्ञाता भगवान वादरायणि स्वामी शुकदेवजी के समक्ष रखा कि हे प्रभो! मेरा उद्धार कैसे हो? मैं आर्त हूँ। आज से सातवें दिन ऋषि कुमार के शाप से तक्षक मुझे डस लेगा। मैं मृत्यु के निकट हूँ। इस दशा में मेरा आत्म कल्याण कैसे होगा? इस संसार सागर से मेरा उद्धार कैसे होगा? यहीं से श्री स्वामी शुकदेवजी और राजा परीक्षित का संवाद शुरू होता है।

 

एवमाभाषितः पृष्टः राज्ञा श्लक्ष्णया गिरा

प्रत्यभाषत धर्मज्ञो भगवान बादरायणिः ।।

(श्रीमद्भागवत 1/19/40)

 

इस प्रकार सम्राट परीक्षित की जिज्ञासा देखकर भगवद्धर्म के परिज्ञाता भगवान बादरायणि श्री स्वामी शुकदेवजी बोले-

 

वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितो नृप

आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ।।

(श्रीमद् भागवत 21/1 / 1)

 

हे राजन! एष ते प्रश्नः वरीयान् जगत के जीवमात्र के कल्याण के लिए यह तुम्हारा प्रश्न महान श्रेष्ठ एवं आत्म वित्सम्मत है। यानी बड़े से बड़े आत्मवेत्ता पुरुष भी तुम्हारे इस प्रश्न का समर्थन करते हैं। राजा परीक्षित का यह आत्मपरक प्रश्न कि किस तरह संसार सागर से उद्धार हो, जीवमात्र का कल्याण कैसे हो? श्री स्वामी शुकदेवजी के समक्ष रखा गया।

 

बड़े-बड़े आत्मनैष्ठिक विद्वान महात्माओं के समक्ष यदि कोई प्रश्न करना हो तो यही एकमात्र प्रश्न करना चाहिए कि प्रभो! मैं कौन हूँ? यथार्थ में यह प्रश्न सुंदर एवं मौलिक है। हालांकि यह प्रश्न सूक्ष्म है और जैसी आशा की जाती है कि इसका उत्तर भी छोटा होगा, परन्तु ऐसा नहीं है। उत्तर इतना विस्तृत है कि जीवन पर्यन्त भी इस प्रश्न पर विवेचन हो फिर भी वह अनंत है। इस छोटे से प्रश्न में अनेक सारगर्भित समाधान निहित हैं। इस संदर्भ में एक वृद्धा कुमारी का दृष्टांत सुनो- कैसे एक छोटे से प्रश्न में अनेक समस्याएँ भरी रहती हैं।

 

किसी समय एक ब्राह्मण कुमारी के शादी योग्य होने पर उसके विवाह हेतु वर ढूँढ़ा गया। दैवयोग-कन्या का अभाग्य, विवाह के पूर्व ही चुना हुआ वर मर गया। तब गाँव के लोग उसके लिए दूसरा उपयुक्त वर ढूँढ़ने लगे, परन्तु अभाग्य कन्या का कि कोई भी ढूँढ़ा गया वर उसे प्राप्त हुआ। विवाह के पूर्व ही वह मर जाता था। समय बीत गया, वह कुमारी अब कुमारी रही, चालीस वर्ष की वृद्धा हो गई। अब कौन शादी करे। विवाह हुआ। एक बार कोई महात्मा उसे उपदेश कर गए कि तू इन्द्रदेव की आराधना कर, तेरे भाग्य फिर सकते हैं। आराधना से इन्द्रदेव प्रसन्न होकर जब वरदान देने के लिए प्रगट होंगे तो उनसे वरदान मांगना कि 'मे पुत्राः स्वर्णपात्रे भुञ्जीरन्।' मेरे पुत्र स्वर्ण पात्र में खीर का भोजन करें।

 

वह वृद्धा कुमारी श्री इन्द्रदेव की बड़ी भक्ति भाव से आराधना की। कुछ साल बाद उसकी तपस्या फलवती हुई। इन्द्रदेव प्रगट हुए और कहे कि देवि ! वर वृणीश्व-वर मांगो। वह ब्राह्मणी कहती है कि 'मे पुत्राः स्वर्णपात्रे भुञ्जीरन् ' मेरे पुत्र स्वर्णथाल में भोजन करें और यहाँ यह हाल कि वृद्धा कुमारी के विवाह का ही पता नहीं, फिर पुत्र कहाँ, धन कहाँ। इन्द्रदेव भी चक्कर में पड़े। वृद्धा कुमारी के विवाह का ही पता नहीं, परन्तु सब कुछ मांग लिया। इन्द्रदेव तथास्तु कहकर अन्तर्द्धान हो गए। इन्द्रदेव की कृपा से वृद्धाकुमारी को कौमार्यपन, सुंदर षोडसी रूप मिला। शादी हुई, धनधान्य से सम्पन्न हुई और पुत्र लाभ हुआ क्योंकि वर ही ऐसा मांगा गया था। कहीं कंगाल का पुत्र भी सोने की थाली में भोजन करेगा? इन्द्रदेव को उन्हें सम्पन्न परिवार बनाना पड़ा। तब यह वरदान सत्य हुआ। इसी प्रकार प्रश्न तो छोटा-सा है कि 'मैं कौन हूँ?'

 

'अतः पृच्छामि संसिद्धिं योगिनां परमं गुरुम्

पुरुषस्येह यत्कार्यं म्रियमाणस्य सर्वथा ।।

(श्रीमद् भागवत 1/19/37)

 

श्री चरणों के सान्निध्य में पड़े शिष्य को गुरुओं से यही उपदेश, यही गुप्त ज्ञान प्राप्त करना चाहिए कि प्रभो! मेरा आत्म कल्याण कैसे हो?

 

वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितो नृप

आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ।।

 

राजन् ! तुम्हारा प्रश्न बहुत सुंदर सारगर्भित एवं मौलिक है। इससे तो तुम्हारा ही नहीं वरन् जीवमात्र का कल्याण होगा। तुम चिंता करो। तुम्हें तो अभी सात दिन जीना है। वस्तुतः जब आत्मतत्व को जानने की प्रबल इच्छा हो तो सात दिन का भी समय बहुत अधिक है। इसके लिए तो दो घड़ी का ही समय पर्याप्त है और यदि आत्म कल्याण की जिज्ञासा प्रबल नहीं है तो सात दिन क्या एक हजार वर्षों का समय भी अधिक नहीं है। आत्म जिज्ञासा विहीन पुरुषों का उद्यम वैसा ही है जैसे कुत्ते की पूँछ। कुत्ते की पूँछ उसके भी काम की नहीं और उसे काट दो तो हानि भी नहीं। इसी तरह बकरी के गले की निर्दुग्ध स्तन, उससे दूध तो निकलता नहीं व्यर्थ ही लटकता रहता है। आत्म जिज्ञासा के बिना वेदों का अध्ययन भी ऐसा ही प्रयास है। यदि आत्म जिज्ञासा प्रबल है तो दो घड़ी जीवन ही पर्याप्त है। जैसे राजा खट्वांग को जिन्हें दो घड़ी के उपदेश से ही आत्मलाभ हुआ था। वे राजर्षि सूर्यवंश में हुए थे। उनका सारा जीवन ऐश-आराम, आमोद-प्रमोद आदि विषयों में ही बीत गया। जब जीवन सिर्फ दो घड़ी शेष रहा तो उन्हें ब्रह्म ज्ञान की उत्कट अभिलाषा हुई। श्री भगवान वामदेव की कृपा से राजा को बोध हुआ और वह संसार सागर से तर गया। इससे सिद्ध है कि आत्म कल्याण के जिज्ञासुओं के लिए समय का प्रतिबंध नहीं है। बशर्ते कि आत्म कल्याण की भावना, जिज्ञासा प्रबल हो। राजा परीक्षित की प्रबल जिज्ञासा थी कि मेरा आत्म कल्याण कैसे हो? इसलिए श्री शुकदेव स्वामी के प्रसाद से उसका आत्म कल्याण हुआ।

 

श्रीमद् भागवत के द्वितीय स्कंध में भगवान के विराट स्वरूप का वर्णन है। साथ ही साथ सृष्टि के सृजन का और भगवान के अवतार आदि का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। द्वितीय स्कंध के नवें अध्याय में ब्रह्माजी को भगवान नारायण द्वारा ब्रह्मतत्व के उपदेश का वर्णन है जिसे चतुः श्लोकी भागवत कहते हैं। यही परम उपदेश बीज मंत्र है। यह पावन कथा अब प्रेम से सुनो। आत्म जिज्ञासुओं! दोनों समाज प्रकृति एवं पुरुष जो जहाँ बैठे हो ध्यान से सुनो- आनंद लो।

 

सृष्टि के आदि में श्री शेषशायी भगवान नारायण के नाभि से कमल उत्पन्न हुआ और उस कमल में श्री ब्रह्माजी हुए। इसी से इनका नाम कमलोद्भव है- कमल से पैदा हुए हैं। श्री ब्रह्माजी ने दृष्टि फैलायी, कमल के चारों तरफ उन्हें सिर्फ जल ही जल दिखा। जल ही जल अपने चारों तरफ देख के कुछ निश्चय कर सके कि वे कहाँ हैं। उनको जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि मैं कौन हूँ, कहाँ से उत्पन्न हुआ हूँ? तो वे कमलनाल में चक्कर लगाने लगे, परन्तु वर्षों बीतने पर भी जब वे अपने आधार का पता लगा सके तो हारकर कमल में बैठकर सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए? एकाएक उन्हें प्रणव () नाद (शब्द) सुनाई पड़ा और '', '' ये दो अक्षर तीन बार सुनाई पड़ा-तप, तप, तप सुने तो वे कमल में ही आसन जमा हजारों वर्ष तपस्या किए। उस तप से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी के समक्ष भगवान नारायण प्रगट हुए। ब्रह्माजी ने स्तुति की। उससे प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने ब्रह्माजी के प्रति आत्म तत्व का उपदेश किया। वस्तुतः इसी चतुःश्लोकी भागवत में भगवान नारायण द्वारा ब्रह्माजी को जो उपदेश हुआ है यही सम्पूर्ण भागवत है। इसी की व्याख्या, उपदेश श्री स्वामी शुकदेवजी राजा परीक्षित को किए हैं। बाद में श्री स्वामी शुकदेवजी के पिता महर्षि व्यासजी ने चतुःश्लोकी भागवत को आधार मानकर श्रीमद् भागवत पुराण बड़े ग्रंथ का निर्माण किया है।

 

वेदान्तवेदसुस्नाते गीताया अपि कर्तरि

परितापवति व्यासे मुह्यत्यज्ञानसागरे ।।

(श्रीमद् भागवत महा. 2/72)

 

तदा त्वया पुरा प्रोक्तं चतुः श्लोकसमन्वितम्

तदीयश्रवणात्सद्यो निर्बाधो बादरायणः ।।

(श्रीमद् भागवत महा. 2/73 )

 

महर्षि व्यासजी वेदों की संहिता बनाए, ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थों की भी रचना किए, ऋचायें लिखी, श्री महाभारत ग्रन्थ जिसमें सवा लाख श्लोक हैं, बनाया। इसमें गीता भी जाती है। इन सब संहिताओं का निर्माण किया और अपने शिष्यों को पढ़ाते रहे, परन्तु इतने पर भी उनके चित्त को शांति मिली। चित उपराम हुआ। वे बोधवान नहीं हुए। अज्ञान सागर में डूबे रहे।

 

भैया ! बुद्धि का व्यापार दूसरी चीज है! वेदों का सुनना सुनाना दूसरी बात है। परन्तु बोध प्राप्त करना, आत्म तत्व प्राप्त करना अलग चीज है। दर्शन, ब्रह्मसूत्र आदि की रचना करने पर भी जब श्री व्यासजी का चित्त शांत हुआ तो वे सरस्वती नदी (शम्याप्रास) के तट पर (यह नदी हिमालय प्रदेश में है) खिन्न चित्त से बैठ गए। श्री व्यास जी ने अपनी इस अशांति को नारदजी के समक्ष रखा। उस समय देवर्षि नारद ने श्री व्यास जी के समक्ष इसी चतुःश्लोकी भागवत का प्रतिपादन किया। जिसे सुनकर महर्षि व्यास जी का चित्त प्रशांत हुआ, अज्ञान का नाश हुआ एवं वे निर्बाध हो गए।

 

तदा त्वया पुरा प्रोक्तं चतुःश्लोकसमन्वितम्

तदीयश्रवणात्सद्यो निर्बाधो बादरायणः ।।

 

जब भगवान नारद ने बादरायण (व्यासजी) को चतुःश्लोकी भागवत सुनाया, तब 'तदीय श्रवणात्सद्यो' अरे ! सुनते ही महर्षि व्यास जी निर्बाध अर्थात् संशय-विपर्यय रहित हो गए। निस्संकल्प हो गए अज्ञान का मूलोच्छेद हो गया। चित्त को परम शांति मिली। श्री शुकदेव जी ने यही चतुःश्लोकी भागवत। राजा परीक्षित को सुनाया था। यही विस्तार होने से अट्ठारह हजार श्लोकों का महापुराण ग्रन्थ बना। यही इसका प्रसंग है। अब हम सबसे यही कहते हैं कि आत्म कल्याण चाहो तो बिना कान के सुनो और बिना बुद्धि के समझो। स्वामी जी ! आप तो बड़ी अटपट बात बताते हैं, कहीं बिना कान के सुना जाएगा और बिना बुद्धि के समझा जाएगा? हाँ भाई ! यही तो हम बता रहे हैं। कान से जो सुनाई पड़ता है और जो कान से सुनाई नहीं पड़ता, कान के सुनने और सुनने को जो सुनता है, वह किस कान से सुनता है? बुद्धि के समझने और समझने दोनों को जो समझता है वह किस बुद्धि से समझता है? जो कान का कान है, बुद्धि की बुद्धि है, यारों! उसे कान क्या सुनेगा, बुद्धि क्या समझेगी। हाँ, चीज यही है। जो मन, बुद्धि, वाणी से परे है, उसको मन, बुद्धि वाणी से कैसे समझोगे? तो बस, जैसे बैठे हो, मस्त रहो।

 

कोई भी विद्वान संन्यासी जब अपने शिष्य मंडल को वेदांत का पाठ पढ़ाते हैं, उस समय गुरु परम्परा से गुरुओं का स्मरण करके वेदाध्ययन (वेदांत पाठ) कराते हैं। हम भी इसी गुरु परम्परा से आदि गुरुओं का स्मरण करते हुए वेदांत का निरूपण करेंगे।

 

नारायणं पद्मभवं वसिष्ठं शक्तिं तत्पुत्र पराशरंच,

व्यासं शुकं गौड़पदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यम्

श्री शंकराचार्यमथास्य पद्यपादं हस्तामलकं शिष्यम्

तं त्रोटकं वार्तिककारमन्यानस्मद् गुरुन सन्ततमानतोऽस्मि ।।

 

आत्मज्ञान के प्रथम आचार्य भगवान नारायण हैं। इनके बाद पद्मोद्भव (श्री ब्रह्मा जी) हुए। उनके शिष्य हुए श्री गुरुदेव वसिष्ठ। उनके शिष्य हुए महर्षि शक्ति और उनके शिष्य हुए पराशर। फिर इनके शिष्य हुए श्री व्यासजी और फिर शुकदेव स्वामी। जिनके शिष्य श्री गौड़पादाचार्य। उनके शिष्य श्री गोविंदपादाचार्य और इनके श्री आद्य जगद्गुरु भाष्यकार शंकराचार्य। उनके चार प्रधान शिष्य हुए हैं- पद्मपादाचार्य, हस्तामलकाचार्य, सुरेश्वराचार्य और त्रोटकाचार्य। इसी तरह गुरु परम्परा से अन्यान्य अध्यात्मतत्व के ज्ञाता श्रेष्ठ गुरु हुए हैं वे सभी आत्मरत, आत्मवित्, कृतकृत्य पद प्राप्त आनंदस्वरूप हुए हैं। भगवान नारायण से आदि लेकर जितने भी आज तक गुरु हुए हैं और भविष्य में होंगे, इन सब गुरुओं को हम अपने हृदय से स्मरण कर वेदांत का पाठ आरंभ करते हैं।

 

श्री भगवनानुवाच -

 

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदङ्गं गृहाण गदितं मया ।।

 

विज्ञान संयुक्तं तदङ्गं सरहस्यं मे परमगुह्य ज्ञान गृहाण ।।

 

हे ब्रह्मन् ! विज्ञान संयुक्त साङ्गोपाङ्ग क्या है? रहस्य क्या है? परम गुह्य क्या है। सूत्र रूप में इन सबकी व्याख्या की गई है।

 

'मैं' शरीर नहीं, आत्मा हूँ-यह है ज्ञान।

 

'मैं' सर्व हूँ-यह है विज्ञान

 

'मैं' हूँ-यह है परमगुह्य ज्ञान।

 

शरीर नहीं, मैं आत्मा हूँ, इसका बोध होना ज्ञान और 'मैं' हूँ यह परमगुह्य ज्ञान है। देखो-जिस शब्द के साथ परम लगता है वह अपेक्षा रहित होता है। परम वैराग्य, परम पद, परम स्नेह, परम समाधि, परमानंद, परम सुख ये सब अपेक्षा रहित हैं।

 

ज्ञानं परमगुह्यं में यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदङ्ग गृहाण गदितं मया ।।

 

भगवान कहते हैं- यह जो मेरा परमगुह्य ज्ञान है इसको ग्रहण करो। अरे ! मैं जो कहता हूँ उसको जानो, आत्मतत्व का अनुभव करो। यह अनुपम है। सम्पूर्ण अंगों के सहित ग्रहण करो। साङ्गोपाङ्ग क्या है? वेदांत के छः अंग हैं।

 

उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फले

अर्थवादपपत्तिं लिंङ्गं तात्पर्य निर्णये ।।

 

उपक्रमोपसंहार, अपूर्वता, अभ्यास, फल, अर्थवाद और उपपत्ति

 

1. उपक्रमोपसंहार- जिस ब्रह्मतत्व का प्रपिादन किसी ग्रन्थ के अथवा विद्वान महान पुरुषों के भाषण आदि में किया गया है उसी का प्रतिपादन अंत में किया जाए। उसे उपक्रमोपसंहार कहते हैं।

 

2. अपूर्वता- 'नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।' नहीं है ज्ञान के समान पवित्र कोई दूसरा पदार्थ। यह अपूर्वता है।

 

3. अभ्यास- अनेकानेक सुंदर-सुंदर युक्तियों द्वारा प्रतिपाद्य विषय के पुनः-पुनः निरूपण करने का नाम अभ्यास है।

 

4. फल- 'ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ' देव को जानकर पंचक्लेश और अष्टपाश से जीव छूट जाता है। यह फल है।

 

5. अर्थवाद-

 

कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुंधरा पुण्यवती येन

अपार संवित्सुखगारेऽस्मिन् लीने परे ब्रह्मणियस्य चेतः ।।

स्नातं तेन समस्त तीर्थ सलिले दत्तापिसर्वावनिर्यज्ञानां

कृतं सहस्त्रमखिलं देवाश्च संपूजिताः

संसाराच्च समुद्धता स्वपितरस्त्रैलोक्य पूज्योऽप्यसौ

यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि स्थैर्यं मनः प्राप्नुयात् ।।

 

यह अर्थवाद है।

 

6. उपपत्ति - वासुदेवः सर्वमिति। यह उपपत्ति है।

 

जिस विद्वान महात्मा के उपदेशों में छः अंग नहीं रहेंगे तो जिज्ञासु को संशय-विपर्यय रहित पूर्ण रूप से आत्मतत्व का बोध नहीं होगा। इसीलिए यहाँ की कथा में इन छः अंगों का ध्यान रखा जाता है। ज्ञान निरूपण में छह अंगों का समावेश यथास्थान होता रहता है। जिसने अपने आपको जान लिया, आत्मतत्व का साक्षात्कार कर लिया। वह अष्टपाश, पंचक्लेश से छुटकारा पा जाता है। यह वेदांत का फल है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश ये जीव के पंच क्लेश हैं और घृणा, शंका, भय, लज्जा, निंदा, कुल, शील तथा जाति ये जीव के अष्टपाश हैं। असत को सत, चेतन को जड़ और दुःख को सुख यानी साढ़े तीन हाथ के शरीर को आत्मा मानना, यही अविद्या है। द्रष्टा और दृश्य के धर्मों को एक मानना यही अस्मिता है। इष्ट पदार्थ और वह जिसके द्वारा प्राप्त हों, दोनों के प्रति जो आसक्ति है, यही राग है और दोनों के प्रति जो घृणा है, यही द्वेष है। अनादिकालीन परम्परा से जिस मृत्यु प्रवाह से बड़े-बड़े विद्वान भी डरते हैं यही अभिनिवेश है। पंच क्लेश एवं अष्ट पाश से वही छुटकारा पा सकता है, जिसने अपने आप भगवान को पहिचाना है। यही वेदांत का फल है।

 

आत्मतत्व के विचार में यदि एक क्षण भी मन लग जाए, स्थिर हो जाए तो समस्त तीर्थों का स्नान उसने कर लिया। हजारों गौवों के दान का फल प्राप्त कर लिया, उसके पितरों का उद्धार हो गया। हजारों बार अश्वमेधादिक यज्ञ कर चुका, त्रैलोक्य का पूज्य हो चुका। अब जिसका चित्त परब्रह्म में लीन हो गया है उसका क्या फल है, उसकी क्या महिमा है? उसका कुल पवित्र हो गया। जननी जो माता है वह कृतार्थ हो गई, वसुंधरा जो पृथ्वी है वह ऐसे आत्मदर्शी को पाकर पुण्य रूप हो गई। इसको कहते हैं अर्थवाद। और उपपत्ति- 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन।' 'वासुदेवः सर्वमिति ' भगवान आत्मदेव से एक तिल भर भी भिन्न नहीं है। एक ही चेतन परमात्मा है। इसके सिवाय कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं। वेदांत के चार अनुबंध होते हैं- अधिकारी, विषय, संबंध और प्रयोजन।

 

जिसको अपने आत्म कल्याण के लिए मछली के समान तड़प हो, आत्म तत्व को जानने की, प्राप्त करने की प्रबल जिज्ञासा हो वही ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त करने का अधिकारी है। सर्व भगवान है, एक तृण भी भगवान से विलग नहीं, यही प्रतिपाद्य विषय है। प्रतिपादित विषय और उसका प्रतिपादक ग्रन्थ यही प्रतिपाद्य प्रतिपादक भाव संबंध है। आत्मतत्व का पूर्ण रूपेण साक्षात्कार करा देना यही वेदांत ग्रन्थ का प्रयोजन है। हाँ, जी! चलो आगे-

 

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदङ्ग गृहाण गदितं मया ।।

 

भैया ! परमगुह्य ज्ञान पर पहले प्रकाश डालेंगे नहीं तो विषय समझ में नहीं आवेगा।

 

कोई व्यक्ति जब कभी किसी महापुरुष के पास जाता है तो (चाहे शिष्टाचार के ही नाते कहता हो) कहता है कि भगवान! आप तो परम ज्ञानी हैं और में अज्ञानी हूँ, तो महात्मा कहते हैं कि प्यारे ! यदि तू वस्तुतः अज्ञानी होता अपने को अज्ञानी और मुझे ज्ञानी कैसे कहता? जैसे कोई व्यक्ति कहे कि हर जा, मैं पागल हूँ तो क्या हम-तुम उसे पागल कहेंगे? जबकि उसे अपन पागलपन का ज्ञान है तो फिर वह पागल कैसे? इसी तरह जब वह व्यकि अपने को अज्ञानी कहता है तो वस्तुतः क्या वह अज्ञानी हुआ? अपने आपक अज्ञानी कहता है इससे यही सिद्ध होता है कि ज्ञान का स्वरूप जानकर अपने 'मैं' में अज्ञान को आरोपित करता है। वास्तव में तू अज्ञानी नहीं जबकि तुझे ज्ञान और अज्ञान दोनों का ज्ञान है। इसलिए तू स्वयं ज्ञान स्वर भगवान आत्मा है। अच्छा, ज्ञान, अज्ञान और इससे परे परम गुह्य ज्ञान।

 

मैं अमुक हूँ-अज्ञान, 'मैं' हूँ-ज्ञान, दोनों को जो जानता है उसे कहते परमगुह्य ज्ञान। नोट करो-

 

मैं अमुक हूँ-प्रगट ज्ञान, 'मैं' हूँ, गुप्त ज्ञान, इन दोनों प्रगट ज्ञान और गु ज्ञान के परिज्ञाता (जानने वाले) को परम गुह्य ज्ञान कहते हैं।

 

ये सब चीजें नारायण भाव में, नारायण द्वारा ही निकल रही है। अब कसर तो नहीं रही, हृदय देश के भाव का हृदय देश से ही अनुभव हो सक है। जहाँ समझने की कोशिश किया तो सिर्फ साहित्य ही हाथ लगेगा। यहाँ आत्मतत्व का निरूपण, तत्व दर्शन हृदय से प्रवाहित हो रहा है और इसे से ही ग्रहण करो। यहाँ पर नारायण तत्व का निरूपण हो रहा, साहित्य निरूपण नहीं। समझो विषय- वेदांत का क्या स्वरूप है? वेद का अर्थ होता जानना। जिसको जानकर फिर जानना बाकी रहे, उसे कहते हैं वेदांत। जान का अंत हो जाना, यही वेदांत है।

 

आत्म तत्व 'मैं' हूँ के स्वरूप का वर्णन किया जा रहा है। उसी तत्व का प्रतिपादन हो रहा है। भैया! यह बुद्धि का विषय नहीं है। यह जो वेदांत्त है वस्तुतः भगवान आत्मा का ही कथन है। इसको वही कह रहा है और वही अनेकानेक रूप से सुन रहा है। यह तत्व बुद्धिगम्य नहीं है। यदि ' श्री भगवानुवाच' को 'अहं उवाच' कहें तो गलत होगा। बस ! मैं अमुक हूँ, यह प्रगट ज्ञान है और 'मैं' हूँ, यह गुप्त ज्ञान है। अब इन दोनों का जो ज्ञान, वही परम गुह्य ज्ञान है। देखो-अभी अनुभव करो- समझो विषय को, मैं अमुक हूँ, इस अमुक भाव को जानकर ही तो कहोगे कि वैसे ही बिना मतलब फालतू कह दोगे। बिना जाने कैसे कहोगे। अजी! जब वह अपने 'मैं' पर अमुक थोपेगा तो उसे जानकर ही तो कहोगे कि मैं देह हूँ आदि। उसे समझा है, परखा है, माना है तभी कहता है कि मैं देह हूँ, मैं संसारी जीव हूँ। अब देखो-इसमें 'मैं' अछूता है, अलग है, 'मैं' पर कोई कलङ्क नहीं है।

 

जितने यहाँ पर बैठे हो, इसे ठीक तरह से हृदयङ्गम कर लो। यहाँ पर कोई पंथ-पंथाई, मजहब या सभा सोसायटी की बात नहीं है। इनके दायरे के बाहर आओ। यहाँ पर कोई साम्प्रदायिक चीज नहीं बताई जा रही है। हम तो हिन्दुओं को ही नहीं, वरन् मुसलमान, जैन, ईसाई, वैष्णव, शैव सभी को उपदेश करते हैं। इन दायरों में क्यों पड़े हो? अरे ! मैं स्वयं अपने को कुछ मानकर ही तो इन दायरों में पड़ा हूँ। अरे राम, राम! बाहर जगत से संबंध तोड़कर आत्म जगत में आओ। बाह्य जगत को छोड़कर मैदान में आओ। युनिव्हर्सल टुथ (सार्वभौम सिद्धांत) सारे विश्व का एक होता है। इसमें कोई शंका नहीं। यदि अपना कल्याण चाहो, अपने कल्याण की तुम्हें भावना है और यहाँ से कुछ ले जाना चाहते हो तो विषय को हृदय से समझो। अपने व्यक्तित्व को अपने आपको जो माना है, उसका लोप करो। व्यक्तित्व को रखकर समझना चाहोगे तो तुम्हारे पल्ले कुछ पड़ेगा। कुछ भी समझ में नहीं आएगा। व्यक्तित्व को लोप करके ही आत्म तत्व जान सकते हो। तो मैं अमुक हूँ, यह प्रगट ज्ञान है। मैं जानता हूँ कि मैं देह हूँ, जीव हूँ, इसलिए यह प्रगट ज्ञान है। तो क्या जानने वाला भी जीव है? जरा होश में आकर समझो। 'मैं' का आधार क्या जीव है? मैं देह हूँ, मैं जीव हूँ, मैं ब्रह्म हूँ यहाँ तक सब प्रगट ज्ञान है और 'मैं' हूँ यह गुप्त ज्ञान है और 'मैं' अर्थात् आत्मतत्व यही ब्रह्म ज्ञान है। इसको ग्रहण करो। इसका अनुभव करो।

 

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम्

सरहस्यं तदङ्गं गृहाण गदितं मया ।।

 

आत्मतत्व का क्या रहस्य है? 'मैं' के रहस्य चार हैं। 'मैं' (आत्मा) का भाव। 'मैं' (आत्मा) का रूप। 'मैं' (आत्मा) का गुण और 'मैं' (आत्मा) का कर्म। आगे श्लोक में भगवान नारायण कहते हैं-

 

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः

तथैव तत्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।

(श्रीमद् भा. 2/9/31)

 

जैसा मैं हूँ 'मैं' का जैसा भाव, 'मैं' का जैसा रूप, 'मैं' का जैसा गुण और 'मैं' का जैसा कर्म, इन्हीं विषयों का ज्ञान 'मैं' आत्मा (आत्मतत्व) का रहस्य है। मेरी कृपा से इन तत्वों का अनुभव करो। अच्छा, विषय को पूर्णतया हृदयङ्गम करने के लिए प्रक्रिया सुनो। जो सत्संगी गण बाहर से आए हैं (छत्तीसगढ़ से) उनके लिए प्रक्रिया समझाने की जरूरत नहीं है। तुम लोग तो प्रक्रिया कहने से ही समझ लेते हो, परन्तु यह (झंडापुर स्थान) नवीन क्षेत्र है और नवीन क्षेत्र होने के कारण प्रक्रिया समझा देना आवश्यक हो जाता है। इसलिए पहिले जरा प्रक्रिया समझा दूं तब बाद में आत्म तत्व के भाव, रूप, गुण और कर्म का निरूपण करूँगा। साधारणतया 'मैं' का मतलब साढ़े तीन हाथ का शरीर ही मान रहे हैं, दिखाई तो ऐसा ही दे रहा है। जिस तरह मक्खन दूध में व्याप्त है, परन्तु दूध में व्यापक होते हुए भी स्पर्श करने पर नहीं मिलता और जब उसी दूध का मन्थन किया जाता है तो मक्खन ऊपर जाता है। मक्खन की प्राप्ति दूध के मन्थन से होती है। इसी तरह विचार रूपी मथानी से इस मान्यता का मन्थन करें।

 

कोई अपने आपको साढ़े तीन हाथ का शरीर मानता है, कोई अपने आप को जीव मानता है तो कोई अपने आप को ब्रह्म मानता है। सभी अपने को एक ही विशिष्ट शरीर, जीव या ब्रह्म नहीं मानते। सभी मान्यताएँ विभिन्न-विभिन्न प्रकार की हैं। इन मान्यताओं को अलग करके समझा दूं। सुनो, ध्यान दो, पहले ये दो शब्द 'मैं' और 'मेरा' समझ लो। 'मैं' कर्तृवाचक है और 'मेरा' संबंध वाचक है। अपने आप के लिए, खुद के लिए 'मैं' कहा जाता है और अपने से संबंधित सम्बन्ध वाचक है। अपने आप के लिए, खुद के लिए 'मैं' कहा जाता है और अपने से संबंधित के लिए 'मेरा' का प्रयोग होता है। इस तरह मैं का अर्थ मेरा नहीं होता और मेरा का अर्थ मैं होता है। अच्छा, यदि किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि तेरा नाम क्या है? वह कहता है मेरा नाम जगदीश है। भैया ! यह तो बताओ कि तुम्हारा नाम जगदीश कब रखा गया? तुम्हारे जन्म होने के पूर्व रखा गया था या तुम्हारे जन्म लेने के बाद? यदि तुम्हारा नाम जन्म लेने के पहले ही जगदीश होता तो जब तुम्हारा जन्म हुआ तभी तुम्हारी माँ पुकारती कि देखो जगदीश पैदा हो गया है। परन्तु, ऐसा कोई नहीं कहता। यह तो मौलिक बात है। तो नाम जन्म लेने के बाद ही रखा जाता है और कहते भी हो कि मेरा नाम, नाम 'में' मेरा शब्द लगा है। इसलिए यह स्वयं सिद्ध है कि मेरा कहने वाला नाम से अलग है। कुछ तुम्हें नई बात नहीं बताई जा रही है। साधारणतया सभी कहते हैं कि मेरा नाम, मेरा सिर, मेरी आँख, मेरी नाक, मेरा मुँह, मेरा हाथ, मेरा पाँव, मेरा शरीर। ऐसा कहने से ही सिद्ध होता है कि नाम से लेकर शरीर तक 'मैं' नहीं हूँ। हाँ जी, यदि मेरा का अर्थ मैं लगाऊँ तो?

 

किसी शहर में एक बड़े अच्छे पढ़े-लिखे धनवान व्यक्ति जमींदार साहब रहते थे। किसी दिन उसका पुत्र बीमार पड़ा। उसे डबल निमोनियो हो गया। उन्होंने अपने नौकर को आज्ञा दी कि फौरन अमुक डॉ. साहब को बुलाकर लावो। नौकर थोड़ी दूर जाकर कहता है कि सरकार ! यदि डॉ. साहब घर पर हों तो? मालिक ने कहा जल्दी जाता है कि नहीं? हुजूर, मैं यह चला। फिर बाहर जाकर वापस आकर कहता है कि सरकार! डॉ. मिल भी गए और और दवाई हुई तो? मालिक गुस्सा होकर कहता है कि अबे, जाता है कि नहीं? नहीं सरकार, चला जाता हूँ, ऐसी बात नहीं है। परन्तु, फिर वापस आकर कहता है कि सरकार ! यदि डॉक्टर साहब मिले भी, दवाई भी मिली, लेकिन यदि डॉक्टर साहब आने को तैयार नहीं हुए तो? जमींदार साहब गरम होकर बोले कि बेवकूफ कहीं का, जल्दी जाता है कि नहीं, बकबक कर रहा है। जल्दी ही डॉ. साहब को बुलाकर ला। हाँ सरकार अभी जाता हूँ। थोड़ी ही देर में फिर वापस कर कहता है कि यदि डॉ. साहब मिले भी, दवाई भी मिली और वे आने को तैयार भी हो गए, परन्तु उनके आने के पहले ही लड़का रहा तो? भैया। इस, 'तो', का तो कोई इलाज नहीं है। यदि मेरा का अर्थ मैं लगाऊँ तो मैं गाड़ी हो जाऊँ, क्योंकि मेरी गाड़ी कहता हूँ। मेरी टोपी कहता हूँ, तो मैं टोपी हो जाऊँगा। इसलिए मेरा का अर्थ मैं नहीं।

 

आजकल जगह जगह वेदांत के प्रचारक, वेदांत के ठेकेदार मिल सकते हैं, परन्तु ऐसे उपदेशक वेदांत का ठीक अर्थ नहीं लगाते। वे क्या भगवान की कथा करेंगे। भगवान को कभी देखे हों, उनका अनुभव किए हो तब , भगवान को वे क्या लखावेंगे। वे तो भगवान को कभी सुने भी नहीं। मैं कथा नहीं करता, मैं वेदांत का प्रचारक हूँ। भगवान को देखना हो तो हमारे पास आवो। जब चाहो, जहाँ जाहो, जिस समय चाहो हम भगवान को लखा देने का दावा करते हैं। हम उन्हें अनुभव करा देंगे कि यही भगवान है। परन्तु, उन्हें भी भगवान के दर्शन की भूख हो तब ?

 

यदि किसी व्यक्ति को जिसे धन का लोभ है, कोई कहे कि भैया ! तुम्हें कोई काम करना होगा। बिना कमाई के तुम्हें धन मिल जाएगा, तुम्हें लखपति बना देंगे, यदि तुम्हें धन की इच्छा हो तो दिला सकते हैं। तब तो सभी राजी हो जाएँगे, कहेंगे कृपा करो दादा, शीघ्रातिशीघ्र धनी बना दो। जब कोई काम ही करना पड़े और धन मिलता हो तो सभी स्त्री-पुरुष तैयार हो जाते हैं। धन लेने के लिए शायद ही कोई बचे, सब तैयार बैठे हैं। हाँ भाई ! ऐसी ही बातें हैं। परन्तु, भगवान को पाने के लिए पता नहीं क्या नुकसान हो रहा है- राम ! राम !! घोर निद्रा से उठो ! जब चाहो, जहाँ चाहो, जिस समय चाहो देखो। हम तुम्हें दिखा देंगे कि यही भगवान हैं। बस ! बाकी सब कुछ पाखंड है, गप्प बात है। हम विश्व के लिए चुनौती देते हैं। वह भगवान नहीं है, जिसे देखने के लिए तुम ज्योतिषियों से पूछकर मुहूर्त निकालकर मिलो ज्योतिषियों के पास जाकर पूछो कि हमारी जन्मकुंडली देखकर बताइये कि हमें भगवान मिलेंगे कि नहीं और यदि मिलेंगे तो कब मिलेंगे? भगवान ऐसे नहीं हैं कि इस तरह से मिलें।

 

कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही ।।

(रा. उत्तर. कां.)

 

अरे! विषय भोग तो कूकर-सूकर भी करते हैं। विषय भोग उन्हें भी मिलता है। भगवान ने मनुष्य जन्म क्यों दिया? भगवान प्राप्त करने के लिए ही भगवान ने शरीर दिया है, क्योंकि भगवान की प्राप्ति इसी शरीर से ही होती है। मेरी नाक, मेरा कान, मेरा पैर, मेरा शरीर, हम सब यही कहते हैं और अंग्रेजी में भी 'माई बॉडी' कहते हैं, 'आई एम बॉडी' ऐसा तो कोई नहीं कहता। तो नाम से लेकर शरीर तक 'मैं' नहीं हूँ, क्योंकि मेरा कहता हूँ और गौर करो तो शरीर मेरा भी नहीं है।

 

छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम शरीरा

प्रगट सो तनु तव आगे सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ।।

(रा.कि.)

 

आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन पाँचों तत्