भगवन्नाम की महिमा

 

स्वामी चिदानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटीना

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

 www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

 

 

प्रथम संस्करण : २०१७

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

परम पूज्य श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज के

१०१वें जन्मदिवस के

पावन अवसर पर प्रकाशित

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर-२४९१९२,

जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड' में मुद्रित

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विषय-सूची

 

भगवन्नाम की महिमा.. 4

आपके जीवन में धर्म का स्थान. 10

भक्ति-मोक्ष का श्रेष्ठ साधन. 17

हमारे तीन ऐश्वर्य. 23

हर क्षण आप भगवान् के सान्निध्य में हैं. 27

निष्काम कर्म योग का उद्देश्य... 36

सुखी जीवन के लिए साधना.. 41

साधना का आन्तरिक स्वरूप. 47

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भगवन्नाम की महिमा

( मुम्बई में ३१..८४ को दिया गया प्रवचन)

 

 

प्यारे उज्वल आत्मस्वरूप, परमपिता परमात्मा की दिव्य अमर सन्तान !

 

मानव जन्म ऊर्ध्वगामी प्रगति का द्वार है। पशु-पक्षी, कीट-पतंग, अन्य प्राणी वर्ग में और मनुष्य के जीवन में यही अन्तर है। अन्य पशु वर्ग जिस भूमिका में अपना जन्म लेते हैं, उसी भूमिका में, उसी स्तर पर जीवन पर्यन्त व्यवहार एवं चेष्टा करते रहते हैं। अपनी आयु को पूरी करके उसी भूमिका में अपने जीवन का अवसान कर देते हैं। शारीरिक दृष्टि से तो प्रगति होती है, खा-पीकर, मेहनत करके, आराम करके हृष्ट-पुष्ट बनते हैं, किन्तु किसी प्रकार की मौलिक आन्तरिक प्रगति नहीं होती है। उनका वर्ग ही ऐसा है कि कोई प्रगति की गुंजाइश ही नहीं है, प्रबन्ध नहीं है। केवल मात्र जीवात्मा जब मानव के रूप में आता है तो उसके लिए ऊर्ध्वगामी प्रगति के लिए द्वार खुल जाता है। इस ऊर्ध्वगामी प्रगति की सीमा कहाँ है? इसकी सीमा भगवदाकार अवस्था को प्राप्त करने तक है। मनुष्यत्व प्राप्त होने का अर्थ यही है कि परिपूर्ण दिव्यता की ओर आपकी यात्रा प्रारम्भ हो गई है।

 

हमारे ऋषि-मुनि, ज्ञानी, सन्त एवं तत्त्ववेत्ता महापुरुषों ने अपनी अपरोक्ष अनुभूति से जान लिया था कि परब्रह्म तत्त्व से सब कुछ प्रकट हुआ है। परब्रह्म तत्त्व के आधार पर ही सब कुछ अस्तित्व में है और अन्त में परब्रह्म तत्त्व में लीन होने के लिए ही सब कुछ प्रस्तुत है। भगवान् अथवा  ब्रह्मन् ही हमारा आदिमूल, सूक्ष्म, अदृश्य आधार है। हमारे जीवन का अन्तिम लक्ष्य भी यही है, हमारा जीवन तभी सफल होगा जब हम, जहाँ से हमारी उत्पत्ति है, वहीं जाकर विलीन हो जाएँगे, जैसे नदियाँ सागर में समा जाती हैं।

 

भगवान् की परिपूर्ण दिव्यता को प्राप्त करना ही प्रत्येक जीवात्मा का परम सौभाग्य है। भगवान् ने जब जीवात्मा को यहाँ पर भेजा तो साथ में ऊर्ध्वगामी प्रगति के लिए सामग्री भी भेज दी। मुख्य सामग्री क्या है? मानव व्यक्तित्व में चार प्रकार की शक्तियाँ निहित हैं- शरीर की क्रिया शक्ति, मन की चिंतन शक्ति, हृदय की भाव शक्ति तथा बुद्धि की विवेक-विचार करने की शक्ति। नित्य-अनित्य क्या है? परिपूर्ण-अपूर्ण क्या है? आत्म तत्त्व अनादि-अनन्त है और अनात्मा अनित्य, नाशवान, अशाश्वत है-ऐसा विचार बुद्धि के द्वारा ही किया जा सकता है। भगवतोन्मुख दिशा में प्रवृत्त होकर हर दिन ऊँचा उठने के लिए इन चारों शक्तियों को लगा देना ही दिव्य जीवन है। भगवान् ने परिपूर्ण दिव्यता प्राप्त करने के उद्देश्य से ही मानव को ये क्षमताएँ देकर भेजा है। भगवान् ने हमें यहाँ हाय-हाय करके रोने के लिए नहीं भेजा है। तापत्रय, जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि एवं सुख-दुःख आदि को अनुभव करने के लिए नहीं भेजा है, ये सब गौण हैं। पूर्वजन्मकृत शुभाशुभ कर्मों के कारण सुख-दुःख आदि अनुभवों को भोगना अनिवार्य है, क्योंकि कर्मों के हिसाब को यहाँ खत्म करना है। जीवन में आये हुए भोगों को भोगते समय तुम्हारे मन की क्या वृत्ति है, भगवान् के द्वारा दी गयी शक्तियों का कैसे प्रयोग कर रहे हो ? यही जीवन का सच्चा एवं असली स्वरूप है, सारभूत तत्त्व है, मार्मिक अर्थ है। हमारे भविष्य का निर्माण भोग से नहीं होता, आगामी कर्मों से होता है जिसे उचित पुरुषार्थ कहते हैं। भविष्य का निर्माण काला होना चाहिए या सुनहरी, दुःखमय होना चाहिए या सुखमय? इसका सटीक उत्तर यही है कि कोई भी दुःख दर्द को नहीं चाहता, सभी सुखमय जीवन चाहते हैं, उज्वल भविष्य एवं शान्तिपूर्ण जीवन चाहते हैं। अन्त में जाकर परिपूर्ण दिव्यता को प्राप्त करने के लिए साधना करने का, उचित पुरुषार्थ करने का समय यही है। यदि इस समय को हमने खो दिया तो आगे अवसर नहीं मिलेगा। अतः ऐसे कर्म करें जिससे हमें सन्तुष्टि एवं प्रसन्नता मिले, कर्म हमें रूलाएँ नहीं। भगवान् ने हमें जब मानव जीवन का अमूल्य उपहार दिया है तो अपने परम लक्ष्य को प्राप्त कर लें।

 

लोग प्रश्न करते हैं कि महान् लक्ष्य की प्राप्ति से क्या प्रयोजन है? इसका प्रयोजन यही है कि परिपूर्ण दिव्यता को यहीं पहचान कर प्राप्त कर लेते हैं। भगवान् की क्या अवस्था है एवं क्या स्वरूप है? इस सम्बन्ध में भगवान् के अनुभव को प्राप्त किये हुए तत्त्ववेत्ता, ब्रह्मज्ञानी उपनिषद् में बताते हैं। भगवान् का अनुभव क्या होता है? भगवान् का अनुभव शत प्रतिशत केवल मात्र अवर्णनीय दिव्य आनन्द है। अद्भुत अतुलनीय आनन्द-इसमें किसी अन्य तत्त्व का मिश्रण नहीं है। प्रपंच में मिश्रित अनुभव होते हैं, सुख चाहते हो तो दुःख का अनुभव लेना ही पड़ेगा। द्वन्द्व से परे जाकर केवल आनन्द के अनुभव को प्राप्त करना है तो उसका एक ही उपाय है कि आनन्दस्वरूप पर ब्रह्म तत्त्व ईश्वर के सान्निध्य में ही निवास करें। वे ही हमारे सर्वस्व, माता-पिता, बन्धु-सखा, बुद्धि एवं धन हैं। प्रातः रोजाना प्रार्थना करके, हमने उनको पूजा घर में ही सीमित कर दिया है, व्यवहार क्षेत्र में भगवान् भूल जाते हैं इस कारण हम भगवान् के परमानन्द से वंचित रह जाते हैं। यदि वे हमारे सर्वस्व हैं तो उनको प्राथमिकता देकर जीवन में केन्द्रीय स्थान देना चाहिए। प्रपंच में मनसा वाचा कर्मणा सबसे अधिक उनको मूल्यता देकर भगवतोन्मुख चेष्टा होनी चाहिए। यदि उनको प्राप्त कर लिया तो सब कुछ प्राप्त कर लिया। यदि सब कुछ प्राप्त कर लिया और उनको प्राप्त नहीं किया तो कुछ भी प्राप्त नहीं किया, जीवन को वृथा खो दिया। जैसे अध्यापक बोर्ड पर चॉक से ज़ीरो-ज़ीरो लिखता जाये तो उसका कोई मूल्य नहीं होता। यदि उसके आगे एक लिख दे तो एक ज़ीरो से दस, दो ज़ीरो से सौ, तीन ज़ीरो से हजार, इस प्रकार लाख-करोड़ बढ़ते चले जायेंगे। यदि एक नहीं है तो हज़ार ज़ीरो भी शून्य ही कहलायेंगे।

 

संसार के दुःख-शोक, संकट-तकलीफ, चिंता से मुक्त होकर अनादि अनन्त काल के लिए अपने आप को निरन्तर आनन्द में ही स्थापित करना चाहते हैं तो प्रभु प्राप्ति के मार्ग में अभी से लग जाना चाहिए। समय बड़ा विचित्र है। मिनट, घड़ी, दिन-रात सप्ताह-मास और वर्ष कैसे चले जाते हैं, पता ही नहीं पड़ता। ऐसे लगता है जैसे कल ही हम छोटे बच्चे होकर स्कूल पढ़ने जाते थे और अब यहाँ से चले जाने की अवस्था गयी है। यह भगवान् की प्रबल माया ही है कि व्यक्ति को समय का व्यय और आयु की क्षीणता का भान ही नहीं होता। इसलिए अपने लक्ष्य की प्राप्ति में विलम्ब नहीं करना चाहिए। तुरन्त ऐसे सत्कार्यों में लग जाना चाहिए जो हमें भगवान् के निकट पहुँचाते हैं। सदाचारपूर्ण और परोपकारमय सुन्दर सात्विक जीवन में लग जाना चाहिए, यही सुन्दर अवसर है।

 

भगवान् के अनेक स्वरूप एवं शक्तियाँ हैं। हर एक शक्ति का एक साकार स्वरूप मानकर हम उनकी उपासना करते हैं। वैसे तो हम सत्य सनातन वैदिक धर्म के अनुयायी हैं तो एक ही भगवान् में विश्वास रखते हैं 'एकमेव अद्वितीयं ब्रह्म' भले ही अनेक नाम हों लेकिन ब्रह्म एक ही है, अद्वितीय है। इस अद्वितीय तत्त्व को ईश्वर, परब्रह्म कहते हैं। किन्तु रूप या आकृति का अवलम्बन नहीं होता है तो मानव का मन टिकता नहीं है। केवल सूक्ष्म, अव्यक्त, अदृश्य के ऊपर मन को टिकाये रखना कठिन है। मन चंचल एवं स्थूल है। सूक्ष्मता को प्राप्त करने के लिए मन को भले ही लगाये रखो लेकिन हजार में से नौ सौ निन्यानवे के मन में इतनी सूक्ष्मता नहीं है कि निराकार तत्त्व पर उनकी धारणा हो जाये। हमारे मन की कमी और कमज़ोरी के कारण हम निराकार तत्त्व का ध्यान नहीं कर सकते हैं। भगवान् की उपासना, प्रार्थना, ध्यान करने में मन को सहायता मिल सके, इसलिए भगवान् ने असीम कृपा से अपने साकार स्वरूप को प्रकट किया है।

 

वर्तमान समय में जो गणेश चतुर्थी की वार्षिक पूजा हो रही है, वह परब्रह्म परमात्मा की शक्ति का प्रकट स्वरूप है। यह शक्ति, मानव जीवन की प्रगति में जितनी भी बाधाएँ आती हैं, उनका नाश कर देती है। हमें सत्य संकल्प करके अच्छे कार्यों में लग जाना चाहिए। पुरुषार्थ को सफल करने वाली, हमारे कार्यों को सिद्ध करने वाली, भगवान् की इस शक्ति को कहते हैं 'गणेश' जो विघ्नविनायक हैं, सिद्धिदायक हैं, इसलिए इनको 'सिद्धि विनायक विघ्नेश्वर' कहते हैं। सब विघ्नों का विनाश करने वाले तथा सिद्धि प्रदाता हैं। हमारा सौभाग्य है कि उनके आशीर्वाद से मानव जीवन को परिपूर्ण करने वाला, मानव को आप्तकाम और कृत-कृत्य करने वाला उनका यह स्वरूप है।

 

आज गणेश पूजा का पुण्य पर्व है। परम लक्ष्य एवं परम कल्याण प्राप्ति का जो उद्देश्य है, उसे सर्वभाव से प्राप्त करने का यह शुभ मुहूर्त है। यदि सत्य संकल्प लेकर साधनामय जीवन बना लेंगे, परोपकार, भक्ति, भजन, योगाभ्यास में लग जायेंगे तो प्रभु के आशीर्वाद, अनुग्रह एवं कृपा से सफलता अवश्य मिलेगी। साथ ही काया वाचा मनसा हमारे बाहरी क्षेत्र में समस्त व्यवहार को इस प्रकार करें जो हमें भगवान् की ओर ले जाये। कौटुम्बिक व्यवहार में, औद्योगिक क्षेत्र में, सामाजिक क्षेत्र में भी भगवतोन्मुखी दिशा होनी चाहिए। समस्त व्यवहार में धर्म तत्त्व व्यापक रूप से विराजमान होना चाहिए। धार्मिक जीवन भगवान् की तरफ ले जाता है। अधार्मिक जीवन भगवान् से वंचित कर देता है।

 

हमारे पूर्वजों ने पुरुषार्थ चतुष्टय में धर्म को प्रथम स्थान दिया है। धर्म के विस्मरण से खाने, पीने, कमाने में विषमता जाती है। व्यास भगवान् ने अठारह पुराण, ब्रह्मसूत्र, भागवत, महाभारत में मानव के लिए सुख प्राधि का मार्ग बताया है। जो धर्म का अनुसरण करता है उसे सुख मिलेगा। आर नहीं तो कल मिलेगा, यह त्रिबार सत्य है। बड़े आश्चर्य की बात है कि हम सुख को चाहते हैं और उल्टा काम करके सुख से वंचित हो जाते हैं। हम अपने व्यवहार में व्यापक रूप से धर्म को बनाये रखें। हृदय में प्रभु के प्रति प्रेम रखें सर्वदा उनका चिंतन करें। नित्य अनित्य का विवेक हो और सदा नित्य की ओर ही जायें।

 

सत्य संकल्प लेने के लिए, निश्चयात्मक निर्णय करने के लिए और नये रास्ते में प्रवृत्त होने के लिए आज अच्छा सुन्दर समय है, अतः विलम्ब नहीं करना चाहिए। यह शुभ मुहूर्त केवल पटाखे छोड़ कर खुश होने के लिए नहीं है, बल्कि जीवन में नयी ज्योति जगाने, जीवन को नयी दिशा देने, नये अर्थ को प्राप्त करने का है। जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाकर दिव्य जीवन बनाने का है। कबीर दास जी कहते हैं कि इस अवसर को खोना नहीं चाहिए क्योंकि 'जब चिड़ियन खेती चुगि डाली फिर पछताये क्या होवत है जो भी सत्कार्य सामने जाये, उसी समय कर देना चाहिए। कहा गया है,

 

कालक्षेपो कर्त्तव्यः क्षीणमायु क्षणे क्षणे।

यमस्यकरुणानास्ति कर्त्तव्यं हरि कीर्तनम् ।।

कर्त्तव्यं हरि चिन्तनम्

 

प्रभु आपको ऐसी आन्तरिक शक्ति दें। घर-बार छोड़कर अरण्य में जाकर गुहा-कन्दरा में बैठकर भगवान् प्राप्त होते हैं, ऐसी बात नहीं है। हम अपने व्यावहारिक जीवन को धर्ममय, भक्तिमय, दिव्य जीवन बनाकर रखेंगे तो ये सब यहीं भगवद् प्राप्ति के लिए सोपान बन जायेंगे। सदा सर्वदा भगवान् का स्मरण करें एवं मुख से नाम रटते रहें। नाम भगवान् का साक्षात् स्वरूप है। नाम और नामी में कोई अन्तर नहीं है, दोनो परस्पर अभिन्न हैं।

 

वेदान्त भी इसकी पुष्टि करता है। अप्रकट 'एकमेवाद्वितीयम्' अवस्था से ब्रह्म ने अनेक होने का संकल्प किया। पहले आद्य स्पंदन नाद के रूप में प्रणव प्रकट हुआ जिसे नादब्रह्म, शब्दब्रह्म कहते हैं। अन्य जितने भी भगवान् के दिव्य नाम और मन्त्र हैं, इसी शब्द का रूप रूपान्तरण हैं। साक्षात् भगवदाकार होने से हरेक नाम में भगवद् शक्ति निहित है। इसलिए जो निरन्तर भगवद् नाम लेता रहता है, उसके अन्दर आध्यात्मिक विकास एवं जागृति जाती है, अज्ञान का अन्धकार हट जाता है और ज्ञान की ज्योति जग जाती है। तुलसीदास जी ने कहा है

 

राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरी द्वार।

तुलसी भीतर बाहरेहूँ जो चाहसि उजिआर।।

 

नाम मणि दीप है जिसे यदि मुख रूपी द्वार की दहलीज में रख दिया तो बाहर भी प्रकाश है और अन्दर भी उजाला है। मणि दीप जलता नहीं है, बाकी दीप जलते हैं। मणिदीप में प्रकाश है, उष्णता नहीं है, इसमें कोई हानि नहीं है केवल लाभ ही लाभ है। विशेष करके महाराष्ट्र के जितने भी सन्त हुए हैं, उन्होंने भगवद् प्राप्ति के लिए भगवद् नाम को ही सुलभ उपाय बताया है। निरन्तर भगवद् नाम रटने से जहाँ पर तुम हो, वहीं पर आकर भगवान् दर्शन देंगे जैसे भक्त पुण्डरीक को दिया।

 

बहुत प्रयास करके जंगल में जाने की जरुरत नहीं है, घर में रहकर निरन्तर नाम जपते रहो, 'हरि बोल - - हरि बोल--' नाम बोलते बोलते जब आदत में जायेगा, तभी अन्त काल में नाम के आने की सम्भावना रहेगी। वरना अन्त में व्यवहार का चिंतन, बैंक बैलेन्स, भोजन, परिवार आदि का विचार आयेगा जो अत्यन्त हानिकारक है। एक मराठी सन्त ने इसे नाम यज्ञ कहा है- 'ज्याचे मुखी सदा हरि त्याचे यज्ञ पावली पावली।' पावली माने कदम। जो हमेशा नाम रटता है, उसका कदम-कदम यज्ञ के समान है, महान् यज्ञ के समान फल देने वाला है। गीता में भगवान् ने स्वयं माया से मुक्त होने के लिए उपाय बता दिया है-

 

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।।

गीता - /१४

 

जो केवल भगवान् के ही शरण होते हैं, जो दैवी सम्पत्ति वाले होते हैं, वे भगवान् की गुणमयी माया से पार हो जाते हैं।

 

भगवान् गणेश के पुण्य पर्व पर उनके सामने यह प्रार्थना करें, संकल्प लें, 'हे प्रभो! हे नारायण! हे गणाधीश ! आपकी प्राप्ति के लिए हम जीवन में निरन्तर चेष्टा करें। आप इस संकल्प की सिद्धि में सहायता करें एवं आशीर्वाद देकर सारे विघ्न बाधाओं का नाश करें ' ऐसी प्रार्थना करके अपने नये जीवन को प्रारम्भ करें।

 

' एक सार नाम हरि भज हरि

हरे हरी तेरी चिन्ता सारी।'

 

प्रपंच के माया बाजार में नाशवान वस्तु पदार्थों में कोई सार तत्त्व नहीं है। एक ही सार वस्तु है- भगवद् नाम, क्योंकि यह एक ही सत्य है।

 

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं मायामयमख्रिलम् जगत्।

सत्यं सत्यं पुनर्सत्यं हरेर्नामैव केवलम् ।।

 

अमूल्य मानव जीवन की सार्थकता इसमें है कि हम सत्पथ पर चलकर ईश्वर प्राप्ति को अपना लक्ष्य बनाएँ। प्रपंच के वस्तु पदार्थों के मोह में पड़कर एक ही सार तत्त्व को अपनाएँ।

 

'सब है समान, सबमें एक प्राण

तज के अभिमान हरि नाम गाओ

हरि नाम गाओ दया अपनाओ

अपने हृदय में हरि को बसाओ

हरि नाम प्यारा सबका सहारा

हरि नाम जप के सुख शान्ति पाओ।'

 

यह रचना ज्ञानेश्वर महाराज के गुरु श्री निवृत्ति नाथ जी की है। इस अशान्त दुःखमय प्रपंच में आपको सुख-शान्ति भगवन्नाम से ही मिल सकती है, अतः हर समय भगवन्नाम स्मरण करते रहें। हरि तत् सत्।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आपके जीवन में धर्म का स्थान

(सांगली (महाराष्ट्र) २५.११.८४ में दिया गया प्रवचन)

 

 

प्रिय दिव्य आत्मस्वरूप, परम पिता परमात्मा की दिव्य अमर सन्तान !

 

परम आराधनीय परम प्रियतम सद्गुरु श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज्ज के चरण कमलों का यह दास आज आपके समक्ष 'आपके जीवन में धर्म स्थान' विषय पर मनन हेतु कुछ विचार प्रस्तुत करेगा ताकि आप इन विचारो पर गंभीर भाव से चिंतन करें और इनका वास्तविक अर्थ समझने का प्रयास करें। जब हम किसी एक विशेष विषय को अच्छी तरह से समझ लेते हैं तो उसमें विश्वास हो जाता है, उसमें दिलचस्पी उत्पन्न होती है, व्यवहार में उसको प्रयोग करने के लिए तैयार हो जाते हैं। जब अच्छी तरह से समझ में नहीं आता है तो उसमें हमारी किसी प्रकार की दिलचस्पी नहीं रहती, उत्साह नहीं रहता, अभ्यास करने की चेष्टा भी नहीं रहती है क्योंकि विषय स्पष्ट नहीं हुआ, पता नहीं चला कि क्या बोला है ? इसका हमारे जीवन से क्या संबंध है? क्या आवश्यकता है? हाँ, यदि समझ में गया है तो सहज में ही यह विचार जाता है कि इससे हमें कुछ कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। जीवन में इसका प्रयोग करके अवश्यमेव लाभान्वित हो सकते हैं।

 

आप सब भारतवर्ष की सौभाग्यशाली सन्तान है। धर्म क्या है? इसका ज्ञान अपने आप आपको होना ही चाहिए फिर भी मैंने धर्म के बारे में बताने का विषय रखा है। माता-पिता और अभिभावकों को अपने बच्चों को धर्म के बारे में अच्छी तरह से समझाना चाहिए। विद्यालयों में अध्यापकों को अनिवार्य रूप से धर्म का परिचय देना चाहिए, धर्म के विज्ञान को समझाना चाहिए। धर्म शब्द का अर्थ रिलीज़न, मजहब से भी लगाया जाता है। यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म, पारसी धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिक्ख धर्म आदि जो विभिन्न मत-मतान्तर हैं, उनके लिए धर्म शब्द का प्रयोग करते हैं। हमारे इतिहास, साहित्य, संस्कृति में यह अर्थ लगा दिया गया है, किन्तु यह अर्थ गौण है।

 

हिन्दू मत का अनुसरण करने वालों के लिए हिन्दू धर्म है, उसे सत्य सनातन वैदिक धर्म कहते हैं। वेद बहुत प्राचीन काल से आये हुए ज्ञान का अद्भुत भण्डार हैं, यही हमारे धर्म का मूल स्रोत और उत्पत्ति स्थान है। वेद से निकले होने के कारण वैदिक और अत्यन्त प्राचीन होने के कारण इसे सनातन धर्म कहते हैं। वेद के ज्ञान के आधार पर ही हम भगवान् को मानते हैं, उनकी उपासना करते हैं। हमारी आस्तिकता, भक्ति, श्रद्धा और विश्वास धर्म के ऊपर ही निर्भर है। हमारी राष्ट्रीय संस्कृति में भी धर्म को मजहब अथवा रिलीज़न के अर्थ में प्रयोग किया है। लेकिन यह विशेष प्रयोग है। सर्वसाधारण भाषा में यह अर्थ नहीं होता है।

 

धर्म का मुख्य अर्थ नैतिकता है-यथा मानव जीवन में मानव के क्या कर्तव्य हैं, उसकी वाणी और व्यवहार कैसा होना चाहिए और कैसा नहीं होना चाहिए। मनुष्य जीवन को उत्तम रूप से, सुचारु रूप से, आदर्श रूप से बिताने के लिए पर्याप्त मार्गदर्शन इस धर्म में दिया गया है। जीवन के किसी भी अंग को नहीं छोड़ा गया है। मौलिक अर्थ से धर्म के विषय में अलग शास्त्र बनाया है, इसे धर्मशास्त्र कहते हैं। स्मृतियों के वर्ग में मनु स्मृति एवं पाराशर स्मृति आते हैं। मानव लोक में मानव को अपना व्यवहार कैसे करना चाहिए, कैसे नहीं करना चाहिए-यह बताया गया है। जिस प्रकार एक ड्राइवर सही मार्ग पर ठीक प्रकार से कार को ले जाता है, उसी प्रकार धर्म मानव के आचरण, चरित्र, व्यवहार के लिए मार्गदर्शन का कार्य करता है। किस तरह से हमारा विचार, व्यवहार, आचरण होना चाहिए, यह बताने वाला कौन है? उन ऋषि-मुनियों को कैसे मालूम होता है कि ऐसा करना चाहिए और ऐसा नहीं करना चाहिए। क्या वे सर्वज्ञ हैं? मेधावी हैं? कुछ लोग ऐसा प्रश्न पूछते हैं। इसका अर्थ बहुत गम्भीर, अत्यन्त विचारणीय है। जिन्होंने इस प्रकार से मानव के लिए उपदेश, मार्गदर्शन, आदेश दिया। वह किस आधार पर एवं किस अधिकार से दिया ?

 

उन्होंने जिस आधार पर दिया, वह केवल मात्र उनके हृदय में मानव मात्र के प्रति सद्भावना, अत्यन्त दया भाव एवं विश्व प्रेम था। उनका सर्वहितकारी भाव था। कोई भी मानव दुःखी नहीं होना चाहिए, सभी सुखी होने चाहिए, सभी को शान्ति प्राप्त होनी चाहिए। क्योंकि वे पहुँचे हुए कृत-कृत्य, आप्त काम महापुरुष थे। उनके लिए इस प्रपंच में कोई कार्य करने के लिए नहीं रह गया था। वे स्वच्छंद एवं स्वतन्त्र थे। भगवद् साक्षात्कार करके, आत्मज्ञान प्राप्त करके वे इस अवस्था में पहुँचे थे। इस दिव्यता को प्राप्त करने का परिणाम यह हुआ कि जो भगवान् के अन्दर दया, करुणा का भाव है, वह दया का भाव सहज रूप में, उनके हृदय में उत्पन्न हो गया। वे अति मानवीय शक्तियों के स्वामी थे, ईश्वरीय शाश्वत सत्ता में निवास करते थे। ब्रह्माण्डीय प्रेम से ओत-प्रोत थे, उन्हें दिव्य ज्ञान की सम्प्राप्ति हो चुकी थी। फिर भी उनकी सदा 'सर्वभूत हितेरताः' की चेष्टा रहती थी। प्रारब्धानुसार प्रपंच में रहते हुए हमें अन्तिम श्वास तक लोक कल्याण एवं मावन मात्र का हित करते हुए यहाँ से चले जाना है, यही विचार उनके अन्दर था क्योंकि उन्होंने अद्वैत सिद्धि को प्राप्त कर लिया था। एक ही आत्मा सर्व भूतों में अनुस्यूत है, एक ही जीवन शक्ति है, जो हमारे हृदय में है, वही सबमें है। हमारे से अन्य कोई नहीं है, सब हमारे ही स्वरूप हैं।

 

'अयं निज परो वेति गणना लघुचेतसाम् '-छोटे मन वाले, अल्प मति वाले 'यह मेरा है' 'वह पराया है' ऐसी गणना करते हैं। 'उदारचरितानां तु वसुधैवकुटुम्बकम्' - लेकिन जिनका मन छोटा नहीं है, जो अल्पमति नहीं हैं, उदार हैं उनके लिए विश्व के समस्त प्राणी उनका परिवार है। जीवन्मुक्त ऋषियों ने अद्वैत सिद्धि से प्रत्येक प्राणी के साथ, कीट-पतंग, वनस्पति के साथ आत्मीय एकता का अनुभव कर लिया था, वे विश्वप्रेम, भूत-दया, लोककल्याण, सर्वहितकारी भाव के कारण जीवित रहे वरना वे इच्छा मरण से शरीर छोड़ कर जा सकते थे। जीवन्मुक्त होते हुए भी इस शरीर में, बद्धावस्था में रहकर के मानव समाज एवं विश्व के लिए आशीर्वाद के रूप में "सर्वे भवन्तु सुखिनः" के आधार पर उन्होंने धर्म का उपदेश एवं मार्गदर्शन दिया। सेवा करने से सेवक के पास कभी कभी अधिकार जाते हैं। जैसे वैद्य मरीज को रोगमुक्त करने के लिए इलाज कर रहा है। रोगी को तेल, खटाई, मिर्च नहीं खानी है, ऐसा आदेश लगा देता है। ऐसा आदेश लगाने का वैद्य को क्या अधिकार है? वह तो फीस लेकर आपका इलाज कर रहा है। फिर भी इलाज़ करने के कारण आपको आदेश देता है कि इस दवाई को अनुपान के साथ खाना पड़ेगा, चाहे अच्छी लगे या लगे।

 

वे जीवन्मुक्त ऋषि उच्चतर दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक शक्ति, अक्षय दैवी सम्पत्ति से सम्पन्न थे। स्वार्थपरता से मुक्त होकर सेवा करना चाहते थे। वे विश्व-बन्धु, विश्व-मित्र थे। उन्होंने सेवा के लिए ही अपने जीवन को आहुति के रूप में अर्पण कर दिया था। इसी अधिकार से जनहित को चाहते हुए, आपके कल्याण को मन में रखते हुए धर्म शास्त्र को बनाया। कैसा व्यवहार करना चाहिए और कैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। क्या उचित है और क्या अनुचित है, यह सब बताया। लेकिन आप सोचते हैं कि उचित अनुचित का ज्ञान उनको किस प्रकार से हुआ। मेरे लिए क्या हितकारी है और क्या अहितकारी हैइनको क्या पता ? मेरी परिस्थितियों की कल्पना भी इनको नहीं है। कई शताब्दियों के पूर्व धर्मशास्त्र लिखे गये थे।

 

ऐसी बात नहीं है, भविष्य में आपके हित को ध्यान में रखते हुए नियम बनाये थे। आपका कल्याण हो, दुःखी जीवन नहीं होना चाहिए, संकटरहित सुखी जीवन होना चाहिए। इन ज्ञानी ऋषियों ने अपनी अपरोक्ष अनुभूति से, दिव्य दृष्टि से भगवान् एवं भगवान् की सृष्टि को जान लिया था। भगवान् ने जब ब्रह्माण्ड को, सृष्टि को रचाया तो उसके ऊपर एक शासन को भी लगा दिया। शासन के रहने से ही सृष्टि ठीक प्रकार से चल रही है। जैसे एक घड़ी है, उसके पता नहीं कितने भाग हैं, हर भाग अपने अपने स्थान पर रहकर, जिस तरह से उसे कार्य करना चाहिए वैसा करता रहता है। टिक-टिक-टिक, वह अपना कार्य अनुशासित रीति से, नियमित रीति से कर रहा है क्योंकि बनाने वाले ने उसको इस प्रकार से बना के रखा है।

 

पंचांग बनाने वाले ज्योतिषी बताते हैं कि एक वर्ष बाद, दो वर्ष बाद, पाँच वर्ष बाद अमुक समय, अमुक दिन पूर्णिमा होगी, अमुक दिन अमावस्या होगी, इस दिन सूर्य ग्रहण होगा, इस दिन चन्द्र ग्रहण होगा, इस दिन धूम्रकेतु आयेगा। उनको यह सब कैसे मालूम पड़ता है? आकाश मण्डल में अनेकानेक नक्षत्र, तारे, चन्द्रमा, सूर्य आदि हैं। यदि वे अनुशासनविहीन हों तो ज्योतिषी इनके बारे में कुछ भी निश्चयात्मक नहीं बता सकते हैं। सैकड़ों हजारों वर्षों से उन्होंने अपनी गति को अनुशासित एवं नियमबद्ध रूप से बना के रखा है। इसीलिए भगवान् की सृष्टि को कॉसमास (cosmos) कहते हैं। कॉसमास बिल्कुल नियमबद्ध अनुशासित रूप से होने वाली प्रक्रिया को कहते हैं। छिन्न-भिन्न, अव्यवस्था, गड़बड़ को केऑस (chaos) कहते हैं। कॉसमास गणित का अध्ययन करके ज्योतिष शास्त्र जो बताता है, कभी गलत नहीं होता है, आधे मिनट तक की बात बता देते हैं।

 

सत्य-ऋत इन दो तत्त्वों को भगवान् ने पहले बनाकर फिर सृष्टि का निर्माण किया। सत्य क्या है? हरेक वस्तु में एक मौलिक सारभूत तत्त्व है, जैसा जिसका स्वभाव, प्रकृति है उसको उसी रूप में प्रकट कर देना ही सत्य कहलाता है। अग्नि का स्वभाव जलाना है, हर परिस्थिति में हर काल में सदा सर्वदा अचूक रीति से उसको प्रकट करती है। ज्वलन शक्ति से सम्बन्धित सभी कार्यों को हम शत प्रतिशत विश्वास के साथ करते हैं। बड़े-बड़े इंजन, बड़ी-बड़ी फेक्टरियाँ इसी की सहायता से चलती हैं। रसोई का कार्य भी इसी के द्वारा होता है। यदि अग्नि अपनी सत्यता, ज्वलन शक्ति को छोड़ दे तो वह अग्नि नहीं कहलायेगी, खोटी हो जायेगी।

 

जहाँ पर जिस परिस्थिति में, दो तत्त्वों की जिस तरह से परस्पर प्रतिक्रिया होनी चाहिए, इसका निर्णय करने वाला ऋत है। कॉसमिक आर्डर (cosmic order) को ऋत कहते हैं। जब दो ग्रह एक दूसरे की आकर्षण शक्ति के क्षेत्र में जाते हैं तो दोनों ग्रह वहीं स्थित हो जाते हैं। तो निकट सकते हैं और ही दूर जा सकते हैं। इस प्रकार की परस्पर प्रतिक्रिया और उसका परस्पर सम्बन्ध बनाने वाला वैश्वात्मक तत्त्व ऋत कहलाता है।

 

इसके बाद भगवान् ने सृष्टि को बनाकर अपने शासन को लागू किया। विशेष करके भारतवर्ष में जन्म लेने वाले, सत्य सनातन वैदिक धर्म के अनुयायी कहलाने वालों को प्रत्येक क्षण इस शासन को याद करके अपना जीवन बनाना चाहिए। यह शासन क्या है? कार्य और कार्य का परिणाम परस्पर जुड़े हुए हैं। कर्म और कर्म-फल भोग को हम अलग नहीं कर सकते हैं, सम्बन्ध विच्छेद नहीं कर सकते हैं। कार्य के परिणाम का अनुभव करना ही पड़ेगा। गेहूँ से गेहूँ, ज्वार से ज्वार, बाजरे से बाजरे की ही फसल प्राप्त कर सकते हैं। काँटों के वृक्ष को बोकर हम फल-फूल नहीं ले सकते हैं। जैसा कर्म वैसा फल-भगवान् ने इस शासन को मानव के ऊपर लागू किया। हमारे महान् ब्रह्मज्ञानी ऋषि मनु, पाराशर, याज्ञवल्क्य ने भगवान् को जान लिया था। ब्रह्मज्ञानी थे, अतः शासन को अनुभूति से देखा था कि किस प्रकार के विचार धारण करने, किस प्रकार का कार्य करने, किस प्रकार की बातचीत करने, आचरण और व्यवहार करने से लोगों को आगे जाकर सुख की प्राप्ति हो सकती है, कल्याण हो सकता है, हित हो सकता है, ये सब उन्होंने धर्मशास्त्र में लिखा है। व्यवहार, आचरण, वाणी से आगे जाकर दुःख संकट उठाने पड़े, कल्याण को भी नष्ट कर दें, भविष्य को अन्धकारमय बना दें, शास्त्रों में ऐसे कार्यों का निषेध किया गया है। ऐसा करने से बड़ा अपराध हो जायेगा। कर्म अभिशाप बन जायेगा। स्वयं भी दुःख प्राप्त करेगा, औरों को भी दुःख में डालेगा। इन कसौटियों पर ही उन्होंने धर्मशास्त्र लिखा है। उज्ज्वल भविष्य, प्रगति और विकासशील जीवन के लिए धर्म को अपने हृदय में केन्द्रीय स्थान देना होगा। धर्म को जीवन में सर्वश्रेष्ठ मूल्यता देनी चाहिए, इससे वंचित नहीं रहना चाहिए। इसको नष्ट नहीं होने देना चाहिए। धर्म के बिना हमारा अति मूल्यवान ऐश्वर्य चला जायेगा ऐसी भावना सदा रखनी चाहिए, और इसको प्राथमिकता देनी चाहिए।

 

हमारा सर्वस्व खो जाये, पर हम धर्म को नहीं खोयेंगे। यदि किसी के घर में आग लग जाती है तो वह उसको बुझाने का प्रयास करता है। दस, बीस, पच्चास के सिक्कों को बचाने का प्रयास करेगा या हीरे जवाहारात की पेटी को जिसकी सबसे ज्यादा मूल्यता है उसको बचाने की कोशिश करेगा ? लोगों के मना करने पर भी वह जोखिम उठाकर जेवर की पेटी ले आता है। उसके मन में सन्तोष रहता है कि पूरा मकान जलकर राख होने पर भी उसके पास लाखों की सम्पत्ति है। इसी प्रकार अपने प्राणों से भी ज्यादा मूल्यवान धर्म को अपने जीवन में रखने वाला बुद्धिमान है, उसका अध्ययन सार्थक है। बी.., बी.एस. सी., एम. एस. सी., इन्जीनियरिंग, डाक्टरी पढ़ कर यदि धर्म को नहीं जाना तो वह अज्ञानी है। यूनिवर्सिटी से डिग्री भले ही ले ली हो, लेकिन वह बुद्धिमान नहीं है। वह क्या हो सकता है? इसका अर्थ आप ही लगा लीजिए।

 

धर्म ही हमारा रक्षक है, यह हर प्रकार की परिस्थितियों से हमें उबारता है। धर्म हमारा सच्चा मित्र है ऐसा समझ करके जो धर्म को धारण करता है, उसका हाथ धर्म कभी भी नहीं छोड़ता है। इसी बात का अनुसरण करते हुए राजा हरिश्चन्द्र ने चाण्डाल का वेश धारण कर श्मशान में कार्य किया। अन्ततोगत्वा उसका परिणाम क्या हुआ? इसी चाण्डाल की अवस्था में ही श्मशान के अन्दर ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर ने प्रकट होकर दर्शन दिये। प्रशंसा करते हुए कहा, 'धन्य हो हरिश्चंद्र, धन्य हो ' हजारों वर्ष पहले कौरव-पाण्डव थे किन्तु अभी तक हमने युधिष्ठिर राजा को अपनी स्मृति में रखा हुआ है क्योंकि वे धर्मात्मा थे, भयंकर कठिनाइयों में भी उन्होंने धर्म को नहीं छोड़ा। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी को सम्पूर्ण इतिहास में एक अग्रगण्य व्यक्ति क्यों मानते हैं? क्योंकि वे धर्म के साक्षात् स्वरूप, सजीव प्रतीक थे।

 

धार्मिक कार्यों द्वारा सत्कर्मों के बीज वर्तमान में बोते जायें तो हमारा की भविष्य सुनहरा, सुखप्रद और आनन्दमय होगा। कोई भी शक्ति हमें इससे ? वंचित नहीं कर सकती है। धर्म साक्षात् भगवान् का प्रकट स्वरूप है। है। व्यक्तिगत जीवन में धर्म के विपरीत कार्य एवं विचार नहीं करना चाहिए के सदैव काया वाचा मनसा पवित्र धार्मिक जीवन जीना चाहिए।

 

हर स्तर के लोगों के लिए धर्म मार्ग प्रशस्त करता है। प्रथम अवस्था विद्यार्थी जीवन ज्ञान प्राप्त करने, चरित्र निर्माण करने, शारीरिक बल और आरोग्य प्राप्त करने तथा मानसिक बल प्राप्त करने की अवस्था है। इसे ब्रह्मचर्य आश्रम कहते हैं। माता-पिता, ज्ञानदाता गुरुजनों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए। बड़ों के साथ, मित्रों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए, इसके लिए धर्म शास्त्र में रूपरेखा बनाई गई है।

 

उसके बाद दूसरी अवस्था गृहस्थ-धर्म की आती है। पति-पत्नी को धार्मिक जीवन में सहयोगी होकर भगवद् भजन, उपासना, व्रत-नियमारि का पालन करना चाहिए। धर्मपत्नी को पतिव्रता धर्म का पालन करना चाहिए। प्रपंच में केवल मात्र पति से ही स्त्री का व्यवहार करूँगी, सर्क मानव समाज में मातृभाव रखूँगी। तमाम मानवता के प्रति मेरा भाव, दृष्टिकोण जगन्माता जगदम्बा जानकी की तरह होगा। ऐसा उच्च आदर्श भाव, जैसे सीता जी में, सावित्री जी में, महर्षि अत्रि जी की धर्मपली अनसूया के हृदय में रहा, रखना चाहिए। ऐसे ही पति के लिए एकपत्नी व्रत धर्म है, स्त्री वर्ग में मातृ भावना, पवित्र दृष्टि रहे। अनुचित विचार स्वप्न में भी नहीं आना चाहिए। पारिवारिक क्षेत्र में यह गृहस्थ का धर्म है। अन्य व्यक्तियों की, पड़ोसियों की काया-वाचा-मनसा मदद करें। भगवान् ने जो हमें दे रखा है, उसमें से दूसरों को सुख देने के लिए भी उपयोग करें।

 

आगे चलकर गृहस्थाश्रम के मोह ममता में फँसे रहना, सत्य सनातन वैदिक धर्म की परम्परा नहीं है। अपने बड़े पुत्र को जिम्मेवारी सौंप देनी चाहिए। पति-पत्नी दोनों मिलकर तीर्थ पर्यटन करें। एक-दो मास तीर्थ स्थान में रहकर जप-अनुष्ठान, पुरश्चरण करें, सत्संग सुनें, श्रवण-मनन निदिध्यासन करें। अनाथ, दुःखी, गरीब, वृद्ध लोगों की सेवा करें। यह तीसरी अवस्था वानप्रस्थाश्रम है। अपने अनुभव और ज्ञान द्वारा भावी पीढ़ी का मार्ग दर्शन करना चाहिए। अब आपको चतुर्थ अवस्था संन्यासाश्रम में प्रवेश करना है। भगवत्-प्राप्ति के वास्ते परिपूर्ण रूप में जीवन अर्पित कर देना है तथा प्रपंच से कोई नाता नहीं रखना है। इस प्रकार संन्यास धर्म की रूपरेखा बताई है।

 

राजा को प्रजा के ऊपर किस प्रकार शासन करना चाहिए- प्रजा को अपने पुत्रवत् समझ कर अपने हितों को तिलांजलि देकर निस्वार्थ भाव से पालन करना चाहिए, यह राजधर्म है। प्रजा का धर्म 3sqrt(6) - 3sqrt(47) प्राणों का उत्सर्ग करके देश की रक्षा करना। इस प्रकार हर कार्यक्षेत्र में हर व्यक्ति के लिए विविध रूप में धर्म की व्याख्या करके समझाया गया है। इन सबकी एक ही कसौटी है-कौन-सा कर्म करने से तुम्हारा अहित हो जायेगा और कौन-सा कर्म करने से तुम्हारा कल्याण होगा। इसी आधार पर धर्म-अधर्म का विभाजन किया है। अपने धर्म को सबसे ऊँची मूल्यता देकर, केन्द्रीय स्थान में रखकर उपासना करनी चाहिए। इसी में हमारे जीवन की सच्ची सफलता एवं सुख की आशा है।

 

धार्मिक ग्रन्थ पुराण, रामायण, भागवत तथा महाभारत में जिज्ञासु, मुमुक्षु ज्ञानी पुरुषों के पास जाकर प्रश्नोत्तर द्वारा धर्म के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। महाभारत में दस प्रकार के गुणों का वर्णन करके धर्म का लक्षण बताया है। मनु जी ने धर्म को सारांश रूप में इस प्रकार बताया है— "तुम अपने लिए जिस प्रकार के व्यवहार को नहीं चाहते हो, वैसा व्यवहार कदापि किसी के साथ नहीं करना। जिस तरह का व्यवहार औरों से तुम अपने वास्ते चाहते हो, इच्छा रखते हो ऐसा ही व्यवहार तुम्हारा दूसरों के प्रति होना चाहिए।" यही धर्म का सारभूत तत्व है, सूक्ष्म स्वरूप है।

 

धर्म के विरूद्ध कार्य करने से कर्म फल भोग रूपी कड़वा परिणाम सहन करना पड़ेगा, रोना पड़ेगा इसलिए मत करो। हम दुःख, हानि नहीं चाहते हैं, अपमान निंदा को सहन नहीं कर पाते हैं तो हमें दूसरों की भी

निंदा, अपमान नहीं करना चाहिए, दुःख नहीं देना चाहिए, हानि नहीं करनी चाहिए। व्यास भगवान् इस प्रकार कहते हैं-"परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीड़नम्। इससे आगे जाकर परम धर्म की घोषणा की है। है मानव! तुम जानवर या हैवान नहीं हो। ये मानव शरीर भगवान् ने तुमको इसलिए दिया है ताकि तुम परोपकार कर सको, हितकारी कार्यों में लग जाओपरोपकारार्थं इदं शरीरं" इस प्रकार से अपनी मानवता को परोपकार में प्रयोग करने से अपना परम हित करने में, कल्याण साधने में मानव सक्षम बन जाता है, भविष्य उज्ज्वल हो जाता है।

 

हमारे परम कल्याण के लिए ही भगवान् ने वैश्वात्मक कानून बनाया है- 'कर्म और कर्म फल भोग' - जैसा कर्म करता है वैसा ही भोगना पड़ता है। इसको देखकर हमारे ऋषियों ने हृदय में विश्व प्रेम के कारण, सर्व भूतों का हित चाहने के कारण बड़ी उदारता से धर्म का शास्त्र बनाकर धर्म का रहस्य बताया। हम सबका कल्याण हो, मानव समाज में शान्ति रहे, परस्पर सामंजस्य रहे, सौहार्दपूर्ण व्यवहार हो, सबका विकास और प्रगति हो। जहाँ धर्म नहीं है, वहाँ भय है। किसी ने कहा है कि मानव को भूत-पिशाच से डर नहीं है, अधर्म से डर है। जिसने धर्म को अपना लिया है, वह निडर, निर्भय होकर अपने जीवन को बना लेता है। भगवान् आपको परिपूर्ण रूप से धर्मयुक्त, धर्ममय, सफल जीवन प्रदान करें और आप अपना परम कल्याण साध लें। हरि

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भक्ति-मोक्ष का श्रेष्ठ साधन

(भद्रक (ओडिशा) में --९० को दिया गया प्रवचन)

 

उज्ज्वल आत्मस्वरूप, परम पिता परमात्मा की दिव्य अमर सन्तान!

 

अपने अपने पूर्व जन्मकृत शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप सुख दुःख आदि भोगों को भोगने के लिए, एक पार्थिव शरीर धारण करके कुछ समय के लिए क्रमबद्ध अवस्था में जीवन यात्रा को पूरा करने के लिए आप आये हैं। आप परमात्मा के अंश हैं। इसलिए आप सभी अजर अमर अविनाशी आत्म तत्त्व हैं, अनादि, अनन्त, देश-काल, नाम-रूप से परे हैं। जैसे सागर से लहर, सूरज से किरण भिन्न नहीं होती है। उसमें केवल मात्र आकृति की भिन्नता प्रतीत होती है, तात्त्विक भेद कदापि नहीं होता है। छोटी-बड़ी लहर के रूप में, भंवर के रूप में, धारा के रूप में, बुलबुले के रूप में, सागर का जल अनेकानेक रूपों में तत्काल के लिए प्रतीत होता है। प्रकट होने से पूर्व वह सागर के साथ ही रहा, कुछ समय बाद वह सिमट कर सागर में ही विलीन हो गया। अंश का स्वरूप ही यह है कि वह जिसका अंश है उससे कभी भिन्न नहीं हो सकता है।

 

परब्रह्म परमात्मा श्री कृष्णचन्द्र ने अपने दिव्य मुखारविन्द से हमें स्वयं ही बताया है-

 

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।

मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।

(गी. १५/)

 

मेरा ही अंश प्रकृति से सामग्रियों को साथ लेकर जीव लोक में जीवात्मा का स्वरूप धारण करता है। कुछ कुछ खेल खेलता रहता है, जीवन को बनाता है। आपका सच्चा स्वरूप, यह मर मिटने वाला, हड्डी-मांस का पिंजरा नहीं है। मेरा अंश होने के कारण आपका सच्चा स्वरूप दिव्य है, आप दिव्य आत्म तत्त्व हैं। जब भगवान् ने स्वयं अपनी दिव्य वाणी से इस प्रकार के रहस्य को खोल दिया है तो फिर इसके बाद क्या सन्देह रह जाता है? दूसरा अन्य विचार सुनने की क्या जरूरत है? केवल मात्र हम भगवान् के ही अंश हैं।

 

अभी अभी पूर्व वक्ता ने अपनी वार्ता में बताया- राम बड़ा है या राम का नाम बड़ा है। राम नाम आत्मोन्नति का साधन है, राम से मिला देने में पर्याप्त है, उद्धार करने में समर्थ है। राम ने तो एक अहिल्या बनी शिला को ही तारा है, किन्तु उनके नाम ने असंख्य शिलाओं, पहाड़ के पत्थरों को तार दिया है। चैतन्य महाप्रभु बंगाल के विशिष्ट भक्त रहे हैं, सभी प्रान्तों में कुछ भक्त आते ही रहे हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में जितने उच्च कोटि के भक्त हुए हैं, उतने अन्य प्रदेशों में आप नहीं देख सकते हैं। एक ही समय में उनका एक सम्प्रदाय बन गया, परम्परा बन गई। कर्नाटक में इसे "दासपीठ" बोलते हैं-सब दास ही दास। पुरन्दर दास, विजय दास, अनंत दास आदि। उन्होंने भगवद् नाम एवं भगवद् प्रेम की साधना की एवं कलिकाल में इसको स्थापित किया। पुरन्दर दास जी ने एक गीत में गाया है कि मैंने आपके दर्शन के लिए अनेकानेक प्रार्थनाएँ की, बहुत रोया किन्तु आपने मुझे दर्शन नहीं दिये। उन्होंने व्यंग्य भाव में कहा- "ठीक है आप दर्शन नहीं देते हो तो मत दो, प्रसन्न नहीं होते हो तो मत हों, मुझको परवाह नहीं है, आपके पीछे क्यों पड़ना है? मेरे पास आपसे भी अधिक बड़ी चीज है, वह है आपका नाम। यह मेरे लिए पर्याप्त है। जब अजामिल को यमदूत में आकर ले जाने लगे तो क्या आपने बचाया ? नहीं, आपकेनारायणनाम ने ही उनको बचाया।"

 

ऐसे ही जब सूरदास जी की लाठी पकड़ कर कन्हैया उन्हें ले जा रहे थे। सूरदास जी को लगा कि कोई गाँव का लड़का है। सूरदास जी ने पूछा- "तुम कौन हो ? तुम्हारा क्या नाम है ? तुम्हारे माता-पिता कहाँ रहते हैं? कौन से गाँव से आये हो।" कन्हैया उनको टालता रहा, सही बात नहीं बताई। तब सूरदास जी को अनुभव हुआ-अरे ! इस लड़के में कुछ विशेष चमत्कार है। यह गाँव का लड़का नहीं है, मेरा साक्षात् कन्हैया ही है। इतना निकट आने पर अब मैं इसे नहीं छोडूगाँ, इस सुनहरे अवसर को मुझे नहीं खोना है। यह तो बड़ा छलिया है, मैं तो अन्धा हूँ। तीन पुट की लकड़ी थी, एक तरफ सूरदासजी ने पकड़ी थी, दूसरी तरफ कन्हैया ने। सूरदास जी ने कन्हैया से बात चालू रखी एवं अपने छोर से हाथ को धीरे-धीरे बढ़ाते-बढ़ाते कन्हैया का हाथ पकड़ लिया, झट से हाथ छूट गया, लकड़ी हाथ में रह गई। कन्हैया दूर खड़े होकर जोर-जोर से हंसने लगे। उस समय सूरदास जी की क्या अवस्था रही होगी, उसको सूरदास जी ही जानते हैं। इतना नज़दीक आकर के भी छूट गया, लाला को नहीं पकड़ पाया। इस स्थिति को भगवान् एवं सूर के अलावा कोई नहीं समझ सकता है। कैसे भी सूरदास जी ने अपने आप को सम्भाल लिया और कहा- "अन्धे के हाथ से छूट कर तुम अपने आप को बड़ा शूर समझते हो, चालाक समझते हो। समझते हो कि तुम जीत गये, मैं हार गया। नहीं-नहीं, मैं अपनी हार तब मानूगाँ जब तुम मेरे हृदय से चले जाओगे। हृदय से तुम नहीं जा सकते, यहाँ पर मेरे वश में हो।

 

हाथ छुड़ाये जात हो निबल जान के मोहि।

हृदय से जब जाओगे, तब सबल जानिहों तोहि ।।

 

इसी प्रकार पुरन्दर दास जी कहते हैं नाम के बल से मैं निहाल हो जाऊगाँ एवं आपके पास पहुँच जाऊँगा। भगवान् का नाम लेने से पाष मिटते हैं। रत्नाकार डाकूने मरा-मरा जप करके ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर लिया, कौन नहीं जानता है—'उल्टा नाम जपत जग जाना, वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना' भारी पाप करने के बाद भी नाम के प्रताप से हम सब को वाल्मीकि रामायण ग्रन्थं दिया। नाम के अन्दर भगवान् ने स्वयं शक्ति दी है यह उनकी लीला है। आओ, हम और आप सब मिलकर नाम को गायें-

 

प्रेम मुदित मन से कहो

राम राम राम श्री राम राम राम,

श्री राम राम राम श्री राम राम राम

पाप कटे दुःख मिटे, लेत राम नाम,

भव समुद्र-सुखद नाव, एक राम नाम ।।

श्री राम राम परम शान्ति-सुख निधान,

दिव्य राम नाम, निराधार को आधार, एक राम नाम ।। श्री राम राम .....

 

परम-गोप्य परम-इष्ट-मंत्र राम नाम,

सन्त हृदय सदा बसत, एक राम नाम ।। श्री राम राम

महादेव सतत जपत, दिव्य राम नाम,

काशी मरत मुक्ति करत, कहत राम नाम।। श्री राम

माता-पिता बन्धु सखा सब ही राम नाम

भक्त-जनन जीवन-धन एक राम नाम ।। श्री राम राम

 

प्रेम और आनन्दपूर्ण मन से बार-बार नाम लेते रहो -

 

श्री राम जय राम जय जय राम

श्री राम जय राम जय जय जय राम

श्री राम जय राम जय जय राम

श्री राम जय राम जय जय राम

 

आनन्दमय आत्मस्वरूप ! आप सब आनन्द में हैं कि नहीं- हाँ हैं। यह आनन्द आपको कहाँ से मिला। भोजन से, टी.वी. से, रेडियो से, क्लब से, सिनेमा से-नहीं आनंद के लिए किसी भौतिक पदार्थ की जरूरत नहीं है। आनन्द सदा सर्वदा परिपूर्ण रूप से आपके स्वरूप में विराजमान है। भगवान् केवल मात्र असीम अगाध आनन्द स्वरूप हैं।

 

श्रुतियों, अनुभवसिद्ध ज्ञानियों, तत्त्ववेत्ता ब्रह्मसाक्षात्कार किये हुए सिद्ध महापुरुषों की यह घोषणा है'आनन्दं ब्रह्मेति विजानात्' हे मानव ! क्षणिक सुख के लिए, अल्प वस्तुओं के लिए तुम्हारे अन्दर भ्रान्ति है, बड़ा धोखा है, इस कारण भटकते फिर रहे हो। लेकिन अनन्त आनन्द के सागर में डूब रहे हो, उसे आप जानते नहीं हैं। "जल में मीन प्यासी देख कबीरा आवत हासी" सारी जिन्दगी जल में रहकर के भी मीन प्यासी है। अखबार में छपवा दो कोई क्या बोलेगा। ठीक यही दशा हमारी है। 'आनन्दं ब्रह्मेति विजानात्' निराकार, निर्गुण, अनन्त, नित्य, अविनाशी, शाश्वत, अमर परात्पर तत्त्व कहाँ है ? 'सर्व खल्विदं ब्रह्म' ऐसा सिद्ध महापुरुषों ने अनुभव करके बोला है, जो कुछ भी है सब ब्रह्म से ओत-प्रोत है।

 

भक्त कहता है कि आनन्दकन्द भगवान् आनन्दस्वरूप है। भगवान् कहाँ हैं? वैकुण्ठ में, गोलोक में, कैलाश में, साकेत में हैं? 'सर्वं विष्णुमयं जगत्' है। यह पूरा का पूरा अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड विष्णु तत्त्व से, भगवद् तत्त्व से ओतप्रोत है आनन्दस्वरूप परमात्मा सर्वव्यापी सर्वर्वान्तर्यामी है। उपनिषद्, गीता सबमें इस तत्त्व को पुष्ट किया गया है। अर्जुन को निमित्त बनाकर इस तत्त्व को सिद्ध करने के लिए एक पूरा अध्याय गीता में रख दिया है। भगवान् कहते हैंजो तुम देखते हो, सुनते हो, स्पर्श करते हो सब कुछ मैं ही हूँ। इस विशाल विश्व को मैं ही धारण किये हुए हूँ।

 

हमने यह चद्दर ओढ़ा है, बताओ इसमें ऐसा कौन-सा स्थान है जहाँ पर कपास या धागा हो। कुम्हार के पास घड़ा, सुराही, सकोरा बर्तन आदि मिट्टी के सिवाय कुछ भी नहीं है। सुनार के पास चूड़ी, हार, नथ कर्णपुल है, उसमें भी सोने के अलावा कुछ भी नहीं है। भगवान् के साथ विश्व का सम्बन्ध भी ऐसा ही है, आप अनुमान लगा सकते हैं।

 

आनन्द कहाँ नहीं है? कहाँ खोजने जायें ? नारायण तत्त्व, ईश्वर तत्त्व, ब्रह्म तत्त्व, सच्चिदानन्द तत्त्व, अन्दर बाहर सबमें समाया हुआ है, सबमें ओतप्रोत है जहाँ तुम हो 'वह' भी वहाँ है। उसके लिए किसी को छोड़कर, इधर उधर जाने का प्रश्न ही नहीं है। इसलिए नारायणसूक्त में भी कहते हैं-

 

यच्चकिञ्चिज्जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा।

अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः।।

 

शंकर भगवान् सदैव आपके हृदय-कमल में विराजमान हैं-

 

कर्पूरगौरं करूणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्

सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि ।।

 

भगवान् स्वयं कहते हैं-हे अर्जुन ! मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ?

 

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः

अहमादिश्च मध्यं भूतानामन्त एव च।।

 

सम्पूर्ण प्राणियों के आदि, मध्य तथा अन्त में मैं ही हूँ और प्राणिय के अन्तःकरण में आत्मरूप से भी मैं ही स्थित हूँ। एक दिव्य तत्त्व सब प्राणी मात्र में गूढ़ रूप में छिपा हुआ है

 

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।

कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।।

 

इस एक श्लोक में बार प्रमाण दिया है

 

. एकोदेवः सर्वभूतेषु गूढः

 

. सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा

 

. कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः

 

इसको प्रतिदिन १० बार, १००० बार मनन करना चाहिए, ध्यान करना चाहिए तभी यह सत्य हमारे मन में उतरेगा। आनन्दस्वरूप तत्त्व हमारे हृदय में बसा हुआ है, फिर भी हम भिखारी की तरह इधर-उधर भटक रहे हैं तो हमसे ज्यादा मूर्ख कौन होगा? मक्खी, कीड़ा, मच्छर मल के ऊपर भी बैठते हैं, गुलाब जामुन के ऊपर भी बैठते हैं भगवान् ने उनको बुद्धि नहीं दी है, इसलिए वे क्षम्य हैं। भगवान् ने हमें बुद्धि, विचारशक्ति, सोचने-समझने के लिए दे रखी है। हमें मानव बनाया है, घोड़ा, गधा, कुत्ता आदि नहीं।

 

ईसाई मजहब में कहते हैं-भगवान् ने अपने जैसा ही इन्सान को बनाया है। इतना ऊँचा स्थान देकर हम इस सत्य को नहीं भूलें, इसके लिए वेद, पुराण, उपनिषद्, गीता, भागवत, रामायण, महाभारत, योगवशिष्ठ, ब्रह्म सूत्र आदि ग्रन्थ दिये हैं। ऋषि-मुनियों ने इस सत्य को उजागर करके हमारे अन्दर कूट-कूट कर भर दिया है फिर भी हम इधर-उधर भटक रहे हैं। तभी तो कहा है आश्चर्यमेतत् मनुष्य लोके सुधां विसृज्य विषं पिबन्ति घोर आश्चर्य है कि संसार में मनुष्य अमृत का त्याग कर विषपान कर रहे हैं। श्रीमद्भागवत में भी कहा है

 

"कांचार्थं रत्नं संत्यक्तम् काँच के टुकड़ों के लिए अमूल्य रलो को छोड़कर खेल-खेल रहे हो, आश्चर्य है! जागो जी, उठो जी आप माया के पीछे जाकर कब तक ऐसा करते रहोगे। श्री नानक देव जी ने भी कहा है-कौड़ी को तो खूब सम्भाला, लाल रतन क्यों छोड़ दिया। ऐसा नहीं करना चाहिए। हमारे आनन्द को हम ही खोते हैं, कोई भी हमें इससे वंचित नहीं करता है, कोई छीन नहीं रहा है। बार-बार आनन्द हमारे सामने खड़ा होता है, हम इन्कार कर देते हैं। क्या करें, हताश होकर चला जाता है, उसके बाद में हम बैठ कर रोते हैं। यही समय है, मुहूर्त है, मौका है, अपने जीवन को परिपूर्ण, सुन्दर बनाओ। इस मौके को छोड़ दिया तो किसी के ऊपर दोषारोपण मत करना।

 

बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में भगवान् ने आधुनिक जगत् के मानव के ऊपर ज्ञान के भण्डार को बरसा दिया है। इतने ऐश्वर्य, इतने ज्ञान से सम्पन्न होने के बाद भी हम कहते हैं भगवद् प्राप्ति का मार्ग नहीं मिल रहा है। भगवान् ने अपना भण्डार खोल दिया है, कुछ भी छुपा के नहीं रखा है। अब शतशः हमें पूरी जिम्मेदारी से कर्तव्य करना है। इसलिए हमें उपनिषद् कह रहे हैं-

 

उत्तिष्ठत ! जाग्रत ! प्राप्य वरान्निबोधत ।।

 

उठो जागो और उस ज्ञान को प्राप्त करके, अपने आपको जान करने निहाल हो जाओ। निर्भय और परमानन्द अवस्था प्राप्त करके