शिवानन्द-आत्मकथा

 

Autobiography of Swami Sivananda

का अविकल अनुवाद

 

 

 

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादक

श्री स्वामी ज्योतिर्मयानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

प्रकाशक

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९ १९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण १९५९

सप्तम हिन्दी संस्करण : २०१५

अष्टम हिन्दी संस्करण : 30%

 

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

ISBN 81-7052-127-0 HS 5

 

PRICE: 120/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्यनाभानन्द

द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पो. शिवानन्दनगर-२४९ १९२, जिला टिहरी गढ़वाल,

उत्तराखण्ड' में मुद्रित

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प्रकाशकीय

 

सन्त का जीवन सभी के लिए आदर्श है, जिसका अनुगमन कर सभी अपने जीवन को उन्नत बना सकते हैं। इस पुस्तक में दिव्य जीवन के पाठ खोल कर रख दिये गये हैं। मनुष्य धर्मग्रन्थों तथा उपनिषदों के अध्ययन से आध्यात्मिक सत्यों की प्राप्ति के लिए कितना भी प्रयास क्यों करे; परन्तु अपने दैनिक जीवन में उन सत्यों का साक्षात्कार करने के लिए उसमें तभी प्रेरणा, उत्कण्ठा तथा पिपासा की जागृति होती है, जब वह किसी व्यक्ति के जीवन में उन सत्यों को साकार-उन आदर्शों को मूर्त हुआ देख लेता है।

 

यह प्रेरणात्मक पुस्तक इसी उद्देश्य की पूर्ति करेगी।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादकीय

 

स्वामी शिवानन्द जी जैसे महर्षि के जीवन में गीता एवं उपनिषदों की जैसी स्पष्ट व्याख्या जीवन्तरूपेण मिलती है वैसी अन्यत्र कहीं भी मिल नहीं सकती। यही कारण - कि अध्यात्म-मार्ग पर चलने वाले धीर साधक सर्वप्रथम सन्तों एवं महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा ग्रहण कर सम्पूर्ण जीवन के रहस्य को समझने का प्रयास करते हैं।

 

स्वामी जी का व्यक्तित्व सम्पूर्ण योग का मूर्त स्वरूप है। उनके जीवन में कर्मयोग, भक्तियोग, राजयोग एवं ज्ञानयोग वीणा के विभिन्न स्वरों की तरह लयभूत हो कर ऐसे आत्म-संगीत का निर्माण करते हैं, जिसकी मोहक तान ने हजारों साधकों के दय में दिव्य जीवन का जागरण किया तथा विशुद्ध आनन्द के असीम सागर को लोड़ित किया है।

 

हिन्दी भाषा-भाषी पाठकों की सेवा हेतु मैंने पूज्य श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज की मूल अँगरेजी पुस्तक Autobiography of Swami Sivananda का सरल हिन्दी भाषा में अनुवाद किया है। आशा है, इस पूजा को सभी स्वीकार करेंगे।

 

-अनुवादक

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भूमिका

 

जब मुझे श्री स्वामी शिवानन्द जी की इस आत्मकथा की पाण्डुलिपि प्राप्त हुई, तब मैं प्रसन्नता से उछल पड़ा। मैं सोचने लगा (शायद दूसरे लोग भी मेरी तरह सोचते होंगे) कि गुरुदेव के साथ वर्षों तक रहने के बावजूद उनके जीवन की जो बातें मैं उनसे या किसी दूसरे स्रोत से नहीं जान पाया था, वे सारी बातें अब इस पाण्डुलिपि के माध्यम से विस्तार से जानने को मिल जायेंगी। परन्तु जब मुझे इसमें उन सब बातों की झलक भी देखने को नहीं मिली, तो मुझे अत्यन्त आश्चर्य (निराशा नहीं) हुआ। पाण्डुलिपि को एक ओर रख देने के बाद और गुरुदेव से जिस ढंग से सोचने का प्रशिक्षण मुझे मिला था, उस ढंग से सोचने पर मुझे पता चला कि उनकी इस चुप्पी का एक गहरा अर्थ था। एक बात जो उनमें नहीं है और जिसे वह किसी दूसरे व्यक्तित्व में भी नहीं देखना चाहते, वह है निरुद्देश्य उत्सुकता तथा व्यर्थ का वार्तालाप तमिल क्षेत्र के सन्त तिरुवल्लुवर (जिन्हें कवि ही नहीं, विधिकर्ता भी माना जाता है) ने अपने अमर काव्य 'तिरुक्कुरल' के तीसरे अध्याय में गृहस्थों के लिए नियमों का उल्लेख करते हुए 'अराथुप्पल' (धर्म) परिच्छेद के अन्तर्गत 'पयानिला सोल्लामई' अर्थात् 'व्यर्थ बातों को व्यक्त करना' पर विस्तार से चर्चा की है। इस अध्याय के आठवें छन्द में कवि ने लिखा है- "जो धीमान् उपयोगी और अनुपयोगी बातों का अन्तर समझ लेते हैं, वे कभी भी व्यर्थ शब्दों को व्यक्त नहीं करते।" स्वामी शिवानन्द ने इसी नियम को अपने जीवन में अपनाया है और भूल कर भी इसकी उपेक्षा नहीं की। उनके अनुसार अपने जीवन की उन घटनाओं के बारे में लिखना व्यर्थ है जो पाठकों की आध्यात्मिक उन्नति में प्रत्यक्ष रूप से सहायक नहीं होतीं। यही कारण है कि इस पाण्डुलिपि में इस बारे में कोई चर्चा नहीं की गयी कि क्यों वे उन दिनों समुद्र पार करके भारत से मलाया गये, जब रूढ़िवादी ब्राह्मण-परिवार समुद्र के पार की यात्रा को धर्म-विरोधी समझते थे। पाठकों को यह तो विदित ही होगा कि स्वामी शिवानन्द एक अत्यन्त रूढ़िवादी ब्राह्मण-परिवार के सदस्य थे। इस बारे में भी उन्होंने कोई चर्चा नहीं की कि क्यों वे मलाया की अत्यन्त अर्थकर (lucrative) नौकरी छोड़ कर संन्यासी का जीवन व्यतीत करने के लिए भारत लौट आये। उनके अनेक भक्त एवं शिष्य यह भी जानना चाहते हैं कि क्या वे गृहस्थ थे और यदि यह बात सच है, तो उनका परिवार कहाँ है? उनकी आध्यात्मिक श्रेष्ठता के प्रति सम्मान की भावना रखने वाले लोगों में जो बहुत कम उत्सुक हैं, वे भी यह जानना चाहते हैं कि उन्होंने एक नये साधक के रूप में हिमालय में क्या-क्या साधना की और उनकी तपस्या का क्या स्वरूप था। वे सोचते हैं कि सही दिशा में अशिथिल और कठिन परिश्रम किये बिना स्वामी शिवानन्द के लिए आध्यात्मिक उत्कर्ष की ऊँचाइयों पर पहुँचना सम्भव नहीं था। मानव से महामानव बनने के लिए उन्होंने क्या-क्या किया, इस बारे में उन्होंने अपने भक्तों को कुछ भी नहीं बताया है।

 

निःसन्देह यह चुप्पी किसी संकोच के कारण नहीं है। स्वामी शिवानन्द जब कभी अपने बारे में कुछ कहने लगते हैं, तो अपने ऊपर वह किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं लगाते वह निर्भीकता के साथ अपनी उपलब्धियों की चर्चा करते हैं और इस बात की चिन्ता नहीं करते कि लोग उन्हें आत्मश्लाघी कहेंगे। अपने जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में उनकी चुप्पी का कारण केवल यही है कि वह ऐसा मानते हैं कि उनका वर्णन करने से दूसरों को कोई लाभ नहीं होगा।

 

उनके मलाया जाने की ही बात करें। मान लें कि वह वहाँ इसलिए गये क्योंकि वह कोई साहसिक कार्य करना चाहते थे, या उनमें दूरस्थ स्थानों को देखने की इच्छा थी, या वह मलाया में कार्यरत उन भारतीय श्रमिकों के हित में कुछ कार्य करना चाहते थे, जो अच्छी आय तथा सुखद जीविका के लालच में वहाँ पहुँचे थे और जिनका शोषण किया जा रहा था। अब इस जानकारी से आध्यात्मिक साधकों को अपनी साधना में कोई सहायता नहीं मिलेगी। और यही कारण है कि स्वामी शिवानन्द ने अपनी आत्मकथा में इस बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा।

 

यदि किसी विशेष परिस्थिति में जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तन जाने के कारण वह संन्यासी बनने के लिए आतुर हो उठे थे और इसीलिए वह भारत भागे चले आये थे, तो यह जानकारी भी साधकों के लिए उपयोगी सिद्ध नहीं होगी। यह आवश्यक नहीं है जो कोई भी संसार का त्याग करना चाहता है, उसे उसी प्रकार के अनुभव होंगे जो अनुभव स्वामी शिवानन्द को हुए थे। जब अप्रतिरोध्य दैवी पुकार सुनायी पड़ेगी, तब सभी साधक सहज ही उस ओर खिंचे चले आयेंगे। इसलिए यह बताने से कोई लाभ नहीं है कि क्यों उन्होंने संसार का त्याग किया।

 

इसी प्रकार की अन्य बातों (जिनमें उनकी साधना के स्वरूप से सम्बन्धित बात भी सम्मिलित है) का भी यही उत्तर है। यह याद रखना चाहिए कि अनेकानेक पुस्तकों (और स्वामी शिवानन्द ने भी इस प्रकार की अनेक पुस्तकें लिखी हैं) में यह बात स्पष्ट की गयी है कि साधना बिलकुल व्यक्तिपरक होती है और उसका सम्बन्ध केवल उस व्यक्ति-विशेष से होता है जो उस साधना को कर रहा होता है, किसी अन्य साधक से उसका सम्बन्ध नहीं होता। सभी साधनाओं का उद्देश्य साधक के मन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करना होता है। लेकिन किसी का मन उसी का मन होता है, किसी दूसरे का नहीं। गत और वर्तमान जन्मों के कर्मों के परिणाम उसमें प्रतिबिम्बित होते हैं। प्रत्येक मन को एक विशेष ढंग से साधना होता है और वह मन जिसका है, वही व्यक्ति अनुभव और अभ्यास के आधार पर उस ढंग को जान सकता है। अतः यदि स्वामी शिवानन्द ने अपने मन को नियन्त्रित करने में आने वाली बाधाओं के बारे में विस्तार से लिखा भी होता, तो भी वह उनके व्यक्तिगत इतिहास से अधिक और कुछ बन पाता और उससे किसी भी व्यक्ति को (भले ही वह उन बाधाओं की जानकारी से लाभ उठाने के लिए उत्सुक रहा हो) कोई लाभ नहीं मिल पाता। फिर भी, यह कहना उचित होगा कि इस बारे में स्वामी शिवानन्द बिलकुल चुप रहे हैं। इस पाण्डुलिपि में यत्र-तत्र उन्होंने लिखा है- "तीर्थयात्रा करते समय मेरे द्वारा भिक्षुक के रूप में व्यतीत किये गये जीवन से मुझे बहुत सहायता मिली है। वह जीवन मेरे लिए अपने व्यक्तित्व में तितिक्षा, समदृष्टि और सुख-दुःख में सन्तुलित बने रहने के गुणों का विकास करने में बहुत सहायक सिद्ध हुआ है। उस अवधि में मुझे कई महात्माओं के दर्शन हुए और उनसे मुझे महत्त्वपूर्ण बातें जानने को मिलीं। कभी-कभी मुझे भूखे पेट मीलों चलना पड़ता था। लेकिन मुस्कराते हुए मैंने सारी कठिनाइयाँ झेलीं।"

 

निश्चित ही यह एक अत्यन्त संक्षिप्त विवरण है; लेकिन इससे बहुत-कुछ जानने को मिलता है। इससे यह पता चलता है कि उनकी तपस्या का स्वरूप क्या रहा होगा। अपनी समचित्तता को बनाये रखते हुए खाली पेट मीलों चल पाना आसान बात नहीं है। यही सच्ची साधना है। जिसने भूखा रहना जाना हो, किसी सुखद स्थान में बैठ कर जो माला-पर-माला फेरता रहा हो, ऐसे साधक की अपेक्षा उनकी जैसी साधना करने वाला कई गुणा श्रेष्ठ है।

 

पुस्तक में एक जगह उन्होंने लिखा है-"आत्म-साक्षात्कार एक अतीन्द्रिय अनुभव है। परम सत्य का साक्षात्कार कर लेने वाले आत्मज्ञानी महापुरुषों के सद्वचनों में गहन आस्था रख कर ही अध्यात्म-मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है।" ये शब्द उन्होंने गुरु की खोज के सन्दर्भ में लिखे हैं। यहाँ हमें उनकी आस्था के स्वरूप के बारे में पता चलता है। वह अज्ञानी नहीं थे। | उपनिषदों में वर्णित  आत्मा-विषयक समस्त तथ्यों का उन्हें पूर्ण ज्ञान था। फिर भी साधना में गुरु की आवश्यकता को वह बहुत अधिक महत्त्व देते थे। वह जानते थे कि जब तक गुरु के अमृत-वचनों में असन्दिग्ध आस्था नहीं होती, तब तक अहं का नाश नहीं हो सकता। अपने गुरु की खोज का विवरण प्रस्तुत करते समय उन्होंने हमें इसी सत्य की शिक्षा दी है।

 

उनकी साधना के स्वरूप के बारे में हमें इसी प्रकार जानना होगा। वास्तविकता यह है कि स्वामी शिवानन्द का व्यक्तित्व अत्यन्त व्यावहारिक था। जो-कुछ वह सद्ग्रन्थों या महापुरुषों से सीखते थे, उसे वह व्यवहार में ला कर देखते थे, ताकि इस बात का ज्ञान हो सके कि किस सीमा तक वे उपदेश लिए अनुकूल हैं। यदि वे अनुकूल नहीं सिद्ध होते थे, तो उनकी निन्दा के बजाय वह उन पर ध्यान देना बन्द कर देते थे। कोई उपदेश या विचार उनके लिए अनुकूल नहीं है। बस, इससे अधिक वह उसके बारे में नहीं सोचते थे। इसीलिए जो-कुछ उन्होंने लिखा है, उसका सम्बन्ध उनके स्वभाव से है। वह चमत्कार दिखाने या सिद्धि प्राप्त करने के उद्देश्य से शरीर को यातना देने के पक्ष में नहीं थे।

 

कभी-कभी मैं सोचता हूँ-क्या किसी सन्त को अपनी आत्मकथा लिखनी चाहिए ? अपने और अपनी उपलब्धियों के बारे में कुछ व्यक्त करने के पीछे क्या आत्म-प्रदर्शन की भावना छिपी नहीं रहती है? यदि सांसारिक व्यक्ति अपने बारे में इस प्रकार कहे या लिखे कि अन्य व्यक्ति उससे प्रभावित हो जाये, तो उसे क्षमा किया जा सकता है; परन्तु क्या अपनी महत्ता को नकारने वाले आत्म-त्यागी सन्त के लिए ऐसा करना उचित है? इस दृष्टि से विचार करें तो स्वामी शिवानन्द बिलकुल निर्दोष हैं। उनकी यह पुस्तक नाम मात्र को ही आत्मकथा है। इससे पाठकों के प्रशंसा-पत्र प्राप्त करने के उद्देश्य के कुछ भी नहीं लिखा गया है। उनका केवल एक ही उद्देश्य रहा है। वह जानते हैं कि यद्यपि उन्होंने पहले से कोई योजना नहीं बनायी थी; परन्तु ईश्वर ने उनसे डिवाइन लाइफ सोसायटी (दिव्य जीवन संघ) स्थापित करवायी, अरण्य विश्वविद्यालय (अब अरण्य अकादमी) की नींव डलवायी तथा इसी तरह के अन्य कार्य भी करवाये थे। ये सारे कार्य ईश्वर से प्राप्त संरक्षण में आस्था रखते हुए निर्भीक जीने की अनुभूत आवश्यकता की पूर्ति कर रहे हैं। उन्हें पता है कि उनकी इच्छा होने या होने के बावजूद वह एक बहुत बड़े मिशन के अध्यक्ष हैं और इस धरती से प्रयाण करने के पूर्व वह सबको यह बता सकेंगे कि समस्त मानवता के लिए उनका मिशन हितकारी है। जहाँ तक मैं समझ सका हूँ, इस आत्मकथा को प्रस्तुत करने का यही मुख्य उद्देश्य है। इतर उद्देश्यों से लिखी गयी अन्य आत्मकथाओं से इस आत्मकथा की तुलना नहीं की जानी चाहिए।

 

अब इस आत्मकथा का मूल्यांकन करें। प्रारम्भ से अन्त तक उस व्यक्ति के लिए इस पुस्तक का बहुत अधिक शैक्षणिक महत्त्व है जो इससे लाभ उठाना चाहता है। प्रथम अध्याय में उन्होंने अपने पूर्वज अप्पय्य दीक्षितार के प्रति अपनी असीम श्रद्धा व्यक्त की है। अपने माता-पिता तथा बाल्यकाल के बारे में उन्होंने जान-बूझ कर बहुत कम लिखा है। मलाया में व्यतीत किये गये अपने जीवन के बारे में लिखते समय उन्होंने डाक्टरी व्यवसाय के प्रति अपने प्रेम तथा आदर्श डाक्टरों द्वारा चिकित्सा-कार्य सम्पन्न करके ढंग के बारे में अपने विचार व्यक्त किये हैं। किस प्रकार एक श्रुति-वाक्य (जिस क्षण वैराग्य की भावना जन्म ले, संसार का त्याग कर देना चाहिए) ने उनके जीवन को रूपान्तरित कर दिया, इसका वर्णन उन्होंने 'नवीन दृष्टिकोण का उदय' शीर्षक के अन्तर्गत किया है। उन्होंने भ्रमणशील भिक्षुक के रूप में बिताये गये जीवन, तीर्थयात्रा से प्राप्त होने वाले लाभों, गुरु की खोज, ऋषिकेश में स्थायी रूप से निवास करने के निर्णय का वर्णन अतिरंजना-रहित सरल भाषा में किया है। इस वर्णन से हमें कुछ--कुछ सीखने को मिलता है। एकांगी आध्यात्मिक साधनाओं, समन्वित साधना को अपनाने के अपने निर्णय, स्वर्गाश्रम में उस साधना का व्यावहारिक अभ्यास, भ्रमण करने की अवधि में दिये गये भाषणों तथा अपनी कैलास-यात्रा के बारे में जो कुछ उन्होंने लिखा है, उससे साधना में सेवा को सम्मिलित करने के उनके प्रारम्भिक प्रयासों का पता चलता है। आध्यात्मिक क्रम-विकास की इस निर्माणात्मक अवधि के व्यतीत हो जाने के बाद स्वामी शिवानन्द के जीवन का वह भाग प्रारम्भ होता है, जिसमें उन्होंने जन-जन के बीच आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार किया। दिव्य जीवन संघ के निर्माण के प्रारम्भिक चरणों का उन्होंने बहुत अच्छा वर्णन किया है। अपनी निःस्वार्थता और उदारता से उन्होंने जिस प्रकार अपने शिष्यों का मन जीत लिया, उससे सम्बन्धित उनके उद्गार अत्यन् मूल्यवान् हैं और जिन दिनों दिव्य जीवन संघ के कल्याणकारी और उदात्त कार्य प्रारम् हुए थे और दूसरों को लाभान्वित करने लगे थे, उस समय अपनी महान् कामनाओं को फलता-फूलता देख कर उन्हें जो प्रसन्नता और सन्तोष हुआ था, उसका भी वर्णन उन्होंने किया है। फिर वह उपनिषद् के महावाक्य 'अहं ब्रह्मास्मि' में ही रमण करने बाले समस्त विश्व के हितकारी मित्र के रूप में उभर कर आये। इसके बाद उन्होंने अपने सहयोगियों के स्वभावों में सुधार लाना प्रारम्भ किया। इस उद्देश्य से उन्होंने किस-किस के साथ क्या-क्या किया, इसका वर्णन 'सामूहिक साधना' शीर्षक के अन्तर्गत और उसके बाद के अध्यायों में मिलता है। इसके बाद दिव्य जीवन अभियान ने और जोर पकड़ा। अपने आदर्शों की सार्वजनीन उपयोगिता तथा आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त करने हेतु सुझाये गये उपायों की प्रभावोत्पादकता के कारण यह अभियान तत्कालीन अनुभूत आवश्यकता की पूर्ति में सक्षम होने लगा।

 

इन सब तथ्यों के बारे में स्वामी शिवानन्द ने इस प्रकार लिखा है, मानो वह किसी संस्था का वार्षिक प्रतिवेदन लिख रहे हैं; परन्तु पुस्तक का प्रत्येक वाक्य उनके मन की उच्चता, मानव-कल्याण के कार्यों के प्रति उनकी निष्ठा और भक्तों-शिष्यों द्वारा दिये जाने वाले स्नेह तथा सम्मान की सूचना देता है। आश्रम की घटनाओं के सीधे-सरल विवरण में उनके तथा उनके कार्यों की महत्ता ही झलक झलकती है। अपने मिशन के द्रुतगति से होने वाले विकास का विवरण उन्होंने एक संक्षिप्त अध्याय में किया है। यह इस बात का प्रमाण है कि किसी भले आदमी द्वारा किये जाने वाले भले कार्यों में ईश्वर हमेशा साथ देता है। दिव्य जीवन संघ के सिद्धान्त किसी से छिपे नहीं हैं। ये धर्म के उस सच्चे स्वरूप पर प्रकाश डालते हैं जो प्रसन्नता-सहजता के साथ जीवन को सरल तथा व्यावहारिक ढंग से जीने का तरीका सिखाता है। इस दिव्य जीवन संघ के विवरण अत्यन्त प्रबोधक हैं।

 

आध्यात्मिक सम्मेलनों, भ्रमण करने की अवधि में दिये भाषणों, कीर्तनों, प्रभातफेरियों के विवरणों को पढ़ कर पता चलता है कि दिव्य जीवन संघ के आदशों के अनुसार जीवन व्यतीत करने हेतु समय का अधिकतर सदुपयोग हो सके, इस दृष्टि से अनेक सक्रिय कार्यक्रम चलाये गये हैं। आत्मकथा के लेखक ने साधकों की देखभाल करने, विश्वजनीन प्रेम का दान करने, दूसरों को सहायता पहुँचाने और दूरस्थ प्रदेशों में रहने वाले साधकों का मार्ग-निर्देशन करने से सम्बन्धित निर्देश भी दिये हैं। लेखक ने अपने कुछ पत्रों को भी उद्धृत किया है। इन्हें पढ़ने से पता चलता है कि जो व्यक्ति उनके द्वारा संचालित कार्यों में सेवा-भाव से रत थे, उनके आध्यात्मिक-यहाँ तक कि भौतिक कल्याण के लिए भी वह (लेखक) बहुत उत्सुक थे।

 

पुस्तक के उत्तरार्ध में लेखक ने अनुकूलन (accommodation) की भावना, त्याग की महिमा, युवावस्था में ही त्याग की आवश्यकता, आदर्श शिष्य की अर्हताएँ, हृदय-शुद्धि की आवश्यकता, महिलाओं के प्रति हमारे दृष्टिकोण, महिलाओं द्वारा संसार-त्याग आदि के बारे में बहुमूल्य बातें बतलायी हैं। कुछ अध्यायों को पढ़ने से पता चलता है कि आधुनिक मानव की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए वे अपने उदार दृष्टिकोण के कारण प्राचीन परम्पराओं का त्याग करने में पीछे नहीं रहे हैं।

 

लेखक ने पुस्तक में ध्यान, सेवा, आश्रमों की स्थापना, राजनीति में रुचि, दीक्षा का महत्त्व आदि विषयों पर संन्यासियों को महत्त्वपूर्ण उपदेश दिये हैं। पुस्तक का शीर्षक चाहे जो हो, यह बहुमूल्य सुझावों और उपदेशों का एक अद्वितीय खजाना है।

 

लेखक ने अपनी पुस्तकों तथा अन्य प्रकाशनों के बारे में जो-कुछ लिखा है, उसका अध्ययन करने से पता चलता है कि तो उन्हें प्रकाशनाधिकार (copyright) से कोई मोह था और वे धन ही अर्जित करना चाहते थे। उनकी इच्छा थी कि शरीर-त्याग के बाद भी संसार के प्रत्येक भाग में बहुमूल्य ज्ञान का भण्डार स्थायी रूप से बना रहना चाहिए। शायद इसीलिए वह एक बहुसर्जक लेखक बन गये हैं। हर वर्ष इनकी पुस्तकें प्रकाशित होती हैं, जो देश-विदेश में बिना मूल्य वितरित की जाती हैं।

 

पुस्तक के एक अंश में उन्होंने अपने शिष्यों को लड़ाई करने, दूसरों को विक्षुब्ध करने और उनके प्रति दुर्भावना रखने की बुराइयों से मुक्त होने के लिए महत्त्वपूर्ण उपदेश दिये हैं।

 

समूची पुस्तक की सामग्री पर चर्चा करना सम्भव नहीं है; परन्तु एक बात निश्चित ही कही जा सकती है-कोई भी पृष्ठ खोल लें, उसमें आपको आन्तरिक जीवन को रूपान्तरित कर देने वाली सामग्री मिल जायेगी। पुस्तक का एक-एक शब्द लेखक के आन्तरिक अनुभव की लेखनी से लिखा गया है। पुस्तक पढ़ने से ज्ञात होता है कि उन्होंने केवल सदैव अपने मन को शुद्ध और उदात्त बनाये रखने का प्रयास किया है, वरन् वह अपने इन गुणों को दूसरों को देने के लिए भी सदैव प्रयत्नशील रहे हैं।

 

स्वामी शिवानन्द बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि साधक को सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए लालायित नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये अध्यात्म-मार्ग की यात्रा में अवरोध उत्पन्न करती हैं। वह कुछ ऐसे व्यक्तियों के बारे में जानते हैं जो अध्यात्म-क्षेत्र में उत्तरोत्तर विकास कर रहे थे; परन्तु सिद्धियों के लालच में पड़ कर वे पतन के गर्त में गिर गये। स्वामी जी के इस मत को कौन स्वीकार नहीं करेगा ! लेकिन मेरे मन में बार-बार एक बात आती है। आश्रम में अनगिनत ऐसे पत्र आते हैं जिनमें स्वामी जी के चमत्कारों का उल्लेख रहता है। ऐसा तो सम्भव नहीं है कि ऐसे पत्रों के सभी लेखकों ने झूठ लिखा हो या वे विभ्रम के शिकार हों। हाँ, उनमें से कुछ थोड़े आत्म-प्रबंधक लोग अवश्य हो सकते हैं। लेकिन जिस प्रकार की घटनाएँ, प्रकाश में आयी हैं और जितनी सावधानी से उनका वर्णन किया गया है, उन्हें देखते हुए यह कहा जा सकता है कि 'स्वामी जी में असाधारण शक्तियाँ (सिद्धियाँ) हैं।' यदि यह बात सत्य है, तो क्या उनका भी पतन होगा? नहीं, कभी नहीं; क्योंकि वे उत्थान-पतन से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। वह एक ऐसी स्थिति में पहुँच गये हैं जिसमें वह अमर आत्मा सच्चिदानन्द या ईश्वर से एकाकार हो सकते हैं। फिर उनके उत्थान-पतन का प्रश्न नहीं उठता ही नहीं। जब अहं को ही नकार दिया जाता है, तब किसी प्रकार की आशंका नहीं रह जाती।

 

एक बात निश्चित है। जो सिद्धियों की कामना नहीं करता, परन्तु ईश्वर के साथ अपने घनिष्ठ सम्पर्क के परिणाम-स्वरूप निःस्वार्थ भाव से सिद्धियों का प्रदर्शन करता है, ऐसा सिद्ध पुरुष उस घटिया श्रेणी के व्यक्ति से नितान्त भिन्न है जो आत्माओं को वश में कर लेता है तथा अजीबो-गरीब कार्यों का प्रदर्शन करने के उद्देश्य से अतीन्द्रिय शक्तियाँ प्राप्त कर लेता है। (अच्छी या बुरी) आत्माओं को वश में कर लेना और आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न होना-ये दो भिन्न-भिन्न बातें हैं। जो वास्तविक सिद्ध पुरुष होगा, वह अपने को भगवान् कहलायेगा और अपनी सिद्धियों का प्रदर्शन करेगा। ऐसी बात नहीं है कि सिद्ध पुरुष को इस बात का बोध हो कि वह चमत्कारों का प्रदर्शन कर सकता है; परन्तु उसकी दृष्टि में वे सम क्षमताएँ, जिन्हें चमत्कार कहा जाता है, अति-साधारण से भी अधिक साधारण हैं। इसका कारण यह है कि जन-साधारण, जो उन क्षमताओं को असाधारण मानते हैं, की पहुँच से वह परे हैं। और स्वामी शिवानन्द इसी प्रकार के वास्तविक सिद्ध पुरुष हैं, लेकिन वह कभी सार्वजनिक रूप से इस बात की घोषणा नहीं करते।

 

इस भूमिका को समाप्त करते-करते मैं यह बात कहने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ कि इस आत्मकथा के लेखक ने सम्भवतः अनजाने में अपने प्रत्येक वाक्य में अपने वास्तविक व्यक्तित्व का द्घाटन कर दिया है। और क्या ही भव्य व्यक्तित्व है यह! इस दृष्टि से यह पुस्तक एक वास्तविक आत्मकथा है।

 

उन्होंने जितना कुछ लिखा है, उसे पढ़ कर आपको उनके इस असाधारण गुण का पता चलता है कि वह बड़े-छोटे, विद्वान्-मूर्ख-सभी को सहायता देने के लिए आतुर रहते थे। वह यह भी समझते थे कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी सीमाओं के अन्तर्गत उस परमानन्द को प्राप्त करने का पात्र है जो इस संसार का जन्मदाता, पालक और संहारकर्ता है। वह इस बात के लिए भी सतत प्रयत्नशील रहते थे कि सामान्य जनों का ऊर्ध्वगामी रूपान्तरण हो सके, ताकि वे सदा के लिए अपने-अपने बन्धनों से मुक्ति पा लें और उस परमानन्द को प्राप्त कर सकें जिसे ईश्वर की सन्तान होने के नाते प्राप्त करने का जन्मसिद्ध अधिकार उन्हें है।

 

स्वामी शिवानन्द जो महान् कार्य कर चुके हैं, उनके बदले हम नश्वर प्राणी भगवान् से यही प्रार्थना कर सकते हैं कि वह हमें उनके चरण-चिह्नों पर चलने की सामर्थ्य प्रदान करें!

 

-स्वामी सदानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आमुख

 

एक महान् विद्वान् की आत्मकथा प्रकाशित करके योग-वेदान्त अरण्य विश्वविद्यालय (अब योग-वेदान्त अरण्य अकादमी), शिवानन्दनगर ने बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। यह पुस्तक स्वामी जी की प्रतिभा की अत्यन्त मौलिक उपज है। इसमें उन्होंने अपने अनुभवों का महान् विश्लेषण तो किया ही है, साथ ही पाठकों पर भी अपनी निष्ठा की गहरी छाप छोड़ी है। इस कारण यह पुस्तक पूर्णतः विश्वसनीय बन गयी है। समूची आत्मकथा आत्मसाक्षात्कार-प्राप्त एक महान् द्रष्टा के दिव्य दर्शन से अनुप्राणित है। अभिव्यक्तियाँ इतनी प्रांजल तथा काव्यात्मक हैं कि उनसे अत्यन्त दुरूह विषयों के दार्शनिक विवेचनों की सूखी अस्थियाँ नवीन प्राण-ऊर्जा प्राप्त करके पुनरुज्जीवित हो उठी हैं।

 

इस आत्मकथा के प्रकाशन से भारतीय संस्कृति की सम्पूर्ण धरोहर गौरवान्वित हुई है। निश्चय ही इससे विश्व का अत्यधिक कल्याण होगा; क्योंकि इसमें कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो अन्य जीवन-वृत्तान्तों में नहीं पायी जातीं। इस पुस्तक में गुरुदेव की लेखनी ने केवल उनके अपने व्यक्तित्व की अन्तरतम झाँकियाँ प्रस्तुत की हैं, वरन् व्यावहारिक अध्यात्म तथा भारत की आध्यात्मिक सम्पदा पर भी प्रकाश डाला है। इसमें वह सब-कुछ है जिस पर सार्वजनीन सहानुभूति और बोध आधारित रहते हैं। इसमें दिव्य जीवन संघ की स्थापना, विकास तथा कार्यकलापों का भी वर्णन प्रस्तुत किया गया है।

 

परमाणविक युग के कोलाहल में दिव्य जीवन संघ जैसी आध्यात्मिक संस्था की स्थापना होना विरोधाभास है। लोकोपकारी कार्यों तथा सौन्दर्यपरक (aesthetic) संस्कृति के सीमित माध्यमों से यह संस्था जिस असीम सत्ता को अभिव्यक कर रही है, उसके कारण आधुनिक सभ्यता की बहुत-सी अधोगामी प्रवृत्तियाँ नियन्त्रित हुई हैं। जन-साधारण के लिए इस संस्था के विविध कार्यकलापों तथा इसके प्रख्यात संस्थापक के बारे में जानकारी प्राप्त करना सरल नहीं है। इस दृष्टि से यह पुस्तक बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। पुस्तक की गागर में विद्वान् लेखक ने अध्यात्म-जीवन का सागर भर दिया है और एक ऐसा वातावरण निर्मित किया है जो पाठक को आरम्भ से अन्त तक मन्त्रमुग्ध किये रहता है। उन्होंने जीवन की कुछ ऐसी घटनाओं का उल्लेख किया है जो चमत्कारिक तो हैं ही, साथ ही शिक्षापूर्ण भी हैं। संसार-भर की सभी धार्मिक प्रवृत्तियों के पाठक आध्यात्मिक उत्थान के व्यावहारिक उपदेशों को पुस्तक-रूपी इस भण्डार से प्राप्त करके अत्यन्त आनन्दित होंगे। इस छोटी पुस्तक में लेखक ने सांसारिक बन्धन में पड़े हुए परन्तु अपने आध्यात्मिक विकास के लिए उत्सुक उन पाठकों के लिए भारत की अध्यात्म-संस्कृति की सारी उपयोगी बातें भर दी हैं जो वेद जैसे महान् ग्रन्थ की गहराइयों में समयाभाव या क्षमताभाव के कारण नहीं उतर पाते। संक्षेप में हम कह सकते हैं, कि पुस्तक उस दिव्य तत्त्व का निरूपण (भले ही आंशिक रूप से) करती है, जो भक्तों का आराध्य प्रेमास्पद या परम ध्येय है। इस दृष्टि से यह पुस्तक पाठकों को आध्यात्मिक साधक का जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करती है।

 

मानवता के कल्याण के लिए स्वामी जी ने साधना के व्यावहारिक पक्ष पर पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत करके इस पुस्तक को सभी प्रकार के साधकों के लिए उपयोगी बना दिया है। देश-विदेश के अनेक सन्तप्त प्राणियों के लिए स्वामी जी के हृदय में दुःख का जो सागर उमड़ता था और भारत माता को उसकी प्राचीन प्रतिष्ठा के सिंहासन पर पुन आसीन करने के लिए मन में जो ललक थी और इसके लिए वह जो-कुछ करना चाहते थे, उन सबका विशद वर्णन इस पुस्तक में है। यदि हमारे देश के नवयुवक देश-विदेश में सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें श्रेष्ठ द्रष्टा, वेदान्त-ध्वजी, महानता तथा उच्चता के साकार रूप में स्वामी शिवानन्द जी के अद्भुत जीवन से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। स्वामी शिवानन्द के जादुई व्यक्तित्व, उनकी जीवन्तता और सहनशीलता का भी सजीव वर्णन इस पुस्तक में मिलता है। आत्मोत्तेजक घटनाओं से परिपूर्ण यह पुस्तक निश्चित ही पाठक का मन मोह लेगी।

 

अपने शिष्यों को स्वामी जी जिन नवीन और क्रान्तिकारी विधियों से प्रशिक्षित करते थे, उनके वृत्तान्त से हमारे अपने आध्यात्मिक जीवन पर भी प्रकाश पड़ता है। ईसामसीह ने कहा था- "जो मेरा अनुसरण करेगा, वह अँधेरे में चलेगा; परन्तु उसे जीवन का प्रकाश मिलेगा।" मननशील लेखक ने सत्य (जो परम सत्ता के साथ हमारे ऐक्य का एक रूप है) के विभिन्न पक्षों के बारे में स्पष्ट शब्दों में विभिन्न तरीकों से इस प्रकार बतलाया है, मानो सत्य-रूपी पदार्थ पर बहुरंगी संकेन्द्रिय किरणें पड़ रही हों। उसे पढ़ कर उनके (लेखक के) प्रति हमारा मन श्रद्धा से भर जाता है। वह हमें लोकप्रियता की उमड़ती हुई लहरों पर आरूढ़ दिखायी देने लगते हैं। गहनतम दर्शन के गहनतम सत्यों की विवेचना भावोत्तेजक घटनाओं, कहानियों के सहारे आकर्षक और सरल शैली में इस प्रकार की गयी है कि वह प्रारम्भिक अभ्यासियों के लिए भी बोधगम्य बन गयी है। भक्त, ज्ञानी, कर्मयोगी-सभी प्रकार के पाठकों को यह पुस्तक अच्छी लगेगी; क्योंकि यह उन्हें एक ऐसे नये संसार का परिचय देती है जिसमें आनन्द अपने चरमोत्कर्ष पर रहता है और हर्ष की खुमारी सर्वत्र छायी रहती है। इस संसार से परिचित हो कर परम तत्त्व की प्राप्ति हो जाती है जो अस्तित्व के लिए अपरिहार्य है।

 

जब स्वामी शिवानन्द द्घोष करते हैं, तब सारा जगत् भाव-विभोर हो कर उन्हें सुनने लगता है। उनके व्यक्तित्व की दीप्ति, उनके दृष्टिकोण का पुरातनत्व, उनकी प्रतिभा की प्रखरता, करुणा से पूरित उनका स्वभाव और मानवता का कल्याण करने हेतु उनके उत्साह की प्रखरता-इन सब गुणों ने उन्हें एक दैवी पुरुष बना दिया है। वह कहते हैं-"पतित जनों का उद्धार करना; अन्धों को राह बताना; दुःखी प्राणियों को सान्त्वना देना; निराश व्यक्तियों को प्रोत्साहित करना; पड़ोसियों को आत्म-स्वरूप मान कर उन्हें प्रेम करना; गायों, पशुओं, महिलाओं और बच्चों की रक्षा करना; अपनी वस्तु पर दूसरों का भी अधिकार समझना-ये हैं मेरे जीवन के आदर्श और उद्देश्य मैं आपकी सहायता और मार्ग-दर्शन करूँगा। मैं आपकी सेवा करने के लिए ही जीवित हूँ। मैं आपको प्रसन्न करने के लिए ही जीवित हूँ। मेरा शरीर सेवा के लिए ही बना है।" यह है उनका रोमहर्षक सन्देश। इस परमाणविक युग के लोगों के लिए स्वामी जी ने वर्षों तक परिश्रम करके एक नया संसार निर्मित किया। उसका नाम है 'आनन्द-कुटीर' इस अनोखे संसार में तरह-तरह की रुचियों, स्वभावों वाले और क्रम-विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरने वाले सत्यान्वेषी साधकों का आध्यात्मिक विकास अत्यन्त द्रुत गति से होता है। आध्यात्मिक सत्य शाश्वत होता है, परन्तु इसे बार-बार दोहराना होता है; इसका बार-बार निदर्शन किया जाता है, ताकि यह हम सबके लिए एक जीवन्त उदाहरण बन सके। स्वामी जी का जीवन मूक प्रार्थना की शान्ति तथा निःस्वार्थ सेवा की गत्यात्मक का संयम है। यह जीवनी अनगिनत कठिनाइयों के बीच दुःखी मानवता की सेवा तथा कठिन आध्यात्मिक प्रयासों की एक कहानी है। जो लोग स्वामी शिवानन्द के आश्रम गये हैं, वे जानते हैं कि अपने शिष्यों में अपनी अनुकम्पा की शक्ति संचारित करके स्वामी शिवानन्द ने उन्हें आश्रम-संचालन की अभूतपूर्व क्षमता तथा दिव्य प्रेम के जिन गुणों से विभूषित कर दिया है, वे अत्यन्त असाधारण गुण हैं। निःसन्देह स्वामी जी का मिशन तथा दिव्य जीवन अभियान शीघ्र ही एक विश्व-शक्ति बन जायेगा।

 

परमहंस स्वामी शिवानन्द के जीवन की कहानी पढ़ना व्यावहारिक धर्म का पाठ पढ़ने के समान है। स्वामी जी ने अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा, बहुमुखी मनःशक्तियों तथा अनगिनत नानाविध योगदानों से संसार को चकित कर रखा है। सत्य का साक्षात्कार प्राप्त करने के बाद अब वह इसका दर्शन दूसरों को कराना चाहते हैं। मानव-इतिहास में अनेक सिद्ध ज्ञानी हुए हैं; यथा बुद्ध, ईसा, रामकृष्ण परमहंस स्वामी शिवानन्द अपने गुणों तथा कार्यों के बल पर सिद्ध ज्ञानियों की श्रेणी में गये हैं।

 

अपनी आध्यात्मिकता द्वारा विश्व में अपेक्षित परिवर्तन लाने का उत्तरदायित्व भारत के ही सबल स्कन्धों पर है। भारत का मुख्य लक्ष्य अपने आध्यात्मिक सन्देशों को देश-विदेश तक पहुँचाना है। हृदय-परिवर्तन वर्तमान समय की आवश्यकता है। हमें स्वतन्त्रता की आवश्यकता थी; क्योंकि हम समझते थे कि हमारे पास प्रतिपादित तथा प्रचारित करने हेतु आध्यात्मिक सत्य हैं तथा प्रसारित करने हेतु समस्त संसार के लिए हितकारी सन्देश हैं। अब इन्हीं सन्देशों को प्रसारित करके भारत के लक्ष्य की पूर्ति हो सकेगी। इस कार्य में स्वामी शिवानन्द हमारा मार्ग निर्देशन कर रहे हैं। यदि परतन्त्र भारत को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए महात्मा गान्धी की आवश्यकता थी, तो पुनरुत्थानशील भारत को अपनी मूल्यवान् विरासत तथा अपने (उपर्युक्त) मुख्य लक्ष्य के प्रति जागरूक बनाने के लिए स्वामी शिवानन्द की आवश्यकता है।

 

स्वामी शिवानन्द की तरह के महामानव की आवश्यकता का अनुभव इतना कभी नहीं हुआ जितना वर्तमान समय-परमाणविक युद्ध द्वारा आत्मघात करने पर उतारू मनुष्यों के युग में हो रहा है। वह पृथ्वी और स्वर्ग के बीच की एक कड़ी हैं और यदि कोई महापुरुष मानव के आध्यात्मिक विकास तथा उसको शान्ति प्रदान करने के कार्यों में सहायक हो सकता है तो वह स्वामी शिवानन्द ही हैं।

 

भारत देश दुःखी और गरीब है, फिर भी भारतीय प्रसन्न रहते हैं। इसका कारण यह है कि अब भी भारत में स्वामी शिवानन्द जैसे सन्त-महात्माओं की यह वाणी गूँज रही है कि आनन्द का स्रोत आत्मा है, कि भौतिक सुख-सुविधाएँ। स्वामी जी अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण वाले सन्त हैं। वह योग को निर्जन मठों से निकाल कर जन-समूह तक ले आये हैं। वह अज्ञात, अदृश्य ब्रह्म के चिन्तन में खो नहीं गये हैं।

 

वह जन-साधारण के सन्त हैं और वह हमें बताना चाहते हैं कि इस संसार में अमरता के, 'असत्' में 'सत्' के तथा अन्धकार में प्रकाश के तत्त्व उपस्थित हैं। वह एक आधुनिक पैगम्बर हैं। आप शिवानन्द आश्रम अवश्य जायें तथा अपना शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कायाकल्प करा कर लौटें। यह आश्रम गंगा के तट पर स्थित है। पीछे आश्रम का विश्वनाथ-मन्दिर है। इस आश्रम में अनेक सन्त-महात्मा रहते हैं जो सद्गुरु शिवानन्द महाराज के मानव-कल्याण का कार्य कर रहे हैं।

 

स्वामी शिवानन्द ने इस आश्रम (दिव्य जीवन संघ) की स्थापना सन् १९३६ में की थी। इस आश्रम के योग-वेदान्त अरण्य विश्वविद्यालय (अब योग-वेदान्त अरण्य अकादमी) में आध्यात्मिक साधकों को योग तथा वेदान्त का प्रशिक्षण दिया जाता है तथा अध्यात्म-ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया जाता है। प्रत्येक सच्चे सत्यान्वेषी की सहायता करने को आतुर इस महान् व्यक्ति की ओर मैं समूचे संसार का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। धार्मिक जीवन के प्रति एक नवीन दृष्टिकोण रखने वाला यह व्यक्तित्व सन्त की वैश्व चेतना, उद्यमशील उद्योगपति की सक्रियता तथा साहसिक व्यक्ति की निर्भीकता का अद्भुत समुच्चय है। ईश्वर तक पहुँचने के अनेकानेक मार्गों तथा भगवच्चिन्तन की विविध प्रणालियों के मूलतत्त्वों का समन्वय उनकी संस्था शिवानन्दाश्रम के प्रत्येक कार्यकलाप में झलकता है।

 

परम पावन स्वामी शिवानन्द के जीवन की दो युगान्तरकारी घटनाएँ हैं-सन् १९५० में की गयी भारत तथा लंका देशों की यात्रा तथा सन् १९५३ में आयोजित धर्म-संसद। अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने कई विश्वविद्यालयों तथा उच्चस्तरीय संस्थाओं में प्रवचन दिये जिनके मुख्य विषय थे-विश्व-शान्ति तथा हिन्दू-दर्शन अपार ज्ञान से अनुप्राणित उनकी विचारोत्तेजक वाणी को जिस किसी ने सुना, वह उनका श्रद्धालु बन गया।

 

अप्रैल १९५३ भारत के लिए एक गौरवमय दिन था। उस दिन जब धर्म-संसद का उद्घाटन किया गया, तब शिवानन्द आश्रम के इतिहास के एक नवीन अध्याय का प्रारम्भ हुआ था। भारतीय इतिहास में प्रथम बार संसार के विभिन्न मार्गों से सुविख्यात विद्वान् कर इस देश की धरती पर इकट्ठे हुए। निःसन्देह संसार के बुद्धिजीवी तथा दार्शनिक विद्वान् इस आयोजन को बीसवीं शती की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानेंगे।

 

मानवीय भाषा अतीन्द्रिय-बोध को पूर्णतः व्यक्त नहीं कर पाती। इस पुस्तक में कई स्थलों पर ऐसे दृश्यों (visions) और अनुभवों का उल्लेख है जिन्हें भौतिक विज्ञान तथा मनोविज्ञान की सहायता से नहीं समझा जा सकता। आधुनिक ज्ञान का विकास होने के साथ-साथ लौकिक और अलौकिक के बीच की सीमारेखा स्थिर नहीं रह गयी है। यधार्थ रहस्यवादी अनुभव अब पूर्व की भाँति गहरे सन्देह की दृष्टि से नहीं देखे जाते। स्वामी शिवाानन्द की अमृतवाणी ने उनकी जन्मभूमि भारत को अत्यधिक प्रभावित किया है। यूरोप के विद्वज्जनों को उनके (स्वामी जी के) शब्दों में सर्वव्यापक सत्य की गूंज सुनायी पड़ी है। लेकिन उनके शब्द बौद्धिक चिन्तन की उपज नहीं है। उनकी जड़ें उनके प्रत्यक्ष अनुभवों में छिपी हुई हैं। अतएव सामान्यत धर्म के दिखायी पड़ने वाले रूप को समझने की दृष्टि से धर्म, मनोविज्ञान तथा भौतिक विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए उनके अनुभवों का बहुत महत्त्व है।

 

अध्यात्म के आकाश में स्वामी शिवानन्द वर्धमान बालचन्द्र के समान हैं। वह धर्मनिष्ठा के साकार रूप हैं। उनके सन्देश संसार के सुदूर स्थानों तक प्रसारित हो चुके हैं। देश-विदेश में दिव्य जीवन संघ की शाखाएँ पहले से ही स्थापित हैं। अनगिनत व्यक्ति उनके सन्देशों से सान्त्वना प्राप्त कर चुके हैं। अनेक लोगों ने यह अनुभव किया कि स्वामी जी अपनी अलौकिक शक्तियों से उनके भौतिक तथा आध्यात्मिक जीवन की बाधाएँ दूर कर देते हैं। शान्ति तथा मैत्री (सामंजस्य) के उच्च आदर्श-जिनके स्वामी जी साक्षात् उदाहरण हैं-आज संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं के आदर्श-वाक्य बन गये हैं। आज स्वामी जी को कृष्ण, बुद्ध और ईसामसीह के समकक्ष मान कर सम्मान दिया जा रहा है। मानवता की सेवा करना उनकी एक प्रबल आकाक्षा रही है और इसे उन्होंने हर सम्भव साधन से पूरी करने का प्रयत्न किया है। विश्वविख्यातक योग-वेदान्त अरण्य अकादमी ने विविध उपयोगी विषयों पर उनकी २०० पुस्तकें प्रकाशित की हैं, परन्तु श्रेष्ठता की दृष्टि से इस पुस्तक ने उनके अन्य प्रकाशनों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। इस पुस्तक में हमें अनूठी भारतीय संस्कृति, सभ्यता और गौरव की यथार्थ झाँकी देखने को मिलती है। गहन आध्यात्मिक सत्य सजीव कहानियों के माध्यम से अत्यन्त सरल शब्दों में व्यक्त किये गये हैं। विभिन्न धर्मों की विचारधाराओं के बीच पाये जाने वाले विरोधों को प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त बोध की सहायता से दूर किया गया है। इन पृष्ठों में प्रत्येक पाठक को-चाहे वह किसी भी धर्म का अनुयायी हो-साहस, आस्था, आशा, प्रबोधन-सम्बन्धी प्रेरक विचार पढ़ने को मिलेंगे। स्वामी जी का जीवन धार्मिक प्रयोगों की एक प्रयोगशाला है। उनका सन्देश भारत के राष्ट्रीय जीवन को अनुप्राणित करने वाली एक मूक शक्ति है। वह समस्त विश्व के लिए प्रकाश और बोध के नये युग का अग्रदूत है।

 

उनकी अप्रतिरोध्य आध्यात्मिक शक्ति से आकर्षित हो कर स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध, शिक्षित-अशिक्षित, अज्ञेयवादी-रूढ़िवादी-सभी तरह के लोग उनके पास जाते हैं। सभी उनकी पवित्रात्मा के विकिरणी प्रभाव का तथा उनकी उपस्थिति में अपने उन्नयन का अनुभव करते हैं। उनका प्रेम भेदभाव करना नहीं जानता। सभी प्रजातियों, वर्णों, पन्थों के व्यक्तियों पर उनके प्रेम की वर्षा समान रूप से होती है। जो कोई भी उनसे 'पाना' चाहता है, उसे वह मुक्त-हस्त से 'देते' हैं।

 

मुझे विश्वास है कि इस पुस्तक से पाठकों को उस दिव्यामृत की प्राप्ति होगी जो भौतिकता से ग्रस्त इस संसार में उनके लिए अत्यन्त आवश्यक है। इस पुस्तक में जीवन के प्रत्येक दिवस के लिए एक सन्देश है। प्रत्येक सन्देश मन पर एक स्थायी प्रभाव छोड़ता है तथा उसमें जीवन को रूपान्तरित करने की अद्भुत क्षमता है।

 

-एन. सी. घोष

शिवानन्द-आत्मकथा

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय. 3

अनुवादकीय. 4

भूमिका.. 5

आमुख.. 12

प्रथमअध्‍याय

मेरा जन्म... 25

श्री दीक्षितार का अवतरण.. 25

उनकी विशाल प्रतिभा.. 25

महान् आध्यात्मिक ज्योति.. 26

मेरा जन्म-स्थान. 27

प्रस्फुटन-काल. 28

जीवन के संघर्ष. 29

मानव-सेवा के प्रथम पाठ. 32

द्धितीय अध्‍याय

अमृतत्व का आह्वान. 34

नवीन दृष्टिकोण का उदय. 34

परिव्राजक के रूप में. 35

तीर्थ-यात्रा से लाभ कैसे उठाया जाये ?. 35

गुरु की आवश्यकता.. 36

यात्रा की समाप्ति.... 37

तृतीय अध्‍याय

दिव्य खजाने का वितरण.. 38

मनमुखी साधनाएँ. 38

मेरी समन्वय-साधना की विधि.. 38

स्वर्गाश्रम का जीवन. 39

दिव्य सेवा हेतु प्रवास पर. 40

कैलास-पर्वत के आह्वान पर. 41

आध्यात्मिक ज्ञान का सामूहिक प्रसार. 42

आध्यात्मिक अधिवेशन. 43

प्रवचन-यात्रा.. 43

अमोघ प्रेरणा.. 44

जनता के जीवन में गतिशील रूपान्तर. 45

कीर्तन के विभिन्न प्रकार. 45

चतुर्थ अध्‍याय

दिव्य सेवा-कार्य. 47

साधकों की प्रशिक्षण-विधि.. 47

विनय तथा नम्रता.. 48

नये साधकों का पथ-प्रदर्शन. 48

दिव्य जीवन संघ का बीजारोपण.. 49

साधकों की योग्यता तथा क्षमता का उपयोग. 50

महान् संस्था का जन्म... 51

गतिशील आध्यात्मिक नव-निर्माण का केन्द्र... 51

सामूहिक साधना.. 53

प्रार्थना तथा स्वाध्याय-कक्षाएँ. 53

दर्शनार्थियों की सेवा.. 54

पंचम अध्‍याय

मेरा धर्म, उसकी पद्धति तथा प्रचार. 56

दिव्य जीवन-अभियान. 56

समय की माँग. 56

आध्यात्मिक पूर्णता के लिए सार्वभौम आदर्श. 57

संकटकालीन-स्थिति.. 58

संघ के कार्यों का द्रुत विकास. 59

दिव्य जीवन का मार्ग. 60

कोई गुप्त सिद्धान्त नहीं.. 60

सच्चा धर्म क्या है?. 60

दिव्य जीवन का सन्देश. 61

व्यावहारिक रूप. 62

दिव्य जीवन संघ की शाखाएँ तथा आध्यात्मिक साधक.. 62

मानव का एकत्व... 63

दिव्य जीवन की पुकार. 63

() सामूहिक साधना का महत्त्व... 64

() दिव्य जीवन संघ की शाखा कैसे खोली जाये ?. 64

() आध्यात्मिक प्रवाह जीवित रहना चाहिए. 66

() सेवा ध्यान से भी महान् है. 67

() पूर्ण योग. 67

() सर्वांगीण सेवा-कार्य में रत होना.. 68

षष्‍ठ अध्‍याय

शिवानन्द आश्रम. 70

आध्यात्मिक संस्थाओं की समस्याएँ. 70

आश्रम स्वतः बढ़ चला.. 70

जहाँ सभी का स्वागत होता है. 71

पूर्ण स्वतन्त्रता.. 72

चमत्कारों का चमत्कार. 72

साधकों की देख-रेख कैसे करनी चाहिए?. 73

सभी के लिए सहायता तथा प्रेम. 74

वैयक्तिक देख-रेख.. 74

प्रोत्साहन तथा परामर्श. 75

यथा-व्यवस्था का गुण.. 77

किसे आश्रम चलाना चाहिए?. 77

आदर्शों को भूलिए. 78

सप्‍तम अध्‍याय

संन्यास-मार्ग पर प्रकाश. 80

संन्यास की महिमा.. 80

संन्यास के लिए युवावस्था ही सर्वोत्तम है. 80

संन्यास के लिए कठोर शर्तें नहीं हैं. 81

कौन मेरा शिष्य बनने योग्य है. 82

आन्तरिक स्वभाव को शुद्ध बनायें. 83

स्त्रियों के प्रति भाव. 83

क्या स्त्रियों को संन्यास लेना चाहिए?. 84

स्त्रियों की सेवा.. 85

जो संन्यास लेना चाहते हैं. 85

सेवा तथा ध्यान का समन्वय रखें.. 87

आर्थिक स्वतन्त्रता.. 87

सेवा का महत्त्व... 88

संन्यासी तथा राजनीति.. 88

क्या गुरु अनिवार्य है?. 88

दीक्षा से मन का रूपान्तर. 89

पहले योग्य बनिए, फिर कामना कीजिए. 90

अष्‍टम अध्‍याय

ज्ञान-यज्ञ.. 91

गम्भीर अनुभव ही अनेकानेक प्रकाशनों में प्रस्फुटित हुए हैं. 91

मेरी पुस्तकों में पुनरुक्ति क्यों ?. 92

सत्वर कार्य ही मेरा आदर्श है. 93

विस्तार पर ध्यान देना.. 94

सर्वाधिकार सुरक्षित रखने में आसक्ति नहीं.. 95

लाभ के प्रति मेरा दृष्टिकोण.. 96

नवम अध्‍याय

जीवन का आदर्श. 97

जीवन-दर्शन. 97

पूर्ण विकास. 97

मेरा मत. 98

शक्ति तथा महान् कार्य का रहस्य... 98

प्रार्थनाओं द्वारा उपचार. 99

दशम अध्‍याय

आध्यात्मिक प्रगति के लिए मेरा तरीका.. 100

अनासक्त परन्तु सावधान. 100

आजीवन साधना.. 100

इतने फोटो क्यों ?. 101

आत्म-निर्भरता.. 102

प्रत्येक वस्तु के पीछे एक उद्देश्य है. 102

सरल जीवन तथा उदारता.. 103

किसी फैशन का दास नहीं.. 103

प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रगति.. 104

वैयक्तिक देख-रेख तथा उदार दृष्टिकोण.. 104

बल का प्रयोग नहीं वरन् पूर्ण स्वतन्त्रता.. 105

काम लेने का तरीका.. 106

प्रसन्नता का सन्देश. 108

निन्दा के प्रति मेरा रुख.. 108

समालोचना के ऊपर उठिए. 109

दृढ़ता तथा कृतज्ञता.. 110

आप बुराई से बच नहीं सकते. 111

शिष्यों के बीच झगड़े के प्रति मेरा रुख.. 112

एक ही विषय को बार-बार उकसाने से समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता.. 113

सफलता का मार्ग. 114

मनुष्य के स्वभाव को कैसे बदला जाये ?. 114

गुण्डों के प्रति मेरा विचार. 115

अभिमान नष्ट कीजिए. 115

आदर्श गुरु. 115

आओ, आओ, मेरे मित्रो ! 116

एकादश अध्‍याय

आध्यात्मिक मार्ग पर व्यावहारिक संकेत. 117

डाक द्वारा साधकों को उपदेश. 117

शान्ति का मार्ग. 117

ज्ञान के पिपासु बनिए. 118

मेरे पास आइए. 118

संसार के त्याग में जल्दबाजी कीजिए. 119

कार्य करने से पहले विचार कर लीजिए. 120

आध्यात्मिक उन्नति के लिए बहुमूल्य उपदेश. 121

प्रसुप्त ईश्वरीय स्वरूप का प्रस्फुटन कीजिए. 122

निम्न प्रकृति का शोधन. 124

विषयपरायणता का अभिशाप. 125

साधना आपकी नित्य की आदत बन जाये. 125

निष्काम सेवा.. 126

प्राणायाम से उपद्रव. 126

उदासी तथा आलस्य को दूर कीजिए. 126

जब आप उत्तेजित हों.. 127

योग में अति से बचिए. 127

योग क्या है ?. 127

द्वादश अध्‍याय

आध्यात्मिक अनुभव. 128

नव-जीवन का अवतरण.. 128

प्रारम्भिक आध्यात्मिक अनुभव. 128

ध्यान में. 129

मैंने जीवन-क्रीड़ा में विजय पायी.. 130

उसी में मैं अपना सर्वस्व पाता हूँ. 130

आनन्द-सागर में. 131

मैं अमर आत्मा हूँ. 131

भाषा-रहित कटिबन्ध... 132

मैं वही बन चुका हूँ. 132

भूमा-अनुभव. 132

रहस्यमय अनुभव. 133

शिवोऽहम्, शिवोऽहम्, शिवोऽहम्. 133

समाधि की अवस्था.... 134

गुरु-कृपा से. 135

हंसः सोऽहम्. 135

त्रयोदश अध्‍याय

दर्शन तथा विनोद. 137

साधकों को भाषण देने का प्रशिक्षण.. 137

व्यावसायिक व्यक्तियों का मार्ग. 137

मजबूत पैकिंग के प्रति जिसमें मोटी कीलें लगायी गयी थीं.. 138

जब प्रकाशक गण मुख्य बातों को छोड़ देते हैं. 138

पुस्तक ही पाण्डुलिपि के विषय में. 138

आकर्षक विज्ञापन के प्रति.. 138

कॉफी के प्रति.. 138

याद दिलाने का तरीका.. 139

साधकों की देख-रेख.. 139

औपचारिक आमन्त्रण.. 139

काजू के क्षति-ग्रस्त पार्सल के प्रति.. 139

ऋण के होते हुए भी धनी.. 139

दिमागी काम करने वालों के लिए आदर्श टानिक.. 140

मेरे आदरणीय अतिथि.. 140

पैदल चलने में 'दुर्बलता' के प्रति.. 140

विरक्त महात्माओं के तरीके.. 140

स्नफ के प्रति दर्शन. 141

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शिवानन्-आत्मकथा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम अध्याय

मेरा जन्म

 

श्री दीक्षितार का अवतरण

 

मात्र इस पुण्य भूमि में जहाँ मनुष्य मोक्ष-प्र