भगवान
श्रीकृष्ण
Lord Krishna, His Lilas and Teachings
का हिन्दी अनुवाद
लेखक
श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती
अनुवादिका
सुश्री चन्द्रावती सिंह
प्रकाशक
द डिवाइन लाइफ सोसायटी
पत्रालय शिवानन्दनगर- २४९ १९२
जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत
www.sivanandaonline.org, www.dishq.orgप्रथम
हिन्दी संस्करण- १९६०
पंचम हिन्दी संस्करण -२०१६
(१००० प्रतियाँ)
ॐ द डिवाइन लाइफ ट्रस्ट
ISBN 81-7052-118-1
HS 227
PRICE: ₹130/-
'द डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए
स्वामी पद्यनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त
फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर- २४९ १९२,
जिला टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड में मुद्रित।
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जगद्गुरु तथा
वृन्दावन
के
मुरलीमनोहर
भगवान् श्रीकृष्ण
के श्रीचरणों में
समर्पित
ॐ
आनन्द कुटीर,
ऋषिकेश
मधुर आत्मन् ।
भगवान् कृष्ण षोडश कला से युक्त पूर्णावतार हैं। उनके उपदेशों के हर शब्द तथा उनके जीवन के हर कर्म मानव-जाति के लिए अपूर्व सन्देशों से पूर्ण हैं।
उद्धव के प्रति भगवान् के उपदेशों का अध्ययन कीजिए। श्रीमद्भागवत-अमृत का पान कीजिए। उनकी महिमा का गायन कीजिए। उनके महान् मन्त्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप कीजिए। उनके प्रति पूर्ण आत्मार्पण कीजिए। आप शीघ्र ही उनके साथ सायुज्यता को प्राप्त करेंगे!
स्वामी शिवानन्द
षोडश कलावतार भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा से कौन परिचित नहीं है। ईश्वरत्व का जितना निखार भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन में प्रकट हुआ, उतना अन्य किसी भी व्यक्तित्व में प्राप्त करना सम्भव नहीं है। उनका गीतोपदेश जगत् के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम है। भगवान् के हर शब्द तथा हर कर्म मानव जाति के लिए शाश्वत सन्देश रखते हैं। उनकी लीला में वह अमृत सरिता प्रवाहित हो रही है, जिसमें अवगाहन कर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त कर सकता है।
जनता के कलि-सन्तप्त जीवन में कृष्ण-लीला-रूपी सुधा का संचार करने के लिए ही परम कारुणिक श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज ने भगवान् श्रीकृष्ण की बाल लीला तथा उनके उपदेशों को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। हमें पूर्ण विश्वास है कि इस पुस्तक से सभी प्रकार के मनुष्य प्रेरणा, शक्ति एवं सान्त्वना प्राप्त करेंगे। इस पुस्तक का दैनिक स्वाध्याय शुभ तथा मंगलकारक है। इसके उपदेशों पर चिन्तन तथा मनन करने से मनुष्य उस धाम को प्राप्त कर सकता है "यद्गत्वा न निवर्तन्ते"- जहाँ से पुन: इस नश्वर जगत् में लौटना नहीं पड़ता।
अनुवादिका सुश्री चन्द्रावती सिंह को धन्यवाद देते हैं जिनकी गुरु-सेवा के फल-स्वरूप यह अमूल्य रत्न हम जनता को प्रस्तुत करने में समर्थ हुए हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण के अनुपम आशीर्वाद आप सभी प्राप्त करें।
- प्रकाशक
भगवान् की पावन लीला का रहस्य सन्त-महापुरुषों को ही विशेषतः अवगत है। सन्तशिरोमणि शुकदेव जी ही भगवद्-भक्ति के रस से सुपरिचित हैं। उसी प्रकार सद्गुरुदेव शिवानन्द जी महाराज की लेखनी द्वारा हम भगवान् की लीला का अधिकाधिक रहस्य जान सकते हैं; क्योंकि वे सदा कृष्ण-प्रेम में गोते लगा रहे हैं तथा 'वासुदेवः सर्वमिति — यह सब वासुदेव ही है' के विश्वात्म चैतन्य में परमानन्द का उपभोग कर रहे हैं।
अतः मैंने श्रीकृष्ण-लीला-सम्बन्धी अंगरेजी पुस्तक को जनता- जनार्दन की सेवा के लिए हिन्दी में अनूदित किया है। मुझे आशा एवं विश्वास है कि हिन्दी भाषा-भाषी जनता मेरे इस विनम्र प्रयास का हार्दिक स्वागत करेगी तथा भगवत्प्रेम की सरिता बहाने में सहायक सिद्ध होगी।
मैंने अनुवाद को सरल तथा स्वाभाविक बनाने का यथाशक्ति प्रयत्न किया है। मैं भगवान् श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती हूँ कि उनकी अपार कृपा से इस पुस्तक के सभी पाठकों में अपूर्व भगवत्प्रेम का जागरण हो तथा वे अमृत-पथ के धीर पथिक बने ।
-चन्द्रावती सिंह
आदौ देवकिदेविगर्भजननं गोपीगृहे वर्धनं
मायापूतनजीवितापहरणं गोवर्धनोद्धारणम् ।
कंसच्छेदनकौरवादिहननं कुन्तीसुतापालनं
एतद्भागवतं पुराणकथितं श्रीकृष्णलीलामृतम् ।।
प्राचीन काल में भगवान् श्रीकृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म धारण किया, वे गोपी यशोदा के गृह में पाले-पोषे गये। उन्होंने मायारूपिणी पूतना को मारा, गोवर्धन को धारण किया, कंस तथा कौरवों का हनन किया और कुन्ती के पुत्रों की रक्षा की। यही भागवतपुराण का सारांश है जो श्रीकृष्ण-लीला-रूपी अमृत से पूर्ण है।
ज्ञानं परमगु मे यद्विज्ञानसमन्वितम् ।
सरहस्य तदंगं च गृहाण गदितं मया ।।
भगवान् श्रीकृष्णण उद्भव से कहते है-
हे उद्धव) मुझसे इस परमगुह्य ज्ञान का श्रवण करो जो विज्ञान से तथा उसके अंगों से समन्वित है।
यावानहं यथाभावी यदूपगुणकर्मकः ।
तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।
मेरी कृपा से तुम मेरे तत्त्वज्ञान तथा उसके रूप का साक्षात्कार करो कर्मों के रहस्य को समझो।
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् ।
पश्चादहं यदेतच्च योऽयशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।१।।
सृष्टि होने से पहले मैं ही था। अन्य कुछ भी सत् या असत् न था । प्रलय के पश्चात् भी जो शेष बचा रहता है, वही मैं हूँ।
ऋतेऽर्थ यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥२॥
उसी को माया समझो, जिसका कुछ भी उद्देश्य न हो, जिसको आत्मा में प्राप्त नहीं किया जा सके तथा जो ज्योति एवं अन्धकार की भाँति मिथ्या हो ।
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्यहम् ||३ ||
जिस तरह महाभूत संयुक्त हैं तथा साथ ही एक-दूसरे से पृथक-पृथक भी उसी प्रकार मैं समस्त जगत् को परिव्याप्त कर रहा हूँ, साथ ही उससे पृथक भी हूँ।
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ||४||
साधक को अन्वय व्यतिरेक की विधि से उस वस्तु को जान लेना चाहिए जो सदा तथा सर्वदा स्थित है।
एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना ।
भवान्कल्पविकल्पेषु न विमुह्यति कर्हिचित् ।।
परम समाधि के द्वारा इस सत्य का अनुभव करो जिससे तुम मायिक वस्तुओं से मोहित न हो जाओ।
(गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद्)
नमो विश्वस्वरूपाय विश्वस्थित्यन्तहेतवे ।
विश्वेश्वराय विश्वाय गोविन्दाय नमो नमः ||१ ॥
मैं उन भगवान् श्रीकृष्ण को, गोविन्द को नमस्कार करता हूँ जो इस विश्व के रूप में प्रकट हैं, जो इसकी स्थिति तथा प्रलय के हेतु हैं, जो इस विश्व के ईश्वर हैं, जो विश्व-रूप ही हैं।
नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दरूपिणे ।
कृष्णाय गोपीनाथाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ २ ॥
उन श्रीकृष्ण अथवा गोविन्द को नमस्कार है जो गोपियों के स्वामी हैं, जो ज्ञान तथा परमानन्द के स्वरूप हैं।
नमः कमलनेत्राय नमः कमलमालिने ।
नमः कमलनाभाय कमलापतये नमः ||३||
कमल-नेत्र भगवान् श्रीकृष्ण, लक्ष्मीपति को नमस्कार है जो पद्मों की माला से विभूषित हैं तथा जिनकी नाभि से कमल की उत्पत्ति है।
बर्हापीडाभिरामाय रामायाकुण्ठमेधसे ।
रमामानसहंसाय गोविन्दाय नमो नमः || ४ ||
उस गोविन्द अथवा राम को नमस्कार है जो लक्ष्मी के मनः सरोवर में हंस के समान हैं, जिनका मोर मुकुट मनुष्यों के हृदय को आह्लादित करता है तथा जो अपूर्व मेधावी हैं।
कंसवंशविनाशाय केशिचाणूरघातिने ।
वृषभध्वजवन्द्याय पार्थसारथये नमः || ५ ||
उन अर्जुन सारथि को नमस्कार है, जो केशी तथा चाणूर के विनाशक हैं, जो कंसवंश के संहारक है, जो वृषभध्वज भगवान् शिव द्वारा वन्दित है।
वेणुवादनशीलाय गोपालायाहिमर्दिने ।
कालिन्दीकूललीलाय लोलकुण्डल धारिणे ||६||
गोपाल श्रीकृष्ण को नमस्कार है, जिन्होंने कालिय के मद को नष्ट किया, जो अपनी सुरीली बाँसुरी से श्रोताओं के हृदयों को आह्लादित करते हैं, जो कुण्डल से विभूषित हैं तथा जो कालिन्दी (यमुना) के तट पर विहार करते हैं।
वल्लवीवदनांभोजमालिने नृत्यशालिने ।
नमः प्रणतपालाय श्रीकृष्णाय नमो नमः ॥ ७ ॥
मैं उन श्रीकृष्ण की वन्दना करता हूँ जो सुन्दर कमल-रूपी बदनों वाली गोपियों से आवेष्टित हो कर उन्हें अपने नृत्य द्वारा आह्लादित करते हैं तथा जो प्रणतपालक हैं।
नमः पापप्रणाशाय गोवर्धनधराय च ।
पूतनाजीवितान्ताय तृणावर्तासुहारिणे ॥८ ॥
मैं उन गोवर्धनधारी, पापप्रणाशक भगवान् को नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने पूतना का वध किया तथा तृणावर्त का संहार किया।
निष्कलाय विमोहाय शुद्धायाशुद्धवैरिणे ।
अद्वितीयाय महते श्रीकृष्णाय नमो नमः || ९ ||
उन परम अद्वितीय श्रीकृष्ण को नमस्कार है जो सदा शुद्ध हैं, जो मोह से रहित हैं, जो निष्कल हैं तथा अशुद्ध मन वाले व्यक्तियों के शत्रु हैं।
प्रसीद परमानन्द प्रसीद परमेश्वर ।
आधिव्याधिभुजंगेन दष्टं मामुद्धर प्रभो ।। १० ।।
हे प्रभो! हे परमेश्वर! हे परमानन्द। मुझ पर प्रसन्न होइए। मानसिक एवं शारीरिक क्लेश-रूपी सर्प ने मुझे डस लिया है। मेरा उद्धार कीजिए ।
श्रीकृष्ण रुक्मिणीकान्त गोपीजनमनोहर ।
संसारसागरे मग्नं मामुद्धर जगद्गुरो ।। १९ ।।
हे श्रीकृष्ण, रुक्मिणीपति, हे जगदगुरु, हे गोपियों के मन को हरने वाले, संसार सागर से मेरा उद्धार कीजिए।
केशव क्लेशहरण नारायण जनार्दन ।
गोविन्द परमानन्द मां समुद्धर माधव ।। १२ ।।
हे केशव, हे क्लेशहरण, हे नारायण, हे जनार्दन, हे गोविन्द, हे परमानन्द, हे लक्ष्मीपति, मेरा उद्धार कीजिए।
लसद्बर्हापीडं ललितललितस्मेरवदनं
भ्रमत्कीडापांगं प्रणतजनतानिर्वृत्तिपदम् ।
नवाम्भोदश्यामं निजमधुरिमाभोगभरितं परं
देवं वन्दे परिमिलितकैशोरकरसम् ||१ ||
मैं उन भगवान् श्रीकृष्ण की बन्दना करता हूँ जिनका मुकुट मयूरपंख से सुशोभित हैं, जिनका बदन प्रेमपूर्ण मुस्कान से दीप्त है, जिनकी आँखों से कृपा--दृष्टि संचरित होती है, जिनका शरीर घनश्याम है, जिनमें किशोरावस्था का शुद्ध सौन्दर्य है, जो माधुर्य-रस से पूर्ण हैं, जो अमृतत्व प्रदान करते हैं तथा प्रणत जनों को संसार से मुक्त करते हैं।
मनसि मम सन्निधत्तां मधुरमुखा मधुरापांगा।
करकलितललितवंशी कापि किशोरकृपालहरी ||२||
भगवान् श्रीकृष्ण का वह मधुर मुख, जो कृपा से पूर्ण है, जिसका सौन्दर्य अनिर्वचनीय है; वह किशोर श्रीकृष्ण जिनके हाथ में ललित वंशी है, सदा मेरे हृदय में विराजमान हो ।
सार्धं समृद्धैरमृतायमानैराध्मायमानैर्मुरलीनिनादैः ।
मूर्धाभिषिक्तं मधुराकृतीनां बालं कदा नाम विलोकयिष्ये ||३||
मैं कब उन किशोर प्रभु के दर्शन करूंगा जो सौन्दर्य के स्वरूप हैं, जो अपनी बाँसुरी को कलात्मक ढंग से बजाते हैं तथा मधुर संगीत का सृजन करते हैं, जो कानों को बहुत प्रिय है तथा जो अमृतत्वप्रदायक है।
(भागवत: स्कन्द १, अध्याय ८)
नमस्ये पुरुषं त्वाऽऽद्यमीश्वरं प्रकृतेः परम् ।
अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम् । । १ ।।
हे पुरातन पुरुष परमात्मा! मैं आपको नमस्कार करती हूँ, आप प्रकृति से परे, अलक्ष्य है तथा सभी भूतों के अन्तर्बाह्य स्थित हैं।
मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाऽधोक्षजमव्ययम् ।
न लक्ष्यसे मूढदृशा नटो नाट्यधरो यथा ।। २ ।।
मैं अज्ञ स्त्री हूँ, मैं किस प्रकार आप अव्यय परमात्मा की पूजा कर सकती हूँ? आप तो माया के पर्दे से आच्छन्न हैं। जिस प्रकार नाटक में भाग लेने वाले नट अपने नाट्य से एकात्म नहीं होते, उसी प्रकार अज्ञानी जन आपको देख नहीं पाते।
तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् ।
भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः ||३ ॥
शुद्ध चित्त वाले परमहंसों के लिए भी आप दुर्लभ हैं। तो फिर हम स्त्री-जन किस प्रकार आपके लिए भक्तियोग का विधान कर आपके दर्शन प्राप्त कर सकती हैं?
कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च ।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ।।४ ।।
मैं बारम्बार श्रीकृष्ण को नमस्कार करती हूँ जो वासुदेव हैं, देवकीनन्दन हैं, नन्द गोप कुमार तथा गोविन्द अथवा गौओं के पालक हैं।
नमः पंकजनाभाय नमः पंकजमालिने ।
नमः पंकजनेत्राय नमस्ते पंकजांघ्रये ॥५ ॥
आप परमात्मा को नमस्कार है, आप पंकज-नाम है, अर्थात् आपकी नाभि से पंकज की उत्पत्ति हुई थी, आप कमल-पुष्पों की माला से सुशोभित है, नमस्कार है आपको। आपकी आँखें कमल के समान है तथा आपके चरण सुन्दर पद्म के समान है।
विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो ।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ||६||
हम समय-समय पर विपत्तियों को प्राप्त करें, जिससे हे जगद्गुरु, हम आपके दर्शन प्राप्त कर सकें, जिससे पुनः ससार का दर्शन न करना पड़े अर्थात् हम अमृतत्व प्राप्त कर लें।
जन्मैश्वर्य श्रुतिश्रीभिरेधमानमदः पुमान् ।
नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिंचनगोचरम् ।।७।।
जिस व्यक्ति की दृष्टि जाति, धन, विद्वत्ता तथा ऐश्वर्य के मद से आच्छन्न है, वह आपकी स्तुति के योग्य नहीं, आप तो अकिंचन तथा निष्पाप जनों के लिए ही सुलभ हैं।
नमोऽकिंचनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये ।
आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नमः ॥८ ॥
आप ही अकिंचनों का धन हैं, मैं आपको नमस्कार करती हूँ; आप माया के गुणों से निर्लिप्त हैं। मैं आपकी पूजा करती हूँ; आप सदा आत्मा में ही रमण करते हैं, आप शान्ति तथा कैवल्य मोक्ष के प्रभु हैं।
मन्ये त्वां कालमीशानमनादिनिधनं विभुम्
समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः ।। ९ ।।
आप काल हैं, आप सबके ईश्वर हैं, आप आदि तथा अन्त से रहित हैं, आप सर्वत्र समरूप से विचरण करते हैं, अशान्ति तो भूत पदार्थों में ही है।
न वेद कश्चिद्भगवंश्चिकीर्षितं
तवेहमानस्य नृणां विडम्बनम् ।
न यस्य कश्चिहयितोऽस्ति कर्हिचिद्
द्वेष्यश्च यस्मिन् विषमा मतिर्नृणाम् ।। १० ।।
हे प्रभु! आप क्या करने जा रहे हैं, इसे कोई नहीं जानता, फिर भी आप साधारण व्यक्ति के समान लीला करते हैं। आपके लिए न तो कोई प्रिय है और न कोई अप्रिय। विभिन्न लोग आपको विभिन्न रूपों से समझते हैं।
ब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धाः
सत्त्वैकतानमतयो वचसां प्रवाहैः ।
नाराधितुं पुरुगुणैरधुनापि पिप्रुः
किं तोष्टुमर्हति स मे हरिरुग्रजातेः ।। १ ।।
मैं कैसे उन हरि की स्तुति करूँ, जिनकी ब्रह्मा और अन्य देव गण ऋषि तथा सिद्धों के साथ सत्त्व से परिप्लावित मन से युक्त हो, प्रार्थना प्रवाहों से स्तुति में निरत रहते हुए भी आराधना करने में असमर्थ हैं? मैं तो असुर-कुल में उत्पन्न हूँ।
मन्ये धनाभिजनरूपतपा श्रुतौज-
स्तेजः प्रभाववलपौरुषबुद्धियोगाः ।
नाराधनाय हि भवंति परस्य पुंसो
भक्त्या तुतोष भगवान् गजयूथपाय ।। २ ।।
मेरी समझ में तो धन, उन्नत कुल में जन्म, शारीरिक सौन्दर्य, तपस्या, विद्वत्ता, शक्ति, ज्ञान तथा योगाभ्यास के द्वारा भी श्री हरि की कृपा को प्राप्त करना सम्भव नहीं; वह श्री हरि भक्ति मात्र से ही गजेन्द्र पर प्रसन्न हो गये थे।
विप्रद्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-
पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।
मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ-
प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ ३ ॥
वह चाण्डाल, जिसने मन, वचन तथा कर्म से अपने धन तथा जीवन को भगवान् के चरणों में लगा दिया है, उस ब्राह्मण से श्रेष्ठ है जो बारहों गुणों से सम्पन्न होते हुए भी भगवान् के चरण-कमलों में प्रीति नहीं रखता। वह चाण्डाल सबको शुद्ध बनाता है, परन्तु वह ब्राह्मण अभिमान से पूर्ण हो ऐसा नहीं कर पाता ।
नैवात्मनः प्रभुरयं निजलाभ पूर्णो
मानं जनादविदुषः करुणो वृणीते ।
यद्यज्जनो भगवते विदधीत मानं
तच्चात्मने प्रतिमुखस्य यथा मुखश्रीः ।।४।।
वह प्रभु, जो सदा अपनी आत्मा में ही परितृप्त हैं, तुच्छं बुद्धि वाले व्यक्तियों की पूजा के लिए लालायित नहीं हैं; परन्तु करुणा तथा दया के कारण वह भक्त पर अनुग्रह करने के लिए उसके द्वारा अर्पित वस्तुओं को ग्रहण कर लेते हैं। मुख पर जो कुछ भी शोभावर्धक लेप लगाया जाये, वह वैसा ही दर्पण में प्रतिबिम्बित हो जाता है; उसी प्रकार भक्ति द्वारा भक्त अपना ही उद्धार करता है।
नाहं विभेम्यजित तेऽतिभयानकास्य
जिह्वार्कनेत्रभ्रुकुटीरभसोग्रदंष्ट्रात् ।
आन्त्रस्रजः क्षतजकेसरशंकुकर्णा-
न्निर्ह्रादभीतदिगिभादरिभिन्नखाग्रात् ।।५ ।।
हे महाप्रभु! मैं आपके भयंकर रूप से भयभीत नहीं हूँ, आपका मुख विशाल है, जिह्वा विकराल है, आँखें सूर्य की तरह विभासित हैं, भौंहें भयानक हैं, दाँत कराल हैं, आप अंतड़ियों की माला पहने हैं, आपकी गरदन रुधिर से स्नात है। आपके कर्ण खडे हैं, आपका गर्जन दिग्पालों को विकम्पित करने वाला है, आपके नख शत्रुओं को विदीर्ण करने में समर्थ हैं।
त्रस्तोस्म्यहं कृपणवत्सल दुःसहोग्र-
संसारचक्रकदनाद् ग्रसतां प्रणीतः ।
बद्धः स्वकर्मभिरुशत्तम तेऽङ्घ्रिमूलं
प्रीतोऽपवर्गमरणं ह्रयसे कदा नु ।।६।।
परन्तु हे कृपणवत्सल प्रभु! मैं इस भयानक संसार-चक्र से भयभीत हूँ जिसके हे मध्य अपने कर्म से विवश हो कर मैं पड़ा हुआ हूँ। हे परम पूज्य प्रभु, आप कब मुझे अमृतत्वधाम में अपने निकट बुला लेंगे ?
यस्मात्प्रियाप्रियवियोगसंयोगजन्म-
शोकाग्निना सकलयोनिषु दह्यमानः ।
दुःखौषधं तदपि दुःखमतद्धियाहं
भूमन् भ्रमामि वद मे तव दास्ययोगम् ॥७॥
मैं विभिन्न योनियों में जन्म ग्रहण से प्राप्त शोकाग्नि से भयभीत हैं, प्रिय वस्तुओं से विरह तथा अप्रिय के मिलने से प्राप्त दुःख, राग-द्वेष के द्वन्द्वों से दोलायमान जीवन, जहाँ शोक की दवा शोक ही है, इस दयनीय जीवन से भयभीत हैं; फिर भी मैं अज्ञानी हो इस संसार में भ्रमण कर रहा हूँ। हे पूर्ण प्रभु! कृपया मेरी सेवा को स्वीकार कर इस दारुण संसार से मेरा उद्धार करें।
माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः
कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः ।
छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं
संसारचक्रमज कोऽतितरेत्त्वदन्यः ॥८ ॥
प्रकृति अपनी कर्ममय अचिन्त्य शक्ति द्वारा काल की सहायता से आपकी अध्यक्षता में सृष्टि करती है। प्रकृति असीम बल से सम्पन्न हो वैदिक कर्मों की प्रवृत्ति रखती हुई सोलह अरों वाले संसार-चक्र की रचना करती है। हे अजन्मा प्रभु! आपकी कृपा के बिना कैसे कोई इस चक्र से मुक्ति प्राप्त कर सकता है ?
तस्मादमूस्तनुभृतामहमाशिषोऽज्ञ
आयुः श्रियं विभवमैन्द्रियमा विरिञ्चात् ।
नेच्छामि ते विलुलितानुरुविक्रमेण
कालात्मनोऽपनय मां निजभृत्यपार्श्वम् ।।९।।
अतः मैं उन विषय सुखों की इच्छा नहीं करता जिनके लिए अज्ञानी जन लालायित रहते हैं; जैसे दीर्घायु, धन, यश, इन्द्र-पद, ब्रह्म-पद आदि; न तो मैं अणिमा आदि सिद्धियों की ही कामना करता क्योंकि ये सब विषय कालरूप प्रभु आपसे अपहृत हो जायेंगे, अतः मेरी प्रार्थना है कि हे प्रभु, आप अपने सम्पर्क में मुझे बनाये रखें।
कुत्राशिषः श्रुतिसुखा मृगतृष्णिरूपाः
क्वेदं कलेवरमशेषरुजां विरोहः ।
निर्विद्यते न तु जनो यदपीति विद्वान्-
कामानलं मधुलवैः शमयन्दुरापैः ।। १० ।।
उन सुखोपभोगों से क्या लाभ जो कणों को ही प्रिय हैं; परन्तु वास्तव में मृगजल की भाँति मिथ्या हैं? इस भौतिक शरीर से क्या लाभ जो रोगों का घर है ? ऐसा जानते हुए भी मनुष्य विरक्त नहीं होते तथा वे विषय-सुख की बूंदों से कामाग्नि को बुझाने का विफल प्रयत्न करते रहते हैं।
श्रीकृष्णः कमलानाथो वासुदेवः सनातनः ।
वसुदेवात्मजः पुण्यो लीलामानुषविग्रहः ।। १ ।।
श्रीवत्सकौस्तुभधरो यशोदावत्सलो हरिः ।
चतुर्भुजात्तचक्रासिगदाशंखाम्बुजायुधः ।। २ ।।
'देवकीनन्दनः श्रीशो नन्दगोपप्रियात्मजः ।
यमुनावेगसंहारी बलभद्रप्रियानुजः ।।३ ।।
पूतनाजीवितहरः शकटासुरभंजनः ।
नन्दब्रजजनानन्दी सच्चिदानन्दविग्रहः ||४ ||
नवनीतावलिप्तांगो नवनीतनटोऽनघः ।
नवनीतनवाहारो मुचुकुन्दप्रसादकः ।।५।।
षोडशस्त्रीसहस्रेशः त्रिभंगी मधुराकृतिः ।
शुकवागमृताब्धीन्दुर्गोविन्दो गोविदां पतिः ।। ६ ।।
वत्सवाटचरोऽनन्तो धेनुकासुरभंजनः ।
तृणीकृततृणावर्तो यमलार्जुनभंजनः ।।७।।
उत्तालतालभेत्ता च तमालश्यामलाकृतिः ।
गोपगोपीश्वरो योगी कोटिसूर्यसमप्रभः ॥८ ॥
इलापतिः परंज्योतिर्यादवेन्द्रो यदूद्वहः ।
वनमाली पीतवासाः पारिजातापहारकः ।। ९ ।।
गोवर्धनाचलोद्धर्ता गोपालः सर्वपालकः ।
अजो निरंजनः कामजनकः कंजलोचनः ||१०||
मधुहा मथुरानाथो द्वारकानायको बली ।
वृदावनान्तसंचारी तुलसीदामभूषणः ।। ११ ।।
स्यमन्तकमणेर्हर्ता नरनारायणात्मकः ।
कुब्जाकृष्णाम्बरधरो मायी परमपूरुषः । । १२ ।।
मुष्टिकासुरचाणूरमल्लयुद्धविशारदः ।
संसारवैरी कंसारिः मुरारिर्नरकान्तकः ।। १३ ।।
अनादिर्ब्रह्मचारी च कृष्णाव्यसनकर्षकः ।
शिशुपालशिरश्छेत्ता दुर्योधनकुलान्तकः ।। १४ ।।
विदुराक्रूरवरदो विश्वरूपप्रदर्शकः ।
सत्यवाक् सत्यसंकल्पो सत्यभामारतो जयी ।। १५ ।।
सुभद्रापूर्वजो विष्णुः भीष्ममुक्तिप्रदायकः ।
जगद्गुरुर्जगन्नाथो वेणुनादविशारदः ।। १६ ।।
वृषभासुरविध्वंसी बाणासुरबलान्तकृतः ।
युधिष्ठिरप्रतिष्ठाता बर्हिबर्हावतंसकः ।। १७ ।।
पार्थसारथिरव्यक्तो गीतामृतमहोदधिः ।
कालीयफणमाणिक्यरंजित श्रीपदाम्बुजः ।। १८ ।।
दामोदरो यज्ञभोक्ता दानवेन्द्रविनाशनः ।
नारायणः परंब्रह्म पन्नगाशनवाहनः ।।१९।।
जलक्रीडासमासक्तः गोपीवस्त्रापहारकः ।
पुण्यश्लोकस्तीर्थपादो वेदवेद्यो दयानिधिः ।। २० ।।
सर्वतीर्थात्मकस्सर्वग्रहरूपी परात्परः ।
एवं श्रीकृष्णदेवस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।। २१ ।।
कृष्णनामामृतन्त्राम परमानन्दकारकम् ।
अत्युपद्रवदोषघ्नं परमायुष्यवर्धनम् ।। २२ ।।
।। इति श्रीकृष्णाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
उन परम प्रभु भगवान् कृष्ण को नमस्कार है, जो सर्वान्तर्यामी हैं, जो सत्-चित्-आनन्द हैं, जो सर्वात्मा है, जो भक्त जनों के मोक्षदाता हैं, जो सबके आदि कारण हैं, जिन्होंने भक्तों एवं देवताओं को प्रमुदित करने तथा अधर्म का उच्छेदन कर धर्म की संस्थापना करने के हेतु मानव-रूप धारण किया है।
मैं उन परब्रह्म परमात्मा को नमस्कार करता हैं, जिनसे यह रहस्यमय जगत् उत्पन्न हुआ, जिनमें यह संस्थित है तथा अन्त में जिनमें यह विलीन होगा। वे स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण महाविष्णु के सभी अवतारों में सर्वोत्कृष्ट हैं। वे सभी अवतारों में अनुपम एवं शिरोमणि हैं। वे षोडश कलासम्पन्न पूर्ण अवतार हैं। वे सुप्रसिद्ध यादव वंशज तथा जगद्गुरु थे। वे प्रेमाधीश तथा मानव-प्रेमी थे। उनके दिव्य रूप ने आज भी भारत की आत्मा को प्रेम की स्निग्ध श्रृंखला में आबद्ध कर रखा है।
भागवत, महाभारत तथा विष्णुपुराण- सभी एक-स्वर से यह घोषित करते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण के रूप की सुषमा एवं मधुरिमा की समता त्रैलोक्य में कोई नहीं कर सकता।
करयुग्म में वंशी धारण किये हुए उनके मनोहर रूप का पूजन होता है। यह वह रूप है जिस पर भारत में ही नहीं वरन् पाश्चात्य देशों में तथा अमरीका में भी असंख्य भक्त गण अपनी श्रद्धा एवं विशुद्ध प्रेम को न्योछावर करते हैं।
वे बौद्धिक एवं भावात्मक गुणों के साकार रूप थे। वे तत्कालीन युग के सर्वोच्च प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। वे एक महान् ऐतिहासिक पुरुष थे। उनकी बाल-लीला सभी विचारशील व्यक्तियों के लिए असंख्य प्रत्यक्ष शिक्षाएँ हैं। उनका व्यक्तित्व भव्य तथा असाधारण था ।
भगवान् श्रीकृष्ण के सदुपदेशों के प्रत्येक शब्द तथा उनकी प्रत्येक क्रिया मानव जाति के लिए विविध प्रकार से महत्त्वपूर्ण निहितार्थ के श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट प्रत्यक्ष पाठ से आपूर्ण है।
सृष्टि के आरम्भ से ही भगवान् श्रीकृष्ण की उपासना प्रचलित है। यह तो बद का ही एक अंग है; कोई नवीन सम्प्रदाय नहीं। भगवान् श्रीकृष्ण सारे भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय आराध्य देव बन गये हैं। भारत में ही नहीं, विदेशों में भी सहस्रों महिलाएँ उनकी आराधना करती हैं तथा उनके मन्त्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करती हैं।
ज्ञान, भाव तथा कर्म में श्रीकृष्ण सर्वथा महान् थे। शास्त्रों ने इतना पूर्ण, इतना दिव्य, इतना सूक्ष्म तथा इतना श्रेष्ठ जीवन किसी अन्य का वर्णन नहीं किया जितना कि उनका ।
यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण मानव रूप में प्रकट हुए थे तथापि उनका शरीर अप्राकृतिक तथा दिव्य था। न तो उन्होंने कोई जन्म ग्रहण किया और न वे काल-कवलित ही हुए। अपनी योग-माया के द्वारा ही वे प्रकट हुए तथा अन्तर्धान भी। इस रहस्य से केवल ऋषि, योगी तथा भक्त गण ही अवगत हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस घरा-धाम में अनेक लीलाएं कीं। उन्होंने अर्जुन का रथ हाँका। वे सर्वोत्तम राजनीतिज्ञ थे। वे संगीत कला में निपुण थे। उन्होंने नारद को वीणा की शिक्षा दी। उनकी बाँसुरी के संगीत ने गोपियों के तथा सभी लोगों के हृदय को पुलकित कर दिया। वे नन्दग्राम तथा गोकुल में गोपाल थे। शैशवावस्था में ही उन्होंने अनेक अद्भुत कौशल प्रदर्शित किये, अनेक असुरों का संहार किया। माता को उन्होंने विश्वरूप-दर्शन कराया। उन्होंने रासलीला की जिसके रहस्य का ज्ञान केवल नारद, गौरांग, राधा तथा गोपियों-जैसे भक्तों को ही था। उन्होंने अर्जुन तथा उद्धव को योग, भक्ति तथा वेदान्त के परम रहस्य का उपदेश दिया। उन्हें चौसठ कलाओं में निपुणता प्राप्त थी। इन्हीं कारणों से वे षोडश कला-युक्त पूर्ण अवतार माने जाते हैं।
अवतार
विशेष परिस्थिति में विशेष कारण के हेतु ही अवतारों का प्रादुर्भाव होता है। जब कभी अधर्म की अधिकता होती है, जब कभी अधर्म के कारण अस्त-व्यस्तता तथा अव्यवस्था आने लगती है तथा लोगों का सुनिश्चित विकास अवरुद्ध हो जाता है, जब कभी स्वार्थपरता, क्रूरता एवं नृशंसता के द्वारा मानव समाज का सन्तुलन विकृत हो जाता है, जब कभी अधर्म का बोलबाला होता है, जब सामाजिक संस्थाओं की नींव जर्जरित हो उठती है तब धर्म के संस्थापन एवं शान्ति स्थापना के लिए अवतारों का प्रादुर्भाव होता है।
मानव के उत्थान के लिए ईश्वर का अवतरण ही अवतार है। संसार में सन्तुलन बनाये रखने के लिए हिरण्यगर्भ की एक किरण अतुल शक्ति ले कर इस भूलोक में अवतीर्ण होती है। अवतारों के कार्य तथा उनकी शिक्षाएँ मानो प्राणी पर विशेष आध्यात्मिक प्रभाव डालती हैं तथा उनके दिव्य प्रस्फुटन एवं आत्मसाक्षात्कार में सहायता पहुँचाती हैं।
अवतार मनुष्य की दिव्य प्रकति को अभिव्यक्त करने तथा कामुकता एवं अहंकारमय क्षुद्र भौतिक जीवन से उसे ऊपर उठाने के लिए ही आते हैं। भगवान् की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति ही अवतार कहलाती है। आवेश, अंश तथा कला-अवतार, ऋषि, मुनि, सिद्ध पुरुष, मसीहा, पैगम्बर आदि भगवान् की छोटी अभिव्यक्तियाँ हैं।
अवतार प्रायः अपने अन्तरंग साथियों के साथ ही अवतीर्ण होते हैं। भगवान् राम लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न के साथ; भगवान् कृष्ण बलराम, देवताओं तथा ऋषियों के साथ तथा भगवान् सनक कुमार सनातन, सनन्दन और सनत्कुमार के साथ प्रकट हुए।
श्री शंकर, रामानुज आदि कुछ आचार्य एवं आध्यात्मिक नेता के रूप में आते हैं। श्री चैतन्य की भाँति कुछ अवतार लोगों के हृदय में भक्ति-रस का संचार करने तथा उन्हें ईश्वरोन्मुख बनाने के लिए आते हैं; किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण के समान पूर्ण अवतार तो तभी आते हैं जब संसार में चतुर्दिक् अशान्ति, अराजकता तथा आपत्ति छा जाती है।
अधिकांश अवतारों ने किसी एक कार्य-विशेष को ही सम्पादित किया; किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण के कार्यकलाप तो बहुमुखी थे, अतएव वे पूर्ण अवतार कहलाये।
पुराण के श्रीकृष्ण
अग्नि, ब्रह्म, पद्म, ब्रह्मवैवर्त, विष्णु तथा श्रीमद्भागवत पुराण श्रीकृष्ण चरित्र का वर्णन करते हैं। ब्रह्म तथा पद्म-पुराण के कई अध्यायों में इसका वर्णन किया गया है। ब्रह्मवैवर्त, विष्णु तथा श्रीमद्भागवत पुराण के सम्पूर्ण ग्रन्थ अथवा स्कन्धों में श्रीकृष्ण चरित्र का वर्णन है।
वैष्णव मत के उत्तरकालीन विकास में राधा-तत्त्व का महत्त्वपूर्ण भाग रहा। श्रीविष्णु तथा श्रीमद्भागवत पुराण में श्री राधा का कहीं उल्लेख नहीं है। पद्म तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में ही राधा-तत्त्व, राधा तथा उसकी सखियों की वास्तविक प्रकृति, उनके नाम, उनके रहस्यात्मक अर्थ तथा रासलीला में श्रीकृष्ण जी के साथ उनके सम्बन्ध इत्यादि का विशद् वर्णन है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्रीकृष्ण की आराधना में राधा-तत्त्व को विशेष महत्त्व दिया गया है। श्रीविष्णु तथा श्रीमद्भागवत-पुराण में भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनकी आराधना का दार्शनिक निरूपण किया गया है।
जीवन-चरित्र
भगवान् श्रीकृष्ण लीला-पुरुषोत्तम थे, योगेश्वर थे और थे प्रेम मूर्ति । भगवान् राम मर्यादा-पुरुषोत्तम थे। वे एक आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति, आदर्श मित्र तथा आदर्श राजा थे। वे मनुष्य के सभी उच्चतम आदशों के साकार रूप ही माने जा सकते हैं। मानव प्राणी के शिक्षार्थ उन्होंने आदर्श गार्हस्थ्य जीवन यापन किया।
श्रीकृष्ण कर्मनिष्ठ पुरुष थे। वे ऐतिहासिक पुरुष थे तथा अनुचित को उचित में परिणत करने वाले थे। वे न्याय एवं धर्म के पक्षपाती थे। आततायियों से पीड़ितों का परित्राण करना ही उनकी नीति थी। उनमें अलौकिक शारीरिक शक्ति थी। वे ज्ञानी तथा जगद्गुरु थे।
वे स्वर्गिक संगीतज्ञ थे। वे योगेश्वर थे। वे अर्जुन तथा उद्धव के सखा थे। अर्जुन तथा उद्धव के प्रति योग, भक्ति तथा ज्ञान पर दिये गये उनके अमर उपदेश अद्वितीय हैं। वे अभी तक पाठकों के हृदय को स्पन्दित करते हैं तथा उन्हें आध्यात्मिक पथ की ओर प्रेरित करते हैं और उनके हृदय में शान्ति लाते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण सदा के लिए सर्वश्रेष्ठ कर्मयोगी थे। उन्होंने ज्ञान ज्योति को जीवित रखा। वे ज्ञान तथा निष्काम कर्म की साक्षात् मूर्ति थे। इस भूलोक तथा स्वर्गलोक में जो भी श्रेष्ठतम, उच्चतम, पवित्रतम तथा सर्वाधिक सौन्दर्यमय, उत्कृष्ट एवं महान् था, उसका अपने जीवन में उन्होंने समावेश किया। वे गौ, गोपकुमार तथा गोपियों के सर्वस्व थे। वे निर्धनों तथा असहायों के मित्र तथा सहायक थे। वे एक अपूर्व प्रतिभाशाली पुरुष थे।
कंस की रंगशाला में उपस्थित मल्ल युद्ध करने वालों के लिए वे वज्र थे; फिर भी उनका हृदय सबसे अधिक कोमल था। वे कंस के लिए काल, गोपियों के लिए कामदेव, योगियों तथा भक्तों के लिए निरन्तर ध्येय पदार्थ, मुनियों के लिए आनन्द-स्वरूप एवं परमगति तथा माता-पिता के लिए बालक थे। वे मन्मथ के भी साक्षात् मन्मथ थे।
भगवान् श्रीकृष्ण जगत्पति होते हुए भी नम्रता की मूर्ति थे। वे अर्जुन के सारथि बने। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अतिथियों के पाद प्रक्षालन का कार्य उन्होंने स्वेच्छा से अपने हाथों में लिया।
भागवत पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण इस धरा धाम पर कुल एक सौ पचीस वर्ष तक रहे।
विद्यार्थी जीवन
भगवान् श्रीकृष्ण ने अवन्तीपुर के गुरु सान्दीपनि से विद्या प्राप्त की। वे एक साधारण विद्यार्थी की भाँति अपने गुरु के पास रहे। वे नम्र, विनीत तथा आज्ञाकारी शिष्य थे। उन्होंने बहुत कठोर जीवन व्यतीत किया। अपने गुरु के लिए उन्होंने अरण्य से समिधाएँ एकत्र कीं। उन्होंने अपने सहपाठियों के हृदय में प्रेम का संचार किया। सुदामा, जो बाद में कुचेला के नाम से प्रसिद्ध हुए, भगवान् श्रीकृष्ण के सहाध्यायी थे।
श्रीकृष्ण में अलौकिक स्मरण शक्ति थी। कितना ही कठिन क्यों न हो, जिस विषय को वे एक बार श्रवण करते, वह सदा उनके स्मृति पटल पर अंकित रहता। चौंसठ दिन के स्वल्पकाल में ही उन्होंने चौंसठ कलाओं में पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया। उनका शारीरिक बल अतुलनीय था। वे धनुर्विद्या तथा युद्ध-कौशल में भी पारंगत थे।
जब उनका विद्यार्थी जीवन समाप्त हुआ, तब गुरु की आज्ञा से वे पंचजन नामक सामुद्रिक दैत्य से गुरुपुत्र को मुक्त कर लाये जो उन्हें उठा ले गया था। श्रीकृष्ण ने पंचजन का वध कर उसका शंख पांचजन्य ले लिया।
दया की मूर्ति
भगवान् श्रीकृष्ण मुनियों के सम्मुख परब्रह्म के रूप में, योगियों के सम्मुख परम तत्त्व के रूप में, गोपियों के सम्मुख कामदेव के रूप में, योद्धाओं के सम्मुख शूरवीर योद्धा के रूप में, वसुदेव-देवकी के सम्मुख नन्हें शिशु के रूप में, कंस के सम्मुख काल के रूप में तथा राजाओं के सम्मुख सम्राट् के रूप में अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों की भावना के अनुसार विविध रूप में प्रतीत होते थे। विषय वे ही थे; किन्तु दर्शक के दृष्टिकोण के अनुसार वे विभिन्न रूपों में दृष्टिगोचर होते थे।
गोपियों के अतीव प्रेम के कारण वे उनके घरों से छिप कर मक्खन खाया करते थे। इसलिए वे माखन चोर कहलाते थे; परन्तु वास्तव में तो वे भक्तों के कुत्सित भावों का हरण कर उनके मन को दिव्य भावों से पूरित कर देते हैं। बाल्यावस्था की माखन चोरी तो प्रेमी गोपियों को आह्लादित करने के लिए उनकी एक प्रकार की लीला मात्र थी। गोपिकाओं को श्रीकृष्ण जी की यह लीला बहुत ही प्रिय थी; अतः वे भगवान् के आगमन तथा उनके मक्खन के आस्वादन की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा किया करती थीं। भगवान् वास्तव में अपने भक्तों के हृदय को चुरा कर उन्हें संसार से उदासीन बनाते तथा उनके मन को अपने चरण-कमलों की ओर आकर्षित कर उन्हें चिरन्तन शान्ति एवं आनन्द में विभोर कर देते हैं। 'दासोऽहम्' शब्द में 'दा' अक्षर का हरण कर अपने भक्तों को 'सोऽहम्' मैं वही हूँ अथवा जीव को परमात्मा से ऐक्य की भावना— के महत्त्व की अनुभूति कराते हैं। भगवान् गीता में कहते हैं: “ददामि बुद्धियोगं तम् — अपने भक्तों को मैं विवेक-योग प्रदान करता हूँ" (अध्याय: १०-१०)। भगवान् कितने दयालु है। । धन्य हैं वे तथा धन्य है उनका नाम!
उनके ही प्राण लेने के विचार से आयी हुई पूतना के प्रति भी मातृभाव रख कर उसे उन्होंने मुक्ति दी। उन्होंने कंस तथा शिशुपाल के समान घोर शत्रु को भी, जिसने भरी सभा में उनका अपमान किया था, मोक्ष प्रदान किया; फिर तो जो उनके अनन्य भक्त हैं, उनका कहना ही क्या!
एक बार भगवान् श्रीकृष्ण जी ने अपनी धर्मपत्नी श्रीरुक्मिणीदेवी से कहा "हे राजकुमारी अनेक वीर नरेशों के प्रेम को ठुकरा कर तुमने मुझसे ब्याह कर भला नहीं किया। मैं किसी देश का राजा नहीं हूँ। मैं तो भय के कारण समुद्र-तटीय नगर में निवास करता हूँ। मेरा आचार-व्यवहार भी विचित्र-सा है। यह सामान्य लौकिक व्यवहार के अनुरूप नहीं है। अल्पसंख्यक ही मुझे समझ पाते हैं। मेरे समान पुरुष को वरण करने वाली स्त्रियों को सदा क्लेश ही झेलना पड़ता है। मेरा सम्पर्क पतितों तथा अकिंचन लोगों से रहता है; अतः धनाढ्य लोग तो मुझ जैसे लोगों से मिलना-जुलना भी पसन्द नहीं करते । अपनी आत्मा में ही लीन रहने के कारण स्त्री, पुत्र, सम्पत्ति में मेरी कोई आसक्ति नहीं है; अतः हे विदर्भ कुमारी ! तुमने मेरे संग विवाह कर भूल ही की।"
श्रीकृष्ण का यह छोटा वक्तव्य उनकी महत्ता का परिचायक है। वे दुर्बल एवं विनम्र के प्रति अत्यन्त दयालु तथा कारुणिक थे।
महान् योद्धा
भगवान् श्रीकृष्ण बारह वर्ष की अल्पायु में ही एक निर्भीक योद्धा थे। कुब्जा के तिलक से अभिषिक्त तथा सुदामा माली के पुष्पहार से अलंकृत हो उन्होंने कंस के धनुर्यज्ञ की यज्ञशाला में प्रवेश कर विशाल धनुष को तोड़ डाला। कंस ने कुवलयापीड नामक हाथी को श्रीकृष्ण को मारने भेजा। भगवान् ने उसका वध कर रंगभूमि में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने कंस के प्रधान पहलवानों को अर्थात् चाणुर तथा तोषल को धराशायी बनाया। अब वे छलाँग मार कर कंस के मंच पर जा पहुँचे और उसको केश पकड़ कर मंच से गिरा दिया और उसके प्राण ले लिये।
श्रीकृष्ण जी ने मगधराज जरासन्ध तथा कालयवन से वीरतापूर्वक लोहा लिया। जरासन्ध अपने जामाता कंस के मारे जाने का वृत्तान्त सुन कर आग-बबूला हो उठा। उसने मथुरा नगरी पर सत्रह बार आक्रमण किया; किन्तु प्रत्येक बार उसे श्रीकृष्ण से मुँह की खानी पड़ी।
शोणितपुर नरेश सहस्रबाहु बाणासुर से उन्होंने युद्ध किया। श्रीकृष्ण के पुत्र अनिरुद्ध गुप्त रूप से बाण की पुत्री ऊषा से विवाह कर उसी के साथ रहने लगे थे। बाणासुर को इस रहस्य का पता चल गया और उसने अनिरुद्ध को बन्दी बना लिया। श्रीकृष्ण ने बाणासुर से युद्ध कर उसकी भुजाएँ काट डालीं और अनिरुद्ध तथा ऊषा के साथ द्वारका वापस आ गये।
तदुपरान्त उन्होंने करूष देश के राजा पौण्ड्रक का वध किया। वह श्रीकृष्ण की दिव्यता को अस्वीकार करता था और श्री विष्णु के चिह्न शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कर अपने को वास्तविक वासुदेव घोषित करता था ।
दुष्ट शिशुपाल ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। भगवान् ने सुदर्शन चक्र उसके ऊपर चला कर उसका शिरोच्छेदन कर दिया। सौभपति शाल्व, जो शिशुपाल का मित्र था, ने अपने मित्र की मृत्यु के प्रतिकार की भावना से श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया; किन्तु वह उनके हाथों मारा गया। इसी भाँति उन्होंने दन्तवक्त्र का भी बध किया।
योगेश्वर
आकाश मण्डल की तारिकाओं एवं समुद्र तट के रजत कणों की गणना कर सकना सम्भव है; किन्तु त्रिलोकपति भगवान् श्रीकृष्ण की अद्भुत तथा वीरतापूर्ण लीलाओं और यशस्वी कार्यों का परिगणन सम्भव नहीं है।
बाल्यावस्था में उन्होंने अनेक अद्भुत लीलाएँ कीं। उन्होंने जँभाई लेते समय माता यशोदा को विश्वरूप-दर्शन कराया, यमलार्जुन वृक्ष को उखाड़ फेंका, कालिय नाग के मस्तक पर नृत्य किया, इन्द्र द्वारा प्रेरित घनघोर वर्षा से गोकुल की रक्षा के हेतु गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा उँगली पर धारण किया, नेत्रहीन विल्वमंगल को दृष्टि प्रदान की, द्रौपदी का चीर बढ़ाया तथा अर्जुन को विश्वरूप-दर्शन कराया।
एक बार दुर्वासा ऋषि अपने बहुत से शिष्यों के साथ महाराजा युधिष्ठिर का आतिथ्य ग्रहण करने के लिए पधारे। उस समय द्रौपदी भी भोजन समाप्त कर चुकी थीं और अतिथियों को परोसने के लिए कुछ भी भोजन शेष न था । श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के पात्र में अवशिष्ट शाक का एक टुकड़ा खाया। जब वे ऋषि स्नान कर रहेथे, उन्हें ऐसा अनुभव भगवान् के कराया मानो कि उन्होंने बहुत अधिक राजसिक भोजन कर लिया है। वे लज्जित मन से शिर नीचा किये वहाँ से चल दिये। दुर्योधन की सभा में द्रौपदी के चीर हरण के अवसर पर उन्होंने उसे अनन्त वस्त्र प्रदान किये। रासलीला के समय वे अनेक रूप धारण कर प्रकट होते थे। जब ब्रह्मा जी ने गोपों और बछड़ों को श्रीकृष्ण जी से छिपा लिया तो उन्होंने अनेक रूप धारण कर लिये थे। क्या कोई मानव प्राणी ऐसा कर सकता है। केवल योगेश्वर ही इस प्रकार के अद्भुत कार्य कर सकते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् योगेश्वर, त्रिलोक-नाथ तथा चराचर जगत् की आत्मा हैं। भला उनके वैभव का कौन वर्णन कर सकता है। श्रीकृष्ण द्वारा अवशिष्ट शाक का एक टुकड़ा मात्र खा लेने से ही दुर्वासा तथा उनके शिष्य तृप्त हो गये। इससे यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि भगवान् श्रीकृष्ण सभी प्राणियों में निवास करते हैं।
नारद मुनि ने एक बार यह जानने की इच्छा से कि भगवान् श्रीकृष्ण किस प्रकार सोलह सहस्र स्त्रियों के साथ दाम्पत्य जीवन निर्वहन करते हैं, उनके अन्तःपुर में प्रवेश किया और सर्वत्र श्रीकृष्ण को विभिन्न कार्यों में व्यस्त पाया। कैसी अद्भुत बात है! नारद तो स्तब्ध रह गये। क्या यह सिद्ध नहीं करता कि श्रीकृष्ण योगेश्वर और स्वयं भगवान् ही हैं ?
श्रीकृष्ण भूतभर्तृ हैं। वास्तव में वे ही संसार की सभी स्त्रियों के पति हैं। वास्तविक पति तो केवल प्रभु ही हैं। इसी बात को बतलाने के लिए ही तो उन्होंने वसुदेव-देवकी के यहाँ पुत्र रूप में अवतार लिया ।
महान् राजनीतिज्ञ
श्रीकृष्ण एक महान् राजपुरुष थे। श्रीकृष्ण से श्रेष्ठ राजपुरुष का विश्व ने आज तक दर्शन नहीं किया। वे शान्ति से संस्थापक तथा स्वतन्त्रता के समर्थक थे। उनमें अपूर्व दूरदर्शिता थी तथा वे उदार विचारों के पोषक थे। जब वे बालक थे, तभी उन्होंने वर्षा के हितार्थ इन्द्र की प्रचलित पूजा-प्रथा के विरुद्ध आवाज उठायी और लोगों को धर्म के आधारभूत सारतत्त्वों के वास्तविक महत्त्व की शिक्षा दी ।
श्रीकृष्ण सर्वश्रेष्ठ राजनीतिज्ञ थे। वे सभी युगों के सबसे महान् राजनीतिज्ञ )हुए। वे नरेश-निर्माता थे। वे द्वारका नगर के जन्मदाता तथा एक महान् ऐतिहासिक पुरुष थे। वे एक आध्यात्मिक नेता तथा मानव-जाति के रक्षक थे। वे आध्यात्मिक गुरुओं में सबसे महान् थे।
कौरव-पाण्डवों के आसन्न गृह-युद्ध में वे शान्ति-संस्थापक नियुक्त किये गये। युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को कौरवों के यहाँ सन्धि-प्रस्ताव ले कर भेजा। वहाँ उन्होंने दुर्योधन को विस्तारपूर्वक ज्ञानोपदेश दिया। धृतराष्ट्र की सभा में उनका रोमांचकारी-प्रेरणात्मक भाषण उनके सर्वश्रेष्ठ राजनीतिज्ञ होने का प्रमाण है। उन्होंने दुर्योधन से कहा: “हे भरतवंश के राजकुमार ! बुद्धिमान्, वीर तथा धर्मपरायण पाण्डवों से मित्रता कर लीजिए। शान्ति ही मित्रों, सम्बन्धियों तथा समस्त विश्व में सुख-समृद्धि लाती है। जो अपने मित्र के ज्ञानोपदेश पर ध्यान नहीं देते, वे नाश तथा शोक को प्राप्त होते हैं।'
उनके समकालीन योग्य राजा गण भी उनकी कूटनीति में सूक्ष्मदर्शिता तथा कुशल राजनीतिज्ञता की प्रशंसा करते थे। राजा एवं शासक गण उनका सत्परामर्श लिया करते थे।
उनकी शिक्षाएँ
उद्धव के प्रति दिये गये श्रीकृष्ण के सर्वोत्कृष्ट उपदेश को तनिक सुनिए । श्रीकृष्ण कहते हैं: "यदि लोग उपहास करते हैं तो उस पर तनिक भी ध्यान न दें, उसकी परवाह न करें, देहाभिमान तथा लोक-लज्जा को छोड़ दें और कुत्ते, चाण्डाल, गौ एवं गधे को भी भूमि पर लेट कर साष्टांग प्रणाम करें। मुझ परमात्मा को सबमें देखें और सबको मुझमें आत्म-समर्पण करें। मेरे ही हेतु सभी कर्मों का सम्पादन करें। सभी प्रकार के राग का परित्याग करें। मुझमें पूर्ण तथा अविचल श्रद्धा रखें। मेरी महिमा का गायन करें।'
गीता की शिक्षा कर्म-प्रधान है। इसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म के महत्त्व पर विशेष बल दिया है; किन्तु उद्धव के प्रति दिये हुए उपदेश भक्ति-प्रधान हैं। उन्होंने उद्धव को भक्ति के महत्त्व पर अधिक बल दिया है। गीता में भी भगवान् ने आत्म-समर्पण पर अधिक बल दिया है। अन्तिम अध्याय में वे घोषित करते हैं. "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" (गीता : १८-६६) ।
बाँसुरी की पुकार
बाँसुरी प्रणव का प्रतीक है। यह वह बाँसुरी है जो प्रेमी गोपिकाओं अथवा ब्रजांगनाओं का पुण्यतोया यमुना के पुलिन पर प्राणप्रिय श्रीकृष्ण से मिलने के लिए आह्वान करती थी । वंशी का दिव्य संगीत बहुत ही मनोहारी था। उसमें जादू की-सी शक्ति थी। जब वह श्रोत्र- रन्ध्रों से हृदय गुहा में प्रवेश करता तो सुनने वाला अपने प्रियजनों की, जगत् की तथा अपनी भी सुध-बुध खो बैठता। श्रोता आनन्दातिरेक से नृत्य करने लग जाते और उनका हृदय प्रेम से परिपूरित हो जाता।। उसकी स्वर्गिक ध्वनि हृदय में आनन्द का स्फुरण कर नव-जीवन और हर्ष का संचार करती थी। वह सभी प्राणियों में ईश्वरीय प्रेमोन्माद उत्पन्न करती तथा जड़ जगत् में भी जीवनी शक्ति का संचार करती थी। उस संगीत में अनुपम माधुर्य था । जिसने श्रीकृष्ण की वंशी का संगीत एक बार भी सुन लिया, उसे स्वर्ग के अमृत अथवा मोक्ष के आनन्द की भी अभिलाषा न रही।
वंशी तथा उसके संगीत ने गोपियों की हृत्तन्त्री के तार को झंकृत कर दिया। उन्हें अपने पर अधिकार न रहा। जगत् की भी चेतना उन्हें न रही। वे श्रीकृष्ण की ओर बलात् खिंची-सी अनुभव करत । अपने गृह के परित्याग से न तो उन्हें भय लगता और न लज्जा ही। उनका मन इस स्थूल जगत् में न था। उनके पति तथा भ्राताओं ने उन्हें रोका; किन्तु वे न रुकीं, वे रोक न सके। प्रभु प्रेम की प्रबल धारा को भला कौन अवरुद्ध कर सकता है!
श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का प्रेम दिव्य प्रेम था। वह आत्मा का आत्मा के साथ मिलन था, स्त्री-पुरुष का लौकिक मिलन नहीं था। वह जीवात्मा की परमात्मा में विलीन होने की तीव्र आकांक्षा थी।
गोपियाँ पूर्व जन्म में दण्डक वन में मुनि थे। वे भगवान् राम का आलिंगन करना चाहते थे। इस कामना की पूर्ति आगामी किसी अवतार में करने का भगवान् ने उन्हें वचन दिया था। कृष्णावतार में वे परमात्मा के साथ सायुज्यता प्राप्त कर सके।
हे भगवान् कृष्ण ! हे त्रिलोकी के अमर गायक ! इस घोर संकटकाल में, जबकि सर्वत्र अशान्ति एवं विषाद छाया हुआ है, क्या एक बार वही बाँसुरी की तान छेड़ कर दिव्य प्रेम एवं आनन्द का नव-जीवन नहीं प्रदान करेंगे !
हे प्रभो। एक बार वंशी के उस मोहक संगीत को पुनः सुनने दीजिए जो क्षुब्ध प्राणियों एवं वातावरण को शान्त तथा स्थिर बनाता था, जो दिव्य राग जड़ पदार्थों को भी चलायमान कर देता था, जो स्वर्गिक संगीत नभ-चर पक्षियों को, भटकती हुई गौओ को तथा वन में विचरते हुए मृगों को यमुना तट पर हटात् खींच लाता और उन्हें आत्म-विस्मृत हो निर्निमेष दृष्टि से आपकी ओर देखते रहने को बाध्य करता था।
श्रीमद्भागवत की रचना
श्री व्यासदेव सरस्वती नदी के तट पर विचार मन थे। आज उनका हृदय क्षुब्ध था। उनमें सन्तोष एवं शान्ति न थी। उन्होंने मन में सोचा, “मैंने ब्रह्मचर्य-व्रत का पूर्ण पालन किया है। मैंने उचित भाव से वेदों का स्वाध्याय, गुरुजनों की सेवा तथा अग्निहोत्र किये तथा उनकी आज्ञा का पालन भी किया। मैंने महाभारत के रूप में वेदों का वास्तविक अर्थ प्रकट कर दिया जिससे शूद्र, स्त्री तथा दूसरे अनधिकारी लोग धर्म तथा नीति आदि स्पष्ट रूप से समझ सकें। फिर भी मुझे ऐसा जान पड़ता है कि मैंने अपना कर्तव्य अभी तक पूरा नहीं किया।"
इसी अवसर पर नारद जी वहाँ आ पहुँचे। देवर्षि नारद ने कहा, "सभी ज्ञातव्य विषय आप भली-भाँति जान गये हैं। आपने श्रेष्ठ महाभारत की रचना की, जिसमें सभी विषयों का समावेश है। फिर यह असन्तोष एवं अशान्ति क्यों?"
श्री व्यासदेव ने कहा, “मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूँ; फिर भी मुझे सन्तोष नहीं। मैं आपसे इसका कारण जानना चाहता हूँ। आप ब्रह्मा के पुत्र हैं। आपमें असीम ज्ञान है।"
देवर्षि नारद ने कहा, "हे महर्षे! आपने धर्म आदि का निरूपण तो किया है; किन्तु आपने भगवद्-गुणानुवादों का गायन नहीं किया। मेरे विचार से इसी कारण भगवान् सन्तुष्ट नहीं हैं। अतः हे सौभाग्यशाली! भगवान् श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का चित्रण करें, जिसे सुन और जान कर लोग मोक्ष प्राप्त कर सकें। जिनसे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होती है, वे भगवान् ही विश्व के रूप में भी हैं। आप इस बात को स्वयं भली-भाँति जानते हैं; किन्तु आपने इस सत्य के आंशिक रूप का ही लोगों को दिग्दर्शन कराया है। अतः हे व्यासदेव ! उस सर्वव्यापी भगवान् हरि की कीर्ति का, उनकी महिमा का वर्णन कीजिए। उसी से बड़े-बड़े ज्ञानियों की भी जिज्ञासा पूर्ण होती है। ज्ञानी जन जानते हैं कि संसार सागर की तरंगों से बारम्बार थपेड़े खाने वाले प्राणियों के क्लेश-शमन की यही एकमेव औषधि है।"
तदुपरान्त श्री व्यासदेव ने श्रीमद्भागवत की रचना की और परम शान्ति प्राप्त की। उन्होंने उसे अपने आत्मज श्री शुकदेव जी को अध्यापन कराया।
श्रीमद्भागवत- -महापुराण
हिन्दुओं के धर्म-ग्रन्थों में पुराणों को अद्वितीय स्थान प्राप्त है। वे दर्शन एवं धर्म के सभी विषयों के ज्ञान और सूचना के अक्षुण्ण कोष हैं। सामान्य जन श्रुतियों अथवा वेदों को सुगमतया समझ नहीं सकते हैं। अतः परम दयालु भगवान् वेदव्यास जी ने मानव जाति के कल्याणार्थ अठारह पुराणों का प्रणयन किया और श्रुतियों के रहस्यात्मक सत्य तथा गूढ़ तत्त्वों की सरल शैली में व्याख्या की। वे वास्तव में हिन्दू-धर्म एवं नीति के विश्वकोष हैं।
पुराणों में गल्प, परियों की कहानियों, दर्शन, धर्म, कथानक एवं आख्यायिकाओं का समावेश है, अतः पाश्चात्य देश का विद्वान् यदि वह भारतीय ऋषियों के धर्म तथा दर्शन की प्रतिपादन शैली से परिचित नहीं है तो इनका उचित मूल्यांकन न कर सकेगा। वैदिक सत्य को समाख्यानों, कथानकों तथा रूपकों द्वारा लोकप्रिय बनाना ही पुराणों का मुख्य उदेश्य है।
श्रीमद्भागवत सबके लिए एक व्यावहारिक पथ-प्रदर्शक है। यह बतलाता है। कि ईश्वर - साक्षात्कार ही मनुष्य को मोक्ष देता है। यह ईश्वरीय चेतना की प्राप्ति का पथ भी प्रदर्शित करता है। इसका उपदेश है कि एकमेव ईश्वर की ही सत्ता है तथा ईश्वर साक्षात्कार ही मानव जीवन का परम तथा चरम लक्ष्य है। सर्वत्र, सर्वदा तथा सर्व स्थिति में ईश्वर की अनुभूति की यह हमें शिक्षा देता है। निश्चय ही यह एक अलौकिक ग्रन्थ तथा मनुष्य की महानिधि है।
श्रीमद्भागवत जीवन में सान्त्वना प्रदान करता है। यह अपने सौन्दर्य एवं माधुर्य में, अपनी प्रतिपादन शैली एवं दर्शन में अद्वितीय है। यह दिव्य ज्ञान का बहुमूल्य भण्डार है। इसका स्वाध्याय मात्र हृदय में भक्ति की प्रेरणा भरता तथा ज्ञान विस्तृत एवं वैराग्य का स्फुरण करता है। इसमें भगवान् वासुदेव की महिमा का 1 वर्णन है।
भगवान् व्यासदेव स्वयं इसके प्रणेता है। उन्होंने इसका अपने पुत्र श्री शुकदेव । जी को अध्यापन कराया। इसकी अनेक टीकाएँ हैं; किन्तु श्रीधर स्वामी की टीका ही अधिक लोकप्रिय तथा प्रामाणिक मानी जाती है।
श्रीमद्भागवत ही सभी पुराणों में सर्वाधिक लोकप्रिय तथा सम्मानित है। भारत के सभी वैष्णव इसे सबसे अधिक आदर की दृष्टि से देखते है । संस्कृत-साहित्य को अपने भक्तिपरक ग्रन्थों पर गर्व एवं अभिमान है। यह उन ग्रन्थों में कीर्ति स्तम्भ के तुल्य है। स्वयं व्यासदेव अपने श्रीमुख से कहते हैं कि यह श्रीमद्भागवत विशालकाय महाभारत का सारतत्त्व है तथा समस्त वैदिक साहित्य के परिपक्क फल के समान है।
उपदेशकों तथा धर्माचार्यों का यह अति-प्रिय ग्रन्थ है। सभी हिन्दू-घरों में इसकी पूजा होती है। सारे भारत में विद्वान्, पण्डित, साधु और संन्यासी इसका पाठ करते हैं।
इस ग्रन्थ में ज्ञान, भक्ति तथा कर्म को समुचित स्थान दिया गया है। जो शरीर तथा संसार से अधिक आसक्त हैं उनके लिए कर्म का, जो वैराग्यवान् तथा विरक्त हैं उनके लिए ज्ञान का और जो न अधिक आसक्त हैं और न अधिक वैराग्यवान् ही हैं, जो उदासीन हैं उनके लिए भक्ति का उपदेश किया गया है। यह भागवत-धर्म या प्रेम-धर्म की पूर्ण शिक्षा देता है।
हिन्दू-धर्म, दर्शन तथा संस्कृति में जो कुछ भी उत्कृष्ट है, वह सब भागवत में उपलब्ध है। इस अनूठे एवं अनुपम ग्रन्थ में धर्म एवं दर्शन के चरम सत्य का तथा नीति-शास्त्र के सर्वोच्च सिद्धान्तों का बहुत ही सुन्दर ढंग से निरूपण किया गया है।
भारतीय ऋषि-मुनियों ने आचार नीति, दर्शन तथा धर्म की शिक्षा देने के लिए चित्ताकर्षक आख्यायिकाओं का आश्रय लिया है। भागवत के प्रणेता ने भी यही नीति अपनायी है। कहानियाँ और रूपक धर्म के सत्य की ओर मन को प्रेरित तथा प्रलोभित करते हैं। वे मिश्री लगी हुई औषधीय टिकियों के समान हैं। अनुन्नत मस्तिष्क वाले व्यक्तियों के लिए वह मनोरंजन के साधन हैं।
इस अनुपम ग्रन्थ के विदेशी भाषा के अनुवाद में मूल ग्रन्थ का सौन्दर्य तथा माधुर्य नहीं लाया जा सकता - अनुवादक चाहे कितना भी प्रकाण्ड पण्डित, कुशल तथा अधिकारी लेखक क्यों न हो !
श्रीमद्भागवत में अठारह सहस्र श्लोक, तीन सौ बत्तीस (किसी-किसी के मतानुसार तीन सौ पैंतीस) अध्याय तथा बाहर स्कन्ध है। भगवान् की महिमा का वर्णन होने के कारण इस ग्रन्थ का नाम भागवत पड़ा। यह भारत में बहुत ही प्रसिद्ध ग्रन्थ है। यह लोगों के विचार तथा भावनाओं पर सीधा एवं शक्तिशाली प्रभाव रखता है। हिन्दू-मस्तिष्क पर इसने अपूर्व प्रभुत्व प्राप्त कर लिया है। इसमें सभी पुराणों का सार है। केवल श्रीमद्भागवत महापुराण में ही सृष्टि के विकास का क्रमिक विवेचन है, अन्यत्र नहीं।
भगवान् श्रीकृष्ण इस अनुपम ग्रन्थ के मुख्य पात्र हैं। यह भक्ति का प्रामाणिक ग्रन्थ है। यह भक्ति-युक्त ज्ञान की शिक्षा देता है। यह ज्ञान को भक्ति से पृथक नहीं करता। यह बतलाता है कि परा-भक्ति की प्राप्ति में ज्ञान बहुत ही सहायक है। श्रीमद्भागवत में ज्ञान रूपी अमृत रस में भक्ति-रूपी मिश्री का सुन्दर सम्मिश्रण है।
इस जगत् से प्रयाण करते समय भगवान् श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिये थे, वे अनुपम हैं। उनका वर्णन एकादश स्कन्ध में आया है। श्रीकृष्ण ने अपने सखा, अग्रगण्य शिष्य तथा यादव कुल प्रधान उद्धव की सभी शंकाओं का समाधान किया। उन्होंने विभिन्न विषयों पर उपदेश दिये; किन्तु एक प्रमुख वाणी जो सबमें प्रतिध्वनित होती है, वह है: "मुझे सबमें देखें। मुझमें आत्मसमर्पण करें। मेरे लिए ही सब कर्मों को करें। सभी प्रकार की आसक्तियों का उच्छेदन करें। मुझमें अटल श्रद्धा रखें तथा मेरी महिमा का गायन करें।"
एकादश स्कन्ध के प्रारम्भ में राजा निमि के प्रति भागवत-धर्म पर नौ योगीश्वरों के उपदेश बहुत ही प्रेरक तथा आत्मोद्बोधक हैं। दशम अध्याय में भगवान् की सभी लीलाओं का वर्णन है। भगवान् श्रीकृष्ण शैशवावस्था के क्रीड़ा-कौतुक, हास-परिहास, बाल लीला, वृन्दावन-लीला, मथुरा-लीला, द्वारका-लीला, कुरुक्षेत्र-लीला तथा प्रभासक्षेत्र-लीला का वर्णन इस स्कन्ध में है। इसमें कुल नब्बे अध्याय हैं।
दशम स्कन्ध का भाव कामुक एवं विषयी वृत्ति से आपूर्ण हृदय वाले मनुष्य की समझ से परे है। सभी धमों में प्रेम-प्रेमिका-भाव का रूप पाया जाता है; किन्तु वे सांसारिकता में नमन मनुष्यों के लिए बोधगम्य नहीं है। दशम स्कन्ध में मन की कल्मषताओं से मुक्त मानव-आत्मा के हृदयोद्गार या प्रेमोन्माद की अभिव्यंजना है। जब मन के मल घुल जाते हैं तथा हृदय पूर्णतया शुद्ध हो जाता है, तब मानव आत्मा स्वभावतः ईश्वरोन्मुख हो जाती है और अन्ततोगत्वा उसी में विलीन हो जाती है।
विभिन्न प्रकार के साधकों के अनुकूल भागवत ने विभिन्न प्रकार के ध्यान का निदर्शन किया है। नये साधकों के लिए विराट् पुरुष का ध्यान बताया गया है। उसे ऐसा समझना चाहिए कि यह समस्त विश्व भगवान् का ही शरीर है। इसका उल्लेख द्वितीय स्कन्ध में है। इसी स्कन्ध में तथा तीसरे स्कन्ध में भी हृदय भगवान् के रूप का तथा आपाद-मस्तक उनके विभिन्न अंग-प्रत्यंग का ध्यान करने का वर्णन है। एकादश स्कन्ध में हृदय-कमल में तीन क्रमिक ध्यान, प्रथम सूर्य, द्वितीय चन्द्रमा तथा तृतीय अग्नि का ध्यान निर्धारित किये गये हैं। उसी स्कन्ध में प्रथम भगवान् श्रीकृष्ण के रूप का ध्यान करने, तदुपरान्त मन को आकाश अथवा महत्-तत्त्व में स्थिर करने के तथा अन्त में परब्रह्म में विलीन कर देने के लिए कहा है।
श्रीमद्भागवत-सप्ताह सारे भारतवर्ष में होता है। इसमें सम्पूर्ण भागवत का केवल सात दिनों में ही पारायण किया जाता है। पूर्ण भागवत का केवल श्रवण अथवा मनन करने का यह उत्तम अवसर प्रदान किया करता है। आप सबको अपने घरों में वर्ष में एक बार श्रीमद्भागवत सप्ताह का आयोजन करना चाहिए। इससे आपके सुख-समृद्धि की वृद्धि होगी। प्रत्येक व्यक्ति को श्रीमद्भागवत महापुराण की एक पुस्तक अपने घर में रखनी चाहिए।
परीक्षित की परमगति
एक बार राजा परीक्षित मृगया के लिए गये। वे श्रान्ति तथा तीव्र पिपासा सेव्याकुल हो गये; अतः वे शमीक मुनि के कुटीर में प्रविष्ट हुए। उस समय मुनि ध्यानमग्न थे; अतः उन्हें महाराजा परीक्षित के आने का पता नहीं चला। क्षुधा और तृषा से वे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। उन्हें क्रोध आया कि इस मुनि ने मेरा आविध्य-सत्कार नहीं किया। उन्होंने सोचा कि इन्होंने समाधि का झूठ-मूठ ढोंग कर रखा है जिससे इन्हें मेरे उपयुक्त शिष्टाचार तथा साधारण अतिथि-सत्कार न करना पड़े। ये मेरा अपमान कर रहे हैं। उन्होंने धनुष की नोक से एक मृत सर्प को मुनि के गले में हार की भाँति डाल दिया तथा वहाँ से चले गये।
शमीक मुनि का कुमार पुत्र निकटवर्ती कौशिकी नदी पर दूसरे ऋषिकुमारों के साथ क्रीड़ा कर रहा था। उसे अपने किसी साथी बालक से पता चला कि उसके पिता के गले में राजा परीक्षित ने एक मृत सर्प डाल दिया है। उसने शाप दिया कि आज से सातवें दिन राजा को उसके अशिष्ट एवं उद्धत व्यवहार के कारण तक्षक नाग काटेगा। इसके बाद वह बालक आश्रम में भागता हुआ आया और अपने पिता के गले में साँप देख कर ढाढ़ मार कर रोने लगा। उसकी क्रन्दन-ध्वनि से मुनि की समाधि भन हुई। उन्होंने नेत्र खोले तथा मरे हुए साँप को फेंक कर पुत्र से शोक का कारण पूछा। बालक ने सब वृत्तान्त कह सुनाया।
मुनि को उस शाप का वृत्तान्त सुन कर अत्यन्त पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने कहा, "पुत्र! तू बहुत ही अज्ञानी तथा अदूरदर्शी है। राजा गण इस पृथ्वी पर साक्षात् विष्णु भगवान् के स्वरूप ही हैं। वे अपनी शक्ति, न्याय तथा मान-मर्यादा से प्रजा की रक्षा करते हैं तथा नीति और व्यवस्था कायम रखते हैं। यदि राजा न रहे, तो देश में अराजकता फैल जायेगी। राजा के कर्तव्य बहुत कठिन तथा अपूर्व हैं। उनके उत्तरदायित्व बहुत ही गम्भीर हैं। यदि तुम्हारे अपराधानुसार वे तुम्हें दण्ड दें, तो कम-से-कम तुम शाप देने के पाप से मुक्त हो जाओगे। किन्तु राजा परीक्षितः महानु भक्त हैं। वे कभी भी इसका प्रतिकार नहीं करेंगे। वे तुम्हारे शाप को अपने अविचारपूर्ण कर्म का प्रायश्चित्त समझ कर साभार शिरोधार्य करेंगे। यही नहीं, वे सर्वथा निर्दोष हैं। मैं ही उनका मर्यादानुकूल सम्मान न कर प्रजोचित कर्तव्य से च्युत रहा तथा उन्हें अन्नोदक प्रस्तुत न कर अतिथि सत्कार के कर्तव्य का भी मैंने निर्वहन नहीं किया। वे तुम्हारे शाप के योग्य कदापि न थे। अज्ञानवश किये हुए तुम्हारे पाप को भगवान् क्षमा करें!
तदुपरान्त मुनि ने अपने शिष्य को राजा के पास भेज कर उन्हें अपने पुत्र की अज्ञानता की सूचना दी और अपने बहुमूल्य जीवन की सुरक्षा के लिए आवश्यक सावधानी बरतने का अनुरोध किया।
राजा परीक्षित ने अपने राजमहल में पहुंच कर कुछ देर विश्राम किया। उन्हें अपने अज्ञान तथा उद्धवपूर्ण कार्य के लिए बहुत पश्चात्ताप हुआ। उसी समय मुनि का शिष्य सन्देश ले कर आ पहुंचा। उसे सुन कर राजा की मानसिक व्यथा शान्त हुई। उन्होंने उस शाप को प्रायश्चित तथा वरदान का अवान्तर रूप समझ कर स्वीकार किया।
उन्होंने अपने मन में विचार किया: "मैं अपने वैभव एवं गौरव के कारण ही ज्ञान तथा उचित-अनुचित के विवेक को खो बैठा था। मैं मदान्ध हो रहा था। अब मैं अधिक बुद्धिशील बन गया हूँ। मुझमें वैराग्य का विकास हुआ है। इस शाप से उन ऋषि के प्रति किये गये मेरे जघन्य कर्म का प्रायश्चित हो जायेगा। भगवान् श्रीकृष्ण में मन को स्थिर करने का मुझे सुअवसर प्राप्त हुआ है। उन्हीं की मैत्री ही शाश्वत सुख प्रदान कर सकती है।'
ऐसा कह कर राजा परीक्षित अपने साम्राज्य को पुत्र को सौंप कर भागीरथी के पावन तट पर यह दृढ़ निश्चय कर बैठ गये कि जब तक मन भगवान् श्रीकृष्ण में लीन न हो जाये तथा इस नश्वर शरीर का परित्याग न कर दूँ, तब तक न उठूँगा।
यह समाचार ऋषियों के कानों तक पहुँचा। प्रतापी राजा की भक्ति देखने के लिए वे समुपस्थित हुए। राजा परीक्षित ने उन सबका विनीत भाव से स्वागत किया तथा उनसे यह जानने की इच्छा प्रकट की कि वे अपने इस समय का भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा में कैसे सर्वोत्तम उपयोग करें। विभिन्न ऋषियों ने विभिन्न मार्गों का निदर्शन किया। इसी समय श्री शुकदेव जी वहाँ पधारे और परीक्षित ने अपने प्रश्न को दुहराया।
श्री शुकदेव जी ने उत्तर दिया “भगवान् श्रीकृष्ण का सतत ध्यान करना चाहिए। उनका पावनकारी नाम सदा तुम्हारे अधर-पुट पर हो। उनकी लीलाओं तथा गुणों का सदैव स्मरण तथा ध्यान करते रहो। मृत्यु-काल में भगवान् की स्मृति बनाये रखने तथा समय का सदुपयोग करने का यही सर्वोत्तम मार्ग है जो शाश्वत सुख की प्राप्ति कराता है।
"परीक्षित। यह न सोचो कि तुम्हारे पास केवल एक ही सप्ताह है। राजर्षि खट्वांग ने देवासुर संग्राम में देवताओं की बड़ी सहायता की। देवताओं ने उनकी इस सेवा के उपलक्ष्य में जब वर माँगने के लिए कहा तो उन्होंने पूछा कि प्राप्य वरदान का उपभोग करने के लिए उनके जीवन के कितने दिन अवशेष रहे हैं। देवताओं से यह मालूम होने पर उनकी आयु अब केवल एक ही मुहूर्त शेष है; उन्होंने प्रभु से शीघ्र योग प्राप्त करने की अभिलाषा प्रकट की। देवताओं ने कहा, ‘तथास्तु।' उन्होंने भक्तिपूर्वक अपने मन को भगवान् में केन्द्रित कर शाश्वत आनन्द को प्राप्त किया।"
श्री शुकदेव जी ने पुनः कहा: "हे राजन्! अतः पूर्ण भक्तिपूर्वक अपने मन को भगवान् में स्थिर करो। सांसारिक विषयों का चिन्तन छोड़ दो। भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा तथा उनकी विविध लीलाओं का श्रवण करो। यही श्रीमद्भागवत का सारांश है जिसे मैंने अपने पिता श्री व्यासदेव से सुना था।"
तदुपरान्त श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत की कथा सुनायी। महाराजा परीक्षित ने बहुत ही श्रद्धा एवं ध्यानपूर्वक उसे सुना मन को भगवान् में एकाग्र कर उनसे सायुज्य प्राप्त किया। और अपने
नास्तिकों की गति
कुछ अज्ञानी तथा विचारहीन व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण को कुछ विशिष्ट गुण सम्पन्न साधारण मानव मात्र मानते हैं। उनका कहना है कि वे निम्न भूमिका से ही पधारे हैं। कुछ उनके जीवन और चरित्र को दोषपूर्ण ठहराते हैं। वे कहते हैं : 'श्रीकृष्ण भगवान् नहीं हैं। वे अवतार नहीं हैं। वे एक कामुक गोप थे, जो गोपियों के साथ काम-क्रीड़ा करते थे।"
जो भगवान् पर इस भाँति लांछन लगाते हैं, वे उनकी महत्ता तथा गौरव से परिचित नहीं हैं; क्योंकि उन्होंने योगाभ्यास नहीं किया, यम-नियम के परिपालन से उनके पापों का प्रक्षालन नहीं हुआ और न उन्होंने सत्संग का ही आश्रय ग्रहण किया है। अध्यात्म-शास्त्र में उनका प्रवेश नहीं है।
क्या भगवान् में भी काम-वासना का लेश रह सकता है ? क्या रासलीला के समय वे सप्तवर्षीय बालक न थे? रासलीला तथा माधुर्य-: -भाव, जो भक्ति तथा आत्मनिवेदन की चरमावस्था है, के रहस्य को कौन जान सकता है? नारद, शुकदेव, चैतन्य, मीरा, रामानन्द तथा गोपियों ने ही रासलीला के रहस्य को समझ पाया। क्या वे असंख्य कृष्णों का रूप धारण नहीं कर लेते थे ? क्या कोई इस प्रकार के कौतुक कर सकता है?
श्री मधुसूदन सरस्वती, जो उच्चकोटि के ज्ञानी थे, कहते हैं उन कमल लोचन भगवान् श्रीकृष्ण से श्रेष्ठ अन्य कुछ नहीं जानता है जिनके युग्म-करों में वंशी शोभायमान है तथा जिनका मुख-मण्डल श्याम-मेघों के मध्य पूर्णिमा के चन्द्रमा-सा विभासित हो रहा है। ध्यान द्वारा मन को वश में करने वाले योगी उस निर्गुण, अकर्ता, अनिर्वचनीय एवं परम ज्योति का यदि ध्यान करना चाहते है तो करने दीजिए; किन्तु हमारे नेत्रों में तो कालिन्दी- पुलिन पर विहार करने वाला वही श्याम सुन्दर रूप सदा झूमता रहता है।"
जो भगवान् के विरुद्ध टीका-टिप्पणी करते रहते हैं, उनकी क्या गति होती है। इसके विषय में जरा सुनिए "बुद्धिहीन पुरुष मन और इन्द्रियों से परे सच्चिदानन्द परमात्मा को साधारण मनुष्य की भाँति प्रारब्धवश जन्मा हुआ मानते हैं; क्योंकि वे मेरे अनुत्तम, अविनाशी परम भाव को नहीं जानते" (गीता : ७-२४)। “मेरे परम भाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य-शरीर धारण करने वाले मुझ सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वर की अवहेलना करते हैं। वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और ज्ञान वाले अज्ञानी जन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किये रहते हैं" (गीता : ९-११ और १२) । "अन्धकार में पड़े हुए वे लोग अपनी विपरीत बुद्धि के कारण पाप को ही पुण्य कर्म मान बैठते हैं। वे लोग प्रवृत्ति और निवृत्ति — इन दोनों को ही नहीं जानते हैं। अतः न उनमें शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है। उन्हें विहित-अविहित तथा कर्तव्य-कर्म का ज्ञान नहीं है। इस भाँति भ्रान्ति में हुए वे लोग जन्म-जन्मान्तरों तक नाना प्रकार के ताप और दुःख को सहते हुए संसार-पंक में विचरण करते रहते हैं तथा कभी भी परम गति को प्राप्त नहीं होते।"
उपसंहार
सांसारिक कार्यों में व्यस्त रहने वाले लोगों के लिए सम्पूर्ण भागवत का पाठ करना बहुत ही कठिन है; अतः मैंने श्रीकृष्ण के जीवन, उनकी लीलाओं तथा उनके उपदेशों का संक्षिप्त रूप इस पुस्तक में बहुत ही सरस एवं रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। यदि आप इस पुस्तक का एक या दो पृष्ठ भी प्रतिदिन स्वाध्याय करें तो आपमें भगवद्-भक्ति का विकास होगा तथा आप शाश्वत सुख, शान्ति एवं अमरत्व प्राप्त करेंगे।
आप सभी भागवत-सुधा का पान करें। आप सभी भगवान की श्रद्धा तथा भक्ति से सम्पन्न बनें। आप सभी पवित्र तथा सदाचारमय जीवन यापन करें। भगवान् श्रीकृष्ण आपके केन्द्र, आदर्श तथा ध्येय बनें। आप सबको उनका आशीर्वाद प्राप्त हो। श्रीकृष्ण जी की कृपा से भागवत के गूढ़ तत्त्व हस्तामलक की भाँति आप सब पर प्रकट हो। श्री व्यास भगवान् तथा श्री शुकदेव जी की जय हो।
देवकीनन्दन, राधा के जीवन सर्वस्व हम सबके अन्तर्वासी तथा गोपियों के प्राणप्रिय भगवान् श्रीकृष्ण आप सबकी रक्षा करें तथा आपके पथ-प्रदर्शक बनें। आप सब उनकी मधुर वंशी, आत्मा के स्वर्गिक संगीत को एक बार पुनः सुनें। वे हमारे जीवन- रथ के सारथि बनें। आप सब उनमें निरन्तर निवास कर शाश्वत आनन्द एवं परम शान्ति का उपभोग करें।
-स्वामी शिवानन्द
विषय-सूची
श्रीकृष्ण अष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्
विरह - कातर गोपियों का भगवान् श्रीकृष्ण को ढूँढ़ना
श्रीकृष्ण का अकस्मात् प्रकट हो कर गोपियों को सान्त्वना देना
तीन मार्ग : कर्म, भक्ति और ज्ञान
अन्तरिक्ष का उपदेश (माया की शक्ति का निरूपण)
प्रबुद्ध का उपदेश (माया के सन्तरण का उपाय)
पिप्पलायन का उपदेश (नारायण का स्वरूप)
आविर्होत्र का उपदेश (कर्म-योग)
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भगवान श्रीकृष्ण
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श्रीकृष्ण को नमस्कार है जो गोपीपति, अर्जुन के सारथि, पाप-विनाशक, मानव मात्र के गुरु, लक्ष्मीपति, रुक्मिणी, राधा तथा सत्यभामा के प्राणवल्लभ हैं तथा जो आनन्द-स्वरूप हैं, जो विश्वरूप हैं तथा जिन्होंने अपनी कनिष्ठ उँगली पर गोवर्धन पर्वत को धारण किया।
अभिमानी राजाओं के रूप में प्रकट असंख्य असुरों के असह्या भार से भूदेवी बहुत ही उत्पीड़ित हो रही थीं अतः वे ब्रह्मा जी की शरण में गयीं। ब्रह्मा जी ने कहा "स्वयं भगवान् नारायण वसुदेव जी के घर श्रीकृष्ण के रूप में अवतार ग्रहण करने वाले हैं। आदिशेष भी उनकी सेवा के हेतु उनके ज्येष्ठ भ्राता के रूप में अवतार ग्रहण करेंगे। देवांगनाएँ भी उनकी सेवा के लिए भूलोक में जन्म ग्रहण करेंगी। महात्मा गण गौ का रूप ग्रहण करेंगे । अब तुम्हें कोई कष्ट न होगा। भगवान् श्रीकृष्ण दुष्टों को दण्ड दे कर धर्म की स्थापना करेंगे।"
कंस ने यदु, भोज और अन्धक-वंश के अधिनायक अपने पिता उग्रसेन को बन्दी बना लिया और शूरसेन देश का राज्य स्वयं करने लगा। अपने श्वसुर मगध नरेश जरासन्ध की सहायता से वह यदुवंशियों को सताने लगा। बकासुर, चाणूर, धेनुक, पूतना, केशी, बाणासुर, भौमासुर, प्रलम्बासुर, तृणावर्त, महासेन, मुष्टिक, अरिष्ट, द्विविद आदि दैत्यराज भी उसके सहायक थे।
मथुरापुरी में शूरसेन नामक राजा शूरसेन देश पर राज्य करते थे। वे यादवों के प्रधान थे। एक बार मथुरा में शूर के पुत्र वसुदेव जी अपनी नवविवाहिता पत्नी देवकी के साथ रथ पर सवार हुए। उग्रसेन के पुत्र कंस ने बारात में अपनी बहन देवकी को प्रसन्न करने के लिए रथ हाँका ।
मार्ग में कंस को सम्बोधित करते हुए आकाशवाणी हुई, "रे मूर्ख! अपनी बहन देवकी, जिसे तू रथ में बैठा कर लिये जा रहा है, के गर्भ की आठवीं सन्तान तुझे मार डालेगी।” तत्काल ही दुष्ट कंस ने अपनी बहन की चोटी पकड़ ली और हाथ में तलवार लेकर मारने को उद्यत हो गया। वसुदेव ने कंस को शान्त किया और मधुर वाणी में कहा, "कंस! शूरवीर आपके गुणों की सराहना करते हैं। आपको भोज-वंश को गौरवशाली बनाना है। आप एक महान योद्धा है। आप एक अबला स्त्री को और वह भी अपनी बहन को विवाह के अवसर पर कैसे मार सकते हैं। यह कदापि उचित नहीं है। इससे आपका बड़ा अपयश और पाप होगा। आकाशवाणी से आप भयभीत न हों। मैं सब बच्चों, जिनसे आपको भय है, को आपको समर्पित कर दूंगा।"
कंस इस क्रूर कर्म को करने से रुक गया। वसुदेव भी उसकी प्रशंसा कर अपने महल में वापस ले आये।
देवकी के छह पुत्रों को कंस ने मौत के घाट उतारा और वसुदेव तथा देवकी को हथकड़ी-बेड़ी से जकड़ कर कारागार में डाल दिया। सातवां गर्भ अनन्त का एक अश था। देवकी के गर्भ से खींचे जाने के कारण इस बालक का नाम संकर्षण पड़ा।
भगवान् ने अपनी शक्ति योगमाया को यह आदेश दिया, "हे कल्याणी! हे। देवी! तुम व्रज- प्रदेश के नन्द बाबा के गोकुल ग्राम में जाओ; वहाँ वसुदेव की पत्नी रोहिणी निवास करती है। मेरा अंश, जिसे आदिशेष कहते हैं, देवकी के उदर में है। उसे वहाँ से निकाल कर रोहिणी के उदर में रख दो। मैं देवकी के पुत्र के रूप में जन्म लूंगा और तुम नन्द बाबा की पत्नी यशोदा के गर्भ से जन्म लेना ।'
योगमाया उनकी बात स्वीकार कर पृथ्वीलोक में चली आयी और जैसा उन्होंने कहा था, वैसा ही किया । सर्वव्यापी भगवान् ने अपनी सम्पूर्ण कलाओं से वसुदेव जी के मन में प्रवेश किया। वसुदेव ने मानसिक रूप से उस सर्वात्मा के दिव्य अंश को देवकी में आधान किया। इससे वे दैवी आभा से चमक उठीं। वसुदेव-देवकी ने अपने पूर्व जन्म में श्रीकृष्ण को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए उग्र तप किया था।
आठवीं बार कंस अधिक चौकन्ना था। उसने वसुदेव-देवकी को कड़े पहरे में रखा। श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में ही हुआ ।
ईश्वरीय सत्ता के व्याप्त होने के कारण कंस ने देखा कि उसकी बहन का मुख दिव्य आभा से देदीप्यमान् हो रहा था। उसने मन-ही-मन सोचा, "मेरा प्राणघाती हरि इसके गर्भ में अवश्य प्रवेश कर गया है। अब मुझे तत्काल क्या करना चाहिए? प्रभु तो अपनी प्रतिज्ञा अवश्य ही पूरी करेंगे। एक तो स्त्री की हत्या और वह भी गर्भवती बहन की, इससे तो मेरी कीर्ति, लक्ष्मी और आयु अवश्य ही नष्ट हो जायेगी!" उसने अपनी बहन की हत्या के क्रूर विचार को त्याग दिया। प्रभु के प्रति दृढ घृणा का भाव उसके मन में उत्पन्न हुआ। वह उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते और चलते-फिरते सदा प्रभु का चिन्तन करता रहता। उसने सारी सृष्टि को प्रभुमय देखा। उसने घृणा के द्वारा भक्ति (वैर-भक्ति) का विकास किया।
ब्रह्मा जी भगवान् शंकर, नारदादि ऋषि तथा देवता गणों के साथ आये और गर्भ-स्थित भगवान् की स्तुति करने लगे : "हे हरि। आपके अवतार से भूदेवी का भार दूर हो गया। हे सौभाग्यवती माँ देवकी । हम लोगों की रक्षा तथा विश्व के कल्याण के लिए परम प्रभु आपकी कोख में पधारे हैं। आप भय न करें। कंस का अब शीघ्र ही विनाश होगा। आपके पुत्र जग-रक्षक होंगे।"
वह शुभ घड़ी आयी। रोहिणी नक्षत्र था। विजय मुहूर्त था। श्रीकृष्ण के जन्म के समय सभी तत्त्व सौम्य हो रहे थे। शीतल मन्द सुगन्ध समीर बह रहा था। तारे जगमगा रहे थे। सरोवर पंकजों से पूर्ण थे। भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्धरात्रि को इस पृथ्वी-लोक में अवतार लिया। स्वर्ग में देवताओं ने बाजे बजाये। किन्नर और गन्धर्व मधुर स्वर से गाने लगे। सिद्ध और चारण स्तुति करने लगे। विद्याधरियाँ अप्सराओं के साथ नाचने लगीं। देवता और ऋषि-मुनि आनन्द में आकाश से पुष्प वर्षा करने लगे।
अवतार लेने के समय विष्णु के कमल से नेत्र थे तथा वे चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा पद्य से सुसज्जित, गले में कौस्तुभ मणि, वक्षःस्थल को सुशोभित करने वाला श्रीवत्स का चिह्न, शरीर पर पीताम्बर परिधान, कानों में हीरक कुण्डल, शिर पर अनेक रत्न जड़ित किरीट, बाँहों में बाजूबन्द, कलाइयों में कंकण तथा कमर में बहुमूल्य कटि-बन्ध धारण किये हुए थे। वसुदेव ने दिव्य बालक के इस अद्भुत रूप के दर्शन किये।
वसुदेव जी स्तुति करने लगे "मैं समझ गया कि आप परम पुरुष परमात्मा हैं। आप चिदानन्द-स्वरूप हैं। आप सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। आप समस्त बुद्धियों के साक्षी हैं। आप माया तथा अविद्या से परे हैं।"
देवकी भी अपने पुत्र में भगवान् विष्णु के सभी लक्षण देख कर उनकी स्तुति करने लगी : “अनादि, सर्वव्यापी, स्वयंज्योतिर्मय, निर्गुण, अव्यय तथा निष्क्रिय ब्रह्म आप ही हैं। आप समस्त सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के कारण हैं। कृपा करके मुझे अपना यह चतुर्भुज रूप न दिखलाइए। एक सामान्य बालक के रूप में ही मुझे दीजिए। अपने इस दिव्य अलौकिक रूप को छिपा लीजिए। हम कंस से बहुत भयभीत हो रहे हैं।"
श्री भगवान ने कहा "तुम दोनों प्रेम से मेरे प्रति वात्सल्य और ब्रह्म-भाव से निरन्तर चिन्तन करते रहना। इससे तुम्हें परम पद की प्राप्ति होगी।"
भगवान् ने अपनी माया शक्ति से सुन्दर बालक का रूप धारण कर लिया और बोले, “यदि तुम कंस से भयभीत हो तो मुझे शीघ्र ही गोकुल ले चलो और वहाँ यशोदा के गर्भ से उत्पन्न मेरी माया को यहाँ ले आओ। वसुदेव जी शिशु को ले कर बाहर आये। भगवान् की माया से द्वारपाल अचेत-से हो गये तथा पुरवासी सो गये। दरवाजे, जिनमें ताले लगे हुए थे, अपने-आप खुल गये। वर्षा की फुहारें पड़ रही थीं। जल को रोकने के लिए आदिशेष ने अपने फनों को छत्र की तरह फैला दिया। यमुना जी ने, बाढ़ के कारण जिसका प्रवाह बहुत गहरा और तेज था, वसुदेव जी को मार्ग दे दिया।
वसुदेव जी पुत्र को यशोदा जी की शय्या के पास सुला कर और वहाँ से नवजात कन्या को ले कर बन्दीगृह में लौट आये; उस माया-कन्या को देवकी के पास सुला दिया और अपने पैरों में पूर्ववत् बेड़ियाँ डाल लीं।
द्वारपाल भाग कर गये और कंस से देवकी के सन्तान होने की बात कही। कंस झटपट पलंग पर उठ बैठा और जहाँ देवकी कैद थी, वहाँ भाग कर आया तथा सूतिका-गृह में प्रवेश किया। बेचारी देवकी ने कंस से निवेदन किया : "हे कंस! यह बालिका तुम्हारी भानजी हैं। बालिका का बध करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।" कंस ने अपनी बहन को झिड़का और उसके हाथों से कन्या को छीन कर एक शिला पर दे मारा।
बालिका उसके हाथ से छूट कर आकाश में चली गयी। वह भगवान् विष्णु की बहन अष्टभुजा -सी दिखायी पड़ी। वह दिव्य माला, वस्त्र तथा आभूषणों को धारण किये हुए थी और धनुष, त्रिशूल, बाण, ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा से सुसज्जित थी। सिद्ध, गन्धर्व और किन्नर उसकी स्तुति कर रहे थे।
उसने कहा, "रे मूर्ख! मुझे मारने से तुझे क्या लाभ होगा? तेरा जीवन-घातक और कहीं जन्म ले चुका है। वह तुम्हारा पूर्व शत्रु है। अब तू इन निर्दोष वसुदेव, देवकी तथा अन्य बच्चों को व्यर्थ आघात न पहुँचा।”
उस कन्या की बात सुन कर कंस आश्चर्यचकित सा रह गया। उसने वसुदेव और देवकी को छोड़ दिया और नम्रता से उनसे कहा, "हे महात्मा जन! यद्यपि मैने तुम्हारे पुत्रों को मार डाला है, फिर भी तुम उनके लिए शोक न करो। मनुष्य अपने-अपने कर्म के फल भोगने के लिए विवश है। पता नहीं, मृत्यु के अनन्तर मेरी क्या गति होगी। उसने उन्हें बन्धन से मुक्त कर दिया।
कंस ने अपने मन्त्रियों को बुलाया और योगमाया ने जो कुछ कहा था, वह सब उनको कह सुनाया। मन्त्रियों ने कहा, "भोजराज। यदि ऐसी बात है तो हम नगरों में, गाँवों में तथा विहार-स्थलों में सब बच्चों को, वे चाहे दस दिन के हों या इससे कम के, मार डालेंगे। विष्णु देवताओं की जड़ है। वेद, गौ, ब्राह्मण, तप और यज्ञ–ये धर्म की जड़ हैं; अतः हम लोग जिस किसी भी तरह होगा वेदवादी, याज्ञिक और तपस्वी ब्राह्मण तथा उन गौओं को, जो यज्ञ के लिए हविष्य पदार्थ देती हैं, मार डालेंगे। ब्राह्मण, गौ, वेद, तपस्या, सत्त्व, इन्द्रियदम, मनोनिग्रह, श्रद्धा, दया, तितिक्षा और यज्ञ–ये विष्णु के शरीर है; अतः उसको मार डालने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि इन्हें ही मार डाला जाये।'
पुत्र का जन्म होने से नन्द बहुत प्रसन्न हुए। नन्द जी ने अपने पुत्र का जन्मोत्सव गोकुल में बड़ी धूम-धाम से मनाया। उन्होंने वेदज्ञ ब्राह्मणों को आमन्त्रित कर जातकर्म संस्कार करवाया तथा देवता और पितरों की विधिपूर्वक पूजा करवायी। उन्होंने अमित दान दिया। ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिये। सूत, मागध और बन्दी-जनों ने स्तुति गान किये। व्रज-मण्डल के सभी घर ध्वजापताकाओं तथा वन्दनवारों से सजाये गये। वे भली-भाँति साफ-सुथरे किये गये तथा उनमें सुगन्धित जल का छिड़काव किया गया। सभी गोप बहुमूल्य वस्त्र, अंगरखे और पगड़ियों से सुसज्जित हो कर अपने हाथों में बहुत-सा उपहार ले कर नन्द बाबा के महल में समुपस्थित हुए।
गोपियाँ केसर और तेल मिला कर बच्चे को लगातीं, मंगल-गान गातीं तथा बालक को दीर्घायु होने का आशीर्वाद देतीं। उन्होंने वस्त्र, आभूषण तथा अंजन आदि से अपना शृंगार किया। वे परस्पर हल्दी मिश्रित जल छिड़कतीं। जिस दिन भगवान् प्रकट हुए, उसी दिन से व्रज सभी तरह से अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया।
कंस की आज्ञा से क्रूर राक्षसी पूतना नगर, ग्राम तथा अहीरों की बस्तियों में गोकुल में बच्चों को मारने के लिए घूमा करती थी। बच्चों की हत्या उसका एकमात्र कार्य था। उसे वायु में विचरण करने तथा स्वेच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति थी। आकाश में विचरण करने वाली पूतना ने एक दिन रूपवती स्त्री का रूप धारण कर प्रवेश किया। वह नन्द बाबा के घर में जा घुसी, जहाँ उसने दष्टों के काल दिव्य बालक को पालने में देखा, जिसने राख के ढेर में ढके हुए अंगारे की भाँति अपने प्रचण्ड तेज को छिपा रखा था। निष्ठुर पूतना ने झट से बालक को गोद में उठा लिया और विष लगे हुए स्तन से दूध पिलाने लगी। भगवान् अपने हाथों से उसके स्तन को जोर से दबा कर उसके प्राणों के साथ दूध पीने लगे। वह चिल्लाने लगी, "जाने दे। जाने दें। अब बस कर!" उसके नेत्र बाहर निकल पड़े और अन्त में वह बड़े पर्वत की भांति पृथ्वी पर गिर पड़ी।
गोपियों तथा रोहिणी के साथ यशोदा वहाँ दौड़ती हुई आयीं और बालक कृष्ण, जो पूतना के मृत शरीर पर निर्भय हो कर खेल रहे थे, को गोद में उठा लिया। भगवान को स्तन-पान कराने के कारण पूतना अब पाप-मुक्त हो चुकी थी। उसके जलते हुए शरीर से जो धुआँ निकला, उसमें अगर की-सी सुगन्ध थी; क्योंकि श्रीकृष्ण के शरीर का स्पर्श तो शत्रु तक को पवित्र बना डालता है। यद्यपि उसकी दुर्भावना बालक को मार डालने की थी, फिर भी वह भगवान् की धात्री बनी।
बालक के करवट बदलने का उत्सव तथा जन्मोत्सव — दोनों साथ ही मनाये जा रहे थे । नन्द बाबा के घर बड़ा यज्ञ (भोज) हुआ। अभिषेक के अनन्तर यशोदा ने देखा कि बालक ने निद्रा से अपने नेत्र बन्द कर लिये हैं; अतः उन्होंने एक गाड़ी जिस पर दूध-दही से भरे मटके रखे थे, के नीचे शय्या पर उसे सुला दिया। कुछ देर के बाद बालक ने आँखें खोलीं और स्तनपान के लिए रोने लगे। उस समय यशोदा अतिथियों के स्वागत-सत्कार में तन्मय हो रही थीं; अतः वे श्रीकृष्ण का रुदन न सुन सकीं। तब श्रीकृष्ण ने पैरों से गाड़ी को ठोकर मरी। गाड़ी उलट गयी, बरतन टूट गये और गाड़ी के पहिये और घुरी अस्त-व्यस्त हो गयी तथा जुआ फट गया। गोपियाँ और गोप आश्चर्यचकित रह गये । वे इस अद्भुत घटना का कोई कारण निश्चित नहीं कर सके। वहाँ खेलते हुए बालकों ने गोपों और गोपियों को बतलाया कि बालक श्रीकृष्ण ने ही रोते-रोते अपने पाँव की ठोकर से गाड़ी को उलट दिया; किन्तु गोपों ने उनकी बात का विश्वास न किया। वे बालक के अनन्त बल को नहीं जानते थे।लीला
एक दिन यशोदा बालक श्रीकृष्ण को गोद में ले कर दुलार रही थीं। सहसा श्रीकृष्ण चट्टान के समान भारी हो गये। वे उनका भार सह न सक; अतः बालक को भूमि पर बैठा कर घर के काम-काज में लग गयीं। तृणावर्त नाम का एक दैत्य सेवक कंस की प्रेरणा से बबण्डर के रूप में बालक श्रीकृष्ण को उड़ा ले गया।
समस्त गोकुल कुछ समय तक धूल और अन्धकार से ढक गया। दैत्य आकाश तक पहुँच गया; किन्तु भगवान् के शरीर के भारी होने के कारण आगे न जा सका। बालक ने उसके गले को कस कर पकड़ लिया। उस असुर का गला घुट गया। वह निश्चेष्ट हो गया और अलौकिक बालक को नीचे न फेंक सका। उसकी आँखें बाहर निकल आयीं। वह निष्प्राण हो आकाश से नीचे चट्टान पर गिर पड़ा और उसका एक-एक अंग चकनाचूर हो गया गोप और गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्ण को मृत असुर के वक्षःस्थल पर सकुशल एवं प्रसन्न देख कर अत्यन्त आनन्दित हुए और शिशु को उठा कर माता को दे आये।
एक दिन की बात है। यशोदा अपने बच्चे को गोद में ले कर स्तनपान करा रही थीं और बार-बार उनके मुख का चुम्बन ले रही थीं। ठीक उसी समय बालक ने जंभाई ली। जब बालक ने मुख खोला तो माता ने सारे ब्रह्माण्ड को उसके अन्दर देखा । उन्होंने देखा कि उसमें आकाश, अन्तरिक्ष, सूर्य, चन्द्रमा, तारा गण, दिशाएँ, अग्नि, वायु, महासागर, महाद्वीप, पर्वत, नदियाँ, वन तथा विश्व के समस्त चराचर प्राणी स्थित हैं।
यशोदा अपने पुत्र के मुख में सारा जगत् देख कर भय से काँप उठीं और उन्होंने अपने नेत्र बन्द कर लिये। वे आश्चर्यचकित रह गयीं।
श्री गर्गाचार्य यदुवंशियों के पुरोहित थे। वसुदेव के अनुरोध पर वे एक दिन नन्द बाबा के गोकुल में आये। नन्द बाबा ने उनका यथायोग्य सत्कार कर कहा, "आप वेदों में पारंगत हैं। आपने ज्योतिष शास्त्र की रचना की है; अतः इन दोनों बालकों का नामकरण संस्कार आप ही कर दीजिए।" श्री गंगाचार्य ने उत्तर दिया, “मैं नन्द यदुवंशियों के आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हूँ। यदि मैं तुम्हारे पुत्र का नामकरण-संस्कार करूँगा, तो कंस तुम्हारे पुत्र पर देवकी का आठवाँ पुत्र होने का सन्देह करेगा।" बाबा ने इसे गुप्त रखने का वचन दिया। श्री गर्गाचार्य ने एक एकान्त और शान्त स्थान में नामकरण संस्कार कर दिया।
गर्गाचार्य ने कहा: "रोहिणी का पुत्र अपने गुणों से अपने मित्रों एवं सम्बन्धियों को आनन्दित करेगा; इसलिए इसका नाम 'राम होगा। अपने अनन्त बल के कारण इसका नाम 'बल' होगा। यह यादवों के सारे पारस्परिक भेद को दूर कर सबको संगठित करेगा; अतः इसका नाम 'संकर्षण' भी होगा। यह श्याम वर्ण का बालक प्रत्येक युग में मानव-शरीर धारण करता है। शुक्ल, रक्त और पीत—इन तीनों रंगों में तो यह आ चुका था। अब यह कृष्ण-वर्ण हुआ है, इसलिए इसका नाम 'कृष्ण' होगा। तुम्हारे पुत्र के और भी बहुत से नाम तथा रूप हैं। यह तुम लोगों का कल्याण करेगा। यह तुम्हारी सब विपत्तियों से रक्षा करेगा। तुम सारी कठिनाइयों पर पूर्णतः विजय प्राप्त करोगे। यह समस्त गोपों, गौओं और गोकुल को भी अत्यन्त आक्रन्दित करेगा । नन्द जी! तुम्हारा यह पुत्र गुण में, कीर्ति में, बल में, ऐश्वर्य में साक्षात् भगवान् नारायण के समान है।"
श्रीकृष्ण अब बहुत नटखट हो गये। गोपियों के बछड़ों को गाय दुहने के समय से पूर्व ही खोल देते थे। वे दूध, दही तथा मक्खन चुरा चुरा कर खा जाते थे और जो बचा रहता, उसे बन्दरों को बाँट देते थे। यदि वे भी न खाते तो वह मटकों को ही फोड़ डालते। छींकों पर टँगे हुए बरतनों में छेद कर देते थे कि उनमें क्या है। वस्तु का पता लग जाने पर यदि उनके हाथ वहाँ तक न पहुँच पाते, तो उस तक पहुँचने के लिए वे उनके नीचे ऊखल रख देते और उस पर चढ़ जाते थे। अँधेरे घरों में अपने शरीर की ज्योति तथा आभूषणों की दमक से अपना काम चला लेते थे ।
एक समय की बात है। एक गोपी ने श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लिया और उनकी करतूत का उलाहना देने माता यशोदा के पास चल पड़ी; परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण मार्ग में चमत्कारी ढंग से उसके हाथों से बच निकले। अदृश्य बालक को अपनी माँ के पास देख कर वह बहुत लज्जित हुई और अपने घर वापस चली गयी।
एक दिन बलराम तथा अन्य ग्वाल-बालों ने यशोदा से शिकायत की कि श्रीकृष्ण ने मिट्टी खायी है। यशोदा डर गयीं, इससे श्रीकृष्ण के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव न हो। उन्होंने श्रीकृष्ण को फटकारते हुए कहा, "क्यों रे नटखट तूने छिप कर मिट्टी क्यों खायी ?" श्रीकृष्ण ने कहा, "माँ, मैंने मिट्टी नहीं खायी। इन लड़कों ने झूठ कहा है। मेरा मुँह देख लो।" यशोदा ने कहा, "अच्छा तो मुँह खोल ।" श्रीकृष्ण ने अपना मुँह खोल दिया। यशोदा ने उनके मुख में चर-अचर सम्पूर्ण जगत्, आकाश, दिशाएँ, पर्वत, महाद्वीप, समुद्र, सारी पृथ्वी, वायु, अनि, सूर्य, चन्द्रमा और तारे, सप्तद्वीप, नक्षत्र, देवता, मन- इन्द्रिय, तीनों गुण तथा पंचतन्मात्राएँ, जीव, काल, स्वभाव, कर्म और उनकी वासना, वृन्दावन और अपने-आपको भी देखा। वे आश्चर्य में पड़ कर सोचने लगीं कि यह कोई स्वप्न है या भगवान् की माया का विचित्र दर्शन या मेरे इस पुत्र में ही कोई जन्मजात योग-सिद्धि है। उन्होंने कहा, "मैं प्रभु को प्रणाम करती हूँ। मैं उन्हीं प्रभु की शरण में हूँ जिनकी माया यह भ्रम बुद्धि उत्पन्न करती है ये नन्द हैं; ये मेरे पति है; यह मेरा पुत्र है; मैं यशोदा हूँ; यह सब मेरा है।" यशोदा को वास्तविक तत्त्व का ज्ञान हो गया; किन्तु भगवान् की योगमाया से इस घटना की स्मृति जाती रही। वे श्रीकृष्ण को पुनः अपना पुत्र समझने लगीं और उन्हें अपनी गोदी में उन्होंने उठा लिया।
एक दिन यशोदा स्वयं ही दही मथ रही थीं और साथ ही अपने पुत्र की बाल लीलाएँ भी गा रही थीं। उसी समय श्रीकृष्ण माता के पास आये और स्तनपान करना चाहा। उन्होंने मथानी पकड़ ली और उन्हें मथने से रोक दिया। यशोदा ने उन्हें गोद में उठा लिया और अपने लाल को स्तनपान कराने लगीं। इतने में ही अँगीठी पर रखे हुए दूध में उफान आ गया। वे बालक को अतृप्त अवस्था में ही भूमि पर बैठा कर शीघ्रता से दूध उतारने चली गयीं। श्रीकृष्ण को इससे बहुत क्रोध आया। अपने ओठों को दाँतों से चबाते हुए उन्होंने दही के मटके को एक पत्थर से फोड़ डाला और दूसरे में जा कर चुपके से माखन खाने लगे।
थोड़ी देर बाद जब यशोदा लौट कर आयी तो देखा कि दही का मटका चूर-चूर हो कर पड़ा है। श्रीकृष्ण तो वहाँ से पहले ही चले गये थे। यशोदा तुरन्त समझ गयी कि यह सब उनके ही पुत्र की करतूत है। उधर वे उल्टे हुए ऊखल पर खड़े हो कर छींके पर रखे हुए बरतनों का सामान बन्दरों को खूब लुटा रहे हैं। यशोदा हाथ में छड़ी लिये हुए चुपके से उनके पास जा पहुँचीं। श्रीकृष्ण झट से ऊखल पर से कूद पड़े और डर कर भागे। यशोदा उनके पीछे दौड़ी और अन्ततः उन्हें पकड़ ही लिया। उन्होंने छड़ी फेंक दी और रस्सी से उन्हें ऊखल से बांधने की कोशिश में लग गयी; किन्तु जब वे उन्हें बाँधने लगीं, तब वह रस्सी कुछ इंच छोटी रह गयी। तब उन्होंने दूसरी रस्सी ला कर उसमें जोड़ी। जब वह भी छोटी हो गयी तो उसमें एक दूसरी रस्सी फिर जोड़ी। वे बार-बार रस्सी जोड़ती ही गयीं और रस्सी बराबर छोटी ही पड़ती गयी। यशोदा आश्चर्यचकित हो गयीं।
श्रीकृष्ण ने देखा कि उनकी माँ थक कर चूर हो गयी हैं और उनका शरीर पसीने से लथपथ हो गया है। उन्हें उन पर दया आयी और स्वयं ही बन्धन में बंध गये।
यशोदा जी घर के काम-काज में लग गयीं। उधर श्रीकृष्ण ने यमलार्जुन वृक्ष को मुक्ति देने की सोची, जो पूर्व जन्म में कुबेर के पुत्र थे और जिनके नाम नलकूबर तथा मणिग्रीव थे। उनके पास अमित धन, सौन्दर्य तथा ऐश्वर्य था; किन्तु उनके अभिमान के कारण देवर्षि नारद ने उन्हें शाप दे कर वृक्ष बना दिया था।
कुबेर के वे दोनों पुत्र एक बार गन्धर्व कन्याओं के साथ नग्न हो कर एक नदी में जल-क्रीड़ा कर रहे थे। संयोगवश नारद उस मार्ग से आ निकले। वे अप्सराएँ अपनी वस्त्रहीनता पर लज्जित हुईं और शाप के भय से अपने-अपने कपड़े झटपट पहन लिये. किन्तु उन दोनों यक्षों ने परवाह न की; अतः देवर्षि नारद ने अपना शाप दिया, "कुबेर के ये दोनों पुत्र बहुत ही मूर्ख तथा अभिमानी हैं, अतः ये वृक्ष हो जायें; किन्तु मेरी कृपा से इनकी स्मृति बनी रहेगी और देवताओं के सौ वर्ष व्यतीत हो जाने पर श्रीकृष्ण के स्पर्श से इनका उद्धार होगा।” कुबेर के वे दोनों पुत्र वृन्दावन में यमलार्जुन वृक्ष हो गये।
भगवान् श्रीकृष्ण ऊखल घसीटते हुए यमलार्जुन वृक्ष के निकट पहुँचे और दोनों वृक्षों के मध्य में खड़े हो कर उन्हें उखाड़ फेंका। वे धड़ाके की आवाज के साथ पृथ्वी पर गिर पड़े। उन वृक्षों में से दो सिद्ध निकले और अपनी आभा से उस स्थान को प्रकाशित कर दिया। उन्होंने भगवान् की स्तुति की और आकाश मार्ग को गमन किया।
भयंकर शब्द सुन कर गोप-गोपिकाएँ उस स्थल पर आ पहुँची और उन्होंने अर्जुन के दोनों वृक्षों को पृथ्वी पर गिरे हुए पाया। लड़कों ने जो-कुछ देखा था, उन्हें कह सुनाया। उन्होंने कहा, “यह सब श्रीकृष्ण की करतूत है। इन्होंने एक धक्का दिया और दोनों वृक्ष धड़ाके के साथ गिर पड़े। हमने तो इन वृक्षों से दो पुरुष भी निकलते हुए देखे।" परन्तु गोप-गोपिकाओं ने बालकों की बात का विश्वास नहीं किया। उन्होंने सोचा कि यह सम्भव नहीं कि एक नन्हा सा बच्चा दो वृक्षों को उखाड़ डालें; अतः वे सब आश्चर्यचकित से थे।
एक दिन श्रीकृष्ण ने एक स्त्री को पुकारते हुए सुना, “फल लो, फल।” यद्यपि वे समस्त कर्म और उपासनाओं के फल देने वाले स्वयं भगवान् हैं; पर उन्होंने झट से मुट्ठी भर अनाज लिया और उससे फल लेने दौड़ पड़े। फल बेचने वाली ने उनके दोनों हाथों को फलों से भर दिया और बदले में अनाज ले कर टोकरी में रख दिया। उसकी टोकरी रत्नों से भर गयी।
उपनन्द नाम के एक बुद्धिमान् गोप ने अन्य गोपों से कहा, “अब गोकुल में रहना किसी भी तरह सुरक्षित नहीं है। बहुत से उत्पात हो चुके हैं। हम लोगों के बालकों के लिए बड़ा भय है। यह बालक श्रीकृष्ण बड़ी कठिनाई से पूतना के चुंगल से बचा । भगवान् की कृपा से ही गाड़ी इसके ऊपर नहीं गिरी। असुर इसे आकाश में उठा ले गया और वहाँ से चट्टान पर गिरा; फिर देवताओं ने इसकी रक्षा की। अच्युत ने ही इसकी रक्षा की जब इस पर वृक्ष गिरे। अपने बच्चों और अनुचरों को ले कर आज ही हम लोग वृन्दावन के लिए चल पड़ें। गोप, गोपी और पशुओं के लिए वही उपयुक्त स्थान है। वहाँ बड़ी ही सुन्दर पहाड़ियाँ, हरे-भरे मैदान तथा लता वनस्पतियाँ हैं। "
सभी गोपों ने एक स्वर से समर्थन करते हुए कहा, "बहुत अच्छा, बहुत अच्छा।” वे सब वृन्दावन चल पड़े। बलराम तथा श्रीकृष्ण गोवर्धन, वृन्दावन तथा यमुना के तट को देख कर बहुत प्रसन्न हुए। वे ग्वाल-बालों के साथ बछड़े चराते और सामान्य बालकों की भाँति दूसरे बच्चों के संग खेलते थे ।
एक दिन की बात है। श्रीकृष्ण तथा बलराम अन्य ग्वाल-बालों के साथ यमुना के तट पर बछड़े चरा रहे थे तथा खेल रहे थे। एक दैत्य बछड़े का रूप धारण कर उनके झुण्ड में मिल गया। श्रीकृष्ण तथा बलराम को मारने की उसके मन में कुभावना थी। श्रीकृष्ण ने अपने बछड़ों के मध्य उस वत्सरूपधारी असुर को पहचान लिया औरभगवान् श्रीकृष्ण बलराम को उसकी ओर संकेत किया। उसके पश्चात् चुपके से उसके पास पहुंच कर उसके पिछले पैर तथा पूँछ पकड़ ली और उसे अपने शिर के ऊपर घुमा कर एक वृक्ष पर दे पटका। दैत्य मर गया। ग्वाल-बाल 'वाह-वाह कह कर श्रीकृष्ण की प्रशंसा करने लगे तथा देवताओं ने उनके ऊपर पुष्प वर्षा की।
एक दिन ग्वाल-बाल एक जलाशय में जल पीने गये। वहाँ उन्होंने बक के रूप में एक बहुत बड़े भयानक राक्षस को देखा जो कंस का मित्र था। वह राक्षस श्रीकृष्ण पर अपनी कठोर चोंच से चोट करने के लिए अचानक झपटा। श्रीकृष्ण ने उसके दोनों ठोरों को अलग कर तिनके की तरह फाड़ डाला। इससे देवताओं ने पुष्प-वृष्टि की।
एक दिन श्रीकृष्ण जब दूसरे बालकों के साथ खेल रहे थे, कंस की प्रेरणा से पूतना और बकासुर का छोटा भाई अघासुर महाराक्षस आया। अमृत पान कर अमर हुए देवता भी अघासुर से भयभीत रहते थे। अघासुर ने सोचा, “यही मेरे भाई और बहन को मारने वाला है। अब मैं श्रीकृष्ण को बलराम तथा उसके साथियों के साथ मार कर बदला लूंगा।"
दुष्ट असुर ने विशाल अजगर का रूप धारण कर लिया, जो एक योजन लम्बा और विशाल पर्वत के समान मोटा था। उसके खुले हुए मुख का एक जबड़ा बादलों को और दूसरा पृथ्वी को स्पर्श कर रहा था। उसने श्रीकृष्ण तथा उनके साथी बालको को निगल जाने के लिए अपना मुँह गुहा के समान फाड़ रखा था। सारे बालक ताली पीट-पीट कर हँसते हुए बछड़ों के साथ अघासुर के मुँह में घुस गये; परन्तु उसने अपना मुँह बन्द नहीं किया। वह मुँह खोले हुए श्रीकृष्ण की प्रतीक्षा कर रहा था। श्रीकृष्ण भी उस सर्प के मुँह में घुसे और अपना शरीर उसके गले के भीतर इतना विस्तीर्ण कर लिया कि उस असुर की मृत्यु हो गयी। श्रीकृष्ण ने ग्वाल-बालों तथा बछड़ों को नया जीवन प्रदान किया और उन सबको साथ ले कर असुर के मुख से बाहर निकल आये। उस सर्प के स्थूल शरीर से एक तेजस्वी ज्योति निकली और श्रीकृष्ण के शरीर में प्रवेश कर गयी।
श्रीकृष्ण उन ग्वाल-बालों को यमुना तट पर ले गये, जहाँ सबने जल-पान किया। इतने में बछड़े कहीं भटक गये और उनका पता न चल सका। बालकों को भय हुआ और वे ढूँढ़ने के लिए उठने लगे। श्रीकृष्ण ने उन्हें रोका और कहा कि वह स्वयं ढूँढ लायेंगे और ढूँढने चल दिये। ब्रह्मा ने वहाँ आ कर बछड़ों को और ग्वाल-बालों को किसी अन्य सुरक्षित स्थान में रख दिया और स्वयं अन्तर्धान हो गये ।
बछड़े न मिलने पर श्रीकृष्ण यमुना के तट पर वापस आ गये। वहाँ उन्होंने देखा कि ग्वाल-बाल भी चले गये हैं। वे तुरन्त ताड़ गये कि यह सब ब्रह्मा की करतूत है। भगवान् ने बछड़ों और ग्वाल-बालों की माताओं को और ब्रह्मा को भी आनन्दित करने के लिए स्वयं बछड़ों और ग्वाल-बालों का रूप धारण कर लिया। सभी बछड़े तथा ग्वाल-बाल ठीक पहले के जैसे ही थे। माताएँ अब अपने पुत्रों से अधिक स्नेह करने लग; क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण उनके पुत्र बन गये थे। गायें भी अपने बछड़ों के प्रति अब असाधारण प्रेम दिखलाती थीं।
श्रीकृष्ण इसी भाँति एक वर्ष तक अनेक रूप की लीला करते रहे। जब एक वर्ष होने में केवल पाँच-छह दिन शेष थे, तब एक दिन बलराम ने देखा कि गौएँ पूरा गोवर्धन पर्वत के शिखर पर घास चर रही थीं। वहाँ से ब्रज के पास अपने बछड़ों को चरते हुए देख कर वे अत्यन्त वात्सल्य स्नेह के कारण अपने बछड़ों की ओर ऐसे मार्ग से दौड़ पड़ीं जो मनुष्य और पशु के लिए दुर्गम था। उनके थनों से दूध बह रहा था। ऐसी गायें, जो नये बछड़ों को जन्म दे चुकी थीं, भी अपने पहले बछड़ों के पास दौड़ आयीं और उन्हें दूध पिलाने लगीं। बलराम ने यह भी देखा कि व्रजवासी अपनी सन्तान पर अब अधिक स्नेह करने लगे हैं। वे सोचने लगे, "मैंने आज तक गायों तथा बछड़ों और वह भी ऐसे बछड़ों, जिन्होंने अपनी माँ का दूध पीना बहुत दिनों से छोड़ दिया है, में ऐसा अगाध प्रेम कभी भी नहीं देखा है। व्रजवासी भी अपने पुत्रों को श्रीकृष्ण से अधिक प्रेम करने लगे हैं। अवश्य ही वह भगवान् श्रीकृष्ण की योगमाया है।" बलराम ने ज्ञान दृष्टि से देखा तो समझ गये कि ये बछड़े और बालक भगवान् श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं।
तब उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा, “भगवन्! ये ग्वाल-बाल और बछड़े न देवता है और न कोई ऋषि ही। ये सब आपके सदृश्य ही लगते हैं। हे कृष्ण! इसका क्या रहस्य है? कृपा करके समझाइए ।" तब श्रीकृष्ण ने घटना कह सुनायी। उन्होंने ब्रह्मा की सब करतूत सुनायी और बलराम ने सब बातें जान लीं।
ब्रह्मा व्रज को लौट आये और ग्वाल-बाल तथा बछड़ों को देखा। उन्होंने श्रीकृष्ण को एक वर्ष पहले की भाँति ही ग्वाल-बाल और बछड़ों के साथ क्रीड़ा करते हुए पाया, जिन्हें ब्रह्मा ने अपनी माया के अधीन कर रखा था तथा जिन्हें भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी माया द्वारा रखा था, वे इन दोनों में कोई भेद न कर सके। ब्रह्मा भगवान् को मोहित करना चाहते थे; किन्तु वे स्वयं ही मोहित हो गये। सभी ग्वाल-बाल तथा बछड़े श्रीकृष्ण के रूप में उन्हें दिखायी पड़ने लगे। वे सब-के-सब श्याम वर्ण, पीताम्बरधारी तथा दिव्य अस्त्र युक्त चतुर्भुज थे। सभी शिर पर मुकुट तथा कुण्डल आदि धारण किये थे। इस आश्चर्यमय दृश्य को देख कर ब्रह्मा चकित और स्तब्ध से हो गये। श्रीकृष्ण ने अपनी माया का आवरण हटा लिया। ब्रह्मा सचेत हो उठे और उन्होंने अकेले श्रीकृष्ण को बालकों एवं बछड़ों को खोजते हुए देखा।
सजल नेत्र ब्रह्मा भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में बार-बार गिरे और उनकी स्तुति की।
बलराम तथा श्रीकृष्ण के प्रधान सखा श्रीदामा तथा सुबल और स्तोक इत्यादि ने श्रीकृष्ण और बलराम से कहा, “यहाँ से थोड़ी दूर ताड़ का एक विशाल वन है। उसका सौन्दर्य अवर्णनीय है । वहाँ कतार के कतार पके फल से लदे ताड़ के वृक्ष हैं। परन्तु उसमें कोई प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि धेनुक नाम का दैत्य अपने अन्य साथियों के साथ लोगों को वन में प्रवेश करने से रोकता है। उसका गधे का सा रूप है। उसने अब तक कितने ही मनुष्य मार डाले; अतः उसके डर से लोग वहाँ नहीं जाते । उन फलों की सुगन्धि हमें यहाँ तक आ रही है। वे मन को बहुत आकर्षित करते हैं। हम उन्हें चखना चाहते हैं।"
बलराम निर्भय हो कर जंगल में घुस पड़े और वृक्षों को जोर से हिलाया, जिससे बहुत से फल वृक्षों से नीचे आ गिरे। फलों के गिरने का शब्द सुन कर वह दैत्य दौड़ आया और अपने पिछले पैरों से बलराम की छाती पर जोर से आघात किया। बलराम ने उस गधे के पिछले दोनों पैर पकड़ लिये और आकाश में घुमा कर एक विशाल ताड़ के पेड़ पर दे पटका। असुर की मृत्यु हो गयी। तब धेनुक के सभी भाई-बन्धु बलराम और श्रीकृष्ण—दोनों पर टूट पड़े; किन्तु वे सभी श्रीकृष्ण और बलराम द्वारा मारे गये। बलराम और श्रीकृष्ण के सखाओं ने भर-पेट फल खाये। धेनुक और उसके साथियों की मृत्यु के पश्चात् लोग निर्भय हो कर उस वन में जाने लगे और पशु भी स्वतन्त्रतापूर्वक घास चरने लगे।
एक दिन श्रीकृष्ण बलराम के अतिरिक्त अन्य सखाओं के साथ वृन्दावन के जंगल में विचरण करते हुए यमुना तट पर जा पहुंचे। ग्रीष्म के ताप से सन्तप्त होने के कारण ग्वाल-बाल, गौएँ तथा बछड़े बहुत ही प्यासे हो गये थे; इसलिए उन्होंने यमुना का विषैला जल पी लिया। जल के पीते ही वे सब यमुना-तट पर प्राणहीन हो कर गिर पड़े। श्रीकृष्ण ने अपनी अमृत-प्रदायिनी दृष्टि द्वारा सबको पुनर्जीवित कर दिया। चेतना प्राप्त होने पर सब-के-सब यमुना तट पर उठ खड़े हुए और आश्चर्यचकित हो कर एक-दूसरे को देखने लगे। उन्हें ज्ञात हो गया कि यमुना के विषाक्त जल के पान से वे सब मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे; पर श्रीकृष्ण ने अपनी अनुग्रहपूर्ण दृष्टि से उन सबको नवजीवन प्रदान किया।
पहले गरुड़ सर्पों को खाया करते थे; अतः सर्पों ने गरुड़ से यह समझौता कर लिया कि प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को निर्दिष्ट वृक्ष के नीचे उन्हें एक सर्प की बलि दी जायेगी। सभी सर्प गरुड़ को अपना-अपना भाग देते रहते थे। गरुड़ भी इस व्यवस्था से बहुत प्रसन्न थे। किन्तु कद्र के पुत्र कालिय को अपने बल पर अति-अभिमान था। अतएव उसने गरुड़ को कोई भेंट नहीं की, अपितु अन्य के भेंट किये हुए को भी उठा ले जाता था। गरुड़ ने क्रुद्ध हो कर उस पर आक्रमण किया जिसमें कालिय की हार हुई। उसने यमुना कुण्ड में जा कर शरण ली।
एक बार गरुड़ ने उस कुण्ड से एक मछली पकड़ी और उसे खाने ही वाले थे कि सौभरि ऋषि ने कहा, "हे गरुड़! इस मछली को न खाओ।" गरुड़ ने ऋषि की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। अन्य मछलियों के रुदन से ऋषि का हृदय द्रवीभूत हो गया। अतः सब मछलियों की रक्षा के लिए ऋषि ने गरुड़ को शाप दे दिया कि यदि उसने फिर कभी इस कुण्ड में प्रवेश किया तो उसकी मृत्यु हो जायेगी।
कालिय को इस बात का ज्ञान था; अतः अपने परिवार के साथ उसने इस कुण्ड में शरण ली।
श्रीकृष्ण ने देखा कि महाविषधर कालिय नाग ने यमुना का जल विषैला कर दिया है। जल को शुद्ध करने के विचार से उन्होंने वहाँ से सर्प को निकालना चाहा। श्रीकृष्ण अपनी कमर में फैटा कस कर एक ऊंचे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गये और उस कुण्ड के जल में कूद पड़े। नाग ने भयंकर रूप से श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया और उनके मर्म स्थानों में दंशन कर अपने पाश में उन्हें पूर्णतया जकड़ लिया। गायें:क्रन्दन करने लगी। ग्वाल-बाल मूर्च्छित हो कर गिर पड़े। नन्द बाबा और गोप श्रीकृष्ण की खोज में निकल पड़े। उन्हें बलवान् नाग के शरीर से जकड़ा देख कर व फूट-फूट कर रोने लगे।
श्रीकृष्ण ने अपने को नाग के पाश से छुड़ा लिया और उससे क्रीड़ा करने लगे। वे उसके शिर पर चढ़ गये और नृत्य करने लगे। उसके एक सहस्र शिर थे जिनमें सौ मुख्य थे। भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने चरणों से उसके प्रत्यक शिर को रौंद डाला। • उसका शरीर चूर-चूर हो गया और मुँह से खून की उल्टी होने लगी। सर्प ने भगवान् की शरण ली। नाग-पत्नियों ने श्रीकृष्ण की स्तुति की और अपने पति के प्राण-दान की याचना की। भगवान् ने नृत्य बन्द कर दिया और धीरे-धीरे कालिय को चेतना आ गयी।
श्रीकृष्ण ने कहा, “सर्प। अब तुझे यहाँ नहीं रहना चाहिए। तू अपनी स्त्री और सम्बन्धियों-सहित शीघ्र ही यहाँ से समुद्र में चला जा। अब गौएँ और मनुष्य यमुना के जल का उपभोग करें। मैं जानता हूँ कि तू गरुड़ के भय से रमणक द्वीप छोड़ कर इस दह में आ बसा था; किन्तु अब तुम्हारे शिर पर मेरे चरण-चिह्न अंकित हैं, गरुड़ तुम्हें स्पर्श नहीं करेगा।" तत्पश्चात् कालिय ने अपनी पत्नियों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवों के साथ रमणक द्वीप को प्रस्थान किया और यमुना का जल अमृत के समान हो गया।
ग्रीष्म के प्रचण्ड ताप से वन सूख गया था। अर्ध-रात्रि को वन में अचानक भयंकर अगिन लग गयी और उसने व्रजवासियों को चारों ओर से घेर लिया। वह उन्हें जलाने लगी। वे सब श्रीकृष्ण की शरण में गये। उन्होंने आर्त स्वर में कहा, "हम आपसे प्रार्थना करते हैं। कृपा करके इस प्रलय की अपार आग से हमें बचाओ! हम मृत्यु से नहीं डरते; पर हम आपके चरण-कमलों को नहीं त्याग सकते।"
श्रीकृष्ण अपने भक्तों की असहायावस्था को देख कर उस भयंकर अग्नि का पान कर गये। भगवान् श्रीकृष्ण में अनन्त शक्ति है। उनके लिए यह कौन-सी आश्चर्य की बात है।
एक दिन राम, श्याम तथा दूसरे ग्वाल-बालों ने अपने को रक्तप्रवाल, शिखीपुच्छ तथा सुन्दर वन-पुष्पों से सजा लिया। कुछ ने नृत्य आरम्भ किया तो कुछ ने संगीत अलापना। प्रलम्ब नाम का एक असुर ग्वाल के वेष में बालकों में घुस गया। श्रीकृष्ण तथा बलराम—दोनों को हर ले जाने की उसकी इच्छा थी। सर्वज्ञ श्रीकृष्ण उसे पहचान गये, फिर भी उसका वध करने के विचार से उससे मैत्री का नाटक किया। श्रीकृष्ण ने प्रस्ताव किया, “मित्रो! हम लोग अपने को दो दलों में बाँट लें और फिर खेलें।" अतः ग्वाल-बाल दो भागों में विभक्त हो गये। एक दल ने बलराम को अपना नेता बनाया तथा दूसरे ने श्रीकृष्ण को । पराजित दल को विजेता दल के खिलाड़ियों को अपनी पीठ पर चढ़ा कर एक निर्दिष्ट स्थान तक ले जाना होता था।
खेल में एक बार बलराम के दल वाले श्रीदामा, वृषभ आदि ग्वाल-बाल विजयी हुए, इसलिए श्रीकृष्ण ने दामा को, भद्रसेन ने वृषभ को और प्रलम्ब ने बलराम को अपनी पीठ पर चढ़ाया और ले चले। प्रलम्ब बलराम को ले कर निर्दिष्ट स्थान से आगे भागता चला गया। बलराम को सन्देह हुआ। अब प्रलम्ब ने अपना विशाल रूप धारण कर लिया। बलराम ने उसके शिर में एक मजबूत घूँसा मारा और उसका शिर चूर-चूर हो गया। असुर मुँह से खून उगलने लगा और प्राणहीन हो कर पृथ्वी पर गिर पड़ा। ग्वाल-बालों को बहुत ही आश्चर्य हुआ और वे कहने लगे, "वाह-वाह ! शाबाश, शाबाश!"
भाण्डीर वन में गौएँ भटक गयीं और अकस्मात् वन में प्रचण्ड दावाग्नि प्रज्वलित हो उठी। ग्वाल-बाल भगवान् श्रीकृष्ण के शरणापन्न हो कहने लगे, "हे प्रिय कृष्ण ! हम आपके चरणों में शरणागत हैं। दावाग्नि हम सबको भस्म करना चाहती है। आप अनन्त शक्ति के स्वामी हैं। कृपया हम सबकी रक्षा करें। आप ही हमारे एकमात्र प्रभु हैं। हमें आपका ही भरोसा है।"
श्रीकृष्ण ने कहा, "प्रिय सखे! घबराओ नहीं, तुम अपनी आँखें बन्द कर लो।” सब बालकों ने अपने नेत्र मूँद लिये। श्रीकृष्ण के कहने पर जब उन्होंने अपनी आँखें खोलीं, तो अपने को पुनः भाण्डीर वन के पास पाया। अपनी सभी गौओं को दावाग्नि से सुरक्षित देख कर ग्वाल-बाल विस्मित हुए। श्रीकृष्ण की योग-शक्ति एवं दावानल से अपनी रक्षा को देख कर बालकों ने समझा कि श्रीकृष्ण साधारण मनुष्य नहीं हैं, अपितु साक्षात् अविनाशी भगवान् हैं।
शरद ऋतु के कारण वन बहुत रमणीक एवं आकर्षक था। जल निर्मल था। मन्द मन्द वायु चल रही थी। भगवान् श्रीकृष्ण ने बलराम, ग्वाल-बाल और गोओं के साथ उस मनोरम दृश्य का आनन्द लेने के लिए उस वन में प्रवेश किया और अपनी बाँसुरी पर मधुर तान छेड़ी। गोपियाँ वंशी-ध्वनि सुन कर अपनी सुध-बुध खो बैठीं। बाँसुरी का संगीत सबके चित्त को चुरा लेता था।
किसी गोपी ने कहा, "इस बाँसुरी ने पूर्व जन्म में अवश्य ही पुण्य-कर्म किया है जिससे यह श्रीकृष्ण का अधरामृत पान करती रहती है। जिस जल ने इसका पोषणा किया, वह भी आनन्द से पुलकित हो रहा है और जिसके यहाँ इसने जन्म ग्रहण किया. वह वृक्ष भी मधुधारा के रूप में आनन्दाश्रु बहा रहा है, जैसे भक्त जन अपने वंश में भगवत्प्रेमी सन्तान उत्पन्न होने पर बहाया करते हैं।"
दूसरी गोपी ने कहा, “यह वृन्दावन तो पृथ्वी की कीर्ति का विस्तार वैकुण्ठलोक तक कर रहा है; क्योंकि इसे भगवान् के चरण-चिह्न से चिह्नित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। श्रीकृष्ण के चरण-कमल के स्पर्श से वृन्दावन कितना शोभायमान लग रहा है! पृथ्वी पर वृन्दावन के सदृश अन्य कोई स्थल नहीं ।
"जब श्रीकृष्ण मनमोहिनी वंशी बजाते हैं, तब मोर उसे मेघ-सी मन्द-मद गरज समझ मतवाले हो कर उसकी तान पर नृत्य करते हैं। दूसरे पशु-पक्षी भी बाँसुरी की ध्वनि सुनते ही चुपचाप शान्त हो कर खड़े हो जाते हैं। वंशी की तान मृग भी सुनते हैं और अपनी प्रेम-भरी चितवन उन पर निछावर कर देते हैं। देवांगनाएँ भी संगीत से आत्म-विभोर हो अपनी बाह्य चेतना खो बैठती हैं। गौएँ भी अपने कान खड़े कर संगीत-सुधा का पान करतीं तथा आनन्दाश्रुपूर्ण नेत्रों से स्थिर खड़ी रहती हैं। बछड़े मुँह में माँ का दूध लिये ही उत्सुकतापूर्वक वंशी के संगीत को सुनने लगते हैं। पक्षी भी वृक्षों पर ऊँचे बैठ कर चुपचाप वंशी का मोहक संगीत सुनते रहते हैं। नदियों की भँवरे भी श्रीकृष्ण से मिलने की अपनी तीव्र आकांक्षा प्रकट कर रही हैं। नदियाँ भी श्रीकृष्ण के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करती हैं। वे श्रीकृष्ण के मधुर संगीत को सुनने के लिए अपने प्रवाह को रोक देती हैं। वे अपनी तरंगों के हाथों से श्रीकृष्ण के चरणों पर पद्म-पुष्प चढ़ा कर उनके चरणों का आलिंगन करने के लिए पकड़ लेती हैं। तनिक आकाश में उन बादलों को तो देखो। उन्होंने श्रीकृष्ण के ऊपर अपने को इस प्रकार फैला दिया है। जैसे छाता । जब श्रीकृष्ण तप्त धूप में वंशी की तान छेड़ते हैं, तो ये बादल उन पर नन्हीं-नन्हीं फूहियों की-सी वर्षा करने लगते हैं जैसे कि नन्हें-नन्हें श्वेत कुसुम चढ़ा रहे हों और इस भांति अपने को ही उनके चरणों में न्योछावर कर देते हो।
"गिरिराज गोवर्धन के धन्य भाग हैं जिसकी तलहटी में श्रीकृष्ण गौएँ चराते हैं और यह उन्हें स्वादिष्ट कन्द-मूल, फल और पीने के लिए स्वच्छ जल भेंट करता है। यह वंशी क्या ही जादू करती है।"
श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं का वर्णन तथा उनका गुणगान करते-करते गोपियाँ आत्म-विस्मृत हो जाती थीं। वे श्रीकृष्ण में तन्मय हो गयी थीं।
हेमन्त ऋतु का आगमन हुआ। नन्द बाबा के व्रज की कुमारियाँ कात्यायनी देवी की पूजा और व्रत करने लगीं। वे केवल हविष्यान्न ही ग्रहण करती थीं। वे प्रार्थना करती, "हे कात्यायनी ! हे सृष्टि संचालिका ! हे महायोगिनी । नन्दनन्दन श्रीकृष्ण हमारे पति बनें। देवि! हम आपके चरणों में नमस्कार करती हैं।" उन्होंने एक महीने तक व्रत रखा। वे प्रतिदिन उषाकाल में ही यमुना में स्नान करती थीं। एक दिन उन्होंने अपने-अपने वस्त्र तट पर उतार दिये और स्नान के लिए जल में घुसी और श्रीकृष्ण के गुणों का गायन करती हुई बड़े आनन्द से जल-क्रीड़ा करने लगीं।
श्रीकृष्ण अपने सभी सखाओं के साथ उनकी साधना को सफल करने के लिए यमुना तट पर गये। उन्होंने उनके वस्त्र उठा लिये और झट से निकट के एक कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गये और गोपियों से बाहर आ कर वस्त्र ले जाने के लिए कहा। गोपियों ने वैसा ही किया और श्रीकृष्ण ने उनके वस्त्र वापस कर दिये।
श्रीकृष्ण ने गोपियों से कहा, "हे धर्मशील पवित्र कुमारियो ! मैं तुम्हारे संकल्प को जानता हूँ। तुमने अपने व्रत का भली-भाँति पालन किया है। तुम मेरी पूजा करना चाहती हो। मैं तुम्हारी अभिलाषा का अनुमोदन करता हूँ। तुम सफल होगी। जिन्होंने अपने मन और प्राण मुझमें लगा रखे हैं, उनमें सांसारिक संकुचित कामनाएँ नहीं रह जातीं; क्योंकि जब मैं उनकी कामनाओं का विषय होता हूँ तो उनकी सारी कामनाएँ भस्म हो जाती हैं। जैसे भुने या उबाले हुए बीज फिर अंकुरित नहीं होते, वैसे ही मेरे प्रति की हुई कामनाएँ भी विषय-सुख उत्पन्न नहीं कर सकतीं। अतः व्रज वापस जाओ। कात्यायनी देवी के पूजन का तुम्हारा उद्देश्य सिद्ध हो गया। तुम सब आने वाली शरद ऋतु की रात्रियों में मेरे साथ विहार करना।"
एक दिन की बात है, श्रीकृष्ण बलराम तथा ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन से बहुत दूर निकल गये। ग्रीष्म ऋतु थी। सूर्य की किरणें बहुत प्रखर हो रही थीं। वृक्षों ने छाया दी। श्रीकृष्ण ने कहा, “मेरे मित्रों! देखो ये वृक्ष कितने उदार हैं। ये दूसरे के लिए ही जीते हैं; झंझावात, वर्षा, धूप और तुषार-सब-कुछ सहन करते हैं। इनका ही जीवन सबसे श्रेष्ठ है। ये सबका पोषण करते हैं। जो कोई भी इनके पास जाये, उसे कुछ-न-कुछ अवश्य देते हैं; किसी को निराश नहीं लौटाते। ये अपने पत्ते, फूल, फल, जड़, छाल, सुगन्ध, रस, लकड़ी, कली, गोंद, राख, कोयला, कोपलें और छाया प्रदान कर सभी की कामनाओं को पूर्ण करते हैं। जो अपने धन से, ज्ञान से, वाणी से और प्राणों से दूसरों का भला करता है, केवल उसी प्राणी का जन्म सार्थक है।"
कुछ बालक क्षुधित हो श्रीकृष्ण के पास आये और उन्होंने कहा, "हमें भूख सता रही है, इसे बुझाने का कोई उपाय करें।" श्रीकृष्ण ने कहा, "मित्रो! यहाँ से थोड़ी ही दूर पर वेदवादी ब्राह्मण स्वर्ग की कामना से आंगिरस नाम का यज्ञ कर रहे हैं। उनकी यज्ञशाला में जाओ और हमारा नाम बतला कर उनसे कुछ भोजन माँग लाओ।"
ग्वाल-बाल यज्ञशाला में गये और ब्राह्मणों से भोजन माँगा; किन्तु ब्राह्मणों ने उनकी बात अनसुनी कर दी। उन्होंने श्रीकृष्ण को एक साधारण मनुष्य ही माना और उनकी प्रार्थना पर ध्यान न दिया। यज्ञ ही उनके लिए सब कुछ था; किन्तु उन्होंने यज्ञपति की ही अवहेलना की। वे अपने को श्रीकृष्ण से उच्च समझते थे। जब ब्राह्मणों ने 'हाँ' या 'ना' कुछ नहीं कहा, तब ग्वाल-बालों की आशा जाती रही; वे निराश हो कर लौट आये और श्रीकृष्ण से वृत्तान्त निवेदन किया। श्रीकृष्ण हँसते हुए बोले, "इस बार तुम इन ब्राह्मणों की पत्नियों के पास जाओ।" ग्वाल-बालों ने वैसा ही किया। सुनते ही वे स्त्रियाँ भाई-बन्धु तथा पति-पुत्रों के रोकते रहने पर भी सभी प्रकार की भोजन-सामग्री ले श्रीकृष्ण के पास उतावली से चल पड़ीं।
श्रीकृष्ण ने कहा, “सौभाग्यवती देवियो! तुम्हारा स्वागत है। आसन ग्रहण करो। हम तुम्हारी क्या सेवा करें? तुम सब केवल हमारे दर्शन की इच्छा से यहाँ आयी हो। मैं आत्मा हूँ । जो आत्मा को ही सब-कुछ समझते है, उनकी मुझमें अकारण अव्यभिचारिणी भक्ति होती है। प्राण, बुद्धि, मन, शरीर, स्त्री, पुत्र, स्वजन और धन आत्मा के लिए ही प्रिय होता है। उस आत्मा से अधिक प्रियंतर क्या हो सकता है ? अब तुम सब मेरे दर्शन कर चुकी अतः अपने-अपने पति के पास लौट जाओ। तुम्हारे साथ मिल कर उन्हें यज्ञ की आहुति देनी है।
ब्राह्मण-पत्नियों ने कहा, "हम सबने आपके चरणों की शरण ली है तथा अपने सगे-सम्बन्धियों का परित्याग कर दिया है। हमें आपके चरणों से गिरी हुई तुलसी की माला अपने केशों में धारण करने दें। अब हमारे पति, पुत्र, भाई-बन्धु तथा सम्बन्धी हमें स्वीकार नहीं करेंगे। संसार के लोग हमारा तिरस्कार करेंगे। हमें और किसी का सहारा नहीं है। अब हम आपके चरणों में आ पड़ी हैं। अब आप ही हमें शरण में रखिए तथा अपनी दासी बनाइए।" श्रीकृष्ण ने कहा, "भाग्यवती देवियो! तुम अपने घर वापस जाओ। तुम्हारे पति, पुत्र, माता-पिता इत्यादि तुमसे अप्रसन्न नहीं होंगे। मनुष्य ही नहीं, देवता भी हमारे आदेश से तुम्हारे इस कार्य का अनुमोदन करेंगे। मैंने तुम सबको स्वीकार कर लिया है; अतः संसार तुम्हारी प्रतिष्ठा करेगा। मेरा अंग-संग ही मेरी प्रीति या अनुराग का कारण नहीं है। पूरे हृदय से तुम मेरा ध्यान करो। बहुत शीघ्र ही तुम्हें मेरी प्राप्ति होगी।"
वे ब्राह्मण पत्नियाँ यज्ञशाला में लौट गयीं। ब्राह्मणों ने उनके इस प्रकार के आचरण को कोई अपराध नहीं समझा। जब ब्राह्मणों को यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान् हैं, तब उन्हें अपने कृत्य पर बड़ा पछतावा हुआ। कंस के भय से वे वृन्दावन न जा सके। वे अपने घर में ही उपासना करते रहे।
एक दिन श्रीकृष्ण ने देखा कि लोग इन्द्र-यज्ञ की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने अपने पिता नन्द बाबा से पूछा, "पिता जी! यह कौन-सा बड़ा उत्सव आ पहुँचा है? इसका फल क्या है? किस उद्देश्य से, कौन से लोग तथा किन साधनों से यह यज्ञ किया करते हैं।”
नन्द बाबा ने कहा, "प्रिय पुत्र ! भगवान् इन्द्र मेघों के स्वामी हैं। उनकी पूजा करने से वे जल बरसाते हैं। वर्षा समस्त प्राणियों को जीवन-दान करती है। अतः लोग यज्ञों के द्वारा इन्द्र भगवान् की पूजा किया करते हैं। उनका यज्ञ करने के पश्चात जो अवशिष्ट रहता है, उसी अन्न से हम लोग अर्थ, धर्म और कामरूप त्रिवर्ग की सिद्धि के लिए अपना जीवन-निर्वाह करते हैं। हम लोगों के पुरुषार्थ का फल देने वाले इन्द्र ही हैं।"
श्रीकृष्ण ने कहा, "पूज्य पिता जी। प्राणी अपने कर्म के अनुसार ही जन्म लेता है और अपने कर्म के अनुसार ही मर जाता है। मनुष्य के अपने कर्म द्वारा ही उसके जन्म-मृत्यु का निर्धारण होता है। सुख-दुःख, भय, मंगल-ये सब कर्म के ही विपाक हैं। यदि जीवों को कर्म-फल देने वाला कोई भगवान् है, तो वह भी कर्म के अनुसार ही फल दे सकता है। वह अपने-आप कुछ नहीं कर सकता। जब मनुष्य अपने कर्मानुसार ही फल भोगता है, तब हमें इन्द्र की क्या आवश्यकता है? भला इन्द्र उन जीवों का क्या कर सकता है जो अपने कर्मों के अनुसार ही फल भोग रहे हैं? वह पूर्व-संस्कार के अनुसार प्राप्त होने वाले मनुष्यों के कर्म-फल को, नियति द्वारा निर्धारित उनके भाग्य को बदल नहीं सकता है। नियति ही मनुष्य के स्वभाव को निर्धारित करती है। मनुष्य पूर्वकृत कर्म-संस्कार द्वारा निर्मित अपने स्वभाव के अधीन है। वह अपने स्वभाव का ही अनुसरण करता है। देवता, असुर और मनुष्य को लिये हुए यह सम्पूर्ण जगत् स्वभाव में ही स्थित तथा गतिशील है। जीव अपने कर्मों के अनुसार उत्तम तथा अधम शरीरों को ग्रहण करता है और छोड़ता रहता है। कर्म ही व्यक्ति का गुरु है और कर्म ही उसका ईश्वर है। इसमें भला इन्द्र क्या कर सकता है? हम लोग अपनी गौओं, अपने ब्राह्मणों, अपने गिरिराज तथा पतितों का यजन करें। कुत्तों को भली-भाँति भोजन करायें और गौओं को चारा दें।"
नन्द बाबा तथा अन्य गोपों ने श्रीकृष्ण की बात स्वीकार कर जैसा उन्होंने आदेश दिया, वैसा ही किया। उन्होंने गौओं, ब्राह्मणों तथा गोवर्धन को अपनी भेंट चढ़ायी और गिरिराज की प्रदक्षिणा की। श्रीकृष्ण ने कहा, “मैं गिरिराज हूँ।” वे गोपों को विश्वास दिलाने के लिए गिरिराज के ऊपर एक दूसरा विशाल शरीर धारण करके प्रकट हो गये और भेंट की सारी सामग्री खा गये ।
इन्द्र नन्द बाबा तथा अन्य गोपों पर बहुत ही क्रोधित हुए। उन्होंने मेघ और मरुद्गणों को भेजा। वृन्दावन में मूसलाधार वर्षा, प्रचण्ड आँधी तथा ओलों की बौछार होने लगी। श्रीकृष्ण ने एक हाथ से गोवर्धन को उठा लिया और व्रजवासियों ने अपनी गौओं के साथ उस पर्वत के नीचे शरण ली। सात दिन तक लगातार वर्षा होती रही और श्रीकृष्ण ने सात दिन तक एक इंच भी इधर-उधर हुए बिना उस पर्वत को लगातार उठाये रखा।
इन्द्र को बड़ा आश्चर्य हुआ और उनका अभिमान जाता रहा। उन्होंने मेघ तथा वायु को वापस बुला लिया । गोप अपनी-अपनी गायें और सामग्री ले कर अपने घरों को वापस चले गये और भगवान् ने गिरिराज को पूर्ववत् उसके स्थान पर रख दिया।
गोप आश्चर्यचकित रह गये। वे नन्द बाबा के पास आये और कहने लगे, "इस सात वर्ष के बालक ने गोवर्धन पर्वत को पृथ्वी से उखाड़ कर सात दिन तक लगातार एक हाथ पर उठाये रखा। इस तरह का अलौकिक कार्य एक साधारण मनुष्य नहीं कर सकता। तुम्हारा पुत्र अवश्य ही स्वयं भगवान् है। यह सब प्राणियों की आत्मा है।"
स्वर्ग से देवराज इन्द्र तथा कामधेनु आये। वे श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़े और उनकी स्तुति करने लगे, “आप जगत् के पिता, गुरु और स्वामी हैं। भक्तों की लालसा पूर्ण करने के लिए आप स्वेच्छा से लीला-शरीर प्रकट करते हैं। हमारे-जैसे अज्ञानी तथा अभिमानी जन, जो अपने को ही जगत् का ईश्वर मान बैठते हैं, आपकी कृपा और आपके दर्शन से अपने मद और मान का परित्याग कर भक्ति-मार्ग का आश्रय ग्रहण करते हैं। आपकी प्रत्येक चेष्टा दुष्टों का दमन करने तथा उन्हें सुधारने के निमित्त ही होती है। शक्ति एवं ऐश्वर्य से मदमत्त हो कर मैंने आपकी अवहेलना की है। मुझमें बुद्धि, विवेक और ज्ञान न था, इसी से मैं आपकी महत्ता न समझ सका। हे प्रभो! मेरे अपराध को क्षमा करें, मुझे शुद्ध विवेक दें और मेरा अभिमान दूर करें। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ।"
श्रीकृष्ण ने कहा, “इन्द्र! तुमने ऐश्वर्य और धन सम्पत्ति के मद में चूर हो कर मुझे विस्मृत कर दिया था; अतः तुम्हारा यज्ञ भंग करके मैंने तुम पर बहुत अनुग्रह ही किया। तुम मेरा स्मरण करते रहो, इसीलिए मैंने ऐसा किया। शक्ति तथा ऐश्वर्य मनुष्य तथा देवों को मदान्ध बना देते हैं। वे अभिमानी बन जाते हैं। अतः मैं जिस पर अनुग्रह करना चाहता हूँ, उसका ऐश्वर्य और सम्पत्ति छीन लेता हूँ। तुम अपनी राजधानी अमरावती में जाओ और उचित रूप से अपने कर्तव्य का पालन करो। अभिमान को पूर्णतया त्याग दो। मेरी आज्ञाओं का पालन करते रहना और मेरी सन्निधि का नित्य अनुभव करते रहना। तुम्हारा मंगल हो ! "
गौओं की दिव्य माता कामधेनु ने अपनी सन्तान के प्रति किये हुए उनके उपकार के लिए श्रीकृष्ण को धन्यवाद दिया और कहा, 'हे कृष्ण! आप महायोगेश्वर है। आप सर्वान्तर्यामी है। हे अच्युत! आप ही समस्त जगत् के रक्षक है। आप स्वयं विश्व है, इस विश्व के परम कारण भी आप ही हैं। हमने आपको ही अपना आराध्य देव माना है। गौ, ब्राह्मण और देवताओं की रक्षा के लिए आप ही हमारे इन्द्र बन जाइए। ब्रह्मा जी की प्रेरणा से हम आपको अपने इन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित करेगी।"
श्रीकृष्ण से ऐसा कह कर कामधेनु ने अपने दूध से तथा देवताओं की प्रेरणा से देवराज इन्द्र ने ऐरावत की सूंड के द्वारा लाये हुए आकाशगंगा के जल से देवताओं के साथ श्रीकृष्ण जी का अभिषेक किया और उन्हें 'गोविन्द' (गो—इन्द्र, धेनु, स्वर्ग, विन्द प्राप्त होना) नाम से सम्बोधित किया। ऋषि गण, गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध और चारण—सबने अभिषेकोत्सव में भाग लिया। तीनों लोकों में आनन्द छा गया। गौओं ने पृथ्वी पर दूध की नदी बहा दी। नदियों में दूध और दूसरे रसों की बाद आ गयी। वृक्षों से धारा बहने लगी। बिना जोते-बोये ही खेतों में खूब अन्न उत्पन्न होने लगा। पर्वतों ने मणियाँ भेंट की। वन्य पशु भी शान्त स्वभाव वाले हो गये।
इन्द्र ने इस प्रकार श्रीकृष्ण का गौ और गोकुल के रक्षक एवं स्वामी के रूप में अभिषेक कर उनका नाम 'गोविन्द' घोषित किया और उनसे अनुमति प्राप्त कर देवताओं के साथ स्वर्गलोक को वापस चले गये।
नन्द बाबा ने एकादशी का व्रत रखा और जनार्दन भगवान् की पूजा की। वे द्वादशी को यमुना में स्नान करने गये। तब अँधेरा ही था। वे रात्रि के समय ही यमुना में घुस गये। वरुण के एक असुर सेवक ने उन्हें पकड़ लिया और अपने स्वामी के पास ले गया।
नन्द के खो जाने पर गोपों ने श्रीकृष्ण और बलराम को पुकारा। सुन कर भगवान् को ज्ञात हो गया कि नन्द बाबा को वरुणलोक में ले गये हैं। श्रीकृष्ण ने जल में प्रवेश किया और वरुणलोक चले गये।
वरुण ने श्रीकृष्ण की पूजा की और कहा, “आज ही मेरा जीवन सफल हुआ। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। प्रभो! मेरा मूढ तथा अज्ञानी सेवक आपके पिता जी को यहाँ लाया। आप कृपा करके मेरा अपराध क्षमा कीजिए। आपके पिता जी यहाँ हैं। इन्हें आप ले जाइए। आपके पिता जी यहाँ आये, इसी से मुझे आपके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ।" भगवान् श्रीकृष्ण अपने पिता जी को कर चले आये।
नन्द बाबा ने जो कुछ देखा था, उस सारे वृत्तान्त को गोपों को कह सुनाया। श्रीकृष्ण भगवान् के अतिरिक्त और क्या हो सकते हैं?
गोपों की तीव्र इच्छा हुई कि भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें अपने परमधाम का दर्शन करायें। सर्वज्ञ भगवान् यह जान गये। वे उन गोपों को यमुना के ब्रह्महद नाम के स्थान में ले गये और उनसे डुबकी लगवायी। वहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण के मायातीत परमधाम वैकुण्ठलोक के दर्शन किये। वहाँ उन्हें श्रीकृष्ण के भी दर्शन हुए। वैदिक स्तोताओं के मध्य में श्रीकृष्ण को विराजमान देख कर वे सब-के-सब बहुत ही आनन्दित एवं विस्मित हुए ।
श्रीकृष्ण ने एक बार गोपियों को वचन दिया था कि आगामी रात्रियों में वे उनके संग विहार करेंगी।
शरद ऋतु की रात्रि को देख कर श्रीकृष्ण ने अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमाया के सहारे रासक्रीड़ा करने तथा गोपियों की चिरकालीन अभिलाषा को पूर्ण करने का संकल्प किया। चन्द्रदेव की शुभ्र ज्योत्स्ना समस्त क्षिति मण्डल को विभासित कर रही थी। श्रीकृष्ण ने गोपियों को मोहित करने वाली तथा उनके मन को हरण करने वाली मधुर तान अपनी बाँसुरी पर उसी समय छेड़ दी।
प्रेमाग्नि को प्रदीप्त तथा भगवान् से मिलने की लालसा को अत्यन्त उद्दीप्त करने वाले उस मधुर संगीत को सुनते ही श्रीकृष्ण-प्रेम में विमोहित गोपियाँ एक-दूसरे से छिप कर श्रीकृष्ण से मिलने झटपट उनके पास चल पड़ीं। वेग से चलने के कारण उस समय उनके कुण्डल कानों में हिल रहे थे।
कुछ गोपियाँ दूध दुह रहीं थीं, वे दूध दुहना छोड़ कर; कुछ उफनते हुए दूध को छोड़ कर तथा कुछ पकती हुई खीर को बिना उतारे ही चूल्हे पर छोड़ कर चल पड़ीं। जो भोजन परस रही थीं वे परसना छोड़ कर, जो बच्चों को दूध पिला रही थीं वे दूध पिलाना छोड़ कर, जो पतियों की सेवा कर रही थीं वे सेवा-शुश्रूषा छोड़ कर तथा जो भोजन कर रही थीं वे भोजन करना छोड़ कर दौड़ पड़ीं। उस समय कुछ गोपियाँ उबटन लगा रही थीं, कुछ आँखों में अंजन लगा रही थीं, वे सब अपना काम अधूरा ही छोड़ कर उतावली में अपने वस्त्र आभूषण उल्टे-सीधे पहन झटपट श्रीकृष्ण के पास जाने के लिए दौड़ पड़ीं।
गोपियों के पति, माता-पिता, भाई और जाति-बन्धुओं ने रोका और बाधा भी डाली; किन्तु वे सम्मोहित की भाँति चली जा रही थीं। उनके मन का तो श्रीकृष्ण ने अपहरण कर लिया था; अतः घर की ओर उन्होंने मुड़ कर देखा तक नहीं ।
कुछ गोपियों को उनके घर वालों ने घर में बन्द कर दिया; अतः वे बाहर न निकल सकीं। तब उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये और श्रीकृष्ण का ध्यान करने लगीं। उसका मन तो पहले ही श्रीकृष्ण को अर्पित हो चुका था। अब उन्होंने अपने हृदय में उन्हें दृढ़ता से आसीन कर लिया। अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के विरह की असह्य वेदना की तीव्र अग्नि में उनके सब अशुभ संस्कार भस्म हो गये तथा ध्यान में भगवान् के मधुर आलिंगन के सुख से उनके पुण्य के संस्कार भी दूर हो गये; अतः उनके कर्मबन्धन उसी समय छिन्न-भिन्न हो गये। यद्यपि वे श्रीकृष्ण में जार-भाव ही रखती थीं तथा अपने प्रियतम के रूप में ही उनका ध्यान करती थीं, फिर भी इस गुणमय शरीर का परित्याग करने पर वे परमात्मा को प्राप्त हुईं।
भगवान् अव्यय, अनन्त तथा गुणातीत — तीनों गुणों से परे हैं। जीवों के नियन्ता होने के कारण लोक-कल्याण के लिए ही अपनी लीला को प्रकट करते हैं। काम से, क्रोध से, भय से, स्नेह से, सौहार्द्र से अथवा भक्ति से सारांश यह है कि चाहे जिस किसी भाव से जो मनुष्य भगवान् का ध्यान करता है, वह भगवान् को प्राप्त करता है। अतः आपको योगेश्वर के भी ईश्वर अजन्मा भगवान् के विषय में इस बात पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए। उनकी कृपा से निम्न योनिगत प्राणी भी मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।
जब गोपियाँ श्रीकृष्ण के निकट आ गयीं, तब उन्हें सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा, “सौभाग्यवती देवियो! मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ ? व्रज सब प्रकार से सुरक्षित तो है ? अब अपने यहाँ आने का प्रयोजन बतलाइए। रात्रि भयावनी है। हिंसक जीव-जन्तु इधर-उधर घूम रहे हैं। अतः तुम व्रज को वापस चली जाओ। यह स्थान स्त्रियों के लिए नहीं है। तुम्हारे माता-पिता, भाई-बन्धु और पति-पुत्र तुम्हें ढूँढ़ रहे होंगे। उन्हें चिन्तित न करो। तुमने वन की सुषमा तो देख ही ली, अब व्रज वापस लौट जाओ। तुम्हारे पति, बछड़े और बच्चे बिलख रहे होंगे। पति की सेवा-शुश्रूषा करो, बच्चों को दूध पिलाओ और गौओं को दुहो। यदि तुम लोग मेरे प्रेम-वश यहाँ आयी हो तो यह स्वाभाविक ही है; क्योंकि सभी प्राणी मुझसे प्रेम करते हैं।
"पति-प्रेम ही स्त्रियों का महान् धर्म है। स्त्री का परम धर्म है कि वह अति-प्रेम से अपने पति की सेवा करे। उसे अपने सम्बन्धियों की देख-भाल तथा बच्चों का पालन-पोषण करना चाहिए। जिन स्त्रियों को शुभ गति प्राप्त करने की अभिलाषा हो, उन्हें पातकी को छोड़ कर अन्य किसी भी प्रकार के पति का परित्याग नहीं करना चाहिए, चाहे वह दुष्ट, वृद्ध, रोगी या निर्धन, असभ्य और कुरूप ही क्यों न हो। कुलीन स्त्रियों को जार-कर्म बहुत ही निन्दनीय है। ऐसा करने से दुःख तथा अपयश मिलता है और स्वर्गप्राप्ति में भी बाधा पड़ती है। अतः यह सर्वथा हेय है। गोपियों । मेरे पास न रह कर भी तुम मुझसे प्रेम कर सकती हो जैसे मेरी लीला तथा गुणों का श्रवण, रूप का दर्शन, मेरा ध्यान तथा मेरे गुणों का कीर्तन इत्यादि; अतः तुम सब अपने-अपने घरों को वापस लौट जाओ।'
गोपियों ने कहा, "हे सर्वशक्तिमान् प्रभो। आपको इस प्रकार कठोर वचन नहीं कहने चाहिए। सर्वस्व परित्याग कर हमने आपके चरणों की शरण ली है। हमारा त्याग मत करें। जैसे भगवान् नारायण अपने भक्तों को अपनाते हैं, वैसे ही आप हमें स्वीकार कर लें। आप सब धर्मों का रहस्य जानते हैं। आपने यह सर्वथा ठीक ही कहा कि अपने पति, पुत्र, सम्बन्धी तथा भाई-बन्धु के प्रति निष्कपट तथा आज्ञाकारिणी होना तथा उनकी सेवा करना ही स्त्री का स्वधर्म है। आप ही हमारे गुरु और प्रभु हैं। अतः आपके आदेशानुसार हम अपने पति तथा दूसरों की आज्ञाकारिणी हैं। उन धार्मिक उपदेशों के ध्येय तो आप ही हैं। आप साक्षात् परमेश्वर हैं। आप ही हमारे परम प्रियतम, स्वामी, सम्बन्धी तथा सभी जीवधारियों की आत्मा है। आप ही हमारे वास्तविक पति हैं। ज्ञानी जन आपमें ही आनन्द प्राप्त करते हैं; क्योंकि आप उनके नित्य प्रिय आत्मा हैं। वे केवल आप ही से प्रेम करते हैं। पति, पुत्र अथवा दूसरों से क्या लाभ, जो कि दुःख के ही हेतु हैं। आप ही हमारे नित्य सुख-स्वरूप हैं।
"अतः हम सब पर दया कर अपनी सेवा करने की आज्ञा दें। हमारी चिर-सेवित आशा भंग न करें। हमें अपने चरणों से दूर न करें। हमारा चित्त, जो अब तक घर के काम में लगा रहता था, का तो आपने अब हरण कर लिया। हमारे पैर आपको छोड़ कर एक पग भी नहीं हटते; फिर हम व्रज को कैसे जायें और जा कर वहाँ करें भी क्या ?
"हे प्रियतम! आपकी मधुर मुस्कान, प्रेम-भरी चितवन और मनोहर संगीत से हमारे हृदय में जो अग्नि धधक उठी है, उसे अपने अधरामृत की रसधारा से बुझा दें अन्यथा आपकी विरहाम्रि में हम अपने-अपने शरीर को भस्म कर, योगियों की भाँति ध्यान द्वारा आपको प्राप्त करेंगी।
"हे कमलनयन प्रभो! हे वनवासियों के परम प्रिय ! लक्ष्मी जी को प्रमुदित करने वाले आपके चरण-कमलों का स्पर्श हमें एक बार वन में प्राप्त हुआ। जिस दिन से हमें यह सौभाग्य आपसे मिला, उसी दिन से हम किसी और के सामने एक क्षण के लिए भी ठहरने में असमर्थ हो गयी हैं। फिर भला हम किस प्रकार पति-पुत्रादिका की सेवा कर सकती है?
"जिन लक्ष्मी जी के कृपा-कटाक्ष प्राप्त करने के लिए सभी देवता उग्र तपस्या करते रहते हैं, वही लक्ष्मी आपके वक्षःस्थल में बिना किसी की प्रतिद्वन्द्विता के स्थान प्राप्त कर लेने पर भी तुलसी के साथ आपके भक्तों और सेवकों के ध्येय तथा पूज्य आपके चरण-कमलों की रज पाने की अभिलाषा किया करती है। हम भी आपकी उसी चरण-रज की शरण में आयी हैं। हे दुःख-हारी प्रभो! आप हम पर कृपा करें। एकमात्र आपकी सेवा की भावना से हमने अपने घर और कुटुम्ब का परित्याग कर आपके युगल चरणों की शरण ली है। आपकी मनोहर मुस्कान तथा चितवन से उद्दीप्त उग्र प्रेम की ज्वाला से हम दग्ध हो रही हैं। हमारी सेवा स्वीकार करें।
“घुँघराली अलकों से आच्छादित आपका मुख, सुन्दर कुण्डलों की आभा से दीप्त कपोल, सुधा-स्निग्ध अधर, मधुर मुस्कानयुक्त चितवन, शरणागतों को अभयदान देने वाली भुजाओं तथा लक्ष्मी को प्रमुदित करने वाले आपके वक्षःस्थल देख कर हम सब आप पर आत्मार्पण कर चुकी हैं और आपकी दासी हो गयी हैं।
"हे प्रियतम! तीनों लोकों में ऐसी कौन-सी स्त्री है जो आपकी वंशी की मधुर सुरीली तान से मुग्ध हो कर आपकी आराधना न करने लगे। आपकी इस त्रिलोक सुन्दर मोहिनी मूर्ति, जिसे देख कर गौ, पक्षी, वृक्ष और मृग भी पुलकित हो जाते हैं, को अपने नेत्रों से देख कर कौन अपने को रोक सकता है? यह तो स्पष्ट ही है कि जैसे आदि पुरुष भगवान् नारायण देवलोक के रक्षार्थ जन्म ग्रहण करते हैं, वैसे ही आप व्रज-मण्डल का भय और दुःख मिटाने के लिए प्रकट हुए हैं। अतः हे दीनबन्धो! आप अपनी इन दासियों के धड़कते हुए वक्षःस्थल और कुत्सित शिर पर कर-कमल रखें। "
योगेश्वरों के ईश्वर भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों की आर्तवाणी को सुन कर दया से द्रवित हो गये। यद्यपि वे अपने-आपमें ही रमण करते रहते हैं, फिर भी उन्होंने मुस्कराते हुए गोपियों को अपने साथ क्रीड़ा करने की स्वीकृति दे दी।
गोपियों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। भगवान् तो अपने स्वरूप में ही दृढ़ता से स्थित थे । उनकी प्रेम-भरी चितवन तथा मनमोहिनी मुस्कान गोपियों के मुखारविन्द को प्रफुल्लित कर रही थी। अद्भुत लीलाधारी भगवान् अच्युत तारिकाओं से घिरे हुए चन्द्रमा के समान उस समय सुशोभित हो रहे थे।
कभी श्रीकृष्ण जी स्वयं गीत गाने लगते, तो कभी गोपियाँ उनके गुणों का गायन करती। गोपियों के शत-शत झुण्ड के साथ भगवान् श्रीकृष्ण वैजयन्ती माला धारण किये हुए वृन्दावन को शोभायमान करते हुए विचरण करने लगे।
इसके पश्चात् उन्होंने यमुना के शीतल तट पर पदार्पण किया, जो कि श्वेत कपूर की तरह मालूम पड़ रहा था। कुमुदिनी की सुगन्ध से सुवासित आनन्दप्रद शीतल कपूर वायु यमुना की ओर से प्रवाहित हो रही थी। भगवान् ने गोपियों के साथ वहाँ क्रीड़ा की।
हाथ फैला, आलिंगन कर, उनकी चोटी, जंघा, कमर और स्तन का स्पर्श कर, नखक्षत कर, हास-परिहास कर, विनोदपूर्ण चितवन से देख कर और मुस्करा कर, इसी प्रकार की अन्य क्रीड़ाओं से उनके हृदय में शुद्ध दिव्य प्रेम उद्दीप्त कर उन्हें आनन्दित किया।
परम उदार तथा सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रास लीला कर उनका सम्मान किया। पर वे गर्व से फूल उठीं। संसार की समस्त स्त्रियों में वे अपने को ही सर्वश्रेष्ठ समझने लगीं।
गोपियों को अपने सुहाग पर गर्व एवं मान करते देख कर उनके मान को दूर करने तथा उन पर कृपा करने के लिए भगवान् वहाँ से अन्तर्धान हो गये।
श्री शुकदेव जी ने कहा—भगवान् के एकाएक अन्तर्धान हो जाने पर ब्रजांगनाएँ अधीर हो उठीं। उन्हें न देख कर उन्हें वैसा ही महान् दुःख हुआ जैसा कि यूथपति गजराज के बिना हथिनियों को होता है। उनका हृदय विरह की ज्वाला से जलने लगा। उनका चित्त श्रीकृष्ण की भावभंगिमाओं, तिरछी चितवन, मनोरम प्रेमालाप, लीला तथा चाल में इतना तन्मय हो गया था कि वे विभिन्न प्रकार से श्रीकृष्ण के समान ही व्यवहार करने लगीं। वे उनकी चेष्टाओं का अनुकरण करने लगीं और अपने को श्रीकृष्ण तक कहने लगीं।
चाल-ढाल, चितवन, मुस्कान, बोलचाल आदि में वे श्रीकृष्ण के समान ही व्यवहार करती थीं। उनमें वैसी ही गति तथा भावभंगिमा आ गयी। वे श्रीकृष्ण में इतनी तद्रूप हो गयीं कि वे एक-दूसरे से 'मैं श्रीकृष्ण हूँ' कहने लगीं।
वे सब परस्पर मिल कर ऊँचे स्वर से उन्हीं के गुणों का गान करने लगी और एक वन से दूसरे वन में श्रीकृष्ण को ढूँढने लगीं। वे वृक्षों से उन पुरुषोत्तम का पता पूछने लगी जो सभी प्राणियों के हृदय में तथा बाह्य जगत् में भी आकाश के समान का स्थित है।
वे कहती, "हे अश्वत्थ, पाकर और बरगद ! क्या तुम लोगों ने नन्दनन्दन को देखा है जो अभी-अभी अपनी प्रेम-भरी मुस्कान और चितवन से हमारा मन चुरा कर अदृश्य हो गये हैं? हे कुरबक, अशोक, नागकेशर, पुन्नाग और चम्पक ! क्या बलराम के छोटे भाई, जिनकी मुस्कान मात्र से मानिनियों के मान-मर्दन हो जाते हैं तथा क्रोधित युवतियों के क्रोध विदूरित हो जाते हैं, इस मार्ग से गये हैं? हे सौभाग्यवती तुलसी, गोविन्दचरणानुरागिनी! क्या तुमने अपने प्रियतम अच्युत को देखा है, जो भौरें से युक्त होने पर भी तुम्हें सदा अपने गले में धारण किये रहते हैं? हे मालती, मल्लिका, जाती और जूही! क्या तुम लोगों ने माधव को कहीं देखा है जो अपने कर-स्पर्श से तुम्हें आनन्दित करते हैं? हे रसाल, प्रियाल, पनस, कोविदार, जम्बू, अर्ख, बिल्व, बकुल, आम्र, कदम्ब, नीम तथा अन्यान्य तरुवरो! तुम सब पवित्र यमुना जी के तट पर विराजमान रह कर परोपकारार्थ ही जीवन धारण करते हो। हमें बतलाइए कि श्रीकृष्ण कहाँ हैं? जिस मार्ग से श्रीकृष्ण गये हैं, वह मार्ग हमें बतला दीजिए।
"हे पृथ्वी देवी! तुमने ऐसी कौन-सी उग्र तपस्या की है कि श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श प्राप्त करके आनन्दित एवं पुलकित हो रही हो? तुम्हारा यह उल्लास अभी श्रीकृष्ण के चरण के स्पर्श के कारण है या त्रिविक्रम के चरणों के कारण है अथवा वाराह भगवान् के अंग-संग के कारण है? हे प्रिय मृग! क्या भगवान् अच्युत अपने कमनीय वदन से तुम्हारे नेत्रों को आनन्द प्रदान करते हुए इस मार्ग से गये हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि वे इधर से गये हैं; क्योंकि श्रीकृष्ण की कुन्द-माला की सुगन्ध आ रही है जो कि उनकी प्रेयसी के आलिंगन के समय उनके वक्षःस्थल पर के कुंकुम से धूसरित हो गयी थी। हे तरुवरो! क्या बलराम के भाई एक हाथ अपनी प्रियतमा के कन्धे पर रखे हुए तथा दूसरे हाथ में कमल-पुष्प लिये हुए तथा तुलसी पर मतवाले भ्रमरों से घिरे हुए इस मार्ग से गये हैं? क्या उन्होंने अपनी प्रेम-भरी चितवन से तुम्हारी बन्दना को स्वीकार किया था? सखियो! आओ, इन लताओं से पूछें जो अपने पति वृक्षों की शाखाओं से लिपटी हुई हैं। श्रीकृष्ण ने अवश्य ही अपनी उँगलियों से इन्हें स्पर्श किया है, तभी तो ये आनन्द से पुलकित हो रही हैं।"
श्रीकृष्ण की खोज में इधर-उधर भटकते-भटकते वे थक गयीं। उनका प्रगाढ़ दिव्य प्रेम और भी विकसित हो चला। वे कृष्णमय हो कर भगवान की विभिन्न लीलाओं का अनुकरण करने लगीं। एक पूतना बन गयी और दूसरी कृष्ण बन कर उसका स्तनपान करने लगी। एक गाड़ी बन गयी तो दूसरी ने बाल कृष्ण बन कर रोते हुए उसे एक पैर से ठोकर मार उलट दिया। कोई सखी तृणावर्त दैत्य का रूप धारण किये हुए थी। कोई गोपी बाल कृष्ण की भाँति पाँव घसीट-घसीट कर रुनझुन की झनकार करती हुई घुटनों के बल चलने लगी। एक गोपी कृष्ण बनी तो दूसरी बलराम बन गयी और बहुत-सी गोपियाँ ग्वाल-बाल बन गयीं। एक गोपी वत्सासुर बनी और दूसरी बकासुर । एक गोपी उस गोपी, जो बत्सासुर बनी थी तथा दूसरी, जो बकासुरः बनी थी, को मारने लगी। एक गोपी श्रीकृष्ण की भाँति ही दूर गयी हुई गायों के नाम ले ले कर पुकारती हुई बाँसुरी बजाने का अभिनय करने लगी। दूसरी गोपियाँ 'वाह वाह' करके उसकी प्रशंसा करने लगीं।
एक गोपी, जिसका मन श्रीकृष्ण में तन्मय हो गया था, दूसरी सखी के गले में बाँह डाल कर चलने लगी और वहाँ उपस्थित दूसरी गोपियों से उसने कहा, |मैं ''कृष्ण हूँ। तुम सब मेरी मनोहर चाल देखो।" दूसरी गोपी ने कहा, "हे व्रजवासियो ! तुम इस वर्षा और तूफान से मत डरो। देखो, मैं तुम्हें छाया दे रहा हूँ।" ऐसा कहते हुए गोवर्धन-धारण का अनुकरण कर अपने उत्तरीय को एक हाथ से ऊपर तान लिया। एक गोपी बोली, "हे ग्वालो! भयंकर दावानि को देखो। तुम अपनी आँखें जल्दी से मूँद लो। मैं शीघ्र ही तुम्हारी रक्षा करूँगा।" एक गोपी दूसरी के कन्धे पर चढ़ कर अपने पैर को उसके शिर पर रखती हुई बोली, "रे दुष्ट साँप। तू यहाँ से चला जा। क्या तुझे पता नहीं कि मैं दुष्टों का दमन करने के लिए ही उत्पन्न हुआ हूँ।" एक गोपी ने यशोदा जी का अभिनय किया और दूसरी गोपी, जो कृष्ण बनी हुई थी, को तीसरी गोपी, जो ऊखल बनी हुई थी, से बाँध दिया और कहने लगी, "बरतन तोड़ कर मक्खन चुराने वाले चोर को मैंने पकड़ लिया है।" श्रीकृष्ण बनी हुई गोपी अपने दोनों हाथों से अपना मुख ढक कर काँपने लगी, मानो कि वह डर रही हो।
इस प्रकार वृन्दावन के वृक्ष और लताओं से श्रीकृष्ण का पता पूछते हुए उन गोपियों ने वन में एक स्थान पर भगवान् के चरण-चिह्न देखे। वे कहने लगी, "अवश्य ही ये चरण-चिह्न उदारमना नन्दनन्दन के हैं; क्योंकि इनमें ध्वजा, पद्य, गदा, वज्र, अंकुश, जी आदि के चिह्न दीख रहे हैं।" उन चरण-चिह्नों का अनुसरण करती हुई जब वे थोड़ा आगे बढ़ीं, तो उन चिह्नों के साथ एक युवती के पद-चिह्न मिले हुए पाये। इससे उनके हृदय को बहुत आघात पहुँचा।
गोपियाँ आपस में कहने लगीं, "ये किसके पद-चिह्न है? जैसे हथिनी अपने प्रियतम गजराज के साथ जाती है, वैसे ही नन्दनन्दन के कन्धे पर हाथ रख कर जाने वाली यह युवती कौन है? अवश्य ही इसने सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण की हार्दिक आराधना की होगी और उन्हें विशेष रूप से प्रसन्न किया होगा, तभी तो उन्होंने: प्रसन्न हो कर हमें यहाँ छोड़ दिया और उसे एकान्त में ले गये। हे सखिया। भगवान् के चरण-कमल की रज भी धन्य है; क्योंकि ब्रह्मा, रुद्र और लक्ष्मी देवी भी अपने अशुभ को नष्ट करने के हेतु से उसे अपने सिर पर धारण करते हैं।
"इस युवती के चरण-चिह्न तो हमारे हृदय में बड़ा ही क्षोभ उत्पन्न कर रहे है क्योंकि यह अच्युत को एकान्त में ले जा कर अकेले ही उनके अधरामृत का पान कर रही है। यहाँ उस गोपी के पदचिह्न नहीं दिखायी देते। ऐसा प्रतीत होता है कि उसके सुकुमार चरणों में घास और काँटे चुभने के कारण प्रेमी भगवान् ने उसे अपने कन्धे पर चढ़ा लिया होगा। युवती को उठा कर ले जाने के कारण श्रीकृष्ण के चरण-चिह्न अधिक गहरे हैं। यहाँ देखो, भारी बोझ से प्रेमी कृष्ण के चरण-चिह्न कितने गहरे पड़े। हैं। यहाँ उन्होंने अवश्य ही अपनी प्रेयसी को कन्धे पर चढ़ाया होगा। यहां फूल चुनने के लिए उन्होंने उसे नीचे उतार दिया है और केवल अंगूठों पर खड़े हुए है; क्योंकि उनके चरण यहाँ पूर्ण रूप से चिह्नित नहीं हुए। उस गोपी के केश सँवारने तथा उसकी चोटी में फूल गूंथने के लिए यहाँ अवश्य ही बैठे रहे होंगे।"
भगवान् श्रीकृष्ण आत्माराम हैं। वे अपने-आपमें ही पूर्ण हैं। वे अद्वैत तथा अखण्ड हैं। वे नित्य शुद्ध हैं। वे मल, कामना तथा वासना से मुक्त हैं। वे मायापति हैं। माया उनको स्पर्श नहीं कर सकती। वे सदा अद्वैत भावना में ही स्थित रहते हैं, द्वैत में नहीं। वे व्रजांगनाओं की काम-चेष्टा से आकर्षित नहीं हुए थे। उनमें काम-वासना की कैसे कल्पना की जा सकती है? फिर भी पूर्ण ब्रह्म ने संसार को काम-परवश व्यक्तियों की दयनीय तथा दुःखपूर्ण स्थिति दिखलाने के लिए उस गोपी के साथ क्रीड़ा की।
इस प्रकार वे गोपियाँ त्रिया-चरित्र का प्रदर्शन करती हुईं तथा एक-दूसरे को श्रीकृष्ण के चरण-चिह्न दिखलाती हुई वन-वन में भटकती फिर रही थीं।
अन्य गोपियों को छोड़ कर भगवान् श्रीकृष्ण जिस गोपी को वन में ले गये थे, वह अपने को समस्त गोपियों से समझने लगी। उसने समझा, “प्रियतम श्रीकृष्ण अपनी दूसरी प्रेमी गोपियों से मुझे ही अधिक मान देते हैं।" वह गर्व से फूल उठी और वन के मध्य में आ कर भगवान् से कहने लगी, “प्रियतम! मुझसे अब तो और नहीं चला जाता; अतः जहाँ आप चलना चाहें, मुझे उठा कर ले चलें।"
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "अच्छा प्रिये! अब तुम मेरे कन्धे पर चढ़ लो।"
ज्यों ही गोपी उनके कन्धे पर चढ़ने लगी, त्यों ही वे अन्तर्धान हो गये। वह युवती धाड़ मार कर रोने लगी। वह दुःखित हो कहने लगी, “हे मेरे स्वामी हे मेरे प्रियतम! हे जीवन-धन। आप कहाँ हैं? हे विशाल बाहुओं वाले। आप कहाँ चले गये हैं? हे प्रिय सखे। अपने दर्शन से मुझे धन्य बनायें। मैं आपकी असहाय दासी हूँ।"
वे गोपियाँ सर्वशक्तिमान् भगवान् के चरण-चिह्नों का अनुसरण करती हुई वहाँ आ पहुँची और कुछ ही दूर पर भगवान् द्वारा परित्यक्त अपनी सखी को दुःखित तथा अचेत पाया। वे सब उसके पास गयीं और उससे यह वृत्तान्त सुना कि कैसे उसने भगवान् की विशेष कृपा का आनन्द लूटा और क्योंकर उसने अपनी कुटिलता से उसे अपने हाथों से गंवा दिया। उसकी बात सुन कर गोपियाँ बहुत ही आश्चर्यचकित हुई।
वन में जहाँ तक चन्द्रिका का प्रकाश था, वहाँ तक वे उन्हें ढूँढ़ती रहीं। उसके आगे जहाँ अन्धकार था, वहाँ से उन्होंने ढूंढ़ना बन्द कर दिया। उनके हृदय श्रीकृष्णमय हो रहे थे। वे केवल उन्हीं की चर्चा करती रहीं तथा उन्हीं की लीलाओं का अभिनय करती रहीं। वे भगवान् में तन्मय हो रही थीं। वे केवल उन्हीं के गुणानुवाद का गायन करती थीं। उन्हें अपने घर की याद ही न रही। इस प्रकार श्रीकृष्ण के ध्यान में लीन गोपियाँ यमुना जी के उसी तट पर लौट आयीं और उनके पुनरागमन की प्रतीक्षा एवं उत्कण्ठा में एक साथ मिल कर श्रीकृष्ण के गुणों का गायन करने लगी।
श्रीकृष्ण के विरहावेश में गोपियाँ गाने लगीं, “आपके जन्म से ब्रज धन्य हो गया है। तभी तो देवी लक्ष्मी यहाँ नित्य-निरन्तर निवास करने लगीं हैं। हम आपकी दासी हैं और वन में आपके लिए मारी मारी फिर रही हैं। कृपा करके हमें दर्शन दें, हम आपके लिए ही जी रही हैं। हम वन में आपको सर्वत्र ढूँढ़ती हुई इधर-उधर भटक रही हैं।
"हे प्रभु! हे आनन्ददाता! हे वरदाता! हम आपकी परिचारिका है। निर्मल सरोवर में पूर्ण विकसित शरत्कालीन कमल के सौन्दर्य का अपहरण करने वाले अपने नयन - बाण से हमारे हृदय को आहत कर फिर हमें निराश करना क्या आपके लिए स्त्री-हत्या नहीं है?
"हे पुरुषोत्तम! यमुना के विषाक्त जल के विनाश से, अजगर-रूप-धारी अघासुर से, आँधी, पानी और बिजली के प्रकोप से, दावानल से, वृषभासुर तथा व्योमासुर के समान दैत्यों से सभी प्रकार के भयों से आपने हमारी बारम्बार रक्षा की है।
"निश्चय ही आप यशोदानन्दन हैं तथा सभी शरीरधारियों के अन्तर्यामी है। ब्रह्मा जी की प्रार्थना से विश्व की रक्षा करने के लिए आप यदुवंश में अवतीर्ण हुए हैं।
"हे प्रियतम! हे यदुवंशशिरोमणे। अपने उन मंगलकारी कर-कमलों को हमारे शिर पर रख दें, जो सभी प्रकार के वर प्रदान करने वाले हैं, जिनसे आप लक्ष्मी जी को पकड़े हुए हैं तथा जिनसे आप भयंकर संसार से भयभीत अपने शरणागतों को अभय-दान देते हैं।
"हे व्रजवासियों के दुःखहर्ता वीरशिरोमणे। अपने भक्तों के मद-मर्दन करने वाली मधुर मुस्कान वाले प्रभो! हे प्रिय सखा। हम आपकी दासी हैं। हम दीन अबलाओं को स्वीकार कर अपना सलोना मुख-कमल दिखलाओ।
“अपने उन चरण-कमलों, जो शरणागत प्राणियों के सारे पापों को दूर कर देते हैं, जो तृणचर पशुओं पर भी दया करते हैं, जो लक्ष्मी जी द्वारा सदा-सर्वदा परिसेवित हैं, जो समस्त ऐश्वयों की खान हैं तथा जिन्हें आपने कालिय नाग के फणों पर रखा था, को हमारे वक्षःस्थल पर रखें। दया करके अपने उन चरणों को हमारे वक्षःस्थल पर रख हमारे हृदय की व्यथा एवं ज्वाला को शान्त कर दें।
"हे कमलनयन प्रभो! हे दयामय! हम आपके लिए अचेत हो रही हैं, हमें ज्ञानियों को भी आनन्द प्रदान करने वाली अपनी मधुर वाणी तथा अपने नयनामृत से सान्त्वना दें।
"आपका लीलामृत सन्तप्तों के लिए जीवन सर्वस्व है। ज्ञानी और भक्त जनों ने इसकी महिमा का बहुत बखान किया है। आपकी मधुर तथा पावन लीला-कथा के श्रवण करते ही वह तत्काल सारे पाप ताप को मिटा कर परम मंगल प्रदान करती है। वह सभी के हृदयों में शान्ति लाती है। जो इनका गायन तथा अभिनय करते हैं, वे इस भूलोक में सबसे बड़ा दान करते हैं।
"हे कपटी ! हे प्यारे ! आपकी मधुर मुस्कान, हृदयस्पर्शी हास्य, प्रेम-भरी चितवन तथा मनोहारी क्रीड़ाओं का ध्यान बहुत ही आनन्ददायी है। आपकी प्रेम की बातें हमारे हृदय में गहरी प्रवेश कर गयी हैं। वे हमारे मन को क्षुब्ध बना रही है।
"हे स्वामी! आपके चरण कमल के सदृश सुकोमल है। जब आप गौओं को चराने के लिए व्रज से बाहर जाते हैं, तो इस आशंका से हमारा मन अशान्त हो जाता है कि कहीं आपके चरणों में कठोर कंकड़, तिनके अथवा काँटे न चुभ जायें।
"हे वीर! दिन ढलने पर हमें आपकी मुस्कान के प्रायः दर्शन होते हैं, जिस पर काली अलकें लटक रही होती हैं तथा गौओं के खुर से उड़-उड़ कर धूल पड़ी हुई होती है। उस समय का आपका वह सौन्दर्य हमारे हृदय में प्रेमाग्नि प्रज्वलित करता तथा आपके मिलन की आकांक्षा को उद्दीप्त करता है।
"हे आनन्ददायक! हे दुःखहारी प्रभो! जिन चरण-कमलों की बन्दना से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है, जिनकी आराधना पद्मजात ब्रह्मा भी करते हैं, जो धराधाम को अलंकृत करते हैं, आपत्ति तथा विपत्ति में जो स्मरणीय हैं तथा जिनकी सेवा से शान्ति प्राप्त होती है, ऐसे अपने चरण-कमलों को हमारे वक्षस्थल पर रखिए।
"हे वीरशिरोमणे! आपका अधरामृत, जो हमारे हृदय की आकांक्षा को बढ़ाने वाला है, जो समस्त शोक-सन्ताप का विनाशक है, जिसका उपभोग कर आपकी सुरीली बाँसुरी पूर्ण रूप से आनन्द लेती है, जो दूसरी समस्त आसक्तियों को विस्मृत करा देता है तथा जो मन की समस्त विषय-वासनाओं को नष्ट कर डालता है, का हमें पान करने दें।
"जब आप दिन में वन को चले जाते हैं, तब आपको देखे बिना हमारे लिए, एक-एक पल युग के समान हो जाता है। जब हम घुँघराली अलकों से सुशोभित आपके सुन्दर मुखारविन्द को देखती हैं, तब हम पलकों के विधाता मन्द-बुद्धि ब्रह्मा की भर्त्सना करने लगती हैं; क्योंकि वे पलकें बार-बार गिर कर हमारे निर्निमेष अवलोकन में विक्षेप उपस्थित करती हैं।
"हे अच्युत ! हम अपने पति-पुत्र, भाई-बन्धु आदि का परित्याग कर आपके पास आयी हैं और आपको हमारे यहाँ आने का कारण भी विदित ही है। आपकी दिव्य बाँसुरी के सुरीले संगीत से मोहित हो कर हम यहाँ आयी हैं।
"हे कपटी ! आपके अतिरिक्त भला दूसरा अन्य कौन होगा जो उन स्त्रियों का त्याग करेगा जिन्होंने आप पर विश्वास किया। हे प्रियतम! आपका सस्मित मधुर मुख, आपकी प्रेम-भरी चितवन, श्री लक्ष्मी जी के वास स्थान आपके विशाल वक्षःस्थल का सौन्दर्य — इन सबका स्मरण कर हम काम से विदग्ध रही हैं तथा हमारा मन अधिकाधिक मुग्ध होता जा रहा है।
"हे प्रियतम! समस्त व्रजवासियों के दुःख नष्ट करने तथा संसार का कल्याण करने के लिए ही आपका अवतार हुआ है। हमारा हृदय आपके लिए तड़प रहा है। है प्रभो! कृपण न बने। हम आपको ही चाहती है। अतः हमें भी थोड़ी ऐसी दवा दे दें जिससे हमारे हृदय की पीड़ा शान्त हो जाये।
"हे प्रियतम! आप उन सुन्दर सुकुमार चरण-कमलों से इस घोर जंगल में भटक रहे हैं, जिन्हें हम अपने कठोर स्तनों पर बहुत धीरे से रखती थीं कि कहीं हमसे उन्हें पीड़ा न पहुँचे। हे प्रभो! हमारा समस्त जीवन आपमें ही केन्द्रित है। आप ही हमारे प्राण है। क्या आपके चरणों में इन कंकड़ियों से पीड़ा नहीं होती ? इस वन भूमि पर बिखरी हुई ककड़ियों से आपके कोमल चरणों को कहीं चोट न लग जाये, यह सोच कर हमें चक्कर आ रहा है।"
इस भांति गोपियाँ उच्च स्वर से श्रीकृष्ण का गुणगान करने लगीं। वे श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए क्रन्दन करने लगीं और उनका वह रुदन ही गान के रूप में फूट निकला। ठीक उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण पीताम्बर तथा वन-माला धारण किये हुए उनके बीच में प्रकट हो गये। उस समय उनका सस्मित मुख-कमल कामदेव को भी प्रलोभित करने वाला था।
श्रीकृष्ण को वापस आया देख गोपियाँ आनन्द से विकसित नेत्रों के साथ वैसे ही उठ बैठीं, जैसे मृत शरीर में पुनः प्राणों के आ जाने पर शरीर के अंग-प्रत्यंग नवजीवन प्राप्त कर पुनः अपने-अपने काम करने लग जाते हैं।
एक गोपी ने बड़े आनन्द से श्रीकृष्ण के कर-कमलों को अपने दोनों हाथों में ले लिया और उन्हें सहलाने लगी। दूसरी गोपी ने श्रीकृष्ण की चन्दन-चर्चित भुजाओं को अपने कन्धे पर रख लिया। तीसरी गोपी ने कठोर भूमि में भटकने से उनके पीड़ित चरण-कमलों को अपने वक्षःस्थल पर रख लिया। एक अन्य गोपी अपने निर्निमेष नयन-पात्रों से उसके मुख-कमल का सुधामृत पान करने लगी। परन्तु जैसे सन्त पुरुष भगवान् के चरणों की सेवा से कभी तृप्त नहीं होते, वैसे ही वे भी तृप्त नहीं होती थीं। दूसरी गोपी ने नेत्रों के मार्ग से भगवान् को अपनी हृदय-गुहा में आसीन कर अपने नेत्रों को बन्द कर लिया और ध्यान-स्थित योगियों के समान परमानन्द में मग्न हो गयी!
श्रीकृष्ण के दर्शन से सभी गोपियाँ बहुत ही आनन्दित हुईं। उनके विरह के कारण गोपियों को जो दुःख हुआ था, उससे वे वैसे ही मुक्त हो गयीं जैसे मुमुक्षु जन आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर लेने पर संसार की पीड़ा से मुक्त हो जाते हैं। विरह-वेदना से मुक्त हुई उन गोपियों से घिरे हुए सौन्दर्यशाली अच्युत परम शोभायमान लग रहे थे; ठीक वैसे ही जैसे कि परमेश्वर अपने नित्य ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, श्री आदि शक्तियों से परिवृत होने पर सुशोभित होता है।
उसके पश्चात् श्रीकृष्ण उन गोपियों के साथ यमुना जी के रेतीले तट पर गये, जहाँ सुविकसित कुन्द-पुष्पों की मधुर सुरभि से उन्मत्त भ्रमर इधर-उधर मंडरा रहे थे। शरच्चन्द्र रजत ज्योत्स्ना से रात्रि का अन्धकार तो पहले ही विदूरित हो चला था, वह स्थान अत्यन्त सुहावना प्रतीत हो रहा था। सुकोमल रजत बालुका कण से आच्छादित सरिता-तट ऐसा लगता था मानो यमुना जी ने स्वयं अपनी लहरों के हाथों से सुचिकण बना रखा है। श्रीकृष्ण के दर्शन के आनन्द से गोपियों के हृदय के ताप मिट गये। जिस प्रकार श्रुतियाँ आत्म-साक्षात्कार का प्रतिपादन करते हुए मनुष्य को आप्तकाम बना देती हैं वैसे ही गोपियाँ भी पूर्णकाम हो गयीं। उन्होंने अपने बदन में लगी हुई केसर के रंजित अपनी ओढ़नी को प्रियतम श्रीकृष्ण के लिए बिछा दिया।
तब योगेश्वरों के हृदय सिंहासन पर विराजमान रहने वाले सर्वशक्तिमान् भगवान् गोपियों की ओढ़नी पर बैठ गये। गोपी-वृन्द के मध्य में बैठे हुए वे बहुत ही सौन्दर्यपूर्ण प्रतीत हो रहे थे। गोपियों ने उनकी पूजा की। तब उन्होंने अपना एक ऐसा रूप धारण किया जिसमें त्रैलोक्य का सौन्दर्य समाश्रित था। गोपियों ने हृदय में प्रेम को उद्दीप्त करने वाली मधुर मुस्कान तथा प्रेमपूर्ण चितवन से उनका सम्मान किया कर- युगल तथा चरण-कमलों को अपनी गोद में रख लिया। वे उनकी सराहना कर रही थीं और कभी कुछ रूठी-सी उलाहने के स्वर में बातें करती थीं। गोपियों ने कहा, "कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो प्रेम करने वालों से ही प्रेम करते हैं और कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो प्रेम न करने वालों से भी प्रेम करते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं, जो न तो प्रेम करने वालों से प्रेम करते हैं और न ही प्रेम न करने वालों से। इसका कारण आप कृपा करके स्पष्ट कीजिए।" भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "सखियो ! जो प्रेम करने पर प्रेम करते हैं, उनका प्रेम स्वार्थपूर्ण है। वे अपने स्वार्थपूर्ण हितों से ही प्रेरित होते हैं। उनमें न तो सौहार्द्र है और न धर्म । उनका प्रेम केवल स्वार्थ के लिए ही है। वास्तव में वे एक-दूसरे से प्रेम नहीं करते, वरन् अपने से तथा अपने स्वार्थ से ही प्रेम करते हैं। उनका प्रेम केवल आत्म-तृप्ति के लिए है, इसके अतिरिक्त उनका और कोई प्रयोजन नहीं।
"जो लोग प्रेम न करने वालों से प्रेम करते हैं, वे माता-पिता की श्रेणी के हैं। और करुणा तथा स्नेह से पूर्ण होते हैं। उनका व्यवहार धर्म तथा हितैषिता से अनुशासित होता है। ऐसे मनुष्य दो प्रकार के होते हैं—दयालु तथा सहृदय । इनमें से प्रथम कोटि के लोग महान् पुण्य अर्जन करते हैं तथा दूसरी कोटि के लोग लोगों की अटूट मैत्री प्राप्त करते हैं।
"इनके अतिरिक्त जो तीसरी श्रेणी के व्यक्ति हैं, जो प्रेम करने वालों से भी प्रेम नहीं करते, फिर प्रेम न करने वालों से प्रेम करने का तो उनके सामने प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसे लोग चार प्रकार के होते हैं। एक तो वे जो आत्मा में ही लीन रहते हैं. उन्हें बाह्य जगत् की चेतना ही नहीं रहती। दूसरे वे जो कृतकृत्य हो चुके हैं। तीसरे प्रकार के लोग कृतघ्न हैं तथा चौथे वे जो अपने हितैषी को भी आघात पहुँचाते हैं।
"हे सखियो। मैं इन सब श्रेणियों में से किसी में नहीं हूँ। मैं अपने प्रेम करने वालों से आसक्त नहीं होता; परन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं कि मैं उनसे प्रेम नहीं करता। मैं उनके प्रेम को प्रगाढ़ करने के लिए, उनके हृदय को और अधिक अपनी ओर आकर्षित करने के लिए ही वैसा करता हूँ जिससे उनका हृदय पूर्णतया मुझमें ही लगा रहे। तब उन्हें किसी वस्तु की चिन्ता नहीं रहेगी। वे नित्य निरन्तर मुझसे ही प्रेम करेंगे तथा मेरा ही चिन्तन करेंगे। जैसे किसी निर्धन व्यक्ति को कुछ धन मिल जाये और फिर खो जाये तो वह उसी धन के विषय में चिन्तन करता रहता है, और कुछ नहीं सोचता, वैसे ही जब मैं भक्तों से मिल कर बार-बार छिप जाता हूँ, तो उनके सतत ध्यान का विषय बन जाता हूँ ।
"यद्यपि मुझे देवताओं के समान अमर जीवन प्राप्त है, फिर भी मैं तुम्हारी उत्तम सेवा का बदला कभी नहीं चुका सकता। मेरे साथ तुम्हारा यह सम्बन्ध सर्वथा निर्मल तथा निर्दोष है। तुमने मेरे लिए कठोर पारिवारिक बन्धन को तोड़ डाला है। मैं सदा के लिए तुम्हारा ऋणी हूँ। तुम्हारी सौम्यता ही तुम्हारी भक्ति का प्रतिफल है। तुम्हारी धर्मपरायणता पूर्णतः फलदायी हो!"
श्रीकृष्ण जी के प्रति गोपियों का प्रेम शारीरिक काम-वासना-जन्य प्रेम न था । उनके लिए भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् परमात्मा थे, परमात्मा के चल-रूप थे। उनमें श्रीकृष्ण के प्रति अगाध श्रद्धा थी। उनका ध्यान आते ही वे अपने सांसारिक कार्यों की सुध-बुध को खो कर कृष्ण प्रेम में तन्मय हो जाती थीं।
शैशवावस्था से ही भगवान् श्रीकृष्ण ने उनको मोहित कर लिया था। वे बहुत ही रूपवान् बालक थे। सौन्दर्य की मूर्ति थे। अतः गोपियाँ उनके जन्म से ही उनसे प्रेम करने लगीं। वे श्रीकृष्ण को अपने बालको की भाँति दुलारती तथा वात्सल्य स्नेह रखती थीं। व्रज की गोपकुमारियाँ उनसे अपने सहोदर भाई की भाँति स्नेह करती हैं, क्या कभी भाई-बहन में कामुक प्रेम सम्भव है? जैसे बइन अपने भाई से स्नेह करती है, उसे दुलारती है तथा उसके साथ खेलती है, वैसा ही प्रेम गोपियों का श्रीकृष्ण के साथ था।
श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों के प्रेम ने शनैः-शनै दिव्य प्रेम का रूप धारण कर लिया। दही मथते समय, कुएँ से जल निकालते समय भी उनका ध्यान श्रीकृष्ण में ही लगा रहता था। स्नान करते समय वे उनके ही गुणों का वर्णन करती रहती थी। भोजन करते समय तथा सदा-सर्वदा ये उनके विषय में ही सोचा करती थीं। इस प्रकार भगवान् के सतत स्मरण से उनका चित्त कृष्णमय हो गया।
सभी प्राणियों में निद्रा, आहार, भय और मैथुन की प्रवृत्ति समान रूप से पायी जाती है; अतः यह हो सकता है कि वयस्क होने पर गोपियों में भी अंग-संग की कामना जाग्रत हुई हो, परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों के हृदय से सुपरिचित थे। उन्होंने उनकी काम वासना का उन्मूलन कर उनके हृदय को उचित दिशा में मोड़ दिया। इसी लक्ष्य को ध्यान में रख कर भगवान् श्रीकृष्ण ने गोपियों के संग रास लीला की।
रासलीला के समय वे अनेक श्रीकृष्ण का रूप धारण कर लेते थे। गोपियाँ आश्चर्यचकित यह सब देखती ही रह जातीं। इस अलौकिकता के कारण उनकी शारीरिक प्रेम की चाह जाती रही। आकाश से उन्होंने देवों को पुष्प वृष्टि करते हुए. देखा; गन्धर्व, विद्याधर, यक्ष, चारण इत्यादि को स्तुति गान करते हुए सुना। उन्होंने वैषयिक सुख से करोड़ों गुना अधिक आनन्द रासलीला के समय श्रीकृष्ण के सुखमय संग से उपभोग किया। उन्होंने समाधि-सुख का आनन्द लूटा।
"यह 'यह' है, यह 'वह' है "- यह पार्थक्य भाव उस मनुष्य का केवल भ्रम है जिसका मन विक्षिप्त और अनियन्त्रित है तथा भगवान् के साथ सम्बद्ध नहीं है। अस्थिर मन वाला व्यक्ति विषय-पदार्थों में बहुलता मानने की भूल करता है। यह भूल उसे पुण्य-पाप, उचित-अनुचित तथा अच्छे-बुरे मार्ग पर ले जाती है। इन्द्रियों की स्वाभाविक बहिर्मुखी वृत्ति द्वारा निर्मित भेद के कारण भ्रान्त एवं आश्चर्यचकित हुआ अनियन्त्रित प्राणी संसार में अपना अलग व्यक्तित्व मान बैठता है और कामनाएँ उत्पन्न करना प्रारम्भ कर विषय - सुख भोगता है। मन, इन्द्रिय तथा बुद्धि-कल्पित भेद की यह भ्रान्त धारणा ही कर्म, अकर्म तथा विकर्म का कारण है। जिस व्यक्ति में पुण्य-पाप, उचित-अनुचित तथा भले-बुरे की भावना विद्यमान है, यह कर्म, अकर्म तथा विकर्म का भेद केवज उन्ही के लिए है। भेद-भाव के ज्ञान से ही यह भ्रम उत्पन्न होता है जिससे उचित-अनुचित भला-बुरा तथा पाप-पुण्य का अनुभव या विचार होता है। जिनमें उचित-अनुचित, भले-बुरे तथा पाप-पुण्य की भावना है, केवल उन्हीं मनुष्यों के लिए विहित, अविहित तथा निषिद्ध कर्मों का वेदों ने वर्णन किया है। व्यक्ति को अहंभाव का परित्याग कर तथा इन्द्रियों एवं मन को नियन्त्रित रख कर अखिल विश्व की समस्त वस्तुओं में एक ही ब्रह्म के दर्शन करने चाहिए। मनुष्य को अपने आत्म तत्व का, संसार में सुख एवं एकता का अनुभव करना तथा इस व्यापक विश्व का अपनी आत्मा में और अपनी आत्मा का परमात्मा में दर्शन करना चाहिए।
जो बुरे और भले की भावना से ऊपर उठ चुका है, वह अविहित कर्मों को कुपरिणाम के भय की भावना से करने में नहीं हिचकता और न ही विहित कमों को इस आशा से करता है कि उनसे पुण्य की प्राप्ति हो। वह केवल शिशुवत व्यवहार करता है। उसमें उचित-अनुचित का भाव, शास्त्रीय उपदेशों पर आधारित न हो कर स्वाभाविक होता है। उसने अहंभाव को पूर्णतः नष्ट कर डाला है। संसार के नीति-नियम उसे प्रभावित नहीं करते। उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है। वह कर्म से ऊपर उठ चुका है। कर्म उसको स्पर्श नहीं कर पाते हैं। जगत् की शिक्षा के हेतु वह विहित कर्मों को करता तथा अविहित का परित्याग करता है। वह उचित-अनुचित- दोनों की सीमा रेखाओं का अतिक्रमण कर चुका है।
इस अद्भुत एवं अभूतपूर्व अनुभव से गोपियों को दृढ विश्वास हो गया कि श्रीकृष्ण एक साधारण मानव नहीं। यद्यपि गोपियाँ कभी-कभी उन्हें नन्द-यशोदा के पुत्र के रूप में ही समझतीं, फिर भी उन्हें दृढ निश्चय हो चुका था कि श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं। भगवान् की योग-माया के कारण रास-लीला के समय तक श्रीकृष्ण के भगवद्-स्वरूप की भावना उनमें बलवती न थी।
श्रीमद्भागवत (स्कन्ध १०, अध्याय ३१) के गोपीगीत में इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि गोपियाँ श्रीकृष्ण को परमेश्वर मानती थीं। वे काम-वासना के लेशमात्र से मुक्त हो गयी थीं और भगवान् के प्रेम के बन्धन से आबद्ध थीं।
श्रीकृष्ण के बाल्य काल की अतिमानवीय लीलाओं ने गोपियों में उनक सर्वज्ञता तथा सर्वशक्तिमत्ता में विश्वास उत्पन्न कर दिया। भला क्या इस संसार में इतना निम्न कोटि का मूर्ख हो सकता है जो सम्पूर्ण मानवीय आकांक्षाओं को पूर्ण करने वाले भगवान् के प्रति निम्न वासनात्मक प्रेम रखे ? मानव-अनुभवगम्य सम्पक सुखों के भगवान् ही परम कारण है। भगवान् का साक्षात् दर्शन कर लेने पर ऐसा कोई महान मूर्ख है जो क्षुद्र सुख की कामना रखे? मिश्री की डली प्रचुर मात्रा में प्राप्य होने पर क्या कोई गुड़ की आकांक्षा करेगा ?
इससे यह स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का प्रेम दिव्य था। उनमें अनन्य भक्ति थी और वे कामोपभोग की सभी प्रकार की निम्न तथा क्षुद्र तृष्णाओं से मुक्त थी।
रासलीला वह दिव्य क्रीड़ा है जिसमें भक्त प्रेम के द्वारा भगवान् से ऐक्य प्राप्त करता है। रस प्रेम का मधुरतम तत्त्व है। यह दिव्य प्रेम की वह अभिव्यक्ति है जो भक्त को भगवत्साक्षात्कार के उच्चतम शिखर पर ले जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण की रासलीला रहस्यों का रहस्य है। यह अत्यन्त गुह्य है, यह बौद्धिक विलास का विषय नहीं। यह तो भक्तों के मूक ध्यान का विषय है। भगवद्-भक्ति-हीन अश्रद्धालु आलोचकों पर इसे प्रकट नहीं करना चाहिए। श्रद्धा और भक्तिपूर्वक इसका पाठ करना चाहिए। पूर्ण आत्मार्पण तथा भगवान् का सायुज्य प्राप्त कराने वाली भक्ति की श्रेष्ठतम विभूति माधुर्य रस का इसमें वर्णन है।
श्रीकृष्ण ने पवित्र प्रेम द्वारा विषय-वासना को नष्ट करने के लिए ही रासलीला की थी। उन्होंने रासलीला द्वारा जगत् को यह शिक्षा दी कि किस प्रकार राग को वैराग्य तथा प्रेम में परिणत किया जाये तथा किस प्रकार मन को काम-वासना से हटाया जाये। उन्होंने प्रदर्शित किया कि माधुर्य-रस द्वारा व्यक्ति आत्म-निवेदन कर सकता है तथा अपने हृदयेश भगवान् का सायुज्य प्राप्त कर सकता है।
जिस समय श्रीकृष्ण ने रासलीला की, उस समय वे केवल दस वर्ष के थे। नृत्य-काल में गोपियों ने अपने अन्तर, बाह्य, चतुर्दिक् तथा सर्वत्र ही श्रीकृष्ण को देखा। वे अपने घर, पति, पुत्र तथा माता-पिता-सबकी सुध-बुध खो बैठीं। उनका हृदय भगवान् श्रीकृष्ण में लीन गया। प्रेमाग्नि ने उनके हृदय को विगलित कर दिया। प्रेम-रस ने उनके हृदय को श्रीकृष्ण से संयोजित कर दिया। गोपियाँ साधारण स्त्रियाँ न थीं, उनका व्यक्तित्व महान् था।
श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के २९, ३०, ३१, ३२ तथा ३३ – इन पाँच अध्यायों में रासलीला का वर्णन है। रासलीला प्रारम्भ होने पर गोपियों के मद-मान-मर्दन करने के लिए श्रीकृष्ण अदृश्य हो गये। गोपियाँ श्रीकृष्ण को खोजती हुई यमुना जी के वालुकामय पुलिन पर श्रीकृष्ण के पुनरागमन की आशा में एकत्रित हुई और गोपी-गीत गाना प्रारम्भ किया। अकस्मात् भगवान् श्रीकृष्ण प्रलाप करती गोपियों के मध्य में प्रकट हो गये और उन्होंने उनके साथ नृत्य किया।
भागवत का दशम स्कन्ध सारे भागवत का सार माना जाता है और दशम स्कन्ध की रासलीला के पाँच अध्याय दशम स्कन्ध के सार हैं। सारे संस्कृत-साहित्य के विशाल क्षेत्र में आपको रास-पंचाध्यायी के समान विवरण नहीं मिलेगा। आत्म-प्रेरक, उत्कृष्ट तथा रहस्यात्मक हैं। इनके दार्शनिक विचार बहुत गूढ़ हैं।
जिसमें शास्त्र तथा भगवान् के अस्तित्व में पूर्ण विश्वास है, जिसमे गुरु-भक्ति है, जिसने अपने इन्द्रिय तथा मन को वश में कर लिया है, जो विवेक, वैराग्य शुचिता से सम्पन्न है, जो भगवान् के दर्शन तथा साक्षात्कार के लिए व्याकुल है और जो भक्त तथा सन्तों के बीच में रहता है, वही रासलीला के पाठ का अधिकारी है, केवल उसी व्यक्ति को इसका रहस्य, इसका दिव्य स्वरूप और भाव हस्तामलकवत प्रकट हो सकता है।
एक विषय-परायण व्यक्ति, जिसका हृदय इन्द्रिय-सम्भोग तथा काम-वासनाओं में लिप्त है, जिसने अपनी इन्द्रियों को अनियन्त्रित छोड़ दिया है, जो इन्द्रिय-परायणता से ऊपर उठना नहीं चाहता, जो अतीन्द्रिय वस्तुओं तथा मानवी चेतना से परे सुखोन्मादमय दिव्य जीवन में विश्वास नहीं करता, उसके लिए भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का वर्णन करने वाले ये पाँचों अध्याय कलुषित साहित्य के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं । उसे भागवत के इस खण्ड के अध्ययन से कुछ भी लाभ न होगा।
रासलीला के इन श्लोकों का गान करते समय श्री नारद, व्यास, शुकदेव तथा गौरांग-जैसे महर्षियों तथा भागवतों के नेत्रों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होती थी। नैमिषारण्य के मुनियों ने बड़े प्रेम-भाव से ध्यानपूर्वक इसे श्रवण किया। महाराजा परीक्षित ने मोक्ष की प्राप्ति के लिए अपनी मृत्यु-शय्या पर इन्हें श्रवण किया। जिस प्रकार बन्दरों के लिए मोती का कोई मूल्य नहीं है वैसे ही नास्तिक, भौतिकवादी तथा कामी व्यक्ति के लिए सच्चे भक्तों को भगवान् के समीप पहुँचाने वाली इन उत्कृष्ट बातों का कोई महत्त्व नहीं है।
सारी रासलीला भक्ति रस से ओत-प्रोत है। यह एक पवित्र यज्ञ है। परा-भक्ति में जीवात्मा (गोपिकाएँ) परमात्मा अर्थात् भगवान् कृष्ण में लीन हो गयीं । दो अब एक हो गये। यही परा-भक्ति द्वारा वेदान्त की अद्वैतानुभूति है। श्रीकृष्ण तथा जागनाओं का सम्बन्ध अत्यन्त पवित्र था। उसमें काम-वासना का लेश भी न था। क्या उसमें विषय-वासना का लेश हो सकता है, जो त्रिलोकी का स्रष्टा, पालक तथा संहारक है, जो सभी भूतों की योनि है, जो शुद्धस्वरूप है तथा जो धर्मरक्षक और जगद्गुरु है ?
भगवान् से योग प्राप्त करना ही रासलीला का उद्देश्य था। केवल प्रेम-भक्ति के. द्वारा ही भगवान् का सायुज्य प्राप्त हो सकता है, जो कि वृन्दावन की गोपियों में थी। भगवान् श्रीकृष्ण तथा गोपियों में शुद्ध प्रेम का बन्धन था, उनमें काम-वासना की गन्ध भी न थी। वे बहुत ही शुद्ध तथा पवित्र थीं। सांसारिक वृत्ति वाले मनुष्य चाहे वे कितने ही बुद्धिमान् क्यों न हो, इस शुद्ध प्रेम की कल्पना भी नहीं कर सकते। सांसारिक मानव स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध केवल काम-वासना के निमित्त ही अनुमान करेगा; क्योंकि उसकी बुद्धि पर आवरण पड़ा हुआ है तथा उसकी समझ तमसाच्छत्र है। वह इस दिव्य प्रेम की किंचित् झलक तभी पा सकता है, जब वह अपनी माता के प्रति अपने प्रेम को स्मरण करे। क्या यह प्रेम काम वासना से मुक्त नहीं है?
भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से अपने भक्तों को आनन्दप्रद रासलीला सत्य का मार्ग दिखलाया। रासलीला काम पर विजय की शिक्षा देती है। ये पाँचों अध्याय सांसारिक विषयों से पूर्णतः उपरत बनाने के लिए ही हैं।
शरत्कालीन रात्रि थी। शुभ्र ज्योत्स्ना बिखर रही थी, जिससे गोपियों का हृदय उल्लसित हो उठा। भगवान् श्रीकृष्ण ने रात्रि को यमुना जी के तट पर मधुर गीत गाया और बाँसुरी पर मधुर तान छेड़ी। गोपियों ने अपना-अपना काम छोड़ दिया और वे अपने प्रिय श्रीकृष्ण के पास चल पड़ीं। उनका मन श्रीकृष्ण में लीन था।
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, “तुम सब अपने-अपने घरों को लौट जाओ तथा अपने पति, पुत्र एवं माता-पिता की देखभाल करो। बछड़े रंभा रहे हैं और तुम्हारे बच्चे रो रहे हैं। पातिव्रत्य ही स्त्रियों का परम धर्म है।"
गोपियों ने उत्तर दिया, "हे प्रभु! आपके लिए हम सबने सब-कुछ त्याग दिया है और आपके चरण-कमलों की शरण ली है। आप ही सारी धार्मिक शिक्षाओं के लक्ष्य हैं। शाश्वत सुख के स्रोत आपसे जब हमारा प्रेम है तो हम पति-पुत्रादिकों की चिन्ता करें जो कि दुःख के कारण हैं। हमें अपनी सेवा का अवसर दीजिए।”
भगवान् श्रीकृष्ण ने उनकी आर्त विनती से द्रवित हो कर उन्हें वहाँ रहने दिया। भगवान् के साहचर्य से गोपियाँ बहुत गर्वीली हो गयीं। उन्होंने सोचा कि संसार के सब लोगों में हम ही सर्वश्रेष्ठ है। भगवान् उनके गर्व को दूर करने के लिए अकस्मात अन्तर्धान हो गये।
गोपियों के हृदय में बहुत ही वेदना हुई और वन-वन में श्रीकृष्ण को ढ़ूंढतह फिरीं। वे वृक्ष, पौधों, लताओं, पृथ्वी तथा मृगों से पूछर्ती कि क्या किसी ने प्रियतम कृष्ण को देखा है ? उनके कपोलों पर अश्रुधारा बह चली। उनका सारा ध्यान श्रीकृष्ण में ही लगा था। वे श्रीकृष्ण की ही चर्चा करती थीं, वे कृष्णमय हो रही थी। वे श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाएँ करने लगीं। वे यमुना तट पर गयीं और एक-साथ मिल कर श्रीकृष्ण के गुणों का गायन करने लगीं तथा उनके वापस आने के लिए हार्दिक प्रार्थना करने लगी। ये गीत सुधा के समान मधुर है तथा बहुत ही हृदयस्पर्शी है।
श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए प्रकट हो गये। गोपियाँ प्रसन्न हो गयीं। उनकी विरह वेदना शान्त हो गयी। श्रीकृष्ण ने कहा, "हे प्रिय गोपिया, तुम लोगों ने मेरे लिए अपने पति पुत्र तथा सगे-सम्बन्धियों को भी छोड़ दिया है। मैं कुछ समय के लिए छिप गया था जिससे तुम्हारा प्रेम निरन्तर प्रवाहित होता रहे। तुम सब मुझे अत्यन्त प्रिय हो। यदि मैं अनन्त काल तक जीवित रहँ, तो भी मैं तुम्हारे प्रेम का बदला नहीं चुका सकता। मेरे साथ तुम सबने सर्वथा निर्मल तथा पवित्र सम्बन्ध स्थापित किया है।"
तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला प्रारम्भ की। उनके दोनों और एक-एक गोपी थी और गोपियों के दोनों ओर श्रीकृष्ण थे। गोपियों ने वृत्त बनाया । योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण दो-दो गोपियों के बीच में थे। सभी गोपियाँ ऐसा अनुभव करती थीं कि श्रीकृष्ण हमारे ही पास हैं। क्या ही महान् कौतुक था वह! सर्वशक्तिमान् भगवान् ही अनेक रूप धारण करने का चमत्कार कर सकता है। क्या यह श्रीकृष्ण की सर्वशक्तिमत्ता का द्योतक नहीं है? अपनी-अपनी पत्नियों के साथ देवताओं के शत-शत विमानों की आकाश में भीड़ लग गयी। वे रासोत्सव देखने को उत्सुक हो रहे थे। उन्होंने ऊपर आकाश से पुष्प वृष्टि की, गन्धर्वों ने भगवान् के यश का गायन किया।
राधा अथवा राधिका गोपियों में प्रधान थीं। उन्होंने श्रीकृष्ण की आराधना की थी। 'राधिका' का शब्दार्थ है जो राधना या आराधना करें। राधा प्रेम की मूर्ति थीं । वे स्वयं भगवान् कृष्ण का ही स्वरूप थीं। अग्नि और ताप के सदृश्य राधा- -कृष्ण हैं। रासलीला के द्वारा भगवान् ने यह प्रकट किया कि वे ही वास्तविक पति अथवा मित्र हैं। वे ही इस देह में परम पुरुष है। वे ही भर्ता, भोक्ता, महेश्वर तथा परमात्मा हैं (गीता १३-२२) । वे ही सभी इन्द्रियों के प्रकाशक है। वे ही सब प्राणियों में निवास करते हैं। उन्होंने स्वयं ही शरीर, मन, प्राण तथा इन्द्रिया का रूप धारण किया है। वे ही कर्ता तथा भोक्ता है। श्रृंगार रस के द्वारा उनका भी मन भगवान् की ओर आकर्षित हो जाता है, जो भगवान् से विमुख है; इसीलिए भगवान् की वह प्रेम-लीला हुई। भगवान् की योगमाया से ब्रजवासी गोपों ने अपनी पत्नियों को अपने पास से अलग होने का अनुभव नहीं किया। क्या ही चमत्कार! एक गोपी को उसके घर वालों ने बलपूर्वक रोक लिया। वह अविलम्ब ही अपना यह भौतिक शरीर परित्याग कर श्रीकृष्ण से मिल कर एक हो गयी। क्या इससे यह प्रकट नहीं है कि श्रीकृष्ण भगवान् थे और उनके प्रति गोपियों का प्रेम वासनात्मक न था? गोपियाँ भगवान् की सबसे बड़ी भक्त थीं। भक्ति-भाव के चरमोत्कर्ष-रूप माधुर्य भाव के द्वारा श्रीकृष्ण की आराधना कर वे भक्ति के उच्चतम शिखर पर जा पहुँची थीं।
वे मनुष्य जो संसार-सागर में निमग्न हैं तथा जिनका मन काम-वासना से भरा हुआ है, भगवान् को अन्यथा समझ कर इस रासलीला पर आक्षेप करते हैं। प्रेमी के लिए रति ही प्रेम का श्रेष्ठतम रूप है। भगवान् से उसी प्रकार का प्रेम होना चाहिए जैसे की राधा जी श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं। हमारे ग्रन्थों में राधा का प्रेम सर्वोच्च प्रेम के रूप में विख्यात है।
त्रिलोकी में राधा के प्रेम की समता नहीं है। एक बार राधा रुष्ट तथा मानिनी हो कर रास - मण्डल को छोड़ कर चली गयीं। श्रीकृष्ण राधा के लिए शोकाकुल हो गोपियों के साथ नृत्य करना बन्द कर वन में भटकते फिरे। राधा के न मिलने पर वे अत्यन्त शोक सन्तप्त हुए, सहस्रों गोपियाँ उन्हें सन्तुष्ट न कर सकीं। इससे ही आप राधा के गुणों का अनुमान लगा सकते हैं।
राधा महाभाव का स्वरूप हैं। रासलीला का रहस्य सर्वसाधारण भक्तों के जानने की वस्तु नहीं। इनके रहस्य का तो भाग्यवती गोपियों को ही पता था। गोपियाँ ही इसकी अधिकारी थीं। शान्त, दास्य और वात्सल्य भाव वाले भक्तों को इसे समझ सकना कठिन ही है। माधुर्य भाव अथवा सखी-भाव से श्रीकृष्ण की उपासना करने वाले भक्त ही रास से आनन्द उठा सकते हैं।
गोपियों का प्रेम काम-वासना का न था। वह पवित्र, निष्काम, दिव्य प्रेम था। वे श्रीकृष्ण के आलिंगन के लिए लालायित न थीं। उनका यथाशक्य यही प्रयास रहता था कि श्रीकृष्ण राधा का आलिंगन करें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे अनेकानेक बहानों से श्रीकृष्ण को राधा के पास भेजती थीं। इससे वे अपने मिलन की अपेक्षा सैकड़ों गुना अधिक आनन्द लूटती थी। श्रीकृष्ण गोपियों के पवित्र निःस्वार्थ प्रेम को देख कर बहुत ही प्रसन्न होते थे। गोपियों के निःस्वार्थ प्रेम ने उनके प्रेम-रस को प्रगाढ़ कर दिया।
गोपियाँ अथवा सखियाँ अपने सुख के लिए श्रीकृष्ण के साथ क्रीड़ा करने की किंचित भी इच्छा न रखती थीं। श्रीकृष्ण को राधा का आलिंगन करने के लिए प्रेरित करने में ही हार्दिक आनन्द लेती थीं। राधा कृष्ण प्रेमवल्लरी थी। गोपियाँ इस लतिका के पत्र, पुष्प और कोमल शाखाओं के रूप में थीं। यदि कृष्ण-बिहार के अमृत-जल से इस लता का सिंचन किया गया तो पत्र, पुष्प और कोपल अपने सीचे जाने की अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक प्रफुल्लित होंगे।
यदि आप श्रीकृष्ण को प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको गोपी की तरह उनकी सेवा करनी होगी, आपको गोपी भाव से उनकी आराधना करनी होगी। जो श्रीकृष्ण की उपासना सखी-भाव से करते हैं, वे माधुर्य-रस के आनन्द का उपभोग करते हैं।
रासलीला का अभिनय शुद्ध मन वाले भक्तों को ही करना चाहिए और वह भी किसी बन्द स्थान में भक्ति-भाव--सम्पन्न कुछ चुने हुए व्यक्तियों के ही सम्मुख। तभी वह दर्शकों पर अपना अमिट प्रभाव डाल सकेगा और उनके हृदय में भक्ति जाग्रत कर सकेगा। माधुर्य-भाव परम पवित्र भाव है।
आधुनिक काल में स्वार्थी व्यक्ति तथा दम्भी भक्त धन के लोभ से कृष्ण-राधा का अभिनय अपवित्र हृदय से खुले रंगमंच पर करते हैं। इससे दर्शकों के मन पर दूषित प्रभाव ही पड़ता है। लोगों को ऐसी रासलीला में सम्मिलित नहीं होना चाहिए। उन्हें ऐसे लोगों को प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए जो अपने विषैले प्रचार से जनता को महान क्षति पहुँचाते हैं। जो अपने शरीर और वासना के दास हैं, उन्हें अपने मन में भी रासलीला का चिन्तन नहीं करना चाहिए। यदि वे अज्ञानवश ऐसा करते हैं, तो उनका विनाश निश्चित समझिए। क्षीर सागर से निकले हुए विष का पान तो केवल शिव ही कर सकते हैं।
जो पुरुष ब्रजांगनाओं के साथ भगवान् श्रीकृष्ण की इस पवित्र लीला का श्रवण अथवा वर्णन करता है, उसे भगवान् में परा-भक्ति की प्राप्ति होती है और वह बहुत शीघ्र अपने हृदय के रोग, काम-विकार से छुटकारा पा जाता है।
व्रजयुवतियों के समान अपने मन को भगवान् में लीन कर आप सभी अपने हृदय रूपी वृन्दावन में नित्य रासलीला करें।
भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी प्रेयसी और सेविका गोपियों के साथ रासलीला प्रारम्भ की। वे एक-दूसरे की बाँह में बाहें डाले एक चक्र बनाये हुए खड़ी थीं। सम्पूर्ण योगों के स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण दो-दो गोपियों के बीच में उपस्थित हो गये और निकट वाली गोपी के गले में अपना हाथ डाले हुए उस गोपी-मण्डल में अपनी रासलीला प्रारम्भ की। सभी गोपियाँ ऐसा अनुभव करती थीं कि हमारे प्रियतम तो हमारे ही पास है। अपनी-अपनी पत्नियों के साथ देवों के शत-शत विमानों से आकाश भर गया। वे रासोत्सव देखने को उत्सक थे। दुन्दुभियाँ बजायी गयीं और पुष्प-वर्षा होने लगी । गन्धर्व गण अपनी-अपनी पत्नियों के साथ भगवान् के निर्मल यश का गायन करने लगे। अपने प्रियतम के साथ नृत्य करती हुई व्रजयुवतियों के कंगन, चूड़ी, बाजूबन्द तथा पायल से सारा रास मण्डल झंकृत हो उठा। भगवान् वासुदेव उन युवतियों के मध्य में ऐसे शोभायमान तथा दीप्तिमान हो रहे थे मानो स्वर्ण मणियों के हार के मध्य में नीलम हो ।
अपने सन्तुलित पद- संचार, सुन्दर हाव-भाव, मनोहारी मुस्कान, मोहक भू-भंगिमा, कपोलों पर झूमते हुए कुण्डल, लचकीला बदन, मुख पर लटकती हुई अलकों, मुखारविन्द से टपकते हुए स्वेद-कर्णो तथा ढीली पड़ी हुई चोटियों के साथ गोपियों ने गाना आरम्भ किया। उस समय वे नीले मेघ-मण्डल को प्रकाशित करने वाली बिजली की कौंध के समान शोभायमान प्रतीत हो रही थीं।
गोपियाँ श्रीकृष्ण का संस्पर्श पा पा कर आनन्दमन हो रही थीं। उनके संगीत से विश्व गूंज उठा। वे बड़े प्रेम से ऊँचे स्वर में गा रही थीं। एक गोपी ने श्रीकृष्ण के स्वर में स्वर मिला कर उनके साथ गाना प्रारम्भ किया। वह अचानक और ऊँचे स्वर में राग अलापने लगी और उसने बहुत ही सुन्दर गाया। 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कह कर भगवान् ने उसकी बड़ी प्रशंसा की। इसी भाँति प्रोत्साहित हो कर उसने उसी राग को ध्रुपद में गाया। भगवान् ने पुनः उसे सम्मानित किया।
एक गोपी नृत्य करते-करते थक गयी। उसकी चोटियों से बेला के फूल खिसकने लगे और कलाइयों के कंगन ढीले पड़ गये। उसने श्रीकृष्ण के गले में बाँहें डाल दीं और उन्हें कस कर अपने से लगा लिया।
दूसरी गोपी ने अपने कन्धे पर रखे हुए चन्दन लगे हुए तथा कमल से सुगन्धित श्रीकृष्ण के हाथ को सूँघा । उसने आनन्द से पुलकित हो उसे चूम लिया।
एक दूसरी गोपी ने अपने कपोलों को श्रीकृष्ण के कपोलों से सटा दिया जो कि नृत्य करते समय कुण्डल की चमक से सुशोभित हो रहे थे।
एक दूसरी गोपी पायलों को झंकृत करती हुई उनके साथ गान तथा नृत्य करती रही। जब वह थक गयी, तब उसने श्रीकृष्ण का शान्तिदायक कर-कमल अपने वक्षस्थल पर रख लिया।
इस भांति लक्ष्मीपति भगवान् अच्युत को पा कर तथा उनके भुज पाश में आलिंगित हुई गोपियां उनके साथ गायन करती हुई बिहार करने लगी। कानों में कुमुदिनी से उनका मुखारविन्द अधिक शोभित हो रहा था। कपोलों पर अलके लटक रही थीं। उनके मुख-मण्डल पर स्वेद-कण थे। अपने कंगन और पायल पर रास-मण्डल में भगवान् श्रीकृष्ण के साथ नृत्य कर रही थी। भ्रमर वहां गायक थे।
जैसे नन्हा सा बालक दर्पण में पड़े हुए अपने प्रतिबिम्ब के साथ खेलता है, वैसे ही श्रीकृष्ण ने हाथ से उनके अंग स्पर्श करके, प्रेम-भरी चितवन से, मनोहारी हास्य से एवं मधुर मुस्कराहट से व्रजांगनाओं को प्रमुदित करते हुए उनके साथ क्रीड़ा की।
परीक्षित। भगवान् के अंगों का स्पर्श प्राप्त कर गोपियों की इन्द्रियों आनन्द-विह्वल हो गयीं। फूलों के हार टूट गये और उनके आभूषण ढीले हो कर अपने स्थान से गिर पड़े। वे अपने केश, वस्त्र और कंचुकी को भी पूर्णतया सँभालने में असमर्थ थीं। भगवान् श्रीकृष्ण की यह रासलीला देख कर देवांगनाएँ काम से आहत हो मोहित हो गयीं। समस्त तारों और ग्रहों के साथ चन्द्रमा विस्मित हो स्थिर रह गये। यद्यपि भगवान् आत्माराम हैं फिर भी उन्होंने खेल-खेल में, जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण कर उनके साथ विहार किया।
जब गोपियाँ बहुत श्रान्त हो गयीं, तब करुणामय भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने सुखद हाथों से उनके मुख पर से श्रम-कण पोंछे। भगवान् के कर-स्पर्श से गोपियों को बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने अपने कपोलों के सौन्दर्य से, जिन पर सोने के कुण्डल झिलमिला रहे थे और घुँघराली अलकें लटक रही थीं तथा उस प्रेम-भरी चितवन और सुधा से भी अधिक मधुर मुस्कान से श्रीकृष्ण का सम्मान किया और प्रभु की पवित्र लीलाओं का गायन किया।
जैसे गजराज बाँध को तोड़ता हुआ हथिनियों के साथ जल में प्रवेश करता। वैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी थकान दूर करने के लिए गोपियों के साथ यमुना जल में प्रवेश किया। गन्धर्वराज की तरह उनके यश का गायन करते हुए भ्रमर पीछे-पीछे चल रहे थे।
तत्पश्चात् गोपियों ने प्रेम-भरी चितवन से देखते हुए और हँस-हँस कर श्रीकृष्ण के ऊपर जल उलीचा विमानों पर चढ़े हुए देवता पुष्पवृष्टि करके उनकी स्तुति करने लगे। इस भांति आत्माराम भगवान् श्रीकृष्ण ने गजराज के समान यमुना जी में जल-विहार किया।
तदुपरान्त भगवान् श्रीकृष्ण जल से बाहर आये और गोपियों तथा भौरों की भीड़ से घिरे हुए यमुना तट के कुंज में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने जल तथा स्थल के पुष्पों से सुरभित रमणीय वायु में गजराज की भाँति विहार किया। पूर्णचन्द्र ने अपनी शुभ्र रजत ज्योत्स्ना समस्त भूमण्डल में बिखेर रखी थी। कवियों ने शरद ऋतु की जिन रस-सामग्रियों का वर्णन किया है, उन सभी से वह रात्रि युक्त थी। भगवान् ने चाँदनी रात्रि अपनी प्रेयसी गोपियों के संग बितायी।
राजा परीक्षित ने कहा, "भगवान्! समस्त जगत् के एकमात्र स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के उद्देश्य से ही अपने एक अंशा से अवतार ग्रहण किया था। वे धर्म-मर्यादा को बनाने वाले, उपदेश करने वाले और रक्षक थे। उन्हें तो आदर्श उपस्थित करना था। फिर उन्होंने स्वयं धर्म के विपरित पर- स्त्रियों से प्रेम और उनका स्पर्श कैसे किया ? भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णकाम थे। उन्हें किसी भी वस्तु की कामना न थी। उन्होंने निन्दनीय कर्म किया। उन्होंने यह अनुचित काम क्यों किया? ऐसा करने में उनका क्या अभिप्राय रहा होगा? हे मुनिसत्तम। आप कृपा करके मेरा यह सन्देह मिटाइए।"
श्री शुकदेव जी ने उत्तर दिया, "राजन्! ईश्वर कभी-कभी धर्म का उल्लंघन और साहस का काम करते देखे जाते हैं। किन्तु उन तेजस्वी पुरुषों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यानी महान् आत्माओं को इन कर्मों का कोई दोष नहीं होता। अग्रि सब कुछ खा जाती है; परन्तु उन पदार्थों के दोष से लिप्त नहीं होती। जिसने अपनी वासनाओं पर आधिपत्य नहीं प्राप्त किया है, जो अपनी देह का गुलाम है, उसे मन से भी ऐसी बात नहीं सोचनी चाहिए, शरीर से करना तो दूर रहा। यदि मूर्खतावश कोई ऐसा काम कर बैठे, तो उसका नाश हो जाता है। जैसे भगवान् शंकर के अतिरिक्त यदि कोई दूसरा व्यक्ति विषपान करे, तो वह नाश को प्राप्त करता है। क्षीर-सागर से निकले हलाहल का पान तो रुद्र ही कर सकते हैं।
"सामर्थ्यवान् पुरुषों के वचन सत्य मानने चाहिए और उसी के अनुसार आचरण करना चाहिए। उनके आचरण का अनुकरण तो कभी-कभी किया जाता है। वे विशेष उद्देश्य के लिए ही असाधारण परिस्थितियों में अलौकिक जीवन-यापन करते है। यह सर्वसाधारण के लिए सदा अनुकरणीय नहीं है। अतः बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि उनके उपदेशों को अपने जीवन में उतारे। वे मानव-कल्याण के लिए है।
"सामर्थ्यवान् पुरुष अहंकार-रहित होते हैं, शुभ कर्म करने में उनका कोई लाभ नहीं होता और न अशुभ कर्म करने में उनकी कोई हानि होती है। वे शुभ और अशुभ, पाप और पुण्य से ऊपर उठे होते हैं। जब सामर्थ्यवान् पुरुषों के विषय में ऐसी बात तो समस्त जीवों के प्रभु भगवान् के लिए अशुभ और शुभ कैसा? क्या यही अदभुत बात है कि मनुष्य तथा दूसरे प्राणी, जिनके भगवान् नियामक है। पुण्य और पाप कर्म से मुक्त है और जगत् के प्रभु के चरित्र का माप साधारण मनुष्य के शुभ और अशुभ धारणाओं की कसौटी पर हो ?
"जिनके चरण-कमलों में प्रेम कर तथा जिनसे योग प्राप्त करन शुभ-अशुभ के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं: वे कर्म के बन्धनों से आबद्ध नहीं होते और स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण करते हैं, वे ही भगवान् लोक-कल्याण के लिए स्वेच्छा से शरीर धारण करते हैं, तो भला उनमें कर्म-बन्धन कैसे आरोपित किया जा सकता है?
“वे गोपियों के, उनके पतियों के और सम्पूर्ण शरीरधारियों के अन्तःकरण में विराजमान हैं । वे अन्तर्यामी हैं। उन्होंने लीला के हेतु ही शरीर धारण किया था। अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए ही भगवान् ने मनुष्य-रूप धारण किया और ऐसी लीलाएँ की जिन्हें सुन कर मनुष्य भगवत्परायण हो जाये।
“परीक्षित! वज्रवासी गोपों ने भगवान् श्रीकृष्ण में कभी भी दोष-दृष्टि नहीं की: क्योंकि वे भगवान् की योगमाया से मोहित हो रहे थे और अपनी पत्नियों को सदा अपने पास ही पाते थे।"
रात्रि का अवसान निकट आया । उषा का आगमन हुआ ! प्रेमी गोपियाँ श्रीकृष्ण के इच्छानुसार अन्यमनस्क भाव से अपने-अपने घर वापस चली गयीं।
जो पुरुष व्रजयुवतियों के साथ श्रीकृष्ण की इस रासलीला का श्रद्धा के साथ श्रवण अथवा वर्णन करता है, उसे परा-भक्ति की प्राप्ति होती है, वह ज्ञान प्राप्त करता है और बहुत ही शीघ्र वह अपने हृदय के रोग काम-विकार से छुटकारा पा जाता है। वह शीघ्र ही मन की मल-वासनाओं को नष्ट कर डालता है। वह आत्म-दमन कर हृदय के सभी विकारों से मुक्त हो जाता है।
ब्रह्मा तथा अन्य देव गण द्वारकापुरी गये। ब्रह्मा जी ने कहा, "प्रभो। यदुवंश में अवतार ले कर अत्याचारी राजाओं से पृथ्वी की रक्षा करने की हमारी प्रार्थना को आपने पूरा कर दिया है। हमारे प्रार्थित सभी काम पूरे हो चुके हैं। आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किये एक सौ पचीस वर्ष व्यतीत हो चले है। वह कुल भी अब नष्टप्राय हो चुका है; अतः आप अपने परम धाम को पधारिए।"
भगवान् ने कहा, “अब ब्राह्मणों के शाप से यदुवंश का नाश प्रारम्भ हो चुका है। इसका अन्त हो जाने पर मैं अपने धाम को चला जाऊँगा।" ब्रह्मा जी अपने धाम को चले गये।
भगवान् ने यदुकुल के बड़े-बूढ़ों से कहा, "चारों ओर बड़े-बड़े अपशकुन हो रहे हैं। हमारे वंश पर ब्राह्मणों का घोर शाप है। हमें आज ही परम पवित्र प्रभास क्षेत्र के लिए चल पड़ना चाहिए।" यदुवंशी प्रभास क्षेत्र जाने की तैयारी में लग गये।
उद्धव जी ने घोर अपशगुन देख कर और जो कुछ भगवान् ने आज्ञा दी थी, उसे सुन कर श्रीकृष्ण से कहा, “यदुवंश का संहार होते ही आप इस लोक का परित्याग कर देंगे। हे केशव! मैं आधे क्षण भी आपके चरण-कमलों का वियोग नहीं सहन कर सकता। हे प्रभो! आप मुझे भी अपने धाम में ले चलिए।"
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "तुमने जो कुछ कहा है, वही होने वाला है। जिस काम के लिए ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर मैं अपने एक अंश से अवतीर्ण हुआ था, इस पृथ्वी पर देवताओं का वह सारा कार्य पूरा हो चुका है।
"यदुवंशी पारस्परिक फूट से नष्ट हो जायेंगे। आज के सातवें दिन समुद्र इस पुरी को आत्मसात् कर लेगा। जिस क्षण में इस भूलोक का परित्याग कर दूंगा, कलि इस पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेगा और मनुष्य अधार्मिक बन जायेंगे। तब तुम यहाँ न रहना ।
"सभी रागों से अपने को मुक्त करो। अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बान्धवों छोड़ दो। अनन्य प्रेम से मुझमें अपना मन लगाओ। प्राणियों में मेरा दर्शन करते हुए, सभी जीवों में समदृष्टि रखते हुए इस पृथ्वी पर स्वच्छन्द विचरण करो। जो कुछ तुम इन्द्रियों से देखते अथवा ग्रहण करते हो, जो कुछ अपने मन से सोचते हो, सब मिथ्या है, नाशवान् है। ये तुम्हारे मनसे माया की कल्पना है।
"यह 'यह' है, यह 'वह' है—यह पार्थक्य-भाव उस मनुष्य का केवल भ्रम है, जिसका मन विक्षिप्त और अनियन्त्रित है और मुझसे सम्बद्ध नहीं है। असयंत मन वाला व्यक्ति विषय-पदार्थों में बहुलता मानने की भूल करता है। यह भूल उसे पुण्य-पाप, उचित-अनुचित तथा अच्छे-बुरे मार्ग पर ले जाती है। इन्द्रियों की स्वाभाविक बहिर्मुखी वृत्ति द्वारा निर्मित भेद के कारण भ्रान्त एवं आश्चर्यचकित अनियन्त्रित प्राणी संसार में अपना अलग व्यक्तित्व मान बैठता है और कामनाओं का सृजन करना प्रारम्भ कर विषय-सुख भोगता है। मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि द्वारा कल्पित भेद की यह प्रान्त धारणा ही कर्म, अकर्म तथा विकर्म का कारण है। जिन व्यक्तियों में पुण्य-पाप, उचित-अनुचित तथा भले-बुरे की भावना विद्यमान है, यह कर्म, अकर्म तथा विकर्म का भेद केवल उन्हीं के लिए है। भेद-भाव के ज्ञान से ही यह भ्रम उत्पन्न होता है जिससे उचित-अनुचित, भले-बुरे तथा पाप-पुण्य का अनुभव या विचार होता है। जिनमें उचित-अनुचित, पाप-पुण्य तथा भले-बुरे की विभेद-दृष्टि है, केवल उन्हीं मनुष्यों के लिए विहित, अविहित तथा निषिद्ध कर्मों का वेदों में प्रतिपादन है। अहंभाव का परित्याग करो। समस्त इन्द्रियों तथा मन को नियन्त्रित करो और जगत् की सभी वस्तुओं में ब्रह्म अथवा अपनी आत्मा की भावना करो। अपने आत्म-तत्त्व का, संसार में सुख एवं एकता का साक्षात्कार करो। इस व्यापक विश्व को अपनी आत्मा में और अपनी आत्मा को मुझ परमात्मा में देखो ।
"सभी वेदों के मुख्य तात्पर्य-रूप ज्ञान और एक आत्मा अथवा ब्रह्म अनुभव-रूप विज्ञान से जब सम्पन्न हो कर तुम अपनी आत्मा के अनुभव में ही मत्र रहोगे और सभी शरीरधारियों के आत्मा हो जाओगे तो तुम विघ्न-बाधाओं से पीड़ित नहीं होगे।
"जो पुरुष गुण और दोष-बुद्धि से अतीत हो जाता है, वह बालक के समान होता है। वह न तो निषिद्ध कर्म में दोष-बुद्धि से निवृत्त होता है और न विहित कर्मो का अनुष्ठान गुण-बुद्धि से करता है। उसमें अनुचित का विचार, शास्त्रीय उपदेशों पर आधारित न हो कर स्वाभाविक होता है। उसपे अहं-भाव को पूर्णत: नष्ट कर डाला है। संसार के नीति-नियम उसे प्रभावित नहीं करते। उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है। वह कर्म से ऊपर उठ चुका है। कर्म उसको स्पर्श नहीं कर पाते हैं। जगत् की शिक्षा के हेतु ही यह विहित कर्मों को करता तथा अविहित कर्मों का परित्याग करता है। वह उचित-अनुचित दोनों की सीमा रेखाओं का अतिक्रमण कर चुका है।
"वह समस्त प्राणियों का सुहृद होता है। उसकी वृत्तियाँ शान्त होती हैं, ज्ञान और विज्ञान से वह अटल निश्चय वाला होता है। वह इस संसार को आत्म स्वरूप देखता है। ऐसा व्यक्ति शोक को नहीं प्राप्त होता। वह पुनः जन्म नहीं प्राप्त करता। वह आनन्दमय स्थिति से कभी विचलित नहीं होता। वह संसार-पथ में नहीं भटकता। "
जब भगवान् श्रीकृष्ण ने इस प्रकार आदेश दिया, तब भक्तशिरोमणि उद्धव जी ने उनको प्रणाम करके तत्त्वज्ञान की इच्छा से यह प्रश्न किया, "हे योगेश्वर। आप ही समस्त योगों के लक्ष्य, आधार और उनके कारण हैं। आपने मुझे मोक्ष के लिए संन्यास-रूप सांसारिक मोह-ममता का पूर्णतया त्याग बतलाया है; परन्तु विषयासक्त मनुष्यों के लिए जिनकी आपके चरणों में प्रीति नहीं, सभी इच्छाओं का त्याग सम्भव नहीं है। मेरे जैसे संसारासक्त व्यक्ति के लिए सांसारिक इच्छाओं का परित्याग करना अथवा संसार को विनश्वर समझना कैसे एकाएक सम्भव हो सकता है?
"मैं अभी तक 'मैं' तथा 'मेरा' की भावना को विदूरित नहीं कर सका हूँ। मैं मन्द बुद्धि वाला जीव हूँ। मैं आपकी माया से इस देह तथा इस देह सम्बन्धी सभी वस्तुओं से अत्यन्त आसक्त हूँ और इन्हें 'मैं' और 'मेरा' समझता हूँ। पुत्र, परिवार तथा शरीर में मेरी प्रगाढ़ आसक्ति है। भगवन्! आप ही बतलाइए कि मैं आपके उपदेशों का किस प्रकार सुगमतापूर्वक पालन कर सकता हूँ?"
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "इस संसार में वे लोग, जिन्हें जगत् के वास्तविक स्वरूप का सूक्ष्म ज्ञान है, संसार-सम्बन्धी सत्यताओं का जिन्हें ज्ञान है, वे चित्त में भरी हुई अशुभ वासनाओं तथा भौतिक पदार्थों की तृष्णाओं से अपने-आपको प्रायः अपने ही प्रयास से बचा लेते हैं।
"समस्त प्राणियों का, विशेषकर मनुष्य का आत्मा ही गुरु (उपदेशक) है; क्योंकि मनुष्य प्रत्यक्ष अनुभव तथा अनुमान के द्वारा परमानन्द को पा लेता है।
"सांख्ययोग-विशारद धीर पुरुष सभी प्राणियों में व्यापक तथा सर्वशक्तिमान् परम पुरुष के रूप में मेरा सुस्पष्ट साक्षात्कार कर लेते हैं।
'एक पाँव वाले, दो पाँव वाले, तीन पाँव वाले, चार पाँव वाले, चार से अधिक पाँव वाले और बिना पाँव वाले अनेक प्रकार के शरीरों की रचना सबमें मुझे मनुष्य शरीर ही सर्वाधिक प्रिय है; क्योंकि इस मनुष्य शरीर में मन और और इन्द्रियों को नियन्त्रित करने वाला योगाभ्यासी, ध्यान में स्थिर पुरुष मुझ परमेश्वर को पा लेता है, जो कि बुद्धि आदि उपकरणों से तथा अनुमान से भी अग्राह्य है।
इस विषय में एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। वह इतिहास अवधूत और यदु का संवाद है। राजा यह चन्द्रवंश के महाप्रतापी राजा नहुष के पौत्र तथा ययाति के ये पुत्र परम शक्तिशाली और बुद्धिमान् थे।
धर्म में पारंगत यदु ने एक युवक ब्राह्मण संन्यासी को निर्भय विचरते हुए देखा। तथा धर्म-तत्त्व को जानने की इच्छा से उनसे निम्नांकित प्रश्न पूछे:
यदु ने कहा, "हे ऋषि। बिना किसी कार्य को करते हुए भी आपने इस विशुद्ध ज्ञान को कैसे पाया जिसके बल से आप सारे संगों से मुक्त हो कर शिशुक्त निर्भय अवस्था में सम्पूर्ण सुख में विचरण कर रहे हैं?
"साधारणतः इस जगत् के लोग धर्म, अर्थ, काम तथा आत्म-चिन्तन का अभ्यास चिरायु, यश तथा सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए ही करते हैं। आपका सुगठित शरीर है। आप ज्ञान तथा विज्ञान से पूर्ण तथा सुन्दर हैं। आपकी वाणी मधुर तथा अमृत के समान है, यद्यपि आप कोई काम नहीं करते और न कोई प्रयास ही करते हैं। आप किसी वस्तु से राग नहीं रखते। संसार के लोग काम तथा लोभ की अग्नि में झुलस रहे हैं; परन्तु आप इस अग्नि से जरा भी सन्तप्त नहीं हैं। आप आत्मतृप्त तथा सुखी हैं। जिस प्रकार गंगा-जल में बैठा हुआ हाथी दावानल से पीड़ित नहीं होता उसी प्रकार आप भी क्लेशाग्रि से पीड़ित नहीं हैं। आपके सुख और आनन्द का मूल क्या है. इसके प्रति मुझे शिक्षा दीजिए। एकान्त जीवन में विषय-पदार्थों से अलिप्त आत्मा में ही आप कैसे सुख को प्राप्त करते हैं? आपके न तो परिवार है और न विषय-सुख, आपको सुख कहाँ से मिलता है?"
श्रीकृष्ण ने कहा, “बुद्धिमान् यदु के इस प्रकार विनम्र भाव से पूछे जाने पर उन ब्राह्मण ने राजा से कहा।
"मेरे बहुत से गुरु हैं। मैंने अपनी बुद्धि से उन गुरुओं से शिक्षा पायी है। उससे ज्ञान को प्राप्त कर मैं असंग इस पृथ्वी पर विचरण करता हूँ। और सुनिए,वे कौन-कौन है।
"पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्र, सूर्य, कबूतर, अजगर, सागर, पतंग, भौंरा या मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालने वाला, हिरन, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, बाण बनाने वाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट—ये ही मेरे चौबीस गुरु हैं जिनसे मैंने शिक्षा पायी है। उनके स्वाभाविक गुणों से मैंने अपने सारे पाठ पढ़े हैं। मैं अब बतलाऊँगा कि मैंने उनसे क्या-क्या सीखा है।
"ज्ञानी मनुष्य अपने धर्म मार्ग से कभी विचलित न हो। नियति के वशीभूत हो यदि जीव गण उसे कष्ट भी दें तो भी वह अविचल रहे इस तितिक्षा को मैंने पृथ्वी से सीखा है। मैंने पर्वतों से, जो पृथ्वी के ही भाग हैं, यह सीखा कि हमारे सारे फर्म परोपकार के लिए होने चाहिए तथा हमारा अस्तित्व ही परोपकारार्थ होना चाहिए। मैंने वृक्षों, जो पृथ्वी के ही भाग हैं, से सीखा कि मुझे सदा दूसरों की सेवा में ही रहना चाहिए।
"ज्ञानी अपने जीवन निर्वाह में ही सन्तुष्ट रहे। वह इन्द्रिय-सुख के लिए, लालायित न हो; क्योंकि इससे व्यर्थ पदार्थों में पड़ कर मन विक्षिप्त हो जायेगा तथा ज्ञान नष्ट हो जायेगा।
"वायु के समान ही योगी वस्तुओं से निर्लिप्त रहे। शरीर में तथा विभिन्न वस्तुओं के मध्य में रहते हुए भी वह उनसे असंग रहे। वस्तुओं के भले-बुरे परिणामों से भी उसका मन अप्रभावित रहना चाहिए। वायु सुगन्धित एवं दुर्गन्धपूर्ण पदार्थों से हो कर बहते हुए भी अलिप्त रहता है, ठीक उसी प्रकार ज्ञानी को भी रहना चाहिए। आत्मा शरीर में प्रवेश करती है तथा शरीर के गुण उसके अपने जैसे मालूम देते हैं; परन्तु ऐसा नहीं है। वायु गन्ध वहन करता है परन्तु गन्ध वायु का गुण नहीं है। यह शिक्षा मैंने शरीर से बाहर रहने वाले वायु से ग्रहण की है।
"मैंने प्राण से यह शिक्षा ली है कि मनुष्य को जीवन-रक्षा के लिए आहार करना चाहिए, न कि आहार के लिए ही जीवन-यापन करना चाहिए। वह इन्द्रियों के पोषण तथा उन्हें सबल बनाने के लिए भोजन न करे। उतना ही भोजन करे जो कि जीवन की ज्योति को बनाये रखे।
'आत्मा सर्वव्यापक है। वह शरीर के गुणों से अलिप्त है। ऐसा मैंने आकाश से सीखा जो सर्वव्यापक है तथा मेघ एवं अन्य वस्तुओं से अलिप्त है। शरीर में रहते हुए भी ज्ञानी आकाश-सदृश आत्मा के साथ एकता स्थापित कर आत्म-चिन्तन करे। जिस प्रकार एक ही सूत्र में माला के फूल ग्रथित रहते हैं, उसी प्रकार उसी आत्मा के अधिष्ठान में सारे चल एवं अचल भूत पदार्थ ग्रथित है। आत्मा देश-काल से सीमित नहीं है तथा वह किसी वस्तु से लिप्त नहीं होती।
"जल स्वभावतः शुद्ध, स्निग्ध तथा मधुर होता है। उसी प्रकार मनुष्यों में ज्ञानी भी रहता है। वह तीर्थ के जल के समान लोगों को अपने दर्शन, स्पर्श तथा भगवन्नाम के उच्चारण से शुद्ध बनाता है। यह मैंने जल से सीखा।
"तेजस्वी, ज्ञान में सबल, तपस्या से विभासित, पेट के अतिरिक्त भोजन के लिए अन्य कोई पात्र न रखते हुए तथा सब कुछ भक्षण करते हुए ज्ञानी अग्नि के समान ही अलिप्त रहता है। वह कभी-कभी दृष्टि में नहीं आता। कल्याण- कामी मनुष्यों की दृष्टि में आ जाता है। श्रद्धालु भक्ता द्वारा प्रदत्त भिक्षा को वह खाता है। तथा उनके भूत और भविष्य के मलों को भस्मीभूत कर डालता है।
"अग्नि एक ही है, यद्यपि वह विभिन्न प्रकार के ईंधनों में प्रवेश करती है। ईंधन के आकार के अनुसार अग्नि भी त्रिकोण, वृत्त, आयत तथा अन्य आकारों में जलती है। उसी प्रकार परमात्मा भी सभी भूतों में गुप्त हो कर विभिन्न शरीरों में उन उपाधियों के समान ही प्रतीत होता है। अपनी ही माया से रचित इस जगत् के ऊँचे-नीचे पदार्थों में प्रवेश कर हर पदार्थ के समान ही वह प्रतीत होता है। जन्म तथा मृत्यु शरीर के लिए हैं, आत्मा के लिए नहीं तथा ये कालानुसार होते हैं। लपटें ही परिवर्तनशील हैं, अग्नि नहीं।
"चन्द्रमा की घटती-बढ़ती चन्द्रमा के परिवर्तन के कारण नहीं होती, वरन् सूर्य के प्रकाश के परावर्तन के कारण होती है; अतः मैंने यह सीखा कि जन्म, वृद्धि, जरा, मृत्यु इत्यादि शरीर के विकार हैं, आत्मा के नहीं। आत्मा असीम, अजर तथा अमर है। चन्द्रमा ज्यों-का-त्यों रहता है, केवल ग्रह-गति के कारण ही उनमें प्रतीयमान परिवर्तन होता है।
"सूर्य रश्मियों के द्वारा जल खींचता है और कालान्तर में सारे जल को लौटा देता है। ज्ञानी भी ग्रहण करता है देने के लिए ही, अपने अधिकार की वृद्धि के लिए नहीं। जिस प्रकार एक ही सूर्य विभिन्न जल-पूर्ण पात्रों में प्रतिबिम्बित हो कर विभिन्न मालूम पड़ता है, ठीक उसी प्रकार आत्मा भी विभिन्न शरीरों में मन की उपाधियों में विभिन्न रूप से प्रतिबिम्बित हो कर विभिन्न मालूम पड़ता है।
"अधिक आसक्ति बुरी है। मनुष्य को किसी भी व्यक्ति के साथ अधिक ममता अथवा आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। किसी भी वस्तु के प्रति अत्यधिक आसक्ति मनुष्य के विनाश का कारण है, यह मैाने कबूतर के जोड़े से सीखा। किसी जंगल में एक वृक्ष के ऊपर एक कबूतर ने घोसला बनाया तथा अपनी मादा के साथ कुछ वर्षो तक निवास किया। दोनों एक-दूसरे के प्रति अतिरागात थे। बड़ी ममता के साथ उन्होंने बच्चों का पोषण किया। एक दिन घोंसले में ही बच्चों को छोड़कर वे भोजन की तलाश में चल पड़े। एक शिकारी ने जाल फैला कर उन बच्चों को पकड़ लिया। कबूतर भोजन ले कर नीड़ में लौटे। माँ को बच्चों पर अत्यधिक ममता थी। वह जान-बूझ कर जाल में गिर पड़ी। नर कबूतर भी जाल में जा फंसा। शिकारी ने बच्चों के साथ कबूतरों को भी पकड़ लिया। वह बहुत ही सन्तुष्ट हो कर घर की ओर चला। उसी प्रकार अनियन्त्रित इन्द्रिय वाले दुःखी परिवार के लोग वैवाहिक जीवन में सुखोपभोग करते हुए उस कपोत और कपोती के समान ही शोक में निमम हो जाते हैं। मानव जन्म पा कर जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन से ही आसक्त है, वह उस पक्षी के समान ही जाल में जा गिरा है।
"इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त सुख, चाहे इस लोक में या परलोक में नश्वर तथा गतिमान है। ज्ञानी जन उसके पीछे नहीं पड़ते।।
"विशाल अजगर अपने स्थान पर ही स्थिर रहता है और जो कुछ भी आहार उसे स्वतः आ प्राप्त होता है, उसी से वह तृप्त रहता है। अजगर की भाँति मनुष्य को भी प्रयत्न-रहित बन कर जो कुछ भी आहार संयोगवश आ प्राप्त हो, सुस्वाद या नीरस, अधिक या अल्प, उसी को ग्रहण करना चाहिए। यदि भोजन उसके पास न पहुँचे तो उसे दीर्घ काल तक भी शान्त पड़े रहना चाहिए और उसके लिए प्रयास भी नहीं करना चाहिए। शक्तिशाली शरीर के रहते हुए भी तथा बल एवं धैर्य से युक्त हो कर भी वह सज़ग पड़ा रहे तथा सबल इन्द्रियों के रहते हुए भी प्रयत्न न करें।
"ज्ञानी को शान्त, गम्भीर, अथाह, असीम तथा अविचल प्रशान्त सागर की भाँति रहना चाहिए। सागर कभी-कभी नदियों से अत्यधिक जल को प्राप्त करता है और कभी-कभी अत्यल्प; फिर भी वह एक समान ही बना रहता है। उसी प्रकार वह ज्ञानी भी, जिसने अपने हृदय को ईश्वर पर स्थिर किया है, न तो हर्ष से फूलता है और न शोक से खिन्न होता है। अत्यधिक उपभोग से वह फूलता नहीं है, घोर विपत्ति से भी वह खिन्न नहीं होता ।
"अनियन्त्रित इन्द्रिय वाला मनुष्य स्त्री को, ईश्वरीय माया को देख कर उसके हाव-भाव से मोहित हो कर घोर अन्धकार में ठीक उसी प्रकार जा गिरता है, जिस प्रकार पतंगे अग्नि में जा मरते हैं। वह मूर्ख जो कामिनी-कांचन, वस्त्राभूषण आदि मायिक वस्तुओं को भोग-पदार्थ मानता है, वह अपनी विवेक-बुद्धि खो कर पतंगें के समान नष्ट हो जाता है।
"ज्ञानी मनुष्य घर-घर भिक्षा के लिए जाये। हर घर से हथेली-भर प्राप्त करे उनता ही भोजन प्राप्त करे जितना उसके शरीर निर्वाह के लिए पर्याप्त हो गृहस्थ के ऊपर भार न डाले। मधुमक्खी जिस प्रकार सभी फलों से मधु एकत्र करती है, ठीक उसी प्रकार वह भी भिक्षा एकत्र करे ।
"बुद्धिमान मनुष्य सभी छोटे-बड़े शास्त्रों के सारतत्त्व को ग्रहण करें, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार मधुमक्खी फूलों से मधु एकत्र करती है। ज्ञानी पुरुष शाम के लिए अथवा दूसरी सुबह के लिए भोजन संग्रह न करे। हाथ तथा पेट ही उसके पात्र हो। मधुमक्खी की भाँति एकत्र न करे। जो भोजन एकत्र करता है, वह मधुमक्खी की भाँति भोजन के साथ विनष्ट हो जाता है।
"संन्यासी अपने पैरों से भी काष्ठ-निर्मित युवा स्त्री को कभी न छुए। ऐसा करने पर यह उसी प्रकार बंध जायेगा जिस प्रकार हथिनी के अंग-संग से हाथी बंध जाता है। ज्ञानी मनुष्य स्त्री के संग को उसी तरह त्यागे मानो कि वह मूर्तिमती मृत्यु ही है. क्योंकि जैसा करने पर वह हाथियों से कमजोर हाथी की तरह अधिक बलवान् अन्य पुरुषों के द्वारा मारा जायेगा।
" कृपण मनुष्य जो धन का संचय करता है, वह न तो दान देता है और न स्वयं ही धन का उपयोग करता है। जो कुछ भी वह कठिनाई के साथ एकत्र करता है, उसे अन्य ले जाते हैं, जिस प्रकार कि मधु निकालने वाला मधुमक्खियों द्वारा संचित मधु को निकाल ले जाता है। मधु निकालने वाले की भाँति संन्यासी गण उन पदार्थों को गृहम्बों से पहले ही भोगते हैं जिन्हें कि उन्होंने सुखोपभोग की आशा में बड़ी कठिनाई से संचित कर रखा हो।
"यति विषय-सम्बन्धी गीतों का श्रवण न करें। वह मृग से शिक्षा ले। मृग व्याघ के संगीत से मोहित हो बंध जाता है । मृगी के गर्भ से उत्पन्न ऋष्यशृंग मुनि स्त्रियों के विषय संगीत को सुन कर आसानी से बन्धन में पड़ गये। वे उनके हाथ की कठपुतली बन गये थे।
"जिस प्रकार मछली काँटे में लगे हुए आहार से आकृष्ट हो कर बंध जाती है उसी प्रकार स्वाद का लोभी मूर्ख मनुष्य मृत्यु का शिकार बन जाता है। जिह्वा स्वाद के प्रति राग को जीतना सबसे अधिक कठिन है। रसनेन्द्रिय को वश में करने में अन्य सभी इन्द्रियाँ अपने-आप वश में हो जाती हैं। रसनेन्द्रिय को वश में किये बिना कोई भी जितेन्द्रिय नहीं हो सकता । विवेकी पुरुष उपवास द्वारा शीघ्र ही दूसरी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं ।
"प्राचीन काल में विदेह नगरी में एक वेश्या रहती थी। उसका नाम पिंगला था। मैंने उससे भी शिक्षा ली। राजन्! सावधान हो कर सुनो। वह एक दिन सुन्दर वस्त्राभूषणों से सज कर शाम तक ग्राहकों की प्रतीक्षा में दरवाजे पर बैठी रही। उसे कुछ लोगों ने आमन्त्रित भी किया; परन्तु इस आशा में कि अन्य धनिक व्यक्ति उसे अधिक धन देगा, उसने उन्हें भेज दिया। इस तृष्णा से यह निद्रा रहित हो कर दरवाजे पर कभी भीतर तो कभी बाहर आ कर आधी रात तक प्रतीक्षा करती रही। धन की अभिलाषा से आशा ज्वर से पीड़ित हो कर उसने निराशा एवं शोक में रात्रि व्यतीत - की उसे अपने लोभ, काम एव तृष्णामय जीवन से बड़ी विरक्ति हुई।
"अत्यधिक निराश हो कर उसने एक गाना गाया राजन् विषयों के प्रति वैराग्य ही उस खड्ग की भाँति है जिससे मनुष्य अपने आशा-पाश को काट सकता है। मनुष्य को निराशा न हो, वह शरीर और इसके अन्धनों से उसी प्रकार मुक्त नहीं होना चाहता, जैसे अज्ञानी पुरुष अह तथा 'मम' का परित्याग करना नहीं चाहता।
“पिंगला ने गाया : अहा! मन के अनियन्त्रित होने से मैं कितनी भ्रमित हूँ! कितनी मूर्ख हूँ मैं! मनुष्य-जैसे क्षुद्र प्राणियों से मैं अपनी काम तृप्ति की अभिलाषा रखती हूँ ।
"अपने हृदय में विराजमान् भगवान् नारायण को छोड़ कर, जो वास्तविक प्रेमी हैं जो मुझे तुष्टि, शाश्वत सुख तथा आनन्द प्रदान कर सकते हैं, मैं क्षुद्र मनुष्य को प्रसन्न कर रही हूँ, जो मेरी कामनाओं की पूर्ति नहीं कर सकता तथा जिससे दुःख, भय, रोग, शोक तथा मोह की प्राप्ति होती है। मैं सचमुच ही बड़ी मूर्ख हूँ।
“खेद है कि मैंने इस निन्दनीय वेश्यावृत्ति से अपनी आत्मा को व्यर्थ ही पीड़ा पहुँचायी। मैंने अपने शरीर को इन लम्पट और लोभी मनुष्यों के हाथ बेच कर धन और सुख की कामना की।
"मेरे अतिरिक्त अन्य और कौन व्यक्ति इस स्थूल शरीर रूपी गृह का सेवन करेगा जिसमें हड्डियों के शहतीर, खम्भे तथा छत हैं, जो चाम, रोयें तथा नाखूनों से छाया गया है, जिसमें नौ दरवाजे हैं, जिनसे सदा मल निकलते रहते हैं।
“इस विदेह नगरी, जो ज्ञानियों से भरी हुई है, में मैं ही एक स्त्री हूँ जिसने अपने सुख, आशा तथा कामना को शरीर में स्थापित किया है। मैं ही अकेली मूर्ख और दुष्ट हूँ, जो मुक्तिदायक परमात्मा को छोड़ कर विषय-पदार्थों में सुख का कामना
"वे प्रभु ही समस्त प्राणियों के हितैषी, रक्षक, स्वामी और आत्मा है। अपने शरीर को उन्हें अर्पित कर उन्हें खरीद लूँगी और लक्ष्मी जी के समान ही सहवास का आनन्द भोगूँगी तथा उन्हीं में शाश्वत सुख प्राप्त करूंगी।
"दूसरों की सेवा से क्या लाभ? मनुष्य तथा देवताओं की कृपा काल तथा अन्य प्रतिबन्धों से सीमित है। इन्द्रिय-सुख, मनुष्य तथा देवता स्त्रियों को क्या आनन्द प्रदान कर सकते हैं? सबका आदि तथा अन्त है।
"अवश्य ही अपने पूर्व जन्मों से मैंने विष्णु भगवान् के लिए कुछ व्रतादि किये हैं; क्योंकि उन्ही की कृपा से मेरे मन में यह वैराग्य उत्पन्न हुआ है, जो सारी कामनाओं का उन्मूलक है। उन्हीं की कृपा से मैंने शाश्वत शान्ति और सुख के को प्राप्त किया है।
"यदि प्रभु प्रसन्न न होते तो इस प्रकार की निराशा तथा उससे उत्पन्न वैराय उदय नहीं होता जिससे मैं सारे रागों तथा सुखों को त्यागने में समर्थ बन सकूँ।
“अब मैं भगवान् की इस देन को विनम्र भाव से अपने शिर पर ग्रहण करती हूँ । मैं अपनी समस्त दुराशाओं और दुष्कामनाओं का परित्याग कर, उन्हीं परम प्रभु के शरण में जाती हूँ। सन्तुष्ट, ईश्वर में अटूट श्रद्धा रख कर, भाग्यवश जो कुछ भी मिल जाये उसी से जीवन-निर्वाह करते हुए मैं परमात्मा के नित्य सुख का उपभोग करूंगी। संसार-कूप में पतित, विषयान्ध तथा काल-रूपी अजगर से ग्रस्त इस जीव की रक्षा करने में भगवान् के अतिरिक्त दूसरा कौन समर्थ है !
“जब मनुष्य इस जगत् की विनश्वरता का साक्षात्कार करता है, जब वह इस समस्त जगत् को काल-रूपी अजगर के गाल में देखता है, तब वह निश्चय है इहलौकिक तथा पारलौकिक चलायमान, भ्रान्तिमय, असार सुखों से घृणा करेगा। वह सावधान हो कर मिथ्या पदार्थों से अलग रहेगा तथा अपनी आत्मा में ही नित्य सुख का अनुभव करेगा। जिस समय मनुष्य सारे विषय-पदार्थों के प्रति उपेक्षा करता है। उस समय वह स्वयं ही अपनी रक्षा कर लेता है।"
ब्राह्मण ने कहा, "इस प्रकार निश्चय करके प्रेमियों के लिए अपनी सारी आशाओं एवं तृष्णाओं का परित्याग कर तथा अपने मन को ईश्वर में लगा कर शान्त मन से वह अपनी सेज पर जा कर लेटी रही। उसने मन को अशान्त बनाने वाली सारी अपवित्र कामनाओं का परित्याग किया और शान्त मन से वह गहरी नींद में सो गयी। आशा ही सबसे बड़ा दुःख है और निराशा ही सबसे बड़ा सुख है। आशा के परित्याग से मनुष्य परमानन्द को प्राप्त करता है। यह परम सुख की अवस्था है। वैराग्य सुख का मूल है जैसा कि पिंगला के उदाहरण से स्पष्ट होता है जिसने प्रेमियों के प्रति तृष्णा का परित्याग कर सुखपूर्वक निद्रा ली।
"मनुष्य जिसको सबसे अधिक प्रिय मानता है, उसको प्राप्त करना ही सारे क्लेशों तथा दुःखों का मूल है। सत्य को जानने वाला सारे पदार्थों का परित्याग कर असीम सुख की प्राप्त करता है।
"एक कुरर पक्षी अपनी चोंच में मांस का एक टुकड़ा लिये हुए था। दूसरे बलवान् पक्षियों ने, जिनके पास मास का कोई टुकड़ा न था, उसे जा दबोचा; परन्तु कुरर ये उस मांस के टुकड़े को गिरा दिया और वह स्वतन्त्र तथा सुखी बन गया। प्रिय वस्तुओं का परित्याग भला है। इससे शान्ति मिलती है।
"मैं मानापमान की चिन्ता नहीं करता। मैं गृह, स्त्री अथवा सन्तान की चिन्ता नहीं करता। मैं आत्मा में क्रीड़ा करता हूँ, आत्मा में ही रमण करता हूँ तथा शिशुवत् विचरण करता हूँ। यह शिक्षा मैंने बालक से ली है।
"दो प्रकार के व्यक्ति ही दुःखों से विमुक्त तथा सर्वोच्च सुख में निमग्न है-शिशु जो कुछ भी नहीं जानता तथा वह मनुष्य जिसने परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया है, जो गुणों के प्रभाव से परे चला गया है।
"किसी स्थान में एक कुमारी कन्या रहती थी। उसके साथ विवाह के सम्बन्ध के लिए आये हुए लोगों का उसे ही आतिथ्य सत्कार करना पड़ा; क्योंकि उसके - परिवार के लोग कहीं अन्यत्र गये हुए थे वह एकान्त स्थान में धान कूट रही थी। ऐस करते समय उसकी चूड़ियों से बड़ी आवाज होती थी। बुद्धमती लड़की अपनी निर्धनता पर लज्जित हुई। उसने विचार किया कि आये हुए अतिथियों को उसकी निर्धनता का पता नहीं चलना चाहिए। उसने एक-एक कर चूड़ियाँ तोड़ डालीं। केवल दो-दो चूड़ियाँ प्रत्येक हाथ में बच रही थीं। परन्तु धान कूटते समय इन दो चूड़ियों से भी आवाज होती थी। उसने उनमें से भी एक-एक को तोड़ डाला। अब बची हुई एक चूड़ी से आवाज न हुई, यद्यपि वह अपना काम करती रही ।
"सत्य तथा अनुभवों की खोज में विचरण करते हुए मैंने उस लड़की के अनुभव से इस उपदेश को ग्रहण किया । जहाँ बहुत लोग रहते हैं, वहाँ झगड़ा होगा। दो मनुष्यों के बीच भी वाद-विवाद अथवा बातचीत का मौका मिलेगा। अतः कुमारी चूड़ी के समान मनुष्य को एकाकी रहना चाहिए।
"श्वास को वशीभूत कर, आसन में स्थिरता ला कर मनुष्य बाण के समान अपने मन को परमात्मा में एकाग्र करें। वैराग्य, सतत ध्यान तथा क्रमबद्ध साधना के द्वारा वह सावधानीपूर्वक अपने मन को स्थिर करे। जिस प्रकार ईंधन समाप्त हो जाने पर अग्नि स्वयमेव बुझ जाती है, उसी प्रकार मन की बहिर्मुखी वृत्तियों को रोके रखने पर गुण-जन्य नानात्व का निराकरण हो जाता है, मन धीरे-धीर बन्धनों का परित्याग करता है, कर्म की प्रवृत्ति का सन्यास करता है, रजोगुण और तमोगुण का परित्याग करता है तथा गुण-रूपी ईंधन के हट जाने के कारण और इन्द्रिय-संस्कारों के अभाव के कारण मन विलीन हो कर प्रशान्त हो जाता है। मन के आत्मा में विलीन होने पर मनुष्य अन्तर्बाह्य किसी पदार्थ का भान नहीं करता । जिस प्रकार एक बाण बनाने वाले ने बाण निर्माण करने में अपने मन को इतना लीन कर रखा था कि वह अपने सामने से गुजरते हुए राजा को भी न देख सका। मैंने उससे मन एकाग्रता की शिक्षा ग्रहण की।
"ज्ञानी मनुष्य को अकेले ही विचरण करना चाहिए। वह गृह-रहित रहे तथा प्रमाद न करें। वह गुहा का आश्रय ग्रहण करे तथा अपनी योग्यता का परिचय न दे । वह मित्र - रहित रहे । यथासम्भव कम बोले ।
“शरीर नश्वर तथा गतिशील है; फिर भी साधु के लिए गृह-निर्माण करना व्यर्थ है तथा दुःख की जड़ है। जिस प्रकार सर्प दूसरों के बनाये बिल में प्रवेश करता है और बड़े आराम से समय काटता है, उसी प्रकार संन्यासी भी जो भी वास स्थान मिल जाये, उसी में आराम से रहे। उसके लिए एक ही निश्चित स्थान की आवश्यकता है।
"जिस प्रकार मकड़ी अपने भीतर से ही सूत्र निकालती है और उससे जाला फैलाती है, उसी में खेलती है और पुनः उसे पेट के भीतर डाल लेती है, उसी प्रकार परमेश्वर भी अपने भीतर से ही त्रिगुणात्मिका माया के द्वारा जगत् को उत्पन्न करते. उसमें लीला करते तथा उसे स्वयं में विलीन कर लेते हैं।
"प्रेम, घृणा अथवा भय से जिस वस्तु पर प्राणी सदा ध्यान बनाये रखता है, वह भ्रमर-कीट न्याय से कालान्तर में उसी वस्तु के स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
"इस प्रकार उपर्युक्त चौबीस गुरुओं से मैंने ये शिक्षाएँ ग्रहण की हैं। हे राजन्! सुनिए। मैंने शरीर से भी शिक्षा ली है। यह शरीर भी मेरा गुरु है। यह मुझे विवेक तथा वैराग्य की शिक्षा देता है। यह सदा परिवर्तित होता रहता है तथा गतिशील है। मरना और जीना तो इसके साथ ही लगा रहता है। दुःखों की परम्परा का यह शिकार है। यह अहंकार का घर है। इसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राणियों को कितना कष्ट झेलना पड़ता है, यह चिन्ता और शोक का कारण है। यद्यपि इस शरीर से तत्त्व- विचार करने में सहायता मिलती है, तथापि इसे मैं अपना कभी भी नहीं समझता और इसीलिए इसमें मेरा राग नहीं है। मैं सर्वदा यही निश्चय रखता हूँ कि मृत्यु के अनन्तर तो इसे गीदड़ और कुत्ते ही खा जायेंगे।
"शरीर के आराम के लिए मनुष्य स्त्री-पुत्र, हाथी-घोडे, नौकर-चाकर, घर-द्वार और भाई-बन्धुओं के पालन-पोषण में लगा रहता है तथा बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ सह कर धन संचय करता है। अन्ततः वृक्ष के सदृश यह शरीर भी नष्ट हो जाता है और दूसरे शरीर के लिए बीज भी रख छोड़ता है।
"जिह्वा उसे एक ओर खींचती है तो पैर उसे दूसरी ओर जननेन्द्रिय उसे एक ओर ले जाना चाहती है तो त्वचा, कान और पेट दूसरी ओर; नाक कहीं सुन्दर गन्ध सूँघने के लिए जाना चाहती है तो चंचल नेत्र कहीं दूसरी ओर ज्ञानेन्द्रिय किसी दूसरी ओर ले जाती है तो कर्मेन्द्रियाँ उसे दूसरी दिशा में ले जाती है। ये इन्द्रियाँ उसके प्राण- तत्त्व को उसी प्रकार खींच लेती हैं जिस प्रकार बहुत-सी सौतें अपने एक पति को।
"ईश्वर ने वृक्ष, रेंगने वाले जन्तु, पशु, पक्षी, डांस और मछली आदि अनेक प्रकार की योनियाँ रचीं; परन्तु उन्हें सन्तोष न हुआ। तब उन्होंने मनुष्य की सृष्टि की। यह मनुष्य शरीर ऐसी बुद्धि से युक्त है, जो ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकता है। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई।
"यह मनुष्य शरीर यद्यपि क्षणभंगुर है, किन्तु इससे परम पुरुषार्थ — मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है; अतः अनेक जन्मों के पश्चात् यह अत्यन्त दुर्लभ मानव शरीर पाकर बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि वह शीघ्र से शीघ्र मृत्यु से पूर्व ही मोक्ष-प्राप्ति का प्रयत्न कर ले। विषय-भोगों के संंग्रह में यह अमूल्य जीवन नहीं खोना चाहिए; क्योंकि ये तो सभी योनियों में प्राप्त हो सकते हैं ।
"इस भाँति अपने शरीर से सांसारिक भोगों के प्रति वैराग्य तथा अपने भागवतीय स्वरूप के ज्ञान की शिक्षा प्राप्त कर मैं अहंकार और राग-रहित हो कर ज्ञान के प्रकाश के साथ सारे संसार में विचरण करता रहता हूँ।
“अकेले गुरु से ही यथेष्ट और सुदृढ़ बोध नहीं होता; क्योंकि ऋषियों ने एक ही अद्वितीय ब्रह्म को अनेक प्रकार से गायन किया है।'
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, "इतना उपदेश दे कर अवधूत जी ने विदा माँगी। यदु ने उनकी समुचित पूजा की और वे वहाँ से चले गये। राजा यदु ने अवधूत की शिक्षाएँ हृदय से ग्रहण की। उन्होंने समस्त आशक्तियों से छुटकारा पा कर मन का समत्व और शान्ति प्राप्त की।"
(जीव संसार में क्योंकर आ फँसता है, इसी की व्याख्या भगवान् श्री उद्धव से की है। यहाँ जैमिनि के सिद्धान्त का खण्डन किया गया है।)
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं: "मनुष्य को चाहिए कि मेरी शरण में उपदेशानुसार अपने धर्म का सम्यक् परिपालन करे तथा निष्काम भाव से आश्रम और कुल के अनुसार आचरण करे।
"स्वधर्म परिपालन से शुद्ध हुए अपने चित्त में सत्य पर ध्यान करते सावधानीपूर्वक इसका विचार करे कि जो लोग सांसारिक विषयों को सत्य समझ कर उनकी प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होते हैं तथा उनमें आसक्त बनते हैं, वे अपने उस प्रयत्न में कैसे निष्फल होते हैं।
“जिस तरह स्वप्नशील व्यक्ति के तथा मनोराज्य में विचरण करने वाले व्यक्ति के दृश्य पदार्थ मिथ्या ही हैं, उसी तरह काम्य पदार्थ तथा बाह्य पदार्थों में अथवा इन्द्रियजन्य भेद-बुद्धि भी असत्य ही है।
"कर्म चार प्रकार के होते हैं : (१) काम्य कर्म—जो कर्म स्वार्थपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिए किये जाते हैं; (२) निषिद्ध कर्म-जिन कर्मों को शास्त्रों ने बताया है; (३) नित्यकर्म-ये कर्म वे हैं जो नित्यप्रति करने चाहिए जैसे संध्या इत्यादि; तथा (४) नैमित्तिक कर्म-जिन कर्मों का विशेष अवसरों पर ही अनुष्ठान किया जाता है जैसे श्राद्ध आदि। इनमें से प्रथम दो प्रवृत्ति या सकाम कर्म है। स्मृतियों की घोषणा है कि मुमुक्षुओं को प्रवृत्ति कर्म नहीं करने चाहिए। उन्हें नित्य तथा नैमित्तिक कर्म ही करने चाहिए; क्योंकि इनके न करने से बाधाएँ उपस्थित सकती हैं।
"मनुष्य को चाहिए कि मुझ (ईश्वर) में पूर्ण श्रद्धा रख कर निवृत्ति कर्म ( नित्य तथा नैमित्तिक कर्म) करे तथा जन्म-मृत्यु-दायक प्रवृत्ति कर्मों से दूर रहे। सत् वस्तु की खोज प्रारम्भ कर देने पर तो उसे कर्म-सम्बन्धी विधि-विधानों की ओर विशेष ध्यान नहीं देना चाहिए। ज्ञानयोगी को तो निवृत्ति-मार्ग की भी अधिक चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
"मुझमें स्थित हो कर तथा मेरा परायण हो कर वह सदा धर्मों का पूर्णतः तथा नियमों का आंशिक रूप से अभ्यास करे। वह उस गुरु की सेवा करे जिसका मन शान्त है, जो वेदों में पारंगत है, जो मेरा भक्त है, जो मुझसे पूर्ण हैं, जो मुझमें एक हो गया है तथा जिसने अपनी आत्मा के रूप में मेरा साक्षात्कार कर लिया है।
"शिष्य को अभिमान, द्वेष, ईर्ष्या तथा ममता से रहित होना चाहिए। उसे गुरु में दृढ अनुराग होना चाहिए। अधैर्य का वह त्याग करे तथा परमार्थ का ज्ञान प्राप्त करने के लिए सदा तत्पर रहे। वह किसी में दोष न निकाले और न व्यर्थ की बात ही करे। आत्मा सर्वत्र एक ही समान है तथा सबसे हो कर आत्मा ही विभाषित होती है; अतः वह सबको समान दृष्टि से देखे और अपनी स्त्री, सन्तान, घर, भूमि, सम्पत्ति, स्वजन आदि के प्रति उदासीन रहे ।
"जिस तरह काष्ठ को जलाने तथा उसे प्रकाशित करने वाली अग्नि उस काष्ठ से पृथक् है ठीक उसी प्रकार यह आत्मा भी, जो स्वयंप्रकाश तथा साक्षी है, इन स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों से सर्वथा पृथक् है। जिस तरह अग्नि काष्ठ में प्रवेश कर काष्ठ के उत्पत्ति, विनाश, बड़ाई, छोटाई, अनेकता आदि गुणों को धारण कर लेती है, उसी तरह आत्मा भी शरीर से सर्वथा भिन्न होते हुए भी शरीर के गुणों को धारण कर लेती है।
“ईश्वर की त्रिगुणात्मिका माया से निर्मित यह शरीर ही संसार-प्राप्ति का कारण है। यही मनुष्य के आवागमन का कारण है। आत्मज्ञान जन्म-मृत्यु के इस प्रवाह को नष्ट कर डालता है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी आत्मा में ही परमात्मा का साक्षात्कार करे। इस दृश्य जगत् तथा स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर में सत्यत्व की भ्रान्त धारणा का शनैः-शनैः परित्याग करे। उसे यह भी पूर्णतः अनुभव करना चाहिए कि आत्मा शरीर से भिन्न तथा उससे अतीत है।
“विद्या-रूप अग्नि को उत्पन्न करने के लिए गुरु को नीचे की अरणि तथा शिष्य को ऊपर अरणि समझना चाहिए। उपदेश मध्य का मन्थन-काष्ठ है। इन दोनों के को योग से सुखदायक ज्ञानाग्नि की उत्पत्ति होती है। इस भाँति गुरु के द्वारा जो अत्यन विशुद्ध ज्ञान शिष्य प्राप्त करता है, वह गुणों से बनी हुई विषयों की माया को भस्म कर देता है। तत्पश्चात् वे गुण भी भस्म हो जाते हैं, जिनसे कि यह संसार बना हुआ है और अन्ततः वह ज्ञानामि भी वैसे ही शान्त हो जाती है जैसे कि समिधा के अभाव में अग्नि बुझ जाती है।"
(अब मीमांसकों के मत की चर्चा की जा रही है। उनका यहाँ खण्डन भी किया गया है। इस मत के अनुसार जीव नित्य तथा अनेक है। इसके मतावलम्बी ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं रखते। स्वर्गप्राप्ति ही उनका लक्ष्य है। कर्म उनका सर्वस्व है। कर्म से ही फल की प्राप्ति होती है; कर्म-फल-प्रदाता ईश्वर की आवश्यकता नहीं है।)
"यदि तुम ऐसा सोचते हो कि कर्मों के कर्ता तथा सुख-दुःखों के भोक्ता जीव अनेक हैं अथवा स्वर्ग, काल, वेद और आत्माओं को नित्य जानते हो अथवा ऐसा समझते हो कि सभी वस्तुओं का अस्तित्व सत्य एवं शाश्वत है तथा विषय पदार्थे के बाह्य आकार के अनुसार ज्ञान उत्पन्न होता तथा बदलता रहता है। यदि ऐसा मान भी लिया जाये, तो भी सारे प्राणियों को शरीर और कालावयवों के सम्बन्ध से होने जीवों की जन्ममरणादि अवस्थाओं में बारम्बार आना ही पड़ेगा; क्योंकि तुम देहादि पदार्थ और काल को नित्य मानते हो?
“इसके अतिरिक्त इस दशा में कर्म का कर्ता तथा सुख-दुःख के भोक्ता को कुछ भी स्वतन्त्रता नहीं है। फिर जो परतन्त्र है, उसे भला क्या सुख-सौभाग्य के प्राप्ति हो सकती है? ऐसा भला कौन व्यक्ति होगा जो परमार्थ की आशा में उपासना करे जो स्वयं ही परतन्त्र है ?
“जो लोग यह समझते हैं कि वे अपने वैदिक कर्मों में कुशलता के कारण सुखी हैं, यह उनका अज्ञान ही है; क्योंकि कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि विद्वान् को सुख नहीं प्राप्त होता, जब कि कोई-कोई मूढ़ कभी भी दुःखी नहीं देखे जाते । यदि यह मान लें कि लोगों को सुख की प्राप्ति तथा दुःख के नाश के उपाय का पता है, किन्तु उन्हें भी ऐसे उपाय का पता नहीं है जिससे मृत्यु के ऊपर विजय पायी जाये। जब मृत्यु शिर पर हो तो ऐसा कौन-सा भोज्य-पदार्थ है जो मनुष्य को सुखी बना सकें ? जिस मनुष्य को फाँसी पर लटकाने के लिए ले जा रहे हों, उसे कोई भी वस्तु प्रिय नहीं मालूम होती ।
"वेदों में वर्णित स्वर्ग-सुख भी क्षणभंगुर ही है। वहाँ भी विशुद्ध सुख नहीं है। स्वर्ग में भी ईर्ष्या, प्रतिद्वन्द्विता, विनाश, क्षय, दोष-दर्शन, विषमता और इसके परिणाम स्वरूप अशान्ति पायी जाती है। भोग भी नाशवान् हैं। कृषि की भॉंति स्वर्गिक भोग की कामना की पूर्ति में बहुत-सी बाधाएँ हैं। यह उसकी भाँति ही निष्फल है। अतः स्वर्ग भी श्रेय नहीं है।
"मनुष्य यज्ञों के द्वारा देवों की उपासना करके स्वर्ग जाते हैं और वहाँ अपने पुण्यकमों से उपार्जित दिव्य भोगों को देवताओं के समान ही उपभोग करते हैं। वहाँ वे सुन्दर वस्त्रों को धारण करते तथा अपने सुकर्मों से प्राप्त विमान में सवार हो कर स्वर्गिक अप्सराओं के साथ विहार करते हैं। गन्धर्व गण उनका यश-गान करते हैं। उनका विमान छोटी-छोटी घण्टियों से अलंकृत होता है और उनके इच्छानुसार ही चलता है। वे अप्सराओं के साथ देव-उद्यानों में विहार करते हुए अपना समय यों ही गंवा देते हैं। उन्हें अपने पतन का ध्यान ही नहीं रहता। पुण्य-कर्म शेष रहने तक वे स्वर्ग में सुख भोगते हैं; किन्तु पुण्य क्षीण होते ही, उनकी इच्छा न रहते हुए भी काल की गति के कारण उन्हें भी नीचे गिरना ही पड़ता है।
“यदि मनुष्य कुसंग के कारण अधर्मपरायण होता है, यदि उसकी इन्द्रियाँ अनियन्त्रित हैं, यदि वह अज्ञानी, अविवेकी तथा लोभी है, यदि वह विषयी है, यदि वह प्राणियों को सताता है, यदि वह विधि-विरुद्ध पशुओं की बलि दे कर भूत-पिशाचों की उपासना करता है तो वह अवश्य ही विभिन्न नरकों में जाता है और वहाँ घोर अन्धकार में पड़ता है। वह भयंकर तामसिक योनियों में प्रवेश करता है।
"अतः सकाम कर्मों का परिणाम दुःखमय ही होता है। शरीर से कर्म करने पर मनुष्य को नये-नये शरीर प्राप्त होते रहते हैं। इस क्षणभंगुर शरीर को मृत्यु- धर्मा जान कर कर्मों में प्रवृत्त होने पर क्या सुख मिलेगा ?
“सारे लोक तथा लोकपालों की आयु एक कल्प है। वे मुझसे सदा भयभीत रहते हैं। यहाँ तक कि ब्रह्मा भी मुझसे भय खाते हैं; क्योंकि उनकी आयु भी केवल दो परार्ध है; अतएव दुःख, शोक तथा क्लेश-संकुलित प्रवृत्ति-मार्ग का परित्याग कर नित्य-सुख तथा अमृतत्व-प्रदायक निवृत्ति-मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
"गुण इन्द्रियों को कर्म में प्रेरित करते हैं और इन्द्रियाँ कर्म करती हैं। गुणों तथा इन्द्रियों से सम्बन्ध रखने के कारण ही उनके कर्मों के फल (सुख-दुःख) का उपभोग करता है।
"जब तक गुणों में विषमता है तब तक आत्मा की अनेकता का बोध होता है, जब तक आत्मा की अनेकता है तब तक वह परतन्त्र है, जब तक परतन्त्रता है, तब तक उसे ईश्वर से भय बना रहता है; अतः जो कर्मों का सेवन करते हैं, वे शोक और मोह से पीड़ित रहते हैं।
"जब गुणों में क्षोभ होता है, तब मुझको ही आत्मा, वेद, लोक, स्वभाव, धर्म आदि अनेक नामों से पुकारते हैं।'
उद्भव जी ने पूछा: "भगवन्! ब्रह्म शरीर में ही रह रहा है, फिर भी वह शरीर के गुणों से नहीं बंधता है, ऐसा क्यों? जब तक जीव गुणों के विकार रूप इस शरीर में निवास करता है, तब तक वह उन गुणों के बन्धन से कैसे बच सकता है? यदि आत्मा आकाश के समान मुक्त है तो वह बन्धन में क्योंकर आता है ?
"मुक्त तथा बद्ध पुरुष के क्या लक्षण है? वे कैसे व्यवहार करते तथा विहार करकरते हैं? कैसे खाते-पीते, सोते, बैठते तथा चलते हैं? उपर्युक्त बातों पर प्रकाश डालिए। आप सर्वज्ञ हैं। इस प्रश्न का मर्म जानने वालों में आप श्रेष्ठ है। क्या एक ही आत्मा नित्य-बद्ध और नित्य-मुक्त है? "
भगवान् ने कहा : गुणों की उपाधि से ही आत्मा को बद्ध या मुक्त कहा जाता है; परन्तु वस्तुतः ऐसी बात नहीं है। सभी गुण मायामूलक हैं—वे माया की सृष्टि है, अतः न तो बन्धन है और न मोक्ष ही।
“शोक-मोह, सुख-दुःख तथा शरीर की उत्पत्ति माया के कारण ही है। जिस प्रकार स्वप्न मन की भ्रान्त कल्पना है, उसी प्रकार यह संसार-चक्र भी असत्य ही है।
“हे परम ज्ञानी उद्धव ! जीव तो मेरा अंश है। वह अनादि अज्ञान के कारण बद्ध होता है और आत्मज्ञान से मुक्त होता है। अज्ञानवश वह अपने को मुझ (ईश्वर) से भिन्न मान बैठता है, यही बन्धन का कारण है। जब उसे यह ज्ञान होता है कि वह और 'मैं' एक ही हैं, वह मुक्त हो जाता है।
“अब मैं बद्ध और मुक्त जीव का भेद बतलाता हूँ जो एक ही धर्म में रहते हुए भी विरुद्ध धर्म वाले जान पड़ते हैं।
"जीव और ईश्वर नाम के दो पक्षियों ने एक ही वृक्ष (शरीर) में नीड़ बना रखे हैं। वे दोनों चेतन होने के कारण समान हैं और सखा भी हैं। उनमें से एक (जीव) शरीर रूपी वृक्ष के फल का आस्वादन करता है तथा दूसरा (ईश्वर) अभोक्ता होते हुए भी जीव से शक्ति और सामर्थ्य में बढ़ कर है।
"जो फलों का भक्षण नहीं करता, वह (ईश्वर) ज्ञानी है। वह अपने वास्तविक स्वरूप को तथा दूसरे को भी जानता है; परन्तु भोक्ता जीव नहीं जानता है। जीव अविद्या से युक्त होने के कारण सदा बद्ध है और ईश्वर विद्यायुक्त अथवा ज्ञानसम्पन्न होने के कारण नित्य-मुक्त है।
"स्वप्न से जगे हुए पुरुष के समान ही ज्ञानी पुरुष शरीर में रहते हुए भी शरीर से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखता; परन्तु अज्ञानी मनुष्य शरीर से सम्बद्ध न होते हुए भी अज्ञान के कारण, स्वप्न देखने वाले व्यक्ति की भाँति शरीर से बद्ध रहता है। स्वप्नद्रष्टा पुरुष की भाँति अज्ञानी पुरुष शरीर से ही सम्बन्ध स्थापित किये रहता है।
"इन्द्रियाँ ही विषयों को ग्रहण करती हैं। ज्ञानी जन इनमें अभिमान नहीं करते; अतः वे इनसे प्रभावित नहीं होते हैं। यह शरीर प्रारब्ध के अधीन है। इसमें इन्द्रियाँ कार्य करती है; किन्तु अज्ञानी यह सोचता है कि वह कर्ता है और इसी कारण वह बंध जाता है।
“विवेकी पुरुष सोते, बैठते, घूमते फिरते, नहाते, देखते, छूते, सूँघते, खाते आदि क्रियाओं में अज्ञानी की भाँति अपने को इनका कर्ता नहीं मानता है। वह विषयों से विरक्त रहता है। गुण ही सभी कर्मों के कर्ता-भोक्ता हैं, ऐसा समझ कर ज्ञानी पुरुष उनमें आसक्त नहीं होता । वह इन्द्रियों की सभी क्रियाओं तथा अनुभवों का मूक साक्षी बना रहता है। प्रकृति में रहते हुए भी वह आकाश, सूर्य तथा वायु की तरह असंग रहता है। वह शरीर में निवास करता है; परन्तु शरीर में आसक्त नहीं होता है। सूर्य जल में प्रतिबिम्बित होता है; किन्तु वह अस्पृष्ट रहता है। वायु सर्वत्र प्रवाहित होती है; किन्तु वह किसी भी वस्तु में आसक्त नहीं होती। इसी भाँति आकाश भी सर्वव्यापक है; किन्तु वह किसी से आसक्त नहीं होता।
“वैराग्य-बल से ज्ञानी की दृष्टि तीक्ष्ण हो जाती है। सारी शंकाएँ दूर हो जाती हैं। ज्ञानी व्यक्ति निद्रा से जगने की भाँति ही उठ जाता है तथा शरीर एवं विषयों में भेद-दृष्टि से अपने को अलग कर लेता है। जीव-ब्रह्म की एकता सम्बन्धी उसकी सारी शंकाएँ ज्ञान चक्षु के द्वारा नष्ट हो जाती हैं। उसकी समस्त कामनाएँ वैराग्य - खड्ग से छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। वह सर्वत्र ब्रह्म के ही दर्शन करता है तथा इस विविधतापूर्ण जगत्, दृश्य जगत् से पुनः भ्रमित नहीं होता है। जिस प्रकार स्वप्न से जगा हुआ व्यक्ति स्वप्न के अनुभवों से भ्रमित नहीं होता, उसी तरह ज्ञानी भी भेद-बुद्धि-भ्रम से मुक्त हो जाता है।
"जिनके प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि की समस्त चेष्टाएँ बिना संकल्प के होती हैं, वे देह में स्थित रह कर भी उसके गुणों से मुक्त हैं। शरीर में रहते हुए भी वे कर्म-बन्धन से मुक्त हैं।
"ज्ञानी पुरुष किसी द्वारा उत्पीड़न से न तो दुःखी होते हैं और न पूजा करने से सुखी, न तो अच्छे काम करने वालों की प्रशंसा करते हैं और न बुरे काम बालों की निन्दा ही। वे पाप तथा पुण्य से सर्वथा मुक्त हैं। वे सबके प्रति समदृष्टि रखते हैं। वे न तो कोई भला या बुरा काम करते हैं, न कुछ भला या बुरा कहा करते हैं और न सोचते ही हैं। वे आत्म-सुख का अनुभव करते हैं। आत्मानन्द में ही मग्न रहते हैं तथा बाह्य जगत् से उदासीन हो कर जड़ के समान विचरण करते हैं।
"जो पुरुष वेदों में तो पारंगत हो; परन्तु ब्रह्म में संस्थित न हो, जिसे आत्म- साक्षात्कार प्राप्त न हुआ हो, उसका सारा श्रम यो ही निष्फल है जैसे कि बिन दूध की गाय पालने वाले का।
"दूध न देने वाली गाय, व्यभिचारिणी स्त्री, पराधीन शरीर, कुपुत्र, सत्पात्र के रहने पर भी दान न दिया हुआ धन तथा मेरी स्तुति से रहित वाणी-इनकाजो संरक्षण करता है, वह दुःख पर दुःख ही प्राप्त करता रहता है।
"जिस वाणी से जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय-रूपी मेरी लोकपावन लीला का वर्णन न हो अथवा मेरे लोकप्रिय लीलावतारों का गायन न हो, वैसी बन्ध्या वाणी में बुद्धिमान् पुरुष को प्रवृत्त नहीं होना चाहिए।
"मनुष्य को चाहिए कि वह इस प्रकार के विवेक द्वारा आत्मा में अनेकता के भ्रम को दूर कर दे और सभी प्रकार के सांसारिक व्यवहारों से उपरत हो कर अपना निर्मल मन मुझ सर्वव्यापी परमात्मा में लगा दे। यदि तुम अपना मन परब्रह्म में स्थिर न कर सको तो सारे कर्म निरपेक्ष-भाव से मेरे लिए ही करो। "
(अब भगवान् श्रीकृष्ण भक्ति का उपदेश प्रारम्भ कर रहे हैं।)
“हे उद्धव! मेरी कल्याणकारी लोक-पावन कथाएँ सुनने से, निरन्तर कीर्तन से मेरे दिव्य कर्मों तथा लीलाओं के स्मरण से, मेरे लिए ही सभी कर्मों को करने से, मुझे ही अपना परम आश्रय मान लेने से तथा मेरे लिए धर्म, अर्थ और काम-स्वरूप त्रिवर्ग की प्राप्ति में प्रवृत्त होने से श्रद्धालु व्यक्ति मेरी अनन्य भक्ति प्राप्त कर लेता है।
"सत्संग द्वारा भक्ति का अर्जन कर वह मेरा प्रेमी उपासक बन जाता है और सन्तों द्वारा उपदिष्ट मेरे परम पद को अवश्य प्राप्त कर लेता है।"
उद्धव जी ने पूछा: "भगवन्! कृपया बतलाइए कि आपके विचार से साधु क कौन है? आप कैसे साधु को सर्वाधिक पसन्द करते हैं? आपके प्रति कैसी भक्ति सार्थक होगी? नारदादि महर्षियों द्वारा प्रतिपादित कौन-सी भक्ति आपको अधिक स्वीकार्य है?
"हे भूताधिपति! हे जगदीश्वर! मैं आपके चरणों में पड़ा हूँ। मैं आपका भक्त तथा शरणागत हूँ। कृपया आप मुझे इनका उपदेश दीजिए। हे प्रभो! आप चिदाकाश-स्वरूप परब्रह्म है। आप प्रकृति से परे पुरुषोत्तम है। आपने इच्छा से ही इस भूलोक में अवतार धारण किया है।"
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा : “करुणा की मूर्ति, किसी भी प्राणी से बैर न रखने वाला, सहनशील, तितिक्षु, सत्यनिष्ठ, निष्पाप मन बाला, समदर्शी, सबका हितैषी, कामनाओं से अकलुषित बुद्धिमान्, संयमी, विनीत, शुद्ध, भद्र, पवित्र, अपरिग्रही, अकिंचन, अचंचल, खान-पान में परिमित, स्थिर बुद्धि वाला, दृढ़, मेरा शरणागत, प्रमाद-रहित, आत्म-तत्त्व के चिन्तन में संलग्न, जागरूक, गम्भीर, धैर्यवान्, षड उर्मियों (भूख-प्यास, शोक-मोह, जरा-मृत्यु) को वश में रखने वाला, अपने सम्मान की अपेक्षा न रख दूसरों को सम्मान देने वाला, निपुण, मित्र, कारुणिक, ज्ञानी-साधु ऐसा होता है।
“जो स्वधर्म के परिपालन के विषय में मेरे बतलाये हुए विधि-निषेध को जान कर मेरे लिए उन सबका परित्याग कर देता है और मेरे भजन में लगा रहता है, वह परम सन्त है।
"मैं कौन हूँ, मैं क्या हूँ, मैं कैसा हूँ—इन बातों को जाने, चाहे न जाने; किन्तु जो अनन्य भाव से मेरा भजन करता है, वह मेरे विचार में मेरा परम भक्त है।
"मेरी मूर्ति तथा मेरे भक्तों का दर्शन, स्पर्श, पूजन, सेवा-शुश्रूषा, स्तुति और प्रणाम करे; मेरे गुणों तथा कर्मों का भावपूर्वक कीर्तन करे; मेरी कथा सुनने में श्रद्धा रखे; निरन्तर मेरा ध्यान करते रहे; दास्यभाव से आत्मनिवेदन करे; मेरे दिव्य जन्म और कर्मों की चर्चा करे; विशेष पर्वों को मनाये; मेरे मन्दिरों में संगीत, नृत्य और बाजों आदि के साथ उत्सव करे; वार्षिक त्यौहारों के दिन जुलूस निकाले और उपहारों से पूजा करे; वैदिक विधि से दीक्षा ग्रहण करे; मेरे व्रतों का पालन करे; मन्दिरों में मेरी मूर्तियों की स्थापना में उत्साह रखे ; मेरे लिए उद्यान, क्रीड़ा के स्थान, नगर और मन्दिर स्वयं अथवा दूसरों के साथ मिल कर बनवाने का उद्योग करे। सेवक की भाँति मेरे मन्दिरों में झाड़े-बुहारे, लीपे-पोते तथा सजाये, अभिमान तथा दम्भ से रहित हो, अपने शुभ कर्मों का ढिंढोरा न पीटे, मौन रहे; मुझे समर्पित दीपक को भी अपने काम में न लाये। मेरी कृपा तथा नित्य-सुख की प्राप्ति के ये निश्चित साधन है। ये भक्ति के लक्षण हैं। इनसे व्यक्ति के हृदय में भक्ति-भावना का संचार होता है।
"लोगों को जो वस्तु सबसे अधिक अभीष्ट हो तथा जो अपने को भी अधिक प्रिय हो, उसे वह मुझे समर्पित कर दे। इस प्रकार के समर्पण से उसे कल्याण की प्राप्ति होगी।
प्यारे उद्धव ! सूर्य, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, वैष्णव, आकाश, वायु, जल, पृथ्वी हृदय और समस्त प्राणी इन सबमें मेरी उपासना करनी चाहिए। मेरी पूजा के लिए ये ही ग्यारह स्थान हैं।
"वैदिक मन्त्रों के द्वारा सूर्य में, घी की आहति के द्वारा अग्नि में, आतिथ्य द्वारा ब्राह्मण में, घास के द्वारा गौ में, सत्कार के द्वारा वैष्णव में, निरत ध्यान के द्वारा हृदयाकाश में, प्राण को मुख्य समझने से वायु में; जल, पत्र, पुष्पादि विभिन्न सामग्रियों द्वारा जल में, पवित्र मन्त्रों द्वारा पृथ्वी में, भोगों के द्वारा आत्मा में तथा समदृष्टि के द्वारा सभी प्राणियों में क्षेत्रज्ञ के रूप में मेरी आराधना करनी चाहिए।
"पूजा के इन सभी स्थानों में शान्त एवं एकाग्र मन से मेरी शंख, चक्र, और पद्मधारी चतुर्भुज सौम्य मूर्ति का ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार जो एकाग्र मन से यज्ञ यागादि, इष्ट और सरोवर, बाग, मन्दिर, आदि पूर्व-कर्मा के मेरी पूजा करता है, मेरा स्मरण करता है तथा साधु पुरुषों की सेवा करता है, उसे के श्रेष्ठ भक्ति प्राप्त होती है।
“हे उद्धव! भक्ति के अतिरिक्त मुक्ति का अन्य कोई मार्ग नहीं है। यह भक्ति सत्संग के द्वारा ही प्राप्त होती है; क्योंकि मैं ही सन्तों का आधार, लक्ष्य तथा आश्रय हूँ। हे यदुनन्दन ! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त गोपनीय रहस्य को बताऊँगा; क्योंकि मेरे सेवक, सुहृद् और सखा हो। "
"मैं योग, सांख्य, धर्म-पालन, स्वाध्याय, तप, त्याग, इष्टापूर्त, दक्षिणा, व्रत यज्ञ, वेद, तीर्थ, यम-नियम आदि से वैसी सुगमतापूर्वक प्राप्त नहीं होता जैसा कि सत्संग से, जो कि सभी आसक्तियों को नष्ट कर डालता है।
"सत्संग के द्वारा ही दैत्य असुर, पशु-पक्षी, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, सिद्ध चारण, गुह्यक और विद्याधर तथा मनुष्यों में वैश्य, शूद्र, स्त्री, चाण्डाल आदि रजोगुणी तथा तमोगुणी प्रकृति के बहुत से प्राणियों में मेरा परम पद प्राप्त किया है। त्वष्टा ऋषि पुत्र वृत्रासुर, प्रह्लाद, वृषपर्वा, बलि, बाणासुर, मय दानव, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवान्, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, व्रज की गोपियाँ, यक्षपत्नियाँ और दूसरे लोगों ने भी न तो वेदों का स्वाध्याय किया, न ज्ञान के लिए महापुरुषों की विधिवत् सेवा ही की, न तो व्रत-उपवास किये और न तपस्या ही ; किन्तु सत्संग के प्रभाव से वे मुझे प्राप्त हो गये।
"योग, सांख्य, दान, व्रत, तपस्या, यज्ञ, श्रुतियों की व्याख्या, स्वाध्याय, संन्यास आदि बड़े-बड़े साधनों के द्वारा भी लोग मुझे प्राप्त नहीं कर पाते; किन्तु गोपियाँ, गायें, वृक्ष, मृग, नाग तथा मूढ़ बुद्धि के जीव सत्संग से विकसित प्रेमपूर्ण भाव के द्वारा मुझे सहज ही प्राप्त कर कृत-कृत्य हो गये। जिस समय अक्रूर जी मुझे बलराम जी के साथ मथुरा ले जा रहे थे उस समय गोपियों को, जो कि प्रगाढ़ प्रेम के कारण अपना हृदय मुझे अर्पित कर चुकी थीं, मेरे वियोग के कारण मर्मान्तक पीड़ा पहुँची। मेरे अतिरिक्त उन्हें अन्य कुछ भी आनन्दप्रद या रुचिकर न था। गोपियों का प्रियतम मैं जब वृन्दावन में उनके साथ था तब जो रात्रियाँ उन्होंने पल के समान बिता दी, वे ही रात्रियाँ मेरे वियोग में उनके लिए युग के समान हो गयीं। जैसे ऋषि गण समाधि में तथा नदियाँ समुद्र में मिल कर नाम-रूप को खो देती हैं वैसे ही वे गोपियाँ परम प्रेम के द्वारा मुझमें इतना तन्मय हो रही थीं कि उन्हें देह-गेह की, अपने सगे-सम्बन्धियों की तथा अपने पास-पड़ोस की सुध-बुध ही न रह गयी थी।
“उनमें से बहुत-सी गोपियाँ मेरे वास्तविक स्वरूप, परब्रह्म को न जान कर मुझे अपना प्रियतम यार ही समझती थीं; किन्तु उन्होंने सैकड़ों और सहस्रों की संख्या में केवल सत्संग के प्रभाव से मुझ परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लिया । हे उद्धव ! इसलिए तुम विधि-निषेध, प्रवृत्ति-निवृत्ति और सुनने योग्य तथा सुने हुए विषयों का परित्याग कर नीति-नियमों से ऊपर उठ जाओ। श्रुति-स्मृति की, विधि-निषेध की चिन्ता न करो। समस्त प्राणियों के आत्म-स्वरूप मुझ एक की ही शरण पूर्ण हृदय तथा परम प्रेम से ग्रहण करो। तुम्हें किसी से भय नहीं होगा।"
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं: "सम्पूर्ण वस्तुओं को जीवन-दान देने वाले परमात्मा चक्रों में प्रकट हैं। वे पहले अनाहतनादस्वरूप परा वाणी नामक प्राण के साथ मूलाधार चक्र में प्रवेश करते हैं। क्रमशः पश्यन्ती और मध्यमा वाणी का मनोमय सूक्ष्म रूप धारण करने के अनन्तर वे अन्त में मात्रा, स्वर तथा वर्ण-रूप स्थूल-वैखरी वाणी का रूप ग्रहण करते हैं।"
(टिप्पणी-वैखरी वाणी दिव्य शक्ति की अन्तिम तथा स्थूलतम अभिव्यक्त है। ईश्वरीय वाणी की सर्वोच्च सूक्ष्मतम प्रारम्भिक अभिव्यक्ति परा है। परा वाणी ही विचारों का मूल अथवा बीज का रूप धारण करती है। यह वाणी की प्राथमिक अभिव्यक्ति है। परा में ध्वनि अव्यक्तावस्था में रहती है। परा, पश्यन्ती, मध्यमा वैखरी वाणी के क्रमिक रूप है। मध्यमा अप्रकट वाणी में माध्यमिक अवस्था है । इसका स्थान हृदय है।
पश्यन्ती का स्थान मणिपूर चक्र (नाभिस्थान है)। सूक्ष्म अन्तदृष्टि प्राप्त योगी गण पश्यन्ती वाणी का अनुभव कर सकते हैं। इसमें रंग तथा रूप होता है। यह भाषाओं के लिए एक-सा ही है। इसके स्पन्दन में भी समानता होती है। भारतीय यूरोपियन, अमरीकी, जापानी, पशु-पक्षी सभी पश्यन्ती वाणी के द्वारा ही किसी वस्तु की भावना करते हैं। संकेत अव्यक्त वाणी का एक प्रकार है। यह सभी लोगों के लिए एक ही है। किसी भी देश का कोई भी व्यक्ति क्यों न हो अपने हाथों को मुख के निकट ला कर एक ही सा संकेत करता है। जैसे एक ही शक्ति कानों में क्रियाशील हो कर श्रवण शक्ति, नेत्रों में दृष्टि-शक्ति इत्यादि बन जाती है वैसे ही एक ही पश्यन्ती वाणी भी स्थूल रूप में विभिन्न ध्वनियों में परिणत हो जाती है । अपनी माया-शक्ति के द्वारा परमात्मा प्रथम मूलाधार चक्र में परा वाणी के रूप में तदनन्तर नाभि के मणिपूर-चक्र में पश्यन्ती के रूप में, हृदय में मध्यमा के रूप में अन्ततः कण्ठ और मुख में वैखरी के रूप में अपने को प्रकट करते हैं। यह भगवान की वाणी का दिव्य अवतरण (अवतार) है। सभी वैखरी परमात्मा की ही वाणी है। यह विराट् पुरुष की वाणी है।
जैसे अग्नि काष्ठ में अव्यक्त उष्णता के रूप में विद्यमान रहती है। बलपूर्वक रगड़ने से वह वायु की सहायता से चिनगारी के रूप में प्रकट होती है, तदनन्त अग्नि-शिखा के रूप में और अन्ततः घी की आहुति देने पर ज्वाला का रूप धारण कर लेती है वैसे ही मैं वाणी के रूप में प्रकट होता हूँ। उष्णता परा वाणी, चिरगांरी पश्यन्ती, अग्नि- शिखा मध्यमा और ज्वाला वैखरी है।)
"इसी प्रकार बोलना, काम करना, चलना मल-मूत्र त्याग करना, सूँघना, देखना, छूना, सुनना, संकल्प-विकल्प करना, जानना, अभिमान करना, जानना, अभिमान करना,तथा सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के विकार—ये सब मेरी ही अभिव्यक्तियाँ हैं।
"यह ईश्वर एक और पहले अव्यक्त था। वही त्रिगुणात्ममय ब्रह्माण्ड कमल का कारण है। वह ही कालगति से अनेक रूपों में प्रतीत होने लगता है जैसे कि भूमि में बोया हुआ बीज बहुत-सी शाखाएँ प्रस्फुटित कर अनेक रूप धारण कर लेता है।
"जैसे वस्त्र धागे से ओत-प्रोत है, वैसे ही यह विश्व परमात्मा में ही ओत-प्रोत है। यह संसार वृक्ष अनादि और नित्य है। कर्म-परम्परा इसका स्वरूप है। यह फूल भोग और फल मोक्ष उत्पन्न करता है। इसके दो बीज (पाप और पुण्य), सैकड़ों जड़ें (असंख्य वासनाएँ), तीन तने (सत्त्व, रज और तम), पाँच प्रधान शाखाएँ (पाँच भूत) और ग्यारह शाखाएँ (दश इन्द्रियाँ और एक मन) हैं।
“यह पाँच प्रकार के रस (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध) उत्पन्न करता है। इसमें दो पक्षियों (जीव और परमात्मा) के घोंसले हैं। इसमें तीन तरह की छाल (वात, पित्त और कफ) और दो फल (सुख और दुःख) है । यह सूर्य मण्डल तक का फैला हुआ है। जो सूर्य मण्डल को पार कर जाते हैं, वे फिर जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं पड़ते ।
"गाँवों में रहने वाले गृध्र (गृहस्थ जीवन से आसक्त कामनाओं से पूर्ण गृहस्थ) इस वृक्ष का एक फल अर्थात् दुःख का उपभोग करते हैं। जो अरण्यवासी हैं तथा विवेक और ज्ञान से सम्पन्न होने के कारण हंस कहलाते हैं, वे सुख-रूप फल को भोगते हैं। जो गुरु की कृपा से इस बात को जान जाता है कि एक ही ईश्वर माया द्वारा अनेक रूप धारण कर रहा है, वह वास्तव में सत्य को और वेदों के रहस्य को जान जाता है।
"गुरुदेव की सेवा और उपासना से प्राप्त अनन्य भक्ति के द्वारा अपने ज्ञान की कुल्हाड़ी को तीक्ष्ण बना कर धैर्य एवं सावधानीपूर्वक तुम इस संसार वृक्ष का उच्छेदन कर डालो और परमात्मा को प्राप्त कर इन अस्त्रों को भी छोड़ दो।"
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा : "सत्त्व, रज और तम—ये तीन बुद्धि (प्रकृति) के गुण हैं, आत्मा के नहीं। अतः मनुष्य को सत्त्व के द्वारा रज और तम—इन दोनों पर विजय पानी चाहिए और तदनन्तर सत्त्व को सत्त्व के द्वारा ही वशीभूत करना चाहिए।
''जब मनुष्य में सत्तव गुण की वृद्धि होती है, तब वह मेरे भक्तिरूप स्वधर्म को प्राप्त करता है। सात्त्विक वस्तुओं के सेवन से सत्त्व की और तत्पश्चात् सत्त्व से धर्म की वृद्धि होती है । सत्त्व की वृद्धि से उत्पन्न होने वाली धर्म की शक्ति अप्रतिहत होती है। वह रजोगुण तथा तमोगुण दोनों को नष्ट कर डालता है। इन दोनों के नष्ट हो जाने पर इनसे उत्पन्न होने वाला अधर्म भी शीघ्र ही विनष्ट हो जाता है।
"शास्त्र, जल, प्रजा, देश, समय, कर्म, जन्म, ध्यान, मन्त्र तथा सस्कार - इन दश वस्तुओं के अनुसार ही गुणों की वृद्धि होती है। ऋषि गण इनमें से जिनकी प्रशंसा करते हैं, वे सात्विक हैं; जिनकी निन्दा करते हैं, वे तामसिक हैं और जिन वस्तुओं उपेक्षा करते हैं, वे राजसिक हैं।
सत्त्व की वृद्धि के लिए मनुष्य को सात्त्विक वस्तुओं का ही सेवन करना चाहिए। सत्त्व से धर्म की उत्पत्ति होती है और धर्म से ज्ञानोद्भव होता है। ज्ञान की परिसमाप्ति आत्म-साक्षात्कार में होती है जिससे व्यक्ति के सारे सांसारिक बन्धन निवृत्त हो जाते हैं।
(टिप्पणी-सात्त्विक
तथा ब्रह्म-साक्षात्कार का पथ-प्रदर्शन करने वाले ग्रन्थों का ही स्वाध्याय
करना चाहिए। उपन्यास तथा बाजारू पुस्तकें नहीं पढ़नी चाहिए।
इत्र, शराब, अफीम, गाँजा आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। उसे सांसारिक व्यक्तियों