भगवान् का मातृरुप

GOD AS MOTHER

 

का हिन्दी अनुवाद

 

 

 

 

 

लेखक

 

श्री स्वामी चिदानन्द सरस्वती

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादक

 

श्री शिवगोविन्द गुप्त, एम. ., साहित्यरत्न

 

 

 

 

प्रकाशक

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला: टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण : १९७६

द्वितीय हिन्दी संस्करण १९९१

तृतीय हिन्दी संस्करण २००९

 चतुर्थ हिन्दी संस्करण : २०१४

(५०० प्रतियाँ)

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

HC 3

 

 

 

 

 

 

 

PRICE: 70/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा

प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त फारेस्ट एकाडेमी प्रेस,

पो. शिवानन्दनगर-२४९१९२, जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड' में मुद्रित

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अथ सप्तश्लोकी दुर्गा

 

शिव उवाच-

 

देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी

कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ।।

 

देव्युवाच -

 

शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम्।

मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ।।

 

अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः

 

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥१॥

 

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः

स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या

सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥२॥

 

सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते

 

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥४॥

 

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥५॥

 

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा

रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्

त्वामाश्रितानां विपन्नराणां

त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥६॥

 

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि

एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥७

 

इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्णा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

निवेदन

 

करुणामयी माँ के चरण कमलों में कोटि-कोटि प्रणाम! जगज्जननी माँ की जय हो! पार्वती, लक्ष्मी तथा सरस्वती-रूपा माँ के श्रीचरणों में हमारा श्रद्धा एवं भक्तिपूर्ण प्रणाम! वह आद्यशक्ति, पराशक्ति तथा सच्चिदानन्दमयी है। परब्रह्मस्वरूपिणी माँ काली की जय हो! शक्ति, सौन्दर्य तथा सौभाग्य-रूप में तुम स्वरूपतः परब्रह्म का ही प्रकाश हो। हे माँ! सब पर तुम्हारा आशीर्वाद हो!

 

'भगवान् का मातृरूप' माँ के चरणों में निवेदन करते हुए मैं स्वयं को कृतार्थ अनुभव करता हूँ। यह तो माँ की ही वस्तु है। कारण, माँ की दया और करुणा के बिना किसी भी मानव की बुद्धि में प्रकाश आना सम्भव नहीं है। यदि इस पुस्तक में अन्तर्निहित तत्त्व तथा उच्च भाव हमारे मन को उत्साहित करें, तो यह पूजा और भी सुन्दर हो सकती है।

 

श्री भगवती माँ सम्पूर्ण सृष्टि में अन्तर्निहित प्राण-शक्ति हैं। वही सब जीवों की अन्तरात्मा हैं। अतः माँ की श्रेष्ठ पूजा है सभी मानवों की श्रद्धान्वित सेवा, जीवों के प्रति श्रद्धा, सभी प्राणियों के प्रति करुणा और दया। निस्सन्देह, माँ की प्रतिमा अथवा पट पर पूजा की भी आवश्यकता है, तथापि माँ की पूजा का यह भी एक अंग है, और अत्यावश्यक अंग है। तभी पूर्ण भाव से और श्री माँ के मन की भावनाओं के अनुसार पूजा होगी। सभी प्राणियों में माँ की उपस्थिति अनुभव तथा उपलब्ध करनी होगी और जिस भाव से माँ की सेवा करते हैं, उसी भाव से सभी प्राणियों की सेवा करनी होगी।

 

श्री श्री माँ की पूजा का प्रधान अंग है सब जीवों के प्रति श्रद्धा, सम्मान तथा प्रीति-प्रदर्शन। माँ हमारे भक्ति के अर्घ्य को तभी स्वीकार करेंगी, जब हम उनकी समस्त सन्तानों के प्रति समदृष्टि रखेंगे और करुणापूर्ण व्यवहार करेंगे। उनकी सन्तान को कष्ट या दुःख दे कर हम कभी भी माँ को सन्तुष्ट नहीं कर सकते। समस्त मानव उनकी ही सन्तान है। समग्र सृष्टि, यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी उनकी ही सन्तान हैं। कोई भी उनकी गोद से बाहर नहीं है। कोई उनसे विलग नहीं है। अतः सबके कल्याणकारी बनो। सबका आलिंगन करो। सबमें माँ का दर्शन करो। उनकी सन्तान की सेवा करके माँ की सेवा करो। सामान्य तृण, पुष्प या तितली को भी आघात पहुँचाओ। करुणाशील बनो। जीव मात्र के प्रति करुणापूर्ण व्यवहार करो। कभी किसी को आहत करो। पीड़ितों की सेवा करो। दरिद्रों की सेवा करो। आर्तो की सेवा करो। शोक-ग्रस्तों को सान्त्वना प्रदान करो। दुःखियों को शान्ति दो। असहायों को साहाह्य प्रदान करो। आश्रयहीनों को आश्रय दो। दुर्बलों को साहस यो। सहायहीनों से आश्वासनप्रद वार्ता करो। यही महिमामयी माँ की श्रेष्ठ पूजा है।

 

सदा स्मरण रखो कि मानव भगवान् का चल-मन्दिर है। इसका अनुभव करना ही जीवन्त तथा वास्तविक पूजा है। माँ सर्वत्र विद्यमान है। अतः माँ की सर्वत्र, सभी जीवों में पूजा करो। यही माँ की सच्ची पूजा है।

 

देवीसूक्त का पाठ करने से यह रहस्य सहज ही समझ में जायेगा कि वह ही अन्दर, बाहर सभी वस्तुओं में तथा सभी वस्तु-रूप में विराजती है।

 

यहाँ अति-संक्षेप में माँ की कृपा से उस करुणामयी माँ के विश्वव्यापी रूप तथा उनकी पूजा के तत्त्व को किंचित् विस्तार से प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है। यहाँ साधक के वैयक्तिक जीवन में मातृ-शक्ति के उद्दीपन में अन्तर्निहित नैतिक तथा आध्यात्मिक भाव पर प्रकाश डालने की चेष्टा की गयी है। आशा है कि अपने आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने में साधक को यह ग्रन्थ उसके जीवन में सहायक होगा।

 

यह कोई तन्त्रशास्त्र का ग्रन्थ नहीं है और शाक्त मत की व्याख्या ही है। यह तो मातृ-पूजा तथा माँ की भक्ति की यौगिक व्याख्या कही जा सकती है। प्रेम-दृष्टि से, योग-दृष्टि से माँ के प्रति सभक्ति दृष्टिपात है। हमारे धार्मिक तथा राष्ट्रीय जीवन की जागृति में साहाय्य होने के लिए श्री माँ का भक्तिपूर्ण आह्वान है। मैं अति विनीत भाव से अनुरोध करता हूँ कि यदि जन-साधारण इस पुस्तक को सभी ग्रन्थालयों, पाठशालाओं, महाविद्यालयों तथा सत्संगों और वाचनालयों में स्थान दे कर सर्वसाधारण के अध्ययनार्थ उपलब्ध करने की व्यवस्था करेंगे, तो सबका विशेष उपकार होगा।

 

गृह में माता-पिता इस पुस्तक का पाठ करें। पाठ के समय अपनी सन्तान को भी इसका भावार्थ अवगत करा दें, इस प्रकार की आलोचना से वह मांगल्य को प्राप्त करेंगे। दुर्गा-पूजा-काल में इसे पूजा की कर्म-सूची में स्थान दे सकते हैं। वर्तमान पत्रों में भी इसका प्रचार तथा प्रसार कर सकते हैं। इसके पुनर्मुद्रण में भी मुझे कोई आपत्ति नहीं; क्योंकि इसका रचयिता मैं हूँ, ऐसा मेरे मन में किंचित् भी भाव नहीं है। यह मेरी रचना नहीं, माँ की रचना है। माँ इस पुस्तक के माध्यम से अपनी अपार महिमा का अति अल्पांश हम अकिंचनों पर दया करके स्वयं प्रदान कर रही हैं। यह सब माँ का दान है, माँ की ही महिमा है, माँ का ही ऐश्वर्य है।

 

प्रिय पाठक! इस पुस्तक में निहित माँ की करुणामयी कृपा आपके जीवन में विकसित हो! आपको दिव्य ज्योति, शक्ति एवं ज्ञान प्राप्त हो! माँ आपको स्वास्थ्य, दीर्घ जीवन, श्री, साफल्य, विश्वास, भक्ति तथा श्रेष्ठ आध्यात्मिक आनन्द प्रदान करें!

आप शान्ति, आनन्द तथा अमृतत्व प्राप्त करें! जै माँ भगवती! तत्सत्।

माँ का चरणाश्रित

स्वामी चिदानन्द

 

भूमिका

 

परमात्मा के साथ जीव के गूढ़ सम्बन्ध पर विचार करने से परमेश्वर का मातृ-भाव हमारी हृदय-गुहा में स्वतः ही स्फुरित हो उठता है। इस मानव-शरीर के आधार में आध्यात्मिकता का सापेक्षिक विकास निरन्तर होता रहता है। व्यक्ति के अध्यात्म की एक भावधारा में पहुँचने पर दिव्य शक्ति, माया अथवा अन्य नाम वाली कोई दैवी प्रकृति उससे उच्चतर भावधारा की प्राप्ति का माध्यम बनती है। भगवती माँ की आराधना भगवत्प्राप्ति की प्रचेष्टाजन्य सुगम्भीर अनुभूति में सहायक होती है।

 

यद्यपि इस देश में मातृभावाश्रित पूजा-पद्धति तथा भावधारा युग-युगान्तरों से प्रचलित है, तथापि इस भावधारा का भावबोध हमारे धर्मपिपासुओं को अब अगोचर है। नाना प्रकार के बाह्य अनुष्ठान, वीभत्सता, लम्पटता आदि पूजांगों ने शताब्दियों से मातृ-पूजा की पद्धति को विकृत कर दिया है तथा शृंगार के आचार-विचार भी व्यभिचार में पर्यवसित हो गये हैं। इसी कारण अब मातृभावापन्न पूजा-पद्धति को पुनः प्रतिष्ठित करने की नितान्त आवश्यकता है। इस दृष्टि से वर्तमान समय में 'भगवान् का मातृरूप' पुस्तक का प्रकाशन विशेष रूप से समयोपयोगी तथा जिज्ञासुओं के लिए लाभप्रद होगा।

 

आशा है, इस ग्रन्थ से सत्यान्वेषी साधक-समुदाय विशेष उपकृत होगा।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

ह्रीं

आत्मार्पण

 

जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचनं

गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः

प्रणामः संवेशः सुखमखिलमात्मार्पणदशा

सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम्

 

काव्यानुवाद :

 

जो बोलूँ सो मन्त्र-जाप है, जो कुछ करूँ सो सेवा

चलना-फिरना तव परिक्रमा, आहुति खाद्य कलेवा

सो जाना ही नित्य दण्डवत्, सुख आत्मार्पण देवा।

हों स्वीकार कर्म सब मेरे, क्रम पूजा सम लेवा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

अथ सप्तश्लोकी दुर्गा.. 3

निवेदन. 5

भूमिका.. 7

आत्मार्पण.. 8

प्रथम रात्रि

पराशक्ति का अलौकिक प्रकाश. 12

देवी-माहात्म्य का सार. 13

माया और ब्रह्म एक ही हैं. 15

द्वितिय रात्रि

अशुभ शक्ति-विनाशिनी.. 18

माया और मुक्ति.... 19

रहस्यमयी माँ काली.. 20

संरक्षण के लिए ही यह संहार. 21

तृतीय रात्रि

ध्वंस ही सृष्टि का मूल. 23

जीवन के मध्य में ही ध्वंस की क्रीड़ा रहती है. 24

ध्वंस नहीं ऊर्धीकरण.. 25

अपने अन्दर के पशु-भाव की बलि दो.. 26

आध्यात्मिक साधना में दुर्गा का प्राकट्य... 28

सप्तशती की शिक्षा.. 30

चतुर्थ रात्रि

लक्ष्मी : परम पालयित्री.. 31

सूक्ष्म तथा स्थूल में अवतरण.. 31

मनुष्य की ईश्वरत्व-प्राप्ति.... 32

अष्ट-ऐश्वर्यशालिनी लक्ष्मी.... 33

लक्ष्मी के प्रति साधक का भाव. 35

पंचम रात्रि

सौभाग्य का पथ. 37

राष्ट्र के गौरव-चिह्न... 38

राष्ट्रीय नेताओं का सर्वोपरि कर्तव्य... 39

कठोर चेतावनी.. 41

षष्‍ठ रात्रि

गृह तथा हृदय में सौभाग्यदायिनी देवी.. 43

महिमामयी भारतीय नारी. 44

गृह में लक्ष्मी जी का आविर्भाव. 46

साधक की आध्यात्मिक सम्पत्ति.. 48

माता जी की अवहेलना करें. 49

सप्‍तम रात्रि

सृष्टि माता की वीणा का संगीत. 53

योग के तत्त्व तथा उसकी क्रिया.. 54

माँ विशुद्ध सत्त्व हैं. 54

माता सर्वरूप हैं. 55

जिस दिव्य ज्योति के प्रकाश से अन्धकार दूर होता है. 56

अष्‍टम् रात्रि

सिद्धि तथा सफलता की देवी.. 58

सफलता का रहस्य... 60

नवम् रात्रि

अन्तिम मोक्ष का पथ. 65

माता जी : परम सत्त्वस्वरूप. 67

गुरु के वचन वेदवाक्य हैं. 68

स्वाध्याय तथा उसका व्यावहारिक मूल्य... 69

मितभाषी बनो.. 71

सत्य बोलो.. 71

प्रिय बोलो.. 72

अपनी वाणी पर संयम रखें.. 73

विजय दशमी

महान् लक्ष्य तथा उसकी उपलब्धि.... 75

गुरु : परब्रह्म की स्थूल मूर्ति.. 76

महान् धर्मशास्त्रों का सारतत्त्व... 78

प्रार्थना.. 80

परिशिष्‍ट

श्री स्वामी चिदानन्द सरस्वती(जीवन-झांकी) 83

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम रात्रि

 

ॐनमश्चण्डिकायै

पराशक्ति का अलौकिक प्रकाश

 

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

(दुर्गासप्तशती : -१६)

 

(विष्णु की माया कहलाती जो व्याप्त सर्वभूतों में माँ।

नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है, उसे नमः ।।)

 

 

समस्त सृष्टि की उद्भव, स्थिति तथा संहारकारिणी भगवती परम कल्याणमयी माँ के श्रीचरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम!

 

चिन्मयी माँ ब्रह्म की ही अलौकिक अव्यक्त शक्ति हैं। ब्रह्म असीम, अनन्त और अनिर्वचनीय परम शान्ति है। वह इन्द्रिय मन से अनधिगम्य है। माँ उसी परब्रह्म का ही गतिशील रूप हैं।

 

नवरात्र की प्रथम रात्रि से आरम्भ हो कर जो विजयादशमी को समाप्त होता है और जो साधारणतः दशहरा तथा दुर्गा-पूजा के नाम से प्रसिद्ध है, उस वार्षिक पवित्र नवरात्र-पूजा के उपलक्ष्य में आज हम सब यहाँ प्रथम दिवस को एकत्रित हो कर माँ की आराधना में निरत हैं। निश्चय ही यह भगवती माँ की कृपा का महान् संकेत है। जिनकी कृपा से जागतिक पारमार्थिक, आध्यात्मिक व्यावहारिक सभी प्रचेष्टाओं में सफलता सिद्धि प्राप्त होती है, जिनकी दया से साधक अपनी साध्य वस्तु को उपलब्ध करने में समर्थ होता है, जिनके अनुग्रह से जिज्ञासु अपनी जिज्ञासा का समाधान पा लेता है, जीवात्मा पूर्णता को प्राप्त कर भूमा का साक्षात्कार कर पाता है, आज उनके सम्बन्ध में अल्प शब्दों में कुछ चर्चा करने के लिए, उनका पूजा-पाठ, स्तव-स्तुति करने के लिए एकत्रित हुए हैं, यही परम सौभाग्य है। माँ की कृपा के बिना सिद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। आज के इस पवित्र क्षण में हम भगवती माँ के सम्बन्ध में भारतीय विचारधारा तथा इस नवरात्र-पूजा के मर्म ऐतिह्य जानने की कुछ चेष्टा करेंगे।

 

भारतीय हिन्दुओं की उपासना साधारणतया चार बा पाँच विभिन्न धाराओं में विभक्त है। जो भगवान् की शिव-रूप में उपासना करते हैं, वे 'शैव' कहे जाते हैं। उसी भगवान् की जो विष्णु-रूप में उपासना करते हैं, उन्हें 'वैष्णव' कहते हैं। एक तृतीय प्रकार के उपासक है जो उस एक ही भगवान् की देवी-शक्ति के रूप में आराधना करते हैं, वे 'शाक्त' कहलाते हैं। इनकी संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। इनके अतिरिक्त दो कुछ कम प्रसिद्ध विभाग हैं जो 'गाणपत्य' तथा 'सौर्य' के नाम से प्रसिद्ध हैं। भगवान् की गणपति-रूप में उपासना करने वालों को 'गाणपत्य' कहते हैं तथा सूर्य-मण्डल के प्रत्यक्ष तेज-रूप, इस लोक के प्रकाशक और जीवन-गति को धारण करने वाले सूर्य के रूप में भगवान् की उपासना करने वालों को 'सौर्य' कहा जाता है।

 

नवरात्र की देवी-उपासना मुख्यतः शाक्त-उपासना है और इसकी पद्धति हमें शाक्त-परम्परा से ही प्राप्त हुई है। बंगाल तथा असम में बहुत से लोग इसी भावधारा से उपासना करते हैं। 'दुर्गासप्तशती' अथवा 'देवी-माहात्म्य' इनकी प्रधान तन्त्र-पुस्तक है। इसमें सात सौ श्लोक हैं। इसी कारण इसे 'सप्तशती' कहते हैं। बंगाली भाषा में इसका नाम 'चण्डी' है तथा गढ़वाल में भी देवी-माहात्म्य-पाठ को 'चण्डी-पाठ' कहा जाता है। कारण, माँ 'चण्डिका' नाम से भी प्रसिद्ध हैं।

 

यह चण्डी-पाठ खूब नियम निष्ठापूर्वक किया जाता है। शास्त्रों में इसके पाठ का नियम बहुत ही विधि-विधानपूर्वक दिया गया है। प्रथम अंश में, जिसका आज पाठ किया गया है, देवी-तत्त्व की विशद आलोचना है। इसकी योजना एक कथानक के रूप में है। एक ब्रह्मज्ञ ऋषि ने एक राजा और एक वैश्य को देवी के माहात्म्य की व्याख्या की है। देवी कौन हैं, उनका स्वभाव क्या है, वह स्वरूपतः क्या हैं, देवी-सम्बन्धी इन सब गम्भीर दार्शनिक तथ्यों से यह परिपूर्ण है। इसमें सुन्दर प्राणस्पर्शी महान् स्तव दिये गये हैं, देवी-पूजन की विधि दी गयी है। शाक्त-उपासना-विधि में चण्डी का आद्योपान्त पाठ ही एक महान् तथा प्रभावशाली साधना है। यहाँ मैं इस ग्रन्थ का मूल विषय संक्षेप में दे रहा हूँ।

देवी-माहात्म्य का सार

 

देवी-माहात्म्य इस प्रकार आरम्भ होता है। श्री रामचन्द्र के सूर्यवंश में सुरथ नामक एक राजा हुए। एक बार अपने शत्रुओं द्वारा आक्रान्त पराजित होने पर राज्य त्याग कर पलायन करने को वे बाध्य हुए। उन्होंने अरण्य का आश्रय लिया। धन जन सब-कुछ छिन जाने के कारण वे बहुत ही क्लेशित विषण्ण थे और इस दुर्दशाग्रस्त अवस्था में एकाकी विचरण करते फिरते थे। उनके मन में पुनः पुनः अपने नष्ट राज्य हतभाग्य का विचार उठता। अपने राज्य, अपनी सम्पत्ति अपने मन्त्रियों के विषय की चिन्ता उनके मन में उदित होने लगी तथा नूतन राजा इस समय कैसे राज्य-शासन करता होगा, इस चिन्ता में मग्न रहने लगे। जब उनकी यह मनोदशा थी, उस समय वह मेधा नामक एक ब्रह्मज्ञ ऋषि के आश्रम के सन्निकट पहुँचे। वह इस आश्रम के सौन्दर्य, शिष्य-कुल और इसके गम्भीर, प्रशान्त पवित्र परिवेश से आकृष्ट हो कर वहीं रहने लगे।

 

इस आश्रम में रहते हुए संयोगवश उनकी समाधि नामक एक वैश्य से भेंट हुई। वह भी उनके समान ही दुर्दशाग्रस्त था और दुर्भाग्य के कारण घर से भाग निकला था। उसकी सारी सम्पत्ति उसके सम्बन्धियों, स्नेहियों तथा कुटुम्बी जनों ने छीन ली थी और उसे घर से निष्काषित कर दिया था। वह भी अपने परिजनों से विताड़िता हो कर इस वन में विचरण करता था और मुनि के चरणों का आश्रय ग्रहण किये था।

 

उन दोनों ने देखा कि वे दोनों एक-सी ही विषम स्थित में हैं। यद्यपि उनके निजी आत्मीय जनों ने उनका सर्वस्व अपहरण कर उन्हें उनके गृह से निष्काषित कर दिया है, उनके परिजन ही उनके शत्रु और विरोधी बन गये हैं, तथापि उनका मन उन सब लोगों की चिन्ता में ही मग्न रहता है। यह उनके लिए अति आश्चर्य तथा उलझन का विषय है कि जिन लोगों ने उन्हें विताड़ित किया है, जो उनके सम्पूर्ण दुःखों के कारण हैं और जिन वस्तुओं से उनके सम्पूर्ण कष्टों की उत्पत्ति हुई, जिनसे उन्हें निराशा और उदासी झेलनी पड़ी, उनका मन पुनः पुनः उन्हीं लोगों तथा उन्हीं वस्तुओं का चिन्तन करता रहता है।

 

वे दोनों परस्पर आलोचना करने लगे कि मन का यह कैसा अद्भुत स्वभाव है कि जो लोग तथा वस्तुएँ सम्पूर्ण दुःख तथा शोक का कारण हैं, उन्हें जान कर भी वह उन लोगों में आसक्त रहता है और उन्हीं वस्तुओं के प्रति सदा आकृष्ट होता है। इस समस्या का कोई समाधान पा कर वे दोनों इसके समाधान के लिए ऋषि मेधा के पास विनीत भाव से गये। उन्होंने ऋषि से कहा- "हे ज्ञानी प्रवर! इस विषय पर आप कुछ प्रकाश डालें। हमें यह देख कर बड़ा आश्चर्य होता है कि जिन वस्तुओं से हमें दुःख तथा ग्लानि प्राप्त हुई है और जिन लोगों ने हमें सब प्रकार का कष्ट दिया है, यह मन सदा उन्हीं वस्तुओं की ओर आकृष्ट रहता है और उन्हीं लोगों के प्रति अत्यन्त आसक्त रहता है। मन जानता है कि इन सम्पूर्ण वस्तुओं में कोई सुख नहीं है, तथापि वह इनकी आसक्ति का त्याग नहीं कर पाता। मन के इस प्रकार के मोह का कारण क्या है, कृपा करके बतलाइए।

 

राजा सुरथ और वैश्य समाधि के ये प्रश्न वस्तुतः सारे जगत् के प्रश्न हैं तथा प्रत्येक चिन्तनशील मानव का मन इन प्रश्नों से उद्वेलित रहता है। इस प्रश्न के उत्तर में ऋषि मेधा ने देवी-माहात्म्य की एक अपूर्व व्याख्या दी है। उन्होंने कहा- "बालको! मानव-मन एक आश्चर्यमयी माया के द्वारा बद्ध है, जिससे उसकी विशुद्ध विचार-शक्ति तमसावृत हो रही है। उससे ही उसका मन पुनः पुनः सब प्रकार के दुःख तथा बन्त्रणा के कारण-रूप सम्पूर्ण वस्तुओं व्यक्तियों में आसक्त हो कर बार-बार उनमें ही विचरण करता है। यह माया, यह आवरण-शक्ति वस्तुतः महामाया की ही अलौकिक शक्ति है। वही यह विश्वमाया हैं। इस विश्व-प्रपंच के पृष्ठ देश में वही रहती है। उनकी ही रहस्यमयी आवरण-शक्ति एक को अनेक करके दिखाती है, अरूप को बहुरूप धारण कराती है और अव्यक्त को व्यक्त करती है। यह उस ब्रह्म की ही अवर्णनीय शक्ति है। यही ब्रह्म-शक्ति है। यही महामाया भगवान् की विश्वव्यापी विमोहिनी-शक्ति है जो स्वयं भगवान् से प्रकट हुई है। इसी शक्ति के द्वारा वह अपने जगत्-नाटक के नाम-रूपों की सृष्टि, स्थिति प्रलय कर पुनः अपने विशुद्ध परमात्म-स्वरूप में अन्तर्लान कर लेते हैं।"

 

राजा सुरथ तथा वैश्य समाधि में ऋषि द्वारा वर्णन की गयी इस अलौकिक शक्ति के सम्बन्ध में अधिक जानने की जिज्ञासा हुई। विश्व-प्रपंच के पृष्ठ भाग में स्थित हो कर जो उसका संचालन करती है, उस विश्वमाया के विषय में उन्होंने सविस्तार जानना चाहा। उनके अनुरोध पर मेधा ऋषि ने महामाया के स्वरूप की कथा विस्तृत रूप से बतलायी। सप्तशती में इसी का वर्णन है। अन्त में महामाया के देवी-भाव और उनके अलौकिक रहस्य की व्याख्या करके ऋषि ने सुरथ और समाधि को योगाभ्यास द्वारा देवी की पूजा, ध्यान आराधना करके माँ को तुष्ट करने का परामर्श दिया। इस भाव से आराधना करने पर माँ उनके सम्मुख प्रकट हुईं, उन पर अपनी कृपा-वृष्टि की और उनकी मनोवांछा पूर्ण की।

 

यही शाक्तों के सर्वश्रेष्ठ शास्त्र देवी-माहात्म्य ग्रन्थ का सारांश है।

माया और ब्रह्म एक ही हैं

 

देवी-तत्त्व की इस व्याख्या से पता चलता है कि वह परमा शक्ति ही सर्वेसर्वा हैं। इसमें कहा गया है कि इस परिदृश्यमान् जगत्-प्रपंच में जो कुछ भी दृष्टिगोचर हो रहा है, वह सब परब्रह्म की पराशक्ति की क्रिया है। उसे ही आदिशक्ति कहते हैं। उसे ही पराशक्ति कहते हैं। उसे ही श्रेष्ठ विराट् शक्ति और महाशक्ति कहते हैं।

 

उस सर्वशक्तिमान् परमात्मा के साथ इस महाशक्ति का क्या सम्बन्ध है, यह एक बड़ा ही रोचक प्रश्न है और यह प्रश्न प्रायः सभी महान् विचारकों के मन में उठा करता है। इस सम्बन्ध में अनेकों व्याख्याएँ सुनने में आती हैं; किन्तु तत्त्वज्ञानी ऋषियों ने इस गम्भीर गूढ़ तत्त्व के विषय की, भगवान् के इस अलौकिक (परब्रह्म) रूप और उनके महामायिक पराशक्ति-रूप के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय की स्पष्ट रूप से व्याख्या की है। वे कहते हैं कि परब्रह्म और जगत् को आवरण करने वाली अचिन्त्य माया शक्ति या देवी तत्त्वतः एक ही वस्तु हैं। बाह्यतः उनमें पार्थक्य प्रतीत होते हुए भी मूलतः एक ही हैं, कार्यतः पृथक् दृष्टिगोचर होते हुए भी आन्तरिक रूप से एक ही हैं। यही अभेद में भेद है। यही उनमें सम्बन्ध है मानो एक ही सिक्के के मुख पृष्ठ दो रूप हों। महामाया को छोड़ कर परब्रह्म की भावना नहीं की जा सकती एवं परब्रह्म की भावना करते ही उनकी शक्ति महामाया की भावना करनी होती है। वे बतलाते हैं कि महामाया ने ही व्यक्त और अव्यक्त को संयोजित कर रखा है। वही व्यक्त और अव्यक्त को जोड़ने वाली श्रृंखला है। जिस प्रकार कार्य और उसका एक कारण होता है, किन्तु इनको संयोजित करने वाला सूत्र क्या है? इनके मध्य एक रहस्यमय योगसूत्र है, जो इन्हें परस्पर एकीभूत बनाये रखता है। यद्यपि देखने में दो लगते हैं, किन्तु वस्तुतः वे एक ही धारा के दो छोर हैं। जिस शक्ति के द्वारा कार्य कारण के रूप में प्रकट होता है एवं कारण कार्य संयुक्त रहते हैं, वही माया अलीक प्रपंच अथवा देवी है।

 

परब्रह्म निश्चल निष्क्रिय है; क्योंकि वह असीम है, अनन्त है, अतः उसमें किसी गति या क्रिया का प्रश्न का ही नहीं उठता। पराशक्ति, जिसे हम देवी कहते हैं, वही परब्रह्म का सक्रिय भाव है। जिस प्रकार दुग्ध तथा उसकी शुभ्रता, अग्नि और उसकी दाहिका-शक्ति, सर्प और उसकी तिर्यक् गति परस्पर अभिन्न हैं, उसी प्रकार ब्रह्म और उसकी शक्ति भी अभिन्न हैं। दुग्ध का विचार आते ही उसकी शुभ्रता का भी विचार मन में आता है, अग्नि का विचार आते ही उसकी दाहिका-शक्ति का विचार भी मन में आता है। जिस प्रकार अग्नि से उसकी दाहिका-शक्ति निकाल लेने पर वह अग्नि नहीं रह जाती, उसी प्रकार परब्रह्म और उसकी शक्ति अभिन्न हैं। यदि ब्रह्म अग्नि है, तो शक्ति या देवी अग्नि की दाहिका-शक्ति है।

 

ब्रह्म तथा माया या प्रकृति या शक्ति के मध्य के गूढ़ सम्बन्ध को समझाने के लिए एक आधुनिक उदाहरण भी दिया जा सकता है। वह उदाहरण है विद्युत् उत्पादन करने वाला यन्त्र (बैटरी) तथा उसके मध्य की विद्युत्-शक्ति। जिस समय वह यन्त्र क्रियाशील नहीं होता है, स्थिर होता है, उस समय इसको इधर-उधर ले जा सकते हैं। उस समय कोई यह नहीं जान सकता है कि उसके मध्य में इतनी विराट् शक्ति गुप्त रूप से भरी पड़ी है। वहाँ हमें ऐसा कोई बाह्य लक्षण भी दृष्टिगोचर नहीं होता कि जिससे यह कल्पना की जा सके कि उसमें इतनी अद्भुत शक्ति समाहित है। किन्तु विद्युत् तन्तु-प्रणाली द्वारा, परिपथ द्वारा जिस समय यह विद्युत्-यन्त्र (बैटरी) अद्भुत रूप से क्रियाशील हो उठता है, उस समय इसकी निश्चल शक्ति सचल हो उठती है। स्थाणु भाव के जाते रहने पर विराट् कर्मरत शक्ति की क्रिया प्रकट हो उठती है। यह विद्युत् के समान गतिशील होती है। स्पर्श करने पर झटका देती है। ज्योति विकिरण कर उद्दीप्त हो उठती है और आलोक, प्रकाश करती है। चक्रगति से पंखे को चलाती है। कभी यह प्रचण्ड शैत्यधार यन्त्र (रेफ्रीजरेटर) में हिम की सृष्टि करती है और अँगीठी (हीटर) के अन्दर प्रचण्ड अग्नि की सृष्टि करती है। नादयन्त्र (सायरेन) के मध्य में तुमुल नाद की सृष्टि करती है। बैटरी के बीच में जो शक्ति स्थाणु भाव से थी, वही जब गतिशील होती है तो आलोक, गति, ताप, शीत, नाद आदि अनेक प्रकार से हमारी इन्द्रियों के ग्राह्य भाव से प्रकट होती है। इसी भाँति उसी पराशक्ति को अव्यक्त, अक्रिय, स्थाणु अवस्था में परब्रह्म अथवा नाम-रूप-गति-हीन परम अव्यक्त कहते हैं और वही जब गतिवान् सक्रिय भाव धारण करती है, सृष्टि कर नाम-रूप धारण करती है, सारे विश्व-ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो कर प्रकट होती है, उस समय उसे महामाया करते हैं। दोनों एक ही हैं।

 

महामाया ही विद्युत्-शक्ति, सूर्य की आभा, सागर की गम्भीरता, हाथ की गति, कुसुम का सौरभ, शब्द की स्वर लहरी, इस ब्रह्माण्ड के समस्त दृश्य अदृश्य पदार्थ, सम्पूर्ण गतिशील की गति तथा सभी प्रकार की शक्ति हैं। वही मानव-चित्त में बुद्धि-रूप में, मन-रूप में, वृत्ति-रूप में तथा भाव-रूप में अवस्थित हैं। हमें जो भी प्रत्येक व्यक्ति के अन्तर बाह्य प्रकृति में क्रिया-शक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होता है, वह सब वही हैं। वही विश्व की प्राण हैं। वही विश्व की उत्पत्ति, स्थिति लय की कारण हैं। 'सर्व शक्तिमयं जगत्।' यही परम सत्य है। इस विश्व में स्थूलतम से सूक्ष्मतम तक, क्षुद्रतम से ले कर बृहत्तम तक जो कुछ भी वर्तमान है, वह सब ही उसी महामाया का प्रकाश अथवा परब्रह्म की अलौकिक शक्ति का विकास है। यह पराशक्ति ही सब नाम-रूपों में प्रकाशित है, सम्पूर्ण प्रकाशों का मूल व्यक्त का आदि है। माया के कारण यह व्यक्त भाव सम्भव हो सका है।

 

इन नौ दिनों में हम इस पराशक्ति की विभिन्न रूपों में पूजा करते हैं। इस पराशक्ति के भावुक भक्त जन इसे तीन विशेष भावों में महाकाली अथवा दुर्गा, महालक्ष्मी और

महासरस्वती के रूप में पूजा करते हैं। नौ दिनों को तीन-तीन दिनों में तीन भागों में विभाजित किया है। प्रथम तीन दिनों में देवी की महाकाली या दुर्गा के रूप में, द्वितीय तीन दिनों में महालक्ष्मी के रूप में एवं अन्तिम तीन दिनों में महासरस्वती के रूप में कल्पना कर पूजा करते हैं। इस भाव से पर-अपर तीन रूपों में माँ की कल्पना पूजा का गम्भीर महत्त्व विशेष उद्देश्य है। इसके विषय में हम आगामी दिवसों में विचार करेंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

द्वितीय रात्रि

 

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे

अशुभ शक्ति-विनाशिनी

 

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

(दुर्गासप्तशती -३४)

 

जो देवी है शक्ति-रूप से व्याप्त सर्वभूतों में माँ।

नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है उसे नमः

 

परब्रह्म की अलौकिक, अचिन्त्य तथा दुर्बोध शक्ति उस कल्याणमयी परमा माता को बार-बार प्रणाम! जिससे इन असंख्य ब्रह्माण्डों का आविर्भाव होता है, जो असंख्य प्रकाशों का अवस्थान है तथा सम्पूर्ण नाम रूप जिसके मध्य में लय हो कर परब्रह्म में मिल जाते हैं, उस दिव्य शक्ति को मैं प्रणाम करता हूँ।

 

परब्रह्म की मातृ-रूप में भावना करने का कारण सहज ही जाना जा सकता है। कारण, इस संसार में जन्म ग्रहण करने वाले प्रत्येक प्राणी को प्रथम ज्ञान अपनी माँ का ही होता है। जीव को अपने प्रारम्भिक जीवन की सर्वप्रथम स्मृति यदि कुछ हो सकती है, तो वह है माँ के अंक में शयन करते हुए उसके वात्सल्यपूर्ण नेत्रों की ओर एकटक देखते रहने की स्मृति। शिशु के लिए अखिल विश्व की कोमलता, करुणा, पोषण पालन का विषय अपनी माँ में घनीभूत केन्द्रीभूत रहता है। यहाँ ही उसका आदर्श जगत् है, जहाँ से वह अपनी जीवनी शक्ति प्राप्त करता है, सुख के लिए जिधर भागा जाता है तथा रक्षा और परिपोषण के लिए जिससे चिपटा रहता है। वहीं पर वह अपने सुख, निर्भयता, आश्रय की वस्तु को खोज पाता है। कारण, सहृदयता, यत्न तथा निर्भयता की आदर्श भूमि माँ है। इसीलिए सृष्टिकर्ता में यह धारणा आदर्श आरोपित करने का विचार बहुत ही स्वाभाविक, युक्ति-युक्त सहज बोधगम्य है। इसी कारण हिन्दू-दर्शन में इस महिमान्वित जगन्माता की भावना का उद्भव हुआ जो विश्व के सम्पूर्ण प्राणियों पर स्नेह रखती हैं, सँभाल करती हैं तथा पालन रक्षा करती हैं।

 

आज हम उसी माता के महिमामय कुछ रूपों के सम्बन्ध में कुछ शब्द कह कर माँ के श्रीचरणों में अपनी परम भक्तिपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। यहाँ भी हमें यह स्मरण रखना होगा कि उनकी पूजा करने का, उनकी महिमा का कीर्तन करने का तथा उनके महान् भाव के विषय में आलोचना करने का जो सुयोग हमें प्राप्त हुआ है, वह भी उनकी दया कृपा से ही सम्भव हुआ है। उनकी कृपा के बिना उनके विषय में सोचना, उनका स्मरण करना, उनका चरित्र-गान करना, उनका महिमामय नाम लेना अथवा उन्हें माँ कह कर पुकारना सम्भव नहीं है। माँ परम दयामयी अपार करुणामयी हैं। वह स्वभाव से ही प्रेममयी हैं और इसी कारण उन्होंने आज के इस शुभ और पवित्र दिवस को मन वाणी द्वारा उनकी महिमा का कीर्तन करने का परम सौभाग्य आनन्द प्रदान पर हमें कृतार्थ किया है।

 

जो-कुछ है, सब माँ है। परब्रह्म सत्स्वरूप अस्तित्व का सार है और जो-कुछ हम जानते हैं, वही माँ है। जो ज्ञान के परे है, वही पुरुष अथवा परब्रह्म है। जो-कुछ हमारे मन इन्द्रियों द्वारा अवगत होता है, वही माँ का रूप है। हमारे बुद्धिगम्य यह विश्व मात्र ही माँ का स्वरूप नहीं है- यह क्षुद्र पृथ्वी असंख्य चन्द्र, सूर्य, ग्रह, तारा, भू-मण्डल, आकाश-मण्डल, चन्द्र मण्डल सूर्य-मण्डल जिसे यह विश्व कहते हैं, वे सब माँ के असीम तथा अनन्त विराट्र रूप के अति क्षुद्रतम अंश मात्र हैं। उनके मध्य इस प्रकार के कितने ही विश्व उत्पन्न होते तथा लय को प्राप्त होते हैं। माँ सर्वशक्तिमयी हैं। इस सृष्टि के पृष्ठ भाग में वही हैं। वही सब प्रकाशों का प्रथम आदि कारण हैं। वह इस सृष्टि की ही नहीं, इस सृष्टि के सर्जक, पालक तथा संहारक की भी स्रष्टा हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर भी माँ के मध्य में अवस्थित हैं। वे असंख्य ब्रह्माओं, असंख्य विष्णुओं तथा असंख्य महेश्वरों की माँ हैं। वह जिस प्रकार सर्वशक्तिमान् हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण शक्ति उनका खेल है। इस कारण से क्रियमाण त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर आदिशक्ति-रूपी उनकी ही मूर्तियाँ हैं। वही सरस्वती मूर्ति से ब्रह्म-शक्ति रूप में, लक्ष्मी-मूर्ति से विष्णु-शक्ति रूप में और पार्वती-मूर्ति से शिव-शक्ति रूप में हमारे सम्मुख प्रकट होती हैं।

 

माया और मुक्ति

 

सर्वशक्तिरूपिणी माँ के दो रूप हैं। हिन्दू इन दोनों भावों में उनकी पूजा करते हैं। ये भाव बड़े ही सुन्दर हैं। इनके अन्दर कितनी गम्भीर व्यंजना निहित है। माँ के ये दो रूप हैं-विश्वमोहिनी आवरणी माया तथा आवरण-उन्मोचिनी मुक्तिदायिनी महामाया। वे सबको अपने अलौकिक मायिक जगज्जाल में बद्ध कर उन्हें अपने सहज क्रीड़ा-भाव से जन्म-मृत्यु के प्रवाह में डाल देती हैं। उस समय उनको अविद्या कहते हैं। यह आध्यात्मिक ज्ञान के प्रतिकूल है। वही परम मुक्तिदात्री भी हैं। अपने इस रूप में वह अपने बच्चों को देख कर मुस्कराती हैं और उन्हें अपने अविद्या-रूप से छुटकारा देती हैं। इस रूप में माँ विद्या माया कहलाती हैं। शिल्पियों ने परम ज्योतिर्मयी मूर्ति के रूप में उनकी कल्पना की है। उनके एक हाथ में पाश है जिसके द्वारा वह बाँधती हैं, दूसरे हाथ में एक तीक्ष्ण कृपाण है जिसके द्वारा वह अपने भक्तों के बन्धन को काट कर मुक्त बना देती हैं। इस भाँति वह विद्या माया और अविद्या माया की अलौकिक युग्म मूर्ति हैं। इसीलिए उन्हें अनिर्वचनीया कहते हैं।

 

माता जी इन दोनों ही भावों में इस विश्व-प्रपंच की स्रष्टा हैं। माँ के भक्त जन जिन्होंने उनकी पूजा द्वारा उनकी कृपा प्राप्त की है और जो उनके स्वरूप की उपलब्धि करने में सक्षम हुए हैं, उन्होंने प्रेमपूर्वक माँ और उनकी लीला का बड़े ही गूढ़ भाव से चित्रण किया है। हम सब जानते हैं कि जब कभी बच्चे एकत्रित होते हैं, तभी उनमें खेल की इच्छा हो उठती है एवं क्या खेल करें, यह निश्चय कर सकने पर बूढ़ी दादी के पास जा कर उनसे जिज्ञासा करते हैं। वह भी आनन्दपूर्वक एक खेल बतला देती हैं और इस प्रकार आँख-मिचौनी का खेल आरम्भ हो जाता है। वह कहती है-"जाओ बालको, खेल आरम्भ करो।" बच्चे खेलने लग जाते हैं। वे भागते हैं, एक-दूसरे की धर-पकड़ करते हैं और आँख मिचौनी का खेल चलता रहता है; किन्तु जब कोई शिशु थक जाता है और खेल नहीं खेल सकता, उसे अब और धर-पकड़ अच्छी नहीं लगती, तो उसे बूढ़ी दादी के पास भाग कर उन्हें छू देना होता है। जो एक बार बूढ़ी दादी को छू देता है, उसे और कोई पकड़ नहीं सकता। खेल में जिस प्रकार वह वृद्धा ही उस खेल को आरम्भ करती है, खेल की प्रगति भी देखती है और खेलने वाले बच्चों के ऊपर दृष्टि भी रखती है। उनका स्पर्श कर लेने पर खेल समाप्त हो जाता है और स्पर्श करने वाले को छुट्टी मिल जाती है। उसी प्रकार यह विश्व भी माँ महामाया के लिए बच्चों का खेल है। जब कोई व्यक्ति इस दृश्य इन्द्रियग्राह्य भोग-जगत् की दौड़-धूप से क्लान्त हो कर निवृत होने की इच्छा करे, तब उसे केवल इतना ही करना है कि माँ के निकट भाग कर जाये और उन्हें स्पर्श कर ले। ऐसा करने से ही इस जगत्-क्रीड़ा के बन्धन से उसे सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है। इसी से माँ के भक्तों ने इस जगत्-नाटक के विषय में बतलाते हुए इस खेल के सम्बन्ध में कितने मधुर आन्तरिक भाव से बतलाया है कि इस खेल का आरम्भ माँ ही करती हैं और इसका अन्त भी वे ही करती हैं

रहस्यमयी माँ काली

 

देवी के विभिन्न रूपों के सम्बन्ध में विचार करते हुए हम एक विषम समस्या में पड़ जाते हैं। देवी-पूजा के प्रथम चरित्र के रूप के विषय पर विचार करने से सामान्य मानव का मन कुछ द्घान्त हो जाता है। हमारे भाव, विचारधारा तथा संस्कृति से अनभिज्ञ विदेशियों की बात जाने दें, हमारे भारत के ही अनेक शिक्षित बुद्धिमान् हिन्दू भी, जिसको अपनी माँ कह कर ध्यान करते हैं, उसी की इस सर्वसंहारकारिणी अत्युग्र विकराल मूर्ति की कल्पना का कारण समझने में असमर्थ हैं।

 

बंगाल प्रदेश में समस्त दशहरा पूजा ही माँ के इस दुर्गा तथा महाकाली के रूप की पूजा है। अनेक लोगों में काली का नाम मात्र भय उत्पन्न करता है। हिन्दू भी अपने मन में सोचते हैं कि काली के उपासक तामसी होते हैं। काली एक भयंकर भीषण देवी हैं। मैं अपनी निजी अभिज्ञता के आधार पर कह सकता हूँ कि दक्षिण भारत में किसी रूढ़िवादी गृहस्थ के घर में यदि कृष्णवर्णा, रक्तवर्णा विस्तृत लोलजिह्वा, मुण्डमालाविभूषिता, छिन्नहस्तकटिपरिधानपरिवृता, रुधिरप्लुता खड्गधृतहस्ता काली की मूर्ति रखें, तो घर की स्त्रियाँ उसे तुरन्त ही बाहर निकलवा देंगी। यदि माँ काली के सम्बन्ध में उनकी यह धारणा उचित है, तो उनकी किस प्रकार मातृ-रूप में धारणा और पूजा की जाये?

 

यह भूल स्वाभाविक है और इसका संशोधन करना आवश्यक है। माँ कभी भी भीषण भयंकर नहीं हो सकती हैं। वह सदा ही प्रेममयी और दयामयी हैं। महाशक्ति के अन्य सम्पूर्ण रूपों में माँ की काली के रूप में उपासना का अति-सहज कारण है। यह कोई दुर्बोध, गूढ़ आध्यात्मिक अथवा कोई गम्भीर दार्शनिक तत्त्वपूर्ण नहीं है, यह अत्यन्त सहज अत्यन्त स्वाभाविक है।

 

मैं एक आधुनिक अद्यतन उदाहरण देता हूँ, जिससे यह विषय सहज ही बोधगम्य हो जायेगा। वर्तमान काल में पेनसिलिन विभिन्न माइसिन जाति की ऐण्टीबाइटिक्स का प्रचलन है। नूतन युग ने उसे जीवन रक्षक महौषधि नाम दे रखा है और उसके ऊपर लोगों की अगाध श्रद्धा विश्वास है। मैं दिखलाता हूँ कि ये सम्पूर्ण औषधियाँ मनुष्य के लिए हितकारी तथा रोगनाशक होते हुए भी भीषण ध्वंसकारी वस्तु भी कही जा सकती हैं। वे तुम्हारे रोग के कीटाणुओं की भीषण ध्वंसकारी हैं और उनको समूल नष्ट करती हैं। तुम रोगाक्रान्त हो, तुम्हारा शरीर रोग के कीटाणुओं से परिपूर्ण है जो तुम्हें रुग्ण किये हुए हैं। तुम पेनसिलिन लेते हो और यह तुम्हारे रोग के कीटाणुओं को ध्वंस कर देता है। इस भाँति कीटाणुओं के ध्वंस संहार के द्वारा तुम्हारा रोग दूर हो जाता है और तुम स्वस्थ हो जाते हो। तब तुम क्या इस जीवनदायी महौषधि को ध्वंसकारी कहना चाहोगे? यदि इन्हें भीषण और ध्वंसकारी कहा जा सकता है, तो माँ काली को भी भीषण और ध्वंसकारी कह सकते हैं, अन्यथा नहीं।

संरक्षण के लिए ही यह संहार

 

इस प्रकार माँ रक्षा के लिए ही संहार करती हैं। ज्ञान-दान के लिए वह अज्ञानता मोह नष्ट करती हैं। हमारा अन्धकार नष्ट करती हैं जिससे कि हम प्रकाश प्राप्त करें। वह सम्पूर्ण सन्ताप, दुःख और सम्पूर्ण भौतिक आधि-व्याधि और उपाधि नष्ट कर हमें आनन्द, सुख अमृतत्व प्रदान करती हैं। इस भाँति वह जो-कुछ भी जीव को इस भयानक संसार में आबद्ध करता है, उसे नष्ट कर डालती हैं। वह जो कुछ भी भयंकर है, उसे ध्वंस कर सुख तथा शान्ति लाती हैं। जिस प्रकार इच्छा-शक्ति से, जो कि मन का ही एक अंश है, उसी मन में अवस्थित दुर्बलता नीचता को दूर करते हैं, उसी प्रकार माँ निज संहार-शक्ति रूप से अपने ही एक दूसरे अंश का नाश करती हैं। माँ विद्यामाया रूप में अपने काली रूप द्वारा अविद्या नष्ट कर ब्रह्म के साथ योग कराती हैं।

 

इस भाँति हम देखते हैं कि महिमामयी माँ काली मोह से हमारा उद्धार करती हैं। उसके भक्त जन इसी भाव से माँ की काली रूप में पूजा करते हैं। वे माँ से कहते हैं-"हे दयामयी माँ! मैं अति-प्रबल मन के अधीन हो चला हूँ। अहंकार इन्द्रियों द्वारा मैं पीड़ित हूँ। षड्रिपुओं, असंख्य वासनाओं, प्रवृत्तियों और संस्कारों का दास बन गया हूँ। वे सदा मेरे विरुद्ध युद्धरत हैं। एकमात्र तुम्हीं इन प्रबल शत्रुओं के हाथ से मेरी रक्षा कर सकती हो।" जब वे स्वयं उनके साथ युद्ध करने उन्हें पराजित करने में असमर्थ होते हैं, तब वे माँ के शरणापन्न होते हैं और माँ की शक्ति की सहायता चाहते हैं। माँ कृपा करके उन्हें अपनी शक्ति देती हैं और उस समय माँ इस काली रूप विकराल मूर्ति में कर उन्हें अपनी इन्द्रियों को पराभूत करने तथा मन को स्व-वश में ला कर उस पर विजय प्राप्त करने में उनकी सहायता करती हैं।

 

नवरात्र में जिस दुर्गासप्तशती का पाठ किया जाता है, उसका विषय यही है। इसमें कुल तेरह अध्याय हैं। किस रूप से देवी-देवताओं के पक्ष में युद्ध में अवतीर्ण हो कर जो-कुछ अज्ञानता, पापाचार तथा परम सत्य के विपरीत है, उसे ध्वंस कर देती हैं-यह सब उसमें बतलाया है। इसमें असत्य के विभिन्न रूपों की विभिन्न दैत्यों के रूप में कल्पना की गयी है। अज्ञान के विभिन्न स्तरों को विभिन्न दैत्य कह कर उनके स्वभावानुसार उन्हें विभिन्न नाम रूप दिया गया है। इन तेरह अध्यायों में माँ विभिन्न रूप धारण कर सब प्रकार के दोष, अज्ञानता जगद्व्यापी माया को सर्वभावेन ध्वंस कर देती हैं, इस विषय का वर्णन किया गया है और अन्त में ज्ञान विद्या-शक्ति की सम्पूर्ण भाव से जय और जीव की अज्ञान के हाथों में चिरमुक्ति प्रदर्शित की गयी है।

 

इस प्रकार की कल्पना मात्र हमारे देश की देवी-उपासना तथा शाक्त-सम्प्रदाय में ही आबद्ध नहीं है। संसार के सभी धर्मों में इस प्रकार के रूपक का व्यवहार पाया जाता है। ईसाई धर्मग्रन्थ में भगवान् तथा शैतान की कथा है। जो कुछ भी दैवी है, आलोकपूर्ण है-उसका विरोधी ही शैतान है। पारसी धर्मशास्त्र में अरमान तथा अहुरमज़दा है। अरमान ईसाई धर्म के शैतान का पर्यायवाची है। बौद्ध ग्रन्थ में मार की कथा है। उसी प्रकार हिन्दू-शास्त्र में जो कुछ दुष्ट तथा पापपूर्ण है, उसे माया, अज्ञान अथवा आसुरी शक्ति कहा गया है। यह प्रकाश, ज्ञान, प्रज्ञान तथा आत्मा का विपरीत धर्मी है। वेदान्त में उसे आत्मज्ञान द्वारा विदूरणीय अनात्मा कहते हैं। सप्तशती की यही मूल विषय-वस्तु है। इसमें माँ अपने काली-रूप में अपनी सन्तान की उसके दुर्गुणों के नाश करने में सहायता करती हैं।

 

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः

स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि

दारिद्र्यदु:खभयहारिणि का त्वदन्या

सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता  ।।

(दुर्गासप्तशती : -१७)

 

माँ दुर्गे ! स्मरण मात्र से सब जीवों का त्रास हरे।

स्वस्थ जनों द्वारा चिन्तन से, शुभ सम्मति प्रदान करे

दुःखदरिद्रभयहर्ता देवी आप बिना को अन्य करे।

पर उपकारीवश दवाई हो सब जीवों पर कृपा करे ।।

तृतीय रात्रि

 

दुं दुर्गायै नम

ध्वंस ही सृष्टि का मूल

 

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः I

(दुर्गासप्तशती : -५२)

 

 

जो देवी श्रद्धास्वरूप से व्याप्त सर्वभूतों में माँ।

नमस्कार है नमस्कार है नमस्कार है उसे नमः ।।

 

 

सारे साधकों की चरम गति लक्ष्य माँ ही हैं। परब्रह्म परम माँ एक हैं। जो जगत् की सृष्टि, स्थिति संहारकारिणी हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम !

 

कल हमने माँ के दुर्गा भीषण काली-रूप की चर्चा की थी और यह देखने तथा जानने की चेष्टा की थी कि बाहर से कराल-मूर्ति प्रत्यक्षतः ध्वंस की लीला के अन्दर माँ वस्तुतः कैसे कल्याणमयी दयामयी रूप में रहती हैं। उनका ध्वंस सृष्टि के लिए ही, उनका आहरण प्रचुर प्रदान के लिए ही होता है। वह अन्त में अज्ञान के गहन अन्धकार को ध्वंस करने में हमारी सहायता कर अपने को ज्योतियों की ज्योति, आत्मा के शाश्वत प्रकाश के रूप में हमारे समक्ष प्रकट करती हैं।

 

माँ दुर्गा की इस भीषण संहार-मूर्ति के आविर्भाव की कथा ही वास्तव में हमारे अनुसन्धान का विषय है। सप्तशती के एक श्लोक में दुर्गा-नाम की व्याख्या में बतलाया है कि जो सम्पूर्ण दुर्गति का हरण करती हैं, जो सम्पूर्ण प्रकार के विपद् दुःख से रक्षा करती हैं, वही दुर्गा हैं। वह अपने भक्तों के सम्पूर्ण कष्ट, अमंगल सम्पूर्ण आर्ति हर लेती हैं। इसीलिए वह दुर्गा देवी के नाम से अभिहित हैं। यह केवल आध्यात्मिक व्याख्या की ही वस्तु नहीं है, यह व्यापक अनुभव पर आधारित सत्य है कि यह सर्वसंहारिणी शक्ति सम्पूर्ण अमंगल सम्पूर्ण अशुभ को ध्वंस करने में सक्षम हैं।

जीवन के मध्य में ही ध्वंस की क्रीड़ा रहती है

 

हम देखते हैं कि इस जगत् में और मानव-जीवन में ध्वंस-कार्य सदा ही चलता रहता है। ध्वंस के बिना जीवन की गति सम्भव नहीं है। धारावाहिक सृष्टि-कार्य में ध्वंस एक अंग है। मनुष्य के दैनन्दिन जीवन की आलोचना करने पर यह सहज ही उपलब्ध होता है। 'अन्नगताः प्राणाः' मनुष्य के स्थूल शरीर के सम्बन्ध में कहा। गया है। अन्न 1 बन्द कर देने पर शरीर भी नष्ट हो जाता है। आइए, अब हम शरीर-पोषण तथा जीवन-रक्षा की प्रक्रिया पर विचार करें। आहार-उत्पादन कार्य ही अनेक प्रकार के ध्वंस-कार्यों द्वारा सम्पन्न होता है। शस्य के उत्पादन के लिए भूमि के ऊपर से प्रथम झाड़-झंखाड़ और जंगली पौधों का ध्वंस करना होता है। तत्पश्चात् भूमि का कर्षण करना होता है। विशेष उपकरणों से भूमि को खोदना होता है। इससे धरती आहत होती है। तदुपरान्त ही बीज वपन किया जाता है। यह बीज शस्य-रूप में अंकुरित होने के लिए अपना जीवन देता है। अन्न के उत्पन्न होने तक विनाश की यह प्रक्रिया सतत चालू रहती है। तत्पश्चात् भूसी निकालनी होती है। तब अन्न प्राप्त होता है। छिलके के विनाश से ही अन्न उपलब्ध हो पाता है। इस अन्न का भोजन बनाने के लिए ईंधन की आवश्यकता होती है, जिसके लिए कुल्हाड़ी के क्रूर आघात से वृक्षों का विनाश करना पड़ता है। इस काष्ठ को भी अग्नि की ज्वाला में आत्म-दाह करना पड़ता है। इस भाँति अपना विनाश कर वह ताप देता है, तब आहार बनता है। भोजन करने वाले मेज के सामने बैठ कर इस पके हुए भोजन को खा कर नष्ट करते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप अन्न का आकार, प्रकार तथा स्वरूप विनष्ट होता है। इस भाँति अन्न के मनुष्य के शरीर में पहुँच कर जीवन-शक्ति में रूपान्तरित होने तक विनाश की प्रक्रिया चलती रहती है। यह तो केवल एक प्रारूपिक उदाहरण है। इसी भाँति यदि हम मानव जीवन के किसी भी भाग को देखें, तो हम पायेंगे कि जगत् में जो कुछ निर्माण होता है, उसका आधार विनाश-परम्परा ही होती है। अन्त में इन सबका परिणाम आकांक्षित नव-रचना के रूप में ही मिलता है।

 

बृहत्तर रूप में भी हम देखते हैं कि जगत् में जीव-सृष्टि के निर्वाह के लिए यह प्रक्रिया अनिवार्य है। यदि मृत्यु द्वारा मानव शरीर का विनाश होता रहता, तो अर्थशास्त्री माल्थस के सिद्धान्त के अनुसार इस अधिक जनसंख्या-आकीर्ण पृथ्वी पर लोगों को खाने के लिए अन्न तथा रहने के लिए स्थान उपलब्ध हो पाता। अधिक जनसंख्या सामान्य मनुष्य को दृष्टिगोचर होने के कारण उनके लिए भयावह पिशाच नहीं है, किन्तु व्यापक दृष्टिकोण रखने वाले अर्थशास्त्रियों तथा राजनीतिज्ञों को अधिक जनसंख्या मानव-जाति के लिए एक शाश्वत अभिशाप है। माता का यह विनाशकारी रूप इस प्रकार मानव-शरीर की मृत्यु तथा विलय की गति द्वारा अधिक जनसंख्या के भूत को दूर रखता है और मानव जाति की रक्षा करता है। ऐसा होते हुए भी, जनसंख्या बढ़ती ही जाती है और जब वह जीवन की आवश्यकताओं के उत्पादन की क्षमता से भी कहीं अधिक हो जाती है और जब मनुष्य के सम्मुख ऐसी स्थिति उपस्थित होती है, तो वह काँप उठता है और जब ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होती है कि अर्थशास्त्री और राजनैतिक पुरुष भी आकुल हो उठते हैं, तब ही करुणामयी स्नेहमयी माँ की संहारक शक्ति सहायतार्थ दौड़ कर जाती है। अधिक जनसंख्या के विकराल राक्षस को किस प्रकार रोका जाये, यह मनुष्य नहीं जान पाता, तब माता ही भूकम्प, युद्ध, दूर-विस्तृत दुष्काल, जल-बाढ़ तथा महामारी के रूप में प्रकट हो कर परिस्थिति को उग्र रूप धारण करने से रोक देती हैं।

 

यदि हम मानव-जीवन की समस्त प्रक्रियाओं में से प्रत्येक पर पृथक् पृथक् रूप से विचार करें, तो पायेंगे कि अतीव रचनात्मक प्रक्रिया भी आवश्यक तथा अपरिहार्य है और मनुष्य की मानी हुई संहारक प्रक्रिया का