
सद्गुणों का अर्जुन
एवं दुर्गुणों का नाश
किस प्रकार करें
HOW TO CULTIVATE VIRTUES AND ERADICATE VICES
का हिंदी अनुवाद
लेखक
श्री स्वामी शिवानंद
अनुवादिका
स्वामी गुरुवत्सलानन्द माता
प्रकाशक
द डिवाइन लाइफ सोसाइटी
पत्रालय: शिवानंदनगर-249192
जिला: टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड (हिमालय), भारत
www.sivandaonline.org, www.dlshq.org
प्रथम हिन्ती संस्करण २०१९
(१,००० प्रतियाँ)
© द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी
ISBN 81-7052-258.7 8
HS 8
PRICE:195/-
'द डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए
स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त
फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर, जि. टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड,
पिन २४९१९२' में मुद्रित ।
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ॐ
समस्त अभिभावकों एवं शिक्षकों
नेताओं एवं उपदेशकों
को समर्पित
जो करते हैं चरित्र-निर्माण
नर एवं नारियों का
सद्गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज की समस्त कृतियों में यह कृति सर्वोपरि कही जायेगी। इस पुस्तक में श्री गुरुदेव ने वर्तमान विश्व के नर-नारियों के समक्ष एक ऐसा विषय प्रस्तुत किया है जो उनके स्वयं के हृदय को सर्वाधिक प्रिय है तथा जो मनुष्यों को देवताओं में एवं राष्ट्रों को स्वर्ग में रूपान्तरित करने में सक्षम है।
मनसा-वाचा-कर्मणा धर्मपरायणता, उज्ज्वल-दिव्य चरित्र का विकास तथा हृदय के धर्म का पालन श्री गुरुदेव की शिक्षाओं के सारतत्त्व हैं। इस सन्दर्भ में, वे भगवान् बुद्ध की भाँति हैं। परन्तु भगवान् श्री कृष्ण के समान, श्री गुरुदेव स्पष्ट उद्घोषणा करते हैं कि सदाचार-धर्मपरायणता आत्मज्ञान प्राप्ति का एक साधन है।
श्री गुरुदेव ने अपनी प्रत्येक पुस्तक में साधना के इस पक्ष अर्थात् सद्गुणों के अर्जन एवं दुर्गुणों के नाश पर बल दिया है। चाहे वे विशाल सभाओं को सम्बोधित कर रहे हों अथवा भक्तों से वार्तालाप कर रहे हों, उन्होंने सदैव प्रबलतापूर्वक यही कहा है, "केवल सदाचार-धर्मपरायणता के द्वारा ही आप परम तत्त्व को प्राप्त कर सकते हैं।”
इस पुस्तक में श्री गुरुदेव ने हमें सुन्दर सद्गुणों की एक माला प्रदान की है जिसे प्रत्येक सच्चे साधक को धारण करना चाहिए। इसके साथ-ही-साथ उन्होंने उन मानवीय दोषों एवं दुर्बलताओं की भी चर्चा की है जिनका समूल नाश किया जाना चाहिए ताकि मनुष्य की आत्मा अपने दिव्य प्रकाश की उज्ज्वल आभा को पुनः प्राप्त कर सके।
सर्वशक्तिमान् प्रभु के चरणों में इस प्रार्थना के साथ हम सुधी पाठकों को यह पुस्तक समर्पित करते हैं कि यह उन्हें उदात्त एवं दिव्य बनाये, श्रेष्ठ एवं सफल बनाये जिससे कि वे इस विश्व को भ्रातृत्व-भाव एवं शान्ति से परिपूर्ण एक सुन्दर धाम बना सकें।
-द डिवाइन लाइफ सोसायटी
नीतिशास्त्र एवं नैतिकता
नैतिक विकास से नैतिक पूर्णता प्राप्त होगी। एक नैतिक व्यक्ति एक बुद्धिजीवी व्यक्ति से अधिक शक्तिशाली होता है। नैतिक विकास से विभिन्न प्रकार की अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
नैतिकता आध्यात्मिकता की सहचरी है। नैतिकता आध्यात्मिकता के साथ-साथ रहती है। नैतिक विकास आपको 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' - सब ब्रह्म ही है-इस वेदान्तिक साक्षात्कार के लिए तैयार करता है। यहाँ विविधता-भिन्नता जैसी कोई वस्तु नहीं है। सब ब्रह्म ही है।
सभी साधक घर छोड़ने के तुरन्त बाद नैतिक पवित्रता की परवाह किये बिना ध्यान और समाधि प्राप्ति की शीघ्रता करने की गलती करते हैं।
नैतिक जीवन के लिए आवश्यक है-स्पष्टवादिता, ईमानदारी, दया, विनम्रता, जीवन के प्रति सम्मान, प्रत्येक प्राणी के प्रति आदर, पूर्ण निःस्वार्थता, सत्यनिष्ठा, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, निलोंभिता तथा दर्प एवं आडम्बर का अभाव और वैश्विक प्रेम।
एक सदाचारी व्यक्ति के आदर्श सिद्धान्त एवं लक्ष्य होते हैं। वह उनका पूर्ण पालन करता है, अपने दोषों एवं दुर्बलताओं को दूर करता है, अच्छे आचरण का विकास करता है और एक सात्त्विक व्यक्ति बन जाता है।
धर्मपरायणता शाश्वत है। आपका जीवन भी यदि संकट में है तो भी आपको धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। एक धार्मिक एवं सदाचारी जीवन और निर्मल अन्तरात्मा व्यक्ति को जीवन तथा मृत्यु दोनों में ही अत्यधिक सुख देते हैं। आपको केवल सच्चरित्र रूपी हीरा पहनने की ही इच्छा करनी चाहिए। सद्गुण आत्मज्ञान प्राप्ति में सहायक हैं।
निरन्तर दयापूर्ण कर्म करते रहने एवं नैतिक सिद्धान्तों का पालन करने से ही अमरत्व की प्राप्ति की जा सकती है।
दयापूर्ण कार्य, करुणा एवं सेवा हृदय को पवित्र एवं कोमल बनाते हैं, हृदयकमल को ऊर्ध्वमुखी करते हैं एवं साधक को दिव्य प्रकाश ग्रहण करने हेतु तैयार करते हैं।
सत्य, तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा आत्मनियन्त्रण का अभ्यास शाश्वत तत्त्व के ज्ञान की प्राप्ति में सहायक हैं।
विनम्रता सर्वोच्च सद्गुण है। भगवान् आपकी केवल तभी सहायता करते हैं, जब आप पूर्णतया विनम्र बनते हैं। इसलिए इस सद्गुण का अधिकतम सीमा तक विकास करिए।
सदगुण का सकारात्मक एवं क्रियात्मक रूप से अभ्यास करने पर ही वह विकसित होगा एवं बना रहेगा।
अहिंसा का सिद्धान्त उतना ही सही एवं उचित है जितना गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त। यदि आप मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा के अभ्यास में पूर्णतया प्रतिष्ठित हैं, तो आप भगवान् हैं।
अहिंसा का मार्ग कठिन है लेकिन यदि आप गम्भीरतापूर्वक अहिंसा का अभ्यास करते हैं, तो आप सरलता से इस मार्ग पर चल सकते हैं क्योंकि इसमें प्रत्येक पग पर आपको भगवद्कृपा प्राप्त होती है।
एक महान् सन्त शक्तिशाली राजाओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। भगवान् एक पवित्र व्यक्ति से अत्यधिक प्रसन्न होते हैं।
एक मनुष्य जो अपने दिये गये वचनों का पालन करता है, वह दूसरों पर अच्छा प्रभाव डालता है और अन्ततः दिव्यता में लीन होता है।
सहानुभूति, प्रेम, दया, निष्कपटता तथा गीता में वर्णित अन्य दिव्य गुणों का अर्जन करिए। संयमित जीवन जियें। नैतिक शक्ति आध्यात्मिक उन्नति का आधार है। नैतिक विकास आध्यात्मिक साधना का अभिन्न अंग है।
धर्म-नैतिकता का आधार
नैतिक बनने का गुण नैतिकता है। नैतिकता ही एक कार्य को उचित सिद्ध करती है। यह धार्मिक कर्तव्यों के अतिरिक्त, नैतिक कर्तव्यों का पालन है।
मानवीय व्यवहार में उचित एवं अनुचित का सिद्धान्त नैतिकता है। यह पवित्र नीवन है। कभी-कभी संकीर्ण अर्थों में इसका अभिप्राय शुद्धता होता है।
नैतिकता सद्गुण है। नैतिकता नीतिशास्त्र है। यह वह सिद्धान्त है जो कार्यों के चित अथवा अनुचित होने से सम्बन्धित है।
नैतिकता सर्वत्र समान है क्योंकि यह ईश्वर से निःसृत है।
नैतिकता धर्म का क्रियात्मक रूप है; धर्म नैतिकता का ही सैद्धान्तिक रूप है। जो आपको करना आवश्यक है, वह अवश्यमेव करना चाहिए, यद्यपि उससे कष्ट एवं हानि प्राप्त होते हैं, क्योंकि वह उचित है।
सभी सफल कार्य नैतिकता की नींव पर ही आधारित होते हैं। धर्थ के चिना नैतिकता मूलविहीन है। यह सामाजिक रीति-रिवाज के समान परिवर्तनशील, अस्थायी एवं ऐच्छिक बन जाती है।
सुदृढ़ नैतिकता के बिना उच्च सुसंस्कृतता, शिष्टता, विनम्रता एवं शालीनता सम्भव नहीं है।
जो नैतिकता धर्म पर आधारित नहीं है, वह यथार्थ एवं स्थायी नैतिकता नहीं है।
धर्म का नैतिकता से पार्थक्य नहीं हो सकता है। नैतिकता धर्म का आधार है। नैतिकता एवं धर्म उसी प्रकार अपृथक्करणीय हैं जिस प्रकार अग्नि एवं उष्णता, बर्फ एवं शीतलता, पुष्प एवं सुगन्ध।
धर्म के बिना नैतिकता एक मूलविहीन वृक्ष है, रेत पर बना एक घर है, बिना स्रोत की एक नदी है।
नैतिकता सम्बन्धी उपदेश मनुष्य के चरित्र को सुधारने तथा उसे दुर्गुणों एवं अज्ञान से मुक्त कराने के लिए सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।
धर्मविहीन नैतिकता का अस्तित्व नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा है, तो यह परिवर्तित हो जायेगी, ज्यूँ ही आपको असुविधाएँ प्राप्त होंगी। धर्म को इसे शासित-नियन्त्रित करना चाहिए।
किसी कार्य की नैतिकता उसमें निहित उद्देश्य पर निर्भर करती है। सर्वप्रथम उचित आदर्श अपनाइए और फिर आप निश्चय ही सत्कार्य करेंगे।
धार्मिक सिद्धान्त की अनुपस्थिति में राष्ट्रीय नैतिकता नहीं रह सकती है।
बिना धर्म के नैतिकता का नाश होगा। धर्म ही नैतिकता का मूल है। नैतिकता को उसके उचित आधार अर्थात् ईश्वर के प्रति प्रेम एवं भय पर स्थापित करिए।
धर्मविहीन नैतिक मूल्य पथरीली भूमि पर बोये गये बीज के समान सूख जायेंगे और नष्ट हो जायेंगे।
नैतिकता सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य के नैतिक कर्तव्यों का सिद्धान्त है। ईश्वरविहीन नैतिकता अधर्म ही है।
नैतिकता एवं नीतिशास्त्र
नैतिक सिद्धान्त इस अभिप्राय में परिपूर्ण नहीं है कि नैतिक नियमों एवं प्रतिबन्धों से परे भी एक अवस्था है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि नैतिक नियमों की अवहेलना की जा सकती है। नैतिकता अन्तरात्मा द्वारा अभिव्यक्त उचित होने के अन्तर्निहित भाव का पालन है जो कि स्वार्थ एवं इसकी अन्य अभिव्यक्तियों अथवा प्रभावों से मुक्त है। नैतिकता वह आत्म-बोध है, वह सत्य-बोध है जो उन आवेगों-वासनाओं के शासन से प्रतिबन्धित होना अस्वीकार करता है, जो सार्वभौमिक कल्याण के विरुद्ध हैं। नैतिक बोध का उद्देश्य पूर्णता का पथ निर्देशित करना है, और इसीलिए नैतिकता का मूल्यांकन चेतना को अबाधित आनन्द की ओर निर्देशित करने की इसकी क्षमता द्वारा किया जाता है जो कि एक या कुछ व्यक्तियों अथवा ब्रह्माण्ड के एक भाग अथवा अस्तित्व के एक प्रकार तक ही सीमित नहीं है।
निःस्वार्थ भाव तथा इसके परिणामस्वरूप आनन्द का क्षेत्र जितना व्यापक होगा, उतनी ही अधिक नैतिक वह पद्धति अथवा कार्य होगा जिसके माध्यम से यह निःस्वार्थता क्रियान्वित होती है अथवा अभिव्यक्त होती है। सभी स्वार्थपूर्ण कार्य अनैतिक हैं। स्वार्थपूर्ण कार्य क्या है? यह वह कार्य है जिसका उद्देश्य अपने अहंकार एवं इन्द्रियों की इच्छाओं को दमित करना नहीं अपितु उन्हें सन्तुष्ट करना है।
इन स्वार्थपूर्ण कार्यों के अतिरिक्त, मनसा-वाचा-कर्मणा दूसरों को कष्ट पहुँचाना, असत्य भाषण, चोरी करना आदि अनैतिक कार्य हैं। काम, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा ईर्ष्या अनैतिक गुण हैं। दानशीलता द्वारा भी नैतिक नियमों की अवहेलना का औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता है।
नैतिकता एक महान् नियम है जो सार्वभौमिक है तथा देश, काल अथवा परिस्थितियों-अवस्थाओं से प्रतिबन्धित नहीं है। (योग-सूत्र)
विषय-सूची
सुशीलता-स्नेहपात्रता (Amiability)
उद्यमशीलता एवं मनोयोग (Application)
प्रतिपक्ष भावना (Counter Thoughts)
स्वनिर्णय-स्वविवेक (Discretion)
चारुता-सुरुचिपूर्णता (Elegance)
भलाई, पवित्रता एवं सत्यपरायणता विकसित करने हेतु कुछ निर्देश
मनोहारिता-रम्यता (Gracefulness)
कर्मठता-परिश्रमशीलता (Industriousness)
न्यायनिष्ठा-सत्यनिष्ठा (Integrity)
वैश्विक प्रेम (Universal Love)
वैश्विक प्रेम अहिंसा के रूप में (Cosmic Love as Ahimsa)
धैर्य एवं अध्यवसाय (Patience and Perseverance)
उद्यमपूर्ण कौशल (Pluck or Knack)
उत्साहपूर्ण उद्यमी स्वभाव (Pushing Nature)
नियमितता एवं समयनिष्ठता (Regularity and Punctuality)
संसाधनपूर्णता-उपायकुशलता (Resourcefulness)
धर्मपरायणता-जीवन का प्राण (Righteousness-The Breath of Life)
आत्म-परीक्षण (Self-examination)
आत्म-विश्वास (Self-confidence)
सत्यमेव जयते (Truth alone Triumphs)
बारह सद्गुणों पर ध्यान (Meditation on Twelve Virtues)
विकसित किये जाने वाले सद्गुणों की सूक्ती (List of of Virtues to be Developed)
सद्गुणों के शब्द-चित्र (Word-picture of Virtues)
अठारह सद्गुणों का गीत (Song of Eighteen Ities)
भाग-२ दुर्गुणों का नाश कैसे करें
लोभ-लोलुपता का गीत (Song of Avidity)
परनिन्दा-चुगलखोरी (Back-biting)
चिन्ता, परेशानी एवं व्याकुलता (Cares, Worries and Anxities)
असावधानी एवं विस्मृति (Carelessness and Forgetfulness)
कुटिल-मानसिकता (Crooked-mindedness)
वृथा परिभ्रमण (Dilly-dallying)
धर्मोन्माद-धार्मिक कट्टरवाद (Fanaticism)
फैशन-एक भयंकर अभिशाप (Fashion - A Terrible Curse)
उदासी एवं निराशा (Gloom and Despair)
द्यूतक्रीड़ा-जुआ खेलना (Gambling)
धार्मिक पाखण्ड (Religious Hypocricy)
अशुद्ध एवं असंयमित आहार (Impure and Immoderate Food)
हीन भावना (Sense of Inferiority)
मनोराज्य (Building Castle in the Air)
क्षुद्र मानसिकता (Mean-mindedness)
अति विश्वास (Over-credulousness)
तीव्र संवेग-राग-जुनून (Passion)
अविचारपूर्वक-पक्षपात अर्थात् पूर्वाग्रह (Prejudice)
नैतिक एवं आध्यात्मिक गर्व (Moral and Spiritual Pride)
विलम्बन-दीर्घसूत्रনা (Procrastination)
अहंता अथवा स्वाग्रह (Self-assertion)
आत्म-प्रतिपादन (Self-justification)
अलं बुद्धि अर्थात् अपनी योग्यता-सामर्थ्य को पर्याप्त मान लेना
अभद्र शब्द एवं अपशब्द (Slang Terms and Abuses)
धूम्रपान की आदत (Smoking Habit)
अत्यधिक वाद-विवाद करना (Villy-vallying)
सद्गुणों के विकास द्वारा दुर्गुणों का नाश करिए (Destroy Evil Vrittis by developing virtues)
नष्ट किये जाने वाले दुर्गुणों की सूची (List of Vices to be destroyed)
सद्गुणों का अर्जन किस प्रकार करें
परिवर्जन किसी वस्तु के सेवन अथवा भोग से स्वयं को दूर रखना है। परिवर्जन संयम है।
यह अत्यधिक भोग अथवा पाशविक प्रवृत्तियों के तुष्टीकरण से स्वयं को दूर रखने की अवस्था, अभ्यास अथवा कार्य है। यह आत्म-नियन्त्रण अथवा आत्मानुशासन है। उदाहरणतः हम मांसाहार परिवर्जन, मद्य परिवर्जन, भोजन परिवर्जन अथवा कामोपभोग परिवर्जन की बात कहते हैं।
पूर्ण परिवर्जन (Total Abstinence) मादक द्रव्यों के प्रयोग से दूर रहने के कार्य तथा अभ्यास का विशेष नाम है।
परिवर्जन सतत संयम है जो दीर्घायु एवं सुस्वास्थ्य देता है और शरीर को रोगों से मुक्त रखता है।
यह एक अनुशासन है जो वैराग्य प्रदान करता है तथा एक साधक की योग-मार्ग पर अग्रसर होने में सहायता करता है। यह आत्म-नियन्त्रण का अभ्यास है एवं सद्गुणों की नींव है। परिवर्जन रोगों के विरुद्ध एक अत्यन्त शक्तिशाली कवच है। यह रोगों के विरुद्ध रक्षात्मक सद्गुण है। यह उत्तम स्वास्थ्य, ऊर्जा, शक्ति एवं स्फूर्ति प्रदाता है।
आप एक सप्ताह के लिए चाय, कॉफी अथवा धूम्रपान का त्याग करें। यह आपको अगले परिवर्जन के लिए बल तथा संकल्प शक्ति देगा। तीसरी वस्तु पर संयम अपेक्षाकृत अधिक सरल होगा।
परिवर्जन का उद्देश्य मन को निम्नतर रुचियों से ऊपर उठाना है। यह आत्म-सुधार के लिए सहायक है।
मिताहारिता, इन्द्रियनिग्रह, उपवास, मिताचार, आत्मसंयम, आत्मत्याग, आत्मनिग्रह एवं संयम सभी परिवर्जन के समानार्थी शब्द हैं।
मद्यपान, अतिभोजिता, लोभ, असंयम, आमोद-प्रमोद, विषयासक्ति एवं व्यभिचारिता परिवर्जन के विपरीतार्थी हैं।
भोजन परिवर्जन (Abstinence from food) का तात्पर्य सामान्यतया बिना भोजन के रहना है। मिताहारिता (Abstemiousness) संयमपूर्वक भोजन लेना है। परिवर्जन एक अवसर के लिए हो सकता है। मिताहारिता नियमित संयम है।
आत्मत्याग (Self-denial) उस वस्तु का त्याग है जिसकी आप इच्छा करते हैं। परिवर्जन (Abstinence) उस वस्तु का भी हो सकता है जिसे आप नहीं चाहते हैं। उपवास (Fasting) कुछ समय के लिए और सामान्यतया धार्मिक कारणों से भोजन का त्याग है। संयम (Temperance) का अभिप्राय किसी वस्तु के संयमित भोग तथा अन्य के पूर्ण त्याग द्वारा शान्ति एवं मन का समत्व बनाये रखना है। हम भोजन के लिए संयम की बात करते हैं लेकिन दुर्गुणों के परिवर्जन की।
अनुकूलनशीलता एक सद्गुण अथवा उदात्त गुण है जिसके द्वारा व्यक्ति स्वयं को दूसरों के अनुकूल बनाता है, उनके साथ स्वयं को समायोजित करता है, चाहे उनका स्वभाव कैसा भी हो। जीवन में सफलता के लिए यह अत्यधिक वांछनीय आदत अथवा गुण है। इसका धीरे-धीरे विकास किया जाना चाहिए। अधिकांश मनुष्य यह नहीं जानते हैं कि दूसरों के साथ स्वयं को किस प्रकार समायोजित करें। अनुकूलनशीलता दूसरों के हृदय और अन्ततः जीवन का युद्ध थोड़े से झुकने द्वारा जीतने का एक विशेष कौशल अथवा साहस है।
पत्नी नहीं जानती है कि स्वयं को अपने पति के अनुकूल कैसे बनाये। वह सदैव अपने पति को अप्रसन्न करती है और गृह में कलह करवाती है तथा पति से पार्थक्य प्राप्त करती है। एक लिपिक अपने वरिष्ठ अधिकारी अथवा मालिक के साथ स्वयं को समायोजित करना नहीं जानता है। वह उससे झगड़ता है और तुरन्त कार्यमुक्त किया जाता है। एक शिष्य नहीं जानता है कि स्वयं को अपने गुरु के अनुकूल कैसे बनाये। एक व्यवसायी नहीं जानता है कि वह अपने ग्राहकों के साथ किस प्रकार सामंजस्य बैठाये और इसीलिए वह अपने ग्राहक तथा व्यवसाय खो देता है। दीवान महाराजा के अनुकूल बनना नहीं जानता है। उसे राजकीय सेवा छोड़नी पड़ती है। विश्व अनुकूलनशीलता द्वारा ही संचालित होता है। जो व्यक्ति अनुकूलनशीलता की कला अथवा विज्ञान जानता है, वह इस विश्व में भली प्रकार निर्वाह कर पाता है और जीवन की सभी परिस्थितियों में सदैव प्रसन्न रहता है।
यदि मनुष्य स्वयं को अन्यों के साथ समायोजित करना चाहता है, तो उसे नमनशील होना चाहिए। अनुकूलनशीलता विकसित करने के लिए अधिक बुद्धिमानी और प्रतिभा की आवश्यकता नहीं है। यदि लिपिक अपने वरिष्ठ अधिकारी के तरीके, आदतें एवं स्वभाव भली प्रकार समझता है और उनके अनुकूल स्वयं को अच्छी तरह से समायोजित करता है, तो अधिकारी उस लिपिक का दास बन जाता है। आपको कुछ दयापूर्ण और स्निग्ध शब्दों का प्रयोग करना होगा। उसके हृदय को द्रवित करने के लिए थोड़े से प्रयास की आवश्यकता है। बस इतना ही पर्याप्त है। नम्रतापूर्वक एवं मधुर बोलिए। उसके आदेशों का अक्षरश: पालन करिए। उसका विरोध मत करिए। इस उक्ति को याद रखिए-"सेवा से आज्ञापालन श्रेष्ठ है ।'' वरिष्ठ अधिकारी थोड़ा सम्मान चाहता है। "हाँ जी-हाँ जी, जी हुजूर, बहुत अच्छा श्रीमान्" इस प्रकार कहिए। आपको इसका कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता है। तब आपका अधिकारी आपका दास बन जाता है। उसके हृदय में आपके लिए एक विशेष स्थान बन जाता है। आप उसके प्रिय बन जाते हैं। वह वही करेगा जो आप चाहते हैं। वह आपकी त्रुटियों को क्षमा कर देगा। अनुकूलनशीलता विकसित करने के लिए विनम्रता एवं आज्ञापालन आवश्यक है। दम्भी एवं अहंकारी मनुष्य के लिए समायोजित होना कठिन है। वह सदैव कष्ट में ही रहता है। वह अपने प्रयासों में सदैव असफल रहता है। अहंकार एवं अभिमान अनुकूलनशीलता विकसित करने के मार्ग में आने वाली दो महत्त्वपूर्ण बाधाएँ हैं।
जब एक विद्यार्थी एक ही कक्ष में रहने वाले अपने सहपाठियों के साथ समायोजित होना नहीं जानता है, तो संघर्ष प्रारम्भ होता है और उनकी मित्रता संकट में पड़ जाती है। अनुकूलनशोलता मित्रता को दीर्घजीवी बनाती है। विद्यार्थी छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए झगड़ा करते हैं। एक विद्यार्थी कहता है- 'मैंने श्रीमान् एक्स को कई दिनों तक चाय पिलायी। मैं उसे कई दिनों तक सिनेमा ले गया। मैंने उससे बॉसबेल की 'लाइफ ऑफ जॉनसन' पढ़ने के लिए माँगी। उसने देने से मना कर दिया। वह किस प्रकार का मित्र है। मैं उसे बिल्कुल पसन्द नहीं करता हूँ।" इस प्रकार मित्रता टूट जाती है। एक साधारण सी बात मन को विक्षुब्ध कर देती है। अनुकूलनशीलता एक शक्तिशाली बन्धन है जो मनुष्यों को अक्षुण्ण प्रेम एवं मित्रता के बन्धन में बाँध देता है। एक अनुकूलनशील मनुष्य विश्व के किसी भी भाग के किसी भी मनुष्य के साथ सामंजस्य बैठा सकता है। सभी लोग एक अनुकूलनशील मनुष्य से स्वतः ही प्रेम करते हैं। अनुकूलनशीलता अत्यधिक शक्ति एवं आनन्द देती है। अनुकूलनशीलता संकल्प को विकसित करती है।
एक अनुकूलनशील मनुष्य को कुछ त्याग करने होते हैं। अनुकूलनशीलता त्याग की भावना का विकास करती है। वह स्वार्थ का नाश करती है। एक अनुकूलनशील मनुष्या को दूसरों के साथ अपनी वस्तुएँ बाँटनी होती हैं। उसे अपमान एवं कठोर शब्द सहन करने पड़ते हैं। एक अनुकूलनशील मनुष्य में एकता की अथवा जीवन के एकत्व की भावना विकसित होती है। बेदान्तिक साधना के लिए यह अत्यधिक सहायक है। जो अनुकूलनशीलता का अभ्यास करता है, उसे घृणा की भावना और उच्चता के अभिमान का नाश करना पड़ता है। उसे सबके साथ मिल कर रहना होता है। उसे सभी को स्नेहपूर्वक स्वीकार करना होता है। अनुकूलनशीलता सार्वभौमिक प्रेम को विकसित करती है और घृणा की भावना का नाश करती है।
एक अनुकूलनशील मनुष्य को अपने सहयोगियों-साथियों के कठोर शब्दों को सहन करना होता है। उसे धैर्य एवं सहनशीलता का विकास करना होता है। ये गुण स्वयं ही विकसित होते हैं जब वह दूसरों के साथ समायोजित होने का प्रयास करता है। एक अनुकूलनशील मनुष्य किसी भी वातावरण में रह सकता है। वह बनारस अथवा अफ्रीका की गर्मी सहन कर सकता है। वह एक झोपड़ी में रह सकता है। वह एक शीत स्थान में रह सकता है। वह समचित्तता विकसित करता है। वह अत्यधिक गर्मी और सर्दी सहन कर सकता है। अनुकूलनशीलता अन्ततः आत्मज्ञान प्रदान करती है। जो इस सद्गुण को धारण करता है, वह तीनों लोकों में महान् है। वह सदैव प्रसन्न एवं सफल होता है।
१
विपत्ति विषम परिस्थिति है। यह कष्ट अथवा दुर्भाग्य अथवा आपदा है। विपत्ति अप्रिय, कष्टपूर्ण परिस्थितियों, अत्यधिक संकट अथवा पीड़ा से युक्त एक दशा अथवा स्थिति है। यह समृद्धि के विपरीत है। विपत्ति एक घटना अथवा घटनाओं का क्रम है जो सफलता अथवा आकांक्षाओं के विपरीत है। यह दुःख की दशा है।
विपत्ति एक प्रच्छन्न आशीर्वाद है। विपत्ति के अनेक उपयोग हैं। यह संकल्पशक्ति तथा सहनशक्ति को सुदृढ़ करती है तथा मन को प्रभु की ओर अधिकाधिक मोड़ती है। यह हृदय में वैराग्य उत्पन्न करती है। यह सत्य की ओर प्रथम पग है।
विपत्ति एक गुण है। यह आलसी को परिश्रमशील बनाती है। यह बुद्धिमान् की क्षमताओं को प्रकट करती है। यह मनुष्य के लिए उसकी क्षमताओं का प्रयोग करना आवश्यक बनाती है। यह उन प्रतिभाओं एवं क्षमताओं को प्रकट करती है जो समृद्ध परिस्थितियों में सुप्त रह गयी होती हैं।
समृद्धि के प्रकाश में आनन्द उठाना सरल है। कठिनाई एवं विपत्ति में आपके व्यवहार की विकट परीक्षा होती है।
जब आप विषम परिस्थितियों में हैं, मुख पर म्लानता अथवा दुःख नहीं लाइए। मुस्कराइए। हँसिए। आनन्द मनाइए। भीतर से शक्ति एवं बल प्राप्त करिए। राम, राम, राम गाइए। ॐ ॐ ॐ उच्चारण करिए। आपकी आत्मा में शक्ति, ज्ञान एवं आनन्द का स्रोत है। इसका अनुभव करिए। इसका साक्षात्कार करिए।
एक शान्त सागर ने कभी कोई कुशल जहाज संचालक अथवा एडमिरल नहीं बनाया। विपत्ति के तूफान ही एक व्यक्ति की क्षमताओं तथा प्रतिभा को जाग्रत करते हैं तथा विवेक, कौशल, साहस, धैर्य एवं अध्यवसायिता उत्पन्न करते हैं। विपत्ति व्यक्ति को विचार करने, आविष्कार करने एवं नवीन खोज करने पर विवश करती है।
समृद्धि की अवस्था में आपके असंख्य मित्र होंगे लेकिन जब आप विपत्ति में हैं, तब वे आपको छोड़ देंगे। मित्रों की परीक्षा हेतु विपत्ति ही एकमात्र कसौटी है; समृद्धि उचित मापक नहीं है। विपत्ति में आप अनेक पाठ सीखेंगे। विपत्ति आपको उचित रीति से ढालेगी। यह आपकी महान् शिक्षक है। यह सर्वश्रेष्ठ एवं कठोर प्रशिक्षक है।
विपत्ति की अग्नि में ही महान् पुरुष एवं सन्त तपाये गये हैं, परिष्कृत हुए हैं तथा महिमान्वित हुए हैं।
विपत्ति अत्यधिक लाभदायक है। जब आप विषम स्थिति में हैं, तो रोइए मत। विपत्ति आपको सशक्त करती है तथा आपके कौशल में वृद्धि करती है।
वियोग, विपदा, आपदा, दुःख, कठिनाई एवं दुर्भाग्य आदि विपत्ति के समानार्थी शब्द हैं।
किसी आशा का टूटना, कार्य में असफलता, दुर्भाग्य यथा सम्पत्ति, पद की हानि 'विपत्ति' (Adversity) कहे जाते हैं।
मृत्यु के कारण मित्रों अथवा सम्बन्धियों के खोने के लिए हम 'वियोग' (Bereavement) शब्द का प्रयोग करते हैं।
सहसा और अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के लिए 'विपदा' (Calamity) एवं 'आपदा' (Disaster) शब्दों का प्रयोग होता है, थोड़ी परेशानी अथवा असफलता के लिए 'दुर्भाग्य' (Bed-luck) शब्द का प्रयोग होता है।
हम निर्धन के 'दुःख' (Misery) तथा सैनिक की 'कठिनाई' (Hardship) की बात कहते हैं।
आशीर्वाद, वरदान, प्रसन्नता, समृद्धि एवं सफलता विपत्ति के विपरीतार्थी शब्द हैं।
२
आप शेक्सपिअर की रचनाओं में पायेंगे, "विपत्ति के अमूल्य उपयोग हैं, जो एक कुरूप और विषैले मेढक की भाँति एक बहुमूल्य रत्न धारण किये है।" इस संसार में सर्वश्रेष्ठ वस्तु दुःख अथवा विपत्ति है। दुःख के समय ही मनुष्य ईश्वर का स्मरण करता है। दुःख हमें जाग्रत करता है। ईश्वर की खोज दुःख से प्रारम्भ होती है। दर्शनशास्त्र का प्रारम्भिक बिन्दु दुःख ही है। यदि संसार में दुःख नहीं होता, तो मनुष्य ने मोक्ष प्राप्ति के लिए कभी प्रयास नहीं किया होता। वह सांसारिक जीवन में ही सन्तुष्ट रहता। दुःख से मुक्ति पाने के प्रयास में ही वह सत्य अथवा शान्ति के धाम, परम धाम को पाता है। वह प्रार्थना, जप, दान, निःस्वार्थ सेवा, धार्मिक पुस्तकों का स्वाध्याय प्रारम्भ करता है। भक्त भगवान् से हमेशा प्रार्थना करते हैं, "हे प्रभु! हमें हमेशा विपत्ति दें ताकि हम सदैव आपका स्मरण कर सकें।" कुन्ती देवी ने भगवान् कृष्ण से प्रार्थना की, "हे प्रभु! मुझे हमेशा विपत्ति दें ताकि मेरा मन सदैव आपके चरण कमलों में लगा रहे।" विपत्ति सहनशक्ति एवं संकल्पशक्ति का विकास करती है। विपत्ति साहस एवं सहनशीलता का विकास करती है। विपत्ति पाषाण हृदय को द्रवित करती है और उसमें भगवद्भक्ति का संचार करती है। विपत्ति प्रच्छन्न दिव्य आशीर्वाद है। इसलिए जब भी आप विषम परिस्थितियों में हैं, भयभीत मत होइए। विपत्ति के स्वयं के गुण हैं। अनेक मनुष्यों ने विषम परिस्थितियों से ऊपर उठ कर शक्ति एवं उच्च पद प्राप्त किये हैं। विपत्ति मनुष्य से कठोर संघर्ष करवाती है। मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश स्वर्गीय श्री मुथुस्वामी अय्यर भी विकट परिस्थिति में थे। वह रात को नगर परिषद् की सड़क पर लालटेन के प्रकाश में अध्ययन किया करते थे। ब्रिटेन के अनेक प्रधानमन्त्री जीवन की विषम स्थितियों से ऊपर उठे हैं, उन्नत हुए हैं। सभी धर्मगुरुओं, सन्तों, फकीरों, भक्तों एवं योगियों को विकट परिस्थितियों में कठोर संघर्ष करना पड़ा है। शंकर, ज्ञानदेव, रामतीर्थ एवं तुकाराम सभी विपत्ति से अत्यधिक लाभान्वित हुए। यदि उन्हें समृद्ध अवस्था में रखा जाता, तो वे कभी भी महानता और भव्य आध्यात्मिक ऊँचाइयों को नहीं प्राप्त कर पाते।
(१) किसी प्राणी को हानि मत पहुँचाइए, वरन् दूसरे प्राणी के जीवन संरक्षण में उतना ही प्रयासशील होइए
जितना आप स्वयं के जीवन के प्रति होते हैं क्योंकि अहिंसा ही परम धर्म है।
-तीर्थंकर महावीर
(२) आइए, हम क्षुद्र और महान् सभी प्राणियों के प्रति एक असीम प्रेम से परिपूर्ण हृदय एवं मन का विकास
करें। हाँ, हम सम्पूर्ण विश्व के प्रति प्रेम का अभ्यास करें।
- गौतम बुद्ध
(३) तुम किसी की हत्या नहीं करोगे।
-ईसा मसीह
(४) जो एक जीवन की रक्षा करता है, मानो उसने समस्त मानवता की रक्षा की है।
-मोहम्मद (कुरान ५-३२)
इस संसार के समस्त प्राणी, पशु-पक्षी आपके समान ही हैं।
-मोहम्मद (कुरान ६-३८)
(५) एक मनुष्य को बुराई की अपेक्षा भलाई, दुष्कृत्यों की अपेक्षा सत्कर्मों, दोष की अपेक्षा गुण तथा
अन्धकार की अपेक्षा प्रकाश का चयन करना चाहिए।
- जरथुस्त्र
(६) सबमें एक ही आत्मा का वास है। सभी एक ईश्वर की अभिव्यक्तियाँ हैं। किसी दूसरे को आहत करके
आप स्वयं को ही आहत करते हैं। दूसरे की सेवा करके आप स्वयं की ही सेवा करते हैं। सबसे प्रेम करिए। सबकी सेवा करिए। किसी से घृणा मत करिए। किसी का अपमान मत करिए। विचार, शब्द अथवा कार्य से किसी को कष्ट मत पहुँचाइए।
-स्वामी शिवानन्द
सतर्कता सावधानी है। यह स्फूर्ति है। यह फुरतीलापन है। सतर्कता सजगता का व्यवहार है। इसका मुख्यतया प्रयोग 'एक चौकीदार सतर्कतापूर्वक रहा' (The watchman stood on the alert) किया जाता है।
एक जहाज का कमान सदैव सतर्क होता है। एक मछुआरा सदैव सतर्क होता है। एक शल्यचिकित्सक शल्यक्रिया कक्ष में सदैव सतर्क रहता है। इसी प्रकार, एक ज्ञान-पिपासु साधक को सदैव सतर्क रहना चाहिए। तब ही वह इस उच्छृंखल, उपद्रवी और चंचल मन को नियन्त्रित एवं पराजित कर सकता है। योग के एक विद्यार्थी के लिए नतर्कता एक महत्त्वपूर्ण योग्यता है।
सतर्क रहिए। सतर्क दृष्टि रखिए। सदैव उद्यत रहिए। सावधान रहिए। सजग बनिए। आप सभी कार्यों एवं आध्यात्मिक साधना में सदैव सफलता प्राप्त करेंगे।
एक सतर्क मनुष्य अत्यधिक सावधान-जागरूक रहता है। वह समय पर कार्य करने को तैयार रहता है। वह गिलहरी की तरह स्फूर्तिवान् होता है। फुरतीलापन उसकी विशेषता है। एक सतर्क मनुष्य जीवन से भरा होता है। वह सदैव तत्पर और उद्यत रहता है। वह पूर्ण जाग्रत रहता है। 'सतर्क' (Alert), 'उद्यत' (Ready), 'पूर्ण जाग्रत' (Wide awake) शब्दों का प्रयोग किसी कार्य के सम्बन्ध में तत्परता के लिए किया जाता है।
'उद्यत' का तात्पर्य विचारपूर्ण तैयारी है। एक भ्रमणशील भारतीय सतर्क (Alert) होता है; एक प्रशिक्षित सैनिक उद्यत (Ready) होता है।
उद्यत (Ready) शब्द 'तैयार' (Prepared) से अधिक जीवन्तता और शक्ति को अभिव्यक्त करता है। बन्दूक तैयार की जाती है। मनुष्य उद्यत होता है।
आवश्यक क्षण पर प्रस्तुत होना तत्परता (Promptness) का लक्षण है। एक कुशल सेनाध्यक्ष आपदापूर्ण स्थितियों के लिए उद्यत (Ready), संकट पहचानने में सतर्क (Alert) तथा अवसर-लाभ उठाने में तत्पर (Prompt) होता है।
फुरतीलापन (Nimble) अब सतर्कता (Alertness) का गौण एवं कम प्रचलित अर्थ है।
मन्द, सुस्त, निष्क्रिय, अकर्मण्य एवं मूर्ख सतर्क-सावधान के विपरीतार्थक शब्द हैं।
एक उपदेशक को वक्तृत्व कला के ज्ञान के सभी स्रोतों के प्रति सचेत (Alert) रहना चाहिए। न्यायाधीशों को सावधानीपूर्वक (Alertly) अपनी भूमिका निभानी चाहिए।
सुशीलता-स्नेहपात्रता प्रिय बनने और प्रेम उत्पन्न करने का गुण है।
एक सुशील मनुष्य का मधुर स्वभाव होता है। वह इतनी अधिक मानसिक दीप्ति, प्रेम एवं आनन्द प्रसारित करता है कि वह सभी गुणग्राही हृदयों में स्थान पाता है।
सुशीलता दूसरों को प्रसन्न करने एवं प्रेम करने की सतत इच्छा है। सुशीलता दयालुता अथवा स्वभाव की मधुरता है। यह स्नेहपात्रता है।
एक सुशील मनुष्य ऐसी सुखद मनोदशा अथवा सामाजिक गुण रखता है जो प्रसन्न करते हैं एवं मित्र बनाते हैं। वह स्वभावतः स्नेही एवं प्रियकर होता है। वह दयालु, उदार एवं प्रसन्नचित्त होता है। उसका स्वभाव भला होता है। वह क्षुब्धता-चिड़चिड़ाहट से मुक्त होता है। वह मधुर, श्रेष्ठ एवं प्रिय स्वभाव तथा दयालुता से सम्पन्न होता है।
दयापूर्ण मुस्कान एवं शिष्टता अत्यधिक लाभ प्रदान करते हैं। सुशील स्वभाव का मनुष्य दूसरों के लिए करुणा एवं प्रेम रखता है, इन गुणों के द्वारा वह दूसरों का प्रेम जीतता है। सुशील शब्द 'अनुकूल' अथवा 'अच्छे स्वभाव का' शब्दों से ऊँचा है।
इससे तात्पर्य ऐसे स्वभाव से है जो दूसरों को प्रसन्न, आनन्दित एवं हर्षित करने का इच्छुक है। एक सच्चा सुशील मनुष्य कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं करता है तथा न ही अशिष्ट व्यवहार करता है। अपने सरल स्वभाव से वह सभी परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति के साथ समायोजित हो सकता है।
घृणास्पद, क्रूर, अरुचिकर, चिड़चिड़ा, अप्रिय एवं असौम्य 'सुशील' के विपरीतार्थक शब्द हैं।
सुशीलता विकसित करिए। इसे अपने स्वभाव का अभिन्न अंग बनाइए।
एप्लीकेशन शब्द का मूल 'एप्लीकेटो' अथवा 'एप्लीकेटस' है जिसका अर्थ है जोड़ना अथवा बाँधना। यह मन को केन्द्रित करने की कला है। इसमें गहन विचार समाहित होता है।
उद्यमशीलता परिश्रम है। यह गहन विचार एवं ध्यान है। अध्यवसायिता उद्यमशीलता है।
इसका अभिप्राय किसी विधि, नियम, सत्य तथा उपदेश का जीवन में क्रियान्वन है। यह क्रियान्वन की क्षमता भी है यथा यौगिक यम-नियम अथवा प्रभु ईसा के पर्वतोपदेश (Sermon on the Mount) का जीवन में क्रियान्वन।
आप जो कार्य कर रहे हैं, उसमें पूर्ण ध्यान केन्द्रित करना मनोयोग (Application) से कार्य करना है। एप्लीकेशन शब्द का अर्थ ध्यान केन्द्रित करने की आदत एवं क्षमता भी है।
कार्य में मनोयोगपूर्वक सतत लगे रहना प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभप्रद प्रशिक्षण है। सामान्य बोलचाल में हम कहते हैं, "श्रीमान् क ने अध्ययन के प्रति गहन उद्यमशीलता से अपने स्वास्थ्य को हानि पहुँचायी। यदि उनकी उद्यमशीलता उनकी प्रतिभा के अनुरूप होती तो उनकी प्रगति अधिक होती।"
एक मनुष्य जो उद्यमशीलता के गुण से सम्पन्न है, वह अपने सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करता है। समृद्धि उसकी सेविका होती है।
एक उद्यमशील मनुष्य जल्दी उठता है एव उचित समय पर शय्या पर जाता है। वह एक क्षण भी व्यर्थ नहीं गँवाता है। वह सदैव जागरूक, सजग एवं अध्यवसायी होता है। वह सदैव क्रियाशील रहता है। वह कभी अवसर नहीं खोता है। वह शल्यक्रिया कक्ष में शल्यचिकित्सक के समान है। वह एक जहाज के कप्तान के समान है।
वह स्वस्थ होता है। उसका मन हल्का एवं प्रसन्न रहता है। उसके विचार स्पष्ट होते हैं। उसका कक्ष व्यवस्थित होता है। वह अपने कार्य में व्यवस्थित होता है। वह दृढ़ संकल्पवान एवं दृढ़ निश्चयी होता है। वह कभी पश्चात्ताप नहीं करता है और न ही खेद करता है।
वह धनवान होता है। वह अभावमुक्त होता है। वह शक्ति एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वह यश प्राप्त करता है। वह आदर पाता है और सम्मानित किया जाता है।
आप जो भी करने का निश्चय करते हैं, उसे अभी करिए, उसे तुरन्त करिए। एक क्षण की भी प्रतीक्षा मत करिए। जो आप प्रातःकाल कर सकते हैं, उसे सायंकाल तक स्थगित मत करिए।
यह क्षण आपका है। अगला क्षण भविष्य के गर्भ में है। आप नहीं जानते हैं कि वह क्या लाने वाला है।
भविष्य पर अधिक निर्भर मत रहिए। भूतकाल के लिए पश्चात्ताप मत करिए। वर्तमान में जियें। अभी कार्य में लग जायें।
अभी प्रयास करिए। प्रयत्न करिए। पुरुषार्थ करिए। अपने समस्त बल, शक्ति एवं ऊर्जा का प्रयोग करिए। आप निश्चित रूप से सफल होंगे। आप सभी प्रकार के प्रलोभनों एवं बाधाओं पर सरलता से विजय प्राप्त करेंगे। अत्यधिक उद्यमशील मनुष्य असफलता से अपरिचित रहता है।
बिना अत्यधिक उद्यम के, आप गहन ध्यान एवं समाधि में प्रवेश नहीं पा सकते हैं। आलस्य, तन्द्रा, अकर्मण्यता, लापरवाही एवं दीर्घसूत्रता उद्यमशीलता के विपरीतार्थक शब्द हैं।
हे राम! उद्यमशीलता का विकास करिए तथा अभी एवं यहीं सफलता, प्रचुरता, शान्ति, समृद्धि एवं कैवल्य मोक्ष प्राप्त करिए।
भगवद् साक्षात्कार प्राप्त करने की तीव्र-प्रबल इच्छा ही आकांक्षा है।
आकांक्षा का अभिप्राय उत्सुकतापूर्वक इच्छा करना अथवा उच्च वस्तुओं की प्राप्ति का उद्देश्य रखना है। सभी उचित मानवीय आकांक्षाओं का एक वास्तविक उद्देश्य परमात्मा ही है।
आकांक्षा उस तत्त्व की उत्कट अभीप्सा अथवा प्रबल अभिलाषा है जो मनुष्य की वर्तमान पहुँच एवं प्राप्ति से परे है, विशेषतया जो तत्त्व उदात्त, पवित्र एवं आध्यात्मिक है।
आकांक्षा से अभिप्राय ऊर्ध्वगामी दिशा में अग्रसर होना है। आकांक्षा से तात्पर्य अभी तक अप्राप्त किसी उच्च तथा अच्छी वस्तु के लिए तीव्र इच्छा अथवा उत्कण्ठा है जो प्रायः उसे प्राप्त करने के प्रयास के साथ संलग्र रहती है।
अवधान मन को निरन्तर एक दिशा में लगाये रखना है। किसी विशेष उद्देश्य के प्रति उत्साह तथा समग्रता के साथ मानसिक शक्तियों को निर्देशित करना ही अवधान है।
अवधान संकल्प को सशक्त करता है। यह संकल्प का आधार है। अवधान एकाग्रता का विकास करता है।
अवधान सफलता की ओर ले जाता है। अवधान के अभाव के कारण मनुष्य असफलताएँ पाता है।
अवधान प्रतिभावान बनाता है। किसी उद्देश्य के प्रति संकेन्द्रित एवं निरन्तर अवधान करने की शक्ति एक श्रेष्ठ प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति का लक्षण है।
समस्त शिक्षा, विज्ञान एवं कौशल अवधान पर निर्भर हैं। अवधान नवीन आयाम खोलता है तथा व्याधियों का शमन करता है।
अवधान ही काव्यात्मक-प्रतिभा तथा अन्वेषण-प्रतिभा एवं सफलता का स्रोत है। यह अवधान ही था जिसके द्वारा न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण, हार्वे ने शरीर में रक्त संचार एवं डेवी ने आधुनिक रसायनशास्त्र की आधारशिला रखने वाली अवधारणाओं की खोज की।
अवधान मानसिक ऊर्जा का एक प्रकार है जो चेतना के प्रत्येक क्षेत्र के स्वरूप निर्धारण में आवश्यक है।
यह चेतना की जटिल विषयवस्तु की एक अथवा एक से अधिक विशेषताओं को स्पष्टता अथवा विशेषता प्रदान करने का कार्य अथवा प्रक्रिया है।
यह मानसिक क्रिया अथवा क्षमता का एक प्रकार है जो चेतना की विषयवस्तु में कुछ का चयन, उन्हें अधिक स्पष्टता देने के उद्देश्य से सम्भव बनाता है।
अनुभव का वह सामान्य तथ्य, जिससे आधुनिक मनोविज्ञान में अवधान की धारणा तथा सिद्धान्त उत्पन्न हुए, यह है कि कुछ वस्तुएँ अथवा वस्तुओं के अंश अन्य की अपेक्षा चेतना के क्षेत्र में अधिक स्पष्टता से अंकित होते हैं, ग्रहण किये जाते हैं, पहचाने जाते हैं जबकि अन्य केवल अस्पष्ट रूप से अथवा कठिनता से ग्रहण किये जाते हैं। स्पष्टता में अन्तर व्यक्ति के चयनात्मक कार्य अथवा प्रक्रिया पर निर्भर प्रतीत होता है। अस्वैच्छिक अवधान (Non-voluntary Attention) में वस्तु उद्दीपक की तीव्रता के द्वारा अथवा विशेष रुचि के लाभ द्वारा मन पर स्वयं को बलपूर्वक थोपती हुई प्रतीत होती है। स्वैच्छिक अवधान (Voluntary Attention) में व्यक्ति अपनी जिज्ञासा की सन्तुष्टि हेतु अथवा कुछ अन्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु वस्तु का चयन करता प्रतीत होता है जिससे वह उसे अधिक स्पष्टता से समझ सके।
एक मनुष्य अवधानपूर्वक सुनता है, तो हम कहते हैं- "उसके कर्ण सजग-सावधान हैं।" वह अवधानपूर्वक देखता है तो हम कहते हैं-" उसके नेत्र सजग-सावधान हैं।" मनन करने में मन का प्रयोग किया जाता है। जब एक मनुष्य एक वक्ता के शब्दों के साथ साथ उसके वक्तव्य की विषयवस्तु एवं शैली के प्रति भी सावधान-सतर्क है, तो वह मन एवं इन्द्रियों का भी प्रयोग कर रहा है।
व्यवहार, आचरण, स्वभाव विशेषतया शिष्ट आदतें हैं।
अच्छा व्यवहार दूसरों के प्रति अच्छा आचरण है। आप एक मनुष्य की प्रकृति तथा उसके मन की प्रवृत्ति को उसके व्यवहार द्वारा जान सकते हैं।
व्यवहार वह दर्पण है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपना प्रतिबिम्ब दिखाता है। अच्छा व्यवहार मित्रता प्राप्ति एवं समाज में उचित सम्मान प्राप्ति हेतु पासपोर्ट है। ज्ञान बाह्य व्यवहार को विश्वास प्रदान करता है। व्यवहार की तुच्छता अथवा व्यवहार की क्षुद्रता जीवन का अभिशाप है।
व्यवहार में विभिन्न प्रकार की सनक, अजीब प्रवृत्तियाँ मानव के दोष ही हैं। उसे स्वयं का सुधार करना चाहिए एवं इन दोषों को दूर करना चाहिए। जो स्वयं को सुधारना चाहता है, उसे अपने इन दोषों पर लज्जित होना चाहिए। व्यक्तिगत आचरण में मर्यादा पालन ही अच्छा व्यवहार है। उचित अथवा मर्यादित रूप में व्यवहार ही अच्छा व्यवहार है।
व्यवहार ज्ञान, रुचि तथा भावनाओं की सामूहिक अभिव्यक्ति है।
चाल-ढाल (Carriage) से अभिप्राय शरीर के बैठने-उठने एवं चलने के तरीके से है। उदाहरणतः आकर्षक चाल-ढाल (Fain Carriage)
प्रकृति (Bearing) स्वभाव अथवा भावना की शारीरिक अभिव्यक्ति है। उदाहरणतः दम्भी प्रकृति (Haughty Bearing)
आचरण (Demeanour) न केवल भावनाओं की अपितु व्यक्ति की नैतिक स्थिति की शारीरिक अभिव्यक्ति है। उदाहरणतः भक्तिमय आचरण (Devout Demeanour) सभ्य आचार (Breeding) वह आचरण-व्यवहार है जो अच्छे कुल में जन्म एवं अच्छे प्रशिक्षण से प्राप्त होता है।
बरताव (Deportment) वह व्यवहार है जो किन्हीं विशेष नियमों के पालन से सम्बन्धित है। उदाहरणतः विद्यार्थियों का बरताव सर्वथा दोषमुक्त था। (Students' deportment was faultless.)
शिष्टाचार (Manners) से अभिप्राय अन्य व्यक्तियों के प्रति अथवा उनके समक्ष प्रदर्शित व्यवहार अथवा आचार-शैली है जो विशेषतया शिष्टता एवं सभ्यता से सम्बन्धित है।
व्यवहार (Behaviour) अन्य व्यक्तियों के प्रति हमारे व्यवहार का तरीका है। आचार (Conduct) से अभिप्राय अन्य व्यक्तियों के समक्ष हमारे आचरण से है। व्यवहार परिस्थितियों द्वारा निर्मित होता है, आचरण व्यक्ति द्वारा विकसित किया जाता है।
व्यवहारवाद (Behaviourism) व्यक्ति के व्यवहार के वस्तुगत विश्लेषण पर आधारित अध्ययन है। इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति के व्यवहार की परीक्षा वस्तुगत रूप में होनी चाहिए तथा आत्मनिरीक्षण अप्रामाणिक एवं अमान्य है।
अंग्रेजी शब्द बेनेवोलेन्स लेटिन शब्दों 'बेने' अर्थात् शुभ एवं 'वोलेन्स' अर्थात् भावना से बना है।
यह भला करने का स्वभाव है। यह विशेषतया निर्धनों की सहायता के लिए दिया गया धन का उपहार है। यह दयालुता का एक कार्य है। यह उदारता है।
यह दूसरों के कल्याण अथवा सुविधा की अभिलाषा करने का स्वभाव है। यह उनके दुःख का शमन अथवा उन्हें सुख देने की इच्छा है। यह मानवता के प्रति प्रेम अथवा हृदय की दयालुता अथवा दानशीलता है।
परोपकारिता में समस्त गुण समाहित हैं। परोपकारिता में पूर्णता प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अन्य महत्त्वपूर्ण आधारभूत गुणों की आवश्यकता है। वे सभी मुख्य गुण परोपकारिता को उसी प्रकार विभूषित करते हैं जिस प्रकार परोपकारिता उन्हें प्रयुक्त करती है एवं विभूषित करती है।
परोपकारिता वह स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो दयालुता तथा उदारता के लिए उत्प्रेरित करती है।
यह परमात्मा का दूत है। यह दुर्लभ गुण है।
मनुष्य स्वभाव की पूर्णता स्वयं के लिए कम तथा दूसरों के लिए अधिक सोचने एवं स्वयं की स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों को नियन्त्रित करके परोपकारिता के क्रियान्वन में निहित है। इस संसार में कोई भी पूर्णतया आत्मनिर्भर नहीं है। उसे दूसरों के सहयोग की आवश्यकता है। मनुष्य को समाज में पारस्परिक सहयोग एवं पारस्परिक दायित्व निर्वाह हेतु रखा जाता है।
आपका भोजन, आपके वस्त्र, आपका स्वास्थ्य, आघातों से आपकी सुरक्षा, जीवन के सुख तथा सुविधाओं का उपभोग-इन सबके लिए आप दूसरों के सहयोग के ऋणी हैं। इसलिए दूसरों के प्रति दयाशील बनिए। वैश्विक कल्याणकर्ता बनिए। मानवता के मित्र बनिए।
एक विजेता भय के कारण सम्मानित किया जाता है, एक बुद्धिमान् मनुष्य हमारे सम्मान के योग्य होता है, परन्तु केवल एक परोपकारी मनुष्य ही हमारे स्नेह को अर्जित करता है, हमारे स्नेह का पात्र बनता है।
परोपकारी मनुष्य शान्ति एवं प्रसन्नता प्राप्त करता है। वह अपने पड़ोसी तथा अन्य सभी लोगों की सुख- समृद्धि में आनन्दित होता है।
जो अपने धन, विचार, वाणी का दूसरों की भलाई हेतु उपयोग करता है, वह महान् मनुष्य है। वह पृथ्वी पर साक्षात् परमात्मा ही है।
वह सदैव विभिन्न प्रकारों से दूसरों की भलाई करने के अवसर खोजता है। सामाजिक परोपकारिता के नियमों की यह माँग है कि प्रत्येक मनुष्य अन्य मनुष्यों की सहायता के लिए प्रयत्न करें।
असभ्यता, पाशविकता, निर्दयता, लोभ, कठोरता, दुर्भावना, अमानवीयता, विद्वेष, शत्रुता, कृपणता, स्वार्थपरायणता, निष्ठुरता आदि परोपकारिता के विपरीतार्थक शब्द हैं।
भिक्षा-दान, उपकारिता, सदयता, प्रचुरता, हितैषिता, उदारता, सद्भावना, मानवता, सहृदयता, दयालुता, कृपालुता, दानशीलता, वदान्यता, मानव-प्रेम, सहानुभूति एवं कोमलता परोपकारिता के समानार्थी शब्द हैं।
दयालुता (Kindness) एवं कोमलता (Tenderness) वैयक्तिक होती हैं। परोपकारिता (Benevolence) और दान (Charity) सार्वभौमिक होते हैं। दयालुता समृद्धि अथवा विपत्ति में, सभी सजीव प्राणियों, मनुष्य अथवा पशुओं के प्रति अभिव्यक्त होती है। कोमलता विशेषत: छोटों, दुर्बल तथा जरूरतमन्द के प्रति अभिव्यक्त होती है। मनुष्य अथवा पशु के प्रति दयालुता तथा कोमलता का भाव मानवता (Humanity) है। स्वयं को विस्मृत करने वाली दयालुता का स्वभाव अथवा कार्य उदारता (Generosity) है। इसमें देने के अतिरिक्त कुछ अधिक सम्मिलित है।
मुक्तहस्तता (Bounty) अत्यधिक देने के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है, इसका विशाल रूप बदान्यता (Munificence) कहलाता है।
उदारचित्तता (Liberality) विशाल, उदार एवं सहृदय दृष्टिकोण है जो उपहारों तथा अन्य रूपों में व्यक्त होता है।
हम एक उदार मेजबान की मुक्तहस्तता (Bounty) की बात कहते हैं। एक कॉलेज संस्थापक की उदारचित्तता (Liberality) तथा एक धर्मशास्त्री की उसके विपरीत विचार रखने वालों के प्रति उदारचित्तता (Liberality) के विषय में कहते हैं। मानव-प्रेम (Philanthropy) शब्द का प्रयोग मानव-कल्याण के लिए विस्तृत योजनाओं के लिए होता है।
अच्छे कार्य करने के लिए असाधारण परिस्थितियों की प्रतीक्षा मत करिए। साधारण स्थितियों के सदुपयोग का प्रयास करिए।
चरित्र उन विशेष गुणों का समूह है जो वैयक्तिकता का निर्माण करता है।
चरित्र किसी मानव को अथवा मानव वर्ग को अन्यों से पृथकता प्रदान करने वाले गुणों का समूह है। यह एक मनुष्य का कोई विशिष्ट चिह्न अथवा गुण है।
चरित्र शक्ति है। चरित्र सब कुछ है। चरित्र ही वास्तविक सम्पत्ति है। यह सभी सम्पदाओं से उत्तम है।
चरित्र पूर्णतया प्रशिक्षित संकल्प है। यह बुद्धिमत्ता से श्रेष्ठ है।
प्रत्येक मनुष्य अपने चरित्र का स्वयं निर्माता है। आप एक कार्य का रोपण करते हैं और एक आदत को प्राप्त करते हैं। आप एक आदत का रोपण करते हैं और चरित्र को प्राप्त करते हैं।
कार्य, दृष्टि, वचन एवं व्यवहार वे अक्षर हैं जिनके द्वारा चरित्र शब्द की वर्तनी बनती है।
एक मनुष्य जिनसे वह प्रेम करता है, उनके द्वारा जाना जाता है जैसे मित्र, स्थान, पुस्तकें, पोशाक, भोजन, विचार, कार्य, वचन। इन सभी के द्वारा उसका चरित्र व्यक्त होता है।
चरित्र निर्माण हेतु सर्वप्रथम दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। इसके पश्चात् सतत प्रयत्न किया जाना चाहिए।
आपका चरित्र ही एकमात्र स्थायी है। जब आप इस संसार को छोड़ कर जाते हैं, चरित्र के सिवाय अन्य कुछ साथ नहीं ले जा सकते हैं। चरित्र जन्मजात नहीं होता है, इसका निर्माण किया जाता है।
भावी सन्तति के लाभार्थ सर्वोत्तम योगदान जो एक मनुष्य कर सकता है वह है सच्चरित्र निर्माण। चरित्र एक हीरा है जो अन्य पत्थरों को तराशता है अर्थात् अन्य व्यक्तियों को प्रभावित-प्रेरित करता है।
चरित्र स्थायी रूप से रहता है। अच्छा स्वभाव, परोपकारिता, सत्यपरायणता, सहिष्णुता, संयम, न्याय आदि चरित्र के नींव स्वरूप हैं।
आपके समस्त बौद्धिक अनुशासन का उद्देश्य चरित्र है।
चरित्र आत्मानुशासन का परिणाम है। मनुष्य की उत्पत्ति का महान् उद्देश्य एक महान् चरित्र का विकास करना है।
इस संसार में चरित्र से अधिक प्राप्तव्य अन्य कुछ नहीं है।
सर्वश्रेष्ठ धरोहर, जो एक मनुष्य संसार के लिए छोड़ सकता है वह है उज्ज्वल एवं पवित्र आदर्श।
नैतिकता, सत्यपरायणता, न्याय, संयम, बुद्धिमत्ता, विशालहृदयता, अहिंसा, पवित्रता तथा परोपकारिता चरित्र निर्माण के आवश्यक तत्त्व हैं।
बिना चरित्र के धन, यश, विजय आदि सब-कुछ निरर्थक हैं। इन सबके पीछे चरित्र का बल एवं आधार होना चाहिए।
न तो धन अथवा शक्ति और न ही बुद्धि, इस संसार पर शासन करते हैं। नैतिक श्रेष्ठता युक्त नैतिक चरित्र ही वास्तव में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को शासित करता है।
चरित्र का विकास एक दिन में नहीं होता है। इसका निर्माण दिन प्रतिदिन धीरे-धीरे होता है।
धन आता है और चला जाता है। प्रसिद्धि अस्थायी होती है। शक्ति क्षीण हो जाती है। मात्र एक वस्तु स्थायी है। वह चरित्र है।
सुदृढ़ चरित्र का निर्माण सुदृढ़ एवं उदात्त विचारों से होता है। अपने चरित्र का ध्यान रखिए। आपकी प्रतिष्ठा स्वयं स्थापित हो जायेगी। एक अच्छा चरित्र व्यक्तिगत प्रयास का फल है। यह स्वयं के प्रयत्नों का परिणाम है।
सत्यपरायणता चरित्र का आधार है।
शिक्षा नहीं वरन् चरित्र मनुष्य की महानतम आवश्यकता है तथा महानतम सुरक्षा है।
चरित्र निर्माण के लिए, कोई एक राजसी पथ नहीं है। इसके लिए विभिन्न प्रकार के पधों के प्रयोग की आवश्यकता होगी।
अपने चरित्र का निर्माण करिए; आप अपने जीवन का निर्माण कर सकते हैं।
चरित्र शक्ति है। चरित्र प्रभाव है। यह मित्र बनाता है। यह सर्वत्र संरक्षण एवं आश्रय प्राप्त कराता है। यह धन, सम्मान, सफलता तथा प्रसन्नता प्राप्ति का एक निश्चित एवं सरल मार्ग खोलता है। चरित्र जय एवं पराजय, सफलता एवं असफलता तथा जीवन के सभी विषयों में निर्धारक तत्त्व है। एक सच्चरित्र मनुष्य इहलोक तथा परलोक में सुख प्राप्त करता है।
मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं है। वह वास्तव में परिस्थितियों का निर्माता है। एक चरित्रवान् मनुष्य परिस्थितियों से एक नये जीवन का निर्माण करता है। वह निरन्तर प्रयास करता रहता है। वह पीछे मुड़ कर नहीं देखता है। वह साहसपूर्वक आगे बढ़ता है। वह कठिनाइयों से भयभीत नहीं होता है। वह कभी उद्विग्न तथा क्रोधित नहीं होता है। वह कभी हतोत्साहित तथा निराश नहीं होता है। वह बल, ऊर्जा, ओज तथा जीवन शक्ति से पूर्ण होता है। वह सदैव उमंग तथा उत्साहपूर्ण होता है।
मंच पर दिये गये महान् व्याख्यानों, भाषणों, वक्तव्यों, प्रतिभा प्रदर्शन की अपेक्षा आपके सामाजिक व्यवहार में आदतन किये गये छोटे दयापूर्ण कार्य, शिष्ट आचरण तथा परोपकारिता आपके चरित्र को अधिक मनोहारिता प्रदान करते हैं।
चरित्र आन्तरिक तथा आध्यात्मिक लावण्य है जिसका बाह्य तथा प्रत्यक्ष चिह्न प्रतिष्ठा (Reputation) है।
चरित्र वह है जो आप हैं, प्रतिष्ठा वह है जैसे आप जाने जाते हैं। मनुष्य का अभिलेख (Record) उसके सभी कार्यों का योग है। उसका अभिलेख उसके चरित्र को प्रामाणिक रूप से अभिव्यक्त करेगा। उसकी प्रतिष्ठा उसके चरित्र अथवा अभिलेख के प्रमाण से उच्च अथवा निम्न हो सकती है। किसी मनुष्य के स्वभाव (Nature) में उसकी सभी मौलिक प्रतिभाएँ अथवा प्रवृत्तियाँ सम्मिलित होती हैं; चरित्र (Character) में उसकी स्वाभाविक तथा अर्जित दोनों विशेषताएँ सम्मिलित होती हैं।
चरित्र प्रकृति अथवा आदत द्वारा मनुष्य पर अंकित वह विशेष गुण है जो उसे अन्य व्यक्तियों से पृथक् करता है।
प्रधान अथवा प्रबल गुण (Dominant Characters) आनुवांशिकता से प्राप्त वे मुख्य गुण-लक्षण हैं जो माता अथवा पिता से सन्तान को अल्प भिन्नता अथवा बिना किसी भिन्नता के प्रेषित होते हैं तथा जो चरित्र का निर्माण करते हैं।
गौण अथवा अप्रबल गुण (Recessive Characters) सन्तानों में पाये जाने वाले वे गुण-लक्षण हैं जो माता अथवा पिता किसी एक से सम्बन्धित हो सकते हैं लेकिन जो मुख्य नहीं होते हैं। आगामी पीढ़ियों में ये लक्षण कभी प्रधान नहीं होते हैं।
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दानशीलता दान देना है। यह दूसरों के विषय में सोचने तथा उनका भला करने का स्वभाव है। दानशीलता वैश्विक प्रेम है। यह निर्धनों के प्रति पूर्ण उदारता है। यह दयाशीलता है। जो जरूरतमन्द की सहायता के लिए दिया जाता है, वह दान है।
सामान्य अर्थ में, दानशीलता का तात्पर्य प्रेम, परोपकारिता एवं सद्भाव है। धार्मिक अर्थ में, यह समस्त मनुष्यों के प्रति सद्भावना तथा परमात्मा के प्रति परम प्रेम है। अधिक विशेष अर्थ में इसका अभिप्राय प्राकृतिक सम्बन्धों से उत्पन्न दया, स्नेह एवं कोमलता है यथा पिता, पुत्र तथा भ्राता की दानशीलता।
सच्ची दानशीलता पुरस्कार एवं प्रतिदान का विचार किये बिना दूसरों के लिए उपयोगी बनने की आकांक्षा है।
जो अन्यायी नहीं है, वही अपने निर्णय में सर्वाधिक उदार होता है।
जो दानशीलता के कार्य आपने किये हैं, वे सर्वदा आपके साथ रहेंगे।
प्रसन्नतापूर्वक, शीघ्रता से तथा बिना किसी हिचकिचाहट के दीजिए।
अपनी आय का दसवाँ भाग अर्थात् प्रत्येक रुपये में से एक आना दान करिए।
दानशीलता असंख्य पापों से मुक्त करती है। दानशीलता हृदय को पवित्र करती है। सार्थना आपको ईश्वर के पास पहुँचने के आधे मार्ग तक एवं उपवास उनके परम धाम के द्वार तक ले जाता है तथा दानशीलता आपका उसमें प्रवेश करवाती है।
दानशीलता प्रेम का क्रियान्वित रूप है।
दानशीलता गृह में प्रारम्भ होती है, परन्तु इसे बाहर भी जाना चाहिए। समस्त विख आपका घर है। आप विश्व के नागरिक हैं। समस्त विश्व के कल्याण की उदार भावना का विकास करिए।
जो दानशीलता विज्ञापित की जाती है, वह दानशीलता नहीं रह जाती है। वह मात्र अभिमान तथा आडम्बर है।
प्रत्येक अच्छा कार्य दान है। तृषार्त को जल देना दान है। एक दुःखी मनुष्य को उत्साहपूर्ण-सान्त्वनापूर्ण शब्द कहना दान है। एक निर्धन रोगी को औषधि देना दान है। मार्ग से काँटा अथवा काँच का टुकड़ा हटाना दान है।
एक छोटा सा अच्छा विचार तथा थोड़ी सी दयालुता अत्यधिक धन देने की अपेक्षा प्रायः अधिक श्रेष्ठ है।
मृत्युपर्यन्त दान देने से नहीं चूकिए। प्रतिदिन दान करिए।
यदि आप एक भूखे मनुष्य को भोजन देते हैं, वह पुनः भोजन चाहेगा जब वह भूखा होगा। दान का सर्वोत्तम प्रकार विद्या का दान, ज्ञान का दान है। ज्ञान शरीर धारण करने के कारण 'अज्ञान' को दूर करता है तथा सभी प्रकार के दुःखों एवं कष्टों का सदा के लिए पूर्णतया नाश करता है।
दान का दूसरा उत्तम प्रकार रोगी को औषधि देना है। दान का तीसरा उत्तम प्रकार अन्न-दान अथवा भूखे को भोजन देना है।
मौन रह कर दान करिए। इसे विज्ञापित मत करिए। आपका दायाँ हाथ क्या करता है, बायें हाथ को यह ज्ञात नहीं होना चाहिए। ईश्वर प्रेम की प्रथम पुत्री अर्थात् अभिव्यक्ति निर्धनों को दान देना है। प्रारम्भ में विवेकपूर्वक दान करिए। बाद में बिना किसी भेद के दान का अभ्यास करिए। जब आप अनुभव करते हैं कि प्रत्येक प्राणी ईश्वर का ही रूप है, तो भेद करना कठिन हो जाता है कि कौन भला है अथवा कौन बुरा है? अनिच्छुक हृदय से दिया गया दान, दान नहीं है।
दान डॉलर, रुपये, शिलिंग देने तक सीमित नहीं है। दुःखी मनुष्यों के लिए अच्छा सोचिए। उनके कल्याण के लिए प्रार्थना करिए। यह धन दान की अपेक्षा अधिक कल्याणकारी होगा।
२
किसी प्रोफेसर (एम. ए., पी-एच. डी.) ने एक निर्धन मनुष्य को कम्बल दान किया। बाद में उसने सोचा, "मुझे उसे कम्बल नहीं देना चाहिए था।" उसका हृदय विक्षुब्धता एवं पीड़ा की अवस्था में था। वह निर्धन व्यक्ति से कम्बल पुनः लेना चाहता था। यदि आप इस प्रकार का दान करते हैं, तो आपको कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। आपको हृदय की शुद्धता प्राप्त नहीं होगी। अनेक सांसारिक व्यक्ति इस प्रकार के दान-कार्य करते हैं। यह विश्व इस प्रकार के दानशील व्यक्तियों से भरा हुआ है।
दान सहज एवं अनियन्त्रित अर्थात् मुक्तहस्त होना चाहिए। दान देना आपकी आदत बन जाना चाहिए। देने में आपको अत्यधिक प्रसन्नता का अनुभव होना चाहिए। आपको ऐसा नहीं सोचना चाहिए- मैंने अत्यधिक भला कार्य किया है। मैं स्वर्ग-सुख भोग करूँगा। मैं अगले जन्म में एक धनी व्यक्ति के रूप में जन्म लूँगा। दान के कार्य से मेरे पाप घुल जायेंगे। मेरे कस्बे अथवा जिले में मेरे समान दानशील व्यक्ति कोई नहीं है। लोग जानते हैं मैं एक अत्यधिक दानी व्यक्ति हूँ।
कुछ व्यक्ति दान करते हैं तथा समाचार पत्रों में फोटो सहित अपना नाम प्रकाशित देखने के लिए आतुर होते हैं। यह तामसिक प्रकार का दान है। यह दान बिल्कुल नहीं है।
प्रभु ईसा कहते हैं, "आपके बायें हाथ को यह ज्ञात नहीं होना चाहिए कि दायाँ हाथ क्या कर रहा है।" आपको स्वयं के दान तथा दानशील स्वभाव का विज्ञापन नहीं करना चाहिए। जब लोग आपके दानशील स्वभाव की प्रशंसा करें, आपको गर्वित नहीं होना चाहिए।
आपमें प्रतिदिन दान कार्य करने की उत्कण्ठा होनी चाहिए। आपको दान कार्य करने के अवसर उत्पन्न करने चाहिए। सहज रूप में किये गये सात्त्विक दान से श्रेष्ठतर कोई अन्य योग अथवा यज्ञ नहीं है। कर्ण तथा राजा भोज ने असंख्य दानपूर्ण कार्य किये। अतः वे आज भी हमारे हृदयों में निवास करते हैं।
निर्धन, रुग्ण, असहाय तथा निराश्रित को दान दीजिए। अनाथों, अपंगों, अन्धों तथा निःसहाय विधवाओं को दान दीजिए। साधुओं, संन्यासियों, धार्मिक तथा सामाजिक संस्थाओं को दीजिए। उस मनुष्य को धन्यवाद दीजिए जो दान द्वारा आपको अपनी सेवा का अवसर देता है। उचित मानसिक भाव से दीजिए तथा दानपूर्ण कार्यों से परमात्मा का साक्षात्कार करिए। जो उचित भाव से दान करते हैं, वे महिमान्वित हों।
१
प्रफुल्लता प्रसन्न रहने, हर्षित एवं उल्लसित रहने की अवस्था अथवा गुण है। प्रफुल्लता रुग्णता, निर्धनता, जीवन के कष्ट एवं पीड़ा को कम करती है तथा आश्चर्यजनक शक्ति एवं अत्यधिक सहनशक्ति प्रदान करती है।
एक प्रफुल्ल मनुष्य, एक खिन्नमन मनुष्य की अपेक्षा समान समय में अधिक कार्य करेगा, वह कार्य को श्रेष्ठ रूप में करेगा तथा उसमें दीर्घावधि तक लगा रहेगा।
सदैव प्रफुल्लित रहिए। प्रफुल्लता उत्तम रसायन है। यह उज्ज्वल स्वास्थ्य एवं शान्ति प्रदान करती है।
एक दयालु एवं सहानुभूतिशील मनुष्य अधिक प्रफुल्ल होगा। प्रफुल्लता स्वास्थ्य है। यह मन को शान्त बनाती है। यह दीर्घ जीवन प्रदान करती है। यह हृदय को सशक्त करती है।
एक प्रफुल्ल मुख का प्रकाश स्वतः प्रसारित होता है। आप किसी प्रफुल्ल मनुष्य की उपस्थिति में स्वयं को प्रसन्न एवं स्फूर्तिवान् अनुभव करते हैं।
एक प्रफुल्ल मनुष्य उज्ज्वल दिवस की भाँति है। वह सर्वत्र प्रसन्नता का प्रकाश विकीर्ण करता है।
प्रफुल्ल, मधुर, प्रसन्न तथा स्मितवान् बनिए। आप अत्यधिक स्वस्थ होंगे तथा प्रत्येक दिशा में स्वास्थ्य के स्पन्दन प्रसारित करेंगे।
प्रफुल्लता प्रसन्न चित्त तथा शुद्ध एवं भले हृदय का लक्षण है। यह समाज में सम्मान प्राप्ति हेतु एक पारपत्र तथा अनुशंसापत्र है।
एक प्रफुल्ल मनुष्य लोककल्याणकारी होता है। वह सबके हृदयों को हर्षित करता है।
प्रफुल्लता के समान कोई मित्र नहीं है।
प्रफुल्लता के सम्पर्क का आश्चर्यजनक प्रभाव होता है। यह अन्धकार को प्रकाश मैं, निराशा को आशा \mathfrak{pi} तथा रुग्णता को स्वास्थ्य में परिवर्तित करती है। एक प्रफुल्ल-उत्साहवर्द्धक शब्द सहज ही दूसरों को भी प्रफुल्लता एवं उत्साह देता है।
प्रफुल्लता (Cheerfulness) मन की आदत है। आमोद-प्रमोद (Gaiety) विषयसुख की उत्तेजना है। उल्लास (Mirth) कोलाहलपूर्ण प्रसन्नता है।
एक प्रफुल्ल मनुष्य (Cheerful Man) मुस्कराता है, एक उल्लसित मनुष्य (Merry Man) हँसता है, एक जिन्दादिल मनुष्य (Sprightly Man) नृत्य करता है तथा एक विनोदी मनुष्य (Gay Man) सुख का भोग करता है।
२
प्रफुल्लता मन की आह्लादित वृत्ति है।
एक प्रफुल्ल मनुष्य उमंग के भाव से परिपूर्ण होता है। वह जीवन से भरा होता है। वह सर्वत्र आनन्द प्रसारित करता है। प्रफुल्लता मस्तिष्क के लिए एक शक्तिशाली औषधि है।
एक प्रफुल्ल मन मस्तिष्क को सशक्त करता है तथा व्यक्ति को सदाचार में स्थित करता है।
सदैव प्रफुल्लित रहिए। प्रफुल्लता का अर्जन करिए। प्रफुल्ल मुख के साथ एक प्रफुल्ल मुस्कान धारण करिए।
प्रफुल्ल मनुष्य दीर्घजीवी होते हैं। वे स्वस्थ एवं उत्साही होते हैं।
प्रफुल्लता जीवन का सारतत्त्व अर्थात् आत्मा है। यह अच्छाई का परिणाम है। यह सौन्दर्यकारक है।
एक प्रफुल्ल मनुष्य शीघ्रता से मित्र बनाता है। वह सबके लिए आकर्षक होता है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश पुष्पों के लिए जीवनप्रदायक है, उसी प्रकार प्रफुल्लतापूर्ण मुस्कराहटें मानवता के लिए जीवनप्रदायक हैं।
प्रफुल्लता एकान्त तथा दुःख में सान्त्वना है।
प्रफुल्लता की शक्ति आश्चर्यजनक है। प्रफुल्लता बल है। एक प्रफुल्ल मनुष्य में अत्यधिक सहनशक्ति होती है।
प्रफुल्लता स्वास्थ्य है, खिन्नता रुग्णता है।
सदगुणों का अर्जन एवं दुर्गुणों का नाश किस प्रकार करें एक मनुष्य जिसका हृदय दया, उदारता एवं सहानुभूति से पूर्ण है, वह सदैव प्रफुल्ल होगा।
खुश होना (Mirth) एक कार्य है। प्रफुल्लता (Cheerfulness) मन की एक आदत है। खुशी क्षणिक तथा अस्थायी है। खुशी बिजली की चमक की भाँति है। प्रफुल्लता स्थायी है। प्रफुल्लता लावण्य की मित्र है। यह हृदय को प्रभु की स्तुति के लिए तैयार करती है। एक प्रफुल्ल मनुष्य दीर्घावधि तक ध्यान कर सकता है।
कुछ मनुष्य जन्मतः प्रफुल्ल होते हैं। यह उनके पूर्वजन्म के अच्छे, आध्यात्मिक संस्कारों के कारण होता है।
एक उत्साहवर्द्धक शब्द दूसरों को प्रफुल्लित तथा उत्साहित करने के उद्देश्य से बोला जाता है।
प्रमोद, हर्ष, खुशी, उल्लास, प्रसन्नता, आह्लाद, जिन्दादिली समानार्थी शब्द हैं।
मुदिता स्वयं के अथवा दूसरों के साथ प्रसन्न रहने की अवस्था है। यह आत्मतुष्टि है। यह स्वयं के कार्यों अथवा बाह्य वातावरण के प्रति सन्तोष है। यह अच्छा एवं भला स्वभाव है। यह शान्तिपूर्ण सन्तुष्टि की अभिव्यक्ति है।
मुदिता दूसरों को प्रसन्न करने की प्रवृत्ति अथवा स्वभाव है। यह शालीनता अथवा सौम्यता है। मुदितापूर्ण मनुष्य अन्य व्यक्तियों के साथ समायोजन करता है तथा सामंजस्य बिठाता है।
हम कहते हैं, "पुरुषोत्तम का व्यवहार इतना शालीन, सौम्य एवं विनम्र है कि वह सबका सम्मान प्राप्त करता है तथा मुदिता प्रकीर्ण करता है।"
चटर्जी कहता है, "बनर्जी का जीवन प्रत्येक क्षण मेरी रुचियों के प्रति उनकी मुदिता के नवीन उदाहरण प्रस्तुत करता है।"
पिता अपने पुत्र को मुदितापूर्ण प्रेम करता है।
दूसरों को प्रसन्न करने अथवा अनुग्रहीत करने की इच्छा अथवा स्वभाव मुदिता है।
जिस व्यक्ति में मुदिता है, वह अपने से श्रेष्ठ स्थिति वालों के प्रति ईर्ष्यालु नहीं होगा। उसे चित्त-प्रसाद अथवा मन की शान्ति प्राप्त होगी। मुदिता ईर्ष्या का समूल नाश करती है तथा हृदय को प्रेम से पूर्ण करती है।
जब मनुष्यों के पास स्वयं के अतिरिक्त अन्य कोई आदर्श अनुकरण योग्य नहीं होता है, तो वे सुधार नहीं कर पाते हैं। अधिकांश व्यक्ति जीवन में असफल होते हैं क्योंकि वे अपने दोषों को दूर नहीं करते हैं।
मुदिता स्वयं से श्रेष्ठ को प्रिय, समान को अनुकूल तथा निम्न को स्वीकारणीय बनाती है। यह सभी को प्रसन्न करती है, किसी के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखती है, मित्रता को सशक्त करती है तथा प्रेम को द्विगुणित करती है।
मुदिता एक सामाजिक गुण है। यह मनुष्य की प्रत्येक प्रतिभा को आभा एवं दीप्ति प्रदान करती है।
जब मुदिता न्याय एवं उदारता के साथ संयुक्त होती है, तो यह मनुष्य को आकर्षण, प्रशंसा, प्रेम, आदर एवं सम्मान का केन्द्र बनाती है।
मुदिता वार्तालाप को मधुर बनाती है, भेद को समाप्त करती है तथा प्रत्येक मनुष्य को सुख प्रदान करती है। यह समाज में समानता स्थापित करती है।
मुदिता भले स्वभाव तथा पारस्परिक उदारता को उत्पन्न करती है तथा अशान्त व्यक्ति को शान्त करती है एवं हिंसात्मक व्यक्ति का मानवीकरण करती है।
दया अन्य के दुःखों के प्रति कष्ट का अनुभव अथवा सहानुभूति है। दया मुक्ति का द्वार खोलती है तथा हृदय को विशाल बनाती है। यह सांसारिक मनुष्यों के पाप से कठोर हुए हृदयों को द्रवित करती है और नवनीत की तरह कोमल बनाती है।
एक सन्त, साधु अथवा योगी का हृदय दया से आपूरित होता है। दया से शान्ति अथवा चित्त की प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।
दया दूसरों के कष्ट-पीड़ा से उत्पन्न दुःख का भाव है जो उनकी सहायता अथवा उन्हें बचाने की इच्छा रखता है।
दया की अभिव्यक्ति अश्रु रूप में होती है।
दया के द्वारा आप दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझते हैं तथा उन्हें दुःखमुक्त करके आप स्वयं को भी दुःख से मुक्त करते हैं।
करुणा, एकत्व भाव, सहानुभूति, दयालुता एवं कोमलता दया के समानार्थी शब्द हैं।
अधिकांश मनुष्य सहानुभूतिहीन होते हैं। उनमें दया नहीं होती है। वे पूर्णतया स्वार्थी होते हैं। वे अपनी पुत्री को १५०००/- रुपये की कार उपहार में दे सकते हैं। वे पेट्रोल के लिए ३०००/- व्यय कर सकते हैं। परन्तु निर्धनों के कष्ट निवारण के लिए वे एक रुपया भी व्यय नहीं करेंगे। वे अपनी आँखें बन्द रखते हैं। वे दुःखी मनुष्य का आर्त स्वर नहीं सुनते हैं। वे अपने पड़ोसियों के नेत्रों से बहती अश्रुधारा कभी नहीं देखते हैं। वे अपने दरवाजे बन्द कर रसगुल्ला, कलाकन्द तथा परौंठे खाते हैं।
समस्त विश्व एक परिवार है। सभी ईश्वर की सन्तान हैं। समस्त विश्व आपका निवास-स्थान है। इसका अनुभव करिए। अपने हृदय को दयाशील बनाइए। जो आपके पास है, उसे दूसरों के साथ बाँटिए। पीड़ितों के अश्रु पोंछिए। ईश्वर आपको आशीर्वादित करेंगे।
दया का विकास करिए। मृदु एवं कोमल हृदयी बनिए। दूसरों के कष्टों को समझिए, और सदैव उनकी सहायता के लिए तत्पर रहिए।
दया बल है। यह शक्ति एवं प्रसन्नता प्रदान करती है। यह आपके मन को दिव्य प्रकाश के अवतरण के लिए तैयार करती है।
आपके हृदय में दया उत्पन्न हो।
विचारशीलता वास्तव में एक सुन्दर सद्गुण है। एक विचारशील मनुष्य सभी प्रयत्नों में सफलता प्राप्त करता है।
विचारशीलता वह भूमि है जिसमें बुद्धिमत्ता विकसित होती है। अतः इस सद्गुण का अधिक सीमा तक अर्जन करिए।
टालना, उपेक्षा करना, अवहेलना करना, तुच्छ समझना आदि विचारशीलता के विपरीतार्थी शब्द हैं।
एक विचारहीन एवं वाचाल मनुष्य बिना सोचे-समझे बोलता है, अतः वह स्वयं को अपने शब्दों की मूर्खता के जाल में आबद्ध कर लेता है।
विचारशीलता से अभिप्राय है कि निर्णय लेने से पूर्व आप उसके विषय में गहन
चिन्तन-मनन करते हैं, तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तथा सूक्ष्मता एवं सावधानी से निरीक्षण करते हैं।
एक वस्तु पर ध्यान देना तथा उसका परीक्षण करने की कला विचारशीलता है। ज्ञान के विकास के अनुपात में ही नैतिक कारणों पर विचार किया जाता है। धार्मिक व्यक्ति अन्तरात्मा को ज्ञान से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं।
शीघ्रतापूर्वक लिये निर्णयों के परिणामों के विषय में सोचिए।
विचारपूर्वक कार्य करिए।
दूसरों की भावनाओं का आदर तथा सम्मान करिए। उनके सद्गुणों पर ध्यान दीजिए।
बोलने से पहले अपने शब्दों को तोलिए।
प्रत्येक कदम उठाने से पहले अच्छी तरह से सोच-विचार करिए।
अचानक ही कार्य को प्रारम्भ मत करिए। परिणामों पर भलीभाँति विचार करने के पश्चात् ही कार्य करिए। तब आप पश्चात्ताप नहीं करेंगे, दुःख का अनुभव नहीं करेंगे।
एक विचारहीन मनुष्य जिसका अपनी वागेन्द्रिय पर नियन्त्रण नहीं है, अविचारपूर्वक बोलता है तथा अन्त में अपनी मूर्खता पर रोता है। उसे अपमानित एवं लज्जित होना पड़ता है। इसलिए सब समय, सभी अवसरों पर विचारशील बनिए।
हे मानव! विचार की आवाज सुनिए तथा बुद्धिमान् बनिए। वह आपको निर्देशित करेगी तथा सुरक्षा, ज्ञान, सत्य, शान्ति, अमरत्व एवं आनन्द का पथ प्रदर्शित करेगी।
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अब मैं आपसे एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण विषय 'सन्तोष' के बारे में बात करूँगा। आप सभी इस उक्ति से अवगत हैं, "एक सन्तुष्ट मन निरन्तर आनन्दित रहता है। (A contented mind is a continual feast.)" लोभ के कारण मन सदैव विक्षुब्ध रहता है। लोभ एक प्रकार की आन्तरिक अग्नि है जो मनुष्य का धीरे-धीरे भक्षण करती है। सन्तोष लोभ के विष के लिए एक शक्तिशाली औषधि है। जिस प्रकार एक मनुष्य धूप में लम्बी सैर के बाद गंगा जी में एक डुबकी लगाने से प्रसन्नता का अनुभव करता है, उसी प्रकार लोभी मनुष्य जो लोभ की अग्रि से दाध है, सन्तोष के अमृत-सरोवर में एक दुबकी लोभी सूरपुरात ही आनन्द एवं शान्ति अनुभव करता है। मोक्ष-द्वार की सुरक्षा के चार जगाने से दुरन्ता, सन्तोष, सत्संग एवं विचार। यदि आप इनमें से एक प्रहरी तक पहेल पाते हैं, तो आप अन्य तीन को भी प्राप्त कर लेंगे। यदि आप सन्तोष अपनाते हैं, तो आप अन्य तीन प्रहरियों को अपना अनुसरण करता देखेंगे।
सन्तोष से अधिक महान् लाभ कुछ नहीं है। इस महत्त्वपूर्ण सद्गुण से सम्पन्न मनुष्त्र तीनों लोकों में सर्वाधिक समृद्ध है। वह जिस शान्ति का अनुभव करता है, उसका शब्दों में भलीभाँति वर्णन नहीं किया जा सकता है। वह इस धरा पर एक शक्तिशाली सम्राट् है। दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध सन्त तायुमान स्वामी अपने एक गीत में कहते हैं- इस संसार का कुबेर के समान सर्वाधिक धनी व्यक्ति जो चिन्तामणि, कामधेनु एवं कल्पतर का स्वामी है, अन्य राष्ट्रों पर शासन करने की आकांक्षा करता है। वह अधिक धन की प्राप्ति हेतु रसायन विद्या का प्रयोग करता है। एक सौ पचास वर्ष तक जीवित रहने वाला मनुष्य रसायन एवं सिद्ध कल्प लेकर अपने जीवन की अवधि को लम्बा करने का प्रयास करता है। जो एक सौ करोड़ रुपयों का स्वामी है, वह उन्हें दो सौ करोड़ बनाने का यथासम्भव प्रयास करता है। मन एक वस्तु को पकड़ता है तथा अगले ही क्षण उसे छोड़ कर किसी अन्य वस्तु को पकड़ने का प्रयास करता है। मनुष्य इस संसार में अशान्त हो कर विचरण करता है और कहता है-यह मेरा है। वह मेरा है। मैं उसे भी प्राप्त करने की कोशिश करूँगा। हे अशान्त मन! मुझे इन अपवित्र इच्छाओं और विषय-वस्तुओं के मध्य मत घसीटो। मैं तुम्हारा स्वरूप जान चुका हूँ। अब तुम चुप रहो।
हे परम पुरुष! मुझे एक वासनारहित शुद्ध मन प्रदान करें। मेरा मन सदैव सत्य में स्थित रहे। मैं अमन हो जाऊँ। मैं सच्चिदानन्द स्वरूप में विश्राम करूँ। हे परिपूर्ण आनन्द। हे उज्ज्वल आनन्द! जो इन सभी नाम-रूपों में परिव्याप्त है। आपको मेरा बारम्बार नमन है।"
राजयोग-दर्शन में नियमों के अन्तर्गत सन्तोष महत्त्वपूर्ण अंगों में से एक है। श्रीमद्भगवद्गीता भी कहती है- "भाग्यवशात् आपको जो भी प्राप्त हो, उसमें सन्तुष्ट रहें तथा वैराग्यवान् चित्त द्वारा ध्यान करें।" सुकरात भी इस सद्गुण की अत्यधिक प्रशंसा करते हैं।
यद्यपि मनुष्य जानते हैं कि सन्तोष एक सद्गुण है जो मन की शान्ति प्रदान करता है, तथापि वे इस सद्गुण का विकास करने का प्रयास नहीं करते हैं। क्यों ? क्योंकि वासना एवं लोभ के कारण वे विवेक शक्ति तथा आत्मिक विचार की शक्ति खो चुके हैं। वासना का उच्चाधिकारी लोभ है। जहाँ पर लोभ है, वहाँ वासना है, तथा जहाँ पर वासना है, वहाँ निश्चित रूप से लोभ है। काम एवं लोभ से अवबोध क्षमता भ्रमित हो जाती है, बुद्धि एवं स्मृति कुण्ठित हो जाती है। इसीलिए मनुष्य इस सद्गुण 'सन्तोष' का विकास करने में कठिनाई अनुभव करते हैं।
एक आक्षेपकर्ता कहता है-"स्वामी जी, आप जो कहते हैं, पूर्णतया उचित है। मैं भी अनुभव करता हूँ कि सन्तोष शान्ति देता है, परन्तु मुझे एक सन्देह है। यदि मैं सन्तुष्ट हो जाऊँ, तो मेरी सभी महत्त्वाकांक्षाएँ समाप्त हो जायेंगी। मैं अकर्मण्य एवं आलसी बन जाऊँगा। अपनी विभिन्न प्रकार की महत्त्वाकांक्षाओं के कारण ही मैं इधर-उधर विचरता हूँ। मैं प्रयास करता हूँ तथा ऊर्जावान् हूँ। कृपया मेरे इस सन्देह का निवारण करें। मैं पूर्णतः भ्रमित हूँ।" मेरा यही उत्तर है-"सन्तोष कभी आपको अकर्मण्य नहीं बना सकता है। यह एक सात्त्विक सद्गुण है जो मनुष्य को ईश्वर की ओर अभिमुख करता है। यह मानसिक शक्ति एवं शान्ति प्रदान करता है। यह अनावश्यक एवं स्वार्थपूर्ण प्रयासों पर नियन्त्रण रखता है। यह मनुष्य की अन्तर्दृष्टि को खोलता है तथा उसके मन को ईश्वर-चिन्तन की ओर ले जाता है। यह उसकी ऊर्जा को आन्तरिक सात्त्विक केन्द्रों की ओर मोड़ देता है। यह स्थूल ऊर्जा अर्थात् 'लोभ', जो मनुष्य को स्वार्थपूर्ण प्रयासों के लिए बाध्य करती है, को आध्यात्मिक ऊर्जा 'ओज' में परिवर्तित करता है। सन्तुष्ट मनुष्य सत्त्व से पूर्ण होता है। वह अधिक ऊर्जावान् होता है। वह अन्तर्मुखी होता है। वह सदैव शान्त रहता है। वह शान्त एवं एकाग्र मन से अधिक कार्य सम्पन्न करता है। अब मन की सभी बिखरी किरणें एकत्रित कर ली गयी हैं। क्या अब आप इस तथ्य को समझ गये हैं?" आक्षेपकर्ता उत्तर देता है, "जी, स्वामी जी, अब विषय पूर्णतया स्पष्ट है। मैं पूर्णतया सन्तुष्ट हूँ।"
सन्तोष के बल पर प्राचीन समय से सन्त एवं ऋषि, फकीर एवं भिक्षु भिक्षा पर निर्वाह करते हुए इस संसार में चिन्तामुक्त होकर विचरण करते रहे हैं। यह सन्तोष ही है जो एक साधक को आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर चलने की शक्ति देता है तथा आध्यात्मिकता के दुर्गम एवं कण्टकाकीर्ण पथ पर निर्भयतापूर्वक चलने में सक्षम बनाता है। यह सन्तोष ही है जो एक साधक को इस संसार के मूल्यहीन एवं नाशवान् पदार्थों को गोमय, विष, तृण अथवा मिट्टी के समान देखने की दृष्टि प्रदान करता है। सन्तोष वैराग्य, विवेक तथा विचार का विकास करता है।
भक्तिमती मीरा में पूर्ण सन्तोष था। उन्होंने संसार के तुच्छ पदार्थों की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। यद्यपि वह चित्तौड़ की रानी थीं, उन्होंने भिक्षा पर जीवन-निर्वाह किया। वे भिक्षा में प्राप्त रोटी को यमुना के किनारे ले जाती थी तथा इस अल्प भोजन एवं सादे जल से वह पूर्णतया सन्तुष्ट थीं। उन्हें यह शक्ति कहाँ से प्राप्त हुई? यह सन्तोष ही था जिसने उन्हें बल प्रदान किया। सन्तोष मोक्ष, शाश्वत आनन्द एवं प्रकाश के साम्राज्य के द्वार को खोलता है। सन्तोष एक दिव्य सद्गुण है। पूर्ण सन्तुष्ट मनुष्य समचित्तता एवं पूर्ण शान्ति प्राप्त करता है।
दक्षिण भारत के एक अत्यधिक महान् सन्त, पट्टीनाटु स्वामी अपने पूर्वजीवन में अत्यन्त लोभी मनुष्य थे। वह अत्यधिक धनी थे, तथापि धन संग्रह करना चाहते थे। भगवान् शिव ने एक छोटे बालक का रूप धारण किया तथा उन्हें बिना छिद्र वाली सुईयों का एक बण्डल एवं एक सन्देश पत्र दिया। उस पत्र पर यह लिखा था- "इस संसार के धन का क्या उपयोग है? जब तुम्हारी मृत्यु होगी, तब यह टूटी हुई सुई भी तुम्हारे साथ नहीं जायेगी।" इससे उन लोभी व्यापारी की आँखें खुल गयी तथा उनमें वैराग्य एवं सन्तोष का उदय हुआ। उन्होंने अपना गृह, धन, पत्नी तथा सब-कुछ त्याग कर दिया और भिक्षा पर निर्वाह किया, पूर्ण सन्तोष का विकास कर अपने स्वरूप का साक्षात्कार किया।
सन्तोष आनन्द है। सन्तोष अमृत है। सन्तोष अमृतत्व एवं अनन्त शान्ति प्रदाता है। अतः इस सद्गुण का विकास करिए। एक सुखी जीवन जियें। शाश्वत शान्ति में विश्राम करिए। इस सद्गुण का अपने मन में एक चित्र रखिए। 'ॐ सन्तोष' का मानसिक रूप से जप करिए। आपमें सन्तोष की आदत का विकास होगा।
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मनुष्य के लिए एक सन्तुष्ट मन महानतम आशीर्वाद है। इसका मनुष्य की आत्मा पर कल्याणकारी प्रभाव पड़ता है। यह सभी अविवेकपूर्ण आकांक्षाओं, सभी शिकायतों एवं अभावों का नाश कर व्यक्ति को शान्त, प्रसन्न एवं धनी बनाता है। यह एक अमूल्य मोती है।
सन्तोष सर्वश्रेष्ठ शक्तिवर्द्धक रसायन है। यह सर्वश्रेष्ठ औषधि है। यह उत्तम स्वास्थ्यएवं मानसिक शान्ति देता है।
प्रसन्नता अधिक वस्तुओं के संग्रह में नहीं अपितु जो आपके पास है, उसमें सन्तुष्ट रहने में निहित है। जो अल्प की इच्छा करता है, उसके पास सदैव पर्याप्त होता है।
धन अथवा शक्ति अपनी विशिष्ट असुविधाएँ एवं कष्टों को साथ लाते हैं। एक धनी मनुष्य सदैव दुःखी एवं असन्तुष्ट होता है। अर्थ अनर्थकारी है।
एक निर्धन मनुष्य धनी की चिन्ताओं एवं समस्याओं का तथा सत्तावान् मनुष्य की कठिनाइयों एवं परेशानियों का अनुभव नहीं कर सकता है। एक धनी मनुष्य तथा सत्तावान् मनुष्य के अपने गुप्त कष्ट होते हैं।
जब आपका मन जूतों के अभाव से व्यथित हो, तब उस मनुष्य के विषय में सोचिए जिसके पैर नहीं हैं तथा सन्तुष्ट हो जाइए।
जब आप अपने से श्रेष्ठ व्यक्तियों को देख असन्तुष्ट हों, तब अपने से निम्न को देखकर सन्तुष्ट हो जाइए।
इच्छा का अभाव ही महानतम सम्पदा है। इच्छारहित मनुष्य इस संसार का सर्वाधिक धनी एवं सन्तुष्ट मनुष्य है। असन्तुष्ट मनुष्य कभी समृद्ध नहीं होता है।
जो भी होता है, उससे सदैव सन्तुष्ट रहिए। यह जानिए कि आपके चुनाव से ईश्वर का चुनाव श्रेष्ठतर है।
यदि आप उससे सन्तुष्ट नहीं हैं जो आपको प्राप्त है, तो आप उससे भी सन्तुष्ट नहीं होंगे जिसे आप प्राप्त करना चाहते हैं।
सन्तोष स्वाभाविक सम्पदा है। विलासिता कृत्रिम निर्धनता है।
सभी इच्छाओं का त्याग करिए। केवल ईश्वरीय विधान की कामना करिए। केवल परमात्मा की आकांक्षा करिए। आपको पूर्ण सन्तोष, शान्ति एवं आनन्द प्राप्त होगा।
यदि आप अपने धन की वृद्धि करते हैं तो आप अपनी चिन्ताओं, उलझनों और परेशानियों की ही वृद्धि करते हैं। सन्तुष्ट मन एक सर्वश्रेष्ठ एवं गुप्त निधि है। सन्तुष्टमना व्यक्ति चिन्ताएँ एवं परेशानियाँ नहीं जानता है।
एक सन्तुष्ट मनुष्य का मन सहज होता है। वह पछतावा नहीं करता है। स्थितियाँ तथा वस्तुएँ जैसी हैं, वह उनसे सन्तुष्ट रहता है। वह कभी शिकायत नहीं करता है। वह तृप्त तथा सन्तुष्ट रहता है।
सन्तोष स्वर्गिक सुधा है। यह लोभाग्नि को शान्त करती है।
हे मनुष्य! पूर्ण सन्तोष का जीवन जियें तथा सदैव के लिए आनन्दित हो जाइए। ईश्वर में निवास करिए जो नित्य तृप्ति अथवा परम सन्तोष हैं।
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सन्तोष उत्तम सद्गुण है, सन्तोष को सच्चा सुख कहते हैं तथा एक सन्तुष्ट मनुष्य ही उत्तम विश्राम प्राप्त करता है। एक सन्तुष्ट मनुष्य के लिए विश्व का प्रभुत्व तृणवत् तुच्छ है। विषयों का भोग उसे विषतुल्य प्रतीत होता है। उसका मन उच्चतर आध्यात्मिक वस्तु ।। तथा आत्म-विचार की ओर लगा है। वह भीतर से आनन्द प्राप्त करता है। वह विपरीत परिस्थितियों में कभी उद्वेलित नहीं होता है। सन्तोष सभी बुराइयों का शामक है। यह लोभ अथवा लालच के भयंकर रोग के उपचार हेतु रामबाण औषधि है।
सन्तोष से शमित हुआ मन सदैव शान्त रहता है। केवल सन्तोष से युक्त साधक पर ही दिव्य प्रकाश का अवतरण होता है। । सन्तुष्ट मनुष्य निर्धन होते हुए भी सम्पूर्ण विश्व का सम्राट् है। एक सन्तुष्ट मनुष्य वह है जो उसकी आकांक्षा नहीं करता है जो उसके पास नहीं है; अपितु जो उसके पास है उसका वह समुचित रूप से आनन्द उठाता है। वह जो भी प्राप्त करता है, उससे पूर्णतया तृप्त होता है। वह अति उदार होता है। सिद्धियाँ एवं ऋद्धियाँ सेविकाओं की भाँति उसकी सेवा करती हैं। वह चिन्ताओं एवं व्यथाओं से मुक्त होता है। एक सन्तुष्ट मनुष्य के शान्त मुख का दर्शन उसके सम्पर्क में आने वालों व्यक्तियों को प्रसन्नता देता है। ऐसा मनुष्य महान् तपस्वियों तथा सभी महापुरुषों से सम्मान पाता है।
चिन्ता तथा भय के विचार हमारे भीतर की दो भयानक शक्तियाँ हैं। वे जीवन के मूल स्रोत को ही विषाक्त कर देती हैं तथा सामंजस्य, कार्यक्षमता, शक्ति एवं बल को नष्ट करती हैं। इनके विपरीत प्रसन्नता, आनन्द एवं साहस के विचार मन को शान्त करते हैं, कार्यक्षमता में अत्यधिक वृद्धि करते हैं तथा मानसिक शक्तियों को भी बढ़ाते हैं। अतः सदैव प्रसन्न रहिए। मुस्कराइए। हँसिए।
प्रत्येक विचार अथवा भावना अथवा शब्द, शरीर की प्रत्येक कोशिका में एक प्रबल स्पन्दन उत्पन्न करता है तथा वहाँ गहरा प्रभाव छोड़ता है। यदि आप विपरीत विचार अथवा प्रतिपक्ष भावना जाग्रत करने की विधि जानते हैं, तो आप शान्ति एवं शक्ति से भरा एक सुखी एवं सामंजस्यपूर्ण जीवन जी सकते हैं। प्रेम का विचार घृणा भाव को तुरन्त ही निष्प्रभावी कर देगा। साहस का विचार तुरन्त ही भय के विचार के विरुद्ध एक शक्तिशाली औषधि के रूप में कार्य करेगा।
जब दुर्विचारों यथा चिन्ता, भय, घृणा, ईर्ष्या तथा कामुकता के विचारों के प्रभाव के कारण शरीर की कोशिकाएँ रोगग्रस्त हो जाती हैं, तो आप उच्च, उदात्त, जीवनदायी, आत्म-उत्थापक सात्त्विक दिव्य विचारों द्वारा, प्रणवोच्चार के स्पन्दनों द्वारा, ईश्वर के विभिन्न नामों के जप द्वारा, प्राणायाम, कीर्तन, गीता तथा अन्य पवित्र ग्रन्थों के स्वाध्याय द्वारा तथा ध्यान द्वारा इन रोगग्रस्त कोशिकाओं में एकत्रित विष को निष्प्रभावी करके स्वास्थ्य, नवीन बल, ओज एवं शान्ति प्राप्ति कर सकते हैं।
साहस शौर्य, वीरता एवं निर्भयता की भावना है। यह गुण मनुष्यों को निर्भयतापूर्वक संकटों का सामना करने योग्य बनाता है।
साहस आपके संसाधनों का विस्तार करता है परन्तु कायरता उनका नाश करती है। 'अभयम्' साहस अथवा निर्भीकता है। श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में यह सद्गुण प्रथम स्थान पर है। बिना साहस के आध्यात्मिक उन्नति सम्भव नहीं है। साहस उच्च चरित्र के लिए आवश्यक तत्त्व है।
बिना साहस के सत्य नहीं हो सकता है। साहस के बिना आप इस जगत् में कुछ नहीं कर सकते हैं। यह मन का महानतम सद्गुण है।
साहस विजित होता है। साहस सफल होता है। साहस की जय होती है।
साहस मन का वह गुण है जो मनुष्य को संकट, विरोध तथा कठिनाइयों का दृढ़तापूर्वक, शान्तिपूर्वक एवं निर्भयतापूर्वक तथा बिना निराश हुए सामना करने में सक्षम बनाता है।
एक साहसी मनुष्य सौम्य एवं शान्त रहता है। संकट के समय भी वह अत्यन्त शान्त होता है। वह दृढ़मना होता है।
एक मनुष्य को महान् बनाने के लिए शारीरिक साहस तथा नैतिक साहस की आवश्यकता होती है। नैतिक साहस शारीरिक साहस से उच्चतर श्रेणी का सद्गुण है। यह अत्यन्त उदात्त गुण है।
शारीरिक साहस शरीर के बल तथा शक्ति पर निर्भर करता है। नैतिक साहस वह गुण है जो व्यक्ति को उचित मार्ग का अनुसरण करने में सक्षम बनाता है यद्यपि उससे तिरस्कार, अस्वीकृति अथवा अपमान प्राप्त हो।
सच्चा साहस असभ्य वीरों का पाशविक बल नहीं है अपितु सद्गुणी तथा विवेकी व्यक्तियों का दृढ़ निश्चय है। युद्ध में एक सैनिक का साहस राजसी तामसिक होता है किन्तु एक साधक एवं सन्त का साहस सात्त्विक होता है।
डच साहस मत अपनाइए अपितु वास्तविक साहसी बनिए। डच साहस मद्यपान से उत्पन्न काल्पनिक साहस है। मदिरा का प्रभाव कम होते ही यह साहस तुरन्त ही अदृश्य से जाता है। साहस आपके स्वरूप का अभिन्न अंग बनना चाहिए।
अपने संकल्पों में साहस रखिए। अपने विचारों अथवा धारणाओं के अनुसार निरन्तर कार्य करने का साहस रखिए।
सदैव कुछ नवीन साहसिक कार्य करिए।
वीर साहस रूपी सामग्री से बने होते हैं।
यदि आपमें साहस तथा आत्मविश्वास है, तो आप संसार में कुछ भी कर सकते हैं। साहस समस्त सफलताओं का स्रोत है। साहस तथा विश्वास से असम्भव भी सम्भव हो जाता है।
आपमें साहस के अनुपात में ही शक्ति होती है। आपकी कार्य निष्पादन - क्षमता आपके साहस एवं विश्वास के अनुरूप होती है।
जब सब परिस्थितियाँ अनुकूल हैं, तो आप साहस रख सकते हैं किन्तु संकट एवं आपदा के समय साहस रखना कठिन है। वास्तविक साहसी मनुष्य वही है जो संकट के समय भयभीत नहीं होता है तथा शान्त चित्त से दूसरों की सहायता करता है।
बहादुरी, निर्भीकता, शौर्य, धृति, निर्भयता, वीरता, निडरता, हिम्मत एवं जीवट साहस के समानार्थी शब्द हैं।
कायरता, भय, आतंक, भीरुता, कातरता आदि साहस के विपरीतार्थक शब्द हैं। हृदयस्थ पूर्ण निर्भय आत्मा अथवा अमर आत्मा पर निरन्तर ध्यान कीजिए। आप साहस की जीवन्त मूर्ति बन जायेंगे।
शिष्टाचार आचार की चारुता अथवा सुन्दरता है। यह सभ्यता तथा सम्मान का कार्य है।
शिष्टाचार व्यवहार की उदात्तता अथवा विनीतता है। यह दयालुतायुक्त शिष्टता है। यह भद्रता है। यह विनयपूर्वक किया गया दयालुता का कार्य है। यह शालीनता एवं सभ्यता है। यह सभ्यता, श्रद्धा अथवा सम्मान का भाव है।
शिष्टाचार का बीज बोने वाला मित्रता का फल प्राप्त करता है। शिष्टाचार का भाव मधुर एवं उत्तम होता है।
सामान्य वार्तालाप में भी शिष्ट रहिए। आपको सभी का प्रेम प्राप्त होगा। शिष्टता दानशीलता की बहिन है जो प्रेम को जीवन्त रखती है तथा घृणा की अग्नि का शमन करती है।
अपने हृदय में सबके प्रति शिष्टता का भाव रखिए। यह सतत, सहज एवं एकरूप हो। बाह्य व्यवहार में शिष्टता दिखाइए।
अभिवादन का प्रत्युत्तर प्रसन्नतापूर्वक दीजिए। जो व्यक्ति आपका अभिवादन करता है, उससे अधिक श्रेष्ठ अभिवादन से उसे नमन करिए।
शिष्टाचार जीवन को मधुर एवं उदात्त बनाता है। यह सौम्यता तथा सुन्दरता की भाँति जीवन का पथ सुगम करता है। यह द्वार खोल कर अजनबी को गृह के भीतर प्रवेश की अनुमति देता है। यह अतिथियों एवं आगन्तुकों के हृदयों को प्रफुल्लित करता है।
आपके द्वारा किये गये छोटे-छोटे दयालुतापूर्ण कार्य, थोड़ा शिष्टतापूर्ण व्यवहार तथा अन्यों के विषय में सहृदयतापूर्ण विचार आपके चरित्र को एक महान् आकर्षण प्रदान करते हैं।
शिष्टाचार प्रथम भेंट में ही आकर्षित करता है तथा अत्यधिक घनिष्ठता एवं मित्रता की ओर ले जाता है।
एक शिष्ट मनुष्य सभ्य-सुसंस्कृत आचारयुक्त होता है। सभी जन उससे प्रेम करते हैं।
किसी समय किसी एक के प्रति थोड़ी शिष्टता मत दिखाइए। अपनी शिष्टता में उदार बनिए।
सुशिष्टता, सभ्यता, सौजन्यता, भद्रता, सुजनता, चारुता एवं कुलीनता शिष्टाचार के समानार्थी शब्द हैं।
साहस आपका जन्मसिद्ध अधिकार है, भय नहीं। शान्ति आपकी दिव्य विरासत है, अशान्ति नहीं। नश्वरता नहीं, अमृतत्व; निर्बलता नहीं, शक्ति; रोग नहीं, स्वास्थ्य; दुःख नहीं, आनन्द; अज्ञान नहीं, ज्ञान आपका जन्मसिद्ध अधिकार है।
दुःख, कट एवं अज्ञान मिथ्या तथा भ्रामक हैं। हमारा अस्तित्व नहीं है। आनन् प्रसन्नता एवं ज्ञान सत्य हैं; ये कभी नाश को प्राप्त नहीं होते हैं।
आप स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं। आप अपने भाग्य के स्वामी हैं। आप वस्तु-परिस्थिति को बना एवं बिगाड़ सकते हैं। आप एक कार्य रूपी बीज बोते हैं और प्रवृत्ति रूपी फल प्राप्त करते हैं। प्रवृत्ति से आदत तथा आदत से चरित्र प्राप्त करते हैं। आप चरित्र रूपी बीज से भाग्य रूपी फल प्राप्त करते हैं। इसलिए भाग्य आपकी अपनी कृति हैं। यदि आप चाहें तो इसे परिवर्तित कर सकते हैं। भाग्य आदतों का समूह है।
पुरुषार्थ उचित प्रयास है। पुरुषार्थ आपको कुछ भी दे सकता है। अपनी आदतों में परिवर्तन लाइए। विचार करने के ढंग में परिवर्तन लाइए। आप भाग्य पर विजय पा सकते हैं। आप अभी सोचते हैं- "मैं शरीर हूँ।" इसके विपरीत आध्यात्मिक विचार प्रारम्भ करिए, “मैं रोगरहित लिंगरहित अमर आत्मा हूँ।" विचारिए -"मैं अकर्ता तथा अभोक्ता हूँ।" आप मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकते हैं तथा परम भव्य अमर पद प्राप्त कर सकते हैं।
आप सद्कार्यों तथा सम्यक् विचारों द्वारा भाग्य को पराजित कर सकते हैं। आपको कार्य करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है। पुरुषार्थ द्वारा ही डाकू रत्नाकर महर्षि वाल्मीकि बने। पुरुषार्थ द्वारा ही ऋषि मार्कण्डेय ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की। पुरुषार्थ द्वारा ही महापतिव्रता सावित्री ने अपने पति सत्यवान को पुनर्जीवन दिया। पुरुषार्थ द्वारा ही ऋषि उद्दालक ने निर्विकल्प समाधि प्राप्त की।
अतएव स्वयं को आत्मिक विचार एवं ध्यान में दृढ़तापूर्वक संलग्न करिए। सजग रहिए एवं अध्यवसायी बनिए। अनुचित विचारों एवं इच्छाओं का नाश करिए। आज के सम्यक् पुरुषार्थ द्वारा आने वाले दिन के कष्ट पर विजय पाइए। शुभ वासनाओं के द्वारा अशुभ वासनाओं का नाश करिए। शुभ विचारों द्वारा अशुभ विचारों का नाश करिए तथा अपने भाग्य पर विजय प्राप्त करिए।
भाग्यवादी मत बनिए। शक्तिहीन मत बनिए। एक सिंह की भाँति उठ जाइए। पुरुषार्थ करिए तथा मुक्ति अथवा आत्म-स्वराज्य प्राप्त करिए। आपके भीतर ज्ञान का एक विशाल सागर है। सभी शक्तियाँ आपके भीतर प्रच्छन्न हैं। उनको प्रकट करिए तथा जीवन्मुक्त बनिए।
सकारात्मक की नकारात्मक पर विजय होती है। यह प्रकृति का अपरिवर्तनीय नियम है। पुरुषार्थ एक प्रबलतम शक्ति है। पुरुषार्थ एक सिंह अथवा हाथी है, प्रारब्ध- भाग्य एक चीटीं अथवा गीदड़ है अर्थात् प्रारब्ध से पुरुषार्थ प्रबल होता है। ईश्वर उनकी ही सहायता करते हैं जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। महर्षि वशिष्ठ जी ने श्री राम को पुरुषार्थ करने का ही उपदेश दिया था। भाग्यवाद से अकर्मण्यता एवं आलस्य उत्पन्न होगा। अतः अपनी कमर कसिए एवं अत्यधिक पुरुषार्थ करिए। आप सभी इसी जन्म में ही आत्म-साक्षात्कार अथवा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करें। आप सभी प्रबोधित होकर आनन्द सागर में निमज्जित रहें। आप सभी जीवन्मुक्त सन्तों की भाँति दीप्तिमान हों!
दृढ़ निश्चय संकल्पशीलता है, यह उद्देश्य की स्थिरता है, चरित्र का निर्णय है। यह निर्णय लेने का कार्य है, दृढ़ता है।
दृढ़ निश्चय पुरुषोचित गुण है।
दृढ़ निश्चय एक सुनिश्चित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु कार्ययोजना निश्चित करने की आदत है। यह लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के प्रति दृढ़ निष्ठा है।
यदि आपमें केवल दृढ़ निश्चय का गुण है, तो आप समस्त कार्यों में, यहाँ तक कि आत्म-साक्षात्कार में भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
निर्णय करना वाद-विवाद अथवा प्रश्नों का अन्त करना है।
दृढ़ निश्चय उन सीमाओं का निर्धारण है जिनमें रह कर मनुष्य को कार्य करना चाहिए।
संकल्प सन्देहकारक कार्यों से अत्यावश्यक कार्य को पृथक् करना है। यह सदैव एक कार्य के लिए प्रयुक्त होता है।
संकल्पशीलता का भी समान अर्थ है अथवा यह संकल्प लेने एवं उसे तुरन्त क्रियान्वित करने का स्वभाव कहा जा सकता है।
निर्णय (Decision) अथवा दृढ़ निश्चय (Determination) कार्य के आरम्भ के सूचक हैं।
संकल्पशीलता (Resolution) कार्य के पूर्ण होने तक उसमें संलग्न रहना है।
सन्देह, विचलन, चंचलता, हिचक, अनिर्णय, अस्थिरता, अनिश्चय, दुविधा आदि दृढ़ निश्चय के विपरीतार्थी शब्द हैं। दृढ़, शुद्ध एवं अदम्य संकल्पशक्ति से सम्पन्न मनुष्य ही दृढ़ निश्चयी होता है। अपने संकल्प को सशक्त करिए एवं दृढ़ निश्चय के गुण का विकास करिए।
गरिमा मन अथवा चरित्र की उदात्तता है। यह व्यक्तित्व की भव्यता है। यह श्रेष्ठता का एक स्तर है।
गरिमा गम्भीर एवं शिष्ट आचरण है। यह चरित्र अथवा व्यवहार की प्रभावात्मकता है। यह प्रशान्त स्वभाव का होना है।
यह विस्मयजनित आदर एवं श्रद्धा उत्पन्न करने वाली एक अवस्था अथवा गुण है। यह गौरवपूर्णता है।
मिथ्यापवाद के विरुद्ध गरिमा एकमात्र अस्त्र है।
पद की गरिमा, चरित्र तथा व्यवहार की गरिमा में वृद्धि करती है।
एक शासक की गरिमा अन्तर्जात होती है।
गरिमा श्रेष्ठ, योग्य अथवा सम्माननीय होने की स्थिति अथवा गुण है-उदाहरणतः श्रम की गरिमा।
यदि आप सिरदर्द को 'सेफेलजिआ' (Cephalagia) कह दें, तो यह तुरन्त गरिमा प्राप्त कर लेता है तथा रोगी भी इस पर गर्वित अनुभव करता है।
अपमानित होने पर भी अपनी महत्ता के विषय में उच्च धारणा रखना अपनी गरिमा बनाये रखना है।
स्वनिर्णय बुद्धिमानी है। यह अपनी प्रसन्नतानुसार कार्य करने की स्वतन्त्रता है।
स्वनिर्णय बुद्धिमत्ता से चुनने एवं कार्य करने की प्रवृत्ति एवं योग्यता है। यह सावधानीपूर्वक किया गया सहज अवलोकन है जिसके माध्यम से यह जाना जा सके कि क्या उचित अथवा बुद्धिमत्तापूर्ण है? यह दूरदर्शिता है। यह अपने व्यवहार के सम्बन्ध में बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने की आदत है। यह किसी विशेष प्रसंग में निर्णय लेने तथा कार्य करने की स्वतन्त्रता है। उदाहरणतः कहा जाता है-यह विषय आपके निर्णयाधीन है। (The matter is subject to your discretion.)
इस गुण से सम्पन्न मनुष्य उद्देश्य सिद्धि हेतु श्रेष्ठ साधन चुनने तथा त्रुटियों का परिहार करने में अत्यन्त बुद्धिमान होता है। वह कुशाग्र बुद्धिसम्पन्न होता है, समझदार होता है।
स्वनिर्णय-स्वविवेक वह समझ है जो मनुष्य को सही तथा उचित का सावधानीपूर्वक आकलन करने योग्य बनाती है। यह मुख्यतया अपने आचरण के सम्बन्ध में सतर्क बोध तथा निर्णय है।
स्वनिर्णय युद्ध का विजेता है, साहस उसका शिष्य है अर्थात् विजय प्राप्ति में साहस की अपेक्षा स्वनिर्णय की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। सद्गुण अनेक होते हैं परन्तु स्वनिर्णय से अधिक कोई अन्य उपयोगी नहीं है। वाणी में स्वनिर्णय-स्वविवेक का प्रयोग वाक्कौशल से श्रेष्ठ है। यह जीवन का सारतत्त्व है। यह इसे सुरक्षित रखता है। स्वनिर्णय बुद्धि की पूर्णता की अवस्था है। यह जीवन के सभी कर्तव्यों में आपका पथप्रदर्शक होता है। यह केवल बुद्धिमान मनुष्यों में ही पाया जाता है।
विवेक सात्त्विक मन की वह शक्ति है जो सत्य एवं असत्य, स्थायी एवं अस्थायी, आत्मा एवं अनात्मा में भेद करती है।
भगवद्-कृपा से उस मनुष्य का विवेक जाग्रत होता है जिसने पूर्वजन्मों में अहंकार एवं फलाकांक्षा का त्याग कर भगवद्-समर्पण बुद्धि से कर्म किये हैं।
विवेक शास्त्राध्ययन तथा सत्संग से सुदृढ़ होता है।
यदि आप विवेकसम्पन्न हैं, तो निश्चित रूप से आपमें स्थायी वैराग्य होगा।
ज्ञान का भवन विवेक की दृढ़ नींव पर बनाया जाता है।
केवल ब्रह्म ही सत्य है, शाश्वत है। ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य सभी वस्तु-पदार्थ क्षणिक तथा नाशवान हैं।
वैराग्य इहलोक तथा परलोक के ऐन्द्रिक सुखों के प्रति उदासीनता है। वाल इन्द्रिय-विषयों के प्रति अनासक्ति है।
भगवद्-साक्षात्कार हेतु यह एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है।
मनुष्य राग अथवा आसक्ति द्वारा इस संसार से बँधा हुआ है। वह वैराग्य द्वारा मुक्त होता है।
सत्य तथा असत्य के विवेक से उत्पन्न वैराग्य ही स्थायी होगा। मात्र ऐसा वैराग्य आध्यात्मिक उन्नति तथा प्रबोधन प्राप्ति हेतु सहायक होगा। सम्पत्ति की हानि अथवा पु की मृत्यु से उत्पन्न 'कारण-वैराग्य' अस्थायी होता है। यह आपके लिए उपयोगी स होगा। यह अमोनिया की भाँति क्षणभंगुर होता है। विषयासक्त जीवन तथा ऐन्द्रिक सुखों दोषों को देखिए। आपमें वैराग्य विकसित होगा।
ऐन्द्रिक सुख क्षणिक, भ्रामक एवं काल्पनिक हैं। भोग द्वारा इच्छा तृप्ति नहीं होती वरन् भोग के पश्चात् उत्पन्न तीव्र इच्छा मन को अत्यधिक अशान्त करती है।
ऐन्द्रिक सुख जन्म-मृत्यु का कारण है। यह भक्ति, ज्ञान एवं शान्ति का शत्रु है।
किसी कार्य को करने की प्रतिबद्धता कर्तव्य है। अपना कर्तव्य करिए और शेष भगवान् पर छोड़ दीजिए।
जो अपना कर्तव्य जानता है, परन्तु उसका पालन नहीं करता है, वह संसार का अत्यन्त अधम मनुष्य है।
आप इस संसार में, जो आप चाहें वह करने के लिए नहीं आये हैं। आपको अपने कर्तव्य-निर्वाह हेतु इच्छुक होना चाहिए।
सभी कर्तव्यों को पवित्र मानिए। निःस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्य का पालन करिए। तब कर्तव्य कष्टप्रद नहीं रह जाता है, वह आनन्दप्रद हो जाता है।
अपनी दुकान, रसोईघर, ऑफिस, विद्यालय आदि में अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करिए। अपने आवश्यक सामान को व्यवस्थित करना, अपने कक्ष को स्वच्छ रखना तथा वस्त्रों को व्यवस्थित करना आदि छोटे-छोटे कार्य भी पूर्ण हृदय से करिए।
आपके दैनिक कर्तव्य आपके धार्मिक जीवन का एक अंग है।
वर्तमान में आपके समक्ष आये कार्य को तुरन्त तथा निष्ठापूर्वक करना कर्तव्य है। कर्तव्य का विचार श्रेष्ठतम विचार है क्योंकि इसमें भगवान्, आत्मा, मुक्ति, उत्तरदायित्व तथा अमरत्व का विचार निहित है।
जीवन की प्रत्येक अवस्था के कर्तव्यों के समुचित पालन से मनुष्य को सम्मान प्राप्त होता है। अपने कम महत्त्वपूर्ण अथवा साधारण कर्तव्यों के निर्वाह में भी अत्यन्त सावधान रहिए। आपको प्रसन्नता एवं आनन्द प्राप्त होगा।
कोई भी कार्य हीन नहीं है। कर्म पूजा है। समस्त कर्म पवित्र हैं। कर्तव्य पालन ही धर्म का पालन है।
सम्पन्न हुआ कार्य अथवा कर्तव्य नैतिक शक्तिवर्द्धक रसायन है। यह मन एवं हृदय को सशक्त बनाता है।
मानव की प्रसन्नता एवं नैतिक कर्तव्यों का पालन घनिष्ट रूप से सम्बन्धित हैं। जैसा व्यवहार आप स्वयं के लिए चाहते हैं, वैसा ही दूसरों के प्रति भी करिए। यह महान् नैतिक नियम है।
आपका जन्म इस ब्रह्माण्ड की समस्याओं के निवारण हेतु नहीं हुआ है। आपका जन्म यह जानने के लिए हुआ है कि आपका क्या कर्तव्य है?
आपको यह जीवन स्वार्थपरायणता, व्यर्थ गपशप, खाने-पीने तथा सोने में व्यर्थ गँवाने के लिए नहीं दिया गया है, वरन् उच्च कर्तव्यों के पालन, स्वयं के सुधार, सद्गुणों के विकास, मानवता की निःस्वार्थ सेवा तथा भगवद्माप्ति हेतु दिया गया है।
किसी कार्य के प्रति गम्भीर अथवा उत्साहपूर्ण रहने की अवस्था गम्भीरता है। यह बुद्धि-नियन्त्रित उत्साह है।
एक गम्भीर मनुष्य दृढ़ निश्चयी होता है। वह लक्ष्य प्राप्ति हेतु उत्सुक, उद्यत एवं तत्पर होता है। वह कार्य करने की तीव्र आकांक्षा करता है। वह प्रत्येक कार्य को सम्पूर्ण हृदय से करता है।
क्या आप किसी विद्या अथवा उपलब्धि पर अपना अधिकार चाहते हैं? स्वयंसे उसके प्रति पूर्णतः समर्पित करिए। सच्चे तथा गम्भीर बनिए। आपको पूर्ण सफलता प्रा होगी।
कार्य के प्रति उत्साह एवं गम्भीरता उसकी सफलता में प्रतिभा से अधिक सहायक है। आप यह सर्वत्र पायेंगे कि उन मनुष्यों ने ही व्यापार में सफलता अथवा अन्य विशेो उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं जिन्होंने व्यापार अथवा उस उपलब्धि के प्रति स्वयं को एवं समर्पित किया है।
एक गम्भीर मनुष्य कार्य-सिद्धि हेतु साधन खोज लेता है, वह उनका सृजन भी का लेता है।
कार्य के प्रति गम्भीरता दुर्बलता दूर कर शक्ति देती है, संकटों का सामना करती है. दुःखों पर विजय प्राप्त करती है, आशा का संचार करती है, कठिनाइयों का बोझ हल्का करती है और इस प्रयास में उत्पन्न श्रान्ति को कम करती है एवं सहनशक्ति प्रदान करती है।
एक मनुष्य अत्यन्त बुद्धिमान हो, मेधावी हो परन्तु बिना गम्भीरता के कोई महान् व्यक्ति नहीं बनता है और न ही महान् कार्य कर सकता है।
आप उस कार्य के प्रति गम्भीर नहीं हो सकते हैं जो सहजता एवं दृढ़ता से आपके विचारों को आकर्षित न करे।
गम्भीरता उद्देश्य प्राप्ति हेतु सभी क्षमताओं का समर्पण है। यह धैर्य प्रदान करती है। यह धैर्य का कारण है। यह उमंग एवं उत्साह प्रदान करती है।
यह मानसिक शक्ति का उत्तम स्रोत है, बुद्धिप्रदाता है।
पूर्ण, तीव्र एवं सच्ची गम्भीरता का कोई विकल्प नहीं है।
एक गम्भीर मनुष्य उद्देश्य के प्रति सच्चा होता है, वह नैतिक एवं धार्मिक महत्त्व के विषयों तथा वाणी एवं भाव में अत्यधिक उत्साही एवं दृढ़ निश्चयी होता है।
एक महान् कार्य के पीछे एक महान् तथा गम्भीर मनुष्य अवश्य होता है।
जब एक मनुष्य वाणी एवं कर्म में गम्भीर होता है तो हम कहते हैं, "राम के वचन गम्भीर वचन हैं; कृष्ण का प्रयास गम्भीर प्रयास है। शिव एक धीर-गम्भीर चिकित्सक हैं।”
चारुता सुरुचिपूर्ण होने की अवस्था अथवा गुण है। यह पूर्ण उपयुक्तता का सौन्दर्य है। यह सुसंस्करण एवं मनोहारिता है। जो सुरुचिसम्पन्न व्यक्तियों के लिए प्रियकर है, वही चारुता है।
जब मन चारुता की संवेदना खो देता है, वह भ्रष्ट हो जाता है।
चारुता भद्देपन से मुक्ति से अधिक कुछ और है। इसका अभिप्राय वस्तु में परिशुद्धता, परिष्कृति, चमक तथा आभा होना है।
यद्यपि सुरुचिपूर्णता को गौण नैतिक नियमों के अन्तर्गत माना जाता है, परन्तु फिर भी जीवन को नियमित-नियन्त्रित करने में इसका कम महत्त्वपूर्ण योगदान नहीं है। यह कुवृत्तियों को कम करती है।
चारुता-सुरुचिपूर्णता उत्तम गुणों के संयोजन से उत्पन्न सौन्दर्यपूर्ण संरचना, आकृति अथवा कार्य का चयन है; यथा गति की चारुता, शैली की चारुता।
एक स्पष्ट एवं सुनिश्चित वक्तव्य वाणी की चारुता का एक प्रकार है।
हम कहते हैं, "भारतीयों में अनेक गहन एवं सुरुचिसम्पन्न विद्वान् हैं।"
एक सुरुचिपूर्ण-चारु वस्तु उसकी मनोहारिता, परिशुद्धता तथा सममितता द्वारा परिलक्षित होती है। यह उसकी दोषमुक्तता एवं उत्कृष्ट पूर्णता को प्रदर्शित करती है। इसमें सौन्दर्य, शुद्धता अथवा उपयुक्तता समाहित होती है। हम कहते हैं, "यह एक चारु कक्ष है।" "राम का तर्क सुचारु था।" पूर्णता एवं सरलता सुरुचिपूर्णता की विशिष्टता है। यह उचित होती है।
'चारुता' उन विशेषताओं का समन्वय है जो सुसंस्कृत व्यक्तियों को प्रिय होती है। इससे अभिप्राय आकृति अथवा गति में सौन्दर्य के सूक्ष्म तत्त्वों से है।
एक पोशाक 'चारु-सुरुचिपूर्ण' (Elegant dress) हो सकती है परन्तु एक 'चारु क्षेत्र' (Elegant field), 'एक चारु यात्रा' (Elegant ride), 'चारु समय' (Elegant time) आदि भाषा सम्बन्धी सुस्पष्ट त्रुटियाँ हैं।
अत्युत्तमता (Exquisite) से अभिप्राय सुरुचिपूर्णता की सूक्ष्मतम अवस्था में परिपूर्णता है। हम एक 'चारु वस्त्र' तथा 'अत्युत्कृष्ट लेस' कहते हैं। इसका प्रयोग किसी भावना की अत्यधिक गहनता हेतु भी किया जाता है-यथा अत्यधिक प्रसन्नता (Exquisite delight), अत्यधिक कष्ट (Exquisite pain)|
चारुता-सुरुचिपूर्णता पूर्ण उपयुक्तता से उत्पन्न सौन्दर्य अथवा किसी अप्रिय संवे के कारण के अभाव से प्राप्त सौन्दर्य है उदाहरणतः आचरण, भाषा, शैली, आकृ संरचना एवं पोशाक आदि की चारुता।
जो अपनी सूक्ष्मता, सन्तुलन, शुद्धता एवं सौन्दर्य से प्रिय लगे, वह चार है।
सुसंस्कृत, विनयपूर्ण, सभ्य, मनोहारी एवं प्रिय व्यवहार चारु आचार को जाता है।
परिष्कृत, शुद्ध, सुसमृद्ध अभिव्यक्तिपूर्ण, उचित वाक्य-विन्यास सम्पन्न कृति एक चारु कृति अथवा शैली है।
सममित, सन्तुलित, उचित अनुपातों एवं भागों में निर्मित संरचना चारु-सुरुचिपूर्ण संरचना है।
बहुमूल्य तथा सुसज्जित-अलंकृत सामग्री चारु सज्जा-सामग्री है।
सौन्दर्य को कुरूपता से पृथक् करने की क्षमता तथा सौन्दर्य के प्रति संवेदनशीलता, चारु-रुचि अथवा सुरुचि को प्रकट करते हैं।
अनुकरण समान होने अथवा श्रेष्ठ बनने का प्रयास है। यह एक स्वस्थ प्रतियोगिता है। यह दूसरे के समान श्रेष्ठ होने की इच्छा है।
यह एक उदात्त भावना है। यह दूसरे की अवनति द्वारा नहीं वरन् स्वयं के उत्थान द्वारा श्रेष्ठता प्राप्त करने का प्रयास है। यह सम्मान की सीमाओं के भीतर रहता है तथा यश प्राप्ति की प्रतियोगिता को न्यायपूर्ण एवं उदार बनाता है।
बिना अनुकरण के कुछ श्रेष्ठ अथवा महान् कार्य नहीं किया जा सकता है। अनुकरण प्रशंसनीय आकांक्षा है। यह आपको आत्म-सुधार तथा उन्नति की ओर प्रेरित करता है। यह महान् कार्यों की प्रशंसा करता है तथा उनकी अनुकृति करने का प्रयास करता है, परन्तु ईर्ष्या केवल दुर्भावना की ओर ले जाती है।
अनुकरण आकांक्षा की छाया है। यह अन्य व्यक्तियों में गुणों की खोज करता है ताकि स्वयं का उत्थान कर सकें। अनुकरण के द्वारा मनुष्य स्वयं का प्रशंसनीय स्तर तक उत्थान कर लेता है। वह प्रयत्न करता है, संघर्ष करता है। वह अन्य व्यक्तियों के साथ कड़ी प्रतियोगिता में सम्मिलित नहीं होता है।
वह अन्य व्यक्तियों के गुणों से ईर्ष्या नहीं करता है अपितु स्वयं की प्रतिभा, क्षमता एवं योग्यता का विकास करता है। वह आत्म-प्रशंसा नहीं करता है और दूसरों का उपहास नहीं करता है।
एक अनुकरणशील मनुष्य अपने सह-प्रतियोगियों को किन्हीं अनुचित साधनों के प्रयोग द्वारा हतोत्साहित नहीं करता है। वह उनसे श्रेष्ठ हो कर स्वयं के उत्थान का प्रयास करता है। सद्गुणों के अनुकरण द्वारा मनुष्य की आत्मा का उत्थान होता है। ऐसा व्यक्ति सदैव अध्यवसायी, सजग एवं परिश्रमी होता है। वह सदा उच्च से उच्चतर लक्ष्य की ओर प्रगति करता है। वह अपने समक्ष महान् व्यक्तियों के उदाहरण रखता है तथा उनका अनुकरण करने के प्रयास द्वारा शीघ्र ही उनके स्तर तक पहुँच जाता है। वह महान् योजनाएँ बनाता है तथा उन्हें क्रियान्वित करता है।
परन्तु एक ईर्ष्यालु मनुष्य का हृदय कटुतापूर्ण होता है। उसका हृदय अन्य व्यक्तियों की सफलता एवं समृद्धि देख कर सन्तप्त होता है, अशान्त होता है। उसका हृदय घृणा एवं दुर्भावना से भरा होता है। वह दूसरों को हानि पहुँचाता है एवं उनके विनाश को तत्पर होता है। वह अपने से श्रेष्ठ व्यक्तियों की भर्त्सना करता है।
एक क्रियाशील तथा चिन्तनशील जीवन के सभी क्षेत्रों में, अनुकरण मानवता के प्रयासों एवं सुधार का सर्वाधिक शक्तिशाली उत्प्रेरक है।
अनुकरण अमूर्त से सम्बन्धित होता है, प्रतियोगिता मूर्त से। हम व्यापार में 'प्रतियोगिता' (Competition) शब्द का प्रयोग करते हैं, विद्वत्ता में 'अनुकरण' (Emulation) तथा प्रेम एवं राजनीति में 'प्रतिद्वन्द्विता' (Rivalry) कहते हैं। हम श्रेष्ठता, सफलता एवं उपलब्धि के लिए 'अनुकरण' शब्द का, पुरस्कार हेतु 'प्रतियोगिता' तथा मनुष्यों एवं राष्ट्रों के मध्य 'प्रतिद्वन्द्विता' शब्द का प्रयोग करते हैं।
प्रतियोगिता सौहार्दपूर्ण हो सकती है, प्रतिद्वन्द्विता सामान्यतया शत्रुतापूर्ण होती है व्यापारिक बोलचाल में प्रतियोगिता शब्द का स्थान 'विरोध' (Opposition) ले रहा है इसका अर्थ है कि व्यापार में प्रतियोगी एक विरोधी एवं बाधक तत्त्व है। लापरवाही, उदासीनता एवं मिथ्या सन्तुष्टि अनुकरण के विपरीतार्थी शब्द हैं।
तितिक्षा सहन करने की अवस्था है। यह विपरीत परिस्थितियों में बिना हा तथा बिना विरोध किये कष्ट-पीड़ा को धैर्यपूर्वक सहन करना है।
तितिक्षा बिना प्रतिकार किये सहन करने की क्षमता अथवा शक्ति है। यह बिना समर्पण किये अर्थात् हार माने, बिना शिकायत अथवा विलाप किये कष्ट-पीड़ा, विपत्ति अथवा किसी दीर्घकालिक तनाव को सहन करने की योग्यता है। यह धैर्ययुक्त वीरता है । यह विनाशकारी शक्तियों के प्रभाव को सहन करते हुए आगे बढ़ते रहने की योग्यता है।
तितिक्षा तनाव एवं विरोध को बोधपूर्वक सहन करना है। यह उत्तेजित अथवा अपमानित किये जाने पर शान्तिपूर्वक सहन करना है।
तितिक्षु व्यक्ति विजय पाता है। तितिक्षा के द्वारा संकल्प शक्ति एवं धैर्य का विकास होता है। तितिक्षा द्वारा ही बुराइयों तथा कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की जाती है।
आप पर आयी विपत्तियों-कठिनाइयों के अनुपात में आपकी शक्ति में वृद्धि होती है। उनको वीरतापूर्वक सहन करिए।
संकटों एवं कठिनाइयों, विपत्तियों एवं विपदाओं ने ही प्रायः मनुष्य के चरित्र का निर्माण किया है।
जिस प्रकार खजूर का वृक्ष अत्यधिक भार के नीचे रह कर ही उत्तम रूप से विकसित होता है, उसी प्रकार मनुष्य का चरित्र भी विपत्ति में ही विकसित होता है।
कठिनाई जितनी अधिक होगी, उस पर विजय प्राप्त करने से उतना ही अधिक यर प्राप्त होता है। कुशल जहाज-चालक तूफान-झंझावात का सामना करके ही सुविख्यात हुए हैं।
तितिक्षा के द्वारा आप अपनी दिव्य महिमा प्रकट करते हैं तथा भगवान् के साथ सम्बन्ध स्थापित करते हैं।
समचित्तता मन अथवा स्वभाव की समता एवं सन्तुलन है। यह हर्ष और शोक सफलता और असफलता, मान और अपमान, निन्दा और स्तुति में मन का सन्तुलित रहना है।
समचित्तता प्रतिकूल परिस्थितियों में भावस्थैर्य विशेषतया मन की स्थिरता तथा शान्ति है।
समचित्तता की श्रेष्ठता अवर्णनीय है। इस गुण से सम्पन्न मनुष्य विपत्ति में निराश नहीं होता है तथा समृद्धि में गर्वित-हर्षित नहीं होता है। वह अन्य व्यक्तियों के प्रति स्नेहशील तथा स्वयं में सन्तुष्ट रहता है। वह जीवन की समस्त परिस्थितियों में सदैव शान्त रहता है। वह हानि को शान्तिपूर्वक सहन करता है।
एक जीवन्मुक्त पुरुष सदैव समचित्तता अथवा प्रशान्ति से युक्त होता है। उसका मन आत्मा अथवा अन्तःप्रज्ञा में संस्थित हो सदैव अविचलित एवं सन्तुलित रहता है।
इस द्वन्द्वयुक्त संसार में मनुष्य विभिन्न भावनाओं की तरंगों द्वारा इधर-उधर चलायमान होता है। एक क्षण वह लाभ, सफलता, सम्मान एवं प्रशंसा प्राप्त करता है, अगले ही क्षण उसे हानि, असफलता, अपमान, निन्दा तथा निराशा प्राप्त होती है। मन के समत्व एवं शान्ति से सम्पन्न मनुष्य ही इस संसार में आनन्दपूर्वक रह सकता है।
मन एवं इन्द्रियों को नियन्त्रित करके स्वयं को अपने अपरिवर्तनीय आनन्दस्वरूप आत्मा में स्थिर करिए। केवल तब ही आप विश्रान्ति प्राप्त करेंगे। कोई सांसारिक परिस्थिति आपको उद्वेलित नहीं कर सकेगी। आप अपनी आत्मा में शान्तिपूर्वक विश्राम कर सकेंगे जो प्रशान्ति का महासागर है।
'समत्व' योग है। इस अवस्था की प्राप्ति हेतु सतत जागरूकता, लगन, धैर्य तथा शरीर, मन एवं बुद्धि के पूर्ण अनुशासन की आवश्यकता है। यह एक दिन, सप्ताह अथवा माह में प्राप्त नहीं होता है।
सदैव 'समं ब्रह्म' के विषय में विचार करिए जो सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित है। धीरे-धीरे आप समत्व का विकास कर पायेंगे।
इच्छाओं, कामनाओं, आसक्तियों तथा राग-द्वेष का निर्मूलन करिए। विवेक, शान्ति, वैराग्य, आत्म-संयम, आत्म-नियन्त्रण, आत्म-त्याग आदि सद्गुणों का विकास करिए। धीरे-धीरे आप समचित्तता में स्थित हो जायेंगे।
श्रद्धा धर्म की सत्यता में विश्वास है। यह भगवान् में विश्वास है। यह स्वयं की आत्मा में विश्वास है। यह अपने गुरु के वचनों एवं उपदेशों में विश्वास है। याह । ग्रन्थों में विश्वास है।
श्रद्धा अन्य द्वारा घोषित सत्य में बिना किसी प्रमाण की अपेक्षा किये दृढ़ विकास करना है।
श्रद्धा वह व्यक्तिगत दृष्टिकोण है जिसके द्वारा दिव्य सत्य का आत्मपरक ग्रहण हाेता है। यह किन्हीं तार्किक प्रक्रियाओं से नहीं अपितु प्रत्यक्ष आन्तरिक अनुभव से उत्पन्न होती है।
साधनविहीन परन्तु स्वयं में अत्यधिक विश्वास रखने वाले मनुष्यों ने अ उपलब्धियाँ अर्जित की हैं।
भगवान् में पूर्ण श्रद्धा रखिए। स्वयं को पूर्णतः उन्हें समर्पित करिए। वे आपकी देखभाल करेंगे। आपके सभी भय एवं कष्ट पूर्णतः समाप्त हो जायेंगे। आप सदैव सुखी रहेंगे।
श्रद्धा किसी पर आरोपित नहीं की जानी चाहिए। धार्मिक श्रद्धा के लिए बाध्य किये जाने का प्रयास अश्रद्धा उत्पन्न करता है।
भगवान् में श्रद्धा आत्मा का उत्थान करती है, हृदय एवं भावनाओं को शुद्ध करते है तथा भगवद्-साक्षात्कार की ओर अग्रसर करती है।
श्रद्धा धर्म की आत्मा है। यह नयी आशाओं का सृजन करती है तथा अमरत्व प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।
श्रद्धा भगवान् को देखने का नेत्र तथा उनका आश्रय ग्रहण करने वाला हाथ है।
श्रद्धा शक्ति है। श्रद्धा बल है। श्रद्धा अपार ऊर्जा है। श्रद्धावान् मनुष्य शक्ति सम्पन्न होता है तथा सन्देहशील मनुष्य निर्बल होता है। सन्देह ऊर्जा प्रवाह को बाधित करता है। दृढ़ श्रद्धा महान् कार्यों की अग्रगामी है।
श्रद्धा के अभाव के कारण आपने दिव्य ज्ञान खो दिया है।
श्रद्धा आध्यात्मिक पथ को प्रकाशित करती है, मृत्यु-सरिता के ऊपर सेतु बना कर साधक को दूसरे किनारे अर्थात् निर्भयता एवं अमरत्व की ओर ले जाती है।
हम एक अभिलेख को 'मान्यता' (Credence) देते हैं, एक सुझाव को 'स्वीकृति (Assent) देते हैं। विश्वास (Belief) मान्यता से दृढ़ होता है। दृढ़ धारणा (Conviction) तर्क अथवा प्रमाण पर आधारित विश्वास है।
आश्वासन-भरोसा (Assurance) तर्कातीत विश्वास है।
श्रद्धा आस्था एवं विश्वास का मिलन है। श्रद्धा मुख्यतया व्यक्तिगत होती है तथा विश्वास अवैयक्तिक होता है। हम सुझाव में 'विश्वास' तथा वचन में 'श्रद्धा' शब्द का प्रयोग करते हैं क्योंकि वह वचन एक व्यक्ति द्वारा दिया गया है।
एक वक्तव्य को सत्य मान कर अथवा एक व्यक्ति को योग्य मान कर उस पर दृढ़तापूर्वक निर्भर रहना आश्वस्त होना है। हम प्रकृति की एकरूपता के प्रति आश्वस्त होते हैं। भगवान् के प्रति हम श्रद्धा रखते हैं।
निष्ठा-विश्वस्तता कर्तव्य अथवा उत्तरदायित्वों का उचित एवं सावधानीपूर्वक निर्वाह है। यह पति अथवा पत्नी के प्रति वफादारी है। यह ईमानदारी है।
जिनसे व्यक्ति प्रेम अथवा सम्मान के सम्बन्ध से बँधा है, उनके प्रति हार्दिक समर्पण ही निष्ठा है। यह वफादारी अथवा निष्ठा है, जैसा कि एक अधिकारी की निष्ठा, वैवाहिक निष्ठा, पिता अथवा मित्र के प्रति निष्ठा, प्रजा की अपने राजा के प्रति निष्ठा तथा सेवक की अपने स्वामी के प्रति निष्ठा।
निष्ठा उच्च उद्देश्य में अपना पुरस्कार एवं शक्ति प्राप्त करती है। यह व्यापार में सफलता का अति महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।
निष्ठा न्याय की मित्र है।
इससे बढ़ कर कोई अन्य गुण इतना उदात्त एवं सम्मान्य नहीं है। यह मन का मौलिक गुण है।
यह सत्य अथवा तथ्य की अक्षरक्षः प्रस्तुति भी है; जैसा एक अभिलेख अथवा साक्षी की विश्वस्तता, एक चित्र की विश्वस्तता ।
स्थिरता, भक्ति, विश्वास, वफादारी, ईमानदारी, सत्य एवं सत्यनिष्ठता इसके समानार्थी शब्द हैं।
निष्ठाहीनता, विश्वासघात, छल, षडयन्त्र आदि इसके विपरीतार्थी शब्द हैं। ध्रुव तारे की तरह स्थिर रहिए। ईमानदार तथा निष्ठावान बनिए।
दृढ़ता अडिगता, संकल्पशीलता, दृढनिश्चय एवं स्थिरता है। हम नींव की दृढ़ता कदम का दृढ़ता, विश्वास की दृढ़ता, उद्देश्य अथवा संकल्प की दृढता तथा मन अथवा आत्मा की दृढ़ता कहते हैं।
इस गुण से सम्पन्न मनुष्य सरलता से विचलित अथवा उद्वेलित नहीं होता है । वह किसी भी वस्तु-परिस्थिति से क्षुब्ध नहीं होता है। वह वीर होता है।
दृढ़ता के कवच से अरक्षित चतुराई, प्रतिभा, क्षमताएँ, योग्यताएँ, वाक्पटुता, शिष्ट आचरण, मनोहारी वचन आदि व्यर्थ हैं।
दृढ़ता मनुष्य को बाधाओं तथा कठिनाइयों पर सरलता से विजय पाने योग्य बनाती है। ऐसा दृढ़ मनुष्य सभी प्रयासों में सदैव सफलता प्राप्त करता है।
कष्ट के समय तथा कोई कार्य करते हुए आपको दृढ़ता अपनानी चाहिए। केवल तब ही आप महानता तथा विजय प्राप्त करेंगे।
दृढ़ता वास्तव में एक उदात्त गुण है, परन्तु यह ज्ञान द्वारा निर्देशित होना चाहिए, अन्यथा यह दुःसाहस अथवा हठधर्मिता बन जाता है।
उद्देश्य की दृढ़ता सफलता प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है। यह चरित्र के अत्यावश्यक तत्त्वों में से एक है।
पूर्ण विवेक का सहभागी होने पर ही दृढ़ता एक गुण है।
दृढ़ता एक ऐसी क्षमता है जो स्थायित्व, स्थिरता तथा हठधर्मिता देती है।
दृढ़ता (Firmness) बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य से सम्बन्धित है; स्थिरता (Constamecy) स्नेह तथा सिद्धान्तों से सम्बन्धित है- पूर्वोक्त हमें पराजित हो समर्पण करने से तथा उत्तरोक्त विचलित होने से रोकती है।
सहनशीलता धैर्य का प्रयोग है। सहनशीलता आत्मनियन्त्रण अथवा मृदुलता है । यह एक महान् दिव्य गुण है।
सहनशीलता दुर्व्यवहार-अपमान को धैर्यपूर्वक सहन करना है। यह सदयता है । यह भावनाओं पर नियन्त्रण है। यह क्रोध की भावना अथवा प्रतिशोधात्मक कार्य पर संयम रखना है।
सहनशीलता दया, सहानुभूति, करुणा, धैर्य, तितिक्षा, क्षमा तथा दृढ़ इच्छाशक्ति का अद्भुत सम्मिश्रण है।
सहनशीलता का अभ्यास करने वाला व्यक्ति स्वयं को नियन्त्रित रखता है। वह आत्मसंयम अथवा आत्मनियन्त्रण तथा क्षमा का अभ्यास करता है। वह आघात, अपमान, उद्वेग तथा कष्टप्रद उपहास को धैर्यपूर्वक, प्रार्थनापूर्वक तथा आत्मनियन्त्रण द्वारा सहन करता है और इस प्रकार दृढ़ इच्छाशक्ति का विकास करता है।
दूसरों की कमियों, गलतियों एवं दोषों को छिपाइए। उनकी दुर्बलताओं को क्षमा करिए। उनकी कमियों को मौन के आवरण में छिपा दीजिए। उच्च स्वर से उनके गुणों की घोषणा करिए।
सहन करने के अवसर खोजिए। दुर्बल मनुष्यों पर दया कीजिए तथा उन्हें क्षमा कीजिए। सहनशीलता का तब तक विकास कीजिए जब तक कि आपका हृदय इससे परिपूरित न हो जाये।
भगवान् यीशु तथा भगवान् बुद्ध सहनशीलता के मूर्तिमान स्वरूप थे। इन दिव्य पुरुषों की जय। इनके उदाहरण का अनुकरण करिए तथा दिव्य बनिए।
हे मानव ! सहन करिए। अत्यधिक उद्वेगकारी परिस्थिति में भी धैर्य रखिए। आपको प्रचुर शान्ति एवं आनन्द प्राप्त होंगे।
क्षमा माफ करना है। क्षमा अपराध अथवा ऋण की उपेक्षा करना है। यह माफ करने का स्वभाव अथवा प्रवृत्ति है।
एक क्षमाशील मनुष्य दयालु तथा करुणाशील होता है।
त्रुटि करना मानवीय स्वभाव है; क्षमा करना दिव्य स्वभाव है। क्षमा का दिखावा करना सामान्य बात है। वास्तविक क्षमा दुर्लभ है।
यदि आप क्षमा का अभ्यास करेंगे, तो आप शक्तिसम्पन्न एवं उदार बनेंगे। आप सरलता से क्रोध पर नियन्त्रण कर सकते हैं।
क्षमा व्यक्ति को क्रोध एवं घृणा के दुष्परिणामों तथा शक्ति के अपव्यय से बचाती है।
जो क्षमा का अभ्यास करता है, वह उस व्यक्ति के प्रति क्रोध अथवा नाराजगी नहीं रखता है जिसने उसे आहत किया है।
क्षमा क्रोध का प्रतिकारक है।
क्षमा' आन्तरिक भावना को इंगित करती है। जब हम क्षमा की प्रार्थना करते हैं । हम मुख्यतया क्रोध का शमन चाहते हैं।
'माफी’ (pardon) बाह्य वस्तुओं अथवा परिणामों से सम्बन्धित है तथा प्राय: तुच्छ विषयों के लिए प्रयुक्त होती है, यथा किसी प्रकार की बाधा का कारण बनने पर हम माफी माँगते हैं। एक न्यायाधीश माफी देता है, क्षमा नहीं करता है।
१
धृति सहन करने की मानसिक शक्ति है। यह संकट का सामना करने में दृढ़ता है यह प्रतिरोध करने की शक्ति है।
धृति (Fortitude) लेटिन शब्द 'फोरट्यूडो' से बना है जिसका मूल शब्द है । 'फोरटिस' अर्थात् शक्तिशाली।
धृति कष्ट तथा विपत्ति को बिना शिकायत किये तथा निराश हुए, धैर्यपूर्वक सहन करने की अथवा हतोत्साहित हुए बिना शान्तिपूर्वक तथा वीरता से संकट का सामना करने की मानसिक शक्ति है। यह सतत एवं धैर्यपूर्वक साहस रखना है।
धृति शान्त तथा स्थायी वीरता है। यह वह गुण है जो मात्र कष्ट, संकट को सहन करने में सक्षम नहीं है अपितु उन संकटों, जिनके विरुद्ध पर्याप्त सुरक्षा नहीं है तथा जिनका सक्रिय विरोध किया जा सकता है, उनका निरन्तर सामना करने में भी सक्षम है।
तोप में बारूद भरने के लिए साहस की आवश्यकता है, परन्तु शत्रु के अस्त्र के समक्ष स्थिर खड़े रहने के लिए धृति की आवश्यकता है। दृढ़संकल्प मन से होता है। तितिक्षा आंशिक रूप से शारीरिक होती है। प्रलोभन का प्रतिरोध करने में दृढ़ संकल्प की तथा क्षुधा और शीत को सहन करने में तितिक्षा की आवश्यकता है।
बुराईयों पर विजय पाने के लिए 'सक्रिय धृति' की आवश्यकता है। इसमें दृढ़ संकल्प, स्थिरता तथा वीरता सम्मिलित है। बुराईयों को सहन करने के लिए 'निष्क्रिय धृति' की आवश्यकता है। इसमें धैर्य, विनम्रता एवं विनय आदि सम्मिलित हैं।
धृति स्वयं एक आवश्यक गुण है। यह प्रत्येक अन्य गुण का रक्षक भी है। यह संसार कष्ट, दुःख, पीड़ा, संकट, दुर्भाग्य, अभाव तथा व्याधियों से युक्त है। प्रत्येक मनुष्य को कष्ट एवं कठिनाई का सामना करना होता है। कायर मनुष्य उनके बोझ तले झुक जाते हैं तथा धृतिसम्पन्न मनुष्य बिना शिकायत किये सहन करते हैं।
जो अपनी निम्न प्रकृति से संघर्ष कर विजयी बनता है, वह इस उत्तम गुण 'धृति' से सुशोभित होता है।
धैर्य, साहस, तितिक्षा, वीरता, दृढ़ संकल्प तथा प्रत्युत्पन्नमति धृति के घटक हैं। धृति समस्त संकटों, विपदाओं, विपत्तियों में आपकी रक्षा करेगी। जिस प्रकार लहरों के प्रहार एक चट्टान को उद्वेलित नहीं कर पाते हैं, इसी प्रकार जीवन के समस्त संकट आपको व्यथित नहीं कर पायेंगे।
अपने मन को धृति, साहस तथा धैर्य से संरक्षित करिए। आप इस सांसारिक जीवन की समस्त कठिनाइयों पर वीरतापूर्वक विजय पा सकते हैं और सदैव शान्त-प्रशान्त रह सकते हैं। संकट काल में आप व्याकुल तथा भ्रमित नहीं होंगे। दुर्भाग्य काल में आप निराश अथवा हताश नहीं होंगे।
धृति आपकी रक्षा करेगी तथा मन की स्थिरता आपकी सहायता करेगी। आप विजय एवं आनन्दपूर्वक बाहर आयेंगे।
प्रह्लाद, सीता, दमयन्ती, नलयिनि और सावित्री धृति के मूर्तिमन्त विग्रह थे।
२
एक मनुष्य का जन्म उसके अच्छे तथा बुरे कर्मों के मिश्रण के कारण होता है। प्रत्येक मनुष्य को उसके जीवन में किसी समय संकटों, विपदाओं, विपत्तियों, आपदाओं, अभाव, कष्ट तथा पीड़ा का सामना करना ही पड़ेगा। धृतिसम्पन्न मनुष्य उन्हें शान्तिपूर्वक एवं सावधानीपूर्वक सहन करेगा तथा स्मितमुख हो उन पर विजय पा लेगा।
धृति साहस, शान्ति, धैर्य, प्रत्युत्पन्नमति तथा तितिक्षा का मधुर, अद्भुत आध्यात्मिक मिश्रण है। यह सत्त्व से उत्पन्न गुण है। यह सत्य के पथ पर चलने वाले साधकों को तथा प्रवृत्ति मार्ग पर चलने वाले सांसारिक मनुष्यों को भी मानसिक शक्ति प्रदान करता है।
जो साधक धृतियुक्त नहीं है, वह संकट, पीड़ा तथा रोग के समय साधना छोड़ देता है। वह अचेत होता, चिल्लाता तथा निराश हो जाता है। धृति मनुष्य को सभी संकटों, आपत्तियों, पीड़ा तथा रोग में सँभालती है, सम्पोषित करती है। यह धृति ही थी कि जिसने भगवान राम और सीता, नल और दमयन्ती युधिष्ठिर और उनके भाइयों को सम्बल प्रदान किया जव वे वन में अत्यधिक कष्ट में थे। श्री हरिश्चन्द्र, जीसस क्राइस्ट, राणा प्रताप, अब्दुल बाबा आदि ऐसे वीर हैं जो अमित धृति सम्पन्न थे।
धृति आवश्यकता के समय सहायता करने वाला मित्र है। यह पालन करने वाली माता है। वह मानसिक शक्तिवर्द्धक रसायन तथा रामबाण औषधि है। यह भूख, प्यास गर्मी तथा सर्दी से रक्षा करने वाला कवच है। यह भयंकर विपत्ति तथा हृदयाघात के समय तुरन्त आन्तरिक शक्ति प्रदान करने वाला एक अचूक इंजेक्शन है। यह जीवन की संकटपूर्ण स्थितियों तथा प्रतिकूल परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष करने का शक्तिशाल अस्त्र है।
धृतिसम्पन्न मनुष्य विपदाओं के समय हिमालय की भाँति दृढ़ रहता है। वह जीवन की सभी स्थितियों में मन की समता बनाये रखता है। वह बड़े-बड़े कष्टों से विचलित नहीं होता है। जिस प्रकार समुद्र के किनारे की चट्टान लहरों के प्रहार से विचलित नहीं होती है. उसी प्रकार वह इस भयकारक संसार के विविध परिवर्तनों के मध्य अविचलित रहता है।
जिस प्रकार एक मनुष्य युद्धक्षेत्र में विशेष कवच एवं उपकरणों द्वारा अपने नाक आँखों तथा अन्य अंगों की विस्फोटक बमों के विनाशकारी प्रभावों से रक्षा करता है, उसी प्रकार साधक तथा बुद्धिमान मनुष्य धृति द्वारा सांसारिक विपदाओं रूपी विषैली गैसों से अपनी रक्षा करते हैं तथा विजय प्राप्त करते हैं।
परन्तु कायर, कमजोर, धृतिहीन मनुष्य संकट के समय काँपता है, संकुचित होता है, अचेत होता है तथा लज्जा से भर जाता है। वह निराशा में डूब जाता है। वह व्याकुल तथा भ्रमित होता है। वह नहीं जानता है कि उसे क्या करना चाहिए। वह उस कोमल डंठल की भाँति है जो हवा के छोटे से झोंके से हिल जाता है। वह सुध-बुध खो देता है। भय, कायरता एवं दुर्बलता उस पर अधिकार कर लेते हैं। वह असफलता तथा दुःख प्राप्त करता है। वह विपत्ति तथा दुर्भाग्य के समय अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है।
धीरे-धीरे धृति का विकास करिए तथा हिमालय की तरह दृढ़ रहिए। पुनः पुनः धैर्यपूर्वक इस सद्गुण का अर्जन करिए।
धृति चारित्रिक शक्ति की परिचायक है। जिस प्रकार एक उच्चपदासीन मनुष्य के लिए, उसका पद उसकी शक्ति है, एक कुलीन मनुष्य के लिए उसका कुल उसकी शक्ति है, एक महान् नेता के लिए उसका स्थान उसकी शक्ति है, एक धनवान मनुष्य के लिए धन शक्ति है, उसी प्रकार एक चरित्रवान मनुष्य के लिए धृति उसकी शक्ति है। धृति ही उसे सम्पोषित करती है। यह आत्मविश्वास तथा आत्मनिर्भरता की परिचायक है। जहाँ धृति है, वहाँ निरुत्साहिता तथा निराशा पहुँचने का साहस नहीं कर सकते हैं। अतः धृति ही केवल वास्तविक स्थायी शक्ति है क्योंकि उच्च पद, कुल, नेतृत्वशक्ति तथा धन सब नष्ट हो जाते हैं। चरित्र स्थायी धन है, धृति स्थायी शक्ति है।
आप सब धृति द्वारा सांसारिक जीवन तथा भगवद्द्याक्षात्कार में सफलता प्राप्त करें।
मित्रता आपसी सम्मान अथवा अनुरक्ति है। यह सौहार्द है। यह घनिष्ठ परिचय है।
मित्रता समान विचार रखने वाले व्यक्तियों में पारस्परिक स्नेह अथवा आदर है। मित्रता में व्यक्तियों की भावनाओं में समरूपता होती है, उनके मध्य घनिष्ठता होती है जो उन्हें सहानुभूति अथवा पारस्परिक सहायता हेतु प्रेरित करती है।
मित्रता किसी व्यक्ति के सौहार्दपूर्ण तथा सम्माननीय गुणों के प्रति सकारात्मक धारणा से अथवा घनिष्ठ परिचय तथा प्रत्युपकार भावना से उत्पन्न स्नेह है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह संग चाहता है तथा बातचीत करना चाहता है।
वह मित्र बनाने की इच्छा करता है। वह बिना मित्रों के नहीं रह सकता है।
दो व्यक्ति लम्बे समय तक मित्रता बनाये नहीं रख सकते हैं यदि वे एक-दूसरे के छोटे-छोटे दोषों, कमजोरियों अथवा दुर्बलताओं को क्षमा नहीं कर सकते हैं। ईमानदार तथा सच्चे व्यक्तियों के साथ मित्रता लाभदायक होती है। दम्भी, कपटी, झूठे तथा कुटिल व्यक्ति की मित्रता हानिकारक होती है।
किसी से भी मित्रता करने में शीघ्रता मत करिए। एक बार यदि आपने किसी से मित्रता स्थापित की है, तो उसमें दृढ़ एवं स्थिर रहिए। अपने परिचितों एवं मित्रों को सदैव बदलते मत रहिए।
सच्चे मित्र इस संसार में दुर्लभ हैं। आप स्वार्थी मित्रों की प्रचुरता पायेंगे। आपके हृदय का अन्तर्वासी, अन्तर्यामी तथा आन्तरिक शासक ही आपका एकमात्र सच्चा एवं अमर मित्र है।
आप अनेक मनुष्यों की मित्रता को मात्र बाहरी दिखावा ही पायेंगे। झूठी मित्रता शीघ्र ही समाप्त हो जाती है, परन्तु सच्ची मित्रता नया जीवन तथा उत्साह देती है।
आवश्यकता के समय सहायक होने वाला मित्र ही वास्तविक मित्र है। समृद्धि की । अपेक्षा विपत्ति के समय मित्र के पास जाने को तत्पर रहिए।
सच्ची मित्रता अनन्त एवं अमर होती है।
मित्रता एक सुकोमल वस्तु है तथा यह किसी अन्य सुकोमल वस्तु के समय ही सावधानी की अपेक्षा करती है। सावधान रहिए। इसे विकसित होने दीजिए।
आपका मित्र वह होना चाहिए जिसकी समझ, गुणों तथा विचारों में आप पूर्ण विश्वास रखते हों।
जिसने नौ मित्रों को खो दिया है, उसके दसवें मित्र मत बनिए।
एक अच्छा सद्गुणी मनुष्य ही आपका उत्तम मित्र होगा। उसे तुरन्त मित्र बनाइए। जीवन के अन्त तक उससे मित्रता बनाये रखिए। उसके परामर्श तथा मित्रता से आप अत्यधिक लाभान्वित होंगे। वह आपकी सहायता करेगा, मार्गदर्शन करेगा तथा सेवा करेगा।
एक सच्चा, वास्तविक मित्र आपको उचित परामर्श देगा, हर परिस्थिति में आपकी सहायता करेगा, विपत्ति के समय साहसपूर्वक आपकी रक्षा करेगा तथा सतत आपका मित्र बना रहेगा।
सच्ची मित्रता जीवन के मधुरतम सुखों में से एक है।
कुटिल, लोभी, दुष्ट तथा निम्न प्रकृति के व्यक्तियों के मध्य हुई मित्रता अधिक समय तक नहीं रहती है।
समृद्धि के समय नहीं अपितु विपत्ति के समय मित्रता की श्रेष्ठता का ज्ञान होता है। एक सच्चा मित्र सदैव ही प्रेम करता है।
सच्चे मित्रों के मध्य ही सच्चा एवं स्थायी प्रेम, सामंजस्य तथा सद्भावना होते हैं।
मित्रता प्रसन्नता को दुगुना कर उसमें वृद्धि करती है तथा दुःख को बाँट कर उसे कम कर देती है।
मित्रता आपसी आदर एवं सम्मान पर आधारित गहरा, प्रशान्त तथा स्थायी प्रेम है। मित्रता सदैव अन्योन्याश्रित होती है। कभी एकतरफा मित्रता नहीं होती है।
मित्रता के समय गहरा लगाव न रखते हुए मात्र सौहार्दपूर्ण भावना रखना मैत्री (Friendliness) है।
स्नेह (Affection) स्वाभाविक होता है। मित्रता विकसित होती है। मित्रता में कुछ अंश तक समानता अपेक्षित है।
सौजन्यता (Comity) एक-दूसरे के अधिकार का सम्मान करते हुए आपसी शिष्टाचार है। सौहार्द (Amity) मैत्रीपूर्ण भावना एवं सम्बन्ध है, विशेष मित्रता नहीं यथा राष्ट्रों के मध्य सौहार्द अथवा पड़ोसी देशों के मध्य सौहार्द।
मित्रता प्रेम से अधिक बौद्धिक तथा कम भावनात्मक होती है। प्रेम की अपेक्षा मित्रता के कारण देना सरल होता है। मित्रता अधिक शान्त एवं प्रशान्त होती है, प्रेम अधिक प्रबल होता है। प्रेम प्रायः गहनतम रूप को प्राप्त करता है। हम मित्रता की गहनता के विषय में नहीं कह सकते हैं।
एक मित्र वह है जो अपने मित्र से स्नेह से बँधा हुआ है, जो उसके प्रति आदर तथा सम्मान के भाव रखता है, उसकी संगति की आकांक्षा करता है तथा उसकी प्रसन्नता तथा समृद्धि को बढ़ाने का प्रयास करता है।
बिना विश्वास के मित्रता नहीं हो सकती है तथा बिना सत्यनिष्ठा के विश्वास उत्पन्न नहीं होता है।
मितव्ययिता किफायत अथवा कुशलतापूर्वक की गयी व्यवस्था है। मितव्ययिता धन, वस्तु, सामग्री के सम्बन्ध में की गयी विवेकपूर्ण व्यवस्था है। यह अच्छी अर्थव्यवस्था अथवा गृहव्यवस्था है।
मितव्ययिता एक निर्धन मनुष्य को धनी बनाती है। मितव्ययिता रोपित कर आप स्वतंत्रता की एक सुनहरी फसल प्राप्त कर सकते हैं।
मितव्ययी बनिए, परन्तु कृपण अथवा कंजूस मत बनिए।
मितव्ययिता एक गुण है परन्तु कृपणता अथवा कंजूसी दुर्गुण है।
धन की प्राप्ति श्रम तथा मितव्ययिता पर आधारित है। धन तथा समय का अपव्यय मत करिए। दोनों का सदुपयोग करिए।
मितव्ययिता के बिना कोई धनवान नहीं बन सकता है, और इसे अपनाने पर बहुत कम निर्धन होंगे।
जीवन में अनावश्यक सुख-साधनों का त्याग करिए। सरल बनिए। 'सादा जीवन' तथा उच्च विचार के आदर्श को अपनाइए। आप अभाव से मुक्त होंगे। आप आनन्द का अनुभव करेंगे।
मितव्ययिता विवेक की पुत्री, संयम की बहिन तथा स्वतन्त्रता की जननी है।
जो व्यक्ति अपव्ययी है, खर्चालु है, वह शीघ्र ही निर्धन होगा। वह दूसरों पर आश्रित हो जायेगा। वह भ्रष्ट हो जायेगा।
अपने साधनों का बुद्धिमत्तापूर्ण तथा सावधानीपूर्ण प्रबन्ध ही मितव्ययिता है।
कृपणता धन एकत्र करने के उद्देश्य से स्वयं को तथा अन्यों को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं एवं सुविधाओं से वंचित रखना है।
किफायत (Economy) व्यवस्था करती है, मितव्ययिता (Frugality) धन बचाती है, दूरदर्शिता (Providence) योजना बनाती है तथा अल्पव्ययिता (Thrift) उपयुक्त समय में खर्च करने के उद्देश्य से उपार्जित करती है तथा बचाती है।
अपव्यय, फिजूलखर्ची एवं खर्चीलापन मितव्ययिता के विपरीतार्थी शब्द हैं।
उदारता दानशीलता अथवा विशालहृदयता की प्रकृति है। आत्मोत्सर्ग उदारता का सारतत्त्व है। एक उदार मनुष्य दानशील होता है।
उदारता मुक्तहस्त से देने अथवा हृदय से देने का स्वभाव है। यह दयालुतापूर्वक तथा मुक्तहस्त देने का कार्य अथवा अभ्यास है। यह उपकारिता अथवा महामनस्कता है। एक उदार मनुष्य का हृदय विशाल तथा दयापूर्ण होता है। उसकी दानशीलता अतिरेक रूप से प्रवाहित होती है।
एक उदार मनुष्य उदात्त प्रकृति अथवा स्वभाव से युक्त होता है। वह अपने से निम्न के प्रति नम्रता तथा शिष्टतापूर्वक व्यवहार करता है।
उदारता उच्च कुलीनता की साथी है। एक उदार मनुष्य सदैव देता ही रहता है। उसका हृदय सहानुभूति से आपूरित रहता है। सहानुभूति तथा परोपकारिता, उदारता के सेवक है।
जीवन में की गयी उदारता मृत्यु काल की उदारता से भिन्न होती है। प्रथम वास्तविक दानशीलता एवं परोपकारिता से तथा द्वितीय गर्व अथवा भय से उत्पन्न होती है।
वदान्यता, महामनस्कता, विशालहृदयता, उदारचरितता एवं उपकारिता उदारता के समानार्थी शब्द हैं।
उदार (Generous) शब्द दानी मनुष्य के आत्मोत्सर्गपूर्ण हार्दिकता को अभिव्यक्त करता है तथा प्रचुर (Liberal) शब्द उपहार की मात्रा को। हृदय की दयालुता के कारण मनुष्य उदार होता है और वह दोषी को सजा देने की अपेक्षा उसके कल्याण में प्रसन्न होता है।
एक बालक एक सेब के उपहार द्वारा स्वयं की उदारता (Generosity) प्रदर्शित कर सकता है, एक लखपति प्रचुर (Liberal) दान करता है। एक वदान्य (Munificent) उपहार मात्रा की दृष्टि से विशाल होता है चाहे दानी का उद्देश्य कुछ भी रहा हो। निःस्वार्थता आत्म त्याग को इंगित करती है। एक मनुष्य अपनी आत्मा की महानता से महामनस्क (Magnanimous) कहलाता है अर्थात् वह अपमान एवं आघात से ऊपर उठ चुका है।
अनुदार, तुच्छ, कृपण, कंजूस एवं अधम प्रकृति उदार प्रकृति के विपरीतार्थी शब्द हैं।
सौम्यता स्वभाव तथा आचार में मृदु, नम्र एवं शिष्ट होने का गुण अथवा अवस्था है।
यह भाव की कोमलता है। यह प्रेम तथा सम्मान है। यह सहानुभूति है।
सौम्यता स्वभाव की मधुरता है। यह मृदुलता है। यह विनीतता है। यह कठोरता का अभाव है।
एक सौम्य मनुष्य सुशील, शान्त तथा शिष्ट होता है। वह विनम्र आचरणयुक्त होता है। वह कठोरता तथा अभद्रता से मुक्त होता है। वह मधुर तथा मृदु होता है। आपके आचरण में जो भी आपत्तिजनक है, सौम्यता उसका परिष्कार करती है।
यदि एक मनुष्य सौम्य है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह कमजोर अथवा असमर्थ है। केवल शक्तिशाली मनुष्य ही वास्तव में सौम्य हो सकता है। सौम्यता के समान शक्तिशाली कोई नहीं है। अभद्रता अथवा कठोरता दुर्बलता, अज्ञान, अशिष्टता तथा अनुभव की कमी का लक्षण है।
सौम्यता शक्ति है।
'सौम्य'(Gentle) शब्द से मूल स्वभाव परिलक्षित होता है: 'वश्य' (Tame) से अभिप्राय है वह स्वभाव जिसे प्रशिक्षण द्वारा नियन्त्रित किया गया है; मृदुल ऐसा स्वभाव है जो सरलता से उद्वेलित नहीं किया जा सकता है तथा 'विनीत ( वह स्वभाव है जो अनुशासन अथवा पीड़ा द्वारा कोमलता तक प्रशिक्षित किया गया है।
भगवान् भलाई के सर्वोत्कृष्ट रूप हैं।
भलाई एक गुण है, श्रेष्ठता है तथा परोपकारिता है। भलाई किसी भी प्रकार से भला अथवा अच्छा होने का गुण है, विशेषतः यह दवा, परोपकारिता, नैतिकता आदि गुणों से सम्पन्न होना है। भलाई परोपकारिता, करुणा अथवा दया का कार्य है।
यदि आप मानवता का भला करते हैं, तो आप देवताओं के समकक्ष हो जाते हैं। "भले बनो, भला करो।" सम्पूर्ण नीतिशास्त्र एवं सदाचरण इस उक्ति में निहित है। यदि आप इसका अभ्यास करेंगे, तो शीघ्र ही भगवद्-साक्षात्कार प्राप्त करेंगे।
एक भला मनुष्य सदैव भगवान् के साथ रहता है। वह भगवान् में ही रहता है। उसमें दिव्यता वास करती है।
एक भला मनुष्य, जो भले कार्य करता है, यश तथा दीर्घ जीवन प्राप्त करता है। एक भला कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाता है। यह हृदय को शुद्ध करता है तथा दिव्य प्रकाश एवं दिव्य कृपा की प्राप्ति की ओर ले जाता है।
शिष्टता का बीज बोने वाला मित्रता का फल प्राप्त करता है तथा दया का बीज रोपित करने वाला प्रेम का फल प्राप्त करता है।
भलाई 'प्रेम' का क्रियान्वित रूप है। भला होना, भद्र होना है।
भलाई महानतम गुण है। प्रत्येक अच्छा कार्य अमरत्व अथवा शाश्वत जीवन प्राप्ति का बीज है। सम्पूर्ण विश्व के कल्याण हेतु कार्य करिए। विश्व की एकता के लिए कार्य करिए।
सदा सर्वदा, प्रत्येक स्थान पर जितने अधिक मनुष्यों की जितनी अधिक भलाई, जितने अधिक प्रकार से आप कर सकते हैं, उसे पूर्ण उत्साह, शक्ति, प्रेम तथा रुचि के साथ करिए।
बुराई के बदले भलाई करिए। यह सच्चे मनुष्य का लक्षण है। प्रेम प्रेम को उत्पन्न करता है, घृणा घृणा को।
दूसरों की भलाई करने तथा उन्हें प्रसन्न करने से आपको भी भलाई एवं प्रसन्नता प्राप्त होती है।
भलाई बुराई पर विजय है। यह बुराई का अभाव नहीं है।
भलाई जीवन को आशीर्वाद बनाती है। भलाई आपके जीवन में निश्चित रूप से सफलता एवं समृद्धि लायेगी।
भला करना मनुष्यत्व है। भला बनना देवत्व है।
थोड़ा आत्म-त्याग एवं सच्ची सेवा, प्रसन्नता, प्रोत्साहन, सहानुभूति एवं दया के कुछ शब्द, थोड़े दयापूर्ण एवं भले कार्य, प्रलोभनों पर कुछ शान्त विजयें- ये सब शाश्वत आनन्द एवं शान्ति तथा अमरत्व प्राप्ति में सहायक होंगे।
राष्ट्र तथा जनसमुदाय भलाई के नियमों का पालन नहीं करते हैं। अतः वर्तमान विश्व कई प्रकार की बुराइयों से आक्रान्त है।
कारण एवं कार्य का नियम अत्यन्त कठोर तथा अटल है। आप कष्ट, निर्धनता, दुःख एवं पीड़ा की फसल प्राप्त करते हैं क्योंकि भूतकाल में आपने बुराई के बीज बोये हैं। अच्छाई के बीज बोने से आप समृद्धि एवं आनन्द की फसल प्राप्त करते हैं। इस नियम को समझने का प्रयास करिए। इसके बाद आप केवल अच्छाई के बीज ही बोयेंगे।
अच्छे, उच्च तथा दिव्य विचारों को रखिए। बुरे विचारों के विरुद्ध अपने मन के द्वार उसी प्रकार बन्द रखिए, जिस प्रकार आप शत्रुओं, चोर-डाकुओं के विरुद्ध घर के द्वार बन्द रखते हैं। सदैव भले कार्य करिए। अब बुराई आपके मन में प्रवेश नहीं कर सकती है।
अच्छी आदतों को अपनाइए। भलाई एक आदत है। इसके बिना मनुष्य जानवर अथवा कीड़ा है। ऐसा मनुष्य अनिष्टकर, कष्टप्रद एवं घृणास्पद है। वह इस पृथ्वी पर बोझ है।
थोड़े अच्छे विचार तथा थोड़े भले कार्य भी अत्यधिक लाभदायक हैं। ये आपको शाश्वत आनन्द की ओर ले जायेंगे। तब, थोड़े अच्छे विचार एवं अच्छे कार्य करने का प्रयास क्यों नहीं करें?
१. ऐसा उदारमना व्यक्ति जो सदैव संसार का भला करता है तथा उच्च दिव्य विचारों को धारण करता है, विश्व के लिए आशीर्वाद है।
२. भले कार्य करने वाले तथा अच्छे, प्रिय एवं मधुर शब्द बोलने वाले कोई शत्रु नहीं होता है। यदि आप वास्तव में आध्यात्मिक विकास एवं मोक्ष चाहते हैं, तो उन मनुष्यों का भला करिए जो आपको चोट पहुँचाने अथवा विष देने का प्रयास करते हैं।
३. पवित्रता ज्ञान तथा अमरत्व की ओर ले जाती है। पवित्रता दो प्रकार की होती है-आन्तरिक अथवा मानसिक और बाहरी अथवा शारीरिक। मानसिक पवित्रता अधिक महत्त्वपूर्ण है। शारीरिक पवित्रता भी आवश्यक होती है। आन्तरिक-मानसिक पवित्रता द्वारा मन की प्रफुल्लता, एकाग्रता, इन्द्रियों पर विजय तथा आत्मसाक्षात्कार हेतु योग्यता प्राप्त होती है।
४. पवित्रता योगी का सर्वश्रेष्ठ आभूषण है। यह एक सन्त की सर्वश्रेष्ठ एवं महानतम निधि है। यह एक भक्त का सर्वश्रेष्ठ धन है।
५. करुणापूर्ण कार्यों तथा दयापूर्ण सेवा का अभ्यास हृदय को पवित्र एवं कोमल बनाता है, हृदय-कमल को ऊर्ध्वमुखी कर साधक को दिव्य प्रकाश की प्राप्ति योग्य बनाता है।
६. जप, कीर्तन, ध्यान, दान तथा प्राणायाम सभी पापों को जला सकते हैं तथा हृदय को शीघ्र ही पवित्र बना सकते हैं।
७. सत्य उच्चतम ज्ञान है। जनसमुदाय के समर्थन बिना भी सत्य का अस्तित्व रहता है। सत्य शाश्वत है। सत्य का शासन सर्वोच्च है। सत्यभाषी एवं पवित्र मनुष्यों की मृत्यु नहीं होती है अर्थात् वे जन-जन के हृदयों में जीवित रहते हैं। असत्यभाषी एवं वासनायुक्त मनुष्य मृतवत् ही हैं।
८. यदि आप आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपका मन पवित्र होना चाहिए। जब तक मन समस्त इच्छाओं, तृष्णाओं, चिन्ताओं, मोह, गर्व, कामवासना, आसक्ति तथा राग-द्वेष का त्याग नहीं करता है, वह परम शान्ति तथा परमानन्द अथवा अमरपद के साम्राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता है। ९. मन की तुलना एक उद्यान से की जाती है। जिस प्रकार आप भूमि को जोत कार एवं खाद डाल कर, काँटों एवं खरपतवार को हटा कर तथा पौधों एवं वृक्षों का जल से सिंचन कर अच्छे फूल एवं फल प्राप्त कर सकते हैं, उसी प्रकार आप मन की अशुद्धियों राधा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद को दूर कर तथा दिव्य विचारों के जल से सिंचन कर अपने हृदय के उद्यान में भक्ति का पुष्प विकसित कर सकते हैं। खरपतवार तथा काँटे वर्षा ऋतु में विकसित होते हैं तथा ग्रीष्म में अदृश्य हो जाते हैं लेकिन उनके बीज भूमि के नार्य ही रहते हैं। ज्यूँ ही वर्षा होती है, बीज पुन: अंकुरित हो जाते हैं। इसी प्रकार मन की वृत्तियाँ चेतन मन की सतह पर प्रकट होती हैं, तत्पश्चात् अदृश्य हो जाती हैं और सूक्ष्म बीज-अवस्था अर्थात् संस्कार का रूप धारण कर लेती हैं तथा आन्तरिक अथवा बाहरी उत्प्रेरक प्राप्त होने पर पुनः वृत्तियाँ बन जाती हैं। जब उद्यान स्वच्छ होता है, जब वहाँ खरपतवार एवं काँटे नहीं होते हैं, आप अच्छे फल प्राप्त कर सकते हैं। उसी प्रकार जब मन एवं हृदय पवित्र होते हैं, तब आप गहन ध्यान रूपी फल प्राप्त कर सकते हैं। अतः सर्वप्रथम मन की मलिनताओं को दूर करिए।
१०. यदि आप प्रतिदिन थाली को साफ नहीं करते हैं, तो उसकी चमक खो जाती है। मन के साथ भी ऐसा ही है। यदि प्रतिदिन ध्यान के अभ्यास द्वारा मन को स्वच्छ नहीं रखा जाता है, तो मन अशुद्ध हो जाता है।
११. सत्यभाषण मनुष्य को चिन्ताओं से मुक्त करता है तथा शान्ति एवं शक्ति प्रदान करता है।
१२. एक योगी की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योग्यता सत्यभाषण है। यदि सत्य तथा एक हजार अश्वमेध यज्ञ के फल को एक तराजू पर रख कर तौला जाये तो सत्य का ही पलड़ा भारी रहेगा।
१३. ईश्वर सत्य है। उनका साक्षात्कार सत्यभाषण तथा विचार, वचन एवं कर्म में सत्य के आचरण द्वारा किया जा सकता है।
१४. सत्यपरायणता, आत्म-नियन्त्रण, ईर्ष्यापूर्ण प्रतिस्पर्धा का अभाव, क्षमा, शालीनता, तितिक्षा, मात्सर्य का अभाव, दानशीलता, सहृदयता, निःस्वार्थ परोपकारिता, धीरता, करुणा एवं अहानिकरता-सत्य के तेरह प्रकार हैं।
१५. कुछ मनुष्य मानते हैं कि किसी की अत्यधिक भलाई के लिए बोला गया 'झूठ' सत्य ही है। मान लीजिए एक अधार्मिक राजा अकारण ही एक साधु को फाँसी का दण्ड देता है, उस साधु के जीवन को बचाने के लिए बोला गया झूठ सत्य ही है।
१६. प्रत्येक परिस्थिति में सत्यभाषण करने वाला योगी वासिद्धि प्राप्त कर लेता है। वह जो कुछ भी सोचता है अथवा बोलता है, वह सत्य हो जाता है। वह मात्र अपने विचार द्वारा कुछ भी कर सकता है।
१७. ''यह आत्मा सत्य के दृढ़ आचरण द्वारा प्राप्त की जा सकती है। सत्य से महान् कुछ भी नहीं है।" यह श्रुतियों की घोषणा है। युधिष्ठिर तथा सत्यव्रती हरिश्चन्य है। जीवन को देखिए। अत्यन्त घोर संकट के समय भी उन्होंने सत्य का त्याग नहीं किया।
मनोहारिता रूप एवं आचरण की सहज चारुता है। औचित्य अथवा उपयुक्तता इसके लक्षण होते हैं। यह आत्मा की आन्तरिक समरसता की बाह्य अभिव्यक्ति है।
मनोहारिता आचरण की शिष्टता का गरिमायुक्त सौन्दर्य है।
मनोहारी व्यक्तित्व एक चिरस्थायी अनुशंसा पत्र है। एक मनोहारी मनुष्य दिखावे एवं आडम्बर से मुक्त होता है। उसका व्यक्तित्व गरिमायुक्त होता है। उसके विचार, वाणी एवं कर्म मर्यादित होते हैं।
एक मनोहारी मनुष्य शालीनता, लालित्य, सौन्दर्य, समरसता तथा सहजता द्वारा लक्षित होता है। उसकी आकृति, गति तथा भाषा प्रियकर होती है। उसका रूप, कार्य, मुखाकृति तथा भाषण मनोहारी होते हैं।
मनोहारी शब्द गति अथवा गति की सम्भावना सूचित करता है। सौन्दर्य शब्द पूर्ण स्थिरता के लिए प्रयुक्त होता है। मनोहारिता शब्द आँखों से दृश्यमान सौन्दर्य के लिए प्रयुक्त होता है यद्यपि हम प्रायः मनोहारी कविता अथवा प्रशंसोक्ति भी कहते हैं। मनोहारिता लालित्य युक्त रूपरेखा तथा अनुपात का प्रिय सामंजस्य है।
हम मनोहारी व्यवहार, मनोहारी वस्त्र कहते हैं। हम कहते हैं, "सीता का बोलना एवं चलना मनोहारी है" अर्थात् एक प्रकार की स्वाभाविक सहजता, मर्यादा तथा लालित्य से युक्त है।
कृतज्ञता उपकारी के प्रति हार्दिक सौहार्दपूर्ण भावना है।
कृतज्ञता उपकारक के प्रति आभार, दयालुता अथवा सद्भावना का भाव है, उससे प्राप्त लाभों के प्रति प्रशंसा का भाव है तथा उपकार अथवा सेवा का उचित प्रत्युपकार करने का स्वभाव है अथवा जब प्रत्युपकार नहीं किया जा सकता है तो उपकारी को समृद्ध तथा प्रसन्न देखने की इच्छा है।
कृतज्ञता एक कर्तव्य है जिसे अवश्य किया जाना चाहिए। यह धन्यवाद की शाब्दिक अभिव्यक्ति से बढ़ कर है। यह सज्जनता की सूचक है। यह सर्वश्रेष्ठ दैवीय सद्गुण है। यह एक भले तथा दयालु मनुष्य से प्राप्त लाभ की स्मृति मात्र नहीं है वरन् उसके भले कार्यों के लिए उसके प्रति हृदय की श्रद्धांजलि है।
कृतज्ञता सभी सद्गुणों में श्रेष्ठतम है तथा सभी कर्तव्यों में से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
जिस प्रकार एक नदी अपना समस्त जल सागर को दे देती है जिससे उसने यह जल प्राप्त किया, उसी प्रकार एक कृतज्ञ मनुष्य प्रत्युपकार करता है। वह अपने उपकारक के प्रति श्रद्धा एवं प्रेम रखता है। यदि वह प्रत्युपकार करने में असमर्थ है तो वह उस उपकार को अपनी स्मृति में सँजोये रखता है। वह उसे जीवनपर्यन्त नहीं भूलता है।
भगवान् आपके सृजनकर्ता हैं, उन्होंने आपको समस्त ऐश्वर्य प्रदान किये हैं, उनके प्रति कृतज्ञ बनिए। अपने हृदय के अन्तरतम से उन्हें भावपूर्वक प्रार्थना कीजिए। उनकी महिमा का गान करिए। निरन्तर उनका स्मरण कीजिए। उनके प्रति स्वयं को पूर्णतया समर्पित करिए, उनकी कृपा प्राप्त कर सदैव के लिए आनन्दित हो जाइए।
एक कृतघ्न मनुष्य संसार का सर्वाधिक दुःखी प्राणी है। उसकी दशा दयनीय, शोचनीय तथा दुःखद है। यह संसार कृतघ्न दुष्टों से भरा हुआ है।
कृतज्ञ बनिए। सभी आपकी प्रशंसा एवं सम्मान करेंगे। आप शान्ति तथा शाश्वत आनन्द की समृद्ध फसल प्राप्त करेंगे।
वीरता साहस अथवा हिम्मत है।
एक वीर शक्ति, साहस तथा वीरतापूर्ण कार्यों द्वारा पहचाना जाता है। उसे देवतुल्य समझा जाता है। एक वीर की मृत्यु उसे अधिक उच्च स्थान प्राप्त करा देती है। स्थानीय उत्सवों में उसकी पूजा की जाती है।
वीर विशिष्ट साहस से परिपूर्ण होता है। वह अत्यधिक निर्भीक होता है।
वीरता भय पर, दुःख के भय, मृत्यु के भय आदि पर आत्मा की वैभवशाली विजय है।
वीरता वीरोचित गुणों यथा उच्चादर्श, निर्भयता, दृढ़ संकल्प एवं धृति का समन्वित रूप है।
साहस (Courage) सामान्यतया संकटों से निर्भयता सूचित करता है। धृति (Fortitude) निष्क्रिय साहस है, यह संकटों, खतरों तथा कष्टों को शान्तिपूर्वक सहन करने का स्वभाव है।
युद्धक्षेत्र में अथवा प्रत्यक्ष प्रतिद्वन्द्वियों के साथ संघर्ष में साहस प्रदर्शन बहादुरी (Bravery) है।
निर्भीकता (Intrepidity) दृढ़ साहस है जो घोर संकटों के समय भी पीछे नहीं हटता है।
पराक्रम (Gallantry) एक प्रकार का रोमांचकारी साहस है जो भयंकर युद्ध के मध्य प्रदर्शित होता है। वीरता (Heroism) शब्द में साहस के इन सभी प्रकारों का समावेश हो सकता है।
विश्व ने प्रत्येक युग में अपने वीरों की पूजा की है परन्तु वीरता के मापदण्ड सदैव बदलते रहे हैं। आज वीरता का निर्धारण कार्य की अपेक्षा उसके पीछे निहित उद्देश्य के आधार पर किया जाता है।
ईमानदारी न्यायनिष्ठा, सत्यनिष्ठा, छलहीनता, निष्कपटता एवं स्पष्टवादिता है।
ईमानदारी एकमात्र वह सद्गुण है जिसके आधार पर एक व्यक्ति अथवा राष्ट्र का जीवन सुरक्षित रह सकता है। ईमानदारी, न्याय तथा सदाचार पर आधारित समाज ही स्थायी रह सकता है।
एक अपरिवर्तनीय नियम है-ईमानदारी। घर, ऑफिस, राजनीति, व्यवसाय, राजपथ, न्यायालयों, सभी सभाओं में एक ही वस्तु की आवश्यकता है-ईमानदारी।
ईमानदारी सर्वोत्तम नीति नहीं, वरन् सर्वोत्तम सद्गुण है। यह सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है।
ईमानदारी न्याय तथा नैतिक औचित्य के साथ संगतता है।
ईमानदारी न्याय तथा सम्मान्य व्यवहार के अनुसार कार्य करने का स्वभाव है। सामान्यतया यह आचरण की निष्कपटता है। यह न्याय, निष्पक्षता एवं सत्यनिष्ठा है।
उच्च चिन्तन का आधार पूर्ण ईमानदारी है।
एक ईमानदार मनुष्य स्पष्टवादिता, सत्यता एवं निष्कपटता द्वारा जाना जाता है। वह विश्वसनीय, सच्चा, स्पष्टवादी तथा निष्कपट होता है। दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हुए कार्य करना उसका स्वभाव होता है, विशेषतया व्यवसाय तथा सम्पत्ति सम्बन्धित विषयों में। वह आत्मसम्मान के अनुदेशों का पालन करता है जो कि व्यावसायिक कानून की किसी आवश्यकता अथवा लोकमत से ऊँचा स्थान रखते हैं। वह अपनी दिव्य आत्मा की गरिमा के विरुद्ध कुछ कार्य नहीं करेगा। वह चोरी नहीं करता है, किसी को धोखा नहीं देता है। वह किसी स्थिति का अनुचित लाभ नहीं उठाता है।
जो मनुष्य उच्चतम एवं पूर्णतम रूप से ईमानदार है, वह अपने विचारों में भी सत्य तथा उचित का पालन करने के प्रति अत्यन्त सावधान रहता है।
धोखा, बेईमानी, विश्वासघात, छल-कपट, असत्य तथा आडम्बर ईमानदारी के विपरीतार्थक शब्द हैं।
ईमानदारी के बिना योग में सफलता तथा आध्यात्मिक उन्नति सम्भव नहीं है।
कुछ अच्छा प्राप्त करने की इच्छा अथवा यह विश्वास कि वह प्राप्तव्य है, आशा है। आशा पूर्वापेक्षा है।
आशा उत्प्रेरक है। आशा एक शक्तिवर्द्धक रसायन है। मनुष्य इस धरा पर आशा के सहारे रहता है। वह आत्मसुधार की आशा करता है। वह ऐसा कुछ प्राप्त करने की आशा करता है जो उसे सान्त्वना, तृप्ति, सुख, शान्ति, आनन्द तथा अमरत्व प्रदान करेगा।
आशा के अभाव में महान् कार्य नहीं किये जा सकते हैं, यहाँ तक कि बिना आशा के अल्प सफलता भी प्राप्त नहीं की जा सकती है।
आशा आत्मा की प्राणशक्ति है। आशा आपको बल देती है। आशा आपको प्रयत्न करने, संघर्ष करने तथा लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।
मनुष्य सदैव कुछ प्राप्त करने की आशा करता है तथा स्वयं को अच्छे से अच्छा बनाना चाहता है। मन की स्वाभाविक उड़ान एक आशा से दूसरी आशा तक है।
निराश मत होइए। हताश मत होइए। प्रत्येक सुबह नया जीवन आरम्भ होता है। भूतकाल की ओर मत देखिए। सदैव आशावादी रहिए। आप सफलता प्राप्त करेंगे।
आशा आपकी मित्र है। आशा सफलता की जननी है। आशा आपका अवलम्ब है,
यह आपको प्रसन्नता प्रदान करती है। आशा आपको भव्यता की उदात्त ऊँचाइयों की ओर अभिप्रेरित करती है। यह अनुकूल पथ द्वारा जीवन व्यतीत करने में सहायक होती है। आशा प्रेरित तथा उत्साहित करती है। यह आपको सरल एवं सुखद मार्ग द्वारा आपकी यात्रा के लक्ष्य तक पहुँचाती है।
इस विश्व में प्रत्येक पुरुष अथवा स्त्री का जीवन आशा पर आश्रित है। चिकित्साविज्ञान का विद्यार्थी एक सफल एवं प्रसिद्ध चिकित्सक बनने की आशा करता है। एक युवती एक सुन्दर, बुद्धिमान एवं धनी पुरुष से विवाह की आशा करती है। एक व्यापारी करोड़पति बनने की आशा करता है। एक मुंसिफ जिला न्यायाधीश बनने की आशा करता है।
हृदय ही वह अंग है जो सबसे अन्त में कार्य करना बन्द करता है। इसी प्रकार मनुष्य में आशा ही वह तत्त्व है जिसकी सबसे अन्त में मृत्यु होती है।
आपका जीवन उस पर अवलम्बित नहीं है जो आपके पास है, वरन् उस पर अवलम्बित है जिसकी आप आशा करते हैं।
आशा (Hope) वह है जो सदैव अभिनन्दनीय अर्थात् सुखद है। प्रत्याशा (Expectation) अथवा उम्मीद प्रिय अथवा अप्रिय होती है। विश्वास तथा भरोसा उस व्यक्ति अथवा वस्तु पर आपकी निर्भरता को प्रकट करता है जिससे आप अपनी इच्छानुसार परिणाम चाहते हैं।
आशा के वचन अत्यन्त मधुर हैं। जो आशा करता है, वह स्वयं अपनी सहायता करता है। व्यर्थ आशाओं का त्याग करिए। सम्भाव्यता की सीमा से परे की आशा मत कीजिए।
हे हृदय! आशावान बनो!
हे शुभ आशा ! तुम्हारे सुन्दर उद्यान में सफलता एवं प्रसन्नता के पुष्प खिलते हैं।
आतिथ्य बिना फलांकाक्षा के अतिथियों तथा अपरिचितों का दयालुतापूर्वक स्वागत-सत्कार करने की भावना, अभ्यास अथवा कला है। एक सत्कारशील मनुष्य उदार तथा दानशील होता है।
आतिथ्य अतिथि यज्ञ है। यह उन पाँच यज्ञों में से एक है जो गृहस्थियों द्वारा प्रतिदिन सम्पन्न किये जाने चाहिए।
सत्कारशील मनुष्य विश्व में दुर्लभ है। अधिकांश मनुष्य अपने गृहों के दरवाजे बन्द कर लोभपूर्वक एवं मूर्खतापूर्वक स्वयं की उदरपूर्ति में लगे रहते हैं।
आतिथ्य स्वर्ग अथवा उच्चतर आनन्दपूर्ण लोकों को ले जाने वाला सीधा मार्ग है।
यदि धनी मनुष्य सत्कारशील हो जायें, तो इस विश्व में दुःख कम हो जायेंगे।
निर्धनों के प्रति अतिथि-सत्कार की भावना बनाये रखी जाये।
यद्यपि आप महान् विद्वान् हैं, आपको विनम्र होना चाहिए। एक विद्वान् मनुष्य, जो विनम्र भी है, सभी के द्वारा सम्मानित होता है।
यदि आप नल के माध्यम से जल पीना चाहते हैं, तो आपको झुकना होगा। इसी प्रकार यदि आप अमरत्व की आध्यात्मिक-सुधा का पान करना चाहते हैं, तो आपको झुकना होगा, विनीत तथा विनम्र बनना होगा।
विनम्रता सर्वश्रेष्ठ सद्गुण है। "विनीत मनुष्य धन्य हैं क्योंकि वे ही पृथ्वी का साम्राज्य प्राप्त करेंगे।" (सेंट मैथ्यू-अध्याय ५-५१) आप एकमात्र इस सद्गुण का विकास करके अपने अहंकार का नाश कर सकते हैं। आप समस्त विश्व को प्रभावित कर सकते हैं। आप चुम्बकवत् अनेक मनुष्यों को अपनी ओर आकर्षित कर पायेंगे। विनम्रता सच्ची होनी चाहिए। झूठी विनम्रता पाखण्ड है। यह स्थायी नहीं होती है।
जब आप पूर्ण विनम्र बनते हैं, तो ईश्वर आपकी सहायता करते हैं। अतः इस सद्गुण का अत्यधिक मात्रा में विकास करिए। विनम्रता का मूर्तिमन्त रूप बनिए।
विनम्रता से श्रेष्ठ कोई अन्य सद्गुण नहीं है। मात्र इस एक सद्गुण के द्वारा आप मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। विनम्रता अहंकार का नाश करती है तथा समभाव, आत्मनियन्त्रण, मानसिक शान्ति, अच्छी निद्रा और विश्राम, समस्त प्राणियों में आत्म भाव अथवा नारायण भाव तथा अन्ततः आत्म-साक्षात्कार अथवा विष्णुपदम् की प्राप्ति कराती है।
यह परिश्रमी होने का गुण है। यह उद्यमशीलता है। यह श्रम, अध्ययन अथवा लेखन में सतत संलग्नता है।
कर्मठ प्रकृति का मनुष्य परिश्रमी होता है। वह अत्यधिक श्रमशील होता है।
कर्मठता आलस्य, अकर्मण्यता एवं प्रमाद के विपरीत है।
एक कर्मठ मनुष्य सर्वोत्तम फल तथा सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार अर्जित करता है।
कर्मठता आपमें क्षमताओं के अभाव को दूर करेगी, आपकी प्रतिभाओं को और अधिक निखारेगी।
महान् पुरुषों ने प्रखर बुद्धि के बल पर नहीं अपितु अपनी कर्मठता-परिश्रम से महानता प्राप्त की है।
सम्पत्ति एवं समृद्धि परिश्रम तथा मितव्ययिता पर निर्भर है।
परिश्रम से सब कुछ सरल हो जाता है। इसे सदा विजय प्राप्त होती है। एक परिश्रमी मनुष्य कभी भूखा नहीं रहेगा। निर्धनता एवं असफलता से वह अपरिचित होता है।
परिश्रम शरीर को स्वस्थ एवं मजबूत, मन को निर्मल, हृदय को परिपूर्ण और पर्स को भरा हुआ रखता है।
परिश्रमी स्वभाव प्रसन्नता-प्रफुल्लता देता है, बुरी प्रवृत्तियों एवं आदतों का नाश करता है तथा आपकी उपलब्धियों को आनन्ददायक बना देता है।
हम सामान्य बोलचाल की भाषा में कहते हैं- "श्रीमान् ठक्कर एक कर्मठ कार्यकर्ता हैं; श्रीमान् बनर्जी एक कर्मठ साहित्यकार है। "
अँगरेजी भाषा के कवि गोल्डस्मिथ अपनी एक रचना 'द ट्रेवलर' में कहते हैं-
"प्रत्येक हृदय में हो परिश्रमशील भाव
परिश्रम करता सृजन उन्नति के प्रति प्रेम का।"
परिश्रमी बनिए तथा सफलता एवं समृद्धि प्राप्त करिए।
यह किसी कार्य को प्रारम्भ करने की शक्ति अथवा उपक्रम है। यह प्रारम्भिक कदम होता है। यह प्रथम कार्य का सम्पादन है। यह आरम्भ अथवा शुरुआत है। हम कहते हैं, "रमा ने इस भले कार्य को प्रारम्भ किया।”
पहल-शक्ति नये कार्य अथवा उद्योग को प्रारम्भ करने की अभिवृत्ति है। किसी भी उद्योग में यह प्रथम सक्रिय प्रक्रिया है। यह कार्य का नेतृत्व करने की शक्ति है।
अधिकांश व्यक्तियों में पहल-शक्ति का अभाव होता है क्योंकि वे कायर, संकोची एवं आलसी होते हैं। उनमें कार्य-कौशल, उत्साह, संकल्पशक्ति, सजगता, परिश्श्रमशीलता, अध्यवसायिता तथा साहस नहीं होता है। इसलिए वे जीवन में असफल रहते हैं।
साहसी बनिए। कुशल बनिए। सजग रहिए। अध्यवसायी बनिए। धैर्यशील बनिए। आपमें भी पहल-शक्ति उत्पन्न होगी तथा आप अपने समस्त प्रयासों में सफलता प्राप्त करेंगे।
प्रेरणा एक श्रेष्ठ एवं उन्नयनकारी दिव्य प्रभाव है। यह आध्यात्मिक उपदेशकों तथा लेखकों पर परमात्मा का अलौकिक दिव्य प्रभाव है जिसके माध्यम से उनकी रचनाओं एवं कृतियों को दिव्य सत्ता प्रदान की जाती है।
इस दिव्य प्रेरणा से ही मसीहा, धर्मदूत, सन्त तथा पवित्र लेखक दिव्य सत्यों को अमिश्रित एवं त्रुटिरहित रूप से उद्घाटित करने हेतु योग्य बनते हैं।
यह मन को दिये गये सुझावों-संस्कारों के माध्यम से ईश्वरीय इच्छा का मानवीय बुद्धि के साथ सम्पर्क है जिससे उनके दिव्य स्रोत की सत्यता पर कोई सन्देह शेष नहीं रहता है।
समस्त पावन धर्मग्रन्थ भगवद् प्रेरणा से ही हमें प्राप्त हुए हैं।
प्रेरणा अध्यात्मिक शक्ति अथवा परमात्मा द्वारा विचारों अथवा कवित्व का सम्प्रेषण है। प्रेरणा आध्यात्मिक अक्षय निधि है। यह प्रसन्नता, शान्ति एवं शाश्वत आनन्द प्रदान करती है।
एक भगवद्-प्रेरित कृति पापियों, नास्तिकों तथा संशयवादियों में भगवसत्ता के प्रति विश्वास उत्पन्न करती है तथा उन्हें परिवर्तित कर देती है। यह आस्तिकों को सान्त्वना देती है एवं उन्हें उन्नत करती है। यह उन्हें मोक्ष अथवा परमानन्द प्राप्ति हेतु तैयार करती है। यह मोक्षमार्ग हेतु एक सुरक्षित, अचूक एवं विश्वसनीय पथप्रदर्शक है।
ऐसी कृति भव्य, पावन, शक्तिशाली तथा स्पष्ट होती है। यह कृति भगवद वाणी ही है।
न्यायनिष्ठा चरित्र की ईमानदारी अथवा पवित्रता है। यह वास्तविक महानता के और प्रथम कदम है। एक न्यायनिष्ठ व्यक्ति सबके द्वारा आदर-सम्मान प्राप्त करता है। मा उसमें विश्वास रखते हैं।
आत्मत्याग के मूल्य पर न्यायनिष्ठा बनाये रख सकते हैं। इसके विरोधी सम्भावना है, परन्तु इसका परिणाम महान् होता है। समस्त विश्व इसके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करेगा।
न्यायनिष्ठा में सम्पूर्ण नैतिक चरित्र समाहित है परन्तु यह कुछ विशेष प्रसंगों में यदा पारस्परिक लेन-देन, सम्पत्ति एवं शक्ति के हस्तान्तरण आदि में परिलक्षित होती है। न्यायनिष्ठा की नैतिक महिमा विश्व की सर्वाधिक उच्च वस्तु है।
अन्तःप्रज्ञा आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से आत्मा का मनसातीत अपरोक्ष ज्ञान है। यहाँ तार्किकता का स्थान नहीं है। बुद्धि यहाँ कार्य करना बन्द कर देती है। यहाँ कोई ऐन्द्रिक-संवेदना नहीं है। अन्तःप्रज्ञा सापेक्षिक-जगत् से परे है।
यह एक आन्तरिक आध्यात्मिक अनुभव है जिसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता है। भाषा अपूर्ण है; यह इस परिपूर्ण, अनिर्वचनीय, अलौकिक अनुभव को व्यक्त नहीं कर सकती है। शब्द मात्र परम्परागत होते हैं।
आप भगवद्-साक्षात्कार अथवा आत्म-साक्षात्कार केवल अन्तः प्रज्ञा के माध्यम से ही कर सकते हैं।
अन्तःप्रज्ञा के समक्ष सब कुछ स्पष्ट होता है। समस्त सन्देह पूर्णतया समाप्त हो जाते हैं।
किसी माध्यम से अर्जित परोक्ष ज्ञान की तुलना में अन्तःप्रज्ञा प्रत्यक्ष ज्ञान है। अन्तःप्रज्ञा के माध्यम से साधक बिना किसी तर्क अथवा विश्लेषण के वस्तुओं के सत्य को जानता है।
अन्तःप्रज्ञा अन्तःस्फूर्त ज्ञान है। प्रथमतः अन्तःप्रज्ञा की एक किरण उद्भासित होती है। इसके पश्चात्, मुमुक्षु अपनी आत्मा में संस्थित हो जाता है। ज्ञान-चक्षु द्वारा परम तत्त्व का अपरोक्षानुभव अन्तःप्रज्ञा है। यह इन्द्रियों एवं बुद्धि
द्वारा वस्तु-पदार्थों के ज्ञान के विपरीत है। अन्तःप्रज्ञा तर्कातीत है परन्तु तर्क विरोधी नहीं है। ऐन्द्रिक एवं बौद्धिक शक्ति के बिना आन्तरिक अवबोध द्वारा प्राप्त सत्य अन्तःप्रज्ञा है।
व्यक्त एवं अव्यक्त ब्रह्माण्ड में अन्तर्निहित दिव्य सत्ता की अपरोक्षानुभूति अन्तःप्रज्ञा है।
ऋषि अन्तःप्रज्ञा द्वारा उस मनातीत क्षेत्र तक पहुँचता है जहाँ वह दिव्य सत्ता अथवा परब्रह्म का प्रत्यक्ष अनुभव करता है। यह पराचेतनात्मक अनुभव अत्यन्त स्पष्ट एवं सजीव होता है। ऋषि के लिए यह गहन सत्य होता है। वह इसमें ही निवास करता है, गति करता है तथा इससे अनुप्राणित होता है। यह अन्तःप्राज्ञिक अनुभव गहन, भव्य एवं दिव्य होता है।
ऋषि-मनीषियों के अनुभव एवं अन्तःप्रज्ञा के बिना मानव-मात्र के लिए भगवद् ज्ञान की प्राप्ति सुलभ नहीं होती।
केवल अन्तःप्रज्ञा के माध्यम से ही परब्रह्म तत्त्व का इसकी परिपूर्णता एवं समग्रता में अनुभव तथा साक्षात्कार किया जा सकता है। ये सीमित इन्द्रियाँ एवं बुद्धि उस सर्वव्यापक सत्ता का बोध नहीं प्राप्त कर सकते हैं।
मन तथा इन्द्रियों को कार्य करने के लिए देश एवं काल की आवश्यकता है, परन्तु देश, काल एवं कारण से परे उस परम तत्त्व का बोध अन्तःप्रज्ञा द्वारा ही सम्भव है।
बुद्धि केवल सैद्धान्तिक ज्ञान ही देती है तथा यह सैद्धान्तिक ज्ञान आपको परम तत्त्व का परिपूर्ण एवं समग्र अनुभव नहीं दे सकता है; क्योंकि बुद्धि वस्तुओं को विभाजित एवं विखण्डित करती है।
इस भौतिक जगत् की अन्तर्वासी सत्ता शुद्ध चैतन्य है। भारतीय ऋषि-मनीषियों ने इस सत्ता का इसकी परिपूर्ण समग्रता में अन्तः प्राज्ञिक अनुभव प्राप्त किया है तथा मानवता को आत्म ज्ञान रूपी अत्यन्त बहुमूल्य मोती प्रदान किया है।
दयालुता दयाशील होने की अवस्था अथवा गुण है। यह सद्भावना, मानवीयता एवं कोमलता है।
दयालुता ऐसा स्वभाव है जो दूसरों की प्रसन्नता में सहायक सिद्ध हो कर हर्षित होता है। परोपकारिता का कोई भी कार्य जो अन्य व्यक्तियों के कल्याण अथवा प्रसत्रता में वृद्धि करे, दयालुता ही है।
दयालुता भगवद्-अनुग्रह सदृश है।
एक दयालु व्यक्ति दूसरों का भला करने में प्रवण होता है। वह परोपकारी होता है। वह सहानुभूतिपूर्ण, मैत्रीपूर्ण, सहृदय, अच्छे एवं कोमल स्वभाव का होता है।
एक दयालु व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के हृदय जीत लेता है। दयालुता अत्यन्त अल्प मूल्य की अर्थात् सर्वाधिक सस्ती वस्तु है। इसके प्रयोग में अधिक कष्ट तथा त्याग की आवश्यकता नहीं होती है। मुस्कराइए, सेवा करिए, प्रसन्नता का संचार करिए। दयापूर्ण एवं मधुर शब्द बोलिए। एक दुःखी व्यक्ति को प्रसन्न करिए।
दयापूर्ण शब्द श्रोता को सान्त्वना एवं शान्ति प्रदान करते हैं।
दया वह सुनहरी कड़ी है जिसके द्वारा व्यक्ति एक दूसरे से बँधते हैं।
सभी दयाशील व्यक्तियों के लिए स्वर्गद्वार खुला है।
एक दयालु व्यक्ति वास्तव में एक विशाल साम्राज्य का अधिपति होता है। वह वस्तुतः सम्राटों का सम्राट् है।
एक दयापूर्ण दृष्टि, शब्द तथा कार्य एवं एक मैत्रीपूर्ण मुस्कान के लिए आपको कुछ व्यय नहीं करना पड़ता है, परन्तु ये अन्यों के जीवन में प्रसन्नता का संचार करते हैं जो धन द्वारा नहीं खरीदी जा सकती है। ये सब अमूल्य हैं।
दयापूर्ण विचार रखने वाला सदैव शान्त एवं प्रसन्न रहता है। दयापूर्ण विचार आपके शरीर एवं मन में प्राण-ऊर्जा की वृद्धि करते हैं।
वर्तमान में दयापूर्ण कार्य करिए। इन्हें टालिए नहीं।
दयालुता एक शामक औषधि है। यह पीड़ा को शान्त करती है।
दयालुता की भाषा को मूक-बधिर भी सुन एवं समझ सकते हैं।
जिस प्रकार जल की छोटी-छोटी बूँदों से एक विशाल सागर बनता है, उसी प्रकार दयालुतापूर्ण छोटे-छोटे कार्यों से सद्भावना का सागर बनता है।
'अनेक प्रकार की दयालुता' का अर्थ अत्यधिक दयालुता नहीं है, अपितु अनेक अवसरों पर अनेक रूपों में प्रदर्शित दयालुता है।
दयालुता शाश्वत आनन्द के साम्राज्य में प्रवेश करने का पारपत्र (Passport) है। दयालुता का विकास करिए। सबके प्रति दयालु बनिए। आप शीघ्र ही भगवद्-साक्षात्कार प्राप्त करेंगे।
प्रेम दिव्य स्वभाव का सारभूत तत्त्व है जो समस्त प्रकार की अच्छाइयों से परिपूर्ण है। प्रेम वह सुनहरा बन्धन है जो हृदय को हृदय से, मन को मन से तथा आत्मा को आत्मा से बाँधता है। प्रेम मानवता का सर्वोच्च सौन्दर्य है।
यह आत्मा का पवित्रतम अधिकार है। प्रेम शाश्वत आनन्द अथवा मोक्ष के द्वार को खोलने की विशेष चाबी है।
प्रेम विश्व की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। यह भग्न हृदयों को जोड़ता है।
प्रेम जीवन रूपी सुन्दर पुष्प की मधु है। जीवन का महान् सुख प्रेम है। प्रेम आपके हृदय की प्राण-वायु है।
प्रेम वस्तुतः धरा पर स्वर्ग है। यह समस्त प्रकार के भयों का निराकरण कर देता है।
यह विश्व प्रेम से ही सृजित हुआ है, प्रेम में ही अस्तित्ववान है तथा अन्ततः प्रेम में ही लीन हो जाता है।
प्रेम प्रेरित, प्रबोधित एवं निर्देशित करता है। प्रेम, प्रेम को प्रेरित करता है।
प्रेम कभी प्रश्न नहीं करता है, विपुलता से देता ही रहता है। यह अपमान अथवा दुर्व्यवहार से प्रभावित नहीं होता है। यह नेत्रों से नहीं, अपितु हृदय से देखता है। यह एक सूक्ष्मदर्शी यन्त्र के माध्यम से देखता है।
प्रेम महान् त्याग करता है। यह दूसरों की सहायता, सेवा करने तथा उन्हें प्रसन्न करने हेतु सदैव उत्सुक होता है। प्रेम क्षमा करता है।
प्रेम जीवन का रक्षक-उद्धारकर्ता है। प्रेम दिव्य अमृत है। यह अमरत्व, परम शान्ति तथा शाश्वत आनन्द प्रदान करता है।
भगवान् प्रेम के मूर्तिमान विग्रह को भी प्रेम का मूर्तिमन्ती रवारिक भगवद साक्षात्कार करना चाहते हैं, तो आपको भी प्रेम का मूर्तिमन्त स्वरूप करते होगा।
नि:स्वार्थ एवं शुद्ध प्रेम में ही महानता निहित है। शुद्ध प्रेम में स्वार्थ का लेश मात्र भी स्थान नहीं होता है।
एक माता का प्रेम कभी समाप्त नहीं होता है। यह कभी परिवर्तित नहीं होता है और न ही कभी श्रान्त होता है। माता का प्रेम शाश्वत होता है। प्रेम कुछ प्राप्त करना नहीं अपितु देना है। प्रेम अच्छाई, शान्ति एवं पवित्र जीवन है।
शुद्ध प्रेम आनन्द है। शुद्ध प्रेम मधुर है। शुद्ध प्रेम स्वार्थपूर्ण आसक्ति से रहित होता है। शुद्ध प्रेम अमर, दिव्य तत्त्व है। शुद्ध प्रेम दिव्य अभिशिखा है, जो सदैव दीप्तिमन्त रहती है। यह कभी बुझती नहीं।
दूसरों की प्रसन्नता में ही अपनी प्रसन्नता मानना तथा दूसरों के कल्याण हेतु कह उठाने हेतु तत्पर रहना ही शुद्ध प्रेम का सार है।
शुद्ध प्रेम मनुष्य के चरित्र को उन्नत एवं सुदृढ़ बनाता है, जीवन के प्रत्येक कार्य को एक उच्च एवं पवित्र उद्देश्य प्रदान करता है तथा मनुष्य को शक्तिशाली, महान् एवं साहसी बनाता है।
सच्चा, पवित्र अथवा दिव्य प्रेम शाश्वत, अपरिवर्तनीय तथा अनन्त होता है। यह अपने जीवन की अपेक्षा अन्य व्यक्तियों के जीवन में तथा उनके कल्याण में निःस्वार्थ रुचि रखता है।
शारीरिक प्रेम पशुता है। यह काम-वासना का ही उच्च एवं परिष्कृत स्वरूप है। यह स्थूल तथा ऐन्द्रिक है।
भगवान् से प्रीति ही प्रेम अथवा भक्ति है। यह शुद्ध प्रेम है। यह प्रेम के लिए प्रेम है।
अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु किसी से प्रेम करना स्वार्थपूर्ण प्रेम है। यह आपको बन्धन में डालता है।
नारायण भाव से समस्त प्राणियों को प्रेम करना पवित्र प्रेम है। यह दिव्य प्रेम है। यह मोक्ष की ओर ले जाता है।
शुद्ध प्रेम उद्धार करता है, हृदय को पवित्र बनाता है तथा आपको दिव्यता में रूपान्तरित करता है।
पति अपनी पत्नी से पत्नी के लिए प्रेम नहीं करता है अपितु स्वयं के लिए करता है। वह स्वार्थी होता है। वह पत्नी से इन्द्रिय सुख की आशा करता है। यदि कुष्ठ-रोग अथवा चेचक-रोग से पत्नी का सौन्दर्य नष्ट हो जाये, तो पति का उसके लिए प्रेम समाप्त हो जाता है।
समस्त प्रकार के प्रेम भगवद्-प्रेम की प्राप्ति के सोपान ही हैं।
जप, प्रार्थना, कीर्तन, श्रद्धा, भक्ति, सन्तों की सेवा, मानवता एवं समस्त प्राणियों की सेवा, ध्यान तथा सत्संग के माध्यम से अपने हृदय के उद्यान में धीरे-धीरे शुद्ध प्रेम का विकास करिए।
सबसे प्रेम करिए। सबको हृदय से लगाइए। अपने हार्दिक प्रेम में सबको समाहित कीजिए। वैश्विक प्रेम अथवा असीम प्रेम का विकास करिए।
अपने पड़ोसी को अपने समान प्रेम करिए। भगवान् को अपने सम्पूर्ण हृदय, मन एवं आत्मा से प्रेम करिए।
घृणा का नाश घृणा से नहीं अपितु प्रेम से होता है। घृणा के बदले प्रेम दीजिए। अपने शत्रुओं तथा अपने से निम्न व्यक्तियों से प्रेम करिए। सभी पशुओं से प्रेम
अपने गुरु से प्रेम करिए। सभी सन्त-महापुरुषों से प्रेम करिए।
करिए।
थोड़ा प्रेम करिए परन्तु यह स्थायी हो। प्रेम स्थायी प्रकृति का होना चाहिए।
प्रेमपूर्वक बोलिए। प्रेमपूर्वक कार्य करिए। प्रेमपूर्वक सेवा करिए। आप शीघ्र ही भगवद्-साम्राज्य अथवा परम शान्ति के साम्राज्य में प्रवेश करेंगे।
विनाशशील भौतिक वस्तुओं से प्रेम नहीं करिए। यदि आप उनसे प्रेम करेंगे तो आप दुःख एवं विनाश ही प्राप्त करेंगे।
भगवान् से प्रेम करिए। स्वयं के अमर आत्मा से प्रेम करिए। आप सदैव आनन्दित रहेंगे। आप अमर हो जायेंगे।
प्रेम के भाव से परिपूरित हो कर खाइए, पीजिए, चलिए, स्नान करिए, बात करिए, सोइए, लिखिए, विचार करिए और सेवा करिए। प्रेम के साकार विग्रह बन जाइए।
इस विश्व में एकमात्र सार वस्तु प्रेम है। यह शाश्वत, अनन्त एवं अक्षुण्ण है। शारीरिक स्तर का प्रेम मोह अथवा वासना है। वैश्विक प्रेम ही दिव्य प्रेम है।
प्रेम तथा वैश्विक प्रेम समानार्थी शब्द हैं। ईश्वर प्रेम हैं। प्रेम ईश्वर है । स्वार्थपरायणता, लोभ, अहंकार, अभियान तथा घृणा हृदय को संकुचित करते हैं तथा वैश्विक प्रेम के विकास में बाधक होते हैं।
नि:स्वार्थ सेवा, महात्माओं के साथ सत्संग, प्रार्थना एवं गुरुमन्त्र के जप द्वारा धीरे-धीरे वैश्विक प्रेम का विकास करिए। जब प्रारम्भ में स्वार्थ के कारण हृदय संकुचित धीरे-धीरे तो व्यक्ति केवल अपनी पत्नी, सन्तान, कुछ मित्रों एवं सम्बन्धियों से ही प्रेम करता है। हृदय थोड़ा विकसित होने पर वह अपने जिले के और बाद में अपने राज्य के व्यक्तियों से प्रेम करने लगता है। धीरे-धीरे उसके हृदय में अपने देश के सभी व्यक्तियों के प्रति प्रेम विकसित होता है। अन्ततः वह विभिन्न देशों के व्यक्तियों से अर्थात् सभी व्यक्तियों से प्रेम करने लगता है। वह वैश्विक प्रेम का विकास करता है। अब समस्त भेदों का खण्डन हो चुका है। उसका हृदय अनन्त विस्तार पाता है। वैश्विक प्रेम के विषय में बात करना अत्यन्त सरल है, परन्तु व्यावहारिक जीवन में इसका अभ्यास अत्यन्त कठिन है। सभी प्रकार की तुच्छ क्षुद्र बातें बाधा उत्पन्न करने लगती हैं। भूतकाल में अनुचित रूप से जीवन जीने के कारण आपने जो अनुचित संस्कार उत्पन्न किये हैं, वे पुराने संस्कार ही बाधा स्वरूप खड़े होते हैं। लौह-संकल्प, दृढ़ इच्छा शक्ति, धैर्य, अध्यवसाय तथा उचित विचारों द्वारा आप सरलता से इन बाधाओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप सच्चे एवं गम्भीर हैं, तो आपको भगवद्-अनुग्रह प्राप्त होगा।
वैश्विक प्रेम की परिसमाप्ति 'अद्वैतिक एकत्व' अथवा ऋषि-मुनियों द्वारा प्राप्त 'औपनिषदिक चेतना' में होती है। शुद्ध प्रेम महान् समतावादी है। यह समानता तथा समत्व लाता है। हाफिज, कबीर, मीरा, गौरांग, तुकाराम तथा रामदास ने इस वैश्विक प्रेम का आस्वादन किया है। जो अन्य व्यक्ति उपलब्ध कर सकते हैं, उसे आप भी प्राप्त कर सकते हैं।
अनुभव करिए कि समस्त विश्व आपका शरीर है, अथवा आपका अपना घर है। मानव को मानव से पृथक् करने वाले समस्त भेदों को नष्ट करिए। अन्यों से श्रेष्ठता का विचार अज्ञान अथवा भ्रम है। विश्व-प्रेम का विकास करिए। सबसे एकत्व अनुभव करिए। पृथकता मृत्यु है। एकत्व शाश्वत जीवन है। समस्त विश्व 'वृन्दावन' है। अनुभव करिए कि यह शरीर भगवान् का चलता-फिरता मन्दिर है। आप जहाँ भी हों-घर, ऑफिस, रेलवे स्टेशन अथवा बाजार में हों, यही अनुभव करिए कि आप मन्दिर में हैं। प्रत्येक कार्य को भगवद्-चरणों में समर्पित करिए। प्रत्येक कार्य के फल को ईश्वरार्पण करके उसे 'योग' में रूपान्तरित कर दीजिए। यदि आप वेदान्त-मार्ग के साधक हैं, तो अकर्ता, साक्षी भाव रखिए। यदि आप भक्ति मार्ग के साधक हैं तो निमित्त भाव रखिए। अनुभव करिए कि समस्त प्राणी भगवान् के ही रूप हैं। ईशावास्यमिदं सर्वम् - यह विश्व ईश्वर तत्त्व से परिव्याप्त है। अनुभव करिए कि भगवद्-शक्ति ही सभी हाथों के माध्यम से कार्य कर रही है, सभी नेत्रों से देख रही है तथा सभी कानों से सुन रही है। आप
पूर्णतया परिवर्तित हो जायेंगे। आप परम शान्ति एवं आनन्द का अनुभव करेंगे। भगवान् श्री हरि आप सबको अपने हृदय से लगाकर मधुर-प्रेम-जल से स्नात करें। आप सबका हृदय वैश्विक प्रेम से परिपूरित हो।
वैश्विक प्रेम के विषय में बहुत कुछ लिखा एवं कहा जा चुका है। निःस्वार्थता एवं वैश्विक प्रेम का विकास करने की प्रेरणा देना सभी धार्मिक उपदेशों का अंग बन चुका है। ऐसा ही होना चाहिए क्योंकि निःस्वार्थता एवं वैश्विक प्रेम आध्यात्मिक जीवन के प्रारम्भिक घटक हैं। ये दिव्य जीवन की नींव हैं तथा इनका प्रभाव भवन की मुख्य संरचना पर पड़ता है। यह कहना सत्य ही होगा कि ये दो सद्गुण आध्यात्मिक जीवन की अत्यावश्यक शर्तें, अनुशासन, आध्यात्मिक प्रगति की कसौटी होने के साथ-साथ परम उपलब्धि भी हैं। निःस्वार्थता एवं वैश्विक प्रेम साधना है, तथा ये साध्य एवं सिद्धि भी हैं। ये साधक के लिए पथप्रदर्शक 'प्रकाश' हैं तथा सिद्ध की 'दिव्य आभा' हैं। एक साधक एवं सिद्ध दोनों में ये सद्गुण अनुपस्थित नहीं रह सकते हैं। निःस्वार्थता एवं वैश्विक प्रेम अथवा हम ऐसा भी कह सकते हैं कि निःस्वार्थता अथवा वैश्विक प्रेम; क्योंकि गहन परीक्षण से यही सिद्ध होगा कि ये दोनों वास्तव में एक ही हैं। अतः इनके उचित अर्थ का बोध अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। जो व्यक्ति वास्तव में स्वार्थरहित है, जिसने स्वप्रेम का त्याग कर दिया है, वह स्वयं को वैश्विक प्रेम से पूर्ण पाता है। इसी प्रकार जिसके हृदय में वैश्विक प्रेम का दुर्लभतम पुष्प विकसित हुआ है, वह स्वयं के विषय में सोचता ही नहीं है, स्वप्रेम तो दूर की बात है; वह पूर्णतया निःस्वार्थी होता है।
साधना के रूप में वैश्विक प्रेम राग एवं द्वेष के बीच स्वर्णिम मध्यम मार्ग है। एक साधक के लिए यह स्मरण रखना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि वैश्विक प्रेम किसी एक वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति प्रेम से सर्वथा विपरीत है। एक के प्रति प्रेम मोह एवं राग कहलाता है। यह संसार के बन्धन का मूल है। इसके विपरीत, वैश्विक प्रेम मुक्त करता है, इसे राग से भिन्न समझना चाहिए। इसीलिए शास्त्र एवं सन्त साधक को तीव्र वैराग्य विकसित करने का परामर्श देते हैं।
पुनश्च, वैराग्य एक सीमा तक अच्छा है, परन्तु इसे साधक को स्व-पृथकत्व (Self-exclusiveness) की ओर नहीं ले जाना चाहिए; क्योंकि यह स्वार्थ का ही सूक्ष्म रूप है। यहाँ भी सावधानी की आवश्यकता है। एक साधक जो उत्साहपूर्वक वैराग्य विकसित कर रहा है, वह संसार से पूर्णतया विमुख हो सकता है, अन्य व्यक्तियों के संग तथा सुख-सुविधाओं का पूर्ण त्याग कर सकता है परन्तु वह अत्यन्त स्वार्थी बन सकता है। वह सब समय अपने विषय में, अपनी साधना तथा वैराग्य के विषय में ही सोचता रहेगा। जो भी व्यक्ति एवं वस्तु उसके विचारों, व्यवहार, आचरण एवं साधना के अनुरूप नहीं होगा, उन्हें वह अपना शत्रु अथवा विरोधी समझेगा। वैराग्य तिरस्कारपूर्ण द्वेष नहीं यह राग एवं आसक्ति का अभाव है। तिरस्कारपूर्ण द्वेष तो सूक्ष्म घृणा अथवा सूक्ष्म हिंसा है।
वैराग्य अहिंसा का सहज परिणाम होना चाहिए। 'आत्मा' से प्रेम के अतिरिक अन्य सबसे प्रेम का त्याग करना चाहिए। अपनी क्षुद्र मैं, देह, तथा अपने सिद्धान्तों एवं विचारधाराओं के प्रति प्रेम का त्याग करना चाहिए क्योंकि जो इन तुच्छ वस्तुओं, मिथ्या तथ्यों एवं सांसारिक पदार्थों को महत्त्व देता है, वह राग-द्वेष के बन्धन में फँस जाता है। उदाहरणतः एक व्यक्ति को अपने परिवार, सम्पत्ति, यहाँ तक कि अपने शरीर के प्रति कोई आसक्ति नहीं होगी, परन्तु अपनी किसी प्रिय विचारधारा के प्रति वह आसक्त हो सकता है। बाह्यत: ऐसा प्रतीत होगा कि उसमें महान् वैराग्य है, वह पूर्णतः निःस्वार्थी है। सूक्ष्म विश्लेषण से आप यह जानेंगे कि ऐसा नहीं है। किसी एक विचारधारा को अत्यधिक महत्ता देना किसी अन्य विपरीत विचारधारा से सूक्ष्म रूप में द्वेष रखना है। यद्यपि व्यक्ति इस सूक्ष्म द्वेष को अन्य विचारधारा के व्यक्तियों के साथ शत्रुता में परिवर्तित नहीं करेगा परन्तु उसके मन में यह द्वेष बना रहेगा। एक विचारधारा के प्रति आसक्ति है, अतः यहाँ वैराग्य नहीं है। स्वयं की किसी वस्तु को अर्थात् विचारधारा को इतना महत्त्व दिया जा रहा है, भले ही यह सूक्ष्म रूप में हो; अतः यहाँ निःस्वार्थता भी नहीं है। इसी कसौटी से देखा जाये, तो यहाँ वैश्विक प्रेम भी नहीं है।
अब हमें उसे खोजना है जो 'आसक्ति' भी न हो और न ही 'स्व-पृथकत्व' हो। निश्चयमेव यह वैश्विक प्रेम ही है जिसमें सूक्ष्मतम हिंसा का भी अभाव है। 'अनिर्वचनीयम् प्रेमस्वरूपम् - वैश्विक प्रेम का वर्णन अथवा व्याख्या करना असम्भव है। इसीलिए महर्षि पतञ्जलि साधकों को अहिंसा में प्रतिष्ठित होने के लिए निर्देश देते हैं। उनकी विद्वत्ता को देखिए कि उन्होंने प्रेम को एक नकारात्मक नाम 'अहिंसा' से अभिहित किया। बुरे विचार मत रखिए, बुरे शब्द मत बोलिए, किसी को हानि मत पहुँचाइए। एक साधक सावधानी एवं बुद्धिमत्तापूर्वक सब प्रकार की विकृतियों को दूर करता है। इस प्रकार जब साधक अहिंसा में प्रतिष्ठित हो जाता है, उसके हृदय में आत्म-ज्ञान का प्रकाश प्रकट होता है। वह यह अनुभव कर लेता है कि उसका अन्तरात्मा समस्त प्राणियों का भी अन्तरात्मा है। उसका यह ज्ञान वैश्विक प्रेम के रूप में पूर्णतया अभिव्यक्त होता है।
जिसके हृदय में वैश्विक प्रेम है, ऐसा सन्त समाज से दूर नहीं जाता है; वह किसी से घृणा नहीं करता है। वह सबसे प्रेम करता है। दयापूर्ण अनुग्रह के कारण नहीं अपितु अपने स्वाभाविक आचरण के रूप में वह सबसे प्रेम करता है। वह स्वार्थी नहीं होता है, वह किसी व्यक्ति-वस्तु से घृणा नहीं करता है, उसके हृदय में लेशमात्र भी घृणा अथवा दुर्भावना नहीं होती है। वह समस्त प्राणियों में व्याप्त 'आत्मा' से प्रेम करता है। यह आत्मा सर्वव्यापक है, अतः वह किसी व्यक्ति-वस्तु के प्रति आसक्त नहीं होता है। वह सबके साथ तादात्म्य अनुभव करता है क्योंकि वह आत्म-प्रशंसा के भाव से मुक्त होता है। जीवित प्राणियों में श्वास-प्रश्वास की क्रिया की भाँति उसके द्वारा निःस्वार्थ सेवा सहज ही सम्पन्न होती है। अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में वह जिनके भी सम्पर्क में आता है, उन्हें स्वयं की आत्मा का रूप मान कर उनकी आराधना करता है। वह उनके हित की आकांक्षा करता है। वह सद्भावना से परिपूर्ण होता है, क्योंकि उसने दुर्भावना को अपने हृदय से निकाल दिया है। अहिंसा के अभ्यास ने उसे स्वार्थ का निर्मूलन करने में सक्षम बनाया है। एक स्वार्थी व्यक्ति कभी वास्तव में अहिंसा का अभ्यास नहीं कर सकता है। स्वयं के प्रति प्रेम का अभिप्राय सदैव किसी अन्य के प्रति 'अ-प्रेम' (No-love) होता है; स्वयं के लिए कुछ प्राप्त करने की उत्कण्ठा का अर्थ अन्य किसी को उससे वंचित करना ही होगा। इसके विपरीत, अहिंसा अथवा वैश्विक प्रेम में प्रतिष्ठित सन्त दूसरे के सुख में उतना ही आनन्दित होगा जितना कि वह स्वयं के सुख में होता है। जब वह किसी को कष्ट से पीड़ित देखता है, तुरन्त उसकी सहायता के लिए दौड़ता है। वह इसलिए नहीं दौड़ता है क्योंकि वह उस व्यक्ति विशेष से प्रेम करता है, अपितु इसलिए सहायतार्थ जाता है कि क्योंकि उसने यह अनुभव कर लिया है कि उसका ही आत्मा दूसरे व्यक्ति में भी व्याप्त है। उसके हृदय की सद्भावना तथा वैश्विक प्रेम सहज ही पीड़ित व्यक्ति के प्रति प्रवाहित होते हैं तथा उसके कष्ट निवारण का प्रयास करते हैं। वह सहज भाव से अपनी सेवा अर्पित करता है। 'सेवा के लिए सेवा', 'प्रेम के लिए प्रेम' इन शब्दों का अर्थ आप वैश्विक प्रेम से परिपूर्ण हृदय वाले सन्त के व्यवहार को देख कर ही समझ सकते हैं। यह ऐसा प्रेम है जो प्रेम के प्रतिदान की अपेक्षा नहीं करता है। यह ऐसी सेवा है जो प्रशंसा अथवा पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करती है। इस प्रेम में, इस सेवा में विश्वप्रेमी सन्त किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करता है। उसके लिए सब समान हैं, अन्यथा यह वैश्विक प्रेम, अहिंसा तथा नि:स्वार्थता नहीं होगी। वह सदैव शान्त-प्रशान्त रहता है क्योंकि वैश्विक प्रेम ने स्वार्थ वासना, क्रोध एवं लोभ की अग्नि को शमित कर दिया है जो एक साधारण मनुष्य की शान्ति को प्रायः भंग करते हैं। वह सदैव आनन्दित रहता है क्योंकि उसकी कोई इच्छा नहीं है, तथा वैश्विक प्रेम भी उसे सबके सुख में सुखी बनाता है। वह आत्मा के अमाला, आत्मा के अविनाशी होने की जाग्रति के साथ जीवन व्यतीत करता है।
विश्वप्रेमी सन्त की जय हो, जय हो। वैश्विक प्रेम सभी के हृदय में निवास करे।
महामनस्कता आत्मा की महानता है। यह मन का उन्नयन है। यह मन का वह गुण है जो व्यक्ति को तुच्छ अथवा अनुचित बातों से ऊपर उठाता है। यह उदारता है। यह सज्जनता है।
महामनस्कता भाव अथवा व्यवहार में दूसरों के प्रति उदारता है। यह ईर्ष्या, कायरता तथा प्रतिशोधपूर्ण अथवा स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से ऊपर उठना है। यह चरित्र अथवा कर्म की उच्चता है। यह विशालहृदयता है।
महामनस्कता आत्मा की ऐसी गरिमा अथवा उन्नयन है जिससे सम्पन्न व्यक्ति कष्टों एवं कठिनाइयों का शान्ति तथा दृढ़तापूर्वक सामना करता है, प्रतिशोध की भावना का त्याग करता है, परोपकारिता के कार्यों में हर्षित होता है, अन्याय एवं निम्न प्रकृति से घृणा करता है तथा अच्छे एवं उपयोगी उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अपनी सुख-सुविधा एवं सुरक्षा का त्याग करता है।
महामनस्क व्यक्ति की भावनाएँ उच्च होती हैं। वह साहसी तथा निःस्वार्थी होता है। वह प्रलोभनों, निम्न प्रवृत्तियों, लौकिक वैभव-सम्पदा की भर्त्सना करता है।
समस्त सद्गुणों में महामनस्कता दुर्लभतम है।
हृदय से बलवान्, मन से बलवान् अर्थात् महामनस्क होना वास्तव में महान् होना है।
उदारता, उच्चाशयता, शूरवीरता, विशालहृदयता एवं सज्जनता महामनस्कता के समानार्थी शब्द हैं।
पौरुष वीरता है।
पौरुष मात्र साहस नहीं है। यह आत्मा का वह गुण है जो मानव जीवन की सभी परिस्थितियों को निर्भयतापूर्वक स्वीकार करता है तथा उनसे निराश अथवा श्रान्त नहीं होने को अपने सम्मान का विषय बनाता है।
गरिमा पौरुष है। सज्जनता पौरुष है।
पौरुष बचकानेपन, स्त्रैण आचरण एवं स्वभाव से मुक्त होता है।
एक पौरुषसम्पन्न व्यक्ति वास्तविक पुरुष की विशेषताओं यथा वीरता, दृढ़ता आदि से सम्पन्न होता है।
एक पुरुषोचित चरित्र के प्रत्येक गुण का प्रारम्भ समस्त स्त्री जाति के प्रति सत्य, शालीनता, दया तथा सम्मानपूर्ण आचरण से होता है।
पौरुष से अभिप्राय पुरुषोचित समस्त गुणों एवं विशेषताओं से है।
हम पुरुषोचित निर्णय, पुरुषोचित दृढ़ता, पुरुषोचित वीरता, पुरुषोचित गरिमापूर्ण आचरण, पुरुषोचित भद्रता एवं निर्भीकता शब्दों का प्रयोग करते हैं।
सभ्याचार अच्छा व्यवहार अथवा सम्मानजनक आचरण है। यह सच्चरित्र है। यह कुलीनता है।
सभ्याचार एक व्यक्ति विशेष का आचरण है। यह व्यक्तिगत व्यवहार है। यह विनम्र, सभ्य एवं कुलीन व्यवहार है।
एक सुसभ्य व्यक्ति अभद्रता से मुक्त होता है। वह सुशील होता है। वह शिष्ट, संस्कारी एवं विनम्र होता है।
सभ्याचार में अच्छा व्यवहार समाहित है। इसमें शिष्टता एवं दया समाहित है। यह अन्य व्यक्तियों को सहज बनाने की कला है। यह जीवन को सौन्दर्य प्रदान करता है।
सभ्याचार अत्यधिक विवेक, सुशील स्वभाव एवं दूसरों के लिए आत्मत्याग का परिणाम है।
एक सुसभ्य व्यक्ति सदैव मिलनसार एवं विनयशील होता है।
सुयश प्राप्ति तथा मित्रता अर्जित करने का सर्वश्रेष्ठ साधन सभ्याचार है।
एक सुसभ्य व्यक्ति शान्तिपूर्वक भोजन करता है, शान्तिपूर्वक चलता है, शान्तिपूर्वक जीवन व्यतीत करता है तथा यहाँ तक कि शान्तिपूर्वक अपना धन भी खोता है।
सभ्याचार विधि-नियमों से दृढ़तर होता है।
सभ्य आचरण जीवन पथ को सुगम बनाता है। यह अपने से वरिष्ठ को प्रिय, समान को अनुकूल तथा कनिष्ठ को स्वीकरणीय बनाता है। सब प्रकार के भेदभाव को समाप्त कर वार्तालाप को मधुर बनाता है। सभ्याचार पारस्परिक सद्भावना को जन्म देता है, उत्तेजित को शान्त करता है, भीरू को उत्साहित करता है तथा हिंसक को दयापूर्ण बनाता है ।
सभ्याचार गौण नैतिक नियम है। यह सद्गुणों की छाया है। यह सम्मान प्राप्ति का पारपत्र (Passport) है। यह सद्विवेक एवं सद्भावना का पुष्पित रूप है।
गर्व, अहंकार, अधीरता, दुष्ट-प्रकृति एवं विवेक का अभाव असभ्य आचरण के कारण हैं।
सभ्याचार नैतिक नियमों का भाग है। यह दुर्लभ उपहार है। यह सरलता एवं शीघ्रतापूर्वक नैतिक आचरण के रूप में परिपक्व होता है।
अपने विषय में शान्त रहिए, अधिक न कहिए।
यह विनयी एवं सौम्य होने की अवस्था अथवा गुण है। यह आज्ञाकारिता है। यह विनम्रता है। यह स्वभाव की मृदुलता है। यह ईश्वरीय इच्छा के प्रति समर्पण है। यह वह छोटी सी मधुर जड़ है जिससे समस्त दिव्य गुण उत्पन्न होते हैं। विनयशील व्यक्ति धन्य हैं, क्योंकि वे शीघ्र शाश्वत शान्ति प्राप्त करेंगे।
विनयशीलता सद्भावना से पूर्ण होती है। यह प्रतिशोध, क्षुब्धता एवं अतिसंवेदनशीलता का बहिष्कार करती है।
एक विनयी व्यक्ति दूसरों के क्रोध को धैर्यतापूर्वक सहन करता है। विनयशीलता सर्वश्रेष्ठ आत्म-त्याग है। यह स्वप्रेम तथा अभिमान का त्याग है।
विनयशीलता समस्त सद्गुणों की सुदृढ़ नींव है।
यह वास्तविक धर्म का सारतत्त्व है। यह एक सन्त का मौलिक गुण है। यह दुर्बल तथा कायर होना नहीं है। यह एक शक्ति है। विनयशीलता सज्जनता है। यह सदैव शालीन रहना है। शालीनता के तने पर विनयशीलता का पुष्प खिलता है।
भगवान् विनयी व्यक्तियों के हृदय में वास करने से आनन्दित होते हैं।
धर्म का प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय तत्त्व विनयशीलता ही है। यह आध्यात्मिक महिमा की प्राप्ति का द्वार है। यह मनुष्य को दिव्य बनाती है।
विनयशीलता समस्त सद्गुणों का मूल, उनकी जननी तथा परिपालिका है।
विनयशीलता भगवान् की ओर ले जाने वाला पथ है।
विनयशीलता, शिष्टता, परोपकारिता, विनम्रता एवं सौम्यता एक ही प्रकार के गुण हैं।
एक सन्त अथवा महान् पुरुष की प्रथम कसौटी विनयशीलता है।
विनयशीलता दिव्य प्रकाश को प्रकट करती है। भगवान् विनयशील व्यक्ति के साथ रहते हैं। वे उसके समक्ष स्वयं को प्रकट करते हैं।
करुणासागर नारायण।
करुणासिन्धु सदाशिव।
भगवान् करुणा के सागर हैं। वे सर्वकरुणामय हैं। यदि आप उनसे मिलना चाहते हैं, उनके साथ एक होना चाहते हैं, उनमें ही वास करना चाहते हैं तो आपको भी करुणा का मूर्तिमन्त स्वरूप बनना होगा।
करुणा एक सन्त का मौलिक गुण है। यदि आप उनमें करुणा नहीं पाते हैं, तो उन्हें सन्त नहीं मानिए। करुणा क्रूरता, अत्याचार, कठोरता, अशिष्टता एवं उग्रता की शत्रु है। यह कोमलता, मधुरता एवं सौम्यता की मित्र है।
करुणा सद्गुणों के तारावृन्द में चन्द्रमा की भाँति है।
करुणा महान् शक्ति एवं बल है। यह शक्तिप्रदात्री है।
करुणा मुक्ति, अमरत्व एवं शाश्वत आनन्द का द्वार खोलती है। यह संकीर्ष हृदय को आकाश के समान विशाल बनाती है। यह परम शान्ति के साम्राज्य की ओर उड़ान हेतु पंख प्रदान करती है।
करुणा आपको दिव्यत्व प्रदान करती है। यह समस्त शक्तिवान् वस्तुओं में सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न है।
मधुर करुणा अमृत है। यह सज्जनता का लक्षण है। यह कृपा एवं प्रेम की दिव्य वर्षा है। यह एक चुम्बक है।
करुणा भगवान् की सर्वश्रेष्ठ विशेषता है। यह पाप से कठोर हुए हृदय को कोमल एवं पवित्र बनाती है।
करुणा न्याय से अधिक दीप्तिमन्त है। यह मन की शान्ति प्रदान करती है। इसलिए करुणाशील बनिए।
करुणा अपने अधीन अपराधी की रक्षा हेतु प्रदर्शित कोमलता एवं सहिष्णुता है। यह क्षमाशीलता है।
करुणा दया अथवा परोपकारिता है। करुणा उच्च कोटि की भलाई है। यह दूसरों की पीड़ा को समझ कर सदैव उनकी सहायता को तत्पर रहना है।
एक करुणावान् व्यक्ति का हृदय नवनीत से भी अधिक कोमल होता है। नवनीत अग्नि के समीप होने पर पिघलता है अर्थात् अपने कष्ट से दुःखी होता है; परन्तु एक करुणावान् व्यक्ति का हृदय दूरस्थ व्यक्तियों के कष्ट देख कर द्रवित हो जाता है।
हृदय की कोमलता, सद्भावना, सहानुभूति, दया, स्नेह, सौहार्द, उदारता, दानशीलता, निःस्वार्थता एवं त्याग से करुणा का निर्माण होता है। ये करुणा के घटक हैं।
करुणा, दया, सहानुभूति एवं तरस समान प्रकृति के गुण हैं। करुणा इनमें सर्वश्रेष्ठ है। यह दिव्य है। इसमें न केवल दया, अपितु क्षमाशीलता, प्रेम एवं सेवा भी समाहित हैं। स्वयं का बुरा करने वाले व्यक्ति से भी करुणाशील मनुष्य प्रेम करता है तथा उसकी सेवा करता है।
दया का स्थान दूसरा है। यह अन्य के दुःख से दुःखी होना है। दया में तरस के भाव की कोमलता, सहानुभूति के भाव की गरिमा तथा करुणा के भाव की सहायता प्रदान करने की तत्परता विद्यमान है, परन्तु यह केवल दुर्भाग्यशाली तथा दुःखी व्यक्तियों के प्रति ही प्रयुक्त होती है। करुणा में उपरोक्त विशेषताओं के अतिरिक्त क्षमाशीलता, सहनशीलता, सहिष्णुता एवं वैश्विक प्रेम की भावना भी समाहित है।
सहानुभूति एवं तरस खाना अन्य व्यक्तियों के प्रति मात्र एक भावना है। दयावान् व्यक्ति मानव एवं पशु दोनों को प्रेमपूर्वक गले लगाता है। सहानुभूति अपने समकक्ष अथवा उन्नत व्यक्तियों के प्रति होती है परन्तु यह दया अथवा करुणा की भाँति क्रियाशील नहीं होती है।
तरस अपने से हीन व्यक्तियों के कष्ट से उत्पन्न भावना है। अन्य व्यक्ति पर तरस खाने वाले व्यक्ति में गर्व एवं अभिमान का भाव होता है। इस गर्वित भाव के कारण, तरस का अन्त प्रायः शब्दों में ही हो जाता है।
एक करुणाशील व्यक्ति के विचार, शब्द एवं कार्य दयापूर्ण होते हैं। उसके पास जो कुछ भी है, वह सबमें बाँटता है। वह दूसरों के लिए अपनी सुख-सुविधा का त्याग करता है।
यदि आपका हृदय कठोर है, तो छोटे-छोटे करुणापूर्ण कार्य करिए। किसी निर्धन रोगी को दूध का एक कप दीजिए। शीतकाल में किसी निर्धन को कम्बल दीजिए। माह में एक बार किसी निर्धन व्यक्ति अथवा साधु को भोजन कराइए। अस्पताल में जा कर रोगियों की सेवा करिए। इस प्रकार करुणा का विकास कीजिए।
दूसरों के कष्ट का अनुभव करिए। दूसरों के सम्बन्ध में निर्णय देते समय करुणाशील रहिए। स्वयं के दोषों एवं दुर्बलताओं का स्मरण करिए। दूसरों की आलोचना करने में तत्पर मत होइए। बुरे कार्य करने वालों के प्रति उदार रहिए।
दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखिए। अन्य व्यक्ति भी आपके प्रति करुणाशील बनेंगे। आपको उस समय करुणा प्राप्त होगी जब आपको इसकी अत्यधिक आवश्यकता होगी। यह भगवान् का अपरिवर्तनीय विधान है।
भगवान् बुद्ध तथा अन्य सन्तों का एवं उनके कार्यों का पुनः-पुनः स्मरण करिए। 'लाइज ऑफ सेन्ट्स' (Lives of Saints) एवं 'सेन्ट्स एण्ड सेजेज' (Saints and Sages) पुस्तकों को पढ़िए। आप धीरे-धीरे करुणा का विकास कर पायेंगे।
सूर्य, वृक्ष एवं नदियाँ निष्पक्ष-समदर्शी होते हैं। इसी प्रकार आप भी अपने मित्रों एवं शत्रुओं के प्रति करुणाशील बनिए।
साधु-सन्तों का संग करिए। भगवान् का ध्यान करिए। उनके नाम का जप करिए। संकीर्तन करिए। भगवान् की महिमा का गान करिए। आपमें करुणा का विकास होगा। प्रातःकाल 'करुणा' के सद्गुण पर ध्यान करिए। व्यावहारिक जगत् में कार्य करते हुए भाव रखिए- "मैं आज करुणाशील रहूँगा। मैं करुणापूर्ण कार्य करूँगा।" धीरे-धीरे करुणा आपके स्वभाव का अभिन्न अंग बन जायेगी।
दुःखी व्यक्तियों एवं पशुओं के प्रति करुणा कीजिए। उनके आँसुओं को पोंछिए आप निश्चयमेव धन्यता प्राप्त करेंगे।
श्री स्वामी चिदानन्द जी के आदर्श का अनुकरण करिए जिनका हृदय करुणा से परिपूरित है। उन्होंने अनेक दिनों तक एक कुत्ते की देखभाल की जिसके शरीर पर कीड़ों से भरा घाव था। उन्होंने तीन महीने तक एक कुष्ठ रोगी की प्रेमपूर्ण सेवा की।
धर्मार्थ संस्थाएँ, धर्मार्थ अस्पताल, वृद्धाश्रम, कुओं-तालाबों का निर्माण, निर्धनों के लिए अन्नक्षेत्र, धर्मशालाएँ, पशु-कल्याण संस्थाएँ, समाजसेवी संस्थाएँ- ये सब करुणा की ही अभिव्यक्ति हैं।
आपके हृदय में करुणा का उदय हो। आपका हृदय करुणा से परिपूरित हो।
मिताचार किसी भी प्रकार की 'अति' से मुक्ति है। यह नियन्त्रण करने, कम करने अथवा निरोध करने का कार्य है।
एक मिताचारी व्यक्ति स्वयं को सीमाओं के भीतर रखता है। वह अपने भोजन एवं अन्य कार्यों पर नियन्त्रण रखता है। वह संयमी एवं विवेकी होता है।
मिताचार बुद्धिमत्ता का अभिन्न मित्र है।
मिताचार जीवन को सौन्दर्य देता है। यह दीर्घायु एवं सुस्वास्थ्य प्रदान करता है। जीवन के चयनित सुख मिताचार द्वारा प्राप्त होते हैं।
मिताचार अथवा सन्तुलन दो अतियों के मध्य मार्ग का चयन तथा उत्तेजना- वासना का नियमन है। यह स्वयं में एक सद्गुण न हो कर सद्गुण प्राप्ति का साधन है।
मिताचार एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है जिसका नीति शास्त्र के विद्यार्थी अथवा साधक द्वारा अर्जन किया जाना चाहिए। यह मन की प्रशान्तता है। यह समचित्तता है। यह योग में कुशलता है। बिना मिताचार के योग तथा भौतिक जगत् के कार्यों में भी सफलता असम्भव है। पुरातन काल के समस्त यशस्वी महापुरुषों ने मिताचार का पालन किया है। आपको भोजन, शयन, अध्ययन, हास्य, सम्भोग, वार्तालाप, व्यायाम आदि में
मिताचारी-संयमी बनना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के श्लोक १६ एवं १७ में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं, "हे अर्जुन, योग का अभ्यास न तो अधिक भोजन करने वाले के लिए और न ही भोजन का सर्वथा त्याग करने वाले के लिए, न तो अधिक सोने वाले के लिए और न ही निद्रा का सर्वथा त्याग करने वाले के लिए सम्भव है। आहार-विहार, कर्मों की चेष्टा, सोने एवं जागने में नियमित रहने वाले के लिए योग दुःखों को नष्ट करने वाला होता है।" यदि आप बहुत अधिक खायेंगे तो अधिक सोयेंगे। आप उदर, आँत एवं यकृत के विभिन्न रोगों से आक्रान्त हो जायेंगे। आपके सभी आन्तरिक अंग अधिक कार्य से श्रान्त होंगे। अधिक सम्भोग आपकी ऊर्जा का हास करेगा तथा दुर्बलता एवं अन्य अनेक रोगों का कारण बनेगा। अत्यधिक वार्तालाप मानसिक शान्ति को बाधित करेगा।
अपने साधनाभ्यास के प्रारम्भिक काल में भगवान् बुद्ध उग्र तपस्या में लीन हुए थे। उन्होंने भोजन का पूर्णतः त्याग कर कठोर तप किया। इससे उन्हें अत्यधिक कष्ट हुआ; उनका शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया। उनकी आध्यात्मिक प्रगति भी अधिक नहीं हुई। तब उन्होंने 'स्वर्णिम मध्यम' मार्ग अपनाया। उन्होंने संयमपूर्वक भोजन लेना प्रारम्भ किया तथा अपने आध्यात्मिक अभ्यासों का भी नियमन किया। इसके पश्चात् ही उन्हें प्रबोधन प्राप्त हुआ। उन्होंने सदैव अपने शिष्यों को मध्यम मार्ग अपनाने की शिक्षा दी। वे स्वयं अनुभव कर यह सीख पाये थे।
कुछ व्यक्तियों के लिए जिह्वा पर नियन्त्रण कठिन होता है। यदि व्यंजन स्वादिष्ट है तो वे संयम की सीमा लाँघ जाते हैं और अपने उदर को दूँस कर भर देते हैं। महाविद्यालयों के वे विद्यार्थी जिनके पास अधिक धन है, मिठाई की दुकानों पर जाकर अपने उदर को मिठाइयों से भर देते हैं। उदर का पूरा भरना न तो स्वास्थ्यकर है तथा न ही वैज्ञानिक है। व्यक्ति को उदर का आधा भाग भोजन से तथा एक चौथाई भाग जल से भरना चाहिए तथा शेष एक चौथाई भाग वायु-संचरण के लिए खाली छोड़ना चाहिए। यह मिताहार कहलाता है। आप पूर्ण उपवास के माध्यम से अत्यधिक आहार लेने की प्रवृत्ति पर नियन्त्रण कर सकते हैं।
खाने की इच्छा शेष रहते हुए भी सदैव भोजन की थाली छोड़कर खड़े हो जाना चाहिए। एक सप्ताह में दो-तीन दिन नमक का त्याग करने से आपको भोजन की मात्रा घटाने में सहायता मिलेगी। भोजन की मात्रा में कमी आपको मृत्यु नहीं देगी अपितु स्वस्थ रखेगी। यह दीर्घायु प्राप्त करने में सहायक होगी।
कुछ विद्यार्थी सत्रान्त परीक्षा की तैयारी हेतु चाय-काफी आदि के प्रयोग से नींद को भगाकर रात्रि में अध्ययन करते हैं। वे दस माह तक अध्ययन के प्रति लापरवाह रहते हैं। यह बुरी बात है। परीक्षा अवधि में इस प्रकार अत्यधिक तनाव के कारण वे बीमार पड़ते हैं। अध्ययन सुनियोजित रूप से किया जाना चाहिए। आपको प्रतिदिन नियमित रूप से अध्ययन करना चाहिए।
कुछ साधक भोजन का त्याग कर ४० दिन नीम की पत्तियों पर निर्वाह करते हैं। यह मूर्खतापूर्ण तप है। वे बीमार हो जाते हैं, दुर्बल हो जाते हैं तथा इसके बाद साधना करने में भी असमर्थ हो जाते हैं। भगवान् श्री कृष्ण इसकी भर्त्सना करते हुए कहते हैं, "जो व्यकि अहंकार एवं गर्व के वशीभूत हो, अपनी इच्छाओं-वासनाओं की शक्ति से उत्प्रेरित होकर शास्त्रविहित उग्र तपस्या करते हैं, वे मूढ़ दैहिक पंचभूतों तथा मुझ अन्तर्वासी परमात्मा को उत्पीड़ित करते हैं, ऐसे व्यक्तियों को आसुरी प्रकृति का जानो।" तपस्या के नाम पर अपने स्वास्थ्य को नहीं बिगाड़िए। किसी भी क्षेत्र 'अति' तक न जाइए।
साधना भी सुनियन्त्रित होनी चाहिए। ध्यान की अवधि को धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। शीर्षासन की अवधि में धीरे-धीरे वृद्धि करनी चाहिए। निद्रा में भी धीरे-धीरे कमी करनी चाहिए। अनियमित रूप से साधना करने पर आध्यात्मिक प्रगति नहीं होगी।
कुछ व्यक्ति बहुत शीघ्रता से मित्र बना लेते हैं, उनसे कुछ समय अत्यधिक प्रेम करते हैं तथा किसी छोटे से कारण से मित्रता तोड़ देते हैं। वे अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति में 'अतिवादी' हैं। वे गहनतापूर्वक प्रेम अथवा घृणा करते हैं। भावनाएँ भी सुनियन्त्रित होनी चाहिए। किसी के साथ भी अधिक मेलजोल मत रखिए। इस दिशा में भी सन्तुलन अपनाइए। आप प्रत्येक के साथ चिरस्थायी मित्रता रख सकते हैं।
धन के व्यय पर भी नियन्त्रण रखिए। कुछ व्यक्ति अविवेकी होते हैं। वे एक महीने में अविचारपूर्वक अपव्यय करते हैं तथा अगले महीने ऋण लेते हैं।
विचार प्रक्रिया पर नियन्त्रण रखिए। समस्त अप्रांसगिक, मूर्खतापूर्ण एवं क्षुद्र विचारों का नाश करिए। अत्यधिक मत सोचिए। दिव्य एवं उच्च विचार रखिए।
कार्य में भी संयमी बनिए। अत्यधिक कार्य मत करिए। अत्यधिक श्रम अनेक रोगों का कारण है। यदि आप अत्यधिक श्रम करते हैं, तो आप ध्यान नहीं कर सकते हैं।
समस्त क्षेत्रों में पूर्ण मिताचारी-संयमी ही वास्तविक योगी है। वह इहलोक तथा परलोक में सुख प्राप्त करता है। वह सदैव प्रफुल्लित-प्रमुदित रहता है। वह सुस्वास्थ्य, उच्चतर बल, ऊर्जा एवं स्फूर्ति से सम्पन्न होता है। वह दीर्घायु तथा यश प्राप्त करता है। वह आध्यात्मिक एवं भौतिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है।
अतः स्वर्णिम अथवा सुखप्रद मध्यम मार्ग को अपनाइए, सदैव इसका अनुसरण करिए। प्रत्येक क्षेत्र में 'अति' का त्याग करिए तथा सदा के लिए आनन्दित हो जाइए। मिताचार ही आपका आदर्श बने।
शील एक उज्ज्वल ज्योति है। यह मन को ज्ञान तथा हृदय को परम सत्य की प्राप्ति हेतु तैयार करता है।
शील सद्गुणों की शोभा है। यह न केवल आभूषण है अपितु सद्गुणों का रक्षक भी है।
शील चरित्र को नवीन आभा प्रदान करता है। यह लावण्यता है। यह सौन्दर्य एवं सद्गुण का दुर्ग है। यह प्रतिभा-योग्यता रूपी हीरे हेतु सुन्दर पृष्ठभूमि है। यह यशस्वी जीवन का सर्वोत्कृष्ट आभूषण है। यह सादगी का संलग्नक है।
शील व्यक्ति को सबका प्रिय बनाता है। यह सद्गुणों से समृद्ध हृदय में वास करता है।
शील एक स्त्रियोचित गुण है। यह विनम्रता है। यह विचार-व्यवहार की पवित्रता है। यह सुन्दर व्यवहार है। यह पावनता है। यह संयमशीलता है।
शील मर्यादा की भावना है। यह स्वयं को अधिक महत्ता देने की प्रवृत्ति का अभाव है। यह किसी प्रकार की अपवित्रता का अभाव है। यह शिष्टता है। विशेषतया स्त्रियों के सम्बन्ध में यह आचरण की पवित्रता है।
शील किसी भी प्रकार की अति एवं अतिशयोक्ति आदि से मुक्ति है। यह वाणी एवं आचरण की शिष्ट मर्यादा अथवा औचित्य है। यह विचार, भाव, चरित्र एवं आचरण की शुद्धता है। यह मर्यादाशीलता है।
हम कन्या के शील की बात करते हैं। हम शीलसम्पन्न विद्वान् शब्द का प्रयोग करते हैं।
शीलसम्पन्न स्त्री एवं पुरुष में गर्व नहीं होता है। जिस प्रकार साधारण वस्त्र एक स्त्री को सौन्दर्य प्रदान करते हैं, उसी प्रकार शालीन आचरण अथवा शील ज्ञान का सर्वोत्तम आभूषण है।
शीतलताम्पन्न स्त्री अथवा पुरुष आडम्बर-दिखावे से रहित होते हैं। वे स्वयं को सबके ध्यान अथवा आकर्षण का केन्द्र बनाने को इच्छुक नहीं होते हैं।
एक शीलवान व्यक्ति आत्म-श्लाघा नहीं करता है। वह अपनी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता है। वह गर्व-घमण्ड से मुक्त होता है। वह अत्यन्त सरल स्वभाव का होता है एक शीलवती स्त्री लज्जाशील होती है। वह अधिक बहिर्मुखी नहीं होती है। एक अहंकारी व्यक्ति सदैव अपने विषय में बात करेगा, परन्तु शीलसम्पन्न स्वयं को वार्तालाप का विषय बनाने से सदैव बचता है।
एक शीलवान व्यक्ति की वाणी प्रेरक एवं उन्नयनकारी होती है। यह आपके हृदय को छूती है, आपके हृदय में प्रवेश करती है। यह प्रेम एवं ज्ञान का प्रसार करती है तथा सत्य को आभा प्रदान करती है।
अपनी प्रतिभा एवं उपलब्धियों का प्रदर्शन मत करिए। अपना गुणगान स्वयं मत करिए। शीलवान बनिए। सभी आपकी योग्यता, प्रतिभा एवं उपलब्धियों की प्रशंसा करेंगे। जल से भरा घड़ा आवाज नहीं करता है। खाली घड़ा ही आवाज करता है। आपका शीलवान स्वभाव स्वयं ही आपके व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करेगा।
एक शीलवान व्यक्ति सबके हृदयों को जीत लेता है। वह सबके द्वारा सम्मानित होता है। अतः विनयी एवं शीलवान बनिए। इस गुण का अधिकतम सीमा तक विकास करिए।
कुलीनता भद्र होने का गुण है। यह मन अथवा चरित्र की महानता है। यह गरिमा, श्रेष्ठता एवं उदारता है।
कुलीनता कुलीन होने का चारित्रिक गुण एवं अवस्था है जो स्वार्थपरायणता, कायरता एवं क्षुद्रता के सर्वथा विपरीत है। यह महानता, वदान्यता एवं सज्जनता है।
यह आत्मा की वह उन्नत अवस्था है जिसमें साहस, उदारहृदयता, महामनस्कता, वीरता के साथ साथ चरित्र को दूषित करने वाली समस्त प्रवृत्तियों के प्रति उपेक्षा समाहित है।
धन-सम्पदा अथवा उच्च कुल में जन्म नहीं अपितु सम्माननीय आचरण एवं अच्छा स्वभाव आपको महान् बनाता है।
बिना सदगुणों के कुलीनता, बिना हीरे के सुन्दर पृष्ठसज्जा के समान है। सद्गुण कुलीनता की प्रथम आवश्यकता है। यदि आप उदारचेता हैं तो यह सर्वश्रेष्ठ प्रकार की कुलीनता है।
कुलीनता पुरुष एवं स्त्री के लिए सुन्दर आभूषण है। सच्ची कुलीनता सद्गुणों से प्राप्त होती है, उच्च कुल में जन्म लेने से नहीं। किसी भी गुण का वास्तविक स्तर मन से ज्ञात होता है। जो अच्छा सोचता है, वही वास्तव में कुलीन है।
कुलीनता दिव्यता से जुड़े मन एवं हृदय का सार तत्त्व है। वास्तविक कुलीनता का सार 'स्व' का त्याग है। करुणा कुलीनता का सच्चा लक्षण है।
आज्ञाकारिता आदेशों का पालन करने की इच्छुकता है।
आज्ञाकारिता आदेश, विधान अथवा प्रतिबन्धों के प्रति समर्पण अथवा उनका पालन है। यह विहित कार्य को करना तथा निषिद्ध कार्य का त्याग करना है। आज्ञाकारिता एक व्यक्ति अथवा विधान के प्रति समर्पण के समान, पद के प्रति समर्पण भी है।
आज्ञाकारिता त्याग से श्रेष्ठ है।
एक आज्ञाकारी व्यक्ति ही आदेश दे सकता है अथवा शासन कर सकता है।
जो व्यक्ति कुशलतापूर्वक आदेश देने में सक्षम है, उसने भूतकाल में स्वयं अन्य व्यक्तियों के आदेशों का पालन किया है तथा जो निष्ठापूर्वक आज्ञापालन करता है, वह ही किसी दिन आदेश देने वाला अधिकारी बनने योग्य है।
आज्ञाकारिता से समस्त सद्गुणों का उद्भव होता है।
सच्ची आज्ञाकारिता आदेश-पालन में न तो देर करती है तथा न ही प्रश्न करती है।
आज्ञाकारिता सफलता की जननी है तथा सुरक्षा प्रदान करने के लिए वचनबद्ध है।
आपके बालक को प्रथम शिक्षा 'आज्ञाकारिता' की दी जानी चाहिए।
दुष्ट व्यक्ति भय से आज्ञापालन करते हैं, सज्जन व्यक्ति प्रेम से आज्ञापालन करते हैं।
आदेश देना चिन्ताप्रद है, आज्ञापालन सुखप्रद है।
अच्छाई वह सरिता है जो भगवान् के चरण-कमलों से आज्ञाकारिता के मार्ग के माध्यम से प्रवाहित होती है।
यदि हृदय सन्तुष्ट नहीं है तो इसका अभिप्राय है कि शरीर द्वारा वास्तविक आज्ञापालन नहीं हुआ है।
आशावादिता एक सिद्धान्त है जिसके अनुसार सब कुछ अच्छे के लिए होता है। यह वस्तुओं के प्रति उज्ज्वल एवं आशापूर्ण दृष्टिकोण रखने का स्वभाव है।
आशावादिता का यह सिद्धान्त अथवा दृष्टिकोण है कि प्रकृति में तथा मानवता के इतिहास में घटित सब कुछ अच्छे के लिए है; ब्रह्माण्ड की व्यवस्था परम कल्याण हेतु निर्धारित है।
इस सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड श्रेष्ठ स्थिति की ओर अग्रसर है। यह ऐसा विश्वास रखने का स्वभाव है कि वस्तु-परिस्थिति कितनी विपरीत प्रतीत हो; जो है अथवा घटित हो रहा है, वह उचित एवं कल्याणकारी है। यह निराशावादिता के पूर्णतया विपरीत स्वभाव है।
निराशावादिता आशावादिता का विपरीतार्थी शब्द है।
आशावादी व्यक्ति प्रत्येक कठिनाई में एक नवीन अवसर देखता है; निराशावादी व्यक्ति प्रत्येक अवसर में कठिनाई देखता है।
प्रत्येक परिस्थिति का एक उज्ज्वल पक्ष होता है। मन को आशावादिता एवं आत्मविश्वास से पूर्ण रखिए। इससे ही कठिनाई पर आधी विजय प्राप्त हो जायेगी।
एक आशावादी व्यक्ति जीवन से सर्वश्रेष्ठ लाभ प्राप्त करता है। वह अच्छे की आशा करता है, वस्तु-परिस्थितियों का सदुपयोग करता है तथा सबके लिए अच्छा सोचता है।
आशावादिता आशा है। यह सुखी जीवन है। यह लोगों की रक्षा करती है।
भगवान् की अच्छाई के साथ विश्व में बुराई कैसे विद्यमान है? आशावादी व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर देते हैं कि बुराई अच्छाई का आवश्यक पूर्वगामी तत्त्व है।
आशावादिता आपको प्रमुदित-प्रफुल्लित रखती है। दुर्घटना उतनी भयंकर नहीं होती है जितना आपका भय था। पर्वत की चढ़ाई उतनी खड़ी नहीं होती है जितनी आरोहण से पूर्व आपने सोची थी। कठिनाई उतनी बड़ी नहीं होती है जितनी आपने आशा की थी। धातु-परिस्थितियाँ आपकी आशा-कल्पना से अच्छी अवस्था में ही प्राप्त होती है।
धैर्य धैर्यवान् रहने अथवा शान्तिपूर्वक सहन करने का गुण है। यह बिना खिन्न हुए कार सहन करने का गुण है।
एक धैर्यशील व्यक्ति सरलता से उत्तेजित नहीं होता है। वह विपरीत परिस्थितियों में शान्त-प्रशान्त रहता है।
धैर्य शक्ति है। यह दुर्बलता के लिए सहारा है। यह महानतम एवं उच्चतम बल है। धैर्य से आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न हो सकते हैं। यह पर्वतों को हिला सकता है। धैर्य से इस विश्व में कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। सत्य की खोज में धैर्य प्रत्येक कठिनाई पर विजय प्राप्त कर लेगा। एक धैर्यवान् व्यक्ति जो चाहे वह प्राप्त कर सकता है।
यदि आप प्रतीक्षा करें तो सब कुछ प्राप्त होता है। प्रतीक्षा किस प्रकार करें-यही सफलता का महान् रहस्य है। समस्त सुखों का मूल धैर्य ही है। धैर्य इच्छाशक्ति एवं सहनशक्ति विकसित करता है।
धैर्य निष्क्रियता नहीं है। यह उदासीनता है। यह केन्द्रीकृत शक्ति है। यह धरा पर शान्ति का स्तम्भ है।
धैर्य ज्ञान का प्रमुख घटक है। यह धृति एवं सहनशीलता का सारतत्त्व है। यह सन्तोष की कुंजी है। यह एक विजेता का साहस है।
छोटी-छोटी बातों में धैर्यशील रहिए। दैनिक समस्याओं एवं दुःखों को शान्तिपूर्वक सहन करिए। आप महान् शक्ति का अर्जन कर सकेंगे तथा गम्भीर विकट परिस्थितियों, खों एवं कष्टों को सहन कर पायेंगे।
धैर्य आत्मा को सशक्त करता है, स्वभाव को मधुर बनाता है, क्रोध का दमन करता है, इच्छाशक्ति को विकसित करता है, ईर्ष्या को शमित करता है, गर्व को पराभूत करता जिह्वा एवं हाथ पर नियन्त्रण रखता है अर्थात् वाणी एवं कर्म का नियमन करता है।
धैर्य सहनशक्ति की बहिन अथवा पुत्री है।
धैर्य कटु होता है परन्तु इसका फल अत्यन्त मधुर होता है। धैर्य शान्ति की आत्मा है। यह मनुष्य को दिव्य बनाता है। समस्त सन्त-महापुरुष, योगी एवं संन्यासी-वृन्द अत्यधिक धैर्यवान् थे। यह उनका आभूषण अथवा चूड़ामणि था।
धैर्य क्रोध के नियन्त्रण हेतु एक विशिष्ट उपाय है। यह क्रोध के लिए पैन्सिलीर इन्जेक्शन है।
धैर्य निष्क्रिय सहनशक्ति है। यह मानव की सम्भाव्य बुराइयों को अप्रतिरोधपूर्वक सहन करने की मानसिक प्रवृत्ति है।
धैर्य निर्भीक एवं अटल अध्यवसाय है। प्रतिभा धैर्य है। यह किसी इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अथवा किसी कार्य या उपलब्धि हेतु दृढ़तापूर्वक लगे रहना है। हम कहते हैं, "राम धैर्यपूर्वक अध्ययन करता है।"
धैर्य में क्रियाशीलता भी हो सकती है अर्थात् किसी कार्य को बिना शिकायत किये निरन्तर करते रहना यथा भूमि की जुताई करना, चिलगोजे का छिलका निकालना आदि। इनमें अथक प्रयास की आवश्यकता है।
तितिक्षा (Endurance) कष्ट के विरुद्ध स्वयं को कठोर बना लेती है और मात्र हठधर्मिता हो सकती है। इसमें निष्क्रिय शक्ति हो सकती है।
धृति (Fortitude) साहसयुक्त तितिक्षा-शक्ति है। धैर्य तितिक्षा की भाँति कठोर नहीं होता है, यह समर्पण के भाव के समान स्व को विस्मृत करता है। समर्पण सदैव महान् क्षणों के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि छोटी-छोटी चिन्ताओं-परेशानियों के लिए धैर्य का प्रयोग होता है।
सहनशीलता (Forbearance) प्रतिशोध अथवा प्रतिकार का त्याग है। धैर्य दुःखदायी-उद्वेगकर आचरण के समक्ष हृदय में करुणा बनाये रखना है। दीर्घकालीन कष्ट सहन करना सतत धैर्य का परिचायक है।
धैर्य शान्ति अथवा आत्मनियन्त्रण है, यह दूसरे की इच्छा के प्रति समर्पण है।
हम कष्ट 'में' धैर्य रखते हैं। विरोधियों 'के प्रति' धैर्य का प्रयोग करते हैं। अत्यन्त पीड़ा में धैर्य रखने की बात कहते हैं। हम सर्दी-गर्मी अथवा क्षुधा के सन्दर्भ में धैर्य रखने का प्रयोग नहीं करते हैं।
कष्ट, पीड़ा, आघात, अपमान, घोर विपत्ति आदि को शान्तिपूर्वक सहन करना धैर्य है।
एक धैर्यशील व्यक्ति का स्वभाव शान्त एवं अविक्षुब्ध होता है। वह बिना शिकायत, क्रोध अथवा प्रतिशोध की भावना के सहन करता है।
धैर्य बिना असन्तुष्ट हुए न्याय अथवा सुपरिणाम की प्रतीक्षा करने का कार्य अथवा गुण भी है।
एक धैर्यवान् व्यक्ति जल्दबाजी नहीं करता है। वह अति-उत्सुक अथवा क्रोधी नहीं होता है।
धैर्य एवं अध्यवसाय सत्त्व से उत्पन्न सद्गुण हैं। इन सद्गुणों के बिना न तो भौतिक जगत् तथा न ही आध्यात्मिक जगत् में सफलता प्राप्त करना सम्भव है। ये सद्गुण संकल्प शक्ति का विकास करते हैं। जीवन में प्रत्येक अवस्था में कठिनाइयाँ सामने आती है; धैर्यपूर्वक प्रयास एवं अध्यवसाय द्वारा इन पर विजय प्राप्त की जानी चाहिए। इन सद्गुणों के कारण ही महात्मा गाँधी ने सफलता प्राप्त की। वे असफलताओं से कभी हतोत्साहित नहीं हुए। विश्व के समस्त महापुरुषों ने धैर्य एवं अध्यवसाय से ही सफलता, श्रेष्ठता एवं महानता अर्जित की है। आपको इन सद्गुणों का धीरे-धीरे विकास करना होगा।
एक धैर्यवान् व्यक्ति सदैव स्वयं को प्रशान्तचित्त रखता है। वह मन को सन्तुलित रखता है। वह असफलता एवं कठिनाइयों से भयभीत नहीं होता है। वह स्वयं को सशक्त करने के उपाय खोजता है। चित्त की एकाग्रता के अभ्यास हेतु व्यक्ति के पास असीम धैर्य होना चाहिए। अधिकांश व्यक्ति कुछ कठिनाइयाँ आते ही हतोत्साहित हो जाते हैं तथा इसे निरर्थक मान प्रयास छोड़ देते हैं। यह बहुत बुरी बात है। कठिनाइयाँ आने पर साधकों को अपनी साधना नहीं छोड़नी चाहिए।
चींटियाँ चावल एवं चीनी के छोटे-छोटे कण अपने घरों में एकत्रित करती हैं। वे कितनी धैर्यवान् एवं अध्यवसायी हैं! आप बाइबल में इन शब्दों को पायेंगे, "हे अकर्मण्य-आलसी मनुष्य! चींटियों के पास जाओ, उनके कार्य-व्यवहार को देखो और बुद्धिमान् बनो।" मधुमक्खियाँ प्रत्येक पुष्प से एक-एक बूँद शहद ले कर अपने छत्ते में एकत्रित करती हैं। वे कितनी धैर्यवान् एवं अध्यवसायी हैं। समुद्र एवं नदियों पर विशाल बाँध एवं पुल बनाने वाले इन्जीनियर कितने धैर्यशील हैं! वह वैज्ञानिक कितना धैर्यवान् था जिसने यह खोजा कि हीरा मात्र कार्बन ही था। श्री जे. सी. बोस प्रयोगशाला में पौधों के साथ प्रयोग करते हुए कितने धैर्यवान् हैं। हिमालय की गुहा में वास करने वाला सन्त मन पर नियन्त्रण के अभ्यास में इन सबसे अधिक धैर्यशील है।
एक धैर्यशील व्यक्ति थोड़ा भी क्षुब्ध नहीं होता है। धैर्य क्रोध पर नियन्त्रण में सहायता देता है। धैर्य अत्यधिक शक्ति प्रदान करता है। अपनी समस्त दैनिक क्रियाओं को धैर्यपूर्वक करिए। धीरे-धीरे सद्गुणों का विकास करिए। उनके विकास हेतु उत्सुक होइए। अपने मन में 'ॐ धैर्य' का चित्र रखिए। इससे आपमें धैर्य का विकास होगा। प्रात:काल इस सद्गुण पर ध्यान करिए। समस्त दैनिक कार्य धैर्यपूर्वक करने का प्रयास करिए, शिकायत मत करिए। धैर्य के लाभों पर विचार करिए। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आप अन्ततः धैर्य के साकार विग्रह बन जायेंगे।
देशभक्ति अपने देश के प्रति प्रेम एवं भक्ति है।
देशभक्ति वह भाव है जो व्यक्ति को देश की बाह्य आक्रमण से रक्षा तथा इसके अधिकारों, विधि-नियमों एवं संस्थाओं की सुरक्षा द्वारा इसकी सेवा हेतु प्रेरित करता है।
इस भाव का आरम्भ देश के प्रति प्रेम से होता है; यह भाव व्यक्ति को देश के अस्तित्व, अधिकारों एवं संस्थाओं की रक्षा और इसके विधि-विधान के पालन तथा इसके कल्याण-संवर्धन हेतु प्रेरणा देता है।
जो वास्तव में अपनी मातृभूमि से प्रेम करता है तथा इसकी सेवा करता है, वही देशभक्ति है।
देश के प्रति प्रेम उच्चतम सद्गुणों में से एक है।
अपने देश का कल्याण आपका प्रथम कर्तव्य है। जो व्यक्ति इसके कल्याण हेतु श्रेष्ठ कार्य करता है, वही अपना कर्तव्य श्रेष्ठ रूप में निर्वाह करता है।
सार्वजनिक कल्याण उच्चतम लक्ष्य है।
जो देशभक्ति व्यक्ति को आत्म-बलिदान, साहस एवं निष्ठापूर्ण कार्यों हेतु, यहाँ तक की मृत्यु-स्वीकार करने को प्रेरित करती है, वह समस्त सद्गुणों में सर्वोच्च है। प्रथम देशभक्ति तथा उसके पश्चात् वेदान्त-निष्ठा का विकास करिए।
प्राचीन समय से ही अवर्णनीय-अबोधगम्य शान्ति वह धुरी रही है जिसके चहुँ ओर भारतीय संस्कृति अपने विविध पक्षों में केन्द्रित रही है।
शान्ति प्रशान्त अवस्था है। यह उद्वेग, चिन्ता, विक्षुब्धता एवं हिंसा से मुक्ति है। यह समरसता, मौन एवं विश्रान्ति है। विशेषतया यह युद्ध का अभाव अथवा युद्ध की समाभि है। शान्ति आत्मा का स्वरूप है। मन की समस्त वृत्तियाँ आत्मा में विलय हो जाती हैं।
यहाँ कोई संकल्प-विकल्प नहीं रहता है। निःस्वार्थता, इच्छाशून्यता, अनासक्ति, अहंता-ममता-वासना से मुक्ति, आत्मा अधवा परमात्मा के प्रति भक्ति, आत्म-संयम, इन्द्रियों एवं मन पर नियन्त्रण सुख एवं शान्ति प्रदान करते हैं।
राष्ट्रों के मध्य सद्भावना, सहानुभूति, सहिष्णुता एवं मेल-मिलाप से राष्ट्रीय शान्ति बनी रहती है। वैश्विक प्रेम, दयालुता एवं क्षमाशीलता का विकास करिए; दूसरों के विचारों को समझने का प्रयास करिए।
एक विषय-लोलुप व्यक्ति के हृदय में शान्ति का वास नहीं होता है। मन्त्रियों, वकीलों, व्यापारियों, तानाशाहों एवं सम्राटों के हृदयों में भी शान्ति नहीं रहती है। योगियों, सन्त-महापुरुषों एवं आध्यात्मिक व्यक्तियों के हृदय में ही शान्ति का वास होता है।
प्रार्थना, जप, कीर्तन, ध्यान, सद्विचार एवं सचिन्तन से शान्ति प्राप्त होती है। राष्ट्रों के मध्य सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध, आपसी सद्भावना एवं सर्वकल्याण के भाव के आधार पर शान्ति स्थापित होनी चाहिए।
शान्तिपूर्वक बोलिए, चलिए एवं कार्य करिए। भगवान् की अबोधगम्य असीम शान्ति का अनुभव करिए।
आपके अतिरिक्त आपको कोई अन्य शान्ति नहीं दे सकता है। अपनी निम्न प्रकृति, मन, इन्द्रियों एवं इच्छाओं-कामनाओं पर विजय ही आपको शान्ति प्रदान कर सकती है।
यदि आपके भीतर शान्ति नहीं है, तो इसे बाहरी वस्तु-पदार्थों में खोजना व्यर्थ है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मात्सर्य-ये शान्ति के छह शत्रु हैं। विवेक, वैराग्य एवं अनासक्ति के खड्ग से इन शत्रुओं का नाश करिए। आप शाश्वत शान्ति प्राप्त करेंगे।
शान्ति धन-सम्पदा, कोठी-बँगले इत्यादि में नहीं है। शान्ति बाह्य वस्तु-पदाथों में नहीं, आपके आत्मा के भीतर निवास करती है। बाह्य वस्तु-पदार्थों से मन को हटा कर ध्यान करिए एवं अपने आत्मा में विश्राम करिए। आप इसी क्षण शाश्वत शान्ति का अनुभव करेंगे।
शान्ति एक बहुमूल्य रत्न है। यह एक अमूल्य निधि है। शान्ति मनुष्य की स्वाभाविक अवस्था है। यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। युद्ध उसका भ्रष्ट आचरण है, एक लज्जाजनक कार्य है।
भगवदीय शान्ति आपके हृदय में निवास करती है। भक्ति एवं ध्यान द्वारा इस परम शान्ति का अनुभव करिए।
अध्यवसाय प्रारम्भ किये गये कार्य में निरन्तर लगे रहना है। यह सफलताप्राप्ति पर्यन्त कार्य में सतत संलग्न रहना है।
अध्यवसाय किसी उद्देश्य अथवा संकल्पपूर्ति हेतु निरन्तर क्रियाशील रहना है। यह सतत श्रमशील होना है।
भगवान् उनके साथ सदैव रहते हैं जो अध्यवसायी हैं।
यदि आपमें अध्यवसाय अथवा लगन है तो आप जो चाहे वह कार्य सम्पन्न कर सकते हैं।
विघ्न-बाधाओं, निराशाजनक एवं असम्भाव्य परिस्थितियों में भी अध्यवसायपूर्वक क्रियाशील रहने की प्रवृत्ति ही एक शक्तिशाली मनुष्य को दुर्बल से पृथक् करती है।
एक अध्यवसायी को कभी असफलता प्राप्त नहीं होती है। वह अपने सभी कार्यों में सदैव सफलता प्राप्त करता है।
जब आप एक कार्य प्रारम्भ करते हैं, तो पूर्ण सफलता प्राप्त होने तक आपको उसमें दृढ़तापूर्वक लगे रहना चाहिए, उसे मध्य में नहीं छोड़ना चाहिए।
एक परिश्रमशील, जागरूक एवं दृढ़ संकल्पवान् मनुष्य ही एक प्रतिभाशाली व्यक्ति के रूप में विकसित होता है।
अथक क्रियाशीलता, सतत सजगता एवं दृढ़ एकाग्रता-ये तीन सद्गुण विजय अथवा सफलता के स्वामी हैं।
सर्वाधिक अध्यवसायी को सदैव विजय प्राप्त होती है।
अध्यवसाय दुर्बल को शक्ति प्रदान करता है तथा निर्धन के लिए विश्व की सम्पूर्ण सम्पदा प्राप्ति का मार्ग खोल देता है। सतत अध्यवसाय से बड़ी से बड़ी कठिनाइयाँ भी दूर हो जाती है।
'निरन्तरता' (to continue) से अभिप्राय वह करते रहना है जो अब तक किया है; 'अध्यवसाय' (to persevere) का अर्थ किसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एक विशिष्ट दिशा में सतत प्रयत्नशील रहना है; 'डटे रहना' (to persist) से अभिप्राय कार्य मध्य में न छोड़ने के संकल्प के साथ कार्यशील रहना है।
मानव-प्रेम समस्त मनुष्यों के प्रति सद्भावना है। यह सम्पूर्ण मानवता के प्रति प्रेम है जो विशेषतया सद्कार्यों एवं सेवा कार्यों में परिलक्षित होता है।
यह सम्पूर्ण मानवता के सामाजिक उत्थान एवं हित संवर्धन का प्रयास अथवा स्वभाव है।
मानव-प्रेम सामाजिक बुराइयों को समाप्त कर सामाजिक सुख-सुविधाओं में वृद्धि की आकांक्षा अथवा प्रयास है। यह व्यापक स्तर की परोपकारिता है परन्तु इसके प्राय कुछ विशिष्ट उद्देश्य होते हैं। यह सक्रिय मानवतावाद है। यह दयापूर्ण कार्यों द्वारा सम्पूर्ण मानवता के प्रति सद्भावना अभिव्यक्त करना है।
जो मानवता को लाभान्वित करने का प्रयास करता है, वह मानव-प्रेमी है।
एक सच्चा मानव-प्रेमी स्वयं के लिए नहीं अपितु विश्व के लिए जीता है। उस हृदय में सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की उदार भावना विद्यमान होती है।
एक मानव-प्रेमी का लक्षण समस्त मनुष्यों के प्रति दया का भाव है। वह मानक के कल्याणार्थ कार्य करता है। वह परोपकारी होता है। वह मानवतावादी होता है।
यह दूसरों के कष्टों से दुःखी होना है। जहाँ यह भाव है, वहाँ भगवद्शान्ति निवास करती है।
यह दूसरों के दुःख, कष्ट, विपत्तियों से उत्पन्न पीड़ा का भाव है तथा उनके कष्ट दूर करने की इच्छा है। यह दूसरों की पीड़ा के प्रति सहानुभूति है जो उनकी सहायता की इच्छुक है।
सहानुभूति में एक प्रकार की समानता अथवा एकता का भाव निहित होता है। परन्तु तरस का भाव दुर्बल अथवा दुर्भाग्यशाली तथा हमसे किसी क्षेत्र में निम्न के प्रति अभिव्यक्त किया जाता है, अत: सहानुभूति स्वीकार की जाती है परन्तु तरस खाने पर बुरा माना जाता है। सहानुभूति सुख-दुःख अथवा प्रसन्नता-शोक दोनों में अभिव्यक्त की जाती है परन्तु तरस की भावना केवल पीड़ितों के प्रति अभिव्यक्त की जाती है। हम एक विजेता के संघर्षों के प्रति सहानुभूतिशील होते हैं, परन्तु एक बन्धक अथवा दास के प्रति तरस के भाव से भरते हैं।
तरस का भाव केवल मन में रह सकता है, परन्तु करुणा (Mercy) पीड़ितों के लिए कुछ करने को सदैव तत्पर रहती है।
दया (Compassion) भी तरस (Pity) की भाँति दुःखी अथवा पीड़ितों के प्रति ही की जाती है परन्तु इसमें तरस भाव की कोमलता, सहानुभूति की गरिमा तथा करुणा की सक्रियता समाहित होती है।
सह-संवेदना (Commiseration) दया की भाँति कोमल भाव है, परन्तु निरर्थक ही है। यह भाव उन दुःखी व्यक्तियों के प्रति होता है जिन तक हम पहुँच नहीं सकते हैं तथा कोई सहायता भी नहीं कर सकते हैं।
सान्त्वना (Condolence) सहानुभूति की अभिव्यक्ति है। पाशविकता, क्रूरता, उग्रता, कठोरहृदयता, रूक्षता, अमानवीयता, करुणाहीनता आदि तरस-भाव के विपरीत भाव है।
जीवट साहस है। यह कठिनाइयों के सम्मुख आत्म-विश्वास एवं उत्साह है। यह अक्लान्त ऊर्जा तथा संकल्प है।
यह सहनशीलता है। यह विपत्ति काल में दृढ़ संकल्पशील होना है। इस गुण से सम्पन्न व्यक्ति महान् उपलब्धि अर्जित कर सकता है।
जब भाग्य आपका साथ नहीं दे रहा हो, आप इस गुण के माध्यम से एक नया जीवन प्रारम्भ कर सकते हैं तथा जो चाहे प्राप्त कर सकते हैं।
राष्ट्रपति चेडबोर्न ने अपने नष्ट हुए फेफड़े के स्थान पर 'जीवट' का प्रयोग किया तथा अपने अन्तिम संस्कार की तैयारी हो जाने के उपरान्त भी पैंतीस वर्ष तक कार्य किया।
यह गुण सामान्य व्यक्ति के साथ-साथ एक व्यवसायी के लिए अत्यावश्यक है। यह कौशल अथवा दक्षता है। जब कोई व्यवसाय-व्यापार में उन्नति करता है तो लोग कहते हैं, "श्रीमान् बनर्जी में व्यावसायिक कौशल है।" इसका एक समानार्थी शब्द 'अभिवृत्ति' है। विनम्रता, शिष्टता, सद्व्यवहार आदि इस एक सद्गुण में छिपे हैं। जब कोई व्यक्ति कुछ खरीदने के लिए किसी दुकान में प्रवेश करता है तो सेल्समेन को उसके साथ अत्यन्त सौम्यतापूर्वक व्यवहार करना होता है तथा विनम्रतापूर्वक बात करनी होती है, "श्रीमान्, क्या मैं आपके लिए कुछ कर सकता हूँ? कृपया, यहाँ बैठिए। क्या आप चाय अथवा कुछ शीतल पेय लेंगे?" एक अशिष्ट व्यक्ति व्यवसाय में कभी प्रगति नहीं कर सकता है। व्यवसाय की सफलता में उत्साहपूर्ण स्वभाव भी आवश्यक होता है।
व्यावसायिक कौशल से सम्पन्न व्यक्ति अपने व्यावसायिक लेखे में अत्यधिक सावधान रहता है। उसकी स्मरण शक्ति अच्छी होती है। वह समस्त वस्तुओं के बाजार में वर्तमान मूल्य को जानता है। वह अर्थव्यवस्था से सुपरिचित होता है। वह उन स्थानों को जानता है जहाँ से वह वस्तुओं को सस्ते दामों में खरीद सकता है। वह वस्तुओं का प्रचार-प्रसार करना भी जानता है। वह प्रत्युत्पन्नमति होता है। वह असफलता एवं हानि से भयभीत नहीं होता है। वह किसी अन्य उपाय द्वारा हानि की पूर्ति कर लेगा। ऐसे व्यवसायी का मस्तिष्क रचनात्मक होता है। वह बहुत बुद्धिमान् होता है।
वकीलों एवं चिकित्सकों को भी सफल होने हेतु इस कौशल की आवश्यकता होती है। कुछ व्यक्ति जन्मतः उद्यमपूर्ण कौशल से सम्पन्न होते हैं। यदि आप चाहें तो आप भी शीघ्र ही इसका विकास कर सकते हैं। इस प्रकार कुशल अथवा दक्ष व्यक्ति अनेक आश्चर्यपूर्ण कार्य कर सकता है। धर्मशिक्षकों में ऐसे कौशल की आवश्यकता है। तभी वे लोगों को प्रभावित कर सकते हैं तथा अपनी शिक्षाओं का प्रसार कर सकते हैं। आचार्य शंकर भी उद्यमपूर्ण कौशल से सम्पन्न थे। उन्होंने बौद्धों के विरुद्ध नागा साधुओं की सेना का निर्माण किया । गुरु गोविन्द सिंह में भी यह असाधारण कौशल था। यद्यपि वे एक आध्यात्मिक व्यक्ति थे, उनमें एक योद्धा के भी गुण थे। धर्मगुरुओं को समय, परिस्थिति एवं आवश्यकतानुसार विभिन्न कार्य-विधियों को अपनाना चाहिए।
शिष्टता शिष्ट आचरण है। यह अच्छा पालन-पोषण दर्शित करती है। यह शिष्ट एवं सभ्य स्वभाव है।
यह आचरण की सहजता एवं चारुता है। यह आचरण का सौन्दर्य है। यह कुलीनता-भद्रता है।
यह आपकी भावनाओं को संयमित एवं कोमल बनाती है। यह एक सरल सद्गुण है परन्तु इसमें महान् शक्ति है।
शिष्टता मानवता का पुष्प है। इससे अभिप्राय दूसरों से वही व्यवहार करना है जैसा आप स्वयं के लिए चाहते हैं।
एक शिष्ट व्यक्ति सबके स्नेह एवं सम्मान का पात्र होता है। उसे सुयश प्राप्त होता है। शिष्टता शिष्टाचार, सभ्यता, विनीतता एवं सुजनता का मिश्रण है।
शिष्टता न केवल आचरण अपितु मन एवं हृदय पर भी प्रभाव डालती है। यह व्यक्ति के भावों, विचारों एवं शब्दों को परिमित एवं सौम्य बनाती है।
शिष्टता सहृदयतापूर्वक अभिव्यक्त सहृदयता है। इसका प्रतिदिन अभ्यास करिए। विनीत बनिए। सभी आपके आचरण से प्रभावित होंगे।
एक शिष्ट व्यक्ति सर्वप्रिय एवं सर्वानुकूल होता है। शिष्टता सद्भाव एवं सद्प्रकृति का परिणाम है। यह व्यक्ति को एक पूर्ण भद्रपुरुष बनाती है।
शिष्टता एक दर्पण है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपनी छवि दिखाता है। यह सद्भाव से नियन्त्रित सद्प्रकृति है।
शिष्टता के लिए विनम्रता, सद्भाव एवं परोपकारिता आवश्यक है।
यह दूसरों के प्रति सद्भावना है। यह अच्छे स्वभाव, दूसरों के शुभ की इच्छा एवं उनके लिए स्वार्थ-त्याग का परिणाम है।
सर्वप्रथम हृदय में शिष्टता का भाव होता है जो बाह्य व्यवहार में प्रकट होता है। एक शिष्ट व्यक्ति के वाणी एवं आचरण में दूसरों की सुख-सुविधा के प्रति सम्मान का भाव होता है। वह अपने व्यवहार एवं भाषा में शिष्ट होता है।
शिष्टता आचरण की चारुता तथा वाणी की विनीतता है। सौजन्यता, भद्रता, सभ्यता, नम्रता, शिष्टाचार, सौहार्दता, मर्यादा, सौम्यता, सुशीलता एवं सुसंस्कृतता आदि शिष्टता के समानार्थी शब्द हैं।
अभिमान, रूक्षता, अशिष्टता, अभद्रता, असभ्यता, उद्धतता, देहातीपन, धृष्टता एवं गँवारुपन आदि शिष्टता के विपरीतार्थी शब्द हैं।
एक शिष्ट व्यक्ति अपनी वाणी एवं आचरण में इस प्रकार की मर्यादा का पालन करता है ताकि वह किसी के प्रति अभद्र न हो पाये। वह सभ्य समाज के आचार-व्यवहार में मान्य एवं स्वीकृत मर्यादाओं के पालन में भी अधिक सजग होता है।
एक व्यक्ति दूसरों के विषय में विचार न करते हुए भी सभ्य हो सकता है क्योंकि उसका आत्म-सम्मान उसे धृष्ट होने से रोकता है, परन्तु एक शिष्ट व्यक्ति दूसरों के विषय में सोचता है। यदि व्यक्ति वास्तविक एवं उच्च रूप में शिष्ट है तो वह छोटे-छोटे विषयों मे भी दूसरों की सुख-सुविधा का ध्यान रखता है।
'सभ्य' (Civil) शिष्ट से थोड़ा शुष्क शब्द है।
सुशिष्टता (Courteousness) अधिक पूर्ण एवं समृद्ध शब्द है जो प्रायः महान् विषयों एवं अच्छे भाव में प्रयुक्त होता है।
कुलीन (Genteel) मात्र बाह्य रूप में सौम्य शालीन होना है। यह विनीतता एवं शिष्टता से निम्न शब्द है।
सुसभ्य (Urbane) शिष्टता का वह भाव है जो दूसरों को सुख एवं प्रसन्नता अनुभव कराने में सफल होता है।
परिष्कृत (Polished) वास्तविक भाव से रहित वाणी-व्यवहार की चारुता से सम्पन्न होना है।
सुसंस्कृत (Cultured) शब्द मन एवं आत्मा के उच्च विकास को दर्शाता है जिसका कुछ अंश बाह्य व्यवहार में अभिव्यक्त होता है।
भद्रता (Complaisance) शिष्टता के क्षेत्र से अधिक आगे जाकर दूसरों को प्रसन्न करने का स्वभाव है।
शिष्टता (Politeness) आचरण की सहजता एवं चारुता है तथा यह अन्य व्यक्तियों की आवश्यकताओ-इच्छाओं का पूर्वानुमान करके उन्हें प्रसन्न करने तथा उन्हें कष्टप्रद लगने वाले व्यवहार को त्यागने की इच्छा है।
शिष्टाचार (Courtsey) वाणी एवं आचरण में परिलक्षित होता है। यह विशेषतया अन्य व्यक्तियों का स्वागत एवं आतिथ्य करते समय प्रदर्शित होता है। यह गरिमापूर्ण शिष्टता एवं दयालुता का संयुक्त रूप है।
तत्परता निर्णय एवं कार्य में शीघ्रता है। यह भाग्योदय, प्रतिष्ठा एवं प्रभाव स्थापित करने में सहायक है।
यह व्यवसाय की आत्मा है।
इस गुण से सम्पन्न व्यक्ति शीघ्र ही योजना बनाता है, संकल्प ले कर उसे क्रियान्वित करता है तथा सफल होता है।
तत्परता आपका कर्तव्य है। यह शिष्टाचार का एक भाग है। समय अत्यन्त मूल्यवान् है। समय के वास्तविक मूल्य को जानिए। प्रत्येक क्षण का आनन्द उठाइए। प्रत्येक क्षण का पूर्णतम उपयोग करिए। आलस्य, प्रमाद एवं दीर्घसूत्रता छोड़िए। जो कार्य आप आज कर सकते हैं, उसे कल के लिए मत टालिए।
पत्रों का उत्तर देने में तत्पर रहिए। इससे आपका पत्र प्राप्त करने वालों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा।
समझदारी एक सार्वलौकिक सद्गुण है। यह अन्य सभी सद्गुणों में निहित है। इस सद्गुण के बिना साहस, साहस नहीं कहलाता है।
यह समस्त सद्गुणों का आवश्यक घटक है। अनेक सद्गुण इस पर आश्रित हैं। यह आपकी रक्षा करेगा।
समझदारी विचारपूर्वक कार्य करने की आदत है। यह मुख्यतया कार्यों, उनके साधनों एवं विधियों, क्रम एवं समय से सम्बन्धित है।
इसमें एवं बुद्धिमत्ता में मात्रा का ही अन्तर है। बुद्धिमत्ता (Wisdom) समझदारी (Traurice) का अधिक पूर्ण-परिष्कृत रूप है। समझदारी बुद्धिमत्ता की दुर्बल आदते अथवा कम मात्रा है।
मूर्खता, मूढ़ता, नासमझी, लापरवाही, विवेकहीनता, दुस्साहस, उतावलापन, असावधानी एवं असतर्कता समझदारी के विपरीतार्थी शब्द हैं।
समझदारी बुद्धिमत्ता का व्यावहारिक प्रयोग है। एक समझदार व्यक्ति अपने आचरण में सदैव सतर्क एवं बुद्धिमान् रहता है। वह सावधान एवं विवेकशील होता है। वह कार्य से पूर्व विचार करता है। वह मितव्ययी होता है।
समझदारी सर्वश्रेष्ठ कवच है। समझदार व्यक्ति प्रायः अपने शत्रुओं से भी सीख लेते हैं। वही व्यक्ति समझदार है जो भविष्य की अनिश्चित घटनाओं से न कुछ आशा रखता है और न ही भयभीत होता है। वही व्यक्ति सुखी है जो अपने व्यक्तिगत कष्टों से नहीं अपितु दूसरों के कार्यों एवं अनुभवों से सीख कर समझदार बनता है।
एक समझदार व्यक्ति त्रुटियाँ करने से बचता है। वह सावधान होता है। वह निरीक्षण की क्षमता से सम्पन्न होता है। व्यावहारिक विषयों में वह दूरदर्शी एवं उचित निर्णायक सिद्ध होता है। वह मितव्ययी एवं विचारशील होता है। वह दूरदर्शिता, पूर्वज्ञान, विवेक एवं बुद्धि से सम्पन्न होता है। वह निरीक्षण करता है तथा अपनी रक्षा करता है। चूँकि वह दूरदशीं है, अतः वह भविष्य के विषय में विचार करते हुए कार्य करता है।
एक समझदार व्यक्ति स्वभाववशात् त्रुटियों से बचने तथा लाभप्रद मार्ग चुनने में सावधान रहता है। वह सांसारिक कार्य-व्यवहार को भली प्रकार समझता है। वह अपने हित एवं लाभ के प्रति अत्यन्त सजग रहता है। वह उचित निर्णय लेता है। वह बुद्धिमतापूर्वक विचार करता है। वह सजग सावधान रहता है। वह आने वाली विपत्ति को देख कर स्वयं को बचा लेता है। उसमें व्यावहारिक ज्ञान होता है। वह विवेकी होता है।
एक समझदार व्यक्ति किसी कार्य अथवा आचरण को अपनाने में अत्यन्त सावधान रहता है। वह किसी कार्य, व्यवसाय एवं उद्योग के परिणामों के विषय में सजग रहता है।
नयी सूचना की प्राप्ति की सम्भावना पर्यन्त अन्तिम निर्णय नहीं लेना समझदारी का सूचक है।
'समझदारी' के शब्दों को सुनिए। वह आपको उचित मार्ग पर चलायेगी। वह आपको विवेकपूर्ण परामर्श देगी। उसके परामर्श पर ध्यान दीजिए। उन्हें अपने हृदय में रखिए। सजगतापूर्वक उनका पालन करिए। समस्त सद्गुण इस एक गुण पर आश्रित हैं।
दूसरों के अनुभवों से शिक्षा ग्रहण करिए। उनकी असफलताओं को देख कर अपनी त्रुटियाँ सुधारिए। दूरदर्शी बनिए। आप कभी विपत्ति का सामना नहीं करेंगे। जिस वस्तु की कल आवश्यकता पड़ सकती है, उसका आज प्रयोग नहीं करिए। समझदारी के इस सद्गुण का अधिकतम सीमा तक विकास करिए।
समयनिष्ठता किसी भी कार्य के निर्धारित समय का पालन है। एक समयनिष्ठ व्यक्ति पूर्वनियोजित भेंट अथवा कार्य हेतु समय पर पहुँचता है। समयनिष्ठता वचन दिये हुए समय के प्रति निष्ठा है अर्थात् उसका पालन है।
एक समयनिष्ठ व्यक्ति अपने कार्य की अवधि तथा अन्य व्यक्तियों से मिलने के निर्धारित समय के सम्बन्ध में अत्यन्त सजग होता है। वह किसी भी कार्यक्रम-अवसर के निश्चित समय पर पहुँचता है।
समयनिष्ठता व्यवसाय-उद्योगरत व्यक्तियों तथा महापुरुषों का विशिष्ट सद्गुण है। एक समयनिष्ठ व्यक्ति जीवन में सदैव सफल रहता है।
एक क्षण देरी करने की अपेक्षा दो घण्टे जल्दी पहुँचना श्रेष्ठ है।
जब अमेरिका के राष्ट्रपति वाशिंगटन के सचिव ने अपनी देरी का कारण घड़ी की खरानी बताया तो वाशिंगटन का उत्तर था, "आप नयी घड़ी खरीद लें अथवा मैं नया सचिव नियुक्त कर लूँगा।"
एक चिकित्सक, रसोइये, ऑफिसर एवं प्रोफेसर की सर्वाधिक आवश्यक योग्यता समयनिष्ठता ही है।
मैं हर स्थान पर सदैव निर्धारित समय से आधा घण्टे पहले ही पहुँचता हूँ। यही मेरी सफलता का रहस्य है।
दृढ़ समयनिष्ठता सर्वाधिक सरल सद्गुण है। इसका अभाव सदगुणों का अभाव है। अधिकांश व्यक्ति आदत एवं स्वभाववशात् आलसी होते हैं। सच्ची एवं दृद समयनिष्ठा से युक्त व्यक्ति को खोज पाना अत्यन्त दुर्लभ है।
व्यवसाय तथा समस्त महत्त्वपूर्ण कार्यों की मुख्य धुरी उनकी विधि है। समयनिष्ठता के बिना कोई विधि कार्य नहीं करती है।
"कभी नहीं से थोड़ी देर अच्छी" (Better late than never) इस कहावत से श्रेष्ठ कहावत है-"कभी देर नहीं करना अच्छा (Better never late)।" समयनिष्ठ बनिए। आपको समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होगी।
पवित्रता पाप अथवा दोष से मुक्ति है। पवित्रता मनसा वाचा-कर्मणा शुद्धता है। पवित्रता कामुक विचारों से मुक्ति है। यह नैतिक शुद्धता है।
पवित्रता-शुचिता दो प्रकार की होती है-आन्तरिक एवं बाह्य। राग-द्वेष का अभाव तथा भाव, लक्ष्य एवं उद्देश्य की शुद्धता आन्तरिक पवित्रता है। शरीर, वस्त्रों, अपने घर एवं आस-पास के क्षेत्र की स्वच्छता बाह्य पवित्रता है।
पवित्रता सद्गुण का मुख्य अंग है। यह आत्मा से अपना जीवन प्राप्त करती है। आपका आत्मा नित्य शुद्ध है। मन एवं इन्द्रियों के सम्पर्क के कारण आप अपवित्र-अशुद्ध हो गये हैं। जप, कीर्तन, प्रार्थना, ध्यान, आत्म-विचार, प्राणायाम, स्वाध्याय, सत्संग एवं सात्त्विक आहार द्वारा अपनी मौलिक पवित्रता को पुनः प्राप्त करिए।
पवित्रता के बिना आध्यात्मिक प्रगति सम्भव नहीं है। आत्मा पवित्र है। आपको पवित्रता के सद्गुण के अभ्यास एवं काया-वाचा-मनसा ब्रह्मचर्य पालन द्वारा इस नित्य शुद्ध आत्मा को प्राप्त करना चाहिए।
मैं इस प्रकार प्रार्थना करता हूँ, "हे आराधनीय प्रभु! मेरे मन को पवित्र बनाइए। मुझे समस्त अपवित्र विचारों से मुक्त करिए। मेरे मन को एक स्फटिक की भाँति पारदर्शी, हिमालय की श्वेतहिम की भाँति पवित्र तथा एक उज्ज्वल दर्पण की भाँति दीप्तिमन्त बनाइए।"
अपने जीवन को शत्रुता, अपवित्रता, घृणा एवं कामुकता से मुक्त कर इसे प्रेम, पवित्रता, शान्ति एवं परोपकारिता से परिपूरित करने से अधिक महान् कार्य आपके समक्ष अन्य क्या है?
इस स्वभाव को 'गशिंग नेचर' भी कहा जाता है। यह लज्जा-संकोच का विपरीत भाव है। ऐसा व्यक्ति अति उत्साही होता है। वह सभी स्थानों में ईथर की भाँति प्रवेश करने की प्रवास करता है। कुछ चिकित्सक एवं वकील अपना जीविकोपार्जन नहीं कर पाते । क्योंकि उनका उत्साही-उद्यमी स्वभाव नहीं है। वे अत्यधिक बुद्धिमान् एवं प्रतिभासम्पन्न होते हैं परन्तु अपने स्वभाव में असुधार्य रूप से लज्जाशील-संकोचशील होते हैं। अन्य व्यक्तियों को प्रभावित नहीं कर पाते हैं। एक उत्साहपूर्ण-उद्यमी व्यक्ति मधुरतापूर्वक बात कर सकता है। वह बहुत अधिक साहसी होता है।
इस प्रकार का व्यक्ति अत्यधिक क्रियाशील होता है। वह जानता है कि अन्य व्यक्तियों को कैसे प्रसन्न किया जाये तथा उनका हृदय किस प्रकार जीता जाये। वह भली प्रकार जानता है कि किस प्रकार अन्य व्यक्तियों की सेवा करके उनका विश्वासपात्र बना जाये। वह अपने लिए किसी न किसी कार्य का सृजन कर लेता है। वह निष्क्रिय नहीं बैठ सकता है। वह सदैव योजनाएँ बनाता है तथा उन पर विचार करता है। वह जीवन में अत्यधिक उन्नति करना चाहता है तथा संसार की दृष्टि में स्वयं को ऊपर उठाना चाहता है। वह अत्यन्त हँसमुख स्वभाव का होता है तथा सबके साथ घुलमिल जाता है। वह जानता है कि विभिन्न स्वभावों के व्यक्तियों के साथ स्वयं को कैसे समायोजित किया जाये। जीवन में तथा भगवद्-साक्षात्कार में सफलता हेतु इस प्रकार का स्वभाव आवश्यक है। आपको इस स्वभाव का अधिकतम विकास करना होगा। इस स्वभाव को विकसित करने की तीव्र उत्कण्ठा रखिए तथा इसे अपना घनिष्ठ मित्र बनाने हेतु अधिकतम प्रयास करिए। तब आपके अन्य घनिष्ठ मित्र 'अवचेतन मन' एवं 'संकल्प शक्ति' आपको अपना सहयोग प्रदान करेंगे। जिस वस्तु को आप चाहते हैं, अपने मन में उसका स्पष्ट चित्र रखिए। मात्र इसकी ही आवश्यकता है।
यूरोपियन व्यक्तियों में यह स्वभाव अधिक मात्रा में होता है। ब्रिटिश भारत में व्यापारियों के रूप में आये तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की। धीरे-धीरे अपने उत्साही-उद्यमी स्वभाव के कारण ही वे इस भूमि के शासक बन गये। मालाबार के निवासियों का भी ऐसा ही स्वभाव होता है। आप पृथ्वी के प्रत्येक कोने में मालाबार-निवासियों को पायेंगे। वास्को-डी-गामा का ऐसा स्वभाव था। उसने भारत तक के समुद्री मार्ग की खोज की। कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की। जापानी व्यक्ति अपने इस स्वभाव के कारण प्रसिद्ध हैं। इसी कारण इतनी कम अवधि में उन्होंने अत्यधिक उन्नति की है। जापान एक छोटा सा राष्ट्र है, परन्तु उद्योग-व्यवसाय के क्षेत्र में यह विश्व के अन्य राष्ट्रों से कम नहीं है।
उत्साहपूर्ण उद्यमी स्वभाव व्यक्ति को सदैव क्रियाशील रखता है तथा यह आध्यात्मिक साधक के लिए भी उपयोगी है। व्यवसायी-व्यापारी वर्ग के व्यक्तियों को इस गुण से सम्पन्न होना चाहिए। यह सभी के लिए एक अत्यन्त महत्वपूर्ण योग्यता है ।
नियमितता एवं समयनिष्ठता के बिना कोई व्यक्ति जीवन तथा भगवद्-साक्षात्कार में सफलता प्राप्ति की आशा नहीं कर सकता है। नियमितता एवं समयनिष्ठता के द्वारा ही पूर्ण अनुशासन का पालन किया जा सकता है। अनुशासन के बिना कहीं कोई सफलता प्राप्त नहीं हो सकती है। अनुशासन मन का शत्रु है। मन अत्यधिक भयभीत हो जाता है जब बह अनुशासन, नियमितता, तपस्या, वैराग्य, त्याग, साधना इत्यादि शब्द सुनता है। ये अभ्यास मनोनाश का कारण होते हैं।
नियमित अभ्यास से मनुष्य शीघ्र ही उन्नति करता है। जो नियमित रूप से ध्यान करता है, वह शीघ्र ही समाधि अवस्था को प्राप्त होता है। वह बिना किसी प्रयास के सहजतापूर्वक ध्यान की अवस्था में आ जाता है। जो नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम करता है, उसका शरीर शीघ्र सुदृढ़ होता है। जो व्यक्ति अनियमित रूप से सभी कार्य करता है, उसे अपने कार्यों का फल प्राप्त नहीं होता है।
प्रकृति से शिक्षा ग्रहण करिए। देखिए किस प्रकार ऋतुएँ नियमित रूप से आती हैं, सूर्य उदय-अस्त होता है, चन्द्रमा गगन में आता है, पुष्प खिलते हैं, फल-सब्जियाँ उत्पन्न होते हैं; पृथ्वी एवं चन्द्रमा गति करते हैं, दिन-रात, सप्ताह, माह एवं वर्ष आते हैं। प्रकृति आपकी गुरु एवं पथप्रदर्शक है। पंचभूत आपके शिक्षक हैं। जाग्रत होइए, उनके निर्देशों को ग्रहण कर अनुपालन करिए।
नियमितता, समयनिष्ठता एवं अनुशासन साथ-साथ चलते हैं। वे अभिन्न हैं। भारत में विद्यालय-महाविद्यालयों के कुछ छात्र एवं छात्राएँ पश्चिम के वस्त्र, वेशभूषा, केशविन्यास आदि का अनुकरण करते हैं। यह निम्न-तुच्छ अनुकरण है। क्या आपने उनसे नियमितता एवं समयनिष्ठता जैसे सद्गुण ग्रहण किये हैं? देखिए, एक अँग्रेज समय के प्रत्येक सैकण्ड के प्रति सजग रहता है। वह कितना समयनिष्ठ है! विशेषज्ञों एवं शोधकर्ताओं की संख्या भारत की अपेक्षा पश्चिमी राष्ट्रों में अधिक है। भारत में टैगोर, बाँस, अरबिन्दो जैसे कुछ ही प्रतिभाशाली व्यक्ति तथा कुछ सन्त एवं योगी हैं। परन्तु पश्चिम में असंख्य विशेषज्ञ एवं विद्वान् हैं। वे भारतीयों की अपेक्षा अधिक अध्ययनशील, नियमित एवं समयनिष्ठ होते हैं। वे अपनी इस एक विशेषता अर्थात् समयनिष्ठता के लिए सुविख्यात हैं। एक यूरोपियन मैनेजर ऐसे लिपिकों को पसन्द नहीं करता है जो समयनिष्ठ नहीं हैं। वह ऐसे व्यक्ति को शीघ्र ही कार्यमुक्ति का आदेश दे देगा। नियमित एवं समयनिष्ठ व्यक्ति जीवन के समस्त क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करेगा। इसमें कोई सन्देह नहीं है।
'भारतीय अपनी 'भारतीय समयनिष्ठता' के लिए प्रसिद्ध हैं। यदि समाचार में एक सूचना प्रकाशित होती है कि टाउन हॉल में अपराह्न ४ बजे एक मीटिंग आयोजित की जायेगी तो भारतीय ५.३० बजे तक धीरे-धीरे एकत्रित होना प्रारम्भ करेंगे। इसे ही 'भारतीय समयनिष्ठता' कहते हैं। यदि घोषणा द्वारा लोगों को सूचित किया जाता है कि रात्रि ८.०० बजे कीर्तन आयोजित किया जायेगा, तो वे ९.३० बजे तक ही पहुँचेंगे। यदि कुछ मिनटों का ही विलम्ब हो, तो कोई समस्या नहीं। परन्तु घण्टों का विलम्ब उचित नहीं है। मुझे संकीर्तन एवं व्याख्यान यात्राओं में इस भारतीय समयनिष्ठता का अनुभव हुआ है। भारतीयों को अपने इस दुर्गुण-दोष के कारण लज्जित होना चाहिए तथा शीघ्र ही इसका निराकरण करना चाहिए। हे भारतीय जन, जागिए! जागिए!
इस एक महत्त्वपूर्ण सद्गुण 'समयनिष्ठता' ने ही मुझे जीवन में सफल बनाया है। यूरोपियन भी मेरी समयनिष्ठता की प्रशंसा करते थे। मैं हर स्थान पर निर्धारित समय से पूर्व ही पहुँचता था। इससे व्यक्तियों पर अत्यधिक गहरा प्रभाव पड़ता था। मैं कभी ट्रेन पकड़ने में असफल नहीं हुआ। मैं रेलवे स्टेशन समय पर पहुँचता था। जो व्यक्ति समयनिष्ठ नहीं है, वह सदा ट्रेन पकड़ने में चूक जाता है। वह व्यवसाय में असफल रहता है। वह अपने सभी ग्राहक खो देता है। एक प्रोफेसर ऐसे विद्यार्थियों को पसन्द नहीं करता है, जो समय के पाबन्द नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति समय पर अदालत नहीं पहुँचता है, तो वह अपना मुकदमा हार जायेगा।
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नियमित रहिए। अपने सोने एवं जगने के समय में नियमित रहिए। जल्दी सोने एवं प्रातः जल्दी उठने वाला व्यक्ति स्वस्थ, धनवान् एवं बुद्धिमान् बनता है। अपने भोजन, अध्ययन, शारीरिक व्यायाम एवं ध्यान में नियमित रहिए। इससे आपका जीवन सफल एवं सुखद होगा। नियमितता आपके जीवन का 'आदर्श' होना चाहिए।
मात्र त्याग द्वारा ही अमरत्व अथवा आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति होती है।
त्याग मन एवं संकल्प शक्ति को सुदृढ़ करता है तथा शान्ति प्रदान करता है।
वस्तु-पदार्थों का त्याग करिए। यह विषय-त्याग है। वस्तु-पदार्थों के प्रति आसक्ति का त्याग करिए। यह संग-त्याग है। यह मानसिक अनुशासन है।
त्याग के बिना, लेशमात्र भी आध्यात्मिक प्रगति सम्भव नहीं है।
त्याग का रहस्य अहंता, ममता, इच्छाओं, वासनाओं, तृष्णाओं, भेद-बुद्धि तथा कर्तृत्व-अभिमान का त्याग है।
पूर्ण त्याग एक दिन में घटित नहीं होता है। इसमें अत्यधिक समय लगता है। सन्त-महापुरुषों के साथ सत्संग, 'संन्यास की आवश्यकता' (Necessity for Sannyasa) पुस्तक के समान त्याग एवं वैराग्य पर आधारित अन्य पुस्तकों का स्वाध्याय त्याग के अभ्यास में सहायता प्रदान करते हैं।
जो परिपूर्ण त्यागी है, वह सम्राटों का सम्राट् है।
इस धरा पर त्याग महानतम शक्ति है।
पश्चात्ताप किये गये पाप अथवा दुष्कृत्य के लिए पछतावा है जो जीवन में नवीन सुधार लाता है।
यह भूतकालीन पापाचरण के प्रति दुःख अथवा खेद का भाव तथा उचित कृत्य करने की इच्छा है।
पश्चात्ताप पापों का नाश करता है। यह हृदय को शुद्ध करता है। पश्चात्तापपूर्ण प्रत्येक अश्रु पवित्रकारक होता है।
पश्चात्ताप एक नये एवं श्रेष्ठ जीवन की ओर गतिशील करता है। इसमें अत्यधिक पवित्रकारक शक्ति होती है।
वास्तविक पश्चात्ताप का अर्थ पाप का पूर्ण त्याग है।
पश्चात्ताप भूतकालिक दुष्कृत्य हेतु गहन दुःख तथा भगवदीय विधान के अनुसार कर्म करने का दृढ़ संकल्प एवं सच्चा प्रयास है।
हृदय एवं आचरण में परिवर्तन के बिना किया गया पश्चात्ताप निरर्थक है। मृत्युशय्या पर किये जाने वाले पश्चात्ताप का कोई ठोस परिणाम प्राप्त नहीं होगा।
पश्चात्ताप दुःख एवं खेदपूर्ण हृदय द्वारा होना चाहिए। मन एवं स्वभाव में गम्भीर तथा पूर्ण परिवर्तन घटित होना चाहिए, अन्यथा इसका कोई उपयोग नहीं है।
पश्चाताप आत्म-भर्त्सना सहित दुष्कृत्य के लिए, खेद करना है तथा पाप से पूर्णतया विमुख होना है।
पछतावा (Penitence) क्षणिक होता है तथा इससे चरित्र अथवा आचरण में परिवर्तन नहीं होता है।
गम्भीर अनुताप (Remorse) हृदय को कचोटने-सन्तप्त करने वाला अपराध-बोध है, इसमें भगवान् से क्षमा की आशा भी नहीं होती है।
खेद (Regret) किसी कष्टप्रद विषय में दुःखी होना है। बिना पश्चात्ताप के दुःख हो सकता है परन्तु बिना दुःख के पश्चात्ताप नहीं होता है। अनुताप (Contrition) सत्पुरुष तथा प्रेम के विरुद्ध किये गये पाप के लिए दुःख है। आत्म-श्लाघा, आत्म-सन्तोष एवं आत्म-स्वीकृति पश्चात्ताप के विपरीताथी शब्द हैं।
संकल्प अथवा प्रतिज्ञा दृढ़ निश्चय है। यह स्थैर्य है। यह उद्देश्य की निश्चितता एवं स्थिरता है।
एक संकल्पवान् व्यक्ति दृढ़निश्चयी होता है। उसका निश्चित लक्ष्य होता है। वह लक्ष्य प्राप्ति के प्रयास में स्थिर रहता है। वह अविचलित हुए दृढ़ रहता है। वह साहसी एवं निर्भीक होता है। वह दृढ़ इच्छा शक्ति से सम्पन्न होता है। संकटों अथवा कठिनाइयों के सम्मुख भी वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति में स्थिर एवं दृढ़ रहता है। वह सक्रिय धृति से सम्पन्न होता है।
जो व्यक्ति दृढ़ संकल्प शक्ति से युक्त है, वह अपने समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त करता है। असफलता से वह अपरिचित रहता है।
दृढ़ संकल्पशीलता अपनाइए। हे वीर! आगे बढ़िए। आपको सभी प्रयासों में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त होगी। समस्त बाधाएँ शीघ्र ही दूर हो जायेंगी।
दृढ़ संकल्प सर्वशक्तिमान् है। एक दृढ़ संकल्पशील व्यक्ति अपने मार्ग में आने वाले समस्त विघ्न-बाधाओं पर विजय प्राप्त करता है। उसके लिए समस्त कठिनाइयाँ अदृश्य हो जाती हैं। साहस, लगन, अध्यवसाय, धृति एवं शक्ति संकल्प के मित्र हैं।
एक दृढ़ संकल्पशील मनुष्य अथक रूप से क्रियाशील, सतत सजग, एकाग्रचित्त एवं अटल उद्देश्य युक्त होता है। वह सदैव सफलता प्राप्त करता है।
दृढ़ संकल्प आवश्यकता के समय आत्मा द्वारा प्रदत्त सहायता है। दृढ़प्रतिज्ञ एवं संकल्पवान् बनिए। दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ते रहिए। अपनी कमर कस लीजिए। निरन्तर आरामशील रहिए। आप समस्त विश्व पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
एक दृढ़ संकल्पशील मनुष्य हिमालय को चूर्णित कर सकता है, अग्नि को निगल सकता है तथा एक क्षण में समुद्र के समस्त जल को पी सकता है। वह एक क्षण में तीनों लोकों में कुछ भी करने में सक्षम हैं। यदि सम्पूर्ण विश्व भी उसका विरोध करे, तो भी वह निर्भीकतापूर्वक आगे बढ़ता है।
समस्त महापुरुष, जिन्होंने महानता अर्जित की है तथा अतिमानवीय कार्य सम्पन्न किये हैं, इस गुण से सम्पन्न थे। जहाँ दृढ़ संकल्प है, वहाँ सक्रिय अप्रतिरोध्य दृढ़ इच्छा शक्ति भी है। संकल्प एवं दृढ़ इच्छा शक्ति साथ-साथ चलते हैं।
दृढ़ संकल्पशील बनिए। अपने संकल्पों का पालन करिए। उन्हें सशक्त करिए। इससे आप अपनी इच्छा-शक्ति का विकास कर सकेंगे।
संसाधनपूर्णता किसी प्रकार के साधनों से सम्पन्न होना है।
एक संसाधनपूर्ण व्यक्ति साधनों, उपायों अथवा युक्तियों से परिपूर्ण होता है। वह कार्य करने की विभिन्न विधियों में दक्ष होता है। वह विपुल साधन-सम्पन्न होता है।
जिस वस्तु का आश्रय लिया जाये, जिस पर निर्भर रहा जाये अथवा सहयोग हेतु जिसे उपलब्ध कराया जाये, उसे संसाधन कहते हैं।
जिस उपाय अथवा साधन का सहायता अथवा सुरक्षा हेतु आश्रय लिया जाये, वह संसाधन है।
उदाहरणतः हम कहते हैं "व्यावसायिक संसाधन", "एक स्त्री का संसाधन धैर्य है", "अक्षय संसाधनों का राष्ट्र", "राम विदग्धमना है अर्थात् उसका मस्तिष्क संसाधनपूर्ण है। वह बिना पूर्व तैयारी के किसी विषय पर व्याख्यान दे सकता है । ''व्यास ने दर्शन के संसाधनों का उपयोग किया।" ।
संसाधन वे आर्थिक साधन, धन-सम्पत्ति अथवा उपलब्ध क्षमताएँ भी हैं जिनकी कहीं आपूर्ति की जा सकती है।
जो विदग्धमना है अथवा उपायकुशल है, वह थल सेना का जनरल, जल सेना का एडमिरल तथा वैज्ञानिक उपकरणों का अन्वेषक बन सकता है।
नीतिशास्त्र अथवा नैतिक विज्ञान, सदाचार अथवा नैतिकता अथवा कर्तव्य का विवेचन करता है। नीतिशास्त्र नैतिक मूल्यों का विज्ञान है। यह दर्शन की वह शाखा है जो मानवीय चरित्र एवं आचरण से सम्बन्धित है।
आचरण व्यवहार है। प्रकृति, स्वभाव, आचार, व्यवहार, चाल-चलन समानार्थी शब्द हैं। विवेकशील प्राणियों को एक-दूसरे के साथ तथा अन्य प्राणियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए-यह नीतिशास्त्र की विषय-वस्तु है।
सत्य बोलना, अहिंसा का अभ्यास करना, मनसा वाचा-कर्मणा अन्य व्यक्तियों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना, किसी के प्रति कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं करना, किसी के प्रति क्रोध नहीं करना, अपशब्द नहीं बोलना तथा समस्त प्राणियों में भगवद्-दर्शन करना सदाचार है। यदि आप किसी को अपशब्द कहते हैं, अन्य व्यक्तियों की भावनाओं को ठेस पहुँचाते हैं तो वास्तव में आप स्वयं को ही अपशब्द कह रहे हैं तथा भगवान् की भावनाओं को ही ठेस पहुँचा रहे हैं। हिंसा भक्ति एवं ज्ञान की घातक शत्रु है। यह विभक्त तथा पृथक् करती है। यह आत्मा के एकत्व के अनुभव में बाधक है।
वह कार्य, जिससे दूसरों का हित न होता हो अथवा वह कार्य जिसमें स्वयं को लज्जा अनुभव होती हो, कभी नहीं करना चाहिए। वह कार्य किया जाना चाहिए जिसकी समाज में सराहना की जाती है। यह सदाचार का संक्षिप्त वर्णन है।
भगवान् मनु मनुस्मृति में कहते हैं, "श्रुति-स्मृति के अनुसार आचार (सदाचार) ही सर्वोच्च धर्म है। अतः आत्मज्ञानी द्विज सदैव इसमें संलग्न रहें। इस प्रकार आचार को धर्म का स्रोत जानते हुए सन्त-मनीषी समस्त तपस्या के मूल के रूप में आचार का पालन करते हैं।"
धर्माचरण, सत्य, सद्कार्य, शक्ति एवं समृद्धि सदाचार से उद्भूत होते हैं। आप महाभारत में पायेंगे, "धर्म का लक्षण सदाचार है। सदाचार ही कल्याण अथवा शुभ का लक्षण है। समस्त शिक्षाओं से ऊँचा स्थान सदाचार का है। सदाचार से धर्म का जन्म होता है। धर्म जीवन को पोषित करता है। सदाचार से मनुष्य जीवन, समृद्धि तथा इहलोक एवं हरलोक में यश प्राप्त करता है। जो व्यक्ति समस्त प्राणियों का मित्र है, जो मनसा वाचा-कर्मणा सबके कल्याण में संलग्न है, वही वास्तव में धर्म को जानता है।"
धर्म का तत्त्व अतिसूक्ष्म, गूढ़ एवं जटिल है। इसे समझने में सन्त महापुरुष भी भमित होते हैं। धर्म धन, तृप्ति तथा अन्ततः मोक्ष प्रदान करता है। धर्म का चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष) में प्रथम स्थान है। धर्म को सामान्यतया कर्तव्य भी कहा जाता है। कोई भी कार्य जो मोक्षप्राप्ति में सहायक है, धर्म है। ऐसा कार्य जो समस्त मनुष्यों के लिए कल्याणकारी है, धर्म है।
वे समस्त कार्य जो किसी भी प्राणी को हिंसा पहुँचाने के उद्देश्य से मुक्त हैं, निश्वितरूपेण नैतिक कहे जा सकते हैं। क्योंकि प्राणियों की समस्त प्रकार के दुःख-कष्टों से रक्षा हेतु ही नैतिक नियम बनाये गये हैं। धर्म को इसलिए धर्म कहा जाता है क्योंकि यह सबकी रक्षा करता है। वस्तुतः नैतिकता समस्त प्राणियों की रक्षा करती है।
सदाचार समृद्धि का मूल है। यह यश में वृद्धि करता है, दीर्घायु प्रदान करता है, समस्त प्रकार की विपत्तियों एवं बुराइयों का नाश करता है। सदाचार को ज्ञान की समस्त शाखाओं में श्रेष्ठ कहा गया है। ज्ञान शक्ति है, परन्तु चरित्र उससे महान् शक्ति है।
सदाचार जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति का साधन भी है। सदाचार के बिना कोई परम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता है। सदाचार पुण्य प्रदान करता है तथा पुण्य से दीर्घायु प्राप्त होती है। सदाचार देवताओं को प्रसन्न करने की सर्वाधिक प्रभावशाली विधि है। स्वयंभू ब्रह्मा जी ने कहा है, "मनुष्य को समस्त प्राणियों के प्रति करुणा का भाव रखना चाहिए।"
सद्गुण आचरण में ही परिलक्षित होते हैं। सज्जन एवं सद्गुणी अपने आचरण के कारण ही सज्जन एवं सद्गुणी हैं। सज्जन एवं धर्मपरायण व्यक्तियों के कार्यों से ही सदाचार के लक्षण प्राप्त होते हैं। इहलोक एवं परलोक में यश महान् कार्यों से प्राप्त होता है तथा ऐसे महान् कार्य सदाचार पर ही निर्भर होते हैं। मनुष्य अपने आचरण द्वारा ही तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर सकता है। ऐसा कुछ नहीं है जो सदाचारी-सद्गुणी व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। सत्कार्य करने वाला तथा हितकारी एवं मधुर वचन बोलने वाला अद्वितीय होता है। समस्त व्यक्ति ऐसे मनुष्य का सम्मान करते हैं जो धर्मपूर्वक कार्य करता है, शुभ कार्य करता है यद्यपि वे इस मनुष्य से मिले न हों, मात्र उसके विषय में सुरा ही हो।
जिस व्यक्ति का आचरण अनुचित अथवा बुरा है, वह कभी दीर्घ जीवन प्राप्त नहीं करता है। समस्त प्राणी इस प्रकार के दुराचारी व्यक्ति से भयभीत होते हैं तथा उसके द्वारा पीड़ित होते हैं। अतः यदि व्यक्ति अपनी समृद्धि एवं उन्नति चाहता है, तो उसे सदाचार का मार्ग अपनाना चाहिए तथा धर्मपरायण व्यवहार करना चाहिए। सदाचार एक पापी मनुष्य के भी दुःख-कष्ट को दूर कर सकता है।
एक सदाचारी व्यक्ति के जीवन के कुछ निश्चित आदर्श एवं सिद्धान्त होते हैं जिनका वह दृढतापूर्वक पालन करता है। वह अपनी दुर्बलताओं एवं दोषों का निराकरण कर सदाचार का विकास करता है तथा एक सात्विक व्यक्ति बन जाता है। वह अपने माता-पिता, शिक्षकों, आचार्यों, वयोवृद्ध जनों, बहिनों-भाइयों, मित्रों, सम्बन्धियों, अपरिचितों तथा अन्य समस्त प्राणियों के प्रति व्यवहार में अत्यन्त सावधान रहता है। वह साधु-महात्माओं के सत्संग से तथा सद्ग्रन्थों के गहन स्वाध्याय से यह जानने का प्रयास करता है कि क्या उचित है एवं क्या अनुचित है, तदुपरान्त वह प्रसन्नतापूर्वक धर्म के मार्ग पर चलता है।
एक सदाचारी व्यक्ति सदैव समस्त प्राणियों के हित के विषय में सोचता है। वह अपने पड़ोसियों एवं अन्य व्यक्तियों के साथ प्रेमपूर्वक रहता है। वह अन्य व्यक्तियों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाता है तथा कभी झूठ नहीं बोलता है। वह ब्रह्मचर्य का पालन करता है। वह मन की दुष्प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण रखता है तथा सदाचार के अभ्यास द्वारा स्वयं को परमात्मा से एकत्व के आनन्द की प्राप्ति हेतु तैयार करता है।
एक बार एक साधक महर्षि वेदव्यास के पास गया और कहने लगा, "महर्षि, आप भगवान् विष्णु के अवतार हैं। मैं दुविधा में हूँ। मैं 'धर्म' शब्द का वास्तविक अभिप्राय नहीं समझ पा रहा हूँ। कुछ कहते हैं कि यह सदाचार है। अन्य कहते हैं जो श्रेय (मोक्ष) एवं आनन्द की ओर ले जाये, वह धर्म है। जो कार्य पतन की ओर ले जाये, वह अधर्म है। भगवान् कृष्ण कहते हैं कि सन्त-महापुरुष भी यह पूर्णतया समझने में असमर्थ होते हैं कि धर्म क्या है? अधर्म क्या है? मैं भ्रमित हूँ। कृपया मुझे धर्म का सरल शब्दों में अभिप्राय समझाइए जिससे मैं अपने कार्यों में धर्म का पालन कर सकूँ।" महर्षि व्यास ने उत्तर दिया, "हे साधक! सुनो, मैं तुम्हें एक सरल युक्ति बताऊँगा। कोई भी कार्य करते समय इसे स्मरण रखना। दूसरों के साथ वही व्यवहार करो जैसा तुम अपने लिए चाहते हो। इस नियम का सावधानीपूर्वक पालन करो। तुम समस्त कठिनाइयों-कष्टों से मुक्त हो जाओगे। यदि तुम इसका पालन करते हो, तो तुम किसी को दुःख नहीं पहुँचाओगे। अपने दिन- पतिदिन के जीवन में इसका अभ्यास करो। यदि तुम सौ बार भी असफल होते हो, कोई बात नहीं। तुम्हारे पुराने संस्कार एवं अशुभ वासनाएँ, तुम्हारे वास्तविक शत्रु है हो। जारी में बाधा-स्वरूप खड़े हो जायेंगे। परन्तु तुम दृढतापूर्वक अभ्यास करते रहो। तुम्हें साक्ष्य प्राप्ति में अवश्यमेव सफलता मिलेगी।" साधक ने महर्षि व्यास के उपदेश तुम्हें अक्षरशः पालन किया तथा मुक्ति को प्राप्त हुआ।
यह एक अत्यन्त श्रेष्ठ उक्ति है। सदाचार का सार इस कथन में निहित है। यदि व्यक्ति सावधानीपूर्वक इसका अभ्यास करता है, तो वह कभी अनुचित कार्य नहीं करेगा। ईश्वरीय इच्छा के अनुरूप कार्य करना उचित है, उसके विपरीत कार्य करना अनुचित है।
भगवान् एवं धर्म अविभाज्य हैं। धर्माचरण ही समस्त मनुष्यों की विशिष्टता है तथा इसके माध्यम से वे प्रगति-उन्नति करते हुए दिव्यत्व को प्राप्त करते हैं। मनुष्य अपनी जाति, वर्ण एवं स्थिति के अनुसार धर्म का पालन करता हुआ अन्ततः जीवन के परम लक्ष्य 'आत्म-साक्षात्कार' को प्राप्त करता है जिससे उसे अनन्त अखण्ड आनन्द, परम शान्ति, सर्वोच्च ज्ञान, शाश्वत तृप्ति एवं अमरत्व की प्राप्ति होती है। आत्म-साक्षात्कार हेतु नैतिक पूर्णता एक आवश्यक शर्त है।
आध्यात्मिकता नैतिकता पर निर्भर है, नैतिकता आध्यात्मिकता पर निर्भर है। नैतिकता का आधार वेदान्त है। उपनिषद् कहते हैं, "आपका पड़ोसी वस्तुतः आपका अपना आत्मा ही है। भ्रम अथवा माया ही आपको उससे पृथकत्व का बोध कराती है।" अद्वैतिक एकत्व अथवा आत्मा के एकत्व की अनुभूति का आधार सदाचार है। “सर्वं खल्विदं ब्रह्म-सब कुछ ब्रह्म ही है। यहाँ नानात्व नहीं है।" नैतिक पूर्णता ही आपको इस वेदान्तिक सत्य के अनुभव हेतु तैयार करती है।
सदाचार की महिमा
जिस व्यक्ति ने सदाचार अथवा यम-नियम के सतत अभ्यास द्वारा नैतिक परिपूर्णता प्राप्त कर ली है, उसके व्यक्तित्व में चुम्बकीय आकर्षण होता है। चरित्र व्यक्ति को एक दृढ़ व्यक्तित्व प्रदान करता है। एक सच्चरित्र व्यक्ति का सभी सम्मान करते हैं। नैतिक रूप से परिपूर्ण व्यक्तियों का सर्वत्र आदर होता है। सच्चा, ईमानदार, निष्कपट, सत्यनिष्ठ एवं उदारहृदयी व्यक्ति सबका सम्माननीय होता है तथा सबको प्रभावित करने में सक्षम होता है। सात्विक गुण मनुष्य को दिव्य बनाते हैं। जो सत्य बोलता है तथा ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह एक महान् व्यक्तित्व का स्वामी बनता है। उसके प्रत्येक शब्द में शक्ति होती है तथा अन्य व्यक्ति उससे प्रभावित होते हैं। यदि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास करना चाहता है, तो चरित्र निर्माण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। ब्रह्मचर्य के बिना एक प्रभावशाली व्यक्तित्व का विकास सम्भव नहीं है।
मनुष्य की मृत्यु हो जाती है परन्तु उसका चरित्र, उसके विचार विद्यमान रहते हैं चरित्र ही मनुष्य को वास्तविक बल