श्री श्री परमहंस योगानन्द

 

 

ईश्वर की

 असीम शक्ति

द्वारा

रोग - मुक्ति

 

 

 

 

Yogoda Satsanga Society of India

 

 

Founded 1917 by Paramahansa Yogananda

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्री श्री परमहंस योगानन्द

(1893-1952)

 


 

ईश्वर की असीम शक्ति

द्वारा रोग मुक्ति

(Healing by God’s Unlimited Power)

 

 

 

 

श्री श्री परमहंस योगानन्द

 

 

“आदर्श जीवन” पुस्तकमाला

 

 

 

 

Yogoda Satsanga Society of India

Founded 1917 by Paramahansa Yogananda

 

“आदर्श जीवन” पुस्तकमाला के विषय में

इन अनौपचारिक वार्त्ताओं और निबन्धों को मूल रूप से सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप द्वारा अपनी त्रैमासिक पत्रिका में, सन् 1925 में प्रकाशित किया गया था, जिसे श्री योगानन्दजी द्वारा (सन् 1948 से ‘सेल्फ़-रियलाइज़ेशन’ के रूप में जानी जाती है) स्थापित किया गया था। इनमें से कुछ, संकलनों और सोसाइटी द्वारा निर्मित रिकॉर्डिंग्स के माध्यम से प्रसारित हुए हैं। विभिन्न विषयों पर परमहंस योगानन्दजी की शिक्षाओं की पॉकेट-साइज़ पुस्तिकें बनाने के अनुरोध पर “आदर्श जीवन” पुस्तकमाला तैयार की गई थी। इस शृंखला में, श्री योगानन्दजी और उनके कुछ दीर्घकालिक शिष्यों, सेल्फ़-रियलाइज़ेशन परम्परा के संन्यासियों द्वारा मार्गदर्शन प्रदान किया गया है जिन्हें इस प्रिय जगद्गुरु से आध्यात्मिक अनुदेश और प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर कई वर्षों तक मिला। इस शृंखला में समय-समय पर नए शीर्षक जोड़े जाते हैं।


 

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योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इंडिया/


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 को यह आश्वासन देने के लिए कि अमुक कृति परमहंस
 योगानन्दजी द्वारा स्थापित संस्था से अभिहित हुई है तथा
 उनकी शिक्षाओं को विश्वसनीय रूप से प्रस्तुत करती है।

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Self Realization Fellowship

 

 

 

 

 

 


 

डिजिटल अधिकार नोटिस और उपयोग की शर्तें

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श्री श्री परमहंस योगानन्द की आध्यात्मिक विरासत से सम्बंधित हमारे गैर-लाभकारी प्रकाशन के प्रयासों को प्रोत्साहन देने के लिए हम आपके प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

 

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इण्डिया

परमहंस योगानंद पथ, राँची, झारखण्ड

Ebook edition, 2021.

ISBN: 978-81-89955-66-3 (paperback)

ISBN: 978-93-92126-22-2 (Kindle edition)

 

 

एक शक्ति है जो स्वास्थ्य, सुख, शांति और सफलता की ओर ले जाने वाले मार्ग को आपके लिये प्रकाशमान कर सकती है, यदि आप उस प्रकाश की ओर उन्मुख हों।

—श्री श्री परमहंस योगानन्द


 

ईश्वर की असीम शक्ति द्वारा रोग-मुक्ति

द्वारा श्री श्री परमहंस योगानन्द

अमेरिका के हॉलिवुड, कैलिफोर्निया में स्थित सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप मन्दिर में दिया गया एक प्रवचन, 31 अगस्त, 1947

अस्वस्थताएँ तीन प्रकार की होती हैं : शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक। शारीरिक अस्वस्थता विभिन्न प्रकार की विषाक्त दशाओं (toxic conditions), संक्रामक रोगों, तथा अपघातों के कारण होती है। मानसिक अस्वस्थता भय, चिंता, क्रोध तथा अन्य भावनात्मक विकारों के कारण होती है। आत्मा की अस्वस्थता मनुष्य को भगवान के साथ उसके सम्बन्ध का ज्ञान न होने के कारण होती है।

अज्ञान ही सबसे बड़ा रोग है। जब कोई अज्ञान को हटा देता है तो वह शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रोगों के कारणों को भी हटा देता है। मेरे गुरु1 स्वामी श्रीयुक्तेश्वर प्राय: कहते थे, ‘‘ज्ञान सबसे उत्तम परिष्कारक है।’’

विभिन्न प्रकार की पीड़ाओं को भौतिक उपचारों की सीमित शक्ति से हटाने के प्रयास प्राय: निराशा ही लाते हैं। केवल आध्यात्मिक उपचारों की असीम शक्ति में ही मानव शरीर, मन एवं आत्मा की अस्वस्थताओं का स्थायी इलाज पा सकता है। उस असीम शक्ति को ईश्वर में ढूँढ़ना पड़ता है। यदि आपने अपने प्रियजनों की मृत्यु पर मानसिक दु:ख उठाया है तो आप उन्हें ईश्वर में फिर से पा लेंगे। भगवान की सहायता से सब कुछ संभव है।

जब तक कोई भगवान को सचमुच जान न ले तब तक उसका यह कहना ठीक नहीं है कि केवल मन का ही अस्तित्व है, इसलिये उसे स्वास्थ्य-नियमों का पालन करने की या रोग-निवारण के लिये किसी भौतिक साधन की सहायता लेने की आवश्यकता नहीं। जब तक सच्चा साक्षात्कार प्राप्त न हो तब तक मनुष्य को वह जो भी करता है उसमें सहज बुद्धि का प्रयोग करना चाहिये। परन्तु साथ ही ईश्वर पर कभी संदेह नहीं करना चाहिये, बल्कि ईश्वर की सर्वशक्तिमान सामर्थ्य में अपने विश्वास को निरन्तर मन-ही-मन दृढ़ करते रहना चाहिये।

डॉक्टर रोग के कारणों को खोजकर नष्ट करने का प्रयास करते हैं ताकि वह रोग फिर से न हो। चिकित्सा की अनेकानेक भौतिक पद्धतियों के प्रयोग में डॉक्टर प्राय: निपुण होते हैं। परन्तु प्रत्येक रोग औषधि और शल्यचिकित्सा से ठीक नहीं होता, और इसी तथ्य में निहित है इन पद्धतियों की सीमितता।

औषधि और रसायन शरीर की कोशिकाओं की केवल बाह्य भौतिक संरचना पर प्रभाव डालते हैं। वे कोशिकाओं के जीवन तत्त्व या आंतरिक अणु-संरचना में कोई परिवर्तन नहीं ला सकते। कई स्थितियों में रोग का निवारण तब तक संभव नहीं होता जब तक ईश्वर की रोग-निवारक शक्ति भीतर से शरीर की प्राणशक्ति में उत्पन्न असंतुलन को ठीक नहीं कर देती। रोग के दो मूल कारण हैं शरीर का निर्माण कर उसे जीवित रखने वाली प्राणशक्ति की कार्यशीलता में न्‍यूनता, और अत्यधिकता। पंचप्राणों में से किसी भी एक (या अधिक) के ठीक से कार्य न करने का शरीर पर अहितकारी प्रभाव पड़ता है। पंचप्राणों में व्यान  रक्त संचारण (circulation) का; उदान  विपचन या रस-प्रक्रिया (metabolism) का; समान  अन्न के विघटित तत्त्वों को शरीर में आत्मसात करने (assimilation) का; प्राण  उन तत्त्वों को शरीर की आवश्यकतानुसार घन रूप में परिवर्तित करने (crystallization) का; और अपान  निरसन या मल को निकाल बाहर करने (elimination) का कार्य करते हैं। जब इन सूक्ष्म शक्तियों का प्राकृतिक सुसंगत संतुलन ईश्वर की दिव्य शक्ति से वापस आ जाता है तो उनके द्वारा पोषित जड़ कोशिकाओं का आण्विक संतुलन भी ठीक हो जाता है। तब रोग-निवारण परिपूर्ण, और प्राय: तत्काल होता है। जब तक उचित जीवन-यापन, उचित आहार तथा प्राणायाम सहित ध्यान द्वारा पंचप्राणों का संतुलन बनाया रखा जाता है, तब तक स्वयं शरीर की अपनी प्राण शक्ति रोग को अपने पाँव जमाने से पहले ही नष्ट कर देती है।

 

संतुलित विकास आवश्यक है

बुढ़ापे से अधिक, चोट या आघात और रोग प्राय: मृत्यु का कारण बनते हैं। अधिकांश लोग वास्तविक बुढ़ापा आने के पहले ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं। बहुत ही कम, बल्कि अपवादात्मक रूप से ही ऐसे लोग देखे जाते हैं जिनके शरीर के सब अवयव एक साथ दुर्बल हो जाते हैं और बिना किसी व्यथा के वे मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं, जैसे वृक्ष से फल पकने पर अपने आप टपक पड़ते हैं। परन्तु अधिकाँश लोगों को पक कर मृत्यु के लिये तैयार होने से पहले ही, जीवन रूपी वृक्ष से तोड़ लिया जाता है।

मृत्यु की अधिकाँश घटनाओं में शरीर का कोई एक अवयव अन्य अवयवों से पहले ही काम करना बंद कर देता है। यह भी हो सकता है कि यदि शरीर का एक हिस्सा दूसरे किसी हिस्से से अधिक बलवान है या अधिक विकसित है तो उसके परिणामस्वरूप शरीर की प्राण शक्ति में निर्माण होने वाला असंतुलन पीड़ा और मृत्यु का भी कारण बन सकता है। उदाहरण के लिये, किसी का शरीर मजबूत मांसपेशियों का बना है परन्तु हृदय दुर्बल है, तो मांसपेशियों की शक्ति का अतिप्रयोग कर वह अपने हृदय को हानि पहुँचा सकता है। अत्यंत शक्तिशाली सैण्डो2 अठ्ठावन वर्ष की आयु में ही मृत्यु का ग्रास बन गया जब अकेले ही एक कार को ऊपर उठाने के परिणामस्वरूप उसके मस्तिष्क की एक रक्तवाहिनी फट गयी। असंतुलित विकास कराने वाला अति व्यायाम इस प्रकार हानिकारक परिणाम उत्पन्न कर सकता है।

योगदा सत्संग के शक्तिसंचार व्यायाम3 हृदय पर न्यूनतम बोझ डालते हैं और शरीर के सब अंगों का समान विकास करते हैं। खुली हवा में किये जाने वाले सरल व्यायाम जैसे चलना; संतुलित आहार तथा खाने में संयम; और नि:स्तब्ध ध्यान, ये सब स्वास्थ्य के लिये अच्छे हैं।

 

प्रकृति के नियमों का पालन करो और ईश्वर में अधिक विश्वास रखो

स्वास्थ्य के लिये खानपान के और अन्य जो नियम हैं उन्हें सिद्ध पुरुष बिना कोई हानि उठाये तोड़ सकते हैं। परन्तु साधारण मनुष्य को प्रकृति के नियमों का उचित पालन करते हुए अपना स्वास्थ्य बनाये रखने के प्रति सावधान रहना चाहिये।

अपना आहर बुद्धिमानी का प्रयोग करते हुए निर्धारित करना चाहिये। शरीर को विशिष्ट मात्राओं में स्टार्च, प्रोटीन और वसा (fat) की आवश्यकता होती है। परन्तु इनका आधिक्य शरीर के लिये हानिकारक हो सकता है। स्टार्च अत्यंत कम मात्रा में आवश्यक होता है; ब्रेड को अब ‘‘जीवनाधार’’ नहीं माना जाता। आहार में स्टार्च की अत्यधिक मात्रा, विशेषकर जो मैदे के माध्यम से आती है, शरीर में अत्‍यधिक कफ संचय करती है। (सूक्ष्म जीवाणुओं का श्‍लेष्माओं (mucous membranes) में प्रवेश रोकने के लिये एक विशिष्ट मात्रा में कफ निस्सन्देह आवश्यक होता है।) खनिज पदार्थों से भरपूर आहार बहुतायत में लो, जैसे फल और सब्जियाँ। इस प्रकार का आहार कोष्ठबद्धता (constipation) होने नहीं देता। कोष्ठबद्धता अनेक रोगों को निमंत्रण देती है।

प्रकृति स्‍वाभाविक रूप से शरीर की अस्वस्थता के कारणों को हटाने का प्रयास करती है। जब आँख में धूल चली जाती है तो हम अपने आप ही आँख को झपका-झपका कर धूल को निकाल बाहर करने का प्रयास करते हैं। जब धूल या कोई गंदगी नाक में चली जाती है तो हम छींकते हैं। जब हम कोई हानिप्रद पदार्थ खा लेते हैं तो हमें उल्टी हो जाती है। जब शरीर के किसी आंतरिक अवयव पर कोई रोग आक्रमण कर देता है तो प्रकृति कई साधन उपलब्ध करा देती है जिनका प्रयोग कर वह अवयव अपनी सुरक्षा कर ले, अपने आप को बचा ले और यथापूर्व कर ले। परन्तु जीने की उन विभिन्न रीतियों के कारण, जो अधिकाँश लोगों को प्रकृति से पृथक करती है, लोगों की पुनरारोग्यलाभ एवं कायाकल्प की क्षमतायें क्षीण हो जाती हैं और समय से पहले लुप्त हो जाती हैं।

हानिप्रद जीवाणु शरीर पर निरन्तर आक्रमण कर रहे हैं; लाभप्रद जीवाणु निरन्तर उसकी रक्षा कर रहे हैं, और इस कार्य में उन्हें कभी-कभी पथ्य, जड़ी-बूटी, औषधि एवं अन्य स्वास्थप्रद उपायों से सहायता मिलती है। परन्तु मनुष्य के लिये सुरक्षा का असीम स्रोत इस दृढ़ विचार में निहित है कि ईश्वर की संतान होने के कारण वह किसी भी रोग का शिकार नहीं हो सकता।

मन में औषधि से कहीं अधिक शक्ति है। परन्तु औषधि में कोई शक्ति ही नहीं यह कहना न्यायविसंगत होगा, क्योंकि यदि औषधि में कोई शक्ति नहीं होती तो मनुष्य विष खाकर भी न मरता। जहाँ किसी को औ‍षधियों की शक्ति से इन्कार नहीं करना चाहिये, वहीं मनुष्य को यह भी समझ लेना चाहिये कि औषधियों पर निरन्तर निर्भरता उनकी कार्यक्षमता की सीमा को प्रकट कर देगी। एक समय ऐसा आयेगा जब शरीर को पुन:स्वास्थ्य प्रदान करने की अपनी पूर्व गुणकारिता वे खो देंगी। रोग-निवारण की एकमात्र अनंत शक्ति केवल मनुष्य के मन एवं आत्मा में है। यदि मानसिक शक्ति और विश्वास दुर्बल है तो शरीर को आध्यात्मिक उपायों से स्वस्थ नहीं किया जा सकता। चिरंतन स्वस्थता मन की अपार शक्ति एवं भगवान की कृपा से ही प्राप्त होती है।

 

फल, सब्जियाँ एवं काष्ठफल मांस से श्रेष्ठ हैं

चिकित्सा क्षेत्र में एक मत यह भी है कि प्राणियों के अवयव खाकर रोग ठीक किये जा सकते हैं। जंगली लोग इस विश्वास में शेर का हृदय खा लेते हैं कि उस से उनका अपना हृदय बलवान हो जायेगा। यह विदित है कि मुर्गियों के हृदय खाने से मनुष्य का हृदय बलवान होता है; और कलेजा खाने से रक्तक्षीणता से ग्रस्त लोगों को लाभ होता है। तथापि स्वास्थ्य क्षेत्र के कई मान्यवर लोग कहते हैं कि लौह और विटामिन युक्त आहार, जैसे अंडे, काजू, सोयाबीन, गन्ने की राब, सुखाये गये खूबानी, सुखाया गया राजमा, सुखाये गये मटर, गाजर, पालक, अजवायन के पत्ते रक्तक्षीणता दूर करने के लिये कलेजे के बजाय प्रयुक्त किये जा सकते हैं। प्राणियों के अवयवों से निकाला हुआ पेप्सिन पेट के अल्सर में उपयोगी होता है परन्तु उसी के समान एक पदार्थ पेपेन (papain) पपीता से मिलता है जो पाचन सम्बन्धी किसी भी विकार में लाभप्रद होता है।

जब मनुष्य रोगग्रस्त हो जाता है तब वह रोग-निवारक गुण रखनेवाली किसी भी वस्तु को खाना न्यायसंगत मान सकता है, परन्तु इसके लिये पशुमांस खाना वास्तव में आवश्यक नहीं होता; बल्कि यह रक्त प्रवाह में विषाक्त पदार्थ (toxins) बढ़ाकर व्याधि को और अधिक उलझा सकता है। इस प्रकार, मांसाहार जहाँ एक रोग को ठीक करने में सहायता कर सकता है वहीं वह ऐसी अवस्था भी उत्पन्न कर सकता है जिससे शरीर के किसी अन्य हिस्से में कोई अन्य रोग विकसित हो जाय। इसलिये मनुष्य के लिये सबसे सुरक्षित आहार है ताजे फल, सब्जियाँ, महीन पिसे हुए काष्ठफल (nuts), और वनस्पति तथा दुग्ध से प्राप्त प्रोटीन। कुछ लोगों के शरीर शायद फल और कच्ची सब्जियों को सहन न करें परन्‍तु साधारण तौर पर मनुष्य अपने दैनिक आहार में इन्हें सम्मिलित कर अवश्य लाभान्वित होगा।

फल और सब्जियों में रोग को हटाने में सहायता करने की शक्ति ईश्वर ने भर दी है। किन्तु इनकी भी शक्ति सीमित है। शरीर के अवयव मुख्यत: ईश्वर की शक्ति से पोषित हैं। जो इस शक्ति को बढ़ाने के विभिन्न तरीकों का प्रयोग करेगा उसके पास किसी भी औषधि या आहार से कहीं अधिक रोग-निवारक शक्ति होगी।

 

शरीर को हानिप्रद विषाक्त पदार्थों से मुक्त करो

शरीर का तीन चतुर्थांश हिस्सा पानी है; इसलिये शरीर को पानी की आवश्यकता अन्न से अधिक है। (प्‍यास से मृत्यु भूख से मृत्यु से कहीं अधिक पीड़ादायक होती है।) शरीर को विपुल मात्रा में पानी देना आवश्यक है। फलों के रस, जिन्हें कुछ डालकर कृत्रिम मिठास न दी गयी हो, पीना भी अच्छा होता है। जिन प्रदेशों में पानी में कैल्शियम की मात्रा इतनी अधिक हो कि उससे धमनियाँ सख्त होती हों, वहाँ के लोगों को पानी के बजाय फलों के रस, तरबूज, खरबूजा और इसी प्रकार के रसीले फलों का सेवन करना चाहिये। परन्तु कुछ स्वास्थ्य अनुसंधानकर्ता कहते हैं कि जिन्हें शिरानाल (sinus) की शिकायत हो उन्हें नींबू जाति के फलों के रस नहीं लेना चाहिये। तरल पदार्थों को विपुल मात्रा में पीने का नियम बना लो (सोडा वाटर या उससे बने पेय नहीं !) जिससे आपके शरीर से सारे विषाक्त पदार्थ (toxins) धुल जायें। परन्तु भोजन के साथ तरल पदार्थ पीना टालने का प्रयास करो क्योंकि इससे पाचन क्रिया को हानि पहुँचती है। अन्न का ठीक से चर्वण किये बिना ही उसे तरल पदार्थों के साथ निगल जाने की प्रवृत्ति होती है। स्टार्च युक्त पदार्थों का यदि मुँह में ही अंशत: पचन नहीं किया गया तो पेट में प्राय: उनका पूर्ण पाचन नहीं होता। खूब चबाकर खाना महत्त्वपूर्ण है — पेट में दाँत नहीं होते। जल्दबाजी में खाना हानिकारक है, विशेषत: यदि खाने के साथ बड़ी मात्रा में तरल पदार्थ पिये जायें जो उदर के पाचक रसों को क्षीण बना देते हैं। भोजन के साथ तरल पदार्थ पीने से मोटापा बढ़ने की ओर भी झुकाव होता है।

रक्त प्रवाह को स्वस्थ रखना महत्त्वपूर्ण है। गाय, सुअर या अन्य बड़े पशुओं का मांस आपके रक्त प्रवाह में विषाक्त पदार्थ एवं जीवाणु छोड़ सकता है। रक्त के श्वेताणु जीवाणुओं को नष्ट करने का प्रयास करते हैं, परन्तु यदि जीवाणु श्वेताणु से अधिक बलवान निकले या श्वेताणु उनका प्रतिकार करने के लिये पर्याप्त मात्रा में न रहें तो रक्त प्रवाह में विषैली अभिक्रियाएँ (toxic reactions) शुरू हो जाती हैं। मांसाहारी लोगों के लिये गाय, सुअर और बड़े पशुओं के बजाय मछली, मुर्गी तथा बकरे का मांस खाना अधिक अच्छा होगा। बड़े पशुओं का मांस आम्लकारी होता है।

आहार के बारे में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी प्रकार का अतिसेवन न हो। मनुष्य खाने में जैसे-जैसे संयम बरतना शुरू करता है वैसे-वैसे वह अधिकाधिक स्वस्थ होता जाता है। प्राय: यह हो सकता है कि किसी की कोई विशिष्ट पदार्थ खाने की इच्छा इतनी प्रबल हो कि वह सोचे कि उस इच्छा को दबाना उसके लिये संभव नहीं है। उसकी इंद्रियाँ उस पर हुक्म चलाती हैं कि उसे वह पदार्थ खाना ही होगा, भले ही वह स्वयं जानता हो कि वह उसके लिये हानिकारक है। यदि वह अपनी बुरी आदतों को बनाये रखने से इन्कार कर दे तो वह देखेगा कि जो हानिकारक है उसके प्रति अरुचि और जो लाभप्रद है उसके प्रति रुचि उसमें अपने आप जागने लगेगी। लालची लोग पेट भर जाने के बाद भी खाने के लिये और कुछ देखते ही रहते हैं। अतिभोजन से वे उस अतिश्रमित हृदय-पंप पर और अधिक भार डालने का दुस्साहस करते हैं, जो शायद चालीस वर्षों से अतिश्रमित ही रहा है !

कई लोग बिना विचार किये देर रात को खाते हैं। साधारणतया इसके तुरन्त बाद नींद आती है जिसमें मानव देह की मशीनरी अपना कार्य कम कर देती है। अन्न पेट में उचित पचन हुए बिना ही पड़ा रह सकता है। इसलिये सोने से थोड़े ही समय पहले खाना अनुचित है।

परन्तु शरीर और मन के लिये मद्यपान से अधिक हानिकारक कुछ भी नहीं है। मद्य के प्रभाव में मनुष्य ऐसे कार्य कर सकता है जिन्हें करने में अन्यथा उसे लज्जा आती। हिंसा, लालच, पैसे और कामुकता का लोभ, यहाँ तक कि हत्या भी नशे के कारण हो सकता है। संत जन कहते हैं कि यह विचार कि मदिरा, संभोग और पैसा सुख देगा, सबसे बड़ा भ्रम है और यदि मनुष्य को अपना सच्चा स्वरूप जानना है तो उसे इस विचार को अपने दिमाग से निकाल फेंकना ही होगा।

मदिरा मनुष्य की पैसे और यौन भोग की इच्छाओं को तीव्र करती है, इसलिये इन तीनों में यह सबसे बुरी बला है। इसका सेवन अनावश्यक और अत्यंत खतरनाक है क्योंकि यह बुद्धि को भ्रष्ट कर देती है। नशे में धुत् मनुष्य नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है। खान-पान की केवल सहज प्रवृत्तियों का पोषण करना ही बुद्धिमानी है।

 

रोग के प्रति अपनी प्राकृतिक प्रतिरोध क्षमता को बढ़ाइये

उपवास रोगनिवारण का एक प्राकृतिक तरीका है। जब पशु या वनमानव अस्वस्थ हो जाते हैं तो वे उपवास करते हैं। इस तरह शरीर की मशीनरी को अपने आप को परिष्कृत करने का और आवश्यक विश्राम प्राप्‍त करने का अवसर मिल जाता है। विवेकपूर्ण उपवास से अधिकाँश रोगों को ठीक किया जा सकता है।4 जिसका हृदय कमज़ोर हो उसे छोड़कर, अन्य लोगों के लिये योगीजनों ने नियमित लघु उपवास को एक उत्कृष्ट स्वास्थ्यवर्द्धक उपाय कहा है। शारीरिक रोग निवारण का एक और अच्छा उपाय है उचित जड़ीबूटियों या वनस्पतियों के अर्क।

औषधियों का उपयोग करने में व्यक्ति प्राय: अनुभव करता है कि या तो रोगनिवारण के लिये पर्याप्त सामर्थ्य उनमें नहीं है या फिर वे इतनी शक्तिशाली हैं कि रोग को ठीक करने के बजाय वे उत्तकों को क्षुब्ध कर देती हैं। इसी प्रकार कुछ विशिष्ट प्रकार की ‘‘रोग निवारक किरणें’’ उत्तकों को जला देती हैं। रोगनिवारण की भौतिक पद्धतियों में अनेकानेक सीमा-निर्धारण हैं !

औषधियों से श्रेष्ठ हैं सूर्य की किरणें। उनमें रोगनिवारण की अद्भुत शक्ति होती है। मनुष्य को प्रतिदिन दस मिनट तक सूर्यस्नान करना चाहिये। यदाकदा दीर्घ अवधि के स्नान से प्रतिदिन दस मिनट का सूर्यस्नान अधिक श्रेष्ठ है।5 प्रतिदिन अल्प सूर्यस्नान और साथ में स्वास्थ्य विषयी नियमों का पालन ठीक से किया जाय, तो शरीर में सभी हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने के लिये पर्याप्त प्राण शक्ति सदा रहेगी।

स्वस्थ लोगों में रोगों के प्रतिरोध की प्राकृतिक शक्ति होती है। जब अनुचित आहार से या अतिआहार से, या अति यौनाचार से रक्त की प्रतिरोध शक्ति कम हो जाती है तो रोग प्रवेश करता है। वीर्य का रक्षण करने से सभी कोशिकाओं को तेजस्वी प्राणशक्ति की आपूर्ति होती है; तब शरीर में रोग प्रतिरोधकशक्ति अत्यधिक मात्रा में जमा हो जाती है। अति यौनाचार शरीर को दुर्बल बनाकर रोग के प्रति ग्रहणशील कर देता है।

 

आप अपने जीवन की कालावधि बढ़ा सकते हैं

वृद्धावस्था की अपेक्षा युवास्था में रोगमुक्त होना सहजतया ही अधिक आसान होता है। (परन्तु कर्मों के अनुसार इसमें भी अपवाद होते हैं।) आज6 जीवन की औसत कालावधि साठ वर्ष है। अनेक डाक्टर इस बात से सहमत हैं कि सावधानी पूर्वक जीवन जीने से आयु में वृद्धि की जा सकती है।

महावतार बाबाजी तथा अनेक अन्य सिद्ध पुरुष कई शताब्दियों से जीवित हैं। जीवन को अनिश्‍चित काल तक लम्बा किया जा सकता है — अन्न, औषधि, व्यायाम, सूर्यस्नान और दूसरे सीमित साधनों से नहीं, बल्कि ईश्वर की अपरिमित शक्ति के साथ सम्पर्क करके। हमें केवल शरीर के ही नहीं, बल्कि आत्मा के विषय में भी सोचना चाहिये। यदि आत्मा परमात्मा के साथ एक हो जाय, तो शरीर अपने आप पूर्ण स्वस्थ हो जायेगा।7

कई लोग अपने शरीर की देखभाल करने में निरन्तर व्यस्त रहते हैं परन्तु मन की देखभाल की ओर जरा-सा भी ध्यान नहीं देते। मन में ही सम्पूर्ण शक्ति समाहित है। यदि मनुष्य उस शक्ति को विकसित नहीं करता, तो जब वह किसी गम्भीर बीमारी का शिकार हो जाता है तब बिना कोई प्रतिकार किये ही मर सकता है, चाहे उसकी आयु कुछ भी हो।

 

मुस्कराहट की शक्ति

ब्रह्मचर्य का पालन कर अमूल्य शक्ति को बचाइये, संतुलित आहार लीजिये और सदा खुश रहकर मुस्कराते रहिये। जो अपने भीतर आनंद अनुभव करता है उसे शीघ्र ही पता चल जाता है कि उसका शरीर विद्युत् प्रवाह से, प्राण शक्ति से आवेशित रहता है जो अन्न से नहीं, बल्कि भगवान से प्राप्त होती है। यदि आप सोचते हैं कि आप मुस्करा नहीं सकते तो आइने के सामने खड़े होकर उंगलियों से मुँह को दोनों ओर खींचकर मुस्कराहट का आकार दीजिये। मुस्कराहट इतनी महत्त्वपूर्ण है !

मैंने अब तक संक्षेप में आहार और वनस्पतियों के प्रयोग तथा उपवास से शरीर के परिष्कार की जिन रोग निवारक पद्धतियों का वर्णन किया है, उन सब की भी अपनी एक सीमा है। परन्तु जब मनुष्य अन्तर में आनन्दित होता है तब भगवान की अदम्य शक्ति उसमें प्रवेश करती है। और मेरा मतलब है सच्चा आनंद, न कि वह जो आप बाहर तो दिखा रहे हों परन्तु अन्तर में उसकी कोई अनुभूति ही न हो। जब आपका आनन्द सच्चा होता है तब आप मुस्कराहटों के राजकुमार होते हैं। सच्ची मुस्कराहट प्राण शक्ति को शरीर की प्रत्येक कोशिका में भेजती है। आनंदी मनुष्य रोग का आसानी से शिकार नहीं होता क्योंकि आनंद शरीर में ब्रह्माण्‍डीय प्राण शक्ति को अधिक मात्रा में खींच लेता है।

रोगनिवारण के इस विषय पर बताने योग्य अनेक बातें हैं। मुख्य बात यह है कि हमें मन की शक्ति पर अधिक निर्भर रहना चाहिये क्योंकि मन की शक्ति असीम है। रोग से अपना संरक्षण करने के मुख्य नियम होने चाहिये : आत्म-संयम, व्यायाम, उचित आहर, फलों के रस का भरपूर सेवन, कभी-कभी उपवास, और सदा मुस्कराते रहना — अंतर से। ऐसी मुस्कराहटें ध्यान करने से उत्पन्न होती हैं। तब आप ईश्वर की अनंत शक्ति को प्राप्त करेंगे। जब आप ईश्वर के परमानंद में लीन रहते हैं तब आप सचेत रूप से उसकी स्वास्थ्यकारी उपस्थिति को अपने शरीर में उजागर करते हैं।

 

चिरस्थायी रोग निवारण ईश्वर से ही प्राप्त होता है

मन की शक्ति ईश्वर की अक्षय शक्ति से ओतप्रोत होती है; और उसी शक्ति की आपको अपने शरीर के लिये आवश्यकता है। और उस शक्ति को शरीर में लाने का एक तरीका भी है। वह तरीका है ध्यान में ईश्वर से सम्पर्क करना। जब आपका सम्पर्क सच्चा होता है तब रोग सदा के लिये हट जाते हैं। जब ईश्वर की कारणवाचक शक्ति प्रवेश करती है तब रोगनिवारण तत्क्षण हो जाता है; तब कारण के परिणाम में परिपक्व होने में कोई समय नहीं लगता।

व्यथा में कई लोग उस शक्ति को जगाने का प्रयास करते हैं, परन्तु जब उनका रोग तुरन्त दूर नहीं हो जाता तब भगवान की सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न करते रहने के बजाय प्रभु में उनका विश्वास खत्म हो जाता है। जो ईश्वर के साथ लगा रहेगा उसका रोग हटाना ही है; क्योंकि ईश्वर जानते हैं कि वह भक्त उनसे प्रार्थना कर रहा है, और वे उत्तर दिये बिना नहीं रह सकते। परन्तु जब आप प्रयास छोड़ देते हैं तो भगवान कहते हैं, ‘‘ठीक है। मैं देख रहा हूँ कि तुम्हें मेरी आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हरी प्रतीक्षा करूँगा।’’

उस परमसत्ता की शक्ति को निरन्तर विश्वास और अखण्ड प्रार्थना से जगाया जा सकता है। आपको उचित आहार लेना चाहिये और शरीर की उचित देखभाल के लिये जो भी करना आवश्यक है वह अवश्य करना चाहिये। परन्तु इससे भी अधिक भगवान से निरन्तर प्रार्थना करनी चाहिये, ‘‘प्रभु ! आप ही मुझे ठीक कर सकते हैं क्योंकि प्राण शक्ति के अणुओं को और शरीर की सूक्ष्म अवस्थाओं को, जिन तक कोई डाक्टर कभी अपनी औषधियों के साथ पहुँच ही नहीं सकता, आप ही नियंत्रित करते हैं।’’ औषधियों और उपवास के बाह्य घटकों का शरीर में लाभप्रद परिणाम उत्पन्न होता है, परन्तु वे उस आंतरिक शक्ति पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते जो कोशिकाओं को जीवित रखती हैं केवल जब आप ईश्वर की ओर मुड़ते हैं और उसकी रोग निवारक शक्ति को प्राप्त करते हैं, तभी प्राण शक्ति शरीर की कोशिकाओं की अणुओं में प्रवेश करती है और तत्क्षण रोगनिवारण कर देती है। क्या आपको ईश्वर पर अधिक निर्भर नहीं होना चाहिये ?

परन्तु भौतिक पद्धतियों पर निर्भरता छोड़कर आध्यात्मिक पद्धतियों पर निर्भर होने की प्रक्रिया धीरे-धीरे होनी चाहिये। यदि कोई अति खाने की आदत वाला मनुष्य बीमार पड़ जाता है और मन के द्वारा रोग को हटाने के इरादे से अचानक उपवास करना शुरू कर देता है, तो सफलता न मिलने पर हतोत्साहित हो सकता है। अन्न पर निर्भरता की विचारधारा को छोड़कर मन पर निर्भरता की विचारधारा को आत्मसात् करने में समय लगता है। ईश्वर की रोग-निवारक शक्ति के प्रति ग्रहणशील बनने के लिये पहले मन को ईश्वर की सहायता में विश्वास होना चाहिये।

उस परमसत्ता की शक्ति के कारण ही समस्त आण्विक ऊर्जा कम्पायमान है और जड़ सृष्टि की प्रत्येक कोशिका को प्रकट कर रही है और उसका पोषण भी कर रही है। जिस प्रकार सिनेमा घर के परदे पर दीखने वाले चित्र अपने अस्तित्व के लिये प्रोजेक्शन बूथ से आनेवाली प्रकाश किरणों पर निर्भर होते हैं, उसी प्रकार हम सब अपने अस्तित्व के लिये ब्रह्म किरणों पर निर्भर हैं, अनंतता के प्रोजेक्शन बूथ से निकलने वाले दिव्य प्रकाश पर निर्भर हैं। जब आप उस प्रकाश को खोजेंगे और उसे पा लेंगे तब आप के शरीर की समस्त ‘‘अव्यवस्थित’’ कोशिकाओं की अणुओं, विद्युत् अणुओं एवं जीव अणुओं की पुनर्रचना करने की उसकी असीम शक्ति को आप देखेंगे। उस परम रोग निवारक के साथ सम्पर्क कीजिये।

 

 

1 शब्दावली देखें।

2 यूजिन सैण्डो (1867-1925), व्यायाम एवं कुश्ती का समर्थक जो अपने शरीर-सौष्ठव तथा शारीरिक शक्ति के लिये विख्‍यात था। उसने शरीर-सौष्ठव के अपने विचारों का प्रचार-प्रसार करने के लिये व्यापक यात्राएँ की थीं।

3 प्राण शक्ति को अपनी इच्छा शक्ति के द्वारा शरीर में संचारित कर संपूर्ण शरीर को शक्ति से आपूरित करने के लिये इन व्यायामों को परमहंस योगानन्द जी ने 1916 में विकसित किया था। ये योगदा सत्संग पाठों में सिखाये जाते हैं। (प्रकाशक की टिप्पणी)

4 आर्मेनिया में डा. ग्रान्ट सारकिस्यान ने उपवास का प्रयोग अनेक प्रकार के रोगों को ठीक करने में सफलतापूर्वक किया है, जिनमें दमा, त्वचा रोग, धमनी-काठिन्य (arteriosclerosis) की प्रारंभिक अवस्था, उच्च रक्तचाप, छाती में होनेवाली घुटन और दर्द (angina pectoris), तथा पाचन तंत्र के रोग शामिल हैं। अस्पताल से डिस्चार्ज के बाद पथ्य पालन करना पड़ता है जिसमें फल और साग-सब्जियों को प्राथमिकता दी जाती है। डा. सारकिस्यान समझते हैं कि दीर्घायु के लिये फल और सब्जियाँ महत्त्वपूर्ण हैं।

रूस में डा. यूरि निकोलायेव पिछले तेईस वर्षों से उपवास उपचार पद्धति का प्रयोग अपने रोगियों पर कर रहे हैं। वे कहते हैं कि उनके चौंसठ प्रतिशत रोगियों को इससे लाभ हुआ है। ये सब मानसिक रोग से ग्रस्त हैं — शीज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia)।

कैलिफोर्निया के विक्टरविली स्थित जार्ज एयर फोर्स बेस में मोटापे से मुक्त होने के लिये पचीस रोगियों का चौरासी दिनों तक उपवास से उपचार किया गया। इनमें से सोलह रोगियों ने पूर्ण उपचार करवाया और चालीस से एक सौ पाऊण्ड तक उनका वजन कम हुआ। यह उपचार करने वाले डा. राबर्ट एम. कार्नस् कहते हैं कि एक अडतालीस वर्षीय मधुमेह का रोगी जो इस उपवास उपचार के पहले प्रतिदिन इन्सुलिन के पचीस यूनिट लेता था, उसे उपचार के बाद इन्सुलिन की कोई आवश्यकता नहीं रही। एक साठ वर्षीय रोगी की, जो संधिवात तथा हृदय विकार से ग्रस्त था, अवस्था में काफी सुधार हुआ।

मानवीय रोगों के उपचार के लिये प्राय: चूहों को परीक्षणात्मक प्रयोगों के लिये प्रयुक्त किया जाता है। उन पर जब उपवास उपचार पद्धति का प्रयोग किया गया तो देखा गया कि उनके जीवनकाल में पचास प्रतिशत वृद्धि हुई।

एक साथ तीन दिन से अधिक कालावधि का उपवास किसी ऐसे व्यक्ति की देखरेख में करना चाहिये जो इस विज्ञान में अच्छी तरह प्रशिक्षित हो। पुराने रोगों से या कायिक दोषों से ग्रस्त लोगों को उपवास पद्धतियों का अनुभव प्राप्त किये किसी डाक्टर के परामर्श से ही उपवास करना चाहिये। (प्रकाशक की टिप्पणी)

5 सूर्यस्नान सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय ही करना अच्छा है। संवेदनशील त्वचा को अतिसूर्यस्‍नान नहीं कराना चाहिये। यदि किसी को सूर्यस्नान के विषय में कोई शंका हो तो उसे अपने डाक्टर से या त्वचारोग विशेषज्ञ से सलाह लेकर उसका पालन करना चाहिये। (प्रकाशक की टिप्पणी)

6 1947 में, जब यह प्रवचन दिया गया था।

7 जिन सिद्धों ने परमात्मा के साथ एकता प्राप्त कर ली है, वे भी कभी-कभी तीव्र शारीरिक वेदना को झेलते हैं — इसमें परमात्मा की कोई विफलता नहीं होती, बल्कि वे सिद्धजन दूसरों की सहायता करने हेतु उनके दुष्कर्मों को परमात्मा की अनुमति से अपने शरीर पर ले लेते हैं और इस प्रकार उनके दुष्प्रभावों को नष्ट कर देते हैं।

 

 

 

 

 

श्री श्री परमहंस योगानन्द

(1893-1952)

‘‘ईश्वर-प्रेम तथा मानव-सेवा के आदर्श ने परमहंस योगानन्द के जीवन में सम्पूर्ण अभिव्यक्ति पायी...। यद्यपि उनके जीवन का अधिकतर हिस्सा भारत के बाहर व्यतीत हुआ, तब भी उनका स्थान हमारे महान् संतों में है। हर जग परमात्मा प्राप्ति के मार्ग पर लोगों को आकर्षित करता हुआ उनका कार्य निरन्तर वृद्धिंगत एवं अधिकाधिक दीप्तिमान हो रहा है।’’

इन शब्दों में भारत सरकार ने योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया / सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के संस्थापक श्री श्री परमहंस योगानन्द को उनकी महासमाधि की पचीसवीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में 7 मार्च 1977 को उनके सम्मान में एक स्मृति टिकट जारी करते हुए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

जगद्वंद्य महान् गुरु श्री श्री परमहंस योगानन्द ने, जिनका शिष्य समुदाय मानवजाति के सभी वर्ण-वर्गों में फैला हुआ है, और जिनकी इस जगत् में उपस्थिति ने अगणित लोगों के लिये ईश्वर-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त कर दिया, उच्चतम सत्यों को ही अपना जीवन बनाया और उन्हीं की शिक्षा दी। परमहंस योगानन्दजी का जन्म 1893 में गोरखपुर में हुआ था। 1920 में उन्हें उनके गुरु ने अमेरिका में हो रहे उदारवादियों के विश्व धर्म सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि के रूप में भेजा। सम्मेलन के पश्चात् बोस्टन, न्यूयॉर्क, फिलाडेल्फिया में दिये गये उनके व्याख्यानों का अत्यंत उत्साह के साथ भव्य स्वागत हुआ, और 1924 में उन्होंने सम्पूर्ण अमेरिका में दौरे करते हुए व्याख्यान दिये।

अगले दशक में परमहंसजी ने व्यापक यात्राएँ कीं जिनमें उन्होंने अपने व्याख्यानों और कक्षाओं के दौरान हजारों नर-नारियों को ध्यान के यौगिक विज्ञान एवं संतुलित आध्यात्मिक जीवन की शिक्षा प्रदान की।

परमहंस योगानन्दजी द्वारा प्रारम्भ किया गया आध्यात्मिक एवं मानवतावादी कार्य वर्तमान में, योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया / सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के अध्यक्ष, श्री श्री स्वामी चिदानन्द गिरि के मार्गदर्शन में चल रहा है। परमहंस योगानन्दजी की रचनाएँ, उनके व्याख्यान कक्षाएँ, अनौपचारिक भाषण इत्यादि का प्रकाशन करने के साथ-साथ (जिसमें व्यक्तिगत अध्ययन के लिए योगदा सत्संग पाठमाला  भी शामिल है), यह सोसाइटी योगदा सत्संग / सेल्फ़-रियलाइज़ेशन मन्दिरों, आश्रमों एवं ध्यान केन्द्रों की देखभाल करती है जो सारे विश्व में फैले हुए हैं। इसके अलावा यह संन्यास प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं विश्व प्रार्थना मंडल का भी संचालन करती है जो जरूरतमंदों की दैवी सहायता तथा सारे विश्व के लिये सामंजस्य एवं शांति के माध्यम का कार्य करती है।

क्विंसी हौवे, ज्यूनियर, पी.एच.डी., पुरातत्व भाषाओं के प्रोफेसर, स्क्रिप्स कॉलेज, ने लिखा है : ‘‘परमहंस योगानन्दजी पश्चिम में केवल भारत का ईश्वर-साक्षात्कार का चिरन्तन आश्वासन ही नहीं लाये, अपितु एक व्यावहारिक पद्धति भी लाये जिसका अनुसरण करके जीवन के सभी क्षेत्रों में कार्यरत आध्यात्मिक अभिलाषी उस लक्ष्य की ओर तेज़ी से अग्रसर हो सकते हैं। भारत की यह आध्यात्मिक विरासत जो पश्चिम में पहले अति गूढ़ एवं जटिल समझी जाती थी, अब उन सबकी पहुँच में अभ्यास एवं अनुभूति के रूप में आ गयी है जो ईश्वर को जानने की अभिलाषा रखते हैं, परलोक में नहीं, अपितु यहाँ और अभी...। श्री योगानन्द ने ध्यान की उच्चतम प्रविधियों को सब की पहुँच के अन्दर लाकर रख दिया है।’’

परमहंस योगानन्द के जीवन एवं उनकी शिक्षाओं का वर्णन उनकी आत्मकथा योगी कथामृत  में उपलब्ध है, जो 1946 में उसके प्रकाशन के बाद आध्यात्मिक क्षेत्र में गौरव ग्रन्थ बन गयी है तथा अब विश्व भर में कई महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में पाठ्य-पुस्तक तथा सन्दर्भ-ग्रन्थ के रूप में प्रयोग में लायी जा रही है। परमहंस योगानन्द के जीवन और कार्य पर आधारित पुरस्कृत वृत्तचित्र Awake: The Life of Yogananda,  को अक्टूबर 2014 में रिलीज़ किया गया।

 

 

 

 

 

 

 

आदर्श जीवन पुस्तकमाला शब्दावली

 

अवतार — यह शब्द अवतरण से बना है जिसका संस्कृत में अर्थ है नीचे आना  या उतरना ; विशेषत: ईश्वर या ईश्वरीय शक्तियों का शरीर में उतरना। जो परब्रह्म के साथ एक हो जाता है और फिर मानवजाति की सहायता के लिये शरीर धारण कर इस जगत् में आता है उसे अवतार कहते हैं।

आत्म-साक्षात्कार — ईश्वर की सर्वव्यापी चेतना के साथ एकाकार आत्मा के रूप में अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान होना। श्री श्री परमहंस योगानन्द ने लिखा है : ‘‘आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है अपने शरीर, मन एवं आत्मा में यह जान लेना कि हम ईश्वर की सर्वव्यापिता के साथ एक हैं; कि हमें अपने पास उसे बुलाने के लिये प्रार्थना नहीं करनी पड़ती, कि हम न केवल सदैव उसके सान्निध्य में हैं, बल्कि ईश्वर की सर्वव्यापिता ही हमारी अपनी सर्वव्यापिता है; कि हम उसके अभी भी उतने ही अभिन्न अंग हैं जितने कभी हो सकते हैं। हमें केवल इतना ही करना है कि अपने बोध को विकसित करें।’’

ओम् (ॐ) — परमतत्त्व के सृजन एवं पालन करने वाले पहलू का, अर्थात् ब्रह्मनाद या ब्रह्माण्डीय स्पंदन का संकेत करने वाला बीज शब्द या बीज ध्वनि। वेदों का ओम्, तिब्बतियों का हुम्,  मुसलमानों का आमीन  और मिश्रवासी, यूनानी, रोमन, यहूदी तथा ईसाइयों का आमेन  बना। विश्व के सभी महान् धर्म कहते हैं कि सृष्टि की प्रत्येक वस्तु ओम् या आमेन या शब्द या पवित्रात्मा की स्पन्दनात्मक ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से उत्पन्न हुई है। ‘‘आरम्भ में केवल शब्‍द था और शब्द ईश्वर के पास था और शब्द ही ईश्वर था... हर वस्तु का सृजन उसी [शब्द या ओम्] ने किया था; और जो भी बना है उसमें उसके बिना कुछ भी नहीं बना।’’ (बाइबिल : जॉन  1:1, 3)।

कूटस्थ केन्द्र — भ्रूमध्य में स्थित एकाग्रता एवं इच्छा शक्ति का केन्द्र; कूटस्थ चैतन्य एवं दिव्य चक्षु (इसी शब्दावली में अन्यत्र देखें) का स्थान।

कूटस्थ चैतन्य — समस्त सृष्टि में व्याप्त ईश-चैतन्य। सृष्टि के प्रत्येक कण-कण में व्याप्त इस ब्रह्म तेज को हिंदू शास्त्रों ने कूटस्थ चैतन्य कहा, ईसाई बाइबिल में इसे ‘‘एकमात्र पुत्र’’ कहा गया है। यह सर्वव्यापी चैतन्य है, परब्रह्म के साथ एकरूपता है जो श्रीकृष्ण, जीसस तथा अन्य अवतारों में प्रकट हुई। महान् सन्तजन एवं योगीजन इसे समाधि (इसी शब्दावली में अन्यत्र देखें) की अवस्था के रूप में जानते हैं जब उनकी चेतना सृष्टि के कण-कण में व्याप्त प्रज्ञा या तेज के साथ एकाकार हो जाती है; तब समूचे ब्रह्माण्ड को वे अपने ही शरीर के रूप में अनुभव करते हैं।

क्रियायोग — सहस्राब्दियों पहले भारत में उद्भुत हुआ एक पवित्र आध्यात्मिक विज्ञान। यह राजयोग का ही एक रूप है। इसमें ध्यान की कुछ ऐसी उन्नत प्रविधियाँ हैं जिनके अभ्यास से साधक ईश्वर की प्रत्यक्षानुभूति प्राप्त करता है। योगी कथामृत  के 26वें अध्याय में इसका अधिक विस्तार से वर्णन है। यह योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया / सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप के उन शिष्यों को सिखाया जाता है जो उसके लिये आवश्यक आध्यात्मिक योग्यताओं को पूर्ण करते हैं।

गुरु — आध्यात्मिक शिक्षक। गुरु गीता के 17वें श्‍लोक में गुरु का वर्णन ‘‘अन्धकार नष्ट करने वाला’’ कह कर किया है (गु से अन्धकार और रु से नष्ट करने वाला)। यद्यपि गुरु शब्द का दुष्प्रयोग प्राय: किसी भी शिक्षक के लिये किया जाता है तथापि सच्चा ब्रह्मज्ञानी गुरु वही होता है जिसने अपने आत्म-प्रभुत्व की प्राप्ति में सर्वव्यापी परमतत्त्व के साथ अपनी एकता स्थापित कर ली है। ऐसा सद्गुरु ही दूसरों का उनकी अंतरोन्मुखी आध्यात्मिक यात्रा में मार्गदर्शन के लिये योग्य होता है।

दिव्य चक्षु — भ्रूमध्य में कूटस्थ केन्द्र में स्थित अंतर्ज्ञान एवं आत्मिक अनुभूति का एकमात्र नेत्र; चेतना की उच्चतर अवस्थाओं में जाने का प्रवेश-द्वार। गहरे ध्यान में यह एकमात्र नेत्र या दिव्य चक्षु एक उज्ज्वल तारे के रूप में दृष्टिगोचर होता है। यह तारा नीले प्रकाशगोल से घिरा रहता है, और नीला प्रकाशगोल एक देदीप्यमान स्वर्णिम प्रकाश वलय से घिरा रहता है। इस सर्वदर्शी नेत्र का उल्लेख शास्त्रों में विभिन्न नामों से किया गया है, यथा, तृतीय नेत्र, पूर्व का तारा, अंत:चक्षु, स्वर्ग से उतरता कबूतर, शिव का तृतीय नेत्र, अंतर्ज्ञान चक्षु। ‘‘इसलिये यदि तुम्हारी आँख एक हो तो तुम्हारा सारा शरीर प्रकाश से भर जायेगा।’’ (बाइबिल : मैथ्यू  रचित सुसमाचार 6:22)।

परमहंस — ईश्वर के साथ अखण्ड एकरूपता की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त कर लेने वाले मनुष्य के लिये प्रयुक्त की जानेवाली आध्यात्मिक उपाधि। यह उपाधि किसी योग्यता प्राप्त शिष्य को केवल एक सद्गुरु ही प्रदान कर सकता है। श्री योगानन्द को यह उपाधि स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी ने 1935 में प्रदान की।

पुनर्जन्म — इस पर विवरण परमहंस योगानन्द जी की योगी कथामृत  के 43वें अध्याय में दिया गया है। जैसा कि वहाँ स्पष्ट किया गया है, मानवों के गत कर्मों के परिणाम उन्हें कर्म सिद्धान्त (इसी शब्दावली में अन्यत्र देखें) के अनुसार इस भौतिक जगत् में वापस ले आते हैं। उन गत कर्मों के परिणामों को भोगने के लिये और अंत में आत्मा की अंतर्निहित परिपूर्णता एवं उसकी ईश्वर के साथ एकरूपता के ज्ञान तक पहुँचानेवाली आध्यात्मिक क्रम विकास की प्रक्रिया को निरन्तर जारी रखने के लिये मानव जन्म-मृत्यु के फेरे से बार-बार गुज़रते हुए बार-बार इस जगत् में आते हैं।

ब्रह्म चैतन्य — परंब्रह्म; सृष्टि से परे चैतन्य। इस संज्ञा का प्रयोग समाधि की उस अवस्था का संकेत करने के लिये भी किया जाता है जिसमें स्पन्दनात्मक सृष्टि में व्याप्त और सृष्टि से परे ईश्वर के साथ तद्रूपता स्थापित हो जाती है।

भाग्य या कर्म — इस जन्म के या पिछले जन्मों के गत कर्मों के परिणाम। कर्म सिद्धान्त क्रिया और प्रतिक्रिया, कारण और परिणाम, बोने और काटने का नाम है। अपने विचारों और कर्मों से मानव अपने भाग्य के विधाता स्वयं बनते हैं। किसी व्यक्ति ने जिन शक्तियों को जाने-अनजाने में, बुद्धिमानी से या मूर्खता से गति दे दी हो, उन शक्तियों को उसी व्यक्ति के पास, आरम्भ बिन्दु होने के कारण, अपरिहार्यरूप से पूर्ण करने वाले वृत्त के समान, लौटकर आना ही होगा। किसी भी व्यक्ति के कर्म जन्म-जन्मांतर में उसका पीछा करते हैं जब तक उन्हें भोगकर समाप्त नहीं किया जाता या फिर जब तक वह व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति द्वारा उनकी पहुँच से बाहर नहीं निकल जाता। (इसी शब्दावली में पुनर्जन्म  देखें)

माया — सृष्टि की रचना में अंतर्निहित एक भ्रम उत्पन्न करनेवाली शक्ति, जिसके कारण एक परमात्मा अनेक रूपों में प्रतीत होता है। माया सापेक्षता या परस्पर-सम्बद्धता, विपर्यास, परस्पर-भेद, द्वैत, परस्पर-विपरीत अवस्थाओं का तत्त्व है। इसे ही बाइबिल के पूर्वविधान में शैतान  कहा गया है। परमहंस योगानन्दजी ने लिखा है : ‘‘संस्कृत में माया शब्द का अर्थ है ‘परिमाप करनेवाला या मापनेवाला’। माया सृष्टि में एक विलक्षण शक्ति है जिसके कारण अपरिमेय और अभेद में परिमितता और भेद की विद्यमानता का स्पष्ट आभास होता है...। ईश्वर की योजना एवं लीला में माया या शैतान का एकमेव कार्य है मनुष्य को ब्रह्म से जड़ पदार्थ की ओर, सत्य से मिथ्या की ओर मोड़ने का प्रयास करना...। माया प्रकृति में असारता का परदा है... ऐसा परदा जो प्रत्येक मनुष्य को उसके पीछे छिपे स्रष्टा, अपरिवर्तनीय सनातन सत्य का दर्शन करने के लिये उठाना ही होगा।’’

योग — योग  (संस्कृत युज् से व्युत्पन्न) शब्द का अर्थ है आत्मा का परमात्मा से मिलन, सायुज्यता। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये जिन विधियों या प्रक्रियाओं को प्रयुक्त किया जाता है उन्हें भी योग कहा जाता है। योग की विभिन्न प्रणालियाँ हैं। जिस प्रणाली की शिक्षा परमहंस योगानन्दजी ने दी वह राजयोग या सम्पूर्ण योग है जो मुख्यत: ध्यान की वैज्ञानिक प्रविधियों पर केन्द्रित है। योग के प्रथम व्याख्याता महर्षि पतंजलि ने अपने अष्टांग योग में आठ अंगों को क्रमबद्ध किया है जिनके अभ्यास से राजयोगी समाधि या ईश्वर-सायुज्यता प्राप्त करता है। ये आठ अंग हैं (1) यम, (2) नियम, (3) आसन, (4) प्राणायाम, (5) प्रत्याहार, (6) धारणा, (7) ध्यान, (8) समाधि।

समाधि — आत्मिक परमानंद; अधिचेतन अनुभव; अंतत:, सर्वव्यापी परम सत्य के रूप में ईश्वर के साथ सायुज्यता।

सूक्ष्म जगत् — भौतिक सृष्टि के पीछे विद्यमान प्रकाश एवं ऊर्जा का सूक्ष्म जगत्। भौतिक जगत् के प्रत्येक जीव, प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक स्पंदन का प्रतिरूप सूक्ष्म जगत् में है क्योंकि सूक्ष्म जगत् (स्वर्ग) में भौतिक जगत् की सम्पूर्ण रूपरेखा विद्यमान है। सूक्ष्म जगत् और उससे भी अतिसूक्ष्म कारण जगत् या विचारमूलक जगत् का विवरण श्री श्री परमहंस योगानन्द की योगी कथामृत  के 43वें अध्याय में दिया गया है।

 


 

 

परमहंस योगानन्द: जीवन में भी योगी और मृत्यु में भी योगी

 

श्री श्री परमहंस योगानन्द ने लॉस एंजिलिस, कैलिफ़ोर्निया (अमेरिका) में 7 मार्च, 1952 को, भारतीय राजदूत श्री बिनय रंजन सेन के सम्मान के निमित्त आयोजित भोज के अवसर पर अपना भाषण समाप्त करने के उपरान्त ‘महासमाधि’ (एक योगी का शरीर से अभिज्ञ अंतिम प्रस्थान) में प्रवेश किया।

विश्व के महान् गुरु ने योग के मूल्य (ईश्वर-प्राप्ति के लिए वैज्ञानिक प्रविधियों) को जीवन में ही नहीं अपितु मृत्यु में भी प्रदर्शित किया। उनके देहावसान के कई सप्ताह बाद भी उनका अपरिवर्तित मुख अक्षयता की दिव्य कान्ति से देदीप्यमान था।

फारेस्ट लॉन मेमोरियल — पार्क, लॉस एंजिलिस (जहाँ महान् गुरु का पार्थिव शरीर अस्थायी रूप से रखा गया है) के निर्देशक श्री हैरी टी. रोंवे ने सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप को एक प्रमाणित पत्र भेजा था, जिसके कुछ अंश निम्नलिखित हैं :

‘‘परमहंस योगानन्दजी के पार्थिव शरीर में किसी भी प्रकार के विकार का लक्षण न दिखायी पड़ना हमारे लिए एक अत्यन्त असाधारण और अपूर्व अनुभव है।... उनकी मृत्यु के बीस दिन बाद भी उनके शरीर में किसी प्रकार की विक्रिया नहीं दिखायी पड़ी।... न तो त्वचा के रंग में किसी प्रकार के परिवर्तन के संकेत थे और न शरीरतन्तुओं में शुष्कता ही आयी प्रतीत होती थी। शवागार के वृत्ति-इतिहास से हमें जहाँ तक विदित है, पार्थिव शरीर के ऐसे परिपूर्ण संरक्षण की अवस्था अद्वितीय है।... योगानन्दजी का शव स्वीकार करते समय शवागार के कर्मचारियों को यह आशा थी कि उन्हें शवपेटिका के काँच के आवरण से साधारण वर्धमान शारीरिक क्षय के चिह्न दीख पड़ेंगे। हमारा विस्मय बढ़ता गया, जब निरीक्षण के अन्तर्गत दिन पर दिन बीतते गये, किन्तु उनकी देह पर परिवर्तन के कोई चिह्न दृष्टिगत नहीं हुए। प्रत्यक्षत: योगानन्दजी की देह निर्विकारता की अद्भुत अवस्था में थी। किसी समय उनके शरीर में तनिक भी विक्रियात्मक दुर्गन्ध नहीं आयी।...

‘‘27 मार्च को शवपेटिका पर काँसे के ढक्कन को बन्द करने के पूर्व योगानन्दजी का शारीरिक रूप ठीक वैसा ही था जैसा 7 मार्च को। 27 मार्च को भी उनका शरीर उतना ही ताजा और विकाररहित दिखायी पड़ रहा था जितना मृत्यु की रात्रि को। 27 मार्च को ऐसा कोई लक्षण नहीं दिखायी पड़ा, जिससे यह कहा जा सके कि उनके शरीर में किसी भी प्रकार का तनिक भी विकार आया हो। इन कारणों से हम पुन: अभिव्यक्त करते हैं कि परमहंस योगानन्दजी का उदाहरण हमारे अनुभव में अभूतपूर्व है।’’


 

 

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ये पाठमाला  जिसका आप घर-बैठे अध्ययन कर सकते हैं, दैनिक जीवन के लिये व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करती हैं, तथा समस्त सहायता एवं आश्वासन के परम स्रोत, अर्थात् ईश्वर, के साथ एकरूपता प्राप्त करने के लिये बोधप्रद निर्देश देती हैं।

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इसी लेखक की लेखनी से…

 

योगी कथामृत

द्वारा श्री श्री परमहंस योगानन्द

 

‘‘शताब्दी की श्रेष्ठतम एक सौ आध्यात्मिक पुस्तकों’’ में चुनी गयी यह लोकप्रिय आत्मकथा हमारे युग की एक महान् आध्यात्मिक विभूति की अत्यंत चित्ताकर्षक छवि प्रस्तुत करती है। मन को मोह लेने वाली सुस्पष्टता, वाक्पटुता और हास्यरस युक्त भाषा कौशल का श्री श्री परमहंस योगानन्द ने अपने जीवन के इस प्रेरणाप्रद वृत्तान्त का वर्णन करने में प्रयोग किया है — उनके विलक्षण बचपन के अनुभव, किसी ब्रह्मज्ञानी गुरु की उत्साही खोज में सारे भारत भर के अनेक संतों एवं ज्ञानियों से उनकी मुलाकातें, अपने गुरु के आश्रम में दस वर्षों का प्रशिक्षण, और वे तीस वर्ष जो उन्होंने अमेरिका में अपनी शिक्षाओं का प्रचार करते हुए बिताये। इसमें महात्मा गाँधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, लूथर बरबैन्क, कैथोलिक सन्त थेरेसे नॉयमन और अनेक विख्यात पौर्वात्य तथा पाश्‍चात आध्‍यात्मिक विभूतियों से उनकी मुलाकातों का भी वर्णन है।

योगी कथामृत  एक असाधारण जीवन का अत्यंत सुंदर ढंग से लिखा गया वर्णन भी है और साथ ही योग के प्राचीन विज्ञान और उसकी ध्यान की चिरप्रचलित परंपरा का गहन परिचय भी है। इसमें लेखक महोदय दैनंदिन मानव जीवन की साधारण घटनाओं एवं साधारणतया चमत्कार कही जाने वाली असाधारण घटनाओं के पीछे कार्यरत सूक्ष्म किन्तु सुनिश्‍चित नियमों को विस्तृत रूप से स्पष्ट करते हैं। इस प्रकार उनकी मंत्रमुग्ध कर देने वाली जीवन गाथा मानव अस्तित्व के अंतिम रहस्यों का अंतर्वेधी एवं अविस्मरणीय झलक प्रदान करने के लिये पृष्ठभूमि बन जाती है।

आधुनिक काल का आध्यात्मिक गौरव ग्रन्थ मानी जाने वाली यह पुस्तक पचास से भी अधिक भाषाओं में अनुवादित हो चुकी है तथा अब विश्व भर में कई महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पाठ्य-पुस्तक तथा संदर्भ-ग्रन्थ के रूप में प्रयोग में लायी जा रही है। पचहत्तर वर्ष पहले, जब यह प्रथम बार अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी, तब से अब तक लोकप्रियता के शिखर पर आसीन इस पुस्तक ने विश्वभर में लाखों लोगों के हृदयों में अपना स्थान बना लिया है।

‘‘इस ज्ञानी महात्मा की यह आत्मकथा पाठक को मंत्रमुग्ध कर देती है।’’ — द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया

‘‘एक अनुपम वृत्तान्त।’’ — द न्यूयॉर्क टाइम्स

‘‘सुस्पष्ट टिप्पणियों सहित दिया गया मनमोहक चिंतन।’’ — न्यूज़वीक

‘‘योग की इस प्रस्‍तुति के समान अंग्रेजी या किसी भी अन्य यूरोपीय भाषा में आज तक कुछ भी कभी लिखा नहीं गया।’’ — कोलम्बिया युनिवर्सिटी प्रेस


 

परमहंस योगानन्द रचित अन्य पुस्तकें

योगी कथामृत

मानव की निरन्तर खोज

जहाँ है प्रकाश

धर्म विज्ञान

ईश्वर से वार्तालाप की विधि

सफलता का नियम

परमहंस योगानन्द के वचनामृत

जीने की कला

मानसिक अशान्ति : कारण एवं निवारण

योगी कथामृत (विस्तृत MP3 ऑडियोबुक, www.yssbooks.org से नि:शुल्क डाउनलोड)

ईश्वर-अर्जुन संवाद : श्रीमद्भगवद्गीता (एक नवीन अनुवाद एवं व्याख्या)

The Second Coming of Christ: The Resurrection of the Christ Within You — A Revelatory Commentary on the Original Teachings of Jesus

The Divine Romance

Journey to Self-realization

Wine of the Mystic: The Rubaiyat of Omar Khayyam — A Spiritual Interpretation

Songs of the Soul

Whispers from Eternity

Scientific Healing Affirmations

In the Sanctuary of the Soul: A Guide to Effective Prayer

Metaphysical Meditations

Inner Peace: How to Be Calmly Active and Actively Calm

Living Fearlessly: Bringing Out Your Inner Soul Strength

Why God Permits Evil and How to Rise Above It

To be Victorious in Life

The Universality of Yoga

Words of Cosmic Chants

Seek God Now

Who Made God?

Developing Dynamic Will

Man’s Greatest Adventure

Increasing the Power of Initiative

Habit Your Master or Your Slave?

Prayers of a Master for His Disciples

Audio Recordings of Paramahansa Yogananda

(Available in downloadable MP3 format)

Awake in the Cosmic Dream

Be a Smile Millionaire

Beholding the One in All

In the Glory of Spirit

The Great Light of God

To Make Heaven on Earth

One Life Versus Reincarnation

Removing All Sorrow and Suffering

Self-Realization: The Inner and the Outer Path

Songs of My Heart (Chants, Poems, and Prayers)

 

ऊपर लिखी किताबों में से कुछ असमिया, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंहली, तमिल, तेलुगु, एवं उर्दू में भी उपलब्ध है। योगदा सत्संग सोसाइटी की किताबों और ऑडियो रिकार्डिंग की पूर्ण सूची के लिए नीचे दिए गये पते पर देखें। श्री श्री परमहंस योगानन्द के रंगीन एवं ब्लैक और वाइट चित्र भी उपलब्ध है।

आपके नज़दीकी बुक स्टोर या नीचे लिखे पते पर उपलब्ध:

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया

परमहंस योगानन्द पथ

राँची 834 001, झारखण्ड

फ़ोन : (0651) 6655 555

bookstore.yssofindia.org

 


 

‘‘आदर्श जीवन’’ पुस्तकमाला के अंतर्गत अन्य पुस्तिकाएँ

 

श्री श्री परमहंस योगानन्द

प्रार्थनाओं के उत्तर प्राप्त करना

चिंतामुक्त जीवन

मानसिक एकाग्रता द्वारा सफलता

दिव्य प्रेम का विकास कैसे करें

रोग-निवारण की शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक पद्धतियों का समन्वित उपयोग

कहाँ हैं हमारे दिवंगत प्रियजन ?

विजय का मार्ग कैसे पायें

जीवन का पुनर्निर्माण

श्री श्री दया माता

दूसरों के अंत:करण में परिवर्तन कैसे लायें

बच्चों का उचित लालन-पालन

चरित्र दोषों पर विजय कैसे पायें

श्री श्री मृणालिनी माता

गुरु-शिष्य सम्बन्ध

 


 

उद्देश्य और आदर्श

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया

श्री श्री परमहंस योगानन्द, गुरुदेव एवं संस्थापक द्वारा निर्धारित

श्री श्री स्वामी चिदानन्द गिरि, अध्यक्ष

 

ईश्वर की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुभूति प्राप्त करने के लिए सुनिश्चित वैज्ञानिक प्रविधियों के ज्ञान का विभिन्न राष्ट्रों में प्रचार करना।

यह शिक्षा देना कि स्वयं-प्रयास के द्वारा मनुष्य के अनित्य चैतन्य को ईश-चैतन्य में विकसित करना जीवन का उद्देश्य है और इस ध्येय की उपलब्धि के लिए योगदा सत्संग मन्दिरों की ईश-सम्पर्क के लिए स्थापना करना तथा मनुष्य जाति के घरों और हृदयों में ईश्वर के व्यक्तिगत मन्दिरों की स्थापना हेतु प्रोत्साहित करना।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उपदिष्ट मूल योग और ईसा मसीह द्वारा उपदिष्ट मूल ईसाई धर्म में मूलभूत एकता और पूर्ण सामंजस्य पर प्रकाश डालना और यह दर्शाना कि सत्य के ये सिद्धान्त सभी सच्चे धर्मों के सामान्य वैज्ञानिक आधार हैं।

एक ही दिव्य राजमार्ग को इंगित करना, जिसकी ओर सच्चे धर्मों के सारे पथ अन्तत: पहुँचाते हैं। वह राजमार्ग ईश्वर का दैनिक, वैज्ञानिक, भक्तिमय ध्यान करना है।

मनुष्य को तीन प्रकार के कष्टों शारीरिक रोग, मानसिक अशान्ति और आध्यात्मिक अज्ञान — से मुक्त करना।

‘‘सादा जीवन और उच्च विचार’’ को प्रोत्साहित करना तथा मानवजाति के मध्य उनकी एकता के शाश्वत आधार — ईश्वर सें संबंध — की शिक्षा देकर बन्धुत्व की भावना का प्रचार करना।

शरीर पर मन और मन पर आत्मा की वरिष्ठता प्रतिपादित करना।

 


 

“आदर्श जीवन” पुस्तकमाला


 

यह पुस्तिका, योगी कथामृत के लेखक श्री श्री परमहंस योगानन्द की शिक्षाओं पर प्रकाशित की गयी पॉकेट-साईज़ पुस्तिकाओं की श्रृंखला में से एक है। ये अनौपचारिक प्रवचन और निबंध आध्यात्मिक संतुलन में जीवन जीने के लिये प्रेरणाप्रद और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं ताकि हम जीवन को शालीनता एवं सादेपन के साथ, जीवन के प्रतिमान विरोधाभासों में आंतरिक समभाव के साथ, और सर्वोपरि, आनंद के साथ जी सकें—इस ज्ञान से सुरक्षित अनुभव करते हुए कि हम प्रत्येक क्षण प्रेमपूर्ण परम सत्ता के आलिंगन में बँधे हैं।

 

 

 

परमहंस योगानन्द की
आध्यात्मिक विरासत