श्री श्री परमहंस योगानन्द
ईश्वर
से
वार्तालाप की विधि
Yogoda Satsanga Society of India
Founded 1917 by Paramahansa Yogananda
श्री श्री परमहंस योगानन्द
(1893-1952)
श्री श्री परमहंस योगानन्द
ईश्वर
से
वार्तालाप की विधि
Yogoda Satsanga Society of India
Founded 1917 by Paramahansa Yogananda
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ईश्वर से वार्तालाप की विधि
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श्री श्री परमहंस योगानन्द की आध्यात्मिक विरासत से सम्बंधित हमारे गैर-लाभकारी प्रकाशन के प्रयासों को प्रोत्साहन देने के लिए हम आपके प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
Yogoda Satsanga Society of India
Paramahansa Yogananda Path, Ranchi, Jharkhand
Ebook edition, 2022.
ISBN: 978-81-89535-53-7 (paperback)
ISBN: 978-93-92126-26-0 (Kindle edition)
श्री श्री परमहंस योगानन्द की
आध्यात्मिक विरासत
उनके सभी लेख, व्याख्यान, तथा अनौपचारिक प्रवचन
परमहंस योगानन्दजी अपनी शिक्षाओं के विश्वव्यापी प्रसार के लिये तथा भविष्य में आने वाली संततियों के लिये उनकी शुद्धता एवं सम्पूर्णता को परिरक्षित रखने के उद्देश्य से सन् 1917 में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया की स्थापना की तथा तत्पश्चात् सन् 1920 में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की। अमेरिका में अपने प्रारम्भिक वर्षों से ही वे अनेक लेखों तथा व्याख्यानों की रचना करते आ रहे थे, और उन्होंने ध्यान के योग विज्ञान, सन्तुलित जीवन की कला, एवं सभी महान् धर्मों में अन्तर्निहित एकता पर विख्यात एवं बृहत् रचनाओं का सृजन किया। उनकी यह अद्वितीय एवं युग-युगान्तरकारी आध्यात्मिक विरासत आज भी चली आ रही है और विश्व भर के लाखों सत्यान्वेशियों को प्रेरणा प्रदान कर रही है।
महान् गुरुदेव की सुस्पष्ट इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप ने परमहंस योगानन्द की सम्पूर्ण रचनाओं के प्रकाशन एवं इनके सतत मुद्रण के कार्य को अविराम जारी रखा है। इनमें केवल उन सभी पुस्तकों के अन्तिम संस्करण ही सम्मिलित नहीं हैं जिनकी रचना उन्होंने अपने जीवनकाल में की थी, अपितु अनेक नयी रचनायें भी हैं–वे रचनायें जो 1952 में उनके देहवसान के समय तक प्रकाशित नहीं हो सकी थीं, अथवा जो योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप की पत्रिकाओं में अब तक एक अधूरे प्रारूप में ही क्रमानुसार प्रकाशित हो सकी थीं, तथा साथ ही ऐसे सैकड़ों गहन और प्रेरणास्पद व्याख्यान तथा अनौपचारिक सत्संग भी हैं जो उनके जीवनकाल में रिकॉर्ड तो किये गये थे किन्तु प्रकाशित नहीं हो सके थे।
परमहंस योगानन्दजी ने स्वयं अपने उन निकटतम शिष्यों को योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के प्रकाशन परिषद के लिये चुना एवं प्रशिक्षित किया, जिन्हें उन्होंने अपनी शिक्षाओं के प्रस्तुतीकरण एवं प्रकाशन के लिये विशेष दिशानिर्देश दिये। योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के प्रकाशन परिषद के सदस्य (वे सभी संन्यासीगण जिन्होंने जीवन पर्यन्त संन्यास तथा नि:स्वार्थ सेवा का संकल्प लिया है) इन दिशानिर्देशों का सम्मान एक पवित्र विश्वास के रूप में करते हैं, ताकि परमप्रिय जगद्गुरु का विश्वजनीन सन्देश अपनी मूल शक्ति एवं प्रामाणिकता के साथ बना रह सके।
योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप का प्रतीक चिन्ह् (जैसा की ऊपर मुद्रित है) परमहंस योगानन्दजी ने अपनी शिक्षाओं के प्रसार के लिये स्थापित की गयी संस्था की पहचान करने के लिये स्वयं निर्धारित किया था। पाठक को यह आश्वासन देने के लिये कि अमुक कृति परमहंस योगानन्दजी द्वारा स्थापित संस्था से अभिहित हुई है तथा उनकी शिक्षाओं को ठीक उसी रूप में प्रस्तुत करती है जैसा कि वे चाहते थे, योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप का नाम तथा प्रतीक चिन्ह् सभी प्रकाशनों एवं रिकॉर्डिंग पर मुद्रित रहते हैं।
– योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/
सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप
ईश्वर की महिमा महान है। वह सत्य है, और उसे पाया जा सकता है...। शान्ति से और विश्वास से जब आप जीवन-पथ पर चलते हैं, आपको अवश्य अनुभूति होगी कि केवल ईश्वर वह वस्तु है, वह लक्ष्य है, जो आपको सन्तुष्ट करेगा; क्योंकि हृदय की प्रत्येक इच्छा का उत्तर ईश्वर में है।
—श्री श्री परमहंस योगानन्द
ईश्वर से वार्तालाप की विधि
परमहंस योगानन्दजी के 19 मार्च और 26 मार्च, 1944 को दिए गए व्याख्यानों के अंश
ईश्वर के साथ वार्तालाप करना एक वास्तविकता है। जब मैं भारत में था, मुझे संतों का उन क्षणों का सान्निध्य प्राप्त हुआ जिस समय वे परमपिता के साथ वार्तालाप कर रहे थे। और आप सब भी भगवान से वार्तालाप कर सकते हैं; एकपक्षीय बातचीत नहीं अपितु वास्तविक वार्तालाप जिसमें आप ईश्वर से बातें करते हैं और वे उत्तर देते हैं। निस्सन्देह प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर से वार्तालाप कर सकता है। परन्तु मैं आज इस बात की चर्चा कर रहा हूँ कि हम भगवान को उत्तर देने के लिये कैसे प्रेरित कर सकते हैं।
हम सन्देह क्यों करें? संसार के धर्म-ग्रन्थ भगवान और मनुष्य के बीच वार्तालापों के वर्णनों से भरपूर हैं। इसी प्रकार की एक अत्यन्त सुन्दर घटना का वर्णन बाइबिल (I किंग्स 3:5-13) में है : ‘‘रात्रि के समय स्वप्न में सोलोमन के सामने प्रभु प्रकट हुए और प्रभु ने कहाँ, माँग मैं तुझे क्या दूँ? और सोलोमन ने कहा... आप इस लिये अपने सेवक को एक विवेकपूर्ण हृदय प्रदान कीजिए... फिर ईश्वर ने उससे कहा, क्योंकि तूने केवल यही माँगा है और अपने लिए दीर्घायु और धन नहीं माँगा, न ही अपने शत्रुओं का जीवन माँगा है परन्तु न्याय करने के लिए अपने लिए केवल विवेक ही माँगा है। देख, मैंने तेरे कहे अनुसार ही किया है; देख, मैंने तुझे एक विवेकशील और उदार हृदय दिया है... और मैंने तुझे वह भी दे दिया है जो तूने नहीं माँगा, धन और सम्मान, दोनों।’’
डेविड ने भी कई बार भगवान के साथ वार्तालाप किया और उनसे सांसारिक विषयों पर भी विचार विमर्श किया। ‘‘और डेविड ने ईश्वर से पूछा, क्या मैं फिलिस्तीनियों पर आक्रमण करूँ और क्या तुम उन्हें मेर अधीन कर दोगे? और ईश्वर ने उससे कहा आक्रमण कर दो : क्योंकि मैं उनको तुम्हारे हाथ सौंप दूँगा।’’
ईश्वर केवल प्रेम से ही प्रभावित होते हैं
सामान्य मनुष्य केवल अपने मन से ही ईश्वर से प्रार्थना करता है, न कि अपने हृदय की पूर्ण आतुरता के साथ। ऐसी प्रार्थनाएँ भगवान का उत्तर लाने में अति असमर्थ हैं। परमात्मा से हमें आत्म-विश्वास से और ऐसी निकटता की भावना के साथ बातचीत करनी चाहिए जैसे हम अपने माता-पिता से करते हैं। ईश्वर से हमारा सम्बन्ध केवल अप्रतिबंधित प्रेम का ही होना चाहिए। अन्य किसी सम्बन्ध से कहीं अधिक परमात्मा से जगन्माता के रूप में हम अधिकारपूर्ण तथा स्वाभाविक ढंग से उत्तर की माँग कर सकते हैं। ईश्वर इस प्रकार की विनती को स्वीकार करने के लिए विवश हो जाते हैं क्योंकि माता का सार ही अपने बच्चे से प्रेम और क्षमा है, चाहे वह कितना महा पापी ही क्यों न हो। माता व बच्चे के बीच सम्बन्ध ईश्वर द्वारा प्रदान किये गये मानवीय प्रेम का अत्यधिक सुन्दर रूप है।
ईश्वर की एक निश्चित धारणा (जैसे जगन्माता के रूप में) अनिवार्य हे, अन्यथा कोई स्पष्ट उत्तर नहीं पा सकता। और प्रभु से उत्तर पाने की माँग दृढ़ होनी चाहिए; अर्धविश्वासी प्रार्थना पर्याप्त नहीं है। यदि आप दृढ़ निश्चय कर लें : ‘‘ईश्वर मुझसे अवश्य वार्तालाप करेंगे;’’ और आप कोई अन्य शंका मन में नहीं लायें, चाहे कितने ही वर्षों तक भगवान आपको उत्तर न दें; यदि आप उनपर पूर्ण विश्वास रखे रहें, तो एक दिन वे अवश्य उत्तर देंगे।
मैंने योगी-कथामृत में अनेक अवसरों में से कुछ का वर्णन किया है जिनमें मैंने ईश्वर से वार्तालाप किया है। ईश्वर की वाणी को सुनने का प्रथम अनुभव मुझे तब हुआ था जब मैं छोटा सा बालक था। एक दिन प्रातःकाल अपने बिछौने पर बैठे हुए मैं एक गहन चिन्तन में खो गया।
‘‘बन्द नेत्रों के अन्धकार के पीछे क्या है?’’ यह अन्वेषी विचार बड़े वेग से मेरे मन में आया। तत्क्षण ही मेरी अनतर्दृष्टि में प्रकाश की एक अपरिमित चमक प्रकट हुई। पर्वत गुफ़ाओं में ध्यान-मुद्रा में बैठे हुए सन्तों की दिव्य आकृतियाँ मेरे ललाट के भीतर विशाल ज्योति-पट पर छोटे-छोटे चलचित्रों के समान दृष्टिगोचर होने लगी।
‘‘आप कौन है?’’ मैंने ऊँचे स्वर में पूछा।
‘‘हम हिमालय के योगी हैं।’’ दिव्यात्माओं के उत्तर का आनन्द वर्णनातीत था। मेरा हृदय आनन्द-पुलकित हो उठा। दिव्य-दर्शन अदृश्य हो गया किन्तु वे रजत किरणें बढ़ते-बढ़ते मण्डलाकार रूप में अनन्त की ओर प्रसारित होती गयीं।
‘‘यह आश्चर्यजनक प्रकाश क्या है?’’ मैंने पूछा।
‘‘मैं ईश्वर हूँ। मैं प्रकाश हूँ।’’ यह ध्वनि बादलों की गड़गड़ाहट की सी थी।
जब मुझे यह प्रारम्भिक अनुभव हुआ था, उस समय मेरी माँ और बड़ी बहन रोमा मेरे पास ही थीं, और उन्होंने भी इस दिव्य वाणी को सुना था। ईश्वर के उत्तर से मुझे इतनी प्रसन्नता हुई थी कि मैंने उसी क्षण तत्काल यह निश्चय कर लिया कि तब तक ईश्वर की खोज करूँगा जब तक मैं पूर्ण रूप से उनमें एकाकार न हो जाऊँ।
अधिकांश लोग सोचते हैं कि बन्द आँखों के पीछे केवल अन्धकार ही होता है। परन्तु ज्यों-ज्यों आप आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करते हैं और मस्तक में स्थित ‘‘दिव्य चक्षु’’ पर एकाग्रचित होते हैं तो आप अनुभव करेंगे कि आपकी अन्तर्दृष्टि खुल गई है। आपको एक दूसरा जगत दृष्टिगोचर होगा, जो अनेक प्रकाशों का बना और अति सुन्दर है। महात्माओं के दिव्य दर्शन, जैसे कि मैंने हिमालय के योगियों के किए थे, आपके सामने प्रकट होंगे। यदि आपकी एकाग्रता और गहन हो जाए, तो आपको भी ईश्वर की वाणी सुनाई पड़ेगी।
बारम्बार धर्म-ग्रन्थों ने भगवान के वचन को दुहराया है कि वे हमारे साथ वार्तालाप करेंगे : ‘‘और तुम मुझे ढूँढोगे और मुझे पा लोगे, जब तुम अपने सच्चे हृदय से मेरी खोज करोगे।’’ — जरमिया 29:13। ‘‘भगवान तुम्हारे पास ही है, यदि तुम उनके साथ होना चाहते हो; और यदि तुम उन्हें खोजने का प्रयास करोगे तो उन्हें पा लोगे; किन्तु यदि तुम उन्हें छोड़ दोगे तो वे भी तुम्हें त्याग देंगे।’’ — II क्रोनिकल्स
15:2। ‘‘देखो, मैं द्वार पर खड़ा हूँ और इसे खटखटा रहा हूँ : यदि कोई मनुष्य मेरी आवाज़ सुने और द्वार खोले, तो मैं उसके पास आऊँगा और उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ।’’ — रेविलेशन 3:20, (बाइबिल)।
यदि आप ईश्वर के साथ केवल एक बार भी सम्पर्क कर सकें और उनके मौन को तोड़ सकें तो वे कई बार आपके साथ वार्तालाप करेंगे। परन्तु आरम्भ में यह बहुत कठिन है। ईश्वर से परिचित होना सुगम नहीं है। क्योंकि वे आश्वस्त होना चाहते हैं कि आप वास्तव में उन्हें पाने की इच्छा रखते हैं। वे इस बात की परीक्षा लेते हैं कि भक्त केवल उन्हें ही चाहता है या किसी अन्य वस्तु को। वे आपके साथ तब तक बात नहीं करेंगे जब तक आप उन्हें इस बात का विश्वास नहीं दिलाते कि आपके हृदय में कोई अन्य इच्छा नहीं छिपी है। यदि आपके हृदय में केवल उनके उपहारों को पाने की आकांक्षाएँ भरी हुई हैं तो वे आपके सामने क्यों प्रकट होवें?
मनुष्य का प्रेम ही उसका ईश्वर के लिए एकमात्र उपहार है
सारी सृष्टि मनुष्य की परीक्षा के लिए रची गयी थी। इस संसार में अपने व्यवहार द्वारा ही हम यह व्यक्त करते हैं कि हम ईश्वर को चाहते हैं या उनके उपहारों को। ईश्वर आपको यह नहीं कहेंगे कि आपको उन्हें पाने के लिए अन्य वस्तुओं की अपेक्षा अधिक इच्छा करनी चाहिए, क्योंकि वे चाहते हैं कि आपका प्रेम स्वेच्छापूर्वक, बिना ‘‘अनुबोधन’’ के दिया जाय। इस संसार के खेल का यही एकमात्र रहस्य है। जिन्होंने हमें जन्म दिया है, वही हमारा प्रेम पाने के लिए आतुर हैं! वे चाहते हैं कि हम अपना प्रेम बिना माँगे स्वत: स्वेच्छापूर्वक दें। हमारा प्रेम ही एक ऐसी वस्तु है जो ईश्वर के पास नहीं है — जब तक कि हम स्वयं ही उन्हें यह अर्पित न करें। अत: आप देखते हैं कि भगवान को भी किसी वस्तु को प्राप्त करना है : हमारा प्रेम। और जब तक हम अपना प्रेम उन्हें नहीं दे देते, हम कदापि सुखी नहीं हो सकते। जब तक हम निरंकुश बालक हैं, तथा बौनों की भाँति इस पृथ्वीरूपी गेंद पर रेंगते हुए और उनके उपहारा के लिये चिल्लाते हुए, दाता की अवहेलना करते रहते हैं, तब तक हम दुर्गति के अनेक गड्ढों में गिरते रहते हैं।
ईश्वर, हमारे अस्तित्व का मूलभूत तत्त्व होने के नाते; उसकी उपस्थिति को अपने अन्तर में प्रत्यक्ष अनुभव करना सीखे बिना वास्तव में हम स्वयं को व्यक्त नहीं कर सकते। यही सत्य है। क्योंकि हम दिव्य हैं, उनका अंश हैं, इसलिये हम किसी भौतिक वस्तु को पाकर पूर्णत: सन्तुष्ट नहीं हो सकते। ‘‘यदि तू मेरी शरण में नहीं आएगा तो तुझे कौन शरण देगा।’’2 जब तक आप ईश्वर में सन्तुष्टि नहीं पा लेते तब तक आप किसी अन्य वस्तु से सन्तुष्ट नहीं हो पाएँगे।
ईश्वर साकार है या निराकार?
क्या ईश्वर साकार है या निराकार? इस विषय पर थोड़ी सी चर्चा आपके ईश्वर के साथ सम्पर्क स्थापित करने के प्रयासों में सहायता करेगी। बहुत लोग ईश्वर को साकार मानना पसन्द नहीं करते; वे अनुभव करते है कि मानावाकार धारणा उन्हें सीमित कर देती है। वे लोग ईश्वर को निराकार परमात्मा मानते हैं, एक सर्वशक्ति, एक बुद्धिमान (अथवा ज्ञान) शक्ति जो सृष्टि के लिए उत्तरदायी है।
परन्तु यदि हमारे सृष्टिकर्ता निराकार हैं तो उन्होंने मानवजाति की उत्पत्ति क्योंकी? हम साकार हैं और अपना व्यक्तित्व रखते हैं। हम सोचते हैं, अनुभव करते हैं और इच्छाशक्ति का प्रयोग करते हैं। और ईश्वर ने हमें न केवल दूसरों के विचारों और भावनाओं को समझने की शक्ति दी है अपितु उन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने का सामर्थ्य भी दिया है। नि:सन्देह, प्रभु उस पारस्परिक आदान-प्रदान की भावना से रहित नहीं हैं जो उनकी सृष्टि को अनुप्राणित करती है। जब भी हम चाहेंगे, हमारे परमपिता हम सब के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं और करेंगे।
भगवान के निराकार स्वरूप पर विचार करते हुए हममें यह धारणा बनती है कि वे एक दूरस्थ सत्ता हैं जो हमारे द्वारा अर्पित की गई प्रार्थनाओं का प्रत्युत्तर दिए बिना केवल उन्हें ग्रहण करते हैं; जो सर्वज्ञ हैं, किन्तु फिर भी हृदयहीन मौन धारण किए रहते हैं। परन्तु यह एक दार्शनिक भूल है, क्योंकि ईश्वर सभी कुछ है : साकार भी और निराकार भी। उन्होंने समस्त मानव जाति की सृस्टि की है। उनके सृष्टिकर्ता पूर्णतया निराकार नहीं हो सकते।
यह विचार कि ईश्वर मनुष्य का रूप धारण कर हमारे पास आ सकते हैं और हमसे वार्तालाप कर सकते हैं, हमारे हृदयों की एक गहन आवश्यकता को तृप्त करता है। प्रभु सबके लिए ऐसा क्यों नहीं करते? बहुत से सन्तों ने उनकी वाणी को सुना है। आप ऐसा कयों नहीं कर सकते? ‘‘हे प्रभु, आप अदृश्य, निराकार, अज्ञात और अज्ञेय हैं, फिर भी मुझे विश्वास है कि मेरी भक्ति की पुकार से आप साकार रूप धारण कर सकते हैं।’’ भगवान को मनुष्य की तीव्र भक्ति द्वारा एक व्यक्तिगत आकार लेने के लिए द्रवित किया जा सकता है। यदि आप पूर्ण गहनता से प्रार्थना करें तो आप भी असीसी के सन्त फ्रांसिस तथा अन्य महात्माओं की तरह ईसामसीह के जीवित शरीर का दर्शन कर सकते हैं। ईसामसीह भगवान की एक साकार अभिव्यक्ति थे। जो ब्रह्म को जानता है वह स्वयं ब्रह्म है। क्या क्राइस्ट ने नहीं कहा था : ‘‘मैं और मेरे पिता एक रूप हैं?’’ 3 स्वामी शंकर ने भी घोषणा की थी : ‘‘मैं ‘आत्मा’ हूँ’’ और ‘‘तू वही है’’ (तत्त्वमसि)। अनेकों सन्त-महात्माओं के कथनानुसार सभी मनुष्य ईश्वर की प्रतिच्छाया में बने हैं।
मैं अपना अधिकांश ज्ञान पुस्तकों की अपेक्षा ईश्वर से सीधे प्राप्त करता हूँ। मैं विरले ही पढ़ता हूँ। मैं आपको वही बताता हूँ जो मैंने साक्षात अनुभव किया है। इसलिए मैं सत्य के प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर अधिकार के साथ बोलता हूँ। सारे संसार का मत इसके विरुद्ध हो सकता है परन्तु प्रत्यक्ष अनुभव के प्रमाण को अन्त में सदैव ही मान लिया जायेगा।
‘‘ईश्वर की प्रतिच्छाया’’ का अर्थ
बाइबिल में हम पढ़ते हैं ‘‘प्रभु ने अपनी प्रतिच्छाया में मनुष्य को बनाया।’’ 4 किसी ने भी कभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया है कि किस प्रकार से मनुष्य ईश्वर की प्रतिच्छाया है। ईश्वर ‘परमात्मा’ हैं और मनुष्य भी अपने मूलभूत स्वरूप में परमात्मा ही है। यही बाइबिल के परिच्छेद का मूल अर्थ है, परन्तु इसकी अनेक अन्य सच्ची व्याख्याएँ भी हैं।
मनुष्य का समूचा शरीर और उसमें चेतना तथा गति ईश्वर का सूक्ष्म स्वरूप हैं। चेतना में सर्वज्ञता और सर्वव्यापकता विद्यमान हैं। आप तुरन्त कल्पना कर सकते हैं कि आप ध्रुवतारे पर हैं अथवा मंगल ग्रह पर हैं। विचार में आप और किसी अन्य वस्तु के मध्य कोई दूरी नहीं रह जाती। इसलिए मनुष्य में चेतना होने के कारण उसे भगवान की प्रतिच्छाया के रूप में बना कहा जा सकता है।
चेतना को अपना बोध है। वह अपने अन्तर्ज्ञान द्वारा अपने आपको अनुभव करती है। भगवान को अपनी ब्रह्माण्डीय चेतना द्वारा सृष्टि के प्रत्येक परमाणु में अपना बोध होता है। ‘‘क्या वे दोनों चिड़ियाँ एक फार्दिंग में नहीं बेची गई? क्या उनमें से एक तुम्हारे पिता के जाने बिना पृथ्वी पर गिर सकी?’’ 5
मनुष्य में भी ईश-चेतना की एक स्वाभाविक शक्ति है, यद्यपि बहुत बहुत कम लोग इसे विकसित कर पाते हैं। मनुष्य में इच्छा-शक्ति भी है जिसके द्वारा वह सृष्टिकर्ता की तरह तत्काल लोकों की सृष्टि कर सकता है; परन्तु यह शक्ति जो उनके भीतर है, बहुत कम लोग विकसित कर पाते हैं। पशु तर्क नहीं कर सकते परन्तु मानव कर सकता है। ईश्वर में जितने गुण हैं — चेतना, बुद्धि, इच्छा-शक्ति, भावना और प्रेम — ये सभी मनुष्य में भी हैं। इन्हीं गुणों के कारण मनुष्य को ईश्वर की प्रतिच्छाया में बना हुआ कहा जा सकता है।
स्थूल शरीर द्रव्य नहीं परन्तु ऊर्जा है
जिस ऊर्जा का हम अपने शरीर में अनुभव करते हैं वह व्यक्तिगत भौतिक शरीर को चलाने मात्र के लिए आवश्यक शक्ति की अपेक्षा एक विशाल शक्ति के अस्तित्व को प्रदर्शित करती है। ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की शक्ति जो सृष्टि का पोषण करती है वह हमारे शरीरों में भी विद्यमान है। ब्रह्माण्डीय-शक्ति ईश्वर का एक स्वरूप है। इसलिए इस भौतिक दृष्टिकोण से भी हम ईश्वर की प्रतिच्छाया में बने हैं।
हमारे शरीर में जो ऊर्जा है वह क्या है? हमारा स्थूल शरीर अणुओं से बना है, अणु परमाणुओं से, परमाणु विद्युदणुओं से और विद्युदणु प्राणशक्ति या ‘‘जीवन अणुओं’’ से जो शक्ति के अगणित करोड़ों बिन्दुओं से, बने हैं। आप अपने दिव्य-चक्षु द्वारा अपने शरीर को टिमटिमाते हुए प्रकाश बिन्दुओं — जो आपके सत्ताईस खरब कोशाणुओं से उत्पन्न ऊर्जा है — के एक समूह की भाँति देख सकते हैं। केवल माया के कारण ही आप शरीर को ठोस रक्त-मांसयुक्त रूप में देखते हें। वास्तव में यह द्रव्य नहीं बल्कि ऊर्जा है।
क्योंकि आप समझते हैं कि आप रक्त-मांस के बने हैं। अत: कभी-कभी आप स्वयं को अशक्त मानते हैं। परन्तु यदि आप अपने शरीर में ईश-चेतना का अनुभव करें तो आपको ज्ञात होगा कि शरीर केवल पाँच प्रकम्पनशील तत्त्वों — पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु की एक स्थूल अभिव्यक्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
मानव शरीर विश्वव्यापक पंचतत्त्वों द्वारा संगठित है
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, जो ईश्वर का शरीर है, उन्हीं पाँच तत्त्वों से बना है जिनसे मनुष्य का शरीर रचित है। मानव शरीर की तारे की सी आकृति इन पाँच तत्त्वों की किरणों का प्रतीक है। सिर, दोनों हाथ और दोनों पैर उस तारे के पाँच कोने हैं। अतएव इस प्रकार से भी हम ईश्वर के प्रतिरूप बनाये गये हैं।
पाँच अंगुलियाँ भी ब्रह्माण्डीय, बुद्धिशील स्पन्दन के पाँच स्पन्दनशील तत्त्वों को चित्रित करती हैं जो सृष्टि की संरचना को बनाए हुए हैं। अंगूठा अति स्थूल स्पन्दनशील तत्त्व, पृथ्वी को चित्रित करता है, इसीलिए मोटा है। प्रथम अंगुली जल-तत्त्व को व्यक्त करती है। द्वितीय अंगुली झपटते हुए अग्नि-तत्त्व को व्यक्त करती है इसलिये सबसे लम्बी है। तृतीय अंगुली वायु-तत्त्व को व्यक्त करती है। सबसे छोटी अंगुली से आकाश, जो सूक्ष्म है, का अभिप्राय है।
प्रत्येक अंगुली को मलने से वह शक्ति अनुप्राणित होती है जिसका यह प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए बीच की अंगुली को, (जो ‘अग्नि-तत्त्व’ को व्यक्त करती है) और नाभी को (जो मेरुदण्ड में ‘अग्नि-चक्र’ के सामने स्थित है और पाचन-क्रिया तथा परिपाचन को नियमित रखती है) रगड़ने से अजीर्ण को दूर करने में सहायता मिलती है।
भगवान सृष्टि में गति को बनाए हुए हैं। गति को व्यक्त करने की प्रवृत्ति के कारण मनुष्य ने अपनी टांगों और पैरों को विकसित किया है। पैर का पंजा ऊर्जा की पाँच किरणों का भौतिक रूप है।
आँखों की पुतली, आँख का उपतारा और सफ़ेद भाग क्रमश: सत् (परमपिता), तत् (पुत्र) और ओम् (पवित्र आत्मा) का प्रतीक हैं। जब आप भ्रूमध्य केन्द्र पर ध्यान एकाग्र करते हैं तो दोनों आँखों की विद्युत-शक्ति का प्रवाह एक ज्योति में प्रतिबिम्बित हो जाता है और आपको ‘‘दिव्य चक्षु’’ दिखाई देने लगता है। यह गोलाकार नेत्र ‘‘भगवान का नेत्र’’ है। सापेक्षता के नियम के कारण, जो हमारे द्वैतवादी विश्व में प्रचलित है, हमारे दो नेत्र विकसित हुए हैं। हमें ईसामसीह ने कहा था, ‘‘यदि तुम्हारा चक्षु एक हो जाय तो तुम्हारा सम्पूर्ण शरीर प्रकाश से परिपूर्ण हो जायेगा।’’ 6 यदि हम अपने ‘‘दिव्य-चक्षु,’’ अर्थात् ‘भगवान के नेत्र’ द्वारा देखें तो हमें अनुभव होता है कि सम्पूर्ण सृष्टि केवल एक ही तत्त्व — ईश्वरीय प्रकाश — से रची गयी है।
ईश्वर से एकात्मता उसकी दिव्य-शक्ति से एकात्मता है
चरम भाव में मनुष्य के पास सम्पूर्ण शक्ति है। जब आपकी चेतना दिव्य-चैतन्य से एक हो जाय तो आप किसी भी वस्तु को परिवर्तित कर सकते हैं। मोटर गाड़ी के पुर्जे आवश्यकतानुसार बदले अथवा नये लगाये जा सकते हैं, परन्तु मनुष्य शरीर में इस प्रकार का परिवर्तन लाना अधिक जटिल है। मन, जो सब कोशाणुओं को नियंत्रित करता है, आधारभूत तत्त्व है। जब मानव अपने मन पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लेता है तो वह अपनी इच्छानुसार जितनी बार चाहे अपने शरीर के कोशाणुओं तथा अन्य अवयवों को परिवर्तित तथा प्रतिस्थापित कर सकता है। उदाहरणार्थ केवल एक विचार मात्र से ही वह शारीरिक परमाणुओं को परिवर्तित कर अपने पूरे दांत नये पैदा कर सकता है। जब मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर लेता है तो वह सम्पूर्ण पदार्थों पर पूरा नियंत्रण पा लेता है।
ईश्वर परमात्मा है; उनका निराकार स्वरूप अदृश्य है। परन्तु उन्होंने भौतिक संसार की रचना की तो वे परमेश्वर जगतपिता कहलाये। सृष्टिकर्ता की भूमिका निभाने के लिये वे साकार हो गये। वे दृष्टिगोचर हो गये। यह सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर का शरीर है।
पृथ्वी के रूप में उनके दो स्वरूप हैं — ऋणात्मक और धनात्मक — अर्थात् उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। तारे उनकी आँखें, घास और पेड़ उनके बाल, और नदियाँ उनका रक्त प्रवाह हैं। समुद्र का गर्जन, लवा पक्षी का गीत, नवजात शिशु का रुदन और सृष्टि की सभी अन्य ध्वनियाँ उनकी वाणी हैं। यह ईश्वर का साकार रूप है। सबके हृदयों की धड़कन उस प्रभु की धड़कती हुई ब्रह्माण्डीय-शक्ति है। वे समस्त मानवजाति के असंख्य चरणों द्वारा चलते हैं। वे सबके हाथों के माध्यम से काम करते हैं। यह एक मात्र दिव्य-चेतना ही है जो सब मस्तिष्कों द्वारा व्यक्त हो रही है।
ईश्वर के आकर्षण और प्रतिकर्षण के नियम के कारण मनुष्य-शरीर के कोशाणु एक दूसरे के साथ एक लय में उसी प्रकार सम्बद्ध हैं जिस प्रकार सितारे अपनी-अपनी कक्षा में सन्तुलन रखे हुए हैं। सर्वव्यापक भगवान नित्य क्रियाशील हैं। कहीं कोई भी ऐसा स्थान नहीं है जहाँ किसी न किसी प्रकार का जीवन न हो। अपनी असीम उदारता द्वारा ईश्वर सदा ही अनेक रूपों के आकारों — अपनी विश्व-शक्ति के अनन्त स्वरूपों — को प्रक्षिप्त करते हैं।
जब परमपिता परमात्मा ने सृष्टि रची तो उनके मन में एक विशेष विचार या रूपरेखा थी। पहले उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को बाह्य रूप दिया, तत्पश्चात मानव की सृष्टि की। अपने लिए ग्रहीय मण्डलों का भौतिक रूप बनाने हेतु ईश्वर ने तीन स्वरूप प्रदर्शित किए : विश्व-चैतन्य, विश्व-शक्ति और विश्व-द्रव्य या पदार्थ।
ये तीनों क्रमानुसार मनुष्य का कारण शरीर, सूक्ष्म या शक्तिमय शरीर, और स्थूल शरीर को दर्शाते हैं। इन सबकी आत्मा या जीवन परमात्मा हैं।
परमात्मा समष्टि रूप से विश्व-चैतन्य, विश्व-शक्ति और ब्रह्माण्डों के रूप में प्रकट होते हैं और व्यष्टि रूप से मानव चेतना, मानव शक्ति और मानव शरीर के रूप में। इस प्रकार पुन: हम देखते हैं कि नि:सन्देह मनुष्य ईश्वर की प्रतिच्छाया में निर्मित है।
ईश्वर स्पन्दन द्वारा ‘‘वार्ता करते हैं’’
नि:सन्देह ईश्वर साकार या शारीरिक रूप में हमारे लिए प्रकट होते हैं। वे आपकी कल्पना से भी अधिक साकार हैं। वे इतने यथार्थ और वास्तविक हैं जितने आप। आज मैं यही आपको बताना चाहता हूँ। भगवान सदा ही हमें प्रत्युत्तर देते रहते हैं। उनके विचार का प्रकम्पन निरन्तर भेजा जा रहा है। इसके लिए शक्ति की आवश्यकता है और शक्ति ‘ध्वनि’ रूप में प्रकट होती है। अब आप देखिए यह कितनी महत्त्वपूर्ण बात है कि ईश्वर चेतना है, ईश्वर शक्ति है, और ‘‘वार्ता करने का’’ अर्थ है स्पन्दित होना। अपनी विश्व-शक्ति के स्पन्दन में वे सदैव वार्ता कर रहे हैं वे सृष्टि की माता बन कर स्वयं को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के रूप में प्रकट करते हैं।
सर्वव्यापी जगन्माता निरन्तर दृश्यमान रूपों में, जैसे फूलों, पर्वतों, समुद्र और नक्षत्रों में, अपने आपको निरन्तर व्यक्त कर रही है। द्रव्य क्या है? यह ईश्वर की विश्व-शक्ति के प्रकम्पन की एक विशेष दर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। संसार का कोई भी रूप वास्तव में ठोस नहीं है। जो ऐसा दिखाई दे रहा है वह केवल उसकी शक्ति का एक घनीभूत या स्थूल प्रकम्पन है। ईश्वर स्पन्दनों के द्वारा हमारे साथ वार्ता कर रहे हैं। परन्तु प्रश्न यह है कि उनके साथ सीधे कैसे वार्तालाप करें। यही सबसे दु:साध्य उपलब्धि है : ईश्वर से वार्तालाप करना।
यदि आप एक पर्वत से बोलें तो वह उत्तर नहीं देता। फूलों से बातें करें, जैसे लूथर बरबैंक करते थे; तो उनमें आप थोड़े से उत्तर का अनुभव कर सकते हैं। नि:सन्देह हम दूसरे लोगों से बातें कर सकते हैं। परन्तु क्या ईश्वर फूलों और मनुष्यों की अपेक्षा कम उत्तरदायी हैं कि हम उनसे बोलते जाते हैं फिर भी वह उत्तर नहीं देते? हमें देखने में तो ऐसा ही लगता है न? इसमें ईश्वर का कोई दोष नहीं है परन्तु हमारा है। हमारे अन्तर्ज्ञान की टेलीफोन व्यवस्था खराब हो गई है। ईश्वर हमें पुकार रहे हैं और हमसे बातें कर रहे हैं, परन्तु हम उन्हें नहीं सुन पा रहे हैं।
विश्व स्पन्दन सभी भाषाओं में ‘‘बातें करता है’’
परन्तु सन्त ईश्वर की वाणी सुनते हैं। जब कभी मेरे एक परिचित सन्त प्रार्थना करते थे, तो ईश्वर की उत्तरस्वरूप वाणी आकाश की ओर से आती प्रतीत होती थी। ईश्वर को बोलने के लिए किसी कंठ की आवश्यकता नहीं है। यदि आप पर्याप्त दृढ़ता के साथ प्रार्थना करें तो वे प्रार्थना-स्पन्दन तुरन्त ही स्पन्दनशील उत्तर लायेंगे। ये उसी भाषा में व्यक्त हो जाएँगे जिसमें भी आप सुनने के अभ्यस्त होंगे। यदि आप हिन्दी भाषा में प्रार्थना करेंगे तो उत्तर भी हिन्दी में ही मिलेगा। यदि आप अंग्रेज़ी में बोलेंगे तो उत्तर भी अंग्रेज़ी में ही सुनाई पड़ेगा।
विभिन्न भाषाओं के प्रकम्पन ईश्वर के विश्व-स्पन्दन से उत्पन्न होते हैं। ईश्वर स्वयं विश्व-स्पन्दन होने के नाते सभी भाषाओं को जानते हैं। भाषा क्या है? यह एक विशेष स्पन्दन है। स्पन्दन क्या है? यह एक विशेष शक्ति है। और शक्ति क्या है? यह एक विशेष विचार है।
यद्यपि ईश्वर हमारी सभी प्रार्थनाओं को सुनते हैं, तथापि वे सदा ही उत्तर नहीं देते। हमारी अवस्था उस बालक की सी है जो अपनी माँ को पुकारता है परन्तु माँ उसके पास आना आवश्यक नहीं समझती। वह उसे शान्त रखने के लिए खिलौने दे देती है परन्तु जब बालक किसी भी वस्तु से सन्तुष्ट न होकर केवल माँ की उपस्थिति ही चाहता है तो माँ आ जाती है। यदि आप ईश्वर को जानना चाहते हैं, तो आपको भी उस नटखट बालक की तरह बनना होगा जो तब तक रोता रहता है जब तक उसकी माँ नहीं आ जाती।
यदि आप निश्चय कर लें कि उनके लिए कभी भी रोना बन्द नहीं करंगे, जगनमाता आपके साथ वार्तालाप करेंगी। वह संसार के काम-काज में चाहे कितनी भी व्यसत क्यों न हो, यदि आप रोते रहेंगे तो वह बोलने के लिए बाध्य हो जायेगी। हिन्दू-धर्मग्रन्थ कहते हैं कि यदि कोई भक्त एक दिन और एक रात एक पल भी रुके बिना अगाध भक्ति के साथ ईश्वर को पुकारे तो वे अवश्य उत्तर देंगे। परन्तु कितने कम भक्त ऐसा करेंगे! प्रतिदिन आपके ‘‘महत्त्वपूर्ण कार्य’’ — ‘‘माया’’ के रूप में — आपको ईश्वर से दूर रखते हैं। यदि आप केवल एक छोटी सी प्रार्थना करें, और फिर अन्य विचारों में खो जाएँ; अथवा आप इस प्रकार प्रार्थना करने लगें : ‘‘हे ईश्वर, मैं तुझे बुलाता हूँ पर मुझे बड़ी नींद आ रही है। ओम्’’ तो ईश्वर आपके पास नहीं आयेंगे। सन्त पॉल ने कहा था, ‘‘अनवरत प्रार्थना करो।’’ 7
धैर्यवान जॉब ने ईश्वर से बहुत देर तक बातचीत की। जॉब ने उनसे कहा : ‘‘सुनो, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ, मैं तुमसे बातें करूँगा। मैंने तुम्हें पुकारा, और तुमने मुझसे बातें की। मैंने तुम्हें अपने कानों से तो सुना है, परन्तु अब मेरी आँखें भी तुम्हें देख रही हैं।’’ 8
जब एक प्रेमी अपने प्रेम को दृढ़ता से परन्तु यन्त्रवत व्यक्त करता है, तो उसकी प्रेमिका जान लेती है कि उसके वचन सच्चे नहीं है; वह जानती है कि उसके प्रेमी के हृदय में वास्तव में क्या है। इसी प्रकार, जब ईश्वर के भक्त उनसे प्रार्थना करते हैं तो वे जानते हैं कि उनके मन और हृदय भक्ति रहित, शुष्क हैं या उनके मन और विचार असंयत होकर इधर-उधर भटक रहे हैं। वे उन अर्धमनी पुकारों के उत्तर नहीं देते। परन्तु उन भक्तों के सम्मुख जो दिन और रात प्रबल भक्ति सहित उनसे प्रार्थना और बातें करते हैं, वे अवश्य प्रकट होते हैं। ऐसे भक्तों के पास वे अवश्य ही आ जाते हैं।
सर्वोत्तम (ईश्वर) को पाये बिना सन्तुष्ट न हों
छोटी-छोटी वस्तुओं को प्राप्त करने में अपना समय नष्ट न करें। स्वभावत: ईश्वर से उनको स्वयं को प्राप्त करने के सर्वोत्तम उपहार की अपेक्षा दूसरे उपहार प्राप्त करना अधिक आसान है। परन्तु सबसे उत्तम उपहार (ईश्वर) के अतिरिक्त किसी निम्न वस्तु से सन्तुष्ट न हों। मैंने ईश्वर से प्राप्त हुए उपहारों पर ध्यान नहीं दिया है; इसकी अपेक्षा उन उपहारों के पीछे मैं उन्हें देखता हूँ जो दाता हैं। मेरी सभी कामनाएँ क्यों पूरी हो जाती हैं? क्योंकि मैं गहराई तक पहुँचता हूँ। मैं सीधे ईश्वर के पास जाता हूँ। सृष्टि के प्रत्येक रूप में मैं उन्हें देखता हूँ। वे हमारे पिता हैं। वे समीपतम से भी समीप और प्रियतम से भी प्रिय हैं, तथा अन्य किसी व्यक्ति से भी अधिक वास्तविक हैं। वे अज्ञेय और ज्ञेय दोनों ही हैं।
ईश्वर आपके लिए बेचैन हैं। वे चाहते हैं कि आप उनके पास वापस लौट जायें। यह आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। एक न एक दिन आपको इस संसार से विदा होना ही होगा; यह आपका निवास स्थान नहीं है। संसारिक जीवन केवल एक पाठशाला है जिसमें भगवान ने हमें हमारे व्यवहार की परीक्षा लेने के लिए भेजा है : बस इतना ही है। स्वयं को प्रकट करने से पहले ईश्वर यह जान लेना चाहते हैं कि क्या हम संसार के चमकीले ऐश्वर्य की इच्छा करते हैं अथवा हमें इतना ज्ञान हो गया है कि हम कह सकें :
‘‘प्रभु, मैं यह सब कुछ देख चुका हूँ। अब मैं केवल आपके ही साथ बातें करना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ कि आप ही मेरी वास्तविक सम्पत्ति हैं। जब सब लोग मुझसे मुँह मोड़ लेंगे तो आप ही मेरा साथ देंगे।’’
मानव विवाह में, धन-दौलत में, मदिरा में और इसी प्रकार की अन्य वस्तुओं में सुख को खोज रहा है; परन्तु ऐसे लोग भाग्य की कठपुतलियाँ हैं। जब एक बार यह ज्ञान प्राप्त हो जाये तो व्यक्ति को जीवन के वास्तविक उद्देश्य का पता चल जाता है और स्वाभाविक रूप से ईश्वर की खोज आरम्भ कर देता है।
हमें अपना खोया हुआ दिव्य पैतृक अधिकार माँगना चाहिए। व्यक्ति जितना अधिक नि:स्वार्थी होगा, उतना अधिक वह दूसरों को सुख देने का प्रयास करेगा, संभवत: उतना ही अधिक उसको ईश्वर के विषय में जिज्ञासा होगी। जितना अधिक मनुष्य सांसारिक उद्देश्यों और इच्छाओं का चिन्तन करता है उसकी आत्मा की प्रसन्नता उतनी ही दूर होती जाती है। हम इस संसार में इन्द्रियों के कीचड़ में रेंगने और दु:खों से दबाये जाकर यातना भोगने के लिए नहीं भेजे गये थे। जो कुछ संसार से सम्बन्धित है वह दु:खमय है क्योंकि वह आत्मा से आनन्द को अवरुद्ध करता है। सर्वोच्च आनन्द मन को ईश्वर के चिन्तन में निमग्न करने से प्राप्त होता है।
सुख को स्थगित क्यों करें?
आप भविष्य की चिन्ता क्यों नहीं करते? आप अनावश्यक वस्तुओं को इतना महत्त्व क्यों देते हैं? अधिकांश लोग प्रात:, दोपहर तथा रात्रि के भोजन, काम-काज, सामाजिक कार्यकलापों आदि में ही व्यस्त रहते हैं। अपने जीवन को और सरल बनाइये तथा अपना सम्पूर्ण ध्यान ईश्वर में केन्द्रित कीजिए। यह संसार ईश्वर के पास वापस पहुँचने की तैयारी करने का स्थान है। ईश्वर यह जानना चाहते हैं कि हम उन्हें उनके उपहारों से अधिक चाहते हैं या नहीं। वे पिता हैं और हम सब उनकी सन्तान हैं। हमारे प्रेम पर उनका अधिकार है और उनके प्रेम पर हमारा अधिकार है। हमारे कष्ट इसलिये उत्पन्न होते हैं क्योंकि हम उनकी अवहेलना करते हैं। परन्तु वे सदैव हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
मैं केवल यही चाहता हूँ कि ईश्वर ने मानव को थोड़ी अधिक बुद्धि दी होती। हम ईश्वर को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र हैं। और यहाँ पर हम थोड़े धन, अल्प सुख और तनिक प्रेम के भिखारी ही बने रहते हैं। ऐसी वस्तुओं की माँग क्यों की जाय जो एक दिन हमसे छीन ली जायेंगी? आप कब तक धन, रोग और आपत्तियों के लिए शोक मनाते रहेंगे? अमरत्व और भगवान के राज्य को ग्रहण करें! यही आपकी वास्तविक आवश्यकता है।
दिव्य साम्राज्य दाँव पर लगा है
सन्तों ने अनासक्ति पर बल दिया है जिससे कि सांसारिक आसक्ति की शक्ति हमें भगवान के पूर्ण साम्राज्य को प्राप्त करने में रुकावट न डाल सके। संन्यास का अर्थ सब कुछ त्यागना नहीं है; इसका अर्थ है तुच्छ भोग-विलासों को अक्षय आनन्द के हेतु त्याग देना। ईश्वर आपसे उस समय बातें करते हैं जब आप उनके लिए काम कर रहे हों, और आपको उनके निरंतर सम्पर्क में रहना चाहिए। जो कोई विचार आपके मन में उठे वही उन्हें बता दें। और उनसे कहें, ‘‘प्रभु, अपने स्वरूप को प्रकट करो, प्रकट करो।’’ उनके मौन को उनका उत्तर न समझ लें। वे पहले-पहल आपके उत्तर में आपकी कोई मनोकामना पूरी कर देंगे और यह व्यक्त करेंगे कि आप उनके ध्यान में हैं। परन्तु उनके उपहारों को पाकर ही सन्तुष्ट मत हो जाएँ। उन्हें यह बता दें कि आप उन्हें पाये बिना कदापि सन्तुष्ट नहीं होंगे। अन्तत: वे आपको उत्तर देंगे ही। अर्न्तदृष्टि (vision) में आपको किसी सन्त पुरुष के दर्शन हो सकते हैं या आप किसी दिव्यवाणी को आपसे वार्तालाप करते हुए सुन सकते हैं; उस समय आपको ज्ञान होगा कि आप ईश्वर के साथ सम्पर्क में हैं।
भगवान को पाने के लिए अटल, अनवरत उत्सुकता की आवश्यकता होती है। यह उत्सुकता आपको कोई दूसरा नहीं सिखा सकता। आपको स्वयं ही इसे विकसित करना होगा। ‘‘आप एक घोड़े को पानी के पास तो ले जा सकते हैं परन्तु उसे पानी पीने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।’’ तथापि जब घोड़े को प्यास लगती है तो वह बड़ी तत्परता से पानी खोजता है। इसी प्रकार, आपके हृदय में भी जब ईश्वर को पाने के लिए प्रबल पिपासा होगी, जब आप किसी भी अन्य वस्तु को अनुचित महत्त्व नहीं देंगे, चाहे वे सांसारिक परीक्षण हों अथवा शारीरिक — तभी वे आपके सम्मुख प्रकट होंगे। याद रखिए, जब आपके हृदय की पुकार तीव्र होगी, जब आप कोई भी बहाना न बनाएंगे तब भगवान आयेंगे।
ईश्वर का उत्तर पाने के विषय में आपको अपने मन से सब सन्देहों को दूर कर देना चाहिए। अधिकांश मनुष्य अपने अविश्वास के कारण कोई भी उत्तर नहीं पाते। यदि आप पूर्णतया कृतसंकल्प हैं कि आप अवश्य ही कुछ प्राप्त करेंगे, तो आपको कोई रोक नहीं सकता। जब आप आशा छोड़ देते हैं तभी अपने विरुद्ध निर्णय लिख देते हैं। सफल मनुष्य ‘‘असम्भव’’ शब्द नहीं जानता।
आपके भीतर विश्वास ईश्वर की असीम शक्ति है। ईश्वर अपनी चेतना के द्वारा जानते हैं कि उन्होंने ही सब वस्तुओं का निर्माण किया है; अत: विश्वास का अर्थ है यह ज्ञान और दृढ़ धारणा कि हम ईश्वर की प्रतिच्छाया में निर्मित हैं। जब हम अपने भीतर उनकी चेतना से अंतर्सम्पर्क कर लेते हैं तो हम लोकों की सृष्टि कर सकते हैं। स्मरण रखें, आपकी इच्छा-शक्ति में ईश्वर की सर्वशक्तिमान शक्ति निहित है। जब विपत्तियों का समूह सामने आता है और आप इनके होते हुए भी पराजित होना अस्वीकार कर देते हैं; जब आपका मन ‘स्थिर’ हो जाता है, तब आप अनुभव करेंगे कि ईश्वर आपको उत्तर दे रहे हैं।
भगवान ब्रह्माण्डीय-स्पन्दन होने के कारण ‘शब्द’ हैं। भगवान शब्द रूप में सभी परमाणुओं के द्वारा गुंजन कर रहे हैं। सृष्टि में से एक संगीत निःसृत हो रहा है जिसे गहनतापूर्वक ध्यान करने वाले भक्त सुन सकते हैं। अब, इस क्षण, मैं ईश्वर की वाणी सुन रहा हूँ। जिस ब्रह्माण्डी-ध्वनि 9 को आप ध्यान में सुनते हैं, वह भगवान की वाणी है। वही ध्वनि उस भाषा के रूप में बदल जाती है जिसे आप जानते हों। जब मैं ‘‘ओम्’’ ध्वनि सुनता हूँ और यदा-कदा ईश्वर से कुछ जानना चाहता हूँ, तो वह ओम् ध्वनि अंग्रेज़ी या बंगला भाषा में परिवर्तित हो जाती है और मुझे उसके विषय में सुस्पष्ट आदेश देती है।
भगवान मानव से उसके अन्तर्ज्ञान द्वारा भी बातें करते हैं। यदि आप ब्रह्माण्डीय-स्पन्दन 10 को सुनना सीखें तो ईश्वर की वाणी को सुनना सरलतर हो जायेगा। परन्तु यदि आप केवल सार्वभौम-आकाश के द्वारा ही ईश्वर से प्रार्थना करें और यदि आपकी इच्छा-शक्ति पर्याप्त मात्रा में प्रबल हो तो आकाश ईश्वर की वाणी के साथ उत्तर देगा। ईश्वर सदैव आपसे बातें कर रहे हैं और कह रहे हैं :
‘‘मुझे पुकारो। मुझसे अपने हृदय की गहराई से, अपने अन्तर्मन से, अपनी आत्मा की नितान्त गहनता से, आग्रहपूर्वक, अधिकारपूर्वक और दृढ़तापूर्वक बात करो; अपने हृदय में मुझे पाने के दृढ़निश्चय के साथ मुझे पुकारते जाओ, चाहे मैं कितनी ही बार उत्तर न दूँ। यदि तुम निरन्तर अपने हृदय में मुझे पुकारते हुए कहते जाओगे, ‘हे मेरे मौन प्रियतम, मुझसे बोलो’ तो हे मेरे भक्त, मैं तेरे पास आवश्य आऊँगा।’’
यदि आप एक बार ईश्वर से उत्तर पा सकें तो आप अपने को पुनः: कदापि उससे पृथक अनुभव नहीं करेंगे। वह दिव्य अनुभव आप में सदा बना रहेगा। परन्तु यह ‘‘एक बार’’ का सम्पर्क ही कठिन है क्योंकि मन और हृदय को विश्वास नहीं होता; पूर्व सांसारिक धारणाओं के कारण शंका उत्पन्न हो जाती है।
ईश्वर सच्चे भक्तों की हार्दिक पुकार का उत्तर देते हैं
ईश्वर प्रत्येक मनुष्य को उत्तर देते हैं, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, मत या वर्ण का हो। बंगला में एक कहावत है कि यदि आप ईश्वर को जगदम्बा माँ के रूप में सच्चे मन से पुकारोगे तो वह चुप नहीं रह सकेगी। उसे बोलना ही पड़ेगा। यह भाव कितना सुन्दर है, है न?
जो अन्त: प्रेरणा मुझे आज प्राप्त हुई और जो मैंने आपको बताया उस पर विचार करो। यदि आप अपनी माँगों के लिए निरन्तर प्रयासरत रहेंगे तो आप कभी भी ईश्वर का प्रत्युत्तर पाने में सन्देह नहीं करेंगे। ‘‘और ईश्वर ने मोज़िज़ के साथ आमने-सामने होकर ऐसे बातें कीं जैसे एक मनुष्य अपने मित्र के साथ करता है।’’ 11
1 I क्रोनिकल्स 14:10।
2 फ्रांसिस थामसन द्वारा लिखित ‘दि हाउन्ड ऑफ़ हैवन’ ।
3 जॉन 10:30।
4 जैनेसिस 9:6।
5 मैथ्यू 10:29।
6 मैथ्यू 6:22।
7 येस्सालोनियन्स 5:17।
8 जॉब 42:4-5।
9 ओम्, चेतन, नादब्रह्म या पवित्र आत्मा।
10 योगदा सत्संग/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप पाठमाला में सिखाई गई एक प्राचीन प्रविधि द्वारा।
11 एक्सोडस 33:11।
लेखक का परिचय
(1893-1952)
‘‘ईश्वर-प्रेम तथा मानव-सेवा के आदर्श ने परमहंस योगानन्द के जीवन में सम्पूर्ण अभिव्यक्ति पायी...। यद्यपि उनके जीवन का अधिकतर हिस्सा भारत के बाहर व्यतीत हुआ, तब भी उनका स्थान हमारे महान् संतों में है। हर जगह परमात्मा प्राप्ति के मार्ग पर लोगों को आकर्षित करता हुआ उनका कार्य निरन्तर वृद्धिंगत एवं अधिकाधिक दीप्तिमान हो रहा है।’’
इन शब्दों में भारत सरकार ने योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया / सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के संस्थापक श्री श्री परमहंस योगानन्द को उनकी महासमाधि की पचीसवीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में 7 मार्च 1977 को उनके सम्मान में एक स्मृति टिकट जारी करते हुए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
जगद्वंद्य महान् गुरु श्री श्री परमहंस योगानन्द ने, जिनका शिष्य समुदाय मानवजाति के सभी वर्ण-वर्गों में फैला हुआ है, और जिनकी इस जगत् में उपस्थिति ने अगणित लोगों के लिये ईश्वर-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त कर दिया, उच्चतम सत्यों को ही अपना जीवन बनाया और उन्हीं की शिक्षा दी। परमहंस योगानन्दजी का जन्म 1893 में गोरखपुर में हुआ था। 1920 में उन्हें उनके गुरु ने अमेरिका में हो रहे उदारवादियों के विश्व धर्म सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि के रूप में भेजा। सम्मेलन के पश्चात् बोस्टन, न्यूयॉर्क, फिलाडेल्फिया में दिये गये उनके व्याख्यानों का अत्यंत उत्साह के साथ भव्य स्वागत हुआ, और 1924 में उन्होंने सम्पूर्ण अमेरिका में दौरे करते हुए व्याख्यान दिये।
अगले दशक में परमहंसजी ने व्यापक यात्राएँ कीं जिनमें उन्होंने अपने व्याख्यानों और कक्षाओं के दौरान हजारों नर-नारियों को ध्यान के यौगिक विज्ञान एवं संतुलित आध्यात्मिक जीवन की शिक्षा प्रदान की।
परमहंस योगानन्दजी द्वारा प्रारम्भ किया गया आध्यात्मिक एवं मानवतावादी कार्य वर्तमान में, योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया / सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के अध्यक्ष, श्री श्री स्वामी चिदानन्द गिरि के मार्गदर्शन में चल रहा है। परमहंस योगानन्दजी की रचनाएँ, उनके व्याख्यान कक्षाएँ, अनौपचारिक भाषण इत्यादि का प्रकाशन करने के साथ-साथ (जिसमें व्यक्तिगत अध्ययन के लिए
योगदा सत्संग पाठमाला भी शामिल है), यह सोसाइटी योगदा सत्संग / सेल्फ़-रियलाइज़ेशन मन्दिरों, आश्रमों, एवं ध्यान केन्द्रों की देखभाल करती है जो सारे विश्व में फैले हुए हैं। इसके अलावा यह संन्यास प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं विश्व प्रार्थना मंडल का भी संचालन करती है जो जरूरतमंदों की दैवी सहायता तथा सारे विश्व के लिये सामंजस्य एवं शांति के माध्यम का कार्य करती है।
क्विंसी हौवे, ज्यूनियर, पीएच.डी., पुरातत्व भाषाओं के प्रोफेसर, स्क्रिप्स कॉलेज, ने लिखा है : ‘‘परमहंस योगानन्दजी पश्चिम में केवल भारत का ईश्वर-साक्षात्कार का चिरन्तन आश्वासन ही नहीं लाये, अपितु एक व्यावहारिक पद्धति भी लाये जिसका अनुसरण करके जीवन के सभी क्षेत्रों में कार्यरत आध्यात्मिक अभिलाषी उस लक्ष्य की ओर तेज़ी से अग्रसर हो सकते हैं। भारत की यह आध्यात्मिक विरासत जो पश्चिम में पहले अति गूढ़ एवं जटिल समझी जाती थी, अब उन सबकी पहुँच में अभ्यास एवं अनुभूति के रूप में आ गयी है जो ईश्वर को जानने की अभिलाषा रखते हैं, परलोक में नहीं, अपितु यहाँ और अभी...। श्री योगानन्द ने ध्यान की उच्चतम प्रविधियों को सब की पहुँच के अन्दर लाकर रख दिया है।’’
परमहंस योगानन्द के जीवन एवं उनकी शिक्षाओं का वर्णन उनकी आत्मकथा
योगी कथामृत में उपलब्ध है, जो 1946 में उसके प्रकाशन के बाद आध्यात्मिक क्षेत्र में गौरव ग्रन्थ बन गयी है तथा अब विश्व भर में कई महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में पाठ्य-पुस्तक तथा सन्दर्भ-ग्रन्थ के रूप में प्रयोग में लायी जा रही है। परमहंस योगानन्द के जीवन और कार्य पर आधारित पुरस्कृत वृत्तचित्र
Awake: The Life of Yogananda, को अक्टूबर 2014 में रिलीज़ किया गया।
परमहंस योगानन्द: जीवन में भी योगी और मृत्यु में भी योगी
श्री श्री परमहंस योगानन्द ने लॉस एंजिलिस, कैलिफ़ोर्निया (अमेरिका) में 7 मार्च, 1952 को, भारतीय राजदूत श्री बिनय रंजन सेन के सम्मान के निमित्त आयोजित भोज के अवसर पर अपना भाषण समाप्त करने के उपरान्त ‘महासमाधि’ (एक योगी का शरीर से अभिज्ञ अंतिम प्रस्थान) में प्रवेश किया।
विश्व के महान गुरु ने योग के मूल्य (ईश्वर-प्राप्ति के लिए वैज्ञानिक प्रविधियों) को जीवन में ही नहीं अपितु मृत्यु में भी प्रदर्शित किया। उनके देहावसान के कई सप्ताह बाद भी उनका अपरिवर्तित मुख अक्षयता की दिव्य कान्ति से देदीप्यमान था।
फारेस्ट लॉन मेमोरियल — पार्क, लॉस ऐंजेलिस (जहाँ महान् गुरु का पार्थिव शरीर अस्थायी रूप से रखा गया है) के निर्देशक श्री हैरी टी. रोंवे ने सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप को एक प्रमाणित पत्र भेजा था, जिसके कुछ अंश निम्नलिखित हैं :
‘‘परमहंस योगानन्दजी के पार्थिव शरीर में किसी भी प्रकार के विकार का लक्षण न दिखायी पड़ना हमारे लिए एक अत्यन्त असाधारण और अपूर्व अनुभव है।... उनकी मृत्यु के बीस दिन बाद भी उनके शरीर में किसी प्रकार की विक्रिया नहीं दिखायी पड़ी।... न तो त्वचा के रंग में किसी प्रकार के परिवर्तन के संकेत थे और न शरीरतन्तुओं में शुष्कता ही आयी प्रतीत होती थी। शवागार के वृत्ति-इतिहास से हमें जहाँ तक विदित है, पार्थिव शरीर के ऐसे परिपूर्ण संरक्षण की अवस्था अद्वितीय है।... योगानन्दजी का शव स्वीकार करते समय शवागार के कर्मचारियों को यह आशा थी कि उन्हें शवपेटिका के काँच के आवरण से साधारण वर्धमान शारीरिक क्षय के चिह्न दीख पड़ेंगे। हमारा विस्मय बढ़ता गया, जब निरीक्षण के अन्तर्गत दिन पर दिन बीतते गये, किन्तु उनकी देह पर परिवर्तन के कोई चिह्न दृष्टिगत नहीं हुए। प्रत्यक्षत: योगानन्दजी की देह निर्विकारता की अद्भुत अवस्था में थी। किसी समय उनके शरीर में तनिक भी विक्रियात्मक दुर्गन्ध नहीं आयी।...
‘‘27 मार्च को शवपेटिका पर काँसे के ढक्कन को बन्द करने के पूर्व योगानन्दजी का शारीरिक रूप ठीक वैसा ही था जैसा 7 मार्च को। 27 मार्च को भी उनका शरीर उतना ही ताजा और विकाररहित दिखायी पड़ रहा था जितना मृत्यु की रात्रि को। 27 मार्च को ऐसा कोई लक्षण नहीं दिखायी पड़ा, जिससे यह कहा जा सके कि उनके शरीर में किसी भी प्रकार का तनिक भी विकार आया हो। इन कारणों से हम पुन: अभिव्यक्त करते हैं कि परमहंस योगानन्दजी का उदाहरण हमारे अनुभव में अभूतपूर्व है।’’
परमहंस योगानन्दजी की
क्रिया-योग शिक्षाओं के विषय में
अधिक जानकारियॉं
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योगी कथामृत
द्वारा श्री श्री परमहंस योगानन्द
‘‘शताब्दी की श्रेष्ठतम एक सौ आध्यात्मिक पुस्तकों’’ में चुनी गयी यह लोकप्रिय आत्मकथा हमारे युग की एक महान् आध्यात्मिक विभूति की अत्यंत चित्ताकर्षक छवि प्रस्तुत करती है। मन को मोह लेने वाली सुस्पष्टता, वाक्पटुता और हास्यरस युक्त भाषा कौशल का श्री श्री परमहंस योगानन्द ने अपने जीवन के इस प्रेरणाप्रद वृत्तान्त का वर्णन करने में प्रयोग किया है — उनके विलक्षण बचपन के अनुभव, किसी ब्रह्मज्ञानी गुरु की उत्साही खोज में सारे भारत भर के अनेक संतों एवं ज्ञानियों से उनकी मुलाकातें, अपने गुरु के आश्रम में दस वर्षों का प्रशिक्षण, और वे तीस वर्ष जो उन्होंने अमेरिका में अपनी शिक्षाओं का प्रचार करते हुए बिताये। इसमें महात्मा गाँधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, लूथर बरबैन्क, कैथोलिक सन्त थेरेसे नॉयमन और अनेक विख्यात पौर्वात्य तथा पाश्चात्य आध्यात्मिक विभूतियों से उनकी मुलाकातों का भी वर्णन है।
योगी कथामृत एक असाधारण जीवन का अत्यंत सुंदर ढंग से लिखा गया वर्णन भी है और साथ ही योग के प्राचीन विज्ञान और उसकी ध्यान की चिरप्रचलित परंपरा का गहन परिचय भी है। इसमें लेखक महोदय दैनंदिन मानव जीवन की साधारण घटनाओं एवं साधारणतया चमत्कार कही जाने वाली असाधारण घटनाओं के पीछे कार्यरत सूक्ष्म किन्तु सुनिश्चित नियमों को विस्तृत रूप से स्पष्ट करते हैं। इस प्रकार उनकी मंत्रमुग्ध कर देने वाली जीवन गाथा मानव अस्तित्व के अंतिम रहस्यों का अंतर्वेधी एवं अविस्मरणीय झलक प्रदान करने के लिये पृष्ठभूमि बन जाती है।
आधुनिक काल का आध्यात्मिक गौरव ग्रन्थ मानी जाने वाली यह पुस्तक पचास से भी अधिक भाषाओं में अनुवादित हो चुकी है तथा अब विश्व भर में कई महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पाठ्य-पुस्तक तथा संदर्भ-ग्रन्थ के रूप में प्रयोग में लायी जा रही है। पचहत्तर वर्षों से भी अधिक पहले, जब यह प्रथम बार अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी, तब से अब तक लोकप्रियता के शिखर पर आसीन इस पुस्तक ने विश्वभर में लाखों के हृदयों में अपना स्थान बना लिया है।
‘‘इस ज्ञानी महात्मा की यह आत्मकथा पाठक को मंत्रमुग्ध कर देती है।’’
— द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया
‘‘एक अनुपम वृत्तान्त।’’ — द न्यूयॉर्क टाइम्स
‘‘सुस्पष्ट टिप्पणियों सहित दिया गया मनमोहक चिंतन।’’ — न्यूज़वीक
‘‘योग की इस प्रस्तुति के समान अंग्रेजी या किसी भी अन्य यूरोपीय भाषा में आज तक कुछ भी कभी लिखा नहीं गया।’’ — कोलम्बिया युनिवर्सिटी प्रेस
परमहंस योगानन्द रचित अन्य पुस्तकें
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योगी कथामृत
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मानव की निरन्तर खोज
दिव्य प्रेम-लीला
जहाँ है प्रकाश
धर्म विज्ञान
सफलता का नियम
परमहंस योगानन्द के वचनामृत
जीने की कला
मानसिक अशान्ति : कारण एवं निवारण
ईश्वर-अर्जुन संवाद : श्रीमद्भगवद्गीता (एक नवीन अनुवाद एवं व्याख्या)
The Second Coming of Christ: The Resurrection of the Christ Within You — A Revelatory Commentary on the Original Teachings of Jesus
Journey to Self-realization
Wine of the Mystic: The Rubaiyat of Omar Khayyam — A Spiritual Interpretation
Songs of the Soul
Whispers from Eternity
Scientific Healing Affirmations
In the Sanctuary of the Soul: A Guide to Effective Prayer
Metaphysical Meditations
Inner Peace: How to Be Calmly Active and Actively Calm
Living Fearlessly: Bringing Out Your Inner Soul Strength
Why God Permits Evil and How to Rise Above It
To be Victorious in Life
Words of Cosmic Chants
Seek God Now
Who Made God?
Developing Dynamic Will
Man’s Greatest Adventure
Increasing the Power of Initiative
Habit — Your Master or Your Slave?
Audio Recordings of Paramahansa Yogananda
Available in downloadable MP3 format
Awake in the Cosmic Dream
Be a Smile Millionaire
Beholding the One in All
In the Glory of Spirit
The Great Light of God
To Make Heaven on Earth
One Life Versus Reincarnation
Removing All Sorrow and Suffering
Self-Realization: The Inner and the Outer Path
Songs of My Heart (Chants, Poems, and Prayers)
ऊपर लिखी किताबों में से कुछ हिन्दी, असमिया, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंहली, तमिल, तेलुगु, एवं उर्दू में भी उपलब्ध है। योगदा सत्संग सोसाइटी की किताबों और ऑडियो रिकार्डिंग की पूर्ण सूची के लिए नीचे दिए गये पते पर देखें। श्री श्री परमहंस योगानन्द के रंगीन एवं ब्लैक और वाइट चित्र भी उपलब्ध है।
योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया
परमहंस योगानन्द पथ
रॉंची 834001, झारखण्ड
फ़ोन : (0651) 6655 555
उद्देश्य और आदर्श
योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया
श्री श्री परमहंस योगानन्द, गुरुदेव एवं संस्थापक द्वारा निर्धारित
श्री श्री स्वामी चिदानन्द गिरि, अध्यक्ष
ईश्वर की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुभूति प्राप्त करने के लिए सुनिश्चित वैज्ञानिक प्रविधियों के ज्ञान का विभिन्न राष्ट्रों में प्रचार करना।
यह शिक्षा देना कि स्वयं-प्रयास के द्वारा मनुष्य के अनित्य चैतन्य को ईश-चैतन्य में विकसित करना जीवन का उद्देश्य है और इस ध्येय की उपलब्धि के लिए योगदा सत्संग मन्दिरों की ईश-सम्पर्क के लिए स्थापना करना तथा मनुष्य जाति के घरों और हृदयों में ईश्वर के व्यक्तिगत मन्दिरों की स्थापना हेतु प्रोत्साहित करना।
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उपदिष्ट मूल योग और ईसा मसीह द्वारा उपदिष्ट मूल ईसाई धर्म में मूलभूत एकता और पूर्ण सामंजस्य पर प्रकाश डालना और यह दर्शाना कि सत्य के ये सिद्धान्त सभी सच्चे धर्मों के सामान्य वैज्ञानिक आधार हैं।
एक ही दिव्य राजमार्ग को इंगित करना, जिसकी ओर सच्चे धर्मों के सारे पथ अन्तत: पहुँचाते हैं। वह राजमार्ग ईश्वर का दैनिक, वैज्ञानिक, भक्तिमय ध्यान करना है।
मनुष्य को तीन प्रकार के कष्टों शारीरिक रोग, मानसिक अशान्ति और आध्यात्मिक अज्ञान — से मुक्त करना।
‘‘सादा जीवन और उच्च विचार’’ को प्रोत्साहित करना तथा मानवजाति के मध्य उनकी एकता के शाश्वत आधार — ईश्वर सें संबंध — की शिक्षा देकर बन्धुत्व की भावना का प्रचार करना।
शरीर पर मन और मन पर आत्मा की वरिष्ठता प्रतिपादित करना।
बुराई पर भलाई से, दुख पर आनन्द से, क्रूरता पर दया से और अज्ञान पर ज्ञान से विजय पाना।
विज्ञान और धर्म में उनके मूलभूत सिद्धान्तों की एकता के प्रत्यक्ष निरूपण द्वारा सामंजस्य स्थापित करना।
पूर्व और पश्चिम के बीच आध्यात्मिक सौमनस्य का विकास करना और उनके सर्वोत्तम विशिष्ट पहलुओं के आदान-प्रदान का समर्थन करना।
अपनी ही बृहद् आत्मा (परमात्मा) के रूप में मानव जाति की सेवा करना।
क्या ईश्वर के साथ वार्तालाप करना
और
अपनी प्रार्थनाओं का निश्चित प्रत्युत्तर पाना
वास्तव में सम्भव है?
इस उत्कृष्ट
मार्ग-दर्शिका में एक विश्वविख्यात आध्यात्मिक गुरु इस प्रश्न का व अन्य प्रश्नों का
उत्तर देते हैं। यह विश्व-भर में आध्यात्मिक अन्वेषकों की प्रिय है। ईश्वर से वार्तालाप
की विधि हमें दर्शाती है कि भगवान के साथ एक गहन व
परिपूर्ण व्यक्तिगत सम्बन्ध विकसित करने के लिए अत्यन्त घनिष्ठता के साथ प्रार्थना
कैसे करें। यह पुस्तक अपने सिरहाने रखने योग्य है, जो प्रत्येक पठन के साथ प्रेरणा
व ज्ञान रूपी नये रत्नों को प्रकट करती है।
श्री श्री परमहंस योगानन्द
परमहंस योगानन्द की
आध्यात्मिक विरासत
Spirituality/Self-Improvement