भारतीय दर्शन-2

 

 

 

 

 

 

 

 

हिन्दू धर्म-पुनर्जागरण काल से वर्तमान तक

(Indian Philosophy का हिन्दी अनुवाद)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

डॉ. राधाकृष्णन

 

 

 

 

राजपाल

 

 

 

अनुवाद

 

नन्दकिशोर गोभिल

 

 

 

स्थापित 1912

100 वर्षो की श्रेष्ठ प्रकाशन परम्परा

राजपाल

 

 

रू.650

 

ISBN: 9788170281887

 

संस्करण : 2024

 

हिन्दी अनुवाद राजपाल एण्ड सन्ज़

BHARATIYA DARSHAN (Part-2) by Dr. S. Radhakrishnan

मुद्रक : जी.एस. ऑफसेट, दिल्ली

 

राजपाल एण्ड सन्ज़

1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली-110006

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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रस्तावना

 

इस खण्ड में भी, जिसका प्रतिपाद्य विषय वैदिक षड्दर्शन का विवेचन है, मैंने पहले खण्ड जैसी ही योजना तथा विधि अपनाई है। इसके अतिरिक्त, मैंने उस भावना को भी अपनाने का प्रयत्न किया है जो दार्शनिक व्याख्या के लिए उचित मानी गई है, अर्थात् प्राचीन लेखकों तथा उनके विचारों की सुचारु रूप से व्याख्या करके उन्हें दर्शन तथा धर्म-सम्बन्धी आज के विचारणीय विषयों के सन्दर्भ में रखना। वाचस्पति मिश्र ने, जो हिन्दू विचारधारा के लगभग सभी दर्शनों के टीकाकार हैं, प्रत्येक पर अपनी लेखनी का जिस प्रकार प्रयोग किया है उससे प्रतीत होता है मानो वे उनके सिद्धान्तों में भी विश्वास रखते हैं। विचारधारा की उन प्रवृत्तियों को जो प्राचीन काल में परिपक्वता को पहुँची थीं और जो अनेक दुर्बोध ग्रंथों में लिपिबद्ध हैं, बुद्धिपूर्वक प्रस्तुत करने में यह आवश्यक हो गया कि विशेष दृष्टिकोणों को चुना जाए, उन पर बल दिया जाए और उनकी आलोचना तक की जाए। यह कार्य, स्वभावतः यह प्रकट कर देता है कि मेरी अपनी विचारधारा किस दिशा में चल रही है। इस प्रकार के कार्य में क्योंकि विवरण-सम्बन्धी अनेक प्रकार के निर्णयों का समावेश रहता है, अतः यह आशा नहीं की जा सकती कि यह पुस्तक निर्णय-सम्बन्धी भूलों से मुक्त होगी। किन्तु मैंने, प्रमाणों में किसी प्रकार की उलट-फेर करने से बचते हुए, केवल विषयपरक प्रतिपादन का ही प्रयत्न किया है।

 

मैं यहाँ इस बात को दोहरा देना आवश्यक समझता हूँ कि मेरे विषय-प्रतिपादन को सर्वथा पूर्ण मान लेना चाहिए। क्योंकि, लगभग प्रत्येक अध्याय में जितने विषय का प्रतिपादन है, उसके अध्ययन के लिए एक पूर्णतया सन्नद्ध विशेषज्ञ अपना पूरा जीवन लगा देता है। विशिष्ट दर्शनों के ब्यौरेवार विवेचन के लिए पृथक् निबन्धों की आवश्यकता है। मेरे कार्य का क्षेत्र सीमित है, अर्थात् विविध विचारधाराओं के आन्दोलनों की, उनकी प्रेरक भावनाओं और उनके परिणामों की एक मोटी रूपरेखा तैयार करना। भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के अल्प-महत्त्व के लेखकों में परस्पर जो गौण मतभेद पाए जाते हैं, उनको दर्शाने की मैंने वस्तुतः कोई चेष्टा नहीं की है। शैव, शाक्त और परवर्ती वैष्णव दर्शनों के सम्बन्ध में, जो भारत के दार्शनिक विकास की अपेक्षा धार्मिक इतिहास से अधिक सम्बन्ध रखते हैं, मेरा विवेचन बहुत संक्षिप्त तथा सार-नात्र है। यदि मैं प्रकल्पनात्मक भारतीय विचारधारा के नाना रूपों की वास्तविक भावना का एक चित्र, जो भले ही अपर्याप्त हो, अपने पाठकों के सम्मुख रख सका तो मुझे पूर्ण सन्तोष हो जाएगा।

 

यदि यह खण्ड पहले की अपेक्षा कुछ कठिन है तो मैं आशा करता हूं कि पाठक अनुभव करेंगे कि कठिनाई का निर्माता / नहीं हूँ, बल्कि कुछ सीमा तक यह कठिनाई विषयगत है और गम्भीर विवेचन के कारण है जो विषय के अध्ययन के लिए आवश्यक है। मैंने अनुभव किया कि तथ्यों के पुंज को एक ऐसे विशद आख्यान में समो कर रखना, जिसे पाठक सम्भ्रम में पड़े बिना और बिना उकताए समझ सके, एक ऐसा कार्य है जिसे पहले से मापना मेरे लिए सम्भव नहीं था। शैथिल्य तथा पाण्डित्याभिमान के बीच में से मध्यम मार्ग का अवलम्बन करके चलने में मैं कहाँ तक सफल हो सका हूँ, इसका निर्णय पाठक करेंगे। साधारण पाठक के सुभीते के विचार से अधिक पारिभाषिक अचवा सन्दर्भ-सम्बन्धी वाद-विवाद ऊपर और नीचे कुछ स्थान छोड़ कर पृथक् रूप से दिए गए हैं।

 

इस खण्ड के संकलन में मुझे विविध सम्प्रदायों के संस्कृत के सन्दर्भों से ही नहीं, बल्कि ड्यूसन और कीथ, थिबीत और गार्ब, गंगानाथ झा और विद्याभूषण प्रभृति विद्वानों के लेखों से भी बहुत सहायता मिली है। मैं  अपने मित्रों, श्रीयुत बी. सुब्रह्मण्य अय्यर तथा प्रोफ़ेसर जे. एस. मैकेंजी का अत्यन्त कृतज्ञ हूँ क्योंकि इन्होंने पुस्तक की पाण्डुलिपि और प्रूफ के अनेक भागों को देखने का कष्ट किया तथा अनेकों मूल्यवान् सुझाव दिए। प्रोफ़ेसर . बेरीडेल कीथ ने प्रूफ़ देखने की कृपा की और इनकी समालोचनाओं से पुस्तक को बहुत लाभ हुआ। मुझे पुस्तक के प्रधान सम्पादक प्रोफ़ेसर जे. एच. म्यूरहेड को भी हार्दिक धन्यवाद देना है, जिन्होंने प्रथम खण्ड के समान ही, इस खण्ड के लिए भी अपना बहुत समय और चिन्तन प्रदान किया। यदि इनकी उदार सहायता प्राप्त होती तो इस पुस्तक में जो भी त्रुटियाँ अब रहगई हैं उनसे कहीं अधिक रह जातीं।

 

- राधाकृष्णन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

पहला अध्याय. 15

विषय-प्रवेश. 15

1. दर्शनशास्त्रों का प्रादुर्भाव. 15

2. वेदों के साथ सम्बन्ध... 16

3. सूत्र-साहित्य... 19

4. सामान्य विचारधाराएं. 21

दूसरा अध्याय. 26

न्यायशास्त्र का तर्कसम्मत यथार्थवाद. 26

1. न्याय और वैशेषिक.. 26

2. न्याय की प्रारम्भिक अवस्था.... 29

3. साहित्य और इतिहास. 32

4. न्याय का क्षेत्र. 40

5. परिभाषा का स्वरूप. 43

6. प्रत्यक्ष अथवा अन्तर्दृष्टि... 44

7. अनुमान-प्रमाण.. 67

8. परार्थानुमान. 70

9. आगमन अनुमान. 80

10. कारण.. 85

11. उपमान अथवा तुलना.. 95

12. आप्त प्रमाण.. 97

13. ज्ञान के अन्य रूप. 104

14. तर्क और बाद. 106

15. स्मृति.. 108

16. संशय. 108

17. हेत्वाभास. 110

18. सत्य अथवा प्रमा.. 112

19. भ्रान्ति.... 121

20. न्याय के प्रमाणवाद का सामान्य मूल्यांकन. 125

21. भौतिक जगत्. 132

22. जीवात्मा और उसकी नियति.. 135

23. आत्मा तथा चेतना के सम्बन्ध के विषय में न्याय के सिद्धान्त पर कुछ समालोचनात्मक विचार. 142

24. नीतिशास्त्र... 149

25. ब्रह्मविद्या.... 154

26. उपसंहार. 161

तीसरा अध्याय. 164

वैशेषिक का परमाणु-विषयक अनेकवाद. 164

1. वैशेषिक दर्शन. 164

2. निर्माण काल तथा साहित्य... 165

3. ज्ञान का सिद्धान्त... 169

4. पदार्थ. 171

5. द्रव्य... 174

6. परमाणुवाद की प्रकल्पना.. 181

7. गुण.. 190

8. कर्म अथवा क्रिया.. 194

9. सामान्य... 195

10. विशेष. 200

11. समवाय. 201

12. अभाव. 204

13. नीतिशास्त्र... 207

14. ईश्वर. 210

15. वैशेषिक दर्शन का सामान्य मूल्यांकन. 213

चतुर्थ अध्याय. 230

सांख्य दर्शन. 230

1. प्रस्तावना.. 230

2. पूर्ववर्ती परिस्थिति.. 231

3. साहित्य... 236

4. कार्यकारणभाव. 239

5. प्रकृति.. 241

6. गुण.. 244

7. विकास. 247

8. देश और काल. 257

9. पुरुष. 259

10. लौकिक जीवात्मा.... 262

11. पुरुष और प्रकृति.. 266

12. पुरुष और बुद्धि.... 270

13. ज्ञान के उपकरण.. 272

14. ज्ञान के स्रोत. 275

15. सांख्य की ज्ञान-सम्बन्धी प्रकल्पना पर कुछ आलोचनात्मक विचार. 281

16. नीतिशास्त्र... 284

17. मोक्ष.. 288

18. परलोक-जीवन. 291

19. क्या सांख्य निरीश्वरवादी है. 293

20. सामान्य मूल्यांकन. 296

पाँचवाँ अध्याय. 310

पतंजलि का योगदर्शन. 310

1. प्रस्तावना.. 310

2. पूर्ववर्ती परिस्थिति.. 312

3. निर्माणकाल और साहित्य... 315

4. सांख्य और योग. 316

5. मनोविज्ञान. 318

6. प्रमाण.. 323

7. योग की कला.. 324

8. नैतिक साधना.. 326

9. शरीर का नियंत्रण.. 327

10. प्राणायाम. 329

11. इन्द्रिय-निग्रह. 329

12. ध्यान. 330

13. समाधि अथवा एकाग्रता.. 330

14. मोक्ष.. 335

15. कर्म. 337

16. अलौकिक सिद्धियां.. 338

17. ईश्वर. 341

18. उपसंहार. 344

छठा अध्याय. 346

पूर्वमीमांसा.. 346

1. प्रस्तावना.. 346

2. रचनाकाल और साहित्य... 347

3. प्रमाण.. 351

4. प्रत्यक्ष ज्ञान. 352

5. अनुमान. 358

6. वैदिक प्रामाण्य... 359

7. उपमान प्रमाण.. 364

8. अर्थापत्ति.. 364

9. अनुपलब्धि.... 365

10. प्रभाकर की ज्ञान-विषयक प्रकल्पना.. 366

11. कुमारिल की ज्ञानविषयक प्रकल्पना.. 370

12. आत्मा.... 376

13. यथार्थता का स्वरूप. 382

14. नीति शास्त्र... 385

15. अपूर्व. 388

16. मोक्ष.. 390

17. ईश्वर. 391

2. सातवाँ अध्याय. 397

वेदान्तसूत्र. 397

1. प्रस्तावना.. 397

2. सूत्रकार तथा सूत्र की रचना का काल. 399

3. अन्य सम्प्रदायों के साथ सम्बन्ध... 401

4. अध्यात्मविद्या-सम्बन्धी विचार. 401

5. उपसंहार. 410

आठवाँ अध्याय. 412

शंकर का अद्वैत वेदान्त... 412

1. प्रस्तावना.. 412

2. शंकर का जन्म काल तथा जीवन. 414

3. साहित्य... 417

4. गौडपाद. 419

5. अनुभूत ज्ञान का विश्लेषण.. 420

6. सृष्टिरचना.. 426

7. नीतिशास्त्र और धर्म. 428

8. गौडपाद और बौद्धधर्म. 430

9. भर्तृहरि.. 432

10. भर्तृप्रपंच. 433

11. उपनिषदों तथा ब्रह्मसूत्र के साथ शंकर का सम्बन्ध... 433

12. शंकर तथा अन्य सम्प्रदाय. 437

13. आत्मा.... 441

14. ज्ञान का तन्त्र या रचना.. 450

15. प्रत्यक्ष.. 452

16. अनुमान. 458

17. शास्त्रप्रमाण.. 459

18. विषयी विज्ञानवाद का निराकरण.. 461

19. सत्य की कसौटी.. 463

20. तार्किक ज्ञान की अपूर्णता.. 466

21. अनुभव. 473

22. अनुभव, तर्क तथा श्रुति.. 477

23. परा तथा अपरा विद्या.... 481

24. शंकर के सिद्धान्त और कुछ पाश्चात्य विचारों की तुलना.. 483

25. विषयनिष्ठ मार्ग देश, काल और कारण.. 488

26. ब्रह्म... 494

27. ईश्वर अथवा शरीरधारी परमात्मा.... 503

28. ईश्वर का मायिक रूप. 515

29. जगत् का मिथ्यात्व... 523

30. मायावाद. 526

31. अविद्या.... 534

32. क्या जगत् एक भ्रांति है?. 538

33. माया और अविद्या.... 546

34. प्राकृतिक जगत्. 549

35. जीवात्मा.... 553

36. साक्षी और जीव. 560

37. आत्मा और जीव. 562

38. ईश्वर और जीव. 567

39. एकजीववाद तथा अनेकजीववाद. 569

40. नीति शास्त्र... 571

41. शंकर के नीतिशास्त्र पर किए गए कुछ आरोपों पर विचार. 580

42. कर्म. 592

43. मोक्ष.. 593

44. परलोक.. 603

45. धर्म. 606

46. उपसंहार. 612

नौवाँ अध्याय. 616

रामानुज का ईश्वरवाद. 616

1. प्रस्तावना.. 616

2. आगम. 618

3. पुराण.. 619

4. रामानुज का जीवन. 622

5. इतिहास और साहित्य... 623

6. भास्कर. 627

7. यादवप्रकाश. 628

8. ज्ञान के साधन. 629

9. कारण तथा द्रव्य... 635

10. आत्मा तथा चैतन्य... 635

11. ईश्वर. 638

12. जीवात्मा.... 645

13. प्रकृति.. 650

14. सृष्टि-रचना.. 652

15. नैतिक तथा धार्मिक जीवन. 656

16. मोक्ष.. 663

17. सामान्य मूल्यांकन. 665

दसवाँ अध्याय. 674

शैव, शाक्त तथा परवर्ती वैष्णव ईश्वरवाद. 674

1. शैव सिद्धान्त... 674

2. साहित्य... 675

3. सिद्धान्त... 676

4. प्रत्यभिज्ञा दर्शन. 683

5. शाक्त सम्प्रदाय. 686

6. मध्वाचार्य. 689

7. जीवन तथा साहित्य... 690

8. ज्ञान का सिद्धान्त... 691

9. ईश्वर. 693

10. जीवात्मा.... 694

11. प्राकृतिक जगत्. 695

12. ईश्वर और जगत्. 696

13. नीतिशास्त्र और धर्म. 697

14. समीक्षात्मक विचार. 700

15. निम्बार्क.. 702

16. वल्लभ. 706

17. चैतन्य का आन्दोलन. 709

ग्यारहवाँ अध्याय. 714

उपसंहार. 714

1. दार्शनिक विकास. 714

2. समस्त दर्शन-पद्धतियों का समन्वय. 716

3. दर्शन और जीवन. 718

4. आधुनिक युग में भारत दर्शनशास्त्र का हास. 718

5. वर्तमान स्थिति.. 720

परिशष्ट.. 728

टिप्पणियां.. 728

पारिभाषिक शब्द.. 739

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पहला अध्याय

विषय-प्रवेश

 

दर्शनशास्त्रों का प्रादुर्भाव वेदों के साथ

सम्बन्ध-सूत्र साहित्य-सामान्य विचारधाराएँ।

 

1. दर्शनशास्त्रों का प्रादुर्भाव

 

भारत में हम बौद्धकाल में दार्शनिक चिन्तन की एक महती लहर उमड़ती हुई पाते हैं। दर्शनशास्त्र की प्रगति साधारणतः, किसी ऐतिहासिक परम्परा पर होनेवाले किसी प्रबल आक्रमण के कारण ही सम्भव होती है, जबकि मनुष्य-समाज पीछे लौटने को और उन मूलभूत प्रश्नों को एक बार फिर उठाने के लिए बाध्य हो जाता है जिनका समाधान उसके पूर्वपुरुषों ने प्राचीनतर योजनाओं के द्वारा किया था। बौद्ध तथा जैन धर्मों के विप्लव ने, वह विप्लव अपने-आप में चाहे जैसा भी था, भारतीय विचारधारा के क्षेत्र में एक विशेष ऐतिहासिक युग का निर्माण किया, क्योंकि उसने कट्टरता की पद्धति को अन्त में उड़ा कर ही दम लिया तथा एक समालोचनात्मक दृष्टिकोण को उत्पन्न करने में सहायता दी। महान् बौद्ध विचारकों के लिए तर्क ही एक ऐसा मुख्य शस्त्रागार था जहां सार्वभौम खण्डनात्मक समालोचना के शस्त्र गढ़ कर तैयार किए गए थे। बौद्ध धर्म ने मस्तिष्क को पुराने अवरोधों के कष्टदायक प्रभावों से मुक्त करने में विरेचन का काम किया। वास्तविक तथा जिज्ञासा-भाव से निकला हुआ संशयवाद विश्वास को उसकी स्वाभाविक नींवों पर जमाने में सहायक होता है। नींव को अधिक गहराई में डालने की आवश्यकता का ही परिणाम महान् दार्शनिक हलचल के रूप में प्रकट हुआ, जिसने छह दर्शनों को जन्म दिया जिनमें काव्य तथा धर्म का स्थान विश्लेषण और शुष्क समीक्षा ने ले लिया। रूढ़िवादी सम्प्रदाय अपने विचारों को संहिताबद्ध करने तथा उनकी रक्षा के लिए तार्किक प्रमाणों का आश्रय लेने को बाध्य हो गए। दर्शनशास्त्र का समीक्षात्मक पक्ष उतना ही महत्त्वपूर्ण हो गया जितना कि अभी तक प्रकल्पनात्मक पक्ष था। दर्शनकाल से पूर्व के दार्शनिक मतों द्वारा अखण्ड विश्व के स्वरूप के सम्बन्ध में कुछ सामान्य विचार तो अवश्य प्राप्त हुए थे, किन्तु यह अनुभव नहीं हो पाया था कि किसी भी सफल कल्पना का आधार ज्ञान का एक समीक्षात्मक सिद्धान्त ही होना चाहिए। समालोचकों ने विरोधियों को इस बात के लिए विवश कर दिया कि वे अपनी प्रकल्पनाओं की प्रामाणिकता किसी दिव्य ज्ञान के सहारे सिद्ध करें, बल्कि ऐसी स्वाभाविक पद्धतियों द्वारा सिद्ध करें जो जीवन और अनुभव पर आधारित हों। कुछ ऐसे विश्वासों के लिए, जिनकी हम रक्षा करना चाहते हैं, हमारा मापदण्ड शिथिल नहीं होना चाहिए। इस प्रकार आत्मविद्या अर्थात् दर्शन को अब आन्वीक्षिकी'[1] अर्थात् अनुसन्धानरूपी विज्ञान का सहारा मिल गया। दार्शनिक विचारों का तर्क की कसौटी पर इस प्रकार कसा जाना स्वभावतः कट्टरतावादियों को रुचिकर नहीं हुआ।[2] श्रद्धालुओं को यह निश्चय ही निर्जीव लगा होगा, क्योंकि अंतःप्रेरणा के स्थान पर अब आलोचनात्मक तर्क गया था। चिन्तन की उस शक्ति का स्थान जो सीधी जीवन और अनुभव से फूटती है, जैसी कि उपनिषदों में और आत्मा की उस अलौकिक महानता का स्थान जो परब्रह्म का दर्शन और गान करती है, जैसा कि भगवद्गीता में है, कठोर दर्शन ले लेता है। इसके अतिरिक्त, तर्क की कसौटी पर पुरानी मान्यताएँ निश्चय ही खरी उतर सकेंगी यह भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता था। इतने पर भी उस युग की सर्वमान्य भावना का आग्रह था कि प्रत्येक ऐसी विचारधारा को जो तर्क की कसौटी पर खरी उतर सके, 'दर्शन' के नाम से ग्रहण करना चाहिए। इसी कारण उन सभी तर्कसम्मत प्रयासों को जो विश्व के सम्बन्ध में फैली विभिन्न बिखरी हुई धारणाओं को कुछ महान् व्यापक विचारों में समेटने के लिए किए गए, दर्शन की संज्ञा दी गई।[3] ये समस्त प्रयास हमें सत्य के किसी--किसी अंश को अनुभव कराने में सहायक सिद्ध होते हैं। इससे यह विचार बना कि प्रकट रूप में पृथक् स्वतन्त्र प्रतीत होते हुए भी, ये सब दर्शन वस्तुतः एक ही बृहत् ऐतिहासिक योजना के अंग हैं। और जब तक हम इन्हें स्वतन्त्र समझते रहेंगे तथा ऐतिहासिक समन्वय में इनकी स्थिति पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक हम इनकी वास्तविकता को पूर्णरूप से हृदयंगम नहीं कर सकते।

2. वेदों के साथ सम्बन्ध

तर्क की कसौटी को स्वीकार कर लेने पर काल्पनिक मान्यताओं के प्रचारकों का विरोध नरम पड़ गया और उससे यह स्पष्ट हो गया कि उनका आधार उतना सशक्त सुदृढ़ नहीं था और उन विचारधाराओं को दर्शन का नाम देना भी ठीक नहीं था। किन्तु भौतिकवादियों, संशयवादियों और कतिपय बौद्ध धर्मानुयायियों के विध्वंसात्मक जोश ने निश्चयात्मक ज्ञान के आधार को ही नष्ट कर दिया। हिन्दू मानस इस निषेधात्मक परिणाम को कभी भी शांति से ग्रहण नहीं कर पाया। मनुष्य संशयवादी रह कर जीवन-निर्वाह नहीं कर सकता। निरे बौद्धिक द्वन्द्व से ही काम नहीं चल सकता। वाद-विवाद का स्वाद मानय की आत्मिक भूख को शान्त नहीं कर सकता। ऐसे शुष्क तर्क से कुछ लाभ नहीं जो हमें किसी सत्य तक पहुंचा सके। यह असम्भव था कि उपनिषदों के ऋषियों जैसे आत्मनिष्ठ महात्माओं की आशाएं और महत्त्वाकांक्षाएं, तार्किक समर्थन के अभाव में, यों ही नष्ट हो जातीं। और यह भी असंभव था कि शताब्दियों के संघर्ष और चिन्तन से भी मानव-समस्या के समाधान की दिशा में कुछ आगे जाता। एकमात्र निराशा में ही उसका अन्त नहीं होने दिया जा सकता था। तर्क को भी अन्ततोगत्वा श्रद्धा का ही आश्रय ढूँढ़ना पड़ता है। उपनिषदों के ऋषि पवित्र ज्ञान के शिक्षणालय के महान् शिक्षक हैं। वे हमारे आगे ब्रह्मज्ञान आध्यात्मिक जीवन की सुन्दर व्याख्या रखते हैं। यदि निरे तर्क से मानव यथार्थ सत्य की प्राप्ति नहीं कर सकता तो निश्चय ही उसे उन ऋषियों के महान लेखों की सहायता प्राप्त करनी चाहिए, जिन्होंने आध्यात्मिक ध्रुव सत्य को प्राप्त करने का दावा किया है। इस प्रकार, जो कुछ श्रद्धा के द्वारा स्वीकार किया गया था उसकी वास्तविकता को तर्क द्वारा सिद्ध करने के प्रबल प्रयास किए गए। यह ढंग बुद्धिसंगत हो, ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दर्शन उस प्रयास का ही दूसरा नाम है जो मानव-समाज के बढ़ते हुए अनुभव की व्याख्या के लिए किया जाता है। किन्तु जिस ख़तरे से हमें सावधान रहना होगा वह यह है कि कहीं श्रद्धा को ही दार्शनिक विज्ञान का परिणाम स्वीकार कर लिया जाए।

 

सब दर्शनों में छह दर्शन अधिक प्रसिद्ध हुए-महर्षि गौतम का 'न्याय', कणाद का 'वैशेषिक', कपिल का 'सांख्य', पतंजलि का 'योग', जैमिनि का 'पूर्व मीमांसा', और बादरायण का 'उत्तर मीमांसा' अथवा 'वेदान्त' '[4] ये सब वैदिक दर्शन के नाम से जाने जाते हैं क्योंकि ये वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हैं। जो दर्शन वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हैं वे आस्तिक कहलाते हैं, और जो उसे स्वीकार नहीं करते उन्हें नास्तिक की संज्ञा दी गई है। किसी भी दर्शन का आस्तिक या नास्तिक होना परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने पर निर्भर होकर वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने पर निर्भर है।[5] यहां तक कि बौद्ध धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों का भी उद्गम उपनिषदों में है; यद्यपि उन्हें सनातन धर्म नहीं माना जाता है, क्योंकि वे वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करते। कुमारिल भट्ट, जिनकी सम्मति इन विषयों में प्रामाणिक समझी जाती है, स्वीकार करते हैं कि बौद्ध दर्शनों ने उपनिषदों से प्रेरणा ली है, और वे यह युक्ति देते हैं कि इनका उद्देश्य अत्यन्त विषय-भोग पर रोक-थाम लगाना था। वे यह भी घोषणा करते हैं कि ये सब प्रामाणिक दर्शन हैं।'[6]

 

वेद को स्वीकार करने का अर्थ यह है कि आध्यात्मिक अनुभव से इन सब विषयों में शुष्क तर्क की अपेक्षा प्रकाश मिलता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे वेद प्रतिपादित सब सिद्धान्तों को भी स्वीकार करते हैं, या परमात्मा के अस्तित्व में भी विश्वास रखते हैं। इसका अर्थ केवल जीवन के मूल रहस्य के उद्घाटन के लिए गम्भीर प्रयास करना है, क्योंकि इन सम्प्रदायों ने वेदों की निर्दोषता तक को समान रूप में स्वीकार नहीं किया है। हम देखते हैं कि वैशेषिक और न्याय परमात्मा की सत्ता को अनुमान प्रमाण द्वारा ही स्वीकार करते हैं। सांख्य ईश्वरवादी नहीं है। योग वेद से वस्तुतः स्वतन्त्र ही है। दोनों मीमांसा शास्त्र अवश्य ही वेद पर स्पष्ट रूप से निर्भर करते हैं। पूर्व मीमांसा में वर्णित देवता का सामान्य विचार वेदमूलक अवश्य है, किन्तु उसे परब्रह्म के रूप की चिन्ता नहीं है। उत्तर मीमांसा ब्रह्म के अस्तित्व को श्रुति के आधार पर स्वीकार करता है, किन्तु उसकी सिद्धि में अनुमान प्रमाण का भी उपयोग करता है, और उसकी सम्मति में उसका साक्षात्कार ज्ञान ध्यान द्वारा हो सकता है। परवर्ती काल के आस्तिक विचारक सांख्य को सनातन दर्शनशास्त्रों के अन्तर्गत मानने को तैयार नहीं थे।'[7]

 

इस प्रकार वेद की प्रामाणिकता मानने से इन छः दर्शनों की दार्शनिकता में कोई विशेष अन्तर नहीं आता।'[8] श्रुति और स्मृति का भेद सर्वविदित है, और जहां दोनों में परस्पर मतभेद हो वहाँ श्रुति की ही प्रधानता मानी जाती है। श्रुति भी अपने-आप में दो भागों में विभक्त है, कर्मकाण्ड (संहिता भाग और ब्राह्मण ग्रन्थ) और ज्ञानकाण्ड (उपनिषद्) ज्ञानकाण्ड का महत्त्व अधिक है, यद्यपि इसके अधिकांश भाग को केवल अर्थवाद अर्थात् अनावश्यक या गौण कथन कह कर एक ओर रख दिया गया है। इन सबके कारण वेद की प्रामाणिकता को बहुत उदार भाव से ही ग्रहण किया जा सकता है। वेदों की व्याख्या भी व्याख्याकारों की दार्शनिक रुचियों पर निर्भर करती है। तार्किक विधियों का प्रयोग करते हुए और युक्तिसंगत सत्यों पर पहुँचते हुए भी, वे प्राचीन मंत्रों से उनकी संगति बनाए रखने के लिए बराबर उत्सुक रहे। उनकी इच्छा बराबर यही रही कि उन्हें किसी बिलकुल नवीन विषय का प्रतिपादक समझा जाए। यद्यपि इससे उनकी स्पष्टवादिता का कुछ अभाव ही टपकता है, तो भी इससे इन सिद्धान्तों के प्रचार में सहायता मिली जिन्हें वे सत्य मानते थे।'[9] भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों के समालोचक और टीकाकार अपने-अपने मत की पुष्टि में वेद की सम्मति का दावा करते हैं, और जहां यह सम्मति स्वतः दृष्टि में नहीं आती वहां बलपूर्वक संगति बैठाने में अपनी पटुता दिखाते हैं। परवर्ती काल के वाद-विवादों के प्रकाश में, ये लोग वेदों की भाषा में उन विषयों पर भी सम्मति ढूंढते हैं जिनका ज्ञान इन्हें बहुत ही कम या बिलकुल नहीं होता। वेदों के साधारण विचार तो निश्चित ही हैं और विस्तृत रूप से स्पष्ट ही हैं। इसीलिए भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय वालों को उनके अर्थों में खींचातानी करने का सुयोग मिल जाता है। इसके अतिरिक्त, वेदों की विशालता के कारण भी, ग्रन्थकारों को अपने विश्वास के अनुसार कोई-सा भाग चुन लेने से एक नवीन विचार का प्रचार करने के लिए सामग्री मिल जाती है।

 

इन दर्शनों में विषयों की विविधता इसलिए है कि दार्शनिक कल्पनाओं के पीछे धार्मिक उद्देश्य छिपा है। शब्द की नित्यता का सिद्धान्त दार्शनिक समस्या से अधिक आस्तिकवाद की समस्या है, क्योंकि इसका सम्बन्ध वेद की निर्दोषता के सिद्धान्त से है। हर एक वैदिक दर्शन में तर्क, मनोविज्ञान, तत्त्वज्ञान और धर्म का सम्मिश्रण पाया जाता है।

3. सूत्र-साहित्य

 

जब वैदिक साहित्य बहुत अधिक बढ़ गया और वैदिक विषय के विचारकों को अपने विचारों को क्रमबद्ध करने की आवश्यकता अनुभव होने लगी तब सूत्र-साहित्य की उत्पत्ति हुई। दर्शनों के मुख्य-मुख्य सिद्धान्त संक्षेप में सूत्रों के रूप में रखे गए हैं। इन्हें, जहाँ तक सम्भव हो सका छोटे-से-छोटे कलेवर में, शंकारहित, किन्तु वास्तविक तत्त्व को प्रकट करनेवाले रूप में रखा गया है, जिसमें अनावश्यक अशुद्ध अंश के लिए कोई स्थान नहीं है।'[10] सब प्रकार के अनावश्यक पुनरुक्तिदोष से रहित और चुने हुए कम-से-कम शब्दों में इनका निर्माण किया गया है।'[11] प्राचीन काल के लेखकों को विस्तार से लिखने का कोई प्रलोभन नहीं था, क्योंकि वे छपे हुए ग्रन्थों की अपेक्षा स्मृति पर अधिक निर्भर करते थे। अत्यन्त संक्षिप्त रूप में होने के कारण सूत्रों के पूरे आशय को बिना टीका की सहायता के समझना एक कठिन कार्य है।

 

दार्शनिक विचारों के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न पद्धतियों का विकास हुआ। कितनी ही पीढ़ियों में विचार एकत्र होते गए और अन्त में सूत्रों के रूप में उनका संग्रह किया गया। सूत्र किसी एक विचारक के परिश्रम का परिणाम नहीं हैं, किसी एक युग में इनका निर्माण हुआ है। ये कितने ही और कई पीढ़ियों में बँटे हुए विचारकों के सतत परिश्रम का परिणाम हैं। सूत्रों का रूप लेने से पूर्व उन विचारों की कितने ही समय तक गर्भरूप में बढ़ते रहने की कल्पना की जा सकती है, इसलिए उनके उद्गम को खोज निकालना एक कठिन कार्य है। आध्यात्मिक ज्ञान के प्रारम्भ के विषय में निश्चित रूप से कुछ भी धारणा बनाना कठिन है। सूत्र ग्रन्थ प्राचीन काल के श्रृंखलाबद्ध प्रयासों का परिणाम हैं और इन्हें 'एक बिलकुल केन्द्रीय स्थान प्राप्त है, क्योंकि जहां एक ओर ये पुराने साहित्यिक निबन्धों का, जो कितनी ही पीढ़ियों में लिखे गए होंगे, सार प्रस्तुत करते हैं, यहां दूसरी ओर ये टीकाकारों तथा स्वतन्त्र लेखकों के उस उत्तरोत्तर बढ़ते कार्य-कलाप का मुख्य स्रोत भी हैं जिसकी परम्परा हमारे काल तक पहुंचती है और शायद कुछ आगे भी जा सकती है।"[12] दर्शनों का विकास सूत्रों के निर्माण से बहुत समय पूर्व हो गया होगा। दार्शनिक सूत्रों की समस्त शैली और भाव से यह प्रतीत होता है कि ये लगभग एक ही काल में बने हैं।'[13] सूत्रों के निर्माण दर्शनशास्त्रों के संस्थापक अथवा उत्पादक होकर मात्र उनके संग्राहक ही हैं। यही कारण है कि दार्शनिक सूत्रों में यत्र-तत्र परस्पर विरोधी प्रकरण पाए जाते हैं। और यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि विविध दर्शनशास्त्रों का निर्माण साथ-साथ एक ही समय में हो रहा था और वह समय सूत्रों के निर्माण-काल के पूर्व का समय है। मिले-जुले दार्शनिक समाधानों में से दर्शनों के पृथक्करण का समय बुद्ध के पश्चात् की प्रारम्भिक शताब्दियों में और ईसा के समय से पूर्व आंका जा सकता है। उस समय दार्शनिक विचारों का आदान-प्रदान पुस्तकों के द्वारा होकर मौखिक रूप में होता था। यह सम्भव है कि मौलिक शिक्षा की परम्परा टूट जाने के बाद कई प्रमुख ग्रन्थ नष्ट हो गए हों और जो आज हमें उपलब्ध हैं उनके अन्दर बहुत-सी मिलावट हो गई हो। कुछ अति प्राचीन प्रमुख सूत्रग्रन्थ, यथा बृहस्पतिसूत्र, वैखानससूत्र और भिक्षुसूत्र और कितना ही दार्शनिक साहित्य आज हमें प्राप्त नहीं है और उसके साथ ही बहुत-सी उपयोगी सामग्री भी, जो विभिन्न दर्शनों के कालानुक्रम पर प्रकाश डाल सकती थी, आज लुप्त हो गई है। मैक्समूलर के अनुसार, सूत्रग्रन्थों का निर्माण-काल बुद्ध से लेकर अशोक के समय तक है, यद्यपि वे यह स्वीकार करते हैं कि वेदान्त, सांख्य और योग के लिए उससे बहुत पूर्व का समय दिया जा सकता है। इस मत की पुष्टि कौटिल्य के अर्थशास्त्र की साक्षी से होती है। उस समय तक परम्परागत आन्वीक्षिकी अथवा तार्किक पद्धतियाँ मुख्यतः दो सम्प्रदायों, पूर्व मीमांसा और सांख्य में बंटी हुई थीं। यद्यपि बौद्धग्रन्थों में बहुत ही स्पष्ट उल्लेख है, तो भी यह कहा जा सकता है कि बौद्धसूत्रों में षड्दर्शन से उपलब्ध ज्ञान का समावेश पाया जाता है। बुद्ध के पीछे की प्रारम्भिक शताब्दियों का विशद बौद्धिक जीवन अनेक समानान्तर धाराओं में प्रवाहित हुआ, यद्यपि उन्हें सूत्रों का रूप देने का कारण विरोधी दर्शनों की प्रतिक्रिया ही थी। इन दर्शनों में अनेक परिवर्तन यद्यपि पीछे के भाष्यकारों के हाथों हुए, तो भी इनका श्रेय इनके जादि निर्माताओं को ही दिया जाता है। वेदान्त दर्शन व्यास का कहलाता है, यद्यपि शंकर, रामानुज और अन्य अनेक भाष्यकारों ने इसमें सिद्धान्त सम्बन्धी मौलिक परिवर्तन किए हैं। बड़े-से-बड़े भारतीय विचारक अपने को प्राचीन परिपाटी का अनुयायी ही मानते रहे हैं; यद्यपि मूलसूत्रों का भाष्य करते समय उन्होंने उनको अधिक उन्नत बना दिया है। प्रत्येक दर्शन ने अन्य दर्शनों को सामने रख कर उन्नति की है। वर्तमान समय तक भी षड्दर्शनों के विकास में उन्नति होती रही है। उत्तरोत्तर भाष्यकार विरोधियों के आक्षेपों के सामने अपने परम्परागत सिद्धान्त की बराबर रक्षा करते आए हैं।

 

प्रत्येक दर्शन के निर्माण की प्रारम्भिक अवस्था में दार्शनिक विचार का एक प्रकार का उबाल-सा आता है जो आगे चल कर एक विशेष स्थल पर सूत्ररूप में संक्षिप्त आकार धारण करता है। इसके पश्चात् सूत्रों के भाष्यों का समय आता है। फिर उन पर टिप्पणियां, टीकाएं एवं सारभूत व्याख्याएं आती हैं, जिनके कारण मौलिक सिद्धान्त में बहुत-सा परिवर्तन, सुधार विस्तार भी हो जाता है। भाष्य प्रश्नोत्तर के रूप में होते हैं, क्योंकि उपनिषदों के समय से ही इस पद्धति को जटिल विषय को विशद रूप में समझाने का एकमात्र उपयुक्त साधन समझा जाता रहा है। इस प्रकार भाष्यकार को विरोधी विचारों का उत्तर देते हुए मौलिक सिद्धान्त के समर्थन का उत्तम अवसर प्राप्त हो जाता है और इस विधि से उन्हीं विचारों की पुनः स्थापना करते हुए अन्यान्य विचारों की तुलना में उसकी उत्कृष्टता सिद्ध हो जाती है।

4. सामान्य विचारधाराएं

 

छः के छः दर्शन कुछ मौलिक सिद्धान्तों में परस्पर एकमत हैं।'[14] वेद की प्रामाणिकता मान्य होने से ध्वनित होता है कि इन सभी दर्शनों का विकास विचारधारा के एक ही आदिम स्रोत से हुआ है। हिन्दू शिक्षकों ने भूतकाल के अपने पूर्वपुरुषों से प्राप्त ज्ञान का उपयोग इसलिए भी किया क्योंकि इस आधार पर व्यक्त किए गए विचार सरलता से समझ में सकते थे। यद्यपि अविद्या, माया, पुरुष और जीव आदि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग यह प्रकट करता है कि विभिन्न दर्शनों की भाषा एक समान है, तो भी इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि उक्त पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग भिन्न-भिन्न दर्शनों में भिन्न-भिन्न अर्थों में हुआ है। विचारशास्त्र के इतिहास में प्रायः ऐसा होता है कि उन्हीं शब्दों और परिभाषाओं का भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय वाले अपने भिन्न-भिन्ने अथों में प्रयोग करते हैं। प्रत्येक दर्शन अपने विशेष सिद्धान्त के प्रतिपादन में सर्वोच्च धार्मिक विवेचन की उसी प्रचलित भाषा का प्रयोग आवश्यक परिवर्तनों के साथ करता है। इन दर्शनशास्त्रों में दार्शनिक विज्ञान आत्मचेतन रूप में विद्यमान है। वेदों में उल्लिखित अध्यात्म अनुभवों की तार्किक आलोचना इन ग्रन्थों का विषय है। ज्ञान की यथार्थता और उसको प्राप्त करने के साधन प्रत्येक दर्शन का एक मुख्य अध्याय हैं। प्रत्येक दार्शनिक योजना ज्ञान के सम्बन्ध में अपना स्वतन्त्र सिद्धान्त प्रतिपादित करती है, जो उस दर्शन के प्रतिपाद्य विषय-अध्यात्मविद्या-का मुख्य भाग है। अन्तर्दृष्टि, अनुमान और वेद-सब दर्शनों को एक समान मान्य हैं। युक्ति और तर्क को अन्तर्दृष्टि के अधीन ही स्थान दिया गया है। जीवन की पूर्णता का अनुभव केवल तर्क द्वारा सम्भव नहीं है। आत्मचेतन का स्थान विश्व में सर्वोपरि नहीं है। कोई वस्तु आत्मचेतना से भी ऊपर है जिसे अन्तर्दृष्टि, दिव्य ज्ञान, विश्वचेतना, और ईश्वरदर्शन आदि नाना संज्ञाएँ दी गई हैं। क्योंकि हम ठीक-ठीक इसकी व्याख्या नहीं कर सकते, इसलिए हम इसे उच्चतर चेतना के नाम से पुकारते हैं। जब कभी इस उच्च सत्ता की झलक हमारे सामने आती है तो हम अनुभव करते हैं कि यह एक पवित्र ज्योति की सत्ता है जिसका क्षेत्र अधिक विस्तृत है। जिस प्रकार 'चेतना' और आत्मचेतना का भेद पशु और मनुष्य के भेद को प्रदर्शित करता है, उसी प्रकार आत्मचेतना और उच्चतर चेतना का भेद मनुष्य को, जैसा कि वह है, उस मनुष्य से भिन्न प्रदर्शित करता है जैसा कि उसे बनना चाहिए। भारतीय दर्शन का आधार एक ऐसी भावना है जो केवल तर्क से ऊपर है, और उसका यह मत है कि जिस संस्कृति की नींव केवल तर्क और विज्ञान पर हो, उसमें कार्यक्षमता भले ही हो किन्तु उससे प्रेरणा नहीं मिल सकती।

 

सभी वैदिक दर्शन बौद्धों के संशयवाद के विरुद्ध हैं और एक शाश्वत, अस्थिर परिवर्तन-क्रम के विपरीत, एक उद्देश्यपूर्ण वास्तविकता और सत्य के पक्ष में अपना झंडा ऊंचा करते हैं। यह सृष्टि-प्रवाह अनादि है और यह केवल मन की कल्पनामात्र होकर वास्तविक है और एक उद्देश्य को लिए हुए है। इसी को अनादि प्रकृति, माया अथवा परमाणु कहा है। उस सत्ता को जिसमें नाम और रूप से रहित विश्व स्थित है, कोई प्रकृति, कोई माया और कोई परमाणु नाम से पुकारते हैं।'[15] यह मान लिया गया है कि जिसका प्रारम्भ है उसका अन्त भी है। अनेक हिस्सों से मिल कर जिस वस्तु का निर्माण हुआ है, वह तो नित्य हो सकती है और अपना अस्तित्व सदा स्थिर रख सकती है। यथार्थ अस्तित्व अविभाज्य है। देश और काल की सीमा में बँधा हुआ यह जगत् वास्तविक नहीं है, क्योंकि बनना बिगड़ना इसका प्रकृत स्वभाव है। इससे अधिक गहराई में कुछ है-परमाणु और जीवात्माएं, अथवा पुरुष और प्रकृति, अथवा ब्रह्म।

 

सभी दर्शन इस महान् विश्वरूपी प्रवाह के दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं। उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का क्रम अनन्त काल से चल रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा। इस सिद्धान्त का प्रगति-सम्बन्धी विश्वास के साथ कोई विरोध नहीं है; क्योंकि इसमें सृष्टि की गति के अपने अन्तिम लक्ष्य तक अनेक बार पहुँचने और फिर नये सिरे से प्रारम्भ करने का प्रश्न नहीं उठता। उत्पत्ति और विनाश का तात्पर्य यहां विश्व के नये सिरे से उत्पन्न होने और सर्वथा विनष्ट हो जाने से नहीं है। नवीन सृष्टि विश्व इतिहास का अगला पड़ाव होता है, जबकि बची हुई सद् और असद् क्षमताओं को अपनी पूर्णता तक पहुँचने का अवसर प्राप्त होता है। इसका तात्पर्य यह है कि मानव जाति को नये सिरे से आत्मदर्शन के अपने मार्ग पर आरूढ़ होने का अवसर प्राप्त होता है। यह संसार के युगों का कभी समाप्त होनेवाला विधान है जिसका कोई आरम्भकाल नहीं है।

 

पूर्व मीमांसा को छोड़, अन्य सभी वैदिक दर्शनों का लक्ष्य मोक्षप्राप्ति के क्रियात्मक उपायों को ढूंढ़ निकालना है। मोक्ष का अर्थ इन शास्त्रों के अनुसार है, जीवात्मा का पाप अथवा भूलों से छूट कर अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानना उसे प्राप्त करना। इस अंश में सभी दर्शनों का एक ही उद्देश्य है, अर्थात् पूर्ण मानसिक सन्तुलन, जीवन की विषमताओं और अनिश्चितताओं, दुःखों और कष्टों से छुटकारा पाना, 'एक ऐसी शान्ति जो शाश्वत बनी रहे' जिसमें कोई संशय विघ्न डाल सके और पुनर्जन्म जिसे भंग कर सके। जीवनमुक्ति के विचार को, अर्थात् इसी जन्म में मुक्त होने के भाव को अनेक सम्प्रदायों ने स्वीकार किया है।

 

हिन्दुओं का यह एक मूल विश्वास है कि इस विश्व का संचालन पूर्णरूप से किसी नियम के अनुसार हो रहा है, और तो भी मानव को अपने भाग्य का निर्णय करने में पूर्णतया स्वतन्त्र रखा गया है।

 

हमारे कार्य दूर से अभी भी हमारा पीछा करते हैं, जो कुछ हम पहले रहे हैं उसी के अनुसार हमारा वर्तमान रूप है।

 

सारे दर्शन पुनर्जन्म एवं पूर्वजन्म में आस्था रखते हैं। हमारा जीवन एक ऐसे मार्ग पर एक डग है जिसकी दिशा लक्ष्य अनन्त में निहित है। इस मार्ग में मृत्यु अन्त नहीं है और ही वह बाधा है। अधिक-से-अधिक वह नये डगों का प्रारम्भ है। आत्मा का विकास एक निरन्तर चलनेवाली प्रक्रिया है, यद्यपि भिन्न-भिन्न पड़ावों पर मृत्युरूपी संस्कार द्वारा बार-बार इसकी लड़ी टूटती रहती है।

 

दर्शन हमें गन्तव्य स्थान के द्वार तक ले जाता है, किन्तु उसके अन्दर प्रवेश नहीं करा सकता। उसके लिए अन्तर्दृष्टि या आत्मज्ञान आवश्यक है। हम संसाररूपी अन्धकार में भटक गए बच्चों के समान हैं, जिन्हें अपने असली रूप का ज्ञान नहीं है। इसीलिए हम भयभीत होते हैं और अपने चारों ओर व्याप्त दुःख में आशा को लेकर चिपके हुए हैं। इसीलिए प्रकाश की आवश्यकता है जो हमें वासनाओं से मुक्त करके अपने शुद्ध एवं वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराए और उस अवास्तविक स्थिति का भी परिचय दे सके जिसमें हम अज्ञानवश रह रहे हैं। इस प्रकार के अन्तर्निरीक्षण को मोक्ष की प्राप्ति का एकनात्र साथन स्वीकार किया गया है, यद्यपि अन्तर्निरीक्षण के उद्देश्य के विषय में मतभेद अवश्य है।'[16] अज्ञान ही बन्धन का कारण है और इसलिए सत्य का ज्ञान प्राप्त होने पर ही उससे मुक्ति मिल सकती है। दर्शनशास्त्रों का आदर्श नीतिशास्त्र की सतह से ऊपर उठने का है। पवित्रात्मा पुरुष की तुलना कमल के उस सुन्दर पुष्प से की गई है जो उस पंक से भी अलिप्त रहता है, जिससे कि वह उत्पन्न होता है। उसके लिए अच्छाई ऐसा लक्ष्य नहीं है जिसे कि प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना होता है, बल्कि वह अपने-आप में एक निश्चित सत्य है जबकि पाप पुण्य इस संसार-चक्र में अच्छे बुरे जीवन की ओर ले जाते हैं, हम अपने सदाचारमय जीवन से ऊपर उठ कर इस संसार से भी छुटकारा पा सकते हैं। सभी दर्शन हमें निःस्वार्थ प्रेम और निष्काम कर्म की शिक्षा देते हैं और सदाचार के लिए चित्तशुद्धि पर बल देते हैं। भिन्न-भिन्न अनुपातों में वे वर्णव्यवस्था तथा आश्रम-व्यवस्था के नियमों का पालन करने का आदेश देते हैं।

 

भारतीय दर्शन का इतिहास, जैसा कि हमने विषय-प्रवेश[17] में बताया है, अनेक प्रकार की कठिनाइयों से पूर्ण है। प्रमुख शास्त्रकारों और उनके ग्रन्थों के समय के विषय में संशयरहित कुछ भी कहा नहीं जा सकता और कितने ही सुप्रसिद्ध ग्रन्थकारों की ऐतिहासिकता के विषय में भी बहुत मतभेद है, कितने ही प्रासंगिक ग्रन्थ तो उपलब्ध नहीं हैं और कतिपय जो प्रकाशित हुए हैं उनमें से सबका अभी आलोचनात्मक अध्ययन नहीं हुआ है। महान् भारतीय विचारकों ने भी भारतीय दर्शन की ऐतिहासिक दृष्टि से छानबीन नहीं की है। माधवाचार्य ने अपने सर्वदर्शनसंग्रह में सोलह विभिन्न दर्शनों का विवेचन किया है। प्रथम खण्ड में हमने भौतिकवादी, बौद्ध और जैन विचारों की चर्चा की है। इस खण्ड में हम न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा और वेदान्त दर्शनों का विवेचन करेंगे। शैव सिद्धान्त के चारों सम्प्रदायों और रामानुज पूर्णप्रज्ञ के सम्प्रदायों का आधार वेदान्त सूत्र हैं, और वे भिन्न-भिन्न प्रकार से उनकी व्याख्या करने का प्रयत्न करते हैं। पाणिनि के मत का महत्त्व दार्शनिक दृष्टि से बहुत कम है। वे शब्द की नित्यता के सम्बन्ध में मीमांसा के मत से सहमत होकर स्फोट अर्थात् प्रत्येक शब्द के अन्तर्गत अर्थ की अभिव्यक्ति के अविभाज्य रूप को स्वीकार करते हैं। वैदिक षड्दर्शनों में वैशेषिक दर्शन की अधिक प्रतिष्ठा नहीं है, जबकि न्यायदर्शन का तर्कपक्ष अधिक प्रचलित है और इसके भक्त अनुयायी विशेष रूप से बंगाल में बहुत अधिक हैं। योगदर्शन का क्रियात्मक प्रयोग बहुत कम मिलता है, जबकि पूर्व मीमांसा का हिन्दू कानून के साथ निकट सम्बन्ध है। सांख्य का प्रचार नहीं के बराबर है, जबकि वेदान्त अपने भिन्न-भिन्न रूपों में प्रायः सर्वत्र छाया हुआ है। हिन्दू-विचारधारा के प्रतीक इन छः दर्शनों के विषय में लिखते हुए हम अधिकतर अपना ध्यान प्राचीन शास्त्रों, सूत्रों तथा उनके प्रमुख भाष्यकारों पर ही केन्द्रित करेंगे। अर्वाचीन काल के प्रायः सभी विचारकों के आध्यात्मिक ग्रंथ, कुछेक अपवादों को छोड़ कर, पर्याप्त मात्रा में प्रभावोत्पादक नहीं हैं। उनका अध्ययन तो विस्तृत है; किन्तु अवनति के युग में निर्मित होने के कारण उनके कृतित्व में टीका-टिप्पणियों पुरानी बातों को दोहराने के अतिरिक्त किसी नवीन सृजन की शक्ति नहीं पाई जाती। उनमें मताग्रह को अत्यधिक मात्रा में सुविधाएं दी गई हैं। प्रत्यक्ष को भी रहस्यमय करके वर्णन करने की प्रवृत्ति, आस्तिकवाद के प्रति पक्षपात और तात्त्विक अनुर्वरता के कारण उस पर विशेष ध्यान देना आवश्यक नहीं है।

 

प्रचलित प्रथा के अनुसार ही, जिसके प्रतिकूल व्यवहार करना व्यर्थ होगा, हम पहले न्याय और वैशेषिक सिद्धान्त को ही लेंगे, जो हमें अनुभव के संसार का विश्लेषण प्रदान करते हैं। फिर हम सांख्य और योग को लेंगे, जिनमें अनुभव का साहसपूर्ण कल्पनात्मक वर्णन किया गया है। इसके बाद अन्त में हम दोनों मीमांसा दर्शनों का विवेचन करेंगे, जिनमें यह दशनि का प्रयत्न किया गया है कि श्रुति के दिव्य ज्ञान और दर्शन के अन्तिम निर्णयों में परस्पर सामंजस्य है। विवेचन का इस प्रकार का क्रम ऐतिहासिक कार्यकाल की दृष्टि से भले ही संगत हो, किन्तु तार्किक दृष्टि से पूर्णतया संगत होगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दूसरा अध्याय

न्यायशास्त्र का तर्कसम्मत यथार्थवाद

 

न्याय और वैशेषिक-न्याय की प्रारम्भिक अवस्था-साहित्य और इतिहास-न्याय का क्षेत्र-परिभाषा का स्वरूप-प्रत्यक्ष अथवा अन्तर्दृष्टि - अनुमान-प्रमाण- परार्थानुमान -आगमन-अनुमान-कारण-उपमान अथवा तुलना-आप्त प्रमाण-ज्ञान के अन्य रूप-तर्क और वाद-स्मृति-संशय-हेत्वाभास-सत्य अचवा प्रभा-भ्रान्ति-न्याय के प्रमाणवाद का सामान्य मूल्यांकन-भौतिक जगत्-जीवात्मा और उसकी नियति जीवात्मा तथा चेतना से सम्बन्ध के विषय में न्याय के सिद्धान्त पर कुछ आलोचनात्मक विचार नीतिशास्त्र - ब्रह्मविद्या-उपसंहार

 

1. न्याय और वैशेषिक

 

भारतीय विचारधारा के अन्य दर्शन जहां मुख्यतया कल्पनापरक हैं, इन अर्थों में कि वे संसार की अखण्ड रूप में विवेचना करते हैं, वहां न्याय और वैशेषिक विश्लेषणात्मक दर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं, और साधारण ज्ञान विज्ञान का आश्रय लेकर चलते हैं तथा उनकी उपेक्षा नहीं करते। इन दोनों सम्प्रदायों में विशेषत्व यह है कि ये एक ऐसी विधि का प्रयोग करते हैं जिसे इनके अनुयायी वैज्ञानिक मानते हैं। तार्किक जांच तथा आलोचनात्मक विधि का प्रयोग करके, ये यह दर्शाने का प्रयत्न करते हैं कि बौद्ध विचारक जिन परिणामों पर पहुँचे वे परिणाम आवश्यक रूप से अभिमत नहीं थे। ये इस बात को भी दर्शाने का प्रयत्न करते हैं कि तर्क हमें जीवन को सदा के लिए नश्वर एवं क्षण-क्षण में परिवर्तनशील मानने के लिए भी बाध्य नहीं करता। इन दर्शनों का मुख्य उद्देश्य उन संशयवादी परिणामों का निराकरण करना है जो बौद्धों के प्रत्यक्ष ज्ञानवाद से निकलते हैं, क्योंकि वह बाह्य यथार्थ को मन के विचारों में मिला देता है। इनका प्रवास परम्परागत निष्कर्षों के प्रति, अर्थात् अन्तर्जगत् में जीवात्मा और बाह्य जगत् में प्रकृति के प्रति विश्वास को पुनः दृढ़ करने की ओर है और ये ऐसा केवल प्रामाण्य के आधार पर नहीं, बल्कि तर्क के आधार पर करते हैं। संशयवाद का जो प्रवाह बाढ़ की तरह आया उसकी रोकथाम केवल आस्था द्वारा नहीं की जा सकती थी, विशेषतः जबकि नास्तिकों ने उसके दुर्ग पर ही आक्रमण करने के लिए इन्द्रियजन्य ज्ञान तर्क का आधार ले रखा हो। ऐसे समय में जीवन धर्म के लक्ष्यों की प्राप्ति विशुद्ध ज्ञान के साधनों उनकी विधियों की गम्भीर जांच से ही हो सकती है। धर्मशास्त्र एवं इन्द्रियों द्वारा प्राप्त किए जानेवाले ज्ञान की जो सामग्री हमारे सम्मुख आती है उसकी तार्किक छानबीन ही का प्राचीन नाम आन्वीक्षिकी विद्या है।[18] नैयायिक उस सबको सत्य मानता है जो तर्क की कसौटी पर ठीक उतर सकता है।[19] वात्स्यायन और उद्योतकर इस विषय पर बल देते हैं कि यदि न्यायदर्शन केवल जीवात्मा और उसकी मुक्त अवस्था के विषय का ही प्रतिपादन करता तो उपनिषदों से उक्त दर्शन में कोई विशेष भेद होता, क्योंकि वे भी इन समस्याओं का विवेचन करते हैं। न्यायदर्शन की विशेषता यही है कि यह आध्यात्मिक समस्याओं का आलोचनात्मक दृष्टि से विवेचन करता है। वाचस्पति के अनुसार, न्यायशास्त्र का उद्देश्य ज्ञान के विषयों की तर्कबुद्धि द्वारा आलोचना और छानवीन करना है।'[20]

 

न्याय और वैशेषिक दोनों ही परम्परागत सामान्य दार्शनिक पदार्थों, यथा देश, काल, कारण, भौतिक प्रकृति, मन, जीवात्मा और ज्ञान को लेकर उनके विषय में उचित अनुसन्धान करके विश्व की रचना का समाधान करते हैं। तर्कसम्मत तत्त्व-विभाग इस परम्परा की मुख्य विशेषता रही है। न्याय और वैशेषिक दोनों क्रमशः आन्तरिक तथा बाह्य जगत् की व्याख्या करते हैं। न्याय अत्यन्त विस्तार के साथ ज्ञानप्राप्ति की पद्धति की व्याख्या करता है और बलपूर्वक उस संशयवाद का युक्तियुक्त विरोध करता है जो कि प्रत्येक पदार्थ की अनिश्चितता की घोषणा करता है। वैशेषिक का मुख्य विषय इन्द्रियजन्य ज्ञान अथवा अनुभव का विश्लेषण करना है। यह उन पदार्थों के विषय में सामान्य धारणाएँ देता है जो या तो प्रत्यक्ष या अनुमान अथवा श्रुति के प्रमाण द्वारा जाने जाते हैं। इस प्रकार का रुख अपनाते हुए यदि न्याय और वैशेषिक जीवात्माओं को वास्तविक मानने के विश्वास का समर्थन करें तो कुछ आश्चर्य नहीं। ये जीवात्माएँ अपने चारों ओर व्याप्त वस्तुओं के विधान में परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया में संलग्न हैं।

 

दोनों दर्शन बहुत समय से एक-दूसरे के पूरक माने जाते रहे हैं। कभी-कभी यह सुझाया जाता है कि उक्त दोनों दर्शन एक ऐसे उद्गम से निकली दो स्वतन्त्र विचारधाराएँ हैं जिसमें ज्ञात पदार्थों तथा ज्ञान के साधनों का विवेचन किया गया था। परन्तु, इस विषय पर निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है। बाद के ग्रंथकारों ने दोनों दर्शनों को एक ही सामान्य विचारधारा का अंग स्वीकार किया है।'[21] यहां तक कि वात्स्यायन के न्यायभाष्य में दोनों के अन्दर भेद नहीं किया गया है। वैशेषिक का उपयोग न्याय के परिशिष्ट के रूप में हुआ है।'[22] उद्योतकर के न्यायवार्तिक में वैशेषिक सिद्धान्तों का उपयोग किया गया है। जैकोबी का कहना है कि 'उक्त दोनों सम्प्रदायों का सम्मिश्रण बहुत पहले आरम्भ हो गया था और उसकी पूर्ति उस समय हुई लगती है जबकि न्यायवार्तिक लिखा गया।"[23] कितने ही न्यायसूत्रों में वैशेषिक के सिद्धांतों की पूर्वकल्पना की गई है। इन्हें समानतन्त्र अथवा संयुक्त दर्शन नाम से भी पुकारा जाता है, क्योंकि दोनों ही जीवात्माओं के अनेक होने, एक पृथक् ईश्वर की सत्ता, परमाणुरूप जगत् की सत्ता में विश्वास करते हैं, और बहुत-सी एक जैसी युक्तियों का उपयोग करते हैं। यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि उक्त दोनों दर्शन-पद्धतियाँ बहुत प्राचीन काल में ही एक साथ मिल गई थीं। फिर भी जहां एक ने तर्क के विषय का प्रतिपादन किया वहां दूसरे ने भौतिक जगत् की व्याख्या की। इस प्रकार दोनों में भेद प्रकट होता है।[24] जबकि न्याय तर्क द्वारा पदार्थों के ज्ञान की प्रक्रियाओं और प्रणालियों का वर्णन करता है, वैशेषिक पदार्थों की परमाणु द्वारा रचना की व्याख्या करता है जिसे न्याय ने बिना किसी तर्क के स्वयंसिद्ध स्वीकार कर लिया है।'[25]

 

न्यायदर्शन को अत्यन्त प्राचीन काल से ही बहुत प्रतिष्ठा के साथ देखा जाता रहा है। मनु ने इसका समावेश श्रुति के अन्दर किया है, याज्ञवल्क्य ने भी इसे वेद के चार अंगों में से एक माना है।'[26] हिन्दुओं के पाँच प्राचीन पाठ्यविषयों-काव्य (साहित्य), नाटक, जलंकार, तर्क (न्यायदर्शन) और व्याकरण में न्याय की भी गणना की गई है। आगे चल कर विद्यार्थी किसी भी विषय के विशेष अध्ययन को भले ही स्वीकार करें, किन्तु प्रारम्भिक विषयों में तर्कशास्त्र अवश्य सम्मिलित था, जो समस्त पाठ्यविषयों का आधार समझा जाता था। प्रत्येक हिन्दू दर्शन न्याय द्वारा प्रतिपादित मौलिक सिद्धांतों को स्वीकार करता है। यहां तक कि न्यायदर्शन की आलोचना के लिए भी न्याय की तार्किक परिभाषाओं का आश्रय लेता है। इस दृष्टिकोण से न्याय एक प्रकार से समस्त व्यवस्थित दर्शनविज्ञान की भूमिका है।'[27]

2. न्याय की प्रारम्भिक अवस्था

 

आन्वीक्षिकी विद्या का प्रयोग, जैसा कि हम ऊपर देख आए हैं, अध्यात्मविषयक समस्याओं की तार्किक समीक्षा के लिए हुआ है। साथ ही, इसका प्रयोग व्यापक अर्थ में भी हुआ है, जिससे इसमें सांख्य, योग और लोकायत्त आदि उन समस्त व्यवस्थित प्रयासों का समावेश हो जाता है जो दार्शनिक समस्याओं को सुलझाने के लिए किए गए थे। इन विभिन्न दर्शनों में समान रूप से प्रयुक्त होनेवाली तार्किक