मन : रहस्य और निग्रह

 

MIND-ITS MYSTERIES AND CONTROL

 

का हिन्दी अनुवाद

 

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

SERVE LOVE MEDITATE REALIZE

THE DIVINE LIFE SOCIETY

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर- २४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dishq.org

चतुर्थ हिन्दी संस्करण : २००५ :

पंचम हिन्दी संस्करण २०१८

(,००० प्रतियां)

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

ISBN 81-7052-063-0 HS 97

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

PRICE : ₹ 205/-

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्मनाभानन्द

द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पो. शिवनन्दनगर- २४९ १९२, जिला टिहरी गढ़वाल,

उत्तराखण्ड' में मुद्रित

For online orders and Catalogue visit: disbooks.org

पत्र

 

जुलाई १९४६

प्रिय धीरेन्द्र

 

भयभीत हों। निःसन्देह मन अतीव दुर्दान्त है। बार-बार के प्रयास से आप इसे पूर्णतया वश में कर सकते हैं।

 

आप मन के स्वामी हैं। अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा अपने प्रभुत्व की दृढ़तापूर्वक घोषणा करें पूर्ण आत्मविजय से निष्पन्न होने वाले अधिकार, आनन्द तथा वैभव का अनुभव करें।

 

मन का निष्ठुरता से निरोध करें। वासनाओं का उन्मूलन करें। वासनाओं के समाप्त होते ही मन आपका दास बन जायेगा। निष्काम बनें और विजयी हों।

 

आप अपनी आदिम स्वतन्त्रता में विश्राम करें!

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रार्थना

 

हे दृग्गोचर! हे आराध्यदेव ! हे परम तत्त्व! आप अनन्त आकाश से ले कर मेरे पैरों मेरे के नीचे की घास की नन्हीं पत्ती तक इस विशाल ब्रह्माण्ड में व्याप्त तथा अन्तः प्रविष्ट हैं। आप इन समस्त नाम-रूपों के आधार हैं। आप मेरे नेत्रों के तारे, मेरे हृदय के प्राण, मेरे जीवन के जीवन, मेरी आत्मा की आत्मा, मेरी बुद्धि तथा इन्द्रियों के प्रकाशक, के मधुर अनाहत संगीत तथा मेरे स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीरों के सारतत्त्व हैं।

 

मैं आपको ही इस ब्रह्माण्ड का महान् शासक तथा अपने शरीर-त्रय का अन्तर्यामी मानता हूँ। हे प्रभो! मैं आपको बारम्बार साष्टांग प्रणाम करता हूँ। आप ही मेरे एकमात्र शरण हैं। हे करुणा और प्रेम के सागर! मैं आप पर ही विश्वास रखता हूँ। मेरा उद्धार करें, मुझे प्रबुद्ध करें, मेरा पथ-प्रदर्शन करें तथा मेरी रक्षा करें। मेरे आध्यात्मिक पथ के अवरोधों को दूर करें। हे जगद्गुरु! अज्ञानावरण को हटायें। अब मैं और अधिक, एक क्षण के लिए भी इस शरीर इस जीवन के क्लेशों को सहन नहीं कर सकता। मुझे शीघ्र दर्शन दें। हे प्रभो! मैं लालावित हो रहा हूँ। मैं द्रवित हो रहा हूँ। मेरी भक्तिमयी आन्तरिक प्रार्थना पर ध्यान दें, ध्यान दें। हे प्रभो ! निष्ठुर बनें। आप दीन बन्धु हैं। आप अधम-उद्धारक हैं। आप पतितपावन हैं।

 

शान्तिः शान्तिः शान्तिः

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक का वक्तव्य

यद्यपि परम पूज्य श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज की सभी पुस्तकें लोकप्रिय है; किन्तु 'Mind Its Mysteries and Control' नामक पुस्तक सर्वाधिक लोकप्रिय है। यही कारण है कि अंगरेजी में इसके अनेक संस्करण प्रकाशित होने पर भी इसकी माँग बराबर बनी हुई है। हमें खेद है कि हिन्दी जनता के हार्दिक अनुरोध के होते हुए भी बहुत दिनों से इसका हिन्दी-संस्करण प्रकाशित नहीं हो सका। यह सन्तोष का विषय है कि इसका नवीन संस्करण अपने नवीन रूप में सुधी जनता की सेवा में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका प्रथम संस्करण दो भागों में प्रकाशित हुआ था जिससे एक ही प्रकार का विषय कई स्थानों पर बिखर गया था। नवीन संस्करण में सभी सम्बद्ध विषयों को एक ही शीर्षक के अन्तर्गत लाने का प्रयास किया गया है। आशा है कि इससे यह संस्करण पूर्वापेक्षा अधिक उपयोगी सिद्ध होगा।

 

प्रस्तुत पुस्तक में अनेक आध्यात्मिक ग्रन्थों के प्रणेता, अध्यात्मविद्या-विशारद योगीराज श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी ने मन की रचना, उसकी कार्यविधि, उसकी अलौकिक शक्तियाँ तथा उनके समुचित प्रयोग द्वारा दिव्यानन्द की प्राप्ति का वर्णन बड़े विस्तृत, सुबोध और सरल ढंग से किया है। संक्षेप में यह पुस्तक मन की फिलासफी पर एक छोटा-सा विश्व ज्ञानकोश है जिसमें विद्वान् लेखक ने अपने गम्भीर अध्ययन और यौगिक आत्मानुभव के आधार पर मन के समस्त रहस्यों का उद्घाटन किया है। इस संसार में जितने भी उच्च कोटि के साधक तथा सन्त-महात्मा हुए हैं, उनका कहना है कि यह संसार मन का खेल है। मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण बनता है। यदि आप विश्व विजय प्राप्त करना चाहते हैं, तो सबसे पहले मन को विजित करें। मन की - विजय के उपरान्त संसार की किसी अन्य वस्तु के विजय की आवश्यकता नहीं रहती। मन का साम्राज्य ही सच्चा साम्राज्य है। जिसने श्रवण, मनन और निदिध्यासन के सतत अभ्यास से मन को वश में कर लिया है, जो धारणा, ध्यान और समाधि के दिव्यानन्द की सरिता में गोते लगा चुका है, उस महापुरुष के लिए राजाधिराजों का सिंहासन भी तुच्छ और निर्मूल्य है। सत्यं शिवं, सुन्दरम् के पुनीत ध्येय की ओर अग्रसर होने वाले जिज्ञासु साधक के लिए जहाँ यह पुस्तक परम उपयोगी है, वहाँ साधारण संसारी पुरुषों के लिए भी इस पुस्तक का कम महत्व नहीं है। साधारण गृहस्थ इस पुस्तक के श्रद्धापूर्वक अध्ययन और तदनुकूल आचरण से अपने दैनिक जीवन और सांसारिक व्यवहारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला सकते हैं। इस पुस्तक में अनेक नवीन विषयों का समावेश किया गया है जो साधना के लिए सर्वथा अनूठी वस्तु है।

पुस्तक के हिन्दी अनुवाद की भाषा अत्यन्त सरल, सुबोध, सरस और माधुर्य से भरी हुई है। कहीं-कहीं कविता की धारा स्वच्छन्द, मस्त सरिता की तरह बहती चली जाती है। पुस्तक के कई अंश इतने प्रभावशाली हैं कि पुस्तक पढ़ते ही हृदय-सागर में अनिर्वचनीय आनन्द की उत्ताल तरंगें उठने लगती हैं। पुस्तक की भाषा हृदयस्पर्शी है और उसमें इतनी ताकत मौजूद है कि वह दिलों को हिला सके, दिमागों में परिवर्तन कर सके।

 

आशा है, प्रेमी पाठक प्रस्तुत पुस्तक से लाभ उठायेंगे; इसी में हमारे प्रयास की मफलता है।

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

प्रस्तावना

 

हममें से प्रत्येक व्यक्ति सुख की खोज में संलग्न है; किन्तु इस आनन्द की प्राप्ति के लिए हमने जिस उपाय का अवलम्बन किया है, वह ठीक नहीं है। प्रस्तुत आनन्द प्राप्ति - की खोज के मार्ग में हम भटक गये हैं। हम जीवन भर तो सांसारिक कामों में अनुरक्त रहते हैं। बालपन से ले कर वृद्धावस्था तक यह मोह हमारे पीछे लगा ही रहता है। बचपन में माता की स्नेहमयी गोद, खेल-खिलौने, युवक होने पर ढेर-की-ढेर पुस्तकें और विश्वविद्यालय की उपाधियाँ, संसार में प्रवेश के समय पत्नी प्रेम और धन कमाने की अतृप्त लालसा, सन्तान की इच्छा अभिमान और झूठे गौरव के विचार आदि के मोह में हम लिप्त रहते हैं।

 

किन्तु इस संसार में पुत्र, दारा और प्राण से भी बढ़ कर एक वस्तु है जो आत्मा या पुरुष के रूप में आपके अन्तस्तल या हृदयदेश में छिपी हुई है। हम सांसारिक विषयों से मन को हटा कर, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर, ध्यान, तपस्या, समाधि और योग-साधना द्वारा ही अपने अन्दर छिपी हुई इस दिव्य शक्ति को प्राप्त कर सकते हैं।

 

मनुष्य अविद्या की तीन ग्रन्थियों अज्ञान, इच्छा और कर्म के कारण जन्म, मृत्यु और रोग की निरन्तर बहने वाली धारा में गिरता रहता है। बाह्य पदार्थों को देखने और इहलौकिक आनन्दोपभोग की ओर मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति आत्म-साक्षात्कार में बाधक है। वह परब्रह्म, अन्तः नियन्त्रक, विनश्चर पदार्थों में अविनाशी, अनित्यों में नित्य और अचेतनों में चेतन भगवान् सब प्राणियों के हृदय मन्दिर में विराजमान है जो उस भगवान् के दर्शन कर लेता है, वह शाश्वत शान्ति और दिव्यानन्द प्राप्त करता है। जरा,

 

यह सच है कि आत्मा या ब्रह्म प्रत्येक प्राणी में छिपा हुआ है; परन्तु वही इसके दर्शन कर पाता है जिसका मन शुद्ध, पवित्र और उसके पूर्ण नियन्त्रण में है।

 

मन और इन्द्रियों पर नियन्त्रण प्राप्त करने के लिए हमें प्रकृति विज्ञान की पूरी जानकारी और कठिन मनोनिग्रह की आवश्यकता है; क्योंकि जैसा ऊपर कहा गया है, मानस-तत्त्व का पूर्ण ज्ञान तथा मन और इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण करके ही हम आत्मा या सच्चे सुख को प्राप्त कर सकते हैं।

 

जिसने मन के स्वभाव और क्रिया-पद्धति को पूर्णतया समझ लिया है, उसके लिए मनोनिग्रह बड़ा सरल है। सम्पूर्ण साधना का लक्ष्य मनोजय है जिससे आत्म-ज्ञान मिलता है और जीव जन्म-मरण के बन्धन से छुटकारा पा लेता है।

 

मन को वशीभूत कर राजयोगी दर्शन, ध्यान और समाधि प्राप्त करते हैं। इसी की सहायता से वेदान्तियों को श्रवण, मनन और निदिध्यासन की आत्मिक शक्तियाँ सुलभ हो जाती हैं। इसी से भक्तगण भगवान के चरणारविन्दों के ध्यान में लीन हो जाते हैं। यह सब मनोनिग्रह के महत्व का ही प्रसाद है।

मन के दृढ़ नियन्त्रण का नाम योग है। योग एकता है। योग भगवान् के साथ समरसता है। जब पाँचों इन्द्रियों सहित मन शान्त हो जाता है, तभी परमानन्द, अनन्त ज्ञान, अमरता और परम शान्ति की उपलब्धि होती है। जिसका मन पर पूर्ण नियन्त्रण है, वह अपने जीवन के लक्ष्य को सुगमता से प्राप्त कर लेता है; क्योंकि इस शरीर रथ को खींचने वाली इन्द्रियाँ उसके लिए अच्छे घोड़ों की तरह अपना कार्य सम्पादन करती है।

 

इस पुस्तक में मन को नियन्त्रित करने के कुछ क्रियात्मक उपाय बतलाये गये हैं। इसलिए यह आत्म-साक्षात्कार के पथ पर चलने वाले साधकों के लिए बड़ी सहायक सिद्ध होगी। इसमें मन को नियन्त्रित करने के योग के विभिन्न उपायों का सरल, सुबोध भाषा में वर्णन किया गया है। यह पुस्तक निरन्तर तीव्र अध्ययन के लिए है; क्योंकि इसमें योग के साधकों के लिए क्रियात्मक अनुभव, निर्देश और सुझाव हैं। यदि कोई भी पाठक इस पुस्तक के अध्ययन से सत्य और आत्म-साक्षात्कार के पथ पर आरूढ़ हो सका, , तो मैं अपने प्रयत्नों को सफल समझँगा।

 

मेरी शुभ कामना है कि परमात्मा आपको आत्मबल प्रदान करें जिससे आप अपने मन पर विजय प्राप्त कर सकें, आपके जीवन में चिरस्थायी शान्ति और आत्मानन्द की प्राप्ति हो! आप कैवल्य प्राप्त करें, यही परम प्रभु से विनय है।

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

पत्र. 3

प्रार्थना.. 4

प्रकाशक का वक्तव्य... 5

प्रस्तावना.. 6

परिच्छेद- . 13

मन क्या है?. 13

परिच्छेद- . 29

मन और शरीर. 29

परिच्छेद- . 34

मन, प्राण और कुण्डलिनी.. 34

परिच्छेद-. 37

मन और आहार. 37

परिच्छेद-. 40

अवस्था - त्रय. 40

परिच्छेद- . 45

गुण- त्रय. 45

परिच्छेद-. 48

मानसिक अवस्थाएँ. 48

परिच्छेद-. 56

मानसिक शक्ति.... 56

परिच्छेद-. 60

दोष-त्रय. 60

परिच्छेद- १०. 62

शुद्ध और अशुद्ध मन. 62

परिच्छेद- -११. 66

वृत्तियाँ.. 66

परिच्छेद- १२. 70

प्रत्यक्ष ज्ञान का सिद्धान्त... 70

परिच्छेद- १३. 77

चित्त और स्मृति.. 77

परिच्छेद- १४. 82

संस्कार. 82

परिच्छेद- १५. 89

संकल्प... 89

परिच्छेद- १६. 93

विचार ही संसार की सृष्टि करता है. 93

परिच्छेद-१७. 99

अविद्या और अहंकार. 99

परिच्छेद- १८. 103

विचार-शक्ति.... 103

परिच्छेद- १९. 113

विचार-संस्कृति.. 113

परिच्छेद-२०. 122

वासनाएँ. 122

परिच्छेद- २१. 127

कामनाएँ. 127

परिच्छेद- २२. 133

राग-द्वेष. 133

परिच्छेद-२३. 138

सुख तथा दुःख.. 138

परिच्छेद- २४. 143

विवेक.. 143

परिच्छेद-२५. 144

वैराग्य और त्याग. 144

परिच्छेद- २६. 149

इन्द्रिय-संयम. 149

परिच्छेद-२७. 154

मौन तथा आत्मनिरीक्षण.. 154

परिच्छेद- २८. 159

कुवृत्तियाँ तथा उनका उन्मूलन. 159

परिच्छेद- २९. 180

सद्गुणों का संवर्धन. 180

परिच्छेद-३०. 182

मन के निग्रह की विधि.. 182

परिच्छेद - ३१. 202

धारणा.. 202

परिच्छेद-३२. 209

ध्यान. 209

परिच्छेद-३३. 222

ध्यान में अनुभव तथा बाधाएँ. 222

परिच्छेद - ३४. 232

समाधि.. 232

परिच्छेद-३५. 239

मनोनाश. 239

परिच्छेद - ३६. 243

मन की तुलना.. 243

परिच्छेद - ३७. 247

ज्ञानयोग का सार. 247

परिच्छेद-३८. 257

जीवन्मुक्त पुरुष में मन. 257

परिच्छेद - ३९. 261

एक योगी की शक्तियाँ.. 261

परिच्छेद-४०. 263

गुरु की आवश्यकता.. 263

परिच्छेद-४१. 265

साधकों को संकेत. 265

परिशिष्ट-. 269

मन के प्रति.. 269

परिशिष्ट-. 294

अतीन्द्रिय-संवेदन. 294

परिशिष्ट-. 305

मनोनाश. 305

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मन : रहस्य और निग्रह

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद-

मन क्या है?

 

"यो वा आयतनं वेदायतनं स्वानां भवति मनो वा आयतनम्"

जो आयतन को जानता है, वह स्वजातियों का आयतन (आश्रय) होता है। निश्चय मन ही आयतन है।

(छान्दोग्य उपनिषद् --)

 

जो आपको ईश्वर से पृथक् करता है, वह मन है। इस मन को ओंकार-चिन्तन या भक्ति के द्वारा हटा दें, तो आपको ईश्वर का दर्शन हो जायेगा।

 

मन : एक रहस्य

 

अधिकांश मनुष्य मन के अस्तित्व और इसकी क्रियाओं से अवगत नहीं हैं। तथाकथित शिक्षित लोगों को भी मन तथा इसके स्वभाव और कार्यों के विषय में बहुत स्वल्प जानकारी है। उन्होंने केवल सुन रखा है कि मन होता है।

 

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों को इसकी किंचित् जानकारी है।

 

पाश्चात्य चिकित्सक केवल आंशिक रूप से ही मन को जानते हैं। अभिवाही चेताएँ परिणाह अथवा मेक-रज्जु के अयांगों से संवेदनाएं लाती हैं। फिर ये संवेदनाएँ वहाँ से शिर के पश्च भाग, मस्तिष्क-पुच्छ में, जहाँ चेता-तन्तु व्यत्यस्त होते हैं, पहुँचती हैं और वहाँ से वे उत्तरवर्ती पुरोभागीय संवेल्लक अथवा ललाट में, जो बुद्धि अथवा मन का स्थान माना जाता है, मस्तिष्क के ऊर्ध्ववर्ती पुरोभागीय संवेल्लक में पहुँचती हैं। मन संवेदनाओं को अनुभव करता है तथा अभिवाही चेताओं के द्वारा हाथ, पैर आदि अग्रांगों को प्रेरक प्रणोदन प्रेषित करता है। उन लोगों के लिए यह सब केवल मस्तिष्क का कार्य है। उनके मत से जैसे पित्त यकृत का उत्सर्जन है, वैसे ही मन भी मस्तिष्क का उत्सर्जन है। वे चिकित्सक अब भी निपट अन्धकार में ही भटक रहे हैं। उनके मन में हिन्दू-दार्शनिक विचारों को प्रवेश कराने के लिए उनको (मन का) प्रचुर परिमार्जन करने की आवश्यकता है।

 

केवल योगी जन अथवा वे लोग जो ध्यान तथा आत्म-निरीक्षण का अभ्यास करते हैं, मन के अस्तित्व, इसके स्वभाव तथा व्यवहार, इसकी जटिल क्रियाविधि आदि के विषय में जानते हैं वे इसको यश में करने के अनेक उपाय भी जानते हैं।

 

मन आष्ट प्रकृतियों में से एक है:

 

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ।।

 

-- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार- यह मेरी आठ प्रकार की प्रकृति है

(गीता : -)

 

मन आत्म-शक्ति है। विश्राम (निद्रा) की आवश्यकता मस्तिष्क को होती है, मन को नहीं। जिस योगी ने मन का निग्रह कर लिया है, वह कभी नहीं सोता। उसे ध्यान से ही विश्राम प्राप्त हो जाता है।

 

 

मन का अधिष्ठान

 

मन आत्म-शक्ति है। मन के द्वारा ब्रह्म अनेक प्रकार की सृष्टि में प्रकट होता है। ऐतरेय उपनिषद् में बताया जाता है कि सृष्टि के आदिकाल में ब्रह्म ने सोचा :

 

ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत्।।

"तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य... हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा

 

ये तो हुए लोक, अब मुझे लोकपालों की भी रचना करनी चाहिए। तब उसने जल में से पुरुष (हिरण्यगर्भ) को निकाल कर मूर्तिमान किया तथा उसे ध्यान की अग्नि से तपाया। इस प्रकार तपाये जाने से उसका हृदय प्रकट हुआ। हृदय से मन का आविर्भाव हुआ और मन से उसका अधिष्ठातृ देवता चन्द्रमा उत्पन्न हुआ। (मन का अधिष्ठान हृदय है, इसलिए मन हृदय में से निकला। समाधि-काल में मन अपने अधिष्ठान हृदय में प्रवेश कर जाता है सुषुप्ति अवस्था में भी यह हृदय में प्रवेश करता है। तब मन और ब्रह्म के बीच में अज्ञान का आवरण होता है) (ऐतरेयोपनिषद् --, )

 

वैश्य मन और व्यष्टि मन

 

हिरण्यगर्भ अथवा कार्य ब्रह्म अथवा सम्भूति ही वैश्व मन है वह सारे मनों की समष्टि है। व्यक्ति का मन वैश्व मन से सम्बन्ध रखता है। वैश्व मन, हिरण्यगर्भ, अतिचेतन मन, असीम मन अथवा विराट् मन पर्यायवाची शब्द हैं। भिन्न-भिन्न लेखकों ने भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग किया है। इनसे भ्रम में पड़ें। इनमें उलझें यह केवल शब्द-भेद है।

 

हिरण्यगर्भ वैश्व प्राण भी है। वह सूत्रात्मा है। वह विश्व का विद्युत् गृह है। अनेक जीव भाँति-भाँति के छोटे-छोटे लहू है। विद्युत्गृह से विद्युत् शक्ति का संचार ताम्र-तन्तुओं द्वारा लड्डुओं में होता है। इसी भाँति हिरण्यगर्भ से शक्ति का संचार जीवों में होता है।

 

यद्यपि मस्तिष्क भिन्न-भिन्न होते हैं, तथापि मन के अति सूक्ष्म होने के कारण एक - मनुष्य का मन दूसरों के मन के निकट सान्निध्य अथवा सम्पर्क में रहता है। जैसे-जैसे मन की उन्नति होती जाती है, मानसिक प्रवाहों से या निकट तथा दूर के जीवित अथवा मृतक अन्य पुरुषों के मन से आपका सचेत सम्पर्क होता है। '' का व्यष्टि मन यद्यपि अन्य पुरुषों के मन से अति सूक्ष्म पदार्थ के पतले से परदे के द्वारा पृथक् होता है; परन्तु वास्तव में वह अपने अंशी हिरण्यगर्भ के तथा अन्य व्यक्तियों के प्रतीयमानतः पृथक् मन के संसर्ग में रहता है।

 

यदि श्याम राम का मित्र है तो उनके मन का परस्पर सम्बन्ध है। श्याम के मित्रों, सम्बन्धियों और भाइयों के मन का सम्बन्ध श्याम के मन से है। इसी प्रकार राम के मन में भी कई मन सम्बद्ध हैं। राम के सम्बन्धियों के मन धीरे-धीरे श्याम के सम्बन्धियों के मन से सम्बद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार एक व्यक्ति का मन समस्त संसार के मन से सम्बन्ध बना लेता है। यह राजयोग का मन के विभु होने का सिद्धान्त है।

 

सांख्य-दर्शन में मन

 

सांख्य दर्शन में वैश्व मन को महत् कहा गया है। अव्यक्त से यह प्रथम तत्त्व प्रकट होता है। यह अव्यक्त से व्यक्त होने वाला प्रथम तत्त्व है। छकड़े के पहिये का आधार उसके अरे होते हैं। अरे नाभि में टिके हुए होते हैं। इसी प्रकार मन प्रकृति पर और प्रकृति ब्रह्म पर आश्रित होती है।

 

महत् से अहंकार प्रकट होता है। सात्त्विक अहंकार से मन, राजसिक अहंकार से प्राण और तामसिक अहंकार से तन्मात्राएँ प्रकट होती हैं। तन्मात्राओं से महाभूत और पंचमहाभूतों से स्थूल जगत् प्रकट होता है। अहंकार, अहंभाव के अतिरिक्त मन और कुछ नहीं है। इस अहंभाव से बचना बहुत कठिन है। मन सदा किसी स्थूल पदार्थ से संसक्त होता है। यह अकेला नहीं ठहर सकता। यह मन ही शरीर में 'मैं' की घोषणा करता है।

 

मन रूपी वृक्ष का बीज अहंभाव है। इस अहंकार के बीज से बुद्धि रूपी कॉपल निकलती है। इसी में संकल्प-रूपी शाखाएँ- प्रशाखाएँ उद्भूत होती हैं।

 

लिंग शरीर और अन्तर्वाह शरीर

 

मन लिंग शरीर का सबसे मुख्य तत्त्व है। लिंग शरीर या सूक्ष्म शरीर स्थूल प्राण के द्वारा स्थूल शरीर से संयुक्त होता है। मृत्यु-काल में यह स्थूल शरीर से पृथक् हो कर स्वर्ग-गमन करता है। यह सूक्ष्म शरीर ही कर्मफल से सुख या दुःख भोगता है। यह शरीर ही आवागमन करता रहता है। विदेह मुक्ति होने पर सूक्ष्म शरीर लय हो जाता है।

 

लिंग शरीर और अन्तर्वाह शरीर में भेद है। लिंग शरीर सतरह तत्त्वों वाला सूक्ष्म शरीर है। पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच प्राण, मन और बुद्धि-ये सतरह तत्त्व हैं। अन्तर्वाह शरीर अत्यन्त शुद्ध होता है। यह सत्य से पूर्ण तथा रजोगुण और तमोगुण से रहित होता है। इस शरीर के द्वारा योगी परकाय प्रवेश करता है। भगवती सरस्वती की कृपा से, लीला ने इसी अन्तर्वाह शरीर के द्वारा स्थूल देह से निकल कर, ऊर्ध्व लोकों में गमन किया था। आपको यह योगवार में मिलेगा। श्री शंकराचार्य, राजा विक्रमादित्य, हस्तामलक और तिरुमूलार के अन्तर्वाह शरीर थे। इस प्रकार के विशेष शुद्ध शरीर की सहायता से वे अन्य पुरुषों की देह में प्रवेश करते थे। अन्तर्वाह शरीर वाले योगी का सत्संकल्प या शुद्ध संकल्प होता है।

 

मन सूक्ष्म पदार्थ है

 

मन कोई स्थूल पदार्थ नहीं है, जो देखा या स्पर्श किया जा सके। इसका अस्तित्व कहीं भी नहीं देखा जाता। इसका परिमाण (नाप-तौल) भी नहीं बतलाया जा सकता है। इसके रहने के लिए स्थान की भी आवश्यकता नहीं है।

 

मन और पदार्थ एक ही परिपूर्ण ब्रह्म के दो रूप हैं। ब्रह्म दोनों में से एक भी नहीं है, अपितु दोनों ही उसके अन्तर्गत हैं। मन पदार्थों से पहले बनता है। यह वेदान्त का सिद्धान्त है। विज्ञान का सिद्धान्त यह है कि पदार्थ मन से पहले बने हैं।

 

मन को इस भाव से अपार्थिव कहा जा सकता है कि उसमें अन्य पदार्थों की सी नहीं है जिसे इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सके; परन्तु जिस भाव से ब्रह्म पार्थिव (अपदार्थनीय) कहा जाता है, उस भाव से मन अपार्थिव नहीं है। मन स्थूल पदार्थ का सूक्ष्म रूप है, इसलिए यह शरीर का प्रेरक भी है। मन सूक्ष्म सात्त्विक अपंचीकृत तन्मात्राओं से बना है। मन विद्युत् शक्ति है। छान्दोग्य उपनिषद् के मत से मन भोजन के सूक्ष्मतम अंशों से बनता है।

 

मन पदार्थमय है। यह सूक्ष्म पदार्थ है। यह भेद इस सिद्धान्त पर किया जाता है कि ज्ञान का स्रोत केवल आत्मा में है। यह (आत्मा) स्वयंसिद्ध है, स्वयं-प्रकाश है; परन्तु मन और इन्द्रियाँ अपना जीवन और क्रिया-शक्ति आत्मा से प्राप्त करते हैं। वे अकेले आप ही निर्जीव (जड़) हैं। इसलिए आत्मा सदा कर्ता ही रहता है, कार्य नहीं। मन आत्मा का कार्य हो सकता है। और, यह वेदान्त का मुख्य सिद्धान्त है कि जो पदार्थ किसी दूसरे का कार्य होता है, वह जड़ होता है। अहंकार तत्त्व (अहं प्रत्यक् विषयत्व) भी जड़ है; क्योंकि इसकी पृथक् सत्ता नहीं है। यह आत्मा के अभिबोध का कार्य है।

मनोमय शरीर

 

जिस प्रकार स्थूल शरीर ठोस, द्रव तथा वातीय पदार्थों से बना हुआ है, इसी प्रकार मन भिन्न-भिन्न सघनता की श्रेणी और कम्पन की गति वाले सूक्ष्म द्रव्यों से बना हुआ है। राजयोग उग्र साधना के द्वारा मन के भिन्न-भिन्न स्तरों का भेदन कर देता है।

 

भिन्न-भिन्न मनुष्यों में भिन्न-भिन्न मनोमय शरीर होता है। जिसके अन्दर चैतन्य जितना अधिक या कम अभिव्यक्त होता है, उतने ही स्थूल या सूक्ष्म पदार्थ से उसका मनोमय शरीर बना हुआ होता है। शिक्षित मनुष्यों में यह चेतना क्रियाशील तथा अधिक प्रकट होती है तथा अविकसित लोगों में यह धुंधली और कम प्रकट होती है।

 

जिस प्रकार विशेष विचारों के लिए मस्तिष्क में अनेक खाने बने हुए होते हैं, उसी प्रकार मनोमय शरीर में भी भिन्न-भिन्न क्षेत्र या खण्ड बने होते हैं। तीव्र क्रोध के आवेश में सम्पूर्ण मन द्वेष तथा दुर्भाव के काले बादलों से घिर जाता है और उनमें से क्रोध के अमिय बाग निकलते हैं जो उन भूत पदार्थों को आहत कर देते हैं जिनके प्रति क्रोध रहता है।

 

मन के प्रकार

 

प्रत्येक मनुष्य का अपना मानसिक संसार निराला ही होता है। प्रत्येक मनुष्य विचार शैली, स्वभाव, रुचि, मनोवृत्ति, शारीरिक लक्षण आदि में दूसरे से भिन्न होता है। शारीरिक दृष्टि से भी मनुष्य एक-दूसरे से भिन्न होता है, भले ही उनमें थोड़ी-सी समानता हो। भिन्न-भिन्न मनुष्यों के नासिका, कान, ओष्ठ, नेत्र, भृकुटियाँ, दन्त-विन्यास, स्कन्ध, हाथ, उँगलियों, अंगूठों, दृष्टि, स्वर, गति, बातचीत के ढंग आदि को ध्यानपूर्वक देखें। आपको किन्हीं भी दो व्यक्तियों में बहुत बड़ा अन्तर मिलेगा। हथेलियों की रेखाएँ भी भिन्न होती हैं। कोई दो पत्तियाँ भी एक समान नहीं होतीं। विविधता ही सृष्टि का सौन्दर्य है।

 

मन के अनेक प्रकार होते हैं। बंगाली मन भावुक होता है और कला तथा भक्ति के उपयुक्त होता है। मद्रासी मन बौद्धिक तथा गणित में निपुण होता है। पंजाबी और महाराष्ट्रीय मन वीर और साहसी होता है। बंगाल ने श्री गौरांग महाप्रभु श्री रामकृष्ण परमहंसदेव आदि भावप्रवण सन्तों को जन्म दिया है। मद्रास में श्री रामानुजाचार्य और श्री शंकराचार्य-जैसे प्रतिभाशाली दार्शनिक हुए हैं। पंजाब में श्री गुरुगोविन्दसिंह जैसे वीर उत्पन्न हुए हैं। साधना और योगपथ मन के प्रकार, स्वभाव और शक्ति के अनुकूल पृथक्-पृथक् हुआ करता है। रुचियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। मछली देख कर बंगाली को अत्यन्त हर्ष होता है। इमली और मिर्च देख कर मद्रासी के मुँह में पानी भर आता है। ताड़ के फल को देख कर लंका के जाफना तामिल बहुत प्रसन्न होते हैं। मांस देख कर मांसाहारी को विशेष प्रसन्नता होती है। क्या यह रहस्य की बात नहीं है कि एक वस्तु बाहर पड़ी रहे और उसे देख कर ही मुँह में पानी भर आये? अपने दैनन्दिन जीवन में आपको नित्य ही यह अनुभव होता है, अतः आप इस बात को महत्त्व नहीं देते। मन बड़ा रहस्यमय है और ऐसी ही माया भी है।

 

अत्यन्त उन्नत मनुष्य का मन भी मन ही रहता है, अर्थात् साधारण मनुष्य के मन की भाँति वह भी अपने गुण और धर्म को नहीं छोड़ता।

 

 

मनोमय शरीर का आकार

 

न्याय दर्शन के मत से मन अणु है, महर्षि पतंजलि के मत से यह विभु (विश्वव्यापी) है और वेदान्त मत से वह सारे शरीर में व्याप्त है।

 

मनोमय प्रभा

 

मन की प्रभा दिव्य हुआ करती है। प्रभा मन से निकलने वाला तेज अथवा दीप्ति है। जिनके मन परिपक्व हो गये हैं, उनकी प्रभा अतीव प्रकाशमान होती है। इसकी गति दूर तक हो सकती है और बहुत से मनुष्यों को वह अपने प्रभाव से लाभ पहुँचा सकती है। आत्मिक प्रथा मानसिक वा प्राणमय प्रभा से भी अधिक शक्तिशाली होती है।

 

बलवान् मन का दुर्बल मन पर प्रभाव

 

बलवान् मन दुर्बल मन पर अपना प्रभाव डालता है। शक्ति-युक्त मन वाला सम्मोहक व्यक्ति (hypnotist) दुर्बल मन वाले बालकों के पूरे समूह या मण्डली को सम्मोहित कर देता है। हममें से ऐसे मनुष्य भी हैं जिनकी शरीर रचना दूसरों की अपेक्षा बहुत अधिक संवेदनशील होती है। अवयवी के रूप में उनके शरीर अधिक सूक्ष्म तथा अधिक संवेदी निर्मित होते हैं। साधारणतया ऐसे लोग जिन लोगों के संग में रहते या जिनके संसर्ग में आते हैं, उनकी मनोवृत्ति से सदा प्रभावित होते हैं।

 

जिसने अपने मन को पवित्र कर लिया है, वह शक्ति का केन्द्र बन जाता है। समस्त दुर्बल, अपवित्र और हीन मन अनजाने ही शुद्ध तथा महत्तर मन की ओर खिंचे आते हैं; क्योंकि उन्हें ऐसे शुद्ध और उन्नत मन से शान्ति, शक्ति और बल प्राप्त होते हैं।

 

देखिए, पूर्ण विकसित मन का अल्प विकसित मन पर कैसे प्रभाव पड़ता है! समर्थ पुरुषों के सम्मुख रहने में मन पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका वर्णन करना असम्भव है। चाहे वे कुछ भी कहें, फिर भी उनके सामने बैठने में बड़ा आनन्द होता है; क्योंकि मन को नयी प्रेरणा मिलती है। यह बड़ा असाधारण अनुभव होता है।

 

यदि आप नल से पानी पीना चाहें, तो आपको अपना शरीर झुकाना पड़ेगा। इसी प्रकार निम्नतर मन यदि परिपक्व मन के सद्गुण ग्रहण करना चाहता है, तो उसे उसके सम्मुख झुकना पड़ेगा अर्थात् विनीत होना पड़ेगा। विचार को ही शान्त तथा अक्षुब्ध होना चाहिए, तभी आपको प्रेरणा प्राप्त हो सकेगी। ऐसी दशा में ही उच्च मन अपना हितकर प्रभाव निम्न मन पर डाल सकेगा। ऐसी शान्त मानसिक स्थिति में आप ईश्वर के साथ संसर्ग रख सकेंगे। योजना बनाना, क्रोध और विषाद की मनोदशाये सब ही मन में उद्वेग उत्पन्न करते और ईश्वर प्राप्ति में बाधक बनते हैं।

 

मन सतत परिवर्तनशील है

 

मन संस्कारों का समूह है। यह स्वभावों (आदतों) की पोटली है। अनेक पदार्थों के संग से उत्पन्न हुई इच्छाओं का समुच्चय मन है। सांसारिक चिन्ताओं से उत्पन्न होने वाली भावनाओं का समूह मन है। यह विविध पदार्थों से संग्रहीत विचारों का समूह है। ये इच्छाएँ, विचार और अनुभव निरन्तर परिवर्तित होते रहते हैं। कुछ पुराने विचार, इच्छाएँ और अनुभव मन रूपी भण्डार गृह से निकलते रहते हैं और नये-नये उनका स्थान लेते रहते हैं।

 

परन्तु यह निरन्तर होने वाला परिवर्तन मानसिक क्रियाओं की सुव्यवस्था में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करता। पुराने विचारों, इच्छाओं और अनुभवों में से कुछ थोड़े से ही बाहर जाते हैं और जो रह जाते हैं, वे नये आने वाले विचारों के साथ सहयोग और सामंजस्य से काम करते हैं। नये विचारों पर पुराने विचारों का बड़ा प्रभाव पड़ता है। ये दोनों मेल से कार्य करते हैं और इसलिए मन की सत्ता की सारूप्यता बनी रहती है।

 

मन केवल प्रतिदिन बनता है, अपितु सर्वदा बनता है। यह गिरगिट की भाँति प्रतिक्षण अपना रंग-रूप बदलता रहता है। "यह अत्यन्त चंचल और अस्थिर है" (गीता : -२६) मन बराबर बदलता रहता है। आप नित्य नये-नये अनुभव प्राप्त करते रहते हैं। आपकी जो धारणाएँ, अन्तःकरण और विवेक-बुद्धि आज है, वह कल बदल जायेगी। अनुभव के द्वारा मन विकसित होता है। संसार सर्वोत्तम शिक्षक अथवा गुरु है।

 

मनुष्य की चेतना (conscience) उसके ज्ञान के अनुसार बनती है, कालान्तर में नया ज्ञान प्राप्त होने पर जैसे-जैसे उसके विचारों या दृष्टिकोणों में संशोधन होता है, वैसे-वैसे उसकी चेतना परिवर्तित होती रहती है। सहज ज्ञान अथवा तर्कणा से मनुष्य जो दृढ धारणाएं बना लेता है, वहीं चेतना कहलाती है। बच्चे की या बर्बर मनुष्य की चेतना पूर्ण परिपक्व सभ्य मनुष्य की चेतना से भिन्न होती है और सभ्य मनुष्यों में भी ज्ञान का अन्तर इतना होता है कि उनकी अपनी-अपनी चेतनाएँ भिन्न भिन्न क्रिया-पद्धति का - निर्देश करती है। सात्त्विक मनुष्य की चेतना राजसी मनुष्य की चेतना से बहुत ही भिन्न होती है। सात्त्विक मनुष्य की चेतना अत्यधिक निर्मल और शुद्ध होती है।

 

अन्तःकरण चतुष्टय (चार प्रकार के मन)

 

वेदान्ती अन्तःकरण में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का समावेश करते हैं। व्यापक भाव में इसका अर्थ है आन्तरिक उपकरण (अन्तः - आन्तरिक, करण उपकरण) यह एक ऐसा आन्तरिक यन्त्र है जिससे आप बोध, अनुभव, विचार तथा निश्चय कर सकते हैं। यह बाह्य करण अर्थात् इन्द्रियों से भिन्न है।

 

तन्मात्राएँ सूक्ष्म भूत हैं। पांचों स्थूल भूत तन्मात्राओं से बने हैं। अहंकार पृथ्वी- तन्मात्रा से, चित्त जल-तन्मात्रा से, बुद्धि अप्रि-तन्मात्रा से मन वायु तन्मात्रा से तथा हृदय आकाश- तन्मात्रा से बनता है।

 

मन इन्द्रियों की तुलना में चेतन है और बुद्धि की तुलना में जड़ है। सांख्य योग में इच्छा-शक्ति और बुद्धि (विवेक शक्ति) को मिला कर बुद्धि कहते हैं। कोई-कोई चित्त को मन के अन्तर्गत और अहंकार को बुद्धि के अन्तर्गत बनाते हैं।

 

मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार केवल वृत्ति-भेद या मन के कार्यात्मक रूप हैं। मन के कार्य सारे पदार्थ होते हैं और यह भूत, वर्तमान तथा भविष्य तीनों कालों में व्यापता है। यह एक ही है; परन्तु क्रियाएँ अनेक करता है। जब आप न्यायालय में अपने न्याय के अधिकार का उपयोग करते हैं, तब आप न्यायाधीश बनते हैं, जब आप रसोईघर में काम करते हैं, तब आप रसोइया कहलाते हैं और जब आप किसी संस्था के अध्यक्ष के आसन पर बैठते हैं तो अध्यक्ष कहलाते हैं। आप एक ही मनुष्य हैं; परन्तु जब-जब जो-जो कार्य करते हैं, उसके अनुसार वैसे ही नाम से आप पुकारे जाते हैं। इसी प्रकार मन जब संकल्प-विकल्प करता है तब इसका नाम मन होता है, जब विवेक से निश्चय करता है। तो बुद्धि कहलाता है, जब अहंभाव प्रस्तुत करता है तो अहंकार कहलाता है और जब संस्कारों का भण्डार तथा स्मृति का अधिष्ठान बनता है एवं धारणा और अनुसन्धान करता है तब चित्त कहलाता है।

 

जल में शीतलता, अग्नि में तेज और वायु में गति किसने प्रदान की? यह इनके स्वभाव हैं। ऐसे ही मन का स्वभाव वस्तुओं की ओर भागना, बुद्धि का स्वभाव निश्चयः करना, अहंकार का स्वभाव स्वाग्रह और चित्त का स्वभाव अहंकार द्वारा अभिज्ञात विषयों की स्मृति है।

 

जब मन काम करता है, तब बुद्धि और अहंकार साथ-साथ काम करते हैं। मन, बुद्धि तथा अहंकार परस्पर स्वस्थ सहयोग से कार्य करते हैं। मन संकल्प-विकल्प करता है। यह पदार्थों की अच्छाई और बुराई सोचता है। बुद्धि निश्चय तथा विषय का विवेचन करती है (निश्चयात्मिका, व्यवसायात्मिका)

 

मन का स्वरूप विचार है। मन संकल्प-विकल्पात्मक है। जब यह बुद्धि के निर्णयों बुद्धि के सन्देशों के निष्पादन के लिए उन्हें कर्मेन्द्रियों के आगे प्रस्तुत का देता है तो व्याकरणात्मक हो जाता है। मन पसन्द करता, ध्यान देता और अस्वीकार करता है।

मन के कार्य

 

संवेदन, विचार और संकल्प —— ये मन के त्रिविध कार्य हैं। संज्ञान, इच्छा तथा संकल्पये तीन मानसिक प्रक्रम हैं।

 

मन की तीन अवस्थाएँ होती हैंसक्रिय, निष्क्रिय तथा तटस्थ। मन को सदैव अनेकरूपता तथा नयी-नयी संवेदनाएँ पसन्द हैं। एकरसता से यह ऊब जाता है।

 

साहचर्व-नियम, सातत्य नियम और सापेक्षता नियम ये मन के तीन मुख्य नियम है।

 

मन के ये स्वभाव है परिणाम, चेष्टा, निरोध, शक्ति, जीवन और धर्म

 

विचार करना, योजना बनाना, अनुभव करना और जानना ये क्रियाएँ मन में सदा चलती रहती हैं। कभी योजना बनाते हैं, कभी आप अनुभव करते हैं, कभी जानने का प्रयास करते हैं, कभी गम्भीरतापूर्वक सोचते हैं और कभी इच्छा करते हैं। इच्छा से मन की सारी शक्तियाँ सक्रिय हो जाती है। आत्मनिरीक्षण के द्वारा आपको यह जान सकने में समर्थ होना चाहिए कि भिन्न-भिन्न समय पर आपके मन में क्या हो रहा है?

 

मन के स्वरूप

 

अचेतन मन अथवा विषयपरक मन, अवचेतन मन अथवा आत्मपरक मन या चित्त और अतिचेतन मन मन के तीन रूप है। आप विषयपरक मन (सचेतन मन ) के द्वारा देखते, सुनने तथा पढ़ते हैं।

 

पाश्चात्य वैज्ञानिकों के वर्गीकरण के अनुसार संवेदनात्मक मन, तर्कणापरक मन और अन्तर्ज्ञानी मनये मन के तीन स्वरूप है।

 

मन का स्थान

 

प्राण, मन, अहंकार और आत्माइन चारों तत्त्वों का स्थान हृदय है। वेदान्त के अनुसार मन का स्थान हृदय है। जाग्रत अवस्था में यह मस्तिष्क में रहता है। हठयोग के मत से अस्थायी रूप से मन का स्थान आज्ञा चक्र है जो दो कमलों के आकार का है और जिसका स्थान दोनों भृकुटियों के बीच में है।

 

मन की अनेक शक्तियाँ और केन्द्र होते हैं। वह मस्तिष्क में स्थूल शरीर के तत्सम्बन्धी केन्द्रों के द्वारा काम करता है। मन, बुद्धि तथा विवेक लिंग शरीर में हैं; परन्तु वे भौतिक मस्तिष्क में तत्सम्बन्धी केन्द्रों के द्वारा ही कार्य करते हैं। मस्तिष्क मन नहीं है। जैसा कि पाश्चात्य विद्वानों का मत है। मन का स्थान भौतिक मस्तिष्क में है। वह इस भौतिक जगत् की अनुभूति मस्तिष्क के कम्पन द्वारा करता है।

 

यद्यपि अपने सम्पूर्ण देश पर राजा का एकाधिकार होता है, सारा राज्य उसका ही होता है; फिर भी उसके निवास के लिए विशेष स्थान होते हैं। एक विशाल राजप्रासाद राजधानी में होता है और ग्रीष्मऋतु के लिए एक सुन्दर भव्य भवन मसूरी या आबू पर्वत पर बना होता है। इसी प्रकार, मन यद्यपि सारे शरीर में व्यापक है; किन्तु जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्तिइन तीनों अवस्थाओं में इसके लिए तीन स्थान नियत हैं। सुषुप्ति में मन का स्थान हृदय, स्वप्न में कण्ठ तथा जाग्रति में दक्षिण नेत्र या आज्ञा चक्र होता है। देखिए, आलोचना के समय आप क्या करते हैं? आप चिम्बुक पर उँगली रख कर, ग्रीवा दाय ओर को झुकाते हुए दृष्टि को भ्रू-मध्य में स्थित करके अपनी समस्या पर विचार करते हैं। इससे प्रतीत होता है कि मन का स्थान आज्ञा चक्र है।

 

मन आत्मा नहीं है

 

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक ऐसा कहने में बड़ी भारी भूल करते हैं कि चेतना मन की एक क्रिया और उपाधि है। चित्त या आत्मा ही स्वयं शुद्ध चेतना है। मन आत्मा से ही समय-समय पर अपना प्रकाश प्राप्त करता है और थोड़े काल तक चेतना की भाँति वैसे ही चमकता है जैसे पीतल पर सोने का मुलम्मा चमकता है। आत्मा ही प्रकाश का स्रोत तथा ज्योतियों की ज्योति और सूर्यो का सूर्य है। जैसे लौह-शलाका अपनी उष्णता तथा प्रकाश अग्नि से प्राप्त करती है, वैसे ही मन अपनी ज्योति और शक्ति ब्रह्म से प्राप्त करता है। मन जड़ है। जैसे धूप में रखा हुआ जल सूर्य के ताप से उष्ण हो जाता है, वैसे ही यह जड़ मन ब्रह्म से प्रकाश प्राप्त करके बुद्धियुक्त-सा हो जाता है।

 

मन एक समय में एक ही कार्य कर सकता है। यह परिच्छिन्न है, जड़ है और सत्वगुण का कार्य है। यह विनाशी तथा चंचल है। यह विचारों, संस्कारों, स्वभावों, प्रेरणाओं तथा भावनाओं की एक पोटली है। यह अपने अधिष्ठान ब्रह्म से प्रकाश प्राप्त करता है। आप मन पर नियन्त्रण कर सकते हैं। विचार करने वाला विचार से भिन्न होता है। प्रगाढ़ निद्रा में मन की क्रिया बन्द हो जाती है। आप सदा 'मेरा मन' कहा करते हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि मन भी छतरी या छड़ी-जैसा आपका एक उपकरण है, इसलिए मन स्वयं-प्रकाश आत्मा नहीं है।

 

मूर्च्छा की अवस्था में, मानसिक क्रियाओं के स्तम्भित होने और स्मृति के पूर्णत: अथवा अंशतः नष्ट होने पर भी व्यक्ति का अस्तित्व रह जाता है—'मैं' बना रहता है 'अहमस्मि' मन आपसे बाहर रहते हुए भी आपकी उसी प्रकार सम्पत्ति है, जैसे | आपके स्थूल शरीर के दूसरे अंग, आपके पहनने के वस्त्र या आपके रहने का घर आपसे बाहर रहते हुए भी आपकी सम्पत्ति है। इसलिए मन इस 'मैं' से भिन्न है।

 

मन अन्धकार में टटोलता है। यह प्रतिपल भूलता तथा प्रतिक्षण बदलता रहता है। यदि कुछ दिन तक आहार मिले, तो यह सुचारु रूप से विचार भी नहीं कर सकता। सुषुप्तिप्रगाढ़ निद्रा में मन की क्रिया नहीं होती। मन मल, वासनाओं और तृष्णाओं से परिपूर्ण है। क्रोध आने पर यह मोह को प्राप्त होता है, भय होने पर इसे कम्प होता है. और प्रघात लगने पर यह मरणासन्न-सा हो जाता है। फिर, आप मन को शुद्ध आत्मा कैसे मान सकते हैं?

 

मन संवेदन और विचार का एक साधन है। यह उपकरण उसके नियन्त्रण में होना चाहिए जो इसका उपयोग करता है। जीव मन का निर्देशक नहीं है; क्योंकि हम देखते हैं कि सामान्य व्यक्ति अपने मन को वश में नहीं रख सकते। वे तुच्छ राग-द्वेष, आवेग, भय आदि से सहज ही इधर-उधर दोलायमान होते रहते हैं। इसलिए यह निश्चित है कि कोई ऐसी सत्ता अवश्य है जो मन की निर्देशक है। यहाँ प्रश्न उठता है, वह कौन है ? वह है मनसस्पति, अन्तर्यामी, कूटस्थ ब्रह्म

 

आप जैसे अपने सामने वृक्ष को देखते हैं, इसी प्रकार जीवों के मन में क्या हो रहा है, इस सबको देखने तथा जानने के लिए भी कोई कोई होना चाहिए। वह कूटस्थ है। - उसी को ब्रह्म कहते हैं। आपके सामने एक पात्र रखा है। पात्र अपने-आपको देख नहीं सकता है। उसे देखने के लिए एक द्रष्टा और देखने का करण अर्थात् नेत्र की आवश्यकता होती है। यदि आप कहें कि पात्र अपने आपको देख सकता है तो इसमें तर्कशास्त्र के कर्म-कर्तृत्व-भाव का विरोध होगा। तर्कानुसार यह एक असंगति है। इसलिए आपको मानना पड़ेगा कि मन का एक मूक साक्षी है जो अनादि, अनन्त, अपरिवर्तनशील और नित्य ज्ञाता है। वह जीवों के मन में उठने वाले भावों और विकारों को देखता है।

 

ईश्वर या सगुण ब्रह्म को निर्गुण ब्रह्म की पूर्ण चेतना होती है। यह उसका स्वरूप लक्षण है। साथ-ही-साथ उसे पूर्ण वैश्व चेतना भी होती है। वह जानता है कि प्रत्येक मन में क्या-क्या हो रहा है।

 

स्वाभाविक चेतना अथवा निरपेक्ष चेतना सबमें समान होती है। यह शुद्ध चेतना एक ही होती है। यह कूटस्थ चैतन्य है। मन की सारी क्रियाएँ और सभी लोगों के मन में उठने वाले विकार उस एक सामान्य चेतना के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं जो कि मन की सारी वृत्तियों की साक्षी है। यद्यपि चेतना एक ही होती है तो भी जब राम को बिच्छू डंक मारता है तो केवल राम को ही पीड़ा होती है। उसके पास खड़ा उसका मित्र कृष्ण इस पीड़ा को अनुभव नहीं करता। प्रत्येक व्यक्ति का अन्तःकरण भिन्न होता है। वास्तव में तो मनुष्य और परमात्मा में कोई भेद नहीं होता, परन्तु यह अन्तःकरण ही मनुष्य को सीमाबद्ध रखता है। जब अविद्या का आवरण हट जाता है, तो इस अभेद का साक्षात्कार होता है।

ब्रह्म के लिए मन ज्ञान की वस्तु है। मन के सारे प्रपंचों, जैसे-इच्छा, कल्पना, शंका, विश्वास, अविश्वास, लज्जा, चातुर्य, भय आदि को आत्मा अपरोक्ष रूप से देखता है; परन्तु वह सर्वव्यापी आकाश या विविध रंगों वाले पदार्थ को प्रतिबिम्बित करने वाले स्फटिक अथवा सूर्य की भाँति उनसे सर्वथा अनासक्त तथा अप्रभावित रहता है।

 

आत्मा मन का स्रोत है

 

यह मन जो संकल्प-विकल्प के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होता है, अपने कारणभूत ब्रह्म से उत्पन्न होता है। अनन्त रूप आत्मा संकल्प के द्वारा जो रूप धारण करता है, वह मन है। पहले इसने विवेक से पीठ मोड़ी और इसलिए पदार्थों की वासनाओं की शक्ति के लपेट में गया। मन का मूलाधार, अधिष्ठान तथा मूल स्रोत आत्मा, ब्रह्म अथवा शुद्ध चैतन्य है। सारी शक्तियों की शक्ति जो मन को शक्ति देती है, सारी ज्योतियों की ज्योति जो मन को प्रकाश देती है, सारे द्राओं का द्रष्टा जो मन के आशय और कार्यों का साक्षी है. सारे आधारों का आधार जिसमें सुषुप्ति में मन विश्राम करता है, ब्रह्म है।

 

" केनेषितं पतति प्रेषितं मनः" अर्थात् किसके द्वारा स्फूर्ति पा कर और संचालित हो कर मन अपने विषयों तक पहुँचता है (केनोपनिषद्) मैं उस सर्वशक्तिमान् को हाथ जोड़ कर प्रणाम करता है। वह शक्तियों की शक्ति में है- "सोऽहम्, शिवोऽहम्।"

 

वह अद्वितीय परमात्मा जो आपके हृदय-प्रकोष्ठ में अन्तर्यामी, सूत्रधार, साक्षी अथवा परमात्मा के रूप में निवास करता है; जो आदि, मध्य और अन्त-रहित है; जो इस संसार का, वेदों का तथा शरीर, मन, इन्द्रियों और प्राणों का स्रोत है; जो सर्वव्यापक, निर्विकार है जो सदा एकरस है; जो सर्वकाल में विद्यमान रहता है तथा जो स्वयम्भू, है; स्वतन्त्र और स्वयं ज्योति है; वही ईश्वर है, आत्मा है, ब्रह्म है, पुरुष है, चैतन्य है, भगवान् या पुरुषोत्तम है।

 

स्वप्न में आप अत्यन्त तेजोमय प्रकाश देखते हैं। यह कहाँ से आता है ? आत्मा से। स्वप्न में प्रकट होने वाला प्रकाश आत्मा के स्वयं ज्योति अथवा स्वयं-प्रकाश होने का स्पष्ट द्योतक है।

 

ईश्वर सत्य, प्रेम, ज्योतियों की ज्योति, शान्ति, ज्ञान तथा आनन्दविग्रह है। वह सच्चिदानन्द, अनन्त, अमृत तथा असीम है। वह अविनाशी, परम वस्तु तथा सर्वव्यापी तत्त्व है। ईश्वर ही सार वस्तु और अनन्त सौन्दर्य है।

 

भगवान् ईश्वर शब्द का पर्याय है। जिसमें ज्ञान, वैराग्य, यश, ऐश्वर्य, श्री और धर्मये षड्गुण अपने पूर्ण रूप में विद्यमान हों, वह भगवान् है।

वायुपुराण के अनुसार सर्वज्ञता, सन्तोष, अनन्त ज्ञान, स्वतन्त्रता, सर्वदा शक्तिमत्ता और असीम शक्तिमत्ताये छह लक्षण परमात्मा के बताये गये हैं।

 

सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व, सर्वान्तर्यामित्व, सर्वकारणत्व, सर्वनियन्तृत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वशक्तिमत्व और स्वतन्त्रत्व-ये आठ लक्षण ईश्वर के हैं।

 

ज्ञान, निष्कामता, संयम-शक्ति, तप, सत्य, क्षमा, तितिक्षा, सर्जन, आत्मज्ञान और समस्त क्रियाओं की आधार भूमि होनावे दश अव्यय लक्षण सर्वसुखमूल परमात्मा में सदा निवास करते हैं।

 

सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह-ये ईश्वर के पंच कृत्य है।

 

ईश्वर नियामक, अन्तर्यामी और प्रेरक भी है। वह स्वप्न, अन्तर्वाणी, नित्य की बातचीत में दूसरों के मुख द्वारा, मित्रों के परामर्श आदि द्वारा अनेक प्रकार से साधकों की सहायता करता है।

 

नित्य सुख, परम शान्ति, नित्य तृप्ति, अनन्त आनन्द तथा अखण्ड सुख केवल ईश्वर में ही प्राप्त हो सकते हैं। इस भागवत-चेतना, आत्म-साक्षात्कार या भगवद्-दर्शन को अनन्य भक्ति या विचार द्वारा प्राप्त करें। यही जीवन का लक्ष्य है। यही आपका परम धर्म है; अन्य सारे धर्म गौण हैं।

 

इन्द्रियों का सार मन है; मन का सार बुद्धि है; बुद्धि का सार अहंकार है तथा अहंकार का सार जीव है। ब्रह्म या शुद्ध चैतन्य प्रत्येक वस्तु की योनि या गर्भ अथवा उसका अधिष्ठान है। वह प्रत्येक वस्तु का साक्षी है।

 

आत्मा इस विशाल मानसिक कार्यालय का स्वामी है, बुद्धि प्रबन्धक तथा मन मुख्य लिपिक है। मुख्य लिपिक को दो कार्य करने पड़ते हैं उसे सीधे प्रबन्धक से आदेश प्राप्त करना पड़ता है और श्रमिकों के कार्य का पर्यवेक्षण करना होता है। इसी प्रकार मन को दो कार्य करने पड़ते हैं। इसका सम्बन्ध बुद्धि-रूपी प्रबन्धक और कर्मेन्द्रिय-रूपी श्रमिकों से होता है।

 

मन वाणी से अधिक आन्तरिक है, बुद्धि मन से अधिक आन्तरिक है, अहंकार बुद्धि से अधिक आन्तरिक है, जीव-चैतन्य अहंकार से अधिक आन्तरिक है तथा आत्मा या कूटस्थ जीव- चैतन्य से अधिक आन्तरिक है। आत्मा से अधिक आन्तरिक अन्य कोई वस्तु नहीं है। यह परिपूर्ण है।

 

जब अपने मन का विश्लेषण करके आप किसी ऐसे तत्त्व के सम्मुख होंगे जो अविनाशी है और स्वभाव से ही निर्मल, पूर्ण, स्वयं-प्रकाश और अविकारी है, तब आप कभी खिन्न नहीं होंगे, दुःखी नहीं होंगे।

 

केवल एक ही तत्त्व है। वह 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' है। वह अनन्त निष्कलंक, नित्य शुद्ध और परिपूर्ण है। मन को स्थिर करके उसी का ध्यान करें और मन की सच्ची शान्ति प्राप्त करके सारे दुःखों से मुक्त हो जायें।

 

मन के अस्तित्व का प्रमाण

 

आत्मा और ब्रह्म का स्वरूप क्या है? आत्मा सच्चिदानन्द है, व्यापक है। फिर जीवात्मा की दृष्टि को कौन परिच्छिन्न बनाता है? मन इस तथ्य से एक अन्तरंग अवयव (मन) की सत्ता का प्रमाण मिलता है।

 

बृहदारण्यक के भाष्य में श्री शंकराचार्य ने मन की सत्ता के दो प्रमाण दिये हैं। एक तो यह है कि इन्द्रियों द्वारा संवेदन को प्राप्त करना मन का ही कार्य है। यह सर्व कर्म विषय- योग कहलाता है। मन और ज्ञानेन्द्रियों के संसर्ग से इन्द्रियजन्य ज्ञान संवेदन प्राप्त होता है। इसीलिए अनेक इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होने वाले संवेदन एक ही समय में एक-साथ नहीं व्यापते। मनुष्य कहा करते हैं कि मेरा मन अन्यत्र था, मैंने उसे नहीं देखा। इस समकालीन संवेदन की असम्भवता से भी मन की सत्ता का प्रमाण मिलता है।

 

अन्तःकरण (मन) की सत्ता के लिए युक्ति यह है। आत्मा अव्यय तत्त्व है। आत्मा और ज्ञानेन्द्रियों के बीच में एक संयोजक की आवश्यकता है। हमें एक आन्तरिक अवयव (मन) की सत्ता माननी पड़ेगी जिसके अवधान तथा अनवधान से पदार्थों का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। यदि हम इस आन्तरिक अवयव की सत्ता को स्वीकार नहीं करते तो, या तो सदा दर्शन ही होता रहेगा या अदर्शन हीजब आत्मा, इन्द्रिय और विषय का संयोजन होगा तो दर्शन ही होगा; क्योंकि ये ही तीनों दर्शन के कारण हैं और यदि इन तीनों के संयोजन से दर्शन नहीं प्राप्त होता तो सदा अदर्शन ही बना रहेगा। परन्तु वास्तव में इन दोनों बातों में से एक भी सत्य नहीं है। इसलिए हमें एक आन्तरिक अवयव की सत्ता माननी पड़ती है। जिसके अवधान और अनवधान के फल स्वरूप पदार्थ का दर्शन या अदर्शन प्राप्त होता है।

 

दूसरा प्रमाण हमारी निश्चयात्मक क्षमता है। कोई मनुष्य जिसे हम नहीं देख सकते, हमें स्पर्श करता है और हम उसका अनुमान कर लेते हैं। केवल स्पर्श से ही हमें इसका ज्ञान नहीं हो सकता। जिस शक्ति के द्वारा हम ऐसा अनुमान करते हैं, वह मन है।

 

मनुष्य और पशु में भिन्नता बताने वाला विशेष ज्ञान

 

पशु स्वयं अपने को नहीं जान सकता। उसको केवल शारीरिक चेतना होती है। उसको आत्म-चेतना का अनुभव नहीं होता। पशु को असुविधा और पीड़ा की संवेदना होती है। वह अपनी मनोदशाओं का विश्लेषण नहीं कर सकता। मनुष्य केवल जानता ही नहीं, अपितु उसे यह भी ज्ञान होता है कि वह जानता है। यह उच्च मानसिक चेतना या आत्म चेतना है। मनुष्य केवल संवेदन और भावना ही नहीं करता, अपितु अपनी भावनाओं और संवेदनों को अभिव्यक्त करने को उसके पास शब्द भी हैं। वह अपनी भावनाओं का विशद वर्णन कर सकता है। वह अपने आपको अनुभव करता हुआ जान सकता है तथा अपने को उस संवेदन या भाव से पृथक् भी कर सकता है। वह सोच सकता है, 'मैं स्पर्श करता हूँ, मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं सूँघता हूँ, मैं स्वाद लेता हूँ, मैं कामना करता हूँ, मैं भोगता हूँ।'

 

मैं इस पुस्तक को जानता हूँ। मैं यह भी जानता हूँ कि मैं इस पुस्तक को जानता हूँ। यह आत्म-चेतना कहलाती है, जो केवल मनुष्यों की विशिष्टता है।

 

पुलिस चौकी पर चपरासी दश का घण्टा बजाता है। वह शब्द मनुष्यों और पशुओं के कानों में जाता है। पशु भी घण्टे की ध्वनि दश बार सुनते हैं; परन्तु मनुष्य उनको गिनते हैं और बुद्धि के द्वारा जान लेते हैं कि अब दश बज गये। मनुष्य में यह विशेष ज्ञान होता है। और पशुओं में सामान्य ज्ञान होता है। यह विशेष ज्ञान ही मनुष्य और पशुओं में भेद करता है। आहार, निद्रा, भय और मैथुन दोनों में समान हैं। इस विशेष ज्ञान के द्वारा मनुष्य भलाई-बुराई, उचित-अनुचित, कर्तव्याकर्तव्य की पहचान करता है।

 

ज्ञान के चार स्रोत

प्रेरणा, उद्घाटन, अन्तर्दृष्टि, सहज प्रवृत्ति, हर्षोद्रेक, दिव्य दृष्टि और परमानन्द-ये ज्ञान के सात स्तर हैं। ज्ञान के चार स्रोत हैं : सहज प्रवृत्ति, विवेक, अन्तःप्रज्ञा और ब्रह्मज्ञान

सहज प्रवृत्ति

 

जब आपकी दाहिनी भुजा पर चींटी रेंगती है, तो बायीं भुजा उसे हटाने के लिए दाहिनी भुजा की ओर स्वयं ही उठ जाती है, इसके लिए मन को तर्क-वितर्क नहीं करना पड़ता। जब आप अपने पैर के सामने बिच्छू को देखते हैं तो आप स्वतः ही पैर हटा लेते हैं। यह सहज प्रवृत्ति की अथवा अविवेचित क्रियाएँ हैं। सड़क पार करते मोटरगाड़ियों से आप अपने शरीर को इस सहज प्रवृत्ति के द्वारा कैसे बचा लेते हैं? ऐसी यान्त्रिक गति में कोई वृत्ति काम नहीं करती।

 

सहज प्रवृत्ति पशुओं और पक्षियों में पायी जाती हैं। पक्षियों के अन्दर का अहंकार दिव्य प्रवाह अथवा दिव्य लीला में हस्तक्षेप नहीं करता। इसलिए उनका सहज प्रवृत्ति से किया हुआ कार्य मनुष्यों के कार्य से भी अधिक पूर्ण होता है। पक्षियों के उत्कृष्ट घोंसले निर्माण करने के सुन्दर कार्य को क्या आपने नहीं देखा है।

 

विवेक

विवेक सहज प्रवृत्ति से उच्चतर वस्तु है और केवल मनुष्यों में ही पाया जाता है। विवेक बहुत-सी बातों को इकट्ठा करके उनमें से समान धर्म का नियम निकाल देता है, कारण से कार्य तक और कार्य से कारण तक युक्ति सोचता है तथा आधार वाक्यों से निष्कर्ष तक, प्रतिज्ञप्ति से उपपत्ति तक युक्ति करता है। यह निष्कर्ष निकालता, निश्चय करता तथा निर्णय देता है। यह आपको सुरक्षित रूप से अन्तःप्रज्ञा के द्वार तक पहुँचाता है।

 

विश्वास, तर्क, ज्ञान और श्रद्धाये चार महत्त्वपूर्ण मानसिक क्रियाएँ हैं। पहले आपको किसी चिकित्सक में विश्वास होता है और आप उसके पास रोग निदान तथा चिकित्सा के लिए जाते हैं। वह आपकी भली-भाँति परीक्षा करके कुछ औषधि निश्चित करता है। आप औषधि का सेवन करते हैं और तर्क करते हैं कि 'अमुक रोग है। डाक्टर ने लौह और जम्बेय (आयोडाइड) दिया है। लोहे से रक्त में वृद्धि होगी और जम्बेय (आयोडाइड) लसीकाओं को उद्दीप्त तथा यकृत के स्राव तथा वृद्धि का अवशोषण करेगा। अतः मुझे औषधि लेनी चाहिए।' इन औषधियों का क्रम पूरा करने से रोग एक माह में दूर हो जाता है, तब आपको उस औषधि की क्षमता तथा चिकित्सक की निपुणता का ज्ञान होता है, आपकी उसमें पूर्ण श्रद्धा हो जाती है और आप अपने मित्रों को भी उसी चिकित्सक तथा उसकी औषधि की अनुशंसा करते हैं।

 

अन्तःप्रज्ञा

 

अन्तःप्रज्ञा आध्यात्मिक अनुभव होता है। कारण शरीर की क्रियाओं द्वारा प्राप्त हुआ ज्ञान अन्तःप्रज्ञा है। श्री अरविन्द इसे अतिमानसिक चेतना कहते हैं। वहाँ आपको समाधि में सत्य का अपरोक्ष ज्ञान होता है। आपको एक ही झलक में पदार्थ का ज्ञान हो। जाता है। प्रोफेसर वर्गसन ने फ्रांस में अन्तःप्रज्ञा का प्रचार किया ताकि लोग समझ जायें। कि बुद्धि के अतिरिक्त भी ज्ञान का अन्य उच्च स्रोत है। अन्तःप्रज्ञा में तर्क-विधि नहीं होती। यह प्रत्यक्ष होता है। अन्तः प्रज्ञा विवेक से अतीत होती है; परन्तु इसका खण्डन नहीं करती। बुद्धि मनुष्य को अन्तःप्रज्ञा की ड्योढ़ी तक पहुँचा कर लौट जाती है।

 

अन्तःप्रज्ञा दिव्य दृष्टि या ज्ञान चक्षु है। अन्तः प्रज्ञा के द्वारा सत्य की कौंध तथा झलक आया करती है। प्रेरणा, प्रकटन और आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टिये सब अन्तःप्रज्ञा के द्वारा प्राप्त होते हैं।

 

आत्म-ज्ञान

 

आत्म-ज्ञान अन्तः प्रज्ञा से ऊपर है। यह कारण शरीर का भी अतिक्रमण कर जाता है। यह ज्ञान का उच्चतम स्वरूप है। एकमात्र सत्य यही है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद-

मन और शरीर

 

शरीर मन के उपभोग के लिए एक साँचा है

 

इन्द्रियों सहित शरीर मन के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। स्थूल शरीर मन की बाह्य अभिव्यक्ति है। मन इस स्थूल शरीर का सूक्ष्म रूप है। शरीर का ध्यान करते-करते मन स्वयं शरीर बन जाता है और इसमें फँस कर दुःख भोगता है। समस्त शरीरों का स्थान मन में ही होता है। यदि मन शक्तिहीन हो जाता है, तो शरीर भी बुद्धि के कार्य प्रकट नहीं करता। क्या बिना पानी के उद्यान बना रह सकता है? मन ही सारे कार्य करता है और शरीरों में श्रेष्ठतम है। मानसिक क्रियाएँ ही वास्तविक क्रियाएँ होती हैं। लिंग शरीर में मन बड़ी द्रुत गति से सारे कार्य करता है और इसी से अस्थिर रहता है; परन्तु स्थूल शरीर कुछ भी नहीं जानता और निष्क्रिय रहता है। स्थूल शरीर के नाश हो जाने पर मन अपनी रुचि के अनुसार शीघ्र ही नवीन शरीर धारण कर लेता है। ऐसा लगता है कि मन ने अपने उपयोग के लिए तथा अपनी शक्ति को प्रकट करने के लिए और उसके द्वारा पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के मार्ग से संसार के नाना प्रकार के अनुभव प्राप्त करने के लिए भौतिक शरीर का एक साँचा-सा बनाया हुआ है।

 

विचार शरीर को बनाते हैं

 

वस्तुतः केवल मन के कर्म ही कर्म हैं, शरीर के नहीं। हमारे अपने विचार, मनोदशाएँ, विश्वास और मनोभावनाएँ ही विषयीकृत हो कर हमारे शरीर बनते हैं और नेत्रों को दृष्टिगोचर होते हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है कि जैसा विचार मन में प्रवेश करता है, उसी के अनुसार शरीर का प्रत्येक कोशाणु वृद्धि या हास को प्राप्त होता है, जीवन या मृत्यु का प्रणोदन प्राप्त करता है; क्योंकि जिस विषय का आप अधिक चिन्तन किया करते हैं, उसकी ही प्रतिकृति आप बनते जाते हैं।

 

जब मन किसी विचार-विशेष की ओर मुड़ता है और उसमें देर तक संलग्न रहता है, तो पदार्थ का एक स्पन्दन-विशेष चलता है और जितनी बार यह स्पन्दन होता रहता है, वह स्वभाव का रूप लेने के लिए, स्वयंचालित बनने के लिए उतना ही अधिक अपनी पुनरावृत्ति करता है। शरीर मन का अनुगामी होता है और इसके परिवर्तनों का अनुकरण करता है। यदि आप अपने विचार संकेन्द्रित करते हैं तो नेत्र निश्चल हो जाते हैं।

 

विचार के प्रेरक परिवर्तन से आपके मनोमय शरीर में स्पन्दन होता है और जब यह स्पन्दन स्थूल शरीर में पहुँचता है तो मस्तिष्क के स्नायविक द्रव्य में क्रिया-संचालन करता है। इस क्रिया से नाड़ियों के कोशाणुओं में अनेक वैद्युत और रासायनिक परिवर्तन होते हैं। विचार-क्रिया से ही ये सब परिवर्तन हुआ करते हैं।

मुख मन का अभिसूचक है

 

मन इस स्थूल शरीर का सूक्ष्म रूप है। स्थूल शरीर मन की बाह्य अभिव्यक्ति है। इसलिए जब मन रुक्ष हो जाता है, तो शरीर भी रुक्ष हो जाता है। जैसे रुक्ष रूप-रंग वाला व्यक्ति दूसरों के अन्दर दया और प्रेम उत्पन्न नहीं कर सकता, ऐसे ही रुक्षमनस्क मनुष्य भी अन्य मनुष्यों में दया और प्रेम पैदा नहीं कर सकता मन अपनी अनेक अवस्थाओं की छाया मुख पर विशेष रूप से प्रकट करता है, जिसको एक बुद्धिमान् मनुष्य बड़ी सुगमता से पहचान लेता है जैसे जिद्वा उदर की अभिसूचक है, वैसे ही मुख मन का अभिसूचक है।

 

शरीर मन का अनुगामी है। यदि मन में ऊंचाई से गिरने का विचार उत्पन्न होता है, तो शरीर तुरन्त ही इसके लिए तैयार हो जाता है और बाहरी चिह्न प्रकट करता है। भय, चिन्ता, शोक, प्रसन्नता, हर्ष, क्रोधये सब ही मुख पर अपने-अपने विविध चिह्न अंकित कर देते हैं।

 

नेत्र आत्मा के वातायन रूप हैं, जो मनोदशा तथा मनःस्थिति बताते हैं। आँखों में एक तार यन्त्र होता है जो विश्वासघात, धूर्तता, धोखा, शुद्ध प्रेम, दया, भक्ति, उदासी, शोक, घृणा, प्रसाद, शान्ति, एकरसता, स्वास्थ्य, शक्ति, बल और सौन्दर्य का सन्देश बाहर सम्प्रेषित करता है।

 

यदि आपमें अन्य व्यक्तियों की दृष्टि पहचानने की कला है तो आप तुरन्त उनके मन का हाल भी जान सकते हैं। यदि आप किसी मनुष्य की मुख-मुद्रा, वाणी और आचरण को सतर्क हो कर देखें, तो आप उसके मन के प्रमुख विचार को जान सकते हैं। इसके लिए थोड़ा-सा साहस, चातुर्य, बुद्धि और अनुभव की आवश्यकता है।

 

आपके विचार और भाव मुख पर अपना गहरा प्रभाव उत्पन्न करते हैं। मन के अन्दर क्या हो रहा है, उसको बताने के लिए मुख विज्ञापन-पट के समान है। आप अपने विचारों को मुख से कठिनता से छिपा सकते हैं आप मूर्खतावश भले ही सोचते रहें कि आपने विचारों को गुप्त रखा हुआ है। कामुकता, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, प्रतिकार, घृणा आदि के विचार तत्काल ही आपके मुख पर अपनी गहरी छाप प्रकट करते हैं। मुख बहुत विश्वासपात्र लेख-पत्र - रक्षक और बहुत सूक्ष्म-ग्राही निबन्धक-यन्त्र है, जो आपके मन में गतिमान विचारों को निबद्ध करता है। किसी विशेष समय में मन तथा उसकी अन्तर्वस्तु के स्वरूप को प्रकट करने के लिए मुख एक परिमार्जित दर्पण है।

 

जो यह समझता है कि वह अपने विचारों को छिपा सकता है, वह प्रथम श्रेणी का मूर्ख है। उसकी दशा उस शुतुरमुर्ग जैसी है जो शिकारियों से पीछा किये जाने पर रेत के नीचे अपना शिर छिपा लेता है और सोचता है कि उसे कोई देख नहीं सकता।

 

आपका मुख ग्रामोफोन रेकार्ड के समान है जो कुछ आप विचार करते हैं, वह तत्काल आपके मुख पर अंकित हो जाता है। प्रत्येक दूषित विचार मन के भाव को मुख-मण्डल पर अंकित करने के लिए छेनी या सूई का काम करता है। घृणा, क्रोध, कामवासना, ईर्ष्या, प्रतिकार आदि दूषित विचारों द्वारा किये हुए व्रणों और व्रण चिह्नों - से आपका मुख आच्छादित है। आपके मुख पर के व्रण-चिह्नों के लक्षणों से मैं आपके मन की दशा को तुरन्त पहचान सकता हूँ। मैं आपके मन के रोग का तुरन्त निदान कर सकता हूँ।

 

मन और शरीर का पारस्परिक प्रभाव

 

मन और शरीर का अति घनिष्ठ सम्बन्ध है। मन शरीर पर प्रभाव डालता है तथा - शरीर मन पर प्रतिक्रिया करता है। मन का प्रभाव शरीर पर होता है। शुद्ध स्वस्थ मन हो तो शरीर भी स्वस्थ होता है। मन में विवाद होने से शरीर दुर्बल हो जाता है। ऐसे ही शरीर का प्रभाव मन पर होता है। स्वस्थ तथा सबल शरीर हो तो मन भी स्वस्थ तथा सबल होता है। यदि शरीर रुग्ण है तो मन भी रूग्ण होता है। पेट में दर्द हो तो मन पर उदासी छा जाती है।

 

बुरे विचार रोगों के मुख्य कारण हैं

 

शरीर को आक्रान्त करने वाले रोगों का मुख्य कारण दुर्विचार होता है। जो कुछ आपके मन में होगा, वही आपके स्थूल शरीर में प्रकट हो जायेगा। यदि किसी मनुष्य के प्रति कोई भी दुर्भावना या कटुता हो तो वह शरीर पर तत्काल अपना प्रभाव डालती है और उसमें किसी--किसी प्रकार का रोग पैदा कर देती है। तीव्र भावावेश, घृणा, दीर्घकालीन कटु ईर्ष्या, क्षयकारी चिन्ता और क्रोध के आवेश से शरीर के कोशाणु नष्ट होते हैं और हृदय, यकृत, वृक्क (गुरदा), तिल्ली और पेट के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। क्रोध के तीव्र आवेश मस्तिष्क के कोशाणुओं के लिए विशेष हानिकारक होते हैं, रक्त में विषैले रासायनिक पदार्थ पैदा कर देते हैं, एक व्यापक आघात पहुँचाते और उदासी पैदा करते हैं, अन्ननाल में आमाशय-रस, पित्त और अन्य पाचक रसों के स्राव को दबा देते हैं, आपकी शक्ति और ओजस्विता का शोषण करते, असामयिक ही वृद्धावस्था उत्पन्न करते और जीवन का हास करते हैं।

 

जब मन में उद्वेग हो तो शरीर भी अद्विग्न हो जाता है। मन और शरीर का सदा साथ है। जब दोनों में उद्वेग पैदा होता है तो प्राण की गति गलत दिशा में हो जाती है। उस समय यह सारे शरीर में निरन्तर तथा समान रूप से चलने की जगह विषम गति से चलता है। तब भोजन भी ठीक-ठीक नहीं पचता जिससे रोग पैदा हो जाते हैं। यदि मुख्य कारण को हटा दिया जाये तो सारे रोग स्वयं ही मिट जायेंगे।

 

शारीरिक रोग तो गौण रोग कहलाते हैं, जब कि मन को प्रभावित करने वाली वासनाएँ मानसिक अथवा मुख्य रोग कहलाती है। यदि कुविचारों को नष्ट कर दिया जाये तो शरीर के सभी रोग जाते रहेंगे। मन के निर्मल होने से शरीर स्वस्थ होता है। इसलिए अपनी विचार-क्रिया और विचारों के चुनाव में सावधान रहें। सदा उन्नत, सौम्य, प्रेमपूर्ण और कृपापूर्ण विचार बनाये रहें। आपको एकरसता, स्वास्थ्य और सौन्दर्य मिलेंगे।

 

शोचनीय व्यवहार

 

यह बड़े खेद का विषय है कि संसार के अधिसंख्य चिकित्सक अपने रोगियों को लाभ पहुँचाने के स्थान पर हानि ही अधिक करते हैं। वे अपने रोगियों से उनके रोग के स्वरूप को बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं। वे उनके मन में सब प्रकार से काल्पनिक भय भर देते हैं। वे संकेतों की शक्ति और रोगियों के मन पर उसके प्रभाव को नहीं जानते। उनके मन में लोभ भरा हुआ होता है, धनवान् बन जाने की वासना मूलबद्ध होती है, वे रोगियों से यथा-सम्भव अधिक-से-अधिक धन प्राप्त करने का पूरा प्रयत्न करते हैं। यदि वे रोगी को कहें, 'यह रोग तो कुछ भी नहीं है, मैं आपको थोड़े से घण्टों में ही स्वस्थ कर दूँगा' तो उनको अधिक पैसा कौन देगा? वे रोगियों को झूठे संकेत देते हैं—'यह बड़ा भयानक रोग है, असाध्य रोग है। तुम्हारे फेफड़ों में खतरनाक विष या रोगाणु छिपा हुआ है।' चिकित्सक द्वारा दिये गये झूठे संकेत से उत्पन्न इन काल्पनिक भय के कारण बेचारा रोगी निद्रा रहित रात्रियाँ बिताता है। वह प्रतिक्षण सोचता है- “मैं किसी भी क्षण मर जाऊँगा। डाक्टर ने कहा है कि मेरा रोग भयानक और असाध्य है।" वह खिन्न जीवन घसीटता है। चिन्ता और भय नित्य ही रक्त में लाल कीटाणु लाखों की संख्या में नष्ट कर देते हैं। डाक्टर ऐसे झूठे संकेत व्यवसाय में अपना कौशल और निपुणता दिखाने के लिए भी दिया करते हैं।

 

सब अनिष्टों का मूल

 

यह मिथ्या कल्पना ही कि आप शरीर हैं, सब अनिष्टों का मूल है। गलत विचार करने के कारण आप अपने को शरीर मानते हैं, जिससे देहाध्यास पैदा होता है। आप शरीर में आसक्त हो जाते हैं। यह अभिमान है। फिर ममता आती है। आप अपने को पत्नी, पुत्र तथा घर से अभिन्न समझने लगते हैं। यह तादात्म्यता अथवा आसक्ति बन्धन, दुःख और संकट लाती है। जब युद्ध में लाखों जर्मन मारे गये तो आप कभी नहीं रोये। क्यों? क्योंकि उनमें आपकी एकात्मता या आसक्ति नहीं थी। परन्तु जब आपका पुत्र मर जाता है, तो आसक्ति या ममता के कारण आप बड़ी कातरता से रोते हैं। 'मेरा' शब्द से मन में बड़ा विचित्र प्रभाव होता है। 'घोड़ा मर गया' और 'मेरा घोड़ा मर गया' – इन दोनों वाक्यों को सुन कर मन पर दो प्रकार का प्रभाव होता है। इनके भेद को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।

दुःख केवल मन में है

 

जब तक आप अपने मन से अपना सम्बन्ध रखते हैं, तभी तक दुःख मिलता है। नींद में वेदना नहीं रहती। यदि आपकी पीठ पर तीव्र पीड़ायुक्त सूजन हो तो रात्रि में सो जाने के पश्चात् आपको वेदना का अनुभव नहीं होता। केवल उसी समय जब कि मन नाड़ियों और चिन्तन द्वारा पीड़ित अंग के साथ सम्बद्ध होता है, आपको वेदना का अनुभव प्राप्त होता है। जब क्लोरोफार्म आदि के प्रयोग से मन का सम्बन्ध शरीर से नहीं रहता तो वेदना का अनुभव नहीं होता। अत्यन्त हर्ष की घड़ियों में तीव्र वेदना बिलकुल बन्द हो जाती है, क्योंकि मन दुःख के स्थान, शरीर से हटा लिया जाता है। यदि आप सचेत हो कर इच्छापूर्वक मन को ईश्वर या किसी अन्य आकर्षक पदार्थ पर लगा कर पीड़ित अंग से हटा सकें तो जाग्रत अवस्था में भी आपको वेदना का अनुभव नहीं होगा। यदि आपकी दृढ़ इच्छा-शक्ति या बलवती तितिक्षा होगी, तो भी आपको वेदना का अनुभव नहीं होगा। किसी दुःख या रोग का निरन्तर चिन्तन करते रहने से आप अपने दुःख को बढ़ाते ही हैं। दुःख तो मन में होता है। आत्मा आनन्दस्वरूप है।

 

शरीर पर नियन्त्रण हेतु मन पर विजय

 

अधिकतर मनुष्यों के मन पर शरीर का प्रभुत्व अधिक होता है। उनका मन परिपक्व नहीं होता, इसलिए अन्नमय कोश में ही रहता है। विज्ञानमय कोश (बुद्धि) की वृद्धि करें और इसके द्वारा मनोमय-कोश (मन) का निग्रह करें। विज्ञानमय कोश की वृद्धि और पुष्टि गूढ़ विचार तथा तर्क, सुव्यवस्थित ध्यान-क्रिया, ब्रह्म-चिन्तन तथा उपनिषदों, योगवासिष्ठ और ब्रह्मसूत्रों के स्वाध्याय द्वारा होती है।

 

मन का संयम करने से शरीर का भी पूर्ण संयम हो जाता है। शरीर मन की छाया है। यह मन का तैयार किया हुआ साँचा है जिसमें वह अपने को अभिव्यक्त करता है। जब आप मन को जीत लेते हैं, तब शरीर आपका दास हो जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद-

मन, प्राण और कुण्डलिनी

 

प्राण : मन का ओवरकोट

 

संसार में दो मुख्य तत्त्व है मन और प्राण जब-जब प्राण की गति होती है, तभी मन की गति होती है। नाशिका के बाहर श्वास जाने पर भी मन श्वास के साथ बाहर निकलता है। प्राण मन का ओवरकोट है। प्राण अन्न को पचाता, इसको रस और रक्त में बदलता और उसे मस्तिष्क तथा मन में भेजता है। ऐसा होने पर ही मन सोच सकता और ब्रह्म-विचार कर सकता है। मन का जीवन विचार-निर्माण करने वाले सूक्ष्म आत्मिक प्राण के स्पन्दन से ही बना रहता है।

 

प्राण स्थूल है। मन सूक्ष्म है। मन पाँचों तन्मात्राओं के सात्त्विक अंश के पंचीकृत रूप से बना है। प्राण इनके राजसिक अंश के पंचीकृत रूप से बना है। यही कारण है कि मन प्राण से भी अधिक सूक्ष्म है।

 

प्राणमय कोश स्थूल शरीर से अधिक सूक्ष्म है। यह अन्नमय कोश को आच्छादित करता है और उससे अधिक विस्तृत है। मनोमय कोश प्राणमय कोश से भी अधिक सूक्ष्म और विस्तृत है। किसी मनुष्य पर भौतिक प्रभाव डालने के लिए आपको उसके शरीर का स्पर्श करना पड़ता है; परन्तु उसे अपना प्राण आप दूर खड़े रह कर भी केवल 'पासों' के द्वारा ही दे सकते हैं; क्योंकि प्राण स्थूल शरीर से अधिक सूक्ष्म है। आप विचार-शक्ति द्वारा किसी मनुष्य पर मानसिक प्रभाव डाल सकते हैं, चाहे वह आपसे हजारों मील दूर रहता हो; क्योंकि मानसिक शक्ति प्राण से सूक्ष्मतर है ।।

 

प्राण और मन अन्योन्याश्रित हैं

 

प्राण और मन का सम्बन्ध आधार और आधेय का है। इन दोनों का सम्बन्ध ऐसा है, जैसा सुगन्धि और फूल का या तेल और तिलों का। यदि दोनों में से एक भी नष्ट हो जाये तो दूसरे का अस्तित्व नहीं रहेगा। यदि मन और प्राण का अस्तित्व रहे तो विचार उत्पन्न ही नहीं होंगे। दोनों के नाश से मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी।

 

एकाग्रता और निरोध मन की दो अवस्थाएँ हैं। स्पन्द और निरोध प्राण की दो अवस्थाएँ हैं। जब मन एकाग्र हो जाता है तो प्राण की स्पन्दावस्था स्वयं ही हो जाती है। यदि शुद्ध सत्त्वगुण के द्वारा मन को निर्मल कर दिया जाये तो सारे शरीर में प्राण की गति स्वच्छन्द हो जाती है और भोजन भली प्रकार पच जाता है।

 

 

मन, प्राण और वीर्य

 

मन, प्राण और वीर्य एक ही सम्बन्ध-सूत्र में बँधे हैं। यदि इनमें से एक का भी संयम हो जाता है तो शेष दोनों का संयम बड़ी सुगमता से हो जाता है। हठयोगी प्राण का निग्रह करने का प्रयत्न करते हैं और राजयोगी मन का संयम करते हैं। ज्ञानयोगियों की साधना बुद्धि और इच्छा-शक्ति से आरम्भ होती है।

 

प्राणायाम के लाभ

 

प्राणायाम से आप मनोबल को बढ़ा सकते हैं और विचार-निग्रह तथा विचार-संस्कृति का विकास भी कर सकते हैं। इससे धारणा और ध्यान में सहायता मिलती है, मन स्थिर हो जाता है तथा रजोगुण और तमोगुण दूर हो जाते हैं। वह मन के कमल को जला देता है।

 

प्राणायाम द्वारा मन स्थूल पदार्थों से सूक्ष्म की ओर जाता है; इसलिए काम वासना का निग्रह करने के लिए प्राणायाम को अच्छा नियन्त्रक माना गया है। जब कभी भी कोई दूषित विचार आपके मन को शुब्ध करे तो तुरन्त पद्मासन या सिद्धासन में बैठ जायें और प्राणायाम करने लगें। कुविचार आपको तुरन्त ही छोड़ देगा।

 

मन से प्राण की वरिष्ठता

 

दृष्टि वाणी से अधिक आन्तरिक होती है; क्योंकि साधारणतया दृष्टि बिना किसी विरोध के सूचना देती है। इसी प्रकार श्रवण शक्ति दृष्टि से अधिक आन्तरिक है, क्योंकि आँख भले ही धोखा दे जाये (जैसेसीपी को चाँदी देखना), परन्तु कान अस्तित्वहीन शब्द कभी नहीं सुनता। इसी प्रकार कान भी मन के अवधान की सहायता से क्रिया करता है और मन प्राण के ऊपर आश्रित रहता है। इसलिए प्राण सबसे आन्तरिक है; वही ब्रह्म है।

 

छान्दोग्योपनिषद् में एक दृशन्त दिया हुआ है जिससे इस बात को समझने में आसानी होगी।तत्पश्चात् मन ने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष प्रवास करने के अनन्तर फिर लौट कर इन्द्रियों से पूछा- 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सकी?' उन्होंने कहा- 'जिस प्रकार बच्चे, जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राण से प्राणन-क्रिया करते, वाणी से बोलते, नेत्र से देखते और कान से सुनते हुए जीवित रहते हैं। उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' यह सुन कर मन ने शरीर में प्रवेश किया। तदनन्तर प्राण से मन ने कहा—'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं आयतन हो। लोक में इन्द्रिय को मन नहीं कहते, परन्तु 'प्राण' ऐसा कहते हैं; क्योंकि वह प्राण ही है” (छान्दोग्योपनिषद् : --११,१४,१५ ) इस दृष्टान्त से यह प्रकट होता है कि प्राण मन तथा अन्य इन्द्रियों से श्रेष्ठ है। वस्तुतः किसी प्रकार का विवाद नहीं था।

 

 

मन और कुण्डलिनी

 

कुण्डलिनी शक्ति, पृष्ठवंश के अन्त में मूलाधार चक्र के अन्दर नीचे को मुख कर साढ़े तीन बल दिये सर्पिणी के रूप में प्रसुप्त पड़ी रहती है। यह कुण्डलिनी प्राण से सम्बद्ध है और प्राण का मन से सम्बन्ध है। एक वेदान्ती भी कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करके ही ज्ञान-निष्ठा प्राप्त कर सकता है। चाहे राजयोग हो, भक्तियोग हो अथवा ज्ञानयोग हो, इस आद्य शक्ति को जाग्रत किये बिना अतिचेतनावस्था या समाधि सम्भव नहीं है।

 

कुण्डलिनी शक्ति तभी जाग्रत हो सकती है, जब मन वास्तव में कामनाओं तथा वासनाओं से मुक्त हो जाता है। शक्ति-चालन या अश्विनी मुद्रा, ताड़न और प्रचारण- ये सब कुण्डलिनी को जाग्रत करने में सहायक होते हैं। महावेध कुण्डलिनी को और ऊपर ले जाने में सहायक होता है। जब कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत हो जाती है तो मन प्राण और जीव के साथ सुषुम्ना में प्रवेश कर जाता है और सारा प्रत्यक्ष दर्शन चिदाकाश में ही होता है। कुण्डलिनी के जाग्रत होने पर मन प्राण और अग्नि के सहित मेरुरज्जु में स्थित सुषुम्ना नाड़ी अथवा ब्रह्म-नाड़ी के द्वारा ऊपर को जाने लगता है। योगी भौतिक (स्थूल) चेतना से मुक्त हो जाता है। उसके बाह्य स्थूल अनुभव बन्द हो जाते हैं। कुण्डलिनी जब प्रथम बार जाग्रत होती है तो योगी को छह प्रकार के अल्पकालिक अनुभव होते हैं अर्थात् आनन्द, कम्पन, उद्भव ( शरीर का पृथ्वी के ऊपर उठ जाना), घूर्णा (दिव्योन्माद में शरीर का झूमना), निद्रा और मूर्च्छा। कुण्डलिनी को जाग्रत करके उसे कपाल में सहस्रार चक्र में ले जाना होता है।

 

जब कुण्डलिनी एक चक्र से दूसरे चक्र में जाती है तो मन की परतें एक के बाद एक खुलती जाती हैं। योगी प्रत्येक नये चक्र पर पृथक् प्रकार का आनन्द अनुभव करता है। उसे भाँति-भाँति के अनुभव और शक्तियाँ प्राप्त होते हैं तथा पाँच तत्त्वों पर वश्यता प्राप्त होती है। वह संसार को सूक्ष्म रूप में देखता है तथा सूक्ष्म जगत् के अनेक प्रकार के प्रारूपों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है। जब कुण्डलिनी सहस्रार चक्र में प्रवेश करती है तो योगी चिदाकाश में रहता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद-

मन और आहार

 

आहारशुद्धी सत्त्वशुद्धिः

सत्वशुद्धौ धुवा स्मृतिः

स्मृतिलाभे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ।।

 

- आहार-शुद्धि होने पर अन्तःकरण की शुद्धि होती है; अन्तःकरण की शुद्धि होने पर निश्चल स्मृति होती है तथा स्मृति की प्राप्ति होने पर सम्पूर्ण ग्रन्थियों की निवृत्ति हो जाती है। (छान्दोग्योपनिषद् : -२६- )

 

मन भोजन से बना है

 

जो भोजन हम करते हैं, उससे मन बनता है। आहार का सूक्ष्मतम अंश हृदय में पहुँचता है और वहाँ से हिता-नाड़ी में प्रवेश करके वाक्-इन्द्रिय-समूह को बनाता है। इस प्रकार आहार से वर्धित मन भौतिक है और जैसा वैशेषिक मानते हैं, नित्य नहीं है।

 

उपनिषद्-वेत्ता शास्त्रज्ञों का विश्वास था कि मन की बनावट आहार पर निर्भर रहती है।खाया हुआ अन्न तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो अत्यन्त स्थूल भाग होता है वह मल हो जाता है, जो मध्यम भाग है वह मांस हो जाता है, और जो अत्यन्त सूक्ष्म भाग होता है वह मन हो जाता है” (छान्दोग्योपनिषद् : --)

 

"मथे जाते हुए दही का जो सूक्ष्मतम भाग होता है वह ऊपर इकट्ठा होता है, वह नवनीत होता है। उसी प्रकार खाये हुए अन्न का जो सूक्ष्मतम अंश होता है, वह सम्यक् प्रकार से ऊपर जाता है, वह मन होता है" (छान्दोग्योपनिषद् : --,) हमें पता लगता है कि परवर्ती भगवद्गीता-काल में भी सात्त्विक, राजस और तामसतीनों प्रकार के स्वभावों के कारण तीनों भिन्न-भिन्न प्रकार का भोजन ही समझा जाता था (भगवद्गीता १७८ तथा १० )

 

मन की कोटि भोजन की कोटि पर निर्भर करती है

 

भोजन का मन के साथ सीधा तथा घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा मन के गठन में यह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सात्त्विक आहार से मन शान्त होता है तथा राजसिक भोजन से मन में उत्तेजना होती है। मांसाहारी शेर और दुर्वा चुगने वाली गाय के स्वभावों के भेद देखिए आप नित्य स्पष्ट रूप से देखते हैं कि भोजन का मन पर कैसा महत्त्वपूर्ण प्रभाव होता है। भारी, राजसी और अपाच्य भोजन करने पर मन का निग्रह बड़ा कठिन हो जाता है। मन भागता, विचरण करता तथा बन्दर की भाँति सदा उछल-कूद करता रहता है। मदिरा मन के अन्दर अत्यधिक उत्तेजना उत्पन्न करती है।

 

ध्यान में भोजन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। ध्यान के लिए भोजन हलका, सात्विक और पुष्टिकारक होना चाहिए। शरीर अन्नमय है। इसी अन्नमय कोश में भैरवी चक्र है। भैरवी चक्र माया का नाम है। दूध, फल आदि हलका सात्त्विक भोजन मन को विष्णु चक्र की ओर, और फिर वहाँ से बड़ी सुगमता से निर्विकल्प समाधि की ओर ले जाता है।

 

जब मन का स्वरूप हमारे भोजन के स्वरूप पर निर्भर करता है तो ध्यान-परायण जीवन-यापन करने वाले साधकों तथा संसार में रह कर आध्यात्मिक जीवन यापन में प्रयत्नशील गृहस्थों के हित में शुद्ध सात्त्विक भोजन-शैली पर जोर देना समुन्नत नैतिकता के लिए स्वाभाविक ही है। इसीलिए श्रद्धेय सनत्कुमार ने नारद का मल घुल जाने के बाद ही उनको मोक्ष मार्ग बताया था। अन्धकार से परे ले जाने वाले मार्ग की खोज भोजन की शुद्धि में ही करनी चाहिए; क्योंकि आहार-शुद्धि से मन की शुद्धि स्वतः ही हो जाती है।

 

हानिकारक भोजन

 

भिन्न-भिन्न भोजन मस्तिष्क के नाना विभागों में भिन्न-भिन्न प्रभाव उत्पन्न करते हैं। मसालेदार पकवान, खट्टे पदार्थ, उड़द, प्याज, लहसुन, चाय, शराब, मछली, मांस, राई, तेल इत्यादि कामवर्धक हैं; अतः ये त्याज्य हैं। साधकों को ये पदार्थ प्रत्येक अवस्था में त्यागने चाहिए। जिज्ञासु को मांस, मछली और मद्य का नितान्त त्याग कर देना चाहिए; क्योंकि ये पदार्थ मन को स्थूल बनाते हैं और उसमें उत्तेजना उत्पन्न करते हैं। भारी भोजन से तन्द्रा और आलस्य आता है। चाय छोड़ देनी चाहिए; क्योंकि इससे वीर्य नष्ट होता है। चीनी सामान्य परिमाण में खानी चाहिए। यदि बिलकुल छोड़ दी जाये तो अच्छा है।

 

साधना में सहायक भोजन

 

दूध, फल, बादाम, मिश्री, मक्खन, ताजी जई, रात में भिगोई हुई चिनाई, रोटी आदि भोजन ध्यान करने में सहायक है। तेड़ एक प्रकार का कन्दमूल, जो ब्रह्मपुरी, बहिगुहा और हिमालय के अन्य भागों में बहुत मिलता है बड़ा सात्विक भोजन है। इससे ध्यान में सहायता मिलती है मेरे मित्र स्वामी पुरुषोत्तमानन्द जी ऋषिकेश से ची मील दूर प्रसिद्ध वसिष्ठगुहा में रह कर कुछ दिनों तक वहाँ इस पर ही निर्वाह करते थे। साधकों के लिए सोंठ का सेवन अच्छा होता है। इसका सेवन दूध के साथ किया जा सकता है। इससे मन में ताजगी रहती है और पाचन-क्रिया को सहायता मिलती है। योगी इसका सेवन प्रायः करते हैं। त्रिफला का जल भी योगी पिया करते हैं। इससे कोडबद्धता और स्वप्नदोष दूर हो कर शरीर को शीतलता मिलती है। हरीतकी भी चबायी जा सकती है। इससे वीर्य की रक्षा और स्वप्न-दोष का निग्रह होता है। उबाले या भूने हुए बिना नमक के आलू भी अच्छे होते हैं।

 

चेतावनी

 

आकस्मिक परिवर्तन की अपेक्षा क्रमिक सुधार अच्छा होता है। किसी बात में, विशेषकर भोजन में कोई परिवर्तन एकाएक नहीं करना चाहिए। धीरे-धीरे परिवर्तन करें। आपका शरीर परिवर्तन को बिना किसी रुकावट के अपना लेगा।प्रकृति में सहसा कोई परिवर्तन नहीं हुआ करता।

 

जो राजयोगी मन का संयम करना चाहता है, उसको विलासिता और तीव्र तामसिक तप दोनों ही अतियों से बचना चाहिए। अधिक उपवास करने से अत्यधिक दुर्बलता बढ़ती है। आप कुछ भी साधना नहीं कर सकते। आप विचार नहीं कर सकते। आप युक्ति नहीं सोच सकते। जो भी भोजन आपके अनुकूल हो, वही खायें। इसके लिए अधिक सोच-विचार करें। जो भी आहार सुगमता से प्राप्य और आपके शरीर के अनुकूल हो, वही हानिरहित है।

 

भोजन कब छोड़ा जा सकता है ?

 

भोजन केवल शक्ति का समूह है जल और वायु से भी शक्ति मिलती है। बिना भोजन के कई दिनों तक जीवित रहा जा सकता है; परन्तु वायु के बिना थोड़ी देर भी जीवित नहीं रहा जा सकता। ऑक्सीजन इससे भी अधिक आवश्यक है। शरीर धारण करने के लिए शक्ति की आवश्यकता है। यदि इस शक्ति को आप किसी और स्रोत से प्राप्त कर सकें, तो आप भोजन बिलकुल ही छोड़ सकते हैं। योगी लोग ब्रहारन्ध्र में से स्रवित अमृत का पान करते हैं और इस प्रकार बिना भोजन के शरीर धारण करते हैं। ज्ञानी को अपनी शुद्ध और दृढ इच्छाशक्ति से वह शक्ति मिलती है और बिना भोजन के शरीर धारण कर सकता है। यदि आप विश्व शक्ति अथवा सूर्य मण्डल की शक्ति से बल ग्रहण करने की क्रिया जानते हैं तो आप इस शक्ति के आधार पर चाहे जितने काल तक बिना भोजन के शरीर धारण कर सकते हैं।

 

मधुकरी भिक्षा का रहस्य

 

मन भोजन के सूक्ष्म सार से बनता है। इसलिए जिन मनुष्यों से भोजन प्राप्त होता है, उनसे मन आसक्त हो जाता है। यदि आप कुछ महीनों तक अपने किसी मित्र के साथ रहें और उसी का भोजन करें तो उस अन्नदाता मित्र में आपका मन आसक्त हो जायेगा। यही कारण है कि संन्यासियों को तीन या पाँच घरों से मधुकरी भिक्षा पर निर्वाह करने का नियम है। वह आसक्ति से बचता है तथा एक गाँव से दूसरे गाँव में फिरता है। परिव्राजक- जीवन में उसे एक ग्राम में एक दिन से अधिक ठहरने का निषेध है। जो परमहंस इस प्रकार की भिक्षा पर रहता है, उसका मन गंगाजल के समान निर्मल हो जाता है और वह सब प्रकार की आसक्तियों से मुक्त रहता है। आसक्ति बन्धन लाती है। आसक्ति मृत्यु है। आसक्ति सारी बुराइयों की जड़ है।

 

 

 

परिच्छेद-

अवस्था - त्रय

 

मन की तीन अवस्थाएँ होती हैजाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति

 

जाग्रत अवस्था

 

जीव जब तक मन के विकारों द्वारा विभिन्न बाह्य पदार्थों से सम्बद्ध रहता है तब तक वह जाग्रत कहलाता है। यह इन पदार्थों को समझता है तथा अपने को स्थूल देह से अभिन्न मानता है; जो उन बाह्य पदार्थों में से एक है। जाग्रत अवस्था में मन मस्तिष्क में निवास - करता है।

 

स्वप्न- अवस्था

 

जब मन हिता नाड़ी में प्रवेश करता है, जो कि हृदय में से निकल कर इसके चारों ओर बड़ी झिल्ली को घेरे हुए है और बाल के सहस्रांश के समान सूक्ष्म है और सफेद, काले, पीले और लाल रंगों के सूक्ष्म अंशों से पूर्ण है, उस समय जीव स्वप्नावस्था को भोगता है।

 

स्वप्न में इन्द्रियाँ वैसे ही अलग फेंक दी जाती हैं जैसे आप सोने से पूर्व अपने भारी वस्त्रों को उतार फेंकते हैं। स्वप्नावस्था में इन्द्रियाँ शान्त होती हैं और मन में लीन हो जाती हैं। स्वप्न में केवल मन ही क्रिया करता है, स्वतन्त्र और अबाध गति से कार्य करता है। स्वप्न में पृथ्वी, समुद्र, घोड़ा और हाथी कुछ भी नहीं रहता; परन्तु मन अपने ही शरीर में से जाग्रत अवस्था में प्राप्त हुई सामग्री से सब पदार्थ बना लेता है। मन स्वयं ही मधु मक्षिका, पुष्प, पर्वत, हाथी, घोड़ा, नदी आदि के रूप में बन जाता है। यही कर्ता है - और यही पदार्थ भी बन जाता है। द्रष्टा और दृश्य दोनों एक होते हैं।

 

जाग्रत अवस्था में प्राप्त हुए आकार ही स्वप्नावस्था के पदार्थ बन जाते हैं और केवल स्वप्न के द्रष्टा के लिए उनका बाहरी तत्त्व रहता है। जब बाह्य पदार्थों के संस्कारों से विकार होता है, तो जीव स्वप्न देखता है। स्वप्न-दर्शन एक आन्तरिक अंग से होता है। जिसे 'मनस्' कहते हैं। इसीलिए इसे मानसिक दर्शन कहते हैं।

 

प्रत्येक मनुष्य का अपना न्यारा ही मानसिक संसार और न्यारे ही स्वप्न के पदार्थ होते हैं। युवती स्त्री के स्वप्न के पदार्थ उसका पति और नवजात शिशु होते हैं। उसके मन में से ही दो दृढ मूर्तियाँ बनी रहती है। निरन्तर विचार करते रहने से इन मूर्तियों की प्रबलता बढ़ जाती है। डाक्टर के स्वप्न के पदार्थ उसके रोगी और बैरिस्टर (विधिवक्ता) के स्वप्न के पदार्थ उसके मुवक्किल होते हैं।

 

मनुष्यों में स्वभाव का भेद हुआ करता है। कुछ को स्वप्न बहुत कम आते हैं। आत्म ज्ञानी को कभी स्वप्न नहीं होता।

 

जाग्रत तथा स्वप्न अवस्थाओं में भेद

 

जाग्रत और स्वप्न अवस्था का अन्तर यह है कि जाग्रत अवस्था में मन बाह्य पदार्थों के अंगों का आश्रय लेता है और स्वप्नावस्था में यह अपने ही अंक (रूपरेखा) बनाता है और उनको भोगता है; परन्तु निश्चय ही इसके लिए भी जाग्रत काल से सामग्री लेता है।

 

जाग्रत अवस्था में मन से स्वतन्त्र रूप से पदार्थों की स्थिति रहती है। इसीलिए सो कर उठते ही आप प्रतिदिन वही पदार्थ देखते हैं, परन्तु स्वप्न में पदार्थों की स्थिति उतने ही काल तक रहती है जब तक मन वहाँ रहता है, जब तक स्वप्न टिका रहता है; क्योंकि स्वप्न के पदार्थ मन की कल्पना से बने हैं। मन अपने ही शरीर में से जाग्रत अवस्था में प्राप्त हुई सामग्री से सब पदार्थ बना लेता है। जब मन जाग्रत अवस्था में आता है तो स्वप्न के सारे पदार्थ तुम हो जाते हैं।

 

जाग्रत अवस्था एक दीर्घ स्वप्न ही है

 

आप स्वप्न देखते हैं कि आप राजा है, आप सारे राजोचित ऐश्वर्यों का उपभोग करते हैं। ज्यों ही आप जागते हैं, सब कुछ लुप्त हो जाता है। परन्तु आप इस हानि से दुःख नहीं मानते; क्योंकि आप जानते हैं कि स्वप्न के सारे पदार्थ मिथ्या होते हैं। जाग्रत अवस्था में भी यदि आपकी इसी भाव में निष्ठा हो जाये कि संसार एक मिथ्या भ्रम है तो आपको दुःख का अनुभव नहीं होगा। जब आप परम तत्त्व (ब्रह्म) को जान लेंगे तो जाग्रत- -चेतना भी स्वप्न के समान मिथ्या प्रतीत होने लगेगी। जाग्रत अवस्था दीर्घ स्वप्न ही है। जाग्रत अवस्था की चेतना स्वप्न या सुषुप्ति में नहीं रहती; इसलिए यह भ्रममूलक है। तस्व पदार्थ सारी अवस्थाओं में वर्तमान रहता है। मेरे बच्चे जागो और ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त करो!

 

स्वप्न- जाग्रत

 

मनोराज्य (मनसूबे गढ़ना), स्वप्न के पदार्थों और घटनाओं को याद करना, सुदूर जाग्रत अवस्था की स्मृतिये सब स्वप्न - जाग्रत (अर्थात् जाग्रत अवस्था में स्वप्न देखने के समान) हैं।

 

 

सुषुप्त अवस्था

 

जब मन पुरीतत्-नाड़ी में प्रवेश करता है तो सुषुप्ति-अवस्था होती है। दृढ सुषुप्ति में अनुभवमूलक चेतना रुक जाती है। इस अवस्था में मन की क्रिया भी नहीं रहती और राग-द्वेष भी नहीं रहते। मन अपने अधिष्ठान में लय हो जाता है। यह मनोलय कहलाता है। इन्द्रियों की भी क्रिया नहीं रहती।

 

यह दृढ सुषुप्ति की अवस्था अतिशय अभाव की दशा नहीं है; क्योंकि यदि ऐसा मान लिया जाये तो जागने पर सुखपूर्ण निद्रा की स्मृति कैसे हो सकती है? आत्मा की सत्ता रहती है और उसमें कोई अनुभव नहीं रहता। चेतना अविरल (धारावाही) रहती है। जागने पर आप जानते हैं कि आपका अस्तित्व सुषुप्ति में भी बना रहता है। आप समझते हैं कि आप सर्वदा विद्यमान रहते हैं। वेदान्ती अपना शास्त्र-निर्माण इस सुषुप्ति अवस्था के ही चारों ओर करते हैं। यह अवस्था उनकी अद्वैत दशा का संकेत देती है। वेदान्त को भली प्रकार समझ लेने के वास्ते जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं को भली प्रकार जानना चाहिए।

 

बृहदारण्यक उपनिषद् (--१६) में अजातशत्रु ने गार्ग्य को समझाते हुए कहा है- "वह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब सोया हुआ था, तब कहीं था? यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब यह सोया हुआ था, उस समय यह विज्ञान के द्वारा इन इन्द्रियों की ज्ञान-शक्ति को ग्रहण कर यह जो हृदय के भीतर आकाश है, उसमें शयन करता है। जिस समय यह ज्ञान-शक्तियों को ग्रहण कर लेता है, उस समय इस पुरुष का 'स्वपिति' नाम होता है। उस समय घ्राणेन्द्रिय लीन रहती है, वाणी लीन रहती है, चक्षु लीन रहता है, श्रोत्र लीन रहता है और मन भी लीन रहता है।"

 

जब स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और तद्भव विकारों के पृथक् हो जाने पर यह मन आत्मा में लीन हो कर सुषुप्तावस्था में रहता है, भासता है तो इसको सोया हुआ कहते हैं। "जिस अवस्था में यह पुरुष 'सोता है' ऐसा कहा जाता है; उस समय सौम्य ! यह सत् से सम्पन्न हो जाता हैयह अपने स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। इसी से इसे 'स्वपिति' ऐसा कहते हैं; क्योंकि उस समय यह स्व-अपने को ही प्राप्त हो जाता है" (छान्दोग्योपनिषद् : --)

 

शंकराचार्य कहते हैं कि मन की क्रिया से उत्पन्न द्वैत-भाव केवल जाग्रत और स्वप्न अवस्था में ही रहते हैं; सुषुप्ति-काल में नहीं रहते। जाग्रत और स्वप्न दोनों अवस्थाओं में विचार, नाम और रूप साथ-ही-साथ आते हैं; अतः संसार भी प्रकट होता है। स्वप्न-रहित सुषुप्ति में कुछ भी भाव नहीं रहते और इसलिए संसार भी नहीं रहता। मन ही भेद, पार्थक्य और द्वैत-भाव उत्पन्न किया करता है। यदि सत्त्व की वृद्धि करके और अहंग्रह - उपासना द्वारा इस अशुद्ध मन का नाश कर दिया जाये तो आपको सर्वात्म भाव का अनुभव होने लगेगा। इसके लिए साधक को दृढ़ और सतत प्रयत्न करना चाहिए।

 

 

तीनों अवस्थाओं में चेतना की श्रेणियाँ

 

निद्रा में आपके मनोमय या प्राणमय शरीर में सदा कुछ--कुछ क्रिया चलती रहती है। वही क्रिया जाग्रत अवस्था में भी प्रकट हो जाती है। उदाहरणार्थ कोई-कोई अपने को पूर्ण बनाने को बहुत उत्सुक रहते हैं और इसके लिए दिन में बड़ा प्रयत्न करते हैं। वे रात को सो जाते हैं और जब अगले दिन जागते हैं तो पूर्व-दिन के प्रयत्नों के लाभ का उन्हें कोई चिह्न नहीं मिलता। उन्हें उतना ही प्रयत्न फिर प्रारम्भ से करना पड़ता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जो 1-कुछ प्रयत्न और सफलता प्राप्त हुई थी, वह जीव की जाग्रत अवस्था से ही सम्बन्ध रखती थी, सूक्ष्म तथा प्रसुप्त अवयवों तक तो उसका प्रभाव पहुँचा ही नहीं था। निद्रा में वे इन सूक्ष्म अवयवों के वश में पड़ गये और कठोर श्रम से जो कुछ सफलता जाग्रत अवस्था में प्राप्त की थी, वह सब इन अज्ञात सूक्ष्म अवयवों ने हड़प ली।

 

सचेत रहें। दिन में और रात्रि में भी सदा चेत रखें। पहले चेतना प्राप्त करनी होगी। उसके बाद वश्यता प्राप्त होगी। आप लोगों में से जिनको स्वप्न की बात याद रहती है, उन्हें ऐसा अनुभव भी हुआ होगा कि कभी-कभी स्वप्न देखते हुए भी आपको यही मालूम होता है कि यह स्वप्न ही है। आप जानते हैं कि यह अनुभव स्थूल जगत् से सम्बन्ध नहीं रखता। यदि एक बार आपको मालूम हो जाये तो आप वहाँ भौतिक जगत् का सा व्यवहार कर सकते हैं। स्वप्नावस्था में भी आप अपनी चैतन्य इच्छा-शक्ति का प्रयोग करके अपने स्वप्नानुभव की गति बदल सकते हैं और जैसे-जैसे आप विशेष रूप से चैतन्य होते जायेंगे, आप अपने ऊपर उतना ही संयम रात्रि में भी रख सकेंगे जितना दिन में, शायद रात्रि में ज्यादा संयम रख सकेंगे, क्योंकि रात्रि में आप शरीर के बन्धन से मुक्त रहते हैं। शरीर-सम्बन्धी चेतन क्रियाओं का संयम करना अधिक कठिन होता है; क्योंकि ये क्रियाएँ मन और प्राण की क्रियाओं से अधिक दृढ़ और अपरिवर्तनशील होती हैं। रात्रि में आपके प्राण-सम्बन्धी और मानसिक विभाग विशेष क्रियाशील होते हैं। दिन में उन पर विशेष प्रतिबन्ध लगा होता है; क्योंकि स्थूल शरीर की चेतना मानसिक और प्राणाम चेतना का स्थान स्वतः ले लेती है सुषुप्ति में यह प्रतिबन्ध हट जाता है और मानसिक तथा प्राणमय क्रियाएँ विशेष रूप से प्रकट हो जाती हैं।

 

सुषुप्ति और अद्वैत-निष्ठा में प्रभेद

 

"सुषुमि में मन सूक्ष्म दशा में रहता है। वृत्तियों की भी सूक्ष्म दशा हो जाती है। परन्तु अद्वैत-निष्ठा में मन होता ही नहीं, संसार नहीं रहता तथा संसार ब्रह्म में लीन प्रपंचोपशमम्) रहता है" (माण्डूक्योपनिषद् )

 

तीनों अवस्थाओं में परमात्मा के विविध रूप

 

समस्त प्राणियों के अन्दर रहने वाले परमात्मा के चार रूप हैं जो विश्व, तैजस्, प्राज्ञ और तुरीय बहलाते हैं। विश्व का निवास दक्षिण नेत्र, तैजसू का मन ('मनस्यन्तस्तुतैजसः 'माण्डूक्योपनिषद् पर गौडपाद कारिका) और प्राज्ञ का विकाश है। इनके भोग्य-पदार्थ तीन प्रकार के स्थूल, सूक्ष्म और आनन्द तथा इनकी तृप्ति भी तीन प्रकार की हैं- "भोगास्त्रिधा तृप्तिस्त्रिधा "

 

जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्तांग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः " ओंकार का प्रथम चरण वैश्वानर है-जिसका स्थान जाग्रत अवस्था है, जिसकी प्रशा वस्तुनिह है, जिसके सात अंग और उन्नीस मुख हैं और जो स्थूल पदार्थों को भोगता है माण्डुक्योपनिषद् ) वस्तुनिष्ठ मन जाग्रत अवस्था में काम करता है।

 

सात अंग ये हैंद्युलोक शिर है, सूर्य नेत्र है, वायु श्वास है, आकाश कमर है, जल जंघा है, अनि मुख है और पृथ्वी उसके चरण हैं।

 

उन्नीस मुख ये हैं-पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा अन्तःकरण चतुष्टय अर्थात् मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार।

 

"स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्तांग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तमुक् तैजसो द्वितीयः पादः " ओंकार का दूसरा चरण तेज है, जिसका स्थान स्वप्नावस्था है, जिसकी प्रज्ञा आत्मनिष्ठ है, जिसके सात अंग हैं, उन्नीस मुख हैं और जो सूक्ष्म पदार्थों को भोगता है (माण्डूक्योपनिषद् ) स्वप्नावस्था से सम्बद्ध चैतन्य तैजस कहलाता है। यह सूक्ष्म जगत् का भोक्ता है। आत्मनिष्ठ मन और मिथ्या अहंकार स्वप्न में काम करते हैं।

 

"यत्र सुप्तो कंचन कामं कामयते कंचन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः।" ओंकार का तीसरा पद प्राज्ञ है जिसका स्थान सुषुप्ति है, जिसमें सारे भेद एकरूप हो जाते हैं, जो प्रज्ञानघन, आनन्दमय, आनन्द का भोगने वाला और चेतना का द्वार है। यह सुषुप्ति अवस्था है जिसमें सोने वाले को किसी वस्तु की इच्छा नहीं रहती और कोई स्वप्न देखता है ( माण्डूक्योपनिषद् : ) अपनी वासनाओं सहित मन सुषुप्ति-अवस्था में हृदयावस्थित मुख्य प्राण में विश्राम लेता है। सारी वृत्तियों की सूक्ष्मावस्था हो जाती है।

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद-

गुण- त्रय

 

गुण तथा वृत्तियाँ

 

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणये मन के तीन गुण हैं। इन तीनों गुणों के अनुरूप ही मन की तीन वृत्तियाँ होती हैंसत्त्वगुण से उत्पन होने वाली शान्त-वृत्ति, रजोगुण से उत्पन्न होने वाली घोर-वृत्ति और तमोगुण से उत्पन्न होने वाली मूढ-वृत्ति साम्यावस्था शान्त-वृत्ति है, क्रोध घोर-वृत्ति है तथा आलस्य, प्रमाद और तन्द्रा मूढ़-वृत्तियाँ हैं।

 

सत्त्वगुण के लक्षण

 

सत्त्वगुण पवित्रता है, प्रकाश है। सत्त्वगुण मोक्ष-प्राप्ति के लिए अनुकूल शक्ति है। दैवी सम्पत् अर्थात् अभय, शौच, चित्त-शुद्धि आदि गुण आपको मोक्ष दिला सकते हैं। सत्त्वगुण का फल ब्रह्म-विचार अर्थात् सत्य की खोज, सत् और असत् का विवेक होता है।

 

सात्त्विक मन सदा स्थिर रहता है। उसको अन्दर से ही आनन्द मिलता है। वह अनिश्चित काल तक एक ही स्थान पर रह सकता है, व्यक्तियों से दीर्घ काल तक मित्रता रख सकता है, अनेक दिनों तक गीता और योगवासिष्ठ पढ़ सकता है तथा बिना शिकायत किये लगातार वर्षों तक दाल-रोटी खा कर रह सकता है।

 

सात्त्विक क्षणों में जब मन में शुद्ध सात्त्विकता की प्रधानता होती है तो मन मुकुर के निर्मल होने के कारण आप दिव्यात्मा से सम्पर्क में होते हैं। आपको प्रेरणा मिलती है। आप सुन्दर कविताएँ भी करते हैं। उन रचनाओं को सँभाल कर रखें। उन्हें अपनी नोट- बुक में लिख लें।

 

सत्त्वापत्ति मन की वह दशा होती है जिसमें मन सत्त्वगुण से पूर्ण हो जाता है। इसमें भाव-संशुद्धि और सत्त्वसंशुद्धि हो जाती है। यह ज्ञान की चतुर्थ भूमिका है।

 

रजोगुण के लक्षण

रजोगुण प्रतिकूल शक्ति है जो आपको संसार में नीचे घसीट लेती है। आसुरी सम्पत् अर्थात् दम्भ, दर्प, क्रोध आदि दुर्गुण आपको नरक में घसीट सकते हैं। सात्त्विक मन मनुष्य को शान्त और प्रवृत्ति रहित बना देता है। राजसिक मन से मनुष्य अशान्त रहता है। यह उसे निश्चल रहने दे कर काम करने के लिए बाध्य करता है।

 

राजसिक मन सदा नये भोग और विविधता चाहता है। अभी यह किन्हीं मनुष्यों, पदार्थों और स्थानों को पसन्द करता है और थोड़े काल पीछे वह उनसे ऊब जाता है और नये-नये पुरुषों का संग, खाने को नये-नये शाक, पढ़ने को नयी-नयी पुस्तकें और देखने को नये-नये स्थान चाहता है।

 

राजसिक मन सदा संगति और बातचीत चाहता है। ये दो दोष हैं जो मन को अपने लक्ष्य से बहुत दूर हटाते हैं। लोगों की संगति से बच कर अकेले रहना चाहिए और मौन व्रत का पालन करना चाहिए। मौन रहने से आपको शान्ति मिलेगी। बहुत-सा दु: कुसंगति से मिलता है। अपने साथी बनाने में सावधान रहें। आपको अच्छे और सच्चे मित्र बहुत कम मिलेंगे। किसी मित्र को दीर्घ काल तक परीक्षा किये बिना अपना विश्वासपात्र बनायें। ब्रह्म में कोई संगति और कोई वार्ता नहीं है। वह असंग और अशब्द है।

 

राजसिक मन में दूसरों के दोष देखने की प्रवृत्ति होती है। यह उनके किये हुए बुरे कर्मों और अपराधों को भी स्मरण रखता है और उनके अच्छे कर्मों को सहज में भूल जाता है। यह दोनों प्रवृत्तियाँ द्वेष को बढ़ाती हैं और मन में निरन्तर उद्वेग उत्पन्न करती है।

 

सत्त्वगुण से हीन मन ऐसा साधुवृत्त नहीं होता कि वह दूसरों की प्रसन्नता को अपना आनन्द माने; इसलिए सदा घूमता रहता है और क्योंकि इस मन में दूसरों के सद्गुणों से प्रसन्न होने का सौजन्य नहीं होता इसलिए आन्तरिक सन्तोष नहीं होता और क्योंकि यह दूसरों के दुःखों को अपना दुःख नहीं मानता; इसलिए ऐसे मन में दया, संवेदना और सहानुभूति नहीं होती।

 

राजसिक मन वस्तुओं में भेद करके भ्रम-कपट द्वारा नानात्व दिखाता है। सूर्य एक है। चन्द्रमा एक है। आकाश एक है। भाषा के पीछे विचार एक है। सत्यता का भाव एक है। कुछ अन्तर्बाह्य नहीं है। पति और पत्नी हृदय में एक है। सच्चे मित्र हृदय में एक होते हैं। जड़ पदार्थ एक है। शक्ति एक है। सात्त्विक मन एक है। यह मिलाता है। विश्व - महत् एक है। कर्म एक है। धर्म एक है। सत्य एक है। ब्रह्म एक है – “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म "

 

अति-तीव्र रजोगुण सात्त्विकता में बदल जाता है। डाकू रत्नाकर महर्षि वाल्मीकि बन गया। जधाई और मधाई जो अत्यधिक राजसिक थे और श्री गौरांग महाप्रभु पर पत्थर फेंका करते थे, वे ही उनके सर्वप्रथम शिष्य बन गये।

 

सत्त्वगुण का महत्त्व

 

सच्ची मानसिक शान्ति बाहर से नहीं आती। जब मन का संयम हो जाता है और इसके विचारों का निग्रह किया जाता है, तब यह मन में ही उत्पन्न होती है। अपनी इच्छाओं और कामनाओं को रोकने के लिए आपको भारी प्रयत्न करना चाहिए। तभी आपकी कार्य की प्रवृत्ति दमित होगी, आपके विचार शान्त होंगे तथा आपको शान्ति मिलेगी। इसलिए जप, विचार, ध्यान, सत्संग, लघु सात्त्विक आहार, तप और स्वाध्याय के द्वारा सत्त्वगुण की वृद्धि करें।

 

साधारण संसारी मन वाला मनुष्य आत्मा की आन्तरिक पुकार को कदाचित ही सुन सके। उसको आत्म-विचार-सम्बन्धी शुद्ध विचार भी प्राप्त नहीं हो सकते। प्रत्येक सात्त्विक विचार सात्त्विक बुद्धि से उत्पन्न होता है संसारी जनों के सारे विचार मन में ही उपजते हैं। जो निष्काम कर्मयोग का अभ्यास करता है और जिसका मन शुद्ध होता है, उसे ही ईश्वर-सम्बन्धी विचार और ध्यान प्राप्त होने लगते हैं। साधारणतः मन अनेक प्रकार के विलक्षण विचार पैदा कर देता है। यह सबको भ्रम में डाल देता है। यह विचार करने का बहाना भी करता है; परन्तु जब क्रियात्मक अभ्यास की बात आती है तो यह कुछ नहीं करता। यदि आपमें धारणा और ध्यान के अभ्यास का दृढ़ निश्चय हो, इसको स्थिरता से कई महीने तक क्रियात्मक अभ्यास में डाल दें और यदि ईश्वर दर्शन की इच्छा तीव्र हो, तभी आप समझिए कि ये सब प्रकार के विचार आपकी सात्त्विक बुद्धि से ही प्रकट हुए हैं।

 

सारी साधनाओं का ध्येय सत्त्वगुण की वृद्धि और शुद्ध अप्रतिरोध्य इच्छा-शक्ति प्राप्त करना होता है। इसी इच्छा शक्ति से अविद्या की निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति होती है। ईश्वर प्राप्ति का मार्ग सत्वगुण की वृद्धि और दृढ़ तथा शुद्ध इच्छा-शक्ति के द्वारा बहुत सुगम हो जाता है।

 

संसार में भी कुछ थोड़े-से सात्त्विक गुणों वाले पुरुष होते हैं, जिनमें सन्तोष, उदारता, क्षमा आदि सद्गुण होते हैं; परन्तु आध्यात्मिक साधक तो सारे सात्त्विक सद्गुणों को प्राप्त करने के लिए मन को समग्र रूप से उन्नत करने का प्रयत्न करता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद-

मानसिक अवस्थाएँ

 

अकेले कमरे में मौन बैठ जायें और मन में घटने वाली विविध घटनाओं, मानसिक अवस्थाओं, मनोदशाओं, प्रणोदों, आवेगों, तरंगों तथा कल्पनाओं का निरीक्षण करते रहें। आन्तरिक मनोजगत् की सूक्ष्म स्थितियों का निरीक्षण बड़ा ही चित्ताकर्षक होता है।

 

सहज प्रवृत्तियाँ

 

मनुष्यों में और पशुओं में भी दो प्रबल सहज प्रवृत्तियाँ हुआ करती हैं। वे हैंआत्म-परिरक्षण की सहज प्रवृत्ति और प्रजनन की सहज प्रवृत्ति क्षुधा आत्म-परिरक्षण की सहज प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है। कामवासना (मैथुन) प्रजनन की सहज प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है। सहज प्रवृत्ति कर्म के लिए अनैच्छिक प्रेरणा को कहते हैं।

 

अहंकार-युक्त जीव अधिकार, नाम और यश चाहता है। यह चाह आत्म-विवर्धन के लिए होती है। स्वार्थ साधन (शोषण) लोभ है। यह स्वार्थपूर्ण उद्देश्य के लिए उपयोग करना है। निरंकुशता अहंकारपूर्वक शासन करना कहलाता है। जीव दूसरों पर अधिकार प्रयोग करना चाहता है। यह जीव-भावना कहलाती है। उद्योग-धन्धा, व्यवसाय, वाणिज्य आदि का मूल कारण लोभ और आत्म-संरक्षण होता है। यदि आप निरन्तर ब्रह्म-भावना रखना चाहते हैं तो आपको शोषण और निरंकुशता छोड़ देनी चाहिए।

 

एक तृतीय सहज प्रवृत्ति भी होती हैयूथ - वृत्ति स्त्रियाँ पुरुषों के संग रह कर प्रसन्न रहती हैं। पुरुष स्त्रियों के संग रह कर हर्षित होते हैं। इसका मूल कारण प्रजनन की प्रवृत्ति है। एक और भी कारण है। बलवान् पुरुष के संग रह कर दुर्बल मनुष्य भी बल प्राप्त कर लेता है। किन्तु जो मनुष्य ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है, उसे संगति से, विशेषकर स्त्रियों और संसारी मनुष्यों के संग से बचना चाहिए। उसे अकेला रहना चाहिए। इससे वह बहुत बलवान् और दृढ़ हो जायेगा। उसका व्यक्तित्व बहुत शक्तिशाली हो जायेगा। प्रारम्भ में तो अकेले रहने में कठिनाई प्रतीत होती है, भय मालूम होता है। यदि आप अमृतत्व प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको एक-एक करके सारी कठिनाइयों पर विजय पानी होगी। इसका पुरस्कार बहुत बड़ा है। 'ब्रह्मवित् परमाप्नोति' अर्थात् ब्रह्म को जानने वाला परम पद प्राप्त करता है। 'अमृतमश्नुते' – वह अमृतत्वअमरता रूपी अमृत पीता है।

 

 

 

प्रणोद

प्रणोद आकस्मिक प्रेरक शक्ति होते हैं। प्रणोद तीन प्रकार के होते हैं अर्थात् विचार-प्रणोद, वाणी-प्रणोद और कर्म-प्रणोद। मौन से वाणी-प्रणोद रुकता है और ध्यान से मिथ्या विचार और असत्कर्म के प्रणोद रुकते हैं।

 

दो महत्त्वपूर्ण प्रणोद होते हैं। वे हैं काम-प्रणोद और वाणी प्रणोद। प्रणोद और कल्पना में घनिष्ठ सम्बन्ध है। कल्पना प्रणोद उत्पन्न करती है। प्रणोद को विवेक, इच्छा-शक्ति तथा परमात्मा के ध्यान द्वारा रोकना चाहिए।

 

आवेग

 

विचार और इच्छा के मिश्रण से आवेग बनता है। प्रत्येक विचार आवेग से प्रभारित होता है। आवेग वे इच्छाएँ हैं जिनमें विचार का अंश प्रविष्ट रहता है। दूसरे शब्दों में विचार और इच्छा मिल कर आवेग कहलाते हैं। आवेगों के स्पन्दन से शुद्ध मानसिक पदार्थ में उद्वेग होता है और मनुष्य के सभी विचार विक्षुब्ध तथा विकृत हो जाते हैं।

 

एक आवेग इच्छा होती है और एक आवेग भावना होती है। यदि इच्छा-तत्त्व अधिक हो तो आवेग-इच्छा कहलाती है और यदि सुख-तत्त्व अधिक हो तो आवेग भावना कहलाती है।

 

राग और द्वेष मन के दो प्रधान आवेग हैं। अन्य सभी आवेग इन दोनों के अन्तर्गत विभक्त किये जा सकते हैं। आश्चर्य एक मिश्रित आवेग है जिसमें श्लाघा और भय दोनों मिले होते हैं। श्रद्धा भी मिश्रित आवेग है। इसमें विस्मय और सम्मान मिले होते हैं। अमर्ष भी मिश्रित आवेग है जिसमें क्रोध और घृणा मिले होते हैं। प्रबल शत्रु के नीचे स्तर पर खिंच जाते ही घृणा रखने वाले असमर्थ मनुष्य का क्रोध नष्ट हो जाता है।

 

आनन्द मन में एक प्रकार का आवेग है। आनन्द में मन फैलता है। मन में शीतलता रहती है। आनन्द के समय मन में क्या होता है, इसे पाश्चात्य मनोविज्ञानवेत्ता ठीक-ठीक नहीं समझ पाये हैं। साधारण मनुष्य भी इसको नहीं समझ सकते। इस मन में घटने वाली घटना को योगी या ज्ञानी ही जानता है। दुःख में मन सिकुड़ जाता है और मन में अत्यन्त उष्णता पैदा हो जाती है।

 

मनुष्य में बहुत सी भौतिक इच्छाएँ और आवेग पशु-जगत् की इच्छाओं के सदृश होते हैं। क्रोध और मैथुन की प्रवृत्ति पाशविक वृत्तियाँ हैं। असंस्कृत मनुष्यों में ये इच्छाएँ और आवेग जो अपरा प्रकृति में निहित होते हैं, परा प्रकृति को दबा कर प्रबल हो जाते हैं।

 

मन में आवेगों का आना दुर्बलता का परिचायक है। बुद्धि और इच्छा-शक्ति के द्वारा इनका संयम करना चाहिए।

 

आवेगों और प्रणोदों के नियन्त्रण की विधि

जब कभी आवेग और प्रणोद आपको अधिक कष्ट दें, तो उनसे उदासीन हो जाया करें तथा अपने आपसे कहें- "मैं कौन हूँ? मैं मन नहीं हूँ, मैं सर्वव्यापी आत्मा हूँ, शुद्ध सच्चिदानन्द हूँ। मुझ पर आवेगों का क्या प्रभाव हो सकता है? मैं तो निर्लिप्त हूँ। मैं इन आवेगों का साक्षी हूँ। मुझे कोई भी वस्तु आन्दोलित नहीं कर सकती।" विचारों के इन संकेतों को दोहराने से आवेग अपने आप ही नष्ट हो जायेंगे। आवेगों को भगाने का यह ज्ञान-मार्ग योग-मार्ग के बताये हुए मन से जबरदस्ती करने (योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः) से सुगमतर है।

 

भावनाएँ

 

धार्मिक भावना, नैतिक भावना और सौन्दर्य भावनाये तीनों मन की मुख्य भावनाएँ हैं। ये संवेदनाएँ तथा भावनाएँ भ्रामक हैं। ये आत्मा में नहीं होती हैं। ये मन के उत्पन्न किये हुए भ्रम मात्र हैं।

 

भाव

 

भाव एक मानसिक अवस्था है। अंगरेजी के 'मूड' (Mood) शब्द का सच्चा अर्थ 'भाव' से भी पूरी तरह प्रकट नहीं होता। हम कहा करते हैं "मि. नायुडु या मि. एकिन्सन भावयुक्त सज्जन है।" इसका अर्थ है कि वह शीघ्र ही भाव का दास बन जाता है। हम यह भी कहा करते हैं: "अमुक सज्जन अच्छे या प्रसन्न भाव में है। अब मैं थोड़ी-सी बातचीत करने के लिए उसके निकट जा सकता हूँ अथवा वह बड़ी क्रुद्ध दशा में है। इस समय मुझे उससे नहीं मिलना चाहिए।"

 

अँगरेज अपने वार्तालाप में 'मूड' (Mood) शब्द को विस्तृत अर्थों में भी प्रयोग करते हैं। वे कहते हैं- "वह बातचीत करने के भाव में है।" "वह मौन भाव में है।" "वह घृणा के भाव में है।" "वह प्रेम के भाव में है।" "वह स्वार्थ के भाव में है।" "वह ईर्ष्या के भाव में है।" "वह पार्थक्य के भाव में है।" "वह एकत्व के भाव में है।" वेदान्त की परिभाषा में ये सब वृत्तियाँ ही हैं। 'भावना-विज्ञान' (Sciencs of Emotions) प्रसिद्ध लेखक डाक्टर भगवानदास इनको भावनाओं में ही मानते हैं।

 

दो प्रकार के भाव तथा उनके प्रभाव

 

वेदान्त में केवल दो ही प्रकार के भाव हुआ करते हैं-हर्ष और शोक मन में हर्ष और शोक से दो प्रकार के भाव उठा करते हैं। अभी हर्ष है। पाँच मिनट पीछे उदासी होती है। ये प्रवाह बारी-बारी से आते रहते हैं। ये षर्मियों में से हैं। ये दो लहरें हैं जो मनु सागर को क्षुब्ध करती हैं।

 

उदास (निरानन्द) भावयुक्त पुरुष दूसरे मनुष्यों से तथा स्थूल जगत् के आकाश भण्डार से अपनी ओर उदास पदार्थ और निरानन्द विचार आकृष्ट किया करते हैं। आशा, विश्वास और प्रसन्नवृत्तियुक्त पुरुष दूसरों से भी इसी प्रकार के विचार अपनी ओर खींचते हैं। वे सदा अपने प्रयत्न में सफल हुआ करते हैं।

 

उदासी, क्रोध, घृणा आदि ऋणात्मक भावों वाले मनुष्य दूसरों को निश्चित ही हानि पहुँचाते हैं। वे दूसरों पर प्रभाव डालते हैं और उनमें भी ये विनाशकारी वृत्तियाँ जगा देते हैं। वे अपराधी हैं। विचार-जगत् की वे बहुत हानि करते हैं। प्रसन्नचित्त मनुष्य समाज के लिए प्रसाद रूप हैं। वे दूसरों में भी प्रसन्नता लाते हैं।

 

जैसे कोई सुन्दरी युवती जिसके गाल या नाक पर पका हुआ गन्दा फोड़ा हो तो वह अपना मुँह ढक लेती है और समाज में दूसरों से मिलने के लिए बाहर निकलना पसन्द नहीं करती; इसी प्रकार जब आपके मन में उदासी, घृणा या ईर्ष्या के भाव हों तो आपको बाहर निकलना और अपने मित्रों तथा अन्य लोगों से मिलना नहीं चाहिए, क्योंकि आप दूसरों में भी यही भाव भर देंगे। आप समाज के लिए भय की वस्तु हैं।

 

ऋणात्मक भावों के नियन्त्रण की विधि

 

साधकों को चाहिए कि उदासी को प्रार्थना, ध्यान, आनन्द के विचार, प्रणवोच्चार, सद्विचार और दिव्य भजनों के गायन द्वारा दूर करें। निराशाजनक उदासी के भाव को कभी स्थान नहीं देना चाहिए। भाव सहित का उच्चारण करें और कहें "मैं आनन्दमय है। मेरा स्वरूप आनन्द है।उदासी दूर हो जायेगी। इस उदासी के अनेक कारण होते हैं। बादलों का दिन, दुर्जनों की संगति, अपच, सूक्ष्मात्माओं का प्रभाव, उदासी के पुराने संस्कारों का पुनरुद्भव ये सब उदासी लाते हैं।

 

जब आपको बोलने की इच्छा हो, एकदम मौन का अभ्यास करें। यह बोलने की इच्छा की प्रतिरोधक औषधि है। जब आपके मन में घृणा का भाव हो तो इसके विरोधी प्रेम के सद्गुण की वृद्धि करें। घृणा का भाव शीघ्र दूर हो जायेगा। जब आपके मन में स्वार्थपूर्ण भाव हो तो एकदम निःस्वार्थ कार्य प्रारम्भ कर दें। जब आपके मन में पार्थक्य का भाव आये तो सेवा, प्रेम, कृपा और क्षमा के द्वारा दूसरों के साथ मिलने की चेष्टा करें। जब आप आलस्य के भाव में हों तो तुरन्त कोई--कोई फुरतीला काम - यथा बगीचा लगाना, पानी खींचना, दौड़ना, तेज चलना या साइकिल चलाना आदि करने लगे।

 

जीवन्मुक्त पुरुष सारे भावों से सर्वथा रहित होता है। उसने समस्त भावों का पूर्ण संयम कर लिया होता है। वह इन सबका स्वामी बन गया होता है। आत्मा में कोई भी भाव नहीं हुआ करता। यह (आत्मा) शुद्ध चेतना है। उससे सारूप्य प्राप्त करें। आप सारे भावों को सुगमता से नष्ट कर सकते हैं।

 

 

 

ध्यानशील भाव

जो ध्यान का अभ्यास करते हैं, उनमें एक अच्छा भाव हुआ करता है जिसे 'ध्यानशील भाव' कहते हैं। जो धारणा और ध्यान का अभ्यास करते हैं, उनको इस प्रकार के भाव का अनुभव होता है। जब यह भाव प्रकट हो, आपको अवश्यमेव तुरन्त ही पढ़ना, लिखना, बातचीत करना आदि सब कुछ छोड़ कर तत्काल नित्य के आसन में बैठ कर ध्यान करना आरम्भ कर देना चाहिए। ध्यान बिना किसी प्रयास के स्वयमेव लगने लगेगा। यह भाव ध्यान के अभ्यास (निदिध्यासन) के लिए बहुत अनुकूल होता है। इस प्रकार के भाव की उत्सुकता से प्रतीक्षा करें। यदि प्रकाश से बापा होती हो तो खिड़कियाँ बन्द कर दें या उनमें परदे लगा दें। ध्यान के नवीन अभ्यासियों के लिए अँधेरा कमरा अनुकूल होता है।

 

तरंगें तथा कल्पनाएँ

 

'Whim' को संस्कृत में तरंग कहते हैं। तरंग का अर्थ मौज है। मन में अचानक एक परिवर्तन आता है जिसे तरंग कहते हैं। तरंग मन में उठने वाली मौजें हैं। वे जल्दी-जल्दी उठती और टूटती हैं। वे आपको इधर-उधर घसीटती हैं। वे आपको अशान्त करती हैं।

 

प्रत्येक मनुष्य को कुछ--कुछ सनक होती है जब कोई व्यक्ति सनक के सामने झुक जाता है तो हम प्राय: कहते हैं, “अमुक व्यक्ति सनकी है।" तरंग को लहर भी कहते हैं। खब्त सनक का अतिशयोक्तिपूर्ण रूप है। यदि व्यक्ति सनक से दब जाता है तो यह उसे उधर से उस नचाती है। सनक के द्वारा किये हुए कर्म से क्लेश मिलता है। मन आपको सनक के द्वारा धोखे में डालता है। इसे बुद्धि के द्वारा रोकना चाहिए।

 

सनक के वश में हो कर कार्य करें। कर्म विवेक और बुद्धि-सहित करना चाहिए। जैसे ही सनक उत्पन्न हो, वैसे ही विचार द्वारा उसको नष्ट कर दें। सदा प्रश्न करें कि प्रस्तावित कार्य से आपको आनन्द और आत्म-कल्याण मिलेगा या नहीं ? सतर्क रहें। 'Whim' (तरंग) शब्द सदा 'Fancy' (कल्पना) शब्द के साथ प्रयोग होता है। हम कहा करते हैं : *Whims and Fancies' कल्पना से हलकी या कम प्रभाव वाली बौद्धिक प्रक्रिया का एक रूप ‘Fancy (ललित कल्पना) है। इस मानसिक शक्ति के कारण नवीन तथा आनन्दप्रद विचार Fancy कहलाता है। Fancy कल्पना का एक रूप है। भावुकता कवि की सहायक भले ही हो; परन्तु साधक को इससे लाभ नहीं हो सकता। ध्यान करने में यह एक बाधा है। इससे हवाई किले बनते हैं। इसे विचार और विवेक से रोकना चाहिए।

 

जैसे सागर के ऊपर छोटी और बड़ी लहरें उठती हैं, इसी प्रकार मन रूपी समुद्र में क्षुद्र वासनाएँ और मिथ्या संकल्प उठा करते हैं। अनेक प्रकार की सनक छोटी-छोटी लहरें हैं। आपको इनसे भय नहीं करना चाहिए। ये आती हैं और शीघ्र ही चली जाती हैं। आपको बलवती लहरों अर्थात् असत् संकल्पों से सतर्क रहना चाहिए। बलवान् विचारों को सद्विचार के दृढ़ अभ्यास और तर्क द्वारा निकाल देना चाहिए।

 

कल्पना

 

प्रकृति मन में कभी शून्यता नहीं होने देती। यदि एक चिन्ता समाप्त हो जाती है तो दूसरी तुरन्त प्रकट हो जाती है। मन कभी भी रिक्त नहीं रह सकता है। इसमें अनन्त पूर्वधारणाएँ होती है।

 

मन के कार्यों को ध्यानपूर्वक देखें। यह लुभाता है, अतिरंजित करता है, बात को बढ़ाता है, मोहित करता है और मिथ्या कल्पनाओं, मिथ्या भव मिथ्या चिन्ताओं और मिथ्या पूर्वाभासों के द्वारा अनावश्यक भयभीत करता है। आपको लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करने से हटाने के लिए यह पूरा प्रयास करता है।।

 

मन की सूक्ष्म क्रियाओं को पूर्णतः समझने के लिए मैंने कई वर्ष लगा दिये। अनुमान-शक्ति के द्वारा मन विनाश करता है। अनेक प्रकार के अनुमानगत भय, बात को बढ़ा कर बताना, निर्मूल बात को गढ़ना, मानसिक कल्पना से नाटक की-सी घटनाएँ घटाना, मनोराज्य बनानायह सब कार्य अनुमान - शक्ति करती है। मन की कल्पना शक्ति के कारण पूर्णतः स्वस्थ मनुष्य को भी कोई--कोई कल्पित रोग होता ही है। कल्पित भय के कारण बहुत-सी शक्ति क्षीण हो जाती है।

 

जब मन युद्ध-कार्य में पूर्ण रूप से संलग्न होता है तो योद्धा को गोली लगने के भारी आघात का अनुमान नहीं होता। उसे अधिक परिमाण में रक्त बह जाने का भी ज्ञान नहीं होता। उसमें आवेश होता है। उतने समय के लिए वह अपने शरीर से भी बेसुध होता है। जब वह आवेश बीत जाता है, जब वह अपने वस्त्रों पर खून के धब्बे देखता है या जब उसका कोई मित्र उसकी टाँग के घाव को उसे दिखाता है, तब उसे इसका ज्ञान होता है। तब उसे थोड़ा-सा भय प्रतीत होता है। तब अनुमान शक्ति विनाश करती है और वह अचेत हो कर गिर पड़ता है। अनुमान-शक्ति हमेशा बात को बढ़ा दिया करती है।

 

किसी मनुष्य में कोई तनिक-सी दुर्बलता (त्रुटि) हो तो जब वह आपका शत्रु बनता है, आप तुरन्त ही उसकी त्रुटियों और दोषों को वामन अवतार की भाँति बढ़ा देते हैं और आप बहुत से दोषों का उसमें आरोप कर देते हैं अथवा बहुत से दूसरे दोष और दुर्बलताएँ गढ़ते हैं। यह आपकी दूषित कल्पना के कारण होता है।

 

जब कभी दो मित्रों में दुर्भावना के कारण मन-मुटाव हो जाता है तो उन दोनों के मन नयी-नयी बातें गढ़ने लगते हैं और बात को बढ़ा देते हैं। एक-दूसरे के दोष ढूँढ़ने का स्वभाव बढ़ जाता है। इन भंग मैत्री वाले दोनों मित्रों के वक्तव्यों से सत्य बात तक पहुँचना कठिन हो जाता है। उनकी बातें उनकी अपनी आन्तरिक भावनाओं के रंग में पगी हुई होती हैं। यहाँ भी अनुमान-शक्ति विनाश करती है। माया मन और इसकी अनुमान - शक्ति के द्वारा विनाश करती है।

मन प्रलोभन दिखाता है और उगता है। किसी को अपना पक्का मित्र सोचें और वही विचार सत्य में परिणत हो जाता है। उसी को अपना शत्रु मान लें तो मन उसी भाव को सत्य में परिणत कर देता है। जिसने मन के कार्य को समझ लिया, वही सचमुच सुखी है।

अब हम आपको मन का नाटक समझाते हैं। मन की रीति देखिए। अपने मित्रों से वार्तालाप करते हुए कभी आपका मन व्यर्थ कल्पना करता है कि आपके मित्र के भावों को ठेस पहुँची है। तब यह अनावश्यक भावना में बहुत शक्ति का अपव्यय कर देता है। आप सोचते हैं, "कल सबेरे मैं उससे किस प्रकार मिल सकता | शायद वह मुझसे नाराज हो।" अगले दिन प्रातःकाल जब आप उससे मिलते हैं तो कुछ भी नहीं होता। आपका मित्र आनन्दप्रद वार्तालाप प्रारम्भ कर देता है और आपसे सस्मित मिलता है। आपको आश्चर्य होता है जब वार्तालाप का रंग कुछ और ही बदल जाता है। जब महामारी (प्लेग) का प्रकोप होता है तो गृहस्थी मनुष्य विचार करता है, “यदि अब मेरी पत्नी को प्लेग हो गया और वह मर गयी तो मैं क्या करूँगा, मेरे छह बच्चे हैं।यह उसकी वृथा कल्पना होती है। कुछ भी नहीं होता। कभी-कभी जब श्रीरामेश्वरम् के निकट समुद्र के ऊपर के पम्बन पुल पर रेलगाड़ी मन्द गति से चलती है तो मन सोचता है, “यदि अब पुल टूट जाये तो मेरी क्या दशा होगी। मेरे तो टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।" उसी समय भय का संचार हो जाता है। इनके ही समान हजारों रीतियों से मन नाटक के दृश्य गढ़ा करता है। इसमें कल्पना-शक्ति का मुख्य भाग होता है।

 

जब आपका मन गम्भीरता से एकाग्र होता है तो दो घण्टे का समय पाँच मिनट के समान प्रतीत होता है। यदि मन चंचल और अस्थिर हो तो आधा घण्टा भी दो घण्टे के समान हो जाता है। यह प्रत्येक मनुष्य के अनुभव की बात है। स्वप्न में भी बहुत-सी घटनाएँ जो पचास वर्षों में पूरी होने वाली हैं, दश मिनट में हो जाती हैं। मन की लीला के द्वारा एक कल्प क्षणमात्र प्रतीत होता है और क्षणमात्र समय कल्पसम बीतता है। समय भी मन का रूप है। यह काल शक्ति है। यह भी अन्य पदार्थों की भाँति भ्रममूलक है।

 

मन की छलना से कभी-कभी एक फरलांग भी बहुत दूर प्रतीत होता है और कभी-कभी तीन मील बहुत निकट लगते हैं। आपने नित्य के व्यवहार में यह तो देखा होगा।

 

मैं और रूमानियाँ के ब्रह्मचारी मरीचि चैतन्य, एम. ., पीएच. डी. स्वर्गाश्रम की कैलास कुटिया में भोजन करने बैठे आलू की झोल एक प्लेट आयी। मरीचि को - भारतीय भोजन-सामग्री का ज्ञान नहीं था। उसने उसे मांस का शोरबा समझा। उसका रूप-रंग ठीक वैसा ही था। यह मानसिक प्रक्षेपण का एक दृष्टान्त है। मरीचि ने अपने मन में स्थित संस्कारों से आलू के शोल में मांस के शोरबे का प्रक्षेपण किया। मानसिक प्रक्षेपण सब झूठे होते हैं।

 

कल्पना का अर्थ है उद्भावना। मन की कल्पना सच्ची योगमाया है। आपको इन विविध कल्पनाओं को नष्ट करना होगा। सारी आध्यात्मिक साधनाओं का यही ध्येय है। तब आप निर्विकल्प आनन्द अवस्था में स्थित हो जायेंगे। निष्काम कर्मयोग के द्वारा चित्त शुद्धि हो जाने पर इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए शुद्ध निवृत्ति की आवश्यकता होती है।

 

 

 

स्वभाव तथा उसको रूपान्तरित करने की विधि

 

अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ यथा अवटुग्रन्थि, बाल्य-ग्रन्थि, कर्ण-मूल-ग्रन्थि, शंकुरूप-ग्रन्थि, अधिवृक्क-ग्रन्थि वाहिनीहीन होती हैं। इनमें स्राव बनता रहता है। यह स्राव-पदार्थ सीधा ही रक्त में मिल जाता है। इस द्रव पदार्थ का प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव बनाने में मुख्य भाग होता है। मनुष्य का स्वभाव उसकी समीपवर्ती परिस्थिति, उसकी शिक्षा और उसके अनुभव से विशेषकर रूपान्तरित हो सकता है; परन्तु इसका बिलकुल रूपान्तरण असम्भव है। इसी कारण गीता (-३३) में बताया गया है: "सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि "ज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद-

मानसिक शक्ति

 

मानव मन की शक्ति

 

यदि आप मन की मन के ऊपर, पदार्थ के ऊपर तथा मानव शरीर के ऊपर क्रियाओं को ध्यानपूर्वक देखें तो आपको ज्ञात होगा कि प्रत्येक मनुष्य स्वयं एक शक्ति है। अपनी वासनाओं पर प्रभुत्व और आत्म-निरोध के द्वारा आपको अन्तर्निहित शक्ति का विकास करना होगा। जब मन इतना शक्तिशाली है तो उस आत्मा की महिमा का क्या कहना है जो सब वस्तुओं का भण्डार हैं, जो शक्ति, ज्ञान तथा आनन्द का केन्द्रीभूत असीम तथा कभी चुकने वाला भण्डार है जिससे यह तुच्छ मन अपना प्रकाश और बल प्राप्त करता है।

 

मन की शक्ति का दृष्टान्त

 

जब कभी कोई अग्निकाण्ड अथवा अन्य घटना हो जाती है, आप कितने सचेत और फुरतीले हो जाते हैं! क्या आप अद्भुत शक्तियों का प्रदर्शन नहीं करते? आप ऊँची दीवार को लाँघ जाते हैं, बहुत से बच्चों को बचा लेते हैं तथा अग्नि में से दौड़ कर बहुत-सी वस्तुएँ ले आते हैं। सारी मानसिक शक्तियाँ अर्थात् स्मृति, कल्पना, इच्छा इत्यादि अपना कार्य करती हैं। शौर्य, निर्भीकता, दया तथा अनेक अन्य सद्गुण आप प्रदर्शित करते हैं। आपने ये सब क्षमताएँ तथा शक्तियाँ कहाँ से प्राप्त कीं ? इससे आप यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वास्तव में आप सर्वशक्तिसम्पन्न हैं। आपके अन्दर एक महान् विशाल शक्ति-भण्डार है। ध्यानाभ्यास द्वारा इसी स्रोत तक पहुँच जायें और शक्ति प्राप्त करें। आपको प्रत्येक वस्तु मिलेगी। अन्तरात्मा पर विश्वास करें।

 

यदि ग्रीष्म काल के उष्ण मध्याहन काल में बारह बजे आपको एक तार मिले कि बीस मील दूर आपके गाँव में आपके पिता अत्यन्त चिन्ताजनक रूप से बीमार पड़े हैं तो आप तुरन्त अपना भोजन भी छोड़ कर दौड़ते हुए जाने लगते हैं। यद्यपि आपका अपना स्वास्थ्य भी उस समय अच्छा नहीं होता तो भी केवल अपने प्रिय पिता को देखने की इच्छा मात्र से आप किसी बात की चिन्ता नहीं करते। आप सारे मार्ग-भर दौड़ते चले जाते हैं और कुछ ही घण्टों में उस स्थान पर पहुँच जाते हैं। तब आप आश्चर्य करते हैं— ''यह क्या? मैं स्वयं भी अच्छा नहीं था। मैं बीस मील दो घण्टे में चले आया। यह कैसा आश्चर्य है।" इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि वास्तव में आप सर्वशक्तिसम्पन्न हैं। आपके मन में अनेक प्रकार की शक्तियाँ तथा क्षमताएँ हैं। वे अक्रिय रहती हैं। आपको उन्हें जाग्रत करना होगा।

 

 

 

मन की छह महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ

मन में तीन शक्तियाँ होती हैंइच्छा-शक्ति, क्रिया-शक्ति और ज्ञान-शक्ति। मन में एक वासना उठती है; यह इच्छा-शक्ति है। मन इस वासना को तृप्त करने का प्रयत्न करता है; यह क्रिया-शक्ति है। यह उसकी पूर्ति के लिए उपाय सोचता है; यह ज्ञान-शक्ति है।

 

वेदना-शक्ति (इन्द्रिय-ज्ञान), स्मरण शक्ति अथवा स्मृति शक्ति, भावना-शक्ति, - मनीषा शक्ति, इच्छा या संकल्प शक्ति और धारणा शक्तिये मन की छह मुख्य - शक्तियाँ हैं।

 

वेदना-शक्ति

 

वेदना शक्ति संज्ञान शक्ति अथवा संवेदन-शक्ति अथवा बोध शक्ति अथवा इन्द्रिय-ज्ञान है।

 

स्मृति-शक्ति

 

स्मृति शक्ति के तीन काम हैं। यह ग्रहण करती है, धारण करती है और - आवश्यकता पड़ने पर याद दिलाती है। यद्यपि ग्रहण करने का काम वेदना-शक्ति द्वारा होता है तो भी स्मृति-शक्ति इसमें भाग लेती है।

 

कल्पना करें कि आप मन्दिर में घण्टे का शब्द सुनते हैं स्मृति शक्ति इसे ग्रहण कर लेती है। फिर धारणा द्वारा वह इसे धारण करती है। फिर जब कभी आप मन्दिर के घण्टे का शब्द सुनते हैं तो आपको याद आता है, 'यह मन्दिर के घण्टे का शब्द है, यह छात्रावास का घण्टा नहीं है।'

 

ध्यान में मन अपने इन्द्रिय-ज्ञान और निश्चय को ग्रहण करता है और उन्हें पकड़ लेता है, विचार के विषय को अपना लेता है, संस्कारों को दृढ़ करता है और इसकी इच्छागत स्मृति को सुगम कर देता है।

 

भावना-शक्ति

 

आपने कभी हाथी को साइकिल चलाते नहीं देखा है। जिस मनुष्य ने वास्तव में देखा है, जब यह आपको इसका वर्णन सुनाता है तो आपका मन तत्काल इसका मानसिक चित्र बना लेता है। यह मन की भावना-शक्ति द्वारा होता है।

 

मनीषा-शक्ति

 

तुलना और भेद देखने की शक्ति, अनुमान, परामर्श, निष्कर्ष आदि ये सब मन की मनीषा-शक्ति के अन्तर्गत है। मनीषा शक्ति के दो उपांग और हैंनिर्णय (निश्चय करना) और तर्क।

 

राम मरणशील है, श्याम मरणशील है, मुरारी मरणशील है; इसलिए सारे मनुष्य मरणशील हैं। सारे मनुष्य मरणशील हैं, महाशय चौधरी मनुष्य हैं; इसलिए महाशय चौधरी मरणशील हैं। साध्य-पद, पक्ष-पद तथा मध्य-पद के साथ निगमनिक तथा आगमिक तर्क द्वारा इस प्रकार के निष्कर्ष निकालना या गौतम ऋषि के न्यायशास्त्र के न्यायबद्ध तर्क की पाँच प्रकार की युक्तियों द्वारा निर्णय और तर्क की सहायता से निश्चय करना मनीषा शक्ति का काम है।

 

तर्क के दो अंग और हैंअनुमान और परामर्श। जब प्रातः काल आप नदी में चढ़ाव देखते हैं तो आप अनुमान करते हैं कि गत रात्रि में वर्षा हुई होगी। जब आप पहाड़ियों पर धुआं देखते हैं तो अनुमान करते हैं कि वहाँ अग्नि होनी चाहिए। यह अनुमान शक्ति के कारण है।

 

इच्छा-शक्ति

 

इच्छा आत्म-शक्ति है। यह ब्रह्म का प्रगतिशील रूप है। यह ब्रह्म का चल रूप है। वेदान्त में इच्छा शक्ति एक विशेष भूमिका अदा करती है।

 

पाश्चात्य दार्शनिकों ने कल्पना-शक्ति के लिए बहुत कुछ कहा है कि मनुष्य के मन में यह सबसे उग्र शक्ति है और जब कल्पना और इच्छा-शक्ति में टक्कर होती है तो निर्विकल्प रूप से कल्पना शक्ति का ही बोलबाला होता है।

 

कुछ लोग कहते हैं कि कल्पना से अधिक बलवती इच्छा-शक्ति होती है। पूर्व में वेदान्तियों ने इच्छा-शक्ति को कल्पना से भी बड़ी शक्ति माना है। कामनाओं, लक्ष्यों तथा वासनाओं को सक्रिय शक्ति द्वारा निष्पन्न करने के लिए इच्छा-शक्ति का गतिबल प्राप्तः किये बिना अकेली कल्पना क्या करेगी ?

 

मन के भिन्न-भिन्न तत्त्वों में सह-सम्बन्ध, समन्वय तथा सहयोग पाया जाता है। इसलिए जब प्रत्येक दूसरे पर अपनी शक्ति के लिए निर्भर करता है तो कौन कह सकता है कि अमुक बड़ा है तथा अमुक छोटा, अमुक प्रधान है तथा अमुक गौण ? यह यथार्थतः नहीं कहा जा सकता कि इनमें कौन बड़ी है; क्योंकि इनकी स्वतन्त्रता तथा शक्ति एक-दूसरे से प्राप्त की जाती है।

 

धारणा-शक्ति

 

धारणा-शक्ति वास्तव में स्मृति-शक्ति का ही अंग है। साधारण बातचीत में हम कहते हैं, "श्री रामकृष्ण की वेदान्त में अच्छी धारणा है।" इसका अर्थ यह है कि श्री रामकृष्ण के वेदान्तविषयक विचार स्थिर और दृढ़ हैं। उन्हें कोई भी बदल नहीं सकता। उनकी वृत्ति डाँवाडोल नहीं है वह केवल वेदान्त में ही लगी रहती है उसे कोई भी नहीं हिला सकता।

 

आत्म-बोध

 

जब मन चेतन कर्ता के रूप में अपने को ही देखता है तो उसे आत्मबोध कहते हैं। यह आत्म-बोध तत्त्व चेतना के डाक बाबू की भाँति है जो सन्देश प्राप्त करता है, छाँटता है, एक-दूसरे से मिलाता है, यथास्थान रखता है, संसर्ग करता है और बाहर भेजता है।

 

मन की अन्तर्निहित शक्ति का उद्घाटन

 

मनुष्य के अन्दर बहुत-सी उच्च तथा गुप्त मानसिक शक्तियाँ हैं। मन शक्तियों का भण्डार है। उपयुक्त साधना के द्वारा इन अन्तर्निहित मानसिक शक्तियों का उद्घाटन सम्भव है। साधना क्रमबद्ध, निरन्तर और तीव्र होनी चाहिए। साधक को अपनी परिपक्वता की योग्य अवस्था तक भी पहुँच जाना आवश्यक है। सच्ची श्रद्धा भी होनी चाहिए। तभी प्रत्याशित सफलता की सम्भावना होती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद-

दोष-त्रय

 

कुछ लोगों को दूध पसन्द है, कुछ को नहीं। दूध में कुछ खराबी नहीं होती। मन में कुछ--कुछ खराबी अवश्य होती है। एक ही स्त्री को जब उसका बच्चा देखता है तो वह उसे अपना पोषण करने वाली और सुखों को देने वाली माता समझता है, उसका पति उसे उपभोग की सामग्री मानता है और बाघ उसे अपना शिकार समझता है। स्त्री पदार्थ एक ही होता है; किन्तु इन तीनों स्थितियों में मन के दोष के कारण दृष्टिकोण का भेद हो जाता है।

 

मन के तीन दोष हैंमल, विक्षेप और आवरण

 

जैसे तेज झंझावात में हलका पंख इधर-उधर उड़ा उड़ा फिरता है, इसी प्रकार राग और द्वेष के विषयों में मन इधर-उधर डोलता है। व्यर्थ में ही ग्राम-कुक्कुर की भाँति विषयों में घूमता हुआ मन ज्ञानियों की संगति से बहुत दूर चला जाता है; परन्तु परिणाम कुछ नहीं निकलता। यह कुत्सित मन अति अभीप्सित अतुल धन के दर्शन मात्र से नाच उठता है। यह मन रूपी क्रूर शिकारी कुत्ता वासना रूपी कुतिया के पीछे-पीछे फिरता हुआ अभागे अज्ञानी संसारी मनुष्यों को लाश के समान अपना शिकार बनाता रहता है। एक क्षण में वह हावड़ा से पेरिस और कोलम्बो से बर्लिन को उड़ जाता है। यह किसी एक पदार्थ पर स्थिर नहीं रहता और चंचल बना रहता है। यह अस्थिर तथा सम्भ्रमित रहता है, एक विषय से भाग जाता है और फिर उसी पर वापस आता है। निरर्थक आनन्दित होता है। और अहंकार से मदहोश हो जाता है। यह भय का शिकार बन जाता है।

 

मन को मोक्ष के योग्य बनाना चाहिए अर्थात् वह इस योग्य हो जाये कि अपने अधिष्ठान, अपने पिता ब्रह्म के पास पहुँच सके। तीनों दोषों को दूर कर देना आवश्यक है।

 

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्यादि मल निष्काम कर्म करने से दूर हो सकते हैं।

 

उपासना, त्राटक, प्राणायाम और राजयोग से मन का विशेष सकता है। दूर किया जा सकता है

 

ज्ञान से, वेदान्तशास्त्र के अध्ययन से, निदिध्यासन से और 'तत्त्वमसि' महावाक्य के तात्पर्य को ठीक-ठीक समझ कर अभेद चिन्तन से आवरण को दूर किया जा सकता है।

 

दुच्छ सांसारिक पदार्थों के पीछे भरमाये बिना और अपने मन को इलाये बिना आप शिला के समान दृढ़ और अचल बन जायें। जिनमें पाशविक कामनाएँ नहीं होतीं, वे पुनम को बहुत दूर भगा देते हैं।

 

मन के स्वभाव को देखें। सावधानीपूर्वक इसका विश्लेषण करें। मन के तीनों दोषविक्षेप और आवरण को दूर हटायें। मन को पवित्र बना कर स्थिर करें। इसे ईश्वर मल, 'अथवा ब्रह्म पर लगा दें। निरन्तर तीव्र विचार के अभ्यास से मन को ईश्वर में विलीन कर दें। मनोनाश के साधन का अभ्यास करें। मन के भुलावे और लालच से ऊँचे उठ जायें। यह आपका धर्म है। आपका जन्म ही इसके लिए हुआ है। और सारे धर्म तो अविद्या के कारण आपने स्वयं ही अपने ऊपर लाद लिये हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद- १०

शुद्ध और अशुद्ध मन

 

बुद्धिमान् मनुष्य विवेकयुक्त मन के द्वारा नीच मन को दृढ़ता से वश में कर लेते हैं। "उदरेदात्मनात्मानम्" जीवात्मा अपने द्वारा आपका (संसार-समुद्र से) उद्धार करे (भगवद्गीता -)

 

मन के दो भेद

 

उपनिषदों के मतानुसार मन शुद्ध और अशुद्ध दो प्रकार का होता है। अशुद्ध मन में कामनाएँ भरी हुई होती हैं। शुद्ध मन में पवित्रता भरी हुई होती है। इस प्रकार दो मन होते। हैं। यदि आप ध्यान का अभ्यास करना चाहते हैं तो इन दोनों को एक कर देंसात्त्विक मन बना दें। सात्त्विक मन के द्वारा वासनामय और भावमय अशुद्ध मन का संयम करना होगा।

 

बुद्धि भी दो प्रकार की होती हैव्यावहारिक बुद्धि और शुद्ध बुद्धि। अहं अथवा अहंकार भी दो प्रकार का होता हैशुद्ध अहंकार जो ब्रह्म से एकीभाव बनाता है और अशुद्ध अहंकार जो शरीर से एकीभाव बनाता है। संकल्प भी दो प्रकार का होता हैशुद्ध संकल्प अर्थात् ईश्वर-सम्बन्धी विचार और अशुद्ध संकल्प अर्थात् शरीर और संसार-सम्बन्धी विचार

 

अशुद्ध मन से अशुद्ध संकल्प, व्यावहारिक बुद्धि और अशुद्ध अहंकार बनते हैं। इन तीनों का दुश्चक्र है। ये तीनों परस्पर सहयोग से काम करते हैं। मन का बीज अहंकार है। मन विचारों की गठरी मात्र है। सारे विचारों की जड़ अहंभाव है। यही विचार सबसे पहले मन से निकला था। अतएव मन केवल अहंभाव है। अहंकार की नींव बुद्धि है। बुद्धि ही आपको भौतिक शरीर के साथ एकरूप हो जाने को विवश करती है। बुद्धि ही भेद और नानाभाव उत्पन्न करती है।

 

सात्त्विक मन के लक्षण

 

सात्त्विक मन को एकान्त. मौन. सरल जीवन, उच्च विचारधारा, आध्यात्मिक ग्रन्थों का स्वाध्याय, दार्शनिक परिचर्चा, मन की एकाग्रता और साधु-महात्माओं तथा संन्यासियों का सत्संग पसन्द होता है। शुद्ध मन की परीक्षा वाणी, मुख और नेत्रों द्वारा हो सकती है। इन मुद्राओं के द्वारा मत स्थिर किया जा सकता है कि क्या व्यक्ति का मन निर्दोष है। उच्च कामनाएँ, महान् आकांक्षाएँ, ऊँचे आदर्श, सच्ची धार्मिक भावना, दया, सहानुभूति, शुद्ध निःस्वार्थ प्रेम, भक्ति, आत्मिक विचार, प्रेरणा और प्रतिभाये सब उच्च मन से प्राप्त होते हैं। शुद्ध मन तो ब्रह्म ही है। यह मूर्तिमान् पवित्रता है।

 

राजसिक मन के लक्षण

 

राजसिक मन को भीड़-भाड़ वाले नगर, ज्यादा बातचीत, विलासी जीवन, नीच विचारधारा, स्त्रियों की संगति, स्वच्छन्दतावादी उपन्यासों का अध्ययन, स्वादिष्ट भोजन और स्वार्थपूर्ण कार्य पसन्द होता है। सहजवृत्तिक मन नीच, मलिन काम-मानस है जिसमें कामनाएँ, वासनाएँ और प्रवृत्तियाँ होती हैं। अधिक संख्या में मनुष्यों में यह सहजवृत्तिक मन ही होता है। शिक्षित और सभ्य कहलाने वाले मनुष्य भी इसी सहजवृत्तिक मन के स्तर पर रहते हैं। उनकी इन्द्रियाँ बड़ी निपुण तथा संवेदनशील होती हैं और वे उनकी तृप्ति के लिए अधिक परिष्कृत पदार्थों की खोज में रहते हैं। वे अपने को भौतिक शरीर और इन्द्रियों से एकरूप मानते हैं। सूक्ष्म आत्मा का उनको ज्ञान नहीं होता जो शरीर और इन्द्रियों से बिलकुल पृथक् है। यद्यपि वे यह जानते हैं कि मन भी होता है; पर उसका 'मैं' यह भौतिक स्थूल शरीर ही है।

 

विषय-भोग से रोग उत्पन्न होते हैं और विवेक-शक्ति नष्ट होती है। यह मन को मलिन बनाता है। इसलिए विषय-भोग से बचे रहें। अपने अन्दर ही आत्म-साक्षात्कार का प्रयत्न करें जहाँ नित्य सुख और अमृतत्व का वास है।

 

आत्म-विचार के लिए सात्त्विक मन की आवश्यकता

 

तीक्ष्ण, सूक्ष्म, एकाग्र और सात्त्विक मन की आवश्यकता आत्म-विचार और उपनिषदों के स्वाध्याय के लिए होती है। स्वार्थपरायण और कामपूर्ण व्यावहारिक बुद्धि विचार तथा दार्शनिक तर्कणा में नितान्त असमर्थ होती है। उसकी समझ पर स्वार्थ का बादल छाया रहता है। स्वार्थपरता जीवन का अभिशाप है संसारी मनुष्य का मन यौन विचारों को आत्मसात् करने को सदा प्रस्तुत रहता है। वह सूक्ष्म शास्त्रीय विचारों को आत्मसात् नहीं कर सकता। वह बहुत कठोर होता है और शास्त्रीय विचारों को ग्रहण करने के लिए ठीक तरह से प्रदोलित नहीं होता। आप चिकनी मिट्टी में कील ठोक सकते हैं; परन्तु पत्थर में नहीं। निष्काम कर्म, जप, प्राणायाम और दूसरी आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा मन को शुद्ध करना होगा।

 

यदि दर्पण मैला हो तो आप अपना मुँह साफ नहीं देख सकते। ऐसे ही यदि मन-मुकुर मैला हो तो आप परमात्मा का, आत्मा का स्पष्ट दर्शन नहीं कर सकते। ब्रह्म-ज्योति कार्यसाधक ढंग से प्रकाशित नहीं हो सकती है। यह मैल काम, क्रोध, लोभ आदि का मल है। इनको दैनिक प्रयास से आध्यात्मिक साधना, ध्यान, अनवरत निष्काम कर्मयोग, भक्ति आदि के द्वारा दूर कर दें।

 

श्रुति वाक्य है 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्'- 'मन के द्वारा ब्रह्म को देखना चाहिए। यहाँ मन का तात्पर्य शुद्ध मन से है। ब्रह्म उस मन से देखा जा सकता है जो मोक्ष के साधन-चतुष्टय से युक्त हो; जो शम, दम, यम और नियम के अभ्यास से सूक्ष्म और शुद्ध किया गया हो, जो सुयोग्य गुरु के सदुपदेशों से युक्त हो तथा जो श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता हो। यदि शुद्ध मन ज्ञान-शास्त्रों के अध्ययन, ज्ञानियों के सत्संग और ध्यान के निरन्तर अभ्यास से कुछ समय के लिए एकाग्र होने लगे तो ऐसे पुरुषों की सारवृद्धि होकर दिव्य दृष्टि हो जायेगी जिससे उन्हें एक सत्य परब्रह्म की अपरोक्षानुभूति हो जायेगी।

 

अशुद्ध मन को मार डालें

 

आत्मा का शत्रु यह अशुद्ध मन हैं जो अतिशय भ्रान्ति और विचारों के समूह से परिपूर्ण है। अशुद्ध मन रूपी यह शैतान और बलवान् नट सारे दुःख और भय उत्पन्न करता है और सारी उत्तम आध्यात्मिक सम्पत्ति नष्ट कर देता है। आपका वास्तविक शत्रु केवल यह अशुद्ध मन है जिसमें तृष्णा, भ्रम, वासना और अपवित्र विचारों का समूह भरा हुआ है। कहीं ऐसा हो कि यह मन रूपी शत्रु आपको अनेक प्रकार से संसार के नाना सुखों के उपभोग द्वारा बिगाड़ दे; इसलिए नित्य सुख और आत्मिक ज्ञान-प्रकाश के लिए इसको मार डालें। शुद्ध मन के द्वारा इस अशुद्ध मन का नाश कर दें। अपने सात्त्विक उच्च मनस् और विवेक की सहायता से इस सहजवृत्तिक मन को नष्ट कर दें। तब आपको स्थायी अपरिच्छिन्न शान्ति और आत्मानन्द प्राप्त होगा। तब आप जीवन्मुक्त हो जायेंगे।

 

सात्विक और राजसिक मन की गति एक-दूसरे के विपरीत दिशा में हुआ करती है। सात्त्विक मन एकता बनाता है। सहजवृत्तिक मन विभाग और भेद बनाता है। सहजवृत्तिक मन की नाणी आपको धोखे में डालेगी मन शुद्ध करें और सात्विक मन की आवाज सुने। नीच, अशुद्ध और सहजवृत्तिक मन का विनाश कर आपको शुद्ध मन की वृद्धि करनी होगी। शुद्ध मन के द्वारा इस अशुद्ध मन का नाश कर दें, तब आपको शाश्वत सुख तथा शान्ति प्राप्त होगी, तभी आपको मोक्ष, ब्रह्मज्ञान तथा नित्यानन्द प्राप्त होगा। इस मन को सतत विचार और प्रणव के ध्यान से नष्ट कर देना चाहिए और अपने सच्चिदानन्द-स्वरूप में स्थित हो जाना चाहिए।

 

मन को कैसे शुद्ध करें

 

जैसे लोहे के एक साँचे से दूसरे लोहे का आकार बनता है, वैसे ही मनुष्य के धार्मिक मार्ग में प्रयत्नशील शुद्ध मन को उसके अशुद्ध मन को सुधारने और पवित्रता में छालने में समर्थ होना चाहिए। वास्तविक सत्कर्म तथा निरन्तर सत्संग के द्वारा निश्चय ही मन शुद्ध हो जाता है। सत्य भाषण और दया का अभ्यास मन को बहुत शुद्ध करते हैं। सारी महती आकांक्षाएँ, समष्टि-प्रेम की वृत्तियाँ तथा दयावे सब मन की सात्त्विक सामग्री बढ़ाने में बड़ी सहायक होती हैं। इनसे उच्च मन की वृद्धि होती है।

 

यज्ञ, दान, दया, वेदाध्ययन, सत्य भाषणये पाँचों शुद्ध करने वाले हैं। छठी सुआचरित तपस्या है। अन्तिमोक्त परम पावनी है। तीर्थयात्रा भी चित्त की शुद्धि करती है। 6 इसके द्वारा महात्माओं का अच्छा सत्संग हो सकता है।

 

दान, जप, निष्काम कर्म, यश, अग्रिहोत्र, ब्रह्मचर्य, सन्ध्या, तीर्थयात्रा, शम, दम, नियम, स्वाध्याय, तप, व्रत, साधु-सेवाये सब मन को शुद्ध करने वाले हैं। निश्चय ही इस प्रकार शुद्ध हुए मन में विशुद्ध आनन्द रहेगा।

 

मन्त्र भी मन को शुद्ध करता है। तोते की तरह मन्त्र को केवल रटने से फल होता है। मन्त्र का भावपूर्वक जप करना चाहिए। तब इसका आश्चर्यजनक प्रभाव बहुत कम होता है। जब तक मन्त्र में अपने ही मन की पूर्ण इच्छा-शक्ति नहीं भरी होती, तब तक उसका बहुत प्रभाव नहीं हो सकता

 

दार्शनिक ग्रन्थों का स्वाध्याय, सद्विचार, अच्छी भावनाओं का अभ्यास, प्रार्थना तथा परोपकारी कार्य और सर्वोपरि नियमबद्ध तथा तीव्र ध्यान मन को सुधारने के साधन हैं। इनके द्वारा मन की उन्नति शीघ्र होगी। जब मन पवित्र हो जाता है तो मध्य में एक छिद्र बन जाता है जिसमें पवित्रता, प्रकाश और ज्ञान ब्रह्म से बहते हैं।

 

दश कैरट के सोने को तेजाब मिला कर मूषा में बार-बार तपा कर सुनार पन्दरह कैरट का बना लेता है। इसी प्रकार आपको अपने इस इन्द्रिय- लोलुप मन को धारणा, गुरु-वचनों के मनन, उपनिषद्-वाक्यों पर विचार, ध्यान, जप तथा मौन नाम-स्मरण द्वारा शुद्ध बनाना होगा।

 

हरताल को शुद्ध करने में बहुत समय लगता है। पहले इसे गोमूत्र में सात दिन, फिर चूने के पानी में दश दिन और फिर दूध में सात दिन भिगोते हैं। इसके बाद इसे १०८ बार अग्नि में जलाना पड़ता है, तब इसकी भस्म बनती है। इसी प्रकार चित्त-शुद्धि करने में भी बहुत समय लगता है। इसके लिए कठोर तपश्चर्या की आवश्यकता होती है।

 

मन शुद्ध हो जाने पर इसकी संवेदन-शक्ति बढ़ जाती है। थोड़े से भी शब्द या झटके से बाधा मालूम होती है और किसी भी दबाव को तीव्र मानता है। साधक की संवेदनशक्ति विकसित होनी चाहिए, तो भी उसको अपने शरीर और नाड़ियों को संयमित रखना चाहिए। ज्यों-ज्यों संवेदनशक्ति बढ़ती जाती है, संयम भी अधिकतर कठिन होता जाता है। बहुत से शब्दों पर साधारण मनुष्य ध्यान तक नहीं देता; परन्तु जिसकी संवेदन-शक्ति अत्यधिक विकसित हो गयी हो, उसको वे बड़ी व्यथा पहुँचाते हैं। आपको इस अतिसंवेदनशीलता को समाप्त करना चाहिए।

 

शुद्ध मन की दीक्षा निर्विकल्पावस्था की ओर अग्रसारित करती है

 

शुद्धि योग का प्रथम अंग है। जब शुद्धि हो जाती है, तब मन की प्रवृत्ति स्वभावतः ही मोक्ष की ओर जाती है। यदि किसी शिष्य का मन सारे मलों से शुद्ध हो गया है और उसे गुरु ईश्वरीय रहस्यों में दीक्षा दें तो उसका मन बिलकुल शान्त हो जायेगा और वह निर्विकल्प अवस्था (असंवेदन) प्राप्त कर लेगा।

 

 

परिच्छेद- -११

वृत्तियाँ

 

वृत्ति: उसका स्वरूप और कार्य

 

पानी में जो भँवर पड़ते हैं, उन्हें आवर्तन या वृत्ति कहते हैं। इसी प्रकार विचार की लहर, जो अन्तःकरण में उठती है, वृत्ति कहलाती है। वृत्तियाँ मन के विकार हैं और वे अविद्या के कार्य हैं। जब ज्ञान द्वारा अविद्या नष्ट हो जाती है तो वृत्तियाँ भी उसी प्रकार मन में लय हो जाती हैं जैसे गरम तवे पर डाला जल उसी में सूख जाता है।

 

वृत्ति कहाँ से उठती है? चित्त से। वृत्ति क्यों उठती है? यह अन्तःकरण का स्वभाव है। इसका क्या कर्म है? यह आवरण भंग करती है अर्थात् स्थूल अविद्या के आवरण को, जो पदार्थों को ढके रखता है, हटाती है। यह मनुष्य को पूर्णता (जीवन्मुक्ति) प्राप्त करने तक उन्नति में सहायक होती है। वृत्ति ज्ञानियों में, आज्ञाचक्र में कुण्डलिनी को खोलती है और उसे सहस्रार चक्र से मिलाती है। यह एक मार्ग है।

 

चित्त मानस-द्रव्य है। यह मानसिक द्रव्य है। वृत्ति या विचार-तरंग इसी मानसिक द्रव्य का विकार है। यह एक कार्य-प्रणाली है। जैसे समुद्र के ऊपरी तल से लहरें तथा बुदबुद उठते हैं, वैसे ही ये वृत्तियाँ मन रूपी सागर से उठती हैं। जैसे सूर्य से किरणें निकलती हैं, उसी प्रकार मानसिक किरणें (विकार या वृत्तियाँ) मन रूपी सूर्य से निकलती हैं। जैसे सूर्यास्त के समय अपने किरण-समूह को समेट कर सूर्य पश्चिम क्षितिज में लीन हो जाता है, उसी प्रकार आपको भी उस सूर्यों के सूर्य, चिद्घन, नित्य शान्ति-रूप आत्मा में मन की सारी बिखरी हुई किरणें समेट कर मन को लीन करना होगा।

 

वृत्ति का काम मन के आवरण को हटाना है। सब पदार्थों को स्थूल अविद्या ने ढक रखा है। जब यह आवरण हटता है तो सारे पदार्थ भासते हैं। जब आप बहुत से लोगों में से गुजरते हैं तो उनमें से कुछ लोगों को ही देखते हैं। यद्यपि कुछ व्यक्ति आपकी दृष्टि के सामने भी आते हैं, तथापि आप उनको इसलिए नहीं देखते कि पूरा-पूरा आवरण भंग नहीं हुआ था। जब पूरा आवरण भंग हो जाता है तो पदार्थ भासने लगता है।

 

महर्षि पतंजलि के राजयोग के अनुसार पाँच प्रकार की मनोवृत्तियाँ होती हैं अर्थात् प्रमाणवि विकल्प निद्रा और स्मृति यदि वे पाँचों मानसिक क्रियाएं दबा दी जायें तो इच्छाओं और अन्य क्रियाओं का निग्रह स्वयं ही हो जायेगा।

 

 

विषयाकार-वृत्ति तथा ब्रह्माकार-वृत्ति

 

अपने ही प्रयत्नों द्वारा जिस पदार्थ पर मन धारणा करता है, उसी का रूप बन जाता है। यह स्त्री का चिन्तन करता है तो स्त्री का रूप बन जाता है। यह वृत्ति तदाकार कहलाती है। यदि वह ईश्वर या ब्रह्म का चिन्तन करता है तो ईश्वर या ब्रह्म का रूप बन जाता है। ब्रह्माकार-वृत्ति अब पैदा होती है। पहली अवस्था में मन में रजस् भर आता है और दूसरी अवस्था में सत्त्व या पवित्रता भरती है।

 

जब मन पदार्थों का चिन्तन तथा उन पर देर तक विचार करता है तो वह स्वयं उन पदार्थों का रूप धारण कर लेता है। इसे विषयाकार-वृत्ति कहते हैं। जब यह ब्रह्म-चिन्तन करता है तो ब्रह्माकार-वृत्ति बन जाती है। मन और उसकी क्रियाओं को देखने में साधक को बड़ा सतर्क तथा सावधान रहना चाहिए। विषयाकार-वृत्ति को ब्रह्माकार-वृत्ति में बदलना आवश्यक है। ज्यों-ही मन ब्रह्माकार-वृत्ति से विषयाकार-वृत्ति में गिरे, उसे फिर ब्रह्माकार-वृत्ति में लगा देना चाहिए। यह संग्राम निस्सन्देह बड़ा कठिन है।

 

आप एक ही समय में (घटपटादि) विषयाकार वृत्ति और ब्रह्माकार वृत्ति नहीं रख - सकते। यह श्रुति-विरुद्ध है और क्रियात्मक अनुभव भी ऐसा नहीं बताता।

 

आपको पदार्थ या विषय नहीं बाँधते वृत्ति और उसके साथ तादात्म्य-सम्बन्ध ही आसक्ति और बन्धन का कारण होते हैं। अविद्या के कारण आप वृत्ति के साथ सारूप्य कर लेते हैं, यथा क्रोध आने पर आप कहते हैं—'मैं क्रुद्ध हूँ।"

 

वृत्तियों के भेद

 

वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं : () मनोवृत्ति, () बुद्धि-वृत्ति, () साक्षी - वृत्ति, () अखण्डाकार-वृत्ति और () अखण्डैकरस- वृत्ति। इसमें प्रथम जड़-रूप मन की वृत्ति है और शेष सब सात्त्विक मन की वृत्तियाँ हैं। सांसारिक मनुष्यों की विषयाकार - वृत्ति ही मनोवृत्ति है। विवेकियों की बुद्धि-वृत्ति होती है। जब आप साक्षी वृत्ति से तादात्म्य कर लेते हैं, तो मन के विकारों को देख सकते हैं। जब आप ऐसा अनुभव करने का प्रयास करते हैं कि आप अनन्त, असीम आत्मा हैं, तब अखण्डाकार-वृत्ति पैदा है। यही ब्रह्माकार-वृत्ति भी कहलाती है। ब्रह्म में कोई वृत्ति नहीं होती।

 

मनोवृत्ति से विवेक-वृत्ति पर पहुँचना चाहिए। मनोवृत्ति का सम्बन्ध मनोमय कोश से है तथा विवेक-वृत्ति का सम्बन्ध विज्ञानमय कोश से है। विज्ञानमय कोश को समृद्ध करने से मनोवृत्तियों को जीता जा सकता है। विवेक वृत्ति से साक्षी-वृत्ति पर पहुँचना चाहिए। साक्षी वृत्ति से अखण्डाकार वृत्ति प्राप्त करनी चाहिए। अखण्डाकार-वृत्ति से अखण्डैक-रस प्राप्त करना चाहिए। यही ब्रह्म स्वरूप है, कैवल्य है और जीवन का चरम लक्ष्य है।

अन्तर्मुख-वृत्ति तथा बहिर्मुख-वृत्ति

 

जब मन की बहिर्गामी वृत्तियों का निरोध हो जाता है और मन को हृदय गुहा में ही रोक लिया जाता है, जब इसका सम्पूर्ण अवधान इसी पर लगा दिया जाता है, वह दशा अन्तर्मुख-वृत्ति कहलाती है। सत्त्वगुण में वृद्धि होने से मन में जो अन्तः प्रत्याहरन की शक्ति होती है, उसे अन्तर्मुख-वृत्ति कहते हैं। जब साधक को यह अन्तर्मुख-वृत्ति प्राप्त हो जाये तो साधक बहुत कुछ साधना कर सकता है।

 

रजोगुण के कारण मन की बहिर्गमनशीलता को बहिर्मुख वृत्ति कहते हैं जब दृष्टि - बाहर की ओर डाली जाये तो मन भागती हुई घटनाओं के वेग में संलग्न हो जाता है। तब मन की बहिर्गामिनी शक्तियाँ अपना कार्य करने लगती हैं स्वभाववश कान और आँख दोनों शब्द तथा दृश्य की ओर दौड़ते हैं। पदार्थ (विषय) और इच्छाएँ मन को बहिर्मुख बनाने वाली शक्तियाँ हैं। वासनाओं से भरा हुआ रजोगुणी मनुष्य अन्तर्मुख-वृत्ति सहित आन्तरिक आध्यात्मिक जीवन की स्वप्न में भी आशा नहीं कर सकता। वह अन्तर्निरीक्षण के सर्वथा अनुपयुक्त है।

 

बहिर्मुख करने वाली मन की सारी शक्तियों को नष्ट कर चुकने पर ही अन्तर्मुख-वृत्ति प्राप्त होती है। इस मानसिक अवस्था को प्राप्त करने में वैराग्य और त्याग के द्वारा मन को भूखा मार दें। यौगिक क्रिया प्रत्याहार के द्वारा मन को अपने ऊपर अन्तर्मुख करने की कला आपको अवश्य सीखनी चाहिए। जिस प्रकार आपका कपड़ा किसी काँटेदार झाड़ी पर गिर जाये तो आप धीरे-धीरे एक-एक काँटा निकाल कर कपड़े को उठाते हैं, इसी प्रकार अनेक वर्षों से गिरी हुई मन की किरणों को भी सतर्कता और अध्यवसाय से समेटना होगा।

 

आपको धैर्य के साथ वैराग्य और अभ्यास, त्याग और तप के द्वारा इन शक्तियों को समेटना होगा तथा फिर साहस और अथक सामर्थ्य के साथ परमात्मा या ब्रह्म की ओर आगे बढ़ना होगा। जिन्हें इस अभ्यास का ज्ञान है, वे ही वास्तव में शान्त हो सकते हैं, वे ही सुखी रह सकते हैं। जब मन की किरणें संकेन्द्रित होती हैं तो प्रकाश मिलने लगता है। अब मन कुछ भी हानि नहीं कर सकता। वह बाहर नहीं जा सकता। उसे हृदय-गुहा के अन्दर ही रखा जा सकता है।

 

वृत्ति नाश मनोबल प्राप्त कराता है

 

वृत्तियों को नष्ट कर देने से मन को बड़ी शक्ति मिल जाती है। वृत्तियों का नाश करना सहज नहीं है; क्योंकि ये अगणित हैं। इनसे एक-एक करके निबटना चाहिए। कुछ वृत्तियाँ प्रबल होती हैं। उनके विनाश के लिए दृढ़ प्रयत्न की आवश्यकता होती है। अधिकांश वृतियाँ बहुत दुर्बल होती हैं। छोटी-छोटी वृत्तियाँ फटे हुए बादलों की भाँति विलीन हो जाती है। प्रबल वृत्तियाँ बची रहती हैं और नींद से उठने के बाद प्रायः पुनः प्रकट होती हैं।

 

मौन हो जायें। शान्ति में प्रवेश करें। आत्मा शान्ति रूप है। ब्रह्म शान्ति रूप है। मौन ही केन्द्र है। मौन ही हृदय गुहा है। जब मन एक वस्तु से दूसरी वस्तु की ओर दौड़ता है तो वह बीच की अवस्था जिसमें आप अति सूक्ष्म काल के लिए ही अमन हो जाते हैं, स्वरूपस्थिति है। वह ब्रह्म है। जब मन का पूर्ण निग्रह हो जाता है तो वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। जब सारे विकार शान्त हो जाते हैं, तब ही आप शान्ति-रूप मौन में प्रवेश करते हैं। इसका इसी क्षण साक्षात्कार करें। नेत्रों को बन्द करके, इन्द्रियों का प्रत्याहार करके, मन को निश्चत करके, विचारों को शान्त करके, बुद्धि को तीव्र करके, चित्त शुद्धि करके, ओंकार का चिन्तन करके, भावसहित प्रणवोच्चार द्वारा दिव्य महिमा और ब्रह्मतेज का अनुभव करें। चौबीसों घण्टे ब्रह्ममयी चेतना को अनवरत जारी रखें। आत्म-चेतना का निरन्तर प्रवाह रखें। यह अत्यन्त आवश्यक है। यह अनिवार्य शर्त है। यह बहुत ही अभीष्ट है।

 

जब सारी वृत्तियाँ मर जाती हैं तो संस्कार और मन का ढाँचा रह जाता है। संस्कार केवल निर्बीज समाधि द्वारा भस्म किये जा सकते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद- १२

प्रत्यक्ष ज्ञान का सिद्धान्त

 

"यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्चैव विजानाति..."

- जिस समय मनुष्य मनन करता है, तभी वह विशेष रूप से जानता है: बिना मनन किये कोई नहीं जानता, अपितु मनन करने पर ही जानता है। (छान्दोग्योपनिषद् : (-१८-)

 

....... अन्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौपमिति मनसा होव पश्यति मनसा शृणोति कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिहींर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एवं तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्ठो मनसा विजानाति ... " - " मेरा मन अन्यत्र था, इसलिए मैंने नहीं देखा, मेरा मन अन्यत्र था. इसलिए मैंने नहीं सुना (ऐसा जो मनुष्य कहता है, इससे निश्चय होता है कि) वह मन से ही देखता है और मन से ही सुनता है। काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, लज्जा, बुद्धि, भय-ये सब मन ही हैं। इसी से पीछे से स्पर्श किये जाने पर मनुष्य मन से जान लेता है। (बृहदारण्यकोपनिषद् : --)

 

मन के दो उपखण्ड हैंएक विचार वाला भाग और दूसरा प्रत्यक्ष दर्शन करने वाला भाग। विचार करने वाले भाग को बन्द कर देना सुगम है; परन्तु प्रत्यक्ष दर्शन के भाग को बन्द करना कठिन है।

 

व्यक्तिगत मन बाहरी पदार्थों को देखता है। यदि दूरदर्शक से वही पदार्थ देखा जाये तो वह कुछ और तरह दिखायी देता है। यदि आप सीधे मन के ही द्वारा देख सकते होते तो वही पदार्थ कुछ और तरह दिखायी देता हिरण्यगर्भ (कार्य ब्रह्म) की दृष्टि भिन्न है। यदि आप ध्यान करें कि बड़ी भारी लड़ाई चल रही है और दोनों पक्षों के बहुत से मनुष्य मर रहे हैं तो उस समय जिस प्रकार का दृश्य आपके मानस पटल पर अंकित हो जायेगा, उसी प्रकार वह (हिरण्यगर्भ) प्रत्येक पदार्थ अपने अन्दर ही संकल्प के रूप में स्पन्दित या गतिशील-सा देखता है। अपने इच्छानुसार अपने ध्यान को आप वापस कर सकते हैं।

 

प्रत्यक्ष ज्ञान के सिद्धान्त

 

एक सिद्धान्त मन के लचीले होने का है। इस विचारधारा के लोग कहते हैं कि जब विविध इन्द्रियों का स्पर्श अनेक विषयों से होता है तो मन लचीला हो जाता है और इस प्रकार एक-साथ ही सारी ज्ञानेन्द्रियों के संसर्ग में जाता है। जब मन का स्पर्श एक विषय और एक इन्द्रिय से होता है तो मन किसी अंश तक सिमट जाता है। बेदान्तियों ने इस सिद्धान्त को पौधा बता कर इसका खण्डन कर निर्मूल सिद्ध किया है।

 

एक विचारधारा अन्य भी है जो कहती है कि मन के भिन्न-भिन्न विभाग होते हैं। मन का एक भाग एक ज्ञानेन्द्रिय से स्पर्श करता है, दूसरा भाग दूसरी इन्द्रिय से इत्यादि। वेदान्ती इस सिद्धान्त को भी निर्मूल और थोथा बता कर निराधार कर देते हैं।

 

दृष्टि-सृष्टिवाद के नाम से प्रसिद्ध विचारधारा के अनुसार द्रष्टा और दृश्य पदार्थ एक ही हैं। जैसे मकड़ी अपने ही शरीर में से जाला बनाती है, उसी तरह मन भी अपने ही शरीर से जाग्रत अवस्था में यह स्थूल संसार रचता है और सुषुप्ति में इस संसार को वापस ले लेता है। मानसिक वृत्ति बाहर कर पदार्थ बन जाती है।

 

मानसिक अविद्या के कारण ही दृश्य की स्थिति है। बाहर तो केवल प्रकाश और स्पन्दन है। मन ही आकार और रंग देता है। यह सब मन का ही धोखा है। यह एक दृष्टिकोण है, प्रत्यक्ष ज्ञान का एक सिद्धान्त है।

 

आन्तरिक मन और बाह्य तन्मात्रा के स्पन्दन का पारस्परिक प्रभाव ही वह पदार्थ या संसार है जो आप देखते हैं। पाँचों तन्मात्राओं के सात्त्विक अंश से मन बनता है। बाहर प्रकाश है। सूर्य भी प्रकाश उत्सर्जित करता है। आँख अग्नि-तत्त्व से बनी है। मन का वह अंश भी अनि-तत्त्व से बना है जो देखता है। इसलिए अनि अनि को देखती है। मन का वह अंश जो शब्द-तन्मात्रा से बना है, सुन सकता है। शब्द बाहर आकाश से आता है, इसलिए मन का आकाश बाहर के आकाश को सुनता है। परन्तु आत्मा प्रत्येक वस्तु को देख सकती है, सुन सकती, स्वाद ले सकती और स्पर्श कर सकती है। आत्मा आत्मा से देखी जा सकती है। इसलिए आप जो कुछ भी बाहर देखते हैं, सब आत्मा ही है। सर्व खल्विदं ब्रह्म -निश्चय ही प्रत्येक वस्तु ब्रह्म है।

 

पाश्चात्य चिकित्सा शास्त्र का मत

 

पाश्चात्य चिकित्सा शास्त्र के अनुसार बाहरी प्रकाश के स्पन्दन दृष्टि-पटल पर - पड़ते हैं और वहाँ पदार्थ का विलोम आकार बन जाता है। वे स्पन्दन दृग्-क्षेत्र तथा दृग् चेतक द्वारा शिर के पश्च भाग में मस्तिष्क के पश्चकपाल-खण्ड के केन्द्र में पहुँचते हैं और वहाँ उसी पदार्थ का सीधा आकार बनता है। तभी आप अपने सामने के पदार्थ को देखते हैं।

 

सांख्य-दर्शन के अनुसार प्रत्यक्ष ज्ञान

 

प्रत्यक्ष ज्ञान की असली भित्ति पुरुष है जिसका पाश्चात्य चिकित्सकों और मनोविज्ञानियों को ज्ञान तक नहीं है। मांसल चक्षु केवल दर्शन के लिए बाह्य करण है। यह दृष्टि की इन्द्रिय नहीं है। इन्द्रिय-दृष्टि तो मस्तिष्क में स्थित एक केन्द्र है। यही बात सारी इन्द्रियों की है। मन इन्द्रियों से सम्बद्ध है, इन्द्रियाँ तत्सम्बन्धी मस्तिष्क केन्द्रों से, मस्तिष्क केन्द्र स्थूल इन्द्रियों (करणों) से और स्थूल करण बाह्य विषयों से सम्बद्ध हैं। मन इन्द्रिय-ज्ञान को बुद्धि के सम्मुख रखता है और बुद्धि पुरुष (अर्थात् अभौतिक शुद्ध आत्मा) के सम्मुख रखती है। वास्तविक दर्शन तभी होता है। पुरुष बुद्धि को आदेश देता है। इसके बाद बुद्धि उस विषय की भलाइयों तथा बुराइयों की तुलना करके, निश्चय करके, मन को कर्मेन्द्रियों के द्वारा कार्य सम्पन्न करने की आज्ञा देती है। बुद्धि प्रधानमन्त्री और न्यायाधीश है जो मन-वकील के बयान सुनती है। मन वकालत भी करता है और प्रधान सेनापति का काम भी करता है। बुद्धि की आज्ञा मिलने पर मन प्रधान सेनापति का काम करता हुआ पाँच कर्मेन्द्रिय-रूपी अपने पाँच सैनिकों द्वारा कार्य कराता है। सांख्य-मत के अनुसार यह दर्शन का सिद्धान्त है। ध्यान दें कि हिन्दू-दर्शन में विषयों का प्रतिपादन कितना स्पष्ट है।

 

पहले स्थूल आँख करण होती है। यह पदार्थों का अंक इन्द्रिय-केन्द्र तक पहुँचाती है। फिर मन का सम्बन्ध इन्द्रिय-केन्द्र और बाह्य स्थूल करण से हो जाता है। फिर मन उसी अंक को बुद्धि तक पहुँचाता है। तब अहंकार की अभिव्यक्ति होती है, जो अपना अस्तित्व प्रस्तुत करके अभिमान का स्वरूप ले लेता है। तब इस क्रिया-प्रतिक्रिया 1 परिणाम आत्मा के आगे पहुँचता है जो उस पदार्थ को इस परिणाम के प्रकाश देखती है।

 

इन्द्रियार्थसन्निकर्ष अर्थात् इन्द्रियों और विषयों के संस्पर्श द्वारा भौतिक ज्ञान प्र होता है। प्रपंच-विषय को जानने के लिए इन्द्रिय, अन्तःकरण और जीव इन तीनों आवश्यकता होती है। इन्द्रिय अपने विषय को देखेगी, मन उसको प्रकट करेगा और बु आभास-चैतन्य की सहायता से उसको समझेगी। मन, इन्द्रियाँ और करण तीनों इकट्ठे हो जायें, तभी किसी पदार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान (Perception) हो सकता है। पदार्थ इन्द्रियों के संसर्ग में आता है। इन्द्रियाँ मन से सम्बद्ध हैं। मन का आत्मा से सम्बन्ध होता है। आत्मा प्रकाश देता है। यह भौतिक जगत् के सम्बन्ध में है।

 

वेदान्त का सिद्धान्त

 

अद्वैत दर्शन के सिद्धान्त के अनुसार हमारे अन्दर का चैतन्य प्रत्यक्ष ज्ञान की सम्भावना बनाता है। हमारे अन्तर की चेतना विषय की चेतना से संयुक्त होती है और पहुँचाने के लिए परिणाम में प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि मन और इन्द्रियों का कुछ उपयोग ही नहीं है। दर्शन को तत्सम्बन्धी विषयों के साथ यथास्थान इन्द्रियाँ आवश्यक है। आत्मा के चैतन्य-स्वरूप होने से इन्द्रियों की निरर्थकता सिद्ध नहीं होती; क्योंकि ये प्रत्येक इन्द्रिय का विषय-विशेष निरूपण करती हैं।

 

वेदान्तमतानुसार मन आँख के द्वारा बाहर आता है और स्वयं बाह्य पदार्थ का रूप बन जाता है। इन्द्रियों के मार्ग से अन्तःकरण-वृत्ति प्रवेश करती है, विषय-अज्ञान को हटाती है और विषयाकार अर्थात् पदार्थ का स्वरूप बन कर उस पदार्थ को आपकी दृष्टि के सम्मुख लाती है वृत्ति का काम मन के आवरण को भंग करना है।

 

वास्तव में मन की एक किरण ही बाहर जा कर पदार्थ का रूप तथा आकार धारण करती है और उसे ढक लेती है। तभी प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। पुस्तक का ज्ञान तभी हो सकता है जब मन पुस्तक का रूप बन जाता है। मन की आकृति और बाह्य आकार मिल कर पदार्थ बनता है। जो-कुछ भी पदार्थ आप बाहर देखते हैं, मन में उसका आकार अवश्य होता है।

 

जब आप किसी आम के बगीचे से हो कर निकलते हैं तो आपके मन की एक किरण आँख के द्वारा बाहर निकल कर एक आम को घेर लेती है। यह आम का स्वरूप बन जाती है। इस किरण को वृत्ति कहते हैं। ढक लेने की क्रिया को वृत्ति-व्याप्ति कहते हैं। पदार्थ और उपहत चैतन्य को आवरण ढक लेता है, उसको हटाना वृत्ति का काम है। जो आवरण पदार्थ-रूप आम को ढके हुए है, वह वृत्ति द्वारा दूर हो जाता है। वृत्ति के साथ चैतन्य (वृत्ति - सहित चैतन्य) होता है। यह चैतन्य पदार्थ-रूप आम को प्रकाशित करता है। इसे फल-व्याप्ति कहते हैं। जिस प्रकार टार्च के प्रकाश में पदार्थ भी प्रकाश में जाते हैं, उसी प्रकार वृत्ति-चैतन्य पदार्थ को प्रकाशित कर देता है। फिर आम का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। मन संकल्प-विकल्प करता है कि यह आम है या नहीं। बुद्धि मन की सहायता करती है और पूर्व अनुभव के द्वारा निश्चय करती है कि आम है। चित्त अनुसन्धान करता है कि मुझे आम किस प्रकार मिल सकता है।क्या मैं मालिक से पूछूं या माली से माँगें ?" अहंकार कहता है, "मुझे किसी--किसी प्रकार आम मिलना ही चाहिए। मैं इसे चाहता हूँ।" फिर मन कर्मेन्द्रियों को कार्य करने का आदेश देता है।

 

जब आप आम के वृक्ष को देखते हैं तो यह आपसे बाहर का पदार्थ है। इसमें बाह्यता है। आम का वृक्ष मानसिक पदार्थ है। इसकी एक मानसिक स्मृति-जन्य आकृति भी है। मन से भिन्न (पृथक्) आम का वृक्ष है ही नहीं। किसी वृक्ष की सत्ता आप मन के द्वारा ही जान सकते हैं। मन के अन्दर एक आकृति होती है। वह मानसिक आकृति और बाह्य पदार्थ मिल कर आम का वृक्ष बनता है। यदि आप आँखें बन्द भी कर लें तो स्मृति के द्वारा ही आप मानसिक आकृति देख सकते हैं। पत्तियों का हरा रंग प्रकाश-स्पन्दों के एक निश्चित प्रमाण के कारण बनता है। ये प्रकाश-स्पन्द आँख की पुतली से टकराते हैं और मस्तिष्क के पिछले भाग में दृष्टि के केन्द्र तक पहुँचाये जाते हैं। विज्ञान कहता है कि आम की पत्तियों में सूर्य की किरणों को भेद कर केवल हरा रंग ग्रहण करने की शक्ति रहती है।

 

आपका शरीर भी आपके लिए उसी प्रकार बाह्य पदार्थ है जैसे कि वह आम का वृक्ष। यह भी एक मानसिक पदार्थ अथवा मानसिक आकार है। आम का वृक्ष आपके शरीर-सम्बन्ध से आपसे बाह्य है। आम का वृक्ष भी उस नित्य सत्ता में तैरता हुआ एक आभास मात्र है। क्योंकि आम का वृक्ष शरीर के सम्बन्ध से आपसे बाह्य है और आपका शरीर भी बाह्य पदार्थ है, इसलिए आम के वृक्ष की बाह्यता अथवा इस संसार की बाह्यता का भाव अब निर्मूल हो जाता है। इसी प्रकार आन्तरिकता का भेद है। यदि बाह्यता जाती रहे तो आन्तरिकता कहाँ रहेगी ? बाह्यता और आन्तरिकता ये दोनों शब्द भ्रममात्र हैं और मन की कल्पनाएँ हैं। इन कहलाने वाली बाह्यता और आन्तरिकता के पीछे एक ही नित्य सत्ता अथवा परम सत्ता है। वह नित्य अनन्त 'मैं' है। यह आपकी अपनी आत्मा है।

 

मन ही भेद उत्पन्न करता है

 

चक्षु मन के सम्मुख कुछ एक रूप या आकार उपस्थित करते हैं। मन उनको अच्छा या बुरा निश्चय करता है। यह कहता है, "यह आकार सुन्दर है, यह भद्दा है, यह अच्छा है।यहाँ ही बन्धन और दुःख आता है। अच्छा-बुरा, सुरूप और कुरूप, यह सब मन की कल्पना मात्र है। यदि मन बना सकता है तो विनाश भी कर सकता है। इसी प्रकार कान कुछ एक शब्दों के स्पन्द मन के सम्मुख उपस्थित करते हैं। मन कहता है, "यह प्रशंसा है, यह आक्षेप है।" आँख और कान का किंचित् भी दोष नहीं है। वे निर्दोष हैं। मन ही शैतानी करता है।

मानसिक बोध क्रमशः होता है

 

मन केवल परिच्छिन्न पदार्थों का चिन्तन कर सकता है। हरे पदार्थ का ध्यान किये बिना मन हरियाली का ध्यान नहीं कर सकता।

 

मन निरवयव है। वह केवल एक ही विचार एक समय में ग्रहण कर सकता है। यह वैकों का सिद्धान्त है। ये वेदान्ती भी जो मन को सावयव बताते हैं और इसी के लिए बोरनारीदृष्टान्त देते हैं अर्थात् उसे कुलटा स्त्री घर का धन्धा करती हुई भी उपपत्ति में लगाये रखती है, यह मानते हैं कि उस समय उसके मन की विशेष वृत्ति उपपत्ति में होती है और केवल सामान्य वृत्ति घर के काम में होती है।

 

मनुष्य का मन एक समय में एक ही पदार्थ को ग्रहण कर सकता है, यद्यपि यह एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ पर ऐसे अद्भुत वेग से जा सकता है कि कुछ वैज्ञानिकों ने निश्चय किया है कि यह एक समय में अनेक वस्तुओं को ग्रहण कर सकता है। मन एक प्रकार का द्वारपाल है जो एक समय में एक ही प्रकार का इन्द्रिय-ज्ञान मानसिक उद्योगशाला में आने देता है। आप एक ही साथ देख और सुन नहीं सकते। मन एक समय में एक ही विचार कर सकता है। परन्तु मन की गति चपला-सी इतनी तीव्र होती है कि साधारण मनुष्य समझता है कि वह एक ही समय में अनेक विचार रख सकता है।

 

सीमित या परिमित मन के द्वारा प्रत्यक्ष ज्ञान, अनुभव या बोध क्रमशः होता है, एक-साथ ही सहसा कई पदार्थों का ज्ञान नहीं हुआ करता। एक-साथ अनेक विषयों का ज्ञान केवल निर्विकल्प समाधि में प्राप्त हो सकता है जिसमें भूत और भविष्य दोनों ही वर्तमान काल में लीन हो जाते हैं। केवल योगी को ही सारी वस्तुओं का एक साथ ज्ञान हो सकता है। संसारी मनुष्य का मन सीमित होता है। वह तो क्रमशः ही ज्ञान प्राप्त कर सकता है। दो विचार परस्पर चाहे जितने भी सम्बद्ध क्यों हों, एक ही समय में साथ-साथ नहीं रह सकते। हमारे अन्तःकरण का स्वभाव एक क्षण में एक पदार्थ को एक से अधिक रूप में चेतना के सम्मुख जाने से रोकता है। यद्यपि भिन्न-भिन्न इन्द्रियों से तत्सम्बन्धी अनेक विषयों का स्पर्श एक ही काल में हो जाता है, फिर भी मन उस द्वारपाल का कार्य करता है जो फाटक में एक समय में एक ही मनुष्य को आने देता है। मन एक समय में केवल एक ही प्रकार का संवेदन मानसिक उद्योगशाला में भेज सकता। जिसके फलस्वरूप सम्यग्दर्शन तथा सुन्दर आकृति तैयार होती है। है

 

जब मन दृष्टि के साथ लगा होता है और उधर ध्यान देता है तो यह केवल देखता ही है, सुन नहीं सकता। यह एक समय में दोनों काम नहीं कर सकता। यह प्रत्येक मनुष्य का नित्य का अनुभव है। जब आपका मन किसी रोचक पुस्तक में लगा होता है, तो यदि कोई जोर से चिल्लाये भी तो आप नहीं सुन सकते; क्योंकि मन कान के साथ नहीं होगा। "मेरा मन अन्यत्र था, इसलिए मैंने नहीं देखा: मेरा मन अन्यत्र था, इसलिए मैंने नहीं सुना, क्योंकि मनुष्य अपने मन के द्वारा ही देखता है और अपने मन के द्वारा ही सुनता है" (बृहदारण्यकोपनिषद् : --) जब आप किसी विषय पर बड़ा गम्भीर विचार कर रहे हों तो आप देख सकते हैं, सुन सकते हैं और अनुभव कर सकते हैं। सारी इन्द्रियाँ मन से वियुक्त होती हैं। उस समय चित्त के द्वारा अनुसन्धान की क्रिया चल रही होती है।

 

अच्छे-अच्छे दार्शनिक और ऋषि तथा मुनि प्राच्य तथा पाश्चात्य जगत् के श्रेष्ठ विशेषज्ञ 'एकल विचार' के सिद्धान्त को ठीक मानते हैं। वे इस बात पर एक स्वर से सहमत हैं कि वास्तव में मन एक समय में एक वस्तु से अधिक की ओर ध्यान नहीं दे सकता। परन्तु जिस काल में वह ऐसा करता हुआ प्रतीत होता है, वह असामान्य तीव्र गति से एक सिरे से दूसरे सिरे तक आगे-पीछे दौड़ता रहता है। निरक्षर लोग कहते हैं कि वे एक-साथ ही सुन भी सकते हैं और देख भी सकते हैं। मन बड़ी तीव्र गति से दोनों ओर दौड़ता है और लोग समझते हैं कि मन दोनों काम एक-साथ कर सकता है। यह भारी भूल है। अग्नि की चिनगारी को यदि जल्दी-जल्दी घुमाया जाये तो वह अग्नि चक्राकार होने लगती है। इसी प्रकार यद्यपि मन एक समय में एक ही कार्य कर सकता हैसुनना, देखना, सूँघना और एक समय में एक ही प्रकार का संवेदन ग्रहण कर सकता है; क्योंकि यह एक वस्तु से दूसरी वस्तु पर इतनी शीघ्रता से जाता है कि इसकी क्रमशः की हुई अनेक क्रियाएँ एक ही अबाधित क्रिया प्रतीत होती है और हमें यह विश्वास हो जाता है कि मन एक ही साथ कई-कई कार्य करता है।

इन्द्रिय-संवेदन में प्रतिपूरक सुविधा

 

कुछ मनुष्यों में चक्षु की अपेक्षा श्रोत्रेन्द्रिय विशेष विकसित होती है। न्यायाधीशों की श्रोत्रेन्द्रिय तीव्र होती है। प्रधान सेनापतियों की दृष्टि तीव्र होती है। अपने-अपने कार्य के अनुसार मनुष्य इन्द्रिय-विशेष को विकसित करने को बाध्य हो जाता है। अन्धों की श्रवण-शक्ति तीव्र होती है। यदि एक इन्द्रिय-शक्ति हो तो प्रकृति उसकी पूर्ति किसी अन्य इन्द्रिय को अधिक विकसित करके कर देती है। मेरा एक मित्र एक ऐसे अन्धे मनुष्य को जानता है जो स्पर्श मात्र से रंग बता सकता है।

 

वाणी भी पुरुष की दृष्टि ही है। यहाँ वाणी से आशय श्रोत्रेन्द्रिय के विषय शब्द का है। जब यह इन्द्रिय जाग्रत होती है तो मन पर इसका प्रतिबिम्ब पड़ता है। मन के ही द्वारा बाह्य विषयों को ग्रहण करने का प्रयत्न होता है; क्योंकि मनुष्य मन के द्वारा ही देखता और सुनता है। जब रात्रि में किसी समय मनुष्य निश्चय नहीं कर सकता कि शब्द कहाँ हो रहा है (चाहे वह शब्द घोड़े की हिनहिनाहट, गधे का रेंकना या कुत्ते का भौंकना हो) वह उसी ओर जाता है जिधर से शब्द रहा होता है।

 

अतीन्द्रिय ज्ञान

 

वास्तव में मन ही देखता, चखता, सूंघता और स्पर्श करता है। जब आप भगवान् कृष्ण के चित्र का ध्यान करना प्रारम्भ करते हैं, तब नेत्र तो बन्द रहते हैं; किन्तु आप मन के नेत्रों से चित्र को देखते हैं।

 

तान्त्रिक अपने स्थूल चक्षुओं से काम नहीं लेता और सीधे मन के द्वारा देख सकता है। ईश्वर से अभिन्न हुआ भक्त उसे कारण शरीर की दिव्य दृष्टि द्वारा देखता है। ज्ञानी ज्ञान चक्षु अथवा दिव्य दृष्टि द्वारा देखता है।

 

ब्रह्म के अवलोकन की विधि

 

मन में दृष्टि और इच्छा पृथक्-पृथक् हैं। शुद्ध चित्त में दृष्टि और इच्छा अभिन्न हैं। और मन की तरह एक-दूसरे से पृथक्-पृथक् नहीं हैं।

 

ब्रह्म को अनुभव करने, सोचने तथा तर्क करने के लिए अन्तःकरण की भी आवश्यकता नहीं है। ब्रह्म को देखने के लिए आँख की आवश्यकता नहीं है। वह स्वयं ज्योति है। वह सबको प्रकाश प्रदान करता है। वह अन्तःकरण को प्रकाश प्रदान करता है। वह इन्द्रियों को प्रकाश और शक्ति देता है। वह चित्स्वरूप है, चिधन है, ज्ञान का भण्डार है। वह आत्मज्ञान द्वारा प्रत्येक विषय को जानता है। वह अपने अन्दर ही आत्मज्ञान द्वारा सारे संसार को अपने संकल्प से विवर्त रूप में देखता है।

 

ब्रह्म-दर्शन की विधि

 

ब्रह्म कोई पदार्थ या विषय नहीं है जिसे देखा जा सके। उसका अनुभव तो साक्षात्कार से ही हो सकता है। ब्रह्मज्ञान आध्यात्मिक अनुभव अथवा आत्म-साक्षात्कार द्वारा होता है जिसमें द्रष्टा, दृश्य और दृष्टि एक ही सत्ता में लीन हो जाते हैंजैसे समुद्र में बुदबुद

 

 

 

 

परिच्छेद- १३

चित्त और स्मृति

 

चित्त क्या है ?

 

चित्त को मानस- द्रव्य कहते हैं। यह पहली मंजिल के समान है। इससे मन, बुद्धि और अहंकार उत्पन्न होते हैं। यह (चित्त) महर्षि पतंजलि के राजयोग का शब्द है। गीता में भी भगवान् कृष्ण ने 'चित्त' का प्रयोग कई स्थलों पर किया है।

 

वेदान्त में चित्त एक भिन्न मनःशक्ति या प्रवर्ग है कभी-कभी यह मन के ही अन्तर्गत आता है। सांख्य-दर्शन में यह बुद्धि या महत् तत्त्व के ही अन्तर्गत है। पतंजलि ऋषि के राजयोग का 'चित्त' (योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः) वेदान्त के 'अन्तःकरण' के सदृश है।

 

वेदान्त की परिभाषा में अवचेतन मन को चित्त कहते हैं। आपके अवचेतन मन का अधिकांश अन्तस्तल में छिपे हुए अनुभवों और पृष्ठभूमि में डाली हुई उन स्मृतियों का बना हुआ होता है जो फिर प्राप्त हो सकती हैं। चित्त एक शान्त सरोवर है। इसके ऊपर वृत्तियों की लहरें उठती हैं। नाम और रूप के कारण ही ये वृत्ति-रूपी लहरें उठती हैं। नाम और रूप के बिना कोई लहर नहीं उठ सकती।

 

स्मृति या स्मरण, धारणा और अनुसन्धान चित्त के कार्य हैं। जब आप किसी मन्त्र का जप करते हैं तो चित्त स्मरण करता है। यह बहुत-सा कार्य करता है। यह मन या बुद्धि से भी अच्छा और अधिक कार्य करता है।

 

अवचेतन मन की प्रक्रिया का क्षेत्र

 

मानसिक प्रक्रियाएँ चेतना के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं होतीं। अवचेतन मानसिक प्रक्रियाओं का क्षेत्र चेतन मानसिक प्रक्रियाओं से अधिक व्यापक होता है। अपनी क्रियाओं के अधिकांश को मन स्वयं नहीं जानता है। क्योंकि व्यक्ति को एक समय में एक ही वस्तु की चेतना हो सकती है; हमारे ज्ञान का एक अंश ही एक समय में हमारी चेतना के सम्मुख सकता है। केवल दश प्रतिशत मानसिक क्रियाएँ चेतना के क्षेत्र में आती हैं और नब्बे प्रतिशत अवचेतन मन अथवा चित्त में होती रहती हैं। चित्त में से तैयार हुए सन्देश चेतन मन के तल पर अवचेतन मन के छदाद्वार से शीघ्र जाते हैं। हम समस्या सुलझाने को बैठते हैं और असफल रहते हैं। फिर उठ कर थोड़ी दूर घूम कर आते हैं और पुनः प्रयत्न करते हैं, फिर भी नहीं सुलझा पाते। अकस्मात् एक विचार का उदय होता है जिसके द्वारा हमारी समस्या सुलझ जाती है। अवचेतन मन इसके सुलझाने का कार्य बराबर कर रहा था।

 

रात्रि को गणित या रेखागणित का कोई प्रश्न निकालने में आप बारम्बार असफल रहते हैं। प्रातःकाल जब आप सो कर जागते हैं, तो उस प्रश्न का उत्तर ठीक-ठीक मिल जाता है। यह उत्तर आपके अवचेतन मन से विद्युत्प्रकाश के समान प्राप्त होता है। निद्रा में भी आपका अवचेतन मन अविराम कार्य करता रहता है। यह सारे तथ्यों को व्यवस्थित करता, उनका वर्गीकरण करता, उनकी तुलना करता तथा उन्हें छाँटता है और उपयुक्त तथा सन्तोषजनक उत्तर निकाल देता है।

 

कभी-कभी आप रात्रि के दश बजे इस विचार से सोते हैं कि गाड़ी पकड़ने के लिए मुझे प्रातः दो बजे अवश्य जागना है। आपका चित्त यह सन्देश ग्रहण कर लेता है और ठीक दो बजे निश्चय ही आपको जगा देता है। यह अवचेतन मन आपका सच्चा मित्र और निरन्तर विश्वसनीय सहचर है।

 

इस अवचेतन मन की सहायता से आप अपने दूषित स्वभाव को बदल सकते हैं। और उन सद्गुणों की स्थापना कर सकते हैं जो प्रत्येक मानव हृदय में रहते हैं। यदि आप - भय से मुक्त होना चाहते हैं, तो अपने मन से भय का निषेध कर दें और उसके विरोधी सद्गुणसाहस की मानसिक धारणा करें जब साहस की वृद्धि होती है तो भय स्वयं ही दूर हो जाता है। धनात्मक सदा ऋणात्मक को पराजित करता है। यह प्रकृति का अचूक नियम है। इसे राजयोगी प्रतिपक्ष भावना कहते हैं। इसी प्रकार अरुचिकर कार्यों तथा कर्तव्यों के लिए भी आप रुचि उत्पन्न कर सकते हैं। आप नये स्वभाव, नये आदर्श, नये विचार, नयी रुचियाँ और नये आचरण चित्त में बना सकते हैं और पुरानों को बदल सकते हैं।

 

स्मृति

 

स्मृति चित्त का कार्य है। स्मृति का प्रयोग दो अर्थों में हुआ करता है। जब हम कहते हैं कि महाशय जॉन की स्मरण शक्ति अच्छी है, तो हमारा तात्पर्य यह होता है कि महाशय जॉन के मन में अतीत के अनुभवों को संचित करने की अच्छी क्षमता है। कभी-कभी हम कहते हैं, “मुझे उस घटना का कुछ स्मरण नहीं है।" इसमें कुछ वर्ष पहले जो घटना हो चुकी है, उसको अपने मौलिक स्वरूप में चेतना के स्तर के ऊपर आप नहीं ला सकते हैं। यह एक स्मृति की क्रिया है। स्मृति से आपको नया ज्ञान प्राप्त नहीं होता। यह तो पुराने ज्ञान का ही अनुभव है।

 

यदि नया अनुभव हो तो स्मृति के द्वारा आप उसे पूर्ण रूप से दोबारा याद कर सकते हैं। साधारण स्मरण कार्य में एक सामयिक प्रतिनिधि (सहकारी) हुआ करता है। वैयक्तिक स्मृति में एक निर्दिष्ट प्रतिनिधि (सहकारी) होता है। जो किसी दूसरे के साथ कार्य करता है, वह सहकारी प्रतिनिधि कहलाता है। गणित विद्या में एक अज्ञात संख्या के पूर्व जो संख्या या अपूर्ण अंश बीजगणित में लगाया जाता है, वह भी सहकारी (Coefficient) कहलाता है।

 

 

 

स्मृति क्योंकर उदित होती है ?

 

मान लें कि अपने किसी मित्र से आपको एक सुन्दर पंखी मिली है। जब आप पंखी को काम में लाते हैं, तो यह कभी-कभी आपको उस मित्र का स्मरण दिलाती है। थोड़े समय तक आप उसका चिन्तन करते हैं। यह पंखी उद्बोधक या स्मृति-हेतु का काम करती है।

 

यदि आपका भाई लम्बा है, तो दूसरे स्थान पर इसी प्रकार के दूसरे लम्बे मनुष्य को देख कर आपको अपने भाई का स्मरण हो जाता है। इस स्मृति का कारण पदार्थों का सादृश्य है।

 

मान लीजिए, आपने मद्रास में एक वामन को देखा है। जब आप किसी बहुत लम्बे मनुष्य को देखते हैं, तो आपको उस वामन की याद आती है जिसे आपने मद्रास में देखा था। किसी बड़े राजमहल को देख कर किसान की झोंपड़ी या गंगा के किनारे किसी संन्यासी की पर्णकुटीर याद आती है। यह स्मृति पदार्थों की विपरीतता के कारण होती है।

 

जब किसी दिन आँधी चली हो और आप सड़क पर जाते समय किसी उखड़े हुए वृक्ष को देखते हैं, तो आप निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि वृक्ष आँधी के कारण गिरा है। यह स्मृति कार्य-कारण-सम्बन्ध द्वारा हुई है।

 

नये संस्कार पुराने संस्कारों को बहा देते हैं। यदि संस्कार नवीन तथा सद्यस्क हों, तो उन्हें स्मरण करना सुगम होता है। वे शीघ्र ही अन्तर्मन की गहराई से सचेत मन के ऊपर पुनः जाते हैं। पुराने संस्कारों का नव-जागरण होता है। यदि राजकीय पदाधिकारी बन जाने के दश वर्ष पश्चात् आप एक बार उस विद्यालय में जायें, जहाँ से आपने शिक्षा प्राप्त की थी, तो आपके विद्यार्थी जीवन के पूर्व-संस्कार फिर सजीव हो जायेंगे। अब अपने भूतपूर्व अध्यापकों, मित्रों, पुस्तकों और अन्य अनेक वस्तुओं का स्मरण करेंगे।

 

 

अच्छी स्मृति के लक्षण

 

अच्छी स्मृति के ये चार लक्षण है: यदि आप किसी पुस्तक का कोई परिच्छेद एक बार पढ़ें और उसको भली प्रकार दोहरा सकें, तो यह इस बात का सूचक है कि आपकी स्मृति बहुत अच्छी है। यह 'सुगमता' कहलाती है। यदि आप उसी विषय को बिना घटाये-बढ़ाये, बिना संयोजक-वियोजन दोहरा सकें, तो यह 'अवैकल्य' कहलाती है। यदि आप किसी बात को या किसी परिच्छेद को दीर्घ काल तक स्मरण रख सकते हैं, तो यह 'धारणा' कहलाती है। यदि आप आवश्यकता पड़ने पर तत्काल किसी परिच्छेद को बिना किसी कठिनाई के दोहरा सकें, तो यह 'उपाहरण' कहलाता है।

 

 

 

अनुस्मरण की प्रक्रिया

 

जब आप किसी बात को स्मरण करना चाहते हैं, तो आपको मानसिक प्रयत्न करना पड़ता है। आपको अन्तःकरण के विभिन्न स्तरों की गहराई में नीचे-ऊपर जाना पड़ता है और विभिन्न प्रकार की असंगत वस्तुओं के विचित्र मिश्रण में से ठीक अभीप्सित वस्तु का चयन करना होता है। जैसे रेलगाड़ी की डाक छाँटने वाला बाबू पत्रों के खाने में नीचे-ऊपर हाथ हिला कर ठीक इच्छित पत्र को निकाल लेता है, इसी प्रकार यह अन्तःकरण भी अपने भिन्न-भिन्न कोष्ठकों में से इच्छित वस्तु को निकाल कर सामान्य चेतना के स्तर पर ले आता है। अन्त:करण भिन्न-भिन्न पदार्थों के ढेर में से ठीक इच्छित वस्तु को निकाल सकता है।

 

एक बड़े शल्य-कर्म-चिकित्सालय में सहायक शल्य-चिकित्सक एक समय में एक ही रोगी को वरिष्ठ शल्य-चिकित्सक के परामर्श-कक्ष में परीक्षा के लिए भेजता है। इसी प्रकार मन भी मनोद्वार से एक विचार को ही मानसिक उद्योगशाला में परीक्षा करने देता है। अवचेतन मन स्मृति-कार्य के समय चेतन मन की देहली पर और सब वस्तुओं को दबा कर यथासमय उचित वस्तु ही लाता है। यह नियन्त्रक का कार्य करता है और केवल प्रासंगिक स्मृतियों को ही गुजरने देता है। यह कैसी आश्चर्यजनक यन्त्र-रचना है! इस द्विविध मन का संचालक कौन है? इसको किसने बनाया? वह कितना महान् व्यक्ति होगा! जब मैं उसका ध्यान करता हूँ, तो रोम खड़े हो जाते हैं। जब लिखता हूँ, तो लेखनी कम्पित हो जाती है। क्या और उसके साथ रहना नहीं चाहते? उसके सम्पर्क में रहना कितना बड़ा सम्मान (विशेषाधिकार) और हर्ष की बात है!

 

जब आप किसी बात को स्मरण करने का प्रयास करते हैं, तो कभी-कभी वह शीघ्र स्मरण नहीं आती। कुछ समय पश्चात् वह विस्मृत बात स्वयमेव चेतन मन में कौंध उठती है। इसका क्या कारण है? यह स्मृति लोप है। उस बात का संस्कार चित्त के भण्डार में नीचे दब गया है। छत-द्वार के द्वारा उसे चेतन मन के ऊपर लाने के लिए चित्त को कुछ अभ्यास करके विश्लेषण तथा छँटाई करनी पड़ती है। थोड़े से श्रम के अनन्तर पुराने संस्कारों की स्मृति होने लगती है और वह विस्मृत विचार अथवा नाम, जिसे कुछ समय पूर्व आप स्मरण करना चाहते थे, चेतन मन में अकस्मात् कौंध उठता है। मस्तिष्क में कुछ विचार संकुलता अवश्य रही होगी जिससे विस्मृत विषय, विचार अथवा व्यक्ति के स्मरण आने में बाधा हुई, ज्यों ही यह विचार संकुलता हट जाती है, तो विस्मृत विचार - चेतन मन के ऊपरी तल पर तैरने लगता है। जब मन शान्त होता है, तो स्मरण शक्ति तीव्र होती है।

 

स्मरण-शक्ति

 

जो लोग मानसिक काम अधिक करते हैं, ब्रह्मचर्य व्रत पालन नहीं करते और जिन्हें मानसिक व्यथा और चिन्ता अधिक सताती हैं, उनकी स्मरण शक्ति शीघ्र जाती रहती है। जब वृद्धावस्था के कारण आपमें स्मृति लोप होने लगता है, तो इसका पहला चिह्न यह है कि आपको मनुष्यों के नाम स्मरण करने में कठिनाई होती है। इसका कारण खोजने कहीं दूर नहीं जाना है। सारे नाम यादृच्छिक होते हैं। वे नाम-पत्र की भाँति होते हैं। नाम के साथ कोई साहचर्य नहीं होता। मन प्रायः साहचर्य रखता है; क्योंकि उससे स्मृति के अंक गहरे हो जाते हैं।

 

वृद्धावस्था में भी आप किन्हीं घटनाओं को याद रख सकते हैं; क्योंकि उनमें साहचर्य सम्बन्ध होते हैं। वृद्धावस्था में भी आप स्कूल और कालेज में पढ़े हुए कुछ अंशों को भली प्रकार स्मरण रखते हैं; परन्तु जो अंश आपने प्रभात में ही नया पढ़ा है, सन्ध्या समय में उसको याद रखने में आपको कठिनाई मालूम होती है। इसका कारण यह है कि मन ने अपनी धारणा शक्ति खो दी है। मस्तिष्क के कोशाणुओं का अपकर्ष हो चुका है।

 

बाल्यकाल में मन की धारणा शक्ति अच्छी होती है; परन्तु समझने की शक्ति नहीं - होती १६ वें १८ वें, २० वें वर्ष में समझने की शक्ति प्रकट हो जाती है। इस अवस्था में स्मरण-शक्ति भी अधिक होती है। ३० वर्ष की अवस्था में मन स्थिर हो जाता है। इससे कम अवस्था में मन में बड़ी चंचलता होती है। ३० वर्ष से कम अवस्था का मनुष्य स्वयं विचार कर निश्चय नहीं कर सकता। उसमें निर्णय शक्ति नहीं होती। ४५ वर्ष के बाद धारणा-शक्ति घटने लगती है। स्मरण शक्ति भी कम होती जाती है। जो कुछ उसने पहले सीखा है, उसे ही धारण कर सकता है। वह नये विज्ञान नहीं सीख सकता। ब्रह्मचर्य मनुष्य की धारणा-शक्ति और अन्य मानसिक शक्तियों के विकास में सहायता करता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद- १४

संस्कार

 

संस्कार क्या है ?

 

मन-रूपी समुद्र में वृत्ति उठती है, कुछ काल तक यह क्रिया करती है और तब यह सामान्य चेतना की देहली के नीचे बैठ जाती है। चेतना के उपरिस्तर से, जहाँ यह कुछ काल तक अभिभावी रही है, अवचेतन मन (चित्त) के क्षेत्र में गहरी उतर जाती है। वहाँ इसका शोधन-कार्य चालू रहता है और संस्कार बन जाती है। एक सचेत क्रिया चाहे वह संज्ञानात्मक, भावात्मक या क्रियात्मक हो, चेतना की देहली के ठीक नीचे सूक्ष्म और अव्यक्त रूप धारण कर लेती है। इसे संस्कार कहते हैं।

 

स्मृति-संस्कारों का नव-जागरण

 

अवचेतन मन या चित्त में संस्कार सन्निहित रहते हैं। अवचेतन मन दूसरे शब्दों में सुषुप्त चेतन मन भी कहलाता है। आत्मपरक मन, अवचेतन मन, सुषुप्त चेतन मन तथा चित्त पर्यायवाची शब्द हैं। इस अवचेतन मन का स्थान अनुमस्तिष्क या मस्तिष्क का पिछला भाग है। आप गत अनुभवों को अवचेतन मन में संस्कारों के भण्डार से स्मरण कर सकते हैं। भूतकाल का सूक्ष्मतम विवरण तक सुरक्षित रखा रहता है, उसमें से कभी भी किंचिन्मात्र भी लुप्त नहीं होता। जब सूक्ष्म संस्कार अवचेतन मन के ऊपर पुनः बड़ी वृत्ति के रूप में जाते हैं, पुरानी वृत्ति जब अवचेतन मन के उपरिस्तल पर फिर जाती है तो उसे स्मृति कहते हैं। संस्कार की सहायता के बिना स्मृति का आना सम्भव नहीं है।

 

संस्कार कैसे बनते हैं ?

 

इन्द्रिय-ज्ञान का अनुभव चित्त की गहराई में उतर जाता है और वहाँ संस्कार बन जाता है। जब मन को किसी वस्तु का अनुभव होता है तो उसी समय चित्त में उसका एक संस्कार पड़ जाता है। इस वर्तमान अनुभव और चित्त में पड़ने वाले संस्कार के बीच में कुछ अन्तराल नहीं पड़ता। एक अनुभव-विशेष संस्कार-विशेष छोड़ता है। इस अनुभव की स्मृति उसी संस्कार से बनती है जो कि उस विशेष अनुभव से बना था।

 

जब आप सन्तरे को पहली बार देखते हैं और चखते हैं तो आपको सन्तरे का ज्ञान होता है। आप उसके स्वाद को जानते हैं। आप पदार्थ-रूप सन्तरे को जान लेते हैं। तुरन्त अवचेतन मन में उसका संस्कार बन जाता है। किसी समय भी यह संस्कार पदार्थ रूप सन्तरे और उसके ज्ञान की स्मृति बना सकता है। यद्यपि पदार्थ और ज्ञान-क्रिया में भेट किया जा सकता है, फिर भी ये अभिन्न रहते हैं।

विचार तथा संस्कार का कार्य-कारण-सम्बन्ध-चक्र

 

बाहरी आवेग के कारण विषय-पदार्थ मन में संस्कारों को जाग्रत कर देता है। इसलिए संकल्प उठता है। जब किसी पहले देखी हुई गौ का आप विचार करते हैं और आप मन में 'गौ' शब्द का उच्चारण करते हैं, तभी मन में गौ की मूर्ति आती है। तब विचार आकार लेता है। जैसे बीच से वृक्ष और फिर वृक्ष से बीज बनता है, उसी प्रकार संस्कार से संकल्प और संकल्प से संस्कार बनते हैं। बीज से वृक्ष होता है और वृक्ष में फिर बीज बनता है। यह कार्य-कारण का चक्र अथवा बीज-वृक्ष-न्याय कहलाता है। इसी प्रकार वृत्ति संस्कार को बनाती है और संस्कार फिर वृत्ति बनाता है। जैसे बीज- -वृक्ष के उदाहरण में उसी प्रकार यहाँ भी कार्य-कारण का चक्र चलता रहता है। आन्तरिक या बाह्य उद्बोधक शक्ति के बल से ये बीज-रूप संस्कार फिर फैल जाते हैं और आगे क्रियाओं को जन्म देते हैं। यह वृत्ति तथा संस्कार का चक्र अनादि है; परन्तु दिव्य ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होने से इसका अन्त हो जाता है। ये प्रकृति में लय हो जाते हैं। जीवन्मुक्त पर इनका प्रभाव नहीं पड़ता। निरन्तर समाधि के द्वारा इन संस्कारों को भून देना चाहिए। तभी आप जन्म और मृत्यु से मुक्त हो सकेंगे।

 

संस्कारों पर संयम

 

संस्कार को अवशिष्ट शक्ति भी कहते हैं। जब सारी वृत्तियाँ और विचार नष्ट हो जाते हैं, तो संस्कारों सहित मन शेष बचता है। यह सूक्ष्म मन कहलाता है। वेदान्त की शब्दावली में इसे अन्तःकरण मात्र कहते हैं।

 

सारे संस्कार एक-साथ मन में रहते हैं। धीरे-धीरे वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं और मन में अपना अंक छोड़ जाती हैं। ये अंक संस्कार होते हैं। इन संस्कारों से स्मृति बनती है। यदि आपको योग-दृष्टि प्राप्त है तो आप मनुष्य की मानसिक उद्योगशाला में होने वाले आश्चर्यों को साफ-साफ देख सकते हैंकैसे वृत्ति उठती है, कैसे शान्त होती है और कैसे संस्कार बनता है। आप आश्चर्यचकित रह जायेंगे। इन संस्कारों के ऊपर किया हुआ संयम अवशिष्ट शक्तियों का ज्ञान कराता है। योगी संस्कारों का अपरोक्ष ज्ञान प्राप्त करके पूर्व-जन्मों की अपरोक्ष चेतना पाता है। ऐसा ज्ञान विश्वविद्यालयों में कठिनाई से प्राप्त होता है। सत्पात्र साधकों को योगी ही ऐसा ज्ञान दे सकता है।

 

सद् तथा असद् संस्कार

 

शक्तियों की भाँति संस्कार भी एक-दूसरे की सहायता अथवा निरोध करते हैं। जब आप किसी मनुष्य को गम्भीर रोग से ग्रसित देखते हैं, तो आपके मन में दया का संचार हो जाता है, आपके पुराने दयामय कर्मों के सभी संस्कार परस्पर सम्मिलित हो जाते हैं तथा आपको रोगी की सहायता और सेवा करने को बाध्य कर देते हैं। इसी प्रकार, जब आप किसी मनुष्य को गम्भीर दुःखी तथा तंगहाल दशा में देखते हैं तो आपके पुण्य कर्मों के मारे संस्कार अवचेतन मन के ऊपर जाते हैं और आपको उसकी सहायता के लिए बाध्य कर देते हैं। आप अपनी सम्पत्ति में से उसे भी एक भाग देने लगते हैं।

 

जब किसी सद् कार्य का संस्कार उभरा हुआ हो तो उसका विसदृश संस्कार भी प्रकट हो सकता है और उसके पूर्वागत संस्कार भी पूर्णता में बाधक हो सकता है। यह सद् तथा असद् संस्कारों की टक्कर है।

 

जब आप अपना मन परमात्मा में स्थिर करने की चेष्टा करते हैं और पवित्रता की भावना करते हैं, ठीक उसी क्षण में सारे कुत्सित विचार और संस्कार आपके विरुद्ध लड़ने के लिए उग्रता तथा प्रतिशोध-भावना के साथ फूट पड़ते हैं। इसे संस्कारों का जमघट कहते हैं। अच्छे संस्कार भी आपकी सहायता और कुसंस्कारों को भगाने के लिए इकट्ठे हुआ करते हैं। श्री स्वामी अद्वैतानन्द जी के पिता चण्डी के बड़े भक्त थे। मृत्युकाल में वह अर्धचेतन-अवस्था में थे। युवावस्था में जितने चण्डी के स्तोत्र के श्लोक उन्होंने कण्ठस्थ किये थे, वह उन सबकी आवृत्ति करने लगे। यह आध्यात्मिक संस्कारों का जमघट है।

 

भूतपूर्व संस्कारों से प्रारब्ध बनता है

 

आपके जन्म-समय में मन कोरा कागज नहीं होता है। यह संस्कार का, प्रवृत्तियों, अभिरुचियों आदि का भण्डार होता है। बालक अपने संस्कारों सहित उत्पन्न होता है। उसके विगत अनुभव मानसिक और नैतिक वृत्तियों तथा शक्तियों में बदल जाते हैं। आनन्दयुक्त अथवा दुःखप्रद अनुभवों से मनुष्य सामग्री इकट्ठी करके मानसिक अथवा चारित्र्य की शक्तियाँ बनाता है। भौतिक अनुभव बौद्धिक शक्तियाँ बन जाते हैं। संसार से इन्द्रियों द्वारा जो रूप-रेखा अंकित होती है, उससे ही मन का उद्विकास होता है। सारे संसार का पूर्ण अनुभव प्राप्त करने के लिए इसे अनेक शरीर धारण करने पड़ेंगे। प्रत्येक मनुष्य अपने संस्कारों सहित जन्म लेता है और वे संस्कार चित्त में, जो प्रारब्ध का अधिष्ठान है, अन्तःस्थापित रखे अथवा अंकित रहते हैं। भौतिक जीवन में उसे और बहुत से संस्कार प्राप्त हो जाते हैं और ये पूर्व के भण्डारों से मिल कर आगामी संचित कर्म बन जाते हैं।

 

सारे संस्कार प्रच्छन्न कार्यकलाप के रूप में चित्त में निश्चेष्ट पड़े रहते हैं, केवल इसी जन्म के, अपितु अनादि काल से सभी अनेक पूर्व-जन्मों के भी पशु-जीवन के संस्कार, देव-योनि के संस्कार, राजा के जीवन के, कृषक के जीवन के सारे संस्कार चित में छिपे पड़े रहते हैं। मनुष्य-जन्म में केवल उसी प्रकार के संस्कार क्रियाशील होते हैं जो उस जन्म के उपयुक्त होते हैं। अन्य प्रकार के संस्कार प्रच्छन्न और निष्क्रिय रहते हैं।

 

जैसे वर्ष-भर का खाता बन्द करके नये वर्ष का खाता खोलने वाला व्यापारी पिछले वर्ष की सारी रकमें नये खाते में नहीं लिखता, अपितु अन्त शेष ही लिखता है; इसी प्रकार जीवात्मा नये मस्तिष्क को अतीत जीवन के अनुभवों पर उसके निर्णय, जिस निष्कर्ष अथवा निर्णय पर वह पहुँचा है, उसे दे देता है। यही वह सामान है जो नये जीवन को मिलता है, यही मानसिक सामग्री नये मकान को मिलती है। यह वास्तविक स्मृति होती है।

 

 

कर्म

 

आपके पिछले कर्मों के अनुसार आपके शरीर और मन का झुकाव एक निश्चित विधि से कर्म करने की ओर होता है और आप यन्त्र के समान ठीक उसी झुकाव के अनुसार कार्य करते हैं। आप भूल से इन कर्मों का कर्तापन अपने ऊपर आरोपित कर लेते हैं और इस प्रकार मामला और भी बिगाड़ लेते आपके बहुत से काम न्यूनाधिक स्वभावत: ही होते रहते हैं।

 

यदि आप निष्काम भाव से कर्म करने में कठिनाई देखें तो सारे कार्य करते हुए केवल मोक्ष की ही इच्छा रखें।

 

स्वर्ग में मन के सारे भौतिक अनुभवों की छँटाई और विश्लेषण किया जाता है। सार भाग ग्रहण कर लिया जाता है। मानसिक जगत् ने जो सार-भाग निकाला है, उसके स्वरूप के अनुकूल ही नवीन मनोवृत्ति आदि के सहित जीव फिर भौतिक जगत् में जन्म लेता है।

 

जब आप कोई नाटक लिख रहे हैं, यदि निद्रा आती है तो आप लिखायी बन्द कर देते हैं और सोने चले जाते हैं। जब आप सो कर उठते हैं तो जहाँ से आपने पूर्व रात्रि में लिखना छोड़ा था, वहाँ से आगे लिखने लग जाते हैं। इसी प्रकार पूर्व जन्म की वासनाओं के अनुसार नये जन्म में भी आप वही कार्य जारी रखते हैं जिसे पूर्व जन्म में आपने अधूरा छोड़ा था।

 

आपका आगामी जीवन अधिकतर उन कर्मों के अधीन रहेगा जो आप इस जीवन में करेंगे। बहुत-सी ऐसी बातें हैं जो संसारी मनुष्य करते हैं और शायद उनसे उनको कुछ हानि नहीं होती; परन्तु आध्यात्मिक पथ के सच्चे साधक यदि वही बातें करने लगें तो निश्चय ही वे हानिकारक होंगे।

 

स्वभावतः सूक्ष्म विषयों के अध्ययन से दूसरे भौतिक जीवन का रूप ही बदल जाता है। इससे सूक्ष्म विचार-शक्ति बढ़ती है और जल्दी-जल्दी ऊपरी विचार द्वारा एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ पर कूद जाने की आदत से अगले जीवन में अत्यन्त अशान्त तथा कुव्यवस्थित मन मिलेगा।

 

संस्कारों की दासता की श्रृंखला

 

मन संस्कारों के द्वारा अपना आधिपत्य स्थापित करता है। संस्कारों से टिड्डी-दल की भाँति वासनाएँ प्रकट होती हैं, वासनाओं से इच्छाओं का प्रवाह चलता है और इच्छित पदार्थों के भोग से तृष्णा बढ़ती है। तृष्णा बड़ी प्रबल होती है। मन में, कारण शरीर में संस्कारों का स्थान है। मन में भोग की स्मृति उठती है। फिर मन पदार्थों का चिन्तन करता है। चिन्तन में माया का दृढ़ आसन है। अब आसक्ति जाती है। मन योजनाएँ और परियोजनाएँ बनाने लगता है। आप काम-वासनाओं से विचलित हो जाते हैं। आप उन पदार्थों को प्राप्त करने और भोगने का शरीर से प्रयत्न करते हैं। इस प्रयत्न में राग और द्वेष के कारण आप किसी पर अनुराग करते हैं और किसी से अरुचि करते हैं। आपको अपने पुण्य और पाप का फल भोगना ही पड़ेगा। अनादि काल से राग-द्वेष, पाप-पुण्य और सुख-दुःख-रूपी इन छह अरों वाला आवागमन का यह संसार-चक्र घूमता ही रहता है।

 

विचार तथा इच्छाएँ संस्कारों पर निर्भर करते हैं

 

आपकी इच्छाओं और विचारों का स्वरूप आपके संस्कारों के स्वरूप पर निर्भर करता है। यदि अच्छे संस्कार होंगे तो आपकी इच्छाएँ और विचार भी अच्छे होंगे। इसके विपरीत यदि आपके बुरे संस्कार होंगे तो आपकी इच्छाएँ और विचार भी बुरे होंगे। यदि आपने चालीस वर्ष की आयु तक भी दुष्कर्म किये हैं तो भी इसी क्षण से दान, जप, दम, स्वाध्याय, ध्यान, दरिद्र और रोगियों की सेवा, साधु-सेवा आदि सत्कर्म आरम्भ कर दें। और यह संस्कार आपको विशेष सत्कर्म करने की प्रेरणा करेंगे। इनसे सदिच्छाएँ और शुभ विचार प्रकट होंगे। भगवान् ने भगवद्गीता (-३०) में कहा है-

 

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्

साधुरेव मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ।।

 

अर्थात् यदि कोई अतिशय दुराचारी मनुष्य भी अनन्य भाव से मेरी उपासना करता है तो उसको साधु ही समझना चाहिए; क्योंकि उसने सच्चा निश्चय कर लिया है।

 

कुसंस्कार ही वास्तविक शत्रु हैं

 

आपका वास्तविक शत्रु कौन है? आपके अपने ही बुरे संस्कार। अशुभ वासनाओं के स्थान में शुभ वासनाएँ प्रतिस्थापित करें। तब आप ईश्वर के समीप पहुँच सकते हैं। आपका मन बदल जायेगा, पुराने संस्कार मिट जायेंगे। आपके मन में अनेक प्रकार के असत् सुझाव और विचित्र अन्धविश्वास दृढ़ता से जमे हुए हैं। ये हानिकारक हैं। इनको उन्नत सुझावों और सद्विचार द्वारा धराशायी कर देना चाहिए। 'मैं शरीर हूँ,' 'मैं अमुक व्यक्ति हूँ’, ‘मैं ब्राह्मण हूँ', ‘मैं धनवान् हूँ' इत्यादि सब असद् सुझाव और असद् संस्कार हैं। मन के अन्दर यह सुझाव दृढ़ता से भरें कि आप ब्रह्म हैं। आपकी पुरानी देहाध्यास की भावना प्रबल प्रयत्न से धीरे-धीरे लुप्त हो जायेगी।

 

यदि आप एक मिनट के लिए भी अपने सच्चे ब्रह्म-स्वभाव को भूल जायेंगे तो अज्ञान के पुराने संस्कार ऊपर आने और आपको दबा लेने की चेष्टा करेंगे। देखें, नारद ने ध्यान में स्थित होते हुए भी जब देव-कन्याओं को देखा तो उनका निश्चय डगमगाने लगा था। उनको तुरन्त काम-वासना का अनुभव हुआ। उनका वीर्य स्खलित हुआ। उन्होंने वीर्य को एक कुम्भ (घड़े में रखा और उसमें से कुम्भ मुनि के रूप में रानी चुडाला प्रकट हुई। इसलिए आपको बहुत सावधान रहना होगा। हर प्रकार के प्रलोभनों से; यथाधन, नारी, यश आदि से; दूर रहें।

 

सुसंस्कारों की प्राप्ति की विधि

 

यदि आप अपना सारा समय आध्यात्मिक साधना में लगा देने में असमर्थ हैं तो इस जीवन में कम-से-कम आध्यात्मिक संस्कार बनाने की तो चेष्टा कर लें। नित्य ही थोड़ी देर के लिए - कम-से-कम प्रातः काल और सायंकाल आधे घण्टे के लिए अवश्य ही किसी प्रकार का ध्यान किया करें। ध्यान के लिए एक कमरा रखें। किसी मन्त्र का थोड़ा-सा जप किया करें। गीता का स्वाध्याय नियमपूर्वक किया करें। सत्संग करें। वर्ष में एक बार एक सप्ताह के लिए ऋषिकेश, नासिक, वाराणसी, हरिद्वार अथवा प्रयाग में रहने के लिए जाया करें। महात्माओं का दर्शन करें। ऐसा करने से आपको कुछ आध्यात्मिक संस्कार प्राप्त हो जायेंगे, जो नया सात्त्विक जीवन प्रारम्भ करने में उपयोगी प्रतीत होंगे। आपको उत्तम जन्म मिलेगा। आपके अगले जन्म में योग-साधना के लिए, अपने हृदय में निभृत दिव्यता का उद्घाटन करने के लिए उपयुक्त वातावरण प्राप्त होगा। ईश्वर अपनी कृपा द्वारा आपको आध्यात्मिक साधना के लिए सारी सुगमताएँ और अवसर प्रदान करेंगे। थोड़े से भी नियमपूर्वक योगाभ्यास और वेदान्तिक साधना के द्वारा आप अपनी मनोवृत्ति और पुराने कुसंस्कारों को बदल सकते हैं। आप कई आगामी जन्मों को अचानक समाप्त कर सकते हैं। तीन वर्ष के अभ्यास से आप जन्म-मरण के चंगुल से छुटकारा पा सकते हैं। आप अवश्य ही संन्यासी बनेंगे। इसी जन्म में, अभी ही क्यों नहीं बनते? अनावश्यक जन्मों के चक्र को और इनके अनुगामी क्लेशों को आप अचानक समाप्त क्यों नहीं कर देते हैं? आप कब तक इस संसार के विषयों के और इन्द्रियों के दास बने रहना चाहते हैं? अब जाग जायें। साधना करें और अमृतत्व प्राप्त कर लें।उद्धरेदात्मनात्मानम्अपने ही द्वारा अपना (संसार-सागर से) उद्धार करना चाहिए (गीता : -)

 

नये अच्छे-अच्छे संस्कार नये स्व-स्व सुझावों से बनाये जा सकते हैं। कल्पना करें कि मस्तिष्क एक काष्ठफलक है और उसमें कीलें लगी हैं जो कि विचार, स्वभाव तथा नैसर्गिक प्रवृत्ति की प्रतीक हैं जिनसे कर्मों का निश्चय होता है। यदि आपको ज्ञात हो कि कोई विचार या स्वभाव बुरा है, कोई नैसर्गिक प्रवृत्ति बुरी है तो जैसे तख्ते में कोई बुरी कील लगी हो तो नयी कील ले कर, उसे बुरी कील के ऊपर रख कर बराबर हथोड़े की चोट लगाते रहने से बुरी कील थोड़ी-थोड़ी बाहर को निकलती रहेगी और नयी कील उतने ही परिमाण में अन्दर धँसती जायेगी और अन्त में बुरी कील बिलकुल निकल जायेगी। इसी प्रकार नया विचार, स्वभाव या नैसर्गिक प्रवृत्ति मन के सम्मुख प्रस्तुत करें और उसका थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करते रहें। इस तरह करते रहने से कुछ समय में बुरे विचार और स्वभाव बिलकुल दूर हो जायेंगे। निःसन्देह इसके लिए दृढ़ प्रयत्न की आवश्यकता है। नये स्वस्थ सुझाओं को निरन्तर दोहराते रहने की आवश्यकता है। आदत भी दूसरी प्रकृति होती है। परन्तु शुद्ध, अप्रतिरोध्य, निश्चित दृढ़ इच्छा-शक्ति अवश्य ही विजय प्राप्त कर लेगी।

 

जब आप ओंकार या 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्य का उच्चारण करते हैं तो चित्त में एक संस्कार बनता है कि 'मैं ब्रह्म हूँ।' ओंकार का नित्य २१,६०० जप करने का उद्देश्य यह है कि यह संस्कार दृढ़ हो जाये।

 

संस्कार-नाश मोक्षदायक है

 

व्यक्ति का स्थूल शरीर भले ही मर जाये; परन्तु कर्मों के, भोगों के और विचारों के संस्कार मृत्यु के बाद भी मोक्ष-प्राप्ति तक उसका अनुसरण करते हैं। ये उपाधियाँ मृत्यु के पीछे उसके साथ-साथ रहती हैं। ये उपाधियाँ परिवर्तनशील हैं; क्योंकि व्यक्ति प्रत्येक मृत्यु के समय भिन्न-भिन्न प्रकार के संस्कार ले जाता है। अनेक जन्मों में आप भिन्न-भिन्न प्रकार के संस्कार बनाते हैं। जो निश्चित उपाधियाँ मृत्यु के बाद आपके साथ जाती हैं, वे हैं पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ, पंच प्राण, अन्तःकरण चतुष्टय और कारण शरीर जो लिंग-शरीर का आधार होता है। संस्कारों का नाश या कारण-शरीर का नाश ही मोक्ष प्राप्त कराता है। यह ब्रह्म-ज्ञान-प्राप्ति कराता है। जब तक संस्कार बने रहेंगे तब तक आपको नये-नये जन्म लेने पड़ेंगे। जब तक ब्रह्म-ज्ञान-प्राप्ति द्वारा सारे संस्कार मिट नहीं जाते, विदग्ध नहीं हो जाते, तब तक आपको बारम्बार जन्म लेना पड़ेगा। जब संस्कार मिट जायेंगे तो ब्रह्म-ज्ञान स्वयं अपनी महिमा से विभासित हो उठेगा।

 

संस्कारों को नष्ट करना ही साधना है

 

साधक का लक्ष्य निर्बीज समाधि के द्वारा इन संस्कारों को जला देना या मिटा देना होता है। संस्कारों को मिटा देना ही साधना है। श्वास लेना, सुनना, देखना, स्पर्श करना, चखना, सूँघनाइन सबसे मन में संस्कार बनते हैं। संसार मन में आँखों, कानों, वाणी और पुराने संस्कारों के द्वारा प्रवेश करता है। यदि आप एकान्त में रहें तो आप प्रथमोक्त तीन द्वारों को बन्द कर सकते हैं। विचार के द्वारा आप चौथे द्वार, संस्कारों को भी बन्द कर सकते हैं। तभी ज्ञान का उदय होगा। ज्ञानी पुरुष में संस्कार नहीं होते। वे ज्ञान द्वारा जल जाते हैं। निस्सन्देह उसके अन्तःकरण में संस्कारों का बल रह जाता है; परन्तु उससे हानि नहीं हो सकती। वे ज्ञानी को बन्धन में नहीं डाल सकते।

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद- १५

संकल्प

 

विचार-प्रक्रिया

 

ईश्वर में ही आध्यात्मिक जीवन है। यही हमें अनन्त से युक्त कर देता है। क्योंकि ब्रह्म स्वत: पूर्ण और परिपूर्ण है, इसलिए आपको ब्रह्म में सब कुछ मिल जाता है। आपकी सारी आवश्यकताएं और इच्छाएँ वहाँ तृप्त हो जाती हैं। दूसरी ओर भौतिक जीवन है; यह हमारा सम्बन्ध चारों ओर के संसार से करा देता है। इन दोनों से सम्बन्ध कराने वाला विचार है। यही दोनों के बीच खिलवाड़ करता है।

 

हमारे अन्दर शक्ति है जिससे हम अपनी पसन्द के अनुसार दिव्य प्रवाह के लिए अपना हृदय खोल या बन्द कर सकते हैं। यह सब मन की शक्ति से विचार-प्रक्रिया द्वारा होता है। यदि आप राजसी प्रकृति के हैं तो आप ईश्वर से बहुत दूर हैं, आपका हृदय ईश्व की ओर से बन्द है और यदि आपकी प्रकृति सात्त्विक है तो आपका हृदय ईश्वर के दिव्य प्रवाह के लिए खुला है।

 

पवित्र गंगा जी का उद्गम-स्थान गंगोत्तरी है और वे सदा गंगा-सागर की ओर बहती रहती हैं। इसी प्रकार विचार-धारा मन में जमे हुए संस्कारों के तल से प्रारम्भ होती हैं जहाँ वासनाएँ भरी रहती हैं और जाग्रत तथा स्वप्न अवस्था में निरन्तर पदार्थों की ओर बहती रहती है। जब पहिये बहुत गरम हो जाते हैं तो रेल के इंजन को भी आराम देने के लिए इंजन-घर में भेज दिया जाता है। परन्तु मन का यह रहस्यमय इंजन पल-भर भी आराम किये बिना बराबर काम किये जाता है। इस मन का विस्तार ही संकल्प है और अपनी नानात्व-शक्ति के द्वारा इस संकल्प-जगत् को जन्म देता है।

 

अज्ञानियों का मन विक्षेपयुक्त, चंचल और करोड़ों संकल्पों वाला होता है। उनके मग संकल्पों द्वारा डोलते रहते हैं। परन्तु ज्ञानी संकल्पों से मुक्त होते हैं। वे सदा आत्मज्ञान में स्थित होते हैं जो सर्वोच्च तृप्ति और परम शान्ति देता है।

 

संसार केवल संकल्प है

 

जब संकल्प अति-वेग से बढ़ने लगता है तो कभी भी लाभदायक नहीं होता, प्रत्युत् इससे हानि ही होती है। संकल्प बन्धन का कारण है। जो कुछ संकल्प और वासनाएँ आप बनाते हैं, वे सब ही आपको जाल में फँसाते जाते हैं। जैसे रेशम कीट स्व-निर्मित कृमिकोश में फँस जाता है, वैसे ही आप स्व-रचित संकल्पों और वासनाओं के द्वारा बन्धनग्रस्त हो जाते हैं। संकल्प ही दुःख है और इसका अभाव ब्रह्मानन्द है। संकल्प ही संसार है और इसका विनाश मोक्ष है।

 

मन का संकल्प ही सारे स्थावर और जंगम जीवों के सहित सारे संसार का उद्भव करता है। महामाया की भ्रान्ति का यह विषैला वृक्ष संसार के भिन्न-भिन्न विषय-भोगों की भूमि में मन के विकारों के बीज से अधिकाधिक फलता-फूलता है, संकल्पों से पूर्ण होता है।

 

माया एक बड़ा विषैला वृक्ष है। माया-भ्रम के इस वृक्ष को तृष्णाएँ और वासनाएँ सींचती हैं। कर्म इसके फल हैं। कामवासना, क्रोध, लोभादि इसकी कोंपलें हैं। सत्त्व, रज और तम कलियाँ हैं। इन्द्रियाँ टहनियाँ हैं। अहंकार इसका तना है। राग और द्वेष इसकी दो मुख्य शाखाएँ हैं। उनके विषय पदार्थ इसकी पत्तियाँ हैं।

 

जैसे सर्वगत आकाश का रूप नहीं है, वैसे ही यद्यपि व्यक्तिगत मन की, जो अविद्या से पूर्ण और व्यापक है, स्थिति नाम के लिए है तथापि इसका बाहरी या आन्तरिक कोई रूप नहीं है। सारे पदार्थों से भासमान सत्यता का विकास ही मन है। जहाँ भी संकल्प है वहाँ मन का अस्तित्व है।

 

इस संसार का उद्भव और विलय (जो चेतना के विकार के सिवाय और कुछ नहीं है) मन के संकल्पों के उद्भव और क्षय के साथ-साथ होता है। संकल्पों और विकल्पों का त्याग कर देने पर ही मन के द्वारा ब्रह्म-साक्षात्कार हो सकता है। आपको संकल्पों का यथासम्भव पूर्ण उन्मूलन करना चाहिए। यह संकल्प-नाश की साधना बुद्धिमत्तापूर्वक करनी चाहिए।

 

संकल्प-नाश से ही मोक्ष होता है

 

चाहे आप कोटि-कोटि वर्षों तक तप करते रहें, चाहे आप एक ही समय में तीनों लोकों की यात्रा करने में समर्थ हो जायें; परन्तु संकल्प-नाश के सुनिश्चित पथ का अनुसरण किये बिना आप निर्विकार मोक्ष को प्राप्त करने में कदापि सक्षम नहीं हो सकते। इसलिए संकल्प के विनाश का प्रयत्न करें और इससे सारे दुःख और विषमता से रहित ब्रह्मानन्द की प्राप्ति कर लें।

 

अपुनर्जन्य संकल्प-क्षय ही निर्दोष ब्राह्मी-स्थिति है। तो फिर मौन हो कर गुप्त रूप से अपने हृदय में संकल्पों के नाश का विचार क्यों नहीं बनाते ? जिन्होंने संकल्पों का विनाश कर दिया है, उन्हें चक्रवर्ती सम्राट् का राजसिंहासन भी तुच्छ खिलौना-सा प्रतीत होगा।

 

संकल्प, विकल्प और द्वैत-भावना से रहित हो जायें। अपने को बिलकुल संकल्प- रहित बना दें और निर्विकल्प बन जायें। यही ब्रह्म-निष्ठा या अद्वैत-निष्ठा है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए कठोर प्रयत्न करें। तब आप पूर्ण शान्ति और आनन्द में रहेंगे।

 

मन का स्वभाव

 

मन संसारी पदार्थों का ध्यान सरलता से कर सकता है। यह इसका स्वभाव है। साधारणतया विचार पदार्थों की ओर सुगमता से जाते हैं। मानसिक शक्ति इस ओर सहज ही प्रवाहित होती है। यह सांसारिक विचारों की प्राचीन बीधियों या लीकों में सरलता से प्रवाहित होती है। ईश्वर का ध्यान करना इसे अत्यधिक कठिन लगता है। संसारी व्यावहारिक मन के लिए यह उतना ही कठिन है जितना पहाड़ी पर चढ़ना। मन को पदार्थों की ओर से हटा कर ईश्वर की ओर ले जाना वैसा ही कठिन है, जैसे गंगा के सहज प्रवाह को गंगा सागर की ओर से रोक कर बदरीनारायण की ओर जाना या यमुना के प्रवाह के प्रतिकूल नाव चलाना तो भी यदि आप जन्म मरण से मुक्त होना चाहते हैं तो मन को इच्छा के विरुद्ध भी अनवरत प्रयत्न और त्याग के द्वारा ईश्वर की ओर चलने के लिए साधना चाहिए। यदि संसार के क्लेशों और विपत्तियों से छुटकारा पाना चाहते हैं तो इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।

 

संकल्प-नाश कैसे करें ?

 

संकल्प के धब्बे या बादल को विवेक और सतत प्रयत्न की शक्ति से छिन्न करके आत्म-प्रकाश सहित ब्रह्मानन्द-सागर में निमन हो जायें। जब आप अपनी छाया पर मिट्टी डाल कर उसे दबाना चाहते हैं तो छाया सदा ऊपर ही रहती है। इसी प्रकार जब आप संकल्पों को विवेक-वृत्ति से नष्ट करने का यत्न करते हैं तो वे बार-बार प्रकट हो जाते हैं। मन को वस्तुओं की ओर से हटा लें और अपने गुरु के उपदेशों के अनुसार चलें। मन को शुद्ध करके चिदाकाश में स्थिर करें। संयम पा कर मन का क्षय हो जायेगा; इसमें सन्देह नहीं है।

 

सांसारिक पदार्थों का क्षणमात्र के लिए भी ध्यान करें। संकल्प से छुटकारा पाने के लिए बहुत प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। विचारों का निग्रह करने से मन का नाश हो जायेगा। एक पूर्ण विकसित पुष्प को अपने हाथ से मसल डालने में तो कुछ प्रयत्न लगता भी है; परन्तु संकल्प का क्षय करने के लिए उतने भी प्रयत्न की आवश्यकता नहीं। विचारों के संयम से संकल्प का नाश हो जाता है। आन्तरिक संकल्प के द्वारा बाह्य संकल्पों को टूढ़ता से क्षय करके और शुद्ध मन के द्वारा अशुद्ध मन का नाश कर आत्मज्ञान में दृढ़तापूर्वक स्थित हो जायें।

 

जब संसार की असारता का विचार आपके अन्दर दृढ़ता से जम जायेगा तो नम और रूप द्वारा जनित विक्षेप और संकल्प की स्फुरणा भी धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो जायेगी। निरन्तर कहते रहें, "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर: अर्थात् केवल ब्रह्म ही सत्य है, संसार असत्य है और जीव ब्रह्म से अभिन्न है। इसका उच्चारण करते रहने से आपको अत्यधिक मानसिक शक्ति तथा शान्ति प्राप्त होगी।

 

अपने सम्मुख के दृश्य पदार्थों के लिए समस्त वासनाओं से अपने को मुक्त कर अपने मन में उठने वाले सारे संकल्पों का उन्मूलन कर दें। यह मन जो संकल्पों द्वारा उत्प होता है, इन्हीं संकल्पों द्वारा नष्ट हो जाता है जैसे अग्नि वायु द्वारा उद्दीप्त होती है और वायु द्वारा ही शमित भी होती है।

 

निःसंकल्पावस्था

 

नीच संकल्पों के मिटने के साथ-साथ अविद्या और उसका कार्य (मन) भी मिट जाता है। संकल्प दुःखमय है। निःसंकल्प परमानन्द है। एकान्त कमरे में अकेले बैठ जायें। नेत्र बन्द कर लें। मन को देखें और निरन्तर तथा दृढ़ प्रयत्न द्वारा एक-एक करके वृत्तियों को नष्ट कर दें। असम्प्रज्ञात समाधि हो जायेगी।

 

यदि दुःखजनक संकल्पों के विनाश के साथ-साथ मन का भी नाश कर दिया जाये तो मोह-रूपी घना कुहासा, जो आप पर अतीत काल से छाया हुआ है, स्वयं ही मिट जायेगा। फिर शरत्काल के निरभ्र आकाश के समान ज्योतिस्वरूप, आनन्दमय, अद्वितीय, निराकार, अजन्मा, अविनाशी ब्रह्म स्वयं प्रकाश करने लगेगा।

 

जब आपके विकीर्ण विचार एकत्र हो जायेंगे और आप शान्त हो कर विश्राम की अवस्था में रहेंगे तो नित्यानन्द-स्वरूप आत्मा उसी प्रकार प्रकाशित हो जायेगा जिस प्रकार निर्मल जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब चमकता है धन, स्त्री या भोजन में शान्ति नहीं है। जब मन वासना रहित हो जायेगा तो आत्मदेव प्रकाश करके नित्य सुख और शान्ति की वर्षा करेंगे। आप व्यर्थ ही बाह्य पदार्थों में आनन्द की खोज क्यों करते हैं? अपने अन्दर ही स्वानुभूतिमूलक सच्चिदानन्द अमृत आत्मा में सुख की खोज करें।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद- १६

विचार ही संसार की सृष्टि करता है

 

विचार ही प्रत्येक पदार्थ का स्रोत है

 

हमारे चतुर्दिक् के इस स्थूल जगत् की प्रत्येक वस्तु का उद्गम सबसे प्रथम विचार में हुआ। इससे उसका आकार बना। प्रत्येक राजमहल, मूर्ति, चित्र, यन्त्र का पुरजा इत्यादि पदार्थों ने पहले उसके निर्माता के मन में आकार लिया था और फिर वे इस स्थूल रूप में बनाये गये।

 

मन पर अनेक विषयों का पूर्वाधिकार होता है। जब चित्रकार कोई चित्र बनाने लगता है तो अपने मन में पूर्व-कल्पित किसी चित्र से ही सामग्री ले लेता है।

 

अन्ततः संसार एक विचार मात्र ही तो है। जैसे उपयुक्त समय और स्थान पर बीज का अंकुर फूटने लगता है, वैसे ही मन के संकल्प से द्रष्टा भी दृश्य रूप में दिखायी देने लगता है। जब मन सोचना बन्द कर देता है, संसार का लोप हो जाता है और अनिर्वचनीय आनन्द प्राप्त होता है। जब मन सोचना आरम्भ कर देता है तो संसार पुनः प्रकट हो जाता है और परिणाम दुःखमय होता है।

 

डेकार्टेस के सिद्धान्त का मौलिक आधार है कि मेरा अस्तित्व मेरे विचार के अनुकूल है। भगवान् शंकर के वचन इस सिद्धान्त के अनुकूल ही हैं कि आत्मा कभी भ्रममूलक नहीं हो सकता; क्योंकि जो आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानता है, वह इसके इनकार करने में भी इसकी सत्ता को देखता है।

 

मन के द्वारा जगत् को देखा जा सकता है; परन्तु यह खेद का विषय है कि ऋषि-मुनियों के अतिरिक्त अन्य किसी ने मन को नहीं देखा। जब आप निरन्तर और गम्भीरतापूर्वक मनस्तत्त्व का विचार करेंगे, तो आपको ज्ञात होगा कि मन कुछ भी नहीं है। मन का विश्लेषण करने पर वह कुछ भी नहीं रह जाता। मन विचारों की पोटली है और 'मैं' सब विचारों का मूल है। यह अहंभाव एक मिथ्या भाव, असत्त्व है। जब सब विचारों का मूल अहंभाव ही कुछ नहीं है, तो फिर मन का अस्तित्व कहाँ रहा!

 

प्रथम विचार जो आपके मन में उठा, वह अहंभाव था। ब्रह्म में लय होने से पहले जो विचार मन में उठेगा, वह ब्रह्माकार-वृत्ति होगी, जो आपकी इस अनुभूति से पैदा हुई। है कि आप ब्रह्म हैं।

 

 

 

 

संसार वैश्व मन की सृष्टि है

 

संसार जीव की मानसिक कल्पना नहीं है। वैश्व मन (हिरण्यगर्भ) के एक संगति विचार ने भासमान जगत् का आकार लिया। यह संसार केवल ईश्वरेच्छा का फल है जो मन की क्रियाओं के द्वारा सच्चा सा प्रतीत होता है।

 

कोई नाटक लिखने से पहले आपके मन में सारे नाटक का सुस्पष्ट चित्र बना होता है। फिर आप इसको क्रमानुसार चार अंकों में लिखते हैं। जब यह नाटक दिखाया जाता है. तो इसके एक-एक भाग को क्रमशः खेला जाता है। इस प्रकार ईश्वर के मन में इस जगत् और इसकी गति-विधि का एक स्पष्ट चित्र रहता है। उसके लिए अतीतकाल या भविष्यकाल नहीं होता। उसके लिए तो सब कुछ वर्तमान ही है। उसके लिए निकट और - दूर कुछ नहीं है। सब-कुछ यहाँ ही है। समय की गति के अनुसार इस विशाल जगत्-रूपी रंगमच पर घटनाएँ क्रमिक रूप से आती रहती हैं। अणु निरन्तर चक्कर लगाते रहते हैं। नवी वस्तु पुरानी होती रहती है और पुरानी नयी हो जाती है। वस्तुतः पुरानी या एकल कोई वस्तु नहीं है। जीव अपने व्यष्टि मन के द्वारा घटनाओं को क्रमानुसार देखते हैं; परन्तु ईश्वर सारी घटनाओं को एक-साथ ही जानता है। वह सर्वज्ञ है। वह सर्वविद् भी है। वह अपनी सृष्टि के प्रत्येक विवरण को जानता है। विश्व-मन से माया उत्पन्न होती है। व्यष्टि-मनः वस्तुओं को इसी माया के भ्रम से ग्रहण करते हैं।

 

यह जगत् मन के विकार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यह ब्रह्म से, जो जगत् का कारण है, स्वयं ही बना है। यह समस्त विश्व, जो केवल मन द्वारा भासमान है, मन के विकार के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आत्मनिष्ठ रूप में मन चैतन्य है और वस्तुगत रूप में यही यह संसार है। इसलिए यह सर्वव्यापी जगत् चैतन्य के सिवाय और कुछ नहीं है।" (जीव तथा जगत् अपनी अन्तर्जात अवस्था में ही ब्रह्म है)

 

ईश्वर और माया

 

सारे संस्कार माया में तैरते हैं। कल्पना करें कि एक बहुत बड़ा दर्पण है। आप उसमें बाजार में जाने वाले सारे मनुष्यों, ठेलों, गाड़ियों, मोटरों आदि के प्रतिबिम्ब देख सकते है। बिना किंचित् भी प्रभावित हुए आप दूर से दर्पण में इन गतियों को देखते रह सकते हैं। ऐसे ही संसार की सारी गतियाँ माया नामक सबसे बड़े दर्पण में होती हैं। संसार का स्वामी ईश्वर केवल प्रत्येक वस्तु को देखता रहता है। वह मूक साक्षी है। जब जीवों का अदृष्ट (कर्म भोग का पारब्ध) परिपक्क होता है तो ईश्वर केवल इच्छा करता है और संसार का प्रादुर्भाव हो जाता है।

 

मन के संकल्प में संसार की सत्यता स्थित है

 

अनिर्वचनीय ब्रह्म से सत्ता प्राप्त कर यह सर्वदा उत्तेजित मन अपने संकल्पों के अनुसार जगत् की रचना करता है। आपके मन के संकल्पों से ही इन्द्रजाल-रूपी संसार प्रकट होता है। आपके संकल्पों के कारण ही यह संसार अस्तित्ववान्-सा प्रतीत होता है और यदि आप इस संसार से परे सत्-ब्रह्म को प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको इन्हीं को देने का आदेश दिया जाता है। भगवद्गीता (-) में कहा है "सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते--सर्व संकल्पों का त्यागी व्यक्ति योगारूढ़ कहा जाता है।

 

छोटे से संकल्प की वृद्धि के साथ ही जगत् पैदा हो जाता है और संकल्प-क्षय हो जाने पर भी दृष्टि से ओझल हो जाता है। संकल्पों के नष्ट हो जाने से द्रष्टा और दृश्य के भेद के सारे भाव दूर हो जाते हैं और फिर ब्रह्म की सत्यता अबाध गति से प्रकाशित होने लगती है। फिर सचराचर संसार की छाया अद्वैत रूप से इसी में लीन हुई मिलती है।

 

अहंभावना के साथ ही सांसारिक विचारों का समूह आरम्भ हो जाता है अहंभावना के नहीं रहने से सारा संसार उसी क्षण इसी प्रकार जाता रहता है जैसे सूर्य के आने पर अन्धकार दूर हो जाता है। 'मैं' और मन एक हैं। मैं को नष्ट कर दीजिए तो मन भी नष्ट हो जायेगा।

 

योगवासिष्ठ में कहा है- "मनः कल्पितं जगत्" अर्थात् यह जगत् मन की कल्पना है। यह संसार की जादूगरी का खेल केवल मन ही तो बनाता है- "मनोमात्रं जगत्।" जिसे आप जगत् कहते हैं, वह केवल मन ही है। मन संसार है। यह संसार मन के सिवाय और कुछ नहीं है। जैसे स्वप्न में ही दूसरा स्वप्न बन जाता है, इसी प्रकार यह सूक्ष्म मन अदृश्य पदार्थ भी बनाता रहता है। मन की सत्ता के साथ-साथ ही यह नाशवान् संसार में रहता है; मन के क्षीण हो जाने से यह भी अदृश्य हो जाता है। यदि ज्ञान, दर्शन और क्रिया का कारणभूत मन लोप हो जाये तो उसके साथ ही साथ यह विषय जगत् भी लय हो जाता है।

 

प्रत्येक शब्द के लिए एक पदार्थ और एक अर्थ होता है। गौ शब्द के लिए भी एक अर्थ और एक पदार्थ है। माया आपको शब्दजाल के द्वारा धोखा दे रही है। सारा संसार भाव मात्र है। यह संकल्प मात्र, भ्रान्ति-मात्र है। यह कल्पना मात्र है, आकाश मात्र है। इसकी स्थिति केवल नाम मात्र है। "वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्ये सत्यम्" अर्थात् विकार केवल वाणी के आश्रयभूत नाम मात्र है, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है (छा. . --) सारा संसार पंचभूतों का बना हुआ है। विश्लेषण करें, सभी पदार्थों की भ्रम-मूलक दशा जान लें और सारे मिथ्या पदार्थों को त्याग दें। जब आप विश्लेषण करना प्रारम्भ करेंगे तो सारा संसार लोप हो जायेगा और इसके साथ-साथ शब्द भाव और पदार्थों का भी लोप हो जायेगा।

 

जगत् में जितना हर्ष-शोक का अनुभव होता है, वह मन की क्रिया से ही होता है। सारे दुःख और सुख-समूह मन के द्वारा ही उत्पन्न होते हैं। इसलिए यदि शुद्ध विवेक और आध्यात्मिक साधना के द्वारा मन का नाश कर दिया जाये, तो सुख-दुःख का भी नाश हो जायेगा। मन के सुख और दुःख के लिए ही त्रिलोकी की रचना होती है। मन की क्रिया रोक देने से तीनों लोक और उनके दुःख सब लोप हो जाते हैं। मन के विनाश के साथ ही त्रिकाल का सर्वथा लोप हो जाता है। मन के निग्रह से सारी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यदि मन का निग्रह नहीं हो, तो सब-कुछ दुःखमय और व्यर्थ हो जाता है। इसलिए मन का नाश कर देना चाहिए।

 

मन तीन प्रवर्गों की सीमा में कार्य करता है

 

मन सर्वदा देश, काल और कारण इन्हीं तीनों प्रवर्गों के अन्दर काम करता है। ये तीनों प्रवर्ग मन के बनाये हुए पदार्थ हैं। वस्तुतः नारियल का पेड़ बीस फुट ऊँचा नहीं है। ऊँचाई तो मन की बनाई हुई व्याख्या है बाहर तो केवल स्पन्द मात्र है। यह मन ही लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई, मोटाई, विस्तार, चौकोर, शून्य आदि बनाता रहता है। दो मील की दूरी आभास मात्र ही है। आप वास्तव में यह अनुभव करते हैं कि आपने इतनी दूरी तय की है। जब आप मन से ऊपर पहुँच जाते हैं, तो ये प्रवर्ग बिलकुल लुप्त हो जाते हैं। इसलिए ब्रह्म-विचार के द्वारा मन को कुचल दें। तब आप शान्ति, आनन्द और परम कारण-रूप प्रदेश में पहुँच जायेंगे जो शाश्वत, असीम तथा परम कारण है।

 

संसार की उत्पत्ति क्यों और कैसे हुईएक दुर्बोध प्रश्न

 

श्रीयुत् नारायण जो मेरा मित्र मेरे सम्मुख खड़ा है, वह मेरे अपने ही मन का कार्य है। यह संसार भी मेरे ही मन का कार्य है।

 

अभाव दर्शन का विषय कहा गया है; क्योंकि किसी पदार्थ का अभाव किसी दूसरे स्थान में उसकी सत्ता की सूचना देता है।

 

मायावाद के सिद्धान्त के अनुसार वास्तव में संसार है ही नहीं। यह केवल मानसिक कल्पना है। बौद्धमत में इसे विज्ञानवाद कहते हैं।

 

यथार्थवाद के अनुसार संसार एक यथार्थ सत्ता है। मध्वाचार्य का द्वैतवाद, कावशिवाद और महर्षि पतंजलि का राजयोग सब संसार को सत् (जगत् सत्यम्) मानते हैं।

 

दार्शनिक काण् ने लिखा है कि देश, काल और कारण ये वस्तुनिष्ठ सत्ताएँ नहीं हूँ, बल्कि हमारी बुद्धि के आत्मगत रूपान्तर हैं। इसका सिद्धान्त यह है कि देश, काल और कारण से परिच्छिन्न यह संसार मन का ही विकास है, इसके सिवाय और कुछ भी नहीं है।

 

परिच्छिन्न मन जो स्थूल है और जो काल, देश और कारण कार्य के नियम में स्थित है, संसार के विषय में 'क्यों और कैसे' नहीं जान सकता। यह अतिप्रश्न है। इसका उत्तर किसी शास्त्र, ऋषि या आचार्य ने भी कभी नहीं दिया है। इस प्रश्न पर अपना मस्तिष्क खपायें; क्योंकि इस समस्या का उत्तर आपको कभी नहीं मिल सकता। संसार की रचना ब्रह्म की मौज है। यह उसका लीला-विलास है। यह उसकी माया है। यह उसका स्वभाव है।

 

जगत् के अभाव से क्या तात्पर्य है

 

जगत् के अभाव या नाश का यह तात्पर्य नहीं है कि इसके पर्वत, सरोवर, वृक्ष और नदियाँ सबका नाश हो जाये जब संसार के मिथ्या होने का आपका निश्चय अधिकाधिक हो जाये और जब आपकी स्थिति इस विचार पर दृढ़ हो जाये कि यह संसार मृगतृष्णा के समान भ्रमपूर्ण है, तो यही जगत् का नाश कहलाता है।

 

आप पहाड़ को नहीं मिटा सकते; किन्तु पहाड़ के विचार को मिटा सकते हैं। यह संसार ऐसा ही है जैसे जाग्रत में स्वप्न होता है। दर्पण में जैसे प्रतिबिम्ब होता है। ऐसे ही मन रूपी दर्पण में यह संसार एक विशाल प्रतिबिम्ब है। मन एक बड़ी चद्दर के समान है जिसमें भाँति-भाँति के चित्र लगे हैं। तो चित्रकार है ही चित्रपट और ही चित्रकारी की अन्य सामग्री यथा तूलिका, रंग-पात्र, तैल, चूर्ण आदि। निर्मल इन-प्रकाश पर संसार का चित्र खिंचा हुआ प्रतीत होता है।

 

चैतन्य से उठने वाली मन की क्रिया से यह संसार बनता है। मन माया है। माया ही मन है। मन की क्रियाएँ माया की ही क्रियाएँ हैं। रूप में मन की आसक्ति माया है। स्वयं अपने मन को मन से अभिन्न समझना माया है।

 

मन संसार के रूप में कैसे अभिव्यक्त होता है।

 

प्राण की गति से मन भी गतिशील होता है। मन की गति से संसार की रचना होती है। मन अपने को बाह्य जगत् के रूप में अभिव्यक्त करता है। माया की शक्तियों में से विक्षेप-शक्ति के द्वारा नाम और रूप प्रकट होते हैं। माया की विक्षेप-शक्ति जाग्रत और स्वप्न दोनों अवस्थाओं में कार्य करती है। इसी के कारण समस्त संसार विक्षेपित होता है। सुषुति में यह लोप हो जाता है।

 

संसार मन में नेत्रों, वाणी और पुराने संस्कारों द्वारा प्रवेश करता है। यदि आप एकान्त में रहें, तो आप इनमें से प्रथमोक्त तीन द्वारों को बन्द कर सकते हैं। विचार द्वारा आप संस्कारों को, जो चतुर्थ द्वार हैं, नष्ट कर सकते हैं। तब ज्ञानोदय होगा।

 

जैसे आपके भ्रमपूर्ण मन के द्वारा आकाश की नीलिमा प्रतीत होती है (जो वास्तव में कुछ भी नहीं है) उसी प्रकार अनेक भेदयुक्त सारे लोक यद्यपि वे आत्म-ज्ञान ही है, संसार की भाँति भासते हैं। केवल परब्रह्म की आत्म-ज्योति ही मन या बहुरंगी संसार के रूप में प्रकट होती है। मन प्रज्ञा शक्ति है और पदार्थ भूत-शक्ति तथा प्राण ब्रह्म की क्रिया-शक्ति है। प्रत्येक वस्तु ब्रह्म की है। वास्तव में जीव है ही नहीं। केवल ब्रह्म ही है।

 

जो मन सदा वासनाओं के साथ-साथ उभरता और गिरता रहता है, वह अपने अज्ञान के कारण इस भ्रमपूर्ण जगत् को सत्य मानता है; परन्तु इसको संसार का असली स्वरूप बता देना चाहिए, तभी यह अपना ब्रह्म रूप जान सकेगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद-१७

अविद्या और अहंकार

 

अविद्या

 

मन अविद्या की रचना है। यह अविद्या का कार्य है। यह भ्रम से पूर्ण है। इसलिए यह आपको लुभाता है और धोखा देता है। यह आपको पथभ्रष्ट कर देता है। यदि आप आत्म-ज्ञान के द्वारा मन के कारण रूप अज्ञान को नष्ट कर सके तो मन का अस्तित्व कहीं नहीं रहता। यह शून्य में लीन हो जाता है। जब ज्ञान का उदय होता है तो मनोनाश हो जाता है।

 

अविद्या उपाधियों द्वारा कार्य करती है। सारी विशेष सामग्रियाँ, जिनको अविद्या की अपेक्षा होती है, आत्मा की उपाधियों से बनी हैं। मन उपाधि है, बुद्धि उपाधि है और अहंकार भी उपाधि है।

 

अविद्या का स्थान मनुष्य के मन में होता है। अनुभवजनित आकार की व्याख्या हमारी संज्ञानात्मक शक्ति में ढूँढ़नी चाहिए। श्री शंकराचार्य अविद्या की व्याख्या इस प्रकार करते हैं। यह नैसर्गिक (स्वाभाविक) है। यह हमारी मानसिक शक्ति में निहित है। यह मिथ्या-ज्ञान-निमित्त है अर्थात् इसका कारण भ्रमात्मक-ज्ञान है और ज्ञान मन की एक क्रिया है। यह नित्य प्रत्ययरूप है।समस्त जीव जिनका अस्तित्व वास्तव में है ही नहींअपने जन्म-मरण-रूप सहकारी आभासों के सहित मन की विषयनिष्ठता की प्रवृत्ति के परिणाम हैं, और कुछ नहीं हैं।"

 

द्रष्टा और दृश्य से रचित द्वैत का सारा अनुभव शुद्ध कल्पना मात्र है। मन से भिन्न अविद्या है ही नहीं। मन का नाश होने पर सब-कुछ नष्ट हो जाता है। मन की क्रिया सारी प्रतीति का कारण है। मन में अविद्या या भ्रान्ति होने के कारण आप वृक्षादि पदार्थों को बाहर देखते हैं और अनुभव करते हैं कि वे आपसे पृथक् हैं और सत्य पदार्थ हैं।

 

जब तक मन बना रहता है, तभी तक बड़े-छोटे, ऊँचे-नीचे, उत्तम और निकृष्ट, भले और बुरे का भेद रहता है। परमोच्च सत्य वही है जिसमें सापेक्षता नहीं है। यदि आप आत्मा पर निरन्तर और गम्भीर ध्यान (आत्म-विज्ञान) द्वारा मन को अतिक्रमण कर सकें तो आप निर्द्वन्द्व दशा को प्राप्त कर लेंगे। वहाँ परम शान्ति और सर्वोत्तम ज्ञान है।

 

मन के बाहर अविद्या कुछ भी नहीं है। स्वयं मन ही अविद्या है। कल्पनाएँ और संकल्प अविद्या के कार्य हैं। अविद्या मन में सन्निहित है। जैसे मोरचा लगी हुई ताँबे की थाली को मिट्टी, राख, खटाई, चूर्ण आदि से चमकाया जाता है, वैसे ही मन को भी जप, प्राणायाम, सत्संग, विचार और निदिध्यासन द्वारा मार्जन करने की आवश्यकता है।

 

अहंकार कैसे विकसित होता है?

 

बुद्धि-संयुक्त आत्मा अहंकार बन जाता है। अहंकार का आधार बुद्धि है। क्योंकि भेद-बुद्धि इस अहंभाव का कारण है, इसलिए अहंकार का बीज बुद्धि कही जाती है। अहन्ता और ममता जीव-सृष्टि है। जीव-सृष्टि ही मनुष्य को संसार से आबद्ध करती है। ईश्वर-सृष्टि भगवत्साक्षात्कार में मनुष्य ही सहायक होती है।

 

मन का बीज अहंकार है। मन के विचारों से अहंकार की वृद्धि होती है। क्योंकि सर्वप्रथम विचार 'अहंभाव' का होता है और यहीं सारे विचारों का आधार है; इसलिए मन का बीज अहंकार है। यह 'मैं' का विचार अपने पीछे-पीछे काल, देश तथा अन्य प्रभविष्णुताओं का विचार ले आता है। इन परिस्थितियों के साथ इसे जीव का नाम प्राप्त होता है। इसी के समकालीन बुद्धि, स्मृति और मन उपजते हैं जो संकल्प रूपी वृक्ष का बीज है।

 

कौमारावस्था में अहंकार अधिक दृढ नहीं होता। वह ऐसा ही होता है जैसे दर्पण में छाया तरुणाई में जब विवाह हो जाता है और आप अनेक सांसारिक वासनाओं की पूर्ति में लग जाते हैं, तब अहंकार विकास प्राप्त करता है और दृढ़ता से बद्धमूल हो जाता है। बाल्यकाल में आप निर्भय रहते हैं और जैसे ही आपके अन्दर यह अहंकार दूर हो जाता है, उसके साथ ही अनेक प्रकार की वासनाएँ, भय और भ्रम आप पर अपना दृढ अधिकार कर लेते हैं और आपको संसार भी अधिकाधिक सत्य प्रतीत होने लगता है।

 

अहंकार का अभिशाप

 

अहंकार कुछ भी नहीं है; परन्तु इसका प्रभाव कितना विस्मयकारी है! माया हो अहंकार है। मन अहंकार का दूसरा नाम है। संसार का अर्थ अहंकार है। अहंकार का अंकुर 'मेरी' और 'तेरी' लम्बी शाखाओं से इधर-उधर फैलता है और बड़ा दृढ़ हो जाता है। अहंकार स्थूल देह में रहना चाहता है (अभिनिवेश), स्थूल मांस खाना चाहता है और मांस का ही आलिंगन करना चाहता है। यह निरा अज्ञान है। माया के छल तथा अन्धाधुन्ध ठगी को देखें सावधान रहें। जग जायें। ज्ञान प्राप्त करें।

 

जैसे बादल सूर्य को ढक लेता है, वैसे ही अहंकार का बादल ज्ञानसूर्य को, ब्रह्म को हक लेता है। यदि आपमें तनिक-सा भी अहंकार है, किसी भी एक नाम या रूप में बोड़ी-सी थी आसक्ति है, का लेशमात्र भी है और मन में किचिन्मात्र भी संसारी है तो आप ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकते।

 

 

 

अहंकार का उन्मूलन कैसे करें ?

 

धन अहंकार की गहरी जड़ों को ज्ञानाग्नि से जला देना चाहिए। तब आपको मोक्ष रूपी धन बड़ी सुगमता से प्राप्त हो सकता है। सारे क्लेश, शोक, दुःख और कष्ट समाप्त हो इन्द्रिय-दमन और प्राणायाम से बुद्धि के विकास में सहायता मिलती है।

 

आप अचानक अहंकार का उन्मूलन नहीं कर सकते। आप स्त्री, सन्तान, धन,क्रोधादि को सुगमता से प्राप् हो सकता है परन्तु अहंकार को त्यागना अति कठिन है; इसे थोड़ा-थोड़ा कम करने का प्रयत्न करें। तीन माह में षोडशांश अहंकार दूर कर दें। चार वर्ष में आप इसका पूरा उन्मूलन कर सकेंगे। आप कर्मयोग द्वारा आत्मबलिदान से या भक्तियोग द्वारा आत्मनिवेदन से या वेदान्तिक आत्म विचार द्वारा अहंकार को दूर कर सकते हैं।

 

मन के संकल्पों से अहंकार उत्पन्न होता है। यदि विषय-भोगों पर आश्रित रहने वाले मन के विकार नष्ट कर दिये जायें तो अहंकार से मुक्त आत्मा अकथनीय ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।

 

अहंकार एक सूत्र के समान है। यह समस्त इन्द्रियों को अपने साथ संयोजित अथवा श्रृंखलित कर लेता है जब सूत्र टूट जाता है तो सारे मोती गिर जाते हैं। इसी प्रकार जब 'अहं ब्रह्मास्मि' भावना द्वारा, साक्षी भाव द्वारा या निमित्त-भाव ले कर आत्म-निवेदन की रीति से (अर्थात् यह मान कर कि मैं भगवान् के हाथों में केवल निमित्त मात्र हूँ) यह मनरूपी सूत्र तोड़ दिया जाये तो सारी इन्द्रियाँ भी टूट जायेंगी। इन्द्रियों के साथ सम्बन्धविच्छेद हो जायेगा।

 

यदि आप अपने को आन्तरिक सूक्ष्म शरीर से भी अभिन्न मान लें तो भी आपको आत्म-साक्षात्कार में सहायता मिलेगी। स्थूल हाड़-मांस के शरीर से आत्मा को अभिन्न मानने से अहंकार के द्वारा सारी कठिनाइयाँ आती हैं। यह स्थूल 'में' बड़ी भारी अड़चन है।

 

जब कभी अहंकार प्रकट होता हो तो प्रश्न करें, ''इस 'मैं' का स्रोत क्या है?" बार-बार इस प्रश्न को दोहरायें। छिलके के बाद छिलका उतारते रहने से प्याज का कुछ भी शेष नहीं रह जाता। जब आप इस छोटे से 'मैं' का विश्लेषण करते हैं तो इसका अभाव ही हो जाता है। शरीर में' नहीं है। टांग काट देने पर भी 'मैं' शेष रहता है। जीव-सृष्टि को त्याग दें।

 

जितना समय फूल तोड़ने में लगता है या जितना समय पलक झपकने में लगता है, उतने ही समय में ब्रह्म-भाव की सम्यक् साधना से अहंकार बड़ी सुगमता से निर्मूल हो. सकता है।

 

 

 

सात्त्विक अहंकार

 

जब आप कहते हैं, 'मैं ब्रह्म हूँ' तो यह सात्त्विक अहकार है। यह मोक्ष-अहंकार है। यह किसी प्रकार भी बन्धन में नहीं रखता है। यह ब्रह्म-साक्षात्कार में सहायक होता है। चित्र में बनी हुई अधि किसी चीज को नहीं जलाती मध्याहनकालीन सूर्य के साम कोई अन्य ज्योति नहीं चमकती और अपना प्रकाश डालती है। इसी प्रकार सात्त्विक पुरुष का अहंकार किसी को हानि नहीं पहुँचा सकता।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद- १८

विचार-शक्ति

 

विचार जीवित शक्ति है

 

विचार एक जीवित प्रबल शक्ति है। यह संसार में वर्तमान सर्वाधिक तेजस्वी, सूक्ष्म तथा अप्रतिरोध्य शक्ति है। इस भौतिक संसार की तुलना में विचारों का जगत् अधिक वास्तविक (सत्य) है। विचार सजीव पदार्थ हैं। विचारों में प्रत्येक परिवर्तन के साथ मनस्तत्त्व में स्पन्द होता है। शक्ति के रूप में कार्य करने के लिए विचार को एक विशेष प्रकार के सूक्ष्म पदार्थ की आवश्यकता होती है।

 

जिस वस्तु का मन ध्यान करता है, उसी का स्वरूप बन जाता है। जब आप किसी वस्तु का ध्यान करते हैं तो आपका मन उसी वस्तु का रूप बन जाता है। जब आप विचार बदल देते हैं तो मन भी अपना रूप बदल देता है। मन में अनेक प्रकार के विचार बराबर बनते रहते हैं। जब आपके विचार जल्दी-जल्दी बदलते हैं तो आपका मन भी अपना रूप जल्दी-जल्दी बदलता है। मन प्रतिक्षण बराबर सैकड़ों विचारों की मूर्तियाँ बनाता है और बिगाड़ता रहता है। यह कभी थोड़े समय के लिए एक विचार-मूर्ति पर स्थिर नहीं रहता।

 

प्रत्येक विचार का एक नाम और रूप होता है। एक ही विचार की अभिव्यंजक शक्ति का स्थूल रूप उसका आकार है और सूक्ष्म रूप उसका नाम है। परन्तु ये तीनों एक ही हैं। यह त्रित्व में एकत्व है, एक ही वस्तु की स्थिति की तीन अवस्थाएँ हैं। जहाँ एक होती है, वहाँ शेष दोनों भी उपस्थित हो जाती हैं। मान लीजिए कि आपका मन बिलकुल शुद्ध और सर्वथा विचार - रहित है। फिर भी ज्यों ही विचार उठने लगता है, यह फौरन ही नाम और रूप धारण कर लेता है। इसलिए मनुष्य के प्रत्येक विचार का प्रतिरूप एक शब्द भी अवश्य होता है।

 

भाषा भिन्न-भिन्न होती है; परन्तु विचार एक ही होता है। सबमें मनोमूर्ति समान होती है। शब्द के चार स्वरूप होते हैंपरा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वैखरी साधारण वाणी है। भिन्न-भिन्न देशों में यह भिन्न-भिन्न होती है; परन्तु परा, पश्यन्ती और मध्यमा एक-सी ही होती हैं। जो मूल स्वरूप में शब्द-ब्रह्म में निश्चेष्ट अवस्था में बिना भेद के रहती है, वह परा-वाणी है। देवताओं की भाषा तथा मानसिक स्तर की भाषा एक ही होती है। कारण शरीर का आवर्ती स्पन्द पश्यन्ती है। यह आपका वास्तविक नाम है। जब आप कारण शरीर के द्वारा कार्य करें, जब कारण शरीर के चक्षु (जिसे दिव्य दृष्टि कहते हैं) द्वारा आप देखें, तब आप पश्यन्ती-वाणी अथवा अपना सच्चा नाम सुनेंगे।

 

 

 

विचार सूक्ष्म पदार्थ है

 

विचार सूक्ष्म पदार्थ है। विचार भी उतना ही ठोस होता है जितना ठोस पत्थर होता है। आपकी मृत्यु भले ही हो जाये; परन्तु आपके विचार कभी भी नहीं भर सकते। इनके भी रूप, आकार, रंग, पदार्थ, शक्ति, तौल और लक्षण होते हैं। आध्यात्मिक विचार का पीत वर्ण, क्रोध और घृणायुक्त विचार का रक्त वर्ण, स्वार्थपूर्ण विचार का भूरा रंग होता है इत्यादि। योगी अपने आन्तरिक योग चक्षु से इन विचारों को देख सकता है।

 

जितने दृढ विचार होंगे, उतनी ही जल्दी उनका फल होगा। विचार को केन्द्र में एकत्र किया जाता है और उसकी दिशा निर्देशित की जाती है और जिस मात्रा में विचार केन्द्रित किया जाता है तथा दिशा निर्देशित की जाती है, उतने ही प्रभाव से वह उस कार्य को सम्पन्न करता है जिसके लिए उसे प्रेषित किया जाता है।

 

विचार रचनात्मक शक्ति है

 

विचार एक महती शक्ति है। विचार गतिशील है। विचार की गति भी होती है। यह संक्रामक होता है। विचार रचनात्मक है। विचार की शक्ति द्वारा आप आश्चर्यपूर्ण कार्य कर सकते हैं। विचार के द्वारा आप रचनात्मक शक्ति प्राप्त करते हैं। आजकल विचार-शक्ति, विचार गति-विद्या और विचार संस्कार के विषय पर अनेक पुस्तकें हैं। उनका अध्ययन करें। फिर आपको विचार, उसकी शक्ति तथा उसके कार्य और उपयोग के विषय में व्यापक ज्ञान हो जायेगा।

 

विचार की शक्ति अति महान् है। आपका प्रत्येक विचार आपके लिए प्रत्येक सम्भव प्रकार से यथार्थ मूल्य रखता है। आपकी शारीरिक और मानसिक शक्ति, जीवन में सफलता और अपने संग से जो प्रसन्नता आप दूसरों को पहुंचाते हैं ये सब आपके विचारों के स्वभाव तथा गुण पर निर्भर करता है। आपको विचार संस्कृति जाननी चाहिए। -

 

विचार स्वास्थ्य प्रदान करता है

 

यदि आपके विचार स्वस्थ होंगे तो आपका शारीरिक स्वास्थ्य भी ठीक होगा। यदि आपके मन में रोगी विचार होंगे अर्थात् रोगी तन्तुओं, दुर्बल नसों और अंगों की क्रियाओं के उचित रूप में क्रिया करने के विचार होंगे तो आपको स्वास्थ्य, सौन्दर्य और एकरसत्व की आशा नहीं रखनी चाहिए। शरीर मन के द्वारा बनता है। यदि आपके विचार बलवान होंगे तो भौतिक शरीर भी बलिष्ठ होगा।

 

सब प्रकार के बुरे विचार मन को गन्दा और आहत करते हैं और यदि उनको जारी रखा जाये तो वे सचमुच रोग बन जाते हैं और मन को ऐसा विकृत बना देते हैं कि जीवन पर्यन्त उनकी चिकित्सा नहीं हो सकती।

 

विचार चरित्र-निर्माण करता है

 

"मनुष्य जैसा विचार करता है वैसा ही स्वयं बन जाता है।" "विचार के द्वारा मनुष्य बनाया जाता है। जिस वस्तु पर मनुष्य विचार करता है, स्वयं भी वही बन जाता है।" आप विचार करें कि आप बलवान् हैं तो आप बलवान् बन जायेंगे। विचार करें कि आप बलहीन है तो आप बलहीन बन जायेंगे। आप विचार करें कि आप मूर्ख हैं तो आप मूर्ख बन जायेंगे। आप विचार करें कि आप ईश्वर हैं तो आप ईश्वर बन जायेंगे। मनुष्य अपना स्वभाव स्वयं ही बनाता है; जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है। यदि आप साहस की धारणा करें तो अपने स्वभाव में आप साहस भर लेंगे। यही बात पवित्रता, धैर्य, निःस्वार्थता और आत्म-संयम की है। यदि आपके उच्च विचार होंगे तो शनैः-शनैः आप अपने लिए ऊँचा चारित्र्य बना लेंगे; परन्तु यदि आपके विचार नीच श्रेणी के हैं तो हीन चारित्र्य ही बनेंगे। स्थिर और दृढ़ता से बने रहने वाला विचार मन की एक निश्चित आदत बना देता है और वह आदत मनुष्य के चरित्र में एक स्वभाव (लक्षण) के रूप में प्रकट हुआ करती है। विचारों के सूत्रों ने मिल कर मानसिक और नैतिक स्वभाव बनाया है और ये स्वभाव मिल कर ही चरित्र कहलाते हैं। आप अपने चरित्र को इतने ही निश्चय के साथ नियमानुसार काम करते हुए बना सकते हैं जैसे राजमिस्त्री दीवार को बनाता है।

 

विचारपूर्वक चरित्र - गठन का प्रथम सोपान यह है कि हम अपने विचारों का विषय सतर्क हो कर पसन्द कर लें और फिर उसी लक्षण पर बार-बार विचार करें। शीघ्र ही उस लक्षण को प्रकट करने की रुचि हो जायेगी। थोड़े समय बाद इसका अभ्यास स्वाभाविक हो जायेगा। विचार ही चरित्र को बनाते हैं। आप विचार के द्वारा ही प्रारब्ध का सूत काटते हैं।

 

विचार प्रारब्ध की रचना करते हैं

 

व्यक्ति एक जन्म में जिस वस्तु का अधिक विचार करता है, अगले जन्म में स्वयं भी वही बन जाता है। यदि मन निरन्तर एक ही विचार धारा में चलता रहे तो एक नाली सी बन जाती है जिसमें विचार-शक्ति स्वतः ही दौड़ती रहती है और ऐसी विचार की आदत मृत्यु के बाद भी रहती है, क्योंकि इसका सम्बन्ध आत्मा से होता है। यह भावी पार्थिव जीवन में कभी एक सामर्थ्य और विचारशैली के रूप में बनी रहती है।

 

प्रत्येक विचार की अपनी अलग ही मनोमूर्ति होती है। प्रत्येक मनुष्य की अपनी मानसिक सृष्टि, अपना मत, अपने भाव और विचार-धारा तथा अनुभव होते हैं। एक भौतिक जीवन में बनी हुई मनोमूर्तियों का सार मानसिक जगत् में बनता रहता है। यहीं अगले भौतिक जीवन का आधार होता है। जैसे प्रत्येक जन्म में नया शरीर बनता है वैसे ही प्रत्येक जन्म में नया मन और नयी बुद्धि भी बनती है।

 

विचार और कर्म की क्रिया को सविस्तार समझाना कठिन है। प्रत्येक कर्म का दो प्रकार का फल होता है, एक व्यक्तिगत मन पर और दूसरा जगत् पर। व्यक्ति अपने भावी जीवन की परिस्थितियाँ दूसरों पर अपने कर्मों का प्रभाव डाल कर स्वयं बनाता है।

प्रत्येक कर्म की एक पूर्वावस्था होती है जिसके द्वारा वह कर्म बनता है। प्रत्येक कर्म का एक भविष्य होता है जो उस कर्म से उत्पन्न होता है। कर्म के बनाने में एक इच्छा होती है जो उसे प्रेरणा करती है और एक विचार होता है जो उसे आकार देता है। कार्य और कारण की अनन्त श्रृंखला में प्रत्येक कर्म एक कड़ी होता है, प्रत्येक कार्य स्वयं कारण बन जाता है और प्रत्येक कारण पहले कार्य बन चुका होता है। इस अनन्त श्रृंखला की प्रत्येक कड़ी इच्छा, विचार और क्रिया-रूपी तीन अवयवों से बनी हुई होती है। इच्छा विचार को चलाती है और विचार क्रिया-रूप में परिणत हो जाता है।

 

दूसरों की सम्पत्ति की स्वार्थपूर्ण लालसा को यद्यपि वर्तमान काल में कभी क्रियात्मक धोखे के रूप में परिणत भी किया हो तथापि यह मनुष्य को आगामी पार्थिव जीवन में चोर बनाती है और गुप्त रूप से दबाये हुए मन में घृणा और प्रतिकार के भाव आगामी जीवन में हत्यारे को जन्म देने के बीज बनते हैं। ऐसे ही नि:स्वार्थ प्रेम के फलस्वरूप परोपकारी तथा सन्त जीव उत्पन्न होता है और दयापूर्ण भावों से सब जीवों में मैत्रीभाव रखने वाला कोमल तथा दयालु प्रकृति का मनुष्य बनता है।

 

प्रत्येक वस्तु सजातीय वस्तु को आकृष्ट करती है

 

यह महान् नियम सदा चालू रहता है: “प्रत्येक वस्तु सजातीय वस्तु को आकृष्ट करती है।" यह महान् विश्वजनीन नियम है। यह प्रकृति का नियम है। विचार-जगत् में भी यह नियम काम करता है। समान विचार वाले मनुष्य एक-दूसरे की ओर आकृष्ट होते हैं। इसी कारण ये लोकोक्तियाँ प्रसिद्ध है: "एक जाति के पक्षी इकट्ठे हुआ करते हैं", "जैसी संगति मनुष्य रखता है, उसी से उसका चरित्र जाना जाता है। एक चिकित्सक दूसरे " चिकित्सक की ओर आकृष्ट होता है। कवि दूसरे कवि से आकृष्ट होता है। गायक दूसरे से प्रेम रखता है। एक दार्शनिक दूसरे दार्शनिक को चाहता है। एक आवारा दूसरे आवारा से प्रेम करता है। मन में खींचने की शक्ति है। आप दृश्य और अदृश्य डॉव-शक्तियों से बराबर अपनी विचार-धारा के अनुकूल विचारों, प्रभावों और स्थितियों को आकृष्ट करते रहते हैं।

 

विचार-जगत् में भी सजातीय विचारों के लोग एक-दूसरे की ओर आकृष्ट होते हैं। यह विश्वव्यापी नियम निरन्तर कार्य करता रहता है, चाहे हम इसको जानें या जानें। ऐसा कहना चाहिए कि हम विचारों के एक विशाल समुद्र में रहते हैं और हमारे चारों ओर का वातावरण उन विचार-शक्तियों से भरा हुआ है जो विचार-तरंगों के रूप में निरन्तर भेजी जा रही हैं। या तो जान-बूझ कर या अनजाने में न्यूनाधिक मात्रा में हम सब पर इन विचार शक्तियों का प्रभाव होता है। यह प्रभाव उतनी ही राशि में होता है जितने न्यूनाधिक परिमाण में हमारी अनुभव-शक्ति बढ़ी होती है या जितने अंश में हम आध्यात्मिक विषय में शून्य होते हैं और बाह्य प्रभावों को जल्दी ग्रहण करते हैं। इन्हीं राशियों से यह निश्चय हुआ करता है कि कौन-कौन से प्रभाव हमारे विचार-साम्राज्य में प्रवेश करेंगे और हमारे जीवन पर प्रभाव डालेंगे।

 

चाहे जिस प्रकार का विचार अपने साथ लिये रहें और जब तक आप उसे अपने साथ रखें, चाहे जैसे भी आप पृथ्वी या समुद्र पर घूमें, आप निरन्तर जाने या अनजाने में केवल वही वस्तु अपनी ओर खींचेंगे जो आपके विचार के प्रधान लक्षण से मिलती-जुलती होगी। विचार आपकी निजी सम्पत्ति है और यदि आप स्थिरता से अपने सामर्थ्य को पहचान लें तो आप उन्हें अपनी रुचि के अनुसार नियन्त्रित कर सकते हैं। अपने विचारों का क्रम और उनके द्वारा आकृष्ट प्रभावों का क्रम निश्चय करना सर्वथा आपके ही हाथ में है और परिस्थितियों के लचकदार खिलौने नहीं हैं जब तक आप स्वयं ही ऐसे बनना पसन्द करें।

 

सद्विचार और कुविचार

 

सद्विचार तीन प्रकार से सफल होता है। प्रथमतः जिस मनुष्य के मन में उठता है. उसके मनोमय कोश में सुधार करके उसे पवित्र करता है। द्वितीयत: जिस व्यक्ति के - सम्बन्ध में वह विचार होता है, उसे लाभदायक होता है और अन्त में समस्त मानसिक वातावरण को सुधार कर सारी मानव जाति को लाभ पहुँचाता है।

 

इसके विपरीत कुविचार तीन प्रकार से अभिशाप लाता है। पहले वह विचार करने वाले मनुष्य के मनोमय कोश को क्षत करके उस मनुष्य के लिए हानिकारक होता है।. दूसरे जिस मनुष्य के विषय में वह विचार किया जाता है, उसे हानिकारक होता है और तीसरे समस्त मानसिक वातावरण को दूषित करके सारी मानव जाति को हानि पहुँचाता है।

 

किसी मनुष्य की ओर भेजा हुआ प्रत्येक कुविचार उसके लिए तलवार के समान होता है। यदि आपके मन में घृणा के विचार हैं तो जिसके प्रति आपकी घृणा है, वास्तव में आप उसके हत्यारे हैं। इस प्रकार आप स्वयं अपनी हत्या करते हैं; क्योंकि ये विचार आप पर ही प्रतिक्रिया करते हैं।

 

जिस मन में खोटे विचार भरे हों, वह इसी प्रकार के विचार अपनी ओर खींचने में चुम्बक का काम करता है और इस प्रकार आदि बुराई को और भी बढ़ा लेता है।

 

मानसिक वातावरण में भेजे हुए कुविचार उसके ग्राही मनों को विषाक्त कर देते हैं। कुविचार में लगे रहने से उससे विरक्ति क्रमशः कम होती जाती है और मनुष्य उस विचार के अनुरूप ही कार्य करने को प्रेरित होता है।

 

विचार-सन्तति

 

यही बात पर्याप्त नहीं है कि आपके विचार बुरे नहीं है। आपको अपने बुरे विचारों को सद्विचारों में बदलना आवश्यक है। आपकी साधना का यह प्रथम अंग है। आपको उन्हें सहायक विचार बनाना चाहिए। जब उन्हें बाहर भेजा जाये तो वे इस योग्य हो कि आपके पड़ोसियों और पीड़ित मानव-समाज की अधिक-से-अधिक भलाई कर सकें।

 

विचार आपके अपने ही सच्चे बच्चे हैं। विचारों की सन्तति के लिए सचेत रहें। सुपुत्र अपने पिता को सुख, नाम और यश देता है। कुपुत्र बदनामी और अपयश देता है। इसी प्रकार सद्विचार आपको सुख तथा प्रसन्नता देता है और कुविचार दुःख तथा कष् पहुंचाता है। जैसे आप अपने बच्चों का पालन बड़ी सावधानी से करते हैं इसी प्रकार आपको सावधानी से अच्छे और उच्च विचारों का पालन करना होगा।

 

विचार संक्रामक है

 

विचार बड़ा ही संक्रामक, यहाँ तक कि फ्लू से भी अधिक संक्रामक होता है। विचार गतिशील है। यह वास्तव में मस्तिष्क से निकल कर घूमता रहता है और दूसरों के मस्तिष्क में भी प्रवेश करता है। आपका सहानुभूतिपूर्ण विचार उन लोगों में भी सहानुभूति उत्पन्न करता है जो आपके सम्पर्क में आते हैं। क्रोध का विचार क्रोधी व्यक्ति के चतुर्दिक् रहने वालों में भी क्रोध उत्पन्न कर देता है। यह एक मनुष्य के मस्तिष्क से निकल कर दूर देश में रहने वालों के मस्तिष्क में प्रवेश कर जाता है और उन्हें अनुप्राणित करता है। एसन्नता का विचार इसी प्रकार दूसरों में भी प्रसन्नता का संचार कर देता है। जब आप खेलते-कूदते प्रसन्न बालकों के झुण्ड को देखते हैं तो आप भी प्रसन्न हो जाते हैं।

 

आकाशवाणी के प्रसारण में गायक कलकत्ता में सुन्दर गाने गाता है। दिल्ली में अपने मकान में रेडियो द्वारा आप उन्हें अच्छी प्रकार सुन सकते हैं। बेतार यन्त्र के द्वारा सारे सन्देश प्राप्त किये जाते हैं। इसी प्रकार आपका मन बेतार यन्त्र के समान है। शान्ति, समत्व, एकरसता और आध्यात्मिक स्पन्दनों से सम्पन्न एक सन्त जगत् में शान्ति और एकान्त के भाव प्रेषित करता है। वे चारों ओर बड़ी तीव्र विद्युत्-गति से दौड़ते हैं और हजारों मनुष्यों के मन में प्रवेश करते हैं तथा उनमें भी शान्ति और एकता के वैसे ही विचार उत्पन्न कर देते हैं। परन्तु जिसके मन में ईर्ष्या, प्रतिकार और घृणा भरी हुई है ऐसा संसारी मनुष्य विसंवादी विचार ही बाहर भेजता है जो हजारों के मन में प्रवेश करके वैसे ही घृणा और भेद के भाव पैदा कर देता है।

 

विचार अतीव संक्रामक होता है। भले और ईमानदार मनुष्य को किसी चोर के साथ रखें तो वह भी चोरी करने लगता है। नशा करने वाले मनुष्य को शराबी के साथ रखें तो वह भी मदिरा पीने लगता है।

 

विचार सम्प्रेषण

 

वह कौन-सा माध्यम सम्भव है जिसके द्वारा विचारों की गति एक मन से दूसरे मन तक होती है? इसकी सबसे उत्तम व्याख्या यही हो सकती है कि आकाश की भाँति मनस्तत्त्व भी समस्त देश या स्थान में व्याप्त है और इसी के द्वारा विचारों की गति होती है, जिस प्रकार भावों की प्रगति प्राण के द्वारा होती है, उष्णता, ज्योति (तेज) और विद्युत् की गति आकाश के द्वारा होती है और शब्द की गति वायु के द्वारा होती है। आकाश की भाँति मन भी विभु अर्थात् व्यापक है; इसीलिए विचार सम्प्रेषण सम्भव है।

 

यदि हम सरोवर में पत्थर का टुकड़ा फेंक दें, तो इसमें केन्द्रीय लहरे उस प्रभावित स्थान से चारों ओर को अनुक्रम से उठती है। इसी प्रकार दीपक की ज्योति से भी आश में स्पन्द की लहरे उस दीपक के चारों ओर फैलती है। इसी रीति से भला या बुरा कोई एक विचार एक मनुष्य के मन में उठता है तो यह मानसिक वातावरण में स्पन्दन (कम्पन) उत्पन्न कर देता है जो चारों ओर दूर-दूर तक जाते हैं।

 

विद्युत् की गति एक सेकण्ड में ,८६,००० मील होती है; परन्तु विचारों की गति में कुछ समय नहीं लगता। विद्युत् के माध्यम आकाश से मन अधिक सूक्ष्म है, इसलिए विचारों की गति विद्युत् से विशेष अधिक होती है।

 

विचार भी वस्तुओं के समान हुआ करते हैं। जैसे आप अपने किसी मित्र को नारंगी दे देते हैं और फिर उसे वापस ले लेते हैं इसी प्रकार आप अपने मित्र को एक उपयोगी और बलशाली विचार दे सकते हैं और फिर उसे उसे वापस ले सकते हैं। विचार का उपयोग तथा उसके व्यवहार करने की सम्यक् कला आपको अवश्य जान लेनी चाहिए। यह विज्ञान बड़ा रोचक और सूक्ष्म है संकट में पड़े हुए अपने मित्र की सहायता सान्त्वना के विचार भेज कर कर सकते हैं। जिस मित्र को सत्य की खोज है, उसकी सहायता उन सच्चाइयों के स्पष्ट तथा निश्चित विचार भेज कर कर सकते हैं जिनको आप जानते हैं। आप मानसिक वातावरण में ऐसे विचार भेज सकते हैं जिनसे उनके संवेदनशील व्यक्तियों को प्रेरणा, पवित्रता और उन्नति मिलेगी।

 

यदि आप किसी अन्य व्यक्ति के लिए प्रेम और सहायता का भाव भेजते हैं तो वह आपके मस्तक से निकल कर सीधा उस व्यक्ति के पास जाता है, जिसके मन में इसी प्रकार का प्रेमभाव उत्पन्न करता है और दोगुनी शक्ति के साथ आपके पास वापस आता है। ऐसे ही यदि आप किसी मनुष्य के प्रति घृणा का भाव भेजें तो वह उस मनुष्य पर आघात करता है और जब दोगुनी शक्ति के साथ वापस आता है तो आपको भी आहत कर देता है। इसलिए विचार के नियम को समझ लें। केवल दया, प्रेम और कृपा के