हिंदू-दर्शन

 

 

 

 

डॉ. एस. राधाकृष्णन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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प्रकाशक

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संस्करण 2022

 

सर्वाधिकार सुरक्षित

 

अनुवाद

श्री आनंद अभय

 

मूल्य

दो सौ रुपए

 

मुद्रक

नरुला प्रिंटर्स, दिल्ली

 

HINDU-DARSHAN

by Dr. S Radhakrishnan

 

Published by PRABHAT PAPERBACKS

An imprint of Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.

4/19 Asaf Ali Road, New Delhi-110002

by Arrangement with Niyogi Books

 

ISBN 978-93-5266-363-7

 

₹200.00

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुक्रम

 

हिंदू-दर्शन. 4

हिंदू धर्म. 16

इसलाम और भारतीय विचार. 30

हिंदू विचार और ईसाई धर्म सिद्धांत. 40

बौद्ध धर्म. 56

भारतीय-दर्शन. 60

डॉ. एस. राधाकृष्णन. 69

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हिंदू-दर्शन

 

मैं इस अध्याय में हिंदू विश्वास के मूल कारकों का पक्ष लेने के बजाय उनकी विवेचना प्रस्तुत कर रहा हूँ, ताकि इसके दार्शनिक सिद्धांत, धार्मिक अनुभवों, नैतिक चरित्र और पारंपरिक विश्वास को प्रस्तुत किया जा सके।

 

दार्शनिक आधार

 

हिंदू धर्म एक उत्कृष्ट युक्तिसंगत चरित्र के रूप में जाना जाता है। अपनी संपूर्ण स्वप्नदर्शी आशाओं की बेचैन भूल-भुलैया, व्यावहारिक आत्मत्याग, संकीर्ण धर्म सिद्धांत तथा अविचारी साहसिकता के साथ एवं चार या पाँच सहस्त्राब्धियों के आध्यात्मिक ईश्वर मीमांसा के अथक प्रयासों के पश्चात् हिंदू विचारकों ने इसकी समस्याओं के साथ-साथ सत्य की विश्वसनीयता वास्तविकता की अनुभूति के साथ इसे समझने का प्रयास किया है। चूँकि इसका दिशा-निर्देश ब्राह्मण विचारकों के द्वारा किया गया है, इसलिए इसे तथाकथित ब्राह्मणवादी सभ्यता के रूप में भी जाना जाता है और उन्हें मुद्दों को भौतिक अनुभवों के परिणामों के आधार पर बिना किसी भावनात्मकता के समझने के लिए प्रशिक्षित किया गया है।

 

हिंदू विचारकों के अनुसार यह संसार नश्वर है। यह संसार स्वतः ही एक अंतहीन गतिमान प्रक्रिया के रूप में है। वह पूछते हैं, "क्या यह स्वतः ही नष्ट हो रहा है या फिर नियति इसे समाप्त कर देगी ?" और फिर जवाब भी देते हैं, "इस संसार में कुछ ऐसा भी है, जो कि नश्वर नहीं है और वह है ब्रह्म !" अनंत की यह अनुभूति सभी को कभी-- कभी होती है, खासतौर से तब जब हम सर्वशक्तिमान की झलक या फिर उसकी विचारमग्न अनुभूति महसूस करते हैं, जो कि हमें भव्यता के एक आवरण से ढक लेती है। यहाँ तक कि जीवन के पीड़ादायक पलों में भी, यानी जब हम निर्धन या अनाथ होते हैं, तब भी हममें मौजूद सर्वशक्तिमान ईश्वर हमें महसूस कराता है कि इस संसार का दुःख या त्रुटियाँ सिर्फ एक बड़े नाटक के घटनाक्रम हैं और इनका अंत एक शक्ति, भव्यता एवं प्रेम के रूप में ही होगा।

 

उपनिषदों के अनुसार-"यदि इस ब्रह्मांड में आनंद हो, तब इस संसार में कौन जी सकता है या साँस ले सकता है ?" दार्शनिक रूप से सत्य एक आत्म समरूप ब्रह्म है, जो कि सभी में परिलक्षित होता है और संसार की रचना की पृष्ठभूमि बनाता रहता है। धार्मिक रूप से इसे ईश्वरीय आत्मचेतना कहा जाता है, जिसके गर्भ में संपूर्ण सृष्टि का विकास और अंतर्वलन समाहित रहता है। इस रूप में हिंदू धर्म के संचालन का आदर्श अंतिम सत्य का एकत्व ही रहा है। ऋग्वेद सर्वशक्तिमान वास्तविकता यानी एकात्मता पर ही विशेष बल देते हैं। उपनिषदों के अनुसार, एक ब्रह्म को ही उसके कार्यों के आधार पर कई नामों से पुकारा गया है। त्रिमूर्ति की अवधारणा महाकाव्य काल में ही उत्पन्न हुई थी और पुराणों के समय तक पूर्णरूपेण स्थापित भी हो चुकी थी। मानव चेतना की अनुरूपता, जिसे त्रिआयामी क्रियाशीलता यानी बोध, भावना एवं इच्छा को सर्वशक्तिमान यानी सत्, चित और आनंद जैसे वास्तविकता, बुद्धिमानी और प्रसन्नता के रूप में व्यक्त किया गया है। सत्त्व या समचित्तता से आशय बुद्धि, रजस या ऊर्जा का संबंध ओजपूर्ण भावना और तमस से आशय ज्ञान और नियंत्रण के अभाव से है तथा ये तीनों ही सभी तरह के अस्तित्व के पहलू हैं। यहाँ तक कि ईश्वर का अस्तित्व भी इन त्रि-नियमों का अपवाद नहीं है। सृष्टि के तीनों कार्य जैसे निर्माण, स्थिति और लय यानी विनाश को इन तीनों गुणों-रजस, सत्त्व और तमस-के रूप में चिह्नित किया गया है। विष्णु, जिन्हें इस ब्रह्मांड का संरक्षक माना गया है, वे ही रजस और सत् गुणों के स्वामी कहे गए हैं तथा ब्रह्मा, जो कि सृष्टि के रचयिता के रूप में हैं, वह रजस तथा शिव सृष्टि का विनाश करनेवाले गुणों के स्वामी हैं। यहाँ एक सर्वशक्तिमान के इन तीन गुणों को अलग-अलग व्यक्तित्वों में बाँटा गया हैं और इनमें से प्रत्येक अपनी ऊर्जा या शक्ति के अनुसार कार्य करता है। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और शिव की शक्तियाँ क्रमशः सरस्वती, लक्ष्मी और काली बताई गई हैं। स्पष्ट रूप से कहा जाए, तब ये सभी गुण और इनके कार्य एक सर्वशक्तिमान के अंतर्गत इतने संतुलित ढंग से समाहित हैं कि पूरी तरह से किसी एक ही गुण को नहीं रखा जा सकता है।

 

1.    वह अबोधगम्य ईश्वर, जो कि सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है तथा यह प्रत्येक मन में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है।

2.    आदिकालीन ग्रंथों के अनुसार सर्वशक्तिमान ईश्वर के निराकार रूप का आकार जिज्ञासुओं की सहायता के लिए प्रस्तुत किया गया है।

 

दार्शनिक मनःस्थिति में खुलेपन की सोच के साथ देखें, तब हिंदुओं का विश्वास एवं धर्म की सापेक्षता का संबंध लोगों के आम चरित्र से जुड़ा हुआ है। इनके अनुसार धर्म एक दैवीय सिद्धांत मात्र नहीं है, जिसे हम अपनी इच्छानुसार छोड़ या पकड़ सकते हैं। यह तो एक प्रजाति का आध्यात्मिक अनुभव एवं इसके सामाजिक विकास का लेखा-जोखा तथा समाज का एक आंतरिक तत्त्व है। विश्वासों की यह भिन्नता अप्राकृतिक नहीं है। इसका संबंध रुचि और मानसिकता से है यानी रुचिनाम वैचित्रियात

 

जब आर्यों का संपर्क यहाँ के मूल निवासियों से हुआ, जो कि सभी तरह के देवताओं की पूजा करते थे, तब उन्हें अपने विश्वासों के परिवर्तित किए जाने की भावना एकाएक महसूस नहीं हुई थी। आखिरकार सभी लोग एक ही सर्वशक्तिमान को मानते हैं। भगवद्गीता के अनुसार, ईश्वर अपने जिज्ञासुओं की इच्छाओं को सिर्फ इसीलिए मना नहीं करता है कि वह उसकी सर्वोच्च सत्ता में विश्वास नहीं करते हैं। एक नियमों के समूह से दूसरे समूह की तरफ तेजी से जाने के प्रयास में अतीत के साथ एक तीव्र असंबद्धता तथा निरंतर भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। इस दुनिया के महान् शिक्षक, जिनके पास पर्याप्त ऐतिहासिक समझ रही है, उन्होंने इस दुनिया की अपनी पीढ़ी के उन लोगों पर अपने विचारों का दबाव देकर बचाने की कोशिश नहीं की थी, जो लोग उनकी बातों को समझ नहीं सके या फिर उन्होंने उनका समर्थन नहीं किया था। यहाँ तक कि नैतिक शिक्षक ईसा ने भी तलाक के मसले पर उच्च आदर्शवाद के बजाय मूसा की यहूदियों से कानूनी माँग पर रियायत की बात कही थी। इस संदर्भ में हठधर्मी मत के लिए मार्क्स x11ff और ल्यूक svi. 18 तथा मैथ्यू v.32, viv9.

 

हिंदू विचारकों ने अपने स्वयं के जीवन में आदर्शवादी मानदंडों का पालन तो किया था, पर वे लोगों को इसके लिए बहुत इच्छुक नहीं पा रहे थे, इसलिए उन्होंने इसके लिए बलपूर्वक बाध्य करने के बजाय सावधानी से प्रेरित किया। वे मानते थे कि जन समूह अज्ञानतावश निचले दर्जे के भगवानों को पूजता है और इसीलिए उनका अनुरोध था कि यह सभी एक सर्वशक्तिमान के अधीन हैं। कुछ लोग अपने भगवानों को जल में, कुछ स्वर्ग में और अन्य अलग-अलग चीजों में देखते थे, जबकि बुद्धिमान जानते थे कि वास्तविक ईश्वर सर्वव्यापी है तथा प्रत्येक हृदय में विद्यमान है। कमजोर मन के लोग ईश्वर को मूर्तियों में तथा सुदृढ मन ईश्वर को सभी जगह पाता है।

 

हिंदू-दर्शन और धर्म इस संसार में निरंतर विकास और अंतर्वलन को एक ब्रह्मांडीय स्पंदन के रूप में लेता है, जिसमें इसकी स्थिति हमेशा विश्राम और क्रियाशीलता के रूप में रहती है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड ईश्वर की अभिव्यक्ति है। सायन के अनुसार, सभी चीजें सर्वशक्तिमान ईश्वर की ही अभिव्यक्ति हैं। ये सभी जीव अलग-अलग स्तरों में नजर आते हैं। इनमें से जो साँस लेते हैं, वे उच्च स्तर पर हैं तथा कुछ ने अपने मस्तिष्क को विकसित किया है और उनके पास ज्ञान है तथा इनमें से सर्वोच्च वे हैं, जो सभी जीवों में ब्रह्म का बोध महसूस करते हैं। इन सभी भिन्न-भिन्न रूपों के मूल में एक ही आत्मा विद्यमान है।

 

मानव में विद्यमान असीमित स्थितियाँ संसार की समाप्त होनेवाली सीमित स्थिति से संतुष्ट नहीं होती हैं। हमारी समस्या इस वास्तविकता की है कि हम स्वयं में विद्यमान ईश्वर को नहीं महसूस करते हैं। यदि हम स्वयं में विद्यमान सीमित और नश्वर से बच जाते हैं, तब स्वतंत्रता हमारे अधिकार क्षेत्र में रहती है। हम अपने जीवन में जितना अधिक असीम को शामिल करते हैं, हमारा स्तर उतना ही ऊपर उठता है। इसी स्थिति की अति अभिव्यक्ति को ईश्वरीय अवतारों के नाम से भी जाना जाता है। यह कुछ अलग हटकर ईश्वर का चमत्कारिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि आम स्थिति से अलग सर्वोच्च सिद्धांतों की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है। गीता के अनुसार-" यद्यपि ईश्वर सर्वव्यापी और सभी में विद्यमान होता है, पर स्वयं को विशेष स्तर तक उन्हीं में अभिव्यक्त करता है, जो भव्य होते हैं। ऋषियों, बुद्धों, पैगंबरों या मसीहाओं में ब्रह्मांडीय आत्म की तीव्र अभिव्यक्ति होती है। गीता यह दावा करती है कि वह आवश्यकता पड़ने पर प्रकट भी होंगे। जब निम्न स्तर का भौतिक स्वभाव जीवन पर अपना प्रभुत्व बनाएगा, तब राम या कृष्ण, बुद्ध या ईसा जैसे महान् धर्म की रक्षा के लिए उत्पन्न होंगे।

 

ऐसे व्यक्तियों में जो हमारी बोध-शक्ति से बाहर हैं तथा प्रेमयुक्त हृदय के स्वामी हैं, वह हमें प्रेम और सदाचार के लिए प्रेरित करते हैं, उन्हें हम ईश्वर के रूप में देखते हैं। वह हमें सत्य और जीवन के मार्ग दिखाते हैं। वह स्वयं की अंध उपासना का निषेध भी करते हैं, क्योंकि इसके उस आत्म महानता के एहसास में कमी महसूस होती है। राम ने स्वयं को एक व्यक्ति के पुत्र से अधिक कुछ नहीं समझा था। एक हिंदू जिसे अपने धर्म पर थोड़ा भी विश्वास है, वह मानवता की सहायता करने वाले सभी लोगों का सम्मान करने के लिए तैयार रहता है। उसे यकीन होता है कि ईश्वर किसी भी शरीर में अवतार ले सकता है जैसे ईसा या बुद्ध के रूप में भी। यदि ईसाई विचारक यह स्वीकार करें कि ईसा की मध्यस्थता के बिना भी ईश्वर से संपर्क और उद्धार हो सकता है, तब हिंदू ईसा के धर्म के आवश्यक कारकों को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लेंगे। ईश्वरीय अभिव्यक्ति मानव व्यक्तित्व का अतिक्रमण नहीं है, बल्कि यह मानव की वास्तविक आत्म-अभिव्यक्ति का उच्चतम स्तर है, क्योंकि मानव का वास्तविक चरित्र दैवीय है।

 

हममें मानवीय शाश्वत अस्तित्व का निरंतर प्रकटीकरण ही जीवन का उद्देश्य होता है। इसकी सामान्य प्रक्रिया कर्म या नैतिक कारणत्व से ही संचालित होती है। हिंदू धर्म इस तरह के एक ईश्वर में यकीन नहीं करता है कि वह अपने न्याय के आसन पर बैठकर प्रत्येक मामले का उसकी गुणवत्ता के आधार पर फैसला करता है। वह अपनी इच्छा से न्याय करते हुए दंड को बढ़ाता या उससे मुक्ति दिलाता है। चूँकि ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान है, इसलिए व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार कर्म का नियम लागू होता है। प्रत्येक पल मनुष्य अपनी स्वयं की पड़ताल पर रहता है तथा उसका प्रत्येक ईमानदार कर्म उसके शाश्वत प्रयास में बेहतर सिद्ध होगा। जब तक हम ईश्वर की एकात्मकता के साथ स्वयं को समाहित कर लें, हमारा यह चरित्र-निर्माण भविष्य में भी जारी रहेगा। ईश्वर की संतानें, जिनकी आँखों में हजारों साल एक दिन के समान हैं, वह यदि एक जीवन में पूर्णता के अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाते हैं, तब भी उन्हें हताश होने की जरूरत नहीं है। सभी हिंदू पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार करते हैं।

 

यह संसार हमारी त्रुटियों से भरा हुआ है। हमारा खंडित जीवन ही सृष्टि की रचना में समाहित होता है और इसे पुनर्व्यवस्थित करने की जरूरत है। यह ब्रह्मांड एक लंबे समय से बार-बार प्रकट और लुप्त होता रहा है तथा यह निरंतर रूप से एक अकल्पनीय अनंतकाल के आने तक होता भी रहेगा।

 

धार्मिक अनुभव

 

धर्म सिर्फ एक प्रस्ताव या सूत्र नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य व्यक्ति को इस योग्य बनाना है कि वह स्वयं में ईश्वर की अनुभूति कर सके तथा स्वयं को उसकी एकात्मकता के साथ विकसित करे। इस धार्मिक अनुभूति तक पहुँचने का मार्ग नहीं निर्धारित किया जा सका है। मनुष्य की आत्मा की प्रकृति अनंत है तथा इसमें असीमित संभावनाएँ भी हैं एवं जिस ईश्वर की उसे तलाश है, वह अनंत और अपरिमित है। इस अनंत आत्मा और अनंत वातावरण की आपसी प्रतिक्रिया को एक सीमित आकार में संकुचित नहीं किया जा सकता है। हिंदू विचारकों के अनुसार, जीवन की इस कभी थकनेवाली स्थिति को एक स्थायी मापदंड में नहीं सीमित किया जा सकता है। एक प्रचलित सूक्ति के अनुसार जिस तरह से एक चिड़िया आकाश में उड़ती है या फिर मछली समुद्र में तैरते समय अपने पीछे निशान नहीं छोड़ती है, ठीक इसी प्रकार जिज्ञासुओं द्वारा ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग भी नजर नहीं आता है। उपनिषदों के ऋषियों, यहूदी पैगंबरों और धर्मों के संस्थापकों ने भी ईश्वर की वाणी सुनी है और उनकी उपस्थिति भी महसूस की है। ईश्वर अपने भक्तों के प्रति पूरी तरह से निष्पक्ष है, चाहे वह जिस भी मार्ग से उसके पास पहुँचे। गीता में भगवान् कहते हैं कि 'कोई भी, किसी भी रूप में मेरे पास आए, मैं उस तक पहुँचूँगा।'

 

मानव चेतना की त्रिआयामी क्रियाशीलता को तीन आधारों- ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग और कर्ममार्ग में विभक्त किया गया है। विचार, भावना और इच्छा अलग-अलग गुण नहीं हैं, बल्कि अनुभव के नजर आनेवाले पहलू हैं। इनमें से प्रत्येक का संपूर्णता के लिए अपना सहयोग होता है और यह दूसरों के द्वारा प्रभावित भी होता है। सही ज्ञान, सही इच्छा और सही कर्म साथ-साथ चलते हैं। इनमें से प्रथम हमें सत्य से अवगत कराता है तथा दूसरा इसके लिए प्रेम उत्पन्न करता है और तीसरा जीवन को आकार प्रदान करता है। संवेदनाविहीन ज्ञान हमें कठोर हृदय वाला बनाता है तथा बिना ज्ञान की भावना एक उन्माद की भाँति है तथा विवेकहीन कर्म, जिसमें प्रेम हो, वह एक बेचैनी और अर्थहीन परंपरा मात्र है। यह तीनों ही एक पूर्ण जीवन के समग्र अनुभव के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। जब अलग-अलग लोगों में इन तीनों ही स्थितियों में परिवर्तन आने लगता है, तब उनके जीवन में अलग-अलग रास्तों से समस्याएँ भी आने लगती हैं। गीता के अनुसार, शुद्धीकरण के लिए ज्ञान या बुद्धिमानी से बेहतर और कुछ भी नहीं है। उपनिषदों में विद्वान् मुनि नारद और जिज्ञासु सनत कुमार के बीच वार्ता के प्रमुख वाक्य में बताया गया है कि ज्ञान सिर्फ तार्किक शिक्षा नहीं है, जिसे मात्र शब्दों में ही व्यक्त किया जा सके।" मनुष्य की प्रकृति स्वतंत्र और बुद्धिमान है, परंतु हमारी सीमाएँ हमें हमारी वास्तविकता से दूर करके हमें त्रुटियों में डाल देती हैं। तार्किक प्रश्न यह नहीं है कि व्यक्ति इसे क्यों जानता है, बल्कि वह क्यों और कैसे इसे जानने में असफल है। इसकी मूल वजह हमारी सीमाबद्धता ही है। जब हमें वास्तविकता का अनुभव होता है, तब हमारा बौद्धिक विकास इन सीमाओं को तोड़ देता है। ज्ञान की यह स्थिति, बोध और प्रतीकों से मुक्त तथा वास्तविकता के नजदीक होती है। संकल्पनात्मक अवधारणा और तार्किक शिक्षा हमें वास्तविक बुद्धिमानी की तरफ ले जाने में सहायक होती है। गीता ज्ञानम् विज्ञान सहितम् यानी अंतः प्रज्ञा के साथ तार्किक क्षमता पर भी बल देती है। बिना तार्किक सहयोग, यह अंत:प्रेरणा सिर्फ भावना के ही रूप में रहती है। गीता के अनुसार सत्य की चेतना सर्वव्यापक है तथा हम इस अनुभव को अपने प्रार्थनामय दृष्टिकोण से प्राप्त कर सकते हैं। जब हम अपने बौद्धिक अहं को समाप्त करके अपनी मानसिकता को ग्रहणशील बनाते हैं, तब हम स्वर्ग से आनेवाली समीर के लिए स्वयं को तैयार करते हैं। अनुशासित योग हमारे मस्तिष्क को निःशब्दता में सर्वशक्तिमान की वाणी सुनने के लिए प्रशिक्षित करता है, तत्पश्चात् हम स्वयं में आत्मा की पहचान महसूस करते हैं।

 

ईश्वर की संज्ञानात्मक तलाश का मार्ग धीमा और कष्टप्रद होता है। इस सृष्टि के परमपिता एवं रचयिता की तलाश कठिन है। हमारा जीवन बहुत ही छोटा और तलाश बहुत ही धीमी होती है। हमारे लिए इसका इंतजार मुश्किल है। हमें उसको देखने की बहुत ही जल्दी रहती है। हम कुछ ऐसे मतों को अपनाना चाहते हैं, जो कि हमें जीवन में स्थिरता प्रदान करें और कुछ करने और पाने के संदेहों से मुक्त करें। ईश्वर तक पहुँचने में लोगों की अधीरता उन धूर्त लोगों के लिए ऐसा अवसर प्रदान करती है, जो शीघ्र मोक्ष की तलाश में रहते हैं और ऐसे लोगों में यकीन भी करते हैं। अंधविश्वास और चमत्कार आम लोगों के जीवन का एक हिस्सा बन जाते हैं। ब्राह्मणवादी परंपरा में तर्क पूरी तरह से त्याज्य नहीं था। सत्य की समझ लोगों के जीवन को नियंत्रित करती है। दर्शन के उत्कृष्ट सत्य को आम लोगों की समझ के लिए लघु कथाओं और कथाओं के माध्यम से बताया गया है, ताकि सभी लोग जीवन के कठिन एवं जोखिम भरे मार्ग को सुरक्षित पार कर सकें तथा सभी जगह आनंदपूर्वक रहते हुए सही ज्ञान प्राप्त कर सकें। पुराणों की कहानियाँ कमजोर मन के लोगों को बेहतर स्थिति में लाते हुए उनकी आंतरिक भावना को सुदृढ बनाती हैं।

 

हिंदू विचारकों ने देश भर में व्याप्त आराधना के सभी रूपों को स्वीकार करते हुए दैवीय आराधना के रूप में इन्हें उत्कृष्ट रूप दिया है और यही ईश्वर की विद्यमानता भी है। शिवपुराण में वर्णित एक श्लोक के अनुसार-"ईश्वर की विद्यमानता की वास्तविक अनुभूति ही उत्तम स्थिति है। दूसरा दर्जा ध्यान और चिंतन का है तथा तीसरा स्तर प्रतीकों की आराधना का है, जिससे सर्वशक्तिमान का स्मरण होता है तथा बौधा स्तर परंपराओं और पवित्र स्थानों की तीर्थयात्राओं का होता है।"

 

ऋग्वेद में मूर्तिपूजा का उल्लेख नहीं है। इसका प्रचलन बाद में आया है। इसे अपूर्ण विकास के स्तर के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है। मानव का रुझान सभी चीजों में ईश्वर को देखने का रहा है तथा वह ईश्वर को सचित्र रूप में समझता है। वह प्रतीक और कला के अलावा अपने मानसिक दृष्टिकोण को व्यक्त नहीं कर सकता है। हालाँकि अपर्याप्त प्रतीक भी वास्तविकता की अभिव्यक्ति हो सकते हैं तथा जब तक वे ईश्वर की प्राप्ति हेतु मानव प्रयासों में सहायक होते हैं, वे सह्य भी होते हैं। यह प्रतीक तब तक नहीं हटते, जब तक इनसे उचित दृष्टिकोण मिलता रहता है।

 

मूर्तिपूजा के संदर्भ में प्रो. गिलबर्ट मरे के फोर स्टेजेज ऑफ ग्रीक रिलीजन से उद्धरण हैं, जो कि प्रतीक उपासना में हिंदुओं के दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं। "परमपिता ईश्वर जो कि सूर्य और आकाश से भी पुराना है तथा समय और दीर्घकाल से भी बड़ा है तथा इसके प्रवाह का कोई नाम नहीं है एवं इसे तो किसी आँख से देखा जा सकता है और ही किसी आवाज से इसका उच्चारण ही हो सकता है। किंतु हम, जो कि उसकी विद्यमानता को समझने में असमर्थ हैं, इसलिए इसके लिए ध्वनि, नाम और चित्रों के रूप में सोना, चाँदी, हाथीदाँत, पेड़ों, नदियों, पहाड़ों की चोटियों और मूसलधार वर्षा का सहारा लेते हैं। हम अपनी कमजोरियों के कारण एक सांसारिक प्रेमी की भाँति इस संसार में जो कुछ भी सुंदर है, उसकी प्रकृति के रूप में उसका नाम दे देते हैं। इनके लिए अतिसुंदर दृश्य उनके परमपिता की वास्तविक विशेषता है, परंतु स्मृति के लिए वे वीणा, छोटी बरछी, सिंहासन, खेल का मैदान या इस संसार की ऐसी और भी चीजें अपनाते हैं, जिससे उनके परमपिता की स्मृति बनती हो। इन छवियों के बारे में मुझे धारणा बनाने की क्या आवश्यकता है? लोगों को समझने दें कि ईश्वर क्या है? इन छवियों के बारे में मुझे फैसले देने की क्या आवश्यकता है? यदि ग्रीस के लोग ईश्वर को फीडिअस की कला में देखते हैं, मिस्र के लोग पशुओं की आराधना करते हैं तथा कोई नदियों या अग्नि में ईश्वर को देखता है, तब भी मुझे इस अंतर से नाराजगी नहीं है; उन्हें ईश्वर को याद करने दो, उससे प्रेम करने दो और उसे जानने दो।" यह शब्द कितने सच्चे और सह्य हैं तथा हमारे कानों में अपना असर दिखाते हैं, जो कि कट्टर मिथ्या मतों एवं नीरस धर्म सिद्धांतों को सुनने के आदी भी हैं। यदि मूर्ति के प्रतीकात्मक कार्य की अनदेखी होती है या इसके रूपक को इस रूप में देखा जाता है कि इसका अस्तित्व ही नहीं है, तब भी हिंदू विचारक मूर्तिपूजा के प्रभावी चरित्र को नहीं भूलता है। योगी ईश्वर को छवियों में देखकर स्वयं में देखते हैं। वे मूर्तिपूजा को उपासना के निचले स्तर पर वैसे ही लेते हैं जैसे दूध बच्चों के लिए और मीट बड़ों के लिए होता है। हिंदूवाद ने उन्नत दार्शनिक समझदारी के साथ-साथ प्रतीक आराधना का भी धार्मिक वातावरण बनाया है, जिसमें भव्य कला भी समाहित है। इसमें सभी धार्मिक भावनाओं और सांस्कृतिक स्तर के व्यक्तियों के लिए स्थान है। हिंदू धर्म में समान छत के नीचे रहनेवाले विकसित होते युवाओं के लिए भी अति शुद्ध उपासना की व्यवस्था है, जिसमें खिलौने तोड़कर बच्चों की भावनाओं का इसलिए दमन नहीं है कि हम बड़े हैं और हमें उनकी जरूरत नहीं है।

 

भावनात्मक स्वभाव के व्यक्ति ईश्वर को पूर्ण सौंदर्य या प्रेम के रूप में ही देखते हैं और उसी के आनंद में खो जाना चाहते हैं। कृष्ण इसी तरह के प्रेम और सौंदर्य के देवता हैं और पुरुषों तथा मुख्यतः स्त्रियों में उनका आकर्षण बहुत है और उनके प्रति इन सभी की भावना और भक्ति महान् है। एक मर्मस्पर्शी लोकगीत की पंक्तियाँ कहती हैं, "उनकी बाँसुरी की पुकार है और मैं जरूर जाऊँगी, हालाँकि रास्ता घने जंगल से होकर है, पर मैं जरूर जाऊँगी। जब उनकी सम्मोहक पुकार आती है, तब कोई रुक नहीं सकता। सौंदर्य बोध रखनेवाले के लिए भावनात्मक तीव्रता ही उसे पूर्ण संतुष्टि प्रदान करती है। सुंदरता का होना अपने आप में उसके लिए एक क्षमाप्रार्थना है। भक्त ईश्वर के चरणों से लिपट जाता है और पृथ्वी की किसी भी चीज के बदले उन्हें छोड़ने से मना कर देता है। तुकाराम कहते हैं, "मैंने तुम्हारे पाँव पकड़ लिये हैं और अब मैं उन्हें जाने नहीं दूँगा। मुझे इसके अलावा और कुछ नहीं चाहिए, मैं उन्हें नहीं जाने दूँगा।" चैतन्य कहते हैं, "मुझे धन की, आदमियों की, सुंदर औरतों की और ही काव्य-विद्वानों की लालसा है। हे परमपिता ईश्वर, मेरी लालसा है कि मेरे प्रत्येक जन्म में आपकी तरफ मेरी भक्ति बढ़ती जाए।" हिंदू विचारकों ने सत्य के प्रति प्रेम और अच्छाई के साथ धार्मिक भक्ति को बढ़ाने की प्रकृति के लिए संघर्ष किया है। वे अच्छी तरह जानते थे कि भावनाएँ अकेले काम नहीं करती है। वह स्वयं में नैतिक रूप से रंगहीन होंगी। भावनाओं का महत्त्व उस स्रोत से है, जिससे वह पनपती हैं, चाहे वह भक्ति हो या फिर निम्नस्तरीय ऐंद्रिक लिप्तता भक्ति का मत यह नहीं दरशाता है कि सभी तरह की भावनाएँ पवित्र होती हैं। ऐसी भावनाएँ, जिनमें विचारशील विनम्रता के साथ ईश्वर पर अटूट निर्भरता का बोध हो, वही सच्ची धार्मिक भावना या भक्ति है। व्यक्ति के कर्म में समर्पण के रूप में ऐसी भावनाएँ अभिव्यक्त होती हैं। आराधना, संगीत, कला, धर्म की भावना को बढ़ाते हैं।

 

व्यावहारिक मनःस्थिति के व्यक्ति ईश्वर की तलाश कर्तव्य, कर्म, समाजसेवा और यज्ञ में ही करते हैं। स्वतंत्रता मानव की प्रकृति है; हमारे बंधन की मूल वजह प्रतिबंध है, जो कि हमें स्वयं में ही कैद करते हैं। हमारी दासता तभी पूरी हो जाती है, जब हम इसे जकड़ना शुरू कर देते हैं और जब हम अपने चारों तरफ खड़ी की गई स्वार्थ की दीवार को तोड़कर स्वयं को पहचानते हैं, तब भयमुक्त होकर प्रेम करते हैं और अपनी कटुता को मिटाकर सभी तरह की घृणा को दूर कर देते हैं। सिर्फ यांत्रिक नैतिकता हमें पार नहीं पहुँचा सकती है, इसके लिए ईश्वर के साथ एक जुड़ाव भी आवश्यक है। इस स्थिति के बाद ही हमें महसूस होगा कि प्रत्येक व्यक्ति में सूर्य के केंद्र से आनेवाले शाश्वत प्रकाश की किरणें मौजूद हैं। जब हम व्यक्ति से प्रेम करते हैं, तब हमारी चेतन आत्मा के स्तर पर उसके साथ एकात्मकता महसूस करती है और हम अपने जीवन में इस चेतना का प्रभाव डालते हैं। हिंदू धर्म का नैतिक चरित्र ही हमारा अगला विषय भी है।

 

नैतिक चरित्र

 

नैतिक अनुशासन, जो कि जीवन के सिद्धांत का एक कर्तव्य है तथा यह व्यक्ति की क्षमताओं से उसे परिचित भी कराता है, ताकि वह अपने अतीत की जकड़न और भविष्य के भय से मुक्त होकर अपनी आत्मा के साथ सुरक्षित रूप से रह सके। नैतिकता के साथ जीवन जीने में हम अपने जीवन के प्रत्येक फल एवं अपनी चेतना का मधुर संबंध ईश्वर के साथ बनाए रखते हैं। एक आदर्श व्यक्ति हमेशा दैवीय प्रकाश में रहता है और उसका जीवन सत्य, शुद्धता, प्रेम और त्याग के गुणों से युक्त रहता है। व्यक्ति की नैतिक प्रगति का मानक प्राकृतिक बलों पर उसकी ताकत से नहीं होता है, बल्कि उसके मन की दीवानगी पर उसके नियंत्रण से होता है। गोलियों की बौछार के बीच भी सत्य बोलना, प्रतिशोध की भावना का होना, मानव और पशुओं का सम्मान, दूसरों के लिए परिश्रम और स्वयं पर नियंत्रण ही मानव का प्रमुख कर्तव्य है। हमारे आधुनिक सुधारक इन सभी को बहुत ऊँचा मानकर नकार सकते हैं और इसे मानव स्वभाव के दैनिक भोजन के लिए अनुपयुक्त भी मानते हैं। यह उत्कृष्ट आदर्श भारत के कमजोर मनों की संतुष्टि के लिए या फिर गैलीली के मछुआरों के लिए तो ठीक है, पर इनका पूरा होना असंभव है। हिंदू विचारकों ने मानव स्वभाव की वास्तविक स्थिति और इस पूर्ण आदर्श से दूरी को समझते हुए व्यक्ति को उसकी नियति के लिए प्रशिक्षित करने हेतु एक संस्कृति और अनुशासन की रचना की थी। इन संस्थानों और इसके प्रभावों की जटिलता, जिसने लोगों की नैतिक भावना और चरित्र को आकार दिया था, इसे ही धर्म कहा गया और यही हिंदू धर्म के मूल कारक हैं। हिंदूवाद का यकीन बलपूर्वक पंथ की वकालत करने में नहीं है, बल्कि यह सभी हिंदुओं को इसके अनुशासन पर यकीन करने के लिए आमंत्रित करता है। यह एक पंथ के बजाय एक संस्कृति है। यदि तुम धर्म पर रहोगे, तब सत्य के सिद्धांत को समझ जाओगे। धर्म उस अग्नि को सुलगाने में सहायक है, जो कि प्रत्येक व्यक्ति में लपट बनाने के लिए मौजूद रहती है।

 

धर्म लोगों की आत्मचेतना के द्वारा प्रस्तुत आचार संहिता है। यह किसी एक व्यक्ति की चेतना द्वारा प्रस्तुत नहीं है तथा ही किसी कानून के द्वारा बलपूर्वक लागू ही किया गया है। यह व्यवहार की ऐसी पद्धति है, जिसे आम सहमति या लोगों का सहयोग प्राप्त है। इस स्थिति को जर्मनी के लोगों ने 'सिटिलिशेकिट' कहा है और इसके अनुसार - "व्यवहार के सिद्धांत लोगों के आपसी संबंधों को नियंत्रित करते हैं और उनकी आदतें बनकर संस्कृति के स्तर तक पहुँचते हैं तथा जिनके बारे में हमें स्पष्ट रूप से पूरी समझ भी नहीं है।" धर्म लोगों को बलपूर्वक सद्गुणों की तरफ नहीं ले जाता है, बल्कि उन्हें इसके लिए प्रशिक्षित भी करता है। यह यांत्रिक नियमों की स्थायी संहिता नहीं है, बल्कि एक ऐसी जीवित आत्मा है, जो कि समाज के विकास के अनुरूप विकसित होती है। यहाँ तक कि भारत में धर्म की स्थिति सेवक के रूप में थी तथा यह नैतिकता से ऊपर नहीं थी। इसका कार्य परिवर्तन करना या वार्षिक धर्म नहीं था, बल्कि सिर्फ संचालन करना था। यह लोगों के जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता था।

 

कई तरह के धार्मिक पंथों, राजवंशों के युद्धों, राजनीतिक शत्रुता के बावजूद चार हजार सालों से धर्म या सामाजिक जीवन का सिद्धांत समान बना रहा। भारतीय जीवन की जाग्रत् निरंतरता इसके इतिहास में दिखकर इसकी संस्कृति और सामाजिक जीवन में नजर आती है। प्लासी के युद्ध के बाद से ही भारत राजनीतिक मोह से ग्रस्त हो गया था। आज राजनीति जीवन में समाहित हो चुकी है। राज्य समाज पर हावी है और रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार, भारत पश्चिमी समझ के अनुरूप अपने सभी गुणों और कमियों के साथ एक राष्ट्र बनने के लिए संघर्ष कर रहा है।

 

धर्म के दो पक्ष होते हैं - वैयक्तिक और सामाजिक। ये दोनों आपस में एक-दूसरे पर निर्भर भी रहते हैं। वैयक्तिक चेतना को मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है और उसे उसके उद्देश्य को समझने का तरीका सिखाया जाता है तथा उसे अपनी समझ के साथ नहीं, बल्कि आत्मा के साथ रहना पड़ता है। समाज के हित में दोनों पर ही ध्यान देने की जरूरत पड़ती है। धर्म ही सभी जीवों को व्यवस्थित ढंग के साथ मिलाए रखता है। सामाजिक कल्याण के लिए सद्गुण सहयोग प्रदान करता है, जबकि दुर्गुण इसका विपरीत होता है। बार-बार इस तथ्य पर बल दिया गया है कि उत्कृष्ट सद्गुणों का समावेश ही नित्य कर्म कहा जाता है, जिसमें स्वच्छता, नेक व्यवहार, समाज-सेवा और प्रार्थना शामिल है। वर्ण आश्रम धर्म-समाज के वर्गों और व्यक्तिगत जीवन के स्तर को दरशाता है।

 

पृथ्वी पर व्यक्ति का अंत किसी आनंद की सुनिश्चितता नहीं करता है, जैसे कि कोई मिशन पूरा हो गया हो। इसकी प्राप्ति के लिए व्यक्ति की शिक्षा आवश्यक है, जिसमें संयम और कष्ट शामिल हैं। प्रत्येक मानव के जीवन में चार स्तरों की विवेचना की गई है। प्रथम चरण ब्रह्मचर्य है, जिसमें युवा मस्तिष्क के आत्मसंयम, शालीनता, ब्रह्मचर्य और समाज सेवा के लिए तैयार होना पड़ता है। चाहे व्यक्ति धनी हो या निर्धन या फिर किसी भी वर्ण या वर्ग का हो, उसे इस अनुशासन से गुजरना ही पड़ता है। व्यक्ति का दूसरा स्तर गृहस्थ का है, जिसमें उसे परिवार की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। इसमें व्यक्ति समाज का एक सदस्य बनता है और इसके अधिकार एवं जिम्मेदारियाँ भी सँभालता है। इस स्थिति में मानवीय समाज की मधुर आदतें भी विकसित होती हैं और इनकी सहायता से हम अपने साथ के लोगों से संबंध भी बनाते हैं। इस स्तर में स्वयं सहयोग, मितव्ययिता और अतिथि सत्कार भी शामिल है। गृहस्थ का सम्मान बहुत अधिक होता है, क्योंकि वह अन्य तीनों स्तरों का सहयोग करता है। तीसरा स्तर वानप्रस्थ का है, जिसमें व्यक्ति से आशा की जाती है कि वह सांसारिक वस्तुओं से अपने लगाव पर नियंत्रण रखे और गृहस्थ आश्रम के घटनाक्रमों से उत्पन्न अपने मिथ्याभिमान पर संयम रखे, जैसे जन्म या संपत्ति का दंभ या फिर सौभाग्य या विद्वत्ता का अहं आदि वानप्रस्थ आश्रम आत्मत्याग की भावना के लिए भी जाना जाता है। संन्यास की स्थिति में व्यक्ति उच्च स्तर के जीवन के लिए पूर्णरूपेण अनुशासित होकर मानवता की सेवा के मुक्त भाव से आत्मा की शक्ति में ही शांति प्राप्त करता है। इस स्थिति में अनादि अनंत के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित हो जाता है और मानवीय शिक्षा का अंत हो जाता है। ऐसे संन्यासी संसार को नष्ट होता छोड़कर स्वयं को संसार से अलग- थलग नहीं कर लेते हैं। बुद्ध, शंकर, रामानुज, रामानंद और बहुत से संन्यासी इसी वर्ग में आते हैं, जिन्होंने अपने धर्म की आधारशिला रखी है। इनका नाम आज हमारे राष्ट्र की विरासत का हिस्सा है।

 

जाति के नियमों का संबंध व्यक्तियों के सामाजिक कार्यों से है। सामाजिक व्यवस्था में एक खास बिंदु पर मानव व्यक्तित्व को केंद्रित करके ही इसके स्वभाव को बनाया जा सकता है। चूँकि मानव में मानसिक जीवन के तीनों पहलुओं में से एक या और अधिक नजर आते हैं, जैसे विचारों के व्यक्ति, भावनाओं के व्यक्ति और कर्म के व्यक्ति। जिन व्यक्तियों में इन तीनों ही गुणों का अभाव होता है, वे शूद्र हैं। इनसे बौद्धिक, युद्धप्रिय, उद्यमी और अकुशल श्रमिकों का पता चलता है, जो कि एक जैवीय संपूर्ण के सदस्य हैं। अतः ऋग्वेद के काल में जैवीय प्रकृति को सिर, हाथ, धड़ और पैरों के माध्यम से समाज के चारों वर्गों को व्यक्त किया गया था। इस स्थिति में प्रत्येक वर्ग अपना स्थान, अधिकार और कर्तव्य रखता है। चूँकि सभी कर्म महत्त्वपूर्ण हैं, इसलिए जाति के अहं को प्रोत्साहित नहीं किया गया है। जातियों से अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का पता चलता है। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जिसमें कोई गुण हो, हालाँकि अलग-अलग लोगों में अलग-अलग गुणों की प्रभुता होती है। हमारे कार्यों की पूर्णता, सिर्फ संपूर्णता में सहयोग नहीं है, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम भी है। प्रत्येक व्यक्ति के अपने कर्म की एक विशेषता है, जो कि उसके कर्म में प्रकट होती है और यही स्वधर्म है।

 

हिंदू धर्म का आदर्श सभी व्यक्तियों को ब्राह्मण संत बनाना है, ताकि वह आंतरिक मुक्ति और आध्यात्मिक संवाद का आनंद प्राप्त कर सके, साथ-ही-साथ बुराइयों से भी बचे रहें, जैसे हिंसा-प्रतिहिंसा और यदि कोई उन्हें चोट पहुँचाए, तब भी धैर्य और प्रेम बनाए रखें। इनमें घृणा का भाव होकर आनंद का भाव रहे। ब्राह्मणत्व को मानव स्वभाव का उच्चतम स्तर माना गया है। आध्यात्मिक आदर्श के आधार पर ही सामाजिक ताने-बाने का गठन किया गया है। मानव के पास ऊँचा उड़ने के लिए पंख नहीं हैं, इसलिए उसे कदम-दर-कदम प्रयासों और तप के माध्यम से संतुष्ट रहना पड़ेगा। हिंदू सामाजिक ढाँचा इसे वर्ग में विभक्त करता है। मैं इस बिंदु को अहिंसा और गौरक्षा के माध्यम से समझाना चाहता हूँ। मनुष्यों और पशुओं को मारो मत। यह ऐसा नियम है, जो कि मानवों पर लागू होता है। प्रत्येक ब्राह्मण को इसका सम्मान करने के लिए कहा गया है। हालाँकि यह व्यवस्था ऐसे योद्धा वर्ग को भी जन्म देती है, जिनका पेशा मरना और मारना है। इस व्यवस्था को बनानेवालों ने आँख के बदले आँख या दाँत के बदले दाँत वाली मानव प्रतिक्रिया को महसूस किया था और उन्हें लगा था कि इसकी जड़ें मानव स्वभाव में गहराई से जमी हुई हैं। इसे एकाएक हटाया नहीं जा सकता है। जब बुराई के सम्मुख समर्पण गलत हो, तब हिंसा से इसके विरोध की स्वीकृति है तथा योद्धा वर्ग से कहा गया है कि बलपूर्वक इसका विरोध उनका कर्तव्य भी है। हालाँकि मानव स्वभाव को एक तरह की छूट प्रदान की गई है और क्षत्रियों से कहा गया है कि ब्राह्मणों के द्वारा अपनाया गया प्रेम का भाव उनके द्वारा अपनाए गए क्रूर भाव के नियम से श्रेष्ठ है। इस प्रकार क्षत्रिय विकास के निचले स्तर का प्रतिनिधित्व करते हैं, क्योंकि वह मानव को ईश्वर के ज्योतिपुंज के रूप में देखकर हाड़-मांस के रूप में देखते हैं। क्षत्रिय से बिना घृणा, बिना किसी प्रतिशोध, सिर्फ कर्तव्य भाव से भाईचारे की स्थापना के लिए युद्ध के लिए कहा गया है। यदि क्षत्रिय मानवता की इस भावना के साथ व्यवहार करता है, तब उसकी आध्यात्मिक उन्नति होगी तथा वह क्रूर शक्तियों पर कम निर्भर होगा और अंततः वह ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता हुआ पृथ्वी के जीवों को हानि नहीं पहुँचाएगा। हालाँकि हिंसात्मक प्रतिशोध की स्वीकृति होने के बावजूद इसका अंत इससे दूर होने में ही है। हमें प्रकृति के बहाव के साथ बहते हुए इसके परे पहुँचना है।

 

हिंसा की खिलाफत का नियम जानवरों के संसार में भी लागू होता है। इसका तार्किक अर्थ यह भी है कि हमें पशु का आहार करने से भी दूर रहना चाहिए। चूँकि पशु भी ईश्वर की ही रचना है। इसलिए इसके साथ भी दयालुता का व्यवहार होना चाहिए। गाय पशु संसार का प्रतीक है। हिंदुओं द्वारा दैनिक प्रार्थना में ब्राह्मण और गौरक्षा की माँग की गई है, क्योंकि यह दोनों ही पशु और मानव संसार के प्रतीक हैं तथा इनसे हमारे शरीर और आत्मा को पोषण प्राप्त होता है। गांधी लिखते हैं- "गाय को देवत्व का दर्जा दिए जाने का कारण स्पष्ट है। गाय भारत के लोगों की सर्वश्रेष्ठ सहयोगी थी। यह प्रचुर मात्रा में भोजन प्रदान करती है तथा यह असहायों की साथी तथा भारतीय मानवता की माता के रूप में है। गौरक्षा का आशय ईश्वर की मूक रचना की रक्षा है।" किंतु भारत में ऐसे भी लोग थे, जिनके मन में पशु-संसार के प्रति दया नहीं थी। उन्हें अपनी आदतों के खिलाफ होने के लिए प्रशिक्षित किया जाना था। ब्राह्मणों के आदर्श में मांसाहार नहीं था तथा यह आहार या मनोरंजन के लिए भी किसी को कष्ट नहीं पहुँचाते थे। इसके साथ ही उन्हें इसके प्रभाव में रहने के लिए प्रेरित भी किया जाता रहा है। योद्धा और व्यापारी वर्ग भी मुख्यतः शाकाहारी ही था। यहाँ तक कि शूद्र भी पवित्र दिनों में मांसाहार नहीं करते हैं। अतः शाकाहार के प्रति यह निरंतरता जारी है। जिन लोगों के मन में पशुओं को साथ हो रहे व्यवहार को लेकर पाप शंका नहीं होती है, वह पंचम कहे गए हैं तथा वह हिंदू धर्म के प्रभाव में भी नहीं हैं।

 

हिंदूवाद पर लगा यह आक्षेप कि इसने समाज के निचले वर्ग की नैतिक और आध्यात्मिक बेड़ियों को तोड़ने के लिए कुछ भी नहीं किया है, भारत में हिंदूवाद के कार्यों की अनदेखी दरशाता है। आज बुद्धवाद और ईसायत शताब्दियों के बाद जब एक सभ्य प्रजाति समाज के पिछड़े वर्ग के संपर्क में आती है, तब यह उस पिछड़े समाज की मानसिकता को समझने पर ध्यान नहीं देती है, बल्कि उनपर विजय और उन्हें अधीन करने के क्रूर तरीके अपनाती है। जहाँ तक उन पिछड़ी जातियों का प्रश्न है, यदि उनकी आँखों में आँसू हैं और वह भगवान् को कोसते हुए बिना सोए अति परिश्रमयुक्त जीवन जी रहे हैं, तब इसकी वजह यही है कि उन्होंने इन सभ्य जातियों को अपनी भूमि पर आने दिया था। भारत के आर्यों ने यहाँ के निवासियों को अपने में मिलाया और उन्हें उनकी गंदी आदतों एवं शराबखोरी से मुक्ति दिलाने में सहायता की तथा उन्हें साफ-सुथरा जीवन जीने एक जीवित ईश्वर की उपासना के लिए प्रेरित किया। आर्यों ने जब यहाँ के मूल निवासियों को नागों की पूजा करते देखा, तब उन्हें बताया कि ईश्वर साँप से महान् है। वह नागेश्वर या कृष्ण है, जो कि कालिया नाग के फन पर नृत्य करता है। उन्होंने तथ्यों की प्रतिशोधात्मक शक्ति के सम्मुख समाज को बलपूर्वक व्यावहारिकता के एक उन्नत स्तर पर पहुँचाने के लिए जल्दबाजी नहीं की, क्योंकि यहाँ बिना किसी आंतरिक पुकार के नहीं पहुँचा जा सकता था। जातियों के माध्यम से सभ्यता का निरंतर विकास मुहम्मद के आगमन तक जारी रहा। भारत जैसे बड़े देश में जहाँ संवाद का आसान माध्यम नहीं था, इस कार्य को संपादित करना वाकई एक बड़ा काम था।

 

मि. जेम्स कैनेडी लिखते हैं-"हिंदुओं का आदि जातियों या विदेशी समूहों के साथ समायोजन हिंदूवाद का एक नया कार्य था। यह कार्य मुख्यतः सातवीं या ग्यारहवीं सदी में हुआ था। यह कार्य इस पूर्णता के साथ हुआ कि संपूर्ण उत्तर भारत में अब हिंदू जनसंख्या के रक्त, संस्कृति एवं धर्म में समरूपता नजर आती है तथा यह उन निचली जनजातियों से पृथक् दिखती है, जो कि सभ्यता के बाहरी क्षेत्रों में अभी विचरण करती रहती है।" बाहर के लोगों का प्रवाह हिंदुओं के बीच आसानी से होता रहा और धर्म उन्नत जीवन के तत्त्वों के साथ विजातीय लोगों का समायोजन करने और इसके लिए उन्हें प्रेरित करता रहा, किंतु सभ्यता के इस काम के लिए भारत में इस संख्या से पाँच गुना अधिक, यानी तकरीबन पाँच करोड़ अछूत होंगे। राजनीतिक परतंत्रता के समय से हिंदुओं के द्वारा इस कार्य की प्रभावशीलता कम हुई है। इस समय तक हिंदू समाज रूढ़िवादी बन चुका था और इसने भारत के एक बड़े वर्ग को महत्त्वहीन बना दिया था और यही गैर-हिंदू धर्मों के लिए जमीन की वजह भी बना था।

 

परंपरा

 

हिंदुओं ने वेद को सर्वोच्च धार्मिक ग्रंथ के रूप में स्वीकार किया है। वह जीवन के सिद्धांतों और ब्रह्मांड को मूर्तरूप मानते हैं। उपनिषद् वेदों के महत्त्वपूर्ण भाग हैं, जिन्होंने वेदों के अपरिष्कृत पहलुओं को स्पष्ट रूप से स्थापित किया है। उपनिषदों में सत्य ही कहा गया है कि हिंदू विश्वास के बाद का इतिहास स्थायी आधार बनता रहा। हालाँकि धार्मिक विचारों की यात्राओं में कई क्रांतियाँ आईं और बड़ी विजय भी हुईं, पर तकरीबन पचास शताब्दियों से इनका मूल विचार अपरिवर्तित ही रहा। जब कभी धार्मिक हठधर्मिता के इन विश्वासों को अपनी जकड़न में लेने में सफलता प्राप्त हुई, तब सच्चे संतों का उदय हुआ और इन्होंने आध्यात्मिक पुनरुत्थान के लिए लोगों का आह्वान किया। जब उपनिषदों का आंदोलन धर्मांधता के विवादों में शुरू हो गया और धर्म की आत्मा बोलियों के तर्क-वितर्क में गुम हो गई, तब बुद्ध ने सत्य की सरलता और नैतिक नियमों के महत्त्व पर बल दिया था। संभवतः उसी समय, हालाँकि देश के दूसरे हिस्से में जब धर्म वैधानिक संस्कृति और धर्म की शिक्षा ने इसे अमानवीय तर्कवादी बना दिया तथा उन विद्वानों में बेतुका अहं भी भर दिया था, तब गीता के रचयिता ने सभी शुद्ध हृदय वालों के लिए स्वर्ग का द्वार खोल दिया था। हिंदू धर्म में शंकर का धर्म-सुधार अभी भी बीता हुआ कल नहीं है। हिंदू मत पर रामानुज, माधव, कबीर और नानक के स्थायी चिह्न मौजूद हैं। यह भी स्पष्ट है कि हिंदूवाद एक परिणाम होकर एक प्रक्रिया है; यह एक स्थायी प्रकटन होकर एक विकसित होती परंपरा है। यह कहीं से भी बलपूर्वक बुद्धिमत्ता से बंद नहीं है क्योंकि आत्मा के परिक्षेत्र में मेरा और तेरा का भेदभाव नहीं है।

हिंदू धर्म

 

भारत में आर्यों की शुरुआत से लेकर आज तक यह भारत का भादुर्भाग्य या स्थिति ऐसी रही है कि इसे गंभीर धार्मिक संकटों का सामना करना पड़ा है। एक विशेष अर्थ में, भारत दुनिया भर के जीवों के लघु रूप की एक प्रयोगशाला की तरह रहा है, जहाँ जातीय और धार्मिक संयोजन के प्रयोगों का संबंध दुनिया भर की उठाई गई समस्याओं के समाधान के रूप में हुआ है। यदि यह सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना गुण होता है और ईश्वरीय अभिव्यक्ति का वह अपना एक खास पहलू रखता है, तब भी ऐसा लगता है कि जातीय और धार्मिक द्वंद्वों के समाधान के लिए भारत का चयन किया जाता रहा है।

 

हिंदू धर्म के एक लंबे इतिहास में इसकी तीव्र धारा और विस्तृत मरुस्थल के बावजूद इसमें एक आध्यात्मिक दिशा की प्रकृति नजर आती है, जो कि विषमताओं के बावजूद अपनी निरंतरता बनाए हुए है। आदिकालीन हिंदू धर्म के मूल सिद्धांत मृतप्राय नहीं हैं, बल्कि यह जीवित एवं शक्तिशाली होने के साथ-साथ परामर्शदाता भी हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो हिंदू विश्वास के सिद्धांतों में रुचि रखे बिना इसे समझा गया होता, जिसके आज बीस करोड़ से अधिक समर्थक हैं।

 

'धर्म' शब्द स्वयं में थोड़ी जटिलता लिये हुए है। धर्म से आशय उन आदर्शों, उद्देश्यों, प्रभावों और संस्थाओं से है, जो कि व्यक्ति के निजी एवं सामाजिक चरित्र को आकार देते हैं। धर्म न्यायोचित जीवन जीने का नियम है तथा यह पृथ्वी पर प्रसन्नता और मोक्ष को सुनिश्चित करता है। इसमें धर्म और नैतिकता सम्मिलित है। हिंदुओं का जीवन काफी हद तक धर्म के नियम से संचालित होता है। इनके उपवास, उत्सव, सामाजिक और पारिवारिक संबंध, वैयक्तिक आदतें तथा रुचियाँ सभी का इससे संबंध है।

 

मानव जीवन का उद्देश्य मोक्ष या आध्यात्मिक स्वतंत्रता ही है। मनुष्य की नियति आत्मा का मिलन और अमरत्व को प्राप्त करना है। हम ईश्वर की संतान हैं। आत्मा का स्वयं को पहचानना ही मानव हृदय का शाश्वत स्वप्न तथा हिंदू धर्म का आधार है। ऐसा माना जाता है कि मानव की आत्मा ही मौलिक वास्तविकता है। मन की सभी इच्छाएँ पूर्व अनुमानित तर्कों की चर्चाएँ ही आत्मा की वास्तविकता है, यह तर्कों से सिद्ध होनेवाली चीज नहीं है, हालाँकि इनके अलावा अन्य साक्ष्य भी संभव नहीं हैं। इसका आशय सिर्फ विश्वास से ही नहीं है, जबकि यह विश्वास ही है, जो कि सभी तर्कों का आधार है। यदि व्यक्ति का आत्म संदेहों से भरा है, तब पृथ्वी की कोई भी चीज इससे मुक्त नहीं है। आत्म ही सबकुछ है। यह अंतिम सत्य ही है, जो कि सभी परिवर्तनों से ऊपर है तथा यह अदृश्य वास्तविकता ही जीवन का आधार और तर्क है। यह ऐसा रहस्य है, जो कि चुपचाप स्वयं की ही पुष्टि करता है। हमारा मस्तिष्क जो सोचता है, वह महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि हम जो हैं, वह अधिक महत्त्वपूर्ण है। व्यक्ति के भय की वजह उसकी वह अपूर्णता है, जिसने उसकी नियति से उसे दूर कर दिया है तथा इस अंधकार ने उसके भीतर के प्रकाश को ढक लिया है। यदि हम आत्म का आश्रय लेते हैं, जो कि हमारे अस्तित्व का एकमात्र स्थायी बिंदु होगा, जहाँ हम जानेंगे कि हम जीवन के इस अंतहीन मार्ग पर अकेले नहीं हैं, तब हम संसार पर विजय प्राप्त कर सकते हैं तथा मृत्यु को चुनौती भी दे सकते हैं। "संसार में जो है, उससे महान् वह है, जो तुम्हारे भीतर है।"

 

हालाँकि व्यक्ति के सभी गुणों का उद्देश्य आध्यात्मिक पूर्णता की प्राप्ति के लिए ही है, पर हिंदू धर्म किसी तरह के धार्मिक विश्वास या अध्यात्म पर बल नहीं देता है। इसकी अधिकतम गुंजाइश सर्वशक्तिमान के पास पहुँचने और इसके संबोधन तक ही है। हिंदू विचारक दर्शन और समाजशास्त्र के अच्छे विद्यार्थी थे तथा यह धार्मिक विश्वासों को बलपूर्वक मनवाए जाने के पक्षधर नहीं थे। जब हम ईश्वर के बारे में अपने स्वयं के विचारों का अतिवाद पूर्ण दावा करते हैं, तब धार्मिक मामलों में गलतफहमियाँ और विरोध उत्पन्न होते हैं। धर्म स्वतंत्रता की हिमायत करता है, पर यह तब सबसे अधिक नुकसान करता है, जब हम व्यक्ति पर जबरदस्ती वह थोपने की कोशिश करते हैं, जो वह समझ नहीं सकता है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए व्यक्ति के तरीकों का वर्गीकरण भी कठिन होता है। ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग व्यक्ति के हृदय में उसके रक्त से लिखा होता है। संस्कृत के श्लोक के अनुसार, जिस प्रकार आकाश में चिड़िया के उड़ने और समुद्र में मछलियों के तैरने के निशान नहीं होते, वैसे ही आध्यात्मिक यात्राओं के मार्गचिह्न भी नहीं दिखाई पड़ते हैं। ईसा ने दैवीय जीवन के रहस्य के बारे में कहा था कि यह सीमाबद्ध आत्मा में स्वयं ही प्रकट होता है। ईश्वर स्वयं को बिजली की चमक और आत्मा के कंपन में भी स्पष्ट करता है। हिंदू धर्म की आत्मा को समझनेवाला हिंदू जानता है कि सभी धर्म पवित्र हैं। बोलपुर में रवींद्रनाथ टैगोर के स्कूल में सिर्फ एक ही अदृश्य ईश्वर की उपासना होती है। यहाँ अन्य धर्मों के अनादर की अनुमति नहीं है। गांधी भी अपने धार्मिक दृष्टिकोण बहुत ही सहनशीलता के साथ रखते थे। ब्राह्मण विचारकों के अन्य धार्मिक दृष्टिकोण के बारे में विल्सन लिखते हैं, "हिंदू धर्मों के नियम को मानने वाले ब्राह्मण सभी तरह की धार्मिक उपासना को समान मान्यता देते हैं।" मतों के विरोध और धार्मिक विभिन्नता के बारे में वह कहते हैं कि यह नियति का एक हिस्सा है, जैसे एक चित्रकार कई रंगों से एक सुंदर चित्र बनाता है या एक माली अपने बगीचे को फूलों की झाड़ियों से सजाता है, इसी प्रकार ईश्वर ने प्रत्येक जनजाति को उसका अपना धर्म प्रदान किया है, ताकि व्यक्ति उसे कई रूपों में भव्यता प्रदान कर सके तथा इन सभी का उनकी दृष्टि में समान महत्त्व है।

 

इसका अर्थ यह नहीं है कि हिंदू विचारकों का ईश्वर के बारे में कोई उचित दृष्टिकोण नहीं है और वे सभी मतों को समान रूप से सत्य मानते हैं। उनकी सर्वोच्च सत्य के बारे में सुनिश्चित धारणा है, फिर भी वे इसकी वैश्विक स्वीकृति के लिए जोर नहीं देते हैं। वह मानते हैं कि जब मस्तिष्क जाग्रत् हो जाता है, तब सत्य का बोध स्वतः ही हो जाएगा। प्रत्येक धर्म उन लोगों के मानसिक और सामाजिक विकास की अभिव्यक्ति है, जो इसे अपनाते हैं। इसलिए मौजूदा विश्वास पर नए मतों को अपनाने के लिए दबाव डालना अनुचित है। तार्किक प्रतिक्रियाओं के सामने अनगढ़ बोध धराशायी हो जाएँगे