डॉक्टर धर्मभूषण

श्री स्वामी शिवानंद

 

DR. DHARAMABHUSANAM SHRI SWAMI SIVANANDA

का हिन्दी रूपांतरण

 

 

 

 

 

 

लेखक

श्री स्वामी श्रद्धानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

भावानुवादिका

श्री श्रीप्रियानंद माताजी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

डिवाइन लाइफ सोसाइटी

पत्रालय: शिवानन्दनगर २४९१९२

जिला-टिहरी-गढ़वाल, उत्तराखण् (हिमालय), भारत

www.shivanadaonline.org.www.dlshq.org

 

प्रथम हिन्दी संस्करण : २०१३

द्वितीय हिन्दी संस्करण : २०१८ (५०० प्रतियाँ)

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

HO 16

 

 

 

 

 

PRICE: 35/-

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर, जि. टिहरी-गढ़वाल,

उत्तराखण्ड, पिन २४९ १९२' में मुद्रित।

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प्रकाशकीय

 

श्री श्री गुरुदेव स्वामी शिवानन्द जी महाराज के ऐसे कई जीवन-चरित लिखे जा चुके हैं, जिनमें इनके संन्यस्त जीवन की अनेक विशिष्टताओं का चित्रण मिलता है। पूर्वाश्रम-जीवन-वृत्त जानने का सद्सौभाग्य हमें अभी तक प्राप्त नहीं हो पाया था। केवल कुछेक को ही उसकी जानकारी रही; और गुरुदेव ने स्वयं तो अपने पूर्व समय के बारे में कभी कुछ बताया ही नहीं।

 

मलेशिया में डाक्टर कुप्पुस्वामि (श्री गुरुदेव का पूर्वाश्रम नाम) के साथ रहते हुए, इनके डाक्टरी-जीवन-काल में लेखक को निजी सेवा का सुअवसर प्राप्त हुआ था। (कुछ वर्षोपरान्त इनको श्रीलंका-यात्रा हेतु डाक्टर साहब से विलग होना पड़ा था) फिर दीर्घ अवधि के पश्चात् यह श्री गुरुदेव की खोज करते दर्शनार्थ ऋषिकेश पहुँच गये। आश्रम में रहते हुए गुरुदेव से संन्यास-दीक्षा ग्रहण कर नरसिंह अय्यर स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती नाम से आशीर्वादित हुए। तदुपरान्त आश्रम में इनका स्थायी वास रहा और अगस्त १९५२ में इन्हें परम धाम की प्राप्ति हुई।

 

श्री गुरुदेव के विलक्षण व्यक्तित्व के बारे में बखान करते हुए आनन्दातिरेक में स्वामी श्रद्धानन्द जी के नेत्रों से अश्रुपात होने लगता तथा श्रोता भी हर्षोन्मादित हो जाते। श्री गुरुदेव के कई भक्त-शिष्यों के प्रेमपूर्ण अनुरोध पर स्वामी जी से हमें यह पुस्तक 'शिवानन्दम्' (शिव का आनन्द) उपलब्ध हुई है। हमें विश्वास है कि प्रभु-कृपा से पाठकों का हृदय 'शिवानन्दम्''तथा जीवन दिव् बन जायेगा एवं 'डाक्टर धर्मभूषण' स्वामी शिवानन्दजी के विविध सद्गुणों के अनुशीलन के लिए भी अनुप्रेरित होंगे।

 

 

भगवान आप सबको इसी जीवन में योगी और ज्ञानी बनने का आर्शीवाद  प्रदान करें।

 

प्रकाशक

शिवानन्दनगर

--१९५४

 

 

 

 

 

 

 

 

 

लेखक की भावाभिव्यक्ति

 

हिमालय के आलोक-पुंज, ज्योतिर्मय सद्गुरु भगवान् स्वामी शिवानन्द जी महाराज के पुनीत श्रीचरणों में अनेकानेक साष्टांग प्रणिपात। भाव अभिव्यक्त करते हुए 'दो शब्द' समर्पित हैं।

 

यह सर्वमान्य है कि एक उच्च अभिलाषा, महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु मानव-मन में अगर अतीव उत्कण्ठा बनी रहे और सच्चे हृदय से आतुर हो कर अनन्यतापूर्वक प्रभु से प्रार्थना होती रहे तो वह अवश्यमेव पूर्ण होती है। जीवन में निरन्तर एकाग्रचित्त हो केवल अपनी शुभ संकल्पित वस्तु पर व्यक्ति ध्यान करता रहे तो वह निःसन्देह प्राप्त हो जाती है। यह पुस्तक उद्घाटित करती है कि अपने हृदय में सँजोयी मेरी चिर अभिलाषा कैसे पूर्ण हो गयी? कैसे वह दिव्य सपना साकार हुआ?

 

सर्वविदित सत्य है कि सद्गुरुदेव स्वामी शिवानन्द जी महाराज केवल पवित्र भारत देश में ही नहीं, अपितु समग्र विश्व में सुप्रतिष्ठित एवं सुविख्यात हैं। ये सभी स्थानों पर समादृत-सम्पूजित एवं आराधित हैं। आनन्द कुटीर में वास करते हुए पतित-पावनी गंगा मैया तथा पर्वतराज हिमालय की शोभा-महिमा बढ़ा रहे हैं। मैं तो इनका एक तुच्छ शिष्य हूँ। युग-विभूति सद्गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज की दिव्य सन्निधि में रहने का और अनोखे व्यक्तित्व के निजी सम्पर्क में आने का सद्भाग्य कैसे प्राप्त हुआ? यह पुस्तक इसी का विवरण देती है।

 

गुरुदेव मलेशिया में डाक्टर कुप्पुस्वामि के रूप में कार्यरत थे। ये आदर्श मानव के रूप में सम्पूर्ण समाज में दीप्तिमान रत्न थे। उस समय भी इनकी जीवन-शैली एक सच्चे वैरागी-संन्यासी जैसी थी। भले ही डाक्टर के रूप में पाश्चात्य वेशभूषा धारण करते। सभी इन्हें प्रेमवश आदरपूर्वक 'धर्मभूषण' नाम से पुकारते थे। अर्थात्-कारुणिकता, संवेदनशीलता एवं धर्मपरायणता से आभूषित रत्न। ऐसे विरले महान् सन्त के निकट सम्पर्क में आने पर ही इनके उत्कृष्ट आदर्श जीवन का अद्भुत परिचय प्राप्त हुआ। मैं सोचता हूँ कि अपने पूर्वजों के महान् सुकृतों के कारण ही मुझे इनका दिव्य सान्निध्य मिल पाया। इनके सन्निकट रहते हुए मुझे धर्मोचित जीवन-यापन करने का मार्ग-दर्शन प्राप्त हुआ।

 

परम सत्य के ज्ञान-प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा का तथा प्रापंचिक जीवन के परित्याग की भावना का मेरे हृदय में जागृत हो कर निरन्तर बढ़ते रहना, वस्तुतः इनके ही आध्यात्मिक निर्देशों का सुपरिणाम है। मेरे हृदय में उठी मुमुक्षुत्व की ज्वाला को गुरुदेव क्षीण नहीं होने देना चाहते थे। उस समय भी इनकी जीवनचर्या ऐसी प्रभावशाली थी कि सम्पर्क में आने वाले सब लोग इन्हें मूर्तिमन्त धर्मपरायणता और सदाचारिता मानने लगे थे। किंचिन्मात्र भी स्वार्थ भावना रखते हुए सबकी सेवा-सहायता करने का व्रत इन्होंने ले लिया था।

 

सब कार्य करते हुए भी सदा सब तरह, सब तरफ से अनासक्त, विरक्त तथा निर्लिप्त ही रहते। मानवता के कल्याण हेतु इन्होंने अथक परिश्रम किया। श्रद्धा और प्रेमपूर्वक मैं इनके स्वभाव-प्रवृत्ति, क्रिया-कलाप इत्यादि पर ध्यान देते हुए प्रसन्न होता। इनका प्रत्येक कार्य-व्यवहार प्रशंसनीय था। ये प्रेम और करुणा की साकार मूर्ति रहे तथापि इनकी अनुशासित संचालन-व्यवस्था सर्वनियन्ता परमात्मा की भाँति है। ये सर्वसमर्थ हैं।

 

इनकी दानशील प्रवृत्ति को देख कर लगता है कि ये कलियुग के कर्ण (महाभारत के पात्र) हैं। श्रीलंका की यात्रा हेतु जब मैं मलेशिया से विदा हुआ, इनका पाचन मनोहारी स्वरूप सदा-सर्वदा मेरे अन्तर्चक्षुओं के समक्ष रहता। पिछले पच्चीस वर्षों से मैं अनेक शहर-नगर में रहा, मेरी अनुभूति है कि इनके द्वारा मेरे हृदय में परम आनन्द का जो बीजारोपण हुआ था, वह अंकुरित होने लगा और समुचित अवसर पा कर प्रस्फुटित हो उठा। अन्ततः मैं संन्यास आश्रम में दीक्षित होने योग्य बन पाया। यही मेरी चिर अभिलाषा, जिसे २५ वर्षों से दिन-रात हृदय में सँजोये था, आखिरकर पूर्ण हो गयी। एक सपना वास्तविकता में परिणत हो गया। मेरा चित्त हर्षित एवं आनन्दित हो उठा। प्रसन्नता का पारावार नहीं। इसी प्रसंग का पुस्तक में निरूपण हुआ है।

 

इस पुस्तक को लिखने का प्रयोजन भी मैं आपको बताना चाहता हूँ। श्रद्धास्पद गुरुदेव के शिष्य श्री स्वामी नारायणानन्द एक दिन श्री गुरुदेव के पूर्वाश्रम-जीवन के विषय में कुछ जानने की उत्कण्ठा ले कर मेरे पास आये। मेरे द्वारा यह जीवन-वृत्त सुन कर प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने कहा - "आह! कितना ही अच्छा होगा अगर यह वृत्तान्त सबको उपलब्ध करा सकें। यह महत् कार्य सबके लिए शिक्षाप्रद एवं प्रेरणाप्रद होगा। कृपया आप इसे पुस्तक-रूप में अवश्य लिखें।" इनके इस प्रेमपूर्ण आग्रह को मानते हुए मैं पुस्तक-रचना के लिए उत्साहित हुआ। पाण्डुलिपि पूर्ण हो जाने पर मेरे मित्र श्री एम. रामरत्नम् (स्वामी षण्मुखानन्द) ने सभी अध्यायों को समुचित रीति से क्रमबद्ध किया। स्वेच्छापूर्वक यथासमय दी गयी इस मदद के लिए मैं उनको धन्यवाद देता हूँ।

 

योगी श्री शुद्धानन्द भारती जी को हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु मेरे पास योग्यता अथवा कोई शब्द नहीं जिन्होंने आदि से अन्त तक पुस्तक की पाण्डुलिपि का मनोयोगपूर्वक अध्ययन किया। इसका संशोधन एवं सम्पादन-कार्य भी किया। महान् योगी शुद्धानन्द भारती द्वारा पुस्तक का मूल्यांकन, समर्थन मिलने से मैं प्रोत्साहित हुआ। इनके द्वारा अर्पित इस समयोचित सहायता को मैं भुला नहीं सकता। इन्होंने अपनी बेजोड़, मधुर तमिल भाषा में पुस्तक की भूमिका भी लिखी है। इनके द्वारा दिया गया शीर्षक 'डाक्टर धर्मभूषण' विषय के अनुरूप है, समुपयुक्त है। इनके विचारानुसार यह लघु पुस्तक उत्प्रेरणा है-इनके द्वारा श्री गुरुदेव के विस्तृत वृहद जीवन-वृत्त की रचना के लिए। जुलाई की रात्रि बजे तक बैठ कर इन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना लिखी, जिससे गुरुदेव के प्रति इनकी असीम श्रद्धा-भावना तथा इस पुस्तक के प्रति इनकी प्रीतिपूर्ण लगन उल्लेखनीय है। मुझ जैसे नगण्य साधारण व्यक्ति के लिए उनकी यह सहायता श्लाघनीय है।

 

अपने सद्गुरुदेव का अगाध प्रेम तथा मेरी तीव्र अभिलाषा के फलस्वरूप यह पुस्तक सम्पूर्ण हो पायी है। इसे मैं श्री गुरुदेव के पादपद्मों में विनीत भाव से समर्पित करता हूँ। सोत्साह हार्दिक प्रार्थना सहित आकांक्षा करता हूँ कि इनके कृपापूर्ण आशीर्वाद मुझे तथा मेरे जैसे अन्य मुमुक्षु-जिज्ञासु जनों को भी प्राप्त हों।

 

 

 

सबकी सेवा में

श्रद्धानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्री स्वामी श्रद्धानन्द

 

सद्गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी पूर्वाश्रम जीवन में मलेशिया में एक प्रख्यात डाक्टर थे। स्वामी श्रद्धानन्द इनके साथ ही निजी सेवा-सहायता में रहे और इनके घनिष्ठ मित्र बन गये थे; तभी आज हमें यह कुछ नवीन जानकारी प्रदान कर सके हैं।

 

हमें ज्ञात हुआ है कि गुरुदेव पूर्वाश्रम में भी अनेक सद्गुणों से सम्पन्न थे। ये यथार्थतः निःस्वार्थपरक परोपकारी थे। निर्लिप्त, तटस्थ तथा विशेषतया संवेदनशील थे। इनके हृदय में अगाध प्रेम था। ये सबकी अथक सेवा करते। सदाचारिता एवं धर्मपरायणता के मार्ग पर चलने वालों के लिए ये मार्गदर्शक थे। इस पुस्तक के लेखक स्वामी श्रद्धानन्द अत्यन्त भाग्यशाली रहे, जिन्हें एक पुण्यात्मा, सन्तहृदयी डाक्टर कुप्पुस्वामि का सान्निध्य तथा व्यक्तिगत सेवा का सुअवसर प्राप्त हुआ। इस प्रकार यह डाक्टर साहब की सोत्साह मनोयोगपूर्वक सेवा के फलस्वरूप इनके सुहृद बन गये थे। जब स्वामी श्रद्धानन्द को श्रीलंका के कदिरकामम् (भगवान् कार्तिकेय जी का सुप्रसिद्ध तीर्थस्थल) के पवित्र मन्दिर दर्शन की इच्छा जाग्रत हुई तो गुरुदेव की सेवा-सन्निधि से वंचित होना पड़ा।

 

यह श्रीलंका में थे, तभी गुरुदेव मलेशिया छोड़ कर गये थे। सम्पूर्ण भौतिक कार्यकलापों, चिकित्सा व्यवसाय इत्यादि से सम्बन्ध-विच्छेद कर हिमालय की ओर खिंचे चले आये और यहाँ कर संन्यास आश्रम में दीक्षित हो गये। तत्पश्चात् एकान्त-नीरव स्थान में अकेले रहते हुए आध्यात्मिक साधना में जुट गये। उधर लेखक को गुरुदेव के विषय में जानने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। कोई रास्ता नहीं दिखायी दे रहा था। फिर भी कदिरकामम् मन्दिर के भगवान् मुरुगन (भगवान् कार्तिकेय) की कृपा तथा अपने अच्छे और अद्भुत सात्त्विक स्वभाव के परिणामस्वरूप इन्हें अपने लौकिक जीवन के प्रति पूर्ण विरक्ति हो गयी, जो दिनोंदिन बढ़ती गयी और संसार से पूर्ण त्याग के समुचित समय की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगे।

 

जैसे-जैसे समय बीतता गया, इनका वैराग्य प्रबल से प्रबलतर होता गया और सन् १९४१ में पवित्र गंगातट पर पहुँच ही गये। उस समय तक इन्हें यह पता चल चुका था कि डाक्टर कुप्पुस्वामि अब श्रद्धेय सद्गुरुदेव स्वामी शिवानन्द जी के रूप में आनन्द कुटीर, ऋषिकेश में निवास करते हैं। यहाँ पहुँच कर इनको महान् सन्त के पुण्य दर्शन-लाभ प्राप्त हुआ। श्री गुरुदेव के श्रीचरणों में दण्डवत् कर, प्रणत भाव से संन्यास-दीक्षा के लिए प्रार्थना की। उस समय इनकी प्रार्थना को स्वीकृत नहीं किया गया। इन्हें दक्षिण भारत में अपने घर वापस लौटना पड़ा। इनकी सांसारिक मोहासक्ति दिन--दिन कम होती गयी। सन् १९४३ में पुनः आनन्द कुटीर में आये और फिर गुरुदेव से संन्यास-दीक्षा की याचना की। इस बार भी अस्वीकृति ही मिली। इन्हें वापस जाना पड़ा। अन्ततोगत्वा सन् १९४७ में आये, बड़ी विनम्रतापूर्वक संन्यास-दीक्षा की याचना-प्रार्थना की तो पूजनीय गुरुदेव ने पवित्र संन्यास आश्रम में दीक्षित कर चिर-प्रतीक्षित संन्यास की अभिलाषा को परिपूर्ण कर दिया और यह स्वामी श्रद्धानन्द नाम से अभिहित हुए। तदुपरान्त आश्रम में श्री गुरुदेव के श्रीचरणों में स्थायी वास रहा। सन् १९५२ में तीन अगस्त को अपने महान् गुरुदेव के श्रीचरणों में समाधिस्थ हो गये।

 

हम स्वामी श्रद्धानन्द जी के अतीव आभारी हैं। इन्होंने गुरुदेव के मलेशिया-वास के जीवन पर प्रकाश डाला है। पूर्ण आशा है कि यह पुस्तक सबके लिए अत्यन्त लाभप्रद, बोधप्रद एवं प्रेरणाप्रद सिद्ध होगी।

 

हम स्वामी निर्मलानन्द जी का भी आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द को इनके निजी अनुभवों को पुस्तक का रूप देने की प्रेरणा दी। लेखन-कार्य के समय भी प्रोत्साहन  देते रहे। योगी श्री शुद्धानन्द भारती को इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखने की प्रार्थना भी इन्होंने ही की थी। पुस्तक-प्रकाशन के समय सर्वेक्षण कार्य, रुचि के साथ सावधानी एवं सजगतापूर्वक किया तथा अन्य कई सेवाएँ अनेकविध रूप से अर्पित करते रहे।

 

प्रकाशक

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

एक अनुभव

 

अपने गुरुभाई स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती द्वारा रचितार धर्मभूषण' पुस्तक मुझे पढ़ कर सुनायी गयी। यह जान कर हर्ष हुआ कि अपने गुरुदेव श्री स्वामी शिवानन्द जी के पूर्वाश्रम जीवन के बारे में वह लिखी गयी है; जिससे सिद्ध होता है कि यह उक्ति 'होनहार विस्वान के होत चीकने पात' अक्षरशः सत्य है, गुरुदेव पर पूर्णतः चरितार्थ होती है।

 

स्वामी श्रद्धानन्द के कथनानुसार उत्कृष्ट आध्यात्मिक विशिष्टताएँ जो श्री गुरुदेव में अब देखने को मिली हैं, ये सब इनके डाक्टरी जीवन में भी दर्शनीय थीं। ये सब जान कर मुझे भी कुछ घटनाओं का स्मरण हो आया है, मैं संक्षेप में उन्हें प्रस्तुत करता हूँ-

 

सन् १९२८ के अगस्त माह में मेरे स्वर्गीय पिता जी, जो पालघाट जिले के अन्तर्गत रामनाथपुरम् गाँव में शान्त-चित्त से पेंशन पर ही अपना सन्तोषी जीवन व्यतीत कर रहे थे, एक दिन अचानक घर छोड़ कर वहाँ से निकल पड़े और राह में बिना कहीं रुके सीधे ऋषिकेश में स्वर्गाश्रम पहुँच गये। एकाएक उन्हें सांसारिक जीवन से विरक्ति का अनुभव होने लगा था। वह इतनी तीव्र थी कि अपनी बढ़ती आयु (७० वर्ष) तथा उत्तर भारत के मौसम और जलवायु इत्यादि का भी ध्यान रहा और निकल पड़े यात्रा पर। ध्यान देने योग्य बात तो यह है कि सर्वप्रथम स्वेच्छापूर्वक उन क्योवृद्ध को सहायता को जो आगे आये, वह थे युवा स्वामी शिवानन्द जी। पिताश्री तो स्थानीय भाषा से अनभिज्ञ थे। अपने प्रति करुणा और प्रेमपूर्ण व्यवहार को देख कर पिताश्नी अपनी प्रतिष्ठापूर्ण उच्च पदवी का गर्व, प्रभावी, ठाट बाट की जीवन-शैली इत्यादि सब-कुछ भुला कर प्रेमावेग से इनके श्रीचरणों में दण्डवत् गिर पड़े; अश्रुपूरित नेत्र, रोमांचित शरीर और था गद्गद कण्ठ।

 

उसी समय से दोनों परस्पर मित्रवत् रहने लगे। पिताश्री के निवास हेतु स्वर्गाश्रम में इन्होंने पूर्ण व्यवस्था कर दी थी। कुछ समय बाद मेरी माताश्री भी स्वर्गाश्रम पहुँच गयीं। उनकी भी सुख-सुविधा, आराम का पूरा-पूरा ध्यान गुरुदेव ने ही रखा था। गुरुदेव का दया और स्नेहपूर्ण आतिथ्य पाते हुए, दोनों कई महीने स्वर्गाश्रम में रहे। चेन्नै आने पर बाद में जब पिताश्री मेरे पास रहे तो उन्होंने अपने स्वर्गाश्रम-वास के अनुभव को प्रकट करते हुए कहा था-“स्वामी शिवानन्द जी अवस्था में अभी युवा हैं। ये मलेशिया में डाक्टर थे। संन्यासी महात्मा होने के बावजूद सेवा-भाव से आवश्यकतानुसार चिकित्सा-कार्य अब भी जारी रखा हुआ है। एक रानी साहिबा द्वारा भेंट में धनराशि मिलने पर 'सत्य सेवाश्रम' के नाम से एक छोटे चिकित्सालय का खर्च चलाते हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि यह एक योग्य डाक्टर हैं। धर्मपरायणता की साकार प्रतिमा हैं। इनके विचार और कथनी-करनी में कोई अन्तर नहीं। इनके जीवन का आधार सत्य-व्रत है। इनके जैसा असाधारण जीवन अति दुर्लभ है। अवश्यमेव यह एक दिन महान् दिव्य विभूति के रूप में प्रख्यात होंगे।"

 

उस समय कहे वचन, और उनका अनुमान पूर्णतः सत्य सिद्ध हो गया है। इन महान् विभूति सद्गुरु श्री स्वामी शिवानन्द जी से संन्यास आश्रम में दीक्षित होने का मुझे अमित सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

 

स्वामी सदानन्द सरस्वती

 

आनन्द कुटीर

--१९५१

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रस्तावना

 

आदिगुरु श्री शंकराचार्य वेदान्ती थे, तथा श्री अप्पय दीक्षितार सिद्धान्ती। स्वामी शिवानन्द जी वेदान्त और सिद्धान्त दोनों का ही संयुक्त साकार रूप हैं। श्री शंकराचार्य जी ने अपने ग्रन्थों तथा स्तोत्रों की रचना तत्कालीन लोकप्रिय भाषा संस्कृत में ही की थी। श्री अप्पय दीक्षितार ने भी संस्कृत भाषा का ही प्रयोग किया। वर्तमान समय में इंग्लिश विश्व भाषा का रूप ले चुकी है। स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, महात्मा गान्धी तथा जवाहरलाल नेहरु ने इसी भाषा में अपनी विचाराभिव्यक्ति की थी।

 

हमारे स्वामी श्री शिवानन्द सस्वती अन्तर्राष्ट्रीय भाषा इंग्लिश में ही अपना दिव्य सन्देश दूर-सुदूर देशों में पहुँचाने में सफल हुए हैं। इनकी ज्ञान-गंगा के धारा-प्रवाह से अनेक जीवात्माओं का पोषण हुआ है। अध्यात्म ज्ञान, योग-विज्ञान एवं दिव्य जीवन के रूप में स्वामी शिवानन्द जी सुप्रसिद्ध हुए हैं। इनके द्वारा सम्पूर्ण मानवता में असीम करुणा का संचार हुआ है।

 

इनका शब्द-चयन प्रभावशाली, हितप्रद तथा प्रेम-अनुग्रह से ओत-प्रोत होता है; भाषा-शैली सुस्पष्ट, सरल और बोधगम्य है। इनका दिव्य व्यक्तित्व, तेजोमय स्वरूप दीप्त कुण्डलिनी शक्ति से प्रदीप्त रहता है। इनकी ज्ञानपूर्ण महान् रचनाओं को देखने मात्र से ही मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होती है। अगर सोत्साह भक्ति-भाव से पढ़ने-सुनने में निमग्न हो जायें, तो परम आनन्द से प्रफुल्लित हो उठते हैं, तब मेरा हृदय शिवानन्द जी से ऐक्य प्राप्त कर लेता है। हम दोनों ध्यानाभ्यास के लिए एक ही वाटिका में विचरण करते हैं। ध्यान का स्तर दोनों का एक ही है। इस प्रकार प्रतिदिन इनके वचनामृत-पान का सौभाग्य प्राप्त होता है। इनके स्तुत्य एवं गुणगान में मेरा हर दिन सार्थक होता है।

 

अँग्रेजी तथा तमिल भाषा में विस्तृत रूप से शिवानन्द जी का जीवनवृत्त लिखने की मेरी योजना है जिसकी अभिप्रेरणा मुझे इस लघु पुस्तक 'डाक्टर धर्मभूषण' से मिली है।

 

शिवानन्द जी का कारुण्य, हृदय की विशालता, सम्पूर्ण तीव्र वैराग्य, अनासक्ति एवं मानवता के प्रति संवेदनशीलता इत्यादि सद्गुणों के अमिट प्रभाव एवं आनन्दप्रद अनुभव के फलस्वरूप श्री स्वामी श्रद्धानन्द ने इस पुस्तक की रचना की है। स्वामी श्रद्धानन्द का व्यापार-व्यवसाय मलेशिया और श्रीलंका में फैला हुआ था। इन्हें गृहस्थ जीवन के उतार-चढ़ाव, हर्ष-विषाद आदि कई खट्टे-मीठे अनुभव हुए। सद्गुरु शिवानन्द जी की महती कृपा से ही यह फले-फूले। अब यह शिवानन्द जी के प्रधान शिष्यों में से एक हैं।

 

अपने सद्गुरु की दिव्य महिमा-उदारता के विषय में केवल लिखने का महत् कार्य ही नहीं किया, बल्कि उसे छपवाने का उत्तरदायित्व वहन करने में इनकी श्रद्धा-भक्ति और प्रेम सर्वोपरि है। यह पुस्तक इन महान् विभूति का दर्शन कराती है जो यथार्थ में जीवन के प्रारम्भ से ही उदारहृदयी, दानशील, धर्माचारी, और अध्यात्म-रत रहते हुए रत्न रूप से विभूषित रहे। इसलिए इस पुस्तक का शीर्षक 'डाक्टर धर्मभूषण' पूर्णतया समुपयुक्त है। मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि शिवानन्द जी के अनुयायी, शिष्य तथा अन्य भक्त गण इसे आदरपूर्वक स्वीकार कर लाभ उठायेंगे।

 

शिवानन्द सर्वव्यापक हैं, सर्वत्र विद्यमान हैं। इनकी उपस्थिति यत्र-तत्र-सर्वत्र है। जहाँ-जहाँ ' डिवाइन लाइफ' पत्रिका जाती है; ये भी साथ ही जाते हैं। अपना अनुभव बताता हूँ। जब कभी इनकी पुस्तकें प्राप्त करता हूँ, इनके साथ जैसे स्वामी जी का भी शुभागमन होता है तथा फिर मेरे ध्यानाभ्यास के समय आत्मैक्य का रूप ले लेते हैं। यह अध्यात्म-गगन के सूर्य हैं; जो उत्तर हिमालय में उदित हो, अपनी दिव्य-प्रकाश-रश्मियों से पूरे भारत देश को ज्योतित करते हैं; प्रबोधित करते हैं।

 

महात्मा गान्धी ने जैसे देश को स्वाधीनता दिलायी; हमारे स्वामी शिवानन्द जी ने जीवात्माओं को मुक्ति दिलायी। महात्मा गान्धी ने स्वतन्त्र देश में राष्ट्रीय झण्डा फहराया, स्वामी शिवानन्द जी ने अद्वैत सिद्धान्त का ध्वज फहराया। भारत की राजधानी दिल्ली में प्रजातन्त्र गणराज्य स्थापित हुआ; शिवानन्द आश्रम में अनन्त कल्याण-गुण-राज्य प्रतिष्ठित हुआ। यहाँ योग का राज्य है। योग-साम्राज्य जो उत्तरोत्तर प्रगति मार्ग पर है। मलेशिया में रहते हुए डाक्टर कुप्पुस्वामि शारीरिक रोग-निवारक डाक्टर थे, जड़ रोग वैद्य थे, अब वह शिवानन्द जी के रूप में मानव को जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त कराने वाले दिव्य भवरोग वैद्य हैं।

 

भारत एक आध्यात्मिक देश है, जिसमें दिव्य जीवन की प्रधानता है। इसमें योग-विज्ञान प्रधान है। इस देश की अन्तःशक्ति का स्रोत कुण्डलिनी जागरण है (जो ब्रह्माकारी है) इस देश के कला-कौशल में दिव्यता की सुगन्ध समायी हुई है। ऋषि-मुनियों के अध्यात्म-ज्ञानालोक की उज्वल किरणों में इस देश की सभ्यता-संस्कृति का अस्तित्व विद्यमान है। यहाँ के निवासी वेदाध्ययन के अभ्यासी हैं। ब्रह्मात्मैक्य की प्राप्ति का साधन, अध्यात्मविद्या (ब्रह्मविद्या) ही है जो भारत का गौरव है। जैसे चीनी की महत्ता उसकी मिठास से है, नमक की सत्ता उसके नमकीन स्वाद में है; इसी प्रकार भारत देश की महानता, गरिमा उसके अध्यात्म-प्रकाश में है, आध्यात्मिक शक्ति में है।

 

आज विश्व में विध्वंस और विनाश का नृत्य हो रहा है। आततायी के जघन्य अपराध का आतंक, नास्तिकता की उद्दण्डता, धन-सम्पत्ति का मिथ्या अभिमान, शारीरिक भोग-विलास का बोलबाला, नयी बस्ती-स्थापकों की लोभ-वृत्ति, राजनैतिक चालबाजी इत्यादि से चहुँओर तबाही मची हुई है। इस अज्ञान-अन्धकार से निकलने का मार्ग स्टेलिन, टूमैन और चर्चिल जैसे भला क्या दिखा सकते हैं? ज्ञान रूपी आलोक के लिए पथ-प्रदर्शन तो कर सकते हैं सन्त-मनीषी जन-आदि शंकराचार्य, वागीश (नायनार सन्त) रामलिंग इत्यादि। सन्तों, ऋषि-मुनियों में त्याग-वैराग्य की शक्ति और सामर्थ्य होती है। सर्मथ सन्त रामदास ने बीर शिवाजी को केसरिया ध्वज दिया था, जिसका आशय था-अनासक्ति और वैराग्य का आश्रय। सन्त-महात्मा दिव्य चेतना तथा आत्मज्ञान के धनी होते हैं, जो मानव को दिव्य बना कर समाज में पवित्रता का संचार कर सकते हैं; मानव को इच्छा और कामनाओं की दासता से विवेक-ज्ञान द्वारा मुक्ति दिला कर आत्म-स्वराज्य की आनन्दानुभूति का साधन-बल प्रदान कर सकते हैं। ऐसे हैं वर्तमान समय की युग-विभूति-स्वामी शिवानन्द जी।

 

जाज्वल्यमान अध्यात्म-ज्योति के रूप में स्वामी शिवानन्द जी युग-युग तक अमर रहें!

 

दिव्य संचेतना नित्य-निरन्तर अमर रहे!

 

दिव्य जीवन संघ की जय हो!

 

सदा-सर्वदा जय हो!

 

--१९५१                                                                                              शुद्धानन्द भारती

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुक्रमणिका

 

प्रकाशकीय. 3

लेखक की भावाभिव्यक्ति.... 4

श्री स्वामी श्रद्धानन्द... 7

एक अनुभव. 9

प्रस्तावना.. 11

अध्‍याय -1

धर्मभूषण' डाक्टर कुप्पुस्वामि से प्रथम मिलन. 17

अध्‍याय -2

डाक्टर महोदय की सहृदयता.. 19

अध्‍याय -3

आध्यात्मिक निर्देशन. 21

अध्‍याय -4

अनूठी उदारता.. 25

अध्‍याय -5

अटूट भगवद्भक्ति.... 29

अध्‍याय -6

डाक्टर महोदय से बिछुड़ना.. 33

अध्‍याय -7

पुनर्मिलन : आनन्द कुटीर में. 38

अध्‍याय -8

श्री सद्गुरुदेव-चरणाश्रित. 43

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

डाक्टर धर्मभूषण

श्री स्वामी शिवानन्द

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय

'धर्मभूषण' डाक्टर कुप्पुस्वामि से प्रथम मिलन

 

'धर्मभूषण' डाक्टर कुप्पुस्वामि से मेरा प्रथम मिलन एक पावन सान्ध्य बेला में हुआ। सिंगापुर के डाक्टर रघुनाथ अय्यर ने उनसे मिलने के लिए जोहोरबाहरु में ग्रीन महाशय के मेडिकल हॉल में मुझे भेजा। जब मैं वहाँ पहुँचा तो डाक्टर कुप्पुस्वामि नहीं थे। उनसे मिलने की प्रत्याशा में वहीं बरामदे में चहल-कदमी करने लगा। सायं .३० बजे का समय था, पैंट-कोट और पगड़ी पहने सुगठित, सुडौल, मध्यम आयु के एक तेजस्वी महानुभाव को मैंने अपनी ओर आते देखा, जिनका व्यक्तित्व चित्ताकर्षक था। यही थे डाक्टर कुप्पुस्वामि

 

मुझे देख कर उन्होंने बैठने के लिए कहा और फिर मन्द स्वर में पूछने लगे- 'आप कौन हैं? कहाँ से आये हैं?"

 

उत्तर में मैंने कहा- "सिंगापुर के डाक्टर रघुनाथ अय्यर ने मुझे यहाँ आपके पास भेजा है।"

 

कुप्पुस्वामि- "आपने रघुनाथ अय्यर का जिक्र किया है क्या? इनके घर में सब कुशलपूर्वक है ?"

 

मैंने कहा- "जी हाँ। सब कुशल-मंगल है।"

 

तत्पश्चात् डाक्टर साहब मुझे अपने घर ले गये, जो मेडिकल हॉल के पीछे ही था।

 

वहाँ पहुँच कर इन्होंने थोड़ा आराम किया। फिर ये अपनी दैनिक सन्ध्या-पूजा करने चले गये। मैं पास के कमरे में बैठा रहा। इसके बाद हमने साथ में बैठ कर रात्रि का आहार लिया। जब सोने का समय हुआ तो ये मुझे अपने साथ हॉल में ले गये। इनके सोने की तैयारी का ढंग मुझे बड़ा दिलचस्प लगा। एक साधारण-सी दरी और तकिया ले कर ये तो फर्श पर ही लेट गये। इन्हें ऐसा करते देख मैं भी अपना बिस्तर छोड़ एक कपड़ा बिछा कर जमीन पर ही सोने लगा। तब डाक्टर साहब ने चारपाई की ओर संकेत करते हुए कहा- "यह आप ही के लिए खाली रखी है, अतः इस पर सोइए।" विस्मित हो मैं सोचने लगा-'जब डाक्टर स्वयं फर्श पर सो रहे हैं तो भला मैं कैसे ऊपर सो सकता हूँ?' तब मेरी आन्तरिक भावनाओं को समझते हुए उन्होंने कहा - "आप यहाँ के मौसम, जलवायु और वातावरण के अभ्यस्त नहीं हैं। जब तक इनके अनुकूल रहने की आदत नहीं हो जाती, तब तक आपको सावधानीपूर्वक बहुत सचेत सतर्क रहना होगा। मैं तो अब इस नये देश के मौसम-जलवायु इत्यादि का अभ्यासी हो गया हूँ।" ऐसा सुन कर मैंने इनके सुझाव अनुसार ही किया।

 

अगले दिन सुबह इन्होंने अपने हाथों से कॉफी बनायी। स्वयं पीने से पहले कॉफी का एक कप मुझे भी दिया। मैंने इन्हें बताया कि कुछ समय से कॉफी पीना छोड़ रखा है। इन्होंने कारण पूछा तो मैंने बतलाया- “एक बार अपने मित्र के साथ कलकत्ता से रंगून समुद्री जहाज द्वारा जा रहा था। कॉफी बनाने के सभी साधन अपने साथ ले गये थे। रास्ते में कॉफी पीने का समय हो जाने पर कॉफी बना कर दोनों ने उसका सेवन किया। कलकत्ता से ६० मील की दूरी पर जहाज पहुँचा ही था कि एकाएक (समुद्री) तूफान आया और साथ ही भारी बवण्डर भी उठने लगा। तब कई यात्रियों का जी मिचलाने लगा तथा कई उल्टी (कै) करने लगे। उनकी दुर्दशा देखते हुए हमारा भी वही हाल हो गया। चारों ओर कॉफी की ही दुर्गन्ध फैलती जा रही थी। इस घटना के बाद से मैंने कॉफी पीना छोड़ दिया।" अपनी सारी बात मैंने इन्हें सुना तो दी; किन्तु मन में विचार आया कि डाक्टर साहब के स्नेहपूर्ण आग्रह को अस्वीकृत करना सर्वथा अनुचित है। इनका कहा मानते हुए मैंने कॉफी पीना शुरू कर दिया।

 

मध्याह्न भोजन के लिए जब डाक्टर साहब बैठे तो मैं पास ही खड़ा हो गया, यह ख्याल करते हुए कि इनके बाद ही मैं खाऊँगा।

 

इन्होंने कहा- "आयें, मेरे साथ भोजन करें।"

 

मैं बोला- "महोदय! मैं तो आपके खा लेने का बाद ही खाऊँगा।"

 

डाक्टर कुप्पुस्वामि-"मेरे साथ भोजन करने की बात से आप हैरान क्यों हो गये ? समस्त जीवों के लिए भोजन की महत्ता-उपयोगिता एक-सी नहीं है क्या? पेट भरने के लिए एक निश्चित मात्रा में ही तो सब भोजन करते हैं। भले ही शरीर को कपड़ों से ढक कर बाहरी वेशभूषा से डीलडौल बड़ा दिखायी देने लगे तो क्या हुआ? हैं तो सब जीव एक समान ही। ईश्वर द्वारा सम भाव से प्रत्येक जीव के लिए भोजन अनुबन्धित है; निश्चित किया हुआ है। ऐसी स्थिति में सम्भव नहीं कि कोई दूसरे का भाग खा सकता हो। अतः छोटे-बड़े का, किसी प्रकार का अन्तर रखते हुए आप आयें और पास बैठ कर मेरे साथ ही भोजन करें।"

 

इस पर मैं गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगा-"ये तो उच्च-महान् वेदान्तिक सिद्धान्तों की, दार्शनिकों जैसी बातें करते हैं; अवश्य ही अब इनके व्यावहारिक क्रियाकलापों पर सूक्ष्म दृष्टि रख, इनकी महानता पर ध्यान देना होगा।" ऐसा सोच कर उनका आदेश मानते हुए भोजन के लिए मैं इनके पास ही बैठ गया। घी और दही के पात्रों को एक ओर रख कर बीच में सब भोजन-सामग्री रख ली गयी। घी के बर्तन से ठीक आधी मात्रा घी मेरी थाली में डाल दिया जिसे खत्म करना भी मुश्किल लगा। दही बहुत गाढ़ा था छुरी से निकालना पड़ा दही का भी आधा भग  मेरी थाली में  परोस दिया भोजन के समय जैसे इन्होंने कोई  भिन्नता या भेदभाव नहीं दिखाया, उसीप्रकार प्रत्येक क्रिया-कलाप में, कार्य-व्यवहार में भी भेदभाव रहित हो कर मेरे साथ सदा प्रेमपूर्वक समानता का ही व्यवहार करते रहे।

 

 

अध्याय

डाक्टर महोदय की सहृदयता

 

इस प्रकार कुछ समय व्यतीत हुआ। डाक्टर साहब प्रतिदिन प्रातः चार बजे के लगभग उठ जाते, मैं भी इनके साथ ही जग जाता। शीर्षासन इत्यादि योगासनों का ये अभ्यास करते और साथ-साथ प्रशिक्षण देते हुए मुझे भी अभ्यास कराते। इसके पश्चात् स्नान आदि प्रातःकालीन नित्य-कर्मों में इनका कुछ समय बीत जाता। फिर पूजा तथा धर्म-ग्रन्थों के स्वाध्याय के बाद ही वे एक कप कॉफी पीते थे।

 

जिस घर में डाक्टर साहब रहते थे, वह बहुत बड़ा था जिसका अगला भाग कार्यालय तथा पिछला भाग निवास के लिए प्रयोग में लाया जाता था। ये ऊपरी मंजिल में रहते थे। दिन में पाश्चात्य वेशभूषा में रहते; परन्तु रात को तो ये भारतीय वस्त्र ही धारण करते थे। एक दिन मैं इनके पास ऊपर गया। कमरे की दीवार पर बहुत सारे चित्र लगे हुए थे। बहुत से तो देवी-देवताओं के थे और कुछ भिन्न-भिन्न भाव-मुद्राओं में खींचे गये डाक्टर साहब के अपने फोटो थे, जिनको मैं एकटक देखता ही रह गया। डाक्टर साहब पीछे खड़े मुझे देख रहे थे। एक सुहृद की भाँति प्रेमपूर्वक उन्होंने पूछा- "आपके भी हम ऐसे फोटो बनवा सकते हैं क्या?" किंचित् संकोच से मैंने स्वीकृति दे दी।

 

सायं बजे के लगभग डाक्टर साहब एक बंडल लिये मेरे पास आये और तैयार हो जाने के लिए कहा। मैंने पूछा- "कहाँ जाना है हमें ?" उत्तर में केवल इतना ही कहा - "बस आप मेरे साथ चलिए।" इनके हाथ से बंडल ले कर साथ चल दिया। एक भवन की पहली मंजिल पर हम गये। वह स्थान एक सुसज्जित महल-सा लग रहा था। इन्होंने बंडल खुलवाया; देखा तो उसमें पाश्चात्य पोशाक थी। मुझे वही कपड़े पहनने के लिए बोला। तब मैं समझ पाया कि हम तो फोटो स्टूडियो में खड़े हैं। हुआ यह कि फोटो खिंचवाने की मेरी इच्छा जान कर इन्होंने पहले स्टूडियो में कर प्रबन्ध किया; फिर घर जा कर अपने कपड़ों का बंडल ले कर मुझे स्टूडियो में लाये और फोटो खिंचवाने के लिए तैयार होने को कहा। अलग-अलग मुद्राओं में मेरे तीन फोटो खींच लिये गये।

 

उस समय डाक्टर साहब पैंतीस वर्षीय थे और मेरी उमर २२ वर्ष थी; फिर भी उनकी ड्रेस मुझे एकदम फिट आयी। फोटो खिंचवाने के बाद हम घर लौटे। अगले दिन शाम को तीन मुद्राओं की तीन-तीन फोटो तथा इनके नैगेटिव लिये हुए मेरे पास आये। मुझे फोटो पकड़ाते हुए डाक्टर साहब अति प्रसन्न थे।

 

डाक्टर साहब की सहृदयता का एक और उदाहरण-इनकी अलमारी में विविध भाषाओं की अनेक पुस्तकें रखी हुई थीं। कुछ पुस्तकें इन्होंने मुझे पढने के लिए दीं। सभी पुस्तकों पर इनके नाम 'पी. वी. कुप्पुस्वामि' की मोहर लगी हुई थी। मैंने पूछ लिया-"यह नाम आपने हाथ से लिखा है या मुद्रांकित है?" तुरन्त ही बोले- “आप भी ऐसा ही चाहते हैं क्या?" मैंने निःसंकोच 'जी हाँ' कह दिया। वे शीघ्र ही पेपर और पैन ले कर आये और कहा- "कृपया इंग्लिश में इस पर अपना नाम लिखें।" नरसिंह अय्यर अपना नाम लिख कर पेपर इन्हें थमा दिया। हस्ताक्षर वाला पेपर सिंगापुर भेज दिया गया। हस्ताक्षर-अंकित मोहर सिंगापुर से एक सप्ताह में ही हमें प्राप्त हो गयी। स्याही तथा स्याही का पैड भी साथ ही थे। सब-कुछ देते हुए डाक्टर साहब ने मुझसे पूछा - "देख लें, सब चीजें ठीक गर्मी?" कृतज्ञतापूर्वक खुश हो कर मैंने 'जी हाँ' कह दिया। मैंने अनुभव किया कि मेरे अपने माता-पिता मेरी भावनाओं का शायद इतना ख्याल नहीं रखते जितना करुणाशील सहृदय डाक्टर साहब ने मेरी सब इच्छाओं को सम्मान देते हुए अविलम्ब पूर्ण किया।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय

आध्यात्मिक निर्देशन

 

डाक्टर साहब ने अपनी लाइब्रेरी में से जो आध्यात्मिक पुस्तकें मुझे दी थीं, उन्हें पढ़ने और चिन्तन-मनन करने के पश्चात् मेरी विचारधारा ही बदल गयी; गम्भीर विरक्ति छा गयी थी। सांसारिक वस्तुओं में अरुचि होने लगी थी। इस प्रापंचिक जगत् से बच निकलने का मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया। मेरे विचारों में तेजी से परिवर्तन आने पर, मन को पवित्र होते देख डाक्टर साहब खुश थे। इस तरह कुछ महीने तो उदासीनता में ही व्यतीत हुए। शेव बनाना, कपड़े धोना इत्यादि सब कार्य स्वतः छूटते गये। सिर पर तेल लगाने से बाल रूखे हो कर उलझ गये थे। अपना अधिक समय एकान्त और मौन में ही बीतने लगा।

 

जब कभी अत्याधुनिक अहंकारी फैशनेबल व्यक्ति नजर में जाते तो अपने मन में सोचता - "विलासितापूर्ण बहुमूल्य वस्त्र-आभूषणों से सज्जित इस नश्वर देह को ढोये इधर-उधर क्यों भटक रहे हो ? केवल बाहरी स्वच्छता-सजावट की ही चिन्ता करते हुए लक्ष्यहीन घूमते रहते हो, परन्तु अपनी आन्तरिक स्वच्छता-शुचिता का ख्याल बिलकुल नहीं करते। तुम लोगों की दशा तो उस व्यक्ति जैसी शोचनीय है, जिसके हाथ में मन्थन के पश्चात् तैयार मक्खन रखा हुआ है, फिर भी वह घी की खोज में भटकता है। अथवा तुम्हारी स्थिति उस गडरिए के समान है जो अपनी भेड़ को कन्धे पर लादे हुए है; किन्तु उसे गिरा हुआ समझ कर उसे कुएँ में ढूँढ़ता है। अरे मूढ़ मानव! तुम्हारे पास तो आत्मज्ञान का पवित्र जल है, जिससे अन्तर का अज्ञान-रूपी मल साफ किया जा सकता है। निरन्तर प्रवाहित इन शाश्वत जल-प्रपात से लाभ उठाने में असमर्थ हो कर अपने बहुमूल्य जीवन को व्यर्थ क्यों गँवा रहे हो ? इस भाँति तुम चलते-फिरते शव मात्र ही नहीं हो क्या?" ऐसा विचार करते हुए उन्हें तिरस्कृत भाव से देखता।

 

डाक्टर साहब ने मेरी मनोदशा को भाँप लिया था। परन्तु कारण इन्हें कुछ पता नहीं लग पाया था। मैं अस्वाभाविक विक्षिप्तता से ग्रस्त होता जा रहा हूँ, इतना तो ये भलीभाँति जान गये।

 

एक दिन की बात है, दोपहर को हमने भोजन किया, जो बहुत स्वादिष्ट था। डाक्टर साहब का स्वभाव था, अपने मित्रों के साथ बहुधा बाँट कर खाने में, मिल कर खाने में आनन्द लेते थे। इनके एक परम मित्र सुब्रह्मणि अय्यर घर से आधे मील की दूरी पर ही रहते थे। आज का कुछ भोजन इनके घर जा कर दे आने का डाक्टर साहब ने मुझे अनुरोध किया। तो कभी पहले उनको मैंने देखा था, ही उनका घर जानता था। डाक्टर साहब को इस बात का पता था। इसीलिए मुझे इनके घर का रास्ता अच्छी तरह समझा दिया और मित्र को फोन द्वारा मेरे आने की सूचना भी दे दी।

 

मैं मित्र के घर की ओर चल पड़ा। परन्तु हालत तो मेरी सामान्य थी। शरीर पर कटि में लिपटे एक छोटे वस्त्र के अतिरिक्त ओर कोई कपड़ा था; क्योंकि पिछले कुछ दिनों से अपने कीमती वस्त्राभूषणों का त्याग कर दिया था। चैत्र मास की तपती दोपहर, बारह बजे का समय था। पैरों में चप्पल पहनी नहीं थी, नंगे पाँव तारकोल की उस सड़क पर चलना शुरू कर दिया।

 

सड़क पर चलते हुए मैं अपनी धुन में सोचने लगा-तन पर मात्र एक छोटा-सा कपड़ा लपेटे मैं इनके घर जा रहा हूँ। पहले कभी इनसे मिला भी नहीं। मान लो, गलती से मैं किसी दूसरे घर में पहुँच गया, जहाँ युवा पीढ़ी के लड़के-लड़कियाँ रहते हों और मुझे 'भिखारी' कह कर मजाक करने लगे तो...? तभी मुझे एक महान् रहस्यवादी सन्त पट्टिनत्तार के जीवन की एक घटना याद गयी। एक बार वह केवल कोपीन पहने भिक्षाटन के लिए, निकले, तो एक दुष्ट ने उन्हें ढोंगी कहते हुए दोषारोपण किया और उनको कोड़े लगाने लगा। तब तक पीटता चला गया जब तक वह बेहोश नहीं हो गये थे। उन महान् सन्त ने सब आघात चुपचाप सहन किये तथा उदर-पूर्ति को ही इसका कारण मानते हुए यह ठान लिया-

 

अगर किसी ने स्वयं कर मुझे भोजन दिया,

तो करूँगा उसे स्वीकार;

नहीं जाऊँगा भोजन हेतु बाहर।

किसी ने चाहे प्रेम भाव से किया आमन्त्रित,

तब भी नहीं जाऊँगा भोजन माँगने बाहर।

हे भगवान्!

मेरा शरीर भले ही मृतप्राय होने लगे,

तब भी नहीं जाऊँगा उदर-पूर्ति हेतु बाहर।

 

भोजन एवं वस्त्रों के लिए कहीं भी जाने का प्रण ले कर पट्टिनत्तार ने एक पेड़ के नीचे आसन लगा लिया। सोचा करते-“क्या ये सब इस नश्वर शरीर के पालन-पोषण हेतु नहीं कर रहा हूँ। तो ठीक! अगर मैं दोषी हूँ तो स्वेच्छापूर्वक खुशी-खुशी सब सहन करूँगा।"

 

इस प्रकार इनके विषय में सोचते-सोचते उन विचारों में खोया हुआ था कि अचानक किसी का स्वर सुनायी दिया जो मुझे पुकार रहे थे; वह थे श्री सुब्रह्मणि अय्यर। डाक्टर साहब द्वारा भेजे गये भोजन-व्यंजन उन्हें दे दिये। स्वीकार करते हुए उन्होंने बतलाया- "डाक्टर साहब के फोन से खबर मिलने पर खिड़की में खड़े बाहर की ओर देखता रहा; अनुमान लगाते हुए मैं खुद ही अब आपके पास गया।

 

कुछ समय इसी तरह विरक्ति में व्यतीत होता चला गया। योग-सम्बन्धी कुछ पुस्तकों का मैंने अध्ययन किया था। 'राजयोग' का शिक्षण प्राप्त करने का मेरा इरादा था। मैं स्वाध्याय करता और फिर एक पेपर पर प्रमुख विषय-बिन्दु लिख लेता।

 

आफिस बन्द होने के बाद डाक्टर साहब रोज शाम को चार बजे एक कप चाय पी कर सायं भ्रमण के लिए चल देते। जैसे ही ये बाहर निकलते मैं अन्दर से दरवाजा बन्द कर अपनी आध्यात्मिक एकान्तिक साधना में लग जाता। अन्दर से कुण्डी बन्द करने की आवाज सुन कर ही ये आगे बढ़ते। नित्यप्रति का यह अभ्यास था। एक दिन ऐसा हुआ कि दरवाजा तो बन्द कर दिया, पर कुण्डी लगाना मैं भूल गया; ऐसा होते देख कर डाक्टर साहब तुरन्त दरवाजा खोल कर मेरे कमरे में प्रविष्ट हुए। मुझे एकान्त में बैठे हुए देखा और सामने रखे उस पेपर की ओर देख कर आश्चर्यचकित हुए कि 'राजयोग' विषय पर मेरी अच्छी जानकारी है। उन्होंने कहा- "पिछले काफी दिनों से आप पर मेरी दृष्टि थी। आज मुझे आपकी व्यस्तता का कारण समझ में गया। आपके व्यक्तित्व में हुए परिवर्तन का कारण जानने के लिए मैं कमरे में दौड़ा चला आया; अच्छा ही हुआ जो दरवाजा अन्दर से बन्द था।"

 

ऐसा उचित अवसर पा कर डाक्टर साहब ने विभिन्न कथा, दृष्टान्त, उपाख्यान, कहानी इत्यादि के माध्यम से मुझे ऐसे अनेक आध्यात्मिक निर्देश दिये, जो हृदयस्पर्शी थे और जिन्होंने उदासीनता-युक्त मानसिक स्थिति को परिवर्तित कर मेरे अन्तस को छू लिया था। इनके अगाध प्रेमभाव को मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। इनके शब्दों में गहरा प्रभाव था। समझाने की शैली अत्यन्त शक्तिप्रद एवं कल्याणप्रद थी। हृदय को पिघलाने वाली उस शैली ने पाषाणवत् मेरे कठोर चित्त को द्रवित कर दिया। इनके इसी विशिष्ट गुण के कारण ही सबके मन में इनके प्रति अद्भुत आकर्षण था। मुझे ठीक समय पर उचित मार्ग-दर्शन देना ही अपना मुख्य कर्तव्य समझते हुए उस शाम को इन्होंने सैर पर जाने का विचार ही छोड़ दिया। इनके अमृतमय वचन अन्तरतम की गहराइयों में ऐसे प्रवेश कर गये जैसे केले के कठोर पेड़ में बिना किसी विशेष प्रयास के कोई कील सहज ही घुसा दी जाये। जिस प्रकार सर्कस-प्रबन्धक जीव-जन्तुओं को चाबुक से सहज ही नियन्त्रित कर लेता है, सँपेरा अपनी बीन बजा कर साँप को नचाता है; जादूगर एक छड़ी के जादू से दर्शकों को मोहित कर लेता है; ठीक उसी प्रकार मैं तो डाक्टर साहब के स्नेहसिक्त, प्रेरणादायी शिक्षाप्रद वचनों से सम्मोहित हो गया। इन महान् सन्त के प्रेरक व्यक्तित्व ने करुणा और सहानुभूति से मुझे यथार्थ परम सत्य से परिचित कराया। मेरा मन पिघल गया और कुछ ही दिनों में अपनी सहज स्वाभाविक दशा में लौट आया। मुझे सामान्य स्थिति में आया देख कर डाक्टर महोदय अत्यन्त प्रसन्न हुए।

 

कुछ समयोपरान्त मैंने अपनी अभिलाषा व्यक्त करते हुए डाक्टर साहब से कहा- "तपस्या हेतु हिमालय-दिशा की ओर प्रस्थान के लिए आपकी कृपापूर्ण अनुमति चाहता हूँ। वहाँ पर सन्त-महात्माओं, ऋषि-मुनियों एवं योगियों की सेवा-पूजा द्वारा अपना जीवन सार्थक और सफल बनाना चाहता हूँ।"

 

मेरी अपरिपक्व स्थिति की बातें सुन कर मुस्कराते हुए ये बोले- "इसके लिए अभी उचित समय नहीं आया। ऐसा माना जाता है कि कठोर तपस्या से अपने शरीर को यन्त्रणा दे कर पीड़ित करने की कोई आवश्यकता नहीं। प्रत्येक घटना विधि के विधानानुसार ठीक अवसर पाते ही स्वयं घटित हो जाती है। बाहर से कठोर नारियल समुचित समय पर पक कर अन्दर से मधुर जलपूर्ण हो जाता है। आप अभी कुछ समय गृहस्थ आश्रम में रह कर अनन्य निष्ठापूर्वक सात्त्विक जीवन-यापन करें। परिपक्व अवस्था में पहुँचने पर आपकी यह मनोकामना स्वतः परिपूर्ण हो जायेगी। यह तो निर्विवाद सत्य है कि मानव-मन की सच्ची एवं दृढ़ अभिलाषा एक एक दिन अवश्यमेव पूर्ण होती है।"

 

मेरे मन की दुविधापूर्ण विचलित दशा को देख कर ये मुझे उस दिन अपने साथ सैर पर ले गये। उस समय जोहोरबाहरू के समुद्र पर पुल बनाया जा रहा था; जहाँ हजारों की संख्या में मजदूर कार्य में जुटे हुए थे। डाक्टर महोदय मुझे कई अन्य स्थानों पर भी ले गये। बन्दरगाह के पास इन्होंने मुझे दिखाया कि जहाज से माल उतार कर लोकल ट्रक में भर कर अन्य शहरों में कैसे पहुँचाया जाता है?

 

ये बहुधा मुझे फुटबाल-खेल-मैदान में भी ले जाते थे। हम दोनों खेल देखा करते। कभी-कभी समुद्र-तट पर बैठ जाते और मुझे महत्त्वपूर्ण बहुमूल्य आध्यात्मिक उपदेश-निर्देश दिया करते-"इतना ध्यान रहे कि संसार में रहते हुए माया के प्रभाव से बचने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहना अत्यावश्यक है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय

अनूठी उदारता

 

सिंगापुर से प्रकाशित पत्रिका ' मलाया ट्रिब्यून' (The Malaya Tribune) के प्रधान सम्पादक की डाक्टर कुप्पुस्वामि से मित्रता थी। उन्होंने अपनी इस पत्रिका के लिए डाक्टर महोदय को अपने लेख भेजने का आग्रह किया ताकि पाठक उनसे लाभान्वित हो सकें। इनके बहुत से लेख इस मैगजीन में प्रकाशित हुए। मेडिकल साईंस में रिसर्च वर्क के कारण इंग्लैण्ड से डाक्टर महोदय को अनेक उपाधियाँ, प्रशंसापत्र, पुरस्कार एवं सार्टिफिकेट इत्यादि प्राप्त हुए थे। सिंगापुर तथा कौलालम्पुर में धर्मानुमोदित जीवन-यापन करते हुए भव्य व्यक्तित्व से विभूषित, सर्वगुणसम्पन्न डाक्टर साहब अपने हृदय की उन्मुक्तता, उदारता आदि विशिष्टताओं के लिए सुविख्यात थे। इसी कारण इन्होंने 'डाक्टर धर्मभूषण : कुप्पुस्वामि अय्यर' की स्नेह-सम्मान-सूचक उपाधि अर्जित की। प्रत्येक व्यक्ति इनके हृदय की विशालता एवं दानशीलता से परिचित था।

 

संसार में रहते हुए एक सच्चे वीर सैनिक की भाँति इन्होंने भौतिकता पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त कर ली थी। ये पूर्णरूपेण निर्लिप्तता, तटस्थता एवं निरासक्ति का जीवन-यापन करते थे। इसी अनासक्ति ने उनमें उदात्त ज्ञानी भक्त की स्थिति प्राप्त होने का बीजारोपण किया। लोग तो पहले से ही इन्हें एक त्यागी-वैरागी गृहस्थ पुकारने लगे थे। प्रथमतः इनमें बाह्य विरक्ति का बीज पड़ा, अंकुरित बीज पौधे के रूप में पल्लवित हुआ, फिर वृक्ष-रूप में बढ़ने लगा जिसमें ज्ञान के अमृत-रस-पूर्ण फल पैदा हुए। ज्ञान-रूपी फल में इनकी आध्यात्मिक क्षुधा मिटा कर परितृप्त करने की पूर्ण क्षमता थी। बिना आन्तरिक विरक्ति के बाह्य विरक्ति या संन्यास पूर्ण वैराग्य-संन्यास नहीं कहलाता। आन्तरिक वैराग्य अत्यन्त शक्तिप्रदायक, क्षमतापूर्ण एवं प्रभावी होता है। डाक्टर महोदय ने तो आन्तरिक विरक्ति और त्याग के दृढ़-अटल नियमों का विधिवत् पालन किया था।

 

हमारे डाक्टर महोदय 'अन्नदान वल्लल' कहलाते थे, जिसका आशय है-उदार अन्नदाता। कोई भी, किसी भी समय जिस प्रकार की सहायता के लिए इनके पास आया, ये पूरे दिल से यथासम्भव सहायता के लिए तत्पर रहते। हम प्रायः महाभारत के सुप्रसिद्ध पात्र कर्ण की दानशीलता की चर्चा करते हैं; जब कि उसने सदैव भौतिक वस्तुओं का ही दान दिया, कभी किसी भूखे की क्षुधापूर्ति हेतु भोजन नहीं खिलाया था।

 

ऐसा कहा जाता है कि एक बार कर्ण अपने महल की बालकनी में टहल रहे थे। उसी समय उस ओर एक निर्धन, भूखा व्यक्ति भोजन की भिक्षा माँगने आया, परन्तु कर्ण ने उसे भोजन दे कर पास के 'अन्नक्षेत्र' की ओर जाने के लिए अँगुली से इशारा कर दिया था। वह व्यक्ति वहाँ गया, भोजन प्राप्त कर उसने अपनी भूख मिटायी। महाभारत के युद्ध में जब कर्ण मरणासन्त्र अवस्था में था तो श्रीकृष्ण से उसने अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी की माँग की। श्रीकृष्ण ने कर्ण को अपने हाथों को मुँह तक लाने के लिए कहा; मुँह के पास अंजुली बनाने के कहा। कर्ण अपना दायाँ हाथ मुँह तक ले गया। श्रीकृष्ण ने जैसे ही हाथ पर पानी डाला तो पानी स्वर्ण में परिवर्तित हो गया। अतृप्त कर्ण हताश हो कर व्यग्र हो उठा। असन्तोष प्रकट करते हुए कर्ण ने श्रीकृष्ण से कहा- 'हे कृष्ण! जल तो स्वर्ण बन गया, मेरी प्यास तो बुझी नहीं, मैं तो प्यासा ही रह गया।"

 

श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- "जीवन-भर तुम स्वर्ण का दान करते रहे; परन्तु भोजन का दान कभी नहीं दिया। भूखे को कभी भोजन नहीं खिलाया, प्यासे को पानी नहीं पिलाया, उसी का यह परिणाम है। याद है तुम्हें? एक बार भूख से तड़पता एक याचक तुम्हारे पास भोजन के लिए आया, तो तुमने कुछ खाने की वस्तु दे कर उँगली से संकेत करते हुए निकट के 'अन्नक्षेत्र' में भोजन के लिए भेज दिया था। जैसे भी है, अब तुम अपनी इस अँगुली को चूस कर अपनी प्यास बुझा सकते हो।"

 

इसी मौके पर कर्ण ने घोषणा कर दी - "सब प्रकार के दान में अन्नदान सर्वश्रेष्ठ दान है। अर्थात् भूखे को भोजन कराना ही सर्वोत्तम दान है।"

 

कुन्ती के ज्येष्ठ पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने सदैव निर्धनों को भोजन दिया। परन्तु हमारे डाक्टर कुप्पुस्वामि तो सब प्रकार से, तन-मन-धन से दूसरों के सहायतार्थ सदैव कटिबद्ध रहे। इनकी परोपकारिता, हृदय की उदारता तो अनोखी ही है।

 

एक दिन की बात है, जैसे ही हम भोजन के लिए बैठे, कि बाहर से किसी भिखारी की भोजन-याचना की पुकार सुनायी दी-"बहुत भूखा हूँ, भोजन चाहिए।" डाक्टर महोदय तत्काल बाहर पहुँचे और याचक से सम्मानपूर्वक कहा- "श्रीमन्! जल्दी ही आपको भोजन कराता हूँ।" ऐसा कहते ही ये रसोईघर में आये। कुल भोजन का आधे से भी अधिक भाग एक थाली में पत्तल बिछा कर परोस दिया। चावलों पर घी डाल दिया। सब्जियाँ भी प्रचुर मात्रा में रखीं। बाहर जा कर भोजन की थाली याचक के सामने रखी। सहानुभूतिपूर्वक उसकी सहायता-हेतु पास ही बैठ गये। भोजन करके वह बहुत खुश हुआ। ऐसे प्रेमपूर्वक परोसा हुआ ताजा-ताजा भोजन उसको पहले कभी कहीं से नहीं मिला था। सन्तुष्ट हो प्रसन्नतापूर्वक उसने कहा- “महोदय! मैं कई जगह भिक्षा माँगने गया; परन्तु प्रेमपूर्वक परोसा गया ऐसा स्वादिष्ट भोजन कहीं भी प्राप्त नहीं हुआ।

 

रन्तिदेव ने अन्न-जल का त्याग कर अड़तालीस दिन तक व्रत-अनुष्ठान किया था। कठोर निर्जल उपवास के बाद जब वह भोजन करने बैठा ही था कि एक अति निर्धन उसके दरवाजे पर भिक्षा माँगने गया। बिना किसी हिचक के तुरन्त ही अपना भोजन खुशी से भिक्षुक को दे दिया। रन्तिदेव ने अल्प जल पी कर ही क्षुधा-तृप्त करनी चाही, तभी एक प्यासा पानी की याचना करते वहाँ पहुँच गया। प्रसन्नतापूर्वक अपना पानी भी उसे दे दिया हमारे डाक्टर महोदय रन्तिदेव की ही तरह अत्यन्त करुणाशील एवं महान् दानी रहे।

 

उस क्षुधार्त को स्वादिष्ट भोजन खिलाने के पश्चात् हम दोनों भोजन करने बैठे। बचे भोजन की मात्रा तो कम ही थी। मैंने थोड़ा और खाना बनाने का विचार किया। अन्तर में उठे इस भाव को डाक्टर साहब ने भाँप लिया और बोले- "आप अल्प मात्रा में बचे भोजन पर विस्मित हो रहे हैं कि हम क्या खायेंगे?" मैं चुप खड़ा रहा। अति प्रसन्न हो वे मुस्कराते हुए बोले- "उस जीवात्मा ने आनन्दपूर्वक भरपेट भोजन किया, पूर्ण तृप्ति की जो उसे अनुभूति हुई, वही तुष्टि हम भी अनुभव कर रहे हैं। इससे अपर्याप्त की तो भावना ही मिट जाती है। आओ खायें, हमें इतना ही भोजन पर्याप्त है।" हम दोनों ने अवशिष्ट भोजन का स्वाद और आनन्द लिया।

 

एक अन्य दिन, लगभग एक बजे हमने अपना भोजन समाप्त किया ही था कि दरवाजे पर एक वृद्ध व्यक्ति की पुकार सुनायी दी-"मैं भूखा हूँ।" बरामदे के बाहर कर देखा-अति निर्धन एक तमिल व्यक्ति खड़े थे। देने के लिए भोजन तो घर में था नहीं। दूसरों के सहायतार्थ सदैव जेब में खुले पैसे अर्थात् कुछ सिक्के रखना डाक्टर साहब की आदत थी। भोजन की याचना सुनते ही तीव्र वेग से उसकी ओर दौड़े। विनम्रतापूर्वक, याचक को भोजन हेतु जेब से पर्याप्त धनराशि देते हुए धीमे से कहा-"श्रीमान् जी, आप वरिष्ठ प्रतीत होते हैं, होटल में जा कर अच्छा भोजन प्राप्त कर सकते हैं।" वह तो बहुत खुश हुआ और डाक्टर साहब को आशीर्वाद देते हुए चला गया।

 

एक समय एक गरीब धनहीन व्यक्ति डाक्टर साहब के घर आया और कहने लगा-"महोदय! मैंने सुना है कि आप बड़े दानशील हैं। मैं गरीब हैं; मेरे पास पैसा नहीं। जिस रोग से मैं पीड़ित हूँ, इसका इलाज बड़ा मँहगा है। चिकित्सा में भारी व्यय उठाना पड़ेगा। कैसे भी आप मेरी सहायता कीजिए और इस कष्ट से मेरी रक्षा कीजिए। सुनते ही डाक्टर साहब उसे अन्दर ले गये। जाँच-परीक्षण किया। मेडिकल टैस्टों की रिपोर्ट से ज्ञात हुआ कि वह गम्भीर रोग से पीड़ित है। सिंगापुर के सरकारी अस्पताल के सर्जन को रोग के विषय में सलाह-मशवरे हेतु तुरन्त फोन किया। वह सर्जन हमारे डाक्टर साहब के मित्र थे। प्रत्युत्तर में उन्होंने रोगी को तुरन्त सिंगापुर भेजने के लिए कहा। डाक्टर साहब ने उसे (सफर) राह-खर्च एवं भोजन इत्यादि दे कर अविलम्ब सिंगापुर के लिए रवाना किया।

 

यह जानते हुए कि रोगी को