मुक्तोद्गार

 

 

 

 

 

जो दर्शन, प्रत्यक्ष रूप से परमात्मा का

दर्शन करा दे, उसका ही नाम दर्शन है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

महर्षि मुक्

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मुक्तोद्गार

 

प्रकाशक                       :महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति

केन्द्र, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

(सर्वाधिकार सुरक्षित प्रकाशकाधीन)

 

मुद्रक                            :नेचर ग्राफिक्स शांति चौक,

पुरानी बस्ती, रायपुर

मो.: 9302230478

 

संस्कृत                         :तृतीय, वर्ष : 2012

 

प्रति                              :1000

 

कार्यालय एवं -               :डॉ. एस.एन. त्रिपाठी

पुस्तक मिलने               50/152, बंधवापारा, पुरानी बस्ती

का पता                         रायपुर (..) - 492001

मो. : 9926130014

 

मूल्य

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

समर्पण

 

मातृदेवो भव

पितृदेवो भव

आचार्य देवो भव ।।

 

 

 

 

 

 

 

परम् पूज्य सद्गुरुदेव महर्षि मुक्त के

श्रीचरणों में सादर समर्पित

 

 

 

 

 

 

महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति

 

 

 

 

 

 

 

संक्षिप्त-कथन

 

'श्री महर्षि मुक्त' के उद्गार श्री महर्षि जी के परिचय के प्रतीक हैं, प्रत्यक्ष, अनुमान, निगम एवं स्वानुभूति प्रमाण संसिद्ध समस्त चराचर का अस्तित्व 'मैं' हूँ, 'मैं' हूँ इस प्रकार नित्य प्रस्फुटित सच्चिदानंद घनभूत भगवान आत्मा का साक्षात्कार कराना जिनके लिए हस्तामलकवत् है।

 

उपरोक्त अनादि, अक्षय सार्वभौम सिद्धान्त का सतत् प्रचार करना श्री महर्षि जी के जीवन का चरम लक्ष्य है।

 

 

अलं

परमानंद शास्त्री

रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

तृतीयावृत्ति का प्रकाशकीय कथन

 

विगत कई वर्षों से 'मुक्तोद्गार' की मांग को देखते हुए इसके संकलनकर्त्ता श्री नरनारायण जी अवावाल से इस पुस्तक का पुनः प्रकाशन हेतु अनुमति प्राप्त कर, समिति इस नव कायाकल्पित, संशोधित मुक्तोद्वार की तृतीयावृत्ति जिज्ञासु पाठकों को भेंट करते हुए हर्षानुभव कर रही है।

 

वृद्ध योगी का किसी शैशव शरीर में परकाय प्रवेश करने के उपरांत भी उसके अनुभव में किंचित मात्र भी कमी नहीं होती। बस, इसी तरह मुक्तोद्वार का काया कल्पित नया रूप आपके समक्ष प्रस्तुत है, इसमें उन सभी परिशिष्टों का समावेश ज्यों का त्यों किया गया है, जैसा कि इसकी प्रथमावृत्ति में है।

 

संशोधन में कहीं-कहीं पर त्रुटियाँ रह गयी हैं, इसके लिए समिति क्षमा चाहती है और पाठकों से अनुरोध करती है कि इसे सुधार कर पढ़ें।

 

महर्षि मुक्तानुभूति

साहित्य प्रचारक समिति

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रस्तावना

 

'मुक्तोद्गार' में महर्षि मुक्त द्वारा समय-समय पर दिए गए प्रवचनों, वार्ताओं के माध्यम से अध्यात्म दर्शन का सार प्रस्तुत किया गया है। श्रीमद भवतगीता के सूत्र 'स्वभावोऽध्यात्म' की एक विशद व्याख्या है यहां अध्यात्म का सार है स्व-भाव अर्थात् आत्म-भाव। प्रकटतः भाव दो ही होते हैं-आत्म-भाव और विषय-भाव। विषय-भाव को ही कभी 'अनात्म-भाव' भी कह दिया जाता है, किंतु, ऐसा वाक्-विपर्यय के फलस्वरूप होता है, कि इसलिए कि अनात्म जैसा कोई वास्तविक अस्ति रूप होता है। अवश्य, विज्ञान अपने अध्ययन की सुविधा हेतु विषय-भाव को एकांतिक 'पदार्थ- भाव' का रूप दे देता है। किंतु उसका उद्देश्य भी अंततः 'पदार्थ' के स्व- भाव या आत्म-भाव को ही उजागर करना होता है। अब, जहाँ भी आटम- भाव है, वहाँ किसी किसी तरह आत्मा का सन्निवेश अवश्य होगा। विज्ञान का 'पदार्थ' जड़ भाव है, इसलिए उसके आत्म-भाव का निदर्शन चैतन्य- धर्मी आत्मा के प्रकाश के बिना असंभव है। मूल प्रकृति में 'महत्' (विराट सृजनात्मक अवगमनात्मक बुद्धि) का स्फुटन बिना पुरुष (आत्मा) के सान्निध्य के संभव ही नहीं है। इस तरह आत्मा के सान्निध्य में अवगम्य पदार्थ (प्रकृति) ही अध्यात्म की दृष्टि में 'विषय' स्वरूपेण प्रस्तुत होता है। अर्थात् अध्यात्म-दर्शन में प्रकृति या पदार्थ का आत्म-भावी अस्ति-रूप अध्ययन की वस्तु बनता है, जबकि विज्ञान में वही विवक्त रूपेण (Abstraction) अनात्म के छद्म अस्ति-देश में प्रस्तुत होता है।

 

अब, यह एक विलक्षण सी बात है कि विज्ञान की शैली में पादार्थिक आत्म-भाव को अनात्म-भाव का वैकल्पिक रूप देकर प्रस्तुत किया जाता है। यह कैसे संभव होता है? इस तरह के जिन प्रश्नों या समस्याओं से विज्ञान की द्भावना होती है उनमें अस्ति या सत् के स्वरूप के प्रति अज्ञानता या उसके ज्ञान के प्रति संदेह का दृष्टिकोण प्रधान होता है। इसके विपरीत, अध्यात्म में उक्त अज्ञानता या ज्ञान के प्रति संदेह होकर उनके संदर्भ में जिज्ञासा का यह दृष्टिकोण होता है कि तद्-तद् रूपों में वे किस तरह सत् के अनिवार्यतः निदर्शित आत्म-रूप को विपर्यस्त कर देने में समर्थ होते हैं।

 

जूडो-क्रिश्चियन धार्मिक परंपरा में 'ईश्वर' की तरह विज्ञान में 'सत्' 'छुपा हुआ' होता है, जबकि भारतीय धार्मिक परंपरा और अध्यात्म में स्वयं-प्रकाश्य रूपेण प्रस्तुत रहता है। यह श्रीमत जिज्ञासा ही अध्यात्म की ही होते उत्सुकता और आश्चर्य की अभिव्यक्ति है। उसका जन्म अज्ञान या संदेह में अतः, जैसा कि महर्षि मुक् कहते जिज्ञासा ही अध्यात् की प्रवेशिका है, कि प्रश्न या समस्याएँ। जिज्ञासा किसी अज्ञात उत्तर को ढूँढने की विधा होकर, प्रस्तावित उत्तर के प्रति उत्सुकता और आश्चर्य की अभिव्यक्ति है उसका जन् अज्ञान या संदेह  में होकर ज्ञान में होता है, अज्ञान या सन्देह-जन्य सत् के प्रकट ज्ञान-स्वरूप को समझाने के लिए होती है।

 

अध्यात्म और विज्ञान के बीच प्रकट अंतर को और अधिक स्पष्टतापूर्वक समझने के लिए हमें वेदांत के 'अध्यास' की धारणा पर ध्यान देना चाहिए। जैसा कि महर्षि मुक्त कहते हैं 'अध्यास' तीन तरह के होते हैं-देहाध्यास, जीवाध्यास और ब्रह्माध्यास। 'अध्यास' का अर्थ है- आत्-भाव (सत्) पर अनात्म-भाव (असत्) का प्रक्षेप। यहाँ दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। एक, यह कि चूँकि भाव मात्र ही सत् का अर्थ रखता है, जिज्ञासा होती है कि असत् या अनात्म भाव क्योंकर संभव हो पाता है और दूसरी यह कि चूँकि भाव के अर्थ में कभी अभावमूलकता नहीं होती, उसके संदर्भ में असत् का भासमान होना (प्रक्षेण रूपेण) कैसे संभव हो पाता है? जिन जिज्ञासाओं पर अध्यात्म की भूमि तैयार होती है, उन्हीं में उक्त दो जिज्ञासाएँ भी शामिल हैं।

 

कर्म जगत् में 'मैं' आत्म-भाव पर 'मेरा शरीर' के अध्यारोपण से 'देहाध्यास' होता है। यह तमोगुणजन्य है, अर्थात् अज्ञान-जन्य है। यहाँ 'मैं' आत्मा के लिए साधनवत् प्रस्तुत देह को आत्म-भाव से संश्लिष्ट समझ लेने का भ्रम छिपा हुआ है। उपासना (भावना) जगत् में 'मैं' आत्मा पर 'मेरा मन' का आत्मभावी अध्यारोपण होने से 'जीवाध्यास' होता है। यह रजोगुण जन्य है अर्थात् विषयमूलक संकल्प-विकल्प जन्य। 'मैं' आत्मा पर विषयावेष्ठित आवेग का आवरण होने से आत्म-भाव के 'विषयी' होने भ्रम के फलस्वरूप जीवाध्यास होता है। यह जैव-तृष्णा का क्षेत्र है। ज्ञान में जगत् में 'मैं' आत्मा पर आत्मेतर 'परमात्मा' के अध्यारोपण से 'ब्रह्माध्यास' होता है। यह सतोगुणजन्य है, अर्थात् दो क्षेत्रज्ञ-प्रभेद जन्य भ्रम (देह क्षेत्र और जीव-क्षेत्र में 'आत्मा' और मूल प्रकृति क्षेत्र में 'परमात्मा' के बीच भेव से पैदा हुआ भ्रम) इन तीनों प्रकार के अध्यास या भ्रम का निराकरण इस सहज बोध से हो जाता है कि 'मैं' आत्मा पर ही देह-भाव, जीव-भाव ब्रह्म-भाव आधारित है, जबकि स्वयं उस आत्म-देश में इन सभी भावों का अभाव हो वह सर्व का सर्व 'मैं' परम तत्व है, जिसमें एकांतिक आत्-भाव की भावना का भी लोप हो जाता है। इसलिए उपनिषदों में कहा गया है कि वह परम-तत्व (आत्मा) किसी भी साधन-प्रवचन, श्रवण, निदिध्यासन, बुद्धि-द्वारा अप्राप्य है। वह अपनी ही प्रेरणा से, अपनी ही शक्ति से प्रकट होता है। यहीं भगवद्कृपा है।

 

अब, यद्यपि 'मैं' आत्मा सहज बोध गम्य है, सांसारिक मनुष्य में उसकी उद्भावना सरल नहीं है। सांसारिक मनुष्य 'इदम् गम्य' प्रपंच या विषय जगत् का जीव है, जबकि 'मैं' आत्मा का क्षेत्र 'अहंगम्य' है, स्वयं-प्रकाश्य है। प्रपंच क्षेत्र सदैव माना जाता है, जाना नहीं, जबकि 'मैं' सदैव जाना जाता है, माना नहीं। प्रपंच विकल्प रूपेण प्रस्तुत होता है, वह चित्त या मनोवृष्तिमूलक संकल्प में कारण भूत है, इसलिए उसमें संदेह या धोखा है, जो वस्तुतः सभी प्रकार के अध्यासों के मूल में हैं। दूसरी ओर, 'मैं' आत्मा का अहं प्रकाश्य क्षेत्र प्रपंच शून्य है, वह कभी विकल्प-रूपेण प्रस्तुत नहीं होता, उसकी प्रकाशता अबाधित शाश्वत होती है। अतः मात्र आत्मा ही त्रिकालाबाधित सत् है। पुनः, चूँकि 'प्रपंच शून्यता' का अर्थ ही 'चित्त- वृत्ति निरोधता' है, सांसारिक मनुष्य द्वारा आत्मा या आत्म- क्षेत्र तक पहुँचने की पहली शर्त ही है चित्त-वृत्ति-निरोध अर्थात्, मनः संकल्पों की रोकथाम।

 

परंतु, चित्त-वृत्तियों या मनः संकल्पों का निरोध कैसे संभव है? शिक्षा द्वारा। और शिक्षा कैसे संभव है? गुरु द्वारा। मानव शिशु-काल से ही शिक्षा आवश्यक है, क्योंकि देह-भाव, जीव-भाव जन्म से ही भासमान रहते हैं। प्रपंच में पड़ने के साथ ही तद्रूप में उसकी पहचान कर लेनी होगी, ठीक वैसे ही जैसे जलाशय में पड़ने के साथ ही तैरना, जान लेना होगा अन्यथा डूबना ही होगा। इस दृष्टि से जैसा कि महर्षि मुक्त कहते हैं, शिक्षा चरित्र- निर्माण का उपक्रम है। फिर, चरित्र निर्माण के लिए अनुशासन आवश्यक है और अनुशासन के संयम-इंद्रिय-संयम के रूप में देह-भाव के क्षेत्र में संयम और संकल्प-संयम के रूप में जीव-भाव के क्षेत्र में संयमा इंद्रिय-संयम भोग-वृत्ति का संयम और संकल्प-संयम (नैतिकता या व्यवहार शलता) के गुणों वाली शिक्षा कभी प्रमुखतः धनार्जन के लिए नहीं होगी, जैसा कि पाश्चात्य प्रभाव में आज उसका स्वरूप है, वरन् वह होगी आत्-बोध के लिए। आत्म-बोध ब्रह्मानुभव की भूमिका है। ब्रह्मानुभव के लक्ष्य की हष्टि से ही पारंपरिक भारतीय शिक्षा में बह्मचर्य का विधान है। किंतु, पुनः, चूँकि आत्मा और ब्रह्म, आत्म-बोध और ब्रह्मानुभव परस्पर भिन्न नही हैं, बह्य (आत्मा) ही साध्य है और साधन भी।

 

चित्त-वृतियों या मन के निरोध के उपाय को ठीक से समझने के लिए यह जानना चाहिए कि भाव मात्र ही मनोमय हैं। मन में ही सारा प्रपंच है, सभी भावों की उत्पत्ति और गति है। इस सर्वदा चंचल और सर्वथा मायावी मन के निरोध हेतु गीता में अभ्यास और वैराग्य का मार्ग सुझाया गया है। 'अभ्यास' का अर्थ है -मन हो रहने, चित्त-वृत्तियों में निर्लिप्तता का अभ्यासा चैतसिक विषयों को आत्म-भाव का प्रक्षेप मानकर उनका उपराम आत्मा में ही कर देना। -मन हो रहने से कर्म भी भाव-शून्य हो जाता है और इस तरह देह-भाव और जीव-भाव दोनों ही आत्म देश में लीन हो जाते हैं। 'वैराग्य' का अर्थ है, ब्रह्म के सत्-चित्-आनंद स्वरूप से अलग सभी अस्ति-भावों का त्याग फलतः ब्रह्म (आत्मा) ही तत्त्वतः दृष्टव्य, श्रोतव्य, ज्ञातव्य, मंतव्य, जिज्ञासतव्य रह जाता है। पुनः, यह भी जानना चाहि कि यद्यपि अभ्यास और वैराग्य की चर्चा यहाँ साधन के रूप में की गई है. साध्य 'आत्मा' तक पहुँचकर वे भाव-स्वरूपेण नहीं ग्राह्य हो पाते। चूँकि 'मैं' आत्मा स्वरूपेण साध्य है, किसी साधन द्वारा नहीं, आत्मा तक पहुँचक अभ्यास और वैराग्य उसी साध्य में विलीन हो जाते हैं, ठीक वैसे ही जैन देह-भाव, जीव-भाव और ब्रह्म-भाव उनके आधार भाव 'मैं' आत्मा में विली होते हैं। आत्म भाववत्ता भूमा है, पूर्ण है, जबकि अन्य भावरूप अल्प है अपूर्ण हैं।

 

अब, यह देखना चाहिए कि यदि आत्मवत्ता ही आधारभूत आदि मानव स्वरूप है, तो इसे धारण करना ही उसके लिए परम श्रेयस्कर है, उसक परम 'धर्म' है। पुनः, चूँकि आधारभूत मानव-स्वरूप सर्वत्र और सर्वकाल एक है, मनुष्य की धर्म-धारणा भी सदैव एकरूप ही होनी चाहिए। पृथक-पृथक धर्मों की धारणा मात्र मान्यताएँ हैं, स्वरूप विक्षेप हैं, ' नहीं। मनोमय होने से वे राग-द्वेष मूलक भी होंगे। इसलिए ब्रह्मानुसंधान जो धर्म का मूल साध्य है, वे बाधक होंगे, प्रकाश के बदले अंधकार वाहिकायें। इतिहास में धर्मों के बीच संघर्ष के मूल में यही बात है। इसलिए वे कभी विश्व-धर्म की पात्रता नहीं रखते। विश्व-धर्म का आधार केवल सहज मानव स्वरुपवता या आत्मवत्ता है। इस दृष्टि से 'विश्व-धर्म' केवल मानव धर्म' के रूप में संभव है।

 

 जैसा कि महर्षि मुक्त कहते हैं, मानव स्वरूपवत्ता का प्रथम प्रकाश्य तत्व है- आनंद   मनुष्य सहित सारा चेतन जगत् आनंद की खोज में निकली एक विराट जीवन-यात्रा है। मनुष्य आनंद के लिए ही सारी चेष्टाएँ करता है। ज्ञान, मंतव्य, जिज्ञासा सभी आनंद को लक्षित करते हैं। इंद्रिय, मन या बुद्धि के द्वारा बाह्य आनंद अल्प है, वह सुख (सु-) है, साधन-जन्य है और इसलिए अनिवार्यतः दुःख द्वारा परिसीमित है। इसलिए 'भूमा' ही वास्तविक आनंद का आश्रय है। वहीं इसीलिए ईश्वर है, सार्वभौम विश्व- धर्म है, भगवद् धर्म है। ब्रह्म को सत्-चित्, आनंद स्वरूप कहने का परिभाषिक अर्थ ही है-संदेह के अभाव में वह सत् है, अज्ञान के अभाव में वह चित् है, विरोध (वैराग्य) के अभाव में वह आनंद है, दूसरी ओर, अन्य भाव-क्षेत्र, 'मैं' आत्मा पर विवर्त का स्वरूप होने से संदेह, अज्ञान और विरोध से भरपूर है, इसलिए वहाँ सत्-चित्-आनंद की खोज सदैव एक मृगतृष्णा साबित होती है।

 

ऊपर मैंने महर्षि मुक्त के  उद्गारों की कुछ मुख्य बातों को एक क्रम में रख कर समझाने का प्रयास किया है। निःसंदेह यह अत्यंत संक्षिप्त और नितांत अपर्याप्त है। उनके सारगर्भित वक्तव्यों की सही ग्राह्यता तो उन्हीं की लय में चलते हुए उनके विचारों का ग्रहण है। जो धैर्यपूर्वक ऐसा करेंगे वे निश्चय ही उनकी वैचारिक गहराई और साधनागत आध्यात्मिक लब्धियों में भागीदार बन सकेंगे।

 

इति !

 

(डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पाण्डेय)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

1.नाहं प्रकाश: सर्वस्... 14

2.चंचलं हि मनः.. 26

3.तस्मात्सर्वेषु कालेषु. 41

4.इदं शरीरं कौन्तेय. 49

5.ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं... 57

6. मन्मना भव मद्भक्तो.... 69

7.अव्यक्त-व्यक्त विवाद. 76

8. मैं 'मैं' का विवाद. 78

9.विवर्त-विवर्तक.. 79

10. आकाश समीक्षा.. 80

11. मन वश में होता है. 82

12. निर्जीव जगत् का अभिशाप. 83

13. शिक्षा मानवता का स्रोत है. 86

14. समाज का आदर्श बनो.. 87

15. सन्तों की अनोखी दृष्टि... 88

।। श्री अच्युताष्टकम् ।। 90

16. सन्तों की अनोखी दुनियाँ.. 91

17. सन्तों की अनोखी अनुभूति.. 92

18. अध्यात्म और विज्ञान. 94

19. विश्व धर्म. 95

20. जगत् का स्वरूप. 101

21. पेंसिल की लकीर. 102

22. श्रीमद्भागवतगीतासार. 103

23. वेदान्त क्या करता है?. 105

24. विद्या कल्पलता है. 106

25. सत् चित् आनन्द... 107

26. कर्त्ता-कर्म-क्रिया.. 108

27. मन (चित्त) 110

28. लुधियाना स्मृति.. 118

विविध. 131

|| माया पंचकम् . 134

मुक्ताष्टक.. 135

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्री गणेशायनमः ।।

श्री गुरुवे नमः

 

 

नारायणोपनिषद्

 

अथ पुरुषो वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति। नारायणात् प्राणो जायते मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्यधारिणी। नारायणाद् ब्रह्मा जायते। नारायणाद् रुद्रो जायते। नारायणाद् इन्द्रो जायते। नारायणात् प्रजापतिः प्रजायते।

 

नारायणाद् द्वादशादित्याः सर्वे रुद्राः सर्वे वसवः सर्वाणि भूतानि सर्वाणि छन्दांसि नारायणादेव समुत्पद्यन्ते। नारायणात् प्रवर्तन्ते। नारायणे प्रलीयन्ते।

 

अथ नित्यो नारायणः। ब्रह्मा नारायणः। शिवश्च नारायणः। शक्रश्च नारायणः। कालश्च नारायणः। दिशश्च नारायणः। विदिशश्च नारायणः। ऊर्ध्वं नारायणः। अधश्च नारायणः। अन्तर्बहिश्च नारायणः।

 

नारायण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं निष्कलंको निरञ्जनो निर्विकल्पो निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो द्वितीयोऽस्ति कश्चित्। एवं वेद विष्णुरेव भवति विष्णुरेव भवति।

 

शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः!!!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

1.नाहं प्रकाश: सर्वस्

 

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः

मूठ्ठोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ।।

(गीता 7/25

 

शब्दार्थ - भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि योगमाया से ढका हुआ में सबको प्रकाशित नहीं होता। अजन्मा अविनाशी मुझ आटमा को मूढ़ पुरुष नहीं जान पाते।

 

भावार्थ - अज्ञान से आच्छादित समस्त विश्व का 'मैं' सबको प्रकट नहीं हूँ, इसलिए जन्म-मरण रहित, सर्व के सर्व मुझ भगवान को अज्ञानी मनुष्य अनुभव नहीं कर सकते।

 

लक्ष्यार्थ- 'साक्षाद्परोक्षाद् ब्रह्म' इस श्रुति के कथनानुसार भगवान कहते हैं कि सम्पूर्ण चराचर के लिए 'मैं' अपरोक्ष हूँ अर्थात् किसी से छुपा नहीं हूँ, बल्कि प्रकट हूँ, परन्तु योगमाया का ढक्कन लगा हुआ है, इसलिए सब देख नहीं पाते। योगमाया कहते हैं नीचे ऊपर के ढक्कन को। जिस प्रकार

 

'मैं अरु मोरि तोरि तँ माया।' मैं-मेरा, तँ-तेरा ये दोनों नीचे ऊपर के ढक्कन हुए और 'मैं' आत्मा चेतन के संयोग हो जाने से नाम हो गया योगमाया। यानी मैं शरीर, मेरा शरीरा तैं शरीर, तेरा शरीरा यह कितना सुन्दर ढक्कन है! इसी के अन्दर 'मैं' आत्मा नाम से प्रसिद्ध भगवान बन्द है और संसारी जीव भगवान के लिए अनादि काल से भटक रहा है। कहावट भी है-बगल में लड़का, शहर में ढिंढोरा।

 

आप भुलान्यो आप में बंध्यो आप ही आप

जाको ढूँढत फिरत है सो तू आपहि आप

 

इसी प्रकार जीव अपने आपको साढ़े तीन हाथ का शरीर मानकर अविद्या की घोर निद्रा में सो रहा है। तभी तो गीताकार कहते हैं कि-

 

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप

अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि

 

अर्थात् श्रद्धा, विश्वास से रहित पुरुष सर्व के सर्व 'मैं' आत्मा को प्राप्त करके बार-बार जन्म-मरण के चक्र में पड़ता है और प्राप्त कौन करता है-

 

श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः

 

ज्ञान, साधन-चतुष्टय के अन्तर्गत सबसे मुख्य साधन 'श्रद्धा' है। श्री मानसकार भी कहते हैं कि -

 

भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ

याभ्यां विना पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम् ।।

(रामायण बाल.)

 

व्यवहारिक जगत् में भी श्रद्धा बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता तब भगवान का मिलना तो असम्भव ही है। इसलिए हृदय में श्रद्धा जाने से बाकी सब साधन अपने आप ही जाते हैं। श्रद्धा का वास्तविक अर्थ होता है गुरु और वेदान्त वाक्य पर अटूट विश्वास। पहला विश्वास तो गुरु (आचार्य) पर होना चाहिए और दूसरा श्रुति-स्मृति, सशास्त्र वेदान्त पर।

 

अब प्रश्न होता है कि गुरु के क्या लक्षण होते हैं? यूँ तो आजकल गुरुओं का बाजार लगा हुआ है। सभी गुरु अपने आपको ज्ञानी तथा सिद्ध होने का विज्ञापन करते हैं। इसके अतिरिक्त गुरु का पहिचानना भी कोई सरल नहीं है, अपितु कठिन है।

 

विधि हरिहर कवि कोविद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी ।।

सो मो सन कहि जात कैसे साठा वणिक मणि गुण ठगन जैसे

(रामायण बाल.)

 

जिन गुरुओं द्वारा आत्म कल्याण होता है उन गुरुओं का लाभ भगवान की कृपा से ही होता है। भगवान और गुरु का अन्योन्याश्रय संबंध है। भगवान की कृपा से गुरु और गुरु की कृपा से भगवान मिलते हैं और सत्य भी है, एक पहलू के दो नाम गुरु कहो अथवा भगवान। अब प्रश्न होता है कि भगवान की कृपा कब होती है और कैसे जाना जाय कि इसी गुरु के द्वारा मेरा आत्म कल्याण होगा? इसका समाधान यह है कि जिस समय हृदय में आत्म कल्याण के लिए मछली के समान तड़प पैदा हो जाय, यही भगवान की कृपा का स्वरूप है, जिसे कि वेदान्त शास्त्र में 'ब्रह्म जिज्ञासा' कहते हैं।

 

'अथातो ब्रहाजिज्ञासा '

(ब्रह्म सूत्र 2/1)

 

सूत्रकार भगवान व्यास कहते हैं कि कुछ भी करना-धरना जब शेष नहीं रह जाता तब अन्त में आत्म कल्याण के लिए हृदय में ब्रह्म जिज्ञासा पैदा होती है। उस समय कोई कोई महान पुरुष प्राप्त हो जाता है और उसके वर्शन से अपने आप स्वभावतः चित्त का खिंचाव होता है, उसके पास बैठने पर चित्त कल्पनारहित हो जाता है एवं विलक्षण आनन्द का अनुभव होने लगता है। तब समझना चाहिए कि यही वास्तविक गुरु है और इसी के प्रसाद से मेरा आत्म कल्याण निःसंदेह होगा। परन्तु मन का खिंचाव तथा चित्त की निर्विकल्पता का अनुभव सात्विक हृदय को ही होगा, राजसी तामसी को नहीं। ऐसे गुरु के प्रति नारायण भाव होना अत्यावश्यक है, नर भाव नहीं।

 

यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ

तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः प्रकाशन्ते महात्मनः ।।

(श्वेताश्व 6/23 )

 

अर्थात् जो पराभक्ति देव भगवान में होता है वही भाव आचार्य गुरु में भी हो तब उस महापुरुष का कथन किया हुआ आत्मा का उपदेश भली-भाँति आत्म जिज्ञासु के समझ में आता है, तभी आत्म कल्याण होता है। क्योंकि नर (जीव) से कल्याण नहीं होता, नारायाण द्वारा ही कल्याण होता है। जबकि जीव स्वयं अस्तित्वहीन है तब दूसरे का कल्याण क्या कर सकता है। भगवान गीताकार कहते हैं कि-

 

मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः

(गीता 7/3 )

 

अर्थात् हजारों मनुष्यों में कोई आत्म कल्याण के लिए यत्न करता है और यत्न करने वालों में भी कोई तत्व से मुझको जानता है। इस श्लोक में सहस्त्रेषु शब्द आया है जिसका अर्थ हजारों यानी अनन्त होता है। सिद्धये का अर्थ होता है ज्ञान प्राप्ति के लिए और तत्त्वतः का अर्थ होता है 'मैं' से। भाव यह है कि अनन्त मनुष्यों में कोई 'मैं ब्रह्म हूँ' इस ज्ञान सिद्धि के लिए यत्न यानी साधन करता है और साधनजन्य ज्ञान सिद्धों में भी कोई ही तत्त्वतः अर्थात् 'मैं हूँ' इस प्रकार से जानता है कहने का मतलब यह है कि 'अहं ब्रह्मास्मि' मैं ब्रह्म हूँ, यह ज्ञान साधनजन्य है। शास्त्र में इसको ब्रह्मानुसंधान (ब्रह्म की खोज) कहते हैं। मैं ब्रह्म हूँ, ऐसा जानना भगवान को जानना नहीं कहा जा सकता। 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म  हूँ इस साधनजन्य ज्ञान से अज्ञान का नाश होता है। इसी को ज्ञान दीपक कहते हैं। यथा -

 

सोहमस्मि इति वृति अखंडा। दीप शिखा सोई परम प्रचंडा ।।

(रामायण ..)

 

क्योंकि, यह भी सतोगुण जन्य अध्यास है। 'मैं देह हूँ' यह देहाध्यास तमोगुण जन्य है। 'मैं जीव हूँ" यह जीवाध्यास रजोगुण जन्य है। 'मैं ब्रहा हूँ" यह ब्रह्माध्यास, सतोगुण जन्य है। इसलिए वस्तुतः भगवान को जानना यह है कि जिस 'मैं' देश में त्रिगुणात्मकजन्य तीनों भाव अथवा अध्यास इत्यादि सभी का अभाव है वह 'मैं' भगवान है। 'मैं देह हूँ' इस अध्यास का नाम कर्म जगत् है। 'मैं जीव हूँ' इस अध्यास का नाम उपासना जगत् है। 'में ब्रह्म हूँ इस अध्यास का नाम ज्ञान जगत् है।

 

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रगुण्यो भवार्जुन

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आटमवान् ।।

(गीता 2/45 )

 

अर्जुन तुम अर्थात् 'मैं' तीनों गुणों से परे निर्द्वन्द्व, नित्य, सत्वस्थ निर्योग एवं आत्मवान हो। क्योंकि, तीनों अध्यास 'मैं' के बिना कभी भी सिद्ध नहीं हो सकते। 'मैं' सबको सिद्ध करता है, 'मैं' को कोई भी सिद्ध नहीं कर सकता। श्रुति कहती है कि 'दृष्टेद्रष्टारं पश्येत्' अर्थात् दृष्टि के द्रष्टा को दृष्टि नहीं देख सकती।

 

येन सर्वं विजानीयात् तत्केन विजानीयात् ।।

(वृहद, उप.)

 

भाव यह है कि जो सर्व का ज्ञाता है, उसका जालने वाला दूसरा कोई नहीं। इसलिए भगवान कहते हैं कि- 'कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ' अर्थात् अनेकों ज्ञानियों में से कोई ही तत्व से जानता है। तत्व से जानने का मतलब यह है कि मैं को कुछ भी मानकर मैं को 'मैं' ही जानना, यही तत्व से भगवान को जानना है। मानने और जानने दोनों के भाव भिन्न-भिन्न होते हैं। जो मानता है, उसको मन कहते हैं और जो जानता है उसको 'मैं' (आत्मा) कहते हैं। मानना मन का धर्म है, जानना आत्मा का धर्म है। जहाँ तक कुछ भी माना जाय वहाँ तक मन है। यानी मैं बहा हूँ यहाँ तक मन है, परन्तु जो बहा को भी जानता है, उसका नाम 'मैं' है और वही में 'मैं' हूँ। इस प्रकार के जानने को ही तत्व से जानना कहते हैं। इसी का नाम सहजपद, कैवल्यपद, सहजावस्था, सहजानन्द, सहज सनेह तथा भगवान की भरित है।

 

राम भगति चिंतामणि सुंदर बसै गरुड़ जाके उर अंतर

परम प्रकाश रूप दिन राती नहिं कछु चहिय दिया घृत बाती

पावन पर्वत वेव पुराना राम कथा रुचिराकर नाना

मरमी सज्जन सुमति कुवारी ज्ञान विराग नयन उरगारी

भाव सहित जो खोजै प्रानी पावै भगति मणि सब सुख खानी

सो स्वतंत्र अवलम्ब आना तेहि आधीन ज्ञान विज्ञाना ।।

 

परन्तु -

 

भगति स्वतंत्र सकल सुख खानी बिन सत्संग पावहिं प्रानी

भगति तात अनुपम सुख मूला मिलहि जो संत होहिं अनुकूला ||

संत विशुद्ध मिलहिं परतेहीं चितवहिं राम कृपा कर जेही

 बिमल ज्ञान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई

(रामायण 3.)

 

फिर भी विचार वाटिका में परिभ्रमण कीजिए।

 

जे ज्ञान मान बिमत तव भव हरिणि भगति आवरी

ते पाइ सुर दुर्लभ पदावपि पतत हम देखत हरी ।।

(रामायण .)

भाव यह है कि- हे प्रभो! जो ज्ञान के मान में उन्मत्त होकर तुम्हारी भव हरणि भक्ति का आदर नहीं करते, उनको दुर्लभ ज्ञान पद यानी अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ इस पद को प्राप्त करके भी इस पद से गिरते हम देखते हैं। क्योंकि अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ यह वृत्ति ज्ञान है और जहाँ पर इस अध्यसित ब्रह्म भाव का भी अभाव हो जाय 'मैं' ही रह जाय, सोई भगवान की भव हरणि भक्ति है अथवा कृतकृत्य पद है, परन्तु यह पद साधन जन्य नहीं, बल्कि कृपा जन्य है।

 

 

दुर्लभो विषयात्याको दुर्लभं तत्त्व दर्शनम्

दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां बिना ।।

(महोप, 4/77)

 

अर्थात् तब तक विषयों का त्याग तुर्लभ, तत्व का दर्शन, सहजावस्था इस भाव में उन्मत्तता एवं प्रमाव होना सम्भव है। क्योंकि, मैं बहा हूँ, यह दुर्लभ है जब तक कि सद्गुरु की कृपा हो। मैं बहा हूँ (अहं ब्रह्मास्मि) साधन जन्य भाव है और साधन का फल सदैव अनित्य होता है, इसलिए इसमें अभिमान एवं प्रगाव होना स्वाभाविक है। क्योंकि, जिसका उत्थान है उसका पतन भी अवश्य है। जिस प्रकार जीव भाव में पतन था अर्थात् अपने आपको जीव मानकर कर्ता-भोक्ता, सुखी-दुःखी, नरकी-स्वी, ठगमनागमन इत्यादि मानता है, यही पतन का स्वरूप है और महान पुरुषों के सत्संग तथा सशास्त्र के विचार द्वारा उत्थान स्वरूप अहं ब्रह्मास्मि इस पद का बोध होता है कि मैं सत्, चित्, आनन्द, अखण्ड, अनन्त, अजन्मा, अजर, अमर, अद्वैत, सत्य, सनातन, व्यापक बहा हूँ। परन्तु यह भाव सत्संग एवं सशास्त्र अथवा सामवेदोक्त महावाक्य से तत्वमसि 'मैं' में लाया गया, किन्तु कालान्तर में कभी जा भी सकता है। परन्तु, जिस 'मैं' पर देह भाव, जीव भाव, ब्रह्म भाव इत्यादि सभी भाव आधारित है अथवा यूँ कहो कि जिस देश में समस्त भावों का अभाव है, वही अनिर्वचनीय पद, वास्तविक तत्व, सर्व का सर्व 'मैं' हूँ। यथा -

 

विशेष दर्शनि आटम भाव भावना विनिवृत्तिः

(योग दर्शन सू, कैवल्यपाद)

 

महर्षि पतंजलि कहते हैं कि स्वरूप का पूर्ण बोध हो जाने पर आत्मभाव की भावना की निवृत्ति हो जाती है। इस प्रकार जो जानना है यही तत्व से भगवान को जानना है। यह पद इतना सरल है कि इसकी सरलता ही कठिनाई है। यहाँ पर कुछ श्रुतियाँ आयी हैं, इनको भी सुनो - -

 

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो मेधया बहुना श्रुतेन

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्

 

भाव यह है कि आत्मा प्रवचन द्वारा, बुद्धि द्वारा, श्रवण द्वारा प्राप्त नहीं जिज्ञासु का हृदय जब आत्म दर्शन के लिए मछली के समान तड़पताहै अथवा व्याकुल होता है तब तत्काल ही भगवान आत्मा सर्व का 'मैं' अपना स्वरूप प्रगट कर देता है। और भी सुनो -

 

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो प्रमादात्तपसो वाप्यलिंगात्

एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आटमा विशते ब्रह्मधाम ।।

(मु. 3 / 2 / 4)

 

भाव यह है कि बलहीन पुरुष को आत्मानुभव कभी नहीं होता। बल शब्द से यहाँ जिज्ञासा बल समझना चाहिए। आटम जिज्ञासा को ही आत्म कृपा भी कहते हैं, क्योंकि किसी और ने बांधा हो तो कोई खोले जबकि अपने संकल्प से स्वयं ही बंधा है तब अपने आप ही छूट भी सकता है।

 

अर्थ अविद्यमान जानिय संसृति नहिं जाय गोसाईं

बिन बांधे निज हठ शठ परवश परयो कीर की नाईं

 

(विनयपत्रिका पद 20)

 

जीवं कल्पयते पूर्वं ततो भावान्पृथग् विधान्

(गौडपदीय का.)

 

अर्थात् साक्षात् परमात्मा ही अपने आप में सबसे प्रथम जीव भाव की कल्पना करता है कि मैं संसारी जीव हूँ, क्योंकि जीव की कल्पना का कोई आधार भी तो हो। तो विचार करने पर 'मैं' के अतिरिक्त दूसरा कौन होगा? बस, जीव भाव आते ही सारा प्रपंच भासने लग जाता है। जीव भाव के अभाव में जगत् का अभाव है और जीव भाव के भाव में अनन्त भावों का भाव है यदि महान शत्रु है तो जीव भाव।

 

सो माया बस भयऊ गोसाईं। बंध्यो कीर मरकट की नाई ।।

 

इसलिए अपने आप पर अपनी कृपा होना अत्यन्त आवश्यक है। गीताकार भगवान कृष्ण कहते हैं कि -

 

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।।

(गीता 6/5)

 

अर्थात् अपने आपका उद्धार अपने आप ही कर सकता है, दूसरा कोई नहीं। हाँ, आचार्य गुरुजन लोग आत्म तत्व का उपदेश करते हैं, चेतावनी देते रहते हैं कि तू भगवान आत्मा है। स्थूल, सूक्ष्म कारण तीनों शरीरों से परे, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी, सत्, चित्, आनन्द, परिपूर्ण, अजन्मा, अजर, अमर समस्त चराचर का 'मैं', परात्पर सर्व का सर्व, सर्व के लिए अपरोक्ष आत्मा है। तीनों काल, तीनों अवस्थाओं में एक रस रहने के कारण तू सत् है। तीनों काल, तीनों अवस्थाओं के प्रपंच को जानने के कारण तू चित् है और तीनों काल, तीनों अवस्थाओं में सर्व को प्रिय है इसलिए तू आनन्द है।

 

ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणः क्षीणैः क्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः

(श्वेता . उप. 1/11 )

 

अर्थात् जिस देव को जानकर अष्टपाश, पंचक्लेश से जीव छुटकारा पा जाता है, सो देव तू है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश ये पंच क्लेश हैं और घृणा, शंका, भय, लञ्जा, निंदा, कुल, शील तथा जाति जीव के ये अष्टपाश हैं। असत् को सत्, चेतन को जड़, दुःख को सुख यानी साढ़े तीन हाथ के शरीर को आत्मा मानना, यही अविद्या है। द्रष्टा और दृश्य के धर्मों को एक जानना, यही अस्मिता है। इष्ट पदार्थ और वह जिसके द्वारा प्राप्त हो, दोनों के प्रति जो आसक्ति है यही राग है और दोनों के प्रति जो घृणा है यही द्वेष है। अनादिकालीन परम्परा से जिस मृत्यु के प्रवाह से बड़े-बड़े विद्वान भी डरते हैं यही अभिनिवेश है। पंचक्लेश एवं अष्टपाश से वही छुटकारा पा सकता है, जिसने अपने आप भगवान आत्मा को पहिचाना है।

 

यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्त मानवाः

तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति

(श्वेताश्व. उप 6/20)

 

अर्थात् आकाश को मृगचर्म के समान यदि कोई लपेट लेवे तब भी आत्मदेव को जाने बिना दुःख का अन्त हो जायेगा, ऐसा असम्भव है। अविद्या के चक्कर में पड़कर स्वयं परमात्मा होते हुए भी अपने आपसे भगवान को भिन्न मानता है। जब तक आत्मा-परमात्मा का भेद है, तभी तक माया का स्तित्व है।

 

यदा परात्मात्मविभेदभेदकं विज्ञानमात्मन्यवभाति भास्वरम्

तदैव माया प्रविलीयतेऽञ्जया सकारका कारणमात्मसंसृतेः

(. रामायण रामगीता 18)

 

अर्थात् हृदयाकाश मंडल में प्रचंड सूर्य के समान विज्ञान का प्रकाश हो जाने पर आत्मा-परमात्मा का भेद मिट जाता है। तब तत्काल ही बंध्या पुत्र के समान अपने अधिष्ठान कारण सत्य सनातन ब्रा में हमेशा के लिए जीव आवागमन का कारण त्रिगुणात्मक विकारों के सहित माया लीन हो जाती है। यथा

 

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते

(गीता 7/14 )

 

गीताकार भगवान कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन। मुझ देव की यह त्रिगुणात्मिका माया दुरत्यया है अर्थात् इसका पार कोई नहीं पा सकता। हाँ, मुझको ही यानी 'मैं' आत्मा को ही जो जान लेते हैं वे इस माया को तर जाते हैं। मतलब यह है कि अधिष्ठान को बिना जाने अधिष्ठान में कल्पित वस्तु का बोध नहीं होता। अपने स्वरूप 'मैं' (आत्मा) में माया उसी प्रकार है जैसे रज्जू में सर्प, ढूँठ में पिशाच, सीपी में चांदी तथा मृगतृष्णा में जला

 

माया, मन, प्रकृति, जगत, चार नाम एक रूप

तब लग ये साँचौ लगें, नहिं जाना निजरूप

 

माया, मन, प्रकृति, जगत ये चारों पर्याय हैं और एक ही भाव के वाचक हैं।

 

रजत सीप महँ भास जिमि यथा भानु कर वारि

जदपि मृषा तिहूँ काल मंह भ्रम सकइ कोउ टारि ।।

एहि विधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई

 झूठउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें

जेहि जाने जग जाइ हेराई जागे यथा सपन भ्रम जाई ।।

( रामायण बाल. शंकरगीता-

 

इसलिए माया से पार होने के लिए अपने 'मैं' को भगवान जानकर अनुभव कर लेने पर ही माया से छुटकारा मिलता है, यानी संसार से तर जाता है। अपने 'मैं' को भगवान से भिन्न मानने पर ही जीव भाव है और जब तक जीव भाव है तभी तक संसार का बंधन अथवा गमनागमन का चक्कर है। यथा-श्रुति कहती है-

 

सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते तस्मिन् हंसो भ्राम्यते ब्रहाचके

पृथगात्मानं प्रेरितारं मटवा जुष्ट स्वतस्ते नामृतत्वमेति

(श्वे.3.1/8)

 

अर्थात सर्व के प्रेरक भगवान को अपने आपसे भिन्न मानकर अनादिकाल से हंस जीव ब्रह्म चक यानी संसार में भ्रमता रहता है और जब भगवान एवं  अपने आप 'मैं' को शरीर से भिन्न करके एकता का अनुभव करता है, टाब यह तत्काल ही समस्त बन्धनों से सुफ होकर अमृत पद (कैवल्यपद) यह तलको जाता है। तात्पर्य यह है कि जितनी उपाधि है माया के ढक्कन ? को सायकल उठाते ही केवल 'मैं' का 'मैं' ही रह जाता है। श्रुति के इस कथन से यही सिद्ध होता है कि जीव का आवागमन इत्यादि भगवान से अपने आप 'मैं' को अलग मानने में ही है। इसलिए -

 

आत्मा नित्योऽव्ययः शुद्ध एकः क्षेत्रज्ञ आश्रयः

अविक्रियः स्वहम् हेतुर्व्यापकोऽसंग्यनावृतः

एतैर्द्वादशभिर्विद्वानाटमनो लक्षणैः परैः

अहं ममेत्यसद्भावं देहादौमोहजं त्यजेत्

(श्रीमद्भागवत् 7/7 / 19, 20 )

 

अर्थात् विचारवान पुरुष को चाहिए कि अपने स्वरूप आत्मा के बारह लक्षणों को भली-भाँति जानकर देहादिकों में जो अज्ञान से उत्पन्न हुआ मैं, मेरापन है, इस भाव का त्याग कर मुक्त हो जाय। अपने आप 'मैं' के बारह लक्षण कौन से हैं? विचार कीजिए-मैं नित्य हूँ मैं अव्यय अर्थात् पूर्ण हूँ, मैं शुद्ध हूँ, मैं एक हूँ, मैं क्षेत्रज्ञ यानी देहादिक प्रपंच का ज्ञाता हूँ, मैं सर्व का आश्रय (आधार) रहित हूँ, 'मैं' अकर्त्ता हूँ, मैं अपने आप स्वयं द्रष्टा हूँ, मैं सर्व का कारण हूँ, मैं व्यापक हूँ, मैं असंग हूँ (निर्लेप हूँ) मैं आवरण (अज्ञान) रहित हूँ, इन्हीं बारह लक्षणों को अपने स्वरूप आत्मा ('मैं') में जानकर सुमेरु पर्वत के समान अचल हो जाना चाहिए। अब प्रश्न यह होता है कि अपने आप 'मैं' को किस प्रकार और कौन-सी युक्ति के द्वारा शरीर से अलग करना चाहिए। समाधान यह है कि यथा -

 

स्वर्णं यथा ग्रावसु हेमकारः क्षेत्रेषु योगैस्तदभिज्ञ आप्नुयात्

क्षेत्रेषु देहेषु तथाऽऽत्मयोगै रध्यात्मविद् ब्रह्मगतिं लभेत्

 

अर्थात् हेमकार यानी सोनार, सोने को गलाकर खोट भाग को त्यागकर स्वर्ण का खरा भाग ग्रहण कर लेता है। इसी प्रकार जहाँ तक मेरा कहा जाता है अथवा जिस पदार्थ के लिए मेरा शब्द का प्रयोग किया जाता है, वह सब खोट है और व्याज्य है। शेष जो 'मैं' रह जाता है, वहीं स्वर्ण के समान खरा अपना आप 'मैं' नाम से प्रसिद्ध भगवान आत्मा सर्व का सर्व है। क्योंकि 'मैं' में कोई धोखा नहीं, बाकी सब में धोखा है, इसलिए उपनिषद् की भाषा में श्रुति 'मैं' आत्मा को प्रत्ययसार कहती है। प्रत्यय-सार का अर्थ होता है विश्वासपात्र। व्यवहारिक जगत् में भी कोई व्यक्ति किसी अपने से उच्च पद पर आसीन महानुभाव के लिए जब कभी आवेदन-पत्र लिखता है, तो लिखता है कि 'आपका विश्वासपात्र (अमुक)' यह विचारणीय विषय है कि स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, चतुष्टय अन्तःकरण, प्राण, अपान, समान, ब्यान, उदान, पंच प्राण, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय पंच कोश, पंच कर्मेन्द्रिय, पंच ज्ञानेन्द्रिय इत्यादि क्या ये कभी विश्वासपात्र हो सकते हैं, जबकि ये सभी असत्, जड़, दुःख रूप, मिथ्या, उत्पत्ति विनाशशील एवं परिवर्तनस्वरूप हैं तो फिर विश्वासपात्र कौन हुआ, 'मैं' अथवा ये सब प्रपंच ? जबकि सारा प्रपंच असत् और मिथ्या है तब यह विश्वासपात्र कैसे हो सकता है। अब प्रश्न यह है कि ये शरीरादिक असत् और मिथ्या कैसे हैं अथवा असत् तथा मिथ्या का लक्षण क्या है? असत् कहते हैं जो तीन काल में हो और मिथ्या कहते हैं जो उत्पन्न होकर नाश हो जाय। शरीर बंध्यापुत्र के समान असत् है और पैदा होकर नाश हो जाता है, इसलिए मिथ्या है। यहाँ शंका होती है कि शरीर को या तो असत् कहो या मिथ्या कहो, दोनों बातें कैसे हो सकती हैं। समाधान यह है कि आत्म देश में शरीर असत् है यानी बंध्यापुत्रवत् है। जिस प्रकार बंध्यापुत्र अनुत्पत्ति रूप है उसी प्रकार प्रपंच अनुत्पत्ति रूप है, इसलिए असत् है और शरीर देश में शरीर उत्पन्न होकर नाश हो जाता है, इसलिए मिथ्या है। जिस प्रकार सूर्य देश में अंधकार नहीं, इसी प्रकार 'मैं' देश में ब्रह्मा से आदि तृण पर्यन्त समस्त प्रपंच नहीं। इसी पर श्री मानसकार जी कहते भी है कि -

 

रजत सीप महँ भास जिमि जथा भानुकर बारि

यदपि मृषा तिहुँ काल मंह भ्रम सकइ कोउ टारि

(रा.बा. दोहा 117)

 

यहाँ पर जगत् प्रपंच को मिथ्या कहा। फिर कहते हैं कि -

 

एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई ।।

(रा.बा. शंकर गीता)

 

यहाँ पर जगत को असत् कहा है इसलिए शरीर असत् भी है और मिथ्या भी है। अब प्रश्न होता है कि शरीर पैदा होने के प्रथम क्या था, भाव रूप था अथवा अभाव रूप था यानी सत् था या असत् था। यदि कहो कि उत्पन्न होने के पूर्व सत् था तो सत् की तो उत्पत्ति ही नहीं होती, क्योंकि उत्पत्ति मानने पर नाश भी मानना पड़ेगा और सत् कहते हैं जो त्रिकालाबाध्य हो, यानी उत्पत्ति विनाश से रहित हो। इसलिए सत् मानकर भी शरीर की उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती। अच्छा, यदि कहो कि शरीर उत्पत्ति के पूर्व असत् था तो असत् मानकर भी शरीर की उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती, क्योकि जो तीन काल में हो, बंध्यापुत्र के समान हो, उसे असत् कहते हैं। यानी जो है ही नहीं वह पैदा क्या होगा। अब यदि कहो कि शरीर पैदा होने के पूर्व सत्-असत् दोनों था, तब भी नहीं बनता, क्योंकि एक अवस्था में साधक-बाधक पदार्थ कदापि नहीं रह सकते। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी प्रकार से शरीरादिक प्रपंच की उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती। अब यदि कहो कि यह जगत् प्रपंच भगवान ने पैदा किया तो भी नहीं बनता, क्योंकि प्रश्न यह उठता है कि जिस भगवान ने प्रपंच पैदा किया वह भगवान जन्मा है अथवा अजन्मा है। यदि भगवान को जन्म वाला मानो तो भगवान नहीं, क्योंकि जन्म लेने वाला नाशवान होता है और अजन्मा मानो तो उससे किसी का जन्म सिद्ध नहीं होता। इसलिए किसी भी तरह से 'मैं' आत्मा के अतिरिक्त किसी का भी अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। इसलिए शरीर आत्म देश में असत् है और यदि मानते हो कि शरीर है, क्योकि यह प्रपंच भासमान है इसलिए मानना ही पड़ेगा कि शरीर है, तो यह कोई बात नहीं। होते हुए भी बहुत सी चीजें भासती हैं। उदाहरण के रूप में जिस प्रकार आकाश में नीलिमा यद्यपि आकाश में नीलिमा तीन काल में नहीं है, परन्तु प्रत्यक्ष भास रही है। हाँ! नीलिमा देश में नीलिमा है। उसी प्रकार नीलिमा के समान 'मैं' आत्म देश में शरीर नहीं है। शरीर देश में शरीर है। इसलिए 'मैं' के जानने पर शरीर असत् है और शरीर मानने पर शरीर मिथ्या है। क्योकि प्रपंच मानने की चीज है और 'मैं' आत्मा जानने की चीज है। तात्पर्य यह है कि किसी भी देश, काल, वस्तु को जानने के लिए चलोगे तो जानने वाले के सिवाय और कोई भी चीज मिलेगी। दूसरी बात यह है कि ढूँठ में पिशाच भासता है, रज्जु देश में अंधकार के कारण सर्प भासता है, मरुस्थल देश में जल असत् होते हुए भी समुद्र उमड़ता हुआ प्रतीत होता है। परन्तु, एक बात और है कि जो असत् होकर भासता है वह स्वदेश यानी अपने देश में भासता है, विचार करने पर आधार में नहीं भासता। मतलब यह है कि सर्प अपने ही देश में प्रतीत होता है, रज्जू देश में नहीं। इसलिए शरीरादिक प्रपंच असत् तथा मिथ्या होने के कारण विश्वासपात्र कभी नहीं हो सकते। यदि विश्वास करने योग्य कोई पदार्थ है तो 'मैं' आत्मा ही हूँ, शेष सब में धोखा है। जानने की चीज 'मैं' है, बाकी सब मानने की। अभाव को माना जाता है। भाव को जाना जाता है। माना हुआ पदार्थ अस्तित्वहीन होता है, जाना हुआ तो अस्तित्व ही है। जिस प्रकार प्रकाश से ही प्रकाश का ज्ञान होता है, प्रकाश के अतिरिक्त और किसी से भी नहीं, इसी प्रकार 'मैं' से ही 'मैं' का ज्ञान होता है, दूसरे से नहीं। इसलिए 'मैं' आत्मा ही विश्वासपात्र हूँ। और कहाँ तक कहा जाय, विश्व में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जो 'मैं' के बिना सिद्ध हो जाय। यहाँ तक कि परमात्मा भी 'मैं' से भिन्न हो जाने पर केवल कल्पना मात्र का ही विषय रह जाता है और वह भी अस्तित्वहीन हो जाता है, इसलिए 'मैं' ही विश्वासपात्र हूँ।

 

यदि कोई ईश्वर के संबंध में प्रश्न करता है कि क्या ईश्वर है अथवा ईश्वर के अस्तित्व में क्या प्रमाण है? तो ईश्वर को सिद्ध करने के लिए ईश्वर ही प्रमाण होगा, अन्य नहीं, उसी प्रकार जैसे प्रकाश को प्रकाश ही सिद्ध कर सरकता है अन्य नहीं। पुनः ईश्वर अहंगम्य है, इदम्गम्य नहीं। यदि ईश्वर को इदम् यानी 'यह ईश्वर है' इस भाव से माना जायेगा तो अनित्य एवं नाशवान होगा, क्योकि सारा प्रपंच इदम्गम्य होने के कारण असत्, जड़, दुःखरूप अथवा परिवर्तनशील है। इसलिए ईश्वर इदम् गम्य होकर अहंगम्य है अर्थात् 'मैं' ही हूँ जिसका नाम ईश्वर, परमात्मा, भगवान अथवा कुछ भी कहो 'मैं' के ही पर्याय हैं। मैं को मैं ही देखता हूँ। मैं को मैं ही जानता हूँ। मैं का अनुभव मैं ही करता हूँ। मैं को माने या माने, जाने या जाने, देखें या देखें, अनुभव करें या करें। हर हालत में, हर काल में, हर अवस्था में, 'मैं' के सिवाय विश्वासपात्र दूसरा कौन हो सकता है।

 

अहं शब्देन विख्यात एक एव स्थितः परः

स्थूलस्त्वनेकतां प्राप्तः कथं स्याद्देहकः पुमान्

 

(शंकराचार्य अपरोक्षानुभूति 31)

 

अर्थात् जो 'मैं' शब्द करके विख्यात यानी प्रसिद्ध है और एक ही रूप से सर्व में स्थित है वह स्थूल अनेक रूप वाला शरीर कैसे हो सकता है। तभी तो श्री मानसकार जी कहते हैं कि -

 

ज्ञान अखण्ड एक सीतावर माया वस्य जीव सचराचर

(रामायण .)

 

अर्थात् जिसका ज्ञान अखण्ड है और एक है, वही सीतावर है। कितना विलक्षण भाव है। अर्थात् जो जागत के प्रपंच को जानता है वही स्वप्न को जानता है, जो जाग्रत और स्वप्न को जानता है वही सुषुप्ति के आनन्द का अनुभव करता है। जो तीनों अवस्थाओं को जानता है, वही तीनों काल को जानता है। कौन सा देश, कौन सा काल, कौन सी वस्तु है कि जिसको में आत्मा सर्वस्थान से सर्व को जानूँ। इसलिए मैं ही विश्वास पात्र सर्व का सर्व साक्षात् भगवान आत्मा हूँ। इसीलिए भगवान कृष्ण कहते हैं कि - -

 

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः

मूढ़ोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ।।

(.गो.. 7 श्लोक 25)

पूर्णमदः शान्तिः !!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

2.चंचलं हि मनः

अर्जुन उवाच-

चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।।

 

श्री भगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निवग्रहं चलम्

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण गृह्यते ।।

(गीता 6/34/35)

 

अर्जुन का प्रश्न है कि भगवन्! आपने जो योग का उपदेश किया तथा आत्म चिंतन बतलाया सो ठीक है, परन्तु यह मन इतना चंचल, उन्मत्त एवं बलवान और वायु से भी अधिक वेग वाला है कि ऐसे मन का निरोध करना अत्यंत दुष्कर है अर्थात् असंभव-सा है। इस प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं कि- 'तुम्हारा कहना यथार्थ है। यह मन निःसंदेह दुर्निग्रह है यानी इसका निरोध कष्टसाध्य है, परन्तु अभ्यास और वैराग्य से इसका निरोध हो जाता है।' भगवान के इस कथन पर विचार कीजिए।

 

व्याख्या - वास्तव में मन तक ही तो सारा आडम्बर है।

यथा-

देहो जीवात्मा नेन्द्रियाणि परंतप

 मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयोः ।।

(विवेक चूडामणि)

 

अर्थात् बंध मोक्ष का कारण देह है, इन्द्रियाँ और जीवात्मा है बल्कि सर्व का कारण मन ही है। इसी पर श्री मानसकार भी कहते हैं कि -

 

योग वियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा

जनम मरण जहं लगि जग जालू। संपति विपति करम अरु कालू

धरणि धाम धन पुर परिवारू सरग नरक जहं लगि व्यवहारू ।।

देखिय सुनिय गुनिय मन मांही मोह मूल परमारथ नाहीं ।।

 

(रामायण अयोध्या.)

 

नह्यस्ति विद्या मनसोतिरिक्ता मनोह्यविद्या भववंध हेतुः

तस्मिन् विनष्टे सकलं विनष्टं विजृम्भितेऽस्मिन् सकलं विजृम्भिते

(महोप. उपनिषद)

 

अर्थात् अविद्या, अज्ञान अथवा सुख-दुःखादि का कारण मन के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं। मन के उदय होने पर प्रपंच का उदय है और अस्त होने पर प्रपंच का अस्त है। जीव-ईश्वर का भेद डालने वाला भी तो मन ही है। गाढ़ी नींद, मूर्छा एवं समाधि अवस्था में मन के अभाव में, सर्व का अभाव हो जाता है। दूसरे शब्दों में यूँ कहो कि मन का ही नाम माया है। समष्टि-व्यष्टि भेद से मन अथवा माया दो नाम हो जाते हैं। समष्टि का अर्थ होता है व्यापक और व्यष्टि का अर्थ होता है एकदेशी, यानी देह व्यष्टि जगत् है और समस्त प्रपंच समष्टि जगत् है। जिस प्रकार सागर की एक तरंग और अनेक तरंग, इसी तरह चैतन्याकाश महासागर में एक विकल्प और अनेक विकल्प। विकल्प का पर्याय कल्पना होता है। विकल्प का स्वरूप महर्षि पतंजलि ने स्पष्ट बतलाया है। महर्षि जी सूत्र लिखते हैं -

 

शब्दज्ञानानुपाती वस्तु शून्यो विकल्पः

(योगदर्शन)

 

अर्थात् शब्द का तो ज्ञान हो, परन्तु वस्तु का अभाव हो। यानी केवल शब्द ही सुनने भर में आवे, किन्तु ढूँढ़ने पर जिसका अस्तित्व किसी भी काल में मिले, उसे कहते हैं विकल्प। मतलब यह कि अस्तित्वहीन वस्तु को ही विकल्प कहते हैं। इसी प्रकार मन, माया अथवा संसार ये श्रोतव्य हैं, प्राप्य नहीं हैं। यानी श्रवण के विषय हैं, प्राप्ति के नहीं। तात्पर्य यह है कि शरीर रूपी व्यष्टि दृष्टि से एक विकल्प का नाम मन है और समस्त प्रपंच रूपी समष्टि जगत् के अन्दर जो अनन्त विकल्प हैं, उन समस्त विकल्पों के समूह का नाम माया है। मतलब यह है कि जो कुछ कहना- सुनना, करना-धरना है वह सब मन के ही अंदर है और मन ही तक है। इसलिए मन की महिमा का कहाँ तक वर्णन किया जाये। आइए, भगवान श्री गीताकार के अभ्यास और वैराग्य पर विचार करें, क्योकि योगेश्वर भगवान