भारतीय दर्शन-2

 

 

 

 

 

 

 

 

हिन्दू धर्म-पुनर्जागरण काल से वर्तमान तक

(Indian Philosophy का हिन्दी अनुवाद)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

डॉ. राधाकृष्णन

 

 

 

 

राजपाल

 

 

 

अनुवाद

 

नन्दकिशोर गोभिल

 

 

 

स्थापित 1912

100 वर्षो की श्रेष्ठ प्रकाशन परम्परा

राजपाल

 

 

रू.650

 

ISBN: 9788170281887

 

संस्करण : 2024

 

हिन्दी अनुवाद राजपाल एण्ड सन्ज़

BHARATIYA DARSHAN (Part-2) by Dr. S. Radhakrishnan

मुद्रक : जी.एस. ऑफसेट, दिल्ली

 

राजपाल एण्ड सन्ज़

1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली-110006

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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रस्तावना

 

इस खण्ड में भी, जिसका प्रतिपाद्य विषय वैदिक षड्दर्शन का विवेचन है, मैंने पहले खण्ड जैसी ही योजना तथा विधि अपनाई है। इसके अतिरिक्त, मैंने उस भावना को भी अपनाने का प्रयत्न किया है जो दार्शनिक व्याख्या के लिए उचित मानी गई है, अर्थात् प्राचीन लेखकों तथा उनके विचारों की सुचारु रूप से व्याख्या करके उन्हें दर्शन तथा धर्म-सम्बन्धी आज के विचारणीय विषयों के सन्दर्भ में रखना। वाचस्पति मिश्र ने, जो हिन्दू विचारधारा के लगभग सभी दर्शनों के टीकाकार हैं, प्रत्येक पर अपनी लेखनी का जिस प्रकार प्रयोग किया है उससे प्रतीत होता है मानो वे उनके सिद्धान्तों में भी विश्वास रखते हैं। विचारधारा की उन प्रवृत्तियों को जो प्राचीन काल में परिपक्वता को पहुँची थीं और जो अनेक दुर्बोध ग्रंथों में लिपिबद्ध हैं, बुद्धिपूर्वक प्रस्तुत करने में यह आवश्यक हो गया कि विशेष दृष्टिकोणों को चुना जाए, उन पर बल दिया जाए और उनकी आलोचना तक की जाए। यह कार्य, स्वभावतः यह प्रकट कर देता है कि मेरी अपनी विचारधारा किस दिशा में चल रही है। इस प्रकार के कार्य में क्योंकि विवरण-सम्बन्धी अनेक प्रकार के निर्णयों का समावेश रहता है, अतः यह आशा नहीं की जा सकती कि यह पुस्तक निर्णय-सम्बन्धी भूलों से मुक्त होगी। किन्तु मैंने, प्रमाणों में किसी प्रकार की उलट-फेर करने से बचते हुए, केवल विषयपरक प्रतिपादन का ही प्रयत्न किया है।

 

मैं यहाँ इस बात को दोहरा देना आवश्यक समझता हूँ कि मेरे विषय-प्रतिपादन को सर्वथा पूर्ण मान लेना चाहिए। क्योंकि, लगभग प्रत्येक अध्याय में जितने विषय का प्रतिपादन है, उसके अध्ययन के लिए एक पूर्णतया सन्नद्ध विशेषज्ञ अपना पूरा जीवन लगा देता है। विशिष्ट दर्शनों के ब्यौरेवार विवेचन के लिए पृथक् निबन्धों की आवश्यकता है। मेरे कार्य का क्षेत्र सीमित है, अर्थात् विविध विचारधाराओं के आन्दोलनों की, उनकी प्रेरक भावनाओं और उनके परिणामों की एक मोटी रूपरेखा तैयार करना। भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के अल्प-महत्त्व के लेखकों में परस्पर जो गौण मतभेद पाए जाते हैं, उनको दर्शाने की मैंने वस्तुतः कोई चेष्टा नहीं की है। शैव, शाक्त और परवर्ती वैष्णव दर्शनों के सम्बन्ध में, जो भारत के दार्शनिक विकास की अपेक्षा धार्मिक इतिहास से अधिक सम्बन्ध रखते हैं, मेरा विवेचन बहुत संक्षिप्त तथा सार-नात्र है। यदि मैं प्रकल्पनात्मक भारतीय विचारधारा के नाना रूपों की वास्तविक भावना का एक चित्र, जो भले ही अपर्याप्त हो, अपने पाठकों के सम्मुख रख सका तो मुझे पूर्ण सन्तोष हो जाएगा।

 

यदि यह खण्ड पहले की अपेक्षा कुछ कठिन है तो मैं आशा करता हूं कि पाठक अनुभव करेंगे कि कठिनाई का निर्माता / नहीं हूँ, बल्कि कुछ सीमा तक यह कठिनाई विषयगत है और गम्भीर विवेचन के कारण है जो विषय के अध्ययन के लिए आवश्यक है। मैंने अनुभव किया कि तथ्यों के पुंज को एक ऐसे विशद आख्यान में समो कर रखना, जिसे पाठक सम्भ्रम में पड़े बिना और बिना उकताए समझ सके, एक ऐसा कार्य है जिसे पहले से मापना मेरे लिए सम्भव नहीं था। शैथिल्य तथा पाण्डित्याभिमान के बीच में से मध्यम मार्ग का अवलम्बन करके चलने में मैं कहाँ तक सफल हो सका हूँ, इसका निर्णय पाठक करेंगे। साधारण पाठक के सुभीते के विचार से अधिक पारिभाषिक अचवा सन्दर्भ-सम्बन्धी वाद-विवाद ऊपर और नीचे कुछ स्थान छोड़ कर पृथक् रूप से दिए गए हैं।

 

इस खण्ड के संकलन में मुझे विविध सम्प्रदायों के संस्कृत के सन्दर्भों से ही नहीं, बल्कि ड्यूसन और कीथ, थिबीत और गार्ब, गंगानाथ झा और विद्याभूषण प्रभृति विद्वानों के लेखों से भी बहुत सहायता मिली है। मैं  अपने मित्रों, श्रीयुत बी. सुब्रह्मण्य अय्यर तथा प्रोफ़ेसर जे. एस. मैकेंजी का अत्यन्त कृतज्ञ हूँ क्योंकि इन्होंने पुस्तक की पाण्डुलिपि और प्रूफ के अनेक भागों को देखने का कष्ट किया तथा अनेकों मूल्यवान् सुझाव दिए। प्रोफ़ेसर . बेरीडेल कीथ ने प्रूफ़ देखने की कृपा की और इनकी समालोचनाओं से पुस्तक को बहुत लाभ हुआ। मुझे पुस्तक के प्रधान सम्पादक प्रोफ़ेसर जे. एच. म्यूरहेड को भी हार्दिक धन्यवाद देना है, जिन्होंने प्रथम खण्ड के समान ही, इस खण्ड के लिए भी अपना बहुत समय और चिन्तन प्रदान किया। यदि इनकी उदार सहायता प्राप्त होती तो इस पुस्तक में जो भी त्रुटियाँ अब रहगई हैं उनसे कहीं अधिक रह जातीं।

 

- राधाकृष्णन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

पहला अध्याय. 15

विषय-प्रवेश. 15

1. दर्शनशास्त्रों का प्रादुर्भाव. 15

2. वेदों के साथ सम्बन्ध... 16

3. सूत्र-साहित्य... 19

4. सामान्य विचारधाराएं. 21

दूसरा अध्याय. 26

न्यायशास्त्र का तर्कसम्मत यथार्थवाद. 26

1. न्याय और वैशेषिक.. 26

2. न्याय की प्रारम्भिक अवस्था.... 29

3. साहित्य और इतिहास. 32

4. न्याय का क्षेत्र. 40

5. परिभाषा का स्वरूप. 43

6. प्रत्यक्ष अथवा अन्तर्दृष्टि... 44

7. अनुमान-प्रमाण.. 67

8. परार्थानुमान. 70

9. आगमन अनुमान. 80

10. कारण.. 85

11. उपमान अथवा तुलना.. 95

12. आप्त प्रमाण.. 97

13. ज्ञान के अन्य रूप. 104

14. तर्क और बाद. 106

15. स्मृति.. 108

16. संशय. 108

17. हेत्वाभास. 110

18. सत्य अथवा प्रमा.. 112

19. भ्रान्ति.... 121

20. न्याय के प्रमाणवाद का सामान्य मूल्यांकन. 125

21. भौतिक जगत्. 132

22. जीवात्मा और उसकी नियति.. 135

23. आत्मा तथा चेतना के सम्बन्ध के विषय में न्याय के सिद्धान्त पर कुछ समालोचनात्मक विचार. 142

24. नीतिशास्त्र... 149

25. ब्रह्मविद्या.... 154

26. उपसंहार. 161

तीसरा अध्याय. 164

वैशेषिक का परमाणु-विषयक अनेकवाद. 164

1. वैशेषिक दर्शन. 164

2. निर्माण काल तथा साहित्य... 165

3. ज्ञान का सिद्धान्त... 169

4. पदार्थ. 171

5. द्रव्य... 174

6. परमाणुवाद की प्रकल्पना.. 181

7. गुण.. 190

8. कर्म अथवा क्रिया.. 194

9. सामान्य... 195

10. विशेष. 200

11. समवाय. 201

12. अभाव. 204

13. नीतिशास्त्र... 207

14. ईश्वर. 210

15. वैशेषिक दर्शन का सामान्य मूल्यांकन. 213

चतुर्थ अध्याय. 230

सांख्य दर्शन. 230

1. प्रस्तावना.. 230

2. पूर्ववर्ती परिस्थिति.. 231

3. साहित्य... 236

4. कार्यकारणभाव. 239

5. प्रकृति.. 241

6. गुण.. 244

7. विकास. 247

8. देश और काल. 257

9. पुरुष. 259

10. लौकिक जीवात्मा.... 262

11. पुरुष और प्रकृति.. 266

12. पुरुष और बुद्धि.... 270

13. ज्ञान के उपकरण.. 272

14. ज्ञान के स्रोत. 275

15. सांख्य की ज्ञान-सम्बन्धी प्रकल्पना पर कुछ आलोचनात्मक विचार. 281

16. नीतिशास्त्र... 284

17. मोक्ष.. 288

18. परलोक-जीवन. 291

19. क्या सांख्य निरीश्वरवादी है. 293

20. सामान्य मूल्यांकन. 296

पाँचवाँ अध्याय. 310

पतंजलि का योगदर्शन. 310

1. प्रस्तावना.. 310

2. पूर्ववर्ती परिस्थिति.. 312

3. निर्माणकाल और साहित्य... 315

4. सांख्य और योग. 316

5. मनोविज्ञान. 318

6. प्रमाण.. 323

7. योग की कला.. 324

8. नैतिक साधना.. 326

9. शरीर का नियंत्रण.. 327

10. प्राणायाम. 329

11. इन्द्रिय-निग्रह. 329

12. ध्यान. 330

13. समाधि अथवा एकाग्रता.. 330

14. मोक्ष.. 335

15. कर्म. 337

16. अलौकिक सिद्धियां.. 338

17. ईश्वर. 341

18. उपसंहार. 344

छठा अध्याय. 346

पूर्वमीमांसा.. 346

1. प्रस्तावना.. 346

2. रचनाकाल और साहित्य... 347

3. प्रमाण.. 351

4. प्रत्यक्ष ज्ञान. 352

5. अनुमान. 358

6. वैदिक प्रामाण्य... 359

7. उपमान प्रमाण.. 364

8. अर्थापत्ति.. 364

9. अनुपलब्धि.... 365

10. प्रभाकर की ज्ञान-विषयक प्रकल्पना.. 366

11. कुमारिल की ज्ञानविषयक प्रकल्पना.. 370

12. आत्मा.... 376

13. यथार्थता का स्वरूप. 382

14. नीति शास्त्र... 385

15. अपूर्व. 388

16. मोक्ष.. 390

17. ईश्वर. 391

2. सातवाँ अध्याय. 397

वेदान्तसूत्र. 397

1. प्रस्तावना.. 397

2. सूत्रकार तथा सूत्र की रचना का काल. 399

3. अन्य सम्प्रदायों के साथ सम्बन्ध... 401

4. अध्यात्मविद्या-सम्बन्धी विचार. 401

5. उपसंहार. 410

आठवाँ अध्याय. 412

शंकर का अद्वैत वेदान्त... 412

1. प्रस्तावना.. 412

2. शंकर का जन्म काल तथा जीवन. 414

3. साहित्य... 417

4. गौडपाद. 419

5. अनुभूत ज्ञान का विश्लेषण.. 420

6. सृष्टिरचना.. 426

7. नीतिशास्त्र और धर्म. 428

8. गौडपाद और बौद्धधर्म. 430

9. भर्तृहरि.. 432

10. भर्तृप्रपंच. 433

11. उपनिषदों तथा ब्रह्मसूत्र के साथ शंकर का सम्बन्ध... 433

12. शंकर तथा अन्य सम्प्रदाय. 437

13. आत्मा.... 441

14. ज्ञान का तन्त्र या रचना.. 450

15. प्रत्यक्ष.. 452

16. अनुमान. 458

17. शास्त्रप्रमाण.. 459

18. विषयी विज्ञानवाद का निराकरण.. 461

19. सत्य की कसौटी.. 463

20. तार्किक ज्ञान की अपूर्णता.. 466

21. अनुभव. 473

22. अनुभव, तर्क तथा श्रुति.. 477

23. परा तथा अपरा विद्या.... 481

24. शंकर के सिद्धान्त और कुछ पाश्चात्य विचारों की तुलना.. 483

25. विषयनिष्ठ मार्ग देश, काल और कारण.. 488

26. ब्रह्म... 494

27. ईश्वर अथवा शरीरधारी परमात्मा.... 503

28. ईश्वर का मायिक रूप. 515

29. जगत् का मिथ्यात्व... 523

30. मायावाद. 526

31. अविद्या.... 534

32. क्या जगत् एक भ्रांति है?. 538

33. माया और अविद्या.... 546

34. प्राकृतिक जगत्. 549

35. जीवात्मा.... 553

36. साक्षी और जीव. 560

37. आत्मा और जीव. 562

38. ईश्वर और जीव. 567

39. एकजीववाद तथा अनेकजीववाद. 569

40. नीति शास्त्र... 571

41. शंकर के नीतिशास्त्र पर किए गए कुछ आरोपों पर विचार. 580

42. कर्म. 592

43. मोक्ष.. 593

44. परलोक.. 603

45. धर्म. 606

46. उपसंहार. 612

नौवाँ अध्याय. 616

रामानुज का ईश्वरवाद. 616

1. प्रस्तावना.. 616

2. आगम. 618

3. पुराण.. 619

4. रामानुज का जीवन. 622

5. इतिहास और साहित्य... 623

6. भास्कर. 627

7. यादवप्रकाश. 628

8. ज्ञान के साधन. 629

9. कारण तथा द्रव्य... 635

10. आत्मा तथा चैतन्य... 635

11. ईश्वर. 638

12. जीवात्मा.... 645

13. प्रकृति.. 650

14. सृष्टि-रचना.. 652

15. नैतिक तथा धार्मिक जीवन. 656

16. मोक्ष.. 663

17. सामान्य मूल्यांकन. 665

दसवाँ अध्याय. 674

शैव, शाक्त तथा परवर्ती वैष्णव ईश्वरवाद. 674

1. शैव सिद्धान्त... 674

2. साहित्य... 675

3. सिद्धान्त... 676

4. प्रत्यभिज्ञा दर्शन. 683

5. शाक्त सम्प्रदाय. 686

6. मध्वाचार्य. 689

7. जीवन तथा साहित्य... 690

8. ज्ञान का सिद्धान्त... 691

9. ईश्वर. 693

10. जीवात्मा.... 694

11. प्राकृतिक जगत्. 695

12. ईश्वर और जगत्. 696

13. नीतिशास्त्र और धर्म. 697

14. समीक्षात्मक विचार. 700

15. निम्बार्क.. 702

16. वल्लभ. 706

17. चैतन्य का आन्दोलन. 709

ग्यारहवाँ अध्याय. 714

उपसंहार. 714

1. दार्शनिक विकास. 714

2. समस्त दर्शन-पद्धतियों का समन्वय. 716

3. दर्शन और जीवन. 718

4. आधुनिक युग में भारत दर्शनशास्त्र का हास. 718

5. वर्तमान स्थिति.. 720

परिशष्ट.. 728

टिप्पणियां.. 728

पारिभाषिक शब्द.. 739

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पहला अध्याय

विषय-प्रवेश

 

दर्शनशास्त्रों का प्रादुर्भाव वेदों के साथ

सम्बन्ध-सूत्र साहित्य-सामान्य विचारधाराएँ।

 

1. दर्शनशास्त्रों का प्रादुर्भाव

 

भारत में हम बौद्धकाल में दार्शनिक चिन्तन की एक महती लहर उमड़ती हुई पाते हैं। दर्शनशास्त्र की प्रगति साधारणतः, किसी ऐतिहासिक परम्परा पर होनेवाले किसी प्रबल आक्रमण के कारण ही सम्भव होती है, जबकि मनुष्य-समाज पीछे लौटने को और उन मूलभूत प्रश्नों को एक बार फिर उठाने के लिए बाध्य हो जाता है जिनका समाधान उसके पूर्वपुरुषों ने प्राचीनतर योजनाओं के द्वारा किया था। बौद्ध तथा जैन धर्मों के विप्लव ने, वह विप्लव अपने-आप में चाहे जैसा भी था, भारतीय विचारधारा के क्षेत्र में एक विशेष ऐतिहासिक युग का निर्माण किया, क्योंकि उसने कट्टरता की पद्धति को अन्त में उड़ा कर ही दम लिया तथा एक समालोचनात्मक दृष्टिकोण को उत्पन्न करने में सहायता दी। महान् बौद्ध विचारकों के लिए तर्क ही एक ऐसा मुख्य शस्त्रागार था जहां सार्वभौम खण्डनात्मक समालोचना के शस्त्र गढ़ कर तैयार किए गए थे। बौद्ध धर्म ने मस्तिष्क को पुराने अवरोधों के कष्टदायक प्रभावों से मुक्त करने में विरेचन का काम किया। वास्तविक तथा जिज्ञासा-भाव से निकला हुआ संशयवाद विश्वास को उसकी स्वाभाविक नींवों पर जमाने में सहायक होता है। नींव को अधिक गहराई में डालने की आवश्यकता का ही परिणाम महान् दार्शनिक हलचल के रूप में प्रकट हुआ, जिसने छह दर्शनों को जन्म दिया जिनमें काव्य तथा धर्म का स्थान विश्लेषण और शुष्क समीक्षा ने ले लिया। रूढ़िवादी सम्प्रदाय अपने विचारों को संहिताबद्ध करने तथा उनकी रक्षा के लिए तार्किक प्रमाणों का आश्रय लेने को बाध्य हो गए। दर्शनशास्त्र का समीक्षात्मक पक्ष उतना ही महत्त्वपूर्ण हो गया जितना कि अभी तक प्रकल्पनात्मक पक्ष था। दर्शनकाल से पूर्व के दार्शनिक मतों द्वारा अखण्ड विश्व के स्वरूप के सम्बन्ध में कुछ सामान्य विचार तो अवश्य प्राप्त हुए थे, किन्तु यह अनुभव नहीं हो पाया था कि किसी भी सफल कल्पना का आधार ज्ञान का एक समीक्षात्मक सिद्धान्त ही होना चाहिए। समालोचकों ने विरोधियों को इस बात के लिए विवश कर दिया कि वे अपनी प्रकल्पनाओं की प्रामाणिकता किसी दिव्य ज्ञान के सहारे सिद्ध करें, बल्कि ऐसी स्वाभाविक पद्धतियों द्वारा सिद्ध करें जो जीवन और अनुभव पर आधारित हों। कुछ ऐसे विश्वासों के लिए, जिनकी हम रक्षा करना चाहते हैं, हमारा मापदण्ड शिथिल नहीं होना चाहिए। इस प्रकार आत्मविद्या अर्थात् दर्शन को अब आन्वीक्षिकी'[1] अर्थात् अनुसन्धानरूपी विज्ञान का सहारा मिल गया। दार्शनिक विचारों का तर्क की कसौटी पर इस प्रकार कसा जाना स्वभावतः कट्टरतावादियों को रुचिकर नहीं हुआ।[2] श्रद्धालुओं को यह निश्चय ही निर्जीव लगा होगा, क्योंकि अंतःप्रेरणा के स्थान पर अब आलोचनात्मक तर्क गया था। चिन्तन की उस शक्ति का स्थान जो सीधी जीवन और अनुभव से फूटती है, जैसी कि उपनिषदों में और आत्मा की उस अलौकिक महानता का स्थान जो परब्रह्म का दर्शन और गान करती है, जैसा कि भगवद्गीता में है, कठोर दर्शन ले लेता है। इसके अतिरिक्त, तर्क की कसौटी पर पुरानी मान्यताएँ निश्चय ही खरी उतर सकेंगी यह भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता था। इतने पर भी उस युग की सर्वमान्य भावना का आग्रह था कि प्रत्येक ऐसी विचारधारा को जो तर्क की कसौटी पर खरी उतर सके, 'दर्शन' के नाम से ग्रहण करना चाहिए। इसी कारण उन सभी तर्कसम्मत प्रयासों को जो विश्व के सम्बन्ध में फैली विभिन्न बिखरी हुई धारणाओं को कुछ महान् व्यापक विचारों में समेटने के लिए किए गए, दर्शन की संज्ञा दी गई।[3] ये समस्त प्रयास हमें सत्य के किसी--किसी अंश को अनुभव कराने में सहायक सिद्ध होते हैं। इससे यह विचार बना कि प्रकट रूप में पृथक् स्वतन्त्र प्रतीत होते हुए भी, ये सब दर्शन वस्तुतः एक ही बृहत् ऐतिहासिक योजना के अंग हैं। और जब तक हम इन्हें स्वतन्त्र समझते रहेंगे तथा ऐतिहासिक समन्वय में इनकी स्थिति पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक हम इनकी वास्तविकता को पूर्णरूप से हृदयंगम नहीं कर सकते।

2. वेदों के साथ सम्बन्ध

तर्क की कसौटी को स्वीकार कर लेने पर काल्पनिक मान्यताओं के प्रचारकों का विरोध नरम पड़ गया और उससे यह स्पष्ट हो गया कि उनका आधार उतना सशक्त सुदृढ़ नहीं था और उन विचारधाराओं को दर्शन का नाम देना भी ठीक नहीं था। किन्तु भौतिकवादियों, संशयवादियों और कतिपय बौद्ध धर्मानुयायियों के विध्वंसात्मक जोश ने निश्चयात्मक ज्ञान के आधार को ही नष्ट कर दिया। हिन्दू मानस इस निषेधात्मक परिणाम को कभी भी शांति से ग्रहण नहीं कर पाया। मनुष्य संशयवादी रह कर जीवन-निर्वाह नहीं कर सकता। निरे बौद्धिक द्वन्द्व से ही काम नहीं चल सकता। वाद-विवाद का स्वाद मानय की आत्मिक भूख को शान्त नहीं कर सकता। ऐसे शुष्क तर्क से कुछ लाभ नहीं जो हमें किसी सत्य तक पहुंचा सके। यह असम्भव था कि उपनिषदों के ऋषियों जैसे आत्मनिष्ठ महात्माओं की आशाएं और महत्त्वाकांक्षाएं, तार्किक समर्थन के अभाव में, यों ही नष्ट हो जातीं। और यह भी असंभव था कि शताब्दियों के संघर्ष और चिन्तन से भी मानव-समस्या के समाधान की दिशा में कुछ आगे जाता। एकमात्र निराशा में ही उसका अन्त नहीं होने दिया जा सकता था। तर्क को भी अन्ततोगत्वा श्रद्धा का ही आश्रय ढूँढ़ना पड़ता है। उपनिषदों के ऋषि पवित्र ज्ञान के शिक्षणालय के महान् शिक्षक हैं। वे हमारे आगे ब्रह्मज्ञान आध्यात्मिक जीवन की सुन्दर व्याख्या रखते हैं। यदि निरे तर्क से मानव यथार्थ सत्य की प्राप्ति नहीं कर सकता तो निश्चय ही उसे उन ऋषियों के महान लेखों की सहायता प्राप्त करनी चाहिए, जिन्होंने आध्यात्मिक ध्रुव सत्य को प्राप्त करने का दावा किया है। इस प्रकार, जो कुछ श्रद्धा के द्वारा स्वीकार किया गया था उसकी वास्तविकता को तर्क द्वारा सिद्ध करने के प्रबल प्रयास किए गए। यह ढंग बुद्धिसंगत हो, ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दर्शन उस प्रयास का ही दूसरा नाम है जो मानव-समाज के बढ़ते हुए अनुभव की व्याख्या के लिए किया जाता है। किन्तु जिस ख़तरे से हमें सावधान रहना होगा वह यह है कि कहीं श्रद्धा को ही दार्शनिक विज्ञान का परिणाम स्वीकार कर लिया जाए।

 

सब दर्शनों में छह दर्शन अधिक प्रसिद्ध हुए-महर्षि गौतम का 'न्याय', कणाद का 'वैशेषिक', कपिल का 'सांख्य', पतंजलि का 'योग', जैमिनि का 'पूर्व मीमांसा', और बादरायण का 'उत्तर मीमांसा' अथवा 'वेदान्त' '[4] ये सब वैदिक दर्शन के नाम से जाने जाते हैं क्योंकि ये वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हैं। जो दर्शन वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हैं वे आस्तिक कहलाते हैं, और जो उसे स्वीकार नहीं करते उन्हें नास्तिक की संज्ञा दी गई है। किसी भी दर्शन का आस्तिक या नास्तिक होना परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने पर निर्भर होकर वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने पर निर्भर है।[5] यहां तक कि बौद्ध धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों का भी उद्गम उपनिषदों में है; यद्यपि उन्हें सनातन धर्म नहीं माना जाता है, क्योंकि वे वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करते। कुमारिल भट्ट, जिनकी सम्मति इन विषयों में प्रामाणिक समझी जाती है, स्वीकार करते हैं कि बौद्ध दर्शनों ने उपनिषदों से प्रेरणा ली है, और वे यह युक्ति देते हैं कि इनका उद्देश्य अत्यन्त विषय-भोग पर रोक-थाम लगाना था। वे यह भी घोषणा करते हैं कि ये सब प्रामाणिक दर्शन हैं।'[6]

 

वेद को स्वीकार करने का अर्थ यह है कि आध्यात्मिक अनुभव से इन सब विषयों में शुष्क तर्क की अपेक्षा प्रकाश मिलता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे वेद प्रतिपादित सब सिद्धान्तों को भी स्वीकार करते हैं, या परमात्मा के अस्तित्व में भी विश्वास रखते हैं। इसका अर्थ केवल जीवन के मूल रहस्य के उद्घाटन के लिए गम्भीर प्रयास करना है, क्योंकि इन सम्प्रदायों ने वेदों की निर्दोषता तक को समान रूप में स्वीकार नहीं किया है। हम देखते हैं कि वैशेषिक और न्याय परमात्मा की सत्ता को अनुमान प्रमाण द्वारा ही स्वीकार करते हैं। सांख्य ईश्वरवादी नहीं है। योग वेद से वस्तुतः स्वतन्त्र ही है। दोनों मीमांसा शास्त्र अवश्य ही वेद पर स्पष्ट रूप से निर्भर करते हैं। पूर्व मीमांसा में वर्णित देवता का सामान्य विचार वेदमूलक अवश्य है, किन्तु उसे परब्रह्म के रूप की चिन्ता नहीं है। उत्तर मीमांसा ब्रह्म के अस्तित्व को श्रुति के आधार पर स्वीकार करता है, किन्तु उसकी सिद्धि में अनुमान प्रमाण का भी उपयोग करता है, और उसकी सम्मति में उसका साक्षात्कार ज्ञान ध्यान द्वारा हो सकता है। परवर्ती काल के आस्तिक विचारक सांख्य को सनातन दर्शनशास्त्रों के अन्तर्गत मानने को तैयार नहीं थे।'[7]

 

इस प्रकार वेद की प्रामाणिकता मानने से इन छः दर्शनों की दार्शनिकता में कोई विशेष अन्तर नहीं आता।'[8] श्रुति और स्मृति का भेद सर्वविदित है, और जहां दोनों में परस्पर मतभेद हो वहाँ श्रुति की ही प्रधानता मानी जाती है। श्रुति भी अपने-आप में दो भागों में विभक्त है, कर्मकाण्ड (संहिता भाग और ब्राह्मण ग्रन्थ) और ज्ञानकाण्ड (उपनिषद्) ज्ञानकाण्ड का महत्त्व अधिक है, यद्यपि इसके अधिकांश भाग को केवल अर्थवाद अर्थात् अनावश्यक या गौण कथन कह कर एक ओर रख दिया गया है। इन सबके कारण वेद की प्रामाणिकता को बहुत उदार भाव से ही ग्रहण किया जा सकता है। वेदों की व्याख्या भी व्याख्याकारों की दार्शनिक रुचियों पर निर्भर करती है। तार्किक विधियों का प्रयोग करते हुए और युक्तिसंगत सत्यों पर पहुँचते हुए भी, वे प्राचीन मंत्रों से उनकी संगति बनाए रखने के लिए बराबर उत्सुक रहे। उनकी इच्छा बराबर यही रही कि उन्हें किसी बिलकुल नवीन विषय का प्रतिपादक समझा जाए। यद्यपि इससे उनकी स्पष्टवादिता का कुछ अभाव ही टपकता है, तो भी इससे इन सिद्धान्तों के प्रचार में सहायता मिली जिन्हें वे सत्य मानते थे।'[9] भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के समालोचक और टीकाकार अपने-अपने मत की पुष्टि में वेद की सम्मति का दावा करते हैं, और जहां यह सम्मति स्वतः दृष्टि में नहीं आती वहां बलपूर्वक संगति बैठाने में अपनी पटुता दिखाते हैं। परवर्ती काल के वाद-विवादों के प्रकाश में, ये लोग वेदों की भाषा में उन विषयों पर भी सम्मति ढूंढते हैं जिनका ज्ञान इन्हें बहुत ही कम या बिलकुल नहीं होता। वेदों के साधारण विचार तो निश्चित ही हैं और विस्तृत रूप से स्पष्ट ही हैं। इसीलिए भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय वालों को उनके अर्थों में खींचातानी करने का सुयोग मिल जाता है। इसके अतिरिक्त, वेदों की विशालता के कारण भी, ग्रन्थकारों को अपने विश्वास के अनुसार कोई-सा भाग चुन लेने से एक नवीन विचार का प्रचार करने के लिए सामग्री मिल जाती है।

 

इन दर्शनों में विषयों की विविधता इसलिए है कि दार्शनिक कल्पनाओं के पीछे धार्मिक उद्देश्य छिपा है। शब्द की नित्यता का सिद्धान्त दार्शनिक समस्या से अधिक आस्तिकवाद की समस्या है, क्योंकि इसका सम्बन्ध वेद की निर्दोषता के सिद्धान्त से है। हर एक वैदिक दर्शन में तर्क, मनोविज्ञान, तत्त्वज्ञान और धर्म का सम्मिश्रण पाया जाता है।

3. सूत्र-साहित्य

 

जब वैदिक साहित्य बहुत अधिक बढ़ गया और वैदिक विषय के विचारकों को अपने विचारों को क्रमबद्ध करने की आवश्यकता अनुभव होने लगी तब सूत्र-साहित्य की उत्पत्ति हुई। दर्शनों के मुख्य-मुख्य सिद्धान्त संक्षेप में सूत्रों के रूप में रखे गए हैं। इन्हें, जहाँ तक सम्भव हो सका छोटे-से-छोटे कलेवर में, शंकारहित, किन्तु वास्तविक तत्त्व को प्रकट करनेवाले रूप में रखा गया है, जिसमें अनावश्यक अशुद्ध अंश के लिए कोई स्थान नहीं है।'[10] सब प्रकार के अनावश्यक पुनरुक्तिदोष से रहित और चुने हुए कम-से-कम शब्दों में इनका निर्माण किया गया है।'[11] प्राचीन काल के लेखकों को विस्तार से लिखने का कोई प्रलोभन नहीं था, क्योंकि वे छपे हुए ग्रन्थों की अपेक्षा स्मृति पर अधिक निर्भर करते थे। अत्यन्त संक्षिप्त रूप में होने के कारण सूत्रों के पूरे आशय को बिना टीका की सहायता के समझना एक कठिन कार्य है।

 

दार्शनिक विचारों के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न पद्धतियों का विकास हुआ। कितनी ही पीढ़ियों में विचार एकत्र होते गए और अन्त में सूत्रों के रूप में उनका संग्रह किया गया। सूत्र किसी एक विचारक के परिश्रम का परिणाम नहीं हैं, किसी एक युग में इनका निर्माण हुआ है। ये कितने ही और कई पीढ़ियों में बँटे हुए विचारकों के सतत परिश्रम का परिणाम हैं। सूत्रों का रूप लेने से पूर्व उन विचारों की कितने ही समय तक गर्भरूप में बढ़ते रहने की कल्पना की जा सकती है, इसलिए उनके उद्गम को खोज निकालना एक कठिन कार्य है। आध्यात्मिक ज्ञान के प्रारम्भ के विषय में निश्चित रूप से कुछ भी धारणा बनाना कठिन है। सूत्र ग्रन्थ प्राचीन काल के श्रृंखलाबद्ध प्रयासों का परिणाम हैं और इन्हें 'एक बिलकुल केन्द्रीय स्थान प्राप्त है, क्योंकि जहां एक ओर ये पुराने साहित्यिक निबन्धों का, जो कितनी ही पीढ़ियों में लिखे गए होंगे, सार प्रस्तुत करते हैं, यहां दूसरी ओर ये टीकाकारों तथा स्वतन्त्र लेखकों के उस उत्तरोत्तर बढ़ते कार्य-कलाप का मुख्य स्रोत भी हैं जिसकी परम्परा हमारे काल तक पहुंचती है और शायद कुछ आगे भी जा सकती है।"[12] दर्शनों का विकास सूत्रों के निर्माण से बहुत समय पूर्व हो गया होगा। दार्शनिक सूत्रों की समस्त शैली और भाव से यह प्रतीत होता है कि ये लगभग एक ही काल में बने हैं।'[13] सूत्रों के निर्माण दर्शनशास्त्रों के संस्थापक अथवा उत्पादक होकर मात्र उनके संग्राहक ही हैं। यही कारण है कि दार्शनिक सूत्रों में यत्र-तत्र परस्पर विरोधी प्रकरण पाए जाते हैं। और यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि विविध दर्शनशास्त्रों का निर्माण साथ-साथ एक ही समय में हो रहा था और वह समय सूत्रों के निर्माण-काल के पूर्व का समय है। मिले-जुले दार्शनिक समाधानों में से दर्शनों के पृथक्करण का समय बुद्ध के पश्चात् की प्रारम्भिक शताब्दियों में और ईसा के समय से पूर्व आंका जा सकता है। उस समय दार्शनिक विचारों का आदान-प्रदान पुस्तकों के द्वारा होकर मौखिक रूप में होता था। यह सम्भव है कि मौलिक शिक्षा की परम्परा टूट जाने के बाद कई प्रमुख ग्रन्थ नष्ट हो गए हों और जो आज हमें उपलब्ध हैं उनके अन्दर बहुत-सी मिलावट हो गई हो। कुछ अति प्राचीन प्रमुख सूत्रग्रन्थ, यथा बृहस्पतिसूत्र, वैखानससूत्र और भिक्षुसूत्र और कितना ही दार्शनिक साहित्य आज हमें प्राप्त नहीं है और उसके साथ ही बहुत-सी उपयोगी सामग्री भी, जो विभिन्न दर्शनों के कालानुक्रम पर प्रकाश डाल सकती थी, आज लुप्त हो गई है। मैक्समूलर के अनुसार, सूत्रग्रन्थों का निर्माण-काल बुद्ध से लेकर अशोक के समय तक है, यद्यपि वे यह स्वीकार करते हैं कि वेदान्त, सांख्य और योग के लिए उससे बहुत पूर्व का समय दिया जा सकता है। इस मत की पुष्टि कौटिल्य के अर्थशास्त्र की साक्षी से होती है। उस समय तक परम्परागत आन्वीक्षिकी अथवा तार्किक पद्धतियाँ मुख्यतः दो सम्प्रदायों, पूर्व मीमांसा और सांख्य में बंटी हुई थीं। यद्यपि बौद्धग्रन्थों में बहुत ही स्पष्ट उल्लेख है, तो भी यह कहा जा सकता है कि बौद्धसूत्रों में षड्दर्शन से उपलब्ध ज्ञान का समावेश पाया जाता है। बुद्ध के पीछे की प्रारम्भिक शताब्दियों का विशद बौद्धिक जीवन अनेक समानान्तर धाराओं में प्रवाहित हुआ, यद्यपि उन्हें सूत्रों का रूप देने का कारण विरोधी दर्शनों की प्रतिक्रिया ही थी। इन दर्शनों में अनेक परिवर्तन यद्यपि पीछे के भाष्यकारों के हाथों हुए, तो भी इनका श्रेय इनके जादि निर्माताओं को ही दिया जाता है। वेदान्त दर्शन व्यास का कहलाता है, यद्यपि शंकर, रामानुज और अन्य अनेक भाष्यकारों ने इसमें सिद्धान्त सम्बन्धी मौलिक परिवर्तन किए हैं। बड़े-से-बड़े भारतीय विचारक अपने को प्राचीन परिपाटी का अनुयायी ही मानते रहे हैं; यद्यपि मूलसूत्रों का भाष्य करते समय उन्होंने उनको अधिक उन्नत बना दिया है। प्रत्येक दर्शन ने अन्य दर्शनों को सामने रख कर उन्नति की है। वर्तमान समय तक भी षड्दर्शनों के विकास में उन्नति होती रही है। उत्तरोत्तर भाष्यकार विरोधियों के आक्षेपों के सामने अपने परम्परागत सिद्धान्त की बराबर रक्षा करते आए हैं।

 

प्रत्येक दर्शन के निर्माण की प्रारम्भिक अवस्था में दार्शनिक विचार का एक प्रकार का उबाल-सा आता है जो आगे चल कर एक विशेष स्थल पर सूत्ररूप में संक्षिप्त आकार धारण करता है। इसके पश्चात् सूत्रों के भाष्यों का समय आता है। फिर उन पर टिप्पणियां, टीकाएं एवं सारभूत व्याख्याएं आती हैं, जिनके कारण मौलिक सिद्धान्त में बहुत-सा परिवर्तन, सुधार विस्तार भी हो जाता है। भाष्य प्रश्नोत्तर के रूप में होते हैं, क्योंकि उपनिषदों के समय से ही इस पद्धति को जटिल विषय को विशद रूप में समझाने का एकमात्र उपयुक्त साधन समझा जाता रहा है। इस प्रकार भाष्यकार को विरोधी विचारों का उत्तर देते हुए मौलिक सिद्धान्त के समर्थन का उत्तम अवसर प्राप्त हो जाता है और इस विधि से उन्हीं विचारों की पुनः स्थापना करते हुए अन्यान्य विचारों की तुलना में उसकी उत्कृष्टता सिद्ध हो जाती है।

4. सामान्य विचारधाराएं

 

छः के छः दर्शन कुछ मौलिक सिद्धान्तों में परस्पर एकमत हैं।'[14] वेद की प्रामाणिकता मान्य होने से ध्वनित होता है कि इन सभी दर्शनों का विकास विचारधारा के एक ही आदिम स्रोत से हुआ है। हिन्दू शिक्षकों ने भूतकाल के अपने पूर्वपुरुषों से प्राप्त ज्ञान का उपयोग इसलिए भी किया क्योंकि इस आधार पर व्यक्त किए गए विचार सरलता से समझ में सकते थे। यद्यपि अविद्या, माया, पुरुष और जीव आदि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग यह प्रकट करता है कि विभिन्न दर्शनों की भाषा एक समान है, तो भी इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि उक्त पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग भिन्न-भिन्न दर्शनों में भिन्न-भिन्न अर्थों में हुआ है। विचारशास्त्र के इतिहास में प्रायः ऐसा होता है कि उन्हीं शब्दों और परिभाषाओं का भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय वाले अपने भिन्न-भिन्ने अथों में प्रयोग करते हैं। प्रत्येक दर्शन अपने विशेष सिद्धान्त के प्रतिपादन में सर्वोच्च धार्मिक विवेचन की उसी प्रचलित भाषा का प्रयोग आवश्यक परिवर्तनों के साथ करता है। इन दर्शनशास्त्रों में दार्शनिक विज्ञान आत्मचेतन रूप में विद्यमान है। वेदों में उल्लिखित अध्यात्म अनुभवों की तार्किक आलोचना इन ग्रन्थों का विषय है। ज्ञान की यथार्थता और उसको प्राप्त करने के साधन प्रत्येक दर्शन का एक मुख्य अध्याय हैं। प्रत्येक दार्शनिक योजना ज्ञान के सम्बन्ध में अपना स्वतन्त्र सिद्धान्त प्रतिपादित करती है, जो उस दर्शन के प्रतिपाद्य विषय-अध्यात्मविद्या-का मुख्य भाग है। अन्तर्दृष्टि, अनुमान और वेद-सब दर्शनों को एक समान मान्य हैं। युक्ति और तर्क को अन्तर्दृष्टि के अधीन ही स्थान दिया गया है। जीवन की पूर्णता का अनुभव केवल तर्क द्वारा सम्भव नहीं है। आत्मचेतन का स्थान विश्व में सर्वोपरि नहीं है। कोई वस्तु आत्मचेतना से भी ऊपर है जिसे अन्तर्दृष्टि, दिव्य ज्ञान, विश्वचेतना, और ईश्वरदर्शन आदि नाना संज्ञाएँ दी गई हैं। क्योंकि हम ठीक-ठीक इसकी व्याख्या नहीं कर सकते, इसलिए हम इसे उच्चतर चेतना के नाम से पुकारते हैं। जब कभी इस उच्च सत्ता की झलक हमारे सामने आती है तो हम अनुभव करते हैं कि यह एक पवित्र ज्योति की सत्ता है जिसका क्षेत्र अधिक विस्तृत है। जिस प्रकार 'चेतना' और आत्मचेतना का भेद पशु और मनुष्य के भेद को प्रदर्शित करता है, उसी प्रकार आत्मचेतना और उच्चतर चेतना का भेद मनुष्य को, जैसा कि वह है, उस मनुष्य से भिन्न प्रदर्शित करता है जैसा कि उसे बनना चाहिए। भारतीय दर्शन का आधार एक ऐसी भावना है जो केवल तर्क से ऊपर है, और उसका यह मत है कि जिस संस्कृति की नींव केवल तर्क और विज्ञान पर हो, उसमें कार्यक्षमता भले ही हो किन्तु उससे प्रेरणा नहीं मिल सकती।

 

सभी वैदिक दर्शन बौद्धों के संशयवाद के विरुद्ध हैं और एक शाश्वत, अस्थिर परिवर्तन-क्रम के विपरीत, एक उद्देश्यपूर्ण वास्तविकता और सत्य के पक्ष में अपना झंडा ऊंचा करते हैं। यह सृष्टि-प्रवाह अनादि है और यह केवल मन की कल्पनामात्र होकर वास्तविक है और एक उद्देश्य को लिए हुए है। इसी को अनादि प्रकृति, माया अथवा परमाणु कहा है। उस सत्ता को जिसमें नाम और रूप से रहित विश्व स्थित है, कोई प्रकृति, कोई माया और कोई परमाणु नाम से पुकारते हैं।'[15] यह मान लिया गया है कि जिसका प्रारम्भ है उसका अन्त भी है। अनेक हिस्सों से मिल कर जिस वस्तु का निर्माण हुआ है, वह तो नित्य हो सकती है और अपना अस्तित्व सदा स्थिर रख सकती है। यथार्थ अस्तित्व अविभाज्य है। देश और काल की सीमा में बँधा हुआ यह जगत् वास्तविक नहीं है, क्योंकि बनना बिगड़ना इसका प्रकृत स्वभाव है। इससे अधिक गहराई में कुछ है-परमाणु और जीवात्माएं, अथवा पुरुष और प्रकृति, अथवा ब्रह्म।

 

सभी दर्शन इस महान् विश्वरूपी प्रवाह के दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं। उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का क्रम अनन्त काल से चल रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा। इस सिद्धान्त का प्रगति-सम्बन्धी विश्वास के साथ कोई विरोध नहीं है; क्योंकि इसमें सृष्टि की गति के अपने अन्तिम लक्ष्य तक अनेक बार पहुँचने और फिर नये सिरे से प्रारम्भ करने का प्रश्न नहीं उठता। उत्पत्ति और विनाश का तात्पर्य यहां विश्व के नये सिरे से उत्पन्न होने और सर्वथा विनष्ट हो जाने से नहीं है। नवीन सृष्टि विश्व इतिहास का अगला पड़ाव होता है, जबकि बची हुई सद् और असद् क्षमताओं को अपनी पूर्णता तक पहुँचने का अवसर प्राप्त होता है। इसका तात्पर्य यह है कि मानव जाति को नये सिरे से आत्मदर्शन के अपने मार्ग पर आरूढ़ होने का अवसर प्राप्त होता है। यह संसार के युगों का कभी समाप्त होनेवाला विधान है जिसका कोई आरम्भकाल नहीं है।

 

पूर्व मीमांसा को छोड़, अन्य सभी वैदिक दर्शनों का लक्ष्य मोक्षप्राप्ति के क्रियात्मक उपायों को ढूंढ़ निकालना है। मोक्ष का अर्थ इन शास्त्रों के अनुसार है, जीवात्मा का पाप अथवा भूलों से छूट कर अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानना उसे प्राप्त करना। इस अंश में सभी दर्शनों का एक ही उद्देश्य है, अर्थात् पूर्ण मानसिक सन्तुलन, जीवन की विषमताओं और अनिश्चितताओं, दुःखों और कष्टों से छुटकारा पाना, 'एक ऐसी शान्ति जो शाश्वत बनी रहे' जिसमें कोई संशय विघ्न डाल सके और पुनर्जन्म जिसे भंग कर सके। जीवनमुक्ति के विचार को, अर्थात् इसी जन्म में मुक्त होने के भाव को अनेक सम्प्रदायों ने स्वीकार किया है।

 

हिन्दुओं का यह एक मूल विश्वास है कि इस विश्व का संचालन पूर्णरूप से किसी नियम के अनुसार हो रहा है, और तो भी मानव को अपने भाग्य का निर्णय करने में पूर्णतया स्वतन्त्र रखा गया है।

 

हमारे कार्य दूर से अभी भी हमारा पीछा करते हैं, जो कुछ हम पहले रहे हैं उसी के अनुसार हमारा वर्तमान रूप है।

 

सारे दर्शन पुनर्जन्म एवं पूर्वजन्म में आस्था रखते हैं। हमारा जीवन एक ऐसे मार्ग पर एक डग है जिसकी दिशा लक्ष्य अनन्त में निहित है। इस मार्ग में मृत्यु अन्त नहीं है और ही वह बाधा है। अधिक-से-अधिक वह नये डगों का प्रारम्भ है। आत्मा का विकास एक निरन्तर चलनेवाली प्रक्रिया है, यद्यपि भिन्न-भिन्न पड़ावों पर मृत्युरूपी संस्कार द्वारा बार-बार इसकी लड़ी टूटती रहती है।

 

दर्शन हमें गन्तव्य स्थान के द्वार तक ले जाता है, किन्तु उसके अन्दर प्रवेश नहीं करा सकता। उसके लिए अन्तर्दृष्टि या आत्मज्ञान आवश्यक है। हम संसाररूपी अन्धकार में भटक गए बच्चों के समान हैं, जिन्हें अपने असली रूप का ज्ञान नहीं है। इसीलिए हम भयभीत होते हैं और अपने चारों ओर व्याप्त दुःख में आशा को लेकर चिपके हुए हैं। इसीलिए प्रकाश की आवश्यकता है जो हमें वासनाओं से मुक्त करके अपने शुद्ध एवं वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराए और उस अवास्तविक स्थिति का भी परिचय दे सके जिसमें हम अज्ञानवश रह रहे हैं। इस प्रकार के अन्तर्निरीक्षण को मोक्ष की प्राप्ति का एकनात्र साथन स्वीकार किया गया है, यद्यपि अन्तर्निरीक्षण के उद्देश्य के विषय में मतभेद अवश्य है।'[16] अज्ञान ही बन्धन का कारण है और इसलिए सत्य का ज्ञान प्राप्त होने पर ही उससे मुक्ति मिल सकती है। दर्शनशास्त्रों का आदर्श नीतिशास्त्र की सतह से ऊपर उठने का है। पवित्रात्मा पुरुष की तुलना कमल के उस सुन्दर पुष्प से की गई है जो उस पंक से भी अलिप्त रहता है, जिससे कि वह उत्पन्न होता है। उसके लिए अच्छाई ऐसा लक्ष्य नहीं है जिसे कि प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना होता है, बल्कि वह अपने-आप में एक निश्चित सत्य है जबकि पाप पुण्य इस संसार-चक्र में अच्छे बुरे जीवन की ओर ले जाते हैं, हम अपने सदाचारमय जीवन से ऊपर उठ कर इस संसार से भी छुटकारा पा सकते हैं। सभी दर्शन हमें निःस्वार्थ प्रेम और निष्काम कर्म की शिक्षा देते हैं और सदाचार के लिए चित्तशुद्धि पर बल देते हैं। भिन्न-भिन्न अनुपातों में वे वर्णव्यवस्था तथा आश्रम-व्यवस्था के नियमों का पालन करने का आदेश देते हैं।

 

भारतीय दर्शन का इतिहास, जैसा कि हमने विषय-प्रवेश[17] में बताया है, अनेक प्रकार की कठिनाइयों से पूर्ण है। प्रमुख शास्त्रकारों और उनके ग्रन्थों के समय के विषय में संशयरहित कुछ भी कहा नहीं जा सकता और कितने ही सुप्रसिद्ध ग्रन्थकारों की ऐतिहासिकता के विषय में भी बहुत मतभेद है, कितने ही प्रासंगिक ग्रन्थ तो उपलब्ध नहीं हैं और कतिपय जो प्रकाशित हुए हैं उनमें से सबका अभी आलोचनात्मक अध्ययन नहीं हुआ है। महान् भारतीय विचारकों ने भी भारतीय दर्शन की ऐतिहासिक दृष्टि से छानबीन नहीं की है। माधवाचार्य ने अपने सर्वदर्शनसंग्रह में सोलह विभिन्न दर्शनों का विवेचन किया है। प्रथम खण्ड में हमने भौतिकवादी, बौद्ध और जैन विचारों की चर्चा की है। इस खण्ड में हम न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा और वेदान्त दर्शनों का विवेचन करेंगे। शैव सिद्धान्त के चारों सम्प्रदायों और रामानुज पूर्णप्रज्ञ के सम्प्रदायों का आधार वेदान्त सूत्र हैं, और वे भिन्न-भिन्न प्रकार से उनकी व्याख्या करने का प्रयत्न करते हैं। पाणिनि के मत का महत्त्व दार्शनिक दृष्टि से बहुत कम है। वे शब्द की नित्यता के सम्बन्ध में मीमांसा के मत से सहमत होकर स्फोट अर्थात् प्रत्येक शब्द के अन्तर्गत अर्थ की अभिव्यक्ति के अविभाज्य रूप को स्वीकार करते हैं। वैदिक षड्दर्शनों में वैशेषिक दर्शन की अधिक प्रतिष्ठा नहीं है, जबकि न्यायदर्शन का तर्कपक्ष अधिक प्रचलित है और इसके भक्त अनुयायी विशेष रूप से बंगाल में बहुत अधिक हैं। योगदर्शन का क्रियात्मक प्रयोग बहुत कम मिलता है, जबकि पूर्व मीमांसा का हिन्दू कानून के साथ निकट सम्बन्ध है। सांख्य का प्रचार नहीं के बराबर है, जबकि वेदान्त अपने भिन्न-भिन्न रूपों में प्रायः सर्वत्र छाया हुआ है। हिन्दू-विचारधारा के प्रतीक इन छः दर्शनों के विषय में लिखते हुए हम अधिकतर अपना ध्यान प्राचीन शास्त्रों, सूत्रों तथा उनके प्रमुख भाष्यकारों पर ही केन्द्रित करेंगे। अर्वाचीन काल के प्रायः सभी विचारकों के आध्यात्मिक ग्रंथ, कुछेक अपवादों को छोड़ कर, पर्याप्त मात्रा में प्रभावोत्पादक नहीं हैं। उनका अध्ययन तो विस्तृत है; किन्तु अवनति के युग में निर्मित होने के कारण उनके कृतित्व में टीका-टिप्पणियों पुरानी बातों को दोहराने के अतिरिक्त किसी नवीन सृजन की शक्ति नहीं पाई जाती। उनमें मताग्रह को अत्यधिक मात्रा में सुविधाएं दी गई हैं। प्रत्यक्ष को भी रहस्यमय करके वर्णन करने की प्रवृत्ति, आस्तिकवाद के प्रति पक्षपात और तात्त्विक अनुर्वरता के कारण उस पर विशेष ध्यान देना आवश्यक नहीं है।

 

प्रचलित प्रथा के अनुसार ही, जिसके प्रतिकूल व्यवहार करना व्यर्थ होगा, हम पहले न्याय और वैशेषिक सिद्धान्त को ही लेंगे, जो हमें अनुभव के संसार का विश्लेषण प्रदान करते हैं। फिर हम सांख्य और योग को लेंगे, जिनमें अनुभव का साहसपूर्ण कल्पनात्मक वर्णन किया गया है। इसके बाद अन्त में हम दोनों मीमांसा दर्शनों का विवेचन करेंगे, जिनमें यह दशनि का प्रयत्न किया गया है कि श्रुति के दिव्य ज्ञान और दर्शन के अन्तिम निर्णयों में परस्पर सामंजस्य है। विवेचन का इस प्रकार का क्रम ऐतिहासिक कार्यकाल की दृष्टि से भले ही संगत हो, किन्तु तार्किक दृष्टि से पूर्णतया संगत होगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दूसरा अध्याय

न्यायशास्त्र का तर्कसम्मत यथार्थवाद

 

न्याय और वैशेषिक-न्याय की प्रारम्भिक अवस्था-साहित्य और इतिहास-न्याय का क्षेत्र-परिभाषा का स्वरूप-प्रत्यक्ष अथवा अन्तर्दृष्टि - अनुमान-प्रमाण- परार्थानुमान -आगमन-अनुमान-कारण-उपमान अथवा तुलना-आप्त प्रमाण-ज्ञान के अन्य रूप-तर्क और वाद-स्मृति-संशय-हेत्वाभास-सत्य अचवा प्रभा-भ्रान्ति-न्याय के प्रमाणवाद का सामान्य मूल्यांकन-भौतिक जगत्-जीवात्मा और उसकी नियति जीवात्मा तथा चेतना से सम्बन्ध के विषय में न्याय के सिद्धान्त पर कुछ आलोचनात्मक विचार नीतिशास्त्र - ब्रह्मविद्या-उपसंहार

 

1. न्याय और वैशेषिक

 

भारतीय विचारधारा के अन्य दर्शन जहां मुख्यतया कल्पनापरक हैं, इन अर्थों में कि वे संसार की अखण्ड रूप में विवेचना करते हैं, वहां न्याय और वैशेषिक विश्लेषणात्मक दर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं, और साधारण ज्ञान विज्ञान का आश्रय लेकर चलते हैं तथा उनकी उपेक्षा नहीं करते। इन दोनों सम्प्रदायों में विशेषत्व यह है कि ये एक ऐसी विधि का प्रयोग करते हैं जिसे इनके अनुयायी वैज्ञानिक मानते हैं। तार्किक जांच तथा आलोचनात्मक विधि का प्रयोग करके, ये यह दर्शाने का प्रयत्न करते हैं कि बौद्ध विचारक जिन परिणामों पर पहुँचे वे परिणाम आवश्यक रूप से अभिमत नहीं थे। ये इस बात को भी दर्शाने का प्रयत्न करते हैं कि तर्क हमें जीवन को सदा के लिए नश्वर एवं क्षण-क्षण में परिवर्तनशील मानने के लिए भी बाध्य नहीं करता। इन दर्शनों का मुख्य उद्देश्य उन संशयवादी परिणामों का निराकरण करना है जो बौद्धों के प्रत्यक्ष ज्ञानवाद से निकलते हैं, क्योंकि वह बाह्य यथार्थ को मन के विचारों में मिला देता है। इनका प्रवास परम्परागत निष्कर्षों के प्रति, अर्थात् अन्तर्जगत् में जीवात्मा और बाह्य जगत् में प्रकृति के प्रति विश्वास को पुनः दृढ़ करने की ओर है और ये ऐसा केवल प्रामाण्य के आधार पर नहीं, बल्कि तर्क के आधार पर करते हैं। संशयवाद का जो प्रवाह बाढ़ की तरह आया उसकी रोकथाम केवल आस्था द्वारा नहीं की जा सकती थी, विशेषतः जबकि नास्तिकों ने उसके दुर्ग पर ही आक्रमण करने के लिए इन्द्रियजन्य ज्ञान तर्क का आधार ले रखा हो। ऐसे समय में जीवन धर्म के लक्ष्यों की प्राप्ति विशुद्ध ज्ञान के साधनों उनकी विधियों की गम्भीर जांच से ही हो सकती है। धर्मशास्त्र एवं इन्द्रियों द्वारा प्राप्त किए जानेवाले ज्ञान की जो सामग्री हमारे सम्मुख आती है उसकी तार्किक छानबीन ही का प्राचीन नाम आन्वीक्षिकी विद्या है।[18] नैयायिक उस सबको सत्य मानता है जो तर्क की कसौटी पर ठीक उतर सकता है।[19] वात्स्यायन और उद्योतकर इस विषय पर बल देते हैं कि यदि न्यायदर्शन केवल जीवात्मा और उसकी मुक्त अवस्था के विषय का ही प्रतिपादन करता तो उपनिषदों से उक्त दर्शन में कोई विशेष भेद होता, क्योंकि वे भी इन समस्याओं का विवेचन करते हैं। न्यायदर्शन की विशेषता यही है कि यह आध्यात्मिक समस्याओं का आलोचनात्मक दृष्टि से विवेचन करता है। वाचस्पति के अनुसार, न्यायशास्त्र का उद्देश्य ज्ञान के विषयों की तर्कबुद्धि द्वारा आलोचना और छानवीन करना है।'[20]

 

न्याय और वैशेषिक दोनों ही परम्परागत सामान्य दार्शनिक पदार्थों, यथा देश, काल, कारण, भौतिक प्रकृति, मन, जीवात्मा और ज्ञान को लेकर उनके विषय में उचित अनुसन्धान करके विश्व की रचना का समाधान करते हैं। तर्कसम्मत तत्त्व-विभाग इस परम्परा की मुख्य विशेषता रही है। न्याय और वैशेषिक दोनों क्रमशः आन्तरिक तथा बाह्य जगत् की व्याख्या करते हैं। न्याय अत्यन्त विस्तार के साथ ज्ञानप्राप्ति की पद्धति की व्याख्या करता है और बलपूर्वक उस संशयवाद का युक्तियुक्त विरोध करता है जो कि प्रत्येक पदार्थ की अनिश्चितता की घोषणा करता है। वैशेषिक का मुख्य विषय इन्द्रियजन्य ज्ञान अथवा अनुभव का विश्लेषण करना है। यह उन पदार्थों के विषय में सामान्य धारणाएँ देता है जो या तो प्रत्यक्ष या अनुमान अथवा श्रुति के प्रमाण द्वारा जाने जाते हैं। इस प्रकार का रुख अपनाते हुए यदि न्याय और वैशेषिक जीवात्माओं को वास्तविक मानने के विश्वास का समर्थन करें तो कुछ आश्चर्य नहीं। ये जीवात्माएँ अपने चारों ओर व्याप्त वस्तुओं के विधान में परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया में संलग्न हैं।

 

दोनों दर्शन बहुत समय से एक-दूसरे के पूरक माने जाते रहे हैं। कभी-कभी यह सुझाया जाता है कि उक्त दोनों दर्शन एक ऐसे उद्गम से निकली दो स्वतन्त्र विचारधाराएँ हैं जिसमें ज्ञात पदार्थों तथा ज्ञान के साधनों का विवेचन किया गया था। परन्तु, इस विषय पर निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है। बाद के ग्रंथकारों ने दोनों दर्शनों को एक ही सामान्य विचारधारा का अंग स्वीकार किया है।'[21] यहां तक कि वात्स्यायन के न्यायभाष्य में दोनों के अन्दर भेद नहीं किया गया है। वैशेषिक का उपयोग न्याय के परिशिष्ट के रूप में हुआ है।'[22] उद्योतकर के न्यायवार्तिक में वैशेषिक सिद्धान्तों का उपयोग किया गया है। जैकोबी का कहना है कि 'उक्त दोनों सम्प्रदायों का सम्मिश्रण बहुत पहले आरम्भ हो गया था और उसकी पूर्ति उस समय हुई लगती है जबकि न्यायवार्तिक लिखा गया।"[23] कितने ही न्यायसूत्रों में वैशेषिक के सिद्धांतों की पूर्वकल्पना की गई है। इन्हें समानतन्त्र अथवा संयुक्त दर्शन नाम से भी पुकारा जाता है, क्योंकि दोनों ही जीवात्माओं के अनेक होने, एक पृथक् ईश्वर की सत्ता, परमाणुरूप जगत् की सत्ता में विश्वास करते हैं, और बहुत-सी एक जैसी युक्तियों का उपयोग करते हैं। यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि उक्त दोनों दर्शन-पद्धतियाँ बहुत प्राचीन काल में ही एक साथ मिल गई थीं। फिर भी जहां एक ने तर्क के विषय का प्रतिपादन किया वहां दूसरे ने भौतिक जगत् की व्याख्या की। इस प्रकार दोनों में भेद प्रकट होता है।[24] जबकि न्याय तर्क द्वारा पदार्थों के ज्ञान की प्रक्रियाओं और प्रणालियों का वर्णन करता है, वैशेषिक पदार्थों की परमाणु द्वारा रचना की व्याख्या करता है जिसे न्याय ने बिना किसी तर्क के स्वयंसिद्ध स्वीकार कर लिया है।'[25]

 

न्यायदर्शन को अत्यन्त प्राचीन काल से ही बहुत प्रतिष्ठा के साथ देखा जाता रहा है। मनु ने इसका समावेश श्रुति के अन्दर किया है, याज्ञवल्क्य ने भी इसे वेद के चार अंगों में से एक माना है।'[26] हिन्दुओं के पाँच प्राचीन पाठ्यविषयों-काव्य (साहित्य), नाटक, जलंकार, तर्क (न्यायदर्शन) और व्याकरण में न्याय की भी गणना की गई है। आगे चल कर विद्यार्थी किसी भी विषय के विशेष अध्ययन को भले ही स्वीकार करें, किन्तु प्रारम्भिक विषयों में तर्कशास्त्र अवश्य सम्मिलित था, जो समस्त पाठ्यविषयों का आधार समझा जाता था। प्रत्येक हिन्दू दर्शन न्याय द्वारा प्रतिपादित मौलिक सिद्धांतों को स्वीकार करता है। यहां तक कि न्यायदर्शन की आलोचना के लिए भी न्याय की तार्किक परिभाषाओं का आश्रय लेता है। इस दृष्टिकोण से न्याय एक प्रकार से समस्त व्यवस्थित दर्शनविज्ञान की भूमिका है।'[27]

2. न्याय की प्रारम्भिक अवस्था

 

आन्वीक्षिकी विद्या का प्रयोग, जैसा कि हम ऊपर देख आए हैं, अध्यात्मविषयक समस्याओं की तार्किक समीक्षा के लिए हुआ है। साथ ही, इसका प्रयोग व्यापक अर्थ में भी हुआ है, जिससे इसमें सांख्य, योग और लोकायत्त आदि उन समस्त व्यवस्थित प्रयासों का समावेश हो जाता है जो दार्शनिक समस्याओं को सुलझाने के लिए किए गए थे। इन विभिन्न दर्शनों में समान रूप से प्रयुक्त होनेवाली तार्किक पद्धति आलोचना के स्वरूप की ओर शीघ्र ही ध्यान गया है। प्रत्येक विज्ञान न्याय के नाम से पुकारा जा सकता है, क्योंकि न्याय का शाब्दिक अर्थ है किसी विषय के भीतर जाना अर्थात् उसकी विश्लेषणात्मक समीक्षा करना। इसलिए हम न्यायदर्शन को, जिनमें आलोचनात्मक छानबीन की सामान्य योजना और पद्धति का अध्ययन किया जाता है, विज्ञानों का विज्ञान कह सकते हैं। मीमांसकों ने, जो केवल श्रुतियों के भाष्यकार ही नहीं थे किन्तु तार्किक भी थे, इस प्रकार के तार्किक अध्ययन को प्रोत्साहन दिया। हो सकता है कि कर्मकाण्ड की आवश्यकताओं के कारण ही तर्कबुद्धि का उदय हुआ हो, खासकर तब जब कि कर्मकाण्ड की नाना विधियों, नियमों तथा उसके फलों की ठीक-ठीक व्याख्या करने की आवश्यकता हुई। इसीलिए जिन विचारकों ने मीमांसाशास्त्र की नींव रखी और उसे उन्नत किया उन्होंने तर्कशास्त्र की उन्नति में भी सहायता की।[28] जब गौतम ने अन्य विचारकों की अपेक्षा तार्किक पक्ष की व्याख्या की ओर विशेष ध्यान दिया तो उनके दृष्टिकोण का आन्वीक्षिकी के साथ तादात्म्य हो गया। इस प्रकार एक पारिभाषिक शब्द, जो बहुत प्राचीन काल से सामान्य अयों में प्रत्येक व्यवस्थित दर्शन के लिए प्रयुक्त होता था, संकुचित अर्थों में प्रयुक्त होने लगा।[29]

 

पूर्व की जिन श्रृंखलाबद्ध अवस्थाओं में से गुज़र कर न्यायशास्त्र विकसित हुआ उनमें तार्किक वाद-विवाद का विशेष स्थान है।'[30] न्याय को कभी-कभी तर्कविद्या और वादविद्या, अर्थात् वाद-विवाद सम्बन्धी विज्ञान का नाम भी दिया गया है। बहस अथवा वाद बौद्धिक जीवन का प्राण है। सत्य के अन्वेषण के लिए इस विधि का आश्रय लेना आवश्यक हो जाता है। सत्य स्वयं में एक अत्यन्त जटिल विषय है और इसीलिए बिना विभिन्न मस्तिष्कों के सम्मिलित सहयोग के सत्य के अन्वेषण में सफलता नहीं मिलती।'[31] उपनिषदों में ऐसी विद्वत्परिषदों का उल्लेख मिलता है जिनमें दार्शनिक विषयों पर वाद-विवाद होते थे।[32] यूनानी तर्कशास्त्र भी बहुत हद तक सोफिस्ट आन्दोलन से विकसित हुआ जिसमें प्रश्नोत्तर के रूप में वाद-विवाद होता था। वाद-विवाद की कला के अभ्यास से ही सोफिस्टों ने केवल तर्क के यथार्थ सिद्धांतों, बल्कि कुतर्क और वाक्छल का भी आविष्कार किया। प्लेटो के 'डायलौग्स्' से पता चलता है कि सुकरात वाद-विवाद की कला का उपयोग सत्य के अन्वेषण के लिए करता था। अरस्तू ने अपनी दो पुस्तकों, टॉपिक्स तथा सोफिस्टिकल रेफयूटेशन्स का प्रयोग विवाद-प्रतियोगिता के मार्गप्रदर्शन के लिए किया है, यद्यपि वह विशुद्ध तर्क को भाषणकला से पृथक् रखता था और तर्क के सिद्धांतों को वाद-विवाद के नियमों से अलग रखता था। इसी प्रकार इसमें संदेह नहीं कि गौतम के न्यायशास्त्र का जन्म भी ऐसी ही वाद-विवाद प्रतियोगिताओं अथवा शास्त्राथों से हुआ, जिनका प्रचार राजदरबारों तथा दार्शनिकों में बराबर था। ऐसे शास्त्रार्थों को नियमबद्ध करने के प्रयत्नों से ही तर्कशास्त्र का विकास हुआ। अरस्तू के समान गौतम ने भी तर्क के सिद्धांतों को एक व्यवस्थित रूप दिया, सत्य से असत्य का भेद किया, और अनेक प्रकार के वितण्डा वाक्छल का विस्तृत विवरण दिया। पहले सूत्र में गिनाए गए सोलह विषय शास्त्रार्थ द्वारा ज्ञानप्राप्ति के साधन हैं।[33] तर्कशास्त्र पर लिखे गए परवर्तीकाल के कितने ही ग्रंथों में वाद-विवाद के नियमों पर बहस की गई है।[34] जबकि वे सब ग्रंथ विवादसम्बन्धी समस्याओं की ओर निर्देश करते हैं।[35]

 

जयन्त अधिकारपूर्वक कहता है कि यद्यपि गौतम का न्यायदर्शन तर्कशास्त्र के विषय को एक सन्तोषजनक रूप में उपस्थित करता है फिर भी गौतम से पूर्व भी तर्कशास्त्र विद्यमान था, जैसे कि जैमिनि से पूर्व मीमांसा और पाणिनि से पूर्व व्याकरण विद्यमान था।'[36] छांदोग्य उपनिषद् में वाकोवाक्य का[37] वर्णन मिलता है जिसे शंकर ने तर्कशास्त्र'[38] ही बतलाया है। महाभारत में भी तर्कशास्त्र और आन्वीक्षिकी का उल्लेख है।'[39] यहां कहा गया है कि नारद न्यावशास्त्र के परार्यानुमान एवं वैशेषिक के युति और न्यास से परिचित थे विश्वनाथ कुछेक पुराणों में एक वाक्य उद्धृत करता है जिसके अनुसार न्याय की गणना वेदों के उपांगों में की गई है।[40] यर्याप बौद्धदर्शन मुख्यतः बुद्धि पर आश्रित था तो भी उसके प्राचीन ग्रंथों में कोई व्यवस्थित तार्किक पद्धति नहीं मिलती। केवल तर्कविद्या में निपुण व्यक्तियों का वर्णन मिलता है। ब्रह्मजालसूत्त में तक्की (वितण्डावादी) और वीमांसी[41] का उल्लेख है। मज्झिमनिकाय में आए अनुमान सूत्त इस नाम से यह प्रकट होता है कि अनुमान शब्द का प्रयोग, शायद अनुमान-प्रमाण के लिए हुआ है। कथावस्तु में पतिन्ना (प्रतिज्ञा), उपनय, निग्गाह आदि शब्दों का व्यवहार उनके पारिभाषिक अर्थो में ही हुआ है।'[42] यमक परिभाषाओं के विभाग और रूपांतर के नियमों से परिचित है। पतिसम्भिदामाग शब्दों और पदार्थों के विश्लेषण का वर्णन करता है। नेत्तिपकरण तार्किक सिद्धांत के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करता है मिलिन्द के प्रश्नों में न्यायदर्शन का वर्णन शायद नीति के नाम से आया है।'[43] ललितविस्तर ने न्यायशास्त्र का वर्णन हेतुविद्या के नाम से किया है। जैन आगमों ने भी भारतीय न्यायशास्त्र की प्राचीनता को प्रमाणित किया है। आर्यरक्षित ने जो ईसा की प्रथम शताब्दी में विद्यमान था, अपने अणुयोग द्वार में अनुमान के तीन विभाग- पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट गौतम के सूत्र के अनुसार ही किए हैं। आर्यरक्षित केवल एक प्राचीन ग्रंथ का संकलनकर्त्ता प्रतीत होता हैजिसका वर्णन भगवती सूत्र में, . पू. तीसरी शताब्दी में पाटलिपुत्र में संघटित जैन सिद्धान्तों में  पाया जाता है। सम्भवतः अनुमान-प्रमाण के तीन प्रकारों का सिद्धान्त . पू. तीसरी शताब्दी से भी पुराना है।

 

न्यायशास्त्र का आरम्भ बौद्धकाल से पूर्व हो गया था, यद्यपि उसकी वैज्ञानिक विवेचना बौद्धकाल के आरम्भ में और मुख्य सिद्धान्तों की स्थापना . पू. तीसरी शताब्दी से पहले हुई। किन्तु सूत्र-निर्माण से पूर्व के न्याय के ऐतिहासिक विकास के सम्बन्ध में बहुत कम सामग्री उपलब्ध है।

3. साहित्य और इतिहास

 

न्यायशास्त्र का इतिहास बीस शताब्दियों में फैला हुआ है। गौतम का न्यायसूत्र, जो पाँच अध्यायों में बैटा है जिनमें से प्रत्येक के दो-दो परिच्छेद हैं, न्यायशास्त्र की प्रथम पाठ्य-पुस्तक है। वात्स्यायन के अनुसार ग्रन्थ उद्देश्य, लक्षण और परीक्षा की विधि का अनुसरण करता है। प्रथम अध्याय में सामान्यतः सोलह विषयों का वर्णन है जिन पर अगले चार अध्यायों में विचार किया गया है। दूसरे अध्याय में संशय के रूप का प्रतिपादन है, और हेतु प्रामाण्य का वर्णन किया गया है। तीसरे अध्याय में आत्मा के स्वरूप, भौतिक देह, इन्द्रियों और उनके विषयों, अभिज्ञान मन के विषय में विचार किया गया है। चौथे अध्याय में संकल्पशक्ति, शोक, दुःख और उससे छुटकारे के विषय पर विचार किया गया है। प्रकरणवश इस अध्याय में त्रुटि और पूर्ण उसके अंशों के परस्पर सम्बन्ध का भी वर्णन किया गया है। अंतिम अध्याय में जाति, अर्थात् निराधार आक्षेपों और निग्रहस्थान अर्थात् दोषारोपण के अवसरों का विवेचन किया गया है। न्यायसूत्र वैदिक विचारधारा के निष्कर्षों को तर्कसम्मत सिद्धान्तों के आधार पर, उसके धार्मिक एवं दार्शनिक मतों के साथ जोड़ता है; और इस प्रकार आस्तिक यथार्थवाद का तर्क द्वारा समर्थन करता है। गौतम के सूत्र, कम-से-कम उनमें से प्राचीनतम, . पू. तीसरी शताब्दी की रचनाएँ हैं। वह युग आहिकों अर्थात् दैनिक पाठों, यथा पतंजलिकृत व्याकरण महाभाष्य के नवाहिक का युग था। परन्तु कुछ न्यायसूत्र निश्चित रूप से ईसा की मृत्यु के पीछे बने हैं।'[44]

वात्स्यायन का न्यायभाष्य न्यायसूत्र पर शास्त्रीय टीका है। यह प्रकट है कि वात्स्यायन गौतम के तुरन्त बाद नहीं हुआ था, क्योंकि उसके ग्रन्थ में वार्तिक के सन्दर्भ पाए जाते हैं जो कि गौतम के सम्प्रदाय में हुए वाद-विवादों के निष्कर्षों को सार रूप में रखते हैं। वात्स्यायन ने कुछ सूत्रों की प्रकारान्तर से व्याख्या की है, जिससे प्रकट होता है कि उससे पूर्व भी टीकाकार हो गए हैं जो उक्त. सब सूत्रों की व्याख्या के विषय में एकमत नहीं थे।'[45] इसके अतिरिक्त, वात्स्यायन गौतम को अत्यन्त प्राचीन काल का एक ऋषि मानता है और अपनी मान्यता के समर्थन में पतञ्जलि, के महाभाष्य, कौटिल्य के अर्थशास्त्र'[46] और वैशेषिक सूत्र'[47] से भी उद्धरण देता है। 'उपायकौशल्य' और 'विग्रहव्यावर्तनी' ग्रन्थों का रचयिता नागार्जुन निश्चित रूप में वात्स्यायन से पहले हुआ, क्योंकि वात्स्यायन ने नागार्जुन के विचारों का कहीं-कहीं खण्डन भी किया है। दिग्नाग ने बौद्ध दृष्टिकोण से वात्स्यायन के भाष्य की आलोचना की है। इस सबसे हम यह अनुमान करते हैं कि वात्स्यायन 400 ईस्वी से कुछ पहले विद्यमान था।'[48]

 

दिग्नाग के ग्रन्थ, जो तिब्बती अनुवादों में सुरक्षित हैं, ये हैं 'प्रमाणसमुच्चय' जिस पर ग्रन्धकार का अपना निजी भाष्य है, 'न्यायप्रवेश', 'हेतु-चक्रहमरु', 'आलम्बनपरीक्षा' और 'प्रमाणशास्त्रप्रवेश' कहा जाता है कि जापान में ये ग्रन्य लोकप्रिय हैं।'[49] दिग्नाग पाँचवीं शताब्दी (ईस्वी) में हुआ।[50] न्यायदर्शन के सिद्धान्तों में कितने ही आवश्यक परिवर्तन जो प्रशस्तपाद ने किए थे, दिग्नाग के कारण ही किए गए। यदि प्रशस्तपाद को दिग्नाग का पूर्ववर्ती माना जाए तो दिग्नाग की मौलिकता में बाधा आएगी।

 

उद्योतकर के 'न्यायवार्तिक' (छठी शताब्दी ईस्वी)'[51] में दिग्नाग द्वारा वात्स्यायन पर किए गए आक्षेपों का उत्तर दिया गया है। धर्मकीर्ति का 'न्यायबिन्दु' उद्योतकर द्वारा दिग्नाग की आलोचना के उत्तर में लिखा गया था। यदि हम यह मान लें कि 'वादविधि', जिसका उद्योतकर ने उल्लेख किया है,'[52] धर्मकीर्ति के 'वादन्याय' का ही दूसरा नाम है, और धर्मकीर्ति ने अपने न्यायबिन्दु'[53] में जिस शास्त्र का उल्लेख किया है वह उद्योतकर का वार्तिक ही है, तो उस अवस्था में इन दोनों लेखकों के एक ही काल में विद्यमान होने की कल्पना हो सकती है। धर्मकीर्ति का समय अधिक-से-अधिक सातवीं शताब्दी का प्रारम्भिक काल माना जा सकता है।[54] नवीं शताब्दी में धर्मोत्तर ने अपनी न्यायबिन्दु टीका में दिग्नाग एवं धर्मकीर्ति का अनुसरण किया।

 

नवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में वाचस्पति ने अपनी 'न्यायवार्तिकतात्पर्य-टीका' में न्याय के प्राचीन सिद्धान्तों की फिर से स्थापना की। उसने न्यायशास्त्र पर 'न्यायशुचिनिवन्ध' एवं 'न्यायसूत्रोद्धार"[55] जैसे छोटे-छोटे ग्रन्थ भी लिखे। वाचस्पति एक प्रतिभाशाली विद्वान था जिसने अन्य दर्शनों पर भी प्रामाणिक टीकाएँ लिखीं, जैसे अद्वैत वेदान्त पर 'भामती' टीका और सांख्यदर्शन पर 'सांख्यतत्त्वकौमुदी' नामक टीका। इसलिए उसे सर्वतन्त्रस्वतन्त्र एवं षड्दर्शनबल्लभ की संज्ञा दी गई है। उदयन (984 ईस्वी) की 'तात्पर्यपरिशुद्धि' नामक एक बहुमूल्य टीका वाचस्पति के ग्रन्थ पर मिलती है। उसका 'आत्मतत्त्वविवेक' नामक ग्रन्य आत्मा के नित्यत्व के सिद्धान्त के समर्थन में तथा आर्यकीर्ति आदि बौद्ध विचारकों की आलोचना में लिखा गया था। उसका 'कुसुमांजलि' ग्रन्थ न्यायशास्त्र के परमात्मसिद्धि विषय का प्रथम व्यवस्थित ग्रन्थ है।[56] उसके अन्य ग्रन्थ हैं 'किरणावलि' और 'न्यायपरिशिष्ट' जयन्त की 'न्यायमंजरी' 'न्यायसूत्र' पर एक स्वतन्त्र टीका है। जयन्त, जिसने वाचस्पति का अपने ग्रन्थों में उल्लेख किया है और जिसका उल्लेख रत्नप्रभा एवं देवसूरी द्वारा किया गया है, दसवीं शताब्दी में हुआ।'[57] भासर्वज्ञ का 'न्यायसार', जैसाकि नाम से प्रकट होता है, न्यायदर्शन का सर्वेक्षण है। वह प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्त वाक्य इन तीनों प्रमाणों को स्वीकार करता है तथा तुलना को वस्तुसिद्धि का स्वतन्त्र साधन नहीं मानता। वह शैवमतावलम्बी है, सम्भवतः काश्मीरी शैव सम्प्रदाय का है, और उसका समय दसवीं शताब्दी (ईस्वी) है। वर्धमान का 'न्यायनिबन्धप्रकाश' (1225 ईस्वी) उदयन के 'न्यायतात्पर्यपरिशुद्धि' नामक ग्रन्थ पर टीका है, यद्यपि इसमें नव्यन्याय सम्प्रदाय के संस्थापक वर्धमान के पिता गंगेश के विचारों का समावेश किया गया है। रुचिदत्त के 'मकरन्द' (1275 ईस्वी) में वर्धमान के विचारों का विकास हुआ है।'[58]

 

न्यायशास्त्र पर लिखे गए परवर्ती ग्रन्थ वैशेषिक के पदार्थों को स्पष्ट रूप में स्वीकार करते हैं, जिन्हें वे प्रमेय अर्थात् ज्ञान के विषयों के अन्तर्गत या अर्थ के अन्तर्गत रखते हैं, जो बारह प्रकार के प्रमेयों में से एक है। वरदराज का 'तार्किकरक्षा' (बारहवीं शताब्दी ईस्वी) नामक ग्रन्थ समन्वयवादी सम्प्रदाय का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। वह प्रमेय के अन्तर्गत न्याय के बारह पदार्थों तथा वैशेषिक के छः पदार्थों का भी समावेश करता है। केशव मिश्र की 'तर्कभाषा' (तेरहवीं शताब्दी के अन्त में निर्मित) में न्याय और वैशेषिक के विचारों का सम्मिश्रण किया गया है।[59]

 

जैन दर्शन के प्रमुख तर्क-ग्रन्थ हैं: भद्रबाहुकृत 'दशवेकालिकनियुक्ति' (लगभग 357 . पू.), सिद्धसेन दिवाकर का 'न्यायावतार' (छठी शताब्दी ईस्वी), माणिक्यनन्दी का 'परीक्षामुखसूत्र' (800 ईस्वी), देवसूरी का प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार' (बारहवीं शताब्दी ईस्वी) और प्रभाचन्द्र का 'प्रमेयकमलमार्तण्ड' जेन विचारकों और बौद्ध तार्किकों ने तर्कशास्त्र के क्षेत्र को धर्म और अध्यात्म विषय से पृथक् रखा, जबकि हिन्दू विचारधारा में तर्कशास्त्र उक्त दोनों विषयों से मिश्रित था। हिन्दू लेखकों द्वारा लिखे गए न्यायशास्त्र के ग्रन्थों में परमाणु उनके गुणों, जीवात्मा और पुनर्जन्म, परमात्मा और जगत् तथा प्रकृति ज्ञान की सीमा-सम्बन्धी तार्किक समस्याओं का वर्णन है। बौद्ध जैन विचारकों ने प्राचीन न्याय के अध्यात्म विषय में रुचि लेकर केवल तार्किक विषय पर ही बल दिया और इस प्रकार नव्यन्याय के लिए मार्ग तैयार किया, जो विशुद्ध तर्क और वाद-विवाद से सम्बन्ध रखता है।

 

गंगेश का 'तत्त्वचिन्तामणि' नव्यन्याय का एक मान्य ग्रन्थ है।'[60] गंगेश के पुत्र वर्धमान ने अपने ग्रन्थों में इसी परम्परा को जारी रखा है। जयदेव ने 'तत्त्वचिन्तामणि' पर एक टीका लिखी है जिसका नाम 'आलोक' (तेरहवीं शताब्दी) है। वासुदेव सार्वभौम की 'तत्त्वचिन्तामणिव्याख्या[61] को नवद्वीप सम्प्रदाय का पहला बड़ा ग्रन्थ माना जा सकता है, और यह पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त में या सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में लिखा गया था। सौभाग्यवश उन्हें बहुत प्रसिद्ध शिष्य भी प्राप्त हुए, जिनमें मुख्य हैं: प्रसिद्ध वैष्णव सुधारक चैतन्य महाप्रभु, प्रसिद्ध नैय्यायिक रघुनाथ जो 'दीधिति' और 'पदार्थखण्डन"[62] ग्रन्थों के रचयिता हैं, प्रसिद्ध स्मृतिकार रघुनन्दन और कृष्णनन्द जो तान्त्रिक विधियों के अधिकारी विद्वान् माने जाते हैं। यद्यपि गंगेश ने केवल चार प्रमाणों पर ही लिखा है और अध्यात्म विषय को स्पष्ट रूप में नहीं लिया है, परन्तु रघुनाथ ने इस सम्प्रदाय के कुछ अन्य लेखकों की भांति अध्यात्म विषयों पर भी बहुत लिखा है। जगदीश (सोलहवीं शताब्दी के अन्त में) और गदाधर (सत्रहवीं शताब्दी) इस सम्प्रदाय के प्रसिद्ध तार्किक हुए हैं। अन्नं भट्ट'[63] (सत्रहवीं शताब्दी) ने, जो आन्ध देश का एक ब्राह्मण था, प्राचीन तथा नव्यन्याय और वैशेषिक को लेकर एक व्यवस्थित दर्शनपद्धति विकसित करने का प्रयत्न किया। यद्यपि उसके विचारों का झुकाव अधिकतर प्राचीन न्याय की ही ओर था। उसके द्वारा रचित 'तर्कसंग्रह' और 'दीपिका' न्याय वैशेषिक सम्प्रदाय की दो प्रसिद्ध पुस्तकें हैं। वल्लभ का 'न्याय-लीलावती', विश्वनाथ का 'न्यायसूत्रवृत्ति' (सत्रहवीं शताब्दी) आदि अन्य ग्रन्थ भी प्रमुख हैं।'[64]

 

भारतवर्ष में तर्कशास्त्र के अध्ययन के विकास के भिन्न-भिन्न पहलुओं को जानना असम्भव नहीं है। सबसे पहले आन्वीक्षिकी है, जिसे महाभारत में न्यायशास्त्र के साथ पृथक् स्थान दिया गया है। शीघ्र ही यह न्याय के साथ मिल जाती है और प्राचीन सम्प्रदाय के सूत्रों में हमें अखण्ड विश्व का आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी उसके तार्किक सिद्धांत के साथ-साथ मिलता है। जैसाकि वात्स्यायन ने लिखा है, 'सर्वोच्च लाभ की तभी प्राप्ति होती है जबकि मनुष्य निम्नलिखित की यथार्थ प्रकृति को ठीक-ठीक समझ लेता है (1) जिसे छोड़ देना ही उत्तम है (अर्थात् कारणों सहित दुख की जो अविद्या या अज्ञान और उसके परिणामों के रूप में होता है); (2) जिससे दुःख का नाश होता है; दूसरे शब्दों में ज्ञान या विद्या; (3) वे साधन जिनके द्वारा दुःख का नाश होता है, अर्थात् दार्शनिक ग्रन्थ; और (4) प्राप्तव्य लक्ष्य, या सर्वोच्च लाभ।"[65] प्राचीन न्यायशास्त्र तार्किक प्रश्नों पर बहस करता है, किन्तु केवल बहस के विचार से ही नहीं। जैन बौद्ध दार्शनिकों ने इस विषय में एक सर्वथा भिन्न दृष्टिकोण सम्मुख रखा। नव्यन्याय ने केवल ज्ञानमात्र में ही अपनी रुचि प्रकट करते हुए तर्क और जीवन के बीच जो घनिष्ठ सम्बन्ध है उसे सर्वथा भुला दिया। तर्क अध्यात्म विद्या के बीच जो सम्बन्ध है, उसका विचार प्राचीन नैय्यायिका के सामने अधिक स्पष्ट रूप में था। विचारगत विषय का विचार के प्रामाणिक रूपों के साथ क्या सम्बन्ध है, तर्क के द्वारा केवल इसी का हमें निश्चय हो सकता है। नव्य नैय्यायिक अधिकतर ध्यान केवल प्रमाण अर्थात् ज्ञानप्राप्ति के साधनों और परिभाषा के सिद्धान्त पर ही देता है,'[66] और प्रमेय अर्थात् ज्ञातव्य पदार्थों के प्रश्न को बिलकुल ही छोड़ देता है। साम्प्रदायिक बारीकियों, तार्किक वाक्-छल और बाल की खाल निकालने वाले ग्रन्थ, जिनकी रचना में गंगेश के उत्तराधिकारियों ने अधिक रुचि दिखाई, बहुतों को भयभीत कर देते हैं, यहां तक कि जिन्होंने इनमें गहराई तक प्रवेश किया है वे भी यह निश्चय नहीं कर सकते कि उन्होंने इन ग्रन्थों के विचारों को पूरे तीर पर समझा है। ऐसे भी अनेक व्यक्ति हैं जिन्होंने इन ग्रन्थों की गहराई में उतर कर छानबीन की है। वे इनकी उज्ज्वल एवं आकर्षक वाक्चातुरी से तो प्रभावित अवश्य हुए, किन्तु उन्हें मतिविभ्रम ही हुआ और ज्ञान की उपलब्धि नहीं हो सकी। विशद विषय जटिलता के कारण धुँधले प्रतीत होने लगे। वैशिष्ट्य के ज्ञान के लिए लालायित एक तार्किक मस्तिष्क प्रायः सूत्रों के प्रेम में फंस जाता है और औपचारिक विषयों में ही उलझे रहने से वास्तविक तत्त्व की प्राप्ति उसे नहीं होती। वास्तविक ज्ञान का स्थान पारिभाषिक शब्दों की खोज ले लेती है। परिभाषाएँ, जिनका प्रयोग वैशिष्ट्य के ज्ञान के लिए होना चाहिए था, कभी-कभी कठिनाइयों से बच निकलने के लिए काम में लाई जाती हैं। इन ग्रंथों में से कुछ के विषय में तो यह कहा जा सकता है कि उनसे केवल यही प्रकट होता है कि जिस विषय का ग्रंथकार को कुछ भी ज्ञान हो उसमें भी पाण्डित्य का प्रदर्शन किस प्रकार किया जा सकता है। ऐसे व्यक्तियों को भी, जो यह मानते हैं कि उनकी बुद्धिरूपी चक्की बहुत ही बारीक पीसती  है, यह स्वीकार करना पड़ता है कि उनके पास पीसने लायक अनाज की कमी रहती है।[67] यह कहना कि नव्यन्याय बुद्धि के लिए एक शिक्षणभूमि है, अतिशयोक्तिपूर्ण होगा।

 

 

 

4. न्याय का क्षेत्र

 

न्याय शब्द का अर्थ है-वह प्रक्रिया जिसके द्वारा मस्तिष्क एक निष्कर्ष तक पहुँच सके।[68] इस प्रकार 'न्याय' तर्क का पर्यायवाची शब्द है और वह दर्शन, जो अन्य दर्शनों की अपेक्षा अधिक पूर्णता के साथ तर्क विषय का प्रतिपादन करता है, न्यायदर्शन के नाम से जाना जाने लगता है। तर्क दो प्रकार का है मान्य और अमान्य। 'न्याय' शब्द का प्रयोग साधारण व्यवहार की भाषा में ठीक या उचित के अर्थ में होता है, और इसलिए ठीक या उचित तर्क के विज्ञान का नाम ही न्याय हो गया। संकुचित अर्थों में 'न्याय' से तात्पर्य परार्थानुमान तर्क से है,'[69] जबकि व्यापक अर्थों में प्रमाणों के द्वारा किसी विषय की समीक्षा करने का नाम न्याय है। इस दृष्टिकोण से यह प्रमाणित करने का अथवा विशुद्ध ज्ञान का विज्ञान है जिसे प्रमाणशास्त्र भी कहा जाता है। प्रत्येक ज्ञान के लिए चार प्रकार की सामग्री की आवश्यकता है: (1) प्रमाता, अर्थात् ज्ञान प्राप्त करने की सामर्थ्य रखने वाला; (2) पदार्थ अथवा प्रमेय, जिसके ज्ञान के लिए साधनों का प्रयोग किया जाता है; (3) ज्ञान अथवा प्रमितिः और (4) प्रमाण अथवा ज्ञान प्राप्त करने के साधन'[70] ज्ञान प्राप्ति की प्रत्येक क्रिया में, चाहे वह मान्य हो या अमान्य, तीन अवयवों का होना आवश्यक है: एक, ज्ञान प्राप्त करने वाला कर्ता, दूसरा, पदार्थ जिसके अस्तित्व का पता ज्ञानकर्ता को है; और तीसरा, इन दोनों के बीच, जो अलग-अलग नहीं हैं किन्तु पृथक् पृथक् करके समझे जा सकते हैं, ज्ञान का सम्बन्ध। वह ज्ञान मान्य है अथवा अमान्य, यह चौथे अवयव अर्थात् प्रमाण पर निर्भर करता है   साधारण परिस्थितियों में प्रमाण मान्य ज्ञान का क्रियात्मक कारण होता है।'[71]

 

जहां वात्स्यायन प्रमाण की परिभाषा करते हुए उसे ज्ञान-प्राप्ति का साधन बताता है, अर्थात् 'जिसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करने वाला अपने प्रमेय पदार्थ का ज्ञान प्राप्त करता है,"[72] वहां उद्योतकर इसे ज्ञान के कारण (उपलब्धि हेतु) के रूप में मानता है।'[73] वह यह स्वीकार करता है कि प्रमाण की यह परिभाषा अधिक व्यापक है, क्योंकि ज्ञान प्राप्त करने वाला और ज्ञेय पदार्थ भी ज्ञान के कारण हैं। किन्तु वह इसे इस आधार पर उचित ठहराता है कि 'ज्ञाता और ज्ञेय प्रमाण को क्रियाशील करते हैं, इसलिए उन दोनों की उपयोगिता अन्य प्रकार की है। किन्तु प्रमाण की उपयोगिता केवल ज्ञान सम्पादन के कारण होने में ही है। इसलिए ज्ञान का वास्तविक कारण प्रमाण ही है। जहां भी प्रमाण उपस्थित है वहां ज्ञान उत्पन्न होता है। प्रमाण की उपस्थिति के बिना ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता, चाहे अन्य अवयव क्यों उपस्थित हों। इसलिए प्रमाण ही ज्ञान का मुख्य कारण है और ज्ञान की उपलब्धि से पहले प्रकट होने वाला आखिरी अवयव है।[74] शिवादित्य तार्किक भावार्य उपस्थित करते हुए प्रमाण की परिभाषा यों करता है, कि प्रमाण वह है जो वास्तविकता के अनुरूप प्रमा अर्थात् ज्ञान को उत्पन्न करता है।'[75] जयन्त के अनुसार, प्रमाण उस कारण का नाम है जो प्रमेय पदार्थों के विषय में भ्रमरहित एवं निश्चित ज्ञान की प्राप्ति कराता है।"[76]

 

प्रमाता और प्रमेय ये अवयव प्रत्यक्ष अथवा अनुमान ज्ञानोपलब्धि में एक समान हो सकते हैं, परन्तु ज्ञान का विशिष्ट रूप प्रमाण ही पर निर्भर करता है। इसी प्रकार मन का आत्मा के साथ संयोग भी प्रत्येक प्रकार के ज्ञान में सामान्य मध्यवर्ती कारण है। भिन्न-भिन्न प्रकार के ज्ञान में केवल संयोग का प्रकार भिन्न-भिन्न होता है। ज्ञान के विषय का प्रतिपादन तो न्याय करता ही है, किन्तु उससे भी अधिक यह ज्ञान की सबसे बड़ी शर्त, अर्थात् प्रमाण का प्रतिपादन करता है, और इसी कारण इसे प्रमाणशास्त्र कहते हैं।[77] इससे पूर्व कि हम पदार्थों के स्वरूप का अनुसन्धान करें, हमें ज्ञानोपलब्धि के साधनों की शक्ति का ज्ञान होना चाहिए' क्योंकि 'जिसे मापना है उसका ज्ञान माप के ज्ञान पर निर्भर करता है।"[78] प्रमाणशास्त्र केवल पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने में सहायक होता है, बल्कि यह ज्ञान की यथार्थता के जांचने में भी सहायक होता है।'[79] यह दोनों प्रकार का है अर्थात् औपचारिक और वास्तविक, और संगति तथा सत्य दोनों में ही रुचि रखता है। न्यायशास्त्र इस धारणा को लेकर चनत है कि हमारे मस्तिष्क को यह जगत् जिस रूप में प्रकट होता है वह बहुत हद तक इसका विश्वसर्गग रूप है। सभी प्रकार का ज्ञान यथार्थ को दर्शाता है (अर्थप्रकाश) प्रकृति ने हमारी रचना हो। प्रकार से की है कि हम पदार्थों का इन्द्रियों द्वारा बोध करते हैं, उनकी समानता को ध्यान देखते हैं और उनसे अनुमान द्वारा एक विशेष परिणाम पर पहुंचते हैं। प्रत्येक मनुष्य, जो सोध सकता है, इस क्रिया को सम्पन्न करता है, यद्यपि प्रत्येक के कार्य में सावधानी तथा वथार्थत की दृष्टि से परस्पर भेद होता है। जब कभी हमारे मस्तिष्क में किसी पदार्थ की यथार्थता का ज्ञान प्राप्त करने के लिए चेष्टा उत्पन्न होती है तो हमें तार्किक आलोचना के लिए एक विषा मिलता है। सत्य के अन्वेषण का कार्य मानव के कार्यकलाप में पहले से ही विद्यमान है। तर्कशास्त्र उसे उत्पन्न नहीं करता। वह केवल उसके स्वरूप को अभिव्यक्त करके सामान्य सिद्धांतों के रूप में उसकी व्याख्या मात्र करता है। तर्कशास्त्र की समस्या अन्य भौतिक विज्ञानों को समस्या से अधिक भिन्न नहीं है। ठीक जिस प्रकार एक भौतिकविज्ञानशास्त्री उस विशेष प्रक्रिया के विषय में अनुसंधान करता है जिसके द्वारा प्रत्येक प्राणी जीवन धारण करता है, उसी प्रकार न्यायशास्त्री उन नियमों की व्याख्या करता है जो ज्ञानप्राप्ति की प्रक्रिया का नियमन करते हैं। उसका उत्तरदायित्व भी उसी प्रकार का है जिस प्रकार का कि एक भौतिकविज्ञानशास्त्री का है।

 

न्यायशास्त्र यह नहीं मानता कि मूल्य और तथ्य एक-दूसरे से बिलकुल पृथक् पदार्थ हैं और इनके विवेचन के लिए भी भिन्न-भिन्न विधियों का प्रयोग आवश्यक है। मूल्य तथ्यों के साथ जुड़े हुए हैं और उनका अध्ययन उन्हीं के साथ हो सकता है। हम कभी भी खाली मस्तिष्क से प्रारम्भ नहीं करते। अपने निजी अनुभवों और परम्पराओं के आधार पर संसार के विषय में ज्ञान हमारे कोष में पहले से विद्यमान रहता है। श्रुति, स्मृति एवं धर्मशास्त्रों द्वारा हमें ज्ञान का एक गहन सिलसिला मिला है। विज्ञान की अनुमानात्मक प्रणाली का उपयोग करके न्याय उन भिन्न उपायों का वर्गीकरण करता है जिनके द्वारा हमें ज्ञान प्राप्त होता है। वे चार प्रकार के प्रमाण, जिनके द्वारा हमें ज्ञान प्राप्त होता है, ये हैं: (1) प्रत्यक्ष'[80] अथवा अन्तर्दृष्टि, (2) अनुमान[81] (3) उपमान अथवा तुलना, और (4) शब्द अर्थात् आप्त प्रमाण'[82] तर्कशास्त्र पर लिखे गए पाश्चात्य ग्रन्थों में सामान्यतः प्रत्यक्ष का प्रतिपादन नहीं किया गया'[83] किन्तु न्यायशास्त्र उसे ज्ञान के एक महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में स्वीकार करता है। अनुमान न्यायदर्शन का एक मुख्य विषय है और न्याय को कभी-कभी हेतुविद्या भी कहते हैं, अर्थात् हेतु का विज्ञान जिस पर अनुमान रूपी तर्क निर्भर करता है।'[84] इस दृष्टि से न्यायदर्शन अनुमान का सिद्धांत है अर्थात् अनुमानवाद है। इस प्रकार ऐसा समझा जा सकता है कि अन्तर्दृष्टि से उत्पन्न या प्रत्यक्ष ज्ञान न्यायशास्त्र के क्षेत्र से बाहर का विषय है। किन्तु न्यायशास्त्र इस संकीर्ण विचार को ठीक नहीं मानता। आप्त प्रमाण का समावेश, जिसमें कि ईश्वरप्रदत्त आस्तिकवाद भी गया, यह प्रदर्शित करता है कि यह दर्शन धार्मिक विषय में भी रुचि रखता है। न्याय हमारे सामने ज्ञानप्राप्ति के इन चार साघनों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार तार्किक अनुसन्धान मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया पर ध्यान दिए बिना, जिससे ज्ञानरूप मानसिक तत्त्व की प्राप्ति होती है, आगे नहीं चल सकता। यह शास्त्र उन उपायों का विस्तार से प्रतिपादन करता है जिनके द्वारा मस्तिष्क आगे बढ़ता है और नये-नये परिणामों को हमारे आगे प्रस्तुत करता है और इस प्रतिपादन में यह उन विघ्नों की ओर भी निर्देश करता है जो उक्त उपायों के प्रयोग से आ सकते हैं। तर्कशास्त्र का काम मात्र अनुमानात्मक ही नहीं है। इस सामान्य कथन से ही कि इन चार साधनों में से ही किसी के द्वारा हमें सारा ज्ञान प्राप्त होता है, ज्ञान की समस्या का समाधान नहीं हो जाता। सामान्य कथन समाधान नहीं हो सकता।

 

न्यायशास्त्र उन साधनों उपायों का ही केवल अनुसन्धान नहीं करता जिनके द्वारा मानव-मस्तिष्क ज्ञान को आत्मसात् और विकसित करता है। यह तर्कित तथ्यों की भी व्याख्या करता है तथा उन्हें तार्किक सूत्रों में प्रकट करता है, जो सत्य के अन्वेषण में विविध सिद्धांतों की स्थापना करते हैं, इस प्रकार प्रमाण ज्ञान के माप या मानदण्ड बनते हैं जिनके द्वारा हम अपने अन्दर पहले से विद्यमान ज्ञान की परीक्षा कर सकते हैं। इस प्रकार तर्कशास्त्र प्रमाण का विज्ञान है, अर्थात् साक्षी का मूल्य निर्धारण करता है। यह उपलब्ध आधारों पर ज्ञान की निर्भरता को दर्शा कर अथवा यथार्थ के साथ उसकी अनुकूलता दिखा कर ज्ञान की प्रामाणिकता का विवेचन करता है। सत्य की समस्या तत्त्वज्ञान-सम्बन्धी सिद्धांत के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। न्यायशास्त्र यथार्थता का तत्त्वशास्त्र है और ज्ञान का सिद्धांत है।'[85] इस प्रकार यह केवल तर्कशास्त्र मात्र नहीं, बल्कि ज्ञानप्राप्ति की सम्पूर्ण प्रक्रिया की व्याख्या करने वाला शास्त्र है, जिसमें मनोविज्ञान, तर्क, तत्त्वज्ञान और आस्तिकवाद-सभी का समन्वय है।

5. परिभाषा का स्वरूप

 

न्यायसूत्रों में विवेचना किए जानेवाले विषयों की पहले उपस्थापना की जाती है, फिर उनकी परिभाषा की जाती है और अन्त में उनकी परीक्षा होती है [86] परिभाषा के द्वारा वस्तु का तात्त्विक स्वरूप बतलाया जाता है जिससे कि उसे अन्य पदार्थों से भिन्न करके पहचाना जा सके। परिभाषा का कार्य किसी पदार्थ को उन सभी पदार्थों से भिन्न दिखाना है जिनके साथ उसके सादृश्य का भ्रम हो सकता है।'[87] पदार्थों में उनकी विशेषताओं की व्याख्या किए बिना भी परस्पर भेद किया जा सकता है। पदार्थ का असाधारण धर्म अर्थात् विशेष गुण भी भेद करने में सहायक होता है। परिभाषा में हो सकने वाले दोष तीन प्रकार के होते हैं। उदाहरण के लिए, गाय की परिभाषा करने में यदि कहा जाए कि गाय एक ऐसा जन्तु है जिसके सींग होते हैं तो यह 'अतिव्याप्ति' दोष होगा, क्योंकि ऐसी परिभाषा गाय के अतिरिक्त उस परिधि के बाहर वाले और जन्तुओं पर भी लागू हो जाएगी। इसी प्रकार गाय की परिभाषा करते हुए यदि कहा जाए कि गाय एक भूरे रंग का जन्तु है तो यह 'अव्याप्ति' दोष होगा, क्योंकि भूरे रंग के अतिरिक्त रंग की गायें भी अनेक होने से यह परिभाषा सारी गोजाति पर ठीक नहीं घटती। इसी प्रकार यदि गाय की परिभाषा करते हुए कहा जाए कि गाय एक बिना फटे खुरों वाला जन्तु है तो यह 'असम्भव' दोष है, क्योंकि ऐसी गाय जिसका खुर फटा हुआ हो, नहीं मिलेगी। निर्दोष परिभाषा 'एक ऐसी विशेषता दर्शाती है जो परिभाषित शब्द से अभिप्रेत सभी चीजों पर लागू होती है। वह अधिक पर लागू होती है, कम पर।"[88] उसकी प्राप्ति के लिए हम एक जाति से प्रारम्भ करके पीछे से उसके क्षेत्र को संकुचित करते-करते अमुक से इतर, अमुक से भिन्न आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए[89] अनावश्यक पदार्थों को उसमें से निकालते जाते हैं।

6. प्रत्यक्ष अथवा अन्तर्दृष्टि

 

ज्ञान के विविध साधनों में प्रत्यक्ष या अन्तर्दृष्टि का महत्त्व सबसे अधिक है। वात्स्यायन का कहना है कि 'जब मनुष्य किसी पदार्थ-विशेष का ज्ञान प्राप्त करने की अभिलाषा करता है और कोई विश्वसनीय पुरुष उसे उस पदार्थ के विषय में बतला भी देता है, तो भी उसके अन्दर एक अभिलाषा उसकी यथार्थता को अनुमान द्वारा विशेष-विशेष लक्षण जान कर परखने की होती है। किन्तु इतने पर भी उसकी जिज्ञासा शान्त नहीं होती जब तक कि वह स्वयं उसे अपनी आँखों से देख ले। अपनी आँखों से देख लेने पर ही उसकी इच्छा पूर्ण होती है और तब वह फिर ज्ञान-प्राप्ति के लिए और किसी साधन की खोज नहीं करता।'[90] प्रत्यक्ष शब्द द्वयर्थक है, क्योंकि इसका प्रयोग परिणाम अर्थात् सत्य के ग्रहण के लिए और उस समस्त प्रक्रिया के लिए भी होता है जो सत्य का ग्रहण कराती है। यद्यपि 'प्रत्यक्ष' शब्द का व्यवहार प्रारम्भ में केवल इन्द्रियों द्वारा साक्षात्कार के लिए ही होता था, किन्तु शीघ्र ही इसके अन्तर्गत वह समस्त ज्ञान भी गया जिसका ग्रहण तुरन्त हो जाता है, भले ही उसमें इन्द्रियों की सहायता की आवश्यकता भी हुई हो।'[91] गंगेश ने प्रत्यक्ष का लक्षण इस प्रकार दिया है, वह ज्ञान जिसका ग्रहण सीधे रूप में अर्थात् साक्षात् हो।[92] यह ऐसा ज्ञान है जिसकी प्राप्ति में अन्य ज्ञान की आवश्यकता साधन के  रूप में नहीं है।'[93] अन्य तीनों, अर्थात् अनुमान, उपमान और आप्त प्रमाणों में हमारी ज्ञानप्राप्ति का आधार, क्रमशः, प्रस्तुत विषय का ज्ञान अथवा समानता अथवा परम्परा आदि पहले से उपस्थित रहते हैं। वह ज्ञान जिसे हमने पहले ग्रहण किया है, हमारी स्मृति में रहता है। प्रत्यक्ष में, ज्ञान की पहले आवश्यकता नहीं पड़ती। परमात्मा के अस्तित्व का ज्ञान साक्षात्, तुरन्त और पूर्ण रूप में होने वाला ज्ञान है और इसके लिए किसी अन्य प्रकार के पूर्वबोध की आवश्यकता नहीं।

 

गौतम ने इन्द्रियजन्य ज्ञान की परिभाषा इस प्रकार की है। वह ज्ञान जो किसी इन्द्रिय के साथ पदार्थ का संयोग होने से प्रादुर्भूत होता है, जिसे शब्दों द्वारा प्रकट किया जा सके, भ्रमरहित हो और पूर्ण रूप से प्रकट हो रहा हो।'[94] इस परिभाषा में उन विभिन्न अवयवों का, जो ज्ञान की क्रिया में विद्यमान रहते हैं, समावेश हो जाता है, अर्थात् (1) इन्द्रियाँ, (2) उनके द्वारा ज्ञेय पदार्थ, (3) इन्द्रियों का पदार्थ के साथ संयोग, और (4) वह ज्ञान जो इस संयोग से उत्पन्न होता है। इन्द्रियों का अस्तित्व अनुमान प्रमाण का विषय है। यदि देखने वाली चक्षु इन्द्रिय विद्यमान हो तो रंग का ज्ञान सम्भव नहीं होगा।'[95] ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच बतलाई जाती हैं क्योंकि इन्द्रियजन्य ज्ञान भी पाँच प्रकार का है दर्शनात्मक, श्रवणात्मक, घ्राणात्मक, स्वादात्मक और स्पर्शात्मक [96] इन इन्द्रियों के अधिष्ठान भी भिन्न-भिन्न हैं आँखों के गोलक, कानों के गह्वर, नासिका, जिह्वा और त्वचा। गति, आकृति और जाति-भेद से भी यह स्पष्ट है कि इन्द्रियाँ पाँच हैं। आँख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा। इन पाँच इन्द्रियों की भी प्रकृति वही है जैसाकि तेजस्, आकाश, पृथ्वी, जल और वायु आदि पाँचों तत्त्वों की है, जिनके विशेष गुणों, रंग, शब्द, गन्ध, स्वाद और स्पर्श आदि का आविर्भाव उक्त पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा होता है।[97]

 

डैमोक्रीट्स के मत से मिलता-जुलता यह मत कि सभी इन्द्रियाँ त्वचा के ही परिवर्तित भेद हैइस आधार पर खण्डित हो जाता है कि एक अंधा[98] पुरुष रंग का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।'[99] यदि त्वचा के विशेष भाग ही इन्द्रियाँ समझी जाएँ तो इन्द्रियों की संख्या अनगिनत ठहरेगी, और यदि ऐत्ता नहीं है तो रंग और शब्द इत्यादि का ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा नहीं हो सकता।'[100] यदि एक ही इन्द्रिय का अस्तित्व माना जाए तो देखना, सुनना सूंघना आदि सबका ज्ञान एक साथ ही हो जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त त्वचा केवल उन्हीं पदार्थों का ज्ञान करा सकती है जो समीप में हैं, जबकि देखने और सुनने से दूर-दूर के पदार्थों का भी ज्ञान होता है। जहां न्यायदर्शन समस्त इन्द्रियों की एकता को अस्वीकार करता है, वहां वह त्वचा के विशेष गुण को भी स्वीकार करता है। सापेक्ष चेतना का उत्पन्न होना उसी अवस्था में सम्भव है जबकि मन का सम्पर्क त्वचा के साथ हो। और जब मन, त्वचा के क्षेत्र से बाहर पुरीतत् में होता है, जैसाकि सुषुप्ति अवस्था में होता है, तो उस समय चेतना बिलकुल स्थगित अवस्था में रहती है।"[101]

 

मन भी प्रत्यक्ष ज्ञान के लिए आवश्यक है। जिस समय हम अध्ययन में खूब मग्न होते हैं तो हमें वायु के शब्द की प्रतीति नहीं होती, यद्यपि शब्द श्रवणेन्द्रिय से टकराता है और देह-भर से व्याप्त आत्मा का भी उसके साथ सम्बन्ध रहता ही है। इसके अतिरिक्त, 'एक से अधिक इन्द्रियों का सम्बन्ध अपने-अपने विषयों के साथ रहने पर भी सब विषयों का एकसाथ प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हो पाता। इसका कारण यह है कि मन का सम्पर्क एक समय में एक ही इन्द्रिय के साथ हो सकता है और बिना मन के साथ सम्पर्क हुए इन्द्रिय ज्ञान नहीं ग्रहण कर सकती है। इसका अर्थ यह हुआ प्रत्येक प्रत्यक्ष ज्ञान में मन का सम्पर्क आवश्यक है।"[102] जीवात्मा और इन्द्रियों के बीच में मन मध्यस्थ रहता है। यही कारण है कि एक ही समय में भिन्न-भिन्न इन्द्रिय-ज्ञान एकसाथ नहीं हो सकता।'[103] यद्यपि कभी-कभी शीघ्रता के साथ हो रहे क्रमिक प्रभावों के कारण मात्र आभास होने लगता है कि अनेक प्रत्यक्ष ज्ञान साथ-साथ हो रहे हैं। जब हम पिन को कागजों के अनेक पन्नों में घुसाते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि पिन एक साथ ही अनेक पन्नों में छेद कर रहा है। किन्तु, वस्तुतः वह एक के बाद दूसरे पन्ने में छेद करता है [104] इससे परिणाम यह निकलता है कि जब मन का सम्पर्क एक इन्द्रिय से होता है तो उसी समय से दूसरी इन्द्रिय से उसका सम्पर्क नहीं हो सकता। इसलिए आयाम के विचार से मन को अणु कहा गया है। इसके विपरीत यदि मन विभु अर्थात् देह-भर में व्याप्त होता तो हम प्रत्यक्ष ज्ञान की क्रमिकता की व्याख्या करने में अपने को असमर्थ पाते। ज्योंही इन्द्रिय किसी पदार्थ के सम्पर्क में आती है, मन विद्युत्-गति से तुरन्त वहां पहुँच जाता है। इसके अतिरिक्त, दो व्यापक पदार्थों के सम्पर्क की कल्पना भी असम्भव है। 'स्मरण, अनुमान, आप्त ज्ञान, संशय, प्रतिभा, स्वप्न, ऊहा (कल्पना) और आनन्द आदि का प्रत्यक्ष करना भी उसी अवस्था में सम्भव है जबकि मन उपस्थित हो।"[105] आत्मा को जो बोध होते हैं वे भी अनुव्यवसाय को छोड़ कर, स्वयं प्रकाशमय नहीं होते।[106] हमें उनका ज्ञान मन के द्वारा उसी प्रकार होता है, जैसाकि अनुभवों और इच्छाओं का होता है।

 

                वात्स्यायन मन की गणना इन्द्रियों के अन्दर करता है। वह इसे अन्तरिन्द्रिय मानता है जिसके द्वारा हम आन्तरिक मनोभावों, इच्छाओं और ज्ञानों का बोध प्राप्त करते हैं। जिस प्रकार आकाश में विद्यमान सूर्य और टेबल पर रखी हुई दवात के बारे में तुरन्त यह अनुभूति हो जाती है कि ये हमसे भिन्न बाह्य जगत् के पदार्थ हैं, उसी प्रकार सुख और दुःख की भावनाओं, प्रसन्नता खिन्नता के मनोवेगों और इच्छा अभिलाषा आदि की क्रियाओं कके बारे में भी तुरन्त यह अनुभूति होती है कि ये जीवात्मा की विशेषताएँ हैं। जीवात्मा मन ही के साधन से आन्तरिक अवस्थाओं का ज्ञान प्राप्त करता है, जबकि बाह्य जगत् के पदार्थों के ज्ञान के लिए मन को इन्द्रियों के सहयोग की आवश्यकता होती है।'[107] आन्तरिक तथा बाह्य में भेद ठीक वैसा ही नहीं है जैसा कि आत्मनिष्ठ और विषयनिष्ठ में है, क्योंकि कागज पर लिखने की इच्छा भी प्रत्यक्ष ज्ञान का उतना ही विषय है जितना कि स्वयं कागज है। ज्ञान का सम्बन्ध ठीक उसी प्रकार का है, विषय चाहे कागज़ के समान बाह्य हो या इच्छा के समान आन्तरिक हो। विषय का प्रत्यक्ष और तुरन्त ज्ञान दोनों में एकसमान है।'[108]

 

वात्स्यायन के मत में मन भी एक इन्द्रिय है है। जिस प्रकार कि चक्षु आदि इन्द्रियों हैं, यद्यपि दोनों में अनेक स्पष्ट भेद हैं। बाह्य इन्द्रियाँ भौतिक तत्त्वों से बनी हैं, कुछ विशेष पदार्थों का ज्ञान कराने की ही क्षमता रखती हैं, और कुछ विशेष गुण रखती हुई ही इन्द्रिय के रूप में कार्य कर सकती हैं परन्तु मन अभौतिक है। सभी प्रकार के पदार्थों का ज्ञान कराने में एकसमान क्षमता रखता है और कोई विशेष गुण रखता हुआ भी इन्द्रिय के रूप में कार्य कर सकता है।[109] किन्तु उद्योतकर पूर्णरूपेण इस मत का समर्थन नहीं करता। भौतिक अथवा अभौतिक होना केवल उत्पन्न हुए पदार्थों पर ही लागू होता है, जबकि मन कोई उत्पन्न हुआ पदार्थ नहीं है। वह यह स्वीकार करता है कि मन सब पदार्थों पर कार्य करता है, जबकि इन्द्रियाँ परिमित क्षेत्रों में ही कार्य करती हैं। इस लेखक के अनुसार, मन की जीवात्मा के साथ समानता इस अंश में है कि स्मृति के लिए जिस सम्पर्क की आवश्यकता होती है उसके दोनों ही आधार हैं और दोनों उस सम्पर्क के भी आधार हैं जो सुख का ज्ञान कराता है। प्रत्येक जीवात्मा के पास अपना-अपना मन है जो नित्य है, यद्यपि यह दुर्बोध तथा सूक्ष्म है।'[110] प्रत्येक जीवात्मा के साथ केवल एक ही मन है अनेर नहीं, क्योंकि प्रत्येक जीवात्मा के साथ यदि अनेक मनों का सम्बन्ध होता तो प्रत्येक अवस्था में भिन्न-भिन्न ज्ञान एकसाथ हो जाते और अनेक प्रकार की इच्छाएँ भी एक साथ ही में जाया करतीं जबकि ऐसा होता नहीं है।'[111]

 

क्योंकि प्रत्यक्ष एक प्रकार का ज्ञान है, इसका सम्बन्ध जीवात्मा से है। यद्यपि जीवात्मा और मन का सम्पर्क एक विशेष अर्थ में नित्य है तो भी प्रत्येक मानसिक क्रिया में उसकी पुनरावृत्ति होती रहती है। न्यायशास्त्र जीवात्मा के भौतिक पदार्थों के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध को स्वतः सिद्ध मान कर चलता है। उसके मत से बाह्य पदार्थों की जीवात्मा के ऊपर उसी प्रकार की छाप पड़ने की कल्पना की जाती है जिस प्रकार कि लाख के ऊपर मोहर की छाप पड़ती है। न्यायशास्त्र का प्रत्यक्ष-विषयक सिद्धान्त शरीर क्रिया सम्बन्धी मनोविज्ञान की मुख्य समस्या को अर्थात् एक बाह्य पदार्थ से उत्पन्न उद्दीपना, जो इन्द्रिय पर होती है और एक यान्त्रिक सम्पर्क के रूप में परिणत हो जाती है, किस प्रकार एक मनोवैज्ञानित्र अवस्था का रूप धारण कर लेती है, हल नहीं करता। यह समस्या आज भी, जबकि विज्ञान ने इतनी अधिक उन्नति कर ली है, एक रहस्य ही है।

 

प्रत्यक्ष ज्ञान के उदय होने के लिए कर्ता के अतिरिक्त बाह्य पदार्थ का होना भी आवश्यक है। इस यथार्थ धारणा को स्वीकार कर लेने से न्यायशास्त्र अपनी रक्षा ज्ञान सापेक्षतावाद से करने में समर्थ हो गया, जिसके अनुसार हमें केवल क्षणिक अनुभव ही होते हैं और बाह्य पदार्थ का यथार्थ अस्तित्व मानना मूढ़ पुरुषों की केवल भ्रमात्मक कल्पना-मात्र है। इन्द्रिय का अपने उपयुक्त विषय के साथ सम्पर्क उस पदार्थ का चेतना के साथ सीधा सम्बन्ध स्थापित करा देता है। विषय जो उद्दीपक है, तथा चेतनामय परिणाम जो प्रत्यक्ष है, दोनों के आपसी सम्बन्ध का अध्ययन किया गया है और न्यूनतम संवेद्यता आदि के संकेतों की कमी नहीं है, यद्यपि सूक्ष्म यन्त्र के अभाव में इन प्रश्नों का समाधान ठीक-ठीक मिलना सम्भव नहीं है।

 

प्रत्यक्ष की परिभाषा आत्मा तथा मन के सम्पर्क को तथा मन और इन्द्रियों के सम्पर्क को स्वतः सिद्ध मान लेती है जो सब बोधों में विद्यमान रहता है, और 'इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष' को उक्त ज्ञान का विशेष लक्षण बताती है।'[112] इन्द्रियों का पदाथों के साथ सन्निकर्ष होने से जीवात्मा के अन्दर जो परिवर्तन होता है, उसी से प्रत्यक्ष ज्ञान उत्पन्न होता है। 'यदि इन्द्रियाँ पदार्थ के साथ सम्पर्क में आए बिना भी ज्ञान उत्पन्न कर सकतीं तो वे दीवार के पीछे से भी ज्ञान-सम्पादन करने में समर्थ हो सकतीं [113] किन्तु साधारणतः यह सम्भव नहीं है। 'सन्निकर्ष' का अर्थ, उद्योतकर के अनुसार, निकट सम्पर्क मात्र नहीं है, बल्कि मात्र इन्द्रिय का विषय 'बन जाना' अथवा इन्द्रिय के साथ एक निश्चित सम्बन्ध स्थापित हो जाना है।

 

पदार्थ (विषय) कई प्रकार के हैं। घास का पत्ता एक द्रव्य है, हरापन इसका एक गुण है, और चूंकि गुण द्रव्य के अन्दर रहते हैं, उनका प्रत्यक्ष ज्ञान द्रव्य से अलग नहीं हो सकता।'[114] द्रव्य और उनके गुण एक ही जाति के होने से उनका पृथक् पृथक् अस्तित्व नहीं है और इसलिए उनका ज्ञान केवल उनके आधार के ज्ञान द्वारा ही होता है। इन्द्रिय और द्रव्य के मध्य जो सम्पर्क है वह संयोग है, किन्तु द्रव्य और उसके गुण अथवा जाति और अकेले के मध्य जो सम्बन्ध है यह उसमें समाविष्ट रहने से 'समवाय' सम्बन्ध है। उदाहरण के रूप में, आँख द्रव्य के साथ सीधे सम्पर्क में आती है, किन्तु उसमें समाविष्ट रंग के साथ उसका सम्पर्क केवल परोक्ष रूप में ही होता है; और उससे भी अधिक परोक्ष रूप में उस रंग की विशेष जाति के साथ होता है जो उस रंग में समाविष्ट होती है, जो उस पदार्थ में रहता है, जिसके साथ आँख का सम्पर्क हुआ है।

 

इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष छः भिन्न-भिन्न प्रकार का बताया गया है। पहला केवल संयोग मात्र है, जैसे कि हम एक घड़े को देखते हैं। दूसरा द्रव्य के गुण अथवा उसकी जाति के साथ सम्पर्क जिसे संयुक्त समवाय कहते हैं, जैसे कि घड़े के रंग आदि का ज्ञान हमें होता है। तीसरी संयुक्त समवेत-समवाय, जैसे कि घड़े के रंग की विशेष जाति का, जो उसके भी अन्तर्गत है, ज्ञान होता है। चीथा समवाय है, जैसे कि हम शब्दरूपी गुण का ज्ञान प्राप्त करते हैं[115], जहां कि कान और शब्द के बीच समवाय सम्बन्ध होता है। पाँचवाँ समवेत-समवाय है जबकि हम किसी ऐसे गुण की जाति-विशेष का ज्ञान प्राप्त करते हैं जो द्रव्य से स्वतन्त्र है, जैसे कि शब्दरूपी गुण की जाति-विशेष का ज्ञान। छठा अर्थात् अन्तिम है विशेषणता अथवा विशेषण का विशेष्य के साथ सम्बन्ध। इसका एक दृष्टान्त घड़े के अभाव को देखने पर हमारे आगे आता है। यहां पर हमारी आंख का सम्पर्क भूमितल के साथ होता है जिसमें घड़े के अभाव रूपी विशेषण की विद्यमानता है। इस सम्पर्क को हम दो भिन्न-भिन्न प्रकार से वर्णन कर सकते हैं। प्रथम यह कि घड़े का अभाव रूपी विशेषत्व भूमि में है। (घटाभाववद् भूतलम्) इसमें भूमि प्रतिपाद्य पदार्थ है और उसमें घड़े का अभाव होना उसका विशेषण है। दूसरे रूप में यह कि भूमि पर घड़े का अभाव है (भूतले घटाभावोऽस्ति) दूसरे प्रकार में विशेषण और विशेष्य के पारस्परिक सम्बन्ध उलट गए। पहली अवस्था में अभाव उसका विशेषण हुआ जिसके साथ इन्द्रिय का सम्पर्क है (संयुक्त विशेषणता)[116] अर्थात् भूमि का आंख के साथ। दूसरी अवस्था में अभाव का विशेषगुण उसके द्वारा बताया गया है जिसके साथ इन्द्रिय का सम्पर्क है (संयुक्त विशेष्यता)' उक्त विशेषताएँ यथार्थ के स्वरूप के सम्बन्ध में न्यायशास्त्र की इन तात्त्विक धारणाओं पर आधारित हैं कि वस्तुएँ, गुण तथा सम्बन्ध सब विषय रूप जगत् के ही हैं। वैशेषिक के समान न्याय की भी यह धारणा है कि द्रव्यों, गुणों, क्रियाओं, सामान्यता, विशेषता, समवाय और अभाव का स्वतन्त्र अस्तित्व है। एक द्रव्य जिसका विस्तार है दृष्टि द्वारा देखा जाता है बशर्ते कि उसका रंग प्रकट हो।'[117] इस सम्पर्क का स्वरूप संयोग है, आंख तथा पदार्थ को परस्पर वास्तविक सम्पर्क में आया हुआ कहा जाता है। नव्यन्याय के मत में, यदि पदार्थ मूर्त रूप में है, तो स्पर्श भी पदार्थ का ज्ञान कराता है। गुणों और गति का ज्ञान सम्पर्क के दूसरे प्रकार द्वारा होता है। सामान्यता का ज्ञान दूसरे या तीसरे प्रकार से होता है, अर्थात् द्रव्य, उसके गुण या गति सम्बन्धी जैसी भी सामान्यता हो, उसके अनुसार होता है। न्यायशास्त्र के मत में समवाय अथवा अन्तर्गत गुण स्वयं ज्ञान का विषय है, जबकि वैशेपिक के मत में यह अन्तर्गत प्रमेय पदार्थ है। अभाव छठे प्रकार में आता है।

 

कुमारिलभट्ट तथा वेदान्त के अनुयायियों के मत में ज्ञान होना (अनुपलव्धि) ज्ञान का एक स्वतन्त्र साघन है। कुमारिल के अनुसार, जब हम घड़े के अभाव को देखते हैं तो हमें दो भिन्न-भिन्न प्रकार के ज्ञान होते हैं-एक तो निश्चित ज्ञान अर्थात् भूमि का और दूसरा निपेधात्मक ज्ञान अर्थात् घड़े के अभाव का। नैव्यायिक के मत में घड़े का अभाव रिक्तभूमि का एक विशेषण है और हमें इस प्रकार की अभाव-विशिष्ट भूमि का ज्ञान होता है। यदि यह कहा जाए कि हमें उन्हीं पदार्थों का ज्ञान होता है जो इन्द्रियों के सम्पर्क में आते हैं और पदार्थों के अभाव का इन्द्रियों के साथ सम्पर्क नहीं हो सकता, तो नैय्यायिक का उत्तर यह है कि आलोचक भूल से यह धारणा बना लेते हैं कि केवल संयोग और समवाय दो प्रकार के ही सम्बन्ध हैं, अभाव के सम्बन्ध में इनमें से एक भी संभव नहीं, क्योंकि संयोग केवल दो द्रव्यों में ही सम्भव हो सकता है और अभाव द्रव्य नहीं है, तथा समवाय भी सम्भव नहीं, क्योंकि अभाव अविभाज्य रूप में किसी वस्तु के साथ सम्बद्ध नहीं हो सकता।'[118]

 

बौद्ध दर्शन के अनुसार, अभाव के ज्ञान का अर्थ अभाव का अस्तित्व नहीं है, बल्कि उसका तात्पर्य केवल ऐसी किसी वस्तु का अस्तित्व है जो अभाव का आधार है। घड़े से रहित भूमि के निश्चित ज्ञान को, भ्रम में पड़ कर, घड़े के अभाव के ज्ञान के साथ मिला दिया गया है। किन्तु न्यायशास्त्र का मत है कि निश्चित सत्तात्मक पदार्थों का ज्ञान भी अपने-आपमें वैसा ही एक सत्य है जैसाकि अभावात्मक पदार्थों का ज्ञान है। यदि यह कहा जाए कि भूमि पर घड़े के प्रत्यक्ष ज्ञान का होना घड़े से रहित भूमि का प्रत्यक्ष ज्ञान ही है, तो प्रश्न उठता है कि भूमि का घड़े से रहित होना भूमि के साथ तादात्म्य रखता है या उससे भिन्न है? दोनों एकसमान नहीं हो सकते। यदि घड़े सहित भूमि और घड़े रहित भूमि में परस्पर भेद है तो जैसे एक का ज्ञान प्रत्यक्ष से होता है दूसरी का ज्ञान भी प्रत्यक्ष से हो सकता है।'[119]

 

बौद्ध तार्किक सिद्ध करते हैं कि चक्षु और श्रवणेन्द्रिय अपने विषयों के साथ सीधे सम्पर्क में नहीं आतीं, बल्कि दूर से भी पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करती हैं। ये दोनों इन्द्रियां, उनके मत में, अप्राप्यकारी अर्थात् पदार्थों का ज्ञान दूर से प्राप्त करने में भी समर्थ हैं। नैय्यायिक का तर्क है कि चक्षु इन्द्रिय आँखों के गोलक या पुतलियों का नाम नहीं है, जो इन्द्रियों के अधिष्ठान मात्र हैं। चक्षु इन्द्रिय तेजस् प्रकृति की है और प्रकाश की किरण पुतली से बाहर दूरस्थित पदार्थ तक जाती है और उसके साथ सीधे सम्पर्क में आती है। यही कारण है कि हमें दिशा, दूरी स्थिति का सीधा प्रत्यक्ष इन्द्रियजन्य ज्ञान होता है।'[120]

 

बौद्ध तार्किक निम्नलिखित युक्तियों के आधार पर न्याय के मत पर आपत्ति करता है:

 

(1) चसु इन्द्रिय आंख की वह पुतली है जिसके द्वारा हम पदार्थों को देखते हैं और पुतली स्वयं बाहर जा नहीं सकती कि दूरस्थित पदार्थों के साथ सम्पर्क स्थापित करे। (2) चक्षु इन्द्रिय आकार में अपने से कितने ही बड़े पदार्थों, यथा पर्वत आदि, का ज्ञान प्राप्त करती है, किन्तु इतने बड़े पदार्थों के निकट सम्पर्क में overline 46 नहीं सकती। (3) चक्षु इन्द्रिय को एक वृक्ष के ऊपर के हिस्से अथवा चन्द्रमा को देखने में एकसमान ही समय लगता है जिससे यह प्रमाणित होता है कि इन्द्रिय को पदार्थ के निकट पहुँचने की आवश्यकता नहीं है। (4) आंख पदार्थ तक नहीं जा सकती, अन्यथा शीशे अभ्रक आदि पारदर्शी पदाथों के पीछे की वस्तुओं का ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकती ? दूरी दिशा का ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है किन्तु प्राप्त किया गया है।'[121] उदयन नेअपने 'किरणावलि"[122] नामक ग्रन्थ में उक्त आपत्तियों का समाधान करने का प्रयत्न इस प्रकार किया है : (1) जो कोई पदार्थ का ज्ञान प्राप्त कराता है या उसे प्रकट करता है उसका उस पदार्थ के  साथ सम्पर्क में आना आवश्यक है। दीपक उस पदार्थ को प्रकाशित करता है जिसके सम्पर्क में वह आता है। इसी प्रकार चक्षु इन्द्रिय, जो तेजोमय है, पुतली से निकल कर पदार्थ के सम्पर्क में आती है। (2) पुतली से बाहर आकर प्रकाश फैलता है और पदार्थ को आच्छादित कर लेता है तथा समूचे क्षेत्र में समा जाता है | (3) समीप और दूर के पदार्थों को ज्ञान-प्राप्ति में समय की अवधि में अन्तर अवश्य होता है यद्यपि हमें इसका स्पष्ट भान नहीं होता। दूरस्थित चन्द्रमा आंख के खोलने पर इसलिए दिखाई देता है कि प्रकाश की गति इतनी वेगवती है कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह सुझाव कि हमारी चक्षु इन्द्रिय से निकला हुआ प्रकाश बाहर के प्रकाश के साथ मिल कर तुरन्त एकाकार हो जाता है जिसके कारण समीप और दूर के पदार्थ एकसाथ दिखाई दे सकते हैं, युक्तिसंगत नहीं ठहरता, क्योंकि इस सिद्धान्त के आधार पर हमें उन पदार्थों का भी, जो हमारी दृष्टि से छिपे हुए हैं और जो हमारी पीठ के पीछे हैं, ज्ञान होना चाहिए। (4) शीशा एवं अभ्रक आदि कुछ वस्तुएँ स्वभाव से पारदर्शक हैं और इसीलिए ये प्रकाश को आर-पार जाने देने में बाधा नहीं देतीं। पूर्वमीमांसा न्याय के इस मत का समर्थन करता है कि सभी इन्द्रियां प्राप्यकारी हैं, अर्थात् जिनका वे ज्ञान प्राप्त कराती हैं उन पदार्थों के सम्पर्क में आती हैं। श्रवण ज्ञान के विषय में, शब्द एक निश्चित स्थान से चल कर ध्वनि की लहरों द्वारा वायु के अन्दर गति करता है और इस प्रकार श्रवणेन्द्रिय का अन्तिम शब्द के साथ सम्पर्क होता है। शब्द अपने निकास-स्थान से चल कर क्रमशः लहरों के द्वारा वायु के माध्यम से सर्वत्र फैलता है, ठीक उसी प्रकार जैसे कि पौधे का पराग वायु की लहरों द्वारा सब दिशाओं में दूर-दूर पहुँच जाता है।'[123] किस दिशा से शब्द रहा है इसका परिज्ञान इस प्रकार होता है कि शब्द के निकास-स्थानों की विविधता शब्द में विशेषता पैदा कर देती है और श्रवणेन्द्रिय के विशेष भाग क्रियाशील हो जाते हैं। इसी प्रकार गन्ध के विषय में, पदार्थ के छोटे-छोटे कण वायु के माध्यम से नासिका तक पहुँचते हैं। पदार्थ का इन्द्रिय के साथ केवल सम्पर्क ही प्रत्यक्ष ज्ञान की उत्पत्ति के लिए पर्याप्त है, जैसेकि सोता हुआ मनुष्य भी बिजली की कड़क सुन लेता है।[124]

 

गौतम के अनुसार, इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष ज्ञान का सबसे प्रथम स्वरूप यह है कि वह अवर्णनीय (अव्यपदेश्य) है। पदार्थ के प्रत्यक्ष ज्ञान के लिए उसके नाम का होना आवश्यक नहीं है। नाम की आवश्यकता सामाजिक व्यवहार के लिए है किन्तु पदार्थ के प्रत्यक्ष ज्ञान के साथ-ही-साथ उसके नाम का ज्ञान आवश्यक नहीं है। जयन्त ने एक प्रसिद्ध आचार्य की सम्मति उद्धृत करते हुए कहा है कि उन सब पदार्थों का ज्ञान जिनमें नाम पदार्थ का अंगभूत अवयव है, प्रत्यक्ष ज्ञान के क्षेत्र से बाहर है। यदि एक मनुष्य किसी फल को देख कर उसके स्वरूप का अनुभव करता है तो यह प्रत्यक्ष ज्ञान है। किन्तु यदि वही मनुष्य किसी दूसरे पुरुष से उस फल का नाम 'बिल्व' सुनता है तो यह प्रत्यक्ष ज्ञान होकर आप्त ज्ञान कहलाएंगा।'[125] वात्स्यायन का मत है कि पदार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान उसके नाम के साथ और उसके बिना भी हो सकता है। पहली अवस्था में उसे निश्चयात्मक और दूसरी अवस्था में अनिश्चयात्मक प्रत्यक्ष ज्ञान कहेंगे।'[126] अवर्णनीय (अव्यपदेश्य) और सुपरिभाषित (व्यवसायात्मक) में जो भेद है वही भेद निर्विकल्प तथा सविकल्प में है।

 

वात्स्यायन और उद्योतकर इस भेद का उल्लेख नहीं करते और वाचस्पति, जो इसका उल्लेख करते हैं, इसे अपने गुरु त्रिलोचन का मत बताते हैं।'[127] परवर्ती सभी दार्शनिक जैसे भासर्वज्ञ, केशवमिश्र, अन्नंभट्ट और सांख्य तथा वैशेषिक के अनुयायी तथा कुमारिल भी इस विचार से सहमत हैं। गीतम अपनी परिभाषा से सभी प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान को निश्चयात्मक मानते हैं। यदि हमें इस विषय में सन्देह है कि दूरस्थित पदार्थ मनुष्य है अथवा एक खम्भा है, धूल है या धुआँ है, तो यह प्रत्यक्ष नहीं है। जैन, जिनका मत है कि हम प्रत्येक प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान में प्रत्यक्ष के कर्ता तथा ज्ञेय पदार्थ दोनों से अभिज्ञ रहते हैं, प्रत्यक्ष ज्ञान के अनिश्चयात्मक होने की सम्भावना का निषेध करते हैं।

 

सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान के अन्दर ज्ञान पदार्थ किस जाति का है, यह ज्ञान, उन विशेष गुणों का ज्ञान जो उसे जाति के अन्य पदार्थों से विशिष्ट करते हैं तथा दोनों के परस्पर सम्पर्क का ज्ञान, ये सब उपलक्षित रहते हैं। पदार्थ की जाति, विशिष्ट गुणों और दोनों के सम्पर्क का स्पष्ट ज्ञान निर्विकल्प प्रत्यक्ष में उपस्थित नहीं रहता।'[128] निर्विकल्प और सविकल्प ज्ञान का भेद लगभग वैसा ही है जैसाकि पदार्थ के साधारण परिचय और उसके ज्ञान में, अर्थात् साधारण बोध तथा निर्णयात्मक प्रत्यक्ष ज्ञान में है।

 

प्राचीन वैशेषिक मतानुयायियों के अनुसार, निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान वह है जो पदार्थ के सामान्य (जातिगत) एवं विशिष्ट स्वरूप के सम्बन्ध में प्रथम साक्षात्कार के समय उत्पन्न होता है, जिसमें उक्त दोनों के अन्तर का ज्ञान सम्मिलित नहीं है। सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान में पदार्थ और उसके विशिष्ट गुणों का भेद स्पष्ट होकर पदार्थ का ज्ञान निश्चयात्मक हो जाता है।'[129] वाचस्पति का विचार है कि निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान में हमें पदार्थ के गुणों का ज्ञान तो होता है, किन्तु हम पदार्थ और उनमें विशेषण-विशेष्य भाव का सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाते। और जब ऐसा कर पाते हैं तो उसकी सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान संज्ञा हो जाती है। श्रीघर का यही मत है। प्रभाकर प्राचीन वैशेषिक के अनुयायियों के साथ सहमत होकर कहता है कि निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान में हमें केवल पदार्थ के स्वरूप-मात्र का ज्ञान होता है। यद्यपि हम जातिगत सामान्य और उक्त पदार्थगत विशेष गुणों को भी देखते हैं, किन्तु उनमें भेद कर सकने से , जैसाकि सविकल्प ज्ञान में करते हैं, उक्त ज्ञान को निर्विकल्प संज्ञा देते हैं। गंगेश की सम्मति में निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान वह है जिसमें पदार्थ और उसके जातिगत गुणों का पृथक् पृथक् ज्ञान तो हो किन्तु दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध का ज्ञान हो। पदार्थ का इन्द्रिय के साथ जैसेकि घड़े का आंख के साथ सम्पर्क होते ही घड़े के विषय में तुरन्त यह ज्ञान नहीं होता कि यह घड़ा घड़ों की जाति का है I[130] किन्तु जब पदार्थ और जिस जाति का वह पदार्थ है उसके पारस्परिक सम्बन्ध का भी ज्ञान हो जाता है तो उसे हम सविकल्प अथवा निश्चयात्मक प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं। अन्नंभट्ट के अनुसार, निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान पदार्थ के विशेष गुणों के ज्ञान से रहित केवल पदार्थ के ज्ञान का नाम है, जबकि सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान के अन्दर पदार्थ (विशेष्य) और उसके गुणों (विशेषणों) जैसे कि पदार्थ की संज्ञा और जाति के सम्बन्ध का ज्ञान जाता है [131]

 

सविकल्प प्रत्यक्ष का उक्त विश्लेषण प्रत्यक्ष की क्रिया के अन्तर्गत दो अवयवों, अर्थात् सामान्य प्रत्यय तथा अन्तिम निर्णय को हमारे सामने उपस्थित करता है। मनोवैज्ञानिक श्रेणीबद्ध प्रकल्पना के हेत्वाभास का कि पहले हमें प्रत्यक्ष होता है, फिर सामान्य प्रत्यय बनता है और उसके बाद अन्तिम निर्णय होता है, इस प्रकार निराकरण हो जाता है।

 

निर्विकल्प प्रत्यक्ष के सम्बन्ध में एक भिन्न प्रकार का विचार, जो कि वस्तुतः असन्तोषजनक है, हमें नव्यन्याय में देखने को मिलता है। वहां ऐसा कहा गया है कि चेतना में जो ज्ञान प्रस्तुत होता है वह सविकल्प प्रत्यक्ष है, और उससे हम निर्विकल्प प्रत्यक्ष के अस्तित्व का अनुमान करते हैं। किसी पदार्थ का सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान, अर्थात् पदार्थ के विशेष गुणों से युक्त होने का ज्ञान, उन गुणों के निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान की पूर्वावस्या का संकेत करता है, जिसके बिना सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान सम्भव नहीं हो सकता। यदि गुणों का प्रत्यक्ष ज्ञान भी सविकल्प होता तो उसका तात्पर्य होता गुणों के गुणों का प्रत्यक्ष ज्ञान और इस प्रकार उसका कहीं भी अन्त होता। अतएव उक्त उलझन से दूर रहने के लिए हम निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान के अस्तित्व को ही स्वीकार कर लेते हैं।[132]

 

कुछ नैव्यायिक निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान को अनुमान का विषय नहीं मानते, बल्कि इसे केवल चेतना की एक अवस्था मात्र स्वीकार करते हैं जो हमें केवल अस्तित्व का बोध कराती है।[133] जो इसे चेतना का एक तथ्य मानते हैं उनका तात्पर्य इससे एक अस्पष्ट बोध से है। किन्तु जो इसे सविकल्प चेतना से निकसित अमूर्तभावरूप मानते हैं वे इसे भाववाचक गुणों की अभिज्ञता के समान समझते हैं और इसे वे निर्विकल्प इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें अनुव्यवसाय को स्थान नहीं है।

 

न्यायशास्त्र का झुकाव प्रधानतः निर्विकल्प प्रत्यक्ष को सब प्रकार के ज्ञान का प्रारम्भिक विन्दु समझने की ओर है, यद्यपि उसकी सम्मति में यह अपने-आप में ज्ञान नहीं है। यह पदार्थ का तात्कालिक बोध है जो सही अर्थों में ज्ञान नहीं कहला सकता। यह एक प्रकार की भेद-रहित, असम्बद्ध चेतनामात्र है, जो आत्मसात्करण, विभेदीकरण, विश्लेषण और समन्वय के कार्य से मुक्त है। इसे मूक, अव्यक्त तथा शाब्दिक प्रतिबिम्बों से मुक्त समझना चाहिए। सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान चेतना की एक व्यवहृत, भेद-प्रदर्शक एवं सम्बन्ध निर्देशक अवस्था है जिसमें आत्मसात्करण और विभेदीकरण के परिणाम भी समाविष्ट हैं। यह व्यक्त, मूर्तरूप और निश्चित ज्ञान है। निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान में जातिगत वैशिष्ट्य और सम्बन्ध अन्तर्निहित तो अवश्य हैं, किन्तु वे प्रकट होते हैं सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान में ही। इस मत का समर्थन पार्थसारथि मिश्र ने किया है। निर्विकल्प-प्रत्यक्ष अर्थात् इन्द्रिय-सम्पर्क से उत्पन्न अनुभव और सविकल्प प्रत्यक्ष जो प्रत्यक्ष ज्ञान का निर्णयात्मक रूप है दोनों एक ही प्रक्रिया के, जो प्रकृति से एक ही है, प्रारम्भिक और समुन्नत रूप हैं। निर्विकल्प प्रत्यक्ष क्योंकि तत्काल आगे नहीं बढ़ता, यह मूक और विश्लेषण-रहित है, जेम्स के शब्दों में 'अपरिपक्व और आवाचिक अनुभवः है इसलिए सत्य-असत्य का भेद इसके विषय में लागू नहीं होता।'[134] पहले-पहल जब हम प्रकाश को देखते हैं तो, कण्डिलैक के शब्दों में, "हम उसे देखने की अपेक्षा हम यही होते हैं।[135] इसलिए साधारण बोध में भूल होने की सम्भावना नहीं है। प्रत्यक्ष ज्ञान सम्बन्धी निर्णय में, जहां कर्ता के विषय में कुछ विधान किया जाता है, तार्किक विवेचन की उत्पत्ति होती है क्योंकि हमारा अपना निर्णय पदार्थ-सम्बन्धी व्यवस्था के अनुकूल हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता। जब हम कहते हैं कि 'वह मनुष्य है', तो हमारा ज्ञान, जहां तक 'वह' शब्द का सम्बन्ध है, सत्य है, किन्तु जहां तक 'मनुष्य' शब्द का सम्बन्ध है, वह सत्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता।'[136]

 

विरोध में बौद्ध तार्किकों का कहना है कि सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान व्यवहत होने के कारण पूर्वधारणा से स्वतन्त्र नहीं है किन्तु निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान पूर्वधारणा से स्वतन्त्र, अर्थात् कल्पनापोढ़[137] है। निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान के पदार्थ के गुणों अर्थात् सामान्यता, द्रव्यत्व, गुण, क्रिया, नाम आदि का ज्ञान नहीं होता, बल्कि यह केवल पदार्थ के स्वलक्षण'[138] अर्थात् निजी अस्तित्व का ही ग्रहण कराता है। यधार्थ, जिसके हम सम्पर्क में आते हैं, अवर्णनीय है और जिसका हम वर्णन करते हैं उसका क्षेत्र सामान्य प्रत्यय हैं। धर्मकीर्ति का कहना है कि प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय स्वलक्षण है, जबकि व्यवहत ज्ञान का विषय सामान्य लक्षण है। उपस्थित पदार्थ अपूर्व, विशेष और क्षणिक है और जाना हुआ पदार्थ आदर्श, सामान्य और स्थायी है।"[139] जैसे ही हम किसी अनुभूत यथार्थ के विषय में कुछ कहते हैं, हम उसका सम्बन्ध किसी अन्य वस्तु के साथ स्थापित कर देते हैं, और इस प्रकार यथार्थ अपनी प्रकृति को खो देता है तथा बुद्धि के द्वारा आविष्कृत भावों से आरोपित हो जाता है। हम श्रवणेन्द्रिय द्वारा भन-भन की-सी आवाज सुनते हैं और यह आवाज यथार्थ है, किन्तु यह आवाज मक्खी की है या दूरस्थित वाप्पसीटी की, यह हमारी अपनी कल्पना है। धर्मोत्तर का तर्क है कि मां के स्तन का ज्ञान जो बच्चे को दूसरी बार होता है, अपने पूर्वानुभव के आधार पर ही होता है, और इसलिए यह ज्ञान भी विशुद्ध या अनिश्चित नहीं है। जैसाकि काण्ट ने कहा है, सभी सम्पर्क ऐसे रूप हैं जो हमारे मन द्वारा उपस्थित तत्त्वों पर आरोपित किए गए हैं और तभी वे ज्ञान के विषय बन सके हैं। सविकल्प ज्ञान में हम यथार्थ को मरोड़ कर उसका रूप बदल देते हैं और इसीलिए वह अप्रामाणिक कहलाता है।'[140] दिग्नाग की सम्मति में द्रव्यों, गुणों तथा क्रियाओं का ज्ञान मिथ्या है।'[141] बाह्य पदार्थ क्षणिक हैं और इसलिए वे जाने नहीं जा सकते।[142] रचनात्मक कल्पना क्षणिक अवस्था को एक ऐसी श्रृंखला में परिणत कर देती है, जिसमें भूतकाल प्रविष्ट होता है और जो आगे की ओर भविष्य में बढ़ी होती है। विचार-जगत् अयथार्थ (अनर्थ) है। परमार्थसत् अनुभूत संवेदना है I[143] यह समस्त मत इन विचारकों की अध्यात्म-विषयक पूर्वकल्पनाओं द्वारा निर्धारित है। दिग्नाग एक विषयीविज्ञानवादी है जो समस्त ज्ञान को विशुद्ध मानसिक मानता है। यथार्थ के स्वरूप के प्रश्न को उसने अनिर्णीत ही छोड़ दिया है, यद्यपि प्रत्यक्ष-विषयक तथ्य उसे यह स्वीकार करने को बाध्य कर देते हैं कि हम किसी यथार्थ सत्ता के सम्पर्क में आते हैं, चाहे वह क्षणिक ही क्यों हो। धर्मकीर्ति अपने सौत्रान्तिक झुकावों के कारण अतिमानसिक यथार्थ सत्ताओं को स्वीकार करता है, जिससे कि प्रत्यक्ष ज्ञान की विविधता का समाधान हो सके, यद्यपि उनका क्षणिक रूप उनके ज्ञान को असम्भव बना देता है। वह संवेदनाओं को वैयक्तिक तथा उनके पदार्थ सम्बन्धी संकेत को अनुमानगम्य मानता है।

 

नैय्यायिक बौद्धमत की कड़ी आलोचना करते हैं। उद्योतकर का तर्क है कि विशुद्ध इन्द्रिय-ज्ञान जो अपने-आप में विशिष्ट और स्वतः प्रज्ञात है और जो नाम या जाति के सम्मिश्रण से रहित है, एक असम्भव धारणा है। हमारा पदार्थ-विषयक ज्ञान अनिवार्य रूप से व्यापक (जातिमात्र में सामान्य) रूप धारण कर लेता है। बौद्धों का यह मत कि सभी सामान्य स्थापनाएँ काल्पनिक हैं क्योंकि केवल विशिष्ट पदार्थों का ही अस्तित्व है, नैय्यायिकों को अमान्य है। उनका मत है कि सामान्य स्थापनाएँ उतनी ही यथार्थ हैं जितने कि वे पदार्थ-विशेष हैं जिनमें वे समवाय सम्बन्ध से विद्यमान हैं। इस सम्बन्ध का ज्ञान या तो हमें सीधा प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा होता है या इस तथ्य के अनुमान द्वारा होता है कि हमें विशिष्ट पदार्थों के बारे में यह अभिज्ञता होती है कि वे यथार्थ प्रकार के हैं। पदार्थों का स्वरूप ही अन्तिम साक्षी है जो स्वयं प्रकट रूप में हमारी चेतना को निर्धारित करता है। सम्बन्ध उपस्थित पदार्थों पर आरोपित नहीं किए जाते हैं बल्कि यथार्थ के स्वरूप में ही भासित होते हैं। हमारी बोधशक्ति का कार्य यथार्थ की पूर्णता में उस सम्बन्ध को केवल खोज निकालना है। यदि 'यथार्थ' में सम्बन्ध निहित नहीं है और ज्ञान का विषय सम्बन्धयुक्त है, तो हमें बुद्धिगत विषय और दृष्टिगत विषय के मिथ्या विरोध को स्वीकार करना पड़ेगा। ज्ञात विषय वैसा नहीं है जैसाकि विषय वस्तुतः स्वयं है। वह ज्ञाता और उद्दीपक पदार्थ के मध्य स्थित एक तृतीय दल है। किन्न जैसाकि हमने देखा, न्यायदर्शन के अनुसार निर्विकल्प और सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान तात्त्विक रूप में एक ही हैं। सम्बन्ध शून्य से हठात् प्रकट नहीं हो जाते। वे निर्विकल्प ज्ञान में विद्यमान है यद्यपि हम सविकल्प ज्ञान में ही उनके अस्तित्व से अभिज्ञ होते हैं। जयन्त का तर्क है कि सचिकत्य ज्ञान का विषय अयथार्थ नहीं है, क्योंकि निर्विकल्प ज्ञान के द्वारा भी उसका बोध होता है। विचार-सम्बन्धी अवयवों अथवा स्मृति के विषयभूत तत्त्वों की उपस्थिति मात्र इन्द्रियों की सक्रियता में हस्तक्षेप नहीं करती। सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान की जटिलता एक तार्किक दोष नहीं है। उसमें अन्तर्निहित विचार का प्रयोग उसकी प्रामाणिकता का समर्थन करता है। यदि सविकल्प प्रत्यक्ष उसी का ज्ञान कराता है जिसका ज्ञान पहले ही निर्विकल्प प्रत्यक्ष द्वारा हुआ है, तो यह कोई इस बात की दलील नहीं है कि वह सत्य नहीं हो सकता। नवीनता सत्य की कसौटी नहीं है। विचार विषयक तत्त्व विकल्पमात्र नहीं हैं। सामान्य, जो प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय है, मात्र नाम ही नहीं है, क्योंकि नाम के अभाव में भी उसका ज्ञान होता है। दक्षिण भारत का निवासी जब उत्तर भारत में ऊंटों को देखता है तो वह उनकी सामान्यता को लक्ष्य करता है, चाहे उसे उक्त पशु के नाम का ज्ञान हो। हम जब अपनी चारों उंगलियों को देखते हैं, तो हम उनमें एक सामान्य भाव भी लक्ष्य करते हैं तथा उनके विशेष गुणों को भी लक्ष्य करते हैं। यदि हम पदार्थ के केवल विशेष रूप को ही ग्रहण करें तो हम दूसरी घटना का प्रथम के साथ सम्बन्ध स्थापित कर सकेंगे। यदि यह तर्क दिया जाय कि जब हम दूसरी बार देखते हैं तो पहली बार का स्मरण हो आता है, तो जयन्त का कहना है कि पहले के स्मरणमात्र से कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि वह दूसरे के साथ सम्बद्ध नहीं है। यदि इसका तात्पर्य यह है कि दूसरा ज्ञान पहले का संकेत देता है, क्योंकि दोनों एक ही वर्ग के हैं, तो यह स्पष्ट है कि पहले प्रत्यक्ष ज्ञान में भी उसकी सामान्यता और विशेषता का भी ज्ञान हुआ था। निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान में सामान्य तथा विशिष्ट का ज्ञान अस्पष्ट रूप में और सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान में स्पष्ट रूप में होता है। बौद्ध विचारक भी यह अस्वीकार नहीं करते कि जब हमें किसी विशिष्ट पदार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है तो हमें सामान्यता (अनुवृत्ति ज्ञान) का भी बोध होता है। अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि इस बोध (अनुवृत्तिज्ञानोत्पादिका शक्ति) का आधार क्या है, अर्थात् क्या यह विशिष्ट है अथवा उससे कुछ भिन्न है, नित्य है अथवा अनित्य है, प्रत्यक्ष होने योग्य है अथवा नहीं, क्योंकि यदि बोध में कोई वैशिष्ट्य है तो बोध के विषय में भी वैशिष्ट्य अवश्य होगा।'[144] इसलिए सामान्य विशिष्ट से भिन्न है, वह व्याप्त होने से नित्य है, जबकि विशिष्ट पदार्थ उत्पन्न होते तथा नष्ट होते हैं। और सामान्य यथार्थ है, चाहे वह प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय हो या अनुमानगम्य हो।'[145] इस तर्क की कि सविकल्प प्रत्यक्ष ज्ञान पदार्थ के निर्देशक शब्द के स्मरण पर निर्भर करता है और पदार्थ के इन्द्रिय के साथ सीधे सम्पर्क पर निर्भर नहीं करता, इस आधार पर आलोचना की गई है कि यद्यपि सविकल्प प्रत्यक्ष इन्द्रियगृहीत ज्ञान तथा स्मृतिगत प्रतिबिम्ब का सम्मिश्रण है, तो भी प्रमुख अवयव इन्द्रिय सम्पर्क ही है, नाम की स्मृति सहायक अवयव है। कोई भी बोध प्रत्यक्षजनित है अथवा नहीं, यह परिधिस्थ उत्तेजना की विद्यमानता अथवा उसके अभाव पर निर्भर करता है।'[146]

 

यहाँ हम बौद्ध तथा नैय्यायिकों द्वारा समर्थित यथार्थ सम्बन्धी विचारों में जो मौलिक विभिन्नता है, उस पर पहुँचते हैं। बौद्धों की धारणा है कि यथार्थ सत्ता साधारण 'यह' है, अर्थात् एक क्षणिक विशिष्ट जो अपने गुण के अन्दर बन्द है, जो काल के अन्दर बराबर रहने अथवा देश के अन्दर विस्तार से सर्वथा स्वतन्त्र 'सर्व पृथक्' है। समस्त सम्बन्ध स्वेच्छा से बाहर से कल्पना द्वारा फैलाया गया जाल है, इसके विपरीत, नैय्यायिका का तर्क यह है कि जिसका अस्तित्व है वह क्षणिक गुण नहीं है, बल्कि विशिष्ट पदार्थ है जिसके अन्दर विषयवस्तु की विविधता है। अनेकत्व के होते हुए भी वह एक रहता है। वह अनेकों में एक है। जहाँ तक वह दूसरों से पृथक् है वह अपने-आप में विशिष्ट है, और जहाँ तक वह अपनी विविधता में एकसमान है वह सामान्य है, और अपनी इस समानता के कारण वह एक वर्ग का अंग भी है। प्रत्येक विशिष्ट पदार्थ के ये दो पहलू हैं। अणु-रूप विशिष्ट पदार्थ, जो सब प्रकार के विभेदों से रहित है और मात्र सम्बन्ध जिसका कोई अन्तिम बिन्दु नहीं है, एक ऐसा मिथ्या विश्वास है जिसका सम्बन्ध जिसका समर्थन अनुभव से नहीं होता। तादात्म्य तथा विभेद एक पूर्ण इकाई के अन्दर ही पृथक् पृथक् जाने जा सकते हैं, और ये ही जब स्वतन्त्र इकाइयों में बँटकर कठोर हो जाते हैं तो मिथ्या हो जाते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान न्याय के इस मत का समर्थन करता है कि प्रस्तुत पदार्थगत विषय के दो पहलू हैं- इन्द्रियगम्य गुण और सम्बन्ध

 

ऊपरी तौर पर विचार करने से हमें यह प्रतीत होता है कि अपरिवक्व इन्द्रिय संवेदनाएँ जो ज्ञान की उत्पादक सामग्री हैं, उच्चतम यथार्थ सत्ता हैं। किन्तु इस स्थिति को स्वीकार करना कठिन है कि मनुष्य की खण्ड-खण्ड संवेदनाएँ ही वस्तुओं का यथार्थतत्व है। अस्तव्यस्त पड़े असंख्य पत्थर, ईंटें तथा लकड़ी मकान नहीं हैं। अनुभूत संवेदनाएँ ज्ञान नहीं हैं। वर्तमान क्षण की परिधि में आबद्ध सीमित ज्ञानवाद तो हमें सीधा बौद्धिक आत्मघात की ओर अग्रसर करेगा, क्योंकि उससे विचार सम्बन्धी जीवन एक कल्पित कहानी-मात्र रह जाएगा। बौद्ध दार्शनिक निष्क्रिय अभिज्ञता का वास्तविकता के अनुभव के साथ तादात्म्य बतलाते हैं। वे हमें मानसिक आलोचना के पाप से मुक्त होने का आदेश देते हैं परन्तु व्यवधानशून्यता के लिए उनका जोश एक पूर्वाग्रह मात्र है। तथ्य के प्रति निष्ठा का अर्थ मानसिक आलोचना से मुक्ति तो नहीं है। मैं जब यह कहता हूँ कि यह वस्तु, जिसे मैं अपने सम्मुख देखता हूँ, नारंगी है, तो निश्चय ही में इस सम्बन्ध में जान-बूझकर कोई आलोचनात्मक मूर्खता नहीं करता हूँ। मानसिक आत्मबोध मानवमस्तिष्क का स्वाभाविक कार्य है। मानव का मस्तिष्क कोई खाली कमरा तो है नहीं जिसमें इन्द्रियजन्य बोध तुरन्त घुस जाते हों। प्रत्येक इन्द्रियजन्य ज्ञान प्रेरणात्मक पदार्थ के सम्पर्क की क्रियात्मक प्रतिक्रिया है। हम जन्मजात विचारक हैं और इसलिए जो ज्ञान हमें उपलब्ध होता है उसकी व्याख्या किए बिना हम नहीं रह सकते। संवेदनाएँ हमें एकदम सम्बन्ध रहित प्राप्त नहीं होतीं। वे हमें विषयनिष्ठता के भाव के साथ प्राप्त होती हैं। वे अन्य तत्त्वों के सम्मिश्रित पुंज से घिरी हुई हमारे आगे प्रस्तुत होती हैं। आणविक 'अब' (वर्तमान) का कोई अस्तित्व नहीं है। आकाश-स्थिति प्रत्येक विन्दु के चारों ओर अन्य बिन्दु भी हैं, जैसाकि समय का प्रत्येक क्षण निरंतर दूसरे क्षण में परिवर्तित होता रहता है। बौद्ध दर्शन के मत से इन्द्रिय और अवबोध (प्रतिपत्ति) भिन्न-भिन्न हैं और दोनों के कार्य भी एक-दूसरे से बिलकुल पृथक् हैं। इन्द्रियों द्वारा गृहीत सामग्री भिन्न-भिन्न विधियों से परस्पर एकत्र होकर ज्ञान के जगत् का निर्माण करती है। उक्त सामग्री में ऐसे सम्बन्ध जुड़े रहते हैं जिन्हें हमारा ज्ञान ही पृथक् करके सुलझाता है। ज्ञान में यथार्थता का तो हम निर्माण कर सकते हैं और उसमें कोई परिवर्तन ही कर सकते हैं। इन्द्रियों द्वारा जो अस्पष्ट रूप में ज्ञात होता है उसका स्पष्ट ज्ञान तब होता है जब हम अवबोध के क्षेत्र में पहुँचते हैं। जो सम्बद्ध तर्कसंगत है, वही यथार्थ है। यथार्थता का स्वरूप तो इन्द्रियों को प्राप्त होता है और ही अवबोध को। वह केवल पूर्ण आत्मा को ही प्राप्त होता है।

 

धर्मकीर्ति प्रत्यक्ष ज्ञान के चार प्रकार स्वीकार करता है इन्द्रियजन्य ज्ञान, मानसिक ज्ञान (मनोविज्ञान), आत्मचेतना तथा यौगिक अन्तर्दृष्टि इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष ज्ञान में इन्द्रियाँ माध्यम का काम करती हैं। मानसिक ज्ञान को भी इन्द्रियजन्य ज्ञान के ही समान कहा गया है, क्योंकि दोनों एक ही श्रेणी के (एक सन्तान) हैं। यह ज्ञान इन्द्रियजन्य ज्ञान के अगले ही क्षण में उत्पन्न होता है। एक प्रकार से यह कुछ-कुछ पश्चात्-बिम्ब है, क्योंकि धर्मोत्तर का कहना है कि 'मानसिक-ज्ञान तब तक उत्पन्न नहीं हो सकता जब तक कि आंख अपना काम कुछ समय के लिए बन्द कर दे। यदि आंख क्रियाशील रहे तो हमें आकृति तथा दृष्टिशक्ति सम्बन्धी इन्द्रिय ज्ञान बराबर होते ही रहेंगे।"[147] सुख और दुःख का आन्तरिक प्रत्यक्ष ज्ञान तीसरे वर्ग के अन्तर्गत आता है जिसे स्वसंवेदना या आत्मचेतना कहा गया है। हमें आत्मा के अस्तित्व का ज्ञान उसकी सुख या दुःख जैसी भिन्न-भिन्न स्थितियों के ज्ञान के द्वारा होता है। यह सीधा अन्तर्ज्ञान है जिसके द्वारा जीवात्मा का आविर्भाव हमें होता है (आत्मनः साक्षात्कारी) यह बुद्धि के हस्तक्षेप से स्वतन्त्र है और इसीलिए इसमें भ्रम की संभावना भी नहीं हो सकती। प्रत्येक मानसिक व्यापार में इसका सहयोग विद्यमान रहता है। धर्मोत्तर ने इस स्वसंवेदना को और उस आत्मीयता तथा भावुकतापूर्ण आवेश को, जो प्रत्येक प्रत्यक्ष ज्ञान में उपस्थित रहता है, एक समान बताया है। नव्यन्याय ने इसे परवर्ती उपज कहा है जो चेतना के ऊपर आच्छादित हो जाती है। गंगेश के मत से इसकी उत्पत्ति तथ होती है जच हम कहते हैं कि 'मैं जानता हूँ कि यह एक बरतन है।' व्यवसाय अथवा सविकल्पज्ञान हमें किसी पदार्थ का ज्ञान कराता है, किन्तु इस ज्ञान को कि 'मुझे पदार्थ का ज्ञान है' अनु अर्थात् पीछे से उत्पन्न होनेवाला व्यवसाय अथवा पश्चाद्ज्ञान कहा जाएगा। 'यह एक घड़ा है'[148] एक अवबोध है; 'मैं जानता हूं कि यह घड़ा है," अनुव्यवसाय है, अर्थात् पदार्थ के अवबोध के पीछे होनेवाला ज्ञान है। सांख्य और वेदान्त का मत है कि चेतना की प्रत्येक वृत्ति पदार्थ को तथा अपने-आपको भी प्रकट करती है, जिसमें आत्मा सम्मिलित है।[149] 

धर्मकीर्ति के मतानुसार, हम बौद्धधर्म के चार सत्यों को, जो ज्ञान के साधारण साधनों की पहुंच से परे हैं, यौगिक अन्तर्दृष्टि से प्रत्यक्ष देखते हैं जो समस्त भ्रम से उन्मुक्त है और बौद्धिक दोष से भी रहित है,'[150] यद्यपि स्वरूप में वह निर्विकल्प प्रत्यक्ष ही है। प्रत्यक्ष ज्ञान की नानाविध श्रेणियाँ हैं। विल्लियों घने अन्धकार में भी पदार्थों को देख सकती हैं और गिद्ध अपने शिकार को बहुत दूर से ताक लेते हैं। निरन्तर ध्यान का अभ्यास करने से मनुष्य इन्द्रियातीत अर्थात् दिव्यदृष्टि प्राप्त कर सकता है, और समीप दूर के, भूत और भविष्य के तथा सुदूर और दृष्टि से ओझल सभी पदार्थों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर सकता है।[151] इस अत्यन्त उच्च श्रेणी के अन्तर्ज्ञान में अन्तर्दृष्टि की व्यवधानशून्यता होती है। हमारी दृष्टि में जो चमत्कार प्रतीत होता है, ऋषियों के लिए वही एक प्राकृतिक देन है। हमारी विमूढ़ दृष्टि को जो अत्यन्त जटिल और रहस्यपूर्ण प्रतीत होता है, ऋषियों को वही हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष हो जाता है। यहां हर एक वस्तु रूपान्तरित है। सबसे निचले धरातल में पिण्डीभूत पदार्थों का सीधा-सादा इन्द्रियजन्य ज्ञान है और सर्वोच्च धरातल पर यौगिक अन्तर्दृष्टि है। प्रथम प्रकार का ज्ञान प्रकृत एकजन्मा मनुष्य का है, जबकि दूसरे प्रकार का ज्ञान आध्यात्मिक द्विजन्मा पुरुष का है। पहले प्रकार का ज्ञान आत्मान्वेषण का महान् संघर्ष प्रारम्भ होने से पहले आता है, और दूसरे प्रकार का उस संघर्ष के अन्त में आता है। दूसरा ज्ञान एक सिद्धि है जो ज्ञान की परिपक्व अवस्था एवं आन्तरिक वेदना का परिणाम है। यौगिक अन्तर्दृष्टि यथार्थ का ज्ञान, जैसाकि वह है, उसकी पूर्णता और एकलयता में प्राप्त करती है।'[152] यौगिक अन्तर्दृष्टि तथा ईश्वरीय सर्वज्ञता में इतना अन्तर है कि पहली उत्पन्न होती है और दूसरी नित्य है।'[153]

 

गंगेश लौकिक तथा अलौकिक प्रत्यक्ष में भेद करता है। अलौकिक प्रत्यक्ष के तीन भेद हैं जो तीन प्रकार के अलौकिक सन्निकर्षों, अर्थात् सामान्य लक्षण, ज्ञानलक्षण और योगज धर्म द्वारा उत्पन्न होते हैं।'[154] अन्तिम यौगिक अंतर्दृष्टि है। जब हम पदार्थों का जातिगत ज्ञान प्राप्त करते हैं तो यह सामान्य लक्षण है। प्राचीन न्याय सामान्यता के प्रत्यक्ष ज्ञान को स्वीकार करता है। गंगेश के अनुसार, सामान्यों के ज्ञान में बुद्धि के कार्य की विशेष महत्ता रहती है। किसी एक पदार्थ के जातिगत सामान्य धर्म के ज्ञान के द्वारा हम उस जाति के अन्य सभी पदार्थों को हर समय और हर स्थान में जानने में समर्थ होते हैं। यदि इस प्रकार का ज्ञान हर एक अवस्था में हो सके तब तो हम सर्वज्ञ होते प्रतीत होंगे। इस आपत्ति का उत्तर देते हुए विश्वनाथ कहते हैं कि हम इस प्रकार से उन सब पदार्थों का केवल सामान्य ज्ञान ही प्राप्त करते हैं किन्तु उनके पारस्परिक भेद को जान नहीं पाते। सामान्य धर्म का ज्ञान बिना इंद्रिय-सम्पर्क के होता है ऐसा कहा जाता है, क्योंकि ऐसी अवस्था में भी, जहां हमें धुआं नहीं दिखाई देता, सामान्य धर्म का ज्ञान हो सकता है। वहां पर पदार्थ-विशेष और सामान्य धर्म दोनों ही प्रकट हैं, वास्तविक रूप में विद्यमान हैं और उनका साक्षात् प्रत्यक्ष ज्ञान भी होता है। सामान्य धर्म मानसिक रचना नहीं है, बल्कि एक यथार्थ सारतत्त्व है जो पदार्थों के अन्दर निहित रहता है। यह सारतत्त्व हमें उन सब पदार्थों का स्मरण कराता है जिनमें इसकी प्रतीति होती है। सामान्य धर्म और पदार्थ-विशेष के सम्बन्ध का स्वरूप अभिन्न है और ये अवयवावयवी-भाव से अर्थात् समवाय-सम्बन्ध से विद्यमान रहते हैं। सामान्य धर्म का ज्ञान ही अनुमान की प्रक्रियाओं द्वारा सामान्य सम्बन्धों की पूर्वानुभूति को सम्भव होने देता है।[155] जब हम चन्दन की लकड़ी को देखते हैं तो ज्ञान लक्षण हो जाता है, किन्तु सुगन्ध का ज्ञान घ्राणेन्द्रिय द्वारा ही होता है। चक्षु-इन्द्रिय के सन्निकर्ष के साथ-साथ सुगन्ध की स्मृति भी हो जाती है और उससे मन का सम्पर्क होता है। यह परोक्ष ज्ञान है। इसी का दूसरा नाम स्मृतिज्ञान भी है।

 

जैन दार्शनिकों का विचार है कि यह चेतना की एक मिश्रित स्थिति (समूहालम्बनज्ञानम्) है जिसमें चन्दन का दृष्टिगत होना तथा सुगन्ध का विचार एक साथ मिश्रित है। 'वेदान्त परिभाषा' का मत है कि ज्ञान के एक विषयवस्तु में दो तत्त्व हैं, एक तात्कालिक ज्ञान और दूसरा व्यवहत ज्ञान'[156], जबकि जैन तथा अद्वैतवादी अलौकिक सन्निकर्ष को नहीं मानते, नैय्यायिक इसे मानते हैं। वे चेतना की मिश्रित स्थितियों को स्वीकार नहीं करते। प्रत्येक मनोविकार अपने-आप में एक इकाई है और भिन्न है तथा मन का सूक्ष्म-स्वरूप एक साथ ही दो मनोविकारों की सम्भावना को असम्भव बनाता है इसलिए वे सुगन्धित चन्दन के चाक्षुष ज्ञान को एक साधारण मनोविकार मानते हैं, यद्यपि इससे पूर्व चन्दन का प्रत्यक्ष ज्ञान और सुगन्ध की स्मृति विद्यमान थी। श्रीधर और जयन्त का विचार है कि चाक्षुष ज्ञान सुगन्ध के पूर्वज्ञान की पुनरावृत्ति से सम्बद्ध है, और सुगन्धित चन्दन का वर्तमान ज्ञान चक्षु इन्द्रिय की अपेक्षा मन के कारण अधिक है।'[157] आधुनिक मनोविज्ञान इस घटना की व्याख्या प्रत्ययसाहचर्य (associations of ideas) के सिद्धान्त के आधार पर करता है। योगज धर्मलक्षण वह है जो समाधिस्थ ध्यान से उत्पन्न होता है।

 

प्रत्यभिज्ञा (पहचान) की घटना के स्वरूप का विवेचन जैसे कि 'यह वही घड़ा है जिसे मैंने देखा था,' यह ज्ञान साधारण है या मिश्रित, इसका विवेचन नैय्यायिकों ने किया है। क्या प्रत्यभिज्ञा की अवस्था दो ज्ञानों का सम्मिश्रण है-एक वह जो सीधा प्रत्यक्ष हुआ है, अर्थात् वह घड़ा जो दिखाई दिया और दूसरा जो स्मृति में है, अर्थात् वह घड़ा जिसके साथ वर्तमान घड़े का तादात्म्य है? क्या यह ऐसा ज्ञान है जो अंशतः प्रत्यक्ष है तथा अंशतः स्मृति है जैसाकि प्रभाकर मानता है, या विशुद्ध स्मृति या विशुद्ध अनुभूति है? बौद्ध इसको अनुभवात्मक तथा स्मरणात्मक मानसिक अवस्थाओं का यांत्रिक सम्मिश्रण मानते हैं।[158] यह अकेला अनुभवात्मक या स्मरणात्मक मनोविकार नहीं है, क्योंकि इसका कारण केवल इन्द्रिय-सन्निकर्ष नहीं है क्योंकि भूतकाल के पदार्थ के साथ इन्द्रिय सन्निकर्ष हो नहीं सकता; और इसका कारण केवल संस्कार भी नहीं है, क्योंकि इस पहचान में 'यह' की चेतना विद्यमान है और यह इन दोनों का सम्मिश्रण भी नहीं है, क्योंकि दोनों पृथक् पृथक् क्रिया करते हैं और दोनों के प्रभाव भी भिन्न हैं। यदि हम यह मान भी लें कि प्रत्यभिज्ञारूपी घटना अपने-आप में एक पृथक् प्रभाव है तो प्रश्न उठता है कि इसका उद्दिष्ट पदार्थ क्या है? भूतकाल की घटना उद्दिष्ट पदार्थ नहीं हो सकती, क्योंकि इस अवस्था में प्रत्यभिज्ञा स्मृति से भिन्न नहीं ठहरती। भविष्य की घटना भी नहीं, क्योंकि उस अवस्था में प्रत्यभिज्ञा तथा रचनात्मक कल्पना में कोई भेद रहेगा। केवल वर्तमान पदार्थ भी नहीं हो सकती, क्योंकि प्रत्यभिज्ञा का कार्य वर्तमान पदार्थ की भूतकाल के पदार्थ के साथ समता दिखाना है। इस प्रकार का मत प्रकट करना कि प्रत्यभिज्ञा के द्वारा ऐसे पदार्थ का ज्ञान होता है जो भूत, भविष्यत् और वर्तमान में भी विद्यमान है, परस्पर विरोधी कथन होगा। इसलिए नैय्यायिक का कहना है कि प्रत्यभिज्ञा एक प्रकार का विशिष्ट प्रत्यक्ष ज्ञान है जो हमें वर्तमान में अवस्थित पदार्थों का ज्ञान भूतकाल के गुणों के साथ विशिष्ट रूप में कराता है। हम एक पदार्थ को देखते और पहचानते हैं कि इसे पहले भी देखा था।'[159] मीमांसक और वेदान्ती इस मत का समर्थन करते हैं, जबकि जैन दार्शनिकों का तर्क है कि पहचानने की अवस्था यद्यपि साधारण है तो भी प्रत्यक्ष ज्ञान अथवा स्मृति से स्वरूप में भिन्न है।'[160] उनके अनुसार प्रत्येक प्रत्यक्ष ज्ञान में अनुमान का अंश समाविष्ट रहता है। हम जिस समय एक वृक्ष को देखते हैं तो वस्तुतः केवल उसके एक भाग को ही देखते हैं, अर्थात् ऊपर के भाग के एक पार्श्व को देखते हैं। हम इन्द्रियानुभव को पदार्थ के मूर्तरूप अथवा अर्थ के साथ संश्लिष्ट करते हैं और इस प्रकार हमें पदार्थ का प्रत्यक्ष होता है।[161] सम्पूर्ण पदार्थ का पूर्वज्ञान, और वर्तमान में प्राप्त किए गए उसके आशिक ज्ञान से सम्पूर्ण पदार्थ का अनुमान, ये प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रत्येक कर्म में समाविष्ट रहते हैं। स्मृति तथा अनुमान के तत्त्व सहायक हैं, किन्तु इन्द्रियजन्य ज्ञान मुख्य तत्त्व है। इन्द्रिय सन्निकर्ष से जो भी मानसिक स्थिति उत्पन्न होती है वह प्रत्यक्ष ज्ञान है, भले ही उसमें अन्य तत्त्व भी जैसे स्मृति और अनुमान, क्यों समाविष्ट हों।

गौतम की परिभाषा के अनुसार, भ्रान्तिरहित होना प्रत्यक्ष ज्ञान की विशिष्टता है। प्रत्येक इन्द्रियजन्य ज्ञान प्रामाणिक नहीं होता। साधारण प्रत्यक्ष में निम्नलिखित विषय विद्यमान रहते हैं: (1) पदार्थ, जिसका प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, (2) बाह्य माध्यम, जैसे चाक्षुष ज्ञान में प्रकाश, (3) इन्द्रिय, जिसके द्वारा पदार्थ का ज्ञान होता है, (4) मन अथवा मुख्य इन्द्रिय, जिसकी सहायता के बिना ज्ञानेन्द्रियाँ अपने पदार्थों पर कार्य नहीं कर सकतीं, और (5) जीवात्मा। यदि इन पाँचों में से कोई एक भी ठीक-ठीक कार्य करे तो भ्रमात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है। बाह्य पदार्थों में या तो गति के कारण अथवा सादृश्य के कारण दोष हो सकते हैं। सादृश्य के कारण सीप चांदी दिखती है। यदि प्रकाश मन्द है तो हमें पदार्थ स्पष्ट, रूप में दिखाई नहीं पड़ेगा। यदि हमारी आँखों में कोई रोग है या वे अंशतः अन्धी हैं तो हमारे प्रत्यक्ष ज्ञान में भी दोष रहेगा। यदि मन किसी और जगह लगा है, या यदि जीवात्मा के अन्दर भावनावश उत्तेजना है, तो भ्रम उत्पन्न होगा।'[162] भ्रमों के कारणों को तीन वर्गों में बांटा गया है: (1) दोष, अथवा इन्द्रिय में त्रुटि, जैसे आँख में पीलिया रोग होना, (2) सम्प्रयोग, अर्थात् पदार्थ का सम्पूर्ण रूप में प्रकट होना बल्कि उसके एक भाग या पहलू का ही गोचर होना, (3) संस्कार, अर्थात् स्वभाव अथवा मानसिक पक्षपात के विघ्नकारक प्रभाव के कारण असम्बद्ध स्मृतियों का उदय होना। रस्सी को देख कर उसमें सांप का भ्रम होता है, क्योंकि सांप की स्मृति जाग जाती है।[163]

 

स्वप्नों का स्वरूप अनुभवात्मक है और उसके उद्दीपक तत्त्व बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों ही प्रकार के होते हैं। उनकी उत्पत्ति अवचेतन संस्कारों के पुनर्जीवन से होती है जिसका कारण इन्द्रिय-सम्बन्धी हलचलें तथा पिछले पुण्य पाप होते हैं। भविष्यवाणीपूर्ण स्वप्न, जिनका अस्तित्व अरस्तू तक ने स्वीकार किया है,'[164] प्रेतात्माओं के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं, ऐसा कहा जाता है।

 

कणाद स्वप्नों का कारण मुख्य इन्द्रिय, मन के साथ आत्मा का संयुक्त हो जाना बताता है, जिसमें पिछले अनुभवों के अवचेतना में पड़े हुए संस्कार सहायक होते हैं।'[165] प्रशस्तपाद की दृष्टि में स्वप्न मन के द्वारा किए गए आभ्यन्तर प्रत्यक्ष के कारण होते हैं, जबकि इन्द्रियाँ निद्रा में दबी होती हैं और कार्य करना बन्द कर देती हैं।"[166] पूर्वानुभूत ज्ञान के अवशिष्ट प्रभावों के आधार पर, शारीरिक वात, पित्त, कफ (त्रिदोष) के वैषम्य के कारण और अदृष्ट शक्तियों के कारण स्वप्नों की उत्पत्ति होती है। श्रीधर का कहना है कि स्वप्न केवल पूर्वानुभवों की पुनरुत्पत्ति ही नहीं हैं। उसका मत है कि वे केन्द्र की आभ्यन्तर उत्तेजनाओं से उत्पन्न होते हैं।"[167] उदयन अपनी भिन्न सम्मति रखता है। उसके अनुसार, परिधिस्थ अंग स्वप्न की अवस्थाओं में कार्य करना बन्द नहीं करते। यह यह भी स्वीकार करता है कि स्वप्न कभी-कभी सच्चे निकलते हैं।'[168] प्रभाकर, अपने सामान्य दृष्टिकोण के अनुरूप पूर्वानुभवों की पुनरुत्पत्ति को ही स्वप्न बताता है, जो स्मृति के धुंधलेपन के कारण चेतना को तुरन्त प्रस्तुत हुए प्रतीत होते हैं। पार्थसारथि स्वप्नावस्था को स्मृति के समान बतलाता है ''[169] प्रशस्तपाद स्वप्न ज्ञान और उस ज्ञान के मध्य जो निद्रा अथवा स्वप्न के समीप (स्वप्नान्तिक) होता है, भेद करता है। स्वप्नान्तिक में स्वयं स्वप्नगत अनुभवों की स्मृति होती है, भ्रान्ति, जिसका आधार (अधिष्ठान) कोई--कोई भौतिक तत्त्व होता है, उस माया इन्द्रजाल से भिन्न है जिसका कुछ भी अधिष्ठान नहीं है, अर्थात् जो निरधिष्ठान है। श्रीधर उदाहरणरूप में एक ऐसे व्यक्ति को रखते हैं जो किसी स्त्री के प्रेम में अन्धा हुआ हर जगह अपनी प्रेयसी ही का रूप देखता है।[170]

7. अनुमान-प्रमाण

 

अनुमान का यौगिक अर्थ है 'किसी वस्तु के पश्चात् मापना' यह वह ज्ञान है जो अन्य ज्ञान के पश्चात् आता है। चिह्न (लिंग) के ज्ञान से हम पदार्थ का ज्ञान प्राप्त करते हैं जिसमें वह चिह्न विद्यमान हो। अनुमान शब्द का प्रयोग बहुत व्यापक अर्थों में होता है जिनमें निगमन (deduction) और आगमन (induction) दोनों प्रकार की प्रक्रिया जाती है। अनुमान की परिभाषा कभी-कभी इस प्रकार की जाती है ऐसा ज्ञान जिससे पूर्व प्रत्यक्ष ज्ञान आवश्यक है। वात्स्यायन की सम्मति में, 'प्रत्यक्ष ज्ञान के अभाव में अनुमान हो ही नहीं सकता।' केवल उसी अवस्था में जबकि देखनेवाला आग और धुएं को एक-दूसरे के साथ सम्बद्ध देख चुका है, तो वह दूसरी बार धुएं को देख कर वहां पर आग की उपस्थिति का भी अनुमान कर सकता है।'[171] उद्योतकर ने प्रत्यक्ष ज्ञान और आनुमानिक ज्ञान में भेदजनक कुछ चिह्नों का निर्देश किया है। यथा (1) योगजन्य अन्तर्दृष्टि को छोड़ कर अन्य समस्त प्रत्यक्ष ज्ञान एक ही प्रकार का है, किन्तु अनुमान में विविधता है; (2) प्रत्यक्ष ज्ञान केवल वर्तमान में विद्यमान ऐसे पदार्थों तक ही सीमित है जो इन्द्रियों की पहुँच के अन्दर आते हैं, जबकि अनुमान भूतकाल, वर्तमान और भविष्य के पदार्थों से भी सम्बन्ध रखता है; (3) अनुमान में सामान्य सम्बन्ध या व्याप्ति के स्मरण की आवश्यकता है, जबकि प्रत्यक्ष ज्ञान में नहीं है।[172] जहां प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है वहां अनुमान के लिए कोई स्थान नहीं है।[173] हमारी इन्द्रियों की पहुंच के अन्दर जो पदार्थ हैं उनके ज्ञान के लिए हमें विशेष विचार करने की आवश्यकता नहीं होती।'[174] अनुमान का विषय ' तो वह पदार्थ है जो अज्ञात है और वह पदार्थ है जिसका ज्ञान निश्चित रूप से है। केवल वही पदार्थ अनुमान के क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं जिनके अस्तित्व में सन्देह है।"[175] इसका उपयोग यथार्थ के ऐसे भाग के ज्ञान के लिए किया जाता है जिसका प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता। प्रत्यक्ष पदार्थ ऐसी वस्तु की ओर निर्देश करता है जो प्रत्यक्ष तो नहीं है किन्तु जिसका सम्बन्ध उसके साथ अवश्य है। भासर्वज्ञ ने अपने 'न्यायसार' में अनुमान की परिभाषा करते हुए कहा है कि यह इन्द्रियगोचर क्षेत्र से परे उस पदार्थ को जानने का साधन है जो इन्द्रियों के विषय के साथ अभिन्न सम्बन्ध रखता है। गंगेश'[176] शिवादित्य'[177] का अनुसरण करते हुए अनुमानजन्य ज्ञान की परिभाषा करता है कि ऐसा ज्ञान जिसकी उत्पत्ति अन्य ज्ञान के द्वारा हो।

 

गौतम अनुमान के तीन भेद बताते हैं: पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट'[178] और वात्स्यायन इस विभाग की थोड़ी भिन्न व्याख्या करता है, जिससे पता लगता है कि वात्स्यायन के पूर्व भी न्यायसूत्रों की परस्पर विरोधी व्याख्याएँ विद्यमान थीं। अनुमान में हम प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर जाते हैं जिससे वह सम्बद्ध है। और यह सम्बन्ध तीन प्रकार का हो सकता है, अनुमेय तत्त्व या तो प्रत्यक्ष तत्त्व का कारण हो सकता है, या उसका परिणाम हो सकता है अथवा दोनों ही किसी अन्य तत्त्व hat 8 संयुक्त परिणाम हो सकते हैं। जब हम बादलों को देखते हैं और उनसे वर्षा का अनुमान करते हैं तो यह 'पूर्ववत्' अनुमान है, जिसमें हम पूर्ववस्तु को देख कर परिणाम रूपी परवर्ती वस्तु के अस्तित्व का अनुमान करते हैं। परन्तु इस अवस्था में अनुमान केवल कारण ही को देख कर नहीं किया गया, बल्कि पूर्वानुभव के आधार पर भी किया गया है। जब हम नदी में आई हुई बाढ़ को देखते हैं और अनुमान करते हैं कि वर्षा हुई होगी, तो यह शेषवत् अनुमान है, क्योंकि इसमें हम परवर्ती परिणाम को देख कर उसके पूर्ववर्ती कारण का अनुमान करते हैं। इसका प्रयोग ऐसे स्थान पर भी होता है जहां हम दो परस्पर सम्बद्ध पदार्थों में से एक को देख कर दूसरे का अनुमान करते हैं, अथवा एक भाग से या निरसन (elimination) विधि से दूसरे का अनुमान करते हैं, अथवा एक भाग hat H या निरसन अथवा बहिष्कार (exclusion) विधि के सिद्धांत का एक दृष्टान्त यह है जिससे शब्द के गुण होने का अनुमान किया गया है। हम सिद्ध करते हैं, कि शब्द सामान्य नहीं है, विशेष ही है, समवाय भी नहीं है, द्रव्य है, और क्रिया है। इस प्रकार हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि इसे गुण होना चाहिए। जब हम किसी सींगों वाले पशु को देखते हैं और अनुमान करते हैं कि इस पशु के पूंछ भी है, तो यह सामान्यतोऽदृष्ट अनुमान का विषय है। इस अनुमान का आधार कार्य-कारणभाव उतना नहीं है जितनी कि अनुभव की समानता है। उद्योतकर इससे सहमत है और वह एक दृष्टान्त यह देता है कि जैसे किसी स्थान पर यदि सारस पक्षी दिखाई दें तो वहां पानी भी विद्यमान होगा, ऐसा अनुमान होता है। इसका (सामान्यतोऽदृष्ट का) उपयोग इन्द्रियातीत तथ्यों के अनुमान का निर्देश करने के लिए भी किया गया है।'[179] हम धूप वाले भिन्न-भिन्न स्थानों अनुचखते हैं, और यद्यपि सूर्य को भी देख सकें तो भी अनुमान कर लेते हैं कि सूर्य अवश्य गतिमान है। विरक्ति तथा स्नेह आदि भावों को देखकर हम जीवात्मा के अस्तित्व का अनुमान करते हैं, जिसका हमें प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता।"

 

उक्त सब दृष्टान्त यह प्रतिपादित करने के लिए पर्याप्त हैं कि व्यापक सम्बन्ध की, जिसे व्याप्ति कहा जाता है, विद्यमानता को स्वीकार करना आवश्यक है। प्रत्येक व्याप्ति दो तत्त्वों को जोड़ती है-एक व्यापक, अर्थात् जो फैला हुआ है; और दूसरा व्याप्य अर्थात् जिसमे यह (व्यापक) फैला है। अनुमान इस निश्चित तथ्य से कि इस पदार्थ में एक ऐसा गुण है जो एक अन्य गुण के साथ सहचारी रूप से व्याप्त पाया जाता है, एक निष्कर्ष पर पहुँचता है। हम इस विषय का निश्चय, कि पहाड़ में आग लगी है इस तथ्य से करते हैं कि पहाड़ में धुआँ है, और धुएँ के साथ आग सर्वत्र रहती है। चिह्न के विचार से अर्थात् धुएँ से हम अनुमान करते हैं कि वह पदार्थ जिसमें धुआं है उसमें आग भी है। उद्योतकर के अनुसार अनुमान, चिह तथा स्मृति के एक साथ मिलने से बने तर्क से उत्पन्न होता है' अथवा उस ज्ञान से जिसके पूर्व हेतु का प्रत्यक्ष ज्ञान हुआ है और इस स्मृति से कि उसका साध्य के साथ निरन्तर साहचर्य है, उत्पन्न होता है।[180] अनुमानविषयक तर्क के भिन्न-भिन्न अवयव परार्थानुमान में प्रकट होते हैं।

8. परार्थानुमान

 

परार्यानुमान के पाँच अवयव हैं (1) प्रतिज्ञा, अर्थात् वह विषय जिसे सिद्ध करना है: पहाड़ में आग लगी है; (2) हेतु अथवा कारण क्योंकि इसमें धुआँ है; (3) उदाहरण, अथवा सादृश्यनिदर्शक दृष्टान्त : जहाँ-जहाँ धुआँ दिखाई देता है वहाँ-वहाँ आग भी रहती है, उदाहरण के रूप में रसोईघर; (4) उपनय, अथवा प्रयोग इसी प्रकार का यह पहाड़ भी है; (5) निगमन अथवा निष्कर्ष : इसलिए पहाड़ पर आग लगी हुई है।[181]

 

प्रतिज्ञा एकदम प्रारम्भ में ही उस विषय को प्रस्तुत करती है जिसे सिद्ध करना है। यह समस्या प्रस्तुत करती है और जांच की सीमा का भी निर्धारण कर देती है। सुझाव अथवा प्रस्तावित विषय, जिसे सिद्ध करना है, प्रारम्भ से ही प्रक्रिया पर नियन्त्रण रखता है और अनुमान उसे सुदृढ़ करने में शक्ति देता है। प्रतिज्ञा केवल एक 'प्रस्ताव या सम्भावनामात्र' है।[182] तर्क आगे बढ़ ही नहीं सकता जब तक कि हम प्रतिक्षा में उपस्थित विषय के सम्बन्ध में अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त करने की आकांक्षा प्रकट करें। प्रतिज्ञा के दो भाग होते हैं, अर्थात् एक उद्देश्य जिसका ज्ञान होता है और जो आम तौर पर या तो एक व्यक्तिरूप पदार्थ होता है या कोई वर्ग-विशेष होता है जिसे एक इकाई के रूप में स्वीकार किया जा सकता है'[183] और दूसरा भाग विधेय है जिसको सिद्ध करना होता है। 'पहाड़ पर आग लगी हुई है', इस वाक्य में 'पहाड़' उद्देश्य पक्ष अथवा धर्मी है, और 'आग लगी' यह विधेय अर्थात् साध्य, धर्म अथवा अनुमेय है, अर्थात् जिसका अनुमान किया जाना है। उद्देश्य हमारे ध्यान को यथार्थ के एक भाग की ओर आकृष्ट करता है और विधेय उद्देश्य को विशिष्ट बना देता है, यह बता कर कि इसमें अमुक गुण विद्यमान है या यह उन पदार्थों के वर्ग में शामिल है जो अमुक गुण रखते हैं। परार्थानुमान का कार्य यह सिद्ध करना है कि प्रत्यक्ष ज्ञान के विषयरूपी उद्देश्य में वह विशेषता है जिसका विधेय में निर्देश किया गया है। संयोजक अथवा विधेय वाचक क्रियापद भाषा का एक आकस्मिक पद है, यह प्रतिज्ञा का आवश्यक भाग नहीं है।'[184] प्रतिज्ञा को प्रत्यक्ष ज्ञान के अथवा आम्नाय (श्रुति) के विरुद्ध होना चाहिए। दिङ्नाग के अनुसार, ऐसी प्रतिज्ञाएँ जो बुद्धिगम्य नहीं हैं, स्वयं में विरोधी हैं, अथवा स्वतःप्रकाश्य हैं, प्रतिपाद्य विषय नहीं बन सकतीं।'[185] उनमें अपरिचित पद नहीं रहने चाहिए तथा वे स्वीकृत सत्यधारणाओं और अपने सुनिश्वित विश्वासों के विपरीत नहीं होनी चाहिए।[186] यह पता लगाने के लिए कि '' '' है, यह प्रतिज्ञा सत्य है अथवा नहीं, हम पक्ष को लेते हैं, उसके पृथक् पृथक् तत्त्वों का विश्लेषण करते हैं, उसके अन्दर हेतु की विद्यमानता को खोजते हैं। प्रत्येक तर्क में प्रतिज्ञा के बाद पक्ष का विश्लेषण आता है। परार्थानुमान का दूसरा अवयव पक्ष में हेतु, या आधार, साधन, या सिद्ध करने के उपाय लिंग या चिह्न की विद्यमानता को बताता है। इससे उसमें ऐसा विशिष्ट लक्षण (पक्षधर्मता) प्राप्त होता है कि वह निष्कर्ष का विषय बन जाता है। पहाड़ में धुआं दिखाई देता है। पक्षता अनुमान की एक आवश्यक शर्त है। कोई भी पहाड़ पक्ष नहीं है। यद्यपि जैसे ही हमें उसमें धुआ दिखाई देता है और हम अनुमान से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि उसमें आग भी है. यह वन जा सकता है। किन्तु यदि हमें उसमें आग भी दिखाई देती है. तो पहाड़ पक्ष नहीं रहता। का होना संदिग्ध है।[187] पक्ष पद से अधिक प्रस्तुत विषय है। परार्थानुमान के लिए आवश्यक तीन पद अब हमारे पास हो गए हैं। एक पक्ष, जिसके विषय में किसी बात का अनुमान कि गया है, दूसरा साध्य, जिसका अनुमान पक्ष के विषय में किया गया है, और तीसरा हेतु, जिसके द्वारा पक्ष के विषय में साध्य की सत्यता का अनुमान किया गया है।

 

हेतु के पक्ष में विद्यमान होने मात्र से ही, जिसे पक्षधर्मता कहते हैं, अनुमान तब तह प्रामाणिक नहीं हो सकता जब तक कि एक व्यापक सम्बन्ध हेतु और साध्य के बीच में स्थापित हो। तीसरा अवयव, उदाहरण, 'जहां-जहां धुआं है वहां-वहां आग रहती है, जैसे रसोईघर में, हमें अनुमान के आधार, साध्यपद की ओर ले जाता है। गौतम के अनुसार, उदाहरण से तात्पर्य एक ऐसे समान दृष्टान्त से है जहां साध्य का आवश्यक गुण विद्यमान हो।  वात्स्यायन का भी यही मत प्रतीत होता है। यहां हमें यह जताने की आवश्यकता नहीं है कि ये दोनों विचारक 'उदाहरण' को एक सामान्य नियम के दृष्टान्त रूप में स्वीकार करते हैं। सम्भवतः उनका विचार यह था कि समस्त तर्क विशिष्ट से विशिष्ट की ओर हैं। कुछेक विशिष्ट पदार्थों में एक विशेष गुण रहता है। एक या अनेक विशिष्ट पदार्थ उनके साथ कुछ अन्य गुणों से सादृश्य रखते हैं। इसलिए वे उस विशेष गुण में भी उनके साथ सादृश्य रखते हैं। यह हो सकता है कि न्यायशास्त्र का परार्थानुमान उदाहरण द्वारा प्रस्तुत तर्क से विकसित हुआ हो। उदाहरण को अरस्तू ने भी स्वीकार किया है।[188] किन्तु शीघ्र ही यह जाना गया कि यद्यपि यह ऐसी विधि है जिसके अनुसार हम प्रायः तर्क करते हैं, फिर भी यह तार्किक अनुमान नहीं है कि जहां निष्कर्ष पदों द्वारा समर्थित होता है। तर्क अप्रामाणिक ठहरता है, यदि उदाहरण सामान्य नियम का निर्देश करता हो। साधर्म्य जातिगत स्वरूप (सामान्य) का संकेत करता है। प्रशस्तपाद साहचर्य की धारणा से अवगत है और इसे कणाद का मत घोषित करता है।'[189] परवर्ती तर्कशास्त्र तीसरे अवयव (उदाहरण) की सामान्य सम्बन्ध के साथ तुल्यता दिखाता है।'[190] जब तक कि चिह्न और अनुमानित लक्षण में सतत व्याप्ति विद्यमान हो तब तक अनुमान हो ही नहीं सकता। 'वेदान्तपरिभाषा' का कहना है कि 'व्याप्ति का ज्ञान ही अनुमान का साधन है '[191] उदाहरण के वर्णन करने का तात्पर्य है कि अनुमान दोनों प्रकार का होता है, अर्थात् आगमन और निगमन। सामान्यीकरण का आधार उदाहरण होते हैं और इससे हमें नये तथ्यों को तर्क के द्वारा जानने में सहायता मिलती है। दिङ्नाग ने उदाहरण के सहायक और नीति महत्त्वपूर्ण स्वरूप पर बल दिया है। धर्मकीर्ति का मत है कि उदाहरण अनावश्यक है और इसका उपयोग केवल मनुष्य को समझाने में सहायक के रूप में किया जाता है। उदाहरण विषय को स्पष्ट भले ही कर सकता है किन्तु यह नियम की व्यापकता को स्थापित नहीं कर सकता। डॉ. सील के अनुसार, "साध्य पद (major premise) सम्बन्धी मिल के इस मत का कि वह पहले देखे गए तत्सदृश दृष्टान्तों का एक संक्षिप्त स्मरणपत्र है जिसमें उसे अनदेखी स्थितियों में लागू करने की सिफारिश भी रहती है, और अरस्तू के इस मत का कि वह एक व्यापक प्रस्थापना है जो अनुमान का आधार है, उदाहरण में मिश्रण और पूर्ण सामंजस्य हो जाता है।"[192] उदाहरण भिन्न-भिन्न प्रकार के हो सकते हैं-सजातीय अर्थात् स्वीकारात्मक (साधर्म्य, जहां कि साध्य गुण और हेतु उपस्थित हैं जैसेकि रसोईघर और विजातीय अथवा निषेधात्मक (वैधम्य) जहां कि साध्य गुण और हेतु दोनों ही अनुपस्थित हैं जैसे कि झील।' [193]दिड्नाग इन दोनों में सादृश्यबोधक उदाहरण और जोड़ देता है। वह दस प्रकार के हेत्वाभासों का भी वर्णन करता है जिनका सम्बन्ध उदाहरणों के साथ है, जबकि सिद्धसेन दिवाकर छः प्रकार के हेत्वाभास सजातीय उदाहरणों के बारे में और छः प्रकार के विजातीय उदाहरणों के बारे में बताता है।

 

हेतु अर्थात् मध्यपद की व्याप्ति के विषय में यह कहा जाता है कि (1) हेतु के लिए पक्ष के कुल क्षेत्र को व्याप्त करना आवश्यक है, जैसाकि इस दृष्टान्त में है: 'शब्द अनित्य है क्योंकि यह उत्पन्न पदार्थ है।'[194] यहां हेतु अर्थात् उत्पन्न पदार्थ अपने अन्दर शब्द की प्रत्येक अवस्था को रखता है; (2) हेतु द्वारा निर्दिष्ट सब पदार्थ उन पदार्थों के सजातीय होने चाहिए जिनका निर्देश साध्य द्वारा होता है, जैसा कि इस दृष्टान्त में है: "सब उत्पन्न पदार्थ अनित्य हैं; और (3) साध्य के विजातीय किसी भी पदार्थ का हेतु में समावेश नहीं होना चाहिए 'कोई भी नित्य उत्पन्न पदार्थ नहीं है।' दिङ्नाग इस पर बल देता है कि हेतु को व्यापक रूप से और सतत रूप से साध्य के साथ सम्बद्ध रहना चाहिए। उद्योतकर का तर्क है कि हेतु और साध्य में व्यापक सम्बन्ध रहना चाहिए, यथा जहां-जहां साध्य है, वहां-वहां हेतु भी होना चाहिए और जहां-जहां साध्य नहीं है वहां-वहां हेतु भी नहीं होना चाहिए। प्रशस्तपाद भी इसी मत का समर्थन करता है जब वह यह कहता है कि लिंग अथवा हेतु वह है जो अनुमेय पदार्थ के साथ सम्बद्ध रहता है, और जिसके बारे में हम यह जानते हैं कि जहां-जहां वह पदार्थ उपस्थित है वहां-वहां वह है और जहां-जहां वह पदार्थ अनुपस्थित है वहां-वहां वह भी नहीं है।' वरदराज हेतु की पांच विशेषताओं का वर्णन करता है। वे ये हैं- (1) पक्षधर्मता, अर्थात् हेतु का पक्ष में विद्यमान रहना, जैसे पहाड़ में धुएँ का होना; (2) सपक्षसत्त्व अर्थात् हेतु का साध्य के सजातीय निश्चयात्मक उदाहरणों में विद्यमान रहना, जैसे कि धुएँ का रसोईघर में होना; (3) विपक्षसत्त्व, अर्थात् साध्य के विजातीय निषेधात्मक उदाहरणों में हेतु का अनुपस्थित रहना, जैसे झील में धुआँ नहीं; (4) अबाधितविषयत्व, अथवापक्ष के साथ प्रभाव।'[195] नितान्त स्वीकारात्मक एवं नितान्त निषेधात्मक अनुमानों में विशुद्ध चार प्रकार की आवश्यकताओं को ही पूर्ति करता है, क्योंकि यह निश्चयात्मक निषेधात्मक दोनों में समान रूप से विद्यमान नहीं रह सकता। अन्नं मटके प्रकार का होने के कारण हेतु भी तीन प्रकार का है (1) से अनुमान तीक (अन्वयतिरेकी), जहां कि हेतु सतत रूपमा मेरो जैसे आग के साथ धुआँ। जहां-जहां धुआँ है वहां-वहां आग है, जैसे रसोईयर में जैसे जहां आग नहीं है वहां धुआँ भी नहीं है, जैसे कि झील में'[196], (2) केवल निश्चयात् (केवलान्वयी), जहां हमें केवल स्वीकारात्मक और सतत साहचर्य मिलता है, जैसे जाना जा सकता है उसका नाम भी रखा जा सकता है,' जहां हमें इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए निषेधात्मक दृष्टान्त नहीं मिल सकता कि 'जिसे नाम नहीं सकते उसे जान भी नहीं सकते।' और (3) केवल निषेधात्मक (केवलव्यतिरेकी) रा एक निश्चयात्मक दृष्टान्त सम्भव नहीं है। उन सभी सत्ताओं में जिनमें पशु-क्रियाएँ है जीवात्मा विद्यमान है, यहां हम केवल यही सिद्ध कर सकते हैं कि कुर्सियों तथा मते में पशु-क्रियाएँ नहीं हैं और इसलिए उनमें जीवात्मा का निवास नहीं है। किन्तु इन कोई निश्चयात्मक दृष्टान्त नहीं दे सकते क्योंकि जीवात्माएँ तथा वे सत्ताएँ जिन् पशु-क्रियाएँ होती हैं अपनी प्रकृति में सह-विस्तारी हैं।[197] वेदांत परिभाषा के अनुसार, निश्चयात्मक व्याप्ति के द्वारा जो परिणाम निकलता है उसे ही हम अनुमान कहते है किन्तु निषेधात्मक व्याप्ति से जिस परिणाम पर पहुँचते हैं, उसे 'अर्थापत्ति' कहते हैं इस आधार पर कि इसमें किसी सामान्य सिद्धांत का प्रयोग अवस्था-विशेष में नहीं होता।'[198] तो भी न्याय का विचार है कि प्रत्येक निषेधात्मक का विरोधी एक निश्चयात्मक होता है, और इसलिए निश्चयात्मक परिणाम निषेधात्मक व्याप्तियों से निकाले जा सकते हैं।[199] हेतु की मुख्य विशेषता यह है कि यह सब प्रकार की उपाधियों से मुक्त होना चाहिए। हम इस प्रकार का तर्क नहीं कर सकते कि '' केवल इसलिए काला है क्योंकि वह '' का लड़का है, '' के अन्य बच्चों के समान और अन्य मनुष्यों के बच्चों से भिन्न है। यह निष्कर्ष सच हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता, किन्तु यह तर्क की दृष्टि से दोषपूर्ण अवश्य है, क्योंकि '' का लड़का होने और काले रंग में कोई अनुपाधिक (उपाधिरहित) सम्बन्ध नहीं है।

 

उपनय (प्रयोग) परार्थानुमान का चौथा अवयव है। पक्ष में प्रस्तुत हेतु की उपस्थिति एवं अनुपस्थिति की यह स्थापना करता है। हेतु की उपस्थित्ति की अवस्था में यह स्थापना निश्चयात्मक होती है, जैसेकि इस दृष्टान्त में, 'इसी तरह का यह पर्वत है,' अर्थात् चुऎवाला है, और दूसरी अवस्था में निषेधात्मक होती है, जैसे कि इस दृष्टान्त में, 'यह पर्वत ऐसा नहीं है, अर्थात् धुएं वाला नहीं है।"[200]

 

निष्कर्ष प्रतिष्ठापित प्रतिज्ञा को इस प्रकार दोहराता है, 'इसलिए पहाड़ में आग लगी है''[201]  पहले अवयव में जो बात अस्थायी रूप में रखी गई थी, निष्कर्ष में उसकी स्थापना की जाती है।

 

वात्स्यायन का कहना है कि कुछ तार्किकों की सम्मति में परार्वानुमान के दस अवयव हैं। ऊपर दिये गये पांच अवयवों के अतिरिक्त निम्नलिखित और उनमें सम्मिलित किए गए हैं: (1) जिज्ञासा, अथवा प्रतिज्ञा के सम्बन्ध में सत्यज्ञान को खोज निकालने की अभिलाषा, अर्थात् सम्पूर्ण पहाड़ में आग लगी है या उसके कुछ हिस्सों में ही है; (2) संशय, कारण के विषय में सन्देह कि जिसे हम धुजां समझ रहे हैं, वह केवल भाप ही तो नहीं है; (3) शक्यप्राप्ति, अर्थात् दृष्टान्त की निष्कर्ष को समर्थित करने की योग्यता कि क्या धुआं सर्वदा ही आग के साथ रहता है क्योंकि तपे हुए लाल लोहे के अन्दर धुआं नहीं भी पाया जाता; (4) प्रयोजन, अर्थात् निष्कर्ष निकालने का प्रयोजन; और (5) संशय-व्युदाम, अर्थात् हेतु के साध्य के साथ सम्बन्ध और पक्ष में उसकी विद्यमानता के बारे में सब प्रकार के संशयों का निवारण।'[202] परार्थानुमान के ये पांच अतिरिक्त अवयव वात्स्यायन के अनुसार सिद्धि के लिए प्रक्रिया को दृष्टि में रखते हैं। जिज्ञासा अर्थात जानने की इच्छा निश्चय ही समस्त ज्ञान का प्रारंभिक बिन्द है; किन्तु जैसाकि उद्योतकर का कहना है, यह विषयसिदि अथवा तर्क का अनिवार्य अवयव नहीं है।[203]

 

शीघ्र ही यह पता लगा कि निष्कर्ष में प्रारम्भिक प्रतिज्ञा को फिर से दोहराया जाता है, जबकि चौथा अवयव दूसरे की आवृत्तिमात्र है। वस्तुतः प्रत्येक परार्वानुमान के केवल तीन ही अवयव हैं। कहा जाता है कि नागार्जुन ने ही तीन अवयवयुक्त वैरायानुमान का प्रचलन अपने 'उपायकौशल्यसूत्र' में किया है, जहां वे बलपूर्वक यह प्रतिपादन करते हैं कि निष्कर्ष की स्थापना तर्क और दृष्टान्त द्वारा ही हो सकती है, दृष्टान्त निश्चयात्मक हो या निषेधात्मक हो।[204] इसका श्रेय कभी-कभी दिङ्नाम को दिया जाता है।'[205] अपने 'न्याय-प्रवेश' में उन्होंने परार्थानुमान के तीन अवयवों को ही वर्णन किया है, यद्यपि तीसरे अवयव में वह निश्चयात्मक एवं निषेधात्मक दोनों ही प्रकार के उदाहरणों की व्याख्या करते हैं; इस पहाड़ में आग लगी है, क्योंकि इसमें धुआं है, जहां-जहां धुआं होता है, आग भी होती है, जैसे रसोईघर में और जहां आग नहीं है वहां धुआं भी नहीं है, जैसे झील में   दिङ्नाग के अनुसार तीसरा अवयव एक सामान्य नियम है जो सांकेतिक दृष्टान्तों के सहित है। धर्म-कीर्ति का विचार हे कि तीसरा अवयव भी आवश्यक है क्योंकि सामान्य प्रतिज्ञा तर्क के अन्दर स्वतः ध्वनित है। इतना कहना ही पर्याप्त है कि पहाड़ पर आग है क्योंकि उसमें से धुआं निकल रहा है। इस प्रकार के अनुमान का उपयोग जो लुप्तावयव हेतुमद् अनुमान से मिलता-जुलता है, हिन्दू दार्शनिक ग्रंथों में भी बहुत मिलता है। जैन तार्किक माणिक्य नन्दी और देवसूरी'[206] का भी यही मत है। मीमांसक और वेदान्ती केवल तीन अवयव वाले परार्थानुमान को ही स्वीकार करते हैं। वेदांत परिभाषा नामक ग्रन्थ पहले तीन अथवा अन्तिम तीन अवयवों के उपयोग की आज्ञा देता है।[207]

 

वास्त्यायन और उद्योतकर दोनों ही परार्थानुमान के अन्तिम दो अवयवों को छोड़ देने के विरुद्ध हैं।[208] वे स्वीकार करते हैं कि प्रथम अवयव को निष्कर्ष में दोहराया जाता है, जबकि चौथा दूसरे और तीसरे अवयव का मिश्रण है। यद्यपि तर्क की दृष्टि से वे अनावश्यक हैं, तो भी विवाद के लिए उपयोगी हैं क्योंकि वे तर्क की पुष्टि करते हैं, तथा उस प्रतिज्ञा की निश्चयपूर्वक स्थापना करने में सहायक होते हैं जो प्रारम्भिक अवयव में अस्थायी रूप से प्रस्तुत की गई थी। पंचावयवी परार्थानुमान दूसरों को निश्चय कराने के लिए उपयोगी है, इसकी परार्यानुमान संज्ञा इसीलिए दी गई है। तीन अवयवों वाला अपने निश्चय के लिए, पर्याप्त है, इसे स्वार्थानुमान की संज्ञा दी जा सकती है। पिछला अनुमान को विचार-सम्बन्धी गति की प्रक्रिया मानता है और इसलिए अन्वेषणात्मक विज्ञान की श्रेणी में आता है, जबकि पहला प्रमाण से सम्बन्ध रखता है। गौतम और कणाद इसका उल्लेख स्पष्ट रूप से नहीं करते, यद्यपि परवर्ती तार्किक इसे स्वीकार करते हैं।'[209] प्रशस्तपाद अपने निश्चय के लिए उपयुक्त अनुमान (स्वनिश्चितार्थ) और दूसरों को निश्चय कराने के लिए उपयुक्त अनुमान (पदार्थ) में भेद करता है।'[210] दूसरों को निश्चय कराने के लिए उपयुक्त परार्थानुमान अधिकतर एक औपचारिक व्याख्या है। हम एक पहाड़ को देखते हैं और हमें सन्देह उत्पन्न होता है कि इसमें आग है या नहीं। धुएं को देखकर हमें आग और धुएं के सम्बन्ध का स्मरण होता है और हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि पहाड़ पर आग अवश्य होगी। इस सूचना को जब हम दूसरों तक पहुंचाने का प्रयत्न करते हैं तो हम पंचावयवी अनुमान की पद्धति का प्रयोग करते हैं।'[211]

 

परार्थानुमान के अवयवों की संख्या के विषय में मतभेद होते हुए भी, इस विषय में सभी तार्किक सहमत हैं कि एक दोषविहीन अनुमान के लिए दो अवयव अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं, अर्थात् व्याप्ति (व्यापक सम्बन्ध) अथवा साध्यपद और पक्षघर्मता अथवा पक्षपद पहला गुणों के व्यापक सम्बन्ध को बतलाता है और पिछला बतलाता है कि कर्ता में व्यापक सम्बन्ध का एक अवयव उपस्थित है।'[212] ये जे. एस. मिल की उन दो विधियों के अनुकूल हैं जिनके द्वारा निश्चय होता है कि (1) कौन-से गुण और किनके चिह हैं, और (2) क्या किन्हीं प्रस्तुत पदार्थों में ये चिह्न पाए जाते हैं?

 

तो साध्य और पक्ष केवल अपने-आपसे किसी निष्कर्ष का निश्चय करा सकते हैं। दोनों का परस्पर संश्लेषण आवश्यक है। लिंग परामर्श अथवा चिह्न का विचार अनुमान की प्रक्रिया का एक अनिवार्य तत्त्व है। गंगेश के अनुसार, व्याप्ति अपने-आप में अनुमान-जन्य ज्ञान का परोक्ष कारण है और लिंग परामर्श अथवा चिह्न का विचार अंतिम कारण (चरम कारण) अथवा मुख्य कारण (कारण) हैं।'[213] तथ्य साररूप में यह है कि साध्य के साथ सम्बद्ध हेतु पक्ष रहता है[214] और वही हमें निष्कर्ष पर ले जाता है। परन्तु अनुमान की प्रक्रिया एक अखंड प्रक्रिया है।

 

अद्वैतवादियों का तर्क है कि हेतु के विचार का कोई प्रश्न प्याप्ति-सम्बन्ध का ज्ञान साधनरूप कारण है। हमें इसका स्मरण होता है। निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं।'[215] यह आपत्ति इस मत के विरुद्ध की गई प्रतीत होती उसके बाद स्मृति होती अनुमान के बाद किता है। अवैतवादी यह सिद्ध करने का प्रयत्न करता है कि अनुमान किया दो निर्ण होता है। अजय रख देना नहीं है, बल्कि यह एक अकेली प्रक्रिया (व्यापार) है जिसने दृश्यतत्त्व (पक्ष) स्मृति द्वारा आविर्भूत सामान्य सिद्धांत अर्थात साध्य के कार्य करता है। ये दोनों तत्त्व स्वतन्त्र मानसिक अवस्थाएँ नहीं हैं और अनुमान की प्रक्रिया में निश्चित स्थितियों के रूप में भाग नहीं लेते हैं। नैय्यायिक, जो मनोवैज्ञानिक की ओश तार्किक अधिक है, बलपूर्वक यह कहता है कि अनुमान के लिए संश्लेषण की क्रिया आवश्यक है।

 

दिङ्नाग अनुमेय के स्वरूप के सम्बन्ध में एक रोचक प्रश्न उठाता है। हम धुएँ से आंग का अनुमान नहीं करते हैं, क्योंकि यह कोई नया ज्ञान नहीं है। हम पहले से जानते हैं कि धुएँ का आग के साथ सम्बन्ध है। इसी प्रकार आग और पहाड़ के परस्पर सम्मन्य का अनुमान हमने किया, यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सम्बन्ध के लिए दो वस्तुओं का होना आवश्यक है, जबकि अनुमान में हमारे पास केवल एक ही वस्तु अर्थात् पहाड़ है, क्योंकि आग तो दिखाई नहीं देती। जिसका हम अनुमान करते हैं वह तो आग और ही पहाड़ है, बल्कि ऐसा पहाड़ है जिसमें आग लगी हुई है।[216] निष्कर्ष एक अंतिम निर्णय है।

 

नेव्यायिक ने उन भिन्न-भिन्न स्थितियों को जिनमें हेतु रह सकता है, कोई महत्व नहीं दिया है। उसने बारबरा को समस्त परार्थानुमान-सम्बन्धी तर्क के उदाहरण के रूप में माना है। निश्चयात्मक तथा निषेधात्मक उदाहरणों के उपयोग ने उसका झुकाव स्वीकारात्मक तथा निषेधात्मक सामान्य प्रतिज्ञाओं को परस्पर सम्बद्ध मानने की ओर किया। वस्तुतः समस्त अनुमान को दोनों ओर से पुष्टि प्राप्त होती है।[217] वस्तुतः हिन्दू तर्कशास्त्र में एक ही सम्बन्ध-प्रकार (फिगर) और एक ही तत्त्व (मूड) है। जब हम यह जान लेते हैं कि प्रतिज्ञा के कर्ता में एक ऐसी विशेषता है जिसका साहचर्य निरंतर एक ऐसे गुण के साथ है जिसकी विद्यमानता को हम सिद्ध करना चाहते हैं, हम अनुमान करते हैं कि कर्ता में उक्त गुण विद्यमान है। इस सिद्धांत को गुण-निर्देश (कन्नोटेशन) की परिभाषा में व्यक्त किया जाता है। इसे यदि वर्गों की परिभाषा में परिवर्तित किया जाए तो हमें सामान्य से विशेष के अनुमान के सिद्धांत की उपलब्धि होती है। एक वर्ग-विशेष के प्रत्येक व्यक्ति के विषय में जो कुछ कहा जा सकता है, वह उस वर्ग के किसी व्यक्ति विशेष के विषय में भी कहा जा सकता है। सही-सही विचार के लिए संवाक्य-प्रकारों तथा तत्त्वों के ब्यौरेवार भेदों की इतनी आवश्यकता नहीं है, यद्यपि वे सूक्ष्म विचार के लिए प्रशिक्षणभूमि प्रस्तुत करते हैं।'[218] अरस्तू ने स्वीकार किया कि अंतिम तीन संवाक्य-प्रकारों को पहले में समावेश किया जा सकता है। न्याय पहले संवाक्य प्रकार में भी केवल बारबरा को स्वीकार करता है। न्याय में दराई (Darii) और फेरियो (Ferio) का प्रयोग नहीं हुआ है, क्योंकि निष्कर्ष सर्वदा एक परिमित पदार्थ से सम्बन्ध रखता है, और व्यापक तथा विशिष्ट के मध्य भेद नहीं उत्पन्न होता। यह भेद केवल अपेक्षाकृत है, क्योंकि एक परिमित वर्ग के लिए जो व्यापक है वह विस्तृत विषय में विशिष्ट हो जाता है। न्याय के परार्थानुमान में पक्ष सदा एक व्यक्तिरूप पदार्थ होता है अथवा वर्ग होता है और इसलिए वह व्यापक है, विशिष्ट नहीं। 'कुछ' दृष्टांतों के विषय में प्राप्त निष्कर्ष हमें प्रस्तुत दृष्टांत-विशेष के विषय में कोई निश्चित सूचना नहीं दे सकता। बारबरा से सेलेरेण्ट बड़ी सुगमता से जाना जा सकता है। अरस्तू ने स्वीकार किया कि उसके सब तत्त्व पहले संवाक्य-प्रकार के पहले दो तत्त्वों में समाविष्ट किए जा सकते हैं। और यदि हम यह जान लें कि सब निर्णय उभयपार्श्ववान होते हैं तो ये दोनों परस्पर परिवर्तनीय हैं।

 

तर्क की प्रक्रिया का विश्लेषण अरस्तु के परार्थानुमान सम्बन्धी विश्लेषण के साथ बिल्कुल निकट सादृश्य रखता है। पञ्चायवी रूप में भी केवल तीन पद रहते हैं, और त्रि-अवयवी अनुमान में तीन विषय होते हैं जो अरस्तु के निष्कर्ष, पक्षपद तथा साध्यपद से अनुकूलता रखते हैं। इस प्रकार की अद्भुत समानता का कारण यह बताया जाता है कि दोनों का एक-दूसरे पर प्रभाव पड़ा है। डॉक्टर विद्याभूषण का कहना है 'ऐसा विचार असंगत होगा कि अरस्तू के तर्कविज्ञान ने अलेक्ज़ैण्ड्रिया, सीरिया तथा अन्य देशों के मार्ग से तक्षशिला में प्रवेश किया हो मेरा विचार ऐसा है कि भारतीय तर्कशास्त्र में वस्तुतः परार्थानुमान की विधि अनुमान से स्वतः उदित नहीं हुई है और यह विचार हिन्दू तार्किकों में अरस्तू से ही आया है।[219] विद्वान् प्रोफेसर का विश्वास है कि परार्थानुमान की कला उधार ली गई है, यद्यपि अनुमान का सिद्धांत हमारा अपना है। प्रोफेसर कीथ लिखते हैं 'प्राचीनकाल के तर्क-विषय सिद्धांतों का उद्गम ग्रीस देश को मानने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता। गौतम और कणाद द्वारा प्रतिपादित 'परार्थानुमान' भी निःसन्देह यहीं उत्पन्न हुआ, भले ही यह रुद्ध विकास रहा हो। उपमान-प्रमाण के द्वारा तर्क करने के स्थान पर, निरन्तर साहचर्य को अनुमान का आधार बनाने का अपने-आप में पूर्ण सिद्धांत, यह ठीक है कि दिड्नाग के द्वारा ही प्रकट हुआ। और यह कहना अयुक्तियुक्ता होगा कि सम्भवतः यहां हर ग्रीक प्रभाव ने भाग लिया हो।"[220] अपने इस सुझाव के समर्थन में वे इस बात का उल्लेख करते हैं कि दिङ्नाग के पूर्ववर्ती आर्यदेव की (जो उससे लगभग दो शताब्दी पूर्व हुआ था) ग्रीक ज्योतिष का ज्ञान था। भरतशास्त्र में पाई जानेवाली हिन्दू नाट्यकला की प्रकल्पना पर अरस्तू का जो प्रभाव बताया जाता है, उसके साथ यदि इस विचार को मिलाया जाए तो यह सम्भव प्रतीत होता है कि भारत और ग्रीस के मध्य परस्पर कुछ सांस्कृतिक आदान-प्रदार रहा हो। कभी-कभी यह प्रतिपादित किया गया है कि अरस्तू हिन्दू प्रकल्पना से बहुत अधिक रहा हो। कभी का जो उसके पास सिकन्दर के द्वारा पहुंची थी, क्योंकि सिकन्दर के विषय में यह कहा जाता है कि उसने भारत के तार्किकों के साथ वार्तालाप किया था। सीधे प्रभाव के सम्बन्ध में कोई निश्चित प्रमाण नहीं है, और जब हम यह स्मरण करते हैं कि परार्यानुमान के नमूने की तर्कप्रणाली अरस्तू के समय से पूर्व हिन्दू और बौद्ध विचारकों के ग्रन्थों में पाई जाती हैं'[221] तो ग्रीस से 'उधार लेने की प्रकल्पना को स्वीकार करना कठिन हो जाता है। मैक्समूलर के शब्दों को यहां दोहराया जा सकता है कि 'हमें यहां पर भी यह अवश्य स्वीकार करना चाहिए कि हमारे पूर्वज जहां तक चाहते थे उससे भी कहीं अधिक विचारों में ऐसा साम्य मिलता है, जिसके विषय में निश्चय ही कोई पूर्वयोजना नहीं रही होगी। हमें यह कदापि भूलना चाहिए कि जो कुछ एक देश में सम्भव हुआ वह अन्य देश में भी सम्भव हो सकता है।"[222] इस मत की और भी अधिक पुष्टि हो जाती है जब हमें यह विदित होता है कि भारतीय और ग्रीक परार्थानुमान विधियों में कितने ही मौलिक भेद भी हैं। ग्रीक तर्कशास्त्र में तर्क के विश्लेषण में 'उपमान' का स्थान नहीं है, जिसे कि हिन्दू विचारक व्यापक सम्बन्ध के कथन के लिए अनिवार्य समझते हैं। यह बिलकुल स्पष्ट है कि अनुमान का आधार व्यापक सम्बन्ध है, क्योंकि दृष्टान्त उस सम्बन्ध का उपयुक्त मूर्तरूप है।

9. आगमन अनुमान

 

अनुमान यथार्थता के प्रति सत्य होने का दावा करता है और यह दावा स्थिर नहीं रह सकता जब तक कि दोनों पद सत्य हों। पक्षपद प्रत्यक्षज्ञान का परिणाम है और साध्यपद हमें आगमन अनुमान की समस्या तक ले जाता है।

 

व्यापक प्रतिज्ञाओं की सिद्धि कैसे होती है? नैय्यायिक इसके भिन्न-भिन्न उत्तर देता है। यह गणना, अन्तर्दृष्टि तथा परोक्ष प्रमाण को प्रस्तुत करता है। परार्थानुमान नियम के साथ-साथ एक उदाहरण का उल्लेख करता है। किसी नियम को दर्शाने के लिए उदाहरण पर्याप्त तो हो सकता है, किन्तु यह अपने-आप में किसी व्यापक सम्बन्ध की स्थापना नहीं कर सकता। रसोईघर में धुएं का आग के साथ सतत साहचर्य हो सकता है, अथवा होम करने के स्थान में भी धुएं का सतत साहचर्य आग के साथ हो सकता है, किन्तु इसमें हम पहाड़ पर आग के होने का अनुमान केवल इसलिए नहीं कर सकते कि हम उसमें धुएं को देखते हैं, जब तक कि हम इस सिद्धांत की स्थापना कर लें कि सभी अवस्थाओं में आग के साथ धुएं का साहचर्य पाया जाता है। यदि हम धुएं तथा आग को अनेक दृष्टांतों में साथ-साथ देखते हैं तो हमारे अनुमान की भित्ति अधिक दृढ़ हो जाती है। बिना किसी अपवाद के (अव्यभिचरित साहचर्य) बार-बार अनुभव (भूयोदर्शन) हमें एक सामान्य नियम तक पहुंचाने में सहायक होता है। जहां-जहां आग है वहां-वहां धुएँ का दिखाई देना ही पर्याप्त नहीं है। हमारे लिए इस बात को लक्ष्य करना भी आवश्यक है कि जहां आग हो वहां धुआं भी हो। उपस्थिति में समानता और अनुपस्थिति में समानता, दोनों आवश्यक हैं।'[223] यदि नियत साहचर्य के साथ-साथ अपवाद भी कहीं मिले, अर्थात् अविनाभावरूप-सम्बन्ध हो तो व्याप्तिविषयक अनुमान को पुष्टि मिलती है और केवल उसी अवस्था में हमें उपाधियों, अर्थात् आकस्मिक अवस्थाओं से रहित साहचर्य मिलता है।[224] यह आवश्यक नहीं है कि जहां-जहां आग है वहां-वहां धुआं भी पाया जाए। एक लाल गर्म लोहे के टुकड़े में आग तो है किन्तु धुआं नहीं है। केवल गीले ईधन की आग के साथ ही धुएं का साहचर्य है। इस प्रकार हम देखते हैं कि आग के साथ धुएं का साहचर्य सोपाधिक है, जबकि धुएं के साथ आग का साहचर्य निरुपाधिक अवश्यंभावी है। इस प्रकार 'सब स्थानों पर आग के साथ धुआं होना' स्वीकार्य नहीं है, जबकि प्रत्येक ऐसी अवस्था में जहां आग गीले ईंधन में लगी हो, धुएं का होना स्वीकार्य है। उपाधि को निश्चित रूप से दोष नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उपाधि से भ्रम केवल उसी अवस्था में होता है जबकि उसका पृथक् ज्ञान हो सके। जब कभी उपाधि का सन्देह हो तो हमारे लिए उन परिस्थितियों की विवेचना करना और यह दिखाना आवश्यक हो जाता है कि उक्त उपाधि की अनुपस्थिति में साहचर्य बना रहता है। निश्चयात्मक दृष्टान्त उपाधिदोष का निराकरण करते हैं, क्योंकि वे यह सिद्ध करते हैं कि हेतु तथा साध्य तो उपस्थित हैं, जबकि और कोई निरन्तर उपस्थित नहीं है। निषेधात्मक दृष्टान्त यह दिखाकर समर्थन करते हैं कि हेतु और साध्य अनुपस्थित हैं, जबकि और कोई भौतिक परिस्थिति निरन्तर अनुपस्थित नहीं है। परवर्ती तर्कशास्त्र ने निषेधात्मक दृष्टान्तों पर विशेष बल दिया है और व्याप्ति की परिभाषा इस प्रकार की है जिससे कि अनुमेय के लिए हेतु की ऐकान्तिक पर्याप्तता प्रकट की जा सके।'[225] नैय्यायिक बलपूर्वक कहता है कि व्यवस्थित मस्तिष्क के लिए उचित है कि वह अपनी स्वच्छंद कल्पनाओं को वश में करके यथार्थ तथ्य के आगे झुक जाए। परीक्षणात्मक विधियों का सही ब्यौरा परीक्षणात्मक विज्ञानों के साथ ही सम्भव है; और उसके अभाव में, वैज्ञानिक विधि के बारे में भारतीय तार्किक के विचार कोई खास दिलवस्थी पैदा नहीं करते। नैय्याविक आगमन की सामान्य समस्या से अभिज्ञ था और प्रकृतिनिष्ठ तथ्यों का सावधानी से निरीक्षण करने की पद्धति से भी अभिज्ञ था, जिसके द्वारा व्यापक प्रतिज्ञाओं पर पहुंचा जाता है।

 

प्रकृति सदा हमें ठीक ढंग से निश्चयात्मक तथा निषेधात्मक दृष्टान्त प्रदान नहीं करती कि जिनकी सहायता से हम किन्हीं सिद्धान्तों का प्रतिपादन या निराकरण कर सकें। नैय्याक्रि का कहना है कि हम निषेधात्मक साक्ष्य की प्राप्ति के लिए तर्क अथवा अप्रत्यक्ष प्रमाण का कोना कर सकते हैं। यदि यह सामान्य प्रतिज्ञा कि 'जहां-जहां धुआं है वहां-वहां आप है', ठीक नहीं है तो इससे विपरीत, अर्थात् कभी-कभी 'धुएं के साथ आग नहीं रहती', अवश्य ठीक होगी। दूसरे शब्दों में यह कि आग अनिवार्य रूप से धुएं की पूर्ववर्ती नहीं है। किन्तु हम यह अस्वीकार नहीं कर सकते कि आग धुएं का कारण है। इस प्रकार एक व्यापक प्रतिज्ञा को पुष्ट करने के लिए, जो अबाधित मेल के निश्चयात्मक दृष्टान्तों पर आधारित है, तर्क का प्रयोग किया जाता है। यह किसी परिकल्पना को सिद्ध करने का भी एक उपाय है।'[226] यह दिखा कर कि यदि हम सुझाई गई परिकल्पना को अस्वीकार करेंगे तो किन-किन असंगतियों में फंस जाएंगे, अप्रत्यक्ष प्रमाण उस प्रकल्पना की पुष्टि करने में प्रवृत्त होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि अन्य कोई प्रकल्पना तथ्यों का समाधान नहीं कर सकती।[227]

तर्क आगमन की उस अनुभवाश्रित प्रणाली के लिए, जिससे हमें व्यापक प्रतिज्ञाओं की उपलब्धि नहीं हो सकती, केवल एक सहायक का काम करता है। जहां हम सभी सम्भव अवस्थाओं का निरीक्षण करके अपने निष्कर्ष की परिपुष्टि अप्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा करते हैं, वहां भी हमें व्यापक प्रतिज्ञाओं के विषय में एकान्त निश्चितता उपलब्ध नहीं होती। जब तक वे परिमिति निरीक्षण पर आश्रित हैं उनमें कोई आवश्यकता नहीं रहती। गणनात्मक व्याप्तियां मात्र सम्भव हैं, निश्चित नहीं हैं। जहां पर यह सत्य है कि इन्द्रिय-ग्राह्य विशिष्टों का अनुभव व्यापकों के ज्ञान को उत्पन्न करता है, वहां यह नहीं कहा जा सकता कि व्यापकों का ज्ञान पूर्णतया इन्द्रिय-ग्राह्य विशिष्टों के द्वारा होता है, क्योंकि व्यापक किसी भी अथवा समस्त विशिष्टों से परे जाता है।

 

समष्टिवाची निर्णयों में भी व्यापक के ज्ञान की पूर्व धारणा रहती है। हम सब दृष्टान्तों की गणना नहीं करते किन्तु केवल उन्हीं की गणना करते हैं जिनके अन्दर वर्गीय गुण विद्यमान हैं, जिसके कारण ही उक्त दृष्टान्तों का स्थान उस वर्ग के अन्दर होता है। इसलिए व्यापक के ज्ञान के बिना गणना-पद्धति भी कार्य नहीं कर सकती। प्राचीन न्याय का दावा है कि हम व्यापकों को प्रत्यक्ष ज्ञान के द्वारा पहचान सकते हैं। गंगेश व्यापकों (सामान्य लक्षण) के ज्ञान में इन्द्रियातीत क्रिया को स्वीकार करता है, जब वह इसे अलौकिक प्रत्यक्ष अथवा इन्द्रियातीत अन्तर्दृष्टि को एक प्रकार बताता है।'[228] उक्त विचारों में से किसी से भी दृष्टान्तों का सर्वांग सर्वेक्षण हमारे लिए आवश्यक नहीं है। व्यापक धूम्रमयता के प्रत्यक्ष द्वारा हम धूम्र-सम्बन्धी सब अवस्थाओं का ज्ञान प्राप्त करते हैं। आग और धुएं की व्यापकताओं का ज्ञान हमें सामान्यलक्षण-प्रत्यासत्ति द्वारा होता है और हम उनके अनिवार्य सम्बन्ध को अनुभव करते हैं। इस प्रकार एक दृष्टान्त विश्लेषण द्वारा हम व्यापक सम्बन्ध को पहचान सकते हैं; और जो कुछ एक दृष्टान्त के विषय में सत्य है उसे उक्त वर्ग के सब सदस्यों तक उचित रूप में विस्तृत किया जा सकता है, क्योंकि समानरूपता नाम की एक वस्तु अवश्य है। जो एक बार सत्य है, वह सर्वदा सत्य है। हम जब कहते हैं 'धुआं', तो हमारे मन में उस समय धुएं की सब अवस्थाएँ नहीं होतीं, किन्तु तो भी धुएं का गुण निर्देश हमारे मस्तिष्क में उपस्थित रहता है। धुएं तथा आग के गुण निर्देश व्याप्ति के अन्दर व्याप्य व्यापक-भाव से परस्पर सम्बद्ध हैं। हमारे सामने अनेकों दृष्टान्तों का रहना आवश्यक है, इसलिए नहीं कि हमें इन विशिष्टों से व्यापक सम्बन्ध की प्राप्ति होती है, बल्कि इसलिए कि वह सम्बन्ध केवल एक उदाहरण से स्पष्ट रूप में पहचाना नहीं जा सकता। यद्यपि विभेदक शक्ति में प्रवीण पुरुष थोड़े-से उदाहरणों से भी सम्बन्धों में भेद कर ही सकते हैं, व्यापक सम्बन्ध केवल खोजमात्र है, उसका सृजन नहीं होता। केवल एक दृष्टान्त से भी विशेष विचार द्वारा हम व्यापक सम्बन्ध तक पहुँच सकते हैं। यदि स्वयं अन्तिम निर्णय में व्यापक सम्बन्ध हमारे सम्मुख स्पष्ट नहीं होता तो एकसमान घटनाओं की पुनरावृत्ति भी इस विषय में हमारी सहायता नहीं कर सकती। यह विषय के अन्दर निहित है जिसे हमारी विचारशक्ति ने बनाया नहीं है। जो कुछ इन्द्रियातीत है वह अनुभवातीत भी हो, यह आवश्यक नहीं है। विधियुक्त प्रेक्षण तथा परीक्षण ऐसे अनुभव का केवल समर्थन करते हैं जो केवल एक घटना से कभी-कभी अन्तर्दृष्टि द्वारा प्राप्त हो जाता है। प्रकृति की प्रत्येक घटना अपने अन्दर एक विशेष सम्बन्ध अथवा नियम को छिपाये हुए है, जिसके अनुसार वह घटना संघटित हुई है। किसी घटना की मौलिक विशेषताओं को उसके आकस्मिक सहचारी विषयों से पृथक् करके समझने में केवल अन्तर्दृष्टि ही हमारी सहायक हो सकती है। व्यापक प्रतिज्ञाएं विषय-वस्तु के सम्बन्ध हैं। यदि सभी लघुपित्त वाले प्राणी दीर्घायु होते हैं तो यह इसलिए नहीं कि मनुष्य, घोड़ा तथा खच्चर, जो लघुपित्त वाले हैं, दीर्घायु हैं, बल्कि इसलिए कि लघुपित्तता और दीर्घ जीवन की विषय-वस्तुओं में एक आवश्यक सम्बन्ध है। न्याय के परार्थानुमान का महत्त्व उसे इस परिकल्पित निरुपाधिक रूप में रखने से अच्छी तरह स्पष्ट हो जाता है। यदि '' तो '', '' इसलिए ''

 

निगमनात्मक तर्क अपने निष्कर्ष में हमें इस प्रकार आधारवाक्य में दी गई सामग्री से अधिक प्रदान कर सकता है, यह समस्या इस दृष्टिकोण से एक नये रूप में प्रकट होती है। सामान्य सिद्धांत, गणनात्मक निष्कर्ष नहीं है और वे सम्बन्ध जो विशिष्टों को शासित करते हैं, उतने ही यथार्थ हैं जितने कि स्वयं विशिष्ट जब हम व्यापक निष्कर्य विशिष्ट सत्य को निकालते हैं तो एक विशेष अर्थ में निष्कर्ष आधारबाक्य से भी परे जाता है, यद्यपि दूसरे अर्थ में यह उसके अन्दर निविष्ट है।

 

किन्तु यदि व्यापक सम्बन्ध यथार्थ हैं और उनके लिए केवल अन्तर्दृष्टि ही को आवश्यकता है तो यह कैसे होता है कि प्रेमी तथा पागल उन सामान्य सिद्धांतों के महत्व को ग्रहण नहीं कर सकते जो वैज्ञानिकों तथा दार्शनिकों की आँखों में गड़ जाते हैं? इसका समाधान ही सरल है कि हमारे सामान्यानुमान कभी-कभी सत्य सिद्ध नहीं होते। त्रुटिपूर्ण आगमनात्मक अनुमानों में सम्बन्धों का सही-सही बोध नहीं होता। विशिष्टों को असीम पूर्णता से उनका ठीक-ठीक भेद नहीं किया जाता है। यथार्थता की जटिलता के कारण सम्बन्धों में भेद करना कठिन होता है। राग, मानसिक पक्षपात और जड़ता तथा विचारहीनता के कारण हम प्रस्थापनाओं को सत्य मान लेते हैं, यद्यपि ये सत्य होती नहीं। इस अर्थ में विशिष्ट प्रत्यक्ष भी अशुद्ध हो सकते हैं। अन्तर्दृष्टि द्वारा पुष्ट आगमनात्मक सिद्धांत अधिक विश्वास-योग्य हो जाते हैं जब उनका प्रयोग नये विशिष्टों के लिए होता है, अर्थात् जब हम आगमन से निगमन अवस्था की ओर आते हैं। जैसाकि हम आगे चलकर देखेंगे व्याप्ति-सम्बन्धों की प्रामाणिकता को भी, अन्य सब ज्ञानों के समान, ज्ञान की अन्य विधियों से सिद्ध करने की आवश्यकता होती है। ऐसा अन्तर्ज्ञान जिसकी पुष्टि अनुभूति के आधार पर हुई हो, परिकल्पना मात्र ही है। केवल अन्तर्ज्ञान कुछ अधिक उपयोगी नहीं है। आनुभविक सामग्री की पूर्ण निःशेषता एक ऐसा आदर्श है जिसको प्राप्त नहीं किया जा सकता। दोनों एक-दूसरे के परस्पर सहायक हैं। सामान्य सिद्धांत में कुछ आवश्यकता निहित रहती है। यद्यपि हम इसे केवल एक आनुभविक तथ्य के अवसर पर ही ठीक-ठीक समझ सकते हैं।

 

व्याप्ति के सम्बन्ध में न्याय की यह धारणा है कि सामान्य स्थापनाएँ यथार्थसत्ता की अवयवभूत हैं,'[229] व्याप्ति-सम्बन्ध यथार्थ हैं।[230] चार्वाक सम्प्रदाय वाले, जो भौतिकवादी हैं, व्याप्ति-सम्बन्धों की सम्भावना को स्वीकार नहीं करते और इसीलिए वे अनुमान की यथार्थता के भी विरोधी हैं। बौद्ध दार्शनिकों के मत में सामान्य प्रस्थापनाएँ आदर्श कृतियाँ हैं, यथार्थ सम्बन्ध नहीं हैं। सामान्य प्रस्थापनाएं केवल नाममात्र हैं और उनकी पहचान केवल कल्पना है। बौद्ध ग्रन्थ 'सामान्यदूषणदिकप्रसारिता' में इस मत की कि हम सामान्य प्रस्थापनाओं का, यथार्थ की तरह प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते हैं, आलोचना की गई है। हम हाथ की पांच अंगुलियों को देखते हैं और इसके अतिरिक्त छठी सामान्य वस्तु को नहीं देखते, जो उतनी ही अवास्तविक है जितना कि सिर पर सींग।[231] यद्यपि इस मत की ठीक-ठाक व्याख्या के अनुसार, प्रत्येक प्रकार का अनुमान असम्भव ठहरता है, तो भी बौद्ध दार्शनिक क्रियात्मक रूप में इसकी यथार्थता को स्वीकार करते हैं और भिन्न-भिन्न प्रकार के सामान्य सम्बन्धों में भेद करते हैं। हेतु का साध्यपद के साच स्वभाव (तादात्म्य), कारण कार्यभाव अथवा अभाव (अनुपलब्धि) रूप से सम्बन्ध हो सकता है इसका तात्पर्य यह है कि हमारे अनुमान विध्यात्मक और निषेधात्मक हो सकते हैं और पहले प्रकार के भी विश्लेषणात्मक अथवा संश्लेषणात्मक हो सकते हैं।'[232] जब हम इस प्रकार का कथन करते हैं कि 'यह एक वृक्ष है क्योंकि यह देवदारु की श्रेणी का है" तो यह अनुमान या तो तादात्म्य, या विश्लेषण, स्वभाव, अथवा सहअस्तित्व के नमूने का है। इसी प्रकार जब हम यह कथन करते हैं कि "चूंकि वहां घुओं है इसलिए वहां आग है" तो यह अनुमान तदुत्पत्ति (अर्थात् आग से धुआँ उत्पन्न होता है) संश्लेषण, कार्यकारणभाव अथवा पूर्वानुपरक्रम के नमूने का है। अनुपलब्धिजन्य अनुमान यह है जहां हम घड़े के अभाव का अनुमान घड़ा दिखाई देने के कारण करते हैं। सामान्य सम्बन्धों का ज्ञान तथ्यों के निरीक्षण द्वारा नहीं होता, बल्कि तात्त्विक तादात्म्य की पूर्वधारणाओं अथवा कार्यकारण रूपी जावश्यकता के आधार पर किए गए अनुमान से होता है। बौद्ध दार्शनिक इन कार्यकारणभाव तथा तादात्म्य सम्बन्धी सिद्धांतों की सामान्य सत्ता को स्वीकार करते हैं, क्योंकि बिना इनकी स्वीकृति के और कोई निस्तार नहीं है। दिङ्नाग के अनुसार, ज्ञान के द्वारा वस्तुनिष्ठ सत्ता के यथार्थ सम्बन्धों का स्पष्टीकरण नहीं होता है। अन्तर्निहितता, तत्त्व, गुण और उद्देश्य वस्तु के सम्बन्ध, जिनके द्वारा हम किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, ये सब विचार के द्वारा आरोपित किए जाते हैं।[233] सम्बन्ध केवल तर्कजन्य है।

 

वाचस्पति उक्त बौद्धमत की कड़ी छानबीन करता है। बौद्ध दार्शनिकों की दृष्टि में कार्यकारणभाव के नियम की सन्तुष्टि हो जाती है यदि हम आग लगने की अवस्था में धुएँ की उपस्थिति को किसी अदृश्य पिशाच के द्वारा उत्पन्न हुआ बता सकें। और उनके मत में यह भी आवश्यक नहीं है कि कार्यविशेष का कारण भी वही एक हो। यदि कारण वह है जो कार्य से पहले आता है तो दोनों का एक ही समय में विद्यमान रहना नहीं बनता। धुएँ को देखने से हम वर्तमान में नहीं किन्तु भूतकाल में आग के अस्तित्व का अनुमान कर सकते हैं। और यदि दोनों का तादात्म्य है तो एक के प्रत्यक्ष ज्ञान का अर्थ दूसरे का भी प्रत्यक्ष ज्ञान है, और उस अवस्था में अनुमान की आवश्यकता नहीं रहती। वाचस्पति और जयन्त बलपूर्वक कहते हैं कि देवदारु और वृक्ष के मध्य सम्बन्ध तादात्म्य सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि सभी वृक्ष देवदारु नहीं हैं।[234] बौद्धमतानुयायी हमें यह नहीं बतलाता कि कार्यकारणभाव तथा तात्त्विक तादात्म्य सम्बन्धी सिद्धान्त स्वयं कहां से आए। साहचर्य की अनेक ऐसी अवस्थाएँ हैं जिनका कार्यकारणभाव अथवा तादात्म्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। नैय्यायिक के अनुसार, सभी प्रकार के पारस्परिक सम्बन्ध व्याप्ति के अन्दर आते हैं। केवल वही सम्बन्ध नहीं जो कार्यकारणरूप से पूर्वापरभाव रखते हैं अथवा जाति एवं उपजाति के मध्य हैं, बल्कि इस प्रकार के अन्य सम्बन्ध भी जैसे कि सभी सींगों वाले पशुओ के खुर फटे हुए होते हैं', व्याप्ति के अन्दर आते हैं।'[235]

10. कारण

 

अन्य सब सामान्य सिद्धान्तों की भांति, कार्यकारणभाव का नियम भी नैय्याविक के लिए एह अंतर्दृष्टि द्वारा ज्ञात स्वतःसिद्ध सिद्धान्त है, जिसकी पुष्टि अनुभव द्वारा होती है। देखे गार कार्यकारण-सम्बन्धों से उस सिद्धान्त का समर्थन होता है जिससे समस्त अनुसंधान आरम्य होता है। कारण वह है जो, विना अपवाद के, कार्य से पूर्व विद्यमान रहता है और जिसकी आवश्यकता केवल सहायक के रूप में ही नहीं, वल्कि कार्य की उत्पत्ति के लिए भी है। यह एक घटनाका का पूर्ववर्ती अवयव है, जो सतत रूप से अनेक अवस्थाओं में पूर्ववर्ती रहा है। किन्तु कैल पूर्ववर्ती होना ही पर्याप्त नहीं है।[236] इसे एक आवश्यक पूर्ववर्ती होना चाहिए।

 

अन्यथासिद्ध उस पूर्ववर्ती को कहते हैं जिसका सम्बन्ध कार्य के साथ कार्यकारण रूप में हो, यद्यपि उसके साथ विद्यमान भले ही रहा हो। विश्वनाथ[237] इस प्रकार के विभिन्न अन्यथासिद्ध कारणों का उल्लेख करता है। हम अपनी उंगली द्वारा किसी पदार्थ की आकाशीय स्थिति का संकेत कर सकते हैं। इस प्रकार उंगली द्वारा किया गया संकेत भले ही सतत उपस्थित रहता हो किन्तु आकाशीय स्थिति के प्रत्यक्ष के साथ यह कार्यकारणभाव से सम्बद्ध नहीं है। कुम्हार का डण्डा एक निरुपाधिक पूर्ववर्ती है, जबकि उस डण्डे के रंग से कोई प्रयोजन नहीं है। डण्डे की गति से जो शब्द होता है वह भी एक सहजात कार्य है। नित्य और सर्वव्यापी द्रव्य, जिन्हें स्वेच्छा से तो उपस्थित ही किया जा सकता है और हटाया ही जा सकता है, निरुपाधिक पूर्ववर्ती नहीं हैं। उपाधि की उपाधि का भी, जैसे कि कुम्हार के बाप का घड़े के निर्माण से कोई सम्बन्ध नहीं है, हमें केवल तात्कालिक पूर्ववर्तियों से प्रयोजन है। एक ही कारण के सहजात कार्यों में भी कभी-कभी परस्पर कार्यकारण-सम्बन्ध की भ्रांति हो जाती है। गुरुत्वाकर्षण के सामान्य कारण से तराजू के पलड़ों का ऊपर उठना एवं नीचे गिरना होता है। जब ये दोनों सहजात कार्य एक-दूसरे के पश्चात् होते हैं, तब इस विषय की बहुत आशंका रहती है कि कहीं पूर्ववर्ती सहजात कार्य को पश्चाद्वर्ती सहजात कार्य का कारण समझ लिया जाए। कार्य की उत्पत्ति के लिए जो अनावश्यक है, वह उसका अनुपाधिक पूर्ववर्ती नहीं है। कारण को आनुषंगिक परीक्ष एवं नैमित्तिक या आकस्मिक उपकरणों के साथ मिश्रित नहीं करना चाहिए।[238] यह मानी हुई बात है कि यदि बाधक शक्तियाँ उपस्थित हैं तो कारण से कार्य नहीं निकलेगा। इसलिए कभी-कभी 'प्रतिबंधकाभाव' को भी कारण की परिभाषा में जोड़ दिया जाता हैं। केशव मिश्र ने कारण की परिभाषा इस प्रकार की है कि ऐसा आवश्यक पूर्ववर्ती जिससे कोई अन्य कार्य सम्पन्न हो सके, कारण है। धागे कपड़े के कारण बनते हैं किन्तु उनका रंग कारण नहीं है, क्योंकि रंग कपड़े के विशेष रंग का कारण भले ही हो, कपड़े का कारण नहीं है।

 

ऐसे दो पदार्थों का परस्पर कार्यकारण-सम्बन्ध नहीं हो सकता जब तक कि उनके बीच अन्वय-व्यतिरेकी सम्बन्ध हो अर्थात् कारण की विद्यमानता का अर्थ कार्य की विद्यमानता और कारण के अभाव का अर्थ कार्य का अभाव हो। कार्यकारण-सम्बन्ध पारस्परिक तथा प्रतिलोमी होते हैं। वे रहस्यमय शक्तियाँ नहीं हैं। उनका निश्चय इन्द्रियानुभव द्वारा पूर्वापरक्रम को देख कर किया गया है जो एकसमान तथा अपवादरहित है।[239] तथ्यों के सावधानी से निरीक्षण पर बल दिया गया है। उदयन कहता है- हमको परिश्रम के साथ प्रयास करके ऊहापोह के द्वारा अनेकों परिमितताओं तथा पृथक्करणों का निर्णय करना चाहिए।'[240] प्रकृति हमारे समक्ष अन्तर्निहित सामग्री को जटिलरूप में प्रस्तुत करती है। हमें अपनी विवेकबुद्धि द्वारा पूर्वापरक्रम की विवेचना करके असम्बद्ध अंशों को कार्य-कारण से अलग करना होगा। हमें यह भी खोज करनी होगी कि क्या कार्य का तिरोभाव संदिग्ध कारण के तिरोभाव की वजह से है? इस सब अनुसन्धान में इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखना आवश्यक है कि अन्य किसी परिस्थिति में तो परिवर्तन नहीं हुआ। पूर्ववर्ती की अनुपाधिकता का निश्चय करने में भेदपरक उभयविधि के प्रयोग का बड़ा महत्त्व है, जैसी कि पंचकारणी नामक बौद्ध सिद्धान्त में पाई जाती है।'[241]

 

कार्यकारण-सम्बन्ध तो हेतुमुख और ही फलमुख से प्राप्त किए जाते हैं। वे प्रस्तुत तथ्य नहीं हैं, बल्कि प्रस्तुत सामग्री के आधार पर की गई बौद्धिक रचनाएँ हैं। यह कहना कि '' '' का कारण है, इन्द्रियज्ञानगम्य विशिष्टों से ऊपर जाना और पूर्वापरक्रम के नियम का ज्ञान प्राप्त करना है। कार्यकारण का नियम केवल घटनाओं का क्रम होकर तत्त्वों का पारस्परिक सम्बन्ध है। जबकि तत्त्व प्रस्तुत किए जाते हैं, सम्बन्ध प्रस्तुत नहीं किया जाता।

 

यदि हम कारणों के अनेकत्व को स्वीकार करें तो कार्यकारणभाव के नियम की प्रयत्नपूर्वक की गई व्याख्या बिलकुल ही निरर्थक हो जाती है। और यदि कारणों के अनेकत्व में कोई वैज्ञानिक सच्चाई है तो अनुमान प्रमाण ज्ञान-प्राप्ति का प्रामाणिक साधन रहेगा।'[242] यदि हम किसी नदी का पानी बढ़ा हुआ देखें तो हम केवल यही अनुमान नहीं कर सकते कि वह पिछली वर्षा का परिणाम है। ऐसा आंशिक रूप में नदी के देखार यांचा बांधने से किया हो सकता है। यदि हम चीटियों को अण्डे ले जाते हुए देखें तो यह कार्य उन्हें आश्रय-स्थानों के बिगड़ जाने से भी हो सकता है. और यह आवश्यक नहीं है कि यह आनेवाली सुनाई पड़े तो यह निश्चित रूप से बादलों के कुणकारण ही नहीं हो सकती है। यह भी सम्भव हो सकता है कि कोई विशेष व्यक्ति मोर के के कारण की नकल कर रहा हो। न्याय का मत है कि कारणों में अनेकत्व नहीं है और एक आवाज की, एक ही कारण है। कारणों के अनेकत्व की प्रतीति त्रुटिपूर्ण विश्लेषण के कारण है। यदि कार्य को पर्याप्त रूप से परिमित तथा विशिष्ट बना दिया जाए तो अनेकत्य गायब हो जाता है। वर्षा के कारण नदी का बढ़ना और प्रकार का होता है और तट पर बांध बन जाने से नही का बढ़ना और प्रकार का होता है। वर्षा के कारण आई हुई बाढ़ में पानी की धारा बहुत वेगव होती है, पानी में झाग भी बहुत रहता है और फूल-पत्ती फल आदि भी अधिक राशि में बहते हुए पाए जाते हैं। इसी प्रकार आश्रय-स्थान के बिगड़ने से जो चींटियाँ अण्डे लेकर भागती है उनकी गति में और वर्षा के आगमन की सूचना से जो चलती हैं उनकी गति में भी काफी अन्ता है। मोरों की स्वाभाविक ध्वनि तथा मनुष्य के द्वारा की गई उसकी नकल में तो स्पष्ट ही भेट किया जा सकता है। यदि हम कार्य के विशेषत्व की ओर ध्यान दें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि उसका एक ही विशेष कारण है। यदि हम कार्य का भावात्मक अमूर्तरूप से विचार करते हैं तो कारण का भी विचार उसी रूप से करना चाहिए। वाचस्पति और जयन्त हमें बताते हैं कि कारणों पर यदि हम पूरा-पूरा ध्यान देकर उनके वैशिष्ट्य की जांच करें तो उनका अनेकत्व मिट जाएगा। परन्तु कई तार्किक यह मान लेते हैं कि एक ही कार्य के विभिन्न संभावित कारण एक सामान्य शक्ति अथवा क्षमता (अतिरिक्त शक्ति) रखते हैं। कारणों के अनेकत्व को हम केवल उसी अवस्था में, स्वीकार कर सकते हैं जबकि हम विज्ञान से विमुख होना पसन्द करें। उस अवस्था में, जैसाकि परवर्ती न्याय हमें बतलाता है, चूंकि किसी भी कार्य के लिए एक से अधिक कारण-कलाप की कल्पना हम कर सकते हैं, अतः कार्य उनमें से कारणसमूह का नहीं, किसी एक विशेष बल्कि प्रत्येक का चिह है। यदि कार्य के अभाव का हमें निश्चय हो तो उक्त कारणों में से भी किसी एक के अभाव का नहीं, बल्कि प्रत्येक के अभाव का निश्चय होना चाहिए। इन अर्थों में, सम्भावित और वैकल्पिक कारण-कलापों में से कोई एक ही ऐसा होगा कि जिसकी विद्यमानता में कार्य की भी सतत रूप से और बिना किसी उपाधि के विद्यमानता अवश्यम्भावी है। कारण को लक्षित करानेवाला (कारणतावच्छेदक) चिह्न सम्भावित कारण-कलापों में से किसी एक की उपस्थिति को ही बतलाता है, इससे अधिक कुछ नहीं।

 

तीन प्रकार के कारण माने गए हैं'[243]- (1) उपादान (भौतिक) कारण वह सामग्री है जिसते कार्य का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए, धागे कपड़े का उपादान कारण हैं और मिट्टी घड़े का उपादान कारण है।[244] (2) अभौतिक अथवा असमवायी करण वह है जो भौतिक कारण में रहता है और जिसकी क्षमता अच्छी तरह जानी हुई है। धागों का परस्पर संवीग कपड़े का अभौतिक कारण है। यदि धागों को जोड़ा जाएगा तो वे केवल एक बण्डलमात्र ही रह जाएँगे और कपड़े का निर्माण कर सकेंगे। धागों का रंग भी अभौतिक कारण है क्योंकि उसकी क्षमता कपड़े के अन्दर रंग लाने के सम्बन्ध में जानी हुई है। उपादान कारण द्रव्य है, किन्तु अभौतिक कारण गुण अथवा क्रिया है।[245] न्यायशास्त्र द्वारा प्रतिपादित परमाणुवाद के सिद्धांत के अनुसार भौतिक जगत् में समस्त परिवर्तन अंशों के परस्पर जुड़ने अलग होने के कारण होता है। मूल घटक वही परमाणु है, यद्यपि उनका योजनाक्रम प्रत्येक क्षण परिवर्तित होता रहता है। निमित्त कारण पूर्वोक्त दोनों कारणों से भिन्न है। यह वह कारण है जिसकी प्रेरणा से कार्य की उत्पत्ति होती है, अर्थात् कार्य का प्रयोजन या साधन जिससे कार्य की उत्पत्ति होती है। कुम्हार घड़े का निमित्त कारण है, जबकि कुम्हार का डण्डा चाक आदि सहकारी कारण हैं।[246] ये तीनों कारण अरस्तू द्वारा प्रतिपादित भौतिक, औपचारिक तथा निमित्त कारणों से अनुकूलता रखते हैं। स्वयं कार्य को अरस्तू का अन्तिम कारण माना जा सकता है।

 

कभी-कभी ऐसे कारण को जो तुरंत कार्य को उत्पन्न करता है, कारण कहा जाता है और उसकी परिभाषा है कारणविशेष।'[247] केशव मिश्र के अनुसार, यह उच्चकोटि का कारण है [248] कारणों के संग्रह में कारण वह है जो तुरंत कार्य को उत्पन्न करे।[249] प्रत्यक्ष ज्ञान की क्रिया में ज्ञाता तथा ज्ञेय पदार्थ दोनों का उपस्थित रहना आवश्यक है, यद्यपि प्रधान कारण इन्द्रिय-सम्पर्क है। नीलकण्ठ ने करण की परिभाषा में कहा है कि ऐसा कारण जिसके बिना अभिलषित कार्य किसी भी अवस्था में उत्पन्न हो सके।[250] घड़े की उत्पत्ति में कुम्हार का डण्डा साधनरूप कारण है। जंगल का डण्डा कारण नहीं है। यह तभी कारण बनता है जबकि घड़े की उत्पत्ति में इसका प्रयोग वस्तुतः किया जाता है। इसलिए 'व्यापारवद्' विशेषण जोड़ दिया जाता है। आधुनिक न्याय एक पग और आगे बढ़ता है और कहता है कि करण वह नहीं है जिसमे अन्दर व्यापार अथवा क्रिया रहती है, बल्कि स्वयं क्रिया ही करण है जो उपयुक्त कार्य का निकटतम कारण है।'[251]

 

परवर्ती न्याय में कार्य की परिभाषा इस प्रकार की गई है कि कार्य 'अपने पूर्वक्त निषेध का प्रतिपक्षी अस्तित्व है।"[252] यह पूर्ववर्ती निषेध का निश्चित सहसंबंधी है। यह कहना कि कार्य का पहले अभाव होता है, यह स्वीकार करना है कि कार्य का आरगद होता है। यह असत्कार्यवाद का सिद्धांत है। इसे, दूसरे शब्दों में, आरम्भवाद भी करते हैं। किन्तु भ्रूणविकासवाद का सिद्धांत यह है कि कार्य का अस्तित्व कारण में पहले से नहीं रहता किन्तु कार्य की उत्पत्ति नये सिरे से होती है, जिसे यों भी कह सकते हैं कि वस्तुसत्ता में रचनात्मक क्रम है जिसके अनुसार उसमें नित्य नूतन स्वरूप की वृद्धि होती रहती है।[253] कई बौद्ध दार्शनिकों का मत है कि कार्य की उत्पत्ति के पूर्व तो उसरे अस्तित्व को ही स्वीकार किया जा सकता है और अभाव को ही, और दोनों की एक साथ भी नहीं माना जा सकता। न्याय का कहना है कि कारण से उत्पन्न होने के पूर्व कार्य का अभाव रहता है और इस विचार की समता न्याय के इस सिद्धांत में भी टीक बैठती है कि पूर्णरूप उन अंशों से जिनसे मिल कर वह बनता है, बिलकुल भिन्न है।[254] सांख्य तथा वेदांत का आग्रह है कि कार्य में पहले से विद्यमान क्षमताओं का वास्तविकीकरण होता है। सांख्य के मतानुसार निमित्त कारण केवल प्रकट होने की प्रक्रिया में सहायक मात्र है। नैय्यायिक इस मत की आलोचना इस प्रकार करता है कि यदि कपड़ा पहले से ही धागों में विद्यमान है तो हमें वह दिखाई क्यों नहीं देता? धागे ही कपड़ा नहीं है, कपड़े की तरह हम धागों को पहन नहीं सकते। कपड़ा प्रकट नहीं होता यह कोई तर्क नहीं है, क्योंकि प्रकट होना ही तो वास्तविक समस्या है। यदि प्रकट होने से तात्पर्व 'ऐसी आकृति के रूप में विद्यमान रहना है जिसका प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और जो कार्य करने में सक्षम है' तो यह कारण की क्रिया से पूर्व कार्य का स्पष्ट ही अभाव है। कोई पदार्थ जो कारण की क्रिया से पूर्व एक आकृति-विशेष में विद्यमान नहीं था, अब कारण की क्रिया से अस्तित्व में आया है।'[255] कार्य कारण से आकृति, क्षमता और स्थिति में भिन्न है। इसके अतिरिक्त, यदि सांख्य के अनुसार कार्य की कारण से अभिन्नता के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए तो यह समस्त भौतिक जगत् ही जो आद्य प्रकृति से बना है, प्रकृति के समान ही अदृश्य होना चाहिए। यदि कार्य का विस्तार शून्य आकाश में कारण ही के समान है तो इसका कारण यह है कि आधार कारण में है। इसलिए प्राकृतिक तथ्यों द्वारा निदिष्ट इस मत को कि पदार्थ नये सिरे से उत्पन्न और नष्ट होते हैं अस्वीकार करने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता।[256] यह मत भी, कि जब दूध दही के रूप में परिवर्तित होता है तो केवल रूप में परिवर्तन होता है, विनाश की कोई क्रिया नहीं होती, तर्कसंगत नहीं है। जब हम किसी नये पदार्थ को पुनर्निर्माण की नई विधि द्वारा बनते हुए देखते हैं तो उससे हम अनुमान करते हैं कि पहला पदार्थ नष्ट हो गया।[257] दूध से संघटित अवयव पहले फट जाते हैं और फिर वे पुनः संघटित होकर दही को उत्पन्न करते हैं। नैय्यायिक स्वीकार करता है कि पूर्व पदार्थ का पूर्णरूपेण विनाश होने से नये पदार्थ का निर्माण होना असम्भव होगा। तात्पर्य यह निकला कि पदार्थ मात्र अपनी पूर्वस्थिति को छोड़ता है, यद्यपि नैय्यायिक इसे प्रकट रूप में स्वीकार करने को प्रवृत्त नहीं होता।

 

सांख्य तथा वेदांत के ग्रंथों में, जिनका सिद्धांत कार्य-कारण भाव के सम्बन्ध में भिन्न है, न्याय के विचार की आलोचना की गई है। यहां सांख्यकारिका से एक दृष्टान्त दिया जा सकता है '[258] जिसका अस्तित्व नहीं है उसे कभी भी उत्पन्न नहीं किया जा सकता। हम चाहे कितना ही प्रयत्न क्यों करें, नीले को पीले में परिवर्तित नहीं कर सकते। और फिर उपादान कारण सदा ही कार्य के साथ जुड़ा हुआ मिलेगा, जैसे कि तेल के साथ तिल। क्योंकि अभावात्मक पदार्थ के साथ सम्बन्ध सम्भव नहीं है, इसलिए कार्य को कारण में विद्यमान मानना पड़ेगा। ऐसा कहना, कि कारण से कार्य की उत्पत्ति हो सकती है विना उसके साथ सम्बन्ध रहते हुए भी, असंगत होगा। क्योंकि उस अवस्था में, कोई भी पदार्थ किसी भी कारण से उत्पन्न हो सकता है और कार्यविशेष की उत्पत्ति के लिए कारणविशेष का भी प्रश्न नहीं उठता।[259] यदि कहा जाए कि असम्बद्ध कारण अपने अन्दर छिपी हुई क्षमता के कारण कार्य को उत्पन्न कर सकता है[260], तो यदि उस शक्ति का कार्य से सम्बन्ध है तो यह कहना भी सर्वथा उचित ही होगा कि कार्य कारण के अन्दर पहले से विद्यमान है; और यदि सम्बन्ध नहीं है तो इस कठिनाई का कि एक कार्यविशेष एक शक्तिविशेष से क्यों उत्पन्न होता है, कोई हल नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त, क्योंकि कारण और कार्य दोनों की एक ही प्रकृति है, अतः यदि एक विद्यमान है तो दूसरे को भी अवश्य विद्यमान होना चाहिए। सांख्य और वेदान्त का आग्रह है कि यदि कार्य कारण से सर्वथा भिन्न है तो दोनों को जोड़नेवाला कोई निर्णायक सिद्धान्त नहीं हो सकता। नैय्यायिक का कहना है कि यदि कार्य कारण से भिन्न नहीं है तो हम उनके अन्दर कारण और कार्य का भेद नहीं कर सकते। दोनों विचार तर्कसंगत हैं, यद्यपि भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों के आधार पर।

 

इस विषय से आगे बढ़ने से पूर्व हम न्यायशास्त्र के कार्यकारणभाव के विषय में कुछ समीक्षात्मक विचार प्रस्तुत करेंगे। नैय्यायिक पूर्ववर्तित्व पर बल देता है। पूर्ववर्तित्व वस्तुतः तार्किक दृष्टि से ठीक है, किन्तु कालक्रम से नहीं। सूर्य प्रकाश का कारण है और दोनों एक ही समय में विद्यमान रहते हैं। वास्तविक कारण तब तक रहता है, जब तक कि कार्य रहता है, और कार्य के पूर्व या पश्चात् कारण का अस्तित्व अनावश्यक है। सत्य की निष्ठा से नहीं किन्तु क्रियात्मक दृष्टि से नैय्यायिक कार्यकारण भाव के लिए पूर्ववर्तित्व के महत्त्व को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है।'[261] पूर्ववर्ती अवस्थाओं के विषय में, और उस परिवर्तन के विषय में जो अवस्थाओं को एकत्र कर उन्हें कारण बना देता है जिससे कि वे कार्य को उत्पन्न करते हैं, न्याय का विश्लेषण कृत्रिम है। अवस्थाओं के एकत्र हो जाने से कार्य तुरंत उत्पन्न हो जाता है और यदि वे एकत्र नहीं होतीं तो कारण विद्यमान रहते हुए भी कार्य को उत्पन्न करने का काम प्रारम्भ नहीं करता। कार्य की उत्पत्ति के बिना कारण विद्यमान नहीं रह सकता। परिवर्तन की प्रक्रिया स्वयं कार्य है। उसके अतिरिक्त और किसी को कार्य नहीं कह सकते। तत्त्वों, उनके एकत्रीकरण और कार्य की उत्पत्ति में भेद करना काल्पनिक है।[262] शंकराचार्य ने ठीक ही कहा है कि हम पूर्ववर्तिता और अनुपाधिकता अथवा अविभाज्यता दोनों पर ज़ोर नहीं दे सकते। यदि कारण और कार्य परस्पर अविभाज्य सम्बन्ध में हैं, अर्थात् अयुतसिद्ध हैं, तो कारण का सदा कार्य से पूर्व होना आवश्यक नहीं हैं। यह कहना अधिक यथार्थ होगा कि कारण और कार्य एक ही वस्तु की दो भिन्न-भिन्न अवस्थाएं है, अपेक्षा इसके कि वे दो भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं और अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं।[263] इस निष्कर्ष की पुष्टि न्याय के समवाय-सम्वन्ध अथवा अन्तर्निहितता पर बल देने से होती है। यदि कार्य तथा कारण परस्पर समवाय-सम्बन्ध से सम्बद्ध हैं तो उन्हें तादात्म्यरूप से सम्बद्ध मानना अधिक सरल होगा।

 

यह नहीं कहा जा सकता कि प्रकृति के तथ्य अपने में कार्यकारण-सम्बन्धों को इतने स्पष्ट रूप में धारण किए हुए हैं कि केवल आंख खोलकर देखने मात्र से ही उनका प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाएगा। हम कहते हैं कि '' '' का कारण है, अथवा यह कि '' आवश्यक हे या '' आनुषंगिक है, और इस प्रकार हम अपने अनुभव में क्रम का निर्माण करते हैं। कार्यकारणभाव हमारे विचार का एक रूप है अथवा बुद्धि की एक वृत्ति है। यह विश्व-नियमों के अधीन शासित होता है, यह एक स्वीकृत पक्ष है जिसे हम तर्कशास्त्र में स्वीकार कर लेते हैं और तब आगे चलते हैं, यद्यपि अध्यात्मशास्त्र में इसे सिद्ध करना होता है। जीवन में हम असली कारण को नहीं पूछते, अथवा किसी भी घटना की व्याख्या नहीं चाहते बल्कि एक विशेष कार्य को करने के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता है उनके ज्ञानमात्र से ही सन्तोष कर लेते हैं। मिट्टी घड़े का कारण है, जहां प्रकृति तो मिट्टी प्रदान करती है और कुम्हार उसका उपयोग अपने प्रयोजन के लिए करता है। अवस्थाओं या परिस्थितियों का कहीं अन्त नहीं है और इसलिए हमारी सब स्थापनाएं सापेक्ष होती हैं। हम कहते हैं कि यदि ऐसी ऐसी अवस्थाएं हों और यदि इसके विरोधी कारण हों तो अमुक कार्य अवश्य होगा। कारणों के भी कारण के विषय में जो कठिनाइयां हैं और उनकी वजह से जो विपरीत परिणाम हो सकता है, उन्हें नैय्यायिक केवल विवादास्पद कहकर त्याज्य समझता है। कारण और कार्य दोनों ही अस्थायी घटनाएं हैं। ये नित्यसत्य नहीं हैं, यद्यपि हम इनको अपना अस्तित्व रखने वाले पदार्थ समझ कर इनकी व्याख्या करने में प्रवृत्त होते हैं। परमाणु यदि कारणरूप हैं, तो वे यथार्थ नहीं हो सकते। कारण का परिवर्तन के अतिरिक्त कुछ अर्थ नहीं है और जो भी परिवर्तनशील है वह केवल अस्थायी घटनामात्र है। विश्लेषण करने पर कार्यकारणभाव केवल एक क्रम प्रतीत होता है ऐसी घटनाओं का, जो सदा एक-दूसरे पर निर्भर करती हैं। फिर भी हम उसे एक वास्तविक प्रत्यय की तरह प्रयुक्त करने को बाध्य हो जाते हैं। अनुभव के क्षेत्र में यह निश्चित रूप से उपयोगी है किन्तु हम इसकी नितान्त प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं कर सकते। कार्यकारणभाव अनुभव का एक रूपमात्र है।'[264]

 

कारण में कार्य का अभाव है, यह विचार जो न्याय ने स्वीकार किया है। इसका उद्गम इस प्राकृतिक पक्षपात में है कि यथार्थ वह है जो प्रत्यक्ष हुआ हो।[265] हम वस्तुतः उच्चतर और अधिक जटिल स्तरों को निम्न तथा सरल स्तरों में उदय होते देखते हैं, जिनमें वे पहले नहीं पाए गए थे। वर्तमान समय के अनेक वैज्ञानिक विचारक यथार्थसत्ता सम्बन्धी इस विचार को एकदेशिक श्रृंखला के रूप में स्वीकार करते हैं, अर्थात् सरल से जटिल की ओर बढ़ना, तथा नीचे से ऊपर की ओर बढ़ना। वे यथार्थवादी नैय्यायिक से इस विषय में मतभेद रख सकते हैं कि अन्तिम सरल इकाई का स्वरूप क्या है, किन्तु उनकी व्याख्या का आदर्श तत्त्वरूप से वही है। हम चाहे भौतिक परमाणुओं से आरम्भ करें, जैसा कि नैय्यायिक करता है, या इलेक्ट्रॉनों से आरम्भ करें, जैसा कि आधुनिक वैज्ञानिक करता है, अथवा निरपेक्ष सामग्री या इन्द्रिय-सामग्री अथवा देशकाल से आरम्भ करें और उत्तरोत्तर बढ़ती विविध जटिलताओं में से गुजरें, जैसा कि कुछेक समकालीन यथार्थवादी करते हैं, हमें एक अपर्याप्त आदर्श व्याख्या को स्वीकार करने के लिए बाध्य होना होता है। दार्शनिक बोधगम्यता की पहली शर्त यह है कि अधिक में से न्यून निकल सकता है, किन्तु न्यून में से अधिक नहीं निकल सकता। विचारधारा की स्वाभाविक प्रवृत्ति हमें इसी सिद्धान्त को स्वीकार करने की प्रेरणा करती है। नदी की धारा अपने निकाल-स्थान की ऊँचाई से ऊपर नहीं उठ सकती। यदि किसी मत में बोधगम्यता की पूर्व-सिद्ध शर्ते भंग होती हों तो हमें बताया जाता है कि उन शतों को छोड़ देना चाहिए। किन्तु हम अपनी मानसिक रचना में यथार्थवाद के आदेशानुसार परिवर्तन नहीं कर सकते। विचार उपलक्षित, किन्तु अव्यक्त अथवा सम्भावित को भी ग्रहण करने के लिए बाध्य होता है और स्वीकार करता है कि कार्य अव्यक्त रूप से अथवा सम्भावित रूप से कारण में पहले से अन्तर्निहित था। एक विशुद्ध यथार्थवादी की दृष्टि से विकास केवल आविर्भाव मात्र है। और यदि यह विकास को, आविर्भाव से कुछ अधिक मानता है तो अपना ही विरोध करता है। अलेक्जेण्डर सरीखे यथार्थवादी जब संघर्ष और उच्चतम गुणों अथवा जीवधारियों के विकास की चर्चा करते हैं तो वे देशकाल के अतिरिक्त, अन्य किसी सिद्धान्त की भी कल्पना कर लेते हैं। यदि यथार्थवादी केवल उसी को जो वास्तविक है, यथार्थ मानता है और सम्भावित को निरर्थक अभिव्यक्ति कहकर छोड़ देता है तो कार्यकारणवाद समझ में नहीं सकता। नैय्यायिक अपने मत का स्वयं उल्लंघन करता है जब वह परमाणुओं तथा आत्माओं की यथार्थता को स्वीकार करता है जोकि देखे नहीं जाते। वे यथार्थ जिन्हें हम देखते हैं, उत्पन्न होते तथा नष्ट होते हैं और इसलिए वे अनित्य हैं। नित्य पदार्थ हमें दृष्टिगोचर नहीं होते, इसके बावजूद हम उनके अस्तित्व की धारणा करते हैं। यथार्थवादी काल के महत्त्व को अतिशयोक्ति के साथ मानने के लिए बाध्य होता है। गुयाऊ 'काल' पर लिखी अपनी छोटी-सी पुस्तक में कहता है कि 'काल को हम आधुनिकों ने एक प्रकार की रहस्यपूर्ण यथार्थसत्ता बना दिया है और उसे दैव-सम्बन्धी पुराने विचार के स्थान में रखकर सर्वशक्तिमान बना दिया है।"[266] काल की परिपूर्णता-विषयक प्रकल्पना के आधार पर हमें कभी भी इस विश्व के, जो तो निश्चित है स्थायी है, उद्देश्य का निश्चय नहीं हो सकता। हम ऐसे जगत् में निवास करते हैं जो परिवर्तित होता रहता है और जहां किसी भी पदार्थ से कोई भी पदार्थ प्रकट हो सकता है। इस प्रकार की योजना में परमात्मा का कोई स्थान नहीं बनता, जब तक कि हम यह पवित्र धारणा कर लें कि पदार्थों का प्रवाह ऊपर की दिशा में है और स्वयं परमात्मा भी निर्माण की प्रक्रिया के अन्दर है। प्रोफेसर अलेक्जैण्डर हमें विश्वास दिलाते हैं कि दैव मन से आगे का उच्चतर गुण है। हमें अवश्य यह प्रश्न करना चाहिए कि फिर परमात्मा के आगे उससे ऊँचा क्या है?

 

नैय्यायिक आग्रहपूर्वक कहता है कि कार्य तथा कारण के मध्य में बराबर तारतम्य है। यदि हम न्याय के मत को आधुनिक विज्ञान की परिभाषा में सिद्धान्त के रूप में रखना चाहें तो कह सकते हैं कि यह समस्त कार्यकारणभाव को शक्ति के व्यय के रूप में मानता है। यह प्रकृति की कार्यप्रणाली में किसी भी अतीन्द्रिय शक्ति की सत्ता को मानने से निषेध करता है, यदि हम क्षण-भर के लिए इसके अदृष्ट पुण्य-पापविषयक विचार को दृष्टि से ओझल कर दें। कार्यकारणभाव केवल शक्ति का पुनर्विभाजन है। कारण परिस्थितियों का संग्रहमात्र है (कारण-सामग्री) और कार्य वह है जो उससे उत्पन्न होता है।[267] साधारण बुद्धि के इस विचार की मान्यता को ठीक बताने के लिए कि पदार्थ उत्पन्न होते तथा नष्ट होते हैं, नैय्यायिक प्रकृति के तारतम्य को दृष्टि से ओझल कर, खतरा मोल लेता है। यह इस सर्वमान्य विचार के साथ कि असत् से कुछ उत्पन्न नहीं होता, इस भाव को समन्वित करने की चेष्टा करता है कि वस्तुएं बननी प्रारम्भ होती हैं। पौधे में से फूल निकलता है, वृक्ष में से फल निकुलता है, तो भी वह अनुभव करता है कि पौधा, फल, फूल और वृक्ष सब अयथार्थ हैं। न्याय, कारण के तात्त्विक तादात्म्य को स्वीकार करता है और उसके मत में क्रमों में भेद होता है, जिससे नये गुणों का उदय होता है। अध्यात्मविद्या के समक्ष प्रश्न है कि क्या ये उत्पन्न हुए नये गुण यथार्थ हैं? यह बिलकुल सत्य है कि हमने उन्हें कार्य अवस्था में ही देखा है, कारणावस्था में नहीं देखा। किन्तु क्या इसी आधार पर हम अनुमान कर सकते हैं कि वे यथार्थ हैं? नैय्यायिक जब यह स्वीकार करता है कि संसार की परिवर्तनशील अवस्थाएं नश्वर हैं, तो वह यह भी स्वीकार करता है कि वे नितान्त यथार्थ नहीं हैं। यथार्थ अपरिवर्तित है, जबकि एकत्रीकृत पदार्थों के रूप में परिवर्तन होता है। प्रचलित रूप में हम कहते हैं कि पदार्थ अस्तित्व में आते तथा विनष्ट होते हैं। वस्तुतः स्पष्टरूप तत्त्वों का परस्पर सम्मिलन तथा पृथक्करण होता है, जो तो उत्पन्न हो सकते हैं, नष्ट हो सकते हैं, न्यून होते हैं और बढ़ाए जा सकते हैं। यथार्थ विद्यमान रहता है किन्तु उसकी अवस्थाओं में परिवर्तन होता है। प्रकृति के राज्य में भी निरन्तरता के प्रथम सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है। परमाणु विद्यमान रहते हैं जबकि उनके आकस्मिक मिश्रण अस्तित्व में आते हैं तथा नष्ट होते हैं। असत् से सत् की उत्पत्ति होती है, इस कथन का विरोधाभास नष्ट हो जाता है जब हम यह स्मरण करते हैं कि जो अंकुर में है वह वास्तविक रूप धारण कर लेता है। किसी एक स्थिति को भावात्मक रूप देकर उसकी पूर्वस्थिति को अभावात्मक रूप देना भाषा का दुरुपयोग करना है।

11. उपमान अथवा तुलना

 

उपमान अथवा तुलना वह साधन है जिससे हम किसी पूर्णतया ज्ञात पदार्थ के सादृश्य से किसी अन्य पदार्थ का ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह सुनकर कि जंगली बैल (गवय) गाय के समान होता है, हम अनुमान करते हैं कि वह पशु जो गाय के सदृश दिखाई देता है, गवय है।'[268] उपमान के तर्क में दो अवयव रहते हैं- (1) ज्ञेय पदार्थ का ज्ञान, (2) सादृश्य का प्रत्यक्ष ज्ञान। जहां प्राचीन नैय्यायिक पहले को नये ज्ञान का मूल कारण मानते थे, वहां अर्वाचीन नैय्यायिक सादृश्य ज्ञान को अधिक महत्त्व देते हैं।[269] मात्र सादृश्य ही, चाहे वह पूर्ण हो, चाहे पर्याप्त मात्रा में हो अथवा आंशिक हो, उपमान प्रमाण को युक्तियुक्त सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। सादृश्य अथवा तादात्म्य की पहली अवस्था में कोई नया ज्ञान उपलब्ध नहीं होता। गाय एक गाय के सदृश है, यह नहीं कहा जाता है। दूसरी, अर्थात् पर्याप्त सादृश्य की अवस्था में अनुमान प्रामाणिक ही हो यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भैंस गाय नहीं है, यद्यपि दोनों में बहुत-सी बातें सादृश्य की पाई जाती हैं। और यदि आशिक सादृश्य है, तब तो मामला और अधिक खराब है। एक तिल मेरु पर्वत नहीं हो सकता, यद्यपि अस्तित्व का गुण दोनों में समान है। उपमान के प्रामाणिक तर्क में हम सादृश्य के अंशों की उतनी गणना नहीं करते जितना कि उनके महत्त्व पर ध्यान देते हैं।'[270] सादृश्य को महत्त्वपूर्ण याआवश्यक होना चाहिए'[271] और कार्यकारण भाव के साथ उसका सम्बन्ध होना चाहिए।[272] उपमान तर्क, पदार्थ और उसके नाम में जो सम्बन्ध है उसका ज्ञान कराता है।'[273] इसका सम्बन्ध अभिज्ञान की समस्या के साथ है। हमें बताया जाता है कि गवय संज्ञा उस जानवर (नील गाय) की है जो गाय के साथ सादृश्य रखता है, और जहां हम ऐसे जानवर को देखते हैं उसे गवय कह देते हैं। परवर्ती तार्किकों का मत है कि यह माध्यमरूप अभिज्ञान केवल सादृश्य के ही कारण नहीं होता, अपितु असादृश्य (वैधम्र्य) के भी कारण होता है, जैसे कि हम एक घोड़े को पहचानते हैं जो कि गाय से भिन्न जानवर है, क्योंकि उसके खुर फटे नहीं होते जो कि गाय का विशेष धर्म है, अथवा जैसे हम ऊंट को पहचानते हैं, ऊंची गरदन आदि उसके विशेष लक्षणों द्वारा।'[274] इस अर्थ में उपमान-प्रमाण आधुनिक काल के सादृश्य-तर्क के अनुकूल नहीं बैठता।

 

जैसा कि हम देखेंगे, न्यायशास्त्र सत्य के विषय में उपयोगितावादी के मत को स्वीकार करता है, जो हमें सफल प्रेरणा देता है। अनुभूत पदार्थों के सम्बन्ध में तो यह कसौटी उपयुक्त हो सकती है, किन्तु इन्द्रियातीत सत्य इसके क्षेत्र से परे है। नैय्यायिक इस कठिनाई का समाधान उपमान के द्वारा करने की कोशिश करता है। यदि प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रतिपादित आयुर्वेद के सिद्धान्त परीक्षा करने पर सत्य सिद्ध हुए तो आध्यात्मिक विज्ञान भी, जो उन्हीं ऋषियों द्वारा प्रतिपादित है, अवश्य सत्य होना चाहिए।

 

क्योंकि उपमान में सादृश्य के प्रत्यक्ष का विशेष भाग है, अतः दिड्नाग इसे प्रत्यक्ष ज्ञान की कोटि में ही रखता है। वैशेषिक इसकी गणना अनुमान में करता है, क्योंकि तर्क को इस रूप में रखा जा सकता है: "यह पदार्थ गवय है, क्योंकि यह एक गाय के समान है, और जो गाय के समान होता है वह गवय होता है।[275] सांख्य तर्क करता है कि उपमान ज्ञानप्राप्ति का स्वतन्त्र साधन नहीं है, क्योंकि अरण्यरक्षक का निर्देश एक आप्त (शाब्दिक) ज्ञान है और सादृश्य का प्रत्यक्ष ज्ञान का एक दृष्टान्त है।[276] भासर्वज्ञ भी इसे शाब्दिक ज्ञान के ही अंदर रखता है। उपमान का तर्क एक प्रकार से जटिल है, क्योंकि इसमें अरण्यरक्षक द्वारा प्राप्त शाब्दिक ज्ञान कि गवदगी के समान है यह अवयव सम्मिलित है, प्रत्यक्ष ज्ञान का भी अवयव है क्योंकि हम गवय को जंगल में देखते हैं, एक अवयव स्मृति का है क्योंकि जब हम गवय को देखते हैं तो हमें (अरण्यरक्षक का) कथन स्मरण हो आता है. एक अवयव अनुमान का है क्योंकि हम धारणा करते हैं इस सामान्य प्रतिज्ञा की कि जो गाय के समान है यह गवय है, और अन्ततोगत्वा वह शान जो इस प्रकार के तर्क का विशेष लक्षण है इस प्रकार के जानवर की संज्ञा गवय है। अन्तिम ही विशेष रूप से उपमान प्राणको देन है और इसे ज्ञान के अन्य भेदों के साथ मिला देना चाहिए, यद्यपि इसमें कुछ रूप अन्य के समान हो सकते हैं।'[277]

12. आप्त प्रमाण

 

ज्ञान के मुख्य स्रोतों में 'आप्त प्रमाण' आता है। हम ऐसी अनेक वस्तुओं के अस्तित्य की, जिन्हें हमने स्वयं नहीं देखा, जिनके विषय में विचार ही किया, अन्य पुरुषों के प्रमाणित कथन के आधार पर स्वीकार कर लेते हैं। हमें प्रचलित साक्ष्य, ऐतिहासिक परंपरा तथा धर्मशास्त्रों की दिव्य वाणी के आधार पर बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त होता है। इस प्रकार की ज्ञान प्राप्ति की विधि में तार्किक दृष्टि से जो विवेचनीय विषय सन्निविष्ट है उनके विषय में शब्द अथवा आप्त प्रमाण के अन्तर्गत हम विचार करेंगे।

 

शब्दों के उद्गम तथा स्वरूप, तथा आशय और वाक्यों के विन्यास के विषय में न्याय का क्या विचार है, इसका उल्लेख संक्षेप में कर सकते हैं। आकाश जो समस्त देश को व्याप्त किए हुए है, किन्तु वायु नहीं, शब्द का अधिष्ठान है।[278] शब्द को एक निर्वात (शून्य) स्थान में भी उत्पन्न किया जा सकता है, भले ही हम उसे सुन तकें क्योंकि उसे हमारे कान तक पहुंचाने के लिए वायु का वहां अभाव है। शब्द किस कोटि का है यह वायु पर निर्भर नहीं है, किन्तु उसका ऊँचापन आदि वायु पर निर्भर है।'[279] शब्द दो कठोर पदार्थों के परस्पर संयोग से उत्पन्न होता है। एक शब्द दूसरे शब्द को, दूसरा एक अन्य शब्द को उत्पन्न करता है, और यह क्रम तब तक चलता है जब तक कि आगे कोई बाधक पदार्थ प्रकट नहीं हो जाता जहां पहुँचकर यह क्रम रुक जाता है।'[280] केवल इसलिए कि इसका अधिष्ठान दुर्बोध (इन्द्रियातीत) है, हम यह तर्क नहीं कर सकते कि शब्द नित्य है।[281]

           

शब्द अक्षरों से मिलकर बनता है जिससे अभिधा अथवा लक्षणा के द्वारा किसी पदार्थ का संकेत होता है। प्रत्येक शब्द कुछ अर्थ रखता है और इसी को सामान्यतः शब्द तथा उस पदार्थ के मध्य जिसे यह द्योतन करता है, एक प्रकार का सम्बन्ध समझा जाता है।[282]

 

शब्दार्थ के तथ्य की व्याख्या वैय्याकरणों ने 'स्फोट' के सिद्धान्त पर की है।[283] इसक अनुसार कोई भी अक्षर अकेला जैसे, 'गा' अथवा '' या कुल अक्षर 'गाय' शब्द के अनुरूप पदार्थ का ज्ञान उत्पन्न नहीं करा सकते, क्योंकि प्रत्येक अक्षर उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाता है। यदि हम यह भी मानें कि पूर्व के अक्षरों ने जो भाव छोड़ा है वह सबसे अन्तिम अक्षर की सहायता करता है, तो भी कई अक्षर मिलकर भी पदार्थ के ज्ञान की व्याख्या नहीं कर सकते। अक्षरों के अतिरिक्त और उनसे ऊपर कोई वस्तु है जिसके द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है, और वह स्फोट है, अर्थात् शब्द का सारभूत तत्त्व जिसका आविर्भाव शब्द, अक्षर अथवा वाक्य द्वारा होता है।[284] शब्द का यह सारतत्त्व पदार्थ का बोध कराता है। केवल अकेला अक्षर, जब तक कि वह पूरा शब्द बन जाए, किसी पदार्थ का संकेत नहीं कर सकता। पदस्फोट के समर्थकों का तर्क है कि केवल एक पद अथवा एक शब्द अर्थ का बोध करा सकता है। इसी प्रकार वाक्यस्फोट के समर्थकों का कहना है कि केवल एक वाक्य पूरे अर्थ का संकेत कर सकता है। वाक्यस्फोट के समर्थकों के अनुसार, वाक्य वाणी का केवल प्रारम्भ है, जबकि शब्द वाक्यों के भाग हैं और अक्षर शब्दों के भाग हैं। स्फोट अथवा शब्द के सारतत्त्व को नित्य कहा गया है और वह स्वयंभूः है जिसका संकेतित पदार्थ के साथ स्थायी सम्बन्ध है। अक्षर, शब्द और वाक्य नित्य-अर्थों का केवल आविर्भाव करते हैं, उन्हें उत्पन्न नहीं करते। नैय्यायिक का मत है कि जो कुछ सार्थक है वह शब्द है,'[285] और ज्योंही हम शब्द के अन्तिम अक्षर को सुनते हैं, हमें उसके अर्थ का ज्ञान हो जाता है। अन्तिम अक्षर '' को सुनने के साथ ही हमें पहले अक्षर 'गा' की स्मृति हो जाती है और पूरा शब्द 'गाय' हमारे मस्तिष्क में जाता है। इस प्रकार हम शब्द और पदार्थ का जो रूढ़िगत सम्बन्ध है उसके द्वारा पदार्थ का ज्ञान कर लेते हैं।[286]

 

शब्द और अर्थ के मध्य जो सम्बन्ध है वह प्रकृति के कारण नहीं, अपितु लोकाचार से है, और इस मत का समर्थन हमारे इस अनुभव से भी होता है कि हम किस विधि से शब्दों के अर्थों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। हमें प्रचलित प्रयोग, व्याकरण तथा शब्दकोश के द्वारा शब्दों के अर्थों का ज्ञान प्राप्त होता है। वेदान्त इसके साथ भावभंगी को भी जोड़ देता है।'[287] यह रूढ़ि कि अमुक अमुक शब्द अमुक अमुक अर्थ का वाचक होगा, ईश्वर संस्थापित (ईश्वरसंकेत) है।'[288] परवर्ती न्याय स्वीकार करता है कि मनुष्य भी रूढ़ि की स्थापना करते हैं (इच्छामात्रं शक्तिः)[289], यद्यपि मानुषिक रूढ़ि को पारिभाषिक संज्ञा दी गई है, क्योंकि वह भिन्न-भिन्न मनुष्यों के साथ बदलती रहती है।

 

शब्दों का द्योतित अर्थ क्या है, व्यक्त, अथवा आकृति, अथवा जाति, या उक्त सब कुछ?"[290] व्यक्ति वह है जिसकी एक निश्चित आकृति (मूर्ति) हो और जो विशेष गुणों का वासस्थान हो।'[291] यह व्यक्त है और उसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।"[292] आकृति विशिष्ट गुण है; गलकंबल का व्यवस्थापन गाय की आकृति है। जाति एक नमूना अथवा वर्ग है और जाति के पदार्थ में पाया जानेवाला सामान्य विचार है। यह हमें प्रस्तुत व्यक्ति के सदृश पदार्थों का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करता है।"[293] न्याय का मत है कि शब्द व्यक्तिउसकी आकृति तथा उसकी जाति, तीनों को बताता है. यद्यपि भिन्न-भिन्न परिमाण में।'[294] व्यवहार में हम आकृति का उल्लेख करते हैं। अधिक रुचि बढ़ने से शब्द व्यक्ति का निर्देश करता है, और जब हथ सामान्य विधार को सूचित करने की कोशिश करते हैं तो जाति का जालेख करते हैं। शब्द आकृति का संकेत करता है, व्यक्ति को बतलाता है तथा जाति का गुण निवेश करता है। विशुद्ध अनिर्दिष्ट लक्षण नाम की कोई चीज नहीं है। यह किसी-किसी रूप में निर्दिष्ट (अविच्छिन्न) है। फिर आकृति भी अपने-आप में पर्याप्त नहीं है। मिट्टी से बनो गाया की मूर्ति को हम गाय नहीं कह सकते यद्यपि आकृति गाय की ही है, किन्तु उसमे अतियत अन्य गुणों का अभाव है। व्यावहारिक प्रयोग से इस मत की पुष्टि सोती है कि शब्द व्यक्तियों का संकेत करते हैं।[295]

 

बौद्ध विचारकों के अनुसार, शब्द निश्चित पदाथों के वाचक नहीं हैं, बल्कि ऐसे अन्य पदायों का निराकरण करते हैं, जिनका ध्यान भूल से मन में जाता है। 'गाय' शब्द से घोड़े आदि अन्य पदाथों का निराकरण (अपोह) हो जाता है। इस निराकरण के कारण इप अनुमान करते हैं कि 'गाय' शब्द गाय रूपी पदार्थ का निर्देश करता है [296] उद्योतकर अपोह के सिद्धान्त की आलोचना निम्नलिखित युक्तियों के आधार पर करता है[297]-जब तक पहले से विध्यात्मक संकेत का ग्रहण हुआ हो, निषेधात्मक संकेत का विचार मन में उठ ही नहीं सकता। प्रत्येक निषेध का एक विध्यात्मक आधार सोस है। मात्र निषेध का कुछ अर्थ ही नहीं, जबकि प्रत्येक निषेधात्मक कथन के साथ विध्यामक कथन अर्थापत्ति द्वारा जुड़ा हुआ है। यद्यपि परस्पर विरोधी दो शब्दों में एक का संकेत दूसरे का निराकरण कर देता है, परन्तु 'सब' जैसे शब्द में इस प्रकार का निराकरण सम्भव नहीं है।[298] प्रत्येक शब्द किसी विध्यात्मक वस्तु का संकेत काला है, जो अन्य पदाथों से उसका मात्र भेद ही नहीं होती है।"[299]

 

यह आपत्ति की जाती है कि शब्द पदार्थों का संकेत नहीं कर सकते, क्योंकि वे पदार्थों के साथ नहीं रहते, और पदार्थों के उपस्थित रहने पर भी विद्यमान रहते हैं, जैसे कि इस निषेधात्मक निर्णय में कि 'यहां कोई घड़ा नहीं है।"[300] इस आपत्ति के उत्तर में वाचस्पति का कहना है कि शब्द व्यापक का संकेत करता है जिसमें देश काल में बंटे हुए सभी व्यक्ति सम्मिलित रहते हैं, और इसलिए वह वर्तमान तथा भूतकाल के भी व्यक्तियों का संकेत करता है।[301] और यही कहा जा सकता है कि शब्द केवल एक अमूर्त विचार है, क्योंकि यह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के भिन्न-भिन्न रूपों को लक्षित नहीं कर सकता है। शब्द विशिष्ट रूपों का ही उल्लेख करता है और ये पदार्थ के ही अन्दर रहते हैं। हम अपने अनुभव में शब्दों का प्रयोग करते हैं और ये जीवन में सफलता की ओर ले जाते हैं। यदि शब्द केवल मानसिक बिम्बों से ही सम्बन्ध रखता, बाह्य पदार्थों से रखता तो यह सब असम्भव होता।[302]

 

कभी-कभी यह कहा जाता है कि शब्द तथा पदार्थ के मध्य क्या सम्बन्ध है, हम इसकी कल्पना नहीं कर सकते। शब्द एक गुण है, और इसके द्वारा प्रकट किया गया पदार्थ द्रव्य है, और इन दो के मध्य संयोग सम्बन्ध नहीं हो सकता। यदि शब्द के द्वारा प्रकट किया गया पदार्थ भी गुण होता, तो भी दो गुणों के मध्य यह सम्बन्ध असम्भव है।'[303] शब्द निष्क्रिय हैं और संयोग निर्भर करता है दोनों में से किसी एक गति पर। शब्द आकाश और पदार्थ आकाश दोनों निष्क्रिय हैं और उनमें कोई संयोग नहीं हो सकता। वात्स्यायन स्वीकार करता है कि शब्द और उसके अर्थ के बीच सम्बन्ध उत्पादक रूप (प्राप्तिलक्षण) नहीं है। 'अग्नि' शब्द अग्नि पदार्थ को उत्पन्न नहीं करता।[304] यही कारण है कि शाब्दिक बोध इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष ज्ञान से कम स्पष्ट होता है।[305] तो भी बोध के रूप में वह किसी भी तरह न्यून नहीं होता।

 

वाक्य सार्थक (भावपूर्ण) शब्दों का संग्रह है। हमें वाक्य को बनानेवाले शब्दों का बोध होता है और उसके बाद उनके अर्थों का। शब्दों के बोध अपने पीछे संस्कार छोड़ जाते हैं जिनको वाक्य के अन्त में स्मरण किया जाता है, और तब विभिन्न अर्थ एक प्रकरण में एकसाथ सम्बद्ध हो जाते हैं। जहां प्राचीन नैय्यायिकों का कहना है कि शाब्दिक ज्ञान का मुख्य कारण मौखिक स्मृति से प्राप्त पदार्थों का स्मरण है, वहां आधुनिक नैव्यायिक तर्क करते हैं कि मौखिक स्मृति मुख्य कारण है। वाक्य का अर्थ निर्भर करता है- (1) आकांक्षा, पारस्परिक आवश्यकता अथवा परस्पराश्रय, अथवा अन्य शब्द के अभाव में किसी शब्द की अभिलषित अर्थ को संकेत करने की असमर्थता पर, (2) योग्यता अथवा वाक्य के भाव के अनुरूप होने की क्षमता तथा उसे निरर्थक किंवा असफल होने देने की क्षमता पर, (3) सन्निधि, निकटता अथवा बीच में लम्बा व्यवधान दिए बिना शब्दों के शीघ्रता के साथ एक के बाद एक उच्चारण पर। ये शब्दों के पदयोजना-सम्बन्धी, तार्किक तथा ध्वन्यात्मक सम्बन्धों पर विशेष वल देते हैं। ऐसे शब्दों के संकलन से जो परस्पर एक-दूसरे पर आश्रित हो, यथा मनुष्य, घोड़ा और बस्ती, कोई भाव नहीं निकलता। एक ऐसे वाक्य का, जैसे 'आग से सींचे,' कुछ भी अर्थ नहीं है, क्योंकि यह बुद्धि में नहीं आता। इसी प्रकार देर-देर से उच्चारण किए गए शब्द कुछ अर्थ नहीं रख सकते। वाक्य ऐसे शब्दों से बनता है जो एक-दूसरे पर आश्रित, और जिन्हें एक-दूसरे के अगल-बगल रखकर कोई रचना की जा सके। गंगेश इसमें एक चौची शर्त भी जोड़ता है, अर्थात् वक्ता के आशय का ज्ञान। एक ऐसे वाक्य, जैसे 'सैन्धवम् आनय' का अर्थ यह हो सकता है कि 'घोड़ा लाओ' और यह भी हो सकता है "नमक लाओ!" इसका निश्चित अर्थ हमें तभी मालूम हो सकता है जबकि हमें वक्ता के मन में क्या है, इसका ज्ञान हो। निश्चित अर्थ को प्रकट करने की योग्यता में इस आवश्यकता को भी सम्मिलित कर लेना चाहिए।[306] जहां योग्यता के लिए औपचारिक संगति की आवश्यकता है, वहां तात्पर्यज्ञान अथवा वक्ता के अभिप्राय के ज्ञान से आशय वास्तविक संगति कहा जा सकता है।'[307]

 

प्रतिज्ञाओं को तीन वर्गों में बांटा गया है विधि, निषेध और व्याख्या (अर्थवाद)[308] शब्द का उपयोग जब ज्ञान के उद्गम के रूप में किया जाता है तो उसका तात्पर्य होता है, 'आप्तीपदेश' अर्थात् एक विश्वस्त व्यक्ति का कथन।'[309] आप्त से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो किसी क्षेत्र-विशेष में विशेषज्ञ हो, 'वह जो किसी विषय का प्रत्यक्ष प्रमाण रखता है और उसे दूसरों को पहुंचाना चाहता है, जिससे कि वे इसे समझ लें।' ऐसे व्यक्ति किसी भी जाति अथवा वर्ण के क्यों हों, 'ऋषि हों, आर्य हों अथवा म्लेच्छ हों।"[310] जब किसी युवक के मन में यह सन्देह हो कि अमुक नदी पार की जा सकती है या नहीं, तो बस्ती के किसी पराने अनुभवी पुरुष से इस प्रकार की सूचना मिलने पर कि वह पार की जा सकती है, उस पर विश्वास करना चाहिए।

 

ये विश्वसनीय कथन दृश्य जगत् से अथवा अदृश्य जगत् से सम्बन्ध रखते हैं। यह कथन कि कुनैन नामक दवा ज्वर का इलाज करती है' है पहले प्रकार का है, और 'धार्मिक जीवन से स्वर्ग मिलता है' यह दूसरे प्रकार का है। ऋषियों के शब्द दूसरे अर्थात् अदृश्य-जगत् से सम्बन्ध रखते हैं।[311] उनके कथनों पर विश्वास करना चाहिए, क्योंकि इस विश्व के सम्बन्ध में उनके कचन, जिनकी सचाई जांची जा सकती थी, सत्य सिद्ध हुए हैं। वेदों के निर्माता आप्तपुरुष अर्थात् विश्वसनीय पुरुष है, क्योंकि उन्होंने सत्य का अष्टि से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया था, उन्हें मनुष्य-मात्र से प्रेम था तथा उनमें अपने ज्ञान को दूसरों को देने की इच्छा थी।[312]

 

उदयन तथा अन्नंभट्ट जैसे परवर्ती नैय्यायिक और वैशेषिक विचारक परमेश्वर को वेदों का नित्य निर्माता मानते हैं। उदयन इस मत का निराकरण करता है कि वेदों की प्रामाणिकता उनके नित्य, दोषहीन तथा महान् सन्तों द्वारा स्वीकृत नहीं हो सकती। वेदों की नित्यता के विषय में मीमांसक का जो मत है उसका उदयन विरोध करता है, और युक्ति देता है कि नित्यता की सूचक कोई निरन्तर परम्परा नहीं है, क्योंकि इस तरह की परम्परा वर्तमान सृष्टि से पूर्व, प्रलय के समय, नष्ट हो गई होगी। परन्तु वात्स्यायन परम्परा की निरन्तरता को स्वीकार करता है तथा कहता है कि ईश्वर प्रत्येक सृष्टि के आरम्भ में वेदों का पुनर्निर्माण करता है, तभी उक्त परम्परा को स्थिर रखता है।[313] यदि मीमांसक अपने इस मत के समर्थन में वेदमन्त्र प्रस्तुत करते हैं कि वेद नित्य हैं और ऋषि उनके निर्माता नहीं अपितु केवल मन्त्रद्रष्टा हैं, तो वेदों के उद्गम के विषय में न्याय-मत के समर्थन में अन्य मन्त्र उद्धृत किए जाते हैं।'[314] इसके अतिरिक्त, वेदों में ऐसे वाक्य हैं जो निर्माता को उपलक्षित करते हैं।

 

वेदों की प्रामाणिकता के विरोध में असत्य, पूर्वापर, विरोध, पुनरुक्ति आदि जो आपत्तियां उठाई जाती हैं उन सबका यह कहकर निषेध किया गया है कि वे टिकनेवाली नहीं हैं।'[315] उनकी प्रामाणिकता की रक्षा इस आधार पर की जाती है कि उनके विषय एक संगत और पूर्ण इकाई का निर्माण करते हैं। वेदों को स्वीकार करने का अर्थ मिथ्याविश्वास अथवा ईश्वरीय वाणी का आश्रय लेना नहीं है।

 

दिङ्नाग विरोध में कहता है कि शब्द, ज्ञान का स्वतन्त्र साधन नहीं है। जब हम विश्वसनीय कथन की बात करते हैं तो उससे हमारा तात्पर्य या तो यह होता है कि जो व्यक्ति बोल रहा है वह विश्वसनीय है, या यह होता है कि यह तथ्य जिसे वह कह रहा है, विश्वसनीय है। पहली अवस्था में यह अनुमान है, और दूसरी अवस्था में प्रत्यक्ष ज्ञान है।[316] यद्यपि शब्द अनुमान के समान है, क्योंकि यह पदार्थ के ज्ञान को उसके चिह्न द्वारा दूसरे को पहुँचाता है। किन्तु इसका चिड अनुमान के चिह्न से भिन्न है, यहां यह संकेत करता है कि शब्दों का प्रयोग करनेवाला व्यक्ति विश्वात के योग्य है या नहीं।[317] अनुमान में चिह्न (लक्षण) तथा लक्षित पदार्थ का सम्बन्ध प्राकृतिक है, किन्तु शब्द प्रमाण में यह सम्बन्ध रूढ़िगत है।'[318] यदि हम यह तर्क उपस्थित करें कि शाब्दिक बोध शब्दों के अर्थों की स्मृति के पीछे आता है और इसलिए यह आनुमानिक ज्ञान है, तो संदिग्ध बोध तथा उपमानजनित ज्ञान को भी आनुमानिक मानना होगा। यदि समय के तीन भागों से सम्बद्ध होने के कारण शाब्दिक बोध अनुमान की कोटि में आता है तो तर्क की अन्यान्य विधियां भी अनुमान की कोटि में जाएगी। यदि इस बात पर बल दिया जाए कि शाब्दिक बोध निश्चित तथा निषेधात्मक के साहचर्य पर निर्भर करता है और यह कहा जाए कि 'घड़ा' शब्द का तात्पर्य है पदार्थ का बोध, और जहां इसे वाणी से उच्चारण नहीं किया जाता वहां बोध नहीं होता, तो प्रत्यक्ष ज्ञान भी अनुमान की कोटि में जाएगा, क्योंकि यह वहां विद्यमान हे जहां घड़ा विद्यमान है और जहां घड़ा विद्यमान नहीं वहां प्रत्यक्ष ज्ञान भी नहीं।[319] इस प्रकार शब्दों द्वारा प्राप्त ज्ञान प्रत्यक्ष, अनुमान तथा उपमान प्रमाण द्वारा प्राप्त ज्ञान से भिन्न है।'[320]

13. ज्ञान के अन्य रूप

 

न्याय के अभिमत ज्ञान के चार साधनों में मीमांसक अर्थापत्ति तथा भाट्ट मत के अनुयायी और वेदान्ती अभाव को भी जोड़ते हैं। पौराणिक लोग परम्परा तथा सम्भावना को भी ज्ञान के प्रामाणिक साधनों में सम्मिलित करते हैं। नैय्यायिक का मत है कि ज्ञान के सभी प्रकार चार प्रमाणों के अन्दर समा जाते हैं।'[321]

 

ऐतिह्य अथवा परम्परा शब्द प्रमाण के अन्दर जाता है।[322] यदि प्रवाद किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा प्रचारित किया गया हो जो विश्वस्त है तो यह वैसा ही प्रामाणिक है जैसे कि शब्द प्रमाण अर्थापत्ति अथवा उपलक्षण एक अन्य तथ्य के आधार पर (अर्थात्) एक नये तथ्य को प्राप्त करना, अथवा किसी चीज के विषय में धारणा बनाना (आपत्ति) है। यह एक ऐसे पदार्थ के विषय में धारणा बनाना है जो अपने-आप प्रत्यक्ष नहीं हुआ है, बल्कि प्रत्यक्ष या अनुमान द्वारा जाने गए अन्य पदार्थ से उपलक्षित हुआ है। मोटे शरीर वाला देवदत्त दिन में नहीं खाता। इससे यह उपलक्षित हुआ कि वह रात में खाता है, क्योंकि बिना खाना खाए कोई मोटा नहीं हो सकता। मीमांसक, जो इसे ज्ञान का स्वतन्त्र साधन मानते हैं, इसे एक विकल्पात्मक काल्पनिक परार्थानुमान मानते हैं।[323] गंगेश के अनुसार, यह एक निषेधात्मक अनुमान का उदाहरण है जो साध्य पद के अभाव द्वारा हेतु के अभाव की स्थापना करता है। भाषापरिच्छेद के अनुसार, हेतु तथा साध्यपद के मध्य निषेधात्मक सम्बन्ध (व्यतिरेकव्याप्ति) को पहचान लेने से अर्थापत्ति सम्पन्न हो जाती है।[324] सम्भव अथवा अन्तर्गमन वह है जहां कि हमें पूर्ण के एक अंश का, जोकि उसका अवयव है, बोध होता है। यह निगमनात्मक अनुमान की अवस्था है। वस्तुतः यह सांख्यिक अभिव्याप्ति है

 

अभाव अथवा अनस्तित्व को कभी-कभी एक स्वतन्त्र प्रमाण माना गया है। यद्यपि न्यायवैशेषिक दर्शन अभाव को एक प्रमेय पदार्थ करके स्वीकार करता है पर वह यह नहीं मानता कि उसके जानने के लिए किसी विशिष्ट प्रमाण की आवश्यकता है। हम पहले देख आए हैं कि किस प्रकार अस्तित्व एक प्रमेय पदार्थ है जो अपने अधिकरण के साथ विशेषणता (अर्थात् गुण और गुणी) सम्बन्ध से सम्बद्ध है। अभावात्मक प्रमेय पदार्थ उसी श्रेणी का है जिस श्रेणी का उसका अधिकरण है जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है, अन्यथा उसके अभाव का ज्ञान उसके अधिकरण से संकेतित नहीं हो सकता। नितान्त अभाव कल्पनातीत है। अभाव, जो ज्ञान का विषय है, सापेक्ष है।'[325]

 

अनुमान द्वारा हम पदार्थों के अभाव का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। अभाव से तात्पर्य केवल निषेध ही से नहीं है, बल्कि वैषम्य से भी है। एक पदार्थ जो विद्यमान है और दूसरा जो विद्यमान नहीं है, उनमें परस्पर वैषम्य है। जैसे कि वर्षा का अभाव तीव्र वायु के साथ बादलों के सम्बन्ध का ज्ञान कराता है, क्योंकि यदि तीव्र वायुरूपी बाधा मार्ग में जाती तो गुरुत्वाकर्षण के नियमों के अनुसार बादलों का नीचे पृथ्वी पर बरस जाना आवश्यक था।[326] दो परस्पर विरोधी पदार्थों में से एक के अभाव से दूसरे के अस्तित्व की स्थापना होती है। न्यायदर्शन का तर्क युग्मशाखीय विभाग के सिद्धान्त को लेकर आगे बढ़ता है। सजातीय तथा विजातीय उदाहरणों का भेद इसी कल्पना के आधार पर टिका हुआ है। दो परस्पर-विरोधी निर्णयों की अवस्था में ऐसा नहीं हो सकता कि दोनों ही सत्य हों अथवा दोनों ही असत्य हों। '' या तो '' है और या '' नहीं है। परस्पर विरोधी दो में से एक अवश्य सत्य होगा, क्योंकि कोई और मार्ग सम्भव नहीं है।[327] यदि हम किसी वस्तु के अभाव का अनुमान दूसरी वस्तु के अस्तित्व से करते हैं तो यह केवल अनुमान का विषय है।'[328] वात्स्यायन का कहना है कि 'जिस समय विद्यमान वस्तु बोध होता है उस समय अभावात्मक वस्तु का बोध नहीं होता, अर्थात् अभावात्मक वस्तु का अज्ञान उसी समय होता है जबकि विद्यमान वस्तु का बोध होता है। जब दीपक जलता है और जो देखा जाने योग्य पदार्थ है उसे दृश्य बना देता है, तो वह जो उसी प्रकार से दिखाई नहीं देता जिस प्रकार उक्त देखने योग्य पदार्थ दिखाई देता है, वह अभावात्मक माना जाता है। उस समय मानसिक प्रक्रिया निम्नलिखित प्रकार की होती है: 'यदि पदार्थ का अस्तित्व होता तो यह दिखाई देत्ता और क्योंकि वह दिखाई नहीं देता इसलिए निष्कर्ष अवश्य यही निकलता है कि वह विद्यमान नहीं है।[329] प्रशस्तपाद इस विचार का समर्थन करता है। 'जिस प्रकार कार्य का रूप कारण के अस्तित्व का संकेत करने वाला होता है, उसी प्रकार कार्य का अभाव कारण के अभाव का संकेत करने वाला होता है, उसी प्रकार कार्य का अभाव कारण के अभाव का संकेत करता है।"[330] शब्द के द्वारा भी अभाव का बोध हो सकता है।'[331]

14. तर्क और बाद

 

तर्क अथवा परोक्ष प्रमाण में हम एक भ्रमात्मक धारणा को लेकर चलते हैं और प्रदर्शित करते हैं कि किस प्रकार यह हमें असंगतियों की ओर प्रेरित करती है। यदि जीवात्मा नित्य होती तो यह अपने कर्मों के फलों का उपभोग कर सकती, पुनर्जन्म में आती और मोक्ष ही प्राप्त कर सकती। इसलिए जीवात्मा नित्य है। एक असत्य आधार वाक्य को मान लेने से हम असत्य साध्यपद को मानने के लिए बाध्य होते हैं।'[332] तर्क एक प्रकार का ऐसा अनुमान है जो अन्य सबसे भिन्न है, क्योंकि यह किसी प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर नहीं है। यह हमें परोक्षरूप से ठीक ज्ञान की ओर ले जाता है।[333] वात्स्यायन के अनुसार, यह हमें निश्चयात्मक ज्ञान नहीं करा सकता, यद्यपि यह हमें इतना बतला देता है कि एक प्रस्तुत पक्ष का विपरीत असम्भव है।"[334] उद्योतकर का तर्क है कि आत्मा के विषय में तर्क हमें ऐसा कहने के योग्य नहीं बनाता कि आत्मा अनादि है बल्कि केवल इतना कहने के योग्य बनाता है कि ऐसा होना चाहिए।'[335] तर्क अपने-आप में प्रामाणिक ज्ञान का साधन नहीं है, यद्यपि प्रकल्पनाओं के प्रस्तुत करने में यह मूल्यवान सिद्ध होता है।

 

प्राचीन न्याय ग्यारह प्रकार के तर्क को स्वीकार करता है जिसे आधुनिक न्याय ने घटाकर पांच ही रखा है। इनमें मुख्य वह है जिसका हमने वर्णन प्रमाणवाचितार्थप्रसंग नाम से किया है। अन्य चार हैं, आत्माश्श्रयम, अन्योन्याश्रय, चकिक अथवा चक्ररूपी तर्क, और अनवस्था, अर्थात् अन्तविहीन पश्चाद्गति प्रमाणबाधितार्थप्रसंग को भी हेत्वाभास माना गया है, क्योंकि यह ऐसा निष्कर्ष निकालता है जो असंगल है। किन्तु जब हम भूल को अतिक्रमण कर जाते हैं तब हम एक निश्चित निर्णय पर पहुंच जाते हैं।[336]

 

वाद पराांनुमान की विधि का स्वतंत्ररूप से प्रयोग करके सत्य के निश्चय करने का लक्ष्य रखता है। किन्तु यह प्रायः बिगड़कर जल्प के रूप में परिणत हो जाता है, जिसका लक्ष्य विजय प्राप्त करना हो जाता है और यह वितण्डा कहलाता है, जो समालोचना के लिए समालोचना करने में ही प्रसन्न होता है।'[337] इस प्रकार के निष्फल वाद-विवाद का अन्त प्रतिपक्षी को उसकी भूल मनवाकर तथा उसे अपनी हार मानने के लिए बाध्य करने से ही हो सकता है।[338]

 

15. स्मृति

 

समस्त ज्ञान दो श्रेणियों में विभवत किया गया है-अनुभव, जो पूर्ण चेतना की पुनरावृत्ति होकर वर्तमानकाल का ज्ञान है, और स्मृति, जो पूर्ण-अनुभवों के आधार पर स्मरणात्मक चेतना के रूप में प्रकट होती है।'[339] यदि हम स्मृतिजन्य ज्ञान को निकाल दें तो समस्त भूतकाल निश्चितता के क्षेत्र से निकल जायेगा। स्मृतिज्ञान संस्कारों के आधार पर स्थित है। स्मृति की परिभाषा करते हुए कहा जाता है कि आत्मा का मन के साथ एक विशेष प्रकार का सम्बन्ध होने से तथा पूर्व-अनुभव के जो संस्कार शेष रहते हैं उनके कारण हमें स्मृति होती है।[340] कभी-कभी यह कहा जाता है कि यह केवल संस्कार मात्र से उत्पन्न होती है। और इस प्रकार की यह पहचान (प्रत्यभिज्ञा) से भिन्न है। जहां संस्कार स्मृति का तात्कालिक कारण है, वहां पहचान किसी अन्य पदार्थ के साथ प्रस्तुत पदार्थ के तादात्म्य के प्रत्यक्ष ज्ञान के कारण होती है। न्याय, स्मृति को ज्ञान का एक पृथक् साधन नहीं मानता, क्योंकि हमें इसमें पदार्थों का कोई बोधात्मक ज्ञान प्राप्त नहीं होता बल्कि केवल पिछले अनुभव की पुनरावृत्ति उसी रूप तथा क्रम में होती है जिसमें कि वह भूतकाल में कभी रहा था और अब विलुप्त हो चुका था।' [341]स्मृतिविषयक ज्ञान की प्रामाणिकता उस पूर्व-अनुभव की प्रामाणिकता पर निर्भर करती है जिसकी कि यह पुनरावृत्ति है। कुछ तार्किक-स्मृतिजन्य ज्ञान को प्रामाणिक बोध के अन्दर सम्मिलित करते हैं, जबकि प्रामाणिक बोध का कभी विरोध नहीं होता।"[342] स्मृतियां एक साथ नहीं होतीं क्योंकि ध्यान (प्रणिधान), चिह का प्रत्यक्ष तथा अन्य (लिंगादि ज्ञान) एक ही समय में उपस्थित नहीं रहते।'[343]

16. संशय

 

संशय कई अवस्थाओं में उत्पन्न होता है, यथा (1) कई पदार्थों के गुणसाम्य से, जैसे कि हम सायंकाल के झुटपुटे में एक लम्बी आकृति को देखें और निश्चय कर सकें कि वह मनुष्य है अथवा खंभा है, क्योंकि लम्बाई दोनों में सामान्य है; (2) ऐसे गुणों के ज्ञान में जोकि किसी भी पदार्थ में समान रूप से पाए जाएं, जैसे कि यह निश्चय करने में हमें कठिनाई हो कि शब्द नित्य है या नहीं, क्योंकि यह मनुष्य में अथवा पशु में नहीं पाया जाता जो अनित्य है, और परमाणु में ही पाया जाता है जो नित्य है; (3) परस्पर-विरोधी साक्ष्य से, जैसे कि दो प्रामाणिक पुरुषों में जीवात्मा के स्वरूप के विषय में मतभेद हो जाता है; (4) प्रत्यक्ष ज्ञान की अनियमितता से, जैसे कि जल दिखाई पड़ने पर हम यह निश्चय कर सकें कि यह वास्तविक जल है जैसाकि तालाब में होता है, अथवा कृत्रिम है जैसाकि मृगमरीचिका में दिखाई देता है, क्योंकि ज्ञान दोनों जगह ही समान है; (5) दिखाई देने की अनियमितता से, जोकि पूर्वावस्था से विपरीत है।"[344] उद्योतकर के अनुसार, पिछली दोनों अवस्थाएं जब तक कि सामान्य अनिश्चयात्मक लक्षणों का ज्ञान हो, अपने-आप संशय को जन्म नहीं देतीं। क्योंकि देखा गया अवयव एक से अधिक पदार्थों से सम्बद्ध होता है, अतः यह एक साथ ही दो प्रकार के विचारों की श्रृंखला की स्मृति को ताजा कर देता है, जिनके बीच मन दोलायमान रहता है और इससे संशय उत्पन्न होता है।' [345] दोनों में से एक भी विचार दृश्य ज्ञान के साथ सम्बद्ध नहीं रहता, यद्यपि क्रमशः दोनों का संकेत मिलता है।[346] संशयात्मक वृति अवांछित रूप में बढ़कर क्रिया को रोक देती है।[347]

 

यदि दोनों विकल्पों में से एक को दबा दिया जाए और मन का झुकाव दूसरे की ओर हो जाए तो उसे, 'ऊहा' अर्थात् अटकल के नाम से जाना जाता है, और कुछ समय के लिए हम एक विकल्प को मान लेते हैं।'[348] एक विकल्प को दबाने का कारण दूसरे का सशक्त होना होता है। यदि हम धान के खेत में किसी लम्बे पदार्थ को देखें तो हम अटकल लगाएंगे कि यह कोई मनुष्य है, लम्बा खंभा नहीं है, क्योंकि धान के खेत में खंभे प्रायः नहीं पाए जाते। जहां संशयावस्था में दोनों विकल्पों की एक समान संभावना रहती है, वहां ऊहा में एक की संभावना दूसरे की अपेक्षा अधिक होती है।

 

एक अन्य संशयात्मक अवस्था भी है जिसे अनध्यवसाय कहते हैं। यह स्मृति के अभाव में उत्पन्न होती है। हम वृक्ष को देखते हैं किन्तु उसका नाम भूल जाते हैं और पूछते हैं कि "इसका क्या नाम हो सकता है?"[349] शिवादित्य के अनुसार, यहां भी हमारे सामने दो वैकल्पिक सुझाव रहते हैं यद्यपि वे चेतना में विद्यमान नहीं रहते। यदि हमें उनका ज्ञान हो तो एक संशयात्मक अवस्था उपस्थित हो जाती है। प्रशस्तपाद, श्रीधर तथा उदयन एक अन्य ही समाधान प्रस्तुत करते हैं। वे इसे अन्यमनस्कता अथवा अधिक ज्ञान की अभिलाषा के कारण परिचित अथवा अपरिचित पदार्थ का सन्दिग्ध (अनिश्चित) ज्ञान मानते हैं। जब कोई परिचित पदार्थ समीप से गुज़रता है और हम उसे उधर ध्यान होने, अर्थात् अन्यमनस्क होने के कारण नहीं देखते तो इसे अनध्यवसाय के नाम से पुकारते हैं, क्योंकि हमें यह तो पता है कि कुछ समीप से गुजर गया किन्तु यह कौन-सा पदार्थ था, सो हम नहीं जानते। किन्तु जब पदार्थ अपरिचित है और हमें उनका नाम नहीं मालूम तो हमारे सम्मुख अपूर्ण ज्ञान की अवस्था उपस्थित होती है, जोकि साधारण संशय की अवस्था से भिन्न है।[350]

 

संशय से हमें अनुसंधान की प्रेरणा मिलती है, क्योंकि यह हमारे अन्दर इस अभिलाषा को उत्पन्न कर देता है कि जिसका पता नहीं मिल सका है उसे जाने। यह अनुमान के पूर्व आता है, यद्यपि प्रत्यक्ष ज्ञान अथवा आप्त ज्ञान में इसका कोई स्थान नहीं है। हमारा ज्ञान सुनिश्चित हो जाने पर संशय लुप्त हो जाता है संशय तथा भूल (भ्रांति) में अन्तर है। इन्हें एक साथ मिलाना चाहिए, क्योंकि ऐसा ज्ञान होना कि हम पदार्थ के स्वरूप से अनभिज्ञ हैं, यथार्थ ज्ञान अथवा प्रत्यय है। संशय अपूर्ण ज्ञान है, जबकि भूल मिथ्या ज्ञान है।

17. हेत्वाभास

 

न्यायदर्शन का तर्क विस्तार के साथ उन सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है जिनके द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है। यह प्राकृतिक विज्ञान के दृष्टिकोण को स्वीकार करता है, और इसके नियम उपदेशरूप होकर सामान्य उक्तियां हैं जिनका आधार उन साधनों का सूक्ष्म निरीक्षण है जिनके द्वारा मानव अपनी बौद्धिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि करता है। साधारणतः ज्ञान यथार्थ होता है; भूल संयोगवश होती है और तभी होती है जबकि वे अवस्थाएं नहीं होतीं जिनमें यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है। हेत्वाभास तब होते हैं जबकि ज्ञानोत्पादक शक्तियों के मार्ग में हस्तक्षेप होता है। न्याय हेत्वाभासों के विषय का विस्तृत विवेचन करता है और इसमें आश्चर्य भी क्या है, क्योंकि हमें स्मरण रखना चाहिए कि विचार में भूल होने की सम्भावना के कारण ही न्यायशास्त्र के निर्माण की आवश्यकता हुई।

 

शब्द-जाल की ओर भी पर्याप्त ध्यान दिया गया है, क्योंकि न्यायशास्त्र का उद्देश्य वितण्डावादियों की कला अर्थात् वाक्छल से हमारी रक्षा करना है। शाब्दिक छल के तीन प्रकार बतलाए गए हैं (1) वाछल-एक ऐसे शब्द का प्रयोग किया जाता है जो सन्दिग्धार्थ है और श्रोता उसका वक्ता के आशय से भिन्न अर्थ लगाता है। जब कोई यह कहता है कि "अमुक लड़का नवकंबल है," अर्थात् जिसके पास नया कंबल है (अथवा नौ कंवल है), तो वाछली उत्तर देता है कि "नहीं, इसके पास नौ नहीं अपितु एक ही कम्बल है।" (2) सामान्यछल-एक व्यक्ति विशेष के विषय में किए गए कथन को जब सारी जाति पर लागू कर दिया जाए, जैसे किसी के यह कहने पर कि "यह ब्राह्मण विद्वान और आचारवान है", वक्रोक्ति-पटु पुरुष आक्षेप करे कि नहीं, सभी ब्राह्मण विद्वान और आचारवान नहीं होते। (3) अपचारछल-अर्थात् जहां आलंकारिक भाषा में किए गए कथन को शाब्दिक अर्थ में लिया जाता है। जैसे कि कोई कहे कि "फांसी के तख्ते चिल्ला उठते हैं", तो उस पर वक्रोक्तिपटु-पुरुष प्रतिवाद करे कि फांसी के तख्ते जैसे निर्जीव पदार्थ से यह आशा नहीं की जा सकती कि वह चिल्ला सके।

 

जाति एवं निग्रहस्थान जैसे हेत्वाभास अधिकतर भाषा-सम्बन्धी दोष हैं, तर्क-सम्बन्धी नहीं। तार्किक हेत्वाभास परार्थानुमानात्मक युक्ति के विभिन्न अवयवों के सम्बन्ध में होते हैं। पक्षपद-सम्बन्धी दोष अर्थात् पक्षाभास, और दृष्टान्त सम्बन्धी दोष अर्थात् दृष्टान्ताभास उतने महत्त्व के नहीं हैं, जितने कि हेत्वाभास अर्थात् मध्य पद (हेतु) सम्बन्धी दोष हैं। गौतम'[351] इस प्रकार के दोषों के पांच भेद बतलाते हैं: (1) सव्यभिचार, अर्थात् जिसके द्वारा एक से अधिक प्रकार के परिणाम निकल सकें। दुर्बोध इन्द्रियातीत होने के कारण शब्द को चाहे तो हम नित्य समझ लें चाहे अनित्य, क्योंकि नित्य परमाणु और अनित्य पदार्थों के ज्ञान भी दुर्बोध अर्थात् इन्द्रियातीत हैं। हेतु में साध्यपद व्याप्त नहीं है। क्योंकि हेतु बराबर किसी एक विकल्प का सहचारी नहीं है, इसलिए परवर्ती तर्कशास्त्र में इसे अनैकान्तिक कहा गया है। इसके तीन उपविभाग माने गये हैं, अर्थात् () साधारण, जहां कि हेतु अत्यन्त व्यापक है, () असाधारण, जहां कि हेतु बहुत संकुचित है, और () अनुसंहारी अर्थातु अनिश्चयात्मक, जहां हेतु की यथार्थता नहीं जांची जा सकती।'[352] (2) विरुद्ध अर्थाद यह तर्क जिससे स्वयं प्रतिज्ञा का ही खण्डन हो जाए।[353] (3) प्रकरणसम, अर्थात् जो इतिक्षा के ही समान हो, जिससे कोई परिणाम नहीं निकल सकता, क्योंकि यह उसी प्रश्न को उठाता है जिसका कि इसे उत्तर देना होता है। यह दो परस्पर विरोधी विशेषताओं में से एक को रखता है, जबकि दोनों ही अप्रत्यक्ष हैं।[354] परवर्ती न्याय इसे सत्प्रतिपक्ष के अन्तर्गत लाता है। जब यह सव्यभिचार के साथ तादात्म्यरूप धारण कल्ला है तो यह एक ऐसा तर्क हो जाता है जिससे दोनों पक्ष अपना तात्पर्य निकाल सकते हैं।[355] (4) साध्यसम वह तर्क है जो साध्य से भिन्न नहीं है, अर्थात् जिसे सिद्ध करने को स्वयं एक प्रमाण की आवश्यकता है। यह असिद्ध विषय है जिसके विभिन्न प्रकार भाने गए हैं, जैसे () स्वरूपासिद्धि, जहां हेतु का स्वरूप बिल्कुल ही अज्ञात है, जैसे हम कहें कि शब्द नित्य है क्योंकि यह दिखाई देता है। यहां शब्द का दिखाई दे सकना बिलकुल ही अज्ञात है; () आश्रयासिद्धि जहां हेतु का कोई आधार ही नहीं, जैसे कि इस उदाहरण में कि 'परमात्मा का अस्तित्व नहीं है, क्योंकि वह झरीरधारी नहीं है, यदि परमात्मा नहीं है तो अशरीरता का कोई अधिष्ठान ही नहीं है, () अन्यथासिद्धि, अर्थात् जो अन्य प्रकार से ज्ञात हो।'[356] (5) कालातीत, अर्थात् ऐला तर्क जिसका समय बीत चुका हो। यह तर्क कि "शब्द स्थायी है क्योंकि इसकी अभिव्यक्ति दो पदार्थों के संयोग से होती है जैसे कि रंग की, इस प्रकार के हेत्वाभास का उदाहरण है। घड़े का रंग तब प्रकट होता है जबकि दीपक के साथ घड़े का संयोग होता है, यद्यपि इस संयोग से पहले भी रंग विद्यमान था और संयोग के विच्छेद हो जाने पर भी बराबर रहेगा। किन्तु उक्त उदाहरण के आधार पर यह तर्क करना कि डोल के साथ डंडे का संयोग होने से पहले भी शब्द विद्यमान था और संयोग के विच्छेद हो जाने पर भी विद्यमान रहेगा, हेत्वाभास है। यह तर्क कालातीत है क्योंकि दीपक और घड़े के संयोग के साथ ही रंग की अभिव्यक्ति होती है, जबकि डंडे और डोल का संयोग होने के बाद शब्द की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार के हेत्वाभास को 'बाधित' भी कहते हैं जहांकि हेतु एक पक्ष की स्थापना करता है, पर उसमें विपरीत की सिद्धि अन्य प्रमाण द्वारा होती है। परवर्ती तर्कशास्त्र में हेत्वाभासों की सूची बहुत अधिक विकसित है।

18. सत्य अथवा प्रमा

 

ज्ञान के सिद्धान्त का प्रारम्भ जिस समय से होता है वह यह नहीं है कि हमें ज्ञान है, बल्कि यह है कि हम उसका दावा करते हैं। यह प्रमाणवादी का कार्य है कि वह अनुसंधान करे कि उस दावे को कहां तक निभाया जा सकता है। प्रमा अथवा सत्य के सिद्धांत में नैव्यायिक जिज्ञासा करना आरम्भ करता है कि कहां तक हमारा दावा तर्क की कसौटी पर न्यायोचित ठहर सकता है। यह यह जताने का प्रयत्न करता है कि चार प्रमाणों के द्वारा जो ज्ञान हमें प्राप्त होता है वह प्रामाणिक है अथवा उसकी प्राकृतिक आवश्यकता है।

 

न्यायशास्त्र द्वारा प्रतिपादित ज्ञान के सिद्धान्त का माध्यमिक मत के संशयवाद के साथ विरोध है। संशयवादी का कहना है कि हमें पदार्थों के तत्त्व का ज्ञान नहीं होता और हमारा विचार परस्पर इतना विरोधी है कि उसे यथार्थ नहीं समझ सकते। इस मत के विरोध में वात्स्यायन का कहना यह है कि यदि माध्यमिक को इतना निश्चय है कि किसी भी पदार्थ की सत्ता नहीं है, तो उसे अपने ही मत के अनुसार कम-से-कम इतनी निश्चितता तो स्वीकार है ही, और इस प्रकार उसके मत का अपने से ही खण्डन हो जाता है। और यदि 'किसी पदार्थ की सत्ता नहीं' इसे सिद्ध करने के लिए उसके पास कोई प्रमाण नहीं है और यह उसकी केवल अयुक्तियुक्त कल्पना है तो इसके विपरीत मत को स्वीकार किया जा सकता है और फिर जो प्रमाणों की मान्यता को स्वीकार करता है, वह या तो किसी प्रमाण के आधार पर ऐसा कर सकता है या बिना किसी आधार के ऐसा कर सकता है। यदि पिछली बात है तो तर्क करना निरर्थक है। और यदि पहली बात है तो वह प्रमाणों की मान्यता को स्वीकार कर ही लेता है। मौलिक संशयवाद क्रियात्मक नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को विचार प्रारंभ करते ही ज्ञान के सिद्धांतों को स्वीकार करना ही पड़ता है और जो विचार की क्रिया को स्वीकार करता है उसे यथार्थ के जगत् को भी स्वीकार करना ही होता है, क्योंकि विचार तथा यथार्थसत्ता एक-दूसरे पर आश्रित हैं। वात्स्यायन का कहना है कि यदि विचार द्वारा पदार्थों का विश्लेषण सम्भव है तो यह कहना अयुक्तियुक्त होगा कि पदार्थों की वास्तविक कृति का ज्ञान नहीं हो सकता। और यदि, दूसरे पक्ष में, पदाथों की वास्तविक सत्ता का ज्ञान नहीं होता तो विचार द्वारा पदार्थों का विश्लेषण सम्भव नहीं है। इस प्रकार यह कहना कि विचार द्वारा पदार्थों का विश्लेषण होता है किन्तु पदाथों की वास्तविक प्रकृति का ज्ञान नहीं होता, इन दोनों वक्तव्यों में परस्पर विरोध है।'[357] उद्योतकर इसे इस प्रकार रखता है कि "यदि विचार द्वारा पदाथों का विश्लेषण हो सकता है तो पदार्थ असत् नहीं हो सकते, और यदि पदार्थों की सत्ता नहीं है तो विचार द्वारा पदाथों का विश्लेषण सम्भव नहीं है।"[358] न्यायशास्त्र का विश्वास है कि ज्ञान यथार्थसत्ता का सूचक है।'[359]

 

वात्स्यायन विज्ञानवाद के इस मत पर आक्षेप करता है कि अनुभूत पदार्थ साक्षात्कार के सूत्रमात्र हैं। स्वप्न में देखे गए पदार्थ यथार्थ नहीं होते क्योंकि जाग्रतावस्था में हमें उनका अनुभव नहीं होता। यदि इन्द्रियग्राह्य अनुभूत जगत् का अस्तित्व होता तो स्वप्न की अवस्थाएं सम्भव ही हो सकतीं। स्वप्नों की विविधता उनके कारणों की विविधता पर आश्रित है।'[360] यदि यथार्थसत्ता का अस्तित्व होता तो सत्य तथा भ्रांति में भेद के बराबर होता और इस तथ्य का कोई स्पष्टीकरण सम्भव होता कि प्रत्यक्ष ज्ञान में हमें स्वेच्छाचार प्राप्त नहीं है।[361] और न्याय उस मत से भी सन्तुष्ट नहीं है जो पदार्थों को स्वयंसिद्ध, यद्यपि क्षणिक स्वभाव वाले, मानता है। यदि पदार्थ हमारे ज्ञान के कारण हैं तो उनका अस्तित्व कार्य अर्थात् ज्ञान से पूर्व होना आवश्यक है। किन्तु पदार्थों की क्षणिकता के मत से, जिस पदार्थ ने ज्ञान उत्पन्न किया उसका दूसरे ही क्षण में, जबकि उसका प्रत्यक्ष होता है, अस्तित्व नहीं रहता। ऐसे मत को किस प्रकार स्वीकार किया जा सकता है, क्योंकि प्रत्यक्ष ज्ञान तो केवल उस पदार्थ का होता है जोकि उसी क्षण में विद्यमान हो। ऐसा तर्क उपस्थित करना कि पदार्थ का तिरोधान प्रत्यक्ष ज्ञान का समकालीन है, निःसार है, क्योंकि हम वर्तमानकाल के पदार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते हैं कि भूतकाल के पदार्थ का। इस प्रकार अनुमान तक भी असम्भव हो जाएगा।[362] फिर, कार्य और कारण के आधान और आधेय के रूप में परस्पर सम्बद्ध होने के