पैगाम मुक्त

 

 

 

महर्षि मुक्त

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पैग़ाम--मुक्त

 

प्रणेता                     -महर्षि मुक्त

 

प्रकाशक -              महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति केन्द्र रायपुर ( पंजीयन क्रमांक २०९३/९४,

 रायपुर (सर्वाधिकार सुरक्षित प्रकाशकाधीन)

 

मुद्रक                      -किरण कम्प्युटर्स, अश्वनी नगर, महादेव घाट रोड, रायपुर महावीर ऑफसेट, गीता नगर,

 रायपुर फोन - 255140

 

संस्करण               - प्रथमावृत्ति

 

प्रति                        -१०००

 

दिनाँक                   -१२ अप्रैल २००० (राम नवमी)

 

पुस्तक मिलने का पता

 

-डॉ. सत्यानंद त्रिपाठी आनंद भवन 80/48 * C बंधवापारा, रायपुर (. प्र.) - ४९२००१

-दाऊ बद्री सिंह बघेल स्थान - तरकोरी, पो. कौशलपुर, (मोहरेंगा)

व्हाया. - बेरला, जि. - दुर्ग (. प्र)

 

प्रकाशन क्रमांक   -

 

मूल्य                      - ६०/- रु.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पैगाम--मुक्त

 

महर्षि मुक्त (1906 झंडापुर से 1976 लुधियाना) विरचित 'पैशाम--मुक्त' रुहानी शेर--गजल का अनूठा संग्रह है, जिसके माध्यम से सारे चराचर के लिए संदेश दिया गया है कि अहम्त्वेन प्रस्फुरित जो तत्व है, वही सर्व का अस्तित्व है और वहीं देव है, जो मन का साक्षित्व करता है।

 

अनुभूतियों से सराबोर इस साहित्य में आत्मा, मन, माया, फकीरी और भगवान के रहस्य आदि पर जितनी सहजता से प्रकाश डाला गया है. अन्यत्र कहीं सुनने-पढ़ने में नहीं आता।

 

वेद के ब्राह्मण भाग उपनिषद् के मंत्रों की शेर--गजल के माध्यम से प्रस्तुति, अपने आप में विचक्षण एवं मौलिकता लिए हुए है।

 

मसलन -

 

"नाहं मन्ये सुवेदेति नो वेदेति वेद च।

यो नस्तद्वेद तढ्वेद नो वेदेति वेद ।।

यस्यामतं तस्यमतं मतं यस्यनवेद

अविज्ञातम् विजानताम् विज्ञातम्ऽविजानताम् ।।"

 

"खुद को जाना, कुछ भी जाना,

जिसने भी जाना, वह भी जाना।

जाने जाने को जिसने जाना,

ये जानना राज बड़ा ही मुश्किल ।।"

 

महर्षि मुक्त एक आजाद दरवेश थे, उनके पास सिवाय कफन की एक लंगोटी के और कुछ भी परिग्रह नहीं था। इसी फकीरी के बलबूते उन्होंने खुदा की भी खबर ली क्योंकि नंगा (फकीर) खुदा से बड़ा होता है-

 

'खुदा के सर पे कमबख्ती किधर से दौड़कर आई।

मोहताजी के चक्कर में, कभी आता, कभी जाता ।।"

 

"जीव कल्पयते पूर्वं ततो भावान् पृथक्विधान "

 

इस विकल्प के बाद ही खुदा मोहताज (दीन-हीन) हो गया। तभी तो -

 

"जो है सरताज का आलम, नचाती चाह अल्लाह को।" जबकि -

 

"बौफ खाते कमर शमशो सितारे टिक नहीं सकते

 मगर सामने पानी पत्थर के झुकाती चाह अल्लाह को "

"खामोश का खजाना, खामोश ढूँढता है।

कदमों तले है दौलत, दौलत को ढूँढता है ।।"

 

लेकिन ऐसी कमबख्ती का आना भी भला है। यदि ऐसा होता तो -

 

"मुबारक हो ये कमबख्ती, अगर आती अल्लाह में।

देखता कौन, कब, किसको, दिखाता कौन अल्लाहे "

 

खुदा को वाद-विवाद का विषय बनाकर लड़ने वालों के कारण ही खुदा बदनाम हुआ है, ऐसे उपासकों के चलते खुदा लांछित हुआ है।

 

इस पर कहते हैं -

 

"खुदा के बंदो को देख करके, खुदा से मुनकिर हुई है दुनियाँ।

जो ऐसे बंदे हैं जिस खुदा के, वो कोई अच्छा खुदा नहीं ।।"

 

महर्षि मुक्त उर्दू, पर्शियन, संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे, मूल पाण्डुलिपि नहीं मिलने के कारण जैसा भी मिला प्रकाशित किया जा रहा है. वैसे हाजी मोहम्मद आफाक साहब (गाजियाबाद वाले) जैसे विद्वान के द्वारा इसका संशोधन कराया गया है, फिर भी कहीं-कहीं यदि भूल रह गई हो तो उसके लिये समिति क्षमा चाहती है। समिति हाजी मोहम्मद आफाक साहब का हृदय से धन्यवाद ज्ञापन करती है।

 

सेवक द्वारा जो भी कार्य होता है उसकी पृष्ठभूमि में सेव्य का अनुग्रह रहता है इसी तरह समिति के इस गिलहरी प्रयास की पृष्ठ भूमि में भी उन्हीं अवधूत महापुरुष का आशीर्वाद एवं कृपा ही है।

 

इस पुस्तक में शेरो गजल के माध्यम से उस देश की खबर ली गई है जहाँ जाकर देश खतम हो जाता है।

 

पुस्तक प्रकाशन में पं. रामलालजी शुक्ल, दाऊ गोकुल प्रसाद बन्छोर एवं ठाकुर बद्री सिंह बघेल मालगुजार के सहयोग पर समिति इनका तहेदिल से शुक्रिया अदा करती है।

 

मस्ती में मस्त होकर मस्ती को लिख रहा हूँ।

मस्ती में मस्त पढ़ना दरिया नजर आएगा ।।

 

अलं

 

 

 

                                                                                                                                सही

                                                                                                                                (सत्यानंद)

रामनवमी                                                                                                              अध्यक्ष

92 - 8 - 2000                                                                                      महर्षि मुक्तानुभूति

साहित्य प्रचारक समिति

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पैग़ाम--मुक्त

(गजल-अनुक्रमणिका)

 

. मैं कौन हूँ कहाँ हूँ- पैग़ाम--मुक्त ("मैं”) 14

.ये दिल बरबाद होकर के.. 15

.रूहानी' दुनियाँ में रहकर. 16

. हक़ीक़ी' इश्क़ दरिया में. 17

. जिन मस्त ऑखों का ये इशारा. 18

.मुबारक बेज़बाँ मस्ती फ़क़ीरों. 19

.हक़ीक़त' का नज़ारा है. 20

.जो बेसहारा इस गुलचमन का.. 21

. मंज़िले मक़सूद' पे मंज़िल का.. 22

१०.खुदमस्त मस्तों की ये मस्त ऑखें.. 23

११.ढूँढ़ता दिल दर दर. 24

१२. मुरादे मर्ज' का दुनियाँ.. 25

१३.बेखुदी का दरिया उमड़ रहा.. 26

१४.हो गया हूँ मस्त... 27

१५.ऑख देखते ही ऑख.. 28

१६.ज़माने की थी जो ख्वाहिशातें. 29

१७. इस दिल की यकसुई' में. 31

१८.किया जो तर्क दुनियां का.. 32

१९.देखने वालों को देखता हूँ. 33

२०.महसूस हो रहा है जो सचमुच. 33

२१. याद की भी याद नहीं.. 34

२२. देख ले हर रौ' में तू खुद का नजारा. 35

२३.नहीं है शिकवा' कभी किसी से. 35

२४. जब सहारा गया तब सहारा मिला.. 36

२५. बक़ा' ये फनों जिंदगी रही.. 37

२६.खुदा की कमबख्ती.... 38

२७. मुवारक हो तेरा साक़ी.. 39

२८. फ़क़ीरी फ़ाक़ा किया है जिसने. 40

२९.सत्य का पैग़ाम सुनाने में. 41

३०. दिल कदा' --कदा है. 42

३१. गर सलामत रहे मयकदा.. 43

३२. चला था बेपता के लिये. 44

३३. दीदार' दिलरुबा का.. 44

३४. मैं अपने आप पे हूँ आशिक़.. 45

३५. मस्तों के जो इशारे समझेगा.. 46

३६. निज आतम की अनुभूति बिना.. 46

३७. हक़ीक़ी मस्ती में मस्त होगा.. 47

३८. रोकर पूछे हँसकर बोले. 48

३९. थे गुज़िरता जो भी हम. 50

४०. जो है सरताज का आलम. 51

४१. ना तो ज़िंदा रहा ना तो मुर्दा रहा.. 51

४२. लबरेज़' है ज़रखेज़ है. 53

४३. अफ़साना दुनियाँ तमाशा देखना.. 53

४४. आता नज़र ये गुलचमन. 54

४५. दीदार होती है हक़ीक़त. 54

४६. दिल मिला दिलवर. 55

४७. दाल' बिन देना कहाँ.. 56

४८. कहते हैं मुझको बेनिशाँ.. 57

४९. जो तेरी राह' में. 57

५०. मज़हबी क़ैदखाने से. 58

५१. ख़ामोश हो जाता है दिल. 59

५२. खुला बाज़ार मुक्ता का.. 59

५३. ख़ामोशी की दुनियाँ में ये दिल. 60

५४. उफ है ऐसी ज़िन्दगी.. 61

५५.दीवानों की बातों को.. 61

५६. ठिकाना सबका जिस जा पे. 62

५७. मैं हूँ दरिया एक सा.. 63

५८. पता था ये मर्ज ज़िन्दगी.. 63

५९. गर मैं होता तो खुदा होता.. 64

६०. खत्म हो जाती है गुरवत' 65

६१. मेरे सिवा कोई नहीं.. 66

६२. हो गया आनंद दुनियाँ को.. 67

६३. क्या क्या सहे हमने सितम' 67

६४. कोई तमन्ना ख्वाहिशातें. 68

६५. कुछ दिया कुछ लिया.. 69

६६. बता दे साक़िया.. 70

६७. बुज़दिली' के चक्कर में पड़कर. 70

६८. बरहना हूँ हक़ीक़त में. 71

६९. जो डर रहा है मुसीबत से. 72

७०. पी लिया गर जाम' तो.. 73

७१. हर रोज़ जनाज़ा होता है. 74

७२. दिल बेदिल हो जाता है पर. 76

७३. मैं हूँ सन्नाटा' मकाँ.. 77

७४. आज़ाद हूँ मैं हरदम. 78

७५. अरमान जिंदगी के.. 79

७६. मैं हूँ कौन क्या हूँ. 79

७७. ज़र' की मुझे दरकार नहीं.. 80

७८. जिस्मानी खुदी जिसमें नहीं.. 81

७९. ख़्वाहिरौं जब खत्म हुई. 82

८०. क़सम ख़ुदा की यार. 83

८१जिस पै ये दिल फिदा है. 83

८२. एक पहलू नाम दो.. 84

८३. किसी से नफरत कोई मुहब्बत. 85

८४. हक़ीक़त गर्चे "मैंही हूँ. 86

८५. हकीकत के परस्तों को.. 86

८६. पैग़ाम हक़ीक़त है. 87

८७. शमा' का मैं हूँ परवाना', 88

८८. इब्तिदा' नहीं इन्तिहा नहीं.. 88

८९. अलमस्त आज़ाद फ़क़ीरों को.. 89

९०. बेसाहिल' मस्ती की दरिया में. 90

९१. है छाई दिल पे ख़ामोशी.. 90

९२. दुनियाँ के जो मज़े हैं. 91

९३. मौज में बेफिकर रहना.. 92

९४. दम दम' दीदार हरसूं' 92

९५. यार दीवाने को पा.. 93

९६. दिल बेदिल हो जाता है. 94

९७. निजानन्द मस्ती में. 95

९८. मैं जैसा हूँ वैसा ही हूँ. 95

९९. हूँ जज़्ब ' जलवा.. 96

१००.पैग़ाम हक़ीक़त है. 97

१०१. है आती बेखुदी मस्ती.... 97

१०२. ये दिल है जिस पे आशिक़.. 98

१०३.हक़ीक़त जानना गरचे हो.. 99

१०४. मैं शमा हूँ तू है परवाना.. 99

पैगाम--मुक्: शे'. 104

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

. मैं कौन हूँ कहाँ हूँ- पैग़ाम--मुक्त ("मैं”)

मैं कौन हूँ कहाँ हूँ, मैं किसको क्या बताऊँ

मेरे सिवा कोई, मैं किसको क्या बताऊँ ।।

 

मेरी ही हुकूमत'[1] है, मेरी ही सकूनत[2] है।

मेरी ही हक़ीक़त है, मैं किसको क्या बताऊँ ।।

 

मैं जीव जब नहीं था, तो ब्रह्म हूँगा कैसे

अफसाना लगब[3] है सब, मैं किसको क्या बताऊँ ।।

 

बेहूदगी सरासर गर, कुछ कहूँ जबॉ से

शरमिन्दगी है चुप में, मैं किसको क्या बताऊँ ।।

 

जिस जा पे दिलकशी[4] हो, जिस जा पे खुदकशीं[5] हो।

उस जा पे जा जा[6] है, मैं किसको क्या बताऊँ ।।

 

जानता है ये मुतलक़[7]', ज़ाहिर[8] ज़हरे[9] फन'[10] है।

फ़नकार[11] हूँ अनोखा, मैं किसको क्या बताऊँ ।।

 

पैग़ाम 'मुक्ता' का यह, मस्तों का तजरबा है

इस दिल का भी तक़ाज़ा'[12], मैं किसको क्या बताऊँ ।।

 

.ये दिल बरबाद होकर के

 

ये दिल बरबाद होकर के दिले दिलदार होता है।

जो हो मोहताज मोहताजी से भी, वही जरदार'[13] होता है

 

मुनादी करते खादिम[14] की जो इस दुनियाँ के पर्दे पर।

मगर खुदमस्तों की खिदमत से ही, खिदमतगार होता है ।।

 

दुरंगी दुनियाँ के पहलू, बिगड़ना और बनना जो

खुशी ग़म में जो एक सॉ हो, वही ग़मख्वार होता है ।।

 

कभी करता है दोज़ख का, कभी करता बहिरतों का

जो करता तर्क दोनों का, करम किरदार[15] होता है ।।

 

अनेकों रागिनी रागें, हैं गाते साज़ बाजों पर

जो गाता बेजुबाँ होकर, वही गुलुकार होता है ।।

 

इश्क़ तालीम लेना गर, तो परवाने से जा पूछो

वजूदे ख़ाक[16] में मिलकर गुले गुलज़ार होता है ।।

 

हुनरमंद और हुनर कितने हैं आलम[17] में हद जिनकी

हक़ीक़ी फ़न में जो माहिर वही फ़नकार होता है ।।

 

फ़क़ीरों का यही नुस्खा 'मुक्त' का यह तजरबा है

समझना ना समझ होकर, जो बेघरवार होता है ।।

 

 

 

 

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.रूहानी' दुनियाँ में रहकर

 

रूहानी'[18] दुनियाँ में रहकर, आबाद हुआ आज़ाद हुआ

टल गया मुसीबत का ख़तरा, आबाद हुआ आज़ाद हुआ ।।

 

ख़्वाव खयाले ग़फ़लत[19] में, आने जाने का चक्कर था।

खुद की नज़रों से जब देखा, आबाद हुआ आज़ाद हुआ ।।

 

पा चुका हूँ जो कुछ पाना था मिल चुका हूँ जिससे मिलना था।

दरअसल नतीजा ये निकला, आबाद हुआ आज़ाद हुआ ।।

 

हूँ क़ज़ा क़ज़ाओं का क़ज़ा[20], बावजूद गुलरूबा हूँ गुलशन का।

दिलरुबा हूँ आलम के दिल का, आबाद हुआ आज़ाद हुआ ।।

 

मैकदा'[21] जाऊँ मय[22] पीने, सिजदा करूँ बुतख़ाने का

बेखुदी की मस्ती पीकर के, आबाद हुआ आज़ाद हुआ ।।

 

कहना है यही फ़कीरों का आज़ादी कोई मज़ाक नहीं

बरबाद बाद सब से 'मुक्ता', आबाद हुआ आज़ाद हुआ ।।

 

**

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

. हक़ीक़ी' इश्क़ दरिया में

 

 

हक़ीक़ी[23]' इश्क़ दरिया में लहराना मुबारक हो

नहीं कोई जुबाँ दुनियाँ में बतलाना मुबारक हो ।।

 

इश्क़ है क्या बला यारों जो परवाने से जा पूछो

राम्मों के रू रू आकर के, जल जाना मुबारक हो ।।

 

बिगड़ते बनते दो पुतले, आशिक़[24] और माशूक[25]

इश्क़ आतिश[26] में पड़ हस्ती[27]' पिघल जाना मुबारक हो ।।

 

वजूदे[28] दिल का कब तक है कि जब तक कुछ सहारा है।

सहारा तर्क कर देने से तब मिलता सहारा है ।।

 

मचलना दिल की आदत है याद में दिलरूबाई की

रोकना गैर मुमकिन है मचल जाना मुबारक हो ।।

 

ज़माने के हरएक दिल को, ख़ास पैग़ाम 'मुक्ता' का

हक़ीक़त पाना गर, कुछ भी कहलाना मुबारक हो ।।

 

**

 

 

 

 

. जिन मस्त ऑखों का ये इशारा

 

जिन मस्त ऑखों का ये इशारा, उन मस्त ऑखों को हम भी देखें।

जिस मस्त मस्ती में मुस्कुराती, उस मुस्कराहट को हम भी देखें ।।

 

तौक़े[29]' तमन्ना ये तर्क करके, हविस हुकूमत[30] से दूर रह कर

दरवेश[31] रहते हैं मस्त जिसमें, उस मस्तखाने को हम भी देखें ।।

 

ताज्जुब ये कि बेइन्तिहा'[32] पे, हदूदे ग़फ़लत का पड़ा जो पर्दा

 खुदा का खुद भी हर रौ[33] पे हाज़िर, पर्दा उठा करके हम भी देखें ।।

 

नमाज़ियों'[34] का क़लीसा[35] काबा, पुजारियों का जो बुतकदा है।

फ़क़ीरों की जो अनमोल दौलत, उस खानेदौलत को हम भी देखें ।।

 

कुर्बान होता है जिसपे आलम, खूबसूरती को है नाज़'[36] जिस पर

कश्मीर है जो हरएक दिल का, उस दिलरूबाई को हम भी देखें ।।

 

 

मस्ती शीरो मैकदा में, इरक माशूक़ आशिकों में।

जो जिस खज़ाने से निकलती मस्ती, उस कुल खज़ाने को हम भी देखें ।।

 

आसान इतना कि जो लाज़बाँ है, मुश्किल भी इतना कि हद जिसका।

दीदार[37] मस्तों की मेहर[38] से मुमकिन, उन 'मुक्त' मस्तों को हम भी देखें ।।

 

.मुबारक बेज़बाँ मस्ती फ़क़ीरों

 

मुबारक बेज़बाँ मस्ती फ़क़ीरों'[39] की इनायत[40] हो।

हुई काफूर'[41] सब हस्ती'[42], फक़ीरों की इनायत हो ।।

 

साक़ी है मैखाना पीने वाला पैमाना।

जिसमें होरा बेहोशी, फक़ीरों की इनायत हो ।।

 

बे-बुनियाद दुनियाँ का था खतरा ख्वाबे गफलत[43] का।

हक़ीकत में हूँ बुनियादी, फ़क़ीरों की इनायात हो ।।

 

मैं क्या था कौन हूँ खदशा[44], जो मुद्दत से खटकता था।

ताज्जुब कैसे कब निकला, फक़ीरों की इनायात हो ।।

 

कहाँ से ले कहाँ पटका डुबोया इश्क़ दरिया में।

भुलाया भूल भी जिसने, फ़क़ीरों की इनायत हो ।।

 

तज़रबा[45]' 'मुक्त' का यारों ही सचमुच में तज़रबा है।

तज़रबा उसको ही होता, फ़क़ीरों की इनायत हो ।।

 

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.हक़ीक़त' का नज़ारा है

 

हक़ीक़त'[46] का नज़ारा[47] है तो देखूँ कहाँ-कहाँ

जब खुद का पसारा'[48] है तो देखूँ कहाँ-कहाँ ।।

 

जज़्बा--दैरो हरम, बुतखाने मैकदा में

महबूब समाया है तो जाऊँ कहाँ-कहाँ ।।

 

पाने की तमन्ना से पर्दा-नसीं[49] को ढूँढ़ा

पाकर के भी पाया, तो पाऊँ कहाँ-कहाँ ।।

 

लवरेज़'[50] जो है लज्ज़त[51], दुनियाँ की लज़्ज़तों में

लाया कहीं से भी, तो लाऊँ कहाँ-कहाँ ।।

 

हक़्क़ानी हक़ीक़ी है और 'मुक्त' रागिनी है

तुम भी तो गाके देखो गाऊँ कहाँ-कहाँ ।।

 

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.जो बेसहारा इस गुलचमन का

 

जो बेसहारा इस गुलचमन का, उस बेसहारे को हम भी जानें।

जो नूरे हस्ती'[52] है बेकिनारा, उस बेकिनारे को हम भी जानें ।।

 

तरह-तरह की बेशुमार[53] कलियाँ, कभी सिकुड़ती कभी उघड़ती।

है मुस्कराती जिस गुलरूबा में, उस गुलरूबाई को हम भी जानें ।।

 

जो इश्क़ दिल है मिरले मजनूँ[54], तलाश करता है कूचे-कूचे।

मिटती है मिलते ही ख्वाहिशातें, माशूके लैला को हम भी जानें ।।

 

जो जानता है जहान[55]' सारा, जो देखता है हमेशा सबको

पहिचान जिसको भले बुरे की, पहिचान वाले को हम भी जानें ।।

 

रहता है सबमें होकर के सब कुछ, वेइब्तदा और वेइन्तिहा[56] है।

मसरूफ़[57] रहते हैं मस्त जिसमें, उस मस्त सूरत को हम भी जानें ।।

 

अनमोल 'मुक्ता' का ये खज़ाना, गर लूटना है मजे से लूटो।

हक़ीक़ी मस्तों की जो हक़ीक़त, ऐसो हक़ीक़त को हम भी जानें ।।

 

 

 

 

 

 

 

. मंज़िले मक़सूद' पे मंज़िल का

 

मंज़िले मक़सूद'[58] पे मंज़िल का निशाँ नाम नहीं।

खो गया जो दिल तो फिर उस दिल का दाल लाम नहीं ।।

 

नज़र से दूर महल मिला हमेशा के लिए

ज़मीं पे आसमाँ पे नहीं ज़ीना[59] नहीं बाम नहीं ।।

 

जिस्म छोड़ते ही जिस्म जो मिला वो बेपैदा

खूबसूरती है बेमिसाल जिसमें हाड़ नहीं चाम नहीं ।।

 

पीता हूँ दम दम[60] पे मगर जाके मैकदा में नहीं

हक़ीक़त में पूछिये तो अगर शीशा नहीं जाम'[61] नहीं ।।

 

फ़तेह[62] पाया जो यार मारके दुनियाँ फरजी[63]

शाहत'[64] मिली है बेमुल्के जहाँ सुबह नहीं शाम नहीं ।।

 

गौर से सुनके दोस्त तुम भी तज़र्वा तो करो

हर वक़्त कह रहा 'मुक्त' दूसरा पैग़ाम नहीं ।।

 

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१०.खुदमस्त मस्तों की ये मस्त ऑखें

खुदमस्त मस्तों की ये मस्त ऑखें,

उन मस्त ऑखों से ख़ुदा बचाये।

सरूरे वहरात'[65] का पिलाती प्याला,

पीकर बहकने से ख़ुदा बचाये ।।

 

हमेशा करती है तलाश उसको,

जो दम दम दिल ये तड़पता उसको।

बरबाद करती हैं देखते ही,

बरबाद होने से खुदा बचाये ।।

 

इशारा करती हैं जबकि उसको,

समझ में आता है इशारा उनका।

छुपा इशारे में बेइशारा,

ऐसे इशारे से ख़ुदा बचाये ।।

 

कोई फरिश्ता कहीं का भी हो,

मुक़ाबिले में जो आए कभी भी।

जनाजा निकला दिमाग़ो दिल का,

ऐसे जनाजे से खुदा बचाये ।।

 

ऑखें फ़क़ीरों की वहीं पे रहतीं,

जहां पे रहता है बेठिकाना।

उन बेठिकानों का बेठिकाना,

उन बेठिकानों से ख़ुदा बचाये ।।

 

आबाद होना है गरचे 'मुक्ता',

उन मस्त ऑखों की तरफ तो देखो।

निकलते जिनमें से मस्त शोले'[66],

उन मस्त शोलों से खुदा बचाये ।।

११.ढूँढ़ता दिल दर दर

 

ढूँढ़ता दिल दर दर,

वह दिलरुबा मैं ही तो हूँ।

गुलचमन गुल गुंचये[67]',

गुलरूबा मैं ही तो हूँ।।

 

जिसके डर से नाचते,

महताब[68] तारे आफ़ताब[69]

आसमाँ दर पर्द ये,

पर्दानशीं मैं ही तो हूँ।।

 

मैकदाओं और शीशों,

में मस्ती है धरी।

होती मस्ती मस्त जिससे,

मस्तीयाँ मैं ही तो हूँ ।।

 

चहचहाना बुलबुलों का,

मुस्कुराना बाग़ का

खूबसूरती हर गुलों की,

बाग़वाँ मैं ही तो हूँ।।

 

इल्म'[70] कितने हैं जो, दुनियाँ में जिनका इन्तिहा'[71]

उल्म इल्मों का महल, इल्मदाँ[72] मैं ही तो हूँ ।।

 

मैं हूँ, मैं हूँ, मैं ही हूँ, 'मुक्त' किससे कह रहा।

कहना सुनना सिर्फ अफ़सों'[73], कुछ भी हो मैं ही तो हूँ।।

१२. मुरादे मर्ज' का दुनियाँ

 

मुरादे मर्ज[74]' का दुनियाँ में मसीहा[75] कोई

हो गया आज़ाद तो फिर उसका नसीहा'[76] कोई ।।

 

ग़म खुशी कुछ नहीं चेहरे पे मायूसी भी नहीं

दिलवर की याद में कहीं जाने की तबियत कोई ।।

 

गुनाह बेगुनाह सभी मौत के मुँह में जो गये

इश्क़ में बेनींद के अब नींद भी आती कोई ।।

 

मुद्दतों के बाद में इस दिल को तसल्ली जो मिली

देखने सुनने की कभी और ज़रूरत कोई ।।

 

फर्जी हक़ीक़त का हक़ीक़त पे ये पर्दा जो पड़ा।

हक़ीक़त तो यही पर्द--पर्दानशी कोई ।।

 

'मुक्त' का इज़हार यही तुम भी तजुर्बा तो करो

मंज़िले मक़सूद पहुँचने पे दूसरा कोई ।।

 

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१३.बेखुदी का दरिया उमड़ रहा

 

बेखुदी का दरिया उमड़ रहा,

कब क्या हो जाये खुदा जाने।

जब डूब गया आलम'[77] सारा,

कब क्या हो जाये खुदा जाने ।।

 

झर रही है मस्त बादलों से,

मुतवातिर[78] मदमाती बूंदे

दिल तड़प रहा था चैन मिला,

कब क्या हो जाये खुदा जाने ।।

 

बाखुदी[79] का जंगल खाक'[80] हुआ,

ज़ालिम थे जानवर भाग गये।

मिल गई हुकूमत आज़ादी,

कब क्या हो जाये ख़ुदा जाने ।।

 

मैकदा जाकर जाम पीया,  सिजदा किया बुतखाने का।

फिर भी ये बेहोशी टपकी,  कब क्या हो जाये खुदा जाने ।।

 

खुद के घर में आबाद हुआ,  दुनियाँ का पर्दाफाश हुआ

हो गये अलविदा[81] ऑख-कान,  कब क्या हो जाये ख़ुदा जाने ।।

 

"मैं" फलॉ हूँ जुर्रत[82] है किसकी,  महफिल में जो कर सके बयाँ।

ये जुर्म है सरे आम'[83] 'मुक्ता'  कब क्या हो जाये खुदा जाने ।।

१४.हो गया हूँ मस्त

 

हो गया हूँ मस्त दुनियाँ को रिझाकर क्या करूँ।

जज़्बे'[84] जल्वा गर'[85] हूँ दीपक राग गाकर क्या करूँ ।।

 

दिल मिला दिलवर से जाकर खुदी बेखुदी से मिली।

हूँ जहाने हस्ती मैं, हस्ती मिटाकर क्या करूँ ।।

 

पैमाने पीकर के हर जा'[86] देखता हूँ मयकदा

मैं हूँ जब खुद का खुद मैकदा जाकर क्या करूँ ।।

 

इज़हार करते रात दिन इंजील वेद कुरों सभी

कुछ भी कहना शर्म है फिर मैं बताकर क्या करूँ ।।

 

पंडितों को है नमस्ते मौलवियों को है सलाम

दे चुका मुर्शद[87] को सर फिर सर झुकाकर क्या करूँ ।।

 

'मुक्त' का पैग़ाम आलम में हमेशा छा रहा

जा जा फ़रमान है तब फिर सुनाकर क्या करूँ ।।

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१५.ऑख देखते ही ऑख

 

ऑख देखते ही ऑख आँख देखते ही नहीं।

मंज़िले मक़सूद'[88] पहुँचकर नदी बहती ही नहीं ।।

 

ख़ुदा के माइने[89] हैं जो एक वही ख़ुद सबका

हक़ीक़त यही सचमुच में कोई बात सूझती ही नहीं ।।

 

हर वक़्त है फ़रमान'[90] इस दुनियाँ में तहीदस्तों"[91] का

 खुद का ही पसारा ही खुद पर लीक[92] टूटती ही नहीं ।।

 

जो देखना था देख लिया देखने वाला ही कौन

पर राज़ खोलने को भी ये ज़बाँ खुलती ही नहीं ।।

 

फूटती तक़दीर जब आता है 'मुक्त' महफ़िल में

फ़क़ीरों की इनयात बिना तक़दीर फूटती ही नहीं ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

१६.ज़माने की थी जो ख्वाहिशातें

 

ज़माने की थी जो ख्वाहिशातें,

गई जहन्नुम'[93] में निजात[94] पाया।

तमन्ना'[95] बैठी ताबूत'[96] अंदर,

हुआ जो मातम[97] तो निजात पाया ।।

 

कभी किसी से कोई मुहव्वत,

कभी किसी से कोई नफरत

कोई है मेरा मैं किसी का,

दुनियाँ दुरंगी से निजात पाया ।।

 

कभी तो आना कभी तो जाना,

था मुद्दतों का खयाले अफ़सॉ।

हक़ीक़त में ही जो मैंने देखा,

ये ख़्वाब खयालों से निजात पाया ।।

 

कभी तो मौला[98] कभी तो बंदा'[99],

कभी तो मादा कभी परिन्दा[100]

बिगड़ते बनते खुद में हमेशा,

बिगड़ते बनने से निजात पाया ।।

 

पलक उठाने से है ये क़ायम,

पलक गिराने से है क़यामत।

मुबारक हो ये खुद का करिश्मा'[101],

क़ायम क़यामत से निजात पाया ।।

 

मखलूके[102] हस्ती जो कुछ भी मैं हूँ,

ख़ुदा परस्तों की हस्ती मैं हूँ।

खुद की जो हस्ती है खुदा परस्ती,

ग़फलत परस्ती से निजात पाया ।।

 

जो कुछ भी कहना बेखौफ हो,

करके तख़्ते सूली मंसूर मानिंद

की है इनायत फ़क़ीरों ने जब,

तब से ही 'मुक्ता' निजात पाया ।।

 

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१७. इस दिल की यकसुई' में

 

इस दिल की यकसुई[103]' में दीदारे दिलरूबा[104] है।

क्या खूब गुलचमन का हर जा'[105] में गुलरूबा है ।।

 

मिलता साक्रिया'[106] जब करता तलाश कूए[107]

पैमाना[108] पकड़ते ही हरराय में मैकदा है ।।

 

महबूब[109]' जुस्तजू[110] में होता है क्यों परेशॉ

ख़ुद को ही गौर कर तू क़तरा क़तरा[111] ही ख़ुदा है ।।

 

जिस्मानी[112] ज़िंदगी में दुश्वार[113]" उसका मिलना

मिलता है जो भी अफसॉ[114] मिलता जुदा है ।।

 

ताबूते'[115] तहखाने[116] से भी, 'मुक्ता' की यह हक़ीक़त

निकलेगी हर ज़बाँ से नुस्खा ये यकींदों[117]" है ।।

 

 

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१८.किया जो तर्क दुनियां का

 

किया जो तर्क दुनियां का, मुक़द्दर हो तो ऐसा हो।

मौत से भी नहीं डरता, मुक़द्दर हो तो ऐसा हो ।।

 

निगाहें जिसकी महबूबी[118]', उस्मानी[119] जिस्मानी।

मकीं[120] खानाबदोशों का, मुक़द्दर हो तो ऐसा हो ।।

 

उमड़ती बेखुदी मस्ती की, लहरों में जो लहराता

दिवाना है जो दिलवर का, मुक़द्दर हो तो ऐसा हो ।।

 

चुका जल इश्क़ शोले में, मिसाले जैसा परवाना

गई जन्नत जहन्नुम में, मुक़द्दर हो तो ऐसा हो ।।

 

रहती याद रोजे'[121] की, रहती है नमाज़ों की

यादगारी है यादों की, मुक़द्दर हो तो ऐसा हो ।।

 

जाता मैकदा अंदर, ख़्वाहिश बुतकदाओं की।

मुसीबत टल गई सारी, मुक़द्दर हो तो ऐसा हो ।।

 

मतलब बेगुनाहों से, नहीं मलतब गुनाहों से

हुआ जो 'मुक्त' दोनों से, मुक़द्दर हो तो ऐसा हो ।।

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१९.देखने वालों को देखता हूँ

 

देखने वालों को देखता हूँ देखने के लिए।

करता हूँ मौत इंतज़ार करने के लिए ।।

 

सचमुच में तअज्जुब तो यही ख्याल में दुनियाँ है छुपी।

खुद पे नज़र डालता हूँ खयाल खातमा के लिए ।।

 

भूल थी कैसी ये बड़ी हमको खुदा से मिलना।

तर्क कर दिया जो भूल, भूल भूलने के लिए ।।

 

स्वाँग वाले के लिए स्वाँग बनाया था जो मैं।

पाकर के बैठ गया हमेशा ही बैठने के लिए ।।

 

खोलते थे ऑख कान दोनों इस्म' जिस्मों से।

खेलने वाला हूँ खेल खेल खेलने के लिए ।।

 

फ़क़ीरों का तजर्दा है 'मुक्त' मस्त की निगाहों में।

मक़सूद है बेखुदी को दोस्त क़ब्र भेजने के लिए ।।

 

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२०.महसूस हो रहा है जो सचमुच

 

महसूस' हो रहा है जो सचमुच में बुतकदा[122]

 इस बुतकदे में जा जा[123] लबरेज़' दिलकदा[124] ।।

 

पर्दा नहीं ज़रा से भी पर्दानशीं कहाँ

जाहीर ज़हर सबको है फिर निहाँ[125] कहाँ ।।

 

जो भी निशान उसके ही तो बेनिहाँ कहाँ

दरअसल होकर मकी फिर बेमकाँ कहाँ ।।

 

ये राज़ मुबारक हो हक़ीक़त का जो कदा

कहता है 'मुक्त' ग़ौर से लेता है अलविदा" ।।

 

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२१. याद की भी याद नहीं

 

याद की भी याद नहीं किसकी याद कौन करे

दूसरा जब है ही नहीं तब याद किसकी कौन करे ।।

 

मालूम नहीं था मुझे कि मर्ज ये आयेगा कभी

मज़े मसीहा' नहीं तब याद किसकी कौन करे ।।

 

दिल दिमाग़ दोनों ही मुक़द्दर' से जहन्नुम में गये

याद वाला ही नहीं याद किसकी कौन करे ।।

 

जिसमें दरो' दीवार नहीं ज़ीना नहीं बाम नहीं

रहता हूँ बेहद्दे' महल याद किसकी कौन करे ।।

 

हर गुल गुलरान में मैं गुजरता हूँ मिसले भँवर

फुर्सत को भी फुर्सत नहीं तब याद किसकी कौन करे ।।

 

'मुक्त' मस्तों की निगाहों का तीर दिल को लगा।

होश आता ही नहीं याद किसकी कौन करे ।।

 

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२२. देख ले हर रौ' में तू खुद का नजारा

 

देख ले हर रौ'[126] में तू खुद का नजारा वाह-वाह

देखते ही ख़्वाबे दुनियाँ खुद फ़ना[127] हो जायेगी ।।

 

मस्त होना चाहता तू हर तरह बर्बाद हो

दुनियाँ दुरंगी तर्क' कर सब फिक्र से आज़ाद हो ।।

 

ज़िंदगी का है मज़ा बेफ़िक्र हो जाना ही दोस्त

खुद परस्ती क्या बेफ़िक्री मस्त रहना जिंदगी ।।

 

ये दुनियाँ सच में अफ़साना बिगड़ती बनती रोज़ाना।

हमेशा मारती ताना, दोस्ती कर दोस्ती कर ।।

 

तमन्ना से बरी' होना हरूफ़े 'मुक्त' के मानिंद

तमाशा देख फिर अपना क़यामत आने वाली है ।।

 

२३.नहीं है शिकवा' कभी किसी से

 

नहीं है शिकवा' कभी किसी से, जो एक दरिया के बलवले हैं।

 गिला करूँ मैं क्या और किससे, जो एक दरिया के चलवले हैं ।।

 

भला कहूँ तो शरमिन्दगी है, बुरा कहूँ तो बेहूदगी है।

हदूदी[128]' नजरों से मुड़ के देखा, जो एक दरिया के वलवले हैं ।।

 

जमी आसमों चाँद सूरज, आबोहवा' कोई सितारे

रखुद में ही खुद का ही ये पसारा, जो एक दरिया के बलवले हैं ।।

 

क्या खूबियाँ हैं इन सूरतों में, कभी तो ज़ाहिर कभी तो बातिन[129]'

तरह-तरह के नमूने जिनके, जो एक दरिया के वलवले हैं ।।

 

बेइन्तिहा यह अपार दरिया, कोई भी करती कोई भी साहिल'

 मानिंद 'मुक्ता' यह हजारों जिसमें, जो एक दरिया के वलवले हैं ।।

 

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२४. जब सहारा गया तब सहारा मिला

 

जब सहारा गया तब सहारा मिला, ज़िंदा रहने का कोई सहारा नहीं

सच में जीना उसी का जगत में सही, जिसके जीने का कोई सहारा नहीं ।।

 

ये दिल ढूँढता था जिसे दर दर, कभी क़ाज़ी मुल्ला, बरहमन बना

पर मिला कैसा जैसा नहीं कुछ मिला, बिन मिले कोई होता गुजारा नहीं ।।

 

जिसे मानता था हक़ीक़त यही, था वो फर्जी वो फ़ानी फ़रेबियाँ'

लेकिन माना था जिसने वह पर्दानशीं, दरअसल कैसा पर्दा उघारा नहीं ।।

 

क़ाबिले ज़िक्र रूपोरा कहना है क्या, जो कि खामोश इतना है बेइन्तिहा

जो कि करता है दीदार सबका वहीं, कर लो दीदार दूजा दीदारा'[130] नहीं ।।

 

तफसीले महबूब तामील कर, 'मुक्त' महफिल की बातें समझ बूझकर

तर्क कर दो तमन्ना तसव्वुर सभी, और कहूँ क्या मैं कुछ भी इशारा नहीं ।।

 

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२५. बक़ा' ये फनों जिंदगी रही

 

बक़ा'[131] ये फनों जिंदगी रही,

ज़िंदगी जो मिली वह सदा के लिये।

जिसे पाकर दिवाना बना घूमता,

जग में फेरी हमेशा लगाता हूँ मैं ।।

 

कहाँ था वो क्या था, कहाँ मैं हूँ, क्या,

तसव्वुर था जन्नात मारा गया।

कैसी खब्तुलहवासी[132] ये सर पे चढ़ी,

बेशरम हो करके क़हक़हाता हूँ मैं ।।

 

गुल चमन कैसा कैसा अनोखा खिला,

गुंचे दामन की क्या क्या यह हैं खूबियाँ।

यह गमकता है क्या गुलराने' गुलरूबा,

मिसले हो बुलबुलें चहचहाता हूँ मैं ।।

 

अंदरे आसमाँ मस्त दरिया भरा,

जो कि बेइव्तदा[133]' और बेइन्तहा।

ब्रह्मा विष्णु शिवादिक यह हैं बुलबुलें,

जिसमें हर वक्त गोता लगाता हूँ मैं ।।

 

यक़ीनन अगर मुझसे पूछो सही,

ज़िंदा रहने का मक़सद मेहरबाँ यहीं।

दिल आलम को पैग़ाम देता रहूँ,

इसलिये मस्त बातें सुनाता हूँ मैं ।।

 

जो फ़क़ीरों की सुहवत' कभी किया,

उनके कदमों पे कुर्यां कभी हुआ।

भला समझेगा क्या 'मुक्त' अल्फाज' को,

जा जा साज़" में गीत गाता हूँ मैं ।।

 

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 २६.खुदा की कमबख्ती

 

खामोश का खजाना खामोश ढूँढता है

क़दमों तले है दौलत दौलत को ढूँढता है ।।

 

कमवख्ती'[134] कमवख्त[135] ने आकर किधर से घेरा

मखलूके[136] खुदा होकर खुदा को ढूँढता है ।।

 

जिसकी रोशनी से आलम है सारा रोशन

रोशन का भी रोशन है रोशन को ढूँढता है ।।

 

महताब[137]' आफ़ताबे[138] तारे हैं जगमगाते

इनका भी जो सहारे सहारे को ढूँढता है ।।

 

सबकी है जो अक़ीदत[139] सबकी है जो तरीक़त[140]'

हक़ की भी जो हक़ीक़त' हक़ीक़त को ढूँढता है ।।

 

बंधन मोक्ष जिसमें मानिंद ख़्वाब के हैं

जो 'मुक्त' है हमेशा मुक्ति को ढूँढता है ।।

 

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२७. मुवारक हो तेरा साक़ी

 

मुवारक हो तेरा साक़ी रहे आबाद मैखाना

जिधर जाऊँ जहाँ पर हो दिले भरपूर पैमाना ।।

 

पिलाया जाम'[141] यह तूने क़ाबिल दीनों दुनियाँ के

देखता हूँ बेदिल होकर नज़र आता है याराना ।।

 

अमूमन[142] कहते हैं पीने से जाती है वेहोशी

झुका सर रही मस्ती हुआ गायब वेहोशाना ।।

 

क़यामत जब कभी होती ज़र्मी आसमाँ होता

क़यामत खुद खुद 'मैं' ही रहा बाक़ी जो अफ़साना ।।

 

नहीं मतलब है उस मय से जो पीते दिल बिगड़ जाए।

मेहरवाँ गर मिला साक़ी जो पीते ही बदल जाना ।।

 

गुज़िरता'[143] कौन था, क्या हूँ आइंदा'[144] क्या रहूँगा मैं।

उलझनें हल हुई सारी यही दुनियाँ का मुरझाना ।।

 

पीया एक बार मस्ती का है मैंने वहदते[145]' प्याला

हमेशा लहरों में गोता लगाता रहता मस्ताना ।।

 

बचाये इंसा अल्लाहे'[146] 'मुक्त' साक़ी की नज़रों से

नज़र पड़ती है जब जिस पर वही हो जाता नज़राना ।।

 

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२८. फ़क़ीरी फ़ाक़ा किया है जिसने

 

हक़ीक़ी

 

फ़क़ीरी फ़ाक़ा किया है जिसने,

राक्ले इलाही'[147] को हो मुवारक।

हो करके वरवाद वजूद'[148] अपना,

मिटाया जिसने हो उसे मुवारक ।।

 

एतराज[149] दोज़ख[150] बहिरते'[151] ख्वाहिश,

कहाँ नहीं 'मैं' यह यक़ीन जिसको।

खुद में ही खुद को देखता जो,

खुदमस्ती-मस्तों को हो मुवारक ।।

 

खुद भी सहारा है नहीं किसी का,

खुद का सहारा भी नहीं है कोई।

हमेशा रहता जो वेसहारा,

उस वेसहारे को हो मुवारक ।।

 

ज़मीं पे रहता आसमाँ पे,

रहता जन्नत ही जहन्नुम

रहता है महले मखलूक़ में जो,

सलाम सिजदा हो उसे मुवारक ।।

 

फ़िदा[152] है जिस पे यह सारा आलम,

तलाश करता है कूए-कूए'[153]

वही हक़ीक़त है नज़र में जिसके,

इस हक़ परस्ती[154] को हो मुवारक ।।

 

कभी आती है याद अपनी,

कभी आती है दूसरों की।

है याद यादों की यादगारी,

उस यादगारी को हो मुवारक

 

खानाबदोशों[155] ख़ुदा बचाये,

भरी मुहव्वत से निगाहें जिसकी।

हुआ निगाहों से निहाल 'मुक्ता',

ऐसी निगाहों को हो मुवारक ।।

 २९.सत्य का पैग़ाम सुनाने में

 

सत्य का पैग़ाम सुनाने में कोई साथ नहीं

नारा--हक़ीक़त का लगाने में कोई साथ नहीं ।।

 

बुज़दिल[156]' दुनियाँ में घूम घूम के कोशिश भी किया।

हर दिल में शम्म [157]' 'मैं' के जलाने में कोई साथ नहीं ।।

 

जहाँ की जान वही, मंज़िले मक़सूद वहीं

खुदा का खुद भी बताने में कोई साथ नहीं ।।

 

क़ाबिले तारीफ़ यह कैसी बेवकूफ़ी है

मगर खुद को बेवकूफ़ बनाने में कोई साथ नहीं ।।

 

तअज़्ज़ुव यह उसे कमबख़्ती'[158] किधर से सूझी

हटाना खुद को पड़ेगा यह हटाने में कोई साथ नहीं ।।

 

रहता है 'मुक्त' मौज में दुनियाँ से बेधड़क होकर

जो मौत की भी मौत भगाने में कोई साथ नहीं ।।

 

* *

 

 

 ३०. दिल कदा' --कदा है

 

दिल कदा[159]' --कदा है यह सारा जहाँ,

जो यक़ीनन है यह जा जा बुतकदा

जिसने देखा है हरसू[160] में नूरेज़हाँ[161],

उसे हर वक़्त हर जा पे है मैकदा ।।

 

था गुज़िरता[162] वही आज[163] भी सब दरअसल,

और आगे भी[164] उसके सिवा कुछ नहीं

पर इनायत फ़क़ीरों की हो जब कभी,

फिर ज़रूरत जाने की है बुतकदा ।।

 

देख हिन्दू मुसलिम की खूंरेज़ियाँ[165]',

तरस आता है मज़हब के हैं जानवर

लेकिन जिस वक़्त दोनों जुदा हो गये,

तो काबा क़लीसा नहीं बुतकदा ।।

 

खुद मायने 'मैं' हूँ सब का सभी,

जो अलिफ़ एक मुतलक़ दूजा कोई

बता गिरज़ा काबा क़लीसा कहाँ,

आना जाना कहाँ और कहाँ बुतकदा ।।

 

क़ाबिले ग़ौर एतबार कर 'मुक्त' का,

गरचे दुनियाँ में सदियों से बेज़ार[166] है।

दिलकदा मैं हूँ और मैकदा मैं हूँ जो,

सिजदा मैं हूँ मैं हूँ सभी बुतकदा ।।

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३१. गर सलामत रहे मयकदा

 

गर सलामत रहे मयकदा साक्रिया

तो जगह जगह बुतकदा साक्रिया ।।

 

पीते पीते बेहोशी बेहोशी गई

क़तरा क़तरा है लवरेज' साक्रिया ।।

 

ग़म खुशी दोनों यकसों जहन्नुम गए

झूमता हूँ नशे में सदा साक्रिया ।।

 

जीने मरने की कोई तमन्ना नहीं

हो गया ख़त्म क़ानून साक्रिया ।।

 

गुलरूबा गुँचे गुलरान हूँ मैं बाग़वाँ

चहचहाता हूँ मैं बुलबुले साक्रिया ।।

 

ज़िंदगी में जिसने तजर्वा किया

'मुक्त' क्या होगा दुनियों से वो साक्रिया ।।

 

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३२. चला था बेपता के लिये

 

चला था बेपता के लिये खुद को बेपता पाया

कहाँ पे किस तरह है निशाँ यह भी बता पाया ।।

 

तक़रीर[167]' कुराँ वेदों की सब कर थके हाफ़िज'[168] मुल्लां³

करवटें बदली तो मैं हर रों में बेपता पाया ।।

 

कोशिश तो यही थी कभी पाने पे मैं जाऊँगा बदल

पाना पाना ख़्वाब था मैं जैसा था वैसा पाया ।।

 

जिस खुदा के वासते वेताब है सारी दुनियाँ

अलिफ़[169] पे गौर जब किया तब खुद में ही खुदा पाया ।।

 

मंज़िले मक़सूद पे ख़्वाहिश थी पहुँचने की बड़ी

मंज़िले मक़सूद को हर जा में जा जा'[170] पाया ।।

 

'मुक्त' का पैग़ाम मुक्त को ही मुक्त करता है।

हक़ीक़त में पूछिये अगर पाया को भी नहीं पाया ।।

३३. दीदार' दिलरुबा का

 

दीदार' दिलरुबा का दीवारे कहकहा'[171] है।

जिसने उधर को देखा वो फिर इधर कहाँ है ।।

 

हक़ीक़त में दिल जो बेदिल नामो निशॉ कोई।

खामोश बे खामोशी दोनों भी यहाँ है यहाँ है ।।

 

नेकी बदी बिल्कुल ख़्वाब ख़्याल'[172] समझो।

कुछ भी दीनों दुनियाँ धरती आसमाँ है ।।

 

कहना है कुछ बेशर्मी सुनना है सिर्फ अफ़सों।

सबमें ऊँचा है सबको लेकिन वो लाज़बाँ [173]है ।।

 

है चरमदीद जो चरम' हमेशा हैरौँ।

 'मुक्ता' मकीं जहाँ में फिर भी वो ला मकाँ है।

 

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३४. मैं अपने आप पे हूँ आशिक़

 

मैं अपने आप पे हूँ आशिक़, कोई कुछ कहता कोई कुछ कहता।

मैं आशिक़ क्या माशूक़ भी हूँ, कोई कुछ कहता कोई कुछ कहता।।

 

इश्क़ लबालब दरिया में, गरक़ाब'[174] हुआ आलम सारा

कुछ भी रहा नामो निशॉ, कोई कुछ कहता कोई कुछ कहता ।।

 

द्वैताद्वैत के दलदल में, फँसना है बिल्कुल नादानी।

रहना अलमस्त' फ़क़ीरी में, कोई कुछ कहता कोई कुछ कहता ।।

 

ग़मी खुशी काफूर' हुई, प्याला पीकर खुद मस्ती का।

फुर्सत भी नहीं कुछ कहने की, कोई कुछ कहता कोई कुछ कहता ।।

 

ऑख कान लाचार हुए, और दिल भी चकनाचूर हुआ।

क्या नशा क़ाबिले दिल पसंद, कोई कुछ कहता कोई कुछ कहता ।।

 

है सच में मज़ा इसे पीने का, जब अर्श ज़र्मी का पता हो।

जिसे पीकर 'मुक्ता' मुक्त हुआ, कोई कुछ कहता कोई कुछ कहता ।।

 

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३५. मस्तों के जो इशारे समझेगा

 

मस्तों के जो इशारे समझेगा मस्त होगा।

 उनकी कृपा से उनको समझेगा मस्त होगा ।।

 

मस्ती में मस्त खेलें हँस हँस के तूफान झेलें।

मस्ताने दीवाने को जानेगा मस्त होगा ।।

 

अज़गैबी'[175] बात बोलैं दुनियों की पोल खोलें

क़दमों पे हमेशा जो लोटेगा मस्त होगा ।।

 

कहता ज़माना कुछ भी दिन रात जल रहा है।

मस्ती हो फिर मुबारक झूमेगा मस्त होगा ।।

 

'मुक्ता' की मुक्त वाणी खोकर वजूद' कहती

सब कुछ मिटाके आपा[176] आयेगा मस्त होगा ।।

 

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३६. निज आतम की अनुभूति बिना

 

निज आतम की अनुभूति बिना, निज आत्मानंद को क्या जाने

अनब्याही किताबें पढ़ करके, ससुराल की बातें क्या जाने ।।

 

सब वेद पुरान कुरान पढ़ा, जीवन सारा वेदान्त पढ़ा

पर पढ़ने वाले आलिम'[177] को, मुर्शद[178] की मेहर बिन क्या जाने ।।

 

अस्तीति चराचर में व्यापक, वह 'मैं' हूँ 'मैं' हूँ बोल रहा

जो श्रुति की टेर कभी सुनी, अभिमानी मुरख क्या जाने ।।

 

हो जा कुर्बान फ़क़ीरों के, क़दमों पे झुका दे सर अपना

फिर देख नज़ारा ख़ुद का ही, गर देखा नहीं तो क्या जाने ।।

 

भगवान आत्मा गुलशन में, भगवान 'मुक्त' ही गूँज रहा

ज़रा ज़र्रा' 'मैं' हूँ 'मैं' हूँ जिसने सुना वो क्या जाने ।।

 

 

 

 

 

३७. हक़ीक़ी मस्ती में मस्त होगा

 

हक़ीक़ी मस्ती में मस्त होगा,

इशारे मस्तों के वो ही जाने

वजूद खोया है जिसने अपना,

नज़ारे मस्तों के वो ही जाने ।।

 

नहीं नसीहा' कोई नसीहत,

मज़हबी झगड़ों से जो अलहदा

 फ़क़ीरी हासिल जिसे मुवारक,

खानाबदोशों को वो ही जाने ।।

 

दीवाना खुद पे लहराना खुद पे,

रामाँ भी खुद ही परवाना खुद पे

छलक पड़ी है ख़ुदाई मस्ती,

ख़ुदा परस्तो को वो ही जाने ।।

 

मिली मुक़द्दर से है बेशर्मी,

कभी तो रोना कभी तो हँसना

पिया है कैसी अनोखी प्याला,

प्याला परस्तों को वो ही जाने ।।

 

दिमाग़ो दिल सब गए जहन्नुम,

मझधार दरिया में डूबा आलम

गले पिन्हाए जो हार 'मुक्ता',

मस्ताना मुक्ता को वो ही जाने ।।

 

३८. रोकर पूछे हँसकर बोले

 

रोकर पूछे हँसकर बोले,

टुकड़ों की मोहताज' रे।

भाई रहना सावधान,

यह दुनियाँ धोखेबाज़ रे ।।

 

बालू की दीवाल उठायै,

आसमान में बाग़ लगावै।

देख देख के जिया ललचावै,

कभी तो रोवै कभी तो गावै ।।

 

खुद का ख़्याल करें नहिं कबहूँ,

जो सबका सिरताज रे।

भाई रहना सावधान,

यह दुनियाँ धोखेबाज़ रे ॥१॥

 

आवागमन का झूला झूलै,

अपने "मैं" को हमेशा भूलै

दुख को सुख, सुख को दुख माने,

संत शरण को नहीं पहचानै ।।

 

खुद का ख़्याल करें नहिं कबहूँ,

जो सबका सिरताज रे

भाई रहना सावधान,

यह दुनियाँ धोखेबाज़ रे ॥२॥

 

दुनियाँ दीखै भोली भाली,

सच में पूछो नागिन काली।

जग जाने पर ख़्वाब ख्याली,

सूझै सावन ही हरियाली ।।

 

खुद का ख्याल करें नहिं कबहूँ,

जो सबका सिरताज रे।

भाई रहना सावधान,

यह दुनियाँ धोखेबाज़ रे

 

दारा सुत मतलब के साथी,

चाहै भरि भरि लावैं थाती।

रे मन चेत मुसाफिर मीता,

समझ बूझ ले आतम नीता ।।

 

खुद का ख्याल करै नहिं कबहूँ,

जो सबका सिरताज रे।

भाई रहना सावधान,

यह दुनियाँ धोखेबाज़ रे ॥४॥

 

खुद ग़रज़ी से प्यार जो करती,

बाहर भीतर चलती फिरती।

सतगुरू 'मुक्त' बिना यह ठगनी,

अद्भूत नाच नचावै नटनी ।।

 

खुद का ख्याल करै नहिं कबहूँ,

जो सबका सिरताज रे।

भाई रहना सावधान,

यह दुनियाँ धोखेबाज़ रे ॥५॥

 

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३९. थे गुज़िरता जो भी हम

 

थे गुज़िरता जो भी हम, वह आज भी हम हो गये।

थे जहाँ पर जिस तरह, वह आज भी हम हो गये

 

ग़फ़लत का ख़्वाब ख़्याल था, संसार कहते हैं जिसे

खुद में था खुद का नज़ारा, आज सब हम हो गये ।।

 

ग़म खुशी थे ज़िंदगी, गाड़ी के पहिये एक सॉ

हो गये महरूम सबसे, जा जा हम हो गये ।।

 

जिस मज़े को ढूँढते, मायूस' की दुनियों में हम

अब जो नफ़रत हमने की, वह खुद खुद हम हो गये ।।

 

गुलचमन कितना अनोखा, चहचहाती बुलबुलें

खुशबू ये हर गुल गुलसितॉ बाग़वाँ हम हो गये ।।

 

गूँजती आलम में यह, दरवेश 'मुक्ता' की सदा'

हम जो थे तुम हो गये, तुम जो थे हम हो गये ।।

 

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 ४०. जो है सरताज का आलम

 

जो है सरताज का आलम, नचाती चाह अल्लाह को

करिरमा क्या-क्या दुनियॉ का, दिखाती चाह अल्लाह को ।।

 

तअज्जुब यह कि कुल'[179] सबमें, बना जुज़'[180] कैसी कमबखती।

गले में हार माया का, पिन्हाती चाह अल्लाह को ।।

 

शहनशाहों के मख़लूके[181] फँसा, खुद कर्म कीचड़ में

सैर दोज़ख बहिश्तों की, कराती चाह अल्लाह को ।।

 

अक़्ल हैराँ ज़ुबाँ हैराँ, परेशा योगी संन्यासी

भटकता दर दर मोहताज़, बनाती चाह अल्लाह को ।।

 

ख़ौफ़ खाते