ज्योति, शक्ति और प्रज्ञा

 

'Light, Power and Wisdom'

का हिन्दी रूपान्तर

 

 

 

 

लेखक

 

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

अनुवादक

श्री स्वामी ज्योतिर्मयानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९ १९२

 जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dishq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण : १९६०

सप्तम हिन्दी संस्करण : २०१५

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

ISBN 81-7052-101-7 HS 224

 

PRICE: 40/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर-२४९ १९२,

 जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड' में मुद्रित

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प्रकाशकीय वक्तव्य

 

यह छोटी-सी पुस्तिका वरदान स्वरूप है। यह आपकी जेब-गुरु, नित्य साथी, शक्तिवर्धक टॉनिक तथा कोमल अंकुश है। इस अनुपम खजाने में महर्षि शिवानन्द के जाज्वल्यमान शब्द सँजो कर रखे गये हैं, जिससे आप अधिकतम लाभ उठा सकें। इसका प्रत्येक शब्द आपको ही सम्बोधित करके लिखा गया है।

 

सम्भवतः आप किसी समस्या के फेर में पड़ गये हों, जिसका समाधान होता हो, तो इसके किसी भी पृष्ठ को उलटिए और आप अवश्य ही एक मार्ग को पा जायेंगे, जिसके द्वारा या तो आप समस्या का समाधान कर लेंगे या फिर समस्या ही दूर हो जायेगी। सम्भवतः आप शंका तथा निराशा से आक्रान्त हों, निराशा की घनीभूत कुहेलिका से आवृत होते जा रहे हों। तब आप इस पुस्तिका के किसी भी पृष्ठ को उलटिए और आप इस पुस्तिका से पूर्ण लाभ उठा सकेंगे; इससे निकलने वाली ज्योति निश्चय ही अन्धकार को दूर भगायेगी। इसका प्रत्येक पृष्ठ दिव्य ज्योति, शक्ति तथा प्रज्ञा से परिपूर्ण है।

 

आध्यात्मिक साधक तो इस उपयोगी पुस्तिका को अपने नेत्रों से भी अधिक उपयोगी पायेंगे। अपने महान् लक्ष्य की ओर यात्रा करते समय उन्हें घनीभूत अन्धकार का जो संसार है, उसका सामना करना पड़ता है और उनको ज्योति की आवश्यकता होती है; मार्ग की बाधाओं का सामना करने, अपनी सावधानी को सतत बनाये रखने तथा प्रगति के पथ पर अग्रसर होने के लिए उनको शक्ति की आवश्यकता होती है और गलतियों से बचने के लिए, विवेक की ज्योति को सदा प्रखर बनाये रखने के लिए तथा अपने स्वरूप का साक्षात्कार करने के लिए उन्हें प्रज्ञा की आवश्यकता होती है। आप इस पुस्तिका में इन सबको प्राप्त करेंगे।

 

आशा है, 'Light, Power and Wisdom' के अनुवाद-रूप में प्रस्तुत इस पुस्तिका का आध्यात्मिक साधक हार्दिक स्वागत करेंगे।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्री स्वामी शिवानन्द

 

दिव्य जीवन संघ के परम पूज्य संस्थापक

 

श्री स्वामी शिवानन्द का जन्म सन्त अप्पय्य दीक्षितार तथा अन्य अनेक प्रख्यात सन्तों तथा विद्वानों के कुलीन परिवार में सितम्बर १८८७ को हुआ था। वेदान्त के अध्ययन तथा उसके व्यावहारिक पक्ष की ओर उन्मुख जीवन के प्रति उनमें जन्मजात झुकाव था। उनमें प्राणिमात्र की सेवा करने की अन्तर्जात आकांक्षा तथा समस्त मानवों में अन्तर्निहित एकता की सहज भावना थी। यद्यपि उन्होंने एक रूढ़िवादी परिवार में जन्म लिया था, तथापि वह अत्यन्त उदारमना, सहिष्णु तथा धर्मपरायण थे।

 

सेवा करने की आकांक्षा ने उन्हें चिकित्सा क्षेत्र की ओर आकर्षित किया। फिर उन्होंने उन स्थानों की ओर ध्यान दिया, जहाँ उनकी सेवा की अत्यधिक आवश्यकता थी। इसी दृष्टि से वह मलया (मलेशिया) गये। इस बीच उन्होंने एक स्वास्थ्य-पत्रिका को सम्पादित करना प्रारम्भ कर दिया था। वह उसमें नियमित रूप से स्वास्थ्य-सम्बन्धी समस्याओं के बारें में लिखा करते थे। उनका कहना था कि जन-साधारण को सही ज्ञान प्रदान करने की परम आवश्यकता है। ऐसे ज्ञान का प्रचार-प्रसार उनका जीवन-लक्ष्य बन गया।

 

यह ईश्वर का मंगलमय विधान ही था, जिसके कारण मन तथा शरीर के इस चिकित्सक में तीव्र वैराग्य की भावना उत्पन्न हो गयी। परिणाम- स्वरूप वह अपनी जीवन-वृत्ति को त्याग कर मानव की आत्मोन्नति में सहायक बनने के लिए संन्यासी बन गये। ऋषिकेश को उन्होंने अपना तपःस्थल बनाया तथा एक मनीषी, योगी, सन्त और जीवन्मुक्त के रूप में ख्याति प्राप्त की।

 

पूज्य स्वामी जी ने मात्र जीवित रहने के लिए कभी उदर-पोषण नहीं किया। हाँ, उन्होंने सेवा करने के लिए जीवित रहना आवश्यक समझा। एक छोटी-सी जीर्ण-शीर्ण कुटिया-जिसमें मच्छरों-बिच्छुओं के अतिरिक्त और कोई नहीं रहता था-ने वर्षा और धूप से उनकी रक्षा की। कठिन तपश्चर्या का जीवन व्यतीत करते हुए भी उन्होंने रोगियों की बहुत सेवा की। वह दवाएँ ले कर रोगी साधुओं की कुटियाओं में जाते थे और उनकी सेवा-शुश्रूषा करते थे। वह उनके लिए भिक्षा माँग कर लाते और उन्हें अपने हाथों से खिलाते थे। रोगियों के सिरहाने रात-रात भर बैठ कर उनकी देख-भाल करना उनकी दिनचर्या का एक अंग बन गया था। तीर्थयात्रियों को भगवान् का रूप मान कर वह उनकी भी सेवा मन लगा कर किया करते थे।

 

अपने परिव्राजक जीवन में पूज्य स्वामी जी ने पूरे भारत का भ्रमण किया। भ्रमण-काल में वह संकीर्तन कराते और प्रवचन दिया करते थे। स्वामी जी ने उन्हीं दिनों में कैलास तथा बदरी की भी यात्राएँ कीं।

 

तीर्थयात्रा से लौटने के बाद सन् १९३२ में उन्होंने पवित्र गंगा के दक्षिण तट पर शिवानन्दाश्रम की स्थापना की। सन् १९३६ में उन्होंने दिव्य जीवन संघ की स्थापना की। किसी परित्यक्त गौशाला की तरह दिखायी पड़ने वाला एक टूटा-फूटा पुराना कुटीर उन्हें मिल गया। उनके लिए वह एक महल से भी बढ़ कर था। उन्होंने उसकी सफाई की और फिर उसी में रहने लगे। जब उनके श्रीचरणों के निकट बैठ कर उनके उपदेशामृत का पान करने वाले भक्तों की संख्या बढ़ने लगी, तब उसके विस्तारण की आवश्यकता समझी जाने लगी। कुछ और रहने योग्य खाली शेड ढूँढ़ निकाले गये। इनमें कोई भी रहने का साहस नहीं कर पाता था। दिव्य जीवन संघ का शैशव इन्हीं -वासयोग्य टूटे-फूटे भवनों में व्यतीत हुआ।

 

श्री स्वामी शिवानन्द योग के, मानवीय कष्टों के उपशमन के तथा प्रत्येक वस्तु के संश्लेषण (समन्वय) में विश्वास रखते थे। स्वामी जी ने सेवा, ध्यान तथा भगवद्-साक्षात्कार के दिव्य उदात्त सन्देश को अपनी पत्रिकाओं, पत्रों तथा अपनी ३०० से अधिक पुस्तकों के माध्यम से संसार के कोने-कोने में प्रचारित-प्रसारित किया। उनके निष्ठावान् शिष्यों में सभी धर्मों, पन्थों तथा सम्प्रदायों के अनुयायी थे।

 

स्वामी शिवानन्द का योग-समन्वययोग-कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग के अभ्यास के माध्यम से 'हाथ', 'मस्तिष्क' तथा 'हृदय' का सुसंगत विकास सम्पन्न करता है। दिव्य जीवन संघ का मुख्य उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार करना है। इसके सुविख्यात संस्थापक श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए गंगा-तट पर स्थित अपने छोटे-से कुटीर में बैठ कर ३० वर्षों तक घोर परिश्रम किया

 

१४ जुलाई १९६३ को महात्मा श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज शिवानन्दनगर में स्थित गंगा-तट पर बने हुए अपने कुटीर में अपना पार्थिव शरीर त्याग कर महासमाधि में लीन हो गये।

 

यद्यपि आज स्वामी शिवानन्द जी महाराज हमारे बीच नहीं हैं; परन्तु वह अपने द्वारा प्रारम्भ किये गये महान् कार्य का मार्ग-निर्देशन आज भी सूक्ष्म रूप से कर रहे हैं। प्रत्येक व्यतीत हो जाने वाला क्षण उस कार्य की गतिमात्रा में वृद्धि कर जाता है। पूज्य गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज और परमाराध्य श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज की कृपा आशीर्वाद से अपने परमाध्यक्ष श्री स्वामी विमलानन्द जी महाराज के नेतृत्व में दिव्य जीवन संघ के वरिष्ठ संन्यासी दिव्य जीवन के इस सिद्धान्त को प्रचारित करने में सदा-सर्वदा रत हैं जो पूज्य गुरुदेव के इन शब्दों में समाहित है :

 

सेवा, प्रेम, दान, शुचिता, ध्यान, साक्षात्कार!"

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय वक्तव्य... 3

श्री स्वामी शिवानन्द... 4

प्रथम अध्याय. 12

ज्योति.. 12

. क्या आप सचमुच ईश्वर को चाहते हैं?. 12

. ज्योति आपके अन्दर है. 12

. जीवन के उपदेश. 13

. भला बनें, भला करें. 13

. वैसा ही कीजिए, जैसा आप दूसरों से चाहते हैं. 13

. उठिए और कार्य कीजिए. 14

. अहिंसा का अभ्यास कीजिए. 14

. दयालु बनिए. 15

. विशुद्ध प्रेम का विकास कीजिए. 15

१०. समदृष्टि रखिए. 15

११. विस्तृत दृष्टिकोण रखिए. 16

१२. सभी से प्रेम कीजिए. 16

१३. सबमें आत्मा के दर्शन कीजिए. 17

१४. सेवा करें, प्रेम करें, दान दें. 17

१६. सदा प्रसन्न रहिए. 18

१७. यथाव्यवस्था के गुण अर्जन कीजिए. 18

१८. सदाचारी बनें. 19

१९. सद्गुणों का विकास करें. 19

२०. अच्छी आदतें डालिए. 19

२१. सहन-शक्ति का विकास कीजिए. 20

२२. नपे-तुले शब्द बोलिए. 20

२३. जीवन को ज्योति दें. 21

२४. अपने दोषों को स्वीकार कर लीजिए. 21

२५. छोटे अहं को मार डालिए. 21

२६. आत्म-निर्दोषिता सिद्ध करने वाली भावनाको नष्ट कीजिए. 22

२७. क्रोध को प्रेम से जीतिए. 22

२८. बीस आध्यात्मिक नियमों का पालन कीजिए. 22

२९. सरल जीवन बिताइए. 23

३०. सादा जीवन तथा उच्च विचार. 23

३१. अनुशासित जीवन बितायें. 24

३२. जीवन अमूल्य है. 24

३३. आध्यात्मिक धन प्राप्त कीजिए. 24

३४. कर्म के नियम को समझिए. 25

३५. एक ही गुरु में निष्ठा रखिए. 25

३६. अपने गुरु की पूजा कीजिए. 26

३७. ज्ञानियों के साथ सत्संग कीजिए. 26

३८. ज्ञानियों के उपदेशों पर चलिए. 26

३९. ईश्वर प्रेम है. 27

४०. नाम सर्वशक्तिमान् है. 27

४१. नियमित कीर्तन कीजिए. 27

४२. ईश्वरीय महिमा गाइए. 28

४३. भक्ति का विकास कीजिए. 28

४४. प्रेम के द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार कीजिए. 28

४५. हार्दिक प्रार्थना कीजिए. 29

४६. प्रार्थना आश्चर्य कर दिखाती है. 29

द्वितीय अध्याय. 30

शक्ति.... 30

. ज्वलन्त मुमुक्षुत्व... 30

. अपने सिद्धान्तों पर दृढ़ रहिए. 30

. अपने संकल्प में दृढ़ बनिए. 30

. अपने व्रतों में दृढ़ बनिए. 31

. कभी निराश हों.. 31

. जैसा सोचोगे, वैसा ही बनोगे. 31

. अपने अन्दर से शक्ति प्राप्त कीजिए. 32

. प्रकृति पर विजय. 32

. यह जगत् महान् पाठशाला है. 32

१०. जगत् आपका शरीर है. 33

११. कर्मयोग के रहस्य को समझिए. 33

१२. कर्मयोग आनन्द प्रदान करता है. 34

१३. कर्मयोग द्वारा ज्ञान. 34

१४. कर्मयोगी ईश्वर के बहुत निकट है. 34

१५. कर्मयोग ही सर्वोत्तम योग है. 35

१६. सभी के साथ एकता का अनुभव करें. 35

१७. विकसित बनिए, प्रगति कीजिए. 35

१८. अपनी प्रवृत्तियों की जाँच कीजिए. 36

१९. आध्यात्मिक दैनन्दिनी रखिए. 36

२०. साधना का तत्काल अभ्यास कीजिए. 37

२१. सतत साधना कीजिए. 37

२२. अपनी साधना में नियमित बनिए. 37

२३. प्रेम के द्वारा सबल बनिए. 38

२४. साधना तथा सन्तोष स्वास्थ्य के रहस्य हैं. 38

२५. साधन-चतुष्टय से युक्त बनिए. 38

२६. आत्मसंयमी बनिए. 39

२७. आत्मावलम्बी बनें. 39

२८. प्रकृति को जीतिए. 39

२९. वैराग्य प्राप्त कीजिए. 40

३०. श्रद्धा ही जीवन है. 40

३१. श्रद्धा नहीं, तो ज्ञान नहीं.. 40

३२. उसके सार को जानिए. 41

३३. ध्यान कीजिए और बल प्राप्त कीजिए. 41

३४. अज्ञान को नष्ट कीजिए. 41

३५. तीन प्रकार की तपस्याओं का अभ्यास कीजिए. 42

३६. अमृत-पान कीजिए. 42

३७. अमृतत्व आपका जन्माधिकार है. 43

३८. अपने लक्ष्य को भूलिए. 43

३९. जागिए तथा लक्ष्य को प्राप्त कीजिए. 43

४०. जीवन का लक्ष्य ईश्वर-साक्षात्कार है. 44

तृतीय अध्याय. 45

प्रज्ञा.. 45

. राग का परित्याग कीजिए. 45

. विषय-सुखों का परित्याग कीजिए. 45

. समत्व-बुद्धि रखिए. 46

. मन को प्रलोभन दीजिए. 46

. मन को अनुशासित कीजिए. 47

. मन को पूर्णतः संलग्न रखिए. 47

. मन को ढीला छोड़िए. 47

. विवेक करना सीखिए. 48

१०. आनन्द की प्राप्ति के लिए विषय-भोग का बलिदान कीजिए. 48

११. ठीक-ठीक विचारिए. 49

१२. अपने विचारों को नियन्त्रित करें. 49

१३. अपने कार्यों को ईश्वरार्पण-रूप में कीजिए. 49

१४. शुद्ध बनिए, बुराई स्वतः नष्ट हो जायेगी.. 50

१५. विवेक-दण्ड उठाइए. 50

१६. केवल ईश्वर पर निर्भर रहें. 51

१७. ईश्वर में ही नित्य-सुख है. 51

१८. गरीबों में ईश्वर की पूजा करें. 51

१९. ईश्वर में संस्थित बनें. 52

२०. ईश्वर अन्तर्यामी है. 52

२१. आत्मा की खोज प्रारम्भ कीजिए. 52

२२. विचारिए, 'मैं कौन हूँ?' 53

२३. खोजें, समझें, साक्षात्कार करें. 53

२४. अन्तर्निरीक्षण करें. 53

२५. ईश्वर को अपने हृदय के अन्दर खोजिए. 54

२६. आवरण दूर करें. 54

२७. अपने अन्दर देखें.. 55

२८. ज्ञान मुक्ति प्रदान करता है. 55

२९. स्थिर बैठ जाइए. 55

३०. श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन. 56

३१. ब्राह्ममुहूर्त में ध्यान कीजिए. 56

३२. ध्यान का नियमित अभ्यास कीजिए. 57

३३. मूल से शक्ति प्राप्त कीजिए. 57

३४. धारणा से सुख की प्राप्ति.... 57

३५. अविचल शान्ति बनाये रखिए. 58

३६. मौन बनिए. 58

३७. स्थिरता में सत्य विभासित होने दें. 58

३८. आन्तरिक वाणी का श्रवण कीजिए. 59

३९. भान कीजिए कि आप आत्मा हैं. 59

४०. आत्मा में निवास कीजिए. 60

४१. आत्मा में आनन्द प्राप्त कीजिए. 60

४२. बालक की भाँति स्पष्टवादी बनें. 60

४३. नम्र तथा सरल बनिए. 61

४४. नित्य-सुख का आस्वादन कीजिए. 61

४५. असीम सुख का साक्षात्कार कीजिए. 62

४६. ईश्वर में निवास कीजिए. 62

४७. ईश्वर से सम्बद्ध रहें. 62

४८. पूर्ण आत्मार्पण कीजिए. 63

४९. नियन्ता के साथ एक बन जाइए. 63

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम अध्याय

ज्योति

. क्या आप सचमुच ईश्वर को चाहते हैं?

 

क्या आप सचमुच ईश्वर को चाहते हैं? क्या आप सचमुच उसके दर्शन के लिए लालायित हैं? क्या आपमें सच्ची आध्यात्मिक भूख है?

 

जो ईश्वर-दर्शन के लिए लालायित है, वही प्रेम का विकास कर सकता है। उसके लिए ही ईश्वर प्रकट होगा। ईश्वर तो माँग तथा माँग-पूर्ति का विषय है। यदि ईश्वर के लिए सच्ची माँग है, तो वह शीघ्र ही प्रकट होगा।

 

प्रह्लाद-जैसी प्रेमपूर्ण प्रार्थना कीजिए। राधा-जैसा गायन कीजिए। वाल्मीकि, तुकाराम तथा तुलसीदास की तरह उसके नाम का जप कीजिए। गौरांग की तरह कीर्तन कीजिए। भगवान् के विरह में एकान्त में बैठ कर मीरा की तरह रुदन कीजिए। आप इसी क्षण भगवान् का दर्शन प्राप्त करेंगे।

. ज्योति आपके अन्दर है

 

सदा धार्मिक बनिए। धर्म-मार्ग से कभी विचलित होइए। सदाचारी बनिए। वीर बनिए। निर्भय बनिए। सत्य का अभ्यास कीजिए। सर्वत्र इसकी घोषणा कीजिए।

 

आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ते जाइए। आपके अन्दर ही ज्योति है। ईश्वर पर मन को एकाग्र कीजिए। अहंकार तथा अभिमान को मार डालिए। सहानुभूति तथा विश्व-बन्धुत्व का अर्जन कीजिए। सबसे प्रेम कीजिए। आप परिपूर्ण जीवन प्राप्त करेंगे।

 

इन्द्रियों का दमन कीजिए। गम्भीर श्रद्धा तथा हार्दिकता के साथ उसकी प्रार्थना कीजिए। ईश्वर के अस्तित्व तथा आध्यात्मिक साधनाओं की शक्ति में अविचल विश्वास कीजिए। नम्र तथा सरल बनिए। आप अमरत्व को प्राप्त करेंगे।

. जीवन के उपदेश

 

नित्य चार बजे प्रातः उठ जाइए। ईश्वर के नाम का कीर्तन कीजिए (जैसे-गोविन्द जय-जय, गोपाल जय-जय, राधारमण हरि गोविन्द जय-जय) हरि-नाम का गायन करते समय सदा यह अनुभव कीजिए कि हरि आपके हृदय के अन्दर ही विराजमान हैं और आपका कीर्तन श्रवण कर रहे हैं।

 

गीता, रामायण, भागवत, विष्णुसहस्रनाम, ललितासहस्रनाम का आधे घण्टे से ले कर एक घण्टे तक नियमित स्वाध्याय कीजिए। अपने माता-पिता की आज्ञा मानिए। सदा सत्य बोलिए। अल्प बोलिए। मधुर बोलिए।

 

ईश्वरीय ज्योति आपके भीतर अधिकाधिक चमकती रहे! आप धर्म के मार्ग का अनुगमन कर इसी जीवन में भगवान् का साक्षात्कार करें!

. भला बनें, भला करें

 

"तू बिना किसी प्रकार की आसक्ति रखे अपने कर्तव्यों का पालन किये जा; क्योंकि आसक्ति-विहीन कर्मों के करने से मनुष्य परम पुरुष को प्राप्त करता है" (गीता : -१९)

 

जब भला विचार मनुष्य के जीवन का अंग बन जाता है, तो बुरा विचार उसके अन्दर प्रवेश नहीं कर पाता है। वह दूसरों की सेवा, दूसरों की भलाई में ही बहुत आनन्द लेता है। निष्काम कर्म में अपूर्व सुख तथा आनन्द है।

 

विकसित बनिए। अपने हृदय में निष्काम सेवा की सच्ची भावना बनाये रखिए। जीवन के प्रत्येक क्षण को जीवन के आदर्श तथा लक्ष्य के लिए बिताइए; तभी आप निष्काम सेवा के वास्तविक महत्त्व को समझ सकेंगे। आप निष्काम सेवा के अभ्यास द्वारा प्रखर योगी के रूप में विभासित हों! आप सच्चे शाश्वत सुख का आस्वादन करें !

. वैसा ही कीजिए, जैसा आप दूसरों से चाहते हैं

 

प्रकृति की सभी वस्तुएँ एक मुख्य नियम के द्वारा संचालित हैं और वह है कारणत्व का नियम-कर्म का नियम। यह नियम ही आन्तरिक समता तथा विधान बनाये रखता है। इस महान् नियम से कोई भी वस्तु मुक्त नहीं रह सकती।

 

कारण कार्य में निहित है तथा कार्य कारण में। कार्य कारण सदृश होता है। यह जगत् इस भौतिक नियम पर ही परिचालित होता है। यह नियम अमोघ तथा अकाट्य है।

 

प्रत्येक क्रिया की आपके अन्दर आवश्यक प्रतिक्रिया होगी। यदि आप किसी दूसरे व्यक्ति की भलाई कर रहे हैं, तो वस्तुतः आप अपनी ही भलाई कर रहे हैं; क्योंकि आत्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। 'आत्मैवेदं सर्वम्' -यही श्रुतियों अथवा उपनिषदों की जोरदार घोषणा है। यह धार्मिक कार्य समान बल तथा प्रभाव के साथ आप पर अपना प्रतिघात दिखायेगा। यह आपके लिए आनन्द तथा सुख लायेगा।

. उठिए और कार्य कीजिए

 

प्रार्थना की शक्ति अवर्णनीय है। इसकी महिमा अमिट है। सच्चे भक्त ही इसके लाभ तथा महत्त्व को समझ सकते हैं।

 

आलसी बन कर ईश्वर की सहायता के लिए लालायित बनिए। उठिए और कार्य कीजिए; क्योंकि ईश्वर उसी की सहायता करता है जो स्वयं अपनी सहायता करता है। जितना भी आपसे हो सके, आप कीजिए; शेष ईश्वर पर छोड़ दीजिए।

 

भक्तों की सेवा कीजिए। उनके संग में रहिए। जप तथा कीर्तन कीजिए। रामायण तथा भागवत का पाठ कीजिए। आप शीघ्र ही भक्ति का विकास करेंगे। ईश्वरीय कृपा का आप पर अवतरण होगा।

 

 

 

. अहिंसा का अभ्यास कीजिए

 

इस जीवन का लक्ष्य ईश्वर-साक्षात्कार ही है। इसको कभी भी भूलिए। उनकी कृपा के लिए अनवरत कामना बनाये रखिए। उनके दर्शन के लिए पिपासु बनिए। सतत सत्संग कीजिए। आप उनका दर्शन करेंगे।

 

अहिंसा का अभ्यास कीजिए। सत्य बोलिए। ईश्वर पर अटूट श्रद्धा रखिए। ईश्वरार्पण-भाव से सारे काम कीजिए। अथक सेवा कीजिए। पूर्ण भक्ति के साथ प्रार्थना कीजिए। मन तथा इन्द्रियों के साथ अपना संग्राम छेड़िए उनको ईश्वर की ओर मोड़िए। ईश्वर-विरह में रोइए। आप उनका दर्शन प्राप्त करेंगे।

 

मान कीजिए कि ईश्वर आपके हाथों से काम करते, आपकी आँखों से देखते तथा आपके कानों से सुनते हैं। आपके अन्दर परिवर्तन होगा। आपको नवीन दृष्टिकोण प्राप्त होगा। आप परमानन्द का उपभोग करेंगे।

. दयालु बनिए

 

सभी छोटे तथा बड़े धर्मग्रन्थों का सार उसी प्रकार निकाल लीजिए, जिस प्रकार मधुमक्खी फूलों में से मधु को निकाल लेती है। सभी प्रकार की बुरी आशाओं तथा कामनाओं का परित्याग कर परमेश्वर की शरण में जाइए

 

सभी वस्तुओं में ईश्वर की व्यापकता का भान कीजिए। अपने से छोटे के प्रति दयालु तथा कारुणिक बनिए, अपनी बराबरी वाले के प्रति मैत्री की भावना रखिए तथा अपने से बड़े लोगों के प्रति आदर का भाव रखिए।

 

वैराग्य-धन का अर्जन कीजिए। आत्मानन्द के द्वारा अपने मन को शीतल बनाइए। वासना-क्षय तथा तत्त्वज्ञान से प्राप्त मन की शान्ति के अमृत में आनन्द लुटिए

. विशुद्ध प्रेम का विकास कीजिए

 

प्रेम ईश्वर के राज्य, सत्य तथा शान्ति एवं सुख के अक्षय धाम का साक्षात् मार्ग है। यह सृष्टि का जीवन्त सिद्धान्त है। यही मीरा, तुकाराम तथा गौरांग महाप्रभु में निहित शक्ति थी।

 

अतः शुद्ध एवं निःस्वार्थ प्रेम का विकास करें। शुद्ध प्रेम एक अनमोल वस्तु है। इसका अर्जन शनैः शनैः कीजिए। द्वेष, मन की संकीर्णता आदि सब दुर्गुण दूर हो जायेंगे। प्रेम मन को पूर्ण शुद्ध बनाता है।

 

सब प्रकार के गलत विश्वासों, दुर्बलताओं, अन्धविश्वासों, गलत धारणाओं तथा व्यर्थ विचारों का परित्याग कीजिए। प्रेम में निवास कीजिए दिव्य जीवन पर श्रद्धा जमाइए। ईश्वर में निवास करने के लिए उत्सुकतापूर्वक सतत प्रयास कीजिए। आप परमानन्द का उपभोग करेंगे।

१०. समदृष्टि रखिए

 

सभी के प्रति समदृष्टि रखिए। गपशप का त्याग कीजिए। ज्ञानी बनना सीखिए। ईश्वर के नाम में अटूट विश्वास रखिए, उसके नाम का गायन कीजिए तथा उसके अस्तित्व का सर्वत्र भान कीजिए।

 

कठिनाइयों से विचलित होइए। धैर्य से उन्हें सहन कीजिए। मन को ईश्वर की ओर मोड़िए। आध्यात्मिक सिंह की तरह चलिए। कामना के पाश को तोड़ कर छिन्न-भिन्न कर डालिए। करुणा, शान्ति, क्षमा, सहिष्णुता आदि दैवी सम्पत् का विकास कीजिए। आप निश्चय ही परम ज्ञान तथा आनन्द प्राप्त करेंगे।

 

सर्वशक्तिमान् ईश्वर से उसकी कृपा के लिए हार्दिक प्रार्थना कीजिए। सांसारिक जीवन की परम्परागत विभिन्नताओं से ऊपर उठिए। ज्ञान-सूर्य के उदय के द्वारा अविद्या के अन्धकार को दूर कीजिए। ईश्वर के प्रति अशेष तथा पूर्ण आत्मार्पण कीजिए। आप शान्ति का उपभोग करेंगे।

११. विस्तृत दृष्टिकोण रखिए

 

सेवा-परायण जीवन बिताइए। सेवा के लिए अपने हृदय को उत्साह तथा प्रेरणा से ओत-प्रोत कर डालिए। हर क्षण सर्वशक्तिमान् प्रभु को याद रखिए।

 

अपने चरित्र का निर्माण कीजिए। उचित व्यवहार कीजिए। दया, उदारता, सहानुभूति, सहनशीलता तथा नम्रता का विकास कीजिए। अपने अभिमान के छोटे से दायरे से निकल जाइए और विस्तृत दृष्टिकोण रखिए। शिष्टतापूर्वक विनीत तथा मधुर शब्दों का उच्चारण कीजिए। अनावश्यक कामनाओं तथा विचारों को नष्ट कर डालिए।

 

अपने आदर्शों, सिद्धान्तों तथा विचारों पर दृढ़तापूर्वक डटे रहिए। समस्त जगत् के विरोध करने पर भी अपने संकल्प से विचलित होइए। सदाचार तथा दिव्य जीवन के सिद्धान्तों पर साहस के साथ डटे रहिए। एक गुरु के उपदेश का पालन कीजिए। आप परब्रह्म को प्राप्त करेंगे।

१२. सभी से प्रेम कीजिए

 

सबसे प्रेम कीजिए। शुद्ध बनिए। सबकी आत्म-भाव से सेवा कीजिए। अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण रखिए। स्वयं पर निर्भर रहिए। ईश्वर की कृपा के लिए अनवरत प्रयास करते रहिए।

 

स्त्री-पुरुष के बीच कोई भेद रखिए। जब आप स्त्रियों के साथ हों, तब इस मन्त्र का जप कीजिए- "एक सच्चिदानन्द आत्मा।" जो आत्मा आपके हृदय में है, वही आत्मा सभी स्त्रियों के अन्दर भी व्याप्त है। लिंग-भावना विलुप्त हो जायेगी। आप उनमें भी ईश्वर का ही दर्शन करेंगे।

 

अनुभव कीजिए कि भगवान् श्री कृष्ण सभी हाथों से काम करते, सभी आँखों से देखते तथा सभी श्रोत्रों से सुनते हैं। राधा की भाँति गाइए। उनके दर्शन के लिए गोपियों के समान लालायित रहिए। भगवान् कृष्ण की कृपा आप पर अवश्य होगी। वह अमर मित्र हैं। इसको कभी भूलिए। आप उनका साक्षात्कार करेंगे।

१३. सबमें आत्मा के दर्शन कीजिए

 

कोई ऐसी वस्तु है जो धन से भी बढ़ कर प्रिय है; कोई ऐसी वस्तु है जो पुत्र से भी बढ़ कर प्रिय है; कोई ऐसी वस्तु है जो स्त्री से भी बढ़ कर प्रिय है; कोई ऐसी वस्तु है जो प्राणों से भी अधिक प्रिय है; वह तेरी आत्मा है-अन्तर्यामी, अमर करुणानिधान प्रभु!

 

दयालु तथा कारुणिक बनिए। शुद्ध तथा विनम्र बनिए। मधुर तथा प्रिय बनिए। विनीत बनिए। सहृदय बनिए। दीनों के बन्धु बनिए; उनके साथ रहिए; उनकी सेवा कीजिए; जब भी वे कठिनाई में हों, उनको प्रसन्न कीजिए। अपने जीवन को सरल बनाइए। सबमें आत्मा को ही देखिए। अनेकता के भावों को त्याग दीजिए। सबके प्रति समदृष्टि रखिए।

 

कठोर शब्दों का प्रयोग करें। दूसरों का शोषण करें। बेकार बकवास तथा सांसारिक गपशप में अपना अमूल्य समय नष्ट करें। सारी आसक्तियों से संन्यास ले लें।

१४. सेवा करें, प्रेम करें, दान दें

 

ओछे तथा सम्मान प्राप्त कार्यों में विभेद लायें। यदि कोई आदमी अपने शरीर के किसी हिस्से में तीव्र वेदना का अनुभव कर रहा हो, तो उसके उस पीड़ित भाग को धीरे-धीरे दबाइए। ऐसा अनुभव कीजिए कि आप रोगी के शरीर में भगवान् की सेवा कर रहे हैं। अपने इष्ट-मन्त्र का भी जप कीजिए। यदि आप सड़क के किनारे किसी मनुष्य अथवा किसी जानवर के शरीर से रुधिर प्रवाहित होते देखें, तो अपनी कमीज के ऊपरी हिस्से में से कुछ कपड़ा फाड़ कर उसके घाव पर पट्टी बाँधिए। रेलवे स्टेशन पर गरीब कुलियों के साथ किसी भी प्रकार का झगड़ा आदि कीजिए। उदार तथा दानशील बनिए। सदा अपनी जेब में कुछ पैसे रखिए तथा उनकों गरीबों और असहायों में बाँट दीजिए।

 

हृदय के शुद्ध होने पर मन स्वतः ही ईश्वर की ओर लग जायेगा। शुद्ध प्रेम, आत्मार्पण तथा उपासना के द्वारा अन्ततः यह ईश्वर में ही विलीन हो जाता है।

 

१५. दान दीजिए, दान दीजिए

 

दान के द्वारा ही पापों को नष्ट किया जा सकता है। प्रभु ईसामसीह कहते हैं-"दान अनेकानेक पापों को ढक लेता है।" भगवद्गीता में आप पायेंगे : "यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्-यज्ञ, दान तथा तप ज्ञानियों के लिए भी पावन हैं।

 

कष्टपीड़ित मानवों के दुःखों को दूर करने के लिए प्रचुर, अबाध तथा सहज रूप से दान करना ही बुरी प्रकृति को नष्ट करने का प्रबल साधन है। पानी के समान धन का दान कीजिए। यदि आप दान करते हैं, तो संसार का सब धन आपको प्राप्त होगा। यही प्रकृति का अमिट, अकाट्य तथा अविचल नियम है। अतः दीजिए, दीजिए।

१६. सदा प्रसन्न रहिए

 

सदा प्रसन्न तथा सुखी रहिए। उदासी तथा निराशा को दूर कीजिए। उदासी से बढ़ कर कोई भी दूसरा संक्रामक रोग नहीं है। विचार, ईश्वरीय भजन, प्रार्थना, प्राणायाम, तेजी से खुली हवा में टहलना, विरोधी गुण-सुख के भाव आदि पर विचार करना इत्यादि के द्वारा निराशा तथा उदासी को दूर भगाइए।

 

दूसरों के लिए वरदान के रूप में जीवन-यापन कीजिए। भान कीजिए कि सब-कुछ ज्योति तथा आनन्द ही है। अपने मन को किसी भी बाह्य वस्तु की ओर जाने दीजिए। मन की सभी बिखरी किरणों को समेट लीजिए। अवधान-शक्ति को बढ़ाइए। अप्रिय वस्तुओं तथा विचारों के प्रति भी दिलचस्पी बढ़ाइए। बहुत-सी मानसिक दुर्बलताएँ स्वतः ही मिट जायेंगी। आपका मन अधिकाधिक सबल होता जायेगा।

 

 

१७. यथाव्यवस्था के गुण अर्जन कीजिए

 

दूसरों की सेवा करते समय कभी भी आनाकानी करें। सेवा में आनन्द लें। सेवा के सुअवसर की ताक में रहें। काम ही ईश्वर की पूजा है।

 

मिलनसार, प्रिय तथा प्रसन्न स्वभाव रखिए। सहानुभूति, यथा- व्यवस्था, आत्मसंयम, प्रेम तथा करुणा रखिए। दूसरों की आदतों तथा उनके तौर-तरीकों के अनुकूल ही स्वयं को बनाने की कोशिश करें। दूसरों से कटु शब्द सुन कर और अपमानित किये जाने पर भी सन्तुलित रहें। सुख, दुःख, शीत एवं उष्ण-सभी में सन्तुलित मन बनाये रखिए।

 

ज्योति तथा ज्ञान को ग्रहण करने के लिए कर्मयोग मन को तैयार करता है। एकता के मार्ग के सारे व्यवधानों को तोड़ कर यह हृदय को विकसित बनाता है। चित्तशुद्धि के लिए कर्मयोग एक प्रबल साधन है। अतः सतत निष्काम सेवा का अभ्यास करें।

१८. सदाचारी बनें

 

पुण्य-कर्मों के द्वारा सुख तथा पाप-कर्मों के द्वारा दुःख होता है। कर्मों के फल अवश्यमेव मिलते हैं। कर्म के बिना कोई भी फल नहीं मिलता। सदाचार ही ईश्वर के चरण कमलों की प्राप्ति का आश्रय है। सदाचार के द्वारा सब-कुछ प्राप्त किया जा सकता है।

 

मन, वचन तथा कर्म से किसी प्राणी की हिंसा करें। दयालु तथा दानशील बनें। अपने विचारों में उदार बनें। सतत सत्यपरायण रहें। क्रोध, घृणा तथा द्वेष से मुक्त रहें।

 

अपने गुरुओं तथा गुरु जनों के प्रति आदर तथा भक्ति रखें। श्रद्धा एवं सच्चाई के साथ देवों की पूजा करें। कपटी लोगों के प्रति विनम्र रहें। आप इस लोक तथा परलोक में बहुत यश और पुण्य भोगेंगे।

१९. सद्गुणों का विकास करें

 

सद्गुणों का विकास कीजिए। आप अपने अन्दर अच्छी आदतों को डालिए। भले कर्म कीजिए। नियमित ध्यान कीजिए। ईश्वर में निवास करने का प्रयास कीजिए। सारे दोष, दुर्बलताएँ तथा बुरे विचार मूलतः नष्ट हो जायेंगे।

 

अपने हृदय में कोई भी कामना रखें। सबसे मिल कर रहें। सबको गले लगायें। सबसे प्रेम करें। यथाव्यवस्था के गुण को बनायें। अथक सेवा के द्वारा सभी के हृदय में प्रवेश करें। इस प्रकार सबके अन्दर एक ही आत्मा का दर्शन करें।

 

सारे भ्रामक नाम-रूपों को भूल जाइए। हर क्षण, हर वस्तु में भगवान् श्री कृष्ण के दर्शन कीजिए। आप परम शान्ति, आनन्द तथा अमृतत्व का उपभोग करेंगे।

२०. अच्छी आदतें डालिए

 

आपके चित्त का अधिकांश भाग ऐसे अनुभवों के द्वारा गठित हुआ है, जो भीतर के प्रकोष्ठों में डूबे हुए हैं; परन्तु जिनको पुनः निकाला जा सकता है। आप चित्त में नयी प्रवृत्तियों, नये पदार्थों, विचारों तथा चरित्र का निर्माण कर सकते हैं।

 

गहराई के साथ विचार कीजिए। चिन्तन कीजिए। सतत सत्संग कीजिए। निष्काम सेवा-यज्ञ कीजिए। साधना-चतुष्टय का अर्जन कीजिए। उसका विकास कीजिए।

 

किसी का भी उपहास कीजिए। किसी के प्रति अपनी भृकुटि चढ़ाइए। अपनी इन्द्रियों का दमन कीजिए। सदा प्रसन्न रहिए। पीछे देखिए। कामना तथा क्रोध से अपने को मुक्त रखिए। अभिमान का परित्याग कीजिए। अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी बनाइए ध्यान कीजिए आप सच्चे सुख का अनुभव करेंगे।

२१. सहन-शक्ति का विकास कीजिए

 

सूर्यास्त के समय जिस तरह सूर्य अपनी सारी किरणों को समेट कर क्षितिज में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार अपने मन की समस्त किरणों को समेट कर सर्वशक्तिमान् प्रभु के पाद-पद्मों में लीन कर दीजिए।

 

मन को ढीला कभी छोड़िए भगवान् बुद्ध के समान प्रेम, करुणा, दया तथा नम्रता का अर्जन कीजिए। गरीबों की सेवा तथा सहायता कीजिए। निराश तथा सन्तप्त व्यक्तियों को सान्त्वना तथा धीरज दीजिए। आप दिव्य बन जायेंगे।

 

तितिक्षा का विकास कीजिए। अपने को उन्नत आध्यात्मिक चेतना के अनुकूल बनाइए। अपने मन को ईश्वर के चरण-कमलों में स्थापित कीजिए। कृपा, ज्योति, शुद्धता, शक्ति, शान्ति तथा ज्ञान के लिए ईश्वर से प्रार्थना कीजिए। आप अवश्य ही उनको पायेंगे तथा परमानन्द का उपभोग करेंगे।

२२. नपे-तुले शब्द बोलिए

 

मन को चतुराई तथा कुशलता के साथ नियन्त्रित करें। ठीक-ठीक तथा स्पष्ट विचार करें। अपनी वाणी को अनुशासित करें। मधुर, कोमल, नम्र तथा सत्य-वचन बोलें। नपे-तुले शब्दों में बोलने वाला आदमी बनें

 

नम्र बनें तथा सभी प्राणियों को मानसिक अभिवादन करें। सर्वत्र ईश्वरीय सत्ता का भान करें। घमण्ड का परित्याग करें। मन, वचन तथा कर्म से कभी किसी को आघात पहुँचायें। सदा भले कर्म करें। आप परम शान्ति तथा नित्य-सुख को प्राप्त करेंगे।

 

नित्य-प्रति हृदय के अन्तरतम से प्रार्थना कीजिए तथा अपने हृदय को ईश्वर के साथ एक कर डालिए। सरल तथा विनीत बनें। सदाचार का अभ्यास करें। सन्तोष का विकास करें। आत्मानन्द का पान करें।

२३. जीवन को ज्योति दें

 

शक्ति की कामना, भौतिक लोभ, वैषयिक उत्तेजना, स्वार्थपरायणता, काम, धन तथा निम्न प्रवृत्तियों के प्रति राग ने मनुष्य को सच्चे आध्यात्मिक जीवन से गिरा कर भौतिक जीवन से आबद्ध कर दिया है। सच्चे हृदय से भक्ति के तत्त्वों के अभ्यास के द्वारा वह अपनी विगत ईश्वरीय महिमा को पुनर्प्राप्त कर सकता है। भक्ति पाशवी प्रकृति को दैवी प्रकृति में परिणत कर मनुष्य को दिव्य महिमा की चोटी पर आसीन करती है।

 

आप भक्ति का विकास करें, ताकि इसके द्वारा आप ईश्वरत्व तथा आत्म-साक्षात्कार में मार्ग-दर्शन प्राप्त करें। आध्यात्मिक ज्योति आपमें दिनानुदिन प्रखरतर होती जाये!

२४. अपने दोषों को स्वीकार कर लीजिए

 

दिव्य ज्योति को स्थिरता के साथ जलने दीजिए। हर व्यक्ति के साथ आदर के साथ बातचीत कीजिए। सबके प्रति समदृष्टि रखिए। सबमें ईश्वर को ही देखिए। ईश्वर के लिए उग्र तथा अनन्य भक्ति का अर्जन कीजिए।

 

छोटी-छोटी बातों के द्वारा उद्विग्न बनिए। दूसरों के द्वारा संकेत दिये जाने पर अपने दोषों को स्वीकार कर लीजिए। उस आदमी को धन्यवाद दीजिए, जो कि आपके दोषों को बतलाता है। प्रार्थना कीजिए। ईश्वरीय लीला का गान कीजिए। आप अमर सुख को प्राप्त करेंगे।

 

अपनी बुद्धिमत्ता से काम लीजिए। मनुष्य के लिए बुद्धिमत्ता ही इस जगत् की सबसे बड़ी निधि है। बुद्धिमानी के साथ इस जगत् के सारे कार्यों को कीजिए, तभी आप अपनी सारी कामनाओं की पूर्ति करने में समर्थ हो सकेंगे।

२५. छोटे अहं को मार डालिए

 

जिस प्रकार काले बादल सूर्य को ढक लेते हैं, उसी प्रकार अहंकार तथा वासनाएँ ज्ञान-सूर्य को ढक लेते हैं। ध्यान का अनवरत प्रवाह बनाये रखिए। छोटे अहं को मार डालिए। शुद्ध प्रेम का विकास कीजिए। कर्म का फल ईश्वर पर अर्पित कीजिए। उसकी कृपा के लिए प्रार्थना कीजिए। आप अमृतत्व-सुधा का पान करेंगे।

 

अज्ञान तथा भौतिकता की निद्रा से जाग उठिए। निष्काम सेवा तथा ईश्वर की उपासना की ओर ध्यान को लगाइए। सभी मनुष्यों के प्रति बन्धुत्व-भावना का विकास कीजिए; आप परम शान्ति का उपभोग करेंगे।

२६. आत्म-निर्दोषिता सिद्ध करने वाली भावनाको नष्ट कीजिए

छोटी-छोटी बातों से उद्विग्न बनिए। प्रसन्न, प्रिय स्वभाव तथा यथाव्यवस्था का गुण अपनाइए। दूसरों के द्वारा दर्शाये जाने पर अपने दोषों को स्वीकार कर लीजिए। उनको दूर कीजिए तथा दोष दिखाने वाले मनुष्य को धन्यवाद दीजिए, तभी आप आध्यात्मिकता तथा ध्यान में उन्नति प्राप्त कर सकेंगे।

 

अन्तर्निरीक्षण कीजिए। भीतर देखिए। अपने दोषों को दूर करने का प्रयास कीजिए यही सच्ची साधना है। आपको अपनी सारी दुर्बलताओं को दूर करना है, बहुत-सी पुरानी आदतों को नष्ट करना है। अपने को निर्दोष बताने की आदत तथा आत्मग्राही भावना को भी दूर कीजिए।

 

जप, प्रार्थना, कीर्तन, ध्यान, गीता तथा रामायण के स्वाध्याय में सदा नियमित बनिए। ब्रह्मचर्य तथा मौन व्रत का पालन कीजिए; आप परम वस्तु का शीघ्र ही उपभोग करेंगे।

 

२७. क्रोध को प्रेम से जीतिए

 

क्रोध शारीरिक स्नायु-प्रणाली को बरबाद कर अन्तः सूक्ष्म शरीर पर स्थायी छाप डाल देता है। सूक्ष्म शरीर से विषाक्त तीर निकलेंगे। भयंकर क्रोधावेश सूक्ष्म शरीर में गहरा घाव पैदा करेगा। क्या अब भी आपको क्रोध के भयंकर परिणामों का ज्ञान नहीं हुआ?

 

क्रोध का शिकार बनिए। उसको क्षमा, प्रेम, करुणा, सहानुभूति, विचार तथा दूसरों के प्रति दया के द्वारा नष्ट कीजिए।

 

अपने मन को ईश्वर के चरण-कमलों में लगाइए अपने हाथों को काम करने दीजिए। अभ्यास के द्वारा आप एक ही समय में दोनों कामों को कर सकते हैं। शारीरिक काम यन्त्रवत् स्वतः ही होने लगेंगे। आपका मन भगवान् के पाद-पद्मों में सदा निवास करेगा। संसार में रहते हुए भी आप ईश्वर का साक्षात्कार कर सकेंगे।

२८. बीस आध्यात्मिक नियमों का पालन कीजिए

 

आध्यात्मिक जीवन बकवास मात्र नहीं है। यह एक प्रकार की उत्तेजना भी नहीं है, वरन् यह है आत्मा में निवास तथा विशुद्ध आनन्द का अनुभवातीत अनुभव

 

सत्य तथा धर्म के मार्ग का अनुगमन कीजिए। बीस आध्यात्मिक नियमों का पालन कीजिए। अपने ध्यान में नियमित बनिए। धीर बनिए अन्तर्निरीक्षण का अभ्यास कीजिए। निष्काम सेवा कीजिए। सर्वग्राही प्रेम का अर्जन कीजिए। वैराग्य का विकास कीजिए। आप अमरत्व को प्राप्त करेंगे।

२९. सरल जीवन बिताइए

 

सरल जीवन बिताइए। आपके विचार उन्नत हों। ईश्वर से भय करिए सत्य बोलिए। सबसे प्रेम कीजिए। सबके अन्दर अपनी आत्मा कादर्शन कीजिए। अपने सभी कार्यों में सच्चा बनिए। आप अपने जीवन में सफलता तथा आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त करेंगे।

 

किसी मामले में चिन्ताग्रस्त बनिए सदा प्रसन्न रहिए। सदा अपनी सहज बुद्धि तथा अपने विचार के द्वारा काम कीजिए। सदा अपने मन को सन्तुलित बनाये रखिए। अपने मन को ईश्वर की ओर मोड़िए। उसके नाम का गान कीजिए। उसके दर्शन के लिए पिपासु बनिए। हृदय से सच्चा बनिए। आप पर ईश्वरीय कृपा का अवतरण होगा।

 

दृढ़-निश्चय तथा लौह-संकल्प रखिए। आपके पास अपने-आपको एक सन्त के रूप में परिणत करने की समस्त सामग्री है। आध्यात्मिक मार्ग में सदा संलग्न रहिए। आन्तरिक शक्ति को प्रबुद्ध बनाइए प्रयत्न कीजिए। बढ़ते जाइए। साक्षात्कार कीजिए।

३०. सादा जीवन तथा उच्च विचार

 

वेद-मन्त्रों की शक्ति में श्रद्धा का अर्जन कीजिए। नित्य-प्रति जप तथा ध्यान का अभ्यास कीजिए। सात्त्विक आहार कीजिए। अपने पेट को अधिक भरिए। प्रकृति के नियमों का पालन कीजिए। नित्य-प्रति प्रचुर शारीरिक व्यायाम कीजिए। अपने नित्य के कर्मों को यथा-समय कीजिए। सरल जीवन तथा उच्च विचार का विकास कीजिए। आप इसी जीवन में ईश्वर का साक्षात्कार कर सकेंगे।

 

आप ईश्वर के पावन नामों का स्मरण करते जायें; आप दिव्य समाधि तथा ईश्वरीय योग के सागर में निवास करें! आप महिमामय ऐश्वर्य के पथ पर सदा अग्रसर होते रहें!

३१. अनुशासित जीवन बितायें

आप समस्त संसार के वास्तविक मालिक अथवा शासक हैं। आप किसी के भी अधीन नहीं हैं। सभी प्रकार के दुःखों, भयों तथा शोकों का

 

परित्याग कीजिए। शान्ति में सदा निवास कीजिए। सदा आत्मा की पूजा करें। अनुशासित जीवन बितायें। अपने चरित्र का निर्माण करें। धार्मिक बनें तथा दूसरों की भलाई के लिए सदा कार्य करें। अपने गुरु के प्रति भक्ति तथा श्रद्धा का भाव रखें। धारणा-शक्ति का विकास करें।

 

काम, अभिमान, क्रोध, स्वार्थ, मद इत्यादि का परित्याग करें। आप चित्त-शुद्धि को प्राप्त करेंगे। जब विषय-सुखों के प्रति राग तथा आकर्षण का लोप हो जायेगा, तब आत्म-ज्ञान का उद्भव होगा। आप परमानन्द का उपभोग करेंगे।

३२. जीवन अमूल्य है

 

तो जन्म से तथा पाण्डित्य से ही आदमी भला बन सकता है। अच्छे चरित्र से ही मनुष्य भला बनता है। जिसने अपने चरित्र को खो दिया है, उसने स्वयं को ही खो दिया है। सच्चरित्र के अर्जन द्वारा मनुष्य आध्यात्मिक प्रगति को प्राप्त करता है। जीवन बहुमूल्य है। गीता के उपदेश के अनुसार जीवन-यापन कीजिए। फल की कामना तथा अभिमान से रहित हो कर अपना कार्य कीजिए। सोचिए कि आप भगवान् नारायण के हाथों के उपकरण हैं। आप शीघ्र ही योगी बन जायेंगे। बहुरूपिया पुरुष में निष्ठा रखता है, परन्तु स्त्रियों-जैसी चेष्टा करता है; उसी प्रकार ईश्वर में निष्ठा रखिए तथा हाथों के द्वारा कार्य कीजिए। आप एक ही समय में दोनों वस्तुओं को पा जायेंगे। आप ईश्वर के साथ एक बन जायेंगे।

३३. आध्यात्मिक धन प्राप्त कीजिए

 

शून्य की कितनी भी संख्या तब तक कोई मूल्य नहीं रखती, जब तक कि उसके पीछे एक अंक नहीं रखा जाता; इसी प्रकार तीनों लोकों का धन भी व्यर्थ है यदि आप आध्यात्मिक धन अथवा आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील नहीं हैं।

 

अतः आत्मा में निवास कीजिए। इस जीवन के साथ आत्मा को जोड़ दीजिए। "सबसे पहले ईश्वर के साम्राज्य की खोज कीजिए। ये सारी वस्तुएँ आपको स्वतः ही मिल जायेंगी" (प्रभु ईसामसीह) जिस प्रकार हरिकेन लैम्प के भीतर दीप जलता रहता है, उसी प्रकार चिरकाल से तुम्हारे हृदय-दीप में दिव्य ज्योति जल रही है। अपने हृदय की गहराइयों में गोता लगायें उस ईश्वरीय ज्योति पर ध्यान करें और उसके साथ एक हो जायें।

 

३४. कर्म के नियम को समझिए

 

कोई भी घटना बिना किसी निश्चित कारण के घटित नहीं हो सकती। हर वस्तु कारण-कार्य के नियम का अनुगमन करती है। यह नियम बहुत ही रहस्यमय है। यही कारण है कि भगवान् कृष्ण कहते हैं: "गहना कर्मणो गतिः-कर्म की गति गहन है।" प्रकृति की सारी शारीरिक तथा मानसिक शक्ति इस कारण-कार्य के महान् सिद्धान्त का अनुगमन करती है। नियम तथा नियन्ता एक ही हैं।

 

आप अपने विचार तथा चरित्र को बदल कर अपने लिए नवजीवन का निर्माण कर सकते हैं। धार्मिक विचारों तथा कार्यों के द्वारा आप एक धार्मिक व्यक्ति तथा सन्त बन सकते हैं। आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद आप अपने स्वरूप में निवास कर सकते हैं। आप नियन्ता के साथ एक हो जायेंगे तथा फिर कारण-कार्य का नियम आप पर लागू नहीं होगा। आपने अब प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली है।

३५. एक ही गुरु में निष्ठा रखिए

 

क्षमा का विकास कीजिए। व्यर्थ की गपशप का त्याग कीजिए। धार्मिक ग्रन्थों का स्वाध्याय कीजिए। दृढ़ता, सरलता, ब्रह्मचर्य, निर्दोषिता तथा सुख-दुःख, हानि-लाभ आदि द्वन्द्वों में मन के समत्व को बनाये रखने का अभ्यास कीजिए। किसी प्राणि को हानि पहुँचाइए

 

धैर्य, लौह-संकल्प तथा अथक संलग्नता रखिए। एक स्थान, एक आध्यात्मिक गुरु, एक साधना तथा योग की एक ही प्रणाली पर आप टिके रहिए। यही सच्ची सफलता का एकमेव मार्ग है।

 

उदासी तथा अवसाद को, विचार, दिव्य संगीत के गायन, प्रार्थना, का जप, प्राणायाम, खुली हवा में तेजी के साथ टहलना तथा विपरीत गुण-आनन्द के द्वारा शीघ्र ही दूर कीजिए। सभी अवस्थाओं में प्रसन्न रहने का प्रयास कीजिए। अपने चतुर्दिक् के व्यक्तियों में आनन्द विकीर्ण कीजिए।

३६. अपने गुरु की पूजा कीजिए

कामनाओं से पूर्णतः मुक्त बनिए। ईश्वर के ज्ञान की पिपासा रखिए। निष्काम सेवा में संलग्न रहिए। आपको अपरोक्षानुभव तथा ईश्वर-दर्शन प्राप्त होंगे।

 

अपने माता, पिता, गुरु और अतिथि की सेवा कीजिए तथा उनको केवल मनुष्य ही नहीं, वरन् साक्षात् देवता समझ कर उनकी पूजा कीजिए। उनको तदनुसार आदर दीजिए। बड़े आदर-भाव के साथ उनकी सेवा कीजिए भाग्यवाद का शिकार बनिए। अपनी आदतों को बदल डालिए। सदाचारमय जीवन बिताइए। लोभ तथा उद्वेग का दमन कीजिए। अभिमान का त्याग कीजिए। ईश्वर के भक्त बनिए। आपमें दिव्य ज्योति का अवतरण होगा।

३७. ज्ञानियों के साथ सत्संग कीजिए

 

हृदय से सच्चा बनिए। नाम-रूप के मिथ्या खिलौनों की ओर दौड़िए। नाम-रूप सब मिथ्या हैं। वे वायु के स्पन्दन मात्र हैं। इस माया-जगत् में कोई भी व्यक्ति शाश्वत यश नहीं कमा सकता। अल्प तथा नश्वर वस्तुओं की चिन्ता कीजिए। शाश्वत सत्य के लिए ही सदा प्रयत्नशील रहिए ।ईश्वर के चिन्तन एवं आन्तरिक भाव के साथ निरन्तर मौन हो कर निष्काम सेवा कीजिए। दूसरों की सेवा करते समय कभी भी असन्तोष प्रकर कीजिए। सेवा करने के सुअवसर की प्रतीक्षा में रहिए। एक भी सुअवसर अपने हाथ से जाने दीजिए सुअवसरों का निर्माण कीजिए। जप, कीर्तन, ध्यान और गीता, रामायण आदि के स्वाध्याय में नियमित रहिए। अपने आवेगों को सदा नियन्त्रित रखिए। मौन तथा ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए। साधु-सन्तों से सम्पर्क रखिए। आपको परमानन्द प्राप्त होगा।

३८. ज्ञानियों के उपदेशों पर चलिए

 

जो मनुष्य दो खरगोशों के पीछे दौड़ता है, वह उनमें से एक को भी नहीं पकड़ पाता; इसी प्रकार वह ध्याता जो कि दो विरोधी विचारों के पीछे दौड़ता है, किसी एक भी विचार में सफल नहीं होता।

 

एक ही ईश्वरीय विचार को बनाये रखिए। हर हालत में उसी पर निष्ठा रखिए। अधिकाधिक शक्ति, बल तथा एकाग्रता के साथ उस विचार का पीछा कीजिए। आप अवश्य ही सफल होंगे। चिन्तित बनें। मन के आदेशों पर चलें ज्ञानियों तथा सन्तों के आदेशानुसार कार्य कीजिए। महात्माओं के स्मरण मात्र से भौतिकवादी व्यक्तियों की नास्तिक प्रवृत्तियों का नाश होता है। उनमें मुक्ति अथवा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति की प्रेरणा तथा प्रवृत्ति का जागरण होता है।

३९. ईश्वर प्रेम है

 

ईश्वर सत्य है। ईश्वर प्रेम है। सत्य बोलिए। हर व्यक्ति से प्रेम कीजिए। आप शीघ्र ही उनका साक्षात्कार करेंगे। साधुओं, संन्यासियों तथा भक्तों का सत्संग कीजिए। इससे आप विवेक, बल, वैराग्य, आध्यात्मिक शक्ति तथा मन की शान्ति प्राप्त करेंगे। दूसरा कोई मार्ग नहीं है। साधुओं की खोज कीजिए। वे सर्वत्र हैं। आपमें सच्चाई की आवश्यकता है। वे प्रेमपूर्वक सदा खुले हाथों से आपको ग्रहण करने के लिए तैयार हैं।

 

सत्संग से आपका मन ईश्वरीय विचार-ईश्वरीय महिमा, ईश्वरीय भाव, आत्मोद्बोधक आध्यात्मिक विचार-से उसी प्रकार सन्तृप्त हो जायेगा, जिस प्रकार जल से चीनी सन्तृप्त होती है; तभी आप सदा दिव्य चेतना में संस्थित रहेंगे। तब आप उतनी ही देर में आत्म-साक्षात्कार कर सकते हैं, जितनी देर में मनुष्य एक फूल को मसल डालता है।

४०. नाम सर्वशक्तिमान् है

 

संसार-सर्प से डसे गये व्यक्तियों के लिए भगवान् का नाम ही प्रबल विष-हर मन्त्र है। यह अमृत है, जिससे अमृतत्व तथा शाश्वत शान्ति की प्राप्ति होती है। जो भगवान् के नाम का जप करते हैं, उनसे यमराज भी भयभीत रहता है। वह उनके पास तक नहीं पहुँच सकता। सदा ईश्वर के नाम का जप कीजिए और अभय अवस्था प्राप्त कीजिए।

 

ईश्वर आपके कार्यों का पथ-प्रदर्शन करे ! वह आपके पथ पर प्रकाश दे, जिससे आप जन्माधिकार, जीवन के लक्ष्य-आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त कर लें! आप सुख, शान्ति तथा सम्पन्नता में निमग्न हो कर जियें।

४१. नियमित कीर्तन कीजिए

संकीर्तन मन अथवा आत्मा के लिए आहार है। संकीर्तन ईश्वरीय 'टॉनिक' है। संकीर्तन श्रान्त स्नायुओं के लिए परम विश्श्रान्तिदायक है। संकीर्तन स्वर्गिक सुधा है। ब्राह्ममुहूर्त तथा रात्रि में संकीर्तन के द्वारा इस अमृत का नित्य-प्रति पान कीजिए।

भक्ति का बल तथा उसकी उग्रता आत्मार्पण और त्याग की परिपूर्णता पर निर्भर है। अधिकांश लोग गुप्त तृप्ति के लिए सूक्ष्म कामनाओं को रखे रहते हैं, यही कारण है कि वे भक्त उन्नति नहीं कर पाते। कामना तथा अहंकार-ये ही आत्मार्पण की दो बाधाएँ हैं।

४२. ईश्वरीय महिमा गाइए

 

पूरे हृदय तथा चित्त के साथ सदा ईश्वर की पूजा कीजिए। उसकी महिमा गाइए। उसका नाम सदा स्मरण रखिए, सारी विपत्तियाँ स्वतः ही नष्ट हो जायेंगी। आपका हृदय शुद्ध हो जायेगा। आप शीघ्र ही ईश्वर-दर्शन करेंगे। आप उसकी उपस्थिति का भान करेंगे।

 

ईश्वरीय ज्योति के अवतरण के लिए ईश्वर से हार्दिक प्रार्थना कीजिए। उसकी कृपा के लिए लालायित रहिए। विरह-व्यथा के कारण उसके लिए रुदन कीजिए। उससे मिलने के लिए व्याकुल बनिए। दिव्य प्रेम के अनल में मन को विलीन कीजिए। प्रेम-मधु का पान कीजिए। ईश्वर-प्रेम की मदिरा पी कर उन्मत्त बन जाइए। अमृतत्व तथा