जीवन में चरित्र का महत्त्व

 

 

 

श्री स्वामी चिदानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम संस्करण : २०१६

 

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Swami Chidananda Birth Centenary Series-93

 

 

 

 

 

 

 

 

निःशुल्क वितरणार्थ

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर-२४९१९२,

जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड' में मुद्रित।

For online orders and Catalogue visit: disbooks.org

प्रकाशकीय

 

परम आराधनीय श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज की जन्मशती के पुनीत अवसर की निर्दिष्ट शुभतिथि २४ सितम्बर २०१६ है। इस मंगलमय महोत्सव को मनाने हेतु मुख्यालय शिवानन्द आश्रम की सुनिश्चित योजना-अनुसार परम पावन श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज के प्रबोधक प्रवचनों से समाविष्ट एक सौ पुस्तिकाओं का प्रकाशन निःशुल्क वितरणार्थ किया जा रहा है।

 

विश्ववंद्य सद्गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज के दिव्य जीवन-सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसारार्थ परम पूजनीय श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज व्यापक रूप से देश-विदेश में आध्यात्मिक यात्रा करते हुए असंख्य जिज्ञासुओं, भगवद्भक्तों को अपने स्वतःस्फुरित सहज, अतीव गहन प्रेरक प्रवचनों द्वारा दिव्य जीवन का पथ निर्देशित करते रहे। सद्गुरुदेव की दिव्यानुभूति के अनुसार स्वामी चिदानन्द जी के प्रवचन एक सन्त-हृदय के सहजानुभूत अन्तर्ज्ञानयुक्त प्रकटित भावोद्गार हैं।

 

अब तक के उनके कुछ अप्रकाशित व्याख्यानों को पुस्तिका रूप में प्रकाशित कर श्री स्वामी जी महाराज को जन्म शताब्दी के महान् शुभावसर पर उनके पावन श्रीचरणों में सादर सप्रीत भेंट समर्पित करते हुए हम हर्ष का अनुभव कर रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तिका 'जीवन में चरित्र का महत्त्व' अन्य स्थानों में दिये गये पाँच प्रवचनों का संकलन है।

 

मुख्यालय शिवानन्द आश्रम के अंतेवासियों द्वारा इन प्रवचनों के अभिलेखन, सम्पादन तथा संकलन कार्यों में प्रेमपूर्ण सेवा-सहयोग के लिये हम हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

 

परम पिता परमात्मा, हमारे आराध्य श्री सद्गुरु भगवान् श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज और परम पावन श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज के अनन्त शुभाशीर्वाद सब पर रहें!

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

 

प्रकाशकीय. 3

. जीवन में चरित्र का महत्त्व... 5

.आदर्श जीवन. 14

.चित्त शुद्धि का महत्त्व... 22

.दिव्य जीवन के मूल सिद्धान्त... 29

. अपने प्रति मित्र बनें. 34

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

. जीवन में चरित्र का महत्त्व

(१५ जुलाई १९९३ को गुरुपूर्णिमा के अवसर पर दि.जी.सं. ऋषिकेश में दिया गया प्रवचन)

 

 

उज्ज्वल आत्मस्वरूप, परम पिता परमात्मा की दिव्य अमर सन्तान !

 

हमारे समक्ष साधकों के रूप में विराजमान आप सब, हमें अपने दर्शन देकर एवं हमें आशीर्वाद करने वाले अजर अमर अविनाशी आत्मा ! अभी स्वामी प्रेमानन्द जी ने बोला, 'अभी स्वामी चिदानन्द जी, दिव्य जीवन संघ के परमाध्यक्ष, आपको आशीर्वाद देंगे' यह बिल्कुल गलत है। आप धन्य आत्मस्वरूपों के दर्शन करने एवं आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यह दास यहाँ पर आया है।

 

आप यहाँ पर परिश्रम करके दूर-दूर से आये हैं। आप अपने समय, उपस्थिति, एवं इन सात दिनों में शान्ति पूर्वक श्रवण का भी हमें दान देंगे। इसके वास्ते हम आपको धन्यवाद देते हैं। इतना कष्ट पाकर अपनी उपस्थिति देकर हमारी सेवा स्वीकार कर रहे हैं। इस सेवा के अवसर को हम अपना सौभाग्य समझते हैं, आशीर्वाद और अनुग्रह समझते हैं। इस सेवा के द्वारा गुरु महाराज का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दास आपके सामने है, आशीर्वाद देने के लिए नहीं है।

 

दूसरी बात-आशीर्वाद किसी से लिया नहीं जाता। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन के कर्मों द्वारा आशीर्वादित भी होता है, और अभिशापित भी होता है। सबसे बड़ा भारी, सबल और प्रबल आशीर्वाद है जिसके फलस्वरूप आप कहाँ-कहाँ से यहाँ तक पहुँचे हैं। इसके साथ ही आपकी  मेहनत और आपका व्यवहार है। उससे एक व्यक्ति जितना आशीर्वादित हो सकता है उतना अन्य किसी भी आशीर्वाद से लाभान्वित नहीं हो सकता। अन्य व्यक्तियों से प्राप्त होने वाला आशीर्वाद भी स्वयं अपने द्वारा प्राप्त किया गया एक आशीर्वाद है।

 

और तीसरी बात यह है कि दुनिया भर के सन्त-महापुरुषों का आशीर्वाद प्राप्त करके भी यदि अपने जीवन को ठीक दिशा में नहीं चलाया तो सब आशीर्वाद ना के बराबर हैं। यदि फूटे घड़े में पानी भरने की कोशिश की जाये तो कभी भी भरेगा नहीं, ऐसे ही यह आशीर्वाद हो जाएगा। आपको क्या-क्या आशीर्वाद नहीं मिले हैं!

 

इसका वर्णन करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं। समस्त जगत् में अग्रगण्य दार्शनिक जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जिनको पूरी की पूरी - विश्व-मानवता मानती है, भारतीय, पाश्चात्य देशों के सभी मानते हैं, वेकहते हैं कि मनुष्यत्व प्राप्त करना ही एक बहुत बड़ा आशीर्वाद है, यह साधारण बात नहीं है। और फिर भारतभूमि में जन्म लेना जो पुण्यभूमि है और हमारी मातृभूमि है।

 

पूरे विश्व भर में एक हमारा ही राष्ट्र और संस्कृति है, जिसमें कहा गया है कि मानव 'दिव्य' है। मानव का यह व्यक्तित्व गौण है, किन्तु मुख्य एवं वास्तविक व्यक्तित्व दिव्यता है। क्योंकि उन्होंने इसे देखा है, अनुभव किया है और स्वयं साक्षात् अनुभूति के आधार पर यह घोषित किया है। हर जीवात्मा, हर मानव, व्यक्ति, परमात्मा का अंश है। परमात्मा परिपूर्ण दिव्यता का सागर है, उनका अंश होने के कारण आप भी परिपूर्ण रूप में दिव्य हैं। आपका निज स्वरूप, असली नित्य व्यक्तित्व, यह तात्कालिक मानव व्यक्तित्व नहीं है। जन्म लेने से पूर्व भी यह व्यक्तित्व नहीं था, मृत्यु के बाद भी यह नहीं रहेगा। इसलिए यह केवल तात्कालिक मुसाफिरी का एक व्यक्तित्व है।

 

जैसे नाटक में कोई व्यक्ति वेश बदल कर विशेष व्यक्तित्व की भूमिका अदा करता है। यह भूमिका निभाने से पूर्व वह कुछ और था, मंच पर कुछ और बना, और उसके बाद पूर्व में जैसा था वैसा ही बना। इस प्रकार यह तात्कालिक व्यक्तित्व गौण व्यक्तित्व है, नित्य व्यक्तित्व आपकी दिव्यता है। सदा-सर्वदा, अनादि-अनन्त काल से आप परम पिता परमात्मा, जो परब्रह्म कहलाता है, उनके एक अंश हैं।

 

केवल भारतवर्ष ने मानव व्यक्तित्व के बारे में जानकर अनुभव किया और घोषणा करके सर्व विश्व मानवता को आशीर्वादित किया। ये खोज हमारी वैज्ञानिक खोज है। यह आविष्कार बाह्य भौतिक जगत् के विषय में नहीं है। आप ही का आन्तरिक अति सूक्ष्मातिसूक्ष्म अव्यक्त जो क्षेत्र है, उसका आविष्कार है। आपके पूर्वज शून्य में बहुत आगे गये थे। पूरे के पूरे जगत को देखा, परीक्षा की, इसमें अन्तिम वास्तविक विश्लेषण में पाया कि इस जगत में कोई तथ्य नहीं है।

 

इसका अल्प उपयोग है, किन्तु उच्च प्रयोजन किसी वस्तु, तत्त्व में नहीं है। जो हर इन्सान चाहता है वह सुख और शान्ति प्रदान करने की क्षमता, सृष्टि किये हुए इन वस्तु-पदार्थों में नहीं है। कुछ आराम भी देगा और साथ ही कुछ परेशानी भी देगा। सभी वस्तुएँ पहले अच्छी लगती हैं, किन्तु बाद में अशान्ति का कारण बन जाती हैं। मानव सुख-शान्ति, तृप्ति-सन्तोष चाहता है, दुःख को नहीं चाहता। दुःख का अभाव और सुख का अनुभव, यही मानव मात्र की चाहना है।

 

पशु भी आराम चाहता है। शीतकाल में ठंड होती है, तो वह गर्मी को चाहता है, धूप सेवन करता है। गाय, भैंस, बकरी, कुत्ता, बिल्ली आदि किसी को भी देख लें-ग्रीष्म ऋतु में कुत्ता भी गंगाजी के थोड़े पानी में जाकर खड़ा हो जाता है। सभी पशु पानी के नजदीक पेड़ की छाया में विश्राम करते हैं। सर्वसाधारण जीवित वर्ग सभी आराम चाहते हैं।

 

किन्तु ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की गयी किसी वस्तु में भी स्थायी सुख प्रदान करने की क्षमता नहीं है। भूख लगी, इस संकट को मिटाने के लिए आहार आपको तात्कालिक तृप्ति-सन्तोष दे सकता है। लेकिन - घण्टे के बाद दुबारा भूख लग जाती है, सब कुछ अपूर्ण है। हमारी संस्कृति में यह कहा गया है कि यदि तुम परिपूर्ण रूप में, सदा के लिए नित्य-शाश्वत सुख प्राप्त करना चाहते हो तो नित्य तत्त्व की खोज करनी पड़ेगी, जिसका स्वरूप केवल अमिश्रित शतशः आनन्द स्वरूप है।

 

'ऐसी कोई वस्तु है, जिसको प्राप्त करके शाश्वत-अनन्त आनन्द में स्थापित हो सकें?' वे बोले, 'है! है क्यों नहीं, जरूर है।' 'कैसे?' 'हम जानते हैं, अनुभव के आधार पर कहते हैं कि एक ऐसा महान् परिपूर्ण दिव्य तत्त्व है, आनन्दम् ब्रह्मेति प्रजायेत परमानन्द, नित्यानन्द, अनन्त, अवर्णननीय आनन्द है।' इस आनन्द का वर्णन करने की कोशिश से व्यक्ति हार जायेगा। पूरी पृथ्वी, पूरे भूमण्डल का एक कागज़ बनाकर बिछा दें, पूरा सागर स्याही बन जाये, विश्व के विशाल वृक्ष जो आकाश को छूते हैं, उनकी कलम बना दी जाए तो साक्षात् सरस्वती भी यदि इस अवर्णनीय आनन्द को युग-युगान्तर तक लिखने बैठे तो लिख नहीं सकेगी, थक कर हार जाएगी।

 

आनन्द की अनुभूति क्या है? स्पष्ट बोलने में कोई शंका नहीं है। हम तर्क नहीं देते, जो जानते हैं, उसी को बोलते हैं। नित्य तत्त्व परिपूर्ण दिव्य तत्त्व है, सत्य है, शिव है, सुन्दर है। इसको प्राप्त करके तुम शहनशाह बन जाओगे। यहीं पर आनन्दित हो जाओगे। संसार का कोई दुःख, शोक, संकट तुम्हारे पास नहीं सकता। भारतवर्ष पुण्यभूमि है, आपकी मातृभूमि है। आध्यात्मिक भारत इस स्थूल जगत का हिस्सा नहीं है, जगत से परे इस जगत की सृष्टि से पूर्व, एक परात्पर तत्त्व है।

 

स्वामी विवेकानन्द जी तीन वर्ष के बाद जब पाश्चात्य देशों से वापिस आये, तमिलनाडु के एक शहर के पत्रकार ने पूछा, 'स्वामी जी आपने पूरे भारत के कोने-कोने में बस्ती, ग्राम, जिला, प्रान्त का भ्रमण किया, जनता के साथ मिले। भारत की हालत को जितना आप जानते हैं, उतना और कोई नहीं जानता, आपको सारा अनुभव है। तीन, साढ़े तीन वर्ष आप पाश्चात्य देशों में रहकर आए हैं। वहाँ जाने से पूर्व भारतवर्ष के प्रति आपके क्या विचार थे और लौटने के बाद भारतवर्ष के प्रति आपके क्या ख्याल है?' कुछ उद्देश्य रखकर के ही पत्रकार सवाल पूछते हैं। पत्रकार ने सोचा होगा स्वामी विवेकानन्द दुःख-शोक प्रकट करेंगे। पाश्चात्य जगत की जगमग, चकाचौंध को देखकर कहेंगे कि उनकी तुलना में भारतवर्ष कुछ भी नहीं है। भारतवर्ष पिछड़ा राष्ट्र है, गरीब और अनपढ़ लोग हैं।

 

स्वामी विवेकानन्द ऊँचे कद के नहीं थे, किन्तु सीधे तनकर पत्रकार को कहा, 'आप पूछते हैं मेरा भारतवर्ष के प्रति क्या विचार है? भारतवर्ष के प्रति मेरा अति प्रेम और सम्मान का भाव है। भारतवर्ष केवल मात्र मेरी मातृभूमि ही नहीं वरन दिव्य भूमि है, पूजनीय है, आराधनीय है। मिट्टी का कण-कण मेरे शिरोधार्य है।' स्वामी जी बड़े विचारक थे, भावुक नहीं थे। कॉलेज के समय में कट्टर नास्तिक विचारों के थे। भगवान् की पूजा, घण्टी, आरती को कुछ भी महत्त्व नहीं देते थे। उनके सहपाठी आस्तिक प्रकृति के थे किन्तु स्वामीजी भगवान् की भक्ति और विश्वास को अपनी जोशीली बहसबाजी से खण्डित कर देते थे। सब दुःखी होकर कहते थे, 'नरेन्द्र ऐसे कैसे नास्तिक हो गया है?' ऐसे स्तर वाला नरेन्द्र अब स्वामी विवेकानन्द बनकर पत्रकार के प्रश्नों का उत्तर दे रहा है। ऐसे राष्ट्र का नागरिक बनकर हमें परम सौभाग्य मिला है, हम पूर्णरूप से आशीर्वादित हैं।

 

इस सप्ताह में आप ऐसा मत सोचना कि हम किसी नये या अपरिचित स्थान में हैं, यह आपका आध्यात्मिक घर है। इसके संस्थापक सद्गुरु भगवान्, स्वामी शिवानन्द जी महाराज हैं जो आपके दादा जी हैं।

 

स्कूलों में पाठ्यक्रम के आधार पर प्रपंच के बाह्य क्षेत्र के विषयों में समझाया जाता है। इतिहास, भूगोल, अंकगणित, सामान्य विज्ञान, जीव विज्ञान, भौतिक शास्त्र आदि के बारे में जानकारी देते हैं। उसी को परीक्षा में लिखना पड़ता है। आगे कॉलेजों में जाकर एक विषय पर विस्तार से विशेष जानकारी दी जाती है। लेकिन अपने जीवन को सम्यक दिशा में ले जाने की जो कला और शास्त्र है, वह स्कूल, कॉलेज और परिवार में से कोई भी नहीं सिखाता। लेकिन मैं साधना-सप्ताह में केवल मात्र आपके विषय में ही बोलूँगा। आपके विषय में आपको परिचय देना चाहूँगा। जीवन के उद्देश्य के सम्बन्ध में गहराई से जानकारी दूँगा। अन्य विषयों पर मैं नहीं कहना चाहूँगा। क्योंकि अन्य विषयों की जानकारी प्राप्त करते-करते आपकी खोपड़ी थक गयी है। पता नहीं, कितने समय से कितने विषयों को मस्तिष्क में भरते रहे हो। सामान्य मानव का मस्तिष्क जैसे कम्प्यूटर हो गया है। ज्यादा से ज्यादा इसको भर लेना है। परीक्षा के समय दिमाग से निकाल करके सफेद को काला बनाना है, एवं कुछ कुछ उपाधि को प्राप्त करना है। किन्तु हजारों की संख्या में बेरोजगारी है। एम.., एम.एस.सी के लिए प्रार्थनापत्र लेकर इधर-उधर भटकते रहते हैं। शिक्षा प्रणाली में अपने आप को जानने का कोई प्रबन्ध नज़र नहीं आता। यदि हमारे बारे में हमारा ज्ञान शून्य है, और दुनिया भर का ज्ञान भरपूर है तो वह ज्ञान, ज्ञान नहीं है। इसको कहते हैं, 'दीपक तले अंधेरा'

 

ऐसी परिस्थिति में आपके अन्दर समस्या, उलझन, झमेला, तनाव गया तो आपको मालूम नहीं है कि कैसे इसका मुकाबला करें, कैसे हल निकालें। तो आपने समझने की कोशिश की और ही किसी ने आपको समझाया। ऐसी परिस्थिति में आप असहाय हो जाते हैं, भ्रमित हो जाते हैं, मालूम नहीं पड़ता क्या करना चाहिए। प्राचीन काल के एक दार्शनिक ने कहा है-मानव के अध्ययन का महानतम विषय मानव स्वयं ही है। इनसान के लिए सबसे बड़ा, अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य विचार क्या है? इनसान के लिए अपने बारे में जानकारी रखना और उसे समझना एक महत्त्वपूर्ण विद्या है। ज्ञान से आदमी जानकार बनता है, किन्तु जानकारी से समझदारी नहीं आती। ज्ञान की असली शुरुआत तब है, जब आदमी खुद को समझने लगता है।

 

हाँ, इतना तो है कि सामान्य विज्ञान, आहार विज्ञान, जीवकोष विज्ञान के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी होनी चाहिए। क्योंकि अन्ट-शन्ट चीज खाने से अपच हो जाता है, गैस रुक जाती है, पेट खराब हो जाता है तो वैद्य, हकीम, डॉक्टर के पास जाना पड़ता है, जा कर कहते हैं, 'डॉ. हमें बहुत पीड़ा हो रहा है, सहन नहीं हो रहा है।' हमें इतना भी तजुरबा-अनुभव नहीं है कि इस पीड़ा से स्वयं को कैसे मुक्त करें। हमें अपनी प्रकृति के बारे में मालूम नहीं है, अनुकूल आहार के बारे में पता नहीं है। कैसा कितना आहार खाने से हम आराम से स्वपाचन कर सकते हैं, यह सब सोचने-समझने की कोशिश नहीं करते।

 

चार बात किसी ने हमारे बारे में बोल दिया तो अशान्ति, व्याकुलता हो जाती है। खाने की इच्छा नहीं होती, रात में निद्रा नहीं आती, उद्विग्न हो जाते हैं। अन्दर की मशीनरी पर इसका इतना प्रभाव पड़ता है कि उद्विग्न हो जाते हैं। 'उद्विग्न क्यों हो जाते हैं, इसको समझ करके, सामना करके क्या मैं अपने आप में सफल नहीं हो सकता हूँ?' यह सोचने की कभी कोशिश ही नहीं की। मौलिक मनोविज्ञान को अपने आप सीखना चाहिए। स्कूलों में ये सब नहीं हैं और ही घर में कोई समझाने वाला है। माता-पिता ही समझाते हैं, वह अपने काम-धन्धे में फँसे हुए हैं। अपने आपको जानना जीवन में एक केन्द्रीय स्थान रखता है।

 

बाहर और अन्दर के बारे में दो कार्य-प्रणालियाँ हैं। फ़िजिकल और बायोलौजिकल। एक शरीर के बाह्य अंगों से सम्बंधित है, दूसरी आन्तरिक अंगों से, जैसे कलेजा, मस्तिष्क, पेट, आँतें, जिगर इत्यादि कैसे काम करते हैं। फिजिकल है, बाह्य शरीर विज्ञान और फिजियोलोजी शरीर के आन्तरिक कोषों की कार्य-प्रणाली जो अन्दर चल रही है, अन्दर छिपी है। इन दोनों विज्ञानों की जानकारी के साथ तीसरा साइकोलॉजी, अर्थात् मन का विज्ञान है। २४ घण्टे यह मन अपने अन्दर मनमाने रूप से काम करता है, उसे कोई रोक नहीं सकता। उसके बारे में भी समझ होनी चाहिए। आप निद्रा करने के लिए जाते हैं, सो जाते हैं, तब भी इस मशीनरी का वेग, इसकी गति समाप्त नहीं होती। बाह्य प्रपंच जब अदृश्य हो जाता है, तब यह आन्तरिक प्रपंच को खड़ा करके, आपको वहाँ पर इधर-उधर ले जाता है। इसमें मन सक्रिय रहकर विचित्र अनुभव देता है, जिसे स्वप्नावस्था कहते हैं। बाहर की निद्रा भी गयी, स्वप्न भी खत्म हो गया, तब जाकर के आप गाढ़ निद्रा की अवस्था, सुषुप्ति में पहुँचते हैं। सवेरा होते ही सारा कार्य व्यापार फिर चालू हो जाता है, इसलिए थोड़ा बहुत इसके बारे में समझ पाने की आवश्यकता है। आवश्यकता क्यों है?

 

मानव समुदाय में एक अच्छा व्यक्ति बनकर कार्य करना है, तब यह समझ आपको आवश्यक है, 'मेरे अन्दर क्रोध आया, इसको कैसे निकाल सकता हूँ? मेरे अन्दर किसी के प्रति द्वेष-घृणा का भाव आया, उसका कैसे निर्मूलन करके मुक्त हो सकता हूँ?' इसको समझ कर, अपनी मालकियत को जानकर अपने व्यक्तित्व में किसी का गुलाम बनकर नहीं रहना है। अपने ऊपर आपका अधिकार तभी होगा जब आप स्वयं पर नियंत्रण कर सकेंगे। पेट भरके खाना खा लिया, किन्तु जिह्वा और भी खाने की इच्छा कर रही है, तब यह विचार करना कि नहीं यह हमारे लिए बाधा करेगा, जिह्वा की मैं नहीं मानूँगा। अपनी बुद्धि विवेक की बात मानकर खाना बन्द करूँगा। ऐसे मिताहारी, संयमी सदा सुखी रहते हैं। जिसके अन्दर संयम नहीं है, वह मन की चाल और इन्द्रियों की गति को नहीं समझता, उसकी आड़ में अति करके अपने आप को संकट में डाल देता है। अपने स्वास्थ्य को खराब कर लेता है।

 

इसलिए मानव के लिए शारीरिक विज्ञान, शरीर के आन्तरिक विज्ञान और मनोविज्ञान को समझना अत्यन्त आवश्यक है, अनिवार्य है, मुख्य है। एक आदमी के अन्दर यदि स्वार्थ आकर अड्डा जमाता है, तो उस में अहंकार और अभिमान जाता है। उसकी बाहर सबके साथ टकराहट रहती है। जो सामंजस्य के बिल्कुल विपरीत है। समाज में १०-२० आदमी के साथ रहना है, जंगल की बात नहीं है। अपने स्वार्थ को छोड़कर सबका चिन्तन करना है। मेरे जैसे और भी हैं, जैसे मैं अपने वास्ते चाहता हूँ, वैसे ही दूसरे भी अपने वास्ते चाहते हैं। सबके अनुकूल बन कर, सबसे समन्वय करके चलना चाहिए। हमारे लिए भी अनुकूल हो, दूसरे के लिए भी प्रतिकूल हो, ऐसा बर्ताव करना चाहिए।

 

परस्पर का व्यवहार, विज्ञान भी है, कला भी है। इसको सीख कर जो आदमी व्यवहार क्षेत्र में कार्य करता है उससे सबको सुख-सुविधा और सुकून मिलता है। उनके रहने से वातावरण-पर्यावरण सुखी हो जाता है, यही इन्सानियत है।

 

मैं आपको निकट पूर्व इतिहास के मार्ग में ले जाना चाहता हूँ। इसको स्मृति की पगडंडी कहो या गली कहो आप सब टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, देहरादून आदि विभिन्न स्थानों के कॉलेजों से आए हुए हो। टिहरी-गढ़वाल जिला था ही नहीं, भारतवर्ष में ब्रिटिश साम्राज्य का यह हिस्सा नहीं था, उससे बाहर था। टिहरी गढ़वाल राजघराने के क्षेत्र में था। लक्ष्मणझूला भी ऐसा नहीं था, एक ओर लकड़ी से बना हुआ था। आदमी बद्रीनाथ की यात्रा के लिए अपना बोझा अपने कन्धों पर ले जाता था। गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ जाने के लिए बस, टैक्सी आदि नहीं थीं, हरिद्वार से ही पैदल यात्रा करनी पड़ती थी।

 

सन् १९२३ की बात है, दक्षिण भारत का जन्मा एक अच्छा लिखा-पढ़ा व्यक्ति युवावस्था में डॉक्टर की उपाधि प्राप्त करके ज्ञान हासिल कर, अपने कार्य वास्ते भारत छोड़कर मलाया सिंगापुर गए। उस समय यह सब ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत था। मलाया जाकर ११-१२ वर्ष पूर्ण अर्पित होकर डॉक्टर का कार्य बड़ी हमदर्दी से किया। डॉक्टर साहब की करुणा, दानशीलता, उदारता, संवेदनशीलता और धर्मपरायणता असीम, असाधारण एवं अनूठी थी। करुणामय हृदय होने से लोगों का दर्द सहन नहीं कर सकते थे। २४ घण्टे, रात-दिन उनकी सेवा करते रहते थे। लोग उस समय उनको उनके नाम से नहीं पुकारते थे, उन्हें 'डॉक्टर धर्मभूषण' कहते थे। गुरुदेव का पूर्वाश्रम का नाम डॉक्टर कुप्पु स्वामी था, वे ऐसे धार्मिक प्रकृति के थे। २४ घण्टे उनके घर ताला-चाबी नहीं रहता था, सबके लिए उनका द्वार खुला रहता था।

 

लेकिन भगवान् उनसे अन्य क्षेत्र में कार्य करवाना चाहते थे। ११-१२ वर्ष की प्रेक्टिस के बाद उनको महान् वैराग्य उत्पन्न हुआ। बड़ी अद्भुत रीति से अपनी प्रेक्टिस, पैसा, भविष्य को तिलाञ्जलि देकर अत्यन्त वैराग्य के साथ, मुमुक्षु-साधक बनकर भारतवर्ष में गये। नासिक, वाराणसी, इलाहाबाद होते हुए हरिद्वार, ऋषिकेश, उत्तराखण्ड की तरफ प्रस्थान किया। सन् १९२३ में कुछ समय ऋषिकेश रामनगर में रहे, जहाँ पर आजकल आई.डी.पी.एल है। १९२४ में गंगा जी में भयंकर बाढ़ आने से लक्ष्मणझूला बह गया। गुरुमहाराज रामनगर को छोड़, नाव द्वारा गंगा पार कर स्वर्गाश्रम में जाकर बसे। १९२४ से १९३४ तक अखण्ड रूप से अत्यन्त कठिन तपस्या, तितिक्षा, योगाभ्यास, मौनव्रत धारण करके बारह-बारह, सोलह-सोलह घण्टे तक ध्यान में बैठते थे। क्षेत्र से भिक्षा में सूखी रोटी-दाल लेकर आते थे। ध्यान को छोड़कर उन्हें क्षेत्र में जाना अच्छा नहीं लगता था। भजन-भाव में विघ्न आता था। क्षेत्र में भिक्षा के लिए लाइन लगती थी। जब सब साधु क्षेत्र से भिक्षा लेकर चले जाते, तब अन्त में जाकर मैनेज़र को कहते, 'यदि भिक्षा ज्यादा बच गई है तो हमें दे दो।' मैनेजर कहता, 'हाँ, हाँ, ले जाओ।' बचा भोजन वैसे भी गाय, कुत्ते, बन्दरों को देना पड़ता।

 

डॉक्टर थे, एक घण्टा सेवा का काम करते थे। क्षेत्र से रोटी ले जाकर ऊपर किसी आले पर रख देते। दिन कुटिया से बाहर नहीं आते थे। भूख लगने पर रोटी को कमण्डल में चूर कर गंगा जल में भिगो देते थे। नरम हो जाने पर अपनी क्षुधा निवृत्ति कर लेते थे, और गहरे ध्यान में बैठ जाते थे। क्षेत्र में आने-जाने से विक्षेप और समय बर्बाद होता था। भजन, ध्यान, तपस्या करके 'आत्मज्ञान' को प्राप्त किया। उस अवर्णननीय अवस्था को प्राप्त करके भरपूर मगन हो गए।

 

पहले से ही सदैव अपने हृदय में दूसरों के हित के लिए ही सोचते थे, कैसे उनकी सेवा करूँ, कैसे उन्हें सुखी बनाऊँ। विश्वप्रेम, परोपकार की भावना उस समय में भी उत्पन्न हुई। जिस आनन्द, शान्ति को मैंने प्राप्त किया है, इस अनुभव को केवल अपने अन्दर ही रखूँ बल्कि सबको बाँटू, ऐसा सोच कर दुनिया को सम्बोधित करके सब बाँट दिया। उस समय यह आश्रम, यह संस्था नहीं थी।

 

१३ जनवरी १९३६, मकर संक्रान्ति के दिन दिव्य जीवन संघ की स्थापना हुई। स्थापना के बाद उनका एकमात्र उद्देश्य रहा कि आधुनिक जगत की दुनिया को, भारतीय आत्म-बन्धुओं को मार्ग दर्शन देकर उनका जीवन सार्थक बनाएँ, शुभ बनाएँ। हर एक आदर्श व्यक्ति बनकर समाज को लाभान्वित करे, उनके रहने से मानव समाज की मूल्यता बढ़ जाये। अपने लिए भी सुखी जीवन हो और अपने द्वारा दूसरों का भी जीवन सुखी हो।

 

एक बात मैं कहूँगा, सफल जीवन की बुनियाद सचरित्र, सदाचरण में है। मनुष्य और पशु में अन्तर ज्ञान का है। ज्ञान विहीन मानव पशु तुल्य है, ज्ञान को प्राप्त किया तो पशु से श्रेष्ठ है। मैं कहता हूँ, ज्ञान-सम्पन्न मानव भी हो, लेकिन चरित्र विहीन है, तो वह पशुओं से भी नीचे चला जाएगा, राक्षस हो जाएगा। क्योंकि वह ज्ञान का दुरुपयोग करेगा, दूसरों की हिंसा करेगा, पीड़ा देगा।

 

आजकल बहुत चतुराई का ज्ञान गया है जिससे बुद्धि, दुर्बुद्धि हो गयी है। मानवता को इतना परेशान कर सकते हैं, सोच भी नहीं सकते, योजनाबद्ध अपराध करते हैं। आप जानते हैं, पाश्चात्य विज्ञान से हमारा भूगोल कितना अभिशापित हो गया है। विज्ञान की पराकाष्ठा पर पहुँच कर पूरे के पूरे मानव समुदाय को विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है।

 

गुरुदेव ने संस्था को बनाकर सदस्यता के नियम रखे। इसमें वर्ण, राष्ट्रीयता, शैक्षणिक योग्यता, सामाजिक परिस्थिति, जाति, सम्प्रदाय, स्त्री, पुरुष का कोई भी सवाल नहीं है, तुम कहीं से भी हो, कोई बाधा नहीं है।

नियम यह पालन करने हैं, 'मैं शपथपूर्वक लिख कर देता हूँ कि, () मैं अपने जीवन में सत्य परायण रहूँगा। () अहिंसात्मक व्यवहार रखूँगा, किसी की हिंसा नहीं करूँगा। () मेरा चरित्र-आचरण पवित्र रहेगा, काया वाचा मनसा मैं पवित्र रहूँगा। मुझे दिव्य जीवन संस्था का सदस्य बनाइये।' बस इतनी ही शर्तें हैं-सत्य, पवित्रता, करुणा-यह शपथ लेने पर संस्था में आने के लिए स्वागत है। ये शर्तें क्यों रखीं ? सर्वधर्म का यह सारभूत तत्त्व-सारामृत यह तीन महान् दिव्य सगुण हैं। आपके उज्ज्वल ज्ञानी पूर्वजों ने आपको कहा है,

 

'यदि मोक्षमिच्छसि चेत् तात विषयान् विषवत् त्यज, ब्रह्मचर्यम् अहिंसा ब्रतम् सत्य पीयूषवत् भज।' पवित्रता, सत्यपरायणता और अहिंसा को अमृत तुल्य समझकर अपनाओ, आचरण में उतारो। १९३६ से १९६३ तक गुरुदेव स्वयं संस्थापक बनकर संस्था का संचालन करते आये हैं। १४ जुलाई १९६३ को अपना कार्य समाप्त करके, जहाँ से आए थे, वहीं महासमाधि लेकर लीन हो गये हैं। यह उनका पुण्यतिथि आराधना दिवस है। १४ जुलाई अंग्रेजी तारीख से नहीं मनाते हैं, गुरुपूर्णिमा के बाद ९वें दिन महोत्सव मनाते हैं।

 

गुरुदेव बड़े उदार पुरुष थे, बड़े प्रसन्नचित्त-बड़े प्रसन्नचित्त ! कोई भी उनसे प्रथम बार मिलकर - मिनट बात कर लेता तो उनको ऐसा लगता था कि वह उनको जन्म से ही जानता है। इतना सम्मोहन था, एकात्मकता थी। - मिनट के बाद उनसे विदा होने का समय गया तो बस अविरल आँसू बहते थे। विश्व मानवता के साथ अपनत्व एवं आध्यात्मिक एकता थी, बड़े अद्भुत पुरुष थे। आप जो कुछ भी अभी प्राप्त कर रहे हैं, सब उनकी ही देन है। हम केवल मात्र उनके दिव्य चरणों के सेवक है, सेवा का सौभाग्य हमें प्राप्त है।

 

इस वक्त परम पिता परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि उनके दिव्य अनुग्रह की वर्षा आप सब पर हो। हमारे भगवद् तुल्य गुरु महाराज स्वामी शिवानन्द जी विश्व प्रेमी, विश्व सेवक, दिव्य देवता पुरुष अब भी अदृश्य रूप में विराजमान हैं। उनका स्नेहमय आशीर्वाद अब भी बना हुआ है, आगे भी बना रहेगा।

 

आपका आदर्श जीवन हो, भविष्य उज्ज्वल हो! आपके आदर्श जीवन द्वारा हमारा प्रिय भारतवर्ष लाभान्वित हो! वर्तमान भारतवर्ष के ऊपर ग्रहण धूमिलता आयी हुई है, उससे मुक्त करने में आपका सबल-सक्षम सहयोग हो। आप भारतवर्ष के छात्र हैं, निकट भविष्य की आप ही प्रजा हैं। भारतवर्ष का ऐश्वर्य खण्डित पदार्थों में, सोना-चाँदी, हीरा-नवरत्न में नहीं है, आप लोगों से है। आपके दिव्य व्यक्तित्व से ही भारत लाभान्वित होगा, निकट भविष्य ऐश्वर्यशाली होगा। यह सौभाग्य आपको प्राप्त है, इसका सदुपयोग करके भारतवर्ष के उद्धारक बनें। गुरुमहाराज आपको आशीर्वाद दें। परम पिता परमात्मा की उपस्थिति में हम सब एकत्रित हुए हैं, उनका अनुग्रह आप पर हो!

 

 

हरि तत् सत्।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

.आदर्श जीवन

('भावनगर, गुजरात में १९ मार्च, १९८७ को दिया गया प्रवचन')

 

उज्ज्वल आत्म स्वरूप, परमपिता परमात्मा की दिव्य अमर सन्तान !

 

भावनगर में स्थित स्थानीय 'दिव्य जीवन संघ शिशु विहार' के प्रांगण में यह सुन्दर ज्ञान यज्ञ सम्पन्न हो रहा है। इस ज्ञान यज्ञ में उपस्थित श्रोतागण के रूप में मुमुक्षु, जिज्ञासु, भगवद् प्रेमी, धर्म निष्ठ सज्जन सत्संगी, आप सब दिव्य अमर आत्माओं की सेवा में छोटी आहुति अर्पण करने जा रहा हूँ। आपके शरीर रूपी मन्दिर में अन्तःस्थित जो प्रभु हैं, उनके चरणों में भ्रातृभाव एवं सादर प्रेम के साथ, आराधना के रूप में यह आहुति पहुँच जाये, स्वीकार हो जाये, यही प्रार्थना है। हमारा भारतवर्ष बहुत विचित्र, विशिष्ट, अनोखा और अद्भुत देश है और हमेशा रहेगा। इतिहास के पूर्व प्राचीन वेदों के युग में महर्षियों ने विश्व जीवन एवं मानवता के पीछे एक गूढ़ अनिर्वचनीय रहस्ययुक्त तत्त्व को बताया है, जो देशकाल से परे, अनादि, अनन्त एवं विचित्र है। जहाँ मन नहीं पहुँच सकता, वाणी नहीं पहुँच सकती, जिसे बुद्धि नहीं ग्रहण कर सकती। उस परात्पर तत्त्व को उन्होंने अनुमान लगाकर नहीं खोजा है, बल्कि अद्भुत अनुभूति के रूप में प्राप्त किया है। इस अनुभूति द्वारा विश्व-जीवन के रहस्य उनके सामने खुली किताब जैसे बन गये। वे त्रिकालज्ञ बन गये, उनके ज्ञान से कोई चीज़ छिपी नहीं थी अर्थात् वे सर्वज्ञ बन गये।

 

इस सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त करके उन्होंने विचित्र, अद्भुत अतुल्य बात को कहा, 'हे मानव! तुम तो अमर आत्मा हो। अभी तक तुम स्वप्न में रहेभूल में रहे कि मैं जन्म-मृत्यु के साथ रहने वाला एक छोटा-सा क्षुद्र व्यक्ति हूँ। नहीं-नहीं-नहीं। तुम्हारे लिए जन्म है, मृत्यु है। तुम तो एक अमर आत्म तत्त्व हो। देश काल, नाम रूप से परे हो!'

 

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

हन्यते हन्यमाने शरीरे।। (गीता /-२०)

 

उन्होंने आपको आपके बारे में ज्ञान दिया, जागृति दी, 'देखो प्यारे आप एक ऐसा अद्भुत तत्त्व हो जिसे अस्त्र-शस्त्र घायल नहीं कर सकते, अग्नि दहन नहीं कर सकती, पानी भिगो नहीं सकता, पवन सुखा नहीं सकता। तुम अजर, अमर, अविनाशी, नित्य-शुद्ध, नित्य-बुद्ध, नित्य-परिपूर्ण आत्म तत्त्व हो। ऐसा होने से तुम्हारे लिए शोक कहाँ से आया? चिंता कहाँ से आयी ? भय कहाँ से आया ? बन्धन का कोई प्रश्न ही नहीं है।' उन्होंने अपनी स्वयं की अनुभूति के आधार पर ऐसे यथार्थ सत्य को हमारे समक्ष प्रकट कर दिया है। वे पाश्चात्य दार्शनिकों की तरह बहुत गहरे चिंतन और तर्क आदि के आधार पर इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं। ऐसा नहीं है, कि पाश्चात्य देशों में परात्पर सत्ता का अनुभव करने वाले सन्त नहीं हुए हैं, वहाँ भी कतिपय हैं, कोई-कोई हैं। हमारे यहाँ इस अनुभूति को प्राप्त करना प्रत्येक मानव का मुख्य कर्तव्य है। 'इसका अनुभव करने पर ही मानव जीवन सार्थक है, अन्यथा उसका जन्म व्यर्थ है,' निर्भय होकर ऐसी घोषणा की है। अज्ञान अन्धकार के बन्धन में जन्म लेना, उसी अज्ञान-अन्धकार में जीवन भर रहना और उसी अन्धकार में मर जाना, यह जीवन नहीं है, धिक्कार है ऐसे मानव जीवन को। भगवान् ने मानव को विचार एवं बुद्धि-शक्ति दी है, उसका सदुपयोग करके अज्ञान के अन्धकार से बाहर आकर ज्ञान के प्रकाश में आना है। बन्धन की जंजीरों को तोड़कर, जीवन्मुक्त बन कर नहीं गया तो हीरे जैसे जीवन को व्यर्थ खो दिया। 'महती विनष्टि!' इससे बढ़कर कोई विनाश नहीं है।

 

श्रुति-स्मृति में, बड़े-बड़े महापुरुषों ने, जगदुरु आदि शंकराचार्य जी ने कहा है, 'हे मानव! तुम केवल मानव नहीं हो, तुम दिव्य हो, तुम देवता हो। उस अनादि, अनन्त, असीम सत्ता के तुम अंश हो। अनन्त सच्चिदानन्द सागर की तुम एक लहर हो। उस अनन्त परम ज्योति स्वरूप परमात्मा की दिव्य उज्ज्वल ज्योतिर्मय किरण हो।' ऐसा दर्शन एवं अनुभूति केवल भारतवर्ष में है, अन्य संस्कृतियों में नहीं है।

 

मानव की दिव्यता को अनुभव करके मानव मात्र के कल्याण के लिए 'श्रुण्वन्तु सर्वे अमृतस्य पुत्राः!' सम्बोधित करके घोषित किया, 'हे मानव ! तुम्हारा जीवन भगवद् साक्षात्कार के लिए है, अन्य जितने भी लक्ष्य हैं, सब गौण हैं। मुख्य लक्ष्य, परम पुरुषार्थ, जिसको प्राप्त करने से ही जीवन परिपूर्ण होगा, वह क्या है? भगवद् साक्षात्कार है, दिव्य अपरोक्षानुभूति है, आत्म ज्ञान है, ब्रह्मज्ञान है। उसको प्राप्त करके सर्व दुःख निवृति कर सकते हो। परमानन्द प्राप्ति, नित्य तृप्ति, कैवल्य मोक्ष साम्राज्य की अवस्था को प्राप्त करना तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है। इस अधिकार को भूलकर क्षणिक सुख के वास्ते पागलों की तरह इधर-उधर भटकते हो। कितनी शोचनीय दशा है, कितनी अफसोस की बात है। उठो, जागो, अपने जीवन की अमूल्यता को देखो, पहचानो। मोती-हीरक जैसे जन्म को व्यर्थ नहीं खोना चाहिए। 'उत्तिष्ठत ! जाग्रत ! प्राप्य वरान्निबोधत्।' बहुत सारा चला गया है, जो कुछ बचा हुआ है उसका अच्छी तरह सदुपयोग करके धन्य बन जाओ।' ऐसी चेतावनी, घोषणा और ऐसा सम्बोधन भारतवर्ष की सर्वश्रेष्ठ विशेषता है। पाश्चात्य संस्कृति, अन्य समुदायों में ऐसी घोषणा नहीं मिलेगी।

 

सौभाग्य से हम भारतवर्ष की प्रजा हैं। हमारी इस मातृभूमि के पूर्वजों ने केवल मात्र परात्पर तत्त्व की घोषणा करके इसे नहीं छोड़ दिया है, उसको प्राप्त करने का तरीका भी श्रुतियों, उपनिषदों, वेदान्त के माध्यम से उदाहरणों से, न्याय से, दृष्टान्तों से बताया है। ब्रह्म विद्या मस्तिष्क से पकड़ने वाली चीज़ नहीं है। जिस अनुभूति को प्राप्त करके वे धन्य, आप्तकाम, कृत-कृत्य हो गये हैं, उसी अनुभूति को क्रमबद्ध वैज्ञानिक रूप से, भगवद् साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए आपके वास्ते विविध प्रकार के शास्त्र बनाये हैं। गुरुदेव बोलते थे कि एक ही प्रकार का कोट-पैन्ट मिस्टर स्मिथ और मिस्टर जॉन हरबर्ट के लिए पूरा नहीं होगा। कोई मोटा होगा, कोई पतला होगा, कोई लम्बा होगा, कोई ठिगना होगा, उसी के अनुकूल कपड़े को बनाना पड़ता है।

 

कुछ लोग कहते हैं कि आपके सत्य सनातन वैदिक धर्म में घोटाला है। कई सम्प्रदाय शैव, वैष्णव, शाक्त आदि हैं। किन्तु नहीं, ऐसा नहीं है, उसके पीछे एक महान उद्देश्य है। प्रत्येक व्यक्ति में रुचि का, क्षमता का वैचित्र्य है, उनका तारतम्य बैठाने के लिए विविध प्रकार के सम्प्रदाय एवं साधनाएँ हैं। भगवान् की दृष्टि में सब एक हैं। परमानन्द एवं परम शान्ति के भण्डार से कोई वञ्चित रह जाये, इस लिए प्रत्येक मानव के लिए उचित, सहाय-प्रद एवं सुलभ-साध्य मार्ग बताये हैं। जैसे नारद भक्ति सूत्र, शांडिल्य भक्ति सूत्र, प्रेम मार्ग का शास्त्र, भक्ति योग शास्त्र, ज्ञान योग शास्त्र-वेदान्त विचार मार्ग, महर्षि पतञ्जलि के अष्टांग योग-सूत्र द्वारा ध्यान योग का शास्त्र इत्यादि। स्वयं भगवान् व्यास जी ने ज्ञान योग के लिए ब्रह्म सूत्र, वेदान्त सूत्र शास्त्र बनाया, कुण्डलिनी योग शास्त्र, जपयोग साधना द्वारा भगवद् प्राप्ति। चैतन्य महाप्रभु ने कीर्तन का महत्त्व बताते हुए कहा कि केवल मात्र कीर्तन से ही भक्ति मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं, 'कलौ केशव कीर्तनादेव मुक्त संगो भवेत।' गुरुदेव ने, हमारे अन्दर योगाभ्यास सहज रूप में एवं अनायास ही जाये, इसके लिए सभी योगों पर सरल ढंग से एवं विस्तार से लिखा है। हमारे पूर्वजों ने उस परम तत्त्व को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक जीवन प्रणाली बनायी है जिसे वर्णाश्रम-व्यवस्था कहते हैं, इसमें चारों वर्णों एवं चारों आश्रमों के सम्बंध में बताया गया है।

 

प्रथम आश्रम को ब्रह्मचर्य आश्रम कहते हैं। जैसे इमारत के लिए बुनियाद से ज्यादा कोई मुख्य चीज नहीं है, वह दिखाई नहीं देती, जमीन के अन्दर नीचे दबी रहती है, किन्तु नींव जितनी मज़बूत होगी इमारत भी उतने लम्बे समय तक टिकी रहेगी, इसी तरह इस ब्रह्मचर्य अवस्था अर्थात् विद्यार्थी जीवन में भौतिक विद्या, धर्म शास्त्र और परा विद्या का अच्छी तरह से अभ्यास कर लेना चाहिए जिससे अन्य अवस्थाएँ भी उत्तम तरीके से बिता सकें। प्रपंच हमें अनर्थ में ले जाये, ठीक दिशा में जायें, सुख को साध लें, दु:-संकट में जाकर नहीं पहुँचें, इसके लिए आध्यात्मिक विद्या, उपनिषद्, श्रुति-स्मृति, पुराण, वेदान्त, भागवत, भगवद्गीता आदि का अभ्यास प्रथम अवस्था में कर लेना चाहिए। यह युवावस्था बड़ी चंचल होती है, 'ब्रह्मचारी शतः मर्कट' अर्थात् ब्रह्मचारी सौ बन्दरों के बराबर है। गुरुमहाराज कहते थे कि मन बड़ा शैतान है, उसके फन्दें में फँस जाने से तुम बर्बाद हो जाओगे। इस मन पर नियन्त्रण करने का एक ही उपाय है, सदा उद्यमी रहो। पुरुषार्थ में लगन लगाये रखो। खाली मत रहो, खाली मन शैतान का कारखाना है।

 

ब्रह्मचर्य अवस्था में गुरु अपने विद्यार्थियों को २४ घण्टे किसी किसी कार्य में लगाए रखते थे, जैसे पाठ पूजन करना, यज्ञ के लिए समिधा लाना, गुरु पत्नी की सेवा शुश्रूषा करना आदि आदि। किसी भी प्रकार का अवकाश नहीं रहने से जीवन अपने आप संयमी बन जाता था। प्रथम आश्रम में युवकों, विद्यार्थियों के लिए बुनियाद रूप से उत्तम चरित्र की बहुत महिमा है। सदाचारी जीवन, आज्ञापालन, नि:स्वार्थ सेवा, इन्द्रिय निग्रह आदि उत्तम चरित्र के लिए जरूरी हैं और इससे आगे आने वाली तीनों अवस्थाओं का भी प्रबन्धन हो जाता है। १०-१२-१५ वर्ष के बाद गुरुकुल से निष्णात होने के बाद यह ब्रह्मचारी, एक आदर्श गृहस्थ बनने के योग्य बन जाता है।

 

विद्यार्थियों को मैं विशेष रूप से कह रहा हूँ कि शास्त्रों में ब्रह्मचर्य का धर्म, गृहस्थ का धर्म, वानप्रस्थ का जीवन, यती-संन्यासी का जीवन, सबका विवरण दिया है। मनुस्मृति में, पाराशर स्मृति में, पुराणों में बहुत सारी बातों का विस्तार से वर्णन किया गया है। महाभारत, रामायण में सम्भाषण के द्वारा कई प्रसंगों में विविध आश्रमों, विविध वर्णों के क्या-क्या धर्म है, सब बताये हैं। चारों वर्णों का क्या धर्म है? राजा का क्या धर्म है, प्रजा का क्या धर्म है? बालकों का माता पिता के प्रति क्या धर्म है ? पति का पत्नी के प्रति और पत्नी का पति के प्रति क्या धर्म है? यह सब बताया गया है। आपको यह जानना चाहिए।

 

दूसरी चीज है, 'धर्मार्थ काम मोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्' शरीर एक यन्त्र है इसमें बलपुष्टि होनी चाहिए, नहीं तो किसी भी क्षेत्र में कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे। स्वास्थ्यप्रद अभ्यास करते रहना चाहिए। सबेरे जल्दी उठना, ठण्डे पानी से स्नान करना, आसन-प्राणायाम आदि करना, सूर्य नमस्कार करना, शरीर को वज्रकाय बनाना एवं बल पुष्टि के साथ आरोग्य बनाये रखना। यह अति आवश्यक है।

 

तीसरी चीज, विद्या अभ्यास करना है, इसमें भौतिक विद्या भी जाती है। जीवन यापन के लिए कोई हुनर व्यापार, उद्योग आदि करना। क्षत्रिय के लिए अस्त्र-शस्त्र धनुर्विद्या आदि का अभ्यास। जिस भी क्षेत्र में जाना है, उस विद्या में पारंगत होना है।

 

ज्ञान की प्राप्ति, शरीर में आरोग्य, बल और पुष्टि की प्राप्ति, सर्वोत्तम पवित्र आदर्श चरित्र की प्राप्ति, इन तीनों को प्राप्त करके जब ब्रह्मचारी दूसरे आश्रम में प्रवेश करेगा तो उसकी शोभा बढ़ायेगा एवं भद्दा कलंक नहीं लगायेगा। सचरित्र होने से सन्तान भी संस्कारी होगी। स्वस्थ शरीर होने से हृष्ट-पुष्ट सन्तान होगी। माँ-बाप दोनों बीमार हों, प्रत्येक सप्ताह में इन्जेक्शन लगाना पड़ता हो तो बालक भी रोगी के रूप में जन्म लेगा। यह भारतीय संस्कृति का आदर्श नहीं है।

 

गृहस्थ धर्म का शास्त्रों में बहुत विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है, किन्तु मैं चार बातों पर आपका ध्यान केन्द्रित करता हूँ। उदाहरण के लिए-एक लड़की किसी भी परिवार में, कहीं भी रही, लड़का दूसरे परिवार में कहीं भी रहा। वे एक दूसरे से परिचित नहीं थे। पुरोहित या समाज वाले बताते हैं, लड़का बहुत अच्छा है। एम.एस.सी. पढ़ा हुआ है, नौकरी करता है। लड़की बहुत कुलीन है, बी.. पढ़ रही है। दोनों का विवाह करके, दो परिवारों का मिलन करवा दिया। दोनों एक स्थान में रहकर पारिवारिक जीवन जीने लगे-यह स्थूल दृष्टि है जो अधूरी है, परिपूर्ण नहीं है। वास्तविक बात क्या है, रहस्य क्या है?

 

वास्तविकता यह है कि जीवात्मा अपना प्रारब्ध का भोग भोगते हुए, चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करने एवं मोक्ष साम्राज्य की प्राप्ति के लिए आया हुआ एक अकेला पथिक है। हम सभी इस धरती पर प्रपंच संसार की यात्रा के मुसाफिर हैं। निश्चित रूप से, यहाँ सब कुछ छोड़कर एक दिन जाना पड़ेगा। इसमें कोई भी मतमतान्तर, वाद-विवाद या मत-भेद नहीं है। पुरुषार्थ को प्राप्त करने के लिए एक स्त्री शरीर में जीवात्मा है, एक पुरुष शरीर में जीवात्मा है। दो दिव्य जीवात्माओं का मिलन दाम्पत्य जीवन का सूक्ष्म यथार्थ अर्थ है। परिस्थितिवश कभी सुख कभी दुःख का अनुभव किया, कभी हँसे कभी रोये और एक दिन समाप्त हो गये। भगवान् ने हमें यहाँ हाय-हाय करने के लिए नहीं भेजा है। यहाँ पर जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि से आप मुक्त नहीं हो सकते। अवतारी पुरुष को भी यहाँ आने पर रोना पड़ता है। कष्ट, संकट पर ज्यादा ध्यान मत दो। 'तांस्तितिक्षस्व भारत' गीता में भगवान् के कथनानुसार ऐसा करके इसे सहन कर लो।

 

हे प्यारे ! जिस उद्देश्य के लिए आये हो उसकी प्राप्ति में लग जाओ। साधनामय जीवन बनाओ, भजनीय जीवन बनाओ। प्रारब्ध कर्म आदमी को केवल संकट में डालता है, ऐसी बात नहीं है। शुभ प्रारब्ध है तो उसका जीवन सुखमय होगा। वैश्वात्मक कर्मफल भोग का शासन निष्पक्ष है, भगवान् का जीवात्मा पर इससे बढ़कर क्या वरदान हो सकता है? दो जीवात्माओं का आध्यात्मिक मिलन, आध्यात्मिक साथ है। प्रतिदिन दोनों मिलकर ईश्वर आराधना, प्रभु भक्ति करें। सत्य सनातन वैदिक धर्म का अनुसरण करने वाले को चाहिए, जब वह नया घर बनाये तो नक्शा बनवाते समय सबसे पहले पूजा घर के स्थान एवं रूपरेखा का निर्णय करावे कि यह कहाँ और कैसा बनेगा, उसके बाद भोजन का कक्ष, रसोई-घर, अन्य सब कमरे और स्नान-गृह इत्यादि का देखे।

 

हमारा सनातन धर्म बहुत ही उदार है। यदि पति शिव भक्त है तो वह शंकर का ध्यान करे, और पत्नी कृष्ण भक्त है तो वह कृष्ण का ध्यान करे। दूसरी बात यह है कि हम दोनों मिलकर आस-पड़ोस और समाज की कितनी ज्यादा से ज्यादा भलाई एवं परोपकार कर सकते हैं। केवल मात्र मानव के लिए ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी, वनस्पति के लिए भी क्या भला कर सकते हैं, इसका भी ध्यान रखें।

 

गृहस्थाश्रम का तीसरा उद्देश्य कुल परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए सन्तान प्राप्त करना है। आदर्श सन्तान प्राप्ति के लिए सात्त्विक वातावरण, शुद्ध पर्यावरण होना चाहिए। घर में चारों तरफ सन्तों के और भगवान् के चित्र होने चाहिएँ, भगवान् का नाम-संकीर्तन गूँजते रहना चाहिए। कमरे के आकाश के कण-कण में आध्यात्मिक स्पंदन भर कर रखें, इसी वातावरण में शन्तान प्राप्ति हो। माता-पिता की सबसे बड़ी देन यही है जो वो दे सकते हैं।

 

उनके परस्पर व्यवहार का सन्तान पर बहुत प्रभाव पड़ता है। बच्चे जब - मास के हो जाते हैं, अभी मूक होते हैं, बात नहीं कर सकते किन्तु हर चीज़ को ग्रहण करते हैं। माता पिता के अन्तःकरण में किस प्रकार की स्थिति है, मानसिक अवस्था कैसी है, उसका प्रभाव २४ घण्टे उन पर पड़ता रहता है। माता-पिता का बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है कि उनका परस्पर का व्यवहार शान्तिमय, सात्त्विक, एक-दूसरे को सम्मान देते हुए, प्रेम के साथ सामंजस्य बनाये रखने वाला हो। खटपट का व्यवहार होने से सन्तान पर बड़ा भारी आघात पहुँचता है। बच्चे चिड़चिड़े हो जाते हैं और क्रोधी बन जाते हैं, प्रत्येक राष्ट्र में गृहस्थाश्रम कल की प्रजा की सृष्टि करने की बाल-वाड़ी है।

 

गृहस्थ-आश्रम का चौथा कर्त्तव्य सन्तान के लिए, एक तो यह है कि अपनी सन्तान के प्रथम आचार्य माता-पिता स्वयं हैं ही, विद्यालय जाने के बाद दूसरा आचार्य आता है। अतः माता-पिता बच्चों को आदर्श शिक्षा, अच्छे संस्कार, पवित्र वातावरण देकर समाज एवं राष्ट्र को समर्पित करें। हमारे यहाँ उपनिषद कहते हैं, ' कर्मणा प्रजया धनेन त्यागे नैके अमृतत्वमानशुः' कर्म से, सन्तान से और धन से अमृत तत्त्व की प्राप्ति नहीं हो सकती है, केवल त्याग ही अन्त में हमें वहाँ पहुँचाने वाला है, जहाँ पर पहुँचने के लिए हम यहाँ पर आये हैं। इस लिए कुछ समय जीविकोपार्जन करके व्यवहार निभाये, आखिर तक चाबी पकड़ कर रखना ठीक नहीं है। कहते हैं, 'प्राप्ते षोड्शे वर्षे पुत्रं मित्रवत् आचरेत्' बच्चों को उत्तरदायित्व देकर गृहस्थाश्रम से मुक्त हो जायें।

 

उलझन, ममता, आसक्ति को छोड़कर, तन-मन-धन से सेवा करके समाज को लाभान्वित करने का तृतीय आश्रम है-वानप्रस्थाश्रम। वानप्रस्थाश्रम में पति-पत्नी दोनों मिलकर तीर्थ पर्यटन करें, सत्संग में जाकर श्रवण करें, मनन करें, निदिध्यासन करें, घर में रहकर ज्यादा से ज्यादा स्वाध्याय, ईश्वरोपासना, जप, ध्यान आदि करें। जीवन में पूर्ण परिवर्तन जाना चाहिए, अब ध्यान प्रपंच के ऊपर होकर, आध्यात्मिकता एवं आन्तरिक जीवन पर हो।

 

इसके बाद अब आपको चतुर्थाश्रम संन्यास-आश्रम में प्रवेश करना है, सर्व परित्याग, एक निष्ठा जैसा कि याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद के प्रसंग में बताया गया है। भगवान् के सिवाय अन्य कोई भी विचार मन में नहीं रहना चाहिए। परिपूर्ण रूप में भगवदाकार-वृत्ति, हृदय में भगवान् के लिए प्रेम, मन में भगवद्-चिंतन, बुद्धि में हमेशा भगवद् तत्त्व के बारे में विचार, समस्त कार्य भगवान् की प्राप्ति के लिए किये जायें। समस्त कर्म-बंधन, मनसा-वाचा-कर्मणा भगवान् को समर्पित कर दें। इस प्रकार आपका हृदय यति, संन्यासी की तरह और जीवन त्यागमय होना चाहिए। यह जीवन का संध्याकाल है, यदि आप प्रारम्भिक आश्रमों में परोपकारी, निष्काम कर्मयोगी रहें हैं तो अनायास ही सहज रूप में त्याग, अनासक्ति, नि:स्पृहा, ध्यान, भगवद् चिन्तन की भावना आपके अन्दर जाएगी। यह जीवन प्रणाली हमारी भारतीय संस्कृति की अद्भुत विशेषता है, इसको हमें देकर हमारे पूर्वजों ने हमें अनुग्रहीत किया है। इसका यदि हमने लाभ नहीं उठाया तो इससे बढ़कर हमारी भूल क्या होगी?

 

स्वामी योगानन्द जी ने अपनी, 'सैल्फ रियलाइजेशन फैलोशिप' द्वारा पाश्चात्य समाज के लोगों को समझाने का प्रयास किया है कि योग क्या है? 'योग इज़ दी साइंस ऑफ रिलीज़न ' अर्थात् योग मजहब का विज्ञान है, उसको अनुभव करने, प्राप्त करने के लिए व्यावहारिक विज्ञान को योग कहा है। स्वामी जी ने अन्त में कहा कि, 'आपका जन्म उत्तम धर्म में हुआ, उत्तम संस्कृति, जीवन प्रणाली आपको विरासत में मिली है। इसका पूरा लाभ उठायें। भगवद् साक्षात्कार एवं ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त करके कृत-कृत्य हो जायें, धन्य हो जायें। इसमें प्रमाद बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।' जैसा कि मैंने कहा, किस दिन वह अन्तिम घड़ी जाये, हमें पता नहीं। एक दिन जाना तो निश्चित है, किस समय जाना है, यह पता नहीं। बूढ़ा भी चला जाता है, जवान भी चला जाता है, बीमार आदमी भी मर जाता है, पहलवान तगड़ा आदमी भी चला जाता है। भगवान् ने मुख्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्यत्व देकर भेजा है, महापुरुषों का आश्रय दिया है और मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा भी दी है। तीन बातों से आशीर्वाद देकर हमें अनुग्रहीत किया है। इन तीनों को प्राप्त कर लेने पर उद्यमी होकर अभ्यास में लग जाना चाहिए।

 

गुरु महाराज कहते थे, डी. आई. एन (डू इट नाऊ, अर्थात् अभी कर लो) कल जो करना है आज कर लो, आज शाम तक जो करना है, अब कर लो, पता नहीं कब तुम्हारा अन्तिम श्वास चला जायेगा। गुरु नानक जी ने कहा है कि इन्सान आधे श्वास का प्राणी है। इसका क्या अर्थ है? बाहर गया हुआ श्वास, अन्दर आयेगा क्या विश्वास है। अन्दर गया श्वास वहीं पर समाप्त हो गया तो बाहर आयेगा नहीं। तुलसी दास जी एक भजन में कहते हैं-

 

'नाच रहा है काल शीश पर चेत चेत अभिमानी' अभिमान मत करो, घमण्ड मत करो, तुम्हारे सिर पर काल नाच रहा है। इसलिए हमेशा प्रातःकाल उठते ही याद रखो, 'एक दिन हमें जाना है, ये हमारा अन्तिम दिन हो सकता है। अपने इस जीवन को आदर्श रूप में बना सकूँ, परोपकारमय बना सकूँ, हरि भजन चिंतन करके परिपूर्णता को प्राप्त कर लूँ, इस में देर करूँ।

 

विवेकी होकर, अनासक्त होकर इस प्रपंच के वस्तु-पदार्थों और नाम-रूपों के बीच में अपने लक्ष्य का ध्यान रखें। चार बातों को हमेशा याद रखना चाहिए-पहली बात मृत्यु को हमेशा याद रखो। द्वितीय बात यह संसार दुःखमय है, संसार की वस्तुओं में सच्चा सुख, शान्ति, तृप्ति, सन्तोष कदापि नहीं हो सकते हैं, यह दुःख का सागर है। संसार के वस्तु-पदार्थ से आकर्षित होकर हमें उल्लू नहीं बनना है, मूर्ख नहीं बनना है। अनासक्त होकर अपना कर्त्तव्य करते हुए लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना है। तीसरी चीज है भगवान् को हमेशा याद रखो। उनकी प्राप्ति से हम मृत्यु से परे जाकर अमर बन जाते हैं और समस्त दुःखों को पार करके नित्य सुख की प्राप्ति कर लेते हैं। भगवद् प्राप्ति से सर्व दुःख निवृत्ति और परमानन्द प्राप्ति होती है। वे मृत्यु और दुःख दोनों से परे ले जाते हैं। चौथी चीज है भगवद् प्राप्ति कैसे हो, धार्मिक जीवन कैसे बने, धार्मिक जीवन क्या है? वे बोले-

'श्रुतिर्विभिन्ना स्मृतयोऽपि भिन्नाः

तथा मुनीनां मतयोऽपि भिन्नाः

धर्मस्य तत्त्वं निहित गुहायाम्

 महाजनो येन गतः पन्थः ।।'

महापुरुष, सन्त, ज्ञानी, तपस्वी, भक्तों के आदर्श जीवन को पढ़ो, अध्ययन करो और अच्छी तरह से जानो। उनके पदचिह्नों पर हम अपने कदम रखते जायें तो अपने आप वहाँ पहुँच जायेंगे। उनके उपदेशों, उद्बोधनों को हृदयंगम करके सामने रखें तो तुम्हारा जीवन धन्य हो जायेगा। सन्त हमेशा मार्ग दर्शन देते हैं।

 

हमेशा याद रखने के लिए आप इन्हें लिखकर स्नानघर में शीशे पर लगा दें। इस प्रकार लिख लें-मौत, संसार के दुःख, भगवान् और सन्त।