मैं इसका उत्तर दूँ?

 

MAY I ANSWER THAT?

 

का अविकल अनुवाद

 

 

लेखक

 

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादिका

 

श्री स्वामी शिवाश्रितानन्द माता जी

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण : २०२०

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

ISBN 81-7052-259-5

 

HS 20

 

PRICE: 130/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा

प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पत्रालय : शिवानन्दनगर, जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड,

पिन : २४९१९२' में मुद्रित।

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प्रकाशकीय

 

यह पुस्तक परम पावन गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज की विभिन्न प्रकाशित रचनाओं में से संकलित की गयी है, जिसमें उनकी तीस के दशक के अन्तिम भाग की कतिपय प्रारम्भिक कृतियाँ भी सम्मिलित की गयी हैं।

 

पुस्तक में लिये गये प्रश्नों एवं उत्तरों की शृंखला में कुछ अत्यधिक सामान्य प्रतीत होने पर भी, आध्यात्मिक साधना का अभ्यास करने वाले जिज्ञासुओं द्वारा की जाने वाली शंकाओं का अत्यन्त सशक्त समाधान प्रस्तुत करने वाले हैं। इन उत्तरों एवं स्पष्टीकरणों को जो अनमोल प्रतिष्ठा प्रदान करता है, वह इसकी प्रामाणिकता का होना है, जो केवल एक सन्त के अन्तर्बोध ही नहीं, अपितु निजी अनुभव की भी उपज हैं।

 

स्वामी शिवानन्द ऐसे सन्त थे जिनकी सर्वप्रथम रुचि, अपितु हम तो कहेंगे, सर्वप्रथम प्रेम था आध्यात्मिक साधकों से, योग-विद्यार्थियों से। शिवानन्द जी का जीवन ही उनकी सेवा हेतु था, और यह अनमोल ग्रन्थ उन महान् गुरुदेव के सेवा भाव का ही परिणाम है।

 

हम आशा करते हैं कि साधक जगत् प्रत्येक पृष्ठ के ध्यानपूर्वक पठन के साथ यथेष्ठ रूप से लाभान्वित होगा और साधक-जन अपनी आध्यात्मिक परिपूर्णता के संघर्ष में असाधारण मार्गदर्शन एवं प्रेरणा प्राप्त करेंगे।

 

सद्गुरुदेव के दिव्य आशीर्वाद सभी पर हों!

 

 

शिवानन्दनगर                                                                                                                     - डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हमें भगवान् में विश्वास क्यों करना चाहिए?

 

क्योंकि भगवान् प्रत्येक मानव के लिए नितान्त आवश्यक हैं। यह सबके लिए एक अनिवार्य अथवा परम आवश्यकता हैं। अविद्या या अज्ञान के कारण दुःख सुख की तरह प्रतीत होता है। वास्तव में तो यह संसार दुःखों, कष्टों, कठिनाइयों और मुसीबतों से भरा हुआ है। संसार एक आग का गोला है। राग, द्वेष, क्रोध और ईर्ष्या से भरा हुआ अन्तःकरण जलती हुई भट्ठी के समान है। हमने स्वयं को जन्म, मरण, वृद्धावस्था, रोग और दुःख से छुटकारा दिलाना है। यह केवल भगवान् में विश्वास करने से ही हो सकता है। इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। धन-सम्पत्ति और पद या शक्ति हमें वास्तविक सुख नहीं दे सकते। चाहे हमें सारे संसार का अधिराज्य प्राप्त हो जाये, तो भी हम चिन्ता, तनाव, भय, निराशा इत्यादि से मुक्त नहीं हो सकते। यह तो केवल भगवान् में विश्वास करने तथा उसके परिणाम स्वरूप ध्यान के द्वारा भगवद्-साक्षात्कार करने से ही हमें सच्ची और सदा रहने वाली प्रसन्नता मिल सकती है और हम सब प्रकार के भय एवं चिन्ता से तथा हर क्षण की यातना से छूट सकते हैं। भगवान् में विश्वास हमें हर समय उनका स्मरण करने को प्रेरित करेगा, उनका ध्यान करने की प्रेरणा देगा और इसी के माध्यम से हम भगवद्-साक्षात्कार की ओर अग्रसर होंगे।

 

 

ईश्वर के अस्तित्व को मानने से क्या हानि है?

 

यदि हम ईश्वर के होने में विश्वास नहीं करते, तो हमें इस संसार में फिर से जन्म लेना पड़ेगा और फिर से कष्ट सहने पड़ेंगे। अज्ञानी अविश्वासी संशयात्मा विनाश को प्राप्त होते हैं। उन्हें जरा से भी सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। संशयात्मा के लिए तो इस संसार में सुख है ही इससे परे दूसरे लोकों में है। जिन्हें भगवान् में विश्वास नहीं है, उन्हें यह ज्ञान ही नहीं है कि क्या ठीक है और क्या गलत। उनकी विवेक-शक्ति नष्ट हो चुकी है। वे असत्यवादी, अभिमानी एवं अहंकारी हैं। वे अत्यधिक लोभी, क्रोधी और कामी हो जाते हैं। वे अनुचित साधनों से धन अर्जित करते हैं। उनकी वृत्ति राक्षसी हो जाती है। वे अनेकों प्रकार के घिनौने अपराध करते हैं। उनके जीवन के कोई आदर्श नहीं होते। वे आसुरी योनियों में गिरा दिये जाते हैं। वे जन्म-जन्मान्तरों तक निम्न से निम्नतम योनियों में भटकते रहते हैं।

 

लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले, दक्षिण भारत के तिरुचिरापल्ली जिले के करूर के निकट नेरूर नगर में सदाशिव ब्रह्येन्द्र नाम के एक सुप्रसिद्ध योगी-ज्ञानी रहते थे। वह 'ब्रह्मसूत्रवृत्ति' तथा 'आत्मविद्याविलास' एवं बहुत से अन्य ग्रन्थों के रचयिता हैं। एक बार जब वे कावेरी नदी के तट पर समाधि में लीन थे तो बाढ़ गयी और उन्हें बहा कर कहीं और ही फेंक गयी। वे बहुत गहरे रेत के ढेर में दब गये। मजदूर खेत में हल चलाने के लिए चले गये। उनके हल की चोट योगी के शिर में लगी और रक्त बह निकला। उन्होंने खुदाई की और यह देख आश्चर्यचकित रह गये कि एक योगी समाधिस्थ बैठे हुए हैं।

 

एक अन्य समय पर सदाशिव ब्रह्मेन्द्र अवधूत-वेश में मुसलिमों के एक सरदार के जनानखाने में नग्नावस्था में प्रविष्ट हो गये। सरदार उन सन्त पर अत्यधिक क्रोधित हो उठा। क्रोध में आग-बबूला हो कर उसने महात्मा की एक भुजा काट डाली। सदाशिव ब्रह्मेन्द्र एक शब्द भी बोले बिना तथा कष्ट का कोई भी भाव चेहरे पर लाये बिना चुपचाप चल दिये। सन्त की अद्भुत स्थिति देख कर सरदार आश्चर्यचकित रह गया। वह समझ गया कि यह व्यक्ति निश्चित रूप से कोई महात्मा, कोई महामानव है। उसे अत्यन्त पश्चात्ताप हुआ और वह सन्त से क्षमा माँगने के लिए उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। सदाशिव को पता ही नहीं चला था कि उसकी भुजा काट दी गयी है। जब सरदार ने शिविर में घटने वाला सारा वृत्तान्त सुनाया तो सदाशिव ने उसे क्षमा करते हुए अत्यन्त सहज भाव से अपनी कटी हुई भुजा वाले कन्धे को स्पर्श किया। सदाशिव ब्रह्मेन्द्र के छूते ही वहाँ नयी भुजा चुकी थी। इस सन्त के जीवन ने मेरे मन पर बहुत ही गहरा प्रभाव डाला। मैं इस निश्चित परिणाम पर पहुँच गया कि इन वस्तु-पदार्थों से अलग, इस मन और इन्द्रियों से परे एक स्वतन्त्र एवं उदात्त दिव्य जीवन है। सन्त इस संसार से पूर्णतया अनभिज्ञ था। उनकी भुजा जब काटी गयी, तब उन्हें किंचित् भी ज्ञात नहीं हुआ। वह उस समय दिव्य चेतना में लीन रहे होंगे, वह उस समय परम तत्त्व से एक होंगे। सामान्य लोग सुई की चुभन से कराह उठते हैं। जब मैंने आप्त व्यक्तियों से सन्त सदाशिव के जीवन का यह द्भुत वृत्तान्त सुना और जब पुस्तक में पढ़ा तो मेरी यह धारणा अत्यन्त दृढ़ हो गयी कि एक दिव्य सत्ता है और एक ऐसा शाश्वत जीवन है जहाँ समस्त दुःख समाप्त हो जाते हैं, जहाँ सभी इच्छाएँ सन्तृप्त हो जाती 35/6 और व्यक्ति परम आनन्द, परम शान्ति तथा परम ज्ञान प्राप्त कर लेता है।

 

 

ब्राह्ममुहूर्त का अर्थ क्या है ? हमारे ऋषियों ने इसकी इतनी प्रशंसा क्यों की है?

 

प्रातः बजे के समय को ब्राह्ममुहूर्त कहते हैं। क्योंकि भगवान् या ब्रह्म पर ध्यान करने के लिए यह समय अनुकूल है, इसलिए इसे ब्राह्ममुहूर्त कहा गया है। इस समय मन विशेष रूप से अत्यन्त शान्त एवं अविक्षुब्ध अथवा निर्मल होता है। यह सांसारिक विचारों, चिन्ताओं और तनावों से मुक्त होता है। इस समय हमारा मन कोरी चादर अथवा कोरे कागज की तरह होता है और अभी लौकिक संस्कारों से अपेक्षाकृत मुक्त होता है। सांसारिक विकर्षणों के प्रवेश होने से पहले मन को सरलता से मोड़ कर अनुकूल साँचे में ढाला जा सकता है। इसके अतिरिक्त इस समय वातावरण में अधिक सत्त्वगुण की प्रधानता होती है। बाह्य जगत् की चहल-पहल और शोरगुल ने अभी वातावरण को प्रभावित नहीं किया होता।

 

 

हिमालय के गुरुओं के सम्बन्ध में आपके क्या विचार हैं?

 

समस्त गुरुओं का एक गुरु है, जो आपके हृदय में निवास करता है। अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी करें, इन्द्रियों को बाह्य वस्तु-पदार्थों की ओर जाने से रोकें और अपने अन्तर्वासी की सहायता माँगें। उसी में स्थिर हो जायें। स्वयं की उनके साथ पहचान बनायें। हिमालय के इन गुरुओं के सम्बन्ध में पुनः मुझसे चर्चा करें। आप भ्रमित हो जायेंगे।

 

 

जप और ध्यान में क्या अन्तर है?

 

भगवान् के नाम को मौन रहते हुए निरन्तर दोहराने को जप कहते हैं। भगवान् के एक ही विचार के सतत प्रवाह का नाम ध्यान है। जब आप ' नमो नारायणाय' मन्त्र को दोहराते जाते हैं, तो यह विष्णु-मन्त्र का जप कहलाता है। जब आप विष्णु भगवान् का हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्य धारण किये हुए स्वरूप का चिन्तन करते हैं, उनके कानों में कुण्डल, शीश पर मुकुट, रेशमी पीताम्बर इत्यादि धारण किये हुए का चिन्तन करते हैं तो यह ध्यान है। जब आप भगवान् के गुणों, जैसे सर्वशक्तिमत्ता, सर्वव्यापकता इत्यादि का चिन्तन करते हैं तो यह भी ध्यान है।

 

 

भगवान् की कृपा से मेरे लिए सब कुछ हो जायेगा, फिर मुझे साधना करने की क्या आवश्यकता है ?

 

यह धारणा गलत है। भगवान् उनकी सहायता करते हैं, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। भगवान् की कृपा-वृष्टि केवल उन पर ही होगी जो परिश्रम करते हैं। भगवान् की कृपा की वर्षा व्यक्ति के समर्पण के अनुपात में होती है। जितना अधिक आपका समर्पण होगा, उतनी ही अधिक उनकी कृपा आप पर होगी, भगवान् आपके लिए आत्म-समर्पण करेंगे, आप यह अपेक्षा नहीं कर सकते। उठें और परिश्रम में जुट जायें। संघर्ष करें! लगे रहें! दृढ़ रहें! भगवान् आप पर अपनी कृपा की वर्षा करेंगे।

 

मीरा ने सब-कुछ त्याग दिया था। उसने राज्य, पति, सगे-सम्बन्धी, मित्र-सखा और धन-दौलत-सबका परित्याग कर दिया था। वह दिन-रात अपने प्रभु श्री कृष्ण का स्मरण करती रहती थी। उसने प्रेमाश्रु बहाये। उसने खाना-पीना छोड़ दिया। उसकी देह सूख कर काँटा हो गयी। किन्तु उसका मन सदा भगवान् कृष्ण के ध्यान में लीन रहता था। केवल तभी भगवान् ने उस पर अपनी कृपा की वर्षा की।

 

 

क्या आप मुझे आत्मा के अस्तित्व के सम्बन्ध में कोई अत्यन्त सरल किन्तु ठोस प्रमाण दे सकते हैं?

 

आप आये दिन 'मेरा शरीर', 'मेरे प्राण', 'मेरा मन', 'मेरी इन्द्रियाँ' कहते हैं। यह स्पष्ट बताता है कि आत्मा शरीर, मन, प्राण और इन्द्रियों से पूर्णतया भिन्न है। यह मन और शरीर आपके सेवक अथवा उपकरण हैं। यह आपसे उतने ही अलग हैं जितना कि यह तौलिये, कुर्सियाँ और प्याले इत्यादि हैं। आप अपने शरीर को इसी तरह से धारण किये हुए हैं, जैसे कि हाथ में यह छड़ी। आप अपने इस शरीर के मालिक हैं। यह शरीर आपकी सम्पत्ति है। यह देह, मन, इन्द्रियाँ इत्यादि आत्मा नहीं हैं, किन्तु उससे सम्बन्धित हैं।

 

 

यदि भगवान् इन्द्रियों की पहुँच से परे है, तो वह एक अस्तित्वहीन, एक शून्य मात्र, एक नकारात्मक धारणा और एक दुर्बोध कल्पना ही होनी चाहिए। इन्द्रियों की पहुँच से परे ? यह कैसे हो सकता है? मैं ऐसी बातों में विश्वास नहीं कर सकता। मैं वैज्ञानिक हूँ। मुझे सही-सही लेबोरेटरी प्रमाण चाहिए।

 

आप लेबोरेटरी के प्रमाण चाहते हैं? बहुत बढ़िया ! आप उस असीम सर्वव्यापक परमात्मा को अपनी परखनली, धौंकनी और रासायनिकों में सीमित करना चाहते हैं! भगवान् आपके रसायनों का उद्गम हैं। वह आपके एटम, इलेक्ट्रोन और मॉलिक्यूल-सभी का आधार हैं। उनके बिना कोई एटम या इलेक्ट्रोन हिल भी नहीं सकेगा। वह अन्तर्यामी हैं। वह नियन्ता हैं। उनके बिना अग्नि जल नहीं सकती, सूर्य चमक नहीं सकता, वायु चल नहीं सकती। उनके बिना आप देख नहीं सकते, बोल नहीं सकते, सुन नहीं सकते और सोच भी नहीं सकते। वह सभी वैज्ञानिक सिद्धान्तों, गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त, संसक्ति (कोहिजन) का सिद्धान्त, आकर्षण और विकर्षण का सिद्धान्त इत्यादि सभी सिद्धान्तों को प्रदान करने वाले हैं। उनके आगे श्रद्धा और भक्ति से नतमस्तक हों। उनकी कृपा से आपको समस्त विज्ञानों के विज्ञान, ब्रह्मविद्या का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जायेगा तथा मोक्ष-प्राप्ति हो जायेगी।

 

 

 

आजकल साधक ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त करने में असफल क्यों रह जाते हैं?

 

विकास की किसी भी एक स्थिति-विशेष पर पहुँचते ही वह अपनी शक्तियों को प्रवचन देने में, शिष्य बनाने में, पुस्तकें छपवाने में गँवाने लग जाते हैं। वह नाम-यश के दास बन जाते हैं। यही कारण है कि वह जीवन के परम लक्ष्य-ईश्वर-साक्षात्कार को प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं।

 

 

१०

 

कुण्डलिनी कैसे जागृत की जा सकती है? क्या केवल जप के द्वारा इसे जागृत किया जा सकता है?

 

आसन, प्राणायाम, मुद्राओं और जप के अभ्यास से तथा गुरु की कृपा से कुण्डलिनी जागृत की जा सकती है। मेरी पुस्तक 'कुण्डलिनीयोग' देखें।

 

हाँ, अकेला जप इसे जागृत करने के लिए पर्याप्त है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। श्री समर्थ रामदास जी ने नासिक के निकट, ताकलि गाँव में, गोदावरी नदी में खड़े हो कर ' श्री राम जय राम, जय जय राम' मन्त्र का तीस करोड़ बार जप करके कुण्डलिनी जागृत कर ली थी।

 

११

 

मन के तीन दोष क्या है? कृपया मुझे ठोस एवं निश्चित उदाहरण दीजिए।

 

यह हैं काम, क्रोध और लोभ इत्यादि मन की मलिनताएँ तथा विक्षेप, अर्थात् मन की चंचलता एवं आवरण, अर्थात् अज्ञान का परदा।

 

एक कीचड़ से भरी हुई झील है और उसके ऊपर काई जमी हुई है। प्रचण्ड वायु तीव्र वेग से चल रही है। अब, यह झील मन है। कीचड़ से भरे होना मल का द्योतक है। वायु के वेग से जल में होने वाली हलचल प्राणों की गति से होने वाले मन के विक्षेप को सूचित करती है। पानी के ऊपर जमी हुई काई अज्ञान के आवरण को दर्शाती है।

 

 

१२

 

मन को सूक्ष्म और पवित्र कैसे किया जा सकता है ?

 

जप करें। निष्काम सेवा करें। मन की गहराई से भगवान् से प्रार्थना करें। सत्संग करें। ध्यान करें। गीता और उपनिषदों का स्वाध्याय करें। अकेले रहें। छह महीनों के लिए सात्त्विक भोजन करें। मांस, मछली, अण्डे, मद्यपान, मिर्च, तेल, चीनी, प्याज और लहसुन का परित्याग कर दें।

 

१३

 

भक्ति और ज्ञान में क्या अन्तर है?

 

भक्ति समर्पण है। ज्ञान की प्राप्ति का जो लक्ष्य है, उसका साधन भक्ति है। भावना-प्रधान स्वभाव वाले लोगों के लिए यह उपयुक्त मार्ग है। इसमें आत्म-समर्पण अथवा आत्म-निवेदन की आवश्यकता है। यह मार्जारीयोग है। बिल्ली का बच्चा जोर से रोता है और उसकी माँ तुरन्त दौड़ कर आती है तथा बिलौटे को मुख में पकड़ कर उठा लेती है। इसी प्रकार भक्त द्रौपदी और गजेन्द्र की तरह जोर से रोता है तथा भगवान् कृष्ण तुरन्त उसकी रक्षा के लिए एवं कृपा-वृष्टि करने के लिए दौड़े आते हैं। भक्ति-मार्ग में केवल सच्ची गहन श्रद्धा, पक्की आस्था तथा सुदृढ़ धारणा की आवश्यकता है, जैसे प्रह्लाद को थी। इसमें पढ़ाई-लिखाई आवश्यक नहीं है। तुकाराम जैसे लोग, जो अपने नाम के हस्ताक्षर तक करना नहीं जानते थे, ने ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त कर लिया था। इसके लिए विस्तृत ज्ञान अथवा अध्ययन नहीं चाहिए। भक्त मिठाई खाना चाहता है। वह तो केवल अपने प्रभु का सान्निध्य चाहता है।

 

ज्ञान आत्म-विस्तारण का योग है। इसमें आत्म निर्भरता की आवश्यकता है। केवल बुद्धि-प्रधान स्वभाव वाले लोग, जो विचार-शक्ति, विवेक-शक्ति तथा तर्क-शक्ति से सम्पन्न हों, ज्ञान-मार्ग के लिए उपयुक्त हैं। यह मर्कटयोग है। बन्दर का बच्चा रोता नहीं, किन्तु उसकी माँ कहीं भी भागती रहे, वह स्वयं ही उसके शरीर के साथ जोर से चिपटा रहता है। इस योग में वेदान्त-साहित्य का विस्तृत अध्ययन, तीक्ष्ण बुद्धि, निर्भीक समझ तथा भीमकाय संकल्प एवं साहस होना चाहिए। ज्ञानी, मिठाई खाने के स्थान पर स्वयं साकार मिठाई ही हो जाना चाहता है। वह ब्रह्म के साथ एक हो जाना चाहता है।

 

१४

 

क्या ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे के विरोधी हैं?

 

मेरा उत्तर है- 'नहीं! बिलकुल नहीं!' वास्तव में इन दोनों में परस्पर नाता है, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। भक्ति ज्ञान का किंचित् भी विरोध नहीं करती। निःसन्देह ये दोनों एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। दोनों एक ही लक्ष्य की ओर ले कर जाते हैं। आप भक्ति को ज्ञान से पूर्णतया अलग नहीं कर सकते। जब भक्ति परिपक्व हो जाती है तो यह ज्ञान में रूपान्तरित हो जाती है। एक वास्तविक ज्ञानी भगवान् हरि का भक्त है, भगवान् कृष्ण का भक्त है; भगवान् राम का, भगवान् शिव का, माँ दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी का, ईसा मसीह तथा बुद्ध भगवान् का भक्त है। वह समरस भक्त होता है। कुछ अज्ञानी लोग सोचते. हैं कि ज्ञानी शुष्क होता है तथा उसमें भक्ति बिलकुल नहीं होती। यह बहुत ही दुःखद गलती है। ज्ञानी का हृदय तो अत्यधिक विशाल होता है। श्री शंकराचार्य की भक्तिमय कृतियों को पढ़ कर देखें और उनकी भक्ति की गहराई का अनुमान लगायें। जरा अप्पय्य दीक्षितार की रचनाओं को पढ़ें और उनकी असीम भक्ति की अमित गहराइयों की थाह लेने का प्रयास करें।

 

स्वामी रामतीर्थ एक ज्ञानी थे। क्या वह भगवान् श्री कृष्ण के भक्त नहीं थे? यदि कोई वेदान्ती भक्ति का बहिष्कार कर देता है, तो याद रखें, उसने वास्तव में वेदान्त को ठीक से समझा और ग्रहण ही नहीं किया है। एक ही निर्गुण ब्रह्म, थोड़ी-सी माया के सहित सगुण ब्रह्म के रूप में अपने भक्तों की पावन पूजा ग्रहण करने के लिए अवतरित हो जाता है।

 

भक्ति ज्ञान से विलग नहीं है। इसके विपरीत ज्ञान भक्ति को प्रगाढ़ करता है। जिस व्यक्ति को वेदान्त का ज्ञान है, वह अपनी भक्ति में भली-भाँति स्थित रहता है। वह सुस्थिर एवं सुदृढ़ हो जाता है। कई अज्ञानी लोग कहते हैं कि यदि कोई भक्त वेदान्त पढ़ लेगा, तो उसकी भक्ति चली जायेगी। यह पूर्णतया गलत है। वेदान्त का अध्ययन तो भक्ति को बढ़ाने और विकसित करने में सहायक है। वेदान्त-साहित्य में प्रवीण व्यक्ति की भक्ति भली-भाँति सुस्थिर हो जाती है। वास्तव में भक्ति और ज्ञान एक पक्षी के दो पंखों की भाँति हैं, जो व्यक्ति को ब्रह्म की ओर उड़ान भरने में, मुक्ति की पराकाष्ठा तक पहुँचाने में सहायता करते हैं।

 

१५

 

क्या रात को भोजन करने के बाद ध्यान के लिए बैठना उचित है? सायंकाल के समय तक गृहस्थ व्यक्ति इतना परेशान हो चुका होता है कि उसे ध्यान के लिए समय निकाल सकना ही बहुत कठिन होता है।

 

सामान्यतया राजसी भोजन करने के बाद लोग निद्रालुता अनुभव करते हैं। आप कल्पना करते रहेंगे कि आप ध्यान में बैठे हैं, किन्तु यह बैठी मुद्रा में पूर्णतया निद्रा भी हो सकती है। यदि आप मिताहार के नियम का अनुसरण करते हैं और सायं बजे से पहले भोजन कर लेते हैं तो आप से १० बजे तक ध्यान के लिए बैठ सकते हैं।

 

रात्रि के समय ध्यान, अर्थात् दिन में दूसरी बार ध्यान के लिए बैठना निश्चित रूप से अत्यन्त आवश्यक है। यदि आपके पास रात को ध्यान के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता तो आप सोने से पहले कुछ मिनट, अर्थात् १० से १५ मिनट के लिए ध्यान करने के लिए बैठ जायें। इस प्रकार करने से आध्यात्मिक संस्कार विकसित होंगे। यह आध्यात्मिक संस्कार आपके लिए बहुमूल्य निधि हैं। इसके साथ-साथ आपको बुरे सपने नहीं आयेंगे। दिव्य विचार निद्रावस्था में भी चलते रहेंगे। इनका आपके ऊपर अच्छा प्रभाव पड़ेगा।

 

१६

 

ब्रह्मचर्य का पालन करने में मुझे कठिनाई रही है। अचानक ही मैं मूर्खतावश गड्ढे में गिर जाता हूँ। भीतर से मैं वास्तव में दुखी हूँ, किन्तु पशु की भाँति उसी काम में फँस जाता हूँ। क्या करूँ ?

 

व्रत रखें। किसी एक ही मन्त्र का नित्य तीन घण्टे सतत जप करें। श्रीमद्भगवद्गीता का एक अध्याय प्रतिदिन पढ़ें। अलग कमरे में सोयें। अपने मन को हर समय पूरी तरह व्यस्त रखें। मन को दूसरी ओर मोड़ दें। मन को उदात्त एवं भले विचारों से भर दें। सत्संग करें। थोड़े से कुम्भक सहित, सुखपूर्वक २० प्राणायाम करें। शारीरिक श्रम भी पर्याप्त मात्रा में करें। चिन्तन करें कि आत्मा में तो काम है, ही काम वासना

 

१७

 

मैं बहुत गम्भीरता से ऐसे गुरु की खोज में हूँ, जो सुनिश्चितता से कह सके कि उसने ब्रह्म-साक्षात्कार अथवा भगवद्-दर्शन प्राप्त कर लिया है। क्या आप मुझे कोई ऐसा व्यक्ति बता सकते हैं? मैं आपसे यह पूछने की धृष्टता कर सकता हूँ कि क्या आपने ब्रह्म-साक्षात्कार कर लिया है ?

 

जो प्रश्न आपने पूछे हैं, यह आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले सभी सच्चे साधकों के मन में आने स्वाभाविक हैं। कल्पना कीजिए कि मैं आपसे कह दूँ कि अमुक व्यक्ति ब्रह्म-साक्षात्कार प्राप्त किये हुए है, तो आप मेरे कथन को सत्य-प्रमाणित कैसे करेंगे और इससे आपको लाभ भी क्या होगा ?

 

साक्षात्कार-प्राप्त आत्माओं का अभाव नहीं है। सामान्य अज्ञानी व्यक्ति सरलता से उन्हें पहचान नहीं सकता। केवल कुछेक लोग, जो शुद्ध हृदय के हैं तथा समस्त सद्गुणों से सम्पन्न हैं,उन्हें  समझ सकते हैं, वही उनके सान्निध्य से लाभान्वित हो सकते हैं।

 

साक्षात्कार-प्राप्त आत्माओं की खोज में इधर-उधर दौड़-भाग करने का कोई लाभ नहीं है। भले ही कृष्ण भगवान् भी आपके साथ रहें, वे भी आपके लिए कुछ नहीं कर सकते, जब तक आप उन्हें ग्रहण करने योग्य नहीं बनते। इस बिन्दु को समझें और स्वयं को निष्काम कर्मयोग, दान, धारणा, जप, ब्रह्मचर्य तथा इन्द्रिय-संयम द्वारा शुद्ध करें।

 

गुरु की परीक्षा करना अत्यन्त कठिन है। यहाँ अपनी बुद्धि का प्रयोग करें। विश्वास रखें। सच्चा जिज्ञासु इन प्रश्नों और शंकाओं से मुक्त है। यदि आप मेरे कथन पर विश्वास करेंगे, तो आप अद्भुत रूप से लाभान्वित होंगे।

 

१८

 

क्या गुरु के लिए अपने शिष्यों को महान् बनाना बहुत कठिन है ?

 

इस प्रश्न से यह आभास होता है कि गुरु को अपने शिष्यों से अन्य सबकी अपेक्षा अधिक लगाव होता है। यदि ऐसा है, तो वह आध्यात्मिक गुरु नहीं है, क्योंकि आध्यात्मिक व्यक्ति की प्रथम योग्यता, आसक्ति पर विजय प्राप्त होना है। वास्तविकता यह है कि सहस्रों में से कोई एक-दो विरले ही इस योग्यता को प्राप्त कर पाते हैं और केवल वही व्यक्ति महान् हैं, महामानव हैं। ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे लोग चारों ओर से घेरे रहते हैं, जो उसके अन्तरनिहित आकर्षण से प्रभावित होते हैं। किन्तु जो लोग उन्हें घेरे रहते हैं, उनमें गुरु होने की योग्यता नहीं होती। वह तो सामान्य लोग ही होते हैं।

 

१९

 

एक असामान्य महिला ने दश वर्षों तक निरन्तर कठोर योगानुशासन में रहते हुए एक महानतम योगगुरु के पास अध्ययन किया और अन्ततः वह इस नतीजे पर पहुँची कि यह सब-कुछ भ्रम है, मृगतृष्णा है।

 

आपने उस महिला के सम्बन्ध में जो कुछ कहा, उससे ज्ञात हो जाता है कि उसमें वह योग्यता नहीं थी कि किसी से लाभान्वित हो सके, भले ही वह व्यक्ति भगवान् बुद्ध जैसी आध्यात्मिक उन्नति तक पहुँचा हुआ क्यों हो। आध्यात्मिक विकास के लिए एक वस्तु, जो बहुत आवश्यक है, वह है-अध्यवसाय अथवा दृढ़ता। वह स्वयं को तरह-तरह की कृतियों से भरती जा रही थी और सभी उसे अलग-अलग रास्ते बतलाने वाली थीं। यदि कोई व्यक्ति कुआँ खोदना चाहता है तो उसे एक ही स्थान पर निरन्तर खुदाई करनी पड़ेगी, जब तक कि वह पानी तक नहीं पहुँच जाता है। यदि वह सौ स्थानों पर खुदाई करे और हरेक गड्डा पाँच फुट से कम गहरा खोदे बिना ही छोड़ दे, तो वह कभी कुआँ नहीं खोद पायेगा। उस महिला की यही स्थिति थी। उसकी धारणा को क्या महत्त्व दिया जा सकता है?

 

२०

 

तीर्थयात्रा को इतना पावन क्यों माना जाता है, पर्यटन अथवा कार्यालय सम्बन्धी यात्रा को क्यों नहीं?

 

क्योंकि, 'तीर्थयात्रा पर जाना है', यह विचार आते ही आपका मन आपको एक अलग ही उच्चतर एवं भक्तिपूर्ण भाव में ले जाता है। मन के सांसारिक घुमाव बन्द होने लगते हैं। जब आप अपने शहर को छोड़ कर निकलते हैं, तो आप अपने सामाजिक जीवन के बोझिल आवरण को निकाल फेंकते हैं। आप भले ही अपने परिवार के सदस्यों के साथ यात्रा पर निकले हों, धीरे-धीरे आपको लगने लग जाता है कि वे सब आपके सगे-सम्बन्धी इतने नहीं हैं, जितने कि सह तीर्थयात्री हैं। और यदि आप अकेले हैं, तो आप सम्भवतया पारिवारिक चिन्ता एवं तनाव से मुक्त तथा पूरी तरह से आध्यात्मिक जगत् में रहते हैं। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जो उत्तराखण्ड जैसे पावन क्षेत्रों के चतुर्दिक् व्याप्त आध्यात्मिक तरंगों को ग्रहण करने के लिए पूर्णतया अनुकूल है। जो व्यक्ति तीर्थयात्री होने के भाव से तीर्थस्थान पर जाता है, वह इस बात के प्रति जागरूक होता है कि वह आध्यात्मिक अनुभव-प्राप्ति के पावन लक्ष्य को ले कर निकला है, इसलिए उसे इस यात्रा से महान् लाभ प्राप्त होगा और जब वह यात्रा से लौटेगा तो वह पूर्णतया परिवर्तित व्यक्ति होगा।

 

२१

 

तीर्थयात्रा से लोग कैसे लाभान्वित होते हैं?

 

इस प्रश्न का उत्तर तो प्रत्येक तीर्थयात्री को अपने बारे में स्वयं ही बताना होगा। आध्यात्मिक लाभ सदैव हृदय के विश्वास पर निर्भर करता है। विश्वास मनुष्य की आत्मा का प्राण है। इसके बिना कोई भी आध्यात्मिक साधना सफल नहीं हो सकती। और इसके साथ, कोई भी आध्यात्मिक प्राप्ति असम्भव नहीं है। यदि तीर्थयात्री को मन में विश्वास हो, उसकी धारणा दृढ़ हो और निश्चय पक्का हो कि उसके समस्त पाप धुल जायेंगे, कि उसे मोक्ष प्राप्ति हो जायेगी तथा वह संसार-चक्र से निकल जायेगा, तो फिर ऐसा बिलकुल भी कोई कारण नहीं है कि यह सत्य सिद्ध हो। बद्री केदार जैसी तीर्थयात्रा आपके समस्त पापों को धो देती है तथा आपको इस योग्य बना देती है कि आप जीवन के परम लक्ष्य-ईश्वर-साक्षात्कार (यदि इसकी महिमा में निष्ठा है, तो) की ओर अग्रसर होने लगें। किन्तु याद रखें, आपके इस विश्वास का परीक्षण यह है कि जब आप यात्रा से लौटते हैं, तब कैसे हैं; यदि यात्रा से लौटने पर आप यह सिद्ध कर देते हैं कि आपने अपने समस्त पाप पूर्णतया धो डाले हैं, कि अपने सारे कुसंस्कार पावन नदियों के जल में स्नान करके बहा डाले हैं, कि जिस उदात्त वातावरण में आप घूम कर आये हैं, उसकी आध्यात्मिक तरंगों से आप पूरी तरह से भर गये हैं तथा यदि आपने एक सही, भक्तिपूर्ण, सत्यपरायण और पवित्र जीवन जीना आरम्भ कर दिया है, तो आप निश्चित रूप से मोक्ष प्राप्त करेंगे। तब तीर्थयात्रा ने अपना उद्देश्य पूर्ण कर दिया समझें।

 

कुछ तीर्थयात्री (भले ही बहुत कम संख्या में हैं, और प्रकट भी नहीं करते हैं, किन्तु फिर भी) ऐसे हैं, जो तीर्थयात्रा द्वारा आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक पहुँच जाते हैं।

 

२२

 

'माई मैगजीन' में मैंने आपका लेख पढ़ा, “सांसारिक मन वाले लोगों का साथ छोड़ दो। सांसारिक बातें करने वाले आपके मन को दूषित कर देंगे। आपका मन चंचल हो जायेगा। दौड़ें ! भागें ! ऋषिकेश जैसे एकान्त स्थानों में भाग जायें! आप आध्यात्मिक पथ पर सुरक्षित रहेंगे।" क्या मैं आपके पास कर संन्यासी-जीवन बिता सकता हूँ?

 

उतावले बनें। भली-भाँति सोचें। पहले तोलें, फिर बोलें। आध्यात्मिक मार्ग में केवल भावुकता से काम नहीं चलेगा। उपरोक्त निर्देशन उन लोगों के लिए हैं, जो पहले से ही किसी--किसी साधना में लगे हुए हैं। उनको उच्चतर साधना के लिए एकान्त में जाना पड़ेगा। आप जैसे प्रारम्भिक साधकों के लिए संसार में रहते हुए, रोगियों और वृद्धों की तीन वर्ष निरन्तर निःस्वार्थ कर्मयोग की साधना करना अधिक अच्छा रहेगा।

 

मान लें कि आप संन्यासी हो कर मेरे पास रहते हैं, तो क्या आपमें इतनी शक्ति है कि यदि आपकी माता जी कर आपके सामने भग्नहृदय से फूट-फूट कर रोने लगें, तो आप उनका सामना कर सकेंगे? यदि आपके पिता जी आपको कर धमकाने लगें, तो क्या आप इस पथ पर दृढ़ रह सकेंगे? यदि कोई युवती आपको प्रलोभित करे, तो क्या आप अप्रभावित रहेंगे! यदि आप किसी रोग से ग्रसित हो जायें, तो क्या इस पथ पर दृढ़ रह सकेंगे? क्या आप सत्य-पथ पर अपना शरीर और जीवन न्योछावर करने को तैयार हैं? क्या आपने संन्यास एवं एकान्त की महिमा को जान लिया है? संन्यासियों को जो कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं, क्या आप उन्हें जानते हैं? क्या आप दर-दर भटक कर भिक्षा-वृत्ति द्वारा निर्वाह करने के लिए तैयार हैं? जब आपको निर्जन स्थान में रहना पड़ेगा तो आप पूरा दिन और रात कैसे बितायेंगे? यहाँ आने से पहले इन सब बातों पर भली-भाँति विचार कर लें। यदि आपको पूरा विश्वास है कि आप संन्यास के लिए तैयार हैं, तो आप यहाँ सकते हैं। मैं आपकी अच्छी तरह देखभाल करूँगा और सहायता करूँगा। मैं आपकी आध्यात्मिक उन्नति का ध्यान रखूँगा। मैं आपको शाहों का शहंशाह बना दूंगा। त्यागमय जीवन से बढ़ कर सुखदायक जीवन और कोई नहीं है। शीघ्र ही आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए यह सबसे अधिक उपयुक्त है। संन्यासियों की जय हो!

 

 

२३

 

मैं-जो ब्रह्म हूँ, परम चैतन्य हूँ, अद्वितीय, अनन्त, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् हूँ, मुझे प्रकृति को प्रकट करने की आवश्यकता ही क्या है? मुझे प्रकृति के नियमों में बँधना और देश, काल एवं कारण की सीमाओं में सीमित होना क्यों आवश्यक है और सबसे बढ़ कर, मुझे क्रम-विकास एवं प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया के चक्र में पड़ने की आवश्यकता ही क्या है?

 

आँख अपने-आपको नहीं देख सकती। मनुष्य अपने कन्धों पर स्वयं सवार नहीं हो सकता। इसी तरह उस परम तत्त्व के, समस्त सृष्टि के कारण-रहित कारण के विषय में की जाने वाली सारी खोज आदि-अज्ञान से जा टकराती है। जो व्यक्ति अपनी मैं को शून्य तक ले जाता है, और इस प्रकार जो ईश्वर की कृपा प्राप्त कर लेता है, वह इस दीवार को भेद कर उस अनन्त के साम्राज्य में प्रवेश पा जाता है। तब वह सब जान जाता है। किन्तु यह जानकारी किसी अन्य को बतायी नहीं जा सकती, क्योंकि इस विशाल दीवार ने दूसरों को सत्य जानने से रोक कर रखा हुआ है। इसलिए प्राचीन सन्तों ने इसे अतिप्रश्न कहा है।

 

केवल इतना जान लेना ही पर्याप्त है कि भगवान् ने इस सृष्टि की रचना इसलिए की है कि आप स्वयं को विकसित कर सकें और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर सकें, ताकि आप उनके प्रकटीकृत रूप-इस समस्त सृष्टि की सेवा कर सकें और उससे प्रेम कर सकें। अज्ञान रूपी डाकू ने मनुष्य को आत्म-जागरूकता के अपने महल से अपहृत कर लिया है और उसे घने जंगल में ला पटका है। जब वह जागता है तो वह यहाँ कैसे गया, इसकी चिन्ता नहीं करता, अपितु यहाँ से बाहर निकलने का प्रयास करता है। इसी प्रकार, सच्चा साधक आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करके जन्म-मरण के चक्र से निकलने का प्रयास करता है।

 

२४

 

वे सर्वहितैषी, दया के सागर, करुणा-सिन्धु भगवान् सदाचारी व्यक्ति की सहायता क्यों नहीं करते और उसे सुखी क्यों नहीं रखते ? वे उसे पूर्व-जन्म के कर्मों की दया पर क्यों छोड़ देते हैं?

 

कर्म एक पहिये की भाँति होते हैं। उनको पूरा करना ही पड़ता है। जिस शक्ति से वह गति में आये होते हैं, उसे खर्च करना ही पड़ता है। यह क्रिया एवं प्रतिक्रिया का चक्र है। जैसे धनुष से एक बार छूटा हुआ बाण वापस नहीं लौटाया जा सकता भले ही शिकारी को यह लगे कि उसने गलत जगह निशाना लगा दिया है; इसी प्रकार प्रारब्ध कर्म, अर्थात् गत जन्मों के किये गये कर्मों के फल जो परिपक्व हो कर इस जन्म में भोगने के लिए गये हैं, उन्हें मिटाया नहीं जा सकता

 

फिर भगवान् अपने भक्त की सहायता कैसे करते हैं? वह करुणा-सागर प्रभु उसकी संकल्प-शक्ति को सुदृढ़ करके तथा सहन-शक्ति को बढ़ा कर, प्रसन्नतापूर्वक कर्म-फल भोगने की शक्ति दे कर सहायता करते हैं। निश्चित रूप से भक्त को पूर्व-कर्मों की दया पर नहीं छोड़ दिया जाता। वह उनके द्वारा अपनी दया के सुरक्षा-कवच से भली-भाँति आवृत्त कर दिया गया होता है। जिस प्रकार भीषण जाड़े और प्रचण्ड वायु में आप अपने घर में एवं गर्म कपड़ों में सुरक्षित रहते हैं, इसी प्रकार भगवान् का भक्त (भले ही देखने वालों को वह अकिंचन, रोगी और पीड़ित प्रतीत होता हो) यह अनुभव नहीं करता कि वह जरा-से भी कष्ट में है और वह सदा उनके स्मरण में प्रसन्न एवं आनन्दित रहता है।

 

२५

 

गलत काम करने वाला व्यक्ति तर्क देता है कि वह अपने कर्मों के कारण यह सब कर रहा है, और वह ऐसा करने का भी प्रयत्न नहीं करता, क्योंकि उसे ऐसा करने में प्रसन्नता प्राप्त होती है। उसे कैसे समझाया जाये कि ऐसे करे ?

 

कर्म मनुष्य को गलत कार्य करने के लिए बाध्य नहीं करता। हाँ, संस्कार कुछ हद तक करते हैं। भगवान् ने मानव को स्वतन्त्र इच्छा-शक्ति प्रदान की है, जिससे वह अपने भविष्य को बिगाड़ या सँवार सकता है। मनुष्य को भोग-स्वतन्त्रता नहीं है, जो कि कर्म द्वारा संचालित है। किन्तु उसे कर्म-स्वतन्त्रता है। वह अपने कुसंस्कारों को विचार-शक्ति द्वारा, इच्छा-शक्ति द्वारा और भले कार्यों के सतत अभ्यास द्वारा सुसंस्कारों में बदल सकता है।

 

दुर्गुण तत्काल सुख देते प्रतीत होते हैं, यही सबसे बड़ा लोभ है और यही सद्गुण अर्जित करने में सबसे बड़ी बाधा है। इसका निराकरण केवल विवेक एवं अनुभव द्वारा हो सकता है। परमात्मा का ध्यान करने से तथा दुष्कर्मों के कारण उस व्यक्ति की आत्मा को एवं समस्त समाज को होने वाली हानि का चिन्तन करने से व्यक्ति दुष्कर्म करने से बच सकता है, किन्तु तत्काल सुख प्रतीत होने वाले दुष्कर्म उसे फिर लुभा लेते हैं। इस गम्भीर समस्या का हल सुगम नहीं है, दुष्टहृदयी इतने शीघ्र नहीं बदलता। इसीलिए हमारे पूर्वजों ने सत्संग को इतना बढ़ावा दिया। केवल विद्वज्जनों एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्नत सन्तों का सतत संग ही दुष्टों के मन से गलत धारणाओं को निकाल सकता है।

 

२६

 

मैं एक अनजान स्त्री हूँ, जो कभी आपसे मिलेगी-इसकी आपने कभी कल्पना भी की होगी, किन्तु मेरी प्रार्थना है कि स्त्री होने के कारण आप मुझसे घृणा करें! मैं तो केवल आध्यात्मिक जीवन का आनन्द पाने को लालायित हूँ। स्वामी जी, स्त्री होने पर भी कृपा करके मेरी ओर ध्यान दें और मुझे बतायें कि क्या मैं ऐसे आनन्द को प्राप्त कर सकूँगी ? और यदि हाँ, तो ऐसा कब होगा ?

 

कहते हैं कि व्यक्ति के सही गुरु होना अनिवार्य है; किन्तु मैं नहीं जानती कि ऐसे गुरु को मैं कहाँ खोजूँ जो मेरी इस क्षुधा को शीघ्र तृप्त कर दे। क्या आप मेरी सहायता कर सकते हैं?

 

क्या आपके गुरु थे ? कौन थे वह ? कृपया मुझे उनके विषय में बतायें। यदि मैं धृष्टता नहीं कर रही हूँ, तो कृपया बतायें कि क्या वह सद्गुरु थे, या हैं?

 

क्या मैं जान सकती हूँ कि आपको गुरु अथवा सद्गुरु कहा जा सकता है?

 

मुझे यह जान कर बहुत प्रसन्नता हुई कि आप आध्यात्मिक जीवन का आनन्द प्राप्त करने को अत्यधिक लालायित हैं। आपके संस्कार अच्छे एवं आध्यात्मिक हैं। इनको सुरक्षित रखें। नियमित अभ्यास के द्वारा आप आध्यात्मिक आनन्द को प्राप्त कर सकती हैं।

 

मैं किसी से भी घृणा नहीं करता। महिलाओं में मैं निज आत्मस्वरूपवत् श्रद्धा रखता हूँ। नारी महाशक्ति का प्रकटीकृत रूप है। मैं उसकी दुर्गा अथवा काली के रूप में उपासना करता हूँ। यद्यपि स्त्रियों को अबला (बलहीन) कहते हैं, तथापि वे इस धरा पर सक्रिय शक्तिस्वरूपा हैं। धर्म की सुरक्षा केवल उन्हीं के माध्यम से हो रही है। भारतीय नारियों में भक्ति का तत्त्व अन्तर्निहित है। उनमें अविचल भक्ति होती है। यदि वे निश्वय कर लें, तो परमात्म-साक्षात्कार अति शीघ्र प्राप्त कर सकती हैं।

 

क्या आप मीरा के समान नहीं होना चाहतीं ? यदि आपका मन सचमुच ईश्वरोन्मुख हो चुका है, यदि आप अपनी आध्यात्मिक साधनाओं में गम्भीर और सुदृढ़ हैं, तो बहुत शीघ्र ही आप दिव्य आनन्द प्राप्त कर सकती हैं। आनन्दित हो जायें! निर्भीक बनें! सुदृढ़ रहें! स्वयं को पहचानें ! साक्षात्कार प्राप्त करें! आध्यात्मिक आनन्द का आस्वादन करें!

 

यदि आपकी इच्छा वास्तविक है तो गुरु आपको अपने समक्ष प्राप्त हो सकता है। सच्चे जिज्ञासु दुष्प्राप्य हैं। हाँ, मेरे भी गुरु हैं। स्थान का अभाव होने के कारण, मैं उनकेविषय में विस्तार से नहीं बता सकता। मैं, तो गुरु हूँ, ही सद्गुरु। दूसरे की सेवा करने में मुझे आनन्द प्राप्त होता है। मैं निश्चित रूप से आपकी सेवा को तत्पर हूँ, तथा मेरे पास जो कुछ भी है, वह आपसे बाँटने को तैयार हूँ। मैं आपके संशयों का निवारण करके आपको अध्यात्म-पथ पर अग्रसर कर दूँगा।

 

 

२७

 

क्या गुरु या शिक्षक के निर्देशन की सहायता लिए बिना प्राणायाम का अभ्यास करने में खतरा है ?

 

साधारण प्राणायाम का अभ्यास गुरु की सहायता के बिना किया जा सकता है। यदि आप सतर्क हैं और सहज बुद्धि का उपयोग करते हैं, तो आसन-प्राणायाम इत्यादि का अभ्यास करने में कोई खतरा नहीं है। लोग अकारण ही भयभीत रहते हैं। यदि आप लापरवाह हैं, तो प्रत्येक कार्य करने में खतरा है। यदि आप लापरवाही से सीढ़ी उतरते हैं, तो आप गिर कर टाँग की हड्डी तुड़वा बैठेंगे। जब आप अपने शहर के किसी व्यस्त क्षेत्र में से जा रहे होते हैं, उस समय यदि आप लापरवाही से चलते हैं, तो गाड़ी के नीचे कर कुचले जाने का भय रहेगा। यदि आप स्टेशन पर टिकट लेते समय सतर्क नहीं रहते, तो अपना बटुआ गंवा बैठेंगे। यदि दवाइयों के मिश्रण बनाते समय सतर्क नहीं हैं, रोगियों को गलत दवाइयाँ अथवा विष या आवश्यकता से अधिक खुराक दे कर, उनके प्राण ले लेंगे। इसी प्रकार जब आप प्राणायाम करते हैं, तो आपको अपने भोजन का भी ध्यान रखना पड़ेगा। आपको पेट को बहुत अधिक भर कर नहीं खाना चाहिए, आपको हल्का, शीघ्र पचने वाला और शक्ति देने वाला भोजन करना चाहिए। आपको सम्भोग में संयमित होना चाहिए। पहले आपको कुम्भक के बिना, एक या दो मास तक केवल अनुलोम-विलोम करना चाहिए, फिर धीरे-धीरे श्वास-प्रश्वास के अनुपात को :: से बढ़ाते हुए, १६:६४:३२ तक ले जाना चाहिए। साँस को बहुत धीरे-धीरे छोड़ें। यदि इन नियमों का पालन किया जाये, तो प्राणायाम का अभ्यास करने में कोई भय नहीं है।

 

यदि आप दीर्घ काल तक कुम्भक करने का अभ्यास करना चाहते हैं तथा अपान को प्राण से मिला देना चाहते हैं, तब गुरु का होना आवश्यक है। यदि गुरु नहीं मिल रहा तो साक्षात्कार प्राप्त योगियों की पुस्तकें आपको निर्देशन दे सकती हैं। किन्तु गुरु के पास होना अधिक अच्छा है। या आप उनसे निर्देशन प्राप्त करके अपने घर पर अभ्यास कर सकते हैं। उनसे नियमित पत्र-व्यवहार करते रह सकते हैं। आधे या एक मिनट तक तो आप बिना किसी कठिनाई या भय के कुम्भक कर सकते हैं। यदि कोई साक्षात्कार-प्राप्त योगी नहीं मिलता, तो आप योग के वरिष्ठ विद्यार्थी के पास जा सकते हैं। वे भी आपकी सहायता कर सकते हैं।

 

२८

 

क्या आहार-शुद्धि से मन पवित्र होता है? क्या निरामिष भोजन सात्त्विक नहीं है ? महाभारत में हमें लोगों द्वारा यज्ञ में समर्पित बलि के बकरे खाये जाने के उदाहरण मिलते हैं।

 

हाँ, भोजन की शुद्धि से मन शुद्ध होता है। 'आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः ' शैम्पेन (मदिरा) की एक खुराक लें और ध्यान में बैठ कर देखें। सन्तरे के रस की एक खुराक पियें और ध्यान के लिए बैठें। आपको अन्तर पता चल जायेगा। अलग-अलग प्रकार का भोजन, मस्तिष्क के अलग-अलग भागों पर प्रभाव डालता है। मदिरा पीने, माँस और लहसुन खाने hat H . जब आप ध्यान के लिए बैठेंगे तो आपका मन चंचल एवं परेशान रहेगा। दूध और फल लेने से आप मन को भली-भाँति एकाग्र कर लेंगे। हमारे ऋषि-मुनि दूध और फलों पर ही रहते थे। छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है, आहार शुद्धि से मन शुद्ध होता है और तब व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। आपको आहार-संयम रखना चाहिए।

 

मांसाहार सात्त्विक नहीं है। साधक के लिए यह अच्छा नहीं है। एक मास तक दूध और फलों पर रहें और फिर देखें। हमें करके देखना चाहिए। करने से आपको अनुभव हो जायेगा कि निरामिष भोजन करना मन के लिए ठीक नहीं है।

 

२९

 

इनमें से क्या अधिक अच्छा है? गृहस्थ-जीवन व्यतीत करना या संन्यासी हो जाना ?

 

आप एकदम से संसार का त्याग नहीं कर सकते। संसार एक विशाल विश्वविद्यालय है। प्रकृति सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। संसार में रह कर आप दया, सहन-शक्ति इत्यादि सद्गुणों का विकास कर सकते हैं। एकाकी गुहाओं में रह कर आप इनका विकास नहीं कर सकते। संसार सर्वोत्तम गुरु है। धीरे-धीरे जब आप उन्नत स्थिति प्राप्त कर लेंगे, तब संन्यास ले सकते हैं। गुरु नानक संसार में ही रहे। उनके दो पुत्र थे। संसार में रहने में कुछ गलती नहीं है। प्रार्थना सब कठिनाइयों को दूर कर देगी।

 

 

३०

 

कहीं-कहीं ऐसा सुना है कि साधु और संन्यासियों के साथ मित्रता करने से व्यक्ति का बहुत कुछ बन या बिगड़ सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी सिद्ध सन्त की भावना को आहत करता है, तो कहते हैं कि वह उसे शाप दे देता है और उसे बहुत-सी मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। यह कहाँ तक सच है ?

 

साधु एवं संन्यासियों का साथ सदा ही मनमोहक है, यदि वह उत्तम चरित्र से सम्पन्न हैं तो! यदि यही एकमात्र गुण उनमें विद्यमान है तो वे पूजा और सम्मान पाने के पूर्ण अधिकारी हैं। वे कभी भी किसी को कष्ट पहुँचाने का कारण नहीं बन सकते।

 

सच्चे साधु और संन्यासियों का सम्पर्क कभी भी लोगों की उन्नति में बाधा का अथवा उनकी निजी हानि का कारण नहीं हो सकता। साधु तो उनको सही एवं नैतिक नियमों का पालन करने योग्य बनने में सहायता करते हैं। साधु-सन्तों के आशीर्वाद लोगों के लिए अनमोल धन हैं। सांसारिक बुद्धि से सम्पन्न लोगों के मन स्वभावतया जिन कुसंस्कारों से भरे होते हैं, साधु-सन्तों का संग उन्हें शुद्ध करने में सहायता करता है।

 

ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त सन्त को भले ही कितना उकसाने का प्रयत्न किया जाये, वह कभी भी किसी को शाप नहीं देता; बल्कि सर्वशक्तिमान् परमात्मा से प्रार्थना करता है-उसे खतरों एवं अपमान से बचाने के लिए नहीं, अपितु उसे और उसके विरोधियों को भी ज्ञान, प्रकाश, पवित्रता एवं द्युति प्रदान करने के लिए। उसे चोट पहुँचाये जाने पर भी

 

 

वह कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाता। वह अत्यन्त सहज रूप से क्षमा करके उसे भूल जाता है। वह अपने प्रति किये गये किसी भी अनुचित कार्य को याद नहीं रखता। सच्चा ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त सन्त चोर, लम्पट, कपटी, हत्यारा, आक्रामक, चींटी, श्वान, अछूत, ब्राह्मण, पेड़, पाषाण, बिच्छु यहाँ तक कि इस समस्त जड़-चेतन सृष्टि में अपने इष्ट की छवि को देखता है। वह सबके साथ स्वयं को एक ही देखता है। जब यह स्थिति है कि वह सबको आत्मवत् ही देखता है, तो वह किसे शाप दे सकता है?

 

याद रखें कि वह साधु या संन्यासी ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति नहीं हो सकता जो किसी भी कारण से किसी को शाप देता है। यह भी सच है कि कोई पवित्रात्मा (भले ही वह साधु या संन्यासी भी हो) यदि शारीरिक या मानसिक कष्ट के प्रभाव से किसी को शाप दे दे तो वह तत्काल फलित हो जाता है।

 

३१

 

जब गुरु और भगवान् - दोनों की कृपा है, तब फिर मन नियन्त्रित क्यों नहीं होता ?

 

इसके साथ-साथ पुरुषार्थ भी अत्यन्त आवश्यक है। जब आप पुरुषार्थ करते हैं, केवल तभी कृपा होती है। कोई प्राध्यापक आपके लिए प्रश्नों के उत्तर लिख कर आपको सफलता नहीं दिलवायेगा। गीता कहती है, 'उद्धरेदात्मनात्मानम्।' व्यक्ति को स्वयं अपने-आपको उन्नत करने का प्रयास करना चाहिए। कृपा व्यक्ति को उन्नत होने में सहायता करती है। प्रत्येक को अपने मोक्ष की प्राप्ति के लिए स्वयं परिश्रम करना चाहिए। आप पूछेंगे कि फिर कृपा क्या है? यदि साधक को अपने गुरु के पत्र प्राप्त होते हैं और उनसे उसकी समस्त शंकाओं का समाधान हो जाता है, वह कृपा है। यदि कोई साधक यहाँ जाता है और गंगा स्नान कर लेता है, तो यह कृपा है। अनेकों इसके लिए लालायित हैं। यहाँ तक कि कितने ही करोड़पति यहाँ आने और गंगा स्नान करने के लिए तरसते रहते हैं, किन्तु उन्हें एक बार भी कर अपनी इच्छा-पूर्ति का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता। यदि स्वाध्याय के लिए अच्छी पुस्