
भारतीय दर्शन -1
(प्रथम खण्ड़)
अनुवाद
नन्दकिशोर गोभिल
₹650
ISBN: 9788170281870
संस्करण : 2023
हिन्दी अनुवाद राजपाल एण्ड सन्ज़
BHARATIYA DARSHAN (Part-1) by Dr. S. Radhakrishnan
मुद्रक : जी.एस. ऑफसेट, दिल्ली
राजपाल एण्ड सन्ज़
1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली-110006
फोन: 011-23869812, 23865483, 23867791
website: www.rajpalpublishing.com
e-mail: sales@rajpalpublishing.com
www.facebook.com/rajpalandsons
भारतीय दर्शन-1
वैदिक युग से बौद्ध काल तक
(Indian Philosophy का हिन्दी अनुवाद)
डॉ. राधाकृष्णन
राजपाल
यद्यपि संसार के बाह्य भौतिक स्वरूप में, संचार-साधनों, वैज्ञानिक आविष्कारों आदि की उन्नति से बहुत अधिक परिवर्तन हुआ है, किन्तु इसके आन्तरिक आध्यात्मिक पक्ष में... कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। क्षुधा एवं अनुराग की पुरातन शक्तियां और हृदयगत निर्दोष उल्लास एवं भय इत्यादि मानव-प्रकृति के सनातन गुण हैं। मानव-जाति के वास्तविक हितों, धर्म के प्रति गम्भीर आवेगों और दार्शनिक ज्ञान की मुख्य-मुख्य समस्याओं आदि ने वैसी उन्नति नहीं की जैसीकि भौतिक पदार्थों ने की है। मानव-मस्तिष्क के इतिहास में भारतीय विचारधारा अपना एक अत्यन्त शक्तिशाली और भाव-पूर्ण स्थान रखती है। महान विचारकों के भाव कभी पुराने अर्थात् अव्यवहार्य नहीं होते। प्रत्युत वह उस उन्नति को जो उन्हें मिटाती-सी प्रतीत होती है, सजीव प्रेरणा देते हैं। कभी-कभी अत्यन्त प्राचीन भावनामयी कल्पनाएं हमें अपने अद्भुत आधुनिक रूप के कारण अचम्भे में डाल देती हैं क्योंकि 'अन्तर्दृष्टि' आधुनिकता के ऊपर निर्भर नहीं करती।
भारतीय विचारधारा के प्रतिपाद्य विषय के सम्बन्ध में अत्यधिक अज्ञान है। आधुनिक विचारकों की दृष्टि में भारतीय दर्शन का अर्थ है माया-अर्थात् संसार एक मायाजाल, कर्म अर्थात् भाग्य का भरोसा और त्याग अर्थात् तपस्या की अभिलाषा इस पार्थिव शरीर को त्याग देने की इच्छा आदि दो-तीन 'मूर्खतापूर्ण' धारणाएं मात्र, कोई गम्भीर विचार नहीं और यह कहा जाता है कि ये साधारण धारणाएं भी जंगली लोगों की शब्दावली में व्यक्त की गई हैं, और अव्यवस्थित निरर्थक कल्पनाओं एवं वाक्प्रपंच रूपी कुहासे से आच्छादित हैं, जिन्हें इस देश के निवासी बुद्धि का चमत्कार मानते हैं। कलकत्ता से कन्याकुमारी तक छह मास भ्रमण करने के पश्चात् हमारा आधुनिक सौन्दर्य-प्रेमी, भारत की समस्त संस्कृति एवं दर्शन-ज्ञान को 'सर्वेश्वरवाद' निरर्थक 'पाण्डित्याभि-मान', 'शब्दों का आडम्बर मात्र' और किसी भी हालत में प्लेटो और अरस्तू यहां तक कि प्लाटिनस और बेकन के दार्शनिक ज्ञान के तिल-भर भी समान न होने के कारण हीन बताकर छोड़ देता है। किन्तु एक बुद्धिमान विद्यार्थी जो दर्शन-ज्ञान की प्राप्ति की अभिलाषा रखता है, भारतीय विचारधारा के अन्दर एक ऐसे अद्वितीय सामग्री-समूह को ढूंढ़ निकालता है जिसका सानी सूक्ष्म विवरण एवं विधता दोनों की दृष्टि से ही संसार के किसी भी भाग में नहीं मिल सकता। संसार-भर में सम्भवतः आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि अथवा बौद्धिक दर्शन की ऐसी कोई भी ऊंचाई नहीं है कि जिसका सममूल्य पुरातन वैदिक ऋषियों और अर्वाचीन नैयायिकों के मध्यवर्ती विस्तृत ऐतिहासिक काल में न पाया जाता हो। प्रोफेसर गिलबर्ट मरे के एक अन्य प्रकरण में प्रयुक्त किए गए शब्दों में "प्राचीन भारत मूल में दुःखद होने पर भी विजयी और एक विशिष्ट उज्ज्वल प्रारम्भ है जो चाहे कितनी ही संकटपूर्ण स्थिति में क्यों न हो, संघर्ष करते-करते उच्च शिखर तक पहुंचा है।" वैदिक कवियों की निश्छल सूक्तियां, उपनिषदों की अद्भुत सांकेतिकता, बौद्धों का विलक्षण मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, और शंकर का विस्मय-विमुग्धकारी दर्शन, ये सब सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ऐसे ही अत्यन्त 'रोचक एवं शिक्षाप्रद हैं जैसेकि प्लेटो और अरस्तू अथवा कांट और हीगल के दर्शनशास्त्र हैं, यदि हम उक्त भारतीय दर्शन-ग्रन्थों का अध्ययन एक निष्पक्ष और वैज्ञानिक भाव से करें और इन्हें पुराना एवं विदेशी समझकर अपमान की दृष्टि से न देखें, इन्हें हेय समझकर इससे घृणा न करें। भारतीय दर्शन की विशिष्ट परिभाषाएं जिनका सही-सही अनुवाद भी आसानी से अंग्रेज़ी भाषा में नहीं हो सकता, स्वयं इस बात की साक्षी हैं कि इस देश का बौद्धिक विचार कितना अद्भुत है। यदि बाह्य कठिनाइयों को दूर करके उनके ऊपर उठा जाए तो हम अनुभव करेंगे कि मानवीय हृदय की धड़कन में मानवता के नाते कोई भेद नहीं, अर्थात् वह न भारतीय है और न यूरोपीय। यदि मान भी लें कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारतीय विचारधारा का कोई महत्त्व नहीं है तो भी वह ध्यान देने योग्य तो है ही, यदि और किसी दृष्टिकोण से नहीं तो कम से कम इसी विचार से कि एशिया की समस्त विचारधाराओं से भी यह भिन्न है और सब पर इसका प्रभाव भी स्पष्ट रूप से लक्षित होता है।
ठीक-ठीक क्रमबद्ध इतिहास के अभाव में किसी भी वृत्त को इतिहास का नाम दे देना अनुचित है और इतिहास शब्द का दुरुपयोग है। प्राचीन भारतीय दर्शनों का ठीक-ठीक समय निर्णय करने की समस्या मनोरंजक भी है एवं उसका समाधान भी असम्भव है और इस क्षेत्र में नाना प्रकार की कल्पनाएं की गई हैं, अद्भुत रचनाओं और साहसपूर्ण अतिशयोक्तियों को भी जन्म दिया गया है। खण्ड-खण्ड रूप में पृथक् पृथक् पड़ी सामग्री में से इतिहास का निर्माण एक और बड़ी बाधा है। ऐसी परिस्थिति में मुझे इस रचना को 'भारतीय दर्शन का इतिहास' की संज्ञा देने में हिचकिचाहट मालूम होती है।
विशेष-विशेष दर्शनों की व्याख्या करने में मैंने लेखबद्ध प्रमाणों के निकट सम्पर्क में रहने का प्रयत्न किया है, जहां कहीं सम्भव हो सका है उन अवस्थाओं का भी मैंने प्रारम्भिक सर्वेक्षण किया है जिनके अन्दर रहकर इन दर्शनों का आविर्भाव हुआ और यह कि किस हद तक ये भूतकाल के ऋणी हैं एवं विचार की प्रगति में इनकी देन क्या और किस रूप में है। मैंने केवल उक्त दर्शनों के सारभूत मूल तत्त्वों पर ही बल दिया हैं जिससे कि ब्यौरे में जाने पर भी सम्पूर्ण दर्शन का जो मुख्य आशय है वह दृष्टि से ओझल न हो जाए, और साथ ही साथ किसी सिद्धान्त-विशेष को लेकर चलने से मैंने अपने को बचाने का प्रयत्न किया है। तो भी मुझे भय है कि मेरे आशय के विषय में किसी को भ्रम न हो। इतिहासलेखक का कार्य, विशेष करके दर्शन के विषय में, बड़ा कठिन है। वह चाहे कितना ही केवल ऐतिहासिक घटनाओं को लेखबद्ध करने तक ही सीमा में रहने का प्रयत्न करे, जिससे कि इतिहास को स्वयं अपने अन्तर को खोलकर अपना आशय निरन्तरता, भूलों की समीक्षा एवं आंशिक अन्तदृष्टि को प्रकट करने का अवसर प्राप्त हो सके, तो भी लेखक का अपना निर्णय एवं सहानुभूति देर तक छिपी नहीं रह सकती। इसके अतिरिक्त भी भारतीय दर्शन के विषय में एक अन्य कठिनाई उपस्थित होती है। हमें ऐसी टीकाएं मिलती हैं जो पुरानी होने पर भी काल की दृष्टि से मूल ग्रन्थ के अधिक निकट है। इस- लिए अनुमान किया जाता है कि वे ग्रन्थ के सन्दर्भ पर अधिक प्रकाश डाल सकती हैं। किन्तु जब टीकाकार परस्पर विरोधी मत रखते हैं तब लेखक विरोधी व्याख्याओं के विषय में अपना निर्णय दिए बिना चुप भी नहीं बैठ सकता। इस प्रकार की निजी सम्मतियों को प्रकट किए बिना, जो भले ही कुछ हानिकर हों, रहा भी नहीं जा सकता। सफल व्याख्या से तात्पर्य समीक्षा और मूल्यांकन से है और मैं समझता हूं कि एक न्याय, युक्तियुक्त एवं निष्पक्ष वक्तव्य दे सकने के लिए समीक्षा से बचना आवश्यक भी नहीं है। मैं एकमात्र यह आशा करता हूं कि इस विषय पर शान्त और निष्पक्ष भाव से विचार किया जायेगा, और इस पुस्तक में और चाहे जो भी त्रुटियां रह गई हों, तथ्यों को पूर्व-निर्धारित सम्मति के अनुकूल बनाने के लिए तोड़ा-मरोड़ा नहीं गया है। मेरा लक्ष्य भारतीय मतों को बतलाने का उतना नहीं है जितना कि उनकी इस प्रकार से व्याख्या करने का है जिससे वे पश्चिमी विचार-परम्परा एवं पद्धति के साथ सामंजस्य में आ सकें। भारतीय और पश्चिमी दो विभिन्न विचारधाराओं में जिन दृष्टान्तों और समानताओं को प्रस्तुत किया गया है उनपर अधिक बल देना ठीक नहीं है, क्योंकि भारतीय दार्शनिक कल्पनाओं की उत्पत्ति शताब्दियों पूर्व हुई है, जिस समय उनकी पृष्ठभूमि में आधुनिक विज्ञान की उज्ज्वल उपलब्धियां नहीं थीं।
भारतवर्ष, एवं यूरोप और अमरीका में अनेक मेधावी विद्वानों ने भारतीय दर्शन के विशेष-विशेष भागों का बहुत सावधानी एवं सम्पूर्णता के साथ अध्ययन किया है। दार्शनिक साहित्य के कुछ विभागों की भी समीक्षात्मक दृष्टि से परीक्षा की गई है किन्तु भारतीय विचार के इतिहास को अविभक्त एवं सम्पूर्ण इकाई के रूप में प्रतिपादित करने का कोई प्रयत्न नहीं हुआ और न ही उसके सतत विकास का प्रतिपादन किया गया जिसके बिना विभिन्न विचारकों व उनके मतों को पूर्णरूप से नहीं समझा जा सकता। भारतीय दर्शन के विकास के इतिहास को उसके प्रारम्भिक अस्पष्ट इतिहास से लेकर विशद रूप में लाना एक अत्यधिक कठिन कार्य है और अकेले इस कार्य को कर सकना किसी अत्यन्त परिश्रमी व बहुश्रुत विद्वान की भी पहुंच के बाहर की बात है। इस प्रकार के सर्वमान्य भारतीय दर्शन के विश्वकोष का निर्माण करने में न केवल विशेष रुचि और पूरी लगन की अपितु व्यापक संस्कृति और प्रतिभासम्पन्न विद्वानों के परस्पर सहयोग की भी आवश्यकता है। इस पुस्तक का दावा इससे अधिक और कुछ नहीं है कि यह भारतीय विचार का एक साधारण सर्वेक्षणमात्र है एवं इसे एक विस्तारपूर्ण विषय की रूपरेखा मात्र ही कहना अधिक उपयुक्त होगा। लेकिन यह कार्य भी बिलकुल सरल नहीं है। आवश्यक विचार-विमर्श से इतिहासलेखक के ऊपर एक बड़े उत्तरदायित्व का भार आ पड़ता है जो इस दृष्टि से और भी महत्त्वपूर्ण है कि कोई एक व्यक्ति अध्ययन के इन सब विविध क्षेत्रों में विषय में अधिकारपूर्वक नहीं कह सकता और इसलिए लेखक को बाध्य होकर ऐसे प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर ही अपना निर्णय देने के लिए बाध्य होना पड़ता है जिनके मूल्य का वह स्वयं सावधानी के साथ निर्णय नहीं कर सकता। काल-निर्णय के विषय में मैंने योग्य विद्वानों के अनुसन्धानों के परिणामों पर ही लगभग पूर्णतः निर्भर किया है। मुझे इस बात का पूरा ज्ञान है कि इस विस्तृत क्षेत्र का सर्वेक्षण करने में बहुत कुछ आवश्यक विषय अछूता ही रह गया है और जिसका प्रतिपादन हुआ है वह भी साधारण रूप में ही आ सका है। यह पुस्तक किसी भी अर्थ में पूर्ण होने का दावा नहीं कर सकती। इस पुस्तक में केवल मुख्य- मुख्य परिणामों का साधारण दिग्दर्शनमात्र किया गया है जिससे कि ऐसे व्यक्तियों को जो इस विषय में सर्वथा अनभिज्ञ हैं, कुछ ज्ञान प्राप्त हो सके और जहां तक सम्भव हो कुछ हद तक उनके अन्दर इसके प्रति रुचि जागृत हो सके, जिस कार्य के लिए यह सर्वथा उपयुक्त है। यदि इस विषय में यह असफल भी रहे तो भी अन्य प्रयासों को इससे सहायता एवं प्रोत्साहन तो प्राप्त हो ही सकेगा।
प्रारम्भ में मेरी योजना दोनों खंडों को एकसाथ प्रकाशित करने की थी किन्तु प्रोफेसर जे. एस. मैकेंज़ी जैसे मेरे कृपालु मित्रों ने मुझे सुझाव दिया कि प्रथम खंड तुरन्त प्रकाशित कर देना चाहिए। चूंकि दूसरे खंड को तैयार करने में कुछ समय लगेगा और पहला खंड अपने-आपमें पूर्ण है, इसलिए इसे मैं स्वतन्त्र रूप से प्रकाशित कर रहा हूं। इस खंड में जिन मन्तव्यों को विवेचन किया गया है, उनकी विशेषता यह है कि भौतिक अस्तित्व की समस्याओं की तार्किक भावनाओं द्वारा व्याख्या करने की अपेक्षा इस विषय पर अधिक ध्यान दिया गया है कि जीवन में उनकी क्रियात्मक आवश्यकता का समर्थन किया जाये। ऐसे विषयों पर जिनका रूप पाठकों की दृष्टि में दार्शनिक की अपेक्षा धार्मिक अधिक है, विचार करने से नहीं बचा जा सकता था, क्योंकि प्राचीन भारतीय कल्पनाओं में धर्म और दर्शन का बहुत निकट सम्बन्ध रहा है। परन्तु दूसरे खंड में अधिकतर विशुद्ध दार्शनिक विषय पर ही विचार किया जायगा, क्योंकि दर्शनशास्त्रों में सैद्धान्तिक दृष्टि का स्थान मुख्यतः सदा ही ऊपर रहता है, यद्यपि ज्ञान और जीवन के परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध को भी भुलाया नहीं जा सकता।
यहां पर मुझे उन कतिपय प्राच्यविद्या-विशारदों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए हर्ष होता है जिनके ग्रन्थों से मुझे अपने अध्ययन में बहुत सहायता मिली है। उन सबके नामों का उल्लेख सम्भव नहीं है जो स्थान-स्थान पर इस पुस्तक में आएंगे। किन्तु निश्चय ही मैक्समूलर, डयूसन, कीथ, जैकोबी, गाबें, तिलक, भण्डारकर, रीज़ डेविड्स एवं श्रीमती रीज़
डेविड्स, ओल्डेनबर्ग, पूसीं, सुजुकी और सोजेन के नाम का उल्लेख आवश्यक है। कितने ही अन्य अमूल्य ग्रन्थ जो हाल में प्रकाशित हुए हैं यथा प्रोफेसर दासगुप्त का 'भारतीय दर्शन का इतिहास' और सर चार्ल्स इलियट का 'हिन्दूइज़्म ऐंड बुद्धिज़्म' मुझे बहुत विलम्ब से प्राप्त हुए, जबकि इस पुस्तक की पाण्डुलिपि पूर्ण करके प्रकाशकों के पास दिसम्बर, 1921 में भेजी जा चुकी थी। प्रत्येक अध्याय के अन्त में दी गई ग्रन्थसूची
अपने-आपमें पूर्ण नहीं है। यह केवल अंग्रेज़ी जाननेवाले पाठकों के निर्देशन के लिए है। मुझे प्रोफेसर जे० एस० मैकेंज़ी और श्री सुब्रह्मण्य अय्यर को धन्यवाद देना है जिन्होंने कृपा करके पुस्तक की पाण्डुलिपि के अधिकतर भाग को पढ़ा और प्रूफ-संशोधन भी किया। इनके मैत्रीपूर्ण सत्परामर्शों से इस पुस्तक को बहुत लाभ पहुंचा। मैं प्रोफेसर ए० बैरीडेल कीथ का अत्यन्त कृतज्ञ हूं जिन्होंने प्रूफ संशोधन किया और कई बहुमूल्य सुझाव भी दिए। मैं 'लाइब्रेरी आफ फिलासफी' के सम्पादक प्रोफेसर जे० एच० म्योरहेड का उनकी उस बहुमूल्य और उदारतापूर्ण सहायता के लिए अत्यन्त कृतज्ञ हूं जो उन्होंने इस पुस्तक की प्रेस कापी तैयार करने में तथा उससे पूर्व भी प्रदान की है। उन्होंने पुस्तक की पाण्डुलिपि पढ़ने का कष्ट किया और उनके सुझाव तथा आलोचनाएं मेरे लिए अत्यन्त सहायक सिद्ध हुई हैं। मैं (स्वर्गीय) सर आशुतोष मुकर्जी नाइट् सी० एस० आई० का भी अत्यन्त कृतज्ञ हूं, क्योंकि उन्होंने मुझे इस कार्य के लिए निरन्तर प्रोत्साहित किया और कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर विभाग में उच्चतर कार्य के लिए सब प्रकार की सुविधाएं प्रदान कीं।
नवम्बर, 1922 - राधाकृष्ण
विषय-सूची
2. भारतीय विचारधारा की सामान्य विशेषताएं
3. भारतीय दर्शन के विरुद्ध कुछ आरोप
4. भारतीय दर्शन के अध्ययन का महत्त्व
5. भारतीय विचारधारा के विभिन्न काल
2. वैदिक सूक्तों के अध्ययन का महत्त्व
3. उपनिषदों की संख्या और रचनाकाल
5. ऋग्वेद की ऋचाएं और उपनिषदें
21. उपनिषदों में सांख्य और योग के तत्त्व
जैनियों का अनेकान्तवादी यथार्थवाद
4. अन्य पद्धतियों के साथ सम्बन्ध
10. ईश्वरवाद के सम्बन्ध में जैनदर्शन का मत
प्रारम्भिक बौद्धमत का नैतिक आदर्शवाद
4. बुद्ध का जीवनवृत्त और व्यक्तित्व
11. नागसेन का आत्मविषयक सिद्धान्त
13. प्रतीत्यसमुत्पाद, या आश्रित उत्पत्ति का सिद्धान्त
17. ईश्वर के सम्बन्ध में बुद्ध के विचार
3. महाभारत का रचनाकाल और उसके रचयिता
9. महाकाव्यों का संसृतिशास्त्र
3. अन्य पद्धतियों के साथ सम्बन्ध
7. भारत में बौद्धधर्म का ह्रास
7. सत्य और यथार्थता की श्रेणियां
भारत की प्राकृतिक स्थिति-भारतीय विचारधारा की सामान्य विशेषताएं-भारतीय दर्शन के विरुद्ध कुछ आरोप- भारतीय दर्शन के अध्ययन का महत्त्व भारतीय विचारधारा के विभिन्न काल।
चिन्तनशील व्यक्तियों के विचारों के प्रस्फुटित हो सकने तथा विभिन्न कलाओं और विज्ञानों के समृद्ध हो सकने के लिए एक सुव्यवस्थित समाज का होना अत्यावश्यक है जो पर्याप्त सुरक्षा और अवकाश प्रदान कर सके। घुमक्कड़ों के समुदाय में, जहां लोगों को जीवित रहने के लिए संघर्ष करना और अभाव से पीड़ित रहना पड़ता है, किसी समृद्ध संस्कृति का पनप सकना असम्भव है। भाग्य से भारत ऐसे स्थान पर स्थित है जहां प्रकृति अपने दान में मुक्तहस्त रही है और जहां के प्राकृतिक दृश्य मनोरम हैं। एक ओर हिमालय अपनी सघन पर्वतमाला और उत्तुंगता के कारण तथा दूसरे पार्थों में लहराता हुआ सागर एक लम्बे समय तक भारत को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखने में सहायक सिद्ध हुए। उदार प्रकृति ने प्रचुर मात्रा में खाद्य-सामग्री प्रदान की और इस प्रकार यहां के निवासी कठोर परिश्रम और जीवित रहने के संघर्ष से मुक्त रहे। भारतीयों ने कभी यह अनुभव नहीं किया कि संसार एक युद्ध-क्षेत्र है जहां लोग शक्ति, सम्पत्ति और प्रभुत्व की प्राप्ति के लिए संघर्ष करते हैं। जब हमें पार्थिव जीवन की समस्याओं को हल करने, प्रकृति से अधिकाधिक लाभसाधन करने तथा संसार की शक्तियों को नियन्त्रित करने में अपनी शक्ति को व्यर्थ नहीं गंवाना पड़ता तो हम उच्चतर जीवन के विषय में, इस विषय में कि आत्मशक्ति में किस प्रकार और अधिक पूर्णता के साथ रहा जा सकता है, सोचना-विचारना आरम्भ करते हैं। संभवतः यहां के दुर्बल बनाने वाले जलवायु ने भारतीयों को विश्राम और कर्मविरति की ओर प्रवृत्त किया। विस्तृत पत्रसंकुल वृक्षावली से पूर्ण विशाल वनों ने धर्मनिष्ठ व्यक्तियों को शांतिपूर्वक विचरने की तथा अद्भुत कल्पनाओं और दिव्य आनन्द के गान में रत रहने की अत्यधिक सुविधा प्रदान की। संसार से क्लांत व्यक्ति इन प्राकृतिक दृश्यों के अवलोकनार्थ तीर्थयात्रा पर निकलते हैं, आन्तरिक शान्ति प्राप्त करते हैं, मन्द-मन्द पवन तथा निर्झरों का संगीत सुनते हैं, एवं पक्षियों और वनलता-पल्लवों के मर्मरगान से प्रमुदित होकर स्वस्थ हृदय और प्रफुल्ल मन वापस लौटते हैं। आश्रमों, तपोवनों और वानप्रस्थों की अरण्य-कुटियों में ही भारत के तत्त्वचिन्तकों ने ध्यानमग्न होकर जीवनसत्ता की गम्भीर समस्याओं पर विचार किया। सुरक्षित जीवन, प्राकृतिक साधनों की सम्पन्नता, अतिचिन्ता से मुक्ति, जीवन की जिम्मेदारियों से विरक्ति और क्रूर व्यावहारिक स्वार्थ के अभाव ने ही भारत के उच्चतर जीवन को प्रोत्साहन प्रदान किया जिसके परिणामस्वरूप हमें इतिहास के आरम्भकाल से ही भारतीय मन में आत्मज्ञान के लिए एक प्रकार की विकलता, विद्या के प्रति प्रेम और मस्तिष्क की अधिक स्वस्थ और युक्तियुक्त प्रवृत्तियों के प्रति लालसा दिखाई देती है।
प्राकृतिक स्थितियों के अनुकूल होने तथा पदार्थों के गूढ़ार्थ पर विचार करने योग्य बौद्धिक क्षेत्र उपलब्ध होने के कारण भारतीय उस सर्वनाश से बचा रहा जिसे प्लेटो ने सबसे बुरा बताया है, अर्थात् विवेक से घृणा। उसने अपने 'फीडो' नामक ग्रन्थ में लिखा है कि "आओ, हम सबसे अधिक इस बात का ध्यान रखें कि इस विपत्ति से हम ग्रस्त न हों, कि हम विवेकद्वेषी न बनें, जैसे कुछ लोग मानवद्वेषी हो जाते हैं; क्योंकि मनुष्यों के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और कोई नहीं हो सकता कि वे विवेक के शत्रु बन जाएं।" ज्ञान का आनन्द मनुष्य को उपलब्ध एक पवित्रतम आनन्द है और भारतीय मस्तिष्क में इसके लिए प्रबल लालसा की ज्याला विद्यमान है।
संसार के अन्य कितने ही देशों में जीवनसत्ता सम्बन्धी मीमांसा को एक प्रकार के विलास के समान माना जाता है। जीवनकाल के गंभीर क्षणों का उपयोग कर्म करने के लिए किया जाता है और दार्शनिक अभिनिवेश को प्रासंगिक एवं अवान्तर विषय माना जाता है। प्राचीन भारत में दर्शन का विषय किसी अन्य विज्ञान अथवा कला के साथ जुड़ा हुआ न होकर सदा ही अपने-आप में एक प्रमुख और स्वतन्त्र स्थान रखता था। किन्तु पश्चिमी देशों में अपने विकास के पूर्ण यौवनकाल में भी, जैसे प्लेटो और अरस्तु के समय में, इसे राजनीति अथवा नीतिशास्त्र जैसे किसी अन्य विषय का सहारा लेना पड़ा है। मध्यकाल में इसे परमार्थ विद्या के नाम से जाना जाता था, बेकन और न्यूटन के लिए यह प्राकृतिक विज्ञान था और उन्नीसवीं शताब्दी के विचारकों के लिए इसका गठबन्धन इतिहास, राजनीति एवं समाजशास्त्र के साथ रहा। भारत में दर्शनशास्त्र आत्मनिर्भर और स्वतन्त्र रहा है तथा अन्य सभी विषय प्रेरणा और समर्थन के लिए इसका आश्रय ढूंढ़ते हैं। भारत में यह प्रमुख विज्ञान है जो अन्य विज्ञानों के लिए मार्गदर्शक है, क्योंकि बिना तर्कज्ञान के आश्रय के वे सब खोखले और मूर्खतापूर्ण समझे जाते हैं। मुण्डकोपिनिषद् में 'ब्रह्मविद्या' (नित्य-विषयक ज्ञान) को अन्य सब विज्ञानों का आधार, सर्व-विद्या-प्रतिष्ठा कहा गया है। कौटिल्य का कथन है, "दर्शनशास्त्र (आन्वीक्षिकी-दर्शन) अन्य सब विषयों के लिए प्रदीप का कार्य करता है, यह समस्त कार्यों का साधन और समस्त कर्तव्यकर्मों का मार्गदर्शक है।"[1]
चूंकि दर्शनशास्त्र विश्व की समस्या को समझने का एक मानवीय प्रयास है इसलिए इस पर जाति और संस्कृति के प्रभावों का पड़ना निश्चित है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी विशिष्ट मनोवृत्ति होती है और उसका बौद्धिक झुकाव भी अपना विशेष होता है। इतिहास की शताब्दियों के प्रवाह और उन समस्त परिवर्तनों के बीच जिनसे भारत गुजरा है, एक विशेष एकरूपता परिलक्षित होती है। इसने कुछ मानसिक विशेषताओं को दृढ़ता से पकड़ रखा है, जो इसकी विशिष्ट परम्परा के अभिन्न अंग हैं, और ये विशेषताएं भारतीय जनों के विशिष्ट लक्षणों के रूप में तब तक विद्यमान रहेंगी जब तक भारतीयों को अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाये रखने का सौभाग्य प्राप्त रहेगा। व्यक्तित्व का अर्थ है विकास की स्वाधीनता। आवश्यक नहीं कि इसका अर्थ असमानता हो। नितान्त असमानता सम्भव नहीं, क्योंकि समस्त संसार में मनुष्य समान है; विशेषतः जहां तक आत्मा की प्रतीति का सम्बन्ध है, मानव सर्वत्र समान है। काल, इतिहास और स्वभाव के भेद से अवश्य भिन्नता लक्षित होती है। ये भेद विश्व-संस्कृति की सम्पन्नता को बढ़ाते हैं, क्योंकि दार्शनिक विकास का इससे अधिक सुगम मार्ग और कोई नहीं है। इससे पूर्व कि हम भारतीय विचारधारा के विशिष्ट स्वरूपों पर दृष्टिपात करें, कुछ शब्द भारतीय विचारधारा पर परिश्रम के प्रभाव के सम्बन्ध में भी आवश्यक हैं।
प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता है कि क्या भारतीय विचारधारा ने विदेशी सूत्रों से, यथा यूनान से, अपने विचार उधार लिए हैं और किस सीमा तक लिए हैं। भारतीय तत्त्वचिन्तकों के कुछ विचार प्राचीन यूनान में प्रतिपादित कुछ सिद्धान्तों से इतने मिलते हैं कि यदि कोई चाहे तो इनमें से किसी भी विचारधारा को सरलता से हीन सिद्ध कर सकता है।'[2] विचारों के सम्बन्धन का प्रश्न उठाना एक निरर्थक विषय के पीछे पड़ना है। निष्पक्ष दृष्टि वाले किसी व्यक्ति के लिए संतापों का होना ऐतिहासिक समानान्तरता का ही एक प्रमाण है। समान अनुभव मनुष्यों के मन में समान विचारों को जन्म देते हैं। ऐसा कोई भौतिक प्रमाण उपलब्ध नहीं जिससे कम से कम यह सिद्ध हो सके कि भारत ने अपने दार्शनिक विचार सीधे-सीधे पश्चिम से उधार लिए। भारतीय विचारधारा के हमारे इस वृतान्त से यह स्पष्ट होगा कि यह मानवीय मस्तिष्क का एक नितान्त स्वतन्त्र उपक्रम है। दार्शनिक समस्याओं पर यहां बिना किसी पश्चिमी प्रभाव अथवा सम्बन्ध के विचार-विमर्श किया गया है। पश्चिम के साथ प्रासंगिक संसर्ग होने पर भी भारत अपने आदर्श जीवन, दर्शन एवं धर्म को विकसित करने के लिए स्वतन्त्र रहा। इस प्रायद्वीप में आकर बसनेवाले आर्यों के आदिस्थान के बारे में चाहे जो भी मत ठीक हो, उनका पश्चिम अथवा उत्तर के अपने सजातियों के साथ शीघ्र ही सम्बन्ध टूट गया और उन्होंने एक निजी तथा सर्वथा स्वतन्त्र पद्धति पर अपना विकास किया। यह सत्य है कि भारत पर उत्तर-पश्चिम के दरों की ओर से आनेवाली सेनाओं ने बार- बार आक्रमण किया किन्तु उनमें से सिकन्दर के आक्रमण के सिवाय और किसी ने दो विश्वों के मध्य आध्यात्मिक संसर्ग को प्रोत्साहन नहीं दिया। केवल उसके पश्चात् के काल में ही, जब से समुद्र का मार्ग खुला है, अधिक घनिष्ठ संसर्ग को बढ़ावा मिल सका है जिसके परिणामों के विषय में अभी हम कुछ नहीं कह सकते, क्योंकि वे अभी निर्माण की अवस्था में ही हैं। इसलिए सब प्रकार के व्यावहारिक प्रयोजन के लिए हम भारतीय विचारधारा को एक परिपूर्ण दार्शनिक पद्धति अथवा विचारों के एक स्वायत्त विकास के रूप में मान सकते हैं।
भारत में दर्शनशास्त्र मूलभूत रूप से आध्यात्मिक है। भारत की प्रगाढ़ आध्यात्मिकता ने ही, न कि उसके द्वारा विकसित किसी बड़े राजनीतिक ढांचे या सामाजिक संगठन ने, इसे काल के विध्वंसकारी प्रभावों और इतिहास की दुर्घटनाओं को सहन कर सकने की सामर्थ्य प्रदान की। भारत के इतिहास में कई बार बाह्य आक्रमणों और आन्तरिक फूट ने इसकी सभ्यता और संस्कृति को नष्टप्राय करने का प्रयास किया। यूनानियों और सीथियनों ने, फारसवासियों और मुगलों ने, फ्रांसीसियों और अंग्रेज़ों ने क्रमशः इस सभ्यता को दबाने का प्रयत्न किया, और फिर भी इसने अपना मस्तक ऊंचा रखा है। भारत पूरे तौर से कभी पराजित नहीं हुआ और इसकी आत्मा की वह पुरातन लौ आज भी प्रकाशमान है। अपने अब तक के सम्पूर्ण जीवन में भारत का एक ही उद्देश्य रहा है, वह है सत्य का संस्थापन और असत्य का प्रतिकार। इसने त्रुटि भले ही की हो किन्तु इसने वही किया जिसके योग्य इसने अपने-आपको समझा और जिसकी इससे आशा की गई। भारतीय विचारधारा के इतिहास में मस्तिष्क के अन्तहीन गवेषणा के दृष्टान्त मिलेंगे, जो पुरातन होने पर भी सदा नवीन हैं।
भारतीय जीवन में आध्यात्मिक प्रयोजन का स्थान सदा ही सर्वोपरि रहता है। भारतीय दर्शन की रुचि मानव-समुदाय में है, किसी काल्पनिक एकान्त में नहीं। इसका उद्भव जीवन में से होता है और विभिन्न शाखाओं और सम्प्रदायों में से होकर यह पुनः जीवन में ही प्रवेश करता है। भारतीय दर्शन की महान रचनाओं का वह आधिकारिक या प्रामाणिक स्वरूप नहीं है जो परवर्ती समीक्षाओं और टीकाओं की एक प्रमुख विशेषता है। गीता और उपनिषदें जनसाधारण के धार्मिक विश्वास की पहुंच के बाहर नहीं हैं। ये ग्रन्थ इस देश के महान् साहित्य के अंग हैं और साथ ही बड़ी-बड़ी दार्शनिक विचार-धाराओं के माध्यम भी हैं। पुराणों में कथाओं और कल्पनाओं के रूप में सत्य छिपा हुआ है जिससे कि न्यूनबोध जनता के बड़े वर्ग का भी उपकार हो सके। बहुसंख्यक जनता की रुचि को तत्त्वमीमांसा की ओर प्रवृत्त करने का जो दुष्कर कार्य है उसमें भारत ने सफलता प्राप्त की है।
दर्शनशास्त्र के संस्थापकों ने देश के सामाजिक-आध्यात्मिक सुधार का प्रयास किया है। जब भारतीय सभ्यता को ब्राह्मण-सभ्यता कहा जाता है तो इसका तात्पर्य केवल यह है कि इसका मुख्य स्वरूप एवं इसके प्रधान लक्ष्यों का निरूपण दार्शनिक विचारकों और धार्मिक आचार्यों के द्वारा हुआ है, यद्यपि इनमें से सभी का जन्म ब्राह्मण-कुल में नहीं हुआ। प्लेटो के इस विचार को कि दार्शनिकों को समाज का शासक और निदेशक होना चाहिए, भारत में ही क्रियात्मक रूप दिया गया है। यहां यह माना गया है कि परम सत्य आध्यात्मिक सत्य ही है और उन्हीं के प्रकाश में जीवन का संस्कार किया जाना चाहिए।
भारत में धर्म-सम्बन्धी हठधर्मिता नहीं है। यहां धर्म एक युक्तियुक्त संश्लेषण है जो दर्शन की प्रगति के साथ-साथ अपने अन्दर नये-नये विचारों का संग्रह करता रहता है। अपने-आप में इसकी प्रकृति परीक्षणात्मक और अनन्तिम है, और यह वैचारिक प्रगति के साथ कदम मिलाकर चलने का प्रयास करता है। यह सामान्य आलोचना कि भारतीय विचार बुद्धि पर बल देने के कारण दर्शनशास्त्र को धर्म का स्थान देता है, भारत में धर्म के युक्तियुक्त स्वरूप का समर्थन करती है। इस देश में कोई भी धार्मिक आन्दोलन ऐसा नहीं हुआ जिसने अपने समर्थन में दार्शनिक विषय का विकास भी साथ-साथ न किया हो। हैवल का कहना है : "भारत में धर्म को रूढ़ि या हठधर्मिता का स्वरूप प्राप्त नहीं है, वरन् यह मानवीय व्यवहार की ऐसी क्रियात्मक परिकल्पना है जो आध्यात्मिक विकास की विभिन्न स्थितियों में और जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में अपने-आपको अनुकूल बना लेती है।"[3] जब भी धर्म ने एक जड़ मतवाद का रूप धारण करने की प्रवृत्ति दिखाई तो अनेक आध्यात्मिक पुनरुत्थान और दार्शनिक प्रतिक्रियाएं उत्पन्न हुई और उपलब्ध विश्वास कसौटी पर कसे गए, असत्य का खण्डन कर सत्य की संस्थापना की गई। हम बराबर देखेंगे कि जब- जब परम्परागत विश्वास, काल-परिवर्तन के कारण, अपर्याप्त ही नहीं झूठ सिद्ध होते हैं और युग उनसे ऊब जाता है तो बुद्ध या महावीर, व्यास या शंकर जैसे युगपुरुष की चेतना आध्यात्मिक जीवन की गहराइयों में हलचल उत्पन्न करती हुई जन-मानस पर छा जाती है। भारतीय विचारधारा के इतिहास में निस्संदेह ये बड़े महत्त्वपूर्ण क्षण रहे हैं, आन्तरिक कसौटी और अन्तर्दृष्टि के क्षण, जबकि आत्मा की पुकार पर मनुष्य का मन एक नये युग में पग रखता है और एक नए साहसिक कार्य पर चल पड़ता है। दर्शन के सत्य और जनसाधारण के दैनिक जीवन का घनिष्ठ सम्बन्ध ही धर्म को सदा सजीव और वास्तविक बनाता है।
धर्मविषयक समस्याओं से दार्शनिक भावना को उत्तेजना मिलती है। भारतीय मस्तिष्क प्राचीन परम्परा से ही सर्वोपरि परब्रह्म, जीवन के उद्देश्य और मनुष्य का विश्वात्मा के साथ सम्बन्ध आदि प्रश्नों के समाधान में परिश्रमपूर्वक लगा रहा है। भारत में यद्यपि दर्शनशास्त्र ने साधारणतया अपने को धार्मिक परिकल्पना के आकर्षण से अछूता नहीं रखा तो भी दार्शनिक विचार-विमर्श की प्रगति में धार्मिक रीतियों एवं क्रियाकलाप ने कोई बाधा नहीं डाली। दोनों का परस्पर संविलयन कभी नहीं हुआ। आगम और व्यवहार के बीच, सिद्धान्त और वास्तविक जीवन के बीच, घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण कोई दर्शन जो जीवन की कसौटी पर खरा न उतर सकता, उपयोगितावाद की दृष्टि से नहीं, वरन् अपने विस्तृत अर्थों में, कभी भी जीवित नहीं रह सकता था। उन लोगों के लिए जो जीवन और आगम के मध्यं वास्तविक नाते का महत्त्व पहचानते हैं, दर्शन जीवन की एक पद्धति या उसका अंग, आत्म-साक्षात्कार का एक साधन, बन जाता है। यहां कोई भी दार्शनिक शिक्षा ऐसी नहीं थी, यहां तक कि सांख्य की भी नहीं, जो केवल एक मौखिक शब्द या सम्प्रदायगत रूढ़ि-मात्र रह गई हो। प्रत्येक सिद्धान्त को एक ऐसी ओजस्वी श्रद्धा के रूप में जीवन में परिवर्तित कर दिया गया जिसने मनुष्य के हृदय को उद्वेलित किया और उसे चैतन्य से परिपूर्ण कर दिया।
यह कहना असत्य है कि भारत में दर्शनज्ञान कभी भी प्रबुद्ध और आत्मचेतन अथवा विवेचनात्मक नहीं रहा। यहां तक कि प्रारम्भिक अवस्थाओं में भी तार्किक चिंतन की प्रवृत्ति धार्मिक विश्वास में सुधार की ओर रही है। धर्म के उस विकास को देखिए जिसका संकेत वेदमन्त्रों से लेकर उपनिषदों तक हुई प्रगति में मिलता है। जब हम बौद्धधर्म के समीप पहुंचते हैं तो ज्ञात होता है कि दार्शनिक भावना ने पहले से ही एक विश्वासपूर्ण मानसिक वृत्ति का रूप धारण कर लिया है, जो बुद्धि से सम्बन्ध रखने वाले विषयों में किसी बाह्य प्रमाण के आगे नहीं झुकती और जो अपने उद्यम की किसी सीमा को भी तब तक स्वीकार नहीं करती जब तक कि यह तर्कसम्मत न जंचे, क्योंकि तर्क हर वस्तु के अन्तस्तल में प्रवेश करता है, हर चीज़ की परख करता है और जहां तक युक्ति एवं प्रमाण मार्ग दिखा सकते हैं, निर्भयता- पूर्वक आगे बढ़ता है। जब हम विभिन्न दर्शनों अथवा विचार की विभिन्न पद्धतियों तक पहुंचते हैं तो हमें क्रमबद्ध विचार के प्रति विशाल और आग्रहपूर्ण प्रयत्नों का प्रमाण मिलता है। यह दर्शन किस प्रकार परम्परागत धार्मिक विश्वासों और पक्षपातों से सर्वथा मुक्त हैं, यह इससे स्पष्ट हो जाता है कि सांख्य दर्शन ईश्वर की सत्ता के विषय में मौन है, हालांकि उसकी सैद्धान्तिक प्रमाणातीतता के विषय में वह आश्वस्त है। वैशेषिक और योग दर्शन एक परब्रह्म की सत्ता को तो स्वीकार करते हैं, किन्तु उसे विश्व का कर्ता नहीं मानते और जैमिनी ईश्वर का उल्लेख तो करते हैं, किन्तु उसे विधाता एवं संसार का नैतिक शासक मानने से इनकार करने के लिए ही। प्रारम्भिक बौद्ध दर्शनों को ईश्वर के प्रति उदासीन माना जाता है और हमारे यहां भौतिकवादी चार्वाक भी मिलते हैं जो ईश्वर के अस्तित्व का निषेध करते हैं, पुराहितों का उपहास करते हैं, वेदों की भर्त्सना करते हैं तथा सांसारिक सुख में ही मुक्ति की खोज करते हैं।
जीवन में धर्म और सामाजिक परम्परा की श्रेष्ठता दार्शनिक ज्ञान के मुक्त अनुसरण में बाधक नहीं होती। यह एक अद्भुत विरोधाभास है, किन्तु फिर भी एक प्रकट सत्य है, क्योंकि जहां एक ओर किसी व्यक्ति का सामाजिक जीवन जन्मगत जाति की कठिन रूढ़ि से जकड़ा हुआ है वहां उसे अपना मत स्थिर करने में पूरी स्वतन्त्रता प्राप्त है। प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी सम्प्रदाय में जन्मा हो, तर्क द्वारा उस सम्प्रदाय की समीक्षा कर सकता है। यही कारण है कि भारतभूमि में विधर्मी या धर्म-भ्रष्ट, संशयवादी, नास्तिक, हेतुवादी एवं स्वर्तन्त्र विचारक, भौतिकवादी एवं आनन्दवादी- सभी फलते-फूलते रहे हैं। महाभारत में कहा है: "ऐसा कोई मुनि नहीं जो अपनी भिन्न सम्मति न रखता हो।"
यह सब भारतीय मस्तिष्क की प्रबल बौद्धिकता का प्रमाण है जो मानवीय कार्य- कलाप के समस्त पक्षों के आभ्यन्तर सत्य एवं नियम को जानने के लिए प्रयत्नशील है। यह बौद्धिक प्रेरणा केवल दर्शनशास्त्र और ब्रह्मविद्या तक ही सीमित नहीं है, बल्कि तर्क-शास्त्र और व्याकरणशास्त्र में, अंलकारशास्त्र और भाषाविज्ञान में, आयुर्विज्ञान और ज्योतिषशास्त्र में-वस्तुतः स्थापत्यकला से लेकर प्राणिविज्ञान तक समस्त ललित कलाओं और विज्ञानों में व्याप्त है। इस देश में प्रत्येक वस्तु जो जीवन के लिए उपयोगी है अथवा मस्तिष्क के लिए रुचिकर है, जांच-पड़ताल एवं समीक्षा का विषय बन जाती है। यहां का बौद्धिक जीवन कितना व्यापक और पूर्ण रहा है इसका आभास इस तथ्य से मिल सकता है कि यहां अश्वपालन-विद्या एवं हाथियों को प्रशिक्षित करने की विद्या जैसे छोटे-छोटे विषयों तक के अपने-अपने शास्त्र और साहित्य रहे हैं।
वास्तविक सत्ता के स्वरूप-निर्णय के दार्शनिक प्रयास का समारम्भ या तो विचारक (प्रमाता) आत्मा से या विचार के विषय (प्रमेय) पदार्थों से हो सकता है। भारत में दर्शन की रुचि मनुष्य की आत्मा में है। जब दृष्टि बाहर की ओर होती है तो निरन्तर बदलती हुई घटनाओं का प्रवाह ध्यान आकृष्ट कर लेता है। इसके विपरीत भारत में 'आत्मानं विद्धि', अर्थात् अपनी आत्मा को पहचानो, इस एक सिद्धान्त में समस्त धार्मिक आदेश और युगपुरुषों की शिक्षाएं समाविष्ट हैं। मनुष्य के अपने अन्दर वह आत्मा है जो प्रत्येक वस्तु का केन्द्र है। मनोविज्ञान और नीतिशास्त्र आधारभूत विज्ञान हैं। भौतिक मन के जीवन का चित्रण उसकी समस्त गतिशील विविधताओं तथा उज्ज्वलता और कालिमा के सूक्ष्म संयोजन के साथ हुआ है। भारतीय मनोविज्ञान ने एकाग्रता के महत्त्व को समझा है और उसे सत्य के प्रत्यक्ष ज्ञान के साधन के रूप में माना है। उसका विश्वास रहा है कि जीवन या मन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां इच्छा-शक्ति एवं ज्ञान के विधिवत् प्रशिक्षण द्वारा नहीं पहुंचा जा सकता। उसने मन और शरीर के घनिष्ठ सम्बन्ध को पहचाना था। आत्मिक या मानसिक अनुभव, यथा मनःपर्यय और अतीन्द्रिय दृष्टि आदि, न तो असामान्य और न ही चमत्कारक समझे जाते हैं। यह विकृत मन अथवा दैवीय प्रेरणा से उत्पन्न शक्तियां नहीं, बल्कि ऐसी शक्तियां हैं जिन्हें मानवीय मानस सावधानीपूर्वक अभिनिश्चित परिस्थितियों में प्रकट कर सकता है। मनुष्य के मन के तीन रूप हैं-अवचेतन, चेतन व अतिचेतन; और 'असामान्य' मानसिक चमत्कार-जिन्हें भावोन्माद (परमानन्द या समाधि), प्रतिभा, ईश्वरीय प्रेरणा, विक्षिप्तावस्था आदि भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है-अतिचेतन मन की क्रियाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। योगदर्शन विशेषकर ऐसे ही अनुभवों से सम्बन्धित है, यद्यपि अन्य दर्शन-प्रणालियां भी उनका उल्लेख करती हैं और अपने प्रयोजन के लिए उनका उपयोग भी करती हैं।
मानसविज्ञान द्वारा प्रस्तुत आधार-सामग्री ही अध्यात्मविद्याओं का आधार है। इस आलोचना को सारहीन नहीं कहा जा सकता कि पाश्चात्य अध्यात्मविद्या एक-पक्षीय है, क्योंकि इसका ध्यान केवल जागरितावस्था तक ही सीमित है। चेतना की अन्य अवस्थाएं भी हैं जिन पर जागरितावस्था की भांति ही विचार करना आवश्यक है। भारतीय विचारधारा जागरितावस्था, स्वप्नावस्था और सुषुप्ति (स्वप्नरहित निद्रा) पर ध्यान देती है। यदि हम केवल जागरितावस्था को ही सब कुछ मान लें तो हमें अध्यात्मविद्या की यथार्थवादी, द्वैतपरक तथा बहुत्ववादी संकल्पनाएं ही प्राप्त होती हैं। जब हम केवल स्वप्नचेतना का पृथक् रूप से अध्ययन करते हैं तो हमें आत्मवादी या विषयिविज्ञानवादी सिद्धान्तों की ही प्राप्ति होती है। सुषुप्ति या स्वप्नरहित प्रगाढ़ निद्रा की अवस्था हमें अमूर्त और रहस्यपूर्ण सिद्धान्तों की ओर उन्मुख करती है। सम्पूर्ण सत्य की प्राप्ति के लिए चेतना की समस्त अवस्थाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।
आत्मपरकता के विषय में विशेष रुचि रखने का तात्पर्य यह नहीं है कि भौतिक विज्ञानों के विषय में भारत ने कुछ नहीं किया। यदि हम भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त की गई सफलताओं की ओर दृष्टिपात करें तो हमें मालूम होगा कि स्थिति इससे ठीक विपरीत है। प्राचीन भारतीयों ने गणितविद्या एवं यन्त्रविद्या की नींव डाली थी। उन्होंने भूमि का माप किया, वर्ष के विभाग किए, आकाश के नक्शे तैयार किए, सूर्य एवं अन्यान्य ग्रहों के, राशि- मण्डलीय परिधि के अन्दर घूमने के मार्ग का परिशीलन किया, प्रकृति की रचना का विश्लेषण किया एवं प्राकृतिक पक्षियों, पशुओं, पेड़-पौधों और बीजों आदि तक का अध्ययन किया।[4]' "ज्योतिषशास्त्र-सम्बन्धी उन विचारों का, जो संसार में प्रचलित हैं, आदिस्रोत क्या था, इस विषय में हम चाहे जो भी परिणाम निकालें, यह सर्वथा सम्भव है कि बीजगणित का आविष्कार हिन्दुओं ने किया और उसका प्रयोग ज्योतिष शास्त्र एवं ज्यामिति में भी हुआ। अरबवासियों ने भी बीजगणितं के विश्लेषक विचारों को और उन अमूल्य अंक-सम्बन्धी चिह्नों और दशमलव के विचारों को, जिनका आज यूरोप में सर्वत्र प्रचलन है और जिनके कारण गणितविद्या ने अद्भुत उन्नति की है, भारतवासियों से ग्रहण किया।"[5] "चांद और सूरज की गतियों का भी हिन्दुओं ने बहुत सूक्ष्म अध्ययन किया था और यहां तक इस विषय में उन्नति की थी कि उनके द्वारा निर्धारित चन्द्रमा की ग्रहों अथवा तारों के समुच्चय-सचेत परिक्रमा का अंकन यूनानियों द्वारा निर्धारित गति से कहीं अधिक पूर्ण और सही था। उन्होंने क्रान्तिवृत्त को 27 एवं 28 भागों में विभक्त किया था, जिसका सुझाव उन्हें चन्द्रमा की दैनिक अवधि से और प्रतीत होता है कि स्वयं उनकी अपनी आकृतियों से भी मिला था। भारतीय ज्योतिषी मुख्य ग्रहों में से जो सबसे अधिक उज्ज्वल ग्रह हैं उनसे भी विशेषरूप से अभिज्ञ थे। बृहस्पति का परिक्रमणकाल सूर्य एवं चन्द्रमा के परिक्रमणकाल के साथ-साथ उनके वर्ष में नियमित होकर 60 वर्ष के कालचक्र में उनके और बेबिलन के भविष्यवक्ता ज्योतिषियों में एक समान है।"[6] यह अब सर्वसम्मत विषय है कि हिन्दुओं ने बहुत प्राचीन समय में दोनों विज्ञानों अर्थात् तर्कशास्त्र एवं व्याकरण को जन्म दिया एवं उनका विकास किया।[7] विल्सन लिखता है: "चिकित्सा विज्ञान में भी ज्योतिष और अध्यात्मविद्या की भांति ही एक समय हिन्दू लोग संसार के सबसे अधिक प्रबुद्ध राष्ट्रों के साथ-साथ चलते थे। और उन्होंने आयुर्वेद और शल्य-चिकित्सा में इसी प्रकार पूर्ण दक्षता प्राप्त की थी जैसी कि उन अन्य देशों ने की थी जिनकी खोज के परिणाम आज हमारे सामने हैं, और वह इससे बहुत पूर्व के समय में व्यवहार में भी आती थी जबकि आधुनिक खोज करनेवालों ने शरीर-विज्ञान का परिचय हमें दिया।'[8] यह सत्य है कि उन्होंने चिकित्सा-सम्बन्धी बड़े-बड़े यन्त्रों का आविष्कार नहीं किया, इसका कारण यह है कि दयालु ईश्वर ने इस देश के निवासियों को बड़ी-बड़ी नदियां और भोजन के लिए प्रचुर मात्रा में अनाज दे रखा था। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि ये यांत्रिक आविष्कार अन्ततः उस सोलहवीं शताब्दी एवं उसके बाद की उपज हैं जिस समय तक भारत अपनी स्वाधीनता खोकर पराश्रयी बन चुका था। जिस दिन से इसने अपनी स्वतन्त्रता खोई और पराये देशों से झूठा प्रेम का नाता बांधना प्रारंभ किया, इसे एक प्रकार के शाप ने ग्रस लिया और यह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। उससे पूर्व तक इसमें गणितविद्या, ज्योतिष, रसायनशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, शल्यचिकित्सा और अन्यान्य भौतिक विज्ञान के उन विभागों के अलावा जो प्राचीन समय में उपयोग में आते थे, कलाओं, दस्तकारी और उद्योगों के मामले में भी अपनापन रखने की क्षमता थी। इस देश के वासी पत्थरों को तराशना, तस्वीरें बनाना, सोने पर पालिश करके उसे चमकाना, और कीमती कपड़े बुनना जानते थे। उन्होंने उन सब प्रकार की कलाओं, ललित एवं औद्योगिक कलाओं का विकास किया, जिनसे सभ्य जीवन की परिस्थितियां प्राप्त होती हैं। उनके जहाज़ समुद्र पार करते थे और उनकी धन-सम्पदा अपने देश से बाहर भी जूडिया, मिस्र और रोम तक अपना वैभव दिखाती थी। उनके विचार मनुष्य और समाज, सदाचार एवं धर्म के विषय में उस युग के लिए अद्वितीय माने जाते थे। यह कहना अयुक्तियुक्त होगा कि भारतीय अपनी कविताओं और पौराणिक कल्पनाओं में ही मस्त रहते थे और उन्होंने विज्ञान एवं दर्शन को त्याज्य समझा, यद्यपि यह सत्य है कि उनका झुकाव अधिकतर वस्तुओं के एकत्व की ओर रहा और वे चालाकी, धूर्तता अथवा विघटन पर ज़ोर नहीं देते थे।
यदि इस प्रकार का भेद करना अनुचित न समझा जाय तो हम कहेंगे कि कल्प- नात्मक मस्तिष्क अधिकतर संश्लेषणप्रिय होता है जबकि वैज्ञानिक मस्तिष्क अधिकतर विश्लेषणात्मक पाया जाता है। पहले प्रकार के मस्तिष्क का झुकाव ब्रह्मांड-सम्बन्धी दर्शन की रचना की ओर होता है, जो एक व्यापक दृष्टिकोण से सब वस्तुओं के निकास, युगों के इतिहास एवं जगत् के विघटन एवं विनाश की व्याख्या करता है। दूसरे प्रकार का मस्तिष्क संसार के जड़ एवं अंशव्यापी भागों पर ही केन्द्रित रहता है और इस प्रकार एकत्व एवं पूर्णता के विचार से वंचित रहता है। भारतीय विचारक अस्तित्व के सम्बन्ध में विस्तृत और अभौतिक विचारों पर बल देते हैं और इसलिए आलोचक आसानी से भारतीय विचारकों पर अधिकतर आदर्शवादी, ध्यानमग्न, स्वप्नदर्शी, कल्पनाविहारी और संसार में अजनबी होने का दोषारोपण कर सकता है, जबकि पश्चिमी विचारक अधिकतर विशिष्टतावादी एवं उपयोगितावादी हैं। पश्चिमी विचारक, जिन्हें हम इन्द्रिय कहते हैं उन पर निर्भर करता है जबकि भारतीय कल्पना के क्षेत्र में आत्मज्ञान के ऊपर बल देता है। यहां पर एक बार फिर हमें यही कहना होता है कि ये भारत की अनुकूल प्राकृतिक स्थितियां ही हैं जिनके कारण भारतीयों की प्रवृत्ति कल्पनापरक रही, क्योंकि उनके पास संसार की सुन्दर वस्तुओं का आनन्द लेने के लिए और अपनी आत्मिक संपत्ति को कविता, कहानी, संगीत, नृत्य, कर्मकाण्ड और धर्म के रूप में प्रकट करने के लिए पर्याप्त अवकाश था, क्योंकि बाह्य जगत् के प्रलोभन उनका ध्यान बंटाने को नहीं थे। 'विचारमग्न पूर्व' का नाम जो प्रायः उपहास के रूप में हमारे देश को दिया जाता है वह बिलकुल निराधार नहीं है।
यह भारत का संश्लेषणात्मक दृष्टिकोण ही है जिससे यहां के दार्शनिक ज्ञान के अन्तर्गत अनेक विज्ञान समवेत हैं जोकि आधुनिक समय में अलग-अलग रूप में आ गए हैं। पश्चिम में पिछले लगभग सौ वर्ष के समय में ज्ञान की अनेक शाखाएं हो गई, जोकि उससे पूर्व दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, नीतिशास्त्र, मनोविज्ञान एवं शिक्षा-शास्त्र आदि एक-एक करके इनसे कट-कटकर पृथक् होती चली गईं। प्लेटो के समय में दर्शनशास्त्र के अन्दर ये सब विज्ञान सम्मिलित थे जो मानव-प्रकृति से सम्बद्ध हैं और जो मानव-हितों के अन्तस्तल का निर्माण करते हैं। इसी प्रकार प्राचीन धर्मशास्त्रों में हमें दार्शनिक क्षेत्र का पूरा सार सन्निविष्ट मिलता है। उसके पश्चात् आधुनिक काल में पश्चिमी देशों में दर्शनशास्त्र एक प्रकार से अध्यात्मविद्या, अर्थात् ज्ञान-सम्बन्धी गूढ़ विवादों, सत्ता और उसके मूल्यांकन का पर्यायवाची हो गया और यह आपत्ति की जाती है कि अध्यात्मविद्या बिलकुल कल्पनात्मक हो गई है, जिसका सम्बन्ध मनुष्य-प्रकृति के कल्पनात्मक एवं क्रियात्मक दोनों पक्षों से सर्वथा पृथक हो गया है।
यदि हम भारतीय मस्तिष्क की आत्मनिष्ठ रुचि को इसके संश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ रखकर विचार करें तो हम इस परिणाम तक पहुंचते हैं कि अद्वैतपरक बाह्य शून्यवाद ही वास्तविक तथ्य है। वैदिक विचार का सम्पूर्ण विकास इसी की ओर निर्देश करता है। इसी पर बौद्ध एवं ब्राह्मण धर्म आश्रित हैं। यह वह परम सत्य है जिसका आविष्कार भारत में हुआ। यहां तक कि वे दर्शन-पद्धतियां भी, जो अपने को द्वैतवादी अथवा अनेकवादी घोषित करती हैं, प्रबल रूप में अद्वैत स्वरूप से आच्छादित प्रतीत होती है। यदि हम भिन्न-भिन्न मतों का सारत्तत्त्व निकालकर सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो प्रतीत होगा कि सामान्य रूप में भारतीय विचारधारा की स्वाभाविक प्रवृत्ति जीवन एवं प्रकृति की अद्वैतपरक बाह्य शून्यवादी व्याख्या की ओर ही है। यद्यपि यह झुकाव इतना लचीला, सजीव और भिन्न प्रकार का है कि इसके कई विविध रूप हो गए हैं और यहां तक कि यह परस्पर विरोधी उपदेशों के रूप में परिणत हो गया है। हम यहां पर संक्षेप में उन मुख्य मुख्य स्वरूपों की ओर ही निर्देश करेंगे जो भारतीय विचारधारा में अद्वैत-सम्बन्धी बाह्य शून्यवाद ने अंगीकार किए, और उनके ब्यौरेवार विकास एवं समीक्षात्मक मूल्यांकन को छोड़ देंगे। इससे हम भारत में दर्शनशास्त्र से क्या तात्पर्य लिया जाता है इसे एवं इसके स्वरूप और क्रिया को ठीक-ठीक ग्रहण कर सकेंगे। अपनी कार्यसिद्धि के लिए अद्वैतपरक बाह्य शून्यवाद के चार विभाग करना ही पर्याप्त है; यथा (1) अद्वैतवाद (अर्थात् सिवाय ब्रह्म के दूसरी सत्ता नहीं), (2) विशुद्धाद्वैत, (3) विशिष्टाद्वैत और (4) अव्यक्त (उपलक्षित) अद्वैतवाद ।
दर्शनशास्त्र साक्षात् अनुभव-सम्बन्धी घटनाओं को लेकर चलता है। तार्किक आलोचना यह निश्चय करने के लिए आवश्यक है कि एक विशेष व्यक्ति द्वारा जानी गई घटनाएं सब व्यक्तियों को स्वीकार हैं या नहीं, अथवा केवल अपने स्वरूप में ही आत्म-निष्ठ हैं। सिद्धान्तों को उसी अवस्था में स्वीकार किया जा सकता है जब वे घटनाओं की सन्तोषजनक व्याख्या कर सकें। हम पहले कह चुके हैं कि मानसिक एवं चेतना-सम्बन्धी घटनाओं का अध्ययन भारतीय विचारकों ने उतनी ही सावधानी और एकाग्रता के साथ किया है जितना कि आधुनिक वैज्ञानिक बाह्य जगत की घटनाओं का अध्ययन करते हैं। अद्वैतपरक बाह्य शून्यवाद के परिणाम भी मनोवैज्ञानिक सूक्ष्म अन्वेक्षणों के आधार पर स्थित हैं।
आत्मा की चेष्टाएं तीन अवस्थाओं में, यया जागृति, स्वप्न, और सुषुप्ति में घटित होती हैं। स्वप्नावस्थाओं में एक वास्तविक ठोस जगत् हमारे आगे प्रस्तुत किया जाता है, हम उसे वास्तविक जगत् इसलिए नहीं मानते, क्योंकि जागने पर हमें प्रतीत होता है कि स्वप्नावस्था का जगत् जागरितावस्था के जगत् के अनुकूल नहीं है, तो भी अपेक्षया स्वप्नावस्था के विचार से स्वप्न-जगत् वास्तविक है। यह विभिन्नता हमारे जागरित जीवन के मान्य मानदण्ड के कारण है न कि एक सत्य के विकल्पशून्य ज्ञान के अपने कारण, जो हमें यह बतलाती हो कि स्वप्नावस्थाएं जागरितावस्थाओं से कम वास्तविक हैं। वस्तुतः जागरित अवस्था की यथार्थसत्ता भी तो स्वयं अपेक्षाकृत ही है। इसकी कोई स्थिर सत्ता नहीं, क्योंकि केवल जागरित अवस्था से ही इनका सम्बन्ध है। स्वप्नावस्था में और निद्रितावस्था में यह विलुप्त हो जाती है। जागरित चेतना एवं जागरित अवस्था के जगत् का वैसा ही पारस्परिक सम्बन्ध है जैसा कि स्वप्नचेतना का और स्वप्न में प्रकट हुए जगत् का। ये दोनों परम सत्य नहीं हैं, क्योंकि शंकर के शब्दों में जबकि "स्वप्नावस्था के जगत का प्रतिदिन प्रत्याख्यान हो जाता है, जागरितावस्था के जगत् का भी प्रत्याख्यान विशेष-विशेष परिस्थितियों में हो जाता है।" स्वप्नरहित प्रगाढ़ निद्रा (सुषुप्ति) में ऐन्द्रिय चेतना का एकदम अभाव हो जाता है। कई भारतीय विचारकों का मत है कि इस अवस्था में एक प्रकार की उद्देश्य-रहित चेतना रहती है। हर हालत में इतना तो स्पष्ट है कि स्वप्न-रहित प्रगाढ़ निद्रा एकदम अभावात्मक नहीं है, क्योंकि ऐसी कल्पना का विरोध स्वयं निद्रा की सुखमय विश्रान्तिपरक भावना-सम्बन्धी परवत्र्ती स्मृति से हो जाता है। इस बात को बिना स्वीकार किए हम नहीं रह सकते कि आत्मा निरन्तर विद्यमान रहती है, यद्यपि सब प्रकार के अनुभवजन्य ज्ञान से यह उस अवस्था में विरहित होती है। जब निद्रा प्रगाढ़ रहती है तब किसी पदार्थ का बोध नहीं होता और न हो ही सकता है। उस अवस्था में विशुद्ध आत्मा विचारों के उन अवशिष्ट एवं प्रक्षिप्त अंशों से सर्वथा अछूती होती है, जो विशेष-विशेष मनोवृत्तियों के साथ उदय होते एवं विनष्ट होते रहते हैं। "भिन्न एवं परिवर्तित होने वाले पदार्थों के बीच जो न भिन्न होता है, न ही परिवर्तित होता है, यह अवश्य उन पदार्थों से पृथक् है ।''[9] आत्मा, जो निरन्तर अपरिणामी रूप में विद्यमान रहती है और समस्त परिवर्तनों के बीच एक समान है, उन सबसे पृथक् है। अवस्थाएं बदलती हैं, आत्मा में परिवर्तन नहीं होता। "समस्त अन्तरहित मासों, वर्षों और छोटे एवं बड़े युगों में, भूतकाल एवं भविष्य में यह स्वतः ज्योतिष्मान चेतना ही एक सत्ता है जो न कभी उदय होती है और न ही अस्त होती है।"[10] जहां देश और काल अपने समस्त विषयों के साथ विलुप्त हो जाते हैं वहां एक प्रतिबन्धरहित यथार्थ सत्ता ही वास्तविक भासित होती है। यह आत्मा ही है जो स्वयं निर्लिप्त रहकर जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाओं की परिवर्तनशील मनोवृत्तियों से प्रभावित विचारों के नाटक की एकमात्र साक्षी एवं दर्शक के रूप में बराबर विद्यमान रहती है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्दर ऐसी एक सत्ता है जो सुख-दुःख, गुण-अवगुण और पुण्य-पाप से परे है। "आत्मा न कभी मरती है न जन्म लेती है-अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन यह शरीर के नाश के साथ कभी नष्ट नहीं होती। यदि मारने वाला समझता है कि वह इस आत्मा को मार सकता है अथवा मृत मनुष्य यह समझता है कि वह मारा गया तो वे दोनों सत्य से अनभिज्ञ हैं, क्योंकि यह न तो मारती है न मर सकती है।"[11]
सदा एकरस रहने वाली आत्मा के अतिरिक्त हमारे आगे इन्द्रियानुभूति के विविध पदार्थ हैं। जीवात्मा नित्य एवं स्थायी है, अविभाज्य एवं अच्छेद्य है जबकि बाह्य पदार्थ अनित्य और सदा परिवर्तनशील हैं। जीवात्मा परम सत्य है, क्योंकि सब पदार्थों से स्वतन्त्र एवं पृथक् है किन्तु पदार्थ मनोवृत्तियों के साथ परिवर्तित होते रहते हैं।
हम संसार की व्याख्या कैसे करें? विविध प्रकार के इन्द्रियानुभव देश, काल और कारण से बद्ध हमारे सामने हैं। यदि आत्मा एक है, व्यापक है, अटल निर्विकार एवं निर्विकल्प है, तो हमें जगत् में परस्पर विरोधी स्वरूपों का विस्तृत समूह भी मिलता है। हम इसे केवल अनात्म और प्रमाता के अतिरिक्त प्रमेय पदार्थों का समूह ही कह सकते हैं। किसी भी अवस्था में यह यथार्थ नहीं है। जगत् की मुख्य मुख्य श्रेणियां-काल, देश, और कारण सब आत्मविरोधी हैं। ये अपने निर्माणकर्त्ता अवयवों के ऊपर आश्रित अन्योन्याश्रित परिभाषाएं हैं। इनकी यथार्थ सत्ता नहीं है। किन्तु ये असत् भी नहीं हैं। जगत् विद्यमान है, हम इसके अन्दर और इसके द्वारा सब काम करते हैं। हम इस जगत् के अस्तित्व के कारण और प्रयोजन, अर्थात् 'कैसे' और 'क्यों', को नहीं जान सकते। 'माया' शब्द से तात्पर्य जगत् की इस अज्ञेयता से ही है। यह प्रश्न कि परम-आत्मा का इन्द्रियानुभूति के निरन्तर प्रवाह के साथ क्या सम्बन्ध है और यह क्यों और कैसे होता है, तथा यह प्रश्न कि दो वस्तुएं सत् हैं, इन सबका तात्पर्य है कि हम यह धारणा कर लेते हैं कि हर विषय में क्यों और कैसे का प्रश्न उठता है। इस मत के आधार पर यह कहना कि अनन्त ने सान्त का रूप धारण कर लिया है अथवा अनन्त ब्रह्म अपने को मूर्तरूप में प्रकट करता है, सर्वथा बेकार की बात है। अनन्त की अभिव्यक्ति कभी सास्त द्वारा नहीं हो सकती, क्योंकि जिस क्षण भी अनन्त सान्त के द्वारा अभिव्यक्ति प्रवृत्त होगा, स्वयं उसकी अनन्तता नष्ट हो जाएगी और वह सान्त हो जाएगा। यह कहना कि इन्द्रियातीत परम सत्ता में हास और पतन होने के कारण वह इन्द्रियानुभूति का विषय हो जाती है, अपने आपमें उसके परमत्व का विरोधी हो जाएगा। पूर्ण सत्ता में हास नहीं हो सकता। पूर्ण प्रकाश के अन्दर अन्धकार का निवास नहीं हो सकता। हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि परब्रह्म, जो परिवर्तन से परे है, परिवर्तित होकर सान्त (मूर्तरूप) हो सकता है। परिवर्तन का तात्पर्य है अभिलाषा अथवा किसी वस्तु का अभाव अनुभव करना और यह पूर्णता के अभाव का द्योतक है। परब्रह्म कभी इन्द्रियज्ञान का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि जो जाना जाता है वह सान्त और सापेक्ष होता है। हमारा सान्त मन काल, देश और कारण की परिधि से परे नहीं जा सकता और न हम इनकी व्याख्या ही कर सकते हैं, क्योंकि व्याख्या करने के प्रयत्न का ही तात्पर्य होगा कि हम इन्हें अंगीकार कर लेते हैं। विचार के द्वारा, जोकि स्वयं सापेक्ष जगत् का एक भाग है, हम परम ब्रह्म को नहीं जान सकते। हमारा सापेक्ष ज्ञान जागरित अवस्था का एक प्रकार का स्वप्न-मात्र है। विज्ञान और तर्क इसके अंश भी हैं और इनके कार्य भी। अध्यात्मविद्या की सफलता के ऊपर न तो खेद प्रकट करना चाहिए और न ही उसका उपहास करना चाहिए, न प्रशंसा ही करनी चाहिए और न दोष ही देना चाहिए; बल्कि उस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। बौद्धिक क्षमता से उत्पन्न स्वाभाविक नम्रता के साथ प्लेटो अथवा नागार्जुन, कांट अथवा शंकर घोषणा करते हैं कि हमारी बुद्धि केवल सापेक्ष का विचार करती है और निरपेक्ष परब्रह्म इसकी पहुंच से बाहर है।
यद्यपि परम सत्ता का ज्ञान तर्कशास्त्र की विधि से नहीं हो सकता तो भी वे सब जो सत्य को जानने के लिए प्रयत्नशील हैं, उस सत्ता का अनुभव करके जान जाते हैं कि उसी सत्ता के अन्दर हम सब जीवन बिताते हैं व समस्त कर्म करते हैं और उसी सत्ता से हम संत्ता धारण किए हुए हैं। केवल इसके द्वारा अन्य सब कुछ जाना जा सकता है। यह समस्त ज्ञान का नित्य साक्षी स्वरूप है। अद्वैतवादी तर्क करता है कि उसका सिद्धान्त सत्य घटनाओं के तर्क पर आश्रित है। आत्मा अत्यन्त आभ्यन्तर और गहनतम सत्ता है जिसे सब अनुभव करते हैं, क्योंकि यह ज्ञान एवं अज्ञात पदार्थों की भी आत्मा है और उसे जानने वाला उसके स्वयं के अतिरिक्त और कोई नहीं है। यह सत्य है और नित्य है और इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इन्द्रियानुभूतिजन्य ज्ञान के श्रेणी-विभाजन के विषय में अद्वैतवादी का कहना है कि वे वह हैं किन्तु वही उनका अन्त भी है। हम क्यों का जवाब जानते भी नहीं और जान सकते भी नहीं। यह सब एक प्रकार की प्रतिकूलता है, किन्तु है वास्तविक। अद्वैतवाद की उक्त दार्शनिक स्थिति गौड़पाद और शंकर ने अंगीकार की है।
ऐसे भी वेदान्ती हैं. जो इस मत से सन्तुष्ट नहीं है और अनुभव करते हैं कि अपनी उलझन को माया के नाम से ढकना उचित नहीं है। वे उस पूर्ण सत्ता के जो सब प्रकार के निषेधात्मक अभाव से रहित है, स्वयं निर्विकार एवं यथार्थ है, और जिसका अनुभव ज्ञान की गहराइयों में होता है-तथा इस परिवर्तनशील, एवं सृज्यमान जगत् के बीच के सम्बन्ध की अधिक निश्चयात्मक व्याख्या करते हैं। उस एकमात्र सत्ता की पूर्णता की रक्षा के लिए हमें बाध्य होकर कहना पड़ता है कि यह सृष्टि बाहर से किसी अवयव के जुड़ने से निर्मित नहीं हुई है, क्योंकि इसके बाहर अथवा इसके अतिरिक्त कोई वस्तु है ही नहीं। यह केवल एक हास के कारण ही सम्भव है। इस सृष्टि-रूपी परिवर्तन के लिए प्लेटो के असत् अथवा अरस्तू की प्रकृति जैसे किसी अभावात्मक तत्त्व की कल्पना कर ली जाती है। इस अभावात्मक तत्त्व की क्रिया के द्वारा क्रियाशील अनेक के मध्य में निर्विकार सत्ता का विस्तार हो गया आभासित होता है, जैसे सूर्य के अन्दर किरणें आती हैं किन्तु सूर्य उन्हें धारण नहीं करता। माया नाम उसी अभावात्मक तत्त्व का है जो सर्वव्यापक सत्ता को उच्छृंखल कर देता है, जिससे अनन्त उत्तेजना और निरन्तर रहनेवाली अशान्ति का जन्म होता है। विश्व का प्रवाह उसी निर्विकार की प्रतीयमान अवनति के कारण सम्भव होता है। सृष्टि में जो कुछ भावनात्मक गुण है वह सब उसी यथार्थ सत्ता के कारण है। जगत् के पदार्थ अपनी वास्तविक सत्ता को पुनः प्राप्त करने, अपने अन्दर के अभाव को पूरा करने एवं अपने व्यक्तित्व को उतार फेंकने के लिए सर्वदा संघर्ष करते हैं, किन्तु उनके इस प्रयत्न में उनका आन्तरिक अभाव, अर्थात् निषेधात्मक माया बराबर बाधा उपस्थित करती है जोकि उस मध्यवर्तीकाल से निर्मित है, जो वह हैं और जो उन्हें होना चाहिए। यदि हम माया से छुटकारा पा सकें, द्वैत की प्रवृत्ति को दबा सकें, उस अन्दर को नष्ट कर सकें, उस न्यूनता को भर सकें और बाधाओं को शिथिल कर सकें, तो देश, काल और परिवर्तन विशुद्ध सत्ता में वापस पहुंच जाते हैं। जब तक मूलभूत माया की कमी विद्यमान रहती है, पदार्थ भी एक दूषण के रूप में देश, काल एवं कारणरूप जगत् में वर्तमान रहेंगे। माया को मानव ने नहीं बनाया। यह हमारी बुद्धि से पूर्व विद्यमान थी और उससे स्वतन्त्र भी है। यथार्थ में यह वस्तुओं की, एवं बुद्धियों की भी, उत्पादक है एवं सारे संसार में अत्यधिक क्षमता रखती है। इसे कभी-कभी प्रकृति भी कहा जाता है। उत्पत्ति और विनाश का बारी-बारी से होना और निरन्तर दुहराए जानेवाले विश्व के विकासचक्न इस मौलिक न्यूनता को दर्शाते हैं जिसके कारण संसार का अस्तित्व है। सृष्टि की रचना सत्ता का अवरोध-मात्र है। माया यथार्थ सत्ता की प्रतिच्छाया-मात्र है। संसार की गति निर्विकार सत्ता का रूपान्तर न होकर एक प्रकार से उसका विपर्यास है। तो भी मायामय जगत् विशुद्ध सत्ता से पृथक् विद्यमान नहीं रह सकता। अगर निर्विकारिता न हो तो कोई गति भी नहीं हो सकती, क्योंकि गति निर्विकार की केवल एक प्रकार की अवनति ही है। अचल सत्ता ही व्यापक गति का सत्य है।
जिस प्रकार सृष्टि सत्ता के हास का नाम है, इसी प्रकार अविद्या अथवा अज्ञान विद्या अथवा ज्ञान की अवनति का नाम है। सत्यज्ञान के लिए एवं यथार्थता का साक्षात्कार करने के लिए हमें अविद्या एवं उससे उत्पन्न आवरणों से भी छुटकारा पाना होगा, और जैसे ही हम उनके अन्दर यथार्थता को बलपूर्वक प्रविष्ट करेंगे, सभी स्वतः ही छिन्न-भिन्न होकर टूट जाएंगे। विचार की मन्दता के लिए यह कोई बहाना नहीं है। इस मत के अनुसार दर्शनशास्त्र तर्क के रूप में हमें प्रेरणा प्रदान करता है कि हम बौद्धिक धारणाओं का उपयोग करना छोड़ दें, क्योंकि वे हमारी क्रियात्मक आवश्यकताओं की सापेक्ष हैं और इस भौतिक सृष्टि से सम्बद्ध हैं। दर्शनशास्त्र हमें बतलाता है कि जब तक हम बुद्धि के अधीन रहेंगे और इस अनेकत्वपूर्ण जगत् में खोए रहेंगे, तब तक उस विशुद्ध सत्ता के समीप वापस पहुंचने के लिए हमारी सारी खोज असफल रहेगी। यदि हम कारण का पता लगाने के लिए पूछें कि यह अविद्या अथवा माया क्यों है, जो हमें विद्या (ज्ञान) एवं विशुद्ध सत्ता से दूर घसीटती है, तो इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सकता। इस स्थान पर दर्शनशास्त्र के पास तर्क के रूप में यह निषेधात्मक कार्य रह जाता है कि वह बौद्धिक वर्ग की अपर्याप्तता को प्रकट में स्वीकार करके निर्देश करे कि किस प्रकार संसार के पदार्थ मन की वृत्ति के ऊपर निर्भर करते हैं जो उनका विचार करता है, किन्तु जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। यह हमें उस निर्विकार सत्ता के. विषय में कुछ निश्चित ज्ञान नहीं दे सकता जिसके विषय में कहा जाता है कि उसकी पृथक् सत्ता है। जो कुछ संसार में हो रहा है उसके माध्यम से वह न तो उस माया के विषय में ही कुछ निश्चित ज्ञान दे सकता है जिसके कारण संसार की उत्पत्ति हुई। यह प्रत्यक्ष रूप से उस विशुद्ध यथार्थ सत्ता की प्राप्ति में हमें सहायता नहीं दे सकता। इसके विपरीत यह हमें बतलाता है कि यथार्थ सत्ता का सही-सही माप करने के लिए हमें मिथ्या कथन करना पड़ेगा। सम्भवतः एक बार निश्चित ज्ञान प्राप्त हो जाने से सत्य के हित में इसका उपयोग हो सकेगा। हम इस पर विचार कर सकते हैं, तर्क द्वारा इसकी रक्षा भी कर सकते हैं और इसका प्रचार करने में सहायक भी बन सकते हैं। विशुद्धाद्वैत के समर्थक अमूर्त बुद्धि से भी ऊंची एक शक्ति को मानते हैं, जिससे हम यथार्थता की प्रेरणा को अनुभव करने के योग्य होते हैं। हमें व्यापक चेतना में अपने-आपको विलीन करना होगा और उसी के समान व्यापक होने के योग्य बनना होगा। उस समय हमें उस सत्ता के विषय में सोचने की अपेक्षा अपने को उसके समान बनाने का प्रयत्न करना है, उसके ज्ञान के भाव की अपेक्षा वैसा बन जाना है। इस प्रकार का नितान्त अद्वैतवाद तर्क, अन्तर्दृष्टि, यथार्थ सत्ता और व्यवस्थित जगत् के भेद के साथ हमें कतिपय उपनिषदों में, नागार्जुन और शंकर के अतिदार्शनिक मनोभावों में, श्रीहर्ष और अन्यान्य अद्वैत वेदान्तियों में मिलता है और इसकी प्रतिध्वनि परमेनिड्स और प्लेटो, स्पिनोज़ा एवं प्लॉटिनस, ब्रेडले और वर्गसां में भी सुनाई पड़ती है-पश्चिम के रहस्यवादियों में तो मिलती ही है।'[12]
अन्तर्दृष्टि के विचार में यथार्थ सत्ता विशुद्ध एवं सहज अथवा जैसी भी हो, बुद्धि के विचार में तो यह एक न्यूनाधिक परम अमूर्तरूप सत्ता है। जिस समय प्रत्येक घटना व आकृति का विलोप हो जाता है, तब भी इसका निरन्तर अस्तित्व अक्षुण्ण रहता है। जबकि समस्त जगत् अमूर्तरूप में परिणत हो जाता है तब भी यह सत्ता अवशिष्ट रहती है। यदि मनुष्य समुद्र, पृथ्वी, सूर्य और नक्षत्रों, देश और काल, मनुष्य एवं ईश्वर आदि के विषय में विचार करना बन्द कर दे तो यह मानसिक विचार के ऊपर एक जबरदस्त प्रतिबन्ध होगा, किन्तु जब समस्त विश्व के अभाव के चिन्तन का प्रयत्न किया जाता है और सब प्रकार की सत्ता को भी मिथ्या समझ लिया जाता है तब मनुष्य के पास और क्या कुछ बाकी बचता है? विचार के लिए, जो सीमित और सापेक्ष है, यह एक अत्यन्त निराशा का विषय है कि जब प्रत्येक सत्तावान पदार्थ का लोप हो जाता है तब उसके लिए कोई विषय शेष नहीं रह जाता। धारणात्मक मन के लिए अन्तर्दृष्टि द्वारा मुख्य साध्य विषय 'केवल ब्रह्म ही सत् है' का तात्पर्य स्पष्ट है, अर्थात् उनके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। विचार, जैसा कि हेगल ने कहा है, केवल सविकन्य सत्ताओं एवं ठोस पदार्थों के सम्बन्ध में ही कार्य कर सकता है। इसके लिए प्रत्येक स्वीकृति से निषेध का संकेत होता है और प्रत्येक निषेध से स्वीकृति का। हर एक ठोस वस्तु रचित है जिसमें सत् और असत्, वास्तविक और अभावात्मक एक साथ जुड़े हुए हैं। इस प्रकार वे विचारक जिन्हें अन्तर्दृष्टि द्वारा सिद्ध सत्ता से सन्तोष नहीं होता और जो ऐसे संश्लेषण की अभिलाषा रखते हैं जिसकी उपलब्धि विचार द्वारा हो सके-क्योंकि इसकी स्वाभाविक प्रेरणा ठोस पदार्थ के प्रति होती है-विषयाश्रित प्रत्ययवाद की ओर आकृष्ट होते हैं। ऐसे अखंड प्रत्ययवादी विचारक विशुद्ध सत्ता एवं प्रतीयमान सृष्टि के दोनों प्रत्ययों को एक साथ जोड़कर ईश्वर के अस्तित्व-रूपी एकत्र संक्षेपण को उपस्थित करते हैं। घोर अद्वैतवादी भी यह स्वीकार करते हैं कि सृष्टि-रचना एक विशुद्ध यथार्थ सत्ता के ऊपर निर्भर करती है, यद्यपि इसके विपरीत कि सृष्टि के कारण उसके कर्ता-रूपी यथार्थ सत्ता की सिद्धि होती है। अब हमारे सामने एक प्रकार का विश्लेषित परम ब्रह्म है-अर्थात्, ऐसा ईश्वर जिसके अपने अन्दर सम्भावित सृष्टि की रूपरेखा है और जो अपने स्वरूप में कुल सत्ता के सारतत्त्व एवं सृष्टि के भी तत्त्व को संयुक्त रूप में, एवं एकता और अनेकता को अनन्तता और सान्तता को भी सम्मिलित रूप में संजोए हुए है। विशुद्ध सत्ता अब प्रमाता का रूप धारण कर लेती है, उसी समय अपने को विषय-रूप में भी परिणत करती हुई विषय को अपने अन्दर धारण कर लेती है। प्रमेय, विपक्षता और संकलन, हेगल की परिभाषा के अनुसार निरन्तर चक्रगति से चलते रहते हैं। हेगल ने ठीक ही कहा है कि ठोस जगत् की अवस्थाएं प्रमाता भी हैं और प्रमेय भी हैं। ये दोनों प्रतिपक्ष प्रत्येक ठोस में एकत्र और सम्मिश्रित हैं। महान ईश्वर स्वयं अपने अन्दर दो परस्पर विपरीत स्वरूपों को धारण करता है जहां कि एक दूसरे के द्वारा नहीं, किन्तु वस्तुतः दूसरा (विभिन्न) ही है। जब इस प्रकार का सक्रिय ईश्वर सदा के लिए परिवर्तनशील चक्र में बंधा हुआ वर्णित किया जाता है तब सत्ता की सब श्रेणियां देवी पूर्णता से लेकर निकृष्ट धूलिपर्यन्त स्वतः ही सामने आ जाती हैं। ईश्वर की स्वीकृति के साथ-साथ सत्ता और अभाव के मध्य की सब श्रेणियां भी स्वतः स्वीकृति में आ जाती हैं। हमारे सामने अब एक विचारमय विश्व है, जिसकी रचना विचारशक्ति से हुई, जो विचारश्रृंखला के अनुकूल है और विचारशक्ति द्वारा ही स्थित है, जिसकी अवस्थाएं ज्ञाता और ज्ञेय हैं। देश, काल और कारण प्रमातृनिष्ठ आकृतियां नहीं हैं अपितु विचार-बुद्धि के व्यापक तत्त्व हैं। यदि विशुद्ध अद्वैत के आधार पर हम अभेद और भेद के परस्पर सम्बन्ध को नहीं समझ सकते तो यहां हम उससे उत्तम आधार पर हैं। एक ही तादात्म्यरूप संसार भिन्न-भिन्न टुकड़ों में बंटा हुआ दिखाई पड़ता है। इनमें से कोई भी दूसरे से जुदा नहीं है। ईश्वर आन्तरिक भित्ति है, जो तादात्म्य का आधार है। जगत् उसकी बाह्य अभिव्यक्ति है, जिसे आत्मचेतना का बाह्यीकरण नाम दिया जा सकता है।
विशुद्ध अद्वैत के मत में इस प्रकार का ईश्वर परम ब्रह्म का हासरूप है, इसे केवल सूक्ष्मतम भेद से उस परम ब्रह्म से पृथक् समझा जाता है। यह भेद अविद्याकृत है जो विद्या से अत्यन्त सूक्ष्म, चिन्तन-योग्य दूरी के कारण पृथक् है। दूसरे शब्दों में, 'यह ईश्वर हमारी उच्चतम बुद्धि का उच्चतम प्रस्तुत पदार्थ है।' दुःख का विषय यह है कि अन्ततोगत्वा यह है एक पदार्थ ही और हमारी बुद्धि भी, चाहे जितना ही विद्या के समीप पहुंचती हो, विद्या- (ज्ञान) रूप नहीं है। यह ईश्वर अपने में अधिक से अधिक सद्भाव और कम से कम त्रुटि धारण किए हुए है, जो है त्रुटि (न्यूनता) ही। माया का पहला ही सम्पर्क, जो न्यून से न्यून परमार्थसत्ता का हास है, इसे देश और काल के बन्धन में डालने के लिए पर्याप्त है; यद्यपि यह देश और यह काल सम्भव रूप में अधिक से अधिक विस्ताराभाव एवं नित्यता के समीप होगा। परमार्थसत्ता सृष्टिकर्ता ईश्वर के रूप में परिवर्तित हो गई, जो किसी देश में अवस्थित है, अपने स्थान के बिना हिले-डुले अन्दर ही अन्दर सब पदार्थों को गति दे रहा है। परमार्थसत्ता ही पदार्थ के रूप में ईश्वर है, कहीं कुछ है, एक आत्मा है जो सब पदार्थों में अस्तित्व को धकेलती है। वह सत्-असत् है, ब्रह्म-माया है, प्रमाता-प्रमेय और नित्यशक्ति है, अरस्तु के शब्दों में स्वयं अचल किन्तु सबको गति देने वाला, हेगल का परम ब्रह्म, रामानुज का परम (किन्तु सापेक्ष) विशिष्ट अद्वैत है-वह सर्वशक्तिमान एवं विश्व का अन्तिम कारण है। सृष्टि का आदि नहीं एवं अन्त भी नहीं है, क्योंकि ईश्वर के शक्तिसम्पन्न होने का कभी आरम्भ या कभी अन्त नहीं हो सकता। सदा कर्मशील होना इसका अनिवार्य स्वरूप है।
इसमें सन्देह नहीं कि यह ऊंचे से ऊंचा विचार है, जिसे बुद्धि सोच सकती है। यदि हम अपनी बुद्धि की प्राकृतिक गति का, जो सांसारिक पदार्थों में एकत्व स्थापित करने का प्रयत्न करती है और परस्पर विरोधी शक्तियों में भी संश्लेषण उत्पन्न करती है, अन्त तक अनुसरण करें तो हमें एक ऐसा व्याख्या-सिद्धान्त मिलता है, जो न तो विशुद्ध सत् है न विशुद्ध असत् ही, किन्तु एक ऐसा पदार्थ है जो दोनों को जोड़ता है। सब वस्तुओं को एक सम्पूर्ण में संकलित करने के द्वारा उक्त विचार का निर्माण हुआ है। इस दृष्टिकोण से दर्शनशास्त्र का स्वरूप रचनात्मक प्रतीत होता है, और इसलिए वह स्वभाव से निश्चयात्मक और अपने कार्य में संश्लेषणात्मक है। यहां पर तार्किक विचार, जिनका कार्यक्षेत्र अमूर्त भावों में ही है, हमें ठोस से परे रखते हैं जबकि अमूर्त उन्हीं ठोस पदार्थों में निवास करते हैं, गति करते हैं और अपना अस्तित्व रखते हैं। विचार-बुद्धि युक्ति के रूप में तार्किक विचार की कठिनाइयों से ऊपर उठ जाती है। संसार के इन्द्रियानुभवों से चलकर हम ऊपर परम तत्त्व ब्रह्म तक पहुंच जाते हैं और इस प्रकार प्राप्त हुए पूर्ण के विचार से हम नीचे ब्यौरे तक उत्तरकर भिन्न-भिन्न अवयवों का ज्ञान करते हैं। समस्त तर्कशास्त्र-सम्बन्धी रूढ़िवाद, जिसे विचार की शक्ति के ऊपर भरोसा है, जगत् के इस प्रत्यय के साथ समाप्त हो जाता है। कठिनाई तब उत्पन्न होती है जब हम विचार-बुद्धि की परमता में सन्देह प्रकट करते हैं। क्या हमारा ज्ञान मानसिक आवश्यकताओं की अपेक्षा नहीं रखता, जो संयुक्त भी करता है और भेद भी करता है? सम्भवतः एक भिन्न आकृति के मन के लिए ज्ञान भी जो प्रतीत होता है उससे भिन्न प्रकार का हो। हमारा वर्तमान ज्ञान हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि समस्त ज्ञान इसी प्रकार का होगा, परन्तु जब ऐसे समीक्षक हैं जो ऐसे कथन का विरोध करते हैं तब स्थिति की रक्षा करना कठिन होता है। यह स्वीकार करते हुए कि यथार्थ सत्ता की धारणामयी योजना जो विचार में आई है वह सत्य है तो भी कई बार इस बात पर बल दिया जाता है कि विचार यथार्थ सत्ता के साथ तादात्म्य नहीं रखता। समस्त प्रत्ययों को एकत्र करके एक बना देने पर भी हम प्रत्ययों के आगे नहीं बढ़ने पाते। सम्बन्ध मन का एक अंश है जो सम्बन्ध स्थापित करता है। अनन्तरूपी परम मन भी एक मन ही है और उसी ढांचे का है, जिस ढांचे का मानवीय मन है। विशिष्टाद्वैत का सिद्धान्त कुछ उपनिषदों और भगवद्गीता ने तथा बौद्धमत एवं रामानुज मत के कुछ अनुयायियों ने स्वीकार किया है किन्तु बादरायण ने नहीं किया। पश्चिम में अरस्तू और हेगल इसके समर्थकों में माने जा सकते हैं।
प्रथम मत के अनुसार पूर्ण सत्ता ही यथार्थ है। अयथार्थ सृष्टि वास्तविक है यद्यपि हम नहीं जानते कि क्यों है। दूसरे मत के अनुसार दृश्यमान सृष्टि, देश और काल के सम्बन्ध से जिसका कारण विशुद्ध आत्मा का मायाजन्म हास है, आभास-मात्र है। और तीसरे मत के अनुसार उच्चतम पदार्थ जो हमारे सामने है, विशुद्ध सत्ता और असत् का ईश्वर के अन्दर संश्लेषण है। हमें तुरन्त एक तार्किक आवश्यकता के कारण यथार्थ सत्ता की निर्विकल्प ज्ञान की सब श्रेणियों को अंगीकार करना पड़ता है। जहां तक कि ज्ञान-विषयक जगत् का सम्बन्ध है, यदि विशुद्ध सत्ता के प्रत्यय को निरर्थक कहकर अस्वीकार कर दिया जाए और हम एक कर्ता के रूप में ईश्वर के विचार को भी अतर्क-संगत कहकर त्याग दें, तब जो शेष रह जाता है वह इससे अधिक और कुछ नहीं कि सृष्टि का यह प्रवाह ऐसा है जो सर्वथा अपने से भिन्न कुछ बनने के लिए उच्च अभिलाषा रखता रहता है। परिणाम में बौद्धमत का ही मुख्य सिद्धान्त आ जाता है। विद्यमान जगत् में विशिष्टाद्वैत की कल्पना के आधार पर निर्विकल्प सत्ता की श्रेणियों के विशेष स्वरूपों का माप उनको अखण्ड सत्ता से पृथक् करने वाले अन्तरों से ही किया जा सकता है। उन सबमें सामान्य व्यापक स्वरूप हैं देश और काल-सम्बन्धी सत्ताएं। अधिक गम्भीरता से ध्यान देने पर हमें विशेष गुणों का स्वरूप स्पष्ट हो सकता है। चिन्तनशील यथार्थ सत्ताओं और जड़ पदार्थों में भेद स्वीकार कर लेने पर हम माध्वाचार्य के द्वैतदर्शन पर पहुंच जाते हैं। यदि हम सत्पदार्थों को ईश्वर के अधीन परतन्त्र मानतें हैं, क्योंकि ईश्वर ही एकमात्र स्वतन्त्र है, तो मौलिक रूप में यह भी एक अद्वैत ही है। यदि विचारशील प्राणियों पर बल दें तो हमारे सामने सांख्य का अनेकात्मवाद आ जाता है, केवल ईश्वर की सत्ता का प्रश्न न उठाएं जिसकी सांख्य के अपने शब्दों में सिद्धि नहीं हो सकती । इसके साथ सांसारिक पदार्थों के बहुत्व को जोड़ दिया जाए तो हमारे सामने अनेकत्वयुक्त यथार्थ सत्ता आ जाती है जहां कि ईश्वर भी एक सत्ता के रूप में प्रकट होता है, भले ही वह अन्य पदार्थों के मध्य में कितना ही महान और शक्तिशाली क्यों न हो। यथार्थ सत्ता की निर्विकल्प श्रेणियों के सम्बन्ध में विवाद उपस्थित होने पर व्यक्तित्व की इकाई का आधार दार्शनिक की भावना के ऊपर निर्भर करता प्रतीत होता है। और कोई दर्शन-पद्धति नास्तिकता अथवा आस्तिकता का रूप धारण करती है यह इसके ऊपर निर्भर है कि वह परम सत्ता के ऊपर कितना ध्यान देती है, जिस परम सत्ता के आश्रय में ही इस समस्त विश्व का नाटक खेला जाता है। यह कभी-कभी तो ज्वलन्त रूप में अपने प्रकाश को ईश्वर के अन्दर केन्द्रित करके प्रकाशित हो जाता है और अन्य समयों में धीमा पड़ जाता है। ये भिन्न-भिन्न मार्ग हैं जिनमें मानव-मस्तिष्क अपनी विशिष्ट गुणयुक्त रचनाओं के कारण संसार की समस्याओं की प्रतिक्रिया में उलझा रहता है।
भारतीय विचारधारा में जहां हमें मानव और ईश्वर के बीच निष्कपट संगति मिलती है, वहां दूसरी ओर पश्चिम में दोनों में परस्पर विरोध स्पष्ट रूप में लक्षित होता है। पश्चिमी देशों की पौराणिक आख्यायिकाएं भी इसी प्रकार का निर्देश करती हैं। आदर्शभूत पुरुष प्रोमिथियस का पौराणिक उपाख्यान, जो मनुष्य-जाति की सहायता करने का प्रयत्न करता है और मनुष्य- जाति-मात्र को नष्ट करनेवाले जीयस से रक्षा करता है एवं नई प्रकार की उत्तम उपजातियाँ प्रदान करता है; हरकुलीज़ के घोर परिश्रम की कहानी, जो संसार को दुःख से मुक्त कराने का प्रयत्न करता है; ईसा को मनुष्य का बेटा मानने का विचार;- ये सब इस बात की ओर निर्देश करते हैं कि पश्चिमी देशों में मनुष्य के ऊपर ही अधिक ध्यान दिया गया है। यह सत्य है कि ईसा को ईश्वर का बेटा भी बतलाया गया है, सबसे बड़ा बेटा, जिसके बलिदान का विधान न्यायकारी ईश्वर का क्रोध शान्त करने के लिए बतलाया गया है। हमारा लक्ष्य यहां यह है कि पश्चिमी संस्कृति की मुख्य प्रवृत्ति मनुष्य और ईश्वर के मध्य विरोध की ओर अधिक है। उस संस्कृति में मनुष्य ईश्वर की शक्ति का मुकाबला करता है, मनुष्यु-जाति के हितों के लिए उसके पास से आग चुराता है। भारत में मनुष्य ईश्वर द्वारा निर्मित वस्तु है। समस्त विश्व ईश्वर के तप के कारण है। पुरुषसूक्त में एक ऐसे निरन्तर क्रियमाण यज्ञ का वर्णन है जो मनुष्य एवं जगत् को धारण करता है।'[13] इसी के अन्दर समस्त विश्व चित्रित है, जो एकमात्र अतुलनीय विस्तार और महानता से युक्त है, जिसमें एक वही सत्ता जीवन फूंकती है और जो अपने अन्दर जीवन की सब अवस्थाओं के सारतत्त्व को धारण किए हुए है।
भारतीय विचारधारा का सर्वोपरि स्वरूप, जिसने इसकी समग्र संस्कृति को ओतप्रोत कर रखा है और जिसने इसके संब चिन्तकों को एक विशेष प्रकार का ढांचा प्रदान किया है, इसकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति है। आध्यात्मिक अनुभव भारत के सम्पन्न सांस्कृतिक इतिहास की आधारभित्ति है। 'यह रहस्यवाद है; इन अर्थों में नहीं कि इसमें कोई अलौकिक शक्ति वर्तमान है किन्तु केवल मनुष्य-प्रकृति के नियन्त्रणपरक के रूप में जिससे आध्यात्मिक ज्ञान का साक्षात्कार होता है। जहां यहूदियों और ईसाइयों के पवित्र ग्रन्थ अधिकतर धार्मिक और नीतिपरक हैं, वहां हिन्दुओं के ग्रन्थ अधिकतर आध्यात्मिक और ध्यानपरक हैं। भारत में जीवन का एक मात्र ध्येय ब्रह्म के नित्य सत्ता-स्वरूप को जानना है।
समस्त दर्शनशास्त्र की परम धारणा है कि कोई भी पदार्थ, जो यथार्थ सत् है, स्वतः विरोधी नहीं हो सकता। विचारधारा के इतिहास में इस धारणा के महत्त्व को समझने और ज्ञानपूर्वक उसका उपयोग करने के लिए कुछ समय अवश्य चाहिए। ऋग्वेद में साधारण ज्ञान की प्रामाणिकता की आकस्मित स्वीकृति पाई जाती है। जब हम उपनिषदों की विकासावधि पर पहुंचते हैं, तार्किक समस्याएं प्रादुर्भूत होकर ज्ञान के मार्ग में कठिनाइयां उपस्थित कर देती हैं। उन कठिनाइयों के अन्दर ज्ञान की मर्यादाएं निर्दिष्ट करके अन्तरर्दृष्टि के लिए उचित स्थान की व्यवस्था कर दी गई है। किन्तु यह सब अर्धदार्शनिक विधि के रूप में है। जब तर्क की शक्ति में विश्वास उठने लगा तब संशयवाद ने सिर उठाया और भौतिकवादी लोकायत एवं शून्यवादी दार्शनिक क्षेत्र में उतर आए। उपनिषदों की व्यवस्था को स्वीकार करते हुए कि अदृश्यमान सत्ता को तार्किक बुद्धि द्वारा नहीं जाना जा सकता, बौद्धमत ने जगत् की अवास्तविकता पर ज़ोर दिया। इस सिद्धान्त के प्रति वस्तुओं के स्वभाव का विरोध है और अनुभूत जगत् में विरोधी तत्त्वों के परस्पर खिंचाव के अतिरिक्त और कुछ है भी नहीं। वस्तुसत्ता के अतिरिक्त और कुछ है, इसे हम नहीं जान सकते। और चूंकि यह स्वतः-विरोधी है इसलिए यह यथार्थ नहीं हो सकता। बौद्धमत के विकास का अन्त इसी परिणाम के साथ होता है। नागार्जुन के सिद्धान्त में उपनिषदों की मुख्य व्यवस्था का दार्शनिक दृष्टि से समर्थन किया गया है। वास्तविक सत्ता का अस्तित्व है, यद्यपि हम उसे नहीं जान सकते और जो कुछ हम जानते हैं वास्तविक नहीं है, क्योंकि जगत् की बुद्धिगम्य पद्धति के रूप में की गई प्रत्येक व्याख्या भंग हो जाती है। इस सबने तर्क की आत्मचेतन समीक्षा के लिए मार्ग तैयार किया। विचार अपने आप में परस्पर विरोधी एवं अपर्याप्त है। मतभेद उत्पन्न होते हैं, जबकि प्रश्न किया जाता है कि ठीक-ठीक यथार्थता को ग्रहण करने की दृष्टि के यह अयोग्य क्यों है। क्या इसलिए कि यह भिन्न-भिन्न भागों का प्रतिपादन करता है, पूर्ण रूप को नहीं लेता, अथवा क्या इसलिए है कि इसकी रचना ही ऐसी है कि यह अक्षम है अथवा यह अन्तर्निहित स्वतः-विरोधिता के कारण है? जैसाकि हम देख चुके हैं, ऐसे व्यक्ति भी हैं जिनके मत में वास्तविक सत्ता तर्कगम्य है, किन्तु वास्तविक सत्ता ही स्वयं मात्र बुद्धि नहीं है। इस प्रकार से विचार सम्पूर्ण सत्ता का ज्ञान कराने में असमर्थ है। ब्रैडले के शब्दों में 'वह' 'क्या' से ऊपर है। विचार हमें वास्तविक सत्ता का ज्ञान कराता है किन्तु वह केवल ज्ञान-मात्र है, स्वयं वस्तुसत्ता नहीं है। दूसरी ओर ऐसे भी व्यक्ति हैं, जिनका विश्वास है कि वास्तविक सत्ता स्वतःसंगत है और जो कुछ विचार है स्वतः असंगत है। विचार ज्ञाता और ज्ञेय पदार्थ के विरोध के साथ काम करता है और परम वास्तविक सत्ता ऐसी है जिसमें ये प्रतिकूल तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। अत्यन्त ठोस विचार, जहां तक यह अनेकों को एक में संयुक्त करने का प्रयत्न करता है, फिर भी अमूर्त है, क्योंकि यह स्वतःविरोधी है और यदि हम वास्तविक सत्ता को ग्रहण करना चाहते हैं तो हमें विचार को त्याग देना होगा। प्रथम कल्पना के ऊपर विचार जो कुछ प्रकाशित करता है वह वस्तु-सत्ता के विरोध में नहीं जाता किन्तु केवल एक भाग का ही प्रकाश करता है। अवयव-विशेष से सम्बन्ध रखने वाले विचार परस्पर विरोधी इसीलिए होते हैं कि वे आंशिक हैं। जहां तक उनकी पहुंच है वहां तक ही वे सत्य हैं, किन्तु पूर्ण सत्य नहीं। दूसरी कल्पना हमें बताती है कि वास्तविक सत्ता का ज्ञान एक प्रकार की विशेष भावना अथवा अन्तर्दृष्टि द्वारा प्राप्त हो सकता है।[14]' पहले मत वाले भी, यदि यथार्थ सत्ता का पूर्ण रूप में जानना अभिष्ट है तो, भावना द्वारा विचार का स्थान ग्रहण करने का आग्रह करते हैं। विचार के अतिरिक्त भी हमें एक अन्य तत्त्व की आवश्यकता है और वह है 'दर्शन', जिस शब्द का प्रयोग दार्शनिक पद्धति, सिद्धान्त अथवा शास्त्र के लिए होता है।
'दर्शन' शब्द की उत्पत्ति 'दृश्' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है 'देखना'। यह दर्शन या तो इन्द्रियजन्य निरीक्षण हो सकता है, या प्रत्ययी ज्ञान अथवा अन्तर्दृष्टि द्वारा अनुभूत हो सकता है। यह घटनाओं के सूक्ष्म निरीक्षण, तार्किक परीक्षण अथवा आत्मा के अन्तर्निरीक्षण द्वारा भी प्राप्त हो सकता है। साधारणतः दर्शनों से तात्पर्य आलोचनात्मक व्याख्याओं (भाष्य), तार्किक सर्वेक्षणों अथवा दार्शनिक पद्धतियों से होता है। दार्शनिक विचार की प्रारम्भिक अवस्थाओं में दर्शन शब्द का प्रयोग इन अर्थों में हमें नहीं मिलता, क्योंकि उस समय दार्शनिक ज्ञान अधिकतर आभ्यन्तर दृष्टिपरक था। यह दर्शाता है कि 'दर्शन' अन्तर्दृष्टि नहीं है, भले ही यह उससे कितना ही सम्बद्ध क्यों न हो। सम्भवतः इस शब्द का प्रयोग बहुत सोच-विचार के बाद उस विचार पद्धति के लिए किया गया है जिसकी प्राप्ति तो अन्तर्दृष्टिजन्य अनुभव से होती है पर जिसकी पुष्टि तार्किक प्रमाणों द्वारा। परम अद्वैतवाद की दर्शन-पद्धतियों में दार्शनिक ज्ञान विचार की शक्तिहीनता का भाव हमारे समक्ष रखकर आन्तरिक अनुभव का मार्ग तैयार करता है। उदार अद्वैतपद्धतियों में, जहां वास्तविक सत्ता को एक पूर्ण ठोस रूप में माना गया है, दर्शनशास्त्र अधिक से अधिक यथार्थ सत्ता की आदर्श पुनर्रचना का विचार हमें देता है। किन्तु वह यथार्थ हमारी निरानन्द श्रेणियों से कहीं ऊपर और इनके चारों ओर और इनसे अतीत है। परम अद्वैत में यह आन्तरिक अनुभव है जो हमारे सामने वास्तविक यथार्थ सत्ता को उसके पूर्ण रूप में प्रकट करता है। ठोस अद्वैतवाद में, जहां ज्ञान का सम्पर्क भावना एवं मानसिक अनुराग के साथ होता है, यह आभ्यन्तर दृष्टि है। काल्पनिक रचनाओं में अनुभवसिद्ध सत्यों जैसी निश्चितता नहीं रहती। फिर कोई भी मत अथवा तार्किक विचार उसी अवस्था में सत्य समझा जा सकता है जब यह जीवन की कसौटी पर ठीक उतर सके।
दर्शन एक ऐसा शब्द है जो सुविधाजनक रूप में स्वयं में संदिग्ध है, क्योंकि परम अद्वैत की तार्किक पद्धति से रक्षा करने के लिए और अन्तर्दृष्टि-सम्बन्धी सत्य के बचाव के लिए भी, जिसके ऊपर यह आश्रित है, यह प्रयोग में आ सकता है। दार्शनिक विधि में दर्शन से तात्पर्य अन्तर्ज्ञान का प्रमाण मांगना है और उसका तार्किक रूप में प्रचार करना है। दूसरी पद्धतियों में भी सत्य की तार्किक व्याख्या के लिए इसका उपयोग होता है, जो अनुप्राणित करने वाली अन्तःप्रेरणा की सहायता से अथवा उसके बिना भी प्राप्त की जा सकती है। दर्शन का प्रयोग इस प्रकार मानव-मन द्वारा गृहीत यथार्थ सत्ता के सब मतों में होता है और यदि यथार्थ सत्ता एक है तो उसे प्रकाशित करने वाले सब मतों का परस्पर एक-दूसरे के साथ सहमत होना आवश्यक है। उन मतों में आकस्मिक अथवा नैमित्तिक घटनाओं का कोई स्थान नहीं है, बल्कि उन्हें यथार्थ सत्ता के विषय में प्राप्त भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों को प्रतिबिम्बित करना चाहिए। उन अनेक मतों पर बहुत निकट से विचार करने पर, जो हमें भिन्न-भिन्न दृष्टि से यथार्थ सत्ता का चित्र लेने पर प्राप्त हों, हम यथार्थ सत्ता के पूर्ण रूप को तार्किक परिभाषाओं में जान सकते हैं। जब हमें अनुभव होता है कि वास्तविक सत्ता की धारणात्मक व्याख्या पर्याप्त नहीं है तब हम अन्तर्ज्ञान द्वारा यथार्थ सत्ता को पकड़ने का प्रयत्न करते हैं और वहां सब बौद्धिक विचार समाप्त हो जाते हैं। उस समय हमें परम अद्वैतवाद की विशुद्ध सत्ता का ज्ञान होता है जिसके द्वारा हम फिर तार्किक विचार द्वारा प्राप्त यथार्थ सत्ता की ओर वापस आते हैं, जिसकी हम भिन्न-भिन्न पद्धतियों में अक्षरशः व्याख्या पाते हैं। इस अन्तिम विधि के लिए उपयुक्त दर्शन शब्द का तात्पर्य है-यथार्थ सत्ता की वैज्ञानिक व्याख्या। यह एक शब्द है जो अपनी सुन्दर अस्पष्टता के कारण दर्शनशास्त्र की समस्त जटिल प्रेरणा की व्याख्या के लिए उपयुक्त हो सकता।
दर्शन एक ऐसा आध्यात्मिक ज्ञान है, जो आत्मा-रूपी इन्द्रिय के समक्ष सम्पूर्ण रूप में प्रकट होता है। यह आत्मदृष्टि, जो वहीं सम्भव है जहां दर्शनशास्त्र का अस्तित्व है, एक सच्चे दार्शनिक की स्पष्ट पहचान है। इस प्रकार दर्शनशास्त्र के विषय में उच्चतम विजय उन्हीं व्यक्तियों को प्राप्त हो सकती है, जिन्होंने अपने अन्दर आत्मा की पवित्रता को प्राप्त कर लिया है। इस पवित्रता का आधार है अनुभन की प्रगाढ़ स्वीकृति, जो केवल उसी अवस्था में साक्षात् हो सकती है जब मनुष्य को अन्तर्निहित उस शक्ति की उपलब्धि हो, जिसके द्वारा वह न केवल जीवन का निरीक्षण ही अपितु पूर्णतया ज्ञान प्राप्त कर सके। इस अन्तस्तम निकास से ही दार्शनिक हमारे सामने जीवन के सत्य को प्रकट करता है-उस सत्य को जो केवल बुद्धि द्वारा प्रकाश में नहीं आ सकता। इस प्रकार की दर्शनशक्ति लगभग ठीक उसी प्रकार स्वाभाविक रूप में उत्पन्न हो जाती है जैसे फूल से फल की उत्पत्ति होती है, और इसका उत्पत्तिस्थान वह रहस्यमय केन्द्र है; जहां सब प्रकार के अनुभव का सामञ्जस्य होता है।
सत्य के अन्वेषक को अन्वेषण प्रारम्भ करने से पूर्व कतिपय अनिवार्य साधनों की पूर्ति करना आवश्यक है। शंकर वेदान्तसूत्रों के अपने भाष्य में पहले ही सूत्र के भाष्य में कहते हैं कि दर्शनशास्त्र के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए चार साधन आवश्यक हैं। प्रथम साधन है नित्य एवं अनित्य के मध्य भेद का ज्ञान। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे इसका पूर्ण ज्ञान होना चाहिए क्योंकि वह तो अन्त में ही प्राप्त हो सकता है, किन्तु केवल आध्यात्मिक प्रवृत्ति, जोकि दृश्यमान वस्तुओं को वास्तविक रूप में स्वीकार नहीं करती अर्थात् अन्वेषक के अन्दर प्रश्नात्मक जिज्ञासुभाव का होना आवश्यक है। उसके अन्दर प्रत्येक विजय के भीतर प्रवेश करने की जिज्ञासा-वृत्ति होनी चाहिए, एक ऐसी चेतन कल्पनाशक्ति, जो प्रकटरूप में असम्बद्ध सामग्री-समूह के अन्दर से सत्य को ढूंढ़कर निकाल सके, तथा ध्यान लगाने की आदत का होना भी आवश्यक है, जिससे कि वह अपने मन को विचलित न होने दे। दूसरा साधन है कर्मफल की प्राप्ति की इच्छा का दमन, चाहे वह फल इस जन्म में अथवा भविष्यजन्म में मिले। इस प्रतिबन्ध का आग्रह है कि सब प्रकार की छोटी-छोटी इच्छाओं एवं निजी प्रयोजन अथवा क्रियात्मक स्वार्थ का सर्वथा त्याग होना चाहिए। चिन्तनशील मन के लिए कल्पना अथवा अन्वेषण स्वयं अपने-आप में लक्ष्य हैं। बुद्धि का ठीक दिशा में उपयोग है वस्तुओं को, चाहे वे अच्छी हों या बुरी, ठीक-ठीक समझना। दार्शनिक एक प्रकार से प्रकृतितत्त्वज्ञ है, जिसे अपने मानसिक पक्षपात को दूर रखकर पदार्थों का, अच्छी या बुरी दोनों प्रकार की दिशाओं में अनुसरण करते हुए, स्वाभाविक प्रकार से अनुगमन करना चाहिए। वह न अच्छे को बहुत बढ़ाकर और न बुरे की अत्यन्त निन्दा करते हुए व्याख्या करे। उसे जीवन से बाहर स्थित होकर निर्लेपभाव से सबका निरीक्षण करना चाहिए। इसलिए यह कहा गया है कि उसे वर्तमान अथवा भविष्य के साथ कोई अनुराग नहीं होना चाहिए। केवल उसी अवस्था में वह अपना सब कुछ विशुद्ध चिन्तन और न्याय परामर्श के लिए निछावर कर सकता है और सत्य के प्रति एक व्यक्तित्व भावरहित सार्वभौम भाव का विकास कर सकता है। इस प्रकार की मनःस्थिति को प्राप्त करने के लिए उसे हृदय-परिवर्तन कर अवसर देना चाहिए, जिस पर तीसरे साधन में बल दिया गया है, जहां दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी के लिए आदेश है कि उसे शान्ति, आत्मसंयम, त्याग, धैर्य, मन की शान्ति और श्रद्धा का संचय करना चाहिए। केवल प्रशिक्षित मन ही, जो पूर्णरूप से शरीर पर नियन्त्रण रख सकता है, जीवन- पर्यन्त निरन्तर खोज एवं ध्यान में मग्न रह सकता है-क्षणमात्र के लिए भी पदार्थ को दृष्टि से ओझल किंए बिना और किसी सांसारिक प्रलोभन से विचलित हुए बिना। सत्य के अन्वेषक को इतना साहस अवश्य होना चाहिए कि वह अपने उच्चतम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सब कुछ खोने के लिए उद्यत रहे। इसलिए उसे कठिन नियन्त्रण में से गुज़रने की, सुख को परे फेंकने एवं दुःख और घृणा को सहने की भी आवश्यकता है। एक प्रकार का आत्मिक नियन्त्रण, जिसमें दयारहित आत्मपरीक्षण भी सम्मिलित है, सत्यान्वेषी को मुक्ति के लक्ष्य तक पहुंचने के योग्य बनाएगा। चौथा साधन है मुमुक्षा। आध्यात्मिक प्रवृत्ति के मनुष्य के लिए, जिसने अपनी सब इच्छाओं का त्याग करके अपने मन को प्रशिक्षण दिया है, मात्र एक ही सर्वोपरि इच्छा रह जाती है, अर्थात् लक्ष्य की प्राप्ति और नित्य के समीप पहुंचने की इच्छा। भारतवासी इन दार्शनिकों के प्रति अत्यन्त प्रतिष्ठा एवं श्रद्धा का भाव रखते हैं जो ज्ञान की शक्ति और बुद्धि के बल का गर्व करते हैं और उसकी पूजा करते हैं। ऐसे व्यक्ति जिन्हें दैवीय प्रेरणा होती है, जो सत्य के प्रति उदार एवं उत्कृष्ट प्रेरणा से विश्व ब्रह्माण्ड के रहस्य को जानने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं और उसका वाणी द्वारा प्रकाश करते हैं और कठिन परिश्रम करते हुए इसी सत्यान्वेषण के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, वे ही वास्तविक अर्थों में दार्शनिक हैं। वे मनुष्य-मात्र के हित के लिए ज्ञान-सम्पादन करते हैं और इसलिए मनुष्य- जाति सदा के लिए उनके प्रति कृतज्ञ रहती है।
भूतकाल के प्रति श्रद्धा हमारी एक अन्य राष्ट्रीय विशेषता है। परम्परा का निरन्तर अनुसरण करते रहना हमारी एक विशिष्ट मनोवृत्ति है अर्थात् युगों तक बराबर प्रचलित प्रथाओं के अन्दर एक प्रकार की आग्रहपूर्ण भक्ति। जब-जब नई संस्कृतियों से सामना हुआ अथवा नवीन ज्ञान आगे आया, भारतीयों ने सामधिक प्रलोभन की अधीनता स्वीकार किए बिना अपने परम्परागत विश्वास को दृढ़तापूर्वक पकड़कर स्थिर रखा, किन्तु जहां तक सम्मय हुआ नवीन से उतना अंश लेकर पुराने के अन्दर मिला भी लिया। यह सनातन मिश्रित उदारता ही भारतीय संस्कृति व सभ्यता की सफलता का प्रधान रहस्य है। संसार की उन बड़ी-बड़ी समस्याओं में से, जो कालक्रम से बहुत पुरानी और वृद्ध हैं, यही एक जीवित बची * 1 मिस्र की सभ्यता की महत्ता का पता पुरातत्व वेत्ताओं की लेखबद्ध सूचनाओं एवं चित्र-लेखों के अध्ययन द्वारा ही पाया जा सकता है, बेबिलोनियन साम्राज्य अपनी आश्चर्यजनक वैज्ञानिक उपलब्धियों, सिंचाई व इंजीनियरी कला के साथ आज खण्डहरों के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह गया है। महान रोमन संस्कृति अपनी राजनीतिक संस्थाओं और कानून व समानता के सिद्धान्तों के साथ अधिकांश में आज भूतकाल का ही एक विषय रह गई है। भारतीय सभ्यता, जो अत्यन्त न्यूनांकन के अनुसार भी 4000 वर्ष पुरानी तो है ही, अपनी समस्त विशेषताओं को अक्षुण्ण रखते हुए जीवित बची है। इस देश की सभ्यता वेदों के काल तक पीछे जाने पर एक साथ ही पुरानी भी है और नई भी। जब-जब इतिहास की मांग हुई, इसने समय-समय पर अपने को नये सिरे से युवा बना लिया। जब-जब परिवर्तन होता है उसका ज्ञान नवीन परिवर्तन के रूप में नहीं भासित होता। उसे अपना लिया जाता है और हर समय यह प्राचीन विचार-पद्धति को दिए गए नवीन रूप में स्वीकृत प्रतीत होता है। ऋग्वेद में हम देखेंगे कि किस प्रकार से आर्य-विजेताओं की धार्मिक चेतना ने इस भूमि के आदिवासियों के अन्धविश्वासों का भी साथ-साथ ध्यान रखा। अथर्ववेद में हमें पता लगता है कि संदिग्ध जागतिक देवी- देवताओं को आकाश, सूर्य, अग्नि एवं वायु आदि देवताओं के साथ-जिसकी पूजा आर्य लोगों में गंगा से लेकर हेलेस्पॉट तक होती थी-जोड़ दिया गया है। उपनिषदों के विषय में कहा जाता है कि वैदिक सूक्तों में जो कुछ पहले से पाया जाता था, ये उसी की पुनरावृत्ति अथवा साक्षात्कार-मात्र हैं। भगवद्गीता का दावा है कि उसमें उपनिषदों की शिक्षा का सारत्त्व निहित है। महाकाव्यों में हमें उच्चतम आशय वाली धार्मिक भावनाओं का प्राचीन प्रकृतिपूजा hat Phi साथ संगम हुआ उपलब्ध होता है। मनुष्य के अन्दर प्राचीनता के प्रति आदर एवं श्रद्धा की भावना के कारण ही उसे नवीन की सफलता प्राप्त हो सकती है।'[15] पुराने भावों की रक्षा की जाती है, यद्यपि पुरानी आकृतियों की नहीं। भारत की इस रक्षणात्मक प्रवृत्ति के कारण ही भारत के विषय में औपचारिक कथन किया जाता है कि वह अचल है। मनुष्य का मन कभी निश्चल नहीं बैठता, यद्यपि वह भूतकाल के साथ एकदम सम्बन्ध तोड़ना भी स्वीकार नहीं कर सकता।
भूतकाल के प्रति इस प्रकार की निष्ठा ने भारतीय विचार में एक प्रकार के नियमित नैरन्तर्य की उत्पन्न किया है, जहां कि प्रत्येक युग एक-दूसरे के साथ स्वाभाविक पवित्रता के बन्धन से जुड़ा हुआ है। हिन्दू संस्कृति युगों की देन है, जिसमें सैकड़ों पीढ़ियों द्वारा किए गए परिवर्तन समवेत हैं। इन परिवर्तनों में कुछ बहुत दीर्घ, विकृत और दुखमय हैं, जबकि अन्य अल्पकालीन, शीघ्रगामी एवं सुखकर हैं, जिनमें प्रत्येक ने इस प्राचीन सम्पन्न परम्पराओं में जो आज भी जीवित है, यद्यपि यह अपने अन्दर मृतप्राय भूतकाल के चिह्नों को भी अभी तक संजोए हुए है-कुछ न कुछ उत्तम गुणयुक्त सामग्री जोड़ दी है। भारतीय दर्शन की जीवन- यात्रा की तुलना एक ऐसी जलधारा के प्रवाह के साथ की जाती है जो अपने आदि उद्गम से निकलकर उत्तरी पर्वतों की चोटियों से आनन्दपूर्वक लुढ़कती हुई छायादार घाटियों और मैदानों में से वेग के साथ आगे बढ़ती हुई, अन्य छोटी-छोटी धाराओं को अपनी निरंकुश धारा में समेटती हुई अन्त में एक महान रूप और गम्भीर शक्ति धारण कर उन मैदानों व मानव- समूहों के अन्दर प्रवाहित होती है जिनके भाग्यों का वह निर्णय करती है एवं हज़ारों जहाज़ों का भार अपनी छाती पर वहन करती है। कौन जानता है कि क्या और कब यह शक्तिशाली महान जलधारा, जो इस समय निरन्तर तुमुल कोलाहल एवं प्रसन्नता के साथ प्रवाहित हो रही है, समुद्र में जा गिरेगी जो समस्त नदियों का जनक है? भारतीय विचारकों का अभाव नहीं है जो समस्त भारतीय दर्शन को निरन्तर दैवी
ऐसे प्रेरणा की एक ही पद्धति के रूप में मानते हैं। उनका विश्वास है कि प्रत्येक सभ्यता किसी दैवी विचार का सम्पादन करती है, जो उसके लिए स्वाभाविक है।'[16] प्रत्येक मानवीय जाति में उसके अन्तर्निहित एक ऐसी कर्म-मीमांसा रहती है जो उसके जीवन का निर्माण करती है और उसे पूर्ण विकास तक ले जाती है। भारत में समय-समय पर जिन भिन्न मतों का प्रचार हुआ वे सब उसी एक मुख्य वृक्ष की शाखाएं मात्र हैं। सत्य की खोज के मुख्य मार्ग के साथ छोटी- छोटी पगडंडियों और अंधी गलियों का भी सामंजस्य किया जा सकता है। एक सुपरिचित विधि, जिसमें छः पुराने दर्शनशास्त्रों का समन्वय हुआ है, इस प्रकार प्रकट की जा सकती है कि जैसे एक मां अपने बच्चे को चांद की ओर संकेत करती हुई बतलाती है कि वह देखो वृक्ष के ऊपर एक चमकीला गोलाकार चक्कर है, और यह बच्चे को बिलकुल आसानी से समझ में आ सकता है-पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच की दूरी का वर्णन किए बिना, जिससे बच्चा चकरा सकता था; इसी प्रकार भिन्न-भिन्न मत मानवीय विचार-शक्ति की विभिन्न दुर्बलताओं के कारण प्रकट हुए हैं। 'प्रबोधचन्द्रोदय' नामक एक दार्शनिक नाटक कहता है कि हिन्दू विचारधारा के छः प्रमुख दर्शन परस्पर एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, किन्तु विविध प्रकार के दृष्टिकोणों से एक ही स्वयंभू ईश्वर की स्थापना करते हैं। वे सब मिलकर तितर- बितर हुई किरणों का केन्द्र-स्थल बनाते हैं, जिससे भिन्न-भिन्न पहलुओं वाली मनुष्य-जाति प्रकाश के पुंज सूर्य से प्रकाश-रूपी ज्ञान प्राप्त करती है। माध्वाचार्य-निर्मित सर्वदर्शन-संग्रह (सन् 1380) ने सोलह विविध दार्शनिक पद्धतियों का वर्णन किया है, जिनसे क्रमानुसार आगे बढ़ते हुए अद्वैतवेदान्त तक पहुंचा जा सकता है। हेगल की तरह भारतीय दर्शन को यह एक उन्नतिशाली प्रयत्न के रूप में देखता है, जो हमें एक पूर्ण संधिबद्ध संसार का विचार देता है। उत्तरोत्तर इन पद्धतियों में धीरे-धीरे आंशिक रूप में सत्य प्रकट होता जाता है और दार्शनिक श्रेणियों का जब अन्त हो जाता है तो सत्य प्रकाश में आ जाता है। अद्वैत वेदान्त में बहुत-से प्रकाश एक केन्द्र-बिन्दु पर आकर एकत्र हो गए हैं। सोलहवीं शताब्दी के अध्यात्मवादी एवं विचारक विज्ञानभिक्षु का मत है कि सब दर्शन प्रामाणिक हैं।[17] और उनके समन्वय की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं कि क्रियात्मक और आध्यात्मिक तथ्य में भेद है, और इस प्रकार वे सांख्य को परम सत्य की व्याख्या करने वाला बताते हैं। मधुसूदन सरस्वती अपने 'प्रस्थानभेद' में लिखते हैं कि "सब मुनियों का अन्तिम लक्ष्य, जो इन भिन्न-भिन्न दर्शनों के कर्ता हैं, माया के सिद्धान्त का समर्थन करना है और उनके दर्शन का मूल आधार एकमात्र सर्वोपरि परम ब्रह्म की सत्ता की स्थापना करना है, जो अन्यतम सारतत्त्व है, क्योंकि ये मुनि जो सर्वज्ञ थे, भूल नहीं कर सकते थे। किन्तु चूंकि उन्होंने अनुभव किया कि मनुष्य, जो बाह्य पदार्थों की ज्ञानप्राप्ति के आदि हैं, एकसाथ ही उच्चतम सत्य के अन्दर प्रवेश करके उसे ग्रहण नहीं कर सकते, इसलिए उन्होंने मनुष्यों के हित के लिए नाना प्रकार के सिद्धान्तों की कल्पना की जिससे कि वे नास्तिकता के गढ़े में न गिर सकें। इस प्रकार से मुनियों के उद्देश्य को, जो उनके मन में था, गलत रूप में समझकर और यहां तक मानने पर उतारू होकर कि मुनियों ने वेद-विरुद्ध मतों का भी प्रचार किया, इन भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के विशेष-विशेष सिद्धान्तों को मनुष्यों ने एक-दूसरे से उत्तम बताकर नाना पद्धतियों का पक्ष ग्रहण कर लिया।"[18] अनेक दार्शनिक पद्धतियों के इस प्रकार के समन्वय का प्रयत्न[19] प्रायः सभी समीक्षकों एवं टीकाकारों ने किया है। भेद केवल इतना ही है कि वे किसे सत्य समझते हैं। न्याय के समर्थक उदयन की तरह न्याय को और ईश्वरवादी रामानुज की तरह ईश्वरवाद को ही सत्य मानते हैं। यह सोचना भारतीय संस्कृति की भावना के अनुकूल ही होगा कि विचार की अनेक और भिन्न-भिन्न धाराएं, जो इस भूमि में बहती हैं, अपना जल एक ही सामान्य नदी में डालेंगी, जिसका बहाव अन्यत्र कहीं न होकर ईश्वर के नगर की ओर ही होगा।
प्रारम्भ से ही भारतीयों ने यह अनुभव किया था कि सत्य अनेक पक्षीय है और विविध मत सत्य के भिन्न-भिन्न पहलू को देखकर प्रकट हुए हैं, क्योंकि विशुद्ध सत्य का प्रतिपादन कोई एक मत नहीं कर सकता। इसीलिए उन्हें अन्य मतों के प्रति सहनशील होकर उन्हें भी स्वीकार करना पड़ा। उन्होंने निर्भयता के साथ ऐसे विषम सिद्धान्तों को भी उस सीमा तक स्वीकृति प्रदान की, जहां तक उन सिद्धान्तों को तर्क का समर्थन प्राप्त हो सकता था। जहां तक सम्भव हो सका, उन्होंने लेशमात्र भी प्राचीन परम्पराओं के शीर्षकों को नष्ट नहीं होने दिया और उन सबको उचित स्थान व महत्त्व प्रदान किया। इस प्रकार की उदारता के अनेकों उदाहरण आगे हम अपने इस अध्ययन में पाएंगे। निःसन्देह इस प्रकार की मत-सम्बन्धी उदारता में कई प्रकार के संकटों का समावेश रहता है। प्रायः इस उदारता के कारण भारतीय विचारकों को अनिश्चितता, शिथिलताजन्य स्वीकृति और सस्ते सारसंग्रहवाद का शिकार होना पड़ा है।
भारतीय दर्शन के विरुद्ध लगाए जाने वाले मुख्य आरोप ये हैं कि यह निराशावादी है, रूढ़िवादी है, नीतिशास्त्र के प्रति उदासीन है और प्रगतिशील नहीं है।
भारतीय दर्शन एवं संस्कृति के प्रायः प्रत्येक समीक्षक ने इसे एक स्वर से निराशावादपरक बताया है।'[20] किन्तु हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किस प्रकार एक ऐसा मानव-मस्तिष्क स्वतन्त्रता के साथ किसी कल्पना में प्रवृत्त हो सकता है और जीवन का पुनर्निर्माण कर सकता है, जबकि वह क्लान्ति से भरा और निराशा के भाव से आक्रान्त हो। वस्तुतः भारतीय विचारधारा के क्षेत्र और स्वातन्त्र्य की संगति अन्तिम रूप में निराशावाद है। यदि निराशावाद से तात्पर्य, जो कुछ है और जिसकी सत्ता हमारे सामने है-उसके प्ररित असन्तोष से है, तो भले ही इसे केवल इन अर्थों में निराशावादी कहा जाए। और, इन अर्थों में तो सम्पूर्ण दर्शनशास्त्र निराशावादी कहला सकता है। इस जगत् में विद्यमान दुःख ही दर्शनशास्त्र एवं धर्म की समस्या को प्रेरणा देता है। धर्मशास्त्र दुःख से निवृत्ति के ऊपर बल देते हैं-जिस प्रकार का जीवन हम इस पृथ्वी पर व्यतीत करते हैं उससे बच निकलने की खोज करते हैं। किन्तु यथार्थ सत्ता अपने तत्त्वरूप में पाप नहीं है। भारतीय दर्शन में वही एक ही शब्द 'सत्' यथार्थ सत्ता और परिपूर्णता दोनों का संकेत करता है। सत्य और साधुता, और अधिक सही अर्थों में कहा जाए तो यथार्थ सत्ता और पूर्णता, साथ-साथ रहती हूं। यथार्थ सत्ता अत्यन्त मूल्यवान भी है और यही समस्त आशावाद का आधार है। प्रोफेसर बोसन्क्वेट लिखते हैं, "मैं आशावाद में विश्वास करता हूं किन्तु मैं यह भी कहता हूं कि वह आशावाद किसी काम का नहीं है जो बराबर नैराश्यवाद के साथ चलकर अन्त में उससे दूर पहुंच जाता है। मुझे निश्चय है कि यही जीवन का सत्यभाव है। और यदि इसे कोई अनर्थकारी समझता है और समझता है कि यह एक प्रकार से दुष्कर्म को अनुचित स्वीकृति देना है तो मेरा उत्तर यह है कि वह समस्त सत्य, जिसमें पूर्णता का थोड़ा-सा भी पुट है, क्रियात्मक रूप में अनर्थकारी है।"[21] भारतीय विचारक निराशावादी इन अर्थों में हैं कि ते इस जगत् की व्यवस्था को बुराई व मिथ्यारूप में देखते हैं। किन्तु आशावादी वे इन अर्थों में हैं कि वे अनुभव करते हैं कि वे इस जगत् से छुटकारा पाकर सत्य के राज्य में, जिसका दूसरा नाम साधुता भी है, पहुंच सकते हैं।
यह कहा जाता है कि यदि भारतीय दर्शन में रूढ़िवाद न रहे तो यह कुछ नहीं है, और रूढ़ि के स्वीकार करने पर वास्तविक दर्शन की कोई सत्ता नहीं रहती। अगले पृष्ठों में दिए गए भारतीय विचारधारा के समस्त अध्ययनक्रम में इस आरोप का उत्तर मिल जाएगा। दर्शनशास्त्र की अनेक पद्धतियां ज्ञान, उसका उद्गमस्थान, एवं यथार्थता की समस्या के समाधान को अन्य सब समस्याओं के समाधान से पूर्व विवेचना के लिए प्रमुख स्थान देती हैं। यह सत्य है कि वेद अथवा श्रुति को साधारणतया ज्ञान का एक प्रामाणिक उद्गमस्थान माना गया है। किन्तु यदि केवल वेद की उक्तियों को एकमात्र सर्वोपरि, अर्थात् इन्द्रियजन्य ज्ञान की प्रामाणिकता और तर्कसंगत निष्कर्षों के प्रामाण्य से उत्तम स्वीकार किया जाए तो दर्शनशास्त्र अवश्य रूढ़ि-मात्र बन जाएगा। वैदिक व्याख्यान आप्तवचन अर्थात् बुद्धिमानों की उक्तियां हैं, जिन्हें स्वीकार करने का हमें आदेश दिया गया है, यदि हमें यह निश्चय हो कि उन बुद्धिमान आप्त पुरुषों को समस्याओं के समाधान के लिए हमारी अपेक्षा अधिक उत्तम साधन उपलब्ध थे। साधारणतः ये वैदिक सचाइयां ऋषियों के अनुभवों का वर्णन करती हैं जिन्हें यथार्थ सत्ता की हेतुवादपरक व्याख्या करने वाले दृष्टि से ओझल नहीं कर सकते। आभ्यन्तर ज्ञान-सम्बन्धी ये अनुभव प्रत्येक मनुष्य के लिए प्राप्य की कोटि में हैं, यदि वह इसे प्राप्त करने की प्रबल इच्छा रखता हो।'[22] वेदों के प्रति अपील करने का तात्पर्य किसी दर्शनशास्त्रातीत मानदण्ड को उद्धृत करने से नहीं है। एक साधारण व्यक्ति के लिए जो मत रूढ़ि है, वही पवित्र हृदय वाले व्यक्ति के लिए अनुभव है। यह सत्य है कि जब हम अर्वाचीन भाष्यों पर आते हैं तो हमारे आगे एक प्रकार की दार्शनिक सनातनता का भाव आता है जबकि कल्पना का उपयोग मानी हुई रूढ़ियों के बचाव के लिए किया जाता है। प्रारम्भिक दर्शनशास्त्र भी अपने को भाष्य-रूप कहते हैं, अर्थात् प्राचीन सन्दर्भों की वे केवल टीकामात्र हैं, किन्तु उन्होंने कभी अति सूक्ष्म शास्त्रीय रूप धारण करने की प्रवृत्ति नहीं दिखाई, क्योंकि उपनिषदें जिनकी ओर वे प्रेरणा के लिए मुख फेरते हैं, अनेक विषयी हैं।[23] आठवीं शताब्दी के पश्चात् दार्शनिक मतभेद ने परम्परा का रूप धारण कर लिया और वह शास्त्रीय रूप में परिणित हो गया। और इस प्रकार वह विचार-स्वातन्त्र्य, जो प्राचीनकाल में पाया जाता था, इनमें नहीं रह गया। इन सम्प्रदायों के संस्थापक धार्मिक सन्तों की सूची में आ गए और इस प्रकार उनके मतों पर किसी प्रकार की आशंका उठाना धर्म-मर्यादा के अतिक्रम जैसा ही अपवित्र कर्म समझा जाने लगा। मौलिक व्यवस्थाएं सदा के लिए बना दी गईं और शिक्षक का कार्य केवल अपने सम्प्रदाय की मान्यताओं को ऐसे परिवर्तनों के साथ, जो उसके मस्तिष्क में समा सकते हैं अथवा समय की मांग को पूरा करते हैं, दूसरों तक प्रसारित करना- भर रह गया। पहले से निश्चित निर्णयों की सिद्धि के लिए केवल नये प्रमाण हमारे सामने आते हैं, नई कठिनाइयों के समाधान के लिए नए-नए अभ्युपाय एवं पुराने ही मतों के पुनःस्थापन कुछ नए परिवर्तित क्षेत्र के साथ या भाषा के हेर-फेर से मिलते हैं। जीवन की गम्भीर समस्याओं पर बहुत कम मनन और कृत्रिम समस्याओं पर अधिक वाद-विवाद मिलता है। परम्परा-रूपी उत्तम कोष अपनी ही बोझिल धन-सम्पत्ति द्वारा हमारे मार्ग में बाधक सिद्ध होता है और दर्शनशास्त्र की गति अवरुद्ध होकर कभी-कभी बिलकुल ही निश्चेष्ट हो जाती है। समस्त भारतीय दर्शन के ऊपर अनुपयोगिता के आरोप में तभी कुछ सार हो सकता है जबकि हम टीकाकारों के शाब्दिक विवेचन की ओर निगाह करते हैं, जिनके अन्दर जीवन की उस दैवी प्रेरणा एवं उस सौन्दर्य का लेशमात्र नहीं पाया जाता, जैसाकि प्राचीन पीढ़ी के दार्शनिकों में था। ये तो केवल पेशेवर तार्किक हैं, जिन्हें मनुष्य जाति के प्रति अपने उद्देश्य का ज्ञान-मात्र है और कुछ नहीं। तो भी ऊपर जम गई कालजनित पपड़ी की सतह के नीचे आत्मा यौवनपूर्ण है और यदा-कदा फूटकर ऊपर हरी व कोमल कोंपल के रूप में निकलती है, और शंकर या माधवाचार्य के समान व्यक्ति उदित होते हैं, जो अपने को बतलाते तो केवल भाष्यकार ही हैं, फिर भी ऐसे आध्यात्मिक तत्त्व का साक्षात्कार करते हैं जो समस्त विश्व की गति का नियन्त्रण करता है।
भारतीय दर्शनशास्त्र के विरुद्ध कभी-कभी यह कहा जाता है कि यह स्वरूप से नीतिहीन है। "हिन्दू विचारधारा की परिधि के अन्दर कोई भी नीतिशास्त्रे नहीं है।"[24] इस आरोप को प्रमाणित नहीं किया जा सकता। समस्त जीवन को आत्मिक शक्ति से पूर्ण करने के प्रयत्न तो यहां सर्वमान्य और साधारण बात है। भारतीय विचारधारा में यथार्थ सत्ता की श्रेणी में अगली श्रेणी में धर्म की भावना का ही अत्यन्त महत्त्व है। जहां तक वास्तविक नीति-सम्बन्धी विषय का सम्बन्ध है, बौद्ध मत, जैन मत, हिन्दू धर्म दूसरों से कम नहीं हैं। दैवीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए आचार-शुद्धि पहला पग है।
कहा जाता है कि भारत में दर्शनशास्त्र समस्थित या प्रगतिशून्य है और केवल पुरानी सामग्री के ऊहापोह में ही मग्न देखा जाता है। 'अपरिवर्तनशील पूर्व' से तात्पर्य है कि भारत में काल की गति अवरुद्ध हो गई है और यह सदा के लिए एकरस है। यदि इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक काल में समस्याएं एक समान रही हैं तब इस प्रकार की प्रगतिशीलता का अभाव सभी दार्शनिक विकासों में एक समान है। ईश्वर, मुक्ति और अमरत्व के सम्बन्ध में वही पुरानी समस्याएं और वही पुराने असन्तोषजनक समाधान बराबर शताब्दियों तक दोहराए जाते रहे हैं, जबकि समस्याओं की आकृतियां वही रहीं, सारतत्त्व में परिवर्तन हो गया है। वैदिक सूक्तों के सोमरस पान करने वाले ईश्वर में और शंकर के परम ब्रह्म में बहुत अन्तर हो गया। वे परिस्थितियां, जिनका असर दार्शनिक ज्ञान के ऊपर होता है, हरएक पीढ़ी में नये सिरे से बदल जाती हैं और उनके प्रति व्यवहार करने के प्रयत्नों में भी उसी के अनुसार पुनरावर्तन हो जाना आवश्यक है। यदि इस आपेक्ष का तात्पर्य यह हो कि भारत में प्राचीन धर्मशास्त्रों में दिए गए समाधानों एवं प्लेटो के ग्रन्थों अथवा ईसाई ग्रन्थों में दिए गए समाधानों में कुछ अधिक मौलिक भेद नहीं है तो इसका अर्थ यही है कि वही एक प्रेमस्वरूप व्यापक आत्मा अपने सन्देश का व्याख्यान दे रही है और समय-समय पर अपनी कल्याणमयी वाणी मनुष्य-मात्र को इन महापुरुषों के माध्यम से सुना रही है। पवित्र सन्देश विविध प्रकार से संकलित होकर युग-युग में हम तक पहुंचते हैं जिन पर जाति एवं परम्परा का रंग-भर चढ़ जाता है। यदि इसका अर्थ यह समझा जाए कि भूतकाल के प्रति भारतीय विचारकों के मन में एक विशेष प्रतिष्ठा का भाव विद्यमान है, जिसके कारण ही 'पुरानी बोतल में नई मदिरा' की लोकोक्ति के अनुसार इस देश के विचारक पुराने विचारकों में नए विचारों का केवल पुट देते रहे हैं तो हम पहले ही कह चुके हैं कि भारतीय मस्तिष्क का यह एक विशिष्ट स्वरूप है। इस देश में प्रगति का अर्थ है, पुरातनकाल के सब अच्छे अंशों को साथ लेकर उनमें कुछ और नई सामग्री जोड़ देना; अर्थात्, पूर्वपुरुषों के विश्वास को उत्तराधिकार के रूप में पाकर वर्तमान समय की भावना के अनुकूल उसमें परिवर्तन कर लेना। यदि भारतीय दर्शन को इन अर्थों में निःसार एवं निरर्थक कहा जाए कि वह विज्ञान की उन्नति को अपने अन्दर धारण नहीं करता तो इस प्रकार की निःसारता नई पीढ़ी के लोगों की दृष्टि में सभी पुराने विषयों में पाई जाती है। उक्त समीक्षा ने जिस प्रकार की धारणा बना रखी है, वैज्ञानिक विकास उस प्रकार का कोई विशेष परिवर्तन अभी तक दार्शनिक ज्ञान के तत्त्व में नहीं ला सका है। अपने वैज्ञानिक स्वरूप में जो सिद्धान्त अधिक क्रान्तिकारी प्रतीत होते हैं- जैसेकि जीवशास्त्र-सम्बन्धी विकासवाद का सिद्धान्त एवं भौतिक जगत् में सापेक्षतावाद का सिद्धान्त उन्होंने सर्वसम्मत दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रत्याख्यान करने के स्थान पर नवीन क्षेत्र में उनका समर्थन ही किया है।
प्रगतिशीलता के अभाव अथवा स्थिरता का आरोप तब आता है जब हम पहले महान भाष्यकारों के बाद के समय पर पहुंचते हैं। भूतकाल के प्रभाव के अधिक बोझिल होने से आगे के उपक्रम में बाधा उपस्थित हो गई और मध्यकाल के सम्प्रदायवादियों के समान पंडिताऊ ढंग का बौद्धिक ऊहापोह, और प्रामाण्य एवं परम्परा के लिए वही सम्मान, और उसी प्रकार के आध्यात्मिक पक्षपात की अनधिकार चेष्टा इत्यादि की सृष्टि हो गई। भारतीय दार्शनिक यदि अधिक स्वतन्त्रता के साथ कार्य कर सकता तो परिणाम कहीं अधिक उत्तम हो सकता था। दर्शनशास्त्र के सजीव विकास के तारतम्य के लिए सृजनात्मक शक्ति की धारा को निरन्तर प्रवाहित होते देने के लिए संसार के सजीव आन्दोलनों के साथ सम्पर्क आवश्यक है, जिससे विचार-स्वातन्त्र्य को प्रोत्साहन प्राप्त हो सके। संभव है कि भारतीय दर्शन, जिसने अपनी क्षमता एवं शक्ति अपनी राजनीतिक स्वतन्त्रता के साथ-साथ खो दी थी, इस नए युग में, जो हमारे सामने आ रहा है, एक नई प्रेरणा और नई स्फूर्ति प्राप्त कर सके। यदि भारतीय विचारक, प्राचीनता के प्रति जो उनका स्वाभाविक मोह है उसके साथ-साथ, सत्य की पिपासा को भी धारण कर सकें तो भारतीय दर्शन का भविष्य उसके उज्ज्वल भूतकाल के सामने ही अब भी उज्ज्वल हो सकता है।
केवल पुरातत्त्व-सम्बन्धी अनुसंधान के एक अंश के रूप में ही भारतीय विचारधारा के अध्ययन का औचित्य पूरा नहीं हो सकता। विशेष-विशेष विचारकों की कल्पनाएं अथवा भूतकाल के विचार अपना विशेष महत्त्व रखते हैं। ऐसा विषय, जिसने किसी समय पुरुषों एवं स्त्रियों की रुचि प्राप्त की है, हमेशा के लिए और पूर्णतया अपने ओज को नहीं खो सकता। वैदिक आर्यों के विचार-शास्त्र में हम बड़े-बड़े शक्तिशाली मस्तिष्कों को उन उच्चतम समस्याओं के साथ, जो मनुष्य को विचार करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं, जूझते हुए पाते हैं। हेगल के शब्दों में, "दर्शनशास्त्र का इतिहास अपने सही अर्थों में भूतकाल-मात्र का ही प्रतिपादन नहीं करता किन्तु नित्य, शाश्वत और वास्तविक वर्तमान काल के साथ भी सम्बन्ध रखता है और अपने परिणामरूप में मानव-बुद्धि के नैतिक हास का एक अजायबघर न होकर उस देवालय के समान है जिसमें समस्त मानव-बुद्धि के अन्तर्निहित तर्क की, भिन्न-भिन्न स्थितियों के प्रतिनिधिस्वरूप देवताओं के समान, आकृतियां सुरक्षित रखी हुई हैं।"[25] भारतीय विचार का इतिहास वह नहीं है जैसाकि पहले ही साक्षात्कार में प्रतीत होता है-अर्थात् केवल, पारमार्थिक विचारों का अनुक्रम, जिसमें एक के बाद दूसरा विचार आता चला गया है।
दर्शनशास्त्र को महाबहलाव का साधन बनाना बहुत आसान है, क्योंकि उन लोगों के लिए जो ऐन्द्रिय विषयों में ही लिप्त रहते हैं और एक अव्यवस्थित रूप में विचार करते हैं, दार्शनिक समस्याएं अवास्तविक प्रतीत होती हैं और उन्हें इस विषय में निस्सारता की गन्ध आती है। विरोधी समालोचक दार्शनिक वाद-विवाद को व्यर्थ समय नष्ट करने वाली तार्किक काट-छांट एवं ऐसा बौद्धिक इन्द्रजाल समझता है, जो पहले मुर्गी या पहले अंडा'[26] इस प्रकार की पहेलियों से ही भरा है। भारतीय दर्शन में विवाद-विषयक समस्याएं अनादिकाल से उलझन में डालती आई हैं और कभी भी उनका समाधान सबके लिए संतोषजनक रूप में नहीं हो सका। ऐसा प्रतीत होता है कि आत्मा एवं परमात्मा को जानने की उत्कट इच्छा मनुष्य- जाति की अनिवार्य आवश्यकताओं का विषय रही है। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति जब इस विषय पर विचार करता है कि वह बिना कहीं बीच में ठहरने के जन्म और मृत्यु के बीच जीवन-रूपी बाढ़ में बहता है-जिस निरन्तर बहती हुई धारा की बाढ़ में वह कभी ऊपर की ओर और कभी नीचे की ओर उछाल दिया जाता है, तब वह यह प्रश्न करने के लिए विवश हो जाता है कि मार्ग की कुछ छोटी-छोटी ध्यान बंटाने वाली घटनाओं को छोड़कर, अन्ततोगत्वा इस सब गति का प्रयोजन अथवा अन्तिम लक्ष्य क्या है। दर्शनशास्त्र भारत की जातीय स्वभावगत विलक्षणता नहीं, बल्कि मानवीय हितों का विषय है।
यादे हम पेशेवर दर्शन को एक ओर रख दें, जो अवश्य एक निरर्थक वस्तु हो सकता है, तो भारत में हमें विचार-शास्त्र-सम्बन्धी एक सर्वोत्तम विकास दृष्टिगोचर होता है। भारतीय विचारकों के परिश्रम के परिणाम मानव-ज्ञान की उन्नति के लिए इतने महत्त्व के हैं कि उनमें प्रकट भूलों के रहते हुए भी उनके ग्रन्थों को अध्ययन के योग्य समझते हैं। यदि मिथ्या तर्क, जिसने भूतकाल में दार्शनिक पद्धतियों का विनाश किया, दर्शनशास्त्र को एकदम त्याग देने का कारण हो सकता है, तब केवल भारतीय दर्शन को ही क्यों, समस्त प्रकार के दर्शनशास्त्र को ही त्याग देना चाहिए। अन्ततोगत्वा अविचल सत्य का अवशिष्टांश- जिसे मानवीय विचारधारा की महत्त्वपूर्ण देन के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए, यहां तक कि पश्चिम के प्लेटो और अरस्तू सरीखे प्रसिद्ध विचारकों को भी इसका अंश मिला-कोई बहुत बड़ी वस्तु नहीं है। प्लेटो की अत्यधिक जोशीली कविताओं, अथवा डेकार्ट के निर्जीव रूढ़िवाद का, ह्यूम के शुष्क अनुभूतिवाद एवं हेगल के भ्रामक हेत्वाभासों का उपहास करना सरल है किन्तु तब भी इसमें सन्देह नहीं कि इस सबके होते हुए भी हमें उनके अध्ययन से लाभ ही होता है। यहां तक कि यद्यपि भारतीय विचारकों द्वारा आविष्कृत थोड़े से ही महत्त्वपूर्ण तथ्यों ने मानवीय विचारशास्त्र के इतिहास की रचना की है तो भी बादरायण अथवा शंकर प्रभृति द्वारा प्रकट किए गए संश्लेषणात्मक और क्रमबद्ध विचार मानवीय विचारशास्त्र में युगान्तरकारी घटनाओं के रूप में और मानवीय प्रतिभा के स्मारक के रूप से विद्यमान रहेंगे।'[27]
भारतीय विद्यार्थी के लिए केवल भारतीय दर्शनशास्त्र का अध्ययन ही अपने-आप में भारत के शानदार भूतकाल का सही-सही चित्र उपस्थित कर सकता है। आज भी एक औसत दर्जे का हिन्दू अपने पुराने दर्शनशास्त्रों, बौद्धदर्शनों, अद्वैतदर्शन, एवं द्वैतवाद सबको एक समान योग्य और युक्तियुक्त मानता है। इन शास्त्रों के रचयिताओं की भगवान की तरह पूजा होती है। भारतीय दर्शन का अध्ययन हमारे सामने स्थिति को स्पष्ट कर सकता है और अधिक सन्तुलित रूप में दृष्टिकोण को एवं मन को इस निरंकुश भाव से, कि प्राचीन जो कुछ है अपने-आप में पूर्ण है, दूर करके स्वतन्त्र विचार करने के योग्य बना सकता है। प्रामाण्य की दासता से मन की इस प्रकार की मुक्ति एक आदर्श है, जिसके लिए प्रयत्न होना चाहिए। क्योंकि जब दासता के बन्धन से बुद्धि स्वतन्त्र हो जाएगी तब मौलिक विचार और रचनात्मक प्रयत्न भी सम्भव हो सकेंगे। आज के भारतीय के लिए अपने देश के प्राचीन इतिहास का ब्यौरेवार ज्ञान होना एक विषादात्मक सन्तोष भी हो सकता है। वृद्ध पुरुष अपनी युवावस्था के किस्सों से सन्तोष प्राप्त करते हैं, और इसी प्रकार दूषित वर्तमान को भूलने का भी एक ही मार्ग है कि हम सुन्दर भूतकाल का अध्ययन करें।
जब हम केवल हिन्दुओं के दर्शन-सम्बन्धी विषय का प्रतिपादन कर रहे हैं, जोकि उन अन्यान्य जातियों की दर्शन-पद्धतियों से भिन्न है जिनका भारत में अपना स्थान है, तब इस विषय को 'भारतीय दर्शन' का शीर्षक क्यों दिया जाए, इसकी युक्तियुक्तता दर्शाना हमारे लिए आवश्यक हो जाता है। इसका सबसे अधिक स्पष्ट और सुगम कारण इस परिभाषा का सामान्य प्रयोग में आना है। आज भी भारत मुख्यांश में हिन्दू है। और यहां हमारा प्रतिपाद्य विषय भी भारतीय विचार के 1000 ईस्वी अथवा कुछ उपरान्त तक के काल का इतिहास है। इस समय के पश्चात् ही हिन्दू जाति का भाग्य अन्यान्य अहिन्दू जातियों के साथ अधिकाधिकजुड़ता गया।
भारतीय विचार के निरन्तर विकास को विभिन्न लोगों ने विभिन्न समयों में अपनी-अपनी भेंट अर्पित की है, फिर भी उन सब पर भारतीय आत्मा के बल की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इस विकास की ठीक-ठीक क्रमबद्धता के विषय में यद्यपि हम निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते, फिर भी हम भारतीय विचार को ऐतिहासिक दृष्टि से देखने का प्रयत्न करेंगे। विशेष सम्प्रदायों के सिद्धांत अपनी-अपनी परिस्थितियों की अपेक्षा रखते हैं और इसलिए उनका निरीक्षण उनके साथ ही करना उचित होगा, अन्यथा हमारे लिए उनके अन्दर किसी प्रकार का जीवित आशय खोजना कठिन होगा और वह एक प्रकार की मृतप्राय परम्परा मात्र ही सिद्ध होगी। दर्शनशास्त्र की प्रत्येक पद्धति अपने समय के महत्त्वपूर्ण प्रश्न का एक निश्चयात्मक उत्तर है और इसलिए जब उस पर उसी दृष्टिकोण से विचार किया जाएगा, तभी प्रतीत होगा कि उममें सत्य की कुछ मात्रा अवश्य है। दार्शनिक तत्त्व निश्चयात्मक अथवा भ्रमात्मक स्थापनाओं के पुंजमात्र नहीं हैं, अपितु एक विचारधारा की अभिव्यक्ति एवं विकास के रूप में हैं, जिसके साथ और जिसके बीच हमें अवश्य तादात्म्य प्राप्त करना चाहिए, यदि हम जानना चाहते हैं कि उक्त पद्धतियों ने अमुक रूप किस प्रकार और क्यों धारण किया। दर्शनशास्त्र का इतिहास के साथ एवं बौद्धिक जीवन का सामाजिक अवस्थाओं के साथ जो पारम्परिक संबंध है, उसका ज्ञान हमें अवश्य होना चाहिए।'[28] ऐतिहासिक विधान के अनुसार सम्प्रदायों के परस्पर विरोध में किसी एक का पक्ष लेना अनुचित है, बल्कि नितान्त निष्पक्ष भाव से विकास का अनुसरण करना चाहिए।
ऐतिहासिक दृष्टि से उक्त विधि के परम आवश्यकता का महत्त्व समझते हुए भी हमें दुःख से कहना पड़ता है कि प्राचीन लेखों में काल और तिथियों का सर्वथा अभाव रहने के कारण हम उक्त पद्धतियों के निर्माण का ठीक-ठीक काल-निर्णय करने में अपने को असमर्थ पाते हैं। प्राचीन भारतीयों का स्वभाव इतना अनैतिहासिक अथवा संभवतः इतना दार्शनिकज्ञानातीत था कि हम दार्शनिकों की अपेक्षा दर्शन-पद्धतियों के विषय में अधिक जानते हैं। बुद्ध के जन्म के समय से भारतीय कालक्रम-विज्ञान अधिक अच्छी स्थिति में आ गया। बौद्धमत के अभ्युदय के काल में ही फारस (ईरान) की शक्ति का विस्तार एकिमेनिडी राजवंश के शासन के अन्तर्गत बढ़ते-बढ़ते सिन्धु नदी तक पहुंच गया था। कहा जाता है कि पश्चिम में भारत-विषयक ज्ञान इसी समय हेकाटिययस और हेरोडोटस द्वारा पहुंचाया गया।
भारतीय दर्शनशास्त्र के मुख्य विभाग निम्नलिखित हैं :
(1) वैदिक काल (1500 ई० पूर्व से 600 ई० पूर्व तक): वह समय है जबकि भारत में आर्य लोगों ने अपने आवासस्थानों का निर्माण किया और उसके साथ-साथ इस देश में आर्य संस्कृति व सभ्यता का धीरे-धीरे विस्तार और प्रसार हुआ। यह वह समय है जिसमें वनों के विश्वविद्यालयों का अभ्युदय हुआ। और इन विश्वविद्यालयों से भारत के उच्च आदर्शवाद का प्रादुर्भाव हुआ। इस काल में हम विचार के बदलते हुए स्तर को स्पष्ट भेद के कारण देख सकते हैं, जो मन्त्रों अथवा सूक्तों एवं ब्राह्मणों और उपनिषदों के रूप में प्रकट हुआ। इस युग के विचार यथार्थ रूप में दार्शनिक नहीं है। यह अन्धकार में टटोलने का काल है, जहां मिथ्या विश्वास और विचार में अब भी परस्पर भेद और द्वन्द्व विद्यमान था। फिर भी, विषय को एक व्यवस्था में रखने और उसे सिलसिला देने के विचार से यह हमारे लिए आवश्यक हो जाता है कि हम ऋग्वेद के सूक्तों के दृष्टिकोण की व्याख्या करते हुए उपनिषदों के मत का भी प्रतिपादन करें।
(2) महाकाव्यकाल (600 ई० पू० से 200 ई० पश्चात्) का विस्तार उपनिषदों और दर्शनशास्त्रों के विकासकाल तक है। रामायण और महाभारत के महाकाव्य मानव में निहित एक नवीन वीरत्व एवं देवत्व के संदेश को फैलाने का माध्यम सिद्ध हुए। इस काल में उपनिषदों के विचारों का प्रजातन्त्रीकरण होकर बौद्धधर्म, एवं भगवद् गीता में उनका संक्रमित होना पाया जाता है। बौद्धधर्म, जैनमत, शैवमत एवं वैष्णवमत की पद्धतियां सब इसी काल की हैं। अमूर्त विचारों का विकास भी जो भारतीय दर्शन के भिन्न भिन्न सम्प्रदायों में परिणत हुआ, इसी काल की देन है। बहुत से दर्शनों का प्रारम्भकाल बौद्धधर्म के अभ्युदयकाल के साथ-साथ है और वे अनेक शताब्दियों तक साथ-साथ विकसित होते रहे, फिर भी उन सम्प्रदायों के क्रमबद्ध ग्रन्थों का निर्माण-काल बाद का है।
(3) सूत्रकाल (200 ई.) उसके बाद आता है। सामग्री का पुंज बढ़कर इतना अधिक स्थूल हो गया कि दर्शनों के ज्ञान को सूक्ष्म रूप में उपस्थित करने की आवश्यकता अनुभव होने लगी। इस न्यूनीकरण एवं समवायिकरण ने सूत्रों का रूप धारण किया। ये सूत्र बिना उसकी टीकाओं की सहायता के समझ में नहीं आ सकते, यहां तक कि टीकाओं का महत्त्य स्वयं सूत्रों से भी अधिक बढ़ गया। यहां हमें दार्शनिक क्षेत्र में समीक्षात्मक प्रवृत्ति विकसित होती दिखाई देती है। इसमें सन्देह नहीं कि इससे पूर्ववर्ती कालों में हमें दार्शनिक वाद-विवार मिलते हैं, जहां मन ने जो कुछ उसे बताया गया उसे निष्क्रियभाव से स्वीकार नहीं किया बल्कि स्वयं भी विषय पर आक्षेप उठाकर और उनका उत्तर देते हुए उनका विवेचन किया। अपने आत्मिक ज्ञान द्वारा विचारकों ने कुछ ऐसे सामान्य सिद्धान्त स्थिर किए जो उनही दृष्टि में विश्व के समस्त रूपों की व्याख्या करते हुए प्रतीत हुए। दार्शनिक संश्लेषण चाहे कितने ही पूर्ण और तीक्ष्ण क्यों न हों, पूर्व विवेचनारहित होने के कारण, काण्ट की परिभाषा में, बराबर दोषपूर्ण रहे हैं। दार्शनिक समस्याओं के समाधान की शक्ति मनुष्य के अन्दर कितनी है, इस विषय की पहले से विवेचना किए बिना मानव ने जगत् को देखा और परिणामों पर पहुंच गया। प्रारम्भिक प्रयत्न जगत् को समझने और उसकी व्याख्या करने के विषय में यथार्थ में दार्शनिक प्रयत्न नहीं थे, क्योंकि मानव-मस्तिष्क की योग्यता के विषय में किसी ने इस प्रकार की आशंका नहीं की कि उसके जिन साधनों का प्रयोग किया गया, उसमें कार्य-क्षमता थी या नहीं, या जिस मानदण्ड का प्रयोग किया गया वह भी ठीक था या नहीं, इत्यादि। जैसा कि केयर्ड ने लिखा है कि मन 'उस समय पदार्थ को ध्यान से देखने में अत्यन्त व्यग्र' था।'[29] इसलिए जब हम सूत्रकाल में आते हैं तो उस समय में केवल रचनात्मक कल्पना और धार्मिक स्वातन्त्र्य ही नहीं, विचार एवं चिन्तन को भी अधिक स्वयंचेतनरूप में पाते हैं। दर्शनशास्त्रों के सम्बन्ध में भी हम निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते कि इनमें से कौन प्राचीन हैं और कौन अर्वाचीन। इस विषय में बराबर विरोधी उद्धरण मिलते हैं। योगदर्शन सांख्य की सत्ता स्वीकार करता है, वैशेषिक न्याय और सांख्य दोनों की सत्ता को स्वीकार करता है, न्याय में वेदान्त और सांख्य का विवरण पाया जाता है, मीमांसा प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में अन्य सब दर्शकों के पूर्व-अस्तित्व का पता देती है, और इसी प्रकार वेदान्त में भी अन्य सब दर्शनों का हवाला आता है। प्रोफेसर गार्ब का मत है कि सांख्य सबसे पुराना सम्प्रदाय है। उसके पश्चात् योगदर्शन आया, इसके पश्चात् मीमांसा और वेदान्त और सबसे अन्त में वैशेषिक और न्याय। सूत्रकाल और टीकाकारों के पाण्डित्य-प्रदर्शन काल के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं खींची जा सकती। ये दोनों काल आज तक विस्तृत हैं।
(4) टीकाकाल भी ईसा के पश्चात् दूसरी शताब्दी से आरम्भ होता है। इस काल और इससे पूर्व के काल के बीच में कोई स्पष्ट विभाजन रेखा नहीं खींची जा सकती। फिर भी इसी काल में हमें बड़े-बड़े विचारकों यथा कुमारिल, शंकर, श्रीधर, रामानुज, माध्व, वाचस्पति, उदयन, भास्कर, जयन्त, विज्ञानभिक्षु और रघुनाथ आदि का नाम सुनाई देता है। उक्त काल का साहित्य शीघ्र ही शास्त्रार्थों और विवादों में ग्रस्त हो जाता है। हमें इस काल में तार्किकों का एक जत्था मिलता है, कोलाहलपूर्ण वाद-विवाद में रत, अत्यन्त सूक्ष्म सिद्धान्तों में लिप्त और युक्ति व प्रमाणों का सूक्ष्म ताना-बाना बनाने वाले तार्किक, जो सामान्य स्थापनाओं पर परस्पर वाक्युद्ध करते रहे। बहुत से उन भारतीय विद्वानों ने अपने बड़े-बड़े ग्रंथों को खोलने में संकोच किया। जो ज्ञान का प्रकाश देने की अपेक्षा अधिकतर हमें असमंजस में डालने का कारण बनते हैं। उसकी कुशाग्रबुद्धि एवं उत्साह से कोई इनकार नहीं कर सकता। किन्तु इन टीकाकारों में विचारों के स्थान पर केवल शब्द मिलते हैं, दर्शनशास्त्र के स्थान में तर्कशास्त्र की काट-छांट, विचार की अस्पष्टता, तार्किक जटिलता और मनोवृत्ति की असहिष्णुता पाई जाती है, जो बहुत खेदजनक है। इनसे उत्तम श्रेणी के भाष्यकार निःसन्देह उतने ही महत्त्वपूर्ण है जितने कि प्राचीन विचारक स्वयं थे। शंकर और रामानुज जैसे भाष्यकार प्राचीन सिद्धान्तों को फिर से स्थिर करते हैं और उनके द्वारा की गई यह पुनःस्थापना आध्यात्मिक खोज के समान ही महत्त्वपूर्ण है।
भारतीय दर्शन के कुछ इतिहास भारतीय विचारकों द्वारा लिखे गए मिलते हैं। लगभग सभी अर्वाचीन टीकाकार अपने-अपने दृष्टिकोण से दूसरों के सिद्धान्तों पर वाद-विवाद करते हैं। इस मार्ग से प्रत्येक टीकाकार हमें अन्य मतों का पता दे जाता है। कभी-कभी तो अन्य कितनी ही दार्शनिक पद्धतियों पर निरन्तर रूप से और जान-बूझकर विवाद किया गया है। इस प्रकार के कुछ मुख्य ऐतिहासिक विवरण यहां दिये जाते हैं। हरिभद्र द्वारा रचित[30]' एक ग्रन्थ है जिसका नाम 'षड्दर्शनसमुच्चय' है, जिसमें छहों वैदिक दर्शनों का सार-संग्रह किया गया है। बताया जाता है कि सामन्तभद्र नामक एक दिगम्बर जैन ने, जो छठी शताब्दी में हुआ, 'आत्ममीमांसा' नामक ग्रन्थ लिखा है, जिसमें नाना प्रकार के दार्शनिक सम्प्रदायों की समालोचना की है।[31] एक माध्यमिक बौद्ध, जिसका नाम भावविवेक है, 'तर्कज्वाला' नामक ग्रन्ध का निर्माता है, जिसमें उसने मीमांसा, सांख्य, वैशेषिक और वेदान्त सम्प्रदायों की आलोचना की है। विद्यानन्द नामक एक दिगम्बर जैन ने अपने 'अष्टसहस्री' नामक ग्रंथ में, और मेरुतुंग नामक एक अन्य दिगम्बर जैन ने 'षड्दर्शनविचार' (1300 ई०) नामक ग्रन्थ में, कहा जाता है कि, हिन्दूदर्शनशास्त्रों की समालोचना की है। प्रसिद्ध वेदान्ती माधवचार्य के 'सर्वदर्शनसंग्रह' नामक ग्रन्थ में भारतीय दर्शन का सर्वाधिक प्रचलित विवरण दिया गया है। माधवाचार्य ने 14वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जन्म लिया था। शंकरस्वामी के 'सर्वसिद्धान्त-सारसंग्रह"[32] और मधुसूदन सरस्वती के 'प्रस्थानभेद"[33] में भी विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्तों का उपयोगी वर्णन पाया जाता है।
वेद-वैदिक सूक्तों के अध्ययन का महत्त्व वेदों की शिक्षाएं-दार्शनिक प्रवृत्तियाँ-परमार्थविद्या-अद्वैतवादी प्रवृत्तियां-एकेश्वरवाद बनाम अद्वैतवाद-सृष्टि विज्ञान-धर्म- नीतिशास्त्र-परलोकशास्त्र-उपसंहार
वेद मानव-मस्तिष्क से प्रादुर्भूत ऐसे नितान्त आदिकालीन प्रमाणिक ग्रन्थ हैं, जिन्हें हम अपनी निधि समझते हैं। विल्सन लिखता है, "जब ऋग्वेद और यजुर्वेद की मूलसंहिताएं पूर्ण हो जाएंगी उस समय हमारे पास इतनी पर्याप्त सामग्री होगी कि हम उनसे निकाले जाने वाले निष्कषों का सही-सही मूल्यांकन कर सकेंगे और यह मालूम कर सकेंगे कि राजनीतिक एवं धार्मिक क्षेत्र में हिन्दुओं की वास्तविक स्थिति एक ऐसे युग में क्या रही होगी, जो सामाजिक संघठन के अब तक के सबसे पूर्व के उल्लेख अर्थात् ग्रीक सभ्यता के उदय से भी बहुत पहले का समकालीन था और जो अब तक के ज्ञात इतिहास में सबसे प्राचीन असीरियन साम्राज्य के स्मृति-चिह्नों से भी पूर्व-सम्भवतः प्राचीन हीब्रू लेखों का समकालीन था और केवल मिस्र के उन राज्यों का ही परवर्ती था, जिनके विषय में सिवा कुछ नामों के अभी तक हम बहुत कम जानते हैं। वेदों से हमें उस सबके विषय में, जो प्राचीनता के बारे में विचार करने पर बहुत रोचक प्रतीत होता है, बहुत बड़ी जानकारी मिलती है ।'[34]' वेद चार हैं: ऋक्, यजुः, समा, अथर्व। पहले तीन परस्पर एक समान हैं, न केवल अपने नाम, आकृति व भाषा में किन्तु अपने अन्तर्गत विषयों में भी। इनमें ऋग्वेद प्रधान है। इसमें उन दिव्य गीतों का संग्रह किया गया जिन्हें आर्य लोग अपनी प्राचीन मातृभूमि से भारत में साथ लाए थे और जो उनकी अत्यन्त मूल्यवान निधि के रूप में थे। क्योंकि जैसा कि आम मत है, जब अपने नये देश में उनका सम्पर्क अन्य देवताओं की पूजा करने वालों के साथ हुआ तो उन्हें उक्त गीतों को संभालकर सुरक्षित रखने की आवश्यकता प्रतीत हुई। ऋग्वेद उन्हीं गीतों का संग्रह है। सामवेद विशुद्ध कर्मकाण्ड-सम्बन्धी संग्रह है। इसका बहुत-सा भाग ऋग्वेद में पाया जाता है और ये सूक्त भी जो विशेषकर इनके अपने हैं, कोई विशेष नई शिक्षा नहीं देते। उन सबको क्रमबद्ध किया गया है केवल यज्ञों में गाने के लिए। साम की भांति यजुर्वेद की उपयोगिता भी कर्मकाण्ड के लिए है। कर्मकाण्डपरक धर्म की मांग को पूरा करने के लिए ही इस वेद का संग्रह किया गया। विटनी लिखता है, "प्रारम्भिक वैदिक काल में यज्ञ अभी तक मुख्यतः बन्धन रहित भक्तिपरक कर्म था, जो किसी विशेषधिकार प्राप्त पुरोहितवर्ग के सुपर्द नहीं था, न उनके छोटे-छोटे ब्योरे के लिए कोई विशेष नियम बनाए गए थे; यज्ञकर्ता यजमान की ही स्वतन्त्र भावनाओं के ऊपर आश्रित होते थे, और उनमें ऋग्वेद तथा सामवेद के ही मन्त्रों का उच्चारण रहता था जिससे कि यजमान का मुख, हाथों से देवताओं के निमित्त हृदय की भावना से प्रेरित होकर आहुति देते समय, बन्द न रहे।... ज्योंज्यों समय बीतता गया, कर्मकाण्ड ने भी अधिकाधिक औपचारिक रूप धारण कर लिया और अन्त में एक सर्वथा निर्दिष्ट एवं सूक्ष्म रूप में यजमान के क्षण-क्षण के व्यापार को तारतम्य में नियन्त्रित कर दिया गया। केवल इतना ही नहीं कि धार्मिक अनुष्ठानविशेष के लिए विशेष मन्त्र नियत कर दिए गए, अपितु उसी प्रकार से प्रत्येक वैयक्तिक व्यापार को प्रकट करने वाले मन्त्र भी स्थिर कर दिए गए जो व्याख्या करने, क्षमा-प्रार्थना करने एवं आशीर्वाद देने में संकेतरूप से प्रयुक्त किए जाने लगे ।... इन यज्ञ सम्बन्धी मन्त्रों के संग्रह का नाम ही यजुर्वेद हुआ, जिसका 'यज्' धातु से 'यज्ञ करना' अर्थ होता है।... यजुर्वेद की रचना इन्हीं मन्त्रों से हुई है, जो कुछ भाग में गद्य और कुछ भाग में पद्य के रूप में हैं और जिन्हें भिन्न-भिन्न यज्ञों में उपयुक्त होने योग्य क्रम में रखा गया है।"[35] साम और यजुर्वेदों का संग्रह अवश्य ऋग्वेद के संग्रह एवं ब्राह्मणग्रन्थों के मध्यवर्ती काल में हुआ होगा जबकि कर्मकाण्ड की स्थापना पूर्णतया हो गई थी। अथर्ववेद को एक दीर्घकाल तक वेद के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं हुई, यद्यपि हमारे मतलब के लिए ऋग्वेद के बाद इसी का महत्त्व है, क्योंकि ऋग्वेद के ही समान यह भी स्वतन्त्र विषयों का एक ऐतिहासिक संकलन है। यह वेद बिलकुल एक भिन्न ही भाव से ओतप्रोत है, जो परिवर्ती युग की विचारधारा की उपज है। यह उस समझौते के भाव की देन है जिसे वैदिक आर्यों ने इस देश के आदिवासियों द्वारा पूजे जाने वाले नये देवी-देवताओं के साथ समन्वय करने के विचार से अंगीकार कर लिया था।
प्रत्येक वेद के तीन भाग हैं, जिन्हें मन्त्रसंहिता, ब्राह्मण और उपनिषद् नामों से जाना जाता है। मन्त्र अथवा ऋचाओं या सूक्तों के संग्रह को संहिता कहते हैं। ब्राह्मणों में उपदेश एवं धार्मिक कर्त्तव्यों का विधान है। उपनिषद् एवं आरण्यक ब्राह्मणों के अन्तिम भाग हैं, जिनमें दार्शनिक समस्याओं की विवेचना की गई है। उपनिषदों के अन्दर हमें देश की परवर्ती विचारधारा की कुल मानसिक पृष्ठभूमि देखने को मिलती है। प्राचीन उपनिषदों में से ऐतरेय और कौशीतकि का सम्बन्ध ऋग्वेद से है, केन और छान्दोग्य का साम से, ईश, तैत्तिरीय और बृहदारण्यक का यजुर्वेद से एवं प्रश्न और मुण्डक का अथर्ववेद से है। आरण्यकों का स्थान ब्राह्मणग्रंथों और उपनिषदों के बीच है और जैसाकि उनका नाम संकेत करता है, आरण्यक उन पुरुषों के मनन एवं चिन्तन के विषय थे जो वनों में रहते थे। ब्राह्मणग्रन्थों में उन कर्मकाण्डों का विवेचन है जिनका विधान गृहस्थ के लिए था। किन्तु वृद्धावस्था में जब वह वनों का आश्रय लेता है तो कर्मकाण्ड के स्थान में किसी और वस्तु की उसे आवश्यकता है, और आरण्यक उसी विषय की पूर्ति करते हैं। याज्ञिक सम्प्रदाय के सांकेतिक एवं धार्मिक पक्षों पर मनन व चिन्तन किया गया है और यह मनन ही यज्ञ की विधि में परिणत हुआ। आरण्यक एक प्रकार से ब्राह्मणों में विहित कर्मकाण्डों एवं उपनिषदों के दार्शनिक ज्ञान के मध्यवर्ती संक्रमणकाल की श्रृंखला के रूप में हैं। जहां वैदिकसूक्त कवियों की कृतियां हैं,'[36] वहां ब्राह्मणग्रंथ पुरोहितों की रचनाएं हैं और उपनिषद् दार्शनिकों के मनन एवं चिन्तन के परिणाम हैं। सूक्तों के स्वरूप का धर्म, एवं ब्राह्मण ग्रंथों का नियमबद्ध धर्म एवं उपनिषदों का भावनामय धर्म उन तीन बड़े विभागों के साथ, जो हेगल का धर्म-सम्बन्धी विकास का भाव है, अत्यन्त निकट रूप में समानता रखते हैं। यद्यपि आगे चलकर ये तीनों विभाग साथ-साथ विद्यमान रहे, फिर भी इसमें सन्देह नहीं कि प्रारम्भ में इनका विकास क्रमशः एक-दूसरे के पश्चात् भिन्न भिन्न कालों में हुआ। उपनिषद् जहां एक ओर वैदिक पूजा की परम्परा में हैं, वहां दूसरी ओर ब्राह्मणों के धर्म के विरोध में हैं।
किसी भी भारतीय विचारधारा की सही-सही व्याख्या के लिए ऋग्वेद के सूक्तों का अध्ययन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। हम उन्हें चाहे जो भी रूप दें-अधूरी पौराणिक कल्पनाएं, असंस्कृत रूपक, अन्धकारावृत विषम मार्ग में की गई चेष्टा का परिणाम, अथवा अपरिपक्व रचनाएं तो भी भारतीय आर्यों के परवर्ती काल के धार्मिक कृत्यों एवं दार्शनिक ज्ञान के वे आदिस्रोत तो हैं ही, साथ ही उनका अध्ययन परवर्ती विचारधारा को ठीक-ठीक समझने के लिए भी आवश्यक है। हम एक प्रकार की ताज़गी और सादगी, और वसन्तकाल की बयार के समान एवं प्रातःकाल के खिले हुए फूल की भांति एक अनिर्वचनीय आकर्षण मानव-मस्तिष्क के इन सर्वप्रथम प्रयलों में देखते हैं, जो विश्व के रहस्य को अवगत करके उसकी अभिव्यक्ति करने के लिए किए गए थे। वेद की मूल संहिताएं, जो आज हमें उपलब्ध हैं, उस समय की बौद्धिक स्फूर्ति से प्राप्त हुई हैं जबकि आर्य लोग अपनी वास्तविक मातृभूति को छोड़कर इस देश में आकर बसे थे। वे अपने साथ कुछ ऐसे विशेष भाव एवं विश्वास लाए जिनका इस देश की भूमि में विकास और प्रचलन हुआ। इन सूक्तों की रचना एवं संकलन के मध्य समय का एक बहुत लम्बा अन्तर अवश्य गुज़रा होगा। मैक्समूलर संहिताकाल के दो भाग करता है-छन्दकाल और मन्त्रों का समय।[37] पहले भाग में सूक्तों की रचना हुई। यह एक रचनात्मक काल था, जिसका विशेष स्वरूप वास्तविक काव्य था, जबकि मनुष्यों के मनोभाव गीतों के रूप में स्वाभाविक रूप से बाहर फूट पड़ते थे। उस समय यज्ञों का कहीं पता नहीं चलता। देवताओं के प्रति केवल प्रार्थना द्वारा ही भेंट दी जाती थी। दूसरा काल उनके संकलन का है, जिसमें उन्हें क्रमबद्ध वर्गों में सजाया गया। आज जिस रूप में सूक्त हमारे सामने हैं उनका संग्रह अथवा क्रमबद्ध रूप में संकलन इसी समय में हुआ। इस काल में यज्ञपरक विचारों का भी विकास हुआ। सूक्तों का निर्माण एवं संकलन ठीक-ठीक किस काल में हुआ, यह विषय कल्पनामात्र है। इतना तो हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि ईसा से पन्द्रह शताब्दी पूर्व उनका प्रचलन था। बौद्धमत, जिसका प्रचार भारत में लगभग 500 ई. पू० से हुआ, केवल वैदिक सूक्तों की ही नहीं अपितु समस्त वैदिक साहित्य की पहले से विद्यमानता को, जिसमें ब्राह्मणग्रन्थ और उपनिषदें भी हैं, स्वीकार करता है। ब्राह्मणग्रन्थों में वर्णित यज्ञपद्धतियों को पूर्णरूप से स्थिर होने के लिए और उपनिषदों में प्रतिपादित दार्शनिक विचारों को भी पूर्णरूप में विकसित होने के लिए एक दीर्घकाल की आवश्यकता थी।'[38] विचार के विकास के लिए, जो इस विस्तृत साहित्य में प्रकट है, कम से कम एक हज़ार वर्ष तो चाहिए ही। उक्त साहित्य में जिस प्रकार की विविधता और उन्नति दिखाई देती है, उस पर विचार करते हुए उक्त अवधि भी अधिक नहीं है। कई भारतीय विद्वानों ने वैदिक सूक्तों का समय 3000 ई. पू. बताया है, दूसरों ने 6000 ई. पू., निर्धारित किया है। स्वर्गीय तिलक इनका समय लगभग 4500 ई. पू., ब्राह्मण ग्रन्थों का समय 2500 ई. पू. और प्राचीन उपनिषदों का 1600 ई. पू. निर्धारित करते हैं। जैकोबी सूक्तों के निर्माणकाल को 4500 ई. पू. रखता है। हम उसके लिए 1500 ई. पूर्व का समय रखते हैं और हमें विश्वास है कि इसे आवश्यकता से अधिक पूर्व का समय कहकर कोई इसका विरोध नहीं करेगा।
ऋग्वेदसंहिता में 1,017 ऋचाएं या सूक्त हैं जो कुल 10,600 स्तवकों में हैं। यह आठ अष्टकों में विभक्त है।[39] प्रत्येक में आठ अध्याय हैं जिनका आगे जाकर फिर वर्गरूप में लघु विभाग किया गया है। कभी-कभी ये दस मंडलों (अर्थात् चक्रों) में भी विभक्त किए गए हैं। यह मंडलों वाला विभाग ही अधिक प्रचलित है। पहले मंडल में 191 सूक्त हैं और सरसरी तौर पर 15 भिन्न-भिन्न ऋषि इसके रचयिता बताए जाते हैं, जैसे गौतम, कण्व आदि। सूक्तों के क्रम में एक नियम काम करता है। जिन सूक्तों में अग्नि को सम्बोधन किया गया है वे पहले आते हैं, इन्द्र को सम्बोधित सूक्त दूसरे नम्बर पर और उसके पश्चात् अन्य सब। अगले छः मंडलों की रचना एक विशिष्ट परिवार के ऋषियों ने की, ऐसा कहा जाता है और उनका क्रम भी एक ही समान है। आठवें मंडल में कोई विशेष क्रम नहीं है। पहले मंडल की भांति इसके भी भिन्न-भिन्न रचयिता बताए जाते हैं। नवें मंडल में सोम को सम्बोधन करते हुए सूक्त हैं। आठवें एवं नवें मंडल के बहुत-से सूक्त सामवेद में भी पाए जाते हैं। दसवां मंडल पीछे से जोड़ा गया प्रतीत होता है। हर हालत में इसके अन्दर से विचार हैं जो वैदिक सूक्तों के विकास के अन्तिम काल में प्रचलित थे। यहां प्राचीन कविता की जो प्राकृतिक छवि थी वह दार्शनिक विचार की शुल्क झलक से पीली पड़ गई प्रतीत होती है। सृष्टि के आरम्भ-सम्बन्धी कुछ काल्पनिक सूक्त ही मिलते हैं। इन अमूर्त विचारों के साथ-साथ इनके अन्दर मिथ्या विश्वासयुक्त भूतप्रेतों को दूर करने वाले विचार भी, जो अथर्ववेद के काल के हैं, मिश्रित हैं। जबकि कल्पनापरक भाग इस विषय की ओर संकेत करता है कि वह मस्तिष्क जो पहले गीतात्मक सूक्तों में अपने को प्रकट कर रहा था अब अधिक पूर्णता को प्राप्त कर रहा है, तब इससे यह भी प्रकट होता है कि उस समय तक वैदिक आर्य इस देश के आदिमवासियों के सिद्धान्तों और क्रिया-कलापों से पूरी तरह परिचित हो गए थे; और ये दोनों बातें इसका स्पष्ट संकेत हैं कि दसवां मंडल बहुत पीछे की उपज है।
जिन योग्य विद्वानों ने इन प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों का जीवन-भर अध्ययन किया है, उनके वैदिक सूक्तों के भाव के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न मत हैं। फ्लीडरर ने ऋग्वेद की प्रार्थना का प्रारम्भिक, बच्चों की सी निश्छल प्रार्थना के रूप में वर्णन किया है। पिक्टेट का मत है कि ऋग्वेद के आर्य एकेश्वरवादी थे, भले ही यह विचार अस्पष्ट एवं पिछड़ा हुआ क्यों न हो, रौथ और आर्यसमाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती इसी मत से सहमति प्रकट करते हैं। राममोहनराय की सम्मति में वैदिक देवता परमब्रह्म के भिन्न-भिन्न गुणों के आलंकारिक प्रतिनधि के रूप में हैं। दूसरे विद्वानों के मत में, ब्लूमफील्ड भी उनमें हैं, ऋग्वेद के सूक्त उस प्राचीन असंस्कृत जाति के यज्ञ के निमित्त बनाए गए सूक्त हैं जो कर्मकाण्ड को विशेष महत्त्व देती थी। बर्गेन का मत है कि ये सब आलंकारिक भाषा में लिखे गए हैं। प्रसिद्ध भारतीय भाष्यकार सायण सूक्तों में वर्णित देवताओं की प्राकृतिक व्याख्या को स्वीकार करता है और इसी का समर्थन आधुनिक काल के यूरोपियन विद्वानों ने भी किया है। सायण ने कभी-कभी इन सूक्तों की व्याख्या प्राचीन ब्राह्मणग्रन्थों के धर्म के भाव को लेकर भी की है। विभिन्न प्रकार के ये सब मत एक-दूसरे के विरोधी हों यह बात नहीं, क्योंकि वे सब ऋग्वेद के सूक्तसंग्रह के विषय-स्वरूप की ओर निर्देश करते हैं। ऋग्वेद एक ऐसा ग्रन्थ है, जिसमें पीढ़ी दर पीढी के विचारकों के विचार अंकित हैं और इसीलिए उसके अन्दर भांति-भांति के विचारों का संचय सन्निहित है। मुख्य रूप से हम कह सकते हैं कि ऋग्वेद निश्छल एवं सरल धर्म का प्रतिपादन करता है। सूक्तों का बहुत बड़ा समूह सादा और सरल है, जो एक ऐसी धार्मिक चेतना की अभिव्यक्ति करता है, जो परवर्ती समय के छल-कपट से सर्वथा शून्य था। ऋग्वेद में ऐसे सूक्त भी है जो परवर्ती औपचारिक ब्राह्मणग्रन्थों के काल के हैं। कुछ ऐसे सूक्त हैं, विशेषरूप से अन्तिम मंडल में, जिसमें जगत् के उद्देश्य और उनके अन्दर मनुष्य का स्थान, इस विषय पर किए गए चैतन्य विचारों के परिपक्व परिणाम दिए हुए हैं। ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में वर्णित एकेश्वरवाद उन सूक्तों की विशेषता है। इसमें सन्देह नहीं कि कभी अनेक प्रकार के देवता व्यापक ब्रह्म के ही भिन्न-भिन्न नाम एवं अभिव्यक्ति के रूप में थे।'[40] किन्तु इस प्रकार का एकेश्वरवाद आज तक आधुनिक जगत् कि तीव्र मर्मस्पर्शी एकेश्वरवाद के समान नहीं है।
महान भारतीय विद्वान योगी श्री अरविन्द घोष की सम्मति में वेद रहस्यमय सिद्धान्तों एवं गूढ़ दार्शनिक ज्ञान से भरे हुए हैं। उनके मत में सूक्तों में वर्णित देवता मनोवैज्ञानिक व्यापारों के संकेत हैं। सूर्य मेधा को उपलक्षित करता है, अग्नि इच्छा को, और सोम मनोभावों को। अरविन्द के मत में वेद एक रहस्यपूर्ण धर्म है, जिसकी तुलना प्राचीन ग्रीस के आरफिक और इल्यूसिनियन सम्प्रदायों के साथ की जा सकती है। एक प्रकल्पनात्मक सिद्धान्त, जो मैं प्रस्तुत करता हूं, यह है कि ऋग्वेद स्वयं एक उपयोगी प्रामाणिक ग्रन्थ है, जो आज हमें उपलब्ध है और जो प्राचीनकाल की उसी मानवीय विचारधारा का है जिसके प्राचीन ऐतिहासिक इल्यूसिनियन और औरफिक रहस्य विनष्ट होते हुए अवशेषमात्र रह गए हैं, जबकि मनुष्य जाति के आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक ज्ञान को महत्त्वपूर्ण आकृतियों एवं संकेतों में छिपाया गया था; किन्हीं कारणों से जिनका आज निर्णय करना कठिन है, और इस प्रकार धर्मभ्रष्ट व्यक्तियों से बचाकर केवल धर्म में दीक्षितों के प्रति उनका प्रकाश किया गया। रहस्यवादी योगियों का एक मुख्य सिद्धान्त यह था कि आत्मज्ञान एवं देवताओं के विषय के सत्यज्ञान को पवित्र समझकर गुप्त रखा जाए। वे समझते थे कि यह ज्ञान साधारण मनुष्य के अयोग्य ही नहीं अपितु सम्भवतः अनर्थकारी भी हो सकता है और उसका दुरुपयोग भी हो सकता है, और यदि असभ्य, गंवार और अपवित्रात्माओं को प्रकाश प्रदान किया जाएगा तो उसकी धार्मिकता नष्ट हो जाएगी। इसीलिए वे वाह्य पूजा को क्रियात्मक रूप में बनाए रखने के पक्ष में थे जोकि धर्मभ्रष्ट के लिए अपूर्ण थी और दीक्षित व्यक्ति के लिए आन्तरिक नियन्त्रण का विधान थी, तथा अपनी भाषा को ऐसे शब्दों एवं मूर्तियों का रूप देते थे जो चुने हुए वरिष्ठ व्यक्तियों के लिए उतना ही धार्मिक अर्थ रखता था और साधारण पूजकों के लिए एक ठोस मूर्तरूप अर्थ रखता था। वैदिक सूक्तों की भावना एवं रचना इन्हीं सिद्धान्तों को लेकर हुई।'[41] जब हम देखते हैं कि यह मत केवल आधुनिक यूरोपीय विद्वानों के ही मत के विरुद्ध नहीं है, अपितु सायण के परम्पराश्रित भाष्य एवं पूर्वमीमांसा के मत के भी विरुद्ध है, क्योंकि पूर्वमीमांसा को वैदिक व्याख्या के लिए प्रमाण समझा जाता है, तो हम श्री अरविन्द घोष के नेतृत्व का अनुसरण करने में हिचकते हैं; भले ही उनका मत कितना ही सुकल्पित क्यों न हो। यह सम्भव नहीं हो सकता कि भारतीय विचार की समस्त उन्नति वैदिक सूक्तों के उच्चतम आध्यात्मिक सत्यों से उतरकर शनैः शनैः गिरती चली जाए। मानवीय विकास के सामान्य नियम के अनुसार यह स्वीकार करना तो सरल है कि परवर्ती धर्म और दर्शन असंस्कृत संकेतों एवं आचार सम्बन्धी मौलिक विचारों से और प्राचीन मानवीय मस्तिष्क की उच्च आकांक्षाओं से उदित हुए, बजाय इसके कि उनके विषय में ये धारणा की जाए कि प्रारम्भ में प्राप्त पूर्णता से अवनति के रूप में ये उत्पन्न हुए।
वैदिक सूक्तों के भाव की व्याख्या करने में हम ब्राह्मणों एवं उपनिषदों के मत को स्वीकार करना अधिक उचित समझते हैं, क्योंकि ये तुरन्त उनके पश्चात् आए। ये अर्वाचीन ग्रन्ध वैदिक सूक्तों की परम्परा के अन्दर हैं और उनका विकसित रूप हैं। हम देखते हैं कि पहले बाह्य जगत् की शक्तियों की पूजा करते-करते उपनिषदों का आध्यात्मिक धर्म उन्नत हुआ तो यह बात सरलता से समझ में आ सकती है, क्योंकि धार्मिक उन्नति का स्वाभाविक नियम ऐसा ही है। इस पृथ्वी पर हर जगह मनुष्य बाह्य जगत् से चलकर आभ्यान्तर की ओर आता है। उपनिषदें प्राचीन प्रकृति-पूजा की ओर ध्यान न देकर मात्र वेदों में संकेत रूप में निविष्ट उच्चतम धर्म को ही विकसित करती हैं। यह व्याख्या आधुनिक ऐतिहासिक विधि और प्रारम्भिक मानव-संस्कृति के सिद्धान्त से बिलकुल संगति खाती है और सायण द्वारा प्रतिपादित-प्रतिष्ठित भारतीय मत के भी सर्वथा अनुकूल है।
ऋग्वेद में हमें आदिम, किन्तु कविहृदयों के भावोत्तेजित उद्गार मिलते हैं, जिनसे विदित होता है कि वे इन्द्रियों एवं बाह्य जगत् के विषय में उठने वाली अदम्य आशंकाओं से मुक्ति पाने की खोज में थे। ऋग्वेद के सूक्त इस अंश में दार्शनिक हैं कि वे संसार के रहस्य की व्याख्या किसी अतिमानवीय अन्तर्दृष्टि अथवा असाधारण दैवी प्रेरणा द्वारा नहीं, किन्तु स्वतन्त्र तर्क द्वारा करने का प्रयत्न करते हैं। वैदिक सूक्तों में बुद्धि का जो प्रकाश मिलता है वह सर्वत्र एक-सा नहीं है। ऐसे भी भावुक व्यक्ति थे जिन्होंने केवल आकाश के सौन्दर्य पर और पृथ्वी की अद्भुत वस्तुओं पर विचारकर के वैदिक सूत्रों के निर्माण द्वारा अपनी आत्मा के बोझ को हल्का किया। भारतीय-ईरानी देवता यथा, द्यौः, वरुण, उषाः, मित्र आदि उनकी काव्यमय चेतना की उपज हैं। अधिक क्रियाशील वृत्ति वाले अन्य लोगों ने दृश्य जगत् को अपने-अपने प्रयोजन के अनुकूल बनाने का प्रयत्न किया। जगत् का ज्ञान उन्हें जीवन का मार्ग प्रदर्शित करने में अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ। विजय और युद्ध के काल में इन्द्र जैसे, उपयोगितावाद में उपयुक्त, देवताओं की कल्पना की गई। मौलिक दार्शनिक प्रेरणा एवं इस जगत् के निजी स्वरूप को जानने और समझने की आकांक्षा केवल इसी विप्लव एवं संघर्षकाल के अन्त में प्रगट हुई। यही काल था जब मनुष्यों ने शान्ति से बैठकर उन देवी-देवताओं के बारे में, जिन्हें वे अज्ञान के कारण पूजते रहे थे, शंका करना और जीवन के रहस्यों पर विचार करना प्रारम्भ किया। यही वह काल था जब ऐसी आशंकाएं उठीं जिनका समाधान मानव-मस्तिष्क ठीक-ठीक नहीं कर सका। वैदिक कवि घोषणा करता है, "मैं नहीं जानता कि में क्या हूं, मेरा रहस्यमय, आबद्ध मन इधर-उधर भटकता है।" यद्यपि यथार्थ दर्शनज्ञान के अंकुर आगे चलकर फूटते हैं, फिर भी जीवन का जो स्वरूप वैदिक सूक्तों के काव्य एवं कर्मकाण्ड में प्रतिबिम्बित होता है वह शिक्षाप्रद है। जिस प्रकार काल्पनिक इतिहास पुरातत्त्व-विज्ञान, रसविद्या-रसायनशास्त्र, और फलित एवं गणित ज्योतिष आदि विज्ञानों से पहले आता है, इसी प्रकार पुराणविद्या और कविता दर्शनशास्त्र एवं भौतिक-विज्ञान से पहले आती हैं। दर्शनशास्त्र-सम्बन्धी मानसिक प्रेरणा सबसे पहले पुराणविद्या और धर्म के रूप में अभिव्यक्त होती है। परमसत्ता के विषय में साधारण जनता के अन्दर फैले हुए विश्वासों के सम्बन्ध में जो भी प्रश्न उठते हैं, उनका उत्तर इन्हीं पुराणशास्त्रों व धर्मग्रन्थों में मिलता है। ये सब कल्पना की उपज हैं, जिसके आधार पर वास्तविक जगत् के कारणों की कल्पनात्मक व्याख्या स्वीकार कर ली जाती है। फिर शनैः शनैः जैसे तर्क कल्पना को दबा देता है, एक प्रयत्न किया जाता है जिससे उस नित्य एवं स्थायी तत्त्व को पहचाना जा सके, जिससे जगत् के सब पदार्थ उत्पन्न हुए हैं। विश्वविज्ञान-सम्बन्धी कल्पनाएं पौराणिक धारणाओं का स्थान ले लेती हैं। जगत् के स्थायी अवयवों को देवताओं का रूप दे दिया जाता है और इस प्रकार विश्वविज्ञान और धर्म में परस्पर भ्रमात्मक सम्मिश्रण होता प्रतीत होता है। विचार की प्रारम्भिक अवस्थाओं में, जो हमें 'ऋग्वेद' में मिलती हैं, पुराणविद्या, विश्वविज्ञान, और धर्म एक-दूसरे के अन्दर मिश्रित रूप में मिलते हैं। यहां पर संक्षेप में ऋग्वेद के सूक्तों के अभिमत विषयों का चार भिन्न शीर्षकों अर्थात् परमार्थविद्या (ब्रह्मज्ञान), विश्वविज्ञान, नीतिशास्त्र और परलोकविज्ञान के अन्तर्गत वर्णन करना उचित होगा।
अनेक शताब्दियों में विकसित हुई धार्मिक प्रगति कोई ऐसा सरल और विशद सम्प्रदाय नहीं हो सकता कि उसकी परिभाषा एवं वर्गीकरण आसान काम समझा जा सके। वैदिक सूक्तों का विस्मयकारी पक्ष उनका बहुदेववादी स्वरूप है। अनेक देवताओं का नाम व उनकी पूजा का विधान उनमें मिलता है। तो भी कुछ ऐसे सूक्त हमें अचम्भे में डाल देते हैं, जिनमें उच्चकोटि के दार्शनिक भाव पाए जाते हैं और जिनके असंस्कृत बहुदेवतावाद से एक क्रमबद्ध दर्शन में परिणत होने में अधिक से अधिक लम्बा समय लगा होगा। ऋग्वेद के सूक्तों द्वारा प्रतिपादित धर्म के जो तीन स्तर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं वे इस प्रकार हैं-प्राकृतिक बहुदेवतावाद, एकेश्वरवाद और अद्वैतवाद ।
इस विवेचना में एक महत्त्वपूर्ण विषय जो ध्यान में रखने योग्य है, वह यह है कि देव शब्द अपने स्वरूप में इतना अधिक भ्रान्तिजनक है और इसका प्रयोग कितने ही भिन्न-भिन्न पदार्थों का संकेत करने के लिये किया गया है।"[42] 'देव' वह है जो मनुष्य को देता है।[43] वह समस्त विश्व को देता है। विद्वान पुरुष भी देव है, क्योंकि वह अपने अन्य साथी मनुष्यों को विद्या का दान देता है।'[44] इसी प्रकार सूर्य, चन्द्रमा और आकाश भी देव हैं, क्योंकि वे समस्त सृष्टि को प्रकाश देते हैं। पिता, माता और आचार्य भी 'देव' हैं।"[45] अतिथि भी एक देव है। हमें यहां केवल 'देव' शब्द के उस भाव से मतलब है जो ईश्वर के आधुनिक भाव को व्यक्त करता है। इससे तात्पर्य है, दिव्यगुणयुक्त अथवा प्रकाशमान ।
मानव-मस्तिष्करूपी कारखाने में देवमाला के निर्माण की पद्धति ऋग्वेद में जैसी स्पष्ट देखी जाती है वैसी अन्यत्र नहीं मिल सकती। हमें इसमें मानवीय मानस की एक प्रातःकालीन स्वाभाविक नवीनता एवं उज्ज्वलता मिलती है जो अभी तक पुराने रीति-रिवाजों और नियत परिपाटी से म्लान नहीं हुई थी। विचारधारा के इतिहास में प्रारम्भ नामक कोई विषय नहीं होता, इसलिए कही न कहीं से तो हमें चलना ही होता है। वैदिक देवताओं के, प्राकृतिक शक्तियों से, साम्य स्थापित करने के समय से ही हम प्रारम्भ कर सकते हैं और निर्देश कर सकते हैं कि किस प्रकार शनैः शनैः उन प्राकृतिक शक्तियों को ही साधुवृत्त एवं अतिमानवसत्ता का रूप दे दिया गया। वैदिक सूक्तों के प्राचीनतम ऋषि प्राकृतिक दृश्यों को देखकर अपने सरल स्वभाव के कारण अनायास ही अत्यन्त प्रफुल्लित हो उठते थे। विशेषकर कवि-स्वभाव के कारण उन्होंने प्राकृतिक पदार्थों को ऐसे प्रगाढ़ मनोभावों और कल्पना-शक्ति द्वारा देखा कि उन्हें वे आत्मा की भावना से परिपूर्ण प्रतीत होने लगे। वे प्रकृतिप्रेम से अभिज्ञ थे और इसलिए सूर्योदय एवं सूर्यास्त के अद्भुत दृश्यों में खो गए, क्योंकि ये दोनों ही रहस्यमयी प्राकृतिक घटनाएं हैं, जो आत्मा को प्रकृति के साथ जोड़ देती हैं। उनके लिए प्रकृति एक जीवित सत्ता थी, जिसके साथ वे प्रेम सम्बन्ध जोड़ सकते थे। प्रकृति के कुछ उज्ज्वल स्वरूप एक प्रकार से द्युलोक के ऐसे झरोखे थे जिनमें से दैवी शक्ति नीचे के ईश्वरविहीन जगत् को झांकती-सी प्रतीत होती थी। चांद और तारे, अगाध समुद्र और अनन्त आकाश, सूर्योदय और रात्रि का आगमन इन सबको दैवी घटना समझा जाने लगा। वैदिक धर्म का प्रारम्भिक रूप
इसी प्रकार की प्रकृति की पूजा था। शीघ्र ही चेष्टाविहीन विचार ने आर्य लोगों के जीवन में प्रवेश किया। एक स्वाभाविक
प्रयत्न इस दिशा में होने लगा कि पदार्थों के आभ्यान्तर स्वरूप में प्रवेश किया जाए। मानव ने अपने ही समान देवों की सृष्टि करना प्रारम्भ किया। अविकसित मानव का धर्म संसार में सर्वत्र 'अवतारवाद' (अर्थात् ईश्वर के मानवीय रूप को मानना) के रूप में ही रहा है। हम भौतिक जगत् की अस्तव्यस्तता को मानने को तैयार नहीं हैं। हम भौतिक जगत् को किसी न किसी प्रकार से समझने की कोशिश करते हैं और जीवन के विषय में एक न एक सिद्धान्त भी स्थिर कर लेते हैं, जिसे हम निश्चित रूप से यह समझ लेते हैं कि इससे अधिक अच्छा दूसरा सिद्धान्त नहीं होगा। स्वभावतः ही हम अपने संकल्प शक्ति रूपी साधन को आगे बढ़ाकर घटनाओं का समाधान उनके आध्यात्मिक कारणों द्वारा करते हैं।'[46] हम सब बातों की ब्याख्या अपने ही स्वभाव की उपमा से करते हैं और इसलिए सब भौतिक घटनाओं की पृष्ठभूमि में भी इच्छाशक्ति का होना यथार्थ रूप में मान लेते हैं। इस कल्पनात्मक सूत्र को सर्वजीववाद के साथ नहीं मिलाना चाहिए, क्योंकि इस कल्पना में प्रकृति-मात्र के अन्दर चेतना के मत को स्वीकार नहीं किया गया है। यह एक प्रकार का बहुदेवतावाद है, जिसमें विलक्षण भौतिक घटनाओं को, जिनसे भारत भरा पड़ा है, दैवीय घटनाओं का रूप दे दिया जाता है। धार्मिक अन्तःप्रेरणा अपनी अभिव्यक्ति इसी प्रकार करती है। गहन धार्मिक भावना के क्षणों में जब मनुष्य किसी आसन्न विपत्ति से छुटकारा पा जाता है और प्रकृत्ति की महान शक्तियों के आगे अपने को नितान्त असमर्थ पाता है तब वह ईश्वर की उपस्थिति की यथार्थता समझ पाता है। वह तूफान में परमात्मा की आवाज़ को सुनता है और अगाध एवं प्रशान्त समुद्र में भी उसी के अस्तित्व का अनुभव करता है। आधुनिक आत्मसंयमी सम्प्रदाय के समय तक हमें इसी प्रकार की भावनाएं मिलती हैं। "सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र, ऋत और मनुष्यों तक को देवता बना डाला गया।"[47] यह अच्छी बात है कि वैदिक आर्य एक अदृश्य लोक की यथार्थता में विश्वास रखते थे। उन्हें इस विषय में तनिक भी सन्देह नहीं था। देवता विद्यमान हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृतिवाद और अवतारवाद वैदिक धर्म का प्राथमिक श्रेणियां रही होंगी।
अब यह इतिहास का सर्वमान्य विषय है कि वैदिक आर्य और ईरानी लोग एक ही जाति के हैं और इनमें बहुत-सी समानताएं एवं बन्धुत्व का नाता दिखाई देता है। वे अपने एक ही आदिनिवासस्थान से भारत में और पारसियों के ईरान में आए। वे अपने उस आदिस्थान में तब तक एक ही अभिन्न जाति के रूप मे रहते रहे थे जब तक कि जीवन की आवश्यकताओं, जगह की कमी, एवं साहसिकता के भाव ने उन्हें अपनी मातृभूमि को छोड़कर नये क्षेत्रों की खोज में बाहर निकलकर भिन्न-भिन्न दिशाओं में घूमने को बाधित नहीं कर दिया।[48] यही कारण है कि हमें फारस एवं भारत के प्राचीन धर्मों एवं दार्शनिक विचारों में इतना साम्य और बन्धुत्व दिखाई देता है। डाक्टर मिल्स का कहना है कि "पारसियों का धर्मग्रन्थ, ज़िन्दावस्ता, वेदों के जितना सन्निकट है उतने निकट इनके अपने संस्कृत के महाकाव्य भी नहीं हैं।" दोनों धर्मग्रन्थों में भाषा-सम्बन्धी अन्तर्निहित अविच्छिन्नता पाई जाती है। जब आर्य-जाति के लोग पंजाब के मार्ग से भारत आए, तो उनका भारत के उन आदिवासियों से सामना हुआ जिन्हें उन्होंने दस्यु की संज्ञा दी और जो उनके निर्वाध प्रसार का विरोध करते थे।[49]' ये दस्यु लोग कृष्ण वर्ण के थे, गोमांस खाते थे और भूत-प्रेत आदि की पूजा करते थे। आर्य लोग इनके सम्पर्क में आकर अपने-आपको इनसे पृथक् रखने के इच्छुक थे। जातिगत अभिमान के कारण व अपनी संस्कृति की सर्वोत्तमत्ता के कारण उत्पन्न हुए, अपने को दस्युओं से पृथक् रहने के भाव ने ही आगे चलकर जात-पांत के भेदभाव का रूप धारण कर लिया। अपने धर्म को पवित्र रखने और उसे भ्रष्टता से बचाने की चिन्ता ने ही आर्यों को अपने पवित्र धार्मिक साहित्य को एकत्र करने की ओर अग्रसर किया। 'संहिता' शब्द से, जिसका अर्थ है संकलन अथवा संग्रह, संकेत मिलता है कि ऋग्वेद के सूत्र उस समय संग्रह किए गए जबकि भारत की भूमि पर आर्यों का अनार्यों के साथ सम्पर्क हुआ। हम वैदिक देवताओं की रूपरेखा उन भारतीय-ईरानी देवताओं के साथ प्रस्तुत करेंगे, जो दोनों बंधु-जातियों में परस्पर अलग होने से पहले समान रूप से मान्य समझे जाते थे।
इस संसार की अपूर्णता की भावना, मनुष्य की दुर्बलता, और एक उच्च आत्मा की आवश्यकता-जो पथप्रदर्शक, सच्चा मित्र और एक ऐसा आधार बन सके जिसका आश्रय मनुष्य ले सके और जिससे वह विपत्ति में अपील कर सके यह सब व्यथित हृदय के पक्ष में स्वाभाविक है। उस प्रारम्भिक काल में अनन्त के प्रति इस प्रकार की आकांक्षा को सिवा असीम और जाज्वल्यमान धु लोक के और कोई कल्पना इतनी अच्छी तरह सन्तुष्ट नहीं कर सकती थी। सूर्य, चन्द्रमा और तारागण स्थान-परिवर्तन कर सकते हैं, आंधी-तूफान आ सकते हैं और मेघ भी मंडराकर विलुप्त हो सकते हैं किन्तु अनन्त आकाश सदा स्थिर रहता है। द्यौः[50] केवल भारतीय-ईरानी देवता ही नहीं है, किन्तु भारतीय-यूरोपीय भी है। यूनान देश में यह जीयस के नाम से विद्यमान है, इटली में जुपिटर (यौस्पिना, द्यु लोक का पिता) और ट्यूटनिक वन्य जातियों में टाइर और ट्याई के रूम में। देव शब्द का प्रारम्भिक अर्थ है उज्ज्वल, और आगे चलकर यह सभी प्रकाशमान तत्त्वों के लिए, यथा सूर्य, आकाश (द्युलोक), नक्षत्रगण, सूर्योदय और दिन आदि के लिए, प्रयोग में आने लगा। यह समस्त उज्ज्वल पदार्थों को प्रकट करने वाली परिभाषा के रूप में परिणत हो गया। पृथ्वी को भी शीघ्र ही देवी मान लिया गया। शुरू-शुरू में संभवतः आकाश एवं पृथ्वी विस्तृतता, चौड़ाई और उत्पादन-क्षमता आदि अपने भौतिक रूपों को ही अभिव्यक्त करते थे।'[51] 'मधु देने वाली', 'दूध से पूर्ण' ऐसे गुण भूमि के कहे जाते थे। किन्तु सबसे पहले यु लोक और पृथ्वीलोक को ही मानवीय गुणों से युक्त रूप दिया गया, जैसे 'हास न होने वाला', 'पिता', 'माता' आदि। उपकारिता, सर्वज्ञता, धर्मात्मापन आदि जैसे आचार-सम्बन्धी गुण भी उसमें जोड़ दिए गए ।''[52] यह हो सकता है कि इस विषय में धीरे-धीरे प्रगति हुई अर्थात् भौतिक अवस्था से चेतनत्य, और चेतनतत्व से दैवीय रूप तक पहुंचा गया। पृथ्वी और द्यु लोक-जिनकी सबसे पहले प्राचीन समय में संसार में सर्वत्र पूजा होती थी यद्यपि शुरू-शुरू में अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखते थे- शीघ्र ही एक प्रकार के वैवाहिक बन्धन में बंध गए। पृथ्वी को फलदायिनी माँ के समान माना जाने लगा, जिसमें आकाश या द्यु लोक बीज वपन करके उसे गर्भित करता है। होमरिक छन्दों में भूमि को 'देवताओं की माता' और 'नक्षत्र-मण्डल-मण्डित द्यु लोक की पत्नी[53] के रूप में सम्बोधित किया गया है। भूमि और द्यु लोक सबके माता-पिता-तुल्य हैं, जो सब प्राणियों को जीवन देते हैं और उन्हें जीवन-निर्वाह के साधन प्रदान करते हैं। ऋग्वेद में उन्हें प्रायः द्वित्व की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है, अर्थात् सत्ताएं दो हैं, किन्तु वे एक ही सामान्य प्रत्यय को अभिव्यक्त करती हैं। ये सबके लिए एक समान माध्यम हैं- सूर्य, सूर्योदय, अग्नि, वायु और वर्षा ये सब उनकी सन्तति हैं। वे मनुष्यों एवं देवताओं दोनों के माता-पिता हैं।'[54] ज्यों ही देवों की संख्या बढ़ने लगी, प्रश्न उत्पन्न हुआ कि द्यु लोक और पृथ्वी का निर्माण किसने किया? "देवों में वह अवश्य ही सबसे चतुर कारीगर होगा, जिसने उन चमत्कारी और प्रकाशमान द्युलोक और पृथ्वी को उत्पन्न किया जो सब पदार्थों में उल्लास पैदा करते हैं; और जो अपनी मेघा के बल से उक्त दोनों दिव्य पदार्थों को मापता है और उन्हें नित्य एवं स्थायी आधारों पर स्थिर रखता है।"[55] इस प्रकार की सृजनशक्ति अग्नि,[56] इन्द्र,'[57] अथवा सोम[58] में बताई गई। इसी प्रतिष्ठित वर्ग में अन्य देव भी आ जाते हैं।'[59]
वरुण आकाश का देवता है। यह शब्द 'वर्' धातु से निकला है, जिसका अर्थ है ढक लेना अथवा घेरना (पूर्ण कर लेना)। यूनान के आरणौस और ज़िन्दावस्ता के अहुरमज़्दा के साथ इसका तादात्म्य है। उसका भौतिक उत्पत्ति स्थान प्रत्यक्ष है। वह आच्छादन करने वाला अथवा लपेटने वाला है। वह आकाश के तारामंडित विस्तृत क्षेत्र को 'मानो एक लम्बे चौगे से समस्त जीव-जन्तुओं एवं उनके निवासस्थानों सहित आच्छादित करता है।"[60] मित्र उसका बराबर का साथी है। वरुण और मित्र जब एक साथ प्रयुक्त किए जाते हैं तो दिन-रात एवं अन्धकार व प्रकाश का बोध कराते हैं। वरुण के व्यक्तित्व को शनैः शनैः परिवर्तित करते- करते आदर्श रूप दे दिया गया। यहां तक कि वह वेदों का अत्यन्त सदाचारी देवता माना जाने लगा। वह समस्त विश्व का निरीक्षण करता है, पापियों को दण्ड देता है और जो उससे क्षमा प्रार्थना करते हैं, उनके पापों को क्षमा कर देता है। सूर्य उसके चक्षु हैं, आकाश उसके बस्त्र हैं, और तूफान उसका निःश्वास है।'[61] नदियां उसी की आज्ञा से बहती हैं,'[62] सूर्य चमकता है, नक्षत्र और चन्द्रमा अपनी-अपनी परिधियों में उसी के भय से स्थित रहते हैं।[63] उसी के नियम से द्यु लोक और पृथ्वी अलग-अलग वर्तमान हैं। वही भौतिक एवं नैतिक व्यवस्था को संभाले हुए है। वह चंचल चित्त न होकर घृतव्रत, अर्थात् दृढ़ संकल्पवाला है। अन्यान्य देवता उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। वह सर्वज्ञ है और इसलिए आकाश में पक्षियों की उड़ान का ज्ञान रखतां है, समुद्र में जहाज़ों के मार्ग का और वायु के मार्ग का भी ज्ञान रखता है। बिना उसके जाने कोई चिड़िया तक नहीं गिर सकती। वही परम ईश्वर है, देवों का देव, अपराधियों के लिए कठोर और पश्चात्ताप करने वालों के लिए दयालु है। वह जगत् के सदाचार-संबंधी नित्यनियमों के, जिनका विधान उसी ने किया है, अनुकूल चलता है, तो भी अपने दयालु स्वभाव के कारण उन्हें भी क्षमा करने को उद्यत है जो उसके नियमों का उल्लंघन करते हैं। "जो पाप करता है, वह उसके प्रति भी कृपालु है।[64] वरुण को सम्बोधित करते हुए जितने भी सूक्त हैं, सबमें हम पापों के लिए क्षमा की प्रार्थना ही पाते हैं, जो अपराधों की स्वीकृति और पश्चात्ताप से ओत-प्रोत हैं।[65] इससे ज्ञात होता है कि आर्य जाति के कविगण पाप के बोझ के भाव एवं उससे छुटकारा पाने की प्रार्थना से अभिज्ञ थे। वैष्णवों और भागवतों का आस्तिक्यवाद, जिसमें भक्ति पर बल दिया गया है, वैदिक वरुण की पूजा का ही रूप प्रतीत होता है जिसमें पाप सम्बन्धी ज्ञान एवं उसके लिए दैवीय क्षमा पर विश्वास प्रकट किया गया है। प्रोफेसर मैकडानल का कहना है, "वरुण का स्वरूप उच्चतम प्रकार के एकेश्वरवाद में जो दैवीय शासक का रूप है, उससे सादृश्य रखता है।"[66]
वह नियम, जिसका वरुण अभिरक्षक है, ऋत कहलाता है। ऋत का शब्दार्थ है, वस्तुओं की कार्यविधि। ऋत से तात्पर्य साधारणतः सब प्रकार के नियमों से है और न्याय के सर्वव्यापी भाव का भी यह द्योतक है। इस भाव का सुझाव प्रारम्भ में सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रगण की नियमित गतियों एवं दिन और रात के नियमित परिवर्तनों से एवं ऋतुओं के नियमित क्रम के कारण हुआ होगा। ऋत से तात्पर्य विश्व की व्याख्या से भी है। इस विश्व में प्रत्येक पदार्थ में जो व्यवस्था पाई जाती है वह ऋत के कारण ही है। यह वही नियम है जिसे प्लेटो व्यापक नियमों के नाम से पुकारता हैं ।''[67] दृश्यमान जगत् उसी ऋत की छायामात्र है जोकि एक स्थिरसत्ता है और सब प्रकार की उथल-पुथल एवं परिवर्तन की विक्रियाओं में अपरिवर्तित रहती है। 'व्यापक नियम' विशिष्ट पदार्थ से पूर्व विद्यमान रहता है और इसीलिए वैदिक ऋषि का विचार है कि ऋत प्रत्येक घटना के प्रकाश में आने से पूर्व विद्यमान रहता है। संसार के परिवर्तनशील क्रम निरन्तर रहने वाले ऋत की ही भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियां हैं। और इसीलिए ऋत को सबका जनक कहा गया है। "मरुद्गण ऋत के ही दूरस्थस्थान से निकलते हैं ।''[68] विष्णु ऋत की अविकसित अवस्था का नाम है।'[69] द्यु लोक और पृथ्वी भी ऋत के कारण द्यु लोक और पृथ्वी कहलाते हैं ।''[70] अपरिवर्तनीय सत्ता के रहस्यपूर्ण भाव के चिह सबसे पूर्व यहीं दिखाई देते हैं। यथार्थ सत्ता अपरिवर्तनीय कानून है। जो दिखाई देता है व अस्थाई प्रदर्शन है, एक अपूर्ण नकल है। यथार्थ सत्ता वह है जिसमें विभाग अथवा परिवर्तन नहीं है जबकि अन्य सब परिवर्तनशील और नश्वर हैं। शीघ्र ही विश्व की यह व्यवस्था एक परम ईश्वर की स्थिर इच्छा के रूप में परिणत हो जाती है, जो सदाचार एवं साधुता का भी नियम है। देवता भी इसका अतिक्रमण नहीं कर सकते। ऋत (त्रिकालाबाधित सत्यरूपी नियम) के भाव में भौतिक से दैवीय विकास को हंम देख सकते हैं। ऋत का मौलिक तात्पर्य था, 'संसार, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रगण, प्रातःकाल, सायंकाल एवं दिन और रात की गति का नियमित मार्ग।' शनैः शनैः यह एक ऐसे सदाचार के मार्ग, जिनका अनुसरण मनुष्य को करना चाहिए, और साध्वाचार के नियम के अर्थों में व्यवहत होने लगा जिनका पालन देवताओं के लिए भी आवश्यक है। "सूर्योदय ऋत के मार्ग का अनुसरण करता है जो ठीक मार्ग है, माना वह पहले से ही उन नियमों को जानता था। वह देशों का अतिक्रमण कभी नहीं करता। सूर्य भी ऋत के मार्ग के अनुसरण करता है।"[71] समस्त विश्व-ब्राह्माण्ड ऋत पर आश्रित है और इसी के अन्दर रहकर गति करता है। ऋत के इस भाव से हमें वर्ड्सवर्थ का कर्तव्य के प्रति कहा हुआ निम्नलिखित'[72] वाक्य स्मरण हो आता है:
तू ही तारागण को विपरीत मार्ग में जाने से बचाता है।
और अत्यन्त प्राचीन द्यु लोक भी तेरे द्वारा ही स्फूर्तिमान व बलशाली है।
भौतिक जगत् में जिसे कानून कहा जाता है सदाचार-जगत् में उसे ही धर्म कहते हैं। सदाचारी जीवन के सम्बन्ध में जो यूनानी विद्वानों का विचार है कि वह एक व्यवस्थापूर्ण और समतायुक्त विषय है, उसी भाव की झलक यहां मिलती है। वरुण, जो पहले भौतिक जगत् का रक्षक समझा जाता था, सदाचार की व्यवस्था का संरक्षक- 'ऋतस्य गोपः' और पाप के लिए दण्ड देने वाला बन गया। कितनी ही अवस्थाओं में देवताओं से प्रार्थना की जाती है कि हमें सन्मार्ग में ले जाएं। "हे इन्द्र! हमें ऋत के मार्ग का निर्देशन करो जो सब बुराइयों से ऊपर यथार्थ मार्ग है।"[73] जैसे ही ऋत के विचार को अपनाया गया, देवों के स्वरूप में भी परिवर्तन हो गया। अब संसार अस्तव्यस्तता एवं उद्देश्यहीन आकस्मिक अवयवों से पूर्ण न होकर एक समता के क्रम में और विशेष प्रयोजन के अनुसार कार्य करता हुआ प्रतीत होता है। जब कभी अविश्वास हमें ललचाकर अन्दर के विश्वास को टुकड़े-टुकड़े करने लगता है, तब इस प्रकार की भावना हमें सान्त्वना एवं शान्ति प्रदान करती है तथा सुरक्षा का भाव हमारे मन में आता है। चाहे कुछ भी क्यों न हो, हम अनुभव करते हैं कि धर्म-सम्बन्धी एक कानून सदाचार के क्षेत्र में वर्तमान है, जो प्रकृति में स्थित सुन्दर व्यवस्था के ही अनुकूल है। जैसे सूर्य का अगले दिन उदय होना निश्चित है, वैसे ही धर्म की विजय भी निश्चित है। ऋत के ऊपर भरोसा किया जा सकता है।
मित्रदेव भी वरुण का सहचारी है और साधारणतः उसी के साथ इसकी प्रार्थना की जाती है। वह कभी-कभी सूर्य को और कभी प्रकाश को अभिव्यक्त करता है। वह एक सर्वद्रष्टा और सत्यप्रिय देवता भी है। मित्र और वरुण दोनों संयुक्त रूप में ऋत के संरक्षक हैं और पाप को क्षमा करने वाले हैं। शनैः शनैः मित्र का सम्बन्ध प्रातःकालीन प्रकाश के साथ और वरुण का रात्रि के आकाश के साथ हो गया। वरुण और मित्र को आदित्य की संज्ञा दी जाती है, अर्थात् यह अर्यमण और भग के समान अदिति के पुत्र हैं।
सूर्यदेव संसार को प्रकाश देने वाला है। उसे सम्बोधन करते हुए दस सूक्त मिलते है। सूर्य की पूजा मनुष्य के मानस के लिए स्वाभाविक है। यह यूनानी धर्म का एक आवश्यक अंग है। प्लेटो ने अपने 'रिपब्लिक' में सूर्यपूजा को आदर्श बताया है। उसके मत में सूर्य धर्म का प्रतीकस्वरूप है। फारस देश में हमें सूर्यपूजा का विधान मिलता है। सूर्य जो संसार में प्रकाश एवं जीवन का कर्ता है, अतिप्राकृतिक शक्ति से सम्पन्न है। वह 'समस्त स्थावर और जंगम जगत्' का जीवन है। वह सर्वद्रष्टा है और ऊपर से चुपके-चुपके सारे जगत् का पर्यवेक्षण करता है। वह मनुष्यों को अपने-अपने कर्मों में प्रवृत्त होने के लिए जगाता है, अन्धकार को दूर करता है और प्रकाश देता है। "सूर्य दोनों लोकों में संचार के लिए मनुष्यों पर निगाह रखते हुए उदय होता है। वह सब स्थावर एवं जंगम जगत् का रक्षक और मनुष्यों के अच्छे व बुरे कर्मों का साक्षी है।"[74] सूर्य जगत् का रचयिता और शासनकर्ता भी है।
सम्पूर्ण सूक्तों में विख्यात 'सवितृ' भी एक सूर्यदेवता है। स्वर्णाक्षि, स्वर्णहस्त और स्वर्णजिह्वा वाले के रूप में उसका वर्णन किया गया है। उसे कभी-कभी तो सूर्य से मिन्न बतलाया गया है, यद्यपि कभी-कभी सूर्य के साथ उसका तादात्म्य भी दिखाया गया है।[75] सविता केवल देदीप्यमान दिन के उज्ज्वल सूर्य को ही नहीं अपितु रात्रि के अदृश्य सूर्य को भी दर्शाता है। उसका एक उच्च सदाचारी पक्ष है, जिसकी प्रार्थना पश्चात्ताप करने वाले पापी लोग अपने पाप के मार्जन के लिए करते हैं। "जो भी अपराध हमने स्वर्ग के देवताओं के प्रति किया हो, विचार की निर्बलता के कारण अथवा शारीरिक दुर्बलता के कारण अथवा गवं के कारण अथवा मनुष्य-स्वभाव के कारण, हे सविता, हमसे उस पाप को दूर करो।"[76] गायत्री मंत्र भी सूर्य को सविता के रूप मानकर सम्बोधन किया गया है। "आओ, हम सविता के उस अर्चनीय तेज का ध्यान करें जिससे कि वह हमारी बुद्धियां को ज्ञान द्वारा प्रकाशित करे।" यजुर्वेद का मंत्र, जिसे प्रायः उद्धृत किया जाता है, सविता को ही सम्बोधन करता है, "हे ईश्वर, सविता, सबके सृष्टा, बाधाओं को दूर करके, हमें जो कुछ कल्याणकारी है उसकी प्राप्ति कराओ!"
सूर्य ही विष्णु के रूप में सब लोकों को धारण करता है।'[77] विष्णु त्रिपाद देवता है जो पृथ्वी, द्यु लोक और अन्यान्य ऊंचे लोकों को, जो मरणधर्मा मनुष्यों के इन्द्रियगोचर हैं, आच्छादित करता है। उसकी महत्ता को पहुंचना कठिन है। "हे विष्णु, हम इस पृथ्वी से तेरे दो ही लोकों को जान सकते हैं, किन्तु तेरा अपना जो सबसे ऊंचा स्थान है, उसे केवल तू ही जान सकता है।"[78] ऋग्वेद में विष्णु को गीण स्थान पर रखा गया है, यद्यपि उसके आगे महान भविष्य है। वैष्णवधर्म का मूल ऋग्वेद में पाया जाता है, जहां कि विष्णु को 'बृहत-शरीरः' करके कहा गया है, अर्थात् जिसका शरीर बड़ा है, अथवा संसार मात्र जिसका शरीर है, 'प्रत्येत्याहवम्', अर्थात् जो भक्तों के बुलाने पर आ उपस्थित होता है।[79] उसके लिए कहा जाता है कि विपद्ग्रस्त मनुष्य के लिए उसने पृथ्वी को तीन पगों में नाम लिया।"[80]
पूषन् सौर जगत् का एक और देवता है। प्रत्यक्ष रूप में वह मनुष्य का मित्र है- चरागाह का देवता अर्थात् पशुओं का संरक्षक। वह यात्रियों और कृषकों का देवता है। र
स्किन कहता है, "एक यथार्थ विचारक मनुष्य के लिए सूर्योदय से बढ़कर कोई और गम्भीर धार्मिक अनुष्ठान नहीं है।" असीम प्रभातवेला जो प्रत्येक प्रातःकाल में दिग्दिगन्त में प्रकाश एवं जीवन को प्रक्षिप्त करती है, उषादेवी के रूप में प्रकट होती है, जिसे यूनानी साहित्य में इओस कहा गया है, जिससे प्रातःकाल की उज्ज्वल कन्या के रूप में अश्विनी देवता-युगल एवं सूर्य दोनों प्रेम करते हैं, किन्तु जो सूर्य के सामने तिरोहित हो जाती है जबकि वह अपनी स्वर्णिम किरणों से उसका आलिंगन करना चाहता है।
लगभग पचास पूरे मन्त्रों में, और बहुत-से अन्य मन्त्रों में भी अंशरूप से, अश्विनी बन्धुओं की प्रार्थना की गई है।'[81] वे अविच्छेद युगल हैं जो उज्ज्वल दीप्ति के स्वामी, शक्तिशाली एवं द्रुतगामी और गरूड़ के समान वेगवान हैं। वे घु लोक के पुत्र हैं और उपा उनकी बहन है। यह कल्पना की जाती है कि संध्याकाल की घटना उनका मुख्य आधार है। यही कारण है कि हमें दो अश्विनी बन्धु बतलाए गए हैं, जो सूर्योदय और सूर्यास्त के प्रतिरूप हैं। आगे चलकर ये अश्विनी बन्धु देवताओं एवं मनुष्यों के वैद्य बन गए अद्भुत कार्यकर्ता, एवं वैवाहिक प्रेम और जीवन के रक्षक तथा दलितवर्ग को सब प्रकार दुःखों से छुटकारा दिलाने वाले ।
हम पहले ही अदिति का वर्णन कर चुके हैं, जिससे अनेक देवताओं की, जिन्हें आदित्य नाम से पुकारा जाता है, उत्पत्ति हुई है। अदिति का शव्दार्थ है, असीम एवं बंधन-रहित। ऐसा प्रतीत होता है कि यह नाम उस अदृश्य अनन्त का है, जो हमारे चारों ओर व्याप्त है और जी पृथ्वी से भी दूर अनन्त विस्तृत क्षेत्र है, अर्थात् मेघमाला एवं आकाश भी अदिति हैं। यह उस सबका, जो यहां और इससे भी परे है, अपरिमित आधार-स्वरूप है। "अदिति आकाश है, अदिति मध्यवर्ती देश भी है, अदिति पिता और माता एवं पुत्र है। अदिति सब देवता हैं और पञ्चजन भी अदिति हैं; जो उत्पन्न हुआ है और जो भविष्य में उत्पन्न होगा वह सब अदिति है।"[82] यह हमें एक व्यापक, सबकी इच्छा की पूर्ति करने वाली, सर्वोत्पादक, अनन्तशक्तिशाली प्रकृति के निजी रूप की पूर्वानुभूति होती है, जिसे सांख्य में भी प्रकृति कहा गया है। यह अनाक्सिमेंडर की अनंत सत्ता की समानान्तर है।
प्रकृति का एक महत्त्वपूर्ण चमत्कार, जिसे बढ़ाकर देवी का पद दिया गया है, 'अग्नि' है। अग्नि'[83] का महत्त्व केवल इन्द्र के नीचे दूसरे दर्जे पर है, जिसे कम से कम 200 मन्त्रों में सम्बोधित किया गया है। अग्नि का विचार प्रखर दाहक सूर्य से उदित हुआ, जो अपनी गर्मी से न जलने योग्य पदार्थ को भी जला देता है। यह बिजली की भांति ही बादलों से आई। इसका उदग्मस्थान चकमक पत्थर भी है।'[84] यह अरणी नामक लकड़ियों से भी निकलती है। ऐसा समझा जाता है कि मातरिश्वा प्रोमिधिवस की भांति अग्नि को आकाश से पृथ्वी पर वापस लाया और भृगु लोगों[85] को इसकी रक्षा का भार सौंपा। अग्निदेवता के भौतिक स्वरूप का वर्णन इस प्रकार किया जाता है कि उसके पिंगल रंग की दाढ़ी है, तेज़ जबड़े हैं और जलते हुए दांत हैं। लकड़ी और घी उसका भोजन है। वह सूर्य के समान रात्रि के अन्धकार को दूर करता हुआ चमकता है। जब वह वनों पर आक्रमण करता है तो उसका मार्ग कृष्णवर्ण होता है और उसकी आवाज़ घु लोक की बिजली की कड़क के समान होती है। वह धूमकेतु है। "हे अग्नि, यह काष्ठ जिसे, मैं तुम्हें अर्पित करता हूं, स्वीकार करो। इसको चमक के साथ जलाजो और अपने पवित्र धुएं को ऊपर भेजो, अपनी छटा से आकाश के उच्चतम भाग का स्पर्श करो और सूर्य की किरणों में मिल जाओ।"[86] इस प्रकार अग्नि का निवास केवल पृथ्वी पर अंगीठी में अथवा वेदी में ही नहीं, किन्तु आकाश में और अन्तरिक्ष में भी है, उसी प्रकार जिस प्रकार सूर्य, और प्रभातवेला, एवं बादलों में बिजली, वर्तमान है। अग्निदेवता शीघ्र ही परम देव बन जाता है, जिसका विस्तार यु लोक एवं पृथ्वी दोनों जगहों में है। ज्यों-ज्यों अग्निदेवता का भाव अधिकाधिक अमूर्तरूप पकड़ता गया, यह उत्तरोत्तर उत्कृष्ट एवं अलौकिक रूप धारण करता गया। इसने देवताओं और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ होने का एवं सबका सहायक होने का रूप धारण किया। "हे अग्नि, हमें यहां आहुति के लिए, वरुण को प्राप्त कराओ, इन्द्र को आकाशलोक से और मरुतों को वायुलोक से ले आओ।"[87] "मैं अग्नि को अपना पिता करके मानता हूं। मैं उसे अपना बन्धु करके मानता हूं, अपना भाई और मित्र भी मानता हूं ।''[88]
सोम जोकि स्फूर्ति का देवता है, अमर जीवन का दाता है, ज़िन्दावस्ता के हाओमा के सदृश है और यूनान के 'डायोनिसस' के समान है, मदिरा और द्राक्षा का देवता है। दुखी मनुष्य अपने दुःखों को भूल जाने के विचार से मत्त होना चाहता है। जब यह पहले- पहल किसी मादक द्रव्य का आश्रय लेता है तो उसे अपूर्व आह्लाद का स्पन्दन अनुभव होता है। इसमें सन्देह नहीं कि वह उन्मत्त हो जाता है। किन्तु वह सोचता है कि यह दैवीय उन्माद है। जिन्हें हम आध्यात्मिक दृष्टि, आकस्मिक प्रकाश, गम्भीरतम अन्र्दृष्टि, बृहत्तर वदान्यता एवं विस्तृत विचार कहते हैं वे सब आत्मा की दैवीय प्रेरणायुक्त अवस्था के साथ-साथ ही आते हैं। इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है कि मदिरा, जो आत्मा को ऊंचा उठाती है, दैवीय स्थिति को प्राप्त हो जाती हो। व्हिटनी का कहना है, "सरलचित आर्य लोगों ने, जिनकी समस्त पूजा आश्चर्यमय शक्तियों की और प्राकृतिक घटनाओं की होती थी, शीघ्र ही यह अनुभव किया कि उक्त तरल पदार्थ में आत्मिक शक्तियों को ऊंचा उठाने का सामर्थ्य है और वह एक प्रकार का अस्थायी उन्माद उत्पन्न कर देता है, जिसके प्रभाव में मनुष्य ऐसे- ऐसे कार्य कर डालने की ओर प्रवृत्त हो जाता है और उनके लिए उसमें शक्ति भी आ जाती है, जो उसकी नैसर्गिक शक्ति से बाहर होते हैं; और इसीलिए उन्हें इसमें कुछ दिव्यता की भावना प्रतीत हुई। उनके विचार में यह एक ऐसे देवता-स्वरूप थी जो मद्यपों के अन्दर प्रविष्ट होकर उनमें ईश्वरतुल्य शक्तियों का समावेश कर देती है। और इस शक्ति को देने वाला यह सोम का पौधा उनके लिए वनस्पति का राजा बन गया तथा मदिरा तैयार करने की विधि पवित्र यज्ञ बन गई। उसके लिए जिन औज़ारों का प्रयोग किया गया वे भी पवित्र माने जाने लगे। यह सम्प्रदाय अत्यन्त प्राचीन है। इस बात के साक्ष्य उन उद्धरणों से मिलते हैं जो पारसियों की अवस्ता में पाए जाते हैं। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की भूमि पर इसे एक प्रेरणा मिली।"[89] इस भूमि पर सोम का पूर्णरूप में मानवीकरण नहीं हुआ। वह पौधा और उसका रस कवि के मानस में इतने स्पष्ट रूप में बैठा हुआ है कि वह उन्हें आसानी से देवत्य प्राप्त नहीं करा सकता। सोम को सम्बोधित मन्त्र उस समय गाए जाने के लिए थे जबकि पौधे से रस निकाला जाता था। "हे सोम ! तुम, जिसे इन्द्र के पानपात्र में डाला गया है, पवित्रतापूर्वक एक अत्यन्त मधुर और उल्लासकारी धारा के रूप में प्रवाहित होओ।"[90] आठवें मंडल के 48,3 सूक्त में पूजा करने वाले उच्च स्वर से हर्ष प्रकट करते हुए कहते हैं, "हमने सोम का पान किया है, हम अमर हो गए, हमने प्रकाश में प्रवेश पा लिया, हमने देवताओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया।" इस आध्यात्मिक हर्षोन्माद का शारीरिक उन्मतता के साथ मिश्रण केवल वैदिक काल की ही विशेषता नहीं है। विलियम जेम्स हमें बताता है कि मंदिरोन्मत्त की चेतना कुछ-कुछ ब्रह्मसाक्षात्कारवादियों की चेतनावस्था के समान है। यह समझा जाता है कि हम दिव्य सत्ता को भौतिक उन्माद की अवस्या में आकर प्राप्त कर सकते हैं। धीरे-धीरे सोम ने रोगनाशक उपयोगिता की शक्ति भी प्राप्त कर ली, जिससे अंघों को देखने और लंगड़ों को चलने की शक्ति प्राप्त होती थी।'[91] सोम को सम्बोधित करके निर्मित निम्न सुन्दर सूक्त में हमें प्रतीत होता है कि इसके प्रति वैदिक आर्यों का कितना अनुराग था :
हे सोम, मुझे उस जगत् में स्थान दो जहां नित्य प्रकाश हो, उस अमर और अविनश्वर लोक में स्थान दो जहां सूर्य का स्थान है। जहां विवस्वत् का पुत्र राज्य करता है, जहां स्वर्ग का गुप्त स्थान है, जहां ये शक्तिशाली नदियां हैं, वहां मुझे अमरत्व प्राप्त कराओ। जहां जीवन बंधनरहित है, घु लोक के भी तीसरे लोक स्वर्ग में जहां जगत् प्रकाशमान है, उस लोक में मुझे अमर बनाकर स्थान दो। जहां इच्छाएं और आकांक्षाएं वर्तमान हैं, जहां चमकीले सोम का पात्र हो, जहां भोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो, और प्रसन्नता ही प्रसन्नता हो, उस लोक में मुझे अमर करो। जहां सुख और आनन्द है, जहां हर्ष और सुख निवास करते हैं, जहां हमारी इच्छाओं की भी इच्छा पूर्ण हो जाती है, वहां मुझे अमरता प्राप्त कराओ।"[92]
ऊपर उद्धृत किए गए सोमसूक्त में विवस्वत् के पुत्र का उल्लेख है, जो ऋग्वेद का यम है और यह ज़िन्दावस्ता के विवन्हन्त का पुत्र यीमा के समान है। यम को सम्बोधित करते हुए तीन सूक्त हैं। वह मृत पुरुषों का सरदार है, मृतों का देवता नहीं किन्तु शासक के रूप में है। मर्त्य मानवों में वह सबसे पहला था जिसे परलोक के लिए अपना मार्ग बनाना पड़ा, और वही पहला था जो पितरों के मार्ग पर अग्रगामी हुआ।[93] उसके पश्चात् अब वह आतिथेय के रूप में नवागन्तुकों का स्वागत करता है। वह उस राज्य का राजा है, क्योंकि उसे इसका सबसे अधिक चिरकाल का अनुभव है। कभी-कभी उसका आह्वान अस्ताचलगामी सूर्य के आह्वान के समान किया जाता है।'[94] ब्राह्मणग्रन्थों में यम न्यायाधीश एवं मनुष्यों को दण्ड देने वाला वन गया है। किन्तु ऋग्वेद में वह अभी केवल उनका राजा ही है। यम उस कथन की सत्यता का उदाहरण उपस्थित करता है जो ल्यूशियन ने हेराक्लिटस के मुख से कहलाया है: "मनुष्य कौन हैं? मर्त्य देव हैं। और, देव क्या हैं? अमरत्व को प्राप्त मनुष्य ।"
पर्जन्य आर्यों का आकाश का देवता था। आर्य लोगों के भारत में प्रवेश करने के पश्चात् वह इन्द्र बन गया, क्योंकि इन्द्र आर्य-परिवार के अन्य सदस्यों को विदित नहीं था, ऐसा प्रतीत होता है। वेदों के अन्दर पर्जन्य आकाश का दूसरा नाम है। "पृथ्वी माता है और मैं पृथ्ची का पुत्र हूं, पर्जन्य पिता है, वह हमारी सहायता करे।"[95] अथर्ववेद में भूमि को पर्जन्य की स्त्री करके कहा गया है।[96] पर्जन्य मेघ और वर्षा का देवता है।'[97] वह एक देवता के समान समस्त जगत् का शासन करता है। वह समस्त स्थावर और जंगम जगत् का जीवन-प्राण है।'[98] ऐसे भी लेखांश हैं जिनमें पर्जन्य शब्द मेघ अथवा वर्षा के लिए प्रयुक्त हुआ है।[99] मैक्समूलर की सम्मति में पर्जन्य लियूएनियन के विद्युत देवता पेरकुनास[100]' के समान है।
समस्त प्राकृतिक घटनाओं में, जो श्रद्धायुक्त विस्मय एवं आतंक को उत्पन्न करती हैं, वज्र-झंझावात से बढ़कर दूसरी कोई घटना नहीं है। इन्द्र कहता है, "जब मैं आंधी- तूफान भेजता हूं या बिजली चमकाता हूं तब तुम मुझे मानते हो।" इन्द्र को सम्बोधन करके कहे गए सूक्तों को देखकर कहा जा सकता है कि इन्द्र वेदों का सबसे अधिक लोकप्रिय देवता है। जब आर्य लोग भारत में आए तब उन्होंने अनुभव किया कि उनका धन-वैभव केवल वर्षा की संभावना के ऊपर ही निर्भर करता है, जैसे आज भी है। स्वभावतः वर्षा का देवता भारतीय आर्यों का राष्ट्रीय देवता बन गया। नीलाभ आकाश की अन्तरिक्ष सम्बन्धी घटनाओं का देवता इन्द्र है। वह भारतीय जीयस है। उसका प्राकृतिक उद्गम स्थान प्रकट है। उसकी उत्पत्ति जल एवं मेघ से है। वह वज्र धारण करता है एवं अन्धकार पर विजय प्राप्त पाता है। वह हमें प्रकाश एवं जीवन देता है, शक्ति और ताजगी देता है। आकाश उसके आगे मस्तक झुकाता है और पृष्वी उसके आने पर कांप जाती है। शनैः-शनैः आकाश एवं वज्र-झंझावात के साथ जो इन्द्र का सम्बन्ध था उसे भुला दिया गया। वह दैवीय आत्मा का रूप धारण कर लेता है, सारे संसार का एवं प्राणिमात्र शासक बन जाता है, जो सबको देखता एवं सब कुछ सुनता है और मनुष्यों के अन्दर सर्वोत्तम विचारों व मनोभावों के लिए अन्तःप्रेरणा उत्पन्न करता है।'[101] झंझावात का देवता तूफान के दैत्यों एवं अन्धकार को परास्त करके आर्यों के इस देश के आदिवासियों के साथ जो युद्ध हुए उनमें विजय प्राप्त कराने वाला देवता बन गया। वह काल अत्यन्त कर्मठता का काल था और लोग उस काल में विजय एवं पराजय के साहसिक कार्यों में जुटे हुए थे। इस देश के विधर्मी आदिवासियों से उसे कुछ वास्ता नहीं था। "उस वीर देवता ने उत्पन्न होने के साथ ही अन्य देवताओं का नायकत्व अपने हाथ में लिया, जिसके आगे दोनों लोक कांपते थे, हे मनुष्यो, वह इन्द्र है; जो द्रुतगति से पृथ्वी पर चलकर पहाड़ों को उठाए हुए है, अन्तरिक्ष को जिसने नाप लिया और घुलोक को जिसने संभाल लिया है, हे मनुष्यो, वह इन्द्र है; जिसने सर्प को मारकर सात नदियों को स्वतन्त्र किया, गौओं की रक्षा की, जो युद्ध में शत्रुओं को कुचलने वाला है, हे मनुष्यो, वह इन्द्र है; वह भयानक देवता, जिसके विषय में सन्देह करते हुए तुम पूछते हो कि वह कहां है और कहते हो कि उसकी सत्ता नहीं है, वह जोकि शत्रुओं की सम्पत्ति को छीन लेता है, उसमें विश्वास रखी, हे मनुष्यो, वह इन्द्र है; जिसकी शक्ति से ही घोड़ों में और पशुओं में और सशस्त्र सेनाओं में शक्ति है और जिसे युद्ध में दोनों ओर के योद्धा पुकारते हैं, हे मनुष्यो, वह इन्द्र है; जिसकी सहायता के बिना मनुष्य कभी विजय नहीं प्राप्त कर सकते, जिसका बाण पापियों का नाश करता है, हे मनुष्यो, वही इन्द्र है।"[102] यह सर्वविजयी देवता उच्चतम दैवीय गुणों की प्राप्ति करता है, आकाश के ऊपर शासन करता है, पृथ्वी, नदियों, समुद्रों और पर्वतों पर भी शासन करता है।"[103] और आगे चलकर वरुण को उसके वैदिक देवालय में सर्वोपरि पद से गिरा देता है। वरुण के समान भव्य, न्यायकारी और सौम्य, अपने प्रयोजन में एकरस रहने वाला देवता संघर्ष एवं विजय के काल में, जिसमें आर्य लोगों ने अभी प्रवेश किया था, उपयुक्त नहीं रह गया था। इस प्रकार हम वैदिक जगत् में कुछ सूक्तों में एक महान क्रांति की पुकार सुनते हैं।'[104]
इन्द्र को उन अन्य देवताओं के साथ भी युद्ध करना पड़ा, जो भारत में बसी हुई
विभिन्न वन्य-जातियों द्वारा पूजे जाते थे। उनमें नदियों के पूजक थे,'[105] अश्वत्यवृक्ष के पूजक थे।'[106] बहुत से दैत्य, जिनसे इन्द्र ने युद्ध किया था, वन्य जातियों के देवता थे, जैसे वृत्र, एवं सर्प ।'[107] इन्द्र का एक अन्यतम शत्रु ऋग्वेद के काल में कृष्ण था, जो कृष्ण नामक वन्य-जातियों का देवतास्वरूप वीरनायक था। छन्द इस प्रकार है, "फुर्तीला कृष्ण अंशुमती (यमुना) के किनारे अपनी दस सहस्र सेनाओं के साथ रहता था। इन्द्र ने अपनी बुद्धि से ऊंचे स्वर से चीत्कार करने वाले इस सरदार का पता लगाया। उसने हमारे लाभ के लिए इस लूटमार करने वाले शत्रु का विनाश किया।"[108] सायणाचार्य ने इस प्रकार की व्याख्या प्रस्तुत की है और यह कथा कृष्ण-सम्प्रदाय के सम्बन्ध में अपना कुछ महत्त्व रखती है। परवर्ती समय के पुराणों में इन्द्र और कृष्ण के विरोध का प्रसंग पाया जाता है। यह हो सकता है कि कृष्ण, जो चरवाहों की जाति का देवता है और जिसे ऋग्वेद काल में इन्द्र ने परास्त किया था, भले ही भगवद्गीता के काल में उसने अपनी खोई हुई भूमि को फिर से विजय करके प्राप्त कर लिया हो और भागवतों के वासुदेव एवं वैष्णवों के विष्णु के रूप में फिर से अत्यधिक बल प्राप्त कर लिया हो। इस विविध प्रकार के उद्भव एवं इतिहास ने उसे 'भगवद्गीता' के रचयिता एवं परब्रह्म के अवतार और यमुना के किनारे बंसी बजाने वाले ग्वाल का रूप दिया।' [109]
इन्द्र के साथ अनेक छोटे-छोटे देवता अन्तरिक्ष-सम्बन्धी अन्य प्रकार के चमत्कारों का प्रतिनिधत्व करते हैं, यथा वात (वायु), मरुद्गण, भयंकर तूफान के देवता और रूद्र भयंकर शब्द करने वाला। वायु के विषय में कवि कहता है, "वह कहां उत्पन्न हुआ और कहां से आ धमका, जो देवताओं का जीवन और जगत् का अंकुर है? वह देवता सर्वत्र गति करता है, जहां कहीं वह सुनता है, उसके शब्द सुनाई पड़ते हैं किन्तु वह दिखाई नहीं देता।"[110] वात एक भारतीय ईरानी देवता है। मरुद्गण उन बड़े-बड़े आंधी-तूफानों के देवता हैं जो भारत में बहुत अधिक आते हैं। "जब वायु धूल और बादलों से काली हो जाती है, जबकि क्षणमात्र में वृक्षों के सारे पत्ते झड़ जाते हैं, उनकी शाखाएं कांपने लगती हैं, तने टूट जाते हैं, जबकि पृथ्वी कांपती हुई प्रतीत होती है और पहाड़ हिल जाते हैं और नदियों में भी उथल पुथल मच जाती है।"[111] मरुद्गण साधारणतः शक्तिपूर्ण और नाशक होते हैं, किन्तु कभी-कभी दयालु और परोपकारी भी सिद्ध होते हैं। वे एक सिरे से दूसरे सिरे तक संसार पर वेग से प्रहार करते हैं अथवा वायु को शुद्ध करते हैं और वर्षा लाते हैं।[112] वे इन्द्र के सहचर और द्यौः के पुत्र हैं। कभी-कभी इन्द्र को मरुद्गणों में सबसे बड़ा कहा गया है। अपने रौद्र स्वभाव के कारण वे रुद्र के पुत्र समझे जाते हैं- रुद्र युद्ध का देवता है।[113] ऋग्वेद में रुद्र की बहुत गौण स्थिति है, जिसकी स्तुति केवल तीन ही सूक्तों में पाई जाती है। वह अपनी भुजाओं में वज्र धारण करता है और आकाश से बिजली के बाण छोड़ता है। बाद में वही कल्याणकारी शिव बन जाता है और उसकी परम्परा का सारा विकास उसके इर्द-गिर्द आ जुटता है।[114]
इसी प्रकार कुछ देवियों का भी विकास हुआ। उषस् और अदिति देवियां हैं। सिन्धु नदी की एक सूक्त में देवी के रूप में ख्याति पाई जाती है।'[115] और सरस्वती, जो पहले एक नदी का नाम था, शनैः-शनैः विद्या की देवी बन गई।[116] वाक् वाणी की देवी है। अरण्यानी जंगल की देवी है।[117] अर्वाचीन शाक्त-सम्प्रदायों ने ऋग्वेद-वर्णित देवियों का उपयोग किया। वैदिक आर्य ज्यों ही पूजा के योग्य उस दैवीय प्रकाश का, जो सारे कूड़े-करकट को भस्म करके राख बना डालता है, ध्यान करने लगे तो उन्होंने ईश्वर की शक्ति की ही उपासना प्रारम्भ की। "आओ, हे शक्ति ! तुम जो हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार कर इच्छित फल प्रदान करती हो, तुम ही अनश्वर हो और ब्रहा के तुल्य हो।'[118]
जब विचारधारा ने प्राकृतिक जगत् से आध्यात्मिक जगत् की ओर एवं भौतिक से आत्मिक जगत् की ओर बढ़ना आरम्भ किया तो अमूर्त देवी-देवताओं की कल्पना करना सरल हो गया। इस प्रकार के अधिकांश देवी-देवता ऋग्वेद के अन्तिम भाग में मिलते हैं, जिससे संकेत मिलता है कि उनकी उत्पत्ति अपेक्षाकृत बाद में हुई। हम मन्यु[119]' श्रद्धा'[120] आदि को पाते हैं। कतिपय गुणों को लेकर जो परमात्मा के यथार्थ भाव के साथ जुड़े हुए हैं उन्हें देवता का रूप दे दिया गया है। त्वष्टा, जिसे कभी-कभी सविता'[121] के साथ मिला दिया गया है, सृष्टि का सष्टा है। उसने इन्द्र का वज्र बनाया, ब्रह्मणस्पति के परशु को तेज किया, ऐसे पात्रों का निर्माण किया जिनमें देवगण सोमपान करते हैं, और अन्य सब जीवित पदार्थों को भी आकृति प्रदान की। ब्रह्मणस्पति बहुत ही आधुनिक देवता है, जो उस काल का है जबकि यज्ञों का प्राधान्य हो गया था। प्रारम्भ में जो प्रार्थना का उपास्य देव था, शीघ्र ही यज्ञ का देवता बन गया। हम उसमें विशुद्ध वैदिक धर्म के भाव और अर्वाचीन समय के ब्राह्मण-धर्म में होने वाला संक्रमण देखते हैं।'[122]
जैसा कि हम आगे चलकर अथर्ववेद की विवेचना में देखेंगे, आर्य जगत् की सीमाओं से परे के रहस्यवादी विचार, जो एक बिलकुल भिन्न विचारधारा के अंग थे, वैदिक देवमाला में भी प्रवेश कर गए। देवी-देवताओं की इस भीड़ ने बुद्धि को अत्यन्त परेशान कर दिया। इसलिए बहुत पहले से एक ऐसी प्रवृत्ति ने जन्म लिया, जिसके अनुसार या तो एक देवता को दूसरे देवता के साथ मिला दिया जाए या सभी देवताओं को एकत्र कर दिया जाए। वर्गीकरण के प्रयत्न से देवता घटकर तीन क्षेत्रों-पृथ्वी, वायु एवं आकाश में रह गए। कभी- कभी देवताओं की संख्या 333 अथवा 3 की संख्या के अन्य किसी जोड़ के रूप में बताई जाती है।[123] जब वे एक समान प्रयोजन को सिद्ध करते हैं तो जोड़े के रूप में उनकी स्तुति की जाती है और कभी-कभी उन सबको एक साथ 'विश्वे देवाः' या देवमाला के रूप देकर एक महत्तर भाव में एकत्र कर दिया जाता है। क्रमबद्ध करने की इस प्रवृत्ति ने अन्त में स्वभावतः अद्वैतवाद को जन्म दिया, जो अधिक सरल और अनेक देवी-देवताओं की परस्पर- विरोधी भीड़भाड़ की अराजकता की अपेक्षा अधिक तर्कसंगत है।
ईश्वर के किसी भी यथार्थ विचार के साथ अद्वैतवाद का भाव आना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। परम सत्ता केवल एक ही हो सकती है। परम एवं अनन्त दो सत्ताएं नहीं स्वीकार की जा सकतीं। हर जगह यह प्रश्न उठता था कि क्या ईश्वर भी किसी अन्य सत्ता द्वारा बनाया गया है। किन्तु वह सत्ता जिसे कोई दूसरा बनाए, ईश्वर नहीं हो सकती। ज्यों- ज्यों संसार की आन्तरिक कार्य प्रणाली के अन्दर निरीक्षण करने का भाव एवं उसके अधिपति ईश्वर के स्वरूप का निर्णय आगे बढ़ता है, अनेक देवता संकुचित होकर एक ईश्वर में समा जाते हैं। ऋत के भाव के अन्दर जो एकत्व के भाव का अनुभव हुआ, उससे भी अद्वैतवाद का समर्थन होता है। यदि प्रकृति की नानाविधि और भिन्न-भिन्न घटनाओं के कारण अनेक देवताओं की कल्पना की जाती है तो प्रकृति के अन्दर जो एकत्व लक्षित हो रहा है उसके अनुसार ईश्वर के एकत्व को भी स्वीकार किया जाए वही एकमात्र ईश्वर, जो सब पदार्थों में व्याप्त है। प्राकृतिक नियम में विश्वास करना ही एक ईश्वर में श्रद्धा को उपजाता है। ज्यों- ज्यों हम इस विश्वास में आगे बढ़ेंगे, मिथ्या विश्वास स्वयं निष्क्रिय हो जाएंगे। प्रकृति में जो एक प्रकार की नियमित व्यवस्था पाई जाती है, उसको देखते हुए चमत्कार-सम्बन्धी अनुमानों व कल्पनाओं के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता, जिनके कारण ही अन्धविश्वास और भ्रांति विषयक विचारों से बहुदेवतावाद की कल्पना उपजती है। वरुण की उपासना से हम अद्वैतवाद से बिलकुल निकट पहुंच जाते हैं। सदाचार-सम्बन्धी एवं आध्यात्मिक सब गुण-यथा न्याय, उपकार, साधुता और यहां तक कि करुणा भी उसी वरुण में सन्निहित बताए गए हैं। उच्चतर और अत्यधिक आदर्शवाद पर अधिकाधिक बल दिया गया है, और दूसरी ओर कठोर एवं भौतिक पक्ष को दबाया गया है और उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया है। वरुण वह देवता है जिसमें मानव एवं प्रकृति, इहलोक एवं परलोक सब ओत-प्रोत हैं जो केवल बाह्य चरित्र की ही परवाह नहीं करता किन्तु जीवन की आन्तरिक पवित्रता की ओर भी पूरा-पूरा ध्यानउ रखता है। धार्मिक चेतना की एक परब्रह्म के प्रति उपलक्षित मांग ने अपने को वेदों के एकेश्वरवाद, अथवा एकसत्तावाद के रूप में अभिव्यक्त किया। मैक्समूलर के अनुसार, इसी ने इस परिभाषा को बनाया कि प्रत्येक देवता को क्रमशः पूज्य मानकर अन्त में सबसे बड़े यहां तक कि एकमात्र ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है। किन्तु समस्त स्थिति तर्क के साथ संगति नहीं खाती, क्योंकि हृदय तो उन्नति का सही मार्ग प्रदर्शित करता है लेकिन विश्वास उसके विरोध में जाता है। हम बहुदेवतावाद को स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि धार्मिक चेतना इसके विरोध में है। एकेश्वरवाद से चलकर हम अन्धकार में टटोलते हुए अद्वैतवाद तक पहुंच जाते हैं। मानव का दुर्बल मानस अभी भी अपने उद्देश्य की खोज में है। वैदिक आर्य लोगों ने परम सत्ता के रहस्य को बहुत सूक्ष्म दृष्टि से अनुभव किया और प्रचलित विचारों को उसकी व्याख्या के लिए अपर्याप्त पाया। सभी देवता, जिनकी परम सत्ता के रूप में पूजा की जाती थी, एक ही श्रेणी में थे, यद्यपि कुछ समय के लिए उनमें से किसी एक को सर्वोच्च स्थान दे दिया जाता था। एक देवता को मानने का तात्पर्य यह नहीं कि अन्य देवताओं की सत्ता का निषेध किया जाता है। कभी-कभी छोटे से छोटा देवता भी ऊंचे से ऊंचा पद पा जाता है। यह निर्भर करता था कवि की भक्ति के ऊपर और इस पर कि उसके सामने उद्देश्य के रूप मे विशिष्ट पदार्थ क्या है। "वरुण ही द्युलोक है, वरुण पृथ्वीलोक है, वरुण वायुमण्डल है, और वरुण ही समस्त विश्व है जो चारों ओर दृष्टगोचर होता है।" कभी अग्नि को ही सर्वदेवता का स्वरूप माना गया है। कभी इन्द्र को सब देवों में महानतम माना गया है। कुछ समय के लिए प्रत्येक देवता अन्य सब देवताओं की समवेत प्रतिकृति के रूप में प्रकट होता है। किन्तु मानव का ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण का भाव, जो धार्मिक जीवन का सत्य है, तभी सम्भव हो सकता है जब एक ही ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किया जाए। इस प्रकार एकेश्वरवाद धर्म सम्बन्धी तर्क का स्वाभाविक निष्कर्ष है। ब्लूमफील्ड के अनुसार, "बहुदेवतावाद के क्रियात्मक जीवन में असमर्थ होने और परस्पर भेदों में अनौचित्य होने के कारण, अद्वैतवाद को सिर उठाने का अवसर मिल गया, जिसमें प्रत्येक देवता प्रभुता को प्राप्त करता था किन्तु उसे रख नहीं पाता था।"[124] लेकिन ऐसी बात नहीं है।
जब प्रत्येक देवता को सृष्टि के कर्ता के रूप में माना जाने लगा और प्रत्येक को विश्वकर्मा अर्थात् संसार के निर्माणकर्ता, और प्रजापति अर्थात् प्राणियों के स्वामी के गुणों से विभूषित किया जाने लगा तब उनकी वैयक्तिक विशेषताओं को छुड़ाकर एक ऐसे देव की कल्पना करना, जिसमें सर्वसामान्य क्रियाएं उपस्थित हों, आसान हो गया-विशेषतः जबकि अनेक देवता केवल भ्रमात्मक और अस्पष्टभावात्मक थे और केवल कल्पना के रूप में रहकर अपनी वास्तविक सत्ता भी नहीं रखते थे।
ईश्वर के विचार के प्रति क्रमशः आदर्शवाद के द्वारा पहुंचना, जैसा कि वरुण सम्प्रदाय में अभिव्यक्त हुआ, धार्मिक तर्क जिसने अनेक देवताओं की एक-दूसरे के अन्दर समाविष्ट हो जाने की प्रवृत्ति को जन्म दिया, एकेश्वरवाद जिसने अपना झुकाव अद्वैतवाद की ओर कर ही लिया था, ऋत के विचार अर्थात् प्रकृति के एकत्य के विचार और मानवीय मानस की क्रमबद्धता के प्रति स्वाभाविक प्रवृत्ति इन सबने एकत्र होकर बहुदेववाद के अवतारवाद के विचार को नीचे गिराकर एक धार्मिक अद्वैतवाद की स्थापना की। इस काल के वैदिक ऋषियों का झुकाव विश्व के एक ऐसे आदिकरण को खोज निकालने की ओर था जो एकमात्र स्रष्टा हो, जो स्वयंभू हो अर्थात् जिसका बनाने वाला दूसरा कोई न हो, और जो अविनाशी हो। इस प्रकार के एक एकेश्वरवाद की स्थापना के लिए एक ही तार्किक विधि थी कि समस्त देवताओं को एक उच्चतम सत्ता अथवा सबको नियन्त्रण में रखने वाली एकमात्र सत्ता के अधीन कर दिया जाए, जो निम्न श्रेणी के देवताओं की गतिविधि का भी नियमन कर सके। इस प्रक्रिया ने एकमात्र ईश्वर की सत्ता के प्रति जो प्रबल अभिलाषा थी उसकी भी पूर्ति कर दी और साथ-साथ भूतकाल के तारतम्य को भी विद्यमान रहने दिया। भारतीय विचारक चाहे कितने ही निर्भीक एवं नेकनीयत क्यों न रहे हों, उन्होंने कभी कठोरता एवं अशिष्टता का व्यवहार विपक्षियों के प्रति नहीं किया। साधारणतः वे बदनाम होने से बचते रहे और इसीलिए प्रायः उन्होंने हर स्थान पर समझौता ही उचित समझा। किन्तु निर्देय तर्कशास्त्र को, जो इतना ईर्षालु शासक है, बदला मिला जिसका परिणाम यह हुआ कि आज का हिन्दूधर्म अपनी समावेश की भावना के कारण ही अनेक विषमाङ्ग दर्शनधाराओं, धर्म-सम्प्रदायों ओर पौराणिक आख्यानों एवं चमत्कारों के एक समूह के रूप में हमारे सामने है। अनेक देवता एक ही व्यापक सत्ता के भिन्न-भिन्न मूर्तरूप मान लिए गए हैं। उन सबको अपने-अपने विभिन्न क्षेत्रों में, यद्यपि परमब्रह्म के साम्राज्य की अधीनता के अन्तर्गत, शासक के रूप में अंगीकार कर लिया गया है। उन्हें भिन्न-भिन्न अधिकार तो दिए गए किन्तु उनका प्रभुत्व एक राजप्रतिनिधि की हैसियत से है न कि एक सम्राट की हैसियत से। अव्यवस्थित प्रकृतिपूजा के अस्थिर देवताओं ने विश्व की शक्तियों का स्थान ग्रहण कर लिया, जिनकी क्रियाओं को एक सामञ्जस्यपूर्ण पद्धति में नियमित किया गया है। यहां तक कि इन्द्र और वरुण भी अपने- अपने विभागों के देवता बन गए। ऋग्वेद के अन्तिम भाग में सबसे ऊंचा स्थान विश्वकर्मा को दिया गया है।[125] वह सर्वद्रष्टा देवता है, जिसकी सब दिशाओं में आंखें हैं, मुख हैं, भुजाएं हैं, पैर हैं, जो यु लोक और पृथ्वीलोक को अपनी विशाल भुजाओं एवं उड़नशील पंखों के प्रभाव से उत्पन्न करता है, जो सब लोकों का ज्ञान रखता है किन्तु जो मर्त्य मानवों के ज्ञान से परे का विषय है। बृहस्पति का भी दावा सर्वोपरि पद की प्राप्ति के लिए है।[126]' अनेक स्थलों पर यही प्रजापति अर्थात् प्राणिमात्र का स्वामी है।[127] हिरण्यगर्भ अर्थात् स्वर्णमय देवता परम सत्ता के नाम के अर्थों में प्रयुक्त होता है, जिसे समस्त विश्व के एकमात्र प्रभु के रूप में बताया गया है।'[128]
यह बात, कि वैदिक सूक्तों के निर्माण के दिनों में केवल अव्यवस्थित कल्पनाओं एवं भ्रांतियों का ही अस्तित्व नही था बल्कि गम्भीर विचार एवं जिज्ञासा का भाव भी साथ-साथ वर्तमान था, इस प्रकार प्रमाणित होती है कि हमें स्थान-स्थान पर प्रश्नात्मक प्रवृत्ति मिलती है। अनेक देवताओं की कल्पना करने की आवश्यकता इसलिए अनुभव हुई, क्योंकि मानवीय मस्तिष्क के अन्दर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति किसी विषय को स्वयं खोजकर समझने की ओर होती है, वह हरेक बात को वैसे ही मान लेने के लिए उद्यत नहीं होना चाहता। "रात के समय सूर्य कहां रहता है?" "दिन के समय तारे कहां गायब हो जाते हैं?" "सूर्य नीचे क्योंनहीं गिर पड़ता?" "दिन और रात दोनों में कौन पहले और कौन पीछे है?" "वायु कहां से आती है एवं कहां जाती है?"[129]- ये इस प्रकार के प्रश्न और श्रद्धायुक्त विस्मय तथा अचम्भे की बातें हैं जो समूचे दर्शनशास्त्र एवं भौतिक विज्ञान को जन्म देती हैं। हमने देख भी लिया है कि किस प्रकार मनुष्य के अन्दर अन्धकार को टटोल-टटोलकर ज्ञान प्राप्त करने की सहज प्रेरणा होती है, और उसकी विभिन्न आकृतियों और धारणाओं को भी हम देख चुके हैं। अनेक देवाताओं की स्वीकृति पर बल दिया गया। किन्तु मानवीय हृदय की अभिलाषा बहुदेववाद की देवामाला से सन्तुष्ट न हो सकी। आशंका उठी कि कौनसा देव यथार्थ है। 'कस्मै देवाय हविषा विधेम', किस विशिष्ट देव के लिए हम अपने मानसिक यज्ञ में आहुति दें।[130] देवताओं का सीधा-सादा उद्गम स्थान बिलकुल स्पष्ट था। भारत की भूमि पर नये-नये देवताओं की उत्पत्ति होने लगी और उनमें से कुछेक यहां के आदिम निवासियों से उधार भी लिए गए। 'हमें भक्तिभाव से पूर्ण करो ।''[131] इस प्रकार की प्रार्थना दृढ़ विश्वास के काल में सम्भव नहीं हो सकती थी। संशयवाद की गन्ध आने लगी थी। इन्द्र की स्थिति और उसके शिरोमणित्व में शंकाएं उठने लगी थीं।'[132] निषेधात्मक नास्तिकता का भाव समस्त विचार को 'मिथ्या का ताना-बाना बनाकर अग्राह्य घोषित कर रहा था। अज्ञात देवताओं को सम्बोधित करके मन्त्र निर्माण किए गए। हम 'देवताओं के सन्ध्याकाल' में आ पहुंचते हैं, जहां वे शनैः-शनैः प्रयाण करते जा रहे हैं। उपनिषदों में पहुंचकर उक्त सन्ध्याकाल रात्रि के रूप में परिणत, हो गया और वे देवता तिरोहित हो गए, केवल भूतकाल के स्वप्न देखने वालों के लिए ही उनका अस्तित्व रह गया। अद्वैतवाद के काल की 'एकमात्र सत्ता' भी आलोचकों से न बच सकी। मानव का मानस ईश्वर के अवतारवाद की कल्पना से सन्तोष नहीं प्राप्त कर सका। यदि हम कहें कि एक ही महान ईश्वर है, जिसके नीचे अन्य सब हैं तो भी आगे प्रश्न उठता है कि "प्रयम उत्पन्न देव को किसने देखा? उसको किसने देखा, जिसने स्वयं अस्थिहीन होते हुए भी अस्थिघारियों को उत्पन्न किया? जीवन, रक्त और विश्व की आत्मा कहां है? जानने बाले विद्वान के पास कौन पूछने के लिए गया?"[133] यह दर्शनशास्त्र की मूलभूत समस्या है। जीवन क्या है अथवा विश्व का तत्त्व क्या है?- केवल रूढ़िवाद से काम नहीं चलेगा। हमें आध्यात्मिक यथार्थ सत्ता को अवश्य अनुभव करना है और उसका ज्ञान प्राप्त करना है। इसलिए प्रश्न यह है कि "पूर्वजन्मा को किसने देखा?"[134] जिज्ञासु अन्वेषक अपने निजी आराम के साधनों और सुख की भी उतनी परवाह नहीं करता जितना कि वह परम सत्य के ध्यान के लिए व्यग्र रहता है। चाहे ईश्वर को एक असभ्य मनुष्य की धारणा के अनुसार कुद्ध एवं छेड़े गए व्यक्ति के रूप में माना जाए, अथवा उसे एक सभ्य मनुष्य के विचार के अनुसार दयानिधान के रूप में माना जाए, जो इस भूलोक के सब प्राणियों का न्यायकर्ता, संसार का रचयिता एवं उनको वश में रखने वाला है, यह एक दुर्बल विचार है जो समीक्षा के आगे नहीं ठहर सकता। ईश्वर के मानवीयकरण का भाव अवश्य लुप्त हो जाना चाहिए। उक्त प्रकार के विचार हमें ईश्वर का प्रतिनिधि तो भले ही दे सकें किन्तु यथार्थ रूप में जीवित ईश्वर नहीं प्राप्त करा सकते। हमें एक ऐसे ईश्वर के अन्दर विश्वास लाना है जो जीवन का केन्द्र है, किन्तु उसकी छायामात्र नहीं है जो मनुष्यों के मनों के अन्दर प्रतिबिम्बित होती है। ईश्वर हमारे चारों तरफ व्याप्त एक प्रकार का अक्षुण्ण भण्डार है। 'प्राणो विराट्' अर्थात् जीवन विशाल और अपरिमित है। इसके अन्दर वस्तुओं का ही नहीं, विचारों का भी समावेश हो जाता है। वह अपने को विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त करता है। यह एक है, एक समान है, नित्य है, आवश्यक है, असीम एवं अनन्त है और सर्वशक्तिमान है। इसी से सब कुछ निकलता है और फिर इसी में समा जाता है। एक देहधारी ईश्वर का भले ही मनोभावात्मक महत्त्व हो, किन्तु सत्य एक अन्य प्रकार के मानदण्ड की स्थापना करता है और एक विशेष प्रकार के पूजनीय विषय के महत्त्व को बताता है। भले ही वह कितना ही रूक्ष और दूरवर्ती, भयानक और अप्रिय हो, उसके सत्य होने में कोई न्यूनता नहीं आती। एकेश्वरवाद, जिसे आज भी मनुष्य-समुदाय का एक बड़ा भाग दृढ़ता के साथ पकड़े हुए है, आधुनिक वैदिक विचारकों को सन्तोष प्रदान करने में असमर्थ रहा है।
उक्त विचारकों ने उस केन्द्रीय तत्त्व को नपुंसकलिंग की संज्ञा अर्थात् सत् की संज्ञा दी, जिससे लक्षित होता है कि वह लिंगातीत है। उन्हें इस बात' का निश्चय था कि एक ऐसी यथार्थ सत्ता अवश्य है जिसकी अग्नि, इन्द्र, वरुण आदि केवल भिन्न-भिन्न संज्ञाएं अथवा आकृतियां हैं। यह कि ऐसी एक सत्ता अवश्य थी और एंकाकी ही थी अनेक नहीं, जो देहधारी मूर्तरूप नहीं है, 'उस सबका जो स्थावर है और भी जो जंगम, अथवा जो चलता या उड़ता है', शासक है, क्योंकि उसका जन्म अन्य प्रकार का ही है।[135] "यथार्थ सत्ता एक ही है, विद्वान लोग उसे नाना प्रकार के नामों से पुकारते हैं, यथा अग्नि, यम और मातरिश्वा आदि।"[136]
नक्षत्र-मण्डल से मण्डित नभ और यह विस्तृत भूमण्डल, महान समुद्र और सर्वदा अचल रहने वाली पर्वतमालाएं "एक ही मस्तिष्क के अद्भुत कार्य हैं, और उसी एक चेहरे के भिन्न- भिन्न पार्श्व हैं, एक ही सामान्य वृक्ष के ऊपर विकसित हुए फूल हैं, उसी महान ईश्वरीय ज्ञान के स्वरूप हैं, उसी नित्य सत्ता के नमूने एवं संकेतमात्र हैं, जो सबसे प्रथम और सबसे अन्तिम शेषरूप है, जो मध्य में भी सत् है, और जिसका अन्त नहीं।"[137]
यही एकमात्र सत्ता विश्व की आत्मा है, यह वह वृद्धिशक्ति है जो समस्त विश्व के अन्तर्हित और उसमें व्याप्त है, समस्त प्रकृति का आदि-उद्गम है और अनादि-अनन्त शक्ति का पुंज है। यह स्वयं न तो द्युलोक है न भूलोक, न सूर्य का प्रकाश है न तूफान, किन्तु एक अन्य ही प्रकार का तत्त्व है, सम्भवतः साक्षात् ऋत ही मूर्तरूप में एवं धार्मिक वृत्ति से पूर्ण अदिति है, एक ऐसी सत्ता जो निरन्तर जीवित रहने वाली है।[138] हम इसे देख नहीं सकते, हम इसका ठीक-ठीक वर्णन नहीं कर सकते। एक हृदयग्राही सरलता के साथ कवि अन्त में कहता है, "हम उसे कभी न देखेंगे जिसने इन सब पदार्थों को जन्म दिया।" "एक अज्ञानी मूर्ख की भांति अपने मन में बिलकुल अबोध मैंने देवताओं के गुप्तस्थानों को जानना चाहा किन्तु जब उन्हें न ढूंढ़ सका तो मैं बिना जाने किन्तु जानने की लालसा से उन सन्तों से पूछता हूं, जिन्होंने सम्भव है उसे खोज लिया हो।"[139] यह वह सर्वोपरि परम सत्ता है, जो सब पदार्थों में जीवितरूप में विद्यमान है और उन सबका संचालन करती है, वही यथार्थ सत्ता गुलाब के फूल को खिलाती है, मेघों के अन्दर सौंदर्य के रूप में प्रस्फुटित होती है, तूफानों में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती है और अन्तरिक्ष में तारागण को जड़ती है। यहां फिर हमें सत्यस्वरूप इंश्वर का अन्तर्ज्ञान मिलता है, जो सब देवों में एक ही देव महादेव है, जो सदा आश्चर्यमय है किन्तु सबसे अधिक अद्भुत एवं आश्चर्यमय इसलिए है कि विचारधारा के इतिहास के प्रथम प्रातःकाल के ब्राह्म मुहूर्त में इसके सत्यस्वरूप की झांकी ऋषियों को मिली थी। इस एक अद्वितीय सत्ता की उपस्थिति में आर्य एवं द्रविड़, यहूदी एवं काफिर, हिन्दु एवं मुस्लिम, देवतापूजक एवं ईसाई के बीच का भेद फीका पड़ जाता है। यहां पर हमें क्षण-मात्र को एक ऐसे आदर्शकाल की झलक मिलती है, जहां समस्त पार्थिव धर्म छायारूप होकर केवल एक पूर्ण समय की ओर संकेत करते हैं। एक ही अद्वितीय सत्ता है, जिसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। "पुरोहित और कवि लोग शब्दजाल के द्वारा उस प्रच्छन्न सत्ता को, जो केवल एक ही है, नानात्व का रूप दे देते हैं।"[140] मनुष्य इस व्यापक सत्ता के विषय में अपूर्ण विचार रखने के लिए विवश है। उसकी इच्छाओं की पूर्ति अपर्याप्त विचारों से, 'ऐसी मिध्या धारणाओं से होती प्रतीत होती है जिनकी हम यहां पूजा करते हैं।' कोई दो मिथ्या धारणाएं एक समान नहीं हो सकतीं, क्योंकि किन्हीं दो मनुष्यों के विचार सदा एक-से नहीं होते। उन संकेतों को लेकर जिनसे हम उस यथार्थ सत्ता की अभिव्यक्ति का प्रयत्न करते हैं, परस्पर कलह करना नितान्त मूर्खतापूर्ण है। परब्रह्म एक और अद्वितीय है, जिसे भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में और अन्वेषकों की भी अपनी भिन्न रुचियों के कारण भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है। इस विचार को प्रचलित धर्म के साथ समन्वित करने को एक संकीर्ण विचार-मात्र न समझना चाहिए। यह गम्भीर दार्शनिक सत्य के रूप में दैवीय प्रेरणा का परिणाम है। इज़राइल को यहां दैवीय प्रेरणा मिली थी, "तेरा प्रभु, तेरा ईश्वर एक है।" प्लूटार्क कहता है, "सब राष्ट्रों के ऊपर एक ही सूर्य, एक ही अन्तरिक्ष और भिन्न-भिन्न नामधारी एक ही 'देव' की छाया है।"
"हे ईश्वर ! अत्यन्त यशस्वी, जिसे अनेक नामों से पुकारा जाता है, प्रकृति के महान सम्राट्, अनन्त वर्षों के एकरस, सर्वशक्तिमान, तुम जो अपनी न्यायपूर्ण आज्ञा से सबको नियन्त्रण में रखते हो, ऐसे हे ज़ीयस, हम तुम्हारा स्वागत करते हैं। क्योंकि सब देशों में तुम्हारे प्राणी तुम्हें ही पुकारते हैं।"[141]
ऋग्वेद के इस एकेश्वरवाद के सिद्धान्त के विषय में ड्यूसन लिखता है, "हिन्दू लोग एक एकेश्वरवाद के सिद्धान्त पर एक ऐसी पद्धति द्वारा पहुंचे हैं जो अन्य देशों की पद्धतियों से तत्त्वरूप में बिलकुल भिन्न है। मिस्र देश में एकेश्वरवाद का मार्ग एक अन्य ही प्रकार का अपनाया गया था, अर्थात् नाना प्रकार के स्थानीय देवताओं के यान्त्रिक तादात्म्य की पद्धति अपनाई गई। पैलस्टाइन में अन्य सब देवताओं को जप्त कर लिया गया और उनकी पूजा करने वालों पर अपने जातीय देवता जेहोवा के हित में नाना प्रकार के अत्याचार किए गए। भारत में लोगों ने एकेश्वरवाद से भी ऊपर अद्वैतवाद को अपनाया, अधिकतर दार्शनिक मार्ग से पहुंचकर अर्थात् विविधता की गहराई में पहुंचकर उसके अन्तर्निहित एकत्व को अनुभव किया।"[142] मैक्समूलर कहता है, "ऋग्वेदसंहिता के संग्रह ही समाप्ति का चाहे जो भी काल रहा हो, उस काल से पहले इस विचार के विश्वास की जड़ जम गई थी कि एक ही अद्वितीय सत्ता है, जो न पुरुष है और न स्त्री, एक ऐसी सत्ता जो दैहिक एवं मानुषिक प्रकृति की सब अवस्थाओं और बन्धनों से उत्युक्त और बहुत ऊंची श्रेणी की है किन्तु तो भी वही सत्ता इन्द्र, अग्नि, मातरिश्वा, और यहां तक कि प्रजापति, अर्थात् प्राणिमात्र का स्वामी, आदि विविध नामों से पुकारी जाती है। वस्तुतः वैदिक कवि ईश्वर के ऐसे विचार तक पहुंच चुके थे जिस तक एक बार फिर सिकंदरिया के दार्शनिक भी पहुंचे, किन्तु जो विचार आज तक भी ऐसे अनेक विद्वानों की पहुंच से बाहर हैं जो अपने को ईसाई कहते हैं।"[143]
ऋग्वेद के कुछेक उन्नत विचार वाले सूक्तों में परब्रह्म को उदासीन भाव से पुल्लिंग और नपुंसकलिंग में सम्बोधन किया गया है। एकेश्वरवाद और अद्वैतवाद के मध्य इस प्रकार की प्रत्यक्ष रूप में प्रकट अस्थिरता ने, जो प्राच्य एवं पाश्चात्य दोनों ही दर्शनों का एक विशिष्ट स्वरूप है, यहां पर सबसे पहले अपने को विचारधारा के इतिहास में अभिव्यक्त किया। उसी अशरीरी, व्यक्तित्वहीन, विशुद्ध, वासनारहित दार्शनिक यथार्थ सत्ता की भावुक व्यक्ति अपने उत्कंठित हृदय से एक करुणामय और परोपकारी देवता के रूप में पूजा एवं उपासना करता रहा। यह अनिवार्य है। धार्मिक चेतना साधारणतः एक संवाद का, दो विभिन्न इच्छाशक्तियों की एकत्र संगति अर्थात् सान्त एवं अनन्त के सम्बन्ध का, रूप धारण कर लेती है। ईश्वर को एक अनन्तपुरुष के रूप में जिसका आधिपत्य सान्त मानव के ऊपर हो, मानकर चलने की प्रवृत्ति पाई जाती है। किन्तु ईश्वर के विषय में इस प्रकार का भाव, जो अन्य कई प्रकार के भावों में से एक है, दर्शनशास्त्र का उच्चतम सत्य नहीं है। कुछ अत्यन्त तार्किक स्वभाव वाले व्यक्तियों को छोड़कर, जो अपने सिद्धान्तों को अन्त तक खींचकर ले जाना चाहते हैं, किसी भी धार्मिक सम्प्रदाय का अस्तित्व एक व्यक्तिरूप ईश्वर को स्वीकार किए बिना स्थिर नहीं रह सकता। यहां तक कि एक दार्शनिक से भी जब उच्चतम सत्ता की परिभाषा करने को कहा जाए तो वह भी उसकी परिभाषा के लिए ऐसे ही शब्दों का प्रयोग करता है जो ईश्वर को निचले स्तर पर ले आते हैं। मनुष्य अच्छी तरह से जानता है कि उसकी परिमित शक्तियां सर्वव्यापक आत्मा के सर्वोपरि विस्तार का ठीक-ठीक माप नहीं कर सकतीं। तो भी वह उस नित्य का वर्णन अपने लघु तरीके से करने के लिए विवश है। अपनी सीमित मर्यादाओं में बद्ध रहने के कारण वह आवश्यकतावश उस विस्तृत, भव्य एवं अचिन्त्य उद्गम की, और जो सब पदार्थों का शक्तिप्रदाता है उसकी अपूर्ण शक्तियों की कल्पना करता है। वह अपने सन्तोष के लिए अपने आराध्यदेव की प्रतिमाएं बनाता है। ईश्वर का अवताररूप सीमित है किन्तु तो भी ईश्वर के सगुणरूप की ही पूजा की जाती है। ईश्वर का मूर्तरूप आत्म और अनात्म में भेद को आनुषंगिक रूप से स्वीकार कर लेता है। इसलिए उस सत्ता के लिए उपयुक्त नहीं होना चाहिए जिससे यह समस्त दृश्यमान जगत् ओतप्रोत है। व्यक्तित्वरूप ईश्वर केवल एक उपलक्षण-मात्र है, यद्यपि है वह सत्यरूप ईश्वर की सत्ता का ही उपलक्षण। आकृतिविहीन को भी आकृति दे दी गई, व्यक्तित्वहीन को व्यक्तित्व का जामा पहना दिया गया, सर्वव्यापक को एक नियत स्थान दे दिया गया, नित्य सत्ता को भौतिक रूप दे दिया गया। जैसे ही हम परमसत्ता को पूजा के एक भौतिक पदार्थ के रूप में उच्चता से गिरा देते हैं, उसकी परमता में न्यूनता का भाव आ जाता है। सीमित इच्छा वाले के साथ क्रियात्मक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए ईश्वर के लिए परम पद से न्यून होना आवश्यक है, परन्तु वह भी यदि परम पद से न्यून है तब वह किसी भी प्रभावशाली धर्म में पूजा के योग्य पदार्थ नहीं रह सकता। यदि ईश्वर पूर्ण है तो धार्मिक सम्प्रदाय असम्भव है, यदि ईश्वर अपूर्ण है तो धर्म प्रभावशून्य है। एक सीमित-परिमित शक्ति वाले ईश्वर को लेकर हमें शान्ति का आनन्द नहीं प्राप्त हो सकता, विजय का आश्वासन नहीं मिल सकता, और न ही विश्व ब्रह्माण्ड के चरम लक्ष्य तक पहुंचने का भरोसा मिल सकता है। सत्य धर्म परब्रह्म की खोज है इसलिए प्रचलित धर्म और प्रदर्शन दोनों की मांग को पूर्ण करने के लिए परम-आत्मा को बिना भेदभाव के पुल्लिंग और नपुंसक दोनों लिंगों में संबोधन किया गया है, अर्थात् वह अमूर्त है और इसीलिए लिंग के विचार से ऊपर उठा हुआ है। उपनिषदों में ठीक ऐसा ही है। भगवद्गीता एवं वेदान्तसूत्रों में भी ऐसा ही है। इस प्रकार के भाव को ईश्वरभाववाद एवं अद्वैतवाद के तत्त्वों के मध्य एक प्रकार का जानबूझकर किया हुआ समझौता अथवा विचारधारा में किसी प्रकार का कपट मानना उचित नहीं है। अद्वैतभाव भी विकसित होकर ऊंची से ऊंची धार्मिक भावना में परिणत हो सकता है। केवल ईश्वर के प्रति प्रार्थना का स्थान उस सर्वोपरि परब्रह्म का ध्यान ले लेता है जो संसार का शासक है, जो प्रेमरूप है और जो जगत् में निभ्रान्त किन्तु मुक्तहस्त होकर प्रेरणा उत्पन्न करता है। मानवीय मानस के पूर्णरूप ब्रह्म के साथ अंशभाव से साम्य होने का भाव उच्चतम धार्मिक भावना को उत्पन्न करता है। ब्रह्म के प्रति इस प्रकार के आदर्श प्रेम से, और उसके सौंदर्य एवं सौजन्य की पुष्कलता के ध्यान से हृदय विश्व ब्रह्मांड के सर्वभौम भावावेशों से आपूरित हो जाता है। यह सत्य है कि इस प्रकार का धर्म ऐसे मनुष्य को जो उस तक न तो पहुंचा हो और न ही जिसने इसकी शक्ति का अभी अनुभव किया हो, अधिकतर रूखा एवं ऊष्माविहीन तथा केवल बौद्धिक प्रतीत होगा, किन्तु तो भी अन्य कोई धर्म दार्शनिक दृष्टि से अधिक युक्तियुक्त नहीं ठहरता।
समस्त धार्मिक सम्प्रदायों ने, जो पृथ्वी पर आविर्भूत हुए, मानवीय हृदय की मूलभूत आवश्यकता को स्वीकार किया है। मनुष्य अपने ऊपर एक ऐसी शक्ति की सत्ता को स्वीकार करने के लिए जिसके ऊपर वह निर्भर कर सकता है, प्रबल अभिलाषा रखता है, जो उससे कहीं अधिक महान हो और जिसकी वह पूजा कर सके। वैदिक धर्म में भिन्न-भिन्न अवस्थाओं एवं परिस्थितियों के अनुसार कल्पना किए गए देवता मनुष्यों की आवश्यकताओं एवं अभावों के विचार के परिणामस्वरूप, और मनुष्यों के हृदयान्वेषण के परिणामस्वरूप हैं।
कभी-कभी मनुष्य को ऐसे देवताओं की आवश्यकता अनुभव हुई जो उसकी प्रार्थना को सुनें और यज्ञ में दी गई उसकी आहुतियों को ग्रहण करें, और इसीलिए ऐसे देवताओं की कल्पना की गई जो इस आवश्यकता को पूर्ण कर सकें। हमें भौतिक देवता मिलते हैं, मानवीय आकृति के देवता मिलते हैं, किन्तु उनमें से एक भी उच्चतम भावना के अनुकूल नहीं जंचता-चाहे कितना ही कोई यह कहकर कि सब उसी परब्रह्म की अभिव्यक्ति-मात्र हैं, मनुष्य के मन को समझाने का प्रयत्न करे। देवताओं की भीड़ में बिखरी हुई किरणें एकत्र हो जाती हैं उस एक नामरहित ब्रह्म के विशाल तेज में, केवल जो मानव-हृदय की बेचैन अभिलाषा को और संशयवादी के संशय को सन्तोष प्रदान कर सकता है, वैदिक प्रगति ने तब तक कहीं बीच में विराम नहीं लिया, जब तक कि वह इस चरम यथार्थ सत्ता तक नहीं पहुंच गई, वैदिक सूक्तों में वर्णित धार्मिक विचार की प्रगति को इस प्रकार से विशिष्ट देवताओं में विभक्त किया जा सकता है, यथा (1) द्धौः, जो प्रकृति-पूजा की पहली श्रेणी का उपलक्षण है; (2) वरुण, जो आधुनिक काल का उच्चतम सदाचारी देवता है; (3) इन्द्र, जो विजय और पराजयकाल का स्वार्थमय देवता है; (4) प्रजापति, जो एकेश्वरवादियों का अभिमत देवता है, और (5) ब्रह्म, जो इन चारों निम्नश्रेणियों का पूर्णरूप है। यह विकास क्रमिक होने के साथ-साथ तर्कसंगत भी है। केवल वैदिक सूक्तों में ही हम उन सबको साथ-साथ एक ही स्थान पर समाविष्ट पाते हैं, जिसमें तार्किक प्रबन्ध अथवा क्रमिक पूर्वापरत का बिलकुल विचार नहीं किया गया। कभी-कभी एक ही सूक्त में उन सबको एक साथ प्रस्तुत किया गया है। इससे केवल यही लक्षित होता है कि जिस समय ऋग्वेद का ग्रन्थ लिखा गया, विचार के वे सब पड़ाव पहले से पार कर चुके थे और जन-साधारण उनमें से कुछ अथवा सभी देवताओं को, बिना उनके पारस्परिक विरोध का विचार मन में लाए, पकड़े बैठे थे।
वैदिक विचारक जगत् के उद्गम एवं स्वरूप सम्बन्धी दार्शनिक समस्याओं की ओर से उदासीन नहीं थे। प्रत्येक परिवर्तनशील पदार्थ के आदिम आधार की खोज में उन्होंने प्राचीन यूनानी विद्वानों के समान जल, वायु आदि को ही मौलिक तत्त्व के रूप में माना, जिनके परस्पर एकत्र होने से इस नानाविध जगत् की उत्पति हुई। कहा गया है कि जल की अवस्था से उन्नत होकर इस जगत् का विकास समय, संवत्सर अथवा वर्ष, इच्छा या काम, एवं बुद्धिरूप पुरुष तथा तप की ऊष्मा की शक्तियों द्वारा हुआ।'[144] कहीं-कहीं स्वयं जल की उत्पत्ति रात्रि रूपी अन्धकार अथवा अविश्रृंखलता की अवस्था एवं तमस् अथवा वायु से हुई बताई गई है।[145] ऋग्वेद के मण्डल 10 सूक्त 72 में संसार के प्रारम्भिक आधार का असत् अथवा अविद्यमान रूप में वर्णन किया गया है, जिसके साथ अदिति का, जो असीम है, तादात्य बताया गया है, अर्थात् वह भी असत् रूप में था। असीम से विश्वशक्ति उदित होती है यद्यपि कभी-कभी विश्वशक्ति का स्वयं असीम उत्पत्ति स्थान करके वर्णन किया गया है।'[146] इस प्रकार की कल्पनाएं शीघ्र अभौतिक सत्ता के साथ सम्बद्ध हो गई और इस प्रकार की भौतिक-विज्ञान ने धर्म के साथ गठवन्धन करके अध्यात्मविद्या को जन्म दिया।
बहुदेववाद के काल में भिन्न-भिन्न देवताओं, यथा वरुण, इन्द्र, अग्नि, विश्वकर्मा आदि, को विश्व का रचयिता समझा जाता था।[147] सृष्टि के निर्माण की विधि के विषय में नाना प्रकार की कल्पनाएं की गई हैं। एक मत है कि कुछ देवताओं ने सृष्टि को इसी प्रकार से बनाया जैसे कि एक बढ़ई किसी मकान को बनाता है। प्रश्न उत्पन्न होता है कि वह वृक्ष या काष्ठ, जिससे कार्य-सम्पादन हो सका, कहां से मिला।[148] आगे चलकर इसका उत्तर यह "दिया गया है कि ब्रह्म ही वह वृक्ष और काष्ठ है जिससे द्युलोक एवं पृथ्वी का निर्माण किया गया।[149] स्थान-स्थान पर कभी-कभी अंगों का विकास भी उपलक्षित किया गया है।[150]' कहीं-कहीं पर देवताओं ने यज्ञ की शक्ति के द्वारा सृष्टि का निर्माण किया, ऐसा भी कहा गया है। इस मत का समावेश वैदिक विचारधारा में पीछे चलकर हुआ। जब हम एकेश्वरवाद के स्तर पर पहुंचते हैं तो प्रश्न उठता है कि क्या ईश्वर ने सृष्टि को अपने निजी स्वभाव से किसी पूर्व- स्थित सामग्री के बिना बनाया, अथवा अपनी शक्ति से पूर्व-स्थित अनादि प्रकृति को साधन के रूप में बरतकर उससे सृष्टि का निर्माण किया? इनमें से पहला पक्ष हमें उच्चतर अद्वैतपरक विचार की ओर ले जाता है और दूसरा एकेश्वरवादपरक निम्नतर स्तर पर रहता है। वैदिक सूक्तों में दोनों ही प्रकार के मत पाए जाते हैं। दसवें मण्डल के 121वें सूक्त में एक सर्वशक्तिमान ईश्वर के द्वारा पूर्वस्थित प्रकृतिरूपी उपादान कारण से सृष्टि की रचना का वर्णन है। प्रारम्भ में विस्तृत जल में से हिरण्यगर्भ उदित हुआ जो विश्व में व्याप्त हो गया। उसने एक आकृतिविहीन और अस्तव्यस्तत अवस्था में से इस सुन्दर विश्व का निर्माण किया, क्योंकि प्रारम्भ में वही अस्तव्यस्त अवस्था थी।[151] किन्तु प्रश्न उठता है-उस अस्त-व्यस्त अवस्था में से हिरण्यगर्भ कैसे और कहां से पैदा हो गया? वह कौन-सी अज्ञात शक्ति अथवा विकास का नियम था जिसका परिणाम हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति के रूप में हुआ ? प्रारम्भिक जलावस्था का रचयिता कौन है? मनु, हरिवंश एवं पुराणों के अनुसार ईश्वर ही उस अस्तव्यस्त अवस्था का भी स्रष्टा था। उसने अपनी इच्छाशक्ति से उनकी रचना की और उसमें बीज डाला, जो स्वर्णिम अंकुर के रूप में प्रस्फुटित हुआ, उसमें वह ब्रह्मा अथवा संसार के स्रष्टाईश्वर के रूप में उत्पन्न हुआ। "मैं ही हरिण्यगर्भ हूं, स्वयं परमात्मा जो हिरण्यगर्भ के रूप में अपने को अभिव्यक्त करता हूं।"[152] इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि अनादिकाल से सहचारी भाव से दो पदार्थ एक ही चरम आधारभूत सत्ता के विकसित रूप हैं। यह एक परवर्ती सूक्त में वर्णित सिद्धान्त है जिसे नासदीयसूक्त कहते हैं और जिसका अनुवाद
मैक्समूलर ने निम्न प्रकार से किया है:
उस समय न तो सत् था और न असत् ही। आकाश भी विद्यमान नहीं था और न ही उससे ऊपर का अन्तरिक्ष था। किसने इसे आवृत कर रखा था ? वह कहां था और किसके आश्रय में रहता था? क्या वह आदिमकालीन गहन और गम्भीर जल था (जिसमें यह सब स्थित था)? मृत्यु भी नहीं थी, इसलिए अमरता की भावना भी नहीं थी। रात और दिन में भेद करने वाला प्रकाश भी नहीं था। वह एक ही उस समय विना श्वास-प्रश्वास की क्रिया के जीवित रहने वाला ब्रह्म विद्यमान था। उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं था। उस समय अन्धकार था, प्रारम्भ में यह सब एक अर्णव समुद्र के रूप में था; प्रकाश-रहित; एक ऐसा अंकुर जो त्विष (भूसी) से ढका हुआ था; उस एक की उत्पत्ति उष्मा (तप) की शक्ति से हुई। प्रारम्भ में प्रेम उसे आविर्भूत किया जो मानस से उत्पन्न हुआ बीज था, कवियों ने अपने हृदय में खोज करने के पश्चात् बुद्धि द्वारा असत् के साथ सत् के बन्धन का पता लगाया। उनकी किरण जो सर्वत्र फैली हुई थी, वह ऊपर थी अथवा नीचे थी ? बीज को धारण करने वाले थे, शक्तियां भी थीं, आत्मशक्ति नीचे और इच्छाशक्ति ऊपर थी। तब फिर ज्ञाता कौन है, किसने इसकी यहां घोषणा की, किससे यह सृष्टि उत्पन्न हुई? देव लोग इस सृष्टि की उत्पत्ति के पीछे आए। तब फिर कौन जानता है कि सृष्टि कहां से हुई? जिससे इस सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ, उसने इसे बनाया या नहीं बनाया, ऊंचे से ऊंचे अन्तरिक्षलोक में ऊंचे से ऊंचा देखने वाला, वही यथार्थ रूप से जानता है अथवा क्या वह भी नहीं जानता ?'[153]
उक्त सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति के विषय का एक अत्यन्त उन्नत सिद्धान्त पाया जाता है। प्रारम्भ में न तो सत् था और न ही असत्। सत् भी उस समय अपने अभिव्यक्त रूप में नहीं था। केवल इसीलिए हम उसे असत् नहीं कह सकते, क्योंकि वह एक निश्चित सत्ता है जिससे सब सं पदार्थ आविर्भूत हुए। पहली पंक्ति में हमारे सिद्धान्तों की अपूर्णता प्रदर्शित की गई है। परम सत्ता को, जो समस्त विश्व की पृष्ठभूमि में है, हम सत् अथवा असत् किसी भी रूप में ठीक-ठीक नहीं जान सकते। वह ऐसी सत्ता है जो अपने ही सामर्थ्य से बिना श्वास-प्रश्वास की क्रिया के जीवित है।[154] उसके अतिरिक्त और कोई वस्तु उसके परे नहीं थी। इन सबका आदिकारण समस्त विश्व से प्राचीन है, जो सूर्य, चन्द्रमा, आकाश और नक्षत्रों से युक्त है। यह काल की, देश की, आयु, मृत्यु और अमरता आदि सबकी पहुंच क्ते बाहर और उनसे परे है। हम इसकी ठीक-ठीक व्याख्या नहीं कर सकते, सिवाय इसके कि यह अस्तित्व रखती है। उस सत्स्वरूप के आदिम और अनिर्वचनीय रूप की यही प्रारम्भिक और मूलभूत भूमिका है। उस परम चेतना के अन्दर सबसे पहले स्वीकृतिसूचक अहं का भाव आता है। यह तर्कशास्त्र के तादात्म्य के सिद्धान्त, अर्थात् 'क' 'क' है, से मेल खाता है, जिसकी प्रामाणिकता पूर्वकल्पना कर लेती है कि आत्मा की यथार्थ सत्ता है। ठीक उसके साथ ही हमें अनात्म की भी कल्पना करना आवश्यक है, जिससे साथ-साथ इस जहं का भेद समझा जा सके। आत्मा की प्रतिद्वन्द्विता में अनात्म भी स्वयं आता है, उसी प्रकार जिस प्रकार 'क' 'ख' नहीं है। अहं तब केवल एक निरर्थक अमूर्तरूप उक्ति रह जायगा जबकि अहं से मिन्न कोई ऐसी दूसरी वस्तु भी न हो जिसकी चेतना अहं को होनी चाहिए। यदि ऐसा पंदार्थ आत्मा से इतर नहीं है तो अहं की सत्ता का भी कोई अर्थ नहीं। अहं से अहंभिन्न उपलक्षित होता है, जोकि अहं की सत्ता के लिए आवश्यक शर्त है। अहं के विरोध में अनहं की विरोधी कल्पना ही प्रारम्भिक अर्थान्तरन्यास है और परम सत्ता से इस प्रकार के सांकेतिक विकास को ही तपस् कहा गया है। तपस् का अर्थ है-बाहर निकल पड़ना, तात्कालिक बाह्य निष्कासन, एक अन्य सत्ता को बाहर प्रकट करना, शक्तियुक्त प्रेरणा, परम सत्ता का स्वाभाविक अन्तस्थ धार्मिक जोश। इस तपस् के द्वारा ही हमारे सामने सत् और असत् दो विविध वस्तुएं आती हैं, अर्थात् अहं और अहंभिन्न, सक्रिय पुरुष, और निष्क्रिय प्रकृति, रचनात्मक तत्त्व और अव्यवस्था में स्थित भौतिक प्रकृति। शेष सार विकास इन्हीं दोनों परस्पर विरोधी तत्त्वों के एक-दूसरे के प्रति आघात प्रत्याघात रूपी क्रिया का परिणाम है। उक्त सूक्त के अनुसार इच्छा में ही सृष्टि के निर्माण का रहस्य छिपा है। इच्छा, अथवा काम, आत्मचेतना का लक्षण है, जो मानस का बीज है- 'मनसो रेतः । समस्त विकास की यही आधारभित्ति है, उन्नति के लिए प्रेरणा है। अनात्म की उपस्थिति के कारण आत्म-चेतनावान अहं के अन्दर इच्छाएं विकास प्राप्त करती हैं। इच्छा विचार से बढ़कर है।'[155] यह वौद्धिक प्रेरणा, अभाव के ज्ञान एवं सक्रिय प्रयत्न की द्योतक है। यही वह बन्धन है जिससे सत् ओर असत् का सम्पर्क सम्भव होता है। वह अजन्मा नित्यसत्ता आत्मचेतन रूपी ब्रह्म के रूप में अभिव्यक्त होकर हमारे सामने आती है, जिसके साथ प्रकृति, अन्धकार, असत, शून्य और विश्रृंखलावस्था है, जो इसके विरोधी हैं। इच्छाशक्ति इस स्वयंचेतन पुरुष को अनिवार्य स्वरूप है। अन्तिम वाक्य 'को वेद ? (कौन जानता है?) सृष्टि के रहस्य का प्रकट करता है, जिसे परवर्ती काल के विचारकों ने माया कहा है।
ऐसे सूक्त हैं जिनका अन्त दो तत्त्वों, पुरुष एवं प्रकृति, के साथ होता है। दशम मण्डल के 82, 5-6 सूक्तों में जो सूक्त विश्वकर्मा को सम्बोधन करके लिखा गया है, उसमें मिलता है कि समुद्र के जलों ने सबसे प्रथम आद्यकालीन बीज को धारण किया। यह आदिम बीज संसार के उत्पादक अण्डे के रूप में अव्यवस्था के आदिकालीन जलों के ऊपर तैरता था और यही जंगम विश्व का आदितत्त्व है। इसी में से विश्वकर्मा, जो विश्व में सबसे पूर्व उत्पन्न हुआ, प्रादुर्भूत हुआ। यहां वर्णित जल वही है जिसे यूनानी विद्वानों ने सृष्टि के पूर्व की विश्रृंखलता कहा है और जिसे बाइबिल के प्रथम अध्याय 'जेनेसिस' में 'आकार-विहीन एवं शून्य' कहा गया है, जिसके ऊपर असीम की इच्छा का आधिपत्य था।[156] इच्छा, काम, स्वयंचेतना, मानस, वाक् अथवा शब्द, ये सब उस अनन्त बुद्धि के गुण हैं, जो अवताररूप ईश्वर के रूप में समुद्र पर विचारमग्न है, और जिसे नारायण कहा गया है और जो अनन्तशय्या पर विश्राम करता है। यह जेनेसिस का ईश्वर है, जो कहता है, "सृष्टि हो जाए और सृष्टि हो गई।" "उसने विचार किया कि मैं संसार की रचना करूंगा तब उसने इन विविध प्रकार के संसारों, जल, प्रकाश आदि को रचा।" किन्तु नासदीय सूक्त द्वैतपरक आध्यात्मिक ज्ञान का उल्लंघन करके उच्च श्रेणी के द्वैतवाद को अपनाता है। यह प्रकृति और आत्मा दोनों को एक परम सत्ता के ही दो रूप बतलाता है। परम सत्ता अपने-आप में न तो अहं है और न अहं का अभाव है, न तो अहं की प्रकृति की स्वयंचेतना है और न ही अहं के अभाव के नमूने की अचेतना है। यह दोनों से ऊंची श्रेणी की सत्ता है। यह श्रेष्ठतर चेतना है। विरोध का विकास स्वयं इसी के अन्दर हुआ है। उक्त हिसाब से आधुनिक परिभाषा में सृष्टि की उत्पत्ति की श्रेणियां इस प्रकार हैं (1) उच्चतम परमार्थ सत्ता (2) केवल स्वयंचेतना, अर्थात् मैं मैं हूं (3) स्वयंचेतना की सीमा दूसरे के रूप में। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कोई एक विशेष लक्ष्यविन्दु ऐसा है जब कि परमसत्ता गति प्रारम्भ करती है। ये श्रेणियां केवल तार्किक दृष्टि से, किन्तु ऐतिहासिक कालक्रम से नहीं, एक के पीछे एक आने वाली हैं। 'अहं' अहं के अभाव की कल्पना का कारण बनता है, इसलिए उससे पूर्व नहीं हो सकता। इसी प्रकार अहं का अभाव भी अहं के पहले नहीं आ सकता और न परम सत्ता ही विना तपस् के सदा रह सकती है। कालरहित पूर्ण सदा श्रृंखलाबद्ध तत्ताओं में प्रकट होता रहता है और यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक कि आत्मा अपने को पुनः प्रकट नहीं करती-नितान्त रूप में नानाविध अनुभवों में जो कभी आने वाली नहीं है। इस प्रकार संसार सदा बेचैन रहता है। यह सूक्त हमें सृष्टि के निर्माण की विधि को तो बतलाता है; किन्तु कहां से यह बनी, इसका समाधान नहीं करता। यह सृष्टि रूपी घटना की व्याख्या-मात्र करता है।'[157]
हम स्पष्ट देख सकते हैं कि ऋग्वेद के सूक्त में जगत् के मिथ्या होने के विचार का कोई आधार नहीं है। संसार एक प्रयोजनशून्य मृगमरीचिका नहीं है, बल्कि ईश्वर का ठीक विकासरूप है। जहां कहीं माया शब्द आया है वह केवल उसके सामर्थ्य एवं शक्ति का द्योतक है। "इन्द्र अपनी माया से शीघ्र शीघ्र नानारूप धारण करता है।"[158] तो भी कभी-कभी माया और इससे निकले हुए मायिन्, मायावन्त आदि शब्दों का व्यवहार राक्षसों की इच्छा को प्रकट करता है ।''[159] और माया शब्द का प्रयोग भ्रमजल एवं प्रदर्शन के अर्थ में भी होता है।'[160] ऋग्वेद की मुख्य प्रवृत्ति एक सीधा-सादा सरल यथार्थवाद है। वाद के भारतीय विचारकों ने पांच मूल तत्त्वों या महाभूतों का प्रभेद किया है-आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। परन्तु ऋग्वेद केवल एक, जल की ही परिकल्पना करता है। यही आदिमहाभूत है, जिससे धीरे-धीरे दूसरे तत्त्वों का विकास हुआ है।
यह सोचना अयुक्ति युक्त होगा कि ऊपर जिस सूक्त की हमने विवेचना की है उसके अनुसार, प्रारम्भ में 'असत्' था जिससे सत्ता का प्रादुर्भाव हुआ। प्रारम्भिक अवस्था नितान्त असत् की नहीं है क्योंकि इस सूक्त में एक ऐसी सत्ता की यथार्थता को जो बिना श्वासोच्छ्वास-प्रणाली के भी जीवित है, स्वीकार किया गया है। यह उनका एक तरीका है जिससे वे परमयथार्थ सत्ता का वर्णन करते हैं, और जो समस्त विश्व की सत्ता का तार्किक आधार है। सत् और असत् अन्योन्याश्रित पारिभाषिक शब्द हैं और उस महान एक के लिए प्रयुक्त नहीं किए जा सकते जो सब प्रकार के विरोधों से परे है। असत् का अर्थ केवल यही है कि जो इस समय हमारे दृष्टिपथ में विद्यमान है उसकी उस समय प्रकटरूप में सत्ता नहीं थी। मण्डल 10 की 72वीं ऋचा में कहा गया है कि "सत्तावान असत् स्वरूप से प्रकट हुआ।" यहां भी इसका अर्थ यह नहीं है कि सत् असत् के अन्दर से आता है। इसका तात्पर्य केवल यही है कि प्रकट सत् अस्पष्ट असत् के प्रादुर्भूत होता है। इसलिए हम इस विचार से सहमत नहीं हो सकते कि "यह ऋचा भौतिक दर्शन का प्रारम्भिक रूप है जो आगे चलकर सांख्यदर्शन के रूप में विकसित हो गई है।"'[161]
सृष्टि की रचना कभी-कभी एक आदिपदार्थ से हुई भी कही जाती है; पुरुषसूक्त[162] में हम देखते हैं कि देवतागण सृष्टि के साधक-मात्र हैं जबकि वह सामग्री जिससे संसार उत्पन्न हुआ, परमपुरुष का शरीर है। सृष्टिरचनारूप कर्म को एक प्रकार का यज्ञ बताया गया है जिसमें पुरुष बलि का पशु है। "यह सब भूत और भविष्यत् जगत् पुरुष ही है।"[163] ईश्वर के मानवीयकरण को ज्यों ही एक बार आश्रय दिया तो उसको फिर किसी सीमा के अन्दर बांधकर नहीं रखा जा सकता, और एक भारतीय की कल्पनाशक्ति उसके ईश्वर की महानता को बड़ी-बड़ी आकृतियों में परिणत कर देती है। कविहृदय विस्तृत छन्दात्मक मन्त्रों की रचना करके संसार और ईश्वर दोनों के एकत्व को अपील करता है। यह सूक्त एक परम सत्ता से विश्व की रचना के सिद्धान्त के साथ, जिसका ऊपर वर्णन किया गया है, असंगति नहीं रखता। समस्त जगत् इसके अनुसार भी परम सत्ता के अपने को विषयी एवं विषय के रूप में, अर्थात् पुरुष और प्रकृति के रूप में, विलोपन करने के ही कारण बना है। इस विचार को केवल एक अपरिमार्जित अलंकार के रूप में रखा गया है। सर्वोपरि महान सत्ता क्रियाशील पुरुष का रूप धारण कर लेती है, क्योंकि कहा गया है कि "पुरुष से विराट उत्पन्न हुआ विराट से फिर पुरुष।" इस प्रकार से पुरुष जनक भी है और जन्य भी। वह परम सत्ता के रूप में भी है और स्वयंचेतन अहं भी है।
हमने देखा है कि किस प्रकार भौतिक घटनाओं ने शुरू शुरू में मनुष्य के ध्यान को आकर्षित किया, और उनका मानवीयकरण किया गया। प्राकृतिक घटनाओं को देवताओं का रूप देने का हानिकारक प्रभाव धार्मिक विचारों और धार्मिक प्रक्रियाओं के ऊपर भी हुआ। संसार ऐसे देवतारूपी पुरुषों से भर गया जिनमें मनुष्यों की भांति न्याय करने का भाव था और जो घृणा अथवा प्रेम के मानवीय गुणों से प्रभावित भी हो सकते थे। बहुत-से देवताओं का पर्याप्त मात्रा में मानवीयकरण भी नहीं हुआ और इसलिए वे आसानी से उक्त स्थिति से गिरकर प्राकृतिक रूप में वापस चले गए। उदाहरण के लिए, इन्द्र जिसका जन्म समुद्र और मेघ से है, कभी-कभी द्युलोक से वज्र-ध्वनि के साथ, बिजली की कड़क के साथ, नीचे उतर आता है। वैदिक देवता, जैसा कि ब्लूमफील्ड ने कहा है, "पकड़े गए व्यक्तित्व' का प्रतिनिधित्व करते हैं। किन्तु मानवाकृतिधारी देवता भी असंस्कृतरूप में ही देहधारी हैं। उनके हाथों और पांवों की कल्पना भी मनुष्यों की सी की गई है। उन्हें शारीरिक आकृति प्रदान की गई है। जिस प्रकार का द्वन्द्व मानवीय हृदय में मनोभावों में होता है, वैसा ही द्वन्द्व उनके अन्दर भी मिलता है। गौरवर्ण त्वचा की चमक-दमक भी मानव जाति के समान है और एक लम्बी दाढ़ी से चेहरे की भव्यता भी मिलती है। वे परस्पर युद्ध भी करते हैं, प्रीतिभोज भी करते हैं, मद्य भी पीते हैं एवं नृत्य भी करते हैं, खाते हैं और प्रसन्न होते हैं। उनमें से कुछ को संस्कारों में 'पुरोहित' का पद भी प्रदान किया जाता है, जैसे अग्नि और बृहस्पति को। कुछ अन्य इन्द्र एवं मरुद्गण के समान योद्धा भी हैं। उनका भोजन भी वही है जो मनुष्यों को प्रिय है, अर्थात् दूध और मक्खन, घी और अनाज। उनका प्रिय पेय सोमरस है। मानवीय स्वभाव की दुर्बलताएं भी उनमें पाई जाती हैं और उन्हें चाटुकारिता से सुगमता से प्रसन्न भी किया जा सकता है। कभी-कभी वे इतनी स्वार्थपरक मूर्खता का भी प्रदर्शन करते हैं, और हमें क्या देना चाहिए इस विषय में बहस करने लगते हैं। "इस काम को मैं करूंगा; अमुक कर्म को नहीं करूंगा; मैं अमुक को गाय दूंगा अथवा क्या उसे अश्व दूं ? मुझे ख्याल नहीं कि अमुक से मुझे सोम मिला था या नहीं।"[164] उनकी दृष्टि में सच्ची प्रार्थना की अपेक्षा एक प्रचुर आहुति अत्यधिक महत्त्व की है। आदान-प्रदान का सीधा-सादा कानून देवताओं एवं मनुष्यों को एक समान परस्पर सम्बद्ध रखता है यद्यपि परवर्तीकाल के ब्राह्मणग्रन्थों में उनके आदान-प्रदान-सम्बन्धी सम्बन्धों को पूर्णता देने का कार्य अभी दूर था।
"प्रकृतिधर्म का मानवीयकरण आवश्यक रूप से उन्हें अनिष्टकारी भी बना देना है। आंधी-तूफान की पूजा करने में कोई बड़ी नैतिक हानि नहीं है, यद्यपि बिजली अच्छे-बुरे सब पर बिना भेदभाव के प्रहार करती है। इस विषय में बहाना करने की आवश्यकता नहीं है कि बिजली एक बुद्धिपूर्ण और धार्मिक चुनाव भी कर सकती है, किन्तु ज्यों ही एक बार आप ऐसे एक अर्धमानुष देवता की पूजा करने लगते हैं जो बिजली गिराता है, आप एक प्रकार के उभयसंभव तर्क को जन्म देते हैं। या तो आपको यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आप एक ऐसी सत्ता की पूजा एवं उसकी चापलूसी कर रहे हैं जिसे कुछ भी नैतिक ज्ञान नहीं है क्योंकि वह भयंकर है; अन्यथा आपको ऐसे कारण गढ़ने पड़ेंगे जिनसे उसके ऐसे व्यक्तियों के प्रति क्रोध की व्याख्या हो सके जिन पर वह प्रहार करती है। और ऐसे कारण निश्चय ही अनुचित होंगे। ईश्वर को यदि मानवीय रूप में माना जाएगा तो वह अवश्य अस्थिरमन व क्रूर होगा ।''[165] इस प्रकार के मत को स्वीकार करने वाली भौतिक शक्तियों की वैदिक पूजा ईमानदारी से परे है और केवल उपभोगितावादी है। हम ऐसे देवताओं से डरते हैं जो हमें नुकसान पहुंचा सकते हैं, और उन्हें आदर की दृष्टि से देखते हैं जो हमें हमारे दैनिक जीवन में सहायता देते हैं। हम इन्द्र से प्रार्थना करते हैं कि वह वर्षा करे, और साथ-साथ यह भी याचना करते हैं कि वह तूफान को दूर रखे। सूर्य से प्रार्थना की जाती है कि हल्की उष्णता दे और यह कि झुलसाने वाली गर्मी को दूर रखे जिससे सूखा या दुर्भिक्ष न पड़ने पाए। देवता भौतिक समृद्धि के भी उद्गम बनते हैं, और सांसारिक पदाथों के लिए प्रार्थनाएं प्रायः ही सामान्य रूप से पाई जाती हैं। और चूंकि कर्मों और गुणों का विभाग भिन्न है, हम खास- खास देवताओं से खास-खास पदार्थों की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।'[166] देवताओं की स्तुति एक ही प्रकार की और सरल है।[167] देवताओं को साधुवृत्त मानने की अपेक्षा अधिकतर शक्तिशाली के रूप में सदाचारी होने की अपेक्षा सामर्थ्यवान के रूप में माना गया है। इस प्रकार का धर्म मनुष्यों की नैतिकता-सम्बन्धी उच्च आकांक्षाओं के लिए सन्तोषप्रद नहीं हो सकता। यह वैदिक आर्य के प्रबल नैतिक भाव को दर्शाता है कि उपयोगितावादी पूजा की प्रचलित प्रवृत्ति के विद्यमान रहते हुए भी वह सामान्यरूप से देवताओं को साधुवृत्त मानता है, जिनका झुकाव सज्जनों की सहायता करने एवं दुर्जनों को दण्ड देने की ओर है। मनुष्य की उच्चतम धार्मिक महत्त्वाकांक्षा अपने को परमब्रह्म के साथ संयुक्त करने की है, यह स्पष्ट प्रतीत होता है।[168] अनेक देवताओं का अस्तित्व अपने भक्तों को परमब्रह्म तक पहुंचाने में एक प्रकार से सहायक ही था।"[169]
यज्ञों का प्रचार होना अनिवार्य था। क्योंकि ईश्वर के प्रति प्रेम की गहराई इसी में निहित है कि उपासक अपने सर्वस्व और सम्पत्ति को ब्रह्म को अर्पित कर दे। हम प्रार्थना एवं समर्पण करते हैं। जिस समय यज्ञात्मक समर्पण केवल औपचारिक रूप में थे, तब भी भावना को ही अधिक महत्त्व दिया जाता था और यज्ञ के वास्तविक स्वरूप पर ही बल दिया जाता था। "इन्द्र के प्रति भावपूर्ण वाणी बोलो, जो घी या मधु से अधिक मधुर है।"[170] प्रत्येक संस्कार में श्रद्धा का भाव आवश्यक है।[171] वरुण ऐसा देवता है जोकि मानवीय हृदय के गृह्यतम भागों में प्रवेश करके अन्तर्निहित प्रेरक भाव का पता लगाता है। धीरे-धीरे देवताओं को मानवीय, और आवश्यकता से अधिक मानवीय, रूप दे देने के कारण उन्होंने सोचा कि ईश्वर के हृदय में स्थान पाने के लिए पूर्ण भोजन अर्पण करना सबसे उत्तम मार्ग है।'[172]
मनुष्य बलि के प्रश्न पर बहुत वाद-विवाद हो चुका है। शुनश्शेप[173] का आख्यान यह नहीं लक्षित करता है कि मनुष्य बलि की आज्ञा अथवा उसका प्रोत्साहन वेदों में पाया जाता है। हम अश्वमेध'[174] के विषय में भी सुनते हैं। किन्तु इन सबके विरोध में उस समय में भी घोर प्रतिवाद सुना जाता था। सामवेद कहता है, "हे देवताओं! हम यज्ञ सम्बन्धी किसी खम्भे का प्रयोग नहीं करते, हम किसी की हिंसा नहीं करते, हम केवल पवित्र मन्त्रों का बारम्बार उच्चारण करके पूजा करते हैं।"[175] इस विद्रोह की आवाज़ को उपनिषदों ने अपनाया और बौद्ध एवं जैन सम्प्रदायों ने इसे आगे बढ़ाया।
यज्ञ वैदिक धर्म की दूसरी श्रेणी है। प्रथम श्रेणी में केवल सरल प्रार्थना का ही विधान था। पाराशरस्मृति के अनुसार हमारे यहां 'कृतयुग में समाधि का, त्रेतायुग में यज्ञों का, द्वापर में पूजा का और कलियुग में स्तुति एवं प्रार्थना का' विधान है। यह मत विष्णुपुराण के मत के साथ पूर्णरूप से मिलता है जहां कहा गया है कि यज्ञसम्बन्धी नियमों का निर्माण त्रेतायुग में हुआ।'[176] हम यहां युगों के विभाग के विषय में भले ही सहमत न हो सकें, किन्तु धार्मिक प्रक्रियाओं की प्रगति समाधि से यज्ञ की ओर, यज्ञ से पूजा की ओर, और पूजा से स्तुति एवं प्रार्थना की ओर यथार्थ घटनाओं के ऊपर अवश्य आधारित है।
वैदिक धर्म मूर्तिपूजक धर्म नहीं प्रतीत होता। उस समय देवताओं के मन्दिर नहीं थे। मनुष्य बिना किसी दूसरे की मध्यस्थता के देवताओं से सीधा सम्बन्ध रखते थे। देवताओं को अपने उपासकों का मित्र समझा जाता था। 'द्यौस्पिता', 'भूमि मांता', 'अग्नि भ्राता'- ये वाक्य निरर्थक नहीं हैं। मनुष्यों और देवताओं के मध्य उस समय अत्यन्त घनिष्ठ मित्रता का नाता था। धर्म का जीवन के समस्त भागों में आधिपत्य था। ईश्वर के ऊपर लोग पूर्ण रूपेण निर्भर करते थे। जीवन की साधारण-सी आवश्यकताओं के लिए भी लोग प्रार्थना करते थे। "आज हमें अपना दैनिक भोजन दो", यह वैदिक आर्य के भाव के अनुकूल प्रार्थना थी। जीवन के सामान्य भोगों के लिए भी ईश्वर के ऊपर निर्भर करने वाले भक्त की सच्ची भक्ति का यह एक नमूना है। जैसा कि हम पहले कह आए हैं, उच्च श्रेणी के आस्तिकवाद के सब सारभूत तत्त्व हमें वरुण की पूजा में मिल जाते हैं। यदि भक्त का अर्थ एक देहधारी ईश्वर में विश्वास, उसके प्रति प्रेम, उसी की सेवा में सर्वस्व अर्पण करना और उसी की विशेष भक्ति द्वारा मोक्षप्राप्ति आदि समझे जाएं तो निश्चय ही हमें ये सब तत्त्व वरुण की पूजा में मिलते हैं।
मण्डल 10 का 15वां एवं उसी मण्डल का 54वां सूक्त (दो सूक्त) हमें पितरों को सम्बोधन करते हुए मिलेंगे। पितर वे सौभाग्यशाली मृतात्मा हैं जो स्वर्ग में निवास करते हैं। वैदिकसूक्तों में देवताओं के साथ-साथ उनकी भी स्तुति की जाती है।[177] यह कल्पना की जाती है कि वे अदृश्य आत्माओं के रूप में प्रार्थनाओं एवं यज्ञों में दी गई आहुतियों को ग्रहण करने के लिए आते हैं। इस सामाजिक परम्परा को पितृपूजा के रूप में श्रद्धा-भाव से देखा जाता है। वेदों के विद्यार्थी ऐसे भी हैं जिनका विश्वास है कि ऋग्वेद के सूक्तों में स्वर्गीय पूर्वजों की पवित्र आत्माओं को उद्दिष्ट करके उत्तरक्रियाकर्म-सम्बन्धी आहुतियां एवं उपहार देने का कोई विधान नहीं है।[178]
वैदिकधर्म के विरुद्ध जो एक आक्षेप साधाराणतः किया जाता है वह यह है कि वेदों "में पाप के प्रति अभिज्ञा का प्रभाव है। यह एक भ्रममूलक मत है। वेदों के अन्दर ईश्वर से विमुख होने को ही पाप (अधर्म) माना गया है।'[179] पाप के विषय में जो वैदिक धारणा है वह • हीब्रू सिद्धान्त के सदृश है। ईश्वरेच्छा ही नैतिकता का मानदण्ड है। मानवीय अपराध ही न्यूनता है। हम पाप तभी करते हैं जब हम ईश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन करते हैं। देवता ऋत, अर्थात् संसार की सदाचार-सम्बन्धी व्यवस्था, को धारण करने वाले हैं। वे सज्जनों की रक्षा करते हैं एवं दुर्जनों को दण्ड देते हैं। बाह्य कर्तव्यों के पालन न करने मात्र का नाम ही पाप नहीं है। पाप दो प्रकार के होते हैं-एक नैतिक पाप और दूसरा कर्मकाण्ड विषयक पाप।[180]' यह पाप की चेतना ही है जिसके कारण शमनकारी यज्ञों का विधान किया जाता है। विशेष रूप से वरुण की कल्पना में हमें पाप और क्षमा की भावना मिलती है, जो हमें आधुनिक ईसाई धर्म के सिद्धान्तों का स्मरण कराती है।
जबकि साधारणतया ऋग्वेद के देवताओं को नैतिकता के संरक्षक समझा जाता है, उसमें से कुछेक अब भी अपनी अहंकारपूर्ण भावनाओं को बनाए हुए हैं, जोकि वस्तुतः बृहदाकाररूप मानव ही हैं, और ऐसे कवियों का भी अभाव नहीं है जो इस सबके अन्दर की पोल साक्षात् देख सकते हैं। एक सूक्त-विशेष[181] में निर्देश किया गया है कि किस प्रकार सभी देवता एवं मनुष्य स्वार्थ के वश में हैं। वैदिक पूजा का ह्रास कई देवताओं की इस निम्नस्तर की भावना के कारण ही हुआ। अन्यथा हम उस सुन्दर सूक्त'[182] का आशय समझ नहीं सकते जो बिना किसी देवी-देवता की प्रसन्नता का विचार किए परोपकार की भावना रूपी कर्तव्य पर विशेष बल देता है। देवता शुद्ध नैतिकता के नियमों की रक्षा करने में अत्यन्त असमर्थ हो गए प्रतीत होते हैं। धार्मिक क्रिया-कलापों से स्वतन्त्र नीतिशास्त्र की भावना के-जिसे बौद्धमत ने प्रचलित किया सम्बन्ध में हमें यहां संकेत मिलता है।
ऋग्वेदप्रतिपादित सदाचार की ओर ध्यान देने पर ज्ञात होता है कि वहां 'ऋत' के विचार का बहुत बड़ा महत्त्व है। यह कर्मसिद्धान्त का, जोकि भारतीय विचारधारा का एक विशिष्ट स्वरूप है, पूर्वरूप है। यह वह कानून है जो संसार. में सर्वत्र व्याप्त है और जिसे सब देवताओं एवं मनुष्यों को अवश्य पालन करना चाहिए। यदि संसार में कोई कानून (त्रिकालाबाधित नियम, ऋत) है तो उसे अवश्य क्रियात्मक रूप में आना ही चाहिए। और यदि किसी कारण से इसके कार्यों का प्रकाश इस भूलोक में नहीं हो सका, तो उनका फल अवश्य ही अन्यत्र कहीं मिलेगा। जहां नियम कार्य करता है वहां अव्यवस्था अथवा अन्याय केवल अस्थायी एवं आंशिक रूप से ही रह सकते हैं। दुर्जन की विजय स्थायी एवं नितान्त नहीं होती। सज्जन पुरुष का अहित निराशा का कारण न होना चाहिए।
ऋत हमारे आगे सदाचार के एक मानदण्ड को प्रस्तुत करता है। यह वस्तुओं का व्यापक सारतत्त्व है। यह सत्य है, अर्थात् वस्तुओं की यथार्थता है। अव्यवस्था अथवा अनृत मिथ्या है, जो सत्य का विरोधी एवं सत्य के विपरीत है,'[183] जो ऋत अर्थात् सत्य एवं व्यवस्थित मार्ग, का अनुसरण करते हैं वे सत्पुरुष हैं। व्यवस्थित आचरण को सत्यव्रत कहा जाता है। ऋत के मार्ग का अनुसरण करने वालों के जीवन-व्यवहारों को 'व्रतानि' कहा जाता है।'[184] स्थिरता एवं संगति धार्मिक जीवन का मुख्य लक्षण है। वैदिक धर्मानुयायी अपने व्यवहार में परिवर्तन नहीं करता। वरुण, जो ऋत के मार्ग का अनुसरण करने वाला है, आदर्शरूप है, धृतव्रत है-अर्थात् उसके व्यवहार में परिवर्तन नहीं होता। जब कर्मकाण्ड का महत्त्व बढ़ने लगा, ऋत यज्ञ अथवा यज्ञात्मक अनुष्ठान का पर्यायवाची हो गया।
आदर्श जीवन का सामान्य वर्णन करने के पश्चात् सूक्तों के अन्दर नैतिक जीवन के विशिष्ट सारतत्त्व व्यौरेवार दिए गए हैं। देवताओं के प्रति प्रार्थना करनी चाहिए, धार्मिक अनुष्ठान करने चाहिए।'[185] वेद मनुष्यों एवं देवताओं के मध्य एक निकटतम एवं घनिष्ठ सम्बन्ध को स्वीकार करते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन के व्यवहार में सर्वदा ईश्वर को साक्षी मानकर चले। देवताओं के प्रति जो हमारे कर्तव्य हैं उनके अतिरिक्त मनुष्य- जाति के प्रति भी कुछ कर्तव्य हैं।[186] सबके प्रति दया का भाव कर्तव्यरूप से विधान किया गया है। अतिथिसत्कार की गणना महान पुण्यकों में की गई है। "जो दाता है उसका धन कभी क्षीण नहीं होता ।... ऐसे मनुष्य को कोई सान्त्वना नहीं दे सकता जो भोजन के पदार्थ को पास में रखते हुए भी एक निर्बल व्यक्ति के प्रति, जिसे पौष्टिक भोजन की अत्यन्त आवश्यकता है, अपने हृदय को निष्ठुर एवं कठोर बना लेता है, और सहायता के लिए आए हुए दुखी व्यक्ति के आगे भी जिसका हृदय नहीं पसीजता, किन्तु इसके विपरीत उसके सामने ही अपने भोगों में मग्न रहता है।"[187] इन्द्रजाल, जादूविद्या, नारीहरण एवं व्यभिचार को पापकर्म बताकर दूषित ठहराया गया है।'[188] जुए को वर्जित माना गया है। धार्मिक गुण ईश्वरीय नियम की अनुकूलता है और इसमें मनुष्य के प्रति प्रेम भी आ जाता है। दुष्कर्म उस ईश्वरीय नियम का उल्लंघन है। "यदि हमने ऐसे किसी मनुष्य के प्रति जो हमसे प्रेम करता है, पाप किया है, मित्र अथवा साथी का अनिष्ट किया है, किसी पड़ोसी को जो सदा हमारे साथ रहता है अथवा पराये को भी कभी नुकसान पहुंचाया है, तो हे प्रभु! इस नियमोल्लंघन रूपी पाप से हमें मुक्त करो।"[189] कुछेक देवता ऐसे हैं जिन्हें धार्मिक मार्ग से दान-उपहार की किसी भी मात्रा के द्वारा फुसलाकर विचलित नहीं किया जा सकता। "उनके अन्दर