जपयोग

 

भारत के ऋषियों के पवित्र मन्त्र-शास्त्र की व्यावहारिक शिक्षा

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

अनुवादिका

सुश्री कान्ती कपूर, एम.., एल.टी.

 

 

 

प्रकाशक

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९ १९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम हिन्दी संस्करण १९५५

 

द्वादश हिन्दी संस्करण २०१९

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

ISBN 81-7052-058-4

HS 70

 

 

PRICE: 120/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट

एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर-२४९ १९२, जिला टिहरी गढ़वाल,

उत्तराखण्ड' में मुद्रित

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समर्पण

 

देवर्षि नारद, ध्रुव, प्रह्लाद, वाल्मीकि, तुकाराम, रामदास, श्री रामकृष्ण तथा उन सभी योगियों को जिन्होंने 'प्रभु-नाम-स्मरण' द्वारा प्रभु-प्राप्ति की।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशकीय

 

परम पावन श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज की अभूतपूर्व एवं अत्यधिक उपयोगी कृति 'जपयोग' का यह संस्करण, भक्त साधकों के सब ओर से प्राप्त होने वाले स्नेहपूर्ण अनुरोधों के उत्तर में निकाला गया था। इस पुस्तक के महत्त्व पर बल देने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि इसकी विषय-वस्तु आध्यात्मिक साधना की नींव है। भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा है : "यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि-सब प्रकार के यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ।' 'सतत भगवन्नाम- स्मरण करना' योग की सीढ़ी का प्रथम सोपान तो है ही, साथ ही योग की विभिन्न साधनाओं में प्रत्येक के अन्तर में प्रवाहित होते रहने वाली अन्तर्धारा भी है।

 

इस पुस्तक की विषय-वस्तु ऐसी है कि यह अध्यात्म-पथ के समस्त जिज्ञासु साधकों की सुदृढ़ सहचर बन जायेगी। साधकों को उपलब्ध कराने के लिए इस विषय पर इससे अधिक सहज-सुलभ एवं सर्वांगपूर्ण पुस्तक अन्य नहीं हो सकती। इसके अध्यायों को इतने क्रमबद्ध रूप में सँजोया गया है कि यह पाठकों को सुविधा प्रदान तो करते ही हैं, साथ ही भक्तियोग के महत्त्वपूर्ण विषय में क्रमबद्ध श्रृंखला भी प्रस्तुत करते हैं।

 

निश्चित रूप से हमें पूर्ण विश्वास है कि समस्त पाठक इस अनुपम ग्रन्थ का अत्यन्त उत्साहपूर्वक स्वागत करते हुए इसको यथोचित प्रशंसा एवं सम्मान देंगे। परम पिता परमात्मा की कृपा हम सब पर हो!

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भूमिका

 

इस कलि-काल में भगवद्-प्राप्ति का केवल जप ही एक सरल उपाय है। गीता के व्याख्याकार और 'अद्वैतसिद्धि' नामक ग्रन्थ के प्रख्यात प्रणेता स्वामी मधुसूदन सरस्वती को श्री कृष्ण-मन्त्र के जप से ही भगवान् श्री कृष्ण के साक्षात् दर्शन हुए थे। 'पंचदशी' नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ के प्रणेता स्वामी विद्यारण्य को जप द्वारा ही माता गायत्री के प्रत्यक्ष दर्शन हुए थे; पर आजकल सभी शिक्षित लोगों और कालेजों के विद्यार्थियों का विश्वास विज्ञान के प्रभाव के कारण मन्त्रों पर से उठ गया है। जप करना उन लोगों ने बिलकुल छोड़ दिया है। यह सचमुच बड़े ही खेद की बात है। जब तक खून में गरमी रहती है, तब तक अँगरेजी पढ़े-लिखे लोग जिद्दी, अभिमानी और नास्तिक रहते हैं। उनके मन और मस्तिष्क का एक बार पूरी तरह कायाकल्प कराने की आवश्यकता है। जीवन अल्प है। समय भागा जा रहा है। संसार यातनाओं से पूर्ण है। अविद्या की गाँठें काट कर निर्वाण-सुख का आनन्द लें। आपका जो दिन बिना जप किये बीतता है, उसे आप व्यर्थ गया समझें। जो इस संसार में केवल खाने, पीने और सोने में ही समय खोते हैं और जो बिलकुल जप नहीं करते, वे दो पैर वाले पशु हैं।

 

अमरीका में गगनचुम्बी मकान हैं। हर एक कमरा नवीनतम है और विद्युत् तथा वायु-सम्बन्धी साधनों से सजा है; पर अब प्रिय मित्र, मुझे सच-सच बतलाओ कि दोनों में कौन बड़ा है? वह जो अमरीका में गगनचुम्बी मकान में रहता है, जिसके पास सैकड़ों मोटरें, हवाई जहाज और अटूट धन है; परन्तु जो बड़ी चिन्ताओं, सोच-विचार, तरह-तरह की सैकड़ों बीमारियों तथा रक्तचाप आदि से ग्रस्त है और जिसका हृदय घोर अज्ञान, काम, क्रोध, लोभ आदि से भरा है या वह जो ऋषिकेश में गंगा-तट पर फूस की कुटिया में रहता है, जिसका स्वास्थ्य अति-सुन्दर है, हृदय विशाल है, जो सेवा में ही आनन्द लेता है, जिसे अनन्त सुख और शान्ति है, जिसे पूर्ण आत्मज्ञान है; किन्तु जिसके पास धन, चिन्ताएँ, सोच-विचार कुछ भी नहीं हैं?

 

आध्यात्मिक जीवन ही सच्चा जीवन है। अध्यात्म-ज्ञान ही सच्चा अटूट धन है। इसीलिए जाग जायें और अध्यात्म-ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उत्कण्ठित हो जायें, साधना का अभ्यास करें। आत्मा को पहचानें और इसी जन्म में सच्चे योगी बन जायें।

 

इस दृश्य जगत् से इन्द्रियों को हटा लेने और मन को भीतर एकाग्र करने का ही नाम योग है। आत्मा में निरन्तर मग्न रहते हुए जीवन बिताना ही असली योग है। योगाभ्यास मनुष्य को देवता बना देता है। योग निराश हुए लोगों को आशा, दुःखियों को सुख, निर्बलों को बल और अज्ञानियों को ज्ञान देता है। परमानन्द-रूपी अन्तर्जगत् और चिर-शान्ति के साम्राज्य में जाने की कुंजी योगाभ्यास ही है।

 

आपकी आध्यात्मिक उन्नति बहिर्परिस्थितियों और वातावरण, कष्टों और कठिनाइयों, विपरीत प्रभावों आदि पर विजय पाने पर ही निर्भर है। जीवन में सर्वदा अच्छी-बुरी परिस्थितियों में योगी को अपना मन एक-सा और समान भाव में रखना पड़ता है। वह वज्र-समान कठोर हो जाता है; क्योंकि वह अपरिवर्तनशील तथा अमर आनन्द-रूपी आत्मा की कड़ी चट्टान की नींव पर खड़ा है। इसलिए योगी को धीर कहते हैं। भगवान् श्री कृष्ण गीता के ग्यारहवें अध्याय के पन्दरहवें श्लोक में कहते हैं- "वह मनुष्य जिसे सुख और दुःख विचलित नहीं करते, जो खेद और आनन्द में समान-चित्त रहता है और जो धीर है, वही अमर पद पाने का अधिकारी है।"

 

संसार का जीवन अस्थिर तथा क्षणिक है। संसारी जीवन कष्टों, अस्थिरता, यातनाओं आदि से पूरित है। समाज में उच्च स्थान प्राप्त, बड़ा धनी और बहुत बड़ा बुद्धिमान् कहलाने वाला सांसारिक मनुष्य भी आध्यात्मिक जगत् में दिवालिया है। आध्यात्मिक धन ही सच्चा अकूत धन है, अध्यात्म-ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है, आध्यात्मिक जीवन ही सच्चा जीवन है। पूर्ण योगी ही संसार का सच्चा चक्रवर्ती सम्राट् है।

 

जिस तरह शिकारी जाल फैला कर और सुन्दर बाजा बजा कर हिरन को फैसाता है, उसी तरह योगी भी दाहिने कान में होने वाले अनाहत नाद में मन लगा कर मन को फँसाते हैं। कान में निरन्तर होने वाले नाद की मोहक तानें मन को आरम्भ में आकर्षित करती हैं। इस तरह नाद सुनते-सुनते मन को बाँध कर नष्ट कर दिया जाता है। मन नाद में घुल कर लीन हो जाता है। मन को बाँधने का अर्थ है- चंचल मन को नितान्त स्थिर कर देना। मन को मारने का अर्थ है-मन को नाद में लीन कर देना। ऐसा होने के बाद मन विषयों के पीछे नहीं भाग सकता।

 

इस चंचल, नटखट और अस्थिर मन को मारने के लिए बुद्धिमान्, चतुर और निरन्तर सावधान योगी धनुष-बाण साधे सदा तैयार रहता है। योगी नैतिक पूर्णता प्राप्त करता है, इन्द्रियों और मन को वश में करता है, प्राणवायु पर नियन्त्रण करता है और अन्त में मन को मार कर गम्भीर असम्प्रज्ञात समाधि में प्रवेश कर जाता है। यम, नियम, आसन और प्राणायाम के अभ्यास में कुछ सफलता प्राप्त होने के बाद साधक को प्रत्याहार का अभ्यास करना चाहिए। इन्द्रियों को विषयों से खींच लेने का नाम प्रत्याहार है। इस तरह के अभ्यास से इन्द्रियाँ नियन्त्रण में जाती हैं। इस अभ्यास के पक्के हो जाने के उपरान्त ही साधक का सच्चा आन्तरिक जीवन आरम्भ होता है। प्रत्याहार के बिना अच्छी तरह साधना किये जो साधक सहसा उछल कर ध्यान का अभ्यास करने लग जाता है, वह मूर्ख है। उसे ध्यान के अभ्यास में कभी सफलता नहीं मिलेगी। इन्द्रियों की बहिर्मुखी प्रवृत्ति को प्रत्याहार रोकता है। चंचल इन्द्रियों की राह में प्रत्याहार एक तरह का विघ्न है। प्राणायाम के उपरान्त प्रत्याहार स्वयं आने लगता है। जब प्राणायाम के अभ्यास से प्राणवायु पर अधिकार होने लगता है, तब इन्द्रियाँ स्वयमेव शिथिल हो जाती हैं। एक तरह से वे भूख से मरने लगती हैं और निरन्तर क्षीण होती जाती हैं। अब इन्द्रियाँ अपने विषयों का संयोग पा कर फुफकार भी नहीं पातीं। प्रत्याहार बड़ी कड़ी कवायद है। आरम्भ में तो इससे बड़ा कष्ट मिलता है; किन्तु आगे चल कर इसके अभ्यास में बड़ा आनन्द आता है। इसके अभ्यास में बड़े धैर्य और अध्यवसाय की आवश्यकता है। इसके अभ्यास से अपार बल मिलता है। साधक की इच्छा-शक्ति बड़ी प्रबल हो उठती है। जिस योगी का प्रत्याहार में अच्छा अभ्यास हो जाता है, वह समर-क्षेत्र में भी शान्तिपूर्वक ध्यान कर सकता है।

 

जब संकल्प-विकल्प नष्ट हो जाते हैं, तब मन अपने उद्गम या आधारभूत आत्मा में उसी तरह लीन हो जाता है, जिस तरह आधारभूत ईंधन के जल जाने पर अग्नि ऐसी ही अवस्था में कैवल्य या पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त होती है। अभ्यास की किसी भी मंजिल पर कभी निराश मत होइए निरन्तर अभ्यास से आपको आध्यात्मिक शक्ति अवश्य प्राप्त होगी। यह निश्चित है। योगियों का आशीर्वाद आपकी सहायता करे!

 

मन्त्रयोग के महत्त्वपूर्ण विषय पर और जप द्वारा पूर्णता प्राप्त करने के साधन पर इस पुस्तक द्वारा अच्छा प्रकाश पड़ेगा। पुस्तक के प्रथम अध्याय में जप की परिभाषा दी गयी है। द्वितीय अध्याय में भगवन्नाम की महिमा और महत्त्व बतलाया गया है। तृतीय अध्याय में भिन्न-भिन्न प्रकार के मन्त्र दिये गये हैं। चतुर्थ अध्याय में साधना-विषयक व्यावहारिक तथा उपयोगी उपदेशों का समावेश है। अन्तिम अर्थात् पंचम अध्याय में उन महात्माओं के संक्षिप्त चरित्र दिये गये हैं, जिन्हें जप द्वारा भगवद्-प्राप्ति हुई है।

 

भगवान् हमें ऐसी अन्तर्शक्ति दे, जिससे मन और इन्द्रियों को वश में करके हम निर्विघ्न जपयोग की साधना करें! जपयोग की चमत्कारिक शक्ति और उसके आश्चर्यकारक फलों पर हमारा विश्वास हो ! ईश्वर के नाम की अपार महिमा को समझने की शक्ति हममें हो ! देश के एक छोर से दूसरे छोर तक भगवान् के नाम के माहात्म्य का हम विस्तार करें ! हरि-नाम की जय हो ! भगवान् शिव, विष्णु, राम, कृष्ण आप लोगों पर कृपा करें!

 

- स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सूर्य-नमस्कार

 

सूर्यं सुन्दरलोकनाथममृतं वेदान्तसारं शिवं

ज्ञानं ब्रह्ममयं सुरेशममलं लोकैकचित्तं स्वयम्

इन्द्रादित्यनराधिपं सुरगुरुं त्रैलोक्यचूडामणिं

ब्रह्माविष्णुशिवस्वरूपहृदयं वन्दे सदा भास्करम् ।।

 

"मैं सदा भगवान् सूर्य को साष्टांग नमस्कार करता हूँ। सूर्य नारायण संसार के स्वामी हैं, अमर हैं, वेदान्त के सूक्ष्म सार हैं, सदा पवित्र पूर्ण ज्ञान-स्वरूप है, पूर्ण ब्रह्म हैं, देवों के भी देव हैं, सदा शुद्ध संसार के सच्चे आत्म-रूप, इन्द्र, मनुष्यों और देवताओं के ईश्वर, देवताओं के गुरु, त्रिलोकी के सर्वश्रेष्ठ मणि-रूप, ब्रह्मा, विष्णु और शिव के हृदय-रूप और प्रकाश को देने वाले हैं।"

 

ईशावास्योपनिषद् में लिखित श्लोक १५ और १६ वाली स्तुति पढ़ो वह इस प्रकार है :

 

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्

तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ।।

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह

तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि

योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ।।

 

सत्य का मुख एक सुवर्ण पात्र से ढका है। हे सूर्य ! अथवा हे भगवान्! आप उस ढक्कन को हटा दें जिससे मुझे सत्य का दर्शन हो जाये। हे पूषन् (सबका पालन करने वाले) ! आप पूर्ण अन्तरिक्ष की परिक्रमा करते हैं, आप ही यम हैं, आप प्रजापति हैं। आप अपनी किरणों को समेट कर प्रकाश को एक स्थान पर एकत्र कीजिए, मैं आपके महामहिमान्वित आकार का दर्शन करता हूँ। जो पुरुष आपमें है, वही मुझमें भी है।"

 

मित्राय नमः

रवये नमः

सूर्याय नमः

भानवे नमः

खगाय नमः

पूष्णे नमः

हिरण्यगर्भाय नमः

मरीचये नमः

आदित्याय नमः

सवित्रे नमः

अर्काय नमः

भास्कराय नमः

 

यजुर्वेद के शब्दों में-"हे सूर्य ! आप सूर्यों के भी सूर्य हैं। आप ही पूर्ण शक्ति हैं, हमें शक्ति दें। आप पूर्ण बल हैं, मुझे भी बल दें। आप शक्तिशाली हैं, मुझे भी शक्ति प्रदान करें।"

 

सूर्य के उपर्युक्त बारह नाम सूर्योदय के समय लो। जो सूर्योदय के पूर्व सूर्य के उक्त बारह नामों को लेता है; उसका स्वास्थ्य, जीवन और ओज सदा बना रहता है; उसको आँखों का कोई रोग नहीं होता तथा उसकी दृष्टि सदा तीव्र रहेगी। सूर्योदय के पूर्व उठ कर सूर्य भगवान् से प्रार्थना करो - "हे सूर्य भगवान्! आप संसार के नेत्र हैं, आप विराट् पुरुष की आँख हैं। आप हमें स्वास्थ्य, शक्ति, जीवन और ओज दीजिए।" त्रिकाल सन्ध्याओं में सूर्य को अर्घ्य प्रदान करो।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय. 4

भूमिका.. 5

सूर्य-नमस्कार. 8

जपयोग-समीक्षा.. 12

. जप क्या है?. 12

. मन्त्रयोग. 13

. ध्वनि और मूर्ति.. 15

नाम का माहात्म्य..... 17

. नाम-महिमा.. 17

. जप से लाभ. 20

मन्त्रों के विषय में. 26

. प्रणव. 26

. हरि-नाम. 26

. कलिसन्तरणोपनिषद्. 29

. जप-विधान. 29

. जप के लिए मन्त्र... 32

. मन्त्रों की महिमा.. 43

. जप के लिए आवश्यक साधन. 46

. जप के लिए नियम. 47

. गायत्री-मन्त्र... 49

साधना-प्रकरण.. 55

. गुरु की आवश्यकता.. 55

. ध्यान का कमरा. 56

. ब्राह्ममुहूर्त. 56

. इष्टदेवता का चयन. 57

. जप के लिए आसन. 57

. चित्त की एकाग्रता.. 58

. जप के लिए तीन बैठकें.. 59

. माला की आवश्यकता.. 61

. जप-माला के प्रयोग की विधि.. 61

१०. जप-गणना की विधि.. 61

११. तीन प्रकार के जप. 62

१२. जप में कुम्भक और मूलबन्ध... 63

१३. जप और कर्मयोग. 63

१४. लिखित जप. 64

१५. जप की संख्या.... 66

१६. बीजाक्षर. 69

१७. जपयोग-साधना-सम्बन्धी निर्देश जप-साधना की आवश्यकता.. 70

१८. मन्त्र-दीक्षा की महिमा.. 75

१९. अनुष्ठान. 77

२०. मन्त्र-पुरश्चरण की विधि.. 80

जपयोगियों की कथाएँ. 85

. ध्रुव. 85

. अजामिल. 86

. एक चेले की कथा विश्वास का चमत्कार. 87

परिशिष्ट.. 90

. भगवन्नाम की महिमा (संकलन) 90

. राम-नाम की महिमा.. 92

. दृष्टि में परिवर्तन करो. 94

. धारणा और ध्यान. 95

. बीस महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक नियम. 97

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती.. 100

प्रथम अध्याय

जपयोग-समीक्षा

. जप क्या है?

 

जप किसी मन्त्र अथवा ईश्वर के नाम को बार-बार दोहराने को कहते हैं। इस कलियुग में, जब कि अधिकतर व्यक्तियों का शरीर-बल पहले जैसा नहीं रहा, हठयोग का अभ्यास केवल कठिन ही नहीं, असम्भव है। ईश्वर-दर्शन का सर्व-सुगम मार्ग केवल जप-साधना ही है। सन्त तुकाराम, भक्त ध्रुव, प्रह्लाद, वाल्मीकि, रामकृष्ण परमहंस इत्यादि सभी ने केवल ईश्वर का नाम जप कर ही उनका साक्षात्कार किया।

 

जपयोग योग-साधना का एक मुख्य अंग है। गीता में भगवान् कहते हैं कि यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ अर्थात् यज्ञों में सबसे बड़ा यज्ञ जप है और वह मैं हूँ। कलियुग में केवल जप ही हमें शाश्वत शान्ति प्रदान कर सकता है। इसी से हमको अमरत्व, मोक्ष तथा परम सुख प्राप्त हो सकता है। जप के निरन्तर अभ्यास से साधक समाधि का अनुभव करने लगता है और उसे भगवद्- साक्षात्कार हो जाता है। जप हमारे दैनिक जीवन की प्रत्येक कला का एक अंग ही बन जाना चाहिए। यदि हम निरन्तर जप का अभ्यास करते रहेंगे, तो एक--एक दिन जप हमारे स्वभाव में ओत-प्रोत हो जायेगा, फिर हमें जप करने में किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं होगा (जैसे हमें खाने, पीने और पहनने में किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं होता है) ईश्वर के नाम का जप प्रेम, श्रद्धा तथा पवित्रता की भावना के आधार पर करना चाहिए। जपयोग से श्रेष्ठतर और कोई भी योग नहीं है। जपयोग में सफलता मिलने पर सभी सिद्धियाँ प्रत्यक्ष होने लगती हैं और भक्त मुक्ति की प्राप्ति कर लेता है।

 

जप किसी मन्त्र के बार-बार उच्चारण को कहा जाता है। ध्यान का अर्थ है-ईश्वर के गुणों का ध्यान करना। जप और ध्यान में यही अन्तर है। ध्यान का अभ्यास जप-सहित और जप-रहित-दोनों प्रकार से किया जाता है। आरम्भ में जप-सहित ध्यान करना चाहिए। जैसे-जैसे ध्यान करने का अभ्यास बढ़ता जायेगा, जप अपने-आप ही विलीन हो जायेगा। इस प्रकार जप-रहित ध्यान का आविर्भाव होता है। किन्तु यह बहुत ऊँची अवस्था है। साधारण कोटि के व्यक्तियों के लिए यह निरन्तर अभ्यास द्वारा सुलभ है। जब आप इस अवस्था को प्राप्त कर लेंगे, तब आप सुगमतापूर्वक ध्यान लगा सकते हैं; आपको जप की आवश्यकता प्रतीत नहीं होगी। प्रणव के दो रूप होते हैं-सगुण और निर्गुण दोनों ब्रह्म के ही रूप हैं। यदि तुम राम के भक्त हो, तो ' राम' का जप कर सकते हो। ' राम' का जप वास्तव में सगुण ब्रह्म की उपासना है।

 

यद्यपि नाम और रूप भिन्न-भिन्न माने जाते हैं, किन्तु वैसे इनको अलग नहीं किया जा सकता। विचार तथा शब्द अभिन्न हैं। जब तुम अपने पुत्र के बारे में विचार करते हो, तो तुरन्त कल्पना में उसका रूप तुम्हारे सामने जाता है। इसी प्रकार जब तुम उसके रूप की कल्पना करते हो, तो उसके नाम की याद भी स्वतः ही जाती है। इसी प्रकार जब तुम राम का नाम लेते हो, तो राम का रूप तुम्हारे सम्मुख जाता है। अतः हम इसी बिन्दु पर पहुँचते हैं कि ध्यान और जप एक-साथ रहते हैं। हम ध्यान और जप को अलग-अलग नहीं कर सकते

 

जब तुम किसी मन्त्र का जप कर रहे हो, तो यह समझो कि तुम वास्तव में इष्टदेवता की प्रार्थना कर रहे हो; वह तुम्हारी प्रार्थना को सुन रहा है; वह तुम्हारी ओर दया-दृष्टि से देख रहा है और वह तुम्हें अपने हाथों से अभय-दान दे रहा है, जिससे तुम मोक्ष की प्राप्ति करने में सफल बन सको। ऐसी ही भावना से तुम्हें जप करना चाहिए। सीए

 

* जप-साधना भावनापूर्वक करनी चाहिए। मन्त्र का अर्थ समझना चाहिए। प्रत्येक वस्तु तथा स्थान पर ईश्वर को व्यापक देखो। जब तुम उसके नाम का जप करते हो, तो तुम उसके अधिक समीप हो तुम उसे अपने हृदय-मन्दिर में व्यापक देखने की चेष्टा करो। ऐसा विचार करो कि वह तुम्हारे प्रत्येक कार्य को देखता है-अतः वह तुम्हारे जप को भी देख रहा है।

 

हमें ईश्वर का नाम पूर्ण विश्वास के साथ गम्भीरतापूर्वक लेना चाहिए। उसका नाम लेना उसकी सेवा करना है। जप करते समय तुम्हारे हृदय में ईश्वर के लिए वही प्रेम और सम्मान होना चाहिए, जो उसके दर्शनों पर तुम्हारे हृदय में उत्पन्न होता है। तुम्हें नाम में पूर्ण विश्वास तथा श्रद्धा होनी चाहिए।

 

. मन्त्रयोग

 

मन्त्रयोग एक प्रकार का विज्ञान है, जिससे हम इस संसार-सागर से पार हो जाते हैं। मन्त्र-बल द्वारा भव-बन्धन से छूट कर हम ईश्वर का साक्षात्कार करते हैं। ध्यान सहित जप करने से जीव पाप से छुटकारा पा कर स्वर्ग में भ्रमण करता है। पूर्ण छुटकारा पा लेने पर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों फल प्राप्त हो जाते हैं। मन्त्र-इन दो अक्षरों के संयोग से 'मन्त्र' शब्द बनता है, जिसका अर्थ होता है-मनन करने से त्राण होना (मननात् त्रायते इति मन्त्रः)

 

मन्त्र में देवत्व है, गुरुत्व है। यह कहना उचित होगा कि मन्त्र दिव्य शक्ति का प्रतीक है, जप ध्वनि का रूप धारण किये हुए है। मन्त्र स्वयं देवता है। जपने वाले को मन्त्र और मन्त्र के देवता की अभिन्नता का विचार करना चाहिए। जप करने वाले की उक्त धारणा जितनी दृढ़तर होगी, उतनी ही अधिक उसे सहायता भी मिलेगी। जैसे आग की लपट वायु की सहायता से जोर पकड़ती है, वैसे जप करने वाले व्यक्ति की शक्ति मन्त्र-शक्ति से बढ़ती है और उसे अधिकाधिक शक्तिशाली बना देती है।

 

भक्त की साधना से सुप्त मन्त्र जाग्रत हो उठता है। देवता का मन्त्र उन अक्षरों का समूह है जो जापक के चेतन को देवता का साक्षात्कार करा देता है। मन्त्र-जप द्वारा मनुष्य की दिव्य शक्तियाँ जाग्रत हो उठती हैं।

 

मन्त्र में स्फुरण-शक्ति होती है, उसमें विस्तार होता है और उसमें से जीवन-शक्ति का अभ्युदय होता है। आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि हमारे शरीर के सभी अंगों में बराबर कार्य करने की शक्ति हो और मन, वाणी तथा कर्म में सामंजस्य हो हमें पूर्णतः दिव्य शक्ति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की चेष्टा करनी चाहिए। दिव्य शक्ति के साथ सामंजस्य स्थापित कर लेने पर हम आध्यात्मिक सत्य को समझ सकेंगे और समझने के पश्चात् उससे ऐक्य हो सकेगा। मन्त्र में ऐक्य और अनुरूपता को स्थापित करने की शक्ति है। मन्त्र-बल द्वारा ऐहिक और आमुष्मिक (परलोक-सम्बन्धी) चेतना का सन्दर्शन किया जा सकता है। मन्त्र-बल से साधक ज्ञान-प्रकाश, स्वतन्त्रता, अविच्छिन्न शान्ति, अनन्त आनन्द तथा अमरत्व की प्राप्ति कर लेता है। मन्त्र-बल में सिद्ध हो जाने से ज्ञान-चक्षु प्राप्त होते हैं।

 

वाणी की चार अवस्थाएँ होती हैं- () वैखरी अथवा व्यक्त स्वर, () मध्यमा अथवा क्षीण स्वर, () पश्यन्ती अथवा अन्तःकरण का स्वर, और () परा अथवा बीज अवस्थागत स्वर। अन्तिम प्रकार की ध्वनि दिव्य शक्ति की परिचायिका है और ध्वनि-तत्त्व की महाशक्तिमयी अवस्था है। यह अव्यक्त रहती है। इसका श्रवण आत्म-ज्ञान के उपरान्त ही हो सकता है। परा वाणी भाषानुसार विविध नहीं होती है। आत्मा की ध्वनि होने से यह सभी भाषाओं में एक ही होती है।

 

मन्त्र के जप-साधन से साधक जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है भले ही उसे मन्त्रार्थ का ज्ञान हो, पर इससे कुछ बिगड़ता नहीं। साधक अभ्यास के बल पर ही चरम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। इतना जरूर है कि इससे उद्देश्य-पूर्ति में जरा भी सन्देह नहीं ईश्वर के नाम में अचिन्त्य और अकथनीय शक्ति है; पर यदि मन्त्र का अर्थ समझ कर जप किया जायेगा, तो ईश्वर-साक्षात्कार और भी जल्दी हो जायेगा।

 

मन्त्र जप से हमारे मन की काम, क्रोध आदि अपवित्रताएँ दूर हो जाती हैं। जब हम दर्पण को निर्मल कर देते हैं, तो उसमें प्रतिबिम्ब स्पष्ट झलकने लगता है। ठीक इसी प्रकार जब अन्तःकरण की अपवित्रता का निराकरण हो जाता है, तो शक्ति का प्रतिबिम्ब स्पष्ट होने लगता है। हममें सत्य-दर्शन की शक्ति अधिकाधिक प्राप्त होने लगती है। जिस प्रकार साबुन के उपयोग से वस्त्र को निर्मल बना दिया जाता है, उसी प्रकार मन्त्र-बल से चित्त की अपवित्रता को भी दूर किया जा सकता है। जिस प्रकार अग्नि में तपने पर सोना खरा हो जाता है, उसी प्रकार मन्त्र-रूप अग्नि में तपने पर मन भी खरा बन जाता है। श्रद्धा और भक्तिपूर्वक अल्पांश जप भी हमारे मन को निर्दोष और पवित्र बना देता है। मन्त्र जप से हमारे पाप नष्ट होते, हमें आनन्द की प्राप्ति होती और अमरत्व का वरदान मिलता है। इस विषय में सन्देह की गुंजाइश ही नहीं है।

 

. ध्वनि और मूर्ति

 

ध्वनि स्फुरणात्मिका है। यह निरन्तर स्पन्दित होती रहती है। इसका रूप निश्चित होता है। यह शून्य में एक-एक रूप उत्पन्न करती है और अनेक ध्वनियों के संघात से विशिष्ट शक्ति की उत्पत्ति होती है। विज्ञान के प्रयोगों ने यह सिद्ध किया है कि विशिष्ट ध्वनियाँ विशिष्ट आकृति को जन्म देती हैं। किसी बाजे से निकली हुई ध्वनि भूमि पर विचित्र प्रकार की रेखाओं को अंकित कर देती है। अनेक प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया है कि विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ भूमि पर विभिन्न प्रकार की रेखाओं को अंकित कर देती हैं। भारतीय संगीत के ग्रन्थों में लिखा है कि संगीत के भिन्न-भिन्न राग और भिन्न-भिन्न रागिनियाँ अपना विशिष्ट रूप रखती हैं। उदाहरणार्थ मेघ राग के आकार का इन ग्रन्थों में शानदार वर्णन है, उसे हाथी पर विराजमान दिखाया गया है। वसन्त राग की आकृति एक सुन्दर युवक की-सी है, जो पुष्पों से अलंकृत है। इन सबका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक राग-रागिनी ठीक से गाये जाने पर सूक्ष्म लहरों को उत्पन्न करती है, जिनसे स्वरूप-विशेष का आविर्भाव होता है। हाल के वैज्ञानिक प्रयोगों ने इस विश्वास का समर्थन किया है। वाट्स नामक एक महिला ने इस विषय के बहुमूल्य प्रयोग किये हैं। इन्होंने 'ध्वनि के रूप' शीर्षक से एक पुस्तक भी लिखी है, जिसमें इन विविध प्रयोगों का वर्णन है। इन्होंने लार्ड लेटन् की चित्रशाला में अपने इस वैज्ञानिक प्रयोग पर एक भाषण भी दिया था, जिसमें इनके अपने ध्वनि-सम्बन्धित प्रयोगों का सांगोपांग वर्णन हुआ था बड़े परिश्रम से इन्होंने वर्षों तक ध्वनि-सम्बन्धी प्रयोग किये और इस परिणाम पर पहुँची। मिसेज् वाट्स अपना एक वाद्य, जिसका नाम ईडोफोन है, बजाती हैं। इस वाद्य में एक नली संयुक्त रहती है तथा एक रिसीवर और एक झिल्ली भी रहती है। अपने प्रयोगों से मिसेज् वाट्स ने यह विश्वास विस्तारित किया है कि विशिष्ट ध्वनियाँ अपना विशिष्ट रूप और महत्त्व रखती हैं और वे आकाश या धरातल पर उन-उन रूपों को अंकित भी कर सकती हैं। इन प्रयोगों का मनोरंजक विश्लेषण आपकी उपरिलिखित पुस्तक में है।

 

फ्रांस की एक महिला ने एक भजन में माता मरियम को सम्बोधित किया, तो माता मरियम की मूर्ति उनके सामने गयी-उनकी गोद में प्रभु यीशु थे। इसी प्रकार वाराणसी का एक विद्यार्थी, जो फ्रांस में अध्ययन कर रहा था, भैरवदेव की स्तुति करते समय, अपने श्वान-वाहन पर आरूढ़ भैरव के साक्षात् दर्शन कर सका।

 

इसी प्रकार से ईश्वर का नाम बार-बार लेने से ईश्वर अथवा तुम्हारे इष्टदेवता, जिसकी तुम पूजा करते हो, का रूप तुम्हारे सम्मुख प्रत्यक्ष हो जाता है और वह रूप ही केन्द्र का कार्य करता है। इस केन्द्र पर ध्यान स्थापित करने से तुम ईश्वर के प्रभाव का ज्ञान पा सकते हो और यह समझ सकते हो कि यह प्रकाश जो केन्द्र से निकल कर धीरे-धीरे आराधक के हृदय में समा जाता है, उसी से वह अनन्त आनन्द का अनुभव करता है।

 

जब कोई ध्यान करने बैठता है, उस समय अन्तःकरण की वृत्ति का बहाव बहुत तीव्र हो जाता है। आप ध्यान में जितने संलग्न होंगे, बहाव भी उतना ही अधिक तीव्र होता हुआ प्रतीत होगा। चित्त की एकाग्रता से इस शक्ति का तीव्र वेग ब्रह्माण्ड की ओर आमुख होता है और फिर वहाँ से आकर्षण शक्ति का प्रस्रवण होता है। हमारे अन्तःकरण से एक भावना जागती है, जो हमारे शरीर में व्याप्त हो जाती है और उस समय हमें ऐसा प्रतीत होता है, जैसे हम किसी विद्युत्-स्फुरण से भर गये हों। अतः हमें यह स्पष्ट हो गया कि :

 

. ध्वनियाँ आकृति को जन्म देती हैं,

. ध्वनि-विशेष से आकृति-विशेष का जन्म होता है, तथा

. यदि विशेष प्रकार की आकृति की उत्पत्ति करनी हो, तो लहरात्मिका ध्वनि के साथ उसको उत्पन्न किया जा सकता है।

 

पंचाक्षर-मन्त्र ( नमः शिवाय) का जप हमारे सामने शिव की मूर्ति को ला कर खड़ा कर देता है। विष्णु का अष्टाक्षर-मन्त्र ( नमो नारायणाय) विष्णु के रूप को हमारे सामने प्रत्यक्ष कर देता है। मन्त्रगत ध्वनि में जो लहरें अन्तर्निहित हैं, उनका अपना विशेष महत्त्व है। इसीलिए स्वर तथा मन्त्र के वर्णों पर अधिक जोर दिया जाता है। वर्ण का अर्थ रंग से लिया जाता है। सूक्ष्म जगत् में समस्त ध्वनियों का अपना-अपना एक-एक रंग होता है, अतः प्रत्येक ध्वनि रंग-बिरंगी आकृतियाँ उत्पन्न करती है। इसी प्रकार प्रत्येक रंग से सम्बन्धित एक-एक ध्वनि होती है। अब हम इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि रूप-विशेष की उत्पत्ति के लिए ध्वनि-विशेष का निःसारण करना पड़ता है। मन्त्र-विज्ञान का अध्ययन करने से हमें पता चलता है कि भिन्न-भिन्न देवताओं की प्रार्थना के लिए भिन्न-भिन्न मन्त्र प्रयुक्त करने पड़ते हैं।

 

यदि तुम शिव के उपासक हो, तो ' नमः शिवाय' मन्त्र का जप करना चाहिए; लेकिन विष्णु और शक्ति के आराधक को दूसरा मन्त्र जपना चाहिए। जब मन्त्र जपते हो, तो क्या होता है? मन्त्र के बार-बार रटने से मन्त्र से सम्बन्धित देवता का रूप तुम्हारे सामने जाता है, यही रूप तुम्हारी चेतना का केन्द्र बन जाता है, जिससे तुम उसका सामीप्य अनुभव करने लगते हो। इसलिए कहा गया है कि देवता का मन्त्र वास्तव में स्वयं देवता ही है। यह बात मीमांसकों के कथन को बिलकुल स्पष्ट कर देती है। मीमांसकों का कथन है कि देवता और मन्त्र में विभिन्नता नहीं है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि जब किसी मन्त्र-विशेष को ठीक रीति से जपा जाता है, तो उसके स्पन्दन विशिष्ट-लोक में प्रसारित हो जाते हैं और उतनी देर तक उन स्पन्दनों का एक रूप निश्चित हो जाता है।

 

 

 

द्वितीय अध्याय

नाम का माहात्म्य

. नाम-महिमा

 

ईश्वर के नाम का जप अनोखे आनन्द को जन्म देता है। इसका वर्णन करना कठिन ही नहीं, असम्भव भी है। भगवन्नाम हमारे अन्दर एक प्रकार की अलौकिक शक्ति भर देता है। वह हमारे स्वभाव में आश्चर्यजनक परिवर्तन कर देता है। वह मनुष्य को देवताओं के समान गुणों से अलंकृत कर देता है। वह हमारे पुराने पापों, वासनाओं, संकल्पों, सन्देहों, काम-वासनाओं, मलिन चित्त-वृत्तियों तथा अनेक प्रकार के संस्कारों को नष्ट कर देता है।

 

ईश्वर का नाम कैसा मधुर है! उसमें कैसी अनोखी शक्ति है! वह कितनी शीघ्रता से आसुरिकता को सात्त्विकता में परिणत कर देता है। वह ईश्वर से साक्षात्कार करा देता है और साधक परमात्मैक्य का अनुभव करने लगता है।

 

भगवन्नाम चाहे जाने में लिया जाये चाहे अनजाने में, चाहे होशियारी से लिया जाये चाहे लापरवाही से, चाहे ठीक से लिया चाहे गलती से, वह वांछित फल की प्राप्ति अवश्य करायेगा। बुद्धि-विलास और तर्क-संघर्ष द्वारा ईश्वर के नाम की महिमा का मोल नहीं आँका जा सकता। ईश्वर के नाम का महत्त्व तो केवल श्रद्धा, भक्ति तथा सतत जप के अभ्यास से ही समझा और अनुभव किया जा सकता है। प्रत्येक नाम में अनन्त शक्तियों का भण्डार है। नाम की शक्ति अकथनीय है। उसकी महिमा अवर्णनीय है। ईश्वर के नाम की शक्ति अपरिमित है।

 

जिस प्रकार जलने योग्य प्रत्येक वस्तु को जला देने की स्वाभाविक शक्ति अग्नि में है, उसी प्रकार ईश्वर के नाम में भी पापों, संस्कारों और वासनाओं को जलाने की तथा अनन्त आनन्द और अमर शान्ति प्रदान करने की शक्ति है। जैसे कि दावाग्नि में वृक्ष, काष्ठ आदि को जलाने की शक्ति स्वाभाविक है, उसी प्रकार ईश्वर के नाम में पाप-रूपी वृक्ष को उसकी जड़ और शाखाओं सहित जला डालने की अद्भुत और स्वाभाविक शक्ति है। ईश्वर का नाम भाव-समाधि द्वारा भक्त को ईश्वर से मिला देता है और भक्त ईश्वर से ऐक्य का अनुभव करके नित्यानन्द को प्राप्त होता है।

 

हे मनुष्य ! ईश्वर के नाम की शरण में जा नामी और नाम अभिन्न सत्ताएँ हैं। निरन्तर ईश्वर का नाम जपा कर प्रत्येक श्वास के साथ ईश्वर के पवित्र नामों का उच्चारण कर इस कराल कलि-काल x/4 ईश्वरत्व तक पहुँचने के लिए नाम-स्मरण अथवा जप सबसे अधिक सुगम, शीघ्र, सुरक्षित और निश्चित मार्ग है। यह अमरत्व और अनन्त आनन्द का दाता है। हे परमात्मन्, तेरी और तेरे नाम की महिमा अपरम्पार है! किसने उसको पूर्ण रूप से जाना है और कौन जानेगा ?

 

अजामिल-जैसा पापी केवल ईश्वर का नाम ले कर ही संसार-सागर से पार उतर गया। अजामिल ब्राह्मण-कुल में पैदा हुआ था और बचपन में ब्राह्मण का एक योग्य पुत्र रहा; पर युवा होने पर वह दुर्भाग्यवश एक नीच जाति की लड़की से प्रेम करने लगा, जिसकी कुसंगति के कारण उसने जीवन-भर घोर पाप किये, किन्तु मरण-काल समीप आने पर अपने पुत्र नारायण को पुकारा बस, फिर क्या था, नारायण के पार्षद उसकी सहायता को पहुँचे और वह यम-पाश से छुटकारा पा गया। अजामिल की कथा हमें ईश्वर के नाम की अद्भुत शक्ति का उपदेश देती है।

 

तुम गणिका पिंगला की कहानी तो जानते ही होगे। वह श्री राम का नाम लेने से कितनी जल्दी एक साध्वी बन गयी थी। कहा जाता है कि किसी चोर ने उसे एक तोता भेंट किया था। वह तोता राम का नाम लिया करता था और उस राम-नाम की आवाज गणिका के कानों में जाती थी। तोते की वह राम-धुनि बहुत ही सुन्दर और मधुर थी। अतः वह उसकी ओर आकर्षित हुई और उसने अपना मन राम-राम शब्द की ओर लगाया। अतः वह राम के साथ पूर्ण रूप से ऐसी मिली कि फिर उनसे कभी अलग नहीं हुई। ऐसी है ईश्वर के नाम की महिमा ! यह अत्यन्त दुःख का विषय है कि जिन लोगों ने विज्ञान का अध्ययन किया है और जो विद्वान् होने का दावा करते हैं, वे नाम-स्मरण में अब विश्वास खो बैठे हैं। यह बड़ी लज्जा की बात है, कोई बड़प्पन की नहीं।

 

ऐसी है राम-नाम की महिमा। हमें राम का नाम पूर्ण विश्वास और श्रद्धा के साथ लेना चाहिए। जब तुम तुलसीदास की रामायण का अध्ययन करोगे, तो पता चलेगा कि इस राम-नाम में कितनी अद्भुत शक्ति है।

 

गान्धी जी लिखते हैं-"तुम मुझसे पूछोगे कि मैं तुमसे राम का ही नाम लेने को क्यों कहता हूँ, ईश्वर के दूसरे नामों को लेने को क्यों नहीं कहता ? सच है, ईश्वर के नाम अनेक हैं, एक वृक्ष की जितनी पत्तियाँ होती हैं, उनसे भी अधिक। मैं तुमसे कह सकता हूँ कि ईश्वर शब्द का उपयोग करो। लेकिन ईश्वर शब्द कौन-सा अर्थ और कौन-सी धारणा तुम्हारे समक्ष उपस्थित कर सकेगा ? ईश्वर शब्द कहने के साथ-साथ तुम्हारे अन्दर कोई--कोई भावना उत्पन्न हो जानी चाहिए। इसके लिए तुम्हें ईश्वर शब्द का विश्लेषण करना होगा। सब कोई तो ऐसा नहीं कर सकते

 

"लेकिन जब मैं तुम्हें राम का नाम लेने को कहता हूँ तो मैं तुम्हें एक ऐसा नाम बताता हूँ, जिसको भारतीयों की अनेक पीढ़ियों ने पूजा है। राम-नाम ऐसा नाम है, जिससे इस देश के मनुष्य ही नहीं, वरन् पशु-पक्षी, यहाँ तक कि वृक्ष और पत्थर तक भी सदियों से परिचित हैं। रामायण पढ़ने से हमें ज्ञात होता है कि जब रामचन्द्र जी राजा जनक के धनुष यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे थे, तो एक पत्थर ने उनके चरण-स्पर्श से जीवन प्राप्त कर लिया था।"

 

राम-नाम को ऐसी मधुरता और भक्ति के साथ लेना सीखना चाहिए कि जब तुम राम का नाम गाओ, तो तुम्हें सुनने के लिए वृक्ष भी अपनी पत्तियाँ तुम्हारी ओर झुका दें।

 

कबीरदास ने अपने बेटे कमाल को एक बार इस बात पर बहुत डाँटा कि उसने एक धनी व्यापारी को कोढ़ से निर्वाण पाने के लिए दो बार राम-नाम लेने को कह दिया था। कमाल ने उस व्यापारी से दो बार राम-नाम लेने को कहा, लेकिन फिर भी उसका रोग ठीक नहीं हुआ। कमाल ने इस बात की अपने पिता को सूचना दी। कबीरदास इस पर बहुत कुपित हुए और कमाल से कहा- "तुमने उस धनी को दो बार राम-नाम लेने को कहा। इससे मुझे कलंक लगा है। राम का नाम तो केवल एक ही बार लेना पर्याप्त है। अब तुम उस व्यापारी के शिर पर छड़ी से खूब मार लगाओ और उससे कहो कि वह गंगा में खड़े हो कर अन्तःकरण से एक बार राम-नाम ले।" कमाल ने अपने पिता के आदेशों का अनुसरण किया। उसने उस धनी व्यापारी से शिर पर खूब मार लगायी। उस व्यापारी ने भाव-सहित केवल एक बार राम का नाम लिया और उसका रोग बिलकुल ठीक हो गया।

 

कबीरदास ने कमाल को तुलसीदास के पास भेजा। कमाल के सामने ही तुलसीदास ने एक तुलसी की पत्ती पर राम का नाम लिखा और उस पत्ती का रस पाँच सौ कुष्ठरोगियों पर छिड़क दिया सब-के-सब कुष्ठरोगी ठीक हो गये। इस पर कमाल को बहुत आश्चर्य हुआ। फिर कबीरदास ने कमाल को अन्धे सूरदास के पास भेजा। सूरदास ने कमाल को एक लाश लाने के लिए कहा, जो नदी में बह रही थी। कमाल लाश को ले आया। सूरदास ने उस लाश के एक कान में राम कहा और लाश में प्राणों का समावेश हो गया। यह सब देख कर कमाल का हृदय आश्चर्य और आदर से भर गया। राम-नाम की ऐसी शक्ति है! मेरे प्रिय मित्रो, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियो, प्रोफेसरो और डाक्टरो! तुम अपनी लौकिक विद्या पर फूले समाओ अपने दिल से प्रेम और भाव-सहित ईश्वर का नाम लो और अनन्त आनन्द, ज्ञान, शान्ति और अमरत्व की प्राप्ति करो। राम-नाम लेने से यह सब-कुछ तुम्हें इसी जन्म में-इसी जन्म में क्यों, इसी क्षण सहज ही में प्राप्त हो जायेंगे।

 

कबीरदास कहते हैं-"अगर कोई केवल स्वप्न में ही राम-नाम कहता है, तो मैं उसके लिए अपनी खाल से उसके प्रतिदिन के प्रयोग के लिए एक जोड़ी जूते बनाना पसन्द करूँगा।" ईश्वर के पवित्र नाम की महिमा को कौन कह सकता है ! ईश्वर के पवित्र नामों का महत्त्व और प्रताप वास्तव में कौन जान सकता है! यहाँ तक कि पार्वती, जो शिव की अर्धांगिनी हैं, ईश्वर के नाम के वास्तविक गौरव और महत्त्व का ठीक-ठीक शब्दों में वर्णन करने में असफल रहीं। जो कोई उसका नाम सुनता है या स्वयं गाता है, वह अपने-आप ही बिना जाने हुए आध्यात्मिकता के शिखर पर जा पहुँचता है। वह अपनी लोक-वासना को खो बैठता है और आनन्दमग्न हो जाता है। वह अमरत्व का दिव्यामृत पान करने लगता है। वह दिव्य उन्माद में झूमने लगता है। ईश्वर के नाम का जप भक्त को भगवद्-सान्निध्य का साक्षात् अनुभव करा देता है। ईश्वर का नाम कैसा शक्तिशाली है! जो उसके नाम का जप करता है, वह असीम आनन्द और शान्ति की प्राप्ति करता है। जो उसका नाम जपता है, वह वास्तव में भाग्यवान् है; क्योंकि वह आवागमन से विमुक्त हो जायेगा।

 

यद्यपि पाण्डवों का लाक्षागृह जल कर खाक हो गया, किन्तु वे नहीं जल मरे; क्योंकि उनको हरि के नाम में अविचल श्रद्धा थी, विश्वास था। गोपालकों को अग्नि से कुछ भी हानि नहीं हुई; क्योंकि उनको ईश्वर के नाम में अटूट विश्वास था यद्यपि राक्षसों ने हनुमान् की पूँछ को आग लगा दी; किन्तु वे जले नहीं, क्योंकि उनको राम-नाम में अद्भुत विश्वास था। प्रह्लाद ने ईश्वर के नाम की ही शरण ली, अतः उनको भी अग्नि जला सकी। सतीत्व की परीक्षा लेने के लिए सीता जी को अग्नि-प्रवेश कराया गया, किन्तु अग्नि की भयंकर लपटें उनके लिए शीतल जल हो गयीं; क्योंकि राम का नाम ही उनके जीवन का आधार था। विभीषण का राम-नाम में अटल विश्वास था, अतः समस्त लंका के जल जाने पर भी उसका गृह सुरक्षित रहा। ऐसी महिमा है ईश्वर के नाम की!

 

. जप से लाभ

 

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जप हमारी विचारधारा को सांसारिक वस्तुओं की ओर जाने से रोकता है। वह हमारे अन्तःकरण को ईश्वर की ओर प्रेरित करता है तथा अनन्त आनन्द और सुख की प्राप्ति के लिए हमें उत्प्रेरित करता है। अन्त में वह हमें ईश्वर के दर्शन करने में सहायता देता है। जब कभी साधक अपनी साधना में ढीलढाल करता है, मन्त्र-शक्ति उसमें पुनः आत्म-शक्ति का संचार करती है। निरन्तर तथा सतत सेवित जप-साधना से हमारे चित्त में अच्छे संस्कारों की पीठिका तैयार होने लगती है।

 

जप करते समय हमारे अन्दर भागवत-गुणों का स्रोत प्रस्रवित होने लगता है। जप से अन्तःकरण की वृत्ति का नव-निर्माण होने लगता है और सात्त्विक वृत्तियों को चित्त में पर्याप्त स्थान मिल जाता है।

 

जप से मानसिक ढाँचे का निर्माण होता है और राजसिक तथा तामसिक विचार सात्त्विकता के अनुरूप ढलने लगते हैं। जप से चित्त शान्त रहता है और उसे शक्ति की प्राप्ति भी होती है। वह हमारे अन्तरात्मा को आत्म-विचारों के उपयुक्त बनाता है। जप से मन की आसुरिक प्रवृत्तियों के प्रतिबन्ध का समावेश होता है। वह सब प्रकार के बुरे विचारों तथा क्षुद्र चित्त-वृत्तियों और अभिलाषाओं को निकाल फेंकता है। वह हमारे अन्दर दृढ़ संकल्प तथा आत्म-संयम उत्पन्न करता है। अन्त में वह हमें ईश्वर के दर्शन कराता है और उससे हमें आत्म-साक्षात्कार हो जाता है।

 

निरन्तर जप और पूजन से हमारा चित्त स्वच्छ तथा निर्मल हो जाता है और उसमें उच्च तथा पवित्र विचार भर जाते हैं। किसी मन्त्र का जप तथा किसी भी देवता का पूजन हमारे अन्दर अच्छे संस्कार ही बनाता है। मनुष्य जैसा अपने को समझता है, वैसा ही हो जाता है। यह एक मनोवैज्ञानिक नियम है। जो मनुष्य अपने को उच्च विचार और पवित्र विचारों को धारण करने में दक्ष बना लेता है, उसके अन्दर वैसी स्वाभाविक प्रवृत्ति जागने लगती है। मस्तिष्क में निरन्तर पवित्र विचारों के रहने से उसका चरित्र ही बदल जाता है। जप और पूजन के समय जब मन ईश्वर की मूर्ति पर विचार करता है, तब मानसिक आकृति वैसा ही रूप धारण कर लेती है। हमारी संस्कार-पीठिका का यह विशेष नियम है कि उस पर कोई भी छाप अंकित हो जाती है। जब कोई काम बार-बार किया जाता है, तो संस्कार अधिक दृढ़ हो जाते हैं और बार-बार दोहराने से मन का स्वभाव या प्रवृत्ति बन जाती है। जो मनुष्य दिव्य विचारों को ग्रहण करता है, वह निरन्तर विचार और ध्यान के कारण स्वयं ही देवत्व में दीक्षित हो जाता है। उसका भाव अथवा उसकी प्रकृति बिलकुल निर्मल हो जाती है। ध्याता तथा ध्येय, पुजारी तथा उसका आराध्य और विचारक तथा विचारणीय दोनों मिल कर बिलकुल एक हो जाते हैं। कहा जाता है कि एक शरीर, दो आत्मा; पर वहाँ तो दो आत्माओं का प्रश्न ही नहीं रहता- आत्मा का परमात्मा में विलयीकरण हो जाता है। यही समाधि की अवस्था है। यही पूजा, उपासना अथवा जप करने का फल है।

 

ईश्वर के नाम का मानसिक जप सब रोगों को दूर करने के लिए अद्भुत पुष्टिकारक पदार्थ तथा अमोघ औषधि है। किसी भी हालत में और किसी भी दिन इसमें कोई कमी नहीं होनी चाहिए। जप को भोजन के समान नितान्त अनिवार्य जानना चाहिए। यह भूखी आत्मा के लिए आध्यात्मिक आहार है। महात्मा ईसा का कहना है- "तुम केवल रोटी पर जीवन व्यतीत नहीं कर सकते हो, पर केवल ईश्वर के नाम पर जीवन धारण कर सकते हो।" तुम उस अमृत ही को पान करके जीवित रह सकते हो, जो ध्यान और जप के समय तुम्हारे अन्तःकरण की पीठिका पर प्रवाहित होने लगता है। यहाँ तक कि यन्त्रवत् भगवन्नाम लेने से भी उसका बहुत प्रभाव होता है। वह हमारे चित्त को स्वच्छ और पवित्र बना देता है। वह प्रहरी का काम करता है। वह हमें यह सूचित करता रहता है कि कब सांसारिक विचार अन्तःकरण में प्रवेश कर रहे हैं। जैसे ही तुम्हें यह पता लगे कि सांसारिक विचार तुम्हारे मन में प्रवेश कर रहे हैं, वैसे ही मन्त्र-स्मरण द्वारा उनको दूर भगा सकते हो। यन्त्रवत् जप करते समय भी तुम्हारे चित्त का एक भाग इस कार्य में संलग्न रहता है।

 

जब तुम्हारा कोई मित्र भोजन करता है, उस समय तुम मूत्र अथवा विष्ठा शब्द कह दो, तो उससे उलटी होने लगती है। जब तुम गरम-गरम चाट के विषय में सोचते हो, तो तुम्हारे मुँह में पानी जाता है। इससे ज्ञात होता है कि प्रत्येक शब्द में कुछ--कुछ शक्ति अवश्य निहित है। जब साधारण शब्दों में ऐसी शक्ति है, तो ईश्वर के नाम में उससे कितने गुना अधिक शक्ति होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। भगवन्नाम का मन पर एक अनोखा प्रभाव पड़ता है। वह हमारे चित्त और उसकी वृत्तियों में आमूल परिवर्तन कर देता है। हमारे पुराने संस्कारों का काया-पलट होने लगता है। प्रत्येक जीव में बद्धमूल आसुरी-वृत्ति को जड़ से खोद कर फेंकने का श्रेय एकमात्र नाम-जप को ही है। यह बात असन्दिग्ध है कि भगवन्नाम ही साक्षात् भगवान् से भक्त का साक्षात्कार करा देता है।

 

केवल नाम-स्मरण ही सारी तकलीफों और कठिनाइयों से मुक्त है। भगवन्नाम का जप सबसे सरल है और सुखद भी है। इसीलिए इसे मोक्ष के सभी साधनों में श्रेष्ठ बताया गया है।

 

जब तुम नाम जप करते हो, उस समय हृदय में अपने इष्टदेवता के प्रति अनन्य भक्ति का विकास कर लेना चाहिए और साथ ही मन से सांसारिक विचारों को निकाल फेंकना चाहिए। मस्तिष्क में ईश्वर के अतिरिक्त और किसी विचार को स्थान ही नहीं देना चाहिए। चित्त का प्रत्येक कण ईश्वर से परिप्लावित रहना चाहिए। इस साधना में भरसक प्रयत्न की आवश्यकता है। भक्ति को अव्यभिचारिणी बनाने का पूरा प्रयत्न करना होगा।

 

तीन महीने कृष्ण की उपासना, तीन माह राम की उपासना और फिर शक्ति की उपासना और उसके बाद शिव की उपासना करना-यह ठीक नहीं है। इसे व्यभिचारिणी भक्ति कहते हैं। यदि तुम कृष्ण के उपासक हो, तो आजीवन उन्हीं की उपासना करते रहो। यह तुम्हें भली-भाँति मालूम होना चाहिए कि जिस प्रकार कुरसी, मेज, तिपाई, छड़ी, आलमारी-सभी में लकड़ी ही है, उसी प्रकार सभी वस्तुओं में केवल कृष्ण ही रमा हुआ है। यही अनन्य भक्ति है। इसे ही परा-भक्ति कहा जाता है।

 

मन्त्र का जप करते समय मन में सात्त्विक भावना अर्थात् शुद्ध भावना का उदय होने दो। यदि चित्त मल-रहित हो गया, तो सात्त्विक भावना स्वतः ही उत्पन्न हो जायेगी। यहाँ तक कि अनजाने भी बार-बार ईश्वर का नाम लेने से बड़ा प्रभाव परिलक्षित होता है। जप करने से जो मानसिक स्पन्दन विकसित होते हैं, उनसे चित्त का प्रक्षालन होता है और शुद्धि का अवतरण होने लगता है।

 

जपाभ्यास के लिए प्रारम्भ में एक माला का रखना अनिवार्य है। कुछ समय तक अभ्यास हो जाने पर फिर मानसिक जप भी किया जा सकता है। जप की मात्रा में जितनी वृद्धि होती जायेगी, हृदय भी उतने ही वेग से शुद्ध होता जायेगा। साधक को इस शुद्धि का प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है। साधक को अपने गुरु-मन्त्र पर अविचल विश्वास होना चाहिए। जप करने का मन्त्र जितना संक्षिप्त होगा, धारणा की शक्ति उतनी ही अधिक होगी। सब मन्त्रों में राम-नाम परमोत्तम है। इसका जप अत्यन्त सरल भी है।

 

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जप हृदय को शुद्ध बनाता है।

 

जप मन को स्थिर बनाता है।

 

जप षड्रिपुओं का विनाश करता है।

 

जप आवागमन का निवारण करता है।

 

जप पापों की राशि को जला देता है।

 

जप से तमाम संस्कार भस्मीभूत हो जाते हैं।

 

जप राग को नष्ट कर देता है।

 

जप से वैराग्य का अवतरण होता है।

 

जप हमारी अनियन्त्रित और व्यर्थ इच्छाओं का दमन करता है।

 

जप हमें निर्भय बनाता है।

 

जप हमारे भ्रम का निवारण करता है।

 

जप साधक को अमर शान्ति देता है।

 

जप प्रेम का विकास करता है।

 

जप भक्त का भगवान् से संयोग करा देता है।

 

जप से आरोग्य, धन, शक्ति और चिरायु की प्राप्ति होती है।

 

जप हमें ईश्वर का ज्ञान कराता है।

 

जप अनन्त आनन्द देता है।