गीता-प्रबोधिनी

 

THE BHAGAVADGITA EXPLAINED

का अविकल अनुवाद

 

लेखक

 

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादक

 

श्री रामकुमार भारतीय

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-249 192

जिला: टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण :१९८३

 

द्वितीय हिन्दी संस्करण : २०११

 

तृतीय हिन्दी संस्करण : २०१४

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

HS 18

 

PRICE: 55/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, शिवानन्दनगर, जि. टिहरी गढ़वाल,

उत्तराखण्ड, पिन २४९ १९२' में मुद्रित।

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प्रकाशकीय

 

श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धान्तों का सम्पूर्ण दृष्टिकोण इस पुस्तक में संघनित रूप में है। भगवद्गीता के सिद्धान्त सम्पूर्ण मानवता के लिए आध्यात्मिक विकास एवं साक्षात्कार हेतु हर युग के लिए सामान्य निर्देशन हैं; किन्तु वर्तमान समय, जब कि जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति तनावग्रस्त एवं चिन्ता से प्रताड़ित है, इस ग्रन्थ का एक विशेष महत्त्व एवं मूल्य है। भगवद्गीता ससीम आत्मा की पुकारों का उस असीम द्वारा दिया गया उत्तर है। यह केवल धरती के मानव की परिस्थितियों के हल ही प्रतिबिम्बित नहीं करती, प्रत्युत् समस्त वैश्वीय अवस्थाओं का भी हल इसमें सन्निहित है। भगवद्गीता किसी एक धर्म-विशेष की पाठ्य-पुस्तक नहीं, प्रत्युत् धर्म के वास्तविक स्वरूप का ग्रन्थ है। यह उस उच्चतर चेतना की वाणी है जो अपने परिपूर्ण स्वरूप को-परमात्म-स्वरूप को उद्घाटित करती है। प्रस्तुत रचना में डिवाइन लाइफ सोसायटी के उपाध्यक्ष श्री स्वामी योगस्वरूपानन्द जी महाराज का परिश्रम एवं प्रयास सम्मिलित है।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

नमो भगवते वासुदेवाय

गीता-ध्यान

 

हे जननी भगवद्गीते! मैं आपका ध्यान करता हूँ; क्योंकि महाभारत के युद्ध-क्षेत्र में स्वयं भगवान् ने अपने मुखारविन्द से अर्जुन को आपका आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया था। मैं परम ज्ञान-स्वरूप महर्षि व्यास का भी ध्यान करता हूँ जिन्होंने महान् ग्रन्थ महाभारत की रचना की जो 'पंचम वेद' कहलाता है; क्योंकि इसमें मानव का समस्त ज्ञान समाहित है। हे महर्षे! मैं आपको साष्टांग प्रणाम करता हूँ। ब्रह्माण्ड-चेतना के साथ एकात्म होने के कारण आप भगवद्-उपदेशों को आत्मसात् कर सके। महाभारत हृदय-प्रदीप के तैल के सदृश है। आपने इस दीप को गीता-ज्ञान से प्रज्वलित किया है और इस भाँति लोगों की अपनी दैनिक समस्याओं तथा अज्ञानान्धकार को पराभूत करने में सहायता की है। हे महर्षे! आपको मेरा नमस्कार! आपने महान् ग्रन्थ महाभारत, जो कि व्यष्टि-सत्ता को विश्व-सत्ता के साथ अपने को युक्त करने की विधि की शिक्षा देने के कारण 'योग-शास्त्र' भी कहलाता है, में विभिन्न परिस्थितियों में कार्य करने वाले विभिन्न पात्रों के माध्यम से मानव-मन के विभिन्न प्रकार्यों का बड़ा ही सुरुचिपूर्ण प्रतिपादन किया है। आपने महाभारत युद्ध में पाण्डव-पक्ष की उच्चतर मन से और कौरव-पक्ष की निम्नतर मन से तुलना की है।

 

महाभारत युद्ध की दुस्तीर्ण सरिता के भीष्म तथा द्रोण दो प्रबल तट हैं। ये दोनों अपराजेय योद्धा थे जिनसे अर्जुन को अत्यधिक अनुराग था जिसके कारण वह विषण्ण और युद्ध में अपना कर्तव्य करने को अनिच्छुक था। हे महर्षे ! आपने तद्वत् शिक्षा दी कि आध्यात्मिक पथ में राग बहुत बड़ा अवरोध है। राजा जयद्रथ ने अनुचित साधनों से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की हत्या की तथा युद्ध में भीषण क्रोध का केन्द्र-बिन्दु बना। अतः महाभारत-युद्ध-सरिता के जल की तुलना इस दुष्ट राजा से की गयी है। दुर्योधन तथा उसके भ्राताओं के मामा शकुनि, जिसने द्यूत-क्रीड़ा में कपट से विजय प्राप्तं की थी, की तुलना सरिता-तल पर स्थित एक बड़े नीलोत्पल से की गयी है जो नेत्रों को लुभाता और इस प्रकार व्यक्ति को सरिता के सम्भाव्य संकटों के प्रति असावधान बनाता है। शल्य इस जल में बलशाली ग्राह के सदृश्य है जो दुराक्रम्य है। कृपाचार्य इस सरिता की प्रबल धारा है; क्योंकि उनका शौर्य सेना को वेगवती धारा की भाँति निरन्तर आगे बढ़ने को उत्तेजित करता था। कर्ण, जिसे धनुर्विद्या में अपनी निपुणता के कारण अभिमान था, की तुलना सरिता की उत्ताल तरंगों से की गयी है मानो वे अभिमान तथा दुराग्रह से क्षुब्ध हो रही हों। अश्वत्थामा तथा विकर्ण ने अवैध रूप से पाण्डवों की सेना के अनेक लोगों का संहार किया; अतः वे सरिता में अपने शिकार को निगल जाने वाले मकर हैं। जैसे सरिता में जलावर्त समस्त जल-प्रवाह को अपनी गति की ओर निर्दिष्ट करता है वैसे ही दुर्योधन ने सम्पत्ति, सत्ता तथा पद के लोभ में कर पाण्डवों को नष्ट करने के लिए अनेक विश्वासघाती उपायों का प्रयोग किया। इससे आपने यह शिक्षा दी कि सम्पत्ति, सत्ता तथा पद की कामना व्यक्ति के जीवन का पूर्णतया सत्यानाश कर डालती है। आपने विश्व को यह प्रकट कर दिया कि एकमात्र भगवान् तथा उनकी महिमा के सतत स्मरण तथा जैसा पाण्डवों ने भगवान् श्रीकृष्ण को आत्म-समर्पण किया था, उसी भाँति सर्वशक्तिमान् प्रभु को आत्म-समर्पण करने से ही मनुष्य अपने जीवन के दैनन्दिन संघर्षों को पराभूत तथा इस जन्म-मृत्यु के चक्र-रूपी संसार सागर का सन्तरण कर सकता है। जैसे पाण्डव अपने कर्णधार-रूप श्रीकृष्ण की सहायता से महाभारत-रूपी सरिता पार कर गये वैसे ही मुझे शुद्ध मन तथा बुद्धि प्रदान करें तथा अज्ञानान्धकार को पार कर अमरत्व का प्रकाश उपलब्ध करने के लिए भगवान् को सतत स्मरण करने तथा उन्हें आत्म-समर्पण करने को मुझे समर्थ बनायें!

 

हे वसुदेव तथा देवकी के पुत्र तथा वृन्दावन की गोपियों को परमानन्द प्रदान करने वाले भगवान् कृष्ण! आपको साष्टांग प्रणाम करता हूँ। जैसे स्वर्गिक पारिजात वृक्ष की छाया के नीचे जाने से लोगों की मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, उसी भाँति आपने पाण्डव तथा अन्य जिन लोगों ने आपके चरण कमलों की शरण ली, उनके सभी क्लेश विदूरित कर उन्हें निष्काम तथा अमर बना दिया।

 

हे परम प्रभु! आपने पार्थसारथि के रूप में दोनों सेनाओं के मध्य में अपने एक हाथ में कशा तथा दूसरे हाथ में ज्ञान-मुद्रा धारण कर अर्जुन को भागवत-धर्म का उपदेश दिया। इस ज्ञान-मुद्रा में मध्यमा, अनामिका तथा कनिष्ठिका उँगलियाँ सीधी तथा परस्पर सन्निकट रखी जाती हैं जो प्रकृति के त्रिविध-सत्त्व, रज तथा तम-गुणों की द्योतक हैं। तर्जनी उँगली जीव की द्योतक है। यह अँगूठे की ओर अभिनत होती है और उसे स्पर्श करती है। अँगूठा परम ब्रह्म का प्रतीक है। जब जीवात्मा तीनों गुणों से पृथक् हो जाता है, तब वह ब्रह्म से योग प्राप्त कर लेता है।

 

हे जगद्गुरो, दुष्टों का संहार तथा साधुओं का परित्राण करने वाले हे भगवान् कृष्ण ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे माधव, हे परमानन्द के स्रोत ! मैं आपको दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। एकमात्र आप ही वाक्शक्तिहीन मूक को वाचाल (वाक्शक्ति विशिष्ट) तया गतिशक्तिहीन पंगु को पर्वत को अतिक्रमण करने वाला बना सकते हैं।

 

हे भगवान् कृष्ण! आपने वत्स-सदृश अर्जुन तथा शुद्ध चित्त तथा भक्तिमय हृदय वाले व्यक्ति के लाभार्थ गो-सदृश उपनिषदों से समस्त ज्ञान के सार का दोहन किया।

 

हे भगवान् कृष्ण ! मैं आपको आत्म-निवेदन करता हूँ। ब्रह्मादि देवता आपकी कृपा तथा स्व-स्व शक्तियों के प्राप्त्यर्थ वेद-गान द्वारा आपकी पूजा करते हैं। योगी जन गहन ध्यानावस्था में निविष्ट हो आपमें तद्गत चित्त द्वारा आपका दर्शन करते हैं। आपका सत्स्वरूप तो स्वर्ग-स्थित देवताओं को और पाताल-स्थित दैत्यों को ज्ञात है; क्योंकि आप सबके मूल स्रोत हैं। मैं आपको साष्टांग प्रणाम करता हूँ।

 

आपने अपने वैयक्तिक आदर्श द्वारा तथा मानवता को गीता के रूप में अपनी देन के द्वारा अपने में प्रविलीन होने की प्रविधि की शिक्षा दी। कृपा कर मुझे ऐसी कुशाग्र बुद्धि प्रदान करें जिससे मैं आपके उपदेशों को ग्रहण कर सकूँ तथा आपमें संविलीन हो सकूँ!

 

हे गीता माता! मैं आपका ध्यान करता हूँ। आप गीतोपदिष्ट जीवन-यापन करने तथा सदा-सर्वदा के लिए भागवतीय चेतना की प्राप्ति में मेरे मन तथा बुद्धि का पथ-प्रदर्शन करें!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गीता के जन्म की पृष्ठभूमि

 

धृतराष्ट्र और पाण्डु दो भाई थे। धृतराष्ट्र का विवाह गान्धारी के साथ हुआ था और पाण्डु के कुन्ती तथा माद्री नामक दो पत्नियाँ थीं। आखेट करते समय हुए पाप के कारण पाण्डु राजा को यह श्राप था कि वह अपनी पत्नी के साथ सम्भोग नहीं कर सकेगा। कुन्ती ने छोटी अवस्था में ऋषि की एकनिष्ठ सेवा द्वारा वरदान प्राप्त किया था, जिसके फल-स्वरूप उसको यम से युधिष्ठिर, वायु से भीम और इन्द्र से अर्जुन-इस प्रकार तीन पुत्र प्राप्त हुए थे। इसी प्रकार स्वर्ग के धन्वन्तरियों अश्विनीकुमारों द्वारा माद्री से क्रमशः नकुल और सहदेव नामक दो जुड़वाँ बालक पैदा हुए थे। धृतराष्ट्र को गान्धारी से १०१ शिशु हुए थे। पाण्डु की मृत्यु के पश्चात् धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र कौरवों के साथ पाण्डुपुत्र पाँचों पाण्डवों का भी पालन-पोषण किया। पाण्डव कौरवों के साथ छोटे से बड़े हुए थे; पर पाण्डवों के शौर्य और बुद्धि-चातुर्य के कारण कौरव उन्हें अधिक समय तक अपने साथ रख सके। अतः पाण्डवों ने राज्य के अपने आधे हिस्से में अलग रहने का निश्चय किया।

 

राजसूय यज्ञ के समय पाण्डवों का वैभव, सम्पत्ति और ऐश्वर्य देख कर कौरवों में ज्येष्ठ दुर्योधन के मन में घोर ईर्ष्या और लोभ का संचार हुआ। उसने अपने मामा शकुनि की दुष्ट सलाह से युधिष्ठिर को जुआ खेलने का आमन्त्रण दे कर छल-कपट से पाण्डवों को हराया। पाण्डव जुए में द्रौपदी-सहित अपनी सारी सम्पत्ति हार गये और निर्णय हुआ कि पाण्डव द्रौपदी के साथ बारह वर्ष तक वनवास में तथा एक साल तक अज्ञातवास में रहें और तब तक दुर्योधन पूरे राज्य पर शासन करे।

 

कौरवों द्वारा दिये गये अनेक प्रकार के कष्ट और बाधाओं को पार करते हुए पाण्डव अपने वनवास और अज्ञातवास के तेरह वर्ष समाप्त कर पूर्व-निर्णय के अनुसार कौरवों से अपना राज्य वापस माँगने लगे; परन्तु दुर्योधन ने उन्हें एक सूई के अग्रभाग जितनी जमीन देने से भी इनकार कर दिया। तब राज्य-प्राप्ति के लिए माता कुन्ती के परामर्श एवं भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेरणा से पाण्डवों ने कौरवों के साथ युद्ध करने का निश्चय किया। इस युद्ध में यादव-कुलभूषण भगवान् श्रीकृष्ण की सहायता प्राप्त करने के लिए कौरवों की ओर से दुर्योधन को तथा पाण्डवों की ओर से अर्जुन को द्वारका भेजा गया। उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण भगवान् अपने महल में पलंग पर आराम कर रहे हैं। दुर्योधन श्रीकृष्ण के शिर के पास जा कर बैठ गये और अर्जुन भगवान् के चरणों के पास खड़े रहे। श्रीकृष्ण ने जब आँखें खोली तो स्वभावतः उनकी नजर सर्व-प्रथम पैरों के पास खड़े अर्जुन पर पड़ी और बाद में पलंग के सिरहाने कुरसी पर बैठे दुर्योधन को उन्होंने देखा। श्रीकृष्ण ने उन दोनों से कुशल समाचार तथा द्वारका आने का प्रयोजन पूछा। तत्कालीन प्रथा के अनुसार प्रथम दृष्टि अर्जुन पर पड़ने के कारण श्रीकृष्ण ने पहले अर्जुन से ही प्रश्न किया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तुम मुझ निःशस्त्र कृष्ण अथवा 'नारायणी-सेना' नामक मेरी समस्त शक्तिशाली सेना-इन दोनों में से किसी एक को पसन्द कर लो। श्रीकृष्ण ने यह भी चेतावनी दे दी थी कि वे स्वयं युद्ध में भाग नहीं लेंगे, शस्त्र ही धारण करेंगे। वे केवल साक्षी-रूप ही रहेंगे। यह सब स्पष्ट होने पर भी श्रीकृष्ण के सच्चे भक्त अर्जुन ने शक्ति-सम्पन्न 'नारायणी-सेना' की अपेक्षा करके भगवान् श्रीकृष्ण को ही अपने पक्ष में लेना पसन्द किया। दुर्योधन ने अर्जुन को मूर्ख मान कर बड़ी उमंग के साथ अपने लिए शक्तिशाली नारायणी सेना की इच्छा प्रदर्शित की और श्रीकृष्ण से आश्वासन पा कर हर्षित हो हस्तिनापुर लौट आये।

 

श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन से पूछा कि वे युद्ध में शस्त्र तो धारण नहीं करेंगे, फिर उनको उसने क्यों पसन्द किया? तब अर्जुन ने कहा कि भगवन् आप तो दृष्टिमात्र से ही सारी सेना का संहार करने में समर्थ हैं, फिर मुझे निःसत्त्व सेना की क्या आवश्यकता है? आप मेरे सारथि बनें, यह मेरी बहुत दिनों से हार्दिक इच्छा है। अतएव आप कृपा कर इस युद्ध में मेरी इस इच्छा की पूर्ति करें। भक्तों को हृदय से चाहने वाले प्रभु ने उसकी यह प्रार्थना सहर्ष स्वीकार कर ली। इस प्रकार महाभारत के युद्ध में श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि बने।

 

द्वारका से दुर्योधन और अर्जुन के लौट आने के बाद स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवों की ओर से मध्यस्थता करने हस्तिनापुर गये और उन्होंने युद्ध टालने का भरसक प्रयत्न किया; परन्तु अहंकारी दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि की सलाह से शान्ति-वार्ता की उपेक्षा कर श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने की कोशिश की। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने विराट् स्वरूप का दर्शन कराया। अन्धे राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्रों के मोह-बन्धन के कारण उन्हें अपने काबू में नहीं रख सके और कौरवों में ज्येष्ठ दुर्योधन ने मिथ्याभिमान से प्रेरित हो कर शक्तिशाली पाण्डवों के साथ युद्ध में सामना करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

 

दोनों ओर से जब युद्ध की तैयारियाँ होने लगीं, तब मुनि वेदव्यास अन्धे धृतराष्ट्र के पास गये और कहा कि जो तुम इस भयंकर सत्यानाशी युद्ध को खुली आँखों से देखना चाहते हो तो मैं तुम्हें दृष्टि प्रदान कर सकता हूँ। धृतराष्ट्र ने कहा "हे ब्रह्मर्षियों में श्रेष मुनिवर! अपने कुटुम्बियों का संहार खुली आँखों से देखने की मेरी बिलकुल भी इच्छा नहीं है; परन्तु युद्ध का सारा विवरण सुनने की मेरी इच्छा है।" इस पर व्यास मुनि ने धृतराष्ट्र के विश्वासपात्र सलाहकार संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की और अन्धे राजा से कहा कि युद्ध के सारे प्रसंगों का वर्णन संजय तुम्हें सुनायेंगे। इस युद्ध में जो-कुछ होगा, उसे संजय सीधे देख सकेंगे अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जान सकेंगे। उनकी आँखों के सामने या पीठ पीछे, दिन में या रात में, प्रकट-अप्रकट रूप से जो भी आचार-विचार होंगे, वे उनकी दृष्टि से छिपे नहीं रह सकेंगे। जो कुछ घटनाएँ होंगी, उनका यथार्थ चित्रण संजय के सम्मुख उपस्थित हो जायेगा। उन्हें किसी प्रकार की शस्त्र बाधा भी नहीं होगी और वह तुम्हें युद्ध का वृत्तान्त सुनाने में थकेंगे भी नहीं; पर अन्त में सत्य की ही विजय होगी।

 

कौरव-पाण्डवों के बीच सतत महाभारत युद्ध चलते रहने पर दश दिन के अन्त में जब महान् योद्धा भीष्मपितामह को अर्जुन ने उनके रथ से नीचे गिराया, तब संजय ने धृतराष्ट्र को यह खबर सुनायी। बाद में दुःखग्रस्त अन्धे राजा धृतराष्ट्र ने संजय से पिछले दश दिनों तक लड़े गये युद्ध का सम्पूर्ण विवरण सुनाने की इच्छा व्यक्त की। बस, यहीं से भगवद्गीता का आरम्भ होता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय. 3

गीता-ध्यान. 4

गीता के जन्म की पृष्ठभूमि.. 7

1.अर्जुनविषादयोग. 11

2.सांख्ययोग. 14

3.कर्मयोग. 17

4.ज्ञानविज्ञानयोग. 20

5.कर्मसंन्यासयोग. 23

6.ध्यानयोग. 25

7.ज्ञानविज्ञानयोग. 27

8.अक्षरब्रह्मयोग. 30

9.राजविद्याराजगुह्ययोग. 34

10.विभूतियोग. 36

11.विश्वरूपदर्शनयोग. 38

12.भक्तियोग. 41

13.क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग. 43

14.गुणत्रयविभागयोग. 47

15.पुरुषोत्तमयोग. 49

16.दैवासुरसम्पद्विभागयोग. 51

17.श्रद्धात्रयविभागयोग. 53

18.मोक्षसंन्यासयोग. 55

श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती.. 60

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम अध्याय

अर्जुनविषादयोग

 

अहंकारी मन, स्वार्थ तथा आतुरता से अन्धे बने धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि उनके स्वजनों और पाण्डु के पुत्रों ने युद्ध के लिए उत्सुक हो कर धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र में क्या-क्या किया ? जहाँ वे युद्ध के लिए एकत्रित हुए हैं, वह धर्मक्षेत्र कहलाता है, क्योंकि अग्नि, इन्द्र, ब्रह्मा आदि देवताओं ने वहाँ तप किया था। वह भूमि कुरुक्षेत्र भी कहलाती है; क्योंकि कौरवों के पूर्वज कुरु राजा ने भी वहाँ घोर तपश्चर्या की थी। यह मान्यता थी कि धर्मयुद्ध में जो इस भूमि पर अपने प्राण त्याग करेंगे, वे स्वर्ग में पहुँचेंगे। अतः युद्ध के लिए यह स्थान पसन्द किया गया था। संजय ने कहा कि कौरवों के राजा दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना देखी। कौरव-सेना की तुलना में उसका संख्या-बल कम होने पर भी उसकी व्यूह रचना के कारण वह सेना विशाल दिखायी देती थी। दुर्योधन अभिमानपूर्वक अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास गये। उन्हें सत्यनिष्ठ पाण्डवों के साथ युद्ध करना था। अतः अपने अन्तर के भयातुर भाव को छिपा कर वे द्रोणाचार्य को द्रुपद के साथ उनकी शत्रुता का स्मरण करा कर प्रतिकार का भाव उदीप्त करना चाहते थे; क्योंकि द्रुपद राजा के पुत्र पाण्डव-सेना की व्यूह रचना कर रहे थे। द्रोणाचार्य के शौर्य की प्रशसा इसलिए भी की गयी; क्योंकि श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम तथा पाण्डवों के पक्ष के अनेक शक्तिशाली योद्धाओं की शक्ति का उन्हें भान था। वे यह भी जानते थे कि वे स्वयं अधर्माचरण कर रहे हैं। अपने सेनापति भीष्मपितामह को उत्तेजना देने के लिए उन्होंने अन्य सभी योद्धाओं को उनकी सब ओर से रक्षा करने का आदेश दे दिया।

 

सबसे वयोवृद्ध एवं सेनानायक भीष्मपितामह ने युद्ध आरम्भ करने का आवाहन शंख बजा कर किया। पश्चात् कौरव-दल के अन्य योद्धाओं ने भी शंख, मृदंग, नगाड़े एवं रणभेरी के तुमुलनाद से रणक्षेत्र को गुंजा दिया। इसके पश्चात् पाण्डव-पक्ष में भी वायुपुत्र हनुमान् की आकृति से अंकित ध्वजा फहराते श्वेत अश्वों से युक्त सुसज्जित रथ में बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन तथा अन्य योद्धाओं ने अपने दिव्य शक्तिशाली शखों की प्रचण्ड ध्वनि से कौरवों के युद्ध के आवाहन का प्रत्युत्तर दिया। उनकी गर्जना से आकाश और पृथ्वी ही निनादित नहीं हुई, अपितु समस्त कौरव-सेना के हृदय में भय का संचार हुआ।

 

धृतराष्ट्र के पुत्रों को युद्ध-कार्य के लिए अवस्थित देख कर योद्धाओं के दर्शन हेतु अर्जुन ने श्रीकृष्ण को अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच ला कर खड़ा करने को कहा। श्रीकृष्ण ने रथ जहाँ भीष्म, द्रोण तथा अन्य महान् योद्धा खड़े थे, वहाँ ला कर खड़ा किया। विदुर जी ने युद्ध से होने वाले जिन अनिष्टों का वर्णन किया था, अपने गुरुजनों और सगे-सम्बन्धियों को देख कर, उनकी याद अर्जुन के मन में ताजी हुई। पाण्डवों को हताश करने के लिए शकुनि को एक कपट-युक्ति सूझी। उसने पाण्डवों के प्रति अत्यन्त सहृदय आदर-भाव रखने वाले विदुर जी से जा कर कहा कि वे पाण्डवों के पास जा कर उन्हें समझायें कि युद्ध के क्या अवांछनीय परिणाम हो सकते हैं। फलतः इस युद्ध के द्वारा उनके ही गुरु एवं सम्बन्धी-जनों की हत्या का पाप, अनेक स्त्रियों के पति-मरण से विधवा होने की शक्यता एवं उससे दुराचार, व्यभिचार के प्रसार की सम्भावना, राष्ट्र की सम्पत्ति और वैभव का विनाश, घोड़े, हाथी आदि निर्दोष प्राणियों का संहार आदि के सम्बन्ध में विदुर जी ने अर्जुन को सब बातें बतलायीं। इस परामर्श को स्मरण कर अर्जुन बहुत दुःखी हुए और उन्होंने युद्ध से इनकार किया।

 

अपने गुरुओं और सगे-सम्बन्धियों को मारे बिना राज्य करने की इच्छा प्रदर्शित करने के स्थान में अर्जुन अपने क्षत्रिय धर्म को भूल कर श्रीकृष्ण से कहने लगे कि उनके हाथ में गाण्डीव धनुष को पकड़ कर रखने तक की शक्ति नहीं रह गयी है तथा युद्ध में उनके पराजय के अपशकुन भी उन्हें दिखायी देने लगे हैं। अपने गुरुजनों की हत्या के भव से चिन्तित एवं भगवान् श्रीकृष्ण की शक्ति से अपरिचित अर्जुन विद्वान् के समान युद्ध के अनिष्ट परिणामों का वर्णन करते हुए कहने लगे कि गुरुओं एवं सगे-सम्बन्धियों को मार कर वे राज्य का आनन्द भोगना नहीं चाहते और इस युद्ध द्वारा यदि तीनों लोकों का राज्य भी उन्हें मिलता हो तो भी उसकी उन्हें चाह नहीं है। अर्जुन यह मानते हैं कि सगे-सम्बन्धियों की मृत्यु के पश्चात् साम्राज्य का उपभोग करने की अपेक्षा मोह के वशीभूत हुए कौरव ही उन्हें मार डालें तो अच्छा है। श्रीकृष्ण की सर्वज्ञ शक्ति को भूल कर वे माया और शोक से पीड़ित हो कर यह तर्क करते हैं कि कुटुम्ब के नाश से कुल-परम्परागत सनातन धार्मिक विधियों का नाश होगा, स्त्रियाँ व्यभिचारिणी बनेंगी, जिससे वर्णसंकरता होगी तथा आप्तजनों के नाश करने से नरक-वास भोगना पड़ेगा। अर्जुन यह सोचते हैं कि वे स्वयं नि शस्त्र और प्रतिकार-रहित हो कर युद्ध में खड़े रहे और कौरव उन्हें मार डालें। यही श्रेयस्कर है। इस प्रकार अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए शोकमग्न अर्जुन अपने धनुष-बाण को एक ओर छोड़ कर रथ पर विषण्ण अन्त करण से बैठ गये।

 

इस अध्याय में मनुष्य को निम्नांकित उपदेश मिलते हैं धृतराष्ट्र के समान जब मनुष्य का मन मोह और स्वार्थ से अन्धा हो जाता है, तब वह राष्ट्रहित की परवाह नहीं करता और परिणाम स्वरूप अपने ही आप्तजनों एवं समस्त राष्ट्र के विनाश का कारण बनता है।

 

दुर्योधन के समान मन जब अभिमान, ईर्ष्या, लोभ, कपट, अहंकार, कीर्ति की इच्छा तथा नाम और सत्ता की कामना से अभिभूत होता है, तब मनुष्य अपने मित्रों तथा सगे-सम्बन्धियों एवं प्रजा का नाश करने में नहीं हिचकिचाता और अन्ततः वह अपना ही नाश कर लेता है।

 

अर्जुन के समान मनुष्य जब मोह और कामनाओं से ग्रसित हो, स्वधर्म-पालन में निष्फल होता है, तब वह अपने बल एवं साहस को खो बैठता है और श्रीकृष्ण जैसे प्रभु के सम्मुख होते हुए भी भगवान् की उपस्थिति का अनुभव नहीं कर पाता।

 

संजय के समान मनुष्य जब सहृदयी, ईश्वर-भक्त, स्वामी भक्त और निष्काम हो कर शत्रु एवं मित्र के प्रति समान भाव रखता है, तब उसे मानसिक शान्ति प्राप्त हो कर ईश्वर के विश्व-रूप का दर्शन होता है।

इस अध्याय में यह समझाया गया है कि द्वन्द्व ही मनुष्य के दुख का मूल कारण है। अर्जुन के व्यक्तित्व के दुविधायुक्त चारित्र्य, उसके मन और हृदय एवं विचार और लगन के बीच की विसंवादिता के कारण ही ऊपर वर्णन की गयी आपत्तियाँ उपस्थित हुई हैं। एक ओर जहाँ पापी शत्रुओं का नाश करने के लिए उनका क्षत्रिय धर्म उन्हें प्रेरित करता है, वहीं दूसरी ओर अपने सगे-सम्बन्धियों तथा गुरुजनों के स्नेह एवं प्रेम के लिए उनका हृदय छटपटाता है; अतः उनके विनाश का निमित्त बनने से वे बचना चाहते हैं। इस प्रकार की आन्तरिक विसंवादिताएँ अर्जुन के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, नैतिक एव आध्यात्मिक स्तरों को असन्तुलित बना कर उनके मन में विषाद उत्पन्न करती हैं।

 

इस प्रकार 'अर्जुनविषादयोग' नामक यह प्रथम अध्याय समाप्त होता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

द्वितीय अध्याय

सांख्ययोग

 

मोह और भय से व्यग्र हुए अर्जुन की परिस्थिति का संजय वर्णन करते हैं। अपना आशय स्पष्ट रूप से प्रकट करने के स्थान में अर्जुन दम्भ से कुटुम्ब के प्रति कर्तव्य, युद्ध से होने वाले दोष, पूज्य द्रोणाचार्य एवं भीष्मपितामह की हत्या आदि की बातें करते हैं। श्रीकृष्ण के सन्तोष के लिए वे त्याग की भावना और भिक्षा माँग कर जीवन-निर्वाह करने की अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं।

 

अर्जुन की इस स्थिति को देख कर भगवान् श्रीकृष्ण उनके विषादपूर्ण हृदयदौर्बल्य के लिए उनकी भर्त्सना करते हैं और उन्हें युद्ध के लिए प्रोत्साहित करते हैं। मन में जब विरोधी विचार उठते हैं, तब मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ बन जाता है। ऐसे समय पर मनुष्य को किसी ज्ञानी पुरुष अथवा गुरु का परामर्श आवश्यक होता है। बारम्बार संसार के थपेड़े खा कर मनुष्य का अहंभाव अपनी असमर्थता एवं असहायता का अनुभव करता है और तब शान्ति की आशा से सर्वशक्तिमान् प्रभु की ओर मुड़ता है, उसकी शरण में जाता है। अर्जुन भी अपनी काल्पनिक विद्वत्ता और बुद्धिमत्ता के अहंकारपूर्ण विचारों से श्रीकृष्ण को निश्चय कराने में असफल सिद्ध हुए, तब उन्हें अपनी निर्बलता का भान हो गया और वह अनन्य भाव से श्रीकृष्ण की शरण में जा कर उनके आश्रित बन गये, सच्चे अर्थ में उनके वह शिष्य बन गये। अपने मन की उलझन पर विजय प्राप्त करने के लिए उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन की प्रार्थना की। तब मुस्कराते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन के अज्ञान और काल्पनिक भय को दूर करते हैं। अर्जुन की उत्सुकता, सहृदयता, निःस्वार्थ शरणागति और आत्मज्ञानाभाव को देखते हुए उन्हें प्रथम 'सांख्ययोग' अर्थात् आत्मा के सच्चे स्वरूप का ज्ञान कराते हैं और उसके पश्चात् जीवन के अन्तिम उद्देश्य अर्थात् परम साक्षात्कार को प्राप्त करने के मार्ग 'कर्मयोग' का उपदेश देते हैं। वे आत्मा के अविनाशी स्वभाव के विषय में शिक्षा देते हुए कहते हैं कि आत्मा के लिए भूत, वर्तमान और भविष्य का कोई अर्थ नहीं है। वह त्रिकालाबाधित है। अर्जुन की मर्यादित बुद्धि को ध्यान में रखते हुए भगवान् श्रीकृष्ण बाल्यावस्था, युवावस्था तथा वृद्धावस्था के शारीरिक परिवर्तनों का उदाहरण दे कर समझाते हैं कि इन परिवर्तनों के कारण जैसे व्यक्ति का 'मैं'-पन नहीं बदलता, वैसे ही जन्म-मरण आदि के कारण भी आत्मा में कोई फेर-बदल नहीं होता। जिस प्रकार पुराने वस्त्रों को छोड़ कर मनुष्य नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार जीव पुराना शरीर छोड़ कर नये शरीर को ग्रहण कर लेता है। जिन-जिन इच्छाओं की तृप्ति के लिए जीव इस संसार में जन्म लेता है, उनका अनुभव लेने के बाद वह शरीर त्याग देता है।

 

इन्द्रियों के साथ विषयों के सम्पर्क से प्रत्येक व्यक्ति सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि का अनुभव करता है। इन्द्रियाँ नाड़ियों के माध्यम से अपनी अनुभूति को मन तक पहुँचाती हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह योग साधना द्वारा इन्द्रियों को कछुए के समान समेट कर उन्हें विषयों से खींच ले और मन को सन्तुलित रखे। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस मनुष्य में सुख और दुःख को समान मानने की क्षमता है, वही अमरता को प्राप्त करने का अधिकारी होता है। आत्मा अविकारी और सत् है। अन्य जो विकारी वस्तुएँ हैं, वे सब असत् हैं। इस अविनाशी आत्मा का कोई नाश नहीं कर सकता। व्यक्ति जो जब यह ज्ञान हो जाता है कि आत्मा का जन्म-मरण नहीं है, तब वह इस नाशवान् शरीर के नष्ट होने पर कभी शोक नहीं करता। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश- इन पंचमहाभूतों के परे जो आत्मा है, उसको शस्त्र काट सकते हैं, वह जल से भीगता है, उसे अग्नि जला सकती है और उसे वायु ही सुखा सकती है। वह सर्वव्यापी, शाश्वत, अविकारी और अविचल है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि वह जिन शक्तिशाली शस्त्रों से अपने सगे-सम्बन्धियों को मारने का विचार कर रहा है, वे किसी को मार डालने में असमर्थ हैं। आत्मा का बुद्धि द्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता और उसे जाना जा सकता है। वह इन्द्रियग्राह्य भी नहीं है; क्योंकि वह इन्द्रियों की पहुँच से सर्वथा परे है।

 

भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के विक्षिप्त मन को समझाने के लिए युद्ध के भौतिक लाभों का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि क्षत्रिय का सुख पारिवारिक आनन्द या भौतिक भोगों में नहीं; अपितु धर्मस्थापना हेतु सत्य एवं न्याय के संग्राम करने में है। श्रीकृष्ण कहते हैं, "यदि तुम शत्रु पर विजय प्राप्त कर लोगे, तो वसुन्धरा पर सुखपूर्वक राज्य कर सकोगे और यदि युद्ध में तुम्हारी मृत्यु हो गयी तो भी तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी। यदि तुमने इस समय युद्ध करने के अपने स्वधर्म का पालन नहीं किया, तो तुम्हें अपने स्वजनों द्वारा ही अपमानित होना पड़ेगा, जो कि मृत्यु से भी अधिक दुःखदायी एवं लज्जाजनक है। परिणाम की आशा रखते हुए सुख एवं दुःख में मन का सन्तुलन बनाये रख कर यदि तुम कर्तव्य-भावना से युद्ध में प्रवृत्त होगे, तो तुम्हें कदापि पाप नहीं लगेगा।"

 

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रारम्भ में 'सांख्ययोग' का उपदेश दिया और तत्पश्चात् निःस्वार्थ सेवा का मार्ग अर्थात् फलाकांक्षा छोड़ कर कर्म करने की कला- 'कर्मयोग' सिखाया। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भी कर्म जायें वे स्वागत योग्य हैं, यदि उन्हें सन्तुलित मन से कुशलतापूर्वक सम्पन्न किया जाये। जब हम किसी कार्य के फल की इच्छा नहीं रखते, तब कर्म करते समय मन शान्त रहता है। ज्ञानी की एकाग्र बुद्धि का कारण उसकी निष्काम वृत्ति ही है तथा अज्ञानी की विचलित बुद्धि का कारण कामना है। बुद्धि की एकाग्रता के द्वारा ही अमरता प्राप्त करने की आशा की जा सकती है।

 

श्रीकृष्ण इस अध्याय में जिसका मन सन्तुलित एवं निःस्वार्थ है ऐसे कार्यरत कर्मयोगी की प्रशंसा करते हैं और अर्जुन को युद्ध के प्रसंग में भी वैसे भी बनने का आदेश देते हैं। वे अर्जुन को राज्य की प्राप्ति अथवा उसके संरक्षण की कामना से रहित हो युद्ध करने का परामर्श देते हैं। इस प्रकार व्यक्ति प्रकृति के सत्त्व, रज और तमस् नामक तीन गुणों से परे हो कर अपनी आत्मा में स्थित होता है। जिसे आत्मज्ञान हो जाता है, वह जानता है कि तीनों लोकों में प्राप्त करने योग्य कुछ भी नहीं है। इसलिए जय-पराजय, हानि-लाभ आदि में व्यक्ति का मन सन्तुलित रहना चाहिए। इसी को योग कहते हैं। मोह-रहित हो कर हर समय मन को सन्तुलित रखते हुए कर्म करना 'कर्मकौशल' कहलाता है। मन का सन्तुलन रखने से व्यक्ति शुभ और अशुभ-दोनों प्रकार के कर्मों का त्याग कर परम चैतन्य अर्थात् आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर करता है। यह सब सुन कर अर्जुन स्थिर मन वाले (स्थित-प्रज्ञ) मनुष्य के विषय में चार प्रश्न पूछते हैं कि ऐसे मनुष्य की परिभाषा क्या है तथा वह कैसे बोलता, बैठता और चलता है? श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्थित-प्रज्ञ मनुष्य की कोई आकांक्षा नहीं होती। वह आत्मज्ञान और वासना-क्षय का एक-साथ अनुभव करता है। जब मन में कोई वासना नहीं होती, तब उसके परिणाम-स्वरूप होने वाले भय और क्रोध जैसे दूषण भी उसमें नहीं रहते, उनका अपने-आप नाश हो जाता है। भगवान् कहते हैं कि जिस पुरुष में ज्ञानोदय हो जाता है. वह तात्कालिक परिस्थितियों से विचलित नहीं होता। उसमें राग, द्वेष नहीं होते। वह जगत् का तो आलिंगन करता है और उससे घृणा ही करता है, अपितु कछुए के समान अपनी इन्द्रियों को समेट कर उन्हें अन्तर्मुखी बना लेता है। सबमें परमात्मा का साक्षात्कार करने वाला अपनी इन्द्रियों पर अधिकार पा लेता है। श्रीकृष्ण अनियन्त्रित मन की आँधी में फँसी हुई नौका से तुलना करते हैं। वासना की वायु का झौंका आते ही मन डाँवाडोल हो जाता है और बुरा कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। सामान्य मनुष्य की अँधेरी रात जितेन्द्रिय मनुष्य के लिए जाग्रत अवस्था के समान है। इसके विपरीत सामान्य मनुष्य का दिन जितेन्द्रिय मनुष्य के लिए रात्रि के समान है। स्थित-प्रज्ञ योगी के विश्वात्म-भाव में सारी विशिष्टताएँ विलीन हो जाती हैं। स्थित प्रज्ञ योगी अनासक्त सेवामय जीवन बिताता है।

 

इस अध्याय में समझाये गये सांख्य-शास्त्र में भारतीय षड्दर्शनों के मूलभूत सिद्धान्तों का समावेश किया गया है। भगवद्गीता का योग मनुष्य को अपने दैनन्दिन जीवन में उसे किस प्रकार उतारा जाये, इसकी शिक्षा देता है। भगवान् जीवन का विस्तृत ज्ञान देते हैं, जिसको हृदयंगम करने से अनन्त की अनुभूति के साथ मानव के समस्त दुःख दूर हो सकते हैं।

 

इस अध्याय में भगवान् मानव को द्वन्द्व से परे होने का मार्ग एवं संघर्षों पर विजय पाने की वैज्ञानिक पद्धति बतलाते हैं। वे कहते हैं- 'साक्षी बन कर रहो', त्रिगुणातीत बनो', 'द्वन्द्व से परे हो कर अहंभाव को छोड़ कर जिओ', 'फल की आशा किये बिना कर्म करो', 'परम सत् के साथ अपना ऐक्य समझ कर कर्म करो' आदि-आदि। जिसे आत्म-साक्षात्कार हो गया है, ऐसे स्थित-प्रज्ञ पुरुष के लक्षण बता कर भगवान् श्रीकृष्ण मनुष्य की मिथ्या धारणाओं को दूर करते एवं उद्विकास की सभी श्रेणियों तथा प्रक्रमों में सम्भाव्य मोक्ष-प्राप्ति की प्रक्रियाओं को प्रस्तुत करते हैं।

 

इस प्रकार यह 'सांख्ययोग' नामक द्वितीय अध्याय समाप्त होता है।

 

 

 

 

तृतीय अध्याय

कर्मयोग

 

पिछले अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने यह उपदेश दिया था कि सन्तुलित मन से किया हुआ कर्म 'बुद्धियोग' है। फल की आशा से किया हुआ कर्म 'बुद्धियोग' से बहुत निम्न कोटि का कर्म है। अर्जुन इसका अर्थ नहीं समझ सके। उन्होंने समझा कि बुद्धि और कर्म-ये दो शब्द क्रमशः ज्ञान और कर्म-मार्ग के प्रतीक हैं। अतः उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा कि 'क्या आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठतर समझते हैं? और यदि ऐसा है तो फिर मुझे आप इस भयंकर कर्म, युद्ध के लिए क्यों प्रेरित करते हैं? क्या करने से परम कल्याण हो सकता है, कृपया समझायें।' तब श्रीकृष्ण सविस्तार उन्हें समझाते हैं। वे कहते हैं कि विद्या और अविद्या के समन्वय से 'कर्मयोग' का आचरण करना चाहिए। अहन्ता-सहित चेतना विद्या है और अहन्ता-रहित अज्ञान अविद्या है। इन दोनों के सत्-पक्ष का संयोग अर्थात् अहंकार-रहित चैतन्य 'कर्मयोग' कहलाता है। पिछले अध्यायों में भगवान् श्रीकृष्ण ने सांख्ययोग और कर्मयोग नामक दो मार्गों का वर्णन किया है। इस अध्याय में वे कर्मयोग का विश्लेषण करते हैं तथा दैनिक जीवन में उसका व्यावहारिक उपयोग बतलाते हैं। कर्म-संन्यास द्वारा कोई भी व्यक्ति पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता; क्योंकि उसका मन गुप्त रूप से अन्दर कार्य करता रहता है। प्रकृति के तीनों गुण-सत्त्व, रज और तम शरीर, मन और बुद्धि-सहित संसार की प्रत्येक वस्तु पर अपना अधिकार जमा लेते हैं और इस कारण कोई भी मनुष्य सदैव शान्त नहीं रह सकता। जो मनुष्य बाह्याचार में इन्द्रियों का निरोध कर कर्म-संन्यास करता है और दूसरा कोई देखे, इस प्रकार भीतर-ही-भीतर कामनाओं में विचरता है, वह दम्भी है। दूसरी ओर जो व्यक्ति भीतर से आत्मा के विषय में मनन-चिन्तन करता है और परिणाम एवं फल की आशा रखते हुए बाहर से कर्म करता है, वह कर्मयोगी है। कोई भी कर्म-संन्यासी बन कर अपने शरीर तक का निर्वाह भी नहीं कर सकता; क्योंकि श्वासोच्छ्वास लेना, देखना, सुनना, भोजन करना, पचाना आदि सभी व्यवहार भी तो क्रिया ही हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्तापन का अभिमान छोड़ कर कर्म करने के लिए समझाते हैं। जगत् स्वयं कर्म से बँधा हुआ है। स्वार्थ-भावना-रहित किया गया कर्म यज्ञ-स्वरूप है। जो व्यक्ति इस यज्ञ-भावना से कर्म करता है, उसका हृदय निर्मल होता है और वह ईश्वर-साक्षात्कार की ओर उन्मुख हो जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को किसी भी प्रकार की कामना रखते हुए कर्तव्य-भावना से यज्ञ (कर्म) करने का उपदेश देते हैं।

 

सार्वजनिक उद्देश्य से प्रेरित हो कर किया गया सहेतुक कर्म कर्मयोग है। कर्म ईश्वर की पूजा है, ऐसा समझ कर व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। जब पूजा की भावना से विचारपूर्वक कर्म किया जाता है, तब वह युगपत् कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग बन जाता है। इसलिए जिस प्रकार वर्षा, सूर्य, वृक्ष आदि समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ-रूप कर्म अविरत करते रहते हैं, वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। श्रीकृष्ण राजा जनक तथा अन्य महापुरुषों का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने कर्म द्वारा पूर्णता प्राप्त की थी। यहाँ भगवान् अर्जुन को अन्य योद्धाओं का नेतृत्व करने के उनके उत्तरदायित्व का भान कराते हैं; क्योंकि वे सब उनके साहस और शास्त्र-निपुणता पर निर्भर थे। यहाँ तीनों लोकों से किसी प्रकार की अपेक्षा रखते हुए फलाकांक्षा-रहित हो कर कर्म करने का रहस्य श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे स्वयं तीनों लोकों के विषय में सब-कुछ जानते हैं। अर्जुन के मन की बात जानने की शक्ति भी उनमें है। श्रीकृष्ण अर्जुन के दम्भपूर्ण भाव की अप्रत्यक्ष रूप से निन्दा करते हैं। अर्जुन को भली-भाँति समझ में जाये, इस प्रकार श्रीकृष्ण युद्ध में उनकी स्वयं की भूमिका और दृष्टिकोण को उद्धृत करते हैं। वे कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि स्वयं कर्म का त्याग कर अथवा दूसरों को इस प्रकार की शिक्षा दे कर उनको अपने धर्म के पालन-रूप कर्म से उपरत करे। ऐसे व्यक्ति को स्वय मार्गदर्शक एव उदाहरण-स्वरूप बन कर दूसरों का नेतृत्व करना चाहिए। इस प्रकार का ज्ञानयुक्त मार्गदर्शन मिलने पर समस्त संसार ज्ञानी का अनुकरण करने लगेगा। कर्तापन की भावना के सम्बन्ध में अर्जुन की मनोवृत्ति की पुन भर्त्सना करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रकृति के गुण बाह्य वस्तुओं के गुणों पर प्रभाव डालते हैं और अन्तत यह तथ्य ही कर्म का रहस्य है।

 

मानव-शरीर प्रकृति-जनित है। सत्त्वगुण की प्रधानता से व्यक्ति शुभाशुभ कर्मों के भेद को जान सकता है। व्यक्ति प्रकृति के सब गुणों का साक्षी भी बन सकता है। रजोगुण की प्रबलता से व्यक्ति अपने को शरीर मान लेता है और स्वयं कर्ता की तरह व्यवहार करता तथा अनुभव करता है जिसके फल-स्वरूप वह संसार में बंध जाता है। तमोगुण की वृद्धि से व्यक्ति अज्ञानी जड़ और प्रमादी बन जाता है। ज्ञानी पुरुष जानता है कि इन्द्रियों के गुण अन्दर से क्रिया करते हुए बाह्य विषयों के गुणों का अनुसरण करते हैं। अतः ऐसे पुरुष उन विषयों से इन्द्रियों को हटा कर उन्हें अन्तर्मुख करते हुए आत्मा का मनन-चिन्तन करते हैं।

 

श्रीकृष्ण अर्जुन को विचार, वाणी और कर्म से सब-कुछ भगवान् को समर्पण कर एवं शरीर को ईश्वर का उपकरण मान कर कर्म करने की व्यावहारिक युक्ति बतलाते हैं। व्यक्ति यदि अपने कर्तव्य-पालन में असफल होता है, तो वह अपना नाश कर लेता है। इन्द्रियों का विषयों के प्रति राग और द्वेष-दोनों अज्ञान से उत्पन्न होते हैं। हम विवेक और आत्म-समर्पण द्वारा उनसे परे हो सकते हैं। मानव के गुणों का विश्लेषण करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके कर्तव्य से विमुख होने के बदले युद्ध करने का अनुरोध करते हैं। स्वधर्म-पालन में भय या रुकावटें हों तो भी व्यक्ति को अपने कर्तव्य का दृढ़ता से पालन करना चाहिए। ऐसा करते हुए कदाचित् मृत्यु भी जाये, तो वह भी कल्याणकारक है। स्वधर्म त्याग कर दूसरों का धर्म ग्रहण करने पर सम्भव है मान, सत्ता एवं प्रतिष्ठा मिले; पर अन्ततोगत्वा उससे भय, अशान्ति और दुःख ही उपलब्ध होंगे, इसलिए स्वधर्म का पालन करना ही श्रेयस्कर है।

 

अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि व्यक्ति अपने श्रेय के विपरीत आचरण क्यों करता है और उसे पाप-कर्म करने के लिए कौन प्रेरित करता है? श्रीकृष्ण बतलाते हैं कि व्यक्ति आकांक्षा एवं कामना के कारण अपनी इच्छा के विरुद्ध पाप-कर्म करने को प्रवृत्त होता है। मन, बुद्धि और इन्द्रियों में इच्छा का वास है। जैसे धुएँ से अग्नि, धूल से दर्पण एव जेर से गर्भ आच्छादित हो जाता है, वैसे ही कामना से ज्ञान बँक जाता है। मानव सुख खोजता है; पर राजसिक इच्छा और अज्ञान के कारण वह उसे इन्द्रियों द्वारा प्राप्त करने की चेष्टा करता है जिसके परिणाम स्वरूप वह पापमय कर्म तथा विनाश की ओर अग्रसर होता है। अप्रशिक्षित घोड़ों के समान इन्द्रियाँ शरीर-रूपी रथ को कुमार्ग पर खींच कर ले जाती हैं।

 

शरीर से परे इन्द्रियाँ हैं और इन्द्रियों से परे मन है, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से परे आत्मा है। इस प्रकार समझ कर कि शरीरान्तर्वासी आत्मा शुद्ध चैतन्य-रूप है और वह (आत्मा) शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि से परे तथा कर्म से अलिप्त है श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रिय, मन और बुद्धि काम के वास-स्थान हैं। वे अर्जुन को कहते हैं कि मन और बुद्धि का शुद्धात्मा के साथ तादात्म्य करें। उनके मान्यतानुसार कामनाओं से मुक्ति पाने का यही एकमात्र उपाय है। अज्ञान के कारण मनुष्य कामनाओं का दास बनता है और विषयेन्द्रियों द्वारा कामनाएँ तृप्त करता है; परन्तु वह अन्तरात्मा की सत्यता को पहचानने में असमर्थ रहता है। योग-साधन के मध्यम मार्ग के अनुसरण, अन्तर्निरीक्षण द्वारा चित्तवृत्तियों का दैनिक विश्लेषण तथा ध्यान के अभ्यास द्वारा मनुष्य गुरु के मार्गदर्शन एवं ईश्वर की कृपा से आत्म-साक्षात्कार कर लेता है।

 

इस अध्याय में मानव को यह शिक्षा दी गयी है कि कर्म किये बिना जीना असम्भव है। अतः पिछले अध्याय में बताये नियमानुसार 'योगस्थः कुरु' (योगारूढ़ हो कर) कर्म करना चाहिए। भगवान् राजा जनक का उदाहरण देते हुए उनका अनुसरण करने का उपदेश देते हैं। 'कर्म' विविधता और क्रिया का क्षेत्र है तथा विविधता के क्षेत्र में रह कर भी दिव्यता के साथ एकता-स्थापन 'योग' है। शक्ति के मूल-स्रोत का ध्यान रखते हुए कर्म करना चाहिए। मन जब इन्द्रियों के कारण बहिर्मुखी हो जाता है, तब अनेक मानवी समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। मन सुख की खोज करता है और यही उसका स्वरूप भी है; परन्तु अज्ञान के कारण वह इन्द्रियों द्वारा उस सुख को प्राप्त करना चाहता है और विषयों में लिप्त हो जाता है। इसके विपरीत यदि मन अपने मूल स्रोत परम चैतन्य आत्मा की ओर उन्मुख हो जाये, तो वह अवर्णनीय सुख प्राप्त कर सकता है। विचार (व्यक्ति चैतन्य) रहित मानव ईश्वर है और व्यक्ति चैतन्य सहित ईश्वर मानव बन जाता है।

 

भगवान् हमें सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणों से परे होने का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि बुद्धि, मन और इन्द्रियों की प्रक्रियाओं से हमें सदैव सचेत एवं जाग्रत रहना चाहिए। बुद्धि के स्तर तक ही इच्छाओं का निवास है। जब बुद्धि और मन अन्तर्चेतना के साथ एकरूप हो जाते हैं, तब समुद्र में विलीन हुई लहर के समान इच्छाएँ अपने-आप ही अपना बल खो बैठती हैं।

 

इस प्रकार यह 'कर्मयोग' नामक तृतीय अध्याय समाप्त होता है।

 

चतुर्थ अध्याय

ज्ञानविज्ञानयोग

 

दैनिक जीवन में कर्मयोग के आचरण की विधि एवं विवरण बताने के पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस अविनाशी योग को मैंने प्रथम सूर्य को सिखाया था। तदनन्तर मनु, इक्ष्वाकु आदि सूर्यवंश के राजाओं को वंश-परम्परा से यह प्राप्त हुआ था। इन राजर्षियों ने इस योग का अभ्यास कर इसका जन-साधारण में प्रचार किया। बाद में इन महारथियों के अभाव में कालान्तर में सामान्य जनता में इस योग की महत्ता का क्रमशः हास हुआ था। श्रीकृष्ण को सर्वज्ञ होने के कारण भूत, वर्तमान और भविष्य-त्रिकाल का ज्ञान था, जब कि अर्जुन अपने जीव-भाव के कारण अपना भूतकाल भूल गये थे। भगवान् श्रीकृष्ण अपने जन्म का रहस्योद्घाटन करते हैं। वे कहते हैं कि साधु-पुरुषों की रक्षा और दुष्टों का नाश करने एवं प्रकृति को नियन्त्रित रखने के लिए योगमाया (दैवी शक्ति) द्वारा वे अवतार लेते हैं। अपने आदर्श द्वारा मानवता के उद्धार के लिए ईश्वर अवतरित होते हैं। अर्जुन के हृदय की पवित्रता, उनके विचार, वाणी और कर्म के समर्पण तथा सत्य का साक्षात्कार करने की उनकी उत्कण्ठा देख कर श्रीकृष्ण उन्हें योग का रहस्य समझाते हैं। भगवान् कहते हैं कि वे स्वयं बिना किसी पक्षपात के मानव जाति की इच्छा के अनुसार उसकी आवश्यकता को पूरी करते हैं। मानवता के उद्विकास की प्रक्रिया में मानव-स्वभाव के स्तर के अनुसार इच्छाओं में भिन्नता होती है। अतः गुण और कर्म के अनुरूप उसके चार वर्ण बनाये गये हैं। जिनमें शम, दम, आर्जव, गाम्भीर्य तथा शात्र-ज्ञान है और जो दूसरों को ज्ञान का उपदेश देते हैं, वे ब्राह्मण कहलाते हैं। ऐसे व्यक्ति सत्त्वगुण-प्रधान होते हैं। जो शौर्य, तेज, धैर्य, कुशलता, उदारता, प्रभुता आदि गुणों से विभूषित होते हैं और जिनमें राज्य करने की क्षमता होती है, वे क्षत्रिय कहलाते हैं। इनमें राजस गुण की प्रधानता होती है। जो लोग कृषि, पशु-पालन तथा वाणिज्य-व्यापार आदि करते हैं और जिनमें रजोगुण के अधीन तमोगुण भी रहता है, वे वैश्य कहलाते हैं और जिनमें तमोगुण की प्रधानता होती है और रजोगुण तमोगुण के अधीनस्थ होता है, वे अन्य तीनों वर्णों की सेवा करते हैं तथा शूद्र कहलाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपने फल की अपेक्षा रखते हुए गुण एवं स्वभाव के अनुसार स्वधर्म का आचरण करे तो वह ईश्वर को पा सकता है। जिसमें ब्रह्मज्ञान है, वह ब्राह्मण कहलाता है। कोई भी वर्ण वंश-परम्परा अथवा जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है।

 

अवतार के प्रयोजन तथा इच्छा-विहीन अस्तित्व का निरूपण करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को फलेच्छा-रहित हो कर्म करने का उपदेश देते हैं। कर्मयोग द्वारा सब बन्धनों से मुक्त हुआ जा सकता है। वे समझाते हैं कि प्राचीन मुमुक्षु पुरुषों ने इस प्रकार का निःस्वार्थ कर्म किया था; अतः वे अर्जुन से इसी भाँति कर्म करने तथा मोह या भय से अपने धर्म का त्याग करने का उपदेश करते हैं।

 

श्रीकृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति को अपना धर्म निश्चित करना बड़ा दुष्कर कार्य है। अतः स्वधर्म का पालन करने के लिए हमें क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए और किस प्रकार करना चाहिए, यह जान लेना आवश्यक है। पूर्वगामी अध्याय में यह समझाया गया है कि कर्म किये बिना कोई शान्त नहीं बैठ सकता। अब यहाँ वे बतलाते हैं कि हमें कर्म, अकर्म और अकर्म में कर्म का रहस्य जान लेना चाहिए। शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि द्वारा जो क्रिया की जाती है, वह कर्म कहलाता है। नियमानुसार अपने धर्मानुकूल फलाशा छोड़ कर मोह, अहन्ता एवं ममता को त्याग कर यदि कोई कर्म किया जाये तो वह कर्म में अकर्म हो जाता है। ऐसा अनासक्त कर्म करने वाला पुरुष मनुष्यों में सचमुच ज्ञानी तथा योगी है। सामान्य रूप से अकर्म का अर्थ सभी शारीरिक क्रियाएँ छोड़ देना होता है; पर बाह्य क्रियाएँ छोड़ कर नाम और कीर्ति के लिए जो त्यागी बनने का ढोंग करता है, वह पाप और बन्धन का भागी होता है। जो कोई शरीर द्वारा कोई कर्म किये बिना शान्त बैठा रहता है, पर मन से कर्म करता रहता है, कामना करता है, वह कर्म ही करता है और इसे अकर्म में कर्म कहते हैं। जो यह भेद समझते हैं, वे अपने प्राप्त वर्णाश्रमानुसार कर्तव्यों को शारीरिक दुःख के भय से नहीं त्यागते।

 

जो पुरुष अन्तःकरण में परमात्मा का चिन्तन करता है और नि स्वार्थ भाव से फलाशा छोड़ कर संसार की भलाई के लिए ज्ञानपूर्वक कर्म करता है, उसे ज्ञानी लोग कर्म में अकर्म का ज्ञाता एवं पण्डित कहते हैं। इस प्रकार के कर्म में अकर्म से सभी पाप दग्ध हो जाते हैं। वह जन्म-मरण के बन्धनों से छूट जाता है। वह संसार से किसी बात की अपेक्षा अथवा इच्छा नहीं करता और सदा सुखी बना रहता है। सभी प्रकार की परिस्थितियों में सम भाव रखता है। शास्त्रों में वर्णित सभी प्रकार के यज्ञ-कर्म करता है। ऐसा पुरुष ज्ञानी अथवा ब्रह्म-स्वरूप हो जाता है।

 

दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण भगवान् ने बतलाया कि आत्मा अथवा ब्रह्म सर्वव्यापक है। जो कोई प्रत्येक कर्म में ब्रह्म का अनुभव करता है, वह ब्रह्म को ही कर्ता, कर्म और कर्म-फल मानता है। इसे 'ज्ञान-यज्ञ' कहते हैं। श्रीकृष्ण स्वाध्याय, इन्द्रिय-निग्रह, प्राणायाम, दान आदि यज्ञ के विविध रूपों का वर्णन करते हैं। ये सारे यज्ञ-कर्म शरीर, मन और इन्द्रियों द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। इन यज्ञों को करने वाला व्यक्ति ऐहिक तथा आध्यात्मिक सुख को कभी प्राप्त नहीं कर सकता। फल की आशा से दान, पवित्र अग्नि में अममा चार-सहित घी, चावल आदि हवन-सामग्री की आहुतियों द्वारा किये यज्ञादि से ऐहिक सुख भले ही प्राप्त हो जाये, पर इस प्रकार अज्ञान से किये गये सकाम-यज्ञ से फलाशा-रहित किया जाने वाला ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। जिस प्रकार प्रज्वलित अधि काष्ठ-समुदाय को भस्मीभूत कर देती है, उसी प्रकार यह ज्ञानानि पाप-समूह को विदग्ध कर डालती है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि सद्भावना से, चित्त-शुद्धि से, ब्रह्मनिष्ठ गुरु की भक्तिपूर्वक सेवा से, कर्मयोग के सतत दीर्घकालीन आचरण से एवं इन्द्रिय-निग्रह से यह ज्ञान प्राप्त होता है।

 

श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मा अर्थात् सत्ता (अन्तरस्थ शुद्ध चैतन्य) का भान ही सच्चा ज्ञान है। दीर्घ काल तक गम्भीर ध्यान का अभ्यास करने से साधक इस शुद्ध चैतन्य का अनुभव कर सकता है। इसके लिए ईश्वर में अपार श्रद्धा, गुरु में विश्वास, धैर्य, समर्पण की भावना के साथ सांसारिक विषयों से प्रयत्नपूर्वक इन्द्रियों की निवृत्ति आवश्यक है। ऐसा होने पर व्यक्ति को परम शान्ति का लाभ हो सकता है। अज्ञानी मूढ़ जन इन गुणों के अभाव में अपने-आपमें तथा दूसरों के प्रति शंकाशील होते हैं और इस लोक तथा परलोक में दुःखी रहते हैं; परन्तु जो लोग कर्मों का त्याग कर किसी प्रकार की कामना रखते हुए सहज भाव से ज्ञानपूर्वक ध्यानयोग की साधना करते हैं, उन्हें संसार की कोई शक्ति बन्धन में