गुरु-तत्त्व

 

GURU TATTVA का हिन्दी रूपान्तर

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

SERVE LOVE MEDITATE REALIZE

THE DIVINE LIFE SOCIETY

 

अनुवादक

श्री कामेश्वरस्वरूप गर्ग

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर- 249192

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org.www.dilshq.org

 

प्रथम हिन्दी संस्करण- १९८५

षष्ठ हिन्दी संस्करण-२०१८

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

ISBN 81-7052-102-5

 

HS 53

 

 

 

 

 

 

 

PRICE : ₹55/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर, जि. टिहरी गढ़वाल,

उत्तराखण्ड, पिन २४९ १९२' में मुद्रित।

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प्रकाशकीय वक्तव्य

 

यद्यपि आध्यात्मिक गुरु की धारणा के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा जा चुका है; फिर भी इस महत्त्वपूर्ण विषय को ले कर जनसाधारण के मन में अनेक भ्रान्तियाँ, भ्रम और सन्देह बने हुए हैं।

 

क्या साधक के लिए गुरु एक अनिवार्यता है? सद्गुरु कौन है? वह किस सीमा तक अपने शिष्य की सहायता कर सकता है? शिष्य के क्या-क्या कर्तव्य हैं ? दीक्षा का क्या अर्थ है? इनके तथा इनसे सम्बन्धित अनेक प्रश्नों के सुस्पष्ट तथा सुनिश्चित उत्तर उपलब्ध होने के कारण अनेक उत्साही साधकों की आध्यात्मिक प्रगति रुक जाती है।

 

आशा है, इन परिस्थितियों में सद्गुरु शिवानन्द जी महाराज की प्रस्तुत पुस्तक अनेक साधकों के लिए वरदान सिद्ध होगी। इस पुस्तक में पाठकों को गुरु-शिष्य के पारस्परिक सम्बन्धों की प्रामाणिक तथा सारगर्भित व्याख्या पढ़ने को मिलेगी।

 

आध्यात्मिक तृष्णा से आकुल-व्याकुल नर-नारियों के लाभ के लिए इस पुस्तक को प्रकाशित करते हुए हमें अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। भगवान् तथा ब्रह्मविद्या-गुरुओं की कृपा आप सब पर बनी रहे !

 

यह पुस्तक मूल अँगरेजी पुस्तक Guru-Tattva का अनुवाद है।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

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विश्व - प्रार्थना

 

हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव!

तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है।

तुम सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ हो

तुम सच्चिदानन्दघन हो

तुम सबके अन्तर्वासी हो

 

हमें उदारता, समदर्शिता और मन का समत्व प्रदान करो।

श्रद्धा, भक्ति और प्रज्ञा से कृतार्थ करो

हमें आध्यात्मिक अन्तःशक्ति का वर दो,

जिससे हम वासनाओं का दमन कर मनोजय को प्राप्त हों।

हम अहंकार, काम, लोभ, घृणा, क्रोध और द्वेष से रहित हों।

हमारा हृदय दिव्य गुणों से परिपूरित करो

 

हम सब नाम-रूपों में तुम्हारा दर्शन करें।

तुम्हारी अर्चना के ही रूप में इन नाम-रूपों की सेवा करें।

सदा तुम्हारा ही स्मरण करें।

सदा तुम्हारी ही महिमा का गान करें।

तुम्हारा ही कलिकल्मषहारी नाम हमारे अधर-पुट पर हो।

सदा हम तुममें ही निवास करें

 

- स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय वक्तव्य... 3

विश्व - प्रार्थना.. 4

गुरु की भूमिका.. 6

शिष्य के कर्तव्य तथा विशेषाधिकार. 14

पावन गुरुपूर्णिमा-दिवस की अर्थवत्ता.. 20

महर्षि व्यास तथा हिन्दू-शास्त्रों को उनका योगदान. 23

श्री दक्षिणामूर्ति.. 26

भगवान् दत्तात्रेय तथा उनके चौबीस गुरु. 27

गुरुपनएक महाविनाशकारी रोग. 34

संन्यासियों से वार्ता.. 39

गुरु-भक्ति-योग. 44

गुरु-गीता का सार. 67

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम अध्याय

गुरु की भूमिका

 

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः

 

"उस गुरु को नमस्कार है जो अज्ञान रूपी तिमिर से अन्धे बने लोगों के नेत्र को ज्ञान रूपी अंजन की शलाका से खोल देता है।"

(गुरुगीता)

 

गुरु साक्षात् भगवान् है जो साधकों के पथ-प्रदर्शन के लिए साकार रूप में प्रकट होता है। गुरु का दर्शन भगवद्-दर्शन है। गुरु का भगवान् के साथ योग होता है। वह अन्य लोगों में भक्ति अनुप्राणित करता है। उसकी उपस्थिति सबके लिए पावनकारी है।

 

गुरु वस्तुतः जीवात्मा के मध्य की कड़ी है। गुरु वह सत्ता है जिसने अपने को त्वम् (जीवत्व) से तत् (ब्रह्म) में उन्नत कर लिया है और इस प्रकार उसकी उभय लोकों में मुक्त तथा अबाधित पहुँच है। वह मानो कि अमरत्व की देहली पर खड़ा है और नीचे झुक कर एक हाथ से संघर्षरत आत्माओं को उन्नत करता और दूसरे हाथ से उन्हें नित्य-स्थायी आनन्द तथा असीम सच्चित् की परम सत्ता में ऊपर उठाता है।

 

सद्गुरु

 

ग्रन्थों के अध्ययन मात्र से कोई गुरु नहीं बन सकता है। जो श्रोत्रिय हो तथा जिसे आत्मा की अपरोक्षानुभूति हो, उसी पर गुरु का नामारोपण किया जा सकता है। जीवन्मुक्त सन्त वास्तविक गुरु है। वह सद्गुरु है। वह ब्रह्म अथवा परमात्मा से अभिन्न होता है। वह ब्रह्मवित् होता है।

 

सिद्धियों पर आधिपत्य किसी ऋषि की महत्ता घोषित करने अथवा उसके आत्म-साक्षात्कार की उपलब्धि प्रमाणित करने की कसौटी नहीं है। सद्गुरु चमत्कार अथवा सिद्धियों का प्रदर्शन नहीं करता फिरता वह साधकों को आधिभौतिक पदार्थों की विद्यमानता का निश्चय दिलाने, उन्हें प्रोत्साहन देने तथा उनके हृदय में श्रद्धा निवेशित करने के लिए कभी-कभी उन्हें प्रदर्शित कर सकता है। सद्गुरु असंख्य सिद्धियों से सम्पन्न होता है। वह सभी दिव्य ऐश्वर्यों का स्वामी होता है।

 

सद्गुरु साक्षात् ब्रह्म है वह आनन्द, ज्ञान तथा करुणा का सागर है। वह आपकी आत्मा का नेतृत्व करने वाला है। वह सुख का स्रोत है। वह आपके समस्त कष्टों, विषादों तथा बाधाओं को विदूरित करता, आपको सम्यक् दिव्य पथ दर्शाता, आपके अज्ञानावरण को विदीर्ण करता, आपको अमर तथा दिव्य बनाता और आपकी निम्न आसुरी प्रकृति को रूपान्तरित करता है। वह आपको ज्ञान-रज्जु देता और इस संसार सागर में डूबते समय आपको पकड़ता है। उसे मात्र एक मनुष्य ही समझें। यदि आप उसे मनुष्य समझते हैं, तो आप पशु हैं।  अपने गुरु की पूजा करें और श्रद्धापूर्वक उन्हें नमस्कार करें।

 

गुरु भगवान् है उसकी वाणी भगवद्-वाणी है। उसे उपदेश देने की आवश्यकता नहीं है। उसका सान्निध्य अथवा उसकी संगति भी उन्नयनकारी, प्रेरणादायी तथा भावोत्तेजक है। उसका संग ही आत्म-प्रबोधक है। उसके सान्निध्य में रहना आध्यात्मिक शिक्षा है। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी का अध्ययन करें, आपको गुरु की महत्ता ज्ञात हो जायेगी।

 

मनुष्य केवल मनुष्य से ही सीख सकता है; अतः भगवान् मानव-शरीर के द्वारा शिक्षा देता है। आप अपने गुरु में स्व-कल्पित पूर्णता के मानवीय आदर्श को साकार हुआ पाते हैं। यह वह आदर्श है जिसके अनुरूप आप अपना निर्माण करना चाहते हैं। आपका मन सहज ही यह स्वीकार कर लेगा कि ऐसी महान आत्मा आदर करने तथा श्रद्धा रखने योग्य है।

 

गुरु मोक्ष का द्वार है वह इन्द्रियातीत सत्-चित् का द्वार है; किन्तु इस द्वार में साधक को ही प्रवेश करना है। गुरु सहायक है; किन्तु व्यावहारिक साधना का वास्तविक कार्य तो साधक के शिर पर ही है।

 

गुरु की आवश्यकता

 

अध्यात्म-पथ पर नवीन साधक को गुरु की आवश्यकता हुआ करती है एक दीपक को जलाने के लिए आपको एक प्रज्वलित दीपक की आवश्यकता होती है; उसी प्रकार एक प्रबुद्ध आत्मा दूसरी आत्मा को प्रबुद्ध कर सकती है।

 

कुछ लोग कुछ वर्षों तक स्वतन्त्र रूप से अध्ययन करते हैं। कालान्तर में उन्हें गुरु की आवश्यकता यथार्थतः अनुभव होती है। उन्हें पथ में कुछ बाधाएँ मिलती हैं। उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि इन अवरोधों अथवा गतिरोधों को कैसे दूर करें। तब वे गुरु की खोज करना आरम्भ कर देते हैं।

 

जो व्यक्ति बदरीनाथ जा चुका है, केवल वही आपको वहाँ जाने का मार्ग बतला सकता है। आध्यात्मिक पथ में तो अपना मार्ग ढूँढ़ निकालना आपके लिए और भी कठिन है। मन आपको प्रायः बहकायेगा। गुरु पतन के गर्तों और अवरोधों को दूर कर आपको सन्मार्ग पर ले जायेगा वह आपको बतलायेगा — “यह मार्ग आपको मोक्ष की ओर ले जायेगा, यह आपको  बन्धन की ओर ले जायेगा।आप जाना तो बदरीनाथ चाहते होंगे; किन्तु इस पथ-प्रदर्शन के अभाव में आप दिल्ली जा पहुँचेंगे।

 

शास्त्र अरण्य के समान हैं। उनमें अस्पष्ट लेखांश होते हैं। उनमें ऐसे भी लेखांश होते हैं जो प्रतीयमानतः परस्पर विरोधी हैं। उनमें ऐसे भी लेखांश पाये जाते हैं जिनके गूढ़ अर्थ, नानाविध अभिप्राय तथा रहस्यात्मक व्याख्याएँ होती हैं। उनमें प्रतिनिर्देश हैं। आपको गुरु की आवश्यकता है जो आपको ठीक अर्थ समझाये, आपके सन्देहों तथा अस्पष्टताओं को दूर करे और आपके सम्मुख उपदेशों का सार प्रस्तुत करे। प्रत्येक साधक को अध्यात्म-पथ में एक गुरु की अपरिहार्य आवश्यकता होती है। गुरु ही आपके दोषों का पता लगा सकता है। अहंकार का स्वरूप ऐसा है कि आप स्वयं अपने दोषों का पता नहीं लगा सकते हैं। जैसे व्यक्ति अपनी पीठ नहीं देख सकता है, वैसे ही वह अपनी त्रुटियों को नहीं देख सकता है। अपने दुर्गुणों तथा दोषों के उन्मूलन के लिए उसे एक गुरु के संरक्षण में रहना चाहिए।

 

किसी गुरु के पथ-प्रदर्शन में रहने वाला साधक पथ-भ्रष्ट होने से जगत् सुरक्षित रहता है। गुरु के साथ सत्संग आपको भौतिक के सभी प्रलोभनों तथा प्रतिकूल शक्तियों से रक्षा करने का एक कवच तथा दुर्ग है।

 

जिन लोगों ने किसी गुरु के संरक्षण में रह कर अध्ययन किये बिना ही पूर्णता प्राप्त की हो, उनके उदाहरण गुरु की आवश्यकता के विरुद्ध प्रमाण के रूप में उद्धृत नहीं करने चाहिए; क्योंकि ऐसे महापुरुष आध्यात्मिक जीवन की सामान्य प्रसमता हो कर उसके अपवाद हुआ करते हैं। आध्यात्मिक गुरु के रूप में उनका आविर्भाव गत जीवनों में की गयी उम्र सेवा, अध्ययन तथा ध्यान के फल-स्वरूप होता है। वे पहले ही गुरु के अधीन अध्ययन कर चुके होते हैं। वर्तमान जन्म केवल उसके आध्यात्मिक फल का निर्वाह है। अतएव उसके द्वारा गुरु का महत्त्व कम नहीं होता है।

 

कुछ गुरु अपने साधकों को बहकाते हैं। वे सबसे कहते हैं: "स्वयं ही विचार करें। अपने को किसी गुरु के प्रति समर्पित करें।" जब व्यक्ति यह कहता है : 'किसी गुरु का अनुसरण करें', तो उसका अभिप्राय श्रोता का गुरु स्वयं बनने का होता है। ऐसे नकली गुरुओं के पास जायें। उनके प्रवचनों को सुनें

 

सभी महापुरुषों के गुरु थे। सभी ऋषियों, मुनियों, पैगम्बरों, जगद्गुरुओं, अवतारों, महापुरुषों के; चाहे वे कितने ही महान् क्यों रहे हों; अपने निजी गुरु थे श्वेतकेतु ने उद्दालक से, मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य से, भृगु ने वरुण से, नारद ने सनत्कुमार से, नचिकेता ने यम से, इन्द्र ने प्रजापति से सत्य के स्वरूप की शिक्षा प्राप्त की तथा अन्य अनेक लोग ज्ञानी जनों के पास विनम्रतापूर्वक गये, ब्रह्मचर्य व्रत का अति-नियमनिष्ठा से पालन किया, कठोर अनुशासनों की साधना की तथा उनसे ब्रह्मविद्या सीखी।

 

भगवान् कृष्ण अपने गुरु सान्दीपनि के चरणों में बैठे। भगवान् राम के गुरु वसिष्ठ थे जिन्होंने उन्हें उपदेश दिया। प्रभु यीशु ने जान से जार्डन नदी के तट पर दीक्षित होने के लिए उन्हें खोजा था। देवताओं के भी बृहस्पति गुरु हैं। दिव्य आत्माओं में से सर्वाधिक महान् भी गुरु दक्षिणामूर्ति के चरणों में बैठे थे।

 

नव-दीक्षित के लिए प्रथम दैहिक गुरु होना आवश्यक है। वह प्रारम्भ में ही भगवान् को गुरु नहीं बना सकता है। उसका चित्त शुद्ध होना चाहिए। उसमें नैतिक पूर्णता होनी चाहिए। उसे पूर्णरूपेण धार्मिक होना चाहिए। तभी वह भगवान् को अपना गुरु बना सकता है।

 

गुरु का चयन

 

यदि आप किसी महात्मा के सान्निध्य में शान्ति पाते हैं; यदि आप किसी के प्रवचनों से अनुप्राणित होते हैं; यदि वह आपकी शंकाओं का समाधान कर सकता है; यदि वह काम, क्रोध तथा लोभ से मुक्त है; यदि वह निःस्वार्थ, स्नेही तथा अस्मिता-रहित है, तो आप उसे अपना गुरु स्वीकार कर सकते हैं। जो आपके सन्देहों का निवारण कर सकता है, जो आपकी साधना में सहानुभूतिशील है, जो आपकी आस्था में बाधा नहीं डालता, वरन् जहाँ आप हैं वहाँ से आगे आपकी सहायता करता है, जिसकी उपस्थिति में आप आध्यात्मिक रूप से अपने को उत्थित अनुभव करते हैं, वह आपका गुरु है। यदि आपने एक बार गुरु का चयन कर लिया, तो निर्विवाद रूप से उनका अनुसरण करें। भगवान् गुरु के माध्यम से आपका पथ-प्रदर्शन करेगा।

 

अपने गुरु के चयन में अपनी बुद्धि का उपयोग अधिक करें। ऐसा करने पर आप असफल रहेंगे। यदि आप श्रेष्ठ गुरु प्राप्त करने में असफल हों तो उस साधु की शिक्षाओं का पालन कीजिए जो कुछ वर्षों से उस पथ पर चल रहा हो, जिसमें शुचिता तथा अन्य सद्गुण हों, जिसे शास्त्रों का ज्ञान हो। जैसे स्नातकोत्तर उपाधि वाले प्राध्यापक के उपलब्ध होने पर माध्यमिक कक्षा का छात्र तृतीय कक्षा के छात्र को पढ़ा सकता है, जैसे जानपद शल्य-चिकित्सक (सिविलसर्जन) के उपलब्ध होने पर उपसहायक शल्य-चिकित्सक रोगी का उपचार कर सकता है, वैसे ही यह मध्यम कोटि का गुरु आपकी सहायता कर सकता है।

 

यदि आप इस मध्यम कोटि के गुरु को पाने में भी असमर्थ हैं, तो आप श्री शंकराचार्य, दत्तात्रेय जैसे आत्मसाक्षात्कार प्राप्त सन्तों द्वारा लिखित ग्रन्थों में अन्तर्विष्ट उपदेशों का अनुसरण कर सकते हैं। यदि प्राप्य हो तो ऐसे साक्षात्कार प्राप्त गुरु का चित्र रख सकते हैं तथा उसकी श्रद्धा और भक्तिपूर्वक पूजा कर सकते हैं। शनैः-शनैः आपको प्रेरणा मिलेगी तथा गुरु स्वप्न में प्रकट होंगे और उचित समय आने पर आपको दीक्षा तथा प्रेरणा देंगे। सच्चे साधक के लिए रहस्यमय ढंग से सहायता आती है।

 

 

 

भगवान् से रहस्यमयी सहायता

 

जरा देखें कि निम्नांकित उदाहरणों में भगवान् ने भक्त की किस प्रकार सहायता की। एकनाथ ने आकाशवाणी सुनी। उसने कहा- "जनार्दन पन्त से देवगिरि में मिलो। वह तुम्हें ठीक मार्ग में ले जायेंगे तथा तुम्हारा पथ-प्रदर्शन करेंगे।उन्होंने तदनुसार कार्य किया तथा उन्हें अपना गुरु मिल गया। तुकाराम को अपना मन्त्र 'राम कृष्ण हरि' स्वप्न में मिला। उन्होंने इस मन्त्र का जप किया तथा भगवान् कृष्ण के दर्शन किये। भगवान् कृष्ण ने नामदेव को उच्चतर शिक्षा प्राप्त करने के लिए मल्लिकार्जुन के एक संन्यासी के पास भेजा। रानी चुडाला ने कुम्भ मुनि का रूप धारण किया, वन में अपने पति शिखिध्वज के सम्मुख प्रकट हुई तथा उन्हें कैवल्य के गूढ़ तत्त्व में दीक्षित किया। मधुर कवि आकाश में लगातार तीन दिन तक ज्योति देखते रहे। इसने उनका मार्ग-प्रदर्शन किया और उन्हें तिन्नेवेली के निकट एक इमली के वृक्ष के नीचे समाधिस्थ उनके गुरु नम्माल्वर के पास पहुँचाया। बिल्वमंगल चिन्तामणि नर्तकी से बहुत आसक्त थे पश्चादुक्त उनकी गुरु बनी। तुलसीदास को एक अदृश्य आत्मा से हनुमान् के और हनुमान् के द्वारा श्री राम के दर्शन का अनुदेश प्राप्त हुआ

 

अधिकारी शिष्यों को सुयोग्य गुरु का कभी भी अभाव नहीं रहता है। साक्षात्कार प्राप्त आत्माएँ दुर्लभ नहीं हैं। सामान्य निर्बुद्धि व्यक्ति उन्हें सहजता से पहचान नहीं पाते हैं। कुछ इने-गिने व्यक्ति ही, जो अनघ तथा सद्गुणों के मूर्त रूप हैं, आत्मसाक्षात्कार प्राप्त आत्माओं को पहचान सकते हैं तथा वे ही उनके सान्निध्य से लाभान्वित होते हैं।

 

जब तक संसार है, तब तक आत्म-साक्षात्कार के पथ में संघर्षरत आत्माओं का पथ-प्रदर्शन करने के लिए गुरु तथा वेद हैं। हो सकता है कि सत्ययुग की अपेक्षा कलियुग में साक्षात्कार प्राप्त आत्माओं की संख्या अल्प हो; किन्तु साधकों की सहायता करने के लिए वे सदा विद्यमान रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता, प्रकृति तथा बुद्धि के अनुसार अपना मार्ग अपनाना चाहिए। उसके सद्गुरु उस मार्ग में उसे मिलेंगे।

 

शिक्षा-गुरु तथा दीक्षा-गुरु

 

इस भूलोक में व्यक्ति के द्विधा कर्तव्य हैंअपने जीवन का परिरक्षण तथा आत्म-साक्षात्कार। अपने जीवन के परिरक्षण के लिए उसे अपनी दैनिक जीविका हेतु कार्य करना सीखना होता है। आत्म-साक्षात्कार के लिए उसे सेवा, प्रेम तथा ध्यान करना होता है। जो गुरु उसे सांसारिक कलाओं का ज्ञान प्रदान करता है, वह शिक्षा-गुरु है। जो गुरु उसे आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रदर्शित करता है, वह दीक्षा गुरु है। शिक्षा-गुरु अनेक हो सकते हैंजितनी बातें वह सीखना चाहता है, उतने गुरु हो सकते हैं। दीक्षा गुरु केवल एक ही होता है-वही होता है, जो उसे मोक्ष की ओर ले जाता है।

 

एक गुरु से संलग्न रहें

 

एक चिकित्सक से आपको औषधि-निर्देश (नुस्खा) मिलता है, दो चिकित्सकों से आपको परामर्श प्राप्त होता है और यदि तीन चिकित्सक हुए, तो आपका अपना दाह-संस्कार होता है। इसी भाँति यदि आपके अनेक गुरु होंगे, तो आप किंकर्तव्यविमूढ़ हो जायेंगे। क्या करणीय है, यह आपको ज्ञात होगा। एक गुरु आपसे कहेगा, 'सोऽहं का जप करो।' दूसरा आपसे कहेगा, 'श्री राम का जप करो।' तृतीय गुरु आपसे कहेगा, 'अनाहत नाद को सुनो।' आप उलझन में पड़ जायेंगे। एक गुरु से संलन रहें और उनके उपदेशों का पालन करें।

 

सबकी बातें सुनें; किन्तु अनुगमन एक ही व्यक्ति का करें। सबका सम्मान करें; किन्तु श्रद्धा एक ही व्यक्ति पर रखें। सबसे ज्ञान एकत्र करें; किन्तु एक ही शिक्षक के उपदेशों को अपनायें। तब आपकी आध्यात्मिक प्रगति शीघ्र होगी।

 

गुरु-परम्परा

 

आध्यात्मिक ज्ञान गुरु-परम्परा का विषय है। यह गुरु से अपने शिष्य को प्रदान किया जाता है। गौडपादाचार्य ने अपने शिष्य गोविन्दाचार्य को, गोविन्दाचार्य ने अपने शिष्य शंकराचार्य को और शंकराचार्य ने अपने शिष्य सुरेश्वराचार्य को आत्मज्ञान प्रदान किया। मत्स्येन्द्रनाथ ने अपने शिष्य गोरखनाथ को, गोरखनाथ ने निवृत्तिनाथ को और निवृत्तिनाथ ने ज्ञानदेव को ज्ञान प्रदान किया। तोतापुरी ने श्री रामकृष्ण को और रामकृष्ण ने स्वामी विवेकानन्द को ज्ञान प्रदान किया। राजा जनक के जीवन को ढालने वाले अष्टावक्र थे। राजा भर्तृहरि की आध्यात्मिक नियति को आकार देने वाले गोरखनाथ थे। जब अर्जुन तथा उद्धव के मन अनिश्चित अवस्था में थे, तब भगवान् श्री कृष्ण ने ही उन्हें आध्यात्मिक पथ पर प्रतिष्ठित किया था।

 

दीक्षा - इसका अर्थ

 

भक्त सन्त एक भक्त को भक्ति-मार्ग में दीक्षित करता है। ज्ञानी वेदान्त के साधक को महावाक्यों की दीक्षा देता है। हठयोगी तथा राजयोगी अपने-अपने विशेष मार्ग में दूसरों को दीक्षित करते हैं; किन्तु पूर्ण ज्ञानी अथवा पूर्ण योगी किसी भी विशेष मार्ग की दीक्षा दे सकता है। श्री शंकर अथवा मधुसूदन सरस्वती जैसा सन्त अथवा ज्ञानी जिस मार्ग के लिए साधक उपयुक्त है, उसकी उसे दीक्षा दे सकता है। गुरु साधक की सूक्ष्म जाँच द्वारा उसकी अभिरुचि, प्रकृति तथा क्षमता का पता लगा लेता है और उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त मार्ग निश्चित करता है। यदि उसका हृदय अपवित्र है, तो गुरु उसके लिए कई वर्षों तक निःस्वार्थ सेवा निर्धारित करता है। तब गुरु पता लगाता है कि साधक किस विशेष मार्ग के उपयुक्त है और उसको उसकी दीक्षा देता है।

 

दीक्षा का अर्थ दूसरे व्यक्ति के कानों में मन्त्रोच्चारण करना नहीं है। यदि राम कृष्ण के विचारों से प्रभावित है, तो राम ने पहले ही कृष्ण से दीक्षा ले ली है। यदि एक साधक एक सन्त द्वारा लिखित पुस्तकों का अध्ययन करके सन्मार्ग पर चलता है और उसके उपदेशों को आत्मसात् करता है, तो वह सन्त उसका गुरु बन चुका है।

 

शक्ति-संचार

 

आप जिस प्रकार एक सन्तरे को एक व्यक्ति को दे सकते हैं, उसी प्रकार आध्यात्मिक शक्ति को एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति में संचारित कर सकता है। आध्यात्मिक शक्ति को सम्प्रेषित करने की इस विधि को शक्ति-संचार कहा जाता है। शक्ति-संचार में सद्गुरु के कुछ आध्यात्मिक स्फुरण वस्तुतः शिष्य के मस्तिष्क में स्थानान्तरित किये जाते हैं।

 

गुरु उस उपयुक्त शिष्य में आध्यात्मिक शक्ति का संचार करता है जिसे वह इसके लिए योग्य समझता है। गुरु शिष्य को दृष्टि-निक्षेप, स्पर्श, विचार, शब्द अथवा इच्छा-शक्ति से रूपान्तरित कर सकता है।

 

शक्ति-संचार परम्परागत है। यह एक गुप्त रहस्यमय विज्ञान है जो गुरु से शिष्य को प्रदान किया जाता है।

 

प्रभु यीशु ने स्पर्श द्वारा अपनी आध्यात्मिक शक्ति अपने कुछ शिष्यों में संचारित की। समर्थ रामदास के एक शिष्य ने नर्तकी की उस पुत्री में अपनी शक्ति संचारित की जो उसके प्रति अत्यधिक कामातुर थी। शिष्य ने उसकी ओर एक टक देखा और उसे समाधिस्थ कर दिया। उसकी काम वासना नष्ट हो गयी। वह बहुत ही धार्मिक तथा आध्यात्मिक बन गयी। भगवान् कृष्ण ने अन्धे सूरदास के नेत्रों को स्पर्श किया, सूरदास की अन्तर्दृष्टि खुल गयी। उन्हें भावसमाधि हुई। गौरांग महाप्रभु ने अपने स्पर्श द्वारा अनेक लोगों में दिव्योन्माद उत्पन्न किया और उनका मन अपनी ओर परिवर्तित कर लिया। उनके स्पर्श से नास्तिक आनन्दातिरेक से गलियों में नृत्य तथा हरि-कीर्तन करते थे

 

शिष्य को गुरु के शक्ति-संचार से ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। उसे और अधिक पूर्णता तथा उपलब्धियों के लिए साधना में कठोर संघर्ष करना होगा। श्री रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानन्द को स्पर्श किया, स्वामी विवेकानन्द को समाधि लग गयी। उन्होंने स्पर्श के बाद भी पूर्णता की प्राप्ति के लिए और सात वर्ष तक कठोर साधना की।

 

 

 

 

कृपा तथा स्व-प्रयास

 

आपके गुरु के चमत्कार के फल-स्वरूप आपको आत्म-साक्षात्कार नहीं हो सकता। भगवान् बुद्ध, प्रभु यीशु, रामतीर्थसभी ने साधना की थी। भगवान् कृष्ण अर्जुन को वैराग्य तथा अभ्यास विकसित करने के लिए कहते हैं। उन्होंने अर्जुन से यह नहीं कहा : "मैं तुम्हें अभी मुक्ति दे दूँगा।" अतः इस असत् धारणा का परित्याग कर दें कि आपके गुरु आपको समाधि तथा मुक्ति दे देंगे। प्रयास करें, शुद्ध बनें, ध्यान करें तथा आत्म-साक्षात्कार करें

 

गुरु कृपा परमावश्यक है; किन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं है कि शिष्य हाथ पर हाथ रख कर बैठा रहे। उसे कठोर पुरुषार्थ करना होता है। सारा कार्य शिष्य को करना होता है। आजकल तो लोग यह चाहते हैं कि वे संन्यासी के कमण्डल से एक बूँद जल लें और उन्हें तुरन्त समाधि लग जाये। वे निर्मलीकरण तथा आत्म-साक्षात्कार के लिए किसी प्रकार की साधना करने को तैयार नहीं हैं। वे जादू की गोली चाहते हैं जो उन्हें समाधि में धकेल दें। यदि आपको ऐसी भ्रान्ति है, तो उसे तत्काल त्याग दीजिए।

 

गुरु तथा शास्त्र आपका मार्ग-प्रदर्शन कर सकते हैं और आपके सन्देहों का निवारण कर सकते हैं। अपरोक्षानुभूति तो आपको स्वयं ही करनी होगी। क्षुधित व्यक्ति को स्वयं ही भोजन करना होगा। जिसे दुःसह खुजली हो, उसे स्वयं खुजलाना होगा।

 

निःसन्देह गुरु का आशीर्वाद सब-कुछ कर सकता है; परन्तु किसी को उसका आशीर्वाद कैसे प्राप्त हो ? गुरु को प्रसन्न करके ही यह प्राप्त किया जा सकता है। गुरु अपने शिष्य से तभी प्रसन्न होता है, जब उत्तरोक्त उसकी आध्यात्मिक शिक्षाओं का निर्विवाद पालन करता है। अतएव गुरु की शिक्षाओं का सावधानीपूर्वक अनुसरण करें। उसकी शिक्षाओं को कार्यान्वित करें। तभी आप उसके आशीर्वाद के पात्र होंगे और तभी उसका आशीर्वाद सब-कुछ कर सकेगा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

द्वितीय अध्याय

शिष्य के कर्तव्य तथा विशेषाधिकार

 

यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ

तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः

 

"जिस साधक की परम देव परमात्मा में परम भक्ति हैं तथा (जिसकी भक्ति) जिस प्रकार परमेश्वर में है उसी प्रकार गुरु में भी है, उस महात्मा पुरुष के हृदय में ही ये रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं।"

(श्वेताश्वतर उपनिषद् : -२३)

 

शिष्य वह है जो गुरु के उपदेशों का अक्षरशः तथा भावशः पालन करता और उनकी शिक्षाओं का प्रचार तथा प्रसार अपने से कम विकसित आत्माओं में आजीवन करता रहता है।

 

वास्तविक शिष्य केवल गुरु के दिव्य स्वरूप से ही सम्बन्ध रखता है। गुरु जो मानव होने के नाते कार्य करता है, उसकी वह चिन्ता नहीं करता। वह इस ओर पूर्ण विस्मरणशील-सा रहता है। उसके लिए गुरु-गुरु है भले ही वह लोकाचार के विपरीत व्यवहार करे। वह सदा स्मरण रखे कि सन्त का स्वरूप अतलस्पर्श होता है। उनके विषय में अपना कोई मत बनाइए। अपनी अज्ञानता के अक्षम मापदण्ड से उसके दिव्य स्वरूप को मापिए व्यापक दृष्टिकोण से सम्पादित अपने गुरु के कार्यों की आलोचना कीजिए।

 

विशुद्ध शिष्यत्व दृष्टि का उन्मीलन करता है। यह आध्यात्मिक अग्नि प्रज्वलित करता है। यह प्रसुप्त क्षमताओं को उद्बोधित करता है। यह आध्यात्मिक पथ की यात्रा में सर्वाधिक आवश्यक पाथेय है। गुरु तथा शिष्य एक बन जाते हैं। गुरु शिष्य को आशीर्वाद देता, उसका पथ-प्रदर्शन करता तथा उसे प्रेरणा देता है। वह उसमें शक्ति-संचार करता है, उसे रूपान्तरित करता तथा आध्यात्मिक बनाता है।

 

गुरु का सान्निध्य प्राप्त करने का अधिकारी कौन है

 

गुरु का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए आपको उपयुक्त अधिकारी होना चाहिए। विवेक, वैराग्य, शम, दम, उपरति, गुरु में श्रद्धा, भगवद्-भक्तिइन आवश्यक उपकरणों से सन्नद्ध हो कर साधक को गुरु के समीप जाना चाहिए।

 

गुरु केवल उसी साधक को आध्यात्मिक उपदेश प्रदान करता है जो मुमुक्षु हो, जो शास्त्रों के आदेशों का यथावत् पालन करता हो, जिसने अपनी दुर्वासनाओं तथा इन्द्रियों का दमन किया हो, जिसका मन शान्त हो तथा जो करुणा, विश्व-प्रेम, धैर्य, विनम्रता, तितिक्षा, सहिष्णुता आदि सद्गुणों से सम्पन्न हो ब्रह्म के रहस्य की दीक्षा तभी फलित होती है और शिष्य के मन में ज्ञान उत्पन्न करती है, जब शिष्य का मन निष्काम बन जाता है।

 

गुरु-सेवा

 

अभीप्सुओं को आरम्भ में अपना सम्पूर्ण अवधान गुरु की दीर्घकालिक सेवा द्वारा स्वार्थपरता के निष्कासन में निर्दिष्ट करना चाहिए। अपने गुरु की सेवा दिव्य भाव से कीजिए। इससे पार्थक्य-रूपी कर्कटार्बुद (कैंसर) विलीन हो जायेगा।

 

पोत का कप्तान सदा सतर्क रहता है। एक धीवर सदा सतर्क रहता है। शल्य-चिकित्सक शल्यकर्म गृह में सदा सतर्क रहता है। इसी प्रकार पिपासु तथा क्षुधित शिष्य को अपने गुरु की सेवा में सदा सतर्क रहना चाहिए।

 

गुरु के सेवार्थ जीवन यापन करें। आपको अवसरों की ताक में रहना चाहिए। आमन्त्रण की प्रतीक्षा कीजिए। गुरु-सेवा के लिए अपने को स्वेच्छा से अर्पित कीजिए

 

अपने गुरु की सेवा नम्रतापूर्वक, स्वेच्छापूर्वक, निर्विवाद, निरभिमानपूर्वक, खुशी से, अथक रूप से तथा प्रेमपूर्वक कीजिए। आप अपने गुरु की सेवा में जितनी अधिक शक्ति व्यय करेंगे, उतनी ही अधिक दिव्य शक्ति आपमें प्रवाहित होगी।

 

जो गुरु की सेवा करता है, वह सम्पूर्ण विश्व की सेवा करता है। गुरु की सेवा बिना किसी स्वार्थपरायण उद्देश्य से करें। गुरु की सेवा करते समय अपने आन्तरिक उद्देश्य की संवीक्षा करें। गुरु की सेवा नाम, यश, सत्ता, धन आदि की प्रत्याशा के बिना की जानी चाहिए।

 

गुरु की आज्ञाकारिता

 

गुरु के प्रति श्रद्धा रखने की अपेक्षा उनकी आज्ञाओं का पालन करना श्रेष्ठतर है। आज्ञाकारिता एक मूल्यवान् सद्गुण है; क्योंकि यदि आप आज्ञाकारिता के गुण का विकास करने का प्रयास करेंगे, तो आत्म-साक्षात्कार के पथ के कट्टर शत्रु अहं का शनैः-शनैः उन्मूलन हो जायेगा

 

जो शिष्य अपने गुरु की आज्ञाओं का पालन करता है, केवल वही अपनी निम्न आत्मा पर आधिपत्य रख सकता है। आज्ञाकारिता अत्यन्त व्यावहारिक, अनन्य तथा सक्रिय अध्यवसायी होनी चाहिए। गुरु की आज्ञाकारिता तो टाल-मटोल करती है और सन्देह ही प्रकट करती है। दम्भी शिष्य अपने गुरु की आज्ञाओं का पालन भयवश करता है। सच्चा शिष्य अपने गुरु की आज्ञाओं का पालन प्रेम के लिए प्रेम के कारण करता है।

 

आज्ञा-पालन की विधि सीखिए। उस स्थिति में ही आप आदेश दे सकते हैं। शिष्य बनना सीखिए, तभी आप गुरु बन सकेंगे।

 

इस भ्रामक धारणा को त्याग दीजिए कि गुरु की अधीनता स्वीकार करना, उनका आज्ञानुवर्ती होना तथा उनकी शिक्षाओं को कार्यान्वित करना दासता की मनोवृत्ति है। अज्ञानी व्यक्ति समझता है कि किसी अन्य व्यक्ति की अधीनता स्वीकार करना उसकी गरिमा के प्रतिकूल तथा उसकी स्वाधीनता के विपरीत है। यह एक बड़ी गम्भीर भूल है। यदि आप ध्यानपूर्वक चिन्तन करें, तो आप देखेंगे कि आपकी वैयक्तिक स्वतन्त्रता वास्तव में आपके अपने ही अहं तथा मिथ्याभिमान की नितान्त घृणित दासता है, यह विषयी मन की तरंग है। जो अपने अहं तथा मन पर विजय प्राप्त कर लेता है, वास्तव में वही स्वतन्त्र व्यक्ति है। वह शूरवीर है। इस विजय को प्राप्त करने के लिए ही व्यक्ति गुरु के उच्चतर अध्यात्मीकृत व्यक्तित्व की अधीनता स्वीकार करता है। वह इस अधीनता स्वीकरण द्वारा अपने निम्न अहं को पराजित करता तथा असीम चेतना के आनन्द को प्राप्त करता है।

 

निश्चिन्त शिष्य

 

आध्यात्मिक पथ कला की स्नातकोत्तर उपाधि के लिए शोध-प्रबन्ध लिखने जैसा नहीं है। यह सर्वथा भिन्न प्रणाली है। इसमें गुरु की सहायता की आवश्यकता प्रति क्षण रहती है। इन दिनों साधक आत्म-निर्भर, उद्धत तथा स्वाग्रही बन गये हैं। वे गुरु की आज्ञाओं को कार्यान्वित करने की चिन्ता नहीं करते। वे गुरु बनाना नहीं चाहते। वे प्रारम्भ से ही स्वतन्त्रता चाहते हैं। वे समझते हैं कि वे तुरीय अवस्था में हैं, जब कि उन्हें आध्यात्मिकता अथवा सत् का प्रारम्भिक ज्ञान भी नहीं होता। वे स्वेच्छाचारिता अथवा अपनी बात मनवाने और स्वेच्छानुसार चलने को स्वतन्त्रता समझने की भूल करते हैं। यह गम्भीर शोचनीय भूल है। यही कारण है कि उनकी उन्नति नहीं होती। वे साधना की क्षमता तथा ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास खो बैठते हैं। वे कश्मीर से गंगोत्तरी तक और गंगोत्तरी से रामेश्वरम् तक मार्ग में 'विचार-सागर' और 'पंचदशी' से कुछ अनाप-शनाप बकते तथा जीवन्मुक्त होने का ढोंग रचते लापरवाही से निरुद्देश्य ठोकरें खाते फिरते हैं।

 

समर्पण तथा कृपा

 

यदि आप नल से जल पीना चाहते हैं, तो आपको अपने को झुकाना पड़ेगा। इसी भाँति यदि आप गुरु के पवित्र ओष्ठों से प्रवाहित होने वाली अमरत्वप्रदायक आध्यात्मिक सुधा का पान करना चाहते हैं, तो आपको विनीतता तथा विनम्रता का मूर्त रूप बनना होगा।

 

मन की निम्न प्रकृति का पूर्णतया नवीकरण करना चाहिए। साधक अपने गुरु से कहता है 'मैं योगाभ्यास करना चाहता हूँ। ''मैं निर्विकल्प समाधि में प्रवेश करना चाहता हूँ। मैं आपके चरणों में बैठना चाहता हूँ। मैंने आपको आत्म-समर्पण कर दिया है।" परन्तु वह अपनी निम्न प्रकृति और स्वभाव को; पुराने चरित्र, व्यवहार और आचरण को परिवर्तित करना नहीं चाहता।

 

व्यक्ति को अपने वैयक्तिक अहं, पूर्वावधारित धारणाओं, प्रिय विचारों, पूर्वाग्रहों तथा स्वार्थमयी अभिरुचियों को त्याग देना चाहिए। ये सब गुरु के आदेशों और उपदेशों के कार्यान्वयन में बाधक हैं। अपने हृदय के भेद को अपने गुरु के सम्मुख अनावृत कर दें। आप जितना ही अधिक ऐसा करेंगे, उतनी ही सहानुभूति अर्थात् पाप तथा प्रलोभन के विरुद्ध संघर्ष में आपको शक्ति की प्राप्ति होगी।

 

गुरु की कृपा की आकांक्षा करने से पूर्व साधक को उसका पात्र बनना चाहिए। दिव्य कृपा की आपूर्ति तभी होती है, जब साधक में सच्ची पिपासा हो और जब वह उसे ग्रहण करने योग्य हो।

 

गुरु की कृपा उन्हीं पर अवतरित होती है, जो उसके प्रति पूर्णरूपेण विनम्र तथा निष्ठावान् अनुभव करते हैं। निष्ठा गुरु में विश्वास तथा सम्प्रत्यय है। गुरु साक्ष्य अथवा प्राधिकार के रूप में जो घोषित करता है, उसकी सत्यता पर बिना किसी अन्य साक्ष्य अथवा प्रमाण के दृढ़ विश्वास करना निष्ठा है। जिस शिष्य की गुरु में निष्ठा है, वह वाद-विवाद नहीं करता, सोच-विचार नहीं करता, तर्क-वितर्क नहीं करता तथा चिन्तन नहीं करता वह उसकी आज्ञाओं का मात्र पालन करता है।

 

शिष्य का गुरु के प्रति आत्म-समर्पण तथा गुरु की कृपा में पारस्परिक सम्बन्ध है। समर्पण गुरु की कृपा को नीचे की ओर आकर्षित करता है और गुरु-कृपा समर्पण को पूर्ण बनाती है। गुरु-कृपा साधक में साधना के रूप में कार्य करती है। यदि साधक अपने पथ में दृढ़तापूर्वक संलग्न रहता है, तो यह गुरु-कृपा है। यदि प्रलोभन के अभ्याक्रमण करने पर वह प्रतिरोध करता है, तो यह गुरु कृपा है। यदि लोग प्रेम तथा सम्मान के साथ उसका स्वागत करते हैं, तो यह गुरु कृपा है। यदि उसे सम्पूर्ण शारीरिक आवश्यकताएँ सुलभ हैं, तो यह गुरु-कृपा है। यदि नैराश्य तथा अवसाद के समय उसे प्रोत्साहन तथा बल प्राप्त होता है, तो यह गुरु-कृपा है। यदि वह शरीर चेतना का अतिक्रमण कर जाता है और अपने आनन्द-स्वरूप में विश्राम करता है, तो यह गुरु कृपा है। प्रत्येक पग पर उसकी कृपा का अनुभव कीजिए तथा उसके प्रति निष्कपट तथा सत्यनिष्ठ रहिए।

 

गुरु की उपदेश-विधि

 

गुरु वैयक्तिक उदाहरण द्वारा शिक्षा देता है। गुरु का दैनन्दिन आचरण सतर्क शिष्य के लिए एक जीवन्त आदर्श है। सच्चे शिष्य के लिए गुरु का जीवन एक जीवन्त धर्मोपदेश है। शिष्य अपने गुरु के निरन्तर सम्पर्क द्वारा उसके सद्गुणों को आत्मसात् करता है। वह शनैः-शनैः नव-आकार लेता है। छान्दोग्योपनिषद् को पढ़िए। उसमें आप पायेंगे कि इन्द्र प्रजापति के पास एक सौ एक वर्ष तक रहे और उनकी अनन्य भाव से सेवा की।

 

अपने शिष्यों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को केवल गुरु ही जानता है। वह शिष्य की प्रकृति तथा विकास के अनुसार उपदेश देता है। इस उपदेश को गुप्त रखना चाहिए। शिष्यों में उसकी परिचर्चा गुरु की आलोचना तथा साधना में शिथिलता की ओर ले जाती है। आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो पाती है। गुरु के उपदेश का अक्षरशः पालन कीजिए। स्मरण रखिए कि वह केवल आपके लिए है। अन्य शिष्यों ने भी गुरूपदेश ग्रहण किया हुआ है। उन्हें उसका पालन करने दीजिए। आपने जो उपदेश प्राप्त किया है, उसे दूसरों पर थोपिए

 

शिष्य अपनी निष्ठा की मात्रा के अनुपात में ही अपने गुरु से आत्मसात् अथवा प्राप्त करता है। जब गुरु आध्यात्मिक उपदेश देने के लिए शिष्य के पास आता है, उस समय शिष्य यदि ध्यान नहीं देता, वह यदि अभिमानी और लापरवाह है, यदि वह अपने हृदय-द्वार में अर्गला लगा देता है, तो वह लाभान्वित नहीं होता।

 

गुरु द्वारा परीक्षा

 

सद्गुरु बार-बार अनुनय-विनय करने तथा कठोर परीक्षा लेने के पश्चात् ही अपने विश्वस्त शिष्यों को उपनिषद् के गूढ़ रहस्यों को बतलाता है। गुरु कभी-कभी अपने शिष्य को प्रलोभित कर सकता है; किन्तु शिष्य को चाहिए कि गुरु में दृढ़ निष्ठा के द्वारा इसे पार कर जाये।

 

प्राचीन काल में बहुत ही कठिन परीक्षाएँ ली जाती थीं। एक बार गोरखनाथ ने अपने कुछ शिष्यों को एक ऊँचे वृक्ष पर चढ़ने तथा उनसे शिर के बल नीचे एक तीक्ष्ण त्रिशूल के ऊपर कूदने के लिए कहा। अनेक अविश्वासी शिष्य निश्चल खड़े रह गये; किन्तु एक निष्ठावान् शिष्य तत्काल विद्युत्-गति से वृक्ष पर चढ़ गया और वहाँ से नीचे त्रिशूल पर कूद गया। गोरखनाथ के अदृश्य हाथों ने उसकी रक्षा की। उसे तत्काल आत्म-साक्षात्कार प्राप्त हुआ

 

एक बार वैशाखी के अवसर पर गुरु गोविन्दसिंह ने अपने शिष्यों की परीक्षा ली। उन्होंने कहा : "मेरे प्रिय शिष्यो ! है कोई ऐसा जो धर्म के लिए अपने प्राण दे सके ?” सुनते ही सभा में सन्नाटा छा गया। परन्तु पहले एक शिष्य खड़ा हो गया। उसे गुरु अपने खेमे में ले गये। वहाँ पर एक बकरे की बली दे कर खून से सनी तलवार ले कर बाहर आये और बोले— “और कौन धर्म के लिए शीश देने के लिए तैयार है ?” तत्पश्चात् एक के बाद एक चार शिष्यों ने अपने को प्रस्तुत किया और चारों बार वही हुआ जो पहले शिष्य के साथ हुआ था। तदुपरान्त गुरु पाँचों शिष्यों को खेमे से बाहर ले कर आये और उन्हें 'पंच प्यारे' कह कर सम्मानित किया।

 

गुरु शिष्यों की विविध प्रकार से परीक्षा लेता है। कुछ शिष्य उन्हें गलत समझते हैं और उनमें अपनी निष्ठा खो बैठते हैं। अतः वे लाभान्वित नहीं होते।

 

चार प्रकार के शिष्य

 

सर्वोत्तम शिष्य भूतेल (पेट्रोल) अथवा उड्डयन आसव की भाँति होता है। वह बहुत दूर से गुरु के उपदेश के स्फुलिंग के प्रति तत्काल प्रतिक्रिया करता है।

 

द्वितीय प्रकार का शिष्य कर्पूर की भाँति होता है। एक स्पर्श उसकी अन्तरात्मा को उदबुद्ध बनाता और उसमें आध्यात्मिकता की अग्नि प्रज्वलित करता है।

 

तृतीय प्रकार का शिष्य कोयले की भाँति होता है। उसमें भाव उत्पन्न करने के लिए गुरु को कठोर श्रम करना पड़ता है।

 

चतुर्थ प्रकार का शिष्य कदली-स्तम्भ की भाँति होता है। उस पर किया गया कोई भी प्रयास सफल नहीं होता। गुरु चाहे कुछ भी करे, वह भावशून्य तथा निष्क्रिय बना रहता है।

 

सुन्दर ढंग से तैयार की हुई मूर्ति अथवा प्रतिमा के लिए दो वस्तुएँ आवश्यक होती हैं। एक है संगमरमर का पूर्ण अनवद्य सुन्दर प्रस्तर-खण्ड तथा दूसरा है निपुण मूर्तिकार सुन्दर प्रतिमा के उत्कीर्णन तथा तक्षण के लिए संगमरमर-खण्ड को अप्रतिबन्ध रूप से मूर्तिकार के हाथों में रहना चाहिए। इसी भाँति शिष्य को भी अपने को निर्मल तथा शुद्ध करना और पूर्णतया अनिन्द्य संगमरमर का प्रस्तर-खण्ड बनाना चाहिए तथा अपने गुरु के कुशल मार्ग-निर्देशन में रख कर उसे भगवान् की मूर्ति के रूप में उत्कीर्णन तथा तक्षण के लिए खुला छोड़ देना चाहिए

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

तृतीय अध्याय

पावन गुरुपूर्णिमा-दिवस की अर्थवत्ता

 

शंकरं शंकराचार्य केशवं बादरायणम्

सूत्रभाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः ।।

 

"श्री शंकराचार्य साक्षात् शंकर हैं और वेदव्यास साक्षात् विष्णु-रूप हैं। में ब्रहासूग तथा उसके भाष्यकर्तादोनों भगवत्स्वरूपों की बारम्बार वन्दना करता हूँ "

(गुरुवन्दनम् )

 

आषाढ़ मास की पूर्णमासी गुरुपूर्णिमा का अतीव मांगलिक तथा पवित्र दिवस है। महर्षि श्री व्यास भगवान् अथवा श्रीकृष्ण द्वैपायन के स्मृति दिवस इस आषाढ़ पूर्णिमा के दिन संन्यासी स्वाध्याय, वेदान्त-विचार तथा महर्षि व्यास द्वारा रचित अतीव श्लाघ्य ब्रह्मसूत्रों पर प्रवचन करने के लिए एक स्थान पर टिक कर निवास करते हैं। श्री वेदव्यास ने चारों वेदों का सम्पादन तथा अठारह पुराणों, महाभारत और भागवत की रचना कर मानव-जाति की अविस्मरणीय शाश्वत सेवा की है। हम उनके प्रति गम्भीर कृतज्ञता के ऋण से जो ऋणी हैं, उसके परिशोधन का प्रयास उनकी रचनाओं के निरन्तर स्वाध्याय तथा इस कलियुग में मानवता के पुनरुद्धार के लिए उन्होंने जो उपदेश दिये हैं, उनके आचरण से कर सकते हैं। सभी साधक तथा भक्त गण इस दिव्य श्रेष्ठ पुरुष के सम्मान में आज के दिन व्यास-पूजा करते हैं, साधक अपने गुरु की पूजा करते हैं; साधु-महात्माओं का सम्मान तथा आतिथ्य-सत्कार किया जाता है तथा गृहस्थी बड़ी श्रद्धा तथा निष्कपटता से दान-पुण्य करते हैं। संन्यासियों का चातुर्मास आज के दिन से ही आरम्भ होता है। संन्यासी वर्षा ऋतु के चार मासों में एक स्थान पर रह कर ब्रह्मसूत्रों का स्वाध्याय तथा निदिध्यासन करते हैं।

 

इस महत्त्वपूर्ण दिवस की गम्भीर अर्थवत्ता पर पूर्ण ध्यान दें। आषाढ़ पूर्णिमा चातुर्मास अथवा उत्सुकतापूर्ण प्रतीक्षित वर्षा के प्रारम्भ की घोषणा करती है। उष्ण ग्रीष्म ऋतु में कर्षित तथा मेघ के रूप में संचित जल अब प्रचुर वृष्टि के रूप में प्रकट होता है जो सर्वत्र नव-जीवन के आगमन का प्रारम्भक है। इसी भाँति आप सबने भी अपने अध्यवसायी परिशीलन द्वारा जिन सिद्धान्तों तथा तत्त्वज्ञान को अपने में संचित कर रखा है, गम्भीरतापूर्वक उन सबको वास्तविक कार्य रूप में परिणत करना आरम्भ कर दें। आज के दिन से ही व्यावहारिक आध्यात्मिक साधना प्रारम्भ करें। आध्यात्मिकता की नवीन लहरें उत्पन्न करें। जो कुछ आपने पढ़ा, सुना, देखा तथा सीखा है, उस सबको साधना द्वारा विश्व-प्रेम के अविरत भावोद्गार, अविराम प्रेममयी सेवा तथा प्राणियों में विराजमान प्रभु की सतत पूजा तथा प्रार्थना में परिणत होने दें।

 

आज के दिन दूध तथा फल पर निर्वाह करें और उग्र जप तथा ध्यान का अभ्यास करें। चातुर्मास काल में ब्रह्मसूत्र का स्वाध्याय तथा अपने गुरु-मन्त्र अथवा इष्ट-मन्त्र का कुछ लाख जप का अनुष्ठान अथवा पुरश्चरण करें। इससे आप अत्यधिक लाभान्वित होंगे।

 

यह दिव्य गुरु-पूजा-दिवस के रूप में सच्चे शिष्य के लिए विशुद्ध आनन्द का दिन है। अपने परम प्रिय गुरु को अपनी श्रद्धांजलि अर्पण की प्रत्याशा से पुलकित साधक इस अवसर की उत्सुकता तथा श्रद्धा के साथ प्रतीक्षा करते हैं। एकमात्र गुरु ही मोह-पाश को भंग करता तथा साधक को सांसारिक जीवन के बन्धन से मुक्त करता है। श्रुति कहती है

 

यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ

तस्यैते कथिता हार्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ।।

"जिसकी परमेश्वर में परम भक्ति होती है तथा जिस प्रकार परमेश्वर में होती है उसी प्रकार अपने गुरु में होती है, उस महात्मा पुरुष के हृदय में ही ये रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं" (श्वेताश्वतर उपनिषद् : -२३) गुरु साक्षात् ब्रह्म है। वह आपकी अन्तरतम सत्ता से आपका पथ-प्रदर्शन करते तथा आपको प्रेरणा देते हैं।

 

समस्त जगत् को गुरु-स्वरूप देखें

 

नवीन दृष्टिकोण अपनायें। समस्त जगत् को गुरु-स्वरूप देखें। इस सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ में गुरु के मार्ग-दर्शक कर, उद्बोधक वाणी तथा प्रबोधक संस्पर्श के दर्शन करें। अब समग्र जगत् आपकी परिवर्तित दृष्टि के समक्ष रूपान्तरित रूप में स्थित होगा विराट् गुरु जीवन के सभी मूल्यवान् रहस्यों का उद्घाटन कर ज्ञान प्रदान करेंगे। दृश्य प्रकृति के रूप में अभिव्यक्त परम गुरु आपको जीवन की सर्वाधिक उपयोगी शिक्षाएँ प्रदान करेंगे। इन गुरुओं के गुरु की, उस गुरु की जिसने अवधूत दत्तात्रेय को भी उपदेश दिया, नित्य पूजा कीजिए। अपनी उदात्त सहिष्णुता वाली मौन परम सहनशीला पृथ्वी, स्वैच्छिक आत्म-बलिदान करने वाला छायादार फलदायक वृक्ष, नन्हें बीज में धैर्यपूर्वक शान्त पड़ा रहने वाला महान् पीपल, अपने अध्यवसाय से शिलाओं को घिस डालने वाली टपकने वाली बूँदें, सुव्यवस्थित समयनिष्ठ तथा नियमनिष्ठ ग्रह तथा ऋतुएँये सब उनके लिए दिव्य गुरु हैं जो देखता, सुनता तथा ग्रहण करता है।

 

शुद्धता एवं उन्नति

 

ग्रहणशीलता के मूर्त रूप बनें। अपनी क्षुद्र अहं भावना से अपने को रिक्त बनायें प्रकृति के वक्षस्थल में बन्द समस्त निधि आपकी हो जायेगी। आप अल्प काल में ही आश्चर्यजनक उन्नति तथा पूर्णता प्राप्त करेंगे। पर्वतीय समीर की भाँति शुद्ध तथा अनासक्त बनें। जैसे सरिता अपने लक्ष्य सागर की ओर अनवच्छिन्न, अनवरत तथा निरन्तर प्रवाहित होती है, वैसे ही आप अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में सच्चिदानन्द की परमावस्था की ओर गति करके अपने सभी विचार, वाणी और कर्म को केवल चरम लक्ष्य की ओर निर्देशित करें।

 

चन्द्रमा सूर्य के चकाचौंध करने वाले प्रकाश को प्रतिबिम्बित कर चमकाता है। पूर्णिमा का राकेन्दु ही सूर्य के तेजस्वी प्रकाश को उसके पूर्ण वैभव में प्रतिबिम्बित करता है। वह सूर्य को महिमान्वित करता है। सेवा तथा साधना की अग्नि द्वारा अपने को शुद्ध बनायें तथा राकेश की भाँति आत्मा के तेजस्वी प्रकाश को प्रतिबिम्बित करें। प्रकाशों के प्रकाश ब्रह्म-वैभव के पूर्ण परावर्तक बनिए। देदीप्यमान सूर्यों के सूर्य, दिव्यता के जीवन-साथी बनने को अपना लक्ष्य बनाइए

 

तत्त्वमसि

 

एकमात्र ब्रह्म अथवा परमात्मा ही सत् है। वह सबका आत्मा है। वह सर्वस्व है। वह इस ब्रह्माण्ड का सारतत्त्व है। वह ऐसा अद्वैत तत्त्व है जो प्रकृति की सभी विविधताओं तथा भिन्नताओं में कभी भी द्वैत स्वीकार नहीं करता। आप वही अमर, सर्वव्यापक, सर्वानन्दमय ब्रह्म हैं। तत्त्वमसितुम वही (ब्रह्म) हो। इसका साक्षात्कार करें तथा मुक्त बनें।

 

ब्रह्मसूत्र के ये चार महत्त्वपूर्ण सूत्र स्मरण रखें :

 

()          अथातो ब्रह्मजिज्ञासा- अब यहाँ से ब्रह्म-विषयक विचार आरम्भ किया जाता है (--);

()          जन्माद्यस्य यतः इस जगत् के जन्मादि जिससे होते हैं (--);

()          शास्त्र योनित्वात्शास्त्र में ब्रह्म को जगत् का कारण बताया गया है (--); तथा

()          तत्तु समन्वयात्वह ब्रह्म समस्त जगत् में अनुगत होने से (उपादान भी है) (--)

 

 

 

अब गायें :

 

जय परम गुरु शिव गुरु हरि गुरु राम

जगद्गुरु गुरु सद्गुरु श्याम ।।

 

श्री व्यास तथा ब्रह्मविद्यागुरुओं को स्मरण करें तथा उनकी पूजा करें। आप सबको उनका आशीर्वाद प्राप्त हो! आप सब अविद्या-ग्रन्थि का उच्छेदन कर भाग्यशाली जीवन्मुक्तों की भाँति सर्वत्र शान्ति, आनन्द तथा प्रकाश विकीर्ण करते हुए देदीप्यमान हों!

 

 

चतुर्थ अध्याय

 

महर्षि व्यास तथा हिन्दू-शास्त्रों को उनका योगदान

 

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविन्दायतपत्र नेत्र

येन त्वया भारततैलपूर्णः प्रज्वालितो ज्ञानमयः प्रदीपः ।।

 

"हे प्रस्फुटित पद्म-पत्र सदृश नेत्र विशिष्ट महामति व्यास आपको नमस्कार; जिसने महाभारत सदृश तैल द्वारा परिपूर्ण ज्ञानमय प्रदीप प्रज्वलित किया है।"

(गीताध्यानम् )

 

प्राचीन काल में हमारे पूर्वज, आर्यावर्त के ऋषिजन व्यासपूर्णिमा- जो कि हिन्दू-पंचांग में एक विशिष्ट तथा महत्त्वपूर्ण दिवस हैके उत्तरवर्ती चार महीनों में तपस्या करने के लिए वन में चले जाया करते थे। इस स्मरणीय दिवस को ही भगवान् के अवतार व्यास जी ने अपने ब्रह्मसूत्रों की रचना आरम्भ की थी। हमारे प्राचीन ऋषि यह तपस्या गुहाओं तथा वनों में करते थे; किन्तु अब समय परिवर्तित हो चला है और यद्यपि ऐसे गृहस्थ तथा राजा अविद्यमान नहीं हैं जो ऐसी सहायता तथा सुविधाएँ जो वे प्रदान कर सकते हैं, चतुर्थ आश्रमियों के अधिकार में देने को समर्थ तथा उत्सुक हैं, पर ऐसी सुविधाएँ अब सर्वसुलभ नहीं रही हैं। वनों एवं गुहाओं का स्थान उनके गुरुद्वारों और मठों के कुटीरों ने ले लिया है। व्यक्ति को अब आवश्यकतावश अपने को स्थानों तथा समयों के उपयुक्त बनाना होगा। स्थान तथा परिस्थिति के परिवर्तन से हमारी मानसिक अभिवृत्ति में इतना अधिक अन्तर नहीं आने देना चाहिए। चातुर्मास व्यासपूर्णिमा-दिवस से आरम्भ होता है। शास्त्र के अनुसार हमसे अपेक्षा की जाती है कि हम इस दिन व्यास तथा ब्रह्मविद्या-गुरुओं की पूजा करें तथा ब्रह्मसूत्रों और अन्य आर्ष ग्रन्थों का स्वाध्याय आरम्भ कर दें।

 

कृष्णद्वैपायन का जन्म

 

हमारे पुराण अनेक व्यासों का उल्लेख करते हैं और ऐसा कहा जाता है कि द्वापर युग के अन्त में प्रस्तुत व्यासकृष्णद्वैपायनके जन्म लेने से पूर्व अट्ठाईस व्यास हो चुके थे। उनका जन्म कुछ विलक्षण तथा असाधारण परिस्थितियों में पराशर ऋषि के द्वारा मत्स्य-कन्या सत्यवती से हुआ। पराशर परम ज्ञानी तथा फलित ज्योतिष के सर्वोच्च विशेषज्ञों में से एक थे। उन द्वारा रचित 'पाराशर होरा' आज भी फलित ज्योतिष का पाठ्य-ग्रन्थ है। उन्होंने 'पाराशर स्मृति' के नाम से एक स्मृति ग्रन्थ की भी रचना की। इसे इतना अधिक सम्मान प्राप्त है कि मानव-विज्ञान तथा नीति-शास्त्र के वर्तमान कालिक लेखक इसका उद्धरण देते हैं। पराशर को पता चला कि अमुक घटिका में गर्भधारण करने वाला बालक महत्तम युगपुरुष के रूप में जन्म लेगा। इतना ही नहीं, वह साक्षात् भगवान् विष्णु का अंश होगा। उस दिन पराशर ऋषि नौका द्वारा यात्रा कर रहे थे। उन्होंने नाविक को इस आसन्न शुभ घड़ी के सम्बन्ध में बतलाया। नाविक के एक विवाहोपयुक्त वयस्क पुत्री थी। वह ऋषि की सन्तता तथा महत्ता से प्रभावित हो गया। उसने पराशर को विवाह में अपनी पुत्री भेंट कर दी। इस युग्मन से हमारे व्यास का जन्म हुआ। कहा जाता है कि उनका जन्म स्वयं भगवान् शिव के आशीर्वाद से हुआ जिन्होंने एक उच्च कोटि के ज्ञानी ऋषि का एक निम्न कुलोत्पन्न कन्या से संयोग को आशीर्वाद दिया था।

 

हिन्दू-शास्त्रों को उनका महान् योगदान

 

अत्यल्पवयस्कावस्था में ही व्यास ने अपने माता-पिता को अपने जीवन के रहस्य से अवगत करा दिया था कि वे वन में जा कर अखण्ड तप करेंगे। उनकी माता प्रथम तो सहमत नहीं हुई; किन्तु बाद में उन्होंने इस आवश्यक प्रतिबन्ध पर अपनी अनुमति प्रदान कर दी कि जब कभी उनको उनकी उपस्थिति की इच्छा हो, वे उनके सम्मुख प्रकट हो जायें। यह स्वयं इस बात को व्यक्त करता है कि माता-पिता तथा पुत्र कितने दूरदर्शी थे। पुराणों का कथन है कि व्यास ने अपने इक्कीसवें गुरु वसुदेव ऋषि से दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने सनक तथा सनन्दन ऋषियों तथा अन्य लोगों से शास्त्रों का अध्ययन किया। उन्होंने मानव हितार्थ वेदों का वर्गीकरण किया तथा श्रुतियों के आशु तथा सहज बोध के लिए ब्रह्मसूत्रों की रचना की। उन्होंने महाभारत का भी प्रणयन किया जिससे कि