साधना


SADHANA

का हिन्दी अनुवाद


लेखक


श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती


SERVE LOVE MEDITATE E


THE DIVINE LIFE SOCIETY


अनुवादक


श्री स्वामी ज्योतिर्मयानन्द


प्रकाशक


डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर- २४९ १९२

जिला : टिहरी-गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org


प्रथम हिन्दी संस्करण: १९६३

सप्तम हिन्दी संस्करण : २०२४

(,००० प्रतियाँ)




© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी


ISBN 81-7052-153-X


HS 130



PRICE:


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' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा 'मेहुल प्रिन्ट सर्विस A - 31,

नरैना इन्डस्ट्रियल एरिया, फेज 1 नई दिल्ली' में मुद्रित

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प्रकाशक का वक्तव्य


सत्य के जिज्ञासुओं तथा ईश्वर साक्षात्कार के मार्ग पर चलने वाले साधकों को भार्ग दिखलाना, उन्हें प्रेरित करना तथा उनमें जागरण लाना यही महर्षि स्वामी शिवानन्द जी के जीवन का एकमेव कार्य रहा है। इस वक्तव्य में हम इस बात को अच्छी तरह समझ लें कि स्वामी शिवानन्द जी साधक से किस प्रकार की अपेक्षा रखते हैं तथा किस प्रकार उन्हें पथ-प्रदर्शन करते हैं। उन्होंने हमें कुछ व्यावहारिक साधन बतलाये हैं। इस ग्रन्थ में सिद्धान्त से अधिक साधना पर जोर दिया गया है। तीन आधारों के ऊपर आध्यात्मिक जीवन का निर्माण तथा परिपोषण होना चाहिए। वे तीन आधार हैं-सुनिश्चित आदर्श, जीवन का सुनिश्चित कार्यक्रम तथा विचार की पृष्ठभूमि।


किसी भी व्यक्ति के लिए पहला पूर्वापेक्ष्य यह है कि उसके पास एक आदर्श होना चाहिए। वह किसी निश्चित वस्तु की प्राप्ति के लिए ही अग्रसर बने। बहुत से आदर्श हैं। एक व्यक्ति सुगठित शरीर बनाना चाहता है; दूसरा विश्व-भ्रमण करना चाहता है; तीसरा लखपति बनना चाहता है। मानवी प्रयास के पीछे अनजानते हुए भी एक आदर्श अवश्य रहता है। साधक के पास आध्यात्मिक आदर्श है जिसका उसे साक्षात्कार करना है।


दूसरा पूर्वापेक्ष्य है उस आदर्श की प्राप्ति के लिए जीवन का एक सुव्यवस्थित कार्यक्रम बनाया जाये। यदि वह जीवन की समुचित योजना कर सकेगा, यदि कार्यक्रम अधूरा रहेगा तो उसकी सारी शक्ति व्यर्थ ही जायेगी। बिना निश्चित कार्यक्रम के उन्नति करना कठिन है। साधक के लिए कार्यक्रम निर्माण करने की विधि कोई खिलवाड़ नहीं; यह अवश्य ही कठिन है। कई बार साधक को बाधाओं के तूफान से अपने साधना-पोत को तात्कालिक आश्रय के लिए मार्ग से अलग ले जाना होगा।


परन्तु एक मार्ग है जिससे साधक घमासान संग्राम करते हुए भी आश्रय ग्रहण कर सकता है। श्री स्वामी शिवानन्द जी ने बतलाया है कि साधक ठोस विचार की पृष्ठभूमि बनाये रखे; क्योंकि साधक के संग्राम अनन्त हैं। उसे विचार की पृष्ठभूमि रखनी चाहिए तथा जब कभी आवश्यकता हो, वह उसमें आश्रय ग्रहण कर सकता है। ऐसे अवसर बहुत मिलेंगे-दिन में कई बार, हर मिनट, हर पल में भी - जब साधक को आश्रय खोजना पड़ेगा।


जीवन का कार्यक्रम बनाते समय कुछ तथ्यों को याद रखना चाहिए। आध्यात्मिक उन्नति क्रमिक होती है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए आन्तरिक संग्राम अनिवार्य है, जिसमें द्विविध पहलू को याद रखना आवश्यक है- पहला है आक्रमण, दूसरा है बचाव अथवा सुरक्षा। साधना के लिए प्रबल मुमुक्षुत्व हो तो साधक आगे नहीं बढ़ सकता; परन्तु यदि उस मुमुक्षुत्व को प्रलोभनों से सुरक्षित नहीं किया जाये, तो उसकी उन्नति सम्भव नहीं। विवेक तथा विचार ही साधक के लिए बचाव के प्रधान साधन हैं। मुमुक्षुत्व के साथ-साथ वैराग्य एवं सत्संग का संरक्षण मिलना चाहिए। इनके साथ आपको जीवन का कार्यक्रम बनाना है। कार्यक्रम बनाते समय विचार की पृष्ठभूमि बनाये रखिए। यदि विचार की पृष्ठभूमि तैयार की गयी, तो साधक संकट के समय अपने मन को स्वभावतः इस पृष्ठभूमि में नहीं ला सकता।


भक्तियोग में विचार की पृष्ठभूमि ईश्वर है; ज्ञानयोग में महावाक्य हैं तथा जपयोगी के लिए भगवान् का नाम है। इस विचार की पृष्ठभूमि में स्थिति होने के लिए सतत अभ्यास की आवश्यकता है। सतत अभ्यास के बिना आध्यात्मिक जीवन में आप सफलता की आशा नहीं रख सकते। कभी-कभी साधक को सान्त्वना देने के लिए स्वामी जी ऐसा कह सकते हैं- "यदि आप साधना में यथेष्ट उन्नति नहीं करते, तो खिन्न होइए। कोई हानि नहीं है।" परन्तु यह सान्त्वना मात्र ही है, जिससे साधक का मन खिन्न बने। साधक को सदा आगे बढ़ने के लिए प्रस्तुत रहना चाहिए। विचार, वैराग्य तथा सत्संग के कवच से युक्त हो कर जीवन के कार्यक्रम में बढ़ते समय उसे अपनी रक्षा करनी चाहिए। जिस तरह कछुवा आपत्ति के समय अपने अंगों को समेट लेता है, उसी तरह साधक को भी अपने को विचार की पृष्ठभूमि में समेट लेना चाहिए। दोनों में अन्तर केवल इतना ही है कि कछुआ बाहर आने पर पुनः पहले ही जैसा रहता है, जब कि साधक हर बार सबल हो कर बाहर आता है।


सारांशतः आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए () साधक एक आदर्श रखे, () जीवन का कार्यक्रम बना ले, () अभ्यास तथा वैराग्य से युक्त बने तथा () विचार की पृष्ठभूमि रखे, जिसमें वह संकट काल में विश्राम ले सके। इन सभी बातों के लिए इस पुस्तक की सहायता अमूल्य है। वास्तव में यह साधक-जगत् के लिए सबसे महान् वरदान है। साधना का ऐसा कोई पहलू नहीं है जिसका इसमें वर्णन किया गया हो, ऐसा कोई मार्ग नहीं जिसे इसमें दिखाया गया हो, साधना-सम्बन्धी ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिसे खोल कर यहाँ रखा गया हो।


- डिवाइन लाइफ सोसायटी



अनुवादकीय


मानव-जीवन प्रकृति के साथ अनवरत संग्राम है; क्योंकि प्रकृति के तीनों गुणों से परे आत्मा ही उसका लक्ष्य है। वही उसका शाश्वत धाम है। वही महासागर है जहाँ जीवन-सरिता अपने बन्धनों और उपाधियों का परित्याग कर असीम के क्रोड़ में कल्लोलें करती, आनन्द की तरंगों में उछलती-कूदती तथा अमरत्व में विलीन हो जाती है। तब शोक नहीं रहता, भय नहीं रहता, क्लेशों का लेश नहीं रहता, कर्मों के भार नहीं रहते तथा त्रितापों की ज्वाला भी शान्त हो जाती है।


मानव-हृदय में सच्चिदानन्द की अमर पिपासा सदा बनी रहती है। उसके हर कार्य, इच्छा तथा भावना में वही अमर आत्म-संगीत स्पन्दित होता रहता है। इस ईश्वरीय विधान में मानव जीवन स्वतः ही साधना है; क्योंकि मनुष्य इस जगत् से शिक्षा ग्रहण करता, अपने अनुभवों को बढ़ाता, अपनी दृष्टि को सूक्ष्म बनाता तथा उसी के अनुसार अपने जीवन को ढालता है। परन्तु, विशेष रूप से हम साधना उसी को कहते हैं जब हममें विवेक और वैराग्य के आधार पर ईश्वर-प्राप्ति की लगन लग जाती है तथा हम सचेतन साधना के द्वारा जीवन में त्वरित उन्नति लाने के लिए प्रयत्नशील बन जाते हैं।


साधना की चेतना ही ईश्वरीय कृपा है। यह साधना ही अमृत-धाम की कुंजी है। साधना के द्वारा मनुष्य ईश्वरत्व को प्राप्त कर लेता है। साधना के द्वारा वह भव-सागर का सन्तरण करता है। साधना का स्वाँग रच कर स्वर्गिक सिद्धि ही मानव जीवन में दिव्य ज्योति का जागरण लाती है।


निरन्तर अभ्यास, अदम्य उत्साह तथा पूर्ण ईश्वरार्पण के द्वारा गुरु-कृपा-कटाक्ष के होते ही साधना जब अनायास होने लगती है, तब वही सिद्धि हो जाती है। बारम्बार ईश्वर की ओर मन को लगाना साधना है; परन्तु जब मन ईश्वरीय आलोक में ही निमग्न हो जाता है, जब वह ईश्वर के अलग कदापि होता ही नहीं, जब वह शनैः शनैः ईश्वर में ही अमृत-रस का आस्वादन करते हुए विलीन होने लगता है, तब साधना सिद्धावस्था को प्राप्त कर लेती है। साधना ही वैयक्तिक प्रयास का अतिक्रमण कर अनायास ईश्वरीय सिद्धि बन जाती है। यही जीवन का परम निःश्रेयस् है।


श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज ने इस 'साधना' ग्रन्थ में आध्यात्मिक जीवन के सभी पहलुओं पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। यह उनकी उत्कृष्ट कृति है। यह सभी व्यक्तियों के लिए हर अवस्था में तथा जीवन के हर क्षेत्र में अमूल्य सन्देश रखती है। 'साधना' अन्य ग्रन्थों की भाँति सिद्धान्तों की ही बातें नहीं करती; अपितु हृदय-मंजूषा से जीवन के अमूल्य रत्नों को निकालने के लिए व्यावहारिक मार्गों को बतलाती है- जिन मार्गों पर चल कर मनुष्य स्वतः ही अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर सकता है।


मूल ग्रन्थ अँगरेजी में है। उसी का हिन्दी भाषा में अनुवाद कर मैंने इस अनुपम ग्रन्थ को हिन्दी भाषा-भाषी व्यक्तियों की सेवा में प्रस्तुत किया है। आशा एवं विश्वास है कि हिन्दी-जगत् में यह ग्रन्थ महान् स्थान प्राप्त करेगा तथा सभी व्यक्तियों को जीवन के परम लक्ष्य-आत्म-साक्षात्कार अथवा ईश्वर-साक्षात्कार की ओर प्रेरित कर राष्ट्र के नैतिक एवं आध्यात्मिक स्तर को उन्नत बनाने में सफलता प्राप्त करेगा।


यह सदा आपके मार्ग को आलोकित करता रहे!


- स्वामी ज्योतिर्मयानन्दन्य




प्रार्थनाएँ


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हे सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अखण्डैकरस प्रभु! हे जगत् के उपास्य देव! तू परदे के पीछे इस जगत् के नाटक को देख रहा है। तू स्वयं-प्रकाश है। तू इन सारे नाम-रूपों का आधार है। तू एकमेवाद्वितीय है। तेरी महिमा अपार है। तू ही सारे ज्ञान, विज्ञान तथा ऐश्वर्य का मूल है।


मैं नहीं जानता कि कैसे तुम्हारी पूजा करूँ। मुझमें किसी प्रकार की साधना करने की शक्ति नहीं है। में दोष एवं दौर्बल्य से पूर्ण हैं। मेरा मन विक्षिप्त है। इन्द्रियाँ शक्तिशाली तथा अशान्त हैं। कुछ लोग कहते हैं, 'तू निराकार तथा निर्गुण है।' मैं विवाद, वितण्डा तथा तर्क-वितर्क में पड़ना नहीं चाहता। मुझे शान्ति एवं भक्ति दे! प्रलोभनों पर विजय पाने के लिए मुझे शक्ति दे! मैं अपना शरीर तेरी सेवा में लगा दूँ। सदा तेरी याद करूँ। मैं सदा तेरे मधुर प्रिय चेहरे को देखता रहूँ। हे प्रेम सागर प्रभु! इस प्रार्थना को स्वीकार कर!


मुझे सच्चा विवेक तथा स्थायी वैराग्य प्रदान कर। मेरा आत्मार्पण भी पूर्ण तथा सच्चा नहीं है। मैं अपने दोषों को स्वीकार करता हूँ। मेरी आँखों से प्रेमाश्रु की एक बूँद नहीं टपकती। मुझे एकान्त में प्रेमाश्रु बरसाने दे। मैं मिथ्या रुदन करना नहीं चाहता। मैं अपने आँसुओं में तुझे देख सकता हूँ। मेरा हृदय इस्पात तथा पाषण से भी अधिक कठोर है। मैं इसे मक्खन-सा कोमल कैसे बनाऊँ? मुझे प्रह्लाद या गौरांग का हृदय प्रदान कर। यही मेरी हार्दिक प्रार्थना है। हे मेरे प्रभु! इस विनीत प्रार्थना को स्वीकार कर। मैं तेरी शरण में हूँ, मैं तेरा शिष्य हूँ, तू ही मेरा गुरु है।


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हे असीम ज्ञान के गुरु! मुझे यह वरदान दे कि मैं रोगियों, गरीबों तथा पीड़ितों की अथक सेवा करता रहूँ, बुराई का साथ करूँ, कदापि झूठ बोलूँ तथा विषय-पदार्थों की आसक्ति में पहुँ।


हे प्रभु! मैं तुझमें हूँ, तू मुझमें है। मैं वही हूँ जिससे मैं प्रेम करता हूँ तथा जिससे मैं प्रेम करता हूँ, वह मैं ही हूँ। हे ज्योति ! मेरी बुद्धि को आलोकित कर। हे प्रेम! मेरे हृदय को परिप्लावित कर। हे शक्ति ! मुझे शक्ति प्रदान कर।



हे प्रभु! तू साहस है, मुझमें साहस भर दे। तू करुणा है, मुझे करुणा से भर दे। तू शान्ति है, मुझे शान्ति से भर दे। तू प्रकाश है, मुझे प्रकाश से भर दे।


हे प्रभु! तू नदी है। तू बादल है। तू सागर है। तू पौधा है। तू रोगी है। तू चिकित्सक है। तू ही रोग है। तू ही औषधि है।


सब-कुछ ईश्वर का ही है। मैं उसी का कार्य कर रहा हूँ। मैं उसके हाथों का निमित्त मात्र हूँ। उसी की इच्छा हो कर रहेगी।


()


हे प्रभु! मेरी इच्छा सबल बना दे जिससे मैं प्रलोभनों का संवरण कर सकूँ, इन्द्रिय तथा निम्न-प्रकृति का दमन कर सकूँ, अपनी पुरानी बुरी आदतों को बदल सकूँ। आत्मार्पण को पूर्ण तथा सत्य बना सकूँ। मेरे हृदय में आसीन हो जा। एक क्षण भी इस स्थान से अन्यत्र कहीं जा। मेरे शरीर, मन तथा इन्द्रियों को अपने काम में ला। मुझे इसके योग्य बना कि मैं सदा-सर्वदा तुझमें ही निवास करूँ।



विश्व-प्रार्थना


हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव !

तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है।

तुम सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ हो।

तुम सच्चिदानन्दघन हो।

तुम सबके अन्तर्वासी हो।


हमें उदारता, समदर्शिता और मन का समत्व प्रदान करो।

श्रद्धा, भक्ति और प्रज्ञा से कृतार्थ करो।

हमें आध्यात्मिक अन्तःशक्ति का वर दो,

जिससे हम वासनाओं का दमन कर मनोजय को प्राप्त हों।

हम अहंकार, काम, लोभ, घृणा, क्रोध और द्वेष से रहित हों।

हमारा हृदय दिव्य गुणों से परिपूरित करो।


हम सब नाम-रूपों में तुम्हारा दर्शन करें।

तुम्हारी अर्चना के ही रूप में इन नाम-रूपों की सेवा करें।

सदा तुम्हारा ही स्मरण करें।

सदा तुम्हारी ही महिमा का गान करें।

तुम्हारा ही कलिकल्मषहारी नाम हमारे अधर-पुट पर हो।

सदा हम तुममें ही निवास करें


-स्वामी शिवानन्द



शिवानन्द-साधना-शतकम्


. साधना के मौलिक पहलू


. साधना से आपमें अधिकाधिक मुदिता, मन की एकाग्रता, प्रसन्नता, समत्व-बुद्धि, शान्ति, सन्तोष, सुख, वैराग्य, निर्भयता, साहस, करुणा, विवेक, अन्तर्मुखी-वृत्ति, असंगता, अक्रोध, निरहंकारिता, निष्कामता आदि का विकास होना चाहिए। साधना से आपका आन्तरिक जीवन सम्पन्न होना चाहिए। आपकी दृष्टि अन्तर्मुखी तथा मन सभी अवस्थाओं में अविचल होना चाहिए। ये ही आपकी आध्यात्मिक उन्नति के लक्षण हैं। दर्शन, ज्योति, अनाहत नाद, दिव्य गन्ध, ऊपर तथा नीचे को प्राण-सम्बन्धी प्रवाह का अनुभव ये सब अधिक आध्यात्मिक मूल्य नहीं रखते। हाँ, ये धारणा की प्रथम अवस्था के परिचायक हैं।


. भक्ति सभी के लिए आवश्यक है। कितना भी प्रबल मनुष्य का पुरुषार्थ क्यों हो, मन की सूक्ष्म वृत्तियों काम, क्रोध, मोह, ईर्ष्या और अभिमान के सूक्ष्म रूपों को विनष्ट करना असम्भव है। आप भले ही करोड़ों जन्मों तक साधना करें; परन्तु आप बुरी वृत्तियों के मूल को विदग्ध नहीं कर सकते। ईश्वर की कृपा से ही यह सम्भव है। ईश्वर उस मनुष्य को चुन लेता है, जिसे वह उन्नत करना तथा मोक्ष प्रदान करना चाहता है। कठोपनिषद् का कथन है- "आध्यात्मिक प्रवचन द्वारा, बुद्धिमत्ता द्वारा, बहुत से ग्रन्थों के स्वाध्याय से यह आत्मा प्राप्त नहीं होता; परन्तु वह मनुष्य, जो ईश्वर के द्वारा चुन लिया गया है, ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।"


. साधना में सच्चाई ही सफलता की कुंजी है। उग्र साधना के द्वारा ही आत्म-साक्षात्कार सम्भव है। साधना केवल कार्यक्रम ही नहीं रहे। ईश्वर-दर्शन के लिए, समाधि द्वारा अमृत-पान करने के लिए तथा शुद्ध भावना बनाये रखने के लिए सच्ची पिपासा होनी चाहिए। जो कुशल है, जो दृढ़ संकल्प है, जो मुमुक्षु है, उसके लिए परम धाम का मार्ग सुगम है।


. नियमित धारणा तथा भगवन्नाम के जप से अनास्था दूर होगी। किसी प्रकार की भी साधना गम्भीर योग-संस्कार डालती है तथा आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि लाती है। मोमबत्ती के जलने पर कुछ भी क्षति नहीं होती। योग में भी यही बात है। आध्यात्मिक उन्नति धीमी होती है। अतः प्रारम्भ में इसको परखना कठिन है; परन्तु उसका परिणाम तो है ही। कुछ समय के बाद वह स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होने लगेगी।


. आत्मार्पण वह वस्तु नहीं है जिसे एक सप्ताह या एक मास में प्राप्त कर लिया जाये। साधना के प्रारम्भ में ही आप पूर्ण आत्मार्पण नहीं कर सकते। अहंकार रहता है तथा बारम्बार अपने को बनाये रखता है। यह जोंक की भाँति पुरानी आदतों, तृष्णाओं तथा कामनाओं से आसक्त रहता है। यह छिप कर युद्ध करता है। इसकी गुप्त तृप्ति के लिए कुछ विषय चाहिए। सम्पूर्ण व्यक्तित्व का आत्मार्पण आवश्यक है। यही कारण है कि भगवान् कृष्ण कहते हैं, "तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत- हे भरतवंशी अर्जुन सर्वभाव से उसकी शरण में जाओ।" चित्त, अहंकार, मन, बुद्धि तथा आत्मा को ईश्वर के पाद-पद्मों में अर्पित कर देना चाहिए। मीरा ने ऐसा ही किया था। यही कारण है कि उसे श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त हुई तथा वह ईश्वर से मिल कर एक हो गयी।


. साधना की प्रक्रिया


. कामना तथा अहंकार हर कदम पर आत्मार्पण का विरोध करते हैं। जब पूर्ण अशेष आत्मार्पण हो जाता है, तब ईश्वरीय कृपा प्रवाहित हो कर साधक के द्वारा साधना करने लगती है। वह ईश्वरीय शक्ति मन, इच्छा, जीवन तथा शरीर पर पूर्ण अधिकार कर लेती है; तब साधना में त्वरित गति जाती है।


. साधना प्रारम्भ में यन्त्रवत् होती है; परन्तु बाद में वह जीवन का अंग बन जाती है। प्रारम्भ में वह भार मालूम पड़ती है; परन्तु बाद में वह सुख, शक्ति, साहस एवं मुक्ति प्रदान करती है।


. यदि आपमें वैराग्य नहीं है, मुमुक्षुत्व नहीं है, हृदय की शुद्धता नहीं है, तो साधना में विफलता होगी ही। यदि आपमें इन तीनों की कमी है, तो आसन का अभ्यास, तीन घण्टे तक एक आसन में रहना, प्राणायाम का अभ्यास, बन्ध तथा मुद्रा आपको आध्यात्मिक उन्नति प्रदान नहीं कर सकते हैं।


. ध्यान के समय आन्तरिक प्रकाश की एक किरण भी आपके मार्ग को आलोकित कर डालेगी। आप पर्याप्त उत्साह तथा आन्तरिक बल प्राप्त करेंगे। यह आपको अधिक उग्र साधना के लिए प्रेरित करेगी। जब ध्यान अधिक गम्भीर बन जायेगा, जब आप शरीर-चेतना से ऊपर उठ जायेंगे, तब आप प्रकाश-किरण का अनुभव करेंगे।


१०. सारी घटनाओं का आधार ईश्वरीय शक्ति ही है। हर वस्तु के लिए कुछ--कुछ कारण अवश्य है। किसी वस्तु के साथ तादात्म्य-सम्बन्ध रखिए। साक्षी बन कर तमाशा देखिए। ईश्वर साक्षात्कार प्राप्त करना आपका लक्ष्य है, अन्य सब मिथ्या तथा निषेध के योग्य हैं। आइए, बद्धपरिकर बनिए। साधना में डूब जाइए। इसी जीवन में ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त कीजिए। ईश्वर का आशीर्वाद आपको प्राप्त हो!


११. वैराग्य तथा अभ्यास के दो पंखों से आप निर्विकल्प समाधि की चोटी पर उड़ कर जा सकते हैं। ये दोनों पंख समान रूप से मजबूत होने चाहिए। यदि वैराग्य दुर्बल है, तो शक्ति का स्राव होगा, इन्द्रियाँ उपद्रवी हो जायेंगी। आप पतन को प्राप्त होंगे। यदि साधना में ढिलाई करेंगे, तो भी पतन की प्राप्ति होगी। पुनः गम्भीर ध्यान तथा समाधि को प्राप्त करना कठिन हो जायेगा।


१२. सांसारिक व्यक्ति बहुत से कार्यों में व्यस्त रहने के कारण कभी-कभी अपनी साधना में नियमित नहीं रहता। उन परिस्थितियों में साधना के सारे अंगों को करने की आवश्यकता नहीं है। जब कभी उसको सुविधा हो, वह दिन में एक बार लिखित जप कर सकता है।


. धारणा तथा सावधानी की आवश्यकता


१३. अपनी साधना में ढीले रहिए। साधना ही कालान्तर में आपको सहायता देगी। यही जीवन में एकमेव वरदान है। साधना में नियमित रह कर इसी जन्म में आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर लीजिए।


१४. यदि अखबार पढ़ना और ताश खेलना आप त्याग दें, यदि निद्रा-काल को कम करें, यदि टेनिस, फुटबाल आदि खेलों के समय को कम करें, तो आप साधना के लिए पर्याप्त समय प्राप्त करेंगे।


१५. ध्यान दो प्रकार का है- एक है स्मरण, दूसरा है गम्भीर ध्यान। ईश्वर का सतत स्मरण अथवा नाम स्मरण का अभ्यास सदैव करना चाहिए। इसे बिना किसी आसन के भी किया जा सकता है; परन्तु गम्भीर ध्यान आसन में ही सम्भव है। यह उसी के लिए सम्भव है, जो पूर्ण जाग्रत स्थिति में ध्यान के लिए बैठता है। बिछावन में लेटे-लेटे, खड़े हो कर तथा चलते-चलते गम्भीर ध्यान करना सुगम नहीं है; क्योंकि मन में विक्षेप उठना आसान है। स्मरण से ध्यान बहुत ही बढ़ कर है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। अतः ध्यान के लिए आसन में बैठने की परमावश्यकता है।


१६. अच्छी धारणा-शक्ति के अभाव में ईश्वर की मूर्ति मन में स्पष्टतः नहीं आती। धारणा-शक्ति अधिकाधिक बढ़ाइए। मन की किरणों को लक्ष्य पर एकाग्र कीजिए। देर तक ईश्वर की मूर्ति पर उन किरणों को केन्द्रित बनाये रखिए। यही धारणा है। यदि आप कुछ देर तक इसी तरह करते रहें, तो आप ईश्वर का स्पष्ट ज्ञान कर पायेंगे तथा दीर्घ काल तक ईश्वरीय चेतना बनाये रखेंगे। यही ध्यान है।


१७. अज्ञान के फन्दे से निकल जाइए। ज्ञान की रश्मि में धूप सेंकिए। नित्य-प्रति कुछ जप तथा कीर्तन कीजिए। इससे काम-ज्वर उतर जायेगा तथा लोभ-मोह का ताप भी दूर होगा। दश मिनट तक आँखें बन्द कर भगवान् कृष्ण, राम अथवा शिवजी की मूर्ति पर ध्यान कीजिए। आध्यात्मिक शान्ति का शीतल समीर आपमें शीघ्र ही शीतलता एवं स्फूर्ति भर देगा।


१८. जीवात्मा का परमात्मा में विलीन हो जाना ही सारे प्रकार के ध्यान की चरमावस्था है। अनुभव जो आते और चले जाते हैं, वे आध्यात्मिक उन्नति के लक्षण हैं। उनको ही महत्त्वपूर्ण मान लीजिए। अन्तिम एकता प्राप्त कीजिए जहाँ तीनों अवस्थाएँ विलुप्त हो जाती हैं तथा एकमेव तुरीय ही विभासित होता है।


. योग-साधना के लिए आवश्यक


१९. आप नगरों में रह कर कल-कारखानों की दूषित वायु में श्वास ले कर, अस्वाभाविक गरिष्ठ भोजन खा कर, सिनेमा, थियेटर, बालरूम आदि में सम्मिलित हो कर, अधिक वीर्य-क्षय कर, स्नायुओं को तनाव की अवस्था में रख कर, मोटर-कार तथा मशीनों के कोलाहलपूर्ण वातावरण में रह कर योगाभ्यास नहीं कर सकते। भगवान् कृष्ण कहते हैं- "योगी एकान्त में गुप्त रूप से निवास कर शुद्ध स्थान में सतत योगाभ्यास करे।"


२०. जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने से स्थिरता तथा दृढ़ संकल्प-शक्ति प्राप्त होगी। दूसरे तट पर पहुँचने से पहले तरंगों से लोहा लेना होगा। छोटी-छोटी गलतियों का सुधार, शुद्धता, जप तथा ब्रह्मचर्य के सिवा मुक्ति के लिए और कोई सुगम मार्ग नहीं है। निम्न मन पर विश्वास कर भटकिए।


२१. एक साधु ने धारा में बहते हुए बिच्छू को बचाने के लिए तीन बार कोशिश की। बिच्छू ने दो बार उसे डंक मारा; परन्तु तीसरी बार साधु को उसकी रक्षा करने में सफलता मिल गयी। दर्शकों ने साधु से कहा- "आपको प्रथम अनुभव से ही पाठ सीख लेना चाहिए था।" उसने उत्तर दिया- "जब यह छोटा जानवर अपना धर्म नहीं छोड़ता, तो फिर भला साधु हो कर मैं अपना धर्म क्योंकर छोहूँ?" जो हानि पहुँचाये, उसके प्रति भी भला ही कीजिए। इसी में सच्ची शक्ति तथा महिमा निहित है।


२२. वहीं जिह्वा है जिससे भगवान् के नाम का गायन हो। वही हाथ हैं जिनसे ईश्वर तथा मानव जाति की सेवा हो। वही मन है जो सतत ईश्वर का स्मरण करे। वही श्रोत्र है जो सतत ईश्वर की लीला का श्रवण करें।


२३. वही शिर है जो सदा साधुओं तथा देवमूर्तियों के समक्ष झुके। वही आँखें है जो ईश्वर की मूर्ति के दर्शन करें। वे ही अंग हैं जो भगवान् विष्णु तथा उनके भक्तों के चरणामृत का सेवन करें।


. साधना, दिव्य नाम और समता


२४. शिर, हाथ तथा हृदय में कर्म, भावना तथा विचार में सन्तुलन रखिए। समत्व को ही योग कहते हैं। आप इसमें कई बार विफल रहेंगे। उठिए, बारम्बार युद्ध कीजिए। अन्ततः आप सफल होंगे ही। उत्साह, संलग्नता, साहस और संकल्प योग में सफलता के लिए इनकी आवश्यकता है।


२५. एक अज्ञानी व्यक्ति चाँदनी में कोई वस्तु ढूँढ़ रहा था। एक यात्री ने उससे पूछा, "हे मनुष्य, तू यहाँ क्या खोज रहा है?" उसने उत्तर दिया, "मैंने घर में सुई खो दी है और उसी को मैं यहाँ ढूँढ़ रहा हूँ।" उस मुसाफिर ने कहा, "हे मूर्ख ! घर में सुई खो कर उसे तुम यहाँ क्यों ढूँढ़ रहे हो? घर में खोजो, वहाँ तुम उसे पा लोगे।" मनुष्य ने उत्तर दिया, "यहाँ चाँदनी का प्रकाश है; अतः मैं यहाँ ढूँढ़ रहा हूँ।" यही हालत है सांसारिक बुद्धि वाले मनुष्यों की। आनन्द-सागर उनके हृदय में ही है; परन्तु वे सुख के लिए बाह्य विषयों की ओर दौड़ते हैं, जहाँ दुःख एवं विपत्ति की ही प्राप्ति होती है।


२६. निम्न प्रकृति का दमन कीजिए। मांस-कामना को नष्ट कर डालिए। रागों का शमन कीजिए। आत्म-संयम रखिए। तभी आप ईश्वरीय जाँच को सहन करने की शक्ति रखेंगे।


२७. हर महीने के लिए एक सद्गुण चुन लीजिए तथा अपने सामने उसका आदर्श बनाये रखिए। प्रातः-सायं उस पर ध्यान कीजिए। मैं सलाह देता हूँ कि इस माह आप शुद्धता को ही रखें।


२८. मैं आपको ईश्वर-साक्षात्कार तथा जीवन में सफलता की कुंजी दे रहा हूँ। यह ईश्वर का नाम है। जब कभी अवकाश हो, उसी क्षण से अपने इष्टदेव के नाम का जप कीजिए। प्रातः-सायं नियमित जप की बैठक रखिए। सोते समय भी ईश्वर से प्रार्थना कर लीजिए। महामन्त्र का कीर्तन कीजिए:


हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।


. प्रेम के परिणाम


२९. यदि आप अहिंसा में प्रतिष्ठित हैं, तो आप कुछ भी बुराई नहीं कर सकते। आप एक पल के लिए रुक्ष, कटु तथा क्रोधी नहीं बन सकते। आपके मन में दूसरों को हानि पहुँचाने का विचार प्रवेश नहीं कर सकता। आपका हृदय प्रेम, दया तथा सहानुभूति से परिप्लावित रहेगा।


३०. यदि आप मन, वचन और कर्म से दूसरों की बुराई कर सकें, यदि आपके मन में बुरे विचार प्रवेश पा सकें, तो आप समस्त जगत् के मानव-हृदय को प्रेरित कर देंगे, आपमें प्रबल आत्म-शक्ति होगी।


३१. मान लीजिए कि किसी लड़के को स्कूल में इस तरह सिखाया जाये कि +=८। घर में उसके माता-पिता तथा भाई भी यही सिखाते हैं कि +=८। कुछ साल तक ऐसी ही शिक्षा मिलती है। यदि कोई व्यक्ति उस लड़के से कहे कि +=१०, तो वह इस पर विश्वास नहीं करेगा। वह विवाद करने लगेगा। इसी तरह जब गुरु और सद्ग्रन्थ कहते हैं कि 'तू अमर सर्वव्यापक आत्मा है। तू नश्वर शरीर नहीं है', तो आप संन्यासियों तथा साधुओं से झगड़ने लगते हैं; क्योंकि आप बहुत दिनों से यही सोचते आये हैं कि 'यह जगत् सत्य है तथा यह शरीर ही आत्मा है।'


३२. ज्ञानियों के सत्संग, गुरु के पथ प्रदर्शन और श्रुतियों के परिशीलन से पुराने सांसारिक संस्कार दूर हो जायेंगे।


३३. मान लीजिए कि आप शरीर से पृथक् हैं। इसके लिए सतत मानसिक प्रयास की आवश्यकता है। कभी-कभी शिथिल रहने पर आप शरीर, इन्द्रियों तथा विषयों से मिल जायेंगे। परन्तु कोई बात नहीं। पुनः प्रयत्न कीजिए तथा पंचकोशों से स्वयं को पृथक् कीजिए।


. उन्नत साधना के लिए मन्त्र


३४. किसी भी कर्म में लगे रहने पर साक्षी बने रहिए। इस मन्त्र का जप कीजिए- "मैं मूक साक्षी हूँ ॐ।" यदि आपको मन के निरीक्षण के लिए पर्याप्त समय हो, तो भी यह देख लीजिए कि मन क्या कर रहा है, कौन-सी वृत्ति इसमें काम कर रही है। कम-से-कम घण्टे में एक बार ऐसा देखिए। ऐसा करने से आप अपने मन के दोष जान जायेंगे और तब अनुकूल साधनों से उन्हें दूर करेंगे। प्रबल धैर्य, महान् उत्साह, अनवरत संलग्नता तथा लौह संकल्प के साथ आपको जप तथा ध्यान करने होंगे। भगवान् ने कहा है-"हे अर्जुन ! मेरा स्मरण कर तथा युद्ध कर।" अतः भगवान् का स्मरण कर अधिकाधिक उत्साह तथा अटूट श्रद्धा के साथ अपनी साधना करते जाइए।


३५. आपका पात्र सबल होना चाहिए जिससे कि वह ईश्वरीय ज्योति को ग्रहण कर सके, अन्यथा किसी भी क्षण वह भग्न हो सकता है। अतःकरण ही वह पात्र है। सतत अधक निष्काम सेवा, जप, कीर्तन, सत्संग, स्वाध्याय, ध्यान तथा प्राणायाम के द्वारा ही यह पात्र सबल बन सकता है। घन-विद्युत् की चमक को सहना भी कितना कठिन है। आप डर कर काँपने लगते हैं। लक्ष्मी भी भगवान् नृसिंह के तेज को सहन करने में असमर्थ थीं। वे काँपने लगीं। प्रह्लाद ही शुद्ध भक्ति के कारण उस तेज को सहन कर सकता था। आप ईश्वरीय ज्योति की प्राप्ति के लिए पहले अपने मन को तैयार कर लीजिए। उसे शुद्ध बनाइए। उसे पूर्णतः निष्कल्मष बनाइए।


३६. चित्त का जीवन सामान्य बाह्य जीवन से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है। सचेतन जीवन से परे सुप्त जीवन का विस्तृत क्षेत्र है। चित्त का जीवन आपके चेतन जीवन को प्रभावित कर बदल सकता है। सारी आदतें चित्त से ही उत्पन्न होती हैं। सारी आदतें चित्त में ही गड़ी हुई हैं। अति चैतन्य अनुभव तुरीय है। यह निर्विकल्प समाधि है।


. साधना तथा आध्यात्मिक नियति


३७. आप पूर्ण विस्मृति तथा अन्धकार से युक्त हो कर इस जगत् में नहीं आते हैं। पूर्व-जन्म की स्मृतियों तथा आदतों से युक्त हो कर आप आते हैं। कामनाओं की उत्पत्ति पूर्व-अनुभवों से ही होती है। कोई भी व्यक्ति निष्काम्य जन्म नहीं लेता। हर व्यक्ति कुछ--कुछ इच्छा ले कर जन्म लेता है। वे इच्छाएँ उन वस्तुओं से सम्बन्ध रखती हैं जिनका उसने अपने पूर्व जीवन में उपभोग किया था। इच्छा पूर्व-जन्मों में आत्मा के अस्तित्व को प्रमाणित करती है।


३८. शुद्धता, श्रद्धा, भक्ति तथा पूर्ण आत्म-समर्पण के द्वारा ईश्वर की ओर मुड़िए। ईश्वरीय कृपा प्रवाहित होगी। आप अपने भीतर काम करने वाली ईश्वरीय शक्ति से अवगत होंगे। अपने अहंकार, सूक्ष्म तृष्णा तथा वासना द्वारा ईश्वर-कृपा के अवतरण में बाधा डालिए।


१८३९. मनुष्य में ही यह संकल्प है कि वह अपने को बन्धन से छुड़ा ले। उग्र साधना द्वारा प्राप्त ज्ञान-खड्ग से अविद्या के आवरण को नष्ट करके ही वह आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर सकता है।


४०. मनुष्य कष्ट सहता है। वह मनन तथा चिन्तन करता है। वह विवेक तथा ध्यान करता है। वह विचार करता है, "मैं कौन हूँ?" अन्ततः वह आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करता है। वह जन्म-मृत्यु, कष्ट तथा सुख-सभी को दीर्घ स्वप्न मानने लगता है।


४१. जब तक आप अपनी वाणी द्वारा दूसरों को आघात पहुँचाते हैं, तब तक आप समझ लें कि आपको रंचमात्र भी आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त नहीं हुई है। जिह्वा में खड्ग अथवा परमाणु बम है। देखिए ! मधुर बोलिए। जिह्वा पर बारम्बार नियन्त्रण कीजिए। मौन-व्रत का पालन कीजिए। प्राणायाम का अभ्यास कीजिए तथा वाणी के वेग को संयमित कीजिए। प्रार्थना, जप तथा ध्यान से आपको काफी सहायता प्राप्त होगी।


. साधना तथा मन


४२. मन सभी प्रकार के संकल्प-विकल्प, धारणाओं तथा शोकों का स्रष्टा है। जब मन के बाह्य धरातल पर उद्वेग की छोटी वृत्तियाँ उठें, तभी उनका शमन कर लेना चाहिए। बन्द कमरे में बैठ जाइए तथा नाम जप के द्वारा विचारों को बलपूर्वक भगा दीजिए। मन जब शान्त हो जाता है, तब वह स्वतः ही अपना भावी कार्यक्रम निश्चित कर लेता है। बहुधा यह आत्मा की वाणी ही होगी।


४३. दृष्टिकोण बदल डालिए। आप बुराई में भलाई, कुरूपता में सौन्दर्य, प्रस्तर में जीवन तथा दुःख में सुख देखेंगे। सब-कुछ अच्छा ही है। सब-कुछ सुन्दर ही है। सब-कुछ जीवित है। सब-कुछ सुखमय है। इसका भान कीजिए। इसका साक्षात्कार कीजिए।


४४. चित्त अपने भीतर के गुप्त विचारों को मन के धरातल पर लायेगा। शुभविचारों को ही ग्रहण कीजिए तथा दुर्विचारों को नष्ट कर डालिए। शुभ विचारों को मन में विश्राम करने दीजिए तथा बुरे विचारों को भगा दीजिए।


४५. आपका आध्यात्मिक उत्साह शनैः शनैः वृद्धि को प्राप्त करे। आपके अन्तर की ज्योति अधिकाधिक स्थिर हो कर जले। हृदय के द्वारा ही आध्यात्मिक साधना के फल को मापा जा सकता है। विचार में शुद्धता, कर्म में शुद्धता, दूसरों के प्रति प्रेम का विकास, ईश्वर का स्मरण होते ही अनुपात, रोमांच, जाति, लिंग, धर्म आदि का भेद रखते हुए सबके प्रति विशेष आकर्षण का भाव, नम्रता, सच्चाई ये आध्यात्मिक उन्नति के कुछ लक्षण हैं।


४६. शान्त बैठ कर मन को देखिए। इसकी आदत तथा वृत्तियों को जान लीजिए। यह भी जान लीजिए कि यह बारम्बार किस वस्तु का चिन्तन किया करता है। शनैः शनैः इसे उन विषयों से हटाइए तथा बारम्बार ईश्वर पर स्थिर कीजिए। धारणा की सीढ़ी पर कदम-कदम चढ़ते जाइए। धैर्य रखिए। कठिन संग्राम कीजिए।


४७. जो नश्वर वस्तु का परित्याग कर नित्य की खोज करता है, जो प्रेय का परित्याग कर श्रेय का अनुगमन करता है, जो बुराई के बदले भलाई करता है, जो घृणा करने वाले के प्रति भी प्रेम करता है, जो दिव्य जीवन यापन करता है, वह निस्सन्देह इस धरा पर ईश्वर ही है।


१०. आध्यात्मिक उन्नति के पूर्वापेक्ष्य


४८. नैतिक पूर्णता के बिना आध्यात्मिक उन्नति सम्भव नहीं है। आध्यात्मिक उन्नति के बिना मुक्ति नहीं। यम तथा नियम के अभ्यास से ही नैतिक पूर्णता की प्राप्ति होती है। आसन तथा प्राणायाम द्वितीय सीढ़ी है तथा धारणा एवं ध्यान तीसरी सीढ़ी है। समाधि लक्ष्य है। इस प्रकार जीव हर सीढ़ी से होते हुए सुखमय लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। नैतिक पूर्णता आधी आध्यात्मिक सफलता की प्राप्ति है।


४९. ध्यान के द्वारा आप मन से उद्भूत बाधाओं को जीत सकते हैं। परिणाम से निराश बनिए। आप शनैः शनैः धारणा को प्राप्त कर सकते हैं। जब मन भागने लगे, तो उसे पुनः वापस लाइए। ऐसा सोचिए कि आप ड्रिल कर रहे हैं। तब कभी मन भागे, कहिए- 'सावधान।' आपका मन शीघ्र ही ईश्वर की मूर्ति पर स्थिर हो जायेगा। कुछ दिनों तथा महीनों के लिए इसका अभ्यास कीजिए। आपको धीरे-धीरे धारणा प्राप्त होगी। आध्यात्मिक पथ में हर विफलता सफलता की ही सीढ़ी है। धैर्य रखिए।


५०. बन्द कमरे में दीर्घ काल तक बैठे रह कर साधक समझ लेते हैं कि उन्होंने ध्यान एवं समाधि में काफी प्रगति कर ली है; परन्तु वे मामूली बातों से ही अशान्त हो जाते हैं। वे सम्मान, सद्व्यवहार तथा अच्छे आसन की अपेक्षा रखते हैं। वे छोटी-छोटी बातों से ही पिनक जाते हैं। वे बड़प्पन की भावना के गुलाम हैं। वे दूसरों के साथ मिल कर नहीं रह सकते। अतः वे एक स्थान से दूसरे स्थान को अशान्त मन से भ्रमण करते रहते हैं। नम्रता, यथाव्यवस्था, निष्काम भाव, प्रेम-इन गुणों का अर्जन अनिवार्य है। यदि एक भी गुण आपमें है, तो समाधि स्वतः ही आपको प्राप्त हो जायेगी।


५१. आप किसी भी साधना को सच्चाईपूर्वक नहीं करते। यदि गुरु कहता है, "उपनिषद् का अध्ययन कर मनन तथा निदिध्यासन करो", तो आप कहते हैं, "इसके लिए मेरे पास समय नहीं है। मुझे आफिस में बहुत काम करना है। मैं इन सत्यों को समझ भी नहीं पाता हूँ। मेरी बुद्धि तीक्ष्ण नहीं है।" यदि गुरु कहता है, "तब राजयोग का अभ्यास करो तथा एक आसन पर एक या दो घण्टे के लिए बैठ कर धीरे-धीरे वृत्तियों का निरोध करो।" तब आप कहते हैं, "मैं तो पन्दरह मिनट से अधिक बैठ ही नहीं पाता। यदि मैं दीर्घ काल तक बैठूं, तो मेरा शरीर दुःखने लगता है।" यदि गुरु कहता है, "तो उपासना करो। भगवान् कृष्ण की पूजा करो। अपने सामने एक चित्र रखो।" आप कहेंगे, "उपासना में क्या रखा है। मूर्ति पूजा व्यर्थ है। मैं चित्र पर ध्यान नहीं कर सकता। यह तो कलाकार की कल्पना मात्र है। मैं तो निराकार सर्वव्यापक ब्रह्म पर ध्यान करना चाहता हूँ। चित्र पर ध्यान करना तो बच्चों का खेल है। यह मेरे लायक नहीं है।" फिर गुरु कहता है, "तब नित्य-प्रति दो घण्टे कीर्तन तथा जप करो।" आप कहते हैं, "जप तथा कीर्तन में कुछ नहीं रखा है। यह तो मन्द अधिकारियों के लिए है। मैं तो विज्ञान जानता हूँ। मैं इन चीजों को नहीं कर सकता। मैं जप तथा कीर्तन से ऊपर उठ गया हूँ। मैं आधुनिक व्यक्ति हूँ।" यदि पुरोहित विधिवत् हवन करता है तो आप कहेंगे, "हे पुरोहित जी! आप यह सब क्या कर रहे हैं? शीघ्रता कीजिए। मुझे भूख लगी हुई है। मुझे दश बजे आफिस जाना है।" यदि पुरोहित जल्दबाजी करता है, तो आप कहेंगे- "यह क्या? इस पुरोहित ने कुछ समय के लिए कुछ मन्त्र उच्चारण किये और अब कहता है कि हवन पूरा हो गया। यह केवल समय, रुपये तथा शक्ति की बरबादी है। मुझे हवन में श्रद्धा नहीं। इससे कुछ भी भलाई नहीं होती है।" यदि गुरु कहता है, "तो प्राणायाम करो, शीर्षासन का अभ्यास करो। तुम्हारी कुण्डलिनी शीघ्र ही जग पड़ेगी।" आप कहेंगे, "मैंने छह महीने तक प्राणायाम किया है। शरीर बहुत ही गरम हो जाता है। मैंने अभ्यास छोड़ दिया। शीर्षासन करते समय मैं गिर पड़ता था। मैंने उसे भी त्याग दिया।" यही आपकी हालत है; फिर भी आप पल मात्र में निर्विकल्प समाधि प्राप्त करना चाहते हैं।


५२. ईर्ष्या तथा द्वेष से मुक्ति सुखमय है। काम, लोभ तथा अभिमान का अभाव सुखमय है। शोक, विपत्ति तथा बन्धन से मुक्त बनिए। शरीर में आत्मा का अध्यास कीजिए। देहाध्यास भयावह है। अज्ञान तथा शरीर के साथ आसक्ति के कारण ही भूलें हुआ करती हैं। भ्रम से कष्टों की उत्पत्ति होती है।


५३. आपने लाखों जन्मों में विषय पदार्थों को भोगा है। इस जन्म में भी गत पचास वर्षों से विषय-भोगों को भोग रहे हैं। यदि अभी तक तृप्ति नहीं हुई, तो कब होगी? इन विषय-पदार्थों की मृगतृष्णा के पीछे दौड़िए। इन्द्रियां आपको मोहित कर रही हैं। वैराग्य तथा संन्यास का विकास कीजिए और आत्म-साक्षात्कार कीजिए। तभी आप नित्य-तृप्ति, शाश्वत शान्ति तथा अमरानन्द प्राप्त कर सकते हैं। आप अज्ञान-निद्रा से जग पड़ेंगे।


५४. प्राचीन काल में साधक आध्यात्मिक शिक्षा के लिए गुरु के पास अपने हाथ में समिधा ले कर जाते थे। इसका अभिप्राय यह है कि साधक गुरु से प्रार्थना करता- "हे पूज्य गुरुवर ! आपकी कृपा से ज्ञानाग्नि में मेरे पापों का गट्ठर जल जाये। मैं परम ज्ञान प्राप्त करूँ ! ईश्वरीय ज्योति प्रखर हो! आन्तर स्वयं-प्रकाश आत्मा का मैं साक्षात्कार करूँ! मेरे इन्द्रिय, वासना, मन, प्राण तथा अहंकार ज्ञानाग्नि से भस्मीभूत हो जायें! मैं ज्योतियों की ज्योति बन जाऊँ !"


५५. कामुक, पाममय सांसारिक जीवन के बीच दिव्य जीवन के लिए सतृष्ण होना, आत्म-साक्षात्कार के लिए पिपासु होना और सात्त्विक परिवार में जन्म लेना-ये ईश्वर के अनुपम वरदान हैं। इनकी रक्षा कीजिए। सावधान रहिए। योग की शीतल छाया में आश्रय ग्रहण कीजिए। ईश्वरीय वरदान तथा कृपा से पूरा लाभ उठाइए। उनके नाम का जप कीजिए। अपने परिवार तथा मित्रों के साथ उसकी महिमा का गायन कीजिए।


५६. सच्चा भक्त यह जानता है कि ईश्वर सब कुछ उसकी भलाई के लिए ही करता है। यदि कष्ट आते हैं, तो इससे उसमें वैराग्य बढ़ेगा तथा मन अधिकाधिक ईश्वर की ओर मुड़ेगा। वह तितिक्षा तथा संकल्प-शक्ति को बढ़ा पायेगा। मूर्ख सांसारिक मनुष्य यह नहीं जानता।


५७. जब तक मनुष्य यह नहीं जानता कि वास्तव में वह अमर आत्मा है, तब तक वह अज्ञानी है। वह अज्ञानवश शरीर को ही आत्मा मानता है। अज्ञान-नाश के द्वारा जब ज्ञान का उद्भव होता है, तब देहाध्यास भी विलुप्त हो जाता है। वह परमात्मा से एक बन जाता है।


५८. यदि ध्यान में मन केन्द्रित नहीं होता, यदि वह भटकता रहता है, यदि वह मनोराज्य में विचरण करता है, यदि उसमें बुरे विचार उठा करते हैं तो अच्छा होगा कि आप उठ कर कुछ निष्काम कर्म अथवा स्वाध्याय में लग जायें। इस मानसिक स्थिति में बैठे रहना समय का अपव्यय ही है।


११. साधना में पथ-प्रदर्शन


५९. आवेगों पर पूर्ण नियन्त्रण रखिए। उनसे चलायमान बनिए। उनका दमन कीजिए। आप परम शान्ति का उपभोग करेंगे। प्राणायाम, जप तथा नियमित ध्यान आपको आवेगों के नियन्त्रण में सहायक सिद्ध होंगे।


६०. श्रुति कहती है, "जो सभी भूतों में एक आत्मा को ही देखता है, उसके लिए शोक कहाँ? मोह कहाँ? वह किसी से भय नहीं करता" (ईश उपनिषद्) "योग से युक्त हुए आत्मा वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है। वह सर्वत्र एक के ही दर्शन करता है" (गीता: /२९) "ज्ञानी जन विद्या और विनय-युक्त ब्राह्मण में तथा गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी सम भाव से देखने वाले ही होते हैं" (गीता: /१८) सभी भूतों में एक ही आत्मा के दर्शन कीजिए। यही समदृष्टि है।


६१. विषय-पदार्थों का चिन्तन संग है। उनका चिन्तन करना वैराग्य है। ब्रह्म-चिन्तन के द्वारा विषय चिन्तन को रोकिए।


६२. मन में वासनाओं को बनाये रखना सर्प को दूध पिला कर पालने के समान है। आपका जीवन सदा खतरे में है। विचार, वैराग्य तथा ध्यान के द्वारा इन वासनाओं को नष्ट कर डालिए।


६३. अधिक आवेगात्मक बनिए। आवेशों से चलायमान होइए। सहानुभूति तथा करुणा होनी चाहिए; परन्तु किसी के बीमार पड़ जाने पर भावनाओं से चलायमान होइए। इस संसार में रोग तथा मृत्यु साधारण घटनाएँ हैं। हर व्यक्ति किसी--किसी रोग से पीड़ित है। किसी व्यक्ति से आसक्त बनिए। आसक्ति से दुःख तथा अशान्ति की प्राप्ति होती है।


६४. यदि आपको धर्मशाला या किसी सराय में रहना हो और आपके बगल वाले कमरे में अकेली स्त्री रहती हो, तो तुरन्त ही उस स्थान को छोड़ कर चले जाइए। आप नहीं जानते कि क्या घटना घट सकती है। स्वयं को प्रलोभनों के समक्ष लाइए। श्री व्यास तथा उनके शिष्य जैमिनि की कहानी याद रखिए।


६५. आपके सारे दुःख तथा कष्ट आपके अहंकार के कारण हैं। आपके दुःख का कारण बाहर से नहीं आता। इस अहंकार को विनष्ट कीजिए। आप असीम सुख तथा विकास को प्राप्त करेंगे।


६६. आपके विषय-सुख ही दुःखों के मूल हैं। आपकी कामनाएँ तथा इच्छाएँ आपको विनाश की ओर ले जाती हैं। आपके इन्द्रिय तथा मन ही आपके शत्रु हैं। सभी विषय आपको प्रलोभित करते तथा मोहित बनाते हैं। इस जगत् में कुछ भी स्थायी नहीं है। सारे विषयों की चमक अस्थायी है। कुछ भी आपको शाश्वत सुख प्रदान नहीं कर सकता। आप आत्मा में ही सुख को प्राप्त कर सकते हैं। आत्मा ही नित्य, शुद्ध तथा आनन्दमय है।


६७. अहंता, ममता तथा कामनाओं का त्याग ही संन्यास का रहस्य है। स्त्री, बच्चे, धन, घर, सम्बन्धी, मित्र आदि के त्याग से ही सच्चा त्याग नहीं हो पाता है। आपको विषय-पदार्थ नहीं बाँधते हैं; अपितु ममता संसार-चक्र में आपको बाँधती है।


६८. अपने भीतर गुप्त अक्षय खजाने को खोजिए। आप यह साक्षात्कार करेंगे कि समस्त जगत् का साम्राज्य, यहाँ तक कि देवलोक भी आत्मज्ञान के सामने धूलि के समान है। इस जगत् का बन्धन भयंकर है। इस भौतिक जीवन से परे जा कर नित्य-वस्तु में जीवन यापन कीजिए।


६९. जब आप ज्ञान-चक्षु को प्राप्त करेंगे, तो आप अपने विगत जन्मों को देख सकेंगे तथा आध्यात्मिक मार्ग में अपनी उन्नति का ज्ञान कर सकेंगे। योग-पथ में टिके रहिए। श्रमपूर्वक अभ्यास कीजिए। ध्यान में नियमित रहिए। संसार के प्रलोभनों से ऊपर उठिए। आप शीघ्र आत्मज्ञान प्राप्त करेंगे। मैं आपकी सेवा करूँगा तथा आपको मार्ग दिखाऊँगा।


१२. आध्यात्मिक उन्नति के सिद्धान्त


७०. मन तथा इन्द्रियों को अनुशासित कीजिए। सद्गुणों का अर्जन कीजिए। आत्मा के स्वरूप को जानने के लिए प्रयत्नशील बनिए। नियमित ध्यान का अभ्यास कीजिए। तभी आप अमृतत्व तथा गम्भीर शाश्वत सुख प्राप्त कर सकेंगे।


७१. जब आप अपने स्वरूप को जान लेंगे, तब यह जगत् स्वप्न मात्र, नाम-रूप मानसिक कल्पना मात्र रह जायेंगे। जो सुख तथा दुःख में स्थिर रहता है, वहीं अमृतत्व का अधिकारी है।


७२. निराश होइए। आपके अन्दर असीम शक्ति तथा बल है। आपका भविष्य सुन्दर है। मुस्कराते हुए सारे कष्टों का सामना कीजिए। दुःख आँखें खोलता है। यही वास्तविक पथ-प्रदर्शक है। ईश्वर आपको उग्र जाँचों द्वारा सबल बनाना चाहता है। इस रहस्य को समझ लीजिए। कभी निराश बनिए। सदा हँसिए, उछलिए, कूदिए, गाइए तथा मुस्कराइए।


७३. कष्ट तथा निराशा की घड़ियों में ईश्वर में अविचल श्रद्धा होनी चाहिए। जब मनुष्य पूर्णतः असहाय-सा भान करता है, तब आशा तथा सहायता अन्दर से प्राप्त होती है। कष्ट के बिना शक्ति नहीं मिल सकती। कष्ट के बिना सफलता नहीं। बिना कष्ट के, बिना पीड़ा के कोई मनुष्य सन्त नहीं बन सकता। हर कष्ट का उद्देश्य है आपको ऊपर उठाना। कष्ट से तितिक्षा, करुणा, श्रद्धा तथा निरभिमानता बढ़ती है।


७४. जो वस्तुएँ छुरी, ताँबे तथा पीतल के बरतन नित्य काम में नहीं लायी जातीं, उनमें जंग लग जाता है। उसी प्रकार यदि शरीर का व्यायाम हो, तो शरीर भी दुर्बल हो जाता है, मनुष्य तामसिक बन जाता है। अतः साधक को सावधान रहना चाहिए। कभी भी तमस् के वशीभूत नहीं होना चाहिए। आसन, सूर्यनमस्कार आदि का अभ्यास करना चाहिए।


१३. साधना के तत्त्व


७५. विषय-पदार्थ महान् विषों से भी भयंकर है। विष तो एक ही शरीर को मारता है; परन्तु विषय नाना जन्मों में कितने ही शरीरों को नष्ट कर डालता है। प्रेम तथा सेवा के द्वारा मन पर विजय प्राप्त कीजिए।


७६. जो सत्संग करता है; करुणा, नम्रता, साहस आदि सद्गुण रखता है तथा छोटी अवस्था से ही आत्मज्ञान के लिए संलग्न रहता है, वही मोक्ष प्राप्त करता है।


७७. किसी भी प्राणी को मन, वचन तथा कर्म से चोट पहुँचाइए। सत्य बोलिए। ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए। सरल जीवन बिताइए। उन्हीं वस्तुओं को रखिए जो जीवन यापन के लिए आवश्यक हों। सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय कीजिए। सद्गुणों का अर्जन करते समय जितने भी क्लेश पड़ें, उनको धैर्यपूर्वक सहन करते जाइए। ईश्वर की पूजा कीजिए। धारणा तथा ध्यान कीजिए। यही परम कल्याण का पथ है।


७८. नित्य दो घण्टे के लिए मौन व्रत रखिए। आसन के द्वारा स्थिरता लाइए। विषयों से इन्द्रियों को समेट लीजिए। प्राणायाम कीजिए। मन को साम्यावस्था में लाइए। यही असीम सुख का मार्ग है।


७९. पूर्ण ईश्वरार्पण कीजिए। ईश्वर के लिए उन सभी का संन्यास कीजिए जो अनात्मा हैं। इस प्रकार जीवन यापन कीजिए मानो ईश्वर तथा आपके अतिरिक्त और कोई है ही नहीं।


८०. शुद्ध आहार कीजिए। इन्द्रिय-सुखों का परित्याग कीजिए। धार्मिक कर्म कीजिए। एकान्त में रहिए। गम्भीरतापूर्वक ध्यान कीजिए। यही आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है।


१४. विचार की पृष्ठभूमि


८१. गम्भीर आन्तरिक साधना को ही जीवन का रहस्य बना डालिए। ईश्वर के सतत स्मरण तथा उसकी सत्ता के सतत अनुभव के ऊपर ही अपने जीवन को आश्रित रखिए।


८२. ईश्वर का नाम अमृत है। नाम आपका एकमेव आधार, अवलम्ब तथा खजाना है। नाम तथा नामी एक ही है। भक्ति के साथ सदा भगवान् के नामों का जप कीजिए, कीर्तन कीजिए। यही कलियुग की मुख्य साधना है।


८३. सदा कुछ प्रेरणात्मक श्लोक अथवा मन्त्र अथवा ईश्वर के नाम का जप कीजिए। यही ईश्वरीय विचार की पृष्ठभूमि है।


८४. अपने हृदय के अन्तरतम से ईश्वर की प्रार्थना कीजिए:


मैं तेरा हूँ, सब-कुछ तेरा ही है। तेरी इच्छा ही पूर्ण हो। मैं तो तेरे हाथों का निमित्त हूँ। तू ही सब-कुछ करता है, तू न्यायी है। मुझे श्रद्धा तथा भक्ति प्रदान कर।


८५. जो ब्रह्मचर्य का अभ्यास करता है, वह धीर है। वह जीवन के कष्टों एवं आपत्तियों का सामना कर सकता है। ब्रह्मचर्य के बिना शिक्षा खोखली तथा छिछली है।


८६. इसी क्षण से शरीर तथा मन को इस तरह अहोरात्र संलग्न रखिए कि बुरे विचारों को अवसर ही मिले। यदि बुरे विचार आक्रमण करें, तो जेबी गीता निकाल लीजिए तथा उसे पढ़ना शुरू कीजिए अथवा नोट-बुक में कुछ मन्त्र लिखिए अथवा जप-माला के सहारे कुछ जप कीजिए। "मुझे ईश्वर ने आध्यात्मिक मार्ग के लिए चुन लिया है। मुझमें प्रबल संकल्प-शक्ति है।" इसका निश्चय कीजिए। तब तक सोइए, जब तक निद्रा आपको वशीभूत कर ले। रात्रि में अधिक भोजन कीजिए।


८७. हर मन्त्र बहुत ही शक्तिशाली है। दुर्गा-मन्त्र द्वारा आप माता की कृपा प्राप्त करेंगे। अहर्निश माता का ध्यान कीजिए जो सर्वशक्तिमयी हैं। माया विलुप्त हो जायेगी। सत्य से डिगिए नहीं।


८८. जिसे विश्वात्म-दृष्टि प्राप्त है, वही सभी घटनाओं के रहस्य को समझ सकता है। वह जानता है कि भगवद्-इच्छा के बिना प्रबल झंझावात भी एक सूखे पत्ते को उड़ा नहीं सकता। 'क्यों' तथा 'कैसे' ये अतिप्रश्न हैं। ईश्वर के नाम का जप कीजिए। विश्व-कल्याण के लिए प्रार्थना कीजिए। प्रेम, सेवा-भाव तथा त्याग का आदर्श अपनाइए। आप इस विश्व को स्वर्ग बना सकते हैं।


८९. साधना में गोता लगाइए। निश्चय कीजिए कि आप अखण्ड ब्रह्म हैं। योग के द्वारा जगत् के साथ एक हो जाइए। सारी शंकाएँ दूर हो जायेंगी। कोई प्रश्न नहीं रह जायेगा।


९०. ईश्वर आपके हृदय में निवास करता है, फिर आप एकाकीपन का भान कैसे कर सकते हैं? प्रार्थना, जप, कीर्तन, ध्यान, मन्त्र लेखन तथा योगाभ्यास के द्वारा उसकी संगति प्रेरणा प्रदान करती है। आप अक्षय शान्ति, सुख तथा शक्ति प्राप्त करेंगे। सांसारिक लोगों के संग से दुःख ही प्राप्त होगा। प्रारम्भ में आपको संघर्ष करना होगा; परन्तु ज्यों-ही आपको ईश्वरीय संगति के माधुर्य का रस मिलेगा, त्यों-ही आप सांसारिक लोगों से भागने लगेंगे। जब कभी आप उदासी का अनुभव करें, तो आध्यात्मिक पुस्तक पढ़िए या एकाग्रतापूर्वक मन्त्र लिखिए।


१५. साधना तथा समाधि


९१. दुःख, कष्ट, दुर्भाग्य-ये सब मानसिक सृष्टियाँ हैं। वास्तव में इनका अस्तित्व ही नहीं है। ईश्वर ही सब-कुछ करता है। इस महान् सत्य पर ध्यान कीजिए तथा इसके आश्चर्यकर परिणाम का अनुभव कीजिए। जब आप सुख और दुःख-दोनों को ईश्वर का प्रसाद समझ कर ग्रहण करने लगेंगे, तब आप परम आनन्द तथा शान्ति प्राप्त कर लेंगे।


९२. सर्व भाव से हृदय, मन, आत्मा तथा सम्पूर्ण भाव से - भगवान् के पास जाइए। सूक्ष्म कामना भी अपने लिए बचाये रखिए। आप भगवान् की पूर्ण कृपा प्राप्त करेंगे।


९३. कुछ ज्योति देख कर, कुछ नाद श्रवण कर, कुछ दिव्य गन्ध का अनुभव कर साधक समझ बैठते हैं कि उन्हें निर्विकल्प समाधि मिल गयी है। यह भारी भूल है। निर्विकल्प समाधि सस्ती वस्तु नहीं है। इसके लिए पूर्ण शुद्धता आवश्यक है। वे जाँच करने पर विफल सिद्ध होते हैं। कुछ समाधि का बहाना करते हैं। वे भारी ठग हैं। लाखों में एक ही ईश्वर की कृपा से समाधि प्राप्त कर सकता है। यदि आप अच्छे साधक हैं, यदि आपको सच्चरित्रता, विवेक, वैराग्य, शास्त्र ज्ञान, नैतिक पूर्णता प्राप्त है, तो यह भारी प्राप्ति है। लाखों में एक ही ईश्वर की कृपा से अच्छा साधक बन सकता है। यह साधक समस्त जगत् को शुद्ध बना सकता है।


९४. मन्त्र लिखते समय सदा मौन व्रत का पालन कीजिए। ऐसा अनुभव कीजिए कि ईश्वरीय शक्ति आपमें प्रवाहित हो रही है। लिखना जब तक पूरा हो जाये, आसन बदलिए। मन्त्र-लेखन में अचिन्त्य शक्ति है। इससे साधक में धारणा बढ़ती है। इन दोनों के मिलने से आनन्द का प्रवाह सारे शरीर को पुलकित कर देता है। साधक आन्तरिक शान्ति का अनुभव करता है। वह ईश्वर के विचार में निमग्न हो जाता है।


१६. आध्यात्मिक साधना के रूप


९५. सभी परिस्थितियों में शान्त रहिए तथा समत्व बुद्धि रखिए। बारम्बार कठिन प्रयास द्वारा शम का अर्जन कीजिए। शम चट्टान के समान है। इस पर अशान्ति की लहरें टकरा सकती हैं; परन्तु वे इसे प्रभावित नहीं कर सकी। उस शाश्वत शान्त आत्मा पर नित्य-प्रति ध्यान कीजिए। शम-युक्त साधक गम्भीर ध्यान के द्वारा निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर लेगा। वही निष्काम कर्मयोग का अभ्यास भी कर सकता है।


९६. हर प्रलोभन का संवरण करने से, हर वृत्ति का दमन करने से, हर कटु शब्द को सहन करने से, हर शुभेच्छा को प्रोत्साहित करने से आपमें संकल्प-शक्ति तथा सच्चरित्रता का विकास होगा और आप नित्य-सुख एवं अमृतत्व को प्राप्त कर लेंगे।


९७. आध्यात्मिक मार्ग में आपका कितना भी क्षीण प्रयास क्यों हो, उससे आपकी आन्तरिक शक्ति बढ़ेगी। प्रार्थना, कीर्तन, जप और स्वाध्याय-ये नित्य-सुख के द्वार खोलेंगे। अनवरत साधना के द्वारा सिद्धि प्राप्त कर लीजिए।


९८. बारम्बार विफलता की परवाह कीजिए। निराश होइए। साधना त्यागिए। कटिबद्ध हो कर पुनः युद्ध कीजिए। आप हर बार सफलता के निकटतर होते जा रहे हैं। हर विफलता सफलता की सीढ़ी है। आप कालान्तर में सफल हो जायेंगे।


९९. कामना, आसक्ति तथा अभिमान के बिना मन का अस्तित्व नहीं रह सकता। यह किसी--किसी को अवश्य पकड़े रहेगा। सात्त्विक कामनाओं को प्रश्रय दीजिए। मुक्ति की प्रबल कामना रखिए। इससे आप सारी सांसारिक कामनाओं को नष्ट कर सकते हैं। स्त्री-पुरुष से आसक्त हो कर मन को भगवान् कृष्ण अथवा भगवान् राम की मूर्ति से आसक्त बनाइए। 'मैं अमरात्मा हूँ' अथवा 'मैं कृष्ण का दास हूँ' - इस भावना द्वारा सात्त्विक अहंकार रखिए।


१००. यदि आप विश्वात्म-चैतन्य से एक बनना चाहते हैं, तो अपने हृदय को विकसित बनाइए। आपको विश्व के साथ एक बनना होगा। आपको अहंकार, स्वार्थ, ईर्ष्या, घृणा, लोभ आदि का उन्मूलन करना होगा; क्योंकि ये आप तथा जगत् के बीच व्यवधान डालते हैं। कर्मयोगी बनिए और विश्व-कल्याण के लिए कार्य कीजिए। आप विश्वात्म-चैतन्य में विलीन हो जायेंगे। सार्वभौम चेतना से एकता की अवस्था प्राप्त करने के लिए आपको सार्वभौमिक सेवा करनी होगी।



प्रस्तावना


साधना शब्द की उत्पत्ति 'साध्' धातु से हुई है जिसका अर्थ है- 'प्रयत्न करना', 'किसी विशेष सिद्धि की प्राप्ति के लिए प्रयास करना। जो प्रयत्न करता है, उसे साधक कहते हैं। यदि अभीष्ट फल-सिद्धि की प्राप्ति हुई, तो उसे सिद्ध कहते हैं। जिसे ब्रह्म का पूर्ण ज्ञान है, वह पूर्ण सिद्ध है। साधना के बिना आत्म-साक्षात्कार अथवा ईश्वर-दर्शन सम्भव नहीं है। कोई भी आध्यात्मिक प्रयत्न साधना है। साधना तथा अभ्यास पर्यायवाची शब्द हैं। जो साधना से प्राप्य हो, उसे साध्य कहते हैं। ईश्वर-साक्षात्कार ही साध्य अथवा लक्ष्य है। ब्रह्म-साक्षात्कार के लिए साधना के प्रायः सभी प्रकारों का इस पुस्तक में वर्णन किया गया है। इस पुस्तक का क्षेत्र सर्वग्राही है।


यदि आप शीघ्र उन्नति करना चाहते हैं, तो आपको ठीक प्रकार की साधना मालूम हो जानी चाहिए। यदि आप आत्मावलम्बी हैं, तो स्वतः ही नित्य प्रति के अभ्यास के लिए साधना को चुन सकते हैं। यदि आपमें आत्मार्पण का भाव है, तो अपने गुरु से अपने लिए उपयुक्त साधना का प्रकार प्राप्त कर लीजिए तथा गम्भीर श्रद्धा के साथ उसका अभ्यास कीजिए।


! उस पूज्य प्रभु को नमस्कार, जिससे महत्तर इस जगत् में कुछ भी नहीं है तथा जो इस जगत् से अतीत है।


आप अनावश्यक ही अपना बन्धन दीर्घ काल तक क्यों बनाये रखेंगे? अभी-अभी आप अपने जन्माधिकार को प्राप्त क्यों नहीं करते? अभी आप अपने बन्धन को क्यों नहीं तोड़ते ? विलम्ब का अर्थ है कष्टों की वृद्धि। आप किसी भी क्षण बन्धन को तोड़ सकते हैं। यह आपकी शक्ति के अन्दर है। अभी कीजिए। खड़े हो जाइए। कटिबद्ध होइए। उग्र तथा अनवरत साधना कीजिए। मुक्ति प्राप्त कर नित्य-सुख का उपभोग कीजिए।


अनुशासन, तप, आत्म-संयम तथा ध्यान के द्वारा निम्न प्रकृति को उच्च प्रकृति का सेवक बना डालिए। यही आपकी मुक्ति का समारम्भ है।


आपके अन्दर का ईश्वरत्व आपके बाहर की सभी वस्तुओं से अधिक शक्तिशाली है। अतः किसी भी वस्तु से भय कीजिए। अपनी अन्तरात्मा पर ही निर्भर रहिए। अन्तर्दृष्टि द्वारा मूल से शक्ति पाइए।


त्याग के बिना आप कदापि सुखी नहीं हो सकते। त्याग के बिना आप कभी विश्राम नहीं कर सकते। अतः सब-कुछ त्याग डालिए। सुख पर अपना अधिकार जमाइए। त्याग को ही सर्वश्रेष्ठ मानिए।


अपना सुधार कीजिए। चरित्र निर्माण कीजिए। हृदय को शुद्ध बनाइए। वृत्तियों को शान्त कीजिए। उफनते हुए आवेगों को स्तब्ध कीजिए। बहिर्मुखी इन्द्रियों को समेट लीजिए। वासनाओं को नष्ट कीजिए। आप गम्भीर ध्यान में महिमामय आत्मा के दर्शन करेंगे।


पूर्ण स्वतन्त्रता तथा निर्वाण प्राप्ति के पाँच साधन हैं। इनसे ही परम सुख की प्राप्ति होती है। ये हैं सत्संग, विवेक, वैराग्य, 'मैं कौन हूँ' का विचार तथा ध्यान। ये ही स्वर्ग हैं। ये ही धर्म हैं। ये ही सर्वोच्च सुख हैं।


पहले भला मनुष्य बनिए। तब इन्द्रियों का दमन कीजिए। तब निम्न मन को उच्च मन से पराजित कीजिए। तब ईश्वरीय ज्योति का अवतरण होगा।


बिना जल्दबाजी किये शान्तिपूर्वक, संलग्नतापूर्वक ध्यान का अभ्यास कीजिए। आप शीघ्र ही समाधि प्राप्त कर लेंगे।


आध्यात्मिक जीवन कठिन तथा श्रमयुक्त है। इसके लिए सतत सावधानी तथा दीर्घ उत्साह की आवश्यकता है। तभी ठोस उन्नति सम्भव है।


आपने स्वयं ही अज्ञानवश बन्दीगृह की दीवारें अपने लिए खड़ी की हैं। आप विवेक तथा 'मैं कौन हूँ' के विचार द्वारा इन दीवारों को ध्वस्त कर सकते हैं।


कष्ट आदमी को शुद्ध बनाते हैं। वे पाप तथा मल को जला डालते हैं। ईश्वरत्व अधिकाधिक प्रकट होने लगता है। उससे आन्तरिक शक्ति मिलती है, इच्छा-शक्ति विकसित होती तथा तितिक्षा-शक्ति बढ़ती है। अतः कष्ट भी छिपे रूप से वरदान ही हैं।


ध्यान के समय प्रकाश की एक किरण भी आपके मार्ग को आलोकित करेगी। इससे आपको पर्याप्त उत्साह तथा आन्तरिक बल मिलेगा। इससे आप अधिकाधिक साधना करने के लिए प्रेरित होंगे। ध्यान की गम्भीरता बढ़ने पर, शरीर-चैतन्य से ऊपर उठने पर आप इस प्रकाश-किरण का अनुभव करेंगे।


आत्मा की प्रसुप्त क्षमताओं का प्रस्फुटन ही जीवन है। दिव्य जीवन बिताइए। ध्यान, जप, कीर्तन तथा स्वाध्याय के द्वारा दिव्य विचारों को उन्नत कीजिए।


शाश्वत जीवन की सरिता में स्नान कीजिए। डुबकी लगाइए। गोता लगाइए। तैरिए, उसमें उतराइए। आनन्द कीजिए।


सूर्य-स्नान के द्वारा शरीर को स्वस्थ बनाइए। नित्य वस्तु आत्मा में सूर्य-स्नान के द्वारा आत्मा को स्वस्थ बनाइए। आप सुन्दर स्वास्थ्य तथा शाश्वत जीवन प्राप्त करेंगे।


आत्मा-रूपी पुष्प की कली का प्रस्फुटन ही पूजा है। पूजा ही जीवन है। पूजा से ही नित्य जीवन की प्राप्ति होती है। आप युद्ध में लाखों व्यक्तियों को जीत सकते हैं; परन्तु मन पर विजय पाने से ही आप वास्तविक विजेता बन सकेंगे।


जब तक आपकी इन्द्रियाँ विजित नहीं होतीं, तब तक आपको तपस्या, दम तथा प्रत्याहार का अभ्यास करते रहना होगा।


जब विद्युत् बल्ब कई परतों वाले कपड़े से ढका रहता है, तब उसकी प्रखर रोशनी प्राप्त नहीं होती। एक-एक परत हटाते जाइए और रोशनी प्रखरतर होती जायेगी। उसी तरह स्वयं-प्रकाश आत्मा भी पंचकोशों से ढका हुआ है। ध्यान अथवा 'नेति-नेति' के अभ्यास के द्वारा एक-एक कर कोश को उतारते जाइए। आत्मा का प्रकाश बढ़ता जायेगा।


शान्तचित्त हो कर बैठ जाइए। शरीर तथा मन के ऊपर अपना स्वामित्व स्थापित कीजिए। अपने हृदय-प्रकोष्ठ में गहरा गोता लगाइए तथा गम्भीर मौन-सागर में निमग्न हो जाइए। इस निःशब्द वाणी को सुनिए।


पहले हृदय को शुद्ध बनाइए, तब योग की सीढ़ी पर साहस तथा अविचल उत्साह के साथ चढ़ते जाइए। शीघ्र ही ऊपर चढ़िए। ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त कर ज्ञान-मन्दिर में प्रवेश कीजिए, वहाँ धर्ममेघ से अमृत की वर्षा होती है।


निश्चित भित्ति पर आध्यात्मिक जीवन का निर्माण कीजिए। ईश्वर-कृपा तथा चरित्र-बल ही पक्की नींव है। ईश्वर तथा उसके सनातन नियम की शरण में जाइए। इस पृथ्वी तथा स्वर्ग में ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो आपके मार्ग में व्यवधान डाल सके। आत्म-साक्षात्कार में सफलता निश्चित है। आपके लिए विफलता है ही नहीं। आपके मार्ग पर आलोक है। सब-कुछ प्रकाशमय है।


साधना का अर्थ कोई भी आध्यात्मिक अभ्यास है जिससे साधक ईश्वर को प्राप्त कर सके। साधना वह साधन है जिससे जीवन के लक्ष्य को पाया जाये। योग्यता, रुचि तथा उन्नति के स्तर के अनुसार व्यक्ति-व्यक्ति में साधना की भिन्नता है। प्रत्येक व्यक्ति को अनुकूल साधना अवश्य ग्रहण कर लेनी चाहिए जिससे परम लक्ष्य की प्राप्ति हो। साध्य वह है जो साधना से प्राप्त किया जाये। यह ईश्वर या आत्मा या पुरुष है।


जो भक्ति-मार्ग का अनुगमन करते हैं, उन्हें जप, भागवत या रामायण का स्वाध्याय करना चाहिए। नवधा-भक्ति श्रवण, स्मरण, कीर्तन, वन्दन, अर्चन, पाद-सेवन, सख्य, दास्य तथा आत्म-निवेदन के द्वारा भक्त उच्च कोटि की भक्ति को प्राप्त कर सकता है। भक्त को व्रत, अनुष्ठान, प्रार्थना तथा मानसिक पूजा भी करनी चाहिए। उन्हें दूसरों की नारायण-भाव से सेवा करनी चाहिए। भक्तियोगी के लिए यही साधन है।


जो कर्मयोग का अनुगमन करते हैं, उन्हें पीड़ित मानव जाति तथा समाज की विविध रूप से निष्काम सेवा करनी चाहिए। उन्हें कर्म के फल को ईश्वरार्पित कर देना चाहिए। अपने को ईश्वर के हाथों का निमित्त समझ कर उन्हें कर्ता-भाव का त्याग करना चाहिए। स्वार्थ से मुक्त हो कर इन्द्रियों का दमन करना चाहिए। अपने जीवन को मानव-सेवा के लिए पूर्णतः अर्पित कर देना चाहिए। उन्हें यह मानना चाहिए कि सारा जगत् ईश्वर का ही रूप है। इस भाव के साथ सेवा करने पर कालान्तर में चित्त शुद्ध हो जाता है। यही कर्मयोगियों की साधना है। यह स्वतः लक्ष्य नहीं है। बहुत से भ्रमवश ऐसा मान कर उन्नत साधना का अभ्यास नहीं करते हैं। उन्हें धारणा, ध्यान तथा समाधि का अभ्यास कर परम लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए।


राजयोगी क्रमशः आठ सीढ़ियों से हो कर चढ़ता है। प्रारम्भ में वह यम-नियम का पालन करता है। तब वह आसन स्थिर बनाता है। वह प्राणायाम के द्वारा मन को स्थिर बनाता है तथा नाड़ियों का संशोधन करता है। प्रत्याहार, धारणा तथा ध्यान का अभ्यास कर वह समाधि प्राप्त करता है। संयम के द्वारा उसे विविध सिद्धियाँ मिलती हैं। वह चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध करता है।


जो ज्ञान-मार्ग अथवा वेदान्त का अवलम्बन करते हैं, उन्हें सर्वप्रथम साधन-चतुष्टय-विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत् तथा मुमुक्षुत्व से युक्त होना चाहिए। तब वे ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाते हैं एवं उनसे श्रुतियों का श्रवण करते हैं। श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन के अभ्यास से वे आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करते हैं। तब ज्ञानी आनन्द में कह उठता है, "आत्मा ही एकमेव है, वह 'एकमेवाद्वितीयम्' है। आत्मा ही एक सत्य है। मैं ब्रह्म हूँ। अहं ब्रह्मास्मि शिवोऽहम्। सर्वं खल्विदं ब्रह्म।" जीवन्मुक्त आत्मा को सभी भूतों में तथा सभी भूतों को आत्मा में देखता है।


हठयोग के साधकों को चाहिए कि वे कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने के लिए प्रयत्नशील बनें। मुद्रा, बन्ध, आसन तथा प्राणायाम के द्वारा मूलाधार चक्र में प्रसुप्त कुण्डलिनी शक्ति को जगाया जाता है। उन्हें प्राण तथा अपान से संयुक्त कर इस संयुक्त प्रवाह को सुषम्ना नाड़ी से ले जाना चाहिए। कुम्भक के द्वारा गरमी बढ़ती है तथा कुण्डलिनी के साथ वायु विभिन्न चक्रों से होते हुए सहस्रार को जाती है। सहस्रार चक्र में जब कुण्डलिनी भगवान् शिव से मिल जाती है, तब योगी परम शान्ति, सुख तथा अमृतत्व प्राप्त कर लेता है।


जीवन का लक्ष्य भगवत्साक्षात्कार अथवा आत्म-साक्षात्कार है। यह सभी का लक्ष्य है। इसमें वर्ण, राष्ट्रीयता, शैक्षणिक योग्यता, सामाजिक परिस्थिति, जाति, सम्प्रदाय और स्त्री-पुरुष का कोई अपवाद नहीं है। सभी प्राणी चेतन अथवा अचेतन अवस्था में इस लक्ष्य की ओर ही प्रगतिशील हैं। मनुष्य का जीवन आत्मिक है; परन्तु उसने इसे भुला दिया है। उसका इहलौकिक जीवन इस आत्मिक जीवन की योग्यता प्राप्त करने के लिए है। इस विस्मृत आध्यात्मिक जीवन की पुनःप्राप्ति ही उसके इहलौकिक जीवन के संघर्ष की पूर्णता तथा उसकी सफलता और उपलब्धियों की पूर्णता है। जब मनुष्य भगवत्साक्षात्कार के पीछे लगता है और वह अपने को अपूर्ण, ससीम, छुद्र एवं विनाशशील पदार्थों से मुक्त बनाने के लिए संघर्षरत होता है, तभी उसके मानव-व्यक्तित्व का पूर्ण सौन्दर्य, उसके अस्तित्व का पूर्ण गाम्भीर्य तथा उसकी प्रकृति की गरिमा और महिमा प्रकट होती है।


संकल्प और इच्छा मात्र से ही परम लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती। आत्मज्ञान की प्राप्ति एक महान् कार्य है। श्रुतियों ने इस संघर्ष को 'क्षुरस्य धारा' की संज्ञा दी है। साधक जब तक भगवत्साक्षात्कार नहीं कर लेता, तब तक उसे निरन्तर एक बलिदान के बाद दूसरा बलिदान देना होता है, एक कठोर परीक्षा के अनन्तर दूसरी कठोर परीक्षा से गुजरना होता है तथा एक समस्या के पश्चात् दूसरी समस्या का समाधान ढूँढ़ना होता है। अतृप्त आध्यात्मिक पिपासा, अक्षुण्ण उत्साह और गम्भीरता, मन की एकाग्रता तथा किसी भी मूल्य पर लक्ष्य तक पहुँचने का दृढ़ निश्चय-ये ही वे अस्त्र हैं जिनसे भगवान् का अनुसन्धान करने वाले व्यक्ति को सुसज्जित होना पड़ता है। तब निश्चय ही उसे आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति होगी और वह सन्त के रूप में विभासित होगा।


यह 'साधना' पुस्तक साधकों के लिए बहुत ही उपयोगी है, क्योंकि इसमें योग के विभिन्न रूपों और योगाभ्यास का निःशेष तथा विस्तृत विवेचन है। इसमें साधकों के जीवन में उठने वाली सभी समस्याओं की पर्यालोचना की गयी है तथा उनके समाधान का सुझाव भी दिया गया है। वीर साधक ! शाश्वत जीवन, चिरन्तन ज्योति तथा अनन्त आनन्द के पथ पर दृढ़ता से अग्रसर होओ ! भगवान् की प्राप्ति के लिए आप जो संघर्ष कर रहे हैं, सर्वशक्तिमान् प्रभु उसमें आपका साथ दें!


शिवानन्दनगर

२४ दिसम्बर १९६२ - स्वामी शिवानन्द




स्वामी शिवानन्द और जाग्रत भारत


पवित्र भारतवर्ष के उत्तरी क्षेत्र में द्रुतगामिनी पतितपावनी गंगा के तट पर बसे हुए देश-प्रेमी अन्वेषकों के एक छोटे केन्द्र द्वारा आध्यात्मिक जागृति के लक्षण दृष्टिगोचर हो रहे हैं, जिसकी लहर अत्यन्त तीव्र गति से चतुर्दिक् प्रसारित होती दिखायी पड़ रही है। इसी पावन क्षेत्र में स्वामी शिवानन्द जी महाराज का सुन्दर पवित्र निवास-स्थान शिवानन्दनगर है। यह स्थान डिवाइन लाइफ सोसायटी (दिव्य जीवन संघ) का प्रधान केन्द्र है। यह संघ जाति तथा धर्म निरपेक्ष प्रतिष्ठान है जिसे शक्तिशाली दार्शनिक महात्मा शिवानन्द जी महाराज ने स्थापित किया था और जिसके द्वारा वे अपने उच्च आदशों, भारतीय संस्कृति तथा आध्यात्मिक उत्थान के कार्यों को प्रगतिवान् तथा विश्व में भारतीय आदर्शों के प्रचार और प्रसार में संलग्न रहे थे।


यह अपूर्व व्यक्तित्व-सम्पन्न सन्त अपने देश भारतवर्ष तथा उसके निवासियों के प्रति अगाध प्रेम रखते थे तथा उनके हृदय में अपनी पवित्र भूमि की विशाल संस्कृति तथा उच्च आदर्शों के प्रति आश्चर्यजनक प्रशंसा के भाव भरे पड़े थे। ये प्रशंसा तथा श्रद्धा की भावनाएँ हमारे देश स्वतन्त्र भारत की जनता के लिए, जो आधुनिक सभ्यता की कृत्रिम चकाचौंध में उलझी हुई है, एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा के विषय हैं। इन अद्वितीय आध्यात्मिक सन्त के जीवन का उच्चतम ध्येय भारत माता के खोये हुए यश तथा गौरव को पुनः प्राप्त करना है जिसके लिए इन महात्मा ने अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। इन महात्मा ने इस पुनीत कार्य को अपने जीवन का महान् उद्देश्य बना लिया था; क्योंकि उन्हें विश्वास था कि पुनर्जाग्रत तथा पुनरुत्थापित भारत विश्व की मानवता के भाग्य निर्णय तथा चरित्र-गठन में बड़ा हाथ बँटा सकेगा और विश्व को प्रेम, शान्ति तथा सार्वभौम बन्धुत्व के आदर्श की ओर ले जाने में समर्थ हो सकेगा।


महान् आध्यात्मिक कार्य


श्रद्धेय स्वामी शिवानन्द जी महाराज अपने जीवन के अन्तिम काल तक रात-दिन स्वयं ही मानवतापूर्ण तथा विश्वोपकारी कार्यों की देख-रेख, छानबीन तथा उसके संचालन-कार्य में लगे रहे। इस कार्य को वे बड़ी ही तत्परता, तल्लीनता, रुचि और प्रसन्नता से करते थे। अपने प्रेम तथा आध्यात्मिक व्यक्तित्व के द्वारा वे अपने शिष्य कार्यकर्ताओं, जिनको उन्होंने विश्व में आध्यात्मिकता के प्रचार और प्रसार करने के लिए सुशिक्षित किया था, में प्राण तथा गति भरते रहते थे।


स्वामी शिवानन्द जी के कार्यों ने उन्हें देश-विदेश के स्त्री-पुरुषों में समान रूप से लोकप्रिय बना दिया है। उनके कार्य अत्यन्त तीव्र गति से राष्ट्र की सम्मति प्राप्त करते जा रहे हैं। जो भी व्यक्ति इनके हृदयस्पर्शी विचारों और शिक्षाओं के सम्पर्क में एक बार जाता है, उसका हृदय अनायास ही इन महात्मा के आकर्षक व्यक्तित्व तथा इनके सच्चे और प्रिय स्वभाव के अपूर्व प्रभाव के कारण खिंच जाता है।


शिक्षित वर्ग का एक बड़ा समुदाय आज स्वामी जी को आधुनिक भारत का सुनिश्चित आध्यात्मिक नेता स्वीकार करता है। वे अपने तथा समाज के जीवन में ज्ञान, गति और प्रकाश के लिए स्वामी जी की ओर उन्मुख हैं। इसी प्रकार भारत के बाहर विदेशों से भी अनेक सुशिक्षित तथा विचारशील स्त्री-पुरुष स्वामी जी में पथ-प्रदर्शक, मित्र, प्रेरक तथा उपदेशक की भावनाओं को पा कर अपने को धन्य समझते हैं।


मनमोहक व्यक्तित्व


खुशी से ओत-प्रोत, शान्ति तथा आशीर्वाद-युक्त मुद्रा वाले, शरीर से लम्बे-चौड़े, हृष्ट-पुष्ट, महान् दिव्य दृष्टिमय साधु अपना एक विशिष्ट व्यक्तित्व रखते थे। जब भी आप उनके निकट सम्पर्क में जाते, वे अपनी अद्भुत किन्तु वस्तुतः विवश कर देने वाली दैवी विद्वत्ता की भावना के रूप में आप पर छा जाते थे। उनके नेत्रों की शक्ति अत्यन्त तेज तथा वाणी अलौकिक ओजपूर्ण थी जो आपके अन्दर प्रवेश करके एक परिवर्तन ला देती थी। जहाँ भी वे जाते थे, वहाँ शान्ति का एक वातावरण छा जाता था। उनकी मुस्कान आपके अन्तस्थ दुःखों का निवारण करती थी। वे जब ईश्वर-नाम का संकीर्तन करते थे, तो मनुष्य भौतिक प्रमाद को छोड़ कर उससे ऊपर उठ जाता था और उस पर आत्मानुभूति की अपूर्व भव्यता छा जाती थी तथा वह अभूतपूर्व आनन्द का अनुभव करने लगता था। कभी अन्तः मुग्ध तथा शान्त और कभी अत्यधिक आनन्द-उत्साह से उद्वेलित स्वामी जी एक स्फुलिंगित व्यक्तित्व, चमचमाती ओजस्विता तथा शिक्षापूर्ण विनोदी थे जो कोमल, सूक्ष्म, सहानुभूति, दूरदर्शिता और सहनशीलता से पूर्ण होता था। उनका प्रेम असीम तथा विघ्न बाधाओं से परे था।


प्रारम्भिक जीवन


स्वामी शिवानन्द जी महाराज आधुनिक युग के व्यक्ति थे। यद्यपि उनका जन्म १९ वीं शताब्दी के अन्त में हुआ, तथापि स्वामी जी २० वीं शताब्दी के अति-वैज्ञानिक युग के व्यक्तियों में से थे। अपनी कार्य प्रणाली एवं विचारों के आदान-प्रदान में स्वामी के सब तरह से आधुनिक तथा परिपूर्ण थे। दक्षिण भारत के एक उच्चकुलीन ब्राह्मण परिवार में जन्म ग्रहण कर स्वामी जी अपने विद्यार्थी-जीवन-काल में ही अपनी तीव्र बुद्धि, चातुर्व और ओजस्विता के कारण एक स्वतन्त्र तथा अमूल्य जीवन की झाँकी दे चुके थे। उन्होंने बड़ी साधना तथा रुचि के साथ औषधविज्ञान की शिक्षा लेनी आरम्भ कर दी। अध्ययन में अति प्रतिभावान् तथा अभूतपूर्व परिश्रमी होने के कारण युवक कुप्पुस्वामि (स्वामी जी पूर्वाश्रम में इसी नाम से पुकारे जाते थे) औषधशास्त्र के छात्रों के बीच अपना अलग व्यक्तित्व प्रसारित करते रहे जो उनके भावी जीवन की उच्चता का परिचायक था। अध्ययनोपरान्त डा. कुप्पुस्वामि ने समुद्र पार मलाया की यात्रा की, जहाँ एक सुयोग्य और अद्भुत चिकित्सक के रूप में उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी और एक अन्तर्राष्ट्रीय सुख्याति प्राप्त चिकित्सक हुए। वे अपनी अपूर्व आध्यात्मिक तथा शुद्ध परोपकारी भावना के कारण एक प्रकार से जनता द्वारा पूजे जाने लगे थे। उनके हृदय में मानव-कल्याण के लिए अथाह तथा अगम्य उदारता और प्रेम थे। उनके जीवन का वह काल पीड़ितों तथा असहायों के अनवरत सेवा-यज्ञ में हर प्रकार से उत्सर्ग हो चुका था। इस उदारता और प्रेम के रास्ते में उनके लिए दिन और रात बराबर थे और कोई भी सेवा-कार्य उनकी नजरों में बड़ा या छोटा नहीं था जिसे वे खुशी से अंगीकार कर लेते।


एक परिवर्तन-बिन्दु


परन्तु, नियति ने भारत के इस शील-सम्पन्न पुत्र के द्वारा इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण सार्वभौमीय कार्य करवाने की सोची। यह स्मरण रहे कि अर्घ शताब्दी के मध्य पश्चिमी सभ्यता की बाहरी तड़क-भड़क तथा उसके खोखले सिद्धान्तों ने भारत की नयी पीढ़ी के विचारों को आक्रान्त करना आरम्भ कर दिया था। खासकर मध्यवर्गीय भारतीय जनता शनैः शनैः उनकी ओर झुकने लगी जो उन्हें अपनी तड़क-भड़क के कारण भारतीय संस्कृति और सभ्यता से अधिक ऊँची और आकर्षक प्रतीत होती थी। किन्तु कुछ काल तक यह सर्वनाशकारी दृष्टिकोण बहुत छोटे दायरे में ही अवस्थित रहा; क्योंकि उस समय तक मध्यवर्गीय भारतीयों का पश्चिमी सभ्यता से विशेष सम्बन्ध स्थापित हो सका था, लेकिन शीघ्र ही १९१७ के प्रथम विश्व युद्ध के अन्तिम काल में यह नशा उतरने लगा। सन् १९१८ में बहुत से भारतीय युवक जो यूरोप तथा मध्य-पूर्व के देशों में युद्धकालीन सेवाओं में संलग्न हुए थे, युद्ध-समाप्ति के पश्चात् जब वे स्वदेश लौटे, तो उनका हृदय और मस्तिष्क पश्चिमी भौतिकवाद तथा उसकी मिथ्या आडम्बर-युक्त अर्थवादिता, कीर्ति, तड़क-भड़क और विज्ञान से प्रभावित था।


यह एक शोचनीय अवसर था जब कि भारतीय नवयुवकों ने आडम्बरपूर्ण आधुनिक फैशन तथा आलोचनात्मक भावों विचारों से भर कर अपनी घृणापूर्ण दृष्टि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की ओर डाली और आपस में एक-दूसरे से नफरत करने लगे। विदेशी सिद्धान्तों का इस रूप में हमारे देश पर यह आक्रमण हमारी मूल्यवान् भारतीय संस्कृति के लिए एक धमकी-भरी खुली चुनौती था। किन्तु इन बातों का असर डा. कुप्युस्वामि के विचारशील तथा अलौकिक मस्तिष्क पर बिलकुल नहीं हुआ, जो उस समय सिंगापुर में विराजमान थे। उन्होंने भारत की प्राचीन संस्कृति तथा उसके अपूर्व संस्कार की पुकार का अनुमान किया जो पश्चिमी सभ्यता की बाहरी चकाचौंध तथा हृदयग्राही आकर्षणों के द्वारा आक्रान्त हो रहा था। भारतीय क्रान्ति का यह आरम्भ काल था। ख्याति प्राप्त युवक डाक्टर ने अनुभव किया कि उनके कार्य करने का अवसर गया है, फलतः वे अपने जीवन के नये अध्याय को कार्यान्वित करने के लिए जुट पड़े और १९२३ के आरम्भ में ही इस प्रभावशाली तथा ख्याति प्राप्त चिकित्सक ने सदा के लिए अपने चिकित्सा कार्य को तिलांजलि दे दी और स्वतः आत्म-प्रेरणा से ईश्वरोपासना में लग गये।


साधु-जीवन का विकास


यद्यपि मलाया से हिमालय तक एक बड़ी लम्बी दूरी है, फिर भी इस नवयुवक का मन विश्व-जागृति के ईश्वरीय कार्यों के लिए प्रज्वलित हो उठा था। वे जून १९२३ में ऋषिकेश पहुँचे और कठिन आध्यात्मिक अनुशासन-युक्त पवित्रता तथा घोर तपस्या में लीन हो गये। साधना का कठोर जीवन यापन करते हुए, बीमार साधुओं, पीड़ित ग्रामवासियों, थके-माँदे पहाड़ के लोगों एवं तीर्थयात्रियों की निःस्वार्थ सेवा करने के कारण यह विचित्र संन्यासी उन रूढ़िवादी सम-सामयिक संन्यासियों द्वारा, जो अनासक्ति तथा पृथकत्व में विश्वास करते हैं, आलोचना का पात्र बना। किन्तु उन संन्यासियों का यह आलोचनापूर्ण दृष्टिकोण स्वामी शिवानन्द के योग के ऊपर अधिकार तथा आन्तरिक आध्यात्मिक प्रकाश के आगे आदर-युक्त श्रद्धा में परिवर्तित हो गया। जब उनका जीवन ईश्वरीय कृपा से परिस्फुटित हो उठा, तो एक नया रूप उठ खड़ा हुआ और यह पवित्रात्मा सभी प्राणियों पर भक्ति, तपस्या तथा आत्मानुभूति के अपूर्व फलों की वर्षा करने लगा। भाग्य ने भारतीय धर्म तथा आध्यात्मिक सिद्धान्तों की सफलता तथा उसकी सूक्ष्मता का दिग्दर्शन कराने के लिए इन्हें अपना आदर्श दूत चुना और स्वामी शिवानन्द जी महाराज के द्वारा भारतीय धर्म तथा आध्यात्मिकता के आदर्श ने नव-जीवन प्राप्त किया तथा मानवों के जीवन में उसको स्थान प्राप्त हुआ। यह विभूति नव-भारत के निर्माण करने वालों में से एक है।


मुक्तिदाता


वह चित्र जिसे विश्व आज हमारे सामने प्रस्तुत करता है, निरंकुश घृणा, लालच, उत्तेजना और युद्ध-क्रीड़ाओं का है। मानवता का एक बड़ा समूह बेचैनी, असन्तोष, नैराश्य की गहरी आशाहीनता में डूब गया। पूर्व और पश्चिम दोनों में मनुष्य अपने बाह्य रूप को सभ्यता, संस्कृति और श्रृंगार के पतले रोगन से रंग रहा है; किन्तु कठिन परीक्षा होने पर यह रोगन तुरन्त उतर जाता है और मनुष्य में निर्दयता, क्रोध, उपेक्षा का भाव, क्रूरता, अधिकार-शून्यता और बेशर्मी जाती है। स्वार्थ और अभिमान मनुष्य-जीवन को नारकीय बना रहे हैं। पूर्णेन्द्रिय सुख, क्रोध, कुटिलता और चातुर्य आदि मनुष्य के अन्दर की ईश्वरीय प्रवृत्ति का नाश कर देते हैं।


यह थोड़ा हो या ज्यादा, आज की दुनिया का चित्र है। स्वामी शिवानन्द जी महाराज उन भगवत्कृपा प्राप्त ईश्वरीय सन्तों में से हैं जो दुनिया के उपर्युक्त चित्र को बदलने का प्रयास कर रहे थे। उनके ये प्रयास उपेक्षा को प्रेम में और निराशा को आशा तथा खुशी में परिणत कर देते थे। स्वामी शिवानन्द जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन मनुष्य को जाग्रत करके उसे जीवन के मुख्य लक्ष्य की ओर सचेष्ट कर असत् से सत्, अन्धकार से प्रकाश, दुःख और व्यथा के निम्न जीवन से स्वर्गीय सुख और शान्ति के जीवन में प्रवेश कराने में लगाया।


अपनी अमूल्य रचनाओं के द्वारा स्वामी जी ने विश्व के भाग्यशाली पुरुष और स्त्रियों के हृदय में आन्तरिक विचारों तथा आदर्शों में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। शारीरिक, मानसिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक उत्थान को लक्ष्य में रखते हुए स्वामी जी का साहित्य विभिन्न मनुष्यों के जीवन की रुचि के विषयों को प्रभावित करता है।


उद्देश्य


स्वामी शिवानन्द जी आक्रान्त तथा दुःखी मानवता को अपनी सेवाओं तथा प्रकाश एवं नव-जीवन प्रदान करते हुए आध्यात्मिक जीवन के सिद्धान्तों का प्रचार करते रहे थे। वे केवल भारत की आध्यात्मिकता के प्रतिरूप ही नहीं थे; वरन् अपनी उच्च आदर्शवादिता के उदाहरण थे जिसने ज्ञान और कर्म के द्वारा मानवता के आध्यात्मिक तथा चारित्रिक उत्थान में अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया था। उनका उद्देश्य इस प्राचीन देश की जनता में भारतीय आदर्शों को जाग्रत करना था तथा भारतीय जीवन की प्राचीन सभ्यता की सूक्ष्मता के मूल्य और सौन्दर्य को सामने ला कर उसके अनुसरण के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना था। वे जनता में धर्म, सदाचार और परोपकार की विचारधाराओं का पुनर्स्थापन करना चाहते थे। वे मनुष्य के जीवन में चारित्रिक तथा आध्यात्मिक आदर्श का पुनर्निर्माण करने के लिए संलग्न थे, जिससे दूर हो कर आज संसार घृणा, युद्ध, विनाश तथा अहर्निश दुःख और भय की सुलगती भट्ठी में गिर गया है।


डिवाइन लाइफ सोसायटी


अपने इस सुन्दर उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने डिवाइन लाइफ सोसायटी (दिव्य जीवन संघ) की स्थापना की जो मानवता को अपवित्र, निम्न पाशविक प्रवृत्ति के ऊपर विजय प्राप्त करना सिखाता है तथा उन्हें सद्गुण, सच्चाई, पवित्रता, दया, प्रेम, निःस्वार्थता और बन्धुजनों के प्रति सेवाभाव, सद्भाव, चारित्रिक गठन और आध्यात्मिकता के आदर्शों का विकास करने में प्रयत्नशील है। डिवाइन लाइफ सोसायटी के द्वारा स्वामी जी क्रमबद्ध रूप से इस बृहत् देश तथा विदेश की जनता को उच्च जीवन स्तर का विकास करने तथा पापमय जीवन को हटा कर शुद्ध जीवन को अंगीकार करने में प्रशिक्षित करना चाहते थे। घृणा, लालच, वासना, अहंकार, असहिष्णुता तथा चरित्रहीनता को दूर करने की उनकी शिक्षा पद्धति बड़ी ठोस तथा प्रभावोत्पादक है। मनुष्य में चरित्र के विरोधी गुणों को काबू में लाने तथा सद्गुणों के विकास के क्षेत्र में उनकी शिक्षा का ढंग बड़ा ही असर डालने वाला है। वे सभी को आध्यात्मिक जीवन की शिक्षा-दीक्षा तथा उसको कार्य-रूप में लाने के उपाय बताते थे।


एक यथार्थवादी


अपने उद्देश्य को कार्य रूप देने तथा मानव को पतन तथा निम्न स्तर से उठाने में स्वामी शिवानन्द जी महाराज ने केवल काल्पनिक सिद्धान्तों से काम नहीं लिया। वे एक यथार्थवादी थे। उन्होंने समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम उठाये। वे शारीरिक, मानसिक, चारित्रिक तथा आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में संस्कृति का पुनरुत्थान करने के लिए संलग्न थे और हमारी भारतीय संस्कृति के उत्थान तथा उसके प्रचार के लिए उन्होंने सभी आधुनिक उपायों का अवलम्बन लिया; उदाहरणार्थ चलचित्र, टेप रिकार्डर इत्यादि। इस प्रकार उन्होंने विश्व को भारत की जनता के सम्बन्ध में यह ज्ञान कराया कि वे उपनिषद्-काल के उन महात्माओं की सन्तान हैं जिनका अध्यात्मवाद विश्व में सर्वोच्च है।


शारीरिक उन्नति


इनके आश्रम में शारीरिक उन्नति हेतु योगासन, प्राणायाम तथा सूर्यनमस्कार आदि वैज्ञानिक तौर-तरीकों से कराये जाते हैं। इस क्षेत्र में डिवाइन लाइफ सोसायटी की ओर से सारे देश में योगासन और प्राणायाम की शिक्षा का युवकों और वृद्धों के बीच प्रचार करने के लिए विशेष केन्द्रों की स्थापना हुई है। प्राकृतिक रहन-सहन तथा स्वास्थ्योन्नति के वैज्ञानिक प्रचार के लिए इस संस्था ने बहुत सारी किताबें, समाचार पत्र, सामयिक पत्रिकाएँ, विज्ञप्तियाँ तथा साहित्य का मुफ्त वितरण किया है। इस संस्था में अनेक तरीकों से ब्रह्मचर्य की शिक्षा, अनुशासित रहन-सहन एवं जीवन क्षेत्र में धैर्य के तरीकों का मुफ्त प्रचार किया जाता है।


धार्मिकता और सच्चरित्रता


स्वामी जी के पुनःस्थापन के कार्यों में धर्म और चारित्रिक रहन-सहन का मुख्य स्थान है। राष्ट्र के समक्ष सच्चरित्रता का एक उच्च आदर्श रखते हुए उन्होंने देश के जवान, वृद्ध, स्त्री और बच्चों सभी को जगाने के लिए अथक परिश्रम किया है। चरित्र-निर्माण, मन पर नियन्त्रण इत्यादि बातों पर भारत के यह ख्याति प्राप्त दूरदर्शी सन्त विशेष रूप से ध्यान देते थे।


निःस्वार्थ सेवा


वे प्राचीन संस्कृति के पुजारी थे तथा निःस्वार्थ सेवा के सिद्धान्त को मानते थे। वे कभी यह कहते हुए नहीं थकते थे कि जीवन का सार निःस्वार्थ सेवा है। वे निःस्वार्थ सेवा को जीवन का उच्चतम विचार तथा प्रार्थनीय कार्य मानते थे। उनके मतानुसार स्वार्थ रहित सेवा हमारी प्रकृति को शुद्ध करने तथा जीवन की प्रतिष्ठा बढ़ाने की सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण कड़ी है। इसीलिए सोसायटी के शिवानन्दनगर-स्थित मुख्य प्रतिष्ठान में एलोपैथिक चिकित्सालय सब प्रकार के उपकरणों एवं औषधियों से सुसज्जित है और यहाँ पीड़ितों को मुफ्त दवा दी जाती है।


अरण्य अकादमी


असंख्य कार्यकर्ताओं को इस देश की प्रभावशाली संस्कृति तथा आध्यात्मिक कार्यों में निपुण बनाने के लिए स्वामी जी ने योग-वेदान्त अरण्य अकादमी (योग-वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी) का संस्थापन किया। यहाँ हमारी आन्तरिक स्व-संस्कृति के प्रयोगात्मक तथा सिद्धान्तात्मक कार्य समय की गति-विधि के अनुसार सिखाये जाते हैं। इस अकादमी के भाषणों को पत्रिकाओं द्वारा जनता में प्रचारित किया जाता है। बहुमूल्य प्रकाशनों का यह क्रम डिवाइन लाइफ सोसायटी के मुख्य उद्देश्य तथा संस्कृति के प्रचारार्थ चलाया जा रहा है। जो व्यक्ति या विद्यार्थी मुख्य प्रतिष्ठान में आते हैं और कुछ काल तक निवास करते हैं, उनको प्रयोगात्मक योग एवं वेदान्त की विभिन्न शाखाओं के विशेषज्ञों द्वारा निजी पथ-प्रदर्शन प्राप्त होता है। संस्था अपने खुद के मुद्रणालय की बहुत ऋणी है जहाँ से स्वास्थ्य, योग साधना और भारतीय संस्कृति की असंख्य पुस्तकें तथा अनेकों पत्र-पत्रिकाएँ हिन्दी तथा अँगरेजी भाषा में प्रकाशित होती हैं। स्वामी जी की सरल, ओजस्वी और श्रेष्ठ प्रयोगात्मक शिक्षाओं के प्रभाव से अनेक स्त्री-पुरुषों ने धर्म को जीवन का मुख्य अंग मान लिया है तथा वे उसे निराशा, निर्बलता से उठा कर नयी आशा तथा आत्मोन्नति के स्तर पर ला देने वाली एक निर्माणकारी और मुक्तिदायिनी शक्ति मानते हैं। वर्तमान वास्तविकता की जागरूकता में सचेत स्वामी जी महाराज अपने कार्यों में निरत रहते हुए उस ईश्वरीय केन्द्र से बारम्बार सम्बन्धित रहते हैं। उन्होंने अपने आध्यात्मिक कार्य की भित्ति पवित्र प्रेम पर आधारित की है; क्योंकि भगवान् के इस दूत ने पार्थसारथि द्वारा उच्चारित स्वर्गीय संकेत 'मुझमें सबको देखो और सबमें मुझे देखो' की सत्यता को ग्रहण कर लिया था। तत्सत् !


-स्वामी चिदानन्द



शिवानन्द-गीता


तमिलनाडु के तिरुनेल्वेली जिले के पत्तमडै गाँव में अप्पय्य दीक्षित के वंश में सितम्बर, सन् १८८७ को श्रीमान् पी. एस. वेंगु अय्यर एवं पार्वती अम्माल के यहाँ मेरा जन्म भरणी नक्षत्र में हुआ। मैं लड़कपन में बड़ा नटखट था। मेरी शिक्षा-दीक्षा एस. पी. जी. कालेज, त्रिचरापल्ली में हुई थी। १० वर्षों तक एक डाक्टर की हैसियत से मैंने मलाया रियासत के निवासियों की सेवाएँ कीं। सन् १९२४ में ऋषिकेश में मैंने संन्यास धारण किया। मैंने १५ वर्षों तक योग, तप एवं भगवद्-आराधना में व्यतीत किये। १० वर्षों तक चारों तरफ घूम-घूम कर शिक्षा-प्रचार करता रहा और सन् १९३६ और १९४५ में क्रमशः The Divine Life Society All-word Religious Federation की स्थापना की।


मेरा स्वभाव बालकों-जैसा है, जिसके कारण मैं सबमें घुल-मिल जाता हूँ। मैं हमेशा प्रसन्नचित्त रहता हूँ और दूसरों को भी प्रसन्न आनन्दमन रखता हूँ। मेरे मन की भावनाएँ सुसंस्कृत और विनोदपूर्ण हैं जिनके द्वारा मैं चारों तरफ प्रसन्नता एवं आनन्द का प्रचार और प्रसार करता हूँ। मैं सभी का सम्मान करता हूँ और सभी को सर्वप्रथम प्रणाम करता हूँ। मैं सदैव मधुर भाषा का प्रयोग करता हूँ। मैं तेज गति से चलता हूँ तथा हर समय चाहे जिस कार्य में क्यों रत रहूँ या रास्ते में चलता रहूँ, मेरा जप और ध्यान चालू रहता है।


मैं काफी परिश्रमी हूँ और परिश्रम में मेरी आस्था है। किसी कार्य में लगने पर मैं उसे पूरा करके ही दम लेता हूँ-किसी कार्य में आलस्य कर उसे तत्काल ही पूरा कर देता हूँ। मैं काम करने में काफी तेज हूँ तथा सेवा की मेरे अन्दर जो असीम भावना है, उसका कभी भी शमन नहीं करता हूँ। तात्पर्य यह है कि बिना सेवा कार्य के मैं एक क्षण भी नहीं रह सकता। सेवा से मुझे बेहद खुशी होती है। सेवा ने मुझे उच्च पद पर आसीन किया है और सेवा ने मुझे हर प्रकार से पाक-साफ बना दिया है। यही नहीं, मैं यह भी भली-भाँति जानता हूँ कि दूसरों से कैसे काम लिया जाता है। मैं दूसरों से दया, सेवा, आदर और प्रेम के सहारे काम लेता हूँ।


मैं आसन और व्यायाम तो नित्य-प्रति करता ही हूँ, साथ-ही-साथ प्राणायाम भी करता हूँ, जिसके द्वारा मेरे अन्दर एक आश्चर्यजनक शक्ति का संचार होता है। मेरा स्वास्थ्य सुन्दर है। मैं अपने आराध्य मन्दिर की परिक्रमा करता हूँ। किसी विशेष प्रकार के बने हुए आसन या मंच पर आरूढ़ हो कर मैं सुन्दर भाषण नहीं कर सकता; क्योंकि इस तरह के बने हुए आसन मुझे चुभते हैं अर्थात् मन में घृणा होती है और इसीलिए मैं उस पर से उठ खड़ा होता हूँ और भाषण देना शुरू कर देता हूँ। जब कभी मुझे किसी आध्यात्मिक सम्मेलन की अध्यक्षता करनी पड़ी, मैं कभी भी विशेष प्रकार से बनाये गये आसनों पर नहीं बैठा। दान करने में मुझे बड़ा आनन्द आता है और मैं सर्वदा दान करता हूँ।


इस ७३ वर्ष की आयु में भी मैं अपने को नौजवान, तेजस्वी, शक्तिवान् और चैतन्यमय महसूस करता हूँ। मैं खुशी से गायन कर सकता हूँ, नृत्य कर सकता हूँ, दौड़ लगा सकता हूँ, कूद-फाँद भी सकता हूँ मेरा शरीर वज्र के समान है। हर प्रकार के भोजन को पचाने की शक्ति मेरे अन्दर विद्यमान है। मैं पढ़ने-लिखने या अन्य कार्य को नियमित धारावाहिक रूप में कर सकता हूँ। अवकाश के समय कभी भी मैं पर्वतीय या समुद्रतटीय स्वास्थ्यवर्धक स्थलों की यात्राएँ नहीं कर, केवल अपने नियमित कार्यक्रमों में हेर-फेर और परिवर्तन कर आनन्द प्राप्त कर लेता हूँ। भगवदाराधन से मुझे काफी शक्ति, आराम और शान्ति मिलती है, कार्य करने से प्रसन्नता मिलती है, सेवा करने से आनन्द मिलता है। यही नहीं लेखन, भगवदाराधन एवं कीर्तन से मुझे जीवन-दान मिलता है।


'अहं ब्रह्मास्मि, शिवोऽहम्, सोऽहम्, सत् चित् आनन्द स्वरूपोऽहम्' - यह मेरा वेदान्तिक अध्ययन और प्रभु के ध्यान का प्रिय नुस्खा है और 'चिदानन्द, चिदानन्द' मेरा प्रिय गीत है।


हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।


यह महामन्त्र-कीर्तन मेरा परम कीर्तन है।


वर्तमान क्षणों में मैं विश्व का सर्वाधिक वैभव-सम्पन्न व्यक्ति हूँ। मेरा हृदय उसके प्रेम से परिपूर्ण है। इसलिए उस प्रभु की सारी सम्पत्ति का मालिक मैं ही हूँ। इसलिए मैं राजाओं का राजा, बादशाहों का बादशाह, शहंशाहों का शहंशाह और महाराजाओं का महाराजा हूँ। मुझे इन सांसारिक राजाओं के ऊपर दया आती है, मेरा अधिकार अपरिमित है, मेरी सम्पदा अक्षय है, मेरी प्रसन्नता अवर्णनीय है, मेरा कोष अक्षय है और यह सब मैंने संन्यास, त्याग, अक्लान्त और निष्काम सेवा, जप, कीर्तन तथा ध्यान से प्राप्त किया है।


मेरी ऊँचाई फुट है; शरीर का ढाँचा काफी हृष्ट-पुष्ट है; शरीर के अवयव काफी सुडौल हैं; मैं अब्बल दर्जे का कसरती हूँ। प्रत्येक एकादशी को निर्जल (जल रहित) व्रत करता हूँ। रविवार के दिन फल और दूध का सेवन करता हूँ, मैं एक सीधा-सादा प्राकृतिक जीवन व्यतीत करता हूँ और मेरे अन्दर जवानी का स्रोत है।


मैं प्राकृतिक दृश्य, संगीत, कला, दर्शन-शास्त्र, सौन्दर्य, सत्संग, एकान्त-वास, ध्यान, योग और वेदान्त को पसन्द करता हूँ। मैं सीधा-सादा और निष्पक्ष हूँ, क्षमावान् और उदार प्रवृत्ति का हूँ। मैं दया और सहानुभूति से परिपूर्ण हूँ। मैं स्वेच्छाचारी, बाघ। रहित और उदारमना हूँ। मैं बहादुर एवं हँसमुख हूँ, शान्त स्वभाव का हूँ। मेरे अन्दर अनादर और आघात को सहन करने की क्षमता है। मैं क्षमाशील हूँ-बदला लेने की प्रवृत्ति नहीं रखता। बुराई के बदले भलाई करता हूँ और उस आदमी का सेवक बन जाता हूँ जो अपने सुन्दर विचारों से मेरे हृदय को जीत लेता है।


मैं गंगा और हिमालय का प्रेमी हूँ। गंगा मेरी प्रकृत माता और हिमालय मेरा प्रकृत पिता है। वे मेरे रक्षक और प्रेरणादायक हैं। मैं गंगा में स्नान करता हूँ, गंगा की पूजा करता हूँ, गंगा की मछलियों को दाना चुगाता हूँ। मैं गंगा माँ को दीप दिखाता हूँ (दीप-दान करता हूँ), गंगा माँ की प्रार्थना करता हूँ, उन्हें प्रणाम करता हूँ और उनके यश और वैभव का गान करता हूँ। मैं गंगा के महत्त्व यश के बारे में लिखता भी हूँ; क्योंकि गंगा मेरा पालन-पोषण करती है, मुझे हर तरह से आराम देती है और उपनिषदों के अन्दर भरी हुई सच्चाई से मुझे परिचित कराती है- "जय माँ गंगा की!"


मेरे दैनन्दिन कार्यक्रम भगवान् बुद्ध के समान हैं। मैं हमेशा कमरे में रहता हूँ, जप करता हूँ, कीर्तन और ध्यान करता हूँ, पवित्र पुस्तकों का अध्ययन करता हूँ, लिखता हूँ। मैं कमरे से उस समय थोड़ी देर के लिए बाहर आता हूँ, जब कि मुझे किसी का साक्षात्कार करना होता है या कोई सेवा-कार्य करना होता है। मैं बहुत कम बोलता हूँ, सोचता अधिक हूँ और ध्यान ज्यादा करता हूँ तथा मुझमें सेवा की भावना अधिक रहती है। मैं अपना एक क्षण भी बेकार नहीं जाने देता हूँ। मैं सर्वदा कार्यरत रहता हूँ और एक नियमबद्ध जीवन यापन करता हूँ- हर समय आत्म-चिन्तन तथा दूसरों की भलाई करने में रत रहता हूँ।


गीता, उपनिषद्, भागवत, योगवासिष्ठ, अवधूतगीता, विवेकचूड़ामणि आदि ग्रन्थ मेरे अभिन्न मित्र हैं। मैं सेवा, निष्ठा, योग और ज्ञान का एक विचित्र मिश्रण हूँ। मैं श्री शंकर का उपासक और कैवल्य अद्वैत वेदान्ती हैं- ऐसा वेदान्ती नहीं जो मात्र नाम के लिए ही हो, बल्कि उसको कार्य-रूप में भी लाता हो। मैं भौतिक योग का समर्थन तथा अभ्यास करता हूँ। मैं श्री शंकर के प्रताप से अहिंसा, सत्य और ब्रह्मचर्य का अभ्यासी हूँ-"जय श्री शंकर की!"


मैं प्रत्येक धर्म के सन्तों और पैगम्बरों (धर्मगुरुओं) का आदर करता हूँ। मैं सभी धमाँ एवं उनकी उपासना-विधियों और मतों का सम्मान करता हूँ। मैं सभी की सेवा और सभी को प्यार करता हूँ और सबमें घुल-मिल कर उन सभी में मंगलमूर्ति भगवान् का दर्शन करता हूँ। मैं अपने वायदों पर दृढ़ रहता हूँ, गरीबों की सेवा करता हूँ जिससे मुझे खुशी नसीब होती है। मैं गर्दभ, श्वान, वृक्ष, ईंट-पत्थर एवं प्रत्येक जीव मात्र को मन-ही-मन साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। मैं बुजुर्गों एवं साधुओं का सम्मान करता हूँ, उनकी आज्ञा का पालन करता हूँ एवं सभी को अपनी निष्काम एवं निष्कपट सेवाओं से सन्तुष्ट करता हूँ। मैं सावधानी से इधर-उधर दौड़ कर अतिथियों की सेवा करता हूँ, साधु-सन्तों एवं पीड़ित व्यक्तियों के चरण प्रक्षालित करता हूँ।


मैं पत्रों का तत्काल उत्तर लिखता हूँ, एक-साथ कई काम करता हूँ। द्रुत गति से लेखन-कार्य सम्पादित करता हूँ। काफी दान देता हूँ, सब-कुछ व्यय कर देता हूँ, यहाँ तक कि अपने पास कुछ भी नहीं रखता हूँ। मैं गरीबों एवं अपने विद्यार्थियों को खिलाने-पिलाने में काफी आनन्द-लाभ करता हूँ और उनके मातृ-तुल्य बनने की कोशिश करता हूँ। मैं अपने अनुभवगम्य विषयों पर दूसरों से वार्तालाप करता हूँ, अपने-आपमें सर्वदा मनन, चिन्तन, विवेचन तथा परीक्षण करता हूँ। मैं दैनन्दिन सत्, तम, रज (सतोगुण, तमोगुण, रजोगुण) त्रिगुणों का आध्यात्मिक लेखा रखता हूँ और उन पर मनन तथा विचार भी करता हूँ।


मैंने अपने गुरुओं की ईमानदारी, प्रचण्ड विश्वास और निष्ठा से सेवा की, जीवन के बहुत ही मूल्यवान् पाठ सीखे, बहुत-सी सच्चाइयों का विकास किया, अपने परिव्राजक जीवन में बिना भोजन के अनेक यात्राएँ कीं, जाड़ों में सड़कों के किनारे वस्त्र-विहीन दशा में शयन किया, पानी में भिगो भिगो कर सूखी रोटियाँ खार्थी, अपने नियमों सिद्धान्तों पर दृढ़ और अडिग रहा। मैं ज्यादा वाद-विवाद नहीं करता और शान्त रहता हूँ। रुग्ण व्यक्तियों के स्वास्थ्य एवं शान्ति, मृतात्माओं और प्रेतात्माओं की शान्ति एवं कल्याण के लिए प्रार्थना एवं कीर्तन करता हूँ। वे लोग जो गंगा स्नान के लिए तरसते हैं, उन सबके नाम ले कर मैं गंगा में डुबकी लगाता हूँ, भजन-मन्दिर में सब विविध धर्मावलम्बियों के सन्तों एवं मुनियों के नाम का स्मरण करता हूँ।


मैं सर्वदा निम्नोक्त सूत्रों पर ध्यान देता हूँ :


"प्रज्ञानं ब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि, अयं आत्मा ब्रह्म, सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म, शान्तं शिवं अद्वैतम्, अहं आत्मा गुडाकेश, अहं आत्मा निराकारः सर्वव्यापी स्वभावतः, ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मव नापरः, अकर्ता, अभोक्ता, असंग साक्षी, अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणो, ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः "


गिरे हुओं को उठाना, अन्धों को मार्ग दिखाना, अपनी वस्तु में दूसरों को भी भागीदार बनाना तथा दुःखियों एवं पीड़ितों को सान्त्वना देना मेरा परम ध्येय है। भगवान् में पूर्ण विश्वास और अन्तरंग प्रेम रखना; पड़ोसियों के साथ अपने-जैसा बरताव और प्यार करना; गाय, बालक और त्रिया (स्त्री) की रक्षा करना मेरा परम लक्ष्य है। मेरा सांकेतिक शब्द 'प्रेम' है और सहज समाधि अवस्था मेरी परम सिद्धि है।


स्वामी शिवानन्द


विषय-सूची

प्रकाशक का वक्तव्य 3

अनुवादकीय 5

प्रार्थनाएँ 7

() 7

() 7

() 8

विश्व-प्रार्थना 9

शिवानन्द-साधना-शतकम् 10

प्रस्तावना 26

स्वामी शिवानन्द और जाग्रत भारत 31

शिवानन्द-गीता 38

अध्याय : साधना के आधार स्तम्भ 58

. साधना के बारह मूल-मन्त्र 58

. साधना के तीन प्रमुख घटक 59

. आध्यात्मिक साधना के लिए पूर्वापेक्ष्य- 63

. आध्यात्मिक साधना के लिए पूर्वापेक्ष्य- 65

. साधना के लिए कुछ आवश्यकीय बातें 67

. साधना के मूल सिद्धान्त तथा विपरीत बुद्धि 68

. अभ्यास : साधना का प्रथम पहलू 72

. साधना में इन चार बातों का स्मरण रखिए 73

. आध्यात्मिक साधना की मूल-भित्ति 73

१०. आध्यात्मिक साधना के कुछ पहलू 75

११. साधना तथा विशिष्ट मनोविज्ञान 85

१२. सांसारिक वातावरण में साधना का सुगम तरीका 86

१३. साधना के कुछ गुप्त रहस्य 87

१४. साधना का सारांश 88

अध्याय :साधना की महत्त्वपूर्ण प्रक्रियाएँ 90

. साधना में वासना की गति 90

. साधना में संयम का स्थान 92

. साधना में दबाव तथा उसके परिणाम 94

. साधना में त्रिविध अन्तर्गमन 97

. साधना में धैर्य 98

. साधना में संलग्नता 102

. साधना के प्रवाह 104

. साधना में उन्नति के चार क्रम 104

अध्याय :साधना के प्रकार 105

. साधन-चतुष्टय 105

. सरल साधना 108

. महत्त्वपूर्ण साधना 110

. अन्तरंग-साधना 111

. सदाचार-साधना 112

. मौन-साधना 113

. ब्रह्मचर्य-साधना 119

. अन्तर्मुख वृत्ति की साधना 120

. सावधानी के द्वारा साधना 121

१०. आत्म-विश्लेषण की साधना 121

११. प्रतिपक्ष-भावना की साधना 122

१२. आध्यात्मिक दृष्टि की साधना 122

१३. विश्व-प्रेम के लिए अनुशासन 123

अध्याय :प्रस्थानत्रयी में साधना 125

. ब्रह्मसूत्र में साधना 125

. उपनिषदों की साधना 126

. भगवद्गीता की साधना 132

अध्याय :महाकाव्यों तथा पुराणों में साधना 138

. रामायण में साधना 138

. महाभारत में साधना 138

. भागवतपुराण में साधना 139

. विष्णुपुराण में मुक्ति के लिए साधना 150

. गरुड़पुराण में साधना 151

अध्याय :योगवासिष्ठ की साधना तथा अन्य सम्प्रदायों की साधना 153

. वीरशैव में साधना 153

. शक्तियोग-साधना 153

. काश्मीर शैव में साधना 154

. पाशुपतयोग में साधना 155

. योगवासिष्ठ की साधना 155

अध्याय :शिवानन्द-सूत्र में साधना 158

. शिवानन्द-उपदेशामृत की साधना 158

. शिवानन्द-मनोविज्ञान-साधना-सूत्र 162

. शिवानन्द-हठयोग-साधना-सूत्र 164

. शिवानन्द-कर्मयोग-साधना-सूत्र 165

. शिवानन्द-भक्ति-साधना-सूत्र 166

. शिवानन्द-योग-साधना-सूत्र 167

. शिवानन्द-वेदान्त-साधना-सूत्र 168

. शिवानन्दवाद में सम्पूर्ण साधना 169

अध्याय :सर्व-साधना-संग्रह 172

. चार मुख्य साधनाओं के त्रिक् 172

. स्वर-साधना 172

. लययोग-साधना 176

. प्रणव-साधना 179

. सोऽहम्-साधना 181

. विचार-साधना 182

. ध्यानयोग-साधना 187

. जपयोग-साधना 195

. गायत्री-साधना 200

१०. मन्त्रयोग-साधना 204

११. संकीर्तन-साधना 210

१२. तन्त्रयोग-साधना 211

१३. शैव-साधना 212

१४. क्रियायोग-साधना 213

१५. संगीत-साधना 215

१६. प्रार्थना के द्वारा साधना 218

१७. समन्वययोग की साधना 221

अध्याय :साधना का महत्त्व 226

. मानव-स्वभाव का अध्यात्मीकरण 226

. जीवन का परम उद्देश्य 229

. पूर्णता के लिए संग्राम 231

. साधना की आवश्यकता 232

. इन्द्रियों की बहिर्मुखी वृत्तियाँ तथा आत्म-संयम की आवश्यकता 234

. साधना के लिए आवश्यक गुण 235

. साधना- जीवन का मुख्य उद्देश्य 237

. ब्राह्ममुहूर्त-साधना के लिए सर्वोत्तम समय 238

. साधना-सम्बन्धी उपदेश 240

अध्याय १०:निम्न प्रकृति पर विजय-प्राप्ति के लिए साधना 242

. मन पर विजय प्राप्त करने के लिए साधना 242

. दशों इन्द्रियों के दमन के लिए साधना 246

. वैराग्य-विकास के लिए साधना () 248

. वैराग्य-विकास के लिए साधना () 248

. अहंकार को दूर करने के लिए साधना 249

. ईर्ष्या को दूर करने के लिए छह साधन 256

. दर्प को दूर करने की साधना 259

. द्वेष के दमन के लिए साधना 261

. क्रोध के दमन के लिए साधना 261

१०. भय पर विजय पाने के लिए साधना 263

अध्याय ११ :विभिन्न सिद्धियों के लिए साधना 265

. ईश्वर-साक्षात्कार के लिए चार साधनाएँ 265

. आत्म-बल के लिए साधना 265

. इन्द्रिय-दमन के लिए साधना () 267

. इन्द्रिय-दमन के लिए साधना () 268

. राग-द्वेष पर विजय प्राप्ति के लिए साधना () 269

. राग-द्वेष पर विजय प्राप्ति के लिए साधना () 272

. दुर्घटनाओं से मुक्ति के लिए साधना 273

. सफलता, सम्पत्ति तथा ज्ञान के लिए साधना 274

. शान्ति के लिए उन्नीस बातें 275

१०. छह महीने में समाधि-प्राप्ति के लिए साधना 278

११. कुण्डलिनी-जागरण के लिए साधना 279

१२. एकता-साक्षात्कार के लिए साधना 279

अध्याय १२:साधना में बाधाएँ 281

. साधक का मन-मनोवैज्ञानिक अध्ययन 281

. साधना तथा साधक 283

. साधना में प्रलोभन 284

. साधना में कठिनाई 284

. साधना के मुख्य व्यवधान 285

अध्याय १३:कर्मयोग-साधना 288

. सेवा आवश्यक है 288

. कर्म को योग में परिणत किया जा सकता है 291

. कर्मयोग-साधना के फल 292

अध्याय १४:भक्तियोग-साधना 295

. भक्तियोग-साधना की रूपरेखा 295

. भक्तियोग-साधना के कुछ पहलू 301

. श्रद्धा, मुमुक्षुत्व तथा आत्मार्पण 303

. भक्ति-साधना के नौ प्रकार 304

. भक्तियोग-साधना के लिए आवश्यक 305

. भक्ति-साधना में श्रद्धा का महत्त्व 306

. सच्चे आत्मार्पण का स्वरूप 306

. भक्तियोग के लिए प्रमुख साधना 307

. भक्तियोग-साधना का सारांश 309

अध्याय १५:योग-साधना 311

. योग-साधना : भूमिका 311

. योग-साधना के आठ अंग 312

. मानसिक शुद्धता : अनिवार्य 315

. मन को रिक्त बनाने की राजयौगिक विधि 315

. योग-साधना की आवश्यकता 316

. योग-साधना का सारांश 318

. योग-साधना की रूपरेखा 319

. योग-साधना का अभ्यास 323

. व्यावहारिक यौगिक उपदेश 325

१०. आन्तर यौगिक अनुशासन 329

११. योग-साधना-प्रश्नोत्तरी 337

१२. योग-साधना में मुख्य बाधाएँ 339

अध्याय १६:वेदान्तिक साधना 343

. परिचय 343

. ज्ञान-साधना के पहलू 344

. सप्त-ज्ञान-भूमिका 345

. वेदान्तिक साधना की विधि 346

. वेदान्त-साधना की बाधाएँ 347

. वेदान्तिक साधना के विषय में कुछ संकेत 348

. वेदान्त-सूत्र 364

. वेदान्त-साधना का सारांश 370

अध्याय १७:विभिन्न योगों में साधना के फल 373

. योग की परिभाषा 373

. चार योग 373

. सम्पूर्ण विकास की आवश्यकता 374

. विवादास्पद विषय का समाधान 374

. राजयोग 375

. हठयोग 377

. भक्तियोग 377

. ज्ञानयोग 377

. जीवन्मुक्ति तथा विदेह-मुक्ति में भेद 378

१०. भक्त तथा ज्ञानी 378

११. ज्ञानी तथा राजयोगी 379

१२. हठयोगी तथा राजयोगी 379

१३. आन्तरिक मार्ग के लिए अनुशासन 379

अध्याय १८:व्यावहारिक साधना का पाठ्यक्रम 382

. सगुण ध्यान-साधना के बारह पहलू 382

. साधना का कार्यक्रम 383

. व्यावहारिक साधना () 384

. व्यावहारिक साधना () 390

. दश दिन के लिए साधना 394

. चालीस दिन के लिए साधना 394

. शाश्वत साधना कैलेण्डर 395

. शाश्वत आध्यात्मिक कैलेण्डर 398

. दैनिक कार्य-तालिका 400

१०. बारह सद्गुणों के ऊपर दश-दश मिनट के लिए साधना 407

११. बीस महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक उपदेश 408

१२. साधना-तत्त्व अर्थात् सप्त-साधन-विद्या 410

१३. आध्यात्मिक दैनन्दिनी का महत्त्व 413

१४. शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए संकल्प 419

१५. प्रतिज्ञा-पत्र या संकल्प-पत्र 420

१६. साधना में सफलता का रहस्य 421

१७. आदर्श गृहस्थ साधक 422

१८. साधना के लिए कुछ संकेत 423

१९. कबीर की साधना-विधि 426

अध्याय १९:साधना-सम्बन्धी प्रश्नोत्तरी 428

. धर्म, साधु तथा योगी 428

. साक्षात्कार के लिए पूर्वापेक्ष्य 429

. मन्त्र जप का विज्ञान 430

. जपयोग 434

. साधना-सम्बन्धी समस्याएँ 435

. हमारा लक्ष्य क्या हो ? 437

. मानसिक शुद्धता के साधन 437

. आत्म-साक्षात्कार की समस्याएँ 439

. हठयोग 439

१०. आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता 442

११. श्रद्धा तथा भक्ति 444

१३. वेदान्त-सम्बन्धी प्रश्न 451

१४. राजयोग-सम्बन्धी प्रश्न 451

१५. योग तथा दिव्य जीवन 453

अध्याय २०:साधकों को आवश्यक उपदेश 455

. साधकों का पथ-प्रदर्शन 455

. संन्यासियों को उपदेश () 459

. संन्यासियों को उपदेश () 464

. पथ पर आलोक 466

. साधक में माधुर्य 469

. साधकों के लिए आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शन 470

. महान् सावधानी की आवश्यकता 472

. आध्यात्मिक प्रेरणा 473

. साधना और समाधि 475

१०. कुछ आध्यात्मिक 'निषेध' 477

११. साधना तथा गुरु () 477

१२. साधना तथा गुरु () 478

१३. पुराणों में पथ-प्रदर्शन 480

१४. श्री शंकराचार्य का साधना-पंचकम् 482

अध्याय २१:साधकों के लिए प्रेरणात्मक स्वाध्याय 484

. भौतिक शरीर तथा दिव्य जीवन 484

. दिव्य नाम का जप 484

. मनुष्य तथा उसकी सीढ़ी 484

. शान्ति, जीवन-लवण तथा संकीर्तन 484

. ज्ञानी, सुख तथा शक्ति 485

. जीवन, द्रवित हृदय तथा ईश्वरीय कृपा 485

. मानवता, प्रेम तथा सज्जनता 486

. शुद्धता, मुमुक्षुत्व तथा साक्षात्कार 486

. साधना तथा शक्ति 487

१०. क्रोध, मन तथा आत्म-विजय 487

११. करुणा, सत्संग तथा विवेक 488

१२. सत्य, वेदान्त तथा मानव-कल्याण 488

१३. अन्तर सुख तथा ईश्वर की सर्वव्यापकता 489

१४. ईश्वर तथा उसका नाम 490

१५. शरीर तथा मानव-जन्म 490

१६. साधना के लिए मुख्य अवलम्ब 491

१७. योग की माँग तथा सांसारिक बुद्धि वाले मनुष्य 491

१८. जीवन में कठिनाइयाँ तथा साधुओं के सन्देश 492

१९. ईश्वर-चैतन्य तथा सच्चिदानन्द 492

२०. धैर्य, सन्तोष तथा ईश्वरीय ज्योति 493

२१. प्रेम तथा ईश्वर-साक्षात्कार का रहस्य 494

२२. ज्ञान तथा पूर्णता 495

२३. ईश्वर, उसका रूप तथा उसकी सत्ता 496

२४. उपमा तथा वरदान 498

२५. पार्थिव जीवन तथा मुक्त ज्ञानी 498

२६. आत्म-संयम तथा ब्रह्मज्ञान 499

२७. सद्गुण तथा भक्ति 499

२८. जप तथा उपनिषद् के स्वाध्याय का फल 500

२९. वैराग्य, अभ्यास तथा ध्यान 501

३०. अज्ञान तथा काम 502

३१. दिव्य सौन्दर्य के प्रतिनिधि 503

३२. शुद्धता का मार्ग 503

३३. ज्ञानी तथा समदृष्टि 504

३४. विचार तथा मधुर आचरण 504

३५. प्रसन्नता तथा ईश्वर से एकता 505

३६. मनुष्य अपनी परिस्थितियों का निर्माता 505

३७. योग- धार्मिक अनुभव की पराकाष्ठा 506

३८. कामना का मूल तथा ब्रह्म-साक्षात्कार 506

३९. सदाचार तथा मार्ग की बाधाएँ 507

४०. व्यापक ब्रह्म तथा सूक्ष्म शरीर 507

४१. वेदान्त-ज्ञान का मार्ग 508

४२. श्रद्धा तथा भगवत्प्रेम 508

४३. आन्तरिक ज्योति तथा सच्चा ज्ञानी 509

४४. धर्म की परिभाषा तथा ईश्वर-परायण जीवन 509

४५. आध्यात्मिक उन्नति की बाधाएँ तथा कष्ट का महत्त्व 510

४६. जगत्, मन तथा प्रार्थना 511

४७. ईश्वर-चैतन्य के गुण 512

४८. अविवेक, क्रोध तथा हृदय की भावना 513

४९. साधुता तथा हृदय की कोमलता 513

५०. कला, जीवन तथा भक्ति 514

५१. ईश्वर का बौद्धिक ज्ञान 515

५२. अमृतत्व की खोज 516

५३. गौरांग तथा नाम का चमत्कार 517

५४. नैतिक जीवन तथा आवेगों का दमन 517

५५. आदर्श 518

५६. धर्म तथा प्रेम की महिमा 519

५७. आत्म-संयम के घटक 520

५८. मौन, इसका अर्थ तथा इसका स्थान 520

५९. मध्यम मार्ग 520

६०. उन्नतिशील जीवन 521

६१. कल्याण-पथ 521

६२. श्री शंकराचार्य का मानसिक पूजा-श्लोक 523

६३. ध्यान के लिए अवधूतगीता के कुछ महत्त्वपूर्ण श्लोक 523

६४. विजयी जीवन 523

६५. आत्मवृक्ष, साधना तथा समाधि 524

अध्याय २२:साधना-गीत 525

. साधना-गीत 525

. साधना का सारांश 525

. आध्यात्मिक उपदेश 529

. सच्ची साधना 529

. उपदेश 530

. साधना-सप्ताह के लिए संगीत 530

. साधक का गीत 532

. साधना 533

अध्याय २३ :साधकों के कुछ अनुभव 535

. साधना का उद्देश्य 535

. साधकों के अनुभव 537

. सामूहिक साधना 540

. साधकों को उपदेश 541

अध्याय २४:शिवानन्द-साधना-सप्तशती 545

. दिव्य जीवन के आधार 545

. अनासक्ति के लिए अनुशासन 545

. योग-साधना का अभ्यास 546

. साधना का सर्वोत्तम रूप 546

. साधकों के लिए योग्यताएँ 547

. इन्द्रिय-संयम तथा आत्म-शुद्धि 549

. साधना में बाधाएँ 550

. अहंकार-जन्म-मृत्यु का बीज 552

१०. तीन प्रधान शत्रु 554

११. स्वार्थ- महापातक 558

१२. व्यावहारिक साधना के मुख्य सिद्धान्त 559

१३. आन्तर आध्यात्मिक अनुशासन 560

१४. ज्ञानयोग की साधना 560

१५. पथ पर आलोक 565

१६. विशेष आध्यात्मिक उपदेश 566

१७. निवृत्ति-साधना 571

१८. योग-साधना का विज्ञान 573

१९. पुरुषार्थ तथा भाग्य 573

२०. ब्रह्मचर्य - सारी साधनाओं का आधार 574

२१. भलाई, शुद्धता तथा ज्ञान 576

२२. दान-साधना का एक रूप 577

२३. कष्ट सफलता का सोपान 578

२४. साधना तथा आत्म-साक्षात्कार 579

२५. आध्यात्मिक जीवन के लिए आवश्यक 580

२६. आध्यात्मिक साधना की महत्ता 581

२९. प्रलोभनों पर विजय पाइए 586

३०. ध्यान कीजिए और आत्म-साक्षात्कार कीजिए 588

३१. आदर्श साधक 589

३२. साधना पर आलोक () 590

३३. साधना पर आलोक () 592

३४. साधना पर आलोक () 593

३५. साधकों को सलाह 594

३६. आत्म-साक्षात्कार 596

३७. कैवल्य का मार्ग () 597

३८. कैवल्य का मार्ग () 598

३९. मार्ग में उन्नति 600

४०. साधना-जीवन का एकमेव उद्देश्य 601

४१. साधना तथा ध्यान 602

४२. ब्रह्म-चैतन्य 604

४३. परम श्रेय की कुंजी 606

४४. साधना तथा कुछ अनुभव 608





श्री सद्गुरुपरमात्मने नमः


साधना


असतो मा सद्गमय

मृत्योर्मा अमृतं गमय ।।

तमसो मा ज्योतिर्गमय


अध्याय : साधना के आधार स्तम्भ


. साधना के बारह मूल-मन्त्र

(भाव के साथ इनका सतत स्मरण करना चाहिए।)


. ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या


एकमेव ब्रह्म ही सत्य है। जगत् असत्य है।

(इससे आपमें आध्यात्मिक बल एवं शान्ति का संचार होगा।)


. जगत् दीर्घ स्वप्न है तथा केवल दुःखों से पूर्ण है।


(इससे वैराग्य होगा तथा बहुत-सी चिन्ताएँ दूर हो जायेंगी।)


. यह भी गुजर जायेगा।


(इससे वैराग्य बढ़ेगा। 'यह' के अन्दर सौभाग्य (सम्पत्ति) तथा दुर्भाग्य (विपत्ति) दोनों ही सम्मिलित हैं। आप सुख तथा दुःख में मन के समत्व को बनाये रख सकेंगे।)


. तेरी ही इच्छा पूर्ण होगी।


(यह सारे शोकों एवं दुःखों को दूर करेगा तथा अहंकार को विनष्ट करेगा।)


. ईश्वर की कृपा से मैं दिन-प्रति-दिन हर प्रकार से अच्छा बनता जा रहा हूँ।


(इससे शक्ति मिलेगी तथा बहुत से रोग दूर हो जायेंगे।)


. अहं ब्रह्मास्मि, शिवोऽहम् शिवोऽहम्। मैं शरीर नहीं हूँ। मैं मन नहीं हूँ। मैं आत्मा हूँ।


(यह तत्काल की आपको आध्यात्मिक ऊँचाइयों की ओर उन्नत करेगा- आत्म-महिमा के सर्वोपरि शिखर पर आरोहित करेगा।)


. मैं उसकी सत्ता का भान कर रहा हूँ।


(यह शीघ्र ही बल तथा प्रेरणा प्रदान करेगा।)


. सब एक ही है। सब ईश्वर अथवा आत्मा ही है। सारे शरीर मेरे हैं। सब मैं ही हूँ।


(यह विश्वात्म-चेतना एकात्मता तथा एकता की भावना उत्पन्न करेगा और कारुण्य-भाव को प्रोत्साहित करेगा। आप घृणा के भाव को दूर कर सकेंगे।)


. में कुछ भी नहीं हूँ, मेरे पास कुछ भी नहीं है। मैं कुछ भी नहीं कर सकता।


(यह अहंकार तथा ममता को दूर कर ईश्वरार्पण, आत्म-निवेदन अथवा शरणागति प्रदान करेगा। यह भक्त का तरीका है।)


१०. मैं सब हूँ। मैं सर्वोपरि हूँ। मैं सबसे एक हूँ।


(यह वेदान्त का तरीका है। इससे आपका हृदय विकसित होगा; एकता की वृद्धि होगी।


११. तू सब-कुछ है। मैं तेरा हूँ। सब तेरा ही है।


(यह भक्त का तरीका है। ममता तथा अहंता विलुप्त हो जायेंगी। इससे आत्मार्पण तथा ईश्वर-साक्षात्कार की प्राप्ति होगी।)


१२. अहं ब्रह्मास्मि, प्रज्ञानं ब्रह्म, तत्त्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म।


(यदि आप इनमें से किसी एक को भी सदा याद रखेंगे, तो आपको ब्राह्मी चैतन्य बनाये रखने में सहायता मिलेगी।)


नोट : अपने घर की दीवालों पर कई स्थानों पर उपर्युक्त आप्त-वाक्यों को बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवा लीजिए। आपके भूल जाने पर भी वे आपको याद दिला देंगे।


. साधना के तीन प्रमुख घटक


धार्मिक एवं दार्शनिक ग्रन्थों के प्रचुर परिशीलन के पश्चात् भी बहुत से लोग यह नहीं जानते कि व्यवहार में क्या लाना चाहिए जिससे जीवन के लक्ष्य-ईश्वर-साक्षात्कार की प्राप्ति हो। ईश्वर साक्षात्कार के लिए तीन बातें आवश्यक हैं: () ईश्वर का सतत स्मरण, () सद्गुणों का अर्जन तथा () सारे कार्यों का अध्यात्मीकरण।


() ईश्वर का सतत स्मरण: प्रारम्भ में कुछ त्रुटि होगी; परन्तु बारम्बार के अभ्यास से आप शनैः शनैः सतत स्मरण बनाये रख सकेंगे। अधिकांश लोगों के लिए सतत स्मरण ही सम्भव है। कुण्डलिनी का जागरण तथा ब्रह्माकार-वृत्ति की प्राप्ति बहुत ही कठिन है; परन्तु मन के शुद्ध हो जाने पर उनकी प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है।


() सद्गुणों का अर्जन : सारे सद्गुणों में अहिंसा, सत्य तथा ब्रह्मचर्य सर्वोपरि हैं। यदि आप एक सद्गुण में भी सुप्रतिष्ठित हैं, तो अन्य सारे सद्गुण स्वतः ही आपके पास जायेंगे। वृत्तियों का निरीक्षण कीजिए। अन्तर्निरीक्षण कीजिए। मन, वाणी तथा कर्म से शुद्ध बनिए। प्रारम्भ में कम-से-कम शारीरिक ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए। मानसिक ब्रह्मचर्य की प्राप्ति तब स्वतः ही हो जायेगी।


() सारे कार्यों का अध्यात्मीकरण: मान लीजिए कि आप ईश्वर के हाथों में निमित्त मात्र हैं तथा सारी इन्द्रियाँ उसकी ही हैं। इस मन्त्र का जप कीजिए: "मैं तेरा हूँ, सब तेरा है, तेरी ही इच्छा पूर्ण होगी।" यह आत्मार्पण के लिए सुन्दर मन्त्र है। हो सकता है कि आप इस मन्त्र को भूल जायें। अहंकार अपना प्रभाव जमाना चाहेगा; परन्तु बारम्बार के अन्तर्निरीक्षण के द्वारा अपने दोषों को ढूंढ़ निकालिए। इस भाव में स्थित होने का प्रयास कीजिए : "मैं ईश्वर के हाथों में एक यन्त्र हूँ।" गीता के इस श्लोक को याद रखिए।


आत्मार्पण


यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ।। (गीता : /२७)


- जो-कुछ भी कर्म तुम करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो तपस्या करते हो, उसे ईश्वरार्पण के रूप में ही करो।


"प्रसीद देवेश जगन्निवास- हे देवाधिदेव! जगत् के आश्रय प्रसन्न होइए।" यह मन्त्र 'प्रचोदयात्' से भी अधिक अथवा उसके समान ही प्रभावशाली है। 'प्रचोदयात्', 'पाहि माम्', 'पालय माम्' - ये सभी मन्त्र अत्यन्त प्रभावशाली हैं। भाव एवं अर्थ के साथ इनका बारम्बार स्मरण कीजिए।


'श्री रामः शरणं मम', 'श्री कृष्णः शरणं मम', 'हरिः शरणं मम'- ये सभी शक्तिशाली शरणागति-मन्त्र हैं। ईश्वर के प्रति आत्मार्पण करना अथवा ईश्वर की शरण में जाना शरणागति है।


कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः

यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।।

(गीता: /)


(मेरा हृदय कायरता के दोष के वशीभूत हो चला है, मेरा मन कर्तव्य के विषय में भ्रमित है। मैं आपसे पूछता हूँ। आप निश्चयपूर्वक बतलाइए कि मेरे लिए क्या श्रेय है। मैं आपका शिष्य हैं। मुझे उपदेश दीजिए। मैं आपकी शरण में हैं।) यह सदगुर शरणागति-मन्त्र है।


सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।


अहं त्या सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।। (गीता : १८/६६) (सारे धर्मों का परित्याग कर तू एक मेरी शरण में जा। मैं तुझे सारे पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक कर।)


ये सभी शरणागति के मन्त्र हैं। गीता के अठारहवें अध्याय में यह श्लोक है।


निमित्त भाव


यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य लिप्यते।

हत्वापि इमाँल्लोकान्न हन्ति निबध्यते

(गीता : १८/१७)


(जिसमें अहंकार नहीं है, जिसकी बुद्धि शुभाशुभ से लिप्त नहीं है, वह पुरुष यदि सारे जगत् को भी मार दे तो भी वह तो वास्तव में किसी को मारता ही है और कर्म के बन्धन में ही पड़ता है।) इसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन से उस समय कहा था जब वह संग्राम से कातर हो कर अपने क्षात्र धर्म को भूल चला था।


इन श्लोकों को याद रखिए। आपमें शरणागति की भावना बढ़ेगी। आप अनुभव करेंगे कि ईश्वर आपमें है और आप ईश्वर में हैं।


दिन-भर कार्य करने के उपरान्त सारे किये हुए कार्यों को ईश्वर को अर्पित कर डालिए। कर्मों के साथ अपना तादात्म्य सम्बन्ध जोड़िए। ऐसा अनुभव कीजिए कि ईश्वर के हाथों में निमित्त मात्र हो कर अनासक्त भाव से आप काम कर रहे हैं।


कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा

बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्

करोमि यद्यत् सकलं परस्मै

नारायणायेति समर्पयामि ।।


सारे कर्मों तथा उनके फलों को ईश्वर को अर्पित कर डालिए; तब आप बन्धन में नहीं पड़ेंगे। इस प्रकार आपको अपने समस्त कर्मों का अध्यात्मीकरण कर डालना चाहिए। अनुभव कीजिए कि अखिल संसार ईश्वर की अभिव्यक्ति है तथा आप सभी नाम-रूपों में ईश्वर की ही सेवा कर रहे हैं तथा जो कुछ भी कर्म आप करें, उन्हें तथा उनके फल को ईश्वर को अर्पित कर डालिए, तब आपका हृदय शुद्ध हो जायेगा और ईश्वरीय ज्योति तथा कृपा के अनुकूल हो जायेगा।


सुनिश्चित मार्ग


अतः इन तीनों का अभ्यास कीजिए-ईश्वर का सतत स्मरण कर, अपने कार्यों का अध्यात्मीकरण तथा सद्गुणों का अर्जन।


ये तीनों बहुत ही आवश्यक हैं। इनका अभ्यास कीजिए। ईश्वर-साक्षात्कार के लिए यही सबसे सुगम तथा सुनिश्चित मार्ग है।


एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा प्रकाशते

दृश्यते त्वक्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ।।

(कठ : //१२)


(यह आत्मा सभी भूतों में छिपा हुआ है; परन्तु सूक्ष्मदर्शियों को ही सूक्ष्म एवं तीक्ष्ण बुद्धि से इसका दर्शन प्राप्त होता है।)


ब्रह्मसूत्रों को समझने के लिए आपकी बुद्धि छुरे की धार के समान तीव्र होनी चाहिए, तभी आप उन्हें ठीक-ठीक समझ सकते हैं; किन्तु सभी इसके लिए उपयुक्त नहीं होते। फिर भी व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करना आवश्यक है। अतः अधिकांश जनता के लिए तो भगवान् का सतत स्मरण अपने सारे कार्यों का अध्यात्मीकरण तथा अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य जैसे सद्गुणों का अर्जन यही साधना का महत्त्वपूर्ण भाग है। भगवान् बुद्ध का अष्टांग मार्ग भी इसमें सन्निहित है। प्रभु यीशु के 'पर्वत पर के उपदेश' भी इनसे मिलते-जुलते हैं। सारे धर्मों में ये ही सार-तत्त्व हैं। अतः कृपया इनका अभ्यास कर ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त कीजिए। सभी से प्रेम कीजिए। भला बनिए। भले कर्म कीजिए। भगवान् आप सभी पर कृपा करें!

. आध्यात्मिक साधना के लिए पूर्वापेक्ष्य-


मैं यहाँ उन मुख्य गुणों की चर्चा करूँगा जो कि वास्तविक साधना के लिए आवश्यक हैं। प्राचीन काल से ही आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त सन्त, ऋषि तथा भक्त जन यह घोषणा करते रहे हैं कि यदि मनुष्य पाप-पंकिल-मय विषय जीवन से मुख मोड़ ले और उन्नत दिव्य जीवन के लिए प्रयत्नशील हो तो वह महान् सुख, अपार शक्ति तथा असीम ज्ञान का अनुभव कर सकता है। फिर भी आज हम देखते हैं कि मनुष्य सांसारिकता में यदि अधिक नहीं तो उतना ही निमग्न है जितना कि वह शताब्दियों पूर्व था तथा मानव-जाति आत्मिक जीवन के प्रश्नों के प्रति उतनी ही उदासीन तथा आलसी है जितनी कि वह सृष्टि के प्रारम्भ में थी। बहुत से महर्षियों की घोषणाओं, सत् शास्त्रों के विश्वसनीय आश्वासनों तथा मनुष्य के बारम्बार ऐहिक विषय-सुख के मिथ्यात्व-सम्बन्धी अनुभवों के होते हुए भी आप बारम्बार धोखे में पड़ रहे हैं; ऐसा क्यों? मनुष्य ने साधना-पथ पर अभी तक चलना सीखा नहीं; ऐसा क्यों? हम सैकड़ों आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं, हम प्रवचनों को सुनते हैं तथा साधना-सप्ताह में सम्मेलन भी बुलाते हैं। वर्षों तक आध्यात्मिक ग्रन्थों के गम्भीर अनुशीलन, साधुओं की संगति तथा बारम्बार उपदेश-श्रवण के अनन्तर भी मनुष्य रचनात्मक रूप से कुछ करता नहीं; क्योंकि उसमें साधुओं के उपदेशों तथा धर्मग्रन्थों के प्रति गम्भीर तथा स्थायी श्रद्धा नहीं है। बाह्य पदार्थों में उसकी श्रद्धा उसके लिए अधिक सत्य है। यदि मनुष्य को इन महापुरुषों में श्रद्धा होती, तो वह उनके कथनानुसार चलने के लिए अवश्य बाध्य होता। श्रद्धा का अभाव ही साधना में विफलता का मूल कारण है। साधना आवश्यक है; किन्तु मनुष्य इसे करता नहीं, क्योंकि इसकी आवश्यकता में उसे विश्वास नहीं है। मनुष्य को इसमें विश्वास है कि उसके सुख के लिए उसे धन की आवश्यकता है। मनुष्य को विश्वास है कि यदि उसे अच्छी नौकरी मिल जाये, तो उसे धन प्राप्त होगा। उसे विश्वास है कि यदि उसे कालेज-शिक्षा प्राप्त हो, तो उसे अच्छी नौकरी मिल सकती है और उससे धन और धन से उसके इच्छानुसार सुख की प्राप्ति हो सकती है। इस पर विश्वास कर माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं तथा शैशवावस्था से ही उस बच्चे में यह विश्वास जमाया जाता है कि यदि वह अच्छे अंकों से परीक्षा में उत्तीर्ण होगा तो उसे अच्छी नौकरी मिलेगी और उसे अच्छा वेतन, मोटर कार इत्यादि प्राप्त होंगे। वह इन बातों में विश्वास करता है और परीक्षा पास कर आशातीत नौकरी प्राप्त करता है। क्योंकि उसमें विश्वास था, उसने इनकी आवश्यकताओं को समझ लिया था; अतः वह इन्हें प्राप्त कर लेता है। परन्तु सभी मनुष्यों का यह दुःखद अनुभव है कि यह सुख दशगुने दुःख से मिश्रित है। मनुष्य एक आना सुख प्राप्त करता है और उसके साथ-साथ उसे पन्दरह आना दुःख भी मिला होता है, जब कि दुःख के लिए तो उसने कोई कामना ही नहीं की थी। अतः यदि मनुष्य को साधना के कार्यक्रम में विश्वास हो तो वह अवश्य तद्नुकूल कार्य करेगा। इस विश्वास के अभाव में ही वह साधना नहीं करता। यदि मनुष्य को साधना-मार्ग का अवलम्बन करना है, यदि वास्तव में ही वह उस सुख को चाहता है जो दुःखों से मिश्रित हो, तो उसे निश्चय ही श्रद्धा पर आश्रित होना होगा। इसे अन्धविश्वास भी कह सकते हैं; परन्तु अन्धविश्वास नामक कोई वस्तु है ही नहीं, क्योंकि इस पृथ्वी की सभी वस्तुएँ विश्वास-पारस्परिक श्रद्धा पर ही अवलम्बित हैं।


यदि आज मनुष्य जी रहा है तो केवल पारस्परिक विश्वास एवं श्रद्धा के कारण ही। दश रुपये का नोट कागज का एक टुकड़ा ही तो है; परन्तु चूँकि उस पर राजा के शिर की छाप है, इससे आप बाजार से जो चाहे खरीद सकते हैं। आपको इस कागजी टुकड़े में विश्वास है। यदि आपको इस टुकड़े में विश्वास होता, तो आप घर से बाजार के लिए निकलते ही नहीं और कभी आप अपने उद्देश्य की पूर्ति में ही समर्थ होते। डाक्टर आपको कागज के एक टुकड़े पर औषधि लिख कर देता है। यदि आपको विश्वास हो, तो आप उससे यह टुकड़ा लेंगे ही नहीं; परन्तु श्रद्धा के कारण-जिस पर सारा समाज टिका है- आप उसकी बातों में विश्वास करते हैं, उसके परामर्श के लिए उसे रुपये देते हैं, उस कागज को औषधि-विक्रेता के पास ले जाते हैं तथा औषधि खरीद कर रोग-मुक्त बनते हैं। यह सारा सामाजिक विधान श्रद्धा एवं विश्वास के ऊपर ही चलता है। यदि आप गतिशील मानव जाति पर श्रद्धा रखने को तैयार हैं, तो इन वस्तुओं के स्रष्टा भगवान् के प्रति श्रद्धा रखने में झिझक क्यों? ऋषियों की वाणी पर श्रद्धा रख कर तथा साधना की आवश्यकता समझ कर तदनन्तर क्या करना चाहिए? आपमें श्रद्धा हो सकती है, आपके सहस्रों हितैषी बहुत अच्छी-अच्छी सम्मतियाँ आपको दें और आपको उन पर पूर्ण विश्वास भी हो; परन्तु यदि आप उन्हें अभ्यास में लायें तो वे योजना मात्र ही रह जायेंगी। अतः साधना में श्रद्धा के उपरान्त अभ्यास की बारी आती है। आपको अभ्यास में लग जाना होगा। केवल श्रद्धा ही पर्याप्त नहीं। श्रद्धा को कार्य रूप में परिणत करना होगा। सन्तों की बात में विश्वास रख कर आप साधना प्रारम्भ कर दें। एक बार साधना प्रारम्भकर लेने के पश्चात् दूसरी मुख्य बात ध्यान देने योग्य यह है कि आप उसे फिर त्याग दें। संलग्नता बहुत ही आवश्यक है। संसार के समस्त विधान क्रमिक हैं। उनमें अवस्थाएँ हैं। कृषि क्रमिक है। इसमें बारह महीने लग जाते हैं। आपको बोना है, खेत की सिंचाई करनी है, मोथों को उखाड़ फेंकना है तथा समय आने पर फसल काटनी है। यदि आप अधीर हैं- आप बीज बो दें और अंकुरित होते ही आप उसे भूमि से निकाल लें, तो वह विनष्ट हो जायेगा। यदि आपको फसल प्राप्त करनी है, तो धैर्य के साथ उसकी सारी अवस्थाओं से गुजरना होगा। कोई व्यक्ति कुएँ से पानी खींचते समय यदि अचानक रस्सी खींचना बन्द कर दे, तो पानी का वह पात्र पहिए के सहारे पुनः कुएँ में जा गिरेगा। उसे तब तक खींचते जाना चाहिए, जब तक कि पात्र ऊपर जाये। तब तक संलग्न रहिए, जब तक कि फल प्राप्त हो जाये। आपको उसे त्यागना नहीं चाहिए। दूसरी प्रमुख बात यह है कि आध्यात्मिक साधना में केवल सहायक शक्तियाँ ही काम करतीं। बहुत-सी विरोधी शक्तियाँ भी हैं जो साधक पर आक्रमण कर उसे नीचे घसीट लाती है। अतः चौद आवश्यक अख धुति की बारी आती है। संलग्न रहते हुए मनुष्य को इतना तो साहस रखना ही चाहिए कि वह बाधाओं से सुगमतया डिगे। उसे तूफानों का सामना करना पड़ेगा तथा विपरीत परिस्थितियों एवं कठिनाइयों से लड़ते हुए साधना के मार्ग पर अविचल रहना होगा। धृति के सहारे वह हतोत्साह नहीं होता तथा अन्तरात्मा पर आश्रित हो कर साधना में अग्रसर होता है और अन्ततः वह उस आदर्श को प्राप्त कर लेता है जिसके लिए इस जगत् में उसका जन्म हुआ है। इस प्रक्रिया से गुजरते हुए उसे इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए कि वह मार्ग की छोटी-छोटी बातों पर भी विशेष ध्यान रखे, उनकी अवहेलना करे। यदि ऐसा समझ कर कि यह तो निरर्थक है, कोई भी छोटी बात छूट गयी, तो उसे अन्त में पता चलेगा कि उसने व्यर्थ में ही अपना बहुमूल्य समय तथा श्रम गँवाया है। इससे उन्नति में विलम्ब होता है। उच्च आदशों की प्राप्ति में छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना अत्यावश्यक है; क्योंकि उन्हीं के संग्रह से ही उच्च आदर्श की प्राप्ति होती है। अतः दृढ़ श्रद्धा, व्यावहारिक साधना, संलग्नता, छोटी-छोटी बातों के प्रति सावधानी तथा परीक्षण में धृति रखते हुए आपको साधना-मार्ग पर पग रखना चाहिए।

. आध्यात्मिक साधना के लिए पूर्वापेक्ष्य-


किसी भी प्रश्न पर विचार करते समय उसके विभिन्न पहलुओं पर भी विचार कर लेना आवश्यक होता है जिससे कि उसे पूर्ण रूप से समझा जा सके। साधारणतः कुछ पहलुओं पर तो विशेष जोर डाला जाता है; परन्तु अन्य को यों ही छोड़ दिया जाता है। यह व्यक्ति की अपनी-अपनी रुचि पर निर्भर करता है। ऋषियों ने मानव-जीवन के सम्बन्ध में बहुत-सी बातें बतलायी हैं- यह जीवन किससे निर्मित है, यह क्योंकर क्षणभंगुर है। इसका लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार अथवा भगवद्-दर्शन है। इसके लिए विभिन्न साधन- जैसे कि भगवन्नाम का जप आदि- बतलाये गये हैं। महर्षि पतंजलि ने यम, नियम आदि के अभ्यास को बतलाया है। अमृतत्व के प्रासाद के निर्माण हेतु हमें यम-नियम की दीवारें खड़ी करनी पड़ेंगी तथा शम-दम के दरवाजे और खिड़कियाँ बनानी पड़ेंगी। यहाँ कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसे आप अपनी कह सकें। सर्वत्र ही जीवन क्षणभंगुर है, सर्वत्र ही अनित्यता है। ये सभी विषय की समस्या के पहलू हैं। इसके समाधान का भी पहलू है। समाधान का सिद्धान्त एक उप-पहलू है तथा समाधान का अभ्यास उसका दूसरा उप-पहलू है। जीवन पर विचार करते समय हम जीवन की समस्या-शोक, दुःख, क्लेश, इनसे कैसे छुटकारा पाया जाये आदि प्रश्नों को रखते हैं, फिर उसके समाधान पर विचार करते हैं- सत्संग, भगवन्नाम का जप, शम, दम तथा धर्म के विषय का प्रतिपादन करते हैं। समाधान के पहलू में समाधान के सिद्धान्त का अपना स्थान है; किन्तु साधक एवं सच्चे जिज्ञासु होने के नाते आप सभी साधना के पहलू को अन्य बातों की अपेक्षा विशेष पसन्द करेंगे। दो पहलू हैं। एक पुस्तक कहती है कि यदि आप अमुक औषधि लें तो आपका रोग दूर हो जायेगा। यह ठीक इसी प्रकार का कथन है जैसा कि 'जप तथा उपासना से विक्षेप को दूर किया जा सकता है।' परन्तु एक दूसरी पुस्तक है, वह कहती है कि यदि आपको यह रोग है तो इस औषधि को इतने तोले खरीद लायें, इस ढंग से उसका शोधन करें, इस अनुपात में उसे मिलायें, उसे गरम करें, इतने समय तक उसे भट्ठी पर छोड़ दीजिए, इन-इन वस्तुओं को उसमें मिला दीजिए। इस विस्तृत प्रक्रिया को पढ़ कर कोई भी मनुष्य उस औषधि का निर्माण आसानी से कर सकता है। केवल औषधि बतला देना और उसे विस्तृत रूप से समझा देना- दोनों में अन्तर है।


सच्चे साधकों के लिए व्यावहारिक पहलू ही सबसे मुख्य है। अब हम आपको दो-एक बातें इस सम्बन्ध में बतलायेंगे। जब आप साधना करना प्रारम्भ कर देते हैं, तब आपके सामने कई कठिनाइयाँ खड़ी होती हैं। साधकों को बाहरी शक्तियों की अपेक्षा आन्तरिक शक्तियों का ही अधिक सामना करना पड़ता है। रोगों के मामले में हम देखते हैं कि कुछ बाह्य परिस्थितियाँ कई बीमारियाँ उत्पन्न करती हैं। उन परिस्थितियों को दूर कर देने से ही वह बीमारी दूर हो जाती है। परन्तु यहाँ तो अधिकांश शक्तियाँ, जिनका आपको विरोध करना है, मानसिक ही हैं। अतः आपको अपने मन के एक भाग को इस तरह प्रशिक्षित करना होगा कि आपके आध्यात्मिक साधना, जप आदि में संलग्न रहते समय भी वह सावधानीपूर्वक निरन्तर पहरा देता रहे। ज्यों ही कोई बुरा विचार या कोई बुरी शक्ति आपके मानसिक क्षेत्र में प्रवेश करना चाहे, त्यों-ही आपका यह संरक्षक उसे तुरन्त ही मार डाले। इसके लिए अनवरत साधना तथा अभ्यास की आवश्यकता है। मन इतना बुरा है कि जब-जब आप उसे किसी विशेष दिशा में ले जाना चाहेंगे, तब-तब उसके बुरे संस्कार आपको बाधा पहुचायेंगे; अतः हमें बड़ी उग्रतापूर्वक उसका दमन करना चाहिए। हमें अपने मानसिक संरक्षक को तैयार रखना चाहिए जिससे कि कोई विरोधी शक्ति प्रवेश कर पाये। मानसिक संरक्षक के रहने पर साधना में बड़ी सुविधा होती है। यह गहरे जल से हो कर गुजरने के समान है। साधक का जहाज शत्रुओं के समुद्र से हो कर गुजरता है जिसके तल में विरोधी शक्तियाँ काम कर रही हैं। विश्व युद्ध के समय में समुद्र तल पर चलने वाले जहाजों को शत्रु-पक्षी जल के अन्दर चुम्बकीय पदार्थों के सहारे डुबा देते थे; परन्तु चुम्बकीय आकर्षण से बचने के लिए जहाज को चुम्बक-विसंवाहक बना दिया जाता था जिससे कि वे चुम्बक की ओर आकृष्ट हों। ठीक उसी प्रकार साधकों को भी अपने मन को विषय-पदार्थों के आकर्षणों से विसंवाहक बना डालना होगा। मुमुक्षुत्व तथा ईश्वर में श्रद्धा-ये दोनों विसंवाहक का काम करेंगे। जब आपकी दृष्टि ऊँची नहीं है, जब आप विषय-सुखों के स्तर पर ही हैं, तभी आप विषय-पदार्थों की ओर आकृष्ट हो जाते हैं और ये विषय-पदार्थ आपकी प्रगति को नष्ट कर डालते हैं। अतः मन को इनकी ओर से विसंवाहक बना लेने के पश्चात् आपको दूसरी बात पर ध्यान रखना है। हमें उस आदर्श को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बना लेना चाहिए। साधक को बहुत-सी वस्तुओं में दिलचस्पी हो सकती है जैसे कि पारिवारिक परिस्थितियाँ, समाज, वातावरण आदि। परन्तु जिस प्रकार सैनिक गण पहले से ही अपनी तोपों के मुख लक्ष्य की ओर करके उन्हें आगे से चलाते हैं, उसी प्रकार साधक को भी उस आदर्श की ओर ही लक्ष्य रखना होगा। हर स्थिति में साधक को मोक्ष को ही अपना लक्ष्य बनाये रखना होगा। यह विचार इतना गहरा जम जाना चाहिए कि अनेकानेक बाधाएँ भी उसे लक्ष्य से डिगा सकें। राग-द्वेष से तरंगायमान जगत् में काम करते हुए भी इस बात पर ध्यान रखिए कि आपके अन्दर एक शक्ति बराबर काम करती रहे, जिससे आपकी आन्तरिक अवस्था दिव्य, समत्वपूर्ण तथा आध्यात्मिक बनी रहे। कर्म होते रहेंगे, शक्तियाँ आप पर आघात प्रतिघात करेंगी; परन्तु आपको ऐसी कला जाननी होगी जिससे आप पर उनका कोई प्रभाव हो। जब मनुष्य बाह्य शक्तियों की ओर प्रतिक्रिया करता है, तभी वह विफल होता है जिसके परिणाम स्वरूप उसे कष्ट उठाने पड़ते हैं। आपके अन्दर मशीनगन की तीव्रता है। पल-भर में ही अनेकानेक गोले छूट पड़ते हैं तथा बैरेल अधिकाधिक परितप्त हो जाता है। राग, द्वेष, क्रोध तथा लोभ के सम्पर्क में आने पर हमें यह देखना है कि संघर्ष हमें सन्तप्त कर डाले। भगवान् के शीतल नाम तथा भगवत्-चिन्तन को सदा अपने साथ रखिए। यह हमारी प्रकृति को सदा शीतल बनाये रखेगा। इससे आध्यात्मिक सन्तुलन सदा बना रहेगा। युद्ध काल में शत्रु-पक्ष के सैनिकों को बन्दी बना लिया जाता है और उन्हें अपने पक्ष में लगाया जाता है। ठीक इसी प्रकार अपनी बुरी आदतों को रूपान्तरण के तरीके से अपने हित के लिए लगाया जा सकता है। हममें दोष-दृष्टि का स्वभाव है। हम सर्वत्र दोष ही ढूँढ़ निकालने का प्रयास करते हैं। यह साधकों का बड़ा भारी दोष है। इससे आध्यात्मिक उन्नति रुक जाती है; किन्तु यह आदत छूटती नहीं। यदि इस आदत को साधक अपने प्रति लागू करे तो वह इससे अपना बड़ा हित कर सकता है। उसे दूसरों के दोष देखने का मौका ही नहीं मिलेगा। तब वह दूसरों के स्वल्प सद्गुण का भी प्रशंसक बन जायेगा।

. साधना के लिए कुछ आवश्यकीय बातें


अहंकार से मुक्त होने पर मनुष्य में प्रेम तथा भक्ति का विकास होता है। चरियै, किरियै, योग तथा ज्ञान- अहंकार के दमन एवं ईश्वर-प्राप्ति के लिए ये चार साधन हैं। मन्दिर बनवाना, उनकी सफाई करना, फूलों के हार गूँथना, ईश्वर की स्तुति करना, मन्दिरों में दीप जलाना, फूलों की वाटिका लगवाना- ये सब चरियै साधना हैं।


पूजा-अर्चना ये किरियै हैं। इन्द्रियों का दमन तथा अन्तज्योंति पर ध्यान योग है। पति, पशु और पाश के तत्त्व को समझना तथा तीन मल-अणव (अहंकार), कर्म तथा माया को दूर कर भगवान् पर सतत ध्यान करते हुए भगवान् से एक हो जाना ज्ञान है।


बाह्य रूपों के द्वारा सर्वव्यापक, अमर परमात्मा की पूजा करना चरियै है। इसके लिए साम्य-दीक्षा दी जाती है। अमर शासक प्रभु के विश्वात्म रूप का अन्तर्बाह्य पूजन ही किरियै है। उसके निराकार रूप का आन्तरिक पूजन योग है। किरियै तथा योग के लिए विशेष दीक्षा दी जाती है। ज्ञान-गुरु के द्वारा भगवान् का साक्षात्कार ज्ञान कहलाता है। इसके लिए निर्वाण-दीक्षा है।


साधक को तीन प्रकार के मल- अणव, कर्म तथा माया से मुक्त होना होगा, तभी वह भगवान् से एक हो कर उनकी कृपा का उपभोग करता है। उसे अभिमान का पूर्णतः उन्मूलन करना चाहिए, कर्म के बन्धन से मुक्त बनना चाहिए तथा सारे मलों की जननी माया को विनष्ट कर देना चाहिए।


निर्वाण प्राप्ति के लिए गुरु बहुत ही आवश्यक है। प्रभु कृपा-सागर है। वह साधकों की सहायता करता है। वह उन पर अपनी कृपा की वर्षा करता है जो श्रद्धा तथा भक्ति के साथ उसकी पूजा करते हैं तथा जिनमें शिशुवत् विश्वास है। भगवान् ही गुरु हैं। ईश्वर की कृपा ही मुक्ति का पथ है। वह गुरु में निवास करता है तथा गुरु के नेत्रों से हो कर वह अपार प्रेम के साथ सच्चे साधकों पर अपनी दृष्टि रखता है। जब आपमें मानव जाति के लिए प्रेम रहेगा, तभी आप ईश्वर की भक्ति कर सकेंगे।


यदि साधक स्वयं तथा ईश्वर के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है तो भक्ति में उसकी शीघ्र उन्नति होगी। वह कोई भी भाव रख सकता है। दास्य-भाव- प्रभु उसके स्वामी तथा वह उनका दास है। तिरुनावुकरसर इस भाव को रखते थे। वात्सल्य भाव- ईश्वर पिता है तथा साधक उसका शिशु। तिरुज्ञानसम्बन्धर इस भाव को रखते थे। सख्य-भाव-प्रभु साधक का सखा है। सुन्दरार इस भाव को रखते थे। सन्मार्ग - भगवान् ही भक्त का प्राण है। मानिक्कवासगर इस भाव को रखते थे। वैष्णव जन इसे माधुर्य-भाव या आत्म-निवेदन कहते हैं।


तीनों मलों के नष्ट हो जाने पर भक्त भगवान् के साथ उसी प्रकार मिल जाता है, जिस प्रकार लवण जल में; परन्तु वह सृष्टि आदि ईश्वरीय कार्यों को नहीं कर सकता। ईश्वर ही उन्हें कर सकता है।


मुक्त पुरुष को जीवन्मुक्त कहते हैं। यद्यपि वह शरीर में रहता है, फिर भी अनुभूति से ब्रह्म के साथ एक है। वह ऐसे कर्मों को नहीं करता जिनसे अन्य शरीरों का निर्माण हो सके। अभिमान से मुक्त होने के कारण कर्म उसे बन्धन में नहीं डालते। वह विश्व-कल्याण के लिए लोक-संग्रह करता है। प्रारब्ध कर्म के अनुसार वह शरीर में रहता है। सारे वर्तमान कर्म ईश्वर की कृपा से विनष्ट हो जाते हैं। जीवन्मुक्त अपने अन्तर्हित प्रभु की प्रेरणा से ही सारे कार्यों को करता है।

. साधना के मूल सिद्धान्त तथा विपरीत बुद्धि


साधना का मार्ग कठिनाइयों एवं समस्याओं के जंगल में से हो कर गुजरता है। उन समस्याओं में एक तो यह है कि आपका मन सर्वोत्तम मित्र है और साथ ही निकृष्ट शत्रु भी। मन आपका सच्चा मित्र तभी बनता है, जब उसे धीरे-धीरे प्रशिक्षित किया जाता है। आध्यात्मिक साधना में पर्याप्त उन्नति कर लेने के बाद ही मन सहायक बन जाता है। जब तक यह अवस्था नहीं प्राप्त होती, तब तक मन को अपने अन्दर दुष्ट शत्रु के रूप में ही समझना चाहिए। यह अत्यन्त कूटनीतिज्ञ, धूर्त तथा चालाक है। यह सबसे बड़ा धोखेबाज है। मन की चालाकियों में एक चालाकी यह है कि यह साधक को इस धोखे में डाल देता है कि साधक भ्रमवश यह समझने लगता है कि उसने मन पर विजय पा ली है। मन असावधान साधक को ऐसे भ्रम में डाल देता है कि वह समझने लगता है कि मन मेरे वश में है; परन्तु अन्त में उसे मूर्ख बनना पड़ता है। मन की चालें सूक्ष्म हैं।


आपने यह सुना है: "शैतान अपने उद्देश्य के समर्थन के लिए शास्त्रों की उक्तियों के उद्धरण दे सकता है।" उसी प्रकार मन भी किसी सद्गुण का प्रयोग पाप कर्म में कर सकता है। विपरीत बुद्धि तो इसका जन्मजात गुण है। यह किसी निकृष्ट कार्य के समर्थन में किसी अच्छे सिद्धान्त का आश्रय ले सकता है। जब तक वैराग्यपूर्वक इसका अन्तर्निरीक्षण नहीं करते, तब तक इसकी चालें पूर्ण रूप से प्रकट नहीं होर्ती।


कुछ विपरीत बुद्धि के उदाहरण नीचे दिये जा रहे हैं। सच्चे साधक उनसे पर्याप्त लाभउठा सकते हैं।


साधकों से कहा जाता है- "स्त्रियों के साथ रहते समय मातृ-भाव या देवी-भाव बनाये रखिए।" आपकी शुद्धता तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह महान् आदर्श है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि आप स्त्रियों के साथ रहिए। तो इसका यह मतलब है कि यदि आप इस भाव को रखें, तो आपको स्त्रियों के साथ चलने की छूट मिल गयी। मन तो कहेगा, "क्यों नहीं? यदि ऐसा करूँ तो हानि ही क्या है? उनसे दूर भागना तो कायरता है। जब देवी-भाव रखते हैं तो डर ही क्या?" सावधान! हे साधक, इस वासना के प्रति सावधान ! देवी-भाव का अर्थ अपने नियन्त्रणों को दूर हटाना नहीं है। साथ ही स्त्रियों से घृणा भी नहीं रखनी है। स्त्रियों का आदर कीजिए; परन्तु कुछ दूरी रख कर ही। देवी-भाव इत्यादि का यह अर्थ नहीं है कि आप सदा उनके साथ रहें। मन का निरीक्षण कीजिए।


दूसरा सिद्धान्त है : "आप फुफकार मार सकते हैं, परन्तु डसिए नहीं- आप धमका सकते हैं, परन्तु दण्डित कीजिए।" यह सिद्धान्त उनके लिए लाभदायक है जो व्यावहारिक जीवन में अत्यन्त ही सीधे हैं; परन्तु यह नीति साधना-मार्ग अथवा निवृत्ति-मार्ग के साधकों के लिए उपयुक्त नहीं है। निश्चय ही नहीं है। साधक इन शब्दों पर ध्यान रखे। साधक तो धमकाये और दण्ड ही दे। यदि आपने फुफकारना शुरू कर दिया, तो यह आपकी आदत हो जायेगी और आप सर्वत्र हर वस्तु को ले कर फुफकारते ही रहेंगे। अन्त में आप हिंसात्मक कार्य कर बैठेंगे। मन सदा अवसर की ताक में रहता है। थोड़ी ढिलाई भी इसके लिए यथेष्ट है। यह स्वभावतः नीचे की ओर जाना चाहता है। हे साधक ! नम्र बनिए, शिष्ट बनिए। दृढ़ परन्तु नम्र रहिए। यदि आप क्रोध करना चाहें, तो अपने मन के प्रति क्रोध कीजिए। अहंकार को कुचल डालिए। षड्-रिपुओं से संग्राम छेड़िए। मन का निरीक्षण कीजिए।


इस सिद्धान्त का भी गलत अर्थ लगाते हैं- "दृढ़ रहिए। अपने सिद्धान्तों पर अटल रहिए। इंच मात्र भी डिगिए।" यद्यपि यह आदेश सर्वोत्तम है, फिर भी साधक इसे अपने हठी स्वभाव का समर्थन मान बैठते हैं। हठ तामसिक गुण है; परन्तु मन आपको बतलायेगा कि यही आत्म-बल अथवा दिव्य संकल्प है। यही मन का काम है। यह साधक को अहंकार के साथ पूर्णतः आसक्त बना डालता है। यही धोखेबाजी है। सावधान साधक को सात्त्विक निष्ठा तथा हठबाजी में विवेक रखना चाहिए। दीर्घकालीन प्रयास, अनुशासन तथा संकल्प-साधन के बिना आत्म-बल मिलने का नहीं। वास्तविक ऊँचे दिव्य सिद्धान्तों के प्रति ही अडिग दृढ़ता की आवश्यकता है। अहंकारपूर्ण भावनाओं के प्रति निष्ठा तो हानिकारक ही है। आध्यात्मिक यौगिक नियमों के पालन में कट्टर बनिए; परन्तु हठी बनिए। धोखे में पड़िए। मन का निरीक्षण कीजिए।


"सदा सत्य बोलिए, स्पष्ट बोलिए" - यह उपदेश है। जब आपसे पूछा जाये, आप सत्य ही बोलिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप हर व्यक्ति के सामने उसके सम्बन्ध में अपने विचार रखते चलें। यह सदाचार नहीं है। दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए, स्वेच्छापूर्वक अपने विचारों को प्रकट करते रहना आर्जव नहीं है। यह कम-से-कम अविचार तो है ही; परन्तु अधिक बढ़ने पर यह उद्दण्डता है। यह साधक को शोभा नहीं देता। जो आपको सत्य बोलने तथा स्पष्ट बोलने की शिक्षा देता है, वही आपके लिए यह भी उपदेश देता है कि 'मित भाषण, मधुर भाषण कीजिए।' मन आपको स्पष्टवादिता के बहाने दूसरों को अपमानित करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। अप्रिय सत्य को कहा जाये तो अच्छा ही है। यदि कहना अनिवार्य है तो उसे मधुर शब्दों में नम्रतापूर्वक कहिए। "दूसरों की भावनाओं पर आघात पहुँचायें" यह उपदेश उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि सत्य बोलना। सत्य तथा अहिंसा दोनों को साथ-साथ चलना चाहिए। अपना अध्ययन कीजिए। मन का निरीक्षण कीजिए।


अब दूसरा सिद्धान्त है- "वैराग्य तो वास्तव में मानसिक अवस्था है, मानसिक अनासक्ति है।" मन इस सिद्धान्त के द्वारा अपने अविवेकपूर्ण विषय-परायण जीवन का भी समर्थन करने लगता है। तर्क यही रहेगा- "हाँ, मैं तो इन सभी से आसक्त नहीं हूँ। मैं तो एक क्षण में ही इनसे परे जा सकता हूँ। मैं तो स्वामी की भाँति इनका उपभोग करता हूँ। मैं तो मानसिक रूप से अनासक्त हूँ।" विषयों के सम्पर्क ने विश्वामित्र जैसे तपस्वियों को गिरा डाला है। अतः वैराग्य को आसान समझिए। श्रमपूर्वक वैराग्य का अर्जन कीजिए। सावधानीपूर्वक वैराग्य की रक्षा कीजिए। सावधान रहिए। मन का निरीक्षण कीजिए।


"तपस्या में अति नहीं करनी चाहिए" - इस उपदेश की भी वैसी ही दुर्दशा होती है। मनुष्य का सहज स्वभाव इन्द्रिय-परायण है। मन आराम चाहता है तथा तपस्या से घृणा करता है। अविवेकी साधक उपर्युक्त सम्मति में अति शब्द को हटा देता है और तपस्या को ही घृणा से देखने लगता है। परिणाम स्वरूप वह विलासी बन बैठता है, उसमें अल्प मात्र भी तितिक्षा नहीं रह जाती तथा वह सैकड़ों इच्छाओं का दास बन जाता है। मूर्खतापूर्ण अति के लिए ही उपयुक्त सावधानी बरतनी चाहिए। परन्तु प्रारम्भिक अवस्था में किसी सीमा तक साधकों को तपस्या अनिवार्य है। मन तो इस पक्ष में बहुत से सुझावों को प्रस्तुत करेगा। वह गीता को अपने पक्ष में ला कर यह दिखलाना चाहेगा कि भगवान् स्वयं तपस्या के विरोधी हैं। हे साधक ! भगवान् ने तो तामसिक तपस्या का ही खण्डन किया है। उन्होंने तो शरीर, मन तथा वाणी की सात्त्विक तपस्या को आवश्यक बतलाया है। सावधानीपूर्वक मनन कीजिए। सदा मन का निरीक्षण कीजिए।


"सारवस्तु पर ध्यान रखो। गौण (अनावश्यक) पर विशेष ध्यान दो।" इस उपदेश को भी साधक अपनी भ्रान्ति का सहायक बना डालते हैं। मन का तो आलसी स्वभाव है ही। यह किसी भी प्रकार के नियम तथा सदाचार से स्वभावतः ही घृणा करता है; अतः वह सभी को अनावश्यक समझ बैठता है। तब बचा क्या रहता है, यह तो ईश्वर ही जाने। मन जो कुछ चाहता है, एकमात्र वही आवश्यक है। साधक को विचार करना चाहिए कि आध्यात्मिक उपदेश का वास्तव में अर्थ क्या है तथा उसे क्यों दिया गया है। आध्यात्मिक साधक की प्रगति के स्तर के अनुसार आवश्यक तथा अनावश्यक में विभिन्नता भी है। जो साधना कालान्तर में अनावश्यक प्रतीत होगी, वह अभी आवश्यक हो सकती है। भूसे के साथ-साथ बहुमूल्य अन्न को फेंक डालिए। मन का निरीक्षण कीजिए।


अन्ततः साधना के विषय में ही मन सबसे बड़ा धोखा देता है। जिस साधना को साधक अपने जीवन को दिव्य बनाने तथा अपना रूपान्तरण करने के लिए अपनाता है, उसी साधना को वह अहंकार तथा इन्द्रियों के विहार के लिए आधार बना डालता है। पूरी सच्चाई तथा हार्दिक प्रयास के बिना इस मोहक जाल से बचना कठिन है। इस कलुष के कारण ही साधक अपने मार्ग में स्तब्ध-सा रह जाता है और वर्षों की साधना के बाद भी उन्नति नहीं हो पाती। उदाहरणतः युवक साधक, जिनका गला मधुर है तथा जो संगीत-प्रेमी हैं, स्वभावतः कीर्तन तथा भजन को अपनी साधना बना लेते हैं। कला के द्वारा बहुत से लोग आकृष्ट होते ही हैं। सारे शुभ कार्यों में उनकी माँग होती है। वे सत्संगियों में विख्यात हो जाते हैं। सूक्ष्म मन जाल फैला देता है। दिनानुदिन कीर्तन और मधुर होता जाता है। उनके संगीत में नये राग एवं तान भी जुड़ते हैं। कीर्तन एक साधन बन गया, जिससे वे अनजाने ही अपनी ख्याति की वृद्धि करने लग जाते हैं। इस प्रकार साधक के दो उद्देश्य हो जाते हैं मुख्यतः ईश्वर का दर्शन और साथ-ही-साथ संसार का आकर्षण। परिणामतः साधना मोचक बन कर बन्धन बन जाती है। माया विस्मयकारी तथा अनिर्वचनीय है। उसकी गति रहस्यमयी है।


निष्काम कर्मयोग को ही लीजिए। दूसरों की सेवा करना तथा प्रत्युपकार की भावना रखना व्यावहारिक जगत् के लिए अश्रुत वस्तु ही है। निष्काम सेवी अतिमानव समझा जाने लगता है। उसके लिए सारे दरवाजे खुले हुए हैं। बहुत से लोग अपनी कठिनाइयाँ उसके सामने रखते, अपने हृदय खोलते तथा अपनी गुप्त समस्याओं को उसके सामने प्रस्तुत करते हैं। यहाँ साधक जीवन के छुरे की धार पर चलता है। मन शैतान है। लोगों के निकट-सम्पर्क में रहने के कारण विषय-परायणता के लिए काफी क्षेत्र मिल जाता है। दम्भ तथा पाशविकता उसके भीतर घुस पड़ते हैं। साधक निष्काम सेवा में खूब दिलचस्पी लेने लग जाता है। परन्तु निर्मम अन्वेषण करने पर पता लगेगा कि यह साधना विषय-परायणता की उतनी ही पोषक है जितनी कि सेवा की। अतः मन साधना को विनष्ट कर डालता है।


तितिक्षा का अभ्यासी साधक भी ऐसे ही कुछ सुप्त-चेतन कारणों से तितिक्षा से आसक्त हो जाता है। उसकी तितिक्षा उसके लिए यश का साधन बन जाती है। वह असाधारण सिद्ध समझा जाता है। तितिक्षा-साधना के उद्देश्य की पूर्ति होने पर भी वह तितिक्षा में लगा रहेगा; क्योंकि इस साधना ने जिस पद को उसे प्रदान किया है, उस पद को वह त्यागना नहीं चाहता। दूसरे प्रकार के साधक शरीर तथा उसकी माँग के प्रति उदासीन होने के कारण केश बनाना भी नहीं चाहते। प्रारम्भ में उनमें पूरी सच्चाई रहती है। परन्तु इस उदासीनता के कारण केश-दाढ़ी लम्बे हो जाते हैं और तब साधक माया का शिकार बन बैठता है। अब वह केश सँवारता, दर्पण में चेहरा देखता, तेल लगाता तथा फैशनदार कपड़े पहनने लगता है। क्षण मात्र में ही भ्रम उत्पन्न हो कर उसको अपना शिकार बना बैठता है। ठीक उसी प्रकार कुछ लोग हठयोग के आसनों द्वारा अतिभोजन में सहायता पाते हैं, वज्रोली को व्यभिचार का साधन बना बैठते हैं तथा योग भोग का साधन बन जाता है। ये सारे भ्रम असंस्कृत मन से उत्पन्न होते हैं; अतः मन का निरीक्षण कीजिए।


सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि मन आपको उपर्युक्त उपदेशों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने नहीं देगा। वह कहेगा, "आप ठीक कह रहे हैं; परन्तु यह आपके लिए नहीं है। इन सभी पर ध्यान दीजिए। जैसे चल रहा है, चलने दीजिए।" हे साधक ! मन की बातों पर ध्यान दीजिए। इस दुष्ट को सहयोग दीजिए। उपदेशों को हृदयंगम कीजिए।


मार्ग में आप कहाँ हैं ठीक-ठीक इसको ज्ञात करना बड़ा कठिन है। मन की चालें बहुत ही सूक्ष्म हैं। सतत विचार आपको सावधान तथा सुरक्षित रखेगा। गम्भीर अन्तर्निरीक्षण से ही आप मन के रहस्य को समझ सकते हैं। मन के अन्दर घुसते जाइए। मन को ढीला छोड़िए। मन के गुप्त विचारों को ढूँढ़ निकालिए। नित्य-प्रति इसका विश्लेषण कीजिए। विचार के द्वारा मन का विश्लेषण कीजिए। गुरु की कृपा के लिए प्रार्थना कीजिए। गुरु ही मन को पराजित कर उसे आपके अधीन बना सकेगा। ईश्वर से प्रार्थना कीजिए कि वह ज्ञान की ज्योति से आपकी बुद्धि को विभासित करे। मन का निरीक्षण कीजिए। प्रार्थना कीजिए। अन्तर्निरीक्षण, विश्लेषण, विवेक, सावधानी तथा प्रार्थना के द्वारा आप इस विचित्र मन के सूक्ष्म जादू को समझ कर इसके भ्रमों तथा चालों से मुक्त हो सकते हैं।

. अभ्यास : साधना का प्रथम पहलू


मन की वृत्तियों को स्थिर बनाने का प्रयास ही अभ्यास है। मन की सारी वृत्तियों का दमन कर निर्वात स्थान में रखे प्रदीप की लौ की भाँति मन को स्थिर करने का प्रयास ही अभ्यास है। मन को उसके उद्गम स्थान हृदय-गुहा में ले जा कर आत्मा में विलीन कर देने का नाम अभ्यास है। मन को अन्तर्मुखी बना कर उसकी सारी बहिर्मुखी प्रवृत्तियों को विनष्ट करने का नाम अभ्यास है। यह अभ्यास चिरकाल तक भक्तिपूर्वक निर्विघ्न रूप से करना चाहिए।


अभ्यास के द्वारा आपको अपनी बहिर्मुखी विषय-वृत्तियों को बदलना होगा। मन की वृत्तियों के बिना आप विषय-वस्तुओं का उपभोग नहीं कर सकते। संस्कार के साथ-साथ वृत्तियों का दमन कर लेने पर मनोनाश हो जायेगा।


दीर्घ काल तक निर्विघ्न साधना करने के बाद अभ्यास स्थिर तथा स्थायी हो जाता है। पूर्ण मनोनिग्रह के लिए स्थिर अभ्यास अनिवार्य है। इससे असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है जिससे संस्कार के बीज परिदग्ध हो जाते हैं। अतः दीर्घ काल तक सतत तथा उग्र अभ्यास की आवश्यकता है। तभी भटकता हुआ मन आपके वश में पायेगा। तब जहाँ-कहीं आप इसे लगायेंगे, यह सदा स्थिर रहेगा। अभ्यास के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। पूर्ण श्रद्धा तथा भक्ति के साथ अभ्यास करना चाहिए। यदि श्रद्धा तथा नियमितता नहीं है तो सफलता असम्भव है। जब तक आपको पूर्णता की प्राप्ति हो, अभ्यास को जारी रखें।

. साधना में इन चार बातों का स्मरण रखिए


. संसार के दुःखों का स्मरण रखिए।


. मृत्यु का स्मरण रखिए।


. सन्तों का स्मरण रखिए।


. ईश्वर का स्मरण कीजिए।


पहला तथा दूसरा आपको वैराग्य प्रदान करेंगे। तीसरा आपमें प्रेरणा भरेगा। चौथा आपको ईश्वर-साक्षात्कार प्रदान करेगा। प्रत्येक साधक को इन चार प्रमुख बातों की याद सदा बनाये रखनी चाहिए।

. आध्यात्मिक साधना की मूल-भित्ति


समाज तथा उसके कार्य-व्यवहारों को बुरा कह कर कुछ लोग एकान्तवास के लिए चले जाते हैं। इन लोगों में सहनशीलता का विकास उतना नहीं हुआ होता जितना कि समाज में रहने वाले मानव-सेवी में हुआ होता है। यदि बन्दर अथवा कुत्ता कुटीर में घुस कर उसकी रोटी ले कर भाग जाये, तो हो सकता है कि एकान्तवासी विरक्त उस जानवर पर श्रापों की बौछार करने लगे तथा आजीवन उसके प्रति वैर-भाव बनाये रखे। यथाव्यवस्था के गुण का विकास भी तरह-तरह की प्रवृत्तियों वाले मनुष्यों के रहने पर ही सम्भव है। निष्काम कर्म तथा सेवा के द्वारा ही मनुष्य विभिन्न स्थानों की विशेषताओं के अनुकूल अपने को बना सकता है। आत्मा की एकता तथा विश्व-बन्धुत्व के साक्षात्कार के लिए यदि आप किसी विजन गुहा में स्वयं को बन्द कर वेदान्तिक मन्त्रों का जप करें, तो सम्भव है, आप तामसी बन जायें। साथ ही आपमें सहनशीलता का अभाव तथा असन्तुलित व्यक्तित्व का गठन होगा। धीरे-धीरे आप अपने सद्गुणों को भी खो बैठेंगे। इसीलिए यह कहावत है- "अपने सद्गुणों को व्यवहार से हटा कर विनष्ट कीजिए।"


यह ठीक है कि एकान्तवासी विरागी कुछ विशेषता प्राप्त कर सकेगा। ध्यान के मार्ग से वह अपने शरीर के प्रति अनासक्ति, वातावरण पर विजय तथा राजसिक प्रकृति पर नियन्त्रण प्राप्त कर सकेगा। आत्म-संयम तथा आत्म-त्याग भी कुछ हद तक विकसित होंगे।


परन्तु निष्काम कर्म, अनासक्त कर्म तथा सप्रेम सेवा के द्वारा ही मनुष्य शुद्धता, धैर्य एवं नम्रता जैसे बहुमूल्य सद्गुणों का अर्जन कर सकता है। निष्काम सेवा द्वारा ही नम्रता का अर्जन होता है। नम्रता ही सारे सद्गुणों का मूल है। नम्र व्यक्ति ही अन्य सभी गुणों का अर्जन उत्सुकतापूर्वक कर लेता है। अभिमानी व्यक्ति के लिए व्यापक क्षेत्र कहाँ है?


उदारता तथा दया का विकास भी दीनों, पीड़ितों तथा असहायों की सेवा से ही सम्भव है। निष्काम कर्म ऐसे कर्म हैं जिनको सर्वशक्तिमान् प्रभु की पूजा के रूप में किया जाता है। इसके अतिरिक्त मनुष्य में प्रसुप्त तथा जाग्रत दो प्रकार के सद्गुण रहते हैं। उदाहरणतः शुद्धता का प्रसुप्त गुण व्यावहारिक जीवन में ब्रह्मचर्य के रूप में प्रकट होता है। अभय का गुण संकट-काल में साहस के रूप में प्रकट होता है। आत्म-निग्रह के अभ्यास की आदत प्रलोभन के समय स्वेच्छापूर्ण आत्म-संयम के रूप में प्रकट होती है। इन दोनों पहलुओं के सन्तुलन के लिए कर्मयोग अनिवार्य है।


पुनः एकान्तवास से अर्जित आध्यात्मिक गुणों को व्यवहार में उतारना चाहिए। केवल बुराई को ही दूर कर मनुष्य को सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए; अपितु अपने सद्गुणों को सभी प्राणियों के हितार्थ व्यवहार में लाने की प्रवृत्ति होनी चाहिए, तभी वे सद्गुण सफल बनते हैं, तभी वे परिपक्व फल अथवा प्रस्फुटित प्रसून बन जाते हैं, तभी वे व्यक्ति-वृत्त से निकल कर समस्त मानव जाति को तथा विश्व को अपने अन्तर्गत करेंगे। वे सद्गुण विश्वात्म बन जायेंगे।


प्रगति तथा विकास को सक्रिय होना चाहिए, तभी वे असीमता को प्राप्त कर सकेंगे। नैतिक तथा आध्यात्मिक सुख के मार्ग पर एकान्तवास का जीवन सद्गुणों के निर्माण-प्रवाह को अवरुद्ध कर पंकिल बना सकता है। अतः निष्काम कर्म एवं सेवा को कभी भी कम नहीं समझना चाहिए।


अन्ततः इस मुख्य बात को याद रखिए। ऐसा हम देख चुके हैं कि सभी भलाई की मूल-भित्ति नम्रता है। साथ ही सभी सद्गुणों की पोषक तथा पालक नम्रता ही है। नैतिक तथा आध्यात्मिक घमण्ड रूपी महान् शत्रु के विरुद्ध नम्रता ही कवच है। धर्म के मार्ग पर कुछ अधिक उन्नति कर लेने पर साधक अनजाने ही अभिमान का शिकार बन बैठता है। वह उन दूसरे लोगों से घृणा करने लगता है जो उसके समान जीवन व्यतीत नहीं करते। नम्रता के अभ्यास के द्वारा इस शत्रु से लोहा ले सकते हैं। जो व्यक्ति अपने छोटे 'अहं' को निष्काम कर्म और नारायण-भाव के साथ विनम्र एवं सप्रेम सेवा के द्वारा मिटा देता है, वही परम सुख एवं आनन्द को प्राप्त करता है। उसके आनन्द की थाह कौन लगा सकता है।


सभी सद्गुणों के अर्जन के महत्त्व को समझें। सभी उन्हें अपने जीवन में उतार कर निष्काम कर्मयोगी बनें!

१०. आध्यात्मिक साधना के कुछ पहलू


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जब घर में आग लगी हो, तब आप कितने साहस के साथ घर में घुस कर सोये हुए बच्चे को उठा लाते हैं। ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग में भी आपको बहुत ही साहसी होना चाहिए। आपको पूर्णतः निर्भय होना चाहिए। आपको शरीर से जरा भी आसक्ति नहीं होनी चाहिए। तभी आप शीघ्र आत्म-साक्षात्कार कर सकते हैं। कायर लोग आध्यात्मिक मार्ग के लिए सर्वथा अयोग्य हैं।


यदि किसी बड़े वृक्ष के ऊपर आम लगे हों, तो आप एक ही छलाँग लगा कर उसे तोड़ नहीं लेते। यह असम्भव है। आप कई शाखाओं को पकड़ते हुए वृक्ष पर धीरे-धीर चढ़ते हैं। ठीक उसी प्रकार आप एक ही छलाँग में आध्यात्मिक निश्रयिणी के ऊपर नहीं चढ़ सकते। आपको सावधानीपूर्वक हर सीढ़ी पर कदम रखना होगा। आपको यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा तथा ध्यान का अभ्यास करना होगा। तभी आप योग की सबसे ऊँची सीढ़ी समाधि को प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप वेदान्त के साधक हैं तो आप पहले साधन-चतुष्टय से सम्पन्न हो लीजिए; तब आपको श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन करना होगा। तभी आप ब्रह्म-साक्षात्कार कर सकेंगे। यदि आप भक्तियोग के साधक हैं तो आपको नवधा भक्ति- श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म-निवेदन- का अभ्यास करना होगा। तभी आप परा-भक्ति की अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं।


घरेलू मुरगी, बत्तख आदि जब गन्दी चीजें खाने लगते हैं, तब उनका मालिक क्या करता है? वह उनके शिर पर हल्की थपकी लगाता है तथा उनके सामने चुगने के लिए अनाज के दाने रखता है। धीरे-धीरे गन्दे पदार्थों को खाने की उनकी आदत छूट जाती है। ठीक उसी प्रकार यह मन यत्र-तत्र गन्दे पदार्थों को खाने के लिए तथा पाँच प्रकार के विषयों के उपभोग के लिए दौड़ता है। उसके शिर पर थोड़ी थपकी लगाइए तथा उसमें धीरे-धीरे जप तथा ध्यान के अभ्यास से आध्यात्मिक सुख के आस्वादन की आदत डालिए।


जीवन्मुक्त अथवा भागवत की आँखें चमकीली होती हैं। उनके शिर के ऊपर तथा त्रिकुटी में उभार रहता है। वे जो कुछ भी कहते हैं, उसकी छाप आपके मन के ऊपर अमिट रहती है। आप उसे आजीवन नहीं भूल सकते। उनमें अपनी आकर्षण शक्ति होती है। वे आपकी सारी शंकाओं को जादू की तरह भगा देते हैं। उनके सामीप्य में आप विशिष्ट आनन्द तथा शान्ति का अनुभव करेंगे। सारी शंकाएँ दूर हो जायेंगी। वे बहुत ही कारुणिक होते हैं। वे स्वार्थ, लोभ, क्रोध, अहंकार, काम तथा अभिमान से मुक्त होते हैं। वे सत्य, शान्ति, ज्ञान तथा सुख की प्रतिमूर्ति होते हैं।


कोयले को जलाने में बहुत समय लगता है; परन्तु बारूद एक क्षण में ही भभक उठती है। उसी प्रकार जिस मनुष्य का हृदय मलिन है उसमें ज्ञानाग्नि जलाने में अधिक समय लगता है; परन्तु जिसका हृदय शुद्ध है, वह पल-भर में ही, उँगलियों से फूल को मसलने में जितना समय लगता है, उतने काल में ही आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है।


माया एक विशाल आरे के समान है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, द्वेष, घृणा, अभिमान इत्यादि उसके तीखे दाँत हैं। सांसारिक बुद्धि वाले सारे व्यक्ति इस आरे के दाँतों में पिसे जा रहे हैं। जिनमें शुद्धता, नम्रता, प्रेम, भक्ति, वैराग्य तथा विचार है, उनको कुछ भी हानि नहीं पहुँचती। वे इस आरे के नीचे से आसानी से निकल कर अमृतत्व के धाम को प्राप्त करते हैं।


साधारण सफेद कागज के टुकड़े का कोई मूल्य नहीं है। आप उसे फेंक देते हैं। परन्तु उसी पर जब सम्राट् या राष्ट्रपति की मुद्रा या उनका चित्र लगा रहता है, तब आप उसे अपनी थैली में सँभाल कर रखते हैं। ठीक उसी प्रकार पत्थर के साधारण टुकड़े का कोई मूल्य नहीं है; परन्तु यदि आप पण्ढरपुर या किसी अन्य मन्दिर में भगवान् कृष्ण की प्रस्तर मूर्ति को देखते हैं, तो आप शिर झुका कर उसकी पूजा करते हैं; क्योंकि उसमें भगवान् की मुहर लगी है। भक्त प्रस्तर मूर्ति में अपने प्रिय प्रभु तथा उसके सारे विशेषणों को देखता है। प्रारम्भिक साधकों के लिए मूर्ति-पूजा बहुत ही आवश्यक है।


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कुछ साधक लगातार साधना करते हैं; किन्तु धीमे रूप से। कुछ उग्र साधना करते हैं-दो घण्टा प्रातःकाल तथा दो घण्टा सन्ध्या को। यदि आप शीघ्र आत्म-साक्षात्कार करना चाहते हैं तो आपको दीर्घ काल तक सतत उग्र साधना करनी होगी।


आप भगवान् कृष्ण का दर्शन कर सकते हैं। आप उनसे कई बार बातें भी कर सकते हैं। आप उनके साथ भोजन तथा क्रीड़ा भी कर सकते हैं। परन्तु यदि आप मुक्ति चाहते हैं, तो आपको आत्म-साक्षात्कार करना होगा। नामदेव को भगवान् कृष्ण के दर्शन कई बार प्राप्त हुए थे; फिर भी सन्त गोरा कुम्हार ने उन्हें अधपका ही बतलाया। कैवल्य-प्राप्ति के लिए उन्हें विशोबा खेचर के पास जाना पड़ा था।


ध्यान के लिए आसन पर आप बैठते हैं, परन्तु शीघ्र ही उठ जाना चाहते हैं। पैरों में दर्द के कारण नहीं, वरन् अधीरता के कारण। धीरे-धीरे धैर्य का विकास कर इस दुर्गुण को दूर कीजिए। तब आप लगातार तीन या चार घण्टे तक बैठ सकेंगे।


ध्यान में आप किसी--किसी व्यक्ति से मानसिक सम्भाषण करना शुरू कर देते हैं। इस बुरी आदत को बन्द कीजिए। मन के ऊपर निगरानी रखिए।


एक साधक मुझे लिखता है "किसी व्यक्ति ने तीन बजे प्रातः दरवाजा


खटखटाया। मैं उठ पड़ा और द्वार खोला। मैंने भगवान् कृष्ण को मुकुट सहित देखा। वे शीघ्र ही अदृश्य हो गये। मैं उनकी खोज में गली में गया। मैं उन्हें खोज सका। तब मैं घर वापस लौट आया और भगवान् के पुनर्दर्शन के लिए दरवाजे पर सूर्योदय के समय तक बैठा रहा।"


निद्रा-भ्रमण की घटनाएँ भी असाधारण नहीं हैं। चलते-फिरते भी लोग स्वप्न में रहते हैं। उपर्युक्त घटना निद्रा-भ्रमण की घटना हो सकती है। आपको आध्यात्मिक अनुभव की सत्यता जानने के लिए बहुत ही सावधान रहना होगा। भगवान् कृष्ण का दर्शन इतना सस्ता नहीं है। साधक प्रारम्भ में गलती कर बैठते हैं।


जिस प्रकार पीड़ा देने वाले कंकड़ को जूते से निकाल फेंकते हैं, उसी प्रकार आपको अपने मन से कष्टदायक विचार को शीघ्र ही निकाल फेंकना चाहिए। तभी समझिए कि आपने विचार संयम में पर्याप्त बल प्राप्त किया है, तभी आध्यात्मिक पथ में कुछ वास्तविक प्रगति की है।


एक साधक लिखता है: "मैं तीन घण्टे तक एक ही आसन में ध्यान कर सकता है। अन्त में मैं बेहोश हो जाता हूँ; परन्तु जमीन पर गिरता नहीं।" यदि वह वास्तविक ध्यान है तो आप कभी भी संज्ञाहीन नहीं होंगे। आपमें पूर्ण चेतना बनी रहेगी। यह तो अवांछनीय मानसिक अवस्था है। पूर्ण सावधानी रखते हुए आपको इस अवस्था पर विजय पानी होगी।


कल्पना कीजिए कि मन एक ही घण्टे में चालीस बार बाहर दौड़ता है। यदि आप उसे अड़तीस बार ही दौड़ने दें तो निश्चय ही आप प्रगति पर हैं। आपने मन पर अवश्य ही कुछ विजय पा ली है। मन के विक्षेप को पूर्णतः रोकने के लिए चिरकाल तक उग्र साधना की आवश्यकता है। विक्षेप शक्ति बड़ी बलवती है; परन्तु सत्त्व विक्षेप-शक्ति से भी अधिक बलशाली है। सत्त्व की वृद्धि कीजिए। आप बड़ी सुगमता से मन के विक्षेप को नियन्त्रित कर सकेंगे।


गम्भीर धारणा के समय आप महान् सुख तथा आध्यात्मिक उन्माद का अनुभव करेंगे। आप शरीर तथा वातावरण को भूल जायेंगे। सारे प्राण आपके शिर में चले जायेंगे।


कमरे के भीतर यदि धारणा का अभ्यास करने में कठिनाई हो तो बाहर खुले स्थान में जाइए। किसी नदी के तट पर अथवा वाटिका के एक शान्त कोने में बैठिए। आप अच्छी धारणा कर सकेंगे।


बिछावन पर लेटे हुए कभी-कभी आप एक बड़ी ज्योति को अपने ललाट से गुजरते हुए देखेंगे। ज्यों-ही आप ध्यान के आसन पर बैठ कर उसे पुनः देखना चाहेंगे, त्यों-ही वह विलुप्त हो जायेगी। आप पूछ सकते हैं, "अनायास ही वह ज्योति आती है; परन्तु जब मैं प्रयास करता हूँ, तब वह नहीं आती। ऐसा क्यों?" कारण यह है कि रजस् के आते ही आपकी धारणा टूट गयी।


अपने केन्द्र को ढूँढ़ निकालिए। केन्द्र में ही सदा निवास कीजिए। वह केन्द्र आत्मा है; यह केन्द्र ही इडेन की वाटिका है। यही आपका मूल धाम है। आप अब शोक, चिन्ता तथा भय से मुक्त रह सकते हैं। कितना मधुर है यह धाम, जहाँ नित्य ज्योति तथा शाश्वत आनन्द है।


हे मित्र ! जागिए! अधिक सोइए। ध्यान कीजिए। ब्राह्ममुहूर्त की बेला है। प्रेम की कुंजी से हृदय-मन्दिर के द्वार खोलिए। आत्म-संगीत का श्रवण कीजिए। अपने प्रियतम को प्रेम-संगीत सुनाइए। असीम की तान छेड़िए। उसके ध्यान में अपने मन को विलीन कर डालिए। उसके साथ एक बन जाइए। प्रेम तथा आनन्द के सागर में निमग्न हो जाइए।


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ध्यान के समय ज्यों-ही आप यह विचार करेंगे- "मैं अब शुद्ध हूँ, मैं अपने मन में पहले जैसे बुरे विचारों को नहीं पाता।" त्यों-ही आप पायेंगे कि बुरे विचारों का एक दल आपके सचेतन मन में धमका है; परन्तु वे शीघ्र दूर हो जायेंगे। आप अभी संग्राम की अवस्था में हैं। ऐसा समय आयेगा, जब आप अपने मन में एक भी बुरा विचार नहीं आने देंगे। ध्यान बुरे विचारों का प्रबल शत्रु है। बुरे विचार सोचते हैं- "हम शीघ्र ही कुचल दिये जायेंगे। हमारा यजमान अब ध्यान करने बैठ गया है। एक बार पुनः हम आक्रमण करें।" उग्रतापूर्वक ध्यान को जारी रखिए। सूर्य के सामने बादल और कोहरा नहीं ठहर सकते।


प्रारम्भ में भगवान् कृष्ण के पूरे चित्र पर मन को एकाग्र करना कठिन रहेगा; क्योंकि मन की सारी किरणें एकाग्र नहीं हुई हैं। कभी चेहरा, कभी पैर तो कभी नेत्र को आप मानसिक पटल पर ला सकेंगे। चित्र के किसी भी भाग पर, जहाँ इसे पसन्द हो, मन को एकाग्र कीजिए।


मन को कुछ नये शब्दों अथवा शहरों एवं व्यक्तियों के नामों की ओर आकर्षण रहता है। कल्पना कीजिए, आपने इन नामों को सुना है- 'फैजाबाद', 'जान हर्बर्ट' ध्यान में बैठते समय मन इन नामों को दुहरायेगा- 'फैजाबाद', 'जान हर्बर्ट' कभी-कभी यह कुछ गाना गायेगा, संस्कृत के पुराने श्लोकों को दुहरायेगा। सावधानीपूर्वक मन का निरीक्षण कीजिए और उसे पुनः केन्द्र पर लाइए।


उग्र ध्यान के लिए शरद् ऋतु बहत ही अनुकूल है। लगातार घण्टों तक ध्यान करने पर भी आप नहीं थकेंगे। परन्तु प्रातः आपको सुस्ती धर दबाती है। एक या दो कम्बलों से ढक लेने पर आप बड़ा आराम अनुभव करते हैं। आप प्रातः उठना नहीं चाहते। घड़ी की घण्टी बारम्बार बजती है। आप सोचते हैं- "पन्दरह मिनट तक और सो लूँ, फिर ध्यान आरम्भ करूँगा।" तब आप अपने पाँव के खुले भाग को अच्छी तरह कम्बल से ढक लेते हैं। अब बड़ा मजा आता है। आखिर परिणाम क्या हुआ? आप गहरी नींद में जा कर सूर्योदय होने पर ही उठते हैं। दिन, सप्ताह तथा महीने इसी तरह बीतते जाते हैं। हर शरद् ऋतु इसी तरह चली जाती है। मन आपको धोखा देता है। शरद् का सुअवसर हाथ से निकल जाता है। मन बहुत बड़ा जादूगर है। यह कई चालें तथा जादू जानता है। माया मन से ही कार्य करती है। मन रहस्यमय है। माया रहस्यमय है। सावधान बनिए। सतर्क रहिए। आप मन तथा माया को वशीभूत कर सकते हैं। ज्यों ही घड़ी का एलार्म बजे, कम्बल अलग डाल दीजिए। वज्रासन पर बैठ कर कुछ प्राणायाम कीजिए। तन्द्रा दूर हो जायेगी।


खुली आँखों से ध्यान करते समय आप अपने मित्र को देखते तथा उसकी वाणी को भी सुनते हैं; परन्तु जब मन आँख या कान से अलग रहेगा, तब आप तो अपने मित्र को पहचानेंगे और उसकी वाणी ही सुनेंगे। यदि मन को विषय-पदार्थों से पूर्णतः मोड़ लिया गया है, यदि वृत्तियों का दमन कर दिया गया है, यदि राग-द्वेष विनष्ट कर दिये गये हैं, तो फिर आप संसार को कैसे देख सकेंगे? आप मन रहित हो जायेंगे। आप सर्वत्र आत्मा को ही देखेंगे। सारे नाम-रूप विलुप्त हो जायेंगे।


मन को एकाएक एक ही बिन्दु पर एकाग्र करना बड़ा कठिन है। मन बड़े वेग से चलता है। जिस प्रकार सरकस का घोड़ा एक वृत्त में बारम्बार दौड़ता रहता है, उसी प्रकार मन भी वृत्त में बारम्बार दौड़ता रहता है। मन को एक बड़े वृत्त में छोड़ कर उसे अधिकाधिक छोटे वृत्त में सीमित बनाइए। अन्ततः इसे एक ही बिन्दु पर लगाया जा सकता है। आपको बुद्धिमानीपूर्वक मन को पकड़ना होगा। केवल बल तथा युद्ध काम नहीं करेगा। इससे तो मामला और भी बिगड़ जायेगा।


कभी-कभी आप निराश हो कर ऐसा अनुभव करेंगे, "मुझमें बहुत से दोष हैं। मैं कैसे उनको दूर कर सकूँगा? क्या मैं इसी जन्म में निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर लूँगा? गत आठ वर्षों से ध्यान का अभ्यास करने पर भी मुझे अधिक लाभ की प्राप्ति नहीं हुई है।" हिम्मत हारिए। यदि आपने एक या दो इन्द्रियों को भी वश में कर लिया है, यदि आपने कुछ विचारों को वशीभूत कर लिया है, तो आधा संग्राम आपने जीत लिया। एक विचार के दमन अथवा एक वासना के विनाश से भी आप मानसिक बल प्राप्त करेंगे। हर विचार के दमन से, हर कामना के विनाश से हर इन्द्रिय के नियन्त्रण से हर दोष के उन्मूलन से आपके मन को अधिक बल प्राप्त होगा और आप लक्ष्य की ओर एक कदम आगे बढ़ जायेंगे। मित्रो! फिर विनाश तथा पश्चात्ताप के लिए स्थान ही कहाँ है? आध्यात्मिक संग्राम में वीरतापूर्वक युद्ध कीजिए। आध्यात्मिक सैनिक बनिए। विजयी बन कर दिव्य ज्ञान, नित्य शान्ति तथा परम सुख के पारितोषिक को प्राप्त कीजिए।


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कभी-कभी मन आलसी रहेगा। आप धारणा नहीं कर सकेंगे। वह काम करने से इनकार करेगा। ध्यान के शुरू में मन सतर्क रहेगा, बाद में वही सुस्त हो सकता है। जिस तरह घोड़ा यात्रा के प्रारम्भ में जोरों से दौड़ता है; परन्तु अन्त में सुस्त पड़ जाता है। उस समय जिस तरह सवार घोड़े को थोड़ा घास तथा पानी दे कर पुनः स्फूर्तिमान बनाता है, उसी तरह आपको कुछ प्रेरणात्मक विचार तथा सावधानीपूर्वक अनुशासन के द्वारा मन में ताजगी लानी होगी।


यदि मन अशान्त तथा विक्षिप्त है तो एकान्त कमरे में बैठ जाइए। पन्दरह मिनट के लिए शवासन में शिथिल पड़ जाइए। कुछ सुखद विचारों को प्रश्रय दीजिए। किसी सुन्दर फूल, हिमालय की हिम-नदियों, सुविस्तृत नीलाकाश, अपार महासागर अथवा हिमालय, कश्मीर अन्य किसी स्थान के रमणीक दृश्यों का स्मरण कीजिए। अब पुनः आप ध्यान में बैठ सकते हैं।


कभी-कभी मन उपद्रव कर बैठेगा। आप अनुभव करेंगे, "मैंने तपस्या, अनुशासन तथा ध्यान के द्वारा अधिक लाभ प्राप्त नहीं किया है। अब मैं ब्रह्मचर्य व्रत का खण्डन करूँगा। मैं सारे आहार-संयम को त्याग दूँगा। अब मैं सारे विषय-सुखों का उपभोग करूँगा। अब खूब छक कर भोजन करूँगा।" झुकिए नहीं। मन को फटकारिए। उग्र जप तथा कीर्तन कीजिए। भर्तृहरि के वैराग्य-शतक को बारम्बार पढ़िए। संसार के दुःखों को याद कीजिए। विषयी जीवन के दुःखों पर विचार कीजिए। साधुओं तथा उनके उपदेशों को बारम्बार याद कीजिए। अविचल रहिए। सावधान रहिए। सतर्क रहिए। निरीक्षण कीजिए और प्रार्थना कीजिए। उपद्रवी मन धीरे-धीरे ठण्ढा पड़ जायेगा।


कभी-कभी मन उदासीन रहेगा। मन पूर्णतः खाली रहेगा। यदि ऐसी हालत रही, तो कुछ ही देर में आप सो जायेंगे। इसे लयावस्था कहते हैं। यह ध्यान में बाधा है। दश-बीस प्राणायाम उग्र रूप से कीजिए, तब दश बार जोरों से का जप कीजिए। यह अवस्था शीघ्र ही दूर हो जायेगी।


शुद्ध ब्रह्मचारी भी शुरू में कुतूहल के कारण कठिनाई का सामना करेगा। वह लैंगिक सुख को जानने का कुतूहल रखेगा। वह कभी-कभी सोचता है- "कम-से-कम एक बार तो मुझे मैथुन-सुख मिलना चाहिए। तब मैं इस काम-वृत्ति को पूर्णतः दूर कर दूँगा। यह कुतूहल मुझे बहुत परेशान कर रहा है।" मन ब्रह्मचारी को धोखे में डालना चाहता है। माया कुतूहल के द्वारा ही भयानक कार्य करवा डालती है। कुतूहल प्रबल कामना में परिणत हो जाता है। विषय-सुख कामना को तृप्त नहीं कर सकता। मानव-रुधिर का एक बार आस्वादन कर लेने पर व्याघ्र मनुष्य के पीछे पड़ता है। उसी प्रकार एक बार मैथुन-सुख प्राप्त करने पर मन सदा उसके लिए लालायित रहेगा। विचार के द्वारा कुतूहल की तरंग को मार डालिए। अलिंग आत्मा का चिन्तन कीजिए। ब्रह्मचर्य की महिमा, अशुद्ध जीवन के दोष तथा सतत आत्म-चिन्तन के द्वारा कामुक वृत्तियों को नष्ट कर डालिए।


अन्धे ब्रह्मचारी में भी, जिसने स्त्री के मुख को कभी देखा तक नहीं, काम-वृत्ति बड़ी प्रबल रहती है। ऐसा क्यों? यह पूर्व जन्म के संस्कारों का फल है। आप जो-कुछ भी करते अथवा विचारते हैं, वह आपके चित्त में गहरा जम जाता है। आत्म-ज्ञान से ही इन संस्कारों को परिदग्ध किया जा सकता है। काम-वासना से शरीर एवं मन परिपूरित हो जाते हैं, संस्कार बड़ी वृत्तियों का रूप लेते हैं और वह बेचारा अन्धा व्यक्ति पीड़ित होता है। इससे यह स्पष्टतः प्रमाणित होता है कि पुनर्जन्म सत्य है।


विचार ही सच्चा कार्य है। परन्तु किसी मनुष्य को वास्तव में गोली से मार देना तथा उसे गोली मारने का विचार करना-दोनों में बहुत बड़ा अन्तर है। लैंगिक सुखोपभोग करना तथा इसका विचार करना-इन दोनों में बहुत बड़ा अन्तर है।


दार्शनिक रूप से मनुष्य को मारने का विचार करना तथा मैथुन-सुख भोगने का विचार करना-दोनों ही वास्तविक कार्य हैं। कामना कर्म से भी अधिक है। ईश्वर मनुष्य की प्रवृत्ति के अनुसार ही फल देता है। अपने विचारों से शुद्ध बनिए, तभी आप ईश्वर के साम्राज्य में प्रवेश कर सकेंगे, तभी ईश्वर आपके हृदय सिंहासन पर आसीन होगा।


हिमालय की गुहा में मौन रूप से ध्यान करने वाला योगी ऐसा विचारता है कि 'मैंने आध्यात्मिकता में बड़ी प्रगति कर ली है।' वह उन लोगों के प्रति घृणा का भाव रखता है जो ध्यान के साथ-साथ अथक निष्काम सेवा के द्वारा अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं। वह योगी वैराग्य तथा तितिक्षा से सम्पन्न हो सकता है। आध्यात्मिक शास्त्रों के अध्ययन में वह काफी कुशल हो सकता है। वह कठिन सर्दी सह सकता है। वह रोटी-दाल पर ही रह सकता है। वह एक आसन में बहुत देर तक बैठ सकता है। परन्तु उसमें करुणा, विश्व-प्रेम, सहिष्णुता, उदारता, साहस इत्यादि गुणों की कमी हो सकती है। मैदानी भाग में आने पर वह गरमी नहीं सह सकेगा तथा समाज के लोगों के बीच अपने मन का समत्व भी नहीं रख सकेगा। परन्तु कर्मयोगी सद्गुणों से सम्पन्न तथा समत्व-बुद्धि का हो सकता है। ऐसी हालत में वह हिमालय के ध्यानयोगी से कहीं बढ़ कर है। साधक में सभी सद्गुणों का विकास होना चाहिए। वह गरमी-सर्दी सहने में भी समर्थ बने। तभी वह पूर्ण ज्ञानी बन सकता है। "समत्वं योग उच्यते।"


सांसारिक मनुष्य को धन तथा पद का अभिमान होता है। उसे अपने बच्चे तथा स्त्री के लिए बड़ा मोह हो सकता है। परन्तु संन्यासी या योगी को महान् आध्यात्मिक एवं नैतिक अभिमान होता है। वह ऐसा समझता है, "मैं गृहस्थी से बढ़ कर हूँ। मैं तो महान् योगी हूँ। मैं बारह घण्टे तक ध्यान कर सकता हूँ। मुझमें बहुत शुद्धता, त्याग तथा वैराग्य है।" इस प्रकार का संन्यास-अभिमान गृहस्थियों के अभिमान से कहीं अधिक खतरनाक है। इसको दूर करना बड़ा ही कठिन है।


'मैं कौन हूँ' का विचार सुगम साधना नहीं है। वही मनुष्य इसका अभ्यास कर सकता है जिसके पास सबल, शुद्ध तथा सूक्ष्म बुद्धि है; जो साधन चतुष्टय से सम्पन्न है; जिसे वेदान्तिक प्रक्रिया-पंचीकरण, नेति नेति-सिद्धान्त, अन्वयव्यतिरेक, भाग-त्याग-लक्षण, अध्यारोप-अपवाद, पंचकोश-विवेक, आत्म-तत्त्व का समुचित ज्ञान है। अधिकारी साधक ही 'मैं कौन हूँ' प्रश्न का उत्तर ध्यान में प्राप्त कर सकता है, अन्यथा मन साधक को भ्रमित करता रहेगा।


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प्रत्येक हृदय में दिव्य ज्योति जल रही है। इन्द्रियों को समेट कर तथा मन को शान्त बना कर आप अन्तर्चक्षु द्वारा दिव्य ज्योति को देख सकते हैं।


नव-द्वारों से सम्पन्न पिंजड़े में जीव नाम का एक छोटा पक्षी वास करता है। अहंता, ममता तथा वासनाओं को विनष्ट कर इस मांस-पिंजर से मुक्त हो सकता है।


पत्थर पिघल सकता है; परन्तु अभिमानी व्यक्ति का हृदय नहीं पिघल सकता। वह हीरा या वज्र से भी अधिक कठोर है। अथक मानव सेवा, सत्संग, जप तथा ध्यान के द्वारा उसे कोमल बनाया जा सकता है।


भगवान् का नाम कितना मधुर है। हरि, राम, कृष्ण, शिव के नाम कितने शीतल तथा प्रेरणात्मक हैं। नाम आपके भय, शोक, दुःख तथा दर्द को दूर भगा देता है और आपके हृदय को सुख, शान्ति, बल एवं साहस से भर देता है। सन्तप्त हृदय तथा दुर्बल स्नायुओं के लिए नाम ही परम औषधि है। नाम वह अमृत है जो अमृतत्व एवं अमर सुख प्रदान करता है। सदा ईश्वर के नाम का स्मरण कीजिए। उसके नाम का गायन कीजिए। अपनी साँस के साथ उसके नाम को लीजिए। आप जन्म-मृत्यु के चक्र से विमुक्त हो जायेंगे।


धारणा का फल है ध्यान। ध्यान का फल है आत्म-साक्षात्कार। आत्म-साक्षात्कार का फल है मोक्ष। धारणा में आप अपने सारे विचारों को समेटते हैं तथा मन को किसी एक बिन्दु या विचार में एकाग्र बनाते हैं। ध्यान में एक ही विचार का अनवरत प्रवाह बना रहता है।


जो चट्टान के भीतर रहने वाले मेढक की देखभाल करता है, वही आपकी भी देखभाल करेगा। श्रद्धा की कमी क्यों? हे राम ! भगवान् में तथा उसकी कृपा में जीवन्त, अविचल एवं अटूट श्रद्धा रखिए। निश्चिन्त बन जाइए।


जो कहता है, वह जानता नहीं। जो जानता है, वह कहता नहीं। अधजल गगरी छलकती जाती है। जो अधिक बोलता है, वह सोचता कम है और काम भी कम ही करता है।


सावधान बनिए। लोगों के स्वभाव का अध्ययन कीजिए। लोगों के साथ रहते समय बहुत सावधान रहना चाहिए। धोखे में पड़िए। मनोविज्ञान का ज्ञान रखिए। लोगों के आचरण, वाणी, मुखाकृति, मुस्कान तथा चाल-ढाल से ही उनका अध्ययन कर लीजिए। उनके आहार-विहार, उनकी पढ़ने की पुस्तकें तथा उनके संगियों के अध्ययन से आप उनका अध्ययन कर सकेंगे।


अपने स्वप्नों के अध्ययन द्वारा आप अपनी आध्यात्मिक उन्नति का भी मापन कर सकते हैं। यदि स्वप्न में बुरे विचार नहीं आते, यदि आप अपने इष्टदेवता का समय-समय पर दर्शन करते हैं, यदि स्वप्न में भी आप इष्ट-मन्त्र का जप करते हैं तो निश्चित ही आपने आध्यात्मिक मार्ग में बड़ी उन्नति कर ली है।


पतंजलि महर्षि के योग-सूत्र में तथा किसी भी वेदान्त-ग्रन्थ में कुण्डलिनी का नाम नहीं आता। 'तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्यों के लक्ष्यार्थ पर ध्यान कर ज्ञानयोगी ब्रह्माकार-वृत्ति के द्वारा निर्विकल्प समाधि में प्रवेश करता है। वह कुण्डलिनी शक्ति को जगाने के लिए कभी भी प्रयास नहीं करता। कुण्डलिनी को बिना जगाये ही वह समाधि में प्रवेश कर सकता है। परन्तु यदि वह कुछ भौतिक सिद्धियों को प्राप्त करना चाहे तो कुण्डलिनी को जगा सकता है। वह संकल्प-शक्ति के द्वारा ही कुण्डलिनी को जगा सकता है। इसके लिए उसे प्राणायाम, आसन, बन्ध, मुद्रा अथवा अन्य किसी भी हठयौगिक क्रिया की आवश्यकता नहीं पड़ती।


आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने पर ही आपमें पूर्ण अनासक्ति हो सकती है। साधना-काल में मन एक--एक वस्तु से आसक्त रहेगा ही। आपको बारम्बार सभी प्रकार की आसक्तियों को असंग-शस्त्र से दृढ़तापूर्वक दूर करना होगा- "असंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा" (गीता : १५/)


आपको यह भाव बनाये रखना चाहिए कि आत्मा, ईश्वर, देवता तथा मन्त्र एक ही हैं। भाव के साथ आपको गुरु-मन्त्र अथवा इष्ट-मन्त्र का जप करना चाहिए। तभी आप मन्त्र-सिद्धि या ईश्वर-साक्षात्कार शीघ्र प्राप्त कर सकेंगे।


सबसे सुन्दर पुष्प जो आप भगवान् को अर्पित कर सकते हैं, वह आपका हृदय ही है। अपने अन्दर कैलास के असीम धाम में, अपार आनन्द तथा शाश्वत शान्ति के साम्राज्य की अधिकाधिक गहराई में प्रवेश कीजिए।


आप अपने इष्ट, पथ प्रदर्शक, परम आश्रय तथा लक्ष्य का साक्षात्कार करें !

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अमर आत्मा हिमालय के हिम जैसा शुद्ध, सूर्य जैसा चमकीला, आकाश जैसा व्यापक, सागर जैसा अथाह, ऋषिकेश की गंगा जैसा शीतल है। वह जगत्, शरीर, मन तथा प्राण का अधिष्ठान है। इस आत्मा से अधिक मधुर कोई वस्तु नहीं है।


हृदय को शुद्ध बनाइए तथा ध्यान कीजिए। अपने हृदय में गहरा गोता लगाइए। आप आत्मा को प्राप्त करेंगे। गम्भीर गोता लगा कर ढूँढ़ने पर ही आप आत्म-मुक्ता को प्राप्त कर सकेंगे। यदि किनारे-किनारे ही रहेंगे तो टूटी-फूटी कौड़ियाँ ही हाथ लगेंगी।


जिस प्रकार वर्षा बादलों में, मक्खन दूध में, सुगन्धि पुष्प में निहित है, उसी प्रकार आत्मा सभी नाम-रूपों में निहित है। जिसकी बुद्धि सूक्ष्म, एकाग्र तथा तीव्र है, वह सतत गम्भीर ध्यान से आत्मा का दर्शन कर सकता है।


जो किसी स्त्री की ओर उसी तरह दृष्टि-निक्षेप करता है जिस तरह पुत्र अपनी माँ की ओर और साथ ही उससे अलग रहता है, जिसने काम तथा क्रोध को वशीभूत कर लिया है, जिसको संसार की नश्वर वस्तुओं की ओर कोई आकर्षण नहीं और जो ध्यान का नियमित अभ्यास कर रहा है, वह शीघ्र ही उस परम धाम को प्राप्त करेगा जहाँ से पुनः इस मृत्युलोक को नहीं लौटते।


चीनी तथा चीनी के खिलौने, बरतन तथा मिट्टी, लोहे की कांटी तथा तलवार, जल तथा फेन, आभूषण तथा सोना- ये दो वस्तुएँ नहीं हैं। ये एक ही हैं। इसी भाँति सच्चे ज्ञान के उदय होने पर विभिन्नतामय जगत् केवल आत्मा ही रह जाता है, जीवात्मा परमात्मा एक बन जाते हैं।


आत्मा सारे संसार में व्याप्त है। सभी आत्मा है। ऐसी कोई वस्तु नहीं जो आपमें हो। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर लेने पर आप किसकी कामना करेंगे, क्योंकि आपके लिए कोई काम्य वस्तु नहीं रह जायेगी।


पुराने अशुभ संस्कार बदले तथा विनष्ट किये जा सकते हैं। मन तो संस्कारों का गट्ठर ही है। उसके साथ साहसपूर्वक युद्ध कीजिए। वीरतापूर्वक संग्राम कीजिए-रोटी के लिए नहीं, रुपये के लिए नहीं, नाम तथा यश के लिए नहीं; अपितु आत्म-साम्राज्य के लिए, नित्य शान्ति के असीम धाम के लिए सांसारिक संस्कारों का विनाश कीजिए। वही महान् योद्धा है जो आन्तरिक संग्राम-क्षेत्र में अपने पुराने संस्कारों के साथ वैराग्य की तलवार तथा विवेक के कवच को धारण कर युद्ध करता है। वह वास्तविक योद्धा नहीं है जो मशीनगनों से शत्रुओं को परास्त करता है। आध्यात्मिक सैनिक के लिए सत्त्व-बल का आधार है; परन्तु सांसारिक सैनिक के लिए रज तथा तम का। राम-रावण युद्ध में राम सात्त्विक थे और रावण तामसिक। एवरेस्ट पर्वत के शिखर पर चढ़ जाना सुगम है, नन्दा पर्वत की ऊँचाइयों पर विजय प्राप्त कर लेना आसान है; परन्तु हिमालय रूपी आत्मा की चोटी पर चढ़ना बड़ा कठिन है। अडिग साधक धैर्य, संलग्नता, श्रम तथा साहस के साथ धीरे-धीरे एक-एक चोटी करके ऊपर चढ़ता है, एक-एक कर इन्द्रियों का दमन करता है, एक-एक कर वृत्तियों का निरोध करता है, एक-एक कर वासनाओं का उन्मूलन करता है तथा अन्ततः आत्म साक्षात्कार की चोटी को प्राप्त कर लेता है।


नये साधकों को रसोईघर के निकट वाले कमरे में ध्यान के लिए नहीं बैठना चाहिए; क्योंकि मन सुस्वादु पकवानों का चिन्तन करने लगेगा।


यदि अपने सामने गरम चाय तथा कुछ मिठाई रख कर आप उपनिषद् का स्वाध्याय अथवा ध्यान करेंगे, तो आपको गम्भीर ध्यान नहीं लग सकेगा। मन का एक भाग मिठाई तथा चाय के विषय में विचार करता रहेगा। नये साधकों को विक्षेप के इन अल्प कारणों को दूर कर लेना चाहिए, तब उन्हें ध्यान में बैठना चाहिए।


सभी के साथ समान रूप से बरताव कीजिए। गरीबों तथा रोगियों की सेवा कीजिए। सभी प्रकार की आसक्तियों को काट डालिए। पीड़ितों की सहायता कीजिए। आवेगों को कुचल डालिए। वासनाओं तथा अभिमान का उन्मूलन कीजिए। विषय-सुखों का परित्याग कीजिए। ध्यान कीजिए तथा आत्मा की एकता का साक्षात्कार कीजिए। दूसरों को भी उनके ज्ञानार्जन में सहायता दीजिए।


जीवन्मुक्त अथवा ज्ञानी ईश्वरीय चेतना से प्रदीप्त, अमृत-पान से उन्मत्त असीम आत्मा में परिपूर्ण, समदृष्टि से युक्त तथा समत्व बुद्धि से सम्पन्न हो कर सर्वत्र आत्मा के ही दर्शन करता है तथा अपने शुद्ध प्रेम में सभी को सन्निहित करता है।

११. साधना तथा विशिष्ट मनोविज्ञान


सावधानीपूर्वक अपनी सारी भावनाओं का निरीक्षण कीजिए। यदि आपमें उदासी की भावना हो, तो थोड़ा दूध या चाय पी लीजिए। शान्त बैठ जाइए। आँखें बन्द कर लीजिए। उदासी के कारण का पता लगाइए और उसे दूर करने का प्रयास कीजिए। प्रतिपक्ष-भावना सर्वोत्तम तरीका है। धनात्मक से ऋणात्मक पर विजय मिलती है। यह प्रकृति का महान् नियम है। गम्भीरतापूर्वक प्रसन्नता का विचार कीजिए। अनुभव कीजिए कि आपमें यह गुण वर्तमान है। बारम्बार इस मन्त्र को मन-ही-मन दुहराइए : " प्रसन्नता, मुदिता।" मुस्कराइए तथा कई बार हँसिए। कभी-कभी संगीत गाइए जिससे प्रेरणा मिल सके। उदासी को दूर करने के लिए संगीत बहुत ही लाभकर है। का जप जोरों से कीजिए। खुली वायु में दौड़िए। शीघ्र ही उदासी दूर हो जायेगी। यही राजयोगियों की प्रतिपक्ष भावना का तरीका है। इच्छा-शक्ति के प्रयोग से तथा आज्ञा दे कर बलपूर्वक उदासी को हटाने से 'इच्छा-शक्ति' पर आघात पहुँचता है, अन्यथा यह सबसे अधिक प्रभावशाली है। इसके लिए प्रचुर इच्छा-शक्ति की आवश्यकता है। साधारण लोग इसमें सफल नहीं होंगे। प्रतिपक्ष भावना के द्वारा थोड़े समय में ही ऋणात्मक भावना को बदल सकते हैं। इसका प्रयास कीजिए और अनुभव कीजिए। बारम्बार विफल होने पर भी इस अभ्यास को जारी रखिए। कुछ अभ्यास के बाद आप सफल हो ही जायेंगे।


अन्य सभी ऋणात्मक भावनाओं को आप इसी प्रकार दूर कर सकते हैं। यदि क्रोध है तो उसे प्रेम से, कठोरता को दया से, बेईमानी को ईमानदारी से, कृपणता को उदारता से दूर कीजिए। मोह को विवेक तथा आत्म-विचार द्वारा भगाइए। अभिमान के लिए नम्रता का चिन्तन कीजिए। दम्भ को सरलता से, द्वेष को भद्रता तथा हृदय की विशालता से, कायरता को साहस से दूर भगाइए। आप ऋणात्मक को दूर भगा कर धनात्मक अवस्था में स्थित हो जायेंगे। लगातार अभ्यास की आवश्यकता है। अपने साथियों के चुनाव में सावधान रहिए। बहुत थोड़ा बोलिए और वह भी उपयोगी मामलों में ही।

१२. सांसारिक वातावरण में साधना का सुगम तरीका


अविद्या के आवरण के कारण ही मनुष्य अपने स्वरूप-सच्चिदानन्द को भूल गया है। अपने खोये हुए ईश्वरत्व को प्राप्त करने के लिए संसार का त्याग कर हिमालय की गुफाओं में जाने की कोई आवश्यकता नहीं। यहाँ मैं सबसे सुगम साधना बतला रहा हूँ जिसके अभ्यास से वह विविध कार्यों में रत रहते हुए भी ईश्वर-चैतन्य को प्राप्त कर सकता है। आपको ध्यान के लिए अलग कमरा तथा निश्चित समय की आवश्यकता नहीं। काम करते हुए हर दो-तीन घण्टे में एक बार आँखें बन्द कर ईश्वर तथा उसके दिव्य गुण-करुणा, प्रेम, शान्ति, सुख, ज्ञान, शुद्धता, पूर्णता आदि पर ध्यान कर लीजिए तथा 'हरि ' या 'श्री राम' या 'राम राम' या 'कृष्ण कृष्ण' किसी भी मन्त्र का जप कीजिए। रात्रि में भी जब कभी मल-मूत्र त्याग के लिए उठें या किसी भी कारणवश उठें, तो उस समय ऐसा ही करें। करवट लेते समय भी इस अभ्यास को करें। अभ्यास के द्वारा ही इसकी आदत दृढ़ हो जायेगी। अनुभव कीजिए कि शरीर ईश्वर का चल-मन्दिर है, आपका कार्यालय अथवा व्यवसायगृह ही बड़ा मन्दिर या वृन्दावन है तथा हर कार्य-टहलना, बोलना, चलना, खाना, श्वास लेना, देखना, सुनना आदि ईश्वर की पूजा ही है। कार्य ही उपासना है। कार्य ही ध्यान है।


फल की भावना तथा कर्तापन की भावना का परित्याग कीजिए। 'मैं कर्ता हूँ', 'भोक्ता हूँ' की भावना का परित्याग कीजिए। अनुभव कीजिए- "मैं ईश्वर के हाथ में निमित्त मात्र हूँ।" वह आपकी इन्द्रियों से कर्म करता है। यह भी अनुभव कीजिए कि यह जगत् ईश्वर की अभिव्यक्ति है, यह विश्व वृन्दावन है तथा हमारे बच्चे, स्त्री, माता-पिता सभी ईश्वर के बच्चे हैं। हर चेहरे तथा विषय में ईश्वर को ही देखिए। सदा शान्त तथा सन्तुलित मन रखिए। यदि आप इस परिवर्तित दृष्टिकोण तथा दिव्य भाव को अपने दैनिक जीवन में बनाये रखें, तो दीर्घकालीन प्रयास के द्वारा आपके सारे कर्म योग बन जायेंगे। यह पर्याप्त है। आप शीघ्र ही ईश्वर साक्षात्कार करेंगे। यह सक्रिय योग है। यह बहुत ही शक्तिशाली साधना है। मैंने आपको बहुत ही सुगम साधना दी है। फिर कभी ऐसा न कहियेगा, "स्वामी जी, मेरे पास तो आध्यात्मिक साधना के लिए समय ही नहीं है।" यदि उपर्युक्त साधना का अल्प अभ्यास भी आप तीन महीने कर लेंगे, तो आपको अपने में पूर्ण परिवर्तन का अनुभव होगा।


नित्य आधे घण्टे तक अपनी नोटबुक में इष्टमन्त्र को लिखिए। मन्त्र लिखते समय मौन रहिए तथा शरीर को एक ही आसन पर रखिए। मोटे अक्षरों में कागज के टुकड़ों पर


इन्हें लिख डालिए : "सत्य बोलो", " साहस", "शुद्धता", "मुझे अभी ईश्वर का साक्षात्कार करना चाहिए", "समय बहुमूल्य है", "ब्रह्मचर्य दिव्य जीवन है", "मैं साहस, शुद्धता, करुणा, प्रेम तथा धैर्य का मूर्त रूप हूँ।" इन्हें अपने शयनगृह, भोजनालय, बरामदे तथा अन्य कमरों में लगा दीजिए। कुछ पत्रों को अपनी जेब तथा डायरी में भी रखिए। दिव्य गुणों के अर्जन के लिए यह सुगम मार्ग है।

१३. साधना के कुछ गुप्त रहस्य


प्राणायाम के अभ्यास से साधक दीर्घायु प्राप्त कर सकते हैं। स्वस्थ मनुष्य हर मिनट में १४ या १६ श्वास लिया करता है। निद्रा, व्यायाम, दौड़ आदि के समय श्वास की गति बढ़ जाती है। कुम्भक के अभ्यास से श्वास को रोकने पर योगी की आयु बढ़ती है। श्वास की संख्या जितनी कम होगी, उतनी ही अधिक आयु की प्राप्ति होगी।


कुत्ता और घोड़ा अधिक श्वास लेते हैं। कुत्ता करीब-करीब ५० बार प्रति मिनट श्वास लेता है और यही कारण है कि इसकी आयु १४ वर्ष के लगभग होती है। घोड़ा ३५ बार श्वास लेता है और उसकी आयु २९ से ३० वर्ष की है। हाथी २० बार प्रति मिनट श्वास लेता है और इसकी आयु करीब १०० वर्ष की है। कछुआ एक मिनट में बार श्वास लेता है तथा इसकी आयु ४०० साल की है। सर्प एक मिनट में दो या तीन बार श्वास लेता है तथा इसकी आयु ५०० से १००० वर्ष की है।


कामनाएँ तथा इच्छाएँ जितनी कम होंगी, उतनी ही श्वास की संख्या में कमी होगी। जो जप, ध्यान, ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय करता है, उसकी श्वास कम तथा धारणा-शक्ति अधिक होगी। श्वास की संख्या में कमी का अर्थ है- धारणा शक्ति में वृद्धि, आत्मिक जीवन में गम्भीरता तथा अधिकाधिक शान्ति।


नाभि में सूर्य-मण्डल अथवा अग्नि है। चन्द्र मण्डल अथवा अमृत आज्ञा चक्र से थोड़ा नीचे है। अमृत का स्राव होता है तथा अग्नि उसे सुखा डालती है। इससे आपकी आयु क्षीण होती है। यदि आप विपरीतकरणी मुद्रा या सर्वांगासन का अभ्यास करें, तो आप मृत्यु पर विजय प्राप्त करेंगे। आपकी आयु दीर्घ होगी। इस आसन में अग्नि ऊपर रहती है। अमृत का स्राव अग्नि में नष्ट नहीं हो पाता। अतः अमृत शरीर तथा नाड़ियों का पोषण करता है तथा जीवन दीर्घ होता है। अतः सुन्दर स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की प्राप्ति के लिए इस आसन का अभ्यास बहुत ही लाभकर है।


यह शारीरिक विपरीतकरणी मुद्रा है। ज्ञान विपरीतकरणी मुद्रा के अभ्यास से आप अमृतत्व तथा नित्य सुख को प्राप्त कर सकते हैं। आप ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। ज्ञान विपरीतकरणी मुद्रा क्या है? अपने दृष्टिकोण को बदल डालिए। नाम-रूपों का निषेध कर ब्रह्म अथवा आत्मा के ही सर्वत्र दर्शन कीजिए।


मनुष्य को सबल मन की प्राप्ति नहीं हो सकती, यदि वह मन की विक्षिप्त किरणों को उसी प्रकार एकाग्र कर ले, जिस तरह लेंस से सूर्य की किरणों को एकाग्र करते हैं। जिस प्रकार लेंस के सहारे किरणों को एकाग्र कर आप बहुत चीजों को जला सकते हैं, उसी प्रकार मन की विक्षिप्त किरणों को वैराग्य, विवेक के द्वारा केन्द्रित कर आप चमत्कार कर सकते हैं, आप अमरात्मा के आश्चर्यों का अनुभव कर सकते हैं।


मल, मूत्र तथा कफ में अल्पता, आँख तथा चेहरे में तेज, सुन्दर वर्ण, शरीर में स्फूर्ति, मधुर वाणी, प्रचुर वीर्य, ज्योति दर्शन, रोग तथा आलस्य से मुक्ति ये योगाभ्यास के प्रथम लक्षण हैं।


दूर-दर्शन, दूर-श्रवण-ये योग-मार्ग के द्वितीय लक्षण हैं।


अग्नि, जल तथा तेज तलवार के ऊपर योगी चल सकता है। वह आकाश में विचरण कर सकता है। उसे त्रिकाल ज्ञान की प्राप्ति होती है। ये तीसरे, चौथे तथा पाँचवें लक्षण हैं। अन्ततः वह प्रकृति तथा तीन गुणों से मुक्त हो कर निर्विकल्प या निर्बीज समाधि के द्वारा कैवल्य प्राप्त कर लेता है।

१४. साधना का सारांश


राजयोगी इन आठ सीढ़ियों पर एक-एक कर चढ़ता है-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि। प्रारम्भ में यम तथा नियम के द्वारा वह नैतिक सम्पत्ति प्राप्त कर अपने में शुद्धता लाता है। तब वह आसन में स्थिरता लाता है। इसके बाद वह मन को स्थिर बनाने तथा नाड़ी-शुद्धि के लिए प्राणायाम का अभ्यास करता है। तदनन्तर प्रत्याहार, धारणा तथा ध्यान के अभ्यास से समाधि प्राप्त करता है। संयम के द्वारा उसे बहुत-सी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वह अपने मन की सारी वृत्तियों का निरोध करता है।


हठयोग भौतिक शरीर तथा प्राणायाम से सम्बन्ध रखता है। राजयोग मन से सम्बन्ध रखता है। राजयोग तथा हठयोग परस्परावलम्बी हैं। दोनों के अभ्यास तथा ज्ञान के बिना कोई भी योगी पूर्ण नहीं हो सकता। हठयोग के समुचित समाप्त होने पर राजयोग का प्रारम्भ होता है। हठयोगी शरीर तथा प्राण से अपनी साधना का प्रारम्भ करता है; परन्तु राजयोगी अपने मन के स्तर से। ज्ञानयोगी अपनी बुद्धि तथा इच्छा-शक्ति से साधना प्रारम्भ करता है। यही मुख्य अन्तर है। राजयोग में सफलता पाने के लिए मनुष्य को मन के रहस्य तथा उसके नियन्त्रण के तरीकों का स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए।


हठयोग के साधक को चाहिए कि वह आसन, प्राणायाम, मुद्रा तथा बन्ध के द्वारा मूलाधार चक्र में प्रसुप्त कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करे। उसे प्राण तथा अपान के योग के लिए प्रयत्न करना चाहिए तथा संयुक्त प्राण-अपान को सुषुम्ना नाड़ी से ले जाना चाहिए। श्वास को रोकने से गरमी बढ़ती है तथा वायु कुण्डलिनी के साथ ऊपर सहस्रार चक्र की ओर विभिन्न चक्रों से होते हुए जाती है। जब कुण्डलिनी सहस्रार चक्र में भगवान् शिव से संयुक्त होती है, तब योगी समाधि प्राप्त कर परम शान्ति, सुख तथा अमृतत्व का उपभोग करता है।


अध्याय : साधना की महत्त्वपूर्ण प्रक्रियाएँ


. साधना में वासना की गति


साधक इस व्यावहारिक जगत् के तूफानों के बीच संग्राम करता है। हर कदम पर कठिनाइयाँ खड़ी होती हैं। प्रलोभन तथा जाँच समय-समय पर उस पर आक्रमण करते हैं। वह वीरतापूर्वक उन कठिनाइयों का सामना करता है; परन्तु अन्ततः वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इन बाधक परिस्थितियों से अलग रह कर ही साधना करना उचित होगा। वह संसार के व्यावहारिक कार्यों के कोलाहल से अलग हट कर किसी आध्यात्मिक संस्था में जाता है तथा कुछ समय निष्काम सेवा में लगा कर अपनी साधना क्रमिक रूप से करता है; परन्तु कुछ साधना करने के उपरान्त वह अपने में अधिकाधिक शुद्धता, नैतिक तथा आध्यात्मिक प्रगति को देख कर उसके विपरीत अधिकाधिक मलिनता, बुरे विचार तथा आवेगों का अनुभव करने लगता है। कैसा आश्चर्य है यह? क्या उसका पतन हो रहा है? कैसी विचित्र स्थिति से उसको गुजरना पड़ रहा है? क्या वह सचमुच प्रकाश की ओर मुड़ रहा है या अधिकाधिक अन्धकार की ओर ? ये विचार उसके मन को अशान्त कर डालते हैं। यदि वह धैर्यपूर्वक अपने मन का निरीक्षण एवं विश्लेषण करे, तो वह शीघ्र ही सत्य को जान पायेगा और उसका मन शान्त हो जायेगा।


यह पतन नहीं है; अपितु शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। आध्यात्मिक विकास में कभी-कभी ठीक उलटा प्रतीत होता है। इसका कारण है। जो वस्तुएँ पूर्णतः विपरीत हैं, वे कभी-कभी समान मालूम पड़ती हैं। अति अल्प स्पन्दन कानों को सुनायी नहीं देते और अत्यधिक स्पन्दन भी सुनायी नहीं पड़ते। स्थिर वस्तु गतिशील नहीं मालूम पड़ती। अत्यधिक वेग से घुमाने पर भी वह वस्तु स्थिर मालूम पड़ती है। उसी तरह साधना के मार्ग में जब शुद्धिकरण की प्रक्रिया जारी होती है, जिससे मल दूर होने लगता है, तब वह ठीक विपरीत अशुभ वासना या मल के अर्जन के समान मालूम पड़ती है।


यहाँ हमें इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जब ये आन्तरिक वासनाएँ निकलने लगें, तो साधक को बड़ी सावधानी रखनी चाहिए कि कहीं उनको शारीरिक सहयोग प्राप्त हो। जिस प्रकार बाँध के छोटे-छोटे द्वारों से अधिक पानी को बाहर निकाल दिया जाता है, उसी प्रकार साधक भी अपने मन से वासनाओं को निकल जाने दे। फिर साधक स्वस्थ हो जाता है और अपनी साधना में प्रगति करने लगता है। यदि इन वासनाओं को क्रिया में परिणत किया गया तो इससे और बन्धनों का निर्माण होगा; मुक्ति की ओर बढ़ कर आप बन्धन की ओर बढ़ने लगेंगे।


दो प्रकार की प्रक्रियाएँ हैं जिन्हें साधक को याद रखना चाहिए तथा विचारपूर्वक उनका उपयोग करना चाहिए। यह सदा आवश्यक नहीं कि आप सदा उन अशुभ शक्तियों को निकल जाने दें। उनको चित्त में ही, जो उनकी जड़ है, विनष्ट अथवा रूपान्तरित किया जा सकता है। जिस प्रकार सूर्य की गरमी जल को सुखा डालती है, ठीक उसी तरह नियमित साधना के द्वारा वासना दिन-प्रति-दिन रूपान्तरित होती जाती है। फिर भी जो शक्तियाँ बाहर निकलने लगें, उन्हें भौतिक जगत् में रूपान्तरित किया जा सकता है, उनको आध्यात्मिक कार्यों में लगा कर दिव्य बनाया जा सकता है। अशुभ वासनाओं के रूपान्तरण के लिए दो प्रकार हैं: आन्तरिक मान लीजिए, काम-वृत्ति अपने को व्यक्त करना चाहती है तो आप उसे दश-बारह बार सूर्यनमस्कार, प्राणायाम, आसन या पुरुषसूक्त, सहस्रनाम, शिवमहिम्नः आदि के कीर्तन में रूपान्तरित कर सकते हैं। रूपान्तरित हो कर ये शक्तियाँ साधना में सहायक बन जाती हैं।


यदि क्रोध की वासना व्यक्त होना चाहे, तो कमरे के अन्दर जा कर जोरों से हँसिए या शान्त बैठ कर प्रेम की तरंगों को एक-एक कर प्रेषित कीजिए। उपनिषद् के शान्ति-मन्त्रों का बारम्बार पाठ कीजिए। आप विश्व-प्रेम से परिप्लावित हो जायेंगे। क्रोध की सारी वासनाएँ विलुप्त हो जायेंगी; उनका स्थान शुद्ध प्रेम ग्रहण कर लेगा।


यह आन्तरिक अथवा आध्यात्मिक तरीका अधिक लाभकर है। रजोगुणी तथा तमोगुणी वासनाओं के रूपान्तरण के लिए यह आवश्यक है। कुछ ऐसी वासनाएँ हैं जिनके लिए समाज की ओर जाने की आवश्यकता पड़ती है।


जब समाज का आकर्षण आपको बलपूर्वक खींचे तो बाजार, चाय की दुकान, डाकघर आदि की ओर जा कर राजनीति, समाचार तथा गपशप में अपनी शक्ति विनष्ट कीजिए। गरीबों के पास जाइए, पीड़ितों के पास जाइए और देखिए कि आप उनकी सहायता किस प्रकार कर सकते हैं। इस प्रकार आप अपनी साधना को सम्पन्न बना सकते हैं।


यदि भावावेश उमड़ने लगे, तो शान्त रहिए। अपने मित्रों तथा साथियों की ओर दौड़िए। प्रकृति की ओर जाइए। मेमने तथा गिलहरियों से बातें कीजिए। छोटी-छोटी चिडियों तथा तितलियों से बातें कीजिए। इस तरह चित्त से वासनाओं को निकाल डालिए। आप सुरक्षित रहेंगे।


हाँ, एक बात का आप ध्यान रखें। इसी के सदृश्य एक दूसरी प्रक्रिया है। वासनाएँ निकलना चाहती हैं। बाह्य विषय अथवा उत्तेजना के द्वारा ये वासनाएँ व्यक्त होना चाहती हैं। इस स्थिति को प्रलोभन कहते हैं। यह खतरनाक है। आपके समक्ष दो शक्तियाँ हैं जिनसे आपको लोहा लेना है-आन्तरिक वासना की शक्ति तथा बाह्य उत्तेजना की शक्ति।


इसके लिए कई तरीकों का समन्वय लाभदायक होगा। उपर्युक्त रूपान्तरण की विधि का अनुसरण कीजिए, साथ ही प्रार्थना, उपवास, आत्म-संयम, स्थान-परिवर्तन तथा संकल्प के द्वारा उस विधि को प्रभावशाली बनाइए। आप प्रलोभन के ऊपर विजय प्राप्त करेंगे।


जिस तरह गन्दे जल को फिल्टर कर शुद्ध बनाने के लिए उसे बालू, कोयला तथा कुछ कीटाणुनाशक माध्यमों से हो कर ले जाते हैं, उसी प्रकार जीव चैतन्य को भी मानसिक तथा आवेगात्मक अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। जगत् के व्यावहारिक अनुभव रूखड़े बालू के समान हैं। इनसे स्थूल मल का नाश होता है। परन्तु सूक्ष्म मल को नष्ट करने के लिए जिस प्रकार जल को कोयले से हो कर गुजरना पड़ता है, उसी तरह चित्त के मल को दूर करने के लिए मानसिक अवस्था से हो कर गुजरना पड़ता है। मल-शोधन की यह क्रिया जाग्रत तथा स्वप्न- दोनों अवस्थाओं में होती है।


स्वप्नावस्था में साधक को अपने चित्त पर ही निर्भर करना है। गुरु के विचारों का प्रभाव, इष्टदेव की कृपा (दोनों वास्तव में एक ही हैं) साधक की स्वप्नावस्था में रक्षा करते हैं। कभी-कभी साधक स्वप्न की बातों से जागृति में हर्षित या खिन्न रहता है; परन्तु कभी-कभी स्वप्न की बात मन को याद ही नहीं रहती।


मनुष्य स्वप्न देखता है, उसकी वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं। परन्तु साधक को उसका बोध नहीं रहता; जाग उठने पर वह स्वयं को परिवर्तित-सा अनुभव करता है।


सावधान साधक को विजय प्राप्त होती है। गुरु के चरणों में श्रद्धा रखने वाले सच्चे साधक सफलता प्राप्त करते हैं।


. साधना में संयम का स्थान


गंगा-जल गंगा-तट के वासियों के लिए सर्वस्व ही है; परन्तु वही जब बाढ़ का रूप धारण करता है तो सैकड़ों जानें चली जाती हैं; वही जल खतरनाक बन जाता है। मनुष्य के जीवन में भी ऐसी ही बात है।


साधारण मनुष्य अपनी इन्द्रियों का गुलाम है। साधारणतः उसका जीवन अनेकानेक विषयों से आक्रान्त है। मनुष्य दो प्रकार के कार्यों के लिए प्रेरित होता है-सुखद एवं आकर्षक वस्तुओं की ओर तथा कुछ विशेष वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करने की ओर। कभी-कभी विशेष विषयों के मामले में दोनों काम जारी रहते हैं- () भोग तथा () खपत। ये दोनों इन्द्रिय-परायणता के दो पहलू हैं।


इन्द्रिय-परायणता विस्तृत अर्थ रखती है। इन्द्रियों के द्वारा सभी प्रकार के भोग इसमें सन्निहित हैं। फिर भी सभी प्रकार के भोग अनैतिक, अशिष्ट तथा अपराध नहीं हैं। कुछ प्रकार के भोग-जैसे शराबखोरी, व्यभिचार आदि प्रत्यक्ष ही अनैतिक तथा अपराध हैं। इन्हें तो पूर्णतः दूर करना चाहिए। कुछ दूसरे प्रकार के यद्यपि अपराध नहीं हैं, फिर भी मनुष्य के शरीर, मन तथा समाज के लिए हानिकर हैं। तम्बाकू, नसवार लेना, बीड़ी पीना, जुआ खेलना आदि इस श्रेणी में आते हैं। इन कर्मों का भी तिरस्कार किया जाता है। भोजन, पान, शयन, विश्राम तथा शरीर के लिए वस्त्र-ये शारीरिक आवश्यकताएँ हैं। ये कार्य बहुत हद तक नीति-निरपेक्ष हैं; परन्तु इनमें अति लाने पर ये नीति-विरुद्ध बन जाते हैं। सोना सभी के लिए आवश्यक है; परन्तु अत्यधिक सोने से मनुष्य आलसी, मन्द-बुद्धि तथा अन्ततः अपने तथा समाज के लिए भार-स्वरूप बन जाता है। साधक के लिए यह खतरनाक आदत है। उसके लिए यह पाप है जिसका उन्मूलन करना चाहिए। अति-शयन से तमोगुण की वृद्धि होती है जो साधना का निराकरण कर उसकी प्रगति को रोकती है।


भोजन करना भी शरीर के लिए अनिवार्य है। अत्यधिक भोजन करना अनुचित, अनैतिक तथा अपराध है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी ऐसा करना गलत है। शिष्टाचार की दृष्टि से भी यह अनुचित है। अति-भोजन से मनुष्य की कामुक प्रवृत्तियाँ परिपुष्ट होती हैं। मनुष्य में विषय-परायणता बढ़ती है। आर्थिक दृष्टि से भी यह अपराध है।


पहले दो प्रकार के कर्मों का तो पूर्णतः परित्याग करना चाहिए; परन्तु इस तीसरे प्रकार के कर्म में संयम बरतना चाहिए। तीसरे प्रकार के कर्म में वैषयिक खपत तथा उपभोग-दोनों अनिवार्य हैं, फिर भी अत्यधिक करने से ये कर्म भी अनैतिक बन जाते हैं। संयम के द्वारा ही अत्यधिक उपभोग पर रोक लगाते हैं।


संयम के दो प्रकार हैं: () अति से बचना तथा () चुनाव करना। भोजन को अधिक परिमाण में करने से बचने के लिए मिताहार के सिद्धान्त को लागू कीजिए। यदि स्वादवश अति उपयोग करते हैं, तो आहार का चुनाव कीजिए। राजसिक एवं तामसिक आहार को त्याग कर सात्त्विक आहार कीजिए. भले ही सात्त्विक आहार कम स्वादिष्ट क्यों हो। रात्रि में एक घण्टा और सो लीजिए; किन्तु दिन में सोइए।


संयम मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र है। यह मनुष्य की विषय-वृत्तियों पर रोक रखता है। संयम खपत तथा उपभोग की प्रक्रिया को एक सीमा में बाँध कर रखता है। संयम से आप स्वास्थ्य, प्रगति तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करेंगे।


संयम से ही जीवन सार्थक बनता है। संयमी बनिए। जितेन्द्रिय योगी बनिए। संयम से आप तीनों लोकों के सम्राट् बन सकते हैं। संयम से आप आत्म-साक्षात्कर कर सकते हैं।


संयम की जय हो ! संयम ईश्वरीय विभूति है।

. साधना में दबाव तथा उसके परिणाम


आध्यात्मिक साधना में वास्तविक उन्नति की प्राप्ति के लिए इन्द्रियों पर विजय तथा आत्म-जय अनिवार्य है। इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिए मन पर विजय प्राप्त करना आवश्यक है; क्योंकि वास्तविक इन्द्रिय कर्मेन्द्रिय या बाह्य शरीर के अंग नहीं हैं, अपितु ज्ञानेन्द्रिय हैं जिनका स्थान मनोमय कोश है। बाहरी शारीरिक इन्द्रिय तो वाहन मात्र हैं जिनसे ज्ञानेन्द्रियाँ अपनी तृष्णाओं को परितृप्त करती हैं। अतः यदि मन के दमन तथा प्रत्याहार के द्वारा आन्तरिक पंचेन्द्रिय के शोरगुल को शान्त कर दिया गया, तो कर्मेन्द्रिय केवल मांस के अंग रह जाते हैं जिनमें मनुष्य को उत्तेजित करने की शक्ति नहीं रह पाती। जब मन अन्तर्मुखी रहता है, तो शब्द कानों में प्रवेश करने पर भी कोई चिह्न नहीं छोड़ते। नासिका बहुत प्रकार की गन्धों को लेती है; परन्तु मन को बोध नहीं होता। आत्मलीन मन वाला व्यक्ति टकटकी लगा कर देखते हुए भी कुछ नहीं देखता। गम्भीर अध्ययन में बैठे हुए व्यक्ति की पीठ पर थपकी लगाइए, वह उसका बोध नहीं कर पायेगा। अतः आन्तरिक पंचेन्द्रियों की तृष्णा ही मनुष्य की बाह्य इन्द्रियों में उत्तेजना तथा अशान्ति लाती है।


इससे यह स्पष्टतः परिलक्षित होता है कि इन्द्रियों पर विजय प्राप्ति के लिए तृष्णाओं के उन्मूलन तथा मन पर विजय प्राप्त करने की आवश्यकता है। फिर भी बहुत से साधक इस बात को भूल कर बाह्य इन्द्रियों के दमन के लिए अत्यधिक तपस्या करते तथा उनसे लड़ाई करके, उन्हें भूखे रख कर उनको वशीभूत करना चाहते हैं। प्रारम्भ में थोड़ी सफलता भी मिलती है और साधक गलत साधना को और भी घनीभूत बनाने लगते हैं। जब बाह्य भौतिक दबाव अधिक अनुचित हो जाता है, तब व्यक्ति के मन पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। मनुष्य विभिन्न प्रकार से अपनी प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्तियों का प्रदर्शन करने लगता है। मनुष्य अब तक के सारे दबावों को तोड़ कर इन्द्रिय-भोगों में पिल पड़ता है। दबाव के सारे बन्धन ढीले पड़ जाते हैं। इसके साथ ही मनुष्य के चित्त में बहुत-सी ग्रन्थियाँ पड़ जाती हैं जिनको आसानी से पहचान नहीं सकते।


एकान्त में रहने वाले साधक के लिए यह स्थिति और भी कठिन है। दूसरों के द्वारा समालोचना, सुधार तथा सावधानी का अवसर उसे प्राप्त नहीं होता है। वह स्वयं अपने ऊपर निर्भर है। रजस् तथा विषय-वासना के प्रतिक्रियात्मक आवेग के समय विवेक तथा बुद्धि काम नहीं करते। परन्तु यदि साधक किसी आश्रम अथवा समाज में हो तो अन्य लोग, जिन्हें अनुभव है, उसे पहले ही सावधान कर देंगे। परन्तु ऐसा देखा जाता है कि सावधान करने पर साधक अपने शुभेच्छु व्यक्ति का विरोधी बन बैठता है तथा उसका दुश्मन बन जाता है। उसकी विरोधी प्रवृत्ति के तीन घटक हैं: अचेतन भय, बुद्धि-भ्रम तथा क्षतिपूर्ति की क्रिया।


पहली हालत में यद्यपि वह जानता है तथा अनुभव करता है कि उसका आचरण यद्यपि अनुचित है, फिर भी वह सारी सम्मति तथा सलाहों का विरोध करता है; क्योंकि यदि वह उनके अनुसार चलना प्रारम्भ करे, तो उसे आत्म-संयम की प्राप्ति होगी; परन्तु इससे जिस भोग को प्राप्त करने का उसने निश्चय किया है, उसे वह प्राप्त नहीं कर सकेगा। भोग-वृत्ति से उसके मन का जो भाग आक्रान्त है, वह भय खाता है कि दूसरों के आदेश को मानने से उसे भोगों से हाथ धोना पड़ेगा। यह भय अपनी रक्षा के लिए विरोध का रूप धारण करता है। यह विरोध कभी-कभी इतना उग्र रूप धारण करता है कि उसके अपने शुभ-चिन्तक भी उसके शत्रु बन बैठते हैं।


दूसरी हालत में अनोखे तर्क द्वारा व्यक्ति स्वयं को समझा लेता है कि 'हाँ, मैं ठीक रास्ते पर हूँ।' वह ऐसा अनुभव करता है कि आत्म-संयम के कुछ काल के अभ्यास से अब कुछ दिनों तक उसे उपभोग करने का अधिकार प्राप्त हो गया है तथा वह अपने निश्चय के विरुद्ध किसी प्रकार की सम्मति को सुनना नहीं चाहता। उसकी अन्तरात्मा जानती है कि वह भूल कर रहा है; परन्तु अन्तरात्मा की वाणी को चित्त में दबा दिया जाता है। यह भ्रम है जो व्यक्ति के राग वशीभूत मन की उपज है।


अल्प विचार से ही स्पष्ट हो जाता है कि साधक भोग में निमग्न होने से पहले स्वयं को समझा लेता है कि यह बिलकुल ठीक है। उपद्रवी इन्द्रियों के वशीभूत हो कर वह गलत कार्य कर बैठता है, तदुपरान्त उन्हें ठीक प्रमाणित करने का प्रयास करता है। वह ऐसा क्यों कर रहा है, इसकी व्याख्या तो नहीं देता; वरन् बुद्धि-भ्रम के कारण ऐसा निश्चय करता है कि जो कुछ मैं कर रहा हूँ, वह ठीक ही है। दुराचार के उपरान्त वह उसे शिष्टाचार प्रमाणित करने के व्यर्थ प्रयास करता है। वह गलत करता है और उसे ठीक बतलाने का प्रयास करता है। वह घोड़े के सामने गाड़ी रखता है।


तीसरी हालत है क्षतिपूर्ति की क्रिया। साधक को यह पता लग जाता है कि वह दूसरों की दृष्टि में नीचे गिर गया है। उसका 'सम्मान' खतरे में है। वह अपने को छोटा समझता है। उसकी क्षतिपूर्ति के लिए तथा दूसरों की दृष्टि में ऊँचा उठने के लिए वह अचेतन रूप से प्रथमाक्रमण का तरीका अपनाता है।


क्षतिपूर्ति की कामना से यह स्पष्ट होता है कि साधक अपनी निम्नात्मा से अभी तक आसक्त है। वह अपने अभिमान को बचाये रखना चाहता है। क्षतिपूर्ति की प्रवृत्ति इसी की परिचायक है। यह साधक को शोभा नहीं देता। आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश करने के समय से ही उसे स्वेच्छापूर्वक अपने उच्च मन के अधीन अपने को अर्पित कर देना चाहिए। आसुरी अभिमान को दमन करने में वह विफल रहा। उसे कम-से-कम अपने गुरु के प्रति आत्मार्पण तो करना ही चाहिए। यह भी उसने नहीं किया। साथ ही उसने मार्ग के आधारभूत सिद्धान्तों की भी उपेक्षा की है। यम तथा नियम ही आधार हैं। यदि उसमें नम्रता है तो क्षतिपूर्ति के प्रथमाक्रमक तरीकों की आवश्यकता रह जायेगी। मनुष्य शीघ्र ही अपनी गलती स्वीकार कर लेगा और उससे शिक्षा ग्रहण करेगा। तो उसमें नम्रता है और अपनी गलती स्वीकार करने की बौद्धिक सच्चाई। वह इस गलत तरीके को काम में लाता है। अब आपको स्पष्ट हो जायेगा कि यद्यपि 'क्षतिपूर्ति' का यह विश्लेषण पूर्णतः मनोवैज्ञानिक है, फिर भी इससे आध्यात्मिक जीवन की निर्माण सम्बन्धी त्रुटियों पर प्रकाश पड़ता है। इससे यह पता चलता है कि साधक में सदाचार की कमी है। इन मामलों को ठीक करने में बड़ी कुशलता, कला तथा अन्तर्दृष्टि की आवश्यकता है। उनके साथ कैसे व्यवहार किया जाये, यह व्यक्ति-विशेष तथा उसकी परिस्थिति विशेष पर निर्भर करता है।


अब आप शंका कर सकते हैं कि दबाव की क्रिया गलत कैसे हो सकती है? क्या यह सत्य नहीं कि ईंधन को हटा लेने पर अग्नि स्वतः बुझ जाती है। इन्द्रियों की अग्नि के लिए विषय-पदार्थ ही ईंधन हैं। हाँ, यदि इन्द्रिय अग्नि है तो विषय-पदार्थ ईंधन ही ठहरेंगे; परन्तु विचार करने पर पता चलेगा कि इन्द्रिय वास्तव में अग्नि नहीं है। वास्तविक अग्नि तो सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रियों की तृष्णा तथा उत्तेजना हैं, जिनकी ज्वाला कर्मेन्द्रिय तथा उनके विषय-भोगों से हो कर फट-फट करती रहती है। स्वाद का उपभोग अस्थिहीन मांसपिण्ड जिह्वा नहीं करती, तो हाथ का चमड़ा ही स्पर्श के सुख का अनुभव करता है। जिह्वा चखती नहीं, वरन् स्वाद का सन्देश देती है। चर्म स्पर्श नहीं करता, वरन् स्पर्श-मुख का सन्देश देता है।


ज्ञानेन्द्रिय अग्नि हैं। स्मृति, कल्पना, विषय-पदार्थों का चिन्तन तथा उपभोग की सतत कामना और आशा- ये ही ईंधन हैं। ईंधन के आयात को बन्द करना आवश्यक है। भूत की स्मृति को पूर्णतः रोकना, सारी कल्पनाओं का निरोध, दृढतापूर्वक मानसिक विषय-चिन्तन पर रोक तथा विषयों की आशा के परित्याग से ही ईंधन के आयात को बन्द कर सकते हैं। यहीं कारण है कि ऐसा उपदेश दिया जाता है: "भूत को भूल जाइए। भविष्य के लिए योजना बनाइए। वर्तमान में रहिए।" "वास्तविक त्याग संकल्प-विकल्प के त्याग में ही है।" "मनोजयं एव महाजयम्" तथा "मन जीता तो जग जीता।"


मानसिक विकारों पर विजय पाने के लिए अहिंसक तरीका विशेष प्रभावशाली है। आसन तथा सात्त्विक आहार के द्वारा आन्तरिक समता लाइए, प्राणायाम के द्वारा मन को सूक्ष्म बनाइए, नियमित स्वाध्याय द्वारा कल्पना को दिव्य विचारों में लगाइए और श्रवण, लक्ष्य-चिन्तन, उपासना आदि के द्वारा इन्द्रियों पर विजय पाइए।


अपने मन के ऊपर एक निरीक्षक को नियुक्त कीजिए। सतत विवेक तथा दृढ़ निरोध होना चाहिए। विचार तथा सत्वर निरोध को कभी भी बन्द नहीं करना चाहिए। मनुष्य नैतिक आचरण में आलसी है। वह इस मुख्य कार्य को करने में दिलचस्पी नहीं रखता। अभिमान इस मार्ग में बाधक है; क्योंकि यह तो पूर्णतः आन्तरिक प्रशिक्षण है जिसके लिए प्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं, जब कि शारीरिक तप तथा बलपूर्वक बाहरी तरीके सभी के लिए वीरतापूर्ण मालूम पड़ते हैं और उनकी प्रशंसा की जाती है। यह अभिमान बड़ा सूक्ष्म है तथा इसे आसानी से समझा नहीं जा सकता। परन्तु फिर भी नैतिक आलस्य तथा शुभेच्छा का अभाव ही मुख्य कारण है। यदि आप वास्तव में प्रगति करना चाहते हैं, तो आप वास्तविक मानसिक नियन्त्रण के लिए सच्चा प्रयास करेंगे। आपको मानसिक आलस्य को दूर भगा कर उच्च मन को सहयोग देना होगा तथा अशुद्ध मन के साथ असहयोग करना होगा। इसको किये बिना आप हठपूर्वक बाह्य साधनों में विफल होते हैं तथा बाहरी कारणों एवं व्यक्तियों को दोष देते हैं अथवा आध्यात्मिक साधना के ही खिलाफ हो जाते हैं। यह आपकी बड़ी भारी गलती है। आपको इससे सबसे भारी क्षति उठानी पड़ती है।


इस विषय का उपसंहार करते हुए एक बात पर विशेष ध्यान रखिए। आप कह सकते हैं कि क्या बाह्य इन्द्रियों को वश में रखने में कोई लाभ या पुण्य नहीं? उनका भी दमन करना आवश्यक है। यह अच्छा है। परन्तु पहले आप इसके उपलक्षण तथा परिसीमा को अच्छी तरह समझ लें। सहज बुद्धि के साथ इनका अभ्यास सहायक सिद्ध होता है। तितिक्षा के अभ्यास में इन्द्रियों से युद्ध करना ठीक है। कभी-कभी एक या दो इन्द्रियों को पूर्णतः नियन्त्रण में रखना ठीक है। उदाहरणतः महीने में एक बार या दो बार एकादशी को आप पूर्ण निर्जल उपवास तथा रात्रि में जागरण रख सकते हैं। इसे एक तरीका मानना चाहिए, कि इसे ही लक्ष्य समझ बैठने की गलती कर लेनी चाहिए। आन्तरिक आत्म-संयम के लिए यह एक सहायक साधन है। तितिक्षा के विकास के लिए यह उपयोगी है। निःसन्देह इसके बहुत लाभ हैं; परन्तु इसमें त्रुटियाँ भी हैं। मूर्खतापूर्वक अति करने पर साधक की साधना-शक्ति बहुत ही कम हो जाती है।


बाह्य इन्द्रिय-दमन आवश्यक है; परन्तु स्वयं लक्ष्य नहीं है। यह छुरी की तेज धार के सदृश है। अनुचित प्रयोग करने पर खतरा भी हो सकता है। साधना में इसके सम्यक् स्थान को समझ लीजिए और बुद्धिमान् बनिए। इसका समुचित उपयोग कर मन पर नियन्त्रण कीजिए। आप सफल होंगे। आप महिमान्वित होंगे।


आत्म-दमन तथा मन के निग्रह की ओर गीता आपका पथ-प्रदर्शन करे ! भगवान् कृष्ण तथा गौतम बुद्ध जैसे योगीश्वर आपको इन्द्रिय-दमन के लिए अन्तर्दृष्टि प्रदान करें ! ईश्वर आपको इस ज्ञान के सम्यक् उपयोग के लिए प्रेरित करें! आप पूर्णता प्राप्त करें!


. साधना में त्रिविध अन्तर्गमन


कठोपनिषद् कहती है, "स्वयम्भू ब्रह्मा ने इन्द्रियों को बहिर्मुखी बनाया और यही कारण है कि मनुष्य जगत् को देखता है, परन्तु अन्तरात्मा को नहीं। पर कुछ धीर पुरुष, जो अमृतत्व के इच्छुक हैं, स्थिर मन से दृष्टि को अन्तर्मुख कर अन्तरात्मा को देखते हैं।"


दृष्टि को अन्तर्मुख करने का अर्थ है-सारी इन्द्रियों को समेट लेना। प्रत्याहार तथा दम के अभ्यास से इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों से समेट ली जाती है।


किसी भी सुविधाजनक आसन में बैठ जाइए। आँखें बन्द कर लीजिए। त्रिकुटी (दोनों भौंहों के बीच का स्थान) पर धारणा कीजिए।


गुदा को सिकोड़ कर मूलबन्ध का अभ्यास कीजिए तथा श्वास भीतर खींचिए। श्वास को रोकिए तथा जालन्धरबन्ध का अभ्यास कीजिए ठुड्डी को कण्ठ में लगा कर एकाग्रता का अभ्यास कीजिए।


प्राण को समेटना, मन को इन्द्रिय-विषयों से समेटना तथा इन्द्रियों को उनके विषयों से समेटना-योग-साधना में इन तीनों का अभ्यास एक ही साथ करते हैं। तीनों के सम्मिलित अभ्यास से अधिक लाभ होता है। इस शक्तिशाली योग-साधना से मन सुगमतापूर्वक नियन्त्रित हो जायेगा।


धीरे-धीरे श्वास नासिका में ही संचरित होगी। मन का वेग रुक जायेगा। मन एकाग्रता प्राप्त करेगा। वासनाएँ स्वल्प हो जायेंगी। उपद्रवी इन्द्रियाँ शान्त हो जायेंगी। समता तथा शान्ति रहेगी। योगनिष्ठा की प्राप्ति होगी। निर्विकल्प समाधि लग जायेगी।

. साधना में धैर्य


योग की पहली आधारशिला है नैतिक पूर्णता-यम-नियम का अभ्यास। अतः सभी दुर्गुणों को दूर करने के लिए प्रयत्नशील बनिए। अन्तर्निरीक्षण कीजिए तथा मन का विश्लेषण कीजिए। एक दुर्गुण के दूर होने पर दूसरा दुर्गुण जायेगा। धैर्य रखिए। एक-एक कर सभी दुर्गुणों को दूर कीजिए। यदि आपमें धैर्य है तो आप निश्चय ही सफल होंगे। हम अखबारों को पढ़ने में बहुत समय खोते हैं। आप संसार का समाचार जानने के लिए अखबार पढ़ सकते हैं; परन्तु आवेगों को उत्तेजना देना इसका उद्देश्य नहीं होना चाहिए। अपने निम्न आवेगों का दमन कर लेने पर ही आप वास्तविक शान्ति प्राप्त करेंगे। तभी आपके लिए आध्यात्मिक जीवन की सम्भावना होगी।


आपका मन अनुशासित नहीं है। यही कारण है कि आपको कष्ट भोगना पड़ता है। आप विचार नहीं करते कि वास्तविक सुख का मूल कहाँ है? आप विचार नहीं करते, "मैंने कौन-कौन-से अच्छे कार्य किये हैं।" मातृ-गर्भ में प्रवेश करते समय हमने ईश्वर से जो प्रतिज्ञा की है, उस प्रतिज्ञा को हम याद नहीं रखते। हम आदर्श को याद नहीं रखते। ईश्वर है या नहीं-इन व्यर्थ के विवादों में पड़ कर धार्मिक जीवन बिताइए। ये सब बेकार विवाद हैं। क्रोधी बनना तो बहुत खराब है। क्रोध का दमन कीजिए। यदि कोई व्यक्ति कुछ अप्रिय कह डालता है, तो आप तुरन्त उसका प्रतिकार करने लगते हैं। हममें सहन-शक्ति नहीं है। हम दुर्बल हैं। मनुष्य पहलवान हो सकता है। वह छह से बारह घण्टे तक शारीरिक व्यायाम कर सकता है। वह बड़ी चट्टान को तोड़ सकता है। परन्तु कटु वचन को सहने की उसमें शक्ति नहीं हो सकती, वह मन से दुर्बल है। हमें मानसिक बल तथा सद्गुणों का अर्जन करना होगा। परन्तु खेद है कि हम इसे शीघ्र ही भूल जाते हैं। हम थोड़ा-बहुत यदा-कदा लिखित जप कर लेते हैं और सिद्धियों की प्रतीक्षा करते हैं। यह पर्याप्त नहीं है। आपको गम्भीर साधना करनी होगी।


अपने घर में एक पृथक् कमरा रखिए। यह आवश्यक है। सदा प्रातः चार बजे उठने का अभ्यास आवश्यक है। लोग कुछ दिनों तक अभ्यास करते हैं, फिर अभ्यास बन्द कर पुनः उसका अभ्यास प्रारम्भ करते हैं। इस आदत को छोड़िए। ब्राह्ममुहूर्त में अभ्यास करने पर आपका मन शीघ्र ही एकाग्र हो जायेगा। यदि आप ध्यान में हैं, तो एकाग्रता में बहुत सुगमता होगी। अभ्यास से समय पर ध्यान लगने लगेगा। शरीर में पीड़ा रहने पर भी उस समय आपका मन अन्तर्मुखी हो जायेगा। यदि आपको निद्रा सता रही है, तो जोरों से कुछ दार्शनिक कीर्तन गाइए, जैसे- "चिदानन्द, चिदानन्द।" आपमें स्फूर्ति जायेगी। अपने मन पर बारम्बार प्रहार कीजिए- "चिदानन्द, चिदानन्द, चिदानन्द हूँ; मैं अमर आत्मा हूँ।" इस गान को गाइए। थोड़ा टहलिए। सारे रोग दूर हो जायेंगे। अपने अन्दर ईश्वरीय सत्ता का भान कीजिए। हर नाम ईश्वरीय शक्ति से पूर्ण है। ईश्वर के नाम के जप से आप आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त करेंगे।


आपमें दान देने की आदत होनी चाहिए। आपको सहज ही दान देना चाहिए। अपनी दानशीलता के कारण हम अपने भाई-बहनों को कुछ रुपया दे सकते हैं, परन्तु अनजान व्यक्तियों को नहीं। दानशीलता सभी के लिए होनी चाहिए। यह सारा जगत् ईश्वर से उत्पन्न है। दूसरों के दुःख को देख कर आपको ऐसा भान होना चाहिए कि आपका ही शरीर पीड़ित है। तभी आप ईश्वर-कृपा प्राप्त करेंगे। सारी सिद्धियाँ तथा ऋद्धियाँ आपके चरणों पर लोटेंगी। परन्तु अभाग्यवश आपका हृदय बहुत संकीर्ण है। आपकी बुद्धि अच्छी हो सकती है, आप पी-एच. डी. हो सकते हैं; परन्तु आपका हृदय संकीर्ण है। आत्म-त्याग की भावना का यह अभाव क्यों है? क्योंकि हम गीता के उपदेशों का पालन नहीं करते। वही सबसे बड़ा योगी है जो सभी को ईश्वर की अभिव्यक्ति समझ कर आत्म-त्याग करता है। दानशीलता को तो आपका स्वभाव ही बन जाना चाहिए। जहाँ-कहीं भी जायें, अपनी जेब में कुछ सिक्के रख लें। जहाँ-कहीं दुःख हो, दान दीजिए और यथासम्भव मानवी कष्टों को दूर कीजिए। ऐसा करने से आप जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने लायक बन जायेंगे। बहुतों ने निष्काम सेवा के द्वारा ईश्वर के दर्शन प्राप्त किये और आप भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।


जप तथा प्रार्थना कीजिए। ईश्वर के विचारों को प्रश्रय दीजिए। विषय-सुखों के दोषों पर विचार कीजिए। तत्सम्बन्धी कुछ श्लोकों को याद रखिए। सोने से पूर्व अच्छे विचारों को लाइए। आपको धीरे-धीरे अपने मन को अनुशासित करना पड़ेगा। साथ ही आध्यात्मिक ग्रन्थों का स्वाध्याय भी बहुत आवश्यक है। उपनिषदों को पढ़िए। पतंजलि के योगसूत्र-राजयोग को पढ़िए। आपको सैद्धान्तिक ज्ञान होना चाहिए। किताबें आवश्यक हैं। ये सभी आपकी बाधाओं को दूर करेंगी।


भोजन के पहले गीता के पन्दरहवें अध्याय का पाठ कीजिए। आपमें से कितने जन इसको याद रखते हैं? बहुत कम हैं। मनुष्य भोजन से बना है तथा भोजन तभी शुद्ध होता है, जब आप इन श्लोकों का पाठ कर लें। विभिन्न प्रकार के अन्न विभिन्न संस्कार बनाते हैं। सात्विक अन्न से मन की एकाग्रता बढ़ती है। अन्न को ईश्वर को अर्पित करने से यह आत्म-त्याग का एक कार्य हो जाता है। अतः यदि आप कुछ श्लोक याद रखें, तो यह उपयोगी सिद्ध होगा।


हम अपने जीवन में नये पृष्ठ बदलें। थोड़ा जप तथा थोड़ा कीर्तन भी प्रबल शक्ति को उत्पन्न करते हैं। अतः हम सभी ईश्वर-प्रेम के प्रति अधिक सच्चे बनें तथा अपने समक्ष आदर्श रखें। गीता पढ़िए। समय भागा जा रहा है। क्रोध आने पर अवन्ती ब्राह्मण को याद कीजिए। सभी परिस्थितियों, प्रलोभनों एवं जाँच की घड़ियों में ईश्वर की याद बनाये रखिए। आपको सदा मधुर शब्द बोलने चाहिए। दिन-प्रति-दिन बल प्राप्त कीजिए। अपने जीवन का निश्चित कार्यक्रम बना लीजिए। मानव-जन्म प्राप्त करना कठिन है। अपने बहुमूल्य जीवन को नष्ट कीजिए। अपने देश के महान् सन्त रामदास, शम्सतवरेज़, श्री रामकृष्ण परमहंस आदि को याद रखें। इसी जन्म में जीवन्मुक्त बनने की शुभेच्छा रखें। सदाशिव ब्रह्म की कहानी सुनिए।


सदाशिव ब्रह्म करूर में एक योगी थे। आज भी उनकी समाधि वहाँ वर्तमान है। उन्होंने ब्रह्मसूत्र के ऊपर बड़ी सुन्दर टिप्पणी तथा अन्य पुस्तकें लिखी हैं। वे विद्वान् पण्डित थे तथा गुरु के अधीन शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। उसी समय उनको यह तार मिला कि उनकी पत्नी रजस्वला हो चुकी है। वे अध्ययन के उपरान्त अपने गुरु-गृह से लौट रहे थे। उनकी माँ खुशियाँ मना रही थी कि उनका पुत्र लौट रहा है। उन्होंने पायस तथा अन्य बहुत से सुस्वादु भोजन तैयार किये। सदाशिव ब्रह्म को भोजन के लिए तीन बजे शाम तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। वे विवेकी पुरुष थे। वे योगभ्रष्ट थे। उन्होंने अपने पिछले जन्म को याद किया तथा वैवाहिक जीवन के कष्टों का स्मरण किया। उन्होंने अपने-आप ही विचार किया, "आज तो मुझे तीन बजे भोजन मिल रहा है। जब मैं पूर्ण रूप से गृहस्थाश्रम में स्थित हो जाऊँगा, तो पता नहीं भोजन भी मिलेगा या नहीं। गृहस्थाश्रम से लाभ ही क्या?" उन्होंने तुरन्त संसार का संन्यास कर दिया। उन्होंने अपनी स्त्री तथा माता के प्रति कोई कर्तव्य पालन नहीं किया, फिर भी उनके लिए बन्धन नहीं रहा।


इन अत्युक्तिपूर्ण कहावतों पर ध्यान दीजिए- "आपके सन्तान नहीं हुई; अतः आप पूर्वजों के श्राप प्राप्त करेंगे आदि।" सदाशिव ब्रह्म को बन्धन नहीं हुआ। जब उन्हें समाधि लग गयी, वे जमीन के अन्दर दब गये। खेत जोतते समय कुछ किसानों ने अनजाने में उन्हें चोट पहुँचायी। खून बह निकला। उस स्थान पर खोदने से सदाशिव ब्रह्म निकले। उन्हें जरा भी इसकी खबर थी। समाधि से उठने पर सदाशिव ब्रह्म ने बहुत से चमत्कार दिखलाये।


इन सभी से यह स्पष्ट है कि विवाह सामाजिक संस्था है, क्योंकि बहुत से लोग कामुक संस्कारों के साथ जन्म लेते हैं तथा इन संस्कारों को थोड़ी परितृप्ति मिलनी चाहिए, जिससे कि मनुष्य यह समझ ले कि इस जगत् से सुख नहीं मिल सकता। उसे ठोकरें खानी पड़ती हैं। उसके स्त्री-बच्चे उसकी कामना की पूर्ति नहीं कर पाते। वह संसार से असन्तुष्ट हो धर्म की ओर मुड़ जाता है। इसी अनुभव को प्राप्त करने के लिए मनुष्य गृहस्थ-जीवन में प्रवेश करता है। परन्तु जिनमें जन्मजात आध्यात्मिक संस्कार हैं, वे गृहस्थी के अनुभवों को प्राप्त किये बिना ही वैराग्य प्राप्त कर लेते हैं। बहुतों ने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किये बिना ही संन्यास ले लिया।


ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन कीजिए। हम सैकड़ों जन्मों से गुजर चुके हैं। फिर भी ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन हमने नहीं किया। वासना बड़ी बलवती है। पुत्र के उत्पन्न होते ही पत्नी आपकी माता बन जाती है। इसे याद रखिए। जानवरों से सीखिए कि किस प्रकार वे प्राकृतिक नियमों का पालन करते हैं। केवल मनुष्य ही इन नियमों की अवहेलना करता है तथा मनुष्य में ही विवेक बुद्धि है। ईश्वरत्व की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्य आवश्यक है। सारी शक्ति को ओज-शक्ति में परिणत करना होगा, तभी जीवन-संग्राम में वह वरदान-स्वरूप सिद्ध होगी। जिसने अपने वीर्य का संरक्षण किया है, वह इस संसार में अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकता है। अधिक सम्पत्ति का अर्जन भी वह कर सकता है। आध्यात्मिक साधक के लिए यह बहुत ही आवश्यक है; क्योंकि वह ब्रह्मचर्य के बिना उन्नति कर ही नहीं सकता। आपसे पुनः कहता हूँ- "चार बजे प्रातः उठना बहुत ही आवश्यक है।" यह जगत् गतिशील है। हर क्षण बहुमूल्य है। आप कब तक तर्क करते रहेंगे- ईश्वर है या नहीं। जितना अधिक सम्भव हो, जप कीजिए।


सतत सेवा तथा सहज एवं अबाध दानशीलता के द्वारा आपको मन के मल का शोधन करना होगा। जिन लोगों के पास दो करोड़ रुपये हैं, वे यदि युद्ध-कोष में एक लाख रुपये दान में दे दें, तो इसमें अधिक उदारता नहीं है; परन्तु एक गरीब भक्त जिसके पास दो रुपये हैं, यदि एक रुपये का दान कर दे तो इसमें बड़ी महिमा है। उपनिषदों की भी घोषणा है कि आप धन का संचय करें। उसे वितरण कर डालें। कुछ लोग काफी कमाते हैं और सामाजिक कार्यों तथा संस्थाओं को काफी दान भी देते हैं। यह महान् सहायता है, परन्तु बिना पाप किये धन का अर्जन होता नहीं। जो अपने अल्प धन में ही दूसरों को भी दान देता है, वही सच्चा योगी है, कि वह मनुष्य जिसके पास चार करोड़ रुपये हैं, परन्तु दान में वह बीस लाख ही खर्च करता है। जो मनुष्य आठ आना ही कमाता है और उसी में से दूसरों को भी देता है, वह ईश्वर को अधिक प्रिय है।


आपने एक गरीब ब्राह्मण तथा उसके परिवार की कहानी सुनी होगी। बहुत दिनों के उपवास के उपरान्त उस ब्राह्मण को अल्प अन्न प्राप्त हुआ था। ज्यों-ही वह सपरिवार भोजन करने बैठा कि भगवान् नारायण उसकी दानशीलता की जाँच करने के लिए अतिथि के रूप में प्रकट हो गये। वह ब्राह्मण, उसकी स्त्री तथा बच्चे सभी ने अतिथि को अपना-अपना भोजन दे दिया। सभी उपवास कर गये। यही सच्चा दान है। दान सहज, अबाध एवं उदार होना चाहिए। हमारे दैनिक जीवन का यह एक भाग बन जाना चाहिए। जीवन किसी भी क्षण समाप्त हो सकता है, फिर धन से चिपटे रहना तो मूर्खता ही है।


मैं आपको एक उदाहरण दूँगा। स्वर्गाश्रम में एक धनी व्यक्ति ने मन्दिर का निर्माण करवाया। उनके पास ठेके का काम था तथा वे प्रचुर रुपया कमा लेते थे। ईश्वर उनके काम से प्रसन्न था। उन्होंने चीनी की एक फैक्टरी बनायी तथा करोड़ों रुपये का अर्जन कर लिया। धीरे-धीरे उनमें आध्यात्मिक लगन बढ़ी। वे साधना करने लगे, लेकिन कोई विशेष लाभ हुआ। उनमें कुछ रोग के चिह्न प्रकट होने लगे और एक दिन उनका देहान्त हो गया। उनको रुपये का बड़ा लोभ था। उनके पास एक करोड़ रुपया था। उन्होंने कई अस्पताल खोले थे, कई धर्मार्थ कार्य किये थे, फिर भी वे बुद्धिमान् थे। बुद्धिमान् तो वही है जो अपने सारे धन को दूसरों के दुःख निवारण में लगा दे। ईश्वर ने कम-से-कम वर्तमान क्षण को तो आपके पास दिया है, इसका तो अपव्यय कीजिए। दूसरों की अधिकाधिक भलाई में अपने हर क्षण का उपयोग कीजिए। अस्पताल आदि का निर्माण करना अच्छा है। इनसे हृदय का विकास होता है। परन्तु यदि निर्धन व्यक्ति दान दे तो वह ईश्वर का प्रिय है; क्योंकि उसके पास दानशील हृदय है। जिनके पास धन है, वे अवश्य उसको खर्च करें। कल का कोई निश्चय नहीं। भले कामों को करने के लिए ही ईश्वर आपको धन देता है।

. साधना में संलग्नता


जीवन शक्ति की अभिव्यक्ति है। सारे जीवन सक्रिय हैं। आधे क्षण के लिए भी कोई वस्तु स्थिर नहीं रहती। विश्वात्म-शक्ति सदा अथक एवं अविरत रूप से काम करती रहती है। वही शक्ति एक तुच्छ परमाणु से ले कर विशाल सूर्य तक सभी में कार्य करती है। अनवरत प्रगति एवं विकास ही प्रकृति का नियम है।


हे साधक, आप भी इस विश्वात्म-शक्ति के केन्द्र हैं। कार्य तथा प्रगति आपके जीवन का भी नियम है। आपको सदा आध्यात्मिक मार्ग में बढ़ते रहना चाहिए। संकल्प-पत्र तथा दैनिक आध्यात्मिक डायरी को भर कर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। अच्छा ध्यान-गृह, मृगचर्म तथा माला को प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। ठीक है, आपने अपने जीवन में परिवर्तन लाया है। परन्तु अपने नये जीवन में आपने कहाँ तक प्रगति की है?


एक महर्षि ने एक बार कहा था, एक क्षण के लिए भी स्तब्ध खड़े होओ; क्योंकि पवित्रता और पूर्णता के मार्ग में स्तब्ध खड़ा होना मनुष्य में स्फूर्ति नहीं लाता, वरन् उसे पहले से अधिक कमजोर बना डालता है जिससे कि वह पीछे मुड़ जाये।" इसे याद रखिए। आध्यात्मिक मार्ग में दो ही बातें सम्भव हैं- उन्नति या अवनति। इसमें ठहरना कहाँ? आराम करना तो सड़ना ही है। ज्वलन्त मुमुक्षुत्व को ले कर आगे बढ़ते जाइए। उन्नति साधना-काल पर निर्भर नहीं करती। यह तो इस पर निर्भर करती है कि आपने कहाँ तक अपने पुराने विचार तथा आचार के तरीकों पर विजय प्राप्त की है, किस हद तक आपने बाह्य परिस्थितियों पर विजय प्राप्त की है। क्या आपका मन शान्त एवं सन्तुलित रहता है? क्या आप छोटे-छोटे क्रोधोद्दीपक कार्यों से अप्रभावित रहते हैं? क्या क्षमा के लिए तो अधिक, परन्तु प्रतिकार करने की कम-ऐसी आपकी प्रवृत्ति है? क्या आप अधिकाधिक साधना कर रहे हैं, या आप ईश्वरीय कृपा की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिससे आप अपने संकल्पों तथा व्रतों का पालन कर सकें? क्या आप सन्तों तथा अवतारों से आशीर्वाद-प्राप्ति की प्रतीक्षा करते हैं। आशीर्वाद तो सदा मिलते हैं; किन्तु जब तक आप वीरतापूर्वक उन्नति के लिए युद्ध नहीं करेंगे, तब तक उनका उपयोग उस व्यक्ति के लिए जूते और छड़ी के समान है जो यात्रा में चलना नहीं चाहता।


जंगल-पथ के किनारे पर्वतीय भाग में एक साधु रहते थे। वे बड़े ही अध्यवसायी थे। उन्होंने पत्थरों को एकत्रित कर एक सुन्दर कुटीर का निर्माण किया। फिर उन्होंने कुटीर के चारों ओर का स्थान साफ कर दिया, परन्तु दरवाजे के सामने एक पत्थर रख छोड़ा। उन्हें लोग पत्थर बाबा कहते थे। वे बहुत बड़े विरक्त थे। लोग उनके दर्शनों को जाते तथा आशीर्वाद की याचना करते। बाबा चुप रहते, परन्तु लोगों के अधिक जोर देने पर वे उन्हें पत्थर की कुटीर दिखा कर कहते, "देखो, यही परिश्रम का फल है।" और पुनः उस पड़े हुए पत्थर को दिखा कर कहते- "आप आशीर्वाद चाहते हैं? उस पत्थर को देखिए। वह दिन में तीन बार मेरा आशीर्वाद प्राप्त करता है, फिर भी वह पत्थर का पत्थर ही है। आशीर्वाद से पत्थर जहाँ-का-तहाँ पड़ा है; परन्तु परिश्रम से यह देखिए, सुन्दर कुटीर तैयार हो गया है।


अतः सदा बाहरी सहायता पर निर्भर रहिए। आगे बढ़ते जाइए। आवश्यकता पड़ने पर अन्तर से सहायता प्राप्त होती है। आपको बहुत दूरी तय करनी है। समय कम है। बाधाएँ अधिक हैं। दिन, महीने तथा वर्ष जल्दी-जल्दी गुजरते जा रहे हैं। हर क्षण बहुमूल्य है। अतः लक्ष्य की ओर शीघ्रतापूर्वक बढ़िए।


ईश्वर बहुत कारुणिक है। यदि आप एक कदम उसकी ओर बढ़ते हैं, तो वह दश कदम आगे बढ़ कर आपकी अगवानी करता है। यह कथन सत्य है। परन्तु पहले आपको ही एक कदम उसकी ओर बढ़ना है। आप शायद ऐसा समझते हैं कि आपकी परिस्थितियाँ प्रतिकूल हैं। तराई में रहने वाला व्यक्ति कभी भी कोहरे को साफ नहीं कर सकता। उसे थोड़ी ऊँचाई चढ़नी होगी, तभी कोहरा उसकी नजरों से दूर होगा। अतः परिस्थिति तथा कमजोरियों की चिन्ता कीजिए। स्थिर साधना के द्वारा आप आत्मज्ञान की ऊँची सीढ़ियों पर चढ़िए। अन्धकार में बैठ कर 'प्रकाश', 'प्रकाश' चिल्लाते रहना तो मूर्खता ही है। उठिए और सूर्य के प्रकाश की ओर बढ़िए।


सेवा में अग्रसर बनिए, प्रेम में विकास कीजिए, ज्ञान में उन्नति कीजिए। सेवा के लिए सुअवसर का निर्माण कीजिए। प्रतिदिन कुछ--कुछ नयी बात सीख लीजिए। ईश्वर के प्रति अधिकाधिक भक्ति का विकास कीजिए। साधना बढ़ाइए। मार्ग में संलग्न रहिए। आपकी उन्नति सतत होती रहेगी। अवनति होने का प्रश्न ही नहीं रहेगा। यही सफलता के लिए सुनिश्चित मार्ग है। कभी ठहरिए नहीं। कभी ढिलाई दीजिए। आगे बढ़ते जाइए। आप शीघ्र ही लक्ष्य को प्राप्त करेंगे।

. साधना के प्रवाह


अल्प अनुभव प्राप्त कर लेने पर ही साधना को बन्द कीजिए। तब तक अभ्यास करते जाइए, जब तक कि आप भूमा में पूर्णतः स्थित हो जायें। यह बहुत आवश्यक है। यदि अभ्यास बन्द कर आप संसार में घूमने लगेंगे, तो आपका कभी भी पतन हो सकता है। प्रबल प्रतिक्रियाएँ होगी। इसके उदाहरणों की कमी नहीं है। अनेक लोग विनष्ट हो गये हैं। एक झलक से ही आप सुरक्षित नहीं रह सकते। लोकैषणा तथा यश के प्रलोभन में पड़िए। आप स्त्री, बच्चे, माता-पिता, गृह, मित्र तथा सम्बन्धियों का परित्याग कर सकते हैं; परन्तु बौद्धिक सुख, नाम तथा यश के सुख का परित्याग करना कठिन है। मैं आपको चेतावनी देता हूँ। जो व्यक्ति आत्मा से सुख प्राप्त करता है, वह इस तुच्छ नाम-यश की जरा भी परवाह नहीं करेगा। सांसारिक व्यक्ति के लिए ही यह जगत् महान् वस्तु है। ब्रह्मज्ञानी के लिए यह जगत् तृणवत् है। ब्रह्मज्ञानी के लिए यह राई के समान, बूँद के समान तथा शून्य के समान ही है। विचारशील बनिए। सभी तुच्छ वस्तुओं की उपेक्षा कीजिए। अपने अभ्यास में स्थिर बनिए। परम-साक्षात्कार की प्राप्ति जब तक हो जाये, तब तक साधना को बन्द कीजिए। पूर्ण ब्रह्म-चैतन्य में जब तक स्थित हो जायें, तब तक साधना कदापि बन्द कीजिए।

. साधना में उन्नति के चार क्रम


साधना की उन्नति में पहली अवस्था है मन की शुद्धता, दूसरी अवस्था है धारणा-शक्ति-मन को एकाग्र करने की शक्ति बहुत ही बढ़ जाती है, तब वह अवस्था आती है जिसमें गम्भीर ध्यान लगने लगता है तथा चतुर्थावस्था में आत्म-साक्षात्कार होता है। अन्तरात्मा का सर्वव्यापक, सर्वज्ञ परमात्मा के साथ तादात्म्य हो जाता है और अन्ततः जीवात्मा असीम आत्मा में विलीन हो जाता है।



अध्याय :साधना के प्रकार

. साधन-चतुष्टय


ज्ञानयोग के मार्ग में साधन-चतुष्टय से सम्पन्न बनना पड़ता है। विवेक, वैराग्य, षट् सम्पत् तथा मुमुक्षुत्व-ये ही साधन-चतुष्टय हैं।


ईश्वर की कृपा से उस व्यक्ति में विवेक का जागरण होता है जिसने पूर्व-जन्म में निष्काम कर्म तथा बहुत से सुकर्म किये हैं। सत्य एवं असत्य, नित्य एवं अनित्य, आत्मा तथा अनात्मा के बीच भेद की पहचान करना ही विवेक है।


सर्वप्रथम आपको सत्य एवं असत्य के बीच विवेक और इहलौकिक तथा पारलौकिक भोगों के प्रति वैराग्य का विकास करना चाहिए, तभी आपको शम के अभ्यास में सफलता मिलेगी। विवेक से उत्पन्न वैराग्य ही आपकी आध्यात्मिक साधना में सहायक बन सकता है। कारण वैराग्य जो पत्नी, पुत्र तथा सम्पत्ति के विनाश से उत्पन्न होता है, स्थायी नहीं रह सकता। इससे आपको कोई लाभ नहीं। यह तो अमोनिया के समान ही उड़ जाने वाला है।


वासनाओं के सतत उन्मूलन के द्वारा शम-मन की शान्ति की प्राप्ति होती है। जब कभी आपके मन में कामनाएँ स्फुटित हों, तो उन्हें पूर्ण होने दीजिए। विवेक, विचार तथा वैराग्य के द्वारा उनका निषेध कीजिए। सतत अभ्यास से आप मन की शान्ति तथा मनोबल प्राप्त करेंगे। मन क्षीण हो जायेगा। इसकी बहिर्मुखी वृत्ति निरुद्ध हो जायेगी। यदि कामनाओं का उन्मूलन कर दिया गया, तो संकल्प स्वतः ही विनष्ट हो जायेंगे। विषयों में दोष-दर्शन के द्वारा मन विविध विषय-पदार्थों से अनासक्त हो कर ब्रह्म में स्थिर हो जाता है। शम के अभ्यास में पंच-ज्ञानेन्द्रिय कान, नेत्र, नासिका, जिह्वा तथा त्वचा को भी नियन्त्रित करते हैं।


बाह्य इन्द्रियों-पंच-कर्मेन्द्रिय, वाणी, हाथ, पैर, जननेन्द्रिय तथा गुदा का नियन्त्रण करना यम कहलाता है। ये इन्द्रियाँ विषयों से समेट ली जाती हैं तथा उनके विशेष केन्द्रों में स्थिर कर दी जाती हैं।


आँखें किसी वस्तु को देखने के लिए बाहर दौड़ती हैं। यदि आप तुरन्त उस वस्तु से आँखों को मोड़ लें तो यह दम है। दम के द्वारा आपको अपनी अन्य इन्द्रियों का भी दमन करना चाहिए।


कुछ लोग कहते हैं- "दम का अभ्यास आवश्यक नहीं है। यह शम में ही सन्निहित है। इन्द्रियाँ स्वतन्त्र काम नहीं कर सकतीं। वे मन के सहयोग से ही काम करती हैं। यदि मन को वश में कर लिया गया, तो इन्द्रियाँ स्वतः ही नियन्त्रित हो जायेंगी।"


यदि दम का भी अभ्यास किया गया, तो मन सुगमता से वश में जायेगा। शत्रु को भीतर तथा बाहर-दोनों ओर से मारना चाहिए। इस प्रकार वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यदि अन्तर्बाह्य दोनों ही दरवाजे बन्द कर दिये गये, तो वह शीघ्र ही पकड़ में जाता है। भागने के लिए कोई मार्ग ही नहीं रह जाता। दम के अभ्यास से आप इन्द्रिय तथा मन को किसी भी विषय के सम्पर्क में आने नहीं देते। आप मन को बाह्य इन्द्रियों से-जैसे आँख से कर वस्तु को आकार धारण करने नहीं देते। नये साधकों में शम का उग्र अभ्यास करने पर भी मन आत्म-स्थित नहीं हो पाता। यह बाह्य वस्तुओं की ओर दौड़ने की कोशिश करता है। दम का अभ्यास करने पर मन को शीघ्र ही वश में कर लिया जाता है। यदि किसी उपद्रवी लड़के के हाथ को आप बाँध दें, तो वह पाँव से उत्पात करने की कोशिश करेगा; परन्तु यदि पैरों को भी बाँध दें, तो वह शान्त हो जायेगा। शम के द्वारा हाथों को बाँधते हैं और दम के द्वारा पैरों को; अतः दम का अभ्यास आवश्यक है।


ज्ञानयोग के साधक के लिए दम का अभ्यास है। प्रत्याहार दम के ही समान है। राजयोगी प्रत्याहार का अभ्यास करता है। शम के बाद दम की बारी आती है। प्राणायाम के बाद प्रत्याहार की बारी आती है। ज्ञानयोग के अभ्यास में मन को शान्त अथवा निरुद्ध कर इन्द्रियों को समेट लेते हैं। राजयोग में प्राण का निरोध कर इन्द्रियों को समेट लेते हैं। प्राण तथा मन दोनों के नियन्त्रण से इन्द्रियाँ शीघ्र ही विषयों से हट जायेंगी। मन ही इन्द्रियों को गतिशील करता है। प्राण इन्द्रियों को स्फूर्ति प्रदान करता है। शम तथा दम वास्तव में राजयोग के अभ्यास हैं।


अब हम उपरति का वर्णन करेंगे। कुछ लोग सारे कर्मों का त्याग तथा संन्यास-ग्रहण को उपरति कहते हैं। शम तथा दम के बाद उपरति की बारी आती है। उपरति आत्मा का अन्तर्मुख होना है। बाह्य विषयों के द्वारा मन कार्य करना बन्द कर देता है। उपरति प्रत्याहार की सीमा है। इसमें मन विषय-भोगों से मुड़ जाता है।


सुन्दर वस्तु को देखने पर भी उपरति में स्थित साधक का मन जरा भी उद्विग्न नहीं होगा, जरा भी आकर्षित होगा। वह स्त्री, वृक्ष तथा काष्ठ-सबकी ओर एक-सी दृष्टि रखेगा। सुस्वादु भोजन की ओर देखते हुए भी उसको प्रलोभन होगा। उसे किसी विशेष वस्तु की ओर तृष्णा रहेगी। वह ऐसा कदापि कहेगा, “मैं अमुक पकवान चाहता हूँ।" जो-कुछ भी उसके समक्ष रख दिया जाये, वह उसी से सन्तुष्ट हो जाता है। विवेक, वैराग्य, शम तथा दम के अभ्यास से उसे मनोबल की प्राप्ति होती है। मनोबल के कारण ही ऐसा सम्भव है। उपर्युक्त अभ्यासों से मन अपूर्व शान्ति तथा आध्यात्मिक सुख का अनुभव करता है। वह भ्रामक अल्प सुखों को नहीं चाहता। यदि आपके पास मिश्री है, तो आपका मन छोओं की ओर नहीं दौड़ेगा। मन को ऊँचे प्रकार के सुख का स्वाद चखा कर उसे निम्न प्रकार के सुखास्वादन से उपरत कर सकते हैं। यदि आप गाय या बैल को बिनौले की खली दें, तो वह घास-भूसे की ओर नहीं दौड़ेगा। मन भी बैल के समान ही है।


ब्रह्मचर्य के अभ्यासियों को शम, दम तथा उपरति का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए, तभी वे ब्रह्मचर्य-पालन में स्थित हो सकते हैं।


सहन करने की शक्ति तितिक्षा है। तितिक्षु व्यक्ति कष्ट, अपमान, गरमी तथा सर्दी को सहन कर सकता है। वह सारी व्यथाओं से मुक्त है। वह इनके कारण अशान्त नहीं होता।


ब्रह्म के अस्तित्व, गुरु तथा शास्त्रों के उपदेश तथा अपनी आत्मा में अविचल विश्वास ही श्रद्धा है। यदि किसी में उपर्युक्त साधना की सम्पन्नता है, तो उसे समाधान या मन की एकाग्रता तथा मुमुक्षुत्व मुक्ति प्राप्ति की ज्वलन्त कामना की प्राप्ति होगी। मन स्वभावतः सदा अन्तरात्मा की ओर मुड़ेगा। साधक को अब किसी ब्रह्मश्रोत्री, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना, श्रुतियों का श्रवण, तदनन्तर मनन तथा 'तत्त्वमसि' महावाक्य के लक्ष्यार्थ पर सतत निदिध्यासन का अभ्यास करना चाहिए। उसे आत्म-साक्षात्कार मिलेगा।


यदि आपमें विवेक है, तो वैराग्य स्वतः ही जायेगा। यदि आपमें विवेक, वैराग्य तथा शम हैं, तो दम स्वतः ही जायेगा। यदि आपमें शम तथा दम हैं, तो उपरति स्वतः ही प्राप्त होगी। यदि आपमें उपर्युक्त सभी मौजूद हैं तो तितिक्षा, श्रद्धा तथा समाधान (एकाग्रता) स्वतः ही जायेंगे। यदि आपमें विवेक, वैराग्य, शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा तथा समाधान हैं, तो मुमुक्षुत्व स्वतः प्रकट होगा।


जीवन्मुक्त की भी आँखें स्वभाववश वस्तुओं की ओर जायेंगी; परन्तु यदि वह चाहे, तो आँखों को पूर्णतः समेट कर उन्हें खाली नेत्र-गोलक के रूप में भी रख सकता है। जब वह किसी स्त्री को देखता है तो वह उसे अपने से अलग नहीं देखता। वह समस्त जगत् को अपने भीतर देखता है। वह स्त्री को भी अपनी आत्मा ही जानता है। उसमें लिंग-विचार नहीं है। उसके मन में बरे विचार नहीं हैं। उसे उस स्त्री के प्रति कामुक आकर्षण नहीं, जब कि सांसारिक व्यक्ति स्त्री को अपने से अलग देखता है। वह कामुक विचारों को रखता है। उसे आत्मा का ज्ञान नहीं है। वह उसकी ओर आकृष्ट हो जाता है। ज्ञानी तथा संसारी जन की दृष्टि में यही अन्तर है। स्त्री की ओर देखने में कोई हानि नहीं है; परन्तु आपको उसके प्रति बुरे विचार नहीं लाने चाहिए। ऐसा भाव बनाइए कि स्त्री माँ काली की अभिव्यक्ति है। भान कीजिए कि स्त्री की सुन्दरता ईश्वर की ही सुन्दरता है। भान कीजिए कि सारे रूप ईश्वर की ही मूर्ति हैं। आपका मन उन्नत हो जायेगा।


कुछ साधक पूछते हैं, "क्या हमें विवेक, वैराग्य आदि का क्रमशः अभ्यास करना चाहिए या सभी का एक-साथ ? यदि हम एक-एक कर अभ्यास करें तो इस जीवन में एक या दो अंगों पर भी प्रभुत्व होना शायद ही सम्भव है। सभी अंगों पर पूर्ण अधिकार करने में तो कई जन्म लग जायेंगे। जीवन बहुत अल्प है। हम क्या करें?" यह साधक की रुचि तथा क्षमता पर निर्भर करता है। कुछ एक-एक कर अंगों को पूर्ण करते हैं। कुछ लोग सभी अंगों का एक बार ही अभ्यास करते हैं। छह महीने तक विवेक, वैराग्य तथा शम के अभ्यास में अपने मन को लगाइए। दूसरे छह महीने में श्रद्धा, समाधान तथा मुमुक्षुत्व के अर्जन में लग जाइए। उस सद्गुण के विकास में अधिक समय लगाइए जिसकी आपमें कमी हो। यदि आप अपने प्रयास में सच्चे हैं, तो आप साधन-चतुष्टय का विकास कर इसी जन्म में आत्म-साक्षात्कार कर सकते हैं।


दूसरा साधक कहता है, "स्वामी जी, इन साधन-चतुष्टय-विवेक, वैराग्यादि की कोई आवश्यकता नहीं। यह तो लम्बा तथा जटिल मार्ग है। मैं तो कई जन्मों में भी उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता हूँ। संक्षिप्त मार्ग तो सदा ब्रह्म-चिन्तन करते रहना है। सारे सद्गुण स्वतः ही जायेंगे। तब मैं गम्भीर ध्यान कर सकूँगा।" वह ठीक कहता है। प्रथम श्रेणी का साधक इस तरीके को व्यवहार में लाये, क्योंकि अपने पिछले जन्म में ही उसने साधन-चतुष्टय का अभ्यास कर लिया है। मध्यम श्रेणी का साधक प्रारम्भ में ही ब्रह्म-चिन्तन नहीं कर सकता है। जब मन मलों से भरा हुआ हो, इन्द्रियाँ उपद्रवी हों, तो फिर ब्रह्म-चिन्तन कैसे होगा? यह असम्भव है। वह ब्रह्म-चिन्तन के लिए बैठेगा, उसका मन आकाश-महल बनाने लगेगा, उसका मन विषय-चिन्तन में निरत रहेगा। वह मूर्खतावश इसी को निर्विकल्प समाधि समझ बैठेगा। गम्भीर निद्रा ही उसे समाधि जान पड़ेगी। बहुत से लोग इस भ्रम में पड़ जाते हैं। उनकी कुछ भी आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती। उन्हें जरा भी ब्रह्म-तत्त्व का ज्ञान नहीं होता। जो मन विवेक, वैराग्य, शम, दम आदि से शुद्ध बन गया है, वही ब्रह्म को निश्चित रूप से जान सकता है। अशान्त, मलिन मन में ब्रह्म-विचार नहीं टिक सकता।


आप सभी विवेक, वैराग्य, शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान तथा मुमुक्षत्व के अभ्यास से ब्रह्मज्ञान में निमग्र हो जायें।


. सरल साधना


मनुष्य तीन घटकों का मिश्रण है- मानवी तत्त्व, पाशवी वृत्ति तथा ईश्वरीय किरण। उसके पास सीमित बुद्धि, नश्वर शरीर, अल्प ज्ञान तथा अल्प शक्ति है। यही उसका मानवी रूप है। काम, क्रोध, द्वेषये उसकी पाशवी प्रकृति हैं। उसकी बुद्धि में विश्वात्म-चैतन्य का प्रतिबिम्ब है; अतः वह ईश्वर की मूर्ति है। जब पाशवी वृत्ति विनष्ट हो जाती है, जब अविद्या को ध्वस्त कर दिया जाता है, जब वह अपमान एवं आघात सहने में सक्षम हो जाता है, तब वह दिव्य बन जाता है।


वही मुमुक्षु साधक है जो आत्म-त्याग का अभ्यास करता है। वह सदा इसका अभ्यास करता है कि शरीर उसका नहीं है। यदि कोई व्यक्ति उसको पीटे, उसका गला काट ले, तो भी उसे शान्त रहना चाहिए। उसे एक भी कटु शब्द नहीं कहना चाहिए, क्योंकि शरीर उसका नहीं है। वह इस साधना का आरम्भ करता है, "मैं शरीर नहीं हूँ। मैं मन नहीं हूँ। चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।"


एक कटु शब्द ही मनुष्य को असन्तुलित बना देता है। अल्प अनादर ही उसे अशान्त कर देता है। वह कई दिनों तक इसकी चिन्ता रखता है। विद्वत्ता, बुद्धि, समाज में उच्च स्थान, पद, डिग्री आदि रखते हुए भी मनुष्य कितना दुर्बल है?


अपमान सहो। नुकसान सहो। यही सारी साधना का सारांश है। यही प्रमुख साधना है। यदि आप इस एक साधना में सफल बन जायें, तो निश्चय ही आप निर्विकल्प समाधि के असीम सुख को प्राप्त करेंगे। यह सबसे कठिन साधना है; परन्तु जिनमें ज्वलन्त वैराग्य तथा मुमुक्षुत्व है, उनके लिए यह बहुत सुगम है।


आपको चट्टानवत् बन जाना चाहिए। तभी आप इस साधना में स्थित हो सकते हैं। गाली, मजाक, व्यंग, अपमान तथा शारीरिक कष्ट कुछ भी आपको प्रभावित नहीं कर सकेगा।


भगवान् जीसस के उपदेशों को याद रखिए: "यदि कोई व्यक्ति एक गाल में थप्पड़ मारे, तो दूसरा गाल भी उसके आगे कर दो। यदि कोई आपका कोट ले ले, तो उसे अपनी टोपी भी दे डालो।" यह उपदेश कितना महान् है! यदि आप इसका पालन करेंगे, तो आपको महान् आध्यात्मिक बल तथा तितिक्षा की प्राप्ति होगी। इससे आप दिव्य बन जायेंगे। इससे आपके विरोधी की भी प्रकृति परिवर्तित हो जायेगी।


श्रीमद्भागवत के नवें स्कन्ध में अवन्ती ब्राह्मण की कथा पढ़िए। आप प्रेरणा तथा बल प्राप्त करेंगे। इस ब्राह्मण के ऊपर पाखाना फेंका गया, लोगों ने थूक फेंका, फिर भी वह अविचल रहा। एक मुसलमान ने सन्त एकनाथ के ऊपर एक सौ आठ बार थूका, फिर भी वे जरा भी प्रभावित हुए। सभी सन्त तथा पैगम्बरों में तितिक्षा होती है। लोगों ने पैगम्बर मुहम्मद के ऊपर पत्थर बरसाये तथा ऊँटनी के गर्भाशय को उनके शिर के ऊपर फेंका, फिर भी हजरत मुहम्मद शान्त बने रहे। यहूदियों ने भगवान् जीसस के शरीर में कीलें गार्डी, उनके साथ तरह-तरह से दुर्व्यवहार किया गया। उन्होंने शान्त रह कर उन सभी को सहन किया और बदले में उन आतताइयों को आशीर्वाद दिया। क्रास पर चढ़ाये जाने पर भी उन्होंने कहा : "हे प्रभु, इन लोगों को क्षमा कर दो। वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।" प्रभु जीसस के 'शर्मन आन दी माउंट' (पर्वत पर के उपदेश) को बारम्बार पढ़िए।


ईश्वर सभी साधकों की जाँच करेगा और एक समय आयेगा, जब सभी साधकों को चरम आपत्ति झेलनी पड़ेगी; परन्तु इन जाँचों से वे बहुत ही शक्तिशाली हो जायेंगे। उन्हें सदा इन जाँचों एवं कष्टों को झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए।


आपमें अपूर्व धैर्य एवं तितिक्षा का विकास होना चाहिए। आपको अपने अहंकार, मद तथा देहाभिमान को विनष्ट करना होगा, तभी आप अपमान तथा नुकसान को सह सकेंगे।


प्रारम्भ में भौतिक भावनाओं तथा प्रतिक्रियाओं के नियन्त्रण का अभ्यास कीजिए। उलाहना दीजिए। अश्लील शब्द बोलिए। बदला लीजिए। बदला लेने की भावना को मार डालिए। वाणी, विचार तथा कार्यों में आवेग को रोकिए। आप धीरे-धीरे नियन्त्रण में सफल होंगे। नियमित जप, ध्यान, कीर्तन, प्रार्थना, विचार, एकान्त सेवन, सत्संग, निष्काम सेवा, मौन, आसन, प्राणायाम आदि के अभ्यास से आप अपार आत्म-बल प्राप्त करेंगे। आप अपमान तथा नुकसान सहने में समर्थ हो जायेंगे। आपकी इच्छा-शक्ति प्रबल होगी।


. महत्त्वपूर्ण साधना


नमक, खटाई तथा इमली के अत्यधिक व्यवहार से अधिक उत्तेजना एवं क्रोध का आवेग होता है; अतः इन तीन वस्तुओं का पूर्णतः परित्याग कीजिए या इन्हें स्वल्प मात्रा में ग्रहण कीजिए।


अल्प बोलिए। सदा मधुर बोलिए। कटु तथा अश्लील शब्द बोलिए। वाणी का बारम्बार नियन्त्रण कीजिए। जब दूसरे गाली दें, तो शान्त रहिए।


विचार कीजिए। गाली कुछ भी नहीं है। यह शब्द-जाल है। जो गाली देता है, वह अपनी शक्ति का अपव्यय करता है तथा जिह्वा एवं चरित्र को बिगाड़ता है।


मन अत्युक्ति करता है। कल्पना आपको कष्ट पहुँचाती है। आप व्यर्थ ही कल्पना करने लगते हैं कि अमुक व्यक्ति आपको हानि पहुँचाना चाहता है। वास्तव में तो वह व्यक्ति निर्दोष ही है। वह आपका मित्र तथा हितैषी है। मन अत्युक्ति तथा कल्पना के द्वारा बहुत नुकसान पहुँचाता है।


सास बेकार की कल्पना करने लग जाती है कि बहू उसका अनादर कर रही है। बहू भी यह कल्पना कर लेती है कि सास उसके प्रति दुर्व्यवहार कर रही है। हर गृह में नित्य ही सास-बहू में झगड़ा होता रहता है। व्यवस्थापक व्यर्थ ही यह कल्पना कर लेता है कि अधिकारी उसके प्रति दुर्व्यवहार कर रहा है। किरानी भी कल्पना कर लेता है कि उसका आफिसर उसके साथ उचित व्यवहार नहीं कर रहा है; अतः वह अपने आफिसर से द्वेष रखता है। यह माया का जादू है। यह सब मन का खेल है। सावधान! मन के खेलों को समझिए। ज्ञानी बनिए। विवेक करना सीखिए। निष्काम सेवा करना सीखिए।


दलबन्दी कीजिए। दल में सम्मिलित होइए। उदासीन रहिए। अकेले रहिए। साधुओं एवं महात्माओं की संगति कीजिए। जप, प्रार्थना तथा ध्यान के द्वारा अपनी अन्तरात्मा की संगति कीजिए।


जो आपको शाप दे, उसे आशीर्वाद दीजिए। जो कष्ट पहुँचाये, उस मनुष्य के लिए प्रार्थना कीजिए। उस मनुष्य की सेवा कीजिए जो आपकी निन्दा करे। उस मनुष्य से प्रेम कीजिए जो आपको हानि पहुँचाना चाहता हो। सभी को गले लगाइए। सभी की सेवा कीजिए। सभी से प्रेम कीजिए। आत्म-भावनारायण-भाव का विकास कीजिए। राग-द्वेष स्वतः ही विनष्ट हो जायेंगे।


आदर तथा मान का परित्याग कीजिए। इसे विष्ठा या विष के तुल्य समझिए। अनादर तथा अपमान को आभूषण समझिए। ऊँचे पद तथा स्तुतिमय शब्दों की अपेक्षा रखिए। फूलदार गद्दियों पर बैठिए। जमीन पर बैठिए। गौरांग महाप्रभु उस स्थान पर बैठते थे, जहाँ जूते रखे जाते थे। नम्र बनिए। उन सेवा कार्यों को कीजिए जिन्हें संसार के लोग हेय दृष्टि से देखते हैं, परन्तु जो वास्तव में ईश्वर की पूजा तथा कर्मयोग हैं। अन्तिम भोजन के समय जीसस ने अपने शिष्यों के चरण धोये तथा उन्हें जूते पहनाये। त्रिलोक के स्वामी भगवान् कृष्ण ने राजसूय यज्ञ के समय अतिथियों के चरण धोये। इन बातों को सदा याद रखिए। इससे आप नम्र बनेंगे।


अपने मन तथा भावनाओं का नित्य निरीक्षण कीजिए। सावधान रहिए। शनैः-शनैः धैर्य का विकास कीजिए। बढिए। उन्नति कीजिए। विकास कीजिए। अवन्ती ब्राह्मण, एकनाथ या जीसस के समान आध्यात्मिक बल से युक्त बनिए तथा आत्मा में शान्तिपूर्वक विश्राम कीजिए।


अपमान तथा नुकसान सहने के लिए ईश्वर आपको आन्तर आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करे ! आप जीवन्मुक्त बन जायें!

. अन्तरंग-साधना


निष्काम कर्मयोग बहिरंग साधना है। यह आपको 'अहं ब्रह्मास्मि' के निदिध्यासन लिए तैयार बनाता है। साधन-चतुष्टय की अपेक्षा कर्मयोग बहिरंग साधन है। श्रवण की अपेक्षा साधन-चतुष्टय बहिरंग है। मनन की अपेक्षा श्रवण बहिरंग है। निदिध्यासन की अपेक्षा मनन बहिरंग है। 'अहं ब्रह्मास्मि' तथा इसके अर्थ पर गम्भीर ध्यान करना ही निदिध्यासन है। पतंजलि महर्षि के अष्टांगयोग में भी बहिरंग तथा अन्तरंग साधनाएँ हैं। यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार बहिरंग साधनाएँ हैं। धारणा, ध्यान तथा समाधि अन्तरंग साधनाएँ हैं।

. सदाचार-साधना


. आत्मा एक ही है। सभी भूतों में एक ही चैतन्य है। सारे जीव एक ही परमात्मा के प्रतिबिम्ब हैं। जिस प्रकार सारे जलपूर्ण पात्रों में एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है, उसी प्रकार एक ही परमात्मा सभी मनुष्यों में प्रतिबिम्बित हो रहा है। एक अनेक नहीं हो सकता। एक अनेक प्रतीत होता है। अनेक मिथ्या है। पृथकता अस्थायी है। एकता सत्य है। सभी भूतों में एक ही जीवन स्पन्दित हो रहा है। पशु, पक्षी तथा मानव में जीवन एक ही है। अस्तित्व एक ही है। यही उपनिषदों की घोषणा है। धर्म का यह मूल सत्य सदाचार का आधार है। यदि आप किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुँचाते हैं, तो आप अपनी ही हानि करते हैं। यदि आप किसी व्यक्ति की सहायता करते हैं, तो यह आपकी ही सहायता है। अज्ञान के कारण एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति हो हानि पहुँचाता है। वह सोचता है कि दूसरे व्यक्ति उससे पृथक् हैं; अतः वह दूसरों को हानि पहुँचाता है। इससे वह स्वार्थी, लोभी और अभिमानी बना रहता है। यदि आप इसकी चेतना रखते हैं कि एक ही आत्मा सभी भूतों में व्याप्त है तथा सभी भूत एक ही आत्मा में वैसे ही ग्रथित हैं जिस प्रकार एक ही सूत्र में पुष्प पिरोये रहते हैं; फिर आप किसी को कष्ट कैसे पहुँचा सकते हैं।


. हममें से कौन ईश्वर अथवा दिव्य जीवन के सत्य के विषय में जानने के लिए उत्कण्ठा रखता है? हम इन प्रश्नों की जिज्ञासा रखते हैं: "इम्पीरियल बैंक में आपके कितने रुपये हैं? किसने मेरे विरुद्ध कहा? क्या आप जानते हैं कि मैं कौन हूँ? आपके स्त्री-बच्चे कैसे हैं?" परन्तु हम ऐसे प्रश्नों की जिज्ञासा नहीं रखते: "मैं कौन हूँ? यह संसार क्या है? मैं कहाँ से आया हूँ? मैं कहाँ जाऊँगा? ईश्वर कौन है? ईश्वर के विशेषण क्या हैं? ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध क्या है? मोक्ष कैसे प्राप्त किया जाये? मोक्ष का स्वरूप क्या है?"


. अपने प्रति तथा अपने वातावरण एवं कार्यों के प्रति चिन्तन करना ही सदाचार का प्रारम्भ है। काम करने से पहले थोड़ा ठहर कर विचार कर लेना आवश्यक है। अपने कर्तव्यों को पहचान कर यदि आप सच्चाईपूर्वक उनका पालन करें, तो आपकी उन्नति होगी; आपकी शान्ति एवं सम्पत्ति की वृद्धि होगी, आपके सुख अधिक शुद्ध होंगे तथा आपके भोग तथा मनोरंजन अधिक शिष्ट होंगे। सुख छाया के समान है। इसके पीछे पड़ने से यह भागता जाता है। यदि मनुष्य इसके पीछे पड़ कर अपना कर्तव्य पालन करता है, तो वह सर्वत्र शुद्ध एवं शिष्ट सुख को प्राप्त करेगा। यदि वह सुख के पीछे पड़े, तो सुख उसके पीछे पड़ेगा।


. सुख की शुद्धता तथा वृद्धि भी सदाचार का चरम लक्ष्य नहीं है; क्योंकि बुद्धि की वृद्धि के साथ-साथ मनुष्य के दुःख तथा अशान्ति की वृद्धि होती जाती है। सारे अस्तित्व का सारांश है प्रगति अथवा नये आदर्शों का सतत साक्षात्कार। अतः सदाचार का लक्ष्य मनुष्य के अस्तित्व को ऊपर उठाना है, उसे सुख-दुःख के आवेगों से ऊपर उठाना है।


. सुकरात का वचन, 'सदाचार ही ज्ञान है' नैतिक जीवन की सम्यक् व्याख्या है। "ठीक क्या है?" इसकी जानकारी एक वस्तु है। उसे व्यवहार में लाना दूसरी वस्तु है। बुद्धि के आदेश के विरुद्ध कामनाएँ काम करती हैं। मनुष्य आसान मार्ग को ग्रहण कर लेता है। बुद्धि के आदेश पर चलने के लिए सहनशीलता की आवश्यकता है, कामनाओं का परित्याग करना होगा। बौद्धिक ज्ञान मात्र ही सदाचार को परिपक्व नहीं बनाता; अतः इच्छा-शक्ति को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है जिससे वह बुद्धि के आदेश पर चले तथा कामनाओं का परित्याग कर सके।


. शुद्ध बुद्धि मनुष्य को उस कार्य के लिए प्रेरित करती है जो श्रेष्ठ है। मनुष्य की आसुरी प्रकृति उसके विरुद्ध संग्राम करती है। जिस मनुष्य में नैतिक अनुशासन नहीं है, उसके आवेग उसकी बुद्धि के विरुद्ध काम करते हैं। सारे सलाह, उपदेश, डाँट-फटकार इस बात को प्रमाणित करते हैं कि मनुष्य अपनी निम्न प्रकृति को बुद्धि के अधीन ला सकता है।


. आत्म-निर्भरता ही सदाचार का आधार है। यही कारण है कि सारे उपदेशकों तथा पैगम्बरों ने अपने अन्दर ईश्वर को पहचानने की आवश्यकता बतलायी है। आत्म-निर्भरता ही शिष्टाचार का आधार है।


. जिस मनुष्य के जीवन में आदर्शों एवं सदाचार के मूल्यों की प्रधानता है, उसमें आत्म-संयम सबसे अधिक रहेगा। सदाचार का चरम लक्ष्य आत्म-संयम ही है। मनुष्य की सारी प्रकृति को अनुशासित करना चाहिए। हर तत्त्व को विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। अनुशासन से आत्म-विरोधी तत्त्वों का दमन होता है। आत्म-संयम से साधक सत्य को जानने, शुभेच्छा की वृद्धि करने तथा आत्म-साक्षात्कार में समर्थ बन जाता है।


. शास्त्रीय आधार पर उपदेश तथा अभ्यास के द्वारा अपनी कामनाओं को प्रशिक्षित करना ही अनुशासन है। आपको केवल बुद्धि को ही नहीं, वरन् संकल्प तथा आवेगों को भी अनुशासित करना चाहिए। अनुशासित व्यक्ति अपने कर्मों को नियन्त्रित करेगा। वह आवेग के वशीभूत नहीं होगा। वह इन्द्रियों का गुलाम नहीं रहेगा। ऐसा प्रभुत्व एक दिन के प्रयास का परिणाम नहीं है। सतत अभ्यास तथा नित्य आत्मानुशासन के द्वारा ही मनुष्य इस शक्ति को प्राप्त कर सकता है। आवेगों की माँग को इनकार करने की कला सीखनी होगी। आत्म-संयमित मनुष्य ऐसे बुरे कर्मों से स्वयं को रोकता है जिन कर्मों में सांसारिक लोग फँसे हुए हैं।


. मौन-साधना


मौन-साधना का शैक्षणिक विवेचन


मौन चुप रहने का एक व्रत है। आध्यात्मिक जीवन के लिए यह परमावश्यक है। व्यर्थ बकवास में बहुत अधिक शक्ति का अपव्यय हो जाता है। सारी शक्ति को ओज-शक्ति में परिणत करना होगा। इससे आपको ध्यान में सहायता मिलेगी।


यदि परिस्थितियाँ मौन के अनुकूल हों तो लम्बी बातें, बेकार की बातें और सभी प्रकार के विवादों एवं बहस आदि से जहाँ तक बन सके, बचिए। यदि मौन के द्वारा आप अपनी शक्ति को सुरक्षित रखेंगे, तो यह ओज-शक्ति में परिणत हो कर आपकी साधना में अधिक सहायक होगी। छान्दोग्योपनिषद् के अनुसार वाणी तेजोमय है। अग्नि का स्थूल भाग हट्टी का मध्यम भाग मज्जा का तथा सूक्ष्म भाग वाणी का निर्माण करता है। अत: वाणी बड़ी शक्तिशाली है। इसे याद रखिए। एक साल या छह महीने के लिए मौनव्रत रखिए। यदि आप छह महीने के लिए मौन व्रत नहीं रख सकते तो सप्ताह में कम-से-कम एक दिन इस व्रत को रखिए। श्री कृष्णाश्रम महाराज जैसे महात्माओं मे आपको प्रेरणा लेनी चाहिए। वे हिमालय के बरफीले प्रदेशों में आठ वर्षों से नंगे ही रहते हैं। वे आठ वर्षों से काष्ठ-मौन का पालन कर रहे हैं। काष्ठ-मौन में आपको दूसरों से संकेत द्वारा अथवा लेखनी द्वारा भी बातें नहीं करनी चाहिए।


इन्द्रियों के मौन हो जाने पर इसे इन्द्रिय-मौन या कारण-मौन कहते हैं। यदि शरीर को स्थिर रखें, तो इसे काष्ठ-मौन कहते हैं। सुषुप्ति में सुषुप्ति-मौन रहता है। द्वैत तथा नानात्व के अन्त होने पर, वृत्तियों के निरोध होने पर ही वास्तविक मौन की प्राप्ति होती है। यही महामौन है। यही परब्रह्म है।


मौन-साधना का महत्त्व


यदि आप गम्भीर ध्यान का अभ्यास तथा शीघ्र आत्म-साक्षाकार प्राप्त करना चाहते हैं, तो ये पाँच वस्तुएँ अनिवार्य हैं मौन, मिताहार या दूध-फल का आहार, मनोरम स्थान में एकान्तवास, गुरु का व्यक्तिगत सम्पर्क तथा ठण्ढी जलवायु।


वाक् इन्द्रिय माया का सबल अस्त्र है जिससे जीवों के मन विक्षिप्त हो जाया करते हैं। इस उपद्रवी इन्द्रिय के कारण झगड़े तथा युद्ध हुआ करते हैं। यदि आपने इस इन्द्रिय को नियन्त्रित कर लिया तो आपका आधा मन नियन्त्रित हो चुका है।


वाक् इन्द्रिय बहुत ही उपद्रवी तथा हठी है। इसका दमन स्थिरतापूर्वक शनैः शनैः करना चाहिए। इसको नियन्त्रित करने के लिए प्रयास करने पर यह आप पर द्विगुणित राक्ति से आक्रमण करेगी। आपको वीर तथा साहसी होना चाहिए।


वाक् इन्द्रिय द्वारा मन की किसी भी बात को बाहर निकलने दीजिए। मौन-व्रत रखिए। इससे सहायता मिलेगी। इससे अशान्ति के बहुत बड़े कारण को आपने बन्द कर डाला है। आप अब शान्ति में निवास करेंगे। ईश्वर पर ध्यान कीजिए।


वाक् इन्द्रिय का दमन कारण-मौन है। शारीरिक क्रियाओं का पूर्ण निरोध काष्ठ-मौन है। वाक्-मौन तथा काष्ठ-मौन में मानसिक वृत्तियों का निरोध नहीं होता। काष्ठ-मौन में आपको शिर भी नहीं हिलाना चाहिए। आपको किसी तरह का संकेत भी नहीं करना चाहिए। आपको किसी पत्र पर कुछ लिख कर व्यक्त नहीं करना चाहिए।


महामौन की प्राप्ति में वाक्-मौन सहायक है। महामौन में मन सच्चिदानन्द ब्रह्म में विश्राम करता है। सारी वृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं। मौन से शक्ति की सुरक्षा, संकल्प-बल की वृद्धि तथा वाणी के आवेगों का नियन्त्रण होता है। सत्य के अभ्यास में तथा क्रोध के दमन में यह बहुत ही सहायक है।


जीवन्मुक्त में ब्रह्मानन्द का सुख सुषुप्ति-मौन है। संसार तथा इसके गुणों के मिथ्या स्वरूप के ज्ञान से मन में सारी शंकाओं का विनष्ट हो जाना सुषुप्ति-मौन है। इसका निश्चय कि यह जगत् ब्रह्म से परिपूर्ण है, सुषुप्ति-मौन है। सबके प्रति सम दृष्टि तथा सत्-असत् एवं सभी में चिदाकाश का अनुभव सुषुप्ति-मौन है।


साधना के प्रारम्भ में ब्रह्मवादियों को भी वाक्-मौन का अभ्यास करना चाहिए। मिथ्या अहंकार तथा अभिमान से फूल नहीं जाना चाहिए। 'मैं वेदान्ती हूँ', 'मेरे लिए वाक्-मौन की कोई आवश्यकता नहीं है।' वेदान्ती के लिए भी वाक् - मौन बहुत सहायक है। यदि आप काष्ठ-मौन कर सकें, तो वाक्-मौन से प्रारम्भ कीजिए।


मौन-व्रत रखने वाले को जप, ध्यान तथा मन्त्र लेखन में संलग्न रहना चाहिए। उसे दूसरों से नहीं मिलना चाहिए। उसे कमरे से बार-बार बाहर नहीं आना चाहिए। वाणी की शक्ति को आध्यात्मिक शक्ति में रूपान्तरित कर उसे ध्यान में लगाना चाहिए। तभी आप शम, शान्ति तथा आन्तर आध्यात्मिक बल का अनुभव कर सकते हैं।


आपको अनुभव करना चाहिए कि आप मौन-व्रत से बहुत लाभ उठायेंगे तथा अधिकाधिक शान्ति, आन्तरिक बल तथा सुख का अनुभव करेंगे। तभी आप मौन-व्रत के पालन में दिलचस्पी लेंगे। तभी आप एक शब्द भी बोलने का प्रयास करेंगे। दूसरों की नकल के लिए अथवा बलपूर्वक मौन करने से तो आप अशान्त एवं उदास रहेंगे।


मौन के समय आप अच्छी तरह अन्तर्निरीक्षण तथा आत्म-विश्लेषण कर सकते हैं। आप अपने विचारों को देख सकते हैं। आप मन के तरीके तथा उसके कार्यों को समझ सकेंगे। आप यह देख पायेंगे कि मन किस तरह एक मिनट में ही एक वस्तु से दूसरी वस्तु की तरफ दौड़ता रहता है। मौन के अभ्यास से आपको बहुत लाभ होगा। मन का मौन ही वास्तविक मौन है। वाणी का मौन अन्त में मन के मौन की ओर ले जायेगा।


मौन से आत्म-बल की वृद्धि होती है। यह संकल्पों को रोकता, वाणी के आवेगों का दमन करता तथा मन को शान्ति प्रदान करता है। आपमें तितिक्षा बढ़ेगी। आप झूठ नहीं बोल सकेंगे। आपको वाणी के ऊपर विजय प्राप्त होगी।


मौन सत्य के पालन तथा क्रोध के दमन में बहुत ही सहायक है। इससे आवेगों का नियन्त्रण होता तथा चिड़चिड़ापन बन्द हो जाता है। मौनी व्यक्ति नपे-तुले शब्द बोलता है तथा उसकी वाणी बहुत ही प्रभावशाली होती है। साधारण लोगों में वाणी पर जरा भी नियन्त्रण नहीं रहता। मौनी पहले सोच लेता है कि उसके शब्द दसरों की भावना पर आघात पहुँचायेंगे या नहीं तथा उनसे दूसरों पर कैसा प्रभाव पड़ेगा। वह अपनी वाणी में बड़ा सावधान रहता है। वह बहुत विचारशील होता है। अपने मुँह से निकालने के पहले वह अपने प्रत्येक शब्द को तोल लेता है। मौनी एकान्त में भी बहुत दिनों तक रह सकता है। सांसारिक बातूनी आदमी कुछ घण्टों के लिए भी एकान्त में नहीं रह सकते। वे सदा संगति चाहते हैं। मौन के लाभ अनिर्वचनीय हैं। अभ्यास कीजिए। शान्ति का अनुभव कीजिए तथा स्वतः मौन का उपभोग कीजिए।


संस्कृत के अध्ययन से कुछ लोग बातूनी बन जाते हैं। वे अपनी विद्वत्ता के प्रदर्शनार्थ अनावश्यक वाद-विवाद में फँस जाते हैं। इन विवादों में शक्ति का कितना अपव्यय होता है? इस शक्ति को सुरक्षित करने से कितना लाभ होगा? ध्यान में कितनी सहायता मिल सकेगी? वह इस बल से आकाश-पाताल को चलायमान कर सकता है।


पीड़ा के समय मौन-व्रत से मन को बहुत शान्ति मिलती है। इससे मन के तनाव दूर होते हैं। मौन से शक्ति सुरक्षित होती है। आप अधिक मानसिक तथा शारीरिक कार्य कर सकेंगे। आप अधिक ध्यान कर सकेंगे। यह मस्तिष्क तथा स्नायुओं पर आश्चर्यकर विश्रान्तिदायक प्रभाव डालता है। मौन के अभ्यास से वाक्-शक्ति शनैः शनैः ओज-शक्ति में बदल जाती है।


अपने आध्यात्मिक उत्थान के लिए मौन का पालन कीजिए। इस प्रदर्शन के लिए मौन रखिए कि लोग आपको महान् समझें। किसी भी कार्य को करते समय अपनी प्रवृत्ति की जाँच कर लीजिए।


भोजन करते समय मौन रहिए। अकेले रहिए। दूसरों से मिलिए। संकेत, हाव-भाव तथा 'हू हूहू' ध्वनि कीजिए। 'हूहू हू' करना बोलने के समान ही है। यह तो बोलने से भी अधिक बुरा है। 'हूहू हू' करने से शक्ति का और भी अधिक अपव्यय होता है।


कामकाजी लोगों को कम-से-कम एक घण्टा नित्य मौन-व्रत रखना चाहिए। रविवार को छह घण्टे के लिए या पूरे दिन तक मौन-व्रत रख सकते हैं। यह जान कर कि आप नियमित मौन-व्रत का पालन कर रहे हैं, अन्य लोग भी आपको विघ्न पहुँचायेंगे। आपके परिवार के लोग भी आपको कष्ट पहुँचायेंगे। मौन के समय को जप तथा ध्यान में लगाइए। प्रातः ध्यान के समय तो मौन रहता ही है. उसके अतिरिक्त प्रातः या साद किसी भी समय अपनी सुविधा के अनुसार मौन व्रत रखिए। प्रातः ध्यान के समय को यदि मौन में गिनेंगे तो निद्रा के समय को भी मौन में गिन सकते हैं।


यदि परिस्थितियाँ आपके अनुकूल हों तो बड़ी बातें करना, व्यर्थ बातें करना, सभी प्रकार के विवाद और बहस को बन्द कीजिए तथा समाज से जितना अधिक हो सके, स्वयं को अलग रखिए।


यदि स्थान मौन के अनुकूल हो, तो किसी एकान्त स्थान में चले जाइए जहाँ आपके मित्र आपको तंग कर सकें।


अच्छा हो कि आप कुछ समय के लिए एकान्त में मौन-व्रत का पालन कर उन्नति करने की कोशिश करें। पूर्णता प्राप्ति के अनन्तर आप कम समय में ही आश्चर्यजनक कार्य कर सकेंगे।


यदि आप चालीस दिनों तक अनुष्ठान करना चाहते हैं तो इस बीच पूर्ण मौन रखिए। आपको अद्भुत शान्ति तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होगी। ऋषिकेश, हरिद्वार या प्रयाग में गंगा के तट पर अनुष्ठान कीजिए। घर में रहने वाली स्त्रियाँ बहुत बातूनी होती हैं। वे सदा कुछ--कुछ विघ्न खड़ा किया करती हैं। सास तथा बहू एक क्षण के लिए भी शान्त नहीं बैठतीं। घर में किसी--किसी प्रकार का झगड़ा चलता रहेगा। अनुष्ठान करने के लिए एकान्त स्थान में चले जाइए।


बहुत दिनों तक लम्बे मौन अथवा काष्ठ-मौन की आवश्यकता नहीं है। अविकसित साधक के लिए बहुत दिनों तक मौन रखना हानिकारक है। बहुत दिनों तक मौन-व्रत रखिए। कुछ दिनों के लिए या एक माह के लिए मौन व्रत रखना वाणी के नियन्त्रणार्थ बड़ा ही लाभकर सिद्ध होगा। शक्ति की अत्यधिक सुरक्षा होगी। आप असीम शक्ति का अनुभव करेंगे।


आप बहुत समय के लिए भी मौन रख सकते हैं; परन्तु यदि इससे आपको कठिनाई मालूम पड़े और जप तथा ध्यान में समय का सदुपयोग हो, तो तुरन्त ही उसे तोड़ दीजिए। परिमित शब्दों वाला मनुष्य बनिए। यह मौन ही है। छह महीनों तक खूब बातें करना और छह महीने तक मौन रहना व्यर्थ ही है।


मौन का अभ्यास क्रमशः होना चाहिए, अन्यथा आप दश या पन्दरह दिन तक एकाएक मौन नहीं रख सकेंगे। जो लोग नित्य दो या तीन घण्टे मौन रखते हैं तथा छुट्टियों में चौबीस घण्टे मौन रखते हैं, वे एक सप्ताह या पन्दरह दिन मौन रखने में समर्थ रहेंगे। आपको मौन का महत्त्व समझ लेना चाहिए। नित्य-प्रति दो घण्टे मौन रहिए। धीरे-धीरे छह घण्टे तक समय बढ़ा दीजिए। धीरे-धीरे चौबीस घण्टे, दो दिन, एक सप्ताह और इसी तरह अधिक रख सकते हैं।


वाणी-शक्ति को संयमित कर यदि उसे आप जप तथा ध्यान में लगायें, तो पूर्ण रूपान्तरित होने के कारण वह तो उपद्रव करेगी। मौनव्रतधारी 'हूहूहू' का उच्चारण करता रहता है तथा हाथों से तरह-तरह के संकेत करता रहता है। 'हू हू हूं' करना तो बोलने से भी अधिक बुरा है।


मौन के समय 'हू हू हू' ध्वनि कीजिए, हाथों से संकेत भी कीजिए। यह बातें करने से भी बुरा है। इससे अधिक शक्ति नष्ट होती है। यदि अनिवार्य कार्य हो तो किसी कागज के टुकड़े पर लिख कर बातें कीजिए। आपको इसका भी त्याग करना चाहिए।


मौन के समय बिना चीनी मिला दूध, बिना नमक की दाल तथा साग-भाजी का आहार कीजिए। यह वाणी का संयम है। दूध में चीनी मिलाने की आवश्यकता नहीं है। दूध में तो प्राकृतिक चीनी रहती ही है। मनुष्य आदत के कारण अपनी जिह्वा की तृप्ति के लिए चीनी मिलाया करता है। जिह्वा के संयम से अन्य सभी इन्द्रियाँ शीघ्र ही नियन्त्रित हो जायेंगी। जिह्वा बहुत ही उपद्रवी इन्द्रिय है। जिह्वा का नियन्त्रण मन का ही नियन्त्रण है। हर वासना के दमन से आपको आत्म-बल की प्राप्ति होगी, जिससे आप अन्य वासनाओं का दमन कर सकेंगे।


एकान्त में मौन-व्रत का पालन करते समय मानसिक संन्यास का भाव रखिए। कम-से-कम कुछ दिनों के लिए मन को जरा भी ढीला छोड़िए। ऐसा विचार कीजिए- "मैं तो अभी गृहस्थी हूँ। मैं संन्यासी नहीं हूँ।" कठोर तप से सारी दुर्बलताएँ दूर हो जायेंगी। आपको शीघ्र उन्नति होगी। उग्र संयम के बिना मन को नियन्त्रित नहीं किया जा सकता।


एकान्तवास के समय मौन व्रत की अवस्था में अखबार पढ़िए। अखबार पढ़ने से सासारिक संस्कारों का जागरण होगा, जिससे आपकी शान्ति भंग हो जायेगी। हिमालय में रहते हुए आप नगरों में ही रहेंगे। मौन से आपको अधिक लाभ होगा। आपको ध्यान में सफलता मिलेगी।


मौन के समय कागज के टुकड़े पर, स्लेट पर अथवा अपनी उँगली से अपने हाथ पर लिख कर अपने पड़ोसियों से अधिक बातें कीजिए। आपको हँसना भी नहीं चाहिए। ये सभी मौन-व्रत के खण्डन हैं। ये सब बोलने से भी अधिक बुरे हैं।


अपनी आवश्यकताओं को कम कीजिए। पहले से ही भोजन तथा उसके समय आदि की व्यवस्था कर लीजिए। अपने आहार में बारम्बार परिवर्तन लाइए। सदा तरह-तरह के खाद्य-पदार्थों का चिन्तन कीजिए।


कमरा साफ करना, पानी लाना, कपड़े साफ करना आदि स्वतः कीजिए। दाढ़ी बनाना, जूते में पालिश करना, धोबी से कपड़े धुलाना आदि की चिन्ता कीजिए। इससे आपके ईश्वर-चिन्तन में विघ्न होगा। शरीर, भोजन तथा दाढ़ी की अधिक चिन्ता कीजिए। ईश्वर का चिन्तन कीजिए।


मन सदा ताक में रहेगा कि वह साधक को पतन के खड्ड में गिरा दे; अतः बहुत सावधान तथा सतर्क रहिए।


मौन के द्वारा आप शान्ति प्राप्त करें! मौन के द्वारा आप शान्ति के असीम सागर में गोता लगायें! मौन के द्वारा आप महामौनी या जीवन्मुक्त बनें! ईश्वर आपको बल दे, जिससे आप अखण्ड मौन व्रत का पालन कर सकें ! शान्तिः शान्तिः शान्तिः !

. ब्रह्मचर्य-साधना


विचार, वाणी तथा कर्म में शुद्धता ही ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य केवल जननेन्द्रिय का ही नहीं, वरन् अन्य सभी इन्द्रियों का भी संयम है। यह ब्रह्मचर्य की विस्तृत व्याख्या है। ब्रह्मचर्य दो प्रकार का है- शारीरिक तथा मानसिक। शरीर का नियन्त्रण शारीरिक है तथा बुरे विचारों का नियन्त्रण मानसिक है। मानसिक ब्रह्मचर्य में कामुक विचार भी मन में प्रवेश नहीं करेंगे। जाग्रत तथा स्वप्न में कामुक विचार से मुक्ति ही पूर्ण ब्रह्मचर्य है।


वीर्य, जो आपके जीवन को धारण करता है, आपका महान् धन है। यह रुधिर का सार-तत्त्व है। ब्रह्मचर्य सचमुच ही बहुमूल्य मुक्ता है। यह सबसे अधिक प्रभावशाली महौषधि है जो रोग, क्षय तथा मृत्यु को विनष्ट करता है। इस आत्मा का स्वरूप ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्य में ही आत्मा का निवास है।


वीर्य जीवन, विचार, बुद्धि तथा चैतन्य का सार है। वीर्य के एक बार नष्ट होने पर पुनः आप दूध, मक्खन, बादाम, मकरध्वज, टानिक आदि के आजीवन सेवन से भी उसकी पूर्ति कर सकेंगे। वीर्य को सावधानीपूर्वक सुरक्षित रखने से यह ईश्वरीय धाम के द्वारों को खोलता है तथा जीवन के सभी ऊँचे आदर्शों की प्राप्ति में सहायक बनता है। ब्रह्मचर्य के द्वारा ही प्राचीन काल के ऋषियों ने मृत्यु पर विजय पायी तथा सुख एवं आनन्द के धाम को प्राप्त किया।


ब्रह्मचर्य के बिना आप स्वास्थ्य तथा आध्यात्मिक जीवन प्राप्त नहीं कर सकते। जीवन के हर क्षेत्र में ब्रह्मचर्य ही सफलता की कुंजी है। ब्रह्मचर्य ही अतीव सुख का प्रवेश-द्वार है। यह मोक्ष के द्वार को खोलता है। ब्रह्मचारी के चरणों पर सिद्धि तथा ऋद्धि लोटती हैं। ब्रह्मचारी की महिमा का कौन वर्णन कर सकता है? ब्रह्मचर्य अथवा निष्कलंक पवित्रता सर्वोत्तम तप है। इस संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसे ब्रह्मचारी प्राप्त कर सके। वह समस्त जगत् को चलायमान कर सकता है।


इन्द्रिय-परायणता जीवन, सौन्दर्य, बल, वीर्य, स्मृति-शक्ति, धन, यश, पवित्रता तथा ईश्वर-भक्ति का विनाश करती है। शरीर से वीर्य के बहिर्गमन से मृत्यु निकट जाती है। उसके संरक्षण से आयु बढ़ती है। जिन लोगों ने वीर्य का अत्यधिक क्षय किया है, वे शीघ्र ही अशान्त तथा आलसी बन जाते हैं। वे शीघ्र ही रोग के शिकार बन जाते हैं। वे अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं।


ब्रह्मचर्य के अभाववश अथवा वीर्य-शक्ति के क्षय के कारण मनुष्य शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक दुर्बलता प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति छोटी-छोटी वस्तु के लिए भी चिड़चिड़ा पड़ते हैं। वे बहुत से रोगों के शिकार हो कर अकाल मृत्यु को प्राप्त करते हैं।


सुसंयमित जीवन, धर्मग्रन्थों का स्वाध्याय, सत्संग, जप, ध्यान, सात्त्विक आहार, सदाचार, तीन प्रकार के तप तथा अन्य आध्यात्मिक साधनाओं से अन्ततः इसकी प्राप्ति होती है।


ब्रह्मचर्य के अभ्यास से किसी तरह की हानि नहीं होती; किसी तरह के रोग अथवा मानसिक ग्रन्थियों की उत्पत्ति नहीं होती। पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक गलत बतलाते हैं। उन्हें विषय का अनुभवात्मक ज्ञान नहीं है। उनकी यह गलत धारणा है कि अतृप्त काम-शक्ति बहुत-सी ग्रन्थियों का रूप धारण करती है। अधिक क्रोध, घृणा, द्वेष, चिन्ता, उदासी आदि के कारण ही ये रोग उत्पन्न होते हैं।


अश्लील चित्रों को देखिए। अश्लील शब्द बोलिए। कामोत्तेजक उपन्यासों को पढ़िए। अशिष्ट भावनाओं को हृदय में स्थान दीजिए। कुसंगति का परित्याग कीजिए। सिनेमा जाइए। प्याज, लहसुन, चटपटी चीजें, चटनी तथा मसालों का त्याग कीजिए। पौष्टिक सात्त्विक आहार लीजिए। काम-शक्ति को ओज में बदल डालिए। जप, कीर्तन, दिव्य विचार अथवा आत्म-विचार तथा प्राणायाम के अभ्यास से यह परिवर्तन सम्भव होगा। शीर्षासन, सर्वांगासन का अभ्यास कीजिए और उपनिषद् तथा गीता का स्वाध्याय कीजिए। योगियों, महात्माओं तथा साधुओं का सत्संग कीजिए। आप ब्रह्मचर्य में स्थित हो जायेंगे। काम-शक्ति का रूपान्तरण हो जायेगा।

. अन्तर्मुख वृत्ति की साधना


खोजिए, समझिए, साक्षात्कार कीजिए-इस त्रितय को याद रखिए। खोजना श्रुतियों का श्रवण है। समझना - मनन अथवा सुनी हुई बात का चिन्तन करना है। 'मैं ब्रह्म हूँ' - इस विचार के सतत गम्भीर निदिध्यासन से आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति होती है। वेदान्त के अनुसार आत्म-साक्षात्कार के ये तीन साधन हैं।


विश्लेषण कीजिए, समझिए तथा त्यागिए यह दूसरा त्रितय भी महत्त्वपूर्ण है। इससे वैराग्य का विकास होगा, विषयों के प्रति मोह का नाश होगा। ज्यों-ही कोई विषय आपको आकृष्ट करे, त्यों-ही इस त्रितय को याद कीजिए। उस विषय के विभिन्न अंगों का विश्लेषण कीजिए। इन विषयों के वास्तविक स्वरूप को समझ लीजिए तथा इनका परित्याग कर दीजिए। उपर्युक्त त्रितय के सतत स्मरण से आप बहुत लाभ उठायेंगे। इससे वैराग्य की वृद्धि होगी। मन विषयों की ओर नहीं दौड़ेगा। यह विषयों से मुड़ जायेगा। विषयों के प्रति राग धीरे-धीरे विलुप्त हो जायेगा। इस तरीके से मैंने बहुत लाभ उठाया है। सभी विषयों के प्रति राग के नष्ट हो जाने पर मन हृदय की ओर मुड़ेगा। यही मन का यथास्थान है। मन ईश्वर की ओर मुड़ेगा। यही अन्तर्वृत्ति है।

. सावधानी के द्वारा साधना


जो व्यक्ति अपने दोषों को उसी प्रकार देख सकता है जिस प्रकार दूसरों के दोषों को देखता है, वह शीघ्र ही महात्मा हो जायेगा। सत्य के साथ सतत अनुराग रखिए। सत्य के लिए अपने सर्वस्व को भी न्योच्छावर करने के लिए तैयार रहिए।


भूत की विफलताओं तथा गलतियों की चिन्ता करते रहिए; क्योंकि इससे आपका मन शोक, पश्चात्ताप तथा अवसाद से भर जायेगा। भविष्य में उनका स्मरण कीजिए। सावधान रहिए। अपनी विफलताओं के कारण का विचार कीजिए और उसे दूर करने के लिए यत्नशील बनिए। सतर्क तथा सावधान रहिए। नयी शक्ति तथा सद्गुणों से सबल बनिए। धीरे-धीरे संकल्प-शक्ति का विकास कीजिए।

१०. आत्म-विश्लेषण की साधना


नित्य आत्म-विश्लेषण या आत्म-निरीक्षण अनिवार्यतः आवश्यक है। तभी आप अपने दोषों को दूर कर शीघ्रतापूर्वक आध्यात्मिक उन्नति कर सकेंगे। माली नये पौधों की देख-रेख बड़ी सावधानी से करता है। वह नित्य-प्रति मोथों को निकालता है। वह उन पौधों के चारों ओर मजबूत घेरा डालता है। वह उचित समय पर पानी डालता है। तभी वे अच्छी तरह बढ़ते तथा शीघ्र फलप्रद होते हैं। ठीक उसी प्रकार दैनिक आत्म-निरीक्षण तथा आत्म-विश्लेषण के द्वारा आपको अपने दोषों का पता लगा लेना होगा तथा अनुकूल साधनों से उन्हें दूर करना होगा। यदि एक तरीके से सफलता मिले, तो कई तरीकों का समन्वय कीजिए। यदि प्रार्थना से सफलता मिले तो सत्संग, प्राणायाम, ध्यान, विचार आदि कीजिए। आपको अभिमान, दम्भ, काम, क्रोध आदि की बड़ी वृत्तियों को ही नष्ट नहीं करना है, वरन् उनकी सूक्ष्म वासनाओं, जो चित्त के प्रकोष्ठों में छिपी रहती हैं, को भी नष्ट करना होगा, तभी आप पूर्णतः सुरक्षित होंगे।


ये सूक्ष्म वासनाएँ बहुत ही खतरनाक हैं। ये चोर की भाँति घात लगाये रहती हैं तथा आपको असावधान पा कर अथवा आपके वैराग्य में कमी देख कर अथवा साधना में ढिलाई होने पर अथवा आपके उत्तेजित होने पर आप पर आक्रमण कर बैठती हैं। कई अवसरों पर अति-उत्तेजना मिलने पर भी जब वे दोष प्रकट हों, कई दिनों तक नित्य अन्तर्निरीक्षण तथा आत्म-विश्लेषण की साधना भी बन्द हो, तो आपको निश्चित रूप से मानना चाहिए कि सूक्ष्म संस्कार विनष्ट हो गये हैं। आप सुरक्षित हैं। आत्म-विश्लेषण तथा आत्म-निरीक्षण के अभ्यास के लिए धैर्य, संलग्नता, जोंक की भाँति चिपके रहना, अध्यवसाय, लौह-संकल्प, सूक्ष्म-बुद्धि, साहस आदि की आवश्यकता है। परन्तु इसका फल अनमोल है। वह फल है अमृतत्व, परम शान्ति, परमानन्द। इसके लिए आपको काफी मूल्य चुकाना होगा। अतः अपनी साधना करते समय असन्तोष प्रकट कीजिए। आध्यात्मिक अभ्यास में आपको पूर्ण मन, हृदय, बुद्धि तथा आत्मा को लगाना होगा; तभी त्वरित सफलता सम्भव है।


नित्य आध्यात्मिक दैनन्दिनी का पालन कीजिए तथा रात्रि में आत्म-विश्लेषण का अभ्यास कीजिए। डायरी में यह अंकित कीजिए कि दिन-भर में आपने कितनी गलतियाँ की हैं तथा कितने भले कार्य किये हैं। प्रातः समय ऐसा संकल्प कीजिए: "मैं आज क्रोध के वशीभूत नहीं बनूँगा। मैं आज ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा। मैं आज सत्य बोलूँगा।"

११. प्रतिपक्ष-भावना की साधना


बुरे विचारों के घुसने पर उन्हें भगाने के लिए अपनी इच्छा-शक्ति का प्रयोग कीजिए। इससे आपकी शक्ति का क्षय होगा। इससे आप थक जायेंगे। जितना अधिक आप प्रयास करेंगे, उतनी ही द्विगुणित शक्ति के साथ वे आप पर आक्रमण करेंगे। वे बारम्बार आप पर आक्रमण करेंगे। वे विचार बहुत मजबूत हो जायेंगे। उपेक्षा कीजिए।शान्त रहिए। वे शीघ्र चले जायेंगे। उनके स्थान पर प्रतिपक्ष-भावना रखिए। काम, क्रोध, मद, लोभ आदि को ब्रह्मचर्य, प्रेम, नम्रता तथा अपरिग्रह आदि के अभ्यास से दूर भगाइए अथवा ईश्वर के चित्र का अथवा मन्त्र का बारम्बार विचार कीजिए तथा प्रार्थना कीजिए।

१२. आध्यात्मिक दृष्टि की साधना


आसुरी प्रकृति को दैवी प्रकृति में परिणत करने के चार साधन हैं। जो इस साधना का अभ्यास करता है, वह कदापि बुरी दृष्टि नहीं रखेगा। उसे आध्यात्मिक दृष्टि की प्राप्ति होगी। उसका दृष्टिकोण परिवर्तित हो जायेगा। वह बुरे वातावरण की शिकायत नहीं करेगा। आपको इन चारों की साधना नित्य-प्रति करनी चाहिए।


. कोई भी व्यक्ति पूर्णतः बुरा नहीं है। हर व्यक्ति में कुछ--कुछ सद्गुण अवश्य हैं। हर व्यक्ति में शुभ के दर्शन कीजिए। शुभ दृष्टि का विकास कीजिए। दोषान्वेषक दृष्टि के लिए यह बहुत ही प्रभावशाली उपचार है।


. पहले दर्जे का दुष्ट व्यक्ति भी प्रसुप्त सन्त ही है। वह भविष्य में होने वाला सन्त है। इसको अच्छी तरह याद रखिए। वह शाश्वत दुष्ट नहीं है। उसे सन्तों की संगति में रखिए, उसकी चोर-वृत्ति तुरन्त ही बदल जायेगी। दुष्टता से घृणा कीजिए, परन्तु दुष्ट से नहीं।


. याद रखिए कि भगवान् नारायण स्वयं दुष्ट, चोर तथा वेश्या के रूप में संसार के रंगमंच पर नाट्य-क्रीड़ा कर रहे हैं। यह उनकी लीला है। आपकी सारी दृष्टि तत्क्षण परिवर्तित हो जायेगी। दुष्ट को देखते ही आपके हृदय में भक्ति की भावना उत्पन्न होगी।


. सर्वत्र नारायण-दृष्टि रखिए। सर्वत्र नारायण को देखिए। उसकी स्थिति का भान कीजिए। जो कुछ भी आप देखते, छूते तथा चखते हैं, वह ईश्वर के सिवा और कुछ नहीं है।


मानसिक दृष्टिकोण को बदल डालिए। दृष्टिकोण को बदलिए, तभी आप इस पृथ्वी पर स्वर्ग को प्राप्त कर सकते हैं। उपनिषदों तथा वेदान्त-सूत्रों के अध्ययन से क्या लाभ, यदि मनुष्य की दृष्टि बुरी और जबान गन्दी हो।

१३. विश्व-प्रेम के लिए अनुशासन


इस जगत् में प्रेम ही एक सार-वस्तु है। यह नित्य, असीम तथा अविनाशी है। शारीरिक प्रेम राग या मोह है। सार्वभौमिक प्रेम ईश्वरीय प्रेम है। ईश्वर प्रेम है। प्रेम ईश्वर है। स्वार्थ, लोभ, अभिमान, मद तथा घृणा हृदय को संकुचित बनाते हैं और विश्व-प्रेम के विकास में बाधक हैं।


निष्काम सेवा, सत्संग, प्रार्थना, मन्त्र जप आदि के द्वारा विश्व प्रेम का क्रमशः विकास कीजिए। स्वार्थ के द्वारा हृदय के आंकुचित हो जाने पर मनुष्य अपने स्त्री, बच्चे तथा सम्बन्धियों से ही प्रेम करता है। थोड़ी उन्नति करने पर वह अपने जिले के लोगों से प्रेम करने लगता है। तब वह प्रान्त के लोगों से प्रेम करता है। तब वह अपने देशवासियों से तथा अन्ततः विभिन्न देशों के वासियों से भी प्रेम करने लगता है। चरमावस्था में वह सभी से प्रेम करने लगता है। वह विश्व-प्रेम को प्राप्त करता है। सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। हृदय विशाल हो जाता है।


विश्व-प्रेम के बारे में बातें करना तो बहुत आसान है; परन्तु उसे व्यवहार में लाना अति-कठिन है। मन की संकीर्णताएँ मार्ग में बाधक बन कर आती हैं। पहले के बुरे संस्कार बाधक बनते हैं। लौह-संकल्प, प्रबल इच्छा शक्ति, धैर्य, संलग्नता तथा विचार के द्वारा आप सभी बाधाओं को बड़ी आसानी से जीत सकते हैं। हे मेरे प्रिय मित्रो ! यदि आप सच्चे हैं, तो ईश्वर की कृपा आपको प्राप्त होगी।


विश्व-प्रेम की परिसमाप्ति अद्वैत चेतना में होती है। यही उपनिषद् के ऋषियों की चेतना है। शुद्ध प्रेम महान् समताप्रदायक है। हाफिज, कबीर, मीरा, गौरांग, तुकाराम, रामदास सभी ने इस विश्व-प्रेम का आस्वादन किया था। दूसरे लोगों ने जिसे प्राप्त किया है, उसे आप भी प्राप्त कर सकते हैं।


अनुभव कीजिए कि सारा जगत् आपका शरीर है, आपका अपना घर है। मनुष्य तथा मनुष्य के बीच जितने भी अवरोधक हैं, उन्हें विनष्ट कर डालिए। बड़प्पन की भावना तो मूर्खता है। विश्व-प्रेम का विकास कीजिए। सभी से एकता रखिए। अलग होना तो मृत्यु है। एकता नित्य जीवन है। अनुभव कीजिए कि सारा जगत् विश्व-वृन्दावन है। अनुभव कीजिए कि यह शरीर ईश्वर का चल-निकेतन है। जहाँ भी आप हों, घर, आफिस, स्टेशन या बाजार में सर्वत्र अनुभव कीजिए कि आप मन्दिर में ही हैं। हर कार्य को ईश्वर की ही पूजा समझिए। कर्म-फल को ईश्वरार्पित कर हर कार्य को योग में परिणत कर डालिए। वेदान्त के साधकों को अकर्ता तथा साक्षी-भाव बनाये रखना चाहिए। भक्ति-मार्ग के साधकों को निमित्त-भाव रखना चाहिए। ऐसी भावना कीजिए कि सारे प्राणी ईश्वर के ही रूप हैं। 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' - यह जगत् ईश्वर द्वारा परिव्याप्त है। भावना कीजिए कि एक ही वस्तु अथवा ईश्वर सभी हाथों से कार्य करता, सभी नेत्रों से देखता तथा सभी कानों से सुनता है। आप परिवर्तित हो जायेंगे। आप परम शान्ति तथा सुख का उपभोग करेंगे।


अध्याय : प्रस्थानत्रयी में साधना

. ब्रह्मसूत्र में साधना


ब्रह्मसूत्र के साधनाध्याय नामक तृतीय अध्याय में ब्रह्म-साक्षात्कार के लिए साधनाओं का वर्णन है। इस अध्याय में उन साधनाओं का निश्चय किया गया है जिनसे ब्रह्म-साक्षात्कार प्राप्त हो सके। इस अध्याय के प्रथम तथा द्वितीय पादों में दो बातें बतलायी गयी हैं- ब्रह्म-साक्षात्कार के लिए प्रबल मुमुक्षुत्व तथा ब्रह्म से इतर सभी वस्तुओं के प्रति तीव्र वैराग्य; क्योंकि सभी साधनाओं के ये ही दो मूल आधार हैं।


वैराग्य की वृद्धि के लिए प्रथम पाद के सूत्रों में सारे लौकिक अस्तित्वों की अनित्यता का निरूपण किया गया है। छान्दोग्य उपनिषद् की पंचाग्निविद्या पर यह आधारित है जिसमें मृत्यु के उपरान्त जीवात्मा की गति का वर्णन किया गया है।


प्रथम पाद पुनर्जन्म के महान् सिद्धान्त, भौतिक शरीर से जीवात्मा का गमन, तृतीय कक्ष में चन्द्रलोक की यात्रा तथा उसके पृथ्वी पर जन्म की शिक्षा देता है। इहलोक तथा परलोक के विषय-सुखों के प्रति वैराग्य उत्पन्न करने के लिए ही ऐसा विवरण दिया गया है। द्वितीय पाद में ब्रह्म के सारे विशेषणों जैसे सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, सर्वप्रियता आदि का वर्णन है जिससे कि सारे जन ब्रह्म की ओर आकृष्ट हों तथा ब्रह्म को ही अपनी खोज का एकमात्र लक्ष्य बनायें।


तृतीय पाद में ब्रह्मसूत्र के सूत्रकार श्रुतियों में वर्णित विभिन्न विद्याओं या उपासनाओं या ध्यानों का निश्चय करते हैं।


साधक को ब्रह्मज्ञान में समर्थ बनाने के हेतु श्रुतियों में विविध प्रकार की विद्याओं का वर्णन है। साधारण मनुष्य के लिए असीम ब्रह्म का पूर्ण ज्ञान होना असम्भव है; क्योंकि ब्रह्म अत्यन्त सूक्ष्म है तथा इन्द्रियों स्वयं स्थूल बुद्धि की पहुँच के परे है। अतः श्रुतियाँ सगुण ध्यान के सुगम साधन बतलाती हैं जिससे कि ब्रह्म की प्राप्ति हो। वे ब्रह्म के बहुत से प्रतीकों का वर्णन करती हैं जैसे वैश्वानर या विराट्, सूर्य, आकाश, अन्न, प्राण तथा मन। नये साधकों के ध्यानार्थ ये बहुत ही उपयोगी हैं। प्रारम्भ में ये प्रतीक आलम्बन का काम करते हैं। ऐसे सगुण ध्यान से मन सूक्ष्म, तेज तथा एकाग्र बन जाता है।


निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति के लिए इन साधनों को विद्या या उपासना कहते हैं। इस पाद में विभिन्न विद्याओं का वर्णन है जिनसे जीव परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। इन सभी विद्याओं का लक्ष्य ब्रह्म-साक्षात्कार है। ब्रह्म ही एकमेव जीवन्त सत्य है। ब्रह्म ही सत्य है। ब्रह्म सत् या परम अस्तित्व है। कोई भी विद्या ब्रह्म-प्राप्ति के लिए अन्य विद्याओं के समान ही शक्ति रखती है।


ब्रह्म पर ध्यान करने के लिए श्रुति या तो साक्षात् साधना बतलाती है या सूर्य, आकाश, अन्न, मन, प्राण, नेत्र स्थित पुरुष, हृदय स्थित दहराकाश, जैसे प्रतीकों के माध्यम से परोक्ष ध्यान की साधना बतलाती है।


आपको इन प्रतीकों में तथा इन प्रतीकों के द्वारा ब्रह्म की उपासना तथा खोज करनी चाहिए। परन्तु ध्यान रखिए कि ये प्रतीक ही ब्रह्म के स्थान को ग्रहण कर लें। आपको इन प्रतीकों के ऊपर मन को एकाग्र करना होगा तथा सर्वशक्तिमत्ता, सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता, सच्चिदानन्द, शुद्धता, पूर्णता, स्वतन्त्रता आदि विशेषणों पर ध्यान करना होगा।


प्रतीकों की भिन्नता की दृष्टि से ही ये विद्याएँ विभिन्न जान पड़ती हैं; परन्तु सर्वत्र लक्ष्य एक ही है। इसको सदा ध्यान में रखिए।


कुछ विद्याओं में ब्रह्म के समान विश्लेषण पाये जाते हैं। आपको अपने को ब्रह्म से पृथक् नहीं समझना चाहिए। यही महत्त्व की बात है।


सभी विद्याओं में तीन बातें समान हैं। सभी का लक्ष्य ब्रह्म-साक्षात्कार के द्वारा-चाहे प्रतीकों की सहायता से इसकी प्राप्ति हो अथवा बिना प्रतीकों की सहायता के ही- नित्य-सुख तथा अमृतत्व की प्राप्ति है। सारी विद्याओं में जो समान विशेषण मिलते हैं जैसे आनन्द, शुद्धता, पूर्णता, ज्ञान, अमृतत्व, कैवल्य, नित्य-तृप्ति आदि, उन्हें ब्रह्म की धारणा के साथ संयोजित करना चाहिए। ध्याता स्वयं को ब्रह्म से एक समझे। वह ब्रह्म को अपनी अमर आत्मा समझ कर उसकी उपासना करे।

. उपनिषदों की साधना


उपनिषद् हिन्दू-धर्म तथा दर्शन के केन्द्रीय आधार हैं। वे वेदान्त अथवा वेदों का अन्त अथवा ज्ञान की पराकाष्ठा हैं। उपनिषदों की गम्भीरता अतुलनीय है। जगत् के सबसे महान् विचारकों ने भी उनसे तृप्ति पायी है, सबसे अधिक महान् आध्यात्मिक पुरुषों ने भी सान्त्वना पायी है। उपनिषदों के पूर्व अथवा बाद का कोई भी ग्रन्थ उनके ज्ञान की गहरायी तथा तृप्ति एवं शान्ति के सन्देश का अतिक्रमण नहीं कर सकता। दध्यांच, उद्दालक, सनत्कुमार, शाण्डिल्य तथा याज्ञवल्क्य-ये उपनिषद के प्रसिद्ध ऋषियों में हैं जिन्होंन ज्ञान की ज्योति जगायी है। उपनिषदें मुख्यतः दर्शन-पद्धति के द्वारा ज्ञान की शिक्षा देती हैं। आत्मान्वेषियों के लिए ये पाठ्य-ग्रन्थ है। इन्हें विभिन्न नामों से पुकारा जाता है: ब्रह्मविद्या, अध्यात्म शास्त्र, वेदान्त, ज्ञान आदि। जो उपनिषदों के उपदेशों का अभ्यास करता है, वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेगा। वह हृदय-ग्रन्थि का भेदन कर तथा शंकाओं को दूर कर सारे पापों को विनष्ट कर देता है। वह सबमें प्रवेश कर जाता है। वह जन्म-मृत्यु से विमुक्त हो जाता है। वह अमर हो जाता है। वह आत्मा ही बन जाता है। वह आप्त-काम है। वह धन्य है। वह शोकों का अतिक्रमण कर लेता है। वह पाप से पार चला जाता है। वह मर्त्यशील शरीर को पुनः धारण नहीं करता। वह ब्रह्म हो जाता है।


उपनिषद् आध्यात्मिक ज्ञान की पुस्तकें हैं। इन सारी प्रतीयमान वस्तुओं में ब्रह्म ही परिव्याप्त है। सांसारिकता के भाव का परित्याग कर मनुष्य को शुद्ध आनन्द का भोग करना चाहिए। उसे दूसरे के धन का लोभ नहीं करना चाहिए।


जीवन दुःख नहीं है। राग रहित हो कर्मों को करते हुए मनुष्य शतायु हो। सम्यक् दृष्टि से देखने पर जीवन बन्धन नहीं है। ऐसा ज्ञानी सभी भूतों में अपनी आत्मा को तथा अपनी आत्मा को सभी भूतों में देखता है। उसके लिए हर वस्तु उसकी आत्मा है तथा वह शोक, मोह अथवा किसी प्रकार के दुःख से प्रभावित नहीं होता।


परब्रह्म अवर्णनीय है। वह मन तथा इन्द्रियों की पहुँच से परे है। वह बुद्धि से भी परे है। वह सभी की रोशनी है। उसके लिए कोई आलोक नहीं। वाणी उसे व्यक्त नहीं कर सकती। मन उसे सोच नहीं सकता। बुद्धि उसे समझ नहीं सकती। इन्द्रियाँ उसे ग्रहण नहीं कर सकतीं। ऐसी विचित्र वस्तु है वह सत्य। ब्रह्मज्ञान किसी वस्तु का ज्ञान नहीं, वरन् परम ज्ञान ही बन जाता है। वाणी के द्वारा कहा जाये तो उसे 'असीम कर्ता' कह सकते हैं। वह अनुभव है, विषय-संवेदन नहीं। वह पारमार्थिक तत्त्व है; अतः वह द्वैत एवं द्वन्द्वों से परे है। उसको जानना ही सबसे महान् लाभ है। वह व्यक्ति अभागा ही है जो उसे बिना जाने ही मर जाता है।


पार्थिव वस्तुएँ नाशवान् हैं; अतः उनके पीछे नहीं पड़ना चाहिए। बहुत वर्षों का सारा जीवन भी अल्प ही है। वह कुछ भी नहीं है। विषयों के भोग से कोई लाभ नहीं है। मनुष्य धन से तृप्त नहीं हो सकता है। अपनी चेतना के विरुद्ध भी वह अमर बनना चाहता है। दुर्भाग्यवश वह उन वस्तुओं के पीछे दौड़ता है जो सुखद मालूम पड़ती हैं, परन्तु वास्तव में सुखद नहीं हैं। श्रेय एक वस्तु है और प्रेय दूसरी वस्तु। पहली मुक्ति प्रदान करती है और दूसरी बन्धन में डालती है। मनुष्य को एक क्षण के लिए भी प्रेय को ग्रहण नहीं करना चाहिए, यद्यपि क्षण मात्र के लिए सुख की प्राप्ति ही क्यों हो।


आत्मा जन्म नहीं लेती और मरती ही है। वह कहीं से उत्पन्न नहीं हुई और तो वह किसी रूप में परिणत हुई है। अज, अव्यय, नित्य, पुराण यह आत्मा शरीर के मारे जाने पर भी नहीं मरती। यह आत्मा सभी भूतों के हृदय के अन्तरतम में छिपी हुई है। कितने भी तर्क, अध्ययन अथवा उपदेश के द्वारा इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह परम कृपा से ही प्राप्य है। दुराचारी व्यक्ति, जिसने अपनी कुटिलता का परित्याग नहीं किया, आत्म-प्राप्ति की आशा नहीं रख सकता।


ब्रह्म का मार्ग काँटों से भरा हुआ है। यह छुरे की धार के समान तीव्र है। यह बहुत ही कठिन है। ज्ञानियों के ज्ञान की सहायता से ही इस पर चलना सम्भव है। इसको जान लेने पर मनुष्य मृत्यु के भयानक क्रोड़ से विमुक्त हो जाता है।


मन तथा इन्द्रियाँ सदा बाहर की ओर दौड़ते हैं। आत्मानुशासन से युक्त धीर पुरुष ही अन्तर की ओर दृष्टि-निक्षेप कर आत्मा के स्वरूप का दर्शन कर सकता है। बाल-प्रकृति वाले मनुष्य, जिन्हें सत्य का ज्ञान नहीं, बाह्य सुखों की ओर दौड़ते हैं तथा मृत्यु के फैले हुए पाश में जा गिरते हैं। ज्ञानी मनुष्य ही अमृतत्व की अवस्था का ज्ञान कर क्षणभंगुर वस्तुओं में अव्यय ब्रह्म की खोज नहीं करते।


मनुष्य को संसार के धन की लिप्सा नहीं रखनी चाहिए। जो भी यहाँ है, वह वहाँ है। जो वहाँ है, वह यहाँ है। वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त करता है जो यहाँ अनेकता देखता है। वास्तव में यहाँ अनेकता नहीं है। वह एक परम वस्तु विभिन्न नाम-रूपों तथा क्रियाओं का परिधान पहन कर बहुत वस्तुओं के रूप में प्रतीयमान होती है।


आत्मा अथवा ब्रह्म का परिवर्तनशील जगत् से कोई सम्बन्ध नहीं है। जिस प्रकार नेत्र के दोषों से सूर्य मलिन नहीं होता, उसी प्रकार संसार के दोषों से आत्मा कलुषित नहीं होती। जिस प्रकार एक ही अग्नि जगत् में प्रवेश कर सभी रूपों के अनुसार अपना रूप धारण करती है, उसी प्रकार अन्तरात्मा भी सभी वस्तुओं में प्रवेश कर उनके आकारों को धारण करती है और फिर भी वह उन सबसे परे है।


संसार के सुख, ज्योति, सौन्दर्य तथा शुभ नाम मात्र भी वहाँ नहीं हैं। सूर्य की ज्योति तथा स्रष्टा की महिमा ब्रह्म के समक्ष कुछ भी नहीं है। जब मन के साथ सारी इन्द्रियाँ काम करना बन्द कर देती हैं, जब बुद्धि भी कार्य नहीं करती, जब वह चिन्मात्र ही रह जाता है, तब उच्च अवस्था की अनुभूति होती है। जब हृदयगत सारी कामनाएँ विमुक्त हो जाती हैं, तब मरणशील मनुष्य अमर हो जाता है। वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।


ब्रह्म की अवस्था हमारी सभी प्रिय वस्तुओं का तिरोधान नहीं, वरन् हमारी सभी कामनाओं की चरम परिपूर्ति है। हमारी ससीमता टूट जाती है, अपूर्णताएँ नष्ट हो जाती है तथा हम नित्य-तृप्ति की पुण्यावस्था में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। हमारी सारी कामनाएँ एक-साथ ही उसी समय परितृप्त हो जाती हैं। हम असीम सुख तथा आनन्द के मूल बन जाते हैं। हम अजन्मता तथा अमरता का अनुभव करते हैं। हमसे बढ़ कर कुछ भी नहीं है।


वह क्या है जिसे जान लेने पर अन्य सभी वस्तुएँ जान ली जाती हैं? वह ब्रह्म है। उसे जानना चाहिए। ब्रह्म सत्य, ज्ञान, असीम तथा आनन्द है। ब्रह्म भूमा है; जहाँ मनुष्य अन्य कुछ भी नहीं देखता, अन्य कुछ भी नहीं सुनता, अन्य कुछ भी नहीं विचारता। वह किसी पर स्थित नहीं है। उसी पर सभी स्थित हैं। जो उसे जानता है, अपनी आत्मा में ही आनन्द उठाता है तथा अपनी आत्मा में ही परितृप्त रहता है।


यज्ञों (कर्मों) से मुक्ति नहीं मिलती। वे प्रलोभन मात्र हैं जो मनुष्य को जन्म-मृत्यु के बन्धन में डालते हैं। अज्ञ मनुष्य सोचते हैं कि कर्म तथा दान से ही नित्य-सुख की प्राप्ति हो जायेगी। वे भ्रम में हैं। जो कर्म का फल नहीं, वह कितना भी कर्म करने से प्राप्त नहीं हो सकता। ब्रह्म, जो कृत नहीं, कृत वस्तु से प्राप्त नहीं हो सकता। संसार की वस्तुस्थिति को परख कर बुद्धिमान् मनुष्य को उदासीनता तथा वैराग्य का अर्जन करना चाहिए। ऐसा सौभाग्यशाली मनुष्य अविद्या ग्रन्थी का भेदन करता है।


आत्मा पर ध्यान करने के अतिरिक्त मनुष्य का अन्य कोई कर्तव्य नहीं है। सब-कुछ का परित्याग कर मनुष्य को आत्मा में संस्थित होना चाहिए। आत्मानुभव प्राप्त कर लेने पर कुछ भी करने अथवा पाने के लिए शेष नहीं रह जाता; क्योंकि वह ब्रह्म ही ऊपर-नीचे, दायें-बायें, आगे-पीछे सब कुछ है। वही महान् तथा लघु है। ब्रह्म के सिवा कुछ भी नहीं है। यह सब ब्रह्म ही है।


सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। मिथ्या तथा झूठ, धोखा अथवा असत्य अपने प्रयासों में सफल नहीं हो सकते। सत्य ही शाश्वत है। ज्ञान युक्त ध्यान के द्वारा ही उस सत्य की प्राप्ति होती है।


शुद्ध प्रकृति वाला मनुष्य जो कुछ भी संकल्प करता है, अथवा जो कुछ भी कामना करता है, वही वह प्राप्त करता है, उसे ही वह पूर्ण करता है। अतः मनुष्य को शुद्ध तथा पूर्ण संकल्प होना चाहिए। जिन विषयों की वह कामना करता है, वह उन कामनाओं की पूर्ति के लिए बारम्बार जन्म लेता है। जिसकी कामना तृप्त हो चुकी है, जो पूर्ण है, उसकी कामनाएँ स्वतः यहीं पर विलीन हो जाती हैं।


मोक्ष की अवस्था बड़ी ही महान् है। इस अवस्था को प्राप्त करने वाली पुण्यात्माएँ सभी में प्रवेश कर जाती हैं। वे सब बन जाती हैं। वे राग से मुक्त हो जाती हैं। वे प्रशान्त तथा परिपूर्ण हैं। वे मृत्यु से विमुक्त हो जाती हैं। वे परब्रह्म से एक बन जाती हैं।


जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूपों का त्याग कर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष नाम-रूप से विमुक्त हो कर परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है। वह शोक तथा मृत्यु का सन्तरण कर लेता है। वह अमर बन जाता है।


चैतन्य की चतुर्थावस्था में परमात्मा का अनुभव होता है। वहाँ यह है, वह है। उसमें कोई विशेष गुण नहीं है। वह सब है। वह शान्त, सुन्दर तथा अद्वैत है। वह दृश्य का उपशमन है। वही आत्मा है। उसे जानना तथा उसका साक्षात्कार करना चाहिए। यही जीवन का उद्देश्य है।


जीवन्मुक्त यह अनुभव करता है कि वह सब-कुछ है। वह वृक्ष तथा पर्वत है। वह सूर्य के समान विभासित है। वह ज्योति पुंज, प्रज्ञानघन, अमर तथा अव्यय है। वह अन्न तथा अन्न का भोक्ता है। वह ज्ञाता, ज्ञेय तथा ज्ञान- तीनों एक में है। वह स्वयं में समस्त जगत् है।


आनन्द सत्य का चरम स्वरूप है। आनन्द से ही यह सब उत्पन्न हुआ है। आनन्द से ही यह सब-कुछ अनुप्राणित है और अन्ततः आनन्द में ही यह सब प्रवेश पाता है। ब्रह्मानन्द के समक्ष चौदहों लोकों का सुख कुछ भी नहीं है। संसार का सारा सुख आत्म-सुख की छाया ही है। आत्म-सुख परम वस्तु है। एकमेव यही सच्चा सुख है। सुख के अन्य साधन गतिमान कल्पनाएँ हैं। अन्य सुख आत्म-सुख की ही क्षीण छाया है। शुद्ध आत्म-सुख अथवा ब्रह्मानन्द के सामने जगत् तथा स्वर्ग का सबसे बड़ा आनन्द भी कुछ नहीं है। सुख की प्राप्ति के लिए मनुष्य को बाह्य पदार्थों की ओर दौड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। आत्मा सारे सुखों का मूल है। आत्मा ही सब-कुछ है, सम्पूर्ण सुख तथा ज्ञान है।


यह सब चैतन्य द्वारा ही अनुशासित है और चैतन्य पर ही आधारित है। चैतन्य ही इस जगत् का विधायक है। चैतन्य ब्रह्म है। वही तू है। यह आत्मा ब्रह्म है। ये सब ब्रह्म की दार्शनिक व्याख्याएँ हैं। "यह सब ब्रह्म ही है।" यह परम साक्षात्कार है। जो इसे जानता है, वह जगत् में पुनर्जन्म नहीं प्राप्त करता।


जिस प्रकार मिट्टी के एक टुकड़े से मिट्टी की बनी हुई सभी चीजें जान ली जाती हैं; जिस प्रकार स्वर्ण के एक टुकड़े से स्वर्ण की बनी सभी चीजें जान ली जाती हैं; जिस प्रकार कैंची के द्वारा लोहे की बनी सभी चीजें जान ली जाती हैं- ये सारे विकार तो नाम मात्र ही हैं। सत्य तो मिट्टी, सोना अथवा लोहा ही है, उसी प्रकार यह जगत् ब्रह्म ही है। ब्रह्म को जान लेने पर सब-कुछ जान लिया जाता है।


प्रारम्भ में एकमेव सत् ही था। वह एकमेवाद्वितीय था। उससे सभी वस्तुओं की उत्पत्ति हुई। उसे विकार केवल प्रतीयमान है। नाम-रूप से परे जगत् है ही नहीं। रंग तथा भ्रामक रूपों के सिवा सूर्य तथा चन्द्र भी नहीं हैं। रंगों को अलग करने पर सूर्य सूर्य नहीं रहता, चन्द्र चन्द्र नहीं रहता, वस्तु वस्तु नहीं रह जाती। ब्रह्म ही रह जाता है।


गुरु के द्वारा पथ-प्रदर्शन प्राप्त मनुष्य सत्य को सुगमतापूर्वक जानता है, अन्यथा आध्यात्मिक अन्धेपन के कारण वह मार्ग भूल जायेगा। गुरु उपदेश देता है- "जो सूक्ष्मतम सार है, वही इस समस्त जगत् की आत्मा है। वही सत्य है। वही आत्मा है। वही तू है।"


भूमा, असीम पूर्णता ही सुख है। अल्प वस्तुओं में सुख कहाँ? असीम ही सुख है। जहाँ मनुष्य अन्य कुछ भी नहीं देखता, अन्य कुछ भी नहीं सुनता, अन्य कुछ भी नहीं समझता वही भूमा है। जहाँ मनुष्य अन्य देखता है, अन्य सुनता है, अन्य समझता है-वही अल्प है। भूमा अमर है। अल्प विनश्वर है। वही भूमा सर्वत्र है। यह सब वही है।


आहार की शुद्धि से अन्तःकरण की शुद्धि होती है। अन्तःकरण की शुद्धि (सत्त्वशुद्धि) से ध्रुवास्मृति मिलती है। ध्रुवास्मृति से हृदय की सम्पूर्ण ग्रन्थियों का भेदन हो जाता है, मनुष्य अमर बन जाता है।


आत्मा ही प्रिय है। जो आत्मा से इतर अन्य वस्तुओं से प्रेम करता है, वह अपनी प्रिय वस्तु को खो बैठता है। आत्मा ही परम है। जो इसे जानता है, वह अक्षय हो जाता है। वह तो पशु के समान ही है जो स्वयं को ईश्वर से भिन्न समझता है। इसके लिए ये सब प्रिय नहीं हैं; परन्तु आत्मा के लिए ही ये सब प्रिय हैं। उस आत्मा को जान लेने पर यह सब स्वतः ही जान लिया जाता है, क्योंकि आत्मा ही यह सब है।


आत्मा अपार एवं अगाध सागर है। यह सत्, चित् तथा आनन्द मात्र है। जहाँ द्वैत है वहीं मनुष्य एक-दूसरे से बातें करता है, एक-दूसरे को देखता है, एक-दूसरे को समझता है; परन्तु जहाँ सब-कुछ आत्मा ही है, वहाँ कौन किससे बातें करेगा, कौन किसे देखेगा, कौन किसे समझेगा? वही परम लक्ष्य है। वही परम वरदान है। वही परम आनन्द है। उसी आनन्द के एक अंश में सभी प्राणी जीते हैं


जो इच्छा रहित है, जो इच्छाओं से मुक्त है, जिसकी इच्छाएँ परितृप्त हैं, जिसकी इच्छा आत्मा ही है, उसके प्राण गमन नहीं करते। वह ब्रह्म तो है ही, शीघ्र ही ब्रह्म बन जाता है।


जीवन्मुक्त बालकवत् है। वह सारे ज्ञान का मूल है, फिर भी अज्ञ की भाँति व्यवहार करता है। वही सच्चा ब्राह्मण है जिसने ब्रह्म को जान लिया।


जो सबमें निवास करता है, फिर भी सबसे अलग है, जिसे सभी वस्तुएँ नहीं जानतीं, जिसके शरीर में ये सारी वस्तुएँ हैं, जो अन्तर से इन सारी वस्तुओं पर नियन्त्रण करता है वही आत्मा अन्तर्यामी तथा अमृत है। वह अदृष्ट द्रष्टा है, अश्रुत श्रोता है, अमंत मंता है। उसके अतिरिक्त किसी भी समय कुछ भी नहीं है। ब्रह्म को जाने बिना ही जो शरीर-त्याग करता है, वह निष्फल ही रह जाता है। वह अभागा है। वह महान् है जो ब्रह्म को जान कर मरता है। वह सच्चा ब्राह्मण है।


वह महान्, अज, अव्यय, अमर, अभय आत्मा ही ब्रह्म है। ब्रह्म अभय है। जो उसे प्राप्त करता है, वह अभय ब्रह्म बन जाता है। वह पूर्ण है। यह पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति हुई है। पूर्ण से पूर्ण को निकाल लेने पर पूर्ण ही बचा रहता है। यही सारे उपनिषदों का सार है।


उपनिषदों की साधना भ्रमर-कीट-न्याय के अनुसार है। उपनिषद् में घोषित सत्य पर ध्यान ही साधना है। यह साधना बहुत ही उच्च कोटि की है। उन्नत साधक ही साधना के इस मार्ग को ग्रहण कर सकते हैं। साधना के इस मार्ग को ज्ञानयोग कहते हैं। इसमें बौद्धिक विश्लेषण के द्वारा अपरोक्षानुभूति को प्राप्त करते हैं। ज्ञानयोगी विज्ञान अथवा बुद्धि से ही साधना का प्रारम्भ करता है। वह आवेगों, प्राणों के संयम आदि पर निर्भर नहीं करता। वह सारे आवेगों को शान्त कर मन को परमात्मा पर केन्द्रित करता है। वह सद्योमुक्ति प्राप्त कर लेता है। वह सभी में प्रवेश कर सबकी आत्मा बन जाता है। यही मानव-जीवन का लक्ष्य है।


. भगवद्गीता की साधना


गीता-साधना


भगवद्गीता खेतों में काम करने वाले कृषकों से ले कर अद्वैत वेदान्त के दार्शनिकों तक सभी के लिए व्यावहारिक साधना का ग्रन्थ है। यह मनुष्य के किसी भी पहलू की उपेक्षा नहीं करती। यह कर्म, आवेग तथा विचार- इन तीनों को ध्यान में रखती है। यह ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र- सिद्धान्त तथा साधना, दोनों ही है। यह कृष्णार्जुनसंवाद, जीव तथा परमात्मा का मिलन है। गीता दार्शनिक सिद्धान्त की पुस्तक नहीं, वरन् मनुष्य के नित्य जीवन में साधना की पथ-प्रदर्शिका है। शुद्ध ज्ञान का मार्ग बहुत उन्नत व्यक्तियों के लिए ही सम्भव है; परन्तु गीता का मार्ग सरल है। सभी इसका अर्थात् ईश्वर-भक्ति का अभ्यास कर सकते हैं।


गीता कर्मयोग पर बल देती है। किसी कर्म को प्रारम्भ कर देने के पश्चात् उससे भागने की कोई आवश्यकता नहीं। कर्म से आत्मा बँधती नहीं तथा आत्मा बाह्य विकारों से प्रभावित नहीं होती, क्योंकि आत्मा नित्य है। मृत्यु तो शरीर का परिवर्तन मात्र है तथा शरीर का विनाश होने पर मनुष्य को शोक करने की आवश्यकता नहीं। आत्मा भूत, भविष्य तथा वर्तमान में एक ही दशा में रहती है। जो इसे जानता है, वह शोक नहीं करता। आत्मा को कोई भी नष्ट नहीं कर सकता। यह अमर तथा अक्षर है। आत्मा किसी को मारती नहीं तथा किसी के द्वारा मारी नहीं जाती। आत्मज्ञान महान् प्राप्ति है।


सुख तथा दुःख में समत्व बुद्धि बनाये रखनी चाहिए। तब मनुष्य पाप-कर्म नहीं कर सकता। मनुष्य का कर्तव्य केवल कर्म करने का है, उसके फल की कामना रखने का नहीं। अनासक्ति के द्वारा मनुष्य कर्मयोग में स्थित हो जाता है। मूर्ख जन ही कर्म-फल के साथ आसक्त बनते हैं।


स्थितप्रज्ञ वह है जो अपनी आत्मा में स्थित तथा तृप्त है। उसे किसी वस्तु से आसक्ति नहीं। वह किसी से द्वेष नहीं रखता। वह किसी से डरता नहीं। ब्रह्म को देख लेने पर विषयों की तृष्णा विलीन हो जाती है। इन्द्रियाँ बड़ी ही शक्तिशाली हैं, वे उन्हें भी भ्रमित कर लेती हैं जो इन्द्रिय-दमन के लिए सतत अभ्यास कर रहे हैं। परन्तु स्थितप्रज्ञ की सारी इन्द्रियाँ उसके वश में होती हैं। विषयाकर्षण से अन्त में मनुष्य का विनाश ही हो जाता है। वही शान्ति प्राप्त कर सकता है जो निरभिमान है, जो ब्रह्मावस्था को प्राप्त है।


कर्म के बिना कोई एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रकृति मनुष्य को उसकी इच्छा के विरुद्ध भी कर्म में लगाये रखती है। वह तो पाखण्डी है जो शरीर से तो शान्त बैठता है; परन्तु मन से विषयों का चिन्तन करता रहता है। वही संन्यासी है जो मन से विरक्त है। कर्म के बिना जीवन सम्भव नहीं; परन्तु उसके लिए कोई कर्म नहीं जो आत्मा में क्रीड़ा कर रहा है तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट है। उसे कोई कर्तव्य करना बाकी नहीं है।


यदि परमेश्वर स्वयं कार्य करे, तो समस्त जगत् ही विनष्ट हो जाये। बड़े जन इसलिए कार्य करते हैं कि दूसरे लोग उनका अनुगमन कर सकें। जिस प्रकार अज्ञ आसक्तिवश काम करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी को आसक्ति रहित हो विश्व-कल्याण के हेतु कार्य करना चाहिए। ज्ञानी मनुष्य को अज्ञानी मनुष्य के मन को अव्यवस्थित नहीं बनाना चाहिए। इन्द्रियों के रूप में गुण विषयों के रूप में गुणों के साथ कार्य करते हैं। ऐसा जान कर ज्ञानी जन आसक्त नहीं होते। प्रकृति के विरुद्ध जाना कठिन है। ज्ञानी भी प्रकृति के बल से प्रेरित होता है। रजोगुण से उत्पन्न काम तथा क्रोध ही मनुष्य के महाशत्रु हैं। वे सद्गुणों को विनष्ट कर शुद्धता का भक्षण करते हैं। वे महान् पापों के मूल हैं। ज्ञान काम से आच्छन्न है; अतः मनुष्य को काम का विनाश करना चाहिए, जो महान् शत्रु है।


वही ज्ञानी ज्ञानी पुरुष है जो कर्म में अकर्म तथा अकर्म में कर्म को देखता है। वही ज्ञानी है जिसने सारे कर्मों को ज्ञान से जला दिया है। वह कर्म के फलों से अविचलित रहता है। उसके लिए सब-कुछ ब्रह्म मात्र ही है। उसके लिए कर्म का कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि वह सभी में ब्रह्म को ही देखता है। सेवा, आत्मार्पण तथा विचार के द्वारा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान महान् पापों को भी विनष्ट कर देता है। सबसे बड़ा पापी भी परम ज्ञान को प्राप्त कर लेता है। जिस प्रकार अग्नि ईंधन को जला डालती है, उसी प्रकार ज्ञान सारे कर्मों को जला डालता है। कालान्तर में ही ज्ञान की प्राप्ति होती है।


ज्ञान तथा कर्म भिन्न-भिन्न नहीं हैं, क्योंकि दोनों ही मुक्ति के साधन हैं। राग रहित कर्म पूर्ण त्याग से कहीं बढ़ कर है। कर्मों का त्याग करना कठिन है। राग रहित कर्म से ब्रह्म की प्राप्ति सुगमता से हो जाती है। वह सारे कार्यों को करते हुए भी असंग रहता है। वह जल में पद्मपत्रवत् अलिप्त रहता है।


परमात्मा मनुष्य को पाप-पुण्य कर्म प्रदान नहीं करता। प्रकृति ही ऐसा करती है। ज्ञान अज्ञान से आवृत है। यही कारण है कि सारे जीव भ्रमित हो रहे हैं। उनके लिए ब्रह्म प्रकट होता है जिन्होंने आत्मज्ञान के द्वारा अज्ञान को हटा दिया है। वे सदा ब्रह्म में निमग्न रहते हैं- ब्रह्म से एक बने रहते हैं। वे उसी ब्रह्म को सभी में देखते हैं। उन्होंने यहीं जन्म और मृत्यु पर विजय पा ली है।


विषयों के सम्पर्क से उत्पन्न सुख भावी दुःख की जननी है। ज्ञानी लोग उसमें सुख को नहीं देखते। जो आत्मा में स्थित है, जो आत्मा में आनन्दोपभोग करता है, जो आत्मा में शान्ति के साथ संस्थित है, जो आत्म-ज्योति का द्रष्टा है, वह परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।


सच्चा योगी वही है जिसने विचारों का संन्यास कर लिया है। आत्मा पर ध्यान के द्वारा इस योग की प्राप्ति होती है। वह अक्षय, अतीत, नित्य, ज्ञानस्वरूप तथा इन्द्रियों से परे है। इसको प्राप्त कर लेने पर मनुष्य के लिए अन्य लाभ नहीं रह जाता। इसमें स्थित हो कर मनुष्य गुरुतम आपत्तियों में भी विचलित नहीं होता। यही योग है जो सारे दुःखों को विनष्ट करता है। उसी का अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास तथा वैराग्य के द्वारा मनुष्य योग में स्थित हो जाता है। यदि इस जीवन में लक्ष्य प्राप्ति हई, तो वह दूसरा अनुकूल जन्म ले कर अभ्यास जारी रखता है। पिछले संस्कार उसका मार्ग-दर्शन करते हैं। वह ब्रह्म को पा जाता है।


परमात्मा सारे लोकों की योनि है। वह स्रष्टा, पालक तथा संहारक है। वह सबसे महान् है। तीन गुणों ने समस्त संसार को भ्रम में डाल दिया है। अतः ईश्वर को कोई जानता नहीं। ईश्वरार्पण के बिना इस माया को जीतना असम्भव है। ऐसे लोग ईश्वर के प्रिय है। उनमें ज्ञानी सर्वोत्तम भक्त है; क्योंकि उसमें स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ नहीं रहीं। बहुत जन्मों के पश्चात् ही मनुष्य यह साक्षात्कार करता है कि सब-कुछ वासुदेव ही है। सभी विभिन्न कामनाओं से मोहित हैं। वे विविध जन्म-मृत्यु के चक्कर से हो कर ही ईश्वर को प्राप्त करेंगे।


जो मृत्यु-काल में का जप करता है तथा ईश्वर का ध्यान करता है, वह परम पद को पा लेता है। उसको प्राप्त कर लेने पर संसार का भय नहीं रह जाता। ब्रह्मलोक भी विनश्वर है। वहाँ से भी मनुष्य को मृत्युलोक में आना पड़ता है; परन्तु परम धाम को प्राप्त करने पर मनुष्य पुनः मृत्युलोक में नहीं लौटता।


स्वर्ग का सुख भी विनश्वर है। पुण्य-कर्म के समाप्त होने पर जीव मृत्युलोक में जा गिरता है। जो ईश्वर को ही आश्रय मान कर सदा उसका चिन्तन करते रहते हैं, ईश्वर स्वयं उनके योग-क्षेम को देखता है। जो गलती से अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे भी अनजाने उसी परमात्मा की पूजा कर रहे हैं तथा यह सारी आराधना उसी परमात्मा को प्राप्त होती है। वह सभी का ईश्वर है। भक्तिपूर्वक अर्पित किये गये सूखे पत्ते को भी वह ग्रहण कर लेता है। उसका भक्त कभी भी विनष्ट नहीं होता। स्त्रियाँ तथा शूद्र भी ईश्वरार्पण के द्वारा मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। यह जगत् अनित्य है। मनुष्य को नित्य प्रभु की शरण में जाना चाहिए। ईश्वर समस्त जगत् में व्याप्त है। ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसमें वह हो। उसके एक अंश से ही समस्त जगत् स्थित है।


ईश्वर को प्राप्त करने के लिए भक्ति ही केन्द्रीय मार्ग है। भक्त ही ईश्वर का दर्शन प्राप्त कर सकता है। निष्काम प्रेम के बिना देवता भी ईश्वर का दर्शन प्राप्त नहीं कर सकते। ऐसा शुद्ध भक्त किसी से घृणा नहीं करता तथा सुख-दुःख में सन्तुलित रहता है। वह तो हर्षित होता है घृणा करता है, शोक करता है और कामना ही करता है। वह जगत् से भय नहीं खाता है और जगत् ही उससे भय खाता है। उसके लिए मान तथा अपमान समान हैं। उसके लिए मित्र तथा शत्रु समान हैं। उसने सारे कर्मारम्भों का परित्याग किया है। उसने सारे गुणों का अतिक्रमण कर लिया है।


परब्रह्म अनिर्वचनीय है। वह ज्योतियों की ज्योति तम से परे है। वह तो सत् है और असत्। वह सभी को व्याप्त कर रहा है। वह निकट और दूर है, सूक्ष्म और स्थूल है। वह सभी के हृदय में अन्तरात्मा के रूप में स्थित है। जब मनुष्य सारी अनेकता को उस एक में स्थित देखता है, तब वह ब्रह्म बनने के योग्य हो जाता है।


सत्त्व से प्रकाश मिलता है। रज विक्षेप उत्पन्न करता है। तम उसे जड़वत् बनाता है। मनुष्य रज तथा तम का सम्मिश्रण है। वह कदाचित् ही कभी शुद्ध सत्त्व की अवस्था का अनुभव करता है। जब मनुष्य यह अनुभव कर लेता है कि गुणों के अतिरिक्त कोई भी कर्ता नहीं, तब वह इन गुणों का अतिक्रमण कर अमर बन जाता है।


यह संसार वृक्ष के समान है, जिसका मूल ऊपर है तथा शाखाएँ नीचे फैली हुई हैं। असंग शस्त्र के द्वारा इस वृक्ष का मूलोच्छेदन करना चाहिए। तब मनुष्य ब्रह्मावस्था को प्राप्त कर लेता है; जहाँ सूर्य तथा चन्द्र नहीं विभासित होते, जहाँ अग्नि की कोई विसात नहीं रहती। जगत् की सबसे बड़ी ज्योति भी उसी परम ज्योति का एक अंश है। जगत् की हर वस्तु उसी ब्रह्म की छाया है। वह सभी वस्तुओं का अतिक्रमण करता है। वह जीव तथा माया से परे है। वह पुरुषोत्तम है जिसका वर्णन वेदों में है। जो उसे जानता है, उसने सारे कर्तव्य कर लिये। वह ज्ञानी है, उसने सब-कुछ जान लिया।


आसुरी सम्पत्ति वाले जन ईश्वर से प्रेम नहीं करते। वे ईश्वर के अस्तित्व के प्रति शंका करते हैं तथा जगत् को काम से उत्पन्न हुआ मानते हैं। वे अभिमानी तथा अहंकारी हैं। वे कठोर तथा क्रोधी हैं। वे अनेकानेक कामनाओं के पाश से बद्ध हैं। वे भोग के लिए ही जीते हैं। वे धन का अभिमान रखते हैं तथा मृत्यूपरान्त नरक में पतित होते हैं। वे ब्रह्म को प्राप्त नहीं करते। काम, क्रोध तथा लोभ-ये नरक के तीन दरवाजे हैं।


मन के संयम के बिना जो शारीरिक तप करता है, वह तो पाखण्डी है। मनुष्य को शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक तपस्या करनी चाहिए। मन, वचन तथा कर्म से मनुष्य को शुद्ध बनना चाहिए। स्वार्थ-कार्य अनैतिक है। निःस्वार्थता ही नीति तथा सदाचार है। हर कर्म परमात्मा के स्मरण के साथ करना चाहिए। परमात्म-चिन्तन के बिना सारे कर्म व्यर्थ हैं।


स्वार्थपूर्ण कर्मों का परित्याग ही संन्यास है; परन्तु अपना कर्तव्य त्यागा नहीं जा सकता। अपना कर्तव्य ही पवित्र है। सारे कर्म आसक्ति से रहित हो कर करने चाहिए। कर्म को इसलिए नहीं त्यागना चाहिए; क्योंकि वह कठिन है। सुख के लिए कर्म नहीं करते। विषय-सुख प्रारम्भ में अमृत-से जान पड़ते हैं; परन्तु अन्त में विषवत हैं। उनका त्याग करना चाहिए। वर्णाश्रम-प्रणाली पूर्ण प्रणाली है। इसका पालन करना चाहिए।


ब्रह्म-साक्षात्कार के लिए एकान्त-वास तथा आत्म-चिन्तन करना चाहिए। बाद्य पदार्थों से असंग हो कर उसे परमात्मा में स्थित होना चाहिए। सारे सांसारिक धर्मों का परित्याग कर उस परमात्मा की शरण में जाना चाहिए। वह पाप के बन्धन से मुक्त हो जायेगा।


गीता मनुष्य को पूर्णता की ओर लक्ष्य करती है जिससे कि वह ईश्वरीय बन जाये। श्री कृष्ण जी का जीवन ही गीता के आदर्शों का सर्वोत्तम उदाहरण है। उनका जीवन ही गीता की सर्वोत्तम टिप्पणी है। कृष्ण के समान बनना ही गीता का आदर्श है। ऐसा बनने के लिए मनुष्य को भक्त, दार्शनिक, योगी तथा कर्मयोगी में से कोई एक नहीं बनना है, वरन् सब बनना है एक-साथ ही। वह किसी भी मार्ग को अपने स्वभावानुसार चुन सकता है; परन्तु उसे अनुभव होगा कि एक मार्ग में उन्नति करने का अर्थ है समानान्तर रूप से सभी मार्गों में उन्नति करना। व्यक्ति की एकांगी उन्नति नहीं हो सकती। यदि सच्ची तथा स्थायी पूर्णता पानी है तो उसे सर्वांगीण होना चाहिए। ब्रह्म का साक्षात्कार करने के लिए ब्रह्म ही बन जाना होगा, जो पूर्ण है। मनुष्य को असीम बनना है और उसके लिए उसे अपने समस्त अस्तित्व को विकसित करना होगा।


हमारा मन आन्तरिक संग्राम के लिए महाभारत का कुरुक्षेत्र है जहाँ हर समय संग्राम जारी रहता है, जहाँ एक प्रकार के विचार दूसरे प्रकार के विचारों से टकराते रहते हैं। अतः हम सभी ज्योति, ज्ञान तथा सम्मति प्राप्त करना चाहते हैं जिसे भगवान् कृष्ण ने गीता में अर्जुन को दिया है। जीवन के मुख्य तत्त्वों का वर्णन करते हुए परमात्मा कृष्ण ने जगत्-समस्या के मूल का ही निदर्शन किया है तथा ऐसे सत्यों को प्रकट किया है जो सार्वभौमिक हैं। अर्जुन के निमित्त से भगवान् कृष्ण ने सारी मानव जाति के लिए भगवद्गीता प्रदान की है। कृष्ण नित्य-तत्त्व का प्रतीक हैं और अर्जुन ससीम मनुष्य का। गीता के उपदेश किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, वरन् सभी मनुष्यों के लिए हैं।


संसार में रहिए। मानव जाति की सेवा कीजिए। सबको समान रूप से प्रेम कीजिए; परन्तु आसक्त बनिए। अनासक्त रहिए। आत्मा में सन्तुष्ट रहिए। जीवन में बन्धनकारक कामनाएँ रखिए। सेवा कीजिए। प्रेम कीजिए। दान दीजिए। शुद्ध बनिए। ध्यान कीजिए। साक्षात्कार कीजिए। अपने को ईश्वर के प्रति अर्पित कीजिए। यही गीता का सारांश है।


इस चेतना से काम कीजिए कि सभी आत्मा हैं, सभी ईश्वर हैं। ईश्वर ही नर और नारी है तथा वही लड़खड़ाता हुआ वृद्ध भी है। विषयों में आसक्ति नहीं होनी चाहिए। सभी आत्मा ही है। सभी में स्वयं के दर्शन कीजिए। दूसरों से ठीक उसी प्रकार प्रेम कीजिए जिस प्रकार आप स्वयं से करते हैं। शरीर की भिन्नताओं को देखिए। अन्तर के सारतत्त्व को देखिए। कर्मों को करते समय अकर्ता-भाव अथवा नारायण-भाव रखिए। जब तक आप शरीरधारी हैं, काम तो आपको करने ही होंगे। शरीर का यह स्वभाव ही है। मन आपको कर्म के लिए बाध्य करेगा। प्रकृति शक्तिशाली है। बुद्धिमान् लोग भी उसके फेर में पड़ जाते हैं। प्रकृति अथवा माया के बन्धन से मुक्त होने के लिए ईश्वरार्पण ही एकमेव मार्ग है।


जीवन की सारी घटनाओं के साक्षी रहिए। अपने कर्तव्य कर्म को कीजिए। फल की आकांक्षा रख कर सेवा कीजिए। यही योग का सारांश है।


सभी भूतों के हृदय में प्रभु का निवास है। वह अन्तर्यामी तथा अमर है। उसी की ओर दौड़िए। उसी में शरण ग्रहण कीजिए। मुक्ति के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं है। आपके सारे कर्म नष्ट हो जायेंगे, सारे पाप विदग्ध हो जायेंगे, सारी शंकाएँ दूर हो जायेंगी। ईश्वरार्पण कीजिए।


मन के विक्षेपों को नियन्त्रित कीजिए। एकान्त स्थान में बैठ कर आत्मा पर ध्यान कीजिए। तब ज्ञान का उदय तथा अज्ञान का विनाश होगा। अमृतत्व की प्राप्ति होगी। परमानन्द का फल मिलेगा। सारे साधनों का एकमेव लक्ष्य नित्य-तृप्ति है। उपर्युक्त समन्वययोग से इसकी प्राप्ति होगी। गीता को मानव जगत् के लिए यही उपदेश प्रदान करना है।


साधना-सम्बन्धी गीता के श्लोक


कर्मयोग : दूसरा अध्याय ४८ वाँ श्लोक; चौथा अध्याय २०, २२ तथा २४ वाँ श्लोक।


भक्तियोग : नवाँ अध्याय २७ तथा ३४ वाँ श्लोक; बारहवाँ अध्याय वाँ श्लोक; अठारहवाँ अध्याय ५२ से ५४ तक के श्लोक


जपयोग : अठारहवाँ अध्याय १४ वाँ श्लोक


अभ्यासयोग : बारहवाँ अध्याय १० तथा १२ वाँ श्लोक


हठयोग : आठवाँ अध्याय १० तथा १२ वाँ श्लोक


राजयोग : छठा अध्याय २५ तथा २६ वाँ श्लोक


ज्ञानयोग : तीसरा अध्याय २८ वाँ श्लोक; पाँचवाँ अध्याय तथा वाँ श्लोकअध्याय



अध्याय :महाकाव्यों तथा पुराणों में साधना


. रामायण में साधना


रामायण जगत् के सबसे प्राचीन तथा महान् ग्रन्थों में परिगणित है। हिन्दू संस्कृति तथा सभ्यता के उच्चतम आदर्श इसमें निहित हैं।


यह युवकों के लिए नीति-शास्त्र है। यह उन्हें आचार तथा चरित्र के उन्नत आदशों की ओर प्रेरित करती है।


रामायण का गूढ़ार्थ इस प्रकार है: रावण अहंकार का प्रतीक है। उसके दश शिर, दश इन्द्रियाँ हैं। लंका नगरी नव द्वार-पुरी यह शरीर ही है। विभीषण बुद्धि है। सीता शान्ति है। राम ज्ञान है। रावण को मारने का अर्थ है- अहंकार को मारना तथा इन्द्रियों का दमन करना। सीता को प्राप्त करने का अर्थ है- शान्ति को प्राप्त करना, जिसे जीव ने कामनाओं के कारण खो दिया है। ज्ञान प्राप्त करने का अर्थ है-राम के दर्शन पाना।


जो मोह के सागर को पार कर राग-द्वेष रूपी राक्षसों को विनष्ट करता है, वही महान् योगी है। वह शान्ति से युक्त है। वह आत्मा में स्थित हो कर नित्य-सुख का उपभोग करता है। वही आत्मा-राम है।


श्री राम सत्त्व के प्रतीक हैं। रावण तम का प्रतीक है। श्री राम तथा रावण में लड़ाई हुई। अन्ततः राम विजयी हुए। धनात्मक की ऋणात्मक के ऊपर विजय होती है। सत्त्व सदा तम पर विजय पाता है। शुभ अशुभ को पराजित करता है।


बाल्मीकि मुनि के अनुसार दैनिक जीवन के अनुशासन के द्वारा ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त करना चाहिए। बाल, अरण्य तथा युद्ध काण्ड में शरणागति और ईश्वरार्पण पर विशेष जोर दिया गया है।

. महाभारत में साधना


महाभारत का सन्देश सत्य तथा धर्म का सन्देश है। यह महाकाव्य पाठकों में नैतिक जागरण लाता है तथा उन्हें सत्य एवं धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। यह


सत्कर्म करने, धर्म पर चलने तथा इस जगत् की भ्रान्ति को देख कर वैराग्य की वृद्धि कर नित्य-सुख एवं अमृतत्व की प्राप्ति के लिए प्रेरणा देता है। यह लोगों में युधिष्ठिर का आदर्श भरता है तथा दुर्योधन के कृत्यों से दूर रहने की शिक्षा देता है। दृढ़तापूर्वक धर्म पर स्थिर रहिए। आप भौतिक तथा आध्यात्मिक सम्पत्ति प्राप्त करेंगे। आप नित्य-सुख तथा मोक्ष प्राप्त करेंगे। यही महाभारत का मुख्य तात्पर्य है।


अन्धा धृतराष्ट्र अविद्या का प्रतीक है। युधिष्ठिर धर्म है। दुर्योधन अधर्म है। द्रौपदी माया है। दुःशासन दुर्गुण है। शकुनी ईर्ष्या तथा अत्याचार है। अर्जुन जीवात्मा है। श्री कृष्ण परमात्मा हैं। अन्तःकरण मनुष्य का अन्तर्मन ही कुरुक्षेत्र है।


धीर तथा वीर पितामह भीष्म, जिन्होंने मृत्यु पर भी विजय पायी थी तथा जो संग्राम में देवताओं द्वारा भी दुर्दम्य थे, हममें आत्म-त्याग, अप्रतिहत साहस तथा शुद्धता की ओर प्रेरित करते हैं। युधिष्ठिर न्याय तथा धर्म की प्रतिमूर्ति हैं। उसके नाम के स्मरण मात्र से हमारे हृदय में हर्षातिरेक हो उठता है तथा सत्य एवं धर्म की चेतना जाग पड़ती है। कर्ण भी अपनी दानशीलता के कारण हम लोगों के हृदय में निवास करता है। कर्ण का नाम कहावत ही बन गया है। जब कभी लोग किसी की दानशीलता की प्रशंसा करते हैं, तो कहते हैं- "वह दान में कर्ण ही है।"


आज भी अर्जुन को पूर्ण मनुष्य के रूप में तथा भगवान् कृष्ण को अपने त्राता के रूप में देखते हैं। जब कभी हम विपत्ति में पड़ते हैं, हम कृष्ण से प्रार्थना करते हैं- "हे प्रभु! मुझे उसी प्रकार बचाओ जिस प्रकार तुमने दौपदी तथा गजेन्द्र को बचाया था।"


पाण्डवों तथा द्रौपदी के दुःख एवं कष्ट, नल तथा दमयन्ती, सावित्री तथा सत्यवान के कष्टये स्पष्टतः बतलाते हैं कि जीवन-लक्ष्य की परिपूर्णता की प्राप्ति दुःख एवं कष्टों के द्वारा ही सम्भव है। दुःख वह साधन है जिससे मनुष्य दिव्य साँचे में ढलता, अनुशासित एवं सबल बनता है। जिस प्रकार अशुद्ध सोने को गला कर शुद्ध बनाया जाता है, उसी प्रकार मलिन एवं अपूर्ण मनुष्य दुःख एवं कष्ट में गल कर शुद्ध, पूर्ण एवं सबल बनता है; अतः मनुष्य को दुःख एवं कष्टों से भय नहीं खाना चाहिए। वे सभी गुप्त वरदान ही हैं। वे आँखों को खोलते हैं। वे मूक गुरु हैं। वे मन को ईश्वरोन्मुख करते तथा हृदय में करुणा भरते एवं आत्म-बल तथा तितिक्षा-शक्ति की वृद्धि करते हैं। वे सब ईश्वर-साक्षात्कार के लिए अनिवार्य हैं।

. भागवतपुराण में साधना


अवधूत के चौबीस गुरु


धर्म में पारंगत यदु ने एक युवक ब्राह्मण संन्यासी को निर्भय विचरते देखा तथा धर्म-तत्त्व को जानने की इच्छा से उससे निम्नांकित प्रश्न पूछे :


यदु ने कहा, "हे ऋषि ! बिना किसी कार्य को करते हुए भी आपने इस विशुद्ध ज्ञान को कैसे पाया, जिसके बल से आप सारे संगों से मुक्त हो कर शिशुवत् निर्भय अवस्था में सम्पूर्ण सुख में विचरण कर रहे हैं?


"साधारणतः इस जगत् के लोग धर्म, अर्थ, काम तथा आत्म-चिन्तन का अभ्यास चिरायु, यश तथा सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए ही करते हैं। आपका सुगठित शरीर है। आप ज्ञान तथा विज्ञान से पूर्ण तथा सुन्दर हैं। आपकी वाणी मधुर तथा अमृत के समान है, यद्यपि आप कोई काम नहीं करते और तो कोई प्रयास ही करते हैं। आप किसी वस्तु से राग नहीं रखते। संसार के लोग काम तथा लोभ की अग्नि से झुलस रहे हैं; परन्तु आप इस अग्नि से जरा भी सन्तप्त नहीं हैं। आप आत्म-तृप्त तथा सुखी हैं।


"जिस प्रकार गंगा-जल में बैठा हुआ हाथी दावानल से पीड़ित नहीं होता, उसी प्रकार आप भी क्लेशाग्नि से पीड़ित नहीं हैं। आपके सुख एवं आनन्द का मूल क्या है, इसकी मुझे शिक्षा दीजिए। एकान्त जीवन में विषय-पदार्थों से अलिप्त आत्मा में ही आप कैसे सुख को प्राप्त करते हैं? आपका तो परिवार है और विषय-सुख, आपको सुख कहाँ से मिलता है?"


श्री कृष्ण ने कहा, "बुद्धिमान् यदु से इस प्रकार पूछे जाने पर उस ब्राह्मण ने राजा से कहा। राजा आदर से विनत हो रहा था।"


ब्राह्मण ने कहा, "मेरे बहुत से गुरु हैं। मैंने अपनी बुद्धि से उन गुरुओं से शिक्षा पायी। उनसे ज्ञान को प्राप्त कर मैं असंग इस पृथ्वी पर विचरण करता हूँ। सुनिए, वे कौन-कौन हैं।


"पृथ्वी, वायु, गगन, जल, अग्नि, चन्द्र, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, भौरा, हाथी, मधुमक्खी, हरिण, मछली, पिंगला नर्तकी, काग, शिशु, स्त्री, तीर-निर्माता, सर्प, मकड़ा, भृंगी हे राजन्, ये मेरे चौबीस गुरु हैं जिनसे मैंने शिक्षा पायी है। उनके स्वाभाविक गुणों से मैंने अपने सारे पाठ पढ़े हैं। अब बतलाऊँगा कि मैंने उनसे क्या-क्या सीखा है।


"ज्ञानी मनुष्य अपने धर्म-मार्ग से कभी भी विचलित हो। नियति के वशीभूत हो यदि जीवगण उसे कष्ट भी दें तो भी वह अविचल रहे। इस तितिक्षा को मैंने पृथ्वी से सीखा है। मैंने पर्वतों से, जो पृथ्वी के ही भाग है, यह सीखा कि हमारे सारे कर्म परोपकार के लिए होने चाहिए तथा हमारा अस्तित्व ही परोपकारार्थ होना चाहिए। मैंने वृक्षों से, जो पृथ्वी के ही भाग हैं, सीखा कि मुझे सदा दूसरों की सेवा में ही लगे रहना चाहिए।


"ज्ञानी अपने जीवन-निर्वाह में ही सन्तुष्ट रहे। वह इन्द्रिय-सुख के लिए लालायित हो; क्योंकि इससे व्यर्थ पदार्थों में पड़ कर मन विक्षिप्त हो जायेगा तथा ज्ञान नष्ट हो जायेगा।


"वायु के समान ही योगी वस्तुओं से निर्लिप्त रहे। शरीर में तथा विभिन्न वस्तुओं के मध्य में रहते हुए भी वह उनसे असंग रहे। वस्तुओं के भले-बुरे परिणामों से भी उसका मन अप्रभावित रहना चाहिए। वायु सुगन्धित एवं दुर्गन्धपूर्ण पदार्थों से हो कर बहते हुए भी अलिप्त रहता है, ठीक उसी प्रकार ज्ञानी को भी रहना चाहिए। आत्मा शरीर में प्रवेश करती है तथा शरीर के गुण उसके अपने जैसे मालूम पड़ते हैं; परन्तु ऐसा नहीं है। वायु गन्ध का वहन करता है; परन्तु गन्ध वायु का गुण नहीं है। यह शिक्षा मैंने बाह्य वायु से ग्रहण की है।


"मैंने प्राण से यह शिक्षा ली है कि मनुष्य को जीवन-रक्षा के लिए आहार करना चाहिए कि आहार के लिए ही जीवन यापन करना चाहिए। वह इन्द्रियों के पोषण तथा उन्हें सबल बनाने के लिए भोजन करे। उतना ही भोजन करे जो जीवन की ज्योति को बनाये रखे।


"आत्मा सर्वव्यापक है। वह शरीर तथा शरीर के गुणों से अलिप्त है। ऐसा मैंने आकाश से सीखा जो सर्वव्यापक है और मेघ तथा अन्य वस्तुओं से अलिप्त है। शरीर में रहते हुए भी ज्ञानी गगन सदृश आत्मा के साथ एकता स्थापित कर आत्म-चिन्तन करें। जिस प्रकार एक ही सूत्र में माला के फूल ग्रथित रहते हैं, उसी प्रकार उस आत्मा के अधिष्ठान में सारे चल एवं अचल भूत पदार्थ ग्रथित हैं। आत्मा देश-काल से सीमित नहीं है तथा वह किसी भी वस्तु से लिप्त नहीं होती।


"जल स्वभावतः शुद्ध, स्निग्ध तथा मधुर होता है। उसी प्रकार मनुष्यों में ज्ञानी भी रहता है। वह तीर्थ के जल के समान लोगों को अपने दर्शन, स्पर्श तथा भगवन्नाम के उच्चार के द्वारा शुद्ध बनाता है। यह मैंने जल से सीखा।


"भास्वर, ज्ञान में सबल, तपस्या से विभासित, पेट के अतिरिक्त भोजन के लिए अन्य कोई पात्र रखते हुए तथा सब-कुछ भक्षण करते हुए ज्ञानी अग्नि के समान ही अलिप्त रहता है। वह कभी-कभी दृष्टि में नहीं आता। कभी-कभी वह कल्याण-कृत मनुष्यों की दृष्टि में जाता है। श्रद्धालु भक्तों द्वारा प्रदत्त भिक्षा को वह खाता है तथा उनके भूत एवं भविष्य के मलों को भस्मीभूत कर डालता है। अग्नि एक ही है, यद्यपि वह विभिन्न प्रकार के ईंधनों में प्रवेश करती है। ईंधन के आकार के अनुसार अग्नि भी त्रिकोण, वृत, आयत तथा अन्य आकारों में जलती है। उसी प्रकार परमात्मा भी सभी भूतों में गुप्त हो कर विभिन्न शरीरों में उन उपाधियों के समान ही प्रतीत होता है। अपनी ही माया से रचित इस जगत् के ऊँचे-नीचे विभिन्न पदार्थों में प्रवेश कर हर पदार्थ के समान ही वह प्रतीत होता है। जन्म तथा मृत्यु शरीर के लिए हैं, आत्मा के लिए नहीं तथा ये कालानुसार होते हैं। लपटें ही परिवर्तनशील हैं, अग्नि नहीं।


"चन्द्रमा का घटना-बढ़ना चन्द्रमा के परिवर्तन के कारण नहीं होता, वरन् सूर्य के प्रकाश के परिवर्तन के कारण होता है। अतः मैंने यह सीखा कि जन्म, वृद्धि, जरा, मृत्यु इत्यादि शरीर के विकार हैं, आत्मा के नहीं। आत्मा असीम, अजर तथा अमर है। चन्द्रमा ज्यों-का-त्यों रहता है, केवल ग्रह-गति के कारण ही उसमें प्रतीयमान परिवर्तन होता है।


"सूर्य रोशनी के द्वारा जल खींचता है और कालान्तर में सारे जल को लौटा देता है। ज्ञानी भी ग्रहण करता है देने के लिए ही, अपने अधिकार की वृद्धि के लिए नहीं। जिस प्रकार एक ही सूर्य विभिन्न जलपूर्ण पात्रों में प्रतिबिम्बित हो कर विभिन्न मालूम पड़ता है, ठीक उसी प्रकार आत्मा भी विभिन्न शरीरों में मन की उपाधियों में विभिन्न रूप से प्रतिबिम्बित हो कर विभिन्न मालूम पड़ता है।


"अधिक आसक्ति बुरी है। मनुष्य को किसी भी व्यक्ति के साथ अधिक ममता अथवा आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। किसी भी वस्तु के प्रति अत्यधिक आसक्ति मनुष्य के विनाश का कारण है, यह मैंने कबूतर के जोड़े से सीखा। किसी जंगल में एक वृक्ष के ऊपर एक कबूतर ने घोंसला बनाया तथा अपनी मादा के साथ कुछ वर्षों तक निवास किया। वे दोनों एक-दूसरे के प्रति रागासक्त थे। बड़ी ममता के साथ उन्होंने बच्चों का पालन-पोषण किया। एक दिन घोंसले में ही बच्चों को छोड़ वे भोजन की तलाश में चल पड़े। एक शिकारी ने जाल फैला कर उनके बच्चों को पकड़ लिया। वे कबूतर भोजन ले कर नीड़ को लौटे। माँ को बच्चों पर अत्यधिक ममता थी। वह जान-बूझ कर जाल में गिर पड़ी। नर कबूतर भी जाल में जा फँसा। शिकारी ने बच्चों के साथ कबूतर को भी पकड़ लिया। वह बहुत ही सन्तुष्ट हो कर घर को चला। उसी प्रकार अनियन्त्रित इन्द्रिय वाले दुःखी गृहस्थ वैवाहिक जीवन में सुखोपभोग करते हुए उस कपोत और कपोती के समान ही शोक में निमग्न हो जाते हैं। मानव-जन्म पा कर जो व्यक्ति गृहस्थ-जीवन से ही आसक्त है, वह उन पक्षियों के समान ही जाल में जा गिरा है।


"इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त सुख, चाहे इस लोक में चाहे परलोक में, नश्वर तथा गतिमान है। ज्ञानी जन उसके पीछे नहीं पड़ते।


"विशाल अजगर अपने स्थान पर ही स्थिर रहता है और जो कुछ भी आहार उसे स्वतः प्राप्त होता है, उसी से तृप्त रहता है। अजगर की भाँति मनुष्य को भी प्रयत्न रहित बन कर जो कुछ भी आहार संयोगवश प्राप्त हो, सुस्वादु या नीरस, अधिक या अल्प, उसी को ग्रहण करना चाहिए। यदि भोजन उसके पास पहुँचे, तो उसे दीर्घ काल तक भी शान्त पड़े रहना चाहिए तथा उसके लिए प्रयास भी नहीं करना चाहिए। अजगर की भाँति उसे नियति के अवलम्ब पर रहना चाहिए। शक्तिशाली शरीर के रहते हुए भी तथा बल और धैर्य से युक्त हो कर भी वह सजग पड़ा रहे तथा सबल इन्द्रियों के रहते हुए भी प्रयत्न करे।


"ज्ञानी को प्रशान्त सागर की भाँति शान्त, गम्भीर, अथाह, असीम तथा अविचल रहना चाहिए। सागर कभी-कभी नदियों से अत्यधिक जल को प्राप्त करता है और कभी-कभी अत्यल्प; फिर भी वह एक समान ही बना रहता है। उसी प्रकार वह ज्ञानी भी, जिसने अपने हृदय को ईश्वर पर स्थिर किया है, तो हर्ष से फूलता है और शोक से खिन्न होता है। अत्यधिक उपभोग से वह फूलता नहीं, प्रबल विपत्ति से भी वह खिन्न नहीं होता।


"अनियन्त्रित इन्द्रिय रखने वाला मनुष्य स्त्री, ईश्वरीय माया को देख कर, उसके भाव एवं व्यवहार से मोहित हो कर अन्ध तम में ठीक उसी प्रकार जा गिरता है जिस प्रकार पतंगे अग्नि में जा मरते हैं। वह मूर्ख जो स्त्री, स्वर्णाभूषण, वस्त्र आदि माया रचित वस्तुओं को भोग-वस्तु मानता है, वह अपनी शुद्ध दृष्टि को खो कर पतंगे की भाँति ही विनष्ट हो जाता है।


"ज्ञानी मनुष्य घर-घर भिक्षा लेने के लिए जाये। हर घर से हथेली-भर प्राप्त करे। उतना ही भोजन करे जितना उसके शरीर निर्वाह के लिए पर्याप्त हो। किसी गृहस्थ के ऊपर भार डाले। मधुमक्खी जिस प्रकार सभी फूलों से मधु एकत्र करती है, ठीक उसी प्रकार वह भी भिक्षा एकत्र करे।


"बुद्धिमान् मनुष्य सभी छोटे-बड़े शास्त्रों के सारतत्त्व को ग्रहण करे, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार मधुमक्खी फूलों से मधु एकत्र करती है। ज्ञानी पुरुष शाम के लिए अथवा दूसरी सुबह के लिए भोजन संग्रह करे। हाथ तथा पेट ही उसके पात्र हों। वह मधुमक्खी की भाँति एकत्र करे। जो भोजन एकत्र करता है, वह मधुमक्खी की भाँति भोजन के साथ-साथ ही विनष्ट हो जाता है।


"संन्यासी अपने पैरों से भी काष्ठ-निर्मित युवा स्त्री को छुए। ऐसा करने पर वह उसी प्रकार बँध जायेगा, जिस प्रकार नर हाथी को मादा हथिनी के स्पर्श के द्वारा बाँध लिया जाता है। ज्ञानी मनुष्य स्त्री के संग को उसी तरह त्यागे मानो कि वे मृत्यु ही हैं।


"कृपण मनुष्य जो धन का संग्रह करता है, वह तो दान देता है और स्वयं ही धन का उपभोग करता है। जो कुछ भी कठिनाई के साथ एकत्र करता है, उसे अन्य ले जाते हैं। जिस प्रकार मधुमक्खी के छत्ते से मधु ले लिया जाता है, ठीक उसी प्रकार कंजूस से धन छीन लिया जाता है।


"यति विषय-सम्बन्धी संगीतों का श्रवण करे। वह मृग से शिक्षा ले। मृग शिकारियों के संगीत के मोह में पड़ कर बंध जाता है। मृगी से उत्पन्न श्रृंग ऋषि स्त्रियों द्वारा विषय-संगीत को सुन कर आसानी से बन्धन में पड़ गये। वे स्त्रियों के हाथों का खिलौना बन गये।


"जिस प्रकार मछली बंसी में लगे हुए आहार से आकृष्ट हो कर बंध जाती है, उसी प्रकार जिह्वा के प्रलोभन में पड़ कर मूर्ख मनुष्य मृत्यु का शिकार बन जाता है। जिह्वा अथवा स्वाद के प्रति राग को जीतना सबसे अधिक कठिन है। जिह्वा को नियन्त्रित करने पर अन्य सभी इन्द्रियों का दमन हो जाता है। स्वादेन्द्रिय को वशीभूत किये बिना कोई भी इन्द्रियों का स्वामी नहीं बन सकता। विचारशील मनुष्य उपवास द्वारा शीघ्र ही इन्द्रियों का दमन कर लेते हैं।


"प्राचीन काल में विदेह नगरी में एक वेश्या रहती थी। उसका नाम पिंगला था। मैंने उससे भी शिक्षा ली। हे राजन् ! सुनिए। एक दिन सुन्दर वस्त्रों से सज्जित हो कर वह गृह-द्वार पर शाम तक ग्राहकों की प्रतीक्षा में बैठी रही। उसने कुछ लोगों को आमन्त्रित किया; परन्तु इस आशा में कि अन्य धनिक व्यक्ति उसे अधिक धन देगा, उसने उन्हें भेज दिया। इस तृष्णा से वह निद्रा रहित हो कर, दरवाजे पर, कभी भीतर तो कभी बाहर कर, आधी रात तक प्रतीक्षा करती रही। धन की अभिलाषा के आशा-ज्वर से पीड़ित हो उसने निराशा एवं शोक में रात्रि व्यतीत की। उसे अपने लोभ, काम एवं तृष्णामय जीवन से बड़ी विरक्ति हुई।


"अत्यधिक निराश हो कर उसने यह गाना गया, 'विषयों के प्रति उदासीनता उस खड्ग की भाँति है जिससे मनुष्य अपनी कामनाओं के धागों को काट सकता है। मनुष्य तब तक शरीर के बन्धन से छूटना नहीं चाहता, जब तक उसे निराशा हो। जिस प्रकार मनुष्य ज्ञान के बिना अहंता तथा ममता का परित्याग नहीं करता, उसी प्रकार निराशा के बिना मनुष्य शरीर-बन्धन से नहीं छूटता।' पिंगला ने कहा, 'अहा! मन के अनियन्त्रित होने से मैं कितनी भ्रमित हूँ। कितनी मूर्ख हूँ मैं। मनुष्य जैसे क्षुद्र व्यक्तियों से मैं काम-तृप्ति की चाहना करती हूँ।'


"भगवान् नारायण के सिवा कौन मुझे शाश्वत सुख तथा सम्पत्ति दे सकता है। वे वास्तविक प्रेमी हैं, जो मुझे तृप्ति दे सकते हैं। मैं क्षुद्र मनुष्य को प्रसन्न कर रही हूँ जो मेरी कामनाओं की पूर्ति नहीं कर सकता तथा जिससे दुःख, भय, रोग, शोक तथा मोह की प्राप्ति होती है। मैं सचमुच ही बड़ी मूर्खा हैं।


"मैंने व्यर्थ ही इस निन्दित व्यवसाय में अपनी आत्मा को पीड़ित किया। मैंने दयनीय मनुष्यों से, जो लोभी तथा स्त्रियों के गुलाम हैं, अपने शरीर को बेच कर धन तथा सुख की कामना की।


"मेरे सिवा अन्य कौन व्यक्ति इस गृह में वास करेगा जिसमें हड्डियाँ ही शहतीर, खम्भे तथा छत हैं, जो चर्म, केश तथा नखों से ढका हुआ है, जो नव-द्वारों से युक्त है जिनसे मल-मूत्र विसर्जित होते रहते हैं।


"इस विदेह नगर में, जो ज्ञानियों से भरा हुआ है, मैं ही एक स्त्री हूँ जिसने अपने सुख, आशा तथा कामना को शरीर में स्थापित किया है। मैं ही एकमेव मूर्खा हूँ जो मुक्तिदाता ईश्वर को छोड़ कर विषय-पदार्थों में सुख की कामना करती हूँ।


"वही सच्चा मित्र, रक्षक, प्रभु, परम प्रिय, मालिक तथा सभी भूतों की आत्मा है। उसे मना कर अपने शरीर को उसी पर अर्पित कर मैं लक्ष्मी के समान ही उसी में शाश्वत सुख प्राप्त करूँगी।


"दूसरों की सेवा से क्या लाभ ? देवताओं तथा मनुष्यों में देश, क्षमता तथा अन्य बहुत से बन्धन हैं। इन्द्रिय-सुख, मनुष्य तथा देवता स्त्रियों को कैसे आनन्द दे सकते हैं? सभी का आदि तथा अन्त है।


"निश्चय ही अपने पूर्व-जन्मों में मैंने विष्णु के लिए व्रतादि किये हैं; क्योंकि उसी की कृपा से यह वैराग्य मेरे मन में उत्पन्न हुआ है जो सारी अपवित्र कामनाओं का उन्मूलक है। उसकी ही कृपा से मैंने शाश्वत शान्ति तथा सुख के मार्ग को प्राप्त किया है।


"यदि प्रभु मेरे ऊपर प्रसन्न होते तो इस प्रकार की निराशा तथा इससे उत्पन्न वैराग्य का उदय होता जिससे मैं सारे रागों तथा सुखों को त्यागने में समर्थ बन सकूँ।


"मैं विनम्र भक्ति के साथ ईश्वर की इस देन को शिर पर ग्रहण करती हूँ। मैं सारी व्यर्थ इच्छाओं तथा कामनाओं का परित्याग कर परम प्रभु की शरण में जाती हैं। सन्तुष्ट, ईश्वर में अटूट श्रद्धा रख कर, संयोगवश जो भी मिल जाये, उसी से जीवन-निर्वाह करते हुए मैं परमात्मा के नित्य-सुख का उपभोग करूँगी। ईश्वर के सिवा उस जीव को अन्य कौन उबार सकता है जो विषयान्ध हो कर संसार गहरे गड्ढे में गिरा हुआ काल रूपी अजगर का शिकार बन रहा है।"


"जब मनुष्य इस जगत् की विनश्वरता का साक्षात्कार करता है, जब इस जगत् को काल रूपी अजगर के गाल में देखता है, तब वह निश्चय ही इस लोक तथा परलोक के चलायमान, भ्रान्तिमय, तत्त्वहीन सुखों से घृणा करेगा। वह सावधान हो कर मिथ्या पदार्थों से अलग रहेगा तथा अपनी आत्मा में ही नित्य-सुख का उपभोग करेगा। जब मनुष्य सारे विषय-पदार्थों के प्रति उपेक्षा करता है, तब आत्मा ही आत्मा की रक्षा करती है।"


ब्राह्मण ने कहा, "इस प्रकार निश्चय कर पिंगला अपने मन को ईश्वर में लगा कर, प्रेमियों के लिए अपनी सारी आशाओं एवं तृष्णाओं का परित्याग कर शान्त मन से बिछावन पर जा बैठी। उसने सारी अपवित्र कामनाओं का परित्याग किया, जिनसे उसको अशान्ति मिल रही थी। शान्त मन से वह गहरी नींद में सो गयी। आशा ही कष्ट देती है। आशा के परित्याग से मनुष्य परमानन्द को प्राप्त करता है। यह परम सुख की अवस्था है। वैराग्य सुख का मूल है जैसा कि पिंगला के उदाहरण से स्पष्ट होता है जिसने प्रेमियों के प्रति तृष्णा का परित्याग कर सुखपूर्वक निद्रा ली।


"मनुष्य जिसको सबसे अधिक प्रिय मानता है, उसको प्राप्त करना ही सारे क्लेशों तथा दुःखों का मूल है। सत्य को जानने वाला सारे पदार्थों का परित्याग कर असीम सुख को प्राप्त करता है।


"एक कुरर पक्षी की चोंच में मांस का एक टुकड़ा था। उससे बलवान् एक पक्षी ने, जिसके पास कोई टुकड़ा था, उस पक्षी को जा दबोचा। परन्तु कुरर ने उस मांस के टुकड़े को गिरा दिया। वह स्वतन्त्र हो सुखी बन गया। प्रिय वस्तुओं का परित्याग भला है। इससे शान्ति मिलती है।


"मैं मानापमान की चिन्ता नहीं करता। मैं गृह, स्त्री अथवा बच्चे की चिन्ता नहीं करता। मैं आत्मा में क्रीड़ा करता हूँ, आत्मा में रमण करता हूँ तथा शिशुवत् विचरण करता हूँ।


"दो जन ही दुःखों से विमुक्त तथा सर्वोच्च सुख में निमग्न हैं- शिशु जो कुछ भी जानता नहीं तथा वह मनुष्य जिसने परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया है, जो गुणों के प्रभाव से परे चला गया है।


"किसी एक स्थान में एक लड़की थी। उसके साथ विवाह-सम्बन्ध के लिए आये हुए लोगों का उसे ही स्वागत-सत्कार करना था; क्योंकि उसके परिवार के लोग अन्यत्र कहीं गये हुए थे। वह एकान्त स्थान में धान कूट रही थी। ऐसा करते समय उसकी चूड़ियों से बड़ी आवाज होती थी। बुद्धिमान् लड़की अपनी निर्धनता पर लज्जित हुई। उसने विचार किया कि आये हुए अतिथियों को उसकी निर्धनता का पता नहीं चलना चाहिए। उसने एक-एक कर चूड़ियाँ तोड़ डालीं। केवल दो चूड़ियाँ हर हाथ में रह गयी थीं; परन्तु धान कूटते समय इन दो चूड़ियों से भी आवाज हो रही थी। उसने उनमें से एक को भी तोड़ दिया। बची हुई एक से आवाज हुई और वह अपना काम करती रही।


"सत्य तथा अनुभवों की खोज में भ्रमण करते हुए मैंने उस लड़की के अनुभव से इस उपदेश को ग्रहण किया। जहाँ बहुत लोग रहते हैं, वहाँ झगड़ा होगा। दो मनुष्यों के बीच भी वाद-विवाद अथवा बातचीत का मौका मिलेगा। अतः मनुष्य को एकान्तवास करना चाहिए। लड़की की एक चूड़ी के समान अकेले ही रहना चाहिए।


"श्वास को वशीभूत कर, आसन में स्थिरता ला कर, मनुष्य तीर-निर्माता के समान अपने मन को परमात्मा में एकाग्र करे। वैराग्य, सतत ध्यान तथा क्रमिक साधना के द्वारा वह सावधान हो कर अपने मन को स्थिर करे। जिस प्रकार ईंधन के नष्ट हो जाने पर अग्नि स्वयमेव बुझ जाती है, उसी प्रकार मन की बहिर्मुखी वृत्तियों को रोके रखने पर गुणजन्य नानात्व का निराकरण होता है, मन धीरे-धीरे कर्म के बन्धनों का परित्याग करता है, कर्म की प्रवृत्ति का संन्यास करता है, सत्त्व की वृद्धि रजस् एवं तमस् को त्यागता है तथा गुण रूपी जलावन के हट जाने से तथा इन्द्रिय-संस्कारों के अभाव के कारण मन विलीन हो कर प्रशान्त हो जाता है, वह ध्येय वस्तु के साथ एक बन जाता है। मन को आत्मा में विलीन कर मनुष्य अन्तर्बाह्य कुछ भी नहीं देखता। जिस प्रकार एक तीर-निर्माता ने तीर-निर्माण करने में अपने मन को इतना लीन कर रखा था कि वह राजा की सवारी तथा जुलूस को अपने सामने से गुजरते हुए भी नहीं देख पाया। मैंने उससे मन की एकाग्रता की शिक्षा ग्रहण की।


"ज्ञानी मनुष्य अकेले ही भ्रमण करे। वह गृह रहित तथा सावधान रहे। वह गुहा का आश्रय ग्रहण करे तथा अपनी योग्यता का प्रदर्शन करे। वह मित्र रहित रहे। यथासम्भव स्वल्प बोले।


"शरीर नश्वर तथा गतिशील है फिर साधु के लिए गृह-निर्माण करना व्यर्थ तथा दुःख की जड़ है। जिस प्रकार सर्प दसरों के बनाये बिल में प्रवेश करता है और बड़े आराम से समय काटता है, उसी प्रकार संन्यासी भी जो वास स्थान उसे मिल जाये, उसी में आराम से रहे। उसके लिए कोई एक ही निश्चित स्थान की आवश्यकता नहीं है।


"जिस प्रकार मकड़ी अपने भीतर से ही सूत्र निकालती है और उससे जाला फैलाती है, उसी में खेलती है और पुनः उसे अपने पेट के भीतर डाल लेती है; उसी प्रकार प्रभु भी अपने भीतर से ही त्रिगुणात्मिका माया के द्वारा जगत् को निकालता, उसमें लीला करता तथा उसे स्वयं में ही विलीन कर देता है।


"प्रेम, घृणा अथवा भय के द्वारा जिस वस्तु पर मनुष्य सदा ध्यान बनाये रखता है, वह भ्रमर-कीट-न्याय से कालान्तर में उसी वस्तु के रूप को प्राप्त कर लेता है। जैसे भृंगी एक कीड़े को ले जा कर अपने बिल में बन्द कर देती है और वह कीड़ा भय से उसी का चिन्तन करते-करते उसी शरीर से तद्रूप हो जाता है। इसलिए मनुष्य को अन्य वस्तु का चिन्तन करके केवल परमात्मा का ही चिन्तन करना चाहिए।


"इस प्रकार उपर्युक्त चौबीस गुरुओं से मैंने ये शिक्षाएँ ग्रहण कीं। हे राजन् ! सुनिए। मैंने अपने शरीर से भी शिक्षा ली है। यह शरीर भी मेरा गुरु है। यह मुझे विवेक तथा वैराग्य की शिक्षा देता है। मरना और जीना तो इसके साथ लगा ही रहता है। यद्यपि इस शरीर से तत्त्व-विचार करने में सहायता मिलती है, तथापि मैं इसे अपना कभी नहीं समझता। सर्वदा यही निश्चय रखता हूँ कि एक दिन इसे गीदड़ या कुत्ते खा जायेंगे।


"शरीर के आराम के लिए मनुष्य स्त्री-पुत्र, हाथी-घोड़े, नौकर-चाकर, घर-द्वार और भाई-बन्धुओं के पालन-पोषण में लगा रहता है तथा बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ सह कर धन-संचय करता है। अन्ततः वृक्ष के सदृश यह शरीर भी विनष्ट हो जाता है और दूसरे शरीर के लिए बीज भी रख छोड़ता है।


"जिह्वा उसे एक ओर खींचती है तो प्यास उसे दूसरी ओर; जननेन्द्रिय उसे एक ओर ले जाना चाहती है तो त्वचा, कान और पेट दूसरी ओर; नाक कहीं सुन्दर गन्ध सूँघने के लिए ले जाना चाहती है तो चंचल नेत्र कहीं दूसरी ओर सुन्दर रूप देखने के लिए। इस प्रकार कर्मेन्द्रियाँ तथा ज्ञानेन्द्रियाँ दोनों इसे सताती रहती हैं। ये इन्द्रियाँ उसके प्राण-तत्त्व को उसी प्रकार खींच लेती हैं जिस प्रकार बहुत-सी सौतें अपने एक पति को।


"ईश्वर ने वृक्ष, रेंगने वाले जन्तु, पशु, पक्षी, डांस और मछली आदि अनेकों प्रकार की योनियाँ रर्ची; परन्तु उनसे उन्हें सन्तोष हुआ। तब उन्होंने मनुष्य की सृष्टि की। यह मनुष्य-शरीर ऐसी बुद्धि से युक्त है जो ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकती है। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई।


"इसलिए अनेक जन्मों के बाद यह अत्यन्त दुर्लभ मानव शरीर पा कर बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि शीघ्र-से-शीघ्र मृत्यु के पूर्व ही मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न कर ले। इस जीवन का मुख्य उद्देश्य मोक्ष ही है। विषय-भोग तो सभी योनियों में प्राप्त हो सकते हैं, इसलिए इनके संग्रह में यह अमूल्य जीवन नहीं खोना चाहिए।


"राजन् ! शरीर से यह शिक्षा ले कर मुझे जगत् से वैराग्य हो गया। मेरे हृदय में ज्ञान-विज्ञान की ज्योति जगमगाती रहती है। तो कहीं मेरी आसक्ति है और कहीं अहंकार ही।


"अकेले गुरु से ही यथेष्ट और सुदृढ़ सुबोध नहीं होता; क्योंकि ऋषियों ने एक ही अद्वितीय ब्रह्म का अनेकों प्रकार से गायन किया है।"


भगवान् श्री कृष्ण ने कहा- "प्यारे उद्धव ! परम ज्ञानी अवधूत दत्तात्रेय ने राजा यदु को इस प्रकार उपदेश दिया। यदु ने उनकी पूजा और वन्दना की, फिर वे उनसे अनुमति ले कर बड़ी प्रसन्नता से इच्छानुसार पधार गये। हमारे पूर्वजों के भी पूर्वज राजा यदु अवधूत की यह बात सुन कर समस्त आसक्तियों से छुटकारा पा गये और समदर्शी हो गये।"


विषय-पदार्थों से कैसे अनासक्ति हो ?


उद्धव ने कहा- "हे कृष्ण ! साधारणतः लोग जानते हैं कि इन्द्रियों के विषय विपत्ति में जा गिराते हैं। फिर भी कुत्ते, गधे और बकरे के समान उनके पीछे क्यों दौड़ते रहते हैं?"


भगवान् ने कहा- "अविवेकी मनुष्य के हृदय में शरीर के प्रति 'अहं' की भ्रान्ति-भावना उत्पन्न होती है, तब भयंकर रजस् मन के ऊपर अधिकार कर लेता है। मन मूलतः सात्त्विक है। रजस् से पूर्ण होने पर शंका तथा कामनाएँ उत्पन्न होती हैं। वह सोचता है, 'मैं अमुक वस्तु को अमुक प्रकार से प्राप्त करूँगा, उसका उपभोग करूँगा इत्यादि।' तब मन विषयों के बाह्य गुणों का चिन्तन करता है, 'अहा! कितना सुन्दर है यह ! कितना अच्छा है यह पदार्थ !' इससे राग दृढ़ होता तथा तृष्णा बढ़ती है।


"मूर्ख मनुष्य कामनाओं तथा तृष्णाओं के वशीभूत हो जाता है। उसका अपनी इन्द्रियों पर वश नहीं चलता। रजस् के तीव्र प्रवाह से भ्रमित हो कर वह जान-बूझ कर ऐसे कर्मों को करता है जिनसे दुःख तथा बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं।


"विवेकी मनुष्य भी रजस् तथा तमस् से विक्षिप्त बन जाता है; परन्तु उनकी बुराइयों से अवगत होने के कारण वह सजग रह कर मन का नियन्त्रण करता है तथा मन की एकाग्रता का अभ्यास करता है। वह उनसे आसक्त नहीं होता।


"सतर्क तथा सजग रह कर मनुष्य आसन तथा प्राणायाम में दृढ़ता प्राप्त कर ले तथा मन को मुझ (ईश्वर) में लगा कर धीरे-धीरे एकाग्रता का अभ्यास करे।


"यही योग है जिसे मेरे शिष्य सनक तथा अन्य ऋषियों ने बतलाया है जिससे कि मनुष्य सभी वस्तुओं से मन हटा कर मुझ (ईश्वर) में स्थिर कर सके।


"इस जगत् को भ्रान्ति समझो, मन का खेल समझो। यह अभी दिखायी देता है तथा दूसरे ही क्षण नष्ट हो जाता है। स्वप्नवत् तथा अलात्-चक्र के समान है। एक ही चैतन्य विविध रूपों में प्रतीयमान होता है। गुणों के परिणामजन्य त्रिविध भेद-जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति माया है।


"अपनी इन्द्रियों को संसार के पदार्थों से हटाओ। सारी कामनाओं का परित्याग करो। शान्त बनो तथा अपनी आत्मा के सुख में ही निमग्न रहो। मौन रहो तथा कर्मों में निरत रहो। जगत् को एक बार मिथ्या समझ लेने पर यदि कभी जगत् का अनुभव हुआ, दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के लिए विषय-पदार्थों का अनुभव हो भी गया, तो उससे आपमें मोह उत्पन्न होगा। जब तक शरीर है, तब तक स्मृति रूप से अनुभव होता रहेगा।"


एकादश स्कन्ध में ध्यान-विधि का वर्णन


भगवान् ने कहा : "जो तो बहुत ऊँचा हो और बहुत नीचा ही- ऐसे आसन पर शरीर को सीधा रख कर आराम से बैठ जाये, हाथों को अपनी गोद में रख ले और दृष्टि अपनी नासिका की नोक पर जमाये। इसके बाद पूरक, कुम्भक तथा रेचक के द्वारा नाड़ियों का शोधन करे।


"मूलाधार के ऊपर का घण्टानाद के समान स्वर फैलता है। प्राणायाम के द्वारा वह इस पवित्र को ऊपर ले जाये। कमलनालवत् पतले सूत के समान उस स्वर का प्रवाह टूटने पाये। हृदय से ले जा कर उसे घण्टानाद के समान बजने दे, उसमें एकाक्षर को जोड़ दे।


"इस प्रकार दिन में वह तीन बार प्राणायाम करे और हर बैठक में सहित दश बार प्राणायाम करे। श्वास-प्रश्वास के साथ वह का मानसिक जप करे। एक महीने में ही प्राण वश में हो जायेगा। शरीर के भीतर हृदय-कमल है, उसकी डण्डी ऊपर की ओर है तथा मुँह नीचे की ओर। फूल के आठ दल हैं और सुकुमार कर्णिका (गद्दी) है। फूल बन्द रहता है। उस पर ध्यान करो मानो वह ऊपर उठ गया हो तथा प्रस्फुटित हो गया हो। कर्णिका पर सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि का, एक के अन्दर दूसरे का चिन्तन करो। तदनन्तर अग्नि के अन्दर मेरे इस रूप का स्मरण करना चाहिए। मेरा यह स्वरूप ध्यान के लिए बड़ा ही मंगलमय है।


"मेरा रूपसुडौल, सुन्दर, चार लम्बी मनोहर भुजाएँ, बड़ी ही सुन्दर और मनोहर गरदन, सुस्निग्ध कपोल तथा अनोखी मुस्कान।


"दोनों ओर के कानों में मकराकृत कुण्डल झिलमिला रहे हैं, मेघश्यामल शरीर, पीताम्बर वस्त्र, श्रीवत्स एवं लक्ष्मी जी का चिह्न, वक्षःस्थल पर दायें बायें विराजमान हैं।


"हाथों में क्रमशः शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किये हुए हैं। गले में वनमाला, चरणों में नूपुर, छाती पर कौस्तुभ मणि है।


"अपने-अपने स्थान पर चमकते हुए किरीट, कंगन, करघनी और बाजूबन्द शोभायमान हो रहे हैं। सुन्दर मुख और प्यार भरी चितवन कृपा-प्रसाद की वर्षा कर रही है। मेरे इस रूप पर मन को जमाना चाहिए- अपने मन को एक-एक अंग में लगाना चाहिए। वह मन के द्वारा इन्द्रियों को उनके विषयों से खींच ले और मन को बुद्धि-रूप सारथि की सहायता से मुझमें ही लगा दे, चाहे मेरे किसी भी अंग में क्यों लगे। जब सारे शरीर का ध्यान होने लगे, तब अपने चित्त को खींच कर एक स्थान में स्थिर करे और अन्य अंगों का चिन्तन करके मुस्कान युक्त मेरे मुख का ही ध्यान करे। जब चित्त मुखारविन्द में ठहर जाये, तब उसे वहाँ से हटा कर आकाश या परम कारण में स्थिर करे। तदनन्तर उसका भी त्याग कर निर्विशेष शुद्ध ब्रह्म मेरे स्वरूप में निवास करे, अन्य कुछ भी सोचे। त्रिपुटी-ध्याता, ध्येय तथा ध्यान को विलीन हो जाने दे। त्रिविध भेद को भूल जाये। यही सर्वोच्च निर्विकल्प समाधि है।"

. विष्णुपुराण में मुक्ति के लिए साधना


ऋभु ने कहा- "हे राजन् ! राजा निदाघ ! आप धर्मज्ञ हैं। आप सभी भूतों को अपनी आत्मा जानते हैं। आप शत्रु तथा मित्र को समान जानते हैं। जिस प्रकार एक ही आकाश उजला तथा नीला प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मा जो वास्तव में एक ही है, भ्रान्ति के कारण विविध रूप मालूम पड़ती है, आत्म-तत्त्व एक ही है। वह अच्युत है। उसके अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्तु नहीं है। वही मैं हूँ। वही तू है। वही सब है। यह जगत् उसी का रूप है। अतः भेद-भ्रान्ति के दर्शन का परित्याग कीजिए।


ब्राह्मण ने कहा- "जीवन का महान् लक्ष्य ज्ञानियों ने नित्य-ब्रह्म ही बतलाया है। यदि विनश्वर पदार्थों से उसकी प्राप्ति हो, तो वह भी विनश्वर ही रहेगा। वह चैतन्य जो अपने शरीर तथा अन्य सभी शरीरों में एक है, वहीं सच्चा ज्ञान है, वही सभी वस्तुओं का सारत्तत्त्व है। सारे जगत् में व्याप्त वायु वंशी के छिद्र से संचरित होने पर विभिन्न स्वरों में निकल पड़ती है, उसी प्रकार आत्मा भी एक होने पर भी कर्म-फल के अनुसार विभिन्न रूपों को धारण करती है। जब विभिन्न रूपों के भेद का विनाश हो जाता है, जब ईश्वर तथा मनुष्य के बीच का भेद नष्ट हो जाता है, तब नानात्व का अन्त हो जाता है।"


केशिध्वज ने कहा- "दुःख, अज्ञान तथा मल प्रकृति के हैं, आत्मा के नहीं। हे मुनि ! जल तथा अग्नि में कोई सम्बन्ध नहीं; परन्तु किसी बरतन में जल को रख कर अग्नि पर रखने से जल भी उबलने लगता है, अग्नि के गुण को धारण करता है। उसी प्रकार आत्मा भी प्रकृति के संग में कर अहंकार आदि मोहात्मिका शक्तियों से मलिन हो जाती है। अविद्या का बीज ऐसा ही है जिसका मैंने वर्णन किया है। सारे शोकों की एक ही दवा है-भक्ति का अभ्यास। अन्य कोई औषधि नहीं है।


"जिसे विवेक-बुद्धि है, वह अपने मन से सारे विषयों को अलग करे तथा परमात्मा पर ध्यान करे। वह परमात्मा अन्तरात्मा ही है। जिस प्रकार चुम्बक लोहे को अपनी ओर आकृष्ट करता है, उसी प्रकार जो मनुष्य परमात्मा पर ध्यान करता है, वह परमात्मा की ओर खिंच जाता है; क्योंकि जीवात्मा का स्वरूप परमात्मा ही है। ध्यान युक्त भक्ति से ब्रह्म के साथ योग की प्राप्ति होती है। जब मन ध्यान के द्वारा पूर्ण हो जाता है, जब पूर्ण आत्म-संयम हो जाता है, तब वह जगत् के बन्धन से मुक्त होने लायक बन जाता है।


"उपासना के लिए निम्नांकित रूप से मन को सम्यक् अवस्था में लाना चाहिए। आशाओं का परित्याग, ब्रह्मचर्य, करुणा, सत्य, नेकी, उदासीनता के अभ्यास से मन को ब्रह्म पर स्थिर करना चाहिए। स्वाध्याय, शौच, सन्तोष, तप तथा आत्म-संयम का अभ्यास करना चाहिए। इन साधनों से सुन्दर फलों की प्राप्ति होती है। निष्काम भाव से करने पर उनसे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।"

. गरुड़पुराण में साधना


गरुड्पुराण के सोलहवें अध्याय में मुक्ति के लिए नियम दिया गया है। मानव-जीवन के क्षेत्र का विवेकपूर्ण विश्लेषण किया गया है, दिव्य जीवन यापन में बाधाओं तथा विफलताओं का विवरण तथा परमात्म-साक्षात्कार पर बल दिया गया है। संग का परित्याग बड़ा ही कठिन है। मनुष्य को शिष्ट एवं महापुरुषों के साथ मित्रता स्थापित करनी चाहिए। अज्ञानवश केवल कर्मकाण्ड से ही मुक्ति नहीं मिलती, तो केवल वेदों तथा शास्त्रों के अध्ययन से; मुक्ति तो ज्ञान से ही प्राप्त होती है। इन दो शब्दों से ही बन्धन तथा मुक्ति सम्भव है- 'मम' से बन्धन, 'अमम' से मुक्ति। जो 'मेरा' कहता है, वह बँधा हुआ है। जो 'मेरा' नहीं कहता, वह मुक्त है। वही कर्म बन्धन में नहीं डालता, वही ज्ञान मुक्ति प्रदान करता है जो 'मेरा नहीं' पर आश्रित है। अन्य कर्म तथा ज्ञान तो क्लेश एवं विवाद ही हैं। असंग शस्त्र के द्वारा मनुष्य को शरीर-सम्बन्धी कामनाओं का उन्मूलन करना चाहिए। का मानसिक जप करना चाहिए। श्वास वशीभूत कर मन को निरुद्ध कर मनुष्य को का ध्यान करना चाहिए। कामनाओं को वश में ला कर, संग रहित हो कर, अभिमान तथा मोह को दूर कर, अविवेक पर विजय प्राप्त कर मनुष्य को परमात्मा में निवास करना चाहिए। प्रशान्तात्मा, ज्ञानालोक से पूर्ण, विचारों से मुक्त मनुष्य को परमात्मा का ही ध्यान करना चाहिए।


अध्याय :योगवासिष्ठ की साधना तथा अन्य सम्प्रदायों की साधना

. वीरशैव में साधना


वीरशैव या लिंगायत मत में लक्ष्य अथवा भगवान् शिव की प्राप्ति का मार्ग बतलाया गया है। भगवान् शिव, भगवान् सुब्रह्मण्य, राजा ऋषभ, सन्त लिंगर, कुमार देवी, शिवप्रकाश-सभी ने वीरशैव दर्शन की विस्तृत व्याख्या की है। इस दर्शन का मूल वीरागम है।


साधारण शैव शिवलिंग को सन्दूक में रखते हैं तथा पूजा के समय उसकी उपासना करते हैं। लिंगायत जन सोने या चाँदी की पेटी में एक छोटे शिवलिंग को रख कर उसे शरीर पर धारण करते हैं। लिंग को शरीर में धारण करने का तात्पर्य यह है कि इससे भगवान् की याद बनी रहेगी। ईसाई भी गले में क्रास पहनते हैं। उसका भी तात्पर्य ऐसा ही है। वीरशैव के अनुयायी, जिन्हें लिंगायत कहते हैं, लिंग-रूप में शिव-ध्यान को मुक्ति का एकमात्र साधन मानते हैं। लिंग पर धारणा की पूर्णता होने पर मनुष्य शिव-साक्षात्कार प्राप्त करता है।

. शक्तियोग-साधना


जो मनुष्य ईश्वर को माता के रूप में पूजता है, जो परम शक्ति जगत् को रचने वाली, पालन करने वाली तथा संहार करने वाली है, उसे शाक्त कहते हैं। सभी स्त्रियाँ उस परम शक्ति के रूप हैं। शरीर के भीतर प्रसुप्त शक्तियों के जागरण के द्वारा शाक्त शक्ति को शिव से युक्त करने के लिए साधना करता है। कुण्डलिनी को जाग्रत कर, षट् चक्र के भेदन के अनन्तर वह अपनी साधना में सिद्ध बन जाता है। किसी सिद्ध गुरु के पथ-प्रदर्शन में ही व्यावहारिक ढंग से यह साधना करनी चाहिए। ध्यान से, भाव से, जप से तथा मन्त्र-शक्ति से शक्ति को जगाना चाहिए।


पचास अक्षरों की स्वरूप माता शक्ति विभिन्न चक्रों में विभिन्न अक्षरों के रूप से व्यक्त हैं। किसी वाद्य यन्त्र के तारों को तालबद्ध रूप से बजाने पर सुमधुर संगीत का संचार होता है। उसी प्रकार अक्षरों के तारों को क्रमानुसार स्पन्दित करने पर, जो छह चक्रों से स्पन्दित होती है तथा जो इन अक्षरों की आत्मा है, जग उठती हैं। माता के जगने पर साधक शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है। ऐसा कहना कठिन है कि कब, किसको और कैसे माता अपना दर्शन देंगी।


साधना का अर्थ है-शक्ति का जागरण अथवा प्रस्फुटन। साधक की क्षमता तथा प्रवृत्ति के ऊपर ही साधना-विधि निर्भर है।


माता की कृपा के बिना कोई भी अपने को मन और पदार्थ के बन्धन से मुक्त नहीं कर सकता। माया के बन्धनों को तोड़ना बड़ा कठिन है। यदि आप उसे माता के रूप में पूजेंगे, तो उसकी कृपा तथा उसके आशीर्वाद से आप सुगमतापूर्वक प्रकृति से परे चले जायेंगे। वह सारी बाधाओं को दूर करेगी तथा आपको असीम सुख के धाम में ले जा कर मुक्त बना देगी। उसके प्रसन्न हो कर आशीर्वाद देने से ही आप इस प्रबल संसार से मुक्त हो सकेंगे।


शाक्त भुक्ति तथा मुक्ति दोनों ही प्राप्त करते हैं। शिव आनन्द तथा ज्ञान का स्वरूप है। शिव ही मनुष्य के सुख-दुःखमय जीवन से व्यक्त होता है। यदि इस बात को आप सदा याद रखेंगे तो सारे द्वैत, द्वेष, ईर्ष्या, घमण्ड विलीन हो जायेंगे। सारे कार्यों को धार्मिक कार्य समझना चाहिए। यदि आपमें सम्यक् भाव है तो चलना, देखना, सुनना ये सब ईश्वर की उपासना बन जाते हैं। शिव ही मनुष्य में तथा उससे हो कर कार्य कर रहा है। फिर कहाँ अभिमान अथवा जीवत्व है? सारे कार्य ईश्वरीय हैं। एक ही सार्वभौम जीवन सभी हृदयों में स्पन्दित होता है, सभी श्रोत्रों से सुनता है। कितना महान् है यह अनुभव ! इस क्षुद्र अहंकार को कुचल कर ही आप इसे प्राप्त करेंगे। पुराने संस्कार, पुरानी वासनाएँ और विचारने की पुरानी आदत इस पूर्ण अनुभव के मार्ग की बाधाएँ हैं।


साधक इस जगत् को माता का ही रूप समझता है। वह अपने रूप को माता का रूप मानते हुए सर्वत्र एकता देखता है। वह ईश्वरीय माता को परब्रह्म से एक मानता है।


शाक्तवाद केवल दर्शन ही नहीं है। यह साधकों की रुचि, क्षमता तथा प्रगति के अनुसार योग की विधियों को बतलाता है। यह साधक को कुण्डलिनी के जागरणार्थ तथा उसे शिव से मिलाने और तत्फलतः निर्विकल्प समाधि के लिए सहायता प्रदान करता है। कुण्डलिनी जब तक सोती रहती है, तब तक मनुष्य जगत् के प्रति जाग्रत रहता है। उसके जग जाने पर मनुष्य संसार के प्रति सो जाता है। वह जगत् तथा शरीर की सारी चेतना खो कर ईश्वर से एक बन जाता है। समाधि में शरीर अमृत द्वारा पोषित होता है। सहस्रार में शिव तथा शक्ति के मेल से अमृत का संचार होता है।


अटूट श्रद्धा तथा पूर्ण भक्ति एवं आत्मार्पण के साथ माता की उपासना के द्वारा आप उसकी कृपा प्राप्त करेंगे। उसकी कृपा से ही आप अविनाशी तत्त्व का ज्ञान कर सकेंगे।

. काश्मीर शैव में साधना


आगम काश्मीर शैव के आधार पर हैं। काश्मीर शैव मत में ईश्वर, जगत्, जीव, बन्धन तथा मोक्ष-ये प्रमुख विचारणीय तत्त्व हैं। बन्धन का कारण है अज्ञान। जीव समझता है कि 'मैं सीमित हूँ। मैं शरीर हूँ।' वह यह भूल जाता है कि आत्मा तथा शिव के बीच तादात्म्यता है तथा शिव के सिवा यह जगत् पूर्णतः मिथ्या है।


चरम मोक्ष के लिए प्रत्यभिज्ञा सत्य-साक्षात्कार की आवश्यकता है। जब आत्मा स्वयं को शिव-रूप से जान लेता है, तब ईश्वरैक्य के नित्य सुख को प्राप्त करता है। मुक्त आत्मा शिव में विलीन हो जाते हैं। जिस तरह जल जल में, दूध दूध में विलीन हो जाता है, ठीक उसी तरह द्वैत-भ्रम के दूर होने पर आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाता है।


आगमों के उपदेशों के अनुसार चलने पर सीमित होने का भ्रम तथा देहाध्यास एवं विनश्वर वस्तुओं के साथ आत्मा के संग का विनाश होता है। अज्ञानजन्य मल के क्षीण होने अथवा दूर होने पर मनुष्य आलोक प्राप्त करता है। आध्यात्मिक साधना के द्वारा अपने आन्तर दिव्य चैतन्य स्वरूप का अनुभव करना होगा। असीम आध्यात्मिक अनुभव के लिए जीव को पहले भगवान् परम शिव की कृपा प्राप्त कर लेनी चाहिए। मल तथा अज्ञान से छुटकारा पाने के लिए चार साधन या उपाय हैं- अनुपाय, शम्भवोपाय, शाक्तोपाय तथा अनवोपाय। इन चार उपायों के अभ्यास से मनुष्य परम चैतन्य को प्राप्त कर लेता है।

. पाशुपतयोग में साधना


इन्द्रियों के दमन के द्वारा आत्मा को परम शिव-तत्त्व से मिला देना ही वास्तव में भस्म को धारण करना है; क्योंकि भगवान् शिव ने अपने तृतीय ज्ञान-नेत्र से काम को क्षार-क्षार कर दिया था। जप के द्वारा प्रणव पर ध्यान करना चाहिए। स्थिर अभ्यास के द्वारा मनुष्य को सच्चे ज्ञान, योग तथा भक्ति की प्राप्ति करनी चाहिए। हृदय में दश-दल पद्म हैं। इसमें दश नाड़ियाँ हैं। यह जीवात्मा का धाम है। यह जीवात्मा मन में सूक्ष्म रूप से रहता है। यह चित्त या पुरुष है। मनुष्य को गुरु के उपदेशानुसार नियमित योगाभ्यास तथा वैराग्य, सदाचार एवं समता के अभ्यास से दशाग्नि-नाड़ी का भेदन कर अथवा उसका अतिक्रमण कर चन्द्र को प्राप्त करना चाहिए। नियमित ध्यानाभ्यास तथा नाड़ी-शुद्धि के द्वारा प्रसन्न हो कर चन्द्रमा धीरे-धीरे पूर्णता को प्राप्त करता है। इस अवस्था में साधक जाग्रत तथा सुषुप्ति की अवस्था का अतिक्रमण कर ध्यानाभ्यास के द्वारा जाग्रतावस्था में ही ध्येय-वस्तु-शिव में विलीन हो जाता है।

. योगवासिष्ठ की साधना


योगवासिष्ठ में साधना के विषय में अपूर्व व्यावहारिक बातें बतायी गयी हैं। अत्यधिक सांसारिक व्यक्ति भी इस ग्रन्थ के अध्ययन से वैराग्य प्राप्त कर मन की शान्ति तथा सान्त्वना प्राप्त करेगा।


जिनका मन इस संसार से पराङ्मुख हो गया है, जो विषय-पदार्थों से उदासीन बन गये हैं तथा जिनमें मुमुक्षुत्व की ज्वाला जल रही है, वे इस बहुमूल्य ग्रन्थ के अध्ययन से अपूर्व लाभ उठायेंगे। वे इस ग्रन्थ में ज्ञान के विशाल भण्डार को प्राप्त करेंगे तथा दैनिक जीवन में व्यवहरणीय उपदेश को प्राप्त करेंगे। योगवासिष्ठ पहले किसी सिद्धान्त को रखता है, फिर बहुत-सी दिलचस्प कहानियों के द्वारा उसकी व्याख्या करता है। यह सतत स्वाध्याय का ग्रन्थ है। इसे बार-बार पढ़ना चाहिए।


जीवन के सभी क्लेशों एवं विपत्तियों में आत्मा एवं परमात्मा की एकता को स्थापित करने की यह शिक्षा देता है। जीवात्मा तथा परमात्मा की एकता के लिए यह विभिन्न प्रकार की विधियों का प्रतिपादन करता है।


इसमें ब्रह्म के स्वरूप तथा आत्म-साक्षात्कार की विधियों का वर्णन दिया गया है। यह सबसे महान् प्रेरणात्मक ग्रन्थ है। वेदान्त का हर साधक इसका नित्य स्वाध्याय करता है। ज्ञानयोग के साधक का यह चिर-साथी है। यह प्रक्रिया-ग्रन्थ नहीं है। यह वेदान्त की प्रक्रियाओं का निरूपण नहीं करता। उन्नत साधक ही अपने स्वाध्याय के लिए इस ग्रन्थ को ले सकते हैं। साधकों को पहले श्री शंकराचार्य लिखित आत्मबोध, तत्त्वबोध, आत्मानात्मविवेक तथा पंचीकरण का अध्ययन कर लेना चाहिए, तब योगवासिष्ठ का अध्ययन करना चाहिए।


आत्मज्ञान के द्वारा ब्रह्मानन्द को प्राप्त करना ही मोक्ष है। जन्म-मृत्यु से मुक्त होना मोक्ष है। यह ब्रह्म का विशुद्ध एवं अक्षय धाम है, जहाँ संकल्प और वासना नहीं रहते। यहाँ मन प्रशान्त हो जाता है। मोक्ष-सुख के सामने समस्त संसार का सुख एक बूँद के समान है। जिसे मोक्ष कहते हैं, वह तो देवलोक में है, पाताललोक में है और पृथ्वी पर ही। जब सारी कामनाएँ विनष्ट हो जाती हैं, इस विस्तृत मन का विनाश हो जाता है, वही मोक्ष है। मोक्ष में तो देश है और काल। अन्तर्बाह्य भी नहीं है। अहंकार की भ्रान्ति के दूर होने पर, माया के विनष्ट होने पर मोक्ष हो जाता है। वासनाओं का विनाश मोक्ष है। संकल्प ही संसार है। संकल्प का विनाश ही मोक्ष है। संकल्प का अशेष नाश ही मोक्ष अथवा परम ब्रह्म का धाम है। मोक्ष सर्व-दुःख-निवृत्ति तथा परमानन्द की प्राप्ति है। जन्म तथा मृत्यु दुःख के कारण हैं। जन्म-मृत्यु से विमुक्त होना ही सभी दुःखों से मुक्त होना है। ब्रह्मज्ञान अथवा आत्मज्ञान से ही मोक्ष सम्भव है। विषयों की कामनाओं के तिरोधान से मन की प्रशान्तावस्था ही मोक्ष है।


यदि मोक्ष-द्वार के चार द्वारपालों से मित्रता कर ली गयी, तो मोक्ष-प्राप्ति में बाधा नहीं रह पायेगी। वे चार द्वारपाल ये हैं- शान्ति, विचार, सन्तोष एवं सत्संग। यदि इनमें से एक की भी प्राप्ति हो गयी, तो अन्य स्वतः ही प्राप्त होंगे।


ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लेने पर आप जन्म-मृत्यु के झमेले से मुक्त हो जायेंगे, सारी शंकाएँ दूर हो जायेंगी तथा सारे कर्म विनष्ट हो जायेंगे। निज-पुरुषार्थ से ही मनुष्य अमर, सुखमय ब्रह्म-धाम को प्राप्त कर सकता है।


मन ही आत्मा का हनन करने वाला है। मन का स्वरूप संकल्प ही है। मन का स्वभाव वासना है। मन के कर्म ही वास्तव में कर्म कहे जाते हैं। यह जगत् ब्रह्म की माया-शक्ति के द्वारा मन का ही विकास है। शरीर का चिन्तन करने से मन शरीर ही बन जाता है तथा शरीर के बन्धन में पड़ कर क्लेशों से सन्तप्त हो उठता है।


सुख तथा दुःख के रूप में मन ही बाह्य जगत् के रूप में व्यक्त होता है। स्वरूपतः मन चैतन्य है, बाह्यतः यह जगत् है। मन विवेक के द्वारा नष्ट हो कर परब्रह्म की अवस्था प्राप्त कर लेता है। मन से सारी कामनाओं के हट जाने पर, नित्य-ज्ञान के द्वारा मन के सूक्ष्म रूप के विनष्ट होने पर वास्तविक सुख का उदय होता है। आपसे उत्पन्न संस्कार तथा वासना ही आपको फन्दे में डाल देते हैं। परब्रह्म की स्वयं ज्योति ही मन अथवा जगत् के रूप में व्यक्त हो रही है।


आत्म-चिन्तन से रहित व्यक्ति इस जगत् को सत्य मानता है जो वास्तव में संकल्प मात्र ही है। मन का विकास ही संकल्प है। भेद-शक्ति के द्वारा संकल्प ही जगत् का निर्माण करता है। संकल्पों का विनाश ही मोक्ष है।


आत्मा का शत्रु यह मन है जो अत्यधिक मोह तथा अनेकानेक विषय-संकल्पों से भरा हुआ है। इस शत्रु मन पर विजय के अतिरिक्त अन्य कोई नौका नहीं है जिससे पुनर्जन्म के सागर को पार किया जाये।


दुःखद अहंकार के अंकुर से पुनर्जन्म के कोमल तने निकल आते हैं, जो समय पा कर चतुर्दिक् फैल जाते हैं, उनमें 'मेरा', 'तेरा' की लम्बी शाखाएँ लग जाती हैं तथा मृत्यु, रोग, जरा, दुःख तथा शोक के फल लगते हैं। ज्ञानाग्नि से ही इस वृक्ष का उन्मूलन किया जा सकता है।


ये सारे नानात्वपूर्ण दृश्य, जो इन्द्रियों से गृहीत होते हैं, सब मिथ्या हैं; परब्रह्म ही एकमेव सत्य है।


यदि सारे विषय-पदार्थ आँखों के काँटे बन जायें, उनके प्रति अनुराग की पहली भावना बदल जाये, तब मन नष्ट हो जाता है। आपकी सारी सम्पत्तियाँ व्यर्थ हैं। सारे धन आपको खतरे में ले जायेंगे। निष्कामता ही आपको नित्य-सुख के धाम को ले जायेगी।


वासनाओं तथा संकल्पों को विनष्ट कीजिए। अभिमान को मारिए। साधन-चतुष्टय से सम्पन्न बनिए। शुद्ध, अमर, सर्वव्यापक आत्मा का ध्यान कीजिए। आत्मज्ञान के द्वारा अमर, शाश्वत शान्ति, नित्य-सुख, मुक्ति तथा परिपूर्णता प्राप्त कीजिए।


अध्याय :शिवानन्द-सूत्र में साधना

. शिवानन्द-उपदेशामृत की साधना


प्रिय अमर आत्मन् !


आप दिव्य हैं। इसके अनुसार जीवन यापन कीजिए। अपने दिव्य स्वरूप का अनुभव तथा साक्षात्कार कीजिए। आप अपने भाग्यविधाता हैं। जीवन-संग्राम में आने वाले शोकों, कठिनाइयों तथा कष्टों से हतोत्साह बनिए। अन्तर में आध्यात्मिक बल एवं साहस प्राप्त कीजिए। अन्दर शक्ति तथा ज्ञान का अथाह भण्डार है। उससे उन्हें निकालने का तरीका सीखिए। अन्दर गोता लगाइए। भीतर डूबिए। आन्तरिक त्रिवेणी, अमृतधारा में डुबकी लगाइए। आप स्फूर्ति, शक्ति तथा नव-चेतना से सम्पन्न हो जायेंगे। 'मैं ही अमर आत्मा हूँ'- आप इसका साक्षात्कार करेंगे।


जगत् के नियमों को समझिए। इस संसार में कुशलतापूर्वक रहिए। प्रकृति के गुप्त रहस्यों को समझ लीजिए। मन को वशीभूत करने के सर्वोत्तम साधनों को जान लीजिए। मन पर विजय पाइए। मन पर विजय ही प्रकृति तथा जगत् पर विजय है। मनोजय के द्वारा आप आत्मा को प्राप्त करेंगे। आप साक्षात्कार करेंगे, "मैं ही अमर आत्मा हूँ।"


कष्ट तथा शोक आने पर शिकायत कीजिए। हर कठिनाई संकल्प-शक्ति के विकासार्थ सुयोग है। इससे आप सबल बनेंगे। इसका स्वागत कीजिए। आपकी सहन-शक्ति बढ़ेगी तथा आपका मन ईश्वर की ओर मुड़ेगा। मुस्कान के साथ उनका स्वागत कीजिए। आपकी दुर्बलता में ही आपकी सच्ची शक्ति छिपी हुई है। आप अजेय हैं। आपको कुछ भी हानि नहीं पहुँचा सकता। एक-एक कर कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कीजिए। यही नव-जीवन का समारम्भ है- यह है व्यापकता, महिमा तथा दिव्य ज्योति का जीवन। महत् कामना कीजिए तथा शक्ति प्राप्त कीजिए। बढ़िए। विकास कीजिए। सारे सद्गुणों का अर्जन कीजिए। दैवी सम्पत्ति-जैसे धैर्य, क्षमा तथा साहस - आपमें सुप्त हैं। नये जीवन का आरम्भ कीजिए। आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण कीजिए तथा साक्षात्कार कीजिए : "मैं ही अमर आत्मा हूँ।"


नये दृष्टिकोण को रखिए। विवेक, विचार, प्रसन्नता तथा बुद्धि से सम्पन्न हो जाइए। आपके लिए स्वर्णिम भविष्य प्रतीक्षा कर रहा है। भूत को गड़े रहने दीजिए। आप चमत्कार कर सकते हैं। आप आश्चर्य कर सकते हैं। आशा छोड़िए। आप अपने संकल्प-बल से दुष्ट ग्रहों के प्रभाव को दूर कर सकते हैं। आप अपने विरुद्ध काम करने वाली शक्तियों को निष्क्रिय बना सकते हैं। आप विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बना सकते हैं। आप भाग्य को बदल सकते हैं। बहुतों ने ऐसा किया है। आप भी ऐसा कर सकते हैं। निश्चय कीजिए। अपने जन्म-सिद्ध अधिकार का साक्षात्कार कीजिए : "आप वही अमरात्मा हैं।"


आत्म-साक्षात्कार में सफलता के लिए निश्चय तथा आत्म निर्भरता की बड़ी आवश्यकता है। मुण्डकोपनिषद् में आप पायेंगे: "यह आत्मा उसके द्वारा प्राप्य नहीं है जो बल से रहित है अथवा जिसमें सच्चाई नहीं है अथवा जो संन्यास रहित तपस्या करता है। परन्तु यदि कोई बुद्धिमान् व्यक्ति उपर्युक्त साधनों से सम्पन्न हो कर प्रयास करता है तो उसकी आत्मा ब्रह्म में प्रवेश पा जायेगी?" साधक के लिए अभय मुख्य गुण है। मनुष्य को इस जीवन का भी परित्याग करने के लिए हर क्षण तैयार रहना चाहिए। इस विषय-जीवन के संन्यास के बिना नित्य-आध्यात्मिक जीवन की प्राप्ति नहीं हो सकती। गीता के सोलहवें अध्याय के पहले श्लोक में दैवी-सम्पद् का वर्णन है जिसमें अभय का नाम सर्वप्रथम दिया गया है। भीरू व्यक्ति मृत्यु से पहले ही कई बार मर चुकता है। आध्यात्मिक साधना के लिए एक बार निश्चय कर बैठने पर हर हालत में उसे करते जाइए। जीवन की बाजी लगा कर भी साधना से च्युत होइए। उठिए, सत्य का साक्षात्कार कीजिए। सर्वत्र घोषणा कीजिए, "तू अमर आत्मा है।"


भाग्य आपकी ही सृष्टि है। अपने विचारों तथा कार्यों के द्वारा आपने अपने भाग्य का निर्माण किया है। सद्विचार तथा सत्कार्यों के द्वारा आप अपने भाग्य को बदल सकते हैं। यदि कोई बुरी शक्ति आप पर आघात करे तो आप दृढ़तापूर्वक उसका निषेध कर, अपने मन को उससे हटा कर उसके बल को कम कर सकते हैं। इस प्रकार आप भाग्य से लोहा ले सकते हैं। "मैं अमर आत्मा हूँ" - यह एक विचार ही सारी बुरी शक्तियों को विनष्ट कर सकता है तथा आपमें साहस एवं आन्तर आध्यात्मिक बल को भर सकता है। बुरे विचार मानव-कष्ट के मूल कारण हैं। सद्विचार एवं सत्कार्य का अर्जन कीजिए। आत्म-भाव के साथ एकतापूर्वक निःस्वार्थतः काम कीजिए। यही सत्कार्य है और सद्विचार है : "मैं ही अमर आत्मा हूँ।


पाप कोई वस्तु नहीं। पाप आन्ति है। पाप मानसिक कल्पना है। प्रगति के मार्ग में बाल-आत्माएँ भूलें करेंगी ही। गलतियाँ ही आपकी सर्वोत्तम गुरु हैं। पाप के विचार विनष्ट हो जायेंगे, यदि आप ऐसा विचार करें- "मैं अमर आत्मा हूँ।"


ऐसा कहिए : "कर्म, कर्म। मेरे कर्म ने ऐसी अवस्था ला दी है।" प्रयास कीजिए। पुरुषार्थ कीजिए। तप कीजिए। धारणा कीजिए। शुद्ध बनिए। ध्यान कीजिए। भाग्यवादी बनिए। तामसिक बनिए। मेमने की तरह 'में-में' कीजिए। वेदान्त-केसरी की तरह ' ' का गर्जन कीजिए। देखिए, किस तरह मार्कण्डेय, जिनके भाग्य में सोलह साल की अवस्था में मृत्यु होने वाली थी, अपने तपोबल द्वारा चिरंजीवि बन गये और यह भी विचार कीजिए कि किस तरह सावित्री ने अपने मृत पति को जीवित कर लिया। किस तरह बेंजामिन फ्रेंकलिन तथा चेन्नै के स्वर्गीय सर टी० मुत्तुस्वामि अय्यर ने अपने को उन्नत बनाया। हे प्रिय निरंजन ! याद रखिए, मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता है। विश्वामित्र, जो क्षत्रिय राजा थे, वसिष्ठ के समान ही ब्रह्मर्षि बन गये तथा उन्होंने अपने तपोबल से त्रिशंकु के लिए एक लोक का ही निर्माण कर दिया। रत्नाकर तपस्या के द्वारा बाल्मीकि महर्षि बन गये। बंगाल के दुष्ट स्वभाव वाले जगाई और मघाई महात्मा बन गये। वे गौरांग महाप्रभु के शिष्य बन गये। जैसा दूसरों ने किया, वैसा आप भी कर सकते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं। यदि आप आध्यात्मिक साधना, तप तथा ध्यान में संलग्न रहें तो आप भी चमत्कार कर सकते हैं। जेम्स एलेन की पुस्तक, 'गरीबी से शक्ति' (पावर्टी टु पावर) को सावधानीपूर्वक पढ़िए। आपको प्रेरणा मिलेगी। अपने जीवन का कार्यक्रम निश्चित कर लीजिए। मेरे 'बीस आध्यात्मिक उपदेश' तथा 'चालीस स्वर्णिम उपदेश' का पालन कीजिए। 'जीवन में सफलता के रहस्य' पढ़िए। आध्यात्मिक कार्य तालिका के अनुसार कार्य कीजिए। साधना में उत्साह रखिए। नैष्टिक ब्रह्मचारी बनिए। अपने अभ्यासों में क्रमिक तथा स्थिर रहिए। ब्रह्म-विभा से विभासित होइए। जीवन्मुक्त बनिए। याद रखिए: "तू अमृतत्व की सन्तान है।"


हे सौम्य, प्रिय अमर आत्मा, वीर बनिए। यद्यपि आपके पास खाने को कुछ हो, आप फटे चिथड़ों में क्यों हों, सदा प्रसन्न रहिए। सच्चिदानन्द ही आपका स्वरूप है। बाह्य शारीरिक कोश तो माया की उपज है। मुस्कराइए। हँसिए। कूदिए। आनन्द में नाचिए। ' राम, राम, राम, श्याम, श्याम, श्याम, शिवोऽहम्, शिवोऽहम्, सोऽहम्, सोऽहम्, ' का गायन कीजिए। इस शरीर पिंजर से बाहर निकल आइए। आप यह नश्वर शरीर नहीं हैं। आप अमर आत्मा हैं। आप अलिंग आत्मा हैं। आप सम्राटों के सम्राट्, उपनिषदों के ब्रह्म के पुत्र हैं। वह आत्मा आपकी हृदय-गुहा में वास करता है। ऐसा अनुभव कीजिए। इसी क्षण अपने जन्माधिकार को प्राप्त कीजिए। निश्वय कीजिए। साक्षात्कार कीजिए। कल या परसों से नहीं, अभी से, इसी क्षण से ही। "तत्त्वमसि" - हे निरंजन ! तू अमरात्मा है।


हे भाई ! साहस आपका जन्माधिकार है, भय नहीं। शान्ति आपका जन्माधिकार है, अशान्ति नहीं। अमृतत्व आपका जन्माधिकार है, मृत्यु नहीं। स्वास्थ्य आपका जन्माधिकार है, रोग नहीं। आनन्द आपका जन्माधिकार है, शोक नहीं। ज्ञान आपका जन्माधिकार है, अज्ञान नहीं।


आप अपने भाग्य के निर्माता हैं। आप अपने भाग्य के विधाता हैं। आप बना सकते हैं, बिगाड़ सकते हैं। सद्विचार, सद्भावना तथा सत्कार्य के द्वारा आप ब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। आप संकल्प-शक्ति के द्वारा पुरानी गन्दी आदतों को हटा सकते हैं। आप बुरे संस्कारों, अपवित्र कामनाओं तथा बुरी कल्पनाओं को विनष्ट कर सकते हैं। आप नयी आदतों का निर्माण कर सकते हैं। आप अपनी प्रकृति को बदल सकते हैं। आप सुन्दर चरित्र का निर्माण कर सकते हैं। आप अपनी आध्यात्मिक शक्ति से समस्त जगत् को हिला सकते हैं। आप दूसरों को भी ईश्वरत्व की ओर प्रेरित कर सकते हैं। आप प्रकृति की शक्ति पर शासन कर सकते हैं। आप पंचतत्त्वों पर शासन कर सकते हैं।


अपनी आत्मा पर निर्भर रहिए। संकीर्ण-बुद्धि बनिए। अन्तःकरण की वाणी सुनिए। गुलाम बनिए। अपनी स्वतन्त्रता को खो दीजिए। आप अमर आत्मा हैं। छोटेपन की ग्रन्थि को नष्ट कर दीजिए। अपने भीतर से शक्ति, साहस तथा बल प्राप्त कीजिए। मुक्त बनिए। अन्ध श्रद्धा रखिए। सावधानीपूर्वक विचार कीजिए और तब किसी वस्तु को मानिए। अन्धे आवेगों के अधीन होइए। उनका दमन कीजिए। असहिष्णु बनिए। विकसित बनिए। आपके अन्दर शक्ति तथा ज्ञान का विशाल क्षेत्र है। उसे प्रदीप्त करना है, तब आत्मा का सारा रहस्य आपको प्रकट हो जायेगा। आत्मज्ञान की ज्योति से अज्ञान का अन्धकार विनष्ट हो जायेगा। आत्मा का सतत ध्यान ज्ञान के साम्राज्य में प्रवेश पाने के लिए एकमात्र कुंजी है। मैंने इन कुछ पंक्तियों में ही वेदान्त का सारांश दे दिया है। वेदान्त-अमृत का पान कर अमृतत्व प्राप्त कीजिए। यही जीवन का लक्ष्य है। यही जीवन की सार्थकता है। कर्मयोग तथा उपासना के द्वारा आप परम साक्षात्कार के लिए समर्थ बन जायेंगे।


अनासक्तिमय जीवन बिताइए। मन को शनैः शनैः अनुशासित कीजिए। कोई भी व्यक्ति दुःख, रोग, कठिनाई तथा बाधाओं से मुक्त नहीं है। आपको अपने स्वरूप-सुखमय आत्मा में ही निवास करना होगा। वही आपके जीवन का मूल तथा आधार है। आपको अपने दिव्य स्वरूप की याद बनाये रखनी होगी, तभी आपको जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए आन्तरिक शक्ति प्राप्त होगी, तभी आप समत्व-बुद्धि प्राप्त करेंगे। आप बाह्य बुरे प्रभावों तथा दुःखद मलिन स्पन्दनों से प्रभावित होंगे। नित्य प्रातः ध्यान के द्वारा आप नयी शक्ति तथा आन्तरिक जीवन, शाश्वत सुख एवं विशुद्ध आनन्द प्राप्त करेंगे। इसका अभ्यास कीजिए। अपनी विपरीत परिस्थितियों में भी इसका अभ्यास कीजिए। धीरे-धीरे आप आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करेंगे। आप अन्ततः आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करेंगे।


आपकी वर्तमान व्याधि कर्म की शोधक है। यह आपमें ईश्वर-स्मरण जगाने के लिए, हृदय में करुणा भरने के लिए, आपको सबल बनाने तथा आपमें सहनशीलता की वृद्धि करने के लिए आपको प्राप्त हुई है। कुन्ती ने भगवान् से प्रार्थना की थी, "मुझे सदा विपत्ति में रखो जिससे मैं सदा आपको याद किया करूँ।" भक्त लोग दुःख में अधिक प्रसन्न होते हैं। रोग, पीड़ा, सर्प, बिच्छू, विपत्ति आदि ईश्वर के ही सन्देशवाहक हैं। भक्त प्रसन्नतापूर्वक उनका स्वागत करता है। वह कभी भी परेशान नहीं होता। वह कहता है: “मैं तेरा हूँ, मेरे प्रभु। तू सब-कुछ मेरी ही भलाई के लिए करता है।"


मेरे प्रिय निरंजन ! दुःख तथा शोक करने को स्थान ही कहाँ है? तू तो ईश्वर का प्रिय है। यही कारण है कि वह तुम्हें कष्ट देता है। जब वह किसी व्यक्ति को अपनी ओर खींचना चाहता है तो वह उसके सारे धन को ले लेता है। वह उसके स्वजनों से उसे अलग करता है। वह उसके सारे सुख-केन्द्रों को नष्ट कर डालता है जिससे कि उसका मन पूर्णतः ईश्वर के चरण-कमलों में स्थापित हो जाये। प्रसन्न मुद्रा में हर वस्तु का सामना कीजिए। उसकी रहस्यमयी लीला को समझिए। हर वस्तु में ईश्वर को देखिए। हर चेहरे में ईश्वर को देखिए। ईश्वर को मन में बनाये रखिए। शरीर से दूर रहते हुए भी हम उसके निकट हैं। श्री कृष्ण अचानक अपने को छिपा लेते हैं जिससे राधा तथा अन्य गोपियाँ उनके लिए अधिक उत्सुकता प्रकट करें। राधा के समान गाइए। गोपियों के समान कृष्ण-दर्शन को तड़पिए। श्री कृष्ण की कृपा आपको प्राप्त होगी। वह आपका अमर सखा है। वृन्दावन के बाँसुरी वाले को भूलिए। वही आपका आधार है। वही देवकी का आनन्द है।


आपके हृदय-प्रकोष्ठ में करुणा-सागर भगवान् निवास करता है। वह आपके निकट है। आप उसे भूल गये हैं; परन्तु वह सदा आपकी देख-रेख करता है। कठिनाइयाँ उसी का आशीर्वाद है। वह आपके शरीर तथा मन को इस प्रकार गठित करना चाहता है कि उनसे हो कर वह अपनी लीला अबाध रूप से जारी रख सके। वह आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति इस तरह से करता है जैसी आप स्वयं नहीं कर सकते। अहंकार के कारण आप अपने कन्धों पर जो बोझ लिये हुए हैं, उसे उतार दीजिए। अहंकार त्याग दीजिए। स्वार्थ-निर्मित उत्तरदायित्वों को त्याग कर पूर्ण आराम से रहिए। उसमें पूर्ण श्रद्धा रखिए। पूर्ण आत्मार्पण कीजिए। उसकी ओर दौड़िए। वह हार्थो को फैला कर आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। वह आपके लिए सब-कुछ करेगा। मेरा विश्वास कीजिए। शिशु के समान अपने हृदय को ईश्वर के प्रति खोले रखिए। सारे दुःख समाप्त हो जायेंगे। कम-से-कम एक बार भी भाव के साथ कहिए: "मैं तेरा हूँ! हे मेरे प्रभु। सब-कुछ तेरा ही है। तेरा ही चाहा हो कर रहेगा।"


विरह का अन्त होगा। सारे दुःख, कष्ट, शोक और रोग विलीन हो जायेंगे। आप ईश्वर के साथ एक हो जायेंगे।


अनुभव कीजिए कि सारा संसार ही आपका शरीर है। उन सारे अवरोधों को नष्ट कीजिए जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से अलग रखते हैं। बड़प्पन की भावना अज्ञान अथवा मोह है। "ईशावास्यमिदं सर्वम्" - विश्व-प्रेम का विकास कीजिए। सभी से मिल कर रहिए। एकता अमर जीवन है। पार्थक्य मृत्यु है। सारा जगत् विश्व-वृन्दावन है। अनुभव कीजिए कि यह शरीर ईश्वर का चल-निकेतन है। जहाँ भी आप हों- घर में, कार्यालय में, समझिए कि यही ईश्वर का मन्दिर है। हर कार्य को उसकी पूजा समझिए। अनुभव कीजिए कि सारे प्राणी उसके रूप हैं। हर कर्म को योग बना डालिए। आप वेदान्त-साधक हों तो साक्षी तथा अकर्ता-भाव बनाये रखिए। यदि भक्तियोगी हों तो निमित्त-भाव रखिए। अनुभव कीजिए कि ईश्वर आपके हाथों से कर्म करता है। वह एक प्रभु ही सारे हाथों से कर्म करता है, सारे कानों से सुनता है, सारी आँखों से देखता है, आप परिवर्तित हो जायेंगे। आपको नयी दृष्टि मिलेगी। आप परम शान्ति एवं सुख का उपभोग करेंगे।

. शिवानन्द-मनोविज्ञान-साधना-सूत्र


अभ्यास तथा वैराग्य से मन को नियन्त्रित किया जा सकता है। मन को ईश्वर पर स्थापित करने का सतत प्रयास ही अभ्यास है। विषय-पदार्थों के प्रति अनासक्ति ही वैराग्य है।


'मैं कौन हूँ' का विचार कीजिए। का मानसिक जप कीजिए। सारे विचार स्वतः ही विलीन हो जायेंगे। आप सच्चिदानन्द आत्मा में विश्राम करेंगे।


अकेले बैठिए तथा मन की वृत्तियों का निरीक्षण कीजिए। उदासीन बनिए। साक्षी बने रहिए। वृत्तियों से तादात्म्य-सम्बन्ध स्थापित कीजिए। मन आपके अधीन हो जायेगा।


कामना रूपी जलावन को नष्ट कीजिए, संकल्प रूपी अग्नि बुझ जायेगी। संकल्प-नाश के अनन्तर ब्रह्म विभासित हो जायेगा।


सुख, दुःख, धर्म तथा अधर्म के प्रति मैत्री, करुणा, मुदिता तथा उपेक्षा का अर्जन कीजिए। आप मन की शान्ति प्राप्त करेंगे।


भूत की चिन्ता कीजिए। भविष्य की योजना बनाइए। मन को हवाई किले बनाने दीजिए। ठोस वर्तमान में निवास कीजिए।


उसी कार्य को कीजिए जिसे मन पसन्द नहीं करता। उस काम को कीजिए जो मन पसन्द करता है।


अपनी कामनाओं को पूर्ण करने का प्रयत्न कीजिए। आशा कीजिए। किसी वस्तु की कामना रखिए। शुभ कामनाओं के द्वारा अशुभ कामनाओं को विनष्ट कर दीजिए। अशुभ कामनाओं को भी मुमुक्षुत्व की कामना द्वारा नष्ट कर डालिए।


प्राणायाम का अभ्यास रजस् तथा तमस् को नष्ट करता है। इससे मन स्थिर होता है।


धार्मिक पुस्तकों का स्वाध्याय, तप, दान तथा महात्माओं, साधुओं एवं संन्यासियों के साथ सत्संग के द्वारा अशुभ संस्कार दूर होते हैं तथा मन के निग्रह में सुगमता होती है।


किसी भी मन्त्र के जप तथा उपासना के द्वारा मन के मल नष्ट होते हैं, मन अन्तर्मुखी बनता है, वैराग्य विकसित होता है, धारणा में सहायता मिलती है तथा अन्ततः मनोनिग्रह की प्राप्ति होती है।


'कलौ केशव कीर्तनात्"- इस कलियुग में भगवान् के नाम का कीर्तन ही मनोनिग्रह के लिए सबसे सुगम मार्ग है।


अन्न का मन के ऊपर प्रभाव पड़ता है। सात्त्विक आहार (दूध, फल इत्यादि) मन को शान्त बनाता है। राजसिक आहार मन को उत्तेजित करता है। सात्त्विक आहार कीजिए। मिताहार कीजिए।


नयी अच्छी आदतों के द्वारा बुरी आदतों को विनष्ट कीजिए। निम्न मन को उन्नत मन के द्वारा नियन्त्रित कीजिए। आत्मभाव के साथ सतत निष्काम सेवा मन के नियन्त्रण तथा चित्त-शुद्धि के लिए लाभदायक है।


मन के साथ युद्ध मत कीजिए। धारणा तथा ध्यान के अभ्यास में नियमित रहिए। आप शान्ति, सुख, आनन्द तथा अमृतत्व प्राप्त करेंगे!

. शिवानन्द-हठयोग-साधना-सूत्र


. अथ अतः हठयोग की जिज्ञासा करते हैं।


. हठयोग शरीर तथा प्राण से सम्बन्ध रखता है।


. हठयोगी प्राणायाम के द्वारा नाड़ी-शुद्धि करता है।


. क्रिया के द्वारा वह शरीर को शुद्ध बनाता है।


. वह त्राटक का अभ्यास कर दृष्टि को स्थिर बनाता है।


. वह आसन, प्राणायाम, बन्ध तथा मुद्रा का अभ्यास करता है।


. वह प्राण तथा अपान को मिलाता है।


. ऐसे अभ्यासों द्वारा वह कुण्डलिनी को जगाता है।


. तब वह उसे षड्चक्रों द्वारा सहस्रार में सदाशिव से मिलाता है।


१०. वह इन चक्रों पर धारणा करता है।


११. वह कुण्डलिनी को सहस्रार में सदाशिव से मिलाता है।


१२. वह अमृत-पान कर अमृतत्व प्राप्त कर लेता है।


१३. हठयोगी काया-सिद्धि प्राप्त करता है।


१४. जहाँ हठयोग की समाप्ति होती है, वहीं से राजयोग का समारम्भ हो जाता है।

. शिवानन्द-कर्मयोग-साधना-सूत्र


. अब कर्मयोग-साधना की जिज्ञासा होती है।


. कर्मयोग की साधना हृदय को शुद्ध बनाती है।


. यह ज्ञान का सहायक है।


. चित्त-शुद्धि के बिना ज्ञान सम्भव नहीं है।


. कर्मयोग की साधना प्रेम तथा करुणा का विकास करती है।


. कर्मयोग से हृदय विशाल बनता है।


. अहंता तथा ममता का परित्याग कीजिए।


. यथाव्यवस्था, सहनशीलता तथा साहस का विकास कीजिए।


. अपने आवेगों को वश में रखिए।


१०. स्वार्थ तथा बड़प्पन की भावना को नष्ट कीजिए।


११. नम्र, सुशील तथा शिष्ट बनिए।


१२. नपे-तुले शब्द बोलिए।


१३. सत्यवादी तथा सच्चा बनिए।


१४. फल की कामना कीजिए।


१५. ईश्वर के हाथों का निमित्त बनिए।


१६. फल को ईश्वर पर अर्पित कर डालिए।


१७. शरीर, मन तथा धन को ईश्वर के प्रति अर्पित कर डालिए।


१८. समदृष्टि तथा समत्व-बुद्धि रखिए।


१९. ऐसा अनुभव कीजिए कि सभी रूप ईश्वर के ही रूप हैं।


२०. अनुभव कीजिए कि आप एकमेव ईश्वर की ही सेवा कर रहे हैं।


२१. गरीब, रोगी तथा अपने माता-पिता की सेवा कीजिए।


२२. देश की सेवा कीजिए।

. शिवानन्द-भक्ति-साधना-सूत्र


. अथ अतः भक्ति-साधना की जिज्ञासा होती है।


. भक्ति-साधना वह प्रक्रिया है जिससे हम ईश्वर को प्राप्त करते हैं।


. नवविधा भक्ति का विकास कीजिए।


. पाँच भावनाओं का विकास कीजिए।


. साधुओं की सेवा कीजिए।


. अपने गुरु के प्रति निष्ठा रखिए।


. अटूट अविचलित श्रद्धा रखिए।


. भागवत, रामायण का स्वाध्याय कीजिए।


. ईश्वर की लीला तथा महिमा का श्रवण कीजिए।


१०. सर्वत्र ईश्वर की सत्ता का भान कीजिए।


११. सम्पूर्ण, अशेष आत्मार्पण कीजिए।


१२. सदा ईश्वर के नाम का जप कीजिए।


१३. उसकी स्तुतियों का गान कीजिए। कीर्तन कीजिए।


१४. भक्ति-साधना का फल है ज्ञान।


१५. पराभक्ति तथा ज्ञान एक ही हैं।

. शिवानन्द-योग-साधना-सूत्र


. अथ अतः योग-साधना की जिज्ञासा होती है।


. योग-साधना से ईश्वर-साक्षात्कार की प्राप्ति होती है।


. गुरु के अधीन योग सीखिए।


. अहिंसा, सत्य तथा ब्रह्मचर्य का अभ्यास कीजिए।


. करुणा, नम्रता तथा धैर्य का अर्जन कीजिए।


. सरल, सुखद तथा स्थिर आसन में बैठिए।


. श्वास को नियन्त्रित कीजिए, प्राण को वशीभूत कीजिए।


. मन की वृत्तियों का निग्रह कीजिए।


. अपने कर्म-फल को ईश्वर पर अर्पित कर डालिए।


१०. धारणा, ध्यान तथा समाधि का अभ्यास कीजिए।


११. हल्का आहार, दूध तथा फल ग्रहण कीजिए।


१२. सिद्धियाँ योग में बाधक हैं। उनका परित्याग कीजिए।


१३. पहले सविकल्प समाधि का अभ्यास कीजिए।


१४. तब असम्प्रज्ञात समाधि में प्रवेश कीजिए।

. शिवानन्द-वेदान्त-साधना-सूत्र


. अथ अतः ब्रह्म की जिज्ञासा होती है।


. ब्रह्म जगत् का निमित्त तथा उपादान कारण है।


. ब्रह्म असीम, नित्य तथा अव्यय है।


. जो सत्य वस्तु को छिपा लेती है, वह माया है।


. जो जीव के लिए आवरण का काम करती है, वह अविद्या है।


. नित्य-सुख की प्राप्ति तथा सारे दुःखों का नाश ही मोक्ष है।


. ज्ञान ही मुक्ति प्रदान करता है।


. साधन-चतुष्टय ज्ञान के लिए सहायक है।


. श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती है।


१०. ब्रह्माकार-वृत्ति अविद्या को दूर करती है।


११. ध्यान कीजिए : "मैं ब्रह्म हूँ" - यही अहंग्रह उपासना है।


१२. जीवन्मुक्त सदा सुखी रहता है। उसे समदृष्टि प्राप्त है।


१३. जीवन्मुक्त को प्रारब्ध भोग करना पड़ता है।


१४. उसके प्राण ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं। वह कहीं जाता नहीं।

. शिवानन्दवाद में सम्पूर्ण साधना


व्यक्तित्व का सम्पूर्ण गठन


स्वयं भगवान् ने गीता में दो मार्गों को बतलाया है और उन दोनों मार्गों में कर्मयोग को श्रेष्ठ कहा है। कर्मयोग ज्ञानयोग से भिन्न नहीं है; क्योंकि ज्ञान कर्म का अन्तर्वर्ती है। कर्मों के संन्यास अथवा अहंकार, राग तथा कामना का त्याग करते हुए कर्मों का सम्यक् सम्पादन-ये ही दो रास्ते हैं।


कर्म तो सृष्टि का प्राण है। अव्यक्त में स्पन्दन द्वारा ही जगत् की उत्पत्ति हुई है। सृष्टि का अतिक्रमण करने पर ही कर्म का अन्त होगा। बाह्य इन्द्रियों के बलपूर्वक नियन्त्रण द्वारा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का दम्भपूर्ण निरोध ही हो सकेगा, उनका ईश्वरत्व में रूपान्तरण नहीं होगा। इसी ज्ञान ने जनक तथा अन्य ज्ञानियों को कर्मयोग के लिए बाध्य किया।


आत्म-साक्षात्कार के लिए जीव-चैतन्य को अनन्त में विलीन होना चाहिए। अहंकार को विनष्ट करना चाहिए जो जीव को पंचकोशों से आबद्ध करता है। कैसा भी अस्त्र आप क्यों चुन लें, लक्ष्य तो अहंकार का नाश ही है। विवेक के द्वारा ही अहंकार का पूर्ण नाश सम्भव है। यही योग का आधार है।


जब अहंकार के बन्धन टूट जाते हैं, योगी सदा निश्चल आत्मा का अनुभव करता है जो बाह्य कार्यों से अप्रभावित रहता है, जो नित्य साक्षी है, जो कर्ता है भोक्ता कर्म प्रकृति के अन्तर्गत है। कर्म पुरुष या आत्मा के लिए नहीं। छह भाव-विकार गुणों के हैं, आत्मा के नहीं जो सदा समरस और एकरस रहता है।


योगी प्रखर कार्यों को करता है; परन्तु अन्तर में सदा शान्त रहता है। लोक-संग्रह के लिए भले ही वह महान् कार्य का सम्पादन करे, परन्तु वह अपनी आन्तरिक शान्ति से लेश मात्र भी विचलित नहीं होता। प्रबल कार्य भी उसके लिए बन्धन उत्पन्न नहीं करते; क्योंकि उसने संस्कार-बीज को जला डाला है। अहंकार के नष्ट हो जाने पर कर्मों के फल, जो संसार के बन्धन हैं, उसके पास नहीं आते।


इस कर्म-ज्ञान-समन्वय में भक्ति भी निहित है। मनुष्य के गठन में भावना का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भावना का स्थान हृदय है। चेतना का त्वरित विकास भावना पर अवलम्बित है। गीता के अनुसार उन्नति के लिए अपरा तथा परा-दोनों प्रकार की भक्ति अनिवार्य है। अपरा भक्ति से परा भक्ति की प्राप्ति होती है। परा भक्ति और ज्ञान एक ही हैं। सच्चा भक्त ईश्वर को अपने हृदय में अवस्थित देखता है। जब हृदय असीमता के विकास को प्राप्त करता है, अहंकार का आवरण धीरे-धीरे पतला पड़ता जाता है तथा अन्ततः विलुप्त ही हो जाता है। लक्ष्य की प्राप्ति होती है।


इस समन्वय से मनुष्य का पूर्ण व्यक्तित्व सर्वांगीण विकास को प्राप्त करता है। उसकी दैवी प्रकृति के विकास में जरा भी त्रुटि नहीं रह पाती। वह अहंकार रूपी भयंकर शेर का शिकार नहीं बन पाता; क्योंकि उसका कोई भी भाग शिकार के अनुकूल भेद्य नहीं रह जाता। विशाल चैतन्य के लिए सांसारिकता का स्थान नहीं रह पाता।


ध्यानयोग के अभ्यास को भी छोड़ा नहीं गया है। योगी प्रातः-सायं अपने लिए किले का निर्माण करता है-बाह्य तथा आन्तर शत्रुओं से रक्षा पाने के लिए। ध्यान के अभ्यास द्वारा ही मनुष्य दिन-भर ज्ञान की भावना बनाये रखता है।


यही समन्वययोग है।


सर्वांगीण विकास


मनुष्य सोचता, अनु