
राम दर्शन
(सम्पूर्ण)

महर्षि मुक्त
राम दर्शन
निरूपणकर्ता -महर्षि मुक्त
प्रकाशक -महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति केन्द्र, दुर्ग (छत्तीसगढ)
(सर्वाधिकार सुरक्षित प्रकाशकाधीन)
मुद्रक -महावीर ऑफसेट रायपुर (छत्तीसगढ) फोन: 0771-255140
डाटा एन्ट्री -नेचर ग्राफिक्स शांति चौक, पुरानी बस्ती, रायपुर मो. : 9302230478
तृतीय संस्करण -25 जुलाई 2010 (गुरु पूर्णिमा)
प्रति -1000
कार्यालय एवं पुस्तक -डॉ. एस.एन. त्रिपाठी 50/152, बंधवापारा, पुरानी बस्ती रायपुर (छ.ग.) - मिलने का पता 492001 मो. : 9926130014
मूल्य -250/- (दो सौ पचास रुपये मात्र)
प्रिय अभेद आत्मन्, रामदर्शन की तृतीयावृत्ति की प्रस्तुति पर समिति मुदित है, इस आवृत्ति में प्रस्तुत साहित्य का कलेवर परिवर्तन ही किया गया है। विषयवस्तु ज्यों का त्यों है, अपितु इस संस्करण में एक नये प्रसंग का समावेश जरूर किया गया है, वह है महारानी शतरूपा द्वारा मांगा गया सहज वरदान -
सो सुख सो गति सो भगति सो निज चरन सनेह ।
सो विवेक सो रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहू ।।
वैसे तो रामायण पर विद्वान महापुरुषों द्वारा 400 वर्षों में अनेक टीकाएँ हुई हैं, परन्तु वर्तमान में इनके मंत्रों पर जो अलौकिक भाष्य हुए हैं, उन दुर्लभ भाष्यों को प्रकाशित कर आप तक पहुँचाकर समिति धन्य हो रही है।
जिस तरह गीता के अर्थ (भाव) को कृष्ण ही जानता है, उसी तरह से रामायण के भावों को सिवाय राम के किसी अन्य में ताकत नहीं जो इसे जान सके, तभी तो कहा गया है कि- किमि समुझै, यह जीव जड। प्रस्तुत साहित्य में भगवान राम के भावों को ज्यों का त्यों बताया गया है, शर्त इतनी है कि इन भावों को "शिव" होकर ग्रहण करें न कि जीव होकर और तभी उसका ग्रहण भी संभव होगा।
श्री रूपेन्द्रनाथ तिवारी (रामावतार भाई) ने इस पुस्तक के संशोधन में जो अपना अमूल्य समय एवं परिश्रम दान किया है, इसके लिए समिति उनका आभारी है। श्री झग्गर सिंह देवांगन जी को धन्यवाद, जिनके सौजन्य से मनु शतरूपा वरदान प्रसंग प्रस्तुत पुस्तक में शामिल किया गया। प्रूफ रीडिंग में श्री महेन्द्र आडिल एवं श्री बसंत पुरी गोस्वामी का सहयोग स्तुत्य है। समिति इनके भी आभारी है। पं. श्रीरामलाल जी शुक्ल का अमूल्य सहयोग वंद्य है। दाऊ गोकुल बंछोर का प्रयास प्रशंसनीय है।
देवमाता, सुरसा के मुख के समान बढ़ती महंगाई के कारण प्रकाशन में कठिनाई आ रही है, फिर भी आपकी जिज्ञासा शान्ति हेतु समिति अपना गिलहरी प्रयास सतत् बनाई हुई है। इस परिप्रेक्ष्य में मूल्य संबंधी या अन्य कोई त्रुटि विद्वान पाठकों को अनुचित लगे तो उनसे करबद्ध क्षमा की कामना सहित -
सत्यानंद
देनहार कोऊ और है देवत है दिन रैन ।
नाम लेत रहिमन को ताते नीचे नैन ।
एक ऐसा व्यक्ति, जिसके लिए यह उक्ति अक्षरशः चरितार्थ हो रही है। जिनने अत्यंत संकोचपूर्वक इस विवरण को प्रकाशित करने की हमें सहमति प्रदान की है -
नाम -श्री यादोराम गंगबेर
आत्मज -श्री सदवाराम गंगबेर
माता -श्रीमती मानबाई
जन्मतिथि -17 अप्रैल 1950
योग्यता -बी.एस.सी.
जन्म स्थान -बगदेई, पो.-लिमोरा, तह.-गुरुर (छ.ग.) जिला-दुर्ग
व्यवसाय -आप एक सम्पन्न कृषक हैं, कृषि आपका पैतृक व्यवसाय है
अन्य रुचि -आप सेवाभावी एवं बैद्यक में रुचि रखने के कारण स्वयं
जड़ी-बूटियों से दवा तैयार करके अनेक जटिल रोगों
का उपचार करते हैं.
आप स्वभाव से अत्यंत विनम्र एवं संत सेवी होने के कारण गृहस्थ जीवन को अंगीकार नहीं किया। आप महर्षि मुक्त के कृपा पात्र हैं।
आपके जीवन का प्रमुख उद्देश्य सत्पुरुषों की सेवा करना एवं उनके सत्संग का लाभ लेना है। महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति के आप संरक्षक सदस्य एवं समिति के समर्पित सदस्य हैं। अपने इसी स्वभाव से प्रेरित होकर इन्हें प्रस्तुत ग्रंथ 'रामदर्शन' की इस आवृत्ति प्रकाशनार्थ 'पचपन हजार रुपये' की सहयोग राशि समिति को प्रदान करके अनुगृहीत किया है।
हम उनके इस अपूर्व योगदान के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त करते, उन्हें साधुवाद देते हैं।
आशा है, उनकी यह दानशीलता अन्य श्रेष्ठिजनों के लिए श्लाघनीय एवं अनुकरणीय सिद्ध होगी। अलं !
भवदीय
अध्यक्ष
महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति
गोस्वामी तुलसीदास का 'रामचरित मानस' एक अद्भुत आध्यात्मिक ग्रंथ है। न केवल इसलिए कि वह शताब्दियों से भारतवासियों के बहुत बड़े वर्ग में सबसे अधिक पठनीय ग्रंथ रहा है वरन, इसलिए भी वह शिक्षित-अशिक्षित, विद्वत- अविद्वत, गृहस्थ-संन्यासी, संत-सामान्य जैसे विषमवर्गीय समूहों में समरूपेण समाहत हुआ है। उसमें रामकथा के सुपरिचित ऐतिहासिक बिम्बों के सहारे भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति, धार्मिक लोक-जीवन, नीतिपरक आचरण को पुरुषार्थमय मानव जीवन में इस तरह गूंथकर रखा गया है कि सभी परिस्थितियों में लोग सहज ही उसमें अपने अस्तित्व का अर्प ढूँढ़ लेते हैं। घर-गृहस्थी की झंझटों में फँसे सामान्यजन फुरसत के समय उनके पठन-श्रवण से परम संतोष और आनंद का अनुभव करते हैं। दूसरी ओर चिंतनशील और दृष्टि सम्पन्न विद्वतजन उसी 'रामचरितमानस' की गहराई में उतरकर उसमें समाये उन ऊँचे आध्यात्मिक शिखरों की खोज करते हैं जिन्हें उसके प्रभूत शब्द-राशि ने अपने अंतर में छिपा रखा है। उनकी ऐसी खोज हमें बार-बार चमत्कृत करती है। महर्षि मुक्त का 'रामदर्शन' इसी तरह का चमत्कार पैदा करने वाली 'रामचरितमानस' की व्याख्या है।
ऐसा नहीं है कि रामकथा का आध्यात्मिक निरुपण पहली बार हुआ है। 'रामचरितमानस' के बहुत पहले ही 'अध्यात्म रामायण' के विस्तारपूर्वक रामकथा का यह रुप निखारा जा चुका है। किंतु महर्षि मुक्त की व्याख्या में दो बातें विशेष ध्यान देने योग्य हैं। पहली यह कि उन्होंने रामकथा के आध्यात्मिक गूढ़ाशय को तुलसीदास के शब्दों में से ही ढूंढ निकाला है, यद्यपि अपने प्रकट अर्थ में भी वे शब्द उतने ही मर्मस्पर्शी और प्रभावोत्पादक हैं। दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रकट शब्दार्थों के नीचे जिस आध्यात्मिक शिखर की खोज उन्होंने की है वह नया और निराला है। 'आध्यात्म रामायण' हमें 'भगवद्गीता' की आध्यात्मिकता की याद दिलाता है। कृष्णावतार में साकार ब्रह्म रुप कृष्ण अपने चरित और शब्दों में ब्रह्म की निराकारता की झलक दिखाते हैं और इसलिए 'लीला पुरुषोत्तम' कहे जाते हैं। दूसरी ओर 'रामचरितमानस' में चित्रित रामावतार में राम के चरित और शब्दों में नहीं वरन् उनकी 'मर्यादा' का 'नीतिमत्ता' के आवरण में से निराकार ब्रह्म की झलक दिखाई दे जाती है। निराकृत आकाश में जिस तरह मेघाकृति पैदा होती, बदलती और विलीन होती दिखाई देती है, उसी तरह निराकार ब्रह्म में राम का सगुण रूप गढ़ा हुआ दिखाई देता है। माता कौशिल्या के वात्सल्य भाव में, भगवान शिव के ज्ञान भाव में, तपःपूत ऋषि-मुनियों के भक्ति-भाव में उन-उन भावों के अनुकूल ब्रह्म-स्वरूप निखरता है। चूँकि राम का प्रकट रूप एक आदर्श नीति-पुरुष का है, सामान्य मनुष्य भी उसमें अपने लोक-जीवन के मूल्यों को चरितार्थ होता देखता है। दूसरी ओर, कृष्ण चरित चूँकि लीलामय है, उसकी बोधगम्यता के लिए भक्ति के तगड़े खुराक की जरुरत होती है। मानुषी कर्म-विधान और ज्ञानलोक के प्रतिमान उसकी समझ तक पहुँच पाने में असमर्थ हैं। जिस पर प्रभु की कृपा दृष्टि है उसे ही वह मिलेंगे। 'भगवद्गीता' में इसीलिए कर्मयोग और ज्ञानयोग अंततः भक्ति योग के अनुषंगी ही सिद्ध होते हैं।
'रामचरित मानस' के राम का मानुषी चरित आध्यात्मिकता का बोध कराने की दृष्टि से अपेक्षया अधिक जटिल है। नीति पुरुष राम के प्रकट मानुषी चरित को उसकी आध्यात्मिक गहराई में 'सत्यं शिवं सुंदरम्' और 'सत्यं ज्ञानमनंतम्' का आकार लेता हुआ देखा जा सकता है इसीलिए कर्मयोग, ज्ञान योग और भक्ति योग समानरुपेण रामपद प्राप्ति के मार्ग हो सकते हैं- (शिवमय) नीतिमत्ता की प्रधानता से कर्मयोग (ज्ञानमय) सत्यव्रतशीलता की प्रधानता से ज्ञानयोग और (सौंदर्यमय) अनंतता की प्रधानता से भक्ति योग। महर्षि मुक्त के अनुसार, तुलसीदास ने 'रामचरित मानस' में इन तीनों का एक समन्वित रूप प्रस्तुत किया है। इस तरह रामचरित मानस सरोवर में आध्यात्मिक अवगाहन हेतु चार घाट हैं- ज्ञान घाट, कर्मघाट, भक्तिघाट और महर्षि मुक्त के शब्दों में स्वयं तुलसीदास का गोघाट जो सीधा और सपाट होने से सभी जीवधारियों के लिए अपंग और अपाहिजों के लिए भी सुगम है।
अध्यात्म की दृष्टि से ज्ञान का एक ही अर्थ है - आत्म दर्शन। संसार का ज्ञान विषय-दर्शन है और इसके वाहक हैं इंद्रियां और मन। मन में इच्छा-वासना की निरंतर उठने वाली तरंगें इंद्रियों को विषय-प्रवृत्त करती हैं और रागी-भोगी मनुष्य संसार-सागर में डूबने-उतराने लगता है। विषयभोगाविष्ट यह बोध आत्म दर्शन से उतना ही दूर है जितना अंधकार प्रकाश से। इसलिए वस्तुतः यह ज्ञान की अवस्था न होकर अज्ञान की अवस्था है। साधारणतः आत्मा के निज-रूप पर अज्ञान का यह धुंध छाया रहता है और इसलिए प्रायः मनुष्य आत्म-प्रकाश से वंचित रह जाता है। दूसरी ओर जब आत्म दर्शनपूर्वक व्यक्ति आत्मा को उसके निज रूप में जान लेता है तब उसके लिए संसार का स्वरूप ही जगदाधार आत्मा का, श्रीराम का विमलयश बनकर प्रकाशित होने लगता है। आत्म-ज्ञान के बिना जगत् प्रपंच के आधार तक नहीं पहुँचा जा सकता। इस तरह आत्म-ज्ञान के बिना जगत का भासना ही अज्ञान है। शिवजी को यह ज्ञान है इसीलिए वे श्रीराम के माया-मानुषी चरित से न तो व्यथित होते हैं और न ही हर्षित जबकि माता पार्वती मोहवश संशयग्रस्त हो जाती हैं। आत्म- ज्ञान की स्थिति में जगदाभास रुपी सारे विकल्प जाति-वर्ण, सगुण निर्गुण, गति- स्थिति, परिवर्तन-परावर्तन, देश-काल आदि-आत्मा में ही समा जाते हैं। इस दृष्टि से आत्मा-परमात्मा, व्यष्टि-समष्टि न भेद भी एकांतिक नहीं है। अस्तित्व रूपों के आधार में स्थित जो आत्मा है वही सत्ता मात्र का आधार स्वरुप सर्वात्मा परमात्मा है। शुद्ध सत्ता स्वरूप आत्मा ही परमात्मा श्रीराम हैं, जबकि यह वह अस्तित्व रुपों में जो प्रकट हो रहा है वह 'मैं' आत्मा हूँ।
कर्मघाट में मानस-अवगाहन जगत्-भ्रम या संशयावस्था से छुटकारा पाने का एक अचूक उपाय है। ज्ञान एक उपाय या साधन न होकर उपलब्धि है जबकि कर्म स्वरुपतः एक साधन है, सुख-दुःख प्राप्ति का या रामपद प्राप्ति का भी। श्रीराम का मानुषी चरित प्रकटतः एक कर्म-क्षेत्र है, जहाँ स्त्री-पुरुष विधि-निषेध, राग-विराग आदि सांसारिक विक्षेप पाये जाते हैं। किन्तु जिस क्षण यह बोध होता है कि ये सारे विक्षेप मायावी संरचनाएं हैं, भ्रम मिट जाता है तथा कर्मों और संलग्न भावों का अत्यंताभाव पैदा होता है। तब न कर्ता-भाव रहता है न भोक्ता भाव, न अहंकार, न मोह, न पाप और न पुण्य। जिसे हम 'धर्म' कहते हैं उसका आशय ठीक यही है-न तो उसे करने में लज्जा होती है और न ही भय। इसीलिए धर्म भगवदावतार द्वारा रक्षणीय बनता है। इसके विपरीत जिस कर्म को करने में लज्जा या भय हो, वही अधर्म है। धर्म करने से हृदय शुद्ध होता है और शुद्ध अंतःकरण में वैराग्य जागता है और वैराग्यवान को ही भगवान को जानने की जिज्ञासा होती है। ऐसे जिज्ञासु व्यक्ति ने परमानंद पाने की योग्यता हासिल कर ली है। परमानंद से आशय है सुख-दुःख रहित आनंद, ब्रह्मानंद। श्रीराम के इस नित्य स्वरुपानंद का ही वर्णन तुलसीदास के शब्दों में है- 'शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं' जिसमें डूबकर मन कामादि दोष रहित हो जाता है। मन के कामादि दोषवश विषय-मूलक कमों से प्राप्त सुख मनुष्य को अंततः दुःख की ओर ढकेलता है जबकि जन्म-जन्मांतरों में उसकी खोज ऐसे सुख के लिए होती है जिससे दुःख की डोर न बंधी हो। उसकी यह खोज कर्म और कर्मफल से परे उनके आधार में स्थित आत्मा से समस्वरुपता प्राप्त कर लेने पर ही पूरी होती है। तब वह कर्त्ता-भोक्ता, कर्म-क्रिया, सुख-दुःख जैसे द्वंदमूल भावों से पृथक अस्तित्व मात्र के मूलाधार आत्मा के प्रति 'निर्भरा' भाव से समर्पित हो जाता है। यही कर्म संदर्भ में भगवद्वद प्राप्ति के लिए आवश्यक निष्काम कर्म, अनासक्त कर्म का रहस्य है।
भक्ति घाट में मानस-अवगाहन हेतु उक्त 'निर्भरा' भाव के अतिरिक्त विमल 'प्रेम भाव' की जरुरत होती है। ईश्वर तक पहुँचने के लिए यह सीधा और सरल मार्ग है। यह एक साधन है और उपलब्धि भी। साधना की दृष्टि से भक्ति एक साधन है जबकि वही प्रेममय प्रपत्ति की दृष्टि से एक उपलब्धि है। श्रीकृष्ण के इन शब्दों में भक्ति के दोनों लक्षण विद्यमान हैं- 'सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।' 'परित्याग' में साधना है, जबकि 'शरणागति' उपलब्धि है। रामकथा के प्रसंग में शरणागति की अवस्था प्रेमानंद से परिपूर्ण है। वस्तुतः 'रम्' धातु से निष्पन्न 'राम' शब्द का गूढाशय ही यही है। श्रीराम आनंद रस से परिपूर्ण सागर हैं जिसमें प्रेमीजन सहज ही तैर सकते हैं। शिवजी और काकभुशुण्डी जी के श्रीराम के बाल स्वरूप में रम्यमान होने का रहस्य अब समझ में आ सकता है- बाल रूप सहज भावेन आनंद स्वरूप है, मनसा-वाचा-कर्मणा से परे वह स्वभावसिद्ध है। परमानंद या आत्मानंद की भी यही सहज अवस्था है और इसके प्रति पूर्ण समर्पण का नाम है भक्ति। ऐसी पूर्णतः सहज भक्ति के लिए किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं है। यहाँ कर्म- अकर्म, ज्ञान-अज्ञान, साधन-साध्य बेमानी है। यह तो सर्वत्र व्याप्त आत्म-स्वरुप शुद्ध सत्ता की ही आत्मीय उपलब्धि है। आत्म स्वरुपता ही आत्मानंद है। मेरा अपनी आत्मा से, जीव का उसमें विराज रहे भगवान आत्मा का मिलन केवल सहज, निरावलंब ही हो सकता है। यह आध्यात्मिक 'तल्लीनता' की स्थिति है जिसमें भगवद् भाव के अतिरिक्त अन्य किसी भाव के लिए जगह बच ही नहीं रह सकती।
प्रकट ही अब तक उल्लिखित मानस के सभी तीन घाट- ज्ञान, भक्ति, कर्म, यत्नवान मानुषी संदर्भ वाले हैं, क्योंकि मानव चेतना में ये पृथक-पृथक रुपेण- व्याकृत हैं। किंतु कण-कण में व्याप्त रहे भगवान और भगवद् प्रसाद के लिए यह विशेष संदर्भ कोई सीमा रेखा नहीं हो सकती। जीवों सहित सारी जड़ प्रकृति के करतब भी तो अपने आधार से, सर्वात्मा से अभिन्नता के लिए ही तो हैं। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास का चौथा घाट-गोघाट, जिसमें ज्ञान, कर्म, भक्ति का अपृथक्कृत समन्वित भाव है-सबके लिए सुगम एक खुला घाट है। इसमें अवगाहन हेतु पशु- पक्षी, सक्षम-अक्षम, अधिकारी-अनधिकृत, जड-चेतन सभी उतर सकते हैं। सांख्य मतानुसार प्रकृति का सारा खेल पुरुष की मुक्ति के लिए है और इस मुक्ति में अपना लक्ष्य साध कर स्वयं प्रकृति भी मुक्त हो जाती है। वेदांत इसीलिए इस प्रकृति को परम पुरुष की शक्ति रूपी माया कहता है। माया मनुष्य को आईना दिखाती है। यह आईना आत्म-दर्शन के लिए भी है और मोहमूल जगत्-दर्शन के लिए भी। इस माया-जन्य आईने को मनुष्य अपने 'मन' के रूप में पहचानता है। जिसे हम बहु आयामी संसार कहते हैं, वह वस्तुतः द्वि-आयामी मन की सृष्टि है। मन के रागानुरायी सुख और द्वेषानुशयी दुःख ये दो ही आयाम हैं जिनके सहारे वह बहु-आयामी संसार की सृष्टि करता है। हमारा सारा संसार राग-द्वेषमय या मोहमूल है। मन के इस स्वरूप को पहचान लेना ही 'ज्ञान' है और मन को इस तरह जानने वाला 'मैं' आत्मा हूँ। इस तरह आत्मवत् हो जाने से मन की भ्रामक सृष्टि मन सहित 'मैं' में लीन हो जाती है। पाप-पुण्य, कर्म-अकर्म, ज्ञान-अज्ञान आदि सारे द्वैत पिघल कर 'मैं' रुपी अद्वैत में समा जाते हैं। आत्म-दर्शन इसी अद्वैत बोध का नाम है।
परंतु यह भी सच है कि वास्तव में ऐसा आत्म-बोध सहजतः लभ्य नहीं है। इसे सुलभ बनाने के लिए हमें पहले 'कर्म' के रहस्य को समझना होगा। रामकथा प्रसंग में श्रीराम के कष्टमय वनवासी जीवन के लिए निषाद राज माता कैकेयी को दोषी मानते हैं। लक्ष्मण उन्हें समझाते हैं कि जीव के सुख-दुःख तो स्वयं उसके अपने कर्मों से उपजते हैं और कर्म-जन्य सुख-दुःख को केवल आत्म-दर्शन के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा है मन द्वारा बुना हुआ भ्रम जाल, जो हमें विषय-जगत में कर्मों की डोर से बांध कर रखता है। आत्म-दर्शन के लिए मन के इस जाल को शिथिल करना होगा, मन की चंचलता को रोक कर उसे स्थिर करना होगा। इसके लिए उपाय है- अभ्यास और वैराग्य। अभ्यास मन को रोकने का उपाय न होकर, केवल अ-मन होकर रहना है। अ-मन होना अर्थात् चेतना का सहज हो जाना, जैसे जब हम अहं - भाव अथवा व्यष्टि भाव की सजगता के बगैर देखने-सुनने-गुनने की क्रिया करते हैं। दूसरी ओर जब भी हम अपने को कुछ-कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता आदि मान लेते हैं, मन सामने आ खड़ा होता है। बल्कि मान लेना, मान्यता ही मन है जबकि अपने को कुछ भी न मान कर आत्मवत् हो रहना ही अ-मन होना है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है-चूँकि मेरा मानना ही, मान्यता ही मन है, मन का स्वामी 'मैं' आत्मा हूँ अर्थात् मन मेरे वश में हुआ। इसलिए वास्तव में मनस जन्य कर्मों से 'मैं' बंधा हुआ नहीं हूँ, कर्म करते हुए भी 'मैं' अकर्त्ता हूँ। अब मेरी गति मनरचित संसार में न होकर आत्मा के अनंताकाश में है। संसार में इसी गतिहीनता का नाम विराग या वैराग्य है, जिसके बिना ज्ञान संभव नहीं।
द्रष्टव्य है कि 'मैं' के अ-कर्त्ता भाव का एक निषेधमूलक पक्ष है और दूसरा विधानमूलक। संसार से उपरति, अपर वैराग्य, उसका निषेधमूलक पक्ष है और यह सर्वथा संभव है कि मन के विषय-विकल्पों से भरी दुनियाँ में परिस्थिति विशेष में अ-कर्त्ता बना मनुष्य परिस्थिति बदल जाने पर पुनः कर्म की राह पकड ले। अतः जब तक हम उक्त अ-कर्त्ता भाव को ज्ञान की भूमि पर आत्म-दर्शन के आधार पर स्थिर नहीं कर देते, उसकी स्थिति डांवाडोल रह सकती है। दूसरी ओर अ-कर्ता भाव की उक्त तरह की स्थिरता ही पर-वैराग्य है अर्थात् वैराग्य का आत्मदर्शी रूप, • जहाँ से लौटकर मनुष्य पुनः कर्म में, कर्त्ता भाव में लिप्त नहीं होता। यह राग-द्वेष, सुख-दुख से परे आत्मानंद की अवस्था है जिसमें जीव और ब्रह्म का, रामभक्त और राम का भेद समाप्त हो जाता है। शुद्ध भक्ति ईश्वर में प्रेममय प्रपत्ति-पूर्वक अपने पृथक अस्तित्व को भेदमूलक सारे प्रकल्पों को समाप्त कर देने का ही भाव है। परमार्थ तत्वतः अभेद-सिद्धि है।
महर्षि मुक्त के 'रामदर्शन' का यही सार है। वास्तव में 'रामदर्शन' आत्म दर्शन है। वेदांत दर्शन का यही सार-कथ्य है। आध्यात्मिक दृष्टि से कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग मूलतः प्रभु संयोग में एकीकृत हो जाते हैं। उनमें अभेद-दर्शन ही राम दर्शन है क्योंकि 'राम' स्वरुप में वे अभेदवत् ही प्रकट होते हैं। सत्, चित् और आनंद के पृथक्कृत मानुषी भाव ब्रह्म स्वरुप में एकीकृत 'सच्चिदानंद' बनकर प्रकट होते हैं। 'रामचरित मानस' के राम का माया-मानुषी सगुणचरित अब देश-काल की परिधि से बाहर शाश्वत, सर्वव्यापी, सर्वग्राही चैतन्य तत्व बनकर अपने निर्मल, शुद्ध, निराकृत-निर्गुण रूप में स्थिर हो जाता है। निराकृत निर्गुण राम का यह प्राकट्य ही आत्म दर्शन है। ऐसा आत्म दर्शन ही सगुण राम को समयानुकूल गढ़ता और पूजा प्रतिष्ठा के लिए प्रस्तुत करता है।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय
पूर्व प्राध्यापक दर्शन एवं धर्म विभाग
विश्वभारती विश्वविद्यालय शांतिनिकेतन (प.वं.)
एवम्
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
मेरे ही स्वात्मस्वरूप
महामहिम -
आपकी महती आकांक्षा का समुचित सम्मान करते हुए "महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति' द्वारा बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय, राम दर्शन आपको समर्पित किया जा रहा है।
श्री रामचरितमानसान्तर्गत अधिकांशतः जितने भी तत्त्व-परक आध्यात्मिक प्रसंग हैं, यथा-शिव गीता, लक्ष्मण गीता, राम गीता, जनक स्तुति, वाल्मीकि स्तुति, वेद स्तुति, चित्रकूट के चारों दरबार, विभीषणशरणागति, ज्ञान-वैराग्य निरूपण, वंदना एवं राम नाम महिमा आदि के क्लिष्ट भावों का सहज एवं सरल भाष्य, इस पुस्तक की विषय वस्तु है।
राम दर्शन में प्रतिपादित तत्त्व- "प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना" - न सगुण ब्रह्म है और न निर्गुण ब्रह्म, अपितु सगुण-निर्गुण से परे, सगुण-निर्गुण का आधार, सगुण-निर्गुण का द्रष्टा, ज्ञाता, अनुभव से परे है और इसे ही सत्ता, भूमा या अस्तित्व कहते हैं।
जिस अनुभूति में, जिस अनुभूति करके, जिस अनुभूति से परानुभूति की अनुभूति नहीं होती, वही अनुभूति अपना स्वरूप (राम) है।
यह रहस्य कृपा साध्य है और संत शरण के भिखारी हुए बिना इस अनुभूति की अनुभूति होना सम्भव नहीं है।
समझेगा वही सुह्वत पसंद बन गया दोस्त दरवेशों का ।
ये दिल दिमाग की चीज नहीं जो करता है सो खो बैठा ।।
श्रीरामचरितमानस की सभी चौपाइयाँ मंत्र हैं और प्रस्तुत पुस्तक रामदर्शन इन मंत्रों का भाष्य है। इस तरह का भाष्य वही कर सकता है, जिनके पास अनुभव बल हो, आत्मबल हो, आत्म निष्ठा हो, गुरुओं की महान कृपा हो और विद्वान भी हो, तब ही इस तरह का विवेचन हो सकता है, यह भगवान की देन है, खाली विद्वत्ता नहीं।
महर्षि मुक्त द्वारा समय-समय पर हुए श्री रामचरित मानस के आधार पर आध्यात्मिक प्रवचनों के इस संकलन को मूर्त रूप दिया है, स्व. श्री झुम्मुकलाल जी दीन, दुर्ग ने।
समिति श्री दीन जी का आभारी है, जिन्होंने महर्षि मुक्त के सान्निध्य में रहकर उनकी अनुमति से ही उनकी अनुभूतियों को शब्दों में पिरोकर जन कल्याणार्थ प्रकाशित कर, उन्हीं के चरणों में समर्पित कर, इस उक्ति को चरितार्थ किया।
मेरा कुछ भी है नहीं, जो कुछ है सो तोर ।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लागे है मोर ।।
उसी पूर्व प्रकाशित पुस्तक का यह नव-संस्करण, नवीन परिधान से वेष्टित कर आपके कल्याणार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है। पहले यह तीन खण्डों में था, अब तीन भागों को एक में सम्मिलित करके इसे रामदर्शन (सम्पूर्ण) नाम से प्रस्तुत कर रहे हैं।
रामदर्शन (सम्पूर्ण) श्री रामचरित मानस प्रेमियों के लिए वरदान सिद्ध हुई है, इसीलिए इसकी बढ़ती हुई मांग को देखते हुए पुनः प्रकाशन का निर्णय लिया गया।
रामदर्शन का श्रद्धापूर्वक पठन, मनन, निदिध्यासन से रामदर्शन में किञ्चित संदेह नहीं, इसके ठीक विपरीत -
अगरचे कुतुब अपनी जगह से टले तो टल जाये ।
बहर जुगनू की दुम से जले तो जल जाये ।
हिमालय बाद की ठोकर से गो फिसल जाये ।
और आफताब भी किबले-उरूज ढल जाये ।।
यद्यपि ये सम्भव नहीं फिर भी ऐसा हो जाये। मगर मंदमति, विषयासक्त, दुराग्रही और कुतर्की जैसे प्रपञ्ची दरिद्र जीवों के लिए इसका भाव, ग्रहण करना असम्भव है, इसलिए रामदर्शन (सम्पूर्ण) "दनुज विमोहन, जन सुखकारी" है।
यह विश्व में अपनी शानी का एक ही साहित्य है। प्रमाण? हाथ कंगन को आरसी क्या। बकौल महर्षि मुक्त -
मस्ती में मस्त होकर मस्ती को लिख रहा हूँ।
मस्ती में मस्त पढ़ना दरिया नजर आयेगा ।।
यूँ तो शुद्धाशुद्धि पर विशेष ध्यान दिया गया है और इसमें श्री नारद दुबेले और श्रीराम प्रसाद साहू का प्रयास प्रशंसनीय है, फिर भी कहीं-कहीं पर यदि अशुद्धि रह गयी हो तो सुधि-जन इसे सुधारकर पढ़ें और समिति को क्षमा करें। क्योंकि
अल्फाज के पेचों में उलझते नहीं दाना ।
गब्बस को मतलब है सदफ से या गौहर से ।।
अलम् !
अध्यक्ष
(डॉ. सत्यानन्द त्रिपाठी)
महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक
समिति
आरती सद्गुरुदेव नमामी । पार ब्रह्म-प्रभु अन्तर्यामी ।
अगुण अपार अलख अविनाशी । अचल विमल प्रभु सब उर वासी ॥
निर्गुण निर्विकार सुखरासी । एक अरूप अलेख अनामी ।।1।।
महिमा नेति नेति श्रुति गावें । नित्य निरंजन सब बतलावें ।॥
शेष शारदा पार न पावें । जय सच्चिदानंद अभिरामी ।।2।।
वचन किरण तम मोह विनाशक । ज्ञान सूर्य माया के शासक ॥
दिव्य दृष्टि के परम प्रकाशक । ब्रह्मादिक सुर सेव्य नमामी ॥३॥
जब तक कृपा न तुम प्रभु करते। विधि हरिहर क्या भव से तरते ॥
असविचारि गुरु भक्ति जो करते। मिलते राम उन्हें सुखधामी ॥4॥
गुरुवर चरण कमल की छाया । करती दूर ताप त्रय माया ||
जब तक पूर्ण न होवे दाया । मिलत नहीं शिव अन्तर्यामी ॥5॥
भक्ति ज्ञान वैराग्य नियम के । रूप सकल इंद्रिय संयम के ।
भूषण शम दम पंच सुयम के । श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ मम स्वामी ॥6॥
जीवन धन मंजुल निज जन के । अंकुश मद मतंग जन मन के ॥
शुचि पथ परमारथ पथिकन के। इक रस आनंद रूप नमामी |17||
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
॥ बोलो सद्गुरुदेव भगवान की जय ॥
महर्षि मुक्त जैसे थे वैसे ही थे। यदि कोई यह दावा करे कि ऐसे थे और वैसे थे, तो उनका दावा गलत ही होगा। अपने परिचय में वे स्वयं कहा करते थे - " हैं तो हम अजन्मा" लेकिन हमें आप लोगों के खातिर आना पड़ा।"
उन्होंने यह भी कहा था भगवान को तो जान सकते हो क्योंकि वह तुम्हारा आत्मा है, परन्तु मुक्त को समझना बहुत ही कठिन (असम्भव) है।' आत्मा का लक्षण होता है परन्तु इनका तो कोई लक्षण ही नहीं था। ऐसे अलक्षण को यदि कोई जान जाय तो बन्ध्या का पुत्र सिंह का शिकार कर सकता है।
अपने पचास वर्षों के अनवरत प्रचार में जिस सिद्धांत या धर्म की इन्होंने प्रतिष्ठा की उस धर्म को महात्मा करपात्री जी ने 'ज़िंदा वेदान्त' (अनुभवयुक्त ) कहा है और यह भी कहा उन्होने कि - "अभी विश्व में जिंदा वेदान्त (सत्य धर्म) का प्रचार कोई कर रहे हैं तो महर्षि मुक्त ही हैं।"
शास्त्रों ने इनका परिचय इस प्रकार दिया है -
यस्यान्तं नादि मध्यं नहि कर चरणं नाम गोत्रं न सूत्रम्,
नो जातिर्नैव वर्णाः नहि भवति पुरूषो न नपुंसो न च स्त्री।
नाकारं नैवकारं नहि जनि मरणं नास्ति पुण्यं न पापम्,
तत्त्वं नो तत्त्वमेकं सहज समरसं ।

विषय-सूची
तृतीयावृत्ति पर संक्षिप्त उद्बोधन
7. भगवान शंकर और माता पार्वती सम्वाद
1. शिव गीता
2. राम नाम महिमा
3. मनु शतरुपा वरदान
।। श्री गणेशाय नमः ।।
।। श्री गुरुवे नमः ।।
नारायणोपनिषत्
ॐ अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति। नारायणात्प्राणो जायते। मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुज्योतिरापः पृथ्वी विश्वस्य धारिणी। नारायणाद् ब्रह्मा जायते। नारायणाद् रुद्रो जायते। नारायणाद् इन्द्रो जायते। नारायणात्प्रजापतिः प्रजायते।
नारायणाद्वादशाऽऽदित्याः सर्वे रुद्रा सर्वे वसवः सर्वाणि भूतानि सर्वाणिछन्दांसि नारायणादेव समुत्पद्यन्ते नारायणात्प्रवर्तन्ते। नारायणे प्रलीयन्ते।
अथ नित्यो नारायणः। ब्रह्मा नारायणः। शिवश्च नारायणः। शक्रश्च नारायणः। कालश्च नारायणः। दिशश्च नारायणः विदिश्च नारायणः। ऊर्ध्वच नारायणः। अधश्च नारायणः। अन्तर्बहिश्च नारायणः।
नारायण एवेदंसर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् निष्कलङ्को निरञ्जनो, निर्विकल्पो निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो न द्वितीयोऽस्ति कश्चित्। य एवं वेद स विष्णुरेव भवति स विष्णुरेव भवति।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
रामाय राम भद्राय, रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय, सीतायाः पतये नमः यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा। यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भमः।। यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां । वन्देऽहं तमशेष कारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।
अनन्त नाम रूपों में अभिव्यक्त अहमत्वेन प्रस्फुरित, महामहिम, स्वात्मस्वरूप सकल चराचर वृन्द एवं समुपस्थित आत्म जिज्ञासु गण। 'उत्तिष्ठत् जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत्।'
अनादिकाल से अविद्या की घोर निद्रा में सोने वाले भव्य जीवो। उठो। स्व- स्वरूप भगवान आत्मा में जागो और किसी श्रेष्ठ महापुरुष की शरण में जाकर अपना आत्म कल्याण करो। मानव जीवन का यही चरम लक्ष्य है।
यहाँ पर आध्यात्मिक प्रवचन श्री रामचरित मानस के आधार पर हो रहा है। रामचरित मानस (रामायण) भारत वर्ष की अनुपम विभूति है। यह संसार के कोने- कोने में फैला हुआ है। विदेशों में भी इसका प्रचार है। रामायण में क्या नहीं है, इसम ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, राजनीति, धर्मनीति आदि सभी कुछ भरा पड़ा है। रामायण की भाषा, अत्यन्त सरल, सरस, रोचक और भावपूर्ण है। इसके भाव सभी के समझ में आने लायक है। इसका महत्व केवल इस देश में ही नहीं, सर्वत्र इसकी प्रतिभा की छटा छिटकी पड़ रही है। हिन्दी जगत् में ऐसा ग्रन्थ न बना है और न भविष्य में इस तरह की आशा है। इसमें चारों वेद, छः हों शास्त्र, उपनिषद्, श्रुति, स्मृति आदि सभी का समन्वय है।
व्यवहार जगत् में पिता के प्रति पुत्र का, पुत्र के प्रति पिता का, भाई के प्रति भाई का, स्त्री के प्रति पुरुष का, पुरुष के प्रति स्त्री का, गुरु के प्रति शिष्य का, शिष्य के प्रति गुरु का, राजा के प्रति प्रजा का, प्रजा के प्रति राजा का, स्वामी के प्रति सेवक का, सेवक के प्रति स्वामी का, क्या कर्त्तव्य है? रामायण में यह सब मिलेगा। प्रत्येक की मर्यादा का यहाँ उल्लेख है। यह एक अलौकिक ग्रन्थ है।
बोधवान होकर व्यवहारिक जगत् में, व्यवहार कैसे करना है, यह रामायण सिखाती है।
जिस देशमें ईश्वर और धर्म के प्रति स्थान नहीं है, उस देश में भी राजनैतिक दृष्टिकोण से लोग इसे अपनाते हैं।
स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा ।
भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति ।।
अर्थात् मैंने (तुलसीदास ने) अपने अन्तःकरण के सुख के लिए इसकी रचना की। तब यहाँ पर शंका होती है कि क्या गोसाई जी महाराज बड़े स्वार्थी थे?
नहीं! इसका दूसरा अर्थ -
"शुष्ठ अन्तःकरण", याने स्वान्तःकरण अर्थात् जिनके सुन्दर पवित्र अन्तःकरण हैं, उनके लिए इस ग्रन्थ की रचना की गयी, जिससे "मतिमञ्जुलमातनोति" उनकी कोमल बुद्धि प्रसारित हो। हृदय मोम बने।
"स्वान्तः सुखाय" जिनके शुष्क हृदय हैं, उन्हें हरा-भरा करने के लिए, श्रुतियों, स्मृतियों, वेदों तथा शास्त्रों सभी का निचोड इस ग्रन्थ में भरा गया।
वेदों की रचना ब्रह्मा ने नहीं की, यह तो ब्रह्मा के मुख से निकले, इसी प्रकार रामायण की रचना, तुलसीदास ने नहीं किया, इसकी रचना तो शिवजी के द्वारा पहिले से ही की गई थी और उन्होंने इसे अपने मन में रखा था, जिसको सुन्दर समय पाकर उन्होंने माता पार्वती को सुनायी। इसलिए इस ग्रन्थ का नाम "रामचरितमानस'" पड़ा, जो तुलसीदास जी के मुख से निकला है।
रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ।।
तातें रामचरितमानस बर। घरेउ नाम हियें हेरि हरषि हर ।।
भैय्या। रामचरितमान से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों फल की प्राप्ति होती है।
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति, सिद्धाः स्वान्तः स्थमीश्वरम् ।।
माता पार्वती श्रद्धा रूप और भगवान शंकर विश्वास रूप हैं, क्योंकि सारे चराचर का अस्तित्व, विश्वात्मा भगवान राम (ईश्वर) 'मैं' आत्मा रूप में, रग-रग में व्यापक है। फिर भी उसे बिना श्रद्धा और विश्वास के देख नहीं सकते। मानसकार कहते हैं -
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम् ।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ।।
अर्थात् नित्य बोधस्वरूप गुरु अहं वन्दे, शंकर रूप गुरु की मैं वन्दना करता हूँ, क्योंकि नित्य ज्ञान-स्वरूप गुरु की उपमा भगवान शंकर से दी गयी।
जैसे, द्वितीया का चन्द्रमा यद्यपि हँसिया के समान टेढा होता है। परन्तु, फिर भी भगवान् शंकर के मस्तक में रहने के कारण उनके आश्रित होने से संसार उसकी वन्दना करता है, इसी प्रकार यह रचना, यद्यपि टेढी-मेढी है, फिर भी नित्य बोधस्वरूप भगवान शंकर के आश्रित होने के कारण जगत वन्दनीय है।
धार्मिक तत्त्व के पर्वत से अभिभूषित रम्य मनोहर है ।
राम की भक्ति अहै इसमें, भरपूर भरा जल सुन्दर है ।।
मौक्तिक हैं मिलते उपदेश, अलभ्य महा सुख निर्झर है ।
प्रेमी मराल गणों के लिए, यह मानस मान सरोवर है ।।
तुलसीकृत राम कथा जग में, नर नारिन तारन को पुल सी ।
पुलसी भव सागर पारन को, पढ़के मन गाँठ गई खुल सी ।
खुलसी गई पापन की गठरी, घुल सी गई जनता अरु हुलसी ।
हुलसी जनता, हुलसी वसुधा, हुलसी-हुलसी, जन के हुलसी ।।
एक बार हनुमान जी ने पहाड़ पर अपने नाखून से पत्थर गढ़-गढ़ कर सातो काण्ड रामायण लिखा और वे उस पहाड़ को भगवान राम के पास ले जाकर विनीत भाव से बोले- "भगवन! मैं सरकारी चरित्र लिख कर लाया हूँ, आप इसे देखकर इसमें अपना हस्ताक्षर कर दीजिये।"
भगवान राम ने उसे ध्यान से देखा तथा पढकर बड़े प्रसन्न हुए और बोले कि हनुमान जी तुमने बहुत परिश्रम किया है। भैया, तुम्हारा यह परिश्रम प्रशंसनीय है। परन्तु, देखो अभी-अभी श्री वाल्मीकि जी भी एक रामायण लिखकर ले आये थे। मैंने उसमें अपने हस्ताक्षर कर दिए है। अब तुम इसे मेरी आज्ञा से उनके पास ले जाओ और उनसे अपने हस्ताक्षर करने के लिए कहना, यदि वे अपना हस्ताक्षकर कर देते हैं तो उसे मेरा हस्ताक्षर समझना।
भगवान राम की आज्ञानुसार हनुमान जी उस पहाड़ को उठाकर श्री वाल्मीकि जी के पास ले गये, वाल्मीकि जी उस समय किसी समुद्र के किनारे रहते थे। श्री हनुमान जी ने उन्हें रामाज्ञा सुनाकर उसमें हस्ताक्षर करने को कहा। वाल्मीकि जी ने उसे इधर-उधर से देखा और उपेक्षा की भावना से यह कहकर इसमें सब बातें स्पष्ट नहीं लिखी गयी हैं, इसमें गोसा पर्दा (लुका-छिपी की बातें) है। उसे समुद्र में फेंक दिये। इस पर हनुमान जी बड़े दुःखी और क्रोधित हुए। वे क्रोध में भरकर बोले- देखो, मैं इतने परिश्रम और श्रद्धा से सरकारी चरित्र लिखकर भगवान के पास ले गया। उन्होंने आपके पास भेजा, परन्तु आपने मेरे परिश्रम की उपेक्षा करते हुए तुच्छ समझकर अभिमानपूर्वक उसे समुद्र में फेंक दिया। आपको अपनी कविता का इतना अभिमान है। अब मैं आपको श्राप देता हूँ कि यद्यपि ब्रह्मनिष्ठ का पुनर्जन्म नही होता, परन्तु फिर भी आपको जन्म लेना पड़ेगा और आपने जिस रामायण को उपेक्षापूर्वक समुद्र में फेंका है, उसी को अपने ही हाथों से लिखना पड़ेगा। वाल्मीकि जी भी कम नहीं थे, उन्होंने भी हनुमान जी को श्राप देने के लिए कमण्डल से जल उठाया। हनुमानजी तुरन्त समझ गये और वे उनके चरणों में गिर कर नम्र भाव से कहने लगे - "भगवन्! ऐसा मत कीजिए। इसमें आपके द्वारा सारे विश्व का कल्याण होना है। कलियुग के जीवों के उद्धार के लिए आप निमित्त होंगे। अतः, क्षमा कीजिए और संसार के जन कल्याण के लिए मेरा अभिशाप स्वीकार कीजिए। इस रामायण को लिखते समय जहाँ कहीं पर आप भूलेंगे, मैं समय-समय पर आकर आपकी सहायता करूँगा।" इस पर वाल्मीकि जी शान्त हो गये। भैय्या ! यह गोपनीय रहस्य है। बड़े-बड़े महात्माओं के द्वारा तथा हमने स्वयं कुछ काल एकान्तवास करके इसका अध्ययन किया है, यह कहीं नहीं लिखा है। इस तरह वाल्मीकि जी ही तुलसीदास हुए और इस रामायण को लिखे।
कलि कुटिल जीव निस्तार हित. वाल्मीकि तुलसी भये ।।
वाल्मीकि जी ने जो कहा था कि इसमें बातें साफ-साफ नहीं लिखी गयी हैं, लुका-छिपी की गयी है, वह यह है कि इन्द्र के पुत्र जयन्त के संबंध में जब सीताजी के लिए "सीता चरन चोंच हति भागा" लिखा है। इसको वाल्मीकि जी ने अपनी रामायण में लिखा है कि जयन्त ने सीताजी के स्तन में चोंच मारा। अब तुलसीदास जी भी चोंच मारना, लिख तो वही रहे हैं, परन्तु कहाँ पर मारा यह नहीं बता रहे हैं। तुलसीदास जी लिखते हैं कि -
"सीता चरन चोंच हति भागा" अर्थात् जयन्त ने सीता जी को अपने चरण से अर्थात् पंजों से और चोंच से आहत किया, मारा। चरण और चोंच दोनों से मारा, पर कहाँ पर? यह नहीं बताया। अपने शब्दों में नहीं कहा, पर भाव स्तन पर मारने का ही रखा, क्योंकि जिस समय चोंच और चरण मारा, उस समय भगवान राम, माता सीता जी के जंघे पर सिर रखकर लेटे हुए थे। इस परिस्थिति में जयन्त यदि सीताजी के चरण में चोंच मारता तो वह भगवान राम को कैसे पता चलता? क्योंकि पैर से खून बहता, तो वह नीचे की ही ओर जाता, जिसे भगवान राम लेटे-लेटे नहीं जान सकते। स्तन में ही चोंच मारने पर खून बहने पर वे तुरन्त लेटे-लेटे ही जान गये-
"चला रुधिर रघुनायक जाना ।"
चोंच स्तन में ही मारा गया तभी तो भगवान बिना बताये लेटे-लेटे ही जान गये। इस तरह तुलसीदास जी ने चोंच के स्थान को अपने मुँह से व्यक्त नहीं किया, क्योंकि सीता जी के प्रति उनकी माता की दृष्टि थी। अतः, ऐसा कहना मर्यादाविहीन था।
इसी को गोसा पट्टी कहकर, वाल्मीकि जी ने क्रोध किया था और उनके द्वारा लिखी गयी रामायण को समुद्र में फेंक दिया था। इसी तरह कहीं-कहीं कुछ और प्रसंग है। भैय्या, यह अभूतपूर्व रचना है, इसमें ऐसे-ऐसे मार्मिक स्थल हैं कि बिना महान् पुरुषों की कृपा के लगते नहीं, चाहे कितना ही विद्वान क्यों न हो। रामायण की रचना करते समय, हनुमान जी ने सहायता कहाँ पहुँचायी है, इस प्रसंग पर थोड़ा प्रकाश डाला जा रहा है।
बालकाण्ड में सीता स्वयंवर के समय एक प्रसंग आता है कि -
संकर चापु जहाजु, सागरु रघुबर बाहुबल ।
बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस ।।
सोरठा के तीन चरण की रचना जब तुलसीदास जी ने कर ली, तब वे सोचने लगे कि मैंने शंकर जी के धनुष को, जहाज कहा और भगवान राम की भुजाओं के बल को सागर की उपमा दी, जहाँ कि जहाज तैर रहा है, अब जितने राजे-महाराजे, सन्त- महात्मा, ऋषि-मुनि उस स्वयंवर में उपस्थित हैं, वे सब-
"बूड़ेउ सकल समाज ॥"
लिख डालने पर डूब गये। तब वे सोचने लगे कि यह मैंने क्या लिख दिया। डूबे तो अभिमानी राजे-महाराजे ही, जिनको भगवान राम की भुजाओं के बल का अज्ञान था और जो धनुष को नहीं तोड़ सकने पर लज्जित होकर, अपनी-अपनी जगह पर जा बैठे थे। उनका धनुष तोड़ने के लिए उठना, मानों चाप रूपी जहाज पर चढ़ना है और उसे नहीं तोड़ सकना ही डूब जाना है। तो डूबे तो यही लोग, न कि वहाँ उपस्थित सन्त-महात्मा, ऋषि-मुनि आदि लोग। परन्तु, मैंने "बूड़ेउ सकल समाज" लिखकर सबका डूब जाना लिख डाला और लिखा हुआ काटा नहीं जा सकता, उस पर हरताल नहीं फेरा जा सकता। अब, आगे क्या कहा जाये? इस उलझन को कैसे सुलझाऊँ। बस, इसी चिन्ता में वे बड़ी देर तक सोचते बैठे रहे, जब वे इस कठिनाई को नहीं हल कर सके, तब अन्त में यह सोचकर कि पहिले स्नान कर आवें, फिर शांत चित्त से और ठण्डे दिमाग से इसे सोचेंगे, वे अपना कमण्डल उठाये और गंगा स्नान को चल दिये। वहाँ से लौटकर आने पर निश्चिन्त हो, जब वे फिर लिखने बैठे, तब उस सोरठा को पूरा लिखा पाया। उसका चौथा चरण पूरा हो चुका था। लिखा था-
"चढ़े जो प्रथमहिं मोह बस ।।"
इसका मतलब था, सब नहीं डूबे, वे ही डूबे, जिन्हें भगवान राम की भुजा के बल का अज्ञान था और जो अपनी ताकत आजमाने धनुष तोड़ने उठे थे। अर्थात्, उस जहाज पर बैठे थे। तुलसीदास जी समझ गये कि यह सहायता अर्थात् चौथे चरण की पूर्ति, हनुमान जी द्वारा की गयी है।
यह एक सरोवर है। मानसकार कहते हैं कि तालाब में घाट होते हैं, इस मानसरोवर में चार घाट हैं। कोई भी कथावाचक चार ही घाट में कथा करते हैं- 1. भगवान शंकर और पार्वती, 2. महात्मा कागभुसुण्डी और गरुड़, 3. महर्षि याज्ञवल्क्य और भारद्वाज और 4. गोसाई तुलसीदास और भक्तगण। ये चारों के संवाद ही चार घाट हैं-
सुठि सुन्दर संवाद बर, बिरचे बुद्धि बिचारि ।
तेइ एहि पावन सुभग सर, घाट मनोहर चारि ॥
यही इस पवित्र और सुन्दर सरोवर के चार मनोहर घाट हैं। चार घाट के चार नाम हैं- 1. राजघाट (ज्ञान घाट), 2. प्रजा घाट (कर्म घाट), 3. स्त्री घाट (भक्ति घाट), 4. गौ घाट (जहाँ पर सभी विषयों पर समन्वय हो, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, सबका मिश्रण)।
इन घाटों में जहाँ कहीं भी ज्ञान का प्रसंग आया है, वह माता पार्वती और भगवान शंकर के प्रसंग में आया है। जहाँ कहीं विधि-निषेध का प्रसंग है, वहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य और भारद्वाज का संवाद है। जहाँ कहीं भक्ति का विवेचन हुआ है, वह महात्मा कागभुसुण्डी और गरुड़ के संवाद में है और रामायण में जिस प्रसंग में, ज्ञान भी हो, भक्ति भी हो, वैराग्य भी हो, सभी का समन्वय हो तो समझ लेना कि यह गोस्वामी तुलसीदास जी का गौ घाट है और घाटों में तो सीढियाँ बनी रहती हैं, मगर गौ घाट में कोई सीढ़ी नहीं होती, यह ढालू और सलामीदार होती है, जिसमें कि वहाँ लूले, लँगड़े, अन्धे, अपाहिज, पशु-पक्षी आदि सभी जाकर पानी पी सकें। इसलिए, इस घाट का नाम गौ घाट पड़ा। जैसे, रामायाण का अयोध्याकाण्ड, लक्ष्मण गीता है (लक्ष्मण-निषाद संवाद)।
बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी ।। से लेकर
सखा समुझि अस परिहरि मोहू। सिय रघुबीर चरन रत होहू ।। तक।
ऐसे प्रसंग जहाँ पर आवे तो समझ लेना कि यह गोसाई जी का घाट है, इसमें सात सीढ़ियाँ हैं -
सप्त प्रबंध सुभग सोपाना, ग्यान नयन निरखत मनमाना ।।
सातों काण्ड सात सीढ़ियाँ हैं। ज्ञान की सात भूमिका ही सात सीढ़ियाँ हैं। 1. शुभेच्छा, 2. विचारणा, 3. तनुमानसा, 4. सत्वापत्ती, 5. असंसक्ति, 6. पदार्थाभावनी, 7. तुर्यगा।
1. शुभेच्छा (बालकाण्ड) -
शुभेच्छा से भरा पड़ा है। महर्षि भारद्वाज की इच्छा हुई कि मैं भगवान राम की कथा सुनूँ। माता सती की इच्छा हुई, कि मैं रामचरित्र सुनूँ। महाराज दशरथ की इच्छा हुई कि मैं पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाऊँ। राजा जनक की इच्छा हुई कि सीता स्वयंवर करूँ।
2. विचारणा (अयोध्याकाण्ड) -
श्रवन समीप भये सित केसा, मनहुँ जरठपनु यह उपदेसा ।
इसलिए, श्रीराम को युवराज पद दे देने का विचार हुआ। देवताओं का विचार हुआ कि अगर राम राज्य में फँस गये, तो हम सबों का बड़ा अहित होगा। अतः, सरस्वती को भेजकर मंथरा की बुद्धि पलटने का विचार हुआ। मंथरा का विचार कैकेई को मंत्रणा देने का हुआ। सीता जी और लक्ष्मण का विचार हुआ कि हम भी सरकारी सेवा में राम के साथ वन जायें। महात्मा भरत का विचार हुआ कि "देखें बिनु रघुनाथ पद, जिय कै जरनि न जाइ" अयोध्यावासी तथा गुरु वशिष्ठ और जनक का विचार चित्रकूट जाने का हुआ। मतलब यह कि अयोध्याकाण्ड 'विचारणा' भूमिका से भरा पड़ा है।
3. तनुमानसा (अरण्यकाण्ड)
लक्ष्मण के सात प्रश्न-"कहहु ग्यान बिराग अरु माया" माया, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति क्या है और जीव, ईश्वर का भेद क्या है? इस भूमिका में इन सबों का निश्चय हुआ।
4. असंसक्ति (सुन्दरकाण्ड) -
सब कुछ त्यागकर विभीषण भगवान की शरण में आता है -
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ।।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं ।।
अस सज्जन मम उर बस कैसे। लोभी हृदय बसइ धनु जैसे ।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरे । घरउँ देह नहि आन निहोरे ।।
देखो, अवतार लेने का जो कारण है, उसका पता इस चौपाई से चलता है। अजन्मा भगवान का जन्म क्यों होता है। सर्व त्याग का फल यही हुआ कि विभीषण की सन्त श्रेणी में गणना हो गयी और साथ ही त्रैलोक्य का स्वामी हो गया। यह भगवत् शरणागति का फल है।
6. पदार्थाभावनी (लंकाकाण्ड) -
जगदाकार वृत्ति का लोप होकर ब्रह्माकार वृत्ति का होना।
दोहा-
बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु ।
लोक कल्पना बेद कर। अंग अंग प्रति जासु ।।12 (क) ।।
ऐसा मन्दोदरी ने रावण से कहा है।
7. तुर्यगा -
उत्तरकाण्ड सबसे भरा हुआ है। पूर्ण ज्ञान और भक्ति का उदय इसमें ज्ञान दीपक, सन्त लक्षण, महात्मा कागभुसुण्डी जी की कथा है।
सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मनमाना ।।
भैय्या! जिनके ज्ञान रूपी नेत्र हों, वही इसका जल पी सकता है। आँख वाला ही इस सरोवर की सीढियों से उतरकर उसमें स्नान कर सकता है, जलपान कर सकता है, अज्ञानी अंधों के वश की बात नहीं है। वे यहाँ नहीं आ सकते। जो प्रसंगानुसार अर्थ करते हैं और समझते हैं, वे ही इस सरोवर के रक्षक हैं।
जिन्होंने सन्त समागम किया है, सन्तों के चरणरज का अपने मस्तक पर अभिषेक किया है, वे ही इसके अधिकारी हैं।
जो विश्वास और श्रद्धा से विहीन हैं, सन्तों का कभी संग नहीं किया है, वे इसके अनधिकारी हैं।
दोहा-
श्रोता वकता ग्याननिधि, कथा राम कै गूढ़ ।
किमि समुझौं मैं जीव जड़, कलिमल ग्रसित बिमूढ़ ।।30 ख।।
इसके श्रोता और वक्ता दोनों को ज्ञान निधि होना चाहिए तभी यह समझा जा सकता है और समझाया जा सकता है, जब तक सत्य वस्तु 'मैं' आत्मा चराचर का अस्तित्व सर्व का 'मैं' को प्राप्त नहीं कर लेगा, तब तक श्रीराम चरित मानस को न कोई समझा सकेगा और न कोई समझ सकेगा। सन्तों की कृपा से ही यह समझा जा सकता है। इसलिए -
जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मनलाई ।।
कथावाचक तीन प्रकार के होते हैं -
1. विषय सूची, रुचिर शब्दावली के ही विवेचन करने वाले होते हैं, उनको अमुक शब्द रामायण में कहाँ-कहाँ पर कितनी बार आया है। बस, इसी की रोचक व्याख्या करने और अपनी मिथ्या पाण्डित्य और विद्वत्ता के प्रदर्शन में ही आनन्द आता है। लोग भी समझते हैं कि पण्डितजी कितने महान विद्वान हैं, सारी रामायण इनके करतल गत हैं। इस व्याख्या से न तो श्रोता के पल्ले कुछ पड़ना है और न वक्ता के।
2. इतिहास, लीला भाग के ही कथन करने वाले होते हैं।
3. तत्त्व का विवेचन करने वाले होते हैं।
रामायण का अर्थ होता है-राम, अस्य, अयन अर्थात रामायण, अयन का अर्थ होता है-विश्राम, निवास। इस तरह राम का जो विश्राम स्थल, निवास स्थान है, उसको कहते हैं, रामायण। राम जिसमें व्याप्य हैं, उसको कहते हैं अयन और जो व्यापक है, उसको कहते हैं, राम। दोनों मिलकर हो गया, रामायण।
व्याप्य 'अयन' है, और व्यापक 'राम' हैं। यदि, अयन नहीं होगा तो राम व्यापेगा किसमें और राम नहीं होगा तो अयन किसका होगा? जैसे, इस मकान में कोई नहीं रहेगा तो मकान रहेगा क्या? नहीं और मकान नहीं रहेगा तो रहने वाला कहाँ रहेगा? इसी प्रकार तृण से आदि ब्रह्मा पर्यन्त अयन हैं और उसमें जो व्यापक है, वह राम है। दोनों मिलकर हो गया रामायण।
एक तृण से लेकर ब्रह्मा तक क्या कोई ऐसी वस्तु है, जिसमें 'है' अस्तित्व सामान्य चेतन न हो? 'है' सबमें है। बिना 'है' अस्तित्व के किसी की भी सिद्धि नहीं। 'है' के बिना 'है' नहीं और 'है' के बिना 'नहीं' नहीं। 'हैं' के बिना न 'है' है और न 'नहीं' है। दोनों की सिद्धि 'है' करके ही है। 'है' से कोई देश, काल, वस्तु खाली नहीं है। यही अस्तित्व 'मैं' आत्मा भगवान राम की व्यापकता है। अस्तित्व पर जो आधारित है, वह है अयन। राम का अर्थ होता है-
"यस्मिन रमन्ते योगिनः सः रामः ।''
जिसमें, योगी महात्माजन रमते हैं, रमण करते हैं, मस्त रहते हैं, खेलते- कूदते, खाते-पीते, चलते-फिरते, देखते-सुनते, सोते-जागते और निवास करते हैं, उसे कहते हैं 'राम'।
प्रश्न होता है- किसमें योगी, महात्मा जन रमण करते हैं? उत्तर है- "चराचरे सुभूतेषु रमन्ते, यस्मिन, सः रामः।"
जो सारे चराचर में रम रहे हैं, अस्तित्व, सत्तामात्र है, सत्ता पद है, उसी में योगीजन रमते हैं। किसमें? अरे, जो सारे चराचर में रम रहे हैं, उसमें। जो सारे चराचर में रम रहे हैं, इसका क्या भाव है?
सुन्दरकाण्ड के मंगलाचरण का एक श्लोक है -
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये ।
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।।
आत्मा कहते हैं, अस्तित्व को। जो अस्तित्व 'मैं' आत्मा 'राम' सारे चराचर में है, वही 'मैं' हूँ। यही 'राम' शब्द का लक्ष्य है। 'रमुक क्रीडायां' धातु से राम शब्द बनता है। जिस चराचर में रमें हैं और जो सारे चराचर में रमे हैं, दोनों को मिलाकर हो गया रामायण।
देखो, इस हार (फूल की माला) में प्रत्येक फूल का आधार है, धागा। अगर इस हार से धागा निकाल लिया जाय, तो हार का अस्तित्व खतम हो जायेगा। हार नहीं रह सकेगा। इसी तरह जिसको तुम संसार कहते हो, उसका आधार 'मैं' आत्मा ही तो हूँ। जिस आधार पर संसार रूप दिखाई दे रहा है। क्या वह 'मैं' से भिन्न है? यदि 'मैं' आत्मा आधार न रहूँ तो संसार किसके आधार पर टिकेगा? यह रहेगा कहाँ? फिर, किसको संसार कहोगे? इसलिए, तृण से लेकर ब्रह्मा तक सर्व का आधार 'मैं' आत्मा ही हूँ।
भैय्या! फिर समझो देखो, यह अटल सिद्धांत है कि जो जिसमें व्यापक होता है, वही उसका आधार होता है। जो जिसका आधार होता है, वही उसका कारण होता है और जो जिसका कारण होता है, वही उसका स्वरूप होता है।
विषय समझो देखो, यह डण्डा है। इस डण्डे में लकडी व्यापक है। इस डण्डे के रग-रग में लकड़ी परिपूर्ण है। डण्डे में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ लकड़ी न हो, इस तरह डण्डे में लकड़ी व्यापक हुई।
डण्डे का लकड़ी आधार है। यदि, इसमें से लकड़ी निकाल लो तो डण्डा रहेगा? नहीं। डण्डे का अस्तित्व खतम। इसलिए डण्डे का आधार लकड़ी है। डण्डे का कारण, लकड़ी है। यदि लकड़ी न होगी तो डण्डा किसको कहोगे? बिना लकड़ी के डण्डा नहीं रह सकता। अतः, लकड़ी डण्डे का कारण है और डण्डा का लकड़ी ही असली स्वरूप है। लकड़ी ही है, जो डण्डा है।
इसी तरह 'है' अस्तित्व सामान्य चेतन (विशेष चेतन 'मैं' आत्मा भगवान राम) सर्व में व्यापक है, सर्व का आधार है, सर्व का कारण है। सर्व का वही रूप ही है। उससे भिन्न एक तृण की भी अलग सत्ता नहीं। सर्व वही है।
राम का अर्थ होता है-देखो 'राम' में दो अक्षर हैं, रा और म। 'रा' का अर्थ होता है-तत्, अर्थात् 'वह' और 'म' का अर्थ होता है-त्वं, अर्थात् तू। अब दोनों अक्षरों को मिला दो, मिलाप हुआ तत् त्वम्। असि अर्थात् 'है' इस तरह राम का अर्थ हुआ तत्त्वमसि, अर्थात् 'वह तू है।' तुम स्वयं राम हो। राम से भिन्न एक कण भी नहीं। रामोपनिषत् में है - "सत्वाच्यस्तू राकारास्यात्।"
राम कथा का स्वरूप क्या है?
जेहि महँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना ।।
जिसके आदि में, मध्य में और अन्त में, भगवान राम 'मैं' आत्मा का ही दिग्दर्शन हो, अनुभूति हो यही राम कथा का स्वरूप है।
एक ही चौपाई में सातों काण्ड रामायण इस तरह है।
गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू ।।
1. गई बहोरि - बालकाण्ड है।
आशा जो चली गयी थी, वह वापस आ गयी। दशरथ की पुत्र की आशा चली गयी थी। परन्तु, पुत्र हुए और आशा लौट आयी। जनक की आशा चली गयी थी कि धनुष को अब कोई नहीं तोड सकता।
तजहु आस निज-निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू ।।
यह गयी हुई आशा वापस आ गयी।
2. गरीब निवाजू (अयोध्याकाण्ड) कहाँ केवटऔर कहाँ राम।
केवट कहता है कि -
"मोहि राम राउरि आन, दसरथ सपथ सब साची कहौं।।"
"तुम्हारे बाप की कसम खाकर कहता हूँ"
उसका ऐसा कहना भगवान राम अथवा राजा राम दोनों के पोजीशन के खिलाफ था और केवट के अधिकार के बाहर था, परन्तु राम की -
दोहा-
सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे ।
बिहसे करुना ऐन, चितइ जानकी लखन तन ।।100।।
ऐसी दृष्टि थी।
3. सरल (अरण्यकाण्ड) -
शबरी के आश्रम में भगवान राम ने जो सरलता दिखाई, वैसी सरलता सिवा भगवान राम के और कौन दिखा सकता है। शबरी में भेद का अभाव था और श्रीराम में व्यक्तित्व का अभाव था। यदि, शबरी अपने में और भगवान राम में भेद मानती कि मैं एक नीच जाति की भीलनी हूँ और ये भगवान हैं, राजा राम हैं। तो, क्या वह अपना जूठा बेर उन्हें खिला सकती थी? नहीं और राम इसी तरह अपना व्यक्तित्व रखते तो वे जूठे बेर खा सकते थे? तब दोनों में कौन-सा भाव था?
उत्तर है- "सहज सनेह" इसमें विधि-निषेध नहीं होता।
4. सबल (किष्किन्धाकाण्ड) -
दोहा-
सुनु सुग्रीव मारिहउँ, बालिहि एकहि बान ।
ब्रह्म रुद्र सरनागत, गएँ न उबरिहिं प्रान ।।6।।
विश्व विजयी बाली को, जिससे युद्ध करने जो कोई भी सामने आता था तो उसका आधा बल वह खींच लेता था, ऐसे बाली को एक ही बाण में मारूँगा, दो बाण से नहीं, ऐसा कहना यह सबलता है।
5. साहिब (सुन्दरकाण्ड) -
अगर, कोई सरकार है तो राम ही है, बाकी सब बेकार है। साहिबी यदि दिखाई है तो राम ने। समुद्र में अभी पुल बँधा नहीं, युद्ध हुआ नहीं, जय-पराजय का कुछ पता नहीं। समुद्र का जल मंगवाया और विभीषण को लंका का राज्य दे दिया। तिलक सार दिया।
6. रघु (लंकाकाण्ड) -
रघु-जीव "रमुक क्रीडायां' धातु। विषयों में जो रमे, उसे रघु कहते हैं। तो, यहाँ लंका काण्ड में जो-जो मरते गये, सब रामाकार होते गये।
7. राजू (उत्तरकाण्ड) -
राजा राम की महिमा क्या थी और राम राज्य की कैसी महिमा थी, यह काण्ड इससे भरा पड़ा है।
इस रामचरित मानस में, विविध प्रकार के जो छन्द हैं, वे भाँति-भाँति की मछलियाँ हैं।
धुनि, अवरेब, कबित गुन जाती, मीन मनोहर ते बहुभाँती ।
धुनि, जो छन्द है वह रोहू मछली है। रोहू मछली खूब गहरे जल में रहती है, ये बहुत थोड़ी होती है। मानसरोवर के अन्दर रोहू क्या है? दो-दो, तीन-तीन अक्षर के छन्द जिनके शब्द थोड़े हैं। परन्तु भाव, बड़े गंभीर हैं, विस्तृत हैं। जैसे -
दोहा-
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न ।
बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न ॥8।।
ये धुनि छन्द है, जो रोहू मछली के समान है। रामचरित मानस में ऐसे छन्द बहुत थोड़े हैं। अवरेव, जो छन्द हैं, वह चढ़वा मछली है, आगे का भाव पीछे को प्रकाशित करता है, जैसे- राम कथा कलि बिटप कुठारी, आदि। गुण, जो छन्द है, वह शहरी मछली है।
जैसे- "भव-भव विभव पराभव कारिनि" आदि।
जाति, जो छन्द है, वह शबरी मछली है।
जैसे-
मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो।
अच्छा तो भैय्या! आओ, पहले राजघाट में ही स्नान करें। यह ज्ञान घाट है, जहाँ माता पार्वती और भगवान शंकर स्नान करते हैं। इसको माता पार्वती और भगवान शंकर का संवाद कहते हैं। सन्त समाज में इस प्रसंग को "शंकर गीता" कहते हैं। लोकोक्ति है कि- बाल का आदि, अयोध्या का मध्य, उत्तर का अन्त, समझै सोई सन्त। यह प्रसंग बाल का आदि ही है -
माता जी भगवान शंकर से पूछती हैं कि हे भगवन्!
प्रभु समरथ सर्वग्य सिव । सकल कला गुन धाम ।।
जोग ग्यान बैराग्य निधि । प्रनत कलपतरु नाम ।।
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी । जानिअ सत्य मोहि निज दासी ।।
तौं प्रभु हरहु मोर अग्याना । कहि रघुनाथ कथा विधि नाना ।।
जासु भवनु सुरतरु तर होई । सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई ॥
ससिभूषन अस हृदय विचारी । हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी ।।
प्रभु जे मुनि परमारथवादी । कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी ।।
सेस सारदा वेद पुराना । सकल करहिं रघुपति गुनगाना ।।
तुम्ह पुनि राम-राम दिन राती । सादर जपहु अनंग आराती ।
रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई ।।
आप समर्थ, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप हैं। योग, ज्ञान और वैराग्य के भण्डार हैं। आपका नाम शरणागतों के लिए कल्पवृक्ष है।
हे सुख स्वरूप! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे अपने चरण की सच्ची दासी समझते हैं, तो हे नाथ! भगवान राम के प्रति मेरा जो अज्ञान है, उसे दूर कीजिये।
जिसका घर कल्पवृक्ष के नीचे हो, वह दरिद्रता का दुःख भोगता है, यह भला कैसे संभव है? इसी प्रकार आपके चरणों के सान्निध्य में रहकर अज्ञान जनित दुःख मुझमें रहे यह कैसे सहन हो सकता है? परमारथवादी ऋषि-मुनि राम को अनादि, अजन्मा, ब्रह्म बताते हैं। शेष शारदा, वेद और पुराण जिनकी महिमा गाते हैं और फिर आप भी तो दिन-रात प्रेमपूर्वक राम-राम जपा करते हैं। तो प्रभो! क्या वे राम यही हैं, जो अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं अथवा अजन्मा निर्गुण अगोचर कोई और राम है?
दोहा-
जौं नृपतनय त ब्रह्म किमि नारि विरहँ मति भोरि ।
देखि चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि ।। 108।।
चरित्र तो देखती हूँ कि "नारि विरहँ मति भोरि" स्त्री के वियोग में पागल बने पेड़-पौधे, पशु-पक्षी से पता पूछते जंगलों में भटक रहे हैं।
हे खग मृग, हे मधुकर श्रेनी, तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ।
और महिमा सुनती हूँ कि
यद्भयाद्वाति वातोऽयं, सूर्यस्तपति यद्भयात् ।
वर्षतीन्द्रोदहत्यग्रिः मृत्युश्चरति यद्भयात् ।।
जिसके भय से वायु बहती है, जिसके भय से सूर्य तपता है, जिसके भय से इन्द्र वर्षा करता है और जिसके भय से काल सारे चराचर को ग्रसता है।
विधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला । माया जीव करम कुलि काला ।।
अहिप महिप जहँ लगि प्रभु ताई । जोग सिद्धि निगमागम गाई ॥
करि विचार जिर्यं देखहु नीके । राम रजाइ सीस सब ही के ।।
तो कौन राम है? भगवन्! मेरी बुद्धि भ्रमित हो गयी है।
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ । कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ ॥
अग्य जानि रिस उर जनि घरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू ।।
यदि, इच्छा रहित व्यापक समर्थ ब्रह्म कोई और है तो हे नाथ! मुझे उसे समझाकर कहिये। मुझे अज्ञ जानकर मन में क्रोध न लाइये, जिस तरह मेरा मोह दूर हो, वही कीजिये।
दोहा-
बन्दउँ पद घरि घरनि सिर, विनय करउँ कर जोरि ।
बरनहु रघुबर बिसद जसु, श्रुति सिद्धान्त निचोरि 109।।
हे प्रभो! मैं पृथ्वी पर सिर टेककर श्री चरणों की वन्दना करती हूँ और हाथ जोड़कर विनती करती हूँ। आप वेदों के सिद्धांत को निचोड़कर श्री रघुनाथ जी का निर्मल यश वर्णन कीजिये।
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम वचन तुम्हारी ।।
गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं । आरत अधिकारी जहँ पावहिं ।।
यद्यपि, स्त्री होने के कारण मैं उसे सुनने की अधिकारिणी नहीं हूँ, तथापि मैं मन, वचन और कर्म से आपकी दासी हूँ। सन्त लोग जहाँ आर्त अधिकारी पाते हैं, वहाँ गूढ़ से गूढ़ तत्त्व भी उनसे नहीं छिपाते। माताजी का यह मौलिक प्रश्न है। इसी प्रश्न का उत्तर सारी रामायण है।
माताजी का कहना है कि यदि राम ब्रह्म है तो यह मनुष्यों का सा चरित्र कैसा? जिसमें योगी रमते हैं, जो व्यापक हैं, अखण्ड हैं, वे कौन राम हैं और यै कौन हैं जो "नारि विरहँ मति भोरि" आप इस तरह समझाइए कि जो वेदों का सार हो और श्रुतियों का निचोड़ हो। माता जी का प्रश्न कितनी गहराई का है। तो भैय्या! इस प्रश्न का उत्तर भी तो अत्यन्त गहराई में मिलेगा। इसीलिए, भगवान शंकर दो घड़ी ब्रह्मानन्द में डूब गये। समुद्र की तह में डूबने से ही मोती आदि बहुमूल्य रत्न मिलते हैं।
देखो भावना चार हैं-
1. असत् भावना - ईश्वर नहीं है।
2. विपरीत भावना - जीव-जीव है, ईश्वर-ईश्वर है। जीव अनेक हैं, ईश्वर एक है।
3. सम्भावना - शायद ईश्वर है। सम्भव तो है, पर निश्चय नहीं है।
4. असम्भावना - जीव कभी ईश्वर नहीं हो सकता।
भगवान आत्मा को ये भाव ढाँकने की कोशिश करते हैं। अरे! ये तो इन्हें स्पर्श तक नहीं कर सकते, ढाँकना तो दूर रहा।
असत भावना वाले से यह प्रश्न है कि -
"ईश्वर नहीं है" ऐसा जो तुम कह रहे हो, तो ईश्वर के नहीं होने का अनुभव किसने किया?
उसका उत्तर है, 'मैं' ने किया।
अब विपरीत भावना वाले से प्रश्न है कि तुम जो कहते हो कि जीव-जीव है, और ईश्वर-ईश्वर है। जीव अनेक हैं और ईश्वर एक है। इस तरह जीव और ईश्वर का इस रूप में अनुभव किसने किया?
वह उत्तर देता है कि 'मैं' ने किया।
अब सम्भावना वाले से ही यही प्रश्न है, तब वह भी यही उत्तर देगा कि 'मैं' ने ही अनुभव किया है, तभी अपना अनुभव सामने रखा है, दूसरा कौन अनुभव करेगा।
अब चलो चौथे महाशय से पूछें- भैय्या! तुम जो कहते हो कि जीव कभी ईश्वरहो नहीं सकता। तुम्हारा यह कहना, सुनकर कहना है या अनुभव करके कहना है?
वह कहता है- अजी! यह हमारा अनुभव है। सुनकर क्यों कहेंगे।
तब उनसे पुनः प्रश्न है कि यह अनुभव है कि जीव कभी ईश्वर हो ही नहीं सकता, किसने किया?
वह उत्तर देता है 'मैं' ने ही किया।
तब जब इन चारों भावों का अनुभव करने वाला 'मैं' आत्मा ही हुआ, इन चारों की सिद्धि 'मैं' आत्मा करके ही हुई। यदि 'मैं' न रहूँ तो अनुभव कौन करेगा? अतः, ये स्वतः सिद्ध नहीं है। अस्तित्वहीन हैं। तब, जो अस्तित्वहीन हैं, वह मुझ अस्तित्व को क्या जान सकेगा? ये 'मैं' आत्मा को किस तरह सिद्ध कर सकेंगे? जिसकी सिमि मुझ आत्मा से है, वह मुझ आत्मा को क्या ढाँकेगा? डण्डा लकड़ी को किस तरह सिद्ध कर सकेगा? क्योंकि, डण्डा है ही नहीं। वह अस्तित्वहीन है। बिना लकड़ी के उसकी सिद्ध नहीं।
1. असत् भावना का मूलोच्छेद करने वाला यजुर्वेद का महावाक्य है- 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ)।
2. विपरीत भावना का मूलोच्छेद करने वाला सामवेद का महावाक्य है- 'तत्त्वमसि' (वह तू है)।
3. सम्भावना का मूलोच्छेद करने वाला अथर्ववेद का महावाक्य है- 'अयमात्मा।' (आत्मा ही ब्रह्म है)
4. असम्भावना का मूलोच्छेद करने वाला ऋग्वेद का महावाक्य है - 'प्रज्ञानं ब्रह्मा' (तत्काल जो जानता है,
ज्ञान ही जिसका स्वरूप है)
जिस समय सीता हरण हो चुका था और उनके वियोग में भगवान राम, लक्ष्मण सहित उनकी खोज में नर-लीला कर रहे थे, उसी समय भगवान शंकर के साथ माता पार्वती ने वन में उनके इस चरित्र को देखा। उस समय राम की दशा थी -
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी । तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ।।
खंजन सुक कपोत मृग मीना । मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥
कुन्द कली दाड़िम दामिनी । कमल सरद ससि अहि भामिनी ।।
बरुन पास मनोज धनु हंसा । गज के हरि निज सुनत प्रसंसा ।।
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं । नेकु न संक सकुच मन माहीं ।।
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू । हरषे सकल पाइ जनु राजू ।।
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं। प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ।।
एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी ।।
भगवान शंकर ने जब उन्हें इस दशा में देखा तो उनने उसका अर्थ नहीं लगाया। वे जानते थे कि यह सब चरित्र असत्य और लीला मिथ्या है। अतः, मैं यदि इसका अर्थ लगाऊँगा तो मुझ पर भी कुसमय आ जायेगा। मुझे तो यार की यारी से काम है, यार के फेलों से क्या काम? अतः वे -
भरि लोचन छबि सिंधु निहारी ।
कुसमय जान न कीन्हि चिन्हारी ।।
उन्होंने कुछ हाल-चाल नहीं पूछा कि - "भगवान यह क्या बात है, आपकी यह कैसी दशा है, माता सीता कहाँ हैं? आदि।" वे जानते थे कि यदि मैंने चिन्हारी की अर्थ लगाया कि मुझ पर भी कुसमयआ जायेगा। अतः, वे इस चक्कर में नहीं पड़े और-
जय सच्चिदानंद जग पावन ।
अस कहि चलेउ मनोज नसावन ।।
वे आगे बढ़ गये। माता सती को चरित्र और लीला देख कर ही भ्रम हुआ। उसने अर्थ लगाया उसे सत्य माना, जिससे वे चक्कर में पड़ गयी।
जो तीनों काल में न हो वह असत्य है और जो न होते हुए उत्पन्न होकर नाश हो जाये वह है मिथ्या। अंधकार में रस्सी सर्प के समान दिखी रस्सी में सर्प असत्य और मिथ्या दोनों है। असत्य, इसलिए है कि सर्प तीनों काल में नहीं है। वह तो अंधकार के कारण सर्प दिख रहा है। ज्यों ही प्रकाश में देखा कि सर्पभाव चला गया। रस्सी ही रह गयी। तब, इस रस्सी में अंधकारवश सर्प हुआ और प्रकाश के आते ही उस सर्पभाव का नाश हो गया। अतः, मिथ्या है। वह रज्जू की लीला है। जो जिसमें भासै, वही उसका चरित्र है। सर्प रज्जू में भासता है, अतः सर्प रज्जू का चरित्र है। सर्प न तो अंधकार में है और न प्रकाश में है, अतः असत्य है। इसी तरह 'मैं' आत्मा भगवान में जगत् प्रपंच का अज्ञान के अन्धकार में भासना, यह मुझ आत्मा 'मैं' का चरित्र है, जो असत्य है।
सर्प नहीं होते हुए भी सर्प भासना, जो कि भय कम्पन का कारण है, वह भासता क्यों है? अरे! यही तो रज्जू की लीला है, जो मिथ्या है। मुझ आत्मा 'मैं' में जगत् प्रपंच नहीं होते हुए भी, जो सारे द्वंद्वों का कारण होता है, क्यों भासता है? अरे, यही तो मुझ आत्मा 'मैं' की लीला है। जो नहीं है वह सर्प है, जगत् प्रपंच है, यह असत्य है, यही चरित्र है और नहीं होते हुए भी जो भासता है, सर्प, प्रपंच, यह मिथ्या है, यही तो मुझ आत्मा 'मैं' की लीला है। अभाव को देखकर, सुनकर भ्रम होता है, भाव को नहीं। सर्प अभाव रूप है और रज्जू भाव रूप है। वही देखा जाता है, जो कभी न हो, रज्जू में सर्प देखा गया जो कभी नहीं है। जो दिखता है वह विकल्प है, वही जगत् है। विकल्प कहते हैं- योग दर्शन का सूत्र है-
"शब्द ज्ञानानुपाती, वस्तु शून्यो विकल्पः ।''
अर्थात्, जिससे केवल शब्द मात्र का ही ज्ञान हो और वस्तु का अभाव हो, उसे विकल्प कहते हैं। जैसे-डण्डा शब्द सुन पड़ा, परन्तु ढूँढने चलेंगे तो हाथ में केवल लकड़ी ही लकड़ी लगेगी। डण्डा नाम की कोई चीज मिलने वाली नहीं है। डण्डा अस्तित्वहीन अभाव रूप है, जो है ही नहीं। मतलब यह कि अस्तित्वहीन पदार्थ जो किसी भी काल में न मिले उसे ही विकल्प कहते हैं। सर्प विकल्प है, वही जगत् है। अनुभव उसी का होता है, जो त्रिकालाबाध्य हो, अभाव न हो। जो भाव है, वह मैं 'है' है, आत्मा है और जो 'है' है अस्तित्व, वह राम है। जो राम है, वह त्रिकालाबाध्य है। यह ज्ञान के प्रकाश से जाना जाता है। भगवान शंकर के लिए चरित्र असत्य और लीला मिथ्या थी, यह ज्ञान के प्रकाश में देखा गया। अतः, वे भ्रम, शोक और मोह से रहित रहे। परन्तु, माता सती भ्रम में पड़ गयी, जिससे उन्हें मोह हुआ, जो दुःख का कारण हुआ। यह अज्ञान के अन्धकार में दिखा! मृगजल, दिखता दोनों को है, जिसे सूर्य की सत्ता का ज्ञान है उसे और अज्ञान है उसे भी, परन्तु अज्ञानी उसे मृग के समान सत्य जल मानता है और ज्ञानी उसे सूर्य की सत्ता जानता है, जल का अभाव जानता है। एक के लिए प्रत्यक्ष जल है और दूसरे के लिए सूर्य की सत्ता है। जिसको सत्य भासता है, उसके लिए दुःख रूप है और जिसको सत्ता भासता है, उसके लिए वह सुख रूप है।
'मैं' आत्मा की सत्ता करके, यह जगत् प्रपंच भासता है। मृग, जल मानकर दौड़ता है, जानकर नहीं। इसी प्रकार यह जगत् प्रपंच, 'मैं' आत्मा भगवान राम की सत्ता है इसे मानकर नहीं, जानकर चलो।
भैय्या! चरित्र असत्य और लीला मिथ्या है। एक बार राम दरबार लगा हुआ था। भगवान राम और माता सीता सिंहासन पर बैठे हुए थे कि भक्त शिरोमणि हनुमान जी हाथ जोड़कर खड़े हुए। उन्हें हाथ जोड़कर खड़े हुए देख, भगवान राम ने माता सीत से कहा- सीते, देखो सामने हाथ जोड़े हुए हनुमान जी खड़े हुए हैं। वे आत्म तत्त्व की जिज्ञासा से खड़े हैं। वे इस तत्त्व के जानने के पूर्ण अधिकारी हैं। अतः, तुम मेरे स्वरूप परम तत्त्व का उनके समक्ष विवेचन करो। रामाज्ञा को स्वीकार कर जगत जननी सीता देवी श्री हनुमान जी से कहने लगीं- हे हनुमान जी!
रामं विद्धि परब्रह्म सच्चिदानन्दमद्वयम् ।
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सत्तामात्रमगोचरम् ।।
आनन्दं निर्मलं शातं निर्विकारं निरंजनम् ।
सर्वव्यापिनमात्मानं स्वप्रकाशमकल्मषम् ।।
श्रीराम को सच्चिदानंद विग्रह, सारी उपाधियों से रहित, सत्तामात्र, इन्द्रियातीत, आनन्दमूर्ति, शुद्ध, शान्त, विकार शून्य, निरंजन अर्थात् निर्लेप, सर्वव्यापी, स्वयंप्रकाश, कल्मषहीन अर्थात् दुःखों से रहित, आत्म स्वरूप, अद्वितीय परब्रह ही समझो।
रामो न गच्छति न तिष्ठति नानुशोच -
त्याकांक्षते त्यजति नो न करोति किञ्चित् ।
आनन्दमूर्ति रचलः परिणामहीनो,
मायागुणाननुगतो हि तथा विभाति ।।
रामः परमात्मा पुरुषः पुराणो,
नित्योदितो नित्यसुखो निरीहः !
तथापि माया गुणसं गतो सौ
सुखीव दुःखीव विभाव्यते बुधैः ।।
श्रीराम न तो कहीं जाते हैं, न कहीं ठहरते हैं, न किसी के लिए शोक करते हैं, न किसी वस्तु की आकांक्षा करते हैं, न किसी का परित्याग करते हैं, न कोई कर्म करते हैं, वे तो अचल, आनन्दमूर्ति एवं परिणामहीन हैं, अर्थात् उनमें परिवर्तन नहीं होता, केवल माया के गुणों के संबंध से, उनके अन्दर ये बातें होती हुई सी प्रतीत होती हैं। श्रीराम परमात्मा, पुराण पुरुषोत्तम, नित्य प्रकाशित, नित्य सुख से सम्पन्न एवं निरीह अर्थात् चेष्टा से रहित हैं, किन्तु फिर भी माया के गुणों से सम्बद्ध होने के कारण, उन्हें बुद्धिमान लोग सुखी अथवा दुःखी समझ लेते हैं।
तीनों गुणों (सत्, रज, तम) से युक्त मैं मूल प्रकृति हूँ। मुझ माया में ऐसी कुछ शक्ति नहीं है कि मैं स्वयं कुछ कर सकूँ। भगवान राम के सन्निकट रहकर ही मैं सब कुछ करती हूँ। राम अकर्त्ता हैं, अभोक्ता हैं, व्यापक हैं, सर्वत्र हैं। मैं प्रकृति माया हूँ। जिस तरह चुम्बक के कारण लोहा भी कर्त्तापन को प्राप्त होता है, इसी प्रकार में भगवान राम के आश्रय से कुछ कर सकने में समर्थ हूँ।
मुझ माया का रामावतार हुआ है। सारा चरित्र मैंने ही किया, राम ने नहीं। विश्वामित्र के मख की रक्षा मैंने की। जनकपुर से धनुष मैंने तोड़ा। सीता का विवाह मुझसे हुआ। चौदह वर्ष के लिए बनवास मुझे हुआ। वन में गयी। सुग्रीव से मित्रता मैंने की। शबरी के बेर मैंने खाये, रावण से युद्ध मैंने किया। राम राज्याभिषेक मेरा हुआ, राम का नहीं। इस प्रकार राम जन्म से लेकर अन्त तक, सारा चरित्र मेरा ही है। सारा चरित्र माया किया राम ने नहीं। राम तो सर्वव्यापक है, आनंद ही इनका स्वरूप है। आनंदमूर्ति राम मुझ माया में व्यापक हैं। अतः, वे मुझ माया में भासते हैं। यह सब मैंने ही किया राम ने नहीं। देहाभिमानी को ही यह सब चरित्र सत्य दिखता है, तत्त्ववित् आत्मनैष्ठिको को नहीं। राम अक्रिय हैं, वे जरा भी कुछ नहीं करते। वे अचल हैं, एक रस हैं। जितर सब चरित्र जन्म से लेकर अंत तक सम्पूर्ण हुआ, कुछ नहीं।
दोहा-
मगन ध्यान रस दंड जुग, पुनि मन बाहेर कीन्ह ।
रघुपति चरित महेस तब, हरषित बरनै लीन्ह ||111||
भगवान शंकर ने दो घड़ी आनन्द सागर में डूबकी लगाई, तब क्या रत्न मिला वो बाहर आकर कहते हैं कि हे पार्वती! तुमने जो चरित्र देखा, वह क्या देखा? किसमे देखा? किसको देखा? किसने देखा?
जिसको बिना जाने, झूठ भी, अभाव रूप भी जो है ही नहीं, वह सत्य सा भासता है। बिना रस्सी के जाने, सर्प जो अभाव रूप है, है ही नहीं। वह सत्य सा भासता है, प्रतीत होता है। रस्सी को जान लो, जो कि सर्प का आधार है। (क्योंकि यदि रस्सी न होगी, तो सर्प दिखेगा किसमें?) तो सर्प का अभाव हो गया। जिसमे दिखता है, उसके आधार को जान लो, फिर देखने का अभाव हो गया। डण्डा दिख रहा है, इसका आधार लकडी को जान लो, फिर डण्डे का अभाव हो गया। लकड़ी ही दिख रही है। डण्डा तो विकल्प था, अस्तित्वहीन जो है ही नहीं।
जो दिखता है, वह दिखता है, मैं दिखता हूँ तब दिखता है।
इस रहस्य को जान लिया, फिर दिखना कहाँ, जो दिखता है।।
लकड़ी यदि न दिखे, तो डण्डा कैसे दिखे। भाई देखने वाला ही दिखता है, दूसरा नहीं। द्रष्टा ही दृश्य है। नहीं होते हुए जो भासता है, वह भगवान का चरित्र है, जो विशद और विमल है। मुझ आत्मा 'मैं' में यह प्रपंच (राम चरित्र) नहीं होते हुए भी दिखा, क्यों? अरे, यही तो उसकी लीला है, यह सब अज्ञान के अन्धकार में अज्ञानी जनों को दिखता है। तत्त्ववित् को नहीं।
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जाने। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचाने ।।
जेहि जाने जग जाइ हेराई । जागे जथा सपन भ्रम जाई ।।
हे पार्वती! तुमने झूठे को देखा, अभाव को देखा और उसके आधार के अज्ञान में जो दिखा उसे सत्य मान लिया, जिसके जान लेने पर संसार प्रपंच का अभाव हो जाता है, वह आधार भगवान आत्मा 'मैं' है। चराचर का अस्तित्व अपना आप, जो हर एक के भीतर 'मैं' हूँ, 'मैं' हूँ ऐसा रात-दिन बोल रहा है, उसके बिना जाने यह संसार प्रपंच मन, बुद्धि, शरीर आदि जो तीन काल में है ही नहीं, सत्य-सा जान पड़ता है।
भाई, यही श्रुतियों, स्मृतियों के सिद्धांत का निचोड़ है, जिसे भगवान शंकर ने ब्रह्मानंद, आत्मानंद, निजानंद, नित्यानंद, सागर में दो घड़ी डूबकर, गोता लगाकर, बाहर निकाला। कौड़ी, घोंघी, सीप और शंखियाँ आदि तो समुद्र के बाहर किनारे में भी मिल जाती हैं, परन्तु यदि अमूल्यरत्न निकालना है, तो भैया! इसके लिए तो समुद्र की तह में, गहरे जल में मीलों जाना पड़ेगा, तब कहीं जाकर मिलेगा। इसी तरह माताजी का प्रश्न कोई किस्सा-कहानी, राजा-रानी के चरित्र, इतिहास आदि जानने को होता तो, भोले बाबा को दो घड़ी समाधिस्थ होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मगर, यहाँ तो माता जी ने कहा था कि भगवन्! आप वेदों, शास्त्रों का सार तथा श्रुतियों स्मृतियों के सिद्धान्त का निचोड़ कहिए। भगवान शंकर कहते हैं- जैसे- जागने पर स्वप्न का भ्रम दूर हो जाता है, उसी प्रकार स्व स्वरूप भगवान आत्मा 'मैं' के जान लेने पर संसार प्रपंच का अभाव हो जाता है।
जिस समय मनुष्य स्वप्न देखता रहता है, तब वह यह नहीं जानता कि मैं स्वप्न देख रहा हूँ, यह असत्य है, जागने पर मुझे कुछ नहीं मिलेगा, उससे यदि जाग्रत अवस्था का मनुष्य कहे कि भाई! यह तू जो देख रहा है, वह असत्य है, स्वप्न है, तो वह उस समय कदापि नहीं मानेगा, क्योंकि वह उस अवस्था में, जाग्रत की नाई सब प्रत्यक्ष ही सत्य देख रहा है, परन्तु वही मनुष्य जब जाग जाता है, तब अपने आप ही कहता है कि आज मैंने ऐसा देखा वह स्वप्न था, आदि। उसे यह समझाना या बताना नहीं पड़ता कि यह असत्य है। झूठ को तुमने देखा था और सत्य माना था। स्वप्नकाल में वह उसके लिए सत्य ही था, वह तो जागने पर असत्य हुआ, इसी तरह स्वस्वरूप भगवान आत्मा में जाग जाओ, तो इस जगत् प्रपंच का अपने आप अभाव हो जायगा।
जो सपने सिर काटै कोई। बिनु जागे न दूरि दुख होई ।।
तुलसीदास जी ने विनय में कहा है -
मैं हरि, साधन करइ न जानी।
जस आमय भेषज न कीन्ह तस, दोष कहा दिरमानी ।।
सपने नृप कहँ घटै बिप्र-बघ, बिकल फिरै अघ लागे ।
बाजिमेध सत कोटि करै, नहिं सुद्ध होइ बिनु जागे ।।
हे प्रभो ! मैंने साधन करना नहीं जाना, जैसा रोग था वैसी दवा नहीं की। इसमें इलाज का क्या दोष? जैसे सपने में किसी राजा को ब्रह्म हत्या का दोष लग जाय और वह उस महापाप के कारण व्याकुल, जहाँ-तहाँ भटकता फिरे, परन्तु जब तक वह जागेगा नहीं, तब तक सौ करोड़ अश्वमेध यज्ञ करने पर भी वह शुद्ध नहीं होगा, इसी प्रकार भगवान 'आत्मा' स्वस्वरूप 'मैं' में बिना जागे अज्ञान जनित संसार प्रपंच से छुटकारा नहीं मिल सकता।
स्रग-महँ सर्प बिपुल भय दायक, प्रगट होइ अबिचारे ।
बहु आयुध घरि, बल अनेक करि, हारहिं मरइ न मारे ।।
जैसे अंधकार में रस्सी में सर्प का भ्रम हो जाता है और वह (मिथ्या सर्प का भ्रम न मिटने तक) अनेक हथियारों के द्वारा बलपूर्वक मारते-मारते थक जाने पर भी नहीं मरता। अरे यार! साँप होता तब तो मरता, जब है ही नहीं तब मरेगा क्या? इसी प्रकार-अज्ञान से भासने वाला यह संसार, बिना इसके असली स्वरूप के जाने नष्ट कैसे होगा ?
निज भ्रम ते रबिकर-सम्भव, सागर अति भय उपजावै ।
अवगाहत बोहित नौका चढ़ि, कबहूँ पार न पावै ।।
अपने ही भ्रम से सूर्य किरणों से उत्पन्न हुआ मृगतृष्णा का समुद्र बड़ा ही भयावना लग रहा है और उस मिथ्या सागर में डूबा हुआ मनुष्य क्या जहाज या नाव पर चढकर पार पा सकता है? नहीं, यही हाल इस अज्ञान से उत्पन्न संसार सागर का है।
तुलसीदास जी कहते हैं कि जब तक 'मैं' पर जितनी मान्यताएँ हैं, विकल्प हैं, अमुक भाव हैं, इनका अत्यन्ताभाव न हो जाये, तब तक करोड़ों यत्न करके भले मर जाओ, परन्तु इस संसार सागर से पार नहीं पा सकते। अमुक भाव, विकल्प भाव ही तो संसार है। अमुक भाव गया कि संसार न रहा। जब संसार का, अर्थात् विकल्प का अभाव हो गया तब विकल्प ही कहाँ रहा? विकल्प के अभाव में विकल्पक का भी अभाव हो गया। विकल्पक संज्ञा न रहा, पर जिस पर ये दोनों कल्पित थे वह रहा, जिसमें दोनों आधारित थे।
किसी व्यक्ति की शादी हुई, गृहणी आयी, अभी वह व्यक्ति ही है, परन्तु जिस क्षण पुत्र हुआ उस व्यक्ति का नाम पिता हो गया। पुत्र के होते ही पिता नाम पड़ गया, अब जिस दिन पुत्र मर गया, पुत्र न रहा उसी क्षण, उसी दिन से पिता भी न रहा। पुत्र के अभाव में पिता कहेगा कौन? अतः, पिता भी जाता रहा, परन्तु वह व्यक्ति तो रहा, उसका अभाव नहीं हुआ। उसी पर पिता-पुत्र दोनों कल्पित थे। केवल पिता संज्ञा न रहा।
इसी तरह विकल्पक 'मैं' और विकल्प हुआ संसार। विकल्प का ज्योंहि अभाव हुआ कि विकल्पक का भी अभाव हो गया, परन्तु 'मैं' रहा, जिस पर दोनों आधारित थे।
यही - तुलसीदास जग आपु सहित जब लगि निरमूल न जाई का भाव है। कर्म देश में जगत्, उपासना देश में चरित्र, ज्ञानदेश में ब्रह्म और तत्त्व देश में 'मैं', कर्म में जो अकर्म और अकर्म में जो कर्म देखता है, वही ज्ञानवान है। कर्म हुआ जगत्, अकर्म हुआ 'मैं' आत्मा। कर्म देश में जगत् दिखता है और 'मैं' आत्मा आत्मदेश में जगत् का अत्यन्ताभाव है।
जेहि जाने जग जाइ हेराई। जागे जथा सपन भ्रम जाई ।।
अपने आत्म स्वरूप 'मैं' आत्मा के बोध हो जाने पर, फिर संसार प्रपंच का अत्यन्ताभाव हो जाता है। विकल्प, मान्यता, अमुक भाव, माया, मन, संसार सबका एक ही भाव है। ये एक ही के पर्यायवाची शब्द हैं।
जो माना जाय, वह है-माया। जिसको माना जाय, वह है उसका आधार, स्वामी, पति, रक्षक अर्थात् माया-पति।
डण्डा, यह माना गया है। यह है माया। डण्डा किसको माना गया? लकड़ी को। तब लकड़ी है डण्डे का आधार, डण्डे का पति, रक्षक, स्वामी। पति का अर्थ होता है रक्षक। यदि डण्डा से लकड़ी निकाल लोगे तो डण्डा का अस्तित्व ही खतम हो जायगा। वह रहेगा किसमें? डण्डा कहा किसको जायगा? अतः लकड़ी डण्डे का आधार हुई, पति हुई, स्वामी और रक्षक हुई। बिना लकड़ी के डण्डा एक क्षण भी जिन्दा नहीं रह सकता। लकड़ी मायापति हुई। अब डण्डे की मान्यता से लकड़ी ढँक गयी, डण्डे ने लकड़ी को छिपा लिया, माया से मायापति ढँक गया। इस प्रकार 'मैं' आत्मा पर जितनी मान्यताएँ हैं, उन मान्यताओं से, माया से 'मैं' आत्मा ढँक गया। माया अपने आधार को अधिष्ठान को, ढाँक कर छिपा लेती है।
माया से मायापति 'मैं' आत्मा भगवान छिप गया।
'मैं' हूँ, अब इस 'मैं' आत्मा पर जितनी मान्यताएँ हुई, जितने विकल्प हुए, जो-जो अमुक भाव आया, 'मैं' को जो-जो माना गया, उन-उनसे 'मैं' आत्मा ढँक गया। क्या-क्या मान्यताएँ हुई?
'मैं' देह हूँ। 'मैं' पर देह की मान्यता हुई। 'मैं' को देह माना। देह मानने के बाद फिर माना कि 'मैं' स्त्री हूँ, 'मैं' पुरुष हूँ। 'मैं' बालक हूँ, युवा हूँ, वृद्ध हूँ। आता हूँ, जाता हूँ, खाता हूँ, पीता हूँ, जन्मता हूँ, मरता हूँ। ब्राह्मण हूँ, क्षत्री हूँ, वैश्य हूँ, शुद्र हूँ, माता, पिता, भाई, बहन, मामा, चाचा, पुत्र हूँ। गृहस्थी हूँ, ब्रह्मचारी हूँ, वानप्रस्थी हूँ, संन्यासी हूँ आदि अनेक मान्यताएँ 'मैं' पर होती गयी। इन मान्यताओं से 'मैं' आत्मा ढँक गया। ढक्कन ही माया है और जो ढँका है, वह मायापति भगवान है।
'मैं' जीव हूँ। 'मैं' को जीव मान लिया। इस जीव मान्यता के बाद 'मैं' सुखी हूँ, दुखी हूँ। पुण्यी हूँ, पापी हूँ, स्वर्गी हूँ, नर्की हूँ आदि अनेक अमुक भाव 'मैं' पर लद गये जिससे 'मैं' आत्मा छिप गया। 'मैं' पर माया का ढक्कन पड़ गया।
मैं 'ब्रह्म' हूँ। 'मैं' को ब्रह्म मान लिया गया। इस ब्रह्म की मान्यता के बाद 'मैं' द्रष्टा हूँ, 'मैं' साक्षी हूँ, 'मैं' नित्य हूँ, शुद्ध हूँ, बुद्ध हूँ, निरंजन, निराकार, निर्लेप, निरीह हूँ, निर्मल हूँ, निर्विकार हूँ, अनन्त हूँ, अपार हूँ, पूर्ण हूँ, अविनाशी हूँ आदि अनेक मान्यताएँ आ गयी। इन मान्यताओं से 'मैं' आत्मा ढँक गया। 'मैं' पर पर्दा पड गया। 'मैं' छिप गया।
'मैं' आत्मा कहा जाता है: प्रश्न है 'मैं' को आत्मा क्यों माना? अरे भाई! 'मैं' और आत्मा, भिन्न-भिन्न नहीं हैं। आत्मा का नाम अस्तित्व है। 'है' है, यह सामान्य चेतन सारे चराचर में व्यापक है। यह भगवान का अव्यक्त रूप है और 'मैं' यह विशेष चेतन है, व्यक्त रूप है। जो अव्यक्त रूप 'है' है, उसका ही व्यक्त रूप 'मैं' है। 'है' ही है, जो अपने को 'मैं' नाम से व्यक्त कर रहा है। इस तरह दोनों एक ही हैं, अलग- अलग नहीं।
आत्मा के लिए 'मैं' कहना ही पर्याप्त है, परन्तु अनादि काल से 'मैं' को देह माने बैठे हैं, देह से अलग होना ही नहीं चाहते। अतः 'मैं' के साथ आत्मा लगाकर कहना पड़ता है। जितनी मान्यताएँ हैं, यही माया देश है, अमुक देश है, परदेश है, जीव जगत् है, प्रपंच देश है, विकल्प देश है, यही अज्ञान जगत् है। इन सब मान्यताओं को हटा दो। बस, अब जो शेष रह गया 'मैं' आत्मा, यही आत्मा देश है, स्वदेश है, भगवान देश है, ज्ञान जगत् है।
यदि लकड़ी न होगी, तो डण्डा मानोगे किसको ? रस्सी न होगी तो अंधेरे में सर्प किसको कहोगे? तब लकड़ी को ही डण्डा माना गया, रस्सी को ही सर्प माना गया। इसी तरह 'मैं' आत्मा को ही, माया माना गया। यदि 'मैं' आत्मा न होऊँ, तो माया का आधार कौन होगा? किसको माना जायेगा? देह हूँ, जीव हूँ, ब्रह्म हूँ आदि मान्यताएँ, किस पर की जाएंगी?
जैसे रस्सी का ज्ञान हो जाने पर सर्प का भ्रम दूर हो जाता है। अरे, यह तो रस्सी ही है, जिसको मैंने सर्प मान लिया था। इस भ्रम का कारण था अंधकार। अन्धकार दूर होते ही, रस्सी प्रत्यक्ष दिखने लगी, इसलिए सबसे पहिले अन्धकार को ही दूर करना पड़ेगा। इधर अंधेरे का नाश हुआ कि उधर रस्सी का ज्ञान हो गया। दोनों साथ ही साथ हुआ। इसी प्रकार सर्प रूप इस संसार प्रपंच का कारण अज्ञान, अंधकार है, ज्यों ही ज्ञान का प्रकाश हुआ कि अज्ञान का नाश हो गया अर्थात् 'मैं' आत्मा का बोध हो गया। स्वरूप आत्मा के बोध में जगत् प्रपंच नहीं है।
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें ॥
यही रघुनाथ जी का विमल यश है कि तीन काल में कुछ हुआ ही नहीं। नाम रूप संसार है, नाम सुना जाता है और रूप देखा जाता है। बस, यही संसार है। हृदय में संसार का प्रवेश दो इन्द्रियों के द्वारा होता है, देखकर और सुनकर -
राम देखि सुनि चरित तुम्हारे । जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ।।
बुध, अर्थात् विवेकी, ज्ञानी जन, सुखी होते हैं, क्योंकि चरित्र को देखकर और सुनकर भी वे जानते हैं कि न कुछ हुआ है, न हो रहा है और न कुछ होने वाला है, जैसे कि शिवजी को हुआ। चरित्र को देखकर और सुनकर भी वे -
जय सच्चिदानन्द जग पावन । अस कहि चलेउ मनोज नसावन ।।
कहकर आगे बढ़ गये, उन्हें न तो हर्ष हुआ, न विषाद और न विस्मय तथा मोह ही। रस्सी में सर्प असत्य है, क्योंकि यदि सत्य होता तो प्रकाश में भी दिखता, परन्तु प्रकाश में सर्प नहीं दिखता। अतः, सर्प सत्य नहीं है, तब क्या असत्य है? अरे, असत्य होता तो देखने से भय, कम्पन नहीं होता। अतः, असत्य भी नहीं है। चरित्र को सत्य कहो तो बनता नहीं, क्योंकि सत्य का कभी अभाव नहीं होता, वह तीनों काल और तीनों अवस्था में नित्य एक रस रहता है तभी तो सत्य है, परन्तु चरित्र तो नित्य नहीं है उसका अभाव हो जाता है, अतः सत्य नहीं है। जब चरित्र सत्य नहीं है, असत्य नहीं है, सत्यासत्य नहीं है, क्योंकि साधक-बाधक पदार्थ एक साथ नहीं रह सकते, तब क्या है? इस पर भगवान शंकर कहते हैं कि यह तर्क का विषय नहीं है।
सगुन राम के चरित भवानी, तरकि न सकहिं बुद्धि मन बानी ।।
भगवान के चरित्र में तर्क की गुंजाइश नहीं है। तर्क में गुण-दोष आता है और भगवान गुण-दोष से परे हैं। इस तरह चरित्र क्या है? कुछ कहते नहीं बनता।
भाई! जब जिसका चरित्र है, वही मन वाणी का विषय नहीं है, अनिर्वचनीय है, तब उसका चरित्र ही कैसे वचनीय होगा, वह भी अनिर्वचनीय है!
जिस आधार पर माना जाय वह आधार 'मैं' आत्मा है, जो माना जाय, वह है माया। जब तक मान्यता है, रजोगुण युक्त सृष्टि का पालन है। जब मान्यता समाप्त हो जाय अर्थात् मान्यता का अभाव ही रजोगुण युक्त सृष्टि का संहार है। तीनों गुणों के समुच्चय का नाम माया है, तीनों गुण अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और महेश।
'मैं' भगवान आत्मदेश में 'मैं' आत्मा भगवान के जन्म, कर्म का अत्यंताभाव है, यही 'मैं' आत्मा भगवान का दिव्य जन्म कर्म है, यह हुआ बोध। इस बोध के बोध को, जो बोध से जानता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता, बोध को ही प्राप्त होता है।
राम सरूप तुम्हार, बचन अगोचर बुद्धि पर ।
अबिगत अकथ अपार, नेति, नेति नित, निगम कह ||26||
हे राम! तुम्हारा रूप, 'स्व' रूप है, यदि 'पर' रूप होता तो कहने में आता। स्व = स्वयं 'मैं'। न मैं बद्ध हूँ, न तुम मुक्त हो, न मैं ज्ञानी हूँ, न तुम अज्ञानी हो, न मैं ब्रह्म हूँ, न तुम जीव हो। न मैं सेवक हूँ, न तुम सेव्य हो, इन समस्त भावों के अभाव का जो भाव है वह राम का जानना है, यह बुद्धिगम्य, इन्द्रियगम्य, वाणीगम्य नहीं है। नहीं, नहीं को देखता है और है, है को देखता है। संशय-विपर्यय के अभाव का नाम ही अनुभव है। यह है अथवा नहीं, इसका नाम संशय (अनिश्चय का नाम)। यह, नहीं है, दूसरा है अर्थात् अन्य को अन्य समझना, इसका नाम विपर्यय है (विपरीत ज्ञान)। अनुभवगम्य के अनुभव में संशय विपर्यय का अभाव है। यही रघुनाथजी का विमल यश है और श्रुतियों, स्मृतियों के सिद्धान्त का निचोड़ है। ये चीजें तह में डूबने से मिलती हैं, जिसे भगवान शंकर ने डुबकी लगाकर निकाला।
चरित्र में जो अनिर्वचनीयता है, वह चरित्र का है या जिसका चरित्र है, उसका है। उत्तर है-जिसका चरित्र है, उसका है। अंगूठी में जो पीलापन है, वह अंगूठी का है या सोने का? उत्तर है-सोने का है। (अंगूठी, सोने का चरित्र है)
असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज विमोहनि जन सुखकारी ।।
दनुज कहते हैं देहाभिमानी को, जिसने देह को ही अपना स्वरूप मान लिया है और जन कहते हैं, जिसको अपने स्वरूप का ज्ञान है।
भगवान का चरित्र स्वरूप ज्ञानियों के लिए सुखदाई है और अज्ञानियों के लिए, दुःखदाई है।
जथा अनेक बेष घरि, नृत्य करइ नट कोइ ।
सोइ सोइ भाव दिखावइ, आपुन होइ न सोइ ।।
यह संसार नाट्य शाला है, यहाँ वह खुद ही तो नाटककार है, खुद ही तो सूत्रधार है, खुद ही राजा है, खुद ही रानी है, खुद ही तो दास है, खुद ही दासी है, खुद ही चोर है, खुद ही साव है, खुद ही साधू है, खुद ही चाण्डाल है, खुद ही पापी है, खुद ही पुण्यात्मा है, खुद ही नीं है, खुद ही स्वर्गी है, नाटकशाला रूप संसार भी खुद ही है। मगर "आपुन होइ न सोइ । भैय्या! विचित्र महिमा है, कहाँ तक कहें -
कहीं होय विरंचि सृष्टि रचता अनेक भाँति,
कहीं होय मुकुन्द सृष्टि पालत अपेला है।
कहीं होय महेश भेष, सृष्टि खास नाश करै,
या प्रकार तीन रूप धरै, तीन बेला है ।
कहीं जै गोविन्द देव वृन्द होय अनन्द करै,
कहीं बन दैत्य देव झगर झमेला है ।
कहाँ लौ बखानिये, न जानिये, सो वाकी गति,
है सही अकेला, पै अनेक खेल खेला है।
स्वयं ही खिलाड़ी है, स्वयं ही खेल है और स्वयं ही दर्शक है। द्रष्टा, दृश्य, दर्शन सब स्वयं ही है।
नट कृत बिकट कपट खगराया, नट सेवकहिं न ब्यापै माया।
सो नर इन्द्रजाल नहिं भूला, जापर हो सो नट अनुकूला ।।
यहाँ पर भगवान की उपमा इन्द्रजाली से दी गयी है, इन्द्रजाली का प्रत्येक खेल विचित्र और प्रत्यक्ष होता है। इस खेल को देखकर वही विस्मय में नहीं पड़ता, जो उसका कृपा-पात्र होता है। बाकी सबको यह इन्द्रजाली अपने इन कपट भरे खेलों से विमोहित कर लेता है। उसके सभी खेल कपट पूर्ण होते हैं, अर्थात् असत्य होता है, परन्तु बिना इन्द्रजाली की कृपा के उसका भेद (रहस्य) समझ में नहीं आता और सत्य ही प्रतीत होता है।
एक बार इलाहाबाद में बैंक के पीछे पोलो ग्राउण्ड में इन्द्रजाली का खेल हुआ। इन्द्रजाली ने अपना खेल दिखाने के पूर्व, कलेक्टर से स्वीकृति ले ली थी। बाद में अपना खेल दिखाया। इस खेल के लिए टिकट की व्यवस्था थी और बड़े-बड़े लोग बहुत संख्या में इस खेल को देखने आये थे। उसका खेल इस प्रकार था -
इन्द्रजाली जोर-जोर से डमरू बजाने लगा और उसकी स्त्री ढोलक बजाने लगी। इन दोनों बाजों की आवाज से दर्शकों का मन उनकी ओर केन्द्रित हो गया। इतने में दर्शकों ने सुना कि आकाश मंडल में मारो-मारो, दौड़ो, राजा रामचन्द्र की जय, लंकापति रावण की जै आदि आवाज जोर-जोर से आने लगी। तब इन्द्रजाली ने अपनी स्त्री से कहा, सुन रही हो, क्या आवाज आ रही है? स्त्री कहने लगी-सुन तो रही हूँ। यह काहे की आवाज है? जो लगातार आ रही है और बड़ी मारकाट मची हुई है।
इन्द्रजाली कहने लगा- अरी पगली ! तू क्या जानेगी। राम-रावण का घोर युद्ध हो रहा है और मेरा भी बुलौवा आ गया है। मुझे भी वहाँ जाना जरूरी है। देखो अब मैं चला। ऐसा कहकर उसने कच्चे तागे की एक बिल्कुल पतली गड्डी अपनी झोली से निकाला और उसके एक छोर को अपने हाथ में रखकर पूरी गड्डी को आकाश मंडल की ओर फेंक दिया। गड्डी सर्र से आकाश की ओर चल दी और कच्चे धागे का लंब खड़ा हो गया। अब इस लंब रूप धागे को पकड़कर इन्द्रजाली आकाश मण्डल की ओर चढने लगा। सभी दर्शक आश्चर्यचकित हो, कौतूहलपूर्ण दृष्टि से उस ओर देखते रहे। लगभग डेढ फर्लांग तक वह इन्द्रजाली धागे के सहारे ऊपर चढ़ता हुआ दिखाई दिया, बाद में वह आँखों से ओझल हो गया। मारकाट की आवाज पूर्ववत् आ रही थी। इतने में दर्शकों ने देखा कि इन्द्रजाली का एक हाथ कटकर उसकी स्त्री के पास गिरा। स्त्री छाती पीटकर, ढांडे मार-मारकर, चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगी। वह रो-रोकर कहते जाती थी कि मैं लुट गयी, मेरा सहारा छिन गया, मैं बेमौत मारी गयी। अब संसार में मेरा आश्रय कौन है? इतने में उसके पति का दूसरा हाथ भी कटकर उसके समीप गिरा, स्त्री इसी तरह और जोर-जोर से रोने लगी। फिर इन्द्रजाली के दोनों पैर कटकर भूमि पर गिरे और थोड़ी देर बाद उसका सिर कटकर उसकी स्त्री की गोद में गिरा। दर्शक यह सब दृश्य देखकर करुणा और आश्चर्य में डूब गये।
अब स्त्री ने कहा कि जब संसार में मेरा पति ही नहीं रहा, तब मैं ही जीकर क्या करूँगी। भाइयों! जल्दी चिता बनाने के लिए लकड़ी की व्यवस्था करो, मुझे अपने पति की लाश को गोद में लेकर सती होना है। तुरन्त, लकड़ी की व्यवस्था कर चिता बनायी गयी और सबके देखते-देखते, वह स्त्री अपने पति के कटे हुए अंगों को गोद में लेकर चिता में बैठ गयी और जलकर राख हो गयी। कैसा हृदय विदारक कारुणिक दृश्य था। लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न था। एक दस मिनट के बाद ही लोगों ने देखा कि वे दोनों स्त्री-पुरुष एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए एक ओर से चले आ रहे हैं और वे सब दर्शकों के बीच उपस्थित हो गये। बस, फिर क्या था, इस दृश्य ने लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। हजारों रुपयों की भेंट व न्यौछावर उस खेल पर किये गये। किसी ने अपने हाथ की घड़ी निकाल कर दे दी, किसी ने सोने का अपना चेन दे दिया, यहाँ तक कि महिलाओं ने भी अपने गले का हार एवं अन्य आभूषण उस इन्द्रजाली को भेंट में दे दिया। इस तरह सबों की जेब खाली हो गयी।
सो नर इन्द्रजाल नहिं भूला। जापर होइ सो नट अनुकूला ।।
मान्यता इन्द्रजाल है, मान्यता का आधार 'मैं' आत्मा इन्द्रजाली है।
इन्द्रजाली रूप मुझ आत्मा में, इन्द्रजाल रूप यह प्रपंच असत्य होते हुए, सत्य भासता है।
अव्यक्त रूप से जो सर्व का 'है' है और व्यक्त रूप से जो सर्व का 'मैं' है, उस 'मैं' आत्मा की जिस पर असीम कृपा है, वह इस प्रपंच के रहस्य को जानकर, उससे प्रभावित नहीं हो सकता।
इसी तरह भगवान राम, इन्द्रजाली चरित्र हैं, इसे देखकर वही विमोहित नहीं होते, जिन पर भगवान राम इन्द्रजाली की कृपा है, यही उनका विमल यश है तथा श्रुतियों, स्मृतियों के सिद्धांत का निचोड है कि तीनों काल में कुछ हुआ ही नहीं।
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें ।।
भगवान शंकर ने निजानन्द सागर में डुबकी लगाई, तो यही रत्न लेकर वे बाहर आये। जिसको जगत् कहते हो, यही रघुनाथजी का विमल यश है। रज्जू के अज्ञान में, जैसे सर्प भासता है, उसी प्रकार भगवान आत्मा के अज्ञान में, जगत् प्रपंच भासता है।
जिस तरह रज्जू की सत्ता से सर्प की सत्ता भिन्न नहीं है, अर्थात् रज्जू ही तो है, जो सर्प के रूप में दिख रहा है, इसी तरह जगत् प्रपंच भी मुझ आत्मा 'मैं' की सत्ता से भिन्न नहीं है। यदि 'मैं' आत्मा जगत् प्रपंच से भिन्न होता, तो मैं प्रपंच का अनुभव नहीं कर सकता और अभिन्न होता, तो भी मैं प्रपंच का अनुभव नहीं कर सकता, क्योंकि एक में अनुभव कहाँ? अतः, विषय प्रपंच का अनुभव करने के लिए 'मैं' प्रपंच होकर ही उसका अनुभव करता हूँ।
देखो! मेला में लाखों मनुष्य उपस्थित हैं, उनमें से प्रत्येक से पूछो, भाई! तुम कहाँ आये हो? तो प्रत्येक यही जवाब देगा "मेला देखने। अब विचार करो कि ये जितने भी मनुष्य मेला में हैं, वे सब तो मेला देखने वाले हुए, अब मेला कहाँ है? जिसे देखने ये सब आये हैं। अरे यार! मेला का देखने वाला, स्वयं ही मेला है। मेला उससे भिन्न नहीं। मैं मेला का अनुभव स्वयं मेला होकर करता हूँ। ऐसे ही जगत् का अनुभव मुझ आत्मा से न भिन्न है और न अभिन्न है। अरे! 'मैं' ही तो हूँ, जो इस रूप में दिख रहा हूँ।
जिसको देखकर भ्रम होता है, वह देखने वाले में तो है नहीं, वह भ्रम तो दिखने में है। चरित्र में भ्रम है, राम में नहीं। जो तीन काल में न हो उसका नाम चरित्र है। तो भासता क्यों है? अरे। यही तो भगवान राम की लीला है।
विकल्प भाव अंदर है, विकल्पाभाव न बाहर है, न भीतर। विकल्पभाव माया है, विकल्पाभाव 'मैं' आत्मा है। देखा हुआ संसार रज्जु में सर्प के समान भासता है। सुना हुआ संसार हूँठ में पिशाच के समान भासता है। अजन्मा संसार बन्ध्यापुत्र के समान और तृष्णा का उपादान संसार मृगजल के समान भासता है। भाव रूप (सत्य) संसार की अनुत्पत्ति है, अभाव रूप (असत्य) संसार की अनुत्पत्ति है और भावाभाव रूप में (सत्य-असत्य दोनों) संसार की अनुत्पत्ति है।
संसार अपनी उत्पत्ति के पूर्व क्या था? सत्य था? असत्य था? या सत्यासत्य था? यदि, कहो सत्य था तो सत्य की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि जो पैदा होगा वह मरेगा, अतः वह सत्य नहीं। सत्य तो अविनाशी होता है, नित्य होता है। यह संसार नित्य नहीं है, अतः सत्य नहीं। यदि असत्य कहो तो असत्य बन्ध्या का पुत्र होता है। अभाव रूप, जो है ही नहीं वह पैदा क्या होगा। इस तरह भी संसार की उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती। यदि कहो सत्यासत्य था तो साधक-बाधक पदार्थ साथ-साथ नहीं रह सकते। इस तरह किसी प्रकार से संसार की उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती।
डण्डा, यह अपने बनने के पहले क्या था? सत् था या असत् ? सत् कहोगे तो सत् भी कहीं बनता है? सत् तो त्रिकालाबाध्य होता है। असत् कहोगे तो असत् तो बन्ध्या का पुत्र होता है, जो अभाव रूप है, है ही नहीं, परन्तु यह डण्डा तो स्पष्ट दिख रहा है। तब क्या सत्यासत्य है? नहीं, क्योंकि साधक-बाधक पदार्थ एक साथ नहीं रह सकते तब सत्यासत्य भी नहीं। इस तरह डण्डा तीन काल में पैदा नहीं हुआ, न डण्डा है, पर सत्य-सा भासता है। इसकी उत्पत्ति किसी भी तरह सिद्ध नहीं होती। डण्डा यह विकल्प है। अब, जब फोटो लिया जायेगा, तब डण्डा विकल्प का फोटो नहीं आ सकेगा, फोटो उतरेगा उसका जिस पर डण्डे का विकल्प है। अब यह विकल्प किस पर है? उत्तर है- लकड़ी परा लकड़ी यह भी तो विकल्प ही है। लकड़ी, यह विकल्प किस पर है? पृथ्वी पर। पृथ्वी, यह भी तो विकल्प ही है। यह विकल्प किस पर है? (पृथ्वी का आधार जल है) जल पर है। जल, यह विकल्प किस पर है? जल का जो आधार अग्नि है, उस पर। अग्नि, यह विकल्प किस पर है? वायु पर। वायु, यह विकल्प किस पर है? इसका आधार जो आकाश है, उस परा आकाश, यह विकल्प किस पर है? अंत में निर्णय हुआ कि यह विकल्प आधारभूत 'मैं' आत्मा पर हुआ है। तब यह सिद्ध हुआ कि यह डण्डा नहीं है। आधारभूत 'मैं' आत्मा ही है, जिसका फोटो उतरा है। डण्डा, इस विकल्प का फोटो नहीं हो सकता। हाँ, इस विकल्प के अभाव में जो रह गया 'दृश्य' वह डण्डा थोड़े ही है। वह अर्थहीन पदार्थ भास है, जो नारायण है, 'मैं' आत्मा है। प्रश्न है-चित्र, जो उतरा वह अर्थ का है या अर्थहीन भास का? उत्तर है-अर्थहीन भास का। अब इस भास का ज्यों ही तुमने नामकरण किया। (भास यह भी तो नामकरण ही है) विकल्प हो गया। इस तरह जिसका फोटो उतरा है, उसको वाणी व्यक्त नहीं कर सकती, बुद्धि निश्चय नहीं कर सकती। वह इन्द्रियों से परे का विषय हो गया। अब इस नारायण तत्त्व पर अनन्त विकल्प कर, उन अस्तित्वहीन विकल्पों को सत्य मान लिया गया। बस, यही संसार का रूप है जो अस्तित्वहीन है, है ही नहीं। यदि, प्रपंच है तो प्रपंच के दर्शनकाल में भी उसके अस्तित्व का भान होना चाहिए। परन्तु, उसके दर्शनकाल में प्रपंच न तो स्वदेश में दिखता है और न परदेश में।
स्वरूप के अज्ञान में स्वरूप ही जगत् है और स्वरूप के ज्ञान में जगत ही स्वरूप है। जगत् नहीं भासता, भास ही भासता है।
जिससे सुख और दुःख दोनों का अनुभव हो उसका ही नाम जगत् है और जिससे अनुभव का भी अनुभव न हो, वही 'मैं' भगवान आत्मा हूँ। वस्तु से भय नहीं है, अर्थ से भय है। छोटे मासूम बचे के सामने काला नाग डाल दो, तो वह उसे अर्थहीन स्थिति में देखता है। वह उसे खिलौना समझकर पकड़ने दौड़ता है और पकडना चाहता है। इसका मतलब हुआ कि वह उस पर अर्थ नहीं लगा रहा है। यह काला नाग है, इसके काटने से प्राणियों की मृत्यु हो जाती है। यह अर्थ वह नहीं लगाता, इसीलिए वह उससे भय रहित है। इसी तरह सर्वदृश्यमान उसे दिखाई तो पड़ता है, परन्तु अर्थहीन स्थिति में। इस अवस्था में वह भय, घृणा, सुख, दुःख, हर्ष, शोक आदि द्वन्द्वों से रहित रहता है। उसे जो दिखता है, वह वस्तु रूप है अर्थात् 'मैं' आत्मा भार रूप, सत्ता मात्र जो सुख-दुःख से परे है। इसी तरह सर्व दृश्यमान जगत अर्थहीन स्थिति में भास ही भास सत्तामात्र 'मैं' आत्मा राम है, जो विकल्प रहित है, द्वन्द्वों से परे है, पर ज्योंही अर्थ लगाया, विकल्प हुआ कि वहीं से सुख-दुःख, हर्ष-शोक का कारण जगत् प्रपंच का निर्माण हो गया। इस तरह वस्तु 'मैं' आत्मा है और अर्थ जगत प्रपंच है। भगवान आत्मा 'मैं' को कुछ भी मान लेना यही अज्ञान अंधकार का स्वरूप है। इस अज्ञान अंधकार के कारण ही 'मैं' आत्मा भगवान, रज्जु में सर्पवत् संसार प्रपंच तीन काल में नहीं होते हुए भी सत्य-सा भासता है। जब ज्ञान का प्रकाश हुआ तो 'मैं' आत्मा ही हूँ। अरे! रस्सी ही रस्सी है, सर्प था ही नहीं। न अंधेरे में, न प्रकाश में। जिस तरह रज्जु देश में न सर्प की उत्पत्ति है, न विनाश, यह उत्पत्ति आ विनाश तो सर्प देश में है। उसी प्रकार 'मैं' आत्मा भगवान देश में, जगत् प्रपंच न पेट हुआ और न विनाश। 'मैं' आत्मा ही हूँ, सिवाय मुझ आत्मा के कुछ है ही नहीं, त बन्धन और मोक्ष संसार देश का है। आत्म देश में न बन्धन है, न मोक्ष। जब संसार नहीं, तब बन्धन और मोक्ष कहाँ? माताजी को भ्रम चरित्र में हुआ, राम में नहीं।
भंगवान शंकर ने कहा कि हे पार्वती !
एक बात नहिं मोहि सोहानी, जदपि मोह बस कहेहु भवानी ।
तुम्ह जो कहा राम कोउ आना जेहि श्रुति गाव घरहिं मुनि ध्याना ।।
कहहिं सुनहिं अस अधम नर, ग्रसे जो मोह पिसाच ।
पाषंडी, हरि-पद विमुख, जानहिं झूठ न साच ।।
संसार में जो पाखण्डी, मलिन अन्तःकरण वाले अज्ञानी हैं, उन्हें ही यह होता है, जिनके मन में कुछ, वचन में कुछ और व्यवहार में कुछ इस तरह तीनो भिन्नता होती है, वे ही इस तरह राम को न जानकर, चरित्र को सत्य मानते हैं।
एक राजा था। वह विद्वान, पंडितऔर सन्त महात्माओं से हमेशा यही प्रश्न किया करता था कि महाराज! भगवान पतित पावन है। अतः, वे संसार के सब पापियों को तार देते हैं अर्थात् भवसागर से पार लगा देते हैं। तब, जब सब पुण्यात्मा अपने पुण्य के बल पर स्वर्ग चले जाते हैं और पापियों का उद्धार पतित पावन भगवान कर देते हैं तब नरक तो खाली पड़ा रहता होगा? भगवन्! नरक में कौन जाता है, यह समझाइये। राजा की इस प्रबल युक्ति का जवाब कोई नहीं दे पाते थे।
एक बार उस राजा के यहाँ एक वीतराग महात्मा का आगमन हुआ। राजा ने उन्हें सम्मानपूर्वक आदर केसाथ गद्दी पर बिठाया और हमेशा की तरह इनसे भी बड़े गर्व के साथ वही प्रश्न पूछा और कहने लगा कि भगवन्! हमारे धन्य भाग, जो हमें आपके दर्शन हुए। हम बड़े पापी हैं, नीच हैं, सत्कर्म तो कभी जानते नहीं आदि।
उपरोक्त शिष्टाचार के बाद राजा ने इनसे वही प्रश्न पूछा, महात्मा ने राजा के इस प्रश्न और व्यावहारिक शिष्टाचार को सुनते ही उनकी ओर पीठ करदिया और अपना मुँह दूसरी ओर कर कहने लगे। हमसे बड़ी भूल हुई कि ऐसे नीच, पापी, अधर्मी राजा के यहाँ हम आ गये। हमें क्या पता था कि यह ऐसा नीच है। भरी सभा में अपने प्रति महात्मा का यह वचन सुनते ही राजा उद्विग्न हो उठा और कहने लगा- महाराज! आप सन्त महात्मा होकर भी ऐसे अपशब्द अपने मुँह से निकालते हैं। आपको भरी सभा में हमारा इस तरह अपमान करना शोभा नहीं देता। राजा की ऐसी बातें सुनकर महात्मा कहने लगे: अरे! तेरे नीच, अधर्मी, पापी होने की बात तो हमने तुमसे ही सुनी और जानी। इसके पहले तो हम कुछ नहीं जानते थे तो क्या तू पापी, अधर्मी और नीच नहीं है। अभी-अभी तो तू ही अपने मुँह से यह सब कह रहा था, उसी को हमने दुहराया है। अब, जब तुम क्रुद्ध हो तब यह निश्चय होता है कि तेरे मन में कुछ, वचन में कुछ और कर्म में कुछ और ही रहता है। इस तरह वाणी में दम्भ, मन में कपट और कर्म में पाखण्ड का होना पाखंडियों के लक्षण हैं। तो भैय्या ! सुनो, पापियों को तो भगवान तार देते हैं, पुण्यात्मा तो स्वर्ग चले जाते हैं और तेरे जैसे पाखण्डी जिनके मन, वचन और कर्म एक से नहीं रहते वे ही नरक जाते हैं। नरक तुम्हारे जैसे के लिए है, वह खाली नहीं पड़ा रहता। ऐसा कह वे महात्मा उठकर अन्यन्त्र चले गये।
अग्य, अकोविद, अंध अभागी । काई विषय मुकुर मन लागी ।
लंपट, कपटी, कुटिल, बिसेषी । सपनेहुँ संत सभा नहिं देखी ।।
कहहिं ते वेद असंमत बानी। जिन्ह के सूझ लाभ नहिं हानी ॥
मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना ।।
जिन्ह के अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं । तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं ॥
बातुल भूत बिबस, मतवारे । ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे ।
जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन्ह कर कहा, करिअ नहीं काना।
सोरठा-
अस निज हृदय बिचारि तजु संसय भजु राम पद ।
सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम ।।
सगुनहिं अगुनहिं नहिं कुछ भेदा । गावहि मुनि पुरान बुध बेदा ।।
अगुन अरूप अलख अज जोई । भगत प्रेम बस सगुन सो होई ॥
जो गुन रहित सगुन सोई कैसे। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसे।
जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा ।।
सन्त महात्मा जन, सगुण और निर्गुण का भेद नहीं मानते। इस रामचरित मानस की यही विशेषता है कि इसमें सगुण-निर्गुण के भेद का कहीं पर उल्लेख नहीं है। सगुण और निर्गुण तो उसके उपासकों की धारणा का नाम है। सन्त तुलसी, भगवान के उपासक थे, सगुण और निर्गुण के नहीं। सगुण को सगुण नहीं मानना, यही निर्गुण भक्ति है। सगुण और निर्गुण ये दोनों भाव उपासक देश में हैं, भगवान देश में नहीं।
स्थूल बुद्धि सगुण मानती है और सूक्ष्म बुद्धि निर्गुण मानती है। ये दोनों बुद्धि जिसकी नहीं है, वह भगवान 'मैं' आत्मा को जानती है (बुद्धि रहित अवस्था) बिन बोध के न सगुण रूप में निष्ठा हो सकती है और न निर्गुण रूप में ही। इन रूपों में तथ चरित्र और लीला में रत तो ज्ञान के बाद ही होता है। अज्ञानी क्या जानेगा कि क्या सगुण है और क्या निर्गुण है। देखकर जाना जाता है और सुनकर माना जाता है। अपने स्वरूप आत्मा को जहाँ देख लेता है, तभी उसमें प्रीति होती है।
देखि चरित, महिमा सुनत, भ्रमित बुद्धि अति मोरि ।
माना जाता है मन से और जाना जाता है आत्मा से। देखो-विवाह के प्रसंग में जनकपुर में चारों भाइयों के जब सब कार्य सम्पन्न हो चुके, तब बिदाई के समय सबसे भेंट करते हुए, जनक जी सबसे अन्त में राम के पास आते हैं और वे उनसे क्या कहते हैं, वे पहले व्यापक ब्रह्म, सनातन तत्त्व निर्गुण से उठाते हैं, विदेह मुक्त राजा जनक कहते हैं -
राम करौं केहि भाँति प्रसंसा । मुनि महेस मन मानस हंसा ।।
करहिं जोग जोगी जेहि लागी । कोहु मोहु ममता मदु त्यागी ।।
ब्यापकु ब्रह्म अलखु अबिनासी । चिदानंदु निरगुन गुनरासी ॥
मन समेत जेहि जानन बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी ।।
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एक रस रहई ।।
ये व्यापक निराकार का वर्णन हुआ, जिसका भाव यह है -
सन्त का सम्बन्ध हृदय से होता है, बाहर से नहीं। जो हृदय वासना से रहित होता है, उसे मान सरोवर कहते हैं, ऐसे हृदय-रूप मान सरोवर में भगवान राम हंस का निवास होता है।
मुनि महेस मन मानस हंसा ।।
जो व्यापक होता है, वह अलख होता है और जो अलख होता है, वह अविनाशी होता है। सन्त महात्मा जन जिसमें रमते हैं, इसलिए राम सारे चराचर में रम रहे हैं, इसलिए राम सबमें व्यापक हैं, किस तरह? भिन्न होकर, अभिन्न होकर या भिन्ना- भिन्न होकर। यदि भिन्न होकर व्यापेगा तो भिन्न पदार्थ किसके आधार पर रहेगा? अभिन्न होकर कहोगे तो अभिन्न होने से वह एक ही हुआ तो एक में व्यापना कैसे होगा? तो व्यापक केवल कहने मात्र को है, वह जब स्वयं वही है, तब व्याप्य और व्यापक कहाँ हैं? अरे, लकड़ी जब स्वयं ही डण्डा है, तब वह व्यापेगी किसमें? यह दृष्टिगम्य, वाणीगम्य नहीं है, बल्कि अनुभव गम्य है। यह व्यापकपना कैसे है, जैसे वस्त्र में धागा। वस्त्र की मान्यता में, धागा व्यापक है और जब वस्त्र है ही नहीं, केवल धागा ही धागा है तब वह व्यापेगा किसमें?
भाव और अभाव, दोनों के अभाव के भाव में लखना कहाँ रहा? न दृश्य है, न द्रष्टा है, तब लखना कहाँ? न विषय रहे, न इनकी इन्द्रियाँ तब लखना कहाँ है? इसलिए, हे राम! तुम अलख हो।
तुम अजन्मा होने के नाते अविनाशी हो। तुम भासते हो, प्रतीयमान हो, इसलिए चिदानन्द हो और 'है' हो, अस्तित्व हो, इसलिए अलख हो। तीनों गुणों से परे हो इसलिए निर्गुण हो और सर्वगुणों के भण्डार हो, आधार हो, इसलिए गुणराशि हो 'व्यापक ब्रह्म अलख अविनाशी चिदानन्द निर्गुण गुणराशी' का यही भाव है।
मन समेत जेहि जान न बानी, तरकि न सकहिं सकल अनुमानी ।।
तुम मन वाणी के विषय नहीं हो, न तो मन तुम्हें जान सकता और न वाणी तुम्हे कह सकती है। तुम्हारे संबंध में किसी प्रकार का तर्क नहीं किया जा सकता, वेद शास्त्र, पुराण, निगम, आगम सबों ने केवल अपना-अपना अनुमान ही बताया है। जो कहता है कि मैं जानता हूँ, वह जानता नहीं और जो जानता है, वह कहता नहीं।
जो कहता है "मैं भगवान को देखा हूँ, जानता हूँ" वह उसे उससे भिन्न होकर जाना या अभिन्न होकर जाना अथवा भिन्नाभिन्न होकर जाना, किस प्रकार जाना? जानने वाला तो जानकर वही हो जायेगा, गल जायेगा, तब कहेगा कौन? बतायेगा कौन? क्योंकि -
जानत तुम्हहि, तुम्हइ होइ जाइ ।।
उसे जानने वाला तो वही हो गया, बताने वाला रहा नहीं।
जैसे पुतली लौन की सिन्धु थाह गई लैन ।
गलत-गलत वह गल गई, कही न पाई बैन ।
जो गल जायेगा, वह क्या बतायेगा? जब जो जानेगा वह बता नहीं सकता और जो कहता है, मैं जानता हूँ, देखा हूँ, वह देखा नहीं। जितने कहने वाले वाणी-रूप वेद, शास्त्र, निगम, पुराण आदि हैं, उन सबों ने "न इति, न इति" ही कहा।
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई ।।
तुम तीनों काल और तीनों अवस्था में हमेशा एक रस हो, जो 'मैं' जाग्रत में, वही 'मैं' स्वप्न में और वही 'मैं' सुषुप्ति में। जनक जी कह रहे हैं कि हे राम ! ऐसे जो आप हैं, सो मेरी आँखों के सामने प्रत्यक्ष खड़े हैं।
दोहा-
नयन विषय मो कहुँ भयउ, सो समस्त सुख मूल ।
सबइ लाभु जग जीव कहूँ, भएँ ईसु अनुकूल ।।
देखो, साकार सगुण ब्रह्म में लाकर विलीन कर दिया, मिला दिया। तो भैय्या! सन्त तुलसी की दृष्टि में, सगुण और निर्गुण दो नहीं, एक ही है।
भगवान यदि सचमुच सगुण होते तो संसार भरके सभी उसके उपासक, उस सगुण ही मानते, मगर ऐसा नहीं है। भगवान तो उसे कहते हैं, जिसे संसार भर के सभी पन्थ, मजहब, सम्प्रदाय, सोसायटी, वर्ण और आश्रम भगवान कहें, जो निर्विरो हो, उसके विरोधी कोई भी न हो, जिसे सब की मान्यता प्रदान हो, जो सार्वभौम हो और सर्वमान्य हो, जिससे भिन्न कुछ भी नहीं और जिसके बिना कुछ भी न हो, वह है भगवान। भगवान में कोई विवाद नहीं है, जब सर्व का भगवान एक ही है, तब मेरा भगवान, तेरा भगवान, सगुण भगवान, निर्गुण भगवान आदि भेद कहाँ रहा? भगवान माने भगवान जानकर, ज़ो भगवान की उपासना करते हैं, वही सच्चे उपासक हैं और भगवान ऐसा है, भगवान वैसा है, ऐसा मानकर जो उपासना करते हैं, वे भगवान के उपासक नहीं, माया (मान्यता) के ही उपासक हैं। प्रश्न-भगवान माने भगवान जानना क्या है और भगवान माने भगवान मानना क्या है?
अपने स्वरूप 'मैं' आत्मा के माने 'मैं' आत्मा जानोगे, तब तुमको यह अर्थ लगेगा कि भगवान माने भगवान है और अपने स्वरूप 'मैं' आत्मा को कुछ भी मानोगे, तब यही अमुक भाव मान्यता है, इसमें भगवान माने भगवान मानना है, क्योंकि ज्यों ही कुछ माना कि 'मैं' से अलग हुआ। एक बार हमसे किसी सज्जन ने पूछा स्वामी जी! मैं सगुण भगवान को भजूँ या निर्गुण भगवान को? हमने कहा भैय्या! तुम, न तो सगुण भगवान को भजो और न निर्गुण भगवान को भजो, इस झगड़े में क्यों पड़ते हो, तुम सीधे भगवान को भजो। देखो, राम सत् स्वरूप है, चित् स्वरूप है और आनन्दस्वरूप है।
अयोध्या के महाराज दशरथ के जब चार पुत्र हुए, तब उनने अपने सूर्यवंश के कुल गुरु वशिष्ट को बुलाकर उनकी विधिवत् पूजा की और तदोपरान्त, इन चारों भाइयों के नामकरण करने के लिए उनसे विनती की, गुरु वशिष्ठ जो ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से हैं तथा त्रिकालदर्शी ब्रह्म निष्ठ महात्मा हैं, उन्होंने ज्योतिष और पंचांग देखकर चारों भाइयों का नामकरण किया।
भगवान राम के नाम के संबंध में 'राम' यह नाम उन्होंने क्यों रखा, उस पर मानसकार कहते हैं कि -
जो आनंद सिन्धु सुखरासी । सीकर तें त्रैलोक सुपासी ।।
सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक विश्रामा ।।
जो आनन्द के समुद्र है और सीकर अर्थात् बालू के एक कण से लेकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक के लिए जो सुपास हैं अर्थात् विश्राम स्थल हैं, वहीं पहुँचने के बाद ही सबको फुर्सत मिलती है, विश्राम मिलता है, शांति मिलती है, इसलिए इनका नाम 'राम' रखा।
अनादि काल से जीव मात्र की यात्रा, आनन्द के लिए है, कोई भी प्राणी एक क्षण के लिए भी दुःख नहीं पाना चाहता। मैं सदा सुखी रहूँ, यही सबकी चाह है, तब आनन्द तो जीव मात्र को शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन विषयों में रात-दिन मिलता ही रहता है, तब जीव की आनन्द यात्रा समाप्त हो जाना चाहिए, परन्तु यात्रा की समाप्ति क्यों नहीं होती?
उत्तर है-उसका प्रयास आनन्द सिन्धु के लिए है, आनन्द सागर के लिए है, न कि आनन्द की डबरी, आनन्द का तालाब, आनन्द का सरोवर। विषयानन्द जो है, वह आनन्द की डबरी है, तलैय्या है, सरोवर है जो कीचड़युक्त है, क्षणिक है, अनित्य है, आगमापायी है। जीव की यात्रा तो आनन्द सागर के लिए है, नित्यानन्द, पूर्णानन्द, परमानन्द, निजानन्द, आत्मानन्द के लिए है। तब "आनन्द सिन्धु सुखरासी" तो भगवान राम ही है, इसलिए जीव की यात्रा भगवान राम की प्राप्ति के लिए है, जब तक उसे उसकी प्राप्ति न हो जायेगी, तब तक उसकी यात्रा समाप्त नहीं हो सकती। चाहे इसके लिए उसको कितनी ही बार जन्म लेना पड़े। तब तक यह यात्रा रहेगी, विश्राम नहीं पा सकता, उसे शांति नहीं मिल सकती।
वह सुख, सुख नहीं, जिसमें दुःख है, डर है, रोना है।
मिलावट से जो है खाली, उसी का नाम सोना है ।।
करो तुम चूर्ण हीरे को, मगर काला नहीं होता ।
अरुण पर फेंक दो तुम धूल, अंधियारा नहीं होता ।।
स्त्री सुख, पुत्र सुख, सम्पत्ति सुख, यौवन सुख, कीर्ति सुख आदि जितने भी सुख हैं उनमें दुःख है, डर है और रोना है। स्त्री, पुत्र, सम्पत्ति, कीर्ति इनको प्राप्त करने के लिए प्रयास और कठिन परिश्रम करना पड़ता है। इनकी रक्षा के लिए अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। तब कहीं इनकी प्राप्ति हो पाती है और ये कुछ काल तक रह पाते हैं, इनमें यही दुःख है। स्त्री पुत्र न मर जायें, कीर्ति और सम्पत्ति नष्ट न हो जाय, धन को चोर न चुरा ले, लुट न जाय, इनका भय नित्य बना रहता है। इनमें यही डर है। इनके नाश हो जाने पर असहनीय दुःख के साथ, रोना पड़ता है, यही इनमें रोना है। इसलिए, ये सब सुख, सुख नहीं है, क्योंकि इनमें दुःख है, डर है, रोना है ये अनित्य सुख है। जिसको नित्य सुख, परम सुख, परमानन्द, सहजानन्द, नित्यानन्द कहते हैं, वह सारे चराचर का अस्तित्व, भगवान आत्मा 'मैं' है। उसको चाहे राम कह लो, कृष्ण कह लो जो तुम्हारी मर्जी आवे कहो। इस नित्य सुख की प्राप्ति के बिना, विश्राम नहीं मिल सकता। मानसकार कहते हैं।
सरिता जल, जल निधि महुँ जाई, होइ अचल, जिमि जिव हरि पाई ।।
नदी बहते-बहते जब तक समुद्र में नहीं पहुँच जाती, तब तक उसे विश्राम नहीं मिल सकता। वह अनेकों पहाड़, जंगल, चट्टान आदि से टकराती हुई, धक्का खाती हुई, चलती रहती है, परन्तु ज्यों ही वह समुद्र में पहुँची कि उसे विश्राम मिल गया, उसका बहना बन्द हो गया, उसका उछलना कूदना हमेशा के लिए बंद हो गया, उसकी यात्रा समाप्त हो गयी, वह शांत हो गयी। बस, इसी तरह जीव की दशा है, जब तक वह 'हरि' (जो दुख को हरे, उसको हरि कहते हैं) अर्थात् भगवान को न पा लेगा, तब तक वह अचल नहीं हो सकता। उसका चलना बन्द नहीं हो सकता, आवागमन लगा ही रहेगा। ज्यों ही उसे 'आनन्द सिन्धु सुखरासी' भगवान राम 'मैं' आत्मा की प्राप्ति हुई कि वह विश्राम पा गया, अचल हो गया, आवागमन के चक्र से छूट गया। उसका भटकना बन्द हो गया।
राम के लक्षण हैं – जिसे पाकर, जीव, आवागमन से फुरसत पा जाता है।
अखिल लोक दायक विश्रामा ।।
जो सुख के धाम हैं "सुखधामा"
जो सारे चराचर के सुपास है -
सीकर ते त्रैलोक सुपासी ।।
जो सत् होते हुए चित् है, चित् होते हुए, आनन्द स्वरूप है। अर्थात् सच्चिादनन्द स्वरूप राम है।
राम सरूप तुम्हार वचन अगोचर बुद्धि पर ।
अबिगत अकथ अपार नेति-नेति नित निगम कह ।।
राम का जो स्वरूप है, वह मन वाणी का विषय नहीं है, वह अविनाशी, असीम और अनन्त है। वेद शास्त्र, श्रुतियाँ, स्मृतियाँ, पता लगाते-लगाते जब स्वयं डूबने लगती हैं, तब न इति, न इति कहते हुए, वहाँ से भाग जाती हैं।
अवस्थाओं का प्रपंच काल के साथ परिवर्तन होते रहता है। जगत् प्रपंच, काल का सहचारी है। काल की गति कैसी अव्याहत है कि सर-सर-सर-सर-सर-सर चला जा रहा है। इसके सामने राकेट की भी कोई हस्ती नहीं है। प्रतिपल वर्तमान, भूत होते जा रहा है और भविष्य, वर्तमान होते जा रहा है। सर्वकाल मुझमें समाते चले जा रहे हैं। 'मैं' काल का भक्षण करते चला जा रहा हूँ।
जो कालहु कर काल भयंकर, बरनत उमा सारदा संकर।
प्रपंच और काल दोनों की आखिरी मंजिल 'मैं' आत्मा हूँ। तीनों अवस्था और तीनों काल के परिवर्तन काल में सर्व के परिवर्तनपने में 'मैं' नित्य एकरस रहा, अपरिवर्तनशील रहा। जो 'मैं' भूत में, वही 'मैं' वर्तमान और भविष्य में और जो 'मैं' जागृत अवस्था में वही 'मैं' स्वप्न और सुषुप्ति में, वही 'मैं' मूर्च्छा में। अस्पताल में जब किसी का कोई बड़ा ऑपरेशन करना होता है, तो डॉक्टर पहले उसे मूर्च्छित कर देता है, तब बेहोशी की हालत में उसके शरीर के अंगों की चीरा-फाड़ी करता है। ऑपरेशन समाप्त होने पर जब वह आदमी होश में आता है, तब कहता है कि भैय्या! मेरा बड़ा खतरनाक ऑपरेशन हुआ, मैं तीन घंटे तक ऐसा बेहोश रहा कि कुछ पता ही नहीं चला।
अब विचार करना है कि यदि 'मैं' आत्मा सचमुच बेहोश हो गया होता, तो यह कौन बताता कि अरे यार! मैं तीन-तीन घंटे तक बेहोश रहा। इस तीन घंटे की बेहोशी का कौन अनुभव करता है? कुछ पता ही नहीं चला, इस 'नहीं पता' का पता, कैसे लगता? मतलब यह कि 'मैं' बेहोश नहीं हुआ 'मैं' ज्यों का त्यों रहा।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म
जानना ही तो मुझ आत्मा का स्वरूप है। प्रक्रिया समझो - देखो भैय्या! पहिले इन दो शब्दों को ठीक-ठीक समझ लो 'मैं' और 'मेरा'।
'मैं' का अर्थ मेरा नहीं होता, और 'मेरा' का अर्थ 'मैं' नहीं होता। यदि मेरा का अर्थ 'मैं' होता, तो मेरा मकान कहने से 'मैं' मकान हो जाता, मेरी साइकिल कहने से 'मैं' साइकिल हो जाता, परन्तु ऐसा नहीं होता। 'मैं' कर्तृवाचक शब्द है, यह (मैं) खुद के लिए कहा जाता है और मेरा सम्बन्ध सूचक शब्द है, अर्थात् जो चीज अपनी होती है, जिस चीज से अपना सम्बन्ध होता है, उसके लिए मेरा कहा जाता है। जैसे मेरा मकान, मेरी साइकिल, मेरी पुस्तक, मेरी गाडी, मेरा बैल आदि। इसका अर्थ 'मैं' मकान, 'मैं' साइकिल, 'मैं' पुस्तक, 'मैं' गाडी और 'मैं' बैल नहीं हो जाता। ये सब मेरे हैं, इसलिए इनके लिए 'मैं' मेरा कहा करता हूँ। 'मैं' इन्हें मेरा कहने वाला, इनसे सर्वथा अलग हूँ। इसी तरह 'मैं' मेरा सिर, मेरा हाथ, मेरे पैर, मेरे कान, मेरी आँख और अन्त में मेरा शरीर आदि कहा करता हूँ। इसका अर्थ हुआ कि 'मैं' सिर नहीं, 'मैं' हाथ नहीं, पैर, कान, आँख, नाक, मुँह और शरीर नहीं, क्योंकि इन सबको 'मैं' मेरा कह रहा हूँ। अतः 'मैं' इन्हें मेरा कहने वाला इनसे अलग हूँ। जब शरीर में नहीं तब, इस शरीर को ही लोग रामदत्त, शिवदत्त, गणेशदत्त, मोहनलाल, रामलाल कहते हैं। मैं रामदत्त, शिवदत्त, गणेशदत्त आदि नहीं हूँ, क्योंकि यदि 'मैं' रामदत्त, शिवदत्त होता, तो मेरे पैदा होते ही लोग पुकार उठते कि अरे भाई ! दौड़ो रामदत्त पैदा हो गया, शिवदत्त पैदा हो गया, परन्तु ऐसा किसी ने नहीं कहा, शरीर के पैदा होने के बाद व्यवहारिक जगत् में काम चलाने के लिए शरीर का ही नामकरण कर लिया जाता है। अतः, शरीर का ही नाम रामदत्त, शिवदत्त आदि है। तब शरीर ही रामदत्त, शिवदत्त है, 'मैं' शरीर नहीं हूँ। अतः मैं रामदत्त, शिवदत्त नहीं हूँ। जब 'मैं' शरीर नहीं हूँ तब शरीर के जितने विकार हैं वे सब विकार भी मुझमें नहीं हैं यथा शरीर ही छोटा, बड़ा, बालक, युवा, वृद्ध होता है।'मैं' उससे अलग होने के कारण न छोटा हूँ, न बडा हूँ, न बालक हूँ, न युवा हूँ, न वृद्ध हूँ।
काला, गोरा, अन्धा, लूला, लंगड़ा आदि शरीर होता है, 'मैं' नहीं। स्त्री और पुरुष शरीर होता है, 'मैं' न स्त्री हूँ, न पुरुष। ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शूद्र आदि शरीर है, 'मैं' नहीं। गृहस्थी, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी, संन्यासी, शरीर होता है, 'मैं' नहीं। पिता, पुत्र, मामा, काका, भाई, भतीजा आदि शरीर को ही कहते हैं। इस शरीर से अलग होने के नाते, मैं ये सब नहीं हूँ। निरालम्बोपनिषत् में है -
न चर्मणो न रक्तस्य न मांसस्य न चास्थिनः ।
न जातिरात्मनो जातिर्व्यवहार प्रकल्पिता ।।
जिसका भाव है कि न तो चमड़े की कोई जाति होती है, न रक्त की जाति होती है, न माँस की कोई जाति होती है, न हड्डी की जाति होती है और न आत्मा की ही कोई जाति होती है। यह तो केवल संसार में व्यवहार चलाने के लिए जाति की कल्पना कर ली गयी है।
यह शरीर ही जन्मता और मरता है 'मैं' इससे अलग हूँ, अतः न 'मैं' जन्मता हूँ, न मरता हूँ।
अब देखो -
शरीर बदलते रहता है, 'मैं' इनसे अलग होने के कारण इसके बदलने के साथ- साथ 'मैं' नहीं बदलता।
जैसे-वृद्धावस्था में बचपन का कोई मेरा दोस्त या मित्र जब मुझसे मिलता है, तब मैं उनका परिचय दूसरों को इस प्रकार देता हूँ। भाई! ये मेरे बचपन के दोस्त हैं। मैं इनके साथ प्रायमरी पढा हूँ, ये मेरे युवावस्था के दोस्त हैं, इनके साथ मैं कॉलेज पढा हूँ। अब वह प्रायमरी पढने वाला बालक शरीर नहीं रहा बदलकर युवा हुआ और कॉलेज पढ़ने वाला, वह युवा शरीर भी नहीं रहा, बदलकर वृद्ध हुआ। परन्तु, जो 'मैं' प्रायमरी पढने वाला शरीर में था, वही मैं युवावस्था में कॉलेज पढ़ने वाला शरीर में भी रहा। अब वह बालक शरीर नहीं रहा, बदलकर युवा हुआ, वह युवा शरीर भी नहीं रहा, बदलकर वृद्ध हो गया। परन्तु, जो 'मैं' बालक शरीर में था, वही 'मैं' युवा शरीर में रहा और जो 'मैं' बालक और युवा शरीर में रहा वही 'मैं' अब इस वृद्ध शरीर में भी हूँ।
वह 'मैं' तीनों शरीर में सदा एक रस, एक-सा रहा। शरीर बदल गये, परन्तु 'मैं' नहीं बदला, क्योंकि यदि शरीर के बदलने के साथ-साथ 'मैं' भी बदल गया होता तो यह कौन बताता, यह ज्ञान किसे रहता कि 'मैं' इनके साथ प्रायमरी पढा था, इनके साथ कॉलेज पढ़ा था आदि। इससे सिद्ध हुआ कि शरीर तो बदला, पर 'मैं' इन सब शरीरों में सदा एक रस, एक-सा रहा। इस तरह शरीर के सम्पूर्ण विकारों से 'मैं' अलग हूँ। मुझमें ये विकार नहीं है। मैं, मेरा मकान कहता हूँ, इसका अर्थ 'मैं' मकान नहीं हूँ। मकान में रहता हूँ, इसलिए मैं इसे मेरा कह लिया करता हूँ। इसी तरह इस शरीर में 'मैं' रहता हूँ। अतः मेरा शरीर कहता हूँ।
जैसे-मकान, मिट्टी, ईंटा, गारा आदि से बनाकर लकड़ी खम्भे, काँड, बल्ली आदि लगाकर मिट्टी, सीमेंट आदि से उसकी छबाई करके चूना, गेरु, नीला थोथा आदि से उसकी पुताई की जाती है, इसी तरह यह शरीर हड्डी, पसली आदि खम्भे और काँड बल्ली से खड़ा किया गया, चमड़े से इसकी छबाई हुई है, नौ द्वार (दो कान, दो आँख, दो नाक, एक मुँह, मल और मूत्र त्याग करने की दो इन्द्रियाँ) इसके दरवाजे और खिड़कियाँ हैं। किसी का शरीर काला है, किसी का गोरा, किसी का साँवला। यह चूना, गेरू और नीला थोथा से पुताई करने के समान है। इस तरह 'मैं' के रहने का यह शरीर मकान है।
'मैं' मकान में रहता हूँ, अतः इसे 'मैं' मेरा कह लिया करता हूँ, परन्तु वास्तव में यह मकान भी मेरा नहीं है, क्योंकि यह मिट्टी, ईंट, गारा आदि से बना है। अतः यह ईंट, गारा, मिट्टी आदि का मकान है, मेरा नहीं। इसी तरह, यह शरीर आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी आदि पंच महाभूतों से बना हुआ होने के कारण यह पंच महाभूतों का है, मेरा नहीं।
छिति जल पावक गगन समीरा ।
पंच रचित अति अधम सरीरा ।।
इसके अंदर 'मैं' हूँ जरूर, पर यह 'मैं' नहीं हूँ। यह हुआ स्थूल शरीर। परमात्मा और अपने आप में भेद का जो भ्रम है, यह सब देहाध्यास के कारण है। जब तक साढ़े तीन हाथ की खुदी है, तब तक खुदा दूर है और जब यह देहाध्यास गया तब फिर खुदा ही खुदा है। खूब समझ लो, यह शरीर उत्पत्ति, विनाश वाला है, घटने-बढ़ने वाला है, इसको संघात कहते हैं, नाशवान कहते हैं।
देहात्मबुद्धिजं पापं न पद् गोबध कोटिभिः ।
आत्माऽहं बुद्धिजं पुण्यं, न भूतं न भविष्यति ।।
(उपनिषद)
यदि शास्त्रों पर विश्वास है, तो अपने आपको जो देह मानता है उसे एक करोड़ गौ की हत्या का पाप लगता है और जो अपने आपको आत्मा 'मैं' हूँ ऐसा जानता है, इससे अधिक पुण्य भी नहीं होता। इसलिए जान लो कि यह स्थूल शरीर न 'मैं' हूँ और न यह मेरा है। इस तरह, यह सिद्ध हुआ कि न 'मैं' शरीर हूँ, न मेरा शरीर है।
अब आगे समझो -
मैं बुद्धि के लिए कहता हूँ, मेरी बुद्धि इस बात को नहीं समझ रही है। मैं चित्त के लिए कहता हूँ, मेरा चित्त इस काम में नहीं लग रहा है।
मैं मन के लिए कहता हूँ, मेरा मन जरा दूसरी ओर चला गया था, आपने क्या कहा मैं समझा नहीं, जरा फिर से कहिए। मैं, प्राण के लिए कहता हूँ कि मेरे प्राण भूख से व्याकुल हो रहे हैं आदि। इस तरह मैं कहता हूँ, मेरी बुद्धि, मेरा चित्त, मेरा मन, मेरे प्राण आदि। जिसका अर्थ हुआ कि 'मैं' बुद्धि, चित्त, मन, प्राण आदि नहीं हूँ, क्योंकि इन सबों को 'मैं' मेरा कह रहा हूँ। अतः, 'मैं' इन्हें मेरा कहने वाला इन सबों से सर्वथा अलग हूँ। इनसे भी भिन्न हूँ, मैं इन सब को जानता हूँ, ये सब मेरे दृश्य हैं, 'मैं' इनका द्रष्टा हूँ।
स्वर्ण यथां ग्रावसु हेमकारः क्षेत्रेषु योगैस्तद्भिज्ञ आप्नुयात् ।
क्षेत्रेषु देहेषु तथाऽऽत्म योगैरध्यात्मवित् ब्रह्मगतिर्लभेत ।।
अर्थात् हेमकार यानी सोनार, सोने को गलाकर खोट भाग को त्याग कर स्वर्ण का खरा भाग ग्रहण कर लेता है। इसी प्रकार जहाँ तक मेरा कहा जाता है अथवा जिस पदार्थ के लिए मेरा शब्द का प्रयोग किया जाता है, वह सब खोट है और त्याज्य है। शेष जो 'मैं' रह जाता है, वही स्वर्ण के समान खरा अपना आप 'मैं' नाम से प्रसिद्ध भगवान आत्मा सर्व का सर्व है, क्योंकि 'मैं' में कोई धोखा नहीं, बाकी सब में धोखा है, इसलिए उपनिषत् की भाषा में श्रुति 'मैं' आत्मा को प्रत्ययसार कहती है। प्रत्ययसार का अर्थ होता है 'विश्वास पात्र'।
अब यह निश्चय हुआ कि जो 'मैं' इन सबों स्थूल शरीर से लेकर सूक्ष्म मन, बुद्धि, चित्त, प्राण आदि सबसे भिन्न, सबका जानने वाला वह 'मैं' कैसा हूँ? कौन हूँ? ऐसा 'मैं' आत्मा, सत्, चित्त, आनन्द स्वरूप हूँ।
सत्- (सत्य) उसे कहते हैं, जिसका तीनों काल और तीनों अवस्थाओं में, कभी भी अभाव न हो। सदा एक रस नित्य रहे। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति ये तीन अवस्थाएँ और भूत, भविष्य और वर्तमान ये तीन काल हैं।
देखो-इन तीनों अवस्थाओं और तीनों काल में 'मैं' का कभी भी अभाव नहीं होता। 'मैं' सदा एक रस विद्यमान रहता है।
समझो -मैं सुबह पाँच बजे सोकर उठता हूँ, तब 'मैं' रहता हूँ, तभी तो पांच बजे को जानता हूँ, फिर छः बजे, इसे भी मैंने जाना, फिर सात बजे, आठ बजे, नौ, दस, ग्यारह, बारह, एक, दो बजते हुए रात के दस बज गये, इन सबको 'मैं' जानते गया। इस तरह पाँच बजे सुबह से लेकर दस बजे रात्रि तक का सब समय जाग्रत अवस्था कहलाती है, इसके सारे प्रपंचों को मैंने जाना। अतः इन सारे प्रपंचों के जानने वाले 'मैं' का अभाव नहीं रहा। यथा-पाँच बजे सुबह से लेकर दस बजे रात्रि तक का काल (समय) कहाँ चला गया, काल अर्थात् समय वे सब अब नहीं रहे, परन्तु 'मैं' एक रस रहा। वे सब समय (काल) कहाँ गये।
अरे! "मैं" ने उन्हें खा लिया "मैं" ने उनका भक्षण कर लिया।
जो कालहु कर काल भयंकर ।
वरनत उमा सारदा संकर ।।
अतः, मैं आत्मा कालों का भक्षण करने वाला कालों का भी महाकाल सिद्ध हुआ।
दस बजे रात्रि में सोने के बाद रात्रि में स्वप्न हुआ, तब इन स्वप्न के सब प्रपंचो को जाग्रत अवस्था के समान ही मैंने अनुभव किया। उन्हें देखा, जाना। तभी तो सोकर उठने पर अपना स्वप्न का अनुभव दूसरों से व्यक्त करता हूँ। कहता हूँ कि आज मैंने ऐसा स्वप्न देखा, यदि उस स्वप्न अवस्था में 'मैं' नहीं रहता, मेरा अभाव होता तो अपना यह अनुभव कि मैंने आज ऐसा स्वप्न देखा, इसे कौन बताता? इससे सिद्ध हुआ कि स्वप्न में भी 'मैं' नित्य विद्यमान रहा, मेरा अभाव नहीं रहा।
तीसरी अवस्था सुषुप्ति (गाढी नींद) है। गाढी नींद से जब मैं सोकर उठता हूँ तब कहता हूँ कि अहा! आज मैं ऐसी सुख की नींद सोया कि कुछ पता ही नहीं रहा, बड़ा आनन्द आया। अब विचार करना है कि इस गाढी नींद में 'मैं' सोया नहीं, सोना जागना मन का धर्म है, आत्मा का नहीं। यदि, 'मैं' सो गया होता, तो गाढी नींद के आनन्द का अनुभव कौन करता? "कुछ पता ही नहीं रहा" इस पता का पता, कौन जानता ? मैं इस गाढ़ी नींद में भी नित्य रहा, तभी "बड़ा आनन्द आया" और "कुछ पता ही नहीं रहा" इन दोनों का अनुभव किया। अतः, सिद्ध हुआ कि सुषुप्ति अवस्था में भी मेरा अभाव नहीं रहा, 'मैं' विद्यमान रहा। इस तरह जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का 'मैं' द्रष्टा, साक्षी और अनुभव करने वाला हूँ।
काल तीन होते हैं, भूत, भविष्य और वर्तमान। अभी जो समय बीत रहा है, उसे वर्तमान काल कहते हैं। इसके सारे प्रपंचों को 'मैं' नित्य देख रहा हूँ, जान रहा हूँ, यह तो प्रत्यक्ष है। जो वर्तमान काल में 'मैं' नित्य हूँ। जो समय बीत चुका उसे भूतकाल कहते हैं, आज के पहिले 'मैं' नहीं था, ऐसा कहना, अपना अनुभव बताना ही है। आज के पहिले 'मैं' नहीं था, इसको नहीं था, वह बता रहा है या जो था, वह बता रहा है? 'था' वही बता रहा है। यदि 'मैं' नहीं रहता तो 'मैं नहीं था' इसका अनुभव कौन करता? इसका अनुभव करने वाला 'मैं' वहाँ मौजूद था, तभी यह अनुभव बता रहा हूँ कि मैं नहीं था। अतः, यह सिद्ध हुआ कि मेरा यह कहना ही कि 'मैं नहीं था' यह सिद्ध करता है कि 'मैं' था। मेरा अभाव भूतकाल में भी नहीं रहा, वहाँ भी 'मैं' था।
एक बार हम रेल में सफर कर रहे थे। दिल्ली के आसपास एक स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी, तब हमारी दृष्टि यह कौन-सा स्टेशन है, यह जानने के लिए प्लेटफार्म पर लगे बोर्ड पर गयी। बोर्ड देखा तो मन प्रफुल्लित हो गया। उसमें लिखा था, 'मैं था' अर्थात् उस स्टेशन का नाम था 'मैं था'। इसका रहस्य समझो। यह स्थान (ग्राम या शहर) यह बता रहा है कि जब यहाँ स्टेशन नहीं बना था, तब भी "मैं था" मेरा अभाव नहीं रहा। अभी भी "मैं था" ही हूँ और आगे चलकर यदि स्टेशन नहीं भी रहेगा तब भी "मैं था" ही रहूँगा। वाह! यह लौकिक रहस्यमय घटना है। यह कह रहा है कि मेरे ही समान जब यह शरीर रूप स्टेशन है (वर्तमान) तब "मैं था" हैं। यह शरीर रूप स्टेशन नहीं रहेगा। (भविष्य) तब भी "मैं था" रहूँगा और यह शरीर रूप स्टेशन नहीं बना था (भूतकाल) तब भी "मैं था" ही रहा। मेरा अभाव तीनो काल में कभी नहीं हुआ।
इसी तरह यह कहना कि भविष्य में 'मैं' नहीं रहूँगा, यह भी अपना अनुभव ही बताना है और अपना अनुभव तभी बताया जा सकेगा, जब अनुभव करने वाला वहाँ मौजूद रहेगा। अतः, सिद्ध हुआ कि 'मैं' का अभाव तीनों काल में नहीं हुआ। इस तरह तीनों काल और तीनों अवस्थाओं में 'मैं' नित्य एक रस विद्यमान रहा, अतः 'मैं' सत्य हूँ।
'मैं' आत्मा चेतन हूँ। जो अपने आपको जाने और दूसरों को भी जाने, उसे चेतन कहते हैं। 'मैं' आत्मा अपने को जानता हूँ और अन्य को भी जानता हूँ।
'मैं' हूँ, इसको तो सारा संसार जानता है, कभी भी ऐसा कोई नहीं कहता कि दौडो रे, 'मैं' तो नहीं हूँ। मुझमें 'मैं' नहीं रहा। इससे पता चलता है कि 'मैं' अपने को जानता हूँ, अन्य को भी जानता हूँ, कान के सुनने, न सुनने, आँख के देखने, न देखने, मन के आने-जाने, सुखी-दुःखी होने, चंचलता-स्थिरता आदि को जानता हूँ। चित्त को जानता हूँ, प्राण को जानता हूँ, बुद्धि को जानता हूँ। शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और इनके विषय को जानता हूँ, यह दूसरों को जानना हुआ। तीनों काल और तीनों अवस्थाओं के सारे प्रपंच को जानने के कारण 'मैं' आत्मा चेतन हूँ।
'मैं' आत्मा, आनन्द स्वरूप हूँ। अपने आप 'मैं' आत्मा से किसी को वैराग्य नहीं होता। स्त्री, पुत्र, धन आदि से तथा अपने शरीर, प्राण आदि से भी मनुष्य को वैराग्य हो जाता है अर्थात् जब कभी शरीर बीमार होकर अधिक समय तक जीर्ण अवस्था में असह्य दुःख भोगने लगता है, तब वह अत्यन्त निराश होकर कहता है कि मेरा यह शरीर शीघ्र छूट जाय, मेरे प्राण निकल जायें आदि। तब मैं सुखी हो जाऊँ। इस तरह शरीर और प्राण से भी मनुष्य को वैराग्य हो जाता है। परन्तु, अपने 'मैं' से एक क्षण भी कभी वैराग्य नहीं होता। वैराग्य तो दुःख से होता है, आनन्द से नहीं। इससे सिद्ध होता है कि 'मैं' आत्मा आनन्द स्वरूप हूँ। इस तरह 'मैं' आत्मा सत् (सत्य) चित् (चेतन) आनन्द रूप, सच्चिदानन्द हूँ। अब इसी को सूत्र रूप में समझो -
1. 'मैं' हूँ इस अस्तित्व में कभी किसी को शंका नहीं होती, अतः 'मैं' आत्मा सत्य हूँ।
2. 'मैं' हूँ इसका किसी को भी अज्ञान नहीं होता, अतः 'मैं' चेतन हूँ।
3. 'मैं' हूँ इससे किसी को भी वैराग्य नहीं होता, अतः 'मैं' आनन्द स्वरूप हूँ।
'मैं' आत्मा शरीर के एक जगह हूँ या शरीर के सब जगह हूँ।
भाई! मैं आत्मा शरीर में नख से लेकर सिर तक सब जगह एक रस, ठसाठस परिपूर्ण हैं।
देखो-जब पैर में काँटा चुभता है, तब मैं उसे जानता हूँ। पेट में, सिर में, आँख, कान, नाक आदि शरीर के किसी भी अंग में, जब कभी भी कुछ सुख-दुःख होता है, स्पर्श होता है तो 'मैं' तुरन्त उसे उसी जगह से ही जानता हूँ। अतः सिद्ध है कि 'मैं' शरीर में सब जगह ठसाठस परिपूर्ण हूँ।
'मैं' आत्मा निराकार हूँ या साकार हूँ? भैय्या! मैं आत्मा न निराकार हूँ, न साकार हूँ। अरे! मैं आत्मा, इन दोनों को जानने वाला, इन दोनों से परे हूँ।
देखो, जब मेरे सिर में दर्द होता है तो वह कितना सूक्ष्म होता है, आँख उसे देख नहीं सकती, हाथ छू नहीं सकता, वाणी व्यक्त नहीं कर सकती। कितना बडा दर्द है? दर्द का क्या रूप रंग है? ऐसा पूछे जाने पर मैं यही कहता हूँ कि भैय्या! इस दर्द को वही जाने, जिसे दर्द हुआ हो। तब एक तो दर्द सूक्ष्म और उस सूक्ष्म दर्द को देखकर, छूकर बताने वाला 'मैं' आत्मा कितना सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हूँ कि इसकी सूक्ष्मता के सामने, आकाश इतना सूक्ष्म होते हुए भी सुमेरू पर्वत के समान स्थूल है। ऐसा 'मैं' आत्मा साकार और निराकार दोनों का जानने वाला इन दोनों से परे हूँ।
इस तरह 'मैं' आत्मा सत्, चित्, आनन्द रूप सच्चिदानन्द भगवान आत्मा ही हूँ, इसका अर्थ शरीर को लेकर मत समझो। अनादि काल से शरीर को 'मैं' मानकर बैठे हो, अतः शरीर से अलग होना ही नहीं चाहते।
अरे यार! इस मल-मूत्र के भाँड, हड्डी, चमडे को भगवान नहीं कहा जा रहा है, यह नाशवान है, अनित्य है। इस शरीर में जो नित्य 'मैं' नाम से बोल रहा है, भगवान आत्मा 'मैं' की व्याख्या हो रही है और हमेशा 'मैं' का अर्थ, इसी तरह शरीर को छोड़कर इसके भीतर का बोलने वाला 'मैं' को समझना चाहिए।
'मैं' को तन मत मानिये, 'मैं' है सर्वाधार । '
मैं' से सिद्धी सर्व की, 'मुक्ता' देखु विचार ॥
आप भुलानो आप में, बन्ध्यो आप में आप ।
जाको ढूँढत फिरत है, सो तू आपै आप ।।
सम्पूर्ण दूध में मक्खन व्यापक रहता है, परन्तु वह प्रत्यक्ष नहीं दिखता, जब तक वह मथानी से न मथ लिया जाय। मथानी से मथकर ही मक्खन प्राप्त किया जाता है, ऐसे ही सारे चराचर में या सम्पूर्ण शरीर में, पैर के नख से लेकर सिर की चोटी तक 'मैं' आत्मा घनभूत, ठसाठस, लबालब पूर्ण रूप से व्याप्त हूँ, उसे विचार रूपी मथानी से मथकर आत्मा रूपी मक्खन को प्राप्त करना चाहिए। 'मैं' और मेरा का विचार पूर्वक पठन, चिन्तन, मनन ही विचार रूपी मथानी से मथना है जिससे आत्मा रूपी मक्खन की प्राप्ति होती है।
जो सबको जानता है, उसको जान लेना ज्ञान है। जो सबको देखता है, उसका दर्शन, भगवत दर्शन है। जो सबको सुनता है, उसको सुनना भगवन्नाम श्रवण है।
हमीं थे भूले, हमीं में ढूँढ़े, हमीं गई, तो हमीं मिले ।
हमीं ने खोजा, हमीं ने पाया, कमी हुई तो हमीं मिले ।।
मोरे हीरा गवाँ गयेव, कचरा मा ।
कोई पूरब, कोई पश्चिम बतावै, कोई पानी कोई पथरे मा ।।
जोगी, पैगम्बर, पीर, अवलिया, सभी भुलानो नखरे मा ।। 1।।
मथुरा ढूँढेव, वृन्दावन ढूँढ़ेव, ढूँढ़ेव कोठरिया के अंतरे मा ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, पायेवँ मैं अपने अंतर मा ।।2।।
मोरे हीरा गवाँ गयेव, कचरे मा ।।
मनुवा अब हँस ले दिल खोल, तूने पाया लाल अमोल ।
सत् चित्, आनन्द तू तो निकला बजा खुशी के ढोल ।।
मनुवा ।। जब सत वाक्य सुने सद्गुरु के, खुल गई जग की पोल ।
जी चाहे तो बोल किसी से, जी चाहे मत बोल ।। ।। मनुवा।।
एक बार राम दरबार लगा हुआ था, तब दरबार में भगवान राम ने हनुमान जी पूछा कि हनुमान! तुम कौन हो? इस प्रश्न के होते ही हनुमान जी सरकारी प्रश समझ सतर्क हो बड़ी सावधानी से हाथ जोड़कर सभा के मध्य में खड़े हुए और बड़ नम्रता से बोले - भगवन् !
देहदृष्टया तु दासोऽहं, जीवदृष्टया त्वदंशकः ।
वस्तुतस्तु त्वमेवाहं, इति मे निश्चितामतिः ।।
देह दृष्टि से मैं आपका दास हूँ, जीवदृष्टि से मैं आपका अंश हूँ और प्रभो! यदि सचाई से पूछो, वास्तव में कहो तो जो आप हैं वही 'मैं' हूँ। ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है।
परमात्मा के दो लक्षण हैं -
1. तटस्थ लक्षण,
2. स्वरूप लक्षण
1. जो लक्षण 'मैं' के अस्तित्व का प्रतिपादन करे, उसे तटस्थ लक्षण कहते हैं। ब्रह्म की जो व्याख्या है,
उसका नाम तटस्थ लक्षण है। इसको अवान्तर वाक्य कहते हैं।
2. जो लक्षण 'मैं' से चराचर के 'मैं' को अभिन्न करके बतावे उसको स्वरूप लक्षण कहते हैं। इसको
महावाक्य कहते हैं।
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना ।।
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी ।।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घान बिनु बास असेषा ।।
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ।।
उपकरण (इन्द्रियों) के द्वारा जो कार्य किया जाय वह लौकिक और बिना उपकरण के जो कार्य किया जाय वह अलौकिक करनी है।
अभी यहाँ बैठे-बैठे सैकड़ों मील दूर किसी देखे हुए स्थान में मन स्मरण करते ही तुरन्त चला गया। दिल्ली, कश्मीर आदि के स्मरण करते ही वहाँ के दृश्य सब दिखने लगे। तब यह मन किस पैर से वहाँ गया? यही 'बिनु पद चलै' है।
आँख से यह दिख रहा है और यह नहीं दिख रहा है, तो 'दिख रहा है' और 'नहीं दिख रहा है' इन दोनों को किस आँख से देखा? यही 'नयन बिनु देखा' है 'कान से सुनाई पड़ रहा है' और 'अब सुनाई नहीं पड़ता' तब कान के सुनने और न सुनने इन दोनों को किसने सुना? यही 'सुनै बिनु काना' है।
सिर के दर्द को किससे छूकर, स्पर्श करके कह रहा हूँ कि अहा! बड़ा दर्द हो रहा है। यही 'तनु बिनु परस' है आदि। ये सब बिना इन्द्रियों के कर्म हो रहे हैं। यही अलौकिक करनी है। यह अलौकिक करनी जिसके द्वारा हो रही है वह 'मैं' आत्मा भगवान है। भगवान आत्मा 'मैं' के ये तटस्थ लक्षण हैं।
आदि अन्त कोउ जासु न पावा । मति अनुमानि निगम अस गावा ।
राम सच्चिदानन्द दिनेसा । नहिं तहँ मोहनिसा लवलेसा ।।
ये स्वरूप लक्षण हैं।
स्मृति, विस्मृति, ज्ञान, अज्ञान, अमुक का ही होता है, 'मैं' का नहीं। इसलिए' ही भगवान आत्मा हूँ और इसी को स्वरूप लक्षण कहते हैं।
'राम' शब्द की व्याख्या -
'र', 'अ' और 'म' मिलकर हुआ राम। 'र' है चित्, 'अ' है सत् और 'म'। आनन्द, इस तरह राम का अर्थ हुआ 'सच्चिदानन्द'। जो सत्य होता है, व त्रिकालाबाध्य होता है। जो त्रिकालाबाध्य होता है, वह व्यापक होता है। जो व्यापक होता है, वह निराकार होता है। जो निराकार होता है वह निरंश होता है, जो निरं होता है वह अजन्मा होता है। जो अजन्मा होता है वह अमर होता है। जो अमर होत है, वह एक होता है। जो एक होता है, वह अविनाशी होता है। जो अविनाशी होताहै। वह पूर्ण होता है। जो पूर्ण होता है, वह चित् होता है। जो चित् होता है, वह आनन्दस्वरूप होता है। जो सत्, चित्, आनन्द होता है, वह स्वतः प्रमाण होता है परतः प्रमाण नहीं। जो स्वतः प्रमाण होता है, वह स्वयंवेद्य होता है, परसंवेद्य नहीं जो स्वयंवेद्य होता है वह अहंगम्य होता है, इदंगम्य नहीं। इस तरह 'मैं' आल सच्चिदानंद हूँ।
राम सच्चिदानंद दिनेसा ॥
जिसमें योगी महात्माजन रमते हैं, रमण करते हैं, उन्मत्त रहते हैं, वह है राम प्रश्न है-किसमें योगी महात्मा जन रमते हैं? उत्तर है-जो ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्न सर्व में व्यापक है, जो सर्व का आधार है, आत्मा है उसमें। इसलिए 'मैं' आत्मा है हुआ राम, ये स्वरूप लक्षण है।
मन की एकाग्रता में जो आनन्द आता है, वह है विषयानन्द और मन की स्थिरत का जो आनन्द है, वह है नित्यानन्द। मन साधना से एकाग्र होता है और यात्रा के परिसमाप्ति में स्थिर होता है। मन एक नदी है, संकल्प विकल्प किनारे हैं, कल्पना धार है। साधन रूपी बाँध से इसे बाँध दो तो वह एकाग्र हो गया। आत्मा रूप सागर पहुँचने पर ही यह मन रूपी नदी स्थिर होती है।
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा ।।
मन का घर तो आनन्द सागर है। वह बिना वहाँ गये स्थिर नहीं हो सकता, वह उसे सुपास होगा।
'आराम' हे राम! आ।
व्यवहारिक जगत में ही देखो, मनुष्य जब सोने लगता है, तब कुछ हल्ला, शोर होता है, तब वह कहता है। अरे! चुप रहो, हमें आराम करना है, अर्थात् शान्ति लेना है। 'आराम' हे राम, आ। तो भैय्या ! शान्ति तो तभी मिलेगी कि जब हृदय में राम आ जायेंगे।
चित्त की चंचलता जाग्रत अवस्था है और चित्त की लय अवस्था सुषुप्ति अवस्था है। सोने की तैयारी में हम बिस्तर पर पड़े हैं, नींद अभी आयी नहीं, आने को है और जाग्रत का अन्त हो रहा है अर्थात् नींद के पूर्व एक ऐसी अवस्था होती है कि उस समय न तो जाग ही रहे हैं और न नींद में ही हैं। यह जाग्रत का अन्त और सुषुप्ति की आदि की अवस्था है। इस समय एक ऐसे विलक्षण आनन्द का अनुभव होते रहता है कि वह 'वृत्ति शून्य' अवस्था ही 'स्वरूप स्थिति' है। इस समय यदि कोई पुकारता है तो वह इस अवस्था का मनुष्य कहता है अरे! अभी चले जाओ कल आना और जो कुछ कहना हो, कहना। अभी हम आराम कर रहे हैं। इतना सब वह कह तो डालता है, परन्तु वृत्ति रहित अवस्था में कहता है। यह अवस्था प्रत्येक में रोज आती है।
सहज प्रकास रूप भगवाना, नहिं तहँ पुनि विज्ञान बिहाना ।।
सहज प्रकाश-जो अंधकार और प्रकाश दोनों का प्रकाशक है, उसे सहज प्रकाश कहते हैं। रात्रि के घोर अंधकार को देखकर हम कहते हैं कि अरे, बड़ा अंधेरा है, टार्च लाओ! इस रात्रि के घोर अंधकार को किस प्रकाश से देखा? रात्रि में तुम स्वप्न देखते हो, स्वप्न में सारा प्रपंच जाग्रत अवस्था के समान ही दिखाई देता है, तब स्वप्न अवस्था में न तो वहाँ सूर्य का प्रकाश है, न चन्द्रमा या बिजली का प्रकाश है और न कोई अन्य प्रकार का ही प्रकाश है, यह सब किसके प्रकाश में देखा जा रहा है, इस स्वप्न के सब व्यवहारों को देखने के लिए, तुम्हारे पास कौन-सा प्रकाश है? यह सब मुझ आत्मा 'मैं' का ही प्रकाश है, जिससे अंधकार और प्रकाश दोनों देखे जाते हैं। यह है सहज प्रकाश। यह बनावटी प्रकाश नहीं है, अकृत्रिम प्रकाश है, परम प्रकाश है।
इस प्रकाश में न रात है, न दिन है। न सुबह है, न शाम है, इसलिए 'सहज प्रकाश रूप भगवाना' 'मैं' आत्मा है। जिससे तीनों काल और तीनों अवस्था नित्य प्रकाशित हैं। सूर्य, चन्द्रमा, बिजली आदि का अन्य प्रकाश, रात के घोर अंधकार को नहीं दिखा सकते। ये प्रकाश अन्धकार के बाधक हैं, परन्तु सहज प्रकाश किसी का बाधक नहीं है।
सहज प्रकाश का अर्थ ज्ञान है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं -
न तद् भासयते सूर्यो, न शशांको न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते, तद्धाम परमं मम् ।।
(गीता 15/6, अ-15, श्लो.-6)
जिस प्रकाश को न सूर्य प्रकाशित कर सकता, न चन्द्रमा प्रकाशित कर सकता, अग्नि, न बिजली इत्यादि का प्रकाश प्रकाशित कर सकता वह 'मैं' आत्मा हूँ, परम प्रकाश स्वरूप। इसका अर्थ है कि सूर्य माने नेत्र, आँख का देवता सूर्य है, तब मुझ आत्मा भगवान को आँख नहीं देख सकती, जो आँख को देखता है, वह 'मैं' आत्म हूँ। मन का देवता चंद्रमा है। अतः, मन मुझ आत्मा को नहीं जान सकता। मन को 'मैं' जानता हूँ। ये सब मुझे प्रकाशित नहीं कर सकते 'मैं' इन सबका प्रकाशक है। मानसकार के शब्दों में, यही परमप्रकाश, सहज प्रकाश है।
सहज प्रकास रूप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना ।।
सहज प्रकाश रूप-अर्थात् सहज ज्ञान ही जिस भगवान आत्मा 'मैं' का स्वरूप है। जहाँ पर विज्ञान रूपी सबेरा नहीं है। किसी भी देश, काल, वस्तु को जानने के लिए 'मैं' आत्मा का ज्ञान, सहज है, स्वाभाविक है, अकृत्रिम है, क्योंकि इनको जानने के लिए 'मैं' आत्मा को किसी की भी अपेक्षा नहीं है। मन को और मन वे सम्पूर्ण व्यवहारों, चित्त को और चित्त के चिन्तन को, बुद्धि को और बुद्धि के निश्चया और अनिश्चय को 'मैं' आत्मा बिना किसी अन्य की सहायता के स्वयं ही जानता हूँ जाग्रत, स्वप्न के सब प्रपंच को और सुषुप्ति के आनन्द का अनुभव 'मैं' स्वयं करत हूँ। तीनों काल को जानता हूँ। 'मैं' आत्मा कितना ज्ञान स्वरूप, ज्ञान पुञ्ज, ज्ञान भण्डार हूँ कि मुझमें जाननापना में कभी कमी नहीं होती। 'मैं' अखण्ड ज्ञान स्वरूप हूँ। जब तक सृष्टि रहेगी, तब तक जानता रहूँगा और सृष्टि के अन्त के बाद भी जानने का अन्त नहीं होगा। इसलिए 'मैं' आत्मा ज्ञान पुञ्ज अखण्ड ज्ञान स्वरूप, सहर प्रकाश हूँ। जिसका जानना सहज है। यदि स्वयं सहज न हो तो जानना भी सहज हो, तब जो स्वयं सहज है तो उसका जानना भी स्वयं सहज है।
'मैं' हूँ यह कहना, सबके लिए सहज है, इसका जानना अनुभव करना, कहना सबके लिये सर्वदा सहज है। किसी को इसमें कोई भी कठिनाई नहीं होती। 'मैं आत्मा सहज हूँ, तो सब सहज है। देखना, सुनना, ज्ञान, अनुभव आदि सब मुः आत्मा का सहज है, यहाँ पर सब साधनों की परिसमाप्ति हो जाती है। भगवान के कठिन मानकर ही तो साधन किये जाते हैं।
सहज ही सहज को अनुभव करता है। सारे चराचर का ज्ञान, इस तरह नित्य सहज है। जानना ही मुझ आत्मा की आँख है, जानना ही मुझ आत्मा का कान है, जानना ही मुझ आत्मा का घ्राण है, जानना ही मुझ आत्मा की त्वचा है, जब 'मैं' स्वयं के लिए सहज हूँ, तब औरों के लिए भी सहज हूँ। जो मुझ आत्मा को कुछ करके जानना चाहता है, उसके लिए कठिन हूँ और जो बिना कुछ किये जानना चाहता है, उसके लिए 'मैं' आत्मा नित्य सहज हूँ।
परमानंद, परेस पुराना ।।
आनन्द और निरानन्द दोनों को जो जानता है, उसे परमानन्द कहते हैं। 'परेश' का अर्थ है 'परा' अर्थात् माया, 'ईश' अर्थात् स्वामी, पति, आधारा इस तरह परेश का अर्थ है, माया का स्वामी, माया का आधार, रक्षक।
'पुराना' अर्थात् जुन्ना, अनादि, सनातन, बिना जन्म कुण्डली का, अजन्मा, अविनाशी।
ज्ञान और अज्ञान दोनों से 'मैं' परे हूँ ऐसा जो जानता है, वह 'मैं' आत्मा हूँ और ऐसा जो नहीं जानता, वह है 'जीव'।
कोई कहता है भगवन्! मैं तो अज्ञानी हूँ और आप तो ज्ञानी पुरुष हैं। ऐसा कहने वाला, जो ज्ञान को भी जान रहा है और अज्ञान को भी जान रहा है और दोनों को जानकर, एक को ज्ञानी और अपने को अज्ञानी कह रहा है, वह कहने वाला कौन है? ज्ञान को जानकर उसे मुझ पर आरोपित किया और मुझे ज्ञानी कहा और अज्ञान को जानकर उसे अपने पर आरोपित करके अपने को अज्ञानी कहा। तो आरोपित की जाने वाली चीज अलग और जिस पर आरोपित किया जा रहा है वह इनसे अलग। जैसे-टोपीवाला कहा जाता है, तब टोपी अलग और जिस पर टोपी आरोपित है, वह अलग। इसी तरह ज्ञान और अज्ञान ये अलग और जिन पर इनको आरोपित किया, वह इनसे अलग, तो वह जो इन दोनों से अलग है वही कह रहा है तब वह कौन है? वही स्वयं है, 'मैं' आत्मा, राम। तब, जब वह स्वयं ज्ञान स्वरूप है, तब अज्ञानी कहाँ रहा।
जो ज्ञान, अज्ञान का नाश करता है, वह है विशेष ज्ञान और जो ज्ञान, अज्ञान को जानता है, वह है सामान्य ज्ञान। सामान्य ज्ञान व्यापक है, यह सब में व्याप्त है। बाँस में सामान्य अग्नि व्यापक है, दो बाँस को रगडो, तो उसमें की वही सामान्य अग्नि विशेष रूप ग्रहण करके बॉस को जलाकर फिर सामान्य का सामान्य हो जाती है।
इसी तरह गुरु-शिष्य के विचार रूपी रगड़ से विशेष ज्ञान की प्राप्ति होती है। सामान्य ज्ञान, सहज ज्ञान है, यही सहज स्वरूप है, यही आत्मा है, यही राम है।
हरष, विषाद, ग्यान, अग्यान, जीवधरम, अहमिति अभिमाना ।।
हर्ष, विषाद, ज्ञान, अज्ञान आदि मान्यता जगत् में है, ये सब जीव देश में ही हैं, आत्म जगत् में नहीं। सम्पूर्ण विकार जीव धर्म में ही है, जीव की मान्यता में ही सम्पूर्ण विकार है, आत्म जगत् में नहीं। आत्मा जान लेने पर सम्पूर्ण विकारों का अभाव हो जाता है।
प्रश्न- इसका क्या प्रमाण है?
उत्तर- अपने आपको आत्मा जानकर देख लो। यही इसका प्रमाण है।
प्रश्न- अपने आपको आत्मा जानना क्या है?
उत्तर- अपने आप को कुछ भी नहीं मानना, यही, अपने आपको आत्मा जानना है।
"राम ब्रह्म व्यापक जग जाना, परमानन्द परेश पुराना" का यही भाव है।
दोहा-
पुरुष, प्रसिद्ध, प्रकास निधि, प्रगट, परावर नाथ ।
रघुकुल मनि, मम, स्वामि सोइ, कहि सिर्वं नायउ माथ ।।
(बा.कां.-116)
जो पुरुष है, यह शब्द लिंग वाचक नहीं है, 'पु' माने पुरी (शरीर) इसके भीतर जो विश्राम करता है (आत्मा) उसे पुरुष कहते हैं। वही सच्चिदानन्द घनभूत आत्मा है।
प्रकृतिविकृतिभिन्नः शुद्धबोधस्वभावः
सदसदिदमशेषं भासयन्निर्विशेषः ।
विलसति परमात्मा जाग्रदादिष्ववस्था-
स्वहमहमिति साक्षात् साक्षिरूपेण बुद्धेः ।।
(137-विवेक चूड़ामणि)
प्रकृति माने कारण और विकृति माने कार्य। न तो भगवान किसी से पैदा हुआ और न भगवान से कोई पैदा हुआ। प्रकृति, विकृति अर्थात् कारण-कार्य से रहित, शुद्ध बोध ही जिसका स्वभाव है।
जिस परमात्मा से जगत् की उत्पत्ति मानते हो, वह परमात्मा, जन्मा है या अजन्मा ?
जन्मा मानने पर उसे विनाशी मानना पड़ेगा, क्योंकि जो जन्म लेगा वह मरेगा और यदि वह जन्मा है तो वह किससे जन्मा ? फिर, जिससे वह जन्मा, उसको किसने जन्म दिया, फिर उसका जन्मदाता कौन? और अजन्मा मानने पर, जब वह स्वयं पैदा नहीं हुआ तब उसे दूसरे को जन्म देने की क्या तमीज, जो दूसरे को जन्म देगा। न्याय से वेदान्त का प्रश्न है-तुम्हारा ईश्वर, जिसने तुम्हारे सिद्धान्त के अनुसार, जगत् की रचना की, वह साकार है या निराकार? यदि साकार है तो वह नित्य नहीं हो सकता और यदि निराकार है तो व्यापक होने के नाते, अक्रिय और अकर्त्ता है। इस तरह दोनों से जगत् की रचना, ईश्वर के द्वारा सिद्ध नहीं होती।
भगवान, शुद्ध बोध स्वरूप है, यही स्वभाव है। अशुद्ध बोध मान्यता ही है शुद्ध बोध 'मैं' का 'मैं' ही जानना है। तीनों काल और तीनों अवस्थाओं का जानना (भोगना) यही इसका विलास करना है, इस पुरी (शरीर) के अन्दर उसे हम कैसे जानें? इसका उत्तर है-अरे, जो सोऽहं, सोऽहं, सोऽहं करके नित्य कहते जा रहा है, वह 'मैं' हूँ, 'मैं' हूँ, ऐसा अहर्निश बोल रहा है, ऐसा जानना ही, उसे जानना है, वह कार्य, कारण से भिन्न है, सर्व से परे, सर्व का दृष्टा है, सर्व उसे नहीं जान सकते, जो सर्व को जानता है, वह आत्मा 'मैं' राम है। जिसके बिना जिसका अस्तित्व एक क्षण के लिए भी न रह सके, वह उसकी आत्मा है। जो जिसका कारण होता है, वह उसका आधार होता है, वह उसमें व्यापक होता है, वह उसका सर्व होता है, ऐसा भगवान सबमें 'मैं' हूँ, 'मैं' हूँ, इस तरह नित्य व्यक्त हो रहा है। प्रसिद्ध है।
शुद्ध बोध क्या है और अशुद्ध बोध क्या है? अपने आप 'मैं' आत्मा को कुछ भी मत माने, 'मैं' का 'मैं' ही जाने, इसको शुद्ध बोध कहते हैं और अपने 'मैं' आत्मा को कुछ भी माने इसको अशुद्ध बोध कहते हैं।
जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा, समाधि इन सबका अनुभव 'मैं' आत्मा सतत् करते रहता हूँ। अगर, इनको न जानूँ तो इनका अनुभव कौन बताएगा? इसलिए जानना ही जिसका स्वभाव है। यही शुद्धबोध है।
अनादिकाल से 'मैं' आत्मा जानते आ रहा हूँ, परन्तु आज तक मुझ आत्मा के जाननापने में कमी नहीं हुई। ऐसा कभी नहीं होता कि भाई! अब हम बहुत जान गये, हमारा जाननापना खतम हो गया, जब थोड़ा जाननापना और इकट्ठा हो जाने दो, तब फिर जानेंगे। रात-दिन मुझ आत्मा का जानना ही स्वभाव है, इसलिए 'मैं' आत्म ज्ञान स्वरूप, ज्ञान पुञ्ज, ज्ञान का भण्डार ज्ञानघन अर्थात ठोस। 'मैं' आत्मा ठोस ज्ञान स्वरूप हूँ।
किसी भी देश-काल, वस्तु को जानने के लिए मुझे समयऔर सीमा की अपेक्षा नहीं कि 'मैं' कितनी जल्दी जानता हूँ। कोई भी वस्तु ज्यों ही सामने आयी कि उसे तत्काल जानता हूँ, 'प्रज्ञानम् ब्रह्म', अर्थात् जो तत्काल ही जाने। इसलिए, 'मैं' ज्ञान स्वरूप हूँ। कितना ज्ञान है, इसकी कोई थाह नहीं, अथाह है। इसलिए 'मैं' आत्मा-ज्ञान निधि हूँ। ज्ञान का समुद्र हूँ। बुद्धि रूपी बर्तन में जितना भर लो इस ज्ञान समुद्र में कमी कभी नहीं होना है। वह तो ज्यों का त्यों है। जितना का उतना है, जैसा का तैसा है, जरूरत तो अपनी बुद्धि रूपी पात्र को बडे बनाने का है। फिर, तो जितना चाहो, उतना भर लो, इस ज्ञान के भण्डार में कमी कभी होने की नहीं है।
मुझ आत्मा का जाननापना, नित्य तीनों काल और तीनों अवस्था में, अनादिकाल से एक रस है, यह कभी खण्डित नहीं होता। इसलिए 'मैं' आत्मा अखण्ड ज्ञान स्वरूप हूँ।
'मैं' क्या नहीं जानता, किसको नहीं जानता, इन्द्रियों से गुप्त होने के कारण 'मैं' गुह्य और स्वयं के द्वारा नहीं जानने के कारण 'मैं' परमगुह्यज्ञानस्वरूप हूँ। वाणी कथन करती है, इसको भी 'मैं' जानता हूँ और चुप हो जाती है, इसको भी 'मैं' जानता हूँ, परन्तु चुप होना और बोलना ये मुझे नहीं जान सकते, इन दोनों की सिद्धि 'मैं' ही करता हूँ। अब कौन है, जिसके सामने 'मैं' व्यक्त होऊँ? या व्यक्त करूँ? यह स्वयं करके नहीं जानता है? यही आलस्यधुरीण पद है, इस अनुभूति में जो निर्विकल्पता और निस्तब्धता आ गयी, इन दोनों को 'मैं' जान रहा हूँ। ये दोनों भी 'मैं' नहीं हूँ, इन दोनों की सिद्धि भी मुझ करके ही है, वह 'मैं' आत्म ज्ञान स्वरूप, इन दोनों से परे हूँ।
'मैं' भिन्न होकर जानता हूँ या अभिन्न होकर जानता हूँ या भिन्नाभिन्न होकर जानता हूँ या वही होकर जानता हूँ?
उत्तर है-वही होकर जानता हूँ।
यदि, इस तरह जानता हूँ तो फिर ये है ही नहीं, तब जानता किसको हूँ? किसी को नहीं।
बस, इस अनुभूति की जो अनुभूति हो रही है, वही 'मैं' आत्मा ज्ञान स्वरूप की स्वरूपस्थिति है। अब यहाँ कुछ नहीं बचा। 'मैं' आत्मा ज्ञान स्वरूप, चैतन्य घनभूत, लबालब परिपूर्ण हूँ। जो मनगम्य, बुद्धिगम्य, चित्तगम्य, वाणीगम्य नहीं हूँ। अहंगम्य और अनुभवगम्य हूँ।
जो बेसहारा, इस गुल चमन का, उस बेसहारे को हम भी जाने ।
जो नूरेहस्ती है बेकिनारा, उस बेकिनारे को हम भी जानें ।
तरह-तरह की बेशुमार कलियाँ, कभी सिकुड़तीं, कभी उघड़तीं ।
जो इश्क ये दिल है, मिश्ले-मजनूं, तलाश करता है कूचे-कूचे।
मिटती है मिलते ही ख्वाहिशातें, माशूक्रे - लैला को हम भी जानें।
जो जानता है जहान सारा, जो देखता है हमेशा सबको ।
पहचान जिसको भले-बुरे की, पहचान वाले को हम भी जानें ।।
रहता है सबमें हो करके सब कुछ, वेइब्तिदा और वेइन्तिहा है ।।
मशरू.फ़ रहते हैं मस्त जिसमें, उस मस्त सूरत को हम भी जानें ।।
अनमोल 'मुक्ता' का ये खजाना, गर लूटना है, मजे से लूटो ।
हक़ीक़ी मस्तों की जो हक़ीक़त, ऐसी हक़ीक़त को हम भी जानें ।।
पुरुष, प्रसिद्ध प्रकास निधि -
जो पुरुष है, 'मैं' आत्मा वह प्रसिद्ध है। तीनों काल और तीनों अवस्थाओं में वह नित्य प्रसिद्ध है। उसका कभी अभाव नहीं होता यही प्रसिद्ध है। वह अव्यक्त और व्यक्त रूप में, नित्य प्रसिद्ध है। अस्तित्व सामान्यचेतन 'है' है, इस रूप में जो नित्य है। संसार में ऐसा कोई है, जो 'है' इस अस्तित्व से खाली हो। ब्रह्मा है, विष्णु है, शंकर है, जीव है, ब्रह्म है, ज्ञान है, अज्ञान है, भाव है, अभाव है, है है, नहीं है, पाप है, पुण्य है, स्वर्ग है, नरक है आदि जो तृण से लेकर ब्रह्मा तक 'है' रूप से प्रसिद्ध है, यही अस्तित्व, सामान्य चेतन 'है' है, इस रूप में जो नित्य है।
जो वाणी से न कहा जाय, अव्यक्त चेतन 'है' का ही व्यक्त रूप 'मैं' है। 'है' जो 'मैं' नाम से नित्य व्यक्त हो रहा है। प्रसिद्ध हो रहा है। इस तरह वह व्यक्त और अव्यक्त रूप में नित्य प्रसिद्ध हो रहा है। 'है' सामान्य चेतन और 'मैं' विशेष चेतन इन दोनों को आत्म भाव से प्राप्त करना चाहिए।
विषय समझो डण्डा 'है'।
प्रश्न होता है कि डण्डे का यह जो 'है' है, (पहला 'है' कर्त्ता, दूसरा 'है' क्रिया है) यह, डण्डे का 'है' है या लकड़ी का 'है' है?
उत्तर है- लकड़ी का 'है' है। यह जो प्रतीत हो रहा है, भान हो रहा है, वह लकड़ी ही तो है, डण्डा नहीं। क्योंकि, यदि डण्डे से लकड़ी निकाल लोगे तो डण्डा नहीं रह सकता, फिर भान या प्रतीति किसकी होगी। अतः, सिद्ध हुआ कि यह जो डण्डे में 'है' पना है, वह डण्डे का नहीं, लकड़ी का है। आगे चलो-अब लकड़ी 'है' इस लकड़ी में जो 'है' है, वह लकड़ी का है या पृथ्वी का है? उत्तर है-पृथ्वी का। क्योंकि यदि लकड़ी में से पृथ्वी निकाल लोगे, तो लकड़ी रहेगी कहाँ ? इससे, सिद्ध हुआ कि यह जो लकड़ी का 'है' है, वह लकड़ी का नहीं बल्कि पृथ्वी का 'है' है। इस तरह, पृथ्वी का जो 'है' है, वह जल का 'है' है। जल का जो 'है' है, वह अग्नि का 'है' है। अग्नि का जो 'है' है, वह वायु का 'है' है। वायु का जो 'है' है वह आकाश का 'है' है और आकाश का जो 'है' है वह मुझ आत्मा, चैतन्यघनभूत का 'है' है। इस तरह वह अव्यक्त रूप से नित्य व्यक्त हो रहा है। प्रसिद्ध है। इसी तरह व्यक्त रूप 'मैं' नित्य प्रसिद्ध है, जिससे भी पूछो भाई! तुम कौन हो? उत्तर मिलेगा 'मैं' हूँ। सारा विश्व अपने आपको 'मैं' भाव से व्यक्त करता है। इस तरह 'मैं' (विशेष चेतन) इस भाव में, सर्व में, नित्य व्यक्त हो रहा है। अब यदि डण्डे से पूछोगे कि तुम कौन हो तो वह भी यही कहता है, कि 'मैं' हूँ, परन्तु वह एक गुण तमोगुण का ही है, उसमें रजोगुण अर्थात् इन्द्रियाँ और सतोगुण अर्थात् बुद्धि का अभाव है, अतः वह बोल नहीं सकता, व्यक्त नहीं कर सकता, परन्तु अव्यक्त रूप 'है' है। इस अस्तित्व सामान्य चेतन से नित्य प्रसिद्ध है।
चारों प्रमाणों से अपना अस्तित्व सिद्ध है।
1. प्रत्यक्ष प्रमाण, 2. अनुमान प्रमाण, 3. निगम प्रमाण और 4. स्वानुभूति प्रमाण ये ही चार प्रमाण हैं।
मानने से रहे और न मानने से भी रहे, वह प्रत्यक्ष प्रमाण है।
आज नदी में बाढ़ आ गयी। यद्यपि, यहाँ पानी नहीं गिरा, तब यह निश्चय है कि ऊपर कहीं पानी गिरा होगा। यह अनुमान प्रमाण है।
वेद, शास्त्र, रामायण, गीता, भागवत सभी यही बताते हैं कि भगवान आत्मा 'मैं' के सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है, यही निगम प्रमाण है।
"मैं" हूँ इसको स्वयं में ही जानता हूँ यही स्वानुभूति प्रमाण है।
सारांश में समझो, 'मैं' हूँ यह प्रमाण सबके लिए प्रत्यक्ष है, यही 'मैं' के लिए दृढ़ प्रत्यक्ष प्रमाण है।
यदि, 'मैं' नहीं होता, तो कहता कौन कि 'मैं' हूँ, यही दृढ़ अनुमान प्रमाण है।
यदि 'मैं' नहीं होता तो भीतर से बोलता कौन कि 'मैं' हूँ, यह दृढ़ निगम प्रमाण है। इन तीनों प्रमाणों को 'मैं' जानता हूँ, यही दृढ़ स्वानुभूति प्रमाण है।
जैसे, प्रकाश को प्रकाश से ही देखा जाता है। अंधकार, प्रकाश को क्या दिखा सकेगा, ऐसे ही 'मैं' को 'मैं' के ही द्वारा देखा जाता है, जाना जाता है। वेद, शास्त्र, पुराण, श्रुति, स्मृति ये सब अनात्म है। ये सब मुझ आत्मा को क्या दिखा सकेंगे? तब शंका होती है कि जब ये मुझ आत्मा को नहीं दिखा सकते, तब इनकी अन्यथा सिद्धि है, ये सभी व्यर्थ है?
भाई! मुझ सच्चिदानन्द के भाव की व्याख्या नहीं हो सकती, जो तत्त्व, अपने आप से ही जाना जाता है, उसकी व्याख्या अगर शास्त्रों में हो तो फिर हम तुम्हें क्या जनाएँगे? जिसको तुम जानते हो, उसी को हम जनाते हैं। तो स्वामी जी! मैं किसको जानता हूँ।
भैय्या! जो सबको जानता है, उसी को जानते हो। सन्त, महात्मा जन उसी को जनाते हैं। प्रश्न- जब मैं पहिले से ही जानता हूँ, तब आप क्या जनाते हैं? भाई! हम यही जनाते हैं कि तुम पहिले से ही जानते हो। अरे, 'मैं' हूँ, इसको जानते हो या नहीं? जी हाँ जानता हूँ। तो और क्या जानोगे? कोई सींग, पूँछ वाला जानना है? नहीं। इसी को हम जनाते हैं। अपने आप 'मैं' आत्मा को, तुम कुछ न कुछ मान कर जानते हो, उसी को सन्त, महात्मा जन जान कर जनाते हैं।
प्रश्न- तुम मानकर कैसे जानते हो? देखो! तुम कहते हो- 'मैं' देह हूँ, 'मैं' स्त्री हूँ, 'मैं' पुरुष हूँ, 'मैं' बालक हूँ, युवा हूँ, वृद्ध हूँ, ब्राह्मण हूँ, गृहस्थ हूँ, माता- पिता, भाई-बहिन हूँ आदि। तुमने अपने आप 'मैं' को, देह माना, स्त्री-पुरुष माना, बालक, युवा, वृद्ध माना, वर्ण, आश्रम वाला माना, माता-पिता, भाई-बहिन माना।
इस तरह तुम कुछ न कुछ मानकर जानते हो। 'मैं' को जानते हो, अपने 'मैं' का ज्ञान है और देह जो मान रहे हो, इस देह का भी ज्ञान है। अब विचार करो कि यह जो तुमने देह माना, वह किसको माना? उत्तर है 'मैं' आत्मा अस्तित्व को, 'है' को। तब देह, देह है या अस्तित्व, 'मैं' आत्मा?
उत्तर- अस्तित्व है, ' मैं' आत्मा है।
तब देह रहा? नहीं।
तब क्या रहा?
उत्तर है- 'मैं' ही रहा।
इस तरह सब मान्यताओं का अभाव है। 'मैं' ही 'मैं' हूँ। बस, हम यही जनाने आये हैं। जिसको देह कहते हो, प्रपंच कहते हो, वह 'मैं' ही है। यह देह है, इसको अध्यास कहते हैं और देह मानकर, 'मैं' देह हूँ कहना अभिमान है। मान्यता अध्यास है और वह 'मैं' हूँ कहना अभिमान है। 'है' और 'मैं' अव्यक्त और व्यक्त दोनों भाव से 'मैं' आत्मा, नित्य प्रसिद्ध है।
पुरुष प्रसिद्ध प्रकाश निघि
जो पुरुष है, वह प्रसिद्ध है, फिर वह प्रकाश निधि है।
प्रकाश निधि का अर्थ होता है, प्रकाश पुञ्ज, जो न कभी उदय हो और न कभी अस्त हो। प्रकाश का अर्थ होता है ज्ञान और अंधकार का अर्थ होता है अज्ञान। जिससे प्रकाश और अंधकार दोनों देखे जाते हैं, वह है प्रकाशनिधि। वह प्रकाश न कभी उदय होता है और न अस्त। यह सर्व का ज्ञाता है।
प्रकाश निधि - प्रकाश माने ज्ञान, निधि माने समुद्र अर्थात् ज्ञान का समुद्र।
ग्यान अखण्ड एक सीताबर, माया वस्य जीव सचराचर ।।
वह ज्ञान अखण्ड है, कभी खण्डित होने वाला नहीं है। खण्ड ज्ञान क्या है? किसी उपकरण (इन्द्रिय) के द्वारा जो जाना जाय, वह खण्ड ज्ञान है और बिना उपकरण के जो जाना जाय वह अखण्ड ज्ञान है। भगवान आत्मा 'मैं' अखण्ड ज्ञान स्वरूप है। देखो! (ताली बजाकर) यह ध्वनि हुई। इसे किसने सुना? कर्ण इन्द्रिय ने और कर्ण इन्द्रिय के सुनने को किसने सुना? 'मैं' आत्मा ने। तो, जो सुनने और नह सुनने दोनों को सुनता है, देखने और नहीं देखने, दोनों को देखता है (बिना उपकरण के) वह 'मैं' आत्मा अखण्ड ज्ञान स्वरूप हूँ। जो सुषुप्ति के आनंद का अनुभव बिन उपकरण के करता है, वह 'मैं' आत्मा ज्ञानस्वरूप अखण्ड हूँ। इन्द्रियों का ज्ञान खण्ड ज्ञान है और "मैं" आत्मा का ज्ञान अखण्ड ज्ञान स्वरूप है। वह अखण्ड ज्ञा अनेक नहीं एक है। तीनों अवस्था और तीनों काल का ज्ञान जो है, वह नित्य एक रह अखण्ड है। इस अखण्ड ज्ञान में देशकाल का अत्यन्ताभाव है। इसलिए 'ग्यान अखण् एक सीताबर' है। यही प्रकाश का समुद्र है, जो आदि अन्त से रहित है।
पदार्थ दो प्रकार के होते हैं 1. दृष्ट पदार्थ, 2. अदृष्ट पदार्थ। जो देखने में आवे, उसे दृष्ट पदार्थ और जो देखने-सुनने में न आये, उसे अदृष्ट पदार्थ कहते हैं।
जगत्, प्रपंच, संसार, विश्व, अश्वत्थ ये सब एक ही शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं। ये सब अदृष्ट हैं। आकाश, वायु (ये सब) अग्नि, जल, पृथ्वी ये पाँचों प्रपंच हैं। ये सब मिलकर एक जगह रहें, तब उसे प्रपंच कहते हैं।
संसार-संसरणम् संसारः। पता चलाने चलो, पकड़ने चलो तो जो सरकता चला जाय, अपनी जगह पर न मिले, इसको ढूँढने चलते हैं, तो यह आगे-आगे सरकता चला जाता है, मिलता नहीं, इसलिए इसका नाम संसार है।
जगत्-गच्छन्तियः सः जगत्-जिसको निश्चय करने चलो, तो वह आगे-आगे सरकता चला जाता है, उसे जगत् कहते हैं।
विश्व-वि, माने विगत, श्व माने प्रातः। रात के अंधेरे में तो रहे और प्रातः प्रकाश में जो विगत हो जाय अर्थात् न रहे। अज्ञानके अंधेरे में तो रहे, पर ज्ञान के प्रकाश में न रहे, उसे कहते हैं विश्व।
अश्वत्थ- 'अ' माने नहीं, 'श्व' माने प्रातः, 'थ' माने स्थिर। जो रात के अंधेरे में तो रहे और प्रातःकाल के प्रकाश में जो स्थिर न रहे, उसे अश्वत्थ कहते हैं। मान्यता अश्वत्थ है, वृक्ष है, इसमें जो सत्यता प्रतीत होती है, वह अज्ञान के अंधेरे में ही होती है। अनन्त मान्यताओं का जो समूह है, उसे संसार कहते हैं। अनन्त- मान्यताओं का जो आधार है वह अस्तित्व ही है। यह संसार सब प्रकार से पूर्ण है।
प्रश्न होता है-क्यों ?
उत्तर है- अरे, इसका बाप भी तो पूर्ण है, जिससे इसकी उत्पत्ति हुई। पूर्ण पिता से पूर्ण पुत्र की उत्पत्ति होती है। बाप के दो आँख, दो कान, दो हाथ, दो पैर हैं, तो बेटा एक आँख, एक कान, एक हाथ और एक पैर वाला, ऐसा अपूर्ण नहीं होता। बाप के सब दो-दो, तब बेटे के भी सब दो-दो। बाप-बेटे दोनों पूर्ण हैं। इसी तरह 'मैं' आत्मा अस्तित्व, अनादि है, अविनाशी है, अनिर्वचनीय है, तब संसार भी वैसा ही है। अब प्रश्न होता है कि संसार के उपरोक्त विशेषण संसार के हैं या भगवान आत्मा के? उत्तर है, भगवान आत्मा के हैं। यही भगवान (बाप) का गुण, संसार (बेटे) में है। अतः, जिसे भगवान कहते हो, जो राम है, 'मैं' आत्मा, वही दृष्ट पदार्थ है, शेष सब प्रपंच, अदृष्ट हैं। उन्हें देखने, अनुभव करने चलो तो वे नहीं मिलते। मान्यता प्रपंच देश है, इसका आधार भगवान देश है। प्रपंच देश में प्रपंच है और भगवान देश में सब भगवान ही है।
भगवान देश में खड़े होकर देखो, ब्रह्मा से लेकर तृण तक, कण-कण, जरी, वर्रा भगवान है। उससे एक तिल भर भी जगह खाली नहीं है।
सर्व में से अमुक भाव हटा दो, विकल्प त्याग दो, फिर तो वही-वही है। वह दू नहीं है। इसका आनन्द तो तभी आयेगा, जब तुम अमली जामा पहिनोगे। इसक बिना, वह आनन्द दूर है। मानसकार विनय में कहते हैं-
हे हरि ! कवन जतन सुख मानहु ।
ज्यों गज-दसन तथा मम करनी, सब प्रकार तुम जानहु ।
जो कछु कहिय-करिय, भव सागर तरिय बच्छपद जैसे ।
रहनि आन विधि, कहिय आन हरिपद सुख पाइय कैसे ।।
देखत चारु मयूर बयन सुभ बोलि सुधा इव सानी ।
सविष उरग आहार, निठुर अस यह करनी वह बानी ।।
अखिल-जीव-वत्सल, निरमत्सर चरन-कमल-अनुरागी ।
ते तव प्रिय रघुबीर धीरमति, अतिसय निज पर त्यागी ।।
हे हरि मैं किस प्रकार सुख मानूँ। मेरी करनी हाथी के दिखावटी दाँतों के समा है। भाव यह है कि जैसे हाथी के दाँत दिखाने के और तथा खाने के और होते हैं, उसे प्रकार मैं भी कहता (दिखाता) कुछ और हूँ और करता कुछ और ही हूँ। मैं दूसरों जो कुछ कहता हूँ, वैसा ही यदि स्वयं करने भी लगूँ तो भवसागर से बछड़े के खुर निशान में भरे हुए जल को सरलतापूर्वक लांघ जाने की भाँति अनायास ही ता जाऊँ, परन्तु करूँ क्या, मेरा आचरण तो कुछ और है और कहता कुछ और हूँ, फि भला तुम्हारे चरणों का यह परमपद का आनन्द कैसे मिले ?
मोर देखने में तो सुन्दर लगता है और अमृत से सने हुए मीठी बोली बोलता है परन्तु उसका भोजन जहरीला साँप है। वह साँप खाता है। कैसा निष्ठुर है? करनी वह (जहरीले सर्प खाना) और कथनी (अमृत से सने हुए मीठी बोली बोलना मानसकार कहते हैं, हे नाथ! तुमको तो वे सन्त प्यारे हैं, जो धीर, गंभीर और राग द्वेष से रहित हैं। जिनने, अपने-पराए का भेद बिल्कुल त्याग दिया है। अर्थात् सब एक तुमको ही देखते हैं।
जद्यपि मम् अवगुन अपार, संसार-जोग्य रघुराया ।
तुलसिदास निज गुन बिचारि, करुनानिधान करु दाया ।।
(विनय पत्रिका पद-118
इस वट वृक्ष के बीज को देखो। वह कितना सूक्ष्म है। इसमें यह इतना बड़ा वृक्ष समाया हुआ है। वह बीज, स्वयं वृक्ष रूप होकर इसके पत्ते, डालियाँ जड़, पींड, फूल-फल सबमें समाया हुआ है। इसी प्रकार भगवान आत्मा स्वयं जगत् प्रपंच का बीज है। यह प्रपंच उसी से पैदा हुआ है। इस प्रपंच की उत्पत्ति उन्हीं के द्वारा हुई तथा वह स्वयं बीज की भाँति इसमें समाया हुआ है। अरे, अधिक क्या कहें, बीज ही तो है, जो स्वयं वृक्ष है। इस तरह ज्ञान और अज्ञान दोनों को प्रकाशित करने वाला 'मैं' आत्मा प्रकाशनिधि है।
'प्रगट परावरनाथ'
वह पुरुष, प्रसिद्ध प्रकाशनिधि होते हुए प्रगट है। सब अपने को 'मैं' नाम से नित्य व्यक्त कर रहे हैं। इसीलिए वह नित्य है (इस व्यक्त रूप में) और सारा चराचर, मान्यता रहित प्रतीयमान भास, भगवान के भाव में 'है' है, अस्तित्व रूप में नित्य प्रकट है, प्रत्यक्ष है।
प्रश्न- आकाश विकल्प है या वस्तु है?
विकल्प कहो तब आकाश नहीं, क्योंकि विकल्प अस्तित्वहीन होता है और आकाश यदि वस्तु है तो भी आकाश नहीं, तब फिर यह क्या है? तब यह जो है, सोई है। जैसा है, वैसा ही है। जहाँ है, वहीं है। बस, इस रूप में वह नित्य प्रगट है।
बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु ।
लोक कल्पना बेद कर, अंग अंग प्रति जासु ॥
शरीर का विकल्प हुआ। अब जिस पर शरीर का विकल्प हुआ, वह इस शरीर विकल्प से ढँक गया। अब इस विकल्प को हटा दो, तब क्या रह गया? इस पर कुछ भी विकल्प मत करो, अब यह जो प्रतीयमान (भास) शेष रह गया है, जो मन, वाणी का विषय न रहा, जो अनुभवगम्य है, वही 'मैं' आत्मा हूँ, जिस पर सारा विश्व आधारित है।
प्रश्न-विकल्प हटाने का साधन क्या है?
उत्तर- विकल्पक के बोध में, विकल्प का अभाव है।
प्रश्न-विकल्पक का बोध, कैसा होता है?
उत्तर-विकल्प, विकल्प है या विकल्प वस्तु है? यदि विकल्प, विकल्प है। विकल्प, विकल्प नहीं, वस्तु ही है 'मैं' आत्मा है और यदि विकल्प वस्तु है, तथा विकल्प, विकल्प नहीं वस्तु है, 'मैं' ही हूँ। यही विकल्प हटाने का साधन है ॐ यही विकल्पक का बोध है। इसलिए -
बिस्व रूप रघुबंस मनि, करहु बचन बिस्वासु ॥
इस रूप में नित्य प्रगट है।
'शरीर है'। यहाँ अब, प्रश्न उठता है कि शरीर, शरीर है या 'है' शरीर है?
उत्तर- 'है' शरीर है, 'है' (अस्तित्व) शरीर है।
प्रश्न- मन, मन है या 'है' मन है? 'है' विषय है।
उत्तर - 'है' (अस्तित्व) मन है।
विषय, विषय है या 'है' विषय?
विश्व, विश्व है या 'है' विश्व है? 'है' विश्व है। बस-
बिस्व रूप रघुबंस मनि, करहु बचन बिस्वासु ॥
इस रूप में नित्य प्रगट है। जब देह नहीं रहा तब देहाभिमान नहीं रहा। ज देहाभिान नहीं रहा, तब जीने मरने का डर नहीं रहा। इस स्थिति में देश, काल वस्तु का अत्यन्ताभाव हो गया। सिवा चैतन्यघन भूत, 'मैं' आत्मा के कुछ भी शे नहीं रहा, यही निर्भय पद है, आत्म पद है-परम पद है।
संसार के प्रत्येक पदार्थ में पाँच अंश होते हैं। अस्ति, भाति, प्रिय, नाम और रूप। इसमें प्रथम तीन अंश-अस्ति, भाति और प्रिय भगवान राम, 'मैं' आत्मा हैं।
विषय समझो - विकल्प हटा देने के बाद जो रह गया, उसे वाणी व्यक्त नहीं क सकती, उस पर सोचना, विचारना, बन्द हो गया, परन्तु उसकी प्रतीति तो हो र है, भान तो हो रहा है कि कुछ है, यही अस्तित्व है, 'है' है। इसी को अस्ति कहते है जो सत् है। यह अस्तित्व जो भास रहा है, वही भाति है अर्थात् भासता है, वह वि (चेतन) है और जो अस्ति, भाति है अर्थात सत् चित् है, वही प्रिय है, आन स्वरूप है। इस तरह सारा चराचर सत्, चित्, आनन्द (सच्चिदानन्द) के रूप में नित्य प्रगट है।
बिस्व रूप रघुबंस मनि, करहु बचन बिस्वासु ।।
अस्ति, भाति, प्रिय ये तीन अंश, भगवान राम हैं, अब इस पर, नाम और रूप का विकल्प कर लिया गया, इस तरह दो अंश, इसमें और जुड़ गये। जिसमें 'मैं' आत्मा भगवान छिप गया, यही दो अंश माया के हैं, यह जो मान्यता है, विकल्प है, यही माया है, सीता है। अतः, सारा चराचर सीय राममय हुआ। श्री मानसकार कहते हैं-
सीय राम मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ।।
का यही भाव है। इस रूप में वह नित्य प्रगट है- 'गुप्त प्रगट वह है नहीं, सरासरी मैदान' ।
गुप्त प्रगट वह है नहीं, सरासरी मैदान ।
ब्रह्मदत्त द्विज देख लो, बिन आँखी बिन कान ।
भाई ! आँख, कान का यहाँ क्या काम, यह इन्द्रियगम्य नहीं है, अहंगम्य है।
नियरे है दीखै नहीं, घिक है ऐसे जिन्द ।
तुलसी या संसार को, भयो मोतिया बिन्द ।।
है सो नजर न आवही, नहीं सो प्रगट दिखाय ।
यह कौतुक तब ही लखै, जब सद्गुरु मिल जाय ।।
बेखुदी का दरिया उमड़ रहा, कब क्या हो जाये ख़ुदा जाने ।
जब डूब गया आलम सारा, कब क्या हो जाये ख़ुदा जाने ।।
झर रही है मस्त बादलों से, मुतवातिर मदमाती बूंदे ।
दिल तड़प रहा था चैन मिला, कब क्या हो जाये ख़ुदा जाने ॥
बाखुदी का जंगल ख़ाक हुआ, ज़ालिम थे जानवर भाग गये ।
मिल गई हुकूमत आज़ादी, कब क्या हो जाये ख़ुदा जाने ।।
मैकदा न जाकर जाम पीया, सिजदा न किया बुतखाने का ।।
फिर भी ये बेहोशी आ टपकी, कब क्या हो जाये ख़ुदा जाने ।।
खुद के घर में आबाद हुआ, दुनियाँ का पर्दाफाश हुआ ।
हो गये अलविदा आँख-कान, कब क्या हो जाये ख़ुदा जाने ।।
'मैं' कौन हूँ, जुर्रत है किसकी, महफिल में जो कर सके बयाँ ॥
ये जुर्म है सरेआम 'मुक्ता' कब क्या हो जाये ख़ुदा जाने ॥
जो पुरुष है, वह पुरुष होते हुए प्रसिद्ध है, प्रकाशनिधि है, प्रगट है और परावरन
है।
'परावरनाथ' परा माने माया, अवर माने संसार (वर माने श्रेष्ठ, अ, माने नई अर्थात् जो श्रेष्ठ न हो, उसको कहते हैं - संसार। अपने आप 'मैं' आत्मा अस्तित्व स पहले देह माना यह है माया, इसके बाद देह मानकर फिर स्त्री, पुरुष। बालक, युट वृद्ध। माता-पिता, भाई-बहिन आदि माना यह मान्यता हुई, यह है संसारा
माया और संसार का जो नाथ है, आधार है 'मैं' आत्मा, वह है परावरनाथ।
'मैं' आत्मा, आधार को खिसका लो, तो न माया रह सकती है और न संसार हूं रह सकता है। ये दोनों किसके आधार पर रहेंगे? टिकेंगे किस पर? इसलिए मैं आत्मा माया और संसार (परा और अवर) दोनों का आधार (नाथ) परावर नार हुआ।
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी ।।
भैया! जीव का स्वभाव होता है कि वह अपनी परछाई दूसरों पर देखता है किसी महात्मा के पास, चार व्यक्ति गये, तब उनमें से एक व्यक्ति ने महात्मा के देखकर, अपने साथियों से कहा- अरे, यह तो चोर है, हमने इसे चोरी करते देखा। और यह यहाँ महात्मापने का ढोंग लगाये बैठा है।
दूसरे ने कहा अरे! यह तो शराबी है, हमने इसे शराब पीते देखा है।
तीसरे ने कहा- अरे, यह तो व्यभिचारी है, हमने इसे वेश्या के कोठे पर देख
चौथे ने कहा- अरे, यह तो जुवाड़ी है, हमने इसे जुवा खेलते देखा है।
महात्मा, प्रत्येक की बात सुनकर कहते गये, हाँ भैय्या! तुम ठीक कहते है इसके बाद वे चारों वहाँ से चल दिये, तब वहाँ पाँचवा व्यक्ति जो पहले से महात्मा पास बैठा था, महात्मा से कहने लगा, भगवन्! आपने सब को, "हाँ भैय्या ठी कहते हो" । ऐसा क्यों कहा?
महात्मा ने कहा भाई! जो जैसा होता है, अन्य को वह वैसा ही देखता औ समझता है।
जीव का स्वभाव है कि अपनी परछाई वह दूसरों पर देखता है, वह दोष रवयं मे रहता है, इसलिए उसे वह दोष दूसरों में दीख पड़ता है।
जो जैसा है, वैसा ही परमात्मा को देखता है। ब्रह्मवादी की दृष्टि में सारा संसार आत्मा है, राम है और जीवनैष्ठिक की दृष्टि में सारा संसार जीव ही जीव दिखता है, देहाभिमानी की दृष्टि में सारा विश्व देहाभिमानी की ही दृष्टि में देखा जाता है। इस को तरह जो जैसा है, उसे सब वैसे ही दिखते हैं।
जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी ।।
चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ ।।
सूर्य और आँख के बीच बादल के आ जाने पर सूर्य दिखाई नहीं देता, जिसे ही अज्ञानी समझता है कि बादल ने सूर्य को ढाँक लिया। कहो, इतने बड़े सूर्य को क्या बादल ढाँक सकता है? नहीं। पर अज्ञानी ऐसा कहता है कि बादल ने सूर्य को ढाँक लिया, वह यह नहीं जानता कि सूर्य और आँख के बीच बादल के आ जाने से सूर्य नहीं दिख रहा है। इसी तरह जो मनुष्य आँख में उंगली लगाकर देखता है उसको चन्द्रमा दो दिखाई देता है, यद्यपि चन्द्रमा दो नहीं, एक ही है।
उमा राम विषइक अस मोहा। नभ तम घूम घूरि जिमि सोहा ।।
(उ माने तप, मा माने मत करो, अर्थात उमा माने अब तपस्या मत करो। उस को दिन से उमा नाम पड़ गया) इस तरह राम में जो दोष दिखाई देता है वह अपना दोष है है। राम तो जैसा है, वैसा ही है। राम के विषय में अज्ञानवश कुछ भी कहना वैसा ही है जैसे आकाश में अंधकार, धुँआ और धूलि है कहना। आकाश तो नित्य, निर्मल और निर्लेप है, ये उन्हें स्पर्श तक नहीं कर सकते।
विषय करन सुर जीव समेता। सकल एक ते एक सचेता ।।
विषय पाँच हैं- शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधा करन माने इन्द्रिय।
शब्द विषय का कर्ण इन्द्रिय है, रूप विषय का चक्षु इन्द्रिय है, रस का जिह्ना, गंध का घ्राण और स्पर्श का त्वचा इन्द्रिय है। इन्द्रियों के जो देवता हैं, उन्हें कहते हैं के सुरजीव।
भैय्या! जीव जगत् बड़ा विशाल है। ब्रह्मा, विष्णु और शंकर को छोड़कर जितने देवता हैं, ये सब जीव ही हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश, ईश्वर कोटि के देवता हैं।
कर्ण इन्द्रिय का देवता दिशा, नेत्र इन्द्रिय का देवता सूर्य, घाण इन्द्रिय का देवता अश्विनीकुमार, मन का देवता चन्द्रमा, बुद्धि का देवता ब्रह्मा, अहंकार का देवता शंकर, चित्त का देवता नारायण, पैर का उपेन्द्र अर्थात् वामन भगवान, भुजा का इन्द्र इत्यादि से सब देवता एक से एक सचेत और बड़े चतुर हैं।
देखो-नेत्र का देवता सूर्य है। शरीर के सब अंगों में ठंड का असर होगा, परन्न आँख को ठण्ड नहीं लगती। कितनी ही बर्फीली जगह में चले जाओ अथवा पूस की कड़ाके की ठण्ड क्यों न हो पर आँख को ठंड नहीं लगेगी, क्योंकि आँख का देवता सूर्य जो है। सूर्य में ठंडक का क्या काम? वाणी का देवता अग्नि है। मुँह में पान भरकर बोलो, क्या बोल सकते हो? नहीं। क्योंकि पानी और अग्नि की दुश्मनी है इसलिए जीभ हमेशा गीली रहती है, कभी सूखती ही नहीं। पैर का उपेन्द्र है। पैर में वामन भगवान निवास करते हैं इसलिए जब कभी भी किसी की पूजा होती है तो पैर की पूजा होती है। सिर की पूजा कोई नहीं करता, क्योंकि पूजा वामन भगवान की होती है। ये सब इन्द्रियाँ एक दूसरे के सेवक हैं। इन सबों में बड़ी एकता है। अपनी- अपनी ड्यूटी सब पूरा करते हैं।
सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई ॥
कान के सुनने और नहीं सुनने, आँख के देखने और नहीं देखने, मन के मन और अमनन, चित्त के चिन्तन और अचिन्तन, बुद्धि के निश्चय और अनिश्चय इन् सबको 'मैं' आत्मा ही जानता हूँ। इनका परम प्रकाशक हूँ, परम ज्ञाता हूँ, इसलिए 'सबकर परम प्रकाशक' 'मैं' आत्मा ही हुआ। बिना बोधवान विद्वान के एक बिना सन्त कृपा के ये बातें समझ में नहीं आती।
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू ।।
प्रकाश्य अर्थात् ज्ञेय। प्रकाशक अर्थात् ज्ञाता। जगत् मेरा दृश्य है और 'मैं' आम इसका दृष्टा हूँ। 'मैं' आत्मा मायाधीश हूँ। माया का ईश अर्थात् माया का आधार है कारण हूँ और ज्ञान तथा गुणों का भण्डार हूँ। 'मैं' आत्मा क्या नहीं जानता?
जासु सत्यता से जड़ माया, भास सत्य इव मोह सहाया ।।
जिसकी सत्यता करके माया जड़ होते हुए भी सत्य-सा भासती है। माया अर्थात मान्यता। माया, किसकी सहायता से सत्य-सा भासती है? "मोह सहाया" अर्थात अज्ञान की सहायता से सत्य-सा भासती है कैसे?
देखो - अंधेरे में जो सर्प दिखा, कौन सर्प दिखा? रस्सी! तब सर्प में जो सत्यत है वह सर्प की है या रज्जू की है?
उत्तर-रज्जू अर्थात् रस्सी की है, क्योंकि रज्जू ही तो है। सर्प न तो अंधेरे में है, न उजाले में। सर्प तो है ही नहीं, असत्य है। सर्प ही माया है, जो है ही नहीं।
उसी प्रकार माया में जो सत्यता है, वह सत्यता माया की है या राम की? राम की है। सत्य इव माने सत्य के समान। भगवान आत्मा में जो माया दिखती है वह सत्य नहीं, सत्य इव अर्थात् सत्य के समान है। रस्सी सर्प के रूप में क्यों दिखी? दिखने का क्या कारण है? अंधकार। इसी तरह भगवान आत्मा के अज्ञान में माया दिखती है? "मोह सहाया"। भगवान आत्मा 'मैं' का जिसको अज्ञान है, उसको ही भगवान माया के रूप में दिखाई देता है। तब भगवान ही माया है। केवल ज्ञान और अज्ञान का ही सवाल है। ज्ञान यही है कि सर्प को रस्सी से भिन्न मत मानो, सर्प को रस्सी ही जानो। ऐसे ही माया को भगवान से भिन्न मत मानो, माया को भगवान ही जानो। जो माया को भगवान से भिन्न मानते हैं, उसे माया चक्कर में डालती है, पेरती है, मरोड़ती है। यही माया में दोष है और जो माया को भगवान ही जानते हैं, उसे माया भगवान का दर्शन कराती है। यही माया का गुण है।
व्यवहारिक जगत् में देखो अगर किसी साहब से मिलना हो तो सहबिन को खुश कर लो, उनसे मिल लो, उनसे मिलने पर यदि वह खुश हो गयी तो साहब के मिलने से खुश होने में क्या देर सब काम बन जाते हैं, तब जगन्नियन्ता अखिल ब्रह्माण्ड के नायक चराचर के स्वामी, जो साहब हैं, उसकी जो सहबिन माया है, उसको खुश कर लो, फिर दर्शन में क्या देर है वह खुद दर्शन करा देगी।
प्रश्न- इस सहबिन को कैसे खुश किया जाय?
उत्तर-अरे, उसको साहब से भिन्न मत मानो, उसको साहब ही जानो, यही उसके खुश करने का तरीका है।
वृन्दावन में जाकर देखो, वहाँ पर जहाँ जाओगे, वहीं सबके सबको जय राधे- जय राधे ही पुकारते पाओगे, उनका कहना है कि राधा के वश में भगवान हैं, इसलिए राधा को जहाँ हमने खुश कर लिया कि भगवान श्रीकृष्ण खुश हुए ही हैं। उनके खुश होने में फिर क्या देर है।
बाबा के दरबार में, बाई कहैं सो होय ।।
भैया! यहाँ तक तो ब्रह्म का निरूपण हुआ, अब इधर जगत् का निरूपण है।
दोहा-
रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानुकर बारि ।
जदपि मृषा तिहुँ काल, सोई भ्रम न सकइ कोउ टारि ।।117।।
जैसे सीप में चांदी का भ्रम, सूर्य की किरणों में मृगतृष्णा के जल का भ्रम, ट्रॅट म पिशाच का भ्रम और रस्सी में सर्प का भ्रम होता है, परन्तु ये सब भ्रम, मिथ्या और असत्य है।
उसी प्रकार -
एहि बिधि, जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई ।।
'मैं' आत्मा के आधार पर जगत प्रपंच, मिथ्या, असत्य और दुःख रूप है। मिथ्या और असत्य में अन्तर है, उत्पन्न होकर जो नाश हो जाये वह है मिथ्या और जो तीनों काल में न हो, बन्ध्या पुत्रवत्, वह असत्य है।
शरीर देश में शरीर मिथ्या है और आत्मदेश में, भगवान देश में, शरीर नाम की कोई चीज ही नहीं है, अतः शरीर असत्य है। संसार या माया, इसी प्रकार 'मैं' आत्म देश में है ही नहीं, जैसे मृगजल में जल नहीं है, सीप में चांदी नहीं है, दूँठ में पिचाश नहीं है और रस्सी में सर्प नहीं है परन्तु -
जदपि असत्य देत दुख अहई ।।
वह नहीं होते हुए भी दुःख का कारण बना है। दुःख दे रहा है इस दुःख का कारण भ्रम है। नहीं होते हुए भी उसे सत्य मान लेना ही दुःख का कारण है।
जौं सपने सिर काटै कोई। बिनु जागे न दूरि दुख होई ।।
जैसे स्वप्न में अपना सिर कटा हुआ दिखा, भला जिसका सिर कट जायेगा, वह अपने कटे हुए सिर को देख सकता है? नहीं, पर दिखा और इस दुःख से वह बहुत व्याकुल है, तो इस दुःख से छुटकारा तो जागने पर ही मिल सकेगा, बिना जागे दुःख का अन्त, किसी प्रकार भी नहीं हो सकता। इसी प्रकार 'मैं' स्वस्वरूप भगवान आत्मा में बिना जागे इस भ्रम का निवारण नहीं हो सकता और जब तक यह भ्रम हटेगा नहीं तब तक इस महान विपत्ति से छुटकारा नहीं मिल सकता।
सन्त तुलसीदास जी विनय में कहते हैं -
हे हरि! यह भ्रम की अधिकाई ।
देखत, सुनत, कहत, समुझत, संसय-संदेह न जाई ।।
हे हरि! यह भ्रम की अधिकता है कि देखने, सुनने, कहने और समझने पर भी, न तो संशय ही जाता है और न सन्देह ही दूर होता है।
संशय, यह कि असत्य जगत् को सत्य मानना और सन्देह यह कि एक परमात्मा की ही अखण्ड सत्ता है या कुछ और भी है।
जो जग मृषा, ताप त्रय अनुभव, होइ कहहु केहि लेखे ।
कहि न जाय, मृगबारि सत्य, भ्रम ते दुख होइ बिसेखे ||2||
कोई कहे कि संसार असत्य है तो संसार के ताप भी असत्य हैं, परन्तु तापों का अनुभव तो सत्य प्रतीत होता है?
तो भैय्या! इसका उत्तर यह है कि मृगतृष्णा का जल सत्य नहीं है, परन्तु जब तक भ्रम है, तब तक वह सत्य ही दिखता है और उसी भ्रम के कारण अज्ञानी मृगों को विशेष दुःख होता है। इसी प्रकार जगत् में भी भ्रमवश दुःखों का अनुभव होता है।
सुभग, सेज, सोवत सपने, बारिधि बूड़त भय लागै ।
कोटिहुँ नाव न पार पाव सो, जब लगि आपु न जागै ।।३।।
जैसे, कोई सुन्दर सेज पर सोया हुआ मनुष्य सपने में समुद्र में डूबने से भयभीत हो रहा हो, पर जब तक वह स्वयं जाग नहीं जाता, तब तक करोड़ों नौकाओं द्वारा भी वह पार नहीं जा सकता। उसी प्रकार यह जीव, अज्ञान निद्रा में अचेत हुआ, संसार सागर में डूब रहा है तो वह स्वस्वरूप भगवान आत्मा में बिना जागे, सहस्त्रों साधनों द्वारा भी दुःखों से मुक्त नहीं हो सकता।
अनबिचार रमनीय सदा, संसार, भयंकर भारी ।
सम संतोष, दया बिवेक तें, व्यवहारी सुखकारी ।।4।।
यह अत्यन्त भयानक संसार अनविचार से ही पैदा हुआ, अज्ञान के कारण ही मनोरम दिखाई देता है, यह उनके लिए ही सुखकारी है, जिनने अपने स्वरूप भगवान आत्मा को जान लिया है। संसार अनविचार से किस तरह पैदा होता है, इस पर एक दृष्टान्त सुनो - -
एक भागवती पण्डित किसी दूसरे गाँव को भागवत की कथा कहने गया। उसने निस्तार के लिए अपने साथ दो लोटा रख लिया। मार्ग में उसे एक नदी मिली। उसने सोचा कि यहाँ स्नान कर लें, फिर आगे बढ़ें। नदी में स्नान करते समय पंडित जी ने सोचा कि वहाँ दो-दो लोटा ले जाकर क्या करूँगा, मुझे साथ में एक लोटा लेकर चलना था। अरे! जहाँ जाऊँगा, लोग वहाँ लोटे का प्रबंध तो कर ही देंगे। मुझे अपने साथ एक ही लोटा रख लेना पर्याप्त है। दो-दो लोटा रखने में चोरी हो जाने का भी भय है। ऐसा सोचकर उसने एक ही लोटा ले चलने का निश्चय किया। पण्डितजी ने नही में स्नान किया और एक लोटा को वहीं नदी की रेत में गड्ढा बनाकर छिपा दिया। उसने सोचा कि लौटते वक्त तो इसी मार्ग से ही लौटना है, उस समय लोटा निकाल कर लेता जाऊँगा। लोटे को छिपाने के स्थान को भूल न जाऊँ इस विचार से पहचान के लिए उसने वहीं रेत का मीनार बना दिया और वहाँ से चल दिया। वहाँ से कुछ ही दूरी पर नदी में जो लोग स्नान कर रहे थे, उन लोगों ने पण्डितजी को लोटा गड़ाते तला नहीं देखा, परन्तु मीनार बनाते हुए देख लिया। लोगों ने सोचा कि आज कोई न कोई महान् पर्व है, इस पर्व में स्नान करने के बाद रेत में मीनार बनाने का महत्व है, तभी तो पण्डितजी महाराज ने स्नान करके मीनार बनाया है। बस, फिर क्या था सब लोग स्नान कर करके रेत में मीनार बनाते गये और अपने-अपने घर की ओर रवाना हुए। इस तरह नदी में वहाँ पर लोगों के द्वारा सैकड़ों मीनारें बन गयी।
जब पण्डित जी महाराज कथा समाप्त करके वापस लौटे, तब अपना लोटा निकाल लेने के लिए वे नदी में गये। वहाँ पहुँचकर पण्डितजी ने देखा कि नदी के रेत में सैकड़ों मीनारें बनी हुई हैं। इन मीनारों में पण्डितजी की बनायी हुई मीनार खो गयी। वे अचम्भे में पड़ गये और यह निश्चय नहीं कर सके कि इन मीनारों में उनकी बनाई हुई मीनार कौन-सी है? उन्होंने घंटे भर तक पच्चीस-तीस मीनारों में अपना लोटा ढूँढा, परन्तु उन्हें लोटा न मिला। लाचार हो, उदास चित्त अपने गाँव को चल दिये।
भाई! देखो-संसार, हानि-लाभ और बिना अर्थ को समझे औरों की देखा-देखी ही करता है। बिना अर्थ किये, मीनारों का संसार बस गया। इस संसार की रचना, अनविचार से ही हुई। संसार, अनविचार से ही पैदा होता है।
तुलसिदास, सब बिधि, प्रपंच जग, जदपि झूठ, श्रुति गावै ।
रघुपति भगति, सन्त संगति बिनु, को भव त्रास नसावै ।।
(विनय पत्रिका 121)
मानसकार कहते हैं कि वेद कह रहे हैं, यद्यपि सांसारिक प्रपंच सब प्रकार के असत्य हैं, किन्तु रघुनाथजी की भक्ति और सन्तों की संगति के बिना इस संसार के भीषण भय का नाश नहीं हो सकता और न इस भ्रम का ही निवारण हो सकता है।
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई, गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई ।।
'मैं' आत्मा को ही मैंने माया, संसार मान लिया है, यह जब तक न जाना जायेगा, तब तक दुःख है। 'मैं' आत्मा की ही कृपा से 'मैं' का ज्ञान होता है, इस 'मैं' को जानो, फिर माया और संसार नहीं और जब माया और संसार नहीं रहा, तब उससे उत्पन्न हुआ दुःख नहीं। जिस भगवान आत्मा 'मैं' की कृपा से, इस भ्रम का निवारण होता है,
गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई ।।
प्रश्न होता है, यह कैसा है -
आदि अन्त कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा ।।
वह आदि, अन्त और मध्य से रहित है।
वेद, शास्त्र, श्रुति आदि भी जिसको नहीं जान सके, उन्होंने केवल अपना- अपना अनुमान ही बताया।
उसकी महिमा इस प्रकार है -
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी ।।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घान बिनु बास असेषा ।
असि सब भाँति, अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ।।
दोहा-
जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि घरहिं मुनि ध्यान ।
सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान ।।118।।
राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी ।।
हे पार्वती वही परमात्मा श्री रामचन्द्र जी हैं। उसमें किसी भी प्रकार का भ्रम का होना अनिष्टकारक है।
अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं ।।
इसमें भ्रम जहाँ हुआ कि मनुष्य के ज्ञान, वैराग्य आदि सभी गुण नष्ट हो जाते हैं।
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटिगै सब कुतरक कै रचना ।।
भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती । दारुन असंभावना बीती ।।
भगवान शंकर के इन भ्रम नाशक वचनों को सुनकर, माताजी के सब संशय ना हो गये। उनके मन में जो असम्भावना थी कि -
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि ।।
दशरथ सुत राम, कभी ब्रह्म हो ही नहीं सकते यह जाता रहा और भगवत चरणे में उनकी दृढ़ निष्ठा हो गयी।
बस, यहीं पर शंकर-गीता का उपसंहार है।
रामु अमित गुन सागर, थाह कि पावइ कोइ ।
संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ, तुम्हहिं सुनायउँ सोइ ॥
॥ॐ श्री सदगुरु देवाय नमः ।।
श्री रामचन्द्राय नमः
श्री गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस
बालकाण्डान्तर्गत
मूकं करोति वाचालं पंगु लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपातमहं बंदे परमानंद माधवम् ।।
चौपाई -
बंदउँ राम नाम रघुबर को । हेतु कृसानु भानु हिमकर को ।
बिधि हरिहर मय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान से ।।
मैं श्री रघुनाथजी के राम नाम की वंदना करता हूँ कि जो कृशानु (अग्नि) भानु (सूर्य) और हिमकर (चंद्रमा) का कारण है तथा उनका शक्तिदाता है। राम के प्रताप से ही ये तीनों तेजस्वी, प्रकाशवान व ज्योतिर्मान हुए हैं। राम नाम के एक-एक अक्षर से ये तीनों शक्ति प्राप्त किये हैं। यदि कृषानु में से 'र', भानु में से 'अ' और हिमकर में से 'म' निकाल लिया जाये तो तीनों ‘र+ आ + म ‘अर्थात् राम निकल जाने से वे शक्तिहीन और निरर्थक हो जाते हैं। कृशानु में से 'र' निकल जाने से कशानु रह जाता है, जो अग्नि का द्योतक न होने से उष्णताहीन और जलाने की शक्ति से रहित है। भानु में से 'अ' निकल जाने से सिर्फ भनु रह जाता है, जो सूर्य का प्रतीक न होने से प्रकाश देने की शक्ति से रहित हो जाता है। उसी प्रकार हिमकर में से 'म' के निकल जाने पर केवल हिकर रह जाता है, जो चंद्रमा का प्रतीक न होने के कारण शीतलता व शांति प्रदान नहीं कर सकता। इस तरह राम अग्नि, सूर्य और चंद्रमा का कारण है, प्राण है, बीज है।
'तत्त्वमसि' सामवेद का महावाक्य है जो जीव व ब्रह्म की एकता का समर्थक है। तत् त्वम् का अर्थ है-वह तू है। तत् पदवाची रा और त्वम् पदवाची म् का संयोग होने से असि पदवाची राम हो जाता है। असि माने 'है' होता है। इस तरह वह 'है' ही है जो राम है। 'है' अर्थात् अस्तित्व, वही 'है', वही राम, अग्नि, सूर्य व चंद्रमा का कारण है, बीज रूप है। वह प्रणव यानी ऊँ (ओंकार) का भी बीज है।
राम नाम के तीनों अक्षर र अ म क्रमशः कृशानु, भानु और हिमकर के बीजाक्षर हैं, र अग्नि बीज है, अ भानुबीज और म चंद्रबीज है। जैसे अग्नि शुभाशुभ वस्तुओं को जलाकर भस्म कर देता है और कुछ वस्तुओं का मल और दोष जलाकर उनको स शुद्ध कर देता है, वैसे ही 'र' के उच्चारण से मनुष्यों के शुभाशुभ कर्मनाश हो जाते हैं और मन का विषयवासना रूपी मल जलकर भस्म हो जाता है। भानुबीज 'अ' वेदशास्त्रों के प्रकाशक है। जैसे सूर्य अंधकार को दूर करके संसार को प्रकाश देता है, वैसे ही 'अ' से अज्ञानरूपी अंधकार का नाश होकर ज्ञान का प्रकाश होता है। चंद्रबीज में 'म' अमृत से परिपूर्ण है। जैसे चंद्रमा ताप को हरता है और शीतलता प्रदान करता है, वैसे ही 'म' से हृदय में भक्ति का उदय होता है जो त्रिताप को हरता है तथा शीतलता और शांति प्रदान करता है। सारांश, राम नाम के स्मरण से वैराग्य, ज्ञान और भक्ति की प्राप्ति होती है। सब शुभाशुभ कर्मों तथा अनंत जन्मों के पापों का नाश होता है, हृदय का अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट होकर ज्ञान का प्रकाश होता है और तीनों तापों का नाश होकर परम शांति प्राप्त होती है।
दूसरा भाव यह है कि जगत् प्रसिद्ध तीन राम हुए हैं- परशुराम, राम और बलरामा अग्निवंश में परशुराम, सूर्यवंश में राम और चंद्रवंश में बलराम। यदि इन वंशों में से राम निकाल दिये जायें तो ये वंश भी अन्य वंशों की भाँति ख्यातिहीन हो जायेंगे और विस्मृति के गर्त में डूब जायेंगे।
बिधि हरिहर मय वेदप्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो ।।
यह राम नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूप है तथा वेदों का प्राण ऊँ (ओंकार) है। फिर भी वह गुणों से रहित व अनुपमेय होने के साथ-साथ गुणों का भण्डार है।
यह राम नाम कैसा है? यह 'र' यानि रकार से विधिरूप अर्थात् ब्रह्मारूप है, 'अ' यानि आकार से हरिमय अर्थात् विष्णु रूप है और म यानि मकार से हरमय अर्थात् शंकर रूप है। इस तरह राम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। तात्पर्य, भगवान राम देवों के देव और वेदों के प्राण ऊँ (ओंकार) हैं। ओंकार के अउम में 'अ' हरिवाचक, 'उ' विधि वाचक और 'म' हरवाचक है। इस तरह ऊँ (ओंकार) भी विधि-हरि-हर मय है। फिर यह राम का नाम तीनों गुणों से यानि सत्, रज, तम से परे है। तीनों गुणों से रचा हुआ जो यह जगत् प्रपंच है, उससे राम अलिप्त है, क्योंकि वह (राम) निराकार है, निर्विकार व असंग है। फिर राम एक है, सत् चित् आनंद है और मन, वाणी, बुद्धि से परे है। मन वाणी से परे होने के कारण भगवान राम अनिवर्चनीय है, इसलिए उसकी उपमा किसी से नहीं की जा सकती। वह सर्वथा अनुपमेय है। तीनों गुणों से रहित होते हुए भी भगवाम राम के नाम का जप व स्मरण सब सिद्धियों का दाता है। इस तरह राम का नाम सब गुणों का भण्डार है। संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो राम नाम के प्रताप से प्राप्त न हो सके।
राम यह वेदों का प्राण है, क्योंकि वेद का मूल जो ओंकार है, वह राम नाम से ही निकला है। यथा -
स्वांसा में सोहम् हुआ, सोहम् में ओंकार ।
ओंकार से रर्रा हुआ, साधो करो विचार ।।
ऊँ (ओम) शब्द आत्मा का बोधक है। ओंकार का अ उ म और मात्रा अनुस्वार अस्तित्व का रूप राम का द्योतक है। यह अस्तित्व रूप राम अर्द्धमात्रा रूप से नित्य स्थित है और उसका कभी नाश नहीं होता। उसे चाहे शक्ति कहो, चाहे शक्ति का आधार कहो, आत्मा कहो, चाहे राम कहो, चाहे जो कहो सब एक ही है। वह अर्द्धमात्रा वाणी से परे है और वही ओंकार है, जो राम नाम से निकला है।
महामंत्र जेई जपत महेसू । कासी मुकुति हेतु उपदेसू ।।
भगवान राम का नाम महामंत्र है, जो सब मंत्रों में श्रेष्ठ है और जिसे शंकर जी हमेशा जपते रहते हैं। शंकर जी द्वारा उस महामंत्र का उपदेश काशी में मरने वाले लोगों के लिए उनके मुक्ति का कारण होता है।
काशी का अर्थ है-"काशः ब्रह्मप्रकाशः यस्यां अवस्थायां सा काशी।" अर्थात् जिस अवस्था में ब्रह्म का प्रकाश हो यानि आत्म अनुभव हो, उसे कहते हैं काशी। भाव यह है कि राम नाम के माध्यम से शंकर जी काशी में निवास करने वाले लोगों को आत्मतत्त्व का उपदेश करते हैं और जब उन लोगों को आत्म अनुभव हो जाता है, तब स्वरूप में विभोर रहने वाले प्राणी जीते जी मर कर मुक्त हो जाते हैं। जीव भाव का अभाव होना और आत्म भाव का जागृत होना ही जीते जी मरना है। आत्म भाव के प्राप्त होने पर जीव आवागमन के चक्र से छुटकारा पा जाता है और यही उसका काशी में मुक्ति है।
महिमा जासु जान गनराऊ । प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ ॥
उस राम नाम की महिमा को गणों के अधिपति गणेशजी भली भाँति जानते थे और इसीलिए उस राम नाम के प्रभाव से वे अग्रपूज्य हो गये और सब मांगलिक कार्यों में सब देवों की अपेक्षा उनकी पूजा सर्वप्रथम होने लगी।
'गणराऊ' का अर्थ होता है गणों का राजा, गणों का पति, गणों का ईश अर्थात गणपति या गणेश। 'गण' शब्द समूह का वाचक है। समूहों के रक्षक, समूहों के पालन करने वाले परमात्मा को गणपति कहते हैं। सम्पूर्ण दृश्य मात्र का जो अधिष्ठान है, इंद्रिय गणों का जो संचालक है, वही गणपति है। इस प्रकार अस्तित्व रूप, सर्वाधार सर्वव्यापक, देवाधिदेव, परात्पर ब्रह्म भगवान आत्मा राम ही गणेश या गणपति है। शिव-पार्वती-पुत्र गणेशजी उन गणाधिपति देवाधिदेव सनातन ब्रह्म भगवान राम के प्रतीक हैं और चूँकि वे राम की महिमा को जानते थे, इसलिए उनके माध्यम से ऊ अनादिदेव भगवान राम का पूजन सर्वमंगल कार्यों के आरम्भ में सर्वप्रथम किया जाता है।
एक बार देवों में विवाद खड़ा हो गया कि सब में अग्रगण्य या अग्रपूज्य कौन है? ब्रह्माजी की सभा में सर्वसम्मति से यह तय हुआ कि पृथ्वी की पूर्ण परिक्रमा करने जो सर्वप्रथम आयेगा, वही सब में अग्रपूज्य होगा। सब देवतागण अपने-अपने शीघ्रगामी वाहनों पर चढ़कर दौड़ चले। गणेशजी का वाहन मूषक धीमी गति वाला था और इसीलिए वे सबसे पीछे रह गये। रास्ते में उनको नारद जी मिले। नारद जी के उपदेश पर उनको राम की महिमा का ज्ञान हुआ और वे राम का नाम पृथ्वी पर लिखकर उसकी प्रदक्षिणा कर सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास पहुँच गये और इस कारण वे सबसे अग्रपूज्य बनाये गये। यह है राम के नाम की महिमा और गणेशजी के अग्रपूज्य होने का रहस्य।
श्रीगणेशजी के अग्रपूज्य होने का एक और महत्वपूर्ण कारण है। उनके श्री विग्रह का एक मुख्य भाग यानि मुख गजमुख है जो एकाक्षर परब्रह्म रूप ओंकार (ॐ) का ही प्रतीक है। उनके सूंड सहित गज-आनन को देखकर (ॐ) ओंकार का स्पष्ट रूप से आभास मिलता है। ओंकार सृष्टि का आदिबीज और अव्यक्त परब्रह्म का व्यक्त स्वरूप है। ओंकार और परब्रह्म का वाच्य-वाचक सम्बन्ध है। श्रीगणेशजी परन मंगल स्वरूप सर्वाधार आदिदेव ओंकार परब्रह्म ही हैं। वे श्रीराम रूप ही हैं। अतः उनका सर्वाग्र पूज्य होना उचित एवं स्वभाविक है और उनके विशिष्ट अधिकार का मूल कारण है।
जान आदि कवि नाम प्रतापू। भयउ सिद्ध करि उल्टा जापू ।।
भगवान राम के नाम के महत्व को ऋषि प्रवर आदि कवि वाल्मीकि जी जान गय क्योंकि उस नाम के उल्टा जाप से भी वे सिद्धता को प्राप्त हो गये।
वाल्मीकि जी राम नाम का जप निरंतर, अटूट गति से करते थे। जप अटूट होने से राम का उच्चारण रा मरा मरा मरा मरा मरा म होने लगा। वे जप में इतने तन्मय हो गये कि उन्हें किसी बात की सुधि नहीं रही। उनकी मनोवृत्ति सांसारिक विषयों से उलट कर आत्मिक या ब्रह्ममय हो गयी। ऋषिराज ने नाम का जप साधारण जीभ से न कर छोटी जीभ से, जो कंठ के भीतर रहती है और जिसको कौआ या अंतर्जीभी कहते हैं, किया। फलस्वरूप उनकी वृत्ति संसार से उलटकर तत्काल अंतर्मुखी हो गयी और वे निर्विकल्प अवस्था को प्राप्त हो गये। वे जप में या तपस्या में इतने लवलीन हो गये कि उन्हें तन-वदन की सुधि नहीं रही और उनके शरीर पर वल्मीक जम गयी। उनकी दृष्टि में संसार रह ही नहीं गया। उनके लिए सर्वत्र केवल आत्मा- राम ही था, राम के अतिरिक्त कहीं कुछ था ही नहीं। इस प्रकार वृत्ति को उलटकर जप करके वाल्मीकि जी सिद्ध हो गये तथा भूत भविष्य का ज्ञान, उनके लिए हस्तामलक वत् हो गया और उन्होंने रामायण के रचनाकर आदि कवि होने का यशोपार्जन किया।
सहसनाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी ।।
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को ।।
नाम प्रभाउ जान सिव नीको । कालकूट फल दीन्ह अमी को ।।
भगवान राम का नाम एक बार लेना विष्णु के सहस्त्र बार नाम जपने के बराबर है-ऐसा शिवजी का वचन सुनकर पार्वती जी राम नाम जपकर महादेवजी के साथ भोजन करने बैठी। राम नाम के प्रति पार्वतीजी की प्रीति, निष्ठा व विश्वास तथा अपने वचनों पर उनकी अटूट श्रद्धा देखकर शिवजी ने उन्हें पतिव्रता स्त्रियों में शिरोमणि कर दिया और अपने अंग का भी भूषण अर्थात् अर्धांगिनी बना दिया। राम नाम की महिमा को स्वयं शंकर जी अच्छी तरह से जानते हैं और उसी के प्रभाव से हलाहल भी उन्हें अमृत का सा फल दिया।
अब यहाँ प्रश्न होता है कि विष क्योंकर अमृत तुल्य हुआ ? भगवान शिव निरंतर श्रीराम नाम का जप करते रहते हैं। जप में वे इतने तल्लीन रहते हैं कि उन्हें भगवान राम के अतिरिक्त कुछ दूसरा दिखता ही नहीं। वे सर्वदा निर्विकल्पावस्था में अर्थात् स्वरूपस्थ रहते हैं। उनकी दृष्टि में न तो संसार है और न प्रपंच जनित कोई अन्य पदार्थ। उनकी दृष्टि में न तो विष है और न अमृत। उनकी धारणा में सब कुछ राम है। अतः, जो पदार्थ संसार वालों की नजर में यानि जीववादियों की दृष्टि में विष था, वह शंकर जी की दृष्टि में राम था, राम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। राम अपना आप अपना स्वरूप है। अपना स्वरूप यानि स्व-स्वरूप किसी को भी अहितकारी न होता। वह सर्वदा सर्वरूपेण हितकारी या कल्याणकारी होता है। अतः, शंकरजी क हलाहल विष भी अमृत तुल्य फल दिया।
दोहा -
बरषा रितु रघुपति भगति, तुलसी सालि सुदास ।
राम नाम बर बरन जुग, सावन भादव मास ।। 18।।
तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री रघुनाथ जी की भक्ति तो वर्षा ऋतु है, श्रो भक्तजन धान की फसल हैं और राम के नाम के दोनों सुंदर अक्षर रा और म श्रावा और भादों महीनें हैं।
जिस तरह श्रावण और भादों के महीनों में अच्छी वर्षा होने से धान की फसल के बाढ़ अच्छी होती है, उसी तरह राम नाम के दोनों अक्षरों को अच्छी तरह से हृदयः धारण करने से यानि उनके निरंतर जप से भक्तों के हृदय में भक्ति की वृद्धि होती और उनका सब प्रकार से कल्याण होता है। वे कृतकृत्य हो जाते हैं।
आखर मधुर मनोहर दोऊ । बरन बिलोचन जन जिय जोऊ ।
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू ।।
राम नाम के दोनों अक्षर 'र' और 'म' मधुर और मन के हरने वाले हैं, सब वणणे के नेत्र हैं अर्थात् सब अक्षरों के ऊपर शोभायमान होते हैं तथा भक्तजनों के जीवन और उनके हृदय को आलोकित करते हैं। उनका स्मरण सब कोई सरलतापूर्वक क सकते हैं, जो सबके लिए सुखदायक है और सब वस्तुओं के देने वाले हैं। उनका ज इस लोक में तो लाभकारक है ही, परलोक को भी सुधारने वाला है अर्थात् मोक्ष क सुलभ कर देता है।
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके । राम लखन सम पिय तुलसी के ।
बरनत बरण प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज संघाती ॥
ये दोनों अक्षर 'र' और 'म' कहने के लिए, सुनने में तथा जप करने के लि अति उत्तम हैं। राम शब्द का 'रा' राम-वाचक है और 'म' लक्ष्मण वाचक है। इसलि तुलसीदास के लिए राम और लक्ष्मण के समान प्यारे हैं। इन दोनों अक्षरों को पृथक पृथक वर्ण का मानकर वर्णन करने में दोनों का अलग-अलग संबंध प्रतीत होता परन्तु, यथार्थ में ये दोनों ब्रह्म और जीव के सदृश एक हैं, अभिन्न हैं।
सरसरी तौर से ऊपर देखने पर 'र' और 'म' अलग-अलग वर्ण के प्रतीत होते हैं। 'र' य वर्ग और 'म' प वर्ग का है। 'र' मूर्द्ध संबंधी है और 'म' औष्ठ संबंधी। 'र' वैराग्यवाची है और म भक्तिवाची है। पुनः इनके वर्णन में न संग है और न प्रीति है। परन्तु, अर्थ में और लक्ष्य में संग और प्रीति दोनों है, क्योंकि 'रकार' ब्रह्म वाचक है और 'मकार' जीव वाचक है। जिस प्रकार ब्रह्म और जीव अलग-अलग न होकर एक ही हैं, उसी प्रकार 'र' और 'म' भिन्न-भिन्न न होकर एक भगवान राम को ही इंगित करते हैं।
जीव और ब्रह्म दोनों एक हैं, अभिन्न हैं। सनातन ब्रह्म भगवान राम सत्य हैं, अखण्ड और अद्वैत हैं। एक या अद्वैत वह है, जिससे भिन्न कोई दूसरा नहीं। एक वह है, जो सबका आधार है और जिसके बिना किसी अन्य की सिद्धि नहीं। भेद एक से अधिक में अर्थात् दो या दो से अधिक में होता है, एक में नहीं। इसलिए ब्रह्म (ईश्वर) में कोई भेद नहीं, वह अभेद रूप है। ब्रह्मा से आदि लेकर एक कण पर्यन्त सब ब्रह्म हैं, ब्रह्म से अभिन्न है। सारा चराचर ही ब्रह्म या ईश्वर है। फिर जीव, ब्रह्म से कैसे भिन्न होगा? इसलिए जीव भी ब्रह्म है। जीव व ब्रह्म में कोई भेद नहीं, दोनों एक हैं, अभिन्न हैं। जो जीव है वही ब्रह्म है और जो ब्रह्म है वही जीव है। दोनों में स्वाभाविक एकता या अभिन्नता है।
नर नारायन सरिस सुभ्राता । जग पालक बिसेषि जनत्राता ।
भगति सुतिय कल करन बिभूषण । जगहित हेतु बिमल बिधु पूषन ।।
ये दोनों अक्षर 'र' और 'म' नर व नारायण के समान प्रेमी भाई के सदृश हैं। ये संसार के पालन करने वाले हैं तथा भक्तजनों के विशेष रूप से रक्षक हैं। फिर ये दोनों अक्षर भक्ति रूपी सौभाग्यवती सुन्दर कामिनी के कानों के आभूषण हैं तथा संसार के कल्याण के मूल कारण व निर्मल पूर्ण चन्द्रमा के समान पोषक और शांतिदायक हैं।
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के । कमठ सेष सम धर बसुधा के ।
जन मन मंजु कंज मधुकर से । जीह जसोमति हरि हलधर से ।।
फिर, ये दोनों अक्षर सद्गति के देने वाले और अमृत के समान संतोषप्रद तथा अमरता प्रदान करने वाले हैं। ये कच्छप (कछुवा) तथा शेषनाग के समान पृथ्वी को धारण करने वाले हैं। फिर ये संतजनों के मन रूपी सुन्दर कमलों के लिए भौरों के समान हैं और जिह्वा रूपी यशोदा को श्रीकृष्ण व बलराम के समान प्रिय हैं।
जिस प्रकार अमृत अपनी अमरता प्रदान करने वाले गुण के कारण सर्वप्रिय अपनी संतोषदायक व आनंददायक स्वाद के लिए प्रशंसनीय है, उसी प्रकार ' और 'म' ये दोनों अक्षर सब जीवों के अत्यंत प्रिय, आनंद के दाता और सद्गति वरदाता हैं। जिस प्रकार पृथ्वी कच्छप और शेषनाग पर आधारित है, उसी तरह या समस्त जग प्रपंच रा + म अर्थात् राम पर आधारित है। राम ही समस्त चराचर क आधार है और उसका मूल कारण है। जिस प्रकार रस के लोभी भौरे कमल के सुन्दा फूलों पर गुंजारते व मंडराते रहते हैं, उसी तरह T + 7 भक्तों के निर्मल मन रूप कमलों में सदा रमण करते हैं। जिस प्रकार यशोदा मैया को कृष्णचन्द्र जी औ बलराम जी अत्यंत प्रिय थे और वे उनका नाम सदा ही लिया करती थी, उसी तरु 'रा' और 'म' यशोदारूपी जिह्वा के अत्यंत प्रिय हैं और उसके जरिये सदा जपे जार हैं। जिस प्रकार एक बालक के बिना घर की शोभा नहीं, उसी तरह मुख रूपी घरः जिह्वा रूपी माता की गोद में 'रा' और 'म' रूपी बालक न हो, तो मुख रूपी घर के शोभा नहीं। जैसे, यशोदा मैया को श्रीकृष्ण और बलराम प्रिय थे, वैसे ही भक्तों की जिह्वा को ये दोनों अक्षर अत्यंत प्रिय हैं। यशोदा जी जैसे सदा उनके लालन-पाल में लगी रहती थी, वैसे ही भक्त जापक जन इन अक्षरों को सदा ध्यान में रखते हैं औ स्मरण करते हैं ।।
एक छत्रु एकु मुकुटमनि, सब बरननि पर जोउ ।
तुलसी रघुबर नाम के, बरन बिराजत दोउ ।।
तुलसीदास जी कहते हैं कि राम नाम के दो अक्षरों में से रकार सब अक्षरों के ऊपर छत्र के समान और मकार मुकुट में मणि के समान अर्थात् बिन्दु के रूपः शोभित होते हैं। क्षत्र और मणि जडित मुकुट जिसके सिर पर होता है, वह राज कहलाता है। उसी तरह जो भक्त इन दोनों वर्णों को अपने हृदय के अन्दर धारण करते हैं, वे भक्त शिरोमणि कहलाते हैं। वे जीवों की श्रेणी में न होकर राम (ब्रह्म) है हो जाते हैं। स्वरहीन होने से 'र' और 'म' सब वर्णों के ऊपर विराजते हैं। वैसे ही ज इनका अर्थात्, राम का अवलम्बन लेते हैं, वे भी (स्वरहीन) श्वाँस रहित होकर यान निर्विकल्पता को प्राप्त कर सद्गति पाते हैं।
समुझत सरिस नाम अरु नामी, प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी ।।
नाम रूप दुई ईस उपाधी । अकथ अनादि सु सामुझि साधी ।।
समझने में नाम और नामी (नामधारी) एक समान हैं और उनका पारस्परिक प्रेम तथा संबंध स्वामी और सेवक के सदृश है। नाम और रूप दोनों ईश्वर की उपाधि अर्थात् माया हैं और इसीलिए अधिष्ठान आत्मा के सदृश अकथ और अनादि हैं तथा निर्मल व स्थिर बुद्धि से समझने व साधने योग्य है।
नाम और नामी (नाम वाला) अलग-अलग नहीं हो सकते, दोनो एक ही हैं। जिस प्रकार पुरुष से प्रकृति भिन्न नहीं, स्वभावी से स्वभाव भिन्न नहीं, उसी प्रकार नामी से नाम भिन्न नहीं, दोनों एक ही हैं। अध्यस्थ अधिष्ठान के अनुरूप रहता है, वैसे ही नाम नामी के अनुरूप होता है। जो गुण नामी में होते हैं, वे ही गुण नाम में भी होते हैं। भगवान में अनन्त गुण हैं और वे सभी गुण उनके नाम में भी हैं। नाम बीज है। बीज में कितना बड़ा वृक्ष समाया रहता है, वह बाद में तब दीखता है जब उस बीज से पेड़ तैयार होता है। जिस प्रकार बीज के अंदर सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में पिंड़, डालियाँ, पत्ते, फूल, फल आदि विद्यमान रहते हैं। उसी प्रकार नाम में भी भगवान के समस्त गुण विद्यमान रहते हैं। नाम नामी से अभिन्न है। नाम ही भगवान है और भगवान ही नाम है।
उपाधि कहते हैं उपनाम को, जो किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को ढाँकता है। जिसको जो ढाँके वही उसकी उपाधि है। जिस प्रकार उपाधि व्यक्तित्व को ढाँकती है, उसी प्रकार नाम और रूप भगवान के भगवानपने को ढाँकते हैं, इसलिए ये भगवान की उपाधि हैं, भगवान की माया हैं। भगवान की उपाधि है माया और भगवान है 'मैं' आत्मा। अपने आप में आत्मा को कुछ मान लेने से 'मैं' आत्मा उस मान्यता रूपी झाड़ी में छिप जाता है। यही भगवान के भगवान पने का ढक्कन है। मान्यता का त्याग यानि आत्म-ज्ञान की प्राप्ति, स्वरूप का बोध, मायापति भगवान आत्मा 'राम' का ज्ञान, यही मान्यता रूपी ढक्कन का उधरना है और माया का साधना है। माया का आधार मायापति को पहिचानना ही माया का समझना है तथा माया से तरना है।
प्रत्येक वस्तु में अस्ति, 'भाँति' प्रिय नाम और रूप से पाँच अंश विद्यमान रहते हैं। अस्ति माने हैं अस्तित्व अर्थात् सत्। भाति माने भासता है अर्थात् जो चेतन है, चित् है। प्रिय माने आनंद, आनन्ददायक, आनंदस्वरूप। अस्ति भाँति और प्रिय ये तीन भगवान आत्मा के बोधक हैं और नाम तथा रूप माया के द्योतक हैं। उदाहरण के लिए डंडा लीजिये। डंडा का अस्तित्व लकड़ी है, डंडा में जो भासता है वह लकड़ी है और डंडा में जो प्रियता है वह लकड़ी की है। उसी तरह शरीर को लीजिये। शरीर का जो अस्तित्व है यानि 'है' पना है, वह पंचमहाभूतों का है और पंच महाभूत सब भगवान आत्मा पर आधारित है। देह का जो भातिपना है वह चेतन का है यानि ' आत्मा का है। देह की जो प्रियता है, उसमें जो आनंद है, वह आनंद-स्वरूप 'b आत्मा का है। इसलिए शरीर नाम की कोई वस्तु ही नहीं है, जो कुछ शरीर रूप दिखाई दे रहा है, वह 'मैं' आत्मा ही है। 'मैं शरीर हैं' - ऐसा जो कहा जाता है, वह शरीर को मान कर कहा जाता है, जानकर नहीं। यदि शरीर को जानने (जाँचने चलो, तो देह मिलता ही नहीं। जो मिलता है वह है भगवान आत्मा 'मैं'। अर्थात् सर कुछ एक कण से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त समस्त चराचर भगवान आत्मा राम है। भगवान आत्मा राम के अतिरिक्त कहीं कुछ है ही नहीं।
जगत् प्रपंच के अंदर जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है वह सब मान्यता है। वह मुड़ आत्मा को कुछ मानने पर ही दिखाई देता है और उसकी पहिचान के लिए उसक कुछ न कुछ नाम और रूप रहता है। अतः नाम और रूप विकल्प हैं, मान्यता है माया है यदि अस्ति भाँति प्रिय न हो तो नाम और रूप का आधार कौन होगा अस्ति, भाति, प्रिय ही नाम रूप का आधार है। अस्ति अर्थात् अस्तित्व ही भासता है और अस्तित्व ही प्रिय है। अस्ति यानि जो 'है' है, वह सत् है वही भासता है औ इसलिए वह चेतन है। चूँकि वह प्रिय है, इसलिए वह आनंदस्वरूप है। अतः जो 'है है, जो अस्तित्व है वही सत् है, चित् है, आनंद है। उसका न नाम है और न रूप है। वह भास ही भास है, वह अकथ है। जहाँ 'क्या' का विकल्प हुआ कि नाम और रूः पैदा हो गये और माया बीच में आ घुसी। यही नाम रूप माया है, सीता है। यही माया भगवान की उपाधि है जो भगवान को ढाँकती है।
यह माया कब से है? माया तब से है जब से भगवान है, क्योंकि वह पुरुष ई प्रकृति है और भगवान कब से है? जब से माया है, क्योंकि दोनों अभिन्न हैं ईश्वर है माया है और माया ही ईश्वर है। भगवान कैसे माया हो सकता है? मान्यता ही क नाम माया है। जब भगवान आत्मा को कुछ माना जाता है, तब वही मान्यता माय कहलाती है। इसलिए भगवान ही माया है। कहूँ तो भगवान नहीं और न कहूँ तो माय नहीं, क्योंकि भगवान अकथ है, मन वाणी से परे है। जिसको आत्म ज्ञान हो गया है जिसको स्वरूप का ज्ञान हो गया है, वही जानता है कि आत्मा अकथ है, अनादि है अनंत है। इसलिए वही आत्मज्ञानी जानता है कि यह नाम रूप वाला जगत् प्रपंच में अपने अधिष्ठान आत्मा के अनुरूप अकथ और अनादि है। कोई नहीं जानता किया प्रपंच कब पैदा हुआ, कैसे पैदा हुआ व किससे पैदा हुआ। जिसने भी देखा और जर भी देखा, उसे उसी प्रकार उसी रूप में देखा। चूँकि यह प्रपंच भगवान अथवा आत्मा राम पर आधारित है और उससे अभिन्न है, इसलिये यह भी भगवान आत्मा के सदृश अकथ और अनादि है।
माया या प्रकृति भगवान का स्वभाव है। स्वभाव, स्वभावी से भिन्न नहीं होता। जब माया भगवान से अभिन्न है, तब वह भी भगवान के समान अकथ और अनादि है। यद्यपि भगवान अनंत है, अविनाशी है, परन्तु माया अनंत व अविनाशी नहीं है। माया जिस अधिष्ठान आत्मा में कल्पित है, उस सनातन ब्रह्म भगवान राम का बोध या अनुभव हो जाने पर माया का अंत हो जाता है। माया की प्रतीति अज्ञान की हालत में होती है और तब होती है जब उसे उसके अधिष्ठान भगवान आत्मा, राम से भिन्न माना जाता है।
जब अधिष्ठान का ज्ञान हो जाता है, तब माया का भी अंत हो जाता है। यदि उपाधि न हो, तो निरूपाधि भगवान आत्मा को जानने की इच्छा कौन करेगा? नाम रूप उपाधि भगवान आत्मा को छिपाने की झाड़ी है और उस उपाधि के ही कारण सनातन ब्रह्म राम को देखने के लिए जीव को जिज्ञासा होती है। जब स्वरूप का दर्शन हो जाता है तब जीव, ब्रह्म सुख का, आत्मानंद का, अनुभव करता है। जिसने मायापति भगवान आत्मा, राम को जान या पहिचान लिया है, जिसने स्वरूप का अनुभव कर लिया है, उसी ने प्रबला माया को साध लिया है। यह बलवती माया सबसे नहीं सधती। उसे साधने के लिए मायापति भगवान आत्मा राम 'मैं' के स्वरूप का ज्ञान होना अनिवार्य है।
को बड़ छोट कहत अपराधू । सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू ।
देखिअहिं रूप नाम आधीना । रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना ।।
नाम और रूप में कौन बड़ा है और कौन छोटा है, यह कहते नहीं बनता। किसी एक को बड़ा कहना या छोटा कहना गलत होगा। साधुजन उनके गुणों का भेद सुनकर उनके बड़प्पन या छुटपन को खुद ही समझ जायेंगे। रूप नाम के अधीन है, ऐसा देखा जाता है, क्योंकि बिना नाम के रूप का यथार्थ ज्ञान नहीं होता।
भूल से मनुष्य नाम और नामी को दो भिन्न वस्तु मान लेते हैं। कोई नाम को नामी से छोटा और कोई नामी को नाम से छोटा कहते हैं। नाम और नामी में छोटे-बड़े का विचार अनुचित है। नामी अपने नाम से ही जाना जाता है। नाम के बिना नामी की पहिचान नहीं हो सकती। हीरा हाथ में है और उसके मूल्य की कल्पना भी है, परन्तु जब तक उसकी पहिचान नहीं है, हाथ में आया हुआ हीरा भी काँच ही समझा जाता है और मनुष्य उसकी कदर नहीं करता। पहिचान लेने पर, नाम जान लेने पर वस्तु का मूल्य बढ़ जाता है। इस तरह नाम की महिमा अपार है। भगवान का नाम भगवान की ही तरह चेतन है और उसकी शक्ति भी असीम है। चूँकि नाम और नामी में कोई भेद नहीं है, इसलिए नाम और रूप को एक-दूसरे से छोटा अथवा बड़ा कहना बहुत गलत होगा।
रूप बिसेष नाम बिनु जाने। करतल गत न परहिं पहिचाने ।
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखे। आवत हृदय सनेह विसेषे ।।
बिना नाम के जाने हथेली पर रखे हुए पदार्थ की विशेषता अथवा महत्ता नहीं जानी जाती। नाम जान लेने पर यानि पदार्थ की सही पहिचान हो जाने पर वस्तु की उपयोगिता अथवा अनुपयोगिता की सही कीमत आँकी जा सकती है, परन्तु नाम जान लेने पर उस पदार्थ के रूप को देखे बिना भी नामी के लिए हृदय में विशेष प्रेम अथवा आकर्षण पैदा हो जाता है। बिना रूप को प्रत्यक्ष देखे नाम के बार-बार स्मरण से नामी के प्रति विशेष अनुराग उत्पन्न हो जाता है।
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी ।
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी । उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी ॥
नाम और रूप अर्थात् माया की गति या महिमा अकथनीय है। यद्यपि समझ जाने पर यह सुख की देने वाली है, परन्तु उस सुख का बखान नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह वाणी से परे है। निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान के बीच नाम ही एक सच्चा साक्षी या मध्यस्थ के रूप में है, जो एक चतुर दुभाषिये के समान दोनों का सम्यक प्रकार से ज्ञान अथवा समाधान करता है।
माया की गति या माया की महिमा अपरंपार है, क्योंकि उसका अधिष्ठान भगवान आत्मा की महिमा अनिवर्चनीय है। भगवान की महिमा का ज्ञान हो जाने पर माया की असत्यता का भी बोध हो जाता है और यह भगवान के नाम के स्मरण से सुगम हे जाता है। जिस प्रकार एक चतुर दूभाषिया या दलाल खरीददार और बेचनदार दोनो को मिलाकर दोनों का कार्य करा देता है, उसी तरह नाम रूपी दलाल जापक की भावना के अनुसार सगुण ईश्वर का भी दर्शन कराता है और निर्गुण ब्रह्म का भी बोध कराता है।
मान्यता का ही नाम माया है। कौन मानता है और किसको मानता है? .... यह जान लेने पर वह सुखदायक है, परन्तु उसका निर्णय नहीं किया जा सकता। 'मैं'ने पहले अपने आपको जीव की कल्पना किया। यही कल्पना माया है और यह भगवान के छिपने की झाड़ी है। जब यह मान्यता हट गयी और मायापति का ज्ञान हो गगा, तब जिसका दर्शन होता है वह भगवान आत्मा 'मैं' राम ही है। उस भगवान राम के नाम की महिमा अकथ है और रूप भी अकथनीय है। नाम पहिले लिया जाता है। नाम लेकर पुकारने पर नामी प्रकट होता है और तब उसके रूप का दर्शन होता है। बार-बार नाम लेकर पुकारने से नामी को बरबस आना पड़ता है और पुकारने वाले की ओर ध्यान देना पड़ता है। जिस प्रकार एक अबोध बालक रोकर अपनी माँ को पुकारता है और जब थोड़े रोने पर भी नहीं आती, तब जोर-जोर से और लगातार रो-रोकर पुकारता है और तब माँ को सब काम छोड़कर दौड़कर बच्चे की ओर ध्यान देने के लिए बरबस ही आना पड़ता है, उसी तरह बार-बार नाम जपने से भगवान को अपने जापक भक्त की पुकार पर ध्यान देना ही पड़ता है और दौड़कर आना ही पड़ता है। इसलिए नाम की महिमा अकथनीय है।
अपने इष्ट के नाम का जप चार प्रकार से किया जाता है। मुँह से जो जप किया जाता है उसे बैखरी वाणी कहते हैं। उससे अन्तःकरण शुद्ध होता है और मन का मैल दूर हो जाता है। वैखरी वाणी द्वारा किया गया जप भी दो प्रकार का होता है, एक साधारण और दूसरा प्रांशु। साधारण जप में शब्द जापक के कान में पड़ता है, परन्तु प्रांशु जप में शब्द इतने धीमे से होते हैं कि जापक को भी सुनाई नहीं पड़ते। कंठ से जो जप किया जाता है, उसे मध्यमा वाणी कहते हैं। वह जप स्वप्नावस्था में होता है और उससे विक्षेप दूर होता है। हृदय से जो जप किया जाता है उसे पश्यंती वाणी कहते हैं और वह सुषुप्ति अवस्था में होता है। इससे हृदय पर का आवरण दूर होता है। नाभि से जप होता है उसे परावाणी कहते हैं और वह तुरीयावस्था का द्योतक है। इन सभी जापों में मन से जो मानसिक जप किया जाता है, उसका महत्व अत्यधिक है, क्योंकि उससे जापक का मन निर्विकल्प हो जाता है। इसलिए नाम की महिमा अकथनीय है।
श्री विष्णु, ब्रह्मा, शंकर, शक्ति, राम, कृष्ण, दत्तात्रेय, गणेश आदि देवताओं में जो भी अपना इष्ट हो और जिनकी उपासना की जाती है, वे सब भगवान की श्रेणी में आते हैं और उनके आगे भगवान की उपाधि लगायी जाती है। जैसे-भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान गणेश इत्यादि। अपने इष्ट भगवान की मूर्ति को हृदय देश में अंकित करके उसकी मानसिक पूजा करे। मानसिक पूजा करने के बाद फिर सब अंगों का यानि आठों अंगों का अर्थात् चरण, नाभि, हृदय, कंठ, ग्रीवा, मुख, नासिका भृकुटी का एक के बाद एक ध्यान करें। चरण के ध्यान से शुरू करके भृकुटी में अंत करें। ध्यान इतना गहरा हो कि जिस-जिस अंग का ध्यान किया जाये वह अंग ध्याता के मानस पटल पर निरंतर अंकित हो। जब आखिरी ध्यान भृकुटी में केन्द्रित होता है, तब ध्याता को इष्ट का कोई भी अंग दिखलाई नहीं पड़ता। वह सर्वथा निर्विकल्प हो जाता है, त्रिपुटी का लोप हो जाता है और ध्याता को अपना ही स्वरूप दिखाई देता है। सबका लोप होने पर देखने वाला स्वयं रह जाता है, इसलिए नाम और रूप की कहानी अकथ है।
प्रबोध तीन प्रकार से होता है, भावना, विचार और जिज्ञासा। हृदय में सगुण मूर्ति की भावना करके इष्ट के नाम का जप किया जाये तो वह नाम का जप सगुण का बोध कराता है। हृदय में विचार करते हुए कि मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, कहाँ को जाऊँगा, मेरा क्या अंत होगा आदि पर विचार करते हुए इष्ट के नाम का जप किया जाता है तो वह नाम जप निर्गुण ब्रह्म का बोध कराता है और जब हृदय में ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा लेकर नाम का जप किया जाता है, तब आत्म-तत्व का आत्म स्वरूप का दर्शन होता है। क्योंकि, इष्ट के नाम का जप सगुण और निर्गुण ब्रह्म का यानि जिसकी जो धारणा होती है उसका दर्शन कराता है, इसलिए नाम ही ऐसा सफल दलाल है जो दोनों को यानि जापक और इष्ट को मिला देता है। इसलिए नाम और रूप की महिमा अकथनीय है। किसी संत ने विचार के बारे में कहा है -
को मैं आयों कहाँ ते, कित जैहौं का सार ।।
को मैं जननी को पिता, याको कहत विचार ।।
इस पर गहराई से विचार करने पर ही मनुष्य जन्म सार्थक होता है।
दोहा-
राम नाम मनि दीप घरु, जीह देहरी द्वार ।।
तुलसी भीतर बाहरहुँ, जौं चाहसि उजियार ||21||
तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि तुम इस शरीर रूपी मकान के भीतर और बाहर उजेला (ज्ञान का प्रकाश) चाहते हो, तो जिह्वा रूपी द्वार पर राम नाम रूपी मणि का दीपक रखो । शरीर एक मंदिर है जिसमें भगवान 'आत्मा' राम स्थापित है। यदि उस भवन के
भीतर और बाहर प्रकाश करना चाहो, तो जीभ रूपी द्वार पर राम नाम रूपी मणि का दीपक रखो। देहरी पर दीया रखने से भीतर और बाहर दोनों तरफ उजाला होता है। मणि दीपक रखने का भाव यह है कि वह निरंतर प्रकाशित रहता है और पवन के झोकों से (विषय रूपी पवन के झोंके से) बुझता नहीं, जबकि साधन जन्य दीपक हवा के झोकों से बुझ जाता है। राम का नाम मणि दीपक है, जिसे जिह्वा रुपी द्वार पर रखने से भीतर और बाहर, जहाँ दोनों ओर अंधकार रहता है, प्रकाश होता है।
भीतर का अंधकारक्या है और बाहर का अंधकार क्या है? भीतर अंधेरा रहने से यानि हृदय में अज्ञान का अंधकार रहने से जीव अपने आपको जैसा है, वैसा न जानकर, भगवान 'आत्मा' राम न जानकर जीव मानता है और बाहर के अंधकार के कारण अज्ञानियों को भगवान 'आत्मा' राम अपना स्वरूप न भासकर संसार दिखाई देता है।
देहरी के भीतर दीपक रखने से बाहर का अंधकार और द्वार के बाहर दीया रखने से घर के भीतर का अंधेरा दूर नहीं हो सकता, इसलिए राम नाम रूपी मणि दीपक को ऐसी जगह रखना चाहिए (जीभ रूपी देहरी पर) जिससे भीतर और बाहर दोनों तरफ का अंधकार एक साथ समान रूप से दूर हो जाये।
राम नाम रूपी मणि दीपक को जिह्वा रूपी द्वार पर किस प्रकार रखना चाहिए? गले के भीतर कंठ में एक छोटी-सी जीभ है, जिसे कौआ या पडजीभ भी कहते हैं। उस अन्तर्जिह्वा से राम नाम का निरंतर जप करने से साधक तत्काल निर्विकल्पावस्था को प्राप्त हो जाता है और उसका जीव भाव अथवा देह भाव अथवा जगत् भाव अथवा अन्य सभी भावों का अभाव हो जाता है। उसमें केवल 'यावानहम्' - मैं जैसा हूँ-यही भाव रह जाता है। इसतरह अन्तर्जिह्वा से राम नाम का जप करने से जापक जब समाधिस्थ हो जाता है तो उसके समस्त विकल्पों का अभाव हो जाता है। समस्त विकल्पों का अभाव होना ही भीतर और बाहर का प्रकाशित होना है। भीतर ज्ञान के प्रकाश में हृदय में अनादि काल से जो जीव भाव बना हुआ है, उसका नाश होकर आत्म भाव का उदय होता है और शुद्ध सत्य स्वरूप भगवान 'आत्मा' राम का दर्शन होता है। स्व-स्वरूप के दर्शन से अनुभव होता है कि सारा चराचर मेरा स्वरूप है और मेरे अतिरिक्त कहीं कुछ है ही नहीं, केवल मात्र अस्तित्व अर्थात् में आत्मा शेष हूँ। बाहर प्रकाश होने पर जिसे हम अज्ञान के अंधकार में जगत् मानते थे, उसका अभाव हो जाता है और सब कुछ राम ही राम भासता है। इस तरह जो राम नाम रूपी मणि दीप को अन्तर्जिव्हा रूपी देहरी (द्वार) पर रखता है, वह सब भावों का (यानि जीव भाव, जगत् भाव व अन्य सब भाव) अभाव करके स्व-स्वरूप भगवान 'आत्मा' रूप का दर्शन करता है और ब्रह्म सुख का अनुभव करता है।
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।
ब्रह्म सुखहिं अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा ।।
वे बीतराग योगी ब्रह्म रचित संसार को सर्वथा त्याग चुके होते हैं और जो जीभ से भगवान राम के नाम का जाप करते हैं, ब्रह्म सुख का अनुभव करते हुए मोह निशा में यानि अविद्या रूपी रात्रि में जागते हैं, उस ब्रह्म सुख या आत्मानन्द का अनुभव ऐसा विकार रहित है, ऐसा अवर्णनीय है कि जिसकी कोई उपमा नहीं, उसका न कोई नाम दिया जा सकता है और न उसका रूप या आकार प्रकार कथन किया जा सकता है।
राम के नाम का वह जप जिससे आत्म सुख का अनुभव होता है, किस प्रकार किया जाता है? कंठ के भीतर जो अन्तर्जिह्वा है, जिसे कौआ या काकल जिह्वा भी कहते हैं, उससे राम का नाम जप करने से मन अविलम्ब निर्विकल्प हो जाता है और उसे संसार के अस्तित्व का कुछ भी ज्ञान नहीं होता। उस निर्विकल्पावस्था में वह उस आत्म सुख का अनुभव करता है जो सर्वथा वर्णनातीत है तथा उपमा रहित है। अन्तर्जीभ से नाम जपने से सब प्रपंच का एवं सब भावों का अभाव हो जाता है। जीव भाव तथा जगत् भाव सब खत्म हो जाते हैं। भीतर प्रकाश होने से जीव भाव दूर हो जाता है और बाहर प्रकाश होने से जगत् भाव तिरोहित हो जाता है। भीतर बाहर दोनों ओर प्रकाश होने से जगत् भाव तिरोहित हो जाता है। भीतर बाहर दोनों ओर प्रकाश होने से जापक निर्विकल्पावरथा का, ब्रह्मानंद का अनुभव करता है और यही योगी का अविद्यारूपी रात्रि में जागना है। ऐसे वैराग्यवान योगी की दृष्टि में सिवाय भगवान 'आत्मा' राम के दूसरे का अस्तित्व ही नहीं रहता, उसके लिए नाम रूपात्मक जगत् प्रपंच का सर्वथा अभाव हो जाता है और वही उसका मोह निशा में जागना है। जीव भाव और जगत् भाव, दोनों भावों का अभाव ही वह ब्रह्म सुख है, वह आत्मानन्द है जिसकी कोई उपमा नहीं और जो वाणी के वर्णन से परे है।
राम नाम रूपी मणि दीप को अन्तर्जीभ रूपी देहरी पर रखने से मैं क्या था, मैं क्या हूँ, मैं क्या रहूँगा। मैं क्या था, अब मैं कैसा हूँ और आगे कैसा रहूँगा आदि सब प्रकार के भाव दूर हो जाते हैं और स्वाभाविक निर्विकल्पता आ जाती है। यही अनुपमेव ब्रह्म सुख है, जिसका अनुभव जापक को होता है। साधारण बोलचाल की जीभ से राम नाम का जप करने पर न तो जीव भाव दूर होता है और न जगत् भाव का नाश होता है, ये दोनों भाव बने ही रहते हैं, परन्तु कौआ से जब यह नाम जपा जाता है तब सब भाव लुप्त हो जाते हैं और स्वाभाविक निर्विकल्पता आ जाती है। में ब्रह्म है मैं आत्मा हूँ, मैं साक्षी हूँ आदि सब भाव अंधकार के द्योतक है, परन्तु देहरी पर दीपक रखते ही सब भाव तुरंत भाग जाते हैं और आत्म सुख का अनुभव होने लगता है। जिस अवस्था में समस्त भावों का अभाव होता है, वही योगी का मोह निशा में जागना है और वही ब्रह्म सुख है, जिससे किसी प्रकार का सुख व दुःख का अनुभव नहीं होता और जो सर्वथा अनुपमेय है। सुख-दुःख तो मन के विषय हैं, परन्तु ब्रह्म सुख तो इन्द्रियों से परे, मन से परे, स्व-स्वरूप भगवान आत्मा ही है, वहाँ सुख- दुःख को कहाँ स्थान?
आनन्द मुझ आत्मा का एक दृश्य है मैं उसे देखता हूँ, उसे अनुभव करता हूँ। उसी तरह समाधि भी मुझ आत्मा का एक दृश्य है, जिसे मैं जानता हूँ। चित्त की चंचलता में जो दृश्य प्रतीत होता है वह बाहर का दृश्य है और चित्त की एकाग्रता में जो दृश्य प्रतीत होता है वह भीतर का दृश्य है। स्वाभाविक निर्विकल्पता ही योगियों की योग निद्रा है। जिस आनन्द का अनुभव मैं इन्द्रियों के द्वारा करता हूँ, वह वृत्ति जन्य अथवा क्षणिक आनन्द है। उससे इन्द्रियजन्य सुख मिलता है। ब्रह्म सुख अथवा आत्मानंद वह सुख है जो चित्त की स्थिरता और चित्त की चंचलता से सर्वथा असंबंधित है और सदा एक रस रहता है। वह अपना स्वरूप ही है। वाणी उस सुख अथवा आनंद का वर्णन नहीं कर सकती, इसलिए उसकी उपमा किसी से नहीं दी जा सकती। वह अनुपमेय है। वह सुख-दुःख से परे सब विकारों से रहित है। उपमा उस चीज की दी जाती है, जो मन वाणी का विषय है, जहाँ मन वाणी की पहुँच है। जो सुख सापेक्ष (दुःख की अपेक्षा से) होता है, वाणी उसी का कथन करती है, परन्तु जो सुख अपेक्षा रहित होता है, जो सुख-दुःख से परे होता है, जो मन वाणी की पहुँच से बाहर है, वाणी उसे कैसे कथन कर सकती है? इसलिए वह अकथ है।
सामान्य सुख जो हर्ष-विषाद से परे है, वही ब्रह्म सुख है। वह इतना प्रशांत महासागर है कि उसमें न कहीं कोई तरंग है और न कहीं कोई ज्वारभाटा है। विकल्प ही तरंग है और संकल्प ही ज्वारभाटा है। संकल्प-विकल्प रूपी ज्वारभाटा एवं तरंग से रहित ब्रह्मानन्द महान प्रशांत सागर है। वह आत्म सुख इतना मनमोहक प सुंदर है कि कश्मीर भी उसके सामने कुछ नहीं वह इतना शीतल है कि हिमालय भी उसकी अपेक्षा उष्ण है। वह इतना ऊँचा है कि सुमेरु भी उसकी तुलना में नीचा है और वह करोड़ों चन्द्रमा की अपेक्षा अधिक शांतिदायक है। उस ब्रह्म सुख के अनुभव काल में मुझ आत्मा के अतिरिक्त कहीं कुछ नहीं रहता, केवल 'मैं' ही 'मैं' रहता हूँ। यही आत्म-दर्शन है और यही आत्मानन्द है, जिसकी कोई उपमा नहीं।
सुख अर्थात् सु + ख। सु माने सुन्दर और ख माने आकाशा इसीलिए सुन्दर आकाश ही सुख स्वरूप है। आकाश का जो आकाश वही सुन्दर आकाश है, सुब स्वरूप है, ब्रह्मानन्द है। आकाशवाणी गम्य है, मन गम्य है, बुद्धिगम्य है, कथनीय है, परन्तु जो आकाश का आकाश है, जो ब्रह्म सुख है, वह मन अथवा वाणी अथवा बुद्धि से परे है, इसलिए वह अकथ है। जो ब्रह्म सुख आत्मज्ञानी, बोधवान पुरुष जो अनिर्वचनीय आनन्द का दाता है वहाँ नाम या रूप अथवा माया या संसार किसी की गुंजाइश नहीं। वह सर्व से परे है, इसलिए अकथ है। इसलिए जो ब्रह्म सुख का अनुभव करना चाहे वह राम नाम रूपी मणिदीप को अन्तर्जिह्वा रूपी देहरी (द्वार) पर रखे
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ । नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ ।
साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाँए ।।
जो भगवान के गूढ़ रहस्य को जानना चाहते हैं, वे उसके नाम की अभ्यंतर जीन से जप कर जान लेते हैं। लौकिक सिद्धियों के चाहने वाले अर्थार्थी साधकगण में एकाग्रतापूर्वक राम नाम का जाप करके अणिमा, महिमा आदिक सिद्धियों को प्रा कर सिद्ध हो जाते हैं।
जो साधक भगवान के नाम की गूढता को, उनकी यथार्थ महिमा को जानन चाहते हैं अथवा जो ब्रह्म सुख का अनुभव करना चाहते हैं अथवा जो अष्ट सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, वे अन्तर्जिह्वा से राम नाम का जप लय लगाकर करते हैं औ अभीष्ट की प्राप्ति करते हैं। वह नाम, नाम नहीं और वह जप, जप नहीं, जिससे नान का दर्शन न हो, अभीष्ट की प्राप्ति न हो।
जो सुख साधन से प्राप्त होता है वह जीव सुख है, क्षणिक है और जो सुख बिन साधन के मिलता है वह सामान्य सुख है, ब्रह्म सुख है, आत्मानन्द है। अन्तर्जीभ नाम जपना साधन जन्य जप नहीं है, क्योंकि उससे जो ब्रह्म सुख प्राप्त होता है अहंगम्य है, मन वाणी से परे है, इन्द्रियों की पहुँच के बाहर है। वह प्राप्ति की प्राप्ति है जीव सुख या सांसारिक सुख, जो इन्द्रियों के जरिये प्राप्त होता है, वह अप्राप्ति के प्राप्ति है। प्राप्ति की प्राप्ति का सुख यानि ब्रह्म सुख का अनुभव ब्रह्म ही करता है, जो नहीं। जीव भाव के रहते ब्रह्मानन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती। अन्तर्जिह्वा से नाम जप करने पर मन निर्विकल्प हो जाता है और जीव भाव, जगत् भाव आदि स भावों का अभाव हो जाता है केवल 'मैं' ही 'मैं' का अनुभव होता है और यही ब सुख है। साधारण जीभ से नाम जपने से जीव भाव बना रहता है और सुख-दुखः की प्रतीति होती है। यह जीव सुख है, अभ्यंतर जिह्वा से नाम जपने पर निर्विकल्पता प्राप्त होती है और आत्मानंद का अनुभव होता है। यही नाम की गूढ गति है।
जीव का जीवन भगवान 'मैं' आत्मा है। अभ्यंतर जीभ से नाम जपने पर जीव जीव न रह जाता है, परन्तु साधारण जीभ से नाम जपने पर जीव भाव का अभाव नहीं होता। तब उसे मन की एकाग्रता की आवश्यकता पड़ती है और जब मन एकाग्र होता है, तब जापक को सुख मिलता है। जब मन चंचल होता है, तब जीव जापक को ग्लानि होती है। योगी जब अन्तर्जिह्वा से नाम जपता है, तब उसे मन की स्थिरता अथवा चंचलता की अपेक्षा नहीं रहती। तब मन स्वभावतः निर्विकल्प हो जाता है और सब भावों का अभाव हो जाता है। यही नाम जप की गूढ गति है।
जिसकी गति गूढ़ है, जिसका दर्शन गूढ है, जिसकी महिमा गूढ़ है, जिसका साक्षात्कार गूढ़ है, जिसका जानना गूढ़ है, वह भगवान आत्मा 'मैं' कैसा है, क्या है आदि कोई नहीं जानता, कोई नहीं कह सकता उस परमात्मा को ऐसा है, वैसा है, कहना सब कपोल-कल्पित है। उस ब्रह्म सुख का जानना इसलिए गूढ़ है कि वह परमात्मा सर्व में, सर्व का सर्व रूप से सब कुछ होकर विद्यमान है। यदि उसमें कुछ विलक्षणता होती तो हर एक का ध्यान उधर जाता, हर एक उसे जानने का प्रयत्न करता। चूँकि 'मैं' आत्मा सर्व में सर्व रूप से सब कुछ होकर रहता हूँ, इसलिए उसकी ओर सर्व साधारण की दृष्टि एकाएक नहीं जाती। इसलिए उस परमात्मा का जानना, उस ब्रह्म सुख का जानना गूढ़ है, उसकी गति गूढ है। जो आँख की आँख है, जो मन का मन है, जो बुद्धि की बुद्धि है, जो वाणी की वाणी है, उसे आँख या मन या बुद्धि या वाणी क्या जाने? इसलिए वह ब्रह्म सुख, वह भगवान आत्मा, वाणी का विषय नहीं है और यही उसकी गूढ़ता है।
लव लगाकर जपना क्या है? साधारण जिह्वा से नाम जपने से जीव भाव बना रहता है और इसलिए मन चंचल रहता है तथा प्रपंच में दौडता है। परन्तु कौआ से नाम का जप करने पर तत्काल लव लग जाती है, क्योंकि तब वृत्तियाँ अन्तर्मुख हो जाती हैं, मन अमन हो जाता है, चित्त चित् हो जाता है और बुद्धि बोध हो जाती है। इस प्रकार नाम जप से साधक अविलम्ब समाधिस्थ हो जाता है और कालांतर में सिद्धियाँ प्राप्त कर सिद्ध हो जाता है।
जपहिं नामु जन आरत भारी । मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।
राम भगत जग चारि प्रकारा । सुकृती चारिउ अनघ उदारा ।।
संसार में भगवान के चार प्रकार के भक्त यानि जिज्ञासु, अर्थार्थी, आर्त और ज्ञानी होते हैं और वे चारों ही सुकृति यानि पुण्यात्मा, पापरहित और उदार होते है और नाम जप के अधिकारी होते हैं। आर्त भक्त, जो भारी दुःख से दुखी रहते हैं। भगवान का नाम जप कर अपने कठिन संकट से छुटकारा पाते हैं और सुखी होते हैं। च
हुँ चतुर कहुँ नाम अधारा । ग्यानी प्रभुहि विसेषि पिआरा ॥
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ । कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ ॥
इन चारों प्रकार के भक्तों को राम नाम का ही आधार होता है और चारों ही नाम जप के अधिकारी हैं। ध्यान-धारणा में, पूजा-पाठ में, यज्ञ आदि कार्यों में, सबमें भक्तों को भगवान के नाम का ही सहारा है, परन्तु इन चारों प्रकार के भक्तों में प्रभु का ज्ञानी भक्त ही विशेष प्यारा है, भगवान जो चराचर का अस्तित्व है, 'मैं' करके जा सबमें प्रकट है, उसे जो जानता है, उसका जो अनुभव करता है, वह ज्ञानी भत भगवान को विशेष प्रिय है। ज्ञानी भक्त भगवान आत्मा को अपने से भिन्न नहीं मानता वह उसे अभिन्न जानता है। चारों युगों में व चारों वेदों में नाम का महत्व प्रसिद्ध है परन्तु कलियुग में तो उसका विशेष प्रभाव है। नाम जप के सिवाय भवसागर तरने क कोई दूसरा उपाय नहीं है।
दोहा-सकल कामनाहीन जे, रामभगति रस लीन ।
नाम सुप्रेम पियूष हद, तिन्हहुँ किए मन मीन ||24||
जो सब प्रकार की कामनाओं से रहित हैं और भगवान राम की भक्ति रूपी जर में सर्वदा निमग्न रहते हैं, वे ज्ञानी भक्त भी राम नाम के विशुद्ध प्रेम से भरे हुए अमृत कुण्ड में अपने मन रूपी मछली को सदा डुबाये रहते हैं।
भक्त चार प्रकार के होते हैं। चारों प्रकार के भक्तों में से तीन को अर्थात् आत अर्थार्थी और जिज्ञासु को तो कामनायें (अर्थ, धर्म, काम व मोक्ष की) रहती हैं परन् ज्ञानी भक्त के मन में किसी प्रकार की कामना नहीं रहती।
ज्ञानी भक्त सर्वथा निःस्वार्थ और पूर्णरूपेण कामना रहित होते हैं। वे असि भाति, प्रिय रूप से सब में रमने वाले भगवान राम के प्रेम रूपी अमृत कुण्ड में अप मन को मछली बना के डुबाये रहते हैं। जैसे मछली जल में जन्मती है, पलती है, जर में ही खाती है-पीती है, जल में मरती है, उसके आगे जल, पीछे जल, दायें-बार जल, ऊपर-नीचे जल अर्थात् सब तरफ जल ही जल रहता है, वैसे ही ज्ञानी भ अस्ति, भाति, प्रिय वासुदेव से अभिन्न होकर अपने आप में ही आते, आप में ही जाते, आप में ही उठते, आप में ही बैठते, अपने आप में ही सोते, आप में ही जागते, आप में ही खाते और आप में ही पीते हैं। आप ही आगे, आप ही पीछे, आप ही दायें, आप ही बायें, आप ही ऊपर, आप ही नीचे अर्थात् सब ही तरफ अपने आप ही हैं। उनकी दृष्टि में सिवाय भगवान 'आत्मा' राम के कहीं कुछ भी नहीं। वे समस्त व्यवहार करते हुए भी भगवान राम में, अपने स्व-स्वरूप आत्मा में ही वर्तते हैं।
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा ।।
सनातन ब्रह्म भगवान राम, जो अकथनीय, अगाध आदि अन्त रहित व उपमा रहित हैं, उनके दो स्वरूप हैं यानि निर्गुण और सगुण।
भगवान के ये दोनों स्वरूप सगुण और निर्गुण भक्तों की भावनाओं के अनुसार हैं। यथार्थ में वह परमात्मा, वह सर्वात्मा, जो सर्व व्यापक ब्रह्म है, न सगुण है, न निर्गुण है और सब कुछ है। वह पुरुष पुरुषोत्तम सनातन ब्रह्म राम सगुण भी है, निर्गुण भी है, साकार भी है, निराकार भी है और उससे विलक्षण भी है। आज तक परमात्मा के विषय में संत महात्माओं ने जितना भी विवेचन किया है, सब अनुमान से किया है, परमात्मा उससे भी कहीं ज्यादा विलक्षण है।
भगवान ऐसा है या वैसा है, कहा ही नहीं जा सकता, क्योंकि वर्णन करने वाली शक्ति सीमित है और भगवान असीम है, अनन्त है, अपार है, अगाध है। मन वाणी से परे अनिर्वचनीय तत्त्व