का हिन्दी अनुवाद
लेखक
श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती
अनुवादक
श्री स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती
प्रकाशक
द डिवाइन लाइफ सोसायटी
पत्रालय : शिवानन्दनगर- २४९१९२
जिला : टिहरी-गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत
www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org
प्रथम हिन्दी संस्करण : २०००
द्वितीय हिन्दी संस्करण : २०१०
तृतीय हिन्दी संस्करण ::२०१५
चतुर्थ हिन्दी संस्करण : २०२५
(१,००० प्रतियाँ)
© द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी
ISBN 81-7052-157-2
HS 291
'द डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए
स्वामी अद्वैतानन्द द्वारा प्रकाशित तथा 'मेहुल प्रिन्ट सर्विस A - 31,
नरैना इन्डस्ट्रियल एरिया, फेज 1 नई दिल्ली' में मुद्रित ।
For online orders and catalogue visit: dlsbooks.org
स्वामी शिवानन्द जी की अँगरेजी पुस्तक 'लाइव्ज़ ऑफ सेंट्स' (Lives of Saints) का प्रथम प्रकाशन सन् १९४१ में हुआ था। इसमें अनेक सन्तों की जीवन-कथाओं को प्रस्तुत किया गया था। इस पुस्तक के नवीनतम पंचम संस्करण में न केवल इसके पूर्व-संस्करणों में समाविष्ट सामग्री को स्थान दिया गया, वरन् इसे स्वामी शिवानन्द जी की अन्यान्य कृतियों से समृद्ध करने का भी प्रयास किया गया।
'सन्त-चरित्र' इसी नवीनतम संस्करण का अनुवाद है।
यहाँ दो बातें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पहली बात तो यह है कि यह पुस्तक पूर्णतः असाम्प्रदायिक तथा पूर्वाग्रह-मुक्त है। इस प्रकार इसमें सम्मिलित विषयों के श्रेष्ठतम सार-तत्त्व को पाठकों के सम्मुख सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया जा रहा है। दूसरी बात यह है कि ये शब्द-चित्र एक आध्यात्मिक महापुरुष की लेखनी से उद्भूत हैं जिसके फल-स्वरूप सन्तों के इन जीवन-चरित्रों को एक सुस्पष्ट तथा विशिष्ट आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जा सका है।
हम इसे अपना सौभाग्य समझते हैं कि हम हिन्दी पाठकों के समक्ष इसे प्रस्तुत कर रहे हैं। इन सन्तों की दिव्य ज्योति पाठकों के पथ को प्रशस्त तथा प्रदीप्त करे और उनके समेत समस्त मानव-जाति के ऊपर इनका आशीष-वर्षण होता रहे !
- द डिवाइन लाइफ सोसायटी
हे कृपा-सिन्धु परमात्मा, काल-चक्र की गति अत्यधिक तीव्र है। इन्द्रियों का नियमन असम्भव हो रहा है। मन चंचल तथा माया द्वारा सम्मोहित है और मैं ताप-त्रय से सन्तप्त, पंच-क्लेशों से प्रताड़ित, मित्रों से विक्षुब्ध और रोगों से ग्रस्त हूँ। मैं ग्रीष्म के ताप से दग्ध हो रहा हूँ। मक्षिकाओं, मशकों, कृमि-कीटों तथा वृश्चिकों का उत्पात बढ़ता जा रहा है। संसार की मोहिनी माया मुझे प्रलोभित कर रही है और मेरे लिए शान्तचित एवं ध्यानस्थ हो पाना असम्भव सिद्ध हो रहा है। तुम्हारी कृपा के अभाव में मैं आध्यात्मिक पथ के अनुसरण में सर्वथा अक्षम हूँ। हे परमात्मा, तुम कृपा-सिन्धु हो। यदि उस समुद्र से मुझे एक बूँद मिल जाती है, तो क्या यह समुद्र वारि-विहीन हो जायेगा? मेरे ऊपर कृपा करो।
हे मेरे आराध्य ! लोग कहते हैं कि तुम दीन-बन्धु, दीनानाथ, कृपा-निधान, करुणा-सागर तथा अनाथ-रक्षक हो। तुमने अहल्या, द्रौपदी, प्रह्लाद, ध्रुव तथा गजेन्द्र की रक्षा की है; किन्तु मेरे सम्बन्ध में तुमने कुछ नहीं किया। घोर यन्त्रणाओं के दंश से पीड़ित मैं अब भी अन्धकार में भटक रहा हूँ। मैं तुम्हारी कृपा तथा सहायता के लिए आर्तनाद कर रहा हूँ। इस जगत् के हे अदृश्य स्वामी ! तुम कहाँ लुप्त हो गये हो ?
हे स्वयं-प्रकाश परमात्मन् ! जल के अभाव में मछली का, सूर्य के अभाव में सूर्यमुखी पुष्प का, पति के अभाव में पतिव्रता पत्नी का, प्राण के अभाव में मन का तथा स्नेह के अभाव में दीपक की ज्योति का अस्तित्व असम्भव है। इसी प्रकार तुम्हारे बिना मेरा भी अस्तित्व असम्भव है। हे भगवन्! तुम मेरे हृदय में अवस्थित हो जाओ। तुम मेरे प्राणों के प्राण तथा मेरे आत्मा के आत्मा हो।
तुम दिव्य प्रकाश तथा ज्ञान-ज्योति हो। तुम अन्धकार के विनाशक तथा सर्वोत्तम गुरु हो। तुम मन एवं वाणी से परे हो। तुम्हें किसी सीमा में आबद्ध नहीं किया जा सकता। तुम परम आत्मा हो; इस समग्र ब्रह्माण्ड के तुम आत्मा हो।
तुम स्वयं-प्रकाश, निरवयव, अकर्ता, अवयव-रहित, निष्कलंक, अज तथा अमर्त्य हो। तुम हमारे माता-पिता, बन्धु, सखा, गुरु, सम्बन्धी तथा एकमात्र आश्रय-स्थान हो। तुम शान्ति, आनन्द, ज्ञान, शक्ति, सामर्थ्य तथा सौन्दर्य के मूर्त रूप हो।
हे दयामय भगवन्! तुम्हारी कृपा से मैं परम सत्य का साक्षात्कार कर सकूँ ! मैं सदा उदात्त विचारों को प्रश्रय दे सकूँ! मैं दिव्य ज्योति के रूप में स्वयं का साक्षात्कार कर सकूँ! मैं आत्म-भाव से मानवता की सेवा कर सकूँ ! मैं लोभ, काम, अहंकार, ईर्ष्या तथा घृणा से मुक्त हो सकूँ ! मैं प्राणिमात्र में उस आत्मा का दर्शन कर सकूँ जो अक्षर तथा अविनाशी है! मैं विशुद्ध बोध से ब्रह्म-साक्षात्कार कर सकूँ !
ज्योतियों की वह ज्योति सर्वदा मेरा मार्ग निर्देशन करे ! वह मेरे मन को कल्मष-मुक्त कर दे! वह मेरे लिए प्रेरणाप्रद सिद्ध हो ! वह मुझे प्रतिभा, शक्ति, साहस तथा सामर्थ्य प्रदान करे ! वह मेरे मन को विक्षेप तथा आवरण से मुक्त करे ! वह मेरे आध्यात्मिक पथ की समस्त विघ्न-बाधाओं का निराकरण करे ! वह मेरे जीवन को आनन्दमय तथा हितकर बना दे ! हे देवाधिदेव, हे उपनिषदों के ब्रह्म, हे माया के अधिष्ठान, हे ईश्वर, मैं तुम्हारे समक्ष नतमस्तक हूँ।
सन्त किसे कहते हैं? जो ईश्वर अथवा शाश्वत सत्ता में निवास करता है; जो अहंकार, राग-द्वेष, स्वार्थपरता, मिथ्याभिमान, अहं-भाव, काम, लोभतथा क्रोध से सर्वथा मुक्त है; जो समदृष्टि, मानसिक सन्तुलन, दया, सहिष्णुता, धर्म-परायणता तथा ब्रह्माण्डीय प्रेम से ओत-प्रोत है तथा जिसे दिव्य ज्ञान की सम्प्राप्ति हो चुकी है, उसी को सन्त कहते हैं।
संसार को साधु-सन्त वस्तुतः एक वरदान के रूप में प्राप्त हुए हैं। वे उच्चतर दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक शक्ति तथा अक्षय दैवी सम्पत्ति के अभिरक्षक हैं। उनके कमलवत् चरणों के समक्ष राजा-महाराजा भी नतमस्तक होते हैं। महाराजा जनक ने एक बार याज्ञवल्क्य से कहा था- "हे प्रणम्य सन्त, आपके उदात्त उपदेशों के माध्यम से मुझे उपनिषदों के प्राचीन ज्ञान की उपलब्धि हुई है। मैं इसके लिए आपका कृतज्ञ हूँ और आपके चरणों पर अपना सम्पूर्ण साम्राज्य अर्पित करता हूँ। अब मैं आपकी सेवा में आपके दास की भाँति उपस्थित रहूँगा।"
उदारचेता साधु-सन्तों का यही स्वभाव होता है। उनके अस्तित्व मात्र से अभिप्रेरित हो कर लोग उस आनन्दमय स्थिति की सम्प्राप्ति के प्रयत्न में संलग्न हो जाते हैं, जिस स्थिति को साधु-सन्त पहले ही प्राप्त कर चुके होते हैं। यदि ये लोग हमारे बीच विद्यमान नहीं रहते, तो हमारा आध्यात्मिक ऊर्ध्वारोहण तथा निर्वाण असम्भव हो जाता है। उनकी महिमा अवर्णनीय तथा उनका ज्ञान अगाध होता है। वे समुद्र की भाँति गहन, हिमालय पर्वत की भाँति अटल, उसके तुहिन की भाँति विशुद्ध एवं सूर्य की भाँति देदीप्यमान होते हैं। उनकी कृपा तथा उनके सत्संग से ही जन्म-मरण के इस भीषण भव-सागर का सन्तरण हो जाता है । उनका सान्निध्य सवोत्तम शिक्षण तथा उनके प्रति हमारी सवोच्च आनन्द है ।
सन्त गाँव-गाँव तथा द्वार-द्वार पर जा कर दिव्य ज्ञान का प्रसाद वितरित करते हैं। वे दूसरों से अत्यल्प ग्रहण करके मानवता को सर्वोच्च शिक्षण, संस्कृति तथा ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं। उनका समग्र जीवन ही अनुकरणीय होता है। वे भाषण दें या न दें, प्रवचन करें या न करें, यह महत्त्वपूर्ण बात नहीं है।
राजाओं के यथार्थ परामर्शदाता सन्त ही हो सकते हैं; क्योंकि वे स्वार्थपरता से मुक्त होते हैं और उनका ज्ञान सर्वोच्च होता है। लोगों की नैतिकता के विकास में साधु-सन्त ही समर्थ होते हैं। केवल वे ही अमरत्व तथा शाश्वत आनन्द की सम्प्राप्ति में हमारा आपका पथ-प्रदर्शन कर सकते हैं। स्वामी रामदास शिवाजी के तथा महर्षि वसिष्ठ राजा दशरथ के परामर्शदाता थे।
सन्तों के जीवन का अध्ययन आपके लिए तत्काल ही प्रेरणाप्रद सिद्ध होगा। आप उनके उपदेशों का स्मरण करते रहिए। इससे आप उच्चतर आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त होंगे और आपको दुःख-दैन्य से मुक्ति प्राप्त हो जायेगी। अतः 'लाइव्ज़ आफ सेंट्स' नामक यह पुस्तक आपकी नित्य सहचरी सिद्ध होगी। यह आपकी जेब में तथा तकिये के नीचे निश्चित रूप से विद्यमान होनी चाहिए।
दोष-दर्शन के अपने स्वभाव तथा अपनी कुदृष्टि के कारण सन्तों पर दोषारोपण मत कीजिए। उनके गुण-दोष के सम्बन्ध में आपको निर्णय देने का कोई अधिकार नहीं है। विनम्र भाव से उनकी सेवा में आप सर्वतोभावेन संलग्न
दोष-दर्शन के अपने स्वभाव तथा अपनी कुदृष्टि के कारण सन्तों पर दोषारोपण मत कीजिए। उनके गुण-दोष के सम्बन्ध में आपको निर्णय देने का कोई अधिकार नहीं है। विनम्र भाव से उनकी सेवा में आप सर्वतोभावेन संलग्न रहिए, उनको अपनी वाटिका में आमन्त्रित कर अपनी शंकाओं का समाधान कीजिए तथा उनके उपदेशामृत का पान कर उसे कार्यान्वित कीजिए। आप निश्चित रूप से कृतकृत्य होंगे।
प्रत्येक विद्यालय, प्रत्येक महाविद्यालय, प्रत्येक छात्रावास, प्रत्येक कारागार, प्रत्येक संस्था तथा प्रत्येक घर में मार्ग-दर्शन के लिए सन्त का होना आवश्यक है। सन्तों का अभाव नहीं है। बात केवल इतनी है कि आप स्वयं उनके पास जाना तथा उनकी सेवा करना नहीं चाहते। आपमें उच्चतर वस्तुओं की सम्प्राप्ति की इच्छा का अभाव है। आप काँच के टूटे-फूटे टुकड़ों से ही सन्तुष्ट हो गये हैं। आपमें उच्चतर दिव्य ज्ञान तथा आन्तरिक शान्ति की सम्प्राप्ति की आध्यात्मिक पिपासा का अभाव है।
सन्तों की कोई जाति नहीं होती। उनकी जाति की ओर ध्यान मत दीजिए। इससे आपको कोई लाभ नहीं होगा। आपके लिए उनके गुणों को आत्मसात् कर पाना असम्भव है। उच्चतर धर्म में जाति या धार्मिक रूढ़िवादिता के लिए कोई स्थान नहीं होता। मोचियों, जुलाहों तथा अन्त्यजों में भी अनेक महान् सन्त हुए हैं। ज्ञान तथा आत्मोपलब्धि पर ब्राह्मणों का एकाधिकार नहीं है। दक्षिण भारत के ब्राह्मण केवल दण्डी स्वामियों को ही भोजन देते हैं। यह भयंकर भूल है। कितनी दुःखद है यह स्थिति ! इसी कारण साधु-सन्त दक्षिण भारत का पर्यटन नहीं करते। पंजाब तथा गुजरात के लोगों में सभी सन्तों के प्रति आदर-भाव है। अतः इन राज्यों में सन्तों का आना-जाना लगा रहता है तथा वहाँ के लोग उनके आध्यात्मिक प्रवचनों से लाभान्वित होते रहते हैं।
सामान्यतः पाठकों तथा विशेषतः अध्यात्म-पथ के साधकों के समक्ष इस पुस्तक को प्रस्तुत करते समय सन्तों की महिमा के सम्बन्ध में कुछ पंक्तियाँ लिख देना समुचित प्रतीत होता है।
सन्त किसी भी देश के क्यों न हों, वे काल के सिकता-कणों पर अपने चरण-चिह्न छोड़ गये हैं जिससे सात्त्विक वृत्ति के लोग उनका अनुसरण कर शाश्वत सत्य के दर्शन कर सकें। उनके जीवन से हमें सतत प्रेरणा प्राप्त होती रही है और हम अभी तक उनकी महिमा का स्मरण करते आ रहे हैं। उनके उपदेशों का हमारे जीवन से अविच्छेद्य सम्बन्ध रहा है। वे हमें सतत अभिप्रेरित करते रहें! वे हमारा सदैव मार्ग-दर्शन करते रहें!
इस पुस्तक को तेरह भागों में वर्गीकृत किया गया है। सन्तों को किसी स्थान-विशेष अथवा देश से सम्बद्ध करके नहीं देखा-परखा जा सकता। उनके प्रभाव को भौगोलिक सीमाएँ अवरुद्ध नहीं कर सकतीं। वे समस्त संसार के होते हैं। हाँ, उनके प्रादेशिक आधार के परिप्रेक्ष्य में उन पर विचार करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उनमें से प्रत्येक से उद्भूत आध्यात्मिक धाराएँ कहाँ-कहाँ से निकलीं तथा किस प्रकार उन सब सन्तों के सम्मिलित आध्यात्मिक प्रभाव ने पूरे देश के आध्यात्मिक पुनरुत्थान में योगदान दिया।
मनुष्य स्वयं को निर्बल तथा असहाय समझ लेता है; किन्तु उसे सम्यक् मार्ग-दर्शन में अध्यवसाय द्वारा इस अशुभ प्रवृत्ति का उन्मूलन करना चाहिए। ऐसे लोगों के लिए सन्तों की जीवनियाँ पथ-प्रदर्शक का काम करती हैं। ये उनके जीवन, चरित्र तथा भविष्य का निर्माण सर्वथा नवीन विधि से कर देती हैं और उनकी मानसिकता को एक नयी दिशा प्रदान कर उन्हें उनके पथ प्रदर्शकों की आस्था तथा उनके उपदेशों के अनुरूप बना देती हैं। इतने सच्चे तथा विश्वस्त पथ-प्रदर्शक होते हैं सन्त - जो इस धरती पर आये और प्रयाण कर गये !
यह संसार अच्छे साधु-सन्तों से परिपूरित रहे ! आप सबको उनके सत्संग तथा परामर्श से जीवन के परम लक्ष्य की सम्प्राप्ति हो ! आप सबको इन सन्तों का आशीर्वाद प्राप्त होता रहे !
आनन्द कुटीर
८ जनवरी १९४७ - स्वामी शिवानन्द
विषय सूची
दक्षिण भारत के आलवार या वैष्णव रहस्यवादी
स्वामी स्वयंप्रकाश ब्रह्मेन्द्र जी
बीस महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक नियम
हिन्दू-पञ्चाङ्ग में व्यास-पूर्णिमा को एक विशिष्ट तथा महत्त्वपूर्ण दिन माना जाता है। इसके उत्तरवर्ती दिन को हमारे पूर्वज आर्यावर्त के ऋषि चार मास की तपस्या के लिए वन में चले जाया करते थे। इसी स्मरणीय दिवस को व्यास, जो स्वयं ईश्वर के अवतार थे, ने ब्रह्मसूत्र की रचना प्रारम्भ की थी। हमारे प्राचीन ऋषि गुफाओं तथा वनों में तपस्या किया करते थे। किन्तु काल की परिवर्तनशीलता के कारण आजकल ऐसी सुविधाएँ सर्व-सुलभ नहीं हैं। फिर भी अभी ऐसे गृहस्थों तथा राजाओं का अभाव नहीं है जो अपने सामर्थ्य के अनुसार चतुर्थ आश्रम के सदस्यों को स्वेच्छापूर्वक ऐसी सहायता तथा सुविधाएँ प्रदान करने में समर्थ हैं। अब वनों तथा गुफाओं का स्थान साधुओं के अपने गुरुद्वारों तथा मठों के कमरों ने ग्रहण कर लिया है। मनुष्य को आवश्यकता के अनुसार स्वयं को देश-काल से समायोजित करना पड़ता है; किन्तु काल तथा परिस्थिति के कारण हमारी मानसिक अभिवृत्तियों में कोई अन्तर नहीं आना चाहिए। चातुर्मास का प्रारम्भ व्यास-पूर्णिमा से होता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन हमसे व्यास तथा ब्रह्मविद्या के अन्यान्य गुरुओं की पूजा तथा ब्रह्मसूत्र एवं दिव्य ज्ञान के संवाहक अन्य पुरातन ग्रन्थों के अध्ययन को प्रारम्भ करने की आशा की जाती है।
हमारे पुराणों में कई व्यासों का उल्लेख है। कहा जाता है कि द्वापर युग के अन्त में कृष्ण-द्वैपायन व्यास का जन्म हुआ था और इसके पूर्व अट्ठाईस व्यास हो चुके थे। कृष्ण-द्वैपायन का जन्म पाराशर ऋषि तथा सत्यवती देवी के संयोग से कुछ विलक्षण तथा आश्चर्यप्रद परिस्थितियों में हुआ था। पाराशर एक महान् ज्ञानी तथा ज्योतिष-शास्त्र के आधिकारिक विद्वान् थे। उनका ग्रन्थ पाराशर-होरा आज भी ज्योतिष शास्त्र का एक पाठ्य-ग्रन्थ माना जाता है। उन्होंने एक स्मृति की भी रचना की थी जिसे पाराशर-स्मृति कहा जाता है। इस ग्रन्थ के प्रति लोगों के हृदय में श्रद्धा तथा सम्मान की इतनी प्रबल भावना है कि समाज-शास्त्र तथा नीति-शास्त्र के आधुनिक लेखक इसके उद्धरण प्रस्तुत किया करते हैं। पाराशर इस तथ्य से अवगत थे कि एक घटिका-विशेष में जन्म ग्रहण करने वाला शिशु युग का महानतम व्यक्ति होगा। वह स्वयं भगवान् विष्णु का एक अंश होगा। उस दिन पाराशर नौका-यात्रा कर रहे थे। उन्होंने केवट से उस आसन्न मांगलिक मुहूर्त की बात की। केवट की एक पुत्री थी जो पूर्ण वयस्क थी और जिसके विवाह की प्रतीक्षा की जा रही थी। वह ऋषि की महानता तथा पवित्रता से प्रभावित था। उसने अपनी पुत्री को उनके समक्ष पाणि-ग्रहण के लिए प्रस्तुत कर दिया। हमारे व्यास ने इसी वैवाहिक सम्बन्ध के फल-स्वरूप जन्म-ग्रहण किया। कहा जाता है कि उनका जन्म स्वयं भगवान् शिव की कृपा से हुआ था जिन्होंने एक सन्त तथा निम्नजातीय कुलोत्पन्न एक ज्ञानी कन्या के संयोग को अपना आशीर्वाद प्रदान किया था।
बाल्यावस्था में ही व्यास ने अपने माता-पिता के समक्ष अपने जीवन के रहस्य का उद्घाटन करते हुए कह दिया कि उन्हें अखण्ड तप के लिए वन-गमन करना होगा। पहले उनकी माता उनसे सहमत नहीं हुई; किन्तु तत्पश्चात् उन्होंने उन्हें इस शर्त पर अनुमति प्रदान कर दी कि उन्हें उनकी उपस्थिति की जब कभी भी कामना होगी, वे उनके समक्ष उपस्थित हो जायेंगे। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके माता-पिता तथा स्वयं वे कितने अधिक दूरदर्शी थे। पुराणों के अनुसार उन्होंने अपने इक्कीसवें गुरु ऋषि वासुदेव से दीक्षा ग्रहण की और सनक, सनन्दन तथा अन्यान्य आचार्यों के चरणों में शरण ग्रहण कर शास्त्राध्ययन किया। उन्होंने लोक-कल्याण के लिए वेदों को व्यवस्थित किया तथा श्रुतियों के त्वरित तथा सरल अर्थ-ग्रहण के लिए ब्रह्मसूत्रों की रचना की। उन्होंने महाभारत की भी रचना की जिससे शूद्र, स्त्री तथा अल्पबुद्धि जन भी सर्वोच्च ज्ञान का अर्थ-ग्रहण सरलतम विधि से कर सकें। व्यास अष्टादश पुराणों के भी प्रणेता थे। उन्होंने उपाख्यानों तथा प्रवचनों के माध्यम से इनकी प्रशिक्षण पद्धति का सूत्रपात किया। इस प्रकार उन्होंने कर्म, उपासना तथा ज्ञान, इन तीन मार्गों की व्यवस्था की। अपनी माता के सन्तति-प्रवाह को अक्षुण्ण रखने तथा धृतराष्ट्र, पाण्डु एवं विदुर के जन्म का श्रेय भी उन्हीं को प्राप्त है। ये उन्हीं की सन्तान थे। व्यास का अन्तिम ग्रन्थ भागवत था। इसके लेखन की प्रेरणा उन्हें देवर्षि नारद से प्राप्त हुई। देवर्षि ने उनको इसके प्रणयन का परामर्श दिया और कहा कि इसके अभाव में उन्हें अपने जीवन के लक्ष्य की सम्प्राप्ति नहीं हो सकेगी।
व्यास को समस्त हिन्दू चिरंजीवी मानते हैं। इनके अनुसार वे अभी भी जीवित हैं और अपने भक्तों के कल्याण के लिए विश्व-भ्रमण किया करते हैं। कहा जाता है कि वे निष्कपट तथा निष्ठावान् व्यक्तियों के समक्ष प्रकट भी हुआ करते हैं। शंकराचार्य ने मण्डन मिश्र के घर में उनका दर्शन किया था। कई और लोगों को भी उनके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि व्यास लोक-कल्याण के लिए अभी भी विद्यमान हैं। हमें अपने लिए तथा इसके साथ ही समस्त संसार के हितार्थ उनके आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।
यह सर्वविदित है कि हमारे पूर्वजों द्वारा विकसित विचारों की छह शास्त्र-सम्मत तथा महत्त्वपूर्ण पद्धतियाँ हैं जिन्हें षड्-दर्शन कहा जाता है। ये षड्-दर्शन हैं-सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्वमीमांसा तथा उत्तरमीमांसा अथवा वेदान्त। इन दर्शनों के भिन्न-भिन्न अभिमत हैं। कालान्तर में इन विचार-पद्धतियों का अर्थ-ग्रहण दुष्कर होता गया। अतः इनके नियमन के लिए सूत्रों की रचना की गयी। सीमित शब्दों में प्रणीत इन ग्रन्थों को संस्कृत में सूत्र कहा जाता है। इनका अभिप्राय स्मरण शक्ति को सम्यक् संकेत तथा प्रत्येक विषय पर शास्त्रार्थ में सहायता प्रदान करना है। पद्मपुराण में सूत्र को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि सूत्र संक्षिप्त, स्पष्ट तथा असन्दिग्ध होना चाहिए। किन्तु सूत्रों को इस सीमा तक संक्षिप्त कर दिया गया है कि सूत्र विशेषतः ब्रह्मसूत्र दुरूह हो गये हैं। आज हम एक ही सूत्र को विभिन्न रूपों में व्याख्यायित होते देखते हैं। व्यास या बादरायण (व्यास को एक अतिरिक्त नाम बादरायण से भी अभिहित किया गया है) द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रों को वेदान्त-सूत्र भी कहते हैं; क्योंकि इनमें वेदान्त की ही विवेचना की गयी है। इन सूत्रों को चार अध्यायों में और पुनः इन चार अध्यायों में से प्रत्येक अध्याय को चार अनुभागों में विभाजित किया गया है। यह एक रोचक तथ्य है कि सूत्रों का प्रारम्भ तथा अन्त उन सूत्रों से होता है कि जिनका अर्थ है कि ब्रह्म के यथार्थ स्वरूप के विचार के फल-स्वरूप प्रत्यावर्तन नहीं होता। इसका तात्पर्य यह है कि सूत्रों के निहितार्थ के अनुरूप जीवन-यापन से मनुष्य अमरत्व को प्राप्त होता है और संसार में उसका प्रत्यावर्तन नहीं होता। परम्परा के अनुसार व्यास को इन सूत्रों का प्रणेता माना जाता है। शंकराचार्य ने अपने भाष्य में गीता तथा महाभारत को व्यास-प्रणीत एवं ब्रह्मसूत्रों को बादरायण-प्रणीत बताया है। उनके अनुयायी वाचस्पति, आनन्दगिरि तथा अन्य लोग इन दोनों को एक ही व्यक्ति मानते हैं। रामानुज, वल्लभ, निम्बार्क तथा कुछ अन्य लोग इन तीनों ग्रन्थों का प्रणेता व्यास को ही मानते हैं। शांकर-भाष्य सूत्रों का प्राचीनतम भाष्य है। इसके पश्चात् रामानुज, वल्लभ, निम्बार्क तथा कुछ अन्य आचार्यों ने भी इन सूत्रों पर अपने भाष्यों की रचना की। इन्होंने अपने भाष्यों के माध्यम से अपने-अपने मतों का प्रतिपादन किया। ब्रह्म इस जगत् का कारण है तथा ब्रह्मज्ञान से आत्यन्तिक मुक्ति की सम्प्राप्ति होती है, इन दो बातों पर इन पाँचों आचार्यों का अधिकांशतः मतैक्य है; किन्तु ब्रह्म के स्वरूप, व्यष्टि आत्मा तथा सर्वोच्च आत्मा के पारस्परिक सम्बन्ध तथा मुक्तावस्था में जीव की दशा के सम्बन्ध में इनमें मत-वैभिन्य है। इनमें से कुछ के अनुसार मुक्ति-प्राप्ति का मुख्य साधन शंकर द्वारा अनुमोदित ज्ञान न हो कर भक्ति है।ऋषि याज्ञवल्क्य व्यास का जीवन ज्ञान के प्रचार-प्रसार के निमित्त जन्म-ग्रहण करने वाले व्यक्ति का अप्रतिम उदाहरण है। हमारी कामना है कि हम उनकी रचनाओं की अर्थवत्ता के अनुरूप जीवन-यापन करें !
श्रुतियों तथा स्मृतियों में मिथिला के याज्ञवल्क्य का नाम एक लब्ध-प्रतिष्ठ तथा प्रख्यात व्यक्ति के रूप में अंकित है। याज्ञवल्क्य को विशेषतः उनके अप्रतिम आध्यात्मिक ज्ञान तथा शक्ति के कारण जाना जाता है। भगवान् सूर्य की कृपा से वे एक वेद-संहिता के द्रष्टा थे और उन्होंने जनक, मैत्रेयी तथा कुछ अन्य व्यक्तियों को ब्रह्मज्ञान प्रदान किया था। पूतात्मा ऋषियों में उनका नाम शीर्षस्थ है। भगवान् सूर्य से उन्हें जिस शुक्ल यजुर्वेद-संहिता की प्राप्ति हुई थी, उससे निम्नांकित आख्यान जुड़ा हुआ है :
याज्ञवल्क्य तैत्तिरीय शाखा के वेदाचार्य महामुनि वैशम्पायन की बहन के पुत्र थे। वे वैशम्पायन के शिष्य थे और उनके निर्देशन में तैत्तिरीय-संहिता का अध्ययन करते थे। वैशम्पायन के अनेक शिष्य थे और ये सभी तैत्तिरीय-शाखा के विद्यार्थी थे।
एक बार सभी ऋषियों ने मेरु-पर्वत के निकट एक संघ के संगठन का निर्णय किया और यह नियम पारित किया कि जो ऋषि निर्धारित समय पर उपस्थित नहीं होंगे, वे सात दिनों तक ब्रह्म-हत्या (ब्राह्मण-हत्या) के पाप के भागी होंगे। उस निश्चित दिन को वैशम्पायन के पिता का श्राद्ध-अनुष्ठान था। वैशम्पायन ने सोचा- 'मुझे किसी भी तरह इस अनुष्ठान को सम्पन्न करना होगा। यदि मैं ब्रह्म-हत्या के पाप का भागी होता हूँ, तो मेरे शिष्य पाप-शोधन के लिए प्रायश्चित्त कर लेंगे।' अतः वैशम्पायन ऋषियों के उस सम्मेलन में नहीं गये जिसके फल-स्वरूप उन्हें ब्रह्म-हत्या के पाप का भागी होना पड़ा।
तब वैशम्पायन ने अपने शिष्यों से कहा- "मुझे अब ब्रह्म-हत्या के महापाप के लिए प्रायश्चित्त करना है। अतः मेरे लिए स्वयं तुम लोगों को सात दिनों तक प्रायश्चित्त करना होगा।"
याज्ञवल्क्य ने तत्क्षण कहा- "हे गुरुदेव, ये सभी दुर्बलचित्त युवा विद्यार्थी हैं। यह कठिन तप इनके लिए असह्य होगा। अतः इन सबके स्थान पर मैं स्वयं इसे इस विधि से सम्पन्न करूँगा जो किसी भी अन्य व्यक्ति के लिए दुष्कर होगी।" किन्तु वैशम्पायन ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी। फिर भी याज्ञवल्क्य अपने आग्रह पर अडिग रहे। गुरु उनके इस उद्धत व्यवहार के कारण उनसे अप्रसन्न हो गये। उन्होंने कहा- "हे अहंकारी, तुम बहुत अहम्मन्य हो। तुम मुझसे दूर चले जाओ। तुमने प्रज्ञाशील ब्राह्मणों के प्रति अपनी घृणा का प्रदर्शन कर अपने स्वभाव को अनावृत कर दिया है। तुमने मुझसे जितना भी ज्ञान अर्जित किया है, वह सब मुझे शीघ्र लौटा दो।"
गुरु के इस आदेश पर देवरात-पुत्र याज्ञवल्क्य ने यजुस् के सर्वांश का अन्न-रूप में वमन कर दिया। अन्य शिष्यों ने तित्तिरि पक्षी के रूप में उस अन्न का भक्षण कर लिया। ये लोग उसकी सम्प्राप्ति के लिए पहले से ही उत्सुक थे। इस प्रकार उन्हें उस यजुर्वेद संहिता का अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त हो गया। तित्तिरि पक्षियों ने इस वेद का भक्षण किया था; अतः तब से इसे तैत्तिरीय यजुर्वेद की संज्ञा प्रदान कर दी गयी। वमन किया हुआ होने के कारण इसे कृष्ण यजुर्वेद भी कहते हैं।
तब याज्ञवल्क्य ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि इसके पश्चात् अब वे किसी भी मनुष्य को गुरु के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। वे भगवान् सूर्य को प्रसन्न करने का प्रयत्न करने लगे। वे अपने गुरु वैशम्पायन के लिए अज्ञात अभिनव वेदांश के ज्ञान की प्राप्ति के लिये वेदों में निष्णात सूर्य के पूजन तथा गुणानुवाद में संलग्न हो गये ।
याज्ञवल्क्य ने इन शब्दों में सूर्य की अभ्यर्थना की- "मैं सभी प्राणियों में आत्मवत् विद्यमान दीप्तिमान आदित्य को साष्टांग दण्डवत् करता हूँ। मैं उनके सम्मुख अवनत-शिर होता हूँ जो आकाश की भाँति सबको आवृत किये हुए हैं, जो अद्वितीय हैं एवं जो प्रतिबन्धक उपाधियों से खण्डित नहीं हैं। हे महान् देव, मैं उस उद्दीप्त ग्रह का ध्यान करता हूँ जो समस्त संसार को प्रकाश तथा ऊष्मा प्रदान करता है, जो निषिद्ध कर्मों से उत्पन्न सभी दुःखों को नष्ट करता है और जो कर्म-बीज अज्ञान को दग्ध कर देता है। हे भगवन्! मैं लोक-त्रय के अधिपतियों द्वारा पूजित एवं स्तुत्य आपके चरण कमलों का पूजन करता हूँ। मुझे आप वेद के वे अंश प्रदान करें जो अन्य लोगों के लिए अज्ञात हैं।"
याज्ञवल्क्य की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान् सूर्य अर्थात् महिमामय हरि ने अश्व का रूप धारण कर उनको यजुर्वेद के उन अभिनव अंशों का ज्ञान प्रदान किया जो अन्य लोगों के लिए अज्ञात था। यजुर्वेद के इस अंश को शुक्ल यजुर्वेद कहा जाता है। इसे वाजसनेय-यजुर्वेद की भी संज्ञा प्रदान की गयी है; क्योंकि सूर्य ने अश्व का रूप ग्रहण कर इसका प्रस्तुतिकरण द्रुत गति से किया था। याज्ञवल्क्य ने इस वाजसनेय-यजुर्वेद को पुनः पन्दरह शाखाओं में विभाजित किया। इन शाखाओं में प्रत्येक में एक सौ यजुस् मन्त्र थे। खाण्डव, माध्यन्दिन तथा अन्य लोगों ने उन शाखाओं का अध्ययन किया।
मैत्रेयी तथा कात्यायनी, याज्ञवल्क्य की ये दो पत्नियाँ र्थी। इन दोनों में मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी। जब याज्ञवल्क्य ने जीवन के चतुर्थ आश्रम में प्रवेश के लिए प्रस्थान करते समय अपनी दोनों पत्नियों के बीच सम्पत्ति के विभाजन की इच्छा प्रकट की, तब मैत्रेयी ने उनसे पूछा- "क्या धन से मुझे अमरत्व की प्राप्ति हो सकेगी?" याज्ञवल्क्य ने कहा कि 'धन से अमृतत्व की प्राप्ति नहीं होती। इससे केवल इतना ही होगा कि वह भी संसार के अन्य लोगों की भाँति सुखमय जीवन व्यतीत कर सकेगी।' इसे सुन कर मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य से चरम ज्ञान प्रदान करने की प्रार्थना की। तब याज्ञवल्क्य ने उसके समक्ष निरपेक्ष आत्मा की आत्यन्तिक महानता, इसकी सत्ता के स्वरूप एवं असीम ज्ञान तथा अमरत्व की प्राप्ति के मार्ग का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। याज्ञवल्क्य तथा मैत्रेयी का यह अमर परिसंवाद बृहदारण्यकोपनिषद में अंकित है। इस परिसंवाद का केन्द्रीय विषय निम्नांकित है :
"समस्त वस्तुएँ अपने (वस्तुओं के) प्रयोजन के लिए प्रिय न हो कर आत्मा के प्रयोजन के लिए प्रिय होती हैं। यह आत्मा ही सर्वत्र विद्यमान है। इसका ज्ञान किसी को नहीं हो सकता; क्योंकि यह स्वयं विज्ञाता है। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि यह निश्चित रूप से ऐसा ही है। यह 'नेति-नेति' के अन्तहीन कथन से ही जाना जा सकता है। आत्मा स्वयंप्रकाश, अनश्वर तथा अचिन्त्य है।"
दूसरी पत्नी भरद्वाज-पुत्री कात्यायनी सामान्य बुद्धि की स्त्री थी और उसके चन्द्रकान्त, महामेघ तथा विजय नामक तीन पुत्र थे।
याज्ञवल्क्य महान् ब्रह्मवादी होने के साथ-साथ महान् कर्मकाण्डी भी थे। यजमानों से उन्होंने कई यज्ञानुष्ठान करवाये और उन महान् यज्ञों के वे स्वयं आचार्य भी बने। वे एक प्रख्यात् श्रोत्रिय तथा ब्रह्मनिष्ठ गुरु थे। एक बार मिथिला के विदेह जनक ने जानना चाहा कि किस ब्रह्मनिष्ठ गुरु से ब्रह्म-विद्या प्राप्त की जाये। यथार्थ ब्रह्मनिष्ठ की खोज के लिए उन्होंने एक विराट् बहुदक्षिणा यज्ञ का अनुष्ठान किया जिसमें दूर-दूर के ऋषियों को आमन्त्रित किया गया। उन्होंने स्वर्ण-जड़ित खुरों तथा शृंगों वाली एक सहस्र गौओं के दान का प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए एकत्र लोगों से कहा- "आप लोगों में जो सर्वोत्तम ब्राह्मण है, वह इन गौओं को अपने घर ले जा सकता है।" किन्तु गौओं को ले जाने का साहस किसी को नहीं हुआ; क्योंकि सबको एक-दूसरे से अपनी निन्दा का भय था। किन्तु याज्ञवल्क्य ने उठ कर अपने शिष्य सामश्रवा को गौओं को घर ले जाने को कह दिया।
इस पर अन्य ब्राह्मण क्रुद्ध हो गये और एक-दूसरे से कहने लगे- "वह स्वयं को हम लोगों से श्रेष्ठ क्यों कहता है?" इसके पश्चात् अनेक ऋषियों ने याज्ञवल्क्य को चुनौती देते हुए उनसे लोकोत्तर विषयों के सम्बन्ध में कई प्रश्न किये जिसके उत्तर याज्ञवल्क्य ने तत्काल दे दिये। वहाँ एक बृहद् शास्त्रार्थ हुआ जिसमें याज्ञवल्क्य ने अन्य लोगों को पराजित कर दिया। जनक को यह स्वीकार करना पड़ा कि याज्ञवल्क्य सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ हैं। उन्होंने उन्हीं से ब्रह्म-विद्या प्राप्त की।
याज्ञवल्क्य के महान् आध्यात्मिक उपदेश बृहदारण्यक उपनिषद् के तृतीय तथा चतुर्थ अध्याय में विपुल मात्रा में उपलब्ध हैं। याज्ञवल्क्य सुप्रसिद्ध याज्ञवल्क्य-संहिता के भी प्रणेता हैं। याज्ञवल्क्य-शाखा, प्रतिज्ञा-सूत्र, सतपथ-ब्राह्मण तथा योग-याज्ञवल्क्य उनकी अन्य कृतियाँ हैं।
जनक के यज्ञ के समय याज्ञवल्क्य तथा वैशम्पायन के बीच कुछ शब्दों का आदान-प्रदान हुआ; किन्तु यह सुन कर कि याज्ञवल्क्य ने भगवान् सूर्य से एक अभिनव वेद प्राप्त कर लिया है, वैशम्पायन को बहुत प्रसन्नता हुई। उन्होंने याज्ञवल्क्य से अपने शिष्यों को भी इस वेद के प्रशिक्षण का अनुरोध किया। याज्ञवल्क्य ने उनके इस अनुरोध को स्वीकार कर उनके शिष्यों को उस वेद-विद्या में प्रशिक्षित किया।
अन्त में याज्ञवल्क्य विद्वत्संन्यास ग्रहण कर वन में चले गये।
याज्ञवल्क्य सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ ऋषियों में थे। उन्होंने जनक की राजसभा में शास्त्रार्थ में अपने गुरु उद्दालक को भी पराजित किया था। उपनिषदों में अन्तर्विष्ट उनके उपदेश ब्रह्म-विद्या के उच्चतम प्रशिक्षण के चूड़ामणि के रूप में प्रख्यात हैं।
चिरंजीवी योगियों में योगी भुशुण्डि का भी नाम आता है। प्राणायाम-विज्ञान में वे निष्णात थे। कहा जाता है कि महामेरु के उत्तरी शिखर पर स्थित कल्पवृक्ष की दक्षिणी शाखा पर उन्होंने एक पर्वताकार बृहद् नीड़ का निर्माण किया था । भुशुण्डि उसी नीड़ में रहा करते थे । वे त्रिकाल ज्ञानी थे । वे कितनी ही दीर्घ अवधि तक समाधिस्थ रह सकत थे । वे निराकांक्षी थे । उन्हें उच्चतम शान्ति तथा ज्ञान की प्राप्ती हो गयी थी । वे यहां आत्मानन्द में निमग्न रहते थे और चिरंजीवी होने के कारण आज भी हैं ।
भुशुझडि को पंच-धारणओं का पूर्ण ज्ञान था । धारण की पंच-विधाओं के अभ्यास से उन्होंने स्वयं को पंच-तत्वों के आघात-प्रत्याघात से अमेघ बना दिया था ।
कहा जाता है कि जब द्वादश आदित्य अपनी प्रज्वलित किरणों से संसार को भस्म करने लगते हैं, तब योगी भुशुण्डि अपनी अपस्-धारणा के बल पर आकाश तक चले जाते हैं, जब चट्टानों को सर्वथा विच्छिन करने वाले प्रबल तथा दुर्निवार अन्तरालों का प्रादुर्भाव होने लगता है तब वे आकाश में स्थत हो जाते हैं और जब महामेरु के साथ-साथ सारा संसार जलमग्न हो जाता है तब वे वायु-धारणा के बल पर जल पर सन्तरण करने लगते हैं ।
पातिव्रत की प्रतिमूर्ति के रूप में सामान्यत: अनसूया का दृष्टान्त प्रस्तुत किया जाता है । वह महर्षि अत्रि की पत्नी थी जो सप्तर्षयों में एक हैं । वह पातिव्रत धर्म में पूर्णत: स्थित थी और अपनेपति की सेवा अत्यन्त निष्ठापूर्व करती थी । उसने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के समकक्ष पुत्रों के प्रजनन के लिये दीर्घ काल तक कठिन तप किया ।
एक दिन नारद चने के आकार का एक लघु लौह-पिण्ड ले कर सरस्वती के पास गये । उन्होंने उनसे कहा - 'हे सरस्वती देवी, इस लौह-पिण्ड को भून दीजिये । मेरी यात्रा में यही खद्य-पदार्थ होगा ।' सरस्वती नीे हँसते हुए कहा -'हे ऋषि नारद, इस लौह-पिण्ड को कैसे भूना जा सकता है? इसका भक्षण भी कैसे सम्भव हैं?' तत्पश्चात नारद महालक्ष्मी और पार्वती के यहां गये और उन्होंने उनसे उस लौह-पिण्ड को भूनने की प्रार्थना की। वे भी नारद पर हँसने लगीं। तब नारद ने कहा- "हे देवियो, देख लेना, मैं इसे महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूया से भुनवा लूँगा। वे महान् पतिव्रता हैं और भू-लोक में रहती हैं।"
इसके पश्चात् नारद अनसूया के पास आये। उन्होंने उससे उस लौह-पिण्ड को भूनने की प्रार्थना की। अनसूया ने उस लौह-पिण्ड को कड़ाही में डाल कर अपने पति के स्वरूप का ध्यान किया और जिस जल का उपयोग वह अपने पति के पद-प्रक्षालन के लिए किया करती थी, उसकी कुछ बूँदें उस लौह-पिण्ड पर डाल दीं। इस प्रकार वह लौह-पिण्ड तत्काल भून दिया गया। नारद शीघ्र ही सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती के पास गये और उनके सम्मुख उस लौह-पिण्ड का भोजन किया और उसका कुछ अंश उन तीनों को भी दिया। उन्होंने अनसूया के पातिव्रत तथा उसकी महिमा की अत्यधिक प्रशंसा की। इसके पश्चात् उन्होंने अनसूया की ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के समकक्ष पुत्रों के प्रजनन की कामना की पूर्ति का निश्चय किया।
नारद ने सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती से कहा- "यदि आप लोगों ने निष्ठा, विश्वास तथा श्रद्धा के साथ अपने पतियों की सेवा की होती, तो उस लौह-पिण्ड को आप लोग भी भून देतीं। कृपया आप लोग अपने पतियों से अनसूया के पातिव्रत-धर्म की परीक्षा लेने का अनुरोध करें।"
तब सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती ने अपने पतियों से अत्रि महर्षि की पत्नी अनसूया के पातिव्रत-धर्म की परीक्षा लेने की प्रार्थना की। उन्होंने उनसे कहा कि वे उससे निर्वाण भिक्षा देने को कहें। निर्वाण भिक्षा नग्न हो कर दी जाती है।
यह त्रिमूर्ति ज्ञान-दृष्टि के बल पर नारद की इस लीला एवं अनसूया की तपस्या तथा कामना से अवगत हो गयी। वे सहमत हो गये। वे तीनों संन्यासियों का वेश धारण कर अनसूया के पास गये और उन्होंने उससे निर्वाण-भिक्षा की माँग की। अनसूया बहुत बड़ी द्विविधा में पड़ गयी। वह भिक्षुओं की याचना को अस्वीकार नहीं कर सकती थी; किन्तु उसे अपने पातिव्रत-धर्म की भी रक्षा करनी थी। उसने अपने पति के स्वरूप का ध्यान किया और उनके चरणों में शरण-ग्रहण कर तीनों संन्यासियों के ऊपर पति के पद-प्रक्षालन के लिए प्रयुक्त जल की कुछ बूँदें छिड़क दीं। इस चरणामृत की महिमा से उन तीनों संन्यासियों ने तीन शिशुओं का रूप ग्रहण कर लिया। उसी समय अनसूया के स्तनों में दूध उतर आया। उसने उन्हें अपने पुत्र मान कर उनको नग्नावस्था में दूध पिलाया और पालने में लिटा दिया। उसके पति स्नान के लिए गये थे और वह उत्सुकतापूर्वक उनकी प्रतीक्षा कर रही थी।
अत्रि ऋषि जैसे ही घर पहुँचे, अनसूया ने उनकी अनुपस्थिति में हुई सम्पूर्ण घटना से उन्हें अवगत करा दिया। तत्पश्चात् उसने उन शिशुओं को उनके चरणों पर रख कर अपने पति का पूजन किया। किन्तु अत्रि अपनी दिव्य दृष्टि से सब-कुछ समझ गये थे। उन्होंने उन तीनों शिशुओं को गले लगाया। उन तीनों शिशुओं ने दो पैर, एक धड़, तीन शिर तथा छह भुजाओं वाले एक ही व्यक्ति का आकार ग्रहण कर लिया। अत्रि ऋषि ने अपनी पत्नी को आशीर्वाद देते हुए सूचित किया कि उसकी इच्छा पूर्ति के लिए ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ने स्वयं उन तीनों शिशुओं का रूप ग्रहण किया था।
नारद ने ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ तथा कैलास जा कर सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती को सूचित किया कि जब उनके पतियों ने अनसूया से निर्वाण-भिक्षा की माँग की, तब उसके पातिव्रत-धर्म के प्रताप से उन तीनों ने शिशुओं का रूप ग्रहण कर लिया। उन्होंने उनसे यह भी कहा कि जब तक वे अत्रि से भर्तृ-भिक्षा (पति की भिक्षा) नहीं माँगतीं, तब तक उनका लौटना असम्भव है। सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती ने साधारण स्त्रियों के वेश में अत्रि के पास जा कर पति-भिक्षा की माँग की और कहा- "हे ऋषि, कृपया हमारे पतियों को हमें लौटा दीजिए।" अत्रि ऋषि ने तीनों महिलाओं का विधिवत् आदर-सत्कार किया और उनसे करबद्ध प्रार्थना करते हुए कहा कि उनकी तथा अनसूया की इच्छाओं की पूर्ति होनी चाहिए। तब ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ने अत्रि के सम्मुख अपने-अपने यथार्थ स्वरूप में प्रकट हो कर कहा- "यह शिशु आपके कथनानुसार एक महान् ऋषि तथा अनसूया की इच्छानुसार हम लोगों के समकक्ष होगा। इस शिशु का नाम दत्तात्रेय होगा।" इसके पश्चात् वे अन्तर्धान हो गये।
दत्तात्रेय ने शारीरिक प्रौढ़ता प्राप्त की। सभी ऋषि-मुनि उनकी पूजा करते थे; क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव की ज्योति उनमें अन्तर्भूत हो चुकी थी और वे एक महान् ज्ञानी थे। वे भद्र, शान्त तथा सौम्य प्रकृति के थे। लोग बड़ी संख्या में उनका अनुगमन करते रहते थे। दत्तात्रेय ने उनसे पीछा छुड़ाने का प्रयत्न किया; लेकिन उनका प्रयत्न व्यर्थ हुआ। एक बार जब वे बहुत लोगों से घिरे हुए थे, वे स्नान करने के लिए नदी में प्रविष्ट हो गये और तीन दिनों तक बाहर नहीं निकले। तीसरे दिन जब वे बाहर निकले तब उन्होंने देखा कि नदी के तट पर लोग उनके बाहर आने की अभी तक प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस विधि से वे लोगों से अपना पीछा छुड़ाने में सफल नहीं हुए।
अतः दत्तात्रेय ने एक दूसरी योजना बनायी। उन्होंने अपनी योग-शक्ति से एक कन्या तथा मदिरा से भरे एक पात्र की सृष्टि की। वे एक हाथ में कन्या तथा दूसरे हाथ में मदिरा-पात्र को ले कर पानी से बाहर निकले। यह समझ कर कि वे योग-भ्रष्ट हो चुके हैं, लोग उनका परित्याग कर चले गये।
दत्तात्रेय ने अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति का परित्याग कर दिया। यहाँ तक कि उनके पास अपर्याप्त मात्रा में जो वस्त्र थे, उनका भी परित्याग कर वे अवधूत हो गये। वे प्रवचन तथा प्रशिक्षण के माध्यम से लोगों को वेदान्त के सत्य से अवगत कराने लगे। दत्तात्रेय ने भगवान् सुब्रह्मण्यम् को अपनी गीता, अवधूत-गीता का प्रशिक्षण दिया। यह सर्वाधिक मूल्यवान् ग्रन्थ है जिसमें वेदान्त के सत्य तथा रहस्य एवं आत्म-साक्षात्कार की अपरोक्षानुभूतियाँ निहित हैं।
एक बार जब आनन्द में मग्न दत्तात्रेय वन में भ्रमण कर रहे थे, उनकी मेर राजा यद से हो गयी। राजा ने उन्हें अत्यन्त प्रमुन्दित देख कर उनके आनन्द का कारण तथा उनके गुरु का नाम पूछा। दत्तात्रेय ने कहा कि आत्मा ही उनका गुरु है। फिर भी उन्होंने चौबीस गुरुओं से ज्ञान प्राप्त किया है। अतः वे भी उनके गुरु हैं।
इसके पश्चात् दत्तात्रेय ने अपने चौबीस गुरुओं के नामों का उल्लेख करते हुए यह भी बताया कि उन्हें उनमें से प्रत्येक से किस ज्ञान की प्राप्ति हुई है।
दत्तात्रेय ने अपने जिन चौबीस गुरुओं के नामों का उल्लेख किया, वे निम्नांकित हैं :
१. धरती, २. जल, ३. वायु, ४. अग्नि, ५. आकाश, ६. चन्द्रमा, ७. सूर्य, ८. कपोत, ९. अजगर, १०. समुद्र, ११. शलभ, १२. मधुमक्खी, १३. मधुसंग्राहक, १४. हाथी, १५. हरिण, १६. मछली, १७. नर्तकी पिंगला, १८. काग, १९. बच्चा, २०. कुमारी, २१. सर्प, २२. बाण बनाने वाला, २३. मकड़ा, और २४. भृंगी।
१. मैंने धैर्य तथा परोपकार की शिक्षा धरती से ग्रहण की है। लोगों से इसे आहत होना पड़ता है; किन्तु इस अपकृत्य को वह सहन कर लेती है। इतना ही नहीं, वह उन्हें अन्न तथा वृक्षों के उत्पादन से उपकृत भी करती है।
२. जल से मैंने निर्मलता का गुण ग्रहण किया है। निर्मल जल दूसरों को उसी प्रकार स्वच्छ करता है जिस प्रकार स्वार्थ, काम, अहंकार, क्रोध, लोभआदि दुर्गुणों से रहित विशुद्ध-चित्त सन्त अपने सम्पर्क में आने वालों को निर्मल करता है।
३. सर्वदा गतिमान वायु के सम्पर्क में सभी पदार्थ रहते हैं; किन्तु वह इनमें से किसी भी पदार्थ के प्रति आसक्त नहीं होता। मैं संसार में अनेक लोगों के सम्पर्क में आता हूँ; किन्तु मैंने वायु से अनासक्ति की शिक्षा ग्रहण की है।
४. जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि दीप्तिमान रहती है, उसी प्रकार सन्त को भी ज्ञान तथा तप की दीप्ति से तेजोमय होना चाहिए।
५. वायु, नक्षत्र, मेघ आदि आकाश में स्थित हैं; किन्तु आकाश इनमें से किसी के भी सम्पर्क में नहीं आता। मैंने आकाश से यह शिक्षा ग्रहण की है कि आत्मा विभु होते हुए भी किसी पदार्थ के सम्पर्क में नहीं आता।
६. चन्द्रमा स्वयं में पूर्ण है; किन्तु इसके ऊपर पृथ्वी के विभिन्न प्रतिबिम्बों के कारण वह क्षय तथा वृद्धि को प्राप्त होता दिखायी देता है। मैंने चन्द्रमा से यह शिक्षा ग्रहण की है कि आत्मा पूर्ण तथा निर्विकार है और उपाधियाँ उस पर अपने प्रतिबिम्बों को आरोपित किया करती हैं।
७. जिस प्रकार विभिन्न जल-पात्रों में प्रतिबिम्बित सूर्य अनेक प्रतिबिम्बों में अवभासित होता है, उसी प्रकार ब्रह्म मन के माध्यम से प्रतिबिम्बप्रसूत उपाधियों (शरीरों) के कारण अनेक रूपों में अवभासित होता है। यह शिक्षा मैंने सूर्य से ग्रहण की है।
८. एक बार मैंने कपोत-युगल को अपनी अल्पवयस्क सन्तानों के साथ देखा। एक व्याध ने जाल फैला कर उन अल्पवयस्क पक्षियों को पकड़ लिया। माता कपोती अपनी सन्तानों के प्रति अत्यधिक आसक्त थी। वह अपने प्राण की चिन्ता न कर जाल में आ गयी जिसके परिणाम स्वरूप वह पकड़ ली गयी। इससे मुझे यह शिक्षा प्राप्त हुई कि आसक्ति बन्धन का कारण है।
९. अजगर अपने आहार के लिए कहीं हिलता-डुलता नहीं है। जो-कुछ भी उसे प्राप्त हो जाता है, वह उसी से सन्तुष्ट रहता है और एक स्थान पर पड़ा रहता है। मैंने इससे आहार के प्रति उदासीनता का पाठ पढ़ा है। मुझे जो-कुछ भी भोजनार्थ मिल जाता है, मैं उसी से सन्तुष्ट हो जाता हूँ।
१०. समुद्र में सैकड़ों नदियाँ गिरती हैं; किन्तु वह शान्त रहता है। इसी प्रकार ज्ञानी पुरुष को सभी प्रकार के प्रलोभनों, कठिनाइयों तथा कष्टों में अविचलित रहना चाहिए। समुद्र से मैंने यही पाठ पढ़ा है।
११. जिस प्रकार शलभ अग्नि की दीप्ति के प्रति अपनी आसक्ति के कारण उसमें गिर कर जल जाता है, उसी प्रकार किसी सुन्दर कन्या के प्रेम-पाश में आबद्ध कामुक व्यक्ति दुःख को प्राप्त होता है।
१२. जिस प्रकार काली मधुमक्खी किसी एक फूल का मधु-पान न कर भिन्न-भिन्न फूलों का मधु-पान करती है, उसी प्रकार मैं कभी एक के घर से और कभी दूसरे के घर से अन्न-ग्रहण करके (मधुकरी-वृत्ति अथवा मधुकरी-भिक्षा से) अपनी क्षुधा-तृप्ति करता हूँ। मैं गृहस्थों पर भार नहीं होता।
१३. मधुमक्खी के लिए मधु-संग्रह एक कष्ट-साध्य कृत्य है; किन्तु कोई शिकारी सरलतापूर्वक उस मधु को ले कर चला जाता है। लोग अत्यन्त कठिनाई से धन तथा अन्य वस्तुओं का संचय करते हैं; किन्तु जब मृत्यु का देवता यम उन्हें अपने पाश में आबद्ध करता है, तब उन्हें उनका परित्याग कर उनसे विदा लेनी पड़ती है। इससे मैंने यह सीखा है कि वस्तुओं का संचय निष्प्रयोजन है।
१४. नर हाथी कागज से बनी मादा हथिनी को देख कर घास-फूस से ढके गर्त में गिर जाता है। तब यह पकड़ा जाता है, उसे जंजीरों में जकड़ा जाता है और उसे अंकुश की यातना सहनी पड़ती है। फिर भी कामुक लोग स्त्रियों के पाश में आबद्ध हो कर दुःख भोगते हैं। अतः मनुष्य को कामुकता को नष्ट कर देना चाहिए। हाथी से मैंने यही पाठ पढ़ा है।
१५. अपने संगीत-प्रेम के कारण हरिण शिकारियों के पाश में आबद्ध हो जाता है। फिर भी मनुष्य दुश्चरित्र स्त्रियों के संगीत के प्रति आकर्षित हो कर विनाश को प्राप्त होता है। मनुष्य को कामोत्तेजक गीत नहीं सुनना चाहिए। हरिण से मैंने यही शिक्षा ग्रहण की है।
१६. जिस प्रकार कोई आहार-लोलुप मछली चारे का शिकार हो जाती है, उसी प्रकार भोजन के लिए लालायित तथा रसनेन्द्रिय से पराभूत व्यक्ति अपनी स्वतन्त्रता को तिलांजलि दे कर विनाश को प्राप्त हो जाता है। अतः आहार के प्रति लोलुपता को नष्ट कर देना चाहिए। मछली से मैंने यही शिक्षा ग्रहण की है।
१७. विदेह नगर में पिंगला नामक एक नर्तकी रहती थी। एक रात वह अपने ग्राहकों की राह देखते-देखते थक गयी। वह निराश हो गयी। तब उसने उसके पास जो कुछ था, उसी से सन्तुष्ट होने का निर्णय कर लिया। मैंने उस पतित स्त्री से यह शिक्षा ग्रहण की कि आशा के परित्याग से सन्तोष की प्राप्ति होती है।
१८. एक काग को मांस का एक टुकड़ा मिल गया। उसका पीछा दूसरे पक्षियों ने किया और वे उसे चोंच मारने लगे। तब उसने मांस के टुकड़े को नीचे गिरा दिया। इससे वह शान्त तथा अश्रान्त हो गया। इससे मैंने यह शिक्षा ग्रहण की कि जब मनुष्य ऐन्द्रिय सुखों का अनुगमन करता है, तब उसे सभी प्रकार के कष्ट तथा दुःख भोगने पड़ते हैं। इसके विपरीत जब वह ऐन्द्रिय सुखों का परित्याग कर देता है, तब वह उस पक्षी की भाँति सुखी हो जाता है।
१९. माता के स्तन से दुग्धपान करने वाला शिशु सभी प्रकार की चिन्ताओं से मुक्त रहता है। मैंने शिशु से ही प्रफुल्लता का गुण ग्रहण किया है।
२०. एक कन्या के माता-पिता उसके लिए उपयुक्त वर की खोज में गये हुए थे। कन्या घर में अकेली थी। उसके माता-पिता की अनुपस्थिति में कुछ लोग उसे देखने के लिए उसके घर आ गये। वे लोग भी वैसे ही अभियान पर निकले थे। कन्या को स्वयं उनका स्वागत सत्कार करना पड़ा। वह धान कूटने के लिए घर के भीतर चली गयी। जब वह धान कूटने लगी, तब उसकी काँच की चूड़ियों से खनखनाहट की तेज आवाज निकलने लगी। बुद्धिमती कन्या ने सोचा- "बाहर बैठे लोग चूड़ियों की इस आवाज से समझ जायेंगे कि मैं स्वयं धान कूट रही हूँ और मेरा परिवार इतना निर्धन है कि इस काम पर दूसरों को नहीं लगा सकता। मुझे हाथों की एक-एक चूड़ियों के अतिरिक्त सभी चूड़ियों को तोड़ देना चाहिए।" इस प्रकार उसने दो चूड़ियों के अतिरिक्त सारी चूड़ियों को तोड़ दिया। किन्तु इन दो चूड़ियों से भी बहुत आवाज आ रही थी। उसने उन दोनों को भी तोड़ डाला। इसके बाद धान कूटते हुए उसके हाथों से कोई आवाज नहीं आयी। मैंने उस कन्या के अनुभव से यह सीखा कि अनेक लोगों के बीच रहने से मतभेद, विघ्न, विवाद तथा कलह की सृष्टि होती है। यहाँ तक कि दो व्यक्तियों के बीच रहने पर भी विवाद और संघर्ष के अवसर आ सकते हैं। तपस्वी या संन्यासी को एकान्त में एकाकी रहना चाहिए।
२१. सर्प अपना घर नहीं बनाता। वह दूसरों के बनाये हुए बिलों में रहता है। इसी प्रकार तपस्वी या संन्यासी को भी अपने लिए घर नहीं बनाना चाहिए। उसे अन्य लोगों द्वारा निर्मित गुफाओं तथा मन्दिरों में रहना चाहिए। मैंने सर्प से यही सीखा है।
२२. एक बाण-निर्माता का मस्तिष्क एक बाण को सीधा तथा तीक्ष्ण बनाने में पूर्णतः तल्लीन था। उसकी व्यस्तता के इन्हीं क्षणों में एक राजा उसकी दुकान के सामने से सदल-बल निकल गया। कुछ देर बाद उससे एक व्यक्ति ने पूछा- "क्या तुम्हारी दुकान के सामने से राजा निकला है?" बाण-निर्माता ने कहा कि उसने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया था। वास्तविकता यही थी कि उसका मस्तिष्क अपने काम में इतना तन्मय था कि वह अपनी दुकान के सामने से हो कर जाते हुए राजा को नहीं देख सका। मैंने उस बाण-निर्माता से मस्तिष्क के आत्यन्तिक ध्यान के गुण की शिक्षा ग्रहण की है।
२३. मकड़ा अपने मुँह से लम्बे-लम्बे धागे निकाल कर उनसे जाला बनाता है। किन्तु वह स्व-निर्मित जाले में ही आबद्ध हो जाता है। फिर भी मनुष्य अपने विचारों का एक जाल बुन कर उसमें आबद्ध हो जाता है। अतः ज्ञानी व्यक्ति को सांसारिक विचारों का परित्याग कर केवल ब्रह्म का ही चिन्तन करना चाहिए। मैंने मकड़े से यही सीखा है ।
२४. भृंगी एक कीड़े को पकड़ कर अपने आवास में डाल देता है और फिर उसे डंक मारता है। असहाय कीड़ा सर्वदा उस भृंगी के आगमन तथा उसके डंक के विषय में सोचा करता है। अपने इस अनवरत चिन्तन के कारण वह स्वयं भृंगी बन जाता है। मनुष्य जिस रूप का चिन्तन करता है, उसे समय आने पर उसी रूप की प्राप्ति हो जाती है। वह जैसा सोचता है, वैसा ही हो जाता है। मैंने उस भृंगी तथा कीड़े से आत्मा के अनवरत चिन्तन द्वारा अपने स्वरूप में स्थिति, शरीराध्यास का परित्याग तथा मुक्ति-प्राप्ति की शिक्षा ग्रहण की है।
राजा यदु दत्तात्रेय के इस उपदेश से अत्यन्त प्रभावित हुए। वे संसार का परित्याग कर आत्मा पर अनवरत ध्यान का अभ्यास करने लगे।
दत्तात्रेय किसी भी प्रकार की असहिष्णुता तथा पक्षपात से पूर्णतः मुक्त थे। कहीं से भी प्राप्त किसी भी स्रोत से वे ज्ञान प्राप्त कर लेते थे। ज्ञान के जिज्ञासुओं को दत्तात्रेय के उदाहरण का अनुकरण करना चाहिए।
जैगीषव्य नामक एक महान् योगी थे। उन्हें निरन्तर दश महाप्रलयों की अवधि में हुए अपने पूर्व-जन्मों का पूर्ण ज्ञान था। एक दिन ऋषि अवात्य ने उनसे कहा- "आपने नरक में, पशु-योनि में तथा गर्भ में अनेक क्लेशों का अनुभव किया है। मनुष्य तथा देवता के रूप में आपने बार-बार जन्म ग्रहण किया है। नरक में प्राप्त दुःखों तथा स्वर्ग में प्राप्त सुखों के विषय में आपके क्या अनुभव हैं? मानव-योनि में सर्वाधिक सुख अथवा दुःख कौन-सा है?"
योगी जैगीषव्य ने कहा- "दश महाकल्पों में समाहित अपने जीवन में मैंने नरक तथा पशु-योनि के कष्टों का अनुभव किया है। मनुष्य तथा देवता के रूप में मैंने अनेक बार जन्म-ग्रहण किया है। संसार हो या स्वर्ग-कहीं किसी वस्तु में अल्प मात्रा में भी सुख नहीं है। मैंने जो कुछ अनुभव किया है, उसे मैं मात्र दुःख के नाम से ही अभिहित करता हूँ।"
अवात्य ने पुनः पूछा- "हे योगी, क्या प्रकृति-लय की अवस्था में प्राप्त आनन्द तथा सन्तोष भी दुःख की ही कोटि में आते हैं?"
योगी जैगीषव्य ने उत्तर दिया- "निस्सन्देह प्रकृति-लय की स्थिति में प्राप्त आनन्द विषयों से प्राप्त ऐन्द्रिय सुख से श्रेष्ठतर है; किन्तु निरपेक्ष स्वातन्त्र्य अथवा कैवल्य के विशुद्ध आनन्द की तुलना में यह दुःख ही है। प्रकृति-लय मात्र गुण-परिणाम है। उसमें अभी भी तृष्णा-तन्तु विद्यमान है। जब योगी पूर्णतः अनपेक्ष हो जाता है तभी उसे विशुद्ध, अमिश्रित, असीम तथा शाश्वत आनन्द की प्राप्ति होती है।"
कैलास के तिरुमूल नायनार एक महान् योगी थे। भगवान् शिव के वाहन नन्दी की कृपा से उन्हें समस्त महत्तर अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त थीं। वे अगस्त्य मुनि के मित्र थे। वे कैलास से आ कर काशी में रहने लगे। इसके पश्चात् वे चिदम्बरम्, तिरुवाडुतुरै तथा चेन्नई (मद्रास) के निकटस्थ अन्य स्थानों पर गये। वे तिरुवाडुतुरै के एक मन्दिर में भगवान् शिव की पूजा करने लगे। कुछ समय तक वे वहीं रहे।
एक बार तिरुमूल नायनार कावेरी के तट पर स्थित एक उद्यान में गये। वहाँ उन्होंने एक ग्वाले का मृत शरीर देखा। उनका ध्यान शव के चतुर्दिक् उच्च स्वर में रँभाती हुई गौओं की ओर आकृष्ट हुआ। इससे वे मर्माहत तथा गौओं के प्रति दयार्द्र हो उठे। एक स्थान पर अपना शरीर छोड़ कर वे ग्वाले के मृत शरीर में प्रविष्ट हो गये। वे दिन-भर गौओं की देख-रेख करते रहे और उसके पश्चात् उन्होंने उन्हें अपने-अपने घर भेज दिया। ग्वाले की पत्नी अपने पति की मृत्यु से अवगत नहीं थी। उसने अपने पति का शरीर धारण किये हुए तिरुमूल नायनार को आमन्त्रित किया; किन्तु उन्होंने उसके आमन्त्रण को अस्वीकार कर दिया। अब उनकी इच्छा अपने शरीर में प्रविष्ट होने की हुई। उन्होंने उसकी खोज की; किन्तु उस स्थान विशेष पर उनका शरीर नहीं मिला। उन्होंने सोचा कि यह सब भगवान् की कृपा से ही हो रहा है। ग्वाले के शरीर में ही वे आडुतुरै पहुँचे और मन्दिर के पश्चिम में पीपल के एक वृक्ष के नीचे बैठ गये। वहाँ उन्होंने तमिल में 'तिरुमन्तिरम्' नामक एक ग्रन्थ की रचना की। इस ग्रन्थ में तीन सौ पद हैं जिनमें वेदों का सार-तत्त्व सन्निहित है।
जरथुश्त्र के जीवन-काल के विषय में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। कुछ लोगों ने इनका समय ६००० ई.पू. तथा कुछ अन्य लोगों ने ई.पू. सातवीं शताब्दी माना है।
प्राचीन ईरानियों में जरथुश्त्र सर्वाधिक महान् पैगम्बर थे। उन्होंने ब्रह्माण्ड के अधिपति अहुरमज़दा की उपासना के प्रतिष्ठापन तथा दैवी लक्ष्य की पूर्ति के लिए जन्म ग्रहण किया था। आवेस्तन भाषा में उनकी स्वयं रचित अमूल्य रचना-गाथा इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि वे ईश्वर-प्रेमाविष्ट व्यक्ति थे।
आदरणीय पुरुशास्पो (Porushaspo) उनके पिता थे और उनकी माता का नाम दुखदहवो (Dughdhvo) था। जरथुश्त्र का जन्म ईरान के पश्चिमी अंचल तख्त-ए-सुलेमान में अजरबैजान जनपद में हुआ था। ईरान के प्राचीन सम्राट् मनुशसिहार (Manushcihar) के राजकीय परिवार से उनका प्रत्यक्ष वंशगत सम्बन्ध था।
ईरान के पैगम्बर के अनुयायियों ने उन्हें जरथुश्त्र (पीले तथा वृद्ध ऊँटों का स्वामी) के नाम से अभिहित किया था। उश्त्र का अर्थ ऊँट होता है।
ईरान के पैगम्बर के जन्म पर प्रकृति उल्लसित हो उठी। वृक्षों, नदियों तथा फूलों ने आनन्द तथा हर्ष व्यक्त किया; किन्तु दुष्टात्माएँ भयभीत हो गयीं। अपने जन्म-ग्रहण के समय पैगम्बर ने सामान्य नश्वर शिशुओं की भाँति रुदन नहीं किया। इसके विपरीत उनके मुख से अट्टहास के स्वर निःसृत हुए।
उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए वहाँ अनेक देवदूत तथा इनसे उच्चतर महान् देवदूत आये।
जरथुश्त्र का पारिवारिक नाम स्पितमा था जिसका अर्थ श्वेत है। उनके दो बड़े भाई तथा दो छोटे भाई थे। जरथुश्त्र का जन्म एक चमत्कार था। स्वर्ग से अहुरमज़दा की महिमा का अवतरण हुआ जो पैगम्बर की भावी माता के घर में प्रविष्ट हो गयी। जब वे गर्भवती हुईं, तब उनके यहाँ स्वर्ग के महान् देवदूत आये और उन लोगों ने गर्भस्थ शिशु की उपासना-अभ्यर्थना की।
जरथुश्त्र ने तीन विवाह किये और कई सन्तानों के पिता बने। उनकी पहली पत्नी से एक पुत्र तथा तीन पुत्रियाँ हुईं। सबसे छोटी पुत्री पोरुसिस्ता (Pourucista) का विवाह जमस्पा से हुआ जो जरथुश्त्र की तीसरी पत्नी का चाचा था। जरथुश्त्र की दूसरी पत्नी से दो पुत्र हुए।
जरथुश्त्र के प्रारम्भिक जीवन से हम बहुत कम परिचित हैं। बाल्यावस्था से ही वे अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने लगे थे। ज्ञानियों के साथ वे वार्तालाप में सम्मिलित होते और विधर्मियों की निन्दा करते।
प्रेतात्माओं ने उनकी हत्या के प्रयत्न किये। तुरानियन सम्राट् दुरास्रोबो ने भी बालक की हत्या के प्रयत्न किये; किन्तु दयालु ईश्वर ने चमत्कारिक विधि से पैगम्बर की प्राण-रक्षा की।
सोलह वर्ष की आयु से ही जरथुश्त्र में वैराग्य-भाव विकसित होने लगा। सांसारिक विषय अपने प्रति उन्हें आकर्षित नहीं कर सके। वे समस्त लौकिक सुखों को हेय समझते थे। वस्तुतः वे ऐन्द्रिय लालसाओं से ऊपर उठ चुके थे। प्राणिमात्र के प्रति उनमें गहन प्रेम तथा करुणा की भावना थी।
जरथुश्त्र बीस वर्ष की आयु में गृह-त्याग कर इतस्ततः परिभ्रमण करने लगे। वे पवित्रता तथा धर्म-परायणता का जीवन व्यतीत करते थे। वे वनों में घूमते तथा गुफाओं और पर्वत-शिखरों पर एकाकी रहा करते थे। वाणी पर उनका नियन्त्रण था और अन्य इन्द्रियों को भी उन्होंने विजित कर लिया था। वे मिताहारी थे और अपना समय शान्त-चित्त हो कर ध्यान में व्यतीत करते थे।
जरथुश्त्र को सबाताम (Sabatam) पर्वत के शिखर पर समाधि अर्थात् ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च अधिपति अहुरमज़दा से तादात्म्य की अनुभूति हुई। उन्हें धर्म-गुरु-सुलभ दिव्य अन्तर्दृष्टि की प्राप्ति हुई। उन्होंने अहुरमज़दा से प्रत्यक्ष वार्तालाप किया, जिन्होंने उन्हें ज्ञान-दान से उपकृत किया। अहुरमज़दा की कृपा से उन्होंने सप्त-विध ज्ञान का साक्षात्कार किया। तीस वर्ष की आयु में उन्हें पैगम्बर कहा जाने लगा। अन्तर्दृष्टि के दिव्य प्रकाश की सम्प्राप्ति के पश्चात् वे अहुरमज़दा के प्रख्यात सन्देशवाहक हो गये।
आध्यात्मिक पथ पर जरथुश्त्र की सहायता अनेक महान् देवदूतों ने की। महान् देवदूत उच्चतम कोटि के दिव्य सन्देशवाहक हैं। वे अहुरमज़दा के अनुवर्ती होते हैं। वे भगवान् शिव के गणों तथा भगवान् विष्णु के अनुवर्ती जय, विजय और सुनन्द के अनुरूप हैं। वे संसार के लोक-पाल हैं। जरथुश्त्र इन महान् देवदूतों से प्रत्यक्ष वार्तालाप करते थे।
वोहुमानाह (Vohumanah) विशुद्ध विचार का महान् देवदूत है। वह घरेलू पशुओं का अधिष्ठातृ देवता है। उसने जरथुश्त्र के समक्ष प्रकट हो कर शारीरिक आवरण के परित्याग में उनको सहयोग प्रदान किया और उनकी आत्मा को अहुरमज़दा के सर्वोच्च धाम की ओर दिशा-निर्देश दिया। स्वयं अहुरमज़दा ने पैगम्बर को उपदेशों के माध्यम से दिव्य ज्ञान प्रदान किया। जरथुश्त्र ने उनके अनुदेशों का पालन किया।
जब जरथुश्त्र अहुरमज़दा के दिव्य धाम से नीचे आ रहे थे, तब आसुरी शक्ति के प्रतीक अहमान (Ahriman) ने उन पर भयंकर आक्रमण किया। वह जरथुश्त्र की हत्या कर देना चाहता था; किन्तु अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के कारण वे सुरक्षित रहे। अहमान पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् वे सभी दुष्टात्माओं के स्वामी हो गये। उन्होंने पुनः उपदेश देना प्रारम्भ कर दिया।
जरथुश्त्र को द्वितीय दिव्य अन्तर्दर्शन का अनुभव हुआ। उसी महान् देवदूत ने पैगम्बर से पशुओं की समुचित देख-भाल तथा सुरक्षा का अनुरोध किया।
अपने तृतीय दिव्य अन्तर्दर्शन में जरथुश्त्र ने पवित्र अग्नि के अधिष्ठातृ देवता तथा धर्मपरायणता के महान् देवदूत अश वहिश्त (Asha Vahishat) से वार्तालाप किया। महान् देवदूत ने जरथुश्त्र को पवित्र अग्नि के साथ-साथ सभी अग्नियों की सुरक्षा का आदेश दिया।
जरथुश्त्र ने धातुओं के अधिष्ठातृ देवता महान् देवदूत खेहाथ्र वैर्य (Khehathra Vairya) से वार्तालाप किया जिसने पैगम्बर को धातुओं की समुचित देख-भाल का आदेश दिया। इसके पश्चात् जरथुश्त्र ने पृथ्वी के अधिष्ठातृ देवता तथा शालीनता के महान् देवदूत स्पेन्ता अरमैथ (Spenta Armaith) से वार्तालाप किया। पुनः उन्होंने अपस् के अधिष्ठातृ देवता तथा स्वास्थ्य के महान् देवदूत हउरावतात (Hauravatat) से वार्तालाप किया तथा अन्ततः उनका वार्तालाप वनस्पतियों के अधिष्ठातृ देवता तथा अमरत्व के महान् देवदूत अमेरेतात (Ameretat) से हुआ।
जरथुश्त्र को इन दिव्य साक्षात्कारों के कारण देवताओं के दिव्य क्रम-सोपान का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया। जेन्द अवेस्ता (Zend Avesta) पारसियों के लिए बाइबिल तथा गीता है जिसमें ईश्वरीय ज्ञान सन्निहित है। पैगम्बर ने इसे सर्वोच्च प्रभु अहुरमज़दा से प्राप्त किया था।
जरथुश्त्र के दिव्य अनुभवों तथा छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णित सत्यकाम जाबाल के अनुभवों में सादृश्य के दर्शन होते हैं। वायु देवता, अग्नि देवता तथा अपस् के अधिष्ठातृ देवता वरुण ने सत्यकाम को दिव्य ज्ञान प्रदान किया था। महान् देवदूत वहिश्ता (Vahishta) तथा हउरावतात हिन्दुओं के क्रमशः अग्निदेवता एवं वरुण देवता हैं।
जरथुश्त्र कवीस (Kavis) तथा करपान्स (Karpans) को हेय दृष्टि से देखते थे। ये प्रेतात्माओं के पूजक थे। करपानों में विशुद्ध धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति श्रद्धा के भाव नहीं थे। अपने धार्मिक अनुष्ठानों में वे मादक पेय होम (Home) का सेवन किया करते थे। यह उनका व्यसन बन चुका था। पैगम्बर ने सभी प्रेत-पूजक दुष्ट स्त्री-पुरुषों तथा उनके नायक कवीस तथा करपान को अपने धर्म में दीक्षित करने का प्रयत्न किया; किन्तु ये अपने सम्प्रदाय के पुरोहित थे और सभी रूढ़िवादी पुरोहित स्वभावतः व्यापक सुधारों के विरोधी होते हैं। अतः जरथुश्त्र अपने प्रयत्न में असफल हो गये।
जरथुश्त्र इतस्ततः भ्रमण करते रहे। वे भारत तथा चीन तक गये; किन्तु प्रारम्भ में किसी ने भी उनका सन्देश ग्रहण नहीं किया। उन्होंने सर्वप्रथम अपने चचेरे भाई मयध्योवी-मनहा (Maidhyoi-Madnha) को अपने धर्म में दीक्षित किया। उनका यह शिष्य उनके प्रति आजीवन निष्ठावान् बना रहा।
राज-सभा के विद्वान् पुरोहित कवीस तथा करपान ने पैगम्बर के विरुद्ध ईरान-सम्राट् विशतास्प (Vishtasp) के कान भर दिये। उन्होंने पैगम्बर के विरुद्ध षड्यन्त्र करते हुए सम्राट् के सम्मुख उन पर जादूगर होने का आरोप लगाया। सम्राट् उनकी इस बात से सहमत हो गया कि पैगम्बर को कारागार में डाल दिया जाये जिससे वे क्षुधा से पीड़ित हो कर प्राण त्याग दें। जरथुश्त्र को कुछ दिनों तक कारागार में रहना पड़ा जहाँ ईश्वर ने उनकी प्राण-रक्षा की।
एक बार सम्राट् का स्नेह-पात्र काला घोड़ा अस्वस्थ हो गया। उसके चारों पैर उसके पेट की ओर चले गये थे। जरथुश्त्र ने सम्राट् को सूचित किया कि वे उसे रोग-मुक्त कर देंगे। उन्होंने सम्राट् के समक्ष चार शर्तें रखीं जिन्हें उसने सहज ही स्वीकार कर लिया। विशतास्प नये मत को स्वीकार कर लेगा, उसे इस बात के प्रति सहमति प्रदान करनी होगी कि उसका पुत्र इस्फेन्दिआर (Isfendiar) इस नये मत की रक्षा करेगा, जरथुश्त्र को साम्राज्ञी हुताओसा (Hutaosa) को दीक्षित करने की अनुमति प्रदान की जायेगी और सम्राट् को जरथुश्त्र के विरुद्ध षड्यन्त्र करने वालों के नाम प्रकट कर उन्हें दण्डित करना होगा। वे चार शर्तें यही थीं।
इसके बदले में सम्राट् ने भी अपनी चार शर्तें प्रस्तुत करते हुए उनसे माँग की कि उसे अपनी अन्तिम नियति तथा स्वर्ग में अपने स्थान के विषय में जानकारी प्राप्त हो जाये, उसका शरीर अभेद्य हो जाये, उसे सार्वभौम ज्ञान की प्राप्ति हो और पुनरुत्थान तक उसकी आत्मा उसके शरीर से विलग न हो। उसी समय सम्राट् तथा साम्राज्ञी के समक्ष तीन महान् देवदूत प्रकट हुए और उन दोनों की आँखें चौंधिया गयीं। उन्हें देखते ही वे काँपने लगे। उन्होंने प्रकाश से निःसृत होने वाले शब्द सुने जिनका तात्पर्य यह था कि वे (महान् देवदूत) ईश्वर के आज्ञानुसार उनको जरथुश्त्र के धर्म की महिमा को प्रदर्शित करने के लिए प्रकट हुए हैं।
सम्राट् विशतास्प को विश्वास हो गया और वह पैगम्बर की अलौकिक शक्ति का कायल हो गया। वह उनके चरणों पर गिर पड़ा, उसने उनके मत को स्वीकार कर लिया तथा ईरान का पैगम्बर मान कर उनकी पूजा की। उसे स्वर्ग की एक झलक का अनुभव हुआ। महान् देवदूत अश वहिश्त ने उसे पीने के लिए अमृत दिया। साम्राज्ञी तथा अन्य नायकों के अतिरिक्त सम्राट् के भाई तथा जरथुश्त्र के श्वसुर फ्राशाओशत्र (Frashaoshtra) भी जरथुश्त्र द्वारा प्रतिपादित मत के निष्ठावान् अनुयायी हो गये। राजकीय संरक्षण के कारण इस नये मत का प्रचार-प्रसार दूर-दूर तक हो गया। इस नये मत को जन-साधारण ने भी अपनी स्वीकृति प्रदान की और जरथुश्त्र द्वारा प्रतिपादित यह मत ईरान का राजधर्म हो गया।
इस नये धर्म की सफलता ईरान तथा तूरान के बीच दो कटुतापूर्ण युद्धों का कारण बन गयी; किन्तु सम्राट् विशतास्प के भाई जरीर तथा स्वयं सम्राट् ने शत्रुओं को पराजित कर दिया। इस युद्ध में जरीर का योगदान आश्चर्यजनक था। वह एक दुर्जेय योद्धा सिद्ध हुआ। उसका शौर्य अवर्णनीय था; किन्तु विश्वासघाती विद्रास्फश (Vidrasfsh) ने पीछे से छलपूर्वक एक विषाक्त बरछी से उसकी हत्या कर दी। तूरान के सम्राट् अर्यास्प (Aryasp) ने इस भयंकर अपकर्म के पुरस्कार-स्वरूप उससे अपनी पुत्री के विवाह का वचन दे दिया।
जरीर का युवा पुत्र बस्तवार (Bastwar) एक शक्तिशाली योद्धा था। उसको महारथी कहा जा सकता था। शक्ति में वह भीष्म के समकक्ष था। उसने विद्रास्फश की हत्या कर अर्यास्प को पराजित कर दिया।
अपनी पराजय के अठारह वर्षों के पश्चात् सम्राट् अर्यास्प ने ईरान पर पुनः आक्रमण किया। उसने मन्दिरों को ध्वस्त कर दिया, पुरोहितों की हत्या कर दी और जेन्द अवेस्ता को जला डाला। इस द्वितीय युद्ध में सम्राट् विशतास्प का पुत्र इस्फेन्दियार महान् नायक सिद्ध हुआ। उसने अर्यास्प को ईरान से बाहर निकाल कर उसकी हत्या कर दी।
ईरान के पैगम्बर नुश-अदर (Nush-Adar) के मन्दिर में हाथ में माला लिये वेदी के समक्ष प्रार्थना कर रहे थे। उसी समय ब्रात्रोक-रेश (Bratrok-Resh) नामक एक तूरानी ने तलवार से उनकी हत्या कर दी।
जरथुश्त्र ने ब्रात्रोक-रेश के ऊपर अपनी माला फेंक दी। माला से आग की लपट उठी जिसमें वह भस्म हो गया। सतहत्तर वर्ष की आयु में जरथुश्त्र का देहान्त हुआ और इस प्रकार ईरान का महिमामय पैगम्बर, अहुरमज़दा के महान् सन्देश वाहक तथा जरथुश्त्रवाद अर्थात् मज़द-उपासना के संस्थापक का अन्त हो गया।
जरथुश्त्र ने अनेक चमत्कार किये। उन्होंने देवदूतों के आदेश का पालन किया, अग्नियों तथा पशुओं की रक्षा की, रोगियों को रोग-मुक्त किया और नेत्रहीनों को उनकी नेत्र-ज्योति पुनः प्रदान की। एक विद्वान् तथा चिकित्सक के रूप में उन्होंने महान् ख्याति अर्जित की। उन्होंने अग्नि-देवता के अनेक मन्दिरों की स्थापना की और अपने मत का प्रचार-प्रसार देश के कोने-कोने में किया। उन्होंने प्रेत-पूजा, जादू-टोना तथा अभिचार के प्रचलन का उन्मूलन किया। उन्होंने महामारी, राष्ट्रीय आपदाओं तथा घोर विपत्तियों का निराकरण, रोगियों को रोगमुक्त, हानिकर जीवों को प्रभावशून्य तथा पृथ्वी को प्रचुर मात्रा में जल प्रदान किया।
जरथुश्त्र धर्मनिष्ठ, कुलीन तथा दयालु थे। उनका सन्देश नैतिक जीवन का उदात्त सन्देश था जो अमरत्व, शाश्वत आनन्द तथा ईश्वर अथवा अहुरमज़दा के सिद्धान्तों की सम्प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। "जो धर्मपरायण हैं, उनसे प्रेम करो; दुःखी जनों के प्रति अपने हृदय में करुणा को स्थान दो", इन्हीं में जरथुश्त्र की नीतिशास्त्रीय शिक्षा निहित है।
पार्श्वनाथ को इन्द्र का अवतार माना जाता है। वे काशी-नरेश इक्ष्वाकुवंशीय महाराजा विश्वसेन के पुत्र थे। उनकी माता का नाम वामादेवी था जो महाराजा महिपाल की पुत्री थीं। वे तेईसवें तीर्थंकर थे। उनका जन्म ८७२ ई.पू. में पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को हुआ था। सीध
पार्श्वनाथ ने आठ वर्ष की आयु से ही गृहस्थाश्रम के द्वादश व्रतों का अनुपालन प्रारम्भ कर दिया था। फागन काल-रस है सा
पार्श्वनाथ सोलह वर्ष की आयु में सिंहासनारूढ़ हो चुके थे। एक दिन उनके पिता विश्वसेन ने उनसे कहा- "हे पुत्र, अपने यशस्वी राजवंश की सन्तति-परम्परा को अविच्छिन्न रखने के लिए तुम्हारा विवाह अत्यावश्यक है। राजा नाभि के इच्छानुसार ऋषभ को भी विवाह करना पड़ा था।" तया
अपने पिता के इन शब्दों से पार्श्वनाथ अत्यन्त भयभीत हो उठे। उन्होंने कहा- "मैं ऋषभ की भाँति दीर्घजीवी नहीं हो सकूँगा। मुझे कुछ ही वर्षों तक जीवित रहना है। मैंने अपने जीवन के सोलह वर्ष बाल-सुलभ क्रीड़ाओं में व्यर्थ ही गँवा दिये। तीस वर्ष की आयु में मेरा दीक्षा ग्रहण अनिवार्य है। तब क्या मैं अपूर्ण, अनित्य तथा मायिक सुखों के प्राप्त्यर्थ अल्पावधि के लिए विवाह कर लूँ?"
पार्श्वनाथ के हृदय में वैराग्य जाग्रत हो उठा। उन्होंने मन-ही-मन विचार किया- "मैंने दीर्घ काल तक इन्द्र के पद का उपभोग किया है, फिर भी सुख के प्रति मेरी तृष्णा का क्षय नहीं हो पाया। जिस प्रकार ईंधन के आधिक्य से अग्नि की ज्वाला का शमन नहीं होता, उसी प्रकार सुखोपभोग से सुख की तृष्णा में वृद्धि ही होती है। उपभोग के समय सुख रुचिकर प्रतीत होते हैं; किन्त उनके परिणाम निश्चित रूप से अनर्थकारी होते हैं।
"सांसारिक विषयों के प्रति आसक्ति के कारण यह जीव अनादि काल से जन्म, जरा आदि के दुःखों का अनुभव करता आ रहा है। इन्द्रिय-लोलुपता की सन्तुष्टि के लिए वह दुःख के संसार में भ्रमण करता रहता है। वैषयिक तुष्टि के लिए वह नैतिक विधि-निषेध की ओर ध्यान नहीं देता और इस प्रकार जघन्य पापों में लिप्त हो जाता है। ऐन्द्रिय सुखों की प्राप्ति के लिए वह पशु-हत्या करता है। चोरी, लोभ, पर-स्त्री-गमन तथा सभी प्रकार के पापों और अपराधों के मूल में तृष्णा ही विद्यमान है।
"पाप-कर्म के परिणाम-स्वरूप जीव जन्म-मरण के चक्र में आबद्ध हो जाता है। इसके फल-स्वरूप उसे निम्नतर पशु-योनि में अवतरित होना तथा नरक की यातना का भोग करना पड़ता है। सुख की इस तृष्णा का निर्मम उच्छेद अत्यावश्यक है। मैंने अब तक अपना जीवन व्यर्थ ही गँवाया; किन्तु अब मैं सुखों की अर्थहीन खोज में और अधिक संलग्न न रह कर गम्भीरतापूर्वक सम्यक् आचरण का अभ्यास करूँगा।"
राजकुमार पार्श्वनाथ अनुप्रेक्षा की द्वादश विधाओं से परिचित थे। उन्होंने संसार-त्याग का निश्चय कर लिया। अपने माता-पिता की आज्ञा प्राप्त कर वे घर से निकल पड़े। गृह-त्याग के पश्चात् वे वन में चले गये। वहाँ वे पूर्णतः निर्वस्त्र हो गये। उत्तर की ओर जा कर उन्होंने मुक्ति-प्राप्त महान् सिद्धों को नमन किया और शिर के केश के पाँच गुच्छों को लुंचित कर वे मुनि या जिन बन गये।
पार्श्वनाथ ने उपवास का अभ्यास किया। उन्होंने अवधान तथा निष्ठा के साथ अर्हत संघ के अट्ठाईस प्रारम्भिक तथा चौरानवे माध्यमिक व्रतों का अनुपालन किया। ध्यानावस्था में वे आत्म-विस्मृत हो जाते थे। वे विशुद्ध सर्वज्ञता की स्थिति को प्राप्त हो चुके थे। उन्हें सामेदा की पहाड़ी पर आत्यन्तिक मुक्ति की प्राप्ति हुई। आजकल इस पहाड़ी को पार्श्वनाथ की पहाड़ी कहते हैं।
पार्श्वनाथ ने काशी, कोसी, कोशल, पांचाल, महाराष्ट्र, मगध, अवन्ती, मालवा, अंग तथा वंग में उपदेश दिये। अनेक व्यक्ति जैन धर्म में दीक्षित हो गये। पार्श्वनाथ ने अपने जीवन के सत्तर वर्ष उपदेश देने में व्यतीत किये।
महावीर ने पार्श्वनाथ की शिक्षाओं को संशोधित-संवर्धित किया। उनके उपदेशों में ऐसा कुछ भी न था जिसे सर्वथा नवीन कहा जा सके।
पार्श्वनाथ एक सौ वर्ष तक जीवित रहे। ८४२ ई.पू. में तीस वर्ष की आयु में उन्होंने गृह-त्याग किया और ७७२ ई.पू. में उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हुई।
तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ महिमान्वित हों !
ईसापूर्व छठी शताब्दी में भारत में धर्म विस्मृति के गर्भ में विलीन हो चुका था। वेदों के उदात्त आदेशोपदेश पृष्ठभूमि में डाल दिये गये थे। सर्वत्र पुरोहित-तन्त्र का वर्चस्व था। कुटिल-कपटी पुरोहितों ने धर्म को व्यवसाय बना लिया था। लोगों को विभिन्न विधियों से प्रवंचित कर उन्होंने अपने लिए अकूत धन-राशि संचित कर ली थी। वे नितान्त अधार्मिक थे और धर्म के नाम पर इन हृदयहीन पुरोहितों का पदानुसरण करता हुआ जन-समुदाय अर्थहीन कर्मकाण्डों के अनुष्ठान में संलग्न था। लोग निर्दोष तथा मूक पशुओं की हत्या कर भिन्न-भिन्न प्रकार के यज्ञानुष्ठान किया करते थे। देश को बुद्ध की कोटि के किसी सुधारक की आवश्यकता की तीव्रतर अनुभूति हो रही थी।
जन्म
शाक्याधिपति शुद्धोधन बुद्ध के पिता थे और उनकी माता का नाम माया था। बुद्ध का जन्म ५६० ई.पू. तथा उनकी मृत्यु ४८० ई.पू. में हुई थी। मृत्यु के समय उनकी आयु अस्सी वर्ष थी। उनका जन्म नेपाल के हिमालय क्षेत्र के अन्तर्गत पाल्यापर्वत की उपत्यका में स्थित कपिलवस्तु नगरी के निकटस्थ लुम्बिनी नामक वन में हुआ था। कपिलवस्तु नामक यह नगरी वाराणसी से लगभग सौ मील दूर रोहिणी नामक एक छोटी नदी के तट पर स्थित है। जब बुद्ध के इस धरा-धाम पर अवतीर्ण होने का समय आया, तब स्वयं देवताओं ने उनके मार्ग में दिव्य तथा मांगलिक प्रतीकों एवं शकुनात्मक लक्षणों की संरचना कर दी। ऋतु के स्वभाव के प्रतिकूल उपवन पुष्पित हो चले और वर्षा की सुखद-मन्द फुहारें पड़ने लगीं। वातावरण में स्वर्गिक संगीत गूंज उठा तथा सुरभित वायु बहने लगी। नवजात शिशु के शरीर पर बत्तीस मांगलिक चिह्न (महाव्यंजन) थे जो उसकी भावी महानता के द्योतक थे। इनके अतिरिक्त उसके शरीर पर अनेक आनुषंगिक चिह्न (अणुव्यंजन) भी थे। पुत्र-जन्म के सात दिनों के पश्चात् ही माया का देहान्त हो गया। शिशु का पालन-पोषण उसकी बहन महाप्रजापति द्वारा हुआ जिसने उसकी प्रतिपालिका माता का उत्तरदायित्व वहन किया।
ज्योतिषियों की भविष्यवाणी
शिशु सिद्धार्थ के जन्म के अवसर पर ज्योतिषियों ने उसके पिता के समक्ष यह भविष्यवाणी की: "युवावस्था को प्राप्त होने पर यह बालक या तो एक चक्रवर्ती सम्राट् होगा या गृह-त्याग के पश्चात् साधु-वेष धारण कर मानव-जाति की मुक्ति के लिए ज्योतिष्मती प्रज्ञा से सम्पन्न बुद्ध हो जायेगा।" तब राजा ने पूछा : "मेरा पुत्र किन वस्तुओं को देख कर संसार से विरक्त होगा?" ज्योतिषियों ने उत्तर दिया "चार लक्षणों को देख कर।" राजा ने पूछा : "ये चार लक्षण क्या हैं?" ज्योतिषियों ने कहा : "एक जर्जरकाय वृद्ध, एक रोगी, एक शव तथा एक साधु को देख कर राजकुमार संसार के प्रति विरक्त हो जायेगा।"
शुद्धोधन की सतर्कता
यह सोच कर कि कहीं वह अपने बहुमूल्य पुत्र से वंचित न हो जाये, शुद्धोधन उसे सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्त करने के अथक प्रयास में संलग्न हो गये। ऐन्द्रिय सुखोपभोग के प्रति उसकी आसक्ति तथा एकान्त एवं निर्धनता के व्रत-ग्रहण के प्रति उसकी विरक्ति के लिए उन्होंने उसके चतुर्दिक् विलास तथा सम्मोहन के समस्त उपकरणों की व्यवस्था कर दी। उन्होंने उसका विवाह कर उसे एक ऐसे स्थान पर रख दिया जो उन प्राचीरों से आवेष्ठित था जिनके अन्तर्गत उद्यान, राजप्रासाद, संगीत तथा नृत्य आदि सभी कुछ उपलब्ध थे। उसको प्रमुदित तथा प्रफुल्ल रखने के लिए अगणित सौन्दर्यमयी युवतियाँ उसकी सेवा में संलग्न रहती थीं। शुद्धोधन विशेष रूप से उसको उन चार लक्षणों से विलग रखना चाहते थे जिनके कारण उन्हें उसके तपस्वी हो जाने का भय था। राजा ने कहा- "इसी क्षण से इन लक्षणों से युक्त किसी भी व्यक्ति को उसके निकट मत आने दो। इस प्रकार वह बुद्ध नहीं हो पायेगा। मेरी कामना है कि मेरा पुत्र चारों महाद्वीपों तथा दो सहस्र सहवर्ती द्वीपों पर अपनी प्रभुसत्ता तथा अपने अधिकार का उपभोग करे और छत्तीस योजन की विस्तृत परिधि वाले स्वर्ग लोकों में उसका अबाध विचरण होता रहे।" इतना कह कर उन्होंने चारों दिशाओं में एक-एक योजन पर चार-चार प्रहरी नियुक्त कर दिये जिससे उक्त चार प्रकार के व्यक्तियों पर उनके पुत्र की दृष्टि न पड़ सके।
प्रव्रज्या
बुद्ध का प्रारम्भिक नाम सिद्धार्थ था। इस शब्द का अभिप्राय उस व्यक्ति से है जिसकी लक्ष्य-पूर्ति हो चुकी हो। सिद्धार्थ का पारिवारिक नाम गौतम था। उनको संसार में बुद्ध के नाम से जाना जाता है। लोग उनको शाक्यमुनि भी कहते थे जिसका अर्थ है शाक्यवंशीय मुनि।
सिद्धार्थ की बाल्यावस्था कपिलवस्तु के परिसर में व्यतीत हुई। सोलह वर्ष की आयु में उनका विवाह हुआ। उनकी पत्नी का नाम यशोधरा था और उनके राहुल नामक एक पुत्र था। उनतीस वर्ष की आयु में आध्यात्मिक खोज तथा योग-साधना के प्रति स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर देने के लिए उन्होंने एक दिन अकस्मात् ही गृह-त्याग कर दिया। एक घटना मात्र से उत्प्रेरित हो कर वे प्रव्रज्या के मार्ग की ओर उन्मुख हो गये। एक दिन उन्हें किसी प्रकार अपने प्राचीर-परिवेष्ठित निवास स्थान से बहिर्गमन का अवसर प्राप्त हो गया और वे अपने भृत्य चन्ना के साथ लोगों के जीवन-यापन की विधि से परिचित होने के लिए नगर में इतस्ततः घूमने लगे। वहाँ एक जर्जरकाय वृद्ध, एक रोग-ग्रस्त व्यक्ति, एक शव तथा एक साधु को देख कर अन्ततः उन्होंने संसार-त्याग का निश्चय कर लिया। उनको इस तथ्य का अनुभव होने लगा कि एक दिन उनको भी जरा, रोग तथा मृत्यु से ग्रस्त होना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त उस साधु के सौम्य तथा गत्यात्मक व्यक्तित्व ने भी उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने मन-ही-मन सोचा- 'मुझे इस दुःखमय संसार का परित्याग कर साधु-वृत्ति ग्रहण कर लेनी चाहिए। सुखोपभोग तथा विलास से ओत-प्रोत यह ऐहिक जीवन नितान्त अर्थहीन है। मेरा क्षय भी अनिवार्य है और मैं भी वृद्धावस्था के परिणाम से मुक्त नहीं हूँ। सांसारिक सुख क्षणिक हैं।'
गौतम ने गृह, धन, राज्य, सत्ता, माता, पत्नी तथा अपने एकमात्र पुत्र का सर्वदा के लिए परित्याग कर दिया। मुण्डित-शीश हो कर उन्होंने पीत वस्त्र धारण कर लिया। तत्पश्चात् उन्होंने मगध साम्राज्य की राजधानी राजगृह की ओर प्रस्थान किया। वहाँ आस-पास की पहाड़ियों में अनेक गुफाएँ थीं जिनमें अनेक वैखानस रहा करते थे। सिद्धार्थ ने अपने प्रथम आचार्य के रूप में अलाम कलाम नामक वैखानस का चयन किया; किन्तु वे उनके उपदेशों से सन्तुष्ट नहीं हो सके। उनका परित्याग कर उन्होंने उद्दक रामपुत्त नामक एक अन्य यति से आध्यात्मिक उपदेश की याचना की। अन्ततः उन्होंने योग-साधना का संकल्प किया। वे उरुविला के वन में चले गये जिसे आजकल बोधगया कहते हैं। वहाँ उन्होंने छह वर्षों तक कठोर तप तथा प्राणायाम की साधना की। उन्होंने आत्म-निग्रह के माध्यम से सर्वोच्च शान्ति की सम्प्राप्ति का निश्चय किया। वे लगभग पूर्णतः निराहार रहने लगे; किन्तु इस विधि से भी उनको किसी प्रकार की प्रगति का अनुभव नहीं हो सका। वे कंकाल मात्र एवं क्षीण-शक्ति हो कर रह गये।
उसी समय कुछ नर्तकियाँ उस मार्ग से वीणा की धुन पर सोल्लास गाती हुई जा रही थीं। बुद्ध को उनके गीतों से वास्तविक आश्वासन प्राप्त हुआ। उन नर्तकियों के लिए उनके गीतों में कोई गहन अर्थवत्ता नहीं निहित थी; किन्तु बुद्ध के लिए यह एक गूढ़ आध्यात्मिक सन्देश था जिसने उन्हें उनके नैराश्य से मुक्त कर उनको शक्ति तथा साहस से अनुप्राणित कर दिया।
इस गीत का अर्थ था :
"सितार के सुर-ताल का अनुगमन करने वाला नृत्य सुखद होता है। हम सितार के तारों को न अधिक ऊर्ध्वस्तरीय करें, न अधिक निम्नस्तरीय। इसी स्थिति में हम दर्शकों के हृदय को तृप्त कर सकेंगी। अधिक कसा तार खण्डित हो कर संगीत को निष्प्राण कर देता है। अधिक ढीला तार भी मूक हो कर मृतप्राय हो जाता है। हम अपने सितार को न अधिक मन्द स्वर प्रदान करें, न अधिक तीव्र।"
सम्बोधि
एक बार बुद्ध योग-साधना में विफल रहने के कारण विषण्ण मनःस्थिति में थे। वे पूर्णतः किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुके थे। एक ग्रामीण बाला उनके अवसादग्रस्त मुख-मण्डल को देख कर उनके समीप गयी और बोली- “श्रद्धेय महोदय, क्या मैं आपके लिए कुछ भोजन का प्रबन्ध करूँ ? ऐसा प्रतीत होता है कि आप बहुत अधिक भूखे हैं।" गौतम ने उसे देख कर कहा- "मेरी प्रिय बहन, तुम्हारा नाम क्या है?" बाला ने उत्तर दिया - "आदरणीय महोदय, मेरा नाम सुजाता है।" गौतम ने कहा- "सुजाता, मैं बहुत भूखा हूँ। क्या तुम वास्तव में मेरी क्षुधा को शान्त कर सकती हो?"
अबोध सुजाता गौतम के मन्तव्य को नहीं समझ सकी। उनकी क्षुधा आध्यात्मिक थी। उनके अन्तर में सर्वोच्च शान्ति तथा आत्म-साक्षात्कार की पिपासा जाग्रत थी। वे आध्यात्मिक आहार की खोज में थे। सुजाता ने उनके समक्ष भोजन रख कर उनसे उसे ग्रहण करने का आग्रह किया। गौतम ने मुस्कराते हुए कहा- "प्रिय सुजाता, मैं तुम्हारे दयालु तथा सद्भावपूर्ण स्वभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। क्या इस भोजन से मेरी क्षुधा शान्त हो सकेगी?" सुजाता ने उत्तर दिया- "हाँ महोदय, इससे आपकी क्षुधा शान्त हो जायेगी। कृपया, अब आप इसे ग्रहण कीजिए।" गौतम एक विशाल अश्वत्थ वृक्ष के नीचे भोजन करने लगे। तबसे लोग उस वृक्ष को 'बोधि वृक्ष' कहने लगे। गौतम ब्राह्ममुहूर्त से सान्ध्य प्रहर तक उग्र निश्चय तथा दृढ़ संकल्प के साथ ध्यान-मुद्रा में बैठे रहे। "भले ही मैं मृत्यु को प्राप्त हो जाऊँ, भले ही मेरा शरीर नष्ट हो जाये और भले ही मेरा शरीर शुष्क चर्म हो जाये, जब तक मुझे सम्बोधि की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब तक मैं इस आसन का परित्याग नहीं करूँगा।" रात्रि में वे उस वृक्ष के नीचे समाधि में प्रविष्ट हो गये। माया अर्थात् मार ने उन्हें कई प्रकार के प्रलोभन दिये; किन्तु उनसे वे अप्रभावित रहे। उनके समक्ष वे अजेय बने रहे। उन्हें दीप्तिमयी विजयश्री प्राप्त हुई। उन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया। उनका मुख-मण्डल दिव्य ज्योति से दीप्तिमान् हो उठा और वे आसन से उठ कर उस बोधि वृक्ष के नीचे आनन्द के उन्मेष में निरन्तर सात दिनों तक नृत्य करते रहे। इसके पश्चात् ही उनकी चेतना सामान्य हो सकी। उनका हृदय दया और करुणा से आप्लावित हो उठा। उन्होंने अपनी उपलब्धियों में सबको भागीदार बनाना चाहा। उन्होंने सम्पूर्ण देश की यात्रा की और स्थान-स्थान पर लोगों को अपने सिद्धान्तों तथा अपनी धार्मिक मान्यताओं का उपदेश दिया। वे एक परित्राता, मुक्तिदाता तथा उद्धारक हो गये।
बुद्ध अपने समाधिजन्य अनुभवों का विवरण इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं- "इस प्रकार मैं देखता हूँ कि मेरा मन जागतिक सत्ता, ऐन्द्रिय सुखों, अपसिद्धान्तों तथा अज्ञान के कालुष्य से मुक्त हो गया है।"
मुक्तावस्था में उन्हें यह ज्ञान हुआ- "मैं मुक्त हूँ, पुनर्जन्म के दीप का निर्वाण हो चुका है, धार्मिक परिभ्रमण की परिसमाप्ति हो गयी है, जो कुछ करणीय था उसे किया जा चुका है और अब यह वर्तमान अस्तित्व अनावश्यक हो गया है। मैंने सभी शत्रुओं को विजित कर लिया है; मैं सर्वज्ञ हूँ; मैं पूर्णतः निष्कलंक हूँ; मैं प्रत्येक वस्तु का परित्याग कर चुका हूँ और तृष्णा के निरसन के माध्यम से मुझे निर्वाण प्राप्त हो चुका है। जब मैं स्वयं ज्ञानी हूँ तब अपना आचार्य किसे कहूँ? मेरा आचार्य कोई नहीं है। मेरे समकक्ष कोई नहीं है। इस संसार में मैं पूतात्मा तथा सर्वश्रेष्ठ आचार्य हूँ। एकमात्र मैं ही बुद्ध हूँ। वासनाओं के परिशमन के फल-स्वरूप मुझे शान्ति तथा निर्वाण की सम्प्राप्ति हो चुकी है। धर्म के साम्राज्य की स्थापना के लिए मैं वाराणसी जा रहा हूँ। इस संसार के अन्धकार में मैं अमरत्व की दुन्दुभि बजाऊँगा।"
इसके पश्चात् भगवान् बुद्ध वाराणसी चले गये। एक दिन सन्ध्या-काल में वे मृगदाव में प्रविष्ट हुए। उन्होंने वहाँ प्रवचन किया और अपने सिद्धान्तों की शिक्षा दी। उन्होंने स्त्री-पुरुष, उच्च निम्न, अज्ञ-विज्ञ- इन सभी को बिना किसी भेद-भाव के अपने उपदेशामृत से उपकृत किया। उनके प्रथम शिष्यों में सभी सामान्य वर्ग के थे जिनमें दो स्त्रियाँ भी थीं। अपने पूर्व-धर्म का परित्याग कर उनके धर्म में दीक्षित होने वाला प्रथम व्यक्ति यश नामक समृद्ध युवक था। उसके अतिरिक्त उसके माता-पिता तथा उसकी पत्नी ने भी उनसे दीक्षा ग्रहण की। ये सभी उनके सामान्य शिष्य थे।
बुद्ध ने अपने उन पूर्व-शिष्यों से शास्त्रार्थ किया और उनके समक्ष अपने तर्क प्रस्तुत किये जिन्होंने उरुविला के वन में उनका परित्याग कर दिया था। उन्होंने अपनी प्रभावोत्पादक युक्तियों एवं अन्वेषी बुद्धि से उन्हें अपने निकटस्थ कर लिया। उन्होंने सर्वप्रथम कोन्दान्नो (Kondanno) नामक एक वृद्ध यति को दीक्षित किया। अन्य लोगों ने भी भगवान् बुद्ध के सिद्धान्तों को स्वीकार किया। बुद्ध ने इस प्रकार साठ शिष्यों को दीक्षित-प्रशिक्षित कर अपने सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार करने के लिए विभिन्न दिशाओं में भेज दिया।
सिद्धान्त का सार
बुद्ध के अनुयायियों की संख्या में क्रमशः वृद्धि होती गयी। सामन्त, ब्राह्मण और अनेक समृद्ध व्यक्ति उनके शिष्य हो गये। बुद्ध ने जाति-पाँति की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। निर्धन तथा जाति-बहिष्कृत व्यक्ति भी उनके संघ में सम्मिलित कर लिये गये। जो लोग उनके संघ के पूर्ण सदस्य बनना चाहते थे, उन्हें भिक्षु बनना और कठोर आचारशास्त्रीय नियमों का पालन करना पड़ता था। सामान्य जन भी उनके शिष्य थे जिन्हें भिक्षुओं की आवश्यकताओं की पूर्ति करनी पड़ती थी।
उरुविला के वन में तीन भाई रहते थे जो प्रख्यात सन्त तथा दार्शनिक थे। उनके अनेक शिष्य थे जो अत्यन्त विद्वान् थे। राजा-महाराजा उनका आदर करते थे। बुद्ध उरुविला जा कर इन तीनों सन्तों के समीप रहे। उन्होंने इन तीनों सन्तों को अपने मत में दीक्षित कर लिया। इस घटना से समस्त देश चमत्कृत रह गया।
भगवान् बुद्ध अपने शिष्यों के साथ मगध की राजधानी राजगृह गये। वहाँ सम्राट् विम्बसार एक लाख बीस हजार ब्राह्मणों तथा गृहस्थों के साथ बुद्ध तथा उनके अनुयायियों से श्रद्धापूर्वक मिले। उन्होंने भगवान् बुद्ध का प्रवचन सुना और वे तत्क्षण उनके शिष्य हो गये। ब्राह्मणों तथा गृहस्थों में एक लाख दश हजार भगवान् बुद्ध के संघ के पूर्णकालिक सदस्य बन गये। शेष दश हजार सामान्य अनुयायी बने। बुद्ध के अनुयायी जब दैनिक भिक्षाटन के लिए जाते थे, तब उन्हें घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। विम्बसार ने अपना वेणुवन बुद्ध को उपहार स्वरूप दे दिया। यह वेणुवन राजधानी के निकटस्थ राजकीय क्रीड़ा-उद्यान था। भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों के साथ वहाँ वर्षा की अनेक ऋतुएँ व्यतीत की थीं।
प्रत्येक बौद्ध भिक्षु को पीत वस्त्र धारण करते समय हिंसा से विरत रहने का व्रत-ग्रहण करना पड़ता था। अतः उसके लिए वर्षा ऋतु में किसी एक ही स्थान पर रहना आवश्यक हो जाता था। आज भी शांकर सम्प्रदाय के परमहंस संन्यासी वर्षा ऋतु में किसी एक ही स्थान पर चातुर्मास व्यतीत करते हैं। इन दिनों सूर्य की उष्णता तथा ऋतु की आर्द्रता के संयुक्त योग-दान के कारण असंख्य कृमि-कीट उत्पन्न हो जाते हैं जिनकी हत्या किये बिना परिभ्रमण असम्भव हो जाता है।
भगवान् बुद्ध को अपने पिता का एक सन्देश प्राप्त हुआ जिसमें उनसे अपने जन्म-स्थान में आगमन का अनुरोध किया गया था जिससे उनके पिता अपनी मृत्यु के पूर्व उन्हें एक बार देख लें। बुद्ध उनके अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर कपिलवस्तु की ओर चल पड़े और नगर के बाहर वन में रुके। उनके पिता तथा सम्बन्धी उनको देखने आये; किन्तु वे भिक्षु गौतम को देख कर प्रसन्न नहीं हुए और कुछ ही क्षणों के पश्चात् वहाँ से लौट गये। उन्होंने उनकी तथा उनके अनुयायियों की भिक्षा की भी कोई व्यवस्था नहीं की। वे लोग सांसारिक प्राणी थे। बुद्ध ने नगर में द्वार-द्वार पर भिक्षाटन किया। यह समाचार उनके पिता तक पहुँचा। उन्होंने गौतम को भिक्षाटन से विरत करने का प्रयास किया; किन्तु गौतम ने कहा- "महाराज, मैं भिक्षु हूँ। द्वार-द्वार पर जा कर भिक्षा-ग्रहण करना मेरा कर्तव्य है। संघ के लिए यही करणीय है। इसमें आप बाधक क्यों बनते हैं? भिक्षान्न अत्यन्त पवित्र होता है।" उनके पिता ने गौतम की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। उनके हाथों से भिक्षा पात्र छीन कर वे उन्हें राजप्रासाद में ले गये। वहाँ उनके प्रति सभी ने अपनी श्रद्धा व्यक्त की; किन्तु उनकी पत्नी यशोधरा वहाँ नहीं गयी। उसने कहा- "यदि उनके लिए मेरा कुछ भी महत्त्व है, तो वे स्वयं मेरे पास आयेंगे।" वह विवेक, वैराग्य एवं अन्य सद्गुणों से सम्पन्न एक पतिव्रता नारी थी। जिस दिन वह पति-परित्यक्ता हुई थी, उसी दिन से उसने प्रसाधन तथा विलास के सभी साधनों का परित्याग कर दिया था। वह दिन में केवल एक बार ही सामान्य अन्न ग्रहण करती और चटाई पर सोती थी। वह एक कठोर तपोमय जीवन व्यतीत कर रही थी। गौतम यह सब सुन कर विचलित हो उठे। वे तत्काल उसे देखने चल पड़े। उसने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। वह उनके चरणों पर गिर कर रोने लगी। बुद्ध ने भिक्षुणियों के संघ की भी स्थापना की थी जिसकी प्रथम भिक्षुणी यशोधरा बनी।
यशोधरा ने वहाँ से जाते हुए बुद्ध की ओर वातायन से संकेत करके अपने पुत्र से कहा- "ओ राहुल, वह भिक्षु तुम्हारे पिता हैं। तुम उनके पास जा कर अपने जन्म-सिद्ध अधिकार की माँग करो। तुम उनसे निर्भीकतापूर्वक कहो कि तुम उनके पुत्र हो और वे तुम्हें तुम्हारी पैतृक सम्पत्ति प्रदान करें।" राहुल ने तत्क्षण उनके निकट जा कर कहा- "पिता जी, मुझे मेरी पैतृक सम्पत्ति दीजिए।" बुद्ध उस समय भोजन कर रहे थे। उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। पुत्र पिता से बार-बार पैतृक सम्पत्ति की माँग करता रहा। बुद्ध ने अपने एक शिष्य से कहा - "बोधि वृक्ष के नीचे मुझे जिस अमूल्य सम्पत्ति की प्राप्ति हुई थी, मैं इस बालक को उसका उत्तराधिकारी नियुक्त करता हूँ।" राहुल को भिक्षुओं के संघ में सम्मिलित कर लिया गया। जब बुद्ध के पिता को इसकी सूचना प्राप्त हुई, तब उन्हें घोर दुःख हुआ; क्योंकि पुत्र से वंचित होने के पश्चात् अब वे अपने पौत्र से भी वंचित हो गये थे।
बुद्ध के जीवन के साथ कुछ चमत्कार भी जुड़े थे। एक बार मायिक शक्ति से सम्पन्न एक हिंस्र सर्प बुद्ध के ऊपर अग्नि-वर्षा करने लगा। बुद्ध भी स्वयं को अग्नि-रूप में परिवर्तित कर उस सर्प पर अग्नि-वर्षा करने लगे। बुद्ध एक बार एक सरोवर से बाहर निकलना चाहते थे। उस अवसर पर एक वृक्ष ने अपनी एक शाखा को झुका कर उनकी सहायता की। एक बार उनके आदेश पर ईंधन के लिए प्रयुक्त पाँच सौ लकड़ियाँ स्वयं विखण्डित हो गयीं। उन्होंने पाँच सौ ऐसे पात्रों की संरचना कर दी जिनमें आग जल रही थी। ऐसा उन्होंने शीत से कम्पित जटिलों के लिए किया था। एक बार नदी में जब बाढ़ आयी थी, तब वे नदी के जल को निम्न स्तर पर ला कर उसे पार कर गये थे।
आनन्द जो बुद्ध के चचेरे भाई थे, उनके प्रारम्भिक शिष्यों में प्रमुख थे। वे बुद्ध के सर्वाधिक निष्ठावान् मित्र तथा शिष्य थे। बुद्ध के प्रति उनकी निष्ठा एक बाल-सुलभ विशिष्ट उत्साह से आप्लावित थी। वे उनके वैयक्तिक अनुवर्ती के रूप में मृत्युपर्यन्त उनकी सेवा में संलग्न रहे। वे एक लोकप्रिय व्यक्ति थे और उनका स्वभाव अत्यन्त मधुर था। बौद्धिक दृष्टि से उनकी सम्प्राप्ति नगण्य-सी थी; किन्तु उनका निष्कपट स्वभाव स्नेह से ओत-प्रोत था। देवदत्त आनन्द का भाई था। वह भी संघ का सदस्य था। वह बुद्ध का सर्वाधिक विरोधी था और उसने उन्हें अपदस्थ कर उनके उच्चासन को स्वयं ग्रहण करने के लिए अथक प्रयास किये थे। उपालि नामक एक नाई तथा अनिरुद्ध नामक एक ग्रामीण भी संघ के सदस्य थे। उपालि संघ का एक प्रख्यात तथा अग्रणी भिक्षु हो गया और अनिरुद्ध एक ऐसे दार्शनिक के रूप में प्रख्यात हुआ जिसका पाण्डित्य अगाध था।
अन्त
बुद्ध कोशल की राजधानी श्रावस्ती गये जहाँ एक समृद्ध श्रेष्ठी ने उनके आवास के लिए एक सुविस्तृत तथा मनोरम उपवन की व्यवस्था कर दी। बुद्ध ने अपनी अनेक वर्षा ऋतुएँ वहीं व्यतीत कीं और वहाँ कई महत्त्वपूर्ण प्रवचन किये। इस प्रकार बुद्ध पैंतालीस से भी अधिक वर्षों तक परिभ्रमण करते हुए अपने सिद्धान्तों का उपदेश देते रहे।
भोजन में कुछ दोष से उत्पन्न एक रोग के कारण बुद्ध की मृत्यु हो गयी। वे कुन्दो (Cundo) नामक एक निष्ठावान् महिला द्वारा प्रदत्त शूकरमद्व के भक्षण से अस्वस्थ हो गये। भाष्यकार इस शब्द का निर्वचन शूकर के मांस के रूप में करते हैं; किन्तु सुभद्र इसे वह खाद्य पदार्थ समझते हैं जो शूकर के लिए रुचिकर होता है। वे इसे कवक (Trufle) की कोटि का कोई पदार्थ मानते हैं। डा. होय के अनुसार यह शूकर-मांस न हो कर शकरकन्द है जो अधिकतर वन में पाया जाता है और जो अत्यधिक सुस्वादु तथा रुचिकर होता है। हिन्दू इसे फलाहार मानते हैं। इसे व्रत के दिन ग्रहण किया जाता है।
बुद्ध ने आनन्द से कहा- “आनन्द ! जाओ और मेरे लिए शाल के दो वृक्षों के बीच एक ऐसी शय्या की व्यवस्था करो जिस पर मेरा शिरोभाग उत्तर की ओर रहे। मैं श्रान्त-क्लान्त हूँ और अब मैं सोना चाहूँगा।" इसके पश्चात् एक आश्चर्यजनक दृश्य उपस्थित हो गया। दोनों शालवृक्ष पूर्णतः कुसुमित हो उठे जब कि ऋतु इसके अनुकूल नहीं थी। सुमन-राशि बुद्ध के शरीर पर झरने लगी। यह उनके प्रति उनकी श्रद्धा का प्रतीक था। बुद्ध के शरीर पर दिव्य पारिजात वृक्ष के सुमनों तथा चन्दन-चूर्ण का वर्षण होने लगा। यह उनके प्रति उनके सम्मान का प्रतीक था।
भगवान् बुद्ध ने कहा- "प्रिय भिक्षुओ, मेरे समीप आओ। जो संयोजित है, उसका विघटन अनिवार्य है। परिश्रम के माध्यम से तुम लोग समृद्धि को प्राप्त करो और अपने निर्वाण के लिए प्रयत्नशील रहो!"
कुछ घटनाएँ
गौतम में बाल्यावस्था से ही अहिंसा की प्रवृत्ति विद्यमान थी। एक दिन उनके भाई देवदत्त ने एक पक्षी को शर-विद्ध कर दिया और आहत पक्षी धरती पर आ गिरा। गौतम ने दौड़ कर उसे उठा लिया और उसे अपने चचेरे भाई देवदत्त को देना अस्वीकार कर दिया। इस विवाद को राजगुरु के समक्ष प्रस्तुत किया गया जिन्होंने अन्ततः अपना निर्णय गौतम के पक्ष में दिया। देवदत्त इस निर्णय से अत्यधिक अपमानित हुआ।
अपने परिभ्रमण के समय एक दिन गौतम ने भेड़-बकरियों के एक यूथ को एक संकीर्ण उपत्यका से हो कर जाते हुए देखा। यूथ के पशुओं को पथ-भ्रान्त न होने देने के लिए चरवाहा प्रायः उनके आगे-पीछे चिल्लाते हुए दौड़ा करता था। पशुओं के उस बृहद् समूह में एक आहत मेमना भी था जो सबसे पीछे सायास मन्द गति से चला जा रहा था। चरवाहे के दण्ड प्रहार से वह पंगु हो गया था। उसे देख कर गौतम का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने उसे बाँहों में भर लिया और उसे ले चलते हुए कहा- "ओलिम्पस की किसी शिला या किसी एकान्त गुहा में बैठ कर मानवता के क्लेश पर चिन्तन करने से किसी निरीह प्राणी का कष्ट निवारण श्रेयस्कर है।" इसके पश्चात् उन्होंने चरवाहे से पूछा- "मित्र, तुम पशुओं के इस यूथ को लिये हुए इतनी शीघ्रता के साथ कहाँ जा रहे हो?" चरवाहे ने कहा- "मैं राजप्रासाद जा रहा हूँ। आज की रात महाराजा देवताओं के अनुग्रह की प्राप्ति के लिए एक यज्ञानुष्ठान का प्रारम्भ करने वाले हैं। मुझे उस यज्ञ में बलि के लिए भेड़-बकरियाँ लाने के लिए भेजा गया है।" यह सुन कर उस मेमने को लिये हुए गौतम ने चरवाहे का अनुगमन किया। जब वे नगर में पहुँचे, तब सर्वसाधारण इस बात से अवगत हो गया कि एक यति राजा के आदेशानुसार यज्ञ के लिए बलि-पशु ला रहा है। उन्हें देखने के लिए लोग पथ पर एकत्र हो गये। उन्होंने पीत वस्त्र धारण किया था तथा उनकी आकृति भव्य तथा सौम्य थी। उनकी अभिजातीय देह-यष्टि तथा सम्मोहक मुख-मुद्रा से सभी आश्चर्य चकित रह गये। यज्ञ में उस पूतात्मा के आगमन की सूचना राजा को दे दी गयी। जब यज्ञानुष्ठान का प्रारम्भ हुआ, तब राजा की उपस्थिति में देवताओं को बलि प्रदान करने के लिए एक बकरा लाया गया। बकरे के पैर बँधे हुए थे और राजपुरोहित हाथ में एक लम्बी छुरी लिये हुए उस मूक पशु के वध के लिए कटिबद्ध खड़ा था। उस निर्मम एवं दुःखान्त क्षण में जब उस निरीह पशु का प्राणान्त लगभग निश्चित था, गौतम ने आगे बढ़ कर कहा- "हे राजा, इस क्रूर कर्म को रोक दीजिए।" इतना कहने के पश्चात् उन्होंने आगे बढ़ कर उस बलि-पशु को मुक्त कर दिया। उन्होंने कहा- "जिस प्रकार मनुष्य-जाति अपने जीवन की सुरक्षा चाहती है, उसी प्रकार प्रत्येक प्राणी को अपना जीवन प्रिय है।" तब पश्चात्ताप की भावना से अनुतप्त पापी की भाँति पुरोहित ने छुरी फेंक दी और दूसरे दिन राजा ने एक राजाज्ञा द्वारा देश-भर में इस आशय का आदेश पारित कर दिया कि अब भविष्य में यज्ञ नहीं होंगे एवं लोगों को पशु-पक्षियों के प्रति दया का व्यवहार करना होगा।
* * * *
युवा नारी किसा गौतमी (Kisagotami) का विवाह एक सम्पन्न व्यक्ति के इकलौते पुत्र के साथ हुआ था और उनके एक पुत्र था। दो वर्ष की अल्यापु में इस पुत्र का देहान्त हो गया। अपने पुत्र के प्रति किसा गौतमी की उत्कट अनुरक्ति थी। उसने उसे अपने वक्षस्थल से लगा लिया और उसको स्वयं से विलग करना अस्वीकार कर दिया। वह अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के द्वार-द्वार पर जा कर उस औषधि की याचना करती रही जिससे उसका पुत्र पुनर्जीवित हो सके। एक बौद्ध भिक्षु ने उससे कहा- "मेरे पास ऐसी कोई औषधि नहीं है; किन्तु तुम भगवान् बुद्ध के पास जाओ। वे तुम्हें कोई रामबाण औषधि अवश्य प्रदान करेंगे। वे प्रेम तथा दया के सागर हैं। तुम्हारा पुत्र पुनर्जीवित हो उठेगा। दुःखी होने की आवश्यकता नहीं।" वह शीघ्र ही बुद्ध के पास जा कर बोली- "हे भन्ते, क्या आप इस बालक को कोई औषधि दे सकते हैं?" बुद्ध ने कहा- "हाँ, मैं तुम्हें एक अत्यन्त उपयोगी औषधि दूँगा। तुम किसी ऐसे घर से सरसों के बीज ले आओ जिसमें किसी बालक-बालिका, किसी पति, किसी पत्नी, किसी पिता, किसी माता या किसी भृत्य की मृत्यु न हुई हो।" उसने कहा - "बहुत अच्छा, महोदय ! मैं इसे शीघ्र ही ला दूँगी।"
अपने पुत्र को वक्षस्थल में लगाये उसने द्वार-द्वार पर जा कर सरसों के बीज की याचना की। घर के लोगों ने कहा- "लो, यह रहे सरसों के बीज।" किसा गौतमी ने पूछा- "क्या आपके घर में किसी पुत्र, किसी पति, किसी पत्नी, किसी पिता, किसी माता या किसी भृत्य की मृत्यु हुई है?" उन्होंने उत्तर दिया- "हे देवी, तुम एक विचित्र प्रश्न पूछ रही हो। हमारे घर में कई लोगों की मृत्यु हो चुकी है।" किसा गौतमी ने एक दूसरे घर में जा कर ऐसे ही प्रश्न किये। गृहपति ने कहा- "इस घर में मेरे ज्येष्ठ पुत्र तथा मेरी पत्नी की मृत्यु हुई थी।" वह तीसरे घर में गयी। वहाँ के लोगों ने उससे कहा- "इस घर में हमारे माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है।" तब वह एक अन्य घर में गयी। वहाँ गृह-स्वामिनी ने कहा- "गत वर्ष मेरे पति की मृत्यु हो गयी।" अन्ततः किसा गौतमी कोई भी ऐसा घर नहीं पा सकी जहाँ किसी की भी मृत्यु न हुई हो। अब उसके मन में विवेक तथा वैराग्य जाग्रत हो गये। अपने पुत्र का अन्तिम संस्कार कर वह इस संसार में जीवन और मृत्यु की समस्या पर गम्भीरतापूर्वक मनन करने लगी।
तत्पश्चात् किसा गौतमी ने बुद्ध के निकट जा कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। बुद्ध ने उससे कहा- "हे प्रिय बालिके, क्या तुम सरसों के बीज ले आयी हो?" किसा गौतमी ने कहा- "मुझे ऐसा कोई घर नहीं मिला जहाँ किसी की मृत्यु न हुई हो।" बुद्ध ने कहा- "संसार के सभी पदार्थ नश्वर तथा क्षणिक हैं। यह संसार दुःख, अशान्ति तथा क्लेश से पूर्ण है। मनुष्य जन्म, मृत्यु, रोग, जरा तथा क्लेश से अशान्त रहता है। हमें अनुभव से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। हमें उन वस्तुओं की सम्प्राप्ति की आशा नहीं करनी चाहिए जिनका कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं है। इस तृष्णा से हमें अनावश्यक दुःख तथा कष्ट होते हैं। मनुष्य को निर्वाण प्राप्त करना चाहिए। इसी से हमारे दुःखों का अन्त सम्भव है और तभी हमें अमरत्व तथा शाश्वत शान्ति की सम्प्राप्ति हो सकेगी।" इसके पश्चात् किसा गौतमी संघ में प्रविष्ट हो कर भिक्षुणी हो गयी।
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एक बार बुद्ध हाथ में भिक्षा पात्र लिये एक समृद्ध ब्राह्मण के घर गये। ब्राह्मण अत्यन्त क्रोधित हो कर बोला- "हे भिक्षु, तुम एक परिव्राजक का अकर्मण्य जीवन व्यतीत करते हुए भिक्षाटन क्यों कर रहे हो? क्या यह कर्म अकीर्तिकर नहीं है? तुम्हारा शरीर सुगठित है। तुम कोई व्यवसाय कर सकते हो। मैं कृषि-कर्म में संलग्न हूँ और अपना पसीना बहा कर जीविकोपार्जन करता हूँ। मेरा जीवन एक श्रमिक का जीवन है। तुम्हारे लिए यह श्रेयस्कर होगा कि तुम भी हल चला कर और खेत में बीज-वपन कर कृषि-कर्म में संलग्न हो जाओ। उदर-पोषण के लिए इससे तुम्हें प्रचुर मात्रा में अन्न प्राप्त होगा।" बुद्ध ने कहा- "हे ब्राह्मण, मैं भी हल चला कर और खेत में बीज-वपन कर अन्नोत्पादन करता हूँ।" ब्राह्मण ने कहा- "तुम स्वयं को कृषक कहते हो; किन्तु मैं तुममें कृषक का कोई लक्षण नहीं देख रहा हूँ।" तब बुद्ध ने कहा- "हे ब्राह्मण, मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो। मैं श्रद्धा के बीज बोता हूँ। मेरे शुभ कर्म वर्षा है जिससे खेत का अभिसिंचन होता है। विवेक तथा वैराग्य मेरे हल के अंग, धर्म-परायणता इसकी मूठ, ध्यान अंकुश तथा शम-दम-मानसिक शान्ति एवं इन्द्रिय-निग्रह- बैल हैं। इस प्रकार मैं अपनी मनोभूमि पर हल चला कर विचिकित्सा, भ्रम, भय, जन्म तथा मृत्यु की अनावश्यक तृण-राशि का निरसन करता हूँ। इससे जिस शस्य की मुझे सम्प्राप्ति होती है, वह है निर्वाण का अमर फल। इस प्रकार के कृषि-कर्म से सभी दुःखों का अन्त हो जाता है।" बुद्ध के इस उपदेश के परिणाम-स्वरूप उस समृद्ध उद्धत ब्राह्मण को ज्ञान हो गया और वह उनके चरणों पर विनत हो कर उनका सामान्य अनुयायी बन गया।
बुद्ध के उपदेश
भगवान् बुद्ध अपने उपदेश में कहा करते थे- "हमें दुःख के कारण तथा दुःख-निरोध-मार्ग की खोज करनी चाहिए। विषयोपभोग के प्रति तृष्णा तथा सांसारिकता के प्रति आसक्ति दुःख का कारण है। यदि हम तृष्णा का उन्मूलन कर दें, तो दुःखों का अन्त हो जायेगा और हमें शाश्वत शान्ति तथा निर्वाण में निहित आनन्द की सम्प्राप्ति हो जायेगी। सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीवन, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति तथा सम्यक् समाधि - इस अष्टांगिक मार्ग के अनुसरण से हम दुःखों से मुक्त हो जायेंगे। हे भिक्षुओ, यही है वह मध्यम मार्ग जिसका बोध तथागत को पूर्णरूपेण हो चुका है। इससे अन्तर्दृष्टि तथा ज्ञान की उत्पत्ति होती है जिससे हम शान्ति, लोकोत्तर ज्ञान, पूर्ण सम्बोधि तथा निर्वाण की ओर उन्मुख होते हैं।
"हे भिक्षुओ, दुःख का आर्य सत्य वस्तुतः यही है। जन्म, जरा, रोग, मृत्यु, अप्रिय पदार्थों से वियोग दुःखमय है। इच्छित पदार्थों से वियोग दुःखमय है। इच्छित पदार्थों की अनुपलब्धि भी दुःखमय है। संक्षेप में जागतिक सत्ता के प्रति आसक्ति के पाँचों स्कन्ध दुःखमय हैं। रूप, संज्ञा, वेदना, संस्कार तथा विज्ञान यही पंच-स्कन्ध हैं।
"हे भिक्षुओ, दुःख के कारण का सत्य यही है। यह वह तृष्णा है जो मनुष्य को ऐहिक सुख तथा व्यसनों से लिप्त सांसारिकता की ओर पुनः-पुनः उत्प्रेरित किया करती है। यह उसे वैषयिक सुख तथा जीवन के प्रति सहज आसक्ति से ग्रस्त कर इतस्ततः सुख की खोज किया करती है। हे भिक्षुओ, यह दुःख-निरोध का आर्य सत्य है जो तृष्णा के पूर्ण विराम, इसके परित्याग, इसके आत्म-समर्पण, इसके प्रति अनासक्ति तथा इससे मुक्ति का पर्याय है। यह आर्य सत्य हमें दुःखों के प्रहाण की ओर अभिप्रेरित करता है। दुःख-निरोध नामक यह आर्य सत्य निश्चित रूप से अष्टांगिक मार्ग है जिसमें सम्यक् परामर्श आदि निहित हैं।"
महावीर का जन्म ५९९ ई.पू. में हुआ था। वे बहत्तर वर्षों तक जीवित रहे। ५६९ ई.पू. में उन्होंने गृह-त्याग किया। उन्होंने ५५७ ई.पू. में सर्वज्ञता प्राप्त की तथा ५२७ ई.पू. में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। वे अन्तिम तीर्थंकर थे।
महावीर का जीवन सत्यवादिता, आर्जव तथा पवित्रता से ओत-प्रोत था। उनमें ये गुण आत्यन्तिक रूप में विद्यमान थे। वे आजीवन अकिंचन बन कर रहे।
महारानी त्रिशला तथा कुण्डलपुर के महाराजा सिद्धार्थ उनके माता-पिता थे। त्रिशला को प्रियकर्णी के नाम से भी जाना जाता है। 'महा' का अर्थ महान् तथा 'वीर' का अर्थ उदात्त नायक होता है। तीर्थ का शाब्दिक अर्थ होता है घाट जो पार उतरने का साधन है। इस शब्द में निहित लाक्षणिकता के अनुसार इसका तात्पर्य पथ-प्रदर्शक या उस दर्शन से है जो किसी को जन्म-मरण के आवर्तन के महोदधि को पार करने की क्षमता प्रदान करता है। 'कर' का अर्थ कर्ता होता है। 'तीर्थ' तथा 'कर' इन दोनों शब्दों का समवेत अर्थ पवित्र जैन अर्हत होता है।
महावीर जैन-धर्म के संस्थापक नहीं थे। उन्होंने जैन सिद्धान्तों को कुछ संशोधनों के साथ व्यवस्थित-भर किया था। वे इस धर्म के संस्थापक होने की अपेक्षा सुधारक अधिक थे। जैन-तत्त्व-शास्त्र के अनुसार काल चक्रों में विभाजित है। यह आधिकारिक रूप से कहा जाता है कि प्रत्येक अर्ध चक्र में दीर्घ अन्तरालों के पश्चात् चौबीस तीर्थंकर जैन-सिद्धान्तों की व्याख्या के लिए एक नवीन दृष्टिकोण का प्रयोग करते हैं। महावीर चौबीसवें तीर्थंकर थे और अन्य तीर्थंकरों की भाँति वे भी सर्वज्ञ थे।
महावीर को वर्द्धमान (निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होने वाला) तथा सन्मति के नामों से भी अभिहित किया जाता था। आठ वर्ष की अल्पायु से ही वे अहिंसादि द्वादश व्रतों का पालन करने लगे थे। वे अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हुए उनकी सेवा श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक किया करते थे। वे एक कुशल राजनयिक थे। वे आजीवन अविवाहित रहे।
आत्म-चिन्तन में निमग्न महावीर इस सत्य से परिचित हो गये थे कि सांसारिक सुख क्षणिक हैं और इनसे कर्म का बन्धन सुदृढ़ होता है। वे जानते थे कि संन्यास ही शाश्वत आनन्द की सम्प्राप्ति का साधन है।
अल्पायु में ही महावीर के स्वभाव में सद्गुणों तथा सदाचार का समावेश हो चुका था जिसे देख कर लोग आश्चर्य चकित रह जाते थे। ध्यान में उनकी अत्यधिक रुचि थी और वे संगीत तथा साहित्य से भी सुपरिचित थे। उनके जीवन के तीस वर्ष इसी प्रकार व्यतीत हुए।
वर्द्धमान ने अतीन्द्रिय दृष्टि से देखा कि वे असंख्य जन्म ग्रहण कर चुके हैं। उन्होंने सोचा - 'कितने जन्म व्यर्थ ही बीत गये। मैं स्पष्टतः देख रहा हूँ कि आत्मा कर्म से मूलतः पृथक् है। मैंने अपने जीवन के तीस वर्ष व्यर्थ ही नष्ट कर दिये। सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति के लिए मैंने संसार का परित्याग और तप नहीं किया। सभी दुःखों के मूल में विद्यमान आसक्ति का भी निराकरण अभी तक नहीं हो पाया है।'
राजकुमार वर्द्धमान पश्चात्ताप की अग्नि में जलने लगे। उन्होंने सांसारिकता के परित्याग का निश्चय कर लिया। वे अपने माता-पिता, मित्रों तथा सम्बन्धियों के प्रति आसक्ति से विरत हो गये। उन्होंने द्वादश अनुप्रेक्षाओं अर्थात् जैन-धर्म-ग्रन्थों में उल्लिखित गहन रूप से विचारणीय पदार्थों का चिन्तन किया :
१. समस्त सांसारिक वस्तुएँ अस्थायी हैं।
२. एकमात्र आत्मा ही अनन्य आश्रय है।
३. संसार अनादि तथा कुटिल है।
४. आत्मा का एकमात्र परिरक्षक स्वयं आत्मा ही है।
५. शरीर, मन इत्यादि मूलतः आत्मा से पृथक् हैं।
६. तत्त्वतः आत्मा शुद्ध तथा शरीरादि अशुद्ध हैं।
७. आत्मा के बन्धन की सृष्टि इसमें कर्मास्रव के प्रवेश से होती है।
८. प्रत्येक व्यक्ति के लिए इस आस्रव का प्रहाण आवश्यक है।
९. कर्म के नितान्त क्षय के उपरान्त ही कैवल्य की प्राप्ति होती है।
१०. केवली आकाश के शीर्ष स्थान पर निवास करते हैं।
११. संसार में मनुष्य-योनि में जन्म-ग्रहण एवं आत्मा के स्वरूप का ध्यान महानतम सौभाग्य है।
१२. सर्वज्ञ द्वारा वर्णित त्रिरत्न ही एकमात्र नैतिकता है।
महावीर ने इन द्वादश अनुपेक्षाओं पर विचार करने के पश्चात् अन्ततोगत्वा गृह-त्याग का दृढ़ निश्चय कर लिया।
महावीर की माता ने कहा- "प्रिय पुत्र, तपस्वी-जीवन की कठोरता तुम्हारे लिए असहनीय होगी। अभी उसके लिए बहुत समय है। राज्य के प्रशासन में तुम्हें अपने पिता को सहयोग प्रदान करना चाहिए। कुछ वर्षों के बाद भी तुम अर्हत हो सकते हो।"
महावीर ने कहा- "श्रद्धेय माता, संसार के समस्त पदार्थ पानी के
बुलबुले की भाँति क्षणभंगुर हैं। जो रोग, दुःख, क्लेश तथा मृत्यु का आश्रय-स्थान है, उस संसार में किसी के लिए सुख की सम्प्राप्ति कैसे सम्भव है? मुझे इस संसार का परित्याग करना ही होगा।"
महावीर ने अपनी सारी सम्पत्ति स्वयं अपने ही हाथों से निर्धनों में वितरित कर दी। वे वन में चले गये और जो वस्त्र उन्होंने धारण किये थे, उनका भी परित्याग कर वे पूर्णतः दिगम्बर हो गये। उत्तराभिमुख हो कर उन्होंने कहा- "मैं सिद्धों को प्रणाम करता हूँ।" अपने शिर से केश के पाँच गुच्छों को स्वयं विलग कर वे अर्हत हो गये।
महावीर ने कठोर तप किया। उन्होंने बहुत दिनों तक उपवास किया। वे आत्मा के विशुद्ध स्वरूप का ध्यान करते रहे।
दिव्य शक्तियों ने महावीर की परीक्षा ली। एक बार रमणीय स्त्री-समुदाय ने उन्हें घेर लिया; किन्तु वे अडिग अविचलित बने रहे। उन्हें सर्वज्ञता की सिद्धि प्राप्त हुई। सर्वज्ञ होने के पश्चात् वे तीस वर्षों तक शान्ति के सन्देश का प्रचार-प्रसार करते रहे। उन्होंने मगध, मिथिला आदि राज्यों का भ्रमण किया जहाँ अनेक राजा उनके शिष्य हो गये।
कन्फ्यूशियस का जन्म ५५१ ई.पू. में लू नामक एक सामन्ती राज्य में हुआ था जो आजकल चीन के उत्तर-पूर्वी समुद्रतटीय प्रान्त शाण्टुंग का एक भाग है। चीनी भाषा में कन्फ्यूशियस का नाम कुंग फू-त्जू है जिसका अर्थ है राजनेता-दार्शनिक कुंग। चीन में सर्वप्रथम प्रविष्ट होने वाले यूरोपीय विद्वानों को इस नाम का उच्चारण श्रम-साध्य प्रतीत हुआ; अतः वे इसे लैटिन स्वरूप प्रदान कर कन्फ्यूशियस कहने लगे।
कन्फ्यूशियसवाद, ताओवाद एवं बौद्ध - चीन में ये तीन धर्म प्रचलित हैं। कन्फ्यूशियस तथा ताओ-धर्म के प्रवर्तक लाओत्से समकालीन थे। वे मनीषी तथा दार्शनिक थे। उनको उद्धारक या मुक्तिदाता नहीं समझा जाता। लाओत्से कन्फ्यूशियस से तिरपन वर्ष बड़े थे। उनके प्रथम पारस्परिक साक्षात्कार के समय लाओत्से की आयु तिरासी वर्ष थी जो कन्फ्यूशियस की आयु के दोगुने से भी अधिक थी। उनकी आयु के साथ-साथ उनके विचारों तथा उनकी आस्थाओं में भी बहुत अन्तर था। चीनी इतिहासकारों की कृपा से उन दोनों के वार्तालाप का सारांश हम लोगों को आज तक उपलब्ध होता आया है। सुकरात और बुद्ध भी कन्फ्यूशियस के समकालीन थे।
प्रचलित अभिप्राय के अनुसार कन्फ्यूशियस के मत को धर्म शब्द से अभिहित नहीं किया जा सकता। इसमें न किसी प्रकार के पौरोहित्य के दर्शन होते हैं और न किसी मठ-विशेष से सम्बन्धित आचार-शास्त्रीय विधि-विधान के। यह मत चीन में कन्फ्यूशियस के समय से बहुत पहले भी प्रचलित था। अपने एक लिपिबद्ध प्रवचन में अपने विषय में कन्फ्यूशियस ने संसार को कोई नया धर्म या कोई नयी आचार संहिता नहीं प्रदान की थी। उन्होंने पुरातन मत को ही एक नवीन संशोधित-संवर्धित संस्करण में लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने संसार को जो कुछ भी दिया, वह मूलभूत मानवीय नैतिकता या आचार-शास्त्र का ओजपूर्ण पुनर्कथन मात्र था। उन्होंने नैतिक संहिता को जो कलेवर प्रदान किया, वह अत्यन्त स्तुत्य था।
कुछ लोगों के अनुसार कन्फ्यूशियस द्वारा प्रतिपादित मत को वस्तुतः धर्म शब्द से अभिहित नहीं किया जा सकता; क्योंकि वे धर्म-गुरु या किसी धर्म के प्रचारक न हो कर दार्शनिक, नैतिकता के प्रति आस्थावान्, राजनयिक एवं शिक्षाविद् थे। इन लोगों के अनुसार कन्फ्यूशियस के विचारों तथा उपदेशों में धर्म से सम्बद्ध किसी दर्शन के स्थान पर आचार-शास्त्रीय एवं राजनैतिक तथा शिक्षा-शास्त्रीय सिद्धान्तों के ही दर्शन होते हैं।
कन्फ्यूशियस का जीवन-चरित्र
कन्फ्यूशियस का जन्म कुंग वंश में हुआ था। उनके पिता राज्य के एक उच्चाधिकारी थे। उनकी देह-यष्टि असामान्य थी और वे असाधारण शक्ति तथा वीरत्व के स्वामी थे।
कन्फ्यूशियस ने जब अपनी आयु के तृतीय वर्ष में प्रवेश किया, तब उनके पिता का देहान्त हो गया; किन्तु उनकी माता के स्नेहपूर्ण संरक्षण में उनके शरीर तथा उनकी बुद्धि का समुचित विकास होता गया। राष्ट्र का इतिहास, कविता, दर्शन तथा संगीत- उन दिनों प्रचलित शिक्षा के ये जितने भी सर्वोत्तम प्रारूप थे, वे सब उनकी माता की कृपा से उन्हें प्राप्त हुए।
कन्फ्यूशियस लोगांग गये जहाँ उन्होंने पुरातत्त्व-विज्ञान, संगीत, धर्म-विधि तथा धर्मानुष्ठान का अध्ययन किया। वहाँ वे लाओत्से से मिले। जब वे राजधानी से लू लौटे, तब वे राज्य के एक अग्रणी विद्वान् के रूप में प्रख्यात हो चुके थे।
कन्फ्यूशियस ने सुंग राज्य की एक लड़की से विवाह किया। उनके एक पुत्र तथा दो पुत्रियाँ थीं। उन्होंने अपने पुत्र का नाम पो यू रखा। हम कन्फ्यूशियस के दार्शनिक उपदेशों के सर्वाधिक पूर्ण परिकलन के लिए पो यू के पुत्र के ऋणी हैं।
सत्रहवर्षीय कन्फ्यूशियस की शिक्षा का समापन एक सामान्य ग्रामीण विद्यालय में हुआ। इसके पश्चात् लू राज्य में ची परिवार के धान्यागार के लेखा-संकलन के उत्तरदायित्व वहन के रूप में उन्हें जीविकोपार्जन का प्रथम साधन उपलब्ध हुआ। वे कठोर परिश्रमी तथा निष्कपट थे। वे अपना अतिरिक्त समय अध्ययन तथा गोचर भूमि के निकट खेलने के लिए एकत्र बालकों के प्रशिक्षण में व्यतीत करते थे। इस प्रकार उनके शिष्यों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती गयी जो उनके निष्ठावान् अनुयायी बन गये और जिन्होंने उनके उपदेशों को लिपिबद्ध रूप में सुरक्षित रख कर उनकी ख्याति को अमर बना दिया। उनके मन में अधिकार तथा अनुशासन के प्रति प्रचुर उत्साह तथा अतीत के प्रति आत्यन्तिक श्रद्धा थी। इस प्रकार उनका प्रबोधन धार्मिक न हो कर आचारगत हुआ करता था।
कन्फ्यूशियस दीर्घकाय थे। उनके कार्य व्यवस्थित रूप से सम्पन्न होते थे। उन्होंने जो कुछ भी किया, देश-काल के अनुरूप समुचित विधि से सम्पन्न किया।
कन्फ्यूशियस आचार-शास्त्र के शिक्षक थे; किन्तु उनका लक्ष्य राजनीतिक था। प्राचीन काल के नैतिक सिद्धान्तों के माध्यम से राज्य का सुधार करना उनका महान् उद्देश्य था।
'द एनालेक्ट्स' (The Analects) नामक पुस्तक में उनके उपदेशों का संकलन है। इस पुस्तक में वे स्वयं को अपने जीवन के विभिन्न चरणों में विभिन्न रूपों में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं- "पन्दरह वर्ष की आयु में मैं अध्ययन की ओर आकृष्ट था। तीस वर्ष की आयु में मैं दृढ़ निश्चयी तथा चालीस वर्ष की आयु में संशय तथा भ्रम से मुक्त हो गया। पचास वर्ष की आयु में मैं ईश्वरेच्छा से परिचित हुआ एवं मुझे स्वर्ग के आदेश का ज्ञान प्राप्त हुआ। जब मैं साठ वर्ष का हुआ, तब मेरे कान सत्य के प्रति ग्रहणशील हो गये। सत्तर वर्ष की आयु में मैं धर्म की सीमाओं का अतिक्रमण किये बिना अपने हृदय के अनुबोधन का अनुसरण कर सकता था।”
कन्फ्यूशियस को उनके राज्य में मन्त्री तथा मुख्य न्यायाधीश के उच्च पदों पर नियुक्त किया गया। ५०१ ई.पू. में, जब वे पचास वर्ष के थे, उनकी नियुक्ति तू जनपद के राज्यपाल के पद पर कर दी गयी। उनका प्रशासन अत्यन्त सफल रहा। पचास वर्ष की आयु में वे प्रधान मन्त्री हो गये।
प्रशासन में उन्होंने जो परिवर्तन किये, वे सर्वदा के लिए चमत्कारपूर्ण सिद्ध हुए। सड़कों पर गिरी किसी भी वस्तु को कोई नहीं उठाता था। लोगों में श्रद्धा तथा भक्ति थी और स्त्रियाँ पवित्र जीवन व्यतीत करती थीं।
कन्फ्यूशियस चीन की समस्त नैतिक आकांक्षाओं के जन-नायक एवं लोगों के लिए पूजनीय रहे।
कन्फ्यूशियस की आश्चर्यजनक उपलब्धियों के कारण उनके पड़ोसी ची के मार्विस के हृदय में भय तथा ईर्ष्या की भावना जाग्रत हो उठी। इसके परिणाम-स्वरूप उन्हें लू को छोड़ कर अन्यत्र जाना पड़ा। वे एक परिव्राजक के रूप में एक राज्य से दूसरे राज्य में घूमने लगे। उन्होंने सोचा कि उनके पूर्व-परिचित राजकुमारों में कोई उन्हें उनके राजनयिक सिद्धान्तों को व्यवहार में परिणत करने का अवसर प्रदान कर देगा; किन्तु उन्हें अपने कुछ निष्ठावान् अनुयायियों के साथ तेरह वर्षों के लिए बलपूर्वक निर्वासित कर दिया गया। इस अवधि में वे शिक्षण कार्य में संलग्न रहे। क्रमिक रूप से अनेक शिष्य उनके प्रति आकर्षित होते गये।
कन्फ्यूशियस को उनके अपने राज्य में प्रत्यागमन के लिए निमन्त्रित किया गया; किन्तु इसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। तिहत्तर वर्ष की आयु में उनका देहान्त हो गया।
कन्फ्यूशियस ने अपने देश के साहित्य तथा इतिहास का गहन अध्ययन किया था। इस तथ्य के प्रति उनकी दृढ़ आस्था थी कि केवल न्याय-प्रिय तथा धर्म-परायण प्रशासक ही राज्य की रक्षा करने और लोगों को सदाचारी बनाने में समर्थ हो सकते हैं। उनका आदर्श राजा जनक की भाँति प्रज्ञाशील प्रशासकों की प्रजाति की सृष्टि करना था। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे सुयोग्य प्रशासक की खोज में एक राज्य से दूसरे राज्य में परिव्रजन करते रहे।
कन्फ्यूशियस के शिष्य उनको पूर्व-निश्चित निष्कर्षों, निरंकुश संकल्पों, हठधर्मिता तथा अहंभाव से सर्वथा मुक्त समझते थे। शिष्यों के साथ अपने वार्तालाप में वे असाधारण वस्तुओं, शक्ति के चमत्कार, विद्रोहात्मक अव्यवस्था एवं आध्यात्मिक लोगों का उल्लेख नहीं करते थे। वे उनके साथ प्रायः कविता, इतिहास एवं औचित्य तथा मर्यादा के विधान की पुस्तकों के सम्बन्ध में बात किया करते थे। वे उनसे कहा करते थे कि यज्ञ के प्रारम्भिक चरण के रूप में उपवास, युद्ध में सम्मिलित होना और रोग का उपचार-इन तीन बातों के प्रति अधिकतम सतर्कता की आवश्यकता है। वे सदाचार, स्वामिभक्ति तथा सत्यवादिता की सम्प्राप्ति पर बहुत बल दिया करते थे। लाभ, पूर्णता तथा स्वर्ग के आदेशों पर उन्होंने शायद ही कभी विचार किया हो।
कन्फ्यूशियस अधिकतर ऐसी वस्तुओं के अध्ययन में व्यस्त रहते थे जिनका सम्बन्ध मानव, मानवता तथा वास्तविक जीवन से रहता था। वे स्वर्ग, प्राकृतिक दृश्य-प्रपंच तथा देवताओं के विषय में कभी भी बात नहीं करते थे। एक बार ची-लू नामक उनके एक शिष्य ने उनसे पूछा - "आदरणीय आचार्य, मैं देवताओं की सेवा किस प्रकार कर सकता हूँ?" कन्फ्यूशियस ने उत्तर दिया - "जब तुम मनुष्य की सेवा करना नहीं जानते, तब तुम देवताओं की सेवा के सम्बन्ध में क्यों प्रश्न करते हो?" शिष्य ने पुनः प्रश्न किया -"पूजनीय आचार्य, कृपया मृत्यु के सम्बन्ध में आप मुझे पूर्ण ज्ञान प्रदान कीजिए।" कन्फ्यूशियस ने उत्तर दिया- "प्रिय ची-लू, जब तुम्हें जीवन का ही पर्याप्त ज्ञान नहीं है, तब तुम मृत्यु-सम्बन्धी ज्ञान की आशा कैसे कर सकते हो?" किन्तु, कन्फ्यूशियस ने स्वर्ग या देवताओं की सत्ता को कभी अस्वीकार नहीं किया।
कन्फ्यूशियस ने स्वयं को समाज के उत्थान के प्रति समर्पित कर दिया था। वे सर्वदा समाज-कल्याण की बात सोचा करते थे। सामाजिक कल्याण के लिए वे अपने अधिकाधिक योगदान के लिए सतत प्रयत्नशील रहते थे। कन्फ्यूशियस के प्रवचनों के संकलन 'द एनालेक्ट्स' में मुख्यतः सामाजिक कल्याण, मानवीय शान्ति तथा सामाजिक समस्वरता पर ही विचार व्यक्त किये गये हैं।
अत्यधिक श्रम-साध्य होते हुए भी कन्फ्यूशियस ने लोगों को नैतिक प्रशिक्षण देने का प्रत्येक सम्भव प्रयत्न किया। आचार-शास्त्रीय सद्गुणों की सम्प्राप्ति पर उन्होंने अत्यधिक बल दिया। समाज को विसंगत एवं अशान्त तत्त्वों से मुक्त करने के लिए वे सर्वदा प्रयत्नशील रहे। इस तथ्य के प्रति उनकी दृढ़ आस्था थी कि यदि ज्येष्ठ तथा वरिष्ठ जनों का चरित्र निर्मल है, तो अन्य लोग भी उनका अनुसरण करेंगे और तब समस्त संसार प्रेम तथा सार्वभौम शान्ति से आप्लावित हो उठेगा। उन्हें देवताओं तथा मरणोत्तर जीवन पर तर्क-वितर्क करने का अवकाश ही नहीं प्राप्त होता था; क्योंकि उनका मन सर्वदा सामाजिक विचारों में तल्लीन रहा करता था। इसका एक कारण यह भी था कि इन विषयों पर विचार करना उन्होंने आवश्यक नहीं समझा।
पुस्तकें
'द एनालेक्ट्स' में कन्फ्यूशियस के संवादों का संकलन है। इसमें शिष्यों तथा अन्वेषी जनों के साथ उनके वार्तालाप संग्रहीत हैं। इसके अनेक भाष्यकार हुए हैं जिन्होंने इसको अपने-अपने मतों के अनुरूप व्याख्यायित किया है। कन्फ्यूशियस निम्नांकित चार पुस्तकों के प्रणेता थे :
१. 'तू सुयेह' में वयस्कों के लिए उनके विद्वत्तापूर्ण विचारों का संकलन है।
२. 'चुंग युंग' में मीन (Mean) के सिद्धान्त का वर्णन है।
३. 'लून यू' नामक बीस ग्रन्थों में कन्फ्यूशियस की उक्तियों का संग्रह है।
४. 'मेंग त्से' मेनसियस (Mencius) के दर्शन का संकलन है जो कन्फ्यूशियस द्वारा प्रतिपादित मतों से घनिष्ट रूप से सम्बन्धित है।
'टा सुयेह' (Ta Hsueh) एक राजनैतिक और आचारशास्त्रीय ग्रन्थ है। कन्फ्यूशियस के पौत्र कुंग-ची 'चुंग युंग' नामक ग्रन्थ के प्रणेता थे। यह एक विशुद्ध दार्शनिक ग्रन्थ है। इसमें उन सामान्य सिद्धान्तों का वर्णन है जिनका सम्बन्ध मनुष्य की प्रकृति तथा सम्यक् आचार से है। 'लून यू' में कन्फ्यूशियस की उक्तियाँ संग्रहीत हैं। इसमें गुरु-शिष्य के वार्तालापों का वर्णन है। 'मेंग त्से' में मेनसियस के दर्शन का वर्णन है। इसका लेखक कन्फ्यूशियस के मत का प्रबल प्रतिपादक था। इसमें उनके शिष्यों द्वारा पूछे गये प्रश्नों की व्याख्या की गयी है। यह सामन्ती राज्यों को दिये गये परामर्शों का संकलन है। इसमें दर्शन, राजनैतिक सिद्धान्तों तथा अर्थशास्त्र का वर्णन है।
कन्फ्यूशियस की सूक्तियाँ
कन्फ्यूशियस की अनेक सूक्तियाँ अपनी अर्थवत्ता तथा दूरदर्शिता के लिए स्तुत्य हैं। इनसे अधिक ज्ञान-प्रद और क्या हो सकता है-
"विचार के अभाव में विद्वत्ता श्रम का अपव्यय तथा विद्वत्ता के अभाव में विचार संकटप्रद है।"
"जो वास्तव में सदाचारी है, वही किसी से प्रेम या घृणा करने का अधिकारी है।"
"बिना प्रतिवाद के निर्धन होना कठिन तथा अहंकार के बिना समृद्ध होना सरल है।"
कन्फ्यूशियस की कुछ सूक्तियाँ किसी प्रहेलिका से कम नहीं हैं। उदाहरण के लिए ये सूक्तियाँ प्रस्तुत हैं- "लोगों को किसी भद्र व्यक्ति से सात वर्षों तक शिक्षा ग्रहण करने दो। इसके पश्चात् इसी प्रकार उन्हें युद्ध में भी नियोजित किया जा सकता है।"
एक अन्य उदाहरण है-"युद्ध में अप्रशिक्षित लोगों के नेतृत्व का अर्थ है उनको सर्वदा के लिए खो देना।"
"श्रेष्ठ जन जिस वस्तु के अन्वेषी होते हैं, वह उन्हीं में विद्यमान रहती है; किन्तु सामान्य जन जिस वस्तु की खोज करते हैं, वह अन्य लोगों में विद्यमान रहती है।"
“एक आन्तरिक प्रतिबन्ध से सद्गुण के प्रति प्रेम सौन्दर्य के प्रति प्रेम के समकक्ष ही होना चाहिए।"
"अपनी तुलना में अन्य लोगों के मूल्यांकन के समय पर्याप्त आत्म-नियन्त्रण की आवश्यकता है। तुम अन्य लोगों के प्रति जो आचरण करते हो, उन लोगों द्वारा अपने प्रति उसी आचरण की आशा में भी इस आत्म-नियन्त्रण की आवश्यकता पड़ती है। इसी को मानवता का सिद्धान्त कहते हैं जिसके परे अन्य कुछ भी नहीं है।"
"श्रेष्ठता की सम्प्राप्ति का मार्ग न्यायोचित बातों एवं ज्ञान तथा सद्गुणों की उपलब्धि के साधन विद्वत्ता के प्रति प्रेम है। इसकी तुलना किसी भी वस्तु से नहीं की जा सकती। जब सद्गुणों का अनुसरण निष्कपट भाव तथा आत्म-प्रवंचना से मुक्त मन से किया जाता है, तब हृदय परिशुद्ध हो जाता है। इस चरण तक व्यक्ति केवल आत्म-विकास में ही व्यस्त रहा है; किन्तु परिष्कृत-हृदय व्यक्ति पहले अपने निकटस्थ लोगों तथा अन्ततोगत्वा सम्पूर्ण साम्राज्य को प्रभावित करने लगता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपने वचन तथा आचरण के प्रति सतर्क रहना चाहिए। उसे कलुषित तथा अशान्त स्थान का परित्याग कर देना चाहिए। परोपकार उसका निवास-स्थान, धर्म-परायणता उसका मार्ग, मर्यादा उसका आभूषण, प्रज्ञा उसका दीपक तथा निष्ठा उसका सौन्दर्य होना चाहिए। किसी परिष्कृत व्यक्तित्व की संरचन में गरिमा, श्रद्धा, स्वामिभक्ति तथा निष्ठा-जैसे गुणों का पर्याप्त योगदान होता है। गरिमा के कारण सामान्य जन से उसकी पृथकता का बोध होता है, श्रद्धा के कारण वह सबका प्रिय होता है, स्वामिभक्ति से उसमें विनय का प्रादुर्भाव होता है और निष्ठा के कारण वह लोगों का विश्वासपात्र बन जाता है।"
कन्फ्यूशियस की विभिन्न सूक्तियों में श्रेष्ठ जनों के गुणों को रेखांकित किया गया है। कन्फ्यूशियस अपने शिष्यों को वरिष्ठ जनों के समादर तथा उनके अनुकरण का आदेश देते थे। वे कहा करते थे कि प्रत्येक व्यक्ति वरिष्ठ-उत्कृष्ट होना चाहता है। वह अपने मित्रों तथा सहकर्मियों की अपेक्षा उच्च स्थिति का आकांक्षी होता है। वह अपनी पूर्व तथा वर्तमान, दोनों स्थितियों से उच्चतर स्थिति प्राप्त करना चाहता है।
कन्फ्यूशियस द्वारा प्रतिपादित वरिष्ठ व्यक्ति के कुछ गुणों का उल्लेख निम्नांकित पंक्तियों में किया जा रहा है-
प्रयोजन : "वरिष्ठ व्यक्ति की शिक्षा-प्राप्ति का उद्देश्य अपने सिद्धान्तों का अधिकाधिक क्रियान्वयन है।"
सन्तुलन : "वरिष्ठ व्यक्ति विचारतः अपनी स्थिति से च्युत नहीं होता।"
आत्म-निर्भरता : "वरिष्ठ व्यक्ति जिस वस्तु की खोज करता है, वह उसी में विद्यमान है; जब कि सामान्य व्यक्ति उस वस्तु की खोज करता है जो अन्य लोगों में विद्यमान है।"
गाम्भीर्य : "वरिष्ठ व्यक्ति के प्रत्येक अभियान में उसके अध्यवसाय की आत्यन्तिकता निहित रहती है।"
पूर्णता : “वरिष्ठ व्यक्ति अपने अवधान को उस लक्ष्य की ओर उन्मुख किये रहता है जो मूलभूत है। इसकी प्राप्ति के पश्चात् सभी पथ अनायास ही प्रशस्त हो जाते हैं।”
निष्कपटता : "इसके कारण वरिष्ठ व्यक्ति अन्य लोगों से पृथक् प्रतीत होने लगता है।"
सत्यवादिता : “वरिष्ठ व्यक्ति को जिस वस्तु की अपेक्षा है, वह यह है कि उसके वचन पूर्णतः परिशुद्ध हों।"
वचन तथा कर्म की विशुद्धि : "वरिष्ठ व्यक्ति को एकान्त में अपने प्रति सतर्क रहना चाहिए।"
सत्य-प्रेम : "वरिष्ठ व्यक्ति सत्य की सम्प्राप्ति के लिए उत्सुक रहता है। वह निर्धनता से भयभीत नहीं होता।"
आर्जव : "वरिष्ठ व्यक्ति सद्गुणों के विषय में सोचता है, जब कि सामान्य व्यक्ति अपनी सुख-सुविधा के विषय में सोचता है।"
विवेक : "वरिष्ठ व्यक्ति सम्भाषण के समय शब्दों के सम्बन्ध में मितव्ययी और आचरण में गम्भीर होता है।"
आत्म-संयम : "वरिष्ठ व्यक्ति को अभावग्रस्त होना पड़ सकता है; किन्तु सामान्य व्यक्ति अभावग्रस्त होने के पश्चात् अत्यधिक स्वेच्छाचारी हो जाता है।"
निर्भीकता : "वरिष्ठ व्यक्ति उत्सुकता तथा भय से मुक्त होता है।"
सहजता तथा गरिमा : "वरिष्ठ व्यक्ति में अहंकार-शून्य गरिमामयी
सहजता होती है, जब कि सामान्य व्यक्ति में गरिमामयी सहजता से रहित अहंकार होता है।"
दृढ़ता : "दूर से देखने पर वरिष्ठ व्यक्ति कठोर और निकट से देखने पर सौम्य-सदय प्रतीत होता है; किन्तु उसकी वाणी में दृढ़ता तथा निश्चयात्मकता के दर्शन होते हैं।"
सामर्थ्य : "साधारण बातों से वरिष्ठ व्यक्ति के सम्बन्ध में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता; किन्तु महत्त्वपूर्ण विषयों में उसका विश्वास किया जा सकता है।”
स्पष्टता : "वरिष्ठ व्यक्ति के दोष सूर्य और चन्द्रमा की भाँति होते हैं। उसमें जो दोष होते हैं, उन्हें सब लोग देख लेते हैं; किन्तु वह व्यक्ति परिवर्तित हो जाता है और इस परिवर्तन को भी सब लोग देखते हैं।"
परोपकार : "वरिष्ठ व्यक्ति स्वयं में स्तुत्य मानवोचित गुणों के विकास के लिए प्रयत्नशील रहता है। वह स्वयं में मनुष्य के दुर्गुणों का समावेश नहीं चाहता। सामान्य व्यक्ति का आचरण इसके विपरीत होता है।"
उन्मुक्त मानसिकता : "वरिष्ठ व्यक्ति मेधा तथा सद्गुणों का सम्मान करता है। वह श्रेष्ठ व्यक्तियों की प्रशंसा करता तथा असमर्थ व्यक्तियों के प्रति दया तथा सहानुभूति प्रकट करता है।"
नियमन : "वरिष्ठ व्यक्ति मध्यम मार्ग का अनुसरण करता है।"
सुरक्षित शक्ति : "जिस बात में किसी वरिष्ठ व्यक्ति को किसी के समकक्ष नहीं रखा जा सकता, वह यह है कि लोग उसके मूल्य से परिचित नहीं हो पाते।"
कन्फ्यूशियस वरिष्ठ या आदर्श व्यक्ति के सम्बन्ध में कहते हैं-
"वरिष्ठ व्यक्ति पुरातन धर्म के प्रति आस्थावान् होते हुए भी धर्मान्ध नहीं होता। वह वही आचरण करता है जो उसकी पद-प्रतिष्ठा के अनुरूप तथा औचित्यपूर्ण होता है। वह सीमोल्लंघन करना नहीं चाहता। वह जिस पद के योग्य नहीं होता, उसकी प्राप्ति का प्रयास नहीं करता।"
"जो विज्ञ होता है, उसके लिए निष्कपटता एवं विश्वास वस्त्र तथा शिरस्त्राण एवं औचित्य तथा धर्मपरायणता ढाल होती है। वह परोपकार में रत रहता है। प्रशासन उस पर जघन्य अत्याचार कर सकता है; किन्तु उसके मार्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता। उसका जीवन-यापन इसी विधि से होता है।"
शिक्षा
कन्फ्यूशियस ने शिक्षा, ज्ञान तथा सम्यक् आचरण के विधान के अध्ययन पर सर्वाधिक बल दिया जिससे इनको व्यवहार-रूप में परिणत किया जा सके। उनके उपदेशों के अनुसार मनुष्य का मुख्य लक्ष्य स्वयं को जानना तथा समाज के एक सदस्य के रूप में स्वयं को समाज के लिए उपयोगी बनाना है। उन्होंने अपने शिष्यों तथा सर्व साधारण को भद्र जीवन तथा सामाजिक समस्वरता के सिद्धान्तों की शिक्षा दी।
कन्फ्यूशियस का प्रशिक्षण अधिकांशतः स्वच्छ प्रशासन की समस्याओं से सम्बन्धित था। वे कहते थे-"प्रशासक को स्वयं सदाचारी, न्यायी, निष्कपट तथा कर्तव्यपरायण होना चाहिए। सदाचारी प्रशासक को ध्रुव तारे की भाँति होना चाहिए जो अपने स्थान पर स्थिर रहते हुए अन्य नक्षत्रों को अपनी परिक्रमा के लिए विवश करता है। 'जैसा राजा वैसी प्रजा'।"
सद्गुण के सम्बन्ध में कन्फ्यूशियस का क्या विचार था ? उनके इस शब्द (सद्गुण) का पर्याय 'जेन' है। उनके नैतिक सिद्धान्त का समुचित बोध मुख्यतः 'जेन' के निहितार्थ पर निर्भर करता है। अँगरेजी में 'जेन' के लिए कोई ऐसा समानार्थक शब्द नहीं मिलता जिससे हम इस शब्द की अर्थवत्ता से पूर्णतः अवगत हो सकें। कन्फ्यूशियस की सम्पूर्ण शिक्षाओं के सार-तत्त्व के दर्शन इस एक शब्द 'जेन' में ही किये जा सकते हैं। इस कठिन शब्द का निकटतम समानार्थक शब्द 'सामाजिक सदाचार' (Social Virtue) है। यह परोपकारिता, दानशीलता, उदारता, निष्कपटता, श्रद्धा, परहितवाद, अध्यवसाय, प्रेमपूर्ण सहृदयता तथा साधुवृत्ति-जैसे उन समस्त सद्गुणों का संयोजन है जो सामाजिक समस्वरता तथा शान्ति के लिए पुष्टिप्रद हैं।
कन्फ्यूशियस से एक शिष्य ने पूछा- "आदरणीय गुरुदेव, सामाजिक सद्गुण का संघटक तत्त्व क्या है?" कन्फ्यूशियस ने उत्तर दिया- "यह दूसरों के प्रति प्रेम है।" एक अन्य शिष्य ने पूछा- "गुरुदेव, क्या ऐसा कोई सिद्धान्त-वाक्य है जिसका अनुसरण हम आजीवन करते रहें?" कन्फ्यूशियस ने उत्तर दिया- "अपने प्रति अन्य लोगों के जिस व्यवहार को तुम अवांछित समझते हो, वह व्यवहार अन्य लोगों के प्रति मत करो।”
कन्फ्यूशियस का एक मुख्य शिष्य कहता है- "स्वयं के प्रति निष्ठा और अपने पड़ोसियों के प्रति दानशीलता - यह एकमात्र सिद्धान्त ही मेरे गुरु की शिक्षाओं का सार-तत्त्व है।"
कन्फ्यूशियस कहते हैं- "स्वर्ग के आदेश, महान् पुरुषों तथा सन्तों की सूक्तियों के प्रति श्रद्धायुक्त विस्मय सद्गुण-सम्पन्न व्यक्ति में विद्यमान रहते हैं। ईश्वर की पूजा के समय तुम्हें यह प्रतीत होना चाहिए कि वह तुम्हारे सम्मुख साक्षात् विद्यमान है।"
कन्फ्यूशियस की शिक्षा के अनुसार समस्त संसार तथा प्रत्येक व्यक्ति में सतत परिवर्तन हो रहा है एवं मानव जीवन का सर्वाधिक मूलभूत पक्ष विद्यमान यथार्थ है।
पति-पत्नी, माता-पिता तथा पुत्र, अग्रज-अनुज या मुख्यतः ज्येष्ठ-कनिष्ठ, शासक-शासित तथा मित्र-मित्र- कन्फ्यूशियस के अनुसार इन पाँच पारस्परिक सम्बन्धों की आधारशिला पर ही समाज का निर्माण हुआ था। किसी देश में स्वच्छ प्रशासन तभी सम्भव है, जब सभी दल इन सम्बन्धों की सम्पुष्टि के लिए अपना सम्यक् योगदान दें। "ताओ अर्थात् उपयुक्त तथा न्यायोचित मार्ग की सम्प्राप्ति तभी सम्भव है, जब पिता, पुत्र, प्रशासक तथा मन्त्री यथार्थ रूप में पिता, पुत्र, प्रशासक तथा मन्त्री हों।"
कन्फ्यूशियस चरित्र-निर्माण एवं मन तथा आचरण की शुद्धि पर अत्यधिक बल देते थे। वे लोगों को सर्वप्रथम सच्चरित्रता के विकास के लिए उत्प्रेरित करते थे जो एक अमूल्य रत्न तथा सर्वोत्तम गुण है।
कन्फ्यूशियस के अनुसार मानव-प्रकृति मूलतः शुद्ध है या शुद्धता की ओर उन्मुख है। विशुद्धि की पूर्णता के दर्शन मात्र साधु-सन्तों में ही सम्भव हैं। प्रत्येक मनुष्य को पवित्र जीवन, भव्य चरित्र एवं निस्स्वार्थ, निष्कपट तथा सत्यनिष्ठ कर्म के माध्यम से इस आदर्श की सिद्धि के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। जो उत्तम चरित्र तथा दिव्य गुणों से अलंकृत है, वह चुन-जू (Cphun-Tzu) अर्थात् राजकुमार की कोटि का मनुष्य है। राजसी स्वभाव का व्यक्ति सद्गुणों के प्रति समर्पित होता है, जब कि निकृष्ट व्यक्ति भौतिक सुख-सुविधा के प्रति आकृष्ट होता है। राजसी स्वभाव वाले व्यक्ति के कार्य-कलाप न्याय-संगत होते हैं; किन्तु निकृष्ट व्यक्ति पुरस्कार तथा अनुग्रह की आशा करता है। राजसी स्वभाव का व्यक्ति गरिमायुक्त, श्रेष्ठ, उदार तथा विनम्र होता है, जब कि निकृष्ट व्यक्ति नीच, अहंकारी, कुटिल तथा उद्धत होता है।
'ग्रेट लर्निंग' नामक ग्रन्थ में कन्फ्यूशियस इस सोपानवत् प्रक्रिया को प्रस्तुत करते हैं जिसके माध्यम से आत्म-विकास की सम्प्राप्ति होती है और जिससे उत्प्रेरित हो कर यह सर्वसाधारण के जीवन में भी प्रवाहित होने लगता है। यह राज्य की सेवा तथा मनुष्य को कृतार्थ करता है। इस क्रम को कन्फ्यूशियस ने इस विधि से प्रस्तुत किया है-
१. प्राकृतिक दृश्य-प्रपंच का अनुसन्धान, २. पाण्डित्य, ३. निष्कपटता, ४. प्रयोजन की पवित्रता, ५. आत्म-विकास, ६. पारिवारिक अनुशासन, ७. स्वायत्त शासन तथा ८. सार्वभौम स्वायत्त शासन।
कन्फ्यूशियस कहते हैं- "प्राचीन मनीषियों ने समस्त साम्राज्य में प्रख्यात सद्गुणों के दृष्टान्त की प्रस्तुति के लिए सर्वप्रथम अपने राज्यों के हित-रक्षण पर बल दिया, अपने राज्यों के हित-रक्षण के लिए उन्होंने सर्वप्रथम अपने परिवारों का नियमन किया, अपने परिवारों के नियमन के लिए उन्होंने सर्वप्रथम स्वयं को परिष्कृत किया, आत्म-परिष्कार के लिए सर्वप्रथम उन्होंने अपने प्रयोजन को विशुद्ध किया, अपने प्रयोजन की विशुद्धि के लिए सर्वप्रथम उन्होंने निष्कपट चिन्तन किया और निष्कपट चिन्तन के लिए उन्होंने अपनी विद्वत्ता का आत्यन्तिक संवर्धन किया। ऐसा वे वस्तुओं के अनुसन्धान के माध्यम से ही कर सके।
"वस्तुओं के अनुसन्धान से उनका ज्ञान विस्तृत होता गया; उनके ज्ञान-विस्तार से उनके विचार निष्कपट हुए, उनके विचार की निष्कपटता से उनके प्रयोजन में आर्जव का समावेश हुआ, प्रयोजन में आर्जव के समावेश से उन्होंने स्वयं को परिष्कृत किया, आत्म-परिष्कार से उनके परिवारों का नियमन हुआ, इस पारिवारिक नियमन से उनके राज्यों को स्वच्छ प्रशासन मिला और राज्यों के स्वच्छ प्रशासन से समस्त साम्राज्य शान्त तथा समृद्ध हो गया।
"जीवन के विहित कर्मों के निष्पादन में सम्पूर्ण जीवन व्यतीत हो जाता है। एक भी स्खलन सम्पूर्ण कर्म के मार्ग में व्यतिरेक की सृष्टि कर देता है। साधु-वृत्ति केवल पवित्रता में निहित नहीं रहती। वस्तुतः यह समग्रता एवं सुनियोजित तथा निर्दोष जीवन-यापन की कला में निहित रहती है। इस विधि से वृद्धावस्था को प्राप्त व्यक्ति का जीवन सौन्दर्यमय हो जाता है।"
निष्कर्ष
कन्फ्यूशियस ने ई.पू. छठी शताब्दी को अमरत्व प्रदान कर दिया। वे एक जन्मजात जन-नेता थे। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल रही होतीं, तो उनकी गणना संसार के महानतम शासकों में होती। उनका नैतिक बोध पूर्णरूपेण विकसित था और उनमें मानव जीवन में नैतिक गुणों के सर्वोच्च महत्त्व की गहन अनुभूति थी। उनकी महानता को अनेक शताब्दियों तक सार्वत्रिक मान्यता प्राप्त होती रही। विश्व के कोटि-कोटि लोग आज भी उनके प्रति अपना हार्दिक सम्मान प्रकट करते हैं।
कन्फ्यूशियस एक महान् चीनी उपदेशक तथा समाज-सुधारक थे। उनका युग अव्यवस्था, अशान्ति, असामंजस्य, मतभेद तथा सामन्ती युद्धों का युग था। उन्हें चीनी संस्कृति का जनक कहा जाता है। चीन के इतिहास को दिशा प्रदान करने में उनका योगदान स्तुत्य रहा है। उस देश के व्यष्टिगत या समष्टिगत जीवन में उनका प्रभाव आज भी एक मुख्य घटक के रूप में विद्यमान है।
पुराकालीनता के एक परिश्रमी विद्यार्थी के रूप में वे अप्रतिम थे। उन्होंने अपने विषय में कहा है कि उनका जन्म एक अज्ञानी के रूप में हुआ था। उन्हें ज्ञान की प्राप्ति अतीत के दिव्य सम्पर्क के कारण हुई।
कन्फ्यूशियस एक प्रभावशाली तथा प्रीतिकर व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे चौबीस सौ वर्षों तक अपने राष्ट्र के विद्वानों तथा चिन्तकों के लिए एक प्रतिमान तथा प्रेरणा बने रहे। उनकी वेदिका पर प्रायः इन शब्दों के दर्शन होते हैं- "एक सहस्र पीढ़ियों के शिक्षक।" निःसन्देह वे इस प्रशस्ति के वास्तविक अधिकारी हैं।
कन्फ्यूशियस के सम्बन्ध में लिखे गये एक लोकप्रिय इतिहास के अन्त में निम्नांकित पंक्तियाँ उल्लिखित हैं-
कन्फ्यूशियस ! कन्फ्यूशियस ! कितना महान् था कन्फ्यूशियस !
उसके समक्ष कोई कन्फ्यूशियस नहीं था।
उसके पश्चात् किसी कन्फ्यूशियस का आविर्भाव नहीं हुआ।
कन्फ्यूशियस ! कन्फ्यूशियस ! कितना महान् था कन्फ्यूशियस !
कन्फ्यूशियस का स्मरण आज भी कोटि-कोटि जन श्रद्धा तथा सम्मान के साथ करते हैं। चीन के लोगों का अधिकांश आज भी कन्फ्यूशियस के मत के प्रति आस्थावान् है।
उस महान् नैतिकतावादी, राजनयिक तथा समाज-सुधारक कन्फ्यूशियस की महिमा स्तुत्य है।
ईसामसीह (Jesus) एक फिलस्तीनी यहूदी थे। उनका जन्म बेतलहम (Bethlehem) में हुआ था और वे मरियम (Mary) तथा यूसुफ (Joseph) के पुत्र थे। एक निष्पाप तथा निष्कलंक अवधारणा से प्रसूत ईसामसीह के जन्म-ग्रहण के लिए उनकी माता मरियम को गर्भ धारण नहीं करना पड़ा था। वे अत्यन्त विनम्र थे। वे आजीवन एक बालक की भाँति अबोध तथा निष्कपट बने रहे। वे सहिष्णु तथा दयालु थे। उन्होंने अपने उपदेशों से फिलस्तीन को उपकृत किया; किन्तु वस्तुतः वे पूर्व के योगी थे।
ईसामसीह ने पापियों, तिरस्कृत व्यक्तियों तथा वेश्याओं तक का स्वागत किया और अपने प्रेम-पाश में आबद्ध कर उन्हें विशुद्ध कर दिया। उन्होंने उन्हें सान्त्वना तथा शान्ति प्रदान की, पतित जनों को ऊपर उठाया तथा जो लोग भग्न-हृदय थे, उनके दुःखों को उपशमित किया।
ईसामसीह कहते थे- "जब तक तुम एक बालक की भाँति अबोध तथा
निश्छल नहीं हो जाते, तब तक ईश्वर के राज्य में तुम्हारा प्रवेश वर्जित रहेगा।" उनके अनुसार ईश्वर वात्सल्यपूर्ण पिता है। 'ईश्वर तथा पड़ोसी के प्रति प्रेम' ईसामसीह का आदर्श वाक्य था।
"ईश्वर के प्रति आस्थावान् बनो। ईश्वर हमारा प्रभु है। तुम अपने सम्पूर्ण हृदय, अपने सम्पूर्ण मन, अपनी सम्पूर्ण आत्मा तथा अपनी सम्पूर्ण शक्ति से ईश्वर से अनन्य प्रेम करो। तुम अपने समीपवर्ती व्यक्तियों से आत्मवत् प्रेम करो। ईश्वर के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति मनुष्य के प्रति प्रेम में होती है।" यह ईसामसीह की केन्द्रीय शिक्षा है।
ईसामसीह एक जगद्गुरु, पैगम्बर तथा मसीहा थे। उनका 'शैलोपदेश' (Sermon on the Mount) सदाचार या सम्यक् आचार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। यह राजयोग के यम-नियम एवं भगवान् बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग के अनुरूप है।
ईसामसीह ने अन्तिम रात्रि-भोज (Last Supper) के समय अपने शिष्यों का चरण-प्रक्षालन किया। कितने विनम्र थे वे ! वे कहते हैं- "वे धन्य हैं जो विनम्र हैं; क्योंकि उन्हें पृथ्वी का उत्तराधिकार प्राप्त होगा।
महाराजा युधिष्ठिर द्वारा अनुष्ठित राजसूय यज्ञ में भगवान् कृष्ण ने भी अतिथियों का पद-प्रक्षालन किया था। ऐसे कर्म अवतारों या शक्तिमान् आत्माओं द्वारा ही निष्पादित हुआ करते हैं। क्या उन महान् व्यक्तियों से आपको शिक्षा ग्रहण नहीं करनी चाहिए? महाबली त्रिलोकाधिपति भगवान् कृष्ण को अतिथियों के चरण-प्रक्षालन से आनन्द प्राप्त हुआ था। क्या आपको विनम्र नहीं होना चाहिए? आप लोगों का हृदय दम्भ तथा अहंकार से किस सीमा तक दूषित हो गया है! जब आपको किंचित् धन, एक कार या नगण्य भू-सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है, तब आप दर्प या अभिमान से मदोन्मत्त हो उठते हैं। इस स्थिति में आप स्वयं को एक शक्तिशाली सम्राट् समझने लगते हैं, आपके पद-प्रक्षेपण में औद्धत्य के दर्शन होने लगते हैं और लोगों के प्रति आपके व्यवहार में तिरस्कार तथा अवज्ञा का समावेश हो जाता है। आप अपने व्यक्तित्व तथा अपनी अवस्थिति को आवश्यकता से अधिक महत्त्वपूर्ण समझने लगते हैं। वस्तुतः आपके पदाधिकार ने आपके अन्दर दास-मनोवृत्ति की सृष्टि कर दी है और आप अपनी पद-च्युति की आशंका के कारण सर्वदा भयग्रस्त रहते हैं।
ईसामसीह यह सन्देश सर्वदा देते रहे- "अपने पड़ोसियों को आत्मवत् प्यार करो।" उन्होंने कहा- "स्वर्ग का राज्य तुम्हारे अन्दर ही है। जिस प्रकार परमेश्वर की इच्छाओं की पूर्ति स्वर्ग में होती है, उसी प्रकार इनकी पूर्ति धरती पर भी हो। चिन्ता मत करो। सर्वप्रथम तुम उसके राज्य की खोज करो। इसके पश्चात् तुमको सब-कुछ प्राप्त हो जायेगा।" लोगों के अनुगमन के लिए वे सन्मार्ग, सत्य तथा प्रकाश थे।
ईसामसीह ने ईश्वर के राज्य में प्रवेश के लिए ईश्वर तथा पड़ोसियों के प्रति प्रेम तथा पश्चात्ताप की आवश्यकता या हृदय-परिवर्तन पर अधिक बल दिया। उन्होंने लोगों को भूखों को भोजन तथा वस्त्रहीनों को वस्त्र देने के लिए अनुदेशित किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर की क्षमा-प्राप्ति के लिए पश्चात्तापपूर्ण हृदय आवश्यक है।
"ईश्वर का राज्य तुम्हारे अन्दर है। उसकी खोज करो। वह तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। उसके द्वार को खटखटाओ, तो वह तुम्हारे लिए खोला जायेगा।" इसी आधार-शिला पर ईसामसीह की आचार संहिता अवस्थित है।
इस राज्य की सम्प्राप्ति के लिए ईसामसीह ने माध्यम के रूप में प्रार्थना की संस्तुति की। उन्होंने कहा- "जब तुम बुरे हो कर अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों नहीं देगा?"
ईसामसीह ने कहा- "तुमने प्राचीन मनीषियों की यह बात सुनी है, 'तुम किसी की हत्या न करना और जो कोई भी हत्या करेगा, उसे दैवी न्याय का कोप-भाजन होना पड़ेगा'; किन्तु मैं कहता हूँ कि जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, उसे दैवी न्याय का कोप-भाजन होना पड़ेगा।"
'शैलोपदेश' में उन्होंने कहा- "धन्य हैं वे जो धर्म के लिए क्षुधा तथा तृषा सहन करते हैं, क्योंकि वे तृप्त किये जायेंगे। जो लोग ईश्वर के राज्य की खोज अपने अन्तर में करते हैं, वे ईश्वर को प्राप्त कर लेंगे और इस प्रकार उन्हें अन्य सभी वस्तुएँ भी प्राप्त हो जायेंगी।"
"शुभ से अशुभ को पराजित करो।" ईसामसीह ने अपने शिष्यों तथा संसार के अन्य लोगों के समक्ष इस महान् व्रत या विधान को प्रस्तुत किया। यह एकमात्र अहिंसा की साधना है जिससे हृदय पवित्र तथा कोमल होता है। अहिंसा सत्य का रूपान्तरण मात्र है।
बपतिस्मा-ग्रहण के पश्चात् ईसामसीह मृत सागर के पार के अरण्य की ओर चले गये। वे तेरह वर्ष की आयु में अन्तर्धान हुए थे और उनका पुनः आगमन उस समय हुआ जब उनकी आयु इकतीस वर्ष की हो चुकी थी। इस अवधि में उन्होंने भारत में योग-साधन की। इसके पश्चात् उन्होंने दो-तीन वर्षों तक उपदेश दिया और सर्वातीत परम सत्ता में विलीन हो गये।
ईसामसीह यरूसलेम (Jerusalem) के परित्याग के पश्चात् श्रेष्ठियों के एक सार्थ में सम्मिलित हो कर सिन्ध नदी के तट पर पहुँचे। उन्होंने वाराणसी, राजगृह तथा भारत के अन्य नगरों की यात्राएँ कीं। हिन्दुस्तान में उन्होंने अनेक वर्ष व्यतीत किये। ईसामसीह यहाँ एक हिन्दू या बौद्ध भिक्षु की भाँति रहे। इस अवधि में उनका जीवन ज्वलन्त त्याग तथा अनासक्ति से आप्लावित रहा। उन्होंने हिन्दू-धर्म के आदर्शों, अनुदेशों तथा सिद्धान्तों को एकीकृत किया। ईसाइयत मात्र संशोधित हिन्दुत्व है जो ईसामसीह के समकालीन जन-समुदाय के अनुकूल था। ईसामसीह वस्तुतः भारतभूमि की ही उपज थे। इसी कारण उनके उपदेशों और हिन्दू-धर्म तथा बौद्ध-धर्म के उपदेशों में इतना अधिक सादृश्य है।
ईसामसीह ने इस धरती पर दिव्य तथा पूर्ण प्रेम का उपदेश दिया। वे दानशीलता तथा उदारता के प्रशस्ति-गायन में सहस्रमुख हो जाते थे। वे कहा करते थे- "ग्रहण की अपेक्षा दान अधिक स्तुत्य एवं पुण्यप्रद है। अपने हृदय के सर्वोत्तम कोष को अर्पित कर दो। निर्मल प्रकृति से शिक्षा ग्रहण करो। अपना प्रेम दे कर प्रत्युत्तर में किसी भी वस्तु की माँग मत करो। प्रति-उपकार की आशा मत करो। अपने सीमित भण्डार से तुम जितना अधिक व्यय करोगे, उतना ही अधिक तुम्हें प्रभु से प्राप्त होगा। वह तुम्हें दूनी राशि प्रदान करेगा।"
ईसामसीह कहते थे- "स्वर्ग का राज्य किसी खेत में छिपे हुए धन की भाँति है जिसे किसी व्यक्ति ने पा कर छिपा दिया है। उसने अपना सब-कुछ बेच कर उस खेत को मोल ले लिया।"
ईसामसीह को सलीब पर टाँग कर उनके शरीर में कीलें ठोंक दी गर्यो और इस प्रकार उनका देहान्त हो गया; किन्तु वे अभी भी जीवित हैं। उन्होंने अपने नाम को अमर कर दिया है। उनके स्वरों को प्रतिबन्धित नहीं किया जा सकता। वे शताब्दियों से मुखर होते आ रहे हैं। उनका कहना था- "अपना सर्वस्व बेच कर तथा उसे निर्धनों में वितरित कर के स्वर्ग के राज्य में प्रविष्ट हो जाओ।" लोग उनके सन्देश के अनुरूप आचरण में असमर्थ रहे; किन्तु उनके स्वरों से धरती-आकाश आज भी गूंजित हैं।
ईसामसीह एक पूर्ण योगी थे। उन्होंने अनेक चमत्कारों का प्रदर्शन किया। उन्होंने समुद्र की तरंगों की गति अवरुद्ध कर दी। उन्होंने अन्धों को नेत्र दान दिया, कुष्ठग्रस्त रोगियों को स्पर्शमात्र से रोगमुक्त कर दिया और रोटी के एक टुकड़े मात्र से बड़ी भीड़ की क्षुधा को शान्त कर दिया।
भगवान् ईसामसीह को सलीब पर लटका दिया गया और उन्होंने मृत्यु को इसलिए आनन्दपूर्वक स्वीकार कर लिया कि अन्य लोग जीवित रह सकें। कितने महान् तथा उदारचेता थे वे ! अपने बच्चों के लिए उन्होंने मृत्यु का सहर्ष आलिंगन करना सीख लिया था। उनके अन्तिम शब्द विश्व के लिए एक दृष्टान्त बन गये हैं। उन्होंने कहा- "हे प्रभो! जो लोग मुझे यन्त्रणा दे कर मृत्यु-दण्ड दे रहे हैं, उन्हें क्षमा कर देना; क्योंकि उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं।" कितने भव्य, कितने उदात्त थे उनके ये अन्तिम शब्द ! उनके हाथों को सलीब से बाँध दिया गया था और उनमें कीलें ठोंक दी गयी थीं। इस स्थिति में भी उन्होंने उन लोगों के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जो उनको उत्पीड़ित कर रहे थे। उनका हृदय कितना विशाल तथा क्षमाशील था! ईसामसीह क्षमाशीलता की प्रतिमूर्ति थे। यही कारण है कि वे आज भी हमारे हृदय में विद्यमान हैं और कोटि-कोटि लोग उनकी उपासना करते हैं।
शुभ से अशुभ की विजय के लिए उन्होंने लोगों के समक्ष एक दृष्टान्त प्रस्तुत किया। ईसामसीह का सलीब उनके इस सिद्धान्त के सर्वोच्च दृष्टान्त के रूप में सर्वदा अमर रहेगा कि 'अशुभ के प्रत्युत्तर में शुभ दो।' ईसामसीह ने स्वयं को ईश्वर को पूर्णतः समर्पित कर दिया था। वे इस सत्य से परिचित थे कि ईश्वर सदाचारी व्यक्तियों के दुःख-भोग के माध्यम से दुराचारी व्यक्तियों का हृदय-परिवर्तन कर देता है।
सलीब पर हुई मृत्यु के पश्चात् वे पुनर्जीवित हो गये। ईसामसीह के अनुसार पुनरुत्थान या मृतक का पुनर्जीवित हो जाना वह अनिर्वचनीय स्थिति है जिसमें समस्त दैहिक सीमाओं का अतिक्रमण हो जाता है। यह ईश्वर के सम्मुख अनन्त काल तक उपस्थिति की दशा है। ईसामसीह एक सिद्ध योगी और सन्त थे। भौतिक शरीर से उनका तादात्म्य नहीं था। उन्होंने स्वयं को परमात्मा के साथ एकात्म कर लिया था। उनका कहना था- "मैं तथा मेरे पिता एक हैं।"
क्रिसमस (ईसा-जयन्ती) की वास्तविक अर्थवत्ता
क्रिसमस का नामकरण ईसामसीह के नाम के आधार पर हुआ था। यह भगवान् ईसामसीह का जन्म-दिवस है जो पूर्व के योगी तथा मानवता के मुक्तिदाता थे। उनका जन्म बेतलहम के एक अस्तबल में मरियम तथा यूसुफ नामक एक नगण्य काष्ठकार दम्पति की सन्तान के रूप में हुआ था। मरियम तथा यूसुफ ने उस अस्तबल को शान्ति के राजकुमार ईसामसीह का निवास-स्थान बना दिया। ईसामसीह का जन्म-दिन पवित्र क्रिसमस के रूप में समस्त संसार में मनाया जाता है।
भगवान् ईसामसीह दया, प्रेम तथा विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे। वे अहिंसा एवं शान्ति के सन्देश-वाहक थे। उन्हें सलीब पर मृत्यु दण्ड दे दिया गया था; किन्तु उनकी वाणी शताब्दियों से मुखर होती आ रही है।
क्रिसमस का सन्देश वैश्व प्रेम का सन्देश है। यह सन्देश दैवी महिमा तथा गौरवमयी दीप्ति का सन्देश है। क्रिसमस का सन्देश सभी राष्ट्रों के बीच शान्ति तथा सद्भावना का सन्देश है।
क्रिसमस हर्ष तथा आनन्दोत्सव के अतिरिक्त एक अन्य दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है। यह ईसामसीह की संचेतना या वैश्व चेतना के अधिगम का दिन है। यह भगवान् ईसामसीह के उदात्त कर्मों तथा पुरातन शुचिता से ओत-प्रोत उनके पवित्र जीवन के स्मरण का दिन है। क्रिसमस आता-जाता रहता है; किन्तु क्रिसमस की अर्थवत्ता आप सब लोगों में सदैव विद्यमान रहनी चाहिए।
क्रिसमस किसी भी दृष्टि से आमोद-प्रमोद नहीं है। घण्टे बजाने, गीत गाने, उपहारों के आदान-प्रदान, क्रिसमस-पत्रों, व्यंजन-बोझिल भोजों तथा केक-भक्षण में क्रिसमस की सार्थकता निहित नहीं है।
क्रिसमस आध्यात्मिक जागरण की मनः स्थिति है। अपने अन्तर में स्वर्ग के राज्य की विद्यमानता की अनुभूति, अपने हृदय-कक्ष में प्रभु का सामीप्य, अपने विलुप्त देवत्व की पुनः सम्प्राप्ति, ईसा की संचेतना अर्थात् वैश्व चेतना की उपलब्धि, सबके प्रति प्रेम तथा सब लोगों का अपने प्रेम-पाश में आलिंगन ही यथार्थ क्रिसमस है।
ईसामसीह की दिव्य मनीषा का पूर्णरूपेण अनुभव कीजिए। ईसामसीह के पद-चिह्नों का अनुसरण कीजिए। ईसामसीह के हृदय की अगाध गहराई में प्रवेश कीजिए। अपने दैनिक जीवन में प्रेम, आनन्द तथा शान्ति की अभिव्यक्ति के लिए प्रयत्नशील रहिए। ईसामसीह के प्रेम तथा बलिदान को हृदयंगम कीजिए। अपने अन्तर में गुप्त, ईसामसीह को अभिव्यक्त कीजिए। 'शैलोपदेश' में निहित सन्देश का अनुसरण कीजिए। स्वयं को ईश्वरीय चेतना से सम्बद्ध कीजिए। ईसामसीह के उपदेशों में निहित मन्तव्यों का अनुसरण कीजिए। तुच्छ दर्प में लिप्त अपने व्यक्तित्व का विध्वंस कीजिए एवं स्वयं को ईसामसीह अर्थात् वैश्व आत्मा में समाहित कर दीजिए। यही यथार्थ क्रिसमस है।
ईश्वर के राज्य में प्रवेश के लिए सभी इच्छुक हैं; किन्तु आपमें से कितने लोगों के पास ईसामसीह की चेतना है? आप लोगों में कितने लोग विशुद्ध क्रिश्चियन हैं? आप लोगों में कितने लोग ऐसे हैं जो ईसामसीह के उपदेशों, निर्देशों तथा सिद्धान्तों का अनुगमन करते हैं? आप लोगों में उन लोगों की संख्या कितनी है जो अपने पड़ोसियों से आत्मवत् प्रेम करते हैं? जो लोग आन्तरिक शुचिता, विनम्रता, वैश्व प्रेम, उदारता तथा उदात्तता से समृद्ध हैं, वही लोग ईश्वर के राज्य अर्थात् सर्वोच्च शान्ति तथा अमरत्व के अधिकारी हैं।
हम लोगों में से अधिकांश में ईसामसीह की आन्तरिक चेतना का सर्वथा अभाव है। ईसामसीह के प्रेम की अपरिहार्य आवश्यकता है। प्रेम, दया तथा शुचिता के अभाव में क्रिसमस की उपयोगिता ही क्या है? प्रत्येक व्यक्ति अपने पड़ोसी का शोषण करना चाहता है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के विनाश के लिए लालायित है। क्या यही क्रिसमस है? क्या यही ईसामसीह की शिक्षा है?
यथार्थ क्रिसमस में आवागमन की प्रक्रिया नहीं है। यह शाश्वत है। क्रिसमस के अभिप्राय से केवल एक दिन परिचित न हो कर वर्ष-भर परिचित रहिए। ईसामसीह के वास्तविक अनुयायी तथा आग्रहशील आकांक्षी के लिए प्रत्येक दिन क्रिसमस है।
जन्म
जब पृथ्वी पर कोई घोर विपत्ति आती है, जब धर्म का क्षय होने लगता है, जब धरती अत्याचार तथा दुर्व्यवस्था से ग्रस्त हो जाती है और जब ईश्वर के प्रति लोगों की आस्था में ह्रास होने लगता है, तब पवित्र ग्रन्थों के प्रणयन, धर्म की रक्षा, अधर्म के विनाश तथा लोगों के मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा के पुनर्जागरण के लिए समय-समय पर महान् पुरुष अवतरित हुआ करते हैं। भारत अधोगति को प्राप्त हो चुका था। बाबर ने भारत पर आक्रमण कर दिया था और उसकी सेनाओं ने अनेक नगरों को लूट लिया था। बन्दी साधु-सन्तों को कठोर परिश्रम करने के लिए विवश किया जाता था। प्रत्येक स्थान पर अन्धाधुन्ध हत्याएँ हो रही थीं। राजा रक्त-पिपासु, निर्दयी तथा अत्याचारी हो गये थे। यथार्थ धर्म कहीं नहीं था। धार्मिक उत्पीड़न अबाध गति से चल रहा था। कर्मकाण्ड ने धर्म के यथार्थ स्वरूप को विकृत कर दिया था। लोगों के हृदय में असत्, कुटिलता, स्वार्थ तथा लोभ का समावेश हो चुका था। ऐसे समय में संसार में गुरु नानक का आगमन शान्ति, एकता, प्रेम तथा ईश्वर-भक्ति के सन्देश-वाहक के रूप में हुआ। उनका आगमन उस समय हुआ जब हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्षरत थे और वास्तविक धर्म का स्थान अर्थहीन अनुष्ठानों तथा मिथ्याडम्बरों ने ग्रहण कर लिया था। ऐसी परिस्थिति में उनका आगमन शान्ति, भ्रातृत्व अर्थात् मानवता की एकता, प्रेम तथा बलिदान के उपदेशों का प्रचार-प्रसार करने के लिए हुआ।
खत्री रहस्यवादी, कवि तथा सिख धर्म के संस्थापक नानक का जन्म सन् १४६९ में पंजाब के लाहौर जनपद में रावी-तट पर स्थित तलवन्डी ग्राम में हुआ। जिस घर में नानक का जन्म हुआ था, उसके एक पार्श्व में आज वह वेदिका अवस्थित है जिसे ननकाना साहब के नाम से जाना जाता है। नानक पंजाब तथा सिन्ध के धर्मगुरु के रूप में प्रसिद्ध हैं। नानक के पिता मेहता कालूचन्द थे जिन्हें लोग कालू कहा करते थे और जो गाँव के लेखपाल थे। वे कृषक भी थे। तृप्ता उनकी माता थीं। बाल्यावस्था से ही नानक रहस्यवादी मनोवृत्ति के थे और साधु-सन्तों से ईश्वर के सम्बन्ध में बातें किया करते थे। उनका मस्तिष्क मननशील और स्वभाव धर्मपरायण था। वे अपना समय ध्यान तथा आध्यात्मिक साधनाओं में व्यतीत करते थे। वे स्वभावतः एक गम्भीर प्रकृति के व्यक्ति थे। वे बहुत कम मात्रा में भोजन ग्रहण किया करते थे।
नानक की शिक्षा
सात वर्ष की आयु में उन्हें गोपाल पान्धा के पास हिन्दी पढ़ने के लिए भेजा गया। उनके शिक्षक ने उनसे एक पुस्तक पढ़ने के लिए कहा। नानक ने कहा- "ईश्वरीय ज्ञान के अभाव में इन सारी वस्तुओं की ज्ञान-प्राप्ति से क्या लाभ है?" तब शिक्षक ने उनके लिए एक काष्ठ-पट्टिका पर हिन्दी की वर्णमाला लिख दी। नानक ने शिक्षक से कहा- "महोदय, मुझे आप यह बताने की कृपा करें कि आपने कितनी पुस्तकों का अध्ययन किया है? आपके ज्ञान का विस्तार किस सीमा तक हो पाया है?" गोपाल पान्धा ने उत्तर दिया- "मुझे गणित तथा दुकानदारी के लिए आवश्यक हिसाब-किताब का ज्ञान है।" नानक ने कहा- "यह ज्ञान आपकी मुक्ति-प्राप्ति में किसी भी रूप में सहायक सिद्ध नहीं होगा।" बालक के इन शब्दों से शिक्षक आश्चर्यचकित रह गया। उसने उनसे कहा- "नानक, मुझे कोई ऐसा उपाय बताओ जो मुक्ति-प्राप्ति में मेरे लिए सहायक हो सके।" नानक ने कहा- "गुरुदेव, सांसारिक प्रेम को विदग्ध कर इसकी भस्म को मसि तथा अपनी बुद्धि को उत्तम लेखन-पत्र में परिणत कर लीजिए। इसके पश्चात् ईश्वर-प्रेम को अपनी लेखनी तथा अपने हृदय को लेखक का रूप प्रदान कर अपने गुरु के अनुदेशन में लेखन तथा ध्यान किया कीजिए। ईश्वर के नाम तथा उसकी प्रशस्ति को लिपिबद्ध कीजिए। यह भी लिखिए, 'वह किसी भी पार्श्व से सीमित नहीं है।' गुरुदेव, आप अपने लेखन-कर्म में इन्हीं सब बातों को स्थान दीजिए।" उनकी इन बातों से शिक्षक स्तब्ध रह गया।
इसके पश्चात् कालू ने अपने पुत्र को पण्डित बृजनाथ के पास संस्कृत पढ़ने के लिए भेजा। पण्डित ने उनके समक्ष लिखा- 'ॐ'। नानक ने उनसे 'ॐ' शब्द का अर्थ पूछा। शिक्षक ने उत्तर दिया- "तुम्हें अभी 'ॐ' शब्द के अर्थ से परिचित होने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हारे समक्ष इसके अर्थ की व्याख्या में असमर्थ हूँ।" नानक ने कहा- "गुरुदेव, बिना अर्थज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता ही क्या है? मैं 'ॐ' के अर्थ को स्पष्ट करूँगा।" इसके पश्चात् नानक ने 'ॐ' के महत्त्व की विस्तृत व्याख्या की। शिक्षक इसे सुन कर आश्चर्य चकित रह गया।
नानक का व्यवसाय
कालू ने नानक को सांसारिकता की ओर अभिमुख करने के लिए अथक प्रयास किये। उन्होंने नानक को कृषि-कर्म में प्रयुक्त किया; किन्तु नानक का ध्यान इस दिशा में अल्प मात्रा में भी आकर्षित न हो सका। खेतों में भी वे ध्यान-मग्न हो जाया करते थे। वे पशुओं को गोचर भूमि में ले जाते थे; किन्तु उनका मन भगवद्भक्ति पर ही केन्द्रित रहता था। एक बार उनके पशु एक पड़ोसी के खेत में प्रविष्ट हो गये। कालू ने उनके इस आलस्य के लिए उनकी भर्त्सना की। नानक ने कहा- "मैं आलसी नहीं हूँ। मैं अपने निजी खेतों की रखवाली कर रहा हूँ।" कालू ने उनसे पूछा- "तुम्हारे खेत कहाँ हैं?" नानक ने उत्तर दिया- "मेरा शरीर खेत, मन हलवाहा, सम्यक् आचरण कृषि-कर्म, विनय सिंचाई का जल, हरि-नाम बीज, सन्तोष पटेला तथा विनम्रता इस खेत के परिरक्षणार्थ निर्मित बाड़ है। प्रेम तथा निष्ठा के माध्यम से इस खेत में बीज से प्रचुर मात्रा में उत्पादन होगा। धन्य है वह घर, जिसमें इस प्रकार के उत्पाद का संग्रहण होता है। महोदय, धन-सम्पत्ति परलोक में हमारे साथ नहीं जा सकेंगे। इसने समस्त संसार को सम्मोहित कर दिया है; किन्तु कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसके प्रवंचक स्वरूप से भली विधि परिचित हैं।"
इसके पश्चात् कालू ने उन्हें दुकानदारी का कार्य-भार सौंप दिया। नानक ने उस दुकान के सारे सामान को साधुओं तथा निर्धनों में वितरित कर दिया। उनके पिता के घर या दुकान में उन्हें जो भी वस्तु प्राप्त होती, वे उसका दान कर देते। वे कहते थे- "मेरी दुकान देश-काल से निर्मित है जिसमें सत्य तथा आत्मानुशासन की सामग्री संग्रहीत है। मेरा व्यापारिक व्यवहार अपने ग्राहक साधु-महात्माओं से ही होता है जो निस्सन्देह अत्यन्त लाभप्रद है।"
जब नानक पन्दरह वर्ष के थे, तब उनके पिता ने उनको बीस रुपये देते हुए कहा- “नानक, बाजार में जा कर कुछ लाभप्रद वस्तुएँ खरीद लाओ।" कालू ने नानक के साथ अपने नौकर बाला को भी भेज दिया। नानक और बाला तलवन्डी से लगभग बीस मील दूर स्थित चूहड़ काना नामक गाँव में पहुँचे। वहाँ नानक की भेंट फकीरों के एक दल से हो गयी। उन्होंने मन-ही-मन सोचा- 'इस समय मुझे इन फकीरों को भोजन कराना चाहिए। मेरे लिए यह सर्वाधिक लाभप्रद सौदा होगा।' उन्होंने शीघ्र ही भोज्य पदार्थो का प्रबन्ध कर उनको विधिवत् भोजन कराया। इसके पश्चात् वे घर लौट आये। नौकर ने अपने स्वामी को उनके पुत्र के इस सौदे की सूचना दे दी। इससे क्षुब्ध हो कर कालू ने नानक के मुँह पर एक चपत लगा दी।
पिता ने सोचा कि नानक की रुचि गृह-कार्य में नहीं है। अतः उन्होंने नानक से कहा- "मेरे प्रिय पुत्र, अब तुम घोड़े पर सवार हो कर पर्यटन करते हुए कोई व्यवसाय करो। यह तुम्हारे स्वभाव के सर्वथा अनुरूप होगा।" नानक ने कहा- "पूज्य पिता जी, दिव्य ज्ञान ही मेरा व्यवसाय तथा मेरे शुभ कार्यों का प्राचुर्य ही मेरा लाभ है। इससे निश्चित रूप में ईश्वर-धाम में मेरा प्रवेश हो जायेगा।"
तब कालूचन्द ने नानक से कहा- "यदि व्यापार-व्यवसाय में तुम्हारी रुचि नहीं है, तो तुम किसी कार्यालय में काम करो।" नानक ने कहा- "मैं पहले से ही ईश्वर का दास हूँ। अपने प्रभु की सेवा में मैं निष्कपट भाव एवं पूर्ण मनोयोग से अपने कर्तव्य पालन के लिए सचेष्ट रहता हूँ। मैं उसके आदेश का पालन परोक्ष रूप से करता हूँ। मैं प्रभु की अथक तथा अविरत सेवा के पुरस्कार-स्वरूप उसके दैवी अनुग्रह का आकांक्षी हूँ।" यह सुन कर उनके पिता मौन हो गये और वहाँ से चले गये।
नानक का विवाह
गुरु नानक के केवल एक बहन थी जिसका नाम नानकी था। उसका विवाह जयराम से हुआ था जो नवाब दौलत खाँ लोधी का दीवान था। दौलत खाँ लोधी दिल्ली के तत्कालीन सम्राट् सुलतान बहलोल का सम्बन्धी था। कपूरथला के निकट सुलतानपुर में नवाब की सुविस्तृत जागीर थी। नानक की बहन के विवाह के पश्चात् शीघ्र ही नानक का भी विवाह हो गया। उनकी पत्नी का नाम सुलक्षणी था जो जनपद गुरदासपुर-स्थित बटाला के मुला नामक व्यक्ति की पुत्री थी। विवाह तथा दो पुत्रों के जन्म के कारण नानक की आध्यात्मिक खोज के मार्ग में कोई भी व्यतिरेक उपस्थित नहीं हो सका। उस समय भी वे वनों में तथा एकान्त स्थानों पर जा कर ध्यान करते थे।
नानक नानकी तथा जयराम के लिए अत्यधिक प्रेम तथा सम्मान के पात्र थे। तलवन्डी का जमींदार राय बुलर भी उनका बहुत अधिक आदर करता था। राय बुलर तथा जयराम ने सोचा कि नानक को सुलतानपुर में किसी व्यवसाय में लगा देना चाहिए। जयराम नानक को नवाब के पास ले गये जिसने उन्हें अपने भण्डार-गृह का प्रभारी बना दिया। नानक ने अपने कर्तव्य का निर्वाह सन्तोषजनक रूप में किया। उनके कार्य से लोगों को अत्यन्त प्रसन्नता होती थी। उन दिनों वेतन मुद्रा के रूप में न मिल कर वस्तुओं के रूप में मिला करता था। इस प्रकार नानक को भी खाद्य-पदार्थ तथा अन्य वस्तुएँ मिला करती थीं। इनका अल्पांश अपने भरण-पोषण के लिए रख कर वे शेषांश को निर्धनों में वितरित कर दिया करते थे।
नानक के दो पुत्र (१४९४ ई. में जन्म-ग्रहण करने वाले श्रीचन्द तथा १४९७ ई. में जन्म-ग्रहण करने वाले लक्ष्मीचन्द) थे। श्रीचन्द ने संसार का परित्याग कर साधुओं के एक सम्प्रदाय की स्थापना की जिसे उदासी-सम्प्रदाय कहा जाता है। उनकी दाढ़ी तथा उनके शिर के केश लम्बे होते थे। उनके शरीर के किसी भी अंग पर उस्तरे का प्रयोग कठोरतापूर्वक वर्जित था। लक्ष्मीचन्द सांसारिक व्यक्ति थे जिनके दो पुत्र थे।
सेवा-मुक्त हो कर नानक ने अपनी सारी वस्तुएँ निर्धनों में वितरित कर दर्दी। फकीर का वेश धारण कर वे वन-वासी हो गये। उन्होंने कठोर तपस्या तथा गहन ध्यान की साधना की। ये समस्त विवरण सिखों की पवित्र पुस्तक आदि ग्रन्थ में संग्रहीत तथा परिरक्षित हैं।
उन्हीं दिनों मरदाना नामक एक चारण तलवन्डी से उनके पास आया और उनका भृत्य तथा निष्ठावान् भक्त हो गया। जब भी नानक अपने भजनों का सस्वर पाठ करते, वह उनके पास रहता। वह एक कुशल संगीतज्ञ था। वह नानक के साथ उनके भजनों की आवृत्ति किया करता था। चौंतीस वर्ष की आयु में नानक एक सर्वविदित उपदेशक हो गये। उनके उपदेश उनके आध्यात्मिक लक्ष्य से सम्बद्ध हुआ करते थे। सर्वसाधारण के मन पर उनके उपदेशों का गहन प्रभाव पड़ा। सुलतानपुर का परित्याग कर वे उत्तर भारत का भ्रमण करने लगे।
तलवन्डी का जमींदार राय बुलर अत्यधिक वृद्ध हो गया था। वह नानक का दर्शन करना चाहता था। अतः उसने नानक के पास अपना एक सन्देश-वाहक भेजा। नानक शीघ्र ही तलवन्डी पहुँचे, जहाँ वे राय बुलर के अतिरिक्त अपने माता-पिता तथा सम्बन्धियों से भी मिले। नानक के सभी सम्बन्धियों ने उनके साथ अपने सम्बन्धों की दुहाई दे कर उन्हें उनके लक्ष्य से विरत करने का प्रयास करते हुए उनसे सुखमय पारिवारिक जीवन व्यतीत करने का आग्रह किया। नानक ने कहा- "क्षमाशीलता मेरी माता, सन्तोष मेरा पिता, सत्य मेरा चाचा, प्रेम मेरा भाई, अनुराग मेरा चचेरा भाई, धृति मेरी पुत्री, शान्ति मेरी महिला सहचारिणी एवं बुद्धि मेरी सेविका है। मेरे परिवार का निर्माण इसी विधि से हुआ है जिसके सदस्य मेरे निष्ठावान् सहचर हैं। अखिल ब्रह्माण्ड का स्रष्टा अद्वितीय ईश्वर मेरा पति है। उसका परित्याग करने वाले को जन्म-मरण के चक्र में आबद्ध हो कर विविध रूपों में कष्ट भोगना होगा।"
बाबर गुरु नानक से अत्यन्त प्रभावित था। वह उनका बहुत अधिक आदर करता था। उसने उन्हें बहुमूल्य उपहार दिये। नानक ने इन्हें अस्वीकार कर उससे कहा कि वह एमिनाबाद के बन्दियों को मुक्त कर उन्हें उनकी सम्पत्ति लौटा दे। बाबर ने शीघ्र ही उनकी इच्छाओं की पूर्ति कर उनसे धार्मिक अनुदेशन की याचना की। गुरु नानक ने उससे कहा- "ईश्वर की उपासना करो, उसका नाम-जप करो, मद्य-पान तथा द्यूत-क्रीड़ा का परित्याग करो, सदाचारी बनो, साधु-सन्तों तथा धर्म-परायण व्यक्तियों का आदर-सत्कार करो, सबके प्रति दया का व्यवहार करो और विजित व्यक्तियों के प्रति सदय रहो।”
गुरु नानक का तप तथा ध्यान
ईश्वर के बोध की सम्यक् उपलब्धि के लिए नानक ने ध्यान की कठोर साधना की। वे सर्वदा गहन ध्यान की मनःस्थिति में रहते थे। उनमें शरीराध्यास नहीं रह गया था। उनके माता-पिता ने सोचा कि वे किसी रोग से गम्भीर रूप से ग्रस्त हो गये हैं। अतः उन्होंने उनके पास एक चिकित्सक को भेजा। नानक ने उससे कहा- "आप मेरे रोग के निदान तथा उसकी औषधि बताने के लिए आये हैं। आप मेरी नाड़ी देखिए। आप एक अबोध चिकित्सक हैं और आपको यह ज्ञात नहीं है कि रोग का सम्बन्ध मेरे मन से है। आप अपने घर जाइए। मैं ईश्वरोन्माद से ग्रस्त हूँ। मेरे रोग से कुछ ही लोग परिचित हैं। जिस भगवान् ने मुझे यह दुःख दिया है, वही इसका उपशमन भी करेगा। मुझे ईश्वर का पार्थक्य-दुःख है। मुझे मृत्यु-प्रदत्त कष्ट का अनुभव हो रहा है। हे अबोध चिकित्सक, आप मुझे कोई औषधि मत दीजिए। मुझे इस बात से दुःख की प्रतीति हो रही है कि मेरा शरीरान्त रोग से होगा। ईश्वर को विस्मृत कर मैं ऐन्द्रिय सुखों में लिप्त रहा। तभी मुझे यह कष्ट भोगना पड़ा। दुष्ट-हृदय को दण्ड दिया जाता है। यदि कोई व्यक्ति ईश्वर के नाम के एक अंश की भी आवृत्ति कर लेता है, तो उसका शरीर स्वर्ण-सदृश तथा उसकी आत्मा विशुद्ध हो जाती है। उसके सभी रोग-कष्ट विनष्ट हो जाते हैं। प्रभु के नाम स्मरण से नानक की भी रक्षा हो जायेगी। चिकित्सक महोदय, आप अब अपने घर जाइए। मेरे शाप के अधिकारी मत बनिए और मुझे अकेला छोड़ दीजिए।"
नानक ने कुछ दिनों तक के लिए अन्न-जल का परित्याग कर दिया। वे दिव्य मनन तथा ध्यान में पूर्णतः तल्लीन हो गये। उन्होंने पूर्णरूपेण मौन-व्रत धारण कर लिया। वे कई दिनों तक अरण्य-वास करते रहे।
नानक संसार में सत्तर वर्षों तक जीवित रहे। वे एक स्थान से दूसरे स्थान का भ्रमण करते रहे। वे पहले गुजराँवाला जनपद-स्थित सैयदपुर में गये और तत्पश्चात् उन्होंने कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, वृन्दावन, वाराणसी, आगरा, कानपुर,अयोध्या, प्रयाग, पटना, राजगीर, गया तथा पूरी की यात्रा की। उनकी चार यात्राएँ बृहद् थीं। उन्होंने श्रीलंका, मयमार, मक्का तथा मदीना की भी यात्रा की। वे बंगाल, दक्षिण भारत, श्रीलंका, तुकी, अरब, बगदाद, काबुल, कन्धार तथा स्याम तक गये। उन्होंने पण्डितों तथा मुल्लाओं से वाद-विवाद किया। गया, हरिद्वार तथा अन्यान्य तीर्थ-स्थानों के पण्डों से शास्त्रार्थ किया। उन्होंने अनेक लोगों के अज्ञान तथा भ्रम का निराकरण किया। उन्होंने सब लोगों को धार्मिक जीवन-यापन, भ्रातृ-प्रेम तथा आतिथ्य-धर्म का उपदेश दिया। अपने उपदेश में उन्होंने कहा- "हरि-नाम-स्मरण करो। ईश्वर से प्रेम करो और उसके प्रति निष्ठावान् रहो। अपने पड़ोसियों की सेवा करो। ईश्वर ही हमारा सर्वस्व है। सर्वदा उसकी प्रार्थना करो और उससे तादात्म्य-जनित आनन्द प्राप्त करो।" लोगों के हृदय-परिवर्तन, उनके श्रद्धा-विश्वास की प्राप्ति एवं उनको सम्यक् आचार तथा भक्ति के मार्ग की ओर अभिमुख करने में नानक ने विशिष्ट सफलता अर्जित की। उन्होंने हिन्दू-मुसलिम एकता के लिए अत्यधिक प्रयत्न किया।
गुरु नानक मुलतान की ओर बढ़े। वे एक नदी के तट पर रुके। मुलतान सर्वदा से फकीरों का नगर रहा है। प्रह्लाद का जन्म मुलतान में ही हुआ था और शम्स तबरेज़ तथा मन्सूर की कर्म-भूमि भी यही नगर था। पीरों को गुरु नानक के मुलतान आगमन की सूचना प्राप्त हो गयी। उन्होंने उनके लिए दूध से लबालब भरा एक पात्र भेजा। गुरु नानक ने उस दुग्ध-पात्र में कुछ बताशे तथा उनके ऊपर एक फूल रख कर उसे लौटा दिया। मरदाना ने अपने स्वामी (नानक) से कहा कि दूध-जैसी वस्तु को न लौटा कर उसे ग्रहण कर लेना ही उचित होता है। गुरु नानक ने कहा- "देखो मरदाना, तुम बुद्ध हो। पीरों ने एक चाल चली थी। उन्होंने दूध मेरे पीने के लिए नहीं भेजा था। इसके अन्तर्गत एक गहन दर्शन निहित है जिसकी अर्थवत्ता अत्यन्त गम्भीर है। इसका तात्पर्य यह है कि जिस तरह यह पात्र दूध से लबालब भरा है, उसी प्रकार मुलतान भी पीरों और फकीरों से भरा हुआ है और अब यहाँ अन्य किसी धर्मोपदेशक के लिए कोई स्थान नहीं है। मैंने प्रत्युत्तर में उन्हीं का अनुसरण किया है। मैंने उनसे कहा है कि जैसे दूध में बताशा घुल-मिल जाता है, वैसे ही मैं उनमें घुल-मिल जाऊँगा और दुग्ध-पात्र में रखे गये फूल की तरह उनके ऊपर आधिपत्य प्राप्त कर लूँगा।" तब पीर तथा फकीर गुरु नानक को देखने आये। नानक ने एक भजन गाया जिसे सुन कर उन दम्भी तथा उद्धत पीरों को ज्ञान हुआ। उन्होंने विनम्र शब्दों में गुरु नानक से कहा - "आदरणीय गुरु, आप हम लोगों को क्षमा कीजिए। हम आत्माभिमान से ग्रस्त थे। कृपया हमें आध्यात्मिक उपदेश तथा आशीर्वाद दीजिए।" गुरु नानक ने उन्हें उपदेश तथा आशीर्वाद दिया।
दो चमत्कार
गुरु नानक की मक्का-यात्रा से दो विशिष्ट घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। एक रात मक्का में जब नानक सो रहे थे, तब उनके पैर काबा की ओर हो गये थे। मुसलमान अपनी प्रार्थना के समय काबा की दिशा में नमन करते हैं। काजी रुकनुद्दीन ने नानक को इस स्थिति में देख कर उनसे क्रुद्ध स्वर में पूछा- "अरे विधर्मी, तुमने अपने पैर ईश्वर की दिशा में कर के उनका अनादर करने का दुस्साहस कैसे किया?" उसने नानक पर पदाघात भी कर दिया। नानक ने संयत हो कर कहा- "मैं थका हुआ हूँ। मेरे पैरों को आप स्वयं उस दिशा में मोड़ दीजिए जिधर ईश्वर का वास स्थान नहीं है।" काजी रुकनुद्दीन ने क्रोधित हो कर उनके पैरों को विपरित दिशा में मोड़ दिया। मसजिद में भी गति का संचार होने लगा। यह देख कर काजी स्तब्ध रह गया। तत्पश्चात् वह गुरु नानक की महिमा से परिचित हो गया।
१५२० ई. में गुरु नानक उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रदेश के अटक जनपद-स्थित हसन अबदल गये। वहाँ वे एक पहाड़ी के अधोभाग में एक पीपल के वृक्ष की छाया में बैठ गये। पहाड़ी के ऊपर बली कन्धारी नामक एक मुसलिम सन्त रहता था। उन दिनों पहाड़ी के ऊपर एक निर्झर था जहाँ से मरदान पानी लाया करता था। गुरु नानक वहाँ अल्प अवधि में ही अत्यधिक जनप्रिय हो गये। उस मुसलिम सन्त के हृदय में नानक के प्रति ईर्ष्या जाग्रत हो ने उस मुसलिम सन्त के इस आचरण की सूचना गुरु नानक को दे दी। गुरु गयी। उसने मरदाना पर वहाँ से पानी ले जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। मरदाना नानक ने मरदाना से कहा- "मरदाना, तुम्हें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर हम लोगों के लिए नीचे ही पानी भेज देगा।" पहाड़ी के ऊपर जो निर्झर था, वह शीघ्र ही सूख गया और पहाड़ी के जिस अधोभाग में नानक ठहरे थे, वहाँ एक निर्झर फूट निकला। इस पर सन्त क्रोधित हो गया। उसने पहाड़ी के ऊपर से नानक पर एक बड़ी चट्टान फेंकी जिसे नानक ने अपने खुले हाथ से रोक लिया। उस चट्टान पर आज भी उनके हाथ का चिह्न अंकित है। तत्पश्चात् वह सन्त गुरु नानक के पास आ कर उनके चरणों पर गिर पड़ा और उसने उनसे क्षमा-याचना की। गुरु नानक ने मुस्करा कर उस उद्धत सन्त को क्षमा प्रदान कर दी। वहाँ उस निर्झर के पार्श्व में अब एक सुन्दर गुरुद्वारा है जिसे पंजा साहब कहा जाता है।
गुरु नानक के उपदेश
गुरु नानक को इस सत्य की अनुभूति हो गयी थी कि हरि-नाम-स्मरण का स्थगन अनुचित है। इसे प्रत्येक साँस के साथ चलना चाहिए; क्योंकि किसी को यह ज्ञात नहीं है कि जो साँस भीतर गयी है, उसका प्रत्यावर्तन होगा कि नहीं होगा। नानक कहते हैं- "हम एक साँस के व्यक्ति हैं। मैं इससे दीर्घ कालावधि से परिचित नहीं हूँ।" गुरु नानक केवल उसी को यथार्थ सन्त कहते हैं जो प्रत्येक श्वास-प्रश्वास के साथ हरि-नाम-स्मरण करता है। यह आदर्श व्यवहार्य तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्भव है। वे लोगों से कहते हैं कि समय नष्ट न करके शीघ्रातिशीघ्र इसको (हरि-नाम-स्मरण को) प्रारम्भ कर देना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि लक्ष्य प्राप्ति में व्यवधान उपस्थित करने वाले प्रजाति, वर्ण, जाति, मत या वर्ग नामक तत्त्व इस मार्ग में किसी अवरोध की सृष्टि नहीं करते। उन्होंने धर्मों के भ्रातृत्व के महान् सत्य का अनुभव कर लिया था। उन्होंने लोगों को मानव के सार्वभौमिक भ्रातृत्व तथा ईश्वर के पितृत्व का उपदेश दिया।
गुरु नानक एक सुधारक थे। उन्होंने सामाजिक भ्रष्टाचार की भर्त्सना की। उन्होंने रूढ़िवाद और कर्मकाण्ड का घोर विरोध तथा शान्ति और मानव-मानव के पारस्परिक प्रेम के सन्देश का प्रचार-प्रसार किया। उनका दृष्टिकोण अत्यन्त उदार था। वे जातिगत नियमों का पालन नहीं करते थे। लोगों के अन्ध-विश्वास के निराकरण के लिए उन्होंने अधिकाधिक प्रयत्न किये। उन्होंने शुचिता, न्याय, भद्रता तथा ईश्वर के प्रति प्रेम के उपदेश दिये। उन्होंने नैतिक प्रदूषण के विनाश, ईश्वरोपासना में यथार्थ तत्त्व के सन्निवेश तथा धर्म और ईश्वर के प्रति वास्तविक श्रद्धा की सृष्टि के लिए अथक प्रयास किये। परमात्मा से आत्मा के तादात्म्य के माध्यम के रूप में हरि-नाम-संकीर्तन के समय उन्होंने गायन में संगीत के प्रचलन का प्रारम्भकिया। वे जहाँ-जहाँ जाते थे, मरदाना को साथ ले जाते थे जिससे वह उनके गायन के समय रेबेक (सारंगीनुमा वाद्य) बजा सके। वे कहते थे- "ईश्वर तथा मानवता की सेवा करो। केवल मानवता की सेवा से स्वर्ग में हमारा स्थान सुरक्षित हो जायेगा।" महिलाओं के प्रति गुरु नानक के हृदय में अत्यधिक आदर का भाव था। उन्होंने उनको सभी धार्मिक सभाओं तथा सम्मेलनों में सम्मिलित होने और ईश्वर के संकीर्तन की अनुमति प्रदान कर दी थी। धार्मिक समारोहों में उनको उनकी पूरी भागीदारी प्राप्त थी।
गुरु नानक स्पष्ट कहते हैं- "ईश्वर-धाम का मार्ग दीर्घ तथा श्रम-साध्य है। समृद्ध लोगों के लिए इसको लघु नहीं बनाया जा सकता। इसमें प्रत्येक व्यक्ति को अनुशासन का पालन करना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति को मानवता की सेवा तथा नाम-स्मरण के माध्यम से अपने मन का शुद्धिकरण करना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी प्रतिवाद के ईश्वरेच्छा के अनुरूप जीवन व्यतीत करना चाहिए। ईश्वर की सम्प्राप्ति का मार्ग क्या है? इसका एक ही मार्ग है और वह यह है कि तुम अपनी इच्छा को उसकी इच्छा लिया था। उन्होंने लोगों को मानव के सार्वभौमिक भ्रातृत्व तथा ईश्वर के पितृत्व का उपदेश दिया।
गुरु नानक एक सुधारक थे। उन्होंने सामाजिक भ्रष्टाचार की भर्त्सना की। उन्होंने रूढ़िवाद और कर्मकाण्ड का घोर विरोध तथा शान्ति और मानव-मानव के पारस्परिक प्रेम के सन्देश का प्रचार-प्रसार किया। उनका दृष्टिकोण अत्यन्त उदार था। वे जातिगत नियमों का पालन नहीं करते थे। लोगों के अन्ध-विश्वास के निराकरण के लिए उन्होंने अधिकाधिक प्रयत्न किये। उन्होंने शुचिता, न्याय, भद्रता तथा ईश्वर के प्रति प्रेम के उपदेश दिये। उन्होंने नैतिक प्रदूषण के विनाश, ईश्वरोपासना में यथार्थ तत्त्व के सन्निवेश तथा धर्म और ईश्वर के प्रति वास्तविक श्रद्धा की सृष्टि के लिए अथक प्रयास किये। परमात्मा से आत्मा के तादात्म्य के माध्यम के रूप में हरि-नाम-संकीर्तन के समय उन्होंने गायन में संगीत के प्रचलन का प्रारम्भकिया। वे जहाँ-जहाँ जाते थे, मरदाना को साथ ले जाते थे जिससे वह उनके गायन के समय रेबेक (सारंगीनुमा वाद्य) बजा सके। वे कहते थे- "ईश्वर तथा मानवता की सेवा करो। केवल मानवता की सेवा से स्वर्ग में हमारा स्थान सुरक्षित हो जायेगा।" महिलाओं के प्रति गुरु नानक के हृदय में अत्यधिक आदर का भाव था। उन्होंने उनको सभी धार्मिक सभाओं तथा सम्मेलनों में सम्मिलित होने और ईश्वर के संकीर्तन की अनुमति प्रदान कर दी थी। धार्मिक समारोहों में उनको उनकी पूरी भागीदारी प्राप्त थी।
गुरु नानक स्पष्ट कहते हैं- "ईश्वर-धाम का मार्ग दीर्घ तथा श्रम-साध्य है। समृद्ध लोगों के लिए इसको लघु नहीं बनाया जा सकता। इसमें प्रत्येक व्यक्ति को अनुशासन का पालन करना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति को मानवता की सेवा तथा नाम-स्मरण के माध्यम से अपने मन का शुद्धिकरण करना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी प्रतिवाद के ईश्वरेच्छा के अनुरूप जीवन व्यतीत करना चाहिए। ईश्वर की सम्प्राप्ति का मार्ग क्या है? इसका एक ही मार्ग है और वह यह है कि तुम अपनी इच्छा को उसकी इच्छा में परिणत कर उसके साथ सामंजस्य स्थापित कर लो। इसके लिए अन्य कोई मार्ग नहीं है।" दैवी इच्छा को अपनी इच्छा में परिणत करने के प्रथम चरण की सम्प्राप्ति दैवी कृपा के लिए प्रार्थना- गुरु-प्रसाद के लिए अरदास के माध्यम से होती है। गुरु नानक प्रार्थना को बहुत अधिक महत्त्व प्रदान करते हैं। वे कहते हैं कि दैवी कृपा के अभाव में मनुष्य द्वारा कुछ भी नहीं प्राप्त किया जा सकता। वे कहते हैं- "ईश्वर के समक्ष विनम्र हो कर जाओ। स्वयं को उसकी दया पर छोड़ दो। दम्भ, आत्म-प्रदर्शन तथा अहंकार का परित्याग करो। उसकी दयालुता तथा कृपा की भिक्षा की याचना करो। अपनी क्षमता, मनीषा तथा अपने सामर्थ्य के सम्बन्ध में कुछ भी मत सोचो। उसके प्रेम तथा उससे तादात्म्य की खोज में मृत्यु के लिए भी उद्यत रहो। जिस प्रकार कोई स्त्री अपने पति से प्रेम करती है, उसी प्रकार तुम ईश्वर से प्रेम करो। उसके प्रति स्वयं को निस्संकोच भाव से पूर्णरूपेण अर्पित कर दो। तुम्हें दैवी कृपा तथा प्रेम की सम्प्राप्ति हो सकती है।"
नानक की रहस्यवादी कविताएँ 'जपुजी' में संकलित हैं। ब्राह्ममुहूर्त में इसे सभी सिख गाते हैं। 'सोहिला' सान्ध्य-प्रार्थनाओं का संकलन है। शाश्वत आनन्द के परम धाम में पहुँचने के लिए मनुष्य को जिन चरणों को पार करना पड़ता है, उनका 'जपुजी' में नानक ने संक्षिप्त और जीवन्त वर्णन किया है। इन चरणों अर्थात् खण्डों की संख्या पाँच है। प्रथम खण्ड को धर्म खण्ड (कर्तव्य का परिमण्डल) कहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन समुचित रीति से करना चाहिए। उसे धर्म-परायणता के मार्ग का अनुगमन करना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्मानुसार न्याय प्राप्त होगा।
द्वितीय चरण ज्ञान खण्ड या ज्ञान का परिमण्डल है जहाँ दिव्य ज्ञान-तत्त्व का आधिपत्य है। यहाँ साधक को आत्यन्तिक श्रद्धा तथा निष्कपट भाव से अपना कर्तव्य-पालन करना होता है। उसे इस सत्य का बोध हो जाता है कि केवल समुचित विधि से कर्तव्य-पालन के माध्यम से ही शाश्वत आनन्द के धाम अर्थात् जीवन के चरम लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।
तृतीय खण्ड को 'शरम खण्ड' अर्थात् आनन्दातिरेक का परिमण्डल कहते हैं। यहाँ आध्यात्मिक हर्षोल्लास तथा सौन्दर्य है। यहाँ धर्म मानव-प्रकृति में घुल-मिल कर उसका एक अंग हो जाता है। यह उसके स्वभाव का एक संघटक तत्त्व हो जाता है। यह मात्र कर्तव्य या ज्ञान में निहित कोई तत्त्व नहीं रह जाता।
चतुर्थ खण्ड 'कर्म खण्ड' या शक्ति का परिमण्डल है। इस परिमण्डल का शासक शक्ति का ईश्वर है। इसमें साधक को शक्ति की सम्प्राप्ति होती है। वह एक शक्तिशाली नायक तथा अजेय व्यक्ति हो जाता है। इस स्थिति में मृत्यु का भय समाप्त हो चुका होता है।
पंचम खण्ड 'सच खण्ड' या सत्य का परिमण्डल है जहाँ निराकार का आधिपत्य है। यहाँ साधक का ईश्वर से तादात्म्य-स्थापन और उसे ईश्वरत्व की उपलब्धि हो जाती है। दिव्यता में रूपान्तरित इस व्यक्ति को अपने जीवन के लक्ष्य की सम्प्राप्ति हो जाती है। अब वह अपने अन्तिम विश्राम स्थल की खोज में सफल हो जाता है। इस प्रकार आत्मा की इस श्रमसाध्य यात्रा का अन्त हो जाता है।
गुरु नानक पुनः-पुनः इन बातों पर बल देते हैं- "सबसे अपने ऐक्य भाव का अनुभव करो, ईश्वर से प्रेम करो, मनुष्य में स्थित ईश्वर से प्रेम करो, ईश्वर-प्रेम का संकीर्तन करो तथा ईश्वर के नाम की आवृत्ति करते रहो। उसकी महिमा का गुणगान करो। ईश्वर से उसी प्रकार प्रेम करो जिस प्रकार कमल जल से, चातक बादल से तथा कोई स्त्री अपने पति से करती है। अपने दिव्य प्रेम को लेखनी तथा अपने हृदय को लेखक के रूप में परिणत कर दो। यदि तुम हरि-नाम की आवृत्ति करते हो, तो तुम्हें जीवन का वरदान प्राप्त होगा; किन्तु यदि तुम इसे विस्मृत करते हो, तो मृत्यु से तुम्हारी रक्षा असम्भव है। ईश्वर के समक्ष अपने हृदय द्वार को उन्मुक्त कर दो। उसका सान्निध्य प्राप्त करो। उसकी बाँहों में आबद्ध हो कर दिव्यालिंगन का अनुभव प्राप्त करो।”
अपनी एक भजनावली में नानक ने अपने उपदेशों के भावार्थ को निम्नांकित शब्दों में व्यक्त किया है :
"सन्त किसी भी मत के क्यों न हों, उनसे प्रेम करो। अहंकार का परित्याग करो। स्मरण रखो-धर्म का तत्त्व है विनम्रता और सहानुभूति; सांसारिक प्रलोभनों के बीच रहते हुए अच्छा और पवित्र जीवन-यापन। उत्तम वस्त्र, योगियों के वस्त्र, भस्म, मुण्डित शिर, दीर्घ प्रार्थनाएँ, मन्त्रोच्चारण, तप द्वारा शरीर का उत्पीड़न, तपस्वी-जैसा जीवन-यापन-ये धर्म के तत्त्व नहीं हैं।
गुरु नानक के अनुयायियों के लिए 'वाहे गुरु' गुरु-मन्त्र है। जप के लिए दूसरा महत्त्वपूर्ण मन्त्र है : "एक ओंकार सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरु प्रसादि" अर्थात् ईश्वर एक है। उसका नाम सत्य है। वह स्रष्टा तथा समस्त संसार में परिव्याप्त है। वह भयमुक्त तथा अजातशत्रु है। वह अमर्त्य, अनादि, स्वयं-जन्मा तथा स्वयं-स्थित है। वह अज्ञान के अन्धकार को विनष्ट करने वाला तथा दयामय है। ईश्वर नित्य, अनादि तथा अनन्त है।
ग्रन्थ साहिब
गुरु नानक ने संस्कृत भाषा के स्वरूप का सरलीकरण कर इसके गुरुमुखी स्वरूप की खोज की। सिक्खों का यह धर्मग्रन्थ गुरुमुखी में है। सिक्खों तथा सिन्धियों द्वारा इसका पूजन होता है। ग्रन्थ साहिब प्रत्येक गुरुद्वारे में है। आदि ग्रन्थ के नाम से अभिहित इस ग्रन्थ में प्रथम पाँच गुरुओं के भजनों का संकलन है। उनको पंचम गुरु द्वारा एकत्र तथा सुव्यवस्थित कर एक ग्रन्थ का आकार दे दिया गया जिसे गुरु ग्रन्थ साहिब कहते हैं। इसमें कबीर तथा समकालीन वैष्णव सन्तों द्वारा रचित कुछ भजन भी हैं। बाद में इस पवित्र ग्रन्थ में दशवें गुरु द्वारा नौवें गुरु के भजनों को भी संकलित कर दिया गया है। गुरु नानक की रचनाएँ अत्यन्त विस्तृत हैं।
'ग्रन्थ साहिब' का प्रारम्भ निम्नांकित शब्दों में होता है : "ईश्वर केवल एक है जिसका नाम सत् अर्थात् स्रष्टा है।" इस ग्रन्थ में उच्चतम नैतिकता के विधान निहित हैं। निष्कलुष जीवन, गुरु-भक्ति, दया, दानशीलता, संयम, न्याय, ऋजुता, सत्य, त्याग, सेवा, प्रेम तथा मांसाहार का परित्याग- इन गुणों की गणना उन गुणों में की जाती है जिन पर पर्याप्त बल दिया गया है। इसके विपरीत काम, क्रोध, अहंकार, घृणा, अहमन्यता, लोभ, स्वार्थ, निर्दयता, पैशुन्य तथा कपटपूर्ण आचरण की कठोर शब्दों में भर्त्सना की गयी है।
गुरु नानक के अन्तिम दिन
अपने जीवन के अन्तिम चरण में गुरु नानक करतारपुर में आ बसे थे। वहाँ उनके परिवार के समस्त सदस्यों को पहली बार उनके सान्निध्य की प्राप्ति हुई। वहाँ एक धर्मशाला का भी निर्माण किया गया। मरदाना भी अपने गुरु के साथ रहता था। वहाँ प्रतिदिन प्रातःकाल तथा सन्ध्या काल में गुरु नानक द्वारा रचित 'जपुजी साहिब' तथा 'सोहिला' का पाठ उनकी उपस्थिति में हुआ करता था। १५३८ ई. में उनहत्तर वर्ष की आयु में गुरु नानक का देहान्त हुआ। गुरु अंगद ने गुरु नानक का उत्तराधिकार ग्रहण किया। गुरु अमरदास, गुरु रामदास, गुरु अर्जुनदेव, गुरु हरगोविन्द, गुरु हर राय, गुरु हर कृष्ण, गुरु तेगबहादुर तथा गुरु गोविन्दसिंह अन्य गुरुओं के नाम हैं।
गुरु नानक की कृपा से आप सभी कृतार्थ हों !
धर्म तथा दर्शन के सम्बन्ध में समस्त भारत में अव्यवस्था व्याप्त थी। चार्वाक, लोकायत, कापालिक, शाक्त, सांख्य, बौद्ध तथा माध्यमिक-जैसे कई एक सम्प्रदायों का प्रादुर्भाव तथा बहत्तर धर्मों का अभ्युदय हो चुका था जो परस्पर संघर्षरत थे। शान्ति-जैसी कोई वस्तु नहीं रह गयी थी और सब-कुछ अस्त-व्यस्त हो चला था। लोग अन्धविश्वास से ग्रस्त थे। ऋषियों, सन्तों तथा योगियों की जो धरती कभी सुख-समृद्धि से पूर्ण थी, उसमें अब अन्धकार व्याप्त हो गया था। आर्यों की महिमामयी भूमि की अवस्था दयनीय हो गयी थी। शंकराचार्य के अवतार-ग्रहण के पूर्व देश की यही दशा थी।
यदि भारत में वैदिक धर्म आज भी जीवित है, तो इसका श्रेय शंकर को ही है। वैदिक धर्म की विरोधी शक्तियाँ आज से भी अधिक बहुसंख्यक तथा बलवती र्थी; किन्तु शंकर ने अल्पावधि में ही उन्हें अकेले ही पराभूत कर वैदिक धर्म एवं अद्वैत वेदान्त को उनकी पूर्व-महिमा में पुनः प्रतिष्ठित कर दिया। अपने इस अभियान में उन्होंने केवल विशुद्ध ज्ञान तथा आध्यात्मिकता के आयुध का ही उपयोग किया था। राम तथा कृष्ण-जैसे शंकर-पूर्व अवतारों को धर्म-विरोधी शक्तियों की पराजय के लिए शारीरिक शक्ति का प्रयोग इसलिए करना पड़ा था कि उन दिनों इन आसुरी शक्तियों का अभ्युदय दैहिक अवरोध तथा उत्पीड़न के माध्यम से ही हुआ था। कलियुग में धर्म के समक्ष जो संकट उपस्थित हो गया था, उसका प्रारूप बाह्य से अधिक आन्तरिक तथा शारीरिक से अधिक मानसिक था। उस समय प्रायः प्रत्येक व्यक्ति के मन में अधर्म के बीज अंकुरित हो रहे थे। अतः अशुभ के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए एकमात्र ज्ञान तथा आत्मशुद्धि के शस्त्र की ही आवश्यकता थी। इस शस्त्र को तीक्ष्णता तथा क्षमता प्रदान करने के लिए शंकर ने ब्राह्मण-परिवार में जन्म-ग्रहण कर जीवन के पूर्वाह्न में ही संन्यास ग्रहण कर लिया। राम तथा कृष्ण-जैसे पूर्वकालिक अवतारों ने क्षत्रिय-वर्ण में जन्म लिया था। इसका कारण यह था कि उनके युग में धर्म के पुनरुद्धार के लिए सैन्य बल की आवश्यकता थी।
भारतीय दर्शन में शंकराचार्य को जो विशिष्ट स्थान प्राप्त है, उससे निस्सन्देह सभी लोग परिचित हैं। बिना किसी प्रतिवाद के इस तथ्य की पुष्टि की जा सकती है कि यदि शंकर का जीवन-यापन उनके आदर्शों के अनुरूप नहीं हुआ होता और यदि उन्होंने अपने उपदेशामृत से इस देश को कृतकृत्य नहीं किया होता, तो अनेक शताब्दी पूर्व ही भारतवर्ष अपने यथार्थ स्वरूप से वंचित हो चुका होता तथा यहाँ उत्तरोत्तर आने वाले आक्रमणकारियों के कृपाणों, उनकी विध्वंसात्मक गतिविधियों एवं धार्मिक असहिष्णुता के विरुद्ध संघर्ष में वह नितान्त असमर्थ सिद्ध हो जाता। उनके वे उपदेश आज भी प्रत्येक निष्कपट जिज्ञासु तथा प्रत्येक सच्चे हिन्दू की रक्त-शिराओं को स्पन्दित कर रहे हैं।
जन्म
शंकर का जन्म सन् ७८८ ई. में आलवाइ से छह मील पूर्व कालडि नामक ग्राम के एक निर्धन परिवार में हुआ था। कालडि कोची-शोरानूर रेल-मार्ग पर अंगमालि रेलवे स्टेशन के निकट है। शंकर नम्बूदरी ब्राह्मण थे। राजशेखर नामक एक भूस्वामी ने कालडि में एक शिव-मन्दिर की स्थापना कर उसमें कार्यरत ब्राह्मणों के लिए एक अग्रहार का निर्माण कर दिया था। विद्याधिराज उस मन्दिर में पूजा किया करते थे। उनके शिवगुरु नामक एक पुत्र था जिसने शास्त्राध्ययन के पश्चात् उपयुक्त आयु में विवाह किया था। शिवगुरु निस्सन्तान थे। उन्होंने अपनी पत्नी आर्यम्बा के साथ सन्तान के लिए भगवान् शिव से प्रार्थना की। वसन्त ऋतु के आर्द्रा नक्षत्र के मांगलिक अभिजित महत में उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। यह पुत्र शंकर थे।
जब शंकर सात वर्ष के थे, तब उनके पिता का देहान्त हो गया। इस स्थिति में शंकर के पठन-पाठन की देख-भाल करने वाला कोई नहीं रहा। उनकी माता एक असाधारण गृहिणी थीं। उन्होंने शंकर के सर्वशास्त्राध्ययन पर विशेष ध्यान दिया। पिता के देहान्त के पश्चात् सात वर्ष की आयु में उनका यज्ञोपवीत-संस्कार हुआ। शंकर ने अल्पायु में ही असामान्य बुद्धि का प्रदर्शन किया। सोलह वर्ष की आयु में ही वे सभी दर्शनों तथा धर्म-विज्ञान के आचार्य हो गये। उन्होंने इसी आयु में गीता, उपनिषदों तथा ब्रह्मसूत्र के भाष्यों की रचना कर दी।
शंकर की माता अपने पुत्र के विवाह के लिए ज्योतिषियों से किसी कन्या की जन्म कुण्डली के विषय में परामर्श कर रही थीं; किन्तु शंकर ने संसार-त्याग तथा संन्यास ग्रहण का दृढ़ निश्चय कर लिया था। उनकी माता को इस बात से अत्यन्त दुःख हुआ कि उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके अन्तिम संस्कार के लिए कोई नहीं रह जायेगा; किन्तु शंकर ने उनको पूर्ण आश्वासन दिया कि वे मृत्युशय्या पर उनकी सेवा में सतत उद्यत रहेंगे और उनका दाह-संस्कार विधिवत् कर देंगे। किन्तु उनकी माता इससे आश्वस्त न हो सकीं।
एक दिन शंकर अपनी माता के साथ नदी में स्नान करने गये। शंकर नदी में कूद गये। वहाँ उनको ऐसा प्रतीत हुआ कि कोई मगर उनको खींचे चला जा रहा है। उन्होंने तीव्र स्वर में अपनी माता को पुकारते हुए कहा- "मेरी प्रिय माता, मुझे एक मगर पानी में लिये जा रहा है। अब मेरा अन्त समीप है। मुझे एक संन्यासी के रूप में मृत्यु को प्राप्त होने दो। मैं एक संन्यासी के रूप में शरीर-त्याग की सन्तुष्टि प्राप्त करना चाहता हूँ। मुझे तुम आतुर-संन्यास ग्रहण करने की अनुमति प्रदान करो।”
माता ने तत्काल ही उन्हें इसकी अनुमति प्रदान कर दी। तब शंकर ने शीघ्र ही आतुर-संन्यास ग्रहण कर लिया। मगर ने उन्हें निरापद जल से बाहर निकल जाने दिया। शंकर नाम मात्र के संन्यासी के रूप में नदी के बाहर आ गये। उन्होंने अपनी माता के समक्ष अपने वचन की पुनः पुष्टि की और उनको अपने सम्बन्धियों के संरक्षण में छोड़ कर अपनी सम्पत्ति उन लोगों को दे दी। तत्पश्चात् संन्यास की पावन दीक्षा के विधिवत् ग्रहण के लिए वे किसी आचार्य की खोज में निकल पड़े।
शंकर हिमालय-स्थित बदरिकाश्रम के एक पर्ण-कुटीर में गोविन्दाचार्य से मिले और उन्होंने उनको साष्टांग प्रणाम किया। गोविन्द ने शंकर से पूछा कि वे कौन हैं? शंकर ने उत्तर दिया- "हे पूज्य गुरुदेव, मैं न अग्नि हूँ, न आकाश; न जल हूँ, न पृथ्वी। मैं इनमें से कुछ भी न हो कर वह अमर्त्य आत्मा हूँ जो समस्त नाम-रूपों में अन्तर्भूत है।" अन्त में उन्होंने यह भी कहा- "मैं केरल के शिवगुरु नामक एक ब्राह्मण का पुत्र हूँ। मेरी बाल्यावस्था में ही मेरे पिता का देहान्त हो गया। मेरी माता ने ही मेरा पालन-पोषण किया। एक आचार्य के चरणों में बैठ कर मैंने वेदों तथा शास्त्रों का अध्ययन किया। एक दिन नदी में स्नान करते समय जब एक मगर ने मेरा पैर पकड़ लिया, तब मैंने आतुर-संन्यास ग्रहण कर लिया। कृपया अब मुझे पावन संन्यास की विधिवत् दीक्षा दीजिए।"
स्वामी गोविन्द शंकर द्वारा प्रस्तुत इस यथार्थ वृत्तान्त से अत्यधिक प्रसन्न हुए। उनको संन्यास-दीक्षा देने के पश्चात् उन्होंने उन्हें संन्यासी के लिए उपयुक्त वस्त्र प्रदान किये। इसके उपरान्त स्वामी गोविन्द ने उन्हें अद्वैत वेदान्त की शिक्षा दी जिसे उन्होंने स्वयं अपने गुरु गौड़पादाचार्य से ग्रहण किया था। अपने गुरु गोविन्दपाद की कृपा से शंकर समस्त दार्शनिक सिद्धान्तों तथा मतों से पूर्णरूपेण परिचित हो गये। गोविन्द ने उन्हें काशी जाने को कहा। काशी पहुँच कर शंकर ने ब्रह्मसूत्रों, उपनिषदों तथा गीता पर भाष्य लिखे। वहाँ उनकी कृतियों की जो आलोचना हुई, उसका उन्होंने सफलतापूर्वक प्रतिवाद किया।
तत्पश्चात् उन्होंने अपने दार्शनिक मत के प्रचार-प्रसार के अभियान का प्रारम्भकिया। शंकर के मन में अपने गुरु गोविन्दपाद तथा परम गुरु (गुरु के गुरु) गौड़पाद के प्रति अत्यधिक श्रद्धा थी।
शंकर का दिग्विजय-अभियान
शंकर का दार्शनिक विजय-अभियान संसार में अद्वितीय है। अपनी विजय-पताका उन्होंने सम्पूर्ण भारत पर फहरा दी। वे विभिन्न मतावलम्बी सम्प्रदायों के पीठाधीश्वरों से मिले। उन लोगों को उनकी युक्तियों के समक्ष विवश हो कर उनकी दार्शनिक अवधारणाओं के प्रति सहमत होना पड़ा और इस प्रकार उन्होंने अपने भाष्यों में प्रतिपादित धर्म के सत्य तथा वर्चस्व को प्रमाणित कर दिखाया। वे समस्त प्रख्यात ज्ञान केन्द्रों में गये। उन्होंने वहाँ के पण्डितों को शास्त्रार्थ की चुनौती दी और उनके समक्ष अपने तर्क प्रस्तुत कर उनकी आस्था को अपने मत तथा दृष्टिकोण के प्रति सुदृढ़ कर दिया। उन्होंने भट्ट भास्कर को पराजित कर उनके वेदान्त-सूत्र-भाष्य की भर्त्सना की और दण्डी तथा मयूर को अपने दर्शन की शिक्षा दी। तत्पश्चात् उन्होंने शास्त्रार्थ में 'खण्डन खण्ड खाद्य' के प्रणेता हर्ष, अभिनवगुप्त, मुरारी मिश्र, उदयनाचार्य, धर्मगुप्त, कुमारिल तथा प्रभाकर को पराजित किया।
इसके पश्चात् शंकर माहिष्मती गये। मण्डन मिश्र माहिष्मती की राजसभा के मुख्य पण्डित थे। मण्डन मिश्र को कर्ममीमांसा के मत में प्रशिक्षित किया गया था; अतः उनके मन में संन्यासियों के प्रति तीव्र घृणा के भाव थे। शंकर एक दिन उस स्थान पर पहुँचे जहाँ वे किसी के श्राद्ध-संस्कार में संलग्न थे। उन्हें देखते ही मण्डन मिश्र क्रोधोन्मत्त हो उठे। वार्तालाप अशोभन हो गया; किन्तु श्राद्ध-भोजन के लिए निमन्त्रित ब्राह्मणों ने हस्तक्षेप कर मण्डन मिश्र को शान्त कर दिया। इसके पश्चात् शंकर ने मण्डन मिश्र को धार्मिक वाद-विवाद की चुनौती दी जिसे मण्डन मिश्र ने स्वीकार कर लिया। भारती, जो मण्डन मिश्र की पत्नी तथा विपुल ज्ञान-राशि की स्वामिनी थी, को निर्णायिका मनोनीत किया गया। यह पहले ही निश्चित कर लिया गया कि यदि शंकर की पराजय हुई, तो वे गृहस्थ हो कर वैवाहिक जीवन व्यतीत करेंगे और यदि मण्डन मिश्र पराजित हुए, तो उनको संन्यास-ग्रहण कर स्वयं अपनी पत्नी से ही संन्यासी का वस्त्र ग्रहण करना होगा। वाद-विवाद विधिवत् प्रारम्भ हुआ और कई दिनों तक बिना किसी विघ्न-बाधा के चलता रहा। भारती ने इस वाद-विवाद को स्वयं नहीं सुना। उसने वाद-विवाद-रत दोनों व्यक्तियों के कन्धे पर एक-एक माला फेंक कर कहा- "जिसकी माला सर्वप्रथम मुरझाने लगेगी, उसे स्वयं को पराजित समझ लेना होगा।" इतना कह कर वह गृह-कार्य में संलग्न हो गयी। वाद-विवाद सत्तरह दिनों तक चलता रहा। तत्पश्चात् मण्डन मिश्र की माला मुरझाने लगी। इसके परिणाम स्वरूप उन्होंने स्वयं को पराजित मान कर संन्यास-ग्रहण करना तथा शंकर का अनुयायी बनना स्वीकार कर लिया।
भारती विद्या की देवी सरस्वती का अवतार थी। एक बार एक बृहद् सभा में ब्रह्मा तथा सरस्वती के समक्ष वेद-पाठ करते हुए ऋषि दुर्वासा से किंचित् त्रुटि हो गयी जिससे सरस्वती को हँसी आ गयी। इस पर दुर्वासा ने क्रुद्ध हो कर उन्हें भू-लोक में जन्म-ग्रहण का शाप दे दिया जिसके परिणाम-स्वरूप उन्हें भारती के रूप में जन्म लेना पड़ा।
भारती ने हस्तक्षेप करते हुए कहा- "मैं मण्डन की अर्धांगिनी हूँ। आपने उनके एक अर्धांश को ही पराजित किया है; अतः आप मुझसे भी वाद-विवाद कीजिए।" शंकर ने एक स्त्री से वाद-विवादों के विरोध में अपना प्रतिवाद व्यक्त किया; किन्तु भारती ने उनके समक्ष ऐसे उद्धरण प्रस्तुत किये जिनसे स्त्री-पुरुष के बीच हुए पूर्व-वाद-विवादों की पुष्टि हो जाती थी। अब शंकर भारती के प्रस्ताव से सहमत हो गये और वाद-विवाद प्रारम्भ हुआ जो अनवरत रूप से सत्तरह दिनों तक चलता रहा। भारती विभिन्न शास्त्रों से उद्धरण प्रस्तुत करती रही, किन्तु अन्ततः उसे अपनी पराजय का पूर्वाभास होने लगा; अतः उसने उन्हें काम-शास्त्र-सम्बन्धी वाद-विवाद के माध्यम से परास्त करने का निश्चय किया।
शंकर ने काम-सम्बन्धी वाद-विवाद के लिए भारती से एक मास के अवकाश की माँग की जिसे उसने स्वीकार कर लिया। शंकर ने काशी जा कर अपनी योग-शक्ति से अपने सूक्ष्म शरीर को अपने भौतिक शरीर से पृथक् लिया और अपने भौतिक शरीर को एक विशाल वृक्ष के छिद्र में रख दिया। अपने शिष्यों को अपने भौतिक शरीर की सुरक्षा का भार सौंप कर वे राजा अमरुक के मृत शरीर में प्रविष्ट हो गये जिसका शीघ्र ही दाह-संस्कार होने वाला था। राजा उठ खड़ा हुआ और वहाँ उपस्थित सभी लोग इस आश्चर्यप्रद घटना से हर्षोन्मत्त हो उठे।
मन्त्रियों तथा रानियों को शीघ्र ही उस पुनर्जीवित राजा में भिन्न गुणों तथा विचारों से युक्त किसी पृथक् व्यक्ति के दर्शन होने लगे। उनको अनुभव होने लगा कि उनके राजा के शरीर में किसी महात्मा की आत्मा का प्रवेश हो गया है; अतः उन्होंने दूतों को किसी विजन वन या किसी गुहा में गुप्त रूप से संरक्षित किसी मानव-शरीर की खोज तथा उसकी प्राप्ति के पश्चात् उसे जला देने के लिए भेज दिया। उन्होंने सोचा कि ऐसा करने से उन्हें राजा का दीर्घकालिक सम्पर्क प्राप्त हो जायेगा।
शंकर को रानियों के प्रेम के सारे अनुभव प्राप्त हो रहे थे। माया अत्यधिक शक्तिशालिनी है। शंकर ने अपने शिष्यों को उनके पास पुनः आगमन का वचन दिया था; किन्तु रानियों के सान्निध्य में रहते-रहते उनको अपना यह वचन पूर्णतः विस्मृत हो चुका था। शिष्य उनकी खोज करने लगे। उन्होंने राजा अमरुक के पुनर्जीवन की चमत्कारपूर्ण घटना की बात सुनी। इसके पश्चात् शीघ्र ही उन्होंने नगर में जा कर राजा से बात की। उन्होंने उनके समक्ष कुछ दार्शनिक गीत गाये जिसके फल-स्वरूप उनकी स्मृति पुनः जाग्रत हो गयी। शिष्य शीघ्र ही उस स्थान पर पहुँचे जहाँ शंकर का मृत शरीर छिपा कर रखा गया था; किन्तु उस समय तक दूतों को वह मृत शरीर प्राप्त हो चुका था और वे उसे जलाने जा रहे थे। उसी समय शंकर की आत्मा उनके शरीर में प्रविष्ट हो गयी। शंकर ने भगवान् हरि से सहायता की याचना की। इसके फल-स्वरूप शीघ्र ही वृष्टि होने लगी जिससे अग्नि की ज्वाला का शमन हो गया।
इसके पश्चात् शंकर मण्डन मिश्र के घर गये। वहाँ पूर्व-वाद-विवाद पुनः आरम्भ हुआ जिसमें उन्होंने भारती के सभी प्रश्नों के उत्तर सन्तोषजनक रूप से दे दिये। तत्पश्चात् मण्डन मिश्र ने अपनी सारी सम्पत्ति भेंट-स्वरूप शंकर को दे दी दे दी जिसे निर्धनों तथा दान-ग्रहण के लिए उपयुक्त पात्रों में वितरित कर दिया गया। मण्डन मिश्र शंकर के शिष्य हो गये। शंकर ने संन्यास के पावन आश्रम में दीक्षित कर उन्हें सुरेश्वराचार्य के नाम से अभिहित किया। सुरेश्वराचार्य प्रथम संन्यासी थे जिन्होंने श्रृंगेरी मठ का प्रभार ग्रहण किया। भारती भी शंकर के साथ श्रृंगेरी चली गयी जहाँ आज भी उसकी पूजा होती है। भारत के प्रत्येक अंचल से वैदिक विद्वानों को आमन्त्रित कर और उनके अनेक प्रश्नों के उत्तर दे कर शंकर सर्वज्ञता की उच्च पीठिका पर आसीन हो गये। इसके अतिरिक्त अपने युग के समस्त धार्मिक प्रतिद्वन्द्वियों को परास्त तथा वैदिक धर्म की श्रेष्ठता स्थापित कर वे जगद्गुरु हो गये। उनके इन प्रतिद्वन्द्वियों में भिन्न-भिन्न बहत्तर मतों के प्रति आस्थावान् अनुयायी थे।
अन्य धार्मिक सम्प्रदायों पर शंकर की विजय सर्वांगतः पूर्ण थी; अतः भारत-भूमि पर उनको चुनौती देने का साहस किसी सम्प्रदाय में नहीं रह गया। इनमें से कई सम्प्रदाय तो विलुप्त ही हो गये। शंकर के युग के पश्चात् भी कई एक आचार्यों का आविर्भाव हुआ; किन्तु शंकर ने अपने प्रतिद्वन्द्वियों को जिस अदम्य उत्साह तथा शक्ति से परास्त कर अपनी श्रेष्ठता को प्रमाणित किया था, उसका उनमें सर्वथा अभाव था।
माता का दाह-संस्कार
अपनी माता के गम्भीर रोग से पीड़ित होने की सूचना प्राप्त होने पर शंकर अपने शिष्यों को छोड़ कर अकेले ही कालडि की ओर चल पड़े। तब उनकी माता रोग-शय्या पर थीं। उन्होंने श्रद्धा-स्वरूप उनके चरणों का स्पर्श किया और भगवान् हरि से स्तुति की, जिसके फल-स्वरूप स्वर्ग-दूतों का आगमन हुआ और वे अपने भौतिक शरीर का परित्याग कर उनके साथ गो-लोक में चली गयीं।
अपनी माता के दाह-संस्कार के समय शंकर को गम्भीर विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ा। गृहस्थों के लिए विहित आचार संहिता का पालन संन्यासियों के लिए वर्जित है। सभी नम्बूदरी ब्राह्मण शंकर के विरोधी थे। शंकर को अपने सम्बन्धियों का सहयोग भी नहीं प्राप्त हो सका। यहाँ तक कि चिता को अग्नि को समर्पित करने के लिए उन्होंने उन्हें अग्नि भी नहीं दी। अन्ततः उन्होंने अकेले ही दाह-संस्कार का निश्चय किया, किन्तु वे अकेले ही शव को उठा पाने में असमर्थ थे; अतः उन्होंने शव को खण्ड-खण्ड कर घर के पृष्ठ भाग तक पहुँचा दिया जहाँ उन्होंने कदली-स्तम्भ से चिता का निर्माण कर उसे अपनी योग-शक्ति से प्रज्वलित कर दिया। शंकर नम्बूदरियों को एक पाठ पढ़ाना चाहते थे। उन्होंने अन्तिम संस्कार-सम्बन्धी स्थानीय लोकाचार को इस प्रथा में परिणत कर दिया जिसके अनुसार नम्बूदरी ब्राह्मणों के परिवार के किसी भी व्यक्ति के शव दाह के लिए प्रत्येक घर में एक पृथक् स्थान की व्यवस्था तथा दाह-संस्कार के पूर्व शव को खण्डित करना अनिवार्य हो गया।
इसके पश्चात् शंकर श्रृंगेरी लौट गये। वहाँ से वे बहुसंख्य अनुयायियों के साथ पूर्वी समुद्र-तट होते हुए पर्यटन के लिए निकल पड़े। वे जहाँ भी गये, वहाँ उन्होंने अद्वैत वेदान्त का उपदेश दिया। पुरी में उन्होंने गोवर्धन-मठ की स्थापना की। कांचीपुरम् में उन्होंने शाक्तों की भर्त्सना की और मन्दिरों का विशुद्धिकरण किया। चोल तथा पाण्ड्य राज्यों के शासकों को उन्होंने अपना पक्ष-समर्थक बना लिया। उज्जैन पहुँचे कर उन्होंने मानव-रक्त-पात में संलग्न भैरवों की नृशंसता का अन्त किया। वहाँ से वे द्वारका गये, जहाँ उन्होंने एक मठ की स्थापना की। तत्पश्चात् उन्होंने गंगा-तट पर स्थित कई स्थानों पर महान् व्यक्तियों से धार्मिक वाद-विवाद किये।
शंकर का अन्त
कामरूप अर्थात् आधुनिक गोहाटी पहुँच कर उन्होंने शाक्त भाष्यकार अभिनव गुप्त को वाद-विवाद में पराजित कर दिया। अभिनव को अपनी पराजय की अनुभूति अत्यन्त तीव्र रूप में हुई। उन्होंने अपने अभिचार-कौशल से शंकर को अर्श रोग से पीड़ित कर दिया; किन्तु पद्मपाद ने इस अभिचार-कौशल का उन्मूलन कर उन्हें रोग-मुक्त कर दिया। इसके पश्चात् वे हिमालय के पर्वतीय अंचलों में गये। जोशी में उन्होंने एक मठ तथा बदरी में एक मन्दिर की स्थापना की। वहाँ से वे उच्चतर पर्वतीय अंचल में स्थित केदारनाथ पहुँचे। वहाँ बत्तीस वर्ष की आयु में ८२० ई. में उन्होंने लिंग के साथ तद्रूपता प्राप्त कर ली।
श्रृंगेरी-मठ
कर्नाटक राज्य के उत्तरपूर्व पश्चिमी घाट के मनोरम पाद-गिरि में अक्षत वनों से आच्छादित श्रृंगेरी ग्राम स्थित है। शंकर ने अपने प्रथम मठ की स्थापना यहीं की। तुंगभद्रा नदी की एक शाखा तुंगा नदी इस उपत्यका से हो कर मन्दिर के प्राचीरों का स्पर्श करती हुई बहती है। इसका विशुद्ध तथा निर्मल जल पान के लिए उतना ही विख्यात है जितना गंगा का जल स्नान के लिए (गंगा स्नानम्, तुंगा पानम्)। श्रृंगेरी की भूमि अति-पवित्र तथा इसकी सुन्दरता मुग्धकारी है। मठ की व्यवस्था आज भी समुचित विधि से हो रही है। विद्यारण्य-जैसे इस मठ के अधीश्वरों की महानता के साथ-साथ इस मठ के संस्थापक की ख्याति के कारण भी साधक तथा भक्त जन इस मठ के प्रति अकृत्रिम हृदय से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
यहाँ इस बात का उल्लेख अप्रासंगिक नहीं होगा कि संस्कृत के सुविदित प्राध्यापक मैक्समूलर को ऋग्वेद पर विद्यारण्य, जो सायण के नाम से भी प्रसिद्ध हैं, के भाष्य के अनुवाद में तीस वर्ष लगे। विद्वान् प्राध्यापक अपने अनुवाद की भूमिका में कहते हैं कि इस अनुवाद-कर्म में तीस वर्षों के अन्तर्गत उन्हें किसी भी दिन दश मिनट से कम श्रम नहीं करना पड़ा। इस सम्बन्ध में एक रोचक घटना का भी उल्लेख मिलता है। जब पाण्डुलिपि के कुछ स्थल अपाठ्य-अस्पष्ट प्रतीत होते थे, तब मैसूर के तत्कालीन महाराजा के प्रभाव के कारण उन्हें श्रृंगेरी मठ में अभी तक सुरक्षित इसकी प्रथम मौलिक कृति की आधिकारिक प्रतिलिपि प्राप्त हो जाती थी।
श्री शारदा की वेदिका भी भक्तों को समानरूपेण आकर्षित करती है। भारत में ऐसे मठों तथा विहारों का बाहुल्य है जहाँ भारत के प्रत्येक अंचल से हिन्दू एकत्र होते हैं; किन्तु महानता तथा ख्याति में इनमें से कोई भी आदि शंकराचार्य के मूल-पीठ श्रृंगेरी के समकक्ष नहीं है। श्रृंगेरी मठ संसार के प्राचीनतन मठों में है जो बारह शताब्दियों से भी अधिक समय से निरन्तर आध्यात्मिक समृद्धि प्राप्त करता आ रहा है। शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार विद्यापीठों में यह प्रथम है। शेष तीन के नाम पुरी, द्वारका तथा जोशी हैं जिनमें से प्रत्येक हिन्दुओं के चार वेदों में से किसी एक वेद का प्रतिनिधित्व करता है।
शंकर ने अपने चार शीर्षस्थ शिष्यों (सुरेश्वराचार्य, पद्मपाद, हस्तामलक तथा तोटकाचार्य) को क्रमशः श्रृंगेरी मठ, जगन्नाथ-मठ, द्वारका-मठ तथा जोशी-मठ का प्रभारी बनाया। गुरु-परम्परा में वेदों के भाष्यकार तथा विजयनगर की वंश-परम्परा के आदि पुरुष विद्यारण्य निर्विवाद रूप से सर्वाधिक प्रसिद्ध संन्यासी थे। वे विजयनगर के दीवान थे। १३३१ ई. में उन्होंने संन्यास-ग्रहण कर लिया। विद्यारण्य के पूर्व के ग्यारह संन्यासियों के नाम हैं-शंकराचार्य, विश्वरूप, नित्यबोधघन, ज्ञानघन, ज्ञानोत्तम, ज्ञान गिरि, सिंह गिरीश्वर, ईश्वर तीर्थ, नरसिंह तीर्थ, विद्याशंकर तीर्थ तथा भारती कृष्ण तीर्थ।
श्रृंगेरी-मठ के ऐतिहासिक तथा पावन धर्माध्यक्षीय सिंहासन को व्याख्यान-मठ अर्थात् विद्यापीठ कहा जाता है। पारम्परिक रूप से प्रचलित एक जन-श्रुति के अनुसार शंकर के अगाध पाण्डित्य से प्रभावित हो कर सरस्वती ने इस विद्यापीठ को उन्हें प्रदान किया था। वर्तमान पीठाधीश्वर के पूर्व इस धर्माध्यक्षीय सिंहासन पर पैंतीस आचार्य आनुक्रमिक, नियमित तथा अव्यहित रूप से आसीन होते रहे हैं।
दशनामी संन्यासी
शंकर ने संन्यासियों को दश निश्चित अखाड़ों या संघों में संघटित किया जिन्हें सम्मिलित रूप से दशनामी कहते हैं। इन संन्यासियों के नाम के अग्रांश से निम्नांकित दश प्रत्ययों में से कोई एक प्रत्यय अवश्य सम्बद्ध रहता है :
सरस्वती, भारती, पुरी (श्रृंगेरी मठ), तीर्थ, आश्रम (द्वारका-मठ), गिरि, पर्वत तथा सागर (जोशी-मठ), वन तथा अरण्य (गोवर्द्धन-मठ)।
उक्त वर्गों में परमहंस शीर्षस्थ है। वेदान्त के दीर्घकालिक अध्ययन, ध्यान तथा आत्म-साक्षात्कार से परमहंस-पद की सम्प्राप्ति सम्भव है। अतिवर्णाश्रमी जाति तथा आश्रमों के परे होते हैं। वे सभी वर्गों के लोगों के साथ भोजन कर लेते हैं। शंकरमतावलम्बी संन्यासी समस्त भारत में पाये जाते हैं।
कुछ घटनाएँ
एक दिन शंकर अपने शिष्यों के साथ गंगा-स्नान को जा रहे थे। मार्ग में उनको एक चाण्डाल मिला जो अपने कुत्ते के साथ उसी मार्ग से कहीं जा रहा था। उसे शंकर के पार्श्व के निकट देख कर शंकर के शिष्यों ने उच्च स्वर में उसे उस मार्ग से अलग हट जाने के लिए कहा। इस पर चाण्डाल ने शंकर से कहा- "हे पूजनीय गुरु, आप अद्वैत वेदान्त के उपदेशक हैं। फिर भी आप मनुष्य-मनुष्य में इस सीमा तक भेद-दर्शन करते हैं। इसे आपके अद्वैत-मत के उपदेशों के अनुरूप कैसे समझा जा सकता है? क्या अद्वैत-मत एक सिद्धान्त मात्र है?" शंकर चाण्डाल के इस बुद्धिमत्तापूर्ण प्रश्न से हतप्रभ रह गये। उन्होंने मन-ही-मन सोचा- 'भगवान् शिव ने मुझे एक पाठ पढ़ाने के लिए यह रूप धारण किया है।' उन्होंने वहीं तत्काल पाँच श्लोकों की रचना कर दी जिसे मनीषा-पंचक कहते हैं। इनमें से प्रत्येक श्लोक का अन्त इस प्रकार होता है- "जो सर्वभूतों को अद्वैत के प्रकाश में देखने में अभ्यस्त है वही, चाहे वह चाण्डाल हो या ब्राह्मण, मेरा यथार्थ गुरु है।"
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काशी में एक विद्यार्थी संस्कृत-व्याकरण के कुछ सूत्र रटे जा रहा था। 'डुकृञ्करणे, डुकृञ्करणे', वह इसकी पुनः पुनः आवृत्ति कर रहा था। इसे सुन कर वे उस विद्यार्थी के अध्यवसाय से चकित रह गये। आत्मा की मुक्ति के सम्बन्ध में इस प्रकार के अध्ययन की अर्थहीनता को अनावृत करने के लिए उन्होंने तत्काल अपना सुप्रसिद्ध संक्षिप्त गीत 'भज गोविन्दम्' गाया जिसका अर्थ है, "गोविन्द की उपासना करो, गोविन्द की उपासना करो, गोविन्द की उपासना करो। हे मूढ़मते, अन्त-काल में संस्कृत के इन सूत्रों की आवृत्ति से तुम्हारी रक्षा नहीं हो पायेगी।"
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एक बार दुष्ट प्रकृति के कुछ व्यक्तियों ने शंकर को मद्य-मांस की भेंट दी; किन्तु शंकर के दाहिने हाथ के स्पर्श मात्र से मांस सेब तथा मद्य दूध हो गया।
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एक कापालिक ने शंकर से भेंट स्वरूप उनके शिर की याचना की। शंकर ने उसकी याचना को स्वीकार करते हुए कहा कि जब वे किसी एकान्त स्थान में ध्यानस्थ हों, तब वह उनका शिर ले ले। कापालिक उनके शिर को लक्ष्य कर उन पर कृपाण चलाना ही चाहता था कि शंकर के निष्ठावान् शिष्य पद्मपाद ने उसे पकड़ कर छुरे से उसकी हत्या कर दी। पद्मपाद भगवान् नृसिंह के उपासक थे। वस्तुतः भगवान् नृसिंह ने ही पद्मपाद के शरीर में प्रविष्ट हो कर उस कापालिक का वध कर दिया था।
शंकर का दर्शन
शंकर ने ब्रह्मसूत्रों, उपनिषदों तथा गीता पर भाष्य लिखे। ब्रह्मसूत्र पर उनके भाष्य को शारीरक भाष्य कहते हैं। उन्होंने 'सनत्सुजातीय' तथा 'सहस्रनाम अध्याय' पर भी भाष्य लिखे। प्रायः ऐसा कहा जाता है कि तर्कशास्त्र तथा 'मीमांसा' के अध्ययन के लिए शंकर के भाष्यों तथा भक्ति को स्फुरित तथा सुदृढ़ करने वाले व्यावहारिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए उनकी कृतियों 'विवेकचूड़ामणि', 'आत्मबोध', 'अपरोक्षानुभूति', 'आनन्द-लहरी', 'आत्म-अनात्म-विवेक', 'दृक्-दृश्य-विवेक' तथा 'उपदेश-साहस्री' का अध्ययन करना चाहिए। शंकर ने पद्य में भी अनेक मौलिक कृतियों का सृजन किया जो माधुर्य, स्वर-लालित्य तथा वैचारिकता में अद्वितीय हैं।
शंकर का परब्रह्म निर्गुण, निराकार, निर्विशेष तथा अकर्ता है। वह आप्तकाम है। शंकर कहते हैं- "यह आत्मा स्वयंप्रकाश है। आत्मा के अस्तित्व के प्रमाण द्वारा आत्मा की सिद्धि नहीं होती। आत्मा का निराकरण असम्भव है; क्योंकि जो उसका निराकरण कर रहा होता है, उसका वह सार-तत्त्व है। आत्मा सर्व ज्ञान का अधिष्ठान है। आत्मा आभ्यन्तर है, आत्मा बाह्य है; आत्मा पूर्व है, आत्मा पश्च है; आत्मा दक्षिण पार्श्व में है, आत्मा वाम पार्श्व में है; आत्मा ऊर्ध्व में है, आत्मा अधः में है।"
सत्यम्-ज्ञानम्-अनन्तम्-आनन्दम्- ये लक्षण एक-दूसरे से पृथक् नहीं हैं। ब्रह्म अवर्णनीय है; क्योंकि वर्णन में भेद अन्तर्निहित है। ब्रह्म की तुलना स्वयं ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तु से नहीं की जा सकती।
नामरूपात्मक जगत् की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। एकमात्र आत्मा की ही यथार्थ सत्ता है। जगत् की सत्ता मात्र व्यावहारिक है।
शंकर केवलाद्वैत-दर्शन के प्रतिपादक थे। उनके उपदेशों का सार निम्नांकित शब्दों में सन्निहित है :
"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मव नापरः एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है, जगत् मिथ्या है और जीव तथा ब्रह्म में तादात्म्य-सम्बन्ध है।"
शंकर ने विवर्तवाद का उपदेश दिया। जिस प्रकार रज्जु में सर्प का अध्यारोप किया जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म में जगत् तथा शरीर का अध्यारोप किया जाता है। यदि आपको रज्जु का ज्ञान हो जाता है, तो सर्प का भ्रम विनष्ट हो जाता है। इसी प्रकार ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति से शरीर तथा जगत् के भ्रम की निवृत्ति हो जाती है।
भारत माता ने जिन सपूतों को जन्म दिया है, उन कुशाग्रबुद्धि महान् आत्माओं में शंकर अग्रगण्य हैं। वे अद्वैत-दर्शन के प्रतिपादक थे। वे एक महान् तत्त्वमीमांसक, एक व्यावहारिक दार्शनिक, एक निर्भान्त तार्किक एवं गत्यात्मक व्यक्तित्व तथा एक नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति के स्वामी थे। जहाँ तक किसी विचार के ग्रहण तथा उसके स्पष्टीकरण का प्रश्न है, उनकी मेधा अपरिमित थी। वे एक सिद्ध योगी, ज्ञानी तथा भक्त थे। वे उच्च श्रेणी के कर्मयोगी भी थे। लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में उनकी क्षमता अप्रतिम थी।
ज्ञान की ऐसी कोई भी विधा नहीं है जो उनकी गवेषणा से वंचित रह गयी हो। इन सभी को उनकी अधिमानवीय बुद्धि के संस्पर्श द्वारा परिष्कृत तथा पूर्ण होने का सुयोग प्राप्त हुआ। शंकर तथा उनकी कृतियों के प्रति हमारे मन में प्रगाढ़ श्रद्धा है। उनके मन की उदात्तता, सौम्यता तथा दृढ़ता, प्रश्नों के उत्तर के सम्बन्ध में उनकी निष्पक्षता, उनकी अभिव्यक्ति की स्पष्टता-ये सभी बातें उनके प्रति हमारी श्रद्धा को अधिकाधिक सुदृढ़ करती हैं। जब तक आकाश में सूर्य प्रकाशित होता रहेगा, तब तक संसार उनके उपदेशों से वंचित नहीं होगा।
आज भी शंकर की प्रगाढ़ विद्वत्ता और दुरूह दार्शनिक समस्याओं की स्पष्ट व्याख्या के कारण संसार के समस्त दार्शनिक मतों के अनुयायी उनको श्रद्धा तथा सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। वे प्रचण्ड मेधा के स्वामी, तत्त्वद्रष्टा दार्शनिक, सुयोग्य प्रचारक, अनन्य उपदेशक, प्रतिभासम्पन्न कवि तथा महान् समाज-सुधारक थे। सम्भवतः किसी भी साहित्य के इतिहास में उनकी कोटि के विस्मयजनक रचनाकार का आविर्भाव नहीं हुआ। आधुनिक युग के पाश्चात्य विद्वान् भी उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। समस्त प्राचीन दार्शनिक सिद्धान्तों की तुलना में शंकराचार्य के सिद्धान्त सर्वाधिक अनुकूल तथा सुगमतापूर्वक ग्रहणीय हैं।
चेन्नई (मद्रास) से लगभग पचीस मील पश्चिम की ओर श्रीपेरम्बुदूर ग्राम में १०१७ ई. में रामानुज का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम केशव सोमयाजि तथा उनकी माता का नाम कान्तिमति था। कान्तिमति एक धर्मनिष्ठ तथा सद्गुण-सम्पन्न महिला थीं। रामानुज का तमिल नाम इलय पेरुमाल था। रामानुज के जीवन के प्रारम्भिक काल में ही उनके पिता का देहान्त हो गया। तत्पश्चात् वे अद्वैत-दर्शन के आचार्य यादवप्रकाश के यहाँ वेदाध्ययन के लिए कांचीपुरम् चले गये।
रामानुज अत्यन्त मेधावी छात्र थे। वैदिक ग्रन्थों की यादवप्रकाश की व्याख्या से वे सन्तुष्ट नहीं हो पाते थे। अपने आचार्य की व्याख्या की कई एक त्रुटियों की ओर वे संकेत किया करते थे। कभी-कभी वे स्वयं व्याख्या कर देते थे जो उनके सहपाठियों को रुचिकर तथा निर्भान्त प्रतीत होती थी। इससे यादवप्रकाश के मन में रामानुज के प्रति ईर्ष्या के भाव जाग्रत होने लगे।
यादवप्रकाश ने रामानुज की हत्या की योजना बनायी। उन्होंने रामानुज तथा उसके चचेरे भाई एवं सहपाठी गोविन्द भट्ट की वाराणसी की तीर्थयात्रा की व्यवस्था की। गोविन्द भट्ट यादवप्रकाश के कृपापात्र विद्यार्थी थे। यात्रा करते समय वे यादवप्रकाश की योजना से अवगत हो गये। उन्होंने रामानुज को इस आसन्न संकट की सूचना दे दी। इतना ही नहीं, उन्होंने इससे उनकी मुक्ति का भी प्रबन्ध कर दिया। ईश्वर की कृपा से वे एक आखेटक तथा उसकी पत्नी, जो उनसे मार्ग में मिल गये थे, की सहायता से बच गये।
दशम शताब्दी के अन्त तक दक्षिण भारत में दर्शन की विशिष्टाद्वैत-पद्धति सम्यक् रूप से स्थापित हो चुकी थी। कांचीपुरम्, श्रीरंगम्, तिरुपति तथा अन्य महत्त्वपूर्ण स्थानों के वैष्णव-मन्दिरों पर इस मत के अनुयायियों का आधिपत्य हो चुका था। महान् सन्त तथा बहुश्रुत विद्वान् यामुनाचार्य वैष्णव-संस्थाओं के अध्यक्ष थे। वे श्रीरंगम्-मठ के भी प्रधान थे। कांचीपूर्ण नामक उनका एक शिष्य कांचीपुरम् के मन्दिर में सेवारत था। कांचीपूर्ण शूद्र था; किन्तु उसकी धर्मनिष्ठा तथा भद्रता के कारण स्थानीय लोगों में उसके प्रति आदर तथा सम्मान के भाव थे। कांचीपुरम् में एक मन्दिर है जहाँ कांचीपूर्ण की एक प्रतिमा अधिष्ठापित की गयी है और वहाँ वह एक सन्त के रूप में पूजित है।
कांचीपूर्ण से प्रभावित युवा रामानुज के मन में उसके प्रति इतनी अधिक श्रद्धा थी कि उन्होंने उसको अपने घर भोजन के लिए निमन्त्रित कर दिया। उनका अभिप्राय कांचीपूर्ण को अपने हाथों भोजन कराने के पश्चात् स्वयं भोजन करना था। दुर्भाग्य से कांचीपूर्ण रामानुज की अनुपस्थिति में उनके घर गया जहाँ उनकी पत्नी ने उसको भोजन कराया। लौटने पर रामानुज ने देखा कि गृह-प्रक्षालन हो रहा है और शूद्र को भोजन कराने के प्रायश्चित्त-स्वरूप उनकी पत्नी स्नान कर रही हैं। इससे वे अत्यन्त क्षुब्ध हुए। उनकी पत्नी एक भिन्न सामाजिक मान्यता की रूढ़िवादी महिला थीं जिनसे अब वे विमुख होने लगे थे। ऐसी ही कुछ अन्य घटनाओं के पश्चात् उन्होंने स्वयं को गृहस्थाश्रम से मुक्त कर संन्यास-ग्रहण कर लिया।
उस समय तक यामुनाचार्य अत्यन्त वृद्ध हो चुके थे और किसी ऐसे सुयोग्य तथा सच्चरित्र युवक की खोज में थे जो श्रीरंगम्-मठ के अधीश्वर के रूप में उनका स्थान ग्रहण कर सके। उनके शिष्य रामानुज के सम्बन्ध में उनको पहले ही सूचित कर चुके थे और उन्होंने उन्हें अपने स्थान पर अधिष्ठित करने का विचार कर लिया था। उन्होंने रामानुज को बुलवाया; किन्तु उनके वहाँ पहुँचने के पूर्व ही यामुनाचार्य का देहान्त हो चुका था। वहाँ आने पर रामानुज ने देखा कि यामुनाचार्य के अनुयायी उनके शव को अन्तिम संस्कार के लिए गाँव के बाहर ले जा रहे हैं। रामानुज श्मशान तक उन लोगों के साथ गये। वहाँ उनको सूचित किया गया कि मृत्यु के पूर्व यामुनाचार्य अपनी तीन इच्छाओं के सम्बन्ध में निर्देश छोड़ गये थे और इन इच्छाओं की पूर्ति का आग्रह रामानुज से किया गया था। अब तक विशिष्टाद्वैत-दर्शन के अनुयायी विद्यार्थियों को व्यास के ब्रह्मसूत्र का प्रशिक्षण मौखिक रूप से ही दिया जाता था। यामुनाचार्य की इच्छा थी कि ब्रह्मसूत्र पर विशिष्टाद्वैत-दर्शन का अनुमोदन करने वाला एक भाष्य लिखा जाये एवं विष्णुपुराण के प्रणेता पराशर तथा सन्त सद्गोप के नाम को अमर किया जाये। रामानुज इसे सुन कर द्रवीभूत हो गये और उन्होंने उस श्मशान में ही यामुनाचार्य के शव के सम्मुख यह प्रतिज्ञा की कि वे यामुनाचार्य की तीनों इच्छाओं की पूर्ति करेंगे। रामानुज एक सौ बीस वर्षों तक जीवित रहे। इस अवधि में उन्होंने यामुनाचार्य की तीनों इच्छाओं की पूर्ति कर अपनी प्रतिज्ञा का पालन किया।
यामुनाचार्य की मृत्यु के पश्चात् श्रीरंगम् में या अन्यत्र रहने वाले उनके शिष्यों की इच्छा थी कि रामानुज श्रीरंगम् के मठाधीश्वर के रूप में यामुनाचार्य का स्थान ग्रहण करें। यामुनाचार्य ने भी यही इच्छा व्यक्त की थी। उनके इच्छानुसार समस्त अनुवर्ती अनुष्ठानों तथा समारोहों के साथ उन्हें श्रीरंगम् के विशिष्टाद्वैत-मठ के अधीश्वर के रूप में अधिष्ठित कर दिया गया।
इसके पश्चात् रामानुज नम्बि से पवित्र अष्टाक्षर-मन्त्र 'ॐ नमो नारायणाय' की जप-दीक्षा लेने के लिए तिरुकोत्तियूर गये। कारण जो भी रहा हो, नम्बि की यह इच्छा नहीं थी कि रामानुज का दीक्षा-संस्कार सुगमतापूर्वक सम्पन्न हो सके। रामानुज को दीक्षित करने का निर्णय लेने के पूर्व नम्बि ने उन्हें श्रीरंगम् से मदुराई के बीच लगभग अठारह बार पद-यात्रा करने को विवश किया। इसके अतिरिक्त उनको गोपनीयता की पवित्र शपथ भी ग्रहण करनी पड़ी। इसके पश्चात् नम्बि ने उन्हें विधिवत् दीक्षा दी और कहा- "रामानुज, इस मन्त्र को गोपनीय रखना। यह मन्त्र अत्यन्त शक्तिशाली है। इसे किसी पूर्व-परीक्षित सुयोग्य शिष्य को ही प्रदान करना।" किन्तु, रामानुज एक विशाल-हृदय व्यक्ति थे। वे अत्यन्त दयालु थे तथा मानवता के प्रति उनका प्रेम असीम था। उनकी इच्छा थी कि भगवान् नारायण के शाश्वत आनन्द की प्राप्ति प्रत्येक व्यक्ति को हो। उनको मन्त्र की आत्यन्तिक शक्ति का स्पष्ट बोध हुआ। उन्होंने जाति तथा मत पर बिना विचार किये मन्दिर के निकट सभी लोगों को बुलाया और स्वयं मन्दिर के मुख्य द्वार के शिखर पर खड़े हो कर तीव्र स्वर में वह पवित्र मन्त्र सबको प्रदान कर दिया। उनके गुरु नम्बि यह सुन कर अत्यन्त क्रुद्ध हुए। रामानुज ने कहा- "हे गुरुदेव, आप मेरे इस दोषपूर्ण कृत्य के लिए किसी उपयुक्त दण्ड की व्यवस्था कीजिए। यदि मेरे मन्त्र-दान से लक्ष-लक्ष लोगों को मोक्ष प्राप्त होता है, तो मैं नारकीय यन्त्रणा को भी सहन कर लूँगा।" नम्बि रामानुज से अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनके समक्ष रामानुज की विशाल-हृदयता तथा करुणा स्पष्टतः अनावृत हो उठी। उन्होंने उनको आलिंगित कर आशीर्वाद दिया और इस प्रकार आवश्यक अर्हता से सुसज्ज हो कर उन्होंने यामुनाचार्य का उत्तराधिकार ग्रहण किया।
इस समय तक रामानुज दूर-दूर तक प्रख्यात हो गये थे। वे वाद-विवाद में निष्णात थे। उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर अपना भाष्य लिखा जिसे 'श्रीभाष्य' कहते हैं। विशिष्टाद्वैत की पद्धति प्राचीन है। बोधायन ने ४०० ई.पू. में लिखित अपनी वृत्ति में इसका प्रतिपादन किया था। ब्रह्मसूत्र के बोधायन तथा रामानुज के प्रतिपादन में कोई अन्तर नहीं है। ब्रह्मसूत्र की जो व्याख्या बोधायन ने की थी, रामानुज ने उसी का अनुसरण किया। वैष्णवों के रामानुजीय सम्प्रदाय को 'श्री-सम्प्रदाय' कहते हैं। रामानुज ने 'वेदान्त-सार', 'वेदान्त-संग्रह' तथा 'वेदान्त-दीप' नामक तीन अन्य पुस्तकें भी लिखीं।
रामानुज ने भक्ति-मार्ग के प्रचार-प्रसार के लिए भारत का आद्योपान्त भ्रमण किया। उन्होंने इस देश के काशी, कश्मीर तथा बदरीनाथ-जैसे समस्त पवित्र स्थानों की यात्रा की। लौटते समय वे तिरुपति की पहाडियों में गये। वहाँ उन्होंने देखा की तिरुपति की पहाडियों में अधिष्ठित भगवान् के विग्रह के सम्बन्ध में शैवों तथा वैष्णवों में परस्पर अन्तर्कलह चल रहा है। एक दल इसका सम्बन्ध शैव-सम्प्रदाय से जोड रहा था और दूसरा वैष्णव-सम्प्रदाय से। रामानुज ने इन दोनों दलों के समक्ष यह प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि इस विवाद का निर्णय स्वयं भगवान् पर ही छोड़ दिया जाये। अतः उन लोगों ने प्रतीक-रूप में शिव तथा विष्णु के लिए कुछ वस्त्र रख दिये। इसके पश्चात् वे मन्दिर का द्वार बन्द कर वहाँ पहरा देने लगे। प्रातःकाल जब उन लोगों ने द्वार खोला, तब देखा कि भगवान् के विग्रह ने विष्णु का वस्त्र धारण कर लिया था और शिव का वस्त्र वहीं भगवान् के विग्रह के चरणों पर यथावत् पड़ा हुआ था। इस घटना से यह निश्चित हो गया कि मन्दिर वैष्णवों का था। तब से ले कर आज तक यह मन्दिर वैष्णव-मन्दिर ही है।
इसके पश्चात् रामानुज दक्षिण भारत के सभी वैष्णव-मन्दिरों में गये और अन्ततः श्रीरंगम् पहुँचे। वहाँ स्थायी रूप से रह कर उन्होंने स्वयं को विशिष्टाद्वैत-दर्शन के प्रवचन तथा ग्रन्थ-लेखन के श्रमसाध्य कर्म में नियोजित कर लिया। उनके प्रवचन को सुनने के लिए प्रतिदिन वहाँ सहस्रों श्रोता एकत्र होने लगे। उन्होंने मन्दिरों को स्वच्छ कर उनमें धार्मिक अनुष्ठानों के पालन की व्यवस्था की और समाज में प्रविष्ट कुरीतियों का निराकरण किया। उनके यहाँ सात सौ संन्यासी थे। इनके अतिरिक्त वहाँ मन्दिरों के विशेष कार्यों की समुचित व्यवस्था के लिए चौहत्तर अनुष्ठाता भी थे। उस परिसर में सहस्रों पवित्र-हृदय स्त्री-पुरुष रहते थे जो उनको ईश्वर की भाँति श्रद्धेय तथा पूजनीय समझते थे। उन्होंने लाखों व्यक्तियों को भक्ति-मार्ग की ओर उन्मुख किया। उन्होंने धोबियों को भी दीक्षित किया था। उनकी आयु सत्तर वर्ष की हो चुकी थी; किन्तु उनके भाग्य-लेख के अनुसार उन्हें अभी कई वर्षों तक
जीवित रहना, कुछ और मठों की स्थापना करना, कई मन्दिरों का निर्माण करना तथा अनेक लोगों को अपने मत में दीक्षित करना था।
उस समय चोल राज्य का अधिपति कुलोतुंग प्रथम था जो एक पूर्णतः निष्ठावान् शैव था। उसने रामानुज को शैव-मत ग्रहण करने तथा शिव को सर्वोच्च भगवान् मानने का आदेश दिया। रामानुज के शिष्यों में से कुरेस तथा महापूर्ण नामक दो शिष्य संन्यासियों के काषाय वस्त्र धारण कर रामानुज के स्थान पर स्वयं कुलोतुंग प्रथम की राजसभा में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने विष्णु की सर्वोच्चता के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किये; किन्तु चोलाधिपति ने उनकी बातों को अस्वीकृत कर उनकी आँखें निकलवा लीं।
वे दोनों भाग्यहीन व्यक्ति अपने पैतृक स्थान श्रीरंगम् की ओर चल पड़े। अत्यन्त वृद्ध महापूर्ण यात्रा का कष्ट सहन करने में असमर्थ थे; अतः मार्ग में ही उनका देहान्त हो गया। कुरेस अकेल ही श्रीरंगम् लौटे।
इस बीच रामानुज अपने कुछ अनुयायियों के साथ मैसूर से लगभग चालीस मील दूर पश्चिमी घाट की उपत्यका में पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपने निवास-स्थान की व्यवस्था करने के पश्चात् कुछ वर्ष उपदेश तथा लोगों को विशिष्टाद्वैत-मत में दीक्षित करने में व्यतीत किये।
उस स्थान का अधिपति होयसल वंशीय भट्टिदेव था। उसकी पुत्री प्रेताविष्ट थी और उसे अभी तक कोई भी व्यक्ति रोग-मुक्त नहीं कर पाया था। रामानुज उस प्रेत-बाधा के निराकरण में सफल हो गये और राजकुमारी अपने स्वास्थ्य की पूर्व-स्थिति को प्राप्त हो गयी। राजा रामानुज से अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने स्वेच्छापूर्वक उनका शिष्य बन कर उनसे वैष्णव-मत की दीक्षा ग्रहण कर ली। इसके पश्चात् रामानुज ने स्वयं को मैसूर-महाराजा के अधिकार-क्षेत्र में प्रतिष्ठित कर मेलकोट में एक मन्दिर का निर्माण कराया और वहाँ एक बृहद् वैष्णव-समुदाय की संरचना की। स्थानीय परया या दलित-वर्ग के लोग उनकी सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने उन्हें कुछ निश्चित दिनों को तथा कुछ सीमित सुविधाओं के साथ स्व-निर्मित मेलकोट के मन्दिर में प्रवेश का अधिकार प्रदान कर दिया। यह सुविधा उन्हें आज भी प्राप्त है।
रामानुज ने मैसूर में तथा इसके आस-पास कुछ अन्य विष्णु-मन्दिरों का भी निर्माण कराया और एक सुदृढ़ वैष्णव-समुदाय की स्थापना कर राज्य-भर में अपने कार्य के नैरन्तर्य को अक्षुण्ण रखने तथा विशिष्टाद्वैत-दर्शन और विष्णु-पूजा के प्रचार-प्रसार के लिए अपने शिष्यों को इसका प्रभारी बना दिया। इस प्रकार वे लगभग बीस वर्षों तक इस श्रम-साध्य कार्य में अनवरत रूप से संलग्न रहे। उनके अनुयायियों की संख्या कई सहस्र हो गयी।
इस बीच रामानुज को उत्पीड़ित करने वाले कुलोतुंग चोल प्रथम की मृत्यु हो गयी। रामानुज के अनुयायियों ने तत्क्षण रामानुज को इसकी सूचना देते हुए उनसे श्रीरंगम् लौटने की प्रार्थना की। रामानुज स्वयं श्रीरंगम् में अपने अनुयायियों के पास जाने तथा वहाँ के मन्दिर में पूजा करने के इच्छुक थे; किन्तु मेलकोट तथा अन्य स्थानों के उनके नव-दीक्षित शिष्य तथा अनुयायी उनको वहाँ से जाने नहीं देना चाहते थे; अतः उन्होंने स्वयं अपने लिए एक मन्दिर का निर्माण कर उसमें अपनी एक प्रतिमा प्रतिष्ठित कर दी जिससे उनके शिष्य तथा अनुयायी उनकी पूजा कर सकें। इसके पश्चात् वे उस स्थान का परित्याग कर श्रीरंगम् चले गये। श्रीरंगम् में उनके मित्रों तथा शिष्यों ने उनका भव्य स्वागत किया। कुलोतुंग चोल प्रथम का उत्तराधिकारी वैष्णव-मत का पक्षधर था जिसके परिणाम-स्वरूप रामानुज की चर्या में कभी कोई व्याघात नहीं आया। रामानुज अपने श्रमसाध्य कर्म में अनवरत रूप से तीस वर्ष तक संलग्न रहे। एक सौ वर्ष की दीर्घायु की प्राप्ति के पश्चात् ही उनकी दीर्घकालिक साधना की इतिश्री हो सकी।
रामानुज विशिष्टाद्वैत-दर्शन अर्थात् सविशेष अद्वैत के प्रतिपादक थे। रामानुज का ब्रह्म सविशेष अर्थात् सबल ब्रह्म है। रामानुज के उपदेशानुसार नारायण अर्थात भगवान् सर्वोच्च तत्त्व है: वैयक्तिक आत्मा चित् तथा जड़ जगत् अचित् है। रामानुज के अनुसार गुण या लक्षण यथार्थ तथा स्थायी हैं, किन्तु इनका नियमन ब्रह्म द्वारा होता है। इन गुणों या लक्षणों को प्रकार कहते हैं। भगवान् नारायण ब्रह्माण्ड के नियन्ता तथा स्वामी हैं। जीव उनका दास तथा उपासक है। भगवान् के प्रति जीव का सर्वतोभावेन समर्पण होना चाहिए। ईश्वर के अद्वैत-स्वरूप तथा इसके गुणों अर्थात् इसकी शक्तियों के बीच किसी प्रकार की असंगति के दर्शन नहीं होते; क्योंकि शक्तियों को अपने अस्तित्व के लिए ईश्वराश्रित होना अनिवार्य है।
मध्वाचार्य एक महान् दार्शनिक एवं ब्रह्मसूत्रों तथा दश उपनिषदों के शास्त्र-सम्मत भाष्यकार थे। उनका जन्म दक्षिण भारत में दक्षिण कनारा जनपद-स्थित उडुपि से कुछ मील दूर बेलाली में ११९९ ई. में हुआ था। जन्मतः वे तुलु ब्राह्मण थे। वे मध्य गेह तथा वेदवती के पुत्र थे। वेदवती एक सद्गुण-सम्पन्न महिला थीं। मध्व को वायु का अवतार माना जाता है। पिता ने उनको वासुदेव नाम से अभिहित किया था।
मध्व को व्यायाम तथा खेल-कूद की अन्य विधाओं में विशिष्टता प्राप्त थी। उनकी शारीरिक संरचना अद्भुत थी। उन्हें मल्लयुद्ध, दौड़, कूद-फाँद तथा तैराकी का भी ज्ञान था; अतः लोगों ने उन्हें 'भीम' का उपनाम दे दिया था। मध्व ने वेद-वेदांगों का अध्ययन किया और इनमें वे पूर्णतः पारंगत हो गये। अच्युतप्रकाशाचार्य से दीक्षा ग्रहण कर वे पचीस वर्ष की आयु में संन्यासी हो गये। तत्पश्चात् लोग उन्हें पूर्णप्रज्ञ के नाम से जानने लगे। अच्युतप्रकाशाचार्य ने देखा कि मध्व वेदान्त तथा अन्य शास्त्रों में सुदक्ष एवं एक मेधावी संन्यासी हैं। उन्होंने अपने स्थान पर स्वयं मध्व को अपने मठ का अधीश्वर बना दिया। अब मध्व ने आनन्द तीर्थ का नाम ग्रहण कर लिया। वे भक्ति के सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार के लिए उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत की एक दीर्घकालिक यात्रा पर चल पडे। उन्होंने कई लोगों को अपने मत में दीक्षित किया। वे बदरीनारायण गये और शीघ्र ही वहाँ से लौटने पर उन्होंने भगवद्गीता तथा वेदान्त-सूत्रों पर अपने भाष्य लिखे। मध्व-सम्प्रदाय के मुख्य केन्द्र उडुपि में उन्होंने कई मन्दिरों का निर्माण किया। मध्व के प्रति निष्ठावान् व्यक्तियों में से अधिकांश अपने जीवन में कम-से-कम एक बार उडुपि जाने का प्रयत्न अवश्य करते हैं।
मध्व अतिमानवीय शक्ति के स्वामी थे। उन्होंने अनेक चमत्कारों के प्रदर्शन किये। उन्होंने एक झंझावात-ग्रस्त नौका की रक्षा की। एक नौका, जिसमें भगवान् कृष्ण की प्रतिमा रखी थी, समुद्र में जल-मग्न हो गयी; किन्तु मध्व उस प्रतिमा को जल से बाहर निकाल लाये। उनकी यात्रा की अवधि में एक बार महाराष्ट्र के अधिपति ईश्वरदेव ने उन्हें एक बाँध के निर्माण कार्य में लगा दिया। मध्व का ध्यान इस बात की ओर गया कि वे अचेतनावस्था में प्रतिदिन राजा के लिए श्रम करते जा रहे हैं। एक बार जब वे स्नान करने गये, तब उन्होंने समुद्र की अशान्त लहरों को शान्त कर दिया।
मध्वाचार्य द्वैत-मत के महान् प्रतिपादक हैं। रामानुज के श्री वैष्णव-मत से पृथकता की सिद्धि के लिए उनके मत को सद्वैष्णव-मत कहा जाता है। उनके दर्शन के अनुसार विष्णु या नारायण सर्वोच्च तत्त्व हैं। माध्व-मत के प्रत्येक अनुयायी को पंच-भेद अर्थात् पाँच यथार्थ तथा नित्य-भेदों के प्रति दृढ़ आस्था व्यक्त करनी पड़ती है। ये पंच-भेद हैं- सर्वोच्च तथा वैयक्तिक आत्मा का पारस्परिक भेद, चेतन तथा जड़ तत्त्व का पारस्परिक भेद, एक जीव तथा अन्य जीव का पारस्परिक भेद, जीव तथा जड़ तत्त्व का पारस्परिक भेद एवं एक ही तत्त्व के एक अंश तथा अन्य अंश का पारस्परिक भेद। नामरूपात्मक जगत् यथार्थ तथा नित्य है। अंकन अर्थात् विष्णु के प्रतीकों का शरीर पर चित्रांकन, नामकरण अर्थात् अपनी सन्तान को भगवान् के नामों से अभिहित करना तथा भजन अर्थात् उसका गुण-गान-ये तीन बातें विष्णु की पूजा के मुख्य अंग हैं। मध्व ने ईश्वर-स्मरण की अनवरत साधना पर अत्यधिक बल दिया। वे कहते हैं "ईश्वर-स्मरण को हमें अपने स्वभाव के एक आवश्यक अंग के रूप में ग्रहण करना चाहिए। ऐसा करने से आपके लिए मृत्यु के क्षणों में ईश्वर-स्मरण सहज तथा स्वाभाविक हो जायेगा।" मध्व इस तथ्य के प्रति संकेत करते हुए कहते हैं कि भगवान् अवतार-ग्रहण के समय प्राकृत शरीर या भौतिक देह धारण किये हुए नहीं थे। उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए कठोर उपवास की व्यवस्था की थी।
वैराग्य, भक्ति तथा ध्यान के माध्यम से अपरोक्षानुभूति मुक्ति-प्राप्ति के साधन हैं। यदि साधक ईश्वर के दर्शन का इच्छुक है, तो उसे स्वयं को वेदाध्ययन, इन्द्रिय-निग्रह, अनासक्ति तथा पूर्ण आत्म-समर्पण के शस्त्र से सुसज्जित करना होगा। द्वैत-मत के प्रख्यात् प्रतिपादक मध्वाचार्य के उपदेशों के ये कुछ महत्त्वपूर्ण अंश हैं।
राजस्थान तथा गुजरात के वल्लभ-सम्प्रदाय के संस्थापक वल्लभाचार्य का जन्म १४७९ ई. में मध्य प्रदेश में रायपुर-स्थित चम्पारण में हुआ था। लक्ष्मण भट्ट उनके पिता तथा इल्लम्मा उनकी माता थीं। चैतन्य महाप्रभु के समकालीन वल्लभाचार्य तेलुगु ब्राह्मण थे। उन्हें अग्नि का अवतार कहा जाता है।
जब वल्लभाचार्य की आयु ग्यारह वर्ष थी, तब उनके पिता का देहान्त हो गया। अपनी आयु के बारहवें वर्ष में उन्होंने वाराणसी में वेदों, षड्-दर्शनों तथा अष्टादश पुराणों का विधिवत् अध्ययन पूर्ण कर लिया था। वाराणसी से वे वृन्दावन चले गये और तत्पश्चात् उन्होंने भारत के समस्त पवित्र स्थानों की यात्रा की।
विजयनगर के राजा कृष्णदेव की राजसभा में जा कर उन्होंने वहाँ के सभी प्रख्यात पण्डितों को पराजित किया। वल्लभ की मेधा तथा पाण्डित्य से राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें विपुल मात्रा में स्वर्णादि की भेंट दी। इसके अतिरिक्त उन्होंने उनको वैष्णवाचार्य की उपाधि से अलंकृत किया। वल्लभकी ख्याति तथा प्रभाव में निरन्तर वृद्धि होती गयी। विजयनगर से वल्लभ ने उज्जैन तथा अन्य स्थानों की यात्रा की।
वल्लभ का विवाह वाराणसी में हुआ। उनकी पत्नी का नाम महालक्ष्मी था। उनके दो पुत्र थे।
व्यास-सूत्र-भाष्य, जैमिनि-सूत्र-भाष्य, भागवत-टीका-सुबोधिनी, पुष्टि-प्रवाल-मर्यादा तथा सिद्धान्त-रहस्य उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं। ये सभी ग्रन्थ संस्कृत में हैं। उन्होंने ब्रजभाषा में भी कई ग्रन्थों की रचना की।
वल्लभ के अनुयायियों ने चम्पारण में उनके जन्म-स्थान पर एक मन्दिर का निर्माण किया। यह मन्दिर अत्यन्त लोकप्रिय है। लोग इसे तीर्थ-स्थान मान कर यहाँ आते हैं।
वल्लभ ने अपने जीवन के अन्तिम दिन वाराणसी में व्यतीत किये। उन्होंने सोचा कि उनके जीवन के लक्ष्य की पूर्ति हो चुकी है। एक दिन वे हनुमान्-घाट पर गंगा-स्नान के लिए गये। वहाँ लोगों ने देखा कि एक प्रोज्ज्वल प्रकाश-पिण्ड धरती से आकाश की ओर ऊर्ध्वगमन करता जा रहा है, वहाँ दर्शकों के समूह की उपस्थिति में वे आकाश में गमन करते हुए अदृश्य हो गये। यह घटना उनकी बावन वर्ष की आयु में १५३१ ई. में हुई।
वल्लभाचार्य शुद्ध अद्वैत अर्थात् दर्शन की शुद्धाद्वैत-शाखा के प्रतिपादक थे। श्रीकृष्ण सर्वोच्च ब्रह्म हैं। उनकी देह में सच्चिदानन्द की संसक्ति हैं। उन्हें पुरुषोत्तम कहा जाता है।
वल्लभ के अनुयायी बाल-कृष्ण की उपासना करते हैं। वल्लभ पुष्टि तथा भक्ति पर अत्यधिक बल देते हैं। महापुष्टि उच्चतम अनुग्रह है। यह साधकों को ईश्वरत्व-प्राप्ति में सहयोग प्रदान करता है। अग्नि से चिन्गारी की भाँति जागतिक पदार्थों का प्रादुर्भाव अक्षर (सच्चिदानन्द) से होता है।
दक्षिण भारत में आन्ध्र प्रदेश-स्थित वैडूर्यपत्तनम् में गोदावरी-तट पर अरुणमुनि नामक एक महान् सन्त रहते थे। उनकी धर्मपरायणा सहधर्मिणी का नाम जयन्तीदेवी था। श्री निम्बार्क उन्हीं दोनों के पुत्र थे। उनके आध्यात्मिक अभियान का काल ग्यारहवीं शताब्दी था। नामकरण-संस्कार के अवसर पर ब्राह्मणों की विद्वत्-मण्डली ने उस बालक को नियमानन्दाचार्य के नाम से अभिहित किया। निम्बार्क को अरुण ऋषि तथा हरिप्रियाचार्य के नाम से भी जाना जाता था।
अरुणमुनि तथा जयन्तीदेवी ने अपने पुत्र के यज्ञोपवीत-संस्कार के समापन के पश्चात् उसे वेद-वेदांग तथा दर्शन आदि के अध्ययन के लिए ऋषिकुल भेजा। वहाँ नियमानन्दाचार्य अल्पावधि में ही सभी शास्त्रों में निष्णात हो गये। वे प्रचण्ड मेधा के स्वामी थे। विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न इस बालक के दर्शन के लिए लोग भारत के कोने-कोने से आने लगे।
एक बार नियमानन्दाचार्य की किशोरावस्था में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा एक संन्यासी का वेश धारण कर अरुणमुनि के आश्रम में आये। सूर्यास्त होने वाला था और मुनि वहाँ नहीं थे। संन्यासी ने मुनि-पत्नी से भोजन की याचना की; किन्तु भोजन समाप्त हो चुका था। अतः उन्होंने मौन धारण कर लिया और संन्यासी वहाँ से जाने लगे।
नियमानन्दाचार्य ने अपनी माता से कहा- "हे माता, संन्यासी को बिना भोजन के नहीं लौटाना चाहिए। हम लोग अतिथि-धर्म के उल्लंघन के भागी होंगे।" माता ने कहा- "प्रिय पुत्र, तुम्हारे पिता बाहर गये हुए हैं और मेरे पास कन्द-मूल या फल, कुछ भी नहीं है। इसके अतिरिक्त मेरे पास भोजन बनाने का समय भी नहीं है। सूर्यास्त हो चुका है और संन्यासी सूर्यास्त के पश्चात् अन्न-ग्रहण नहीं करते।”
नियमानन्दाचार्य ने संन्यासी से कहा- "मैं आपके लिए वन से कन्द-मूल तथा फल शीघ्र ही ला दूँगा। मैं आपको इस बात के लिए आश्वस्त करता हूँ कि जब तक आप भोजन नहीं कर लेंगे, तब तक सूर्यास्त नहीं होगा।" इतना कह कर उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र आश्रम में एक नीम के पेड़ पर रख दिया जहाँ वह सूर्य की भाँति दीप्तिमान हो गया। संन्यासी का वेश धारण किये हुए ब्रह्मा इसे देख कर आश्चर्यचकित हो उठे। कुछ ही क्षणों में निम्बार्क कन्द-मूल और फल ले कर लौट आये। उन्होंने यह सब अपनी माता को दे दिया जिन्होंने यह भोज्य-सामग्री उत्कट भक्ति-भाव से संन्यासी के समक्ष विधिवत् प्रस्तुत कर दी। संन्यासी के भोजन समाप्त करते ही निम्बार्क ने सुदर्शन-चक्र को नीम के पेड़ से हटा लिया और शीघ्र ही घोर अन्धकार व्याप्त हो गया। रात्रि का चतुर्थांश समाप्त हो चुका था। उसी समय संन्यासी-वेश-धारी ब्रह्मा ने बालक को निम्बार्क के नाम से अभिहित कर दिया। नीम का अर्थ है नीम का पेड़ और अर्क का अर्थ है सूर्य। उस दिन से उनको श्री निम्बार्काचार्य कहा जाने लगा। श्री निम्बार्काचार्य को भगवान् हरि के शस्त्र सुदर्शन चक्र का अवतार समझा जाता है।
अवतारों के चार प्रकार हैं : (१) पूर्ण-जैसे भगवान् कृष्ण तथा भगवान् राम; (२) कला (पूर्णतः पूर्ण नहीं) जैसे मत्स्य, वराह, हंस आदि; (३) अंश-जैसे जड़भरत, नर-नारायण आदि; (४) अंशांश-जैसे श्री शंकर, श्री रामानुज, श्री निम्बार्क आदि।
विष्णुयान में श्री निम्बार्काचार्य की आध्यात्मिक वंशावली का वर्णन निम्नांकित क्रमानुसार किया गया है : "श्री नारायण के मुख-कमल से अष्टादश अक्षरों वाले पवित्र गोपाल-मन्त्र का आविर्भाव हुआ। इसे हंस भगवान् को प्रदान किया गया। हंस भगवान् ने इस मन्त्र की दीक्षा कुमारों को दी जिसे कुमारों ने ऋषि नारद के समक्ष उद्घाटित किया। नारद ने यह मन्त्र अपने शिष्य श्री निम्बार्क को दिया और श्री निम्बार्क ने इस मन्त्र की दीक्षा अपने शिष्य श्रीनिवासाचार्य को दी।”
श्री निम्बार्काचार्य दया, धर्मनिष्ठा, प्रेम, अनुग्रह, उदारता तथा अन्य दिव्य गुणों की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने नीम ग्राम में कठोर तप किया जिसके फल-स्वरूप उन्हें वहाँ भगवान् कृष्ण के दर्शन हए। श्री निम्बार्क ने केवल उसी ग्राम में चमत्कार का प्रदर्शन किया था। उस समय संन्यासी-वेश-धारी ब्रह्मा वहाँ भिक्षा के लिए गये हुए थे। निम्बार्क-सम्प्रदाय का एक दूसरा पवित्र स्थल राजस्थान-स्थित सलेम्बाबाद है। यहाँ एक प्रभावशाली महन्त रहते हैं। यहाँ एक निम्बार्क-मन्दिर भी है।
वृन्दावन, नन्दग्राम, बरसाना, गोवर्धन तथा नीम ग्राम निम्बार्काचार्य के अनुयायियों के लिए मुख्य क्षेत्र या पावन भूमि हैं। १६८ मील में विस्तृत ब्रजभूमि की परिक्रमा इनका प्राथमिक कर्तव्य एवं विभिन्न अवसरों पर गोवर्धन से दो मील दूर नीम ग्राम-स्थित निम्बार्क-मन्दिर की यात्रा इनका साम्प्रदायिक कर्तव्य है।
निम्बार्क-सम्प्रदाय के लोग अधिकतर व्रजभूमि अर्थात् वृन्दावन, नन्दग्राम, बरसाना तथा गोवर्धन आदि में पाये जाते हैं। जयपुर, जोधपुर, भरतपुर, ग्वालियर, बर्दवान तथा ओकारा इसके मुख्य केन्द्र हैं। ये लोग मध्य भारत, बिहार, उत्कल तथा पश्चिम बंगाल में भी हैं।
द्वैताद्वैत-दर्शन
श्री निम्बार्काचार्य ने निम्नांकित ग्रन्थों की रचना की : वेदान्त पारिजात सौरभ, ब्रह्मसूत्र पर एक भाष्य; भगवद्गीता पर भाष्य; सदाचार प्रकाश, कर्मकाण्ड पर एक ग्रन्थ; रहस्य षोडशी, श्री गोपाल-मन्त्र की एक पद्यात्मक व्याख्या; प्रपंच कल्प वल्ली, श्री मुकुन्द-मन्त्र की एक पद्यात्मक व्याख्या; प्रपत्ति चिन्तामणि, सर्वोच्च शरण-स्थान के सम्बन्ध में एक ग्रन्थ; प्रातःस्मरण-स्तोत्रम्, एक भजनावली, दशश्लोकी अर्थात् कामधेनु, दश पद्यात्मक अमृत वाणियाँ तथा सविशेष-निर्विशेष श्रीकृष्ण स्तवम्।
श्री निम्बार्काचार्य दर्शन की द्वैताद्वैत शाखा के प्रतिपादक थे। इस सम्प्रदाय के अनुयायी राधा तथा कृष्ण की उपासना करते हैं। इनके लिए भागवत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण धर्मग्रन्थ है। ब्रह्म से जीव तथा जगत् का भेद एवं अभेद दोनों है। इस मत के अनुयायी मथुरा तथा वृन्दावन में आज भी पाये जाते हैं।
शंकर केवलाद्वैत-दर्शन के, रामानुज विशिष्टाद्वैत-दर्शन के, मध्वाचार्य द्वैत-दर्शन के, वल्लभाचार्य शुद्धाद्वैत-दर्शन के तथा निम्बार्काचार्य द्वैताद्वैत-दर्शन के प्रतिपादक थे। ये सभी महान् पुरुष थे। हम यह नहीं कह सकते कि शंकर रामानुज से या वल्लभ निम्बार्क से महान् थे। ये सभी अवतार-पुरुष थे। इनमें से प्रत्येक एक निश्चित लक्ष्य की पूर्ति तथा एक निश्चित सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार के लिए इस धरा-धाम पर अवतरित हुआ था। एक विशेष कालावधि में रहने वाले तथा भक्ति के एक स्तर-विशेष पर पहुँचे हुए लोगों के आध्यात्मिक विकास के लिए उक्त सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार आवश्यक था। प्रत्येक दर्शन किसी व्यक्ति-विशेष के लिए ही उपयुक्त होता है।
वेदान्त-दर्शन के उच्चतम सिद्धान्त का सम्यक् बोध सभी लोगों के लिए शीघ्र ही सम्भव नहीं हो सकता। इसके पूर्व कि कोई व्यक्ति शंकर के अद्वैत-वेदान्त का तत्त्वार्थ-ग्रहण सम्यक्-रूपेण कर सके, उसको अपने मन का नियमन समुचित रूप से करना होगा जिससे वह इस अभियान में एक उपयुक्त माध्यम सिद्ध हो सके।
सभी आचार्यों को नमस्कार ! वे महिमान्वित हों! उनका आशीर्वाद हमें प्राप्त होता रहे !
रामानन्द यामुनाचार्य के शिष्य तथा विशिष्टाद्वैत-दर्शन के प्रतिपादक थे। जहाँ तक धार्मिक मत-सम्बन्धी उत्तराधिकार का प्रश्न है, रामानुज की चार पीढ़ियों के पश्चात् रामानन्द का प्रादुर्भाव हुआ। इनका जन्म १२९९ ई. में प्रयाग अर्थात् आधुनिक इलाहाबाद में हुआ। इनके कान्यकुब्ज ब्राह्मण पिता का नाम पुण्यसदन तथा इनकी माता का नाम सुशीला था। सन् १४१० में इन्होंने महासमाधि ग्रहण की।
श्री रामानन्द एक महान् वैष्णव तथा भक्त थे। उनके अनुयायी राम की उपासना करते हैं। इन्हें रामानन्दी या रामावत कहा जाता है। इनमें जो गृह-त्याग कर भिक्षा-वृत्ति से जीवन-यापन करते हैं, उनको वैरागी कहा जाता है।
रामानन्द एक विशाल-हृदय व्यक्ति थे। उनके शिष्यों में प्रत्येक जाति के लोग थे। आयु की परिपक्वता के पूर्व ही उनका पाण्डित्य परिपक्व हो गया था। अध्ययन के लिए उनको वाराणसी भेजा गया। वहाँ उन्होंने रामानुजीय वैष्णव-मत के लब्धप्रतिष्ठ आचार्य श्री राघवानन्द का शिष्यत्व ग्रहण किया। राघवानन्द का सम्बन्ध शास्त्रानुमोदित वैष्णव-मत से था; किन्तु रामानन्द अत्यन्त सहिष्णु तथा उदार थे। उनका हृदय जातीय पूर्वाग्रह तथा ब्राह्मणों की वर्णगत वरिष्ठता की धारणा से सर्वथा मुक्त था। भगवान् हरि का प्रत्येक भक्त उनका प्रेमपात्र था। वे मानव जाति की एकता के प्रति आस्थावान् थे। उन्होंने प्रत्येक जाति, प्रत्येक मत तथा प्रत्येक वर्ण के लोगों के लिए स्वर्ग के द्वार को उन्मुक्त कर दिया था। वे प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक स्थान पर प्रशिक्षित कर लेते थे। रामानन्द में रूढ़िवादी वैष्णव-मत की संकीर्णता का अभाव था। एक बार उनके गुरु राघवानन्द से उनके वाद-विवाद में कटुता आ गयी जिसके फल-स्वरूप उन्हें उनका परित्याग करना पड़ा। रामानन्द ने कहा- "किसी को किसी से उसकी या उसके सहभोजी की जाति के सम्बन्ध में कुछ नहीं पूछना चाहिए। यदि किसी में भगवान् विष्णु के प्रति भक्ति-भाव है, तो वह विष्णु का कृपा-पात्र हो जाता है।”
रामानन्द ने अपने सत्संग में उच्च तथा निम्न, सबको सम-भाव से देखा। उनके बारह शिष्यों में तीन ब्राह्मण, एक मुसलमान, एक जुलाहा, एक राजपूत, एक जाट, एक नाई, एक मोची तथा दो महिलाएँ थीं। ये बारह शिष्य थे-जुलाहा कबीर, मोची रैदास, राजपूत राजा पीपा, जाट धन्ना, नाई सेना, नरहरीयानन्द, सुरसुरानन्द, भवानन्द तथा अनन्तानन्द। महिला शिष्यों के नाम थे-पद्मावती तथा सुरसरि।
परा-भक्ति में परमात्मा के प्रति पूर्ण प्रेम सन्निहित रहता है और परमात्मा के सभी दास एक-दूसरे के बन्धु होते हैं- इन दो मूल सिद्धान्तों पर रामानन्द के शिष्य अत्यधिक बल देते हैं।
रामानन्द के शिष्यों में से कबीर, सेना तथा रैदास ने अपने मतों की अलग-अलग शाखाएँ स्थापित कर लीं।
रामानन्द ने श्री रामानुज के वैष्णव-मत को ग्रहण किया था; किन्तु उनकी भक्ति राम तथा सीता के प्रति थी जो जन-मानस को अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित करती थी।
इस सम्प्रदाय के दीक्षा नमः'। रामानन्दी तिलक रामानुज के अनुयायियों के तिलक-जैसा ही होता है। अन्तर केवल इतना है कि भाल पर लम्बायमान रामानन्दी तिलक की रक्तिम रेखा आकृति तथा लम्बाई में कुछ भिन्न एवं संकीर्ण होती है। मन्त्र हैं- 'श्री राम' तथा 'ॐ रां रामाय
भारत के गांगेय परिक्षेत्र में रामानन्द के बहुसंख्य अनुयायी हैं। गंगा-यमुना के समस्त तटीय प्रदेश में वे बसे हुए हैं।
जन्म तथा वंश
पश्चिम बंगाल में कलकत्ता से पचहत्तर मील उत्तर में गंगा-तट पर स्थित नवद्वीप नगर शास्त्रविद् लोगों का नगर था। पण्डित जगन्नाथ मिश्र, जिनका उपनाम पुरन्दर मिश्र था और जो वैदिक उप-जाति के एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे, सिलहट से प्रव्रजित हो कर नवद्वीप नगर में आ बसे थे। जगन्नाथ मिश्र की पत्नी शचीदेवी कृतविद्य नीलाम्बर चक्रवर्ती की पुत्री थीं। वे एक धर्मनिष्ठ महिला थीं। ४ फरवरी १४८६ ई. की पूर्णिमा की रात्रि में उनको एक पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई।
नवजात शिशु का नाम विश्वम्भर रखा गया। वह जगन्नाथ मिश्र तथा शची देवी की दशम सन्तान था। इसके पूर्व जन्म-ग्रहण करने वाली उनकी आठ कन्याओं का जन्म के पश्चात् तत्काल देहान्त हो गया था। नवम सन्तान विश्वरूप पुत्र था। सोलह वर्ष की आयु में जब उसे विवाह के लिए बाध्य किया जा रहा था, वह गृह त्याग कर दक्षिण भारत के एक मठ में प्रविष्ट हो गया। यह सोच कर कि शची की कई सन्तानें काल-कवलित हो गर्मी, स्त्रियों ने दुष्टात्माओं से त्राण के लिए विश्वम्भर को निमाई के नाम से अभिहित कर दिया (निमाई शब्द नीम से व्युत्पन्न है)। उसके चमत्कारिक सौन्दर्य के कारण प्रतिवेशी उसे 'गौर' या 'गौर हरि' या 'गौराङ्ग' कहा करते थे। 'गौर' का अर्थ है सुन्दर तथा 'अंग' का अर्थ है शरीर। वे लोग उसे 'गौर हरि' कहा करते थे; क्योंकि हरि-नाम उसे इतना प्रिय था कि शैशवावस्था में जब वह रोने लगता था, तब उसे शान्त करने के लिए हरि-नाम की ही आवृत्ति करनी पड़ती थी।
बाल्यावस्था तथा अध्ययन
न्यायशास्त्र के लब्ध-प्रतिष्ठ आचार्य वासुदेव सार्वभौम की पाठशाला में गौराङ्ग ने तर्कशास्त्र का अध्ययन किया। उनकी असाधारण मेधा ने उनकी ओर 'दीधिति' नामक तर्कशास्त्र के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ के प्रणेता रघुनाथ का ध्यान आकर्षित किया। रघुनाथ ने मन-ही-मन सोचा कि वे (गौराङ्ग) संसार के सर्वाधिक प्रतिभा-सम्पन्न युवक और स्वयं अपने आचार्य सार्वभौम से भी अधिक मेधावी हैं। रघुनाथ की महत्त्वाकांक्षा थी कि समस्त संसार में वे विद्वत्ता में एक अग्रणी व्यक्ति के रूप में प्रख्यात हों; किन्तु जब उन्होंने देखा कि आयु में कनिष्ठ होते हुए भी गौराङ्ग उनसे अधिक मेधावी एवं विद्वान् हैं, तब उनकी आशा क्षीण होने लगी। वे भयभीत हो उठे। गौराङ्ग उन दिनों न्यायशास्त्र पर एक भाष्य की रचना कर रहे थे। इससे रघुनाथ और अधिक अधीर तथा उत्तेजित हो उठे। रघुनाथ को गौराङ्ग के भाष्य को देखने की इच्छा हुई; किन्तु इसके लिए गौराङ्ग की अनुमति के प्रति वे आश्वस्त नहीं थे। फिर भी, उन्होंने गौराङ्ग से न्यायशास्त्र पर अपना भाष्य दिखाने की प्रार्थना की। गौराङ्ग ने उनके समक्ष अपने भाष्य के पाठ के सम्बन्ध में अपनी सहमति व्यक्त कर दी। नौका द्वारा नदी पार करते समय गौराङ्ग ने रघुनाथ के समक्ष अपने भाष्य का पाठ किया और तब रघुनाथ इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि गौराङ्ग का भाष्य एक पाण्डित्यपूर्ण मौलिक विवरण था। संसार में न्याय के आचार्य के शीर्षस्थ पद के ग्रहण के सम्बन्ध में उनकी जो आशाएँ थीं, वे ध्वस्त हो गयीं। वे फूट-फूट कर रोने लगे। गौराङ्ग ने पूछा- "क्या बात हो गयी, बन्धु रघुनाथ ? आप रोते क्यों हैं? मैं आपको आश्वस्ति प्रदान करूँगा।" रघुनाथ ने निष्कपट भाव से कहा- "बन्धु गौराङ्ग! मेरी यह प्रबल महत्त्वाकांक्षा है कि मैं समस्त संसार में न्याय के आचार्य के रूप में प्रथम स्थान प्राप्त करूँ। इसी आशा में मैंने न्याय पर यह सोच कर एक ग्रन्थ लिखा है कि इसके समक्ष प्रचलित ग्रन्थ निष्प्रभ हो जायेंगे; किन्तु अब मेरी आशाओं का दुर्ग ध्वस्त हो गया, क्योंकि तुम्हारी कृति मेरी कृति से श्रेष्ठतर है। यह संक्षिप्त, सुस्पष्ट तथा मौलिक है। निस्सन्देह यह एक विद्वत्तापूर्ण कृति है। मेरे रोने का यही कारण था।"
गौराङ्ग के नेत्रों से अश्रुपात होने लगा। उन्होंने रघुनाथ से कहा- "इस महत्त्वहीन बात पर रोने की कोई आवश्यकता नहीं है, मेरे बन्धु ! न्याय तो एक शुष्क दर्शन है। इससे मैं अधिक लाभान्वित भी नहीं हो पाऊँगा।" इतना कह कर उन्होंने पाण्डुलिपि को नदी में फेंक दिया और उसी क्षण से न्याय के अध्ययन का परित्याग भी कर दिया। गौराङ्ग का हृदय कितना उदार, कितना विशाल था! इस प्रकार गौराङ्ग का न्याय-ग्रन्थ संसार से विलुप्त हो गया और रघुनाथ का 'दीधिति' नामक ग्रन्थ न्याय के प्रथम प्रामाणिक ग्रन्थ के रूप में समादृत होने लगा।
व्याकरण, तर्कशास्त्र, साहित्य, अलंकारशास्त्र, दर्शन तथा धर्मशास्त्र-संस्कृत-वाङ्मय की इन समस्त विधाओं में गौराङ्ग सुदक्ष थे। उनकी चमत्कारिक प्रतिभा का उत्तरोत्तर विकास होता गया। वे एक प्रचण्ड मेधा-सम्पन्न व्यक्ति थे। उन्होंने स्वयं एक टोल अर्थात् पाठशाला की स्थापना की। तब उनकी आयु मात्र सोलह वर्ष की थी और टोल के प्रभारी आचार्यों में आयु की दृष्टि से वे कनिष्ठतम थे।
गौराङ्ग सदय, संवेदनशील, निष्कलुष तथा भद्र थे। उनका हृदय माधुर्य तथा प्रेम से परिपूरित था। वे सहृदयता तथा सहानुभूति की प्रतिमूर्ति थे। वे निर्धनों के सखा, सहचर तथा सेवक थे। वे उनको सदैव प्रसन्न रखते थे। उनके जीवन में कृत्रिमता के लिए कोई स्थान न था।
गौराङ्ग के पिता की मृत्यु
गौराङ्ग के विद्यार्थी-जीवन में ही उनके पिता का देहान्त हो गया। इसके पश्चात् वल्लभाचार्य की पुत्री लक्ष्मी से उनका विवाह हुआ। पाण्डित्य में उन्होंने स्वयं को अनेक विद्वानों से श्रेष्ठतर सिद्ध किया। यहाँ तक कि उन्होंने दूसरे प्रान्त के एक लब्ध-प्रतिष्ठ विद्वान् को भी परास्त कर दिया। उन्होंने बंगाल के पूर्वी अंचल की यात्रा की जहाँ उनको धर्म-निष्ठ तथा उदार-हृदय गृहस्थों की ओर से अनेक बहुमूल्य उपहार प्राप्त हुए। उधर से लौटने पर उनको ज्ञात हुआ कि उनकी अनुपस्थिति में सर्प दंश के कारण उनकी पत्नी का देहान्त हो गया था। तत्पश्चात् उनका विवाह विष्णुप्रिया से हुआ। वे अध्यापन के साथ-साथ अपने शिष्यों का मनोरंजन भी करते थे। उन्हें अपने प्रकाण्ड पाण्डित्य का अहंकार हो गया था।
गौराङ्ग के जीवन का एक संक्रान्ति काल
१५०९ ई. में गौराङ्ग ने अपने सहचरों के साथ गया की तीर्थ-यात्रा की। वहाँ उन्होंने माध्व-सम्प्रदाय के संन्यासी ईश्वर पुरी के दर्शन किये और उनको अपना गुरु मान लिया। यहीं से उनके जीवन में एक चमत्कारिक रूपान्तरण का श्रीगणेश होने लगा। वे भगवान् कृष्ण के उपासक हो गये। उनमें विद्वत्ता का जो अहंकार था, वह पूर्णतः विनष्ट हो गया। वे उच्च स्वर में बोल उठे- "कृष्ण ! कृष्ण ! हरि बोल, हरि बोल।" कृष्ण-प्रेम-जनित आनन्द के अतिरेक में वे हँसने, रोने, उछलने-कूदने तथा नृत्य करने लगते थे। जब वे इस प्रकार के भावावेश में होते थे, तब उनके लिए अन्न-जल ग्रहण करना सम्भव नहीं हो पाता था।
गौराङ्ग भगवान् कृष्ण के चरण-चिह्नों के दर्शन के लिए गदाधर-मन्दिर गये। वे उन चरण-चिह्नों के समक्ष एक प्रतिमा की भाँति निश्चल खड़े हो गये। वे पूर्णतः ध्यानावस्थित हो गये। उनके नेत्रों से अविराम अश्रु-वर्षण होने लगा जिससे उनके वस्त्र अश्रु से आप्लावित हो गये। वे धराशायी होने ही वाले थे कि ईश्वर पुरी ने आगे बढ़ कर उन्हें सँभाल लिया। धीरे-धीरे उनकी चेतना जाग्रत हो पायी। उन्होंने ईश्वर पुरी से कहा- "हे श्रद्धेय गुरुदेव, मुझ पर दया कर मुझे संसार-कलिल से मुक्त कीजिए और कृष्ण के प्रति राधा के प्रेम के रहस्य को मेरे समक्ष अनावृत कीजिए। भगवान् कृष्ण के प्रति मुझमें विशुद्ध प्रेम का विकास हो और मैं कृष्ण-प्रेम-रस का अमृत-पान करता रहूँ।"
तत्पश्चात् ईश्वर पुरी ने उन्हें भगवान् कृष्ण के दशाक्षर-मन्त्र की दीक्षा दी। इसके फल-स्वरूप गौराङ्ग के हृदय में पूर्व राग का उदय हुआ। वे सर्वदा ध्यान में लीन रहने लगे। उनको अन्न ग्रहण का स्मरण भी नहीं हो पाता था और उनके नेत्रों से अश्रु झरते रहते थे। कभी-कभी वे संज्ञाशून्य भी हो जाते थे और संज्ञस्त होने पर पुनः पुनः कहने लगते थे- "हे भगवान् कृष्ण, हे मेरे पिता, तुम कहाँ हो ? मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकता। तुम मेरे एकमात्र आश्रय और आश्वासक हो। यथार्थतः तुम्हीं मेरे पिता, तुम्हीं मेरी माता, तुम्हीं मेरे सखा, तुम्हीं मेरे सम्बन्धी तथा तुम्हीं मेरे गुरु हो। तुम अपने स्वरूप को मेरे समक्ष सर्वदा प्रकट करते रहो।" गौराङ्ग कभी-कभी रिक्त नेत्रों से एकटक देखते रहते और कभी-कभी ध्यान मुद्रा में बैठ जाते। वे अपने मौन अश्रु-कणों को अपने सहचरों से गुप्त ही रखना चाहते थे। कभी-कभी उनको अपने प्रतिवेश का भी ज्ञान नहीं रह जाता था। गौराङ्ग वृन्दावन जाना चाहते थे; किन्तु उनके सहचर उनको बलात् नवद्वीप लौटा लाये।
निताई
निताई का नाम नित्यानन्द था। जन्म से वे ब्राह्मण थे। बारह वर्ष की अल्पायु से ही वे तपस्वी-जीवन व्यतीत करने लगे थे। वे कृष्ण की खोज में इतस्ततः भ्रमण किया करते थे। गौराङ्ग उनको अपने घर ले आये और अपनी माता से उनका परिचय कराते हुए कहा- "हे माता, यह तुम्हारा एक अन्य पुत्र है जो मेरा अग्रज है। तुम अपने जिस विश्वरूप से वंचित हो गयी थी, वह तुम्हारे पास पुनः लौट आया है। इसे तुम अपना विश्वरूप ही समझो।" शची ने निताई से कहा- "यहाँ आओ, पुत्र ! तुम अपने अनुज का ध्यान रखो और उसकी रक्षा करो। वह अपने प्रति उदासीन तथा अबोध है। मुझे अब उसकी चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। बैठ जाओ और प्रसन्न मन से भोजन करो।"
नित्यानन्द ने अनेक स्थानों पर संकीर्तन का आयोजन किया और नवद्वीप हरि-नाम की प्रतिध्वनि से गूंज उठा। निताई सारी रात राधा तथा कृष्ण का गुण-गान करते रहते। प्रायः धार्मिक शोभा यात्राओं का आयोजन हुआ करता था जिनमें गौराङ्ग तथा नित्यानन्द के नेतृत्व में भक्तजन नाचते-गाते चलते थे या घरों के प्रांगण में एकत्र हुआ करते थे।
गौराङ्ग प्रेम की प्रतिमूर्ति थे। वे सर्वांगतः प्रेम में समाहित थे। वस्तुतः उनका अस्तित्व प्रेम का पर्याय बन चुका था। उनकी वाणी प्रेममयी थी; उनके प्रेम की रश्मियाँ सब पर विकीर्ण हुआ करती थीं। उनके स्पर्श में चुम्बकीय शक्ति थी। उनके गीत, उनके श्वास-प्रश्वास तथा उनका व्रजन - यह सभी कुछ प्रेम द्वारा स्फुरित था। उनका अध्यापन नियमों तथा निर्देशों के माध्यम से कम तथा दृष्टान्तों के माध्यम से अधिक होता था। "तुम्हें भक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होगा." उनके ये शब्द ही किसी व्यक्ति को समाधिस्थ तथा उसके हृदय को प्रेम-पूरित करने के लिए पर्याप्त थे। ऐसी थी गौराङ्ग की शक्ति।
जब गौराङ्ग किसी मार्ग से निकलते थे, तब उनके प्रेम-प्रवाह से सहस्र-सहस्र जन प्रभावित एवं अभिभूत हो उठते और बिना किसी विघ्न-बाधा के आनन्दातिरेक में नृत्य करने लगते थे।
गौराङ्ग का संन्यास-ग्रहण
कृतविद्य तथा परम्परा-निष्ठा लोग गौराङ्ग से घृणा तथा उनका विरोध करने लगे; किन्तु गौराङ्ग अविचलित रहे। उन्होंने कुछ ही लोगों का मत-परिवर्तन किया था। उन्होंने इन लोगों की मुक्ति के लिए संन्यास-ग्रहण का निश्चय किया। उन्होंने मन-ही-मन सोचा- "इन दम्भी पण्डितों तथा परम्परा-निष्ठ गृहस्थों की मुक्ति