
हिन्द पॉकेट बुक्स धर्म और समाज
डॉ० सर्वेपल्लि राधाकृष्णन् भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति (1952-1962) और द्वितीय राष्ट्रपति रहे। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक, एक महान लेखक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे। उनके इन्हीं गुणों के कारण सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था। उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
धर्म और समाज
डॉ. सर्वेपल्ली राधाकृष्णन
हिन्द पॉकेट बुक्स
पेंगुइन रैंडम हाउस इिम्प्रंट
हिन्द पॉकेट बुक्स
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पेंगुइन
रैंडम हाउस
इंडिया
'RELIGION AND SOCIETY' का हिंदी अनुवाद
सातवां हिन्दी संस्करण हिन्द पॉकेट बुक्स द्वारा 1975 में प्रकाशित
प्रथम हिन्दी संस्करण हिन्द पॉकेट बुक्स में पेंगुइन रैंडम हाउस द्वारा 2023 में प्रकाशित
कॉपीराइट सरस्वती विहार / हिन्द पॉकेट बुक्स
अनुवादक विराज एम० ए०
सर्वाधिकार सुरक्षित
10 98765432
इस पुस्तक में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं, जिनका यथासंभव तथ्यात्मक
सत्यापन किया गया है, और इस संबंध में प्रकाशक एवं सहयोगी
प्रकाशक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं है।
ISBN 9789353493585
मुद्रकः रेप्रो इंडिया लिमिटेड
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क्रम
धर्म-निरपेक्षता हमारे युग की मुख्य दुर्बलता
आध्यात्मिक पुनरुज्जीवन की आवश्यकता
2: धर्म की प्रेरणा और नई विश्व-व्यवस्था
युद्ध का उत्कृष्ट वस्तु के रूप में वर्णन
जीवन-मूल्यों के सम्बन्ध में शिक्षण
यह पुस्तक 1942 की सर्दियों में कलकत्ता
और बनारस विश्वविद्यालयों में
.दिए गए भाषणों की सामग्री
पर आधारित है।
लेखकीय टिप्पणी
द्वितीय संस्करण के अवसर पर मैंने
भारतीय राजनीति में हाल में
घटित घटनाओं के विषय
में एक उत्तर लेख
जोड़ दिया है।
स० रा०
वर्तमान संकट - सामाजिक व्याधि - युद्ध और नई व्यवस्था - धर्म-निरपेक्षता हमारे युग की मुख्य दुर्बलता - द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद - आध्यात्मिक पुनरुज्जीवन की आवश्यकता
सबसे पहले मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय की सीनेट के सदस्यों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने विश्वविद्यालय के साथ मेरे सक्रिय सहयोग के पिछले बीस वर्षों में मुझे इतने विशेषाधिकार प्रदान किए हैं, जिनमें 'कमला भाषण-माला' के लिए मुझे चुनना भी एक है। इस भाषण-माला की सम्मानित परम्परा को जारी रखने के लिए निमन्त्रित होना एक ऐसा सम्मान है, जिसपर कोई भी विद्वान गर्व अनुभव कर सकता है। मेरे लिए यह विशेष रूप से आनन्द की बात है कि मुझे एक ऐसी भाषण-माला में बोलने का सुअवसर प्राप्त हो, जिसे स्वर्गीय सर आशुतोष मुखर्जी ने अपनी स्नेहमयी पुत्री के नाम पर स्थापित किया था।
'भारतीय जीवन और विचार के किसी पहलू पर तुलनात्मक दृष्टि से विवेचन' एक विस्तृत विषय है, जो हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है और हम इसका अर्थ-निरूपण काफी उदार दृष्टि से कर सकते हैं। मैंने यह विषय चुना है, 'धार्मिक आदर्शों की दृष्टि से समाज का पुनर्गठन'। आजकल के कठिन समय में यह विषय मुझे अत्यन्त महत्त्व का लगता है।
औरंगज़ेब ने अपने एक पत्न में अपने अध्यापक मुल्ला साहेब को लिखा है, "तुमने मेरे पिता शाहजहां से कहा था कि तुम मुझे दर्शन पढ़ाओगे। यह ठीक है, मुझे भली भांति याद है, कि तुमने अनेक वर्षों तक मुझे वस्तुओं के सम्बन्ध में ऐसे अनेक अव्यक्त प्रश्न समझाए, जिनसे मन को कोई सन्तोष नहीं होता और जिनका मानव-समाज के लिए कोई उपयोग नहीं है। ऐसी थोथी धारणाएं और खाली कल्पनाएं, जिनकी केवल यह विशेषता थी कि उन्हें समझ पाना बहुत कठिन था और भूल पाना बहुत सरल... क्या तुमने कभी मुझे यह सिखाने की चेष्टा की कि शहर पर घेरा कैसे डाला जाता है या सेना को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है? इन वस्तुओं के लिए मैं अन्य लोगों का आभारी हूं, तुम्हारा बिलकुल नहीं।[1] इन भाषणों में मेरा एक लक्ष्य यह बताना भी होगा कि आज जो संसार इतनी संकटपूर्ण दशा में फंसा है, वह इसलिए कि वह 'शहर पर घेरा डालने' या 'सेना को व्यवस्थित करने' के विषय में सब कुछ जानता है और जीवन के मूल्यों के, दर्शन और धर्म के केन्द्रीभूत प्रश्नों के सम्बन्ध में, जिनको कि यह 'थोथी धारणाएं और खाली कल्पनाएं,' कहकर एक ओर हटा देता है, बहुत कम जानता है।
हम मानव-जाति के जीवन में एक सबसे अधिक निश्चायक समय में रह रहे हैं। मानव- इतिहास के अन्य किसी भी समय में इतने लोगों के सिर पर इतना बड़ा बोझ नहीं था, या वे इतने येलणापूर्ण अत्याचारों और मनोवेदनाओं के कष्ट नहीं पा रहे थे। हम ऐसे संसार में जी रहे हैं, जिसमें विषाद सर्वव्यापी है। परम्पराएं, संयम और स्थापित कानून और व्यवस्था आश्चर्यजनक रूप से शिथिल हो गए हैं। जो विचार कल तक सामाजिक भद्रता और न्याय से अविच्छेद्य समझे जाते थे और जो शताब्दियों से लोगों के आचरण का निर्देशन और अनुशासन करने में समर्थ रहे थे, आज बह गए हैं। संसार गलतफहमियों, कटुताओं और संघर्षों से विदीर्ण हो गया है। सारा वातावरण संदेह, अनिश्चितता और भविष्य के अत्यधिक भय से भरा है। हमारी जाति के बढ़ते हुए कष्टों, आर्थिक दरिद्रता की तीव्रता, अभूतपूर्व पैमाने पर होनेवाले युद्धों, उच्चपदस्थ लोगों के मतभेदों के कारण, और शक्ति और सत्ताधारी लोगों की, जो बहती हुई व्यवस्था को बनाए रखना, और पंगु सभ्यता को किसी भी शर्त पर बचाना चाहते हैं,'[2] जड़ता के कारण सारे संसार में एक ऐसी भावना जाग रही है, जो सारतः क्रांतिकारी है। 'क्रान्ति' शब्द का अर्थ सदा भीड़ की हिंसा और शासक वर्गों की हत्या ही नहीं समझा जाना चाहिए। सभ्य जीवन के मूल आधारों में तीव्र और प्रबल परिवर्तन की उग्र लालसा भी क्रान्तिकारी इच्छा है। 'क्रान्ति' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है। (1) आकस्मिक और प्रचंड विद्रोह, जिसके परिणामस्वरूप शासन का तख्ता उलट जाए, जैसा फ्रांसीसी और रूस की बोलशेविक क्रान्तियों में हुआ था। (2) एक शनैः-शनैः काफी लम्बे समय में होनेवाला सामाजिक सम्बन्धों की एक प्रणाली से दूसरी प्रणाली की ओर संक्रमण, जैसे उदाहरण के लिए ब्रिटिश औद्योगिक क्रान्ति। किसी भी समय को 'क्रान्तिकारी' परिवर्तन के कारण नहीं कहा जाता, क्योंकि परिवर्तन तो इतिहास में सदा होता ही रहता है, अपितु परिवर्तन की तीव्र गति के कारण कहा जाता है। वर्तमान युग क्रांतिकारी है, क्योंकि इसमें परिवर्तन की गति बहुत तेज़ है। चारों ओर सब जगह हमें वस्तुओं के टूटने- फूटने और सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संस्थाओं में परिवर्तनों की, प्रमुख विश्वासों और विचारों में, मानव-मन की आधारभूत श्रेणियों में परिवर्तन की, आवाज़ सुनाई पड़ रही है। बुद्धिमान, अनुभूतिशील और उद्यमी मनुष्यों का विश्वास है कि राजनीति, अर्थशास्त्र और उद्योग से सम्बद्ध संस्थाओं और वर्तमान प्रबन्धों में कहीं न कहीं कुछ बड़ी गलती है और यदि हमें मनुष्यता को बचाना है तो हमें इन प्रबन्धों और संस्थाओं से छुटकारा पाना होगा।
विज्ञानवेत्ता हमें वे विभिन्न ढंग बताते हैं, जिनसे यह पृथ्वी नष्ट हो सकती हैं। यह कभी सुदूर भविष्य में चन्द्रमा के बहुत निकट आ पहुंचने से या सूर्य के ठंडा पड़ जाने से नष्ट हो सकती है। कोई पुच्छल तारा पृथ्वी से आकर टकरा सकता है, या स्वयं धरती में से ही कोई जहरीली गैस निकल सकती है। परन्तु ये सब बहुत दूर की सम्भावनाएं हैं; जबकि अधिक सम्भाव्यता इस बात की है कि मानव जाति स्वयं जान-बूझकर किए गए कार्यों से और अपनी मूर्खता और स्वार्थ के कारण, जो मानव-स्वभाव में मज़बूती से जमे हुए हैं, नष्ट हो सकती है। यह बड़ी करुणाजनक बात है कि ऐसे संसार में जो हम सबके आनन्द लेने के लिए है और जो यदि हम आजकल युद्ध यन्त्रजात को पूर्णता तक पहुंचने में लगाई जा रही ऊर्जाओं के केवल थोड़े-से हिस्से का ही इसके लिए उपयोग करें तो सबके लिए आनन्दमय बनाया जा सकता है'[3]. हम मृत्यु और विनाश का तांडव चलने दे रहे हैं। विनाश की एक अन्धी प्रेरणा मानव-जाति पर हावी हो गई दीखती है और यदि इसकी रोकथाम न की गई तो हम पूर्ण विनाश की ओर एक लम्बी छलांग लगा लेंगे और एक ऐसे बौद्धिक अन्धकार और नैतिक बर्बरता के काल की ओर बढ़ने की तैयारी कर रहे होंगे, जिसमें मनुष्य की अतीत की अच्छी से अच्छी उपलब्धियां ध्वस्त हो जाएंगी। इस सबका विषाद शारीरिक कष्ट की भांति हमें दुःखी कर रहा है, हमारे मनों को व्यधित कर रहा है और हमारे हृदयों को अशांत किए है। हम यन्त्रणापूर्ण दबाव के, गहरी चिन्ता के और बहुमुखीन मोह-भंग के युग में रह रहे हैं। संसार एक मूर्च्छा की-सी दशा में है। कुछ श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा एक सुन्दरतर संसार का साक्ष्य ही भविष्य के लिए हमारी आशा है। पिछली दशाब्दियों में न केवल भौतिक उन्नति हुई है, जो कि आश्चर्यजनक है और प्रत्यक्ष दीख पड़ती है, अपितु नैतिक बुद्धि और सामाजिक आवेश में भी सुनिश्चित रूप से वृद्धि हुई है। विज्ञान और आविष्कारों के परिणामों को जीवन की सामान्य दशाओं में सुधार के लिए प्रयुक्त करने की इच्छा अधिकाधिक बढ़ रही है। मनुष्य के प्रति मनुष्य के सम्बन्धों और दायित्वों के बारे में हमारे विचारों में बहुत वास्तविक प्रगति हुई है। बाल-श्रम के विरुद्ध जिहाद, कारखाना कानून, वृद्धावस्था की पेन्शनें, दुर्घटनाओं के लिए मुआवज़ा, ये थोड़े-से उदाहरण हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि समाज में अपने प्रत्येक सदस्य के प्रति ज़िम्मेदारी की भावना बढ़ रही है। संसार के इतिहास में इससे पहले कभी शांति के लिए इतनी तीव्र इच्छा और युद्ध के विरुद्ध ऐसी विस्तृत घृणा नहीं हुई थी। इस युद्ध में करोड़ों लोगों का प्रतिशोधहीन साहस और प्रदर्शनहीन
आत्मबलिदान नैतिक बुद्धि और मानवता के प्रेम की वृद्धि के सूचक हैं। आजकल जो कुछ हो रहा है, वह ग्रेट ब्रिटेन या जर्मनी, सोवियत रूस या संयुक्त राज्य अमेरिका, किसी भी एक देश के भाग्य से बहुत ऊपर की वस्तु है। यह समूचे समाज का एक विस्तृत विक्षोभ है। यह केवल युद्ध नहीं है, अपितु यह एक विश्व-क्रान्ति है, युद्ध जिसका एक दौर-मात्न है। यह सम्पूर्ण विचार और सभ्यता के ढांचे में बड़ा परिवर्तन है। यह एक ऐसी संक्रांति है, जो हमारी सभ्यता के मूल तक पहुंचती है। इतिहास ने हमारी पीढ़ी को एक इस प्रकार के युग में ला छोड़ा है और हमें यत्न करना चाहिए कि इस क्रांति को हम ऐसी दशा में ले जाए, जहा यह उचित आदशों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सके। हम क्रांति के मार्ग को उलट नहीं सकते। पुरानी व्यवस्था - जिसने हिटलरों, मुसोलिनियों और तोजोओं को जन्म दिया था - नष्ट होकर रहेगी। जो लोग उसके विरुद्ध लड़ रहे हैं, उन्हें यह अनुभव करना चाहिए कि वे यहीं और इसी समय स्वतन्त्रता की एक नई व्यवस्था की नींव रख रहे हैं। हमारे शत्रुओं को इसलिए हराया जाना चाहिए क्योंकि वे पुरानी व्यवस्था से अब भी चिपटे हुए हैं और नई व्यवस्था के लिए रास्ता साफ करने में हमारी सहायता नहीं करते। यदि हम शान्ति जीतना चाहते हैं और भविष्य की विपत्तियों के बीज बोने को रोकना चाहते हैं, तो हमें मानव-मन की कायरतापूर्ण जड़ता की रोकथाम करनी होगी। यदि हम स्थायी शांति चाहते हैं तो हमें उन दशाओं को समाप्त करना होगा, जो युद्धों के कारण हैं, और हमें जीवन का एक नया रास्ता खोजने के लिए ईमानदारी से काम करना होगा, जिसका अर्थ यह होगा कि हम पुराने लालित आदर्शों को बलिदान कर दें। जहां तक सम्भव हो, हमें इस विषय में सुनिश्चित होना चाहिए कि हम युद्ध की उत्तेजना में, कष्टों के दबाव में और आक्रमण के प्रति क्रोध में अपने शत्रुओं के प्रति उचित न्याय को छोड़ न बैठें। हमें अमानवों के प्रति भी मानवता बरतना सीखना चाहिए। हमें अपने मन को सुदूर भविष्य पर केन्द्रित रखना सीखना चाहिए और उस भविष्य को अनुभूतिहीन विद्वेष से आच्छन्न नहीं होने देना चाहिए।
इस समय संसार एक दोराहे पर खड़ा है और उसके सामने दो विकल्प हैं : सारे संसार का एक रूप में संगठन या समय-समय पर होने वाले युद्ध। हम जिस समाज में रहते हैं, उसके हम निर्माता हैं। जो संस्थाएं गलत मार्ग पर चली गई हैं, हम उनके मालिक हैं और हमें इस रोगी समाज के लिए आवश्यक दवाइयों की खोज करनी ही होगी। यदि वह सभ्यता, जो अभी हाल तक अपनी प्रगति में आनंद अनुभव करती थी, और मानवता किसी यन्त्रणा से पीड़ित है, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह इतिहास की किसी दुर्निवार प्रक्रिया द्वारा अपने विनाश की ओर खदेड़ी जा रही है। सृजन के काल बड़े कष्टों के काल हुए हैं।'[4] संसार एक नये समतुलन तक पहुंचने से पहले बढ़ते हुए कष्टों के दौर में से गुज़रेगा। भले ही अनेक रुकावटें और अड़चनें आएं, परन्तु यह निश्चित है कि मनुष्य-जाति अपेक्षाकृत अधिक विवेकपूर्ण संसार की ओर बढ़ेगी। परन्तु उसकी गति हमारे साहस और बुद्धिमत्ता द्वारा तय होगी। अनेक रचनात्मक प्रयोजन, जिनके द्वारा जाति की मुक्ति हो सकती थी, बहुत बार नष्ट हो जाते हैं; इसलिए नहीं कि उनके लिए इच्छा या संकल्प का अभाव था, बल्कि मन की अस्तव्यस्तता और भीरुता के कारण।
हमारे सामाजिक जीवन की गम्भीर व्याधि का कारण हमारी सामाजिक संस्थाओं और विश्व के उद्देश्य के बीच का व्यवधान है। प्रकृति ने अनेक जातियां बनाई है, जिनकी भाषाएं, धर्म और सामाजिक परम्पराएं भिन्न हैं; और उसने मनुष्य को यह काम सौंपा है कि वह मानव- जगत् में व्यवस्था उत्पन्न करे और जीवन का ऐसा रास्ता खोज निकाले, जिससे विभिन्न समूह आपसी मतभेदों को हल करने के लिए बल का प्रयोग किए बिना शांतिपूर्वक रह सकें। यह संसार युद्धप्रिय राष्ट्रों का युद्ध-क्षेत्र बनने के लिए नहीं रचा गया, अपितु एक ऐसा राष्ट्र-मंडल बनने के लिए रचा गया है, जिसमें विभिन्न समूह सबके लिए गौरव, अच्छा जीवन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए रचनात्मक प्रयत्न में एक-दूसरे के साथ सहयोग कर रहे हों।
संसार के एकीकरण के लिए आवश्यक दशाएं विद्यमान हैं। केवल मनुष्य की इच्छा का अभाव है। विभाजन के बड़े-बड़े कारण- महासागर और पर्वत अब प्रभावहीन हो गए हैं। परिवहन और संचारण की इस समय उपलब्ध सुविधाओं के कारण संसार एक छोटा-सा पड़ोस बन गया है। धर्म और प्रथाओं के विपरीत, जो स्थानीय ढंग की होती हैं, विज्ञान राजनीतिक या सामाजिक सीमाओं को नहीं मानता और ऐसी भाषा में बात करता है, जिसे सब समझते हैं। मनुष्य पर यन्त्रों के प्रभाव ने यन्त्र-युग से पहले के पूर्णतया स्वतन्त्र राज्यों के संसार को छिन्न-भिन्न कर दिया है। औद्योगिक क्रान्ति ने आर्थिक सम्बन्धों को इतना अधिक बदल दिया है कि अब हम एक विश्व-समाज बन गए हैं, जिसकी अपनी विश्व-अर्थ-व्यवस्था है और जिसकी मांग है कि एक विश्व-व्यवस्था कायम की जाए। विज्ञान ने मानवं-जीवन का आधार एक जैसे ब्रह्माण्डीय तत्त्वों को बतलाया है। दर्शन में भी यह कल्पना की गई है कि प्रकृति और मानवता के पीछे एक सार्वभौम चेतना है। धर्म भी हम सबके सांझे आध्यात्मिक संघर्षों और महत्त्वाकांक्षाओं की ओर संकेत करता है।
मानव-विकास के आरम्भिक सोपानों में सामूहिक विचार और अनुभूतियों की अभिव्यक्तियां ऐसी परिस्थितियों में उत्पन्न हुईं और बढ़ती गईं, जिनका परिणाम स्वभावतः एक-दूसरे से पृथकता और एक-दूसरे के प्रति अज्ञान के रूप में हुआ। जब लोगों ने एक विश्वासयोग्य सामाजिक व्यवस्था की और एक ऐसी सुदृढ़ केन्द्रीय शक्ति की आवश्यकता अनुभव की, जो जनपदीय झगड़ों और गृह-युद्धों को दबा सके, तब राष्ट्र-राज्य का जन्म हुआ। अतीत काल में राष्ट्र-राज्य ने अपने राष्ट्रिकों को एक विशालता और सृजनशीलता प्रदान करके मानवता की सेवा की, जो अन्य किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकती थी। अनेक राष्ट्र राष्ट्रीय एकता प्राप्त करने में सफल हुए, और यदि इसी प्रक्रिया को एक सोपान और आगे तक बढ़ाया जाए तो विश्व की एकता प्राप्त की जा सकती है। मानवता की जड़ें जाति और राष्ट्रीयता के तन्तुओं की अपेक्षा कहीं अधिक गहरी जाती हैं। हमारा ग्रह (पृथ्वी) इतना छोटा हो गया है कि इस पर संकीर्ण देशभक्ति के लिए गुंजाइश नहीं रही। ऐतिहासिक पृष्ठभूमियों, जलवायु की दशाओं और दूर-दूर तक फैले हुए अन्तर्जातीय विवाहों के परिणामस्वरूप जातियों का वह रूप बना है, जो आज दीख पड़ता है। हम सबकी मानसिक प्रक्रियाएं; संवेगात्मक प्रक्रियाएं, आधारभूत मनोवेग और लालसाएं तथा महत्त्वाकांक्षाएं एक-सी ही हैं। डार्विन ने अपनी पुस्तक 'डिसेंट आफ मैन' (मनुष्य का अवतरण) में लिखा है, "ज्यों-ज्यों मनुष्य सभ्यता में उन्नति करता जाता है और छोटी-छोटी जातियां बड़े-बड़े समुदायों में संगठित होती जाती हैं, त्यों-त्यों प्रत्येक व्यक्ति को यह बात समझ आती जाती है कि उसे अपनी सामाजिक सहज प्रवृत्तियों और समवेदनाओं का विस्तार अपने राष्ट्र के सब सदस्यों तक कर लेना चाहिए, भले ही वे सदस्य व्यक्तिगत रूप से उससे परिचित न भी हों। जब एक बार यह स्थिति आ जाएगी, तब उसकी समवेदनाओं का सब राष्ट्रों और जातियों के मनुष्यों तक विस्तार होने में केवल एक ही कृतिम बाधा बच जाएगी।" सभ्यता में प्रगति की एक मानी हुई पहचान समूह की सीमाओं का क्रमशः विस्तार होते जाना ही है। डार्विन को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य होता कि कोई जाति पूरी तरह विशुद्ध है और यह कि मनुष्यों की कोई एक जाति इसलिए उत्कृष्ट है कि देवता उसपर विशेष रूप से कृपालु हैं।
राष्ट्रीयता की प्रेरणा और उसके आदर्श अब तक भी लोगों के विचारों पर छाए हुए हैं, भले ही उन लोगों के राजनीतिक विश्वास कुछ भी क्यों न हों; चाहे वे नाज़ी हों या कम्युनिस्ट, फासिस्ट हों या प्रजातन्त्रवादी; और इस प्रकार मनुष्यों की ऊर्जाओं को मानव-प्रगति की मुख्य धारा से मोड़कर संकीर्ण मागों की ओर प्रवाहित किया जा रहा है। हमारी स्थिति बहुत कुछ आदिम, असभ्य जनसमूहों की-सी है, जो केवल अपने रक्त के सम्बन्धियों को ही अपने समाज में सम्मिलित करते थे, या उन लोगों को, जिनसे वे कुछ कम या अधिक घनिष्ठ रूप में परिचित हो जाते थे। विद्यालयों में हमें जो एक प्रकार की कुशिक्षा दी जाती है, उसके कारण हम राष्ट्रवादी आवेश के शिकार हो जाते हैं। हम नीचता, पाशविकता और हिंसा को भी, यदि वह राष्ट्र के निमित्त की जा रही हो, बिलकुल साधारण वस्तु समझने लगते हैं।
राष्ट्रवाद कोई स्वाभाविक सहज वृत्ति नहीं है। यह तो कृत्निम भावुकता द्वारा अधिगत की जाती है। अपने देश के प्रति प्रेम, और प्रादेशिक परम्पराओं के प्रति निष्ठा का यह अर्थ नहीं है कि पड़ोस के देश और परम्पराओं के प्रति उग्र शलुता रखी जाए। आज जो राष्ट्रीय अभिमान की अनुभूति इतनी तीव्र है, उससे केवल यह स्पष्ट होता है कि मानवस्वभाव में आत्म-वंचना की कितनी अधिक क्षमता है। आत्महित, भौतिक लोभ और प्रभुत्व की लालसा - ये राष्ट्रवाद के प्रेरक आदर्श हैं। देशभक्ति ने पवित्नता को और आवेश ने तर्कबुद्धि को समाप्त कर दिया है। जो देश भौतिक सम्पत्ति की दृष्टि से बहुत भाग्यशाली नहीं हैं, पृथ्वी-तल के अनुचित विभाजन के विरुद्ध प्रतिवाद करते हैं। ब्रिटिश लोगों के पास संसार का एक चौथाई स्थल-भाग है। उसके बाद फ्रांस का नम्बर है। हालैंड, बेल्जियम और पुर्तगाल जैसे छोटे-छोटे राष्ट्रों के पास भी बड़े- बड़े औपनिवेशक राज्य हैं। जर्मनी अपने रहने, फैलने और प्रभुत्व जमाने के लिए स्थान चाहता है। रहने के लिए स्थान की आवश्यकता असन्तुष्ट और महत्त्वाकांक्षी शक्तियों की नीतियों का प्रेरक उद्देश्य बन जाती है। यदि हम यह मान लें कि सबसे अधिक शक्तिशाली जाति को संसार का स्वामी बनने का अधिकार है, तो निष्ठुरता ही दैवीय इच्छा की साधना बन जाती है। जब एक आक्सफोर्ड के विद्यार्थी ने हिटलर से पूछा कि उसकी नीति क्या है, तो उसने एक आवेशपूर्ण शब्द में उत्तर दिया, "बट्टा लैंड" (जर्मनी)। और हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि वह अपने उद्देश्य के प्रति अविचलित रूप से सच्चा रहा है। उसने कहा है, "बनने दो हमें अमानव। यदि हम जर्मनी की रक्षा कर पाएंगे, तो समझो कि हमने संसार का सबसे महान कार्य कर लिया है। करने दो हमें गलत काम। यदि हमने जर्मनी की रक्षा कर ली, तो समझो कि हमने संसार की सबसे बड़ी गलती को मिटा दिया है। होने दो हमें अनैतिक। यदि हम अपने लोगों की रक्षा कर पाए, तो समझो कि हमने नैतिकता की पुनः स्थापना के लिए द्वार खोल दिया है।"[5] 'मीन कैम्फ'[6] में हिटलर कहता है, "विदेश नीति तो एक लक्ष्य को पूरा करने का साधन-मात्र है; और वह एकमात्र लक्ष्य है- हमारे अपने राष्ट्र का लाभ।" और फिर, "केवल यही बात है, जिसका महत्व है, बाकी सब राजनीतिक, धार्मिक और मानवतावादी बातों की इस बात की तुलना में पूर्ण उपेक्षा की जानी चाहिए।"[7] सम्पूर्ण मानव जीवन को राष्ट्रीय कार्यक्षमता के एकमात्न उद्देश्य का दास बना दिया गया है। एक युवक जर्मन विमान चालक को, जिसका विमान विमानवेधी तोपों द्वारा गिरा लिया गया था, एक फ्रांसीसी घर में ले जाया गया, जो अब एक अस्पताल बना हुआ था। विमान-चालक प्राणान्तक रूप से घायल था। डाक्टर ने उसके ऊपर झुककर कहा, "तुम सैनिक हो और मृत्यु का सामना वीरता से कर सकते हो। अब तुम्हें केवल एक घंटा और जीना है। क्या तुम अपने परिवार के लोगों को कोई पत्न लिखवाना चाहते हो?" उस लड़के ने सिर हिलाकर इनकार किया। तब पास लेटे हुए, बुरी तरह घायल बच्चों और स्त्रियों की ओर संकेत करते हुए डाक्टर ने कहा, “अब तुम अपने परमात्मा के सामने जा रहे हो। तुम्हें अवश्य ही उसके लिए खेद होगा, जो कुछ तुमने किया है, क्योंकि अपने काम का परिणाम तुम अपनी आंखों से देख रहे हो।" उस मरते हुए विमानचालक ने उत्तर दिया, "नहीं, मुझे खेद केवल इस बात का है कि मैं अपने फ्यूहर के आदेशों का और आगे पालन न कर पाऊंगा। हिटलर की जय हो ।" और वह मरकर लुढ़क गया। नाज़ीवाद जनता का आन्दोलन है। रूस की सरकार धर्मविरोधी भले हो, किन्तु वहां की जनता धर्मविरोधी नहीं है। जब रूस द्वितीय विश्वयुद्ध में सम्मिलित हुआ, तब बड़े अभिमान के साथ मास्को में हुई उन विशाल सभाओं का उल्लेख किया गया था, जिनमें लोगों ने रुसी सेनाओं की सफलता के लिए प्रार्थना की थी और हिटलर को धर्म का सबसे भयानक शत्रु बतलाया था। बाद में रूस ने अधिकृत रूप से इस युद्ध को 'पवित्र सोवियत पितृभूमि की रक्षा के लिए और जनता को मुक्ति दिलाने के लिए किया जा रहा युद्ध' कहा था। किसी एक देश की जनता ही राष्ट्रवादी नहीं हुई, अपितु यह सारा युग ही राष्ट्रवादी हो गया है। राज्य की केन्द्रीभूत व्यवस्था के कारण, तकनीकी प्रगति और विस्तृत प्रचार के आधुनिक उपकरणों के कारण प्रजा का, उनके शरीर, मन और आत्मा का सैनिक रूप में संगठन कर दिया जाता है। पूर्ण राज्य और एकतन्त्रात्मक समुदाय एक ही वस्तु हो गए हैं। व्यक्ति का निजी जीवन बिताने का अधिकार विवादग्रस्त विषय हो गया है और मानव जाति की स्वाभाविक चारुताएं, प्रेम और दया लुप्त हो रही है। हम आसुरी शक्तियों की जकड़ में फंस गए प्रतीत होते हैं, जो मानव-जाति को पतित करके निम्न कोटि के पशुओं के समान बना रही हैं। देवतुल्य मनुष्य रेवड़ का पशु बन रहा है। महान राज्य में विश्वास रखने के कारण हमें विवश होकर परिश्रम और थोथेपन का जीवन और आत्मा की दृष्टि से निष्ठुर, जंगली, तुच्छ और अपरिष्कृत जीवन बिताना पड़ रहा है। सैनिकीकरण द्वारा हमारी मानवीयता समाप्त हो जाती है। यह सीखने में हमें धीरज के साथ अटकते और वीरतापूर्वक प्रयत्न करते हुए कई शताब्दियां लगी है कि मनुष्य का अपना जीवन और दूसरों का जीवन पवित्न है। प्रत्येक व्यक्ति में अपनी अलग दमक होती है; उसका विशिष्ट सौन्दर्य होता है; उसे देखने के लिए केवल हमारी दृष्टि पर्याप्त सूक्ष्म होनी चाहिए। अच्छा बनने की इच्छा हमारी रचना का अनिवार्य अंग है। इस इच्छा को कितना ही दबाया जाए, कितना ही ढका जाए, या रूपान्तरित किया जाए परन्तु इसे नष्ट नहीं किया जा सकता। यह सर्वदा विद्यमान रहती है और जो इसे देख लेता है उसे बहुत माधुर्यपूर्ण प्रतिभावन (रिस्पॉन्स) प्राप्त होता है। फिर भी पूंजीवादी समाज, सैन्यवादी परम्परा और प्रभुत्वसम्पन्न अनेक स्वतन्त्र राज्यों में बंटे हुए संसार की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था मनुष्य की आत्मा को निर्जीव कर देती है।
संसार के सब राष्ट्रों पर, किसी पर कम किसी पर अधिक माला में, यह कट्टर देशभक्ति का, यह सत्ता प्राप्त करने की अंधी इच्छा को और उचित अनुचित के विवेक से शून्य अवसरवादिता का भूत सवार है। ऐसे विरोधी राष्ट्रों के संसार में स्वाभाविक प्रवृत्ति यही होती है कि दूसरों को नीचा दिखाया जाए। यह एक ऐसा मामला है, जिसमें हर व्यक्ति का देश बाकी सब देशों के साथ एक अन्तहीन संघर्ष में जूझ रहा है। आमतौर से यह विरोध राजनीतिक और व्यापारिक रूप में रहता है, पर अनेक बार यह खुल्लमखुल्ला और सशस्त्र रूप में सामने आ जाता है। जो शक्ति संसार में एकता बनाए रखने और स्वस्थता तथा सम्पूर्णता बनाए रखने के लिए अभिप्रेत थी, उसका प्रयोग किसी एक समूह या वर्ग, एक जाति या एक राष्ट्र को उन्नत करने के लिए किया जाता है। राज्य एक विकराल दासों से काम लेने वाला जमादार बन जाता है और हमारे आन्तरिक जीवन मृतप्राय हो जाते हैं। हमारा आन्तरिक अस्तित्व जितना अधिक निर्जीव हो जाता है, राष्ट्रवादी उद्देश्य की दृष्टि से हम उतने ही अधिक कार्यक्षम बन जाते हैं। हमारे सब आन्तरिक विरोध समाप्त हो जाते हैं और हमारे जीवन के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाग का नियमन एक ऐसे यन्त्र द्वारा हो रहा होता है, जो कार्य-पालन में अत्यन्त निष्ठुर है और विरोध के प्रति कभी द्रवित नहीं होता। राज्य अपने-आप में एक लक्ष्य बन जाता है, जिसे यह अधिकार होता है कि वह हमारी आत्माओं को यन्त्र बना दे और हमें घुड़दौड़ के घोड़ों की तरह प्रशिक्षण दे।'[8]
हमें सुपरिचित का शाश्वत के साथ घपला नहीं कर देना चाहिए। वर्तमान व्यवस्था के प्रति हमारी प्राथमिकता का विश्व के अटल नियमों के साथ घपला नहीं होना चाहिए। सत्य और सहानुभूति का मनोवेग, जो मानव-स्वभाव में रमा हुआ है, हमें प्रेरणा देता है कि हम एक मिलतापूर्ण संसार में स्वतन्त्र व्यक्तियों के रूप में जी सकें। पृथ्वी पर पड़ोसियों की भांति रहने, अपनी आत्मविनाश की शक्तियों को वश में रखने और प्रकृति के साधनों का सबके स्वास्थ्य और प्रसन्नता के लिए उपयोग करने की समस्या को हल करने के लिए शान्ति के लिए दृढ़ संकल्प की और उन अनेक दावों को त्यागने की आवश्यकता है, जो विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों और राष्ट्रीय राज्यों ने किए हुए हैं। यदि हम सच्चे देशभक्त हैं, तो हमारा लगाव स्थानीय, जातीय या राष्ट्रीय न होकर मानवीय होना चाहिए। यह सबके लिए स्वतन्त्रता, स्वाधीनता, शान्ति और सामाजिक प्रसन्नता के प्रति प्रेम के रूप में होना चाहिए। हम केवल अपने देश के लिए युद्ध नहीं करेंगे, अपितु सभ्यता के लिए युद्ध करेंगे; और इसलिए युद्ध करेंगे कि जिससे मानव-जाति के अधिकतम हित के लिए विश्व के साधनों का सहकारी संगठन द्वारा विकास किया जा सके। इसके लिए हमें मन को नये सिरे से शिक्षित करने और विश्वासों तथा कल्पनाओं में कुछ सुधार करने की आवश्यकता होगी। विश्व का तर्क और संकल्प मानव-व्यक्ति के माध्यम द्वारा कार्य करता है, क्योंकि मानव आसपास की परिस्थितियों की शक्तियों को समझ सकता है, उनके परिचालन का पहले से अनुमान कर सकता है और उन्हें नियमित कर सकता है। विकास अब कोई ऐसी अनिवार्य भवितव्यता नहीं रहा है जैसे कि आकाश में तारे अनिवार्य रूप से अपने मार्ग पर चलते हैं। विकास का साधन अब मानव-मन और संकल्प है। नई पीढ़ी को आध्यात्मिक जीवन की पवित्रता और सर्वोच्चता, मानव जाति के भ्रातृभाव और शान्ति-प्रेम की भावना के आदशों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
प्रोफेसर आर्नल्ड टॉयनबी ने अपनी पुस्तक 'दी स्टडी आफ हिस्ट्री' में उन परिस्थितियों का विवेचन किया है, जिनमें सभ्यताओं का जन्म होता है और वे बढ़ती हैं; और साथ ही उन दशाओं का भी, जिनमें उनका पतन हो जाता है। सभ्यताओं का जन्म और विकास पूर्णतया किसी जाति की उत्कृष्टता पर अथवा आसपास की परिस्थितियों की स्वतःचालित कार्रवाई पर निर्भर नहीं हो सकता। सभ्यताएं मनुष्यों द्वारा अपनी आसपास की परिस्थितियों के साथ कठिन सम्बन्धों में तालमेल बिठाने का परिणाम होती हैं और टॉयनबी ने इस प्रक्रिया को 'चुनौती और प्रतिभावन' के ढंग की प्रक्रिया माना है। बदलती हुई परिस्थितियां समाजों के लिए चुनौती के रूप में सामने आती हैं और उनका सामना करने के लिए जो प्रयत्न किया जाता है और जो कष्ट उठाए जाते हैं, उनसे भी सभ्यताओं का जन्म और विकास होता है। जीवन प्राणी द्वारा अपने-आपको परिस्थितियों के अनुकूल ढालने के अनवरत प्रयत्न का नाम है। जब आसपास की परिस्थितियां बदलती हैं और हम अपने-आपको सफलतापूर्वक उनके अनुकूल ढाल लेते हैं, तब हम प्रगति कर रहे होते है। परन्तु जब परिवर्तन इतनी शीघ्रता से और इतने एकाएक हो रहे हों कि उनके अनुकूल अपने-आपको ढाल पाना सम्भव न हो, तब विनाश हो जाता है। यह विश्वास करने के लिए कोई कारण नहीं है कि मनुष्य ने बुद्धि का प्रयोग करना सीख लेने के कारण अथवा पृथ्वी पर आधिपत्य जमा लेने के कारण इस आवश्यकता से मुक्ति पा ली है, जो सब प्राणियों के ऊपर अनिवार्य रूप से लादी गई है। प्रारम्भिक सभ्यताओं के मामलों में जहां चुनौतियां भौतिक और बाह्य ढंग की होती थीं, वहां आजकल की सभ्यताओं में समस्याएं मुख्यतया आन्तरिक और आध्यात्मिक हैं। अब उन्नति को भौतिक या तकनीकी प्रगति की दृष्टि से नहीं नापा जा सकता, अपितु मन और आत्मा के जगत् में सृजनात्मक परिवर्तनों की दृष्टि से आंका जाना चाहिए। आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति आदर, सत्य और सौंदर्य के प्रति प्रेम, धर्मपरायणता, न्याय और दया, पीड़ितों के साथ सहानुभूति और मनुष्य-मात्र के भ्रातृत्व में विश्वास, ये वे गुण हैं, जो आधुनिक सभ्यता को बचा सकते हैं। जो लोग धर्म, जाति, राष्ट्र या राजपद्धति के नाम पर अपने-आपको शेष संसार से पृथक् कर लेते हैं, वे मानव- विकास में सहायता नहीं देते, अपितु उसमें बाधा डाल रहे होते हैं। इतिहास ऐसी अनेक सभ्यताओं के ध्वंसावशेषों से भरा पड़ा है, जो अपने-आपको समय के अनुकूल ढालने में सफल नहीं हुईं, जो आवश्यक बुद्धिमत्ता और सूझ-बूझ वाले मन तैयार करने में असफल रहीं। विश्व संकट के इस समय में विवेकशील लोगों को न केवल एक ऐतिहासिक युग की समाप्ति दिखाई देती है, अपितु एक आध्यात्मिक युग की भी, जो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए और प्रत्येक आत्मसचेत व्यक्ति के लिए एक जैसा है। मनुष्य, जैसा कि वह इस समय है, विकास की चरम सीमा नहीं माना जा सकता। पृथ्वी पर जीवन का इतिहास डेढ़ अरब वर्षों से भी अधिक पुराना है। प्रत्येक भूगर्भीय काल में ऐसे प्राणी उत्पन्न हुए, जो अपने काल में सृष्टि के सर्वोत्तम प्राणी समझे जाते थे। फिर भी परवर्ती काल में उनसे भी और अच्छे प्राणी उत्पन्न हो गए।'[9] विकास का अगला सोपान मनुष्य के शरीर में नहीं, अपितु उसकी आत्मा में होगा; उसके मन और चित्त में अपेक्षाकृत अधिक सहृदयता और चेतना की वृद्धि के रूप में, चरित्न के एक नये संगठन के विकास के रूप में, जो कि नये युग के उपयुक्त हों। जब मनुष्य में दार्शनिक चेतना, सहृदयता की तीव्रता और सम्पूर्णता के अर्थ का विशद ज्ञान हो जाएगा, तब अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त सामाजिक जीवन का जन्म होगा, जो न केवल व्यक्तियों को, अपितु जातियों और राष्ट्रों को भी प्रभावित करेगा। हमें इस नई व्यवस्था के लिए पहले अपने मन में और फिर बाह्य संसार में युद्ध करना है।
यह युद्ध सभ्यता और बर्बरता के बीच संघर्ष नहीं है, क्योंकि प्रत्येक योद्धा जिसे सभ्यता समझता है, उसकी रक्षा के लिए लड़ रहा है; यह मृत अतीत को पुनरुज्जीवित करने का या जीर्ण- शीर्ण पुरानी सड़ी-गली सभ्यता को बचाने का प्रयत्न नहीं है; यह तो विघटन की वह अन्तिम क्रिया है, जिसके बाद एक लम्बी प्रसव पीड़ा के बाद विश्व-समाज का जन्म होगा। क्योंकि हम परिवर्तन करने में बहुत मन्द हैं, इसलिए एक नई धारणा जन्म लेने के लिए संघर्ष कर रही है और प्रचंड विस्फोटों के द्वारा बाहर आने का मार्ग बना रही है। यदि पुरातन संसार को हिंसा, विपत्ति, कष्ट, आतंक और अव्यवस्था में मरना पड़े और यदि यह अपने गिरने के साथ-साथ बहुत-सी अच्छी, सुन्दर और सत्य वस्तुओं को भी गिरा दे, रक्तपात हो, प्राणों की हानि हो और अनेकों की आत्माएं विकृत हो जाएं तो इसका कारण केवल यह होगा कि शांतिपूर्वक उस नूतन संसार के साथ अपना समेजन करने (तालमेल बिठाने) में असमर्थ हैं जो सारतः सदा अविच्छेद्य था और अब तध्यतः अविच्छेद्य बनने के प्रयत्न कर रहा है। यदि हम अपनी स्वतन्त्र इच्छा से आगे कदम नहीं बढ़ा सकते, यदि हम अपनी पीठ पर लदी निर्जीव वस्तुओं को उतारकर नहीं फेंक सकते, तो एक घोर विपत्ति हमारी आंखें खोलेगी और उन्हें उतार फेंकने में हमारी सहायता करेगी और उन कठोर रुढ़ियों को चूर-चूर कर देगी, जो हमारे उदार मनोवेगों को पंगु किए हुए हैं और बुद्धिमत्ता के मार्ग में रुकावट बनी हैं।
बुराई का अविर्भाव कोई आकस्मिक घटना नहीं है। हिंसा, अत्याचार और विद्वेष के तथ्य किसी अव्यवस्था या मन की मौज के सूचक नहीं हैं, अपितु एक नैतिक व्यवस्था के चिह्न हैं। जब प्रकृति के आधारभूत नियम को, जो सुसंगति, एकता, मनुष्य और भ्रातृभाव के प्रति आदर है, पैरों तले रौंद दिया जाता है, तब अस्तव्यस्तता, विद्वेष और युद्ध के अतिरिक्त किसी वस्तु की आशा नहीं की जा सकती। यह इतिहास का तर्क है; और सम्भव है कि जो वस्तुएं पुरानी पड़ गई हैं, जिनकी उपयोगिता कभी की समाप्त हो गई है और जो प्रगति के मार्ग में बाधा बनी हुई हैं, उनमें से अनेक को बहा ले जाने के लिए इस प्रकार की अव्यवस्थाएं और गड़बड़े आवश्यक हों। इस समय भी, जबकि संसार भौतिक रूप से घृणा से भरा दिखाई पड़ता है; जब बल, भय, असत्य और निष्ठठुरता ही मानव-जीवन की वास्तविकताएं प्रतीत होती हैं, सत्य और प्रेम के महान आदर्श भी अन्दर ही अन्दर कार्य कर रहे हैं और वे बल और असत्य के प्रभुत्व की जड़ों को खोखला कर रहे हैं। यदि हममें विश्व-शान्ति और विश्व की एकता के लिए कार्य करने योग्य सूझबूझ और साहस नहीं है, तो वे शान्ति और एकता दिव्य न्याय के आसुरी साधनों द्वारा उय उपायों से स्थापित की जाएंगी। जिस तूफान और कष्ट में से होकर हम गुज़र रहे हैं, उनके होते हुए भी हम भविष्य की ओर विश्वास के साथ देख सकते हैं और अपने मन में यह नैतिक सुनिश्चय रख सकते हैं कि इस सारी गड़बड़ और अव्यवस्था में भी एक गहरा अर्थ है। इन विप्लवों और उथल-पुथलों में से भी आध्यात्मिक मूल्यों का परिपूर्णतर ज्ञान प्रकट हो सकता है, जिसके द्वारा मानवता और ऊंचे स्तर पर पहुंच सके। युद्ध पूर्णतया पागलों का, ऐसे पीड़ित जन समुदाय का, जिसका हिताहित-ज्ञान नष्ट हो गया है और जो आवेश से पागल है, कोलाहल-मात्र नहीं है, अपितु यह मानवीय भावना की रक्षा के लिए ऐसे व्यक्तियों का एक युद्ध है, जो विश्वासशील हैं, सहिष्णु हैं, और जो जीवन के नवीनीकरण और शांति के कार्यों के लिए अधीरता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। विनाशकर्ता मानव ही निर्माता भी है। यह कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र भी बन सकता है। हो सकता है, इस लक्ष्य तक पहुंचने में देर लगे। इस तक पहुंचने में अनेक वर्ष या दशाब्दियां या शताब्दियां तक भी लग सकती हैं। हो सकता है कि यह प्रसव, एक नये संसार का जन्म, काफी कठिन हो; परन्तु यह बात सोचने योग्य भी नहीं है कि मानवीय मूल्यों का स्थायी रूप से विनाश हो सकता है। हममें से प्रत्येक में एक छिपा हुआ ज्ञान है, जीवन की एकता की एक आध्यात्मिक अनुभूति है, जिसके कारण मानव-मन में यह विश्वास बना रहता है कि एक अपेक्षाकृत अच्छी व्यवस्था आकर रहेगी। ऐसे भी समय आए हैं, जब यह विश्वास दुर्बल पड़ गया था और आशा धुंधली हो गई थी, परन्तु इन अंधकार के क्षणी के बाद अरुणोदय के क्षण आए, जिन्होंने मानव जीवन को इतना अधिक समृद्ध किया कि शब्दों द्वारा बता पाना कठिन है। हमारे उच्च स्वर में किए गए सारे प्रतिवाद और हमारी क्षणिक विजयें काल की गत्ति पर, और मानवीय आशा और संकल्प की आगे की ओर गति पर विजय नहीं पा सकतीं। सम्भव है कि नैतिक विकास के प्रवाह द्वारा मनुष्य की असहिष्णुता को, उसकी सत्तालोलुपता को, अपने शतु को हराने से प्राप्त होने वाले सहानुभूतिहीन आनन्द को दूर करने में शताब्दियों लग जाएं और तब कहीं जाकर वह अपनी उन सुविधाओं और विशेषाधिकारों का आवश्यक बलिदान करने में समर्थ हो जाएं, केवल जिसके द्वारा समाज को अन्याय और सामाजिक विनाश से बचाया जा सकता है। परन्तु अन्त में संसार की प्रगति हमें छिन्न-भिन्न करके रहेगी, क्योंकि यह संसार किन्हीं अराजक मनमौजी हाथों में नहीं है। हमारी सभ्यता का अन्त इतिहास का अन्त नहीं होगा; हो सकता है यह किसी नये युग का प्रारम्भ ही हो।
वर्तमान विपत्ति के मुख्य कारण कौन-कौन से हैं? जब हम युद्ध के कारणों का जिक्र करते हैं, तो हम दूरस्थ, प्रमुख और गौण कारणों के सम्बन्ध में विचार कर सकते हैं। हमें युद्ध का कारण हिटलर का वैयक्तिक मनोविज्ञान, उसकी असत् प्रतिभा प्रतीत हो सकता है; या वर्साई सन्धिपत्र में युद्ध के दोष-सम्बन्धी अनुच्छेदों को लेकर जर्मनी का क्रोध, या जर्मनी के भूतपूर्व उपनिवेशों को वापस लौटाने से इन्कार करने पर जर्मनी का क्रोध, या एक महान जाति का आहत अभिमान और स्वच्छन्दतावाद युद्ध का कारण प्रतीत हो सकता है। यह भी युद्ध का कारण समझा जा सकता है कि लीग आफ नेशन्स का निःशस्त्रीकरण-सम्मेलन बीच में ही टूट गया; या यह कि औपनिवेशिक विस्तार के भीड़भाड़-भरे क्षेत्र में राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षाओं में संघर्ष चल रहा है, परन्तु इनमें से कोई भी एक कारण इतने बड़े पैमाने की विपत्ति के लिए ठीक-ठीक उत्तरदायी नहीं समझा जा सकता। इनमें से प्रत्येक कार्य है, परिणाम है, कारण नहीं। आशा से भरे हुए संसार को जिस वस्तु ने नष्ट कर दिया है वह है एक मिथ्या विचारधारा और उसकी भ्रामक कल्पनाओं, विश्वासों और मूल्यों का संसार पर प्रभुत्व ।'[10]
सभ्यता एक जीवन-पद्धति है, मानवीय आत्मा की एक हलचल। इसका तत्त्व किसी जाति की प्राणिशास्त्रीय एकता में या राजनीतिक और आर्थिक प्रबन्धों में नहीं है, अपितु उन मान्यताओं (मूल्यों) में है, जो उन प्रबन्धों को रचती हैं और बनाए रखती हैं। वस्तुतः राजनीति और आर्थिक रचना वह ढांचा है, जो लोगों द्वारा जीवन की उन कल्पनाओं और मूल्यों के प्रति आवेशपूर्ण भक्ति और निष्ठा प्रकट करने के लिए खड़ा किया गया है, जिन्हें वे लोग स्वीकार करते हैं। प्रत्येक सभ्यता किसी न किसी धर्म की अभिव्यक्ति होती है, क्योंकि धर्म परम मूल्यों में विश्वास और उन मूल्यों को उपलब्ध करने के लिए जीवन की एक पद्धति का प्रतीक होता है। यदि हमें यह विश्वास न हो कि वे मूल्य, जो किसी सभ्यता में निहित हैं, परम हैं, तो उस सभ्यता के नियम निर्जीव अक्षर बन जाएंगे, और उसकी संस्थाएं नष्ट हो जाएंगी। धार्मिक विश्वास हममें किसी जीवन-पद्धति पर डटे रहने के लिए आवेश भरता है। और यदि उस विश्वास का हास होने लगता है, तो आज्ञापालन घटकर आदत आवेश भरता है। और धीमे-धीमे वह आदत भी अपने- आप समाप्त हो जाती है। उद्यदत-माल रह जाता है। री कम्युनिस्ट विश्वास भी लौकिक धर्म हैं। इनमें विचार या विश्वास या अाण के लिया ताजसे मतभेद होना अपराध समस्या जाता है। राज्य चर्च के समान बनभास में अधिकृत प्रणाली से आऔर इन्कीजीशन (धर्म के विरोधियों को दंड देनेवाले न्यायालय) हैं। जब हम इन सम्प्रदाओं में दीक्षित होते हैं, तो हम उपासना के मन्त्र पढ़ते हैं। हम अविश्वासियों को भांपते हैं और उन्हें पकड़कर फांसी के तख्ते के हवाले कर देते हैं। हम धार्मिक ऊर्जाओं और मनोभावों का उपयोग करते हैं। लौकिक विश्वासों में एक प्रेरक शक्ति, एक मनोवैज्ञानिक गत्वरता (गतिशीलता) दीख पड़ती है, जो उन लोगों की गतिविधियों में दिखाई नहीं पड़ती, जो उनका विरोध करने का प्रयत्न करते हैं।
किसी भी सभ्यता का स्वरूप इस बात पर आधारित होता है कि मनुष्य की प्रकृति और उसकी भवितव्यता के विषय में उसकी धारणाएं क्या हैं। क्या मनुष्य को प्राणिशास्त्रीय दृष्टि से सबसे अधिक चालाक पशु समझा जाना चाहिए? क्या वह एक आर्थिक प्राणी है, जो संभरण और मांग के नियमों और वर्ग-संघषों द्वारा नियन्त्रित रहता है? क्या वह राजनीतिक प्राणी है, जिसमें अपरिष्कृत अत्यधिक राजनीतिकता सब प्रकार के ज्ञान-धर्म और बुद्धिमत्ता को परे हटाकर मानव-मन के केन्द्र पर छाई हुई है? या उसमें कोई ऐसा आध्यात्मिक तत्व भी है, जो सांसारिक और उपयोगी वस्तुओं की अपेक्षा शाश्वत और सत्य को अधिक ऊंचा स्थान प्रदान करता है? क्या मानव प्राणियों को प्राणिशास्त्र, राजनीति या अर्थशास्त्र की दृष्टि से समझना होगा, या हमें उनके पारिवारिक और सामाजिक जीवन, परम्परा और स्थान के प्रति प्रेम, धार्मिक आशाओं और सान्त्वनाओं के प्रति प्रेम को भी ध्यान में रखना होगा, जिनका इतिहास प्राचीन से प्राचीन सभ्यताओं की अपेक्षा भी अधिक पुराना है? युद्ध का गम्भीरतर अर्थ यह है कि यह हमें मनुष्य की प्रकृति और उसकी सच्ची भलाई की उस अपूर्ण धारणा को हृदयंगम करने में सहायता दे, जिसमें हम सब भी अपनी विचार-प्रणाली और जीवन-प्रणाली के रूप में सम्मिलित हैं। यदि हम एक- दूसरे के प्रति दयालु नहीं हैं और यदि पृथ्वी पर शान्ति स्थापित करने के हमारे सब प्रयत्न असफल रहे हैं, तो उसका कारण यह है कि मनुष्यों के मनों और हृदयों में दुष्टता, स्वार्थ और द्वेष से भरी अनेक रुकावटे हैं, जिनकी हमारी जीवन-प्रणाली रोकथाम नहीं करती। यदि हम आज जीवन द्वारा तिरस्कृत हैं, तो इसका कारण कोई दुष्ट भाग्य नहीं है। जीवन के भौतिक उपकरणों को पूर्ण कर लेने में हमारी सफलता के कारण हमारे मन में आत्मविश्वास और अभिमान की एक ऐसी मनोदशा उत्पन्न हो गई है, जिसके कारण हमने प्रकृति का ज्ञान-संचय और मानवीकरण करने के बजाय उसका शोषण करना प्रारम्भ कर दिया है। हमारे सामाजिक जीवन ने हमें साधन तो दिए है परन्तु लक्ष्य प्रदान नहीं किए। हमारी पीढ़ी के लोगों पर एक भयानक अन्धता छा गई है, जो शांति के दिनों में कठोर आर्थिक नियमों के द्वारा और युद्ध के दिनों में आक्रमण और क्रूरता द्वारा मानवीय कष्टों से जुआ खेलते नहीं हिचकते। मानव से आत्मतत्त्व का बहिष्कार भौतिक तत्त्व की सर्वोच्चता का प्रमुख कारण है, जो (भौतिक सर्वोच्चता) आज हमारे लिए इतनी बोझल और कष्टदायक बन गई। भौतिक द्वारा मानवीय की पराजय हमारी सभ्यता की केन्द्रीय दुर्बलता है।
'भगवद्गीता' में लिखा है कि जब मनुष्य अपने-आपको धरती पर देवता समझने लगते हैं और जब वे अपने मूल से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लेते हैं और वे इस प्रकार अज्ञान द्वारा पथभ्रष्ट हो जाते हैं, तब उनमें एक शैतानी विकृति या अहंकार उठ खड़ा होता है, जो ज्ञान और शक्ति दोनों की दृष्टि से अपने-आपको सर्वोच्च घोषित करता है।'[11] मनुष्य स्वायत्त हो गया है और उसने आज्ञा-पालन और विनय को तिलांजलि दे दी है। वह अपना स्वामी स्वयं बनना चाहता है और 'देवताओं के समान' बनना चाहता है।[12] जीवन पर अधिकार करने और उसका नियंक्षण करने और ईश्वरहीन संस्कृति का निर्माण करने के प्रयास में वह परमात्मा के विरुद्ध विद्रोह करता है। आत्मनिर्भरता को वह चरमसीमा तक ले जा रहा है। युद्ध उसके इस धर्म-त्याग के, थारुता द्वारा अपरिष्कृत, प्रकृति के स्तुतिगान के परिणाम हैं। अधिनायकों ने अपने-आपको परमात्मा के स्थान पर ला रखा है। वे ईश्वर-विश्वास को समाप्त कर देना चाहते हैं, क्योंकि वे अपना कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं देखना चाहते। हिटलर एक अद्भुत रचना था। वह हमारी सभ्यता की भविष्यसूचक आत्मा समझा जा सकता है। जब हम मान्यताओं (मूल्यों) के सुनिश्चित अधःपतन को देखते हैं, तो हमें 'किंग लियर' नाटक में ड्यूक आफ ऐलबेनी के साथ यह कह उठने का मन होता है, "यह समय का अभिशाप है कि पागल अन्धों का नेतृत्व कर रहे हैं।" क्योंकि हमारे नेताओं को सुदूर ऊंचाइयों से आनेवाला प्रकाश प्राप्त नहीं होता, अपितु वे केवल बुद्धि के पार्थिव प्रकाश को ही प्रतिफलित करते हैं, इसलिए उनका भी भाग्य ल्युसीफर (शैतान) का सा ही होगा और उन्हें बुद्धि के अभिमान के कारण विनाश के गर्त में गिरना होगा।
किन्तु मनुष्य, अभिमानी मनुष्य
अपने तुच्छ और क्षुद्र अधिकार से भरा,
जिसका उसे सबसे अधिक निश्चय है,
उसी के विषय में सबसे अधिक अज्ञानी;
उसका भंगुर सार एक क्रुद्ध वानर की भांति
उच्च स्वर्ग के सम्मुख ऐसी विचिल करतूतें करता है
कि देखकर देवदूतों को रोना आ जाए ![13]
वह समझता है कि वह सब वस्तुओं का शिरोमणि है और उसे भौतिक और यान्त्रिक तथा मूर्त और दृश्य में अन्धविश्वास है। उद्योग और वाणिज्य के उद्देश्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति होने के बजाय सम्पत्ति और लाभ हो गए हैं। सत्य, शिव और सुन्दरता का संसार परमाणुओं के आकस्मिक संयोग से बना हुआ घोषित किया जाता है और बतलाया जाता है कि इसका अन्त भी हाइड्रोजन गैस के वैसे ही बादलों के रूप में होगा, जैसे बादलों से यह बना था। बुद्धिवाद, जो प्राचीन धर्म-सिद्धान्तों को अक्षरशः सत्य स्वीकार न करने की सीमा तक बिलकुल उचित था, इस विश्वव्यापी कल्पना में आकर समाप्त हुआ है कि परमात्मा की वास्तविकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मनुष्य अपनी अनन्त सत्तालोलुपता और पाशविक संकल्प के साथ दिय विशेषाधिकारों का छल से उपभोग कर रहा है और वह सार्वजनिक मताधिकार, बड़े पैमाने पर उत्पादन और रोटरी क्लब की सेवाओं पर आधारित एक नये संसार की रचना करने का प्रयत्न कर रहा है और इसके लिए वह बीच-बीच में अधिकृत रूप से उस परमात्मा की भी स्तुति करता जाता है, जिसके विषय में उसे पूरी तरह निश्चय नहीं है। निर्मूल धर्मनिरपेक्षता या मनुष्य और राज्य की पूजा, जिसमें धार्मिक भावना का हल्का-सा पुट दे दिया गया है, आधुनिक युग का धर्म है। जिन सिद्धान्तों में इस बात पर आग्रह किया गया है कि मनुष्य को केवल रोटी से ही जीवित रहना चाहिए, वे आध्यात्मिक जगत् के साथ मनुष्य के सम्बन्धों का विच्छेद कर रहे हैं तथा वर्ग और जाति, राज्य और राष्ट्र के लौकिक समुदायों के साथ उसका पूर्णतया एकीकरण कर रहे हैं। उसे अपने चिरपीषित स्वप्नों और आधिविद्यक चिन्तनों से दूर हटाया जा रहा है और पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष बनाया जा रहा है। जो लोग भौतिकवाद का आधिविद्यक विश्वास के रूप में खंडन भी करते हैं और धार्मिक होने का दावा करते हैं, वे भी जीवन के प्रति भौतिकवादी रुख को अपनाते हैं। वे वास्तविक मान्यताएं (मूल्य), जिन्हें लेकर हम जी रहे हैं, चाहे हम ऊपर से कुछ भी क्यों न कहें, वे ही हैं, जो हमारे शत्रुओं की हैं; और वे हैं, सत्ता की तीव्र लालसा, क्रूरता का आनन्द और प्रभुत्व का अभिमान। सारा संसार उस वेदना के चीत्कार से भरा हुआ है, जो युगों को व्याप्त करके न्याय के लिए पुकार रही है।
यदि अनेक अतृप्त कामनाएं न हों, जिनमें से सबकी सब भौतिक स्तर की नहीं हैं, तो धर्म अफीममिश्रित निःसंज्ञ करनेवाली ओषधि का काम नहीं कर सकता। अच्छा भोजन, नरम गद्दे और बढ़िया कपड़े ही हमें सन्तुष्ट करने के लिए काफी नहीं हैं। दुःख और असन्तोष केवल गरीबी के कारण ही पैदा नहीं होते। मनुष्य एक विचित्र प्राणी है जो दूसरे पशुओं से मूलतः भिन्न है। उसकी दृष्टि का क्षितिज बहुत दूर तक है; उसमें अजेय आशाएं, सृजनशील ऊर्जाएं और आध्यात्मिक शक्तियां हैं। यदि इन सबका विकास न होने पाए और वे अतृप्त रहें, तो सम्पत्ति से प्राप्त हो सकने वाली सब सुख-सुविधाओं के होते हुए भी उसे यह अनुभव होता रहेगा कि जीवन जीने योग्य नहीं है। महान मानववादी लेखकों ने, शा और वैल्स, आर्नल्ड बैनट और गाल्सवर्दी ने, जो अरुणोदय के अग्रदूत समझे जाते हैं, आधुनिक जीवन की दुर्बलताओं, असंगतियों और निर्बलताओं का अनावरण किया है। परन्तु उन्होंने और अधिक गहरी धाराओं की उपेक्षा कर दी है और कहीं-कहीं उनका गलत निरूपण कर दिया है। चाहे जो भी हो, उन गम्भीरतर धाराओं के स्थान पर उन्होंने कोई नई वस्तु नहीं दी। परम्परा, नैतिकता और धर्म के हटा देने से रिक्त हुए स्थान में कुछ लोगों ने जाति और सत्ता की अस्पष्ट भावनाओं को रखने का प्रयास किया है। आधुनिक मनुष्य का मन रूसो के 'सोशल कंट्रैक्ट' (सामाजिक युगबन्ध), मार्क्स के 'कैपिटल' (पूंजी), डार्विन के 'आन दी ओरिजिन आफ स्पीसीज़' (जातियों के मूल के विषय में) और स्पैंगलर के 'दि डिक्लाइन आफ दी वेस्ट' (पश्चिम का पतन) द्वारा ढला है। हमारे जीवन की बाहरी अव्यवस्था और गढ़बड़ी हमारे हृदय और मन की अस्तव्यस्तता को प्रतिफलित करती है। प्लेटो कहता है, "संविधान तो उन मान्यताओं (मूल्यों) के बाह्य जगत् में प्रतिफलनमान होते हैं, जो मनुष्य के मन में विद्यमान होती हैं।"[14] जिन आदर्शी को हम पसन्द करते हैं और जिन मान्यताओं को हम अपनाते हैं, उन्हें, हम सामाजिक अभिव्यक्ति प्रदान कर सकें, इसके लिए आवश्यक है कि पहले उनमें परिवर्तन किया जाए। हम भविष्य को सुरक्षित करने में केवल उसी सीमा तक सहायता दे सकते हैं, जिस सीमा तक हम अपने-आपको बदलते हैं। हमारे युग में जो वस्तु लुप्त हो गई है, वह आत्मा है; शरीर में कोई विकार नहीं है। हम आत्मा के रोग से पीड़ित हैं। हमें शाश्वत में अपने मूल को खोजना होगा और अनुभवातीत सत्य में फिर विश्वास जमाना होगा, जिसके द्वारा जीवन व्यवस्थित हो जाएगा, विसंवादी तत्त्व अनुशासन में आ जाएंगे और जीवन में एकता आ जाएगी और उसका कुछ लक्ष्य बन जाएगा। यदि ऐसा न हुआ तो, जब बाढ़ आएगी और जब तूफान उठेगा और उसकी चोट हमारे मकान पर पड़ेगी, तो वह ढह जाएगा।[15]
परन्तु क्या भौतिकवादी का हमसे यह कहना उचित नहीं है कि हम अनुभवगम्य तथ्यों पर और इस संसार की सुनिर्दिष्ट वास्तविकताओं पर अपने पक्ष को आधारित करें? एकमात्न वस्तु, जिसके सम्बन्ध में हम किसी सीमा तक सुनिश्चित हो सकते हैं, यह संसार है। धर्म का दूसरा संसार अर्थात् परलोक सम्भवतः मन की एक कल्पना-मान है; और यदि परलोक का अस्तित्व हो भी, तो 'भी उसके विषय में कुछ भी जाना नहीं जा सकता। सब देशों में आदर्शवादी विचारकों के लिए मार्क्सवाद का आकर्षण बहुत प्रबल रहा है। हममें से अनेक लोग, जो भारत में विद्यमान दशाओं से असन्तुष्ट हैं, सोवियत धारणा की ओर आकृष्ट होते हैं, जिसमें वर्गहीन समाज की प्रशंसा की गई है, जिसमें किसानों की जनसंख्या के लिए उद्योगवाद की विचारधारा का प्रतिपादन किया गया है और जिसमें कामगर के महत्त्व को बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करने के लिए जनसमूह-मनोविज्ञान की अद्भुत तकनीक का उपयोग किया गया है। सोवियत रूस ने, जो पृथ्वी पर स्वर्ग का निकटतम रूप है, अपने लक्ष्य के प्रति अर्थात् संसार के प्रत्येक भाग में एक नये ढंग के राज्य की स्थापना के प्रति सचेत रहते हुए विद्यमान व्यवस्था के प्रति अपनी अवज्ञा लक्ष्य की इतनी आवेशपूर्ण दृढ़ता और उपायों की विभिन्नता के साथ प्रस्तुत की कि लोगों को यह भ्रम हो गया कि उसके अस्तित्व का उद्देश्य केवल विध्वंसकारी प्रचार ही है। इस चुनौती के कारण उतनी ही उच्च और तुमुल प्रतिक्रिया भी हुई, जिसके फलस्वरूप तथ्यों को जान पाना ही कठिन हो गया। इससे पहले कोई भी सामाजिक वाद-विवाद इससे अधिक शोरगुल और कोलाहलपूर्ण सिद्धान्तवाद के साथ नहीं किया गया था। फिर भी उसके कठोर से कठोर आलोचक भी इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि सोवियत रूस एक महान परीक्षण है, जो अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रान्तियों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह पृथ्वी के स्थल भाग के छठे हिस्से पर बसी हुई लगभग 20 करोड़ जनता के सम्पूर्ण समाज की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रचना को कुछ सामाजिक विचारकों द्वारा प्रतिपादित समाज के सिद्धान्तों के अनुसार नये रूप में ढालने का प्रयत्न है। दो दशाब्दियों में वहां से ज़मींदार और पूंजीपति लुप्त हो गए हैं और व्यक्तिगत नवारम्भ (उद्यम) केवल किसानों और कारीगरों के छोटे पैमाने के कार्यों तक ही सीमित रह गया है।
संसार के लिए साम्यवाद की पुकार में धर्म का आवेश है। साम्यवाद विद्यमान बुराइयों को चुनौती देता है, कार्रवाई के लिए एक स्पष्ट और सुनिश्चित कार्यक्रम प्रस्तुत करता है और आर्थिक तथा सामाजिक दशाओं का एक वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करने का दावा करता है। गरीबों और पीड़ितों के लिए इसकी चिन्ता, सम्पत्ति और उन्नति के अवसरों के और अधिक उचित वितरण के लिए इसकी मांग, और जातीय समानता पर इसके आग्रह के द्वारा यह हमें एक ऐसा सामाजिक सन्देश देता है, जिससे सब आदर्शवादी सहमत हैं। परन्तु इसके सामाजिक कार्यक्रम से सहानुभूति होने का यह अर्थ नहीं है कि हम जीवन के मार्क्सवादी दर्शन को, चरम वास्तविकता की उसकी नास्तिक धारणा को, और मनुष्य के सम्बन्ध में उसके प्रकृतिवादी दृष्टिकोण को, और व्यक्तित्व की पवित्रता के प्रति उसकी अवज्ञा को भी स्वीकार करते हैं। सामाजिक क्रांति के प्रभावी उपकरण के रूप में मार्क्सवाद से सहानुभूति रखना एक बात है और उसकी आधिविद्यक पृष्ठभूमि को स्वीकार करना दूसरी बात।
मार्क्सवाद उसके अनालोचक (अन्ध) समर्थकों और कट्टर विरोधियों, दोनों के लिए ही एक धर्म-सा बन गया है। मार्क्सवाद का महत्त्वपूर्ण दावा यह है कि यह वैज्ञानिक है। यह इलहाम के रूप में प्रकट हुआ सिद्धान्त नहीं है, अपितु तथ्यों का वस्तुरूपात्मक अध्ययन है। कई शताब्दी पहले विज्ञान विद्वत्तावाद से अलग हो गया था। विद्वत्तावादी लोग अपनी बात को सत्य सिद्ध करने के लिए स्फुरणाप्राप्त और इसीलिए भ्रमातीत समझे जानेवाले लोगों की पुस्तकों से उद्धरण दिया करते थे। जब मार्क्स ने कहा कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूं, तो उसका अर्थ यह था कि मैं किसी भी सिद्धान्त को अन्तिम और पूर्ण और सुदृढ़ रूप से स्वीकार करने की शपथ नहीं ले चुका हूं। "मार्क्सवाद केवल अस्थायी सत्य को प्रस्तुत करता है।" रोज़ा लक्सम्बर्ग ने गहरी अन्तर्दृष्टि के साथ लिखा, "यह आमूलचूल तर्कप्रधान है और इसके विनाश के बीज इसीमें विद्यमान है।" किन्तु दुर्भाग्य से मार्क्सवादियों ने सब सिद्धान्तवादी प्रणालियों की भांति उसको व माननेवालों को द्रोही ठहराने की तकनीक को अपनाया। फासिस्ट की दृष्टि में कम्युनिस्ट नीच, काफिर और कम्युनिस्ट की दृष्टि में पूंजीपति शैतान का भाई है। हम सब स्वयं देवदूत हैं और हमारे विरोधी शैतान हैं। यदि आप सच्चे धर्म को नहीं मानते, तो आपकी निष्ठा और आज्ञा- पालन, आपका साहस और ईमानदारी, आपकी भक्ति और उत्च्य हृदयता, सब पाप हैं। हम हो पार हो गए हैं, और आप बीच धार में खूब रहे हैं। संदेह करना या प्रश्न करना अपराध है, जिसका दंड उत्पीड़न शिविरों की यन्त्रणाओं द्वारा दिया जाना चाहिए।
हमें मार्क्सवाद को धर्म मानने की आवश्यकता नहीं है, अपितु हमें इसे मन की शिष्टता और आत्मा की विनय के साथ देखना चाहिए, जो कि विज्ञान के विद्यार्थी की विशेषताएं हैं। मार्क्सवाद का सामाजिक कार्यक्रम मानव जाति की वास्तविक आवश्यकताओं और आधुनिक तकनीकी साधनों द्वारा उत्पादन की आवश्यकताओं के अधिक उपयुक्त है। समाजवाद की मांग एक नैतिक मोग है, परन्तु इसे वैज्ञानिक आवश्यकता का रूप देने के लिए यह युक्ति दी जाती है कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की धारणा से ऐतिहासिक प्रक्रिया की अपेक्षाकृत अधिक सन्तोषजनक व्याख्या हो जाती है। मार्क्सवादी विचारधारा के मुख्य तत्त्व मूल्य का सिद्धान्त, जिसमें उन पद्धतियों का वर्णन किया गया है, जिनके द्वारा पूंजीपति कामगरों का शोषण करते है, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की धारणा, इतिहास की आर्थिक दृष्टि से व्याख्या, प्रगति का वर्ग- सिद्धान्त और कामगरों की सत्ता प्राप्त करने के लिए उपाय के रूप में क्रान्ति की वकालत हैं।
श्रमिक-वर्ग की दृष्टि में पूंजीपति का लाभ अतिरिक्त मूल्य (सरप्लस वैल्यू) होता है, जिसे कामगर उत्पन्न करते हैं और जिसे मध्यमवर्ग (बुर्जुआ) चुरा लेता है। परन्तु पूंजीपतियों का विश्वास है कि लाभ तो उद्यम और संगठन की योग्यता का वैध पुरस्कार-मान है। मार्क्सवाद के मूल्य के सिद्धान्त के विषय में, जो आलोचना की कसौटी पर खरा नहीं उतरा है, कुछ कहने का मैं अपने-आपको अधिकारी नहीं मानता। परन्तु जिन लोगों को मार्क्सवादी दर्शन से बहुत अधिक सहानुभूति है, उनका भी यह विचार है कि "यह तथ्यों से विसंगत है और आत्मसंगत नहीं है।"[16]
मार्क्स ने हेगल की द्वन्द्वात्मक पद्धति को अपनाया है और उसने ब्रह्माण्ड के विकास को इस रूप में देखा है कि यह भौतिक तत्त्व का द्वन्द्वात्मक शैली पर प्रस्फुटन मात्र है। उसकी अधिविद्या (मैटाफीज़िक्स) भौतिकवादी है और उसकी पद्धति द्वन्द्वात्मक है। मार्क्स अपने आधिविद्यक भौतिकवाद के लिए कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं करता। वह इतिहास की भौतिकवादी धारणा या समाजिक तत्त्व की आर्थिक कारणता की चर्चा करता है और उसका विचार है कि वे आधिविद्यक भौतिकवाद के परिणाम हैं; परन्तु ये दोनों परस्पर बिलकुल असम्बद्ध हैं।[17]
अपने 'फ्यूअरबाख पर ग्यारह निबन्ध' में मार्क्स ने यह युक्ति प्रस्तुत की है कि "पहले के सब भौतिकवादों में- जिनमें फ्यूअरबाख का भौतिकवाद भी सम्मिलित है- मुख्य बुटि यह है कि जब विषय (गैगनस्टैण्ड), वास्तविकता, अनुभवगम्यता का निरूपण केवल विषय (ऑब्जेक्ट) के रूप नि के अन्तर्गत या रूपचिन्तन (ऐनशाउंग) के अन्तर्गत किया गया है, परन्तु मानवीय अनुभूतिशीर भू गतिविधि या व्यवहार के रूप में नहीं, कर्ताश्रित (सब्जेक्टिव) रूप में नहीं।" इससे यह निष्कार निकला कि आदर्शवाद ने सक्रिय पक्ष को भीतिकवाद के विरोध में विकसित किया। दूसरे शब्दों में, भौतिकवाद के अन्य प्रकारों में भौतिक तत्त्व की धारणा अनुभूति की धारणा के साथ जुड़ी हुई थी। भौतिक तत्त्व को अनुभूति का कारण और साथ ही साथ अनुभूति का विषय भी माना जाता था; और अनुभूति एक निष्क्रिय वस्तु थी, जिसके द्वारा मन बाह्य जगत् के प्रभावों को ग्रहण करता था। प्रभावों का निष्क्रिय ग्रहण जैसी कोई वस्तु है ही नहीं। भौतिक तत्त्व मन की गतिविधि को जागरित करता है और भौतिक तत्व, जिस रूप में हम उसको समझते हैं, मानवीय उपज है। प्रारम्भिक से प्रारम्भिक ज्ञान में भी मन सक्रिय रहता है। हम आसपास की परिस्थितियों को दर्पण की भांति केवल प्रतिबिम्बित नहीं कर रहे होते, अपितु उन्हें परिवर्तित भी कर रहे होते हैं। किसी वस्तु को जानना उसका प्रभाव ग्रहण करना-भर नहीं है, अपितु उसके ऊपर सफलतापूर्वक क्रिया करने में समर्थ होना है। सब प्रकार के सत्य की परख क्रियात्मक है। क्योंकि जब हम किसी वस्तु पर क्रिया करते हैं, तो हम उसे परिवर्तित कर देते हैं, इसलिए सत्य में स्थितिशीलता बिलकुल नहीं है। वह निरन्तर परिवर्तित और विकसित होता रहता है। जिसे आजकल सत्य का परिणामवादी स्वरूप कहा जाता है, मार्क्स उसीको स्वीकार करता है। वह ज्ञान को वस्तुओं के ऊपर की जा रही क्रिया मानता है। यह कार्य है, जिसकी व्याख्या भौतिक शक्तियों के नियंत्रण और रूपान्तरण के रूप में की गई है। परन्तु ज्ञान अपने-आपमें एक बहुमूल्य वस्तु है। मनुष्य भौतिक तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, और उसपर केवल प्रभुत्व स्थापित करना नहीं चाहता। ज्ञान का उद्देश्य अपने-आपमें अन्तिम है। एक सुनिश्चित और पूर्ण प्रकार का ज्ञान ऐसा होता है, जिससे हमारे ज्ञानात्मक पक्ष की गंभीर से गंभीर महत्त्वाकांक्षाएं पूर्ण हो जाती हैं।
मार्क्स अपने भौतिकवाद को द्वन्द्वात्मक कहता है, क्योंकि उसमें प्रगतिशील परिवर्तन का सारभूत सिद्धान्त विद्यमान है। इसे भौतिकवादी कहा गया है, इसलिए नहीं कि यह मन के अस्तित्व को भौतिक तत्त्व के एक व्युत्पन्न गुण के रूप में मानने के सिवाय, अस्वीकार करता है या मन के ऊपर भौतिक तत्त्व की सर्वोच्चता पर ज़ोर देता है, बल्कि इसलिए कि यह मानता है कि विचार वस्तुओं पर क्रिया करके, उनके रूप और शक्ति में परिवर्तन करके इतिहास पर प्रभाव डालते हैं। वे भौतिक वस्तुएं, जिन्हें मार्क्स सामाजिक परिवर्तन का मुख्य निर्णायक बताता है, प्रकृति का कच्चा माल नहीं है, अपितु मानवीय उपजें हैं, जिनपर मानसिक गतिविधि की छाप पड़ी हुई है। वे केवल प्राकृतिक वस्तुएं नहीं हैं, अपितु वे वस्तुएं हैं जो मानव-मन की शक्ति से अनुप्राणित हैं। वे केवल कोयला, पानी या बिजली नहीं हैं, अपितु हमारा उन तरीकों का ज्ञान है, जिनके द्वारा मानवीय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इन प्राकृतिक शक्तियों का उपयोग किया जा सकता है। जब यह कहा जाता है कि उत्पादनशील प्राकृतिक शक्तियों के विकास द्वारा इतिहास की गति का निर्धारण होता है, तब हमें यह ज्ञात रहना चाहिए कि उत्पादनशील शक्तियों के अन्तर्गत न केवल भूमि की उर्वरता, धातुओं के गुण, सूर्य की ऊष्मा, भाप की शक्ति और बिजली-जैसी प्राकृतिक शक्तियां हैं, अपितु मानव-मन की शक्ति भी है। मार्क्स को विवश होकर मनुष्य की बुद्धि को उत्पादनशील शक्तियों से अलग रखना पड़ा है, क्योंकि उसने इसे विचारधारात्मक ऊपरी ढांचे के अन्तर्गत रखा है, जो एक परिणाम है, एक गौण तत्त्व। और यद्यपि उत्पादक शक्तियां पृथ्वी पर अनेक शताब्दियों से विद्यमान थीं, पर आर्थिक उत्पादन के लिए वे तभी उपलब्ध हो पाईं, जब मनुष्य की बुद्धि ने उन्हें खोज निकाला और उन्हें उत्पादन के प्रयोजन के अनुकूल ढाल लिया। इस समय भी ऐसी अनेक प्रकृति की शक्तियां हो सकती हैं, जिनकी अभी खोज नहीं हुई है, जिनका पता चलना अभी शेष हैं और जिनका प्रयोग ऐसे कार्यों के लिए किया जा सकेगा, जिनका हमें अभी गुमान भी नहीं है। औज़ार बनाने, पशु पालने और कृषि प्रारम्भ करने से लेकर भाप और बिजली के उपयोग तक, उत्पादनशील शक्तियों की खोज और उपयोग सबके सब मानवीय मन, कल्पना और उद्देश्य के ही कार्य हैं। उत्पादनशील शक्तियां स्वयमेव विकसित नहीं हो जातीं। यद्यपि मार्क्स जहां-तहां भौतिक को उत्पादनशील शक्तियां, और मानसिक को भौतिक के ऊपरी ढांचे का प्रतिबिम्ब मात्र, आर्थिक हलचल द्वारा फेंकी जा रही छाया-मात्र, मानता है, फिर भी उसका मुख्य इरादा इन दोनों को ही उत्पादनशील शक्तियों की प्रकृति में समाती हुई मानने का है। उदाहरण के लिए, औजारों का निर्माण मानव जाति के बौद्धिक जीवन का एक अंग है।
मार्क्स अपने सिद्धान्त को 'भौतिकवादी' इसलिए कहता है, जिससे हेगल के आदर्शवाद से उसका वैषम्य स्पष्ट हो सके; आदर्शवाद की दृष्टि में यह घटनाओं का जगत् विशुद्ध 'विचार' के जगत् की छाया-मान है। हेगल के विरोध में मार्क्स का यह मत है कि मन और प्रकृति सकारात्मक (पॉज़िटिव) तत्त्व हैं, 'विचार' के सारहीन प्रतिबिम्ब-भर नहीं। इसके अतिरिक्त, हेगले की दृष्टि में, परिवर्तन केवल रूप का भ्रम है, जबकि मार्क्स के लिए परिवर्तन ही वास्तविकता का सार है। जिन वस्तुओं को हम देखते, छूते और अनुभव करते हैं, वे वास्तविक हैं और वे निरन्तर परिवर्तित हो रही हैं; और ये परिवर्तन उनके आन्तरिक अंग हैं, उनपर 'परम सत्ता' (एब्सोल्यूट) द्वारा थोपे गए नहीं हैं। मार्क्स अनुभवसिद्ध मन और वस्तुओं की वास्तविकता में विश्वास करता है, जो हेगल के यहां 'परम सत्ता' में डूबी हुई हैं। फ्यूअरबाख पर अपनी तीसरी टिप्पणी में वह अपरिष्कृत भौतिकवादी दृष्टिकोण का खण्डन करता है, "भौतिकवादी यह सिद्धान्त, कि मनुष्य परिस्थितियों और शिक्षा की उपज हैं और यह कि इसलिए बदले हुए मनुष्य अन्य बदली हुई परिस्थितियों और बदली हुई शिक्षा की उपज हैं, इस बात को भूल जाता है कि परिस्थितियों को मनुष्य बदलते हैं और इस बात को कि स्वयं शिक्षक को भी शिक्षित किया जाना होता है।" मार्क्स के अनुसार सामाजिक परिवर्तन प्रकृति, समाज और मानवीय बुद्धि की पारस्परिक क्रिया द्वारा होता है।
मार्क्स के कथनानुसार भौतिक तत्त्व (मैटर) ब्रह्माण्डीय वास्तविकता का सार है। पर हमें इस नाम से भ्रम में न पड़ना चाहिए। वास्तविकता का अन्तिम मूल तत्त्व ठोस, अचल और अचेतन भौतिक तत्त्व नहीं है। वह तो आत्मा का ही सार है, जो स्वतः सक्रिय गति है। भौतिक तत्त्व को स्वतः गतिशील, स्वतः स्पन्दनशील और स्वतः प्रवर्तित बताना उसमें उन गुणों का आरोप करना है, जो भौतिक नहीं हैं, अपितु सजीव और आत्मिक हैं। द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी की दृष्टि में भौतिक तत्त्व मन का विलोम नहीं है। उसमें न केवल मन की गर्भित शक्तियां और सम्भावित आशाएं हैं, अपितु उसका स्वरूप भी मन का-सा ही है। यह भौतिक तत्त्व के अस्तित्व का ही एक अंग है कि वह गति करता है। द्वन्द्वात्मक विकास उसकी सारभूत और आवश्यक अभिव्यक्ति है। यदि वस्तुतः कोई अन्तवर्ती आदर्श है, भौतिक तत्त्व में जीवन और मन को उत्पन्न करने की अन्तःप्रेरणा है, तो प्रारम्भिक मूल तत्त्व केवल भौतिक तत्त्व, जिस रूप में कि साधारणतया उसे समझा जाता है, नहीं है।
मार्क्स की रुचि हमारे सम्मुख विश्व-ब्रह्माण्ड का सिद्धान्त प्रस्तुत करने की ओर उतनी नहीं है, जितनी कि ऐतिहासिक प्रक्रिया को समझने के लिए हमें एक संकेत-सूल प्रदान करने की ओर है। परमाणु के विश्लेषण और ग्रहों की उत्पत्ति की ओर उसका ध्यान नहीं है। उसका सम्बन्ध ऐतिहासिक घटनाओं से है; और इतिहास इस दृष्टि से प्राकृतिक प्रक्रियाओं से भिन्न है कि यह किन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति में तत्पर मनुष्यों की गतिविधि है। प्रकृति में हमारा वास्ता अचेतन अन्धी प्राकृतिक शक्तियों की पारस्परिक क्रिया से पड़ता है। प्राकृतिक घटनाएं चेतनापूर्वक संकल्पित कार्य नहीं हैं। मानवीय बर्ताव में हम इच्छा से विचार करते हैं और संकल्प से कार्य करते हैं और फिर भी परिणाम सदा वे नहीं होते, जिनका कि हमारा इरादा था। दैनिक जीवन में जो विरोधी शक्तियां मनुष्यों को प्रेरित करती हैं, उनके परिणामस्वरूप ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं, जो हमारी चाही हुई स्थितियों से भिन्न होती हैं। ऐतिहासिक कार्य दैवयोग के परिणाम नहीं होते। हम यह नहीं कह सकते कि कोई बात किसी भी समय हो सकती थी। भले ही हम पहले की सब परिस्थितियां न जानते हों, पर हम यह मानते हैं कि सब कार्यों के कारण होते हैं, और मानव- मन के आदर्श भी उन कारणों में हैं। जो शक्तियां इतिहास की प्रक्रिया का निर्धारण करती हैं, वे विशुद्ध रूप से भौगोलिक या प्राणिशास्त्रीय नहीं हैं। जलवायु, स्थानवृत्त (टॉपोग्राफी), मिट्टी और जाति उन उपादानों में से हैं, जो ऐतिहासिक परिवर्तनों को सीमित करते हैं, किन्तु वे उनका निर्धारण नहीं करते। मानव-समाज किन्हीं अन्य सिद्धान्तों के अनुसार बदलता है।
यदि हम कहें कि वास्तविक ही बुद्धिसंगत है तो हमें केवल इतना करना शेष रह जाता है। कि जो कुछ जैसा है, उसे वैसा ही बनाए रखें। उस दशा में हमारा रुख रूढ़िवादी होगा। यदि, दूसरी ओर, हम यह मानें कि बुद्धिसंगत ही वास्तविक है, तो हमारा प्रयत्न यह होगा कि विद्यमान व्यवस्था में बुद्धिसंगतता का अंश और जोड़ा जाए, और तब हमारा रुख सुधार या क्रान्ति का होगा। मार्क्स ने इनमें से दूसरे दृष्टिकोण को अपनाया है। इसमें संसार को और मानवीय स्वतन्त्रता की वास्तविकता को बदल डालने की आवश्यकता मान ली गई है। यदि हमारे कार्यों का निर्धारण हमारे अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु द्वारा होता है, तो वे हमारे कार्य नहीं हैं।
हेगल के यहां द्वन्द्व तर्क का ही एक अंग है। 'विचार' का विकास विरोधों की अनवरत गति द्वारा पूर्ण होता है। प्रत्येक विचार में सत्य का एक पहलू विद्यमान रहता है और वह हमें अपने प्रतिपक्षी विचार की ओर ले जाता है, और वह प्रतिपक्षी विचार भी आंशिक सत्य ही होता है। इन दोनों के विरोध में से एक नया और उच्चतर विचार उठ खड़ा होता है। वह फिर अपने प्रतिपक्षी विचार को और उसके साथ विरोध को उत्पन्न करता है। यह पक्ष (थीसिस), प्रतिपक्षता (ऍटिथीसिस), और संश्लेषण (सींथेसिस) की प्रक्रिया तब तक चलती रहती है, जब तक कि वह लक्ष्य, जो पूर्ण सत्य है, और सत्य के अतिरिक्त कुछ नहीं है, प्राप्त नहीं हो जाता। हम 'अस्तित्व' के विचार से प्रारम्भ करते हैं; उसके बाद स्वभावतः 'अनस्तित्व' का विचार आता है। इन दोनों परस्पर-विरोधी विचारों के संघर्ष में से एक नया और उच्चतर विचार उत्पन्न होता है, जिसमें यह विरोध समाप्त हो जाता है। 'अस्तित्व' और 'अनस्तित्व' का विरोध 'हो जाने' के विचार में समाप्त हो जाता है। यह नया विचार हमें एक नये प्रतिपक्ष तक ले जाता है और उसके बाद वह प्रतिपक्ष हमें एक नये और उच्चतर विचार तक ले जाता है, जिसमें पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों का समन्वय हो जाता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है, जब तक कि हम 'परम विचार' (ऐब्सोल्यूट आइडिया) तक नहीं पहुंच जाते। हेगल के अनुसार यही 'विचार का आत्मविकास' है। अपनी इसी पद्धति का प्रयोग करते हुए हेगल बहुत ही तर्कपूर्ण ढंग से सारे दर्शन, इतिहास और प्राकृतिक विज्ञान तक को पुष्ट करता है। हेगल की दृष्टि में, इतिहास मन का अनवरत आत्म-अनुभव या आत्म-स्थूलीकरण (सूक्ष्म रूप से स्थूल रूप में आना) है और इसलिए उसे अनिवार्यतः अपने- आपको द्वन्द्वात्मक पद्धति से विकसित करना और अपने-आपको पूर्ण करना होता है।
मार्क्स द्वन्द्वात्मक पद्धति का प्रयोग विचारों के क्षेत्र में या विचारों के आत्मविकास पर नहीं करता, अपितु समाज के भौतिक विकास पर करता है। वह ऐतिहासिक विकास को, उसके परिवर्तनों और उसकी विरोधी प्रवृत्तियों को परखता है और बताता है कि इतिहास के विकास की परम्परा वस्तुतः विरोधों की एक परम्परा में से होती हुई निरन्तर प्रगति की प्रक्रिया है। कोई भी विद्यमान स्थिति हमें अपने प्रतिपक्ष की ओर ले जाती है और उनके विरोध के कारण समाज की एक उच्चतर स्थिति उत्पन्न होती है, जिसमें वे विरोध समाप्त हो जाते हैं।
हेगल और मार्क्स, दोनों ही मानते हैं कि इतिहास का विकास द्वन्द्वात्मक है। अन्तर इतना है कि जहां हेगल का विश्वास है कि इतिहास में 'परम मन' अपने आपको स्थूल रूप में प्रकट कर रहा है, और घटना-जगत् तो केवल उसकी बाह्य अभिव्यक्ति है, वहां मार्क्स का मत है कि ऐतिहासिक घटनाएं प्रमुख हैं और उनके विषय में हमारे विचार गौण वस्तु हैं। 'कैपिटल' के दूसरे संस्करण की भूमिका में मार्क्स भौतिकवादी द्वन्द्व और आदर्शवादी द्वन्द्व के अन्तर पर बल देता है। वह कहता है, "मेरी अपनी द्वन्द्वात्मक पद्धति हेगल की द्वन्द्वात्मक पद्धति से न केवल मूलतः भिन्न है, अपितु वह उसकी ठीक विलोम है। हेगल की दृष्टि में विचार प्रक्रिया (जिसे वह वस्तुतः एक स्वतन्त्र वस्तु के रूप में बदल देता है और उसे विचार- आइडिया - नाम देता है) वास्तविक की सृजक है; और उसकी दृष्टि में वास्तविक जगत् 'विचार' की केवल बाह्य अभिव्यक्ति है। दूसरी ओर, मेरी दृष्टि में विचार भौतिक तत्त्व से पृथक् कोई वस्तु नहीं है। भौतिक तत्त्व ही जब मानव-मस्तिष्क में स्थानान्तरित और रूपान्तरित हो जाता है, तब विचार बन जाता है। यद्यपि हेगल के हाथों में पड़कर द्वन्द्व का सिद्धान्त रहस्यमय बन गया, परन्तु इतने से, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि सबसे पहले हेगल ने ही द्वन्द्व की गति के सामान्य रूपों का सर्वांग सम्पूर्ण और पूर्णतया संज्ञान रीति से प्रतिपादन किया। हेगल की रचनाओं में द्वन्द्व सिर के बल उल्टा खड़ा है। यदि आप उसकी बुद्धिसंगत गिरी (तत्त्व) को खोज निकालना चाहते हैं, जो रहस्य के जाल में छिपी हुई है, तो आपको उसे उलटकर सीधा खड़ा करना होगा।"[18] हेगल हमारे सामने विचारों के विकास को तर्कशास्त्र की दृष्टि से और अनिवार्य शाश्वत व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करता है और पश्चाद्वतीं लौकिक रूप को आभास या छाया बताता है। हेगल ने द्वन्द्व के जो-जो नियम निश्चित किए, वे सबके सब मार्क्स ने स्वीकार कर लिए। विचार के स्थान पर भौतिक तत्त्व को रखने के कारण दार्शनिक आदर्शवाद का स्थान क्रान्तिकारी विज्ञान ने ले लिया है। मार्क्स और हेगल, दोनों की ही दृष्टि में इतिहास का विकास तर्कसंगत है; और हेगल के मामले में इसे ठीक भी समझा जा सकता है, क्योंकि उसके लिए तो मन ही चरम वास्तविकता है। मार्क्स के लिए भौतिक तत्त्व चरम वास्तविकता है और भौतिकवादी के लिए यह सोच पाना अधिक दुष्कर है कि संसार किसी तर्कसंगत नियम के अनुसार विकसित हो रहा है। मार्क्सवादी यह मान लेते हैं कि बाह्य जगत् एक प्रचण्ड अनिवार्यता के साथ ठीक उसी दिशा में बढ़ा चला जा रहा है, जिस और वे चाहते हैं। उनके कथनानुसार संसार एक साम्यवादी समाज के निर्माण की ओर बढ़ रहा है। इस प्रकार का समाज एक ऐतिहासिक आवश्यकता है। यह भौतिक विश्व का बिलकुल उपहार जैसा प्रतीत होता है। मार्क्स लिखता है, "कामगर वर्ग को किसी आदर्श को प्राप्त नहीं करना है; उन्हें तो केवल एक नये समाज के तत्त्वों को स्वतंत्नभर कर देना है।" पूंजीवादी प्रणाली के नियम, "लौह-कठोर अनिवार्यता के साथ अपरिहार्य परिणामों की ओर अग्रसर होते हैं।" ऐंजिल्स लिखता है, "जितनी सुनिश्चितता के साथ गणित के किसी एक दिए हुए साध्य से दूसरे साध्य का अनुमान किया जा सकता है, उतनी ही सुनिश्चितता के साथ विद्यमान सामाजिक परिस्थितियों और राजनीतिक अर्थ-व्यवस्था के सिद्धान्तों से हम क्रान्ति का अनुमान कर सकते हैं।" यह दृष्टिकोण कि तथ्य और आदर्श, अस्तित्व और मान्यताएं (मूल्य) एक-दूसरे के अनुकूल ढले हुए हैं, कम से कम वैज्ञानिक सत्य नहीं है। यह केवल एक आनुमानिक उपकल्पना (हाइपोथीसिस) है, एक विश्वास की वस्तु ! हमें क्यों यह मान लेना चाहिए कि विश्व की शक्तियां हमारी इच्छाओं का समर्थन करती हैं? मार्क्स को फ्यूअरबाख के इस कथन को दोहराने का बड़ा चाव है कि "अधिविद्या-वेत्ता (मैटाफीज़ीशियन) छद्मवेश में पुजारी होता है।" मार्क्स जब यह कहता है कि उसका मानवीय समाज का आदर्श संसार के ताने-बाने में ही रमा हुआ है, तो वह स्वयं भी दार्शनिक बन रहा होता है। इसमें हमें धार्मिक प्रवृत्ति का चिह्न दृष्टिगोचर होता है।
यद्यपि मार्क्स का कथन है कि उसके विचार वास्तविकता पर आधारित हैं, अटकलबाज़ी पर नहीं, फिर भी यह स्पष्ट है कि वह हमारे सम्मुख (वास्तविकता की) एक ऐसी व्याख्या प्रस्तुत करता है, जो उसके सिद्धान्त के साथ मेल खाए। जब वह कहता है कि समाज सामन्तवाद से पूंजीवाद की ओर और पूंजीवाद से समाजवाद की ओर बढ़ता है, तब वह ऐसे शब्दों का प्रयोग कर रहा होता है, जिनके अन्तर्गत अनगिनत तथ्य समा सकते हैं। किसी भी ऐतिहासिक काल को घटनाओं के यथोचित बनाव द्वारा किसी एक या किसी दूसरी प्रवृत्ति का सूचक प्रदर्शित किया जा सकता है। उन्नीसवीं शताब्दी को मध्यमवर्ग के प्रभुत्व का काल भी समझा जा सकता है, या उद्योगवाद या साम्राज्यवाद का युग भी, या राष्ट्रीयता या उदारता का युग भी; यह सब इस बात पर निर्भर है कि हम किन धाराओं पर बल देना चाहते हैं, या व्यक्तिगत रूप से किन धाराओं को सबसे महत्त्वपूर्ण समझते हैं। बीसवीं सदी की व्याख्या, उपयुक्त घटनाओं को चुनकर हम इस रूप में भी कर सकते हैं कि यह उन्नीसवीं शताब्दी से ठीक उल्टी है; या फिर कुछ अन्य घटनाओं पर बल देकर हम यह भी दिखा सकते हैं कि इसमें उन्नीसवीं शताब्दी की प्रवृत्तियां ही आगे बढ़ रही हैं। संभव है, यह सब बहुत रोचक हो, किन्तु यह वस्तुरूपात्मक दृष्टि से सत्य न होगा। इतिहास तथ्यों का स्मरण-'भर नहीं है, अपितु उनका वह रूप है, जिसमें कि हम उन्हें देखते हैं। इसमें तथ्यों की व्याख्या भी होती है और चुनाव भी। फिर भी, लार्ड ऐक्टन के शब्दों में, ऐतिहासिक तथ्य और ऐतिहासिक विचार के मध्य यथोचित अनुपात रहना ही चाहिए। मार्क्सवादी प्राचीनकाल का दास-अर्थव्यवस्था के साथ, मध्ययुग का कृषि-दास अर्थव्यवस्था के साथ, आधुनिक युग का पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के साथ और भविष्य का 'उत्पादन के साधनों के सामाजिकीकरण' के साथ अभिन्न सम्बन्ध समझते हैं; और यह स्पष्ट विभाजन सब देशों पर लागू नहीं हो सकता। हेगल ने भी, जो इतिहास को इसी रूप में देखता है, मनमौजी वैशिष्ट्य-वर्णन प्रस्तुत किए हैं। एक जगह यूनान का अभिन्न सम्बन्ध 'व्यक्ति की स्वाधीनता' के साथ, रोम का सम्बन्ध राज्य के साथ और रोमन जगत् का सम्बन्ध 'व्यक्ति के सार्वभौम के साथ सम्मिलन' के साथ जोड़ा गया है। पर एक दूसरी जगह पूर्व का अभिन्न सम्बन्ध 'अनन्त' के साथ, प्राचीन यूनान और रोम का सम्बन्ध 'सान्त' के साथ और ईसाई युग का सम्बन्ध 'अनन्त और सान्त के संश्लेषण' के साथ जोड़ा गया है। परन्तु इतिहास किसी पक्के नियम के अनुसार नहीं चलता। ऐतिहासिक विकास अनिवार्यतः विरोधों की श्रृंखला द्वारा आगे नहीं बढ़ता। उन्नति की गति कभी बढ़ती है, कभी घटती है, और वह विभिन्न रूपों में होती है; कभी वह एक स्थिति से उसकी विरोधी स्थिति में संक्रमण द्वारा होती है और कभी एक ही अविच्छिन्न धारा के रूप में आगे बढ़ती रहती है। यह कहना - जैसे कि मार्क्स कहता है कि "विरोध के बिना कोई प्रगति नहीं होती, यही एक नियम है, जिसका कि सभ्यता आज तक पालन करती आई है।" - एक मनमानी बात कह देना है। मार्क्स का मत है कि सामन्तवाद से समाजवाद की ओर संक्रमण मध्यवर्ग के प्रभुत्व और पूंजीवाद में से गुज़र कर होता है; परन्तु जब रूस में समाजवाद की स्थापना हुई, तब वह सामन्तवादी समाज की दशा में था, पूंजीवादी समाज की दशा में नहीं।
प्रगति की अनिवार्यता में मार्क्स का विश्वास है। समाज की गति आगे की ही ओर है। प्रत्येक उत्तरवर्ती सोपान विकास का सूचक है, और अपने पूर्ववर्ती सोपानों की अपेक्षा बुद्धिसंगत आदर्श के अधिक निकट है; बुद्धिसंगत आदर्श वह स्वतन्त्र समाज है, जिसमें न कोई स्वामी होगा न कोई दास, न धनी होंगे न गरीब; जिसमें संसार की वस्तुओं का उत्पादन सामाजिक मांग के अनुसार किया जाएगा; व्यक्तियों की मन की मौज उसमें बाधा न डाल सकेगी और उन वस्तुओं का वितरण बुद्धिसंगत रीति से किया जाएगा। इतिहास की शक्तियां इस प्रकार का विकास करके ही रहेंगी; हम न उसमें सहायता कर सकते हैं और न बाधा डाल सकते हैं। परन्तु इतिहास ह्रास और अधःपतन के उदाहरणों से भरा है और उसे विरोधों में होकर निरन्तर होता हुआ विकास नहीं माना जा सकता। हम इस बात पर पक्का भरोसा नहीं रख सकते कि मानवीय प्रगति अनिवार्य है। यह तो फिर भाग्यवाद में जा पड़ना होगा। किसी भी व्यक्ति यां समाज के जीवन में ठीक उस क्षण का निर्धारण कर पाना संभव नहीं है, जब तथाकथित विरोधवाला नया समय वस्तुतः प्रारम्भ होता है। इतिहास एक अखंड विद्यमानता (बिकमिंग) है, एक अविराम धारा, जिसके न किसीको आदि का पता है न अन्त का। मार्क्सवादी सिद्धान्त अनुगमनात्मक या व्याप्तिमूलक (इंडक्टिव) सर्वेक्षण का परिणाम नहीं है, अपितु निगमनात्मक या अनुमानात्मक (डिडक्टिव) ढंग का है। मार्क्स हेगल की तर्कप्रणाली को अपने भौतिकवादी दृष्टिकोण के अनुकूल ढाल लेता है।
इस उदार दृष्टिकोण का, कि हमें वर्ग-युद्ध को त्याग देना चाहिए, बल के प्रयोग का परित्याग करना चाहिए, और मानवीय समस्वार्थता और न्याय की भावना को मनाने (तक पहुंच करने) का प्रयत्न करना चाहिए, मार्क्स ने खण्डन किया है। उसका मत है कि यह आशा, कि पूंजीपति- वर्ग को बुद्धिसंगत आग्रह-अनुरोध से मनाया जा सकता है, मिथ्या है। हमारे लक्ष्य उन आर्थिक परिस्थितियों द्वारा निश्चित कर दिए गए हैं, जिनमें हमें रहना पड़ रहा है। हमें पूंजीपतियों से लड़ना है, इसलिए नहीं कि हम उनसे लड़ना चाहते हैं, अपितु इसलिए कि हमें लड़ना होगा ही। हेगल के द्वन्द्व सिद्धान्त की कठिनाइयां उसके मार्क्सवादी रूप में भी विद्यमान हैं। हेगल की दृष्टि में विरोध मुख्य सिद्धान्त है, जो सारी प्रगति का आधार है। अपने सिद्धान्त को पुष्ट करते हुए हेगल 'विरोधी' और 'भिन्न' में घपला कर जाता है। क्रोचे ने अपनी पुस्तक 'व्हाट इज़ लिविंग एण्ड व्हाट इज़ डेड आफ दि फिलासफी आफ हेगल"[19] (हेगल के दर्शन का कौन-सा अंश अभी जीवित है और कौन-सा मर चुका है) में इस बात पर विस्तार से प्रकाश डाला है। प्रकाश और अंधकार एक-दूसरे के विरोधी हैं। वे साथ-साथ नहीं रह सकते। एक के अस्तित्व का अर्थ है दूसरे का अभाव। विरोधी एक-दूसरे का लोप करते हैं। परन्तु 'भिन्न', जैसे सत्य और सौन्दर्य, दर्शन और कला, एक-दूसरे का बहिष्कार नहीं करते। 'सीमा' की धारणा 'निषेध' की धारणा से भिन्न है। निषेध ही प्रकृति का एकमात्न पहलू नहीं है। यदि आर्थिक शक्तियां ऐतिहासिक विकास को नियंत्रित करती हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य शक्तियां नहीं करतीं। आर्थिक आवश्यकता और धार्मिक आदर्शवाद की शक्तियां पारस्परिक क्रिया द्वारा इतिहास के भविष्य का रूप निर्माण कर सकती हैं।
मार्क्स का कथन है कि एक के बाद एक, विरोधों द्वारा विकास तब तक जारी रहेगा, जब तक कि सारी मानव-जाति साम्यवादी न हो जाए। विश्व-साम्यवाद की स्थापना होते ही द्वन्द्वात्मक विकास समाप्त हो जाएगा। हेगल ने इतिहास के द्वन्द्वात्मक विवरण से यह निष्कर्ष निकाला था, कि द्वन्द्वात्मक विकास प्रशियन राज्य की स्थापना होने पर समाप्त हो जाएगा; उसकी दृष्टि में प्रशियन राज्य 'परम विचार' (ऐब्सोल्यूट आइडिया) का पूर्ण मूर्त रूप था। मार्क्स का कधन है कि द्वन्द्वात्मक विकास का उद्देश्य यह (प्रशियन राज्य की स्थापना) नहीं हो सकता। "सामाजिक विकास का राजनीतिक क्रान्ति होना तभी समाप्त होगा, जब ऐसी व्यवस्था स्थापित हो जाएगी, जिसमें न अलग-अलग वर्ग होंगे, और न वर्गों में परस्पर-विरोध भाव रहेगा।" मार्क्स हेगल की, यह मान लेने के कारण कि प्रशियन राज्य की स्थापना होते ही विरोध और संघर्ष समाप्त हो जाएंगे, आलोचना करता है। क्या यह इसलिए कि उसका विश्वास है कि इतिहास का उद्देश्य प्रशियन राज्य की स्थापना से पूर्ण नहीं होगा, अपितु उसके अपने (मार्क्स के) साम्यवाद की स्थापना से पूर्ण हो जाएगा? यदि मानव-समाज का विकास भौतिकवादीशक्तियों की सतत चल रही क्रीड़ा है, जिसमें विरोधों और वर्ग-युद्धों की एक परम्परा द्वारा पूंजीवाद समाप्त हो जाता है और वर्गहीन समानतावादी राज्य की स्थापना होती है, तो यह नया समाज भौतिकवादी शक्तियों द्वारा निर्धारित द्वन्द्वात्मक प्रगति के नियम से छूट कैसे पा जाताहै? और यदि इसे उस नियम से छूट नहीं मिलती, तो क्या इसके विरोध में भी कोई नया प्रतिपक्ष उठ खड़ा होगा ? या भौतिक तत्त्व के जगत् में निसर्गतः विद्यमान नियम अपना उद्देश्य पूर्ण कर चुकने के बाद अपना कार्य करना बन्द कर देंगे, और आपातिक (संकटकालीन) विकास की एक अज्ञात प्रक्रिया द्वारा नये नियमों को जन्म देंगे? यदि द्वन्द्व सारतः क्रान्तिकारी है, तो वह वर्गहीन राज्य की स्थापना के बाद रुक क्यों जाना चाहिए? यदि वर्ग-संघर्षों की समाप्ति के बाद भी आगे विकास की गुंजाइश हो, तो प्रगति के, वर्ग-संघर्षों के अतिरिक्त, अन्य कारण भी अवश्य होने चाहिएं। मार्क्स स्वीकार करता है कि साम्यवादी समाज की स्थापना के बाद भी 'सामाजिक विकास' के लिए गुंजाइश रहेगी। सामाजिक जीवन में और कौन-से ऐसे विरोध हैं, जिनसे उसे (सामाजिक विकास को) प्रेरक शक्ति प्राप्त होगी? साम्यवादी समाज में भी द्वन्द्व का सिद्धांत क्रियाशील रहेगा, भले ही हम विस्तारपूर्वक यह वर्णन नहीं कर सकते कि उसकी क्रिया का ठीक क्या रूप होगा; हम यह कल्पना कर सकते हैं कि उससे आगे प्रगति क्रांतिकारी और समाज-विरोधी न होकर विकासात्मक और सहयोगात्मक होगी। आर्थिक समस्याओं द्वारा आत्मविकास के मार्ग में खड़ी की गई रुकावटें हट जाएंगी और सृजनशील व्यक्तित्वों को उन्नति का पर्याप्त अवसर मिलेगा। भय और विद्वेष, सत्ता के लिए संघर्ष और स्वार्थ की अपेक्षा प्रेम और मित्नता, साहस और अभिमान की भावना अधिक सबल होगी। कष्ट और दुःख होंगे, पर वे उच्चतर स्तर पर होंगे। वर्तमान आर्थिक व्यवस्था इसलिए अन्यायपूर्ण नहीं है कि यह मनुष्य को दुःखी बनाती है, अपितु इसलिए कि यह उन्हें अमानव बना देती है। मनुष्य का लक्ष्य आनन्द नहीं, अपितु गौरव है।'[20] इतिहास की द्वन्द्वात्मक गति के सिद्धांत में सत्य केवल इतना है कि परस्पर-विरोधी मतों और हितों के संघर्ष और उनके बारे में विचार-विमर्श से सैद्धान्तिक क्षेत्र में नया ज्ञान उत्पन्न होता है और व्यवहार-जगत् में नई संस्थाओं का जन्म होता है, क्योंकि सारी प्रकृति समस्वरता चाहती है और जब तक विसंवादिता (बेमेल स्वर, कलह) का समाधान न हो जाए, वह चैन से नहीं बैठ सकती।
इतिहास की आर्थिक व्याख्या में कहा गया है कि आर्थिक तत्त्व, वह भी विशेष रूप से आर्थिक उत्पादन, आधारभूत वस्तु है और शेष वे सब वस्तुएं, जिन्हें हम संस्कृति, धर्म, राजनीति, सामाजिक और बौद्धिक जीवन कहते हैं, गौण उपज हैं; उनका निर्धारण उत्पादन की प्रणालियों द्वारा होता है और वे उत्पादन की प्रणालियों के तात्कालिक परिणाम हैं। उत्पादन की दशाएं ही समाज का वह आर्थिक ढांचा है, जो सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक जीवन का भौतिक आधार है। जब किसी नई शक्ति की खोज या नये तकनीकी आविष्कार के कारण उत्पादन की प्रणाली बदल जाती है, तब उत्पादन की दशाएं भी बदल जाती हैं; वे एक विचारधारात्मक ऊपरी ढांचे की रचना करती हैं, अर्थात् जायदाद, शक्ति और सम्मतियों की दशाओं की। ये फिर उत्पादन की दशाओं को नया रूप देने का कारण बनती हैं और इस प्रकार क्रिया और अन्योन्य क्रिया द्वारा समाज की प्रगति होती है। कठिनाई तब उत्पन्न होती है, जब उत्पादन की भौतिक शक्तियों का उत्पादन की विद्यमान दशाओं से, जायदाद की उस प्रणाली से, जिसके अधीन वे कार्य कर रही हैं, विरोध उठ खड़ा होता है। यह सिद्धांत अपनी सरलता के कारण ही मानने योग्य जान पड़ता है और यह इस कारण और सत्य प्रतीत होने लगता है कि जीवन और इतिहास में आर्थिक तत्त्व का महत्त्व बहुत अधिक है। तथ्यों के कुछ विशिष्ट समूहों का सावधानी से चुनाव करके और कुछ तथ्यों की उतनी ही सावधानी से अपेक्षा करके इस सिद्धांत को तर्कसंगत और निश्चायक रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। आर्थिक दशाओं के महत्त्व पर जो बल दिया गया है, वह ठीक है; परन्तु यह सुझाव, कि केवल एकमात्न वे ही इतिहास का निर्धारण करती हैं, गलत है।
अरस्तू ने बहुत समय पहले हमें बताया था कि अच्छी तरह जीने से पहले हमारे लिए जीना ज़रूरी है। पहले हमें भोजन, मकान और कपड़ा चाहिए, उसके बाद ही हम अंकन, चित्त्रण और चिन्तन की बात सोच सकते हैं। जीवन और अच्छे जीवन के विभेद को मार्क्स ने एक सिद्धांत के रूप में विकसित किया है। यह विभेद किस प्रकार सामने आया, इसका विवरण देते हुए ऐंजिल्स ने लिखा है, "मार्क्स ने इस सीधे-सादे तथ्य को (जो उससे पहले विचारधारात्मक झाड़-झंखाड़ों में दबा हुआ था) खोज निकाला कि मानव-प्राणियों को सबसे पहले खाना-पीना, कपड़ा और मकान मिलना चाहिए, उसके बाद ही वे राजनीति, विज्ञान, कला, धर्म तथा इसी प्रकार की अन्य वस्तुओं में रुचि ले सकते हैं। इसमें यह अर्थ निहित है कि जीवन-निर्वाह के लिए अविलम्ब आवश्यक साधनों का उत्पादन और उनके द्वारा किसी राष्ट्र या युग के विकास का विद्यमान दौर ही वह नींव (आधार) है, जिसपर राज्य संस्थाएं, वैधानिक दृष्टिकोण, कला-सम्बन्धी और यहां तक कि धार्मिक विचार निर्मित होते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि इन पिछली वस्तुओं की व्याख्या इन पहली वस्तुओं के आधार पर होनी चाहिए, जबकि साधारणतया इन पहली वस्तुओं की व्याख्या इन पिछली वस्तुओं के आधार पर की जाती रही है।" उत्पादनशील शक्तियां बाकी सबका नियंत्रण करने वाले मुख्य साधन हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि बाकी चीज़ों की व्याख्या मुख्य साधनों द्वारा की जा सकती है। अनिवार्य दशा प्रभावी कारण नहीं होती। परम्परा, प्रचार और आदर्श उन कारणों में से कुछ एक हैं, जो परिवर्तन लाते हैं। मार्क्स उत्पादन की शक्तियों और उत्पादन की प्रणालियों में भेद करता है। शक्ति प्रणाली बने, इसके लिए मानवीय मस्तिष्क का हस्तक्षेप आवश्यक होता है। सब नवीन बातें पहले-पहल मानव-मन में विचारों के रूप में आती हैं। दशाएं और कारण एक-दूसरे के साथ इतने घनिष्ठ रूप से मिले-जुले हैं कि उनके सूत्रों को अलग कर पाना कठिन है। यदि आर्थिक शक्तियां स्वयं ही सांस्कृतिक प्रणालियों का निर्धारण करती हों, तो मनुष्य का कोई प्रयोजन ही नहीं रहता और इतिहास केवल एक भ्रांति बन जाता है। यदि इतिहास घटनाओं की यंत्रचालित-सी परम्परा नहीं है, तो स्पष्ट है कि मनुष्य अपने लक्ष्यों का चुनाव स्वयं करते हैं और उन्हें पूर्ण करने के साधनों का निर्धारण भी खुद ही करते हैं। समाज के आर्थिक ढांचे और समाज को अभिन्न समझना ठीक नहीं है। यह ठीक है कि आर्थिक ढांचा बहुत महत्त्वपूर्ण है, परन्तु केवल वही समाज की एकमात्र वास्तविकता नहीं है। यद्यपि ऐंजिल्स यह स्वीकार करता है कि ऊपरी ढांचे की विविध हलचलें भी ऐतिहासिक संघर्षों की प्रगति पर प्रभाव डालती हैं; परन्तु यह कहकर कि "ये सब हलचलें एक-दूसरी को प्रभावित करती हैं, किन्तु अन्ततोगत्वा असंख्य अवसरों पर आर्थिक हलचल का प्रभाव अवश्य ही दूसरी हलचलों की अपेक्षा अधिक रहता है," वह अपनी स्वीकारोक्ति के मुख्य बिन्दु को वापस ले लेता है। केवल इसलिए कि दूसरे उपकरणों के सम्बन्ध में चिन्तन कर पाना संभव नहीं है, हम यह नहीं मान सकते कि उनका अस्तित्व ही नहीं है। यह दृष्टिकोण, कि उत्पादन की दशाएं एक विशेष प्रकार की विचारधारा को जन्म देती हैं, जो समय पाकर उत्पादन की नई दशाओं को जन्म देती है, केवल अनुमान (निराधार कल्पना) है। उत्पादन की दशाएं और विचारधारात्मक ऊपरी ढांचा, अलग- अलग पालियों में (बारी-बारी से) काम नहीं करते। वे साथ-साथ विद्यमान रहते हैं और साथ-साथ काम करते हैं। इसके अतिरिक्त, हम यह नहीं कह सकते कि विचारधारात्मक ऊपरी ढांचा उत्पादन की प्रणालियों का परिणाम है। उदाहरण के लिए हमारे धार्मिक विचार आर्थिक दशाओं के परिणाम नहीं है। आदिम मनुष्य अनुभव करता था कि वह सर्वशक्तिमान नहीं है और घटनाएं उसकी प्रबल इच्छा के विरुद्ध भी होती हैं और उसकी इच्छा के बिना तो प्रायः होती हैं; जिस संसार में वह रहता है, वह उसका अपना बनाया हुआ नहीं है; सूर्य और चन्द्रमा के ग्रहण और भूकम्प उसकी सहमति से नहीं होते। तब उसने भूत-प्रेतों और देवताओं की कल्पना की; और जिन घटनाओं की व्याख्या नहीं हो पाती थी, उनका कारण उन भूत-प्रेतों और देवताओं को माना। मनुष्य की जीने के लिए तीव्र इच्छा के कारण उसका परलोक में विश्वास होता है, उत्पादन की किन्हीं विशिष्ट प्रणालियों के कारण नहीं। ऐंजिल्स इस बात को स्वीकार करता है कि धर्म का निर्धारण उत्पादन की प्रणालियों द्वारा नहीं होता। वह कहता है, "धर्म मनुष्यों के मन में उन बाह्य शक्तियों के, जिनका मनुष्यों के दैनिक जीवन पर नियंत्रण है, विलक्षण प्रतिफलन के अतिरिक्त कुछ नहीं है; ऐसा प्रतिफलन, जिसमें पार्थिव शक्तियां अलौकिक शक्तियों का रूप धारण कर लेती हैं। इतिहास के प्रारंभ में पहले-पहल प्रकृति की शक्तियों का इस रूप में प्रतिफलन हुआ था और विकास होने के साथ-साथ विभिन्न जातियों में उनके अनेक प्रकार और विभिन्न मानवीकरण हो गए।"[21] जो बात धर्म के विषय में सत्य है, वही अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के बारे में भी सच है। बहुत सीमित अर्थ में ही हम यह कह सकते हैं कि किसी समाज की आर्थिक प्रणाली ही उसके सम्पूर्ण वैधानिक, राजनीतिक और बौद्धिक तत्त्व का वास्तविक आधार है; इन तत्त्वों का अस्तित्व आर्थिक प्रणाली के अभाव में स्वतन्त्र रूप से नहीं रह सकता। बिना मिट्टी के कोई पौधा नहीं हो सकता। लेकिन पौधे, भले ही वे मिट्टी में से उगते हैं, केवल मिट्टी से नहीं उगते। बीज बोया जाना चाहिए और अन्य उचित दशाओं का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। इसी प्रकार विचारधारात्मक ऊपरी ढांचे के लिए आर्थिक प्रणाली की आवश्यकता अवश्य होती है, किन्तु इसके द्वारा उसकी व्याख्या पूरी तरह नहीं हो जाती। जीवन के अभाव में अच्छा जीवन नहीं हो सकता; परन्तु जिन जीवन-मूल्यों (मान्यताओं) का हम लालन (प्रेमपूर्वक रक्षा) करते हैं, उन सबकी व्याख्या केवल जीवन द्वारा नहीं हो सकती।
मार्क्स स्वीकार करता है कि इतिहास में एक क्रम है; परन्तु वह सोद्देश्य या प्रयोजनवादी क्रम नहीं है। न वह क्रम अवैयक्तिक शक्तियों, परम आत्मा (एब्सोल्यूट स्पिरिट), यांत्निक प्रकृति या आर्थिक उत्पादन की स्वतःचालित क्रिया की ही उपज है। इतिहास का निर्माण मनुष्यों द्वारा होता है; किसी इस या उस मनुष्य द्वारा नहीं, अपितु मनुष्यों के समूहों और वर्गों द्वारा। यह आवश्यक नहीं कि वर्गों की गतिविधियां वही हों, जिनकी कि उन लोगों के उद्देश्यों को देखकर आशा की जा सकती है, जिन (लोगों) के द्वारा वे वर्ग बने हैं। महान व्यक्ति उन वर्गों के प्रतिनिधि होते हैं, जो उन्हें महानता प्राप्त करने का अवसर देते हैं। मानवीय प्रयत्न ही वह पद्धति है, जिसके द्वारा जो कुछ निर्धारित होता है, वही घटित होता है। मार्क्स का कथन है कि ऐतिहासिक परिवर्तन वर्ग-संघर्षों के कारण होते हैं। जहां उत्पादनशील शक्तियों को इतिहास का आधारभूत तत्त्व माना गया है, और उत्पादन की दशाओं को इन शक्तियों के विकास का एक रूप माना गया है, और बाकी सब वस्तुओं को केवल विचारधारात्मक ऊपरी ढांचा कहा गया है, वहां वर्ग युद्ध को वह पद्धति या विधि बताया गया है, जिसके द्वारा मनुष्य का ऐतिहासिक विकास सम्पन्न होता है। उत्पादन की शक्तियां, ज्यों-ज्यों उनके विषय में हमारा ज्ञान और उनपर हमारा आधिपत्य बढ़ता जाता है, निरन्तर विकास की दशा में हैं और ये समाज के राजनीतिक ढांचे (संरचना) में परिवर्तन उत्पन्न करती हैं। परन्तु राजनीतिक रूप कुछ विशिष्ट वर्गो की सत्ता का मूर्त रूप होता है; ये वर्ग साधारणतया उत्पादन के साधनों में हुए परिवर्तनों के साथ-साथ चल नहीं पाते। ये सत्तारूढ़ वर्ग अपने विशेषाधिकारों से चिपके रहते हैं और संघर्ष के बिना परिवर्तनों के सामने झुकते नहीं। मनुष्य को कष्ट उत्पादनशील यंत्र-रचना (मैकेनिज्म) से नहीं होता, अपितु उन सामाजिक सम्बन्धों से होता है, जिनके अधीन रहकर वह उत्पादनशील यंत्र-रचना कार्य करती है। बदलती हुई आर्थिक आवश्यकताओं की यह मांग होती है कि राजनीतिक प्रणाली में भी परिवर्तन हों; और जब प्रभुत्व सम्पन्न वर्ग राजनीतिक परिवर्तनों को रोकने का यत्न करते हैं, तब संघर्ष प्रारम्भ हो जाते हैं। जब परिवर्तन चाहने वाली शक्तियां सबल हो जाती हैं, तब वर्ग-संघर्ष का क्रान्तिकारी दौर शुरू होता है, पुरानी राजनीतिक प्रणाली को हिंसा द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया जाता है और एक नई प्रणाली, जो नई मान्यताओं और हितों का मूर्त रूप होती है, उठ खड़ी होती है। 'कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो' (साम्यवादी घोषणापत्न) में वर्ग- युद्ध के सिद्धान्त को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है, "हमारे समय तक जिन-जिन भी समाजों का अस्तित्व कभी रहा है, उन सबका इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास है; स्वतन्त्र मनुष्य और दास, कुलीन और अकुलीन, सामन्त और अर्धदास, मालिक और शिल्पसंघों के सदस्य, संक्षेप में अत्याचारी और अत्याचारपीड़ित, निरन्तर एक-दूसरे के विरोध में जीवन बिताते रहे हैं, और एक-दूसरे के विरुद्ध अविराम युद्ध करते रहे हैं; ऐसा युद्ध जो कभी तो अप्रकट रूप से गुपचुप चलता था और कभी खुल्लमखुल्ला संघर्ष के रूप में सामने आ जाता था; और हर बार वह युद्ध तभी समाप्त हुआ है, जब या तो समाज में क्रान्तिकारी रूपान्तर हो गया, या जब दोनों ही वर्गों का लोप हो गया।" हम देखते हैं कि लगभग सभी देशों और कालों में वर्ग-संघर्ष चलते रहे और आज उनका महत्त्व पहले की अपेक्षा भी अधिक है। परन्तु इतिहास केवल वर्ग-संघर्षों का ही अभिलेख (रिकार्ड) नहीं है। राष्ट्रों के बीच युद्ध घरेलू युद्धों की अपेक्षा कहीं अधिक संख्या में और कहीं अधिक उय होते रहे हैं; और मानव जाति के इतिहास के प्रारम्भिक भाग में तो जातियों में और नगरों में आपस में युद्ध हुआ करते थे। इस वर्तमान युद्ध (द्वितीय विश्वयुद्ध) में भी वर्ग-चेतना की अपेक्षा राष्ट्रीयता की भावना कहीं अधिक प्रबल है। सारे इतिहास में शासक और शासित, धनी और निर्धन, देश के शत्रुओं के विरुद्ध कन्धे से कन्धा भिड़ाकर लड़ते रहे हैं। हम आज भी अपने देश के पूंजीपति मालिकों की अपेक्षा विदेशी कामगरों से अधिक घृणा करते हैं। कुछ धार्मिक युद्ध भी हुए हैं, जैसे धर्मसुधार (रिफॉर्मेशन) के पक्ष और विपक्ष में हुए युद्ध, जो यूरोप में दो शताब्दियों तक चलते रहे। इन युद्धों में सब वर्गों के लोग, क्या अमीर, क्या गरीब, क्या राजा और क्या किसान, क्या कुलीन और क्या कारीगर, सब बड़े धर्मान्ध जोश के साथ दोनों ही पक्षों की ओर से लड़े। आज मार्क्सवादी भी, कुछ एक अपवादों को छोड़कर, उन पूंजीवादी राष्ट्रों के लिए लड़ रहे हैं, जिनके वे सदस्य हैं। वर्तमान युद्ध को हम वर्ग-भावना का ही विकृत रूप नहीं मान सकते। भारत में हुए हिन्दुओं और मुसलमानों के संघर्ष या आयरलैंड में प्रोटैस्टैंटों और कैथोलिकों में हुए संघर्ष वर्ग-संघर्षों के निदर्शन नहीं हैं। यह ठीक है कि वर्ग-संघर्ष और गृह-युद्ध होते हैं, परन्तु साथ ही धर्मों के और राष्ट्रों के युद्ध भी होते हैं। मानवीय विकास में इन पिछले प्रकार के युद्धों का हाथ अधिक निश्वायक रहा है।
इसके अतिरिक्त यह युक्ति, कि युद्ध पूंजीवाद का अनिवार्य परिणाम है, ऐतिहासिक दृष्टि से सही नहीं है। यह बात सच हो सकती है कि पूंजीवादी साम्राज्यों को नये बाज़ारों की आवश्यकता होती है और उन बाज़ारों को प्राप्त करने के लिए युद्ध छेड़े जाते हैं, परन्तु पूंजीवाद का अस्तित्व तो केवल पिछली कुछ ही शताब्दियों में रहा है, जबकि युद्ध हज़ारों सालों से लड़े जाते रहे हैं। इस बात का भी कुछ निश्चय नहीं है कि यदि सब देशों में एक नये भिन्न प्रकार की सामाजिक प्रणाली आ जाए, तो संसार में शांति स्थापित हो ही जाएगी। विदेशी आक्रमण से अपनी रक्षा करने तथा दूसरे राज्यों में पूंजीवाद को समाप्त करने के लिए साम्यवादी रुस को भी युद्ध करना ही पड़ता है। यदि संसार के सब देशों में साम्यवाद स्थापित हो भी जाए, तो साम्यवाद के सच्चे स्वरूप और उसको लागू करने की पद्धतियों के बारे में मतभेद उठ खड़े होंगे। यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कभी कोई ऐसा समय आ जाएगा, जब लोगों के कोई विरोधी मत और स्वार्थ न रहेंगे; और लोगों में कोई मतभेद न होगा। मानवीय व्यवहार की मुख्य प्रेरक शक्तियां विविध हैं। देश का प्रेम, सत्तालोलुपता, यूथ की सहजवृत्ति उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं, जितनी कि संग्रहशीलता और महत्त्वाकांक्षा। जब तक अपनी सम्मतियों, वासनाओं और इच्छाओं के समर्थन में उन लोगों से, जो उनका विरोध करते हैं, लड़ने की प्रवृत्ति की रोकथाम नहीं की जाती, तब तक सामाजिक प्रणाली चाहे कोई-सी भी क्यों न हो, युद्ध होते ही रहेंगे। यदि मानव-स्वभाव ही न बदल जाए, तो तीव्र मतभेदों का निपटारा युद्ध के शस्त्रों द्वारा ही होता रहेगा; और हमारी ये आशाएं, कि कोई ऐसा समय आएगा जब विरोधों का निर्णय तलवार की धार से न होकर मनोबल द्वारा होगा, टलती ही रहेंगी। इतिहास को केवल आन्तरिक (घरेलू) संघर्षों की एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत करना और जाति, धर्म, और देशभक्ति की शक्तियों की उपेक्षा कर देना मानवीय विकास की पेचीदा समस्या को आवश्यकता से अधिक सरल मान लेना है। ऐंजिल्स ने इस सम्बन्ध में कुछ सतर्कतापूर्ण शब्द कहे हैं, "मार्क्स ने और उसने अपने खण्डनात्मक वक्तव्यों में कहीं-कहीं बढ़ा-चढ़ाकर बातें कह दी हैं। उन्होंने यह नहीं सोचा था कि वे कोई ऐसे गुर (सून) प्रस्तुत कर रहे हैं, जिनके द्वारा इतिहास की सब घटनाओं की व्याख्या हो सकेगी; यदि ऐसा कर पाना सम्भव होता, तो ऐतिहासिक कालों को पूरी तरह समझ पाना उतना ही सरल हो जाता, जितना कि एक मामूली समीकरण को हल करना।"
मार्क्स ने जिस सत्य की ओर ध्यान खींचा है, वह यह है कि आधुनिक तकनीकों द्वारा वस्तुओं का उत्पादन इतने विशाल परिमाण में हो रहा है कि यदि केवल वितरण की व्यवस्था कुछ भिन्न प्रकार से की जाए, तो उनसे सब लोगों की आवश्यकताएं पूरी हो सकती हैं; और इससे उन लोगों का असन्तोष दूर हो जाएगा, जो इस समय भूख से पीड़ित हैं। भूखे लोग कुछ कर मरने को उतारू होते हैं, जैसे कि सन्तुष्ट लोग कभी हो नहीं सकते और 'कम्युनिस्ट घोषणापत्न' उन भूखों को प्रभावित करता है। यह इन शब्दों के साथ समाप्त होता है, "कम्युनिस्टों को अपने विचारों को और अपने उद्देश्यों को छिपाने से घृणा है। वे खुल्लमखुल्ला घोषणा करते हैं कि उनके उद्देश्य वर्तमान सब सामाजिक दशाओं को केवल बलपूर्वक उलट डालने से ही पूरे हो सकते हैं। शासक-वर्ग कम्युनिस्ट क्रान्ति से कांपते हैं, तो कांपें। श्रमिक-वर्ग के पास गंवाने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवाय और कुछ है ही नहीं। जीतने के लिए उनके सामने सारा संसार है। सब देशों के कामगरो, एक हो जाओ।" आर्थिक क्षेत्ल में 'स्वेच्छाचारी व्यक्तिवाद' के सिद्धान्त के विरुद्ध मार्क्स का प्रतिवाद उचित है। बढ़ती हुई आर्थिक विषमता के सम्मुख राजनीतिक स्वतन्त्रता का मूल्य बहुत कम है। यह मान लेना कि आर्थिक क्षेत्र में हितों की समस्वरता स्वयं उत्पन्न हो जाएगी, यह विश्वास कि यदि प्रत्येक व्यक्ति सोच-समझकर अपना हित पूरा करने की कोशिश करेगा, तो समाज को स्वतः ही अधिकतम लाभ होगा, समर्थनीय नहीं है। व्यक्ति अपने हित के लिए कार्य करते हुए, उसी प्रक्रिया में, समाज के प्रति अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर रहा होता। जनसाधारण का ध्यान व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की ओर उतना नहीं है, जितना कि धन्धों, भोजन और पर्याप्त सुरक्षा की ओर।
भौतिकवादी परिकल्पना द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के संशोधित रूप में भी भौतिकवाद के अन्य रूपों की अपेक्षा कुछ अधिक सन्तोषजनक नहीं है। यह दृष्टिकोण, कि मन केवल भौतिक तत्त्व का ही एक कृत्य है, और इसके विचारों तथा विकास का निर्धारण भौतिक संघटित संस्था (ऑर्गेनिज़्म) की प्राकृतिक दशाओं द्वारा, प्रत्येक पीढ़ी के सामाजिक और आर्थिक ढांचे और भौतिक प्रक्रिया द्वारा, जिसका कि वह 'भौतिक संघटित संस्था एक कृत्य है, होता है, एकपक्षीय और भ्रामक है। इतिहास एक सुघटित और सृजनशील प्रक्रिया है, यह धारणा मार्क्स ने केवल हेगल से ही नहीं ली, अपितु अपने यहूदी पूर्वजों से ली है। इस साभिप्राय आदर्श (नमूना) और इस सृजनशील गतिविधि की व्याख्या उत्पादनशील शक्तियों के विकास के रूप में नहीं हो सकती। उत्पादनशील शक्तियों का सारा विकास मनुष्य की सृजनशील अन्तःप्रेरणा द्वारा हुआ है। सृजनात्मक अन्तःप्रेरणा का स्रोत कौन-सा है? मनुष्य केवल पशु की 'भांति जीकर ही संतुष्ट क्यों नहीं रह लेता ? यदि यह मान भी लिया जाए कि संसार द्वन्द्वात्मक अनिवार्यता के द्वारा यथासमय निष्पत्ति की ओर, अस्तित्व की एक नई व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, तो भी इसके जीवन और गति का स्रोत कौन-सा है? यह कहना कि इतिहास एक सप्रयोजन प्रक्रिया है, भौतिकवादी दृष्टिकोण की यथेष्टता से इनकार करना है। यह मान लेना कि यह एक परम तथ्य है, इसे रहस्य-रूप में ही छोड़ देना है। और रहस्य धर्म का जन्मस्थल है। इसके अतिरिक्त धर्म मानवीय प्रकृति को नये रूप में बदल डालना चाहता है और मार्क्स का विश्वास है कि इसका परिणाम सामाजिक परिवर्तन द्वारा प्राप्त होता है। वह लिखता है, "बाह्य जगत् पर क्रिया करने और उसे परिवर्तित करने के द्वारा मनुष्य स्वयं अपनी प्रकृति (स्वभाव) में भी परिवर्तन कर रहा होता है।"[22] सामाजिक जीवन की दशाओं पर नियंलण करके मनुष्य अपनी प्रकृति को अपनी स्वतन्त्र इच्छा के अनुसार नये रूप में बदल सकता है। मार्क्स कहता है, "मोशिये प्रूधों को मालूम ही नहीं कि सारा इतिहास मानवीय प्रकृति के अधिकाधिक बढ़ते हुए रूपान्तरण के सिवाय और कुछ नहीं है;" और धर्म का उद्देश्य भी ठीक यही है।
विज्ञान और धर्म के बीच चलनेवाला इतिहास-प्रसिद्ध विवाद अब पुराना क्योंकि वह विज्ञान, जो धर्म को चुनौती देता था, आज वैसा ही मर चुका है, जैसाकि वह धर्म, जिसे वह चुनौती दिया करता था। आज समस्या धर्म के अविश्वसनीय कट्टर सिद्धान्तों के विषय में नहीं है, अपितु इस ब्रह्माण्ड में आत्मिक तत्त्व का जो स्थान है, उसके विषय में है; इस आत्मिक तत्त्व की व्याख्या विज्ञान द्वारा बिल्कुल ही नहीं हो सकती। आत्मा का राज्य हममें से हरएक के अन्दर विद्यमान है, सदा से विद्यमान रहा है और सदा रहेगा। इसे सूक्ष्म निरीक्षण द्वारा या बाह्य परिवर्तनों द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता।
जो भारतीय लोग मार्क्सवादी सामाजिक कार्यक्रम की ओर आकर्षित हुए हैं, उन्हें चाहिए कि वे इसका मेल भारतीय जीवन के आधारभूत लक्ष्यों के साथ बिठाएं। एक स्वप्नलोक (आदर्शलोक, युटोपिया) की रचना और एक ऐतिहासिक आदर्श की रचना में काफी अन्तर है। किसी भी दिए हुए समय की सुनिर्दिष्ट परिस्थितियों से बिलकुल पृथक् एक अव्यक्त धारणा स्वप्नलोक है, जो एक पूर्ण सामाजिक व्यवस्था का एक कल्पनाप्रसूत आदर्श है। दूसरी ओर, ऐतिहासिक आदर्श में सुनिर्दिष्ट स्थितियों का ध्यान रखा जाता है और उसका आधार परम पूर्णता नहीं, अपितु सापेक्ष पूर्णता होती है। किन्हीं आधारभूत विशेषताओं के सम्बन्ध में ऐतिहासिक उन्नति का निर्धारण एक सुनिर्दिष्ट पृष्ठभूमि द्वारा होता है; भले ही उसके भावी विकास के सम्बन्ध में निश्चय से कुछ न कहा जा सकता हो। भविष्य को अग्रिम रूप से स्वतन्त्र नहीं कर दिया गया; और मानवीय आत्मा, जो स्वाधीनता की भावना से सम्पन्न है, बाह्य और आन्तरिक आवश्यकताओं पर विजय पा सकती है और इतिहास की गति का निर्धारण कर सकती है। भारत के लिए आदर्श सामाजिक व्यवस्था वही हो सकती है, जिसमें हमारे जीवन की उस आध्यात्मिक दिशा का पूरा ध्यान रखा गया हो, जिसमें से कम्युनिस्टों का केन्द्रीय सिद्धान्त, कि सब मनुष्य भाई-भाई है, निकला है। उन युवकों से, जिन्हें यह निश्चय है कि धर्म के दिन बीत चुके हैं, हम कह सकते हैं कि वे इस प्रकार के महत्त्वपूर्ण विषयों पर दृढ़ सम्मतियां बनाने के लिए सबसे कम योग्य हैं और इसीलिए ऐसी सम्मतियां बनाने के लिए सबसे अधिक अधीर हैं। इस विषय में प्लेटो की सलाह एकदम असंगत नहीं है।'[23]
रूस पर हिटलर के आक्रमण ने सब धार्मिक संस्थाओं की ओर से, जिनमें चर्च और सम्प्रदाय-संस्थाएं (सैक्टरी) भी समान रूप से सम्मिलित हैं, देशभक्तिपूर्ण उत्साह के प्रादुर्भाव को प्रोत्साहन दिया है। अब उनके ऊपर 'क्रान्ति-विरोधी' षड्यन्त्रों से सम्बद्ध होने का शक नहीं किया जा सकता। धार्मिक संस्थाओं की ओर से रूसी सरकार के सच्चे और सोत्साह समर्थन का परिणाम यह हुआ कि स्तालिन ने कट्टर पंथी चर्च के नेताओं को अधिकृत रूप से भेंट के लिए बुलाया और इस बात को माना कि उन्हें पेट्रियार्क (प्राधिधर्माध्यक्ष) का चुनाव करने तथा एक पवित्न धर्मसभा (होली साइनोड) का गठन करने के लिए राष्ट्रीय सभा (नेशनल असेम्बली) बुलाने की स्वतन्त्रता है।'[24] सोवियत सरकार धार्मिक स्वतंत्रता को स्वीकार करती है और उन मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करती, जिनका सम्बन्ध उचित रूप से चर्च के साथ है। चर्च के प्रति पहले का उम्र विरोध मुख्यतया चर्च के अबुद्धिमत्तापूर्ण अप्रजातंत्त्रीय दृष्टिकोण के कारण था; और इस कारण कि चर्च रोमानौफ वंश का जरा-दुर्बल दास-सा बना हुआ था। बहुत-सी ज्यादतियां हुईं, जिनके विषय में अब चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है। हो सकता है कि अब भी रूसी सरकार ने अपनी नीति राजनीतिक कारणों से बदली हो। प्रेरक कारण चाहे कुछ भी क्यों न रहे हों, किन्तु यह ऐतिहासिक निश्चय इस बात की स्वीकृति का द्योतक है कि जनता के जीवन में धर्म का स्थान है।
मार्क्स और उसके साथी जिन उद्देश्यों को दृष्टि में रखकर चल रहे हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए, अप्रिय घृणाओं को समाप्त कर डालने के लिए आध्यात्मिक पुनरुज्जीवन की आवश्यकता है। नई विश्व-व्यवस्था में उसे एकता और प्रेरणा प्रदान करने के लिए गहरा आध्यात्मिक आवेश का होना आवश्यक है। सामाजिक कार्यक्रम के लिए केवल वही बुद्धिसंगत आधार प्रदान कर सकता है। हमें जैसा कि स्वर्गीय हेनरी बर्गसन ने कहा था, "सारी मानव जाति के सांझे उस परमात्मा की ओर देखना चाहिए, जिसकी केवल एक झलक मिलने का, यदि किसी प्रकार मनुष्य उसे पा-भर सके तो, अर्थ यह होगा कि युद्ध का अविलम्ब समूलोच्छेद हो जाए।" जिस परमात्मा का संकेत बर्गसन ने किया है, उसकी झलक हम किस प्रकार पा सकते हैं? हम पाप और असारता से मुक्त होकर किस प्रकार उस भगवान को देखने की अन्तर्दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं, जो सबके लिए एक है? धर्म का आधार व्यक्ति के सारभूत मूल्य और गौरव का उद्घाटन और वास्तविकता के उच्चत्तर संसार के साथ व्यक्ति का सम्बन्ध है। जब मानव-प्राणी यह अनुभव करता है कि वह पाशविक प्रकृति की अपेक्षा उच्चतर एक वास्तविकता की व्यवस्था का अंश है, तो वह सांसारिक सफलता से या भौतिकवादी विज्ञान की विजयी रस्ता सन्तुष्ट नहीं हो सकता। उसमें अपने आदर्शो के लिए शहीद होने की क्षमता है, यह तथ्य इस बात का सूचक है कि मनुष्य शाश्वत वास्तविकताओं के संसार में रहता है और उसीके लिए जीता है। पूजा मनुष्य का (दिव्य) ब्रह्म तक पहुंचने का प्रयत्न है। धर्म वह अनुशासन है, जो अन्तरात्मा को स्पर्श करता है और हमें बुराई और कुत्सितता से संघर्ष करने में सहायता देता है; काम, क्रोध और लोभ से हमारी रक्षा करता है; नैतिक बल को उन्मुक्त करता है। संसार को बचाने का महान कार्य के लिए साहस प्रदान करता है। मन के अनुशासन के रूप में इस (धर्म) में उस बुराई का मुकाबला करने की कुंजी और सारभूत साधन विद्यमान हैं, जो सभ्य संसार के अस्तित्व के लिए खतरा बनी हुई है। इसमें हमारे विचार और आचरण को आत्मा के धर्मों का वशवर्ती बनाने की बात निहित है।
अतीत में धर्म जादू, टोने, नीम हकीमों और अन्धविश्वास के साथ मिश्रित रहा है। उन धर्मसिद्धान्तों को, जो किसी समय दिव्य जीवन की ओर ले जानेवाले मार्ग थे, पर आज रुकावट बने हुए है, मनुष्य और परमात्मा के बीच में रोक बनकर खड़े न होने देना चाहिए और आध्यात्मिक जीवन की सारभूत सरलता को नष्ट न करने देना चाहिए। धर्म को, जैसाकि इसके नाम से ही ध्वनित होता है, एक ऐसी संघटक, परस्पर बांधने वाली शक्ति होना चाहिए, जो मानव-समाज की सुदृढ़ता को और गहरा करती हो, भले ही उसके ऐतिहासिक स्वरूपों में अनेक स्पष्ट लुटियां रही हों। अपने तत्त्व-रूप में धर्म आध्यात्मिक अभियान के लिए आह्वान है। यह धर्म धर्मविज्ञान (थियोलॉजी) नहीं है, अपितु धर्म का व्यवहार और अनुशासन है। आत्मा के दर्द की, जिसने अपने-आपको शाश्वत से पृथक् कर लिया है यही एकमात्र औषध है। जब मानव-आत्मा इसके स्रोतों और इसकी शर्तों की अवज्ञा करती हैं, तब वह उन्मत्त और आत्मघाती बन जाती है। व्यक्ति और शाश्वत के बीच लुप्त हो गए सम्बन्ध को पुनः स्थापित करना ही धर्म का लक्ष्य है।
धर्म का सार उन धर्म-सिद्धान्तों में और धार्मिक मतों में, विधियों में और संस्कारों में नहीं है, जिनसे हममें से अनेक को विरक्ति होती है, अपितु युगों की गम्भीरतम बुद्धिमत्ता में, अनवरत तत्त्वज्ञान में, सनातन धर्म में है, जो आधुनिक विचार की किंकर्तव्यविमूढ़ अस्तव्यस्तता में हमारा एकमात्र पथप्रदर्शक है। विभिन्न धर्म सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते, अपितु सत्य के उन विभिन्न पक्षों और धारणाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें कि लोग विश्वास करते रहे हैं। वे उस एक ही सत्य की विविध ऐतिहासिक अभिव्यक्तियां हैं, जो अपनी प्रामाणिकता की दृष्टि से सार्वभौम और सार्वकालिक है। सेंट आगस्टाइन कहता है, "जिसे ईसाई धर्म कहा जाता है, वह प्राचीन लोगों में भी विद्यमान था, और मानव जाति के प्रारम्भ से लेकर ईसा के शरीर धारण करने के समय तक कोई वक्त ऐसा नहीं रहा, जब इसका अस्तित्व न रहा हो, ईसा के आगमन के बाद सच्चे धर्म को, जो पहले से ही विद्यमान था, ईसाई धर्म कहा जाने लगा।"[25]
इस सृजनशील प्रसव पीड़ा के काल में, अपने कष्ट-सहन की गंभीरता के कारण भी, भारत को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि वह संसार के लिए प्रकाश बन सके, सार्वभौम महत्त्व के एक सेदेश का वाहक बन सके। भारत कोई जातीय व्यक्तित्व नहीं है, क्योंकि जातीय 'भवितव्यता बनावटी है। विशुद्ध जातीय रूप तो नृविज्ञान की आदर्श कल्पनाएं-भर है । वास्तविक जीवन में ऐसे व्यक्तियों को प्राप्त कर पाना सरल नहीं है, जिनमें किसी एक ही जाति की सब विशेषताएं एकत्र विद्यमान हों। सभी जगह मनुष्यों में विभिन्न जातियों की विशेषताएं मिली-जुली मिलती हैं, यहां तक कि एक ही परिवार के सदस्यों में भी एक ही जाति की विशेषताएं शायद ही कहीं दीख पड़ती हों। भारतीय संस्कृति जातीय दृष्टि से एकदेशीय नहीं है, अपितु इसने सब जातियों के लोगों को प्रभावित किया है। अनुभूति और उद्देश्य की दृष्टि से यह अन्तर्राष्ट्रीय है। भारत के प्रतीकरूप धर्म हिन्दुत्व में यही भावना विद्यमान है; वह भावना, जिसमें इतनी असाधारण जीवनी शक्ति है कि वह राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों के बाद भी बची हुई है। जब से भी इतिहासकार का अभिलेख उपलब्ध है, तभी से वह आत्मा की पवित्न ज्वाला का साक्ष्य प्रस्तुत करता रहा है; वह ज्वाला सदा, तब भी जबकि राजवंश नष्ट होते हों और साम्राज्य टूटकर खंडहर बनते हों, विद्यमान रहेगी। केवल यही पवित्र ज्वाला हमारी सभ्यता को आत्मा, और नर-नारियों को जीवन का एक सिद्धान्त प्रदान कर सकती है।
मनुष्य में एक, न केवल जीने की, अपितु गौरव के साथ जीने की तत्त्वगत (मौलिक) आकांक्षा विद्यमान है। जब हमारे इस गौरवपूर्ण जीवन के आवेश को ब्रह्मांडीय समर्थन प्राप्त हो जाता है, तब हमारे अन्दर एक विशिष्ट प्रकार का धार्मिक उत्साह भर उठता है। ऐसा व्यक्ति कोई भी नहीं है, जिसके मन में कभी न कभी ये आधारभूत प्रश्न न उठे हों- मैं क्या हूं? मेरा मूल कहां है? मेरी भवितव्यता क्या है?[26] इसके अतिरिक्त हमें इस विश्व के रहस्य पर विस्मय की अनुभूति होती है, इसकी सुव्यवस्थितता में विश्वास होता है; हमें चिर-काल से बनी आ रही पहेलियों के उत्तरों की अन्तहीन खोज है और वस्तुओं की सचाई को खोज निकालने की अधीरतापूर्वक लालसा है। उस सचाई को, जो इस अर्थ में सार्वभौम और परम है कि वह सब मनुष्यों के लिए, सब देशों और कालों के लिए प्रामाणिक है। रहस्यमय का अनुभव सब धर्मों के मूल में विद्यमान आधारभूत गुण है। गेटे कहता है, "विचारक के रूप में मनुष्य का सबसे बड़ा आनन्द यह है कि जिसकी थाह पाई जा सकती है, उसकी थाह पा ली जाए, और जिसकी थाह नहीं पाई जा सकती (अथाह), उसके सम्मुख श्रद्धा से सिर झुका दिया जाए।" कुछ ऐसे तथ्य और मान्यताएं (जीवन-मूल्य) हैं जिनकी कोई व्याख्या नहीं की जा सकती। हम यह नहीं जानते कि इस संसार का अस्तित्व किसलिए है, और मान्यताओ के जगत् के साथ, जो देश और काल के संसार की अपेक्षा कम वास्तविक नहीं है, इसका क्या सम्बन्ध है। यदि हम मानवीय तर्कबुद्धि की इन सीमाओं को पहचान सकते हैं, और उन्हें स्वीकार कर सकते हैं, तो इसका कारण केवल यही है कि हमारे अन्दर एक आत्मा है, जो तर्कबुद्धि की अपेक्षा कहीं अधिक उत्कृष्ट है, वही तर्कबुद्धि को अपने उपकरण (साधन) के रूप में प्रयुक्त करती है। इन दोनों को पृथक् नहीं किया जा सकता; क्योंकि आत्मा तो वस्तुतः वह समूचा व्यक्तित्व है। जो अपने उच्चतर अंश के पथ-प्रदर्शन में कार्य करती है; और जब आत्मा कार्य करती है, तब हमें परमात्मा का दर्शन होता है। यद्यपि बौद्धिक प्रवृत्ति मानवीय मन के लिए स्वाभाविक (नैसर्गिक) है, परन्तु इसकी सुस्पष्ट भवितव्यता तो इसकी अवयव भूत (मुख्य) ही है। कभी न कभी हममें से प्रत्येक ने अवैयक्तिक आनन्द के उन क्षणों का अनुभव किया होगा, जब ऐसा लगता है कि हम इस स्थूल पृथ्वी पर नहीं चल रहे, अपितु हवा में उड़ रहे हैं, जब हमारा सारा अस्तित्व एक ऐसे सान्निध्य से ओतप्रोत हो उठता है जो अवर्णनीय होते हुए भी अनुभूतिगम्य है, जब हम एक अपार्थिव (दिव्य) वातावरण में स्रान कर रहे होते हैं, जब हम परम आनन्द की सीमाओं तक को स्पर्श कर लेते हैं, जहां पहुंचकर स्वार्थ साधना और अतृप्त लालसाएं उपलब्धि और प्रशान्तता के सम्मुख घुटने टेक देती हैं। इस प्रकार के अन्तर्दृष्टि के क्षण और आनंद की मनोदशाएं व्यक्तित्व को ऊंचा उठानेवाली, विस्तार प्रदान करनेवाली, गहराई तक ले जानेवाली और समृद्ध बनानेवाली होती हैं, और फिर भी वे उसका विश्व के साथ एकात्म्य स्थापित करती हैं। चूर-चूर कर देनेवाली गहराई के और तीव्र उल्लास के इन अनुभवों में, जबकि हम पंखों द्वारा ऊपर उठकर वास्तविकता को स्पर्श करने लगते हैं, जब हम प्रकाश से भर उठते हैं और आत्मा के सान्निध्य के वातावरण से भर उठते हैं, हमारा मन आश्चर्यजनक स्पष्टता से भर जाता है और हम अपने-आपको एक मित्रतापूर्ण विश्व का अंग अनुभव करने लगते हैं। जिनके चरित्न और सत्यनिष्ठा पर कोई आक्षेप किया ही नहीं जा सकता, ऐसे लोगों ने बड़े गम्भीर शब्दों में बताया है कि किस प्रकार उनका सारा अस्तित्व ही रूपान्तरित हो गया। आत्मा ही उनका जीवन, प्रकाश और आनन्द है। उनका सम्पूर्ण स्वभाव अनुसन्धान की गतिविधि है, ज्ञान-प्राप्ति का प्रयत्न। वे तो अपनी आत्मा की शांति में रह रहे होते हैं, परन्तु उनके शरीर जीवनी-शक्ति से प्रबल और अविलम्ब्य होते हैं।
धर्म का मूल एक प्रकार की विस्मय की अनुभूति में और स्वयं जीवन के शाश्वत रहस्य में, इसकी चारुता और शक्ति में, जब हम किसी तृप्तिदायक वस्तु को प्राप्त करते हैं, तब होनेवाले परम उल्लास के अनुभव में है; और इनके अभाव में मनुष्य मृतक-सदृश है। "अरी गार्गी, जो इस 'अविनश्वर' को बिना जाने इस संसार से प्रयाश कर जाता है, वह दरिद्र है, दया का पाल है; दूसरी ओर, जो कोई इस 'अविनश्वर' का ज्ञान प्राप्त करके इस संसार से प्रयाण करता है, वह ब्राह्मण है।"[27] और फिर, "यदि हम उसका ज्ञान यहीं प्राप्त कर लें, तब तो जीवन सफल है, पर यदि हम उसे यहां न जान पाएं, तो यह महान विपत्ति है।"[28] यदि मानव-जीवन शाश्वत के साथ सम्पर्क स्थापित करने की अदम्य लालसा से प्रेरित न हो, तो उस जीवन का कुछ अर्थ ही नहीं है। प्लौटिनस कहता है, "इसके लिए वह सर्वोच्च 'सौन्दर्य, वह परम और मूल सौन्दर्य, अपने प्रेमियों को सौन्दर्य के अनुकूल गढ़ता है और उन्हें प्रेम के योग्य भी बनाता है। और इसके लिए आत्माओं के सामने कठोरततम और चरम संघर्ष प्रस्तुत किया जाता है, हमारा सारा श्रम इसीके लिए है कि कहीं हम इस सर्वश्रेष्ठ झलक का कुछ भी अंश पाए बिना न रह जाएं, जिसे प्राप्त करना आनन्दमय दृष्टि में धन्य होना है; और जिसे प्राप्त करने में असफल रहना चरम असफलता है। क्योंकि जो व्यक्ति रंगों और दीख पड़नेवाले रूपों से मिलनेवाले आनन्द को पाने में असफल रहता है, शक्ति और सम्मान पाने में असफल रहता है, वह असफल नहीं है; अपितु केवल वह असफल है, जो 'इस' आनन्द को पाने में असफल रहता है, जिसे पाने के लिए उसे राज्यों को भी त्याग देना चाहिए।"
जब तक उस 'सर्वोच्च' (परमेश्वर) की झलक न मिले, तब तक जीवन अपूर्ण रहता है। आत्मा की भी ठीक वैसी ही आंखें हैं, जैसी शरीर की हैं; उन आंखों से वह परम सत्य का ज्ञान प्राप्त करती है और परम पूर्णता से, जो परमात्मा है, प्रेम करना सीखती है। "जैसे आंख आकाश को देखती है, वैसे ही साधक लोग परमात्मा के उच्चतम निवासस्थान को सदा देखते हैं।"[29] इस प्रकार के अनुभव मानव- परिवार[30] की सभी शाखाओं में होते रहे हैं, यद्यपि विभिन्न कालों में और विभिन्त जातियों में उनकी व्याख्याएं अलग-अलग ढंग से होती रही हैं। मूसा आवेश में कह उठता है, "शाश्वत परमात्मा ही मेरा आश्रय है और नीचे अनन्त बांहें है।"[31] साम (ईसाई भजन, स्तोत्र) लेखक भी इसी प्रकार के, शाश्वत निवास में ले जाए जाने के, और उस 'एक' के साथ, जो पर्वतों के जन्म से भी पहले, संसार की रचना से भी पहले विद्यमान था, साहचर्य के अनुभव की चर्चा करता है।[32] आत्मा का संसार प्लेटो के दर्शन का एक आवश्यक अंग है। उसकी दृष्टि में यह आत्मजगत् ही सत्य, शिव और सौंदर्य का आधार और आश्रय है। मानवीय मन केवल भौतिक तत्त्व के संसार तक ही सीमित नहीं है और इसे वास्तविकता के लोकोत्तर और अतीन्द्रिय क्षेत्र के साथ घनिष्ठ सम्पर्क तक ऊंचा उठाया जा सकता है। सेंट पाल लिखता है, "भले ही हमारा बाह्य मनुष्य नष्ट हो जाए, फिर भी हमारा अन्तरिक मनुष्य दिनोंदिन नया और नया होता जाता है....। हम उन चीज़ों की ओर नहीं देखते, जो दिखाई पड़ती हैं, बल्कि उन चीज़ों की ओर देखते हैं, जो दिखाई नहीं पड़तीं; क्योंकि जो चीजें दिखाई पड़ती हैं, वे क्षणभंगुर हैं; और जो चीजें दिखाई नहीं पड़तीं वे शाश्वत हैं।"[33] प्लौटिनस (ईस्वी सन् 207-270) कहता है, "कई बार ऐसा हुआ कि मैं अपने शरीर से बाहर, ऊपर उठाकर अपनी आत्मा में पहुंचा दिया गया; इस प्रकार मैं अन्य सब वस्तुओं से पृथक् होकर आत्मकेन्द्रित हो गया; मुझे अद्भुत सौन्दर्य के दर्शन हुए; मुझे पहले भी किसी भी समय की अपेक्षा एक उच्चतम व्यवस्था के साथ सम्मिलन का विश्वास हुआ; मुझे दिव्य सत्ता के साथ तादात्म्य प्राप्त हो गया।"[34] "एक बार वहां पहुंचकर आत्मा इस अनुभव का विनिमय विश्व की किसी भी वस्तु से करने को तैयार नहीं होगी; यहां तक कि यदि उसे सम्पूर्ण नक्षत्रों समेत आकाश-मण्डल दे दिया जाए, तो उसके बदले भी वह इस अनुभव को छोड़ने को तैयार नहीं होगी; इस अनुभव से बढ़कर उच्चतर और उत्कृष्टतर वस्तु और कुछ नहीं है। इससे और ऊपर जाना हो ही नहीं सकता।"[35] आगस्टाइन ने अपनी दोष-स्वीकृतियां इन स्मरणीय शब्दों से प्रारम्भ कीं, "हे प्रभु, तूने हमें अपने लिए बनाया है, और जब तक हम तुझमें पहुंचकर शान्ति प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक हमारे हृदय अशान्त रहते हैं।" उसके लेखों में ऐसे अनेक संदर्भ हैं, जिनसे यह सूचित होता है कि अपने जीवन के महान क्षणों में वह 'उस' तक पहुंच गया था, जो "एक कौंध में, एक छलांग में उस शाश्वत बुद्धिमत्ता को स्पर्श कर लेता है, जो अनन्तकाल स्थायी है" और जो स्वयं वह बुद्धिमता है। मुहम्मद ने ज़ोर देकर कहा था कि परमात्मा सचमुच है, इस बात को सिद्ध करने के लिए अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। उसके अपने इस अनुभव की कि "परमात्मा मेरी अपनी गर्दन की नस से भी मेरे ज़्यादा नज़दीक है।"[36] गवाही ही इसके लिए काफी है। सेंट टामस ऐक्वाइनास को एक उल्लेखनीय अनुभव हुआ था। जब वह नेपल्स में मास (खीष्ट याग, यज्ञ) कर रहा था, तब उसने अपनी कलम और दवात एक ओर रख दी, और उसके बाद अपने अपूर्ण ग्रंथ 'सम्मा थियोलौजिका' का एक शब्द भी आगे नहीं लिखा। उससे अपने इस महान ग्रन्थ को पूर्ण करने को कहा गया, तो उसने उत्तर दिया, "मैंने उसके दर्शन कर लिए हैं, जिसके कारण मैंने जो कुछ लिखा है और उपदेश दिया है, वह मुझे तुच्छ लगने लगा है।" जब एक शिष्य ने बगदाद के सूफी रहस्यवादी साधक जनैद से कहा, "मैंने सुना है कि आपके पास दिव्यज्ञान का मोती है; आप उसे मुझे दे दीजिए, या बेच दीजिए।" जनैद ने उत्तर दिया, "मैं वह मोती तुम्हें बेच नहीं सकता, क्योंकि तुम्हारे पास चुकाने के लिए उसकी कीमत नहीं है; और यदि मैं तुम्हें वह यों ही दे दूं, तो तुम उसे बहुत सस्ते में पा रहे होगे और तुम्हें उसके मूल्य का पता ही नहीं चलेगा। मेरी तरह तुम इस (परमात्मा के) समुद्र में सिर के बल कूद पड़ो, जिससे कि तुम स्वयं ही उस मोती को पा सको।"[37]
जब हम उस वास्तविक का स्पर्श करते हैं, तो हम,
परमात्मा में लीन हो जाते हैं जैसे प्रकाश प्रकाश में; हम उड़ते हैं
स्वेच्छा से एक होकर।
धार्मिक अनुभूतियां उतनी ही पुरातन हैं, जितना मुस्कराना और रोना, प्यार करना और क्षमा करना। परमात्मा की अनुभूति कई ढंगों से होती है, प्रकृति के साथ घनिष्ठ सम्पर्क द्वारा, अच्छाई की पूजा द्वारा और...
सूर्यास्त के स्पर्श,
फूलों की घंटी की कल्पना, किसीकी मृत्यु
यूरीपिडीज़ के किसी नाटक की सम्मिलित-गानमय समाप्ति
द्वारा। यह अनुभूति जीवन के शनैः शनैः उच्चतर होते जाने से लेकर परमात्मा में भाव-समाधि की तीव्रतम कोटि तक अविराम व्याप्त रहती है।
विचारों की कोई भी गम्भीर साधना, विश्वासों की कोई भी खोज, सद्गुणों के अभ्यास का कोई भी प्रयत्न, ये सब उन्हीं स्रोतों से उत्पन्न होते हैं, जिनका नाम धर्म है। मन द्वारा सौन्दर्य, शिवत्व और सत्य की खोज परमात्मा की ही खोज है। माता के स्तनों का दूध पीता हुआ शिशु, असंख्य तारों की ओर निहारता हुआ अशिक्षित जंगली, अपनी प्रयोगशाला में सूक्ष्मवीक्षण के नीचे जीवन का अध्ययन करता हुआ विज्ञानवेत्ता, एकान्त में संसार के सौन्दर्य और करुणा का चिन्तन करता हुआ कवि, तारा- आलोकित आकाश के, उच्च हिमालय के या प्रशान्त समुद्र के सम्मुख, या इन सबसे बढ़कर चमत्कार एक ऐसे मनुष्य के सम्मुख, जो महान भी है और अच्छा भी, श्रद्धापूर्वक खड़ा हुआ एक साधारण मनुष्य, इन सबमें एक अस्पष्ट-सी शाश्वत की भावना और स्वर्ग के लिए संवेदना विद्यमान है।
सच्चे अर्थों में धार्मिक व्यक्ति का धर्म बिलकुल सीधा-सादा होता है, जिसमें धर्म-विश्वासों, धर्म-सिद्धान्तों के मनोभावों या आधिदैविक तत्त्वों की बेड़ियां नहीं होतीं। यह उस आत्मा की वास्तविकता का प्रतिपादन करता है, जो काल और देश के ऊपर व्याप्त है। अपनी व्यावहारिक अभिव्यक्ति के लिए इसकी यह सूक्ति होती है, "जो भी कोई भला करता है, वह भगवान का है।" न्यायपूर्वक आचरण करना, सौन्दर्य से प्रेम करना और सत्य की भावना के साथ विनम्रतापूर्वक चलना यही सबसे ऊंचा धर्म है।'[38] यह अनुभव किसी एक जाति या एक जलवायु (प्रदेश) तक ही सीमित नहीं है। जब भी कभी आत्मा, किसी भी देश में या किसी भी जाति की सीमाओं में, अपने वास्तविक रूप में आती है, जब भी कभी यह अपनी आन्तरिक गहराइयों में केन्द्रित हो उठती है, जब कभी इसकी अनुभूतिशीलता पर अपने आसपास के गम्भीर जीवन की धाराओं का प्रतिभावन (रिस्पोंस) होता है, तब यह अपनी सच्ची प्रकृति को प्राप्त होती है और आनन्द सहित रोमांचकारी उल्लास के साथ पर-आत्मा के जीवन में रहने लगती है। जिनकी चेतना सर्वोच्च आत्मा में, बुद्धि और आनन्द के अपार समुद्र में, लीन हो गई, उसे जन्म देकर माता सफल- मनोरथ हो जाती है, परिवार पवित्न हो जाता है और उससे सारी पृथ्वी पुण्यवती हो उठती है।'[39]
जो संसार अधिकाधिक गम्भीर शोकान्त विपत्ति में भटक रहा है, उसकी मुक्ति किसी अन्य उपाय द्वारा नहीं हो सकती। मानव जाति के विस्तृत जगत् की सब प्रमुख आध्यात्मिक सामग्रियों का मूल आधार मानव जाति की वास्तविक, आत्मिक एकता की स्वीकृति (मानना) है; एक ऐसी एकता, जिसका, व्यक्ति अपनी प्रकृति की गहराई में, अन्य किसी भी अनुभूतिमूलक समाज की अपेक्षा अधिक अंग है। उन व्यावहारिक रोकों का, जो हमें एक-दूसरे से पृथक् करती है, अस्तित्व उससे गहरे स्तर पर पहुंचकर समाप्त हो जाता है। यदि हम आध्यात्मिक वास्तविकता में केन्द्रित हो जाएं, तो हम लोक और भय से, जो हमारे अराजक और प्रतियोगितात्मक समाज के आधार हैं, मुक्ति पा जाते हैं। इसे एक ऐसे मानवीय समाज के रूप में परिवर्तित करने के लिए, जिसमें हर व्यक्ति की भौतिक और मानसिक उन्नति की व्यवस्था हो, हमें अपनी चेतना का विस्तार करना होगा, अपनी चेतना को बढ़ाना होगा, जीवन के उद्देश्य को पहचानना होगा, और उसे अपने कामों में अपनाना होगा। चेतना का यह विस्तार, चेतनता की यह वृद्धि सरल नहीं है। यह जान लेना, कि वास्तविकता हमें दिखाई नहीं पड़ रही है और यह कि हम अन्धे हैं, और अपने अन्धेपन में जो कुछ हमें प्रतीत होता है, उसीको हम वास्तविकता समझ लेते हैं, आसान है। परन्तु उस अन्धेपन का इलाज करने के लिए और सच्ची दृष्टि पाने के लिए आत्मशुद्धि की आवश्यकता है। हमें चेतना को लोभ और भय के शिकार से, अहंकार के मोह से मुक्त करना होगा; और जब हममें पवित्नता और एकाग्रता आ जाती है, तब हम परिवर्तित हो जाते हैं। हम वही हो जाते हैं, जो कुछ हम देखते हैं और हमारी प्रकृति नई हो जाती है, हम संसार के स्वरूप और प्रयोजन को समझने लगते हैं, और इस संसार में उस रीति से जीवन-यापन करने में समर्थ होते हैं, जिस रीति से परमात्मा चाहता है कि हम जीवन बिताएं। सम्पूर्ण सृष्टि का उद्देश्य मानव-जीवन का विकास करना है, मनुष्य का पुनर्निर्माण। मानव-प्रकृति को बदले बिना हम मानव-जीवन और मानव-समाज को बदल पाने की आशा नहीं कर सकते। रिक्त धारणाओं और साभिलाष कल्पनाओं के सम्बन्ध में औरंगज़ेब की चुटीली टिप्पणी के बावजूद कवि के आलोक और दार्शनिक के आदर्श की आवश्यकता है; कवि और दार्शनिक आत्मा को गति देनेवाली शक्तियों के प्रति सचेत रहकर हमारे लिए इस संसार के अन्दर ही एक परिष्कृततर संसार की झलक को सुरक्षित बनाए रखते हैं।
आज हमें आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य के रहन-सहन के ढंग में आमूल परिवर्तन किया जाए। हम भविष्य को केवल उतनी ही सीमा तक निरापद (सुरक्षित) बनाने में सहायता दे पाते हैं, जिस सीमा तक हम अपने-आपको बदल पाते हैं। यह आत्मपरिवर्तन स्वतः नहीं हो जाता। यह उस साभिप्राय आदर्श के प्रति प्रतिभावन (रिस्पौंस) है, जो हमें इतिहास में दिखाई पड़ता है। यह आत्म का वास्तविकता के वरावर्ती होना हैं। यही धर्म का आचरण है। भारत के रहस्यवादी धर्म की ही नये विश्व का धर्म बनने की संभावना है, जो सब मनुष्यों को राष्ट्रीय सीमाओं के पार भी एक सांझे केन्द्र की ओर खींच सकेगा; भारत के इस रहस्यवादी धर्म का कथन है कि आध्यात्मिक वस्तुएं वैयक्तिक हैं और हमें उन्हें अपने जीवन में प्रतिबिम्बित करना चाहिए; इसके लिए यह आवश्यक है कि हम वास्तविक को प्राप्त करने के लिए सांसारिक विषयों से विमुख हो जाएं और नई ऊर्जा तथा संकल्प के साथ इतिहास के जगत् की ओर लौट पड़ें।
धर्म के प्रति विरोध-धर्म द्वारा मैत्री-व्यक्ति की प्रकृति (स्वभाव) चिन्तन बनाम कर्म - नई व्यवस्था- प्रजातन्त्र की गत्वरता (गतिशीलता)
यदि संसार अपनी आत्मा की खोज में है, तो धर्म, जिस रूप में कि वे हम तक पहुंचे हैं, हमें उस आत्मा की प्राप्ति नहीं करा सकते। वे मानवता को मिलाकर एक करने के बजाय उसे विरोधी दलों में विभाजित करते हैं। वे जीवन के सामाजिक पक्ष पर बल न देकर वैयक्तिक पक्ष पर बल देते हैं। वैयक्तिक विकास के मूल्यों का अतिरंजन करके वे सामाजिक भावना और कल्पना को निरुत्साहित करते हैं। वे कर्म की अपेक्षा चिन्तन पर और व्यवहार की अपेक्षा सिद्धान्त पर कहीं अधिक बल देते हैं। अपनी परमात्मा के राज्य की धारणाओं द्वारा वे लोगों को इस पृथ्वी पर अपेक्षाकृत अच्छा जीवन बिताने के प्रयत्नों से विमुख कर देते हैं। ऐसा लगता है कि उनकी आत्मिक शक्ति समाप्त हो चुकी है और अब वे निर्जीव खोल-भर शेष रह गए हैं, जो एक ऐसे शब्दार्थ पर निर्भर हैं, जिसे वे पुनरुज्जीवित नहीं कर सकते। वे अपनी निष्प्राणता को उन विधियों और आचारों के पालन का आग्रह करके छिपाना चाहते हैं, जिन्हें आदतों और प्रथाओं ने बहुत अनुचित महत्त्व दे रखा है। वे बलिदान की उन प्रेरणाओं के प्रति, जो जागरित हो चुकी हैं, और सेवा के उस आवेश के प्रति, जो अवसर पाने के लिए तरस रहा है, निरपेक्ष जान पड़ते हैं। कुल मिलाकर, वे वर्तमान अस्त-व्यस्त दशाओं को बदलने के लिए हममें उत्साह जगाने के बजाय वर्तमान दशाओं को ही उचित ठहराते हैं। मार्क्स का विश्वास है कि धर्म एक वर्गहीन समाज की उन्नति के मार्ग में रोड़ा है, और 'वीर नवीन जगत्' की बन्धनमुक्त मेधाएं धर्म की सनक से छुटकारा पा लेंगी, क्योंकि उन्हें यह अनुभव हो जाएगा कि धर्म का दृष्टिकोण जीवन के अर्थ, प्रयोजन और उद्देश्य के वैज्ञानिक सत्य का मिध्याकरण है। यह कहा गया कि "जिस समाज का लक्ष्य पूंजीवाद है, उससे उस समाज की ओर, जिसमें वर्ग-भेदों और वर्ग-संघर्षों का कोई चिह्न भी न होगा, संक्रमण के परिणामस्वरूप सब धर्म और अन्धविश्वास अपनी मौत आप मर जाएंगे।"[40] अन्धविश्वास के रूप में धर्म के इस दृष्टिकोण का बहुत विस्तृत रूप से प्रचार किया गया है। ''1937 के मई मास तक सोवियत संघ में कोई चर्च बाकी न बचेगा। इसलिए परमात्मा को 'पंचायती समाजवादी गणतनों के संघ' (रुस) की सीमा से मध्ययुगीन अवशेष के रूप में निर्वासित कर दिया जाएगा ।''[41] 23 अगस्त, 1939 को रूस और जर्मनी के बीच मिलता और अनाक्रमण का करार होने के बाद रूस में परमात्मा-विरोधी आन्दोलन के मन्त्री ने घोषणा की थी कि "क्सी- जर्मन करार से नास्तिकवादी प्रचार में सुविधा हो जाएगी, क्योंकि हिटलर और उसकी सरकार ईसाइयत की वैसे ही शत्रु है, जैसी कि सोवियत सरकार।" अब, क्योंकि जर्मनी और रूस एक-दूसरे से लड़ रहे हैं और ग्रेट ब्रिटेन, जो जर्मनी की धर्महीनता के विरुद्ध जिहाद का नेतृत्व कर रहा है, रूस का मित्र बन गया है, परमात्मा की दशा कुछ नाजुक सी हो गई है। राजनीतिक परिवर्तनों के कारण हम यह मानने लगे हैं कि जर्मनी अनीश्वरवादी है और रूस ईश्वर-भक्त।[42]
जिस प्रकार संसार विभिन्न जातियों और राष्ट्रों में बंटा हुआ है, उसी प्रकार विभिन्न धर्मों में भी। पूर्व और पश्चिम, अरब और यहूदी, हिन्दू और ईसाई, परस्पर कोई भी समझौता कर पाने में असमर्थ हैं। यह समझा गया था कि एक परमात्मा में विश्वास के फलस्वरूप शान्ति और एकता हो सकेगी, परन्तु उसकी इस प्रकार की व्याख्या के कारण, कि सब लोगों को एक ही ढंग से विश्वास और बर्ताव करना चाहिए, उससे कहीं अधिक उत्पात हुआ है, जितना कि राजाओं की महत्त्वाकांक्षाओं या जातियों की शत्रुता के कारण हुआ है। धर्म का उद्देश्य भले ही सार्वभौमता हो, किन्तु धर्म स्थानीय और विशिष्ट होते हैं और वे मैत्री के विकसित होने में बाधा डालते हैं। यहां तक कि ईसाई चर्चों को भी मिलाकर एक ही धार्मिक समाज के रूप में संगठित करने के प्रयत्न भी असफल रहे और विभिन्न सम्प्रदाय अब भी अपनी विशिष्ट औपचारिकताओं और कर्मकांडों का आग्रह बनाए हुए हैं।'[43]
परन्तु हिन्दुत्व समझौते और सहयोग के लिए प्रयत्न का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक ही सर्वोच्च वास्तविकता तक पहुंचने और उसे प्राप्त करने के प्रयनों की विविधता को स्वीकार करता है। इसकी दृष्टि में धर्म का सार उसे ग्रहण कर पाने में निहित है, जो शाश्वत है और सब वस्तुओं में व्याप्त है। इसकी प्रामाणिकता ऐतिहासिक घटनाओं पर निर्भर नहीं है। हमारे अन्दर दिव्यता का जो मूल सत्य विद्यमान है, उसीको विभिन्न धर्म-सिद्धान्त विभिन्न काल्पनिक रूप देकर प्रस्तुत करते हैं। सत्य के विषय में हमारा अर्थ-ग्रहण अतीत द्वारा निर्धारित रीतियों से ही सूलबद्ध होता है। क्योंकि केवल वे ही प्रतीक जो शताब्दियों तक प्रयोग में आते रहने के कारण घिस-घिसकर चिकने हो गए हैं हमें 'दिव्य'[44] (ब्रह्म) का ज्ञान प्राप्त करने के लिए सचेष्ट कर सकते हैं। प्रतीक हृदय, विचार और मन द्वारा गढ़ी हुई धारणाए हैं।' हमारा काम उनके बिना नहीं चल सकता, क्योंकि वे ही वे साधन हैं, जिनके द्वारा हम समय के रूपों के अधीन रहते हुए भी शाश्वत का विचार कर सकते हैं। इस परिवर्तनशील संसार के रूपों के अधीन रहकर परमात्मा के परिवर्तन-शून्य रहस्यों का विचार कर सकते हैं। कविता, पुराण-कथाओं और प्रतीकवाद का प्रयोजन आत्मिक जागरण और विकास के लिए राजमार्ग के रूप में सेवा करना है। सब धर्म-विश्वास ससीम मन द्वारा असीम को ग्रहण करने के प्रयत्न हैं। जहां तक वे अन्तिम लक्ष्य तक पहुंचने में हमारी सहायता करते हैं, वहां तक वे मूल्यवान हैं। वे विभिन्न इसलिए हैं क्योंकि वे लोगों की विभिन्न आवश्यकताओं के, उनकी जाति और इतिहास के, उनके लिंग और स्वभाव के अनुकूल बले हैं। परन्तु वे सब परीक्षणात्मक'[45] हैं, और इसलिए असहिष्णुता को किसी प्रकार उचित नहीं ठहराया जा सकता। धर्म का उन नियत बौद्धिक धारणाओं के साथ घपला नहीं किया जाना चाहिए, जो सबकी सब मन द्वारा निर्मित हैं। जो भी कोई धर्म अन्तिम और परम होने का दावा करता है, वह अपने मतों को शेष संसार पर थोपना चाहता है और दूसरे लोगों को अपने प्रमापों (स्टैंडर्ड) के अनुसार सभ्य बनाना चाहता है। जब दो या तीन विश्वास-प्रणालियां (धर्म) सब लोगों को अपने ढांचे के अंदर ले आने की कोशिश करती हैं, तो उनमें टकराव अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि संसार में केवल एक ही 'परम' की - वह भी यदि हो ही- गुंजाइश है। इन विरोधी निरंकुशताओं (धार्मिक तानाशाहियों) की हास्यास्पदता हमारी दृष्टि में इसलिए नहीं आती, क्योंकि हम इनके साथ बहुत अधिक परिचित हैं। जब धार्मिक जीवन का पेशे के साथ और आविर्भूत सत्य की स्वीकृति के साथ मिश्रण कर दिया जाता है, तब उस धर्म में बाहरी यंत्रजात (मशीनरी) प्रमुख हो जाता है। पुरोहित या धर्म-सम्प्रदाय भावना का स्थान ले लेता है और सब लोगों से एक ही बात की मांग की जाती है कि उस मत के विश्वास में निष्ठा रखें। यदि आप उस मत को मानते हैं और उस समुदाय में सम्मिलित हो जाते हैं, तो आपको सदा के लिए कुछ विशेषाधिकार और कुछ विमुक्तियां (छूटें) प्राप्त हो जाती हैं। जीवन की तुलना में यह यंत्रजात बहुत सीधा-सादा है, इसकी क्रिया बहुत स्पष्ट है; और इसके परिणामों की गणना बहुत ही सुनिश्चित रीति से जनगणना की रिपोटों और आंकड़ों द्वारा की जा सकती है; परन्तु इसका प्रभाव हमारे स्वभाव की केवल बाहरी सतह की ओर ही संचालित रहता है। यदि हम यह समझते हैं कि दूसरों को क्षति पहुंचाकर भी, बल प्रयोग द्वारा हमें अपने धर्म का प्रचार करने का इसलिए अधिकार है कि हमारा धर्म अन्य धर्मों से ऊंचा है, तो हम नैतिक आत्मविरोध के दोषी हैं, क्योंकि अत्याचार, अन्याय और क्रूरता तो आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता और उच्चता के ठीक निषेध हैं। हिन्दुत्व का कोई एक ऐसा नियत धर्म-विश्वास नहीं है, जिस पर इसका जीवन या मरण निर्भर हो, क्योंकि इसको यह निश्चय हो चुका है कि भावना धर्म-विश्वासों से कहीं बड़ी सिद्ध होगी। हिन्दू की दृष्टि में प्रत्येक धर्म सच्चा है, पर केवल तभी जबकि उसके अनुयायी सचाई और ईमानदारी से उसका पालन करते हों। उस दशा में वे धर्म-विश्वास से आगे बढ़कर अनुभव तक और सूल से आगे बढ़कर सत्य के दर्शन तक पहुंच जाएंगे। उदाहरण के लिए, शंकराचार्य ने धर्म की छः शास्त्रसम्मत प्रणालियों की बात कही है। उसे एक ही सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियों का व्यापक अनुभव था। इन अल अरबी लिखता है, "मेरा हृदय अब प्रत्येक रूप धारण करने में समर्थ बन गया है; हिरनों के लिए यह चरने का मैदान है, और ईसाई मठवासियों के लिए मठ है, और मूर्तियों के लिए यह मन्दिर है, और हाजियों के लिए यह काबा और टोरा की मेज और कुरान की पुस्तक है। मैं तो प्रेम के धर्म को मानता हूं फिर उसके ऊंट चाहे जिधर भी ले जाए। मेरा धर्म और मेरी श्रद्धा ही सच्चा धर्म है।"[46] रामकृष्ण भी कई प्रकार के विश्वासों और पूजा विधियों का पालन करते थे। हिन्दुत्व का धार्मिक मूल्य इस तथ्य में निहित है कि यह आध्यात्मिक स्वतन्त्रता के अन्वेषकों को हर प्रकार का सहारा देता है, और उन सबको उस एक ही सर्वश्रेष्ठ सत्य तक पहुंचाता है, जिसे अनेक ढंग से अभिव्यक्त किया जाता है। यद्यपि धर्म- विश्वास अनेक और पृथक् पृथक् हैं, परन्तु परम्परा और जीवन की शैली एक ही है। जब हम धर्म-सिद्धान्तों और परिभाषाओं को लेकर विवाद करते हैं, तब हम विभक्त हो जाते हैं। परन्तु जब हम प्रार्थना और ध्यान के धार्मिक जीवन का अवलम्बन करते हैं, तो हम परस्पर एक-दूसरे के निकट आ जाते हैं। प्रार्थना जितनी अधिक गहरी होती है, व्यक्ति 'सर्वोच्च' (ब्रह्म) के ज्ञान में उतना ही अधिक लीन हो जाता है। अहंभाव की कठोरता द्रवित हो जाती है; धार्मिक मतों की परीक्षणात्मकता प्रकट हो जाती है और सब आत्माओं के, एक परम सत्ता में, सुतीव्र केन्द्रीकरण (फोकसिंग) का बोध हो जाता है। हम सब धार्मिक अन्वेषणों की सारभूत एकता को समझ लेते हैं और विभिन्न नामपत्नों (लेबलों) के नीचे विद्यमान एक-से समान अनुभव को पहचान लेते हैं।'[47] ब्रह्मा, विष्णु और शिव उस 'सर्वोच्च' (ब्रह्म) के अन्तर्गत हो जाते हैं, जिसका प्रतीक 'ओ३म्' है, और उनके भक्त भी उस सर्वोच्च की ही पूजा कर रहे होते हैं।[48] यद्यपि सब रास्ते उसी एक ऊंचाई तक ले जाते हैं, फिर भी प्रत्येक मनुष्य अपनी ही पाश्वभूमि के किसी स्थान से चलना प्रारम्भ करना चाहता है। हम सब परम्परा की संतान हैं, और इतिहास की धारा में हमारा एक सुनिश्चित स्थान है। हिन्दुत्व किसी एक धर्म-विश्वास, या एक धर्मग्रन्थ, या एक पैगम्बर या संस्थापक के साथ नहीं जुड़ा हुआ है, अपितु यह तो एक निरन्तर नवीन होते हुए अनुभव के आधार पर सत्य की निरन्तर और आग्रहपूर्ण खोज है। हिन्दुत्व परमात्मा के विषय में निरन्तर विकास-मान मानवीय विचार है। इसके पैगम्बरों और ऋषियों का कोई अन्त नहीं है और न इसके सिद्धान्त-ग्रन्थों की ही कोई सीमा है। यह सब नवीन अनुभवों का और सत्य की नवीन अभिव्यक्तियों का स्वागत करता है। प्रकाश, चाहे वह किसी भी द्वीप से क्यों न निकल रहा हो, अच्छा है, जैसे गुलाब सुन्दर ही होता है, चाहे वह किसी भी उद्यान में क्यों न खिला हुआ हो।
हमें धर्म, जिसे धर्म-सिद्धांतों को मानने और विधि-विधानों के पालन से अभिन्न समझा जाता है और आध्यात्मिक जीवन में, जो चेतना के परिवर्तन का आग्रहकर्ता है, जिसके लिए अन्य सब वस्तुएं साधन मात्र हैं, भेद करना होगा। ईसाई प्रतीक का प्रयोग करते हुए कहा जाए, तो धर्म का उद्देश्य है (ईश्वर के) 'पुत्न' का शाश्वत पुनर्जन्म, जिसके द्वारा पृथक्तावादी स्वार्थपरता का प्रायश्चित हो जाता है। यदि संगठित धर्म मानव जाति का, इसके जीवन और समाज का, रूपान्तर नहीं कर पाया, तो इसका कारण केवल यह है कि उसने इस बात पर पर्याप्त ज़ोर नहीं दिया कि उसका एकमात्र लक्ष्य आध्यात्मिक अस्तित्व के लिए मार्ग खोल देना है। हम मानव-प्रकृति को विचारों द्वारा केवल उसकी ऊपरी सतह छूकर परिवर्तित नहीं कर सकते, अपितु इसके लिए तो हमें प्रकृति में ही आमूल परिवर्तन करना होगा। सब धर्मों का सांझा लक्ष्य आध्यात्मिक जीवन है। उनका परस्पर मतभेद लक्ष्य के विषय में नहीं है, अपितु केवल प्रगति की उस माता में है, जो वे अपने कम या अधिक प्रकाशों के सहारे कर पाते हैं। यदि हम किसी एक धर्म की तुलना दूसरे धर्मों से करें, तो हमें पता चलेगा कि अन्तर केवल मन्त्रों और अनुष्ठानों में ही है। यदि हम धर्म-सिद्धान्तों और धर्म-विश्वासों की तह में गहराई तक जाएं, तो दिखाई पड़ेगा कि सब धर्म उस एक अथाह स्रोत से बल प्राप्त कर रहे हैं। जब कोई ईसाई वर्णन करता है कि उसने ईसा के साक्षात् दर्शन किए, तो हिन्दू उसे वास्तविक मानने से इनकार नहीं करता; इसी प्रकार वह उस बौद्ध भिक्षु के आश्वासनों पर भी अविश्वास नहीं करता, जो मध्यम मार्ग का अवलम्बन करता है। वह मुसलमान के संसार के सर्वोच्च स्वामी की स्वेच्छपूर्वक शरण में जाने के वर्णन का भी खंडन नहीं करता। आधारभूत एकता को स्वीकार कर लेने के कारण, समूची मानव- जाति के कल्याण के लिए एक सांझे आधार पर एक विशिष्ट सीमा तक परस्पर संयोग सम्भव हो सकना चाहिए। धर्मविज्ञान-सम्बन्धी प्रतिपादन के विषय में भी अब विस्तृततर एकरूपता की सम्भावना है। राष्ट्रीय राज्यों की भांति बड़े-बड़े धर्म भी उन दिनों संसार के सीमित क्षेत्लों में उत्पन्न और विकसित हुए, जिन दिनों शेष मानव जाति के साथ सम्पर्क स्थापित कर पाना कठिन था। किन्तु अब विज्ञान और व्यापार के प्रभाव के कारण एक नई विश्व-संस्कृति रूप धारण कर रही है। अब सब धर्म अपने-आपको एक नई बोली में अभिव्यक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं और इसीलिए एक-दूसरे के निकट आते जा रहे हैं। असमर्थनीय सिद्धांतों का खंडन उतना नहीं किया जाता, जितनी कि उनकी उपेक्षा कर दी जाती है, और धर्मों के उन्हीं सार्वभौम तत्त्वों पर बल दिया जाता है, जिनपर कि सब सहमत हैं। आगामी वर्षों में यह प्रक्रिया और अधिक तीव्र गति पर आएगी और सब धर्मों का शनैः शनै सदृशीकरण विश्व-धर्म के रूप में कार्य कर सकेगा।
सहिष्णुता का सिद्धान्त हिन्दुओं का एक स्वीकृत सिद्धान्त रहा है। अशोक और उसके उत्तराधिकारी दशरथ ने नास्तिक आजीवकों को अपने यहां प्रश्रय दिया था। मनु का कथन है कि हमें भिन्न-विश्वासियों की प्रथाओं का भी आदर करना चाहिए,'[49] याज्ञवल्क्य भिन्न-विश्वासियों की प्रथाओं को मान्यता देता है।[50] संक्षेप में, शासकों का यह कर्तव्य बनाया गया था कि वे सब धर्मों के अनुयायियों या किसी भी धर्म को न माननेवालों, सभी की रक्षा करें। मुस्लिम इतिहासकार खफी खां लिखता है, "उसने (शिवाजी ने) यह नियम बना दिया था कि जहां कहीं भी उसके अनुयायी लूटमार करते पहुंचें, वहां वे किसी मस्जिद को, या खुदा की किताब (कुरान) को या किसीकी स्त्री को किसी प्रकार की हानि न पहुंचाएं। जब कभी पविल कुरान की कोई प्रति उसके हाथ में आ जाती थी, तो वह उसे आदर से रखता था, और अपने किसी मुसलमान अनुचर को दे देता था। जब उसके आदमी हिन्दू या मुसलमान स्त्रियों को कैद कर लेते थे और उनकी रक्षा के लिए उनका कोई साथी उनके पास न होता था, तो वह स्वयं तब तक उनकी देख-रेख करता था, जब तक उनके सम्बन्धी आकर धन देकर उन्हें छुड़वाकर न ले जाएं।"[51]
व्यक्ति की प्रकृति के सम्बन्ध में ऐतिहासिक धर्मों और एकाधिकारवादी विश्वासों में आधारभूत अन्तर है। धमों की शिक्षा यह है कि परमात्मा मनुष्य के अन्दर है और मनुष्य में भले और बुरे का विवेक करने की शक्ति है; और यह विवेक की शक्ति ही उसे मनुष्य बनाती है और उसे पशुओं से पृथक करती और मानव-जीवन को पविनता प्रदान करती है। जीवन की वास्तविक इकाई व्यक्ति है, जिसके अन्दर धड़कता हुआ मानवीय हृदय, बौखलाया हुआ मानवीय संकल्प, विशाल गौरवों और अनजानी वेदनाओं की भावना विद्यमान है। प्रजातंत मनुष्य में, और उसके अपने-आपको पूर्ण बनाने के, अपना शासन स्वयं करने के, और एक ऐसे समाज का निर्माण करने के, जिसमें अपने-आपको पूर्ण बना पाना सम्भव हो, अधिकार और कर्तव्य में इस आस्था की अभिव्यक्ति है। सप्राण धर्म मनुष्य को एक पवित्र वस्तु मानते हैं, जबकि मार्क्स की दृष्टि में वह "सामाजिक बन्धनों का सामान्य प्रभाव मात" है। वह कहता है, "मानवीय तत्त्व कोई ऐसी अमूर्त वस्तु नहीं है, जो पृथक् व्यक्ति में निवास करती हो। अपने वास्तविक रूप में यह सामाजिक सम्बन्धों का सामान्य प्रभाव-भर है।"[52] समाज वास्तविकता है और स्वाधीन मनुष्य एक प्रतीति या भ्रम है। हिटलर का कथन है, "व्यक्तिक मानव-आत्मा के और वैयक्तिक उत्तरदायित्व के असीम महत्त्व के ईसाई-सिद्धान्त का मैं विरोध करता हूं। इस सिद्धान्त के विरोध में मैं तुषार के समान स्वच्छ यह रक्षक सिद्धांत प्रस्तुत करता हूं कि व्यक्ति मनुष्य कुछ नहीं है, उसका कोई महत्त्व नहीं है और उसका निरन्तर अस्तित्व राष्ट्र की प्रत्यक्ष अमरता में ही बना रहता है।"[53] 'मीन कैम्फ में वह लिखता है, "उन धर्म-सिद्धान्तों का, जिनके अनुसार व्यष्टिगत व्यक्तित्व को अपनी स्वतन्त्रता और गौरव का अधिकार है, परिणाम विनाश के सिवाय कुछ नहीं हो सकता।" हिटलर समाजवाद के सिद्धान्त की परिभाषा इस रूप में करता है कि यह सब व्यक्तियों पर राज्य का आधिपत्य और राज्य पर पार्टी का अबाधित नियंत्रण है। वह कहता है, "वहां कोई उछृंखलता न होगी, ऐसा कोई स्वतन्त्र अवकाश न होगा जिसमें व्यक्ति अपना स्वामी स्वयं हो; यह है समाजवाद- उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व जैसी छुटपुट वस्तुएं नहीं। इसका क्या महत्त्व है कि मैं लोगों को एक ऐसे कठोर अनुशासन में जकड़कर खड़ा कर दूं, जिससे वे बचकर न निकल सकें? वे जितना चाहें अपनी भूमि या कारखानों पर उतना स्वामित्व बनाए रखें। निर्णायक तत्त्व यह है कि राज्य, पार्टी के माध्यम से, उन सबका अधिपति है, चाहें वे मालिक हों या कामगर। हमें बैंकों या कारखानों का सामाजिकीकरण करने में सिर खपाने की क्या आवश्यकता है? हम तो मनुष्यों का सामाजिकीकरण करते हैं।"[54] मानवीय व्यक्ति में से उसका अपना इतिहास, उसकी भवितव्यता, और उसको आन्तरिक अतीत निकालकर उसे रिक्त कर दिया गया है। उसे एक निरुद्देश्य बहता हुआ, चटपट विश्वास कर लेने वाला प्राणी मान लिया गया है, जो मस्तिष्क और अपनी इच्छा से शून्य होकर, उन लोगों द्वारा पशुओं की भांति हांका जाता है या मोम की भांति ढाल लिया जाता है, जिन्होंने अपने-आपको उसका शासक बनने के लिए चुन लिया है। यदि स्वाधीनता हमारे अपने वास्तविक आत्मरूप में रहने की स्वतन्त्रता का ही नाम है, तो हमसे हमारी स्वाधीनता छीन लेने की यह अधीरता मनुष्य के पतन की द्योतक है। मानवआत्मा का झुंड के सम्मुख यह आत्मसमर्पण हमें ऐसे पशुओं की जाति बना डालता है, जिनमें बुद्धि है। पशु जगत् में व्यष्टि का महत्त्व जाति की अपेक्षा कम होता है।
स्वाभाविक अधिकार और अन्तःकरण की स्वाधीनता, ऐसे "उदार मोह” घोषित किए गए हैं जिनकी आड़ में पूंजीवादी व्यवस्था डेरा जमाए हुए है। द्वंद्वात्मक प्रक्रिया का सम्बन्ध मानवता के सामाजिक तत्त्व से है। कोई भी व्यक्ति तब तक अच्छा नहीं हो सकता, जब तक कि वह सामाजिक ढांचा (संरचना) अच्छा न हो, जिसका कि वह अंग है। धर्म की इस स्थापना के, कि हम तब तक समाज को नहीं बदल सकते जब तक कि मनुष्यों को न बदल डालें, विरोध में मार्क्स यह विचार प्रस्तुत करता है कि जब तक हम समाज को न बदल डालें तब तक हम मनुष्यों को नहीं बदल सकते।
हम ऐसे संसार में रहते हैं, जिसमें यन्त्रों और प्राकृतिक विज्ञान का प्रभुत्व है। मानव-प्रकृति के संबन्ध में यंत्रात्मक दृष्टिकोण अधिक गाह्य हो गए हैं। मनोविश्लेषण मानव-प्राणियों को इस रूप में देखता है कि वे अपने अवचेतन मनोवेगों के, जिन्हें चिकित्सक लोग नये रूपों में बदल सकते हैं, असहाय दास हैं। आचरणवाद (बिहेवियरिज्म) यह मानता है कि मानव-शिशु का मन पूर्णतया एक खाली कागज़ की तरह होता है जिसपर हम चाहे जो कुछ लिख सकते हैं। मानवीय दुष्टता का कारण दूषित ग्रन्थियों और अबुद्धिमत्तापूर्ण प्रतिबन्धों को बताया जाता है। मार्क्सवादियों का विश्वास है कि आत्मा पूर्णतया परिस्थितियों की उपज है, विशेषतः आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों की। इसके विचार करने, मूल्यांकन करने और निश्चय करने के कार्य इसकी स्वतन्त्र और स्वतःस्फूर्त गतिविधि की अभिव्यक्ति नहीं हैं, अपितु उस सामाजिक परिवेश (आसपास की परिस्थितियों) की मनोवैज्ञानिक गौण उपज हैं, जिनमें यह रह रही होती है। मार्क्स ने लिखा है, मनुष्यों की चेतना उनके अस्तित्व का निर्धारण नहीं करती, अपितु इसके विपरीत मनुष्यों का सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना का निर्धारण करता है।" उसके उत्तराधिकारियों ने इस दृष्टिकोण को अनम्य (लचकहीन) नियतिवाद तक ला पहुंचाया है और उनका मत है कि चेतना तो केवल एक गौण तत्त्व है (जो कारणों की परम्परा में नहीं है)। जब भी कभी परिस्थितियां, इतिहास के अदम्य नियमों के कारण अपने-आपको बदल लेती है, व्यक्ति भी बदल जाते हैं। सामाजिक तत्त्व मानवीय व्यवहार का निर्धारण करते हैं। स्पिनोज़ा ने कहा था कि यदि हवा में से नीचे गिरता हुआ कोई पत्थर विचार कर सके, तो वह यह सोच सकता है कि उसने अपना मार्ग अपनी स्वतन्त्र इच्छा से चुना है; उसे बाह्य कारणों का ज्ञान भी न होगा। इसी प्रकार अपने बर्ताव के बाह्य कारणों का ज्ञान न होने से हम यह समझने लगते हैं कि हमारी स्थिति गिरते हुए पत्थर से भिन्न है। परन्तु हर बात प्रकृति की अपरिवर्ततीय प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ही घटित होती है। मनुष्य इस प्रकृति में एक ऐसा पदार्थ है, जिसकी रुचियां और अरुचियां वैसी ही अदम्य दशाओं द्वारा निर्धारित होती हैं, जैसी दशाओं द्वारा पदार्थों का नीचे गिरना, पौधों का बढ़ना और ग्रहों का परिभ्रमण निर्धारित होता है। परस्पर विरोधी मतों की विचारधाराएं केवल सुव्यवस्थित करने के प्रयत्न-भर हैं या उन कार्यों के लिए, जो वस्तुतः आर्थिक हितों के परिणामभूत हैं, दिखावटो (अवास्तविक) कारण खोजने के प्रयत्नमाल हैं। इसका परिणाम है एक यंत्लजातात्मक (यांत्रिक ढंग का दृष्टिकोण) जिसके अनुसार मानवीय कार्य अंधे और स्वतःचालित बन जाते हैं।
अपने समकालीन दृश्य को देखकर हमारा यह दृष्टिकोण बनने लगता है कि हम तो उन विश्व-शक्तियों के बेबस शिकार हैं, जो अपने नियत लक्ष्यों की ओर बढ़ रही हैं। हम जितना समझते हैं, उसकी अपेक्षा बहुत ही कम स्वतन्त्र हैं। इस सम्मोहित संसार में हममें से अधिकांश लोग उन कार्यों को करते हैं, जिन्हें करने की इच्छा हमारी नहीं थी। जिन लोगों की इच्छा-शक्ति कम हो जाती है, वे भाग्यवाद को प्रसन्नता से स्वीकार कर लेते हैं। यह संसार गुमनाम बन गया है, और व्यक्ति इसमें विलीन हो गया है। अपनी शिक्षा-संस्थाओं में हमें अपनी शक्तियों का विकास करने और अपनी बुद्धि को बढ़ाने का प्रशिक्षण मिलने के बजाय हमें पहले से स्वीकृत नमूनों में ढाल दिया जाता है, हममें जानकारी ठूंस-ठूंसकर भर दी जाती है और हमें यह सिखाया जाता है कि हम देशभक्ति, जातीयता और धर्म की प्रेरणाओं के प्रति ठीक-ठीक प्रतिभावन (रिस्पॉस) किस प्रकार करें। हम इस प्रकार आचरण करते हैं, जैसे सिखाए हुए पशु या जानदार गुड़िया हों। आत्मा निस्संज्ञ हो जाती है और हमारे चेहरों का कोई अपना अलग रूप-रंग नहीं रहता। जब हम रेवड़ों (समूहों) के रूप में सोचने लगते हैं, तो हम सोचते उतना नहीं, जितना कि सहज वृत्ति से काम किए जाते हैं। हम सामूहिक मनुष्य बन जाते हैं, जो मानो इस प्रकार मुहरबन्द हों कि हवा भी उन तक न पहुंच पाए और जो समाज, राज्य कानून और व्यक्ति के विषय में तोतों की तरह रटे हुए विचारों को दुहराते चले जाते हैं। हम मानवीय उद्यम के सच्चे महत्त्व से पूर्णतया अनभिज्ञ रहते हैं और मानसिक दृष्टि से उन अविकसित प्राणियों की दा तक पहुंच जाते हैं, जो सनसनी (रोमांच) के लिए लालायित रहते हैं और अस्पष्टतया किसी ऐसी वस्तु के लिए असन्तुष्ट और उत्सुक रहते हैं; जिसे वे दोष दे सकें और घृणा कर सकें। जान-बूझकर मनुष्यों के जीवनों को दरिद्र बनाया जा रहा है। पारिवारिक लेह, घर का प्रेम. अपनों से बड़ों के प्रति आदर, इन सब बातों को आत्मिक दासता का ही एक रूप बताकर, बाना युग की उपांल (एपेंडिक्स) जैसी प्रारम्भिक वस्तु, जिससे कि हमें मुक्त किया ही जाना चाहिए, बताकर अस्वीकृत कर दिया जाता है। हमें इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि यदि आवश्यकता पड़े, तो हम अपने माता-पिता तक के साथ हिंसात्मक पाशविक उपायों का प्रयोग करें। हमें सिखाया जाता है कि हम यह विश्वास करें कि इतिहास अवश्यम्भावी है, उसका प्रतिरोध करना मूर्खता है और मनुष्य महत्वहीन है। हम इतिहास का निर्माण नहीं करते, अपितु इतिहास के द्वारा हमारा निर्माण होता है। जनसमूह को अपने अधीन करने के लिए नेता-गण विवश करने, उत्तेजित करने और प्रभावित करने के सब आधुनिक साधनों का प्रयोग करते हैं। यह भावना साधारणतया लोगों में घर करती जाती है कि विकास की प्रवृत्तियों का प्रतिरोध करने से कोई लाभ नहीं है; ऐसे आन्दोलन का विरोध करना व्यर्थ है, जो परिस्थितियों का तर्कसंगत परिणाम है; हमें उन तथ्यों के सम्मुख सिर झुकाना ही चाहिए, जिनसे बचने का कोई उपाय नहीं है। भाग्य के पुराने सिद्धांत को ही नया, भला-सा लगने वाला बाना दे दिया गया है और आधुनिक तकनीकों से उसका प्रचार किया जा रहा है। व्यावहारिक विज्ञान और तकनीकी विज्ञान का, जो कि वस्तुतः प्रकृति के ऊपर मानवीय तर्क बुद्धि की विजय के परिणाम हैं, सामान्य मनुष्य पर ठीक उल्टा ही प्रभाव इस रूप में हुआ है, कि इस विज्ञान का परिणाम यह हुआ है कि मनुष्य यन्त्रों का दास बन गया है। मानवीय चेतना का यंत्रीकरण हो गया है और मानव-आत्मा में नई स्वतःचलितताएं (ओटोमेटिज्म) उत्पन्न हो गई है। हममें से अधिकांश लोग अपने जीवन का कोई भी ऊंचा उद्देश्य बनाए बिना जीते हैं और बनाना भी नहीं चाहते। हम दिन के बाद दिन, जीवन बिताते जाते हैं, और अन्त में वैसे ही लुप्त हो जाते हैं, जैसे वर्षा के बुलबुले फूटकर पानी में लुप्त हो जाते हैं। जीवन निरर्थक खलबली और अन्तहीन बकबक से भरा हुआ चलता जाता है। हममें से अधिकांश को ऐसा अनुभव होता है, मानो हम पिंजरे में बन्द पशु हैं, जिन्हें इस बिल्कुल बुद्धिहीन संसार में पूर्ण महत्वहीनता को स्वीकार कर लेने के लिए मना लिया गया है। क्या यही है स्वतंत्रता की पवित्र आनुवंशिक सम्पत्ति (बपौती)? स्वतंत्रता उन शब्दों में से एक है, जिसका प्रयोग करना तो सरल होता है, किन्तु परिभाषा कर पाना कठिन। वर्तमान महायुद्ध में दोनों ही पक्षों के राष्ट्रों का दावा है कि ये स्वतंत्रता और शान्ति के लिए लड़ रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की घोषणा है कि वह साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत की स्वतंत्रता के लिए अहिंसात्मक लड़ाई लड़ रही है। हमारे कामगारों का विश्वास है कि जब वे अधिक वेतन, सामूहिक स्वामित्व (भागीदारी), मद्य निषेध और मन्दिर-प्रवेश की मांग करते हैं, तो वे स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे होते हैं। स्वतंत्रता भी पत्नों के थैले या बिस्तरबंद जैसी एक अभिव्यक्ति मालूम होती है, जिसमें आप जो कुछ चाहें, रख सकते हैं। एक राजनीतिक स्वतंत्रता होती है, एक जाति की दूसरी जातियों द्वारा पराजय और उनके प्रभुत्व में स्वतंत्रता। एक सांविधानिक स्वतंत्रता होती है, जनता की किसी एक वर्ग या एक अधिनायक (डिक्टेक्टर) के अत्याचार से स्वतन्त्रता; वर्ग-विशेषाधिकार मानवीय स्वतंत्रता के विरुद्ध अपराध है। एक आर्थिक स्वतंत्रता भी हैं, अर्थात् दरिद्रता या अधिक दबाव के कष्ट से स्वतंत्रता। एक वैधानिक स्वतंत्रता होती है, अर्थात कानून का भरोसा। जो कानून में संयत रखते हैं या हमारी रक्षा करते हैं, उन्हें हमारी प्रत्यक्ष या परोक्ष सहमति प्राप्त है, और जब तक उन कानूनों को रद्द न कर दिया जाए, तब तक समाज में छोटे, बड़े सबको उनका पालन करना चाहिए। यह कानून बनाया गया था कि किसी भी स्वतन्त्र मनुष्य को न तो पकड़ा जाएगा, न कैद किया जाएगा, न उसकी सम्पति छीनी जाएगी, न उसे विधि-बहिष्कृत (भगोड़ा घोषित) किया जाएगा, न देश से निर्वासित किया जाएगा और न किसी प्रकार से नष्ट ही किया जाएगा।" शारीरिक दासता से मुक्ति भी स्वतन्त्रता है। एक सामाजिक स्वतन्त्रता भी होती है। परन्तु ये सबकी सब केवल साधन हैं, अपने-आपमे कोई लक्ष्य नहीं हैं; ये मानव-आत्मा की गम्भीरतम ऊर्जाओं को भलीभांति अनुभव करने में सहायता देने के लिए आवश्यक सामग्री हैं। सामाजिक संगठन का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की आत्मिक स्वतन्त्रता को, मानवीय सृजनशीलता को बढ़ाना है और कष्टदायक कानूनों और प्रथाओं द्वारा रोक-थाम के बिना उसे यथेच्छ रीति से सोचने, अनुभव करने और आराधना करने में सहायता देना है। ऐसे अवसर आ सकते हैं, जब हमसे कहा जाए कि न्यायोचित आर्थिक अवस्था के लिए अपने अधिकारों और जायदाद का बलिदान कर दें। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए हमें अपनी राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का भी बलिदान करना पड़ सकता है; किन्तु आत्मिक स्वतन्त्रता तो सर्वोच्च और परम वस्तु है और इसका त्याग तो केवल अपनी आत्मा को गंवाकर ही किया जा सकता है। महाभारत में कहा गया है, "आत्मा के लिए सारे संसार का भी त्याग करना पड़े, तो कर देना चार्हिए; आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।"[55] "यदि मनुष्य अपनी आत्मा को गंवा दे और सारे संसार को भी प्राप्त कर ले तो लाभ क्या है?"[56] सुकरात के रूप में हमारे सम्मुख एक ऐसे व्यक्ति का सर्वोच्च दृष्टान्त विद्यमान है, जो आत्मा की स्वतन्त्रता का समर्थक था और उसे रत्नों और स्वर्ण की अपेक्षा अधिक मूल्यवान समझता था। दृढ़ विश्वास और भावना से कांपते हुए शब्दों में सुकरात कहता है, "यदि आप मुझे इस शर्त पर छोड़ने का प्रस्ताव रखें कि मैं अपनी सत्य की खोज बन्द कर दूं, तो मैं कहूंगा : ऐथेन्सवासियो, आपका धन्यवाद ! परन्तु मैं और नई विश्व-व्यवस्था आपकी आज्ञा मानने की अपेक्षा परमात्मा की आज्ञा मानूंगा, जिसने मुझे इस कार्य में लगाया है, और जब तक मेरे शरीर में श्वास है और शक्ति है, मैं अपने दर्शन (तत्त्वज्ञान) के धन्ये को नहीं छोडूंगा। मैं अपने इस व्यवहार को जारी रखूंगा कि जो भी कोई मिले, उसे रोककर उससे कहूं : क्या तुम्हें इस बात पर शर्म नहीं आती कि तुमने अपना सारा ध्यान सम्पत्ति और सम्मान पर तो लगाया हुआ है, पर तुम्हें विवेक और सत्य की, और अपनी आत्मा को और अच्छा बनाने की ज़रा भी परवाह नहीं है? - मुझे पता नहीं कि मृत्यु क्या है; हो सकता है कि वह अच्छी ही वस्तु हो और मुझे उसका भय नहीं है। परन्तु यह मैं भली-भांति जानता हूं कि अपने कर्तव्य-स्थान को छोड़कर भाग खड़े होना बुरी बात है; और जो चीज़ संभव है कि अच्छी हो (मृत्यु) और जिस चीज़ का मुझे पता है कि वह बुरी है (पलायन), इन दोनों में से मैं पहली को पसन्द करता हूं।"[57]
किसी संगठित समाज में कोई भी व्यक्ति पूर्णतया स्वतन्त्र नहीं हो सकता। सभ्यता है ही यह कि अधिक मूल्यवान स्वतन्त्रताओं के लिए कम मूल्यवान स्वतंत्रताओं को छोड़ दिया जाए। मन और आत्मा की स्वतन्त्रता सर्वोच्च स्वतन्त्रता है, जो बिना किसीको कोई क्षति पहुंचाए, सब लोगों को और सब लोगों के कल्याण के लिए प्रदान की जा सकती है। राज्य का अस्तित्व व्यक्तियों की स्वतन्त्रता और उनका उत्तरदायित्वपूर्ण जीवन बनाए रखने के लिए है। राज्य व्यक्तियों से मिलकर बना है और उन्हींक लिए इसका अस्तित्व भी है। जीवन का आविर्भाव (प्रकटन) व्यक्ति में होता है। संसार का केन्द्र-बिन्दु व्यक्ति ही है। सत्य की स्फुरणा व्यक्ति को होती है। वह (व्यक्ति) सीखता है और कष्ट सहता है, वह आनन्द और शोक, क्षमा और विद्वेष का ज्ञान प्राप्त करता है। वह अपनी सफलताओं पर आनन्द से रोमांचित हो उठता है। और अपनी सफलताओं की वेदना को भुगतता है। यह उसका अधिकार है कि वह अपने जीवन को, उनके सब हर्षावेशों और कंपकंपियों के साथ, पूर्णरूप में जी सके।[58] यह उसका विशेषाधिकार है कि वह सनकी, स्वेच्छाचारी, अरुढ़िवादी और असहमत हो सके। संसार की सारी प्रगति का श्रेय उन्हीं लोगों को है, जो चैन से नहीं थे। यहां तक कि मानवता द्वारा परित्यक्त लोगों में भी, जो सभ्यता की मुख्य धारा से पृथक् एक पोखर में बहते रहते हैं, अपराधियों और बहिष्कृतों की गुप्त दुनिया में भी, प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर उसका अपना आत्म (सैल्फ) होता है, उसकी अपनी विशिष्ट रुचियां और प्रतिभा होती है।'[59] भले ही उनका स्वभाव किंकर्तव्यविमूढ़ बना देने वाला हो, परन्तु दैवयोग और सुअवसर प्राप्त होने पर उनका सर्वोत्तम अंश सामने आ सकता है। यह देखना राज्य का कृत्य है कि मनुष्य की आंखों में मनुष्य को पहचानने की ज्योति धुंधली न पड़ने पाए। प्रत्येक मानव-आत्मा को गौरव और शक्ति प्राप्त करनी ही चाहिए और उसे उदारतापूर्ण उत्साह, उच्च महत्त्वाकांक्षाओं और मृदु सहानुभूति प्राप्त करने का अवसर मिलना चाहिए। भले ही प्रत्येक आत्मा अपने-अपने ढंग से पूर्णता प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो, फिर भी उनमें से कोई भी दो ठीक एक जैसी नहीं होंगी। यदि हम किसी कारण, वह कारण चाहे कुछ भी क्यों न हो, इस सारभूत स्वतंत्रता को त्यागने के लिए सहमत हो जाएं तो शेष सब स्वतंत्रताएं लुप्त हो जाएंगी।'[60] मानव-आत्मा की अनुल्लंघनीय स्वतंत्रता, मानवीय भावना की स्वाधीनता ही एकमात्र ऐसी वस्तु है, जिसके कारण राज्य को उचित ठहराया जा सकता है।[61] हम लोग मिलकर एक भीड़ भले ही बन जाएं, परन्तु मिलकर एक मनुष्य नहीं बन सकते। हम अलग-अलग जन्म लेते हैं और अलग-अलग मरते हैं और अपने अत्यावश्यक (सारभूत) जीवन में हम अलग-अलग ही रहते हैं। राज्य को व्यक्तियों और समुदायों के धर्म की रक्षा करनी ही चाहिए।
इस दृष्टिकोण का अवलम्बन भी अंशतः इस बात का कारण रहा कि प्राचीन काल से विदेशी आक्रान्ता भारत में आकर सरलता से अपने पांव जमाते रहे। जब तक लोगों के वैयक्तिक और सामाजिक-जीवन में हस्तक्षेप नहीं किया जाता था; जब तक कलाकारों, दार्शनिकों और बुद्धिजीवियों को सत्य का अनुसन्धान करने और सौन्दर्य का सृजन करने की छूट थी और सामान्य लोग शरीर, मन और आत्मा के स्वाभाविक गुणों का विकास करते रह सकते थे; घरेलू शिष्टाचारों और सरल नेह, विशुद्ध निष्ठा, और गंभीर भक्ति का, जो मानव जीवन का सर्वाधिक वैयक्तिक, सर्वाधिक अन्तरंग और सर्वाधिक पवित्न अंश है, का पालन कर सकते थे तब तक उनकी दृष्टि में इस बात का कोई अधिक महत्त्व नहीं था कि राजनीतिक प्रभुत्व किसके हाथ में है। विचार सदा स्वतन्त्र रहता था, यहां तक कि तब भी, जबकि आचरण सामाजिक रुढ़ियों द्वारा नियन्त्रित रहता था।[62]
यह विश्वास करना, कि आध्यात्मिक जीवन का मार्ग भौतिक वस्तुओं में से होकर है, और हम भौतिक लाभ पहुंचाकर लोगों के हृदय को जीत सकते हैं, आधुनिक जीवन की भ्रान्तियों में से एक है? यह मान लिया जाता है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति को पूरी तरह भौतिक तृप्ति प्राप्त हो जाए, तो उसकी स्वर्ग की और परम मूल्यों को प्राप्त करने की इच्छा विलीन हो जाएगी। पर क्या कोई भी भौतिक लाभ जीवन की अपेक्षा अधिक मूल्यवान हो सकता है? या कोई भी विपत्ति मृत्यु की अपेक्षा अधिक भयावह हो सकती है? हम आवेशों और आदर्शों से जितने शासित होते हैं, अपने हितों से उतने नहीं। जीवन में आर्थिक मूल्यों के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है। हम मनुष्य है, केवल उत्पादक या उपभोक्ता नहीं, कामगर या ग्राहक ही नहीं। यदि यह संसार दूध और शहद से भरा हुआ पार्थिव स्वर्ग भी बन जाए और सस्ती मोटरें और रेडियो सब लोगों को सुलभ भी हो जाएं, फिर भी हमें मन की शान्ति या सच्ची प्रसन्नता प्राप्त नहीं हो सकेगी। ऐसे नर-नारी भी, जिन्हें वे सब सुख और सुविधाएं प्राप्त हैं, जो भौतिक सभ्यता द्वारा प्राप्त हो सकती हैं, इस प्रकार हतारा-सा अनुभव कर रहे हैं, जैसे उनसे कुछ वस्तु ठग ली गई हो। मनुष्य केवल वर्तमान के आराम के लिए नहीं जीते, अपितु अवैयक्तिक लक्ष्यों की खोज के लिए, आत्मिक जीवन के लिए जीते हैं; आत्मरति आत्मक्रीड़ा के लिए। आपस्तम्ब कहता है कि आत्मा को प्राप्त करने से बढ़कर और कुछ नहीं है।'[63] अधिकार के यंत्नजात (मशीनरी) द्वारा न कुचली गई आत्मा, अंधकार की शक्तियों द्वारा धुंधली न की जा सकी परमात्मा की ज्योति ही मानव की एकमात्न आशा है।
हमें दो अलग-अलग प्रकार के आनन्दों में, बाह्य और आन्तरिक आनन्दों में घपला न करना चाहिए। यदि हमपर देवताओं की कृपा हो, तो हम जीवन में आराम से रहते हैं हमारी आंखों में चमक होती है; आसपास की दुनिया हमारी प्रशंसा करती है; हमारी स्तुति करती है और हमसे प्रेम करती है। हम मनमौजी और बिगड़े बच्चों की तरह रहते हैं और हमें निश्चय रहता है कि सब बातें जैसी इस समय हैं, उससे भिन्न हो ही नहीं सकतीं। परन्तु जब हम अपने प्रति ईमानदार होते हैं, तब हमें मालूम होता है कि बड़ी बात यह नहीं है कि दुनिया हमारे बारे में क्या सोचती है, अपितु यह है कि हम अपने बारे में क्या सोचते हैं। आनन्द सद्गुण है, परिष्कार है, और सौन्दर्य है; निरानन्द कुरूपता है, गंवारपन और कृत्रिमता। हममें से प्रत्येक की लालसा सरल और सजीव के लिए, एक ज़रा-सी मित्रता के लिए, ज़रा-से मानवीय आनन्द के लिए और ऐसे आदर्श के प्रतिनिष्ठा के लिए रहती है, जिसमें हम अपने-आपको खपा सकें। आध्यात्मिक स्वतंत्रता के ध्वंसावशेषों पर खड़ी की गई कोई भी समाज व्यवस्था अनैतिक है। सम्पत्ति के विरुद्ध पाप को, समाज के विरुद्ध पाप को क्षमा किया जा सकता है; किन्तु पवित्न आत्मा के विरुद्ध पाप को क्षमा नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे पाप के द्वारा हम स्वयं अपने प्रति हिंसा कर रहे होते हैं।
मनुष्य, जिस रूप में हम उसे जानते हैं, कुछ कम या कुछ अधिक आज का-सा ही शरीर और मस्तिष्क लिए हुए, हज़ारों वर्षों से जीता आ रहा है; एक प्राणी, जो जंगलों और गुफाओं में रहता था, जो रात से और वनों से डरता था, जो भूतों और प्रेतनियों को मनाया करता था, जो मनुष्यों की हिंस्र पशुओं के साथ प्राणांतक लड़ाइयों के खेल देखा करता था, धर्म-परीक्षा-समितियों (इक्विज़िशन)[64] और न्यायिक यंत्रणाओं में आनन्द लेता था। क्रूरता और जंगलीपन की शताब्दियों की तुलना में मानव सभ्यता तो कल की बच्ची है। मानवता और संस्कृति स्वाभाविक नहीं है, अपितु परिष्कार द्वारा विकसित की जाती हैं और विचार की पद्धतियों पर निर्भर हैं। रुचि और परम्परा संस्कृति की उपज हैं। समाज के ढांचे को भीड़ के प्रमाप (स्टैंडर्ड) तक नीचे ले आने के बजाय हमें जनसाधारण को सच्चों सस्कृति के स्तर त५. ऊपर उठाना होगा। सार्वभौम समानता का यह अर्थ कदापि नहीं है कि प्रत्येक वस्तु समान रूप से गंवारू हो। जन-साधारण के मन का निम्न स्तर ही निरंकुशताओं (अत्याचारों, तानाशाहों) के विकास के लिए ज़िम्मेदार है।'[65]
सभ्य मनुष्य का जीवन और सत्य के प्रति दृष्टिकोण असभ्य मनुष्य से भिन्न होता है। सभ्य मनुष्य की सम्मतियां सम्बद्ध तथ्यों और युक्तियों पर शान्तिपूर्वक विचार द्वारा बनती हैं, जबकि असभ्य व्यक्ति अपने आवेशों, पूर्वसंस्कारों और क्षणिक नारों का दास होता है। सामूहिक प्रचार मनोवेगों को प्रभावित करता है, जबकि व्यक्तिगत सुझाव बुद्धि पर प्रभाव डालते हैं। असन्तुष्ट और निराश, महत्त्वाकांक्षी और जोखिम पसन्द करनेवाले, अत्यधिक सप्राण और गैर ज़िम्मेदार युवक, जो वातोन्माद (हिस्टीरिया) और सुझावों से बहुत शीघ्र प्रभावित हो जाते हैं, परम्परा की शक्ति को 'सामाजिक विशेषाधिकारों के लिए आड़' बताकर अस्वीकार करते हैं; और वे वर्तमान व्यवस्था को समाप्त कर देने पर उतारू हैं और इसकी जगह वे एक नई वस्तु लाना चाहते हैं, जिसे वे स्वयं नहीं जानते कि वह क्या है। क्योंकि नैतिक साधन असंगठित हैं, इसीलिए संसार में अन्धेरगर्दी मची हुई हैं।
भारतीय संस्कृति में फिर नया यौवन भर देने की क्षमता है और यह नैरन्तर्य को बनाए रखते हुए भी आमूल उथल-पुथल कर सकती है। भारत के निवासियों में, यद्यपि वे कुछ धीमे चलने वाले हैं, फिर भी, यौवन का बल और जीवनी शक्ति है और इसीलिए वे अपनी संस्कृति को बचाए रख सके हैं। उनकी सहजवृत्तियों पर वास्तविकताओं के धक्के की ऐसी प्रतिक्रिया होती है, जिसमें गलती हो ही नहीं सकती। वे आमूल परिवर्तन अनिवार्य रूप से बाहरी आदतों को थोपकर नहीं, अपितु शिक्षण और आत्मिक परिष्कार की प्रक्रिया द्वारा कर पाने में समर्थ हैं। बल-प्रयोग द्वारा किए गए परिवर्तन स्थायी केवल तभी हो सकते हैं, जबकि उन्हें स्वेच्छापूर्वक स्वीकार कर लिया जाए। जन-साधारण की अपने-आपको परम्परा के बन्धन से, जहां वह परम्परा स्वस्थ और सजीव है वहां भी, मुक्त करने की, मनोवेगात्मक दृष्टि से उत्तेजनीय होते जाने की और बौद्धिक अकर्मण्यता और निष्क्रियता की प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए। अंधेरगर्दी और निरंकुशता के बीच में से निकलकर आगे बढ़ पाने का केवल एक यही मार्ग है।
आत्मा की इस स्वतंतता को, भौतिक और सामाजिक बन्धनों से स्वाधीनता को प्राप्त करना अत्यावश्यक है। स्वाधीनता की व्याख्या दो रूपों में की गई है। एक तो स्वाधीनता वह है, जो सामाजिक बल-प्रयोगों (विवशताओं) से रक्षा करती है; दूसरी हमें भौतिक विवशताओं से बचाने का प्रयत्न करती है, उन अभावों और आवश्यकताओं से हमें मुक्त करने का प्रयत्न करती है, जो ठीक-ठीक आर्थिक और सामाजिक सम्बन्धों द्वारा पूर्ण हो सकती हैं। इन दोनों में प्रत्येक अच्छे जीवन का साधन है। दोनों में से प्रत्येक की, जब वह पूर्ण हो, यह मांग होती है कि समाज को न केवल व्यक्तियों और समूहों की इन बल-प्रयोगों से रक्षा करनी चाहिए, अपितु उन जीवन-मूल्यों को प्राप्त करने का भी अवसर देना चाहिए, जिनका ये बल-प्रयोग निषेध करते हैं। जहां एक ओर स्वाधीनता की नकारात्मक परिभाषा करते हुए उसे बल-प्रयोग का अभाव कहा जा सकता है, वहां दूसरी ओर यह सकारात्मक रूप से अच्छे जीवन का साधन भी है। यह आत्मा की स्वतंलता है, जिसने संस्थाओं को ढाला है और फिर नये रूप में ढाला है और हमारे जीवन तथा सभ्यता को इसके अविराम बदलते हुए रूप प्रदान किए हैं। मानव-जाति का इतिहास मनुष्य की अजेय आत्मा का जीवन है; इस जीवन में अनन्त प्रकार के रूप और अभिव्यक्तियां हैं; वे सब वे विभिन्न ढंग हैं जिनके द्वारा मानव-प्रकृति अपने-आपको अपनी आकाक्षांओं और अभियानों को, अपनी महत्त्वाकांक्षाओं और सफलताओं को, अपने संघर्षों और असफलताओं को व्यक्त करने की चेष्टा करती रही है; इन सबके बीच में होकर मनुष्य की सृजनशील आत्मा आशा करती रही है, घोर प्रयत्न करती रही है, असफल होती रही है, फिर भी कुल मिलाकर विजय पाती रही है, आगे ही बढ़ती रही है, कभी भी पीछे न हटकर, आगे बढ़ने के लिए ही प्रयत्नशील रही है; यह स्वतंल आत्मा ही मानव-इतिहास का हृदय (प्राण) है।
अतीत में मानवीय प्रगति इस कारण हो पाई कि व्यक्तियों ने अपनी सामान्य बुद्धि और अन्तःकरण को उन्मादग्रस्त यूथ-भावना में डुबा देने से इनकार कर दिया। जीवन प्रतिरोध है; रेत में अपने पैरों को गहरा गड़ाकर खड़ा होना है, जिससे धारा बहा न ले जाए।'[66] वर्तमान अव्यवस्था का एक सबसे गहरा कारण यह है कि इस समय ऐसे नर-नारियों का अभाव है, जो धारा के प्रवाह में वह जाने से इनकार कर दें। सारी प्रगति का श्रेय बिशेष रूप से प्रतिभासम्पन्न व्यक्तियों द्वारा प्रारम्भ किए गए नये विचारों को ही है। यदि बौद्धिक स्वाधीनता न होती तो शेक्सपियर या गेटे, न्यूटन या फैरैडे, पास्तियर या लिस्टर का नाम भी न होता। वे यांत्तिक आविष्कार स्वतंत्न व्यक्तियों ने किए, जिनके द्वारा पूंजीवाद और वर्तमान राज्यों का अस्तित्व संभव हो सका; जो आविष्कार लोगों को कठोर परिश्रम से छुटकारा दिलाते हैं और एक भिन्न नई सामाजिक व्यवस्था की तैयारी करते हैं। किसी भी समाज के मूल्य को इस दृष्टि से उतना नहीं नापा जाना चाहिए कि उसमें सार्वजनिक व्यवस्था और कार्यक्षमता कितनी उच्चकोटि की है, जितना कि इस दृष्टि से कि उसकी कार्य-प्रणाली लोगों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस सीमा तक देती है, किस सीमा तक नैतिक निर्णय को बढ़ावा देती है और अपने सदस्यों की बुद्धि और सद्भावना के विकास में किस सीमा तक योग देती है।
यद्यपि कार्ल मार्क्स का मत यह नहीं है कि व्यक्तियों का पक्का दृढ़ संकल्प इतिहास के मार्ग को बदल सकता है, और यद्यपि उसे पक्का भरोसा है कि पूंजीवादी व्यवस्था इतिहास के रंगमंच से लुप्त हो जाएगी, अत्याचार-पीड़ितों के जानबूझकर किए गए प्रयत्नों के परिणामस्वरूप नहीं, अपितु इतिहास की अनिवार्य प्रक्रिया के कारण, फिर भी वह हमसे विवेक के नाम पर अपील करता है। प्रकृति और ऐतिहासिक प्रक्रिया के अन्दर सूक्ष्म दृष्टि हमें सही मार्ग की ओर संकेत कर देती है। मनुष्य की भवितव्यता यही है कि वह ऐतिहासिक प्रतिक्रिया के अभिप्राय को समझे और अपने-आपको उस अर्थ के और अधिक प्रकाशन में लगा दे। हमारे जीवन उस अन्तिम लक्ष्य के लिए साधन बन जाने के कारण मान्य बन जाते हैं। हमें प्रगतिशील वर्ग के साथ तादात्म्य स्थापित करना चाहिए और उसी के प्रथ-प्रदर्शन के अनुसार कार्य करना चाहिए। यद्यपि इस वर्ग-संघर्ष में श्रमिक वर्ग की विजय सुनिश्चित है, पर हम अपने साहस और दृढ़ संकल्प द्वारा उसे निकटतर ला सकते हैं और संक्रमण के काल को अपेक्षाकृत कम कष्टपूर्ण बना सकते हैं। यह व्यक्ति का मन ही है, जो समष्टि की प्रकृति को समझ पाता है। इस प्रकार के विचार के कार्यों में आत्मा अपने-आपको सामाजिक समष्टि में अचेतन तल्लीनता से पृथक् कर लेती है। व्यक्ति सामाजिक समष्टि में पूर्णतया कभी विलीन नहीं हो सकता।
फिर, यदि व्यक्ति में अपनी कोई वास्तविकता है ही नहीं, तो हम उससे क्रांतिकारी के रूप में आचरण करने को कैसे कह सकते हैं? यदि प्रवृत्तियां स्वयं ही लौह-अनिवार्यता के साथ अपरिहार्य लक्ष्यों की ओर हमें लिए जा रही हैं, तो हमसे यह कहने का कोई अर्थ नहीं है कि हम उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कार्य करें। जब मार्क्स हमसे जान-बूझकर किए गए कार्यों द्वारा इन प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने के लिए कहता है, तो वह व्यक्ति की वास्तविकता को मान रहा होता है। वह हमसे भावी समाज के लिए कार्य करने को कहता है, अशाम्य 'भाग्य के असहाय पीड़ित शिकारों के रूप में नहीं, अपितु एक महान कार्य में हिस्सा बंटाने वाले ज़िम्मेदार व्यक्तियों के रूप में। समाजवाद कोई अनिवार्य रूप से आनेवाली वस्तु नहीं है। यदि ऐसा होता, तो समाजवादी सिद्धांत और समाजवादी पार्टी (दल) की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। बड़ी माला में प्रचार, बिगुल बजाना और नारे लगाना, पर्चेबाज़ी और खण्डन-मण्डन, सब इस बात के सूचक हैं कि मानवीय कार्य स्वतः नहीं हो रहे। यदि मार्क्सवादियों का यह सिद्धांत, कि समाजवाद समाज के विकास में अगला अनिवार्य सोपान है, सच हो, तो इतनी अथक हलचत की कोई आवश्यकता नहीं है। यह सब केवल इसलिए आवश्यक है क्योंकि वे लोगों को अपने मत में दीक्षित करना चाहते हैं। प्रचार इस उद्देश्य से किया जाता है कि हमारी चेतना पर प्रभाव डाले; और फिर उसका प्रभाव हमारे अस्तित्व पर पड़ेगा।
साम्यवाद (कम्युनिज़्म) के विरुद्ध यह आक्षेप किया गया है कि यह हमें हमारी संस्कृति से वंचित कर देगा; इस आक्षेप का उत्तर देते हुए कम्युनिस्ट मैनीफैस्टो (घोषणापत्र) में कहा गया है, "वह संस्कृति, जिसके नाश पर इतना शोक किया जा रहा है, एक बहुत ही बड़ी बहुसंख्या के लिप एक येत की तरह कार्य करने का प्रशिक्षण-मान है।" मार्क्स यह नहीं समझता विख्या के केवल एक यत्न है, या यह कि सामाजिक सत्युग बिना मानवीय प्रयत्न के ही आ जाएगा। जय बावर्क्स उस पूंजीवादी समाज के विरुद्ध आवाज उठाता है, जो श्रमजीवियों की मनुष्यता को नष्ह कर देता है, जब वह उस धर्म की निन्दा करता है, जो उन अन्यायपूर्ण दशाओं का पृष्ठ-पोषण करता है और उन्हें पवित्न बताता है, जिनमें कामगरों से दासों और भारवाही पशुओं से भी बुरा बर्ताव किया जाता है, तो वह व्यक्ति की वास्तविकता को ही महत्त्व दे रहा होता है। किसी भी व्यक्ति को अपने खाने, पहनने और मकान प्राप्त करने के अधिकार से कदापि वंचित नहीं किया जा सकता। क्योंकि आर्थिक व्यष्टिवाद इस प्रकार का समाज तैयार करने में असफल रहा है, इसलिए मार्क्स स्वैर तंत्र (लेस्से फेयर) की जो निन्दा करता है, वह ठीक ही करता है। परन्तु एक आंशिक सत्य को उठाकर सम्पूर्ण सत्य का स्थान नहीं दिया जा सकता। जब एक बार भौतिक आवश्यकताएं पूरी हो जाएं, तो व्यक्ति को सोचने और जो कुछ वह सोचता है, उसे कहने का अवसर मिलना चाहिए; और यदि उसका मन हो, तो उसे स्वतंत्रतापूर्वक सत्य की खोज करने का या सौंदर्य का सृजन करने का अवसर मिलना चाहिए। कुछ चीजें ऐसी हैं, जिनके अभाव में हम जी नहीं सकते; और कुछ अन्य वस्तुएं ऐसी हैं, जिनके अभाव में हमें जीने का कोई आग्रह नहीं होगा। प्रजातंत्रीय समाज, एकमात्न जो अपने-आपको सभ्य कह सकता है, "अन्य सब स्वतंलताओं से बढ़कर जानने की, बोलने की और अपने अन्तःकरण के अनुसार स्वतन्त्र रूप से तर्क-वितर्क करने की स्वतन्त्रता" पर आधारित होता है। प्रेसिडेण्ट रूज़वेल्ट ने जब यह घोषणा की थी कि भविष्य की गत्वर (गतिशील) व्यवस्था के संगठित प्रयत्न इस दिशा में होने चाहिएं कि वाणी की स्वतन्त्रता, उपासना की स्वतंत्रता, अभाव से स्वतंत्रता और भय से स्वतंत्रता को स्थापित किया जा सके, और उसे सुरक्षित रखा जा सके, तब उसने इसी स्थापना को विकसित किया था।'[67] स्वतंत्रता समाज में किसी भी व्यक्ति का और राष्ट्रों के मण्डल में किसी भी राज्य का आत्मनिर्णय का अधिकार है। इसकी एकमात्न सीमा प्रत्येक दूसरे व्यक्ति के या राज्य के उसी परिणाम में आत्मनिर्णय के अधिकार द्वारा नियत होती है। इस स्वतंत्रता के अभाव में, हमारे पास और चाहे कुछ भी क्यों न हो, हम निर्जीव हैं।
राज्यों और राष्ट्रों के, जो कि बढ़ते-घटते रहते हैं, सम्बन्ध में अन्तिम या शाश्वत कुछ भी वात नहीं है। परन्तु दीन से दीन व्यक्ति में भी आत्मा की वह चिनगारी विद्यमान रहती है, जिसे शक्तिशाली से शक्तिशाली साम्राज्य भी कुचल नहीं सकते। हम सबका मूल एक ही जीवन में है, और हम सब एक ही ब्रह्म के अंश हैं, अमरता के पुत्र, अमृतस्य पुत्रा:।'[68] इन आनन्दहीन दिनों में हमें अपने मनो को सब युगों के श्रेष्ठ पुरुषों के महान वचनों और वीरत्वपूर्ण कार्यों द्वारा सबल बनाना चाहिए। संभव है कि ऐसा प्रतीत हो कि हम इस समय पराजय के काल में हैं, परन्तु यह पराजय भी गौरव और इच्छा की तीव्रता से शून्य नहीं है। मनुष्य की भावना के चिरस्थायी प्रभुत्व में विश्वास ही वह प्रकाश है, जिसके सहारे हम मृत्यु की छाया की घाटी तक में बिना लड़खड़ाए चलते रह सकते हैं।
यदि सभ्यता को जीवित बचाना है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि इसका (सभ्यता का) सार शक्ति, यश, सबलता, सम्पत्ति और प्रतिष्ठा में नहीं है, अपितु मानव-मन की स्वतंत्न गतिविधि में, नैतिक सद्गुणों की वृद्धि में, सुरुचि के विकास और जीने की कला में निपुणता प्राप्त करने में है। मार्क्स ने धर्म की निन्दा करते हुए कहा है कि यह एक सामाजिक प्रतीति-मान है, जो सामाजिक अपूर्णताओं की क्षतिपूर्ति करती है। परन्तु कुछ ऐसे अशाम्य मानवीय अनुभव हैं, जैसे जन्म, प्रेम और मृत्यु, जो सारतः वैयक्तिक हैं। अधिकतम पूर्ण आर्थिक न्याय की या पार्थिव सत्युग की स्थापना भी हमारे कुछ तीव्रतम दुःखों को समाप्त नहीं कर सकती। सामाजिक स्वामित्व की स्थापना या उत्पादनों के साधनों पर नियंत्रण से मानवीय स्वार्थ या मूर्खता को और मानवीय आत्मा के तनाव को समाप्त नहीं किया जा सकता। मार्क्स अवश्य ही उन बुराइयों की, जो सामाजिक व्यवस्था की नहीं, अपितु मानव-प्रकृति की हैं, 'क्षतिपूति' के रूप में धर्म के मूल्य को अस्वीकार नहीं करेगा। सामाजिक क्रान्ति अपने-आपमें हमारे समाज के अव्यवस्थित अपक्षय को रोक पाने में असमर्थ है। जीवन के मानवशून्य होते जाने से यह हमारी रक्षा नहीं कर सकती।
जब हम यह मान लेते हैं कि व्यक्ति के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष ऐसा भी है, जो उसके केवल अपने ही प्रति है; जब मनुष्य अपने-आपको अधिकतम स्पष्टवादिता के साथ प्रकट कर रहे होते हैं, तब भी कुछ वस्तु ऐसी रह जाती है, जो और भी परे और पहुंच के बाहर होती है, एक स्वप्न, जिसमें औरों के साथ हिस्सा नहीं बंटाया गया होता, एक अटूट मितभाषिता; जो कुछ हम कहते या करते हैं, यहां तक कि हम जो कुछ एकान्त में सोचते हैं, जिसमें कि हम जो कुछ हैं, उसका निवास है, उसके भी पीछे कुछ वस्तु बच जाती है तो इससे अनिवार्य परिणाम यह निकलता है कि हमारे जीवन के इस पक्ष से सम्बद्ध कुछ गतिविधियां भी अवश्य होंगी। हम समाज में सक्रिय रहते हैं, परन्तु हम एकान्तसेवी भी है चिन्तनशील, जो अस्तित्व के उग्र ज्वर से निकलकर बारम्बार आत्म-मिलन की शान्ति में डूब जाते हैं। जब हम अपनी दृष्टि को अन्तर्मुख कर लेते हैं, तो हम बाह्य घटनाओं और जीवन की उत्तेजनाओं की अपेक्षा आन्तरिक जीवन के रहस्यों में अधिक आनन्द लेने लगते हैं। उपनिषद् का कथन है कि "आत्म ने जन्म लेकर इन्द्रियों को बहिर्मुख कर लिया है। इसीसे व्यक्ति को बाहर की वस्तुएं ही दीखती हैं, आन्तरिक आत्म नहीं। परन्तु कोई एक, जो बुद्धिमान होता है और शाश्वत जीवन का अभिलाषी होता है, अपनी दृष्टि को अन्तर्मुख करके आन्तरिक आत्मा को देखता है।"[69] आन्तरिक ध्यान ही आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि की ओर ले जाने वाला मार्ग है।[70]
पास्कल ने कहा था कि जीवन की अधिकांश बुराइयां मनुष्य की एक कमरे में शान्त होकर बैठ पाने की असमर्थता से उत्पन्न होती हैं। यदि हम केवल शांत होकर बैठ पाना सीख लें, तो हम कहीं अधिक अच्छी तरह यह जान सकेंगे कि किस ढंग से कार्य करना सर्वोत्तम होगा। वे सब बड़ी-बड़ी सफलताएं, जिन पर मानव-जाति को गर्व है, उन लोगों की कृतियां हैं, जो बैठे और अति सूक्ष्म वस्तुओं का या आकाश के ग्रह-नक्षत्तों की गतियों का चिन्तन करते रहे। वे चिंतनशील लोग ही हैं, आलसी, अपरिचित, वे निकम्मे लोग, जो तारों की ओर देखना छोड़ कर एक कुएं में जा घुसते हैं, जिन्हें हमारी सुविधाओं और आनन्द का श्रेय है।
जब धर्म चिन्तन पर बल देता है, तो वह केवल यह संकेत करने के लिए कि मानवीय जीवन की कुछ अन्तरंगतम पवित्नताएं ऐसी हैं, जिन्हें सुरक्षित बनाए रखा जाना चाहिए। जीवन का उद्देश्य पृथ्वी पर आदर्शलोक उतार लाना ही नहीं है, अपितु एक उच्चतर और तीव्रतर प्रकार की चेतना प्राप्त करना है। शिव, बुद्ध तथा अन्य सैकड़ों सन्तों के चित्न प्लेटो द्वारा और अरस्तू द्वारा भी ग्रहण किए गए इस सत्य के परिचायक हैं कि मनुष्य का सर्वोच्ध लक्ष्य चिन्तन, स्वतन्त्रता और बुद्धि की शान्ति है।
मार्क्स धर्म और दार्शनिक आदर्शवाद को अभिन्न मान लेता है और कहता है कि “अब तक दार्शनिकों ने इस संसार की व्याख्या अनेक रूपों में की है। पर असली काम इस (संसार) को बदलना है।"[71] मार्क्स के अनुयायी उसके इस विचार का स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं कि यह इस बात का द्योतक है कि दर्शन को जीवन से पृथक् किया जाना चाहिए, सिद्धान्त को व्यवहार से। मार्क्स उस भांवसमाधि के, जिसमें रहस्यवाद की अन्तिम परिणति बताई जाती है, विरोध में कर्म का समर्थन करता है। अपने-आपको सार-जगत् के चिन्तन में लीन करने के बजाय हमे सुनिश्चित और ऐतिहासिक अस्तित्वों के जगत् में कर्म करने में जुट जाना चाहिए। 'फ्यूअरबाख पर अपने आठवें प्रबन्ध' में मार्क्स कहता है, "उन सारे रहस्यों का, जो रहस्यवाद के सिद्धान्त को चलाते हैं, बुद्धिसंगत समाधान मानवीय कर्म में और उस कर्म को समझने में ही है।"
इसके अतिरिक्त, धर्म लोगों की जीवन-सम्बन्धी मान्यताओं के मानदण्डों को उलट-पलट देता है। उन सब चीज़ों को, जो प्रकृति की सहजवृत्तियों के अनुसार वर्तमान दृश्य-जीवन में मूल्यवान समझी जाती है, सत्ता और विलास को, सम्पत्ति और यश को, धर्म घृणा की दृष्टि से देखता है। जिन वस्तुओं से दुनिया घृणा करती है और जिन्हें नीत्रो दासता की विशेषताएं कहता है, आज्ञा-पालन और नम्रता, दरिद्रता और संयम, उन्हें धर्म परलोक में सुख प्राप्त करने का अचूक साधन बताता है। मनुष्य की रुचि इन्द्रिय-ग्राह्य वास्तविक जगत् से हटाकर दूसरे उस जगत् की ओर फेर दी जाती है, जिसकी कल्पना धार्मिक स्फुरणाओं (इलहामों) के बल पर की गई है। जो भी कोई इस पृथ्वी पर जीवन की दशाओं को सुधारने का यत्न करता है, उसे शहरी और दुनियादारी में फंसा हुआ बताया जाता है।
मार्क्स को इस बात का ध्यान है कि अन्य धमों की भांति ईसाई धर्म भी गरीबों और अत्याचार-पीड़ितों की अपेक्षाकृत अच्छे जीवन की आशा से लाभ उठाता है। यदि इस जीवन के अन्याय ही सब कुछ हों, तो जीवन का कुछ अर्थ ही नहीं रहेगा। इसलिए धर्म परमात्मा के राज्य की धारणा प्रस्तुत करते हैं; उस परमात्मा के राज्य में मृत्यु के बाद गरीब और अत्याचार पीड़ित लोग धनिकों और आराम से रहनेवालों की अपेक्षा कहीं अधिक सरलता से प्रविष्ट हो सकेंगे। मरणोपरान्त न्याय के विषय में केवल इस प्रकार का विश्वास ही पृथ्वी पर हमारे वर्तमान जीवन का कुछ औचित्य बता सकता है। इसलिए मार्क्स आलोचना करते हुए कहता है, "धर्म पीड़ित प्राणी की सिसकी है, एक हृदयहीन संसार का हृदय है और नितान्त आत्महीन दशाओं की आत्मा है। यह गरीबों की अफीम है।"[72] "परमात्मा की धारणा ही विकृत सभ्यता की केन्द्र शिला है" मार्क्स कहता है, "धर्म का, जो एक भ्रामक काल्पनिक आनन्द देता है, चुकी केन्द्र शिलाविक आनन्द के दावे की स्थापना करना है।"[73] पेंजिल्स कहता है कि "धर्म का पहला शब्द ही झूठ होता है।" लेनिन ने लिखा है कि "धर्म आत्मिक अत्याचार का ही एक फाल हाला शोषकों के विरुद्ध संघर्ष में शोषितों की असहायता अनिवार्य रूप से मृत्यु के पश्चात् उत्कृष्टतर जीवन में विश्वास को जन्म देती है। उन लोगों को जो सारे जीवन परिश्रम करते हैं और फिर भी तंगी में जीवन बिताते हैं, धर्म विनम्रता और धैर्य की शिक्षा देता है और उन्हें स्वर्ग में पुरस्कार मिलने की आशा द्वारा उनके आंसू पोंछता है। परमात्मा और पारलौकिक जीवन में विश्वास आदशों के प्रति निष्ठा की ओर से ध्यान को दूसरी ओर बेटा देते हैं।
ये टिप्पणियां भी धर्म की, विवेक की ओर सहानुभूति की भावना से शून्य नहीं हैं। इस पृथ्वी के उत्तराधिकार से वंचित लोग भौतिक सुख और सुविधा के जीवन के लिए परलोक की और क्यों ताकें? यंत्रों द्वारा उत्पादन की तकनीक के कारण यह संभव हो गया है कि पृथ्वी पर ही सब लोग पहले की अपेक्षा भला जीवन बिता सकें। यदि केवल सिद्धान्तात्मक धर्म की जकड़ किसी प्रकार ढीली हो जाए, तो वे वंचित नर-नारी जिनके पास न सम्पत्ति है, न भविष्य के लिए सुरक्षा, उन पूंजीपतियों के विरुद्ध विद्रोह कर देंगे, जो अपने साथी मनुष्यों के कल्याण के प्रति इतने उत्तरदायित्वशून्य हैं कि वे न्यूनतम वेतन पर उनका उपयोग करते हैं और जब उनसे काम निकल चुकता है, तो उन्हें उठाकर कूड़े के ढेर पर फेंक देते हैं। धर्म, मानवीय भ्रातृत्व को क्रियान्वित करने के बजाय हमें परतन्त्रता के आगे झुकने को क्यों कहें? एक धार्मिक कल्पनाशक्ति के सुमहान प्रयत्न द्वारा मार्क्स इस बात को देखता है और अनुभव करता है कि मानव-समाज एक ही जैव (संजीव) समष्टि है और वह आधिदैविक, परलोकपरक धर्म का विरोध करने का प्रयत्न करता है। पूंजीवादी व्यवस्था के विनाश से, तर्कसंगत रूप से उन सब संस्थाओं, विचारों और पद्धतियों का मूलोच्छेद हो जाएगा, जिनके द्वारा जन-साधारण को बहकाकर दास बनाया गया था।
मार्क्स इस स्थापना को अस्वीकार करता है कि विचार इतिहास के गतिपथ पर नियंत्रण रखते हैं। यह ठीक है कि जिस वस्तु से इतिहास का निर्माण होता है, वह विशुद्ध विचार नहीं है, अपितु वह विचार है, जो अपने-आपको व्यावहारिक समस्याओं पर लागू करता है। विचार की अन्तर्वस्तु भले ही सामाजिक हो, किन्तु विचार को स्वयं सामाजिक उपज नहीं होना चाहिए। इसे तो निष्पक्ष चिन्तन की ही उपज होना होगा। वे महान विचार, जो सम्पूर्ण संसार को आन्दोलित करते हैं और चरित्न को उन्नत करते हैं, शायद ही कभी सक्रिय सार्वजनिक कार्यकर्ताओं की देन होते हैं। वे तो कवियों और विचारकों, कलाकारों और धर्म प्रचारकों की देन होते हैं। उनकी स्फुरणा एकान्त और चिन्तन में होती है और उनके लिए एक ऐसी आत्मपूर्णता और मन की स्वतन्त्रता की अपेक्षा रहती है, जिसे प्राप्त कर पाने की, सार्वजनिक जीवन के दबाव और तनाव के नीचे रहनेवाले सार्वजनिक कार्यकर्ता शायद ही कभी आशा कर सकते हैं।
विचार कर्म का सार है। प्रारम्भ में केवल शब्द था और शब्द से ही यह हाड़मांस बना। दर्शन इतिहास बन जाता है और संस्कृति सभ्यता। यूनानी सभ्यता की रचना में प्लेटो और अरस्तू ने महत्त्वपूर्ण योग दिया। 1642 में हॉब्स ने गृहयुद्ध को और 1688 में लौक ने क्रांति को प्रेरणा दी। फ्रांसीसी क्रांति वाल्लेयर, रूसो तथा विश्व-ज्ञान-कोष-लेखकों (ऐनसाइक्लोपीडिस्ट) की विचारधारा का परिणाम थी। दार्शनिक आमूल परिवर्तनवादियों, बैन्थम और मिल, ने उन्नीसवीं शताब्दी के उदार कार्यक्रम को प्रेरणा दी। मार्क्स स्वयं भी ऐतिहासिक प्रक्रिया की एक व्याख्या प्रस्तुत करता है; और सब व्याख्याएं संसार को बदलने के इरादे से ही प्रस्तुत की जाती हैं। जीवन आदशों से शासित रहता है और सब क्रांतिकारी आंदोलनों की पृष्ठभूमि में विचारधाराएं (दर्शन) कार्य करती रही हैं। हम जो कुछ सोचते हैं, उसीके परिणाम हम है। दार्शनिक लोग भविष्य के स्रष्टा होते हैं। दर्शन का काम केवल जीवन की व्याख्या प्रस्तुत कर देना नहीं है, अपितु उसे दृष्टि प्रदान करना और मार्ग दिखाना भी है।'[74] ध्यान-प्रार्थना और जीवन एक-दूसरे से पृथक् वस्तुएं हैं, एक-दूसरे की विरोधी नहीं। उन दोनों का अस्तित्व साथ-साथ रह सकता है।[75] वे एक-दूसरे की ओर संकेत करती हैं और साथ-साथ कार्य करती हैं। फिर, यदि हम अपने-आपको न बदलें, तो हम समाज-व्यवस्था को बदल नहीं सकते। हमारी समाज- व्यवस्था उन लोगों के चरित्न के अनुसार ही उच्च या निम्र होती है, जिनसे मिलकर वह बनी है। एक अधिक प्रभावी समाज-व्यवस्था का अर्थ है- एक विभिन्न प्रकार के मनुष्य। जीवन की कोटि (किस्म) को बदलने के लिए हमें नया जन्म ग्रहण करना होगा। धर्म केवल इसलिए असफल हो गए कि हमने उन्हें गम्भीरतापूर्वक ग्रहण नहीं किया। उनका मुख्य उद्देश्य है मनुष का पुनर्निर्माण। अपनी मनमानी, अहं भावना, अपनी ही बाज़ी चलते जाने का हठ, अपनी ही सौदेबाज़ी में लगे रहना, और दूसरों को बुद्ध बनाकर अपना उल्लू सीधा करना, ये ही सारी विफलता के कारण हैं। निःस्वार्थता, पड़ोसी के प्रति प्रेम और सहयोग इस विफलता से बचने के उपाय हैं। हममें से कितने लोग हैं, जिन्होंने निःस्वार्थता के नियम का पालन किया है या पालन करने की कोशिश भी की है। यदि बहुत थोड़े-से लोगों की प्रवृत्ति ही इस ओर रही हो, तो हम स्वार्थपरता के पुंज के बारे में क्या कह सकते हैं? हमें बचाने के लिए केवल ज्ञान ही काफी नहीं है। उसके लिए कठोर अनुशासन, जिसमें आत्मविश्लेषण और समर्पण भी सम्मिलित है, आवश्यक है। मानव-व्यक्ति प्रकाश और छाया का, ज्ञान और अज्ञान का मिलन-स्थल है। उसके रूप में ब्रह्म ने शरीर का वस्त्र धारण कर लिया है। सच्चा अस्तित्व वैयक्तिक अस्तित्व की आवश्यकता से सीमित हो गया है। दो प्रवृत्तियां, एक तो पृथक् (एकान्त) वैयक्तिक जीवन की ओर और दूसरी एकता और सार्वभौमता की ओर परस्पर संघर्ष कर रही हैं। इन दोनों का मेल बिठाना ही वह समस्या है, जो हमारे सम्मुख रखी गई है और जिसे हल करने के लिए अनेक कठिनाइयों और कष्टों, रक्त और आंसुओं को सहना होगा।'[76] चिन्तनशील रहस्यवादी संसार को सम्मोहित करके निद्रा या जागरित स्वप्न में नहीं सुला देते। वे भी मारधाड़ से ऊपर उठे हुए नहीं हैं। सांसारिक व्यवस्था के सम्बन्ध में वे प्रायः युद्धप्रिय होते हैं। वे दुनियादारी में फंसे हुए लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक स्पष्ट करनेवाली और रचनात्मक प्रयोजन की तीव्रता के साथ कार्य करते हैं। उन धार्मिक महापुरुषों की शानदार परम्परा पर दृष्टि डालिए, जिन्होंने न केवल धार्मिक संघों की स्थापना की, अपितु शिक्षा, और रोगियों की देखभाल जैसे व्यावहारिक राजनीति के विषयों पर भी बहुत स्वस्थ प्रभाव डाला।
मार्क्स ने धर्म को परलोकपरक बताकर जो उसकी निन्दा की है, वह धर्म के कुछ एकपक्षीय दृष्टिकोणों के विषय में उचित है। भले ही धर्म के वास्तविक जीवन का सम्बन्ध शाश्वतिक व्यवस्था से हो, फिर भी, क्योंकि हम लोग तो पार्थिव और ऐहिक व्यवस्था के सदस्य हैं, इसलिए हम अपनी ज़िम्मेदारियों से बच नहीं सकते। हम आत्माएं अवश्य हैं, किन्तु सशरीर हैं, और हमें, अपने आसपास की दशाओं को स्वीकार करके चलना होगा। हमें अपने शरीरों को निष्फल नहीं करना है, जो एक साधन है, जिसके द्वारा हम संसार की चेतना को ग्रहण करते है और संसार का आनन्द लेते हैं। अधिक अच्छी तरह देखने के लिए हमें अपनी आंखों को निकाल फेंकने की आवश्यकता नहीं है। स्वर्ग प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि हम इन्द्रियों को मृतप्राय कर दें या मन को मारकर बैठ जाएं। शारीरिक आनन्द एक पवित्न लक्ष्य है। यजुर्वेद में भी कहा है, "हम सौ वर्ष जिएं - ऐसा जीवन, जिसमें हमारी दृष्टि, श्रवण-शक्ति और बोलने की शक्ति ठीक बनी रहे, और हम दूसरों पर आश्रित न हों। हम इस प्रकार का जीवन सौ से भी अधिक वर्ष तक जी सके।"[77] यह शरीर शाश्वत का केवल आवरण ही नहीं है। अपितु आवश्यक साधन भी है।
हमें उन शाश्वत सत्यों को, जो हमें अपने जीवन के लिए आचरण के सर्वोच्च नियम प्रदान करते हैं, इस पृथ्वी पर ही सामाजिक और ऐहिक रूपों में प्राप्त करना है। प्रत्येक धर्म की एक नैतिक और सामाजिक अभिव्यक्ति होती है। पवित्नता (सन्तता) और प्रेम दोनों साथ-साथ रहते हैं। मनुष्य किसी न किसी समाज का सदस्य ही बनकर जन्म लेता है। उसका जीवन अन्तरंग सम्बन्धों का, आकर्षणों का और विकर्षणों का, एक जाल-सा है, जिसे तोड़कर स्वतन्त्र हो पाना न तो उसके लिए संभव ही है और न वांछनीय ही। अरस्तु कहता है, "जो व्यक्ति समाज में रहने में असमर्थ है, या जिसे इसलिए समाज में रहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह अपने लिए ही पर्याप्त है, वह या तो देवता है या पशु।"[78] उसके लिए समाज में कोई स्थान नहीं है। सामाजिक सम्बन्ध व्यक्ति की शक्तियों और सुअवसरों को बढ़ाते हैं और उसकी स्वतन्त्रता को और विस्तृत कर देते हैं।
हिन्दू विचारधारा सांसारिक और ऐहिक वस्तुओं की उपेक्षा नहीं करती। यह जीवन के चार लक्ष्यों को स्वीकार करती है : नैतिक, आर्थिक, कलात्मक और आत्मिक (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष)। इसके जीवन के चार सोपानों (आश्रमो) के सिद्धान्त में सामाजिक उत्तरदायित्वों पर बल दिया गया है। संन्यासी के रूप में भी व्यक्ति विश्व-समाज की सेवा करता है। चिन्तन के साथ-साथ इस संसार में कर्म करने पर भी ज़ोर दिया गया। 'ईशोपनिषद्' के अनुसार पूर्णता की खोज करने वाले साधक को कर्म और भगवान का ज्ञान, इन दोनों की साधना साथ-साथ करनी चाहिए। कर्म द्वारा वह मृत्यु के परे पहुंच जाता है और ज्ञान द्वारा अमरता को प्राप्त कर लेता है। जिस बात की मांग की गई है वह है सेवा के लिए समर्पित जीवन। "मेरा जीवन समर्पण का जीवन हो, मेरा प्राण (श्वास), आंखें, कान, बुद्धि और आत्मा सेवा के लिए समर्पित हों, मेरी वैदिक विद्या और समझ, समृद्धि और ज्ञान सेवा के लिए समर्पित हो। स्वयं बलिदान (यज्ञ) भी चरम बलिदान की भावना से हो रहा हो।"[79]
'भगवद्गीता' में कहा गया है कि भगवान का भक्त वह है, जो इस संसार को क्षुब्ध नहीं करता और जिसे यह संसार क्षुब्ध नहीं करता।[80] गीता की शिक्षा है कि केवल प्रेम के द्वारा, जो प्रेम कि सर्वस्व दान कर देता है और जो भाग खड़े होने से इनकार कर देता है, बुराई को पराजित किया जा सकता है और मानव-जाति का उद्धार हो सकता है।'[81] इस पुस्तक का आरम्भ ही एक कर्तव्य की समस्या से होता है। यह एक संवाद है, जो रणभूमि में हुआ है। दोनों सेनाएं युद्ध एक मैं व्यूह रचकर खड़ी है। अर्जुन रातु-दल की ओर दृष्टि डालता है; वह देखता है कि युद्ध क्षेत्र उसके दृष्टबन्धु तथा अन्य आदरणीय लोग खड़े हैं, वह घबराकर रथ में बैठ जाता है और लड़ने से इनकार कर देता है। वह अपने ही सगे-सम्बन्धियों की हत्या किसलिए करे ? यदि योद्धा के इस कर्तव्य की समस्या का समाधान हो जाए, तो शेष सब मामलों को भी इसी ढंग से निपटाया जा सकता है। गीता में जिस प्रश्न का विवेचन किया गया है, वह युद्ध के अनौचित्य या औचित्य का प्रश्न नहीं है। यह तो अपना कर्तव्य करते हुए, चाहे वह कर्तव्य कुछ भी क्यों न हो, सान्ति और पूर्णता प्राप्त करने की बात है। इसका उद्देश्य सिद्धान्त की शिक्षा देना उतना नहीं है, जितना कि व्यवहार में प्रवृत्त करना। कृष्ण कहता है, "जनक आदि ने कर्म द्वारा ही सिद्धि या पूर्णता प्राप्त की थी। तुझे भी संसार की व्यवस्था को दृष्टि में रखते हुए कर्म करना ही चाहिए..... जिस प्रकार मूर्ख कर्मफल में आसक्त होकर काम करते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी लोग कर्मफल में अनासक्त रहकर संसार में व्यवस्था स्थापित करने के लिए कर्म करते है।"[82] फिर, "केवल काम करना छोड़ देने से ही तो कर्म से मुक्ति नहीं मिल जाती; केवल कार्य करना बन्द कर देने से भी किसीको सफलता नहीं मिल सकती।"[83] "जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, मनुष्यों में वही समझदार (पंडित) है; नियमों के अनुसार वही पूर्ण कर्म का करनेवाला है। कर्म के फल की आसक्ति से रहित होकर, सदा संतुष्ट और अबद्ध रहकर यदि वह निरन्तर कर्म में लगा भी हुआ हो, तो भी वह कर्म नहीं करता।" "अपने सारे कामों को 'मुझ' पर छोड़ दें; अपने मन को परमात्मा में लगा दे, और लालसा को त्यागकर, मन में कोई विचार रखे बिना, उत्तेजनाशून्य होकर तू युद्ध कर।" संन्यास का हल (समाधान) कोई हल नहीं है, क्योंकि मनुष्य चाहे या न चाहे, कर्म तो उसे करना पड़ता ही है। योग कर्म में कुशलता का ही नाम है। "जो कोई 'मेरा' काम करता है, 'मुझे'[84] अपना लक्ष्य मानता है, 'मेरा भक्त है, जो सब आसक्तियों से मुक्त है, जो किसी भी जीव से घृणा नहीं करता, वह 'मुझे' प्राप्त करता है (मेरे पास पहुंच जाता है)।"[85] कर्म किया जाना है, उसके बाहरी परिणामों के लिए नहीं, अपितु आन्तरिक विकास के लिए। कर्मयोग इच्छाशून्यता है। समाज के लिए कार्य भी कर्मयोग नहीं है, परन्तु वह प्रारम्भिक अनुशासन के रूप में उपयोगी है। "सद्बुद्धिप्राप्त आत्मा पुण्य और पाप, दोनों को इस संसार में ही छोड़ जाती है।"[86] आध्यात्मिक गुणों का विकास किए बिना आध्यात्मिकता का दिखावा करने से कोई लाभ नहीं है। जो लोग संसार से बाहर रहते हैं और दिव्य शक्ति के उपकरण बन जाते हैं, वे महान कार्य करते हैं। बिना यह जाने कि हम क्या करते हैं और कैसे करते हैं, इधर-उधर भागते फिरना खाली हलचल करना-भर है। जब हम शाश्वतता की चेतना में प्रवेश करते हैं, केवल तभी हम जान पाते हैं कि सच्चा कर्म क्या होता है। संसार का निर्माण बेचैनी से भरी हलचल द्वारा नहीं, अपितु शान्ति और नीरवता द्वारा हुआ था। उपनिषदों और बौद्ध धर्म की ओर बच निकलने के उपाय केवल थोड़े-से लोगों के लिए, ऋषियों और तपस्वियों (भिक्षुओं) के लिए हैं। गीता उन लोगों को मुक्ति प्रदान करती है, जो कर्म में जकड़े हुए हैं; वह उनके लिए ऐसे कर्म का द्वार खोल देती है, जो स्वतंत्नता प्राप्त करने में उनकी सहायता करता है। कर्म है पलायन (संन्यास), ज्ञान या तप के सम्बन्ध में प्राचीन उक्तियों के स्थान पर गीता 'आसक्तिहीन कर्म' का प्रतिपादन करती है। आध्यात्मिक जीवन मनुष्यों और वस्तुओं का त्याग कर देना नहीं है, अपितु यह तो एक भस्म कर देनेवाली आग है, जो अहंभाव को जला देती है, बन्धनों को नए कर देती है और सर्वत्र व्याप्त हो जाती है। जिस वस्तु की प्रशंसा की गई है, वह तप या संन्यास का जीवन नहीं, अपितु शक्ति और ऊर्जा से दमकता हुआ रूपान्तरित जीवन है।
सुकरात का जो हाल हुआ, उसका प्लेटो की कल्पना पर बहुत निर्धारक (निश्चायक) प्रभाव पड़ा। यदि ऐसे महान और न्यायप्रिय व्यक्ति का यह हाल हो सकता है, तो इस संसार के काम-काज में रुचि लेने का क्या लाभ ? ऐसे संसार से, जिसमें कोई न्याय, उद्देश्य, अच्छाई या सत्य हो ही नहीं सकता, हटकर प्लेटो विचारों के जगत् की ओर, अति अनुभूतिशील जगत् की ओर मुड़ा और उसमे परमसुख की खोज में लगा। परन्तु उसके अन्दर जो यूनानी भावना थी, उसने इस मनोदशा के विरुद्ध प्रतिवाद किया और फलतः प्लेटो ने दार्शनिकों को भी राजनीति में भाग लेने का उपदेश दिया।[87]
लगभग 2500 वर्ष पहले यूनानियों ने यह धारणा विकसित की थी कि शासकों को जनता का सेवक होना चाहिए। सत्ता (अधिकार) का पद प्राप्त करने के योग्य होने के लिए पहले उन्हें सम्पत्ति का विचार त्याग देना पड़ता था, मितव्यय और तपस्या का जीवन बिताना पढ़ रहा था, और विशेष शिक्षा ग्रहण करनी होती थी। इस प्रशिक्षण का स्थान अकादमी कहलाता था। जिस संस्था की स्थापना इस उद्देश्य से हुई थी कि वह उस समय यूनानी जगत् को ज्ञात व्यावहारिक उद्यम की अपेक्षा अधिक अच्छे उद्यम की शिक्षा दे सके, यदि उसका नाम अव्यावहारिक जीवन के साथ जोड़ दिया जाए, तो इससे मानव-प्रकृति की विडम्बना ही प्रकट होती है।
दुर्भाग्य से ईसाई नीति-शास्त्र कभी भी स्पष्ट रूप से इस संसार के जीवन का मार्ग नहीं रहा।'[88]
प्रारम्भिक चर्च इस पृथ्वी पर के जीवन को नये जीवन की प्रतीक्षा का स्वल्य-सा समय मानकर चलता था; उस नये जीवन की, "जब हम लोग जो कि जीवित हैं और जीवित रहे। ऊपर बादलों में जा पहुंचेंगे।"[89] मध्ययुग में संसार को आंसुओं की घाटी के रूप में समझा जात था, जिनमें से प्रत्येक व्यक्ति को गुज़रकर न्याय की घाटी में पहुंचना होता है। ईसाई जीवर केवल किसी मठ में या तपोवन में ही बिताया जा सकता है।'[90] प्रोटेस्टेंट पविनतावादियों का संसार में रहने वाले औसत आदमी पर ईसाई जीवन को थोपने का प्रयत्न असफल रहा। एक नियम को मानना और आचरण किसी दूसरे नियम के अनुसार करना हममें से अनेक लोगों के औसत जीवन की सर्वाधिक स्पष्ट विशेषता बन गई है। ईसाइयत ने दुनिया के साथ समझौता कर लिया। कभी-कभी ईसा के इस कथन की, "जो वस्तुएं सीज़र (उस समय का रोमन सम्राट) की हैं, उन्हें सीज़र को दो, और जो वस्तुएं परमात्मा की हैं, उन्हें परमात्मा को दो,” व्याख्या इस रूप में की जाती है, मानो इससे दुरंगा व्यवहार करने की अनुमति मिल जाती हो। धर्म और राजनीति दो अलग-अलग क्षेत्र हैं और उन दोनों के बीच में एक खाई बनी हुई है; इन दोनों क्षेत्रों के विचार, अनुभूति और आचरण के अपने-अपने प्रमाप (स्टैंडर्ड) है। परमात्मा के राज् से आध्यात्मिकता से शून्य मनुष्यों और उनके 'भ्रष्ट उत्तराधिकार से कोई सरोकार नहीं। राज्या मनुष्य इस संसार को सहन कर सकता है, इसमें जैसे-तैसे गुजारा कर सकता है, परन्तु धार्मिक यह यहां केवल कुछ देर के लिए ठहरा हुआ है, उसे इस संसार के निकट भी नहीं जाना वाहत ताकि वह कहीं मलिन न हो जाए। परन्तु यह अन्याय्य दृष्टिकोण है। सीज़र की वस्तुओं का सम्बन्ध परमात्मा की वस्तुओं से होना चाहिए। आध्यात्मिक मूल्य (मान्यताएं) सांसारिक जीवन में रमे रहने चाहिए। धर्म आत्मा के रोगों (उपद्रवों) के लिए कोई अफीम मिश्रित शामक औषधि नहीं है। यह तो सामाजिक प्रगति के लिए गति देनेवाली शक्ति है। जब तक हमें एक आन्तरिक व्यवस्था में आस्था न होगी, तब तक हम स्थायी बाह्य व्यवस्था का निर्माण नहीं कर सकते। धर्म इतनी लोकोत्तर वस्तु नहीं है कि उसका मानव जीवन के साथ कोई सम्बन्ध ही न हो। अपनी अन्तर्दृष्टि के क्षणों में हम मनुष्य के अन्तिम लक्ष्य को समझ पाते हैं और हमें निश्चय होता है कि अन्त में विजय उसीकी होकर रहेगी। यदि ऐसी घटनाएं भी घटती हों, जिनसे यह प्रतीत होता हो कि यह विश्व-प्रयोजन निष्फल रहेगा, तो भी हम हताश नहीं होते। जिसे उच्चतम लक्ष्य की झलक मिल चुकी है, वह अपनी ओर से उस लक्ष्य की सफलता के लिए भरसक प्रयत्न करता है। परमात्मा के उद्देश्य को जान लेने के कारण उसका यह कर्तव्य हो जाता है कि वह उसे पूरा करे। क्रांतदर्शी (पैगम्बर) लोग सदा पहले से स्थापित व्यवस्था का विरोध ही करते रहे। वे शान्ति को भंग करनेवाले लोग थे। इस विश्वास के साथ कि विश्व उनके उद्देश्य का समर्थन करेगा, वे सांसारिक शक्तियों के विरुद्ध जूझ पड़े और कष्ट सहते रहे। सब महान उपलब्धियां (सफलताएं) कष्ट सहन और बलिदान से ही प्रसूत हैं।[91] यदि हम संसार में फंसे रहेंगे, तो हममें कोई मौलिकता नहीं होगी और हम समाज या मानव-प्रकृति को किसी नये सांचे में नहीं ढाल पाएंगे, हम अज्ञात में अन्वेषण-यात्राएं नहीं कर पाएंगे और राजनीति तथा समाज के विषय में हमारे विचार निर्जीव और यन्त्रनिर्मित-से होंगे। सच्चे धार्मिक व्यक्ति को मानवीय वास्तविकताओं की सुनिर्दिष्ट अनुभूति होगी। हेगल का आदर्शवाद जो धर्म का तत्कालीन स्थानापन्न था, उस समय विद्यमान प्रशियन राज्य को परमात्मा के राज्य से अभिन्न मानता था। जो राज्य सार्वभौम और शाश्वत है, उसे, परमात्मा के राज्य के प्रति द्रोह किए बिना, किसी भी सांसारिक राज्य के अधीन नहीं किया जा सकता। गिज़ोट (गिज़ो) ने यूरोपियन सभ्यता का अन्य सब सभ्यताओं से वैषम्य बताते हुए कहा है कि यूरोप में कोई भी सिद्धान्त, विचार, समुदाय या वर्ग कभी भी अन्तिम और पूर्ण रूप से विजयी नहीं हुआ, और यूरोपियन सभ्यता के प्रगतिशील स्वरूप का कारण भी यही है।
यदि आत्मा स्वच्छ हो और प्रेम प्रगाढ़ हो, तो हम उस उच्च कल्पना में, जिसे हम परमात्मा कहते हैं, श्रद्धा रखते हुए संसार में कार्य कर सकते हैं। सन्त आत्माएं मनुष्य के कष्टों के प्रति संवेदनशील होती हैं और जीवन के बोझ को अपने बोझ की ही भांति अनुभव करती हैं। उनकी देशभक्ति विश्वव्यापी होती है, उनकी दृष्टि में युद्ध मानवता का अपने ही विरुद्ध दो भागों में विदीर्ण हो जाना है, जो बहुत ही कुत्सित है, क्योंकि प्रेममय दयालुता ही सर्वोच्च सौन्दर्य है। हमे जीवन के सर्वोत्कृष्ट विशेषाधिकार का उपयोग इस ढंग से करना चाहिए कि विश्व की सृजनशील ऊर्जा हममें सजीव हो उठे, वह हमारे शरीर को अपने वस्त्र रूप में धारण कर सके, अपने. आपको हमारी चेतना द्वारा क्रियान्वित कर सके और परिवेश पर विजय पा सके।
धार्मिक जीवन के विकास के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य व्यावहारिक गतिविधि से विरत हो जाए, जिससे बौद्धिक या भावात्मक चिंतन की एकाग्रता हो पाए। धार्मिक जीवन निवर्तन (पीष्ठे हटना) और पुनरावर्तन की एक लयबद्ध गति है : व्यक्तिगत एकान्त में निवर्तन, जो विचार और चिन्तन की आवश्यकता का द्योतक है, और समाज के जीवन में पुनरावर्तन। एकान्त की गतिविधि दो रूप धारण करती है : बौद्धिक, जो दर्शन और धर्मविज्ञान की ओर ले जाती है; और 'भावात्मक, जो कला और रहस्यवाद में जाकर परिणत होती है। ये दोनों धार्मिक जीवन के अवयवभूत अंग है व्यक्ति की पृथक् और स्वतन्त्र गतिविधियां नहीं हैं। जब भी कभी हमें विफलता अनुभव हो रहे हो, अपनी ऊर्जा क्षीण होती हुई, शक्ति दुर्बल पड़ती हुई अनुभव हो रही हो और ऐसा लगता हो हम स्रायवीय विक्षेप (नर्वस-ब्रेकडाउन) के छोर पर खड़े हैं, तो हमें प्रार्थना और ध्यान की शरण लेनी चाहिए। ईसा के मौन सीधे तौर पर शक्ति को फिर तरोताज़ा कर देने से सम्बद्ध थे। पहाड़िये पर और जैतूनों के शिखर के बाग में उसकी प्रार्थना की रानियां शक्ति प्राप्त करने के लिए ही बीत थीं। जो लोग भगवान के निकट 'प्रतीक्षा' करेंगे, उनकी शक्ति अवश्य 'फिर नई' हो जाएगी। "तुम्हें शक्ति निस्तब्धता और विश्राम (एकान्त) में प्राप्त होगी।" मादाम गुयों के शब्दों में दे "परमात्मा के साहचर्य में बिताती हुई सृजनशील घड़ियां" हैं। सभी ईश्वरनिष्ठ व्यक्तियों के जीवन में हमें यह लयबद्ध गति दिखाई पड़ती है; दबाव और तनाव की ओर से निश्चेष्टता और चिन्तन की ओर, तूफान से निस्तब्धता की ओर तथा संघर्ष से शान्ति की ओर झूले की-सी गति; और सभं जगह, एकान्त में जो दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है, वही तूफानों में भी जीवन का पथ-प्रदर्शन करती है। दिव्यदृष्टिसम्पन्न मनुष्य अपने स्वप्नों को वास्तविकता के तन्तुओं में गूंथ देते हैं। उनका रुख अपने अस्तित्व के ऊपर विजय पाने का होता है, उससे बचकर भाग खड़े होने का नहीं। निरपेक्षता तटस्थता को ऊंचा नहीं बताया गया, अपितु साम्यावस्था (समतुलन) को ऊंचा कहा गया है। इ संसार का, जो कि मतभेदों या झगड़ों का क्षेत्र है, उद्धार केवल अन्तर्दृष्टि द्वारा ही हो सकता है।
वैयक्तिक और सामाजिक, दोनों ही पहलू अत्यावश्यक हैं। व्यक्ति को कभी भी समाय द्वारा या अनेक मध्यवर्ती समूहों में से किसी के द्वारा पूर्ण समावेशन (अपने साथ संयुक्त का लेने) का वशवर्ती नहीं होना चाहिए। समाज की शक्ति सबल व्यक्तियों की शक्ति है। बनती है। यदि व्यक्तित्व जाता रहे, तो समझो कि सब कुछ जाता रहा। अधुनिक मनुष्य बिना अपनी सामाजिक निकालना चाहियो को गवाए, अपने अन्दर व्यक्तिगत पहन (तानाशाहियों) का सामना कर सके।[92]
धर्म का उद्देश्य चिन्तन या भाव-समाधि नहीं है, अपितु जीवन की धारा के साथ एकात्य स्थापित करना और इसलिए सृजनात्मक प्रगति में भाग लेना है। धर्मपरायण मनुष्य कलाका अपर उसकी भौतिक प्रकृति या सामाजिक दशाओं द्वारा थोपी गई मर्यादाओं से ऊपरसके जाता है और सृजनात्मक उद्देश्य को विशालतर बनाता है। धर्म एक गत्वर (गत्यात्मकऊपर उठ है, सृजनशील तीव्र मनोवेग के नवीकृत प्रयास, जो असाधारण व्यक्तियों के माध्यम से कार्य करता है और जो मानव-जाति को एक नये स्तर तक उठाने के लिए प्रयत्नशील है। यदि सामाजिक निश्चेष्टतावाद, जो रहस्यवाद का परिणाम बताया जाता है, बुरा है, तो आर्थिक भाग्यवाद भी उतना ही बुरा है। मार्क्स का मुख्य इरादा यह है कि वह हमें स्वयं को समष्टि के आध्यात्मिकीकरण के लिए समर्पित कर देने को प्रेरित करे। मानवीय आत्मा को स्वतन्त्रता दिलाकर हम केवल उस एकमान पद्धति द्वारा संसार को उत्कृष्टतर बनाते हैं, जिससे कि इसे बनाया जा सकता है, और वह है आन्तरिक पद्धति ।
यदि धर्म को ढंग से समझा जाए और ठीक ढंग से उस पर आचरण किया जाए, तो उससे एक गहरा नवीकरण, एक शान्तिपूर्ण क्रांति हो सकती है; एक आधुनिक कवि के शब्दों में "गम्भीरतम परम्परा के लाभ के लिए बुराइयों पर विजय प्राप्त की जा सकती है। मनुष्य अभी इतिहास के आरम्भ पर ही है, अन्त पर नहीं; वह प्रेम और भक्ति का, सत्य और सृजनशीलता का एक संसार रचने के लिए प्रयत्नशील है; एक ऐसा संसार, जो सही अर्थों में अभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है।
हमारे धार्मिक नेता घोषणा करते हैं कि वे एक धर्मयुद्ध (जिहाद) में जुटे हुए हैं। उनकी यह इस प्रकार की घोषणा कोई पहली बार नहीं हो रही। वे इस बात को ज़ोर देकर कहते हैं कि यदि हम इस युद्ध को न जीत पाएं, यदि हम नाज़ीवाद के अत्याचार को उखाड़ न फेंकें, तो संसार फिर एक नये अन्धकार-युग में जा पड़ेगा, जिसमें विज्ञान की शक्ति का लाभ गुंडे उठा रहे होंगे और वे करोड़ों लोगों को अज्ञान और दरिद्रता में पटक देंगे। वे घोषणा करते हैं कि हिटलर की विजय का अर्थ होगा प्राचीन अन्धकार में से महा विप्लव (असभ्यता) का पुनः प्रादुर्भाव, जो मानव-जाति की सुस्थिरता और सुव्यवस्थित समाज की ओर कष्टपूर्ण उन्नति को यदि उलट नहीं भी देगा, तो भी उसमें बाधा अवश्य हाल देगा। इन बताया जाता है कि यह युद्ध ईसाई सभ्यता और धर्महीन पाशविकता के बीच, प्रजातन्त्र और तानाशाही के बीच युद्ध है। परन्तु थोड़ा ध्यान से सोचने पर पता चलता है कि वैषम्य इतना स्पष्ट नहीं है। वर्तमान व्यवस्था को न तो ईसाई ही समझा जा सकता है, न सभ्य ही, और यहां तक कि न सच्चे तौर पर प्रजातन्त्रीय ही समछा जा सकता है। सैन्यवादी परम्परा, जिसपर हमें गर्व नहीं हो सकता, प्रत्येक राष्ट्र में विद्यमान है और अपने अपराधों को वैध ठहरा रही है। सम्पत्ति और विशेषाधिकारों का वह ढांचा, जिसके परिणामस्वरूप बहुत अमीरी और बहुत सड़ांद उत्पन्न होती है और जो लगभग सभी देशों थे विद्यमान है, अन्यायपूर्ण है। जाति की असमानता आधुनिक साम्राज्यवाद का आधार है। हमने आबादियों (जनसंख्या) के विषय में भी जायदाद की-सी भावना बना ली है; और जो लोग जायदादों पर स्वामित्व कायम करना चाहते हैं, उनमें संघर्ष अवश्यंभावी है। राष्ट्र एक विश्व समाज के सम्भावित सदस्य माने जाने के बजाय ऐसी यांत्रिक शक्तियां समझे जाते हैं, जो एक दूसरे से संघर्ष करती है; और राष्ट्रीय नीतियां इस चिन्ता द्वारा प्रेरित होती हैं कि किसी प्रकार इन शक्तियों में संतुलन बनाए रखा जाए। यदि हम नाजीवाद को पराजित कर भी दें, तो भी जर तक, जिन्हें ईसाई सभ्यता के प्रजातन्त्र कहा जाता है, उनमें ये बुराइयां जारी रहेंगी, तब तक स्थायी शान्ति नहीं हो सकती। 1918 की सैनिक विजय से यह बात स्पष्ट है कि सैनिक विजय अन्तिम सफलता नहीं है। यदि प्रजातन्त्र में हमारी श्रद्धा के अनुसार ही हमारे काम भी हुए होते तो इस वर्तमान युद्ध से बचा जा सकता था। 1919 से 1939 तक के वर्षों में विजयी शक्तियों स्ट्रैसमैन के जर्मन प्रजातन्त्र की जड़ में मट्ठा डाला, निःशस्त्रीकरण सम्मेलन के प्रयत्नों में रुकावट डाली, लीग के प्रतिज्ञा-पत्त्र की सामूहिक सुरक्षा को निर्वीर्य कर दिया, और चीन, अबीसीनिया स्पेन और अन्त में म्युनिख में सैनिक आक्रमण से मौन सहमति प्रकट की। स्ट्रैसमैन ने आर० एच० ब्रूस के साथ हुई अपनी भेंट में क्रान्तर्दार्शियों की-सी स्पष्टता के साथ इस युद्ध की और ले जानेवाले मार्ग को भविष्य में ही देख लिया था, "उसने पश्चिमी शक्तियों की और विशेष का से ब्रिटेन की शिकायत की। उसने अपने अंग्रेज़ दर्शनार्थी को बताया कि मैंने जर्मनी की अस्ससे प्रतिशत जनता को अपनी नीति के पक्ष में कर लिया है। उसने जर्मनी को लीग आफ नेशन का सदस्य बनवा दिया था। उसने लोकार्नी के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए थे। वह देता गया, देता गया, देता गया, यहां तक कि उसके देशवासी उसके विरुद्ध हो गए। यदि तुम लोगों ने मुझे एक भी रियासत दे दी होती, तो मैं लोगों को अपने साथ खींच लेता; मैं अब भी ऐसा कर सकत हूं। परन्तु तुम लोगों ने कुछ भी नहीं दिया, और जो नगण्य-सी छोटी-मोटी रियासतें दर्दी भौ, भी सदा बहुत देर में दीं। खैर अब पाशविक शक्ति के सिवाय और कुछ बचता नहीं है। अप भविष्य नई पीढ़ी के हाथ में है और जर्मनी के युवकों को, जिन्हें शान्ति और नवीन यूरोप के पक्ष में किया जा सकता था, हम दोनों ही खो चुके हैं। यह मेरी विपत्ति है और तुम्हारा अपराध ।"[93]
मानवता उस व्यवस्था से उभरकर बाहर आने के लिए संघर्ष कर रही है, जिसका समय पूरा हो चुका है। यदि बाजा, जिसके कस्या को ही फिकर स्थापित करने का प्रयत्न करा समाय पना नया आधार न खोजें, जिसके ऊपर मानव-जीवन का निर्माण किया जाए, तो यह कोई लड़ना व्यर्थ रहेगा। नये संसार को, जो कि अत्यधिक वैज्ञानिक और यत्तीकृत है, एक यह यद के बर्ताव की आवश्यकता है और उसके लिए मन और हृदय में एक ऐसे नये परिवई रीति ज़रूरत है, जिसके द्वारा हम इस संसार का पथप्रदर्शन कर सकें, इसे नियन्त्रण में रख सकें, और इसका मानवीकरण कर सकें। हम किसी एक दल-विशेष के लिए कार्यक्रम नहीं चाहते, अपितु जनता के लिए एक जीवन-पद्धति चाहते हैं; समंजनों (एडजस्टमेण्ट, बैठ-बिठाव) का एक नया समूह नहीं, अपितु मनुष्य के उद्देश्य की ही एक नई धारणा चाहते हैं।
वह स्थानीय और सामयिक प्रश्नों को एक ओर छोड़कर, अविलम्ब भविष्य की समस्या भौतिकवाद की शक्तियों के, जो मानवीय भ्रातृत्व को व्यावहारिक रूप में क्रियान्वित होने देने के विरोध में कार्य कर रही हैं, और अव्यक्त आध्यात्मिक शक्तियों के, जो उसके पक्ष में कार्य कर रही हैं, बीच की समस्या है। भौतिकवाद प्रजातन्त्रों और अधिनायकतन्त्रों (तानाशाहियो), दोनों में ही मज़बूती से पैर जमाए हुए है; वह मन्दिरों और गिरजाघरों में तथा कार्यालयों और बाज़ारों में दृढ़ता से जमा हुआ है।
वह जीवन का कौन-सा दर्शन (विचारधारा) है, जिसके लिए हम लड़ रहे हैं? वह राष्ट्र- समुदाय की कौन-सी संरचना (ढांचा) है, जिसे पूर्ण विजय प्राप्त करने के बाद ब्रिटेन, रूस और अमेरिका खड़ा करने का प्रयत्न करेंगे? सरकारों के उद्देश्यों को वे किस प्रकार विशालतर बनाएंगे? तोपों और टैंकों से, विमानों और युद्धपोतों से हम शतु को भले ही परास्त कर दें, किन्तु जीतकर स्थायी शान्ति स्थापित नहीं कर सकते। हमें प्रत्येक मानव-प्राणी को उसकी अपनी आत्मा पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने देना होगा और प्रत्येक राष्ट्र को, चाहे वह अशक्त हो या सशक्त, छोटा हो या बड़ा, जीवन और परीक्षण की स्वतन्त्रता का अधिकार देना होगा। आत्मिक परम के रूप में प्रजातन्त्र इस बात के लिए विवश करता है कि समाज का रूपान्तर किया जाए। यदि हमें नये सौन्दर्य और नये अर्थवाले जीवन का विकास करना है, तो वह केवल आध्यात्मिक शक्ति की नई धारा फूट पड़ने के परिणामस्वरूप ही हो सकता है, जैसे बहुत समय पहले मिस्र और भारत में हुआ था, बाद में बौद्ध धर्म के प्रचार के बाद के दिनों में यूनान, चीन और जापान में हुआ था, और उत्तरी यूरोप में मध्ययुग की उन दो शताब्दियों में हुआ था, जब रहस्यवादी धर्म का प्रभुत्व था। श्रद्धा पर केवल श्रद्धा ही विजय पा सकती है।
हम सब चिल्ला-चिल्लाकर यह आशा प्रकट कर रहे हैं कि ऐसी बात फिर कभी नहीं होने पाएगी। हमने ये शब्द तब कहे थे, जब 1814 में नेपोलियन हमारा शत्रु था; 1914 में कैसर के विरुद्ध अपनी घृणा प्रकट करते हुए हमने कहा था, "ऐसा फिर कभी नही होने पाएगा।" आज हम उन्हीं शब्दों को फिर दुहरा रहे हैं और उन्हें सुनकर हमारे श्रोता खुशी से तालियां बजाते हैं। हर बार हम तोते की तरह इन शब्दों की रट लगाते हैं कि हम यह महान युद्ध सभ्यता और मानव के लिए लड़ रहे हैं। युवक लोग इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा और विजय प्राप्त हो जाएगी, तब उनके सम्मुख एक नया जीवन और एक युद्धहीन संसार होगा और उनकी रक्त की आहुति व्यर्थ नहीं होगी। परन्तु इन बातों का तो कहीं कोई चिह्न नहीं है। यदि संसार का कार्यभार विवेकशील और अन्तःकरण-वाले नर-नारी न ले लें, तो हमें सुधार के विषय में भरोसा नहीं हो सकता, अपितु अपने बच्चों के लिए केवल चिन्ता ही रहेगी, जिन्हें अपनी पीढ़ी में फिर आग और ज्वाला का, मृत्यु और विनाश का सामना करने के लिए विवश किया जाएगा। इस बात की क्या निश्चितता है कि 1918-39 के वर्षों का इतिहास फिर नहीं दोहराया जाएगा? जब तक हम यूनानियों की 'नगर-राज्य' की, यहूदियों की 'चुनी हुई जाति' की और आधुनिक यूरोप की 'राष्ट्र- राज्य' की परम्परा को बनाए रखेंगे, तब तक हम युद्धों से बच नहीं सकते। मानव जाति एक इकाई बनने के लिए बनी है। मनुष्य बालू के कणों की भांति एक-दूसरे से पृथक् नहीं है। हम अङ्गाङ्गी रूप से एक सजीव एकता में बंधे हैं। इस एकता को केवल प्रेम की भावना ही सतेज बना सकती है। हममे स्वभाव और परम्परा के अन्तर अवश्य हैं, किन्तु यह विविधता समष्टि के सौन्दर्य को बढ़ा देती है। यदि मानव-जाति की एकता की अनुभूति कुंठित हो जाती है, यदि नैतिक विधान की एकता की चेतना क्षीण पड़ जाती है, तो स्वयं हमारी प्रकृति कलंकित होती है। राष्ट्र सामूहिक जीवन के वे रूप हैं, जो मानवीय इतिहास के प्रवाह को गढ़ते हैं; परन्तु उनमें अन्तिम या परम जैसी कोई बात नहीं है। जो राष्ट्र राजनीतिक दृष्टि से पराधीन हैं, उनको स्वतन्त्रता की मांग समझ में आनेवाली चीज़ है। मनुष्यों की एक जाति पर किसी दूसरी जाति द्वारा शासन शासित लोगों के सम्मान और गौरव से असंगत है, इसीलिए विश्व की शांति और कल्याण से भी असंगत है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीयता मानवीय स्वभाव का कोई जन्मसिद्ध सार्वभौम मनोभाव नहीं है। यह राष्ट्रीयता यूरोप की जातियों में सबसे अधिक प्रबल है, जो 'धर्म-सुधार' (रिफोमॉशन) के इतिहास के पश्चात् की चार शताब्दियों की उपज हैं। फिर, राष्ट्रीयता को सरलता से राजनीतिक प्रभुता से अलग किया जा सकता है राजनीतिक प्रभुता राष्ट्रीयता के साथ आवश्यक रूप से संयुक्त वस्तु नहीं है। यदि प्रत्येक राष्ट्र अपन इच्छा का प्रभुत्वसम्पन्न स्वामी हो, यदि अपने उद्देश्य का वही अन्तिम निर्णायक हो, यदि वह अपने बनाए विधान से उच्चतर किसी विधान को न मानता हो, तो वह केवल शक्ति और अधिकार बढ़ाने की दृष्टि से ही सोचेगा और अन्य सब हितों को शक्ति-संगठन के हितों की अपेक्षा गौण कर देगा। मनुष्यों का कोई भी समाज, जो एकता और समस्वार्थता की भावना से अनुप्राणित हो, राष्ट्र होत है। यह भावना सांझे जातीय, भाषामूलक, धार्मिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक या आर्थिक आधारों में बद्धमूल हो भी सकती है; और संभव है कि न भी हो। राष्ट्र के सम्बन्ध में कुछ भी बात वियन (स्थिर), स्थायी या सुनिश्चित नहीं है। कुछ की रचना परम्परा के आधार पर हुई है, और कुष्ठ नियत परम्पराओं के होते हुए भी राष्ट्रबने हुए हैं; कुछ भाषा के आधार पर बने हैं, जबकि भाषा के आधार पर नहीं हैं। राष्ट्र सांझे इतिहास की परम्पराओं द्वारा बनते हैं। इतिहास कोष्ट अन्य (मूल्यों) की श्रेणी की वस्तु है। जैसाकि ध्यूसीडाइडीज़ ने कहा है, यह "एक ऐसी सम्पत्ति है, जिसपर सदा के लिए कब्ज़ा रहता है।" मान्यताओं के सांझे अनुभव के अभाव में कोई इतिहास होगा ही नहीं। किन्तु मानव-समाज के समृद्धतर और पूर्णतर जीवन के लिए पृथक् राष्ट्र, जो सांस्कृतिक उन्नति का पोषण करते हैं, अत्यावश्यक हैं। "मनुष्य अपने पड़ोसियों से कुछ ऐसी वस्तु की अपेक्षा करते हैं, जो इतनी काफी सदृश (मिलती-जुलती) हो कि समझी जा सके, कुछ ऐसी वस्तु की, जो इतनी काफी भिन्न हो कि ध्यान आकृष्ट करे, और कुछ ऐसी वस्तु की, जो इतनी काफी महान हो कि श्रद्धा की पाल बने।"[94] राष्ट्रीय समाजों की नैतिक प्रामाणिकता न्यायसंगत है। राष्ट्र वे स्वाभाविक और आवश्यक रूप हैं, जो व्यक्ति और मानव जाति के बीच मध्यवर्ती पड़ाव समझे जा सकते हैं।
हम इस समय सभ्यता के ऐक्य के काल में हैं। इस शताब्दी के प्रारम्भ होने तक, परिवहन और संचार (सम्पर्क-स्थापन) की कठिनाइयों के कारण संसार की जातियां समुद्रों, नदियों और पहाड़ों की भौतिक रोकों द्वारा पृथक् कर दिए गए प्रदेशों में रहती थीं और अपना- अपना समूह-जीवन स्वतन्त्र रीति से विकसित करती थीं। उस समय सभ्य जीवन के विकास के लिए जन्मभूमि के प्रेम से पूर्ण उत्कट देशभक्ति और सांस्कृतिक परम्परा के प्रेम से पूर्ण उत्कट राष्ट्रीयता स्वाभाविक आवश्यकताएं थीं। आदिम आर्थिक विकास ने अपरिचितों के प्रति विरोध की मनोवृत्ति को पुष्ट किया, जो आत्मसंरक्षण के लिए आवश्यक समझी गई थी। आज वैज्ञानिक आविष्कारों ने सारे संसार को एक निकट सहभाव में ला रखा है। हमारा ज्ञान, हमारी विचार की आदतें, विश्व के सम्बन्ध में हमारा दृष्टिकोण हमारी सबसे अमूल्य सम्पत्तियां हम तक सभी राष्ट्रों से पहुंचती हैं। यदि ये सब स्वयं ऐक्य स्थापित न भी करती हों, तो भी ये ऐक्य के अनुकूल दशाएं अवश्य उत्पन्न कर देती हैं। संसार की यह नई बढ़ती हुई परस्पर संयुक्तता लोगों से अपेक्षा करती है कि वे नई सहिष्णुता और साहचर्य की भावना लेकर परस्पर निकट आ जाएं। हमें अपने-आपको एक ही परिवार का सदस्य समझना चाहिए और एक सबल विश्व-शक्ति में हिस्सा बंटाना चाहिए, जो हमारी राष्ट्र-भक्तियों का स्थान छीने बिना उनकी पूरक बनती है। हम धीरे-धीरे एक ही सभ्यता के सदस्य बनते जा रहे हैं, इसलिए हमारे अपराध घरेलू दुर्घटनाएं (ट्रेजेडी) हैं और हमारे युद्ध गृह-युद्ध हैं। जब हमने चीन में दमकते हुए संत्रासों को, इथियोपियावासियों की असहायता को और स्पेन में फासिस्टों और कम्युनिस्टों की असमान प्रतियोगिताओं को देखने से ही इनकार कर दिया, और जब हमने निर्दोष दुर्बल की बलि देकर और दोषी बलवान की सहायता करके अपने-आपको बचाने की चेष्टा की, तब हमने अपने-आपको मानव-जाति की एकता के श्रेष्ठ आदर्श के प्रति निष्ठाहीन प्रमाणित कर दिया। परन्तु सिद्धान्ततः प्रजातन्त्रीय प्रणाली दूसरे लोगों के साथ उन्हें कानून से बाहर मानकर या उन्हें अवमानव (मनुष्य से नीचे का) समझकर बर्ताव करने को किसी प्रकार उचित नहीं ठहरा सकती। प्रबुद्ध लोगों को उस नई व्यवस्था के साथ अपना एकात्य स्थापित करना चाहिए, जो जन्म लेने के लिए संघर्ष कर रही है। मानवता के लिए एक उज्ज्वलतर दिन की कल्पना उतनी ही प्रार्थना भी है, जितनी की भविष्यवाणी।'[95]
नये आदशों को नई आदतों और नई प्रथाओं में, उद्योग और व्यवसाय के पुनर्गठन में साकार किया जाना चाहिए; इन प्रक्रियाओं को, जोकि आदशों के हाथ और पैर हैं, नई दिशा की ओर मोड़ने में नये आदशों को साकार किया जाना चाहिए। अच्छा जीवन कानूनों और संस्थाओं के माध्यम से वास्तविक बनना चाहिए। सामूहिक सुरक्षा के लिए राज्यों की प्रभुता और स्वतन्त्रता की कुछ मर्यादा बांधना अत्यावश्यक है। बहुत बड़े परिमाण में बढ़ती हुई सम्पत्ति और शक्ति का, जो इस समय राष्ट्रों के अधिकार में है, अन्तर्राष्ट्रीय और न्यायोचित नियन्त्रण होना आवश्यक है। इस युद्ध में जो बातें नई पता चली हैं, उनमें से एक यह है कि कोई भी राज्य अपनी स्वतन्त्र प्रभुता को बचाए नहीं रख सकता। शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य तक को अमेरिका से सहायता मांगने की आवश्यकता पड़ती है। छोटे-छोटे देशों का अत्यधिक उद्योगीकृत देशों से कोई मुकाबला नहीं है। राष्ट्र या तो स्वेच्छा से, या बाहरी दबाव के कारण एक स्थायी राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से परस्पर मिल जाएंगे।
युद्धोत्तर संसार के लिए कई योजनाएं प्रस्तुत की गई हैं। कुछ लोग प्रजातंलों का संघ बनाने की बात करते हैं; कुछ दूसरे लोग अंग्रेज़-अमेरिकन, यूरोपियन और एशियाई, तीन गुटों की चर्चा करते हैं। हमारा लक्ष्य विश्वव्यापी राजनीतिक और आर्थिक अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग होना चाहिए। एक विशाल समाज पर आधारित शान्ति की आशाएं इन प्रादेशिक संघों पर आधारित आशाओं की अपेक्षा अधिक स्वस्थ हैं। हमारी योजनाएं साहसमय और व्यापक होनी चाहिए; अटकती हुई और टुकड़े-टुकड़े करके (खण्डशः) नहीं होनी चाहिएं। मिल्टन ने कहा था, "इंग्लैण्ड को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह दूसरे राष्ट्रों को यह सिखाने में अग्रणी है कि कैसे जीना चाहिए। सभ्यता को बचाए रखने के लिए मनुष्य जाति की अन्तर्राष्ट्रीय साझेदारी और राजनीतिक एकता अनिवार्य शर्त है और यह काम ब्रिटेन, अमेरिका और रूस का है कि वे स्वतन्त्र लोगों का एक विश्व समाज बनाने के कार्य का नेतृत्व करें। चर्चिल-रुज़वेल्ट घोषणा में शांति-समझौते के लिए सामान्य सिद्धान्त निश्चित कर दिए गए हैं।[96]
स्थायी शान्ति की शर्तें इसमें हैं। यह मान लिया गया है कि कोई भी राष्ट्र आक्रमण द्वारा अपने पड़ोसियों की सुरक्षा के लिए भय का कारण नहीं बनेगा। पूर्व स्थिति को बल-प्रयोग द्वारा बदलने के प्रयत्नों को रोकना ही काफी नहीं है। हमें सामान्य कल्याण के हित में शान्तिपूर्ण परिवर्तनों को करने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था रखनी चाहिए। युद्ध की समाप्ति पर प्रतिशोध के लिए, या राष्ट्रीय क्षेत्र विस्तार के लिए या दोनों के लिए की जानेवाली लोकप्रिय मांगों का प्रतिरोध कर पाना आसान नहीं होगा। यूनानी लोग, जो इतनी वीरता के साथ लड़े हैं, शायद यह मांग कर बैठें कि अल्बानिया का कुछ हिस्सा देकर उनका राज्यक्षेत्र बढ़ा दिया जाए। सोवियत संघ अपनी सुरक्षा के हित में फिनलैंड या बाल्कन राज्यों के कुछ राज्य-क्षेत्र को अपने साथ संयुक्त कर लेने की मांग कर सकता है। हम इस विषय में भी निश्चित नहीं हो सकते कि ब्रिटेन द्वारा अफ्रीका या एशिया में साम्राज्यवादी अतिक्रमण का खतरा नहीं होगा। जापान और ब्रिटेन ने चीन का जो प्रदेश हथिया लिया है और इथियोपिया के जिस प्रदेश पर इटली का कब्जा है, उसे वापस दिलाने में भी कई समस्याएं खड़ी होंगी।
दूसरी धारा सिद्धान्त की दृष्टि से निर्दोष है। जिन राष्ट्रों को धुरी-आक्रान्ताओं ने अपने अधीन कर लिया है, उनके लिए तो युद्ध का असली उद्देश्य विदेशी राज्य से स्वाधीनता प्राप्त करना ही है : यदि सब परिवर्तन लोगों की स्वतन्त्रतापूर्वक प्रकट की गई इच्छाओं के अनुसार ही होने हैं, तो उन्हें अपने भविष्य का चुनाव स्वयं करने की स्वतन्त्रता मिलनी ही चाहिए। यह बात केवल यूरोप में नाजियों द्वारा जीत लिए गए देशों पर ही लागू नहीं होनी चाहिए, अपितु एशिया में जापानियों द्वारा जीते गए देशों पर भी लागू होनी चाहिए। बर्मा, मलाया और डच ईस्ट इंडीज़ के साथ क्या बर्ताव किया जाएगा? क्या आस्ट्रिया को यह निश्चय करने की स्वतन्त्रता रहेगी कि वह जर्मनी के साथ अपने सम्मिलन को बनाए रखे या नहीं? क्या इन सबको राष्ट्रों के रूप में अपने भविष्य का निर्णय करने की स्वतन्त्रता होगी ?
अवश्य ही हमें दूसरे राष्ट्रों को क्षति पहुंचाने की रोकथाम करनी चाहिए। राष्ट्रवाद हूं वह सिद्धान्त है जिसने सारे चीन को मिलाकर एक कर दिया है; और वही आज भारत में भी प्रमुख सिद्धान्त है। हम जातीय या धार्मिक समुदायों को राष्ट्रों की एकता को ठेस नहे पहुंचाने दे सकते, क्योंकि इससे तो राष्ट्र ऐसे छोटे-छोटे खंडों में बंट जाएंगे, जिन्हें संभालना है असम्सव होगा। यदि किसी राष्ट्र के अन्दर कुछ कठिनाइयां या गतिरोध उपस्थित हो जाए, हं अन्तर्राष्ट्रीय निकाय को, जिसे कि सबसे अधिक नैतिक प्राधिकार (अथॉरिटी) प्राप्त है, दोगे पक्षों के दावों पर विचार करने के बाद निर्णय करना चाहिए, और उसका निर्णय सब पक्षों के मान्य होना चाहिए।
तीसरी धारा के अनुसार शासन के रूपों में कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। सोवियत रूस तक ने विश्व-क्रान्ति की योजना को त्याग दिया है। त्रात्सकी के ऊपर स्तालिन की विजय स्थाई विश्व-क्रान्ति के ऊपर 'केवल एक देश में समाजवाद' की विजय है। स्तालिन की पूंजीवादी देखें के साथ मित्रतापूर्ण सहयोग की नीति इस युद्ध में स्पष्ट दीख रही है। बोल्शेविज़्म (साम्यवाद) आदरणीय हो गया है। पेशेवर क्रान्तिकारी रूस से बाहर दूसरे देशों में हैं, रूस में नहीं।'[97] सोविष्ट रूस समाजवाद की सीमाओं का विस्तार करने को प्रणबद्ध नहीं है। यदि हम "सब लोगों के अपने लिए वह शासन-प्रणाली चुनने के, जिसके अधीन वे रहना चाहते हैं, अधिकार का आय करते हैं” तो हमें इस विषय में अपनी सदाशयता उन स्थानों में स्व-शासन का अधिकार देकर प्रमाणित करनी चाहिए, जहां हमारे हाथ में पहले ही शक्ति विद्यमान है। "विदेशी जुए की असहा हीनता" केवल यूरोप से ही नहीं, अपितु संसार के प्रत्येक भाग से समाप्त की जानी है। भारत में, एक राष्ट्र के रूप में अपनी भवितव्यता की चेतना भरने का श्रेय मुख्य रूप से ब्रिटेन को ही है। परन्तु भारत पर विशेष शक्तियों (अधिकारों) का प्रयोग करके, अ-प्रजातंत्नीय प्राधिकार का उपयोग करके, प्रतिनिधि नेताओं को जेल में डालकर शासन इस बात का द्योतक है कि हममें अपने-आपको धोखा देने की कितनी सुविपुल क्षमता है। इस अधिकारपन्न को 'भारत पर लागू करने के प्रसंग में श्री चर्चिल का कथन है, "ब्रिटेन भारत को राष्ट्रमण्डल में हमारे साथ स्वतन्त्र और समान साझेदारी प्राप्त करने में सहायता देने के सम्बन्ध में अगस्त 1940 की घोषणा से वचनबद्ध है, परन्तु उसे भारत के साथ दीर्घकालीन सम्बन्ध के कारण उत्पन्न उत्तरदायित्वों को पूर्ण करते हुए और भारत के विभिन्न धर्मों, जातियों और हितों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए ही ऐसा करना होगा।" इन ऐतिहासिक उत्तर-दायित्वों का उपयोग भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए किया जा रहा है। पराधीन लोगों को आत्मनिर्णय करने का अधिकार नहीं है। इस युद्ध से ब्रिटेन के भारत, बर्मा तथा संसार की रंगीन (काली या पीली) जातियों के प्रति रुख में कम ही अन्तर पड़ा है।'[98] जब श्री चर्चिल इस अधिकार-पत्न को लेकर वापस लौटे, तो उन्होंने यह स्पष्टीकरण करने में तनिक देर नहीं की कि इसकी तीसरी धारा भारत या बर्मा के प्रति ब्रिटिश नीति पर किसी भी तरह लागू नहीं होती। श्री चचिल ने कहा कि "इस धारा का प्रभाव किसी भी रूप में उन नीति-सम्बन्धी अनेक वक्तव्यों पर नहीं पड़ता, जो समय- समय पर भारत, बर्मा तथा ब्रिटिश साम्राज्य के अन्य भागों में सांविधानिक शासन के विकास के सम्बन्ध में दिए गए हैं।" और यह कि इस धारा का सम्बन्ध मुख्यतया "यूरोप के उन राज्यों और राष्ट्रों में, जो इस समय नाज़ी जुए के नीचे दबे हुए हैं, प्रभुता, स्वशासन और राष्ट्रीय जीवन की पुनः स्थापना से है। एशियाई लोगों की महत्त्वाकांक्षाओं की उपेक्षा करके वह हिटलर के श्रेष्ठ जाति के सिद्धान्त को ही स्वीकार कर रहे हैं। 10 नवम्बर, 1942 को लार्ड मेयर के भोज में भाषण देते हुए श्री चर्चिल ने यह स्पष्ट कर दिया कि "यदि इस विषय में किसी को कोई गलतफहमी हो, तो भी हम अपने ही मत पर स्थिर रहेंगे। मैं राजा का प्रधान मंत्नी ब्रिटिश साम्राज्य के परिसमापन का सभापतित्व करने के लिए नहीं बना हूं" और फिर भी हमें बताया जाता है कि साम्राज्यवाद अब अतीत की वस्तु हो चुका है। भारतीय एकता और स्वाधीनता की समस्या को यत्नपूर्वक गलत ढंग से संभालते रहने के फलस्वरूप भारत में स्थिति अब खतरे के बिन्दु तक पहुंच चुकी है। जब शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा अपनाई गई नीतियां समूचे विश्व के सांझे उद्देश्य को ही अस्वीकार करके हमें विस्मयपूर्ण निराशा में पटक देती हैं, तब नेताओं द्वारा की गई घोषणाओं का मूल्य बहुत कम रह जाता है। श्री चर्चिल को अब्राहम लिंकन के इन बुद्धिमत्तापूर्ण शब्दों को याद रखना चाहिए, "क्योंकि मैं दास बनकर रहने को तैयार नहीं हूं, इसलिए मैं मालिक भी नहीं बनना चाहता। जिस किसी व्यक्ति का इस बात से इतना मतभेद है कि उसे मतभेद नहीं कहा जा सके, वह प्रजातन्त्रवादी नहीं है।" ब्रिटिश राजनीतिज्ञ बातें तो नये संसार की करते हैं; परन्तु सदा उनका यत्न यही रहता है कि उसकी स्थापना पुराने साधनों द्वारा ही की जाए। पर ऐसा हो नहीं सकता। यदि वे इस युद्ध को केवल फिर जीवन की पुरानी पद्धतियों की ओर लौट जाने के लिए जीतना चाहते हैं, तो इस 'महान् धर्मयुद्ध' का उद्देश्य सिवाय रक्तपात और विद्वेष के और कुछ नहीं है।
प्रेसिडेंट रूजवेल्ट ने अपने ऐतिहासिक रेडियो-प्रसारित भाषण में कहा था, "हमारा विश्वास है कि स्वामी जाति के बारे में तानाशाहों का नारा निरा कूड़ाकरकट और बेहूदा सिद्ध होगा। अब तक कभी कोई ऐसी जाति नहीं हुई और न कभी होगी, जो अपने साथी मनुष्यों का स्वामी बनकर रहने के उपयुक्त हो सके।" फिर भी उसके देश में सवा करोड़ नीग्रो ऐसे हैं, जिन्हें जातीय पक्षपात के कारण राष्ट्रीय जीवन में किसी प्रकार का सक्रिय भाग नहीं लेने दिया जाता। उनके विरुद्ध किया जाने वाला सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भेदभाव इस बात को प्रकट करता है कि वह स्वाधीनता और समानता, जिसके निमित्त हमें लड़ने को कहा जाता है, उन लोगों पर लागू किए जाने के लिए नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका में रंगीन लोगों के साथ किया जानेवाला बर्ताव, सामाजिक भेदभाव, रक्षा-उद्योगों तथा ट्रेड यूनियनों से रंगीन सैनिकों को बाहर ही रखना इस बात की घोषणा नहीं करते कि अमेरिका सर्वात्मना प्रजातंत्न और जातीय समानता का पृष्ठपोषक है। फिर, दक्षिण अफ्रीका संघ की रचना करनेवाले अधिनियम में दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासियों की बहुत बड़ी संख्या को मतदान का अधिकार नहीं दिया गया। सम्राट् की ब्रिटिश सरकार के प्रत्यक्ष अधिकार क्षेत्रों, जैसे केन्या, में जातीय अन्याय एक ऐसी बुराई है, जो निरन्तर बढ़ती पर है। बाहर से आए थोड़े से अल्पसंख्यक लोगों ने वैसा ही पूर्ण आधिपत्य जमाया हुआ है, जैसा कि नाज़ी लोग कामना कर सकते थे, भले ही यह उतना ज़ोर-ज़बरदस्ती का नहीं है। भूमि, श्रम तथा कर-आरोपण के सम्बन्ध में बने कानून और प्रशासन अफ्रीकी लोगों के स्वाधीन आर्थिक उन्नति के अवसरों को सीमित कर देते हैं, उन्हें यूरोपियन उद्यमों में (कार्यों में) बेगार करने को विवश करते हैं, और उन्हें अपनी पराधीन स्थिति से बाहर निकालने से रोकते हैं, जबकि वे ही कानून और प्रशासन अल्पसंख्यकों के राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक विशेषाधिकारों की रक्षा करते हैं। किसी दूसरी जाति को अपने से घटिया समझकर उससे घृणा करना, जैसेकि नाज़ी करते हैं, एक बात है; परन्तु ऊपर से समानता के बर्ताव का दिखावा करते हुए, व्यवहार में उनसे घृणा करना तो और भी अधिक बुरा है।'[99] इनमें से पहला कम से कम ईमानदार और स्पष्टवादी तो है; दुसरा, जिसमें घृणा और घटिया लोगो के प्रति उदारता के व्यवहार का मिश्रण है, निश्चित रूप से अधिक खतरनाक है। जब ज लोगों लीग के प्रतिज्ञा-पन की शतों में जातीय समानता का सिद्धान्त भी सम्मिलित कर लेने का प्रस्ताव रखा, तो प्रेसिडेण्ट विल्सन ने उसका विरोध किया और ब्रिटिश प्रतिनिधि मंडल का समर्थन भी प्राप्त कर लिया। इसमें सन्देह नहीं कि श्री पेटली ने इस बात पर जोर दिया था कि इससे पहले दिन उन्होंने सिद्धान्तों की जो घोषणा की थी, वह संसार की सब जातियों पर लागू होती है।[100] चीन में ग्रेट ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अपने राज्यक्षेत्रातीत अधिकारों का त्याग एक बड़ा कदम है; और यदि इसके बाद अमेरिका में एशियाई लोगों द्वारा नागरिकता के अधिकार प्राप्त करने पर लगाया गया ईर्ष्यामय प्रतिबन्ध भी समाप्त कर दिया जाए, तो यह संयुक्त राज्य अमेरिका की जनता की ओर से जातीय पक्षपात की भावना से मुक्त होने की घोषणा होगी।
ऐसे संसार में, जिसे पहले विजयों द्वारा खण्डित किया गया और अब बलप्रयोग द्वारा खण्डित रखा जा रहा है, युद्धों का होना अनिवार्य है। यदि इस युद्ध में मृत लोगों की मृत्यु व्यर्थ न जानी हो, यदि युद्ध के अन्त में होनेवाली शान्ति को निरन्तर प्रतिरोध और प्रतिशोध की लालसा को निर्मलित न करते रहना हो, यदि पराधीन राष्ट्रों को अपनी बेड़ियों में ही न घुलते जाना हो, यदि मनुष्यों के मनों में घृणा और निराशा को न जगाया जाना हो, तो अतीत में किए गए अन्यायों को ठीक किया जाना चाहिए और सब राष्ट्रों के जीवन और सुरक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण प्राप्त होना चाहिए। यदि विजय का उपयोग इस समय विद्यमान प्रबन्धों (व्यवस्था) को ही उचित ठहराने के लिए किया जाना हो, जिनमें कुछ थोड़े-से व्यक्तियों और राष्ट्रों के प्रति अनुकूलता प्रदर्शित की जाती है, तो यह तो केवल लोभ ही हुआ, जो अपनी पाशविक महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए हत्या को काम में ला रहा है। सभ्य संसार के अन्तःकरण की यह मांग है। और उसे यह आशा है कि उपनिवेशों और पराधीन देशों की प्रमुख समस्याओं का हल न्याय और निर्लिप्तता की भावना के साथ किया जाए।
फिर, संविधान किस प्रकार का हो, इसका चुनाव जनता द्वारा किया जाना है; परन्तु नवीन संसार में राष्ट्रों को अपने विवाद में स्वयं ही निर्णायक बनने का अधिकार नहीं मिल सकता। सामान्य सुरक्षा की किसी भी प्रणाली में शस्त्रास्त्रों की वृद्धि के अधिकार तथा राष्ट्रों के अन्य अधिकारों को सीमित कर दिया जाएगा। सब राष्ट्रों के लिए कुछ न्यूनतम प्रमाप नियत कर देने पड़ेंगे, जिनके द्वारा सबको “भय और अभाव से मुक्ति" मिल सके। इन प्रमापों को विशुद्ध रूप से घरेलू विषय नहीं माना जा सकता। हमें प्राथमिक मानवीय अधिकारों, जैसे ज्ञान प्राप्त करने और सम्मति प्रकट करने की स्वतन्त्रता, उपासना की स्वतन्त्रता, संगठन बनाने की स्वतन्त्रता और जातीय अत्याचार से स्वतन्त्रता, के सम्बन्ध में एक योजना बनाने और इसे लागू करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय प्राधिकारी (अथॉरिटी) की आवश्यकता है। "छोटे और बड़े, विजेता और विजित," सब राष्ट्रों को समान अधिकार दिलाने की बात को यदि कोई क्रियान्वित कर सकता है, तो वह है केवल एक ऐसा अन्तर्राष्ट्रीय प्राधिकारी, जिसके पास आर्थिक क्षेत्र में विस्तृत शक्तियां और कृत्य हों। हमें व्यापार-युद्धों को रोकना होगा। श्री चर्चिल ने कहा था, "सब प्रकार की अतिरिक्त रोकें और बाधाएं खड़ी करके जर्मनी के व्यापार को नष्ट करने के प्रयत्नों के, जैसीकि 1917 में लोगों की मनोदशा थी, बजाय हमने सुनिश्चित रूप से यह दृष्टिकोण अपना लिया है कि यह बात संसार के और हमारे दो देशों (ब्रिटेन और अमेरिका) के हित में नहीं है कि कोई भी बड़ा राष्ट्र समृद्धिहीन रहे या उसे अपने उद्योग और नवारम्भ (उद्यम) द्वारा अपने लिए और अपनी जनता के लिए भला रहन-सहन प्राप्त करने के साधनों से वंचित रखा जाए।" पांचवीं धारा में उन सबके लिए एक आर्थिक राष्ट्र-मण्डल बनाने का विचार किया गया है, जो उसके सिद्धांतों को स्वीकार करते हैं। इसके द्वारा वर्तमान आर्थिक अराजकता के स्थान पर एक सुव्यवस्था स्थापित करने का प्रस्ताव सामने रखा गया है। आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए लोगों के हितों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा। आर्थिक साम्राज्यवाद को निरुत्साहित करना होगा। सबलों के दुर्व्यवहार से निर्बलों की रक्षा की ही जानी चाहिए।
अगली धारा में आक्रमण के विरोध में सामूहिक सुरक्षा का आग्रह किया गया है। उससे अगली धारा में समुद्रों की स्वतन्त्रता का उल्लेख है; और अन्तिम धारा में राष्ट्रीय नीति के साधन के रूप में बल के प्रयोग को त्यागने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है। हम किसी भी राष्ट्र को इतनी शक्ति प्राप्त नहीं करने देंगे कि वह अपने पड़ोसियों के विरुद्ध आक्रमणात्मक युद्ध छेड़ सके। इसे क्रियान्वित करने के लिए कई उपाय खोज निकालने होंगे; सम्मेलन-पद्धति, आर्थिक सामाजिक, बौद्धिक और आत्मिक रचनात्मक कार्य, अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के शान्तिपूर्ण निपटयो की व्यवस्था, विद्यमान अधिकारों में मध्यस्थता द्वारा परिवर्तन के लिए व्यवस्था, शस्त्रास्त्रों में सर्वतोमुखी घटौती और आक्रमण के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरक्षा के लिए प्रभावी तैयारी की व्यवस्था। युद्ध के बाद का काल विश्व के लिए स्वास्थ्य लाभ का काल होगा, और विजेताओं को शक्ति को अपने पास धरोहर के रूप में रखना चाहिए, जिससे स्वास्थ्य-लाभ शीघ्र हो सके।
वे आधारभूत सिद्धान्त, जिनके अनुसार नई सभ्यता की रूप-रचना होनी चाहिए ि टाइम्स' के नाम भेजे गए एक पत्न में प्रस्तुत किए गए हैं, जिसपर कैंटरबरी और यार्क के आर्कबिशपों, फ्री चर्च फेडरल कौंसिल के मौडरेटर और ग्रेट ब्रिटेन में रोमन कैथोलिक चर्च के अध्यक्ष वेस्टमिंस्टर के आर्कबिशप के हस्ताक्षर हैं। वे सिद्धान्त ये हैं:
(1) सब राष्ट्रों को स्वाधीन रहने का अधिकार।
(2) निःशस्त्रीकरण।
(3) अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों की गारण्टी करने के लिए और जब आवश्यक हो, उनका पुनर्निरीक्षण (रिविज़न) करने और उन्हें ठीक करने के लिए कोई न्याय-विधान-सम्बन्धी संस्था। (4) राष्ट्रों के निवासियों और अल्पसंख्यकों की न्याय्य मांगों का यथाआवश्यक समंजन (बैठ-बिठाव)।
(5) जनता और शासकों को सार्वभौम प्रेम से प्रेरित करना चाहिए। इन आधारभूत सिद्धान्तों के साथ पत्न में पांच सिद्धांत और जोड़े गए हैं:
(क) सम्पत्ति और जायदाद की अत्यधिक असमानता समाप्त कर दी जानी चाहिए। (ख) प्रत्येक बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने का समान अवसर मिलना चाहिए।
(ग) सामाजिक इकाई के रूप में परिवार को बनाए रखने का आश्वासन दिया जाना चाहिए। (घ) मनुष्य के दैनिक कार्य में दैवीय पुकार की भावना फिर स्थापित की जानी चाहिए।
(ङ) पृथ्वी के साधनों का उपयोग समस्त मानव जाति के लिए किया जाना चाहिए और वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं का समुचित ध्यान रखते हुए किया जाना चाहिए।
सोवियत क्रांति के 25वें वार्षिकोत्सव के अवसर पर मास्को सोवियत के सम्मुख भाषण देते हुए स्तालिन ने युद्ध-उद्देश्यों की घोषणा की:
"इटली और जर्मनी के गठबन्धन का कार्यक्रम की ये विशेषताएं कही जा सकती हैं- जातीय विद्वेष, चुने हुए (परमात्मा द्वारा) राष्ट्रों की सर्वोच्चता, दूसरे राष्ट्रों के राज्यक्षेत्रों को हथियाकर उन्हें अधीन करना, विजित राष्ट्रों को आर्थिक दृष्टि से दास बनाना, उनकी राष्ट्रीय सम्पत्ति का वंचन, प्रजातन्त्रीय स्वाधीनता का विनाश, और सब जगह हिटलरी शासन पद्धति की स्थापना। अंग्रेज़सोवियत अमेरिकन गठबन्धन का कार्यक्रम है, जातीय भेदभाव की समाप्ति, राष्ट्रों की समानता और उनके राज्यक्षेत्रों की अलंध्यता, दास बना लिए गए राष्ट्रों को स्वाधीन कराना और उनकी प्रभुता के अधिकार उन्हें वापस दिलाना, जो भी शासन पद्धति वे चाहें स्थापित करने का अधिकार, जिन देशों को क्षति उठानी पड़ी है, उनको आर्थिक सहायता और भौतिक समृद्धि प्राप्त करने में उनकी सहायता की जाए, प्रजातंत्रीय स्वाधीनता की पुनः स्थापना और हिटलरी शासनपद्धति का विनाश।" जर्मनी और जापान की पराजय के बाद रूस की स्थिति सशक्त होगी और संसार की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि शान्ति-काल में अमेरिका, रूस और ग्रेट-ब्रिटेन की मित्रता संसार की भलाई के लिए हो, संसार पर प्रभुत्व जमाने के लिए नहीं। यदि कोई ऐसा समझौता हुआ, जिसमें रूस और उनके घोषित उद्देश्यों का ध्यान नहीं रखा गया, तो उसका परिणाम एक और विश्वयुद्ध होगा, जो और भी खतरनाक दशाओं में लड़ा जाएगा। रूस का जातीय भेद-भाव का अभाव एशिया के लोगों को तथा संसार की अन्य रंगीन जातियों को बहुत अधिक प्रभावित करता है।
यदि हमें विजय के बाद फिर भूख, भय और निराशा की ओर लौट जाना हो, तो युद्ध को जीत लेना-भर पर्याप्त नहीं है। यह तो प्रकाश और अन्धकार के बीच चल रहा संघर्ष है, सच्ची संयमित सभ्यता की उपलब्धि और उच्च्च तानाशाहियों द्वारा असभ्यता में वापस लौट जाने के बीच संघर्ष, जो तानाशाहियां मानव-जाति को तब तक नारकीय पराधीनता में रखेंगी, जब तक कि वह अवनत होते-होते पतन के उस स्तर तक नहीं पहुंच जाती, जहां पहुंचकर वह अंत में समूल नष्ट हो जाएगी।
हम इस समय एक युग की समाप्ति पर खड़े हैं और अब संसार फिर युद्ध-पूर्व काल के नमूने पर नहीं लौट सकेगा। यदि इस युद्ध में अपना जीवन बलिदान करने वाले युवकों की आशाओं के साथ फिर विश्वासघात न किया जाना हो, यदि इस युद्ध को मानव जाति के कल्याण की आशा से शून्य एक और युद्ध न बनाना हो, तो हमें संसार को वैयक्तिक एवं सामूहिक स्वार्थ के दुष्प्रभाव से मुक्त करना चाहिए। राष्ट्रों को अपने कुकृत्यों के लिए लज्जित होना चाहिए। संसार की उन्नति करने का मार्ग पश्चात्ताप का ही है। इस काल के रक्तपात और अव्यवस्था में से एक उत्कृष्टतर युग का आविर्भाव हो सकता है। यदि मानव-समाज को एक सजीव वास्तविकता के रूप में कार्य करना हो तो केवल किसी राजनीतिक या आर्थिक संगठन से काम न चलेगा। यह एक शरीर-रचना है, संगठन नहीं है। यह एक सजीव और बढ़ती हुई वस्तु है। इसके अन्दर आत्मा का श्वास फूंका जाना चाहिए। मानव-समाज को विश्व की सृजनशील आत्मा की एकता में निष्ठा की और एक अर्थ में बन्धुत्व (साथीपन) की अभिव्यक्ति बनना होगा। प्रत्येक मानवीय ढांचे में एक अमर महत्त्वाकांक्षा विद्यमान है, एक सार्वभौम चेतना, जो अपने आपको सीमित मनों और विभक्त अहं भावों में प्रकट करती है। केवल सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं; चाहे हमपर कुछ भी क्यों न बीते, सत्य की ज्योति बुझेगी नहीं।
प्रजातंत्न इस नैतिक सिद्धान्त की; कि मनुष्य का सच्चा उद्देश्य उत्तरदायित्वपूर्ण स्वतंलता है, राजनीतिक अभिव्यक्ति है। कांट का विख्यात नैतिक सिद्धान्त कि "मानवता को, चाहे वह तुम्हारे अपने देह में हो या किसी दूसरे के देह में, सदा साध्य मानकर ही कार्य करो, केवल एक साधन मान कर नहीं" प्रजातंत्त्रीय विश्वास का सूत्रबद्धीकरण है । सिद्धान्ततः प्रजातंत्न नैतिक है और इसलिए सार्वभौम है। स्वयं जीवन की सीमाओं के अतिरिक्त इनकी और कोई सीमाएं नहीं हैं। व्यास कहता है, "सब प्राणी सुखी हों; सब परम आनन्द प्राप्त करें; सब भले दिन देखणे कोई भी दुःख न पाए।"[101] ब्लेक ने अपनी कविता 'डिवाइन इमेज' (दिव्य प्रतिमा) में अकारण ही यह पद्य नहीं लिखा:
क्योंकि सबको मानवीय रूप से प्रेम करना ही चाहिए,
भले ही वह रूप मूर्तिपूजक में हो, या तुर्क में या यहूदी में;
जहां दया, शान्ति और करुणा का निवास है
वहीं भगवान का भी निवास है।
प्रजातंत्न का उद्देश्य सदैव समूचे समाज का हित होता है, किसी एक वर्ग या समुदाय का हित नहीं। सब व्यक्तियों को, चाहे उनका धर्म या जाति कुछ भी क्यों न हो, एकमाल उनकी समान मानवता के आधार पर