शाश्वत सन्देश

 

Eternal Messages का हिन्दी भाषान्तर

 

 

 

 

लेखक

श्री स्वामी चिदानन्द जी

 

 

 

 

 

 

 

संकलनकर्ता

श्री स्वामी विमलानन्द

 

 

 

 

अनुवादक

श्री स्वामी रामराज्यम्

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण-१९९१

द्वितीय हिन्दी संस्करण-२००७

तृतीय हिन्दी संस्करण-२०१६

(१००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

HC 39

 

 

 

 

 

PRICE: 55/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट

एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर-२४९१९२,

जिला : टिहरी-गढ़वाल, उत्तराखण्ड' में मुद्रित।

For online orders and Catalogue visit: dlsbooks.org

 

 

प्रकाशकीय

 

'शाश्वत सन्देश' हमारे परमाध्यक्ष परम पूज्य श्री स्वामी चिदानन्द जी महाराज द्वारा समय-समय पर साधकों को पत्रों द्वारा दिये गये बहुमूल्य परामर्शों तथा सन्देशों का संकलन है। मूल परामर्श-सन्देश अँगरेजी में हैं तथा ‘Eternal Messages' शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित किये जा चुके हैं। मूल सामग्री का संकलन परम पूज्य स्वामी जी के वैयक्तिक सहायक तथा सचिव श्री स्वामी विमलानन्द जी ने किया था।

 

हिन्दी भाषा-भाषी पाठकों के लिए जीवन-निर्माण करने वाली प्रेरणाप्रद सामग्री उपलब्ध कराने की आवश्यकता का अनुभव हम करते रहे हैं। आशा है, यह पुस्तक इस आवश्यकता की पूर्ति करेगी तथा सुहृद् पाठक इसका स्वागत करेंगे।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

 

 

प्रकाशकीय. 3

. दिव्य जीवन. 5

. जप तथा भगवद्-स्मरण.. 22

. अध्यात्म-पथ की बाधाएँ. 34

. गृहस्थों के लिए परामर्श. 51

. साधना.. 55

परिशिष्ट . 63

परिशिष्ट . 65

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

. दिव्य जीवन

 

उदात्त जीवन का सारतत्त्व है-ईश्वरोपासना, परोपकार तथा सदाचार। इन तीनों की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सदैव इनका अभ्यास करना चाहिए। ये ही आपकी वास्तविक कमायी हैं। भले ही किसी के पास कम धन हो; परन्तु यदि उसके पास यह कमायी है, तो उसे सर्वाधिक धनी व्यक्ति माना जाना चाहिए। इसी कमायी को अर्जित करना चाहिए। सामान्य सांसारिक कार्य- कलाप करते हुए दिव्य जीवन व्यतीत करने से आप इस कमायी को अर्जित कर सकते हैं। तब आपका आन्तरिक जीवन समृद्ध हो जायेगा तथा आप शान्ति और आनन्द का अनुभव करेंगे।

 

स्वभावतः सभी मानव एक-समान हैं, एक ही आत्मा सबमें निवास करती है। मानव शरीर, मन तथा आत्मा का त्रिक है। उसकी चेतना पर मन तथा पदार्थ आवरण डाल देते हैं। इसी कारण वह अपने दिव्य स्वभाव का साक्षात्कार नहीं कर पाता। अपनी दिव्यता का साक्षात्कार करना मानव-जीवन का परमोद्देश्य है।

 

मानव एक -शरीर आत्मा है। वह तत्त्वतः एक आध्यात्मिक सत्ता है। उसका आन्तरिक सारतत्त्व उसकी दिव्यात्मा है। आत्मा का साक्षात्कार करके मानव को सुरक्षा, स्वतन्त्रता, अमरता तथा शाश्वत परमानन्द के उपहार प्राप्त होते हैं। इन्हें प्राप्त करने हेतु साधनामय दिव्य जीवन व्यतीत करना चाहिए।

 

मानव में आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने के प्रति आन्तरिक आवेग का होना तथा परम तत्त्व के निकट पहुँचने तथा उसके साथ संलाप करने की इच्छा उत्पन्न होना भगवद्-कृपा की अभिव्यक्ति है।

 

शान्ति एक दिव्य गुण है। यह आत्मा का स्वभाव है। केवल शुद्ध हृदय में ही यह गुण पाया जाता है। वास्तविक आन्तरिक शान्ति बाह्य परिस्थितियों से अप्रभावित रहती है। प्रत्येक स्थान पर भगवान् की उपस्थिति का अनुभव करके आप निर्भय बन सकते हैं तथा असीम शान्ति और परमानन्द प्राप्त कर सकते हैं।

 

जीवन का परम लक्ष्य ईश्वर-साक्षात्कार है। इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जीवन व्यतीत करना चाहिए। केवल यही लक्ष्य प्राप्त करने योग्य है। नित्य-प्रति ईश्वर से प्रार्थना करें। सत्य वचन बोलें। किसी से घृणा करें। बड़ों का आदर करें। दूसरों की सहायता करें। सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करें। यही दिव्य जीवन है। दिव्य जीवन व्यतीत करने से मानव-जीवन पूर्ण बनता है।

 

मानव-जन्म अपनी सीमाओं, बन्धनों, दुःखों, कष्टों तथा पीड़ाओं से मुक्ति प्राप्त करने तथा दिव्य परम तत्त्व के साथ तादात्म्य की अवस्था में असीम आनन्द, परम शान्ति, दिव्य दीप्ति और ज्ञानमयी चेतना का अनुभव करने का एक दुर्लभ अवसर है। यही हमारे जीवन का लक्ष्य है। इस लक्ष्य को इसी जन्म में प्राप्त करें।

 

क्रियाशील प्रेम ही भलाई है। भला बनना एक अच्छी बात है। भलाई एक सर्वश्रेष्ठ सद्गुण है। भलाई का प्रत्येक कार्य शाश्वत जीवन का बीज है। भलाई करने से जीवन धन्य होता है तथा वह सफल और समृद्ध बनता है। भला बनना मानवोचित है। भला बनना दिव्यता है।

 

सरल तथा पवित्र जीवन व्यतीत करें। प्रातः तथा सन्ध्या समय कुछ घण्टे स्वाध्याय के लिए नियत कर लें। दोनों समय कम-से-कम आधे घण्टे तक प्रार्थना तथा भजन किया करें। किसी भी परिस्थिति में सत्य बोलना छोड़ें। दूसरों की सहायता करें। भला बनें; भला करें। कण-कण में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करें। 'उनकी' महिमा का गान करें।

 

इससे अधिक श्रेष्ठ बात और क्या होगी कि हम प्रत्येक जीव में जीवन्त दिव्य उपस्थिति के साक्षी बनें तथा दूसरों को भी इस तथ्य के प्रति जागरूक बनायें!

 

जो ईश्वर में पूर्ण विश्वास रखता है, उसी के हृदय में ईश्वर निवास करते हैं। जो अपने मनश्चक्षुओं के सामने से ईश्वर की मूर्ति कभी नहीं हटाता, उसी से ईश्वर प्रेम करते हैं।

 

ईश्वर के निकट रहें, दैनिक कार्य-कलाप करते हुए भी उनके निकट रहें। पवित्र भगवन्नाम का जप करने, ईश्वर की दिव्य उपस्थिति के प्रति जागरूक रहने तथा ईश्वर का सतत स्मरण करने से जीवन दिव्य बनता है। तब विक्षेपों के बीच भी शान्ति का अनुभव होता है; चित्त-विक्षेप की दशा में भी सन्तुलन बना रहता है, प्रतीयमान दुःखों के बीच भी प्रसन्नता प्राप्त होती है, मृत्यु की परिस्थितियों में रहते हुए भी अमरता उपलब्ध होती है तथा अपूर्णता के बीच भी पूर्णता का अनुभव होता है। जो ईश्वर की सन्तानें हैं, वे ही इस रहस्य को जानती हैं; अन्य लोग इसे नहीं समझ सकते बुद्धिमानी इसी में है कि इस रहस्य को समझ कर हम चुप हो जायें। जिन्हें इस रहस्य को जानना होगा, उनके समक्ष यह रहस्य स्वतः ही प्रकट हो जायेगा।

 

आध्यात्मिकता का अर्थ है-अपने दिव्य आदर्श के अनुरूप अपना विकास करना। आध्यात्मिकता मानवता से भगवत्ता की दिशा में रूपान्तरण है। अभ्यास, साधना और वैराग्य से यह रूपान्तरण सम्भव हो पाता है।

 

सत्यवादी तथा पवित्र बनें। क्रोध का परित्याग करें। सबमें शिव-तत्त्व का दर्शन करें। किसी भी जीव से द्वेष रखें। वैश्व-प्रेम तथा समदृष्टि की भावना रखें। समस्त संसार ईश्वर की अभि- व्यक्ति है।

 

ईश्वर अन्तर्यामी हैं। वे ही शरीर, मन तथा इन्द्रियों को कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। 'उनके' हाथों के उपकरण बन जायें। अपने कर्मों के बदले दूसरों से प्रशंसा प्राप्त करने की आशा रखें। कर्मों को कर्तव्य समझ कर करें। उन्हें तथा उनके फल को ईश्वर को अर्पित कर दें। आप कर्म-बन्धन से मुक्त हो जायेंगे। आपका हृदय पवित्र हो जायेगा।

 

ईश्वर के साथ मौन वार्तालाप करते हुए नित्य-प्रति कुछ समय व्यतीत करें। 'उनके' दिव्य गुणों-असीम करुणा, दया और प्रेम का चिन्तन करें, गहन भक्ति-भाव से उनसे प्रार्थना करें। अपने समस्त दैनिक कार्यों में उनका मार्ग-दर्शन प्राप्त करने का प्रयास करें। तब 'वह' शीघ्र ही आपके सखा बन जायेंगे।

 

नित्य-प्रति ईश्वर से प्रार्थना करें। आध्यात्मिक ग्रन्थों का स्वाध्याय करें। इन ग्रन्थों से आपको सद्-प्रेरणाएँ प्राप्त होंगी। ऐसी पुस्तकों का ही स्वाध्याय करें, जिनसे आपको सकारात्मक विचार प्राप्त होते हों। प्रत्येक स्थान पर ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करें। इस तथ्य को सदैव स्मरण रखें- आप ईश्वर में हैं; 'वह' आप में हैं।

 

शान्त हो जायें। दैवी इच्छा के अनुकूल बनें। चिन्ताओं से मुक्त रहें। अपने हृदय के अन्तरतम प्रदेश में प्रवेश करके शान्ति के सागर में निमज्जन करें।

 

इसकी चिन्ता करें कि अन्य व्यक्ति किस प्रकार जीवन व्यतीत करते हैं। सरल तथा पवित्र जीवन व्यतीत करें। अपनी आवश्यकताओं को कम करें। अपने आवश्यक व्यय में कटौती करें। प्रारम्भ में आप कठिनाई का अनुभव कर सकते हैं; परन्तु अन्ततः आपको प्रसन्नता प्राप्त होगी। सत्य का सदैव पालन करें। चाहे जैसी भी परिस्थितियाँ हों, ईश्वर आपकी रक्षा करेंगे।

 

ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव सदा-सर्वदा करें। इस बात का स्मरण रखें कि ईश्वर करुणामय हैं। 'उनकी' करुणा असीम है। 'वह' कामधेनु के समान हैं- आप जो कुछ 'उनसे' माँगेंगे, वह आपको प्राप्त होगा। 'उनमें' गहन आस्था रखें। नियमित रूप से पूजा-प्रार्थना करके इस आस्था को अर्जित करें। कार्यालय, दुकान आदि में कार्य करते हुए भी ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करें।

 

रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गान्धी, स्वामी शिवानन्द तथा अन्य सन्तों के जीवन-चरित्र पढ़ें। उनसे आपको जीवन के सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त होगी। प्रत्येक ऐसी वस्तु का त्याग करें, जो सत्य की विरोधी हो।

 

प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर ईश्वर छिपे बैठे हैं। सन्तों ने उस आवरण को उतार फेंका, जो ईश्वर को छिपाये रहता है।

 

समग्र अस्तित्व का सारतत्त्व है-क्रम-विकास अथवा जीवन के उच्चतर मूल्यों का अविरत साक्षात्कार प्रार्थना, सेवा, भक्ति तथा ध्यान के माध्यम से आप उच्चतर जीवन व्यतीत करने की क्षमता प्राप्त करेंगे। इन्द्रिय-विषयों में कोई आनन्द नहीं है। केवल आत्मा में ही शाश्वत परमानन्द है। अतः अध्यात्म-पथ पर चलें, पवित्रता का अभ्यास करें, श्रेष्ठता को विकसित करें, दानशील बनें तथा दिव्यता को प्राप्त करें।

 

दिव्य जीवन व्यतीत करें। दिव्य जीवन आपके नित्य-शुद्ध तथा दिव्य स्वरूप की अभिज्ञता का जीवन है। यह वह जीवन है, जहाँ पता चलता है कि आप नाशवान् भौतिक शरीर नहीं हैं; अतः आप जीवन-तत्त्व से भी उच्चतर हैं। तत्त्वतः आप दिव्य हैं। सदाचारपूर्ण तथा सरल जीवन व्यतीत करके इस तथ्य का बोध प्राप्त करें।

 

सदाचारी व्यक्ति ही अपने अन्तःकरण के उपकरण का उपयोग कर सकता है। केवल ऐसा व्यक्ति ही अपनी अन्तरात्मा का स्वर स्पष्टतः सुन सकता है; अतः अपने में सद्गुणों का विकास करके सद्गुणी बनें।

 

भला व्यक्ति सदैव सुखी रहता है। उसके अन्दर दिव्यता का वास होता है। यथासम्भव भलाई करें; पूरे उत्साह, प्रेम के साथ भलाई करें।

 

दिव्य प्रेम संसार की महत्तम शक्ति है। सच्ची भक्ति से ही भगवद्-कृपा प्राप्त होती है। परमानन्द प्राप्त करने का साधन भक्ति ही है। अपनी प्रत्येक वस्तु-विचार, कर्म और इच्छाएँ ईश्वर को अर्पित कर देना ही सर्वश्रेष्ठ भक्ति है। यदि आप ऐसा कर सकें, तो आपको 'उनके' साथ अपने तादात्म्य की अन्तर्दृष्टि प्राप्त हो जायेगी।

 

यदि आप अपने जीवन में सर्वोत्तम विचारों, शुद्ध भावनाओं, श्रेष्ठ उद्देश्यों, मधुर वाणी तथा पवित्र कार्यों को स्थान दे सकें, तो यह (आपका जीवन) आपके लिए अति-आनन्ददायक सिद्ध होगा। इसे भक्तिपूर्ण उपासना के सुगन्धित फूलों से अलंकृत करें। तब आपके जीवन में प्रसन्नता, शान्ति तथा सन्तोष व्याप्त हो जायेंगे।

 

सदाचार जीवन में सुगन्धि फैलाता है। भक्ति जीवन को मधुर बनाती है। उपासना तथा सेवा जीवन के सारतत्त्व हैं। ईश्वर आपको ये सब उपलब्ध करायें! आपका जीवन माधुर्य, सौन्दर्य तथा परमानन्द से परिपूरित हो जाये !

 

ईश्वर में आस्था होना जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धि है। इसके समक्ष कोई बाधा नहीं टिक पाती। अपने पड़ोसी से प्रेम करना ईश्वर से प्रेम करना है। ईश्वर सबमें निवास करते हैं।

 

हमारे हृदयों में वैश्व प्रेम का स्रोत प्रवाहित हो! वैश्व प्रेम में ही चिरस्थायी प्रसन्नता वास करती है। वास्तविक दिव्य दृष्टि शाश्वत तथा वैश्व होती है। यह सिद्धान्तों, मतों, सम्प्रदायों, रीति-रिवाजों तथा धर्मों से परे है।

 

आप दूसरों की सेवा करके उन्हें उन्नत बनाने में जितनी ही अधिक ऊर्जा व्यय करते हैं, उतनी ही अधिक दिव्य ऊर्जा आपकी ओर प्रवाहित होती है।

 

सकारात्मक ढंग से चिन्तन करें। जैसे आपके विचार होंगे, उसी के अनुरूप आपके व्यक्तित्व का निर्माण होगा। अपने जीवन में जिन पदार्थों को ले कर आप अपना विकास करना चाहते हैं, उन पर चिन्तन-मनन करते रहें। यह चिन्तन आपके आध्यात्मिक जीवन के दैनिक कार्य-कलापों का अंग बन जाना चाहिए।

 

अमर ईश्वर की खोज करें। शाश्वत परमानन्द प्राप्त करने के लिए लालायित रहें। परम यथार्थता का साक्षात्कार करने का प्रयत्न करें। जो प्रयत्न करता है, वही पाता है।

 

सेवा-भाव, प्रेम और भगवद्-भक्ति से परिपूरित जीवन ही वास्तविक जीवन है। इस जीवन के द्वार आपके लिए सर्वदा खुले हुए हैं। प्रार्थना, प्रेम, सेवा, मधुर वाणी तथा परोपकारिता के कार्यों में रत रहते हुए इस जीवन को व्यतीत करें।

 

अपने आध्यात्मिक जीवन को पुनः जीवन्त बनायें। दिव्यता को प्राप्त करने को लालायित हो जायें। इस सम्बन्ध में किसी प्रकार की निष्क्रियता सहन करें। आपको इसी जीवन में ईश्वर का अनुभव करना है। यदि आप अपेक्षित प्रयास करने के लिए तैयार हों, तो यह असम्भव नहीं है। अध्यवसाय करें। अभी से प्रयास करें। अपने दिवसों को ईश्वर-चिन्तन, ईश्वर-स्मरण तथा ईश्वर की जीवन्त विद्यमानता से सम्बन्धित विचारों से परिपूरित करें।

 

परम तत्त्व से संयुक्त शाश्वत जीवन ही योग है। योग के क्षेत्र में रखा गया प्रत्येक कदम एक नवीन जीवन तथा आनन्द प्रदान करता है। आप जितनी ही इस क्षेत्र में उन्नति करते जायेंगे, आपकी पवित्रता, शान्ति, दिव्यता, सामंजस्य, शक्ति तथा प्रसन्नता में उतनी ही वृद्धि होगी।

 

भगवान् के सम्मुख अपने को पवित्रता, आस्था, भक्ति तथा सम्पूर्ण आत्म-समर्पण की भावनाओं सहित उद्घाटित कर दें। तब आपके ऊपर भागवती कृपा का अवतरण होगा।

 

भगवन्मय जीवन व्यतीत करें तथा दिव्य स्वभाव (जो आपकी वास्तविक तथा अनिवार्य सत्ता है) का विकिरण करें। ईश्वर के निकट-सम्पर्क में रहें। यही आन्तरिक आध्यात्मिक जीवन का रहस्य है। यही जीवन की धन्यता का भी रहस्य है।

 

दिव्य जीवन यापन तथा ईश्वर-प्राप्ति के आदर्श का प्रकाश सदैव आपके सम्मुख चमकता रहे। ईश्वर में पूर्णता प्राप्त करने के लिए जीवन व्यतीत करें। भगवद्-कृपा सदैव आपके ऊपर रहे!

 

सद्-उद्देश्य तथा सम्यक् अभीप्सा उच्चतर जीवन के अवलम्ब हैं। आध्यात्मिक अभीप्सा का दीप सदैव आपके हृदय में प्रज्वलित रहना चाहिए। यही वह प्रेरक शक्ति है, जो साधक के जीवन को उन्नत बनाती है। आध्यात्मिक भाव-जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है-समग्र जीवन तथा जीवन की समग्र प्रवृत्तियों में ओत-प्रोत होना चाहिए। यह भाव आपकी सामान्य गतिविधियों को आध्यात्मिकता में रूपान्तरित करने तथा आपके जीवन के कर्मों को कर्मयोग का रूप देने की क्षमता रखता है। इस भाव द्वारा होने वाले रूपान्तरण से आन्तरिक तथा बाह्य जीवन में सामंजस्य की स्थिति लायी जा सकती है।

 

जीवों को उनके क्रम-विकास करने में सहायता प्रदान करना सर्वश्रेष्ठ सेवा है। वस्तुतः उन्हें ईश्वर ही सहायता प्रदान करते हैं; हम कर्ता नहीं हैं, परन्तु ईश्वर को अपनी सेवा का उपयोग करने देना महान् सौभाग्य की बात है।

 

आध्यात्मिक पथ पर उन्नति की गति धीमी होती है। महीने-दो-महीने में उन्नति करने की आशा नहीं रखनी चाहिए। इसके लिए आपको वर्षों तक संघर्ष करना होगा-तब कहीं आप थोड़ी उन्नति कर सकेंगे। अतः अपने समस्त कर्म पूजा-भाव से करें। मन ईश्वर को सौंप दें तथा अपने हाथ कर्मों को। आप कहीं भी जायें, आप कुछ भी करें-समस्त स्थानों तथा सबमें ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करें। यह आपके दैनिक आध्यात्मिक जीवन का अंग बन जाना चाहिए।

 

ईश्वर के हाथों में एक उपकरण की तरह बन कर रहने का प्रयास सदैव करें। निमित्त मात्र हो जायें। अपना कर्तव्य करें तथा शेष ईश्वर पर छोड़ दें। आत्म-समर्पण, शरणागति तथा ईश्वरार्पण का यही रहस्य है। इससे भक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। ईश्वर में विश्वास रखें-आप सदैव शाश्वत परमानन्द तथा शान्ति का अनुभव करेंगे।

 

सद्गुरु भगवान् की दिव्य कृपा सदैव आपके ऊपर है। सच्चे शिष्य की वास्तविक अभीप्साएँ गुरु की प्रेम-भरी करुणा से अवश्य ही पूरी होंगी। साधना में सफलता प्राप्त करने की कुंजी नियमितता है। योग-मार्ग के पथिक की उन्नति का रहस्य भी यही है।

 

ईश्वर में गहन आस्था रखें; तभी दिव्यता को प्राप्त करने की प्रबल आकांक्षा आपके हृदय में उत्पन्न होगी। ईश्वर-महिमा, दिव्य जीवन तथा ईश्वर-साक्षात्कार के स्वरूप को स्पष्टतः समझ लें; तभी आप अपना आध्यात्मिक विकास कर पायेंगे।

 

स्वाध्याय करने का सर्वोत्तम समय ब्राह्ममुहूर्त है। प्रातःकाल जल्दी उठें। सरस्वती की पूजा करें तथा स्वाध्याय करें। ब्राह्ममुहूर्त में मन शान्त तथा स्थिर रहता है। उस समय अध्ययन करने से विषय सरलतापूर्वक समझ में जाता है। जब आप स्वाध्याय करें, तब संसार को भूल जायें। पाठों में ही मन लगायें। उन्हें याद करने का यही उपाय है।

 

समस्त प्रकार के भयों से बचें। भय केवल मन में रहता है। दुःसंग का त्याग करें। ब्रह्मचर्य का दृढ़तापूर्वक पालन करें। चलचित्र देखें। उपन्यास पढ़ें। जब तक आप अपना स्वाध्याय समाप्त कर लें, समाचार-पत्र पढ़ें। इस सबसे मन में विक्षेप उत्पन्न होता है।

 

सादा और शुद्ध भोजन ग्रहण करें। आवश्यकता से अधिक काफी या चाय पियें। एक क्षण के भी लिए भगवान् का विस्मरण करें। अपने पाठों के साथ-साथ गीता, महाभारत, रामायण आदि धार्मिक ग्रन्थों का भी स्वाध्याय करें।

 

ईश्वर सर्वव्यापी हैं। आपके हाथ-पैर तथा आपकी श्वासें आपसे जितना निकट हैं, उससे भी अधिक निकट ईश्वर हैं। ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहाँ 'वह' हों। प्रत्येक स्थान पर 'उनका' दर्शन करें। 'वह' कण-कण में उपस्थित हैं।

 

जब कभी भी आपके सामने नये विषय उपस्थित हों, तब अपने से प्रश्न करें-क्या यह (विषय) मुझे परम लक्ष्य की ओर ले जा रहा है? अथवा यह मेरे जीवन को पूर्णता की ओर से जाने वाले मेरे विकास में बाधक है? यदि आपको ऐसा प्रतीत हो कि वह आपको ऐन्द्रिय (सांसारिक) जीवन से बाँध रहा है, तो उसे अस्वीकार करें। उसे तभी स्वीकार करें, जब आपको इस बात का विश्वास हो जाये कि वह आपको आपके जीवन के परम लक्ष्य (भगवद्-दर्शन तथा भगवद्-अनुभव) तक पहुँचा देगा।

 

ऐसा अनुभव करें कि समग्र संसार ईश्वर की अभिव्यक्ति है तथा संसार के विभिन्न नाम-रूपों के माध्यम से आप ईश्वर की ही सेवा कर रहे हैं। अपने समस्त कर्मों तथा उनके परिणामों को प्रत्येक दिवस के अन्त में ईश्वर को अर्पित कर दें। कर्मों के साथ तादात्म्य स्थापित करें। तब आपका हृदय शुद्ध हो जायेगा तथा आप दिव्य प्रकाश और दिव्य अनुग्रह प्राप्त करने के लिए अपने को तैयार पायेंगे।

 

जीवन के छोटे-छोटे विषयों को भी ले कर दिव्य जीवन व्यतीत किया जाना चाहिए। यदि आप छोटे-छोटे विषयों में दिव्य जीवन व्यतीत करते हैं, तो बड़े-बड़े विषयों में भी दिव्य जीवन यापन कर सकते हैं। जब तक आप अपने दैनिक जीवन में सावधानी नहीं बरतेंगे तथा जीवन को अपने आदर्शवाद के अनुरूप नहीं ढालेंगे, तब तक आपके इस प्रयास का कोई शुभ परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होगा।

 

जिसका मन शान्त है, जो आत्म-निग्रही है तथा जो आत्मा का ध्यान करता है, वह धन्य है।

 

जीवन का परम लक्ष्य ईश्वर-साक्षात्कार है। मानव-जीवन इस लक्ष्य को प्राप्त करने का एक दुर्लभ अवसर है। हम जानते हैं कि हमारे अन्दर दिव्यता को प्रकट करने की समस्त क्षमताएँ विद्यमान हैं। स्वभाव से हम त्रियेक (triune) हैं। हमारे अस्तित्व का वास्तविक तथ्य हमारी तात्त्विक दिव्यता है। दिव्य स्वरूप का सतत चिन्तन-मनन करते हुए, मनसा-वाचा-कर्मणा इसे व्यक्त करते हुए तथा गहन ध्यान के माध्यम से समग्र जीवन को परम तत्त्व की अभिव्यक्ति बनाते हुए हमें इस दिव्य मानव को भगवान् की ओर उत्थित करना है।

 

हमारे गुरुदेव प्रायः कहा करते थे कि जीवन को सुखी बनाने का उपाय दूसरों को सुख देना है। वह इसी आदर्श के लिए जिये तथा इसी के लिए उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया।

 

जब आप शान्त-मौन बैठे हों, तब दिव्यता की फुसफुसाहट सुनें। आस्था की शक्ति को समझें। ईश्वर की सम्पोषित करने वाली कृपा का अनुभव करें। अपने हृदय में प्रेम या भक्ति का मन्दिर निर्मित करें। मनोहर शान्ति के क्षेत्र में प्रवेश करें। लोकातीत जीवन का आनन्द लें। अन्तर्मुखी बनें। आत्मा में विलीन हो जायें। आत्मा को जानें। आत्मा ही बन जायें। मुक्त हो कर प्रसन्नतापूर्वक विचरण करें।

 

अन्यों की प्रेरणा तथा सहायता का स्रोत बनना तथा आध्यात्मिक स्पन्दनों, विचारों, भावनाओं एवं शक्ति के प्रसारण का केन्द्र बनना एक सौभाग्य है, जो आपके समान भाग्यशाली व्यक्तियों को ही मिलता है। इस दिशा में ईश्वर की कृपा आपका मार्ग-दर्शन करेगी। दे कर, त्याग करके, कठिन श्रम करके तथा तनावों का सामना करके ही हम विकसित होते हैं।... हमारे पास सभी प्रकार के संसाधन हैंबस, हमें अपनी आन्तरिक शक्ति का प्रयोग करना प्रारम्भ कर देना चाहिए। हम जितना भी उन्हें प्रयोग में लायेंगे, उतनी ही उनमें वृद्धि होगी। असीम पूर्णता की ओर बढ़ते हुए आपके पगों को ईश्वर का मार्ग-दर्शन प्राप्त हो!

 

सद्-कार्यों से प्रसन्नता प्राप्त होती है तथा बुरे कार्यों से पीड़ा। कर्म सदैव फलीभूत होते हैं। कर्म के बिना कर्म-फल का कोई अस्तित्व नहीं होता। भगवद्-दर्शन प्राप्त करने का साधन है-धार्मिकता। इससे समस्त वस्तुओं की प्राप्ति हो सकती है।

 

आप धन्य हैं। ईश्वर ने आपको यह दुर्लभ अवसर प्रदान किया है। भक्तों की सत्संगति आपको ईश्वर की ओर ले जायेगी। इस सत्संगति में रहने से आपका आसुरी स्वभाव दिव्य स्वभाव में रूपान्तरित हो जायेगा। अतः सन्तों और भक्तों की सत्संगति में रहने का प्रयत्न सदैव करते रहना चाहिए।

 

दिव्य जीवन के मार्ग का पथिक बनने की अपनी श्रेष्ठ अभीप्सा के कारण आप अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं। ईश्वर दया और करुणा के सागर हैं। जो व्यक्ति 'उनसे' सुरक्षा की याचना करते हैं, 'उनके' ऊपर 'वह' अवश्य अपनी कृपा की वर्षा करते हैं। 'उन' पर विश्वास रखें। चिन्ताकुल हों। समस्त परिस्थितियों tilde 4 अपने को 'उनके' श्रीचरणों में समर्पित कर दें। प्रतिक्षण यह अनुभव करें कि 'वह' आपकी देख-भाल कर रहे हैं।

 

हमारे पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि अध्यापन का व्यवसाय सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वोत्तम है। इस व्यवसाय में रत व्यक्तियों को इस बात के अवसर प्राप्त होते हैं कि वे नवयुवक साधकों के जीवन को ढाल सकें तथा उन्हें आध्यात्मिक आदर्शों की ओर उन्मुख कर सकें। अतः आस्था तथा उत्साह के साथ इस व्यवसाय में रत हो कर विद्यार्थियों के माध्यम से ईश्वर की सेवा करें। अपने पुनीत कर्तव्य का पालन करने हेतु पूरी तैयारी करने के लिए पूज्य गुरुदेव के ग्रन्थों का भली प्रकार अध्ययन करें। इससे आपके विद्यार्थियों का जीवन उन्नत होगा।

 

धार्मिक पुस्तकों के स्वाध्याय के साथ-साथ घर पर दैनिक सत्संग का आयोजन करें। कोई ऐसा सुविधाजनक समय चुन लें, जब परिवार के सब लोग एकत्र हो सकते हों। ऐसे समय में भगवन्नाम का गान करें तथा ईश्वर के साथ संलाप करें।

 

धार्मिक ग्रन्थों का नियमित स्वाध्याय, प्रार्थना, पूजा तथा ध्यान ईश्वर तक पहुँचने में सहायक सिद्ध होते हैं। सरल तथा पवित्र जीवन व्यतीत करें। सबमें भगवद्-दर्शन करें। हाथ से कर्म करें तथा मन से ईश्वर का स्मरण करें। यही सफल जीवन का रहस्य है।

 

पूज्य गुरुदेव के इस गीत को स्मरण रखें तथा इसमें निहित विचारों को जीवन में उतारने का प्रयत्न करें -

 

दिन का प्रारम्भ ईश्वर से करें।

दिन का समापन ईश्वर से करें।

समग्र दिवस को ईश्वर से परिपूरित कर दें।

समग्र दिवस ईश्वर के सान्निध्य में व्यतीत करें।

 

प्रतिदिन ईश्वर से प्रार्थना करें। सेवा, पूजा, जप, ध्यान तथा मनन में ही दिन व्यतीत करें। सप्ताह में एक बार एकान्त-वास करें तथा आत्म-परिपृच्छा करें। आप त्वरित गति से अपना आध्यात्मिक क्रम-विकास करेंगे।

 

आत्मार्पण का फल है भागवती कृपा इस कृपा की कुछ बूँदों से ही आपको परमानन्द का सागर उपलब्ध हो जायेगा।

 

अमर आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना तथा परम शाश्वत तत्त्व से अभिन्न हो जाना ही जीवन का लक्ष्य है।

 

जीवन का परम लक्ष्य ईश्वर-साक्षात्कार है। इस लक्ष्य को प्राप्त करना हमारी दिव्य नियति है। इस नियति को प्राप्त करने हेतु मानव-जीवन एक दुर्लभ अवसर है। दिव्य चेतना (जो दुःख, पीड़ा तथा अपूर्णता से परे परमानन्द का अनुभव है) को प्राप्त करना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है तथा आपके भौतिक जीवन का प्रमुख लक्ष्य है। निःस्वार्थ सेवा के क्षेत्र में कूद पड़ें। इससे आपका स्वभाव शुद्ध बनेगा, आपकी भक्ति-भावना का विकास होगा तथा आपको भगवद्-दर्शन प्राप्त होगा।

 

भक्ति, धैर्य तथा भागवती कृपा की समझ प्राप्त करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें। आप जितना ही अधिक दूसरों को प्रसन्नता देंगे, उतनी ही अधिक प्रसन्नता आप प्राप्त करेंगे, जीवन में प्रसन्नता का उदय हो, इसके लिए स्वभाव का परिष्कृत होना तथा व्यक्तित्व का शुद्ध होना अनिवार्य है। इस प्रकार प्रसन्नता निःस्वार्थता का फल है। अपने सेवा-कार्य और साधना करते रहें।

 

गहन आस्था रखें, तभी आपके हृदय में दिव्यता को प्राप्त करने की अभीप्सा का उदय होगा। ईश्वर के स्वभाव तथा महिमा एवं दिव्य जीवन तथा ईश्वर-साक्षात्कार के स्वरूप को भली प्रकार समझ लेना चाहिए, तभी आप ईश्वर के प्रति अपने को समर्पित कर पायेंगे।

 

ईश्वर आपके समस्त कार्यों तथा गतियों के परम लक्ष्य हैं। ईश्वर को खोजें। 'उनका' साक्षात्कार करें। तभी आप पूर्ण तथा स्वतन्त्र बन सकेंगे।

 

जीवन के सर्वोच्च आदर्श क्या होने चाहिए, इस विषय में श्री हनुमान् के व्यक्तित्व से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। ब्रह्मचर्य का निष्ठापूर्वक पालन, शक्ति का विकास तथा इस शक्ति को सेवा के रूप में ईश्वरार्पण-इन तीनों के प्रतीक वह हैं। योद्धा तथा नायक होते हुए भी वह सदा अपने स्वामी के सेवक बने रहे। उन्होंने मानवीय ऊर्जा को दिव्योपासना हेतु अर्पित कर दिया। इस ऊर्जा का उदात्तीकरण ही यहाँ प्रमुख विषय है। यह गत्यात्मक सेवा में रूपान्तरित हो जाती है। यही ब्रह्मचर्य है। ऐसे थे हनुमान् महावीर! यही है सात्त्विक यौगिक कर्म पर आधारित भक्ति, ध्यान और ज्ञान यही जीवन आत्मज्ञान के द्वार खोलता है, जैसे हनुमान् राम से सदा अभिन्न थे।

 

भक्ति-भाव से भगवन्नाम लें। भगवान् की उपस्थिति का अनुभव करें। प्रत्येक रूप में 'उनका' दर्शन करें। ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ 'वह' हों। 'वह' सर्वत्र हैं। आध्यात्मिक साहित्य का अध्ययन करें। ज्ञानी पुरुषों का सत्संग करें। नियमित रूप से प्रार्थना करें।

 

संसार के समस्त नाम-रूपों में ईश्वर निवास करते हैं। 'वह' सर्वव्यापी हैं। इस तथ्य को स्वीकार कर लेने तथा इसका अनुभव करने से सेवा पूजा में रूपान्तरित हो जाती है; क्योंकि तब आप मानव में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने लगते हैं। आपके हृदय में एक नवीन भाव उदित हो जाता है। आप एक ऐसे दृश्य के द्रष्टा बन जाते हैं, जिसकी वस्तुएँ जो कुछ देर पहले लौकिक थीं, अब सचमुच अलौकिक हो गयी होती हैं। इस आध्यात्मिक पुट से सेवा पवित्र बन जाती है और इस प्रकार आपका जीवन परम तत्त्व की वैश्व अभिव्यक्ति की सतत उपासना-प्रक्रिया में रूपान्तरित हो जाता है। पूज्य गुरुदेव ने भक्तों तथा साधकों से 'सर्वं विष्णुमयं जगत्' सूत्र को सदा स्मरण रखने तथा उसे अनुभव करने को कहा था।

 

अवकाश के दिनों को आध्यात्मिक ढंग से व्यतीत करना चाहिए। जीवन का लक्ष्य ईश्वर को प्राप्त करना है। विवेकी पुरुष अपने समस्त समय का सदुपयोग इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के साधन के रूप में करता है। अवकाश के दिन पूजा, भजन और सत्संग करने के लिए होते हैं। ईश्वर की ओर इस प्रकार गतिमान होता हुआ विवेकी पुरुष शान्ति और परमानन्द की लहलहाती फसल काटता है।

 

शरीर, नाम तथा रूप मात्र उपकरण हैं। इस संसार के कर्ता केवल ईश्वर हैं। सृष्टि के कण-कण में इसका स्पष्ट अनुभव करें। जागें और अपने अज्ञान से मुक्त हो जायें। केवल ईश्वर समस्त कर्मों के कर्ता हैं। इसका अनुभव करें, तदनुरूप ही व्यवहार करें तथा इसके साथ एकात्म हो जायें।

 

वास्तविक आध्यात्मिक गुरु ही आध्यात्मिकता में सहायता कर सकता है। ऐसा गुरु सामान्य जन के स्तर पर उतर कर उसे क्रमिक गति से उच्चतर लक्ष्य की ओर ले जा सकता है। वह साधक को आध्यात्मिक मार्ग के कण्टकों तथा गर्तों के प्रति भी सचेत कर सकता है। ईश्वर-साक्षात्कार के परम लक्ष्य की प्राप्ति के विषय में भी वह मार्ग-दर्शन दे सकता है। यदि साधक अपनी साधना में एकनिष्ठ है, तो ईश्वर उसके पास उचित समय पर उपयुक्त गुरु अवश्य भेजेंगे।

 

ईश्वर की सत्ता है। 'उनके' बिना किसी की भी सत्ता सम्भव नहीं है। समग्र संसार ईश्वर के ही अन्दर है। ईश्वर ही इस सृष्टि के सर्जक, संचालक तथा शासक हैं। आपके जीवन के रूप में 'उनकी' सत्ता है। साधना तथा उच्चतर आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्रों में ऊँची उड़ानें भरें तथा जीवन, प्रेम तथा प्रसन्नता के प्रदायक ईश्वर का साक्षात्कार करें।

 

जिस प्रकार सरिताएँ सागर की ओर प्रवाहित होती हैं, उसी प्रकार आप भी अनश्वर परमानन्द के सागर परम तत्त्व की ओर प्रवहमान हों।

 

आध्यात्मिक कार्य भव्य है। आध्यात्मिक जीवन भव्य है। जो-कुछ भी आध्यात्मिक है, वह भव्य है।

 

जीवन को आध्यात्मिकता द्वारा संचालित होना चाहिए। प्रत्येक स्थिति में हमारे कार्य आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य, धर्म, सत्य, अहिंसा तथा ब्रह्मचर्य द्वारा निर्दिष्ट हों।

 

भगवान् श्री राम के रूप में इस धरती पर पथभ्रष्ट मानवता का मार्ग-निर्देशन करने के एकमात्र उद्देश्य से ही अवतरित हुए। 'उन्होंने' एक ऐसी लीला की जिसमें जीवन के सभी मोड़ मानव को सदा के लिए हृदयस्पर्शी तथा आत्म-प्रेरक पथ-प्रदर्शन प्रदान करते हैं।

 

रामायण की शिक्षाओं का दैनिक जीवन में बहुत महत्त्व है। जीवन की कोई भी परिस्थिति या समस्या ऐसी नहीं है, जिसका समाधान इतिहास-ग्रन्थों (रामायण तथा महाभारत) में पाया जाता हो।

 

पुराण रोचक कथाओं के संकल्प मात्र नहीं हैं। उनमें जीवन्त आध्यात्मिक सत्य निहित हैं। जो व्यक्ति पुराण के पात्रों के समान ही अपने जीवन का निर्माण करना चाहते हैं, वे वास्तव में आध्यात्मिक नायक बन जायेंगे।

 

सन्तों की संगति आपको शीघ्र ही ईश्वर की ओर ले चलेगी। सन्त आपको अपनी ही तरह का बना लेंगे। वे आपकी अपवित्रता समाप्त करके आपको पवित्र बना देंगे। ईश्वर का सतत स्मरण करने में उनका संग आपके लिए सहायक सिद्ध होगा। शान्त हो जायें। भगवद्-इच्छा के अनुकूल बनें। समस्त चिन्ताओं से मुक्त हो जायें।

 

प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में शाश्वत परमानन्द का परम धाम, प्रसन्नता का चिरस्थायी स्रोत, अमृत का भण्डार तथा दिव्य केन्द्र है। उदात्त तथा दिव्य विचारों को प्रश्रय दें। आपकी परिस्थितियाँ तथा वातावरण सदैव आपके लिए अनुकूल रहेंगे।

 

श्रद्धा तर्क से बढ़ कर है। केवल श्रद्धा से ही परमानन्द तथा परम धाम के द्वार खुल जाते हैं। अविचल श्रद्धा रखें तथा चिरस्थायी शान्ति के असीमित क्षेत्र में प्रवेश करें।

 

योग जीवन का विज्ञान है। यह जीवन को पूर्णता प्रदान करता है। ईश्वर शाश्वत हैं। अतः हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण 'उन्हीं' से परिपूरित है। योग हमें बताता है कि किस प्रकार हम ईश्वर से सम्पर्क स्थापित करके अपने जीवन को 'उनके' प्रकाश और शक्ति एवं परमानन्द और शान्ति से परिपूरित कर सकते हैं।

 

अमर आत्मा की खोज करें। शाश्वत परमानन्द प्राप्त करने की अभीप्सा रखें। परम यथार्थता को उपलब्ध होने का प्रयास करें। जो प्रयास करता है, वही प्राप्त करता है।

 

वास्तविक सहानुभूति हृदय में सीधे प्रवेश करती है। प्रेम में सब-कुछ समाहित है। प्रेम हृदय को विकसित तथा शुद्ध करता है। प्रेम तथा दया के द्वारा अपने विचारों को पवित्र बनायें।

 

वास्तविक शान्ति प्रेम तथा समझ से ही प्राप्त होती है। मानव मानव से प्रेम करे। राष्ट्र राष्ट्र को समझें। प्रत्येक व्यक्ति आत्म-त्याग तथा निःस्वार्थ सेवा की भावना से ओत-प्रोत हो। जब व्यक्ति को यह अनुभूति करायी जायेगी कि खोये हुए स्वर्ग के राज्य को दोबारा प्राप्त करने हेतु वह अपनी इन्द्रियों, मन तथा अहंमन्यता से आन्तरिक युद्ध करने में रत एक आध्यात्मिक सैनिक है, तब ये गुण स्वतः ही प्रकट होंगे। अज्ञान एक साधारण शत्रु है। अहंमन्यता एक सर्वगत शत्रु है। कामुकता, क्रोध और लोभ निकृष्टतम शत्रु हैं। स्वार्थ एक शक्तिशाली शत्रु है।

 

इन विकट शत्रुओं का सामना करने के लिए हृदय में पवित्रता, उदात्तता, दानशीलता, प्रेम तथा सेवा-भाव का विकास करें। इस बात का स्मरण रखें कि ईश्वर ने संसार की सृष्टि एक पाठशाला के रूप में की है। इस पाठशाला में आप इन सद्गुणों का पाठ पढ़ते हैं तथा इन्हें अपने जीवन में उतारते हैं। आपके पड़ोसी को ईश्वर ने इसीलिए बनाया है ताकि आप उसे अपना प्रेम दे सकें, उसकी सेवा कर सकें तथा इस प्रकार अपनी दिव्यता का विकास कर सकें। आपको अपनी सेवा का अवसर देने हेतु (ताकि इस प्रकार आप अपना क्रम-विकास कर सकें) निर्धनों तथा रोगियों के रूपों में ईश्वर ही आता है। अतः सबकी सेवा करें, सबको प्रेम करें। इस प्रकार आप अपने निम्नतर पशु-स्वभाव पर विजय प्राप्त कर लेंगे।

 

प्रेम, ब्रह्मचर्य, करुणा, अहिंसा, प्रार्थना तथा ध्यान द्वारा अपने विचारों को पवित्र करें। दुर्गुणों का त्याग करें। सद्गुणों को अर्जित करें। सत्य के मार्ग से विचलित हों। आपको शाश्वत परमानन्द तथा शान्ति की प्राप्ति होगी। ईश्वर की कृपा आपके ऊपर बनी रहे !

 

आत्मा आपका मित्र, मार्गदर्शक तथा परामर्शदाता है। वह अपनी शान्त तथा मन्द अन्तःकरण की वाणी द्वारा आपका मार्ग-निर्देशन करता है। निम्नतर मन आपका शत्रु है। यह आपको संसार-चक्र से बाँधे रखता है।

 

ईश्वर का प्रेम मुक्तिदायक है। इससे शाश्वत परमानन्द तथा अमरता की प्राप्ति होती है। यह भक्ति ही है जो आपके और परम जगदीश के बीच शाश्वत एकता के सम्बन्ध स्थापित करती है।

 

प्रतिदिन भगवान् से प्रार्थना करें। जिन भक्तों के हृदय शुद्ध तथा भक्ति-भावना से परिपूरित हैं, 'वह' उन्हीं के पीछे-पीछे भागते हैं। आप 'उनकी' उपेक्षा भी करें, तब भी 'वह' आपसे प्रेम करेंगे। सोचें, यदि आप आस्था तथा भक्ति से 'उनकी' ओर उन्मुख हो जायें, तो आपको 'उनका' कितना अधिक प्रेम प्राप्त होगा ! 'उनका' प्रेम विशालतम पर्वतों से भी अधिक विशाल तथा गहनतम सागर से भी अधिक गहन है।

 

शुद्ध तथा सादा भोजन ब्रह्मचर्य का पालन करने में सहायक होता है। उपन्यास पढ़ें। मिताहारी बनें। शीतल जल से स्नान करें। चल-चित्र देखें। महिलाओं की ओर देखें। जब उनकी ओर देखने की आवश्यकता पड़े, तब यह सोचें कि वह जगन्माता की अभिव्यक्ति हैं।

 

सच्ची तथा निष्कपट भक्ति, अन्यों के प्रति प्रेम तथा निःस्वार्थ सेवा से परिपूरित जीवन, असीम धन्यता से परिपूर्ण जीवन है। केवल इसी प्रकार के (दिव्य) जीवन में सफलता सर्वाधिक सुनिश्चित होती है।

 

मानव के जीवन की वास्तविक पूर्णता इसमें नहीं है कि उसकी क्या-क्या उपलब्धियाँ हैं, वरन् इसमें है कि वह क्या 'बनता' है और क्या 'करता' है। सफलता 'बनने' और 'करने' में ही है। पवित्रतम 'होना' तथा सर्वश्रेष्ठ 'करना' ही सर्वोत्तम सफलता है। यह पूर्णता-प्राप्त्यर्थ सम्यक् कर्म है। दिव्य जीवन में भगवद्-दर्शन तथा शाश्वत परमानन्द प्राप्त होता है।

 

व्यक्त अथवा अव्यक्त एकता की अनुभूति सम्पूर्ण सत्ता में करना मानव-जीवन का लक्ष्य है। यह एकता पहले से ही है। अपने अज्ञान के कारण हमने इसका विस्मरण कर दिया है। प्रार्थना; विचार, ध्यान तथा मनन से इस 'एकता' को प्राप्त किया जा सकता है।

 

सम्पूर्ण हृदय, मन तथा आत्मा से ईश्वर को पूरा-पूरा तथा गहन प्रेम दें। आप 'उनमें' पूर्णतः लीन हो जायेंगे।

 

आध्यात्मिक साधना जीवन तथा जीवन के सामान्य सन्दर्भ में अलग-थलग कार्यों का समूह नहीं है। योग, वेदान्त, दिव्य जीवन तथा साधना का वास्तविक अर्थ यह है कि जीवन दिव्य आदर्श की ओर प्रवहमान है। योग आपके जीवन का अंग नहीं है; यह आपका आध्यात्मीकृत जीवन ही है। इस अध्यात्मीकरण का सारतत्त्व है-नश्वर नाम-रूपों की कामनाओं से मन को हटा कर अपनी समस्त सम्भाव्य कामनाओं तथा प्रेमभावनाओं को उस शाश्वत परम तत्त्व पर केन्द्रित करना जो हमारे जीवन की जीवन है, हमारा वास्तविक पोषण-स्रोत तथा परम लक्ष्य है। वही (परम तत्त्व) द्वैतवादी भक्तों तथा ईश्वरोपासकों का जनक तथा जननी है। 'उसके' साथ अपनी एकता के उदात्त अनुभव को प्राप्त करने के लिए जीवन व्यतीत करना, 'उसका' अखण्ड स्मरण रखना, समस्त नाम-रूपों से अव्यक्त सारतत्त्व के रूप में प्रत्येक क्षण 'उसकी' चिरस्थायी उपस्थिति के प्रति जागरूक रहना तथा अपने को 'उसका' सेवक या सन्तान या 'उसके' अस्तित्व का एक अनिवार्य अंग माननायह है योग, यह है वेदान्त।

 

अपने जीवन और कर्मों में पूजा का भाव बनाये रखें। जीवन की समस्त गतिविधियाँ ईश्वर को समर्पित कर दें। जीवन को निःस्वार्थ सेवा से परिपूरित तथा नियमित रूप से प्रातः और सायंकाल किये जाने वाले गुह्य मनन तथा अन्तरावलोकन से सीमाबद्ध कर दें। आन्तरिक रूप से अपने कर्मों के मूक साक्षी बने रहें। अपने समस्त कार्यों को भगवान् को समर्पित करते हुए सम्पन्न करें। यही व्यावहारिक वेदान्त है। कर्म बन्धनकारी नहीं हैं; वरन् उनके साथ हमारी आन्तरिक चेतना के सम्बन्ध बन्धनकारी हैं। आत्म-जागरूकता का अभ्यास करने से यह सम्बन्ध स्थापित नहीं होने पाता। ऐसी स्थिति में भी आपके द्वारा कर्म होते रहते हैं; परन्तु वे आपको बन्धन में नहीं डाल पाते तथा आप अपनी आत्मा में संस्थित रहते हैं। आत्मा में इस प्रकार संस्थित होना परम तत्त्व की खोज तथा उसके मार्ग का एक गुप्त सारतत्त्व है। समस्त आध्यात्मिक साधनाओं का उद्देश्य आत्मा में संस्थित रहना है। शरीर तथा इसकी गतिविधियों से हमारा क्या सम्बन्ध है? कर्म हमारी आन्तरिक सत्ता अथवा अप्रकट महत्ता को कैसे स्पर्श या प्रभावित कर सकते हैं? आप शरीर हैं, मन हैं और इन्द्रिय-आप हैं अमर आत्मन् क्षण-क्षण, पग-पग पर दिव्य प्रकाश आपके हाथ-पैरों का मार्ग-निर्देशन करे! आप परम धन्यभागी बनें।

 

एक आदर्श शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करें। शान्ति एक दिव्य सद्गुण है। यह आत्मा का एक गुण है। यह शुद्ध हृदय को परिपूरित करती है। निरन्तर नाम-स्मरण तथा प्रार्थना करते रहने से शान्ति प्राप्त होती है। अनुभव करें-"मैं कुछ नहीं हूँ, मेरे पास कुछ भी नहीं है; भगवद्-कृपा के बिना मैं कुछ भी नहीं कर सकता; 'आप' ही सब-कुछ हैं; मैं 'आपका' हूँ; सब-कुछ 'आपका' है।' ईश्वर में आस्था रखें। आप दिव्यता से परिपूरित हो उठेंगे।

 

स्थूल मन के पृष्ठ भाग में एक सूक्ष्म मन भी है जो बीज-रूप में विद्यमान है। मनन, प्रार्थना तथा जप द्वारा सूक्ष्म मन का विकास होता है। इसके प्रस्फुटन के साथ ही एक नया दृश्य दृष्टिगोचर होने लगता है।

 

आत्मपरक जीवन ही वास्तविक जीवन है। यदि आप दैहिक जीवन पर ही निर्भर रहेंगे, तो आप पिछड़ जायेंगे। ईश्वर-चिन्तन शरीर, मन तथा आत्मा को प्रफुल्लित कर देता है। भगवन्नाम नाड़ियों को शान्त करता है तथा भगवद्-प्रेम शान्ति और प्रसन्नता प्रदान करता है। ईश्वर का ज्ञान कर्म-बन्धनों को समाप्त कर देता है।

 

यदि साधक गम्भीर तथा निश्छल है, तो ईश्वर उसकी सहायता अवश्य करेंगे। बस, उसे पूर्णतः ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाना चाहिए। उसे अनुभव करना चाहिए कि वह ईश्वर के हाथों में एक उपकरण मात्र है। ऐसे साधक को अध्यात्म-मार्ग में सफलता मिलनी निश्चित है।

 

आत्म-विश्वास रखें। निर्भीक तथा प्रफुल्ल रहें। मन को शान्त तथा सन्तुलित रखें। कर्म के लिए कर्म करें। आप अपने सभी कर्मों में सफलता अवश्य प्राप्त करेंगे।

 

मानव का परम लक्ष्य उसी की सत्ता में निवास करने वाली दिव्यता का साक्षात्कार करना है। यह साक्षात्कार परमानन्द, शान्ति तथा शाश्वत जीवन है। त्याग, भक्ति तथा ध्यान द्वारा यह साक्षात्कार प्राप्त करें। आपके अन्दर उपस्थित दिव्य पूर्णता को प्रकट करने में ही जीवन की सार्थकता है।

 

स्वयं का अध्ययन करें। इस अध्ययन में अपने स्वभाव का एक ऐसा स्पष्ट चित्र उभारने का प्रयास करें, जिसमें गुण और दुर्गुण-दोनों ही दिखायी पड़ें। समस्त दुर्गुणों को इस चित्र से हटा दें। ईश्वर से निरन्तर प्रार्थना करें। सादा जीवन व्यतीत करें। सभी परिस्थितियों में सत्य बोलें। ईश्वर आपका मार्ग-निर्देशन करेंगे।

 

मानव-जन्म अति-दुर्लभ है। पृथ्वी-लोक पर कर हमें एक आदर्श जीवन व्यतीत करने का प्रयत्न करना चाहिए। जीवन का लक्ष्य ईश्वर का साक्षात्कार करना है। इस आदर्श को अपने सम्मुख रखें। इसे प्राप्त करने हेतु प्रयास करें। नियमित रूप से थोड़ा जप तथा ध्यान किया करें।

 

धैर्य खोयें। कोई भी प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाता। गहन आस्था का भाव रखें। ईश्वर में पूर्ण आस्था रखें। 'उनका' नाम ही आपका एकमात्र आश्रय तथा आधार है। आस्था दुःखों का शमन करती है। आस्था सृजन करती है। आस्था से असम्भव कार्य भी सम्पन्न हो जाते हैं। आस्था पहाड़ों तक को हिला देती है। पवित्रता, प्रबोधन, एकीकरण, पूर्णता तथा मुक्ति-अध्यात्म-पथ की विभिन्न अवस्थाएँ हैं।

 

पवित्र अभीप्सा रखें। शुचिता का विकास करें। गम्भीरता- पूर्वक ध्यान करें। उदात्त तथा दिव्य विचारों का स्वागत करें। आप दिव्य जीवन व्यतीत करने लगेंगे।

 

पवित्र तथा सादा जीवन व्यतीत करें। मन की पवित्रता तथा जीवन की सादगी पर ही दिव्य जीवन आधारित है। सदैव भगवन्नाम लिया करें। जहाँ-कहीं भी आप जायें, भगवान् की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करें। भगवान् सर्वत्र हैं। कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ 'वह' हों।

 

राग-द्वेष तथा आकर्षण-विकर्षण से मुक्त जीवन व्यतीत करें। यही दिव्य जीवन है।

 

संसार की सर्वश्रेष्ठ रोग निवारक शक्ति है प्रेम। ईश्वर के प्रति प्रेम का वास्तविक अर्थ है मानवता के प्रति प्रेम।

 

धर्म में चरित्र के उन्नतकारी बाह्य कार्य-कलाप, विचार तथा मानसिक अभ्यास समाहित रहते हैं। धर्म का उद्गम ईश्वर है। वह आपको ईश्वर की ओर ले चलता है।

निःस्वार्थ सेवा, कृपा, करुणा, मैत्री-भाव, उपयोगिता, सूझ-बूझ, सहिष्णुता तथा सद्भाव प्रेम ही हैं। अतः प्रेम को विकसित करें। सबसे मित्रवत् व्यवहार करें।

 

शान्त हो जायें। ईश्वरेच्छा के अनुकूल बनें। चिन्ताओं से मुक्त हो जायें। अपने अन्तरतम की गहराइयों में उतरें तथा शान्ति के सागर में गोता लगायें।

 

प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करें। अपने दैनिक कार्य-कलाप पूजा के पश्चात् प्रारम्भ करें। सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करें। निर्धनों की सहायता करें। सन्तों की सत्संगति में रहें। यही दिव्य जीवन है।

 

ईश्वर की उपस्थिति में निवास करें। अपने सारे कार्य ईश्वर की पूजा समझ कर करें। तब आपके कार्य आपके लिए बन्धनकारी नहीं बन पायेंगे।

 

सच्ची आध्यात्मिक अभीप्सा, सेवा की उदात्त भावना, नियमित प्रार्थना और प्रेरक दार्शनिक तथा धार्मिक साहित्य का अध्ययन-इन सबके परिणाम शुभ होते हैं।

 

संसार में रहें; परन्तु संसार के हो कर रहें। संसार में उसी प्रकार रहें, जिस प्रकार कमल-पत्र जल में रहता है। जल में रहते हुए भी कमल-पत्र जल से प्रभावित नहीं होता। इसी प्रकार आपको इस संसार में रहना चाहिए और इसी जीवन में पूर्णता प्राप्त कर लेनी चाहिए।

 

ईश्वर में सदा निवास करें। इस संसार में खोजने योग्य तत्त्व केवल ईश्वर है। 'उन्हीं' को खोजें। केवल 'उन्हीं' में सुख तथा आनन्द केन्द्रित हैं। अतः ईश्वर को प्राप्त करें।

 

अपने समस्त कर्म ईश्वर को अर्पित कर दें। 'उनके' प्रति समर्पित हो जायें। आपको शीघ्र ही दिव्य प्रसन्नता तथा परमानन्द का अनुभव होगा।

 

सन्तों के जीवन-वृत्तान्तों का अध्ययन करें। आपको तुरन्त प्रेरणा प्राप्त होगी। उनके वचनों को स्मरण रखें। आप तत्काल ही प्रोन्नत होंगे। उनके चरण-चिह्नों पर चलें। आपको शान्ति तथा शाश्वत परमानन्द प्राप्त होंगे।

 

प्रेम, ब्रह्मचर्य, करुणा, अहिंसा, प्रार्थना तथा ध्यान से अपने विचारों को पवित्र करें। आपको जीवन में सफलता प्राप्त होगी।

 

सबके प्रति दयालु बनें। इन्द्रियों पर विश्वास करें। इन दोनों को चरितार्थ करना ही आपको पूर्ण मानव बनाने के लिए पर्याप्त है।

 

मानवता की सेवा ईश्वर की सेवा है। श्री स्वामी विवेकानन्द, पूज्य गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी तथा अन्य आधुनिक सन्तों द्वारा प्रतिपादित यह एक नया धर्म है। महात्मा गान्धी ने इसी धर्म की शिक्षा दी थी। ईश्वर तथा केवल ईश्वर ही समस्त नाम-रूपों को धारण करते हैं। 'वही' भिक्षुक के वेश में आते हैं।वही' रोगी तथा दुःखी व्यक्तियों का रूप धारण कर लेते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

. जप तथा भगवद्-स्मरण

 

सदैव भगवान् का स्मरण रखें। जहाँ-कहीं भी आप जायें, उनकी उपस्थिति का अनुभव करें; क्योंकि 'वह' प्रत्येक स्थान पर हैं। कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ 'वह' हों। 'वह' आपकी श्वासों से भी अधिक निकट हैं। प्रत्येक रूप में 'उनका' दर्शन करें। 'उनके' श्रीचरणों की शरण में जायें। 'वह' आपकी रक्षा तथा मार्ग-निर्देशन करेंगे।

           

भगवान् का सतत स्मरण करने से आपको अनन्त प्रसन्नता तथा परम शान्ति की प्राप्ति होगी। आपकी प्रत्येक गति 'उनसे' की गयी एक जीवन्त प्रार्थना बन जाये। आप जिन-जिन विचारों को निष्ठा तथा दृढ़ता से अपनाते हैं, उन्हीं के सदृश आप अपना विकास करते हैं। उन आदर्शों का चिन्तन करें, जिनके अनुरूप आप विकसित होना चाहते हैं। यह आपके दैनिक आध्यात्मिक जीवन का एक अंग है।

 

भगवान् में पूर्ण आस्था रखें। 'उनका' नाम आपका एकमात्र आश्रय, गति तथा अवलम्ब है। आपका पवित्र हृदय ही 'उनका' मन्दिर है। अपने हृदय को पवित्र रखें तथा श्रेष्ठ कर्म करें।

 

भगवन्नाम-जप आपकी वास्तविक सम्पत्ति है। प्रत्येक अन्य वस्तु क्षणभंगुर है। बँगले, बैंक में जमा किया धन, कारें, बाग-बगीचे आदि आपकी वास्तविक सम्पत्ति नहीं हैं। इनसे आपको मानसिक शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती। केवल भगवान् से ही आपको शान्ति तथा परमानन्द प्राप्त हो सकते हैं। सदैव स्मरण रखेंयो वै भूमा तत्सुखम्।"

 

जप, कीर्तन तथा प्रार्थना करें। दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचायें। आपके विचार उदात्त तथा दिव्य होने चाहिए। प्रत्येक दिवस का प्रारम्भ तथा अन्त भगवद्-स्मरण से करें। दिन-भर के कार्य-कलापों को भगवद्-स्मरण के रंग में रंग डालें। अपने दिवस मानसिक रूप से भगवान् के साथ रहते हुए व्यतीत करें।

 

भगवन्नाम-जप आपकी वास्तविक सम्पत्ति है। जप, कीर्तन, प्रार्थना तथा ध्यान से निश्चय ही आपको अपने मन और हृदय पवित्र करने में सहायता प्राप्त होगी।

 

उसी मन्त्र का जप करें, जिसे आपका हृदय सबसे अधिक पसन्द करे। वही मन्त्र उपयुक्त मन्त्र है, जिसका जप करने से आपको प्रसन्नता तथा शान्ति प्राप्त हों। एक ही मन्त्र का जप करें-मन्त्र को बार-बार बदलें नहीं।

 

सदैव भगवन्नाम का जप करें। भगवान् प्रत्येक स्थान में हैं। 'वह' आपमें तथा आप 'उनमें' हैं। कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ 'वह' हों। आपके हाथ-पैर आपके जितना निकट हैं, 'वह' आपसे उससे भी अधिक निकट हैं। नियमित रूप से जप, पूजा तथा ध्यानाभ्यास करके आप भगवान् को प्राप्त हों।

 

भगवन्नाम का जप सदैव करते रहें। यह जप निरन्तर करते रहने से आपको आनन्द तथा सुख-शान्ति की प्राप्ति होगी।

 

सरल तथा पवित्र जीवन व्यतीत करें। प्रार्थना तथा ध्यान करने हेतु समय निश्चित कर लें। मधुर बोलें। मितभाषी बनें। दूसरों की सहायता करें। किसी भी कीमत पर सत्य ही बोलें। अपने कर्तव्यों का नियमित रूप से पालन करें। प्रत्येक क्षण भगवान् का स्मरण करें। यह दिव्य जीवन का सार है।

 

अपने जीवन को सरल तथा पवित्र बनायें। पवित्र भगवन्नाम सदैव आपके ओंठों पर हो भगवान् की उपस्थिति का अनुभव प्रत्येक स्थान पर करें। भगवान् आपमें तथा आप 'उनमें' हैं-इसे भूलें। अतएव, किसी से घृणा करें। सबसे प्रेम करें।

 

आप जहाँ-कहीं भी जायें, भगवान् की उपस्थिति को अनुभव करने का अभ्यास करें। आप जैसे-जैसे प्रार्थना-ध्यान के अभ्यास में प्रगति करते जायेंगे, वैसे-वैसे इस तथ्य का अनुभव आपको होता जायेगा कि आप भगवान् में तथा 'वह' आपमें हैं।

 

प्रातःकाल जप प्रारम्भ करने से पूर्व भली प्रकार अपने चेहरे तथा हाथों को धो लें अथवा यदि आप शीतल जल से स्नान करने के आदी हों, तो स्नान कर लें। जप करने हेतु कोई निश्चित स्थान चुन लें। नित्य-प्रति उसी स्थान पर जप करें, जहाँ आप नियमित रूप से जप करते हैं। जप करने का स्थान परिवर्तित करें। सरल जीवन व्यतीत करें। मिताहारी बनें। मितभाषी बनें। भले बनें तथा भलाई करें। किसी से घृणा करें। दूसरों की सहायता करें। नित्य-प्रति भगवान् से प्रार्थना करें। सदाचारपूर्ण जीवन व्यतीत करें। सत्यनिष्ठ बन कर अपने कार्य-कलाप करें। नियमित रूप से ध्यान करें। अविनाशी ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करें। प्रज्ञा तथा शान्ति प्राप्त करने का अन्य कोई मार्ग नहीं है।

 

परमात्मा के विषय में निरन्तर चिन्तन करें। पवित्र भगवन्नाम सदैव आपके ओंठों पर हो धर्मग्रन्थों का नियमित स्वाध्याय, 'मैं कौन हूँ' की परिपृच्छा तथा विवेक-ये तीन आपको निश्चय ही भगवान् की ओर ले जायेंगे।

 

जप करते रहें। जहाँ-कहीं भी आपका मन भटक कर पहुँच जाये, वहीं भगवान् की उपस्थिति का अनुभव करें। मन को यह समझायें कि कोई ऐसा स्थान शेष नहीं है, जहाँ 'वह' हों। कण-कण में भगवान् हैं। निरन्तर मन का निरीक्षण करें। इसे थोड़ी देर तक भटकने दें। तब इसे अपने इष्ट-विषय पर वापस लाने का प्रयास करें। उच्च स्वर से भगवन्नाम का उच्चारण करने से एकाग्रता को विकसित करने में सहायता मिलती है। यदि आप स्वयं पुस्तकें नहीं पढ़ सकते, तो घर में किसी अन्य व्यक्ति से अनुरोध करें कि वह प्रतिदिन कुछ निश्चित समय तक आध्यात्मिक साहित्य पढ़ कर आपको सुना दिया करे।

 

असीम परम तत्त्व के साथ समस्वरित रहते हुए जीवन व्यतीत करें। अपनी अन्तरात्मा में आनन्द का अनुभव करें। यही जीवन का महान् घोष है। पवित्र भगवन्नाम का सदैव स्मरण रखें।

 

आप प्रतिदिन प्रातः तथा सायं भगवान् शिव के नाम का गायन कर सकते हैं। शिव सर्वव्यापक हैं। 'वह' आपमें तथा आप 'उनमें' हैं। प्रत्येक स्थान में 'उनकी' उपस्थिति का अनुभव करें।

 

अपने मन को भगवद्-चिन्तन का, अपने हृदय को पवित्रता का तथा अपने हाथों को निःस्वार्थ कर्म का भोजन दें। एकाग्र-चित्त हो कर भगवान् के स्मरण में लीन रहें।

 

अपने जीवन का कोई आदर्श चुन लें और इसके लिए प्रयास करें। मानव-जीवन का सर्वोच्च आदर्श है- पूर्णता की उपलब्धि। यह पूर्णता सुख-शान्ति से परिपूरित है। नियमित रूप से प्रार्थना-ध्यान करने से सुख-शान्ति को प्राप्त किया जा सकता है। अतः प्रार्थना-ध्यान करने हेतु दिन के कुछ घण्टे निश्चित कर लें। अपने दैनिक कार्य-कलापों का प्रारम्भ तथा समापन प्रार्थना से करें। सतत भगवद्-स्मरण करके भगवान् की उपस्थिति को अनुभव करने का अभ्यास करें।

 

भगवान् का पवित्र नाम सदैव आपके ओंठों पर हो। प्रत्येक रूप में भगवान् का दर्शन करें। प्रत्येक के साथ सदय तथा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करें। सरल तथा पवित्र जीवन व्यतीत करें। यही दिव्य जीवन है।

 

आप जहाँ-कहीं भी हों, जिस किसी भी कार्य में संलग्न हों-सदा-सर्वदा भगवान् की उपस्थिति का अनुभव करें। भगवन्नाम को अपना मुख्य आश्रय मानें, भगवद्-स्मरण आपके लिए वैसा ही स्वाभाविक हो, जैसा कि नासिका के लिए श्वास होता है। भगवान् समस्त पदार्थों में अन्तर्निवास करते हैं। परिवर्तनशील नाम-रूपों के बीच 'वह' सदैव विद्यमान रहने वाली सत्ता हैं।

 

शरीर, मन तथा आत्मा का सुसंगत विकास ही आपको उस भव्य भूमिका का निर्वाह करने की क्षमता प्रदान करेगा, जिसके लिए आपने जन्म लिया है। आपको आत्म-साक्षात्कार हो सकता है। सदैव पवित्र भगवन्नाम का उच्चारण करते रहें। ईश्वर- साक्षात्कार के लिए एकमात्र सरल साधना-मार्ग हैअखण्ड नाम-स्मरण।

 

दैनिक जप तथा प्रार्थना के लिए कुछ समय निश्चित कर लें। भगवान् का सदैव स्मरण रखें।उनका' पवित्र नाम सदैव आपके ओंठों पर हो। भगवान् हमसे हमारे हाथ-पैरों से भी अधिक निकट हैं। वह हमारे श्वासों से भी अधिक निकट हैं। 'वह' सर्वत्र हैं। 'वह' आपमें तथा आप 'उनमें ' हैं। प्रत्येक स्थान में 'उनका' दर्शन करें।

 

पूरे हृदय, मन तथा आत्मा से भगवान् को पूरा-पूरा तथा गहन प्रेम दें। तब आप 'उनमें' पूर्णतः अन्तर्लीन हो जायेंगे।

 

भगवान् का अनन्य चिन्तन करें। जप के अपरिमित लाभों का वर्णन कौन कर सकता है ! जप ईश्वर-साक्षात्कार के मार्ग पर अन्धे साधक के हाथ की लाठी है। जप एक दिव्य पारसमणि है, जो जापक को दिव्य बना देती है। मात्र जप करके इसी जीवन में ईश्वर-साक्षात्कार किया जा सकता है।

 

भगवान् से नित्य-प्रति प्रार्थना करें। भगवान् का पवित्र नाम सदैव आपके ओंठों पर हो प्रत्येक दिवस के अन्त में अपने सारे कार्य भगवान् को अर्पित कर दिया करें। जहाँ-कहीं भी आप जायें, 'उनकी' उपस्थिति का अनुभव करें।

 

जीवन बहुमूल्य है; अतः उपयोगी कार्यों के सम्पादन में ही जीवन व्यतीत करें। दैनिक प्रार्थना-पूजा के लिए दिन का कुछ समय निश्चित कर लें। जहाँ-कहीं भी आप जायें, भगवान् की उपस्थिति का अनुभव करें; क्योंकि 'वह' प्रत्येक स्थान में हैं। 'वह' हमारे श्वासों तथा हाथ-पैरों से भी अधिक निकट है। 'वह' आपमें तथा आप 'उनमें' हैं। सदैव उन्हीं में निवास करें।

 

दिवस का प्रारम्भ प्रार्थना तथा भगवन्नाम-जप से करें। ऐसा करने से पूर्व थोड़ा व्यायाम कर लें तथा गहरी श्वास लें। प्रत्येक समय तथा प्रत्येक स्थान पर भगवान् का स्मरण करें। आपको योगी बनने की आवश्यकता नहीं है; परन्तु आपको एक आदर्श पुरुष अवश्य बनना चाहिए। आपके व्यक्तित्व को महान् गुणों के प्रकाश से ज्योतित होना चाहिए। आपके हृदय तथा मन पर सद्गुणों का अधिकार होना चाहिए। निर्भीक बनें। साहसी बनें। सदैव प्रफुल्ल रहें। आपका आन्तरिक जीवन सेवा, पूजा तथा ध्यान से निर्मित होना चाहिए। सदैव 'विचार' करें।

 

जहाँ-कहीं भी आप जायें, भगवान् की उपस्थिति का अनुभव करें; क्योंकि 'वह' प्रत्येक स्थान में हैं। ऐसा कोई स्थान नहीं, जहाँ 'वह' नहीं हैं। 'वह' आपमें तथा आप 'उनमें' हैं। 'वह' आपके सम्बन्धियों तथा मित्रों से भी अधिक निकट हैं। 'उन्हीं' में निवास करें। भगवद्-प्रेम से जीवन आह्लादित, परमानन्दमय तथा धन्य हो जाता है।

 

सरल तथा पवित्र जीवन में ही यथार्थ सुख-शान्ति निहित है। भगवद्-प्रेम आपको एक दिव्य सत्ता में रूपान्तरित कर देगा। भगवान् का गुणगान करके, भगवन्नाम का कीर्तन करके तथा भगवद्-गुणों का श्रवण करके भगवान् के प्रति अपने वास्तविक प्रेम का विकास करें।

 

सरल तथा पवित्र जीवन व्यतीत करें। अपने प्रार्थना, जप तथा स्वाध्याय में नियमित रहें। एक क्षण के लिए भी भगवान् का विस्मरण करें। भगवान् को यथाशक्ति दृढ़तापूर्वक पकड़े रहें। केवल 'उन्हीं' में आप वास्तविक सुख प्राप्त कर सकेंगे।

 

सदैव भगवान् का स्मरण रखें। 'उनका' पवित्र नाम सदैव आपके ओंठों पर हो 'उनके' चिन्तन में लीन रहें। अपना मन 'उन्हें' तथा अपने हाथ कर्मों को सौंप दें। भले बनें। भलाई करें। किसी से घृणा करें। सबको प्यार करें। यही दिव्य जीवन है।

 

भगवान् में ही संस्थित हो कर जियें। केवल भगवद्-प्रेम ही आपको वास्तविक सुख प्रदान कर सकता है। केवल भगवान् ही सत् हैं, शेष सब-कुछ असत् है; अतः सांसारिक पदार्थों से अपने को असम्बद्ध करके भगवान् से जुड़ जायें। पवित्र भगवन्नाम का जप करते रहें। अपने समस्त कार्य-कलाप भगवान् की पूजा समझ कर करें।

 

जीवन भगवान् (जो हमारे अस्तित्व के शाश्वत स्रोत हैं) की दिशा में की जाने वाली एक पवित्र तथा आनन्दप्रद गति है। हमारा जीवन दिव्य सारतत्त्व के साथ हमारे सतत आध्यात्मिक सम्बन्ध की एक अभिव्यक्ति है। भगवन्नाम जप तथा भगवान् का स्नेहिल स्मरण इस आन्तरिक सम्बन्ध को पुनः स्थापित करने का मर्म है। जो-कुछ भी आप करें, उसे भगवान् को समर्पित कर दें। अपना जीवन ही 'उन्हें' समर्पित कर दें। परमानन्द प्राप्त करने एवं निर्भय, मुक्त तथा धन्य होने की यही एक कुंजी है।

 

पूर्णतः सजग रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करें। सम्यक् आध्यात्मिक भाव से सम्पन्न प्रत्येक कार्य पूजा तथा योग बन जाता है। जब आपका शरीर विभिन्न कार्यों को सम्पन्न करने में संलग्न हो, तब आपकी जिह्वा को पवित्र '' का मूक उच्चारण करते रहना चाहिए। प्रत्येक प्रातः तथा सायं ब्रह्मार्पण या कृष्णार्पण द्वारा अपने सारे कार्य भगवान् को अर्पित कर दें।

 

प्रार्थना-काल में आप भगवान् के निकट पहुँच जाते हैं। भक्ति से साधकों में आध्यात्मिक चेतना विकसित होती है। भगवन्नाम- जप से भक्ति की अमूल्य निधि प्राप्त होती है। भगवान् का स्नेहिल स्मरण भक्ति को परिपक्व बनाता है और आपको भगवान् के समक्ष उपस्थित कर देता है। भगवद्-दर्शन प्राप्त करने के लिए ही जीवन व्यतीत करें।

 

यदि ध्यान करने के लिए आपके पास अधिक समय हो, तब भी आप दिन-भर-कुछ भी करते समय-भगवन्नाम का जप करते रह सकते हैं। भगवद्-कृपा प्राप्त करने हेतु यह एक प्रभावकारी साधना है। भगवन्नाम अत्यन्त प्रभावशाली है। भगवन्नाम-जप के साथ-साथ भगवद्-इच्छा के प्रति पूर्ण समर्पण भी होना चाहिए-यह बोध रखते हुए कि जो कुछ भी हो रहा है, 'उनकी' इच्छा से और हमारे कल्याण के लिए हो रहा है। सम्पूर्ण भगवद्-अर्पण की इस आन्तरिक भावना से निरन्तर शान्ति और परमानन्द निःसृत होते हैं।

 

इन तीन बातों को अवश्य ही करें-

 

()        सत्य, शुचिता, निःस्वार्थता, दयालुता तथा (स्वभाव की) सरलता के सद्गुणों को अर्जित करें।

अपने क्रोध पर नियन्त्रण रखें। घृणा तथा अन्य दुर्भावनाओं का परित्याग करें।

 

()        प्रत्येक समय भगवान् का स्मरण रखें तथा उनके पवित्र नाम का निरन्तर जप करते रहें।

 

()        अपने सारे कर्म भगवान् को अर्पित कर दें। किसी भी कर्म को सांसारिक समझें। जो कुछ भी आप

करें, उसे पवित्र समझें तथा पग-पग पर उसे भगवान् को अर्पित कर दें। आपका प्रत्येक दिवस पूजामय बन जाये। अपनी पवित्र भावनाओं को विकसित करें; परन्तु उन पर अपने विवेक का नियन्त्रण बनाये रखें। बुद्धिमत्तापूर्वक विवेक करें।

 

प्रार्थना द्वारा भगवान् की उपस्थिति को अनुभव करने की अनवरत आकांक्षा रखें। भगवन्नाम का जप करें। नाम-जप द्वारा 'उनका' स्मरण करना तथा 'उनसे' उद्भूत शान्ति, परमानन्द तथा प्रकाश का चिन्तन करना 'उनके' सम्पर्क में आने तथा उनकी निकटतम तथा सुखद उपस्थिति में निवास करने के अमोघ उपाय हैं। बस, जिस वस्तु की आवश्यकता है, वह है-प्रभु-मिलन की अखण्ड आकांक्षा से परिपूरित तथा प्रेम से पूर्ण एक हृदय। ऐसे हृदय की प्रेम-पुकार का उत्तर भगवान् अवश्य देते हैं; क्योंकि 'वह' पूर्णतः दयालु तथा करुणामय हैं। धैर्य तथा शान्ति रखें। 'वह' आपकी पुकार का उत्तर देंगे ही।

 

दैनिक तथा सतत ध्यान करने के साथ-साथ आप साक्षात्कार प्राप्त सन्त-महात्माओं द्वारा लिखित प्रेरणाप्रद पुस्तकों का स्वाध्याय भी कर सकते हैं। इससे आपकी (प्रभु-मिलन की) आकांक्षा गहन बनी रहेगी और आपको प्रेरणा प्राप्त होती रहेगी। आप हमारे परम पूज्य गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज की पुस्तकों का स्वाध्याय करें। उन पुस्तकों का प्रत्येक शब्द शक्ति का पुंज है तथा आपको रूपान्तरित कर देने एवं भगवान् की ओर ले जाने की क्षमता से परिपूरित है।

 

मन की शुद्धता निःस्वार्थ सेवा, प्रार्थना तथा उपासना से अर्जित की जाती है। भगवन्नाम का सतत स्मरण करते रहें।

 

दिव्य जीवन के आदर्श के प्रति अपनी निष्ठा को अटल बनाये रखें। प्रतिदिन सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय अवश्य करें-भले ही अल्पकाल के लिए करें। पूजा की भावना बनाये रख कर अपने सामान्य व्यावसायिक कार्यों का अध्यात्मीकरण करें। सदैव प्रसन्न रहें। जिन प्राणियों पर विधाता की कृपा कम है, उनके प्रति दयालु तथा दानशील बनें। सदैव भगवन्नाम का उच्चारण करते रहें। सत्य के निर्भीक दूत तथा भगवान् के विनम्र सेवक बनें।

 

भगवद्-स्मरण ही जीवन है। भगवान् का विस्मरण ही मृत्यु है। भगवान् में श्रद्धा तथा 'उनके' प्रति भक्ति इस संसार का सर्वाधिक मूल्यवान् कोष है। भक्ति-विहीन जीवन नीरस, निस्सार तथा निरर्थक है। भगवन्नाम से महान् कोई कोष नहीं है। धर्म या चरित्र से बड़ी कोई सम्पत्ति नहीं है। धर्म आपको भगवान् की ओर ले चलता है और केवल भगवान् में ही आपको वास्तविक सुख, शान्ति तथा परमानन्द प्राप्त होते हैं। सुख पाने के लिए आपको भगवान् को प्राप्त करना होगा। इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है। यही एकमात्र उपाय है, यही सत्य है।

 

जो व्यक्ति आपके मन की धारा को भगवान् की ओर मोड़ दे, वह आपका परम शुभ-चिन्तक है। जो व्यक्ति आपमें धर्मानुराग उत्पन्न कर दे, वह आपका सच्चा मित्र है। प्रवचन तथा सत्संग मानव के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं तथा उसे ईश्वरोन्मुख कर देते हैं। सचमुच, यह मानवता की एक महान् सेवा है।

 

प्रार्थना तथा भगवन्नाम-जप के लिए प्रतिदिन प्रातः तथा सायं कुछ समय नियत कर लें। भगवद्-चिन्तन से ही दिवस का प्रारम्भ करें। समूचे दिवस को भगवद्-चिन्तन से परिपूरित कर दें। सोते समय भी भगवद्-चिन्तन करें।

 

सदैव भगवान् के चिन्तन में लीन रहें, क्योंकि 'वह' सर्वत्र हैं। कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ 'वह' हों। 'वह' आपमें तथा आप 'उनमें' हैं। नियमित पूजा-प्रार्थना करके इस तथ्य का अनुभव प्राप्त करें।

 

आपके जीवन का एकमात्र लक्ष्य भगवद्-प्राप्ति है। इसके अतिरिक्त अन्य सब निरर्थक तथा मूल्यहीन है। अतएव सरल, पवित्र तथा श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करके परम तत्त्व को प्राप्त करें। भगवान् का नाम सदैव लेते रहें। 'उनका' पवित्र नाम सदैव आपके ओंठों पर हो। जब आस्थापूर्वक भगवान् का नाम लिया जाता है, तब वह आपको आनन्द तथा धन्यता प्रदान करता है।

 

प्रत्येक नव-वर्ष का प्रारम्भ भगवान् की उपस्थिति का कण-कण में अनुभव करके करें। भगवान् से निरन्तर प्रार्थना करते रहें। ऐसा अनुभव करें कि 'वह' आपके अपने ही हैं। अन्तर्मुखी बन कर अन्दर की ओर देखें तथा परमानन्द का अनुभव करें।

 

अपने दैनिक ध्यान में नियमित रहें। प्रातः तथा सायं कम- से-कम आधा-आधा घण्टे तक ध्यान करें। सदैव भगवान् का स्मरण करते रहें। 'उनका' पवित्र नाम सदैव आपके ओंठों पर हो

 

आपके लिए मेरा परामर्श यह है- दिव्य जीवन व्यतीत करें। प्रतिदिन जप करें। प्रत्येक दिवस प्रातः तथा सायं भगवन्नाम का कीर्तन करें। नियमित रूप से प्रातःकाल व्यायाम, आसन आदि करें। सत्यवादी बनें। गुरु जनों की सेवा करें। गीता तथा रामायण का स्वाध्याय करें। अपने अन्दर भक्ति का विकास करें। यही दिव्य जीवन है। ऐसा ही श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करें। आप भगवान् का साक्षात्कार करेंगे।

 

कीर्तन मन तथा हृदय को शुद्ध करता है। कीर्तन करते समय सांसारिक विचारों का लोप हो जाता है। इस कलियुग में भगवन्नाम समस्त सांसारिक रोगों की औषधि है। दोगुनी शक्ति तथा उत्साह से अपनी साधना को जारी रखें।

 

आप अपने इष्टदेव का मन्त्र जपते रहें। आप भक्तियोग के साथ राजयोग को जोड़ सकते हैं। अपने पवित्र मन्त्र का जप करने के साथ-साथ आप उसे एक पृथक् लेखन-पुस्तिका में भी लिखें। मन्त्र-लेखन को लिखित जप कहा जाता है। प्रतिदिन आधा घण्टे तक मन्त्र-लेखन करें। मन्त्र लिखते समय मौन रहें। प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्त में दो घण्टे तक आध्यात्मिक साधना करें। प्रारम्भ में आसनों तथा सरल प्राणायामों का अभ्यास करें। दैनिक अभ्यास के लिए साधना के कार्यक्रम की एक रूपरेखा बना लें।

 

भगवन्नाम में असीम शक्ति है। वर्तमान समय में मानव को आक्रान्त करने वाले कष्टों का समाधान भगवन्नाम-जप ही है।

 

आप सरल तथा पवित्र हैं। सद्गुणों का अर्जन करने हेतु आपको श्रम करना होगा। श्रेष्ठ बनें। बालकों के समान सरल बनें। ईमानदार तथा सत्यवादी बनें। प्रतिदिन प्रातः तथा सायं भगवान् से प्रार्थना करना भूलें। प्रतिदिन जप करें तथा आधा घण्टे तक मौन धारण करें। आप दिव्य जीवन व्यतीत करने लगेंगे।

 

भगवन्नाम के प्रति श्रद्धा तथा गहन आस्था रखें तर्क से भगवन्नाम की महिमा स्थापित नहीं की जा सकती; परन्तु आस्था, भक्ति तथा अखण्ड जप से भगवन्नाम ही महिमा को अनुभव अवश्य किया जा सकता है।

 

सदैव भगवन्नाम का जप करें। जहाँ-कहीं भी आप जायें, भगवान् की उपस्थिति का अनुभव करें। 'वहआपमें तथा आप 'उनमें' हैं। आपके समस्त कार्य-कलाप भगवान् से की गयी एक अखण्ड प्रार्थना बन जायें।

 

अपने समस्त कार्य-कलाप भगवान् को अर्पित कर दें अथवा उन्हें पूजा-भाव से करें। प्रत्येक समय मानसिक रूप से भगवन्नाम-जप करते रहें। भगवान् की कृपा प्राप्त करने हेतु 'उनका' स्मरण तथा पूजन प्रभावकारी साधन हैं। आपका व्यवसाय चाहे जो हो, आप चाहे जहाँ जायें या यात्रा करें, सदैव भगवान् का स्मरण करते रहें तथा अपने कार्यों को पूजा-भाव से 'उन्हें' अर्पित करके करें। आप शीघ्र ही 'उनकी' कृपा प्राप्त करेंगे।

 

प्रतिक्षण भगवान् के प्रति जागरूक रहते हुए जियें। सन्तों का सत्संग करें। सत्संग आपको प्रेरणा प्रदान करेगा तथा आपका मन उत्तम विचारों से परिपूरित हो जायेगा। सन्त आपको भगवान् से सम्पर्क स्थापित करने में सहायता प्रदान करते हैं। इस संसार में प्राप्त करने योग्य एकमात्र भगवान् ही हैं। अतः 'उनके' दिव्य नाम का आश्रय कभी छोड़ें।

 

भगवान् को प्राप्त करने का सरलतम उपाय 'उन्हें' सदैव स्मरण रखना है। 'उन्हें' स्मरण रख कर आप 'उनके' प्रति अपने प्रेम को विकसित करते हैं। 'उनका' चिन्तन करके आप 'उनकी' कृपा को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। 'उनकी' कृपा प्राप्त होने पर मानव के रूप में जन्म लेने के उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है।

 

सदैव पवित्र भगवन्नाम का जप करते रहें। भगवन्नाम एक ऐसी प्रभावकारी आध्यात्मिक शक्ति है, जो उन सभी अवरोधों का सामना करके उन्हें नष्ट कर सकती है, जो साधक के ध्यान तथा प्रार्थना के आन्तरिक पथ पर बाधा उत्पन्न करते हैं। भगवन्नाम में गहन आस्था रख कर उसका निरन्तर जप करके ही उसकी शक्ति का अनुभव किया जा सकता है। सम्यक् भाव रख कर ही भगवन्नाम की शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है।

 

राम-नाम में असीम शक्ति है। यह समस्त रोगों की औषधि है। अतः भगवान् का पवित्र नाम सदैव आपके ओंठों पर रहे।

 

दिन में प्रत्येक समय भगवान् शिव (अथवा अपने इष्टदेव) का नाम जपते रहें। भगवन्नाम का जप किसी निश्चित समय पर ही किया जाये-ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है। साधक के लिए उसके जीवन का प्रत्येक क्षण बहुमूल्य है। अतः (प्रातःकालीन तथा सायंकालीन जप के अतिरिक्त) सदैव भगवान् शिव (अथवा अपने इष्टदेव) का चिन्तन करते रहें। अपने सारे कार्य-कलाप करते हुए भी आप भगवन्नाम का जप मानसिक रूप से करते रह सकते हैं।

 

भगवन्नाम जीवन की समस्त विपत्तियों का असन्दिग्ध प्रतिकार है। यह केवल शारीरिक कष्टों को दूर करता है, वरन् भवरोगों को भी नष्ट कर देता है। अतएव आस्थापूर्वक तथा भक्ति-भाव से भगवन्नाम लेते रहें। दिव्य नाम का आश्रय छोड़ें। भगवन्नाम बहुत बड़ी शान्ति तथा सान्त्वना है।

 

वस्तुतः जीवन अल्पकालिक है। शरीर नश्वर है तथा मृत्यु अवश्यम्भावी है। भगवान् एक महान् तथा शाश्वत सत्ता हैं। मानव जो जीते-जी उस शाश्वत सत्ता का अन्वेषण कर लेना चाहिए। यही जीवन है, यही जीवन का प्रमुख उद्देश्य है।

 

जिस समय शरीर दैनिक कार्य-कलापों को सम्पन्न करने में लगा हुआ हो, उस समय भी आपकी आन्तर सत्ता को शाश्वत सत्ता का चिन्तन करते रहना चाहिए। प्रत्येक क्षण भगवान् का स्मरण बना रहे! सदैव आपकी जिह्वा भगवन्नाम का उच्चारण करती रहे। आपके दैनिक कर्म भक्ति-भाव से किये गये समर्पण का रूप ले लें। दिव्य उपस्थिति अभी और यहीं है। प्रत्येक नाम-रूप से भगवान् का प्रकाश दृश्यमान् हो रहा है। इस जागरूकता के साथ व्यतीत किया गया जीवन धन्यता, प्रसन्नता तथा शान्ति प्रदान करता