मन : रहस्य और निग्रह

 

MIND-ITS MYSTERIES AND CONTROL

 

का हिन्दी अनुवाद

 

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

SERVE LOVE MEDITATE REALIZE

THE DIVINE LIFE SOCIETY

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर- २४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dishq.org

चतुर्थ हिन्दी संस्करण : २००५ :

पंचम हिन्दी संस्करण २०१८

(,००० प्रतियां)

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

ISBN 81-7052-063-0 HS 97

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

PRICE : ₹ 205/-

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्मनाभानन्द

द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पो. शिवनन्दनगर- २४९ १९२, जिला टिहरी गढ़वाल,

उत्तराखण्ड' में मुद्रित

For online orders and Catalogue visit: disbooks.org

पत्र

 

जुलाई १९४६

प्रिय धीरेन्द्र

 

भयभीत हों। निःसन्देह मन अतीव दुर्दान्त है। बार-बार के प्रयास से आप इसे पूर्णतया वश में कर सकते हैं।

 

आप मन के स्वामी हैं। अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा अपने प्रभुत्व की दृढ़तापूर्वक घोषणा करें पूर्ण आत्मविजय से निष्पन्न होने वाले अधिकार, आनन्द तथा वैभव का अनुभव करें।

 

मन का निष्ठुरता से निरोध करें। वासनाओं का उन्मूलन करें। वासनाओं के समाप्त होते ही मन आपका दास बन जायेगा। निष्काम बनें और विजयी हों।

 

आप अपनी आदिम स्वतन्त्रता में विश्राम करें!

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रार्थना

 

हे दृग्गोचर! हे आराध्यदेव ! हे परम तत्त्व! आप अनन्त आकाश से ले कर मेरे पैरों मेरे के नीचे की घास की नन्हीं पत्ती तक इस विशाल ब्रह्माण्ड में व्याप्त तथा अन्तः प्रविष्ट हैं। आप इन समस्त नाम-रूपों के आधार हैं। आप मेरे नेत्रों के तारे, मेरे हृदय के प्राण, मेरे जीवन के जीवन, मेरी आत्मा की आत्मा, मेरी बुद्धि तथा इन्द्रियों के प्रकाशक, के मधुर अनाहत संगीत तथा मेरे स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीरों के सारतत्त्व हैं।

 

मैं आपको ही इस ब्रह्माण्ड का महान् शासक तथा अपने शरीर-त्रय का अन्तर्यामी मानता हूँ। हे प्रभो! मैं आपको बारम्बार साष्टांग प्रणाम करता हूँ। आप ही मेरे एकमात्र शरण हैं। हे करुणा और प्रेम के सागर! मैं आप पर ही विश्वास रखता हूँ। मेरा उद्धार करें, मुझे प्रबुद्ध करें, मेरा पथ-प्रदर्शन करें तथा मेरी रक्षा करें। मेरे आध्यात्मिक पथ के अवरोधों को दूर करें। हे जगद्गुरु! अज्ञानावरण को हटायें। अब मैं और अधिक, एक क्षण के लिए भी इस शरीर इस जीवन के क्लेशों को सहन नहीं कर सकता। मुझे शीघ्र दर्शन दें। हे प्रभो! मैं लालावित हो रहा हूँ। मैं द्रवित हो रहा हूँ। मेरी भक्तिमयी आन्तरिक प्रार्थना पर ध्यान दें, ध्यान दें। हे प्रभो ! निष्ठुर बनें। आप दीन बन्धु हैं। आप अधम-उद्धारक हैं। आप पतितपावन हैं।

 

शान्तिः शान्तिः शान्तिः

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक का वक्तव्य

यद्यपि परम पूज्य श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज की सभी पुस्तकें लोकप्रिय है; किन्तु 'Mind Its Mysteries and Control' नामक पुस्तक सर्वाधिक लोकप्रिय है। यही कारण है कि अंगरेजी में इसके अनेक संस्करण प्रकाशित होने पर भी इसकी माँग बराबर बनी हुई है। हमें खेद है कि हिन्दी जनता के हार्दिक अनुरोध के होते हुए भी बहुत दिनों से इसका हिन्दी-संस्करण प्रकाशित नहीं हो सका। यह सन्तोष का विषय है कि इसका नवीन संस्करण अपने नवीन रूप में सुधी जनता की सेवा में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका प्रथम संस्करण दो भागों में प्रकाशित हुआ था जिससे एक ही प्रकार का विषय कई स्थानों पर बिखर गया था। नवीन संस्करण में सभी सम्बद्ध विषयों को एक ही शीर्षक के अन्तर्गत लाने का प्रयास किया गया है। आशा है कि इससे यह संस्करण पूर्वापेक्षा अधिक उपयोगी सिद्ध होगा।

 

प्रस्तुत पुस्तक में अनेक आध्यात्मिक ग्रन्थों के प्रणेता, अध्यात्मविद्या-विशारद योगीराज श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी ने मन की रचना, उसकी कार्यविधि, उसकी अलौकिक शक्तियाँ तथा उनके समुचित प्रयोग द्वारा दिव्यानन्द की प्राप्ति का वर्णन बड़े विस्तृत, सुबोध और सरल ढंग से किया है। संक्षेप में यह पुस्तक मन की फिलासफी पर एक छोटा-सा विश्व ज्ञानकोश है जिसमें विद्वान् लेखक ने अपने गम्भीर अध्ययन और यौगिक आत्मानुभव के आधार पर मन के समस्त रहस्यों का उद्घाटन किया है। इस संसार में जितने भी उच्च कोटि के साधक तथा सन्त-महात्मा हुए हैं, उनका कहना है कि यह संसार मन का खेल है। मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण बनता है। यदि आप विश्व विजय प्राप्त करना चाहते हैं, तो सबसे पहले मन को विजित करें। मन की - विजय के उपरान्त संसार की किसी अन्य वस्तु के विजय की आवश्यकता नहीं रहती। मन का साम्राज्य ही सच्चा साम्राज्य है। जिसने श्रवण, मनन और निदिध्यासन के सतत अभ्यास से मन को वश में कर लिया है, जो धारणा, ध्यान और समाधि के दिव्यानन्द की सरिता में गोते लगा चुका है, उस महापुरुष के लिए राजाधिराजों का सिंहासन भी तुच्छ और निर्मूल्य है। सत्यं शिवं, सुन्दरम् के पुनीत ध्येय की ओर अग्रसर होने वाले जिज्ञासु साधक के लिए जहाँ यह पुस्तक परम उपयोगी है, वहाँ साधारण संसारी पुरुषों के लिए भी इस पुस्तक का कम महत्व नहीं है। साधारण गृहस्थ इस पुस्तक के श्रद्धापूर्वक अध्ययन और तदनुकूल आचरण से अपने दैनिक जीवन और सांसारिक व्यवहारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला सकते हैं। इस पुस्तक में अनेक नवीन विषयों का समावेश किया गया है जो साधना के लिए सर्वथा अनूठी वस्तु है।

पुस्तक के हिन्दी अनुवाद की भाषा अत्यन्त सरल, सुबोध, सरस और माधुर्य से भरी हुई है। कहीं-कहीं कविता की धारा स्वच्छन्द, मस्त सरिता की तरह बहती चली जाती है। पुस्तक के कई अंश इतने प्रभावशाली हैं कि पुस्तक पढ़ते ही हृदय-सागर में अनिर्वचनीय आनन्द की उत्ताल तरंगें उठने लगती हैं। पुस्तक की भाषा हृदयस्पर्शी है और उसमें इतनी ताकत मौजूद है कि वह दिलों को हिला सके, दिमागों में परिवर्तन कर सके।

 

आशा है, प्रेमी पाठक प्रस्तुत पुस्तक से लाभ उठायेंगे; इसी में हमारे प्रयास की मफलता है।

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

प्रस्तावना

 

हममें से प्रत्येक व्यक्ति सुख की खोज में संलग्न है; किन्तु इस आनन्द की प्राप्ति के लिए हमने जिस उपाय का अवलम्बन किया है, वह ठीक नहीं है। प्रस्तुत आनन्द प्राप्ति - की खोज के मार्ग में हम भटक गये हैं। हम जीवन भर तो सांसारिक कामों में अनुरक्त रहते हैं। बालपन से ले कर वृद्धावस्था तक यह मोह हमारे पीछे लगा ही रहता है। बचपन में माता की स्नेहमयी गोद, खेल-खिलौने, युवक होने पर ढेर-की-ढेर पुस्तकें और विश्वविद्यालय की उपाधियाँ, संसार में प्रवेश के समय पत्नी प्रेम और धन कमाने की अतृप्त लालसा, सन्तान की इच्छा अभिमान और झूठे गौरव के विचार आदि के मोह में हम लिप्त रहते हैं।

 

किन्तु इस संसार में पुत्र, दारा और प्राण से भी बढ़ कर एक वस्तु है जो आत्मा या पुरुष के रूप में आपके अन्तस्तल या हृदयदेश में छिपी हुई है। हम सांसारिक विषयों से मन को हटा कर, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर, ध्यान, तपस्या, समाधि और योग-साधना द्वारा ही अपने अन्दर छिपी हुई इस दिव्य शक्ति को प्राप्त कर सकते हैं।

 

मनुष्य अविद्या की तीन ग्रन्थियों अज्ञान, इच्छा और कर्म के कारण जन्म, मृत्यु और रोग की निरन्तर बहने वाली धारा में गिरता रहता है। बाह्य पदार्थों को देखने और इहलौकिक आनन्दोपभोग की ओर मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति आत्म-साक्षात्कार में बाधक है। वह परब्रह्म, अन्तः नियन्त्रक, विनश्चर पदार्थों में अविनाशी, अनित्यों में नित्य और अचेतनों में चेतन भगवान् सब प्राणियों के हृदय मन्दिर में विराजमान है जो उस भगवान् के दर्शन कर लेता है, वह शाश्वत शान्ति और दिव्यानन्द प्राप्त करता है। जरा,

 

यह सच है कि आत्मा या ब्रह्म प्रत्येक प्राणी में छिपा हुआ है; परन्तु वही इसके दर्शन कर पाता है जिसका मन शुद्ध, पवित्र और उसके पूर्ण नियन्त्रण में है।

 

मन और इन्द्रियों पर नियन्त्रण प्राप्त करने के लिए हमें प्रकृति विज्ञान की पूरी जानकारी और कठिन मनोनिग्रह की आवश्यकता है; क्योंकि जैसा ऊपर कहा गया है, मानस-तत्त्व का पूर्ण ज्ञान तथा मन और इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण करके ही हम आत्मा या सच्चे सुख को प्राप्त कर सकते हैं।

 

जिसने मन के स्वभाव और क्रिया-पद्धति को पूर्णतया समझ लिया है, उसके लिए मनोनिग्रह बड़ा सरल है। सम्पूर्ण साधना का लक्ष्य मनोजय है जिससे आत्म-ज्ञान मिलता है और जीव जन्म-मरण के बन्धन से छुटकारा पा लेता है।

 

मन को वशीभूत कर राजयोगी दर्शन, ध्यान और समाधि प्राप्त करते हैं। इसी की सहायता से वेदान्तियों को श्रवण, मनन और निदिध्यासन की आत्मिक शक्तियाँ सुलभ हो जाती हैं। इसी से भक्तगण भगवान के चरणारविन्दों के ध्यान में लीन हो जाते हैं। यह सब मनोनिग्रह के महत्व का ही प्रसाद है।

मन के दृढ़ नियन्त्रण का नाम योग है। योग एकता है। योग भगवान् के साथ समरसता है। जब पाँचों इन्द्रियों सहित मन शान्त हो जाता है, तभी परमानन्द, अनन्त ज्ञान, अमरता और परम शान्ति की उपलब्धि होती है। जिसका मन पर पूर्ण नियन्त्रण है, वह अपने जीवन के लक्ष्य को सुगमता से प्राप्त कर लेता है; क्योंकि इस शरीर रथ को खींचने वाली इन्द्रियाँ उसके लिए अच्छे घोड़ों की तरह अपना कार्य सम्पादन करती है।

 

इस पुस्तक में मन को नियन्त्रित करने के कुछ क्रियात्मक उपाय बतलाये गये हैं। इसलिए यह आत्म-साक्षात्कार के पथ पर चलने वाले साधकों के लिए बड़ी सहायक सिद्ध होगी। इसमें मन को नियन्त्रित करने के योग के विभिन्न उपायों का सरल, सुबोध भाषा में वर्णन किया गया है। यह पुस्तक निरन्तर तीव्र अध्ययन के लिए है; क्योंकि इसमें योग के साधकों के लिए क्रियात्मक अनुभव, निर्देश और सुझाव हैं। यदि कोई भी पाठक इस पुस्तक के अध्ययन से सत्य और आत्म-साक्षात्कार के पथ पर आरूढ़ हो सका, , तो मैं अपने प्रयत्नों को सफल समझँगा।

 

मेरी शुभ कामना है कि परमात्मा आपको आत्मबल प्रदान करें जिससे आप अपने मन पर विजय प्राप्त कर सकें, आपके जीवन में चिरस्थायी शान्ति और आत्मानन्द की प्राप्ति हो! आप कैवल्य प्राप्त करें, यही परम प्रभु से विनय है।

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

पत्र. 3

प्रार्थना.. 4

प्रकाशक का वक्तव्य... 5

प्रस्तावना.. 6

परिच्छेद- . 13

मन क्या है?. 13

परिच्छेद- . 29

मन और शरीर. 29

परिच्छेद- . 34

मन, प्राण और कुण्डलिनी.. 34

परिच्छेद-. 37

मन और आहार. 37

परिच्छेद-. 40

अवस्था - त्रय. 40

परिच्छेद- . 45

गुण- त्रय. 45

परिच्छेद-. 48

मानसिक अवस्थाएँ. 48

परिच्छेद-. 56

मानसिक शक्ति.... 56

परिच्छेद-. 60

दोष-त्रय. 60

परिच्छेद- १०. 62

शुद्ध और अशुद्ध मन. 62

परिच्छेद- -११. 66

वृत्तियाँ.. 66

परिच्छेद- १२. 70

प्रत्यक्ष ज्ञान का सिद्धान्त... 70

परिच्छेद- १३. 77

चित्त और स्मृति.. 77

परिच्छेद- १४. 82

संस्कार. 82

परिच्छेद- १५. 89

संकल्प... 89

परिच्छेद- १६. 93

विचार ही संसार की सृष्टि करता है. 93

परिच्छेद-१७. 99

अविद्या और अहंकार. 99

परिच्छेद- १८. 103

विचार-शक्ति.... 103

परिच्छेद- १९. 113

विचार-संस्कृति.. 113

परिच्छेद-२०. 122

वासनाएँ. 122

परिच्छेद- २१. 127

कामनाएँ. 127

परिच्छेद- २२. 133

राग-द्वेष. 133

परिच्छेद-२३. 138

सुख तथा दुःख.. 138

परिच्छेद- २४. 143

विवेक.. 143

परिच्छेद-२५. 144

वैराग्य और त्याग. 144

परिच्छेद- २६. 149

इन्द्रिय-संयम. 149

परिच्छेद-२७. 154

मौन तथा आत्मनिरीक्षण.. 154

परिच्छेद- २८. 159

कुवृत्तियाँ तथा उनका उन्मूलन. 159

परिच्छेद- २९. 180

सद्गुणों का संवर्धन. 180

परिच्छेद-३०. 182

मन के निग्रह की विधि.. 182

परिच्छेद - ३१. 202

धारणा.. 202

परिच्छेद-३२. 209

ध्यान. 209

परिच्छेद-३३. 222

ध्यान में अनुभव तथा बाधाएँ. 222

परिच्छेद - ३४. 232

समाधि.. 232

परिच्छेद-३५. 239

मनोनाश. 239

परिच्छेद - ३६. 243

मन की तुलना.. 243

परिच्छेद - ३७. 247

ज्ञानयोग का सार. 247

परिच्छेद-३८. 257

जीवन्मुक्त पुरुष में मन. 257

परिच्छेद - ३९. 261

एक योगी की शक्तियाँ.. 261

परिच्छेद-४०. 263

गुरु की आवश्यकता.. 263

परिच्छेद-४१. 265

साधकों को संकेत. 265

परिशिष्ट-. 269

मन के प्रति.. 269

परिशिष्ट-. 294

अतीन्द्रिय-संवेदन. 294

परिशिष्ट-. 305

मनोनाश. 305

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मन : रहस्य और निग्रह

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिच्छेद-

मन क्या है?

 

"यो वा आयतनं वेदायतनं स्वानां भवति मनो वा आयतनम्"

जो आयतन को जानता है, वह स्वजातियों का आयतन (आश्रय) होता है। निश्चय मन ही आयतन है।

(छान्दोग्य उपनिषद् --)

 

जो आपको ईश्वर से पृथक् करता है, वह मन है। इस मन को ओंकार-चिन्तन या भक्ति के द्वारा हटा दें, तो आपको ईश्वर का दर्शन हो जायेगा।

 

मन : एक रहस्य

 

अधिकांश मनुष्य मन के अस्तित्व और इसकी क्रियाओं से अवगत नहीं हैं। तथाकथित शिक्षित लोगों को भी मन तथा इसके स्वभाव और कार्यों के विषय में बहुत स्वल्प जानकारी है। उन्होंने केवल सुन रखा है कि मन होता है।

 

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों को इसकी किंचित् जानकारी है।

 

पाश्चात्य चिकित्सक केवल आंशिक रूप से ही मन को जानते हैं। अभिवाही चेताएँ परिणाह अथवा मेक-रज्जु के अयांगों से संवेदनाएं लाती हैं। फिर ये संवेदनाएँ वहाँ से शिर के पश्च भाग, मस्तिष्क-पुच्छ में, जहाँ चेता-तन्तु व्यत्यस्त होते हैं, पहुँचती हैं और वहाँ से वे उत्तरवर्ती पुरोभागीय संवेल्लक अथवा ललाट में, जो बुद्धि अथवा मन का स्थान माना जाता है, मस्तिष्क के ऊर्ध्ववर्ती पुरोभागीय संवेल्लक में पहुँचती हैं। मन संवेदनाओं को अनुभव करता है तथा अभिवाही चेताओं के द्वारा हाथ, पैर आदि अग्रांगों को प्रेरक प्रणोदन प्रेषित करता है। उन लोगों के लिए यह सब केवल मस्तिष्क का कार्य है। उनके मत से जैसे पित्त यकृत का उत्सर्जन है, वैसे ही मन भी मस्तिष्क का उत्सर्जन है। वे चिकित्सक अब भी निपट अन्धकार में ही भटक रहे हैं। उनके मन में हिन्दू-दार्शनिक विचारों को प्रवेश कराने के लिए उनको (मन का) प्रचुर परिमार्जन करने की आवश्यकता है।

 

केवल योगी जन अथवा वे लोग जो ध्यान तथा आत्म-निरीक्षण का अभ्यास करते हैं, मन के अस्तित्व, इसके स्वभाव तथा व्यवहार, इसकी जटिल क्रियाविधि आदि के विषय में जानते हैं वे इसको यश में करने के अनेक उपाय भी जानते हैं।

 

मन आष्ट प्रकृतियों में से एक है:

 

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ।।

 

-- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार- यह मेरी आठ प्रकार की प्रकृति है

(गीता : -)

 

मन आत्म-शक्ति है। विश्राम (निद्रा) की आवश्यकता मस्तिष्क को होती है, मन को नहीं। जिस योगी ने मन का निग्रह कर लिया है, वह कभी नहीं सोता। उसे ध्यान से ही विश्राम प्राप्त हो जाता है।

 

 

मन का अधिष्ठान

 

मन आत्म-शक्ति है। मन के द्वारा ब्रह्म अनेक प्रकार की सृष्टि में प्रकट होता है। ऐतरेय उपनिषद् में बताया जाता है कि सृष्टि के आदिकाल में ब्रह्म ने सोचा :

 

ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत्।।

"तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य... हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा

 

ये तो हुए लोक, अब मुझे लोकपालों की भी रचना करनी चाहिए। तब उसने जल में से पुरुष (हिरण्यगर्भ) को निकाल कर मूर्तिमान किया तथा उसे ध्यान की अग्नि से तपाया। इस प्रकार तपाये जाने से उसका हृदय प्रकट हुआ। हृदय से मन का आविर्भाव हुआ और मन से उसका अधिष्ठातृ देवता चन्द्रमा उत्पन्न हुआ। (मन का अधिष्ठान हृदय है, इसलिए मन हृदय में से निकला। समाधि-काल में मन अपने अधिष्ठान हृदय में प्रवेश कर जाता है सुषुप्ति अवस्था में भी यह हृदय में प्रवेश करता है। तब मन और ब्रह्म के बीच में अज्ञान का आवरण होता है) (ऐतरेयोपनिषद् --, )

 

वैश्य मन और व्यष्टि मन

 

हिरण्यगर्भ अथवा कार्य ब्रह्म अथवा सम्भूति ही वैश्व मन है वह सारे मनों की समष्टि है। व्यक्ति का मन वैश्व मन से सम्बन्ध रखता है। वैश्व मन, हिरण्यगर्भ, अतिचेतन मन, असीम मन अथवा विराट् मन पर्यायवाची शब्द हैं। भिन्न-भिन्न लेखकों ने भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग किया है। इनसे भ्रम में पड़ें। इनमें उलझें यह केवल शब्द-भेद है।

 

हिरण्यगर्भ वैश्व प्राण भी है। वह सूत्रात्मा है। वह विश्व का विद्युत् गृह है। अनेक जीव भाँति-भाँति के छोटे-छोटे लहू है। विद्युत्गृह से विद्युत् शक्ति का संचार ताम्र-तन्तुओं द्वारा लड्डुओं में होता है। इसी भाँति हिरण्यगर्भ से शक्ति का संचार जीवों में होता है।

 

यद्यपि मस्तिष्क भिन्न-भिन्न होते हैं, तथापि मन के अति सूक्ष्म होने के कारण एक - मनुष्य का मन दूसरों के मन के निकट सान्निध्य अथवा सम्पर्क में रहता है। जैसे-जैसे मन की उन्नति होती जाती है, मानसिक प्रवाहों से या निकट तथा दूर के जीवित अथवा मृतक अन्य पुरुषों के मन से आपका सचेत सम्पर्क होता है। '' का व्यष्टि मन यद्यपि अन्य पुरुषों के मन से अति सूक्ष्म पदार्थ के पतले से परदे के द्वारा पृथक् होता है; परन्तु वास्तव में वह अपने अंशी हिरण्यगर्भ के तथा अन्य व्यक्तियों के प्रतीयमानतः पृथक् मन के संसर्ग में रहता है।

 

यदि श्याम राम का मित्र है तो उनके मन का परस्पर सम्बन्ध है। श्याम के मित्रों, सम्बन्धियों और भाइयों के मन का सम्बन्ध श्याम के मन से है। इसी प्रकार राम के मन में भी कई मन सम्बद्ध हैं। राम के सम्बन्धियों के मन धीरे-धीरे श्याम के सम्बन्धियों के मन से सम्बद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार एक व्यक्ति का मन समस्त संसार के मन से सम्बन्ध बना लेता है। यह राजयोग का मन के विभु होने का सिद्धान्त है।

 

सांख्य-दर्शन में मन

 

सांख्य दर्शन में वैश्व मन को महत् कहा गया है। अव्यक्त से यह प्रथम तत्त्व प्रकट होता है। यह अव्यक्त से व्यक्त होने वाला प्रथम तत्त्व है। छकड़े के पहिये का आधार उसके अरे होते हैं। अरे नाभि में टिके हुए होते हैं। इसी प्रकार मन प्रकृति पर और प्रकृति ब्रह्म पर आश्रित होती है।

 

महत् से अहंकार प्रकट होता है। सात्त्विक अहंकार से मन, राजसिक अहंकार से प्राण और तामसिक अहंकार से तन्मात्राएँ प्रकट होती हैं। तन्मात्राओं से महाभूत और पंचमहाभूतों से स्थूल जगत् प्रकट होता है। अहंकार, अहंभाव के अतिरिक्त मन और कुछ नहीं है। इस अहंभाव से बचना बहुत कठिन है। मन सदा किसी स्थूल पदार्थ से संसक्त होता है। यह अकेला नहीं ठहर सकता। यह मन ही शरीर में 'मैं' की घोषणा करता है।

 

मन रूपी वृक्ष का बीज अहंभाव है। इस अहंकार के बीज से बुद्धि रूपी कॉपल निकलती है। इसी में संकल्प-रूपी शाखाएँ- प्रशाखाएँ उद्भूत होती हैं।

 

लिंग शरीर और अन्तर्वाह शरीर

 

मन लिंग शरीर का सबसे मुख्य तत्त्व है। लिंग शरीर या सूक्ष्म शरीर स्थूल प्राण के द्वारा स्थूल शरीर से संयुक्त होता है। मृत्यु-काल में यह स्थूल शरीर से पृथक् हो कर स्वर्ग-गमन करता है। यह सूक्ष्म शरीर ही कर्मफल से सुख या दुःख भोगता है। यह शरीर ही आवागमन करता रहता है। विदेह मुक्ति होने पर सूक्ष्म शरीर लय हो जाता है।

 

लिंग शरीर और अन्तर्वाह शरीर में भेद है। लिंग शरीर सतरह तत्त्वों वाला सूक्ष्म शरीर है। पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच प्राण, मन और बुद्धि-ये सतरह तत्त्व हैं। अन्तर्वाह शरीर अत्यन्त शुद्ध होता है। यह सत्य से पूर्ण तथा रजोगुण और तमोगुण से रहित होता है। इस शरीर के द्वारा योगी परकाय प्रवेश करता है। भगवती सरस्वती की कृपा से, लीला ने इसी अन्तर्वाह शरीर के द्वारा स्थूल देह से निकल कर, ऊर्ध्व लोकों में गमन किया था। आपको यह योगवार में मिलेगा। श्री शंकराचार्य, राजा विक्रमादित्य, हस्तामलक और तिरुमूलार के अन्तर्वाह शरीर थे। इस प्रकार के विशेष शुद्ध शरीर की सहायता से वे अन्य पुरुषों की देह में प्रवेश करते थे। अन्तर्वाह शरीर वाले योगी का सत्संकल्प या शुद्ध संकल्प होता है।

 

मन सूक्ष्म पदार्थ है

 

मन कोई स्थूल पदार्थ नहीं है, जो देखा या स्पर्श किया जा सके। इसका अस्तित्व कहीं भी नहीं देखा जाता। इसका परिमाण (नाप-तौल) भी नहीं बतलाया जा सकता है। इसके रहने के लिए स्थान की भी आवश्यकता नहीं है।

 

मन और पदार्थ एक ही परिपूर्ण ब्रह्म के दो रूप हैं। ब्रह्म दोनों में से एक भी नहीं है, अपितु दोनों ही उसके अन्तर्गत हैं। मन पदार्थों से पहले बनता है। यह वेदान्त का सिद्धान्त है। विज्ञान का सिद्धान्त यह है कि पदार्थ मन से पहले बने हैं।

 

मन को इस भाव से अपार्थिव कहा जा सकता है कि उसमें अन्य पदार्थों की सी नहीं है जिसे इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जा सके; परन्तु जिस भाव से ब्रह्म पार्थिव (अपदार्थनीय) कहा जाता है, उस भाव से मन अपार्थिव नहीं है। मन स्थूल पदार्थ का सूक्ष्म रूप है, इसलिए यह शरीर का प्रेरक भी है। मन सूक्ष्म सात्त्विक अपंचीकृत तन्मात्राओं से बना है। मन विद्युत् शक्ति है। छान्दोग्य उपनिषद् के मत से मन भोजन के सूक्ष्मतम अंशों से बनता है।

 

मन पदार्थमय है। यह सूक्ष्म पदार्थ है। यह भेद इस सिद्धान्त पर किया जाता है कि ज्ञान का स्रोत केवल आत्मा में है। यह (आत्मा) स्वयंसिद्ध है, स्वयं-प्रकाश है; परन्तु मन और इन्द्रियाँ अपना जीवन और क्रिया-शक्ति आत्मा से प्राप्त करते हैं। वे अकेले आप ही निर्जीव (जड़) हैं। इसलिए आत्मा सदा कर्ता ही रहता है, कार्य नहीं। मन आत्मा का कार्य हो सकता है। और, यह वेदान्त का मुख्य सिद्धान्त है कि जो पदार्थ किसी दूसरे का कार्य होता है, वह जड़ होता है। अहंकार तत्त्व (अहं प्रत्यक् विषयत्व) भी जड़ है; क्योंकि इसकी पृथक् सत्ता नहीं है। यह आत्मा के अभिबोध का कार्य है।

मनोमय शरीर

 

जिस प्रकार स्थूल शरीर ठोस, द्रव तथा वातीय पदार्थों से बना हुआ है, इसी प्रकार मन भिन्न-भिन्न सघनता की श्रेणी और कम्पन की गति वाले सूक्ष्म द्रव्यों से बना हुआ है। राजयोग उग्र साधना के द्वारा मन के भिन्न-भिन्न स्तरों का भेदन कर देता है।

 

भिन्न-भिन्न मनुष्यों में भिन्न-भिन्न मनोमय शरीर होता है। जिसके अन्दर चैतन्य जितना अधिक या कम अभिव्यक्त होता है, उतने ही स्थूल या सूक्ष्म पदार्थ से उसका मनोमय शरीर बना हुआ होता है। शिक्षित मनुष्यों में यह चेतना क्रियाशील तथा अधिक प्रकट होती है तथा अविकसित लोगों में यह धुंधली और कम प्रकट होती है।

 

जिस प्रकार विशेष विचारों के लिए मस्तिष्क में अनेक खाने बने हुए होते हैं, उसी प्रकार मनोमय शरीर में भी भिन्न-भिन्न क्षेत्र या खण्ड बने होते हैं। तीव्र क्रोध के आवेश में सम्पूर्ण मन द्वेष तथा दुर्भाव के काले बादलों से घिर जाता है और उनमें से क्रोध के अमिय बाग निकलते हैं जो उन भूत पदार्थों को आहत कर देते हैं जिनके प्रति क्रोध रहता है।

 

मन के प्रकार

 

प्रत्येक मनुष्य का अपना मानसिक संसार निराला ही होता है। प्रत्येक मनुष्य विचार शैली, स्वभाव, रुचि, मनोवृत्ति, शारीरिक लक्षण आदि में दूसरे से भिन्न होता है। शारीरिक दृष्टि से भी मनुष्य एक-दूसरे से भिन्न होता है, भले ही उनमें थोड़ी-सी समानता हो। भिन्न-भिन्न मनुष्यों के नासिका, कान, ओष्ठ, नेत्र, भृकुटियाँ, दन्त-विन्यास, स्कन्ध, हाथ, उँगलियों, अंगूठों, दृष्टि, स्वर, गति, बातचीत के ढंग आदि को ध्यानपूर्वक देखें। आपको किन्हीं भी दो व्यक्तियों में बहुत बड़ा अन्तर मिलेगा। हथेलियों की रेखाएँ भी भिन्न होती हैं। कोई दो पत्तियाँ भी एक समान नहीं होतीं। विविधता ही सृष्टि का सौन्दर्य है।

 

मन के अनेक प्रकार होते हैं। बंगाली मन भावुक होता है और कला तथा भक्ति के उपयुक्त होता है। मद्रासी मन बौद्धिक तथा गणित में निपुण होता है। पंजाबी और महाराष्ट्रीय मन वीर और साहसी होता है। बंगाल ने श्री गौरांग महाप्रभु श्री रामकृष्ण परमहंसदेव आदि भावप्रवण सन्तों को जन्म दिया है। मद्रास में श्री रामानुजाचार्य और श्री शंकराचार्य-जैसे प्रतिभाशाली दार्शनिक हुए हैं। पंजाब में श्री गुरुगोविन्दसिंह जैसे वीर उत्पन्न हुए हैं। साधना और योगपथ मन के प्रकार, स्वभाव और शक्ति के अनुकूल पृथक्-पृथक् हुआ करता है। रुचियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। मछली देख कर बंगाली को अत्यन्त हर्ष होता है। इमली और मिर्च देख कर मद्रासी के मुँह में पानी भर आता है। ताड़ के फल को देख कर लंका के जाफना तामिल बहुत प्रसन्न होते हैं। मांस देख कर मांसाहारी को विशेष प्रसन्नता होती है। क्या यह रहस्य की बात नहीं है कि एक वस्तु बाहर पड़ी रहे और उसे देख कर ही मुँह में पानी भर आये? अपने दैनन्दिन जीवन में आपको नित्य ही यह अनुभव होता है, अतः आप इस बात को महत्त्व नहीं देते। मन बड़ा रहस्यमय है और ऐसी ही माया भी है।

 

अत्यन्त उन्नत मनुष्य का मन भी मन ही रहता है, अर्थात् साधारण मनुष्य के मन की भाँति वह भी अपने गुण और धर्म को नहीं छोड़ता।

 

 

मनोमय शरीर का आकार

 

न्याय दर्शन के मत से मन अणु है, महर्षि पतंजलि के मत से यह विभु (विश्वव्यापी) है और वेदान्त मत से वह सारे शरीर में व्याप्त है।

 

मनोमय प्रभा

 

मन की प्रभा दिव्य हुआ करती है। प्रभा मन से निकलने वाला तेज अथवा दीप्ति है। जिनके मन परिपक्व हो गये हैं, उनकी प्रभा अतीव प्रकाशमान होती है। इसकी गति दूर तक हो सकती है और बहुत से मनुष्यों को वह अपने प्रभाव से लाभ पहुँचा सकती है। आत्मिक प्रथा मानसिक वा प्राणमय प्रभा से भी अधिक शक्तिशाली होती है।

 

बलवान् मन का दुर्बल मन पर प्रभाव

 

बलवान् मन दुर्बल मन पर अपना प्रभाव डालता है। शक्ति-युक्त मन वाला सम्मोहक व्यक्ति (hypnotist) दुर्बल मन वाले बालकों के पूरे समूह या मण्डली को सम्मोहित कर देता है। हममें से ऐसे मनुष्य भी हैं जिनकी शरीर रचना दूसरों की अपेक्षा बहुत अधिक संवेदनशील होती है। अवयवी के रूप में उनके शरीर अधिक सूक्ष्म तथा अधिक संवेदी निर्मित होते हैं। साधारणतया ऐसे लोग जिन लोगों के संग में रहते या जिनके संसर्ग में आते हैं, उनकी मनोवृत्ति से सदा प्रभावित होते हैं।

 

जिसने अपने मन को पवित्र कर लिया है, वह शक्ति का केन्द्र बन जाता है। समस्त दुर्बल, अपवित्र और हीन मन अनजाने ही शुद्ध तथा महत्तर मन की ओर खिंचे आते हैं; क्योंकि उन्हें ऐसे शुद्ध और उन्नत मन से शान्ति, शक्ति और बल प्राप्त होते हैं।

 

देखिए, पूर्ण विकसित मन का अल्प विकसित मन पर कैसे प्रभाव पड़ता है! समर्थ पुरुषों के सम्मुख रहने में मन पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका वर्णन करना असम्भव है। चाहे वे कुछ भी कहें, फिर भी उनके सामने बैठने में बड़ा आनन्द होता है; क्योंकि मन को नयी प्रेरणा मिलती है। यह बड़ा असाधारण अनुभव होता है।

 

यदि आप नल से पानी पीना चाहें, तो आपको अपना शरीर झुकाना पड़ेगा। इसी प्रकार निम्नतर मन यदि परिपक्व मन के सद्गुण ग्रहण करना चाहता है, तो उसे उसके सम्मुख झुकना पड़ेगा अर्थात् विनीत होना पड़ेगा। विचार को ही शान्त तथा अक्षुब्ध होना चाहिए, तभी आपको प्रेरणा प्राप्त हो सकेगी। ऐसी दशा में ही उच्च मन अपना हितकर प्रभाव निम्न मन पर डाल सकेगा। ऐसी शान्त मानसिक स्थिति में आप ईश्वर के साथ संसर्ग रख सकेंगे। योजना बनाना, क्रोध और विषाद की मनोदशाये सब ही मन में उद्वेग उत्पन्न करते और ईश्वर प्राप्ति में बाधक बनते हैं।

 

मन सतत परिवर्तनशील है

 

मन संस्कारों का समूह है। यह स्वभावों (आदतों) की पोटली है। अनेक पदार्थों के संग से उत्पन्न हुई इच्छाओं का समुच्चय मन है। सांसारिक चिन्ताओं से उत्पन्न होने वाली भावनाओं का समूह मन है। यह विविध पदार्थों से संग्रहीत विचारों का समूह है। ये इच्छाएँ, विचार और अनुभव निरन्तर परिवर्तित होते रहते हैं। कुछ पुराने विचार, इच्छाएँ और अनुभव मन रूपी भण्डार गृह से निकलते रहते हैं और नये-नये उनका स्थान लेते रहते हैं।

 

परन्तु यह निरन्तर होने वाला परिवर्तन मानसिक क्रियाओं की सुव्यवस्था में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करता। पुराने विचारों, इच्छाओं और अनुभवों में से कुछ थोड़े से ही बाहर जाते हैं और जो रह जाते हैं, वे नये आने वाले विचारों के साथ सहयोग और सामंजस्य से काम करते हैं। नये विचारों पर पुराने विचारों का बड़ा प्रभाव पड़ता है। ये दोनों मेल से कार्य करते हैं और इसलिए मन की सत्ता की सारूप्यता बनी रहती है।

 

मन केवल प्रतिदिन बनता है, अपितु सर्वदा बनता है। यह गिरगिट की भाँति प्रतिक्षण अपना रंग-रूप बदलता रहता है। "यह अत्यन्त चंचल और अस्थिर है" (गीता : -२६) मन बराबर बदलता रहता है। आप नित्य नये-नये अनुभव प्राप्त करते रहते हैं। आपकी जो धारणाएँ, अन्तःकरण और विवेक-बुद्धि आज है, वह कल बदल जायेगी। अनुभव के द्वारा मन विकसित होता है। संसार सर्वोत्तम शिक्षक अथवा गुरु है।

 

मनुष्य की चेतना (conscience) उसके ज्ञान के अनुसार बनती है, कालान्तर में नया ज्ञान प्राप्त होने पर जैसे-जैसे उसके विचारों या दृष्टिकोणों में संशोधन होता है, वैसे-वैसे उसकी चेतना परिवर्तित होती रहती है। सहज ज्ञान अथवा तर्कणा से मनुष्य जो दृढ धारणाएं बना लेता है, वहीं चेतना कहलाती है। बच्चे की या बर्बर मनुष्य की चेतना पूर्ण परिपक्व सभ्य मनुष्य की चेतना से भिन्न होती है और सभ्य मनुष्यों में भी ज्ञान का अन्तर इतना होता है कि उनकी अपनी-अपनी चेतनाएँ भिन्न भिन्न क्रिया-पद्धति का - निर्देश करती है। सात्त्विक मनुष्य की चेतना राजसी मनुष्य की चेतना से बहुत ही भिन्न होती है। सात्त्विक मनुष्य की चेतना अत्यधिक निर्मल और शुद्ध होती है।

 

अन्तःकरण चतुष्टय (चार प्रकार के मन)

 

वेदान्ती अन्तःकरण में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का समावेश करते हैं। व्यापक भाव में इसका अर्थ है आन्तरिक उपकरण (अन्तः - आन्तरिक, करण उपकरण) यह एक ऐसा आन्तरिक यन्त्र है जिससे आप बोध, अनुभव, विचार तथा निश्चय कर सकते हैं। यह बाह्य करण अर्थात् इन्द्रियों से भिन्न है।

 

तन्मात्राएँ सूक्ष्म भूत हैं। पांचों स्थूल भूत तन्मात्राओं से बने हैं। अहंकार पृथ्वी- तन्मात्रा से, चित्त जल-तन्मात्रा से, बुद्धि अप्रि-तन्मात्रा से मन वायु तन्मात्रा से तथा हृदय आकाश- तन्मात्रा से बनता है।

 

मन इन्द्रियों की तुलना में चेतन है और बुद्धि की तुलना में जड़ है। सांख्य योग में इच्छा-शक्ति और बुद्धि (विवेक शक्ति) को मिला कर बुद्धि कहते हैं। कोई-कोई चित्त को मन के अन्तर्गत और अहंकार को बुद्धि के अन्तर्गत बनाते हैं।

 

मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार केवल वृत्ति-भेद या मन के कार्यात्मक रूप हैं। मन के कार्य सारे पदार्थ होते हैं और यह भूत, वर्तमान तथा भविष्य तीनों कालों में व्यापता है। यह एक ही है; परन्तु क्रियाएँ अनेक करता है। जब आप न्यायालय में अपने न्याय के अधिकार का उपयोग करते हैं, तब आप न्यायाधीश बनते हैं, जब आप रसोईघर में काम करते हैं, तब आप रसोइया कहलाते हैं और जब आप किसी संस्था के अध्यक्ष के आसन पर बैठते हैं तो अध्यक्ष कहलाते हैं। आप एक ही मनुष्य हैं; परन्तु जब-जब जो-जो कार्य करते हैं, उसके अनुसार वैसे ही नाम से आप पुकारे जाते हैं। इसी प्रकार मन जब संकल्प-विकल्प करता है तब इसका नाम मन होता है, जब विवेक से निश्चय करता है। तो बुद्धि कहलाता है, जब अहंभाव प्रस्तुत करता है तो अहंकार कहलाता है और जब संस्कारों का भण्डार तथा स्मृति का अधिष्ठान बनता है एवं धारणा और अनुसन्धान करता है तब चित्त कहलाता है।

 

जल में शीतलता, अग्नि में तेज और वायु में गति किसने प्रदान की? यह इनके स्वभाव हैं। ऐसे ही मन का स्वभाव वस्तुओं की ओर भागना, बुद्धि का स्वभाव निश्चयः करना, अहंकार का स्वभाव स्वाग्रह और चित्त का स्वभाव अहंकार द्वारा अभिज्ञात विषयों की स्मृति है।

 

जब मन काम करता है, तब बुद्धि और अहंकार साथ-साथ काम करते हैं। मन, बुद्धि तथा अहंकार परस्पर स्वस्थ सहयोग से कार्य करते हैं। मन संकल्प-विकल्प करता है। यह पदार्थों की अच्छाई और बुराई सोचता है। बुद्धि निश्चय तथा विषय का विवेचन करती है (निश्चयात्मिका, व्यवसायात्मिका)

 

मन का स्वरूप विचार है। मन संकल्प-विकल्पात्मक है। जब यह बुद्धि के निर्णयों बुद्धि के सन्देशों के निष्पादन के लिए उन्हें कर्मेन्द्रियों के आगे प्रस्तुत का देता है तो व्याकरणात्मक हो जाता है। मन पसन्द करता, ध्यान देता और अस्वीकार करता है।

मन के कार्य

 

संवेदन, विचार और संकल्प —— ये मन के त्रिविध कार्य हैं। संज्ञान, इच्छा तथा संकल्पये तीन मानसिक प्रक्रम हैं।

 

मन की तीन अवस्थाएँ होती हैंसक्रिय, निष्क्रिय तथा तटस्थ। मन को सदैव अनेकरूपता तथा नयी-नयी संवेदनाएँ पसन्द हैं। एकरसता से यह ऊब जाता है।

 

साहचर्व-नियम, सातत्य नियम और सापेक्षता नियम ये मन के तीन मुख्य नियम है।

 

मन के ये स्वभाव है परिणाम, चेष्टा, निरोध, शक्ति, जीवन और धर्म

 

विचार करना, योजना बनाना, अनुभव करना और जानना ये क्रियाएँ मन में सदा चलती रहती हैं। कभी योजना बनाते हैं, कभी आप अनुभव करते हैं, कभी जानने का प्रयास करते हैं, कभी गम्भीरतापूर्वक सोचते हैं और कभी इच्छा करते हैं। इच्छा से मन की सारी शक्तियाँ सक्रिय हो जाती है। आत्मनिरीक्षण के द्वारा आपको यह जान सकने में समर्थ होना चाहिए कि भिन्न-भिन्न समय पर आपके मन में क्या हो रहा है?

 

मन के स्वरूप

 

अचेतन मन अथवा विषयपरक मन, अवचेतन मन अथवा आत्मपरक मन या चित्त और अतिचेतन मन मन के तीन रूप है। आप विषयपरक मन (सचेतन मन ) के द्वारा देखते, सुनने तथा पढ़ते हैं।

 

पाश्चात्य वैज्ञानिकों के वर्गीकरण के अनुसार संवेदनात्मक मन, तर्कणापरक मन और अन्तर्ज्ञानी मनये मन के तीन स्वरूप है।

 

मन का स्थान

 

प्राण, मन, अहंकार और आत्माइन चारों तत्त्वों का स्थान हृदय है। वेदान्त के अनुसार मन का स्थान हृदय है। जाग्रत अवस्था में यह मस्तिष्क में रहता है। हठयोग के मत से अस्थायी रूप से मन का स्थान आज्ञा चक्र है जो दो कमलों के आकार का है और जिसका स्थान दोनों भृकुटियों के बीच में है।

 

मन की अनेक शक्तियाँ और केन्द्र होते हैं। वह मस्तिष्क में स्थूल शरीर के तत्सम्बन्धी केन्द्रों के द्वारा काम करता है। मन, बुद्धि तथा विवेक लिंग शरीर में हैं; परन्तु वे भौतिक मस्तिष्क में तत्सम्बन्धी केन्द्रों के द्वारा ही कार्य करते हैं। मस्तिष्क मन नहीं है। जैसा कि पाश्चात्य विद्वानों का मत है। मन का स्थान भौतिक मस्तिष्क में है। वह इस भौतिक जगत् की अनुभूति मस्तिष्क के कम्पन द्वारा करता है।

 

यद्यपि अपने सम्पूर्ण देश पर राजा का एकाधिकार होता है, सारा राज्य उसका ही होता है; फिर भी उसके निवास के लिए विशेष स्थान होते हैं। एक विशाल राजप्रासाद राजधानी में होता है और ग्रीष्मऋतु के लिए एक सुन्दर भव्य भवन मसूरी या आबू पर्वत पर बना होता है। इसी प्रकार, मन यद्यपि सारे शरीर में व्यापक है; किन्तु जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्तिइन तीनों अवस्थाओं में इसके लिए तीन स्थान नियत हैं। सुषुप्ति में मन का स्थान हृदय, स्वप्न में कण्ठ तथा जाग्रति में दक्षिण नेत्र या आज्ञा चक्र होता है। देखिए, आलोचना के समय आप क्या करते हैं? आप चिम्बुक पर उँगली रख कर, ग्रीवा दाय ओर को झुकाते हुए दृष्टि को भ्रू-मध्य में स्थित करके अपनी समस्या पर विचार करते हैं। इससे प्रतीत होता है कि मन का स्थान आज्ञा चक्र है।

 

मन आत्मा नहीं है

 

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक ऐसा कहने में बड़ी भारी भूल करते हैं कि चेतना मन की एक क्रिया और उपाधि है। चित्त या आत्मा ही स्वयं शुद्ध चेतना है। मन आत्मा से ही समय-समय पर अपना प्रकाश प्राप्त करता है और थोड़े काल तक चेतना की भाँति वैसे ही चमकता है जैसे पीतल पर सोने का मुलम्मा चमकता है। आत्मा ही प्रकाश का स्रोत तथा ज्योतियों की ज्योति और सूर्यो का सूर्य है। जैसे लौह-शलाका अपनी उष्णता तथा प्रकाश अग्नि से प्राप्त करती है, वैसे ही मन अपनी ज्योति और शक्ति ब्रह्म से प्राप्त करता है। मन जड़ है। जैसे धूप में रखा हुआ जल सूर्य के ताप से उष्ण हो जाता है, वैसे ही यह जड़ मन ब्रह्म से प्रकाश प्राप्त करके बुद्धियुक्त-सा हो जाता है।

 

मन एक समय में एक ही कार्य कर सकता है। यह परिच्छिन्न है, जड़ है और सत्वगुण का कार्य है। यह विनाशी तथा चंचल है। यह विचारों, संस्कारों, स्वभावों, प्रेरणाओं तथा भावनाओं की एक पोटली है। यह अपने अधिष्ठान ब्रह्म से प्रकाश प्राप्त करता है। आप मन पर नियन्त्रण कर सकते हैं। विचार करने वाला विचार से भिन्न होता है। प्रगाढ़ निद्रा में मन की क्रिया बन्द हो जाती है। आप सदा 'मेरा मन' कहा करते हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि मन भी छतरी या छड़ी-जैसा आपका एक उपकरण है, इसलिए मन स्वयं-प्रकाश आत्मा नहीं है।

 

मूर्च्छा की अवस्था में, मानसिक क्रियाओं के स्तम्भित होने और स्मृति के पूर्णत: अथवा अंशतः नष्ट होने पर भी व्यक्ति का अस्तित्व रह जाता है—'मैं' बना रहता है 'अहमस्मि' मन आपसे बाहर रहते हुए भी आपकी उसी प्रकार सम्पत्ति है, जैसे | आपके स्थूल शरीर के दूसरे अंग, आपके पहनने के वस्त्र या आपके रहने का घर आपसे बाहर रहते हुए भी आपकी सम्पत्ति है। इसलिए मन इस 'मैं' से भिन्न है।

 

मन अन्धकार में टटोलता है। यह प्रतिपल भूलता तथा प्रतिक्षण बदलता रहता है। यदि कुछ दिन तक आहार मिले, तो यह सुचारु रूप से विचार भी नहीं कर सकता। सुषुप्तिप्रगाढ़ निद्रा में मन की क्रिया नहीं होती। मन मल, वासनाओं और तृष्णाओं से परिपूर्ण है। क्रोध आने पर यह मोह को प्राप्त होता है, भय होने पर इसे कम्प होता है. और प्रघात लगने पर यह मरणासन्न-सा हो जाता है। फिर, आप मन को शुद्ध आत्मा कैसे मान सकते हैं?

 

मन संवेदन और विचार का एक साधन है। यह उपकरण उसके नियन्त्रण में होना चाहिए जो इसका उपयोग करता है। जीव मन का निर्देशक नहीं है; क्योंकि हम देखते हैं कि सामान्य व्यक्ति अपने मन को वश में नहीं रख सकते। वे तुच्छ राग-द्वेष, आवेग, भय आदि से सहज ही इधर-उधर दोलायमान होते रहते हैं। इसलिए यह निश्चित है कि कोई ऐसी सत्ता अवश्य है जो मन की निर्देशक है। यहाँ प्रश्न उठता है, वह कौन है ? वह है मनसस्पति, अन्तर्यामी, कूटस्थ ब्रह्म

 

आप जैसे अपने सामने वृक्ष को देखते हैं, इसी प्रकार जीवों के मन में क्या हो रहा है, इस सबको देखने तथा जानने के लिए भी कोई कोई होना चाहिए। वह कूटस्थ है। - उसी को ब्रह्म कहते हैं। आपके सामने एक पात्र रखा है। पात्र अपने-आपको देख नहीं सकता है। उसे देखने के लिए एक द्रष्टा और देखने का करण अर्थात् नेत्र की आवश्यकता होती है। यदि आप कहें कि पात्र अपने आपको देख सकता है तो इसमें तर्कशास्त्र के कर्म-कर्तृत्व-भाव का विरोध होगा। तर्कानुसार यह एक असंगति है। इसलिए आपको मानना पड़ेगा कि मन का एक मूक साक्षी है जो अनादि, अनन्त, अपरिवर्तनशील और नित्य ज्ञाता है। वह जीवों के मन में उठने वाले भावों और विकारों को देखता है।

 

ईश्वर या सगुण ब्रह्म को निर्गुण ब्रह्म की पूर्ण चेतना होती है। यह उसका स्वरूप लक्षण है। साथ-ही-साथ उसे पूर्ण वैश्व चेतना भी होती है। वह जानता है कि प्रत्येक मन में क्या-क्या हो रहा है।

 

स्वाभाविक चेतना अथवा निरपेक्ष चेतना सबमें समान होती है। यह शुद्ध चेतना एक ही होती है। यह कूटस्थ चैतन्य है। मन की सारी क्रियाएँ और सभी लोगों के मन में उठने वाले विकार उस एक सामान्य चेतना के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं जो कि मन की सारी वृत्तियों की साक्षी है। यद्यपि चेतना एक ही होती है तो भी जब राम को बिच्छू डंक मारता है तो केवल राम को ही पीड़ा होती है। उसके पास खड़ा उसका मित्र कृष्ण इस पीड़ा को अनुभव नहीं करता। प्रत्येक व्यक्ति का अन्तःकरण भिन्न होता है। वास्तव में तो मनुष्य और परमात्मा में कोई भेद नहीं होता, परन्तु यह अन्तःकरण ही मनुष्य को सीमाबद्ध रखता है। जब अविद्या का आवरण हट जाता है, तो इस अभेद का साक्षात्कार होता है।

ब्रह्म के लिए मन ज्ञान की वस्तु है। मन के सारे प्रपंचों, जैसे-इच्छा, कल्पना, शंका, विश्वास, अविश्वास, लज्जा, चातुर्य, भय आदि को आत्मा अपरोक्ष रूप से देखता है; परन्तु वह सर्वव्यापी आकाश या विविध रंगों वाले पदार्थ को प्रतिबिम्बित करने वाले स्फटिक अथवा सूर्य की भाँति उनसे सर्वथा अनासक्त तथा अप्रभावित रहता है।

 

आत्मा मन का स्रोत है

 

यह मन जो संकल्प-विकल्प के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होता है, अपने कारणभूत ब्रह्म से उत्पन्न होता है। अनन्त रूप आत्मा संकल्प के द्वारा जो रूप धारण करता है, वह मन है। पहले इसने विवेक से पीठ मोड़ी और इसलिए पदार्थों की वासनाओं की शक्ति के लपेट में गया। मन का मूलाधार, अधिष्ठान तथा मूल स्रोत आत्मा, ब्रह्म अथवा शुद्ध चैतन्य है। सारी शक्तियों की शक्ति जो मन को शक्ति देती है, सारी ज्योतियों की ज्योति जो मन को प्रकाश देती है, सारे द्राओं का द्रष्टा जो मन के आशय और कार्यों का साक्षी है. सारे आधारों का आधार जिसमें सुषुप्ति में मन विश्राम करता है, ब्रह्म है।

 

" केनेषितं पतति प्रेषितं मनः" अर्थात् किसके द्वारा स्फूर्ति पा कर और संचालित हो कर मन अपने विषयों तक पहुँचता है (केनोपनिषद्) मैं उस सर्वशक्तिमान् को हाथ जोड़ कर प्रणाम करता है। वह शक्तियों की शक्ति में है- "सोऽहम्, शिवोऽहम्।"

 

वह अद्वितीय परमात्मा जो आपके हृदय-प्रकोष्ठ में अन्तर्यामी, सूत्रधार, साक्षी अथवा परमात्मा के रूप में निवास करता है; जो आदि, मध्य और अन्त-रहित है; जो इस संसार का, वेदों का तथा शरीर, मन, इन्द्रियों और प्राणों का स्रोत है; जो सर्वव्यापक, निर्विकार है जो सदा एकरस है; जो सर्वकाल में विद्यमान रहता है तथा जो स्वयम्भू, है; स्वतन्त्र और स्वयं ज्योति है; वही ईश्वर है, आत्मा है, ब्रह्म है, पुरुष है, चैतन्य है, भगवान् या पुरुषोत्तम है।

 

स्वप्न में आप अत्यन्त तेजोमय प्रकाश देखते हैं। यह कहाँ से आता है ? आत्मा से। स्वप्न में प्रकट होने वाला प्रकाश आत्मा के स्वयं ज्योति अथवा स्वयं-प्रकाश होने का स्पष्ट द्योतक है।

 

ईश्वर सत्य, प्रेम, ज्योतियों की ज्योति, शान्ति, ज्ञान तथा आनन्दविग्रह है। वह सच्चिदानन्द, अनन्त, अमृत तथा असीम है। वह अविनाशी, परम वस्तु तथा सर्वव्यापी तत्त्व है। ईश्वर ही सार वस्तु और अनन्त सौन्दर्य है।

 

भगवान् ईश्वर शब्द का पर्याय है। जिसमें ज्ञान, वैराग्य, यश, ऐश्वर्य, श्री और धर्मये षड्गुण अपने पूर्ण रूप में विद्यमान हों, वह भगवान् है।

वायुपुराण के अनुसार सर्वज्ञता, सन्तोष, अनन्त ज्ञान, स्वतन्त्रता, सर्वदा शक्तिमत्ता और असीम शक्तिमत्ताये छह लक्षण परमात्मा के बताये गये हैं।

 

सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व, सर्वान्तर्यामित्व, सर्वकारणत्व, सर्वनियन्तृत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वशक्तिमत्व और स्वतन्त्रत्व-ये आठ लक्षण ईश्वर के हैं।

 

ज्ञान, निष्कामता, संयम-शक्ति, तप, सत्य, क्षमा, तितिक्षा, सर्जन, आत्मज्ञान और समस्त क्रियाओं की आधार भूमि होनावे दश अव्यय लक्षण सर्वसुखमूल परमात्मा में सदा निवास करते हैं।

 

सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह-ये ईश्वर के पंच कृत्य है।

 

ईश्वर नियामक, अन्तर्यामी और प्रेरक भी है। वह स्वप्न, अन्तर्वाणी, नित्य की बातचीत में दूसरों के मुख द्वारा, मित्रों के परामर्श आदि द्वारा अनेक प्रकार से साधकों की सहायता करता है।

 

नित्य सुख, परम शान्ति, नित्य तृप्ति, अनन्त आनन्द तथा अखण्ड सुख केवल ईश्वर में ही प्राप्त हो सकते हैं। इस भागवत-चेतना, आत्म-साक्षात्कार या भगवद्-दर्शन को अनन्य भक्ति या विचार द्वारा प्राप्त करें। यही जीवन का लक्ष्य है। यही आपका परम धर्म है; अन्य सारे धर्म गौण हैं।

 

इन्द्रियों का सार मन है; मन का सार बुद्धि है; बुद्धि का सार अहंकार है तथा अहंकार का सार जीव है। ब्रह्म या शुद्ध चैतन्य प्रत्येक वस्तु की योनि या गर्भ अथवा उसका अधिष्ठान है। वह प्रत्येक वस्तु का साक्षी है।

 

आत्मा इस विशाल मानसिक कार्यालय का स्वामी है, बुद्धि प्रबन्धक तथा मन मुख्य लिपिक है। मुख्य लिपिक को दो कार्य करने पड़ते हैं उसे सीधे प्रबन्धक से आदेश प्राप्त करना पड़ता है और श्रमिकों के कार्य का पर्यवेक्षण करना होता है। इसी प्रकार मन को दो कार्य करने पड़ते हैं। इसका सम्बन्ध बुद्धि-रूपी प्रबन्धक और कर्मेन्द्रिय-रूपी श्रमिकों से होता है।

 

मन वाणी से अधिक आन्तरिक है, बुद्धि मन से अधिक आन्तरिक है, अहंकार बुद्धि से अधिक आन्तरिक है, जीव-चैतन्य अहंकार से अधिक आन्तरिक है तथा आत्मा या कूटस्थ जीव- चैतन्य से अधिक आन्तरिक है। आत्मा से अधिक आन्तरिक अन्य कोई वस्तु नहीं है। यह परिपूर्ण है।

 

जब अपने मन का विश्लेषण करके आप किसी ऐसे तत्त्व के सम्मुख होंगे जो अविनाशी है और स्वभाव से ही निर्मल, पूर्ण, स्वयं-प्रकाश और अविकारी है, तब आप कभी खिन्न नहीं होंगे, दुःखी नहीं होंगे।

 

केवल एक ही तत्त्व है। वह 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' है। वह अनन्त निष्कलंक, नित्य शुद्ध और परिपूर्ण है। मन को स्थिर करके उसी का ध्यान करें और मन की सच्ची शान्ति प्राप्त करके सारे दुःखों से मुक्त हो जायें।

 

मन के अस्तित्व का प्रमाण

 

आत्मा और ब्रह्म का स्वरूप क्या है? आत्मा सच्चिदानन्द है, व्यापक है। फिर जीवात्मा की दृष्टि को कौन परिच्छिन्न बनाता है? मन इस तथ्य से एक अन्तरंग अवयव (मन) की सत्ता का प्रमाण मिलता है।

 

बृहदारण्यक के भाष्य में श्री शंकराचार्य ने मन की सत्ता के दो प्रमाण दिये हैं। एक तो यह है कि इन्द्रियों द्वारा संवेदन को प्राप्त करना मन का ही कार्य है। यह सर्व कर्म विषय- योग कहलाता है। मन और ज्ञानेन्द्रियों के संसर्ग से इन्द्रियजन्य ज्ञान संवेदन प्राप्त होता है। इसीलिए अनेक इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होने वाले संवेदन एक ही समय में एक-साथ नहीं व्यापते। मनुष्य कहा करते हैं कि मेरा मन अन्यत्र था, मैंने उसे नहीं देखा। इस समकालीन संवेदन की असम्भवता से भी मन की सत्ता का प्रमाण मिलता है।

 

अन्तःकरण (मन) की सत्ता के लिए युक्ति यह है। आत्मा अव्यय तत्त्व है। आत्मा और ज्ञानेन्द्रियों के बीच में एक संयोजक की आवश्यकता है। हमें एक आन्तरिक अवयव (मन) की सत्ता माननी पड़ेगी जिसके अवधान तथा अनवधान से पदार्थों का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। यदि हम इस आन्तरिक अवयव की सत्ता को स्वीकार नहीं करते तो, या तो सदा दर्शन ही होता रहेगा या अदर्शन हीजब आत्मा, इन्द्रिय और विषय का संयोजन होगा तो दर्शन ही होगा; क्योंकि ये ही तीनों दर्शन के कारण हैं और यदि इन तीनों के संयोजन से दर्शन नहीं प्राप्त होता तो सदा अदर्शन ही बना रहेगा। परन्तु वास्तव में इन दोनों बातों में से एक भी सत्य नहीं है। इसलिए हमें एक आन्तरिक अवयव की सत्ता माननी पड़ती है। जिसके अवधान और अनवधान के फल स्वरूप पदार्थ का दर्शन या अदर्शन प्राप्त होता है।

 

दूसरा प्रमाण हमारी निश्चयात्मक क्षमता है। कोई मनुष्य जिसे हम नहीं देख सकते, हमें स्पर्श करता है और हम उसका अनुमान कर लेते हैं। केवल स्पर्श से ही हमें इसका ज्ञान नहीं हो सकता। जिस शक्ति के द्वारा हम ऐसा अनुमान करते हैं, वह मन है।

 

मनुष्य और पशु में भिन्नता बताने वाला विशेष ज्ञान

 

पशु स्वयं अपने को नहीं जान सकता। उसको केवल शारीरिक चेतना होती है। उसको आत्म-चेतना का अनुभव नहीं होता। पशु को असुविधा और पीड़ा की संवेदना होती है। वह अपनी मनोदशाओं का विश्लेषण नहीं कर सकता। मनुष्य केवल <