माण्डूक्योपनिषद् सार

(श्री महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

श्री महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति

केन्द्र, दुर्ग (. प्र.)

 

 

 

 

 

 

 

श्री महषि मुक्तानुभति प्रकाशन ()                                                                                                मूल्य- पांच रुपये

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

संकलनकर्त्ता-

गिरधारीलाल श्रीवास्तव

 

स्टेनोग्राफर

सैन्चुरी सीमेंट नेवरा

जिला- रायपुर (.प्र.)

 

 

 

 

 

 

 

 

- प्रकाशक

श्री महर्षि मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति केन्द्र, दुर्ग (. प्र.)

 

 

 

 

 

 

(सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन)

 

 

 

 

प्रथम संस्करण १००० प्रति                                                                                                चैत्र रामनवमी सन् १९७७ ई०

 

मुद्रक-

 

ऋतुराज प्रेस, इन्दिरा मार्केट, दुर्ग (. प्र.)

दो शब्द

 

भगवत् प्रेमियो ! मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ विभाग के रायपुर नगर में पुरानी बस्ती स्थित श्रीमहामाया मंदिर के विशाल प्रांगण में श्री सद्गुरुदेव महर्षि मुक्त जी महाराज के श्री मुख द्वारा, सोमवार दिनांक १२ नवम्बर सन् ११७३ से रविवार दिनाक १२ नवम्बर सन् १९७३ तक 'माण्डूक्योपनिषद्' पर आध्यात्मिक प्रवचन हुआ उसे गुरुनैष्ठिक बन्धु श्री गिरधारीलाल जी श्रीवास्तव (स्टेनो- ग्राफर) सेन्चुरी सीमेंट, नेवरा ने लगातार उपस्थित रहकर पूरा का पूरा प्रवचन शार्टहैण्ड के द्वारा स्वयं तथा जन कल्याण की भावना से लिपिबद्ध किया इसके उपरान्त बड़े परिश्रम से उन्हें हिन्दी में लिखकर समिति को प्रकाशनार्थ सर्पित किया इस पुस्तक के प्रकाशन में श्री झुम्मकलाल जी 'दीन, 'सचिव', मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक समिति दुर्ग ने तन मन से अपना सहयोग दिया जिसके फलस्वरूप यह पुस्तकाकार हो, आपके पास तक पहुंच सका

 

मुक्तानुभूति साहित्य प्रकाशन में श्री गिरधारीलाल जी श्रीवास्तव एवं श्री 'दीन जो' द्वारा दिये गये इस सहयोग के लिये समिति उनका बहुत बहुत आभारी है

 

परमानन्द शरस्त्री

 

अध्यक्ष

मुक्तानुभूति साहित्य प्रचारक   समिति, दुर्ग

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

समर्पण

 

गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः

गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री, गुरवे नमः ।।

 

 

 

परम-पूज्य श्री सदगुरुदेव

महर्षि मुक्त जी महाराज

के श्री चरणों में

सप्रेम सादर

समर्पित

 

 

 

 

 

 

विनीत

गिरधारीलाल श्रीवास्तव

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

दो शब्द......................................................................................................................................... 3

समर्पण......................................................................................................................................... 4

प्रथम दिवस का प्रवचन................................................................................................................... 6

द्वितीय दिवस का प्रवचन............................................................................................................. 21

तृतीय दिवस का प्रवचन................................................................................................................ 35

चतुर्थ दिवस का प्रवचन................................................................................................................. 55

पंचम दिवस का प्रवचन................................................................................................................. 71

षष्ठम् दिवस का प्रवचन................................................................................................................ 90

सप्तम दिवस का प्रवचन............................................................................................................. 107

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

माण्डूक्योपनिषद् सार

(श्री मषि मुक्तानुभूति)

 

श्री गणेश य नमः

।। श्री गुरवे नमः ।।

प्रथम दिवस का प्रवचन

(सोमवार दिनांक १२ नवम्बर सन् ७३ के १० बजे से दोपहर १२ बजे दिन तक का है।)

 

…….वन्दना………

(नारायणोपनिषद्)

 

अथ पुरुषो वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति नारायणात् प्राणो जायते मनः सर्वेन्द्रियाणि   खं वायु- ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी नारायणाद् ब्रम्हा जायते नारायणाद् रुद्रो जायते नारायणाद् इन्द्रो जायते नारायणात् प्रजापतिः प्रजायते

 

नारायणाद् द्वादशाऽऽदित्याः सर्वे रुद्राः सर्वे वसवः सर्वाणि भूतानि सर्वाणिच्छदाँसि नारायणादेव समुत्पद्यन्ते नारायणात् प्रवर्तन्ते नारायणे प्रलीयन्ते

 

अथ नित्यो नारायणः ब्रह्मा नारायणः शिवश्च नारायणः शक्रश्च नारायणः कालश्च नारायणः दिशश्च नारायणः विदिशश्च नारायणः ऊर्ध्वं नारायणः अधश्च नारायणः अन्तर्बहिश्च नारायणः

 

नारायण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं निष्कलको निरञ्जनो निर्विकल्पो निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो द्वितीयोऽस्ति कश्चित् एवं वेद, विष्णुरेव भवति विष्णुरेव भवति ।। शांतिः शांतिः शांतिः ।।

 

रामाय राम भद्राय, रामचन्द्राय वेधसे

रघुनाथाय नाथाय, सीतायाः पतये नमः ।।

यन्मायावशर्वात विश्वमखिलं ब्रह्मादि देवासुरा

यत्सत्वाद मृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेभ्रमः ।।

यत्पादप्लव मेक मेव हि भवाम्भो धेस्ति तीर्षावताम्

वन्देऽहं तमशेष कारण परं रामाख्य मीश हरिम् ।।

 

अनन्त नाम रूपों में अभिव्यक्त अहमत्वेन प्रस्फुरित, महा- महिम्, स्वआत्मस्वरूप सकल चराचर एवं आत्मजिज्ञासु गण ! उत्तिष्ठत, जाग्रत प्राप्य वरान्नि बोधत

 

अनादि काल से अविद्या की घोर निद्रा में सोने वाले भव्य जीवो ! उठो ! स्व-स्वरूप भगवान आत्मा में जागो और किसी श्रेष्ठ महापुरुष की शरण में जाकर अपना आत्मकल्याण करो मानव जीवन का यही चरम लक्ष्य है यहाँ पर आध्यात्मिक प्रवचन श्री माण्डूक्योपनिषद् के आधार पर हो रहा है।

 

आत्म जिज्ञासुओ !

 

इसमें सिर्फ बारह मंत्र है, परन्तु सबसे महत्वशाली उपनिषद् माना जाता है और इसकी विस्तृत व्याख्या होती है। अथर्व वेद की ब्राह्मण शाखा से यह उपनिषद् निकली है। वेद चार हैं। और चार उपवेद हैं। यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद है, जिसमें युद्ध कला है। ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद है। सामवेद का उपवेद गंधर्व वेद है। अथर्ववेद का उपवेद शिल्पवेद है। वेद के दो भाग हैं। एक मंत्र भाग और एक ब्राह्मण भाग, ब्राह्मण भाग को उपनिषद् कहते हैं उपनिषद् के जितने मंत्र हैं सब वैदिक ऋचाएं हैं।

 

सनातन ब्रह्म के पास जो पहुंचा दे उसे उपनिषद् कहते हैं

 

उप निषादयति संसारस्य मूल कारण भविद्याम्

शिथिलयति ब्रह्म गमयति इत्युपनिषद्

 

जो संसार का नाश करे, जो संसार का मूल कारण जो अविद्या है, उसको शिथिल करे और सनातन ब्रह्म जो आत्मा है उसे प्राप्त करादे, उसे उपनिषद् कहते हैं। और ये वेद हैं क्योंकि वेद तो किसी ने बनाया नहीं, ये अपौरुषेय हैं। ब्रह्मा ने इसे बनाया। ब्रह्मा के चारों मुख से वेद निकले हैं फिर भी ब्रम्हा जी इसके बनाने वाले नहीं हैं।

 

सृष्टि के आदि में ब्रम्हा जी जब समाधिस्थ थे तो ब्रम्हा जी अपने हृदय में चारों वेदों को सुने, इसलिए वेदों का नाम पड़ा श्रुति इसलिए वेदों को श्रुति कहते हैं। बाद में उसे अपने मुख से प्रकट किए और शास्त्र को कहते हैं स्मृति

 

ऋषि लोग पर्वतों की कन्दराओं में सैकड़ों वर्ष समाधिस्थ रहते थे वहां उन्हें पूर्वापर की बातें याद गई। स्मरण करके, जो लिखी जाय उसे स्मृति कहते हैं। वेदान्त सिर्फ इतना ही है, उपनिषद् भर परन्तु जितने भी ग्रंथ हैं, वे श्रुतियों के विरुद्ध नहीं, चलते श्रुति को लेकर स्मृत्तियां चलती है। और ये कहना चाहिए कि जितनी स्मृतियां हैं वे सब श्रुति की व्याख्या हैं। ये भी नियम स्त है कि जो श्रुति विरुद्ध सिद्धान्त है वो अमान्य होता है। सार्वभौम वि नहीं होता तो भैय्या ! यह है माण्डूक्योपनिषद् इसका पहला मंत्र है-

 

ओमित्येत दक्षरमिद्ꣲ᳭ सर्व तस्योप व्याख्यानं भूतं भवभ्दविदिति

सर्वमोङ कार एव यच्चान्यत्त्रिकाला तीतं तदप्योङकार एव ॥१॥

 

पहले ही घोंट दिया ओम इति अक्षम् इदम् नाट्यं जगत ये सब ओम आत्मा है। ओम् के माने होते हैं 'मैं' सर्व 'मैं' हूं। अक्षर देखो - अक्षर कहा है, अक्षर कहते हैं जिसका कभी नाश हो। और जो अक्षर होता है, उसका कोई आकार प्रकार नहीं होता जैसे तुम लिखते हो ""

 

'', '', '', '' ये सब अक्षर हैं। यदि '' का वास्तव में यही आकार है तो जितनी भाषाएं हैं संसार में '' ऐसे ही लिखना चाहिए ये तो हमारे तुम्हारे दिमाग का फुजला है। '' जैसा है वैसा ही है। और लिखने पढ़ने लायक है इसलिय अक्षर कहते हैं। जिस तरह सनातन ब्रम्ह अवांग मनसगोचर है। परन्तु हम अपनी कल्पना करते हैं कि भगवान इस तरह का है, भगवान का ये आकार प्रकार है, आराधना जगत में, जिस प्रकार हम कल्पना करते हैं यद्यपि आकार प्रकार नहीं है उसका, उसी प्रकार हम अक्षर में '' वर्गादिक की कल्पना करते हैं। यद्यपि ऐसा नहीं है।

 

फिर देखो '', '' जिस आधार पर '' वर्गादिक अध्यस्त है। जैसे लकड़ी आधार है और 'डण्डा' अध्यस्त है। 'सोना' आधार है, 'आभूषण' अध्यस्त है इसी तरह '' से '' निकाल ला, अब '' कहो तुम ? '' का उच्चारण हो और '' कहक दिखाओ भगवान ने अपनी विभूति का जो वर्णन किया है- जिसके बिना जिसका उच्चारण ही हो उसी का नाम 'अक्षर' है। जा अक्षर है ओम् और जो 'ओम' है वह में हूं इसलिए हमारे यहा भारतीय विज्ञानों की परम्परा है। प्राचीनकाल में विद्वान लोग लेख लिखा करते थे, वे हाथ से लिखे जाते थे तो हमारे यहा काटने की प्रथा नहीं है कोष्टक बना दे

 

मिट्टी की दिया में हरताल रखते थे, हरताल लेकर उस पर लगा देते थे, तो वो अशुद्धि माना जाता था ओमिति 'अक्षरम्' इदम् अपंचम् अक्षरम् जो कुछ भी है, में आत्मा हू, मुझ आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है। इसकी व्याख्या क्या है ?

 

आज के पहले जो था और आगे जो कुछ भी रहेगा और अभी जो कुछ है सब ओंकार है। यह 'ओम्' अक्षर की व्याख्या है। सत्, रज, तम तीनों गुणों से जो परे है वह भी ओम है। यानी 'मे' आत्मा हूं। मुझ आत्मा से भिन्न, कुछ भी नहीं भगवान राम- लक्ष्मण से कहते हैं अध्यात्म रामायण में-

 

पूर्व समाधेरखिलं विचिन्तये-दोड्.कारमात्रं सचराचरं जगत्

तवेद वाच्यं प्रणवो हि वाचको, विभाव्यतेऽज्ञानवशान्न बोधतः ।।

 

(. रामा. . का. सर्ग श्लोक ४८ वां)

 

 

निर्विकल्प समाधि से प्रथम ऐसा चिन्तन करे सचराचरम जगत प्रपंचम् ओंकार मात्रम् सत्ता जगत् प्रपंच 'मैं' आत्मा हूं। ओम् माने 'मैं' प्रणव ब्रह्म सनातन तत्व जो में आत्मा हूं, वह हूं. वाचक और सारा चराचर है वाच्य

 

लकड़ी है 'वाचक', डण्डा है 'वाच्य' 'सोना' है 'वाचक' 'आभूषण' है वाच्य 'में' आत्मा 'वाचक' हूं और संसार है 'वाच्य'

 

"विभाव्यतेऽज्ञानवशान्न बोधतः"

 

अज्ञानता के कारण ये जगत प्रपंच भास रहा 'है' नहीं तीन काल में अज्ञान से ये 'प्रपंच' भास रहा है, 'स्वरूप' देश में नहीं आत्म जगत में खड़े होकर देखो प्रपंचादिक है ही नहीं इसका चिंतन समाधि से पूर्व करे

 

पूर्व समाधे  ………………….....        बोधतः

यदन्यदन्यत्र त्रिभाव्यतेभ्रमा दध्यासमित्याहुरमुं विपश्वितः

असर्पभूतेऽहिविभावनं यथा, रज्ज्वादिके तद्वदणीश्वरे जगत्

 

(. रामा. सर्ग . का. श्लो. ३७)

 

अन्य में जो अन्य का भान, जैसे रज्जू में सर्प का भान; इसको विद्वानों ने 'अध्यास' कहा है। यद्यपि सर्प तीन काल में नहीं है। इसी तरह 'मैं' आत्मा जो हूं उसमें जगत् प्रपंच, रज्जू में सर्प के समान भास रहा है। तो भैय्या एक होता है अध्यास और दूसरा होता है अभिमान स्वरूप आत्मा 'मैं' में देह जो है, अध्यास है। इसलिए कहते हैं देहाध्यास है तो रस्सी की रस्सी ही, परन्तु उस रस्सी को हम सर्प देखते हैं, और सर्प मानकर ही हमें भय और कम्पन होता है

 

 

ऐसे स्वरूप आत्मा में 'देह' का अध्यास तो रज्जू के बिना ज्ञान हुए, जैसे सर्पाध्यास नहीं जाता, उसी तरह बिना अपने स्वरूप भगवान 'आत्मा' को जाने देहाध्यास नहीं जाता

 

चाहे जितना कर्म करो, जितनी उपासना करो, वेदान्त के ग्रंथों को पढ़ते रहो रात-दिन जब तक स्वरूप 'आत्मा' का ज्ञान नहीं हो जाता, तब तक देहाध्यास कभी नहीं जाता आनन्द लो !

 

जब तक देहाध्यास नहीं जाता तब तक देहाभिमान नहीं किस तरह जायगा ? कोई-कोई कहते हैं स्वामी जी ! मुझे विषय तो समझ में गया है पर देहाभिमान नहीं जाता, तो तुम कहाँ समझे हो तुम्हारी बुद्धि समझी है। अपने राम तो कश्मीर में बैठे हैं।

 

'ठंडा हो कलेजा जहां, कश्मीर उसे कहते हैं '

 

दो प्रकार की समझ होती है। एक समझ होती है बुद्धिगम्य और एक समझ होती है अहमगम्य देह नहीं मैं आत्मा हूं इसको 'में' समझता हूं। देह नहीं में आत्मा हूं ये बुद्धिगम्य है। तीन काल में देह है ही नहीं इसे 'मैं' समझता हूं। एक ही वाक्य के अन्दर दो भाव निहित हैं साहित्यिक है- देह नहीं जन्म-मरण वाला है ये में नहीं हूं, मैं आत्मा हूं, इसको बुद्धि समझती है। देह नहीं में आत्मा हूँ। देह है ही नहीं तीन काल में, 'मैं' आत्मा ही हूं।

 

इसको समझकर लोग कहते हैं, शिकायत करते हैं कि देहाभिमान नहीं जाता, स्वामी जी ! आनन्दम् ब्रह्म आनन्द ब्रह्म डूच जाओ इस आनंद सागर में, खो को अपनी वजूद, बहादो सारे अध्यास

 

तो देह नहीं में आत्मा हूं। देह नहीं पांच भौतिक है। ये विनाशशील है। 'शरीर' दृश्य है 'मैं' 'द्रष्टा' हूं। अपने आपको साढ़े तीन हाथ का मानकर अपने को शरीर से भिन्न मानता है। शरीर जन्मता है, मरता है। स्त्री है, पुरुष है, बालक है, युवा है, वृद्ध है। इसको बुद्धि ग्रहण करती है और जिन्दगी इसी में खत्म हो जाती है और देह तीन काल में है ही नहीं, ''मैं'' आत्मा हूं। यहां पर जो साहित्य कहते हैं , वह सब परे हो जाता है। इसको में ही ग्रहण करता हूं। जिस प्रकार अपने आपको साढ़े तीन हाथ का देह माना वैसे ही अपने आपको बुद्धि भी तो माना देह नहीं 'मैं' आत्मा हूँ यदि यह बोध होता है तो बुद्धि गई और बुद्धि से निकलने वाला जो साहित्य है वह भी गया। ये है ठोस वेदान्त, यही ठोस अध्यात्म है

 

अभी तो राम भगवान कह गए-

 

पूर्व समाधे ……………………………... बोधतः

 

इसलिए अध्यास को पहले त्याग करो फिर अभिमान तो अपने आप चला ही जायगा अपने स्वरूप भगवान आत्मा को जान लेने पर अध्यास का त्याग होता है। अध्यास के त्याग पर अभिमान का त्याग हो जाता है। दूसरी चीज यह है कि देहाध्यास के त्याग में स्वरूप ज्ञान स्वरूप ज्ञान में देहाध्यास का त्याग और देहाध्यास के त्याग में देहाभिमान का त्याग होता है यद्यपि बुद्धि द्वारा समझा है- देह नहीं, आत्मा हूं। यहां पर क्या भान होता है कि आज के पहले 'में' जीव था और अब ब्रम्ह हुआ आज के पहले बद्ध था अब 'मुक्त' हुआ आज के पहले मैं 'अज्ञानी' था अब 'ज्ञानी' हुआ। अध्यास तक ही यह धारणा रहती है और अध्यास चले जाने पर

 

इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्तेपश्चात्प्रतीच्यस्ता समुद्रात्समुद्र मेवा

पियन्तित्पसमुद्र एव भवतिता यथा तत्र विदुरि- यमहमस्मीय महमस्मीति ॥१॥

(छांदोग्य उपनिषद)

 

गंगा, यमुना - कावेरी जितनी छोटी बड़ी नदियाँ हैं संसार की; जब समुद्र में मिलती हैं तो उन्को पूर्वा पर का भान नहीं रहता कि आज के पहले 'मैं' गंगा, यमुना थी और अब में समुद्र हो गई। यह। याद कौन करे !

 

मुक्ता जब मिला समंदर से, तब कौन किसी की याद करें।

बस इसी लहर में लहराना कोई क्या समझे, कोई क्या समझे !

 

और अभी याद है तो मत समझो समुद्र से मिली है। बाहर से चिल्ला रही है, यह श्रुति ही छान्दोग्योपनिषदकी है जब स्वरूप का पूण बोध हो गया तो अध्यास का त्याग और अध्यास के त्याग से अभिमान का त्याग तब कौन याद करे कि आज से पहले में जीव था या ब्रह्म था। जीव की अपेक्षा से ही तो ब्रह्म भाव था। जब जाव ही चला गया तो ब्रह्म भी चला गया। वेटा मरा तो बाप भी मर गया। इसी तरह पूर्ण रूप से स्वरूप के बोध होने पर यह स्मृति नहीं रहती कि आज के पहले जीव था

 

अब यहाँ एक प्रश्न होता है, कि अधिष्ठान में जो अध्यस्त होता है वह अधिष्ठान के अनुरूप होता है। यह प्रश्न है.? अरे सफेद धागा यदि अधिष्ठान होगा तो वस्त्र भी सफेद होगा। लकड़ी काणी होगी तो डंडा भी काला होगा रज्जू टेढ़ी-मेढ़ी होगी तो सांप भी टेढ़ा मेढ़ा होगा। यह निविवाद सिद्धांत है तो यहाँ प्रश्न होता है कि जैसे कि यह देह दिखाई दे रहा है ? अरे मुझ आत्मा में "भास रहा है तो क्या में भी इसी तरह आकार-प्रकार वाला हूँ? यह पूर्व-पक्षी की शंका है ! अधिष्ठान में जो अध्यस्त भासता है वह अधिष्ठान हो तो है। अधिष्ठान का नाम अध्यस्त कव पड़ता है ? जैसा है उसको वैसा जानकर कुछ का कुछ मान लेना अध्यस्त है। रज्जू अधिष्ठान है सर्प अध्यस्त है जैसा अधिष्ठान रज्जू है वैसे ही उसको जानकर उस रज्जू को सर्प मान लेना अध्यस्त है। अन्य में अन्य का भान होना. इसका नाम है अध्यास तो फिर अध्यास भी तो अधिष्ठान का ही अज्ञान कहा जाता है। रज्जू के अज्ञान से ही तो हम रज्जू को सर्प कहेंगे अध्यास के अस्तित्व में हो तो अधिष्ठान कहा जायगा अध्यास के अभाव में अधिष्ठान का भी तो अभाव है। तो देह हुआ अध्यास और 'मे' हुआ उसका अधिष्ठान जिस तरह रज्जू को सर्प मानने में हुआ रज्जू में अध्यस्त अथवा अध्यास इसी तरह स्वरूप आत्मा को साढ़े तीन हाथ का मान लेना अध्यास अथवा अध्यस्त है।

 

अब यहां शंका होती है ? कि जब अधिष्ठान के अनुरूप ही अध्यस्त होता है। तो क्या इसी तरह में अधिष्ठान आत्मा हूं ? यह शंका है। जी नहीं अरे ! 'में' आत्मा को जब देह मानोगे तब आकार प्रकार का विकल्प होगा और जब अपने 'मैं' आत्मा को 'में' ही जानोगे, कुछ मानोगे तो फिर देह नहीं देह नहीं तो देह का आकार-प्रकार नहीं अरे, अध्यास को मानकर ही तो ये विकल्प उठा, कि क्या में ऐसा हूं ?

 

'मैं' भगवान आत्मा ज्ञान पुञ्ज हूँ। ज्ञान सागर हूं, ज्ञान निधि हूं। कोई अनुभूतियाँ तो नहीं हैं। असीमित है। अपार है। देहा- दिक प्रप्रंच, तृण से आदि ब्रह्मा तक सारा चराचर मुझ आत्मा में अध्यस्त है। मानना अध्यास, देखना अध्यस्त है। रज्जू को सर्प मानना अध्यास है, रज्जू को सर्प देखना अध्यस्त है। अधिष्ठान एक ही रहेगा तो पृथ्वी ऐसी है, वायु ऐसा है, आकाश ऐसा है। पंच महाभूतों के विभिन्न-विभिन्न प्रकार के रूप और रंगों का विकल्प और फिर पंच महाभूत से निकले हुए पंच विषय रज्जू से भय कंपन होता है, कि सर्प से भय कंपन होता है ? सर्प से भय और कंपन होता है गोया विकल्प से भय और कंपन होता है कि रज्जू से तो में आत्मा में जब देहादिक प्रपंच का विकल्प हुआ तभी आकार- प्रकार का विकल्प होता है।

 

अपने आप, 'मैं' को, साढ़े तीन हाथ का देह मानना या तो साढ़े तीन हाथ को स्वरूप मानना, और इसको साफ करेंगे अपने 'मैं' आत्मा को जगत प्रपंच मानना, देहादिक प्रपंच मानना यह ज्ञान भी है और अज्ञान भी है। और 'मैं' ही तो हूं जिसे देह मानते हो यह ज्ञान है। 'मैं' को जानकर 'मैं' देह हूं ऐसा कहना यह अज्ञान है। काल्पनिक जगत में तो कहेंगे ही। बाली को बाली कहेंगे, हार को हार कहेंगे, चैन को चैन कहेंगे काल्पनिक जगत में तो कहना पड़ता है। मगर दृष्टि वही स्वर्णाकार होगी। मगर काल्पनिक जगत में तो देह कहेगा मगर इस कथन में कोई सत्यता नहीं है। आगे चलो। क्यों जी ? सब कुछ 'में' आत्मा हूं, मुझ 'आत्मा' से भिन्न कुछ भी नहीं तो अगर कोई कहता है कि 'में' देह हूं, तो क्या बुरा है। स्वरूप देश में ज्ञान-अज्ञान की कल्पना है कि स्वरूप से बाहर ? जिस तरीके से सूर्य में अंधकार है प्रकाश उसी प्रकार मुझ आत्मा में ज्ञान है अज्ञान यह ज्ञान है, यह अज्ञान है। यह भी तो मुझ आत्मा पर अध्यास है। इसका विकल्प भी तो बुद्धि ने ही किया है। भैय्या ! अगर बुद्धि से समझ रहे हो तो फिर कल्पना उठेगी और स्वयं समझ रहे हो तो ! ये जो उपनिषद् है, वह खुद के समझने वाली है। बुद्धि की चीज नहीं है। 'मैं' ही हूं और में' हूं। अध्यास हटाने के लिए 'में' ही हूं और अध्यास हट जाने पर "मैं' हैं। रज्जू ही है। सर्पाध्यास हट जाने पर तो नहीं कहा जाता कि रज्जू ही है। रज्जू ही है कहने से पता लगता है कोई चीज और है। जब अध्यास हट गया तो मैं हूं। प्रपंच दरिद्र है। देव उठनी एकादशी के दिन औरतें गन्ने के टुकड़ों से सूपा पीटतो हैं। दरिद्र को पीट-पीट के घर से बाहर निकालती हैं। प्रपंच रूपी दरिद्रग्को हृदय रूपी घर से निकालने के लिए हम दस बजे से सूरा पोट रहे हैं। जब दरिद्र निकल जाता है तो अटूट खजाना तो है हो

समय बजे से बजे तक

 

ओम का अर्थ होता है 'में' तृण से लेकर ब्रम्हा पर्यंत सारा चराबर में 'आत्मा' हूँ मुझ आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। तो इसकी व्याख्या क्या है ? जो कुछ था, जो कुछ है और जो कुछ होगा या रहेगा मुझ से भिन्न कुछ भी नहीं यह इसको व्याख्या है।

 

देखो ! उस वक्त कहा गया था अध्यात्म रामायण का जो श्लोक भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा है उसमे थोड़ा सा रह गया है बताने को

 

पूर्वम् समाधे  .... ……………….. सचराचरम् जगत्

 

निर्विकल्प समाधि से पहले इस प्रकार का चितन करे- जो कुछ भी है, सारा जगत प्रपंच ओम् 'मे' आत्मा हू। क्योंकि कहते - हैं कि अपने स्वरूप आत्मा के अज्ञान से सारा प्रपच भास रहा है, दिखाई दे रहा है, अज्ञान के कारण स्वरूप देश से नहीं, आत्म देश से नहीं। अब यहां एक सवाल पैदा होता है कि समाधि से पहले इस प्रकार का चितन क्यों करे ?

 

यह मसला उस वक्त हल नहीं हुआ था। समाधि कहते किसको हैं? चित्त वृत्ति निरोधः समाधिः ' चित्त की स्थिरता को कहते हैं-- समाधि चित्त को स्थिर करने के लिए, चित्त की स्थिरता के लिए यह परम साधन है कि मुझ आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है समाधि की सिद्धि का यह परम साधन है कि, मुझ आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है। क्यो ? चित्त जो है, यह मन जो है दौड़-दौड़कर विषय में जाता है। शब्द में स्पर्श में, रूप में, रस में गध में चित्त का दृश्य जो है वह विषय है। 'अहमेद सर्वम्' मुझ आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है, 'मैं' ही हू तो यह जांयगा कहां?

 

"देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि

यत्र-यत्त्र मनोयाति तत्र तत्र समाधयः ।।''

 

जहां-जहां मन जाता है वहां-वह समाधियां हैं। मन शब्द स्पर्श, रूप, रस, गंध इत्यादि में जाता है। जिसको यह मन विषय समझ- कर जाता है वह जब मुझ आत्मा के सिवाय कुछ है ही नहीं तो यह मन जायेगा कहाँ ? यह मन समाधिस्थ हो जाता है। निरोध का मतलब और होता है। निरोध का नाम है रोकना। जैसे नदी का रुकना और नदी का स्थिर हो जाना। बांध डाल दो, नदी रुक जाती है। स्थिर करने के लिए कोई साधन नहीं है। नदी का जो स्वाभाविक बहाव है वह जंगल, पहाड़ की ओर नहीं है। नदी का स्वाभाविक बहाव समुद्र की ओर है। नदी को स्थिर करने के लिए कोई बांध डालने की जरूरत नहीं है। नदी तो समुद्र में ही जाकर स्थिर होगी इसी तरह मन एक नदी के मानिन्द है

 

चित्त को निरोध करने का साधन तो है स्थिर करने का कोई साधन नहीं है। अब चित्त को स्थिर करना है। जब मुझ आत्मा के सिवाय कुछ नहीं है तो फिर यह जायेगा ही कहां ? अरे ! जब- सब कुछ 'मैं' ही हूं। तो आने-जाने वाला यह चित्त कौन है ? यह भी तो 'मैं' ही हूं। जाएगा कहां ? शान्त हो जायेगा

 

उत्पादस्याप्रसिद्धत्वादजं सर्वमुदाहृतम्

भूतादभूतस्य संमवोऽस्ति कथंचन

 

(गौ. पा. कारि. अलात् शांति प्रकरण मं. क्र. ॥३८॥ )

जगत् प्रपंच का जो उत्पादन है उसकी अप्रसिद्धि है। विश्व 'में किसी की ताकत नहीं है कि प्रपंच को सिद्ध करके बता दे उत्पादन की अप्रसिद्धि के कारण यह सारा प्रपंच अजन्मा है। इसका जन्म ही नहीं हुआ क्योंकि इसकी उत्पत्ति सिद्ध ही नहीं होती

 

"स्वतो वा परतो वापि किंचिद्वस्तु जायते

सदसत्सदसद्वापि किंचिद्वस्तु जायते २२

 

(गौ. पा. कारि. अलात्शान्ति प्रकरण मंत्र क्र. ॥२२॥)

 

यह संसार तो स्वयं पैदा हुआ है इसे किसी ने पैदा किया है। यदि कहो संसार जंजाल पैदा होता है। तो यह पैदा होने के पहले भाव रूप था कि अभाव रूप था इस देह को किसी ने पंदा किया यह देह स्वयं पैदा हुआ यदि मानो कि पैदा हुआ हैं तो पैदा होने के पहले क्या था ? सत्य था कि असत्य था ? तो सत्य मानकर भी पैदा होना सिद्ध नहीं होता और कहो असत्य रूप था- तो जो है ही नहीं वह पैदा क्या होगा ? इसलिए संसार प्रपंच की जो उत्पत्ति है वह सिद्ध नहीं होती इसलिए इदं प्रपचं अजम् 'अजम्'- जन्म हुआ ही नहीं अजत्वादऽहम् और अजन्मा होने से. 'में' हूं।

 

भूतस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेव हि

अभूतस्यापरे धोरा विवदन्तः परस्परम् ।।''

 

(गौ. पा. कारिका अलात् शान्ति प्र. मं. क्र. ।॥३॥)

 

संसार की उत्पत्ति मानकर ही आपस में लोग विवाद करते हैं। कोई कुछ कहता है और कोई कुछ बतलाता है। परन्तु ऐसा नहीं है। शरीरादिक प्रपंच हुए ही नहीं तीन काल में, सब वैतथ्य है।

 

तथ्य कहते हैं, वास्तविकता को वास्तविकता जिसमें हो उसे 'वैतथ्य' कहते हैं जो आदि में हो और अंत में हो और मध्य में यह कहां से पैदा हो गया ? अरे ! यह भी नहीं है। देखने से मालूम होता है कि- 'है' 'है' के सदृश मालूम होता है, 'है' नहीं मालूम होता है। पहले भी सर्प नहीं है। अंधकार में जो सर्प दिखाई देता है वह पहले भी नहीं है, अन्त में भी नहीं है। बीच में दिखाई देता है वह भी तो नहीं  है - ररसी ही है। उजाले में यदि उसी स्थान में सर्प दिखाई दे तब समझो कि अंधकार में जो दिखाई दे रहा है वह सर्प है। 'वैतथ्य' है। वास्तविकता से हीन है, है ही नहीं तीन काल में

 

आदावन्ते यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा

वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ।।३१॥

 

(गोंड़ पा. कारि. अलात् शान्ति. प्र. प्र. मंत्र क्र. ।३१।।)

 

पहले भी यह प्रपंच नहीं था और आगे भी नहीं रहेगा तो फिर बीच में यह ससार कहां से गया। पहले था तो 'में ही था और आखिर में जो कुछ रहेगा तो 'मैं' ही रहूंगा। यह बीच में कहां से गया प्रपंच ? निकालो दरिद्र, पीट-पीट के जिसको तुम संसार मानते हो, प्रपंच मानते हो, यह भी नहीं है क्योंकि ''अजम्'- 'में' ही हूं सनातन तत्व है। जब मुझ 'आत्मा' से भिन्न कुछ नहीं तो यह निश्चय होने पर क्या होता है 'देहाध्यास' चला गया और अध्यास के चले जाने पर उसका अभिमान था वह भी चला गया अब रह गया विशुद्ध तत्व 'आत्मा' का 'आत्मा' अरे! यही तो समाधि है। इसी का नाम तो निर्विकल्प समाधि है। निर्विकल्प समाधि तो चित्त की होती है और एक निर्विकल्प समाधि मुझ निर्विकल्प आत्मा की होती है। जो चित्त की निर्विकल्प समाधि है वह, साधन का फल है और मुझ निर्विकल्प आत्मा की 'जो समाधि है वह आत्म तत्व के बोध का फल है। तो जो चित्त के निर्विकल्प की समाधि है वह एन-केन-प्रकारेण चित्त किसी साधन द्वारा रोका जाता है लेकिन वह समाधि क्षणिक होती है। चन्द घंटे के लिए हो, चन्द दिनों के लिए हो, चन्द कल्प के लिए हो। वह कभी कभी टूटती ही है। और वित्त के निर्विकल्प की जो समाधि है वह परदेश की है, स्वदेश की नहीं है क्योंकि चित्त को निर्विकल्पा करने का जो विकल्प है, चित्त हमारा निर्विकल्प हो, चित्त हमारा निरोध हो यह तो जीव देश में होता है, कि आत्म देश में यह जो वस्तु लखाई जा रही है वह स्वदेश की चीज है अष्टांग योग करके जो साधन द्वारा समाधि लगाई जाती है वह 'इनडायरेक्ट' (Indirect) है और अभी जो बताई जा रही है वह 'डायरेक्ट' (Direct) है। जब मुझ आत्मा से भिन्न कुछ नहीं तो चित्त 'मैं' ही हूं। इन्द्रियां 'मैं' ही हूं। 'ओमित्येदक्षरम्' है तो समाधि ही समाधि है

 

किसी-किसी हृदय में विकल्प होता है कि अगर हम समाधि में है तो आवाज हमारे कान में क्यों सुनाई देती है। अरे ! यार- जो पंहित के पत्रा में वह पंडिताइन के अंगुली में अगर हम समाधिस्थ हैं तो कान में आवाज नहीं आनी चाहिए अगर यह अनुभव करते हो तो सच्चाई से दूर हो जब 'ओमित्येदक्षर सर्व' तो आवाज भी अध्यास है। अगर मानो तो आवाज है और मानो तो 'मैं' ही हूं।

 

"अभूताभिनिवेशाद्धि सदृशे तत्प्रवर्तते

वस्त्वभावं बुद्ध्वैव निःसङ्.गं विनिवर्तते ॥७९॥

 

(गौड पा. कारि. अलात् शांति प्रक. मंत्र क्र. ।।७९।।)

 

जो अभूत है, मन जो है ही नहीं तीन काल में उसमे इस चित्त का 'अभिनिवेश' है। 'अभिनिवेश' कहते है 'आग्रह' को जो 'अमृत' है वह वैतथ्य' है। उसको यह चित्त 'है' ऐसा मानकर जाता है। मगर जब वहां जाता है तो वस्तु का अभाव देखता है, तो स्वरूप में वापस जाता है। अभूत में इस चित्त का आग्रह होता है जैसे मृगजल है नहीं, केवल जलाभास है क्योंकि हरिण मानता है कि जल है और छलांग मारकर जाता है और जल नहीं पाता तो निस्संग हो जाता है। वस्तु के अभाव से निस्सग हो जाता है याने यह मन निविषय हो जाता है। मन का निस्संग होना याने मन का ब्रम्ह हो जाना 'मैं' आत्मा हो जाता है। स्वरूप ही हो जाता है, यह 'मन' तो वस्तु का अभाव जानकर याने जल का अभाव जानकर वह हरिण लौट आता है, निराश हो जाता है। यही निस्संगता है। निविषय हो जाता है।

 

"अभेददर्शनं ज्ञानं ध्यानं निविषयं मनः

स्नानं मनोमल त्यागः शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।।"

 

"श्रुति"

 

अभेद दर्शन-मुझ आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है यही तो ज्ञान है और मन निविषय हो जाता है, यही ध्यान है। आंख बन्द करने के मायने ध्यान नहीं है। आंख बन्द हो जाय मगर मनीराम बन्द हो जाय तब मन निविषय हुआ तो मन कहाँ रहा, भग- वान हो गया स्वरूप ही हो गया।

 

अभेद दर्शनं ज्ञानम्; ध्यानं निविषयँ मनः

 

'मन' का मल है विक्षेप खामख्वाह जो चीज नहीं है उसको मान रहा है यह अनादिकाल से

 

"स्नानं मनोमल …………... शौचमिन्द्रिय निग्रह "

 

जैसे रज्जू में सर्प की भ्रांति होती है ऐसे ही सर्व में व्यापक जो 'मैं' सनातन ब्रम्ह हूं तृण से आदि ब्रम्हा पर्यंत सारे चराचर का जो कल्पित ज्ञान यह अज्ञान है। अभेद दर्शन क्या है ? याने इसका क्या प्रमाण है कि मुझ आत्मा का, अपने आपको अपने स्वरूप आत्मा का ज्ञान है क्या ? इसका क्या प्रमाण है ? इसका प्रमाण यह है कि अपने स्वरूप 'मैं' आत्मा से एक तिनके से लेकर ब्रम्हा पर्यंत कोई भी भिन्न दिखाई दे। अपने से किसी की जुदाई दिखाई दे कि में ज्ञानी हूं और तुम अज्ञानी हो। यह प्रमाण है। यह मीटर है। अपने से दूसरे की प्रतीत हो इसी का नाम अभेद दर्शन है, भेद देखना ही अभेद दर्शन हैं

 

'ब्राम्हणे पुल्कसे स्तेने ब्रम्हण्येऽर्के स्फुलिगके

अक्रूरे क्रूर के चैव समदृक् पण्डितोमतः ।।''

 

(श्रीमदभागवत् एका. स्कंघ, अध्याय २९ श्लोक १४)

 

अक्रूर और क्रूर में जब भेद दिखाई दे वह ब्राम्हण है

 

'विद्या विनय सम्पन्ने ब्राम्हणेगविहस्तिनि

शुनि चैव श्वपाके पण्डिताः समर्दाशनः

 

(श्रीमद्भग. गीता . श्लो. १८)

 

अभेद दर्शन किसकी देन है ?

 

ओमित्येदक्षरमिद सर्वभ्- इसकी देन है। जब मुझ आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं तो भेद दृष्टि का स्वभावतः त्याग हो जायेगा। रामायण की चौपाई कहती है।

 

'ज्ञान मान जहँ एकउ नाहीं, देखत ब्रम्ह रूप सब माहीं

 

जहां एकउ नाहीं मान तहँ ज्ञान और जहां ज्ञान- देखत ब्रम्ह रूप सब माहीं यही अभेद दर्शन है। किसी किस्म की मान्यता हो ज्ञान की अज्ञान की, बद्ध की मुक्त की। यह नारा- यण पद का बोध कराया जा रहा है कि ज्ञान पद का। यह नारायण पद का विवेचन है। तो क्यों भैय्या ? भगवान देश में भी 'मैं' ज्ञानी हू क्या भगवान भी मानता है कि मुझे स्वरूप का बोध हो गया, तुम्हें नहीं हुआ। उस देश का परिचय तुम्हें दिया जा रहा है, उस देश का दर्शन तुम्हें कराया जा रहा है। यह भगवान पद है यह नारायण पद है। यहां जीवभाव है ब्रम्हभाव है ज्ञानी भाव है अज्ञानी भाव है और यदि भाव है तब सब चीजों का भाव एक है। 'ओमित्येदक्षरमिदं सर्वम्' एक प्रश्न होता है ?

 

स्वामीजी, जब मुझ आत्मा से भिन्न कोई है ही नहीं तो फिर यह पुण्यात्मा और पापी, ऊंच-नीच, ज्ञानी-अज्ञानी और फलां धर्म, फलां मजहब और फलां सोसायटी यह क्या है ?

 

अरे यार इसी का नाम तो "अज्ञान" है। यहाँ तो ज्ञान का स्वरूप बताया जा रहा है स्वरूप देश में खड़े होकर तुम प्रश्न करो तो इसका उत्तर सोचा जाय मन का निविषय होना क्या है ? चाहे मन के निविषय होने का नाम ध्यान कहो, अथवा मन के आत्मा हो जाने को, सनात्तन ब्रम्ह हो जाने का नाम ध्यान कहो एक हीं बात है ' क्योंकि आत्मा निविषय है। तो मन जब निविषय हो जाता है, निविषय हो जाना याने स्वरूप हो जाना ' संकल्प और विकल्प से जो यह मन रहित हुआ तो आत्मा हो जाता है यह मन इसी का नाम है ध्यान यदि यह विकल्प होता है कि अभी स्वामी जी ने थोड़ी देर के लिए अनम्यास के अभ्यास में बैठाया था तो आवाज क्यों आई ? तो बेहोशी को समाधि कहते हैं तो इतना कष्ट उठाने की क्या जरूरत है ? क्लोरोफार्म सूंघ लो, नींद की गोली खातो फिर तुम्हारे ऊपर चाहे अजगर चढ़े समाधि ही समाधि है। अरे समाधि तो उसे कहते हैं कि जिस अवस्था में तुम्हारी 'घी' याने बुद्धि सम हो जाय, उसको समाधि कहते हैं। इस हो खूत्र बताएँगे।

 

यह देह है। देह को जानने पर देह है कि देह को मानने पर देह है ? देह को मानने पर देह है जानने पर तो 'में' आत्मा ही हूँ। इसी तरह आवाज को जानने पर आवाज है कि आवाज को मानने पर आवाज है तो फिर मानते ही क्यों हो ? देखो, किस समय आवाज, आवाज नहीं है, आवाज 'मैं' हूँ। जब यह विकल्प उठे कि यह आवाज है।' आवाज सुनने से चित्त को जब ग्लानि हो तब समझना आवाज 'मैं' हूँ। कान में आवाज आने से 'अरे' ऐसा हो शोक हो ' आवाज आए तो हर्ष होय तव समझना कि 'में' हूँ। तब समझना कि यह मन निविषय हो गया शब्दा- दिक विषय के ग्रहण त्याग में मन जब उदासीन हो जाय तब समझना यही निविषय मन है और यही भगवान का ध्यान है। और यही मन का निस्संग होना है। मन का निराश होना है। "उदासीन बदासीनम्" और यही भगवान कृष्ण का अनासक्त योग है ।।

 

'अभूताभिनिवेशाद्धि सदृश .... निःसङ्गं विन्विर्तते ॥७९॥

(वही)

 

'अभूत' कहते हैं- खामख्वाह किसी को मान लेना यदि बाई आप के शब्दों पर ध्यान नहीं देता अपना हो मारता है उसे अभि निवेश कहते हैं। अभाव में अभिनिवेश होने से याने आग्रह करने से यह चित्त जाता है ग्रहण करने के लिए मगर जिस वस्तु को ग्रहण करने के लिए यह चित्त जाता है, उसका अभाव जानता है जब अभाव जानता है तो निराश हो जाता है। निर्विषय हो जाता है याने भगवान आत्मा हो जाता है थोड़ी देर पहले हम बता चुके हैं कि एक समाधि होती है चित्त के निर्विकल्प की और एक समाधि होती है निर्विकल्प की। निर्विकल्प माने आत्मा

 

चित्त के निर्विकल्प की समाधि है वह तो लगाई जाती है अष्टांग योग इसी के लिए है। परन्तु निर्विकल्प की जो समाधि है, स्वरूप की जो समाधि है यह लगाई नहीं जाती यह स्वभावतः सिद्ध है यह पहले से ही है। और इसी निर्विकल्प आत्मा की ही समाधि में सारे काम रात-दिन हो रहे हैं। तो फिर तुम क्या समझा रहे हो ? तुम क्यों सूपा पीट रहे हो ? यही समझा रहे हैं। हम कोई नई चीज़ नहीं समझा रहे हैं। तुमको स्वरूपस्थ कराने के लिए, तुमको स्वरूप ज्ञान कराने के लिए नहीं कह रहे हैं। स्वरूप ज्ञान तो तुम्हें पहले से ही है। स्वामीजी पहले से है ? हाँ जी ! पहले से है। कैसे है ? बताते हैं- "में हूँ" यह ज्ञान तुम्हें कहाँ से मिला ? "मैं हूँकहाँ, किस स्कूल में किस कालेज में किस गुरू से पढ़े ? स्वतः सिद्ध है चाहे देह मानकर हूँ। चाहे पशु पक्षी मानकर 'मैं' हूँ। मगर 'में' हूँ यह ज्ञान कहाँ से मिला। और हर हालत में 'मैं' ही तो हूँ। "मैं हूँ" का ज्ञान कहीं से नहीं मिला स्वतः सिद्ध है। "में" का ज्ञान सभी को है। भैय्या ! इसी का नाम तो ज्ञान है। "में" 'हूँ' क्यों जी जब देह की कोई याद कराता है तब में देखता हूँ ? दूसरे के कहने से यदि में देह हूँ, यह ज्ञान सत्य है, तो हमारे व्यावहारिक जगत के प्रत्येक कार्य में मुझ आत्मा का देह भाव क्यों नहीं रहता ? यहां प्रक्रिया है सिद्धांत है। अभी जैसे कथा सुन रहे हो तो देह भाव में सुन रहे हो कि आत्मभाव में सुन रहे हो ? आत्म भाव में। इसी तरह तुम्हारे जितने कार्य व्यावहारिक जगत में होते हैं वे देह भाव में होते हैं कि आत्म भाव में ? तो यह 'में' का ज्ञान कहाँ आसमान से आया ? स्वतः सिद्ध है। जो चीज़ जैसी है उसको वैसे ही लखा देते हैं। अरे भाई ! में देह हूँ यह में बोल रहा हूँ कि देह बोल रहा है कि नाक बोलती है कि कान बोलता है कि मन बुद्धि चित्त अहंकार बोलते हैं ? अरे ! जो में हूँ, ऐसा "में" ही कहता हूँ, कि ये इन्द्रियां अथवा शरीरादिक ? 'में' ही कहता हूँ। तो फिर यह ज्ञान तुम्हें कहाँ से मिला ? इसलिए देह नहीं "में" आत्मा हूँ यह कहने सुनने की जरूरत नहीं है। अब हो गए देहादिक प्रपंच वैतथ्य ! ये वंतथ्य है याने तथ्य ही नही है.

 

आदावन्ते यन्नास्ति ……………………………… इवलक्षिताः ॥३१॥

 

(गौड़ पा० कारि० अलातशान्ति० मंत्र सं ॥३१॥)

 

आदि अंत में नहीं तो वर्तमान में भी नहीं सत्य के समान अक्षित तो होता है, पर है नहीं। तो इसी तरह मन पहले था, मन अंत में है, वर्तमान में है। यह मन "वैतथ्य" है याने तथ्यहीन है और इसके अंदर जो तथ्य है वह "में" हूँ। अब जब यह चित्त नहीं तो चित्त कल्पित दृश्य भी नहीं। प्रश्न होता है- कि जब संसार प्रपंच तीन काल में है नहीं तो यह पैदा तो नहीं हुआ "प्रपंच इसका कोई वजूद नहीं है देहादिक प्रपंच का 'है' नहीं, माना जाता है। मन को किसने माना ? मन मुझ आत्मा की सृष्टि है। तभी तो कहता हूँ, मेरा मन मेरा पुत्र, जो पिता कहता है तो अपने आपको कहता है कि अपने से भिन्न को ? जो जिसकी चीज होगी उसी को तो कहेगा। किसी के पुत्र को उसका पिता ही कह सकता है-- मेरा है। पुत्र वेतथ्य है। पुत्र के अन्दर जो तथ्य है यह पिता का है

 

मुझ आत्मा पर मन का अध्यास है। परन्तु एक चीज और समझो 'मैं' तथ्य रूप 'आत्मा' को ही वैतथ्य मन ने जगत प्रपंच माना है। तो मन का भी अधिष्ठान और प्रपंच का भी अधिष्ठान में ही हूँ। 'मं' हो तथ्य हूँ और बाकी सब वतथ्य है। इसीलिए-

 

"चित्तं संस्पृशत्यर्थं नार्थाभास तथैवच !

अभूतो हि यतश्चार्थों नार्थाभासस्ततः पृथक"

 

(गौ० पा० कारि० आमातशा० प्र० मं० सं० ।।२६।।)

 

तो यह चित्त पैदा होता है यह चित्त जिसमें जाता है वह दृश्य पैदा होता है। तो चित्त और दृश्य दोनों की जो उत्पत्ति मानते हो, इनको मानना ऐसा है कि जैसे आकाश में पक्षी के चरण चिन्ह देखना है। चित्त कहो, मन कहो, देह कहो इसी तरह संसार प्रपंच की उत्पत्ति मानना ऐसे ही है जैसे आकाश मण्डल में पक्षी के चरण चिन्ह देखना

 

अब चार बज रहे हैं, आज का प्रवचन यहीं समाप्त होता है।

 

पूर्ण मदः पूर्ण मिदं, पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते

पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवाव शिष्यते ।।

शान्तिः ! शान्तिः ! ! शान्तिः !!!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

द्वितीय दिवस का प्रवचन

(मंगलवार दिनांक १३ नवम्बर सन् १९७३ समय १० से १२)

 

कल के प्रसंग में पहले मंत्र की व्याख्या हुई थी।

 

ओमित्येतदक्षर मिदꣲ᳭  सर्व तदप्योङकार एव !

 

समस्त चराचर "मैं" आत्मा हूँ, मुझ आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। इसकी व्याख्या क्या है ? तो कहते है-- जो था, जो है, जो रहेगा सब कुछ 'मैं' आत्मा हूँ।

 

जिज्ञासुओ !

 

"नात्मभावेन नानेदं स्वेनापि कथंचन

पृथङ नापृर्थाक्कचिदिति तत्त्वविदो विदुः

 

(गो० पा० कारि० वैतथ्य प्रकरण मत्र सं० ॥३४॥)

 

तो आत्मभाव से नानात्व है और स्वयं अपने भाव से नानात्व है। स्वयं करके यह अनेक है यह जगत प्रपंच अपने करके नाना है यह जगत प्रपंच माने एक है। यह किसी से भिन्न है, किसी से अभिन्न है। जब कि अपने आपके सिवाय दूसरी सत्ता है हो नहीं तो फिर पृथक और अपृथक का सवाल ही पैदा नहीं होता ये जितने श्लोक कहे जा रहे हैं , ये सब कारिकाए हैं। भगवान गौङपादाचार्य की भगवान् जगत् गुरू शंकराचार्य के दादा गुरु हुए हैं भगवान गोविन्द पादाचार्य भगवान गोविन्द पादाचार्य के गुरु हुए हैं स्वामी शुकदेव जी महाराज ये कारिकाएँ प्रमाणित हैं और वेदान्त के शास्त्री खण्ड में पढ़ाई जाती हैं। बड़े- बड़े जो ब्रह्मवेत्ता पुरुष हैं, आत्म वेत्ता पुरुष हैं वे ऐसा कहते हैं-- वे ऐसा जानते हैं। अज्ञानी; क्या जानेगा अज्ञानियों की दृष्टि में तो अनेकत्व ही है।

 

देखो - यदि अधिष्ठान अनेक हो तो उसमे जो कल्पित पदार्थ है वह भी अनेक हो। जब अधिष्ठान एक है तो उसमें जो कल्पित वस्तु है वह भी एक है। तो जगत प्रपंच का अधिष्ठान 'में' आत्मा हूँ। और मुझ आत्मा में ही जगत जाल अध्यस्त है। आत्म भाव करके यह जो प्रपंच है तो नाना है और अपने आप करके अनेक है नाना है। भिन्न हैं अभिन्न है। जब अनेक नहीं तो यह अपने आप से भिन्ना भिन्न का विकल्प तो तब होता हैं जब अपने आप से कोई परे हो मुझ आत्मा से भिन्न कोई चीज़ और है ही नहीं तो यह प्रश्न पैदा हो नहीं होता अब इसको तर्क और युक्ति द्वारा समझो :--

 

जो नाना भाव है याने अनेकता है। यदि अनेकता अनेक में हो तब तो अनेकता अनेक है और यदि अनेकता एक में है तो फिर अनेकता अनेक होकर एक है। अनेकता का आधार यदि अनेक है तब अनेकता अनेक है और यदि अनेकता का आधार एक है तो अनेकता एक है। अनेकता को यदि अनेक सिद्ध करता है तब तो अनेकता अनेक है और यदि अनेकत्ता की सिद्धि एक में है तो अने- कता एक है। अव प्रश्न होता है ? यहाँ पर कि- हमें तो अनेकता दिखाई देती है। हमें तो अनेकत्ता प्रतीत हो रही है। में तो अनेक देख रहा हूँ। तो मैं एक कैसे समझू ? ठीक है भैय्या ! तुम जो अनेकता देख रहे हो तो तुम एक होकर अनेक देखते हो कि अनेक होकर अनेक को देखते हो तुम जो अनेक को देखते हो तो एक होकर अनेक को देखते हो कि अनेक होकर अनेक को देखते हो नहीं, एक होकर अनेक को देखते हो एक से अनेक को देखते हो तो फिर अनेक कहाँ ? अनेक में से एक निकाल लेने पर यदि अनेक अपने स्थान पर बना रहे तब तो अनेक, अनेक है और एक के निकाल लेने पर यदि अनेक नहीं रहता तो फिर अनेक नहीं है, एक का ही नाम अनेक है

 

आत्मभाव से नाना है और स्वयं करके नाना है याने नाना है ही नहीं यह एकता, यह एकत्व कितना ठोस है। यह एकत्व कितना ठोस घन है कि एक पिन भी नहीं जा सकती इसके अंदर और मन एक, बुद्धि एक, चित्त एक, अहंकार एक, प्राण एक, आंख एक, कान एक स्वामी जी ! तुम आँख को एक कहते हो आंख तो दो है, समझो - एक आँख सुने और एक आँख देखे यदि ऐसी बात हो तब तो ऐसा कहने में हर्ज नहीं कि आँख दो हैं। अरे ! जो इस आँख का काम वही उस आँख का काम इसी तरह कान एक हैं। तो फिर अनेकता कहाँ से आई ? कैसे तुम देख रहे हो ? दूसरी चीज़ यह है। अनेक को जो तुम देखते हो अरे भाई ! अनेक दिखता नहीं क्योंकि जो कल्पित पदार्थ होता है, अधिष्ठान ही है। अरे भाई ! "डंडा-" लकड़ी देख रहे हो कि डंडा लकड़ी। आभूषण में जो पीलापन देखते हो वह आभूषण का है या सोने का। सोने का लचीला पन देखते हो वह आभूषण का नहीं है सोने का है। गुरूत्वपना याने वजनपना देखते हो वह भी सोने का ही है फिर आभूषण कहाँ ? यह निविवाद सिद्धांत है कि जो वैकल्पिक पदार्थ है वह नहीं दिखता जैसे 'डण्डा' वैकल्पिक है। लकड़ी पर डण्डे का विकल्प किया गया है वस्तुतः डण्डा है ही नहीं लकड़ी है। वैकल्पिक - पदार्थ देखा नहीं जाता। है, ही नहीं तो दिखेगा क्या ? वह तो - फर्जी होता है, विल्कुल झूठा अभाव रूप है। डण्डे से लकड़ी = निकाल लेने पर अगर डण्डा दिखाई दे तब तो डण्डा दिख रहा है बौर यदि लकड़ी को निकाल लेने पर डण्डा नहीं दिखाई देता तो लकड़ी ही है। जगत् प्रपंच से अपने को निकाल लेने पर यदि प्रपंच दिखे तब प्रपंच दिख रहा है और यदि आत्म तत्व को निकाल लेने पर प्रपंच नहीं दिखता तो फिर "में" ही हूँ।

 

जो कल्पित पदार्थ है वह दिखता नहीं खाली शब्द ही शब्द सुनाई पड़े और देखने चलो तो वह वस्तु मिले उसे विकल्प कहते हैं। देह नहीं दिखता "मैं" देह नहीं दिख रहा है। यह तो विकल्य है और जो भी चीज़ तुम देखते हो वह सभी विकल्प है। जो भो देखते हो अपने आपको देखते हो चीज को नहीं देखते तो जगत् प्रपंच सुनने की चीज है क्योकि कल्पित वस्तु है। अरे भाई ! जिस मन की शिकायत करते हो कि मन बड़ा चंचल है तो भाई तुमने मन को