सत्संग भजन माला

 

'प्रार्थना-मंजरी' और 'शिवानन्दाश्रम-भजनावली' का संयुक्त तथा परिवर्धित रूप

 

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

प्रकाशक

 

द डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९ १९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

 

प्रथम संस्करण: १९८३

षष्ठ संस्करण: २०१८

(९,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

© द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

ISBN 81-7052-141-6

HS 136

 

 

 

 

 

PRICE: 160/-

 

 

 

 

 

 

 

'द डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्यनाभानन्द द्वारा

प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पो. शिवानन्दनगर-२४९ १९२, जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड' में मुद्रित ।

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प्रकाशकीय वक्तव्य

 

यह पुस्तक 'सत्संग भजन माला' यहाँ की पूर्व-प्रकाशित पुस्तकों 'प्रार्थना-मंजरी' तथा 'शिवानन्दाश्रम-भजनावली' का संयुक्त तथा परिवर्धित रूप है। इसमें स्तोत्र, भजन आदि को नये क्रम से रखा गया है। जो गीत, भजन अथवा स्तोत्र जिस दिन गाये जाते हैं, उन्हें उस दिन के शीर्षक के अन्तर्गत संगृहीत किया गया है। इस भाँति सम्पूर्ण पुस्तक सप्ताह के सात दिनों के क्रम से सात उपशीर्षकों में विभाजित है। उपर्युक्त दोनों पुस्तकों 'प्रार्थना-मंजरी' तथा 'शिवानन्दाश्रम-भजनावली' की उपयोगिता तथा लोकप्रियता सर्वविदित है। आशा है कि ये पुस्तकें अपने इस नवीन परिवर्धित रूप 'सत्संग भजन माला' में हिन्दी पाठकों तथा भक्त जनता के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध होगी।

 

-द डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बीसवीं शताब्दी तथा सत्संग की आवश्यकता

 

बीसवीं शताब्दी के नर और नारियाँ भौतिकवाद के विष से सराबोर हैं। उनके दिलों में आध्यात्मिकता का रज-कण भी नहीं है। सत्संग करने की बात तो दूर रही, उनको यही मालूम नहीं कि सत्संग किस चिड़िया का नाम है। उनके संस्कार उलझ गये हैं, मैले हो गये हैं, काले हो गये हैं-किया ही क्या जाये ?

 

यदि आज का नर-नारी-समाज अपने सामने मुँह खोले हुए दुःखों के निराकरण की जरा भी चाह रखता है, तो अपने दिल और दिमागों को साफ कर ले। जिस प्रकार मन को कल-पुर्जे निकाल कर पुनर्नव किया जाता है, जिस प्रकार गन्दी जगहों को पानी से साफ किया जाता है, उसी प्रकार बीसवीं शताब्दी के प्रतिनिधि मनुष्य को अपने हृदय और अपनी बुद्धि को पुनर्नव करना होगा तथा आध्यात्मिकता के जल से साफ कर लेना होगा। यदि यह हो गया, तो बीसवीं शताब्दी के दूसरे अर्धक को आध्यात्मिकता के प्रकाश से उज्ज्वल किया जा सकता है।

 

आज प्रत्येक व्यक्ति के लिए सत्संग की साधना अनिवार्य हो गयी है। यदि वह सत्संग नहीं करता, तो भौतिकवाद के अन्धकार में ही पथभ्रष्ट बना रहेगा। पहले ही जीवन को छोटा कहा गया था, जब कि मनुष्य कई सौ सालों तक शरीर धारण किये रहते थे। फिर आज की क्या पूछो, जब कि मुश्किल से जीवन की अर्ध-शताब्दी पार होती है, वह भी पार होते ही मृत्यु के तट पर पहुँचती है। इसलिए जीवन एकदम छोटा हो गया है। समय तो भागता ही जा रहा है, रुकने वाला वह है ही कब ? यदि समय को हार खिलानी है, तो हमें उससे तेज भागने की शक्ति का अर्जन करना चाहिए।

 

मनुष्य-जन्म बड़ा अनमोल है। इसको खोना ठीक उस व्यापारी के समान होगा जो मिले हुए मोती को (जो कई साल के परिश्रम के बाद उसे मिला था) अथाह सागर में गिरा देता है। एक बार इस जीवन से हाथ धो दिया तो समझ लो, सदा के लिए धो दिया। कह नहीं सकते कि फिर होगा क्या? यदि इस जीवन में कुछ अच्छे संस्कारो का अर्जन किया है, तो कभी-न-कभी मनुष्य जीवन की आशा की जा सकती है, पर यदि जन्म से ले कर कफन ओढ़ने तक कुत्ते, बिल्ली, गधे आदि के समान कर्म किये, तो न जाने फिर कब यह मनुष्य-योनि मिलेगी ।

 

अभी तो खून में जोश है, विटामिन बी की गोलियाँ, इन्स्यूलिन की सूइयाँ, कालिवर आयल, च्यवनप्राश, स्वर्णभस्म आदि खा-खा कर शक्ति को गिरने से बचाया जा रहा है, गाल अभी लाल हैं, रग-रग में खून खौल रहा है; इसलिए कुछ भी समझ में नहीं आता-भले ही लाख समझाओ । कल को जब लकड़ी के सहारे उठने लगोगे, जिस दिन बालों पर बरफ गिर जायेगी, दाँतों को कोई आ कर सोते-ही-सोते तोड़ जायेगा, जिस दिन हलवा और दूध ही पेट के अन्दर आसानी से जा सकेंगे; सम्भवतः उसी दिन कुछ विचार आयेगा-ओहो, हमने गलती की, युवावस्था को जुए में हार दिया, शराब, सिनेमा, उपन्यास और अश्लील समाज के हाथों बेच दिया। पर तब हो ही क्या सकता है! चिड़ियाँ तो खेत को चुग गयीं, अब तो व्यर्थ में कनस्तर बजाओ।

 

देवी, बीसवीं शताब्दी, जागो; तुम्हारे जन जागें। सोये हुओं में तुम जाग-जाग कर जाग्रति भरो । इतिहास में तुम्हारे अध्याय का शीर्षक न तो काले अक्षरों में लिखा जाना चाहिए और न लाल अक्षरों में ही। या तो पीला या काषाय या स्वर्णिम - मुझे यही तीनों रंग पसन्द हैं। क्यों नहीं तुम ही अपने इतिहास का आमुख अपने हाथों से गेरुए रंग में लिख जाती हो? मैं तुम्हारी सहायता करूँगा।

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रार्थना की महिमा

 

"शरीर के लिए प्राण-तत्त्व जितना आवश्यक है, उतना ही आत्मा के लिए प्रार्थना भी आवश्यक है। प्रार्थना जीवात्मा का परमात्मा के साथ ऐक्य कराती है। प्रार्थना व्यक्ति के अहं को विगलित करती है।"

 

-स्वामी शिवानन्‍द

 

"विश्व के सभी धर्मों के अनुसार प्रार्थना तथा पूजन जीवन का आधार है। अधिकांश साधकों के लिए नित्य दैवी उपासना हेतु यह साधन है। प्रार्थना से मनोभाव की वृद्धि होती है तथा दिव्यता की दिशा में गति होती है। इस भाँति प्रार्थना साधक को पवित्र कर उन्नत बनाती है।"

 

-स्वामी चिदानन्द

 

“स्तोत्रों तथा प्रार्थना की महत्ता समझने की अपेक्षा अनुभव की वस्तु है। प्रार्थना सतत होनी चाहिए। यह तो प्रत्येक साधक की जीवन-साथी होनी चाहिए। प्रार्थना केवल कतिपय शब्दों का उच्चारण मात्र नहीं है। यह तो साधक का ईश्वर के साथ सीधा सम्बन्ध है।"

 

-स्वामी कृष्णानन्‍द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुक्रमणिका

 

प्रकाशकीय वक्तव्य... 3

बीसवीं शताब्दी तथा सत्संग की आवश्यकता.. 4

प्रार्थना की महिमा.. 6

सोमवार

. 'मंगलं दिशतु मे विनायको' और 'जय गणेश' 13

. मुदा करात्तमोदकम् (शंकराचार्यकृत) 17

. गाइये गणपति जगवन्दन. 20

. श्री गणेश जी की आरती.. 20

. शिव-स्तुति.. 21

. लिंगाष्टकम्. 22

. द्वादश ज्योतिर्लिंगस्तोत्रम्. 24

. साम्ब गौरिवर. 25

. साम्बसदाशिव भोलानाथ. 26

१०. महामृत्युंजय-मन्त्र... 27

११. जटाटवी-गलज्जल-प्रवाहपावितस्थले. 28

१२. अतिभीषणकटुभाषण.. 33

१३. बिल्वाष्टकम्. 36

१४. श्री शिवमानसपूजा.. 37

१५. शिवपंचाक्षरस्तोत्रम्. 38

१६. शिवषडक्षरस्तोत्रम्. 39

१७. दारिद्र्य-दहन-शिवस्तोत्रम्. 40

१८. रुद्राष्टकम् (श्री तुलसीदासकृतं) 41

१९. नमो भूतनाथ. 43

२०. हर गाओ शिव गाओ... 44

२१. शंकर महादेव देव. 44

२२. श्री शिव-अष्टोत्तरशत-नामावली.. 45

२३. शिव-आरती.. 48

मंगलवार

. नाद-बिन्दु-कलादि नमो नमः.. 50

. शरणागतमातुरमाधिजितम्. 51

. कार्तिकेयस्तोत्रम्. 54

. पदारविन्द-भक्त-लोक-पालनैक-लोलुपम्. 55

बुधवार

. भजो रे मैया राम गोविन्द हरी. 58

. यमुना-तीर-विहारी. 59

. भज रे गोपालम्. 60

. गायति वनमाली.. 63

. ब्रूहि मुकुन्देति.. 64

. क्रीडति वनमाली.. 66

. भज रे यदुनाथम्. 68

. स्मर वारं वारं. 70

. गोपाल-गोकुल-वल्लभीप्रिय. 71

१०. दर्शन दो घनश्याम नाथ. 73

११. अधरं मधुरं. 75

१२. जयति तेऽधिकम्. 77

१३. कालिय-मर्दनं-अथ बारिणि... 84

१४. अच्युतं केशवं. 88

१५. जय विठ्ठल विठ्ठल. 91

१६. हरि तुम हरो जन की भीर. 91

१७. महायोग-पीठे. 93

१८. प्रलयपयोधिजले. 96

१९. राधारमण कहो.. 100

२०. राम-कृष्ण-हरि.. 100

२१. कृष्ण गोविन्द गोविन्द... 101

२२. नटवर लाल गिरिधर गोपाल. 102

२३. कृष्ण प्रेम मयी राधा.. 103

गुरुवार

. विदिताखिल-शाख-सुधा-जलपे. 104

. देव-देव-शिवानन्द... 107

. जय गुरुदेव दयानिधे. 108

. आनन्द कुटीर के दिव्य देवता.. 109

. श्री दत्तात्रेयस्तोत्रम्. 110

. श्री दत्तात्रेयस्तोत्रम्. 110

. गुरुस्तोत्रम्. 113

. गुर्वष्टकम्. 118

. शिवगुरु-पंचकम्. 120

१०. शिवानन्द योगीन्द्र स्तुतिः... 120

११. श्री शिवानन्दशरणागतिस्तुतिः... 122

१२. श्री शिवानन्दाष्टोत्तरशतनामावलिः.... 123

१३. भव-सागर तारण.. 127

शुक्रवार

. श्री सरस्वति नमोऽस्तु ते. 128

. दे मज दिव्य मती.. 130

. सुवक्षोजकमुम्भाम्. 131

. तातो माता.. 134

. अम्ब-ललिते. 137

. नमस्ते जगद्धात्रि (श्री महालक्ष्मीस्तोत्रम्) 139

. जय तुंग तरंगे. 142

. नमस्ते शरण्ये (श्री दुर्गादेवी-स्तोत्रम्) 144

. नमस्तेऽस्तु गंगे. 148

१०. जय भगवति देवि नमो वरदे. 151

११. नवरत्नमालिका.. 154

१२. श्री अन्नपूर्णास्तोत्रम्. 157

१३. आदि दिव्य ज्योति.. 159

१४. श्री देवी-अष्टोत्तरशत-नामावली.. 159

१५. देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्. 166

१६. देवी-आरती.. 168

१७. श्री गंगा-आरती.. 170

१८. श्रीसूक्तम्. 171

शनिवार

. शनिस्तोत्रम्. 172

. वन्दे सन्तं श्री हनुमन्तम्. 175

. जयतिमंगलागार. 176

. राम सुमिर राम सुमिर. 178

. शुद्ध ब्रह्म परात्पर राम. 180

. रामचन्द्र रघुवीर. 185

. खेलति मम हृदये. 185

. प्रेम मुदित मन से कहो.. 187

. पिब रे राम-रसम्. 188

१०. भज रे रघुवीरम्. 189

११. भज मन रामचरण सुखदाई. 192

१२. चेतः श्री रामम्. 194

१३. राम रतन धन पायो.. 195

१४. राम से कोई मिला दे. 197

१५. श्रीरामरक्षास्तोत्रम्. 198

१६. श्री हनुमान चालीसा.. 202

१७. संकटमोचन हनुमानाष्टक.. 204

१८. हनुमान् स्तुतिः... 206

१९. कलियुगकृत भगवत्स्तुतिः... 206

२०. श्री रामचन्द्र कृपालु. 208

२१. प्रातःस्मरणम्. 209

रविवार

. आदित्यहृदयम्. 212

. गायत्री-मन्त्र... 215

. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय . 216

. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १२. 218

. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १५. 220

. गीता महिमा.. 222

. श्री विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्. 223

. सूर्य-स्तुतिः... 243

. विष्णु-स्तोत्रम्. 243

१०. शान्ति-मन्त्र... 244

११. पुरुषसूक्तम्. 249

१२. नारायणसूक्तम्. 250

१३. खेलति पिण्डाण्डे... 251

१४. चिन्ता नास्ति किल. 252

१५. मानस संचर रे ब्रह्मणि... 254

१६. तद्वत् जीवत्वं ब्रह्मणि... 255

१७. मज गोविन्दम्. 257

१८. नमो आदिरूप. 260

१९. आदि बीज एकले. 261

२०. नहि रे नहि शंका.. 262

२१. सर्वं ब्रह्ममयम्. 263

२२. सब हैं समाना.. 265

२३. एक सार नाम. 265

२४. अठारह सद्गुण.. 265

२५. दिव्य जीवन. 266

२६. कोई-कोई जाने रे. 267

२७. रचा प्रभु. 268

२८. मन्त्र-पुष्पाणि... 268

२९. मा शुचः.. 269

३०. प्रभु-प्रार्थना.. 270

३१. दैव-प्रार्थना.. 271

३२. विश्व-प्रार्थना.. 271

३३. जगदीश-आरती.. 272

३४. आरती.. 273

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सोमवार

प्रार्थना और श्रीगणेशस्तोत्रम्

 

. 'मंगलं दिशतु मे विनायको' और 'जय गणेश'

 

श्लोक

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।

सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटियुगधारिणे नमः ।।

 

देशकालवस्तुपरिच्छेद से रहित, अनेक शरीर वाले, असंख्य हाथ, पैर, आँख, ऊरु तथा शिर वाले, नाना नाम वाले, अनन्त कोटि युगों के धारण करने वाले शाश्वत पुरुष को नमन हो, नमन हो।

 

श्लोक

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ।।

 

हे देवों के भी देव महादेव जी, तू ही मेरी माता है। तू ही मेरा पिता है। तू ही मेरा बन्धु है और तू ही मेरा सखा भी है। तू ही विद्या है। तू ही द्रव्य है और अधिक क्या कहें, मेरा सब-कुछ तू ही है।

 

श्लोक

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।

तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष महेश्वर ।।

 

हे महेश्वर। आप ही मुझ शरणागत के रक्षक है। आपके अतिरिक्त मेरी अन्य कोई गति नहीं है। अतः करुणा करके मेरी रक्षा कीजिए, मेरी रक्षा कीजिए।

 

 

 

 

मन्त्र

ॐ नमो नारायणाय ।

ॐ नमो भगवते रामचन्द्राय ।

ॐ श्री सद्गुरुभ्यो नमः ।

ॐ नमः शिवाय ।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

ॐ नमो भगवते शरवणभवाय ।

ॐ श्री पराशक्त्यै नमः ।

 

श्लोक

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ।

तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

 

वह (परमात्मा) हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करे। वह हम दोनों को साथ-साथ ही मोक्ष के आनन्द का उपभोग कराये । हम दोनों की अध्ययन की हुई विद्या तेजोमयी हो। हम दोनों परस्पर कभी द्वेष न करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

 

श्लोक

मंगलं दिशतु मे विनायको, मंगलं दिशतु मे सरस्वती ।

मंगलं दिशतु मे महेश्वरी, मंगलं दिशतु मे सदाशिवः ।।१।।

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।२।।

 

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ।।३।।

 

लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु !

 

श्री गणेश हमारा मंगल करें, श्री सरस्वती देवी हमारा मंगल करें, श्री महेश्वरी देवी हमारा मंगल करें, श्री सदाशिव हमारा मंगल करें ।।१

 

गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं. गुरु भगवान्, शिव हैं, गुरु ही परब्रह्म हैं, उन गुरु को नमस्कार ।।२

 

हे पार्वती देवी, हे शिवपत्नी, सम्पूर्ण पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, मंगल प्रदान करने वाली, भक्तों की रक्षा करने वाली, तीन नेत्रों वाली माँ दुर्गे ! तुम्हें नमस्कार है ।।३

 

सम्पूर्ण विश्व सुखी हो।

 

कीर्तन

 

जय गणेश जय गणेश जय गणेश पाहि माम्

श्री गणेश श्री गणेश श्री गणेश रक्ष माम् ।।१

 

शरवणभव शरवणभव शरवणभव पाहि माम् ।

कार्तिकेय कार्तिकेय कार्तिकेय रक्ष माम् ।।२

 

जय सरस्वति जय सरस्वति जय सरस्वति पाहि माम् ।

श्री सरस्वति श्री सरस्वति श्री सरस्वति रक्ष माम् ।।३

 

जय गुरु शिव गुरु हरि गुरु राम ।

जगद्गुरु परं गुरु सद्गुरु श्याम ।।४

 

ॐ आदिगुरु अद्वैतगुरु आनन्दगुरु ॐ ।

चिद्गुरु चिद्धन गुरु चिन्मय गुरु ॐ ।।५

 

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।६

 

नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय ।

नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय ।।७

 

ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो नारायणाय ।

ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो नारायणाय ।।८ ।।

 

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

ॐ नमो भगवते रामचन्द्राय ।।९ ।।

 

आंजनेय आंजनेय आंजनेय पाहि माम् ।

हनुमन्त हनुमन्त हनुमन्त रक्ष माम् ।।१०

 

दत्तात्रेय दत्तात्रेय दत्तात्रेय पाहि माम् ।

दत्तगुरु दत्तगुरु दत्तगुरु रक्ष माम् ।।११

 

शिवानन्द शिवानन्द शिवानन्द पाहि माम् ।

शिवानन्द शिवानन्द शिवानन्द रक्ष माम् ।।१२

 

गंगारानी गंगारानी गंगारानी पाहि माम् ।

भागीरथी भागीरथी भागीरथी रक्ष माम् ।।१३

 

ॐ शक्ति ॐ शक्ति ॐ शक्ति पाहि माम् ।

ब्रह्मशक्ति विष्णुशक्ति शिवशक्ति रक्ष माम् ।।१४

 

ॐ आदिशक्ति महाशक्ति पराशक्ति पाहि माम् ।

इच्छाशक्ति क्रियाशक्ति ज्ञानशक्ति रक्ष माम् ।।१५

 

राजराजेश्वरि राजराजेश्वरि राजराजेश्वरी पाहि माम् ।

त्रिपुरसुन्दरि त्रिपुरसुन्दरि त्रिपुरसुन्दरि रक्ष माम् ।।१६

 

ॐ तत्सत् ॐ तत्सत् ॐ तत्सत् ॐ ।

ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ ।।१७

 

श्‍लोक

गजाननं भूतगणाधिसेवितं

कपित्थजम्बूफलसार-भक्षणम् ।

उमासुतं शोकविनाशकारकं

नमामि विघ्नेश्वर-पाद-पंकजम् ।।१

 

श्लोक

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति

द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं

भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ।।२

 

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ।।३

 

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।

तस्मात् कारुण्य-भावेन रक्ष रक्ष महेश्वर ।।४

 

. मुदा करात्तमोदकम् (शंकराचार्यकृत)

 

श्लोक

 

ॐ ॐ ॐकाररूपं त्र्यहमिति च परं यत्स्वरूपं तुरीयम् ।

त्रैगुण्यातीतनीलं कलयति मनसः चारुसिन्दूरमूर्तिम् ।।

योगीन्द्रैः ब्रह्मरन्ध्रः सकलगुणमयं श्री हरेन्द्रेण संगम् ।

गं गं गं गं गणेशं गजमुखमभितो व्यापकं चिन्तयन्ति ।।

 

अपने मन में सोचो कि मैं वही ओंकार-रूप हूँ जो परम है, तुरीय-स्वरूप है, त्रिगुणातीत है तथा आभायुक्त और सुन्दर है। योगिश्रेष्ठ अपने ब्रह्मरन्ध में गजमुख गणेश का ध्यान किया करते हैं, जो सम्पूर्ण सद्गुणों से पूर्ण हैं, शिव और इन्द्र के सहित हैं, जिनका बीजाक्षर 'गं' है और जो सर्वत्र व्यापक हैं।

 

गीत

 

मुदा करात्तमोदकं सदा विमुक्ति-साधकं,

कलाधरावतंसकं विचित्र-लोक-रक्षकम् ।

अनायकैकनायकं विनाशितेभ-दैत्यकं,

नताशुभ-प्रणाशकं नमामि तं विनायकम् ।।१

 

नतेतरातिभीकरं नवोदितार्क-भास्वरं,

नमत्सुरारि-निर्जरं नताधिकापदुद्धरम् ।

सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं,

महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ।।२

 

समस्त लोक-शंकरं निरस्त-दैत्यकुंजरं,

दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्र-मक्षरम् ।

कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरे यशस्कर,

मनस्करं नमस्कृतं नमस्करोमि भास्वरम् ।।३

 

अकिंचनार्ति-मार्जनं चिरन्तरोक्ति-भाजनं,

पुरारि-पूर्वनन्दनं सुरारि-गर्व-चर्वणम् ।

प्रपंच-नाश-भीषणं धनंजयादि-भूषणं,

कपोल-दानवारणं भजे पुराण-वारणम् ।।४

 

नितान्त कान्त-दन्तकं तमन्तकान्तकात्मजं,

अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तराय-कृन्तनम् ।

हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनं,

तमेकदन्तमेकमेव चिन्तयामि सन्ततम् ।।५

 

महागणेश-पंचरत्नमादरेण योऽन्वहं,

प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।

अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां,

समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ।।६

 

मैं उन गणेश को प्रणाम करता हूँ जो प्रसन्नता के साथ हाथ में मोदक धारण किये हुए हैं, मोक्ष के सदा दाता हैं, जिनके मस्तक पर अर्ध-चन्द्र है, जो विचित्र ढंग से लोक-रक्षण करते हैं, जहाँ कोई नायक न हो तो जो नायक हो जाते हैं, जिन्होंने गजासुर का संहार किया है और जो शरणागत लोगों के अमंगल दूर करते हैं ।।१

 

मैं उन परात्पर गणेश की शरण में सर्वदा जाता हूँ जो शत्रुओं के लिए महा-भयानक हैं, जिनकी कान्ति प्रातःकालीन सूर्य के समान है, जिन्हें देवता और राक्षस-सभी प्रणाम करते हैं, जो प्रणाम करने वालों को सारी विपत्तियों से बचाते हैं तथा देवताओं के, सारी सम्पत्ति के तथा हाथियों के स्वामी हैं और साक्षात् परमेश्वर भी हैं ।।२

 

मैं उन विनायक को प्रणाम करता हूँ जो सारे लोकों का कल्याण करने वाले हैं, जिन्होंने महान् राक्षसों का संहार किया है, जिनका पेट बड़ा है, जो उत्तम हैं और जो गजवदन हैं, शाश्वत हैं, कृपा, क्षमा, सन्तोष, कीर्ति, मान्यता आदि को देने वाले हैं और अत्यन्त तेजस्वी हैं ।।३

 

मैं उन सनातन गणेश जी का भजन करता हूँ जो दीन जनों का दुख दूर करते हैं, जो सनातन कहे जाने के योग्य हैं, जो भगवान् शिव के ज्येष्ठ पुत्र हैं, जो राक्षसों का गर्व चूर करते हैं, जो प्रलय-काल में अति-भयंकर हैं, जो धनंजय (सर्प) को आभूषण के रूप में धारण करते हैं और जिनके कपोल से मद-जल प्रस्रवित होता रहता है।।४

 

मैं उन एकदन्त विनायक का ही सदा चिन्तन करता हूँ जो काल के काल (शिव) के पुत्र हैं (शिव जी ने यम को जीता था), जिनके दाँत अत्यन्त प्रकाशमान और तीक्ष्ण हैं, जो अवर्णनीय रूपवान् हैं, अनन्त हैं, विघ्ननाशक हैं और जो योगियों के हृदय में सर्वदा निवास करते हैं ।।५

 

जो प्रतिदिन प्रातःकाल श्री गणेश जी का स्मरण करते हुए इस महागणेश-पंचक का भक्ति और श्रद्धापूर्वक पारायण करता है, उसे शीघ्र ही आरोग्य लाभ होगा, उसका पाप क्षय होगा, उसको विद्वत्ता, सुसन्तान, दीर्घायुष्य और अष्टसिद्धियों की प्राप्ति होगी ।।६

 

नामावली

 

जय गणेश जय गणेश जय गणेश पाहि माम् ।

श्री गणेश श्री गणेश श्री गणेश रक्ष माम् ।।

 

. गाइये गणपति जगवन्दन

(तुलसीदासकृत)

 

गाइये गणपति जगवन्दन ।

शंकर-सुवन भवानी-नन्दन ।।

 

सिद्धि-सदन गजवदन विनायक ।

कृपासिन्धु सुन्दर सबदायक ।।१

 

मोदक-प्रिय मुदमंगलदाता ।

विद्यावारिधि बुद्धिविधाता ।।२

 

माँगत तुलसिदास कर जोरे ।।

बसहि राम-सिय मानस मोरे ।।३

 

. श्री गणेश जी की आरती

 

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ।

माता जाकी पारवती पिता महादेवा ।।

 

एक दन्त दयावन्त चार भुजा धारी ।

माथे सिन्दूर सोहे मूसे की सवारी ।। (जय गणेश...)

 

अन्धन को आँख देत कोढि़न को काया।

बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया ।। (जय गणेश...)

पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा ।

लडुअन को भोग लगे सन्त करे सेवा ।। (जय गणेश...)

 

श्री शिव-स्तोत्रम्

. शिव-स्तुति

 

शान्तं पद्मासनस्थं शशिधरमुकुटं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रं,

शूलं वज्रं च खड्गं परशुमभयदं दक्षिणांगे वहन्तम् ।

नागं पाशं च घण्टां डमरुकसहितं चांकुशं वामभागे,

नानालंकारदीप्तं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि ।।१

 

वन्दे शम्भुमुमापतिं सुरगुरुं वन्दे जगत्कारणं,

वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनां पतिम् ।

वन्दे सूर्यशशांकवह्निनयनं वन्दे मुकुन्दप्रियं,

वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शंकरम् ।।२

 

मैं पार्वतीश का पूजन करता हूँ, जो शान्त हैं, जो पद्मासन में बैठे हैं; जिनका मुकुट चन्द्रमा से सुसज्जित है; जिनके पाँच मुख और तीन नेत्र हैं; जो शूल, वज्र और खड्ग को धारण किये हुए हैं; जिनके दाहिने भाग में अभयदान देने वाला परशु तथा शिर और कन्धे पर सर्प हैं, जिनके वाम भाग में घण्टा, डमरू और त्रिशूल स्थित हैं, जो नाना प्रकार के अलंकारों से प्रदीप्त और स्फटिक-मणि के समान प्रकाशित हैं ।।१

 

शम्भु, उमापति, देवों के गुरु तथा जगत् के कारणभूत शंकर की मैं वन्दना करता हूँ। नाग जिनका आभूषण है, जो मृगचर्म धारण करते हैं, पशुपति हैं, उन शंकर की मैं वन्दना करता हूँ। सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं; जो विष्णु के प्रिय हैं, उन शंकर की मैं बन्दना करता हूँ। जो भक्तों के आश्रय हैं, वरदान देने वाले हैं, कल्याणकारी हैं, उन शंकर की में वन्दना करता हूँ।।२

 

. लिंगाष्टकम्

 

श्लोक

 

तस्मै नमः परमकारण कारणाय

दीप्तोज्वलज्वलित पिंगललोचनाय ।

नागेन्द्रहार कृत कुण्डल भूषणाय

ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नमः शिवाय ।।

 

गीत

 

ब्रह्ममुरारि-सुरार्चित लिंगं,

निर्मल-भाषित-शोभित-लिंगम् ।

जन्मज-दुःख-विनाशक-लिंगं,

तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ।। १

 

देवमुनि-प्रवरार्चित लिंगं,

कामदहं करुणाकर-लिंगम् ।

रावण-दर्प-विनाशन-लिंगं,

तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ।। २

 

सर्व-सुगन्धि-विलेपित-लिंगं,

बुद्धि-विवर्द्धन-कारण-लिंगम् ।

 सिद्ध-सुरासुर-वन्दित-लिंगं,

तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ।। ३

 

कनक-महामणि-भूषित-लिंगं,

फणिपति-वेष्टित-शोभित-लिंगम् ।

दक्षसुयज्ञ-विनाशन-लिंगं,

तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ।। ४

 

कुंकुम-चन्दन-लेपित-लिंग,

पंकज-हार-सुशोभित-लिंगम् ।

संचित-पाप-विनाशन-लिंग,

तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ।। ५

 

देवगणार्चित-सेवित-लिंगं,

भावैर्भक्तिभिरेवच लिंगम् ।

दिनकर-कोटि-प्रभाकर-लिंग,

तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ।। ६

 

अष्टदलोपरि-वेष्टित-लिंगं,

सर्वसमुद्भव-कारण-लिंगम् ।

अष्टदरिद्र-विनाशित-लिंग,

तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ।। ७

 

सुरगुरु-सुरवर-पूजित-लिंगं,

सुरवन-पुष्प-सदार्चित-लिंगम् ।

परात्परं परमात्मक लिंग,

तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ।। ८

 

लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिव सन्निधौ ।

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सहमोदते ।। ९

 

लिंग जो भगवान् शिव का प्रतीक है, ब्रह्मा, विष्णु तथा देवों के द्वारा पूजित है। वह निर्मल, प्रकाशमान तथा शोभित है। वह जन्म के दुखों को नष्ट करने वाला है। मैं उस सदाशिव लिंग को नमस्कार करता हूँ।।१

 

वह लिंग देवता तथा मुनियों द्वारा पूजित है। वह काम का विनाशक है तथा करुणा-सागर है। उसने रावण के दर्प को विनष्ट किया। मैं उस सदाशिव लिग को नमस्कार करता हूँ।।२

 

वह लिंग सब प्रकार की सुगन्धियों से लेपित है, वह बुद्धि की वृद्धि का कारण है। वह सिद्धों, देवताओं तथा असुरों द्वारा वन्दित है। मैं उस सदाशिव लिंग को नमस्कार करता हूँ।।३

 

वह लिंग स्वर्ण तथा महामणि से विभूषित है। वह शेषनाग से वेष्टित हो कर शोभायमान हो रहा है। उसने दक्ष के यज्ञ को विध्वंस किया है। मैं उस सदाशिव लिंग को नमस्कार करता हूँ ।।४

 

वह लिंग कुंकुम तथा चन्दन से लेपित है। वह पंकज-हार से सुशोभित है। वह सारे संचित पापों का विनाशक है। मैं उस सदाशिव लिंग को नमस्कार करता हूँ।।५

 

उस लिंग की सेवा देवता तथा भूत गण करते हैं। वह भावपूर्ण भक्ति के द्वारा प्रसन्न होता है। उसमें करोड़ों सूर्य के समान प्रकाश है। मैं उस सदाशिव लिंग को नमस्कार करता हूँ।।६

 

वह अष्टदल कमल पर आसीन है। वह सबकी उत्पत्ति एवं वृद्धि का कारण है। वह आठ प्रकार की दरिद्रता को नष्ट करता है। मैं उस सदाशिव लिंग को नमस्कार करताहूँ।।७

 

वह लिंग देवताओं के गुरु बृहस्पति तथा श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजित है। वह देवताओं के वनों से लाये हुए पुष्पों द्वारा पूजित है। वह परात्पर तथा परमात्मा है। मैं उस सदाशिव लिंग को नमस्कार करता हूँ।।८

 

. द्वादश ज्योतिर्लिंगस्तोत्रम्

 

सौराष्ट्र सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् ।

उज्जयिन्यां महाकालं ओंकारममलेश्वरम् ।।१

 

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम् ।

सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ।।२

 

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे ।

हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ।।३

 

एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः ।

सप्त जन्म कृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ।।४

. साम्ब गौरिवर

(सन्त केशवदास कृत)

 

साम्ब गौरिवर शंकर शिव शंकर।

अम्बिका मनोहर शंकर शिव शंकर ।।१

 

त्रिनेत्रधारि शंकर शिव शंकर ।

त्रिशूलधारि शंकर शिव शंकर ।।२

 

रजताद्रिवास शंकर शिव शंकर ।

भक्तहृदयवास शंकर शिव शंकर ।।३

 

जटामुकुटधर शंकर शिव शंकर ।

गंगाधर हर शंकर शिव शंकर ।।४

 

नन्दिवाहन शंकर शिव शंकर ।

पार्वतीरमण शंकर शिव शंकर ।।५

 

दक्षिणामूर्ति शंकर शिव शंकर ।

सद्गुरुमूर्ति शंकर शिव शंकर ।।६

 

काशिविश्वनाथ शंकर शिव शंकर ।

दासकेशवनुत शंकर शिव शंकर ।।७

 

 

 

 

 

 

 

. साम्बसदाशिव भोलानाथ

(सन्त केशवदास कृत)

 

साम्बसदाशिव भोलानाथ ।

शम्भो शंकर गौरीनाथ ।।१

 

नन्दिवाहन सुन्दरांग हर,

कन्दर्पारि भोलानाथ ।

चन्द्रचूडधर शंकर सुखकर,

इन्द्रादिविनुत गौरीनाथ ।।२

 

शूलडमरुधर कालकालहर,

फालनेत्र शिव भोलानाथ ।

बालेन्दु फाल व्यालांगरुण्ड,

मालाधर हर गौरीनाथ ।।३

 

जटामुकुटधर घट घट व्यापक,

नटराजा शिव भोलानाथ ।

कुटिल कूल खल दैत्य संहारि,

नटवर शुभकर गौरीनाथ ।।४

 

शिव शिव भव भव नीलकण्ठ शिव,

केशवप्रिय शिव भोलानाथ ।

शिवभव भवशिव भवभयमोचन,

दास केशवनुत गौरीनाथ ।।५

१०. महामृत्युंजय-मन्त्र

 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ।।

 

 

अन्वयार्थ

 

ॐ (प्रणव मन्त्र; हे परमात्मा) त्र्यम्बकं (तीन लोचन वाले भगवान् शंकर को; सूर्य, चन्द्र और कामदेव को जला कर भस्म करने वाली अग्नि के समान त्रिलोचनधारी महादेव को; महाकालेश्वर को) सुगन्धिं (सुवासित, मधुर गन्ध वाला, संस्कृति वाला ऐसे त्र्यम्बक को) पुष्टिवर्धनं (पोषण अर्थात् दैवी अनुग्रह अर्थात् कृपावृष्टि करने वाले त्र्यम्बक को) यजामहे (हम भजते हैं; हम प्रार्थना करते हैं कि) उर्वारुकं (ककड़ी; लता का फल; परिपक्व फल की) इव (तरह; भाँति) मृत्योः (मृत्यु के; देह के; देहरूपी लता के) बन्धनात् (बन्धन से) मुक्षीय (मुक्त करो; मोक्ष करो) मा (मुझे नहीं) अमृतात् (अमरत्व के लिए; अमृत आत्मा से)।

 

शब्दार्थ

 

ॐ मैं त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव की उपासना करता हूँ जो सुगन्धिमय हैं तथा जो सारे प्राणियों को पुष्टि प्रदान करते हैं। वे मुझे अमृतत्व प्रदान करने के लिए मृत्यु से उसी प्रकार मुक्त करें जिस प्रकार ककड़ी का फल अपनी लता के बन्धन से छुटकारा प्राप्त करता है।

 

(कोई-कोई भाष्यकार 'मा अमृतात्' का अर्थ ऐसा भी लगाते हैं कि हे महेश ! तू हमें मृत्यु के अर्थात् देह के बन्धन से मुक्त कर, किन्तु आत्मा के सनातन सम्बन्ध से नहीं।)

 

(१) यह महामृत्युंजय मन्त्र एक संजीवनी मन्त्र है। आज के दिनों में जब कि जीवन बहुत ही जटिल हो चुका है, जब दुर्घटनाएँ हर दिन हुआ करती हैं, इस मन्त्र के द्वारा सर्पदश, बिजली, मोटर-दुर्घटना तथा अन्य सारे प्रकार की दुर्घटनाओं से जीवन की रक्षा होती है। इसके अतिरिक्त यह मन्त्र रोगों का भी निवारण करता है। भाव, श्रद्धा तथा भक्ति के साथ इस मन्त्र के जप द्वारा उन रोगों का भी निवारण हो जाता है जिनको कि डाक्टरों ने असाध्य बतला दिया है। यह सभी व्याधियों का निवारक है। इस मन्त्र से मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है।

 

(२) यह मोक्ष का भी मन्त्र है। यह भगवान् शिव का मन्त्र है। यह दीर्घायु, शान्ति, धन, सम्पत्ति, तुष्टि, पुष्टि तथा मोक्ष प्रदान करता है।

 

 

११. जटाटवी-गलज्जल-प्रवाहपावितस्थले

(शिवताण्डवस्तोत्रम्) (रावणकृतं)

 

श्लोक

 

शान्तं पद्मासनस्थं शश-धर-मुकुटं पंच-वक्त्रं त्रिनेत्रं

शूलं वज्र च खड्गं परशुमभयदं दक्षिणांगे वहन्तम् ।

नागं पाशं च घण्टां डमरुक-सहितं चांकुशं वामभागे

नानालंकारदीप्तं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि ।।

 

शान्त, पद्मासनस्थित (पद्यासन पर बैठे हुए), चन्द्रमुकुट वाले, त्रिलोचन, दाहिने भाग में त्रिशूल, वज्र, तलवार और अभय देने वाले परशु को धारण करने वाले और वाम भाग में नाग, पाश, घण्टा और डमरू के साथ अंकुश धारण करने वाले, तरह-तरह के अलंकारों से शोभायमान, स्फटिकमणि की तरह कान्ति वाले, ऐसे पार्वतीपति शिवजी को मैं प्रणाम करता हूँ।

 

स्तोत्र

 

जटाटवी-गलज्जलप्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंग-तुंग-मालिकाम् ।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं

चकार चण्ड-ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ।।१

 

जटा-कटाहसम्भ्रम-भ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-

विलोल-वीचि-वल्लरी विराजमान-मूर्द्धनि ।

धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्ट-पावके

किशोर-चन्द्र-शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ।।२

 

धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-विलास-बन्धु-बन्धुर-

स्फुरद्दिगन्त-सन्तति-प्रमोद-मान-मानसे ।

कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि

क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ।।३

 

जटा भुजंग-पिंगल-स्फुरत्फणा-मणि-प्रभा-

कदम्ब-कुंकुम-द्रव-प्रलिप्त-दिग्वधू-मुखे ।

मदान्ध-सिन्धुर-स्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदमद्भुतं विभर्तु भूत-भर्तरि ।।४

 

सहस्र-लोचन-प्रभृत्यशेष-लेख-शेखर-

प्रसून-धूलि-धोरणी-विधूसरांघ्रि-पीठ-भूः ।

भुजंग-राज-मालया निबद्ध-जाट-जूटकः

श्रियै चिराय जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः ।।५

 

ललाट-चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिंगभा-

निपीत-पंच-सायकं नमन्निलिम्प- नायकम्।

सुधा-मयूख-लेखया विराजमान-शेखरं

महा-कपालि-सम्पदे शिरोजटालमस्तु नः ।।६

 

कराल-फाल-पट्टिका-धगद्धगद्धगज्यल-

द्धनंजयाहुतीकृत-प्रचण्ड-पंचसायके ।

धराधरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्र-चित्र-पत्रक-

प्रकल्पनैक-शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ।।७

 

नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुर-

त्कुहू-निशीथिनी-तमः-प्रबन्ध-बन्ध-कन्धरः ।

निलिम्प-निर्झरी-धर स्तनोतु कृत्ति-सिन्धुरः

 कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगधुरन्धरः ।।८

 

प्रफुल्ल-नील-पंकज-प्रपंच-कालिमा-प्रभा-

वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचि-प्रबन्ध-कन्धरम् ।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ।।९

 

अखर्व-सर्व-मंगला-कला-कदम्ब-मंजरी

रस-प्रवाह-माधुरी-विजृम्भणा-मधुव्रतम् ।

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं

गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ।।१०

 

जयत्वदन-विभ्रम-भ्रमद्-भुजंगम-श्वस-

द्विनिर्गम-क्रम-स्फुरत्कराल-फाल-हव्यवाड् ।

धिमिद्धिमिद्धिमिद्-ध्वनन्मृदंग-तुंग-मंगल-

ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित-प्रचण्ड-ताण्डवः शिवः ।।११

 

दृषद्विचित्र-तल्पयोर्भुजंग मौक्तिकस्रजो-

र्गरिष्ठ-रत्न-लोष्टयोसुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविन्द-चक्षुषोः प्रजा-महीमहेन्द्रयोः

सम-प्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ।।१२

 

कदा निलिम्प-निर्झरी-निकुंज-कोटरे वसन्

विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थ-मंजलिं वहन् ।

विलोल-लोल-लोचनो ललाम-फाल-लग्नकः

शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ।।१३

 

इमं हि नित्यमेव-मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं

पठन् स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् ।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं

विमोचनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम् ।।१४

 

पूजावसान-समये दशवक्त्र-गीतं

यः शम्भु-पूजन-परं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथ-गजेन्द्र-तुरंग-युक्तां

लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ।।१५

 

जिसने जटारूपी अटवी (वन) से निकली हुई गंगा जी के गिरते हुए प्रवाहों से पवित्र किये गये गले में सर्पों की लटकती हुई विशाल माला को धारण कर डमरू के डमडम शब्दों से मण्डित प्रचण्ड ताण्डव (नृत्य) किया; वह शिव हमारे कल्याण का विस्तार करे! ।।१

 

जिसका मस्तक जटारूपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई गंगा की चंचल तरंग- लताओं से सुशोभित हो रहा है, ललाट की अग्नि धक् धक् जल रही है, शिर पर बालचन्द्रमा विराजमान है, उस (भगवान् शिव) में मेरा निरन्तर अनुराग हो !।।२

 

गिरिराज किशोरी पार्वती के विलासकालोपयोगी शिरोभूषण से समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देख जिसका मन आनन्दित हो रहा है, जिसकी निरन्तर कृपादृष्टि से कठिन आपत्ति का भी निवारण हो जाता है, ऐसे किसी दिगम्बर-तत्त्व में मेरा मन विनोद करे ! ।।३

 

जिसके जटा-जूटवर्ती सर्पों के फणों की मणियों का फैलता हुआ पिंगल प्रभापुंज दिशारूपिणी अंगनाओं के मुख पर कुंकुमराग का अनुलेपन कर रहा है, मतवाले हाथी के हिलते हुए चमड़े का उत्तरीय वस्त्र (चादर) धारण करने से स्निग्ध वर्ण हुए उस भूतनाथ में मेरा चित्त अद्भुत विनोद करे ! ।।४

 

जिसकी चरणपादुकाएँ इन्द्र आदि समस्त देवताओं के (प्रणाम करते समय) मस्तकवर्ती कुसुमों की धूलि से धूसरित हो रही हैं, नागराज (शेष) के हार से बंधी हुई जटा वाला वह भगवान् चन्द्रशेखर मेरे लिए चिरस्थायिनी सम्पत्ति का साधक हो ।।५

 

जिसने ललाटबेदी पर प्रज्वलित हुई अभि की चिनगारियों के तेज से कामदेव को नष्ट कर डाला था, जिसे इन्द्र नमस्कार किया करते हैं, चन्द्रमा की कला से सुशोभित मुकुट वाला वह (श्री महादेव का) उन्नत विशाल ललाट वाला जटा-जटित मस्तक हमारी सम्पत्ति का साधक हो ।।६

 

जिसने अपने विकराल फालपट्ट पर धक् धक् जलती हुई अग्रि में प्रचण्ड कामदेव को हवन कर दिया था, गिरिराज किशोरी के स्तनों पर पत्र-भंग रचना करने वाले एकमात्र कारीगर, उस भगवान् त्रिलोचन में मेरी धारणा लगी रहे ।।७

 

जिसके कण्ठ में नवीन मेघमाला से घिरी हुई अमावस्या की अर्धरात्रि के समय फैलते हुए दुरूह अन्धकार के समय श्यामता अंकित है, जो गजचर्म लपेटे हुए है, वह' संसार-भार को धारण करने वाला, चन्द्रमा (के सम्पर्क) से मनोहर कान्तिवाला भगवान् गगाधर मेरी सम्पत्ति का विस्तार करे ।।८

 

जिसका कण्ठदेश खिले हुए नीलकमल समूह का, श्यामप्रभा का अनुकरण करने वाली हिरणी की-सी छवि वाले चिह्न से सुशोभित है तथा जो कामदेव, त्रिपुर, भव (संसार), दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी उच्छेदन करने वाला है, उसे मैं भजता हूँ ।।९

 

जो अभिमान-रहित पार्वती की कलारूप कादम्बरी के मकरन्दस्रोत की बढ़ती हुई माधुरी का पान करने वाला मधुप है तथा कामदेव, त्रिपुर, भव, दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी उच्छेदन करने वाला है, उसे मैं भजता हूँ ।।१०

 

जिसके मस्तक पर बड़े वेग के साथ घूमते हुए भुजंग के फुफकारने से ललाट की भयंकर अग्नि क्रमशः धधकती हुई फैल रही है, धिमि-धिमि बजते हुए मृदंग के गम्भीर मंगलघोष के क्रमानुसार जिसका प्रचण्ड ताण्डव हो रहा है, उस भगवान् शंकर की जय हो! ।।११

 

पत्थर और सुन्दर बिछौनों में, साँप और मुक्ता की माला में, बहुमूल्य रत्न तथा मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु पक्ष में, तृण और कमललोचना तरुणी में, प्रजा और पृथ्वी के महाराज में समान भाव रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा ? ।।१२

 

सुन्दर ललाट वाले चन्द्रशेखर में दत्तचित्त हो अपने कुविचारों को त्याग कर गंगा जी के तटवर्ती निकुंज के भीतर रहता हुआ शिर पर हाथ जोड़, डबडबाई हुई विह्वल आँखों से शिव-मन्त्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊँगा ? ।।१३

 

जो मनुष्य इस प्रकार से उक्त इस उत्तमोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण और वर्णन करता रहता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही सुरगुरु श्री शंकर जी की अच्छी भक्ति प्राप्त कर लेता है, वह विरुद्ध गति को प्राप्त नहीं होता है; क्योंकि श्री शिव जी का अच्छी प्रकार का चिन्तन प्राणिवर्ग के मोह का नाश करने वाला है ।।१४

 

सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर रावण के गाये हुए इस शम्भु-पूजन-सम्बन्धी स्तोत्र का जो पाठ करता है, भगवान् शंकर उस मनुष्य को रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर रहने वाली सम्पत्ति देते हैं ।।१५

 

नामावली

साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव,

साम्ब सदाशिव, साम्ब शिवोम् ।

१२. अतिभीषणकटुभाषण

 

श्लोक

 

कृपा-समुद्रं सुमुखं त्रिनेत्रं जटा-धरं पर्वतनन्दिनीशम् ।

सदाशिवं रुद्रमनन्त-रूपं चिदम्बरेशं हृदि भावयामि ।।

 

मैं अपने हृदय में उस चिदम्बरेश का स्मरण करता हूँ जो दयासागर है, सुन्दर मुख वाला है, त्रिनयन है, जटाधारी है, जिसके पार्श्व में पार्वती है, जो सदाशिव है, रुद्र है तथा अनेक रूप है।

 

गीत

 

अति-भीषण-कटु-भाषण-यम-किंकर-पटली-

कृत-ताडन-परिपीडन-मरणागम-समये ।

उमया सह मम चेतसि यम-शासन निवसन्

हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ।।१

 

असदिन्द्रिय-विषयोदय-सुख-सत्कृत-सुकृतेः

पर-दूषण-परिमोक्षण-कृत-पातक-विकृतेः ।

 

शमनान्तक भव-कानन-निरतेर्भव शरणं

हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ।।२

 

विषयाभिध-बलिशायुध-पिशितायित-सुखतो

मकरायित-गति-संस्मृति-कृत-साहस-विपदम् ।

परिलालय परिपालय परितापित-मनिशं

हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ।।३

 

दयिता मम दुहिता मम जननी मन जनको

मम कल्पित-मति-सन्तति-मरु-भूमिषु निरतम् ।

गिरिजा-सख जनितासुख-वसतिं कुरु सुखिनं

हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ।।४

जनि-नाशन मृति-मोचन शिव-पूजन-निरते

अभितोदृशमिदमीदृशमहमावह इति हा ।

गज कच्छप जनिताश्रम विमलीकुरु सुमतिं

हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ।।५

 

त्वयि तिष्ठति सकल-स्थिति-करणात्मनि हृदये

वसुमार्गण-कृपणेक्षण मनसा शिव-विमुखम् ।

अकृताह्निकमसु-पोषकमवताद् गिरि-सुतया

हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ।।६

 

पितरावतिसुखदाविति शिशुना कृत-हृदयौ

शिवया हत-भयके हदि जनितं तव सुकृतम् ।

इति मे शिव हृदयं भव भवतात्तव दयया

हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ।।७

 

शरणागत-मरणाश्रित-करुणामृत-जलधे

शरणं तव चरणौ शिव मम संसृति-वसतेः ।

परचिन्मय जगदामय-भिषजे नतिरववात्

हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ।।८

 

विविधाधिभिरतिभीतिभिरकृताधिक-सुकृतं

शतकोटिषु नरकादिषु हत-पातक-विवशम्।

मृड मामव सुकृतीभव शिवया सह कृपया

हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ।।९

 

कलि-नाशन गरलाशन कमलासन-विनुत

कमला-पति-नयनार्चित-करुणाकृति-चरण ।

करुणाकर मुनि-सेवित भव सागर हरण

हर शंकर शिव शंकर हर मे हर दुरितम् ।।१०

 

मरण-समय में जब यमदूत आ कर अत्यन्त भीषण और कठोर बचन से मुझे पीड़ा देंगे और पीटेंगे तब, हे यम का शासन करने वाले ! तू माता पार्वती सहित मेरे चित्त में विराजमान रह। हे हर, हे शंकर, हे शिव, मेरे पाप दूर कर ।।१

 

मैंने अपने जीवन में दुष्ट इन्द्रिय-विषय-भोग को ही पुण्य समझा, दूसरों की निन्दा की, इस प्रकार के कई पाप किये हैं। संसार-रूपी कानन में ही रमता रहा हूँ। यम का नाश करने वाले हे शंकर, मुझे अपनी शरण दे। हे हर, हे शंकर, हे शिव, मेरे पाप दूर कर ॥२

 

जिस प्रकार मछुआरे के काँटे में लगे मांस के टुकड़े को खाने की इच्छा से मछली खुद काँटे में फँस जाती है, उसी प्रकार इन्द्रियों के अनुराग से मैं जन्म-मरण के चक्र में फँस गया हूँ। हे परम दयालु शंकर, सदा सन्तप्त रहने वाले मुझको सहारा दे। हे हर, हे शंकर, हे शिव, मेरे पाप दूर कर ।।३

 

मैंने अपनी बुद्धि की कल्पना से मान लिया कि यह मेरी पत्नी है, बेटी है, मेरी माँ है, मेरा पिता है। उसी मरुभूमि में फँस गया हूँ। हे पार्वतीरमण, मुझे सच्चा सुख प्रदान कर। हे हर, हे शंकर, हे शिव, मेरे पाप दूर कर ।।४

 

जन्म-मरण का नाश करने वाले, गजासुर और कछुए को आराम देने वाले शिव! चारों ओर भटकने वाले, संसार के युद्ध में पड़े हुए मुझे सम्मति दे, शिवपूजन में लगने की बुद्धि दे। हे हर, हे शंकर, हे शिव, मेरे पाप दूर कर ।।५

 

हे पार्वतीश, हे करुणा-सागर, सबके हृदय में तेरे रहते हुए भी मैं धन कमाने और कृपण दृष्टि से जीने में तुझसे विमुख हो गया हूँ। कभी नित्य-कर्म नहीं किया। तू मेरी रक्षा कर। हे हर, हे शंकर, हे शिव, मेरे पाप दूर कर।।६

 

बच्चों को यह विश्वास रहता है कि माता-पिता उनका भला करते हैं और सब प्रकार का सुख देते हैं। अतः हे शिव! मैं भी तेरी कृपा से यह आशा रखूँ कि तू और माँ गौरी-दोनों सदा मेरे चित्त में निवास करेंगे और जन्म-मृत्यु के भय से मुझे मुक्त कर सारे आनन्द प्रदान करेंगे। हे हर, हे शंकर, हे शिव, मेरे पाप दूर कर ।।७

 

हे शरणागतरक्षक, आश्रितों के लिए करुणामृत के सागर, संसार में फँसे हुए मेरे लिए तेरे चरण ही शरण हैं। तुझे प्रणाम । तू चिन्मय है, जगत्-रूपी रोग का औषध है। हे हर, हे शंकर, हे शिव, मेरे पाप दूर कर ।।८

 

कई प्रकार की चिन्ताओं तथा भयों के कारण मैं अधिक पुण्य-कर्म नहीं कर सका । भयंकर पातकों के कारण करोड़ों नरक भोगता रहा हूँ। हे शिव, पार्वती सहित तू मेरी रक्षा कर, मुझे पुण्यवान् बना। हे हर, हे शंकर, हे शिव, मेरे पाप दूर कर ।।९

 

हे कलि का नाश करने वाले, विष निगलने वाले, ब्रह्मा से नमस्कृत, विष्णु के नेत्रों द्वारा पूजित, तेरे चरण करुणामय हैं। तू करुणा-सागर है, मुनियों से सेवित है, भवसागर को दूर करने वाला है। हे हर, हे शंकर, हे शिव, मेरे पाप दूर कर ।।१०

 

नामावली

हर हर शंकर शिव शिव शंकर ।

हर हर हर हर मे दुरितम् ।।

१३. बिल्वाष्टकम्

 

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम् ।

त्रिजन्मपाप-संहारमेकबिल्वं शिवार्पणम् ।।१

 

त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च ह्यच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः ।

शिवपूजां करिष्यामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ।।२

 

अखण्डबिल्वपत्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे ।

शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्यो ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ।।३

 

शालिग्रामशिलामेकां विप्राणां जातु अर्पयेत् ।

सोमयज्ञ-महापुण्यमेकबिल्वं शिवार्पणम् ।।४

 

दन्तिकोटिसहस्राणि वाजपेयशतानि च ।

कोटिकन्या-महादानमेकबिल्वं शिवार्पणम् ।।५

लक्ष्म्याः स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम् ।

बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि होकबिल्वं शिवार्पणम् ।।६

 

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् ।

अघोरपापसंहारमेकबिल्वं शिवार्पणम् ।।७

 

मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे ।

अग्रतः शिवरूपाय होकबिल्वं शिवार्पणम् ।।८

 

बिल्वाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।

सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात् ।।९ ।।

 इति बिल्वाष्टकं सम्पूर्णम् ।।

 

१४. श्री शिवमानसपूजा

 

ॐ श्रीगणेशाय नमः

 

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं

नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदांकितं चन्दनम् ।

जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा

दीपं देव दयानिधे पशुपते हत्कल्पितं गृह्यताम् ।।१

 

सौवर्ण मणिखण्डरलरचिते पात्रे घृतं पायसं

भक्ष्यं पंचविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।

शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्वलं

ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ।।२

 

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं

वीणाभेरिमृदंगकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा ।

साष्टांगं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया

संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ।।३

 

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं

पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।

संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो

यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ।।४

 

इत्येवं हरपूजनं प्रतिदिनं यो वा त्रिसन्ध्यं पठेत्

सेवाश्लोकचतुष्टयं प्रतिदिनं पूजा हरेर्मानसि ।

सोऽयं सौख्यमवाप्नुयाद् द्युतिधरं साक्षाहोर्दर्शनं

व्यासस्तेन महावसानसमये कैलासलोकं गतः ।।५

 

करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा

श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् ।

विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व

जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ।।५ ।।

 इति श्रीशिवमानसपूजा समाप्तम् ।।

१५. शिवपंचाक्षरस्तोत्रम्

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय

भस्मांगरागाय महेश्वराय ।

नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय

तस्मै 'न'-काराय नमः शिवाय ।।१

 

मन्दाकिनी-सलिल-चन्दन-चर्चिताय

नन्दीश्वर-प्रमथनाथ-महेश्वराय ।

मन्दारपुष्प-बहुपुष्प-सुपूजिताय

तस्मै 'म' -काराय नमः शिवाय ।।२

 

शिवाय गौरीवदनारविन्द-

सूर्याय दक्षाऽध्वर-नाशकाय ।

श्री नीलकण्ठाय वृषध्वजाय

तस्मै 'शि' -काराय नमः शिवाय ।।३

 

वसिष्ठ-कुम्भोद्भव-गौतमार्य-

मुनीन्द्र-देवाऽर्चित-शेखराय ।

चन्द्रार्क-वैश्वानर-लोचनाय

तस्मै 'व'-काराय नमः शिवाय ।।४

 

यक्षस्वरूपाय जटाधराय

पिनाकहस्ताय सनातनाय ।

दिव्याय देवाय दिगम्बराय

तस्मै 'य'-काराय नमः शिवाय ।।५

 

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ।।६ ।।

इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं शिवपंचाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

१६. शिवषडक्षरस्तोत्रम्

 

ॐकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः ।

कामदं मोक्षदं चैव 'ॐ' -काराय नमो नमः ।।१

 

नमन्ति ऋषयो देवा नमन्त्यप्सरसां गणाः ।

नरा नमन्ति देवेशं 'न' -काराय नमो नमः ॥२

 

महादेवं महात्मानं महाष्यानं परायणम् ।

महापापहरं देवं 'म'-काराय नमो नमः ।।३

 

शिवं शान्तं जगन्नाथं लोकानुग्रहकारकम् ।

शिवमेकपदं नित्यं 'शि' -काराय नमो नमः ।।४

 

वाहनं वृषभो यस्य वासुकिः कण्ठभूषणम् ।

वामे शक्तिधरं देवं 'व' -काराय नमो नमः ।।५

 

यत्र यत्र स्थितो देवः सर्वव्यापी महेश्वरः ।

यो गुरुः सर्वदेवानां 'य' -काराय नमो नमः ।।६

 

षडक्षरमिदं स्तोत्रं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।

 शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ।।७

१७. दारिद्र्य-दहन-शिवस्तोत्रम्

 

विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय

कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय ।

कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय

दारिद्रय-दुःखहरणाय नमः शिवाय ।।१

 

गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय

कालान्तकाय भुजगाधिपकंकणाय ।

गंगाधराय गजराज-विमर्दनाय

दारिद्रय-दुःखहरणाय नमः शिवाय ।।२

 

भक्तिप्रियाय भव-रोग-भयापहाय

उग्राय दुर्गमभव-सागरतारणाय ।

ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय

दारिद्रय-दु:खहरणाय नमः शिवाय ।।३

 

चर्माम्बराय शवभस्मविलेपनाय

फालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय ।

मंजीरपादयुगलाय जटाधराय

दारिद्रय-दुःखहरणाय नमः शिवाय ।।४

 

पंचाननाय फणिराजविभूषणाय

हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय ।

आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय

दारिद्रय-दुःखहरणाय नमः शिवाय ।।५

 

भानुप्रियाय भवसागरतारणाय

कालान्तकायकमलासनपूजिताय ।

 नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय

दारिद्रय-दुःखहरणाय नमः शिवाय ।।६

 

रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय

नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय ।

पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय

दारिद्रय-दुःखहरणाय नमः शिवाय ।।७

 

मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय

गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय ।

मातंगचर्मवसनाय महेश्वराय

दारिद्रय-दुःखहरणाय नमः शिवाय ।।८

 

वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणम् ।

सर्वसम्पत्करं शीघ्रं पुत्र-पौत्रादि-वर्धनम् ।

त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् ।।९

 

।।इति श्रीवसिष्ठविरचितं दारिद्रय-दहन-शिवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

१८. रुद्राष्टकम् (श्री तुलसीदासकृतं)

 

श्लोक

 

स्थानं न यानं न च बिन्दु नादं रूपं न रेखा न च धातुवर्गम् ।

दृश्यं न दृष्टं श्रवणं न श्राव्यं तस्मै नमो ब्रह्म निरंजनाय ।।

 

 

 

 

गीत

 

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।

अजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

चिदाकारमाकाशवासं भजेऽहम् ।।१

 

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं

गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।

करालं महाकालकालं कृपालुं

गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ।।२

 

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं

मनोभूतकोटिप्रभास्वच्छरीरम् ।

स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी-चारुगंगा

लसत्फालबालेन्दु-कण्ठे-भुजंगम् ।।३

 

चलत्कुण्डलं शुभ्रनेत्रं विशालं

प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालुम् ।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं

प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ।।४

 

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं

अखण्डं भजे भानुकोटिप्रकाशम् ।

त्रयीशूलनिर्मूलनं शूलपाणि

भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ।।५

 

कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी

सदा सज्जनानन्ददाता पुरारिः ।

चिदानन्दसन्दोहमोहोपहारी

प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारिः ।।६

 

न यावद्-उमानाथपादारविन्दं

भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।

न तावत्सुखं शान्तिसन्तापनाशं

प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवास ।।७

 

न जानामि योगं जपं नैव पूजां

नतोऽहं सदा सर्वदा देव तुभ्यम् ।

जराजन्मदुःखौघतातप्यमानं

प्रभो पाहि शापान्नमामीशशम्भो ।।८

 

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेणहरतुष्टये ।

ये पठन्ति नराभक्त्या तेषांशम्भुः प्रसीदति ।।९

 

नामावली

 

साम्बसदाशिव साम्बसदाशिव ।

साम्बसदाशिव साम्बशिवोऽम् ।।

१९. नमो भूतनाथ

 

नमो भूतनाथ, नमो पार्वतीश,

नर रुण्ड माला धारी, विष सर्प ते शरीरा।

डमरु त्रिशूल वाला, नमो पार्वतीशा ।। नमो ...

 

व्याघ्रासने विराजे, ललाट चन्द्र साजे,

अवधूत वेष वाला, नमो पार्वतीशा ।। नमो…

 

शोभे जटाते गंगा, पीये निराला भंगा,

अल मस्त बैल वाला, नमो पार्वतीशा ।। नमो...

 

नाचे पिशाच संगे, जो भिल्लिनी सरंगे,

बस भोले भावि काल, नमो पार्वतीशा ।। नमो...

करि शंख नाद रुंड़झे, मुखे राम नाम गूँजे,

क्षणि जालि लेमदाला, नमो पार्वतीशा ।। नमो...

२०. हर गाओ शिव गाओ

 

हर गाओ शिव गाओ, हर हर शिवशंकर गाओ ।।

 

जय उमानाथ जय मदनान्तक, जय शिव त्रिपुरारी गाओ ।।

डम डम डम डम डमरू बाजे, नन्दिवाहन गाओ।

जय उमा महेश्वर गाओ ।। हर गाओ...

 

जय गंगाधर जय विश्वेश्वर, जय जय भवानीवर गाओ ।

पापविमोचन भवा निरंजन, शिव मनमोहन गाओ ।

जय उमा महेश्वर गाओ ।। हर गाओ...

 

जय नागदमन जय नागभूषण, जय शिव गणभूषण गाओ ।

कल्मषमोचन भवभयहरणा, शिव पंचानन गाओ ।

जय उमा महेश्वर गाओ ।। हर गाओ ...

२१. शंकर महादेव देव

 

शंकर महादेव देव, सेवत सब जाके ।

 

जटा मुकुट सीस गंगा, बहत तेरे अति प्रचण्ड,

गौरी अरधंग संग, भंग रंग साजे ।। शंकर...

 

ध्यावत सुरनर मुनीश, गावत गिरिजा गिरीश ।

पावत नहीं पार शेष, नेति नेति पुकारे ।। शंकर...

 

बरणत तुलसीदास, गिरिजापति चरण आस ।

एसे वर वेष नाथ, भक्त हेतु ताके ।। शंकर...

 

२२. श्री शिव-अष्टोत्तरशत-नामावली

 

१. ॐ शिवाय नमः                २. ॐ महेश्वराय नमः

 

३. ॐ शम्भवे नमः                ४. ॐ पिनाकिने नमः

 

५. ॐ शशिशेखराय नमः            ६. ॐ वामदेवाय नमः

 

७. ॐ विरूपाक्षाय नमः             ८. ॐ कपर्दिने नमः

 

९. ॐ नीललोहिताय नमः           १०. ॐ शंकराय नमः

 

११. ॐ शूलपाणये नमः             १२. ॐ खट्वांगिने नमः

 

१३. ॐ विष्णुवल्लभाय नमः         १४. ॐ शिपिविष्टाय नमः

 

१५. ॐ अम्बिकानाथाय नमः         १६. ॐ श्रीकण्ठाय नमः

 

१७. ॐ भक्तवत्सलाय नमः          १८. ॐ भवाय नमः

 

१९. ॐ शर्वाय नमः                २०. ॐ त्रिलोकेशाय नमः

 

२१. ॐ शितिकण्ठाय नमः           २२. ॐ शिवाप्रियाय नमः

 

२३. ॐ उग्राय नमः                २४. ॐ कपालिने नमः

 

२५. ॐ कामारये नमः              २६. ॐ अन्धकासुरसूदनाय नमः

 

२७. ॐ गंगाधराय नमः             २८. ॐ ललाटाक्षाय नमः           

 

२९. ॐ कालकालाय नमः            ३०. ॐ कृपानिधये नमः           

 

३१. ॐ भीमाय नमः               ३२. ॐ परशुहस्ताय नमः           

 

३३. ॐ मृगपाणये नमः             ३४. ॐ जटाधराय नमः            

 

३५. ॐ कैलासवासिने नमः          ३६. ॐ कवचिने नमः             

 

३७. ॐ कठोराय नमः              ३८. ॐ त्रिपुरान्तकाय नमः         

 

३९. ॐ वृषांकाय नमः              ४०. ॐ वृषभारूढाय नमः           

 

४१. ॐ भस्मोद्धूलितविग्रहाय नमः    ४२. ॐ सामप्रियाय नमः           

 

४३. ॐ स्वरमयाय नमः            ४४. ॐ त्रयीमूर्तये नमः            

 

४५. ॐ अनीश्वराय नमः            ४६. ॐ सर्वज्ञाय नमः             

 

४७. ॐ परमात्मने नमः             ४८. ॐ सोमसूर्याग्निलोचनाय नमः    

 

४९. ॐ हविषे नमः                ५०. ॐ यज्ञमयाय नमः            

 

५१. ॐ सोमाय नमः               ५२. ॐ पंचवक्त्राय नमः

 

५३. ॐ सदाशिवाय नमः            ५४. ॐ विश्वेश्वराय नमः

 

५५. ॐ वीरभद्राय नमः             ५६. ॐ गणनाथाय नमः

 

५७. ॐ प्रजापतये नमः             ५८. ॐ हिरण्यरेतसे नमः

 

५९. ॐ दुर्धर्षाय नमः               ६०. ॐ गिरीशाय नमः

 

६१. ॐ गिरिशाय नमः             ६२. ॐ अनघाय नमः

 

६३. ॐ भुजंगभूषणाय नमः          ६४. ॐ भर्गाय नमः

 

६५. ॐ गिरिधन्वने नमः            ६६. ॐ गिरिप्रियाय नमः

 

६७. ॐ कृत्तिवाससे नमः      ६८. ॐ पुरारातये नमः

 

६९. ॐ भगवते नमः               ७०. ॐ प्रमथाधिपाय नमः

 

७१. ॐ मृत्युंजयाय नमः            ७२. ॐ सूक्ष्मतनवे नमः

 

७३. ॐ जगद्व्यापिने नमः           ७४. ॐ जगद्‌गुरवे नमः

 

७५. ॐ व्योमकेशाय नमः           ७६. ॐ महासेनजनकाय नमः

 

७७. ॐ चारुविक्रमाय नमः           ७८. ॐ रुद्राय नमः

 

७९. ॐ भूतपतये नमः              ८०. ॐ स्थाणवे नमः

 

८१. ॐ अहिर्बुध्याय नमः            ८२. ॐ दिगम्बराय नमः

 

८३. ॐ अष्टपूर्तये नमः             ८४. ॐ अनेकात्मने नमः

 

८५. ॐ सात्त्विकाय नमः      ८६. ॐ शुद्धविग्रहाय नमः

 

८७. ॐ शाश्वताय नमः             ८८. ॐ खण्डपरशवे नमः

 

८९. ॐ अजाय नमः               ९०. ॐ पाशविमोचनाय नमः

 

९१. ॐ मृडाय नमः                ९२. ॐ पशुपतये नमः

 

९३. ॐ देवाय नमः                ९४. ॐ महादेवाय नमः

 

९५. ॐ अव्ययाय नमः             ९६. ॐ हरये नमः

 

९७. ॐ पूषदन्तभिदे नमः           ९८. ॐ अव्यग्राय नमः

 

९९. ॐ दक्षाध्वरहराय नमः          १००. ॐ हराय नमः

 

१०१. ॐ भगनेत्रभिदे नमः           १०२. ॐ अव्यक्ताय नमः

 

१०३. ॐ सहस्राक्षाय नमः            १०४. ॐ सहस्रपदे नमः

 

१०५. ॐ अपवर्गप्रदाय नमः          १०६. ॐ अनन्ताय नमः

 

१०७. ॐ तारकाय नमः             १०८. ॐ परमेश्वराय नमः

 

।। इति श्री शिव-अष्टोत्तरशत-नामावली ।।

२३. शिव-आरती

 

जय शिव ओंकारा, हर जय शिव ओंकारा ।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा ।। जय शिव...

 

एकानन चतुरानन, पंचानन राजै, शिव पंचानन राजै ।

हंसासन गरुड़ासन, हंसासन गरुड़ासन, वृषभासन साजै ।। जय शिव...

 

दो भुज चार चतुर्भुज, दशभुज ते सोहै, शिव दशभुज ते सोहै ।

तीनों रूप निरखता, तीनों रूप निरखता, त्रिभुवन जन मोहै ।। जय शिव...

 

अक्षमाला वनमाला, रुण्डमालाधारी, शिव रुण्डमालाधारी ।

चन्दनमृगमद चन्दा, चन्दनमृगमद चन्दा, भाले शुभकारी ।। जय शिव...

 

श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे, शिव बाघम्बर अंगे ।

सनकादिक प्रभुतादिक, सनकादिक प्रभुतादिक, भूतादिक संगे ।। जय शिव...

 

कर मध्ये करमण्डल चक्र त्रिशूल धर्ता, शिव चक्र त्रिशूल धर्ता ।

जगकर्ता जगभर्ता, जगकर्ता जगभर्ता, जग का संहर्ता ।। जय शिव...

 

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका, शिव जानत अविवेका ।

प्रणव अक्षरनु मध्ये, प्रणव अक्षरनु मध्ये, ये तीनों एका ।। जय शिव…

 

त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावै, शिव जो कोई नर गावै ।

कहत शिवानन्द स्वामी, कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावै ।। जय शिव…

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मंगलवार

श्री सुब्रह्मण्य-स्तोत्रम्

. नाद-बिन्दु-कलादि नमो नमः

(तिरुप्पुगल)

 

श्लोक

 

षडाननं कुंकुम-रक्त-वर्ण महामतिं दिव्य-मयूर-वाहनम् ।

रुद्रस्य सूनुं सुर-सैन्य-नाथं गुहं सदाऽहं शरणं प्रपद्ये ।।

 

मैं सदा भगवान् षण्मुख कार्तिकेय की शरण जाता हूँ जो कुंकुमरक्तवर्ण वाले हैं, जिनमें असीम ज्ञान है, जिनका वाहन दिव्य मयूर है और जो भगवान् शिव के पुत्र तथा देवताओं की सेना के नायक हैं।

 

गीत

 

नाद-बिन्दु-कलादि नमो नमः ।

वेदमन्त्र-स्वरूपा नमो नमः ।

ज्ञान-पण्डित-स्वामी नमो नमः ।।१।। (बहु कोटि)

 

नाम शम्भु-कुमारा नमो नमः ।

भोग अन्तरि-पाला नमो नमः ।

नाग-बन्धु-मयूरा नमो नमः ।।२।। (पर शूरा)

 

छेद-दण्ड-विनोदा नमो नमः ।

गीत-किंकिणि-पादा नमो नमः ।

धीर-सम्भ्रम-वीरा नमो नमः ।।३।। (गिरिराजा)

 

दीपमंगल ज्योति नमो नमः ।

तूय-अम्बल-लीला नमो नमः ।

देव-कुंजरि-भागा नमो नमः ।।४।। (अरुल्ताराई)

उसको नमस्कार है जो शब्द, देश तथा काल से परे है। उसको नमस्कार है जो वेद-मन्त्र-स्वरूप है। उसको नमस्कार है जो ज्ञानियों का सम्राट् है ।।१

 

उसको नमस्कार है जो शिव का पुत्र है। उसको नमस्कार है जो सारे आन्तरिक भोगों का रक्षक है। उसको नमस्कार है जो मयूर पर आसीन हो कर भक्तों के वासना-रूपी सपों का नियन्त्रण करता है ।।२

 

उसको नमस्कार है जिसके हाथ में त्रिशूल है। उसको नमस्कार है जिसके पैर में मधुर झंकार करने वाली किंकिणी है। उसको नमस्कार है जो महान् वीर है ।।३

 

उसको नमस्कार है जो दीप, नैवेद्य आदि में वर्तमान है। उसको नमस्कार है जो भक्तों के पवित्र हृदय-स्थल में नृत्य करता है। उसको नमस्कार है जिसके पास में देवयानी है। वह सुब्रह्मण्य हम पर कृपा तथा आनन्द की वृष्टि करे!!४

 

नामावली

 

वेल् मुरुगा वेल् मुरुगा वेल् मुरुगा पाहि माम् ।

वेलायुधा वेलायुधा वेलायुधा रक्ष माम् ।।

. शरणागतमातुरमाधिजितम्

 

श्लोक

 

शक्ति-हस्तं विरूपाक्षं शिखि-वाहं षडाननम् ।

दारुणं रिपु-रोगघ्नं भावये कुक्कुट-ध्वजम् ।।

 

मैं भगवान् षण्मुख का ध्यान करता हूँ जो अपने हाथों में शक्ति-अस्त्र को धारण किये हुए हैं, जिसके सूर्य, चन्द्र और अग्नि- ये तीन नेत्र हैं, जो मोर की सवारी करता है, दुष्टों के लिए भयानक है, अपने भक्त के शत्रुओं और रोगों का विनाशक है तथा जिसकी ध्वजा पर कुक्कुट का चिह्न अंकित है।

 

 

स्तोत्रम्

 

शरणागत मातुरमाधिजितं

करुणाकर कामद कामहतम् ।

शर-कानन-सम्भव चारु-रुचे

परिपालय तारक-मारक माम् ।।१

 

हर-सार-समुद्भव हैमवती-

कर-पल्लव-लालित-कम्र-तनो ।

मुरवैरि-विरिंचि-मुदम्बुनिधे

परिपालय तारक-मारक माम् ।।२

 

गिरिजा-सुत सायक-भिन्न-गिरे

सुरसिन्धु-तनूज सुवर्ण-रुचे।

सुरसैन्य-पते शिखि-वाहन हे

परिपालय तारक-मारक माम् ।।३

 

जय विप्र-जन-प्रिय वीर नमो

जय भक्त-जन-प्रिय भद्र नमः ।

जय देव विशाख-कुमार नमः

परिपालय तारक-मारक माम् ।।४

 

पुरतो भव मे परितो भव मे

पथि मे भगवन् भव रक्ष गतम् ।

वितराजिषु मे विजयं भगवन्

परिपालय तारक-मारक माम् ।।५

 

शरदिन्दु-समान-षडाननया

सरसीरुह-चारु-विलोचनया ।

निरुपाधिकया निजबालतया

परिपालय तारक-मारक माम् ।।६

 

इति कुक्कुट-केतु-मनुस्मरतां

पठतामपि षण्मुख-षट्कमिमम् ।

नमतामपि नन्दनमिन्दुभृतो

न भयं क्वचिदस्ति शरीरभृताम् ।।७

मैं चिन्ताओं और कामनाओं से आक्रान्त हूँ। मैं तेरे चरणकमल की शरण लेता हूँ। तू दया का सागर, भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला, शरों के वन में जन्म ग्रहण करने वाला तथा मनोहर है। हे तारकासुर का वध करने वाले कार्तिकेय, तू मेरा परिपालन कर ।।१

 

तू शिवजी का पुत्र है, माता पार्वती जी के कोमल हाथों से पोसा गया है। तू सुन्दर अंग वाला है। तू ब्रह्मा और विष्णु के आनन्द का सागर है। है तारकासुर का वध करने वाले कार्तिकेय, तू मेरा परिपालन कर ।।२

 

हे पार्वती-पुत्र, तूने अपने बाणों से (क्रौंच) पर्वत को विदीर्ण कर डाला। तू गंगा जी का पुत्र है, स्वर्ण के समान कान्ति वाला है, देवताओं की सेना का अधिपति है और मोर की सवारी करता है। हे तारकासुर का वध करने वाले कार्तिकेय, तू मेरा परिपालन कर ।।३

 

तेरी जय हो! तुझे वेदज्ञ ब्राह्मण तथा भक्त प्रिय हैं। तू विशाख और कुमार नाम से प्रसिद्ध है। हे भद्र, हे देव, तुझको नमस्कार है। हे तारकासुर का वध करने वाले कार्तिकेय, तू मेरा परिपालन कर ।।४

 

हे भगवान्! मेरे सम्मुख तथा चतुर्दिक् तू उपस्थित रह। मेरे मार्ग में तू सहायक बन और मेरी यात्रा सफल बना। हे तारकासुर का वध करने वाले कार्तिकेय, तू मेरा परिपालन कर ।।५

 

तेरे छह मुख शरच्चन्द्र के समान और नेत्र कमल के समान सुन्दर हैं। तू सभी प्रकार की परिच्छिन्नताओं से मुक्त चिरकुमार है। हे तारकासुर का वध करने वाले कार्तिकेय, तू मेरा परिपालन कर ।।६

 

जो कुक्कुट-ध्वजाधारी भगवान् षण्मुख को स्मरण करते हैं, जो इन छह श्लोकों का पाठ करते हैं और शिव-पुत्र कार्तिकेय जी को नमस्कार करते हैं, उन्हें कहीं भी कोई भय नहीं प्राप्त होता ।।७

 

नामावली

सुब्रह्मण्य सुब्रह्मण्य सुब्रह्मण्य पाहि माम् ।

कार्तिकेय कार्तिकेय कार्तिकेय रक्ष माम् ।।

. कार्तिकेयस्तोत्रम्

 

ॐ श्री गणेशाय नमः

स्कन्द उवाच

 

योगीश्वरो महासेनः कार्तिकेयोऽग्निनन्दनः ।

स्कन्दः कुमारः सेनानिः स्वामी शंकरसम्भवः ।।१

 

गांगेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः ।

तारकारिरुमापुत्रः क्रौंचारिश्च षडाननः ।।२

 

शब्दब्रह्मसमुद्रश्च सिद्धः सारस्वतो गुहः ।

सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षफलप्रदः ।।३

 

शरजन्मा गणाधीशः पूर्वजो मुक्तिमार्गकृत् ।

सर्वागमप्रणेता च वांछितार्थप्रदर्शनः ।॥४

 

अष्टाविंशतिनामानि मदीयानीति यः पठेत् ।

प्रत्यूषे श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत् ।।५

 

महामन्त्रमयानीति मम नामानुकीर्तनम् ।

महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।।६

 

।। इति श्रीरुद्रयामले प्रज्ञाविवर्धनाख्यं श्रीमत्कार्तिकेयस्तोत्रम् ।।

 

 

 

नामावली

 

स्कन्धं वन्दे नमोऽस्तु ते, जय षण्मुखनाथ नमोऽस्तु ते ।

मुरुगा गुहने नमोऽस्तु ते, जय वल्ली-वल्लभ नमोऽस्तु ते ।

कार्तिकेय नमोऽस्तु ते, जय कतिरकाम वासा नमोऽस्तु ते ।

दण्डायुधपाणि नमोऽस्तु ते, जय तिरुपुरनकुन्द्र नमोऽस्तु ते ।

दैवयानै-समेता नमोऽस्तु ते, जय अनाथ-रक्षक नमोऽस्तु ते ।

दीनबन्धु नमोऽस्तु ते, जय दीन-नाथ नमोऽस्तु ते ।

देव देव नमोऽस्तु ते, जय देवनाथ नमोऽस्तु ते ।

भक्तवत्सल नमोऽस्तु ते, जय पतितपावन नमोऽस्तु ते ।।

गुह मुरुगा षण्मुखा, उडिपि सुब्रह्मण्य ।

तिरुचेन्दूर वेला, कतिरकामनाथा ।

देवयानी-समेता, पलनिमलै आन्डवा ।

ॐ शरवणभव, गुह मुरुगेशा ।।

षण्मुखा बाल, षण्मुखा बाल, षण्मुखा बाल, षण्मुखा ।

सुब्रह्मण्य शिव, सुब्रह्मण्य शिव, सुब्रह्मण्य शिव, सुब्रह्मण्य ।

भक्तवत्सल, भक्तवत्सल, भक्तवत्सल, भक्तवत्सल ।

पतितपावन, पतितपावन, पतितपावन, पतितपावन ।।

बोल षण्मुख, बोल षण्मुख, षण्मुख षम्मुख बोल ।

शिव शिव, शिव शिव, सुब्रह्मण्य, शरवणभव बोल ।।

 

श्री हरिहर-पुत्र-स्तोत्रम्

. पदारविन्द-भक्त-लोक-पालनैक-लोलुपम्

 

श्लोक

 

श्रितानन्द-चिन्तामणि श्रीनिवासं

सदा सच्चिदानन्द-पूर्ण-प्रकाशम् ।

उदारं सुदारं सुराधारमीशं

परं-ज्योतिरूपं भजे भूतनाथम् ।।

 

जो सर्व भूतों का नाथ है, आश्रितजनों को आनन्द प्रदान करने के लिए चिन्तामणि रूप है, जो श्री का आवास-स्थान है, सर्वदा सत्, चित् और आनन्द के पूर्ण प्रकाश से युक्त है, जो उदार है, जिसकी पत्नी मंगलकारिणी है, जो देवताओं का आधार और स्वामी है तथा परम ज्योतिस्वरूप है, मैं उसकी आराधना करता हूँ।

 

गीत

 

पदारविन्द-भक्त-लोक-पालनैक-लोलुपं

सदारपार्श्वमात्मजादि मोदकं सुराधिपम्।

उदारमादि-भूतनाथमद्द्युतात्म-वैभवं

सदा रवीन्दु-कुण्डलं नमामि भाग्य-सम्भवम् ।।१

 

कृपा-कटाक्ष-वीक्षणं विभूति-वेत्र-भूषणं

सुपावनं सनातनादि-सत्य-धर्म-पोषणम् ।

अपार-शक्ति-युक्तमात्म-लक्षणं सुलक्षणं

प्रभा-मनोहरं हरीश-भाग्य-सम्भवं भजे ।।२

 

मृगासनं वरासनं शरासनं महौजसं

जगद्धितं समस्त-भक्त-चित्तरंग-संस्थितम् ।

नगाधिराज-राजयोग-पीठ-मध्यवर्तिनं

मृगांक-शेखरं हरीश-भाग्य-सम्भवं भजे ।।३

 

समस्त-लोक-चिन्तित-प्रदं सदा सुख-प्रदं

समुत्थिता-पदन्धकार-कृन्तनं प्रभाकरम् ।

अमर्त्य-नृत्य-गीत-वाद्य-लालसं मदालसं

नमस्करोमि भूतनाथमादिधर्म-पालकम् ।।४

 

चराचरान्तरस्थित प्रभा-मनोहर प्रभो

सुरासुरार्चितांघ्रि-पद्म-युग्म भूतनायक ।

विराजमान-वक्त्र भक्त-मित्र वेत्र-शोभित

हरीश-भाग्य-जात साधु-पारिजात पाहि माम् ।।५

जो अपने चरण-कमल की शरण लेने वाले भक्तजनों का पालन करने में ही लीन है, जिसके पार्श्व में उसकी पत्नी है, जो अपने पुत्रों के संग का आनन्द उठाने वाला है, जो देवताओं का स्वामी है, उदार है, भूतमात्र का आदि स्वामी है, जिसका आध्यात्मिक वैभव अ‌द्भुत है, जिसके कर्ण-कुण्डल के रूप में सूर्य और चन्द्र हैं, विश्व के समस्त भाग्यों से सम्भूत उस देव को नमस्कार करता हूँ।।१

 

जिसके अवलोकन में कृपा भरी हुई है, जो भस्म तथा बेंत से विभूषित है, जो पवित्र है, जो सनातन सत्य, धर्म आदि का पोषण करता है, जिसकी शक्ति अपार है, जो आत्म-ज्ञान में संस्थित है, जिसका शरीर अच्छे लक्षणों से युक्त है, कान्ति के कारण जो मनोहर है और जो विष्णु तथा शिव के भाग्य से उत्पन्न हुआ है, उस देव की मैं आराधना करता हूँ ।।२

 

जो श्रेष्ठ आसन में बाघ पर बैठा है, जिसके हाथ में बाण हैं, जिसका तेज महान् है, जो सारे जग का हित करने वाला है, सब भक्तों के चित्त में जो विराजमान है, जो पर्वत-श्रेष्ठ पर योगपीठ के मध्य में बसता है, जिसके मस्तक पर अर्ध-चन्द्र है और जो विष्णु तथा शिव के भाग्य से उत्पन्न हुआ है, उस देव की मैं आराधना करता हूँ।।३

 

जो सारे संसार की इच्छा पूरी करता है, जो सर्वदा सुख देने वाला है, आये हुए विपत्ति-रूपी अन्धकार को नाश करने वाला है, प्रकाशमान है, देवताओं के नृत्य, गीत, वाद्य आदि के प्रति विशेष रुचि रखता है, जिसके हाव-भाव मनोहर हैं, जो आदि धर्म की रक्षा करता है, उस भूतनाथ को मैं प्रणाम करता हूँ।।४

 

हे प्रभु, तुम चर और अचर सृष्टि के अन्तस्थल में रहने वाले हो, कान्ति से शोभायमान हो । हे भूतनाथ, देवता तथा असुर तुम्हारे चरण-युगल धोते हैं। तुम सुन्दर वदन हो, भक्तों के मित्र हो तथा बेंत से सुशोभित हो, हरि और शिव के भाग्य से उत्पन्न हुए हो, साधुजनों के लिए पारिजात वृक्ष-तुल्य हे देव! मेरी रक्षा करो ।।५

 

नामावली

 

पूर्ण-पुष्कला-समेत-भूतनाथ पाहि माम् ।

 

हे भूतनाथ (सम्पूर्ण जीवों के स्वामी), अपनी अर्धांगिनी पूर्ण पुष्कला के साथ मेरी रक्षा करो।

 

 

बुधवार

श्रीकृष्ण-स्तोत्रम्

. भजो रे मैया राम गोविन्द हरी

(श्री कबीरदासकृत)

 

श्लोक

 

हरिहरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः ।

अनिच्छन्नपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ।।

 

अर्थ

 

दुष्ट हृदयों के स्मरण करने से भी भगवान् उनके पापों को दूर कर देते हैं। जैसे अनिच्छापूर्वक भी स्पर्श हो जाये तो अग्नि जलाती ही है।

 

गीत

 

भजो रे भैया राम गोविन्द हरी ।

जप तप साधन नहिं कछु लागत,

खरचत नहिं गठरी ।। भजो रे भैया...

 

सन्तत सम्पत सुख के कारण,

जासों भूल परी ।। भजो रे भैया...

 

कहत 'कबीरा' राम न जा मुख,

ता मुख धूल भरी ।। भजो रे भैया...

 

हे भाई! राम, गोविन्द और हरि का भजन करो। इसमें जप, तपस्या आदि कोई भी धन नहीं लगता और गाँठ से कुछ खर्च भी नहीं होता।

वह नाम, जिसे तुम भूल गये हो, शाश्वत सुख और सम्पत्ति का कारण है।

 

कबीरदास कहते हैं कि जिस मुख में राम का नाम नहीं है, वह मुख मिट्टी से भरने योग्य है।

 

नामावली

 

राम गोविन्द हरि राम गोविन्द ।

. यमुना-तीर-विहारी

 

श्लोक

 

गोपाल-रत्नं भुवनैक-रत्नं गोपांगना-यौवन-भाग्य-रत्नम् ।

श्रीकृष्ण-रत्नं सुर-सेव्य रत्नं भजामहे यादव-वंश-रत्नम् ।।

 

भगवान् कृष्ण गोपालों के रत्न हैं। वे समस्त लोकों के सर्वोपरि रत्न हैं। वे युवती गोपियों के भाग्य के रत्न हैं। वे सभी देवताओं से पूजित रत्न श्रीकृष्ण-रत्न हैं। उस यादव-वंश-रत्न की हम पूजा करते हैं।

 

गीत

 

यमुना-तीर-विहारी, वृन्दावन-संचारी ।

गोवर्धन-गिरि-धारी, गोपाल-कृष्ण मुरारी ।।

 

दशरथ-नन्दन राम राम, दशमुख मर्दन राम राम ।

पशुपति-रंजन राम राम, पाप-विमोचन राम राम ।।

 

जय श्री राधे जय नन्द-नन्दन ।

जय जय गोपी-जन-मन-रंजन ।।

 

गौओं को चराने वाले गोपाल कृष्ण मुरारी हैं जो यमुना के किनारे विहार करने वाले हैं, श्री वृन्दावन में भ्रमण करने वाले हैं और गोवर्धन गिरि को धारण करने वाले हैं।

 

दशरथ के पुत्र राम हैं, दशमुख अर्थात् रावण को मारने वाले राम हैं, शंकर भगवान् को प्रसन्न करने वाले राम हैं, पापों को दूर करने वाले राम हैं।

 

श्री राधा जी की जय हो, गोपीजनों के मन को लुभाने वाले नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण की जय हो!

. भज रे गोपालम्

(श्री सदाशिवब्रह्मेन्द्रकृतम्)

 

श्लोक

 

बद्धेनांजलिना नतेन शिरसा गात्रैः सरोमोद्गमैः

कण्ठेन स्वर-गद्गदेन नयनेनोद्गीर्ण बाष्पाम्बुना ।

नित्यं त्वच्चरणारविन्द-युगल-ध्यानामृतास्वादिनां

अस्माकं सरसीरुहाक्ष सततं सम्पद्यतां जीवितम् ।।

 

हे परालोचन, हम श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़ कर, सिर को नत कर, रोमांचित हो कर, प्रेम से रुद्ध-कण्ठ हो कर, आँखों से आनन्दाश्रु बहाते हुए आपके पाद-पद्मों में नित्य-प्रति ध्यान की सुधा का आस्वादन करते हैं। हे भगवन्! हमारा जीवन निरन्तर सुसम्पन्न हो !

 

गीत

भज रे गोपालं मानस, भज रे गोपालम् ।।

भज गोपालं भजित-कुचेलं,

त्रिजगन्मूलं दिति-सुत-कालम् ।।१।। भज रे...

 

आगम-सारं योग-विचारं,

भोगशरीरं भुवनाधारम् ।।२।। भज रे...

 

कदन-कुठारं कलुष-विदूरं,

मदन-कुमारं मधुसंहारम् ।।३।। भज रे...

 

नत-मन्दारं नन्द-किशोरं,

हत-चाणूरं हंस-विहारम् ।।४।। भज रे...

हे मेरे मन! गोपाल का भजन कर। गोपाल का भजन कर।

 

हे मेरे मन! गोपाल का भजन करो जो तीनों लोकों का मूल है, जो असुरों के लिए मृत्यु-स्वरूप है तथा कुचेल द्वारा पूजित है ।।१

 

उसका भजन करो, जो वेदों का सार है, जिसे योग के द्वारा पाया जाता है, जिसका शरीर आनन्द है तथा जो भुवनों का आधार है।।२

 

उसका भजन करो, जो पापों को नष्ट करने के लिए कुठार के समान है, अज्ञान का निवारण करता है, जिसके पुत्र कामदेव थे तथा जिसने मधु नामक राक्षस का संहार किया भा ।।३

 

उस नन्द के पुत्र का भजन करो, जो अपने भक्तों के लिए स्वर्ग-वृक्ष के समान है, जिसने चाणूर का संहार किया तथा जो परमहंसों के संग में आनन्दित होता है ।।४

 

नामावली

 

एहि मुदं देहि मे श्री कृष्ण कृष्ण,

पाहि माम् गोपाल-बाल कृष्ण कृष्ण ।।१

 

नन्दगोप-नन्दन श्री कृष्ण कृष्ण,

वृन्दावन-चन्द्र श्री कृष्ण कृष्ण ।।२

 

राधा-मन-मोहन श्री कृष्ण कृष्ण,

माधव दयानिधे श्री कृष्ण कृष्ण ।।३

 

भक्त-परिपालक श्री कृष्ण कृष्ण,

भक्ति-मुक्ति-दायक श्री कृष्ण कृष्ण ।।४

 

गोपीजन-वल्लभ श्री कृष्ण कृष्ण,

गोप-कुल-पालक श्री कृष्ण कृष्ण ।।५

 

सर्वलोक नायक श्री कृष्ण कृष्ण,

सर्वजगन्मोहन श्री कृष्ण कृष्ण ।।६

 

सच्चिदानन्द (कृष्ण) सच्चिदानन्द ।।७

सच्चिदानन्द (गुरु) सच्चिदानन्द ।।८

 

हे कृष्ण! मुझे यह आनन्द दीजिए। हे गोप-कुमार । मेरी रक्षा कीजिए ।।१

 

नन्द तथा गोपों को आनन्द देने वाले, वृन्दावन के चन्द्रमा, हे कृष्ण !!२

 

राधा के मन को मोहने वाले, हे माधव (लक्ष्मीनाथ), हे दयासागर, हे कृष्ण !!३

 

भक्तों की रक्षा करने वाले, भक्ति और मोक्ष प्रदान करने वाले, हे कृष्ण !!४

 

हे कृष्ण। तुम गोपियों के परम प्रिय, ग्वालों के परिपालक हो ।।५

 

हे कृष्ण। तुम अखिल विश्व के अधिनायक, सम्पूर्ण संसार के मन को प्रलुब्ध करने वाले हो ।।६

 

कृष्ण सत्, वित् (ज्ञान) और आनन्द (सुख)-मय हैं।।७

 

गुरु सत्, चित् (ज्ञान) और आनन्द (सुख)-मय हैं ।1८

. गायति वनमाली

(श्री सदाशिवब्रह्मेन्द्रकृतम्)

 

श्लोक

 

कस्तूरी-तिलकं ललाट-फलके वक्षःस्थले कौस्तुभं,

नासाग्रे नव-मौक्तिकं करतले वेणुं करे कंकणम् ।

सर्वांगे हरिचन्दनं च कलयन् कण्ठे च मुक्तामणिं,

गोपस्त्री-परिवेष्टितो विजयते गोपाल-चूडामणिः ।।

 

गोपालों के चूड़ामणि भगवान् कृष्ण की जय हो! वे गोपांगनाओं से परिवेष्ठित हो कर शोभित हो रहे हैं, उनके विशाल ललाट में कस्तूरी का तिलक है, उनके वक्षःस्थल पर कौस्तुभमणि है, नासिका के अग्रभाग में नवमुक्ता सुशोभित हो रही है, करतल में बाँसुरी तथा हाथों में कंगन हैं। उनके सब अंग चन्दन से लेपित हैं तथा उनकी ग्रीवा में मुक्तावली सुशोभित हो रही है।

 

गीत

 

गायति वनमाली मधुरं, गायति वनमाली ।

 

पुष्प-सुगन्धि-सुमलय-समीरे

मुनिजन-सेवित यमुना-तीरे ।।१।। गायति...

 

कूजित-शुक-पिक-मुख खग-कुंजे

कुटिलालक-बहु-नीरद-पुंजे ।।२।। गायति...

 

तुलसी-दाम-विभूषण-हारी

जलज-भव-स्तुत-सद्गुण-शौरी ।।३।। गायति…

 

परमहंस-हृदयोत्सवकारी

परिपूरित-मुरली-रव-धारी ।।४।। गायति...

 

वनमाला धारण किये हुए भगवान् कृष्ण गा रहे हैं, वे मधुर गान गा रहे हैं। यमुना के तट पर जहाँ ऋषि गण मौन हो कर ध्यान करते हैं और जहाँ मलय पर्वत से शीतल, मन्द, सुगन्ध समीर बहता है (वहाँ श्री कृष्ण गा रहे हैं) ।।१

 

(यमुना के तट पर) वृक्ष और लता के कुंजों में जहाँ कोयल, तोता और अन्य गायक पक्षी गाना गा रहे हैं तथा बादलों का समूह घुँघराले बाल की तरह आकाश में दोलायमान हो रहा है (वहाँ श्री कृष्ण गा रहे हैं) ।।२

 

श्री कृष्ण (शौरि) श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न हैं, तुलसी की माला से सुशोभित हैं और पद्मयोनि ब्रह्मा द्वारा पूजित हैं (वे गा रहे हैं) ।।३

 

श्री कृष्ण, जो परमहंसों के हृदय में अपार आनन्द भर देते हैं तथा जिनकी बाँसुरी से संगीत प्रवाह-रूप में संचारित होता है, गा रहे हैं ।।४

 

नामावली

 

गोविन्द जय जय गोपाल जय जय,

राधारमण हरि गोविन्द जय जय ।।

. ब्रूहि मुकुन्देति

(श्री सदाशिवब्रह्मेन्द्रकृतम्)

 

श्लोक

 

वंशी-विभूषित-करात् नव-नीरदाभात्,

पीताम्बराद् अरुण-बिम्ब-फलाधरोष्ठात् ।

पूर्णेन्दु-सुन्दर-मुखाद् अरविन्द-नेत्रात्,

कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ।।

 

भगवान् कृष्ण से परे मैं किसी परम तत्त्व को नहीं जानता, जिनके हाथों में वंशी शोभायमान हो रही है, जो बादल के समान श्यामलांग हैं, पीताम्बर से भूषित हैं, जिनके होंठ बिम्ब-फल के समान लाल हैं, जिनका मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान सुन्दर है तथा जिनकी आँखें कमल-दल के समान हैं।

 

गीत

 

ब्रूहि मुकुन्देति रसने ब्रूहि मुकुन्देति ।

 

केशव माधव गोविन्देति

कृष्णानन्द सदानन्देति ।।१।। ब्रूहि...

राधा-रमण हरे रामेति

राजीवाक्ष घन-श्यामेति ।।२।। ब्रूहि.

 

गरुड-गमन नन्दक-हस्तेति

खण्डित दश-कन्धर मस्तेति ।।३।। ब्रूहि...

 

अक्रूर-प्रिय चक्र-धरेति

हंस-निरंजन कंस-हरेति ।।४।। ब्रूहि...

 

हे जिह्ना! मुकुन्द बोल, मुकुन्द बोल ।

 

केशव, माधव, गोविन्द बोल । कृष्ण आनन्द, सदानन्द बोल! ।।१

 

राधारमण, हरि, राम बोल। पद्मलोचन, घनश्याम बोल ! ।।२

 

गरुड़ पर चलने वाले, नन्दक नामक खड्ग हाथ में धारण करने वाले, दश शिर रावण को मारने वाले-ऐसा बोल ।।३

 

अक्रूर-प्रिय, चक्रधर, निरंजन-हस, कस-विनाशन-ऐसा बोल ! ।।४

 

नामावली

 

भजो राधे गोविन्द, गोपाल तेरा प्यारा नाम है।

गोपाल तेरा प्यारा नाम है, नन्दलाल तेरा प्यारा नाम है ।।

. क्रीडति वनमाली

(श्री सदाशिवब्रह्मेन्द्रकृतम्)

 

श्लोक

 

सर्वरूपधरं शान्तं सर्वनामधरं शिवम् ।

सच्चिदानन्दमद्वैतं आत्मानं तं उपास्महे ।।

 

सर्वनाम और रूपमय, शान्त, शिव तथा सच्चिदानन्दरूप अद्वय आत्मा की मैं उपासना करता हूँ।

गीत

 

क्रीडति वनमाली गोष्ठे क्रीडति वनमाली ।

 

प्रह्लाद-पराशर-परिपाली

पवनात्मज-जाम्बवदनुकूली ।।१।। क्रीडति...

 

पया-कुच-परिरम्भण-शाली

पटुतर-शासित-मालि-सुमाली ।।२।। क्रीडति...

 

परमहंस-वर-कुसुम-सुमाली

प्रणव-पयोरुह-गर्भ-कपाली ।।३।। क्रीडति...

 

वनमाला पहने हुए कृष्ण प्रांगण में क्रीड़ा कर रहे हैं।

 

श्री कृष्ण जो प्रह्लाद तथा पराशर के रक्षक हैं, जो हनुमान् तथा जाम्बवान् के प्रति कृपा करने वाले हैं, वे ही क्रीड़ा कर रहे हैं।।१

 

जो श्री लक्ष्मी से आलिंगित हैं तथा जिन्होंने बड़ी कुशलता से माली तथा सुमाली नामक राक्षसों को दण्ड दिया था, वे ही क्रीड़ा कर रहे हैं ।।२

 

जिनकी माला में परमहंसजन ही पुष्प हैं तथा जो प्रणव-पद्म के अन्दर छिपे हैं, वही कृष्ण क्रीड़ा कर रहे हैं।।३

 

नामावली

 

१.     कमला-वल्लभ गोविन्द, माम् ।

पाहि कल्याण-कृष्ण गोविन्द ।

 

२.     कमनीयानन गोविन्द, माम् (पाहि...)

 

३.     भक्त-वत्सल गोविन्द, माम् (पाहि...)

 

४. भागवत-प्रिय गोविन्द, माम् (पाहि...)

 

५. वेणु-विलोल गोविन्द, माम् (पाहि...)

 

६. विजय-गोपाल गोविन्द, माम् (पाहि…)

 

७. नन्द-नन्दन गोविन्द, माम् (पाहि...)

 

८. नवनीत-चोर गोविन्द, माम् (पाहि...)

 

९. अनाथ-रक्षक गोविन्द, माम् (पाहि...)

 

१०. सर्वेश्वरश्री गोविन्द, माम् (पाहि...)

 

१. हे श्री लक्ष्मी देवी के स्वामी गोविन्द, हे मंगलमय कृष्ण, हे गोविन्द मेरी रक्षा करो।

 

२. हे सौम्यबदन गोविन्द, मेरी (रक्षा करो...)

 

३. हे भक्तों पर स्नेह रखने वाले गोविन्द, मेरी (रक्षा करो...)

 

४. हे सन्तजनों से प्रेम करने वाले गोविन्द, मेरी (रक्षा करो...)

 

५. हे वंशीवादन-प्रिय गोविन्द, मेरी (रक्षा करो...)

 

६. हे विजय प्राप्त करने वाले गोपाल-गोविन्द, मेरी (रक्षा करो...)

 

७. हे नन्द गोप के पुत्र गोविन्द, मेरी (रक्षा करो...)

 

८. हे (भक्तों के हृदय-रूपी) मक्खन की चोरी करने वाले गोविन्द, मेरी (रक्षा करो...)

 

९. हे असहायों की रक्षा करने वाले गोविन्द, मेरी (रक्षा करो...)

 

१०. हे सभी प्राणियों के स्वामी गोविन्द, मेरी (रक्षा करो...)

. भज रे यदुनाथम्

(श्री सदाशिवब्रह्मेन्द्रकृतम्)

 

श्लोक

 

वन्दे नव-घन-श्यामं पीत-कौशेय-वाससम् ।

सानन्दं सुन्दरं शुद्धं श्रीकृष्णं प्रकृतेः परम् ।।

 

श्रीकृष्ण को नमस्कार, जो मेघ की तरह श्याम-वर्ण है, पीले रेशमी वस्त्र को धारण किये है, आनन्दयुक्त है, सुन्दर है, शुद्ध है और प्रकृति से परे है।

 

गीत

 

भज रे यदुनाथं, मानस भज रे यदुनाथम् ।

 

गोप-वधू-परिरम्भण-लोलं

गोप-किशोरकमद्द्भुत-लीलम् ।।१ (भज रे...)

 

कपटांगी-कृत-मानुष-वेषं

कपट-नाट्य-कृत-कृत्स्न सुवेषम् ।।२ (भज रे...)

 

परमहंस-हत्तत्त्व-स्वरूपं

प्रणव-पयोधर-प्रणव-स्वरूपम् ।।३ (भज रे...)

 

हे मन, यादवों के भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा कर। उस यदुनाथ को भज।

 

जो अद्भुत क्रीड़ाओं में रत गोपबालक है और गोपियों के आलिंगन में मस्त है, उस कृष्ण का भजन कर ।।१

 

जिसने कपट-रूप से मानव-रूप धारण किया है और जो सम्पूर्ण नाम-रूपों में प्रच्छन्न रूप से नाटक के समान काम करता है, उस कृष्ण का भजन कर ।।२

 

जो परमहंस योगियों के हृदय में निवास करने वाला परम तत्त्व है, ओंकार-रूपी बादलों के बीच स्वयं ओंकार-स्वरूप है, उस कृष्ण का भजन कर ।।३

 

नामावली

 

कमला-वल्लभ राधेश्याम ।

कमनीयानन राधेश्याम ।।

कनकाम्बर-धर राधेश्याम ।

कौस्तुभ-भूषण राधेश्याम ।।

अखण्ड-स्वरूप राधेश्याम ।

अमित-पराक्रम राधेश्याम ।।

अपरिच्छिन्न राधेश्याम ।

अमर-जन-प्रिय राधेश्याम ।।

 

श्री लक्ष्मी देवी के स्वामी राधेश्याम । सुन्दर मुख वाले राधेश्याम । पीताम्बरधारी राधेश्याम । कौस्तुभ-मणि से विभूषित राधेश्याम । स्वजातीय, विजातीय तथा स्वगत भेद-शून्य स्वरूप वाले राधेश्याम । अपरिमित पराक्रम वाले राधेश्याम। देश, काल और कारण से परे राधेश्याम । देवताओं के प्रिय राधेश्याम ।

. स्मर वारं वारं

(श्री सदाशिवब्रहोन्द्रकृतम्)

 

श्लोक

 

चिदानन्दाकारं श्रुति-सरस-सारं समरसं

निराधाराधारं भव-जलधि-पारं पर-गुणम् ।

रमा-ग्रीवा-हारं वज्ञ-वन-विहारं हर-नुतं

सदा तं गोविन्दं परम-सुख-कन्दं भजत रे ।।

 

आप सर्वदा परमानन्द के मूल उन भगवान् गोविन्द का भजन कीजिए जो चिदानन्द स्वरूप हैं, जो समस्त वेदों के सरस सार हैं, जो सबके लिए समान हैं, जो निराश्रयों के आश्रय हैं, जो जन्म-मृत्यु-रूपी संसार-सागर के तट हैं, जो सभी गुणों के परे हैं, जो लक्ष्मी जी के कण्ठ-हार हैं, जो व्रज के वनों में विहार करने वाले हैं और भगवान् शिव जिनका भजन करते हैं।

 

गीत

 

स्मर वारं वारं चेतः स्मर नन्द-कुमारम् ।

 

घोष-कुटीर-पयो-घृत-चोरं

गोकुल-वृन्दावन-संचारम् ।।१ (स्मर...)

 

वेणु-रवामृत-पान-किशोरं

विश्व-स्थिति-लय-हेतु-विहारम् ।।२ (स्मर...)

 

परमहंस-हत्पंजर-कीर

पटुतर-धेनुक-बक-संहारम् ।।३ (स्मर...)

 

रे मन, नन्द जी के उस कुमार को बार-बार याद कर।

 

जो ग्वालों की झोपड़ियों से दूध-घी चुराता है, जो गोकुल और वृन्दावन में विहार करता है।॥१-

 

जो मुरली के स्वर-रूपी अमृत का पान करता है और संसार की सृष्टि, स्थिति और विलय ही जिसका खेल है ।।२

 

जो परमहंसों के हृदयरूपी पिंजरे का तोता है और जिसने घेनुक, बकासुर आदि चालाक असुरों का संहार किया है ।।३

 

 

नामावली

 

भक्तवत्सल गोविन्द । भागवतप्रिय गोविन्द ।।

पतित-पावन गोविन्द । परम दयालो गोविन्द ।।

नन्द-मुकुन्द गोविन्द । नवनीत चोर गोविन्द ।।

वेणु-विलोल गोविन्द । विजय-गोपाल गोविन्द ।।

करुणा-सागर गोविन्द । कमनीयानन गोविन्द ।।

. गोपाल-गोकुल-वल्लभीप्रिय

 (श्री तुलसीदासकृतम्)

 

श्लोक

 

वसुदेव-सुतं देवं कंस-चाणूर-मर्दनम् ।

देवकी-परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ।।

 

मैं जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण की वन्दना करता हूँ जो वसुदेव जी का पुत्र है, जो स्वयं भगवान् है, जिसने कंस और चाणूर राक्षसों का बध किया तथा जो माता देवकी को परम आनन्द देने वाला है।

 

गीत

 

गोपाल-गोकुल-वल्लभीप्रिय, गोप गोसुत-वल्लभम् ।

चरणारविन्द महं भजे, भजनीय सुर-मुनि-दुर्लभम् ।।१

 

घन-श्याम काम अनेक छवि, लोकाभिराम मनोहरम् ।

किंजल्क-वसन किशोर मूरति, भूरि गुण करुणाकरम् ।।२

 

शिर-केकि-पिच्छ विलोल-कुण्डल, अरुण वनरुह लोचनम् ।

गुंजावतंस विचित्र सब अंग, भक्त-भव-भय-मोचनम् ॥३

 

कच-कुटिल सुन्दर-तिलकभू, राका-मयंक-समाननम् ।

अपहरण-तुलसीदास-त्रास, विहार वृन्दाकाननम् ।।४

 

हे गोपाल, गोकुलांगनाओं के प्रियतम, गोपकुमारों तथा गोवत्सों के स्वामी, सुर-मुनियों को भी दुष्प्राप्य परम आराधनीय भगवान् कृष्ण, मैं तेरे चरण-कमल की उपासना करता हूँ।।१

 

श्यामधन के समान श्याम वर्ण वाले हे भगवान् कृष्ण, तू अगणित कामदेव की शोभा को धारण करता है। तू संसार का रंजन करता है। तू मनोहर रूप वाला, पीताम्बरधारी, किशोर वदन, गुणों का आगार तथा करुणामय है। (मैं तेरे चरण-कमल की उपासना करता हूँ) ।।२

 

सिर में मोर-मुकुट, कानों में चपल कुण्डल, नेत्र कमल-पुष्प के समान लाल, गले में पुष्पों की माला-इस प्रकार तेरा सम्पूर्ण विचित्र अंग भयावह संसार से भक्तों का मुक्तिकर्ता है ।।३

 

तेरी अलकें घुँघराली, ललाट में सुन्दर तिलक धारण किया हुआ, भौहें मनोहर और मुख पूर्णचन्द्र के समान कमनीय है। तू तुलसीदास के भय को दूर करने वाला है तथा वृन्दावन में विहार करता है। (मैं तेरे चरण-कमल की उपासना करता हूँ) ।।४

 

नामावली

 

गोविन्द जय जय गोपाल जय जय ।

राधारमण हरि गोविन्द जय जय ।।

१०. दर्शन दो घनश्याम नाथ

(श्री नरसीमेहताकृत)

 

ॐ इति ज्ञान-वस्त्रेण, राग-निर्णेजनी-कृतः ।

कर्म-निद्रां प्रपन्नोस्मि, त्राहि मां मधु-सूदन ।।

 

अर्थ

हे मधुसूदन ! ॐ-रूप ज्ञान-वस्त्र से राग-रूप मल को दूर कर। मैं कर्मनिद्रा में पड़ा हूँ, मेरी रक्षा कर।

 

गीत

 

दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे ।

मन-मन्दिर की ज्योति जगा दो, घट घट वासी रे ।। दर्शन दो...।।१

मन्दिर-मन्दिर मूरत तेरी, फिर भी न देखी सूरत तेरी ।

युग बीते न आयी मिलन की, पूरनमासी रे ।। दर्शन दो...।।२

 

द्वार दया का जब तू खोले, पंचम स्वर में गूँगा बोले ।

अन्धा देखे लंगड़ा चल कर, पहुँचे काशी रे ।। दर्शन दो...।।३

 

पानी पी कर प्यास बुझाऊँ, नैनन को कैसे समझाऊँ ।

आँखमिचौली छोड़ो अब तो, मन के वासी रे ।। दर्शन दो...।।४

 

निर्बल के बल धन निर्धन के, तुम रखवारे भक्त-जनन के ।

तेरे भजन में सब कुछ पाऊँ, मिटे उदासी रे ।। दर्शन दो...।।५

 

नाम जपे पर तुझे न जाने, उनको भी तू अपना माने ।

तेरी दया का अन्त नहीं है, हे दुःखनाशी रे ।। दर्शन दो...।।६

 

आज फैसला तेरे द्वार पर, मेरी जीत है तेरी हार पर ।

हार जीत है तेरी, मैं तो चरण उपासी रे ।। दर्शन दो...।।७

 

द्वार खड़ा कब से मतवाला, माँगे तुमसे हार तुम्हारा ।

'नरसी' की ये बिनती सुन लो, भक्त विलासी रे ।। दर्शन दो...।।८

 

लाज न लुट जाये प्रभु तेरी, नाथ करो न दया में देरी।

तीनों लोक छोड़ कर आओ, गगन-निवासी रे ।। दर्शन दो...।।९

 

हे घनश्याम, हे नाथ, मुझे दर्शन दो।

 

मेरे नेत्र तुम्हारे दर्शनों के लिए प्यासे हो रहे हैं। हे सबके अन्तर्वासी, मेरे मन-मन्दिर की ज्योति जला दो ।।१

 

तुम्हारी मूर्ति सभी मन्दिरों में विद्यमान है, फिर भी तुम्हारे दर्शन नहीं होते । (तुम्हारी प्रतीक्षा में) युग बीत चले, परन्तु तुम्हारे मिलन की पूर्णिमा की रात्रि अभी तक नहीं आयी ।।२

 

जब तू दया का द्वार खोलता है तो गूँगा पंचम स्वर में बोलने लगता है, अन्धा देखने लगता है और लंगड़ा पाँव-पाँव चल कर काशी पहुँच जाता है ।।३

 

मैं (साधारण) तृष्णा को तो जल पी कर शान्त कर देता हूँ; परन्तु इन नेत्रों को (जो तुम्हारे दर्शन के लिए प्यासे हैं) भला में कैसे समझाऊँ? हे हृदयवासी, आँखमिचौली का यह खेल अब छोड़ दो।।४

 

तुम निर्बलों के बल, निर्धनों के धन और भक्तजनों के रक्षक हो। तुम्हारे भजन से मैं सब-कुछ प्राप्त कर लूँ और सब चिन्ता दूर हो जाये ।।५

 

हे दुःख निवारक! जो तुम्हारा भजन तो करते हैं, परन्तु तुम्हें जानते तक नहीं, उन्हें भी तू अपना लेता है। तुम्हारी दया असीम है ।।६

 

आज तुम्हारे दरवाजे पर ही हमारी हार-जीत का फैसला होने को है। मेरी जीत तुम्हारी हार पर निर्भर करती है, परन्तु हार और जीत-ये दोनों ही तो तुम्हारे (हाथ) हैं। मैं तो तुम्हारे चरणों का उपासक हूँ।।७

 

मैं पागल कब से तुम्हारे द्वार पर खड़ा हुआ तुम्हारे हार की भिक्षा तुम से ही माँग रहा हूँ। हे भक्तों को आनन्द देने वाले, नरसी की प्रार्थना अब तो सुन लो ।।८

 

हे नाथ, अब दया करने में विलम्ब न करो। नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी लाज ही लुट जाय। हे वैकुण्ठवासी, तीनों लोकों को छोड़ कर शीघ्र पधारो ।।९

 

नामावली

 

दर्शन दो घनश्याम नाथ ।

राधेश्याम जय राधेश्याम ।

 

११. अधरं मधुरं

(श्री वल्लभाचार्यकृतम्)

 

श्लोक

 

शान्ताकारं भुजग-शयनं पद्य-नाभं सुरेशं,

विश्वाधारं गगन-सदृशं, मेघ-वर्ण शुभांगम् ।

लक्ष्मी कान्तं, कमल-नयनं, योगिभिर्ध्यान-गम्यं,

वन्दे विष्णुं भव-भय-हरं, सर्व-लोकैकनाथम् ।।

 

मैं उस विष्णु को प्रणाम करता हूँ जिसकी आकृति शान्त है, जो आदि शेष पर लेटा है, जो पद्मनाभ है, देवताओं का स्वामी है, विश्व का आधार है, आकाश सदृश व्यापक है, मेघ जैसी कान्ति वाला है, जिसके अंग मंगलकारी हैं, जो लक्ष्मी का पति है, जिसके नयन कमल के सदृश हैं, जिसे योगिजन ध्यान द्वारा जान पाते हैं, जो संसार-भय को दूर करने वाला और समस्त लोकों का एकमात्र स्वामी है।

 

स्तोत्र

 

अधरं मधुरं वदनं मधुरं, नयनं मधुरं हसितं मधुरं ।

हृदयं मधुरं गमनं मधुरं, मधुराधिपते-रखिलं मधुरम् ।।१

 

वचनं मधुरं चरितं मधुरं, वसनं मधुरं वलितं मधुरं ।

चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं, मधुराधिपते-रखिलं मधुरम् ।।२

 

वेणु-र्मधुरो रेणु-र्मधुरो, पाणि-र्मधुरः पादो मधुरः ।

नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं, मधुराधिपते-रखिलं मधुरम् ।।३

 

गीतं मधुरं पीतं मधुरं, भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरं ।

रूपं मधुरं तिलकं मधुरं, मधुराधिपते-रखिलं मधुरम् ।।४

 

करणं मधुरं तरणं मधुरं, हरणं मधुरं रमणं मधुरं ।

वमितं मधुरं शमितं मधुरं, मधुराधिपतये-रखिलं मधुरम् ।।५

 

गुंजा मधुरा माला मधुरा, यमुना मधुरा वीची मधुरा ।

सलिलं मधुरं कमलं मधुरं, मधुराधिपते-रखिलं मधुरम् ।।६

 

गोपी मधुरा लीला मधुरा, युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरं ।

दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं, मधुराधिपते-रखिलं मधुरम् ।।७

 

गोपा मधुरा गावो मधुरा, यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।

दलितं मधुरं फलितं मधुरं, मधुराधिपते-रखिलं मधुरम् ।।८ ।।

 

उनके अधर मधुर हैं, मुख मधुर है, नेत्र मधुर हैं। हास्य मधुर है और गति भी मधुर है; श्री मधुराधिपति का सब-कुछ मधुर है ।।१

 

उनके वचन मधुर है, चरित्र मधुर है, वस्त्र मधुर हैं, अंगभंगी मधुर है, चाल मधुर है और भ्रमण भी अति मधुर है; श्री मधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है ।।२

 

उनकी वेणु मधुर है, चरण-रज मधुर है, कर-कमल मधुर हैं, चरण मधुर हैं, नृत्य मधुर है और सख्य भी मधुर है; श्री मधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है ।।३

 

उनका गान मधुर है, पान मधुर है, खान मधुर है, शयन मधुर है, रूप मधुर है और तिलक भी अति मधुर है; श्री मधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है ।।४

 

उनका कार्य मधुर है, तैरना मधुर है, हरण मधुर है, रमण मधुर है, उद्‌गार मधुर है और शान्ति भी मधुर है। श्री मधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है ।।५

 

उनकी गुंजा मधुर है, माला मधुर है, यमुना मधुर है, उसकी तरंगें मधुर हैं, उसका जल मधुर है और कमल भी अति मधुर है; श्री मधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है।।६

 

गोपियाँ मधुर हैं, उनकी लीला मधुर है, उनका संयोग मधुर है, वियोग मधुर है, निरीक्षण मधुर है और शिष्टाचार भी मधुर है; श्री मधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है।।७

 

गोप मधुर हैं, गायें मधुर हैं, लकुटी मधुर है, रचना मधुर है, दलन मधुर है और उसका फल भी अति मधुर है, श्री मधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है ।।८

 

नामावली

 

विपिन-विहारी राधेश्याम, कुंज-विहारी राधेश्याम ।

बाँके-विहारी राधेश्याम, देवकी-नन्दन राधेश्याम ।।

गोपिका-वल्लभ राधेश्याम, राधा-वल्लभ राधेश्याम ।

कृष्ण-मुरारी राधेश्याम, करुणा-सागर राधेश्याम ।।

भक्ति-दायक राधेश्याम, शक्ति-दायक राधेश्याम ।

भुक्ति-दायक राधेश्याम, मुक्ति-दायक राधेश्याम ।।

सच्चिदानन्द राधेश्याम, सद्‌गुरु-रूप राधेश्याम ।

सर्व-रूप श्री राधेश्याम, सर्व-नाम श्री राधेश्याम ।

राधेश्याम राधेश्याम, राधेश्याम श्री राधेश्याम ।।

१२. जयति तेऽधिकम्

(भागवत से)

 

श्लोक

 

वन्दे नन्दव्रज-स्त्रीणां पाद-रेणुमभीक्ष्णशः ।

यासां हरि-कथोद्गीतं पुनाति भुवन-त्रयम् ।।

 

गोपियों के, नन्द के, व्रज की स्त्रियों के चरण-रज को सदा नमस्कार, भगवान् की लीलाओं का वर्णन करने वाला जिनका गीत तीनों लोकों को पवित्र करता है।

 

जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः

श्रयत इन्दिरा शश्व-दत्र हि।

दयित दृश्यतां दिक्षु तावका-

स्त्वयि धृतासव-स्त्वां विचिन्वते ।।१

 

शर-दुदाशये साधु-जातसत्-

सरसिजोदर-श्री-मुषा दृशा ।

सुरत-नाथ तेऽशुल्क-दासिका

वरद निघ्नतो नेह किं वधः ।।२

 

विष-जलाप्ययाद्-व्याल-राक्षसाद्-

वर्ष-मारुताद्-वैद्युतानलात् ।

वृष-मयात्मजाद्-विश्वतोभया

दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः ।।३

 

न खलु गोपिका-नन्दनो-भवा-

नखिल-देहिना-मन्तरात्म-दृक् ।

विखनसार्थितो विश्व-गुप्तये

सख उदेयिवान् सात्वतां कुले ।।४

 

विरचिताभयं वृष्णि-धुर्य ते

चरण-मीयुषां संसृते-र्भयात् ।

कर-सरोरुहं कान्त कामदं

शिरसि धेहि नः श्रीकर-ग्रहम् ।।५

 

व्रज-जनार्तिहन् वीर-योषितां

निज-जन-स्मय-ध्वंसन-स्मित ।

भज सखे भवत्-किंकरी स्म नो

जलरुहाननं चारु दर्शय ।।६

 

प्रणत-देहिनां पाप-कर्शनं

तृणचरानुगं श्री-निकेतनम् ।

फणि-फणार्पितं ते पदांबुजं

कृणु कुचेषु नः कृन्धि ह-च्छयम् ।।७

 

मधुरया गिरा वल्तु-वाक्यया

बुध-मनोज्ञया पुष्करेक्षण ।

विधिकरी-रिमा वीर मुहाती-

रधर-सीधुना-ऽऽप्याययस्व नः ।।८

 

तव कथामृतं तप्त-जीवनं

कविभि-रीडितं कल्मषापहम् ।

श्रवण-मंगलं श्रीम-दाततं

भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ।।९

 

प्रहसितं प्रिय प्रेम-वीक्षणं

विहरणं च ते ध्यान-मंगलम्।

रहसि संविदो या हृदि-स्पृशः

कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ।।१०

 

चलसि-यद्-व्रजा-च्चारयन् पशून्

नलिन-सुन्दरं नाथ ते पदम् ।

शिल-तृणांकुरैः सीदतीति नः

कलिलतां मनः कान्त गच्छति ।।११

 

दिन-परिक्षये नीलकुन्तलै-

र्वनरुहाननं विभ्र-दावृतम् ।

घन-रजस्वलं दर्शयन् मुहु-

र्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि ।।१२

 

प्रणत-कामदं पद्मजार्चितं

धरणि-मण्डनं ध्येय-मापदि ।

चरण-पंकजं सन्तमं च ते

रमण नः स्तने-ष्वर्पयाधिहन् ।।१३

 

सुरत-वर्धनं शोक-नाशनं

स्वरित-वेणुना सुष्ठ-चुम्बितम् ।

इतर-राग-विस्मारणं नृणां

वितर वीर न-स्तेऽधरामृतम् ।।१४

 

अटति यद्-भवा-नह्नि काननं

त्रुटि-र्युगायते त्या-मपश्यताम् ।

कुटिल-कुन्तलं श्रीमुखं च ते

जड़ उदीक्षतां पक्ष्मकृद-दृशाम् ।।१५

 

पति-सुतान्वय-भ्रातृ-बान्धवा-

नतिविलंघ्य तेऽन्त्यच्युतागताः ।

गति-विद-स्तवोद्गीत-मोहिताः

कितव योषितः क-स्त्यजे-न्निशि ।।१६

 

रहसि संविदं ह-च्छयोदयं

प्रहसिताननं प्रेम-वीक्षणम् ।

बृह-दुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते

मुहु-रतिस्पृहा मुह्यते मनः ।।१७

 

 

वज्र-जनौकसां व्यक्ति-रंग ते

वृजिन-हन्त्र्यलं विश्व-मंगलम् ।

त्यज मनाक् च न-स्त्वत्स्पृहात्मनां

स्वजन-हृद्रुजां य-न्निषूदनम् ।।१८

 

यत्ते सुजात-चरणाम्बुरुहं स्तनेषु

भीताः शनैः प्रियदधीमहि कर्कशेषु ।

तेनावटी-मटसि तद्-व्यथते न किंस्वित्

कूर्पादिभि-भ्रमति धी-र्भवदायुषां नः ।।१९

 

इति गोप्यः प्रगायन्त्यः प्रलपन्त्यश्च चित्रधा,

रुरुधुः सुस्वरं राजन् कृष्ण-दर्शन-लालसाः ।

तासा माविरभूत् शौरिः स्मयमान-मुखाम्बुजः,

पीताम्बर-धरः स्रग्वी साक्षा-न्मन्मथ-मन्मथः ।।२०

 

 

अर्थ

 

गोपियाँ बिरहावेश में गाने लगीं : प्यारे! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी ब्रज की महिमा बढ़ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मी जो अपना निवास स्थान बैकुण्ठ छोड़ कर यहाँ नित्य निरन्तर निवास करने लगी हैं, इसकी सेवा करने लगी हैं। परन्तु प्रियतम! देखो, तुम्हारी गोपियाँ, जिन्होंने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पण कर रखे हैं, वन में भटक कर तुम्हें खोज रही हैं ।।१

 

हमारे प्रेमपूर्ण हृदय के स्वामी! हम तुम्हारी बिना मोल की दासी हैं। तुम शरत्कालीन जलाशय में सुन्दर सरजिस कर्णिका के सौन्दर्य को चुराने वाले नेत्रों से हमको घायल कर चुके हो। हमारे मनोरथ पूर्ण करने वाले प्राणेश्वर! क्या नेत्रों से मारना वध नहीं है? अस्त्रों से हत्या करना ही वध है?।।२

 

पुरुष-शिरोमणे ! यमुना जी के विषैले जल से होने वाली मृत्यु, साँप का रूप धारण कर खाने वाले अघासुर, इन्द्र की वर्षा, आँधी, बिजली, दावानल, वृषभासुर और व्योमासुर आदि से एवं भिन्न-भिन्न अवसरों पर सब प्रकार के भयों से तुमने हमारी रक्षा की है ।।३

 

तुम केवल यशोदानन्दन ही नहीं हो, समस्त शरीरधारियों के हृदय में रहने वाले साक्षी हो, अन्तर्यामी हो । सखे ! ब्रह्मा जी की प्रार्थना से विश्व की रक्षा करने के लिए तुम यदुवंश में उत्पन्न हुए हो ।।४

 

अपने प्रेमियों की अभिलाषा पूर्ण करने वालों में अग्रगण्य यदुवंश शिरोमणे ! जो लोग जन्म-मृत्यु-रूप संसार के चक्र से डर कर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें तुम्हारे कर-कमल अपनी छत्र-छाया में ले कर निर्भय कर देते हैं। हमारे प्रियतम ! सबकी लालसा-अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला वही कर-कमल, जिससे तुमने लक्ष्मी जी का हाथ पकड़ा है, हमारे शिर पर रख दो ।।५

 

व्रजवासियों के दुःख दूर करने वाले वीरशिरोमणि श्यामसुन्दर ! तुम्हारी मन्द मुस्कान की एक उज्वल रेखा ही तुम्हारे प्रेमीजनों के सारे मानमद को चूर-चूर कर देने के लिए पर्याप्त है। हमारे प्यारे सखा ! हमसे रूठो मत, प्रेम करो। हम तो तुम्हारी दासी हैं, तुम्हारे चरणों पर निछावर हैं। हम अबलाओं को अपना परम सुन्दर साँवला मुख-कमल दिखाओ ।। ६

 

तुम्हारे चरण-कमल शरणागत प्राणियों के सारे पापों को नष्ट कर देते हैं। वे समस्त सौन्दर्य-माधुर्य की खान हैं और स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती हैं। तुम उन्हीं चरणों से हमारे बछड़ों के पीछे-पीछे चलते हो और हमारे लिए तुमने उन्हें साँप के फणों पर भी रखने में संकोच न किया। हमारा हृदय तुम्हारी विरह-व्यथा की आग में जल रहा है, तुम्हारे मिलन की आकांक्षा हमको सता रही है। तुम अपने वही चरण हमारे वक्ष स्थल पर रख कर हमारे हृदय की ज्वाला को शान्त कर दो।।७

 

कमलनयन! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है। उसका एक-एक शब्द, एक-एक अक्षर मधुरातीत मधुर है। बड़े-बड़े विद्वान् उसमें रम जाते हैं, उस पर अपना सर्वस्व निछावर कर देते हैं। तुम्हारी उस वाणी का रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी दासी गोपियाँ मोहित हो रही हैं। दानवीर। अब तुम अपना दिव्य अमृत से भी मधुर अधर-रस पिला कर हमें जीवन दान दो ।।८

 

प्रभो! तुम्हारी जीवन-लीला-कथा भी अमृतस्वरूप है। विरह से सताये हुए लोगों के लिए तो यह जीवनसर्वस्व ही है। बड़े-बड़े ज्ञानी महात्माओं, भक्त कवियों ने उसका गान किया है। वह सारे पाप-ताप'को तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवण मात्र से परम मगल, परम कल्याण का दान भी करती है। वह परम सुन्दर, परम मधुर और परम विस्तृत भी है। जो तुम्हारी उस लीला-कथा का गान करते हैं, वास्तव में भूलोक में वे ही सबसे बड़े दाता हैं ।।९

 

प्यारे! एक दिन वह था, जब तुम्हारी प्रेम-भरी हँसी और चितवन तथा तुम्हारी तरह-तरह की क्रीड़ाओं का ध्यान करके हम आनन्द में मग्न हो जाया करती थीं। उनका ध्यान भी परम मंगलदायक है, और उसके बाद तुम मिले। तुमने एकान्त में हृदयस्पर्शी ठिठोलियाँ कीं, प्रेम की बातें कहीं। हमारे कपटी मित्र! अब वे सब बातें याद आ कर हमारे मन को क्षुब्ध किये देती हैं।।१०

 

हमारे प्यारे स्वामी! तुम्हारे चरण कमल से भी अधिक सुकोमल और सुन्दर हैं। जब तुम गौओं को चराने के लिए व्रज से निकलते हो, यह सोच कर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके और कुश-काँटे के गड़ जाने से कष्ट पाते होंगे, हमारा मन बेचैन हो जाता था। हमें बड़ा दुःख होता है।।११

 

दिन ढलने पर जब तुम वन से घर लौटते हो तो हम देखती हैं कि तुम्हारे मुख-कमल पर नीली-नीली अलकें लटक रही हैं और गौओं के खुर से उड़-उड़ कर घनी धूल पड़ी हुई है। हे प्रियतम। हम तो तुम्हारा वह सौन्दर्य देखती हैं और तुम हमारे हृदय में मिलन की आकांक्षा-प्रेम उत्पन्न करते हो ।।१२

प्रियतम! एकमात्र तुम्हीं हमारे दुःखों को मिटाने वाले हो, तुम्हारे चरण-कमल शरणागत भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले हैं। स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती हैं और पृथ्वी के तो वे भूषण ही हैं। आपत्ति के समय एकमात्र उन्हीं का चिन्तन करना उचित है, जिससे सारी विपत्तियाँ कट जाती हैं। कुंजविहारी। तुम अपने परम कल्याण-स्वरूप चरण-कमल हमारे वक्ष स्थल पर रख कर हमारे हृदय की व्यथा को शान्त कर दो ।।१३

 

वीर शिरोमणे! तुम्हारा अधरामृत मिलने के सुख की आकांक्षा को बढ़ाने वाला है। वह विरहजन्य समस्त शोक-सन्ताप को नष्ट कर देता है। गाने वाली वह बाँसुरी उसको भली-भाँति चूमती रहती है। जिन्होंने एक बार उसको पी लिया, उन लोगों को फिर दूसरों तथा दूसरों की आसक्तियाँ का ध्यान भी नहीं होता। हमारे वीर! अपना वही अधरामृत हमको वितरण करो, हमको पिलाओ ।।१४

 

प्यारे। दिन के समय जब तुम वन में विहार करने के लिए चले जाते हो, तब तुम्हें देखे बिना हमारे लिए एक-एक क्षण युग के समान हो जाता है और जब तुम सन्ध्या के समय लौटते हो तथा घुँघराली अलकों से युक्त तुम्हारा परम सुन्दर मुखारविन्द हम देखती हैं, उस समय पलकों का गिरना हमारे लिए भार हो जाता है और ऐसा जान पड़ता है कि इन नेत्रों की पलकों को बनाने वाला विधाता मूर्ख ही है ।।१५

 

प्यारे श्यामसुन्दर! हम अपने पति, पुत्र, भाई, बन्धु और कुल (परिवार) का त्याग कर, उनकी इच्छा और आज्ञाओं का उल्लंघन करके तुम्हारे पास आयी हैं। हम तुम्हारी एक-एक चाल जानती हैं और संकेत समझती हैं और तुम्हारे मधुर गान की गति समझ कर उसी से मोहित हो कर यहाँ आयी हैं। कपटी ! इस प्रकार रात्रि के समय आयी हुई युवतियों को तुम्हारे सिवा और कौन त्याग सकता है?।।१६

 

प्यारे ! एकान्त में तुम मिलन की आकांक्षा, प्रेमभाव को जगाने वाली बातें किया करते थे। ठिठोली करके हमको छेड़ते थे। तुम प्रेमभरी चितवन से हमारी ओर देख कर मुस्करा दिया करते थे और हम लक्ष्मी-निकेतन तुम्हारा विशाल वक्षःस्थल देखती थीं। तब से अब तक हमारी लालसा निरन्तर बढ़ती जा रही है। हमारा मन अधिकाधिक मुग्ध होता जा रहा है ।।१७

 

प्यारे ! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज-वनवासियों के सम्पूर्ण शोक-ताप को मिटाने वाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है। हमारा हृदय तुम्हारे प्रति लालसा से भरा हुआ है। कुछ थोड़ी-सी ऐसी औषधि दो जो तुम्हारे स्वजनों के हृदय रोग को सर्वथा निर्मूल कर दे ।।१८

 

तुम्हारे चरण कमल से भी सुकुमार हैं। उन्हें हम अपने स्तनों पर भी डरते-डरते बहुत धीरे से रखती हैं कि कहीं उनको चोट न लग जाये। उन्हीं चरणों से तुम रात्रि के समय घोर जंगल में छिपे-छिपे घटक रहे हो। क्या कंकड़-पत्थर आदि की चोट लगने से उनमें पीड़ा नहीं होती ? हमें तो उसकी सम्भावना मात्र से चक्कर आ रहा है। हम अचेत होती जा रही है। श्रीकृष्ण। श्यामसुन्दर। प्राणनाथ। हमारा जीवन तुम्हारे लिए है। हम तुम्हारे लिए ही जी रही हैं, हम तुम्हारी हैं ।।१९

 

इस भाँति गोपियाँ उच्च स्वर से श्रीकृष्ण का गुणगान करने लगीं। वे श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए क्रन्दन करने लगी और उनका वह रुदन ही गान के रूप में फूट निकला। ठीक उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण पीताम्बर तथा बनमाला धारण किये हुए उनके बीच प्रकट हो गये ।।२०

१३. कालिय-मर्दनं-अथ बारिणि

(श्री मेप्पत्तूर नारायण भट्टपाद रचित 'श्रीमन्नारायणीयम्' से)

 

श्लोक

 

वसुदेव-सुतं देवं कंस-चाणूर-मर्दनम्।

देवकी-परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद् गुरुम् ।।

 

मैं जगद्‌गुरु भगवान् श्रीकृष्ण की वन्दना करता हूँ, जो बसुदेव जी का पुत्र है, जो स्वयं भगवान् है, जिसने कंस और चाणूर राक्षसों का वध किया तथा जो माता देवकी को परम आनन्द देने वाला है।

 

गीत

अथ वारिणि घोरतरं फणिनं

प्रतिवारयितुं कृतधी-र्भगवन् ।

द्वत-मारिथ तीरग-नीप-तरुं

विष-मारुत-शोषित-पर्ण-चयम्। ।।१

 

अधिरुह्य पदाम्बुरुहेण च तं

नव-पल्लव-तुल्य-मनोज्ञ-रुचा ।

हृद-वारिणि दूरतरं न्यपतः

परिघूर्णित-घोर-तरंग-गणे ।।२

भुवन-त्रय-भार-भृतो भवतो

गुरु-भार-विकम्पि-विजृम्भि-जला ।

परिमज्जयति स्म धनुः शतकं

तटिनी झटिति स्फुट-घोषवती ।।३

 

अथ दिक्षु विदिक्षु परिक्षुभित-

भ्रमितोदर-वारि-निनाद-भरैः ।

उदका-दुदगा-दुरगाधिपतिः

त्वदुपान्त-मशान्त-रुषान्ध -मन: ।।४

 

फण-श्रृंग-सहस्र-विनिःसृमर-

ज्वल-दग्नि-कणोग्र विषाम्बु-धरम् ।

पुरतः फणिनं समलोकयथा

बहु-श्रृंगिण-मंजन-शैल-मिव ।।५

 

ज्वल-दक्षि-परिक्षर-दुग्र-विष-

श्वसनोष्म-भरः स महा-भुजगः ।

परिदश्य भवन्त-मनन्त-बलं

समवेष्टय-दस्फुट-चेष्ट-महो ।।६

 

अविलोक्य भवन्त-मथाकुलिते

तट गामिनि बालक-धेनु-गणे ।

व्रज-गेह-तलेऽप्यनिमित्त-शतं

समुदीक्ष्य गता यमुनां पशुपाः ।।७

 

अखिलेषु विभो भवदीय-दशां

अवलोक्य जिहासुषु जीवभरम् ।

फणि-बन्धन-माशु विमुच्य जवाद्-

उदगम्यत हास-जुषा भवता ।।८

 

अधिरुह्य ततः फणि-राज फणान्

ननृते भवता मृदु-पाद-रुचा।

कल शिंजित नूपुर-मंजु-मिलत्

कर-कंकण-संकुल-संक्वणितम् ।।९

 

जहषुः पशुपा-स्तुतुषु-र्मुनयो

ववृषुः कुसुमानि सुरेन्द्र-गणाः ।

त्वयि नृत्यति मारुत-गेह-पते

परिपाहि स मां त्व-मदान्त-गदात् ।।१०

 

हे भगवन्! तू यमुना के जल में निवास करने वाले उस महा सर्प का विनाश करने का निश्चय कर नदी के तट पर रहने वाले कदम्ब-वृक्ष पर चढ़ गया, जिसके सारे पत्ते विष-वायु से सूख गये थे ।।१

 

उस कदम्ब-वृक्ष पर तू चढ़ गया और नव-पल्लवों के समान कान्तियुक्त अपने चरण-कमल से नदी का जल दूर तक हिलाने लगा जिससे नदी में जोर से लहरें उठने लगीं ।॥२

 

चूंकि तू तीनों लोकों का भार वहन करता है, तेरे उस महान् भार से नदी का जल सौ-सौ धनुष की उँचाई तक उठने लगा और तटवर्ती प्रदेश में महान् कोलाहल मचने लगा ।।३

 

अब इस प्रकार चारों दिशाओं में उमड़ते, चक्कर लगाते पानी के कोलाहल के बीच सर्पराज पानी से बाहर निकल कर, बड़े क्रोध से अन्धा हो कर तेरे पास आया ।।४

 

उसके हजारों फन पर्वत की चोटियों की तरह दीख रहे थे, उनमें जलते अंगारे के समान विष उमड़ रहा था जो बादलों के समान दीखता था। तू कई चोटियों वाले अंजन पर्वत के समान दीख रहा था ।।५

 

उस महा सर्प की आँखें जल रही थीं। वह बड़ी गरम उसासों के साथ तीव्र विष उगल रहा था। अनन्त शक्ति से सम्पन्न तुमको कुछ भी विचलित न होते देख कर वह तुम्हें लपेटने लगा ।।६

 

यमुना के तट पर सारे गोप बालक और पशु तुझे न देख पाने के कारण तथा घर में भी कई प्रकार के असगुन होते देख कर सब ग्वाल यमुना के पास चले आये ।।७

 

उन लोगों ने जब तेरी अवस्था देखी, तब इतने दुःखी हुए कि सबने अपने प्राण त्याग करने का निश्चय कर लिया। यह देख कर तू सर्प के बन्धन को छुड़ा कर शीघ्र ही हँसन्मुख हो बाहर आ गया ।।८

 

और तब सर्पराज के फनों पर तू चढ़ गया और अपने मृदुल पाद-कमलों से, नुपूर के सुमधुर निनाद तथा हाथों के कंकण की मनोहर ध्वनि के साथ वहाँ नाचने लगा ।।९

 

हे गुरुवागूर, तुझे यों नृत्य करते देख कर गोपालक हर्षित हुए, मुनिजन सन्तुष्ट हुए, देवगण आकाश से पुष्प वर्षा करने लगे। तू मेरी रक्षा कर जो दुर्निवार रोग से पीड़ित

 

नामावली

 

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

 

श्री विष्णु-स्तोत्रम्

१४. अच्युतं केशवं

(श्री शंकराचार्यकृतम्)

 

श्लोक

 

आदौ देवकि-देवि-गर्भ-जननं गोपी-गृहे वर्धनं

माया-पूतन-जीवितापहरणं गोवर्धनोद्धारणम् ।

कंस-च्छेदन-कौरवादि-हननं कुन्ती-सुतापालनं

एकद् भागवतं पुराण-कथितं श्रीकृष्ण-लीलामृतम् ।

 

प्रारम्भ में देवकी देवी के गर्भ में जन्म ग्रहण करना, गोपी (यशोदा) के घस ालन-पालन होना, मायाविनी पूतना का प्राण-हरण, गोवर्धन-पर्वत को धारण करना स तथा दूसरे असुरों का वध, कौरव तथा उनके साथियों का विनाश, कुन्ती के पुत्रों क 1-संक्षेप में भागवतमहापुराण में श्रीकृष्ण की यही अमृतरूपी लीला-कथा है।

 

गीत

 

अच्युतं केशवं राम-नारायणं

कृष्ण-दामोदरं वासुदेवं हरिम् ।

श्रीधरं माधवं गोपिका-वल्लभं,

जानकी-नायकं रामचन्द्रं भजे ।।१

 

अच्युतं केशवं सत्यभामा-धवं,

माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ।

इन्दिरा-मन्दिरं चेतसा सुन्दरं

देवकी नन्दनं नन्दजं सन्दधे ।।२

 

विष्णवे जिष्णवे शंखिने चक्रिणे

रुक्मिणी-रागिणे जानकी-जानये ।

वल्लभी-वल्लभायार्चितायात्मने,

कंस-विध्वंसिने वंशिने ते नमः ।।३

 

कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण,

श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे ।

अच्युतानन्द हे माधवाधोक्षज,

द्वारका-नायक द्रौपदी-रक्षक ।।४

 

राक्षस क्षोभितः सीतया शोभितो,

दण्डकारण्य-भू पुण्यता-कारणः

लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितोऽ

गस्त्य-सम्पूजितो राघवः पातु माम् ।।५

 

धेनुकारिष्टकानिष्ट-कृद्-द्वेषितः,

केशिहा कंस-हृद्-वंशिका-वादकः ।

पूतना-कोपकः सूरजा खेलनो,

बाल-गोपालकः पातु मां सर्वदा ।।६

 

विद्युदुद्योतवत्-प्रस्फुर-द्वाससं,

प्रावृ-दम्भोदवत्-प्रोल्लस-द्विग्रहम् ।

वन्यया मालया शोभितोरः-स्थलं,

लोहितांघ्रि-द्वयं वारिजाक्षं भजे ।।७

 

कुंचितैः कुन्तलै-जिमानाननं,

रत्न-मौलिं लस-त्कुण्डलं गण्डयोः ।

हार-केयूरकं कंकण-प्रोज्वलं, मागणी

किंकिणी-मंजुलं श्यामलं तं भजे ॥८

 

अच्युतस्याष्टकं यः पठे-दिष्टदं,

प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम्।में मिली

वृत्ततः सुन्दरं कर्तृ-विश्वम्भर-

स्तस्य वश्यो हरि-र्जायते सत्वरम् ।।९

 

अर्थ

 

अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपिकावल्लभ तथा जानकीनाथ रामचन्द्र को मैं भजता हूँ।।१

 

अच्युत, केशव, सत्यभामापति, लक्ष्मीपति, श्रीधर, राधिका जी द्वारा आराधित, लक्ष्मीनिवास, परम सुन्दर, देवकीनन्दन, नन्दकुमार का चित्त से मैं ध्यान करता हूँ।।२

 

जो विभु है, विजय है, शंख-चक्र-धारी है, रुक्मिणी जी का परम प्रेमी है, जानकी जी जिसकी धर्मपत्नी हैं तथा जो व्रजांगनाओं का प्राणाधार है, उस परम पूज्य, आत्मस्वरूप, कसविनाशक, मुरलीमनोहर को नमस्कार करता हूँ।।३

 

हे कृष्ण! हे गोविन्द! हे राम' हे नारायण ! हे रमानाथ। हे वासुदेव! हे अजय! हे शोभाधाम' हे अच्युत! हे अनन्त' हे माधव ! हे अधोक्षज (इन्द्रियातीत) । हे द्वारकानाथ! हे द्रौपदीरक्षक! मुझ पर कृपा करो ।।४

 

जो राक्षसों पर अति कुपित है, श्री सीता जी से शोभित है, दण्डकारण्य की भूमि की पवित्रता का कारण है, श्री लक्ष्मी जी द्वारा अनुगत है, वानरों से सेवित है और श्री अगस्त्य जी से पूजित है, वह रघुकुल में उत्पन्न श्री रामचन्द्र मेरी रक्षा करें ।।५

 

धेनुक और अरिष्टासुर आदि का नाश करने वाला, शत्रुओं का ध्वंस करने वाला, केशी और कस का वध करने वाला, वंशी बजाने वाला, पूतना पर कोप करने वाला, यमुना-तट विहारी, बाल-गोपाल श्रीकृष्ण सदा मेरी रक्षा करें ।।६

 

विद्युत् प्रकाश के सदृश जिसका पीताम्बर विभासित हो रहा है, वर्षाकालीन मेघ के समान जिसका शरीर अति शोभायमान है, जिसका वक्ष स्थल वनमाला से विभूषित है और चरणयुगल अरुण वर्ण के हैं, उस कमल-नयन श्री हरि को मैं भजता हूँ।।७

 

जिसका मुख घुँघराली अलकों से सुशोभित है, मस्तक पर मणिमय मुकुट शोभा दे रहा है तथा कपोलों पर कुण्डल सुशोभित हैं, उज्ज्वल हार, भुजबन्द, कंकण और सुन्दर किंकिणी से सुशोभित मनोहर मूर्ति श्री श्यामसुन्दर को भजता हूँ।।८

 

जो पुरुष इस अति सुन्दर छन्दों वाले और अभीष्ट फलदायक अच्युताष्टक का प्रेष और श्रद्धा से नित्य पाठ करता है, विश्वम्भर, विश्वकर्ता श्री हरि शीघ्र ही उसके वशीभूत हो जाते हैं ।।९

१५. जय विठ्ठल विठ्ठल

 

श्लोक

 

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।

इदानी-मस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ।।

 

हे जनार्दन, अब तेरा यह मानवीय सौम्य रूप देख कर मैंने समाधान प्राप्त किया है और मैं स्वस्थचित्त हुआ हूँ।

 

 

 

 

गीत

 

जय विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल, जय विठ्ठल पाण्डुरंग

जय विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल, ओ विट्ठल विठ्ठल विठ्ठल

जय विठ्ठल विठ्ठल विठ्ठल, जय विठ्ठल पाण्डुरंग

जय विट्ठल पाण्डुरंग

 

नामावली

 

जय जय विठ्ठल पाण्डुरंग विट्ठल ।

१६. हरि तुम हरो जन की भीर

(श्री मीराबाईकृत)

 

श्लोक

 

भजे व्रजैक-मण्डनं समस्त-पाप-खण्डनं

स्वभक्त-चित्त रंजनं सदैव नन्द-नन्दनम् ।

सुपञ्छि गुच्छ-मस्तकं सुनाद-वेणु-हस्तकं

अनंग-रंग-सागरं नमामि कृष्ण-नागरम् ।।

 

अर्थ

 

मैं सदा उस नन्दकुमार नटवर कृष्ण भगवान् की वन्दना करता है तथा उसी को भजता हूं, जो व्रज का भूषण है, जो सम्पूर्ण पापों का नाश करता है, जो अपने भक्तों के हृदय को आनन्दित करता है, जिसके शिर पर मोर-पिच्छ का गुच्छा, हाथ में मधुर वशी है तथा जो सौन्दर्यों का सागर है।

 

गीत

 

हरि तुम हरो जन की भीर ।

द्रौपदी की लाज राखी तुम बढ़ायो चीर ।।१।। हरि...

 

भक्त कारन रूप नरहरि धस्यो आप शरीर।

हिरण्यकशिपु मार लीन्हों धस्यो नाहीं धीर ।।२।। हरि...

 

बूड़ते गजराज राख्यो कियो बाहर नीर ।

दासी मीरा लाल गिरिधर चरन कमल पर सीर ।।३ ।। हरि...

 

हे हरि, तू अपने भक्तों की पीड़ा का निवारण कर।  तूने द्रौपदी की साड़ी को बढ़ा कर उसकी लज्जा की रक्षा की ।।१

 

तूने अपने भक्त प्रह्लाद को बचाने के लिए नृसिंह-रूप धारण किया तथा हिरण्यकशिपु का संहार किया। प्रह्लाद को बचाने के लिए तू इतना उतावला हो रहा था ।।२

 

तूने डूबते हुए गजेन्द्र को बचाया और उसे जल से बाहर निकाला । हे गिरिधर! तेरी दासी 'मीरा' तेरे चरण-कमल पर अपना मस्तक रखती है ।।३

 

नामावली

 

हरि तुम हरो जन की भीर।

हरि हरि हरि बोल, हरि हरि हरि ॐ ।

१७. महायोग-पीठे

(श्री शंकराचार्यकृतम्)

 

श्लोक

 

सम-चरण-सरोजं सान्द्र-नीलाम्बुदाभं

जघन-निहित-पाणिं मण्डनं मण्डनानाम् ।

तरुण-तुलसि-माला-कन्धरं कंजनेत्रं

सदय-धवल-हासं विट्ठलं चिन्तयामि ।।

 

मैं उस भगवान् विठ्ठल का ध्यान करता हूँ जिसके कमलसदृश दोनों चरण सामंजस्यपूर्ण हैं, जिसकी कान्ति नवमेघ के समान नील है, जिसने अपने दोनों हाथ कटि-प्रदेश में रखे हैं, संसार के सब आभूषणों का जो आभूषण है, जिसने गले में नवीन तुलसी-माला पहनी है, जिसके नेत्र कमल-सदृश हैं तथा जिसके मुख पर दयापूर्ण और उज्ज्वल स्मित है।

 

गीत

 

महा-योग-पीठे तटे भीम-रथ्यां,

वरं पुण्डरीकाय दातुं मुनीन्द्रैः ।

समागत्य तिष्ठन्त-मानन्द-कन्दं,

परब्रह्म-लिंगं भजे पाण्डुरंगम् ।।१

 

तडि-द्वाससं नील-मेघावभासं,

रमा-मन्दिरं सुन्दरं चित्प्रकाशम् ।

 

वरं त्विष्ट-कायं सम न्‍यस्‍त-पादं

परब्रह्म-लिंगं भजे पाण्डुरंगम् ।।२

 

प्रमाणं भवाब्धे-रिदं मामकानां

नितम्बः कराभ्यां धृतो येन तस्मात् ।

विधातुर्वसत्यै धृतो नाभि-कोशं,

परब्रह्म-लिंगं भजे पाण्डुरंगम् ।।३

 

स्फुरत्कौस्तुभालंकृतं कण्ठदेशे,

श्रिया जुष्टकेयूरकं श्री-निवासम् ।

शिवं शान्त-मीड्यं वरं लोक-पालं,

परब्रह्म-लिगं भजे पाण्डुरंगम् ।।४

 

शरच्चन्द्र-बिम्बाननं चारु-हासं,

लसत्-कुण्डलाक्रान्त-गण्ड-स्थलांगम् ।

जपा-राग-बिम्बाधरं कंज-नेत्रं,

परब्रह्म-लिंगं भजे पाण्डुरंगम् ।।५

 

किरीटोज्ज्वलत्-सर्व-दिक्प्रान्त-भागं,

सुरै-रर्चितं दिव्य-रत्नै-रनधैः ।

त्रिभंगाकृतिं बर्ह-माल्यावतंसं,

परब्रह्म-लिंगं भजे पाण्डुरंगम् ।।६

 

विभुं वेणुनादं चरन्तं दुरन्तं,

स्वयं लीलया गोप-वेषं दधानम् ।

गवां वृन्दकानन्ददं चारुहासं,

परब्रह्म-लिंगं भजे पाण्डुरंगम् ।।७

 

अजं रुक्मिणी-प्राण-संजीवनं तं,

परं धाम कैवल्य-मेकं तुरीयम् ।

प्रसन्नं प्रपन्नार्तिहं देवदेवं,

परब्रह्म-लिंगं भजे पाण्डुरंगम् ।।८

 

स्तवं पाण्डुरंगस्य वै पुण्यदं ये,

पठेन्त्येकचित्तेन भक्त्या च नित्यम् ।

भवाम्भोनिधिं तेऽपि तीर्ध्वान्तकाले,

हरेरालयं शाश्वतं प्राप्नुवन्ति ।।९

 

परब्रह्म के प्रतीक पाण्डुरंग का मैं भजन करता हूँ जो भगीरथी नदी के तट पर, पुण्डरीक को वर प्रदान करने के लिए मुनिजनों के संग आ कर महायोग-मुद्रा में खड़ा है तथा आनन्द देने वाला है।॥१-

 

परब्रह्म के प्रतीक उस पाण्डुरंग का मैं भजन करता हूँ जो नीलमेघध-सदृश श्याम है, जिसके वस्त्र विद्युत् के समान कान्तिमान् है, जो श्री लक्ष्मी का मन्दिर है, सुन्दर है, ज्ञान के प्रकाश से भरा है और जो अपने जुड़े हुए दोनों पैरों को ईंट पर रख कर खड़ा है ।।२

 

जिसने मेरे समान लोगों को यह बताने के लिए कि मेरे भक्तों के लिए भवसागर की गहराई इतनी ही है, अपने दोनों हाथ कटि-प्रदेश में रख रखे हैं तथा ब्रह्मा के निवास-स्थान कमल को अपने नाभि-प्रदेश में धारण कर रखा है, उस परब्रह्म के प्रतीक पाण्डुरंग का मैं भजन करता हूँ।।३

 

परब्रह्म के प्रतीक पाण्डुरंग का मैं भजन करता हूँ जो प्रकाशयुक्त कौस्तुभमणि को गले में पहनता है, जिसके भुजबन्ध सुन्दरता से चमक रहे हैं, जो साक्षात् लक्ष्मी का भी आवास है, जो मंगलकारी है, शान्त है, स्तुत्य है, श्रेष्ठ है तथा लोकरक्षक है ।।४

 

परब्रह्म के प्रतीक पाण्डुरंग का मैं भजन करता हूँ जिसका मुख शरत्कालीन चन्द्र-मण्डल के समान है, जिसकी मुस्कान मीठी है, गण्ड-प्रदेश में कुण्डल आ कर लटक रहे हैं, जपापुष्प के समान लाल-लाल ओठ हैं, कमल-सदृश नेत्र हैं ।।५

 

परब्रह्म के प्रतीक पाण्डुरंग का मैं भजन करता हूँ जिसके मुकुट के प्रकाश से सारी दिशाएँ प्रकाशित हैं, जो देवताओं से दिव्य और अनमोल रत्नों द्वारा पूजित है, त्रिभंगी आकार में खड़ा है और मोर के पंखों से समलंकृत है।। ६

 

परब्रह्म के प्रतीक पाण्डुरंग का मैं भजन करता हूँ जो सर्वव्यापी है, मुरली बजाता है और जो अन्तरहित है, स्वयं लीला से ग्वालवेष धारण करने वाला है, गो-समूह को आनन्द देने वाला और सुन्दर मुस्कान वाला है।।७।।

 

जो अजन्मा है, रुक्मिणी के लिए संजीवन है, जो स्वयं परम धाम है, कैवल्य है और तुरीय अवस्था है, जो सदा प्रसन्न रहता है, शरणागतों की पीड़ा मिटाता है, देवों का देव है, उस परब्रह्म के प्रतीक पाण्डुरंग का मैं भजन करता हूँ।।८

 

जो लोग पाण्डुरंग के इस पुण्यप्रद स्तोत्र का नित्य भक्तिपूर्वक एकाग्र मन से पाठ करते हैं, वे अन्त काल में संसार-सागर को पार कर के श्री हरि का शाश्वत धाम प्राप्त करते हैं।।९

 

नामावली

 

परब्रह्म रूपं भजे पाण्डुरंगम् ।

 

 

 

 

१८. प्रलयपयोधिजले

(दशावतार-स्तोत्रम्)

(श्रीजयदेवकृतम्)

 

श्लोक

 

वेदा-नुद्धरते जगन्ति वहते भूगोल-मुद्बिभ्रते,

दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्र-क्षयं कुर्वते ।

पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्य-मातन्वते,

म्लेच्छान् मूर्च्छयते दशाकृति-कृते कृष्णाय तुभ्यं नमः ।।

 

उस कृष्ण को नमस्कार है जिसने (मत्स्य का रूप धारण कर) वेदों का उद्धार किया, (वाराह-रूप धारण कर) प्रलयपयोनिधि से पृथ्वी का उद्धार किया, (कूर्म-रूप से) जगत् को धारण किया, (नृसिंह-रूप से) हिरण्यकशिपु दैत्य का संहार किया, (वामन-अवतार से) बलि को छला, (परशुराम का रूप धारण कर) क्षत्रियों का संहार किया, (रामावतार में) रावण को मारा, (बलराम-अवतार में) हलधर बना, (बौद्धावतार में) करुणा का प्रसार किया, (कल्कि अवतार में) म्लेच्छों को मूर्च्छित किया। उस एक प्रभु ने ही इन दशावतारों से अनेक लीलाएँ कीं।

 

गीत

 

प्रलय-पयोधि-जले धृतवा-नसि वेदम् ।

विहित-वहित्र-चरित्र-मखेदम् ।।

केशव धृत-मीन-शरीर जय जगदीश हरे ।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।१

 

क्षिति-रतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे ।

धरणी-धरण-किण-चक्र-गरिष्ठे ।।

केशव धृत-कच्छप-रूप जय जगदीश हरे ।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।२

 

वसति दशन-शिखरे धरणी तव लग्ना ।

शशिनि कलंक-कलेव निमग्ना ।।

केशव धृत-सूकर-रूप जय जगदीश हरे।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।३

 

तव कर-कमल-वरे नख-मद्भुत -

शृंगम् । दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृंगम् ।।

केशव धृत-नरहरि-रूप जय जगदीश हरे ।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।४

 

छलयसि विक्रमणे बलि-मद्द्भुत-वामन ।

पद-नख-नीरजनित-जनपावन ।।

केशव धृत-वामन-रूप जय जगदीश हरे ।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।५

 

क्षत्रिय-रुधिरमये जग-दपगत-पापम् ।

स्नपयसि पयसि शमित-भव-तापम् ।।

केशव धृत-भृगुपति-रूप जय जगदीश हरे ।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।६

 

वितरसि दिक्षु रणे दिक्पति-कमनीयम् ।

दशमुख-मौलि-बलिं रमणीयम् ।।

केशव धृत-रघुपति-रूप जय जगदीश रहे ।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।७

 

वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् ।

हल-हति-भीति-मिलित-यमुनाभम् ।।

केशव धृत-हल-धर-रूप जय जगदीश हरे ।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।८

 

निन्दसि यज्ञ-विधे-रहह श्रुतिजातम् ।

सदय-हृदय-दर्शित-पशु-घातम् ।।

केशव धृत-बुद्ध-शरीर जय जगदीश हरे।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।९

 

म्लेच्छ-निवह-निधने कलयसि करवालम् ।

धूमकेतु-मिव किमपि करालम् ।।

केशव धृत-कल्कि-शरीर जय जगदीश हरे ।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।१०

 

श्री जयदेव-कवे-रिद-मुदित-मुदारम् ।

शृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ।।

केशव धृत-दशविध-रूप जय जगदीश हरे ।

गोपालकृष्ण जय जगदीश हरे ।।११

 

हे केशव। प्रलय-काल में बढ़ते हुए समुद्र-जल में बिना क्लेश नौका चलाने की लीला करते हुए तू वेदों की रक्षा करता है , ऐसे मत्स्यरूपधारी जगत्पति, हरि, तेरी जय हो !!१

 

हे केशव। तूने अपनी कठोर और दृढ़ पीठ पर पृथ्वी को धारण कर रखा है, ऐसे कच्छपरूपधारी जगत्पति, हरि, तेरी जय हो ।।२

 

हे केशव। चन्द्रमा में निमग्न हुई कलंक-रेखा के समान यह पृथ्वी तेरे दाँत की नोक पर अटकी हुई सुशोभित हो रही है, ऐसे शूकररूपधारी जगत्पति, हरि, तेरी जय हो !!३

 

हे केशव ! हिरण्यकशिपु के शरीर को चीर डालने वाले विचित्र नुकीले नख तेरे करकमल में हैं, ऐसे नृसिंहरूपधारी जगत्पति, हरि, तेरी जय हो!!४

 

हे केशव ! तू पैर बढ़ा कर राजा बलि को छलता है तथा अपने चरण-नखों के जल से लोगों को पवित्र करता है, ऐसे हे अ‌द्भुत वामनरूपधारी जगत्पति, हरि, तेरी जय हो!!५

 

हे केशव ! तू जगत् के पाप और तापों का नाश करते हुए उसे क्षत्रियों के रुधिर-रूप जल से स्नान कराता है, ऐसे हे परशुरामरूपधारी जगत्पति, हरि, तेरी जय हो !!६

 

हे केशव! तू युद्ध में रावण के शिरों की बलि दे कर सब दिशाओं के लोकपालों को प्रसन्न करता है, ऐसे रामावतारधारी जगत्पति, हरि, तेरी जय हो!! ७

 

हे केशव ! तू अपने गौर वर्ण वाले शरीर पर मेघ-सदृश नीलाम्बर धारण किये रहता है, मानो तेरे हलास्त्र के भय से यमुना ने तुम्हारे वस्त्र का रूप ले रखा है, ऐसे बलरामरूपधारी जगत्पति, हरि, तेरी जय हो !!८

 

हे केशव ! सदय हृदय से पशुहत्या की कठोरता दिखाते हुए यज्ञ-विधान-सम्बन्धी श्रुतियों की निन्दा करने वाले बुद्धरूपधारी जगत्पति, हरि, तेरी जय हो !!९

 

हे केशव। जो म्लेच्छ-समूह का नाश करने के लिए धूमकेतु के समान अत्यन्त भयंकर तलवार चलाता है, ऐसे कल्किरूपधारी जगत्पति, हरि, तेरी जय हो ।1१० (हे भक्तो) जयदेव कवि की कही हुई इस मनोहर, आनन्ददायक, कल्याणमय तत्त्वरूपी स्तुति को सुनो । हे दशावतारधारी। जगत्पति, हरि, केशव, तेरी जय हो !!११

 

नामावली

 

केशव माधव गोविन्द जय ।

राधेकृष्ण मुकुन्द जय जय ।।

१९. राधारमण कहो

 

जिस हाल में, जिस देश में, जिस वेष में रहो ।

राधारमण, राधारमण, राधारमण कहो ।।१

 

जिस काम में, जिस धाम में, जिस गाँव में रहो।

राधारमण, राधारमण, राधारमण कहो ।।२

 

जिस संग में, जिस रंग में, जिस ढंग में रहो।

राधारमण, राधारमण, राधारमण कहो ।।३

 

जिस योग में, जिस भोग में, जिस रोग में रहो ।

राधारमण, राधारमण, राधारमण कहो ।।४

 

२०. राम-कृष्ण-हरि

(सन्त केशवदास कृत)

 

राम-कृष्ण-हरि, मुकुन्द-मुरारी ।

पाण्डुरंग, पाण्डुरंग, पाण्डुरंग हरी ।।१ (राम...)

 

मकर-कुण्डल-धारी, भक्त-बन्धु-शौरी ।

मुक्तिदाता, शक्तिदाता, विट्ठल नरहरी ।।२ (राम...)

 

दीन बन्धु, कृपासिन्धु, श्रीहरी श्रीहरी ।

पावनांग, हे कृपांग, वासुदेव हरी ।।३ (राम…)

 

तुलसीहार कन्धर, भक्त-हृदय मन्दिर ।

मन्दराद्विधर मुकुन्द, इन्दिरेश श्रीहरी ।।४ (राम...)

 

जगत्रय जीवन, केशव नारायण ।

माधव जनार्दन, आनन्दघन हरी ।।५ (राम...)

 

राजस सुकुमार, मोहनाकार ।

करुणासागर, अच्युत श्रीहरी ।।६ (राम...)

 

पुण्डलीक वरदा, पण्डरिनाथ शुभदा ।

अण्डजवाहन कृष्ण, पाण्डुरंग हरी ।।७ (राम...)

 

ज्ञानदेव संस्तुता, नामदेव कीर्तिता ।

तुकाराम पूजिता, दास केशव सन्नुता ।।८ (राम...)

२१. कृष्ण गोविन्द गोविन्द

 

कृष्ण गोविन्द गोविन्द गाते चलो,

मन को विषयों के विष से हटाते चलो ।।

 

देखना इन्द्रियों के न घोड़े भगें,

रात दिन इनपे संयम के कोड़े लगें ।

अपने रथ को सुमार्ग बढ़ाते चलो ।। कृष्ण...

 

नाम जपते चलो काम करते चलो,

नाम धन का खजाना बढ़ाते चलो ।। कृष्ण...

 

सुख में सोना नहीं दुःख में रोना नहीं,

प्रेम भक्ति के आँसू बहाते चलो ।। कृष्ण...

 

लोग कहते हैं भगवान् आते नहीं,

ध्रुव की तरह से बुलाते नहीं,

भक्त प्रह्लाद के जैसा रटना करो ।। कृष्ण...

 

लोग कहते हैं भगवान् खाते नहीं,

शाक विदुर घर के जैसे खिलाते नहीं,

भक्त शबरी के जैसे खिलाया करो ।। कृष्ण…

 

लोग कहते हैं संकट में आते नहीं,

सती द्रौपदी की तरह से बुलाते नहीं,

टेर गज की तरह से सुनाते चलो ।। कृष्ण...

 

चाहे काशी चलो, चाहे मथुरा चलो,

चाहे प्रयागा चलो, चाहे अयोध्या चलो,

प्रेम भक्ति के मार्ग बढ़ाते चलो ।। कृष्ण...

 

याद आवेगा प्रभु को कभी न कभी,

दास पावेगा प्रभु को कभी न कभी,

ऐसा विश्वास मन में जमाते चलो ।। कृष्ण...

 

२२. नटवर लाल गिरिधर गोपाल

 

नटवर लाल गिरिधर गोपाल,

जय जय नन्दा यशोदा के बाल ।

सार सार सबके सार,

राधा रसिक वर रास बिहार ।।

स्फटिक स्फटिक मय गोपि मण्डल धाम,

गोपि गोपि मध्य मकरकत श्याम ।।

नटवर लाल...

 

धन्य धन्य व्रज गोपि धन्य हो,

धन्य वृन्दावन कुंज धन्य हो।

व्रज मृग खग सब धन्य धन्य हो,

व्रज रज यमुना पुलिन धन्य हो ।।

नटवर लाल...

 

शरद पूर्णिमा निर्मल यमुना,

अद्भुत रास महोत्सव अनुपम ।

सार सार सबके सार,

राधा रसिक प्रिय रास बिहार ।।

नटवर लाल…

२३. कृष्ण प्रेम मयी राधा

 

कृष्ण प्रेम मथी राधा, राधा प्रेम मयो हरिः ।

जीवने निधने नित्यं, राधा कृष्णी गतिर्मम ।। (राधा कृष्णी)

 

कृष्ण प्राण मयी राधा, राधा प्राण मयो हरिः ।

जीवने निधने नित्यं, राधा कृष्णौ गतिर्मम ।। (राधा कृष्णी)

 

कृष्णस्य द्रविणं राधा, राधायाः द्रविणं हरिः ।

जीवने निधने नित्यं, राधा कृष्णौ गतिर्मम ।। (राधा कृष्णी)

 

कृष्ण द्रवा मयी राधा, राधा द्रवा मयो हरिः ।

जीवने निधने नित्यं, राधा कृष्णौ गतिर्मम ।। (राधा कृष्णौ)

 

कृष्ण देह स्थिता राधा, राधा देह स्थितो हरिः ।

जीवने निधने नित्यं, राधा कृष्णौ गतिर्मम ।। राधा कृष्णौ)

 

कृष्ण चित्त स्थिता राधा, राधा चित्त स्थितो हरिः ।

जीवने निधने नित्यं, राधा कृष्णौ गतिर्मम ।। (राधा कृष्णौ)

 

नीलाम्बर धरा राधा, पीताम्बर धरो हरिः ।

जीवने निधने नित्यं, राधा कृष्णौ गतिर्मम ।। (राधा कृष्णौ)

 

बृन्दावनेश्वरी राधा, कृष्णौ बृन्दावनेश्वरः ।

जीवने निधने नित्यं, राधा कृष्णौ गतिर्मम ।। (राधा कृष्णौ)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गुरुवार

श्री गुरु-स्तोत्रम्

. विदिताखिल-शाख-सुधा-जलपे

(श्री हस्तामलककृतम्)

 

श्लोक

 

पद्मासीनं प्रशान्तं यमनिरतमनंगारि-तुल्य-प्रभावं

फाले भस्मांकिताभं स्मित-रुचिर-मुखाम्भोजमिन्दीवराक्षम् ।

कम्बुग्रीव कराभ्यामविहत-विलसत्पुस्तकं ज्ञानमुद्र

वन्दयं गीर्वाणमुख्यै-र्नत-जन-वरदं भावये शंकरार्यम् ।।

 

मैं उन भगवान् शंकराचार्य जी का ध्यान करता हूँ जो पद्यासन लगाये बैठे हैं, शान्त बदन हैं, यम में लीन हैं, जिनका प्रभाव कामारि भगवान् शिव के समान है, मस्तक पर भस्म धारण किये हुए हैं, जिनका मुख-कमल मन्द हास से मनोहर है, जिनकी आँखें इन्दीवर पुष्प के समान हैं, जिनकी गर्दन शंख के समान है, जिनके हाथों में निरन्तर पुस्तक सुशोभित रहती है, जो ज्ञानमुद्रा में हैं, देवताओं के प्रमुख भी जिनकी वन्दना करते हैं और जो प्रणतजनों को वरदान देते हैं।

 

गीत

 

विदिताखिल-शास्त्र-सुधाजलधे

महितोपनिषत्कथितार्थ-निधे ।

हृदये कलये विमलं चरणं

भव शंकरदेशिक मे शरणम्।।१

 

करुणा-वरुणालय पालय मां ।

भव-सागर-दुःख-विदून-हृदम्

रचिताखिल-दर्शन-तत्त्वविदं

भव शंकरदेशिक में शरणम् ।।२

भवता जनता सुखिता भविता

निज-बोध-विचारण-चारु-मते ।

कलयेऽश्वर-जीव-विवेक-विदं

भव शंकरदेशिक मे शरणम् ।।३

 

भव एव भवानिति में नितरां

समजायत चेतसि कौतुकिता ।

मम वारय मोह-महा-जलधिं

भव शंकरदेशिक में शरणम् ।।४

 

सुकृतेऽधिकृते बहुधा भवतो

भविता पद-दर्शन-लालसता ।

अतिदीन-मिमं परिपालय मां

भव शकंरदेशिक मे शरणम् ।।५

 

जगती-मवितुं कलिताकृतयो

 विचरन्ति महामहस-श्चलिताः ।

अहिमांशु-रिवात्र विभासि पुरो

भव शंकरदेशिक मे शरणम् ।।६

 

गुरु-पुंगव पुंगव-केतन ते

समता-मयतां न हि कोऽपि सुधीः ।

शरणागत-वत्सल तत्त्व-निधे

भव शंकरदेशिक मे शरणम् ।।७

 

विदिता न मया विशदैककला

न च किंचन कांचन-मस्ति गुरो ।

द्रुतमेव विधेहि कृपां सहजां

भव शंकरदेशिक मे शरणम् ।।८

 

समस्त शास्त्र-रूपी अमृत-सागर के आप ज्ञाता हैं, पूजनीय उपनिषदों की अर्थ-रूपी निधि को आपने (संसार के सामने) कहा है। आपके विशुद्ध चरणों का मैं अपने हृदय में ध्यान करता हूँ। हे आचार्य शंकर, आप मुझे शरण दें ।।१

हे करुणा-सागर, संसार-सागर के दुःख से मेरा हृदय अत्यन्त पीड़ित है, आप मेरी रक्षा करें। आपने समस्त दर्शनों के तत्त्वों का सत्य उ‌द्घाटित किया है। है आचार्य शंकर, आप मुझे शरण दें ।॥२

 

आपके कारण ही सारा संसार सुखी हो सका है। आपकी बुद्धि आत्मज्ञान की चर्चा में कुशल है। आपने जीव और ईश्वर के विवेक को पहचाना है। आपका मैं ध्यान करता हूँ। हे आचार्य शंकर, आप मुझे शरण दें ।।३

 

यह जान कर मुझे बड़ा आनन्द हुआ है कि आप साक्षात् भगवान् शिव ही हैं। मेरे मोह-रूपी महासागर को आप दूर करें। हे आचार्य शंकर, मुझे शरण दें ।।४

 

बहुत काल के महान् पुण्य-संचय से ही मुझमें आपके चरण-दर्शन की इच्छा उत्पन्न हुई है। मुझ अत्यन्त दीन की आप रक्षा करें। हे आचार्य शंकर, आप मुझे शरण 811 ^ 6

 

भूलोक की रक्षा करने के लिए आपके समान तेजस्वी आत्माएँ मनुष्य-रूप धारण कर इधर-उधर घूमती रहती हैं। आप मेरे सामने सूर्य की तरह प्रकाशमान हैं। हे आचार्य शंकर, आप मुझे शरण दें ।।६

 

हे मेरे गुरु महाराज! आप सारे गुरुओं में श्रेष्ठ हैं। हे तत्त्वज्ञान के सागर, ऐसा कोई विद्वान् नहीं है जो आपकी बराबरी कर सके। आप शरण में आये हुओं पर अत्यन्त कृपा रखते हैं। हे आचार्य शंकर, आप मुझे शरण दें ।।७

 

हे गुरुदेव, मुझे इस संसार में आपके अतिरिक्त कोई भी सम्पत्ति या निधि आपसे बढ़ कर नहीं दिखी जिसका संचय किया जा सके। कृपा तो आपकी सहज वस्तु है, अतः मुझ पर शीघ्र कृपा कीजिए। हे आचार्य शंकर, आप मुझे शरण दें ।।८

 

नामावली

 

भव शंकरदेशिक मे शरणम् ।

भव शंकरदेशिक मे शरणम् ।।

 

. देव-देव-शिवानन्द

(श्रीहृदयानन्दकृतम्)

 

श्लोक

 

मंगलं योगिवर्याय महनीय-गुणाब्धये ।

गंगा-तीर-निवासाय शिवानन्दाय मंगलम् ।।

 

जो योगियों में श्रेष्ठ हैं, महान् गुणों के सागर हैं तथा गंगा के तट पर निवास करते हैं, उन शिवानन्द जी का मंगल हो।

 

गीत

 

देव-देव-शिवानन्द दीनबन्धो पाहि माम् ।

चन्द्र-वदन मन्दहास प्रेम-रूप रक्ष माम् ।।

मधुर-गीत-गान-लोल ज्ञान-रूप पाहि माम् ।

समस्त-लोक-पूजनीय मोहनांग रक्ष माम् ।।१

 

दिव्य-गंगा-तीर-वास दान-शील पाहि माम् ।

पाप-हरण पुण्य-शील परम-पुरुष रक्ष माम् ।।

भक्त-लोक-हृदय-वास स्वामिनाथ पाहि माम् ।

चित्स्वरूप चिदानन्द शिवानन्द रक्ष माम् ।।२

 

हे देवों के देव, दीनों के बन्धु शिवानन्द, मेरी रक्षा करो। हे चन्द्रमा के समान मुख वाले, मधुर मुस्कान वाले, प्रेम-स्वरूप! मेरी रक्षा करो। हे मधुर गीत गाने में प्रसन्नचित्त, ज्ञान-स्वरूप! मेरी रक्षा करो। हे सभी प्राणियों के द्वारा पूजित, मोहक अंगों वाले! मेरी रक्षा करो ।।१

 

हे गंगा-तट पर निवास करने वाले, दानशील! मेरी रक्षा करो। हे पाप को दूर करने वाले, सद्‌गुणों के आगार, परम पुरुष! मेरी रक्षा करो। हे भक्तों के हृदय में निवास करने वाले प्रभु! मेरी रक्षा करो। हे चैतन्य तथा आनन्द-स्वरूप शिवानन्द ! मेरी रक्षा करो ।।२

 

 

नामावली

 

सद्गुरु जय सद्गुरु जय, सद्गुरु जय पाहि माम् ।

सद्गुरु जय सद्गुरु जय, सद्गुरु जय रक्ष माम् ।।

. जय गुरुदेव दयानिधे

 

जय गुरुदेव दयानिधे, भगतन के हितकारी।

शिवानन्द जय मोह विनाशक, भव बन्धन हारी ।।

जय गुरुदेव...

 

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव का, गुरु मूरति धारी।

वेद पुराण करत बखाना, गुरु की महिमा भारी ।।

जय गुरुदेव...

 

जप तप तीरथ शम यम दान, गुरु बिना नहीं होवत ज्ञान ।

ज्ञान खड्ग से कर्मा काटे, गुरु नाम सब पातक हारी ।।

जय गुरुदेव...

 

तन मन धन सब अर्पण कीजै, परमागति मोक्ष पद लीजै।

सबके सहारा सद्गुरु नाम, अविनाशी अविकारी ।।

जय गुरुदेव...

नामावली

 

ॐ गुरुनाथ जय गुरुनाथा ।

जय गुरुनाथ शिव गुरुनाथा ।।

जय गुरुनाथ जगद्गुरुनाथा ।

जगद्गुरुनाथ परं गुरुनाथा ।।

परं गुरुनाथ सद्‌गुरुनाथा ।

सद्गुरुनाथ जय गुरुनाथा ।।

सच्चिदानन्द गुरु जय गुरु जय गुरु।

अजर अमर गुरु जय गुरु जय गुरु ।।

. आनन्द कुटीर के दिव्य देवता

 

आनन्द कुटीर के दिव्य देवता, शिवानन्द सदा अमर रहें।

अखिल विश्व का दीप्त सितारा, भारत ज्योति जलती रहे ।।

 

प्रेम भक्ति का दीप जले, हमें जागृति का नव राह मिले ।

मानव दुःख मिटाते रहे, शिवानन्द सदा अमर रहें ।।

जलते जग में शान्ति निराली, ज्ञान सुधा बरसाते रहे ।। आनन्द कुटीर के...

 

शिव शंकर का ले अवतार, दया प्रेम का है भण्डार ।

जग को दिव्य बनाते रहें, शिवानन्द सदा अमर रहें ।।

संसार के पथ से दूर करें, हमें सत्य मार्ग दिखलाते रहें ।। आनन्द कुटीर के...

 

मुख में हरि का गीत रहे, और शिव के चरणों में प्रीत रहे ।

अमृत गीत सुनाते रहें, शिवानन्द सदा अमर रहें ।।

इस धरती पर युग युग स्वामी, 'रामप्रेम' बरसाते रहें ।।आनन्द कुटीर के...

 

. श्री दत्तात्रेयस्तोत्रम्

 

दिगम्बरं भस्मविलेपितांगं

बोधात्मकं मुक्तिकरं प्रसन्नं ।

निर्मानसं श्यामतनुं भजेऽहं

दत्तात्रेयं ब्रह्मसमाधियुक्तम् ।।१

 

सशंखचक्रं रविमण्डले स्थितं

कुशेशयाकान्तमनन्तमच्युतम् ।

भजामि बुद्ध्या तपनीयमूर्ति

सुरोत्तमं चित्तविभूषणोज्वलम् ।।२

 

दिगम्बर, भस्म-चर्चित शरीर वाले, बोध देने वाले, मुक्ति प्रदान करने वाले, प्रसन्न, निर्मल चित्त वाले, श्याम शरीर वाले तथा ब्रह्म-समाधि में स्थित रहने वाले भगवान् दत्तात्रेय को मैं भजता हूँ।।१

 

शंख एवं चक्र के सहित, रवि-मण्डल में स्थित, कमल के समान कान्ति वाले, अनन्त, अविनाशी, तप की साक्षात् मूर्ति, देवों में श्रेष्ठ तथा विविध आभूषणों से उज्वल दत्त भगवान् को मैं भजता हूँ।।२

 

. श्री दत्तात्रेयस्तोत्रम्

(श्री नारदविरचितम्)

 

जटाधरं पाण्डुरंग शूलहस्तं कृपानिधिं ।

सर्वरोगहरं देवं दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।१

 

जगदुत्पत्तिकर्जेच स्थितिसंहारहेतवे ।

भवपाश विमुक्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।२

 

जराजन्मविनाशाय देहशुद्धिकराय च ।

दिगम्बरदयामूर्ते दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।३

 

कर्पूरकान्तिदेहाय ब्रह्ममूर्तिहराय च ।

वेदशास्त्रपरिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।४

 

ह्रस्वदीर्घकृशस्थूल नामगोत्र विवर्जितः ।

पंचभूत प्रदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।५

 

यज्ञभोक्त्रे च यज्ञाय यज्ञरूपधराय च।

यज्ञप्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।६

 

आदौब्रह्म मध्येविष्णुः अन्तेदेवस्सदाशिवः ।

मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।७

 

भोगलयाय भोगाय योगयोग्याय योगिने ।

जितेन्द्रिय जितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।८

 

दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूपधराय च ।

सदोदितपरब्रह्मन् दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।९

 

जम्बूद्वीप महाक्षेत्रे कोल्हापुरनिवासिने ।

जयमानसतांदेव दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।१०

 

भिक्षाटनंगृहे ग्रामेपात्रं हेममयंकरे ।

नानास्वाद्यमयीभिक्षां दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।११

 

ब्रह्मज्ञानमयीं मुद्रां वस्त्रमाकाशमेव च ।

प्रज्ञानधनरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।१२

 

अवधूत सदानन्द परब्रह्मस्वरूपिणे ।

विदेहदेहरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।१३

 

सत्यरूप सदाचार सत्यधर्मपरायण ।

सत्याश्रय परोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।१४

 

शूलहस्तगदापाणि वनमालासुकन्दर ।

यज्ञसूत्रधरब्रह्मन् दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।१५

 

क्षराक्षरस्वरूपाय परात्परतराय ।

दत्तमुक्तिपरस्तोत्रं दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।१६

 

शत्रुनाशकरस्तोत्रं ज्ञानविज्ञानदायकम् ।

सर्वपापप्रशमनं दत्तात्रेय नमोऽस्तु ते ।।१७

 

इदं स्तोत्रं महद्दिव्यं दत्तप्रत्यक्षकारकम् ।

दत्तात्रेयप्रसादाच्च नारदेन प्रकीर्तितम् ।।१८

नामावली

 

दत्तात्रेय दत्तात्रेय दत्तात्रेय पाहि माम् ।

दत्तगुरु दत्तगुरु दत्तगुरु रक्ष माम् ।।

दत्तगुरु जय दत्तगुरु पूर्ण गुरु अवधूत गुरु ।

दत्तगुरु जय दत्तगुरु पूर्ण गुरु अवधूत गुरु ।।

दत्तात्रेय माम् पाहि, दत्तं नाथ माम् पाहि ।

अनसूयसुत माम् पाहि, आश्रितपोषक माम् पाहि ।।

दत्तात्रेय तवचरणम्, दत्तं नाथ भवहरणम् ।

दिगम्बरेशा तवचरणम्, दीनदयालो भवहरणम् ।।

अत्रिपुत्र तवचरणम्, अनन्तरूप मम शरणम् ।

अनसूयपुत्र तवचरणम्, त्रिमूर्तिरूप मम शरणम् ।।

. गुरुस्तोत्रम्

 

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति

द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।

एक नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं

भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ।।१

 

यस्यान्तर्नादिमध्यं न हि करचरणं नामगोत्रं न सूत्रं

नो जातिर्नैव वर्णं न भवति पुरुषो नो नपुंसं न च स्त्री ।

नाकारं नो विकारं न हि जनिमरणं नास्ति पुण्यं न पापं

नो तत्त्वं तत्त्वमेकं सहजसमरसं सद्गुरुं तं नमामि ।।२

 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।३

 

चैतन्यं शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निरंजनम् ।

नादबिन्दुकलातीतं तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।४

 

 

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।५

 

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।६

 

स्थावरं जंगमं व्याप्तं यत्किंचित्सचराचरम् ।

त्वंपदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।७

 

चिन्मयं व्यापितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।

असित्वं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।८

 

यत्सत्येन जगत्सर्वं यत्प्रकाशेन भान्ति यत् ।

यदानन्देन नन्दन्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।९

 

न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः ।

न गुरोरधिकं ज्ञानं तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।१०

 

गुरुरेको जगत्सर्वं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ।

गुरोः परतरं नास्ति तस्मात् सम्पूजयेत् गुरुम् ।।११

 

यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।

तस्यैते कथिता हार्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ।।१२

 

मन्नाथः श्रीजगन्नाथः मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः ।

भमात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।१३

 

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।

मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।१४

 

नमः शिवाय गुरवे सच्चिदानन्दमूर्तये ।

निष्प्रपंचाय शान्ताय निरालम्बाय तेजसे ।।१५

अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणम् ।

ज्ञानवैराग्यसिद्धयर्थं गुरोः पादोदकं पिबेत् ।।१६

 

नित्यशुद्ध निराभासं निराकारं निरंजनम् ।

नित्यबोधं चिदानन्दं गुरुं ब्रह्म नमाम्यहम् ।।१७

 

निधये सर्वविद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् ।

गुरवे सर्वलोकानां दक्षिणामूर्तये नमः ।।१८

 

ॐ नमो ब्रह्मादिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदाय -

कर्तृभ्यो वंशर्षिभ्यो महद्भ्यो ।

नमो गुरुभ्यः सर्वोपप्लवरहितः

प्रज्ञानघनः प्रत्यगों ब्रह्मैवाहमस्मि ।।१९

 

ॐ नारायणं पद्मभवं वसिष्ठं

शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं च ।

व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं

गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यम् ।।२०

 

श्रीशंकराचार्यमथास्य पद्मपादं च

हस्तामलकं च शिष्यम् ।

तं तोटकं वार्तिककारमन्यान्-

अस्मद्‌गुरून् सन्तत मानतोऽस्मि ।।२१

 

श्रुतिस्मृतिपुराणानामालयं करुणालयम् ।

नमामि भगवत्पादं शकरं लोकशंकरम् ।।२२

 

शंकर शंकराचार्य केशवं बादरायणम् ।

सूत्रभाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः ।।२३

 

ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने ।

व्योमवद् व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः ।।२४

मैं सद्गुरु भगवान् को प्रणिपात करता हूँ, जो आनन्दस्वरूप हैं; जो ब्रह्मानन्द प्रदान करते हैं; जो केवल ज्ञानमूर्ति हैं, जो द्वन्द्वातीत हैं; जो गगन के सदृश विशाल हैं; जो 'तत्त्वमसि' के उच्चारण से लभ्य हैं; जो एक, नित्य और अपरिवर्तनशील हैं; जो मन की सभी अवस्थाओं के साक्षी हैं; जो भावों से परे हैं और जो प्रकृति के तीनों गुणों से रहित हैं ।।१

 

मैं उस सद्गुरु को शीश झुकाता हूँ, जिसका आदि, मध्य और अवसान कुछ भी नहीं है, जिसके न तो हाथ हैं न पाँव, न नाम, न गोत्र, न सूत्र, न जाति और न वर्ण है, जो न तो खी है न पुरुष और न नपुंसक है; जो निराकार है, विकार-रहित है; जो जन्म, मरण, पुण्य, पाप और सृष्टि के तत्त्वों से परे है; जो एक सत्य है और जो सहज समरस है ।।२

 

मैं उस सद्गुरु को प्रणाम करता हूँ, जो स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश है और साक्षात् परब्रह्म है ।।३

 

मैं उस सद्गुरु को प्रणाम करता हूँ, जो शुद्ध, चैतन्य, शाश्वत, शान्त, व्योमातीत और निरंजन है तथा जो नाद, बिन्दु और कला से परे है ।।४

 

मैं उस गुरु को प्रणाम करता हूँ, जो अज्ञानान्धकार से अन्धी बनी हुई मेरी आँखों को ज्ञान रूपी अंजन की शलाका से खोलता है ।।५

 

मैं उस गुरु की वन्दना करता हूँ, जो चर और अचर जगत् में अखण्ड मण्डलाकार के समान व्याप्त है और जो ब्रह्म के 'तत्' पद का बोध कराता है ।।६

 

मैं उस गुरु को प्रणाम करता हूँ, जो स्थावर और जंगम तथा जो-कुछ भी चर और अचर है, उन सबमें व्यापक 'त्वं' पद का बोध कराता है।।७

 

मैं उस सद्गुरु की वन्दना करता हूँ, जो सत्-चित्-आनन्द का चिन्मय, चर और अचर में तथा तीनों लोकों में व्यापक 'तत्त्वमसि' के 'असि' पद का बोध कराता है ।।८

 

जिससे सम्पूर्ण जगत् स्थित है, जिसके प्रकाश से प्रकाशित होता है और जिसके आनन्द से आनन्द है, उस सद्गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ।।९

 

गुरु से क्षेप्त कोई तत्व नहीं है, गुरु से अधिक तप नहीं है और गुरु से विशेष कोई ज्ञान नहीं है; ऐसे गुरुदेव को मेरा नमस्कार है ।।१०

 

गुरु एक सर्वजगत् रूप है; वह ब्रह्मा, विष्णु और शिव-रूप है। गुरु से बढ़ कर कोई नहीं है; इसलिए गुरुदेव का पूजन करना चाहिए ।।११

 

जिसकी भगवान् में अगाध भक्ति है और भगवान् के समान गुरु में भी है, ये जितनी बातें कही गयी हैं, सब उसमें प्रकाशित होती हैं ।।१२

 

मेरे नाथ ही जगत् के नाथ हैं, मेरे गुरु आत्मा है, ऐसे गुरुदेव को नमस्कार है ।।१३ जगत् के गुरु हैं, मेरी आत्मा प्राणियों की

 

गुरु की मूर्ति ध्यान, गुरु के पद पूजा, गुरु की वाणी मन्त्र और गुरु की कृपा मुक्ति का मूल है ।।१४

 

उस सद्गुरु को प्रणाम, जो शिव-स्वरूप है; जो सत्-चित्-आनन्द है; जो जाग्रति-चेतना से अतीत है और जो शान्त और स्वप्रकाशित है ।।१५

 

गुरु-चरणामृत पान करने से अज्ञान की जड़ विनष्ट हो जाती है, जन्म और मृत्यु का निवारण हो जाता है, कर्म-फल छूट जाते हैं और ज्ञान तथा वैराग्य की प्राप्ति होती है ।।१६

 

मैं उस गुरु को प्रणाम करता हूँ, जो नित्यशुद्ध, निराभास, निराकार, निरंजन और चिदानन्द है ।।१७

 

मैं दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ जो सम्पूर्ण विद्याओं के भण्डार, भवरूपी रोग के निवारण करने वाले वैद्य तथा सब लोकों के गुरु हैं ।।१८

 

ब्रह्मा आदि को नमस्कार; ब्रह्मविद्या-सम्प्रदाय के कर्ता को नमस्कार; ऋषियों के वंश को, महान् पुरुषों को तथा गुरुदेव को नमस्कार । समस्त प्रपंचों से परे प्रज्ञानधन और सर्वस्वरूप ब्रह्म मैं ही हूँ।।१९

 

आदि गुरु भगवान् नारायण को, इनके शिष्य ब्रह्मा जी को, इनके शिष्य वसिष्ठ को, इनके शिष्य शक्ति को, इनके पुत्र पराशर को, इनके शिष्य व्यासदेव को, इनके शिष्य शुक मुनि को, इनके शिष्य गौडपादाचार्य को, इनके शिष्य महान् गोविन्दापादाचार्य को, इनके शिष्य भगवान् शंकराचार्य को, इनके शिष्यों पद्यपादाचार्य, हस्तामलकाचार्य, तोटकाचार्य और सुरेश्वराचार्य को तथा अन्य सब अपने गुरुजनों को मैं सदा नमस्कार करता हूँ।।२०-२१

 

श्रुति, स्मृति और पुराणों के रहस्य का भण्डार, करुणा-निधि, शंकरावतार, लोगों को सुखी करने वाले भगवान् शंकराचार्य महाराज को मैं नमस्कार करता हूँ।।२२

 

*शंकर-स्वरूप शंकराचार्य तथा केशव-स्वरूप बादरायण जिन्होंने सूत्रों पर भाष्य रचा है, उन दोनों भगवत्स्वरूपों को मैं नमस्कार करता हूँ।।२३

 

मैं दक्षिणामूर्ति को प्रणाम करता हूँ, जो ईश्वर, गुरु और आत्मा में अपने को प्रकट करते हैं और जिनकी देह आकाश के समान व्याप्त है।।२४

 

. गुर्वष्टकम्

 

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं

यशश्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यम् ।

गुरोरंघ्रिपद्ये मनश्चेन्न लग्नं

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ।।१

 

कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं

गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्।

गुरोरंघ्रिपद्ये मनश्चेन्न लग्नं

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ।।२

 

षडंगादिवेदा मुखे शास्त्रविद्या

कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति ।

गुरोरंघ्रिपद्ये मनश्चेन्न लग्नं

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ।।३

विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः

सदाचारवृत्तेषु मत्तौ न चान्यः ।

गुरोरंघ्रिपद्ये मनश्चेन्न लग्नं

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ।।४

 

सभामण्डले भूपभूपालवृन्दैः

सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम् ।

गुरोरंघ्रिपद्ये मनश्चेन्न लग्नं ततः किं

ततः किं ततः किं ततः किम् ।।५

 

यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्

जगद्वस्तु सर्वं करे सत्प्रसादात् ।

गुरोरंघ्रिपद्ये मनश्चेन्न लप्नं

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ।।६

 

न भोगे न योगे न वा वाजिराज्ये

न कान्तासुखे नैव वित्तेषु चित्तम् ।

गुरोरंघ्रिपद्ये मनश्चेन्न लग्नं

ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ।।७

 

अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये

न देहे मनो वर्तते मेऽत्यनर्थे ।

गुरोरंघ्रिपद्ये मनश्चेन्न लग्नं

ततः किं ततः किं  ततः किं ततः किम् ।।८

 

सुन्दर शरीर हो, सुन्दर स्त्री भी हो, यशस्वी और महान् भी हो और सुमेरु पर्वत के सदृश अखिल धन-राशि भी जिसके पास हो; यदि उसका मन गुरु के चरण-कमलों में आसक्त नहीं है तो इन सब वस्तुओं से क्या लाभ ? ?१

 

गुरु के पद्-पद्म में जिसकी भक्ति नहीं है, उसके लिए पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र और कुटुम्ब-परिवार का क्या प्रयोजन ??२

 

षट्-अंगों सहित वेद और शास्त्र-विद्या जिसको कण्ठाग्र है और कविता करने को जिसके पास कवित्व-शक्ति है; यदि उसकी गुरु-चरणों में प्रीति नहीं है तो इन सब गुणों से कोई लाभ नहीं है ।।३

 

विदेशों में जिसका आदर होता हो तथा अपने देश में भी जिसकी जयजयकार की जाती हो तथा जो अपने को इस योग्य समझता भी हो कि सदाचार-पालन में उसके अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं, फिर भी यदि सद्गुरु के चरणों में उसे अनुराग नहीं है तो इन सब बातों से उसको कोई लाभ नहीं ।।४

 

जनता के मध्य, सभा में, सम्राटों के द्वारा जिसके चरण-कमलों की नित्य वन्दना हो; फिर भी उससे कोई लाभ नहीं है, यदि उसने अपने हृदय में गुरु-चरणों के लिए स्थान नहीं बनाया ।।५

 

दान के प्रताप से जिसका यश दिशाओं में फैला हो एवं गुरु-अनुकम्पा से संसार की सभी वस्तुएँ जिसे हस्तप्राप्य हैं, फिर भी गुरु-चरणों में यदि उसे प्रेम नहीं है तो वे सब बीजें उसके लिए निरर्थक हैं ।।६

 

जिसका मन योग, अश्व, राज्य, खी-सुख और धन के सुखों से भी विचलित नहीं होता हो, इतना होते हुए भी उसको इस महिमाशालीनता से कोई लाभ नहीं है, यदि गुरु के युगल-चरणों में भक्ति नहीं है ।।७

 

जिसका मन जंगल या विशाल भवनों में भी नहीं लगता है, जो न कर्तव्यों में और न देह में आसक्त है, फिर भी इससे कुछ लाभ नहीं है, यदि सद्गुरु के युगल-चरणों में प्रीति नहीं है ।।८

 

 

. शिवगुरु-पंचकम्

 

गंगातटस्थं चिरयोगिराजं योगे रमन्तं शुचिशान्तमूर्तिम् ।

आनन्दसंस्थं विपिने वसन्तं काषायवन्तं सततं नमामि ।।१

 

ज्ञाने विशालं क्षितिदेहभालं पूर्णाभिरामं परिपूर्णकामम् ।

दिव्यं शिवानन्दमहायतीन्द्रं कैवल्यवासं सततं नमामि ।।२

 

अज्ञानमोहाम्बुधिघोरदुःखनिमग्नजन्तोरवलम्बभूतम् ।

सत्यप्रकाशाय तनोति शुद्धिं प्रज्ञाघनं तं सततं नमामि ।।३

 

कल्याणहेतुं कृतधर्मसेतुं श्रीविश्वनाथस्य कृतप्रतिष्ठम् ।

धर्मावतारं विमलप्रकाशं विश्वस्य वासं सततं नमामि ।।४

 

वेदान्तघोषं स्वनुभूततत्त्वं संन्यासिवर्यं गुणवद्विहारम् ।

सत्यस्य सत्यं सुखसिन्धुसिन्धुं सारस्य सारं सततं नमामि ।।५

 

१०. शिवानन्द योगीन्द्र स्तुतिः

 

सदापावनं जाह्नवी तीरवासं

सदास्वस्वरूपानुसन्धानशीलम् ।

सदासुप्रसन्नं दयालुं भजेऽहं

शिवानन्द योगीन्द्रमानन्दमूर्तिम् ।।१

 

होदिलानाम स्वयं कीर्तयन्तं

हरेः पादभक्ति सदा बोधयन्तम् ।

हरेः पादपग्रस्थ श्रृंग भजेऽहं

शिवानन्द योगीन्द्रमानन्दमूर्तिम् ।।२

 

जराव्याधिदौर्बल्य सम्पीडितानां

सदाऽऽरोग्यदं यस्य कारुण्यनेत्रम् ।

भजेऽहं समस्तार्तसेवाधुरीणं

शिवानन्द योगीन्द्रमानन्दमूर्तिम् ।।३

 

सदा निर्विकल्पे स्थिरं यस्यचित्तं

सदा कुम्भितः प्राणवायुर्निकामम् ।।

सदा योगनिष्ठं निरीहं भजेऽहं

शिवानन्द योगीन्द्रमानन्दमूर्तिम् ।।४

 

महामुद्रबन्धादियोगांगदक्ष

सुषुम्नान्तरे चित्स्वरूपे निमग्नम् ।

महायोगनिद्राविलीनं भजेऽहं

शिवानन्द योगीन्द्रमानन्दमूर्तिम् ।।५

 

दयासागरं सर्वकल्याणराशिं

सदा सच्चिदानन्दरूपे निलीनम् ।

सदाचारशीलं भजेऽहं भजेऽहं

शिवानन्द योगीन्द्रमानन्दमूर्तिम् ।।६

 

भवाम्भोधिनौकानिभं यस्य नेत्रं

महामोहघोरान्धकारं हरन्तम् ।

भजेऽहं सदा तं महान्तं नितान्तं

शिवानन्द योगीन्द्रमानन्दमूर्तिम् ।।७

 

भजेऽहं जगत्कारणं सत्स्वरूपं

भजेऽहं जगद्व्यापकं चित्स्वरूपम् ।

भजेऽहं निजानन्दमानन्दरूपं

शिवानन्द योगीन्द्रमानन्दमूर्तिम् ।।८

 

पठेद्यः सदा स्तोत्रमेतत् प्रभाते

शिवानन्द योगीन्द्र नाम्नि प्रणीतम् ।

भवेत्तस्य संसार दुःखं विनष्टं तथा

मोक्ष साम्राज्य कैवल्य लाभः ।।९

 

११. श्री शिवानन्दशरणागतिस्तुतिः

(श्री स्वामी ज्ञानानन्द सरस्वती कृतम्)

 

करुणावरुणालय लोकगुरो तरुणारुणभास्वर भव्यनिधे ।

शरणागतवत्सल पालय मां शिवदेशिक ते चरणं शरणम् ।।

 

अवशावनलालस पुण्यतनो भवशोकविनाशन विश्वगुरो ।

अवलेपविहीन कुशाग्रमते शिवदेशिक ते चरणं शरणम् ।।

 

भवतोयधिमप्नसमस्तजनानवतो भवतो विविधान् सुगुणान् ।

स्तुवतोऽविरतं मम नित्यसुखं शिव देहि कृपालय पालय माम् ।।

 

अभिनन्द्यगुणाकर पुण्यवता-मभिगम्य गुरो शिव दिव्यमुने ।

अभितापविनाशन साधुनृणा-मभयप्रद ते चरणं शरणम् ।।

 

अतिपावनमानस तत्त्वविदां स्तुतिभाजन भावुकभाग्यनिधे ।

क्षितिवासिभिरादृत सर्वजनै-श्शिवदेशिक ते चरणं शरणम् ।।

 

सुकृतिप्रवरैरभिनन्द्यशुभ-प्रकृते धृतिमन् प्रथमानमुने ।

अकृतानृतभाषण तोषनिधे शिवदेशिक ते चरणं शरणम् ।।

 

अवधाननिधान विशालमते विविधार्तिविनाशनबद्धमते ।

अवधीरितलौकिकतर्ष यते शिवदेशिक ते चरणं शरणम् ।।

 

विदिताखिलनैगमसार विभो मुदिताशय सद्गुणवारिनिधे ।

उदितारुणसन्निभदीप्रतनो शिवदेशिक ते चरणं शरणम् ।।

 

कमलाधवपावननामजप-क्रमलालस सन्मत साधुमते ।

विमलाशय निस्तुलकीर्तिनिधे शिवदेशिक ते चरणं शरणम् ।।

 

पतितोद्धरणोत्सुक शैलसुतापतिपूजनतत्पर पूतमते ।

प्रतिपन्नमनोरथ वन्द्यमुने शिवदेशिक ते चरणं शरणम् ।।

 

अपराधशतैरतितूनमिमं कृपया परया परिपाहि गुरो ।

उपदिष्टशुभायन पादजुषां शिवदेशिक ते चरणं शरणम् ।।

 

जयतु जगदुपास्यो जीवकारुण्यमूर्ति -

जयतु जनगणानां क्षेमकृत्यैकदीक्षः ।

जयतु जननमृत्युच्छेदकारी गुरुमें

जयतु यतिवरेण्यः श्रीशिवानन्दयोगी ।।

शरणागतिविख्यात-स्तोत्ररत्नमिदं शुभम् ।

भक्त्या पठन् जनो नित्यं लभते सर्वसम्पदः ।।

 

१२. श्री शिवानन्दाष्टोत्तरशतनामावलिः

 

१. ॐ श्री ओंकाररूपाय नमः

२. ॐ श्री सद्गुरवे नमः

३. ॐ श्री साक्षाच्छंकररूपधृते नमः

४. ॐ श्री शिवानन्दाय नमः

५. ॐ श्री शिवाकाराय नमः

६. ॐ श्री शिवाशयनिरूपकाय नमः

७. ॐ श्री हृषीकेशनिवासिने नमः

८. ॐ श्री वैद्यशास्त्रविशारदाय नमः

९. ॐ श्री समदर्शिने नमः

१०. ॐ श्री तपस्विने नमः

११. ॐ श्री प्रेमरूपाय नमः

१२. ॐ श्री महामुनये नमः

१३. ॐ श्री दिव्यजीवनसंघप्रतिष्ठात्रे नमः

१४. ॐ श्री प्रबोधकाय नमः

१५. ॐ श्री गीतानन्दस्वरूपिणे नमः

१६. ॐ श्री भक्तिगम्याय नमः

१७. ॐ श्री भयापहाय नमः

१८. ॐ श्री सर्वविदे नमः

१९. ॐ श्री सर्वगाय नमः

२०. ॐ श्री नेत्रे नमः

२१. ॐ श्री त्रयीमार्गप्रदर्शकाय नमः

२२. ॐ श्री वैराग्यज्ञाननिरताय नमः

२३. ॐ श्री सर्वलोकहितोत्सुकाय नमः

२४. ॐ श्री भवभयप्रशमनाय नमः

२५. ॐ श्री समाधिग्रन्थकल्पकाय नमः

२६. ॐ श्री गुणिने नमः

२७. ॐ श्री महात्मने नमः

२८. ॐ श्री धर्मात्मने नमः

२९. ॐ श्री स्थितप्रज्ञाय नमः

३०. ॐ श्री शुभोदयाय नमः

३१. ॐ श्री आनन्दसागराय नमः

३२. ॐ श्री साराय नमः

३३. ॐ श्री गंगातीराश्रमस्थिताय नमः

३४. ॐ श्री विष्णुदेवानन्ददत्तब्रह्मज्ञानप्रदीपकाय नमः

३५. ॐ श्री ब्रह्मसूत्रोपनिषदांग्लभाष्यप्रकल्पकाय नमः

३६. ॐ श्री विश्वानन्दचरणयुग्मसेवाजातसुबुद्धिमते नमः

३७. ॐ श्री मन्त्रमूर्तये नमः

३८. ॐ श्री जपपराय नमः

३९. ॐ श्री तन्त्रज्ञाय नमः

४०. ॐ श्री मानवते नमः

४१. ॐ श्री बलिने नमः

४२. ॐ श्री उमारमणपादयुग्मसततार्चनलालसाय नमः

४३. ॐ श्री परस्मै ज्योतिषे नमः

४४. ॐ श्री परस्मै धाम्ने नमः

४५. ॐ श्री परमाणवे नमः

४६. ॐ श्री परात्पराय नमः

४७. ॐ श्री शान्तमूर्तये नमः

४८. ॐ श्री दयासागराय नमः

४९. ॐ श्री मुमुक्षुहृदयस्थिताय नमः

५०. ॐ श्री आनन्दामृतसन्दोग्धे नमः

५१. ॐ श्री अप्पय्यकुलदीपकाय नमः

५२. ॐ श्री साक्षिभूताय नमः

५३. ॐ श्री राजयोगिने नमः

५४. ॐ श्री सत्यानन्दस्वरूपिणे नमः

५५. ॐ श्री अज्ञानामयभेषजाय नमः

५६. ॐ श्री लोकोद्धारणपण्डिताय नमः

५७. ॐ श्री योगानन्दरसास्वादिने नमः

५८. ॐ श्री सदाचारसमुज्वलाय नमः

५९. ॐ श्री आत्मारामाय नमः

६०. ॐ श्री गुरवे नमः

६१. ॐ श्री सच्चिदानन्दविग्रहाय नमः

६२. ॐ श्री जीवन्मुक्ताय नमः

६३. ॐ श्री चिन्मयात्मने नमः

६४. ॐ श्री निस्त्रैगुण्याय नमः

६५. ॐ श्री यतीश्वराय नमः

६६. ॐ श्री अद्वैतसारप्रकटवेदवेदान्ततत्त्वगाय नमः

६७. ॐ श्री चिदानन्दजनाह्लादनृत्यगीतप्रवर्तकाय नमः

६८. ॐ श्री नवीनजनसन्त्रात्रे नमः

६९. ॐ श्री ब्रह्ममार्गप्रदर्शकाय नमः

७०. ॐ श्री प्राणायामपरायणाय नमः

७१. ॐ श्री नित्यवैराग्यसमुपाश्रिताय नमः

७२. ॐ श्री जितमायाय नमः

७३. ॐ श्री ध्यानमग्नाय नमः

७४. ॐ श्री क्षेत्रज्ञाय नमः

७५. ॐ श्री ज्ञानभास्कराय नमः

७६. ॐ श्री महादेवादिदेवाय नमः

७७. ॐ श्री कलिकल्मषनाशनाय नमः

७८. ॐ श्री तुषारशैलयोगिने नमः

७९. ॐ श्री कोटिसूर्यसमप्रभाय नमः

८०. ॐ श्री मुनिवर्याय नमः

८१. ॐ श्री सत्ययोनये नमः

८२. ॐ श्री परमपुरुषाय नमः

८३. ॐ श्री प्रतापवते नमः

८४. ॐ श्री नामसंकीर्तनोत्कर्षप्रशंसिने नमः

८५. ॐ श्री महाद्युतये नमः

८६. ॐ श्री कैलासयात्रासम्प्राप्तबहुसन्तुष्टचेतसे नमः

८७. ॐ श्री चतुस्साधनसम्पन्नाय नमः

८८. ॐ श्री धर्मस्थापनतत्पराय नमः

८९. ॐ श्री शिवमूर्तये नमः

९०. ॐ श्री शिवपराय नमः

९१. ॐ श्री शिष्टेष्टाय नमः

९२. ॐ श्री शिवेक्षणाय नमः

९३. ॐ श्री चतुरन्तमेदिनीव्याप्तसुविशालयशोदयाय नमः

९४. ॐ श्री सत्यसम्पूर्णविज्ञानसुतत्त्वैकसुलक्षणाय नमः

९५. ॐ श्री सर्वप्राणिषु संजातभ्रातृभावाय नमः

९६. ॐ श्री सुवर्चलाय नमः

९७. ॐ श्री प्रणवाय नमः

९८. ॐ श्री सर्वतत्त्वज्ञाय नमः

९९. ॐ श्री सुज्ञानाम्बुधिचन्द्रमसे नमः

१००. ॐ श्री ज्ञानगंगास्रोतस्नानपूतपापाय नमः

१०१. ॐ श्री सुखप्रदाय नमः

१०२. ॐ श्री विश्वनाथकृपापात्राय नमः

१०३. ॐ श्री शिष्यहत्तापतस्कराय नमः

१०४. ॐ श्री कल्याणगुणसम्पूर्णाय नमः

१०५. ॐ श्री सदाशिवपरायणाय नमः

१०६. ॐ श्री कल्पनारहिताय नमः

१०७. ॐ श्री वीर्याय नमः

१०८. ॐ श्री भगवद्‌गानलोलुपाय नमः

 

ॐ श्री सद्‌गुरुशिवानन्दस्वामिने नमः

 

१३. भव-सागर तारण

 

भव-सागर-तारण-कारण हे,

रवि-नन्दन-वन्धन-खण्डन हे।

शरणागत किंकर दीनमने,

गुरुदेव दयाकर दीनजने ।।१

 

हदि-कन्दर तामस भास्कर हे,

तुम विष्णु प्रजापति, शंकर हे।

परब्रह्म परात्पर वेद बने,

गुरुदेव दयाकर दीनजने ।।२

 

मन-वारण शासन-अंकुश हे,

नर-त्राण करे हरिचाक्षुष हे।

गुण-गान-परायण देवगणे,

गुरुदेव दयाकर दीनजने ।।३

 

कुल-कुण्डलिनी भव-भंजक हे,

हृदि-ग्रन्थि विदारण-कारण हे।

मम मानस चंचल रात्रि-दिने,

गुरुदेव दयाकर दीनजने ।।४

 

रिपुसूदन मंगलनायक हे,

सुख-शान्ति वराभय दायक हे ।

त्रय ताप हरे तव नाम गुणे,

गुरुदेव दयाकर दीनजने ।।५

 

अभिमान-प्रभाव-विमर्दक है,

गतिहीन-जने तुम रक्षक हे।

चित संचित वंचित भक्तिधने,

गुरुदेव दयाकर दीनजने ।।६

 

तव नाम सदा शुभदायक हे,

पतिताधम मानव-पालक हे।

महिमा तव गोचर शुद्धमने,

गुरुदेव दयाकर दीनजने ।।७

 

जय सद्गुरु ईश्वर-प्रापक हे,

भवरोग विकार विनाशक हे।

मन-वानर हे तव श्री चरणे,

गुरुदेव दयाकर दीनजने ।।८

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार

श्री सरस्वती-स्तोत्रम्

. श्री सरस्वति नमोऽस्तु ते

(श्री दीक्षितकृतम्)

 

श्लोक

 

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता,

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।।

 

जो कुन्द पुष्प, चन्द्रमा तथा हिम-बिन्दु की तरह धवल हैं, जिसने शुभ्र-वस्त्र धारण किया है, जिसके हाथ मनोहर वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमल पर विराजमान हैं तथा जो सर्वदा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवों से पूजित हैं, वह समस्त जड़ता का नाश करने वाली देवी सरस्वती मेरी रक्षा करें!

 

गीत

 

श्री सरस्वति नमोऽस्तु ते । वरदे, परदेवते ।

श्रीपति-गौरीपति गुरु-गुह-विनुते विधियुवते ।।

वासना-त्रय-विवर्जित वर-मुनि-भावित-मूर्ते ।

वासवाद्यखिल-निर्जर-वर-वितरण-बहु-कीर्ते ।।

दर-हास-युत-मुखाम्बुरुहे अद्भुत-चरणाम्बुरुहे।

संसारभीत्यापहे सकल-मन्त्राक्षरगुहे ।।

 

हे देवी सरस्वती, वर प्रदान करने वाली, परम देवते, तुझे नमस्कार। विष्णु, शंकर, गुरु तथा गुह तुझे प्रणाम करने हैं। तू ब्रह्मा की प्रेयसी है। तीनों प्रकार की वासनाओं से तू मुक्त है। तेरी मूर्ति की भावना श्रेष्ठ मुनिजन किया करते हैं। इन्द्र आदि देवताओं को वांछित वर देने की तेरी कीर्ति अपार है। तेरा मुख-कमल मन्दस्यित युक्त है, के चरण-कमल अदभुत है। तू संसार-भय को दूर करने वाली है। सभी मन्त्रों का आधार तू ही है।

 

नामावली

 

वीणा-पुस्तक-धारिणी अम्बा, वाणी जय-जय पाहि माम्।

शक्तिदायिनी पाहि माम् । भुक्तिदायिनी पाहि माम् ।

भक्तिदायिनी पाहि माम् । मुक्तिदायिनी पाहि माम् ।।

 

अपने कर-कमलों में वीणा और पुस्तक धारण करने वाली हे माँ सरस्वती, तैरी जय हो! जय हो!! हे शक्ति, भोग, भक्ति और मोक्ष प्रदायिनी। सम्पूर्ण दोषों और बुरे अदृष्टों से मेरी रक्षा कीजिए ।

 

. दे मज दिव्य मती

(श्री रामदासकृतम्)

 

श्लोक

 

सर्वरूपमयी देवी सर्व देवीमयं जगत् ।

अतोऽहं विश्वरूपां त्वां नमामि परमेश्वरीम् ।।१

माणिक्यवीणा-मुपलालयन्तीं,

मदालसां मंजुल-वाग्विलासाम् ।

माहेन्द्र-नील-द्युति-कोमलांगी

मातंगकन्यां मनसा स्मरामि ।।२

 

देवी सर्वरूपमयी हैं तथा यह विश्व देवीमय है। अतः हे विश्वरूपिणी परमेश्वरी! मैं तुझे नमस्कार करता हूँ।।१

 

मैं मातंग मुनि की कन्या (सरस्वती देवी) का ध्यान करता हूँ जो मणिजटित वीणा बजा रही हैं, जिसकी भावभंगिमा रमणीय है, वाणी मधुर है तथा जिसके सुकुमार वदन की द्युति नील-मणि के समान है।।२

 

गीत

 

दे मज दिव्य मती सरस्वती,

दे मज दिव्य मती ।

 

रामकथा बहु गूढ़ निरूपण

चालवी शीघ्र गती ।।१ (दे मज...)

 

ब्रह्मादिक देव पूजिति तुजला

प्रार्थनाहि करिती ।।२ (दे मज...)

 

रामदास म्हणे काय मला उणे

तू असता जगति ।।३ (दे मज...)

 

हे सरस्वती देवी, मुझे दिव्य ज्ञान दे। भगवान् राम की परम मधुर तथा रहस्यमयी कथा का द्रुत गति से वर्णन करने के लिए मुझे दिव्य ज्ञान दे ।।१

 

ब्रह्मादिक देवगण भी इसके लिए तेरी उपासना करते तथा तुझसे प्रार्थना करते हैं ।।२ 'रामदास' कहते हैं कि जब तक तू यहाँ है, मुझे किसी वस्तु का अभाव नहीं है।।३

 

नामावली

 

वीणा-पुस्तक-धारिणी अम्बा, वाणी जय जय पाहि माम् ।

शक्तिदायिनी पाहि माम्। भुक्तिदायिनी पाहि माम्।

भक्तिदायिनी पाहि माम्। मुक्तिदायिनी पाहि माम्।

 

 

 

 

 

. सुवक्षोजकमुम्भाम्

(श्री शंकराचार्यकृतम्)

 

श्लोक

 

सुरासुरासेवित-पाद-पंकजा

करे विराजत्-कमनीय-पुस्तिका ।

विरिंचि-पत्नी कमलासन-स्थिता,

सरस्वती नृत्यतु वाचि मे सदा ।।

 

हे ब्रह्मा की प्रेयसी, पापुष्प पर आसीन, हाथ में सुन्दर पुस्तक धारण किये हुए तथा देवताओं और असुरों से पूजित कमल के समान चरणों वाली देवी सरस्वती, तू मेहरी वाणी में सदा नृत्य करे।

 

गीत

 

सुवक्षोज-कुम्भां सुधापूर्ण-कुम्भां

प्रसादावलम्बां प्रपुण्यावलम्बाम् ।

सदास्येन्दु-बिम्बां सदानोष्ठ-बिम्बां

भजे शारदाम्बां अजस्रं मदम्बाम् ।।१

 

कटाक्षे दयार्दा करे ज्ञानमुद्रां

कलाभिर्विनिद्रां कलापैः सुभद्राम् ।

पुरन्ध्रीं विनिद्रां पुरस्तुंगभद्रां

भजे शारदाम्बां अजस्रं मदम्बाम् ।।२

 

ललामांक-फालां लसद्गान-लोलां

स्वभक्तकपालां यशश्श्श्री कपोलाम् ।

करे त्वक्षमालां कनद्रत्न-लोलां

भजे शारदाम्बां अजस्रं मदम्बाम् ।।३

 

सुसीमन्तवेणीं दृशा निर्जितैणीं

रमत्-कीरवाणीं नमद्वज्रपाणिम् ।

सुधा-मन्थरास्यां मुदा चिन्त्यवेणीं

भजे शारदाम्बां अजस्रं मदम्बाम् ।।४

 

सुशान्तां सुदेहां दृगन्ते कचान्तां

लसत्-सल्लतांगीं अनन्तां अचिन्त्याम् ।

स्मृतां तापसैः सर्गपूर्वस्थितां तां

भजे शारदाम्बां अजस्र मदम्बाम् ।।५

 

कुरंगे तुरंगे मृगेन्द्रे खगेन्द्रे

मराले मदेभे महोक्षेऽधिरूढाम् ।

महत्यां नवम्यां सदा सामरूपां

भजे शारदाम्बां अजस्रं मदम्बाम् ।।६

 

ज्वलत्-कान्ति-वहीं जगन्मोहनांगी

भजन्मानसाम्भोज-सुभ्रान्त-भृंगीम् ।

निजस्तोत्रसंगीत-नृत्य-प्रभांगी

भजे शारदाम्बां अजसं मदम्बाम् ।।७

 

भवाम्भोजनेत्राज-सम्पूज्यमानां

लसन्मन्दहास-प्रभा-वक्त्र-चिह्नाम् ।

चलत्-चंचला-चारु-ताटंक-कर्णा

भजे शारदाम्बां अजसं मदम्बाम् ।।८

 

अर्थ

 

मैं अपनी माँ श्री शारदा माता की नित्य आराधना करता हूँ। उसके बक्ष अमृत-कलश की भाँति सुन्दर हैं, उसका मुख चन्द्रमा के समान कमनीय है और उसके ओष्ठ दयार्द्र तथा बिम्ब-फल की भाँति अरुण हैं ।।१

 

मैं अपनी माँ श्री शारदा माता की नित्य आराधना करता हूँ। वह तुंगभद्रा नदी के तट पर निवास करती है। उसकी दृष्टि करुणास्निग्ध है। उसके कर में ज्ञानमुद्रा है। वह कलाओं से प्रफुल्ल है। वह शिर पर भूषण धारण किये हुए शोभायमान है। वह पवित्र तथा सदा प्रसन्न रहने वाली है ।।२

मैं अपनी माँ श्री शारदा माता की नित्य आराधना करता हूँ। उसके मस्तक में तिलक है। वह संगीत के आनन्द से दीप्तिमान् है। वह अपने भक्तों की रक्षा करती है। उसके कपोल यशश्री की भाँति सुन्दर हैं। वह अपने हाथों में माला धारण करती है और आभापूर्ण रत्नों से सुभोभित है ।।३

 

मैं अपनी माँ श्री शारदा माता की नित्य आराधना करता हूँ। उसके मस्तक के मध्य में एक सुन्दर रेखा है। उसके सुन्दर नेत्र मृग के नेत्र को भी पराजित करने वाले हैं। उसकी वाणी बुलबुल के समान मधुर है। इन्द्र उसको नमस्कार करते हैं। उसका सुधापूर्ण मुख तथा वेणी आनन्दपूर्वक ध्यान करने योग्य है ।।४

 

मैं अपनी माँ शारदा माता की नित्य आराधना करता हूँ। वह सुशान्त है। उसका शरीर मनोहर है। उसके नेत्रों की कोर पर बाल की लटें झूल रही हैं। उसका अंग लता के समान कोमल और कमनीय है। वह अनन्त और अचिन्त्य है। ऋषिगण उसके सम्मुख बैठे हुए उसका ध्यान करते हैं ।।५

 

मैं अपनी माँ श्री शारदा माता की नित्य आराधना करता हूँ। वह सदा सामवेद के रूप में रहती है और नवमी महोत्सव के समय मृग, तुरंग , सिंह, गरुड़, हंस, मत्त गज तथा वृषभ पर आरूढ़ होती है।।६

 

मैं अपनी माँ श्री शारदा माता की नित्य आराधना करता हूँ। उसके शरीर की कान्ति प्रज्वलित अग्नि के समान है। उसके अंग की शोभा सम्पूर्ण विश्व को विमोहित करती है। वह अपने स्तोत्र, संगीत और नृत्य की आभा से प्रकाशित है और अपने आराधकों के कमल-रूपी मन में भृंग की भाँति विहार करती है ।।७

 

मैं अपनी माँ श्री शारदा माता की नित्य आराधना करता हूँ। ब्रह्मा, विष्णु और शिव उसकी नित्य आराधना करते हैं। उसका मुख मन्द हास की ज्योति से प्रकाशित है। उसके कुण्डल दामिनी की भाँति सुन्दर एवं चंचल हैं।।८

 

नामावली

 

वीणा-पुस्तक-धारिणी अम्बा, वाणी जय-जय पाहि माम् ।

शक्तिदायिनी पाहि माम्। भुक्तिदायिनी पाहि माम्।

भक्तिदायिनी पाहि माम्। मुक्तिदायिनी पाहि माम्।

 

श्री देवी-स्तोत्रम्

. तातो माता

(भवान्यष्टकम्)

(श्री शंकराचार्यकृतम्)

 

श्लोक

 

अम्बा शाम्भवि चन्द्रमौलिरबलाऽपर्णा उमा पार्वती

काली हैमवती शिवा त्रिनयना कात्यायनी भैरवी ।

सावित्री नवयौवना शुभकरी साम्राज्यलक्ष्मीप्रदा

चिद्रूपी परदेवता भगवती श्रीराजराजेश्वरी ।।

 

जो अम्बा (माता) है, शाम्भवी (शम्भु-पत्नी) है, चन्द्रमौलि (जिसका मस्तक चन्द्रमा से सुशोभित है) है, अबला (कृशांगी) है, अपर्णा (जिसने तप करते समय पत्तों तक का खाना छोड़ दिया था) है, उमा (जिसके माता-पिता ने और अधिक तप न करो, ऐसा आग्रह किया) है, पार्वती (पर्वत की पुत्री) है, काली (भयंकरा) है, हैमवती (हिमवान् की पुत्री) है, शिवा (शिव-पत्नी) है, त्रिनयना (तीन नेत्रों वाली) है, कात्यायनी (दुर्गा) है, भैरवी (भैरव की पत्नी) है, सावित्री (गायत्री देवी) है, नव-यौवना (नवयुवती) है, शुभकरी (कल्याणकारिणी) है, साम्राज्यलक्ष्मीप्रदा (साम्राज्य और लक्ष्मी को देने वाली) है, चिद्रूपी (ज्ञानस्वरूपिणी) है और परदेवता (परमोच्च देवी) है, उस भगवती श्री राजराजेश्वरी को मैं प्रणाम करता हूँ।

 

स्तोत्र

 

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता

न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।

न जाया न विद्या न वृत्ति-र्ममैव

गति-स्त्वं गति-स्त्वं त्व-मेका भवानि ।।१

 

भवाब्धा-वपारे महादुःख-भीरुः

पपात प्रकामं प्रलोभी प्रमत्तः ।

कुसंसार-पाश-प्रबद्धः सदाहं

गति-स्त्वं गति-स्त्वं त्व-मेका भवानि ।।२

 

न जानामि दानं न च ध्यान-योगं

न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्र-मन्त्रम् ।

न जानामि पूजां न च न्यास-योगं

गति-स्त्वं गति-स्त्वं त्व-मेका भवानि ।।३

 

न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थ

न जानामि मुक्ति लयं वा कदाचित् ।

न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातः

गति-स्त्वं गति-स्त्वं त्व-मेका भवानि ।।४

 

कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धिः कुदासः

कुलाचार-हीनः कदाचार-लीनः ।

कुदृष्टिः कुवाक्य-प्रबन्धः सदाहं

गति-स्त्वं गति-स्त्वं त्व-मेका भवानि ।।५

 

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं

दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।

न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये

गति-स्त्यं गति-स्त्वं त्व-मेका भवानि ।।६

 

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे

जले चानले पर्वते शत्रु-मध्ये ।

अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि

गति-स्त्वं गति-स्त्वं त्व-मेका भवानि ।।७

 

अनाथो दरिद्रो जरा-रोग-युक्तो

महाक्षीण-दीनः सदा जाड्य-वक्त्रः ।

विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं

गति-स्त्वं गति-स्त्वं त्व-मेका भवानि ।।८

 

मेरा न कोई पिता है, न माता है, न कोई सम्बन्धी है और न कोई देने वाला है। न तो पुत्र है, न पुत्री है, न नौकर है और न मालिक ही है। पत्नी भी नहीं है। मुझमें ज्ञान का अभाव है। कहाँ तक कहूँ, मेरे पास कुछ भी तो नहीं है। हे देवी! तू ही एक मेरा सहारा है ।।१

 

मैं इस अपार संसार-सागर में गिर गया हूँ और इसके महादु खों से भयभीत हूँ। मैं लोभी, प्रमादी और बड़ा कामी हूँ तथा हमेशा इसी कुसंस्कार-पाश में बँधा हुआ हूँ। हे देवी! एक तू ही मेरा सहारा है ।।२

 

न तो मैं दान करना जानता हूँ, न ध्यान-योग से मेरा परिचय है। मैं किसी तन्त्र को नहीं जानता हूँ और न किसी स्तोत्र-मन्त्र का ही मुझे ज्ञान है। मैं यह भी नहीं जानता कि पूजा कैसे की जाती है और न न्यासयोग-विद्या की ही मुझे जानकारी है। हे देवी! एक तू ही मेरा सहारा है ।।३

 

पुण्य क्या है, यह मुझे मालूम नहीं है और न किसी तीर्थ-क्षेत्र को मैं जानता हूँ। मोक्ष तथा लय-योग को भी मैंने कभी नहीं जाना । न मैं भक्ति को जानता हूँ और न व्रत आदि को पहचानता हूँ। हे देवी! एक तू ही मेरा सहारा है ।।४

 

मैं बड़ा कुकर्मी हूँ, कुसंगी हूँ, कुबुद्धि हूँ और कुसेवक हूँ। कुल के आचारों से विहीन और बुरे आचरणों में लीन हूँ। मेरी दृष्टि कुत्सित है और मैं हमेशा बुरे वाक्यों का ही उच्चारण करता हूँ। हे देवी। एक तू ही मेरा सहारा है ।।५

 

मैं तेरे सिवा ब्रह्मा, विष्णु, महेश, देवेन्द्र, सूर्य, चन्द्र अथवा किसी भी अन्य देवता को नहीं जानता हूँ। हे देवी! एक तू ही मेरा सहारा है ।।६

 

जब कभी मैं विपदा में हूँ, दुःख में हूँ, असावधान रहूँ, प्रवास में रहूँ या कहीं पानी में, अग्नि में, पर्वत या शत्रुओं के बीच में अथवा जंगल में रहूँ, है शरणदात्री। तू हर समय मेरी रक्षा कर। हे देवी! एक तू ही मेरा सहारा है ।।७

 

मैं अनाथ हूँ, गरीब हूँ, बुढ़ापा और रोगों से आक्रान्त हूँ, बहुत खिन्न हूँ, दीन हूँ, हमेशा चेहरे पर जड़ता छायी रहती है, संकट में पड़ गया हूँ और सर्वदा विनाश की ओर जा रहा हूँ। हे देवी। एक तू ही मेरा सहारा है ।।८

 

 

नामावली

 

ॐ शक्ति ॐ शक्ति ॐ शक्ति पाहि माम् ।

ॐ शक्ति ॐ शक्ति ॐ शक्ति रक्ष माम् ।।

. अम्ब-ललिते

 

श्लोक

 

सर्व-मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ।।

 

हे नारायणी, हे गौरी, सम्पूर्ण पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, सभी मंगलों का धाम, सभी की रक्षा करने वाली, तीन नेत्रों वाली, माँ तुम्हें नमस्कार है।

 

गीत

 

अम्ब ललिते मां पालय परशिव-वनिते

सौभाग्यजननि (ललिते...)

अम्ब सीते परमानन्द-विलसिते

गुरु-भक्त-जनौध-वृते परतत्त्व-सुधा-रस-मिलिते

अम्ब शासिनि दुरित-विनाशिनि निगम-निवासिनि

विजय-विलासिनि (भगवति)... ।।१ (ललिते…)

 

अम्ब वाले कुंकुम-रेखांकित-फाले

परिपालित-सुर-मुनि-जाले भव-पाश-विमोचन-मूले

अम्ब हिम-गिरि-तनये कमल-सुनिलये

सुमहित-सदये (देवि) सुन्दर-हृदये....।।२ (ललिते...)

 

अम्बे रामे घन-सुन्दर-मेघ-श्यामे

निलयीकृत-हर-तनु-वामे सकलागम-विदितोद्वामे

अम्ब वाम-चारिणि काम-विहारिणि

साम-विनोदिनि (देवी) सोम-शेखरि...11३ (ललिते...)

 

अम्ब तुंगे शृंगालक-परिलस-दंगे

परिपूरित-करुणापांगे सुर-शात्रव-गर्व-विभंगे

अम्ब संग-रहित-मुनि-पुंगव-नुत-पदे

मंगल-शुभकरि (देवी) सर्व-मंगले...||४ (ललिते...)

 

अम्ब कुन्दे परिवन्दित-सनक-सनन्दे

वन्दारु-महीसुर-वृन्दे मृग-राज-स्कन्धे स्पन्दे

अम्ब इन्दिर-मन्दिरे विन्दु-समाकुल-

सुन्दर-चरणे (देवी) त्रिपुरसुन्दरि...।।५ (ललिते...)

 

हे ललिते! हे शिवपत्नी! हे अम्बे ! सौभाग्य की जननी, मेरा पालन कर।

 

हे अम्बे! हे सीते! तू परमानन्द में विलास करने वाली है; परम तत्त्व के रस का पान करने वाले महान् भक्तों से तू घिरी रहती है। हे अम्बे ! तू शासन करती है; सारे दुर्भाग्यों का विनाश करने वाली तू है। तू वेदों में निवास करती है; विजय में विलास करती है।।१

 

हे अम्बे! हे बाले! तेरे ललाट पर कुंकुम-रेखा है, तुझसे ही देवता तथा मुनिजन परिपालित हैं। तू भवपाश का उन्मूलन करती है। हे अम्बे ! तू हिमालय की पुत्री है, तेरी आँखें कमल के समान हैं, तू करुणा तथा कृपा की आगार है; हे देवी तेरा हृदय कोमल है।।२

 

हे अम्बे! हे रामे! तू शिव के वाम पार्श्व को सुशोभित करती है, जो शिव श्यामल मेघ के समान सुनील तथा सुन्दर हैं तथा जो सारे वेदों के धाम हैं। हे अम्बे! तू वामाचार (तन्त्र) में निवास करने वाली है, अपनी कामना के अनुसार चलने वाली है, सामगान में आनन्द लेती है तथा तू सोमेश्वर भगवान् शिव की पत्नी है।।३

 

हे अम्बे! तेरी भौहें ऊँची हैं, कपाल पर श्याम-भ्रमर के समान अलकें शोभायमान हैं। तू करुणासागर है तथा देवशत्रुओं की विनाशक है। हे अम्बे ! मुनिजन जो संगरहित हैं, वे तेरे चरणों को नमन करते हैं। हे देवी! तू मंगलमूर्ति है। तू शुभ करने बाली है।।४

 

अम्बे ! तेरा अंग कुन्द पुष्प के समान है; तू सनक, सनन्दन, देवताओं तथा ब्राह्मणों द्वारा परिपूजित है। तू मृगराज सिंह के कन्धे पर आसीन है। हे अम्बे! तू सौभाग्य का धाम है। हे माते! तू तीनों लोकों में सर्वसुन्दरी है। तेरे चरण सुन्दर हैं। तू मेरी रक्षा कर ।।५

 

नामावली

 

सर्व-शक्ति-दायिनी माता पाहि माम् ।

सर्व-शक्ति-दायिनी माता रक्ष माम् ।।

. नमस्ते जगद्धात्रि (श्री महालक्ष्मीस्तोत्रम्)

(श्रीदेवकृतम्)

 

श्लोक

 

या सा पद्मासना-स्था विपुल-कटि-तटी पद्म-पत्रायताक्षी

गम्भीरावर्त-नाभिः स्तन-भर-नमिता शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया ।

लक्ष्मी-र्दिव्यै-र्गजन्द्रे-र्मणि-गण-खचितैः स्नापिता हेम-कुम्भै-

र्नित्यं सा पद्म-हस्ता मम वसतु गृहे सर्व-मांगल्य-युक्ता ।।

 

जो लक्ष्मी कमलासन पर बैठी है, जिसका कटि-प्रदेश विशाल है, जिसकी आँखें कमलदलों के समान दीर्घ हैं, जिसकी नाभि जल के भँवर के समान गहरी है, जो स्तन-भार से कुछ झुकी हुई है, जिसका परिधान (वस्त्र) उज्वल है, जिसको श्रेष्ठ हाथी हीरे-मोतियों से जड़े हुए स्वर्ण-कुम्भों से स्नान करा रहे हैं, जिसके हाथ में कमल है और जो सकल मंगलों से परिपूर्ण है, वह लक्ष्मी मेरे घर में सदा निवास करे।

 

 

 

गीत

 

नमस्ते जग-द्धात्रि सद्ब्रह्म-रूपे

नमस्ते हरोपेन्द्र धात्रादि-वन्द्ये ।

नमस्ते प्रपन्नेष्ट-दानैक-दक्षे

नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ।।१

 

विधिः कृत्तिवासा हरि-र्विश्व-मेतत्

सृजत्यत्ति पातीति यत्तत् प्रसिद्धम् ।

कृपालोकना-देव ते शक्ति-रूपे

नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ।।२

 

त्वया मायया व्याप्त-मेतत् समस्तं

धृतं लीलया देवि कुक्षौ हि विश्वम् ।

स्थितं बुद्धि-रूपेण सर्वत्र जन्तौ

नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ।।३

 

यया भक्त-वर्गा हि लक्ष्यन्त एते

त्वयाऽत्र प्रकामं कृपा-पूर्ण-दृष्ट्या ।

तो गीयसे देवि लक्ष्मी-रिति त्वं

नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ।।४

 

पुन-र्वाक्-पटुत्वादि-हीना हि मूका

नरे-स्तै-र्निकामं खलु प्रार्थ्यसे यत्।

निजेष्टाप्तये तच्च मूकाम्बिका त्वं

नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ।।५

 

यदद्वैतरूपात् परब्रह्मण-स्त्वं

समुत्था पुन-र्विश्व-लीलोद्यमस्था ।

तदाहु-र्जना-स्त्वां हि गौरी कुमारीं

नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ।।६

 

हरीशादि-देहोत्थ-तेजोमय-प्र-

स्फुर-च्चक्रराजाख्य-लिंग-स्वरूपे ।

महायोगि-कोलर्षि-द्वत्पा-गेहे

नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ।।७

 

नमः शंख-चक्राभयाभीष्ट-हस्ते

नमः-स्त्र्यम्बके गौरि पद्मासन-स्थे ।

नमः स्वर्ण-वर्णे प्रसन्ने शरण्ये

नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ।।८

 

इदं स्तोत्र-रत्नं कृतं सर्व-देवै-

हृदि त्वां समाधाय लक्ष्म्यष्टकं यः ।

पठे-न्नित्य-मेष व्रजत्याषु लक्ष्मीं

सुविद्यां च सत्यं भवत्याः प्रसादात् ।।९

 

 

हे माता, विश्वधारिणी, सद्ब्रह्मस्वरूपिणी तुझे प्रणाम। हे शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदि देवों से पूज्य, तू शरणागतों को बांछित फल देने में समर्थ है। हे कोलापुरेशि महालक्ष्मी ! तुझे प्रणाम ।।१

 

हे शक्तिरूपिणी! ब्रह्मा विश्व का सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं-ऐसी जो प्रसिद्धि हुई है, वस्तुतः य