भारत की अन्तरात्मा

 

 

 

 

 

 

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन्

 

अनुवादक

विश्वम्भरनाथ त्रिपाठी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

ग्रामोदय प्रकाशन, दिल्ली-110032

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

ISBN                            : 978-93-80773-29-2

 

सर्वाधिकार                           : सुरक्षित

 

प्रकाशक                                : ग्रामोदय प्रकाशन 511/2, पांडव रोड, विश्वास नगर दिल्ली-110032

 

प्रथम संस्करण                    : 2022

 

मूल्य                                      : 350.00

 

आवरण                                 : मनोज पंडित

 

मुद्रक                                      : आर० के० ऑफसेट, दिल्ली-110032

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्राक्क्थन

 

दो-तीन वर्ष पहले मैंने डॉ. श्री राधाकृष्णन् की एक अंग्रेजी-पुस्तक Freedom And Culture का हिन्दी रूपान्तर 'स्वतंत्रता और संस्कृति' नाम से किया था। हिन्दी-पाठकों ने उसे बहुत पसन्द किया है ऐसा प्रतीत होता है, क्योंकि इस थोड़े काल में ही उसका प्रथम संस्करण प्रायः समाप्त हो गया है। अतः हिन्दी-भाषी पाठकों के सम्मुख उनकी अमर लेखनी से निसृत एक और ग्रन्थ-रल का रूपान्तर करने को प्रोत्साहित हुआ हूं।

 

प्रस्तुत पुस्तक Heart of Hindusthan नामक अंग्रेजी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद है। इसमें भारतीय संस्कृत के मूल आधारों का, उसकी अन्तरात्मा का संक्षिप्त किन्तु स्पष्ट विवेचन है। विद्वान् लेखक ने भिन्न-भिन्न अवसरों पर हमारी संस्कृति के मार्मिक स्थलों का जो स्पष्टीकरण विभिन्न लेखों में किया है, यह उनका ही संग्रह है। इन्हें पढ़कर हमें भारत की सभ्यता के प्रमुख सिद्धान्तों का ही केवल ज्ञान नहीं होता प्रत्युत् एक सरस, लोकोत्तर आनन्ददायिनी साहित्यिक रचना के पाठ का सुख भी मिलता है। आशा एवं विश्वास है कि विज्ञ एवं सहृदय पाठक इसका भी स्वागत 'स्वतंत्रता और संस्कृति' के समान ही करेंगे।'

 

- -विश्वम्भरनाथ त्रिपाठी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

 

प्राक्क्थन. 3

हिन्दू-धर्म की अन्तरात्मा.... 5

हिन्दू-धर्म. 19

ईश्वर के सम्बन्ध में हिन्दू-मत. 35

इस्लाम और भारतीय विचारधारा. 39

हिन्दू-मत और ईसाई-मत. 53

बौद्ध-धर्म. 71

भारतीय दर्शन. 75

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हिन्दू-धर्म की अन्तरात्मा

 

इस निबन्ध में मैं हिन्दू-धर्म के मुख्य-मुख्य अंगों का वर्णनमात्र कर देना चाहता हूं जिससे संक्षेप में हिन्दुओं के विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदाओं का, उनकी धार्मिक अनुभूति का, उनके आचरणशास्त्र एवं विश्वास-परम्परा का, ययायय दिग्दर्शन हो जाय, उसकी वकालत करना अथवा उसके समर्थन में कुछ कहना हमें अभीष्ट नहीं।

 

दार्शनिक आधार

 

तर्क-प्रेम हिन्दू-धर्म की विशेषता है। भारतीय विद्वान अपनी स्वप्निल आशाओं एवं व्यावहारिक आत्म-विसर्जन में, सरलतम दुराग्रह एवं उच्चतम काल्पनिक उड़ान में, चार-पांच हजार वर्ष के अनवरत दार्शनिक एवं धार्मिक प्रयत्न में, सत्य-भक्ति तथा यथार्थ प्रेम की भावना से प्रेरित होकर चरम समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते रहे हैं इसे ब्राह्मण-सभ्यता कहते हैं, क्योंकि इसका संचालन उन ब्राह्मणों के हाथ में था जो किसी बात का निर्णय करते समय मनः क्षोमों से विचलित नहीं होते थे एवं जिनके सिद्धान्तों की आधार-शिला सच्ची अनुभूति होती थी।

 

जगत की जिस विशेषता ने हिन्दू-दार्शनिकों को सत्य के अनुसन्धान की ओर आकृष्ट किया, वह है इसकी अनित्यता। उन्होंने देखा कि दृश्य-जगत् विरामहीन परिवर्तन का शिकार है। उन्होंने प्रश्न किया-क्या यह अनित्यता, विनश्वरता ही चरम-सत्य है अथवा इस विनाश की भी कोई सीमा कहीं है? उन्हें उत्तर मिला-जगत में एक ऐसी वस्तु भी है जो नित्य है, वह है अविनाशी, अन्य-अपेक्षा-रहित परब्रह्म हम सबके जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब इस अनन्तता की अनुभूति हम करते हैं, जब हमें इस महान् रहस्य का आभास मिलता है और जब हम उस परमात्मा के सान्निध्य का बोध करते हैं जो अपनी महत्ता से हमें आच्छन्न किए है। जीवन की उन शोकपूर्ण घड़ियों में भी जब हमें प्रतीत होता है कि हम एकान्त, दीन, परम अनाथ हैं, हमारे हृदय में स्थित परमात्मका हमें बराबर यह अनुभव कराता है कि ये सांसारिक दुःख-दैन्य तो उस बड़े नाटक की शुद्र घटनाएं-मात्र हैं जिसका अन्त शक्ति, सौन्दर्य एवं प्रेस में हे नाटक वर्ष चिल्ला-चिल्लाकर कहते हैं- ''यदि इस विश्व में आनन्द होता तो यहां कोई जीवन प्राण-धारण ही कैसे करता?" तात्त्विक दृष्टि से देखने पर यह व्यक्त जगत उसी एक अविभक्त ब्रह्म की नाना रूपों में अभिव्यक्ति है, उस ब्रह्म की अभिव्यक्ति जो समस्त सृष्टि का नित्य आधार एवं पृष्ठभूमि है। धार्मिक दृष्टि से देखने पर यह परमेश्वर की आत्म-चेतना बन जाता है जो समस्त सृष्टि के उद्भव तथा लय से युक्त है। उसके सम्पूर्ण दीर्घ जीवन में एकेश्वर ही हिन्दू-धर्म का प्रमुख आदर्श रहा है। ऋग्वेद उस एक ही परमात्मा की बात करता है-एकम् सत्-जिसका वर्णन पंडित लोग नाना रूपों में किया करते हैं। उपनिषदों का कहना है कि अभिव्यक्ति के स्तर के अनुसार एक ही ब्रह्म को भिन्न-भिन्न नामों से अभिहित किया जाता है। त्रिमूर्ति की कल्पना का उदय महाकाव्यकाल में हुआ और पुराण काल तक वह भली भांति प्रतिष्ठित हो गई। मानव-चेतना के ज्ञान, मनःक्षोभ एवं चेष्टा व्यंजक तीन गुणों का ही सूचक सत्-चित्-आनन्द परमात्मा का नाम रखा गया है। सत्व अथवा ज्ञानजात अव्यग्रता, रजस् अथवा वह शक्ति जो उत्साह से उत्पन्न होती है, तमस् अथवा वह शैथिल्य जो ज्ञान अथवा संयम के अभाव का फल है-यही वे तीन गुण हैं जो समस्त सृष्टि में पाये जाते हैं और सर्व-वस्तु-व्यापक इन तीनों गुणों से ईश्वर भी मुक्त नहीं समझा जाता। सृष्टि, स्थिति एवं लय की तीनों क्रियाएं रजस्, सत्व एवं तमस् के ही कारण होती हैं। विश्व के रक्षक विष्णु परमात्मा का ही सत्व-प्रधान रूप हैं। सृष्टिकर्ता ब्रह्म उसी ईश्वर के रजःप्रधान, एवं सृष्टि-संहारक शिव उसी ईश्वर के तमःप्रधान रूप के द्योतक हैं। एक ही ईश्वर के तीन गुणों को विकसित करके तीन भिन्न-भिन्न व्यक्ति बना दिये गए हैं। और इनमें से प्रत्येक अपनी ही विशिष्ट शक्ति से कार्य करता है, अतएव ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के ही समान सरस्वती, लक्ष्मी तथा उनकी शक्तियों की कल्पना कर ली गई। सच तो यह है कि ये सभी गुण एवं कार्य एक ही परमात्मा में इस प्रकार साम्यावस्था में स्थित हैं कि यह भी कहा जा सकता है कि उसमें कोई गुण ही नहीं है, वह निगुर्ण है।[1] एक ही अज्ञेय ईश्वर, जो सर्वविद्, सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान् है। नाना जनों को नाना प्रकार का प्रतीत होता है [2] एक प्राचीन धर्मवाक्य का कथन है कि साधकों की सुविधा के लिए ही निराकार परमात्मा को साकार कल्पित कर लिया गया है।

 

दार्शनिक मनोवृत्ति का जो सहज गुण उदार मति है, उसी की प्रेरणा से अनुयायियों की सामान्य प्रवृत्ति के अनुसार हिन्दू लोग सम्प्रदायों की आपेक्षिकता में विश्वास करते हैं। धर्म तो अव्यक्त-सम्बन्धी कोई सिद्धान्तमात्र नहीं है जिसे जब चाहा मानने लगे और जब इच्छा बदली तो दूर हटा दिया। वह तो जाति के आध्यात्मिक अनुभवों का प्रकटरूप है, उसके सामाजिक विकास का इतिहास है, एक समाज विशेष का अविच्छेद्य घटकावयव है। भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न धर्मों के अनुयायी बनें, यह तो बिलकुल स्वाभाविक ही है। धर्म तो अपने स्वभाव एवं रुचि का प्रश्न है- 'रुचिनाम् वैचित्र्यात्।' जब आर्य लोग यहां के उन मूल निवासियों से मिले जो भांति-भांति के देवताओं की पूजा करते थे, तो उन्होंने एकाएक उनके मतों को दबा देने की बात नहीं सोची। आखिर सभी लोग उसी एक परमत्मा की तलाश में हैं। भगतद्गीता का कथन है कि यदि कोई उपासक भगवान् के श्रेष्ठतम स्वरूप तक नहीं भी पहुंच सका है तो भी वे उसकी प्रार्थना अस्वीकार नहीं करते। एक मत को परित्याग कर शीघ्रतापूर्वक दूसरे को अंगीकार करने की कोशिश में हम अतीत से बहुत दूर जा पड़ते हैं, फलतः अव्यवस्था एवं अनवस्था का सामना करना पड़ता है।

 

संसार के महान् उपदेशक, जिन्हें इतिहास का यथेष्ठ ज्ञान है, अपने विचारों को उन लोगों पर जबरन लादकर जो तो उन्हें समझते ही हैं और पसन्द ही करते हैं, अपनी ही पीढ़ी में संसार का सुधार कर डालने का प्रयास नहीं करते। विवाह-विच्छेद के लिए सर्वोच्च आदर्श की दृष्टि से जितना कुछ चाहिए, मूसा ने यहूदियों से उससे कम को ही न्यायतः पाकर सन्तोष कर लिया और ईसा-जैसे कठोर आचरण-शास्त्री ने भी पर्याय से उसका समर्थन किया। वह इसीलिए कि लोगों के हृदय सख्त, सुधार-विरोधी होते हैं। (10.11....), लूक (16.18) के दृढ़ आग्रह से युक्त शब्दों को देखिए और फिर मैथ्यू (5.32 एवं 14.9) के अपवाद-वाक्यों की ओर ध्यान दीजिए। हिन्दू-दार्शनिक यद्यपि स्वयं परमोच्च आदर्श का पालन करते थे; किन्तु फिर भी उन्हें पता था कि जनसाधारण उसके लिए तैयार नहीं हैं और इसलिए बड़ी सावधानी से वे उनका विकास करने में लग गये, उन पर बर्बर बल-प्रयोग नहीं किया। अज्ञान के कारण जिन निम्न श्रेणी के देवताओं के लोक में उपासना हो रही थी, उन्हें भी उन लोगों ने स्वीकार कर लिया। केवल इतना कहा कि वे सब उसी एक परम महान् ईश्वर के अधीन हैं।[3] 'कुछ लोगों के देवता जल में, कुछ के स्वर्ग में, कुछ के सांसारिक पदार्थों में पाये जाते हैं, पर विद्वान् अपने सच्चे परमात्मा को, जिसकी महत्ता सर्वत्र प्रकट हो रही है, अपनी आत्मा में ही पाते हैं।' एक और श्लोक है- 'कर्मशील व्यक्ति का ईश्वर अग्नि में, भावुक का भगवान् हृदय में, मन्द बुद्धि का मूर्ति में एवं ज्ञानी का परमात्मा सर्वत्र ही निवास करता है।[4]

 

हिन्दू-धर्म तथा दर्शन मानता है कि समय-समय पर आने वाले सृष्टि एवं प्रलय के चक्र उस एक ही विश्व-हृदय के स्फुरण तथा संकोचन के प्रतीक है जो सदा ही निष्क्रिय तथा सदा ही सक्रिय रहता है। समस्त संसार ईश्वर का व्यक्त स्वरूप है। सायण का कहना है कि समस्त पदार्थ परमात्मा के अविर्भाव के उपाधेयमात्र है।[5] ये पदार्थ भिन्न वर्गों में विभक्त किये गए हैं। इनमें से सांस लेते हैं वे श्रेष्ठ हैं; उनमें भी वे श्रेष्ठ हैं जिनके मस्तिष्क विकसित हैं; उनम् वे श्रेष्ठ हैं जो ज्ञान का प्रयोग करते हैं और सर्वश्रेष्ठ वे हैं जिन्होंने प्राणिमात्र में ब्रह्म की एकता का अनुभव कर लिया है [6] एक ही मूल आत्मा इन नान रूपों में अभियुक्त हो रही है।

 

मनुष्य के भीतर जो अनन्त है वह सान्त संसार के नाशमान् रूप सन्तुष्ट नहीं होता। हमारे दुःखों का कारण यह है कि हम अपने भीतर ईश्व को नहीं देख पाते। हममें जो सान्त एवं अनित्य है यदि हम उससे बचे रह सक तो मुक्ति पा सकते हैं। जीवन में जितना ही अधिक हम अपने भीतर स्थि अनन्त को व्यक्त कर सकेंगे, पदार्थों की श्रेणी में हमारा स्थान उतना ही उच्च होगा। बहुत प्रबल अभिव्यक्तियां ही अवतार कहलाती हैं। अवतार अद्भुत, चमत्कारपूर्ण ईश्वर का संसार में प्रकट होना नहीं है, वे तो उसी मह शक्ति की उच्च अभिव्यक्तियां मात्र हैं जिनका सामान्य अभिव्यक्तियों से केवल मात्रा में भेद है। गीता का वचन है कि यद्यपि ईश्वर सभी में है पर वह विशेष रूप में उसी पदार्थ में व्यक्त होता है जिसमें महत्ता पाई जाती है। ऋषि, बुद्ध, पैगम्बर, ईसा आदि उसी विश्वात्मा की प्रबल अभिव्यक्तियों हैं। गीता का कहना है कि आवश्यकता पड़ने पर वे सदा ही प्रकट होती रहेंगी। हमारे जीवन में जब पतन की ओर ले जाने वाली भौतिक मनोवृत्ति की प्रबलता होती है तो धर्म का पुनः संस्थापन करने के लिए कोई राम अथवा कृष्ण, बुद्ध अथवा ईसा हमारे बीच अवश्य जाता है। इन पुरुषों में, जो इन्द्रियों पर विजय पा लेते हैं, जो प्रेम को सर्वत्र बिखेर देते हैं और जो हममें सत्य एवं धर्म के प्रति स्नेह भर देते हैं-ईश्वर की शक्ति घनीभूत हो गई है। वे हमें सच्चे मार्ग, जीवन तथा सत्य का दर्शन कराते हैं। वे अपनी अन्ध-पूजा भी नहीं करने देते, क्योंकि उससे आत्मसाक्षात्कार में कुछ बाधा पड़ती है। रामचन्द्रजी ने अपने को साधारण मनुष्य से अधिक कहकर नहीं प्रचारित किया- 'आत्मानम् मानुषम् मन्ये, राम दशरथात्मजम्' जिस हिन्दू को अपने धर्म का कुछ भी ज्ञान है, वह उन सबकी श्रद्धा और भक्ति करता है जो लोक-कल्याण में लगे हैं। उसका विश्वास है कि ईश्वर किसी भी मनुष्य के रूप में अवतरित हो सकता है जैसे ईसा और बुद्ध में हुआ था। यदि ईसाई इस बात को मान लें कि बिना ईसा की मध्यस्थता के भी मनुष्य को मुक्ति मिल सकती है तथा ईश्वर-साक्षात्कार हो सकता है, तो ईसाई धर्म के आधारभूत सिद्धान्तों को हिन्दू सहर्ष स्वीकार कर लेगा। ईश्वर की अभिव्यक्ति से मनुष्य के व्यक्तित्व का उल्लंघन नहीं होता प्रत्युत् वह तो मनुष्य के नैसर्गिक आत्मप्रकाशन का उच्चतम स्वरूप है, क्योंकि मनुष्य का सच्चा रूप तो अलौकिक ही है। मानव-अस्तित्व में अन्तर्निहित अनन्त की क्रमिक अभिव्यक्ति ही जीवन का चरम उद्देश्य है। इसकी सामान्य गति नैतिक कारणता अथवा कर्म-विपाक के सिद्धान्त पर निर्भर है। हिन्दू-धर्म एक ऐसे परमात्मा में विश्वास नहीं करता जो अपने सिंहासन पर बैठा-बैठा प्रत्येक व्यक्ति को जांचता है और तब उसके सम्बन्ध में उचित निर्णय देता है। दूर बैठकर मनमानी नीति से किसी के दण्ड में वृद्धि करके तथा किसी में कमी करके वह न्याय का विधान नहीं किया करता ईश्वर मनुष्य में ही है, अतएव कर्म-विपाक का सिद्धान्त उसके लिए सर्वथा स्वाभाविक है। प्रत्येक क्षण मनुष्य की परीक्षा हो रही है। उसका प्रत्येक निश्छल प्रयत्न उसके अनन्त प्रयास में सहायक होगा। हम जिस स्वभाव का सृजन करते हैं वह आगे भी तब तक बना रहेगा जब तक कि हम परमात्मा के साथ अपने तादात्म्य का अनुभव नहीं कर लेते। हम उस परमात्मा की सन्तान हैं जिसके लिए एक हजार वर्ष एक दिन के बराबर हैं। अतः यदि एक जीवन में पूर्णता भी प्राप्त हो सके तो हमें हताश नहीं होना चाहिए। सभी हिन्दू पुनर्जन्म मानते हैं। संसार का अस्तित्व हमारी गलतियों के कारण है। सृष्ट-चक्र के चलते रहने के कारण हमारे वे ही गत जीवन हुआ करते हैं जिनके लिए पुनर्जन्म आवश्यक है। भूत में असंख्य बार विश्व की सृष्टि एवं संहार हो चुका है और भविष्य में अनन्तकाल तक बराबर इसी प्रकार उसका उद्भव तथा लय होता रहेगा।

 

धार्मिक अनुभूति

 

धर्म यह प्रयत्न करता है कि मनुष्य को अपने देवत्व का ज्ञान करा दे, केवल कोरा बौद्धिक ज्ञान देकर नहीं; किन्तु उससे तादात्म्य की अनुभूति कराकर इस अनुभूति के लिए किसी विशिष्ट मार्ग का निर्देश नहीं किया जा सकता। मनुष्य की आत्मा अनन्त-स्वभावा है; अतः उसकी शक्ति-सम्भावनाएं भी अनन्त हैं। उसका ज्ञेय परमात्मा भी उसी भांति अनन्त है। असीम परिस्थिति के प्रति अनन्त आत्मा की प्रतिक्रियाएं सीमित नहीं की जा सकतीं। हिन्दू-दार्शनिकों का विश्वास है कि अनन्तरूप जीवन को थोड़े-से बंधे हुए रूपों में समेटकर नहीं रखा जा सकता। एक सुप्रसिद्ध ग्रन्थ का वचन है- 'जिस प्रकार आकाश में उड़ने वाली चिड़ियां तथा समुद्र में तैरने वाली मछलियां अपने मार्ग में कोई चिन्ह नहीं छोड़तीं, ठीक वैसे ही भगवत्प्राप्ति के पथ पर आत्म-साक्षात्कार-रसिक अग्रसर होते हैं i[7] उपनिषदों के ऋषियों ने, यहूदी पैगम्बरों ने तथा धर्म-संस्थापकों ने परमात्मा का शब्द सुना है, उसके सान्निध्य की अनुभूति की है। ईश्वर अपने भक्तों के प्रति सदा ही न्यायपूर्ण, पक्षपातरहित व्यवहार करता है; वे उसे चाहे जिस नाम से पुकारें एवं उसकी उपासना के लिए चाहे जिस सरणि का उपयोग करें। गीता में भगवान् का वचन है- 'जो कोई जिस किसी रूप में मेरे पास आता है, मैं उसी रूप में अवश्य उसको मिलता हूं।'

 

मानव-चेतना के त्रिविधिरूप के आधार पर ज्ञान-मार्ग, भक्ति-मार्ग एवं कर्म-मार्ग के विभाग किये गये हैं। ज्ञान, अनुभूति तथा चेष्टा कोई तीन भिन्न-भिन्न शक्तियां नहीं हैं, वे तो एक ही अनुभव के तीन दृष्टिकोण है। तीनों ही अपना-अपना अंश उसकी पूर्ति में देते हैं एवं सभी एक-दूसरे में व्याप्त है। सम्यक ज्ञान, सम्वक इच्छा, सभ्यक्रिया-ये तीनों की एक साथ रहते हैं। पहला हमें सत्य का दर्शन कराता है, दूसरा उसमें अनुराग उत्पन्न कराता है एवं तीसरा हमें जीवन की रचना में लगाता है। भावना की उष्णता से हीन कोरा ज्ञात हृदय को हिम के समान शीतल कर देता है। ज्ञान से प्रकाशित कोरी भावुकता पागलपन है। जिस कर्म को ज्ञान का पथ-प्रदर्शन तथा स्नेह की स्फूर्ति नहीं मिलती, उसे अर्थहीन संस्कार-पद्धति अथवा उन्मुक्त चंचलता ही समझाना चाहिए। पूर्ण जीवन की संश्लिष्ट अनुभूति में तीनों ही सम्मिलित हैं। भिन्न-भिन्न पुरुष भिन्न-भिन्न अंगों पर विशेष बल देते हैं, अतएव जीवन-समस्या को वे भिन्न-भिन्न मार्गों से सुलझाने का प्रयास करते हैं।

 

गीता का वचन है कि 'ज्ञान के सम्मान पूर्ति-विधायक और कुछ नहीं है। यह ज्ञान उसी विवेचना का नाम है जिसे यथार्थ आत्मज्ञानी सनत्कुमार तथा शुष्क पाण्डित्य के प्रतिनिधि नारद के उपनिषत्प्रसिद्ध शास्त्रार्थ में कोरी बकवास कहकर उड़ा दिया गया है। मनुष्य की मूल प्रकृति तो आत्मस्वातंत्र्य एवं ज्ञान है। अपनी परिच्छिन्नता के कारण हम अपने सत्य-स्वरूप से अनभिज्ञ रहकर भ्रम में पड़े रहते हैं। तर्कशास्त्र का मुख्य कार्य यह बताना नहीं कि मनुष्य को ज्ञान क्यों अथवा कैसे होता है, वरन् यह बताना है कि वह क्यों अथवा कैसे ज्ञान-प्रक्रिया में असफल होता है। भूल का कारण हमारा सीमिति ज्ञान है। सत्य का प्रत्यक्ष करके इन सीमाओं को ध्वस्त करना ही मानसिक विकास कहलाता है। भाव अथवा संकेत पर निर्भर रहने वाला यह ज्ञान सत्य में ही निवास करता है। विचार एवं तर्क ज्ञान की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं। गीता युक्तिपूर्ण आन्तरिक सूझ पर जोर देती है-ज्ञानम् विज्ञान सहितम्। बौद्धिक सहारे के बिना सम्भव है हमारी आन्तरिक सूझ व्यक्तिगत भावुकता ही रह जाय। इस रक्षक वाक्य में गीतकार का यह संकेत पाया जाता है कि सत्य की प्रत्यक्षानुभूति में सार्वभौमिकता रहती है। यह प्रत्यक्षानुभूति हमें विनम्रता की भावना से प्राप्त हो सकती है। यदि हम बौद्धिक अहंकार का परित्याग कर दें तथा जिज्ञासु भाव को अपना लें, तो स्वर्गीय वायु के झोंके हम तक पहुंच सकते हैं। योगाभ्यास मन को इस योग्य बनाता है कि वह आभ्यन्तरिक निस्तब्धता के गम्भीर घोष को सुन सके। तब हम अपनी आत्मा से, विश्वआत्मा से तादात्म्य का अनुभव कर सकते हैं।

 

ईश्वर-साक्षात्कार के लिए ज्ञान-मार्ग बहुत ही मन्द गति एवं कष्टपूर्ण है। 'इस समस्त विश्व के रचयिता एवं पिता को प्राप्त करना बहुत कठिन है तथा उसे पाकर सबको बताना तो असम्भव ही है।[8] हमारी आयु इतनी छोटी होती है एवं अन्वेषण की गति इतनी धीमी। हम खाली बैठकर प्रतीक्षा नहीं कर सकते। हमें जानने की जल्दी है। हम किसी ऐसे धर्म को स्वीकार कर लेना चाहते हैं जो हमारे जीवन का सहारा बन सके, जो सन्देह-भावना से हमारी रक्षा कर सके एवं व्यावहारिक जीवन में हमारा सहायक हो सके। ईश्वर-साक्षात्कार के लिए लोगों की अधीनता उन नीम-हकीमों को अपना जाल बिछाने का मौका देती है जो अपने अनुयायियों की अल्प काल में ही मोक्ष प्राप्त करा देने का वादा किया करते हैं। अन्धविश्वास तथा जादू जनसाधारण का सम्बल बन गया है। ब्राह्मण-व्यवस्था में बुद्धि का पूर्ण परित्याग किसी दशा में भी नहीं किया गया है। सत्य की भावना ही लोक- जीवन का नियन्त्रण करती है। ऊंचे-से-ऊंचे दार्शनिक सत्य को साधारण बुद्धि के मनुष्यों की समझ में अपने योग्य कथा-कहानियों का रूप दे दिया गया है जिससे 'सभी सुगमतापूर्वक जीवन के कठिन स्थलों को पार कर जायं, सभी आनन्द प्राप्त कर सकें, सभी सम्यक् ज्ञान की उपलब्धि कर सकें एवं सभी सर्वत्र सुख-भोग कर सकें I[9] पुराणों के उपाख्यान मन्द-बुद्धि पुरुषों को चरम कल्याण का ज्ञान देकर उसमें उनकी रुचि उत्पन्न करते हैं तथा उनके आत्म-विकास में सहायता प्रदान करते हैं।

 

उपासना के जितने रूप देश में प्रचलित थे, हिन्दू-दार्शनिकों ने उन सबको ही स्वीकार कर लिया तथा उन्हें इस प्रकार क्रमबद्ध कर दिया कि वे क्रमशः ईश्वराराधन के श्रेष्ठतम रूप तक पहुंच जायें, उस रूप तक पहुंच जायें जो ईश्वर के निकट साहचर्य की अनुभूति का अभ्यास करता है। शिशु-पुराण में लिखा है- 'उत्तमावस्था तो सहजावस्था है, दूसरी श्रेणी की अवस्था ध्यान एवं धारणा है; तृतीय अवस्था प्रतिमा-पूजन है तथा चतुर्थ अवस्था तीर्थयात्रा तथा होम इत्यादि करने की है।[10] ऋग्वेद में मूर्ति-पूजा का नाम तक नहीं पाया जाला। अतः स्पष्ट है कि इसका प्रचार बाद में हुआ। सभी मानते हैं कि अधिकसित मस्तिष्क-मनुष्यों के लिए ही इसकी उद्भावना हुई है। मनुष्य में आदिम युग के, सभ्यता-पूर्वकाल के अनेक चिन्ह अब भी पाये जाते हैं। वह ईश्वर की कल्पना रंग-बिरंगे चित्रों के रूप में करना पसन्द करता है। वह अपने मनोभावों को कला एवं संकेतों के द्वारा ही व्यक्त कर सकता है। वे सत्य को व्यक्त करने के लिए कितने ही अपर्याप्त क्यों हों, जब तक मनुष्यों के आत्म-साक्षात्कार में सहायक सिद्ध होते रहते हैं, लोग उन्हें सहन करते रहते हैं। जब तक वह ठीक दृष्टि-कोण को व्यजित करता रहता है तब तक किसी भी प्रतीक को तिरस्कृत नहीं करना चाहिए। प्रोफेसर गिलबर्ट मरे ने 'ग्रीक धर्म की चार अवस्थाएं नामक ग्रन्थ में टापर निवासी मैक्षिमस के लेख का उद्धरण दिया है जो मूर्ति-पूजा का बड़ा ही सुन्दर समर्थन है। उस उद्धरण में प्रतीकोपासना के सम्बन्ध में हिन्दू-भावना का निचोड़ गया है- 'उस ईश्वर की जो सबका सृष्टा तथा पिता है, जो सूर्य एवं आकाश से प्राचीन है, जो काल, अनन्तता तथा समस्त सत्ता प्रवाह से भी महान् है, किसी भी शास्त्री के द्वारा व्याख्या नहीं की जा सकती; वह वाणी के द्वारा प्रकट नहीं किया जा सकता; आंखों के द्वारा देखा नहीं जा सकता।' अतएव उसके सच्चे स्वरूप को समझने में अक्षम होने के कारण हम शब्दों की, नामों की हाथीदांत, चांदी तथा सोने से निर्मित प्रतिमाओं की, वृक्ष तथा नदियों की, पर्वत, शिखर तथा निर्झरों की सहायता लेते हैं एवं उसके ज्ञान की तीव्र जिज्ञासा हृदय में लेकर संसार में जहां भी जो कुछ देखते हैं उसी को उसका रूप कहकर प्रचार करने लगते हैं, ठीक वैसे ही जैसे लौकिक प्रेमी। प्रेमी की दृष्टि में संसार का सुन्दरतम पदार्थ उसकी प्रेमिका ही है; किन्तु उसकी स्मृति जगाने की क्षमता रखने के कारण वह वीणा, माला, कुरसी, क्रीड़ाभूमि अथवा किसी भी अन्य स्मृति-चिन्ह को देखकर आनन्द से भर उठता है। अधिक विवेचना करके प्रतिमाओं के विषय में कोई निर्णय करने के झमेले में हम क्यों पड़े ! आवश्यकता तो केवल इस बात की है कि मनुष्य को ईश्वर के स्वरूप को ज्ञान हो जाय और बस यदि ग्रीक को फिडियस की कला, मिस्र-निवासी को पशु-पूजा किसी को आग एवं किसी को नदी ही ईश्वर का स्मरण कराती है तो उनकी इस भिन्नता से नाराज होने की क्या जरूरत। आवश्यकता तो केवल इस बात की है कि वे भगवान् को जानें, उसमें अनुरक्त हों और उसको कभी भूलें।[11] कितने सत्य, उदार एवं कोमल शब्द हैं पर उत्साहहीन, दुराग्रह एवं साम्प्रदायिक प्रवंचना की ही बातें सुनते रहने के अभ्यासी हमारे कानों में ये कुछ खटकते से हैं। यदि हम प्रतिमा की लाक्षणिकता को भुला दें और रूपक को अक्षरशः सत्य मान लें तो हमारे जिज्ञास्य परमात्मा का ठीक उल्टा रूप हमारे सामने आयेगा। विचारशील भारतवासी यह कभी नहीं भूलता कि मूर्ति-पूजा केवल साधन है। योगी भगवान् का दर्शन आत्मा में करता है, प्रतिभाओं में नहीं।[12]

 

निम्नकोटि की उपासना को आवश्यक मानकर, उसी प्रकार जैसे शिशुओं के लिए दूध एवं प्रौढ़ों के लिए मांस-भोजन की व्यवस्था की जाती है, हिन्दू-धर्म ने एक ऐसे धार्मिक वातावरण का विकास किया है, जिसमें एक ओर सर्वोच्च दार्शनिक ज्ञान पाया जाता है और प्रतीकोपासना का यह विधान जिसको केन्द्र मानकर महान् कलापूर्ण सौंदर्य की सृष्टि की गई है। उसमें भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक विकास एवं धार्मिक ज्ञान से युक्त मनुष्यों की सभी श्रेणियों के लिए सामान्य बाह्य साधना का प्रबन्ध भी है। प्रौढ़ हो जाने से यदि हमें खिलौनों की जरूरत नहीं रह गई तो इसीलिए खिलौने तोड़कर बच्चों का जी दुखाने में बुद्धिमानी नहीं।

 

भावुक पुरुष ईश्वर का पूर्ण सौन्दर्य अथवा प्रेम मानते हैं तथा उसके साहचर्यजनित आनन्द में डूब जाने की कामना करते हैं। प्रेम तथा सौन्दर्य रूपी भगवान् के प्रतीक कृष्ण हैं एवं सहृदय-स्पर्शी लोक गीत है- 'उसकी वंशी बुला रही है, मुझे जाना ही होगा। यद्यपि गहन कंटकाकीर्ण बन में होकर जाना है फिर भी मैं अवश्य जाऊंगी।' जब अनुल्लंघ्य आज्ञा मिलती है तो कोई भी सहृदय व्यक्ति कैसे उसकी अवहेलना कर सकता है! सौन्दर्यप्रेमी को प्रबल भावुकता में ही पूर्ण सन्तोष प्राप्त हो जाता है। सौन्दर्य का अस्तित्व की सौन्दर्य का समर्थन है। भक्त तो भगवान् के चरणों में लोट जाता है और संसार का कोई आकर्षण उसे वहां से हटाने की क्षमता नहीं रखता। तुकाराम कहते हैं- 'मैंने तुम्हारे चरणों को पकड़ लिया है, अब मैं उन्हें छोडूंगा नहीं....मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा, चाहे तुम सारा संसार मुझे बदले में क्यों दे दो।' चैतन्य का कहना है- 'मैं धन नहीं मांगता, जन नहीं मांगता, सुन्दर स्त्रियां अथवा काव्य-प्रतिभा नहीं मांगता। हे संसार के प्रभो। मैं तो केवल यही चाहता हूं कि प्रत्येक जन्म में मैं तुम्हारा भक्ति पाता रहूं।' हिन्दू-दार्शनिक ने सदा यह प्रयत्न किया है कि निर्मल चरित्र का अभ्यास एवं सत्य-प्रेम धार्मिक भक्ति से दब जायें। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि हमारी भावनाएं शेष जीवन से अलग अन्य अपेक्षारहित नहीं हो सकतीं। अलग से देखने पर उनका कोई नैतिक महत्त्व नहीं। किसी भी भावना को महत्त्व तो उसकी मूल प्रेरणा पर निर्भर करता है, हमें यह देखना होता है कि वह उच्च आध्यात्मिक भक्ति का फल है अथवा नीच विषय-वासना का परिणाम। भक्ति-मार्ग का यह सिद्धान्त नहीं है कि सभी भावनाएं पवित्र होती हैं। सच्ची धार्मिक भक्ति तो उस विवेक-जात विनम्रता को कहते हैं जो सब कुछ ईश्वर के सहारे छोड़ देने पर उत्पन्न होती है। ज्ञान-सूचक इस भावना के फलस्वरूप भक्त मानवसेवा में जीवन उत्सर्ग कर देता है। उपासना, संगीत एवं कला भक्ति के विकासक हैं।

 

कर्मयोगी कर्म अथवा स्वकर्तव्य पालन करके तथा यक्ष अथवा समाजसेवा करके मोक्ष-लाभ करने का प्रयास करता है। स्वतन्त्रता मनुष्य का स्वाभाविक गुण है; आत्म-ज्ञान के अवरुद्ध होने से बन्धन उत्पन्न होते हैं। जब हम अपनी दासता को ही प्यार करने लगें तो समझना चाहिए कि हमारी दासता पराकाष्ठा को पहुंच चुकी है। शेष संसार से सम्बन्ध विच्छेद करने वाली स्वार्थ-प्राचीर को यदि हम तोड़ सकें तथा उदात्त आदर्श को अपना सकें, तो हम क्रमशः उस प्रेम का विकास कर सकते हैं जो भय, घृणा एवं कटुता का विनाश करता है। यंत्र कि तरह नीति-धर्म का पालन करने मात्र से हम अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते। उस नीति को ईश्वरानुभूति का पुष्टिकर भोजन देकर सशक्त बनाना होगा। तभी हमें इस बात का अनुभव होगा कि प्रत्येक मनुष्य में केन्द्रीय सूर्य के अमर प्रकाश की किरण विद्यमान है। जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो परमात्मातत्त्व में अपनी तथा उसकी एकता का ज्ञान हमें होता है और उसी ज्ञान को अपने जीवन में हम क्रियात्मक रूप देते हैं। अब हम हिन्दू-धर्म की दूसरी विशेषता उसकी नैतिकता की ओर आते हैं।

 

नैतिकता

 

नैतिक आचरण का सिद्धान्त को कार्यान्वित करने का उद्देश्य यह है कि उसे अपनी शक्तियों का पता चल जाय एवं अतीत के बंधन तथा भविष्य के भयों से मुक्त होकर वह आत्म-विश्वास की दृढ़ता से खड़ा रह सके। ऐहिक जीवन का प्रत्येक क्षण मधुर प्रेम की भावना तथा ईश्वर के चिर सम्बन्ध की आनन्ददायिनी चेतना में बिताना ही नैतिक आचरण है। आदर्श पुरुष सदैव स्वर्गीय प्रकाश में जीवन-यापन करता है एवं सत्य, शुचिता, प्रेम तथा आत्मविसर्जन के महान् गुण उसके जीवन में मूर्तरूप धारण करते हैं। प्राकृतिक शक्तियों पर मनुष्य की विजय से नहीं वरन् वासनाओं के निरोध से ही उसकी नैतिक उन्नति को जांचना चाहिए। गोलियों की बौछार में भी सच बोलना, शूली पर चढ़ा दिये जाने पर भी प्रतिहिंसा से विरत होना, मनुष्य तथा पशु सभी का सम्मान करना, सर्वस्व दान कर देना, परोपकार में जीवन उत्सर्ग कर देना, अत्याचार को अविचलित भाव से सहन करना आदि मनुष्य के प्रधान कर्तव्य हैं। हमारे आधुनिक व्यावहारिक सुधार भले ही उन्हें यह कहकर उड़ा दें कि वे ऊंची बातें हैं और मनुष्य-प्रकृति के दैनिक उपयोग के अयोग्य हैं; बुद्धिहीन भारतीयों अथवा 'गैलीली' के धीवरों को सन्तोष देने के लिए वे प्रशंसनीय आदर्श हो सकते हैं, पर उनको व्यावहारिक रूप देना असम्भव है। हिन्दू-दार्शनिक जानते थे कि सामान्य लोक-प्रकृति एवं नैतिक आदर्श में महान् अन्तर है अतएव उन्होंने शिक्षा एवं अभ्यास की एक ऐसी व्यवस्था बना दी जो मनुष्य को इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तैयार कर सके। संस्थाओं एवं संस्कारों का जाल, जो लोगों के चरित्र एवं नैतिक भावनाओं को विकसित करता है, 'धर्म' कहलाता है और वह हिन्दू-धर्म का एक विशेष अंग है। हिन्दू धर्म किसी को बलपूर्वक किसी मत विशेष में दीक्षित करने में विश्वास नहीं करता, पर सभी हिन्दुओं के व्यवस्था मानकर चलने पर अवश्य जोर देता है। उसे धर्म की अपेक्षा संस्कृति कहना अधिक उपयुक्त होगा। 'यदि तुम 'धर्म' का पालन करोगे, तो तुम्हें सिद्धान्त अथवा सत्य का ज्ञान स्वतः हो जाएगा।' यह 'धर्म' प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थित मृगप्राय अग्नि को प्रज्वलित करने में सहायक होता है।

 

लोक-हृदय से अनुमोदित आचार-शास्त्र ही वह 'धर्म' है। किसी व्यक्ति विशेष का मन इसका विधान नहीं करता; अतः यह वैयक्तिक नहीं कहा जा सकता; कानून इसे मानने को विवश नहीं करता, अतः यह बाह्य भी नहीं कहला सकता। यह तो वह आचार-व्यवस्था है, जिसका अनुमोदन लोकमत अथवा जन-साधारण का हृदय करता है। जर्मन इसे Sittlichkeit करते हैं। 'फिष्टे' ने इसकी परिभाषा इस प्रकार की है- 'आचरण सम्बन्धी वे नियम को लोगों से पारस्परिक व्यवहार को निर्यात्रत करते हैं एवं जो हमारी संस्कृति की वर्तमान दशा में आदत अथवा दूसरी प्रकृति हैं. इसीलिए हमारे अचेतन मस्तिष्क का अंग बन गये हैं। 'धर्म' किसी को भी सदाचारी बनने को विवश नहीं करता, वह तो मनुष्यों को सदाचार-पालन का अभ्यास कराता है। वह अटल यात्रिक नियमों का संग्रह नहीं है प्रत्युत् जीवनधारी के सदृश है एवं समाज के विकास से प्रभावित होकर स्वयं भी बढ़ता चलता है। भारतवर्ष में तो राज्य भी धर्म का सेवक होता था। वह भी धर्म का अतिक्रमण नहीं कर सकता था। उसका काम धर्म को बदलना अथवा रह करना नहीं था, वरन् उसके पालन की व्यवस्था करना था। राज-धर्म किसी दशा में भी लोगों की जीवनचर्या में अनुचित हस्तक्षेप नहीं करता था। चार हजार वर्ष से भी अधिक हो गये जब से भिन्न-भिन्न धार्मिक सम्प्रदायों तथा वंशों के पारस्परिक युद्ध एवं राजनीतिक कलह के बावजूद भी हमारा 'धर्म' अथवा सामाजिक जीवन उन्हीं सिद्धान्तों को मानकर चलता रहा है। यदि हम भारतीय जीवन की सप्राण अविच्छिन्न धारा देखना चाहते हैं तो उसका दर्शन हमें उसके राजनीतिक इतिहास में नहीं वरन् उसके सांस्कृतिक तथा सामाजिक जीवन में ही मिल सकता है। राजनीतिमयता का रोग तो उसे प्लासी के युद्ध के बाद ही लगा है। आज सम्पूर्ण जीवन राजनीति से ओत-प्रोत है। राज्य का समाज पर आक्रमण आरम्भ हो गया है और रवीन्द्रनाथ के शब्दों में 'बिना राष्ट्रों का भारत' अब पाश्चात्य अर्थ में उसके समस्त गुण-दोषों को लेकर एक 'राष्ट्र' बन जाने के प्रयास में संलग्न है।

 

'धर्म' के दो रूप होते हैं-एक वैयक्तिक और दूसरा सामाजिक ये दोनों ही अन्योन्याश्रित हैं। व्यक्ति की धर्म-भावना को एक पथ-प्रदर्शक चाहिए एवं उसे यह सिखाने की आवश्यकता है कि उसका उद्देश्य क्या है तथा किस प्रकार उसे इन्द्रियों का जीवन त्यागकर आध्यात्मिक जीवन पसन्द करना चाहिए। समाज के हित का भी समानरूप से ध्यान रखना है। सब प्राणियों को एक सामञ्जस्य-सूत्र में बांध रखनेवाली शक्ति धर्म कहलाती है।[13] सामाजिक कल्याण का विधान करने वाला आचरण ही पुण्य है, इसके प्रतिकूल आचरण को पाप कहते हैं। प्रायः जोर देकर कहा जाता है कि सबसे बड़ा पुण्य कर्म दूसरों के साथ वही व्यवहार करने में है जिस व्यवहार की आशा हम दूसरों से अपने लिए करते हैं। नित्य कर्मों में सामाजिक तथा वैयक्तिक दोनों ही प्रकार के कर्तव्यों का समावेश कर लिया गया है। नित्य कर्म निम्नलिखित हैं-शौचम् (शुद्धता), आचरम् (शिष्टाचार), पंच महायज्ञ (समाज-सेवा) तथा सन्ध्या-वन्दनम् (सन्ध्या तथा उपासना) वैयक्तिक जीवन के अवस्था-विभाग एवं सामाजिक वर्गों के नियामक वर्णाश्रम धर्म में इसका विस्तृत विवेचन किया गया है। व्यक्ति का लक्ष्य सांसारिक सुख प्राप्ति उतनी नहीं है जितनी आदर्श की प्राप्ति अपने उद्देश्य की सिद्ध है। इसकी प्राप्ति व्यक्ति की उस शिक्षा से ही सम्भव है जिसके लिए कष्ट उठाना होगा तथा संयम का पालन करना होगा। प्रत्येक मनुष्य की आयु को चार आश्रमों में बांट दिया गया है। पहला आश्रम ब्रह्मचर्य है। इस आश्रम में संयम, धैर्य, ब्रह्मचर्य तथा लोक-सेवा की भावनाएं बालकों में परिपुष्ट कर दी जाती है। इस नियम का पालन प्रत्येक व्यक्ति को करना पड़ता है, वह चाहे जिस वर्ग का हो, चाहे धनी हो चाहे निर्धन। दूसरा आश्रम गृहस्थाश्रम है। इस आश्रम में आने पर गृहस्थ-धर्म का पालन करना होता है। अब वह व्यक्ति किसी सामाजिक संस्था का सदस्य बनता है एवं उस संस्था के अधिकार तथा कर्तव्य उसे स्वीकार करने पड़ते हैं। अपने सहचरों के साथ जिस बन्धन में हमें बंधना होता है उसके परिणामस्वरूप मानवप्रकृति की कुछ मधुरतम आदतों का विकास होता है। इस समय आत्मनिर्भरता, मितव्ययिता एवं अतिथिसत्कार का अभ्यास करना होता है। गृहस्थ का सम्मान सबसे अधिक होता है क्योंकि वही शेष तीन आश्रमों का आश्रयदाता है। वर्ण-नियम इसी आश्रय के लिए मान्य है। तीसरा आश्रम वाणप्रस्थ कहलाता है। इस समय व्यक्ति को सांसारिक सम्पत्ति से विरक्त होना पड़ता है, गृहस्थ-धर्म-पालन के परिणामस्वरूप जो गर्व अथवा अहंकार उत्पन्न हो गया है, जैसे कुल-गर्व, धन-गर्व, बुद्धि अथवा सौभाग्य गर्व, उसका निरोध करना पड़ता है तथा संन्यास का अभ्यास करना पड़ता है। जब वह उच्च जीवन के पूर्णतः योग्य हो जाता है तो संन्यास ले लेता है। संन्यासी मनुष्य-जाति का रागरहित सेवक होता है जो आत्म-शक्ति में ही शान्ति का अनुभव करता है। अनन्त से पूर्ण सामंजस्य स्थापित हो जाता है और मनुष्य की शिक्षा का यहीं पर अवसान हो जाता है।

 

ये संन्यासी संसार को दुख-दैन्य में पड़ा छोड़कर अलग नहीं हो जाते। उनमें जो परम महान् हैं, जैसे बुद्ध तथा शंकर, रामानुज तथा रामानन्द एवं और भी अनेक, वे तो राष्ट्र के रक्त में ही प्रविष्ट हो गये हैं तथा उन्होंने ही उसके धर्म की स्थापना की है। उनके नाम आज राष्ट्र की सबसे बड़ी पैतृक सम्पत्ति हैं।

 

वर्ण-व्यवस्था का सम्बन्धक्तियों के सामाजिक कर्तों से है। धनुष्य का विकास तभी सम्भव है जब वह सामाजिक व्यवस्था के किसी किन्दु विशेष पर ही अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को केन्द्रित कर दे। भूकि मनुष्यों में मानसिक जीवन के तीन अंगों में से किसी एक की ही विशिष्टता पाई जाती है, अतः द्विजों को तीन भागों में बांट दिया गया है-विवार-प्रधान, माव-प्रधान एवं क्रिया-प्रधान। जिनमें किसी भी गुण की विशेषता नहीं, वे ही शुद्र है। चारों वर्णों की उपमा पहिलों, सैनिकों, औद्योगिकों एवं साधारण मजदूरों से दी जा सकती है जो सब एक ही संस्था के सदस्य हैं ऋग्वैदिक प्राचीन काल में ही पारस्परिक अनुराग में बद्ध चारों वर्णों के सूचक शिर, बाहु, कटि एवं जंवा के रूपक के द्वारा सामाजिक एकता का आदर्श व्यक्त किया जा चुका था। इस 'सम्पूर्ण' में प्रत्येक वर्ण का उचित स्थान, अधिकार तथा कर्तव्य निश्चित कर दिया गया था। कर्ममात्र सम्मानपूर्ण समझा जाता था; अतः वर्ण-गर्व अथवा ऊंच-नीच की भावना को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता था। वर्ण, अधिकार का नहीं उत्तरदायित्व का सूचक है। प्रत्येक व्यक्ति में सभा गुण विद्यमान है, केवल भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न गुणों की प्रबलता पाई जाती है। अपने कर्तव्य का पालन करके हम केवल 'सम्पूर्ण' का ही उपकार नहीं करते प्रत्युत आत्म-प्रकाशन भी करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट प्रकृति उसके कर्म में ही पूर्णतः विकसित होती है और वह कर्म एक विशेष अर्थ में उसका अपना धर्म, स्वधर्म है।[14]

 

हिन्दू-धर्म का आदर्श प्रत्येक व्यक्ति को ब्राह्मण, प्रत्येक पुरुष को पैगम्बर बनाना है। तभी उसको आन्तरिक स्वतन्त्रता एवं आध्यात्मिक साहचर्य का आनन्द प्राप्त होता है और तभी वह स्वमेव दुष्टता का प्रतिकार तथा प्रतिहिंसा करना बन्द कर देता है और तब उसमें इतना धैर्य एवं प्रेम उत्पन्न हो जाता है कि यदि कोई वार करे तो वह उसे सहन कर सके तथा यदि कोई उसे लूटना चाहे तो खुद ही वांछित वस्तु को उसे अर्पण कर सके। उसका हृदय शान्ति से पूर्ण रहता है जिसका अर्थ है घृणा का एकान्त विनाश सच्चा ब्राह्मणत्व मानव-शक्ति के उच्चतम विकास का प्रतीक है। आध्यात्मिक महत्ता के आधार पर ही समाज में वर्ण की व्यवस्था की गई है। मनुष्य के पंख नहीं होते; अतः उड़कर शिखर पर जा पहुंचना उसके लिए सम्भव नहीं, उसे तो धीरे-धीरे कार तथा प्रयास के साथ ऊपर उठने में ही सन्तुष्ट होना पड़ेगा। हिन्दुओं की सामाजिक व्यवस्था में यही क्रमिक योजना स्वीकृत हुई है। इस बात की पुष्टि में गोरक्षा तथा अहिंसा के दो उदारहण दूंगा। 'किसी जीव की हिंसा मत करो।' यही सबसे बड़ा धर्म है, यही मनुष्य के योग्य धर्म है। प्रत्येक ब्राह्मण के लिए इसका पालन करना अनिवार्य है फिर भी इस व्यवस्था में क्षत्रियों का विधान है जिनका धर्म है युद्ध में लोगों को मारना तथा स्वयं लड़ते हुए मर जाना। व्यवस्था-विधायकों का विचार था कि 'आंख एवं दांत के बदले में दांत' लेने की भावना मानव-प्रकृति का अटल गुण है। उसका निवारण एकाएक नहीं किया जा सकता। जहां अनाचार को स्वीकार करना अनुचित है एवं प्रेम के द्वारा उसका प्रतिकार सम्भव नहीं, वहां बलपूर्वक उसका विरोध करना विहित है एवं क्षत्रियों से कहा गया है कि शत्रुओं का दमन करना तुम्हारा कर्तव्य है। फिर भी यह अधिकार तो मानव-प्रकृति पर दया करके ही दिया गया है तथा क्षत्रियों को बता दिया गया है कि ब्राह्मणों का प्रेम-धर्म उनके हिंसा-धर्म से श्रेष्ठ है। क्षत्रिय विकास की निम्न श्रेणी का द्योतक है, क्योंकि वह मनुष्य को केवल मांस का पिंड मानता है, उसमें भगवान् की ज्योति नहीं देखता। उसे घृणारहित भ्रातृभाव से कर्तव्य समझकर ही युद्ध करने की आज्ञा है, प्रतिहिंसा की भावना से 7f - 3H विचार से नहीं कि इसने हमें दुख दिया है, अतः हम भी इसे दुख देंगे। यदि क्षत्रिय इस प्रकार मानवहित का ध्यान रखकर अपना कर्तव्य करे तो उसकी आध्यात्मिक उन्नति होगी और धीरे-धीरे पशुबल पर आश्रित रहना कम करता हुआ वह अंततोगत्वा संसार में किसी भी जीव की हिंसा करनेवाला ब्राह्मण बन जायेगा। हिंसापूर्ण युद्ध की आज्ञा दी अवश्य गई है, पर चरम लक्ष्य तो उसका अतिक्रमण कर जाना ही है। प्रकृति की धारा के साथ बहने का उद्देश्य उसे पार कर जाना है।

 

अहिंसा धर्म का विधान पशु-पक्षियों के लिए भी है। हेतु-शास्त्र की दृष्टि से इसका अर्थ यह भी है कि हमें निरामिष भोजन ही करना चाहिए। पशु-पक्षियों की सृष्टि भी ईश्वर ने ही की है, अतएव उनके प्रति भी हमें सदस्य होना चाहिए। गाय पशु-जगत् की प्रतीक है। धार्मिक हिन्दू नित्य भगवान् से प्रार्थना करता है कि गो-ब्राह्मण की रक्षा हो, गो-ब्राह्मण जो क्रमशः पशु एवं मानव जगत् के शारीरिक एवं आध्यात्मिक पोषकों के प्रतीक हैं। गांधीजी ने लिखा है- 'गाय के देवत्व-प्रदान का कारण तो स्पष्ट है। भारतवर्ष में मनुष्य की सबसे बड़ी मित्र गाय ही थी। उससे ही समृद्धि की प्राप्ति होती थी। गाय एक करुण काव्य है... वह करोड़ों भारतवासियों की माता है। गौ-रक्षा का अर्थ समस्त मूक सृष्टि की रक्षा है।[15]' भारतवर्ष में कुछ ऐसे लोग भी थे जो पशुओं पर जरा भी दया नहीं दिखाते थे। उनकी आदत में सुधार करना पड़ा था। मांस-त्यागी तथा खेल अधवा भोजन के लिए भी किसी पशु की हिंसा करनेवाले ब्राह्मण का आदर्श लोक-चरित्र की उन्नति में काफी सहायक सिद्ध हुआ है। क्षत्रिय तथा वैश्य मुख्यतः शाकाहारी हैं। उत्सव तथा पर्व के दिन शूद्र भी मांस-भक्षण नहीं करते। इस प्रकार शाकाहारी-प्रवृत्ति निश्चित रूप से बढ़ रही है। पशुओं पर बिल्कुल ही दया करने वाले केवल 'पंचम' वर्णी ही हैं जिन पर हिन्दू-धर्म का प्रभाव रंचमात्र भी नहीं दिखाई पड़ता है।

 

हिन्दू-धर्म पर यह लांछन लगाना कि उसने दलित वर्गों के मानसिक एवं चारित्रिक विकास के लिए कुछ भी नहीं किया, प्रकट करता है कि हिन्दू-धर्म ने भारत में जो कुछ किया है उसके संबंध में हम बिल्कुल ही अज्ञ हैं। बौद्ध एवं ईसाई धर्म की इतनी शताब्दियों के पश्चात् भी आज जब तक सभ्य जाति किसी असभ्य जाति के सम्पर्क में आती है तो वह उस असंस्कृत जाति की मनोवृत्ति को समझने का प्रयास नहीं करती, केवल क्रूर उपायों के द्वारा विजय प्राप्त कर उन्हें अपने अधीन बना लेती है जिसका परिणाम यह होता है कि यदि उस असभ्य जाति के पास रोने को आंखें बच रहीं तो वह दिन-रात रो-रोकर भगवान् को अभिशप्त किया करती है कि क्यों उसने इन संस्कारों को उनके देश में भेजा। भारत के आर्यों ने यहां के मूल निवासियों को भी अपना अंग बना लिया तथा मलिनता एवं मदिरापान की आदत छुड़ाने में, पवित्र जीवन बिताने एवं परमात्मा की भक्ति करने में उनकी प्रचुर सहायता की। यह देखकर कि यहां के मूल निवासी नागों की पूजा करते हैं, आर्यों ने उनसे कहा कि नागदेव से भी महान् नागेश्वर है, वह नागों का स्वामी कृष्ण है जो कालिय नाग के मस्तक पर नृत्य कर रहा है। समाज को शीघ्रतापूर्वक उच्च आचर की ओर ले जाकर, जो आन्तरिक प्रेरणा के बिना असम्भव है, उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया जिसके लिए वे इतिहास के प्रति हिंसा-भाजन बनें। वर्ण-व्यवस्था के द्वारा क्रमिक सभ्यता-विकरण का कार्य मुसलमानों के आने से पहले तक चलता रहा भारत-जैसे विशाल देश में, जहां यातायात की कोई विशेष सुविधा भी नहीं थी, जो कुछ भी सफलता मिली वह वास्तव में महान् है। जेम्स केनेडी लिखते हैं- 'इन आदिम निवासियों अथवा अन्त्यजों को हिन्दू धर्म में दीक्षित करके उन्हें पचा जाने का भार नवीन हिन्दू-धर्म पर पड़ा और ईसा की 7वीं तथा 11वीं शताब्दी के मध्य में यह काम पूरा हो गया। यह काम इतनी कुशलता से किया गया कि आज इस समस्त उत्तरी भारत में रक्त, संस्कृति एवं धर्म की दृष्टि से बहुत कुछ एक ही प्रकार की जनता को निवास करते देखते हैं जो अपनी सीमा के उस पार निवास करने वाली नीच जातियों से भली भांति पहचानी जा सकती है।'[16] हिन्दू-समाज में विदेशी बराबर आते रहे तथा हिन्दू-धर्म इन भिन्न प्रकृति के लोगों में उच्च जीवन की स्फूर्ति उत्पन्न करने में बराबर सफल रहा है। अगर यह संस्कार-कर्म चलता रहता तो आज भारत में पांच करोड़ अछूतों के स्थान में 25 करोड़ अछूत होते। हिन्दुओं की राजनीतिक पराधीनता के कारण यह काम कुछ मन्दा पड़ गया है। तभी से हिन्दू-समाज अनुदार रूढ़िवादी बन गया है और भारत-निवासियों का एक बहुत बड़ा भाग समाज से दूर जा पड़ा है। दूसरे सम्प्रदाय इस दुर्बलता से लाभ उठाकर उसकी काफी हानि कर रहे हैं।

 

परम्परा

 

सभी हिन्दू वेदों को सर्वोपरि धार्मिक प्रमाण स्वीकार करते हैं। उनमें जीवन तथा विश्व के तत्त्व का निरूपण है। वेदों का प्रधान अंग उपनिषद् हैं जो उस स्वतंत्र आध्यात्मिक प्रगति का परिणाम हैं जिसने अज्ञातरूप से वेदों के अपरिष्कृत अंशों को दबा दिया। हिन्दू-धर्म का परवर्ती इतिहास इसी औपनिषदिक सुदृढ़ आधार पर निर्मित एक भव्य भवन का इतिहास यद्यपि धार्मिक विचारों ने अनेक क्रांतियां की, अनेक बार महान् विजयें प्राप्त कीं, फिर भी लगभग पांच हजार वर्षों से उसके मुख्य सिद्धान्त उसी रूप में चले रहे हैं। जब-जब दुराग्रह के विकास ने धर्म को संकीर्ण साम्प्रदायिकता में अवरुद्ध कर दिया है तब-तब सच्चे महात्माओं ने जन्म लेकर आध्यात्मिक नव-जागरण का उपदेश दिया है। उपनिषदों का प्रवाह जब दुराग्रहपूर्ण विवाद में लुप्त हो गया, जब शुष्क शास्त्रार्थ के ज्वर ने धार्मिक चेतना को बेसुध कर दिया, तब भगवान् बुद्ध ने सत्य की सरलता एवं आचरण की विशुद्धता पर जोर दिया। जब शास्त्रीय संस्कृति एवं निरर्थक पाण्डित्य ने धर्म को अमानुषिक शास्त्रवाद बनाकर इस दुर्बोध व्यर्थता में निष्णात् पण्डितों की हास्यास्पद अहंकार से भर दिया था, सम्भवतः तभी, यद्यपि देश के दूसरे भाग में, गीताकार ने सभी पवित्र-हृदय मनुष्यों के लिए स्वर्ग-द्वार उन्मुक्त कर दिया। भारतीय धर्म का जो संस्कार शंकर ने किया था वह अब भी सर्वथा शक्तिहीन नहीं हुआ है। रामानुज तथा माधव, कबीर तथा नानक हिन्दू-धर्म पर अमिट छाप छोड़ गए हैं। यह स्पष्ट है कि हिन्दू-धर्म एक प्रणाली है, परिणाम नहीं; एक वर्द्धमान परम्परा है, अटल दिव्य-प्रकाशन नहीं। किसी ओर से भी आने वाले ज्ञान पर इसने कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया, क्योंकि आत्मराज्य में मेरे और तेरे का भेद नहीं है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हिन्दू-धर्म

 

आर्यों के भारत में प्रवेश करने के दिन से आज तक गम्भीर जातीय एवं धार्मिक विप्लवों की निरन्तर सामना करते रहने का गौरव अथवा दुर्भाग्य भारत का सदा ही रहा है। एक विशेष अर्थ में भारतवर्ष संसार का एक छोटा संस्करण है। वह एक प्रयोगशाला है जहां संसार की समस्याओं से सम्बन्धित जातीय अथवा धार्मिक संश्लेषण के प्रयोग किये जाते हैं। यदि वह ठीक है कि प्रत्येक जाति की एक विशेषता होती है और वह ईश्वराभिव्यक्ति के किसी विशेष रूप को ही हमारे सम्मुख उपस्थित करती है, तो मालूम होता है जातीय एवं धार्मिक संघर्षों का समाधान करने के लिए ही भारत चुना गया है।

 

हिन्दू-धर्म की प्रचंड तरंगों तथा शांत जल-राशि के लम्बे इतिहास में इस सरिता की वक्र गतियों एवं विस्तृत बालुकापूर्ण तटों में एक सामान्य वृत्ति को, एक आध्यात्मिक उद्देश्य को खोज लेना सम्भव है जो नित्य परिवर्तनशील रूपों के भीतर भी स्थिर रहा है। प्राचीन हिन्दू-धर्म के मुख्य सिद्धान्त मृत सीप नहीं हैं प्रत्युत् जीवित शक्तियां हैं जो सामर्थ्य एवं लाक्षणिकता से पूर्ण हैं। यदि ऐसा भी हो तो भी उस हिन्दू-धर्म के सिद्धान्तों को समझना मनोरंजन से खाली नहीं है, जिसके मानने वाले इस समय बीस करोड़ हैं।

 

'धर्म' शब्द का अर्थ काफी जटिल है। यह उन सभी आदर्शों तथा उद्देश्यों को, प्रभावों तथा संस्थाओं को व्यक्त करता है जो मनुष्य के व्यक्तिगत एवं सामाजिक चरित्र का निर्माण करते हैं। यह उस आचार-शास्त्र का नाम है जिसके पालन से ऐहिक सुख तथा मोक्ष, दोनों की ही प्राप्ति होती है।[17] यह आचारशास्त्र तथा धर्म दोनों का समुच्चय है। 'धर्म' नियमों से हिन्दू-जीवन पूर्णतः नियंत्रित है। उसके उपवास तथा उत्सव, उसके पारिवारिक तथा सामाजिक बंधन, उसकी रुचि तथा स्वभाव-सबका मूलाधार धर्म ही है।

 

मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष है। आत्म-शिखर पर चढ़कर अमरत्व लाभ करना मनुष्य के लिए निश्चित है। हम देव-सन्तान-अमृतस्य पुत्राः- हैं। मानव-हृदय का अमर स्वप्न जीवन की आत्मज्ञान के लिए तीव्र उत्कण्ठा ही हिन्दू-धर्म का आधार है। वह मानता है कि आत्मा ही अन्तिम सत्य है। हृदय की सब कामनायें, न्याय के सारे विवाद, आत्मा के अस्तित्त्व को मानकर ही चलते हैं। इसे तर्क के द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता, यद्यपि इसके बिना प्रमाण की ही सम्भावना नहीं हो सकती। यह केवल श्रद्धा का भी विषय नहीं है क्योंकि यह वही श्रद्धा है जो तर्क का भी मूल है। यदि मनुष्य की आत्मा के सम्बन्ध में भी सन्देह सम्भव है तो सन्देह ही संसार से मिट जाएगा। यदि कुछ भी है तो आत्मा भी है। यह वह चरम सत्य है जो परिवर्तन से परे है, वह अदृष्ट वास्तविकता है जो समस्त जीवन एवं तर्क का आधार है। 'हम है' यह एक ऐसा सत्य है जिसकी तुलना में हमारे विचारों का कोई महत्त्व नहीं। मनुष्य की वे दुर्बलताएं ही, जो उसके मार्ग में बाधक होती हैं, उसके भय का कारण बनती हैं; वह अन्धकार