मानसिक शक्ति

 

THOUGHT POWER

का अविकल रूपान्तर

 

 

 

 

लेखक

 श्री स्वामी  शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

अनुवादक

श्री त्रि. . आत्रेय

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण : १९७३

 

बारहवाँ हिन्दी संस्करण : २०१९

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

ISBN 81-7052-057-6 HS 98

 

PRICE: 130/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर-२४९१९२,

जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड' में मुद्रित

For online orders and Catalogue visit: dlsbooks.org

प्रकाशकीय

 

मानव-जीवन में विचारों, बुद्धि तथा संकल्प-शक्ति की भूमिका मूल्यवान् है। यह पुस्तक विचार-शक्ति के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालती है तथा मानव-बुद्धि और संकल्प-शक्ति को एक सम्यक् दिशा प्रदान करती है। इस दृष्टि से यह पुस्तक भी मूल्यवान् है।

 

छात्रों, प्रौढ़ों, व्यापारियों और सत्यान्वेषी साधकों-सभी के लिए इस पुस्तक में विचार-संस्कृति का एक ऐसा चित्र प्रस्तुत किया गया है जो उनके लिए अपने-अपने व्यक्तित्वों को शक्तिशाली बनाने, आत्म-सुधार एवं आत्मोन्नति करने तथा जीवन को एक सुदृढ़ आधार पर अवस्थित करने हेतु एक मार्गदर्शक सिद्ध होगा।

 

लघु आकार की इस पुस्तक की महत्ता निःसन्देह लघु नहीं है।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आमुख

 

इस शिक्षाप्रद पुस्तक में जीवन के रूपान्तरकारी मूल्य समाहित हैं। ऐसा कोई भी व्यक्ति होगा जो इस पुस्तक को पढ़ कर अपनी वैयक्तिक प्रकृति में परिवर्तन तथा आचार और शील में रूपान्तरण लाना चाहे। पर्याप्त विचारपूर्ण निर्णय तथा विश्वास के आधार पर हम यह बलपूर्वक कह सकते हैं कि इस पुस्तक का परिशीलन करने वाला ऐसा कोई भी व्यक्ति होगा जो अपने संकल्प को एक ऐसी शक्ति के रूप में निर्माण करने की अपनी उत्सुकता का प्रतिरोध करने में असफल हो, जो कि उसके निजी जीवन तथा नियति में परिवर्तन लाती तथा उसे उन्नत बनाती है। यह पुस्तक ऐसे गर्भित मार्गदर्शनों से पूर्ण है जिनसे हम अपने व्यक्तित्व को अप्रतिहत प्रभावकारी तथा मोहक शक्ति में रूपान्तर कर सकते तथा जीवन को, अपने में प्रतिष्ठित दिव्य सत्य के, अपने पोषित दिव्य उल्लास के तथा अपनी सत्ता में सन्धृत दिव्य पूर्णता के महाकाव्य-प्रस्फुटन की अनेक भव्य कथाओं का रूप दे सकते हैं।

 

यह इस भाँति एक सरल, खरी तथा प्रेरणादायी पुस्तक है जो विचार-शक्ति के संवर्धन तथा परिपोषण के लिए अनेक विधियाँ प्रसारित करती है। यह ऐसी भी पुस्तक है जो हमें अनेक ऐसे उपयोगी सुझाव प्रस्तुत करती है जिनसे हम विचार तथा उसकी शक्ति के साम्राज्य से परे, मनसातीत अनुभव तथा भागवतीय चेतना के जगत् में पहुँचने में समक्ष बनते हैं।

 

सम्पूर्ण मानवता के प्रति अपने प्रेम से सहायता तथा प्रत्येक मनुष्य की सेवा के लिए अपनी अथक शक्ति के विवेक से आदेश प्राप्त कर शिवानन्द जी ने अपने को सभी प्रकार के व्यक्तियों के लिए, जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों के लिए अत्यधिक उपयोगी सिद्ध कर दिखाया तथा अपनी निजी बोधप्रद और आध्यात्मिक शैली में प्रचुर वैविध्यपूर्ण विषयों पर पुस्तकों का प्रणयन किया। समस्त भारत की आध्यात्मिक संस्कृति की भावना को अपने में समावेश कर शिवानन्द जी ने जीवन-बोधमयी पुस्तकों की शत-शत भेंटों की मानवता पर वृष्टि की। प्रस्तुत पुस्तक अपनी संस्तुति स्वयं करेगी तथा सामान्य जन एवं आध्यात्मिक व्यक्तियों के समुदाय-दोनों को ही अनेक प्रतिफल प्रदान करेगी। यह पुस्तक विशेषकर उन लोगों के लिए अत्यधिक मूल्यवान् सिद्ध होगी जो कि किसी धर्म-विशेष में विश्वास नहीं करते, जिन्होंने किसी ईश्वर के प्रेम से अपना मुँह नहीं मोड़ रखा है, जो किसी मत-मतान्तर की बातों को

 

अंगीकार नहीं करते, फिर भी अपने कार्यशील जगत् के परिसर में रहते हुए अधिकार, शुद्धता, शान्ति, समृद्धि, प्रगति, सुख तथा पूर्णता का जीवन यापन करने के लिए उत्सुक रहते हैं।

 

शिवानन्द जी ने इस पुस्तक में विचार-शक्ति के प्रगतिशील ज्ञान को असन्दिग्ध रूप से इन तीन भिन्न क्षेत्रों में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है :

 

. उच्चतर विशिष्ट मनोविज्ञान का क्षेत्र : शिवानन्द जी यहाँ विचार की उस शक्ति के रूप में चर्चा करते हैं जो मुखाकृति को गढ़ती, चरित्र को सँवारती, भाग्य को बदलती तथा जीवन को सर्वतोमुखी सफल बनाती है।

 

. पूर्ण विकसित परा-मनोविज्ञान : यह क्षेत्र इस पुस्तक में दूर-दूर तक विकीर्ण उन अनुच्छेदों तथा अध्यायों के अन्तर्गत है, जो इस तथ्य पर प्रकाश डालते हैं कि मानव-मन अनेक अधिसामान्य शक्तियों तथा कारकों का अधिष्ठान तथा केन्द्र है। शिवानन्द जी ने अपने पाठकों से उन शक्तियों के उन्मोचन के लिए तथा अपने समादेशाधिकार में रहने वाली विविध उच्चतर क्षमताओं को अपने बाह्य जीवन में प्रवर्ती करने का आग्रह करते हैं।

 

. परा-अनुभूति का क्षेत्र: शिवानन्द जी जहाँ-कहीं भी विचार-मुक्ति के लिए कोई विधि निर्धारित करते हैं अथवा उस विषय की चर्चा करते हैं, वहाँ वह हमें दिव्यानुभूति के उस साम्राज्य में ले जाने का प्रयास कर रहे होते हैं जहाँ विचार विचार रह कर असीम चेतना में विभाषित हो उठता है।

 

अस्तु, यह पुस्तक विचार के दृश्य जगत् में शिवानन्द जी को एक प्रकार से एक व्यावहारिक मानस-शास्त्री, भौतिकीयविद् तथा रसायनज्ञ और परा-मनोवैज्ञानिक तथा योगी के रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती है और इस भाँति अपने भविष्य के निर्माण में, जीवन में अपनी सफलता की उपलब्धि में तथा विचारों के दक्ष-प्रयोग तथा उनमें सँजोयी अलौकिक शक्तियों को बलात् हस्तगत करने की शक्ति के अधिगमन में उनको साहाय्य प्रदान करती है। यह पुस्तक विचार-नियमन द्वारा शिष्टता एवं संस्कृति की प्राप्ति में स्वास्थ्यकर, रचनात्मक तथा प्रेरणादायी विचार-स्पन्दनों के उन्मोचन की अपनी क्षमता के उपयोग में, किसी महान् और भव्य कार्य-निष्पादन द्वारा सुख और शान्ति की उपलब्धि में तथा इस पार्थिव जगत् के सभी मानवों की चरम परिणति-रूप भगवत्साक्षात्कार की प्राप्ति में उनकी सहायक होगी।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विश्व-प्रार्थना

 

हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव!

तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है।

तुम सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ हो।

तुम सच्चिदानन्दघन हो।

तुम सबके अन्तर्वासी हो।

 

हमें उदारता, समदर्शिता और मन का समत्व प्रदान करो।

श्रद्धा, भक्ति और प्रज्ञा से कृतार्थ करो।

हमें आध्यात्मिक अन्तःशक्ति का वर दो,

जिससे हम वासनाओं का दमन कर मनोजय को प्राप्त हों।

हम अहंकार, काम, लोभ, घृणा, क्रोध और द्वेष से रहित हों।

हमारा हृदय दिव्य गुणों से परिपूरित करो।

 

हम सब नाम-रूपों में तुम्हारा दर्शन करें।

तुम्हारी अर्चना के ही रूप में इन नाम-रूपों की सेवा करें।

सदा तुम्हारा ही स्मरण करें।

सदा तुम्हारी ही महिमा का गान करें।

तुम्हारा ही कलिकल्मषहारी नाम हमारे अधर-पुट पर हो।

सदा हम तुममें ही निवास करें।

 

-स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय. 3

आमुख.. 4

विश्व-प्रार्थना.. 6

प्रथम अध्याय. 14

विचार-शक्ति : स्वरूप और दर्शन. 14

. विचार प्रकाश की गति से भी अधिक वेगवान् है. 14

. विचार का वाहन. 14

. आकाश में विचार सुरक्षित हैं. 15

. विचार जीवित पदार्थ है. 15

. विचार : एक सूक्ष्म शक्ति.... 16

. बेतार के तार का दृष्टान्त... 16

. विचार की अद्भुत शक्ति.... 16

. विचार-तरंग और विचार-संचरण.. 17

. विचार-कम्पन के चमत्कार. 17

१०. विचार-तरंगों की विविधता.. 18

११. विचार-शक्ति का संचय. 18

१२. कोष-सिद्धान्त और विचार. 19

१३. आदि विचार और आधुनिक विज्ञान. 19

१४. रेडियम (तेजातु) और दुर्लभ योगी.. 20

१५. विचार का भार, आकार और प्रकार. 21

१६. विचार : उसका रूप, वर्ण और नाम. 21

१७. विचार : उसका बल, काम और उपयोग. 21

१८. असीम विचार-जगत्. 22

१९. विचार, विद्युत् और दर्शन. 23

२०. बाहरी संसार पहले से विचार में है. 23

२१. विश्व : विचार-सृष्टि... 24

२२. विचार, विश्व और कालातीत सत्य... 24

द्वितीय अध्याय. 26

विचार-शक्ति : सिद्धान्त और गति-शक्ति.... 26

. विचार : भाग्य-निर्माता.. 26

. विचार हमें आकार देता है. 27

. विचार का आकार और स्थूल भाव. 28

. तुम्हारे नेत्र तुम्हारे विचारों को प्रकट कर देते हैं. 29

. कुत्सित विचार विष के समान है. 29

. मानसिक तथा शारीरिक असन्तुलन. 29

. विचार की विधायक शक्तियाँ.. 30

. समान विचारों का परस्पर आकर्षण.. 30

. विचारों की संक्रामकता.. 31

१०. मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त का प्रयोग. 32

११. विचार-सिद्धान्त को समझो... 32

१२. उच्च विचारों के नियम. 34

१३. विचार : एक प्रत्यावर्ती अस्त्र... 35

१४. विचार और सागर-तरंग. 36

१५. सद्विचारों का रंग और प्रभाव. 37

१६. समुन्नत चित्त का प्रभामण्डल और गति-शक्ति.... 37

१७. विचारों और वृत्तियों की गति-शक्ति.... 38

१८. व्यापक वातावरण से विचार-शक्ति.... 39

तृतीय अध्याय. 40

विचार-शक्ति का मूल्य और उपयोग. 40

. विचार-स्पन्दन से पर-सेवा.. 40

. डाक्टर सुझाव दे कर उपचार कर सकते हैं. 41

. योगियों की विचार-संक्रमण की उपदेश-पद्धति.. 41

. विचार का औरों पर प्रभाव. 42

. विचार-शक्ति के विविध उपयोग. 42

. विचार-शक्ति का मूल्य... 43

. विचार महान् कार्य-साधक हैं. 43

. प्रेरक विचार. 44

. विचार संचारित करना सीखें.. 45

१०. परामनोविज्ञान और अवचेतन मन. 46

११. तेजस्वी दिव्य विचारों की शक्ति.... 46

चतुर्थ अध्याय. 47

विचार-शक्ति के कार्य. 47

. विचार स्वास्थ्य-संवर्धक है. 47

. विचारों से व्यक्तित्व-निर्माण.. 47

. शरीर पर विचारों का प्रभाव. 47

. विचार-शक्ति भाग्य विधाता है. 48

. मानसिक अव्यवस्था का कारण : विचार. 49

. वातावरण-निर्माता : विचार. 49

. विचार : देह का रचयिता.. 51

पंचम अध्याय. 53

विचार-शक्ति का विकास. 53

. नैतिक शुद्धि से विचार-शक्ति.... 53

. एकाग्रता से विचार-शक्ति.... 53

. व्यवस्थित चिन्तन से विचार-शक्ति.... 54

. संकल्प-शक्ति से विचार-शक्ति.... 54

. स्पष्ट चिन्तन के कुछ सुझाव. 56

. गम्भीर और मौलिक चिन्तन की साधना.. 56

. व्यावहारिक स्थिर चिन्तन के लिए ध्यान. 57

. रचनात्मक विचार-शक्ति प्राप्त करें. 57

. वैयक्तिकता का विकास करें : सुझावों का प्रतिरोध करें. 58

१०. विचार-नियमन से अलौकिक शक्तियाँ.. 58

षष्ठ अध्याय. 60

विचार : उनके प्रकार तथा उन पर विजय. 60

. धूमिल विचारों से ऊपर उठो.. 60

. फालतू विचारों पर विजय. 61

. घृणित विचारों को हटाओ... 62

. सांसारिक विचारों पर विजय पाओ... 62

. अपवित्र विचारों पर विजय. 63

. ऋणात्मक विचारों का दमन. 63

. अभ्यस्त विचारों को वश में करें. 64

. अनावश्यक विचारों का पराभव. 65

. नैसर्गिक विचारों का रूपान्तरण.. 65

१०. अभ्यागत विचारों की संख्या घटायें. 66

११. स्फूर्तिदायी विचार एकत्र करें. 66

१२. आलोकमय विचारों का मनन करो. 67

१३. गलत विचार बनाम सही विचार. 67

१४. विचार का सरगम. 68

१५. हीन विचार और नैतिक विकास. 68

सप्तम अध्याय. 70

विचार-नियमन के विधायक उपाय. 70

. एकाग्रता के अभ्यास से विचार-नियमन. 70

. सद्वृत्तियों से विचार-नियमन. 71

. असहकार से विचार-नियमन. 72

. विचारों के विरलीकरण की कला.. 73

. विचार-नियमन की नेपोलियन की पद्धति.. 74

. दुष्ट विचारों के पुनरावर्तन को रोकें.. 74

. दुष्ट विचारों से नरमी बरतें. 74

. दुष्ट विचारों को अंकुरित होते ही नष्ट कर दो.. 75

. कुविचारों के नाश के लिए आध्यात्मिक उपाय. 75

१०. कुविचारों के निग्रह का सर्वोत्तम उपाय. 77

११. विचार के दैनिक अनुशासन. 77

१२. विचार और सर्प का दृष्टान्त... 78

१३. विचार-जय से विश्व-विजय. 78

१४. विचार-शक्ति के लिए अध्यात्म-मार्ग. 79

१५. विचार-नियमन में जागृति का स्थान. 79

१६. विचारों का निरीक्षण करें, उनका अध्यात्मीकरण करें. 80

अष्टम अध्याय. 81

विचार-संस्कार के आदर्श. 81

. विचार और अन्तःसंस्कार. 81

. अस्वस्थ विचार और सजगता.. 81

. यौगिक विचार-संस्कार से आत्म-विकास. 82

. प्रतिस्थापन की पद्धति से विचार-संस्कार. 83

. विचार-संस्कार के आध्यात्मिक उपाय. 83

. विचार-संस्कार का महत्त्व... 84

. विचारों का युद्ध... 85

. सद्विचार : पहली पूर्णता.. 85

. विचारों को सुधारें और शुद्ध बनें. 85

१०. पर-दोष-दर्शन छोड़ें. 86

११. अन्तिम विचार के अनुरूप अगला जन्म... 86

१२. सात्त्विक विचार की पृष्ठभूमि.. 90

१३. शुद्ध ज्ञान और विचार-मुक्ति.... 92

नवम अध्याय. 93

विचार से विचार-संचरण.. 93

. विचार और जीवन. 93

. विचार और चारित्र्य... 93

. विचार और शब्द.. 94

. विचार और कृति.. 95

. विचार, शान्ति और शक्ति.... 95

. विचार-शक्ति और पवित्र विचार. 96

. बन्धनकारक विचार. 97

. शुद्ध विचारों से परा-अनुभूति.. 97

. विचार-मुक्ति के लिए राजयौगिक पद्धति.. 98

१०. विचार-मुक्ति के लिए वेदान्तिक प्रविधि.. 98

दशम अध्याय. 100

विचार-शक्ति का शास्त्रीय ज्ञान. 100

विचार-शक्ति और व्यावहारिक आदर्शवाद-. 100

. विचार-शक्ति और व्यावहारिक आदर्शवाद-. 102

. विचार-शक्ति और व्यावहारिक आदर्शवाद-. 107

. कुछ विचार-बीज.. 110

एकादश अध्याय. 112

विचार-शक्ति और ईश्वर-साक्षात्कार. 112

. जीवन तथा विचार पारस्परिक प्रतिक्रिया के परिणाम. 112

. आध्यात्मिक अनुभूति के रूप में विचारों का परिणाम. 112

. ईश्वर-सम्बन्धी विचार. 113

. रोग-मुक्ति के लिए ईश्वरीय विचार. 113

. ज्ञान और भक्ति से विचार-संस्कार. 114

. विचार और चित्त-समाधान का योगाभ्यास. 115

. योगाभ्यास से मित्र-लाभ. 115

. योग की निर्विचारावस्था.... 116

. उन्नत विचार-शक्ति से सम्पन्न योगी.. 116

१०. अनन्त शक्ति के लिए विचार-नौका.. 116

द्वादश अध्याय. 117

विचार-शक्ति और नयी सभ्यता.. 117

. शुद्ध विचार : विश्व पर उसका प्रभाव. 117

. विचार-शक्ति और विश्व-कल्याण.. 117

. प्रेम और पराक्रम की वृद्धि के लिए विचार-शक्ति.... 118

. आदर्श जीवन के लिए विचार-शक्ति.... 118

. सेवा और आध्यात्मिक उन्नति के लिए विचार-शक्ति.... 119

. सद्विचारों से विश्व-कल्याण.. 120

. विचार-शक्ति और नयी सभ्यता की स्थिति.. 120

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम अध्याय

विचार-शक्ति : स्वरूप और दर्शन

. विचार प्रकाश की गति से भी अधिक वेगवान् है

 

प्रकाश एक सेकेण्ड में ,८६,००० मील की गति से जाता है, किन्तु विचार की गति वस्तुतः कालातीत है।

 

'ईथर' (Ether) जो विद्युत्-प्रवाह का माध्यम है, काफी सूक्ष्म तत्त्व माना जाता है, किन्तु विचार उससे सूक्ष्मतर है। रेडियो के प्रसारण में हम देखते हैं, गायक कोलकाता में सुन्दर गायन प्रस्तुत कर रहा है और दिल्ली में आप अपने घर बैठे उस गायन को अपने रेडियो में तत्काल सुनते हैं। सारे समाचार बेतार के तार से प्राप्त होते रहते हैं।

 

इसी प्रकार आपका मन भी बेतार के तार के यन्त्र (Wireless Machine) के समान ही है। एक सन्त, जिसका चित्त शान्त, सन्तुलित, समंजस और अध्यात्म-तरंगों से युक्त है, अपने समाधान और शान्ति के विचारों को संसार में प्रसारित करता रहता है। वे विचार विद्युत् की कौंध से भी तीव्र गति से दशों दिशाओं में फैलते हैं, मनुष्यों के हृदय में प्रवेश करते हैं और उनमें भी उसी प्रकार समाधान और शान्ति के विचार उत्पन्न करते हैं। इसके विपरीत सांसारिक मनुष्य, जिसके मन में ईर्ष्या, द्वेष और प्रतीकार की भावनाएँ भरी हैं, विसंगत और दुष्ट विचारों को प्रसारित करता है और वे विचार कोटि-कोटि व्यक्तियों के मन में प्रवेश कर उन्हें आलोड़ित करते हैं और उसी प्रकार के द्वेषपूर्ण तथा विसंगत विचार उत्पन्न करते हैं।

. विचार का वाहन

 

झील या तालाब के पानी में यदि एक कंकड़ फेंकें तो उससे अनेक तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो उस केन्द्र से चारों ओर फैलती फैलती किनारे से जा टकराती हैं।

 

दीपक जलाते हैं तो उसकी ज्योति से प्रकाश की किरणें सभी दिशाओं में फैलती हुई ईथर में कम्प की तरंगें उत्पन्न करती हैं।

 

इसी प्रकार जब मनुष्य के चित्त में भले या बुरे किसी भी प्रकार के विचार उठते हैं तो वे 'मनोभूमि' को कम्पित कर तरंगें उत्पन्न करते हैं, जो दूर-दूर तक सर्वत्र फैल जाती हैं।

 

विचार एक चित्त से दूसरे चित्त तक जो प्रवास करते हैं, इसका वाहन या माध्यम क्या हो सकता है? इसका यथासम्भव समीचीन उत्तर यह है कि ईथर के समान "मनस्तत्त्व' भी समूचे आकाश में व्याप्त है और वह विचारों का वैसे ही वाहन बनता है, जैसे प्राणतत्त्व भावनाओं का वाहन है, ईथर उष्णता, प्रकाश और विद्युत् का वाहन है तथा वायु ध्वनि का वाहन है।

. आकाश में विचार सुरक्षित हैं

आप विचार-शक्ति के बल पर संसार को हिला सकते हैं। विचार में महाबल है। एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में वह संचारित किया जा सकता है। प्राचीन युग के महर्षियों और महायोगियों के शक्तिशाली विचार अब भी आकाश में सुरक्षित हैं।

जिन योगियों को अगोचर वस्तुओं को देख सकने की आन्तरिक शक्ति सिद्ध हुई है वे उन विचारों के प्रतिबिम्ब को देख सकते हैं तथा उन्हें पढ़ सकते हैं।

 

आपके चारों ओर विचारों का सागर भरा हुआ है। आप विचार-सागर में तैर रहे हैं। आप उनमें से कुछ विचार तो ग्रहण कर रहे हैं और कुछ विचार संसार में प्रत्यावर्तित कर रहे हैं।

 

प्रत्येक का अपना-अपना विचार जगत् है।

. विचार जीवित पदार्थ है

 

विचार जीवित पदार्थ है। कोई भी विचार उतना ही ठोस है, जितना एक पत्थर है। हम समाप्त हो सकते हैं, पर हमारे विचार कभी नहीं मिट सकते।

 

विचार के प्रत्येक परिवर्तन के साथ उसके तत्त्व में (मनस्तत्त्व में) कम्पन पैदा होता है। चूँकि विचार एक शक्ति है, उसे कार्य करने में एक विशेष प्रकार का सूक्ष्म पदार्थ आवश्यक होता है।

 

विचार जितना ही बलवान् होता है उतना ही शीघ्र वह फलित होता है। विचार को अमुक निश्चित दिशा में केन्द्रित करते हैं तो जिस अनुपात में हम केन्द्रित करते हैं उसी अनुपात में वह लक्ष्य सिद्ध करने में सफल होता है।

. विचार : एक सूक्ष्म शक्ति

 

विचार एक सूक्ष्म शक्ति है। हममें हमारे आहार के साथ यह उत्पन्न होता है। छान्दोग्योपनिषद् में उद्दालक और श्वेतकेतु के संवाद में इस विषय का अच्छा प्रतिपादन किया गया है।

 

यदि आहार शुद्ध और पवित्र है, तो विचार भी शुद्ध और पवित्र होते हैं। जिसके विचार शुद्ध हों उसकी वाणी तेजस्वी होती है और श्रोताओं पर गहरा प्रभाव डालती है। वह अपने शुद्ध विचारों से सहस्रों मनुष्यों को प्रभावित कर सकता है।

 

शुद्ध विचार तलवार की धार से भी तीक्ष्ण होता है। सर्वदा शुद्ध विचार ही करना चाहिए। विचार-संस्कृति एक पवित्र विज्ञान है, पूर्ण शास्त्र है।

. बेतार के तार का दृष्टान्त

 

जिन व्यक्तियों में द्वेष, ईर्ष्या, प्रतीकार, प्रतिहिंसा आदि के दुष्ट विचार भरे हैं, वे निश्चय ही महाभयानक हैं। वे औरों की अशान्ति और दुर्बलता के मूल कारण हैं। उनके वे दुष्ट विचार बेतार के तार के समान हैं, रेडियो-प्रसारण के समान हैं। विचार 'ईथर' में प्रसारित होते रहते हैं और जिन-जिन लोगों के चित्त में तदनुकूल कम्पन होता रहता है, वे उन्हें ग्रहण करते हैं।

 

विचार की गति अत्यन्त प्रबल है। उदात्त और सद्विचार महान् उपकार के कारण हैं। जिनमें वैसे विचार हैं, उनका सद्-प्रभाव उनके निकटस्थ तथा दूरस्थ मनुष्यों पर अवश्य पड़ता है।

. विचार की अद्भुत शक्ति

 

विचार में अद्भुत शक्ति भरी है। विचार-शक्ति से रोग दूर हो सकते हैं। विचार मनुष्यों की मनोवृत्ति बदल सकता है। विचार से सब-कुछ सम्भव है। वह चमत्कार कर सकता है। उसका वेग अचिन्त्य है।

 

विचार तेजस्वी होता है। मानसिक या सूक्ष्म प्राणतत्त्व के कारण जब मनस्तत्त्व में कम्पन निर्माण होता है, तब विचार उत्पन्न होते हैं। यह आकर्षण-शक्ति, संश्लेषण-शक्ति अथवा अपकर्षण शक्ति की तरह एक शक्ति है। विचार में गति है।

. विचार-तरंग और विचार-संचरण

 

आखिर यह जगत् क्या है? यह हिरण्यगर्भ या ईश्वर के विचारों के मूर्त रूप के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है।

 

वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि उष्णता, प्रकाश, विद्युत् आदि की तरंगें हुआ करती हैं। योगशास्त्र कहता है कि विचार की भी तरंगें होती हैं। विचार की शक्ति अद्भुत है। प्रत्येक व्यक्ति को जाने-अनजाने न्यूनाधिक परिमाण में विचार-शक्ति का अनुभव होता ही है।

 

ज्ञानदेव, भर्तृहरि, पतंजलि आदि महान् योगी जन विचार-संचरण आदि चित्त-शक्ति (मानसिक रेडियो) द्वारा दूसरों को और दूर-दूर के लोगों तक को अपनी बात पहुँचाते थे और उनकी बात ग्रहण करते थे। यह जो विचार-संचरण की चित्त-शक्ति है, जिसे 'टेलीपैथी' (Telepathy) कहते हैं, यही जगत् में बेतार के तार और टेलीफोन (दूरभाष) का प्रथम आविष्कार है।

 

जिस प्रकार हम शारीरिक स्वास्थ्य-रक्षा के लिए व्यायाम करते हैं, टेनिस, क्रिकेट आदि खेलते हैं, उसी प्रकार मानसिक स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए सद्विचार की तरंगें विकीर्ण करनी चाहिए, सात्त्विक आहार ग्रहण करना चाहिए, निर्दोष और हितकारी मनोरंजन के साधनों से मन को प्रसन्न रखना चाहिए, सुन्दर उच्च और निरापद विचारों द्वारा भाव-परिवर्तन करते हुए मन को विश्राम भी देना चाहिए और सर्वदा प्रसन्न रहने का अभ्यास करना चाहिए।

. विचार-कम्पन के चमत्कार

 

हमारे चित्त से जितने भी विचार निर्मित होते हैं, उनका अपना एक कम्पन होता है, जो नित्य है, कभी मिटता नहीं। वह संसार की प्रत्येक वस्तु के कण-कण को कम्पित करता आया है और हमारे विचार यदि उन्नत है, पवित्र हैं, प्रभावशाली हैं तो प्रत्येक संवेदनशील चित्त में कम्पन उत्पन्न करेंगे।

 

हमारे विचारों के अनुकूल जिन-जिन के विचार हैं, वे अनजाने ही हमारे उन विचारों को ग्रहण करते हैं, जिन्हें हमने प्रसारित किया है और वे भी अपनी ओर से यथाशक्ति वैसे ही विचार प्रेषित करते हैं। फल-स्वरूप, हम अपनी क्रिया के परिणामों को जाने बिना ही बहुत बड़े विचार-चक्र को चालना देते हैं और वे सब विचार मिल कर उन निकृष्ट और निम्न स्तर के विचारों को पराभूत करते हैं जिन्हें स्वार्थी तथा दुर्जन व्यक्ति उत्पन्न करते रहते हैं।

१०. विचार-तरंगों की विविधता

 

प्रत्येक मनुष्य का अपना-अपना मनोजगत् होता है, उसकी अपनी विचार-सरणी होती है, वस्तुओं को समझने का अपना ढंग होता है और काम करने की अपनी पद्धति होती है।

 

जिस प्रकार मुखाकृति एवं स्वर प्रत्येक व्यक्ति का दूसरे से भिन्न होता है, उसी प्रकार समझने की और सोचने की पद्धति भी प्रत्येक की भिन्न होती है। अतः मित्रों में अनायास ही मतभेद और भ्रान्ति हो जाया करती है।

 

एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के दृष्टिकोण को ठीक से समझ नहीं पाता। अतः घनिष्ठ मित्रों में भी क्षण-भर में तनाव, संघर्ष और अनबन हो जाती है। मित्रता अधिक समय तक टिक नहीं पाती।

 

प्रत्येक को दूसरों के मानसिक कम्पन अथवा विचार-कम्पन के साथ एकत्व भाव हो जाने का प्रयत्न करना चाहिए। तभी एक-दूसरे को सरलता से समझा जा सकेगा।

 

वासनामय विचार, द्वेषपूर्ण विचार, ईर्ष्या और स्वार्थपूर्ण विचार चित्त में विकार निर्माण करते हैं, ज्ञान पर आवरण डाल देते हैं, बुद्धि को भ्रष्ट कर देते हैं, स्मृति-नाश करते और मन में उलझन बढ़ा देते हैं।

११. विचार-शक्ति का संचय

 

भौतिक विज्ञान में एक शब्द है, 'अनुस्थापन-शक्ति' (Power of Orientation) पदार्थ में यद्यपि 'ऊर्जा (Energy) पड़ी हुई है, फिर भी वह स्वयं प्रवाहित नहीं होती। उसे चुम्बक से जोड़ना पड़ता है, तब वह विद्युत् के रूप में उस 'अनुस्थापन-शक्ति' के गुण के द्वारा प्रवाहित होने लगती है।

 

इसी प्रकार मानसिक शक्तियाँ आज जो कलुषित हो रही हैं और विविध निरर्थक वैषयिक विचारों में जिनका अपव्यय हो रहा है, उन्हें सही आध्यात्मिक मार्ग में काम में लाया जा सकता है।

 

आप अपने मस्तिष्क में व्यर्थ की जानकारी भरे रखें। मन को यथासम्भव शून्य बनाना सीखें। आपके लिए जिस-जिस ज्ञान का उपयोग हो, वह सब भूल जायें। तभी आप अपने मन को दिव्य विचारों से भर सकेंगे। अब जैसे विकृत विचारों की तरंगें आपके मस्तिष्क में संचित हैं, उनके बदले तब आप नयी चित्त-शक्तियाँ अर्जन करेंगे।

१२. कोष-सिद्धान्त और विचार

 

शरीर के प्रत्येक कोष (Cell) की एक न्यष्टि (Nucleus) होती है और उसके चारों ओर प्ररस (Protoplasm) समूह होता है। इन सबका मिल कर एक कोष बनता है। उसमें चेतना होती है। कुछ कोष उदासर्जन (Secrete) करने वाले होते हैं और कुछ उत्सर्जन (Excrete) का काम करते हैं। वृषण के कोष रेतस् का उदासर्जन तथा वृक्क के कोष मूत्र का उत्सर्जन करते हैं। कुछ कोषों का काम सिपाही का होता है। वे शरीर में विजातीय विष-द्रव्यों और कीटाणुओं को प्रवेश करने से रोकते हैं। वे उन्हें पचा देते हैं और बाहर निकाल फेंकते हैं। कुछ कोष होते हैं जो शरीर के अंग-प्रत्यंग तक उनका आहार पहुँचाते हैं।

 

आप उनकी ओर ध्यान दें अथवा दें, ये कोष अपना काम बराबर करते रहते हैं; परन्तु उनकी क्रियाओं पर संवेदनशील नाड़ी-संस्थान का नियन्त्रण रहता है। मस्तिष्क में स्थित मन के साथ उनका सीधा सम्बन्ध रहता है।

 

मन का प्रत्येक उद्वेग, प्रत्येक विचार उन कोषों को स्पर्श करता है। मन की बदलती हुई अवस्थाओं से वे कोष विशेष प्रभावित होते हैं। मन में कभी कोई उलझन पैदा हो जाये, निराश छा जाये या ऐसी ही कोई अवांछित संवेदना निर्मित हो जाये, तो शरीर के प्रत्येक कोष तक उसकी अनुभूति तार की भाँति तत्क्षण ही नाड़ियों के द्वारा पहुँचा दी जाती है। जो सैनिक-कोष हैं, उन्हें तत्काल धक्का लगता है। वे दुर्बल हो जाते हैं। वे अपना काम ठीक से नहीं कर पाते। वे अक्षम बन जाते हैं।

 

कुछ लोगों को सदा अपने शरीर की ही चिन्ता लगी रहती है; उन्हें आत्मा का रंचमात्र विचार नहीं आता। उनका जीवन अस्त-व्यस्त रहता है। कोई नियम नहीं, अनुशासन नहीं। भोजन में संयम नहीं रह पाता। पेट में मिठाई दूँसते रहते हैं, चटोरी चीजें अनाप-शनाप भरते रहते हैं। उनके पेट तथा जीर्ण अंगों को किंचित् विश्रान्ति नहीं मिलती। शरीर सदा रोगग्रस्त एवं दुर्बल रहता है। उनके शरीर के अणु, परमाणु और कोष, विसंगत और असामंजस्य कम्पन पैदा करते रहते हैं। ऐसे लोगों में श्रद्धा, विश्वास, आशा, शान्ति और प्रसन्नता का नितान्त अभाव होता है। वे सदा उद्विग्न रहते हैं। उनकी प्राण-शक्ति ठीक से कार्य नहीं करती। उनकी चैतन्य-शक्ति अत्यन्त क्षीण हो जाती है। उनके मन में भय, निराशा, उद्विग्नता और परेशानी भरी रहती है।

१३. आदि विचार और आधुनिक विज्ञान

 

इस भूतल पर विचार-शक्ति एक महान् शक्ति है। योगी के शस्त्र-सम्भार में विचार एक सर्वाधिक शक्तिशाली शस्त्र है। विधायक विचार ऊँचा उठाते हैं, स्फूर्ति देते हैं और निर्माण करते हैं।

 

हमारे पूर्वजों ने इस शक्ति की अत्यन्त दूरगामी सम्भावनाओं को समुचित रीति से समझा था, उनका विकास किया था और उनका यथासम्भव उत्कृष्ट उपयोग भी किया था।

 

समस्त सृष्टि का मूलाधार आदि-शक्ति विचार ही है। विश्व-चित्त में जो एक विचार स्फुरित हुआ, उसी से इस सकल दृश्य जगत् का निर्माण हुआ है।

 

आदि विचार का आविर्भाव ही यह विश्व है। इस आदि विचार के आविर्भाव के कारण ईश्वरीय संकल्प की स्तब्धता स्पन्दित हो उठी। विश्वात्मा हिरण्यगर्भ में जो इच्छा पैदा हुई, जो स्पन्दन का मूल आधार है उसका यह शास्त्रीय निर्वचन है।

 

यह स्पन्दन कोई भौतिक कणों के झूले की तरह आगे-पीछे तीव्र गतिशील नहीं है, परन्तु यह इतना सूक्ष्म है कि साधारण मन से उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

 

परन्तु इससे यह बात स्पष्ट हुई कि कोई भी शक्ति स्पन्दन में परिणत हो सकती है। आधुनिक विज्ञान भी भौतिक जगत् में सुदीर्घ अनुसन्धानों के बाद अब पुनः इसी निष्कर्ष पर पहुँचा है।

१४. रेडियम (तेजातु) और दुर्लभ योगी

 

रेडियम एक दुर्लभ वस्तु है। विचार-शक्ति को पूर्णतः नियन्त्रित करने वाले योगी भी इस संसार में रेडियम की ही तरह दुर्लभ हैं।

 

जिस योगी ने अपने विचारों पर काबू पा लिया है और निरन्तर ब्रह्म में अवस्थित है, उससे दिव्य गन्ध और दिव्य तेज (ब्रह्म-तेज) उसी प्रकार निःसृत होता रहेगा जिस प्रकार अगरबत्ती से निरन्तर मधुर सुगन्धि निकलती रहती है।

 

उसका जो तेज और सुगन्ध है, वह ब्रह्मवर्चस् कहलाता है। ज्यों-ही आप गुलाब, मोगरा और चम्पा के फूलों का गुलदस्ता उठा लेते हैं तो तुरन्त चारों ओर उसकी सुगन्ध फैल जाती है और सभी को मुग्ध कर लेती है।

 

उसी प्रकार विचार को वश में कर चुके योगी का यश और उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैले बिना नहीं रहती। वह एक विश्व-शक्ति बन जाता है।

१५. विचार का भार, आकार और प्रकार

 

प्रत्येक विचार का अपना एक भार होता है, आकार होता है, स्वरूप, प्रकार, वर्ण, गुण और शक्ति होती है। योगी अपने योग की अन्तर्दृष्टि से यह सब प्रत्यक्ष देख सकता है।

 

विचार भी पदार्थ की तरह है। जिस प्रकार आप एक सन्तरा उठा कर अपने मित्र को दे सकते हैं और उससे ले सकते हैं, उसी प्रकार उपयोगी और बलशाली विचार भी आप दूसरों को दे सकते हैं और लौटा सकते हैं।

 

विचार एक बड़ी शक्ति है। वह चलता है, वह निर्माण करता है। विचार-शक्ति के द्वारा अद्भुत कार्य हो सकते हैं। इसके लिए उसे हस्तगत करने की और ठीक से उपयोग करने की सही पद्धति जान लेना आवश्यक है।

१६. विचार : उसका रूप, वर्ण और नाम

 

मान लीजिए आपका मन पूर्णतया शान्त है, विचारों से सर्वथा मुक्त है; लेकिन ज्यों-ही विचार आने लगे, तत्काल वह कोई--कोई नाम और रूप धारण कर लेता है।

 

प्रत्येक विचार का एक--एक नाम और कुछ--कुछ रूप होता ही है। इस प्रकार आप देखते हैं कि मनुष्य में जो भी विचार आता है या सकता है, वह किसी--किसी शब्द के साथ अवश्य जुड़ा होता है, मानो वह उसका अंग ही है।

 

शक्ति का एक ही आविर्भाव है, जिसे हम विचार कहते हैं; उसी की स्थूल अवस्था को आकार और सूक्ष्म अवस्था को नाम कहा जाता है।

 

परन्तु ये तीनों एक ही हैं। जहाँ एक होगा, वहाँ अन्य दो होंगे ही। जहाँ नाम है, वहाँ आकार भी है, विचार भी है।

 

आध्यात्मिक विचार का वर्ण पीला है। क्रोध तथा द्वेषयुक्त विचार का वर्ण गहरा काला है। स्वार्थी विचार का वर्ण मटमैला होता है।

१७. विचार : उसका बल, काम और उपयोग

विचार एक तेजस्वी, प्राणवान् गतिशील शक्ति है, विश्व-भर में अत्यधिक तेजस्वी, सूक्ष्म और अप्रतिहत बल यही एक है।

विचार को कार्यान्वित करने से विधायक शक्ति निर्माण होती है। विचार एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संचरित होता है, मनुष्यों को प्रभावित करता है। जरा भी विचार-शक्ति प्राप्त होने पर दुर्बल विचार वाले सहस्रों लोगों को निश्चित रूप से प्रभावित किया जा सकता है।

विचार-संस्कृति, विचार-शक्ति, विचार-प्रेरणा आदि विषयों से सम्बन्धित साहित्य आजकल बहुत है। उनको पढ़ने से विचार-सम्बन्धी सम्पूर्ण जानकारी, उसकी शक्ति, काम और उपयोग आदि का समग्र परिचय प्राप्त हो सकता है।

१८. असीम विचार-जगत्

 

एकमात्र विचार ही समस्त विश्व है। महादुःख, वार्धक्य, मृत्यु, महापाप, भूतल, आकाश, जल, वायु, अग्नि सब वही है। विचार मनुष्य को बाँधता है। जिस मनुष्य ने विचारों को वश में कर लिया है, वह इस धरती पर साक्षात् भगवान् है।

 

हम विचार के संसार में जीते हैं। विचार पहले उत्पन्न होता है। उसके बाद वागिन्द्रिय के द्वारा उस विचार का प्रकटीकरण होता है। विचार और वाणी का घनिष्ठ सम्बन्ध है। क्रोध, कटुता और घृणा से युक्त विचार औरों को दुःख देते हैं। इन सब विचारों का आश्रय-रूप मन यदि नष्ट हो जाता है तो फिर बाह्य विषय भी नष्ट हो जाते हैं।

 

विचार भी पदार्थ है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, पंचकोश, जागृति और सुषुप्ति-ये सब मन की कृतियाँ हैं। संकल्प, भावना, क्रोध, बन्धन, काल-ये भी मन के ही परिणाम हैं। मन सभी इन्द्रियों का राजा है और मन की सभी प्रवृत्तियों का मूल है विचार।

 

हम अपने चारों ओर जो विचार-समूह देखते हैं, वह मन का ही स्थूल रूप है। विचार ही बनाता है, विचार ही बिगाड़ता है। कडुवाहट और मिठास वस्तुगत नहीं हैं, वे तो मनोगत हैं, व्यक्तिगत हैं, विचार में हैं। ये विचार से निष्पन्न हैं।

 

विषयों पर मन या विचार का जो खेल चलता है, उसी से दूर की वस्तुएँ समीप हो जाती हैं, समीप की वस्तुएँ दूर हो जाती हैं। इस संसार की सभी वस्तुएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई नहीं हैं। वे तो हमारे विचारों से, मन की कल्पनाओं से जोड़ी जाती है, मिलायी जाती हैं। मन ही है जो प्रत्येक विषय को रूप, रंग और गुण देता है। मन जिस किसी वस्तु का एकाग्र चिन्तन करने लगता है, स्वयं तद्रूप बन जाता है।

 

शत्रु-मित्र, गुण-दोष सब मन में ही हैं। प्रत्येक मनुष्य भले-बुरे का, सुख-दुःख का अपनी-अपनी कल्पना से अलग-अलग संसार ही बसा लेता है। भला और बुरा, सुख और दुःख उन वस्तुओं में नहीं है। संसार में कुछ भी अच्छा है, सुखमय है-हमारी कल्पना ही उसे अच्छा-बुरा, सुखमय अथवा दुःखमय बनाती है।

१९. विचार, विद्युत् और दर्शन

 

विचारों में अति अद्भुत शक्ति है। बिजली से भी बड़ी शक्ति उनमें है। वे हमारे जीवन को नियन्त्रित करते हैं, हमारा चारित्र्य गढ़ते हैं तथा हमारा भाग्य-निर्णय करते हैं।

 

आप देखें, क्षण मात्र में एक विचार किस प्रकार सहस्रों रूप ले लेता है। मान लीजिए, आपने अपने मित्रों को चाय-पार्टी देने का विचार किया। केवल एक 'चाय' का विचार आते ही उसके साथ फौरन चीनी, दूध, केक, बिस्कुट, प्याला, मेज, कुरसी, मेजपोश नेपकिन, चम्मच आदि-आदि अनेकानेक वस्तुओं का विचार उठने लगता है। इसलिए यह संसार विचारों के विस्तार के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। मन के विचारों का विषयों के प्रति विस्तृत होते जाने का नाम ही बन्धन है और उनका सिमटना, उनका त्याग ही मुक्ति कहलाता है।

 

हमें सतर्क रहना चाहिए और विचारों को, खिलने से पहले, कली की अवस्था में ही तोड़ फेंकना चाहिए। तभी हम सुखी रह सकेंगे। मन मायावी है। कई खेल खेलता है। उसका स्वभाव, उसका कार्य और उसके ढंग को हमें समझ लेना चाहिए। तब उस पर अधिकार पाना सरल होगा।

 

भारत के व्यावहारिक दार्शनिक आदर्शवाद का असाधारण और सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थ 'योगवासिष्ठ' है। इस कृति का सार है: "अद्वितीय ब्रहा या एक अमर आत्मा का ही अस्तित्व है। यह संसार कुछ नहीं है। आत्मज्ञान ही मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से छुड़ा सकता है। विचारों की समाप्ति और वासनाओं का नाश ही मोक्ष है। मन का फैलाव ही संकल्प है। यह संकल्प या विचार ही भेदभाव पैदा करने की अपनी शक्ति से इस विश्व की रचना करता है। यह संसार मन का ही खेल है। तीनों कालों में इस संसार का अस्तित्व नहीं है। संकल्पों का नाश ही मोक्ष है। इस छोटे-से 'मैं' को मिटा दो; वासना, संकल्प, विचार को समाप्त कर दो; आत्मा का ध्यान करो और जीवन्मुक्त बनो।"

२०. बाहरी संसार पहले से विचार में है

 

प्रत्येक विचार का अपना एक चित्र है। मेल का अर्थ है-एक मानसिक कल्पना और कुछ बाह्य पदार्थ का मेल।

 

बाहरी संसार में हम जो भी देखते हैं, उसका एक अंग अन्दर मन में है। आँख की पुतली इतनी छोटी-सी वस्तु है, आँख का गोला भी बहुत छोटा है, तो यह कैसे सम्भव है कि इतनी छोटी-सी वस्तु से पर्वत जितना बड़ा पदार्थ ग्रहण हो जाता है और मन में बस जाता है? यह तो आश्चर्यों का आश्चर्य है।

 

पर्वत का चित्र मन में पहले से ही था। मन तो कपड़े के एक बड़े परदे के समान है, जिस पर बाहर दिखने वाले हर पदार्थ का चित्र अंकित हो जाता है।

२१. विश्व : विचार-सृष्टि

 

ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि यह समूचा संसार वस्तुतः मानव-मन की ही कृति है, 'मनोमान्त्रं जगत्' मन को शुद्ध करना और नियमित करना ही सभी योगों का प्रमुख हेतु है। मन एक रिकार्ड के सिवा कुछ नहीं, जो प्रत्येक संसार को अपने में अंकित कर लेता है और भावनाओं तथा विचारों के रूप में निरन्तर प्रकट करता रहता है। विचार हमें क्रिया के लिए प्रेरित करता है। क्रिया मन पर नये और ताजे संस्कार डालती है।

 

योग इस विष-चक्र को प्रारम्भ में की काट देता है। मन की क्रियाओं को अपने ढंग से एकदम रोक देता है। योग मन के मूल कार्य को अर्थात् विचारों को रोकता है, नियन्त्रित करता है और समाप्त कर देता है। ज्यों-ही विचार उन्नत हो जाता है, त्यों-ही प्रज्ञा जाग उठती है और आत्मज्ञान का उदय होने लगता है।

 

विश्व को पल-भर में बनाने या बिगाड़ने की क्षमता विचार में है। मन अपने संकल्प या विचार के अनुरूप सृष्टि रच लेता है। मन ही इस जगत् का स्रष्टा है-"मनोमात्रं जगत्; मनः कल्पितं जगत्।" मन का यह खेल है कि कल्प-काल को क्षण में बदल दे या क्षण को कल्प बना दे। जिस प्रकार स्वप्न अपने में दूसरा स्वप्न पैदा करता है, उसी प्रकार यह मन स्वयं अदृश्य हो कर भी दृश्य जगत् का निर्माण करता है।

२२. विचार, विश्व और कालातीत सत्य

इस संसार-वृक्ष का मूल कारण मन ही है। इसकी अनन्त प्रशाखाएँ हैं, असंख्य फल और पत्र हैं। यदि हम विचार को मिटा सकें तो तुरन्त इस संसार-वृक्ष को मिटा सकते हैं। विचारों को उनके उत्पन्न होते ही समाप्त कर देना चाहिए। विचारों को समाप्त कर देने से मूल नष्ट हो जायेगा। फलतः संसार-वृक्ष भी शीघ्र नष्ट हो जायेगा।

 

इसके लिए विशेष धैर्य और सहिष्णुता की आवश्यकता है। जब सभी विचार समाप्त कर दिये जायेंगे, तब आप आनन्द-सागर में निमग्न हो जायेंगे। उस स्थिति का वर्णन नहीं हो सकता। वह प्रत्येक व्यक्ति को अपने में ही अनुभव करने की वस्तु है।

 

लकड़ी के जल चुकने पर जिस प्रकार अग्नि अपने मूल रूप में लीन हो जाती है, उसी प्रकार जब संकल्प और विचार समाप्त हो जाते हैं, तब मन अपने मूल रूप आत्मा में लीन हो जाता है। उस समय मनुष्य कैवल्य प्राप्त करता है, कालातीत सत्य का अनुभव करता है, परम स्वातन्त्र्य की स्थिति में पहुँच जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

द्वितीय अध्याय

विचार-शक्ति : सिद्धान्त और गति-शक्ति

. विचार : भाग्य-निर्माता

 

यदि मन निरन्तर किसी एक ही विचारसरणी पर स्थिर रहता है, तो उसकी एक प्रसीता बन जाती है जिस पर विचार स्वतः दौड़ने लगता है। यह जो विचार का स्वभाव बन जाता है, मरणोपरान्त भी बना रहता है तथा 'अहंकार' से सम्बन्धित होने के कारण विचार-क्षमता और विचार प्रवृत्ति के रूप में पश्चाद्वर्ती ऐहिक जीवन में अग्रनीत होता रहता है।

 

स्मरण रहे, प्रत्येक विचार के साथ उसका अपना एक मानस-चित्र होता है। किसी भौतिक जीवन-विशेष में ऐसे जितने भी मानस-चित्र बनते हैं, उनके कुल सार का व्यक्ति के मानसिक क्षेत्र में लेखा-जोखा निकाला जाता रहता है। वही उसके दूसरे भौतिक जीवन की भूमिका तैयार करता है।

 

प्रत्येक नये जन्म के साथ जिस प्रकार नये शरीर की रचना होती है, उसी प्रकार प्रत्येक नये जन्म में नया मन और नयी बुद्धि भी बनती है।

 

विचार और भाग्य की सारी प्रक्रियाओं का क्रमिक रूप से वर्णन करना सरल नहीं है। प्रत्येक क्रम द्विविध परिणाम उत्पन्न करता है- एक व्यक्ति के चित्त पर और दूसरा विश्व पर। मनुष्य अपने कर्मों द्वारा दूसरों पर जो प्रभाव डालता है, उसी से वह अपने भावी जीवन का वातावरण तैयार करता है।

 

प्रत्येक कर्म का अपना एक पूर्व-भाव होता है यहाँ से कर्म उत्पन्न होता है और उसका अपना एक भविष्य होता है जो उस (कर्म) से उदय होता है। प्रत्येक क्रिया के पीछे एक इच्छा रहती है जिससे वह क्रिया प्रेरित होती है और एक विचार रहता है जिससे वह साकार होती है।

 

प्रत्येक विचार कार्य-कारण-भाव की अनन्त श्रृंखला की एक कड़ी होता है, प्रत्येक कार्य दूसरे कार्य का कारण बनता है और प्रत्येक कारण दूसरे कारण का कार्य बनता है। इस अखण्ड श्रृंखला की प्रत्येक कड़ी तीन अवयवों-इच्छा, विचार और क्रिया की संघटक है। इच्छा विचार को उद्दीप्त करती है। विचार क्रिया का रूप धारण करता है। क्रिया भाग्य का ताना-बाना बुनती है।

 

कोई मनुष्य यद्यपि इस जीवन में प्रत्यक्ष रूप से कभी भी ठगी नहीं करता; किन्तु मन-ही-मन दूसरे की वस्तु का स्वार्थपूर्ण लोभ करता है, तो वही आगामी जन्म में उसके चोर बनने का कारण होता है। बैठे-बैठे किसी से द्वेष तथा प्रतीकार की भावना रखें, तो वही आगे चल कर हत्यारा बनने में बीज का कार्य करती है।

 

इसके विपरीत निःस्वार्थ प्रेम का चिन्तन करने पर बड़ा दानी और सन्त बनता है। प्रत्येक करुणापूर्ण विचार कोमल और दयालु प्रकृति के निर्माण में सहायक होता है जिससे मनुष्य प्राणिमात्र का मित्र बनता है।

 

महर्षि वसिष्ठ राम से पुरुषार्थ करने को कहते हैं। वह कहते हैं "भाग्य पर निर्भर मत रहो। उससे अकर्मण्यता और आलस्य की वृद्धि होती है। विचार की महान् शक्ति पर ध्यान दो। पुरुषार्थ करो। सम्यक् विचार द्वारा अपने लिए सद्भाग्य का निर्माण करो।"

 

प्रारब्ध पूर्व-जन्म का पुरुषार्थ ही तो है। हम क्रिया का बीज बोते हैं और उसके फल-स्वरूप स्वभाव बनता है; फिर स्वभाव के बीज से चारित्र्य फलता है। हम चारित्र्य-रूपी बीज बो कर भाग्य-रूपी फल प्राप्त करते हैं।

 

मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। हम अपनी विचार-शक्ति के द्वारा अपना भाग्य निर्माण करते हैं। भाग्य को हम चाहें तो मिटा सकते हैं। सभी क्षमताएँ, सारी शक्तियाँ और सारे सामर्थ्य हमारे अन्दर पड़े हैं। उन्हें प्रकट करें तो महान् बन जायें, मुक्त हो जायें।

. विचार हमें आकार देता है

 

हमारी मुखाकृति ग्रामोफोन के रिकार्ड की तरह है। अन्दर हम जो कुछ भी विचार करते हैं, वह तत्काल उस पर प्रतिबिम्बित हो जाता है।

 

प्रत्येक असद् विचार एक सूई या छेनी की तरह हमारी मुखाकृति पर हमारे विचारों को अंकित कर देता है। मन में ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, वासना, प्रतिहिंसा आदि दुर्भावनाओं के कारण ही हमारे मुख पर व्रण आदि के चिह्न होते हैं।

 

मुख पर के चिह्नों को देखते ही पहचान सकते हैं कि आपकी मनःस्थिति क्या है। तुरन्त आपके मनोरोग का निदान कर सकते हैं।

 

जो सोचता है कि अपने मन के भावों को वह छिपा सकता है, यह उसका केवल भ्रम है। उसकी स्थिति बिलकुल उस शुतुरमुर्ग (ostrich) की तरह है, जो शिकारी जब पीछा करता है, तब वह रेत में अपना शिर छिपा लेता है और सोचता है कि अब मुझे कोई नहीं देख रहा है।

मुख मन का दर्पण है। चेहरा मन का साँचा है। प्रत्येक विचार मुख पर अपनी छाप छोड़ जाता है। दिव्य विचार मुख को उज्ज्वल बनाता है। दुष्ट विचार मुख पर कालिमा पोत देता है। निरन्तर दिव्य विचार करते रहने से मुख की कान्ति एवं तेज निखरता जाता है।

 

निरन्तर असद् विचार करते रहने से मुख पर कुत्सित चिह्न गहरे होते जाते हैं जैसे कुएँ से पानी खींचते समय यदि घड़ा कुएँ के किनारे से बराबर टकराता रहे, तो वह (किनारा) दिन-प्रति-दिन दबता ही जाता है। मुख के भाव निश्चित ही अन्तःस्थिति का, मनोगत भावों का प्रत्यक्ष विज्ञापन करने वाले होते हैं।

 

मुख उस विज्ञापन-पट्ट के समान है जिस पर मन के भीतर की सारी बातों का विज्ञापन हो जाता है। हमारे विचार, विकार, वासना, उद्वेग आदि के उस (मुख) पर स्पष्ट चिह्न अंकित होते रहते हैं।

 

हम अपने मनोभावों को कदाचित् ही अपने मुख पर छिपा पाते हैं। भले ही हम मान लें कि हमने अपने विचारों को गुप्त रख लिया है, लेकिन यह हमारी भूल है। कामना, वासना, लोभ, मत्सर, क्रोध, द्वेष आदि सभी वृत्तियाँ हमारे मुख पर तत्काल गहरा प्रभाव डालती हैं।

 

मुखाकृति एक निष्ठावान् अभिलेखक तथा संवेदनशील पंजीयक यन्त्रकलाप है जो हमारे मनोजात सभी विचारों को पंजीकृत तथा लेखबद्ध करती है।

 

मुखाकृति परिमार्जित दर्पण है जिसमें हर समय मन की वृत्तियों और आशयों का प्रतिबिम्ब स्पष्ट झलकता है।

. विचार का आकार और स्थूल भाव

 

मन स्थूल शरीर का सूक्ष्म रूप है। यह स्थूल शरीर विचारों की बाह्य अभिव्यक्ति है; अतः जब मन कलुषित होता है, तब शरीर भी कलुषित हो जाता है।

 

जिस व्यक्ति की आकृति क्रूर दिखायी देती हो, वह सामान्यतया दूसरों के प्रति प्रेम एवं करुणा जाग्रत नहीं कर सकता। उसी प्रकार जिसका मन कठोर होगा, वह