सद्गुणों का अर्जुन

एवं दुर्गुणों का नाश

किस प्रकार करें

 

HOW TO CULTIVATE VIRTUES AND ERADICATE VICES

 

का हिंदी अनुवाद

 

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानंद

 

 

 

 

अनुवादिका

स्वामी गुरुवत्सलानन् माता

 

 

 

 

 

प्रकाशक

 

डिवाइन लाइफ सोसाइटी

पत्रालय: शिवानंदनगर-249192

जिला: टेहरी गढ़वाल, उत्तराखंड (हिमालय), भारत

www.sivandaonline.org, www.dlshq.org

 

प्रथम हिन्ती संस्करण २०१९

 (,००० प्रतियाँ)

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

 

ISBN 81-7052-258.7 8

 HS 8

 

 

 

 

 

 

PRICE:195/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर, जि. टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड,

पिन २४९१९२' में मुद्रित

For online orders and Catalogue visit: disbooks.org

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

समस्त अभिभावकों एवं शिक्षकों

नेताओं एवं उपदेशकों

को समर्पित

जो करते हैं चरित्र-निर्माण

नर एवं नारियों का

 

 

 

 

 

प्रकाशकीय

 

सद्गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज की समस्त कृतियों में यह कृति सर्वोपरि कही जायेगी। इस पुस्तक में श्री गुरुदेव ने वर्तमान विश्व के नर-नारियों के समक्ष एक ऐसा विषय प्रस्तुत किया है जो उनके स्वयं के हृदय को सर्वाधिक प्रिय है तथा जो मनुष्यों को देवताओं में एवं राष्ट्रों को स्वर्ग में रूपान्तरित करने में सक्षम है।

 

मनसा-वाचा-कर्मणा धर्मपरायणता, उज्ज्वल-दिव्य चरित्र का विकास तथा हृदय के धर्म का पालन श्री गुरुदेव की शिक्षाओं के सारतत्त्व हैं। इस सन्दर्भ में, वे भगवान् बुद्ध की भाँति हैं। परन्तु भगवान् श्री कृष्ण के समान, श्री गुरुदेव स्पष्ट उद्घोषणा करते हैं कि सदाचार-धर्मपरायणता आत्मज्ञान प्राप्ति का एक साधन है।

 

श्री गुरुदेव ने अपनी प्रत्येक पुस्तक में साधना के इस पक्ष अर्थात् सद्गुणों के अर्जन एवं दुर्गुणों के नाश पर बल दिया है। चाहे वे विशाल सभाओं को सम्बोधित कर रहे हों अथवा भक्तों से वार्तालाप कर रहे हों, उन्होंने सदैव प्रबलतापूर्वक यही कहा है, "केवल सदाचार-धर्मपरायणता के द्वारा ही आप परम तत्त्व को प्राप्त कर सकते हैं।

 

इस पुस्तक में श्री गुरुदेव ने हमें सुन्दर सद्गुणों की एक माला प्रदान की है जिसे प्रत्येक सच्चे साधक को धारण करना चाहिए। इसके साथ-ही-साथ उन्होंने उन मानवीय दोषों एवं दुर्बलताओं की भी चर्चा की है जिनका समूल नाश किया जाना चाहिए ताकि मनुष्य की आत्मा अपने दिव्य प्रकाश की उज्ज्वल आभा को पुनः प्राप्त कर सके।

 

सर्वशक्तिमान् प्रभु के चरणों में इस प्रार्थना के साथ हम सुधी पाठकों को यह पुस्तक समर्पित करते हैं कि यह उन्हें उदात्त एवं दिव्य बनाये, श्रेष्ठ एवं सफल बनाये जिससे कि वे इस विश्व को भ्रातृत्व-भाव एवं शान्ति से परिपूर्ण एक सुन्दर धाम बना सकें।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भूमिका

नीतिशास्त्र एवं नैतिकता

 

नैतिक विकास से नैतिक पूर्णता प्राप्त होगी। एक नैतिक व्यक्ति एक बुद्धिजीवी व्यक्ति से अधिक शक्तिशाली होता है। नैतिक विकास से विभिन्न प्रकार की अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

 

नैतिकता आध्यात्मिकता की सहचरी है। नैतिकता आध्यात्मिकता के साथ-साथ रहती है। नैतिक विकास आपको 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' - सब ब्रह्म ही है-इस वेदान्तिक साक्षात्कार के लिए तैयार करता है। यहाँ विविधता-भिन्नता जैसी कोई वस्तु नहीं है। सब ब्रह्म ही है।

 

सभी साधक घर छोड़ने के तुरन्त बाद नैतिक पवित्रता की परवाह किये बिना ध्यान और समाधि प्राप्ति की शीघ्रता करने की गलती करते हैं।

 

नैतिक जीवन के लिए आवश्यक है-स्पष्टवादिता, ईमानदारी, दया, विनम्रता, जीवन के प्रति सम्मान, प्रत्येक प्राणी के प्रति आदर, पूर्ण निःस्वार्थता, सत्यनिष्ठा, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, निलोंभिता तथा दर्प एवं आडम्बर का अभाव और वैश्विक प्रेम।

 

एक सदाचारी व्यक्ति के आदर्श सिद्धान्त एवं लक्ष्य होते हैं। वह उनका पूर्ण पालन करता है, अपने दोषों एवं दुर्बलताओं को दूर करता है, अच्छे आचरण का विकास करता है और एक सात्त्विक व्यक्ति बन जाता है।

 

धर्मपरायणता शाश्वत है। आपका जीवन भी यदि संकट में है तो भी आपको धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। एक धार्मिक एवं सदाचारी जीवन और निर्मल अन्तरात्मा व्यक्ति को जीवन तथा मृत्यु दोनों में ही अत्यधिक सुख देते हैं। आपको केवल सच्चरित्र रूपी हीरा पहनने की ही इच्छा करनी चाहिए। सद्गुण आत्मज्ञान प्राप्ति में सहायक हैं।

 

निरन्तर दयापूर्ण कर्म करते रहने एवं नैतिक सिद्धान्तों का पालन करने से ही अमरत्व की प्राप्ति की जा सकती है।

 

दयापूर्ण कार्य, करुणा एवं सेवा हृदय को पवित्र एवं कोमल बनाते हैं, हृदयकमल को ऊर्ध्वमुखी करते हैं एवं साधक को दिव्य प्रकाश ग्रहण करने हेतु तैयार करते हैं।

 

सत्य, तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा आत्मनियन्त्रण का अभ्यास शाश्वत तत्त्व के ज्ञान की प्राप्ति में सहायक हैं।

 

विनम्रता सर्वोच्च सद्गुण है। भगवान् आपकी केवल तभी सहायता करते हैं, जब आप पूर्णतया विनम्र बनते हैं। इसलिए इस सद्गुण का अधिकतम सीमा तक विकास करिए।

 

सदगुण का सकारात्मक एवं क्रियात्मक रूप से अभ्यास करने पर ही वह विकसित होगा एवं बना रहेगा।

 

अहिंसा का सिद्धान्त उतना ही सही एवं उचित है जितना गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त। यदि आप मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा के अभ्यास में पूर्णतया प्रतिष्ठित हैं, तो आप भगवान् हैं।

 

अहिंसा का मार्ग कठिन है लेकिन यदि आप गम्भीरतापूर्वक अहिंसा का अभ्यास करते हैं, तो आप सरलता से इस मार्ग पर चल सकते हैं क्योंकि इसमें प्रत्येक पग पर आपको भगवद्कृपा प्राप्त होती है।

 

एक महान् सन्त शक्तिशाली राजाओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। भगवान् एक पवित्र व्यक्ति से अत्यधिक प्रसन्न होते हैं।

 

एक मनुष्य जो अपने दिये गये वचनों का पालन करता है, वह दूसरों पर अच्छा प्रभाव डालता है और अन्ततः दिव्यता में लीन होता है।

 

सहानुभूति, प्रेम, दया, निष्कपटता तथा गीता में वर्णित अन्य दिव्य गुणों का अर्जन करिए। संयमित जीवन जियें। नैतिक शक्ति आध्यात्मिक उन्नति का आधार है। नैतिक विकास आध्यात्मिक साधना का अभिन्न अंग है।

 

धर्म-नैतिकता का आधार

 

नैतिक बनने का गुण नैतिकता है। नैतिकता ही एक कार्य को उचित सिद्ध करती है। यह धार्मिक कर्तव्यों के अतिरिक्त, नैतिक कर्तव्यों का पालन है।

 

मानवीय व्यवहार में उचित एवं अनुचित का सिद्धान्त नैतिकता है। यह पवित्र नीवन है। कभी-कभी संकीर्ण अर्थों में इसका अभिप्राय शुद्धता होता है।

 

नैतिकता सद्गुण है। नैतिकता नीतिशास्त्र है। यह वह सिद्धान्त है जो कार्यों के चित अथवा अनुचित होने से सम्बन्धित है।

 

नैतिकता सर्वत्र समान है क्योंकि यह ईश्वर से निःसृत है।

 

नैतिकता धर्म का क्रियात्मक रूप है; धर्म नैतिकता का ही सैद्धान्तिक रूप है। जो आपको करना आवश्यक है, वह अवश्यमेव करना चाहिए, यद्यपि उससे कष्ट एवं हानि प्राप्त होते हैं, क्योंकि वह उचित है।

 

सभी सफल कार्य नैतिकता की नींव पर ही आधारित होते हैं। धर्थ के चिना नैतिकता मूलविहीन है। यह सामाजिक रीति-रिवाज के समान परिवर्तनशील, अस्थायी एवं ऐच्छिक बन जाती है।

 

सुदृढ़ नैतिकता के बिना उच्च सुसंस्कृतता, शिष्टता, विनम्रता एवं शालीनता सम्भव नहीं है।

 

जो नैतिकता धर्म पर आधारित नहीं है, वह यथार्थ एवं स्थायी नैतिकता नहीं है।

 

धर्म का नैतिकता से पार्थक्य नहीं हो सकता है। नैतिकता धर्म का आधार है। नैतिकता एवं धर्म उसी प्रकार अपृथक्करणीय हैं जिस प्रकार अग्नि एवं उष्णता, बर्फ एवं शीतलता, पुष्प एवं सुगन्ध।

 

धर्म के बिना नैतिकता एक मूलविहीन वृक्ष है, रेत पर बना एक घर है, बिना स्रोत की एक नदी है।

 

नैतिकता सम्बन्धी उपदेश मनुष्य के चरित्र को सुधारने तथा उसे दुर्गुणों एवं अज्ञान से मुक्त कराने के लिए सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।

 

धर्मविहीन नैतिकता का अस्तित्व नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा है, तो यह परिवर्तित हो जायेगी, ज्यूँ ही आपको असुविधाएँ प्राप्त होंगी। धर्म को इसे शासित-नियन्त्रित करना चाहिए।

 

किसी कार्य की नैतिकता उसमें निहित उद्देश्य पर निर्भर करती है। सर्वप्रथम उचित आदर्श अपनाइए और फिर आप निश्चय ही सत्कार्य करेंगे।

 

धार्मिक सिद्धान्त की अनुपस्थिति में राष्ट्रीय नैतिकता नहीं रह सकती है।

 

बिना धर्म के नैतिकता का नाश होगा। धर्म ही नैतिकता का मूल है। नैतिकता को उसके उचित आधार अर्थात् ईश्वर के प्रति प्रेम एवं भय पर स्थापित करिए।

 

धर्मविहीन नैतिक मूल्य पथरीली भूमि पर बोये गये बीज के समान सूख जायेंगे और नष्ट हो जायेंगे।

 

नैतिकता सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य के नैतिक कर्तव्यों का सिद्धान्त है। ईश्वरविहीन नैतिकता अधर्म ही है।

 

 

 

नैतिकता एवं नीतिशास्त्र

 

नैतिक सिद्धान्त इस अभिप्राय में परिपूर्ण नहीं है कि नैतिक नियमों एवं प्रतिबन्धों से परे भी एक अवस्था है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि नैतिक नियमों की अवहेलना की जा सकती है। नैतिकता अन्तरात्मा द्वारा अभिव्यक्त उचित होने के अन्तर्निहित भाव का पालन है जो कि स्वार्थ एवं इसकी अन्य अभिव्यक्तियों अथवा प्रभावों से मुक्त है। नैतिकता वह आत्म-बोध है, वह सत्य-बोध है जो उन आवेगों-वासनाओं के शासन से प्रतिबन्धित होना अस्वीकार करता है, जो सार्वभौमिक कल्याण के विरुद्ध हैं। नैतिक बोध का उद्देश्य पूर्णता का पथ निर्देशित करना है, और इसीलिए नैतिकता का मूल्यांकन चेतना को अबाधित आनन्द की ओर निर्देशित करने की इसकी क्षमता द्वारा किया जाता है जो कि एक या कुछ व्यक्तियों अथवा ब्रह्माण्ड के एक भाग अथवा अस्तित्व के एक प्रकार तक ही सीमित नहीं है।

 

निःस्वार्थ भाव तथा इसके परिणामस्वरूप आनन्द का क्षेत्र जितना व्यापक होगा, उतनी ही अधिक नैतिक वह पद्धति अथवा कार्य होगा जिसके माध्यम से यह निःस्वार्थता क्रियान्वित होती है अथवा अभिव्यक्त होती है। सभी स्वार्थपूर्ण कार्य अनैतिक हैं। स्वार्थपूर्ण कार्य क्या है? यह वह कार्य है जिसका उद्देश्य अपने अहंकार एवं इन्द्रियों की इच्छाओं को दमित करना नहीं अपितु उन्हें सन्तुष्ट करना है।

 

इन स्वार्थपूर्ण कार्यों के अतिरिक्त, मनसा-वाचा-कर्मणा दूसरों को कष्ट पहुँचाना, असत्य भाषण, चोरी करना आदि अनैतिक कार्य हैं। काम, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा ईर्ष्या अनैतिक गुण हैं। दानशीलता द्वारा भी नैतिक नियमों की अवहेलना का औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता है।

 

नैतिकता एक महान् नियम है जो सार्वभौमिक है तथा देश, काल अथवा परिस्थितियों-अवस्थाओं से प्रतिबन्धित नहीं है। (योग-सूत्र)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय.. 4

भूमिका... 5

भाग-सद्गुणों का अर्जन किस प्रकार करें

परिवर्जन (Abstinence) 19

अनुकूलनशीलता (Adaptability) 20

विपत्ति (Adversity) 22

अहिंसा (Ahimsa) 24

सतर्कता-सावधानी (Alertness) 25

सुशीलता-स्नेहपात्रता (Amiability) 26

उद्यमशीलता एवं मनोयोग (Application) 27

आकांक्षा (Aspiration) 28

अवधान (Attention) 29

व्यवहार (Behaviour) 30

परोपकारिता (Benevolence) 31

चरित्र (Character) 33

दानशीलता (Charity) 36

प्रफुल्लता (Cheerfulness) 39

मुदिता (Complacency) 41

दया (Compassion) 42

विचारशीलता (Consideration) 43

सन्तोष (Contentment) 44

प्रतिपक्ष भावना (Counter Thoughts) 49

साहस (Courage) 49

शिष्टाचार (Courtsey) 51

भाग्य (Destiny) 52

दृढ़ निश्चय (Determination) 53

गरिमा (Dignity) 54

स्वनिर्णय-स्वविवेक (Discretion) 55

विवेक (Discrimination) 56

वैराग्य (Dispassion) 56

कर्तव्य (Duty) 57

गम्भीरता (Earnestness) 58

चारुता-सुरुचिपूर्णता (Elegance) 59

अनुकरण (Emulation) 61

तितिक्षा (Endurance) 62

समचित्तता (Eqanimity) 63

श्रद्धा (Faith) 64

निष्ठा-विश्वस्तता (Fidelity) 65

दृढ़ता (Firmness) 66

सहनशीलता (Forbearance) 67

क्षमा (Forgiveness) 67

धृति (Fortitude) 68

मित्रता (Friendship) 71

मितव्ययिता (Frugality) 73

उदारता (Generosity) 74

सौम्यता (Gentleness) 75

भलाई (Goodness) 76

भलाई, पवित्रता एवं सत्यपरायणता विकसित करने हेतु कुछ निर्देश. 78

मनोहारिता-रम्यता (Gracefulness) 80

कृतज्ञता (Gratitude) 80

वीरता (Heroism) 81

ईमानदारी (Honesty) 82

आशा (Hope) 83

आतिथ्य (Hospitality) 84

विनम्रता (Humility) 85

कर्मठता-परिश्रमशीलता (Industriousness) 85

पहल-शक्ति (Initiative) 86

प्रेरणा (Inspiration) 87

न्यायनिष्ठा-सत्यनिष्ठा (Integrity) 88

अन्तःप्रज्ञा (Intuition) 88

दयालुता (Kindness) 89

प्रेम (Love) 91

वैश्विक प्रेम (Universal Love) 94

वैश्विक प्रेम अहिंसा के रूप में (Cosmic Love as Ahimsa) 95

महामनस्कता (Magnanimity) 97

पौरुष (Manliness) 98

सभ्याचार (Manners) 99

विनयशीलता (Meekness) 100

करुणा (Mercy) 101

मिताचार-सन्तुलन (Moderation) 104

शील (Modesty) 106

कुलीनता-भद्रता (Nobility) 107

आज्ञाकारिता (Obedience) 108

आशावादिता (Optimism) 109

धैर्य (Patience) 110

धैर्य एवं अध्यवसाय (Patience and Perseverance) 112

देशभक्ति (Patriotism) 113

शान्ति (Peace) 114

अध्यवसाय-लगन (Perseverance) 115

मानव-प्रेम (Philanthropy) 116

तरस का भाव (Pity) 117

जीवट (Pluck) 117

उद्यमपूर्ण कौशल (Pluck or Knack) 118

शिष्टता (Politeness) 119

तत्परता (Promptness) 121

समझदारी (Prudence) 121

समयनिष्ठता (Punctuality) 123

पवित्रता (Purity) 124

उत्साहपूर्ण उद्यमी स्वभाव (Pushing Nature) 124

नियमितता एवं समयनिष्ठता (Regularity and Punctuality) 125

त्याग (Renunciation) 127

पश्चात्ताप (Repentance) 127

संकल्प (Resolution) 128

संसाधनपूर्णता-उपायकुशलता (Resourcefulness) 130

सदाचार (Right Conduct) 130

धर्मपरायणता-जीवन का प्राण (Righteousness-The Breath of Life) 135

आत्म-विश्लेषण (Self-analysis) 137

आत्म-नियन्त्रण (Self-control) 138

आत्म-त्याग (Self-denial) 141

आत्म-परीक्षण (Self-examination) 141

आत्म-सहायता (Self-help) 142

आत्म-विश्वास (Self-confidence) 142

आत्म-निग्रह (Self-restraint) 142

आत्मानुशासन (Self-discipline) 142

आत्म-सुधार (Self-improvement) 143

आत्म-निर्भरता (Self-reliance) 144

आत्म-बलिदान (Self-sacrifice) 145

शम (Serenity) 146

मौन (Silence) 146

सरलता (Simplicity) 147

सच्चाई-निष्कपटता (Sincerity) 148

सहानुभूति (Sympathy) 153

मधुरता (Sweetness) 154

व्यवहार-कुशलता (Tact) 155

संयम (Temperance) 156

सहिष्णुता (Tolerance) 158

सत्यमेव जयते (Truth alone Triumphs) 160

संकल्प शक्ति (Will-power) 167

उमंग-उत्साह (Zeal) 171

न्याय (Justice) 172

बारह सद्गुणों पर ध्यान (Meditation on Twelve Virtues) 174

विकसित किये जाने वाले सद्गुणों की सूक्ती (List of of Virtues to be Developed) 175

सद्गुणों के शब्द-चित्र (Word-picture of Virtues) 178

अठारह सद्गुणों का गीत (Song of Eighteen Ities) 179

भाग- दुर्गुणों का नाश कैसे करें

दम्भ (Affectation) 185

अहंकार (Egoism) 186

क्रोध (Anger) 190

व्याकुलता (Anxiety) 193

दर्प (Arrogance) 195

लोभ (Avarice) 198

लोभ-लोलुपता का गीत (Song of Avidity) 199

परनिन्दा-चुगलखोरी (Back-biting) 200

आत्म-स्तुति (Boasting) 201

रिश्वतखोरी (Bribery) 202

चिन्ता, परेशानी एवं व्याकुलता (Cares, Worries and Anxities) 203

असावधानी एवं विस्मृति (Carelessness and Forgetfulness) 206

धन-लोलुपता (Covetousness) 206

कायरता (Cowardice) 207

कुटिल-मानसिकता (Crooked-mindedness) 207

विषाद (Depression) 207

आत्म-संशय (Diffidence) 208

वृथा परिभ्रमण (Dilly-dallying) 209

धूर्तता (Dishonesty) 210

ईर्ष्या (Envy) 210

दुःसंग-कुसंगति (Evil Company) 211

धर्मोन्माद-धार्मिक कट्टरवाद (Fanaticism) 212

फैशन-एक भयंकर अभिशाप (Fashion - A Terrible Curse) 213

परदोषदर्शन (Fault-finding) 216

भय (Fear) 217

चंचलता (Fickleness) 220

चलचित्र दर्शन (Film-going) 221

विस्मरण (Forgetfulness) 222

उदासी एवं निराशा (Gloom and Despair) 223

द्यूतक्रीड़ा-जुआ खेलना (Gambling) 223

लालच (Greed) 224

द्वेष (Hatred) 225

धार्मिक पाखण्ड (Religious Hypocricy) 228

आलस्य (Idleness) 228

अशुद्ध एवं असंयमित आहार (Impure and Immoderate Food) 229

अस्थिरता (Inconstancy) 229

अकर्मण्यता (Indolence) 230

अनिश्चय (Indecision) 230

तमस्-जड़ता (Inertia) 231

हीन भावना (Sense of Inferiority) 232

असहिष्णुता (Intolerance) 233

अदृढ़ता (Irresolution) 233

मात्सर्य (Jealousy) 234

अतिभाषण (Jilly-jallying) 236

मनोराज्य (Building Castle in the Air) 237

क्षुद्र मानसिकता (Mean-mindedness) 238

मांस भक्षण (Meat-eating) 239

कृपणता (Miserliness) 240

नाम एवं यश (Name and Fame) 243

उपन्यास पढ़ना (Novel Reading) 243

हठ (Obstinacy) 244

आडम्बर (Ostentation) 245

अति विश्वास (Over-credulousness) 246

तीव्र संवेग-राग-जुनून (Passion) 246

निराशावाद (Pessimism) 253

हठधर्मिता (Pig-headedness) 254

अल्पचौर्य (Pilfering Habit) 255

अविचारपूर्वक-पक्षपात अर्थात् पूर्वाग्रह (Prejudice) 255

नैतिक एवं आध्यात्मिक गर्व (Moral and Spiritual Pride) 257

विलम्बन-दीर्घसूत्रনা (Procrastination) 257

अतिव्यय (Prodigality) 258

प्रतिशोध (Revenge) 258

धृष्टता (Rudeness) 260

अहंता अथवा स्वाग्रह (Self-assertion) 260

आत्माभिमान (Self-conceit) 261

आत्म-प्रतिपादन (Self-justification) 262

स्वार्थपरता (Selfishness) 262

अलं बुद्धि अर्थात् अपनी योग्यता-सामर्थ्य को पर्याप्त मान लेना.. 264

(Self-sufficiency) 264

विक्षेप (Shilly-shallying) 265

लज्जा-संकोच (Shyness) 266

अभद्र शब्द एवं अपशब्द (Slang Terms and Abuses) 266

दिवाशयन (Sleeping in Daytime) 267

धूम्रपान की आदत (Smoking Habit) 267

शंका-सन्देह (Suspicion) 269

पिशुनता (Tale-bearing) 270

कातरता-भीरुता (Timidity) 270

विश्वासघात (Treachery) 271

मिथ्याभिमानिता (Vanity) 271

अत्यधिक वाद-विवाद करना (Villy-vallying) 274

चिन्ता (Worry) 275

सद्गुणों के विकास द्वारा दुर्गुणों का नाश करिए (Destroy Evil Vrittis by developing virtues) 276

नष्ट किये जाने वाले दुर्गुणों की सूची (List of Vices to be destroyed) 277

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भाग-

सद्गुणों का अर्जन किस प्रकार करें

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिवर्जन (Abstinence)

 

परिवर्जन किसी वस्तु के सेवन अथवा भोग से स्वयं को दूर रखना है। परिवर्जन संयम है।

 

यह अत्यधिक भोग अथवा पाशविक प्रवृत्तियों के तुष्टीकरण से स्वयं को दूर रखने की अवस्था, अभ्यास अथवा कार्य है। यह आत्म-नियन्त्रण अथवा आत्मानुशासन है। उदाहरणतः हम मांसाहार परिवर्जन, मद्य परिवर्जन, भोजन परिवर्जन अथवा कामोपभोग परिवर्जन की बात कहते हैं।

 

पूर्ण परिवर्जन (Total Abstinence) मादक द्रव्यों के प्रयोग से दूर रहने के कार्य तथा अभ्यास का विशेष नाम है।

 

परिवर्जन सतत संयम है जो दीर्घायु एवं सुस्वास्थ्य देता है और शरीर को रोगों से मुक्त रखता है।

 

यह एक अनुशासन है जो वैराग्य प्रदान करता है तथा एक साधक की योग-मार्ग पर अग्रसर होने में सहायता करता है। यह आत्म-नियन्त्रण का अभ्यास है एवं सद्गुणों की नींव है। परिवर्जन रोगों के विरुद्ध एक अत्यन्त शक्तिशाली कवच है। यह रोगों के विरुद्ध रक्षात्मक सद्गुण है। यह उत्तम स्वास्थ्य, ऊर्जा, शक्ति एवं स्फूर्ति प्रदाता है।

 

आप एक सप्ताह के लिए चाय, कॉफी अथवा धूम्रपान का त्याग करें। यह आपको अगले परिवर्जन के लिए बल तथा संकल्प शक्ति देगा। तीसरी वस्तु पर संयम अपेक्षाकृत अधिक सरल होगा।

 

परिवर्जन का उद्देश्य मन को निम्नतर रुचियों से ऊपर उठाना है। यह आत्म-सुधार के लिए सहायक है।

 

मिताहारिता, इन्द्रियनिग्रह, उपवास, मिताचार, आत्मसंयम, आत्मत्याग, आत्मनिग्रह एवं संयम सभी परिवर्जन के समानार्थी शब्द हैं।

 

मद्यपान, अतिभोजिता, लोभ, असंयम, आमोद-प्रमोद, विषयासक्ति एवं व्यभिचारिता परिवर्जन के विपरीतार्थी हैं।

 

भोजन परिवर्जन (Abstinence from food) का तात्पर्य सामान्यतया बिना भोजन के रहना है। मिताहारिता (Abstemiousness) संयमपूर्वक भोजन लेना है। परिवर्जन एक अवसर के लिए हो सकता है। मिताहारिता नियमित संयम है।

 

आत्मत्याग (Self-denial) उस वस्तु का त्याग है जिसकी आप इच्छा करते हैं। परिवर्जन (Abstinence) उस वस्तु का भी हो सकता है जिसे आप नहीं चाहते हैं। उपवास (Fasting) कुछ समय के लिए और सामान्यतया धार्मिक कारणों से भोजन का त्याग है। संयम (Temperance) का अभिप्राय किसी वस्तु के संयमित भोग तथा अन्य के पूर्ण त्याग द्वारा शान्ति एवं मन का समत्व बनाये रखना है। हम भोजन के लिए संयम की बात करते हैं लेकिन दुर्गुणों के परिवर्जन की।

अनुकूलनशीलता (Adaptability)

 

अनुकूलनशीलता एक सद्गुण अथवा उदात्त गुण है जिसके द्वारा व्यक्ति स्वयं को दूसरों के अनुकूल बनाता है, उनके साथ स्वयं को समायोजित करता है, चाहे उनका स्वभाव कैसा भी हो। जीवन में सफलता के लिए यह अत्यधिक वांछनीय आदत अथवा गुण है। इसका धीरे-धीरे विकास किया जाना चाहिए। अधिकांश मनुष्य यह नहीं जानते हैं कि दूसरों के साथ स्वयं को किस प्रकार समायोजित करें। अनुकूलनशीलता दूसरों के हृदय और अन्ततः जीवन का युद्ध थोड़े से झुकने द्वारा जीतने का एक विशेष कौशल अथवा साहस है।

 

पत्नी नहीं जानती है कि स्वयं को अपने पति के अनुकूल कैसे बनाये। वह सदैव अपने पति को अप्रसन्न करती है और गृह में कलह करवाती है तथा पति से पार्थक्य प्राप्त करती है। एक लिपिक अपने वरिष्ठ अधिकारी अथवा मालिक के साथ स्वयं को समायोजित करना नहीं जानता है। वह उससे झगड़ता है और तुरन्त कार्यमुक्त किया जाता है। एक शिष्य नहीं जानता है कि स्वयं को अपने गुरु के अनुकूल कैसे बनाये। एक व्यवसायी नहीं जानता है कि वह अपने ग्राहकों के साथ किस प्रकार सामंजस्य बैठाये और इसीलिए वह अपने ग्राहक तथा व्यवसाय खो देता है। दीवान महाराजा के अनुकूल बनना नहीं जानता है। उसे राजकीय सेवा छोड़नी पड़ती है। विश्व अनुकूलनशीलता द्वारा ही संचालित होता है। जो व्यक्ति अनुकूलनशीलता की कला अथवा विज्ञान जानता है, वह इस विश्व में भली प्रकार निर्वाह कर पाता है और जीवन की सभी परिस्थितियों में सदैव प्रसन्न रहता है।

 

यदि मनुष्य स्वयं को अन्यों के साथ समायोजित करना चाहता है, तो उसे नमनशील होना चाहिए। अनुकूलनशीलता विकसित करने के लिए अधिक बुद्धिमानी और प्रतिभा की आवश्यकता नहीं है। यदि लिपिक अपने वरिष्ठ अधिकारी के तरीके, आदतें एवं स्वभाव भली प्रकार समझता है और उनके अनुकूल स्वयं को अच्छी तरह से समायोजित करता है, तो अधिकारी उस लिपिक का दास बन जाता है। आपको कुछ दयापूर्ण और स्निग्ध शब्दों का प्रयोग करना होगा। उसके हृदय को द्रवित करने के लिए थोड़े से प्रयास की आवश्यकता है। बस इतना ही पर्याप्त है। नम्रतापूर्वक एवं मधुर बोलिए। उसके आदेशों का अक्षरश: पालन करिए। उसका विरोध मत करिए। इस उक्ति को याद रखिए-"सेवा से आज्ञापालन श्रेष्ठ है '' वरिष्ठ अधिकारी थोड़ा सम्मान चाहता है। "हाँ जी-हाँ जी, जी हुजूर, बहुत अच्छा श्रीमान्" इस प्रकार कहिए। आपको इसका कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता है। तब आपका अधिकारी आपका दास बन जाता है। उसके हृदय में आपके लिए एक विशेष स्थान बन जाता है। आप उसके प्रिय बन जाते हैं। वह वही करेगा जो आप चाहते हैं। वह आपकी त्रुटियों को क्षमा कर देगा। अनुकूलनशीलता विकसित करने के लिए विनम्रता एवं आज्ञापालन आवश्यक है। दम्भी एवं अहंकारी मनुष्य के लिए समायोजित होना कठिन है। वह सदैव कष्ट में ही रहता है। वह अपने प्रयासों में सदैव असफल रहता है। अहंकार एवं अभिमान अनुकूलनशीलता विकसित करने के मार्ग में आने वाली दो महत्त्वपूर्ण बाधाएँ हैं।

 

जब एक विद्यार्थी एक ही कक्ष में रहने वाले अपने सहपाठियों के साथ समायोजित होना नहीं जानता है, तो संघर्ष प्रारम्भ होता है और उनकी मित्रता संकट में पड़ जाती है। अनुकूलनशोलता मित्रता को दीर्घजीवी बनाती है। विद्यार्थी छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए झगड़ा करते हैं। एक विद्यार्थी कहता है- 'मैंने श्रीमान् एक्स को कई दिनों तक चाय पिलायी। मैं उसे कई दिनों तक सिनेमा ले गया। मैंने उससे बॉसबेल की 'लाइफ ऑफ जॉनसन' पढ़ने के लिए माँगी। उसने देने से मना कर दिया। वह किस प्रकार का मित्र है। मैं उसे बिल्कुल पसन्द नहीं करता हूँ।" इस प्रकार मित्रता टूट जाती है। एक साधारण सी बात मन को विक्षुब्ध कर देती है। अनुकूलनशीलता एक शक्तिशाली बन्धन है जो मनुष्यों को अक्षुण्ण प्रेम एवं मित्रता के बन्धन में बाँध देता है। एक अनुकूलनशील मनुष्य विश्व के किसी भी भाग के किसी भी मनुष्य के साथ सामंजस्य बैठा सकता है। सभी लोग एक अनुकूलनशील मनुष्य से स्वतः ही प्रेम करते हैं। अनुकूलनशीलता अत्यधिक शक्ति एवं आनन्द देती है। अनुकूलनशीलता संकल्प को विकसित करती है।

 

एक अनुकूलनशील मनुष्य को कुछ त्याग करने होते हैं। अनुकूलनशीलता त्याग की भावना का विकास करती है। वह स्वार्थ का नाश करती है। एक अनुकूलनशील मनुष्या को दूसरों के साथ अपनी वस्तुएँ बाँटनी होती हैं। उसे अपमान एवं कठोर शब्द सहन करने पड़ते हैं। एक अनुकूलनशील मनुष्य में एकता की अथवा जीवन के एकत्व की भावना विकसित होती है। बेदान्तिक साधना के लिए यह अत्यधिक सहायक है। जो अनुकूलनशीलता का अभ्यास करता है, उसे घृणा की भावना और उच्चता के अभिमान का नाश करना पड़ता है। उसे सबके साथ मिल कर रहना होता है। उसे सभी को स्नेहपूर्वक स्वीकार करना होता है। अनुकूलनशीलता सार्वभौमिक प्रेम को विकसित करती है और घृणा की भावना का नाश करती है।

 

एक अनुकूलनशील मनुष्य को अपने सहयोगियों-साथियों के कठोर शब्दों को सहन करना होता है। उसे धैर्य एवं सहनशीलता का विकास करना होता है। ये गुण स्वयं ही विकसित होते हैं जब वह दूसरों के साथ समायोजित होने का प्रयास करता है। एक अनुकूलनशील मनुष्य किसी भी वातावरण में रह सकता है। वह बनारस अथवा अफ्रीका की गर्मी सहन कर सकता है। वह एक झोपड़ी में रह सकता है। वह एक शीत स्थान में रह सकता है। वह समचित्तता विकसित करता है। वह अत्यधिक गर्मी और सर्दी सहन कर सकता है। अनुकूलनशीलता अन्ततः आत्मज्ञान प्रदान करती है। जो इस सद्गुण को धारण करता है, वह तीनों लोकों में महान् है। वह सदैव प्रसन्न एवं सफल होता है।

विपत्ति (Adversity)

 

 

विपत्ति विषम परिस्थिति है। यह कष्ट अथवा दुर्भाग्य अथवा आपदा है। विपत्ति अप्रिय, कष्टपूर्ण परिस्थितियों, अत्यधिक संकट अथवा पीड़ा से युक्त एक दशा अथवा स्थिति है। यह समृद्धि के विपरीत है। विपत्ति एक घटना अथवा घटनाओं का क्रम है जो सफलता अथवा आकांक्षाओं के विपरीत है। यह दुःख की दशा है।

 

विपत्ति एक प्रच्छन्न आशीर्वाद है। विपत्ति के अनेक उपयोग हैं। यह संकल्पशक्ति तथा सहनशक्ति को सुदृढ़ करती है तथा मन को प्रभु की ओर अधिकाधिक मोड़ती है। यह हृदय में वैराग्य उत्पन्न करती है। यह सत्य की ओर प्रथम पग है।

 

विपत्ति एक गुण है। यह आलसी को परिश्रमशील बनाती है। यह बुद्धिमान् की क्षमताओं को प्रकट करती है। यह मनुष्य के लिए उसकी क्षमताओं का प्रयोग करना आवश्यक बनाती है। यह उन प्रतिभाओं एवं क्षमताओं को प्रकट करती है जो समृद्ध परिस्थितियों में सुप्त रह गयी होती हैं।

 

समृद्धि के प्रकाश में आनन्द उठाना सरल है। कठिनाई एवं विपत्ति में आपके व्यवहार की विकट परीक्षा होती है।

 

जब आप विषम परिस्थितियों में हैं, मुख पर म्लानता अथवा दुःख नहीं लाइए। मुस्कराइए। हँसिए। आनन्द मनाइए। भीतर से शक्ति एवं बल प्राप्त करिए। राम, राम, राम गाइए। उच्चारण करिए। आपकी आत्मा में शक्ति, ज्ञान एवं आनन्द का स्रोत है। इसका अनुभव करिए। इसका साक्षात्कार करिए।

 

एक शान्त सागर ने कभी कोई कुशल जहाज संचालक अथवा एडमिरल नहीं बनाया। विपत्ति के तूफान ही एक व्यक्ति की क्षमताओं तथा प्रतिभा को जाग्रत करते हैं तथा विवेक, कौशल, साहस, धैर्य एवं अध्यवसायिता उत्पन्न करते हैं। विपत्ति व्यक्ति को विचार करने, आविष्कार करने एवं नवीन खोज करने पर विवश करती है।

 

समृद्धि की अवस्था में आपके असंख्य मित्र होंगे लेकिन जब आप विपत्ति में हैं, तब वे आपको छोड़ देंगे। मित्रों की परीक्षा हेतु विपत्ति ही एकमात्र कसौटी है; समृद्धि उचित मापक नहीं है। विपत्ति में आप अनेक पाठ सीखेंगे। विपत्ति आपको उचित रीति से ढालेगी। यह आपकी महान् शिक्षक है। यह सर्वश्रेष्ठ एवं कठोर प्रशिक्षक है।

 

विपत्ति की अग्नि में ही महान् पुरुष एवं सन्त तपाये गये हैं, परिष्कृत हुए हैं तथा महिमान्वित हुए हैं।

 

विपत्ति अत्यधिक लाभदायक है। जब आप विषम स्थिति में हैं, तो रोइए मत। विपत्ति आपको सशक्त करती है तथा आपके कौशल में वृद्धि करती है।

 

वियोग, विपदा, आपदा, दुःख, कठिनाई एवं दुर्भाग्य आदि विपत्ति के समानार्थी शब्द हैं।

 

किसी आशा का टूटना, कार्य में असफलता, दुर्भाग्य यथा सम्पत्ति, पद की हानि 'विपत्ति' (Adversity) कहे जाते हैं।

 

मृत्यु के कारण मित्रों अथवा सम्बन्धियों के खोने के लिए हम 'वियोग' (Bereavement) शब्द का प्रयोग करते हैं।

 

सहसा और अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के लिए 'विपदा' (Calamity) एवं 'आपदा' (Disaster) शब्दों का प्रयोग होता है, थोड़ी परेशानी अथवा असफलता के लिए 'दुर्भाग्य' (Bed-luck) शब्द का प्रयोग होता है।

 

हम निर्धन के 'दुःख' (Misery) तथा सैनिक की 'कठिनाई' (Hardship) की बात कहते हैं।

 

आशीर्वाद, वरदान, प्रसन्नता, समृद्धि एवं सफलता विपत्ति के विपरीतार्थी शब्द हैं।

 

 

आप शेक्सपिअर की रचनाओं में पायेंगे, "विपत्ति के अमूल्य उपयोग हैं, जो एक कुरूप और विषैले मेढक की भाँति एक बहुमूल्य रत्न धारण किये है।" इस संसार में सर्वश्रेष्ठ वस्तु दुःख अथवा विपत्ति है। दुःख के समय ही मनुष्य ईश्वर का स्मरण करता है। दुःख हमें जाग्रत करता है। ईश्वर की खोज दुःख से प्रारम्भ होती है। दर्शनशास्त्र का प्रारम्भिक बिन्दु दुःख ही है। यदि संसार में दुःख नहीं होता, तो मनुष्य ने मोक्ष प्राप्ति के लिए कभी प्रयास नहीं किया होता। वह सांसारिक जीवन में ही सन्तुष्ट रहता। दुःख से मुक्ति पाने के प्रयास में ही वह सत्य अथवा शान्ति के धाम, परम धाम को पाता है। वह प्रार्थना, जप, दान, निःस्वार्थ सेवा, धार्मिक पुस्तकों का स्वाध्याय प्रारम्भ करता है। भक्त भगवान् से हमेशा प्रार्थना करते हैं, "हे प्रभु! हमें हमेशा विपत्ति दें ताकि हम सदैव आपका स्मरण कर सकें।" कुन्ती देवी ने भगवान् कृष्ण से प्रार्थना की, "हे प्रभु! मुझे हमेशा विपत्ति दें ताकि मेरा मन सदैव आपके चरण कमलों में लगा रहे।" विपत्ति सहनशक्ति एवं संकल्पशक्ति का विकास करती है। विपत्ति साहस एवं सहनशीलता का विकास करती है। विपत्ति पाषाण हृदय को द्रवित करती है और उसमें भगवद्भक्ति का संचार करती है। विपत्ति प्रच्छन्न दिव्य आशीर्वाद है। इसलिए जब भी आप विषम परिस्थितियों में हैं, भयभीत मत होइए। विपत्ति के स्वयं के गुण हैं। अनेक मनुष्यों ने विषम परिस्थितियों से ऊपर उठ कर शक्ति एवं उच्च पद प्राप्त किये हैं। विपत्ति मनुष्य से कठोर संघर्ष करवाती है। मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश स्वर्गीय श्री मुथुस्वामी अय्यर भी विकट परिस्थिति में थे। वह रात को नगर परिषद् की सड़क पर लालटेन के प्रकाश में अध्ययन किया करते थे। ब्रिटेन के अनेक प्रधानमन्त्री जीवन की विषम स्थितियों से ऊपर उठे हैं, उन्नत हुए हैं। सभी धर्मगुरुओं, सन्तों, फकीरों, भक्तों एवं योगियों को विकट परिस्थितियों में कठोर संघर्ष करना पड़ा है। शंकर, ज्ञानदेव, रामतीर्थ एवं तुकाराम सभी विपत्ति से अत्यधिक लाभान्वित हुए। यदि उन्हें समृद्ध अवस्था में रखा जाता, तो वे कभी भी महानता और भव्य आध्यात्मिक ऊँचाइयों को नहीं प्राप्त कर पाते।

 

अहिंसा (Ahimsa)

 

()          किसी प्राणी को हानि मत पहुँचाइए, वरन् दूसरे प्राणी के जीवन संरक्षण में उतना ही प्रयासशील होइए

जितना आप स्वयं के जीवन के प्रति होते हैं क्योंकि अहिंसा ही परम धर्म है।

-तीर्थंकर महावीर

 

()          आइए, हम क्षुद्र और महान् सभी प्राणियों के प्रति एक असीम प्रेम से परिपूर्ण हृदय एवं मन का विकास

करें। हाँ, हम सम्पूर्ण विश्व के प्रति प्रेम का अभ्यास करें।

- गौतम बुद्ध

 

()          तुम किसी की हत्या नहीं करोगे।

-ईसा मसीह

 

()          जो एक जीवन की रक्षा करता है, मानो उसने समस्त मानवता की रक्षा की है।

 -मोहम्मद (कुरान -३२)

इस संसार के समस्त प्राणी, पशु-पक्षी आपके समान ही हैं।

-मोहम्मद (कुरान -३८)

 

()          एक मनुष्य को बुराई की अपेक्षा भलाई, दुष्कृत्यों की अपेक्षा सत्कर्मों, दोष की अपेक्षा गुण तथा

अन्धकार की अपेक्षा प्रकाश का चयन करना चाहिए।

- जरथुस्त्र

 

()          सबमें एक ही आत्मा का वास है। सभी एक ईश्वर की अभिव्यक्तियाँ हैं। किसी दूसरे को आहत करके

आप स्वयं को ही आहत करते हैं। दूसरे की सेवा करके आप स्वयं की ही सेवा करते हैं। सबसे प्रेम करिए। सबकी सेवा करिए। किसी से घृणा मत करिए। किसी का अपमान मत करिए। विचार, शब्द अथवा कार्य से किसी को कष्ट मत पहुँचाइए।

-स्वामी शिवानन्द

सतर्कता-सावधानी (Alertness)

 

सतर्कता सावधानी है। यह स्फूर्ति है। यह फुरतीलापन है। सतर्कता सजगता का व्यवहार है। इसका मुख्यतया प्रयोग 'एक चौकीदार सतर्कतापूर्वक रहा' (The watchman stood on the alert) किया जाता है।

 

एक जहाज का कमान सदैव सतर्क होता है। एक मछुआरा सदैव सतर्क होता है। एक शल्यचिकित्सक शल्यक्रिया कक्ष में सदैव सतर्क रहता है। इसी प्रकार, एक ज्ञान-पिपासु साधक को सदैव सतर्क रहना चाहिए। तब ही वह इस उच्छृंखल, उपद्रवी और चंचल मन को नियन्त्रित एवं पराजित कर सकता है। योग के एक विद्यार्थी के लिए नतर्कता एक महत्त्वपूर्ण योग्यता है।

 

सतर्क रहिए। सतर्क दृष्टि रखिए। सदैव उद्यत रहिए। सावधान रहिए। सजग बनिए। आप सभी कार्यों एवं आध्यात्मिक साधना में सदैव सफलता प्राप्त करेंगे।

 

एक सतर्क मनुष्य अत्यधिक सावधान-जागरूक रहता है। वह समय पर कार्य करने को तैयार रहता है। वह गिलहरी की तरह स्फूर्तिवान् होता है। फुरतीलापन उसकी विशेषता है। एक सतर्क मनुष्य जीवन से भरा होता है। वह सदैव तत्पर और उद्यत रहता है। वह पूर्ण जाग्रत रहता है। 'सतर्क' (Alert), 'उद्यत' (Ready), 'पूर्ण जाग्रत' (Wide awake) शब्दों का प्रयोग किसी कार्य के सम्बन्ध में तत्परता के लिए किया जाता है।

 

'उद्यत' का तात्पर्य विचारपूर्ण तैयारी है। एक भ्रमणशील भारतीय सतर्क (Alert) होता है; एक प्रशिक्षित सैनिक उद्यत (Ready) होता है।

 

उद्यत (Ready) शब्द 'तैयार' (Prepared) से अधिक जीवन्तता और शक्ति को अभिव्यक्त करता है। बन्दूक तैयार की जाती है। मनुष्य उद्यत होता है।

 

आवश्यक क्षण पर प्रस्तुत होना तत्परता (Promptness) का लक्षण है। एक कुशल सेनाध्यक्ष आपदापूर्ण स्थितियों के लिए उद्यत (Ready), संकट पहचानने में सतर्क (Alert) तथा अवसर-लाभ उठाने में तत्पर (Prompt) होता है।

 

फुरतीलापन (Nimble) अब सतर्कता (Alertness) का गौण एवं कम प्रचलित अर्थ है।

 

मन्द, सुस्त, निष्क्रिय, अकर्मण्य एवं मूर्ख सतर्क-सावधान के विपरीतार्थक शब्द हैं।

 

एक उपदेशक को वक्तृत्व कला के ज्ञान के सभी स्रोतों के प्रति सचेत (Alert) रहना चाहिए। न्यायाधीशों को सावधानीपूर्वक (Alertly) अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

सुशीलता-स्नेहपात्रता (Amiability)

 

सुशीलता-स्नेहपात्रता प्रिय बनने और प्रेम उत्पन्न करने का गुण है।

 

एक सुशील मनुष्य का मधुर स्वभाव होता है। वह इतनी अधिक मानसिक दीप्ति, प्रेम एवं आनन्द प्रसारित करता है कि वह सभी गुणग्राही हृदयों में स्थान पाता है।

 

सुशीलता दूसरों को प्रसन्न करने एवं प्रेम करने की सतत इच्छा है। सुशीलता दयालुता अथवा स्वभाव की मधुरता है। यह स्नेहपात्रता है।

 

एक सुशील मनुष्य ऐसी सुखद मनोदशा अथवा सामाजिक गुण रखता है जो प्रसन्न करते हैं एवं मित्र बनाते हैं। वह स्वभावतः स्नेही एवं प्रियकर होता है। वह दयालु, उदार एवं प्रसन्नचित्त होता है। उसका स्वभाव भला होता है। वह क्षुब्धता-चिड़चिड़ाहट से मुक्त होता है। वह मधुर, श्रेष्ठ एवं प्रिय स्वभाव तथा दयालुता से सम्पन्न होता है।

 

दयापूर्ण मुस्कान एवं शिष्टता अत्यधिक लाभ प्रदान करते हैं। सुशील स्वभाव का मनुष्य दूसरों के लिए करुणा एवं प्रेम रखता है, इन गुणों के द्वारा वह दूसरों का प्रेम जीतता है। सुशील शब्द 'अनुकूल' अथवा 'अच्छे स्वभाव का' शब्दों से ऊँचा है।

 

इससे तात्पर्य ऐसे स्वभाव से है जो दूसरों को प्रसन्न, आनन्दित एवं हर्षित करने का इच्छुक है। एक सच्चा सुशील मनुष्य कठोर शब्दों का प्रयोग नहीं करता है तथा ही अशिष्ट व्यवहार करता है। अपने सरल स्वभाव से वह सभी परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति के साथ समायोजित हो सकता है।

 

घृणास्पद, क्रूर, अरुचिकर, चिड़चिड़ा, अप्रिय एवं असौम्य 'सुशील' के विपरीतार्थक शब्द हैं।

 

सुशीलता विकसित करिए। इसे अपने स्वभाव का अभिन्न अंग बनाइए।

 

उद्यमशीलता एवं मनोयोग (Application)

 

एप्लीकेशन शब्द का मूल 'एप्लीकेटो' अथवा 'एप्लीकेटस' है जिसका अर्थ है जोड़ना अथवा बाँधना। यह मन को केन्द्रित करने की कला है। इसमें गहन विचार समाहित होता है।

 

उद्यमशीलता परिश्रम है। यह गहन विचार एवं ध्यान है। अध्यवसायिता उद्यमशीलता है।

 

इसका अभिप्राय किसी विधि, नियम, सत्य तथा उपदेश का जीवन में क्रियान्वन है। यह क्रियान्वन की क्षमता भी है यथा यौगिक यम-नियम अथवा प्रभु ईसा के पर्वतोपदेश (Sermon on the Mount) का जीवन में क्रियान्वन।

 

आप जो कार्य कर रहे हैं, उसमें पूर्ण ध्यान केन्द्रित करना मनोयोग (Application) से कार्य करना है। एप्लीकेशन शब्द का अर्थ ध्यान केन्द्रित करने की आदत एवं क्षमता भी है।

 

कार्य में मनोयोगपूर्वक सतत लगे रहना प्रत्येक मनुष्य के लिए लाभप्रद प्रशिक्षण है। सामान्य बोलचाल में हम कहते हैं, "श्रीमान् ने अध्ययन के प्रति गहन उद्यमशीलता से अपने स्वास्थ्य को हानि पहुँचायी। यदि उनकी उद्यमशीलता उनकी प्रतिभा के अनुरूप होती तो उनकी प्रगति अधिक होती।"

 

एक मनुष्य जो उद्यमशीलता के गुण से सम्पन्न है, वह अपने सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करता है। समृद्धि उसकी सेविका होती है।

 

एक उद्यमशील मनुष्य जल्दी उठता है एव उचित समय पर शय्या पर जाता है। वह एक क्षण भी व्यर्थ नहीं गँवाता है। वह सदैव जागरूक, सजग एवं अध्यवसायी होता है। वह सदैव क्रियाशील रहता है। वह कभी अवसर नहीं खोता है। वह शल्यक्रिया कक्ष में शल्यचिकित्सक के समान है। वह एक जहाज के कप्तान के समान है।

 

वह स्वस्थ होता है। उसका मन हल्का एवं प्रसन्न रहता है। उसके विचार स्पष्ट होते हैं। उसका कक्ष व्यवस्थित होता है। वह अपने कार्य में व्यवस्थित होता है। वह दृढ़ संकल्पवान एवं दृढ़ निश्चयी होता है। वह कभी पश्चात्ताप नहीं करता है और ही खेद करता है।

 

वह धनवान होता है। वह अभावमुक्त होता है। वह शक्ति एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वह यश प्राप्त करता है। वह आदर पाता है और सम्मानित किया जाता है।

 

आप जो भी करने का निश्चय करते हैं, उसे अभी करिए, उसे तुरन्त करिए। एक क्षण की भी प्रतीक्षा मत करिए। जो आप प्रातःकाल कर सकते हैं, उसे सायंकाल तक स्थगित मत करिए।

 

यह क्षण आपका है। अगला क्षण भविष्य के गर्भ में है। आप नहीं जानते हैं कि वह क्या लाने वाला है।

 

भविष्य पर अधिक निर्भर मत रहिए। भूतकाल के लिए पश्चात्ताप मत करिए। वर्तमान में जियें। अभी कार्य में लग जायें।

 

अभी प्रयास करिए। प्रयत्न करिए। पुरुषार्थ करिए। अपने समस्त बल, शक्ति एवं ऊर्जा का प्रयोग करिए। आप निश्चित रूप से सफल होंगे। आप सभी प्रकार के प्रलोभनों एवं बाधाओं पर सरलता से विजय प्राप्त करेंगे। अत्यधिक उद्यमशील मनुष्य असफलता से अपरिचित रहता है।

 

बिना अत्यधिक उद्यम के, आप गहन ध्यान एवं समाधि में प्रवेश नहीं पा सकते हैं। आलस्य, तन्द्रा, अकर्मण्यता, लापरवाही एवं दीर्घसूत्रता उद्यमशीलता के विपरीतार्थक शब्द हैं।

 

हे राम! उद्यमशीलता का विकास करिए तथा अभी एवं यहीं सफलता, प्रचुरता, शान्ति, समृद्धि एवं कैवल्य मोक्ष प्राप्त करिए।

आकांक्षा (Aspiration)

 

भगवद् साक्षात्कार प्राप्त करने की तीव्र-प्रबल इच्छा ही आकांक्षा है।

 

आकांक्षा का अभिप्राय उत्सुकतापूर्वक इच्छा करना अथवा उच्च वस्तुओं की प्राप्ति का उद्देश्य रखना है। सभी उचित मानवीय आकांक्षाओं का एक वास्तविक उद्देश्य परमात्मा ही है।

 

आकांक्षा उस तत्त्व की उत्कट अभीप्सा अथवा प्रबल अभिलाषा है जो मनुष्य की वर्तमान पहुँच एवं प्राप्ति से परे है, विशेषतया जो तत्त्व उदात्त, पवित्र एवं आध्यात्मिक है।

 

आकांक्षा से अभिप्राय ऊर्ध्वगामी दिशा में अग्रसर होना है। आकांक्षा से तात्पर्य अभी तक अप्राप्त किसी उच्च तथा अच्छी वस्तु के लिए तीव्र इच्छा अथवा उत्कण्ठा है जो प्रायः उसे प्राप्त करने के प्रयास के साथ संलग्र रहती है।

 

अवधान (Attention)

 

अवधान मन को निरन्तर एक दिशा में लगाये रखना है। किसी विशेष उद्देश्य के प्रति उत्साह तथा समग्रता के साथ मानसिक शक्तियों को निर्देशित करना ही अवधान है।

 

अवधान संकल्प को सशक्त करता है। यह संकल्प का आधार है। अवधान एकाग्रता का विकास करता है।

 

अवधान सफलता की ओर ले जाता है। अवधान के अभाव के कारण मनुष्य असफलताएँ पाता है।

 

अवधान प्रतिभावान बनाता है। किसी उद्देश्य के प्रति संकेन्द्रित एवं निरन्तर अवधान करने की शक्ति एक श्रेष्ठ प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति का लक्षण है।

 

समस्त शिक्षा, विज्ञान एवं कौशल अवधान पर निर्भर हैं। अवधान नवीन आयाम खोलता है तथा व्याधियों का शमन करता है।

 

अवधान ही काव्यात्मक-प्रतिभा तथा अन्वेषण-प्रतिभा एवं सफलता का स्रोत है। यह अवधान ही था जिसके द्वारा न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण, हार्वे ने शरीर में रक्त संचार एवं डेवी ने आधुनिक रसायनशास्त्र की आधारशिला रखने वाली अवधारणाओं की खोज की।

 

अवधान मानसिक ऊर्जा का एक प्रकार है जो चेतना के प्रत्येक क्षेत्र के स्वरूप निर्धारण में आवश्यक है।

 

यह चेतना की जटिल विषयवस्तु की एक अथवा एक से अधिक विशेषताओं को स्पष्टता अथवा विशेषता प्रदान करने का कार्य अथवा प्रक्रिया है।

 

यह मानसिक क्रिया अथवा क्षमता का एक प्रकार है जो चेतना की विषयवस्तु में कुछ का चयन, उन्हें अधिक स्पष्टता देने के उद्देश्य से सम्भव बनाता है।

 

अनुभव का वह सामान्य तथ्य, जिससे आधुनिक मनोविज्ञान में अवधान की धारणा तथा सिद्धान्त उत्पन्न हुए, यह है कि कुछ वस्तुएँ अथवा वस्तुओं के अंश अन्य की अपेक्षा चेतना के क्षेत्र में अधिक स्पष्टता से अंकित होते हैं, ग्रहण किये जाते हैं, पहचाने जाते हैं जबकि अन्य केवल अस्पष्ट रूप से अथवा कठिनता से ग्रहण किये जाते हैं। स्पष्टता में अन्तर व्यक्ति के चयनात्मक कार्य अथवा प्रक्रिया पर निर्भर प्रतीत होता है। अस्वैच्छिक अवधान (Non-voluntary Attention) में वस्तु उद्दीपक की तीव्रता के द्वारा अथवा विशेष रुचि के लाभ द्वारा मन पर स्वयं को बलपूर्वक थोपती हुई प्रतीत होती है। स्वैच्छिक अवधान (Voluntary Attention) में व्यक्ति अपनी जिज्ञासा की सन्तुष्टि हेतु अथवा कुछ अन्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु वस्तु का चयन करता प्रतीत होता है जिससे वह उसे अधिक स्पष्टता से समझ सके।

 

एक मनुष्य अवधानपूर्वक सुनता है, तो हम कहते हैं- "उसके कर्ण सजग-सावधान हैं।" वह अवधानपूर्वक देखता है तो हम कहते हैं-" उसके नेत्र सजग-सावधान हैं।" मनन करने में मन का प्रयोग किया जाता है। जब एक मनुष्य एक वक्ता के शब्दों के साथ साथ उसके वक्तव्य की विषयवस्तु एवं शैली के प्रति भी सावधान-सतर्क है, तो वह मन एवं इन्द्रियों का भी प्रयोग कर रहा है।

व्यवहार (Behaviour)

 

व्यवहार, आचरण, स्वभाव विशेषतया शिष्ट आदतें हैं।

 

अच्छा व्यवहार दूसरों के प्रति अच्छा आचरण है। आप एक मनुष्य की प्रकृति तथा उसके मन की प्रवृत्ति को उसके व्यवहार द्वारा जान सकते हैं।

 

व्यवहार वह दर्पण है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपना प्रतिबिम्ब दिखाता है। अच्छा व्यवहार मित्रता प्राप्ति एवं समाज में उचित सम्मान प्राप्ति हेतु पासपोर्ट है। ज्ञान बाह्य व्यवहार को विश्वास प्रदान करता है। व्यवहार की तुच्छता अथवा व्यवहार की क्षुद्रता जीवन का अभिशाप है।

 

व्यवहार में विभिन्न प्रकार की सनक, अजीब प्रवृत्तियाँ मानव के दोष ही हैं। उसे स्वयं का सुधार करना चाहिए एवं इन दोषों को दूर करना चाहिए। जो स्वयं को सुधारना चाहता है, उसे अपने इन दोषों पर लज्जित होना चाहिए। व्यक्तिगत आचरण में मर्यादा पालन ही अच्छा व्यवहार है। उचित अथवा मर्यादित रूप में व्यवहार ही अच्छा व्यवहार है।

 

व्यवहार ज्ञान, रुचि तथा भावनाओं की सामूहिक अभिव्यक्ति है।

 

चाल-ढाल (Carriage) से अभिप्राय शरीर के बैठने-उठने एवं चलने के तरीके से है। उदाहरणतः आकर्षक चाल-ढाल (Fain Carriage)

 

प्रकृति (Bearing) स्वभाव अथवा भावना की शारीरिक अभिव्यक्ति है। उदाहरणतः दम्भी प्रकृति (Haughty Bearing)

 

आचरण (Demeanour) केवल भावनाओं की अपितु व्यक्ति की नैतिक स्थिति की शारीरिक अभिव्यक्ति है। उदाहरणतः भक्तिमय आचरण (Devout Demeanour) सभ्य आचार (Breeding) वह आचरण-व्यवहार है जो अच्छे कुल में जन्म एवं अच्छे प्रशिक्षण से प्राप्त होता है।

 

बरताव (Deportment) वह व्यवहार है जो किन्हीं विशेष नियमों के पालन से सम्बन्धित है। उदाहरणतः विद्यार्थियों का बरताव सर्वथा दोषमुक्त था। (Students' deportment was faultless.)

शिष्टाचार (Manners) से अभिप्राय अन्य व्यक्तियों के प्रति अथवा उनके समक्ष प्रदर्शित व्यवहार अथवा आचार-शैली है जो विशेषतया शिष्टता एवं सभ्यता से सम्बन्धित है।

 

व्यवहार (Behaviour) अन्य व्यक्तियों के प्रति हमारे व्यवहार का तरीका है। आचार (Conduct) से अभिप्राय अन्य व्यक्तियों के समक्ष हमारे आचरण से है। व्यवहार परिस्थितियों द्वारा निर्मित होता है, आचरण व्यक्ति द्वारा विकसित किया जाता है।

 

व्यवहारवाद (Behaviourism) व्यक्ति के व्यवहार के वस्तुगत विश्लेषण पर आधारित अध्ययन है। इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति के व्यवहार की परीक्षा वस्तुगत रूप में होनी चाहिए तथा आत्मनिरीक्षण अप्रामाणिक एवं अमान्य है।

परोपकारिता (Benevolence)

 

अंग्रेजी शब्द बेनेवोलेन्स लेटिन शब्दों 'बेने' अर्थात् शुभ एवं 'वोलेन्स' अर्थात् भावना से बना है।

 

यह भला करने का स्वभाव है। यह विशेषतया निर्धनों की सहायता के लिए दिया गया धन का उपहार है। यह दयालुता का एक कार्य है। यह उदारता है।

 

यह दूसरों के कल्याण अथवा सुविधा की अभिलाषा करने का स्वभाव है। यह उनके दुःख का शमन अथवा उन्हें सुख देने की इच्छा है। यह मानवता के प्रति प्रेम अथवा हृदय की दयालुता अथवा दानशीलता है।

 

परोपकारिता में समस्त गुण समाहित हैं। परोपकारिता में पूर्णता प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अन्य महत्त्वपूर्ण आधारभूत गुणों की आवश्यकता है। वे सभी मुख्य गुण परोपकारिता को उसी प्रकार विभूषित करते हैं जिस प्रकार परोपकारिता उन्हें प्रयुक्त करती है एवं विभूषित करती है।

 

परोपकारिता वह स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो दयालुता तथा उदारता के लिए उत्प्रेरित करती है।

 

यह परमात्मा का दूत है। यह दुर्लभ गुण है।

मनुष्य स्वभाव की पूर्णता स्वयं के लिए कम तथा दूसरों के लिए अधिक सोचने एवं स्वयं की स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों को नियन्त्रित करके परोपकारिता के क्रियान्वन में निहित है। इस संसार में कोई भी पूर्णतया आत्मनिर्भर नहीं है। उसे दूसरों के सहयोग की आवश्यकता है। मनुष्य को समाज में पारस्परिक सहयोग एवं पारस्परिक दायित्व निर्वाह हेतु रखा जाता है।

 

आपका भोजन, आपके वस्त्र, आपका स्वास्थ्य, आघातों से आपकी सुरक्षा, जीवन के सुख तथा सुविधाओं का उपभोग-इन सबके लिए आप दूसरों के सहयोग के ऋणी हैं। इसलिए दूसरों के प्रति दयाशील बनिए। वैश्विक कल्याणकर्ता बनिए। मानवता के मित्र बनिए।

 

एक विजेता भय के कारण सम्मानित किया जाता है, एक बुद्धिमान् मनुष्य हमारे सम्मान के योग्य होता है, परन्तु केवल एक परोपकारी मनुष्य ही हमारे स्नेह को अर्जित करता है, हमारे स्नेह का पात्र बनता है।

 

परोपकारी मनुष्य शान्ति एवं प्रसन्नता प्राप्त करता है। वह अपने पड़ोसी तथा अन्य सभी लोगों की सुख- समृद्धि में आनन्दित होता है।

 

जो अपने धन, विचार, वाणी का दूसरों की भलाई हेतु उपयोग करता है, वह महान् मनुष्य है। वह पृथ्वी पर साक्षात् परमात्मा ही है।

 

वह सदैव विभिन्न प्रकारों से दूसरों की भलाई करने के अवसर खोजता है। सामाजिक परोपकारिता के नियमों की यह माँग है कि प्रत्येक मनुष्य अन्य मनुष्यों की सहायता के लिए प्रयत्न करें।

 

असभ्यता, पाशविकता, निर्दयता, लोभ, कठोरता, दुर्भावना, अमानवीयता, विद्वेष, शत्रुता, कृपणता, स्वार्थपरायणता, निष्ठुरता आदि परोपकारिता के विपरीतार्थक शब्द हैं।

 

भिक्षा-दान, उपकारिता, सदयता, प्रचुरता, हितैषिता, उदारता, सद्भावना, मानवता, सहृदयता, दयालुता, कृपालुता, दानशीलता, वदान्यता, मानव-प्रेम, सहानुभूति एवं कोमलता परोपकारिता के समानार्थी शब्द हैं।

 

दयालुता (Kindness) एवं कोमलता (Tenderness) वैयक्तिक होती हैं। परोपकारिता (Benevolence) और दान (Charity) सार्वभौमिक होते हैं। दयालुता समृद्धि अथवा विपत्ति में, सभी सजीव प्राणियों, मनुष्य अथवा पशुओं के प्रति अभिव्यक्त होती है। कोमलता विशेषत: छोटों, दुर्बल तथा जरूरतमन्द के प्रति अभिव्यक्त होती है। मनुष्य अथवा पशु के प्रति दयालुता तथा कोमलता का भाव मानवता (Humanity) है। स्वयं को विस्मृत करने वाली दयालुता का स्वभाव अथवा कार्य उदारता (Generosity) है। इसमें देने के अतिरिक्त कुछ अधिक सम्मिलित है।

 

मुक्तहस्तता (Bounty) अत्यधिक देने के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है, इसका विशाल रूप बदान्यता (Munificence) कहलाता है।

 

उदारचित्तता (Liberality) विशाल, उदार एवं सहृदय दृष्टिकोण है जो उपहारों तथा अन्य रूपों में व्यक्त होता है।

 

हम एक उदार मेजबान की मुक्तहस्तता (Bounty) की बात कहते हैं। एक कॉलेज संस्थापक की उदारचित्तता (Liberality) तथा एक धर्मशास्त्री की उसके विपरीत विचार रखने वालों के प्रति उदारचित्तता (Liberality) के विषय में कहते हैं। मानव-प्रेम (Philanthropy) शब्द का प्रयोग मानव-कल्याण के लिए विस्तृत योजनाओं के लिए होता है।

 

अच्छे कार्य करने के लिए असाधारण परिस्थितियों की प्रतीक्षा मत करिए। साधारण स्थितियों के सदुपयोग का प्रयास करिए।

चरित्र (Character)

 

चरित्र उन विशेष गुणों का समूह है जो वैयक्तिकता का निर्माण करता है।

 

चरित्र किसी मानव को अथवा मानव वर्ग को अन्यों से पृथकता प्रदान करने वाले गुणों का समूह है। यह एक मनुष्य का कोई विशिष्ट चिह्न अथवा गुण है।

 

चरित्र शक्ति है। चरित्र सब कुछ है। चरित्र ही वास्तविक सम्पत्ति है। यह सभी सम्पदाओं से उत्तम है।

 

चरित्र पूर्णतया प्रशिक्षित संकल्प है। यह बुद्धिमत्ता से श्रेष्ठ है।

 

प्रत्येक मनुष्य अपने चरित्र का स्वयं निर्माता है। आप एक कार्य का रोपण करते हैं और एक आदत को प्राप्त करते हैं। आप एक आदत का रोपण करते हैं और चरित्र को प्राप्त करते हैं।

 

कार्य, दृष्टि, वचन एवं व्यवहार वे अक्षर हैं जिनके द्वारा चरित्र शब्द की वर्तनी बनती है।

 

एक मनुष्य जिनसे वह प्रेम करता है, उनके द्वारा जाना जाता है जैसे मित्र, स्थान, पुस्तकें, पोशाक, भोजन, विचार, कार्य, वचन। इन सभी के द्वारा उसका चरित्र व्यक्त