हिंदुत्व

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विनायक दामोदर सावरकर

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रभात

प्रकाशन

प्रकाशक

 

प्रभात प्रकाशन प्रा. लि.

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संस्करण

2023

 

 

© सात्यकि सावरकर

 

 

 

पेपरबैक मूल्य

तीन सौ रुपए

 

 

 

 

 

मुद्रक

नरुला प्रिंटर्स, दिल्ली

 

 

 

 

HINDUTVA

by Swatantrayaveer Vinayak Damodar Savarkar

Published by PRABHAT PRAKASHAN PVT. LTD.

4/19 Asaf Ali Road, New Delhi-110002

ISBN 978-93-89982-11-4

रु.300.00 (PB)

अनुक्रम

 

1.हिंदुत्व के प्रमुखतम अभिलक्षण.. 7

नाम का क्या महत्त्व है?. 7

नाम की अद्भुत महिमा.. 7

हिंदुत्व कोई सामान्य शब्द नहीं है. 8

'हिंदुत्व' तथा 'हिंदू धर्म' शब्दों का भेदनारविर. 9

2. सप्तसिंधु से प्रथमतः उदय होनेवाला आर्य राष्ट्र.. 10

सप्तसिंधु के लिए आर्यों का भक्तिभाव. 10

संस्कृत के 'सिंधु' का प्राकृत में 'हिंदू' हो जाता है जार. 11

'हिंदू' नाम से ही हमारे राष्ट्र का नामकरण हुआ था.. 12

कदाचित् प्राकृत के 'हिंदू' को ही बाद में संस्कृत भाषा में 'सिंधु' में रूपांतरित किया गया हो.. 12

पंच नदियों के पार जाकर उपनिवेशों का विस्तार करनेवाले आर्य. 14

वही वास्तविक रूप से हिंदू राष्ट्र का जन्मदिन है. 15

आर्यावर्त तथा भारतवर्ष. 15

संपूर्ण विश्व में 'हिंदू' तथा 'हिंदुस्थान' नामों को ही स्वीकारा गया.. 16

कौन सा नाम रूढ़ हो जाता है?. 17

3. बौद्ध धर्म के अभ्युदय तथा हास के कारण 'हिंदू' नाम को असाधारण महत्त्व प्राप्त हुआ... 18

बौद्ध धर्म का हास राजनीतिक कारणों से हुआ था.. 19

राष्ट्रकार्य के लिए शूर तथा बलशाली व्यक्तियों की कमी हो गई. 20

आधुनिक शिक्षित लोगों का इतिहास विषयक बौद्धिक दास्य... 21

अग्नि तथा तलवार का तत्त्वज्ञान. 22

हिंदू खड्ग का यथोचित प्रत्युत्तर. 23

सत्यधर्म से विश्व पर विजय पाने का बौद्धधर्म का विफल प्रयोग. 23

बौद्धों के 'विश्वधर्म' को हिंदुओं के 'राष्ट्रधर्म' का प्रत्युत्तर. 24

विदेशियों की दासता को आमंत्रित करनेवाला तथा स्वदेश को गर्त में डालनेवाला बौद्ध धर्म. 25

वैदिक धर्म का प्रतिक्रियात्मक पुनरुज्जीवनामक.. 26

हिंदू राष्ट्र को अपने स्वतंत्र अस्तित्व की पहचान. 27

हिंदू राष्ट्र का उत्तर-दक्षिण सीमांत. 28

सिंधु ही हिंदुस्थान की स्फूर्ति.. 29

उत्तर-दक्षिण सीमांत दरशानेवाला एक ही शब्द- 'सिंधु' 30

सिंधुस्थान तथा म्लेच्छस्थान. 31

'हिंदुस्थान' नाम की अनेक शतकों की परंपरा. 31

भगवान् बौद्ध के लिए नितांत आदरयुक्त भक्तिभावना.. 32

4. तं वर्ष भारतं नाम भारती यत्र संततिः... 34

हमारे राष्ट्र की जीवंत मातृभाषा-संस्कृतनिष्ठ हिंदी.. 34

हिंदू राष्ट्र के वैभव का काल. 36

मुसलमानों के आक्रमण तथा हिंदुओं द्वारा शौर्यपूर्ण प्रतिकार. 36

हिंदुत्व का आत्म-साक्षात्कार. 38

महत्त्वपूर्ण स्फूर्तिदायक उद्धरण.. 39

पृथ्वीराज रासो.. 39

श्री रामदास स्वामी का गूढ़ स्वप्न... 42

शिवाजी महाराज का भक्तकवि-भूषण.. 43

छत्रसाल का गुणगान. 44

सिख गुरु तेगबहादुर का हिंदुत्व के प्रति प्रखर अभिमान. 45

शिवाजी राजा का हिंदुत्व का आंदोलन. 47

मराठों द्वारा की गई हिंदवी क्रांति.. 48

हिंदू पदपादशाही की धाक.. 49

प्रथम बाजीराव पेशवा.. 50

हिंदू स्वातंत्र्य का अग्रणी नेता नाना साहब. 52

गोविंदराव काले का फडनवीस के नाम पत्र. 52

5. 'हिंदू' नाम मुसलमानों ने द्वेषपूर्वक दिया है : इस धारणा के लिए कोई आधार नहीं है. 54

'सप्तसिंधु' 'हप्तसिंधु' का ही रूपांतर है. 55

इस कारण क्या 'हिंदू' नाम हम लोगों को त्याग देना चाहिए?. 55

हिंदू नाम विश्व के लिए अभिमान का द्योतक है. 56

चीनी लोगों को 'हिंदू' 'इंदु' के समान ही प्रिय थे. 57

नाम बदलने का मूर्खतापूर्ण प्रयास. 58

'हिंदू' तथा 'हिंदुस्थान' नामों की परंपरा. 59

'हिंदुइज्म' शब्द के कारण उत्पन्न अस्तव्यस्तता.. 60

हिंदुस्थान अर्थात् हिंदुओं का स्थान. 61

हिंदुत्व का प्रथम आवश्यक अभिलक्षण.. 62

हम सब एक ही रक्त के हैं. 64

हिंदूजाति की रक्तगंगा का प्रचंडोदात्त प्रवाह. 64

मान्यता प्राप्त अंतरजातीय विवाह. 65

आचारं कुलमुच्यते. 66

अवैदिक जाति से वैदिकों के विवाह-संबंध. 67

वस्तुतः मानवजाति ही विश्व की एकमेव जाति है. 68

हिंदुत्व का दूसरा आवश्यक अभिलक्षण.. 69

समान संस्कृति.. 69

संस्कृति का अर्थ क्या है?. 70

हम लोगों की उज्ज्वल संस्कृति का उत्तराधिकार. 71

कलह और युद्ध क्या आप लोगों में नहीं होते ?. 73

संस्कृत ही हम लोगों के देश की भाषा है. 73

हिंदुओं की वाङ्मय संपत्ति.. 74

कला तथा कलाशिल्प... 74

हिंदू निर्बंध-विधान. 75

त्योहार तथा यात्रा महोत्सव. 76

हिंदुत्व का तीसरा प्रमुख अभिलक्षण.. 77

क्या बोहरी तथा खोजे को 'हिंदू' कह सकते हैं?. 78

हिंदू धर्म से 'हिंदू' की परिभाषा करना अनुचित. 80

हिंदू किसे कहते हैं?. 80

हिंदू धर्म में कई धर्म-पद्धतियों का अंतर्भाव होता है. 81

वैदिक धर्म को ही हिंदू धर्म मानना एक भूल है. 82

सभी हिंदू एक ही ध्वज के नीचे एकत्रित होंगे. 83

हिंदूजाति द्वारा निर्मित समान समष्टि (समुदाय) 84

लोकमान्य तिलक द्वारा की गई हिंदू धर्म की परिभाषा.. 85

हिंदू संस्कृति की चिरस्थायी छाप. 85

ऋषि-मुनियों और साधु पुरुषों की कर्मभूमि.. 86

हुतात्माओं की वीरभूमि तथा यक्षभूमि.. 87

ईसाई अथवा बोहरी अथवा मुसलमान हिंदू नहीं होते. 88

परधर्म अपनाए हुए बांधवो! पुनः हिंदू धर्म को स्वीकार करो. 88

यही हिंदू धर्म की योग्य तथा संक्षिप्त परिभाषा है. 90

6. कुछ प्रत्यक्ष उदाहरण.. 91

हिंदुत्व की भौगोलिक मर्यादाएँ. 92

हिंदू रक्त तथा हिंदू संस्कृति का समान उत्तराधिकार. 93

हमारे सिख बंधुओं का उदाहरण.. 95

सिख वास्तविक रूप में हिंदू ही हैं. 97

स्वतंत्र प्रतिनिधित्व और सिख समाज.. 98

हिंदुओं से अलग समझना सिखों के लिए भयंकर हानिकारक होगा.. 99

एक नाजुक अपवाद. 101

निर्दोष परिभाषा.. 102

7. प्रकृति की दिव्य करांगुलियों द्वारा रेखित राष्ट्र के संरक्षक सीमांत. 104

परमेश्वर की अत्यधिक लाडली बेटी है हमारी मातृभूमि.. 105

समान वसतिस्थान. 105

हम लोगों का संख्याबल. 106

समान संस्कृति.. 106

मातृभूमि की तुलना में पुण्यभूमि के प्रति प्रेम श्रेष्ठतर होता है. 107

भाग्यशाली भारतभूमि.. 108

हिंदू बंधुओ! संघटित होने पर ही आप जीवित रह सकेंगे. 109

देशद्रोही गतिविधियों का कठोरतापूर्वक निर्मूलन करो. 110

हिंदुत्व का आदर्श तत्त्वज्ञान. 111

8. संदर्भ सूची.. 112

'हिंदुत्व'-विनायक दामोदर सावरकर. 119

 

 

 

1.हिंदुत्व के प्रमुखतम अभिलक्षण

नाम का क्या महत्त्व है?

 

'जी हाँ, हम हिंदू हैं, हिंदू कहलाने में हमें सदैव गर्व का अनुभव होता है', यह बात हम साहस के साथ कहते हैं और आशा करते हैं कि हमारे इस स्वाभिमान दर्शक आग्रहपूर्ण वक्तव्य के लिए वेरोना की वह लावण्यवती' हमें उदारतापूर्वक क्षमा कर देगी। इस सुंदरी ने 'नाम का क्या महत्त्व है ? पाँव, मुख आदि के समान नाम मानव शरीर का कोई अंग नहीं है,' ऐसा कहते हुए व्याकुल होकर अपने प्रियतम से प्रार्थना की थी कि उसका नाम बदल दिया जाए। यदि हम इस प्रिय मठवासी भिक्षुश्रेष्ठ' के स्थान पर होते तो हम भी यही कहते कि नाम का क्या महत्त्व है। यदि गुलाब को किसी अन्य नाम से संबोधित किया जाएगा, तब भी उसकी सुगंध पूर्ववत् बनी रहेगी। इस बात को आग्रहपूर्वक प्रस्तुत करनेवाले रमणीय तर्कशास्त्र के सम्मुख नतमस्तक होकर इस कथन को स्वीकार करने का परामर्श भी हम उसके प्रियतम को देते, क्योंकि नाम की तुलना में वस्तु का महत्त्व अधिक होता है। एक ही वस्तु को विभिन्न प्रकार के अनेक नामों से संबोधित किया जाता है। शब्दों की ध्वनि में तथा उससे प्रतीत होनेवाले अर्थ में एक स्वाभाविक तथा अपरिहार्य प्रकार का संबंध रहता है-ऐसा कहना स्वयं अपना ही औचित्य खो देता है। फिर भी उस वस्तु में तथा उसे दिए हुए नाम में विद्यमान परस्पर संबंध समय के साथ दृढ़ होकर अंततः चिरस्थायी बन जाते हैं तथा वस्तु का बोध करानेवाला यह एक माध्यम बन जाता है। नाम तथा वस्तु प्रायः एकरूप हो जाते हैं। इस वस्तु के विषय में उत्पन्न होनेवाले उपविचार तथा भावनाएँ उस वस्तु का और उसके नाम का महत्त्व एक समान हो जाता है। 'नाम का क्या महत्त्व है' ऐसा प्रश्न व्याकुल होकर पूछनेवाली कोमलांगी प्रेषिता को' अपने पूजनीय प्राणेश्वर 'रोमियो को पेरिस" नाम से संबोधित करना उचित नहीं प्रतीत होता, अथवा अपनी प्रियतमा ज्युलिएट को अन्य किसी नाम से संबोधित करना स्वीकार्य नहीं होता। फलों से लदे वृक्ष की शाखाओं को अपने प्रकाश से रजतस्नान करानेवाले चंद्र' को साक्षी रखकर ज्युलिएट का प्रियकर भी क्या शपथपूर्वक कह सकता कि ज्युलिएट की तरह रोजलिन नाम भी उतना ही मधुर और भावपूर्ण लगता है।

Rectangle: Rounded Corners: कुछ शब्द ऐसे भी हैं, जो अत्यंत गूढ़ कल्पना या ध्येय-सृष्टि अथवा विशाल तथा अमूर्त सिद्धांत के स्पर्श से महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं। उनका स्वतंत्र अस्तित्व होता है और वे किसी जीव-जंतु के समान जीते हैं। समय के साथ पुष्‍ट होते हैं । 

नाम की अद्भुत महिमा

 

 

 

 

 

 

 कुछ शब्द ऐसे भी हैं, जो अत्यंत गूढ़ कल्पना या ध्येय-सृष्टि अथवा विशाल तथा अमूर्त सिद्धांत के स्पर्श से महत्त्वपूर्ण बन जाते हैं। उनका स्वतंत्र अस्तित्व होता है और वे किसी जीव-जंतु के समान जीते हैं। समय के साथ वे पुष्ट होते हैं। वे पुष्ट होते हैं। हाथ-पाँव अथवा मनुष्य के अन्य अंगों से ये नाम भिन्न होते हैं, क्योंकि वे मनुष्य की आत्मा ही बनकर रहे होते हैं तथा मानवी पीढ़ियों से भी वे अधिक चिरंतन बन जाते हैं। जीजस का निधन हो गया, परंतु रोमन साम्राज्य की अपेक्षा अथवा किसी भी अन्य सम्राट् की तुलना में वह अधिक चिरंतन हो गया। 'मैडोना' के किसी चित्र के नीचे 'फातिमा' लिख दिया जाए तो स्पैनिश व्यक्ति इसे किसी अन्य कलापूर्ण चित्र की तरह कौतूहल से देखता रहेगा, परंतु चित्र के नीचे 'मैडोना " लिखा होगा तो एक चमत्कार घट जाएगा। तनकर खड़ा वह व्यक्ति अपने घुटनों के बल झुक जाएगा। उसकी आँखों में कला विषयक जिज्ञासा के स्थान पर एक साक्षात्कारी भक्तिभाव झलकने लगेगा। उसकी दृष्टि अंतर्मुखी बन जाएगी। मेरी का पवित्र मातृप्रेम तथा वात्सल्य मूर्तिमंत साकार करनेवाले इस चित्र के दर्शन से उसकी संपूर्ण देह पुलकित हो उठेगी। 'नाम का क्या महत्त्व है' ऐसा कहने में यदि कुछ तथ्य है तो अयोध्या को होनोलुलु अथवा वहाँ के अमरचरित्र रघुकुल तिलक को 'दगडू' या ऐसा ही कोई अन्य नाम देने पर कोई अंतर नहीं आएगा। किसी अमेरिकी को उसके वॉशिंगटन को चंगेज खान कहने में या किसी मुसलमान को स्वयं को ज्यू कहलाने में जो कष्ट होता है, उसे देखकर आप समझ जाएँगे कि 'खुल जा सिमसिम* मंत्र का उच्चारण करने से इस प्रकार के प्रश्नों का समाधान नहीं हो सकता।

 

हिंदुत्व कोई सामान्य शब्द नहीं है

 

हिंदुत्व एक ऐसा शब्द है, जो संपूर्ण मानवजाति के लिए आज भी असामान्य स्फूर्ति तथा चैतन्य का स्रोत बना हुआ है। इसी हिंदुत्व के असंदिग्ध स्वरूप तथा आशय का ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास आज हम करने जा रहे हैं। इस शब्द से संबद्ध विचार, महान् ध्येय, रीति-रिवाज तथा भावनाएँ कितनी विविध तथा श्रेष्ठ हैं, कितनी प्रभावी तथा सूक्ष्मतम हैं।

 

 

हिंदुत्व एक ऐसा शब्द है, जो संपूर्ण मानवजाति के लिए आज भी असामान्य स्फूर्ति तथा चैतन्य का स्रोत बना हुआ है। इसी हिंदुत्व के असंदिग्ध स्वरूप तथा आशय का ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास आज हम करने जा रहे हैं। इस शब्द से संबद्ध विचार, महान् ध्येय, रीति- रिवाज तथा भावनाएँ कितनी विविध तथा श्रेष्ठ हैं, कितनी प्रभावी तथा सूक्ष्मतम हैं। जितनी क्रांतिकारी हैं, उतनी ही भ्रांतिकारक भी हैं; परंतु सुस्पष्ट है, इस कारण 'हिंदुत्व' शब्द का विश्लेषण कर उसका स्पष्ट अर्थ ज्ञात करना अत्यधिक कठिन बन जाता है। आज हिंदुत्व की जो स्थिति सामने दिखाई दे रही है, यह स्थिति उत्पन्न होने में कम-से-कम चालीस शतकों से स्मृतिकार, वीरपुरुष और इतिहासकारों ने इस शब्द की परंपरा को अखंडित रखने के लिए किए हुए त्याग और बलिदान का योगदान है। उन्होंने इसके लिए अपना जीवन व्यतीत किया, प्रखर चिंतन किया, युद्ध किए तथा अपने प्राणों की बाजी भी लगा दी। यह सब इसलिए करना पड़ा कि हम लोग कभी आपस में लड़ते हुए, कभी परस्पर सहकार्य करते हुए और कभी एक-दूसरे में पूर्णतः विलीन होकर एकरूप हो गए थे। यह शब्द इस प्रकार लिये गए अनगिनत व्यावसायिक कार्यों की निष्पत्ति है। 'हिंदुत्व' कोई सामान्य शब्द नहीं है। यह एक परंपरा है। एक इतिहास है। यह इतिहास केवल धार्मिक अथवा आध्यात्मिक इतिहास नहीं है। अनेक बार 'हिंदुत्व' शब्द को उसी के समान किसी अन्य शब्द के समतुल्य मानकर बड़ी भूल की जाती है। वैसा यह इतिहास नहीं है। वह एक सर्वसंग्रही इतिहास है।

 

'हिंदुत्व' तथा 'हिंदू धर्म' शब्दों का भेद

'हिंदुत्व' से ही उपजा उसी का एक रूप है, उसी का एक अंश है; इसलिए यदि 'हिंदुत्व' शब्द की स्पष्ट कल्पना करना हम लोगों के लिए संभव नहीं होता तो 'हिंदू धर्म' शब्द भी हम लोगों के लिए दुर्बोध तथा अनिश्चित बन जाएगा।

 

'हिंदू धर्म' यह शब्द 'हिंदुत्व' से ही उपजा उसी का एक रूप है, उसी का एक अंश है; इसलिए यदि 'हिंदुत्व' शब्द की स्पष्ट कल्पना करना हम लोगों के लिए संभव नहीं होता तो 'हिंदू धर्म' शब्द भी हम लोगों के लिए दुर्बोध तथा अनिश्चित बन जाएगा। इन दो शब्दों में विद्यमान अन्योन्य पृथक्ता ठीक से समझ नहीं पाने के कारण ही कुछ सहोदर जातियों में, जिन्हें हिंदू संस्कृति के अमूल्य उत्तराधिकार प्राप्त हुए हैं, अनेक मिथ्या धारणाएँ उत्पन्न हुई हैं। इन शब्दों के अर्थ में मूलतः क्या अंतर है यह बात आगे स्पष्ट होती जाएगी। यहाँ इतना बताना ही पर्याप्त होगा कि 'हिंदू धर्म' से सामान्यतः जो बोध होता है, वह 'हिंदुत्व' के अर्थ से भिन्न है। किसी आध्यात्मिक अथवा भक्ति संप्रदाय के मतों के अनुसार निर्मित अथवा सीमित आचार-विचार विषयक नीति-नियमों के शास्त्र को ही 'हिंदू धर्म' कहा जाता है। 'धर्म' शब्द का अर्थ भी यही है। हिंदुत्व के मूल तत्त्वों की चर्चा करते समय किसी एक धार्मिक या ईश्वर-प्राप्ति से जुड़ी विचारप्रणाली या पंथ का ही केवल विचार नहीं किया जाता। भाषा की कठिनाई होती तो हिंदुत्व के अर्थ से निकट आनेवाला 'हिंदुपन' शब्द का हमने 'हिंदूधर्म' शब्द के बदले प्रयोग किया होता। 'हिंदुत्व' शब्द में एक राष्ट्र तथा हिंदूजाति के अस्तित्व का तथा पराक्रम के सम्मिलित होने का बोध होता है। इसीलिए 'हिंदुत्व' शब्द का निश्चित आशय ज्ञात करने के लिए पहले हम लोगों को यह समझना आवश्यक है कि 'हिंदू' किसे कहते हैं। इस शब्द ने लाखों लोगों के मानस को किस प्रकार प्रभावित किया है तथा समाज के उत्तमोत्तम पुरुषों ने, शूर तथा साहसी वीरों ने इसी नाम के लिए अपनी भक्तिपूर्ण निष्ठा क्यों अर्पित की, इसका रहस्य ज्ञात करना भी आवश्यक है। यहाँ यह बता देना भी आवश्यक है कि जो शब्द किसी एक पंथ की ओर निर्देश करता है तथा हिंदुत्व की तुलना में अधिक संकुचित तथा असंतोषप्रद है, उसकी चर्चा हम नहीं करनेवाले हैं। इस प्रयास में हम कितने यशस्वी हो सकेंगे तथा हमारा दृष्टिकोण कितना योग्य है-इसका निर्णय आगामी विवेचन समझने के पश्चात् ही किया जा सकेगा।

 

 

 

 

 

 

 

2. सप्तसिंधु से प्रथमतः उदय होनेवाला आर्य राष्ट्र

 

हसी आर्यों के दल ने सिंधुतट पर आकर वहाँ रहना कब प्रारंभ किया तथा अपने यज्ञ की अग्नि सबसे पहले कब प्रज्वलित की- यह बताना आज की प्राच्य अनुसंधान की अवस्था में साहसपूर्ण कार्य होगा। मिस्र देश के वासी तथा बैबिलोनवासियों द्वारा अपनी भव्य सभ्यता की निर्मिति किए जाने से पहले भी सिंधु नदी के पावन तीरों पर नित्य ही यज्ञ के सुगंधित धुएँ के आकाशगामी वलय उठते ही रहते थे। आत्मा की अद्वैत अनुभूति से प्रेरित मंत्र-पठन की ध्वनि सिंधु की घाटियों में गूंज उठती। यह उचित ही था कि उनके पौरुष तथा विश्व के गूढ़ अध्यात्म का विचार करनेवाली उनकी प्रगल्भता की विशेषताओं के कारण एक महान् तथा शाश्वत संस्कृति की स्थापना करने का सम्मान उन्हें प्राप्त हुआ। अपने निकट के जाति-बांधवों से, विशेषतः आर्याणवासी पारसिकों से आर्य जब संपूर्णतः स्वतंत्र हो गए, तब सप्तसिंधु के पार अंतिम सीमा तक उनके उपनिवेशों का विस्तार हो चुका था। 'हम लोग एक स्वतंत्र राष्ट्र हैं' इस बात का पर्याप्त ज्ञान भी उन्हें हो चुका था। इसके अतिरिक्त इस राष्ट्र की सीमाएँ भी निश्चित हो चुकी थीं। शरीर में फैले हुए ज्ञान-तंतुओं के समान उस भूमि पर विरत रूप से प्रवाहित होनेवाली उन तुष्टि-पुष्टिदायक सप्त सरिताओं के कारण ही एक नए संगठित राष्ट्र का निर्माण हुआ था। उन नदियों के प्रति विद्यमान कृत्य भक्तिभाव के कारण ही आर्यों ने स्वयं को 'सप्तसिंधु' कहलाना पसंद किया। विश्व के 'ऋग्वेद' जैसे प्राचीनतम ग्रंथ में वेदकालीन भारत को यही नाम दिया गया है। हमें ज्ञात है कि आर्य प्रमुख रूप से कृषि करते थे। अतः इन सप्त नदियों के प्रति उनके मन में कितना अवर्णनीय प्रेम तथा भक्तिभाव होगा- इसकी कल्पना हम लोग कर सकते हैं। इन नदियों में सर्वश्रेष्ठ तथा ज्येष्ठ नदी सिंधु को वे लोग राष्ट्र तथा संस्कृति का मूतिमंत प्रतीक मानते थे।

 

इमा आपः शिवतमा इमा राष्ट्रस्य भेषजीः

इमा राष्ट्रस्य वर्धमीरिमा राष्ट्रभृतोऽमृताः

 

सप्तसिंधु के लिए आर्यों का भक्तिभाव

भविष्य की दिग्विजयों कालावधि में आर्यों को इन्हीं नदियों जैसी अनेक सुख-समृद्धिवर्धक नदियों लाभ हुआ होगा। परंतु सप्तसिंधुओं ने उनके लिए स्वतंत्र राष्ट्र स्थापित किया और जिनके नामों प्रभावित होकर उनके पूर्वजनों ने उनकी राष्ट्रीयता तथा सांस्कृतिक एकता की घोषणा की और उन्हें सप्तसिंधु' नाम भी दिया, उस सप्तसिंधु के लिए आर्यों के मन में प्रेम तथा भक्ति विद्यमान थी।

 

 

भविष्य की दिग्विजयों की कालावधि में आर्यों को इन्हीं नदियों जैसी अनेक सुख-समृद्धिवर्धक नदियों से लाभ हुआ होगा। परंतु जिन सप्तसिंधुओं ने उनके लिए स्वतंत्र राष्ट्र स्थापित किया और जिनके नामों से प्रभावित होकर उनके पूर्वजनों ने उनकी राष्ट्रीयता तथा सांस्कृतिक एकता की घोषणा की और उन्हें 'सप्तसिंधु' नाम भी दिया, उस सप्तसिंधु के लिए आर्यों के मन में प्रेम तथा भक्ति विद्यमान थी। तब से आज तक सिंधु अर्थात् हिंदू किसी भी स्थान पर क्यों हों, वे चाहते हैं कि उनके पापों का विनाश होकर आत्मशुद्धि हो, इसलिए सप्तसिंधुओं का सान्निध्य उन्हें प्राप्त होना रहे। इसलिए अत्यधिक भक्तिभाव से वह उन सात नदियों शतद्रु', रावी", चिनाव", वितस्ता", गंगा, यमुना, सरस्वती-का स्मरण करता रहता है। की से जिन से '

 

संस्कृत के 'सिंधु' का प्राकृत में 'हिंदू' हो जाता है जार

 

केवल आर्य ही स्वयं को 'सिंधु' कहलाते, ऐसा नहीं था; उनके पड़ोसी राष्ट्र (कम-से-कम एक) भी उन्हें इसी नाम से जानते थे। यह बात सिद्ध करने के लिए हम लोगों के पास पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं। संस्कृत के '' अक्षर का हिंदू तथा अहिंदू प्राकृत भाषाओं में '' ऐसा अपभ्रंश हो जाता है।

 

 

केवल आर्य ही स्वयं को 'सिंधु' कहलाते, ऐसा नहीं था; उनके पड़ोसी राष्ट्र (कम-से-कम एक) भी उन्हें इसी नाम से जानते थे। यह बात सिद्ध करने के लिए हम लोगों के पास पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं। संस्कृत के '' अक्षर का हिंदू तथा अहिंदू प्राकृत भाषाओं में '' ऐसा अपभ्रंश हो जाता है। सप्त का हप्त हो जाना केवल हिंदू प्राकृत भाषा तक ही सीमित नहीं  है। यूरोप की भाषाओं में इस प्रकार की बात देखी जाती है। सप्ताह को हम लोग 'हफ्ता' कहते हैं। यूरोपिय भाषाओं में 'सप्ताह "हप्टार्की' बन जाता है। संस्कृत का 'केसरी' शब्द हिंदी में 'केहरी' में परिवर्तित हो जाता है। 'सरस्वती' का रूप 'हरहवती' तथा 'असुर' का 'अहुर' हो जाता है। इसी प्रकार वेदकालीन सप्तसिंधु के लिए आर्याणवासी प्राचीन पारसिकों ने अपने धर्म ग्रंथ 'अवेस्ता' में 'हप्ताहिंदू' नाम का उल्लेख किया है। इतिहास के प्रारंभिक काल में भी हम लोग 'सिंधु' अथवा 'हिंदू' राष्ट्र के अंग माने जाते रहे हैं। अनेक म्लेच्छ (यावनी) भाषाएँ भी संस्कृत भाषा से ही उत्पन्न हुई हैं। इसे स्पष्ट करते हुए म्लेच्छ पुराणों में इस बात का उल्लेख कुछ इस प्रकार किया गया है-

 

संस्कृतस्य वाणी तु भारतं वर्ष मुह्यताम्। अन्ये खंडे गता सैव म्लेच्छाह्या नंदिनोऽभवत् पितृपैतर भ्राता बादरः पतिरेवच सेति सा यावनी भाषा ह्यश्वश्चास्यस्तथा पुनः जानुस्थाने जैनु शब्दः सप्तसिंधुस्तथैव च। हप्तहिंदुर्यावनी पुनर्जेया गुरुंडिका

 

(-प्रतिसर्ग पर्व, . )

 

'हिंदू' नाम से ही हमारे राष्ट्र का नामकरण हुआ था

इस प्रकार आर्याणवासी पारसिक वैदिक आर्यों को 'हिंदू' नाम से ही संबोधित करते थे। यह निश्चित जानने के बाद तथा अन्य राष्ट्रों को हम जिस नाम से जानते हैं वह नाम भी, जिन्होंने हमारा उस राष्ट्र से परिचय कराया होता है, उनका ही दिया होता है, यह जानने के उपरांत हम स्पष्ट अनुमान लगा सकते हैं कि उस समय के विकसित राष्ट्र भी हमारी इस भूमि को पारसियों की तरह हिंदू नाम से ही जानते थे।

 

 

इस प्रकार आर्याणवासी पारसिक वैदिक आर्यों को 'हिंदू' नाम से ही संबोधित करते थे। यह निश्चित जानने के बाद तथा अन्य राष्ट्रों को हम जिस नाम से जानते हैं वह नाम भी, जिन्होंने हमारा उस राष्ट्र से परिचय कराया होता है, उनका ही दिया होता है, यह जानने के उपरांत हम स्पष्ट अनुमान लगा सकते हैं कि उस समय के विकसित राष्ट्र भी हमारी इस भूमि को पारसियों की तरह हिंदू नाम से ही जानते थे।  यह ज्ञात होने के पश्चात् हम इस स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि उस समय के विकसित राष्ट्र भी हमारी इस भूमि को पारसियों की तरह 'हिंदू' नाम से ही जानते थे। इसके अतिरिक्त सप्तसिंधु के इस प्रदेश में यहाँ-वहाँ फैली हुई आदिवासियों की टोलियाँ उनकी भाषाओं में भाषा शास्त्र के इस नियम के अनुसार आर्यों को 'हिंदू' नाम से ही जानते होंगे। जो प्राकृत भाषाएँ सिंधुओं की तथा उनसे खून का रिश्ता जोड़नेवाली जातियों की नित्य व्यवहार में बोली जानेवाली भाषाएँ बन गईं, और जब हिंदी प्राकृत भाषाओं का जन्म भी वैदिक संस्कृत भाषा से ही हुआ था, तब से यही सिंधु अपने आपको हिंदू कहलवाते थे। अतः जो प्रमाण उपलब्ध हैं, उनका आधार लेने पर यह बात निर्विवाद रूप से प्रभावित हो जाती है कि हम लोगों के पितरों तथा पूर्वजों ने हम लोगों के इस राष्ट्र और जाति का नामकरण 'सप्तसिंधु' अथवा 'हप्त हिंदू' ऐसा ही किया था। उस समय के अधिकतर  परिचित राष्ट्र हम लोगों को सिंधु अथवा 'हिंदू' नाम से ही जानते थे। यहाँ किसी संदेह के लिए कोई स्थान नहीं है।

कदाचित् प्राकृत के 'हिंदू' को ही बाद में संस्कृत भाषा में 'सिंधु' में रूपांतरित किया गया हो

अब तक हम लोगों ने लिखित रूप में विद्यमान प्रमाणों के अनुसार विचार किया है, हम ही परंतु अब तर्क तथा अनुमान की सीमा में संचार करनेवाले हैं। के अभी तक हमने आर्यों मूल स्थान के विषय में किसी भी उपपत्ति की पुष्टि आग्रहपूर्वक नहीं की है। अधिकतर लोगों ने स्वीकार कर लिया आर्य हिंदुस्थान बाहर से में आए हैं।

 

 

 

अब तक हम लोगों ने लिखित रूप में विद्यमान प्रमाणों के अनुसार ही विचार किया है, परंतु अब हम तर्क तथा अनुमान की सीमा में संचार करनेवाले हैं। अभी तक हमने आर्यों के मूल स्थान के विषय में किसी भी उपपत्ति की पुष्टि आग्रहपूर्वक नहीं की है। अधिकतर लोगों ने स्वीकार कर लिया आर्य हिंदुस्थान बाहर से में आए हैं। यह हम लोग भी इसे स्वीकार करते हैं। आर्यों ने प्रारंभ में अपने निवास के लिए जिस भूमि का चयन किया था तथा उसे जो नाम दिया था, वह नाम उन्होंने कहाँ से प्राप्त किया था ? इस बारे में हम लोगों को जिज्ञासा होना स्वाभाविक है- क्या ये नाम आर्यों ने अपनी प्रचलित भाषा से उन्हें रूढ़ किया था? क्या यह करना उनके लिए संभव था ? जब हम लोग किसी प्रदेश का दर्शन प्रथम बार करते हैं या प्रथम बार वहाँ पहुँचते हैं, तब वहाँ के निवासी जिस नाम से उस प्रदेश को संबोधित करते हैं, उसी नाम को हम स्वीकारते हैं; परंतु अपनी सुविधानुसार उच्चारण आदि में हम लोग कुछ परिवर्तन भी करते हैं। यह भी सच है कि ये नए नाम हमारे पूर्वनामों की स्पष्ट तथा मधुर स्मृतियाँ जाग्रत् करनेवाले होते हैं। एक बात निश्चित तथा स्पष्ट दिखाई देती है कि जहाँ मनुष्यबस्ती नहीं है, जहाँ कृषि के संस्कार अभी तक नहीं हुए हैं, उन नए भूखंडों पर जब उपनिवेश बनते हैं, तब उन्हें जो नाम दिए जाते हैं, वे भी इसी प्रकार के ही होते हैं, परंतु नए भूखंडों के नए नाम वहाँ के मूल निवासियों के प्रचलित नाम ही थे- यह जब सिद्ध हो जाएगा, तभी ऊपर निर्दिष्ट अपनी उचित होने की बात भी प्रमाणित हो जाएगी; परंतु यह भी सच है कि नए भूखंडों को उनके पूर्व नामों से ही संबोधित करना सभी को स्वीकार्य है।

 

हम यह निश्चित रूप से जानते हैं कि इस सप्तसिंधु के प्रदेश में अनेक आदिवासी टोलियाँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं। इन्हीं टोलियों में से कुछ इन नवागतों से अत्यधिक मित्रता का व्यवहार करतीं, इन्हीं आदिवासी टोलियों के अनेक लोगों ने इन प्रदेशों के नाम प्राकृतिक स्थिति तथा आवागमन के मार्ग आदि के विषय में आर्यों को व्यक्तिगत रूप से जानकारी दी-यह भी सर्वविदित है।

 

 

हम यह निश्चित रूप से जानते हैं कि इस सप्तसिंधु के प्रदेश में आदिवासी टोलियाँ तक फैली हुई थीं। इन्हीं टोलियों में से कुछ नवागतों से अत्यधिक का व्यवहार करतीं, इन्हीं आदिवासी टोलियों के अनेक लोगों ने इन प्रदेशों के नाम प्राकृतिक स्थिति तथा आवागमन के मार्ग आदि के विषय में आर्यों को व्यक्तिगत रूप से जानकारी दी - यीभी सर्वविदित है। कई लोगों ने आर्यों की सहायता की। विद्याधर, दक्ष, राक्षस, गंधर्व, किन्नर आदि लोग" आर्यों से सर्वदा शत्रुतापूर्ण आचरण करते थे, यह वास्तविकता नहीं है, अनेक प्रसंगों में उनका उल्लेख करते समय उन्हें अत्यंत अनेक दूर-दूर इन मित्रता से परोपकारी तथा भली जातियाँ कहा गया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि आदिवासियों ने इन भूखंडों को जो नाम दिए थे, उन्हें ही संस्कृत रूप देकर आर्यों ने उन्हें प्रचलित किया होगा। इस कथन की पुष्टि के लिए अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं। परस्पर सम्मिश्रण के कारण एकरूप होकर आगे चलकर आर्यों की जो जातियाँ संवर्धित हुईं, उनकी भाषाओं में इनका उल्लेख किया गया है। शवकंटकख, मलय, मिलिंद अलसंदा (अलेक्झांड्रिया), सुलूव (सेल्युकस) इत्यादि नामों का अवलोकन कीजिए।

 

 

यदि यह सत्य है तो इस भूमि के आदिवासियों ने महानदी सिंधु को 'हिंदू' नाम से संबोधित किया होगा, यह भी संभव है कि आर्यों ने अपने विशिष्ट उच्चारण के कारण तथा संस्कृत भाषा में '' के स्थान पर '' अक्षर का प्रयोग किया जाता है- इस नियम के अनुसार 'हिंदू' को 'सिंधु' में परिवर्तित किया होगा  तथा इसी नाम को प्रचलित किया होगा।

            यदि यह सत्य है तो इस भूमि के आदिवासियों ने महानदी सिंधु को 'हिंदू' नाम से संबोधित किया होगा, यह भी संभव है कि आर्यों ने अपने विशिष्ट उच्चारण के कारण तथा संस्कृत भाषा में '' के स्थान पर '' अक्षर का प्रयोग किया जाता है-इस नियम के अनुसार 'हिंदू' को 'सिंधु' में परिवर्तित किया होगा तथा इसी नाम को प्रचलित किया होगा। इसीलिए इस भूमि के निवासियों का तथा हिंदू नाम का अस्तित्व जितना प्राचीन है, उसकी तुलना में 'सिंधु' नाम वैदिक काल से प्रचलन में होते हुए भी उसके बाद का ही है, ऐसा प्रतीत होता है। 'सिंधु' इतिहास के प्रारंभिक धूमिल प्रकाश में दिखाई देता है तो 'हिंदू' नाम का काल इतना प्राचीन है कि वह कब निर्माण हुआ-यह निश्चित करने में पुराणों ने भी पराजय स्वीकार कर ली है।

पंच नदियों के पार जाकर उपनिवेशों का विस्तार करनेवाले आर्य

 

सिंधु या हिंदुओं जैसे साहसी लोगों का कार्यक्षेत्र अब पंजाब अथवा पंचनद के समान संकुचित क्षेत्र में सीमित हो जाना संभव नहीं था। पंचनद के सम्मुख विद्यमान विस्तृत तथा उर्वरक क्षेत्र किसी विलक्षण, परिश्रमी और सामर्थ्यवान लोगों को तथा उनकी कर्तृत्व-शक्ति का आह्वान कर रहे थे। हिंदुओं की अनेक टोलियाँ पंजाब की भूमि को पार कर ऐसे प्रदेश में जा पहुँची, जहाँ मनुष्य का वास्तव्य बहुत कम था। यज्ञ की देवता अग्नि की मदद से उन्होंने नए विस्तीर्ण प्रदेश पर अधिकार कर लिया। यहाँ के जंगलों की कटाई की गई और कृषि का प्रारंभ भी किया गया। नगरों की उन्नति तथा राज्यों का उत्कर्ष हुआ। मानव-हाथों के स्पर्श से यह विशाल, परंतु वीरान बनी हुई प्रकृति का रूप भी परिवर्तित हो गया। इस प्रचंड कार्य को सफलतापूर्वक करते हुए हिंदू एक ऐसी केंद्रीय राज्यसंस्था की स्थापना करने के प्रयास कर रहे थे, जो इस स्थिति के लिए पूर्ण रूप से सुगठित होते हुए भी व्यक्तियों के स्वभाव धर्म के तथा परिवर्तित स्थिति के अनुरूप एवं उपयोगी थी। समय बीतता गया और उनके उपनिवेशों का भी विस्तार होता रहा। विभिन्न उपनिवेश पर्याप्त दूर हो गए। अन्य तरह से निवास करनेवाले जनसमूहों को वे अपनी संस्कृति में सम्मिलित करने लगे। विविध उपनिवेश अपने दिनों का विचार करते हुए स्वतंत्र राजकीय जीवन का उपभोग करने लगे। नए संबंध बने, परंतु पुराने नष्ट होकर अधिक दृढ़ तथा स्पष्ट बन गए। प्राचीन नाम तथा परंपराएँ भी पीछे छूट गईं। कुछ ने स्वयं को 'कुरु' तो कुछ ने 'काशी', 'विदेह', 'मगध' कहलाना प्रारंभ किया, इसलिए सिंधुओं के प्राचीन जातिवाचक नामों को झुकाया जाने लगा और अंतत: वे स्थिति के अनुरूप एवं पूर्णत लुप्त हो गए; परंतु इससे उनके मन में विद्यमान राष्ट्रीय तथा सांस्कृतिक एकता की भावना मिट चुकी थी- यह मानना उचित नहीं होगा। इसी भावना के ये विविध रूप तथा विभिन्न रूप मात्र थे राजकीय दृष्टि से इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा विकसित संस्था को 'चक्रवर्ती' पद कहा जाता था।

नगरों की उन्नति तथा राज्यों का उत्कर्ष हुआ। मानव-हाथों के स्पर्श से यह विशाल, परंतु वीरान बनी हुई प्रकृति का रूप भी परिवर्तित हो गया। इस प्रचंड कार्य को सफलतापूर्वक करते हुए हिंदू एक ऐसी केंद्रीय राज्यसंस्था की स्थापना करने के प्रयास कर रहे थे, जो इस स्थिति के लिए पूर्ण रूप से सुगठित होते हुए भी व्यक्तियों के स्वभाव धर्म के तथा परिवर्तित उपयोगी थी।

 

 

वही वास्तविक रूप से हिंदू राष्ट्र का जन्मदिन है

अयोध्या के महाप्रतापी राजा ने जिस दिन अपने यशस्वी चरण लंका पर रख दिए तथा उत्तर हिंदुस्थान से दक्षिण सागर तक के संपूर्ण क्षेत्र पर सत्ता प्रस्थापित की, उसी दिन सिंधुओं ने जो स्वदेश तथा स्वराज्य-निर्मिति का महान् कार्य करने का प्रण किया था वह पूरा हो गया।

 

अयोध्या के महाप्रतापी राजा ने जिस दिन अपने यशस्वी चरण लंका पर रख दिए तथा उत्तर हिंदुस्थान से दक्षिण सागर तक के संपूर्ण क्षेत्र पर सत्ता प्रस्थापित की, उसी दिन सिंधुओं ने जो स्वदेश तथा स्वराज्य- निर्मिति का महान् कार्य करने का प्रण किया था वह पूरा हो गया।  यह कार्य संपन्न होने के पश्चात् भौगोलिक दृष्टि से इस क्षेत्र की अंतिम सीमा पर भी उनका  अधिकार हो गया। जिस दिन अवश्मेध का अश्व" कहीं पर भी प्रतिबंधित होते हुए तथा अजेय होकर वापस लौटा, जिस दिन लोकाभिराम रामचंद्र के सिंहासन पर चक्रवर्ती सम्राट् का भव्य श्वेत ध्वज आरोहित किया गया, जिस दिन स्वयं को 'आर्य' कहलानेवाले नृपों के अतिरिक्त हनुमान, सुग्रीव, विभीषण आदि ने भी सिंहासन के प्रति अपनी राजनिष्ठा अर्पित की, वही दिन वास्तविक रूप से हम लोगों के हिंदू राष्ट्र का जन्मदिवस था। पहले की सभी पीढ़ियों के प्रयास उसी दिन फलीभूत हुए तथा राजनीतिक दृष्टि से भी वे यश के शिखर पर विराजित हुए। इसके पश्चात् की सभी पीढ़ियों ने जिस ध्येय प्राप्ति के लिए विचारपूर्वक तथा अनजाने में भी युद्ध किए तथा युद्धों में स्वयं की बलि चढ़ा दो, उसी एक ध्येय तथा एक ही कार्य का दायित्व उसी समय हिंदूजाति को परंपरा से प्राप्त हुआ।

 

 

आर्यावर्त तथा भारतवर्ष

प्राचीन आर्यावर्त की परिभाषा करते समय हिमालय से विंध्याचल तक के प्रदेश को 'आर्यावर्त' नाम से संबोधित किया गया था, 'आर्यवर्तः पुण्यभूमिर्मध्य विन्ध्य हिमालयोः '- जिस समय यह परिभाषा की गई थी, उस अवस्था के लिए यह सर्वस्वी अनुरूप थी; परंतु जिस महान् जाति ने आर्यों तथा अनार्यों की एक संयुक्त जाति का निर्माण करते हुए अपनी संस्कृति और साम्राज्य विंध्याचल के शिखरों से आगे सुदूर तक पहुँचाया था

 

 

एकात्मता की भावना को यदि कोई ऐसा नाम दिया जा सकता है, जिसके उच्चारण से ही उसका संपूर्ण अर्थ व्यक्त हो सके तो उस भावना को ही एक प्रकार की शक्ति प्राप्त हो जाती है। सिंधु से सागरतट तक फैली भूमि में जो नई भावना उत्कटता से प्रदर्शित हो रही थी, एक अभिनव राष्ट्र की स्थापना का जो संकल्प व्यक्त हो रहा था, इसका यथार्थ स्वरूप प्रकट करने हेतु 'आर्यावर्त' अथवा 'ब्रह्मावर्त' शब्द पर्याप्त नहीं थे। प्राचीन आर्यावर्त की परिभाषा करते समय हिमालय से विंध्याचल तक के प्रदेश को 'आर्यावर्त' नाम से संबोधित किया गया था, 'आर्यवर्तः पुण्यभूमिर्मध्य विन्ध्य हिमालयोः '- जिस समय यह परिभाषा की गई थी, उस अवस्था के लिए यह सर्वस्वी अनुरूप थी; परंतु जिस महान् जाति ने आर्यों तथा अनार्यों की एक संयुक्त जाति का निर्माण करते हुए अपनी संस्कृति और साम्राज्य विंध्याचल के शिखरों से आगे सुदूर तक पहुँचाया था, उस जाति के लिए यह परिभाषा अब किंचित् भी उपयोगी नहीं थी। उस जाति के लिए तथा सभी को सम्मिलित कर सके-ऐसा नाम व्यक्त करने में यह परिभाषा उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकी। हिंदू राष्ट्र को व्यक्त करनेवाला तथा उसकी विराट् कल्पना को स्पष्ट करनेवाला कोई सुयोग्य नाम खोजने का कार्य भरत द्वारा हिंदू राष्ट्र का आधिपत्य संपूर्ण विश्व पर स्थापित किए जाने के साथ पूरा हुआ। यह भरत वैदिक भरत या जैन पुराणों में वर्णित भरत था। इस विषय में कुछ तर्क देना उचित नहीं होगा। इतना कहना पर्याप्त होगा कि आर्यावर्तवासियों ने तथा दक्षिणपंथी लोगों ने यह नाम केवल स्वयं के लिए नहीं स्वीकारा। यह हम लोगों की मातृभूमि को तथा समान संस्कृति और साम्राज्य को भी दिया। दक्षिण दिशा  में इस साम्राज्य का अधिकार नए क्षेत्रों पर भी हो चुका था। ऐसा प्रतीत होता है कि इस पराक्रम तथा सामर्थ्य का गुरुत्वमध्य भी सप्तसिंधु से गंगा-क्षेत्र में आकर स्थिर हो गया। उत्तर हिमालय से दक्षिण सागर तक का क्षेत्र समाविष्ट किया जा सके-ऐसा 'नामभरत' खंड था। इस राजकीय दृष्टि से सुभव्य नाम प्रचलित होते ही 'सप्तसिंधु', 'आर्यावर्त' अथवा 'दक्षिणापथ' आदि नाम लुप्त हो गए। श्रेष्ठ चिंतकों के मन में जब इस विराट् राष्ट्र की कल्पना साकार होने लगी थी, तब हम लोगों के राष्ट्र की परिभाषा करने का जो प्रयास किया गया था, वह भी इसी बात को प्रमाणित करती है। 'विष्णुपुराण के' एक लघु, परंतु स्पष्ट अनुष्टुप में जो परिभाषा दी गई है, उससे अधिक सुंदर तथा औचित्यपूर्ण अन्य परिभाषा नहीं है-

 

उत्तरयत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्

वर्षं तद्भरतं नाम भारती यत्र संततिः

उत्तर हिमालय से दक्षिण सागर तक का क्षेत्र समाविष्ट किया जा सके- ऐसा 'नामभरत' खंड था। इस राजकीय दृष्टि से सुभव्य नाम प्रचलित होते ही 'सप्तसिंधु', 'आर्यावर्त' अथवा 'दक्षिणापथ' आदि नाम लुप्त हो गए।

 

संपूर्ण विश्व में 'हिंदू' तथा 'हिंदुस्थान' नामों को ही स्वीकारा गया

 

'भारतवर्ष' नाम मूल नाम 'सिंधु' का पूरी तरह से स्थान नहीं ले सका। जिसकी गोद में खेलकर हमारे पूर्वजों ने जीवन-अमृत पिया, उस सिंधु नदी के पवित्र नाम के प्रति उनके मन में जो प्रेम था, वह कदापि कम नहीं हुआ। आज भी सिंधु के तीरों पर स्थित प्रांत को 'सिंधु' नाम से ही जाना जाता है।

 

प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में 'सिंधु सौवीर' अपने राष्ट्र के अत्यंत महत्त्वपूर्ण और अभिन्न घटक हुआ करते थे, ऐसा उल्लेख पाया जाता है। 'महाभारत' में सिंधु सौवीर देश के राजा जयद्रथ का महत्त्वपूर्ण उल्लेख किया गया है। ऐसा भी कहा गया है कि भरत के साथ उसका निकट का संबंध था। सिंधु राष्ट्र की सीमाएँ समय-समय पर बदलती रहीं। परंतु वह उस समय एक स्वतंत्र जाति थी तथा अब भी है-इसे कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता। मुलतान से लेकर समुद्र तट तक सिंधी नामक जो भाषा बोली जाती है, वह इस राष्ट्र की ओर निर्देश करती है तथा यह भी सूचित करती है कि यह भाषा बोलनेवाले सिंधु ही हैं। राजकीय तथा भौगोलिक दृष्टि से उन्हें हिंदुओं के समान राष्ट्र के घटक होने का अधिकार प्राप्त है।

हम लोगों के राष्ट्र का मूल नाम 'हिंदुस्थान', 'भरतखंड' नाम के कारण कुछ पिछड़ गया था, परंतु अन्य राष्ट्रों ने इस नए संबोधन के प्रति विशेष ध्यान नहीं दिया तथा सीमा के निकटवर्ती प्रदेशों के लोगों ने पुराना नाम ही व्यवहार में प्रचलित रखा। इसी कारण पारसी, यहूदी (ज्यू), ग्रीक आदि पड़ोसियों ने भी हम लोगों का पुराना नाम 'सिंधु' अथवा 'हिंदू' प्रयोग में जारी रखा।

 

हम लोगों के राष्ट्र का मूल नाम 'हिंदुस्थान', 'भरतखंड' नाम के कारण कुछ पिछड़ गया था, परंतु अन्य राष्ट्रों ने इस नए संबोधन के प्रति विशेष ध्यान नहीं दिया तथा सीमा के निकटवर्ती प्रदेशों के लोगों ने पुराना नाम ही व्यवहार में प्रचलित रखा। इसी कारण पारसी, यहूदी (ज्यू), ग्रीक आदि पड़ोसियों ने भी हम लोगों का पुराना नाम 'सिंधु' अथवा 'हिंदू' प्रयोग में जारी रखा। केवल सिंधुतट के प्रदेशों को ही वे इस नाम से जानते थे- ऐसा नहीं है। सिंधुओं ने पूर्व में विभिन्न घटकों को अपनाकर दिग्विजय करते हुए जिस नए राष्ट्र का संवर्धन किया था, उस संपूर्ण राष्ट्र को ही 'सिंधु' नाम से संबोधित किया जाता था। पारसी हम लोगों को हिंदू नाम से संबोधित करते। 'हिंदू' शब्द का कठोर उच्चारण त्यागकर ग्रीक हमें 'इंडोज' कहते और इन्हीं ग्रीकों का अनुकरण करते हुए संपूर्ण यूरोप तथा बाद में अमेरिका भी हम लोगों को 'इंडियंस' ही कहने लगे। हिंदुस्थान में बहुत दिनों तक भ्रमण करनेवाला चीनी यात्री ह्वेनसांग हम लोगों को 'शिंतु' अथवा 'हिंदू' ही कहता है। पार्थियन लोग" अफगानिस्तान को 'श्वेत भारत' कहते थे। इस प्रकार के कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकतर विदेशी लोग हम लोगों का मूल नाम भूले नहीं थे अथवा यह नया नाम उन्होंने स्वीकार नहीं किया था। अपनी शेष इच्छाएँ पूरी करने हेतु संपूर्ण विश्व हम लोगों को 'हिंदू' तथा इस धरती को 'हिंदुस्थान' के नाम से ही संबोधित करता है।

 

कौन सा नाम रूढ़ हो जाता है?

कोई भी नाम इसलिए रूढ़ नहीं अथवा सुप्रतिष्ठित नाम बन जाता कि हम लोग उसे पसंद करते हैं, बल्कि इसलिए कि सामान्यतः अन्य लोग हम लोगों के लिए उसका प्रयोग करते हैं। यही नाम मान्यता प्राप्त कर लेता है। वास्तव में इसी कारण वह प्रचलन में अपना अस्तित्व बनाए रखता है।

 

कोई भी नाम इसलिए रूढ़ अथवा सुप्रतिष्ठित नाम नहीं बन जाता कि हम लोग उसे पसंद करते हैं, बल्कि इसलिए कि सामान्यतः अन्य लोग हम लोगों के लिए उसका प्रयोग करते हैं। यही नाम मान्यता प्राप्त कर लेता है। वास्तव में इसी कारण वह प्रचलन में अपना अस्तित्व बनाए रखता है। किसी प्रकार का मोहक रंग अथवा रूप होते हुए भी स्वयं की पहचान निरपवाद रूप से बनी रहती है, परंतु यह 'स्व' जब दूसरे 'परा' के सान्निध्य में आता है अथवा उनमें संघर्ष होता है, तब दूसरे से व्यावहारिक संबंध रखने के अथवा दूसरों ने उससे इस प्रकार के संबंध बनाने की आवश्यकता उत्पन्न हो जाती है, तब इस 'स्व' के लिए कोई निश्चित नाम होना आवश्यक हो जाता है। इस खेल में केवल दो ही व्यक्तियों का सहभाग होता है। यदि विश्व के लोग शिक्षक के लिए 'अष्टावक्र "" तथा किसी विनोदी व्यक्ति को 'मुल्ला दो प्याजा "" कहना चाहेंगे, तब यही नाम रूढ़ हो जाने की संभावना बढ़ जाएगी। दुनिया जिस नाम से हमें संबोधित करती है, वह नाम हम लोगों की इच्छा के एकदम विपरीत नहीं होगा तो यह नाम 37 - 4 नामों से अधिक प्रचलित हो जाएगा; परंतु यदि दुनिया के लोगों ने हम लोगों को अपने पूर्व वैभव तथा ऋणानुकंकों का स्मरण करानेवाला नाम खोज लिया तो यह नाम अन्य नामों की तुलना में अधिक प्रचलित तथा चिरस्थायी बन जाता है। वास्तविक रूप से यह सच है। हम लोगों के 'हिंदू' नाम की प्रसिद्धि असाधारण रूप hat H इसलिए हुई कि इसी के माध्यम से बाहर के लोगों से प्रारंभ में निकट का संपर्क हुआ तथा बाद में कठोर संघर्ष भी हुआ। अतः हम लोगों के अत्यधिक प्रिय नाम की 'भरतखंड' का महत्त्व कम हो गया।

 

3. बौद्ध धर्म के अभ्युदय तथा हास के कारण 'हिंदू' नाम को असाधारण महत्त्व प्राप्त हुआ

 

बौद्ध धर्म के उदय से पूर्व हिंदुओं के बाहरी संबंध दुनिया से अबाधित बने हुए थे-

 

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः

 स्वं स्वं चरित्र शिक्षरेन् पृथिव्यां सर्व मानवाः

 

(-मनु)

 

यह हम लोगों के राष्ट्राभिमानी स्मृतिकारों को गर्व के साथ कहने योग्य था क्योंकि हम लोगों के पराक्रम का क्षेत्र बहुत विस्तृत बन चुका था। तब भी प्रस्तुत विवेचन के परिप्रेक्ष्य में बौद्ध धर्म के अभ्युदय के पश्चात् हिंदुस्थान का अंतरराष्ट्रीय जीवन किस प्रकार का था इसपर विचार करना आवश्यक हो जाता है। अब समय इतना बदल गया है कि हम लोगों की इस भूमि के लिए राजकीय आक्रमण तथा विस्तार की सभी संभावनाएँ समाप्त हो चुकी थीं। राजकीय दिग्विजय के लिए कोई अवसर शेष नहीं बचा था। हम लोगों की राष्ट्रीय आकांक्षाएँ देश की सीमाएँ लाँघती हुई विश्व के अन्य देशों पर आक्रमण करती रहीं। पूर्व इतिहास में ऐसा कोई अन्य उदाहरण नहीं दिखाई देता। विदेशों से भी हमारे संबंध अभूतपूर्व रूप से जटिल हो गए। उसी समय विदेशी राष्ट्र भी एक नई उदंडता तथा आक्रमण के उद्देश्य से हम लोगों के द्वार पर दस्तक देने लगे। इन्हीं राजकीय घटनाओं के साथ बौद्ध भगवान् के धर्मचक्र प्रवर्तन के महान् अवतार-कार्य का प्रारंभ हुआ। उसी समय हिंदुस्थान अन्य राष्ट्रों का केवल हृदय ही नहीं अपितु आत्मा भी बन गया। मिस्र से लेकर मेक्सिको तक के लाखों अनगिनत लोगों के लिए सिंधु की यह भूमि उन्हें ईश्वर तथा संतों की पुण्य पावन भूमि प्रतीत होने लगी। दूर-दूर के क्षेत्रों से लक्षावधि भाविक यात्री यहाँ एकत्र होने लगे तथा हजारों विद्वान् धर्मोपदेशक साधु-संत विश्व के सभी ज्ञात स्थानों पर जाकर संचार करने लगे। विदेशियों ने हमें 'सिंधु' अथवा 'हिंदू' नाम से ही संबोधित करना जारी रखा। इस प्रकार के आवागमन के कारण हम लोगों का पुराना नाम ही राष्ट्रीय नाम के रूप में सर्वमान्य हो गया। हम लोगों से सिंधु अथवा हिंदू नाम से व्यवहार करनेवाले राष्ट्रों के साथ हमारे संबंध राजकीय अथवा दैत्यकर्म विषयक रखते समय प्रारंभ में भरतखंड के साथ हिंदू नाम का प्रयोग करते; परंतु कुछ समय पश्चात् भरतखंड नाम वर्णित कर केवल हिंदू नाम का ही उपयोग करना आवश्यक प्रतीत हुआ।

 

 

संपूर्ण विश्व में हिंदू नाम का ही प्रसार होने के पीछे तथा हम लोगों के मन में अपने हिंदू होने की भावना अधिकाधिक दृढ़ होने के पीछे बौद्ध धर्म का अभ्युदय ही था-ऐसा कहा जाए तो इस बात पर आश्चर्य नहीं होता है तथापि बौद्ध धर्म का ह्रास भी इस भावना को अधिक प्रबल बनाने का कारण बन गया था।

 

 

संपूर्ण विश्व में हिंदू नाम का ही प्रसार होने के पीछे तथा हम लोगों के मन में अपने हिंदू होने की भावना अधिकाधिक दृढ़ होने के पीछे बौद्ध धर्म का अभ्युदय ही था - ऐसा कहा जाए तो इस बात पर आश्चर्य नहीं होता है तथापि बौद्ध धर्म का ह्रास भी इस भावना को अधिक प्रबल बनाने का कारण बन गया था।

 

बौद्ध धर्म का हास राजनीतिक कारणों से हुआ था

बौद्ध धर्म का ह्रास जिन घटनाओं के कारण हुआ, उनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना पर विद्वानों ने सूक्ष्मता से विचार नहीं किया। प्रस्तुत विषय से उसका निकट का संबंध होने के कारण अधिक गहराई से विचार करना इस समय आवश्यक नहीं है।

 

बौद्ध धर्म का ह्रास जिन घटनाओं के कारण हुआ, उनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना पर विद्वानों ने सूक्ष्मता से विचार नहीं किया। प्रस्तुत विषय से उसका निकट का संबंध होने के कारण अधिक गहराई से विचार करना इस समय आवश्यक नहीं है। हम यहाँ इस बात पर सामान्य विचार प्रदर्शित करेंगे तथा इसपर सूक्ष्मता से विचार करने के पश्चात् मतप्रदर्शन का कार्य (अधिकारी व्यक्ति द्वारा नहीं किया गया तो) आगामी प्रसंग के लिए छोड़ देते हैं।" बौद्ध का तत्त्वज्ञान भिन्न था, इसी कारण क्या हमारे राष्ट्र ने उसका विरोध किया ? नहीं, ऐसा नहीं था- इस भूमि में इस प्रकार के भिन्न-भिन्न पंथ और तत्त्वज्ञान विद्यमान थे तथा एक साथ होते हुए भी उनका विकास हो रहा था। तो क्या बौद्ध मठों में वृद्धिंगत होनेवाला भ्रष्टाचार तथा बौद्ध धर्म में उत्पन्न हो रही शिथिलता के कारण ऐसा हुआ ? निश्चित रूप से नहीं। कुछ विहारों में दूसरों की कमाई को स्वयं की आजीविका का साधन बनाकर तथा विकास और उपभोग के लिए अन्य लोगों के धन का उपयोग करनेवाली स्वैराचारी, आलसी तथा नीतिभ्रष्ट स्त्री-पुरुषों की टोलियाँ रहती थीं, परंतु दूसरी ओर अध्यात्म के परमोच्च पद पर आसीन अनुभवी लोगों की तथा भिक्षु श्रेष्ठों की परंपरा खंडित नहीं हुई थी। यह भी एक सत्य है कि केवल बौद्ध विहारों में ही इस प्रकार का दुराचार नहीं था। हम लोगों के राष्ट्रीय गौरव तथा अस्तित्व के लिए बौद्ध धर्म का राजकीय प्रसार गंभीर संकट उत्पन्न नहीं करता तो इन दोषों के अतिरिक्त अन्य दोष होते हुए भी बौद्ध धर्म को इतने कठोर विरोध का सामना नहीं करना पड़ता। उनकी सत्ता पूर्ववत् बनी रहती। जब पूर्व शाक्य युवराज बौद्ध धर्म के मंदिर की आधारशिला रख रहा था, तभी उसे उसके छोटे से प्राजक (राज्य) के नष्ट होने की सूचना मिल गयी थी। कोसल के राजा विद्युत्गर्भ ने शाक्य प्राजक पर आक्रमण करके शाक्यों का पराभव किया। इस बात से शाक्य सिंह" अर्थात् राजपुत्र सिद्धार्थ गौतम ने जीवन में जितने दुःख का अनुभव" किया, वह आगे आनेवाली विपदाओं की झलक ही तो थी।

राष्ट्रकार्य के लिए शूर तथा बलशाली व्यक्तियों की कमी हो गई

बौद्ध ने अपनी जाति के चुने हुए व्यक्तियों को अपने भिक्षु संघ में सम्मिलित कर लिया था। कारण शाक्य गणतंत्र में प्रथम श्रेणी के शूर बलशाली व्यक्तियों कमी होने लगी। अतः अधिक सामर्थ्यवान तथा अधिक युद्धनिपुण शत्रुओं सामना करते हुए शाक्य का यह बलशाली राष्ट्र की उपस्थिति में नष्ट गया।

 

बौद्ध ने अपनी जाति के चुने हुए व्यक्तियों को अपने भिक्षु संघ में सम्मिलित कर लिया था। इस कारण शाक्य गणतंत्र राष्ट्र में प्रथम श्रेणी के शूर तथा बलशाली व्यक्तियों की कमी होने लगी। अतः अधिक सामर्थ्यवान तथा अधिक युद्धनिपुण शत्रुओं का सामना करते हुए शाक्य सिंह का यह बलशाली राष्ट्र उसी की उपस्थिति में नष्ट हो गया। इस समाचार का कोई प्रभाव शाक्य सिंह पर नहीं हुआ, उस बौद्ध कोटि को प्राप्त करनेवाले महात्मा को तो कोई दुःख हुआ, किसी सुख का अनुभव। अनेक शतक बीत गए। अब शाक्यों का राजा सभी राजाओं का राजाधिराज, अखिल विश्व को पदाक्रांत करनेवाला केवल 'लोकजीत" बनकर रह गया। उस छोटे शाक्य प्राजक की सीमाएँ हिंदुस्थान की सीमाओं का स्पर्श करने लगीं। अंतिम इस राष्ट्र तथा की का सिंह उसी हो दैवी सत्य तथा परमोच्च न्याय के अनुसार कपिलवस्तु" के प्राजक पर नियति ने जिस प्रकार मृत्युपाश डाले थे, वही पाश संपूर्ण भारतवर्ष को जकड़ने लगे। संपूर्णतः बलशाली तथा युद्ध निपुण, परंतु शाक्यों जैसे युद्धनिपुण नहीं - लिच्छवि और हूण" लोगों का भारतवर्ष पर अधिकार हो गया। यह समाचार सुनने के