हिन्द पॉकेट बुक्स

भगवद्गीता

 

 

डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति (1952-1962) और द्वितीय राष्ट्रपति रहे। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक, एक महान लेखक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे। उनके इन्हीं गुणों के कारण सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था। उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भगवद्गीता

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

डॉ. सर्वेपल्लि राधाकृष्णन्

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हिन्द पॉकेट बुक्स

पेंगुइन रैंडम हाउस इम्प्रिंट

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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चौथी मंजिल, कैपिटल टावर 1, एमजी रोड,

गुरुग्राम 122002, हरियाणा, भारत

 

पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया

 

प्रथम हिन्दी संस्करण हिन्द पॉकट बुक्स द्वारा 2004 में प्रकाशित यह हिन्दी संस्करण हिन्द पॉकेट बुक्स में पेंगुइन रैंडम हाउस द्वारा 2021 में प्रकाशित कॉपीराइट डॉ. एस गोपाल, 2004

 

सर्वाधिकार सुरक्षित

 

1098765432

 

इस पुस्तक में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं, जिनका यथासंभव तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है, और इस संबंध में प्रकाशक एवं सहयोगी प्रकाशक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं हैं।

 

ISBN 9789353490102

 

मुद्रक : रेप्रो इंडिया लिमिटेड

 

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महात्मा गांधी को

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

भूमिका.. 7

भगवद्गीता.. 9

परिचय. 10

अध्‍याय

1 अर्जुन की दुविधा और विषाद. 74

2.सांख्य-सिद्धान्त और योग का अभ्यास. 92

3.कर्मयोग या कार्य की पद्धति.. 124

4.ज्ञानमार्ग. 144

5.सच्चा संन्यास (त्याग) 166

6.सच्चा योग. 179

7.ईश्वर और जगत्. 203

8.विश्व के विकास का क्रम. 217

9.भगवान् अपनी सृष्टि से बड़ा है. 227

10.परमात्मा सबका मूल है; उसे जान लेना सब-कुछ जान लेना है. 245

11.भगवान् का दिव्य रूपान्तर. 257

12.व्यक्तिक भगवान् की पूजा परब्रह्म की उपासना की अपेक्षा अधिक अच्छी है. 277

13.शरीर क्षेत्र है, आत्मा क्षेत्रज्ञ है, और इन दोनों में अन्तर. 286

14.सब वस्तुओं और प्राणियों का रहस्यमय जनक.. 299

15.जीवन का वृक्ष.. 310

16.दैवीय और आसुरीय मन का स्वभाव. 318

17.धार्मिक तत्व पर लागू किए गए तीनों गुण.. 326

18.निष्कर्ष. 335

सहायक ग्रन्थ सूची.. 367

अनुक्रमणिका.. 368

 

 

 

भूमिका

 

युद्ध और युद्धोत्तर कालों की प्रवृत्ति विज्ञानों के मूल्य को और विशेष रूप से उनके व्यावहारिक प्रयोगों के महत्व को प्रमुखता देने की ओर रहती है। ये विज्ञान युद्धों को चलाने और शान्ति के समय नागरिकों को सुख-सुविधा देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। परन्तु यदि हमें जीवन में मनुष्य के दृष्टिकोण को विशाल और बुद्धिमत्तापूर्ण बनाना हो, तो हमें शास्त्रीय विद्याओं पर भी ज़ोर देना चाहिए। विज्ञानों का शास्त्रीय विद्याओं से सम्बन्ध मोटे तौर पर साधन और साध्य का सम्बन्ध कहा जा सकता है। साधनों के प्रति अत्यधिक उत्साह में हमें साध्यों को दृष्टि से ओझल नहीं कर देना चाहिए। उचित और अनुचित की धारणाएं विज्ञान के क्षेत्र में नहीं हैं, फिर भी अन्ततोगत्वा मानवीय कर्म और आनन्द का आधार इन धारणाओं को केन्द्र बनाकर किया गया विचारों का अध्ययन ही है। किसी भी सन्तुलित संस्कृति में इन दोनों विशाल अर्धभागों में समस्वरता स्थापित की जानी चाहिए। भगवद्गीता जीवन के सर्वोच्च लक्ष्यों को हृदयंगम करने में महत्वपूर्ण सहायता देती है।

 

भगवद्गीता के अनेक संस्करण हैं और इसके कई अच्छे अंग्रेज़ी अनुवाद भी हो चुके हैं; और यदि यह मान लिया जाए कि अंग्रेज़ी पाठकों के लिए केवल एक अनुवाद-भर की आवश्यकता है, तो इस एक और अनुवाद का कोई औचित्य होगा। जो लोग गीता को अंग्रेज़ी में पढ़ते हैं, उनके लिए भी, यदि उन्हें इसका अर्थ हृदयंगम करने में पथभ्रान्त होना हो, तो टिप्पणियों की कम-से-कम उतनी आवश्यकता तो है ही, जितनी कि गीता को संस्कृत में पढ़ने वालों के लिए है। प्राचीन टीकाओं में हमें यह संकेत मिलता है कि उन टीकाकारों और उनके समकालीन लोगों की दृष्टि में गीता का क्या अर्थ था। प्रत्येक धर्मग्रन्थ के दो पक्ष होते हैं, एक तो सामयिक और नश्वर, जो उस काल और देश के लोगों के विचारों से सम्बन्धित होता है, जिसमें कि वह धर्मग्रन्थ रचा गया होता है; और दूसरा शाश्वत और अनश्वर पक्ष, जो सब देशों और कालों पर लागू हो सकता है। बौद्धिक अभिव्यक्ति और मनोवैज्ञानिक भाषा काल की उपज हैं, जब कि शाश्वत सत्य सब कालों में, जीवन में अपनाए जा सकते हैं और बौद्धिक दृष्टि की अपेक्षा एक उच्चतर दृष्टि द्वारा देखे जा सकते हैं। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ की प्राणशक्ति उसकी इस शक्ति में निहित होती है कि वह समय-समय पर ऐसे लोगों को जन्म दे सके, जो उस ग्रन्थ में प्रतिपादित सत्यों को अपने अनुभव से पुष्ट कर सकें और उनकी ग़लतियों को सुधार सकें। टीकाकार हमें अपने अनुभव की बात बताते हैं और धर्मग्रन्थ के प्राचीन विवेक को एक नये रूप में, ऐसे रूप में, जो उनके काल से संगत था और जो उनकी आवश्यकताओं के अनुकूल था, प्रकट करते हैं। सब बड़े-बड़े सिद्धान्त, जैसा कि शताब्दियों के काल-प्रवाह में अनेक बार हुआ है, उस काल के प्रतिक्षेपों के रंग में रंगे रहते हैं, जिस काल में वे प्रकट होते हैं और उन पर उस व्यक्ति की छाप रहती है, जो उन्हें नये सिरे से प्रस्तुत करता है। हमारा काल भिन्न है। हमारी विचार की पद्धति, वह मानसिक पृष्ठभूमि, जिससे कि हमारे अनुभव सम्बन्धित हैं, ठीक वैसी नहीं है, जैसी कि प्राचीन टीकाकारों की थी। आज हमारे सम्मुख विद्यमान विद्यमान मुख्य समस्या मानव-जाति के मेल-मिलाप की समस्या है। इस प्रयोजन के लिए गीता विशेष रूप से उपयुक्त है, क्योंकि इसमें धार्मिक चेतना के पृथक् पृथक् और प्रकट रूप में परस्पर- विरोधी दीख पड़ने वाले रूपों का समन्वय करने का प्रयत्न किया गया है और धर्म की उन मूल धारणाओं पर ज़ोर दिया गया है, जो तो प्राचीन हैं और आधुनिक, बल्कि शाश्वत हैं; और अतीत, वर्तमान और भविष्यत की मानवता के अंग-प्रत्यंग से सम्बन्धित हैं। इतिहास हमारे सम्मुख समस्याए प्रस्तुत करता है और यदि हम प्राचीन सिद्धान्तों को नये रूपों में पुनः प्रस्तुत करते हैं, तो इसलिए नहीं कि हम वैसा करना चाहते हैं, अपितु इसलिए कि वैसा हमें करना ही होता है। शाश्वतता के सत्यों का इस प्रकार पुनःकथन ही हमारे इस काल में एकमाल ऐसा उपाय है, जिसके द्वारा कोई महान् धर्मग्रन्थ मानव-जाति के लिए सजीव रूप में मूल्यवान् हो सकता है। इस बात को दृष्टि में रखते हुए बुद्धिमान् पाठक शायद सामान्य भूमिका और टिप्पणियों को उपयोगी पा सके। ऐसे अनेक स्थल हैं, जहां गीता की विस्तृत व्याख्याओं को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। मैंने टिप्पणियों में केवल उन मतभेदों की ओर संकेतमान कर दिया है, क्योंकि यह पुस्तक उस सामान्य पाठक को दृष्टि में रखकर तैयार की गई है, जो अपने आध्यात्मिक परिवेश का विस्तार करना चाहता है, गीता का विशेषज्ञ बनना चाहने वालों को नहीं।

 

किसी भी अनुवाद को अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए इतना स्पष्ट होना चाहिए, जितना कि उसकी विषयवस्तु उसे स्पष्ट होने दे सके। अनुवाद सुपाठ्य तो होना चाहिए, परन्तु वह उथला हो; वह आधुनिक होना चाहिए, किन्तु सहृदयता से शून्य नहीं। परन्तु गीता के किसी भी अनुवाद में वह प्रभाव और चारुता नहीं सकती, जो मूल में है। इसका माधुर्य और शब्दों का जादू किसी भी अन्य माध्यम में ज्यों का त्यों ला पाना बहुत कठिन है। अनुवादक का यत्न विचार को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने का रहता है, परन्तु वह शब्दों की आत्मा को पूरी तरह सामने नहीं ला सकता। वह पाठक में उन मनोभावों को नहीं जगा सकता, जिनमें कि वह विचार उत्पन्न हुआ था और वह पाठक को द्रष्टा की भाव-समाधि में ही पहुंचा सकता है और उसे वह दिव्य-दर्शन ही करा सकता है, जिसे वह स्वयं करता है। इस बात का अनुभव करते हुए, मैंने मूल पाठ भी दे दिया है, जिससे जो लोग संस्कृत जानते हैं, वे मूल संस्कृत पर विचार करते हुए गीता के अर्थ को पूर्णतया हृदयंगम करने में समर्थ हों।

 

राधाकृष्णन्

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भगवद्गीता

 

स्यं भगवान् नारायण ने अर्जुन को जिसका उपदेश दिया था, प्राचीन मुनि स्व व्यास ने जिसे महाभारत के बीच में संकलित किया है, जो अद्वैतज्ञान का अमृत बरसाने वाली तथा पुनर्जन्म का नाश करने वाली है, ऐसी अट्ठारह अध्यायों वाली हे मां भगवती गीता, मैं तेरा ध्यान करता हूं।'[1]

 

"यह प्रसिद्ध गीताशास्त्र सम्पूर्ण वैदिक शिक्षाओं के तत्वार्थ का सार-संग्रह है। इसकी शिक्षाओं का ज्ञान सब मानवीय महत्वाकांक्षाओ की सिद्धि कराने वाला है।"[2]

 

"मुझे भगवद्गीता में एक ऐसी सान्त्वना मिलती है, जो मुझे 'सर्मन ऑन दि माउण्ट' (बाइबल का एक प्रसंग) तक में नहीं मिलती। जब निराशा मेरे सामने खड़ी होती है और जब बिल्कुल एकाकी मुझको प्रकाश की कोई किरण नहीं दिखाई पड़ती, तब मैं गीता की शरण लेता हूं। जहां-तहां कोई--कोई श्लोक मुझे ऐसा दिखाई पड़ जाता कि मैं विषम विपत्तियों में भी तुरन्त मुस्कुराने लगता हूं - और मेरा जीवन बाह्य विपत्तियों से भरा रहा है- और यदि वे मुझपर अपना कोई दृश्यमान, अमिट चिह्न नहीं छोड़ सकी, तो इसका सारा श्रेय भगवद्गीता की शिक्षाओं को ही है।"

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परिचय

1. इस ग्रन्थ का महत्व

 

'भगवद्गीता' एक दर्शनग्रन्थ कम और एक प्राचीन धर्मग्रन्थ अधिक है। यह कोई गुह्य ग्रन्थ नहीं है, जो विशेष रूप से दीक्षित लोगों के लिए लिखा गया हो और जिसे केवल वे ही समझ सकते हों, अपितु एक लोकप्रिय काव्य है, जो उन लोगों की भी सहायता करता है 'जो अनेक और परिवर्तनशील वस्तुओं के क्षेत्र में भटकते फिर रहे हैं।' इस पुस्तक में सब सम्प्रदायों के उन साधकों की महत्वाकांक्षाओ को वाणी प्रदान की गई है, जो परमात्मा के नगर की ओर आन्तरिक मार्ग पर चलना चाहते हैं। हम वास्तविकता को उस अधिकतम गहराई पर स्पर्श करते हैं, जहां मनुष्य संघर्ष करते हैं, विफल होते हैं और विजय पाते हैं। शताब्दियों तक करोड़ों हिन्दुओं'[3] को इस महान् ग्रन्थ से शान्ति प्राप्त होती रही है। इसमें संक्षिप्त और मर्मस्पर्शी शब्दों में एक आध्यात्मिक धर्म के उन मूलभूत सिद्धान्तों की स्थापना की गई है, जो दुराधारित तथ्यों, अवैज्ञानिक कट्टर सिद्धान्तों या मनमानी कल्पनाओं पर टिके हुए नहीं हैं। आध्यात्मिक बल के एक लम्बे इतिहास के साथ यह आज भी उन सब लोगों को प्रकाश देने का काम कर रही है, जो इसके विवेक की गम्भीरता से लाभ उठाना चाहते हैं। इसमें एक ऐसे संसार पर ज़ोर दिया गया है, जो उसकी अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत और गम्भीर है, जिसे कि युद्ध और क्रान्तियां स्पर्श कर सकती हैं। आध्यात्मिक जीवन के पुनर्नवीकरण में यह एक सबल रूपनिर्धारक तत्व है और इसने संसार के महान् धर्मग्रन्थों में अपना एक सुनिश्चित स्थान बना लिया है।

 

गीता का उपदेश किसी एक विचारक या विचारकों के किसी एक वर्ग द्वारा सोच निकाली गई आधिविद्यक प्रणाली के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया; यह उपदेश एक ऐसी परम्परा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो मानव-जाति के धार्मिक जीवन में से प्रकट हुई है। इस परम्परा को एक ऐसे गम्भीर द्रष्टा ने स्पष्ट शब्दों में कहा है, जो सत्य को उसके सम्पूर्ण पहलुओं की दृष्टि से देख सकता है और उसकी उद्धारक शक्ति में विश्वास रखता है। यह हिन्दू धर्म के किसी एक सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करती, अपितु समूचे रूप में हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करती है; केवल हिन्दू धर्म का, बल्कि जिसे धर्म कहा जाता है, उस सबका, उसकी उस विश्वजनीनता के साथ प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें काल और देश की कोई सीमाएं नहीं हैं।'[4] इसके समन्वय में मानवीय आत्मा का, असभ्य लोगों की अपरिष्कृत जड़पूजा से लेकर सन्तों की सृजनात्मक उक्तियों तक, समस्त सप्तक समाया हुआ है। जीवन के अर्थ और मूल्य के सम्बन्ध में गीता द्वारा प्रस्तुत किए गए सुझाव, शाश्वत जीवन के मूल्यों की भावना और वह रीति, जिसके द्वारा परम रहस्यों को तर्क के प्रकाश द्वारा आलोकित कर दिया गया है, और नैतिक अन्तर्दृष्टि मन और आत्मा के उस मतैक्य के लिए आधार प्रस्तुत कर देते हैं, जो इस संसार को एक बनाए रखने के लिए परम आवश्यक है; यह संसार सभ्यता के बाह्य तत्वों की सार्वभौम स्वीकृति के कारण भौतिक रूप से तो एक बन ही चुका है।

 

जैसा कि गीता की पुष्पिका से प्रकट है, भगवद्गीता अधिविद्या और नीतिशास्त्र, ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र, वास्तविकता (ब्रह्म) का विज्ञान और वास्तविकता (ब्रह्म) के साथ संयोग की कला, दोनों ही है। आत्मा के सत्यों को केवल वे लोग ही पूरी तरह समझ सकते हैं, जो कठोर अनुशासन द्वारा उन्हें ग्रहण करने के लिए अपने-आप को तैयार करते हैं। आत्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें अपने मन को सब प्रकार के विक्षेपों से रहित करना होगा और हृदय को सब प्रकार की भ्रष्टता से स्वच्छ करना होगा।[5] फिर, सत्य के ज्ञान का परिणाम जीवन का पुनर्नवीकरण होता है। आत्मजगत् जीवन के जगत् से बिलकुल अलग-थलग नहीं है। मनुष्य को बाह्य लालसाओं और आन्तरिक गुणों में विभक्त कर देना मानवीय जीवन की अखंडता को खंडित कर देना है। ज्ञानवान् आत्मा ईश्वर के राज्य के एक सदस्य के रूप में कार्य करती है। वह जिस संसार को स्पर्श करती है, उस पर प्रभाव डालती है और दूसरों के लिए उद्धारक बन जाती है।[6] वास्तविकता (ब्रह्म) के दो प्रकार, एक अनुभवातीत (लोकोत्तर) और दूसरा अनुभवगम्य (लौकिक), एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध हैं। गीता के प्रारम्भिक भाग में मानवीय कर्म की समस्या का प्रश्न उठाया गया है। हम किस प्रकार उच्चतम आत्मा में निवास कर सकते हैं और फिर भी संसार में काम करते रह सकते हैं? इसका जो उत्तर दिया गया है, वह हिन्दू धर्म का परम्परागत उत्तर है। यद्यपि यहां इसे एक नये सन्दर्भ के साथ प्रस्तुत किया गया है।

 

अधिकृत पदसंज्ञा'[7] की दृष्टि से गीता को उपनिषद् कहा जाता है, क्योंकि इसकी मुख्य प्रेरणा धर्मग्रन्थों के उस महत्वपूर्ण समूह से ली गई है, जिसे उपनिषद् कहा जाता है। यद्यपि गीता हमें प्रभावपूर्ण और गम्भीर सत्य का दर्शन कराती है, यद्यपि यह मनुष्य के मन के लिए नये मार्ग खोल देती है, फिर भी यह उन मान्यताओं को स्वीकार करती है, जो अतीत की पीढ़ियों की परम्परा का एक अंग है और जो उस भाषा में जमी हुई हैं, जो गीता में प्रयुक्त की गई है। यह उन विचारों और अनुभूतियों को मूर्तिमान और केन्द्रित कर देती है, जो उस काल के विचारशील लोगों में विकसित हो रही थीं। इस भ्रातृघाती संघर्ष को उपनिषदों के प्राचीन ज्ञान, प्रज्ञा पुराणी पर आधारित एक आध्यात्मिक सन्देश के विकास के लिए अवसर बना लिया गया है।'[8]

 

उन अनेक तत्वों को, जो गीता की रचना के काल में हिन्दू धर्म के अन्दर एक-दूसरे से होड़ करने में जुटे हुए थे, इसमें एक जगह ले आया गया है और उन्हें एक उन्मुक्त और विशाल, सूक्ष्म और गम्भीर सर्वांग-सम्पूर्ण समन्वय में मिलाकर एक कर दिया गया है। इसमें गुरु ने विभिन्न विचारधाराओं को, वैदिक बलिदान की पूजा-पद्धति को, उपनिषदों की लोकातीत ब्रह्म की शिक्षा को, भागवत के ईश्वरवाद और करुणा को, सांख्य के अद्वैतवाद को और योग की ध्यान-पद्धति को परिष्कृत किया है और उनमें आपस में मेल बिठाया है। उसने हिन्दू-जीवन और विचार के इन सब जीवित तत्वों को एक सुगठित एकता में गूंथ दिया है। उसने निषेध की नहीं, अपितु अर्थावबोध की पद्धति को अपनाया है और यह दिखा दिया 5/5 कि किस प्रकार वे विभिन्न विचारधाराएं एक ही उद्देश्य तक जा पहुंचती हैं।

2. काल और मूल पाठ

 

भगवद्गीता उस महान आन्दोलन के बाद की, जिसका प्रतिनिधित्व प्रारम्भिक उपनिषद् करते हैं, और दार्शनिक प्रणालियों के विकास और उनके सूतों में बांधे जाने के काल से पहले की रचना है। इसकी प्राचीन वाक्य-रचना और आन्तरिक निर्देशों से हम यह परिणाम निकाल सकते हैं कि यह निश्चित रूप से ईसवी-पूर्व काल की रचना है। इसका काल ईसवी-पूर्व पांचवीं शताब्दी कहा जा सकता है, हालांकि बाद में भी इसके मूल पाठ में अनेक हेर-फेर हुए हैं।'[9]

 

हमें गीता के रचयिता का नाम मालूम नहीं है। भारत के प्रारम्भिक साहित्य की लगभग सभी पुस्तकों के लेखकों के नाम अज्ञात हैं। गीता की रचना का श्रेय व्यास को दिया जाता है, जो महाभारत का पौराणिक संकलनकर्ता है। गीता के अट्ठारह अध्याय महाभारत के भीष्मपर्व के 23 से 40 तक के अध्याय है।

 

यह कहा जाता है कि उपदेश देते समय कृष्ण के लिए युद्धक्षेत्र में अर्जुन के सम्मुख 700 श्लोकों को पढ़ना सम्भव नहीं हुआ होगा। उसने कुछ थोड़ी- सी महत्वपूर्ण बातें कही होंगी, जिन्हें बाद में लेखक ने एक विशाल रचना के रूप में विस्तार से लिख दिया। गर्ने के मतानुसार, भगवद्गीता पहले एक सांख्य- योग-सम्बन्धी ग्रन्थ था, जिसमें बाद में कृष्ण-वासुदेव-पूजा पद्धति मिली और ईसवी-पूर्व तीसरी शताब्दी में इसका मेल-मिलाप कृष्ण को विष्णु का रूप मानकर वैदिक परम्परा के साथ बिठा दिया गया। मूल रचना ईसवी-पूर्व 200 में लिखी गई थी और इसका वर्तमान रूप ईसा की दूसरी शताब्दी में किसी वेदान्त के अनुयायी द्वारा तैयार किया गया है। गर्ने का सिद्धान्त सामान्यतया अस्वीकार किया जाता है। होपकिन्स का विचार है कि "अब जो कृष्णप्रधान रूप मिलता है, वह पहले कोई पुरानी विष्णुप्रधान कविता थी और उससे भी पहले वह कोई एक निस्सम्प्रदाय रचना थी, सम्भवतः विलम्ब से लिखी गई कोई उपनिषद् "[10]' हौल्ज़मन गीता को एक सर्वेश्वरवादी कविता का बाद में विष्णुप्रधान बनाया गया रूप मानता है। कीथ का विश्वास है कि मूलत: गीता श्वेताश्वतर के ढंग की उपनिषद् थी, परन्तु बाद में उसे कृष्णपूजा के अनुकूल ढाल दिया गया। बानेंट का विचार है कि गीता के लेखक के मन में परम्परा की विभिन्न धाराएं गड्डमड्डू हो गई। रूडोल्फ़ ओटो का कथन है कि "मूल गीता महाकाव्य का एक शानदार खण्ड थी और उसमें किसी प्रकार का कोई सैद्धान्तिक साहित्य नहीं था।कृष्ण का इरादामुक्ति का कोई लोकोत्तर उपाय प्रस्तुत करने का नहीं था, अपितु अर्जुन को उस भगवान् की सर्वशक्तिशालिनी इच्छा को पूरा करने की विशेष सेवा के लिए तैयार करना था, जो युद्धों के भाग्य का निर्णय करता है।"" ओटो का विश्वास है कि सैद्धान्तिक अंश प्रक्षिप्त हैं। इस विषय में उसका जैकोबी से मतैक्य है, जिसका विचार है कि विद्वानों ने मूल छोटे-से केन्द्र-बिन्दु को विस्तृत करके वर्तमान रूप दे दिया है।

 

इन विभिन्न मतों का कारण यह तथ्य प्रतीत होता है कि गीता में दार्शनिक और धार्मिक विचार की अनेक धाराएं अनेक ढंगों से घुमा-फिराकर एक जगह मिलाई गई हैं; अनेक परस्पर विरोधी दीख पड़ने वाले विश्वासों को एक सीधी-सादी एकता में गूंथ दिया गया है, जिससे वे सच्ची हिन्दू भावना से उस काल की आवश्यकता को पूरा कर सकें और इन सब विश्वासों के ऊपर इस भावना ने परमात्मा की चारुता बिखेर दी है। गीता विभिन्न विचारधाराओं में मेल बिठाने में कहां तक सफल हुई है, इस प्रश्न का उत्तर सारे ग्रन्थ को पढ़ने के बाद पाठक को अपने लिए स्वयं देना होगा। भारतीय परम्परा में सदा ही यह अनुभव किया गया है कि परस्पर असंगत दीख पड़ने वाले तत्व गीता के लेखक के मन में मिलकर एक हो चुके थे और जो शानदार समन्वय उसने सुझाया है और स्पष्ट किया है, वह सच्चे आत्मिक जीवन को बढ़ाता है, 'भले ही गीताकार ने उसे युक्तियां देकर विस्तारपूर्वक सिद्ध नहीं किया

अपने प्रयोजन के लिए हम गीता के उस मूल पाठ को अपना सकते हैं, जिसे शंकराचार्य ने अपनी टीका में अपनाया है, क्योंकि इस समय गीता की वहीं सबसे पुरानी विद्यमान टीका है।'[11]

 

3. प्रमुख टीकाकार

 

गीता शताब्दियों से हिन्दू धर्म का एक प्राचीन धर्मग्रन्थ मानी जाती रही है, जिसकी प्रामाणिकता उपनिषदों और 'ब्रह्मसूत्न' के बराबर है और ये तीनों मिलकर प्रामाणिक ग्रन्थलयी (प्रस्थानलय) कहलाती हैं। वेदान्त के आचार्यों के लिए यह आवश्यक हो गया कि वे अपने विशेष सिद्धान्तों को इन तीन प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर उचित ठहराएं और इसीलिए उन्होंने इन पर टीकाएं लिखीं, जिनमें उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि किस प्रकार ये मूलग्रन्थ उनके विशिष्ट दृष्टिकोण की शिक्षा देते हैं। उपनिषदों में परब्रह्म के स्वभाव के सम्बन्ध में और संसार के साथ उसके सम्बन्ध के बारे में विभिन्न प्रकार के सुझाव विद्यमान हैं। ब्रह्मसूल इतना सामासिक और अस्पष्ट है कि उसमें से अनेक प्रकार के अर्थ निकाल लिए गए हैं। गीता में अपेक्षाकृत अधिक सुसंगत दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है, इसलिए उन टीकाकारों का काम अपेक्षाकृत अधिक कठिन हो जाता है, जो उसकी व्याख्या अपना मतलब निकालने के लिए करना चाहते हैं। भारत में बौद्ध धर्म के ह्रास के बाद विभिन्न मत उठ खड़े हुए, जिनमें से प्रमुख अद्वैत अर्थात् द्वैत का होना, विशिष्टाद्वैत अर्थात् सोपाधिक अद्वैत, द्वैत अर्थात् दो की सत्ता को स्वीकार करना और शुद्धाद्वैत अर्थात् विशुद्ध अद्वैत थे। गीता की विभिन्न टीकाएं आचार्यों द्वारा उनके अपने सम्प्रदायों के समर्थन और दूसरे सम्प्रदायों के खण्डन के लिए लिखी गईं। ये सब लेखक गीता में अपने-अपने धार्मिक विचारों और अधिविद्या की प्रणालियों को ढूंढ़ पाने में समर्थ हुए, क्योंकि गीता के लेखक ने यह सुझाव प्रस्तुत किया है कि वह शाश्वत सत्य, जिसे हम खोज रहे हैं और जिससे अन्य सब सत्य निकले हैं, किसी एक अकेले गुर में बांधकर बन्द नहीं किया जा सकता। फिर, इस धर्मग्रन्थ के अध्ययन और मनन से हमें उतना ही अधिक जीवित सत्य और आध्यात्मिक प्रभाव प्राप्त हो सकता है, जितना ग्रहण कर पाने में हम समर्थ हैं।

 

शंकराचार्य की टीका (ईसवी सन् 788-820) इस समय विद्यमान टीकाओं में सबसे प्राचीन है। इससे पुरानी भी अन्य टीकाएं थीं, जिनका निर्देश शंकराचार्य ने अपनी भूमिका में किया है, परन्तु वे इस समय प्राप्त नहीं होतीं I[12] शंकराचार्य ने इस बात को जोर देकर कहा है कि वास्तविकता या ब्रह्म एक ही है और उससे भिन्न दूसरी वस्तु कोई नहीं है। यह दिखाई पड़ने वाला विविध-रूप संसार अपने-आप में वास्तविक नहीं है; यह केवल उन लोगों को वास्तविक प्रतीत होता है, जो अज्ञान में (अविद्या में) जीवन बिताते हैं। इस संसार में फंस जाना एक बन्धन है, जिसमें हम सब फंसे हुए हैं। यह दुर्दशा हमारे अपने प्रयत्नों से नहीं हटाई जा सकती। कर्म व्यर्थ हैं और वे हमें इस अवास्तविक विश्व-प्रक्रिया (संसार) से, कारण और कार्य की अन्तहीन परम्परा से मज़बूती से जकड़ देते हैं। केवल इस ज्ञान से, कि विश्वव्यापी ब्रह्म और व्यक्ति की आत्मा एक ही वस्तु है, हमें मुक्ति मिल सकती है। जब यह ज्ञान उत्पन्न हो जाता है, तब जीव विलीन हो जाता है; भटकना समाप्त हो जाता है और हमें पूर्ण आनन्द और परम सुख प्राप्त होता है।

 

ब्रह्म का वर्णन केवल उसके अस्तित्व के रूप में ही किया जा सकता है, क्योंकि वह सब विशेषणों से परे है; विशेष रूप से कर्ता, कर्म, और ज्ञान की क्रिया के सब भेदों से ऊपर है। इसलिए उसे व्यक्ति-रूप में नहीं माना जा सकता और उसके प्रति कोई प्रेम या श्रद्धा नहीं की जा सकती।

 

शंकराचार्य का मत है कि जहां मन को शुद्ध करने के लिए साधन के रूप में कर्म अत्यन्त आवश्यक है, वहां ज्ञान प्राप्त हो जाने पर कर्म दूर छूट जाता है। ज्ञान और कर्म एक-दूसरे के ठीक वैसे ही विरोधी हैं, जैसे प्रकाश और अन्धकार '[13] यह ज्ञान-कर्मसमुच्चय'[14] के दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करता। उसका विश्वास है कि वैदिक विधियां केवल उन लोगों के लिए हैं, जो अज्ञान और लालसा में डूबे हुए हैं। मुक्ति के अभिलाषियों को कर्मकाण्ड की विधियों का परित्याग कर देना चाहिए। शंकराचार्य के मतानुसार[15], गीता का उद्देश्य इस बाह्य (नाम-रूपमय) संसार'[16] का पूर्ण दमन है, जिसमें कि सारा कर्म होता है, यद्यपि शंकराचार्य का अपना जीवन ज्ञान-प्राप्ति के बाद भी कर्म करते जाने का उदाहरण है।

 

शंकराचार्य के दृष्टिकोण का विकास आनन्दगिरि ने, जो सम्भवतः तेरहवीं शताब्दी में हुए, श्रीधर (ईसवी सन् 1400) ने और मधुसूदन (सोलहवीं शताब्दी) ने तथा अन्य कुछ लेखकों ने किया। महाराष्ट्रीय सन्त तुकाराम और ज्ञानेश्वर महान् भक्त थे, यद्यपि अधिविद्या में उन्होंने शंकराचार्य के मत को स्वीकार किया।

 

रामानुज (ईसा की ग्यारहवीं शताब्दी) ने अपनी टीका में संसार की अवास्तविकता और कर्म-त्याग के मार्ग के सिद्धान्त का खण्डन किया। उसने यामुनाचार्य द्वारा अपने 'गीतार्थसंग्रह' में प्रतिपादित व्याख्या का अनुसरण किया ब्रह्म सर्वोच्च वास्तविकता, आत्मा है। परन्तु वह निर्गुण नहीं है। उसमें आत्मचेतना है और अपना ज्ञान भी है, और संसार के सृजन की और अपने जीवों को मुक्ति प्रदान करने की सचेत इच्छा भी उसमें है। सब आदर्श गुणों, असीम और अनन्त गुणों का वह आधार है। वह सारे संसार से पहले और सारे संसार से ऊपर है। उस जैसा दूसरा कोई नहीं है। वैदिक देवता उसके सेवक हैं, जिन्हें कि उसने बनाया है और उनके नियत कर्तव्यों को पूरा करने के लिए उन-उनके स्थानों पर उन्हें नियुक्त किया है। संसार कोई माया या भ्रम नहीं है, बल्कि सत्य और वास्तविक है। संसार और परमात्मा ठीक वैसे ही एक हैं, जैसे शरीर और आत्मा एक हैं। वे समूचे रूप में एक हैं, परन्तु साथ ही अपरिवर्तनीय रूप से परस्पर भिन्न भी हैं। सृष्टि से पहले संसार एक सम्भावित (गर्भित या अव्यक्त) रूप में रहता है, जो इस समय विद्यमान और विभिन्न प्रकट रूपों में विकसित नहीं हुआ होता। सृष्टि होने पर यह नाम और रूप में विकसित हो जाता है। संसार को परमात्मा का शरीर बताकर यह सुझाव प्रस्तुत किया गया है कि संसार किसी विजातीय तत्व से, जो दूसरा मूल तत्व हो, बना हुआ नहीं है, अपितु इसे भगवान् ने स्वयं अपनी प्रकृति में से ही उत्पन्न किया है। परमात्मा इस संसार का बनाने वाला है और स्वयं परमात्मा से ही यह संसार बना भी हुआ है। आत्मा और शरीर की उपमा संसार की ईश्वर पर पूर्ण निर्भरता को सूचित करने के लिए प्रयुक्त की गई है, ठीक उसी प्रकार जैसे कि शरीर आत्मा पर निर्भर होता है। यह संसार केवल ईश्वर का शरीर नहीं है, अपितु उसका अवशिष्ट भाग है, ईश्वरस्य शेषः, और यह वाक्यांश संसार की पूर्ण पराश्रितता और गौणता का सूचक है।

 

सब प्रकार की चेतना में यह पूर्वधारणा विद्यमान है कि एक कर्ता होगा और एक कर्म होगा; और यह उस चेतना से भिन्न है, जिसे रामानुज ने आश्रित तत्व (धर्मभूत द्रव्य) माना है, जो स्वयं बाहर निकल पाने में समर्थ है। अहं (जीव) अवास्तविक नहीं है और मुक्ति की दशा में वह लुप्त नहीं हो जाता। उपनिषद् के प्रसंग, तत् त्वम् असि, 'वह तू है' का अर्थ यह है कि "ईश्वर मैं स्वयं हूँ"; ठीक उसी प्रकार, जैसे मेरी आत्मा मेरे शरीर का आत्म है। परमात्मा आत्मा को संभालने वाला, उसका नियन्त्रण करने वाला मूल तत्व है; ठीक उसी प्रकार, जैसे आत्मा शरीर को संभालने वाला मूल तत्व है। परमात्मा और आत्मा एक हैं; इसलिए नहीं कि दोनों ठीक एक ही वस्तु हैं, बल्कि इसलिए कि परमात्मा आत्मा के अन्दर निवास करता है और उसके अन्दर तक प्रविष्ट हुआ है। वह आन्तरिक मार्गदर्शक है, अन्तर्यामी, जो आत्मा के अन्दर खूब गहराई में निवास करता है और इस रूप में उसके जीवन का मूल तत्व है। परन्तु अन्तर्व्यापिता तद्रूपदा (तादात्म्य) नहीं है। काल और शाश्वतता, दोनों में ही जीव स्रष्टा से पृथक् रहता है।

 

रामानुज ने गीता पर अपनी टीका में एक प्रकार का वैयक्तिक रहस्यवाद विकसित किया है। मानवीय आत्मा के सुगुप्त स्थानों में परमात्मा निवास करता है. परन्तु आत्मा उसे तब तक पहचान नहीं पाती, जब तक आत्मा को मुक्तिदायक ज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता। यह मुक्तिदायक ज्ञान हमें अपने सम्पूर्ण मन और आत्मा द्वारा परमात्मा की सेवा करने से प्राप्त हो सकता है। पूर्ण विश्वास केवल उन लोगों के लिए सम्भव है, जिन्हें दैवीय कृपा इसके लिए वरण कर (चुन) लेती है। रामानुज यह स्वीकार करता है कि गीता में ज्ञान, भक्ति और कर्म इन तीनों का वर्णन है। परन्तु उसका मत है कि गीता का मुख्य बल भक्ति पर है। रामानुज ने पाप की घृणितता, भगवान् को पाने की तीव्र लालसा, परमात्मा के सर्वविजयी प्रेम में विश्वास और श्रद्धा की अनुभूति और ईश्वर द्वारा वरण कर लिए जाने की अनुभूति पर ज़ोर दिया है।

 

रामानुज के लिए भगवान् विष्णु है। वहीं केवल एकमात्र सच्चा देवता है, जिसके दिव्य गौरव में अन्य कोई साझी नहीं है। मुक्ति वैकुण्ठ या स्वर्ग में परमात्मा की सेवा और साहचर्य का नाम है।

 

मध्व ने (ईसवी सन् 1199-1276 तक) भगवद्गीता पर दो ग्रन्थ 'गीताभाव्य' और 'गीता-तात्पर्य' लिखे। उसने गीता में से द्वैतवाद के सिद्धान्त खोज निकालने का प्रयत्न किया है। उसका कथन है कि आत्मा को एक अर्थ में परमात्मा के साथ तद्रूप मानना और दूसरे अर्थ में उससे भिन्न मानना आत्म- विरोधी बातें हैं। जीव और परमात्मा को शाश्वत रूप से एक-दूसरे से पृथक् माना जाना चाहिए, और उन दोनों में आंशिक या पूर्ण एकता का किसी प्रकार समर्थन नहीं किया जा सकता। 'वह तू है' इस प्रसंग की व्याख्या वह यह अर्थ बताकर करता है कि हमें मेरे और तेरे के भेदभाव को त्याग देना चाहिए और यह समझना चाहिए कि प्रत्येक वस्तु भगवान् के नियन्त्रण के अधीन है।[17]' माध्व का मत है कि गीता में भक्ति-पद्धति पर बल दिया गया है।

 

निम्बार्क (ईसवी सन् 1162) ने द्वैताद्वैत के सिद्धान्त को अपनाया है। उसने 'ब्रह्मसूत्र' पर भी टीका लिखी और उसके शिष्य केशव कश्मीरी ने गीता पर एक टीका लिखी, जिसका नाम 'तत्वप्रकाशिका' है। निम्बार्क का मत है कि आत्मा (जीव), संसार (जगत) और परमात्मा एक-दूसरे से भिन्न हैं। फिर भी आत्मा और संसार का अस्तित्व और गतिविधि परमात्मा की इच्छा पर निर्भर है। निम्बार्क की रचनाओं का मुख्य वर्ण्य-विषय भगवान् की भक्ति है।

 

वल्लभाचार्य (ईसवी सन् 1479) ने उस मत का विकास किया, जिसे शुद्धाद्वैत कहा जाता है। जीव, जब वह शुद्ध अवस्था में होता है और माया द्वारा अन्धा हुआ नहीं रहता, और परब्रह्म एक ही वस्तु हैं। आत्माएं ईश्वर का ही अंश हैं, जैसे चिनगारियां अग्नि का अंश होती हैं, और वे भगवान् की कृपा के बिना मुक्ति पाने के लिए आवश्यक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकतीं। मुक्ति पाने का सबसे महत्वपूर्ण साधन भगवान् की भक्ति है। भक्ति प्रेममिश्रित धर्म है।'[18]

 

गीता पर और भी अनेक टीकाकारों ने, और हमारे अपने समय में बालगंगाधर तिलक और श्री अरविन्द ने भी टीकाएं लिखी हैं। गीता पर गांधीजी के अपने अलग विचार हैं।

 

सामान्यतया यह माना जाता है कि व्याख्याओं में अन्तर व्याख्याकार द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोणों के कारण है। हिन्दू परम्परा का यह विश्वास है कि ये विभिन्न दृष्टिकोण एक-दूसरे के पूरक हैं। भारतीय दर्शनशास्त्र की प्रणालियां भी अलग-अलग दृष्टिकोण या दर्शन ही हैं, जो एक-दूसरे के पूरक हैं और विरोधी नहीं। भागवत में कहा गया है कि ऋषियों ने मूल तत्वों का ही वर्णन अनेक रूपों में किया है।[19] एक लोकप्रिय श्लोक में, जो हनुमानरचित माना जाता है, कहा गया है : "शरीर के दृष्टिकोण से मैं तेरा सेवक हूं, जीव के दृष्टिकोण से मैं तेरा अंग हूं और आत्मा के दृष्टिकोण से मैं स्वयं तू ही हूं; यह मेरा दृढ़ विश्वास है।"[20] परमात्मा का अनुभव उस स्तर के अनुसार 'तू' या 'मैं' के रूप में होता है, जिसमें कि चेतना केन्द्रित रहती है।

4. सवाच्च वास्तविकता

अपनी आधिविद्यक स्थिति (अभिमत) के समर्थन में गीता में कोई युक्तियां प्रस्तत नहीं की गईं। भगवान् की वास्तविकता ऐसा प्रश्न नहीं है, जिसे ऐसी तर्क- प्रणाली द्वारा हल किया जा सके, जिसे मानव जाति का विशाल बहुमत समझ पाने में असमर्थ रहेगा। तर्क अपने-आप, किसी व्यक्तिगत अनुभव के निर्देश के बिना हमें विश्वास नहीं दिला सकता। आत्मा के अस्तित्व के सम्बन्ध में प्रमाण केवल आत्मिक अनुभव से प्राप्त हो सकता है।

 

उपनिषदों में परब्रह्म की वास्तविकता की बात जोर देकर कही गई है। यह परब्रह्म अद्वितीय है। उसमें कोई गुण या विशेषताएं नहीं हैं। यह मनुष्य की गरुतम आत्मा के साथ तद्रूप है। आध्यात्मिक अनुभव एक सर्वोच्च एकता के चारों ओर केन्द्रित रहता है, जो ज्ञाता और ज्ञेय के द्वैत पर विजय पा लेती है। इस अनुभव को पूरी तरह हृदयंगम कर पाने की असमर्थता का परिणाम यह होता है कि उसका वर्णन एक शुद्ध और निर्विशेष के रूप में किया जाता है। ब्रह्म स्वतन्त्र सत्ता के रूप में विमान निर्विशेषता है। वह अन्तःस्फुरणा में, जो कि उसका अपना अस्तित्व है, अपना विषय स्वयं ही होता है। यह वह विशुद्ध कर्ता है, जिसके अस्तित्व को बाह्य या वस्तुरूपात्मक जगत् में नहीं छोड़ा जा सकता

 

यदि ठीक-ठीक कहा जाए, तो हम ब्रह्म का किसी प्रकार वर्णन नहीं कर सकते। कठोर चुप्पी ही वह एकमात्र उपाय है, जिसके द्वारा हम अपने अटकते हुए वर्णनों और अपूर्ण प्रमापों की अपर्याप्तता को प्रकट कर सकते हैं।[21] बृहदारण्यक उपनिषद् का कथन है : "जहां प्रत्येक वस्तु वस्तुतः स्वयं आत्मा ही बन गई है, वहां कौन किसका विचार करे और किसके द्वारा विचार करे ? सार्वभौम ज्ञाता का ज्ञान हम किस वस्तु के द्वारा प्राप्त कर सकते हैं?"[22] इस प्रकार तर्कमूलक विचार की ज्ञाता और ज्ञेय के बीच की अद्वैत की भावना से ऊपर उठा जाता है। वह शाश्वत (ब्रह्म) इतना असीम रूप से वास्तविक है कि हम उसे एक का नाम देने की भी हिम्मत नहीं कर सकते, क्योंकि एक होना भी एक ऐसी धारणा है, जो लौकिक अनुभव (व्यवहार) से ली गई है। उस परमात्मा के सम्बन्ध में हम केवल इतना कह सकते हैं कि वह अद्वैत है।[23] और उसका ज्ञान तब प्राप्त होता है, जब कि सब द्वैत उस सर्वोच्च एकता में विलीन हो जाते हैं। उपनिषदों में उसका नकारात्मक वर्णन दिया गया है कि ब्रह्म यह नहीं है, यह नहीं है (नेति नेति) "वह स्रायुरहित है; वह किसी शस्त्र से विद्ध नहीं है और उसे पाप छूता नहीं है।"[24] "उसकी कोई छाया या कालिमा नहीं है। उसके अन्दर या बाहर जैसी वस्तु कुछ नहीं है।"[25] भगवद्गीता में अनेक स्थानों पर उपनिषदों के इस दृष्टिकोण का समर्थन किया गया है। भगवान् को 'अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य[26]' बताया गया है।' 'वह सत् है और असत्।''[27] भगवान् के लिए परस्पर विरोधी विशेषण यह सूचित करने के लिए प्रयुक्त किए गए हैं कि उस पर अनुभवगम्य धारणाएं लागू नहीं की जा सकतीं। "वह गति नहीं करता और फिर भी वह गति करता है। वह बहुत दूर है, पर फिर भी पास है।"[28] इन विशेषणों से भगवान् का दुहरा स्वरूप सामने आता है। एक तो उसका सत् (अस्तित्वमय) स्वरूप और एक नाम-रूपमय स्वरूप। वह 'परा' अर्थात् लोकातीत है और 'अपरा' अर्थात् अन्तर्व्यापी है; संसार के अन्दर और बाहर दोनों जगह विद्यमान है।*[29]

 

परब्रह्म की अवैयक्तिकता उसका सम्पूर्ण महत्व नहीं है। उपनिषदों में दिव्य गतिविधि और प्रकृति में आग लेने की पुष्टि की गई है और हमारे सम्मुख एक ऐसे परमात्मा का रूप प्रस्तुत किया गया है, जो केवल असीम और केवल सलीम से कहीं अधिक है। जिस जिज्ञासा के कारण प्लेटो को अकादेमी के ज्योतिषियों को यह आदेश देने की प्रेरणा मिली कि वे प्रकट दीख पड़ने वाली वस्तुओं (प्रतीतियों) से बचें, उसी रुचि के कारण उपनिषदों के ऋषियों को संसार को अर्थपूर्ण समझने की प्रेरणा मिली। तैत्तिरीय उपनिषद् के शब्दों में- "भगवान् वह है, जिससे ये सब वस्तुएं उत्पन्न होती हैं, जिससे ये सब जीवित रहती हैं और जिसमें विदा होते समय ये सब विलीन हो जाती हैं।" वेद के अनुसार, "परमात्मा वह है, जो अग्नि में है और जो जल में है, जिसने लिखित विश्व को व्याप्त किया हुआ है। उसे, जो कि पौधों में और पेड़ों में है, हम बारम्बार प्रणाम करते हैं।"[30] "यदि यह सर्वोच्च आनन्द आकाश में होता, तो कौन परिश्रम करता और कौन जीवित रहता?"[31] ईश्वरवादी यह स्वर श्वेताश्वतर उपनिषद् में और भी प्रमुख हो उठता है। "वह जो एक है और जिसका कोई रूप-रंग नहीं है, अपनी बहुविध शक्ति को धारण करके किसी गुप्त उद्देश्य से अनेक रूप-रंगों को बनाता है और आदि में और अन्त में विश्व उसी में विलीन हो जाता है। वह परमात्मा है। वह हमें ऐसा ज्ञान प्रदान करे, जो शुभ कर्मों की ओर ले जाता है।"[32] फिर "तू स्त्री है, तू ही पुरुष है; तू ही युवक है और युवती भी है; तू ही वृद्ध पुरुष है, जो लाठी लेकर लड़खड़ाता चलता है; तू ही नवजात शिशु है; तू सब दिशाओं की ओर मुख किए हुए है।"[33] फिर, "उसका रूप देखा नहीं जा सकता। आंख से उसे कोई नहीं देखता। जो लोग उसे इस प्रकार हृदय द्वारा और मन द्वारा जान लेते हैं कि उसका निवास हृदय में है, वे अमर हो जाते हैं।"[34] वह सार्वभौम परमात्मा है, जो अपने-आप ही यह विश्व भी है, जिसे उसने अपने ही अन्दर धारण किया हुआ है। वह हमारे अन्दर विद्यमान प्रकाश है, 'हृद्यन्तोतिः' वह भगवान् है, जीवन और मृत्यु जिसकी छाया हैं।[35]

 

उपनिषदों में हमें भगवान् का वर्णन अविकार्य और अचिन्त्य के रूप में मिलता है और साथ ही यह दृष्टिकोण भी मिलता है कि वह विश्व का स्वामी है। यद्यपि वह समस्त वस्तुओं का स्रोत है, फिर भी वह अपने-आप सदा अविचल रहता है।'[36] शाश्वत वास्तविकता केवल अस्तित्व को संभाले रखती है, अपितु वह संसार में सक्रिय शक्ति भी है। परमात्मा अनुभवातीत, दुष्प्राप्य प्रकाश में निवास करने वाला है, पर साथ ही वह ऑगस्टाइन के शब्दों में, "आत्मा के साथ उससे भी अधिक घनिष्ठ है, जितना कि आत्मा स्वयं आत्मा के साथ है।" उपनिषद् में एक वृक्ष पर बैठे दो पक्षियों का उल्लेख है, जिनमें से एक तो फल खाता है, परन्तु दूसरा खाता नहीं है; वह देखता-भर है। वह आनन्द से दूर रहने वाला मौन साक्षी है।'[37] अव्यक्तिकता (निर्गुण) और व्यक्तिकता (सगुण) मन की मनमानी रचनाएं या कल्पनाएं नहीं, ये तो शाश्वत को देखने की दो विधियां हैं। भगवान् अपने परम, स्वतः विद्यमान रूप में ब्रह्म है परब्रह्म; और संसार का स्वामी और सृजन करने वाला भगवान्, जिसके अन्दर सब विद्यमान है और जो सबका नियन्त्रण करता है, वह ईश्वर कहलाता है। "चाहे भगवान् को निर्गुण माना जाए, चाहे सगुण, इस शिव को सनातन समझना चाहिए। जब उसे सृष्टि से पृथक् करके देखा जाता है, तो वह निर्गुण होता है और जब उसे सब वस्तुओं के रूप में देखा जाता है, तब वह सगुण होता है।"[38] यदि यह संसार एक विश्व है और कोई अरूप अनिश्चितता नहीं है, तो यह परमात्मा की देखरेख के कारण ही है। भागवत में बताया गया है कि वह एक वास्तविकता, जो अविभक्त चेतना के ढंग की है, ब्रह्म, भगवान्, आत्मा या परमात्मा कहलाती है।[39] वही  सर्वोच्च मूल तत्व है: वही हमारे अन्दर विद्यमान वास्तविक आत्मा है और साथ संसार ही वही पूजनीय परमात्मा है। भगवान् अनुभवातीत भी है, विश्वरूप भी है और वैयक्तिक वास्तविकता भी है। अपने अनुभवातीत रूप में वह विशुद्ध आत्म है, जिस पर किसी कर्म या अनुभव का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह अलिप्त और असंग है। अपने तिशील विश्वरूप में वह केवल सारे विश्व की क्रिया को संभालता है, बल्कि उसका शासन करता है; और यही वह आत्म है, जो सबके अन्दर एक ही है और सबसे ऊपर है और व्यक्ति के अन्दर विद्यमान है।[40]

 

परमात्मा बुराई के लिए अप्रत्यक्ष रीति के सिवाय और किसी प्रकार उत्तरदायी नहीं है। यदि यह विश्व ऐसे सक्रिय व्यक्तियों से बना हुआ है, जो अपने कर्म का चुनाव स्वयं करते हैं, जिनको प्रभावित तो किया जा सकता है, किन्तु नियन्त्रित नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमात्मा कोई तानाशाह नहीं है, तो इसमें संघर्ष अवश्यम्भावी है। यह मानने का, कि संसार में स्वतन्त्र आत्माएं विद्यमान हैं, अर्थ यह है कि बुराई सम्भव और सम्भाव्य है। एक यान्त्रिक जगत् की तुलना में उसका दूसरा विकल्प जोखिम और अभियान का जगत् है। यदि गलतियों, कुरूपता और बुराई की सब प्रवृत्तियों का वर्जन कर देना हो, तो सत्य, शिव और सुन्दर की खोज हो ही नहीं सकती। यदि सत्य, सुन्दर और शिव के इन आदशों की सचेत कामना होनी हो, तो उनके विरोधी मिथ्या, कुरूपता और बुराई को केवल अव्यक्त सम्भावना नहीं रहना होगा, अपितु वे ऐसी सकारात्मक प्रवृत्तियां होंगी, जिनका हमें प्रतिरोध करना है। गीता के लिए यह संसार अच्छाई और बुराई के मध्य होने वाले एक सक्रिय संघर्ष की भूमि है, जिसमें परमात्मा की गहरी दिलचस्पी है। वह अपने प्रेम की सम्पत्ति उन मनुष्यों की सहायता करने के लिए लुटाता है, जो उन सब वस्तुओं का प्रतिरोध करते हैं, जो मिथ्या, कुरूपता और बुराई को जन्म देती हैं। क्योंकि परमात्मा पूर्णतया अच्छा है और उसका प्रेम असीम है, इसलिए वह संसार के कष्टों के सम्बन्ध में चिन्तित है। परमात्मा सर्वशक्तिमान् है, क्योंकि उसकी शक्ति की कोई बाह्य सीमाएं नहीं हैं।

 

संसार की सामाजिक प्रकृति परमात्मा पर नहीं थोपी गई, अपितु वह परमात्मा की इच्छा से बनी है। इस प्रश्न के उत्तर में, कि क्या परमात्मा अपनी सर्वज्ञासा हसे इस बात को पहले से जान सकता है कि मनुष्य किस ढंग से आचरण करेंगे और वे कर्म का चुनाव कर पाने की स्वतन्त्रता का सदुपयोग या दुरुपयोग करेंगे हम केवल यह कह सकते हैं कि परमात्मा जिस वस्तु को नहीं जानता, वह सत्य नहीं है। वह जानता है कि प्रवृत्तियां अनिर्धारित हैं और जब वे वास्तविक रूप धारण कर लेती हैं, तो उसे उनका ज्ञान हो जाता है। कर्म का सिद्धान्त परमात्मा की सर्वशक्तिमत्ता को सीमित नहीं करता। हिन्दू विचारक ऋग्वेद की रचना के काल तक में प्रकृति की तर्कसंगतता और नियमपरायणता को जानते थे। ऋत या व्यवस्था सब वस्तुओं में विद्यमान है। नियम का राज्य परमात्मा की इच्छा और संकल्प है और इसलिए उसे परमात्मा की शक्ति की सीमा नहीं माना जा सकता। संसार के व्यक्तिक (सगुण) स्वामी का एक कालमय पक्ष है, जिसमें परिवर्तन होते रहते हैं।

 

गीता में वैयक्तिक परमात्मा के रूप में भगवान् पर बल दिया गया है, जो अपनी प्रकृति में इस अनुभवगम्य संसार का सृजन करता है। वह प्रत्येक प्राणी के हृदय में निवास करता है।[41]' वह सब बलियों का आनन्द देने वाला और स्वामी है।[42] वह हमारे हृदय में भक्ति जताता है और हमारी प्रार्थनाओं को पूर्ण करता है।[43] वह सब मान्यताओं का मूल स्रोत और उन्हें बनाए रखने वाला है। पूजा और प्रार्थना के समय उसका हमसे व्यक्तिगत सम्बन्ध स्थापित होता है।

 

वैयक्तिक ईश्वर इस विश्व की सृष्टि, रक्षा और संहार करता है।[44]' भगवान् की दो प्रकृतियां हैंएक उच्चतर (परा) और दूसरी निम्नतर (अपरा)[45] जीवित आत्माएं उच्चतर प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती हैं और भौतिक माध्यम निम्नतर प्रकृति का प्रतिनिधि है। परमात्मा उस आदर्श योजना और उस सुनिर्दिष्ट माध्यम, दोनों का ही बनाने वाला है, जिनके द्वारा आदर्श वास्तविक बनता है, धारणात्मक वस्तु विश्व बन जाता है। धारणात्मक (काल्पनिक) योजना को सुनिर्दिष्ट रूप देने के लिए एक परिपूर्ण अस्तित्व की, क्षमताशील भौतिक माध्यम में वस्तुओं का रूप ढाल देने की आवश्यकता होती है। एक ओर जहां परमात्मा के विचार अस्तित्वमान होने के लिए प्रयत्नशील हैं, वहां यह अस्तित्वमय संसार पूर्णता तक पहुंचने के लिए भी प्रयत्नशील है। दैवीय योजना और क्षमताशील भौतिक तत्व, ये दोनों उस परमात्मा से निकले हैं, जो आदि, मध्य और अन्त, ब्रह्मा, विष्णु और शिव है। अपने सृजनशील विचारों से युक्त परमात्मा ब्रह्मा है। वह परमात्मा, जो अपना प्रेम सब ओर लुटाता है और इतने धैर्य के साथ कार्य करता है कि उस धैर्य की तुलना केवल उसके प्रेम से की जा सकती है, विष्णु है, जो निरन्तरं संसार की रक्षा के कार्य में लगा रहता है। जब धारणात्मक वस्तु विश्व बन जाती है, जब स्वर्ग पृथ्वी पर उतर आता है, तब हमें एक पूर्णता प्राप्त होती है, जिसका प्रतिनिधि शिव है। परमात्मा एक साथ ही ज्ञान, प्रेम और पूर्णता तीनों है। इन तीनों कृत्यों को पृथक् पृथक् नहीं किया जा सकता। ब्रह्मा, विष्णु और शिव मूलतः एक हैं, भले ही उनकी कल्पना तीन अलग-अलग रूपों में की गई हो। गीता की रुचि संसार को मुक्ति दिलाने की प्रक्रिया में है, इसलिए विष्णु-पक्ष पर अधिक बल दिया गया है। कृष्ण भगवान् के विष्णु रूप का प्रतिनिधि है।

 

विष्णु ऋग्वेद का एक अत्यन्त प्रसिद्ध देवता है। वह महान्, व्यापक है। विष्णु शब्द विश् धातु से बना है, जिसका अर्थ है-व्याप्त करना।[46] वह आन्तरिक नियामक है, जो सारे संसार को व्याप्त किए हुए है। वह निरन्तर बढ़ती हुई माला में शाश्वत भगवान् की स्थिति और गौरव को अपने अन्दर समेटता जाता है। तैत्तिरीय आरण्यक में कहा गया है: "नारायण की हम पूजा करते हैं: वासुदेव का हम ध्यान करते हैं और इस कार्य में विष्णु हमारी सहायता करे।"[47]

 

गीता का उपदेश देने वाले कृष्ण[48] को विष्णु के साथ, जो कि सूर्य का प्राचीन देवता है, और नारायण के साथ, जो ब्रह्माण्डीय स्वरूप वाला प्राचीन देवता है और देवताओं और मनुष्यों का लक्ष्य या विश्राम-स्थान है, एकरूप कर दिया गया है।

 

वास्तविक भगवान् विश्व के ऊपर उठा हुआ सनातन, स्थानातीत और कालातीत ब्रह्मा है, जो स्थान और काल में इस दृश्यमान विश्व को संभाले हुए है। वह सार्वभौम आत्मा है परमात्मा, जो विश्व के रूपों और गतियों की आत्मा है। वह परमेश्वर है, जो व्यक्तिगत आत्माओं और प्रकृति की गतियों का अध्यक्ष है और विश्व के अस्तित्व का नियन्त्रण करता है। वह पुरुषोत्तम भी है, सर्वोच्च पुरुष, जिसकी द्विविधप्रकृति विश्व के विकास में व्यक्त होती है। वह हमारे अस्तित्व को पूर्ण कर देता है; हमारी बुद्धि को प्रकाशित करता है और उसकी गुप्त कमानियों को गतिमान कर देता है।[49]

पुरुषोत्तम से लेकर नीचे तक सब वस्तुएं सत् और असत् की द्वैतता का अंग हैं, यहां तक कि परमात्मा तक में भी निषेधात्मकता या माया का तत्व विद्यमान है, भले ही वह उसका नियन्त्रण क्यों करता हो ! वह अपनी सक्रिय प्रकृति (स्वां प्रकृति) को सामने लाता है और उन आत्माओं का नियन्त्रण करता है, जो अपनी-अपनी प्रकृति द्वारा निर्धारित दिशाओं में अपनी भवितव्यता को पूरा कर रही हैं। एक ओर जहां यह सब काम भगवान् इस संसार में प्रयुक्त की जा रही निजी शक्ति द्वारा करता है, वहां दूसरी ओर उसका एक और पक्ष है, जो इस सबसे बिलकुल अछूता रहता है। वह अवैयक्तिक, परम और साथ ही साथ अन्तर्व्यापी संकल्प है। वह सबका कारण है, पर उसका कोई कारण नहीं। वह सबको गति देने वाला है, पर उसे गति देने वाला कोई नहीं। मनुष्य और प्रकृति में निवास करने वाला भगवान् इन दोनों से अधिक महान् है। सीमाहीन स्थान और काल में रखा यह असीम विश्व उसके अन्दर विश्राम कर रहा है, पर परमात्मा इसमें विश्राम नहीं कर रहा।[50] गीता के परमात्मा को विश्व की प्रक्रिया के साथ एकरूप नहीं समझा जा सकता, क्योंकि वह इससे परे है [51] इस संसार में भी वह अपने कुछ पक्षों में अधिक व्यक्त है, और कुछ में कम। सर्वेश्वरवाद का हीनतर अर्थ में आरोप गीता के दृष्टिकोण पर नहीं किया जा सकता। जहां यह ठीक है कि वास्तविकता एक ही है, जो सर्वोच्च रूप से पूर्ण है, वहा प्रत्येक वस्तु, जो सुनिर्दिष्ट और वास्तविक है, उतने ही समान रूप से पूर्ण नहीं है।

 

5. गुरु कृष्ण

 

जहाँ तक भगवद्गीता की शिक्षा का प्रश्न है, इस बात का कोई महत्व नहीं है कि इसका उपदेश देने वाला कृष्ण कोई ऐतिहासिक व्यक्ति है या नहीं। महत्वपूर्ण बात भगवान् का सनातन अवतार है, जो इस विश्व में और मनुष्य की आत्मा में पूर्ण और दिव्य जीवन को लाने की शाश्वत प्रक्रिया है।

 

परन्तु कृष्ण की ऐतिहासिकता के पक्ष में बहुत काफ़ी प्रमाण विद्यमान हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में देवकीपुल कृष्ण का उल्लेख है और उसे घोर आंगिरस[52] का शिष्य बताया गया है। घोर आंगिरस, कौशीतकि ब्राह्मण[53] के अनुसार, सूर्य का पुजारी था। बलिदान के अर्थ की व्याख्या करने और यह बताने के बाद, कि पुरोहितों के लिए सच्ची दक्षिणा तप, दान, ईमानदारी, अहिंसा और सत्यभाषण आदि सद्गुणों का अभ्यास ही है[54], इस उपनिषद् में कहा गया है कि "जब घोर आंगिरस ने यह बात देवकीपुत्ल कृष्ण को समझाई तो उसने यह भी कहा कि अन्तिम समय में मनुष्य को इन तीन विचारों की शरण लेनी चाहिए : 'तू अविनश्वर (अक्षत) है; तू अविचल (अच्युत) है; तू सारे जीवन का सार (प्राण) है।'[55] इस उपनिषद् में घोर आंगिरस की शिक्षाओं और गीतों में कृष्ण की शिक्षाओं में परस्पर बहुत अधिक समानता है।

 

कृष्ण का महाभारत की कथा में भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, जहां उसे अर्जुन के मिल के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पाणिनि ने वासुदेव और अर्जुन को पूजा का पात्र बतलाया है।[56] कृष्ण प्राचीन यदुवंश की वृष्णि या सात्वत शाखा में उत्पन्न हुआ था। इस वंश का स्थान सम्भवतः मथुरा के आसपास कहीं था। मथुरा का नाम इतिहास-परम्परा और गाथा में कृष्ण के नाम के साथ जुड़ा हुआ है। कृष्ण वैदिक धर्म के याजकवाद का विरोधी था और उन सिद्धान्तों का की भी प्रचार करता था, जो उसने घोर आंगिरस से सीखे थे। वैदिक पूजा-पद्धति से उल्लेख उसका विरोध उन स्थानों में प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है, जहां इन्द्र पराजित होने के बाद कृष्ण के सम्मुख झुक जाता है।'[57] गीता में उन लोगों का भी उल्लेख है, जो कृष्ण की शिक्षाओं के सम्बन्ध में शिकायत करते हैं और कृष्ण पर अश्रद्धा करते हैं।[58] महाभारत में ऐसे संकेत हैं, जिनसे पता चलता है कि कृष्ण की सर्वोच्चता बिना उसे चुनौती दिए स्वीकार नहीं की गई थी। महाभारत में कृष्ण को एक ऐतिहासिक व्यक्ति[59] और भगवान् का अवतार, दोनों ही रूपों में प्रस्तुत किया गया है। कृष्ण ने सात्वतों को सूर्य की पूजा करना सिखाया था और सम्भवतः सात्वतों ने अपने गुरु कृष्ण को उस सूर्य के साथ एकरूप मान लिया, जिसकी पूजा उसने उन्हें सिखाई थी।[60] ईसवी-पूर्व चौथी शताब्दी तक वासुदेव की पूजा- पद्धति भलीभांति स्थापित हो चुकी थी। बौद्ध ग्रन्थ 'निद्देस' (ईसवी-पूर्व चौथी शताब्दी) में जो कि पालि सिद्धान्त-ग्रन्थों में सम्मिलित किया गया है, लेखक ने अन्य सम्प्रदायों के साथ-साथ वासुदेव और बलदेव के उपासकों का उल्लेख किया है। मैगस्थनीज़ (ईसवी पूर्व 320) ने लिखा है कि हैराक्लीज़ की पूजा सौरासैनोई (शूरसेन) लोगों द्वारा की जाती थी, जिनके देश में दो बड़े शहर मैथोरा (मथुरा) और क्लीसोबोरा (कृष्णपुर) हैं। तक्षशिला के यूनानी भागवत हीलियोडोरस ने बेसनगर के शिलालेख (ईसवी-पूर्व 180) में वासुदेव को देवादेव (देवताओं का देवता) कहा है। नानाघाट के शिलालेख में, जो ईसवी-पूर्व पहली शताब्दी का है, प्रारम्भिक श्लोक में अन्य देवताओं के साथ-साथ वासुदेव  की भी स्तुति की गई है। राधा, यशोदा और नन्द जैसे प्रमुख व्यक्तियों का उल्लेख बौद्ध गाथाओं में भी मिलता है। पतंजलि ने पाणिनि पर टीका करते उए अपने महाभाष्य में 4, 3, 98 में, वासुदेव को भागवत कहा है। यह पुस्तक अभगवद्गीता' कहलाती है, क्योंकि भागवत धर्म में कृष्ण को श्री भगवान् समझा जाता है। कृष्ण ने जिस सिद्धान्त का प्रचार किया है, वह भागवत धर्म है। गीता में कृष्ण ने कहा है कि वह कोई नई बात नहीं कह रहा, अपितु केवल उसी बात को दुहरा रहा है, जो पहले उसने विवस्वान् को बताई थी और विवस्वान् ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को बताई थी।'[61] महाभारत में कहा गया है कि "भागवत धर्म परम्परागत रूप से विवस्वान् से मनु को और मनु से इक्ष्वाकु को प्राप्त हुआ था।[62]" ये दो सम्प्रदाय, जो एक ही रूप में प्रारम्भ किए गए थे, अवश्य एक ही रहे होंगे। कुछ अन्य प्रमाण भी हैं। नारायणीय या भागवत धर्म के प्रतिपादन में कहा गया है कि पहले इस धर्म का उपदेश भगवान् ने भगवद्गीता में किया था।[63] फिर यह भी बताया गया है कि "इसका उपदेश भगवान् ने कौरवों और पांडवों के युद्ध में उस समय किया था, जबकि दोनों पक्षों की सेनाए युद्ध के लिए तैयार खड़ी थीं और अर्जुन मोहग्रस्त हो गया था।"[64] यह एकेश्वरवादी (ऐकान्तिक) धर्म है।

 

गीता में कृष्ण को उस परब्रह्म के साथ तद्रूप माना गया है, जो इस बहुरूप दीखने वाले विश्व के पीछे विद्यमान एकता है, जो सब दृश्य वस्तुओं के पीछे विद्यमान अपरिवर्तनशील सत्य है, जो सबसे ऊपर है और सर्वान्त-व्यापी है। वह प्रकट भगवान् है,[65] जिसके कारण मर्त्य लोगों को उसे जानना सरल हो जाता है। अनश्वर ब्रह्म की खोज करने वाले उसे ढूंढ़ अवश्य लेते हैं, परन्तु उसके लिए उन्हें बड़ा तप करना पड़ता है। इस रूप में वे भगवान् को सरलता से पा सकते हैं। वह परमात्मा कहा जाता है, जिसमें यह अर्थ निहित है कि वह सर्वातीत है। इस वह जीवभूत है, अर्थात् सबका प्राणरूप है। हम किसी ऐतिहासिक व्यक्ति को भगवान् किस प्रकार मान सकते हैं?

 

 

हम किसी ऐतिहासिक व्यक्ति को भगवान किस प्रकार मान सकते हैं? हिन्दू विचारधारा में किसी व्यक्ति को परमात्मा के साथ एकरूप मानना साधारण बात है। उपनिषदों में बताया गया है कि पूर्णतया जागरित आत्मा, जो परब्रह्म के साथ वास्तविक सम्बन्ध को समझ लेती है, इस बात को देख लेती है कि वह मूलतः परब्रह्म के साथ एकरूप है और वह अपने ब्रह्म के साथ एकरूप होने की घोषणा भी कर देती है। ऋग्वेद 4, 26 में वामदेव कहता है: "मैं मनु हूँ, मैं सूर्य हूं। मैं विद्वान् ऋषि कक्षिवान् हूं। मैंने अर्जुनी के पुल ऋषि कुत्स की पूजा की है। मैं विद्वान् उशना हूं। मेरी ओर देखो..." कौशीतकि उपनिषद् (3) में इन्द्र प्रतर्दन से कहता है : "मैं प्राण हूं : मैं चेतन आत्मा हूं : मुझे जीवन और प्राण मानकर मेरी पूजा करो। जो मुझे जीवन या अमरता मानकर मेरी पूजा करता है, वह इस संसार में पूर्ण जीवन प्राप्त करता है; वह स्वर्गलोक में जाकर अमरता और अनश्वरता प्राप्त करता है।"[66] गीता में लेखक कहता है : "राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर, मुझमें लीन होकर, मुझमें शरण लेकर अनेक लोग ज्ञानमय तप द्वारा पवित्त होकर मेरे रूप को प्राप्त हो चुके हैं।"[67] जीव अपने से भिन्न किसी ऐसी वस्तु का सहारा लेता है, जिसके प्रति वह अपने-आप को समर्पित कर सके। इस समर्पण में ही उसका रूपान्तरण है। मुक्त आत्मा अपने शरीर को शाश्वत की अभिव्यक्ति के लिए वाहन के रूप में प्रयुक्त करती है। कृष्ण ने जिस दिव्यता का दावा किया है, यह सब सच्चे आध्यात्मिकं अन्वेषकों को प्राप्त होने वाला सामान्य प्रतिफल है। वह कोई ऐसा नायक नहीं है, जो कभी पृथ्वी पर चलता-फिरता था और अपने प्रिय मित्ल और शिष्य को उपदेश देने के बाद इस पृथ्वी को छोड़कर चला गया है, अपितु वह तो सब जगह विद्यमान है और इस सबके अन्दर विद्यमान है; और वह सदा हमें उपदेश देने को उसी प्रकार तैयार रहता है, जैसा कि वह कभी भी किसी को भी उपदेश देने के लिए तैयार था। वह कोई ऐसा व्यक्तित्व नहीं है, जो कि अब समाप्त हो चुका हो, अपितु वह तो अन्तर्वासी आत्मा है, जो हमारी आध्यात्मिक चेतना का लक्ष्य है।

 

परमात्मा साधारण अर्थ में कभी जन्म नहीं लेता। जन्म और अवतार की वे प्रक्रियाएं, जिनमें सीमित हो जाने का अर्थ निहित है, उस पर लागू नहीं होती। जब यह कहा जाता है कि परमात्मा ने अपने-आप को किसी खास समय या किसी खास अवसर पर प्रकट किया, तो उसका अर्थ केवल इतना होता है कि ऐसा प्रकट होना किसी सीमित अस्तित्व को लेकर होता है। ग्यारहवें अध्याय में सारा संसार परमात्मा के अन्दर दिखाया गया है। संसार की कर्ताश्रित और वस्तु-रूपात्मक प्रक्रियाएं भगवान् की केवल उच्चतर और निम्नतर प्रकृतियों की अभिव्यक्तियां-मात्न हैं। फिर भी जो भी कोई वस्तु शानदार, सुन्दर और सबल है, उसमें परमात्मा का अस्तित्व कहीं अधिक अच्छी तरह अभिव्यक्त होता है। जब किसी सीमित व्यक्ति में आध्यात्मिक गुण विकसित हो जाते हैं और उसमें गहरी अन्तर्दृष्टि और उदारता दिखाई पड़ती है, तब वह संसार के भले-बुरे का निर्णय करता है और एक आध्यात्मिक और सामाजिक उथल-पुथल खड़ी कर देता है; तब हम कहते हैं कि परमात्मा ने अच्छाई की रक्षा और बुराई के विनाश के लिए और धर्म के राज्य की स्थापना के लिए जन्म लिया है। व्यक्ति के रूप में कृष्ण उन करोड़ों रूपों में से एक है, जिनके द्वारा विश्वात्मा अपने-आप को प्रकट करता है। गीता के लेखक ने ऐतिहासिक कृष्ण का उल्लेख उसके शिष्य अर्जन के साथ-साथ अनेक रूपों में से एक रूप के तौर पर किया है।'[68] अवतार मनुष्य के आध्यात्मिक साधनों और प्रसुप्त दिव्यता का प्रदर्शन है। यह दिव्य गौरव का मानवीय रूपरेखा की सीमाओं में संकुचित हो जाना उतना नहीं है, जितना कि मानवीय प्रकृति का भगवान् के साथ एकाकार होकर ईश्वरत्व के स्तर तक ऊंचा उठ जाना।

परन्तु ईश्वरवादियों का कथन है कि कृष्ण एक अवतार है अर्थात् ब्रह्म का मानवीय रूप में अवतरण। यद्यपि भगवान् जन्म नहीं लेता या उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता, फिर भी वह बहुत बार जन्म ले चुका है। कृष्ण विष्णु का मानवीय साक्षात् रूप है। वह भगवान् है, जो संसार को ऐसा प्रतीत होता है, मानो उसने जन्म ले लिया है और शरीर धारण कर लिया है।[69] दिव्य ब्रह्म द्वारा मानवीय स्वभाव को अंगीकार कर लेने से ब्रह्म की अखण्डता समाप्त नहीं होती और उसमें कोई वृद्धि ही होती है, ठीक उसी प्रकार जैसे संसार के सृजन से ब्रह्म की अखण्डता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। सृष्टि और अवतार दोनों का सम्बन्ध व्यक्त जगत् से है, परमात्मा से नहीं।[70]

 

यदि असीम परमात्मा सदा सीमित अस्तित्वों में प्रकट रहता है, तो उसका काली एक विशिष्ट समय में विशेष रूप से और किसी एक मानवीय स्वभाव को रहण करके प्रकट होना उसी गतिविधि को स्वेच्छापूर्वक पूर्ण करना-भर है, जिसके द्वारा दैवीय प्रचुरता स्वतन्त्रतापूर्वक अपने-आप को पूर्ण करती है और ससीम की ओर झुकती रहती है। इसके फलस्वरूप उसके अलावा कोई नई समस्या खड़ी नहीं होती, जो सृष्टि के कारण खड़ी होती है। यदि कोई मानव-शरीर परमात्मा की मूर्ति के रूप में गढ़ा जा सकता है, यदि आवर्तनशील ऊर्जा की सामग्री से नये नमूने रचे जा सकते हैं, यदि इन रीतियों से शाश्वतता को आनुक्रमिकता में समाविष्ट किया जा सकता है, तो दिव्य वास्तविकता (ब्रह्म) अपने अस्तित्व के परम स्वरूप को एक पूर्णतया मानवीय शरीर के रूप में और उस मानवीय शरीर के द्वारा प्रकट कर सकती है। मध्यकालीन दार्शनिक धर्म-विज्ञानियों ने हमें बताया है कि परमात्मा सब प्राणियों में 'सार, सान्निध्य और शक्ति द्वारा विद्यमान रहता है। परम, असीम, स्वतः विद्यमान और अविकार्य का ससीम मानव-प्राणी के साथ, जो सांसारिक व्यवस्था में फंसा हुआ है, सम्बन्ध कल्पनातीत रूप से घनिष्ठ है, हालांकि इस सम्बन्ध की परिभाषा कर पाना और उसका स्पष्टीकरण कर पाना कठिन है। उन महान् आत्माओं को, जिन्हें हम अवतार कहते हैं, परमात्मा, जो मानव के अस्तित्व और गौरव के लिए उत्तरदायी है, इस अस्तित्व और गौरव को आश्चर्यजनक रूप से नवीन रूप दे देता है। अवतारों में उस सनातन का, जो विश्व की प्रत्येक घटना में विद्यमान है. आनुक्रमिकता में प्रवेश एक गम्भीरतर अर्थ में प्रकट होता है। हमें स्वतन्त्र इच्छाशक्ति प्रदान करने के बाद परमात्मा हमें छोड़कर अलग खड़ा नहीं हो जाता कि हम स्वेच्छापूर्वक अपना निर्माण या विनाश कर सकें। जब भी कभी स्वतन्त्रता के दुरुपयोग के फलस्वरूप अधर्म बढ़ जाता है और संसार की गाड़ी किसी लीक में फंस जाती है, तो संसार को उस लीक में से निकालने के लिए और किसी नये रास्ते पर उसे चला देने के लिए वह स्वयं जन्म लेता है। अपने प्रेम के कारण वह सृष्टि के कार्य को उच्चतर स्तर पर ले जाने के लिए बार-बार जन्म लेता है। महाभारत के एक श्लोक के अनुसार, विश्व की रक्षा के लिए सदा उद्यत भगवान् के चार रूप हैं। उनमें एक पृथ्वी पर रहकर तप करता है; दूसरा ग़लतियां करने वाली मानवता के कार्यों पर सतर्क दृष्टि रखता है; तीसरा मनुष्य-जगत् में कर्म में लगा रहता है और चौथा रूप एक हज़ार साल की नींद में सोया रहता है।'[71] पूर्ण निष्क्रियता ही ब्रह्म के स्वभाव का एकमात्र पक्ष नहीं है। हिन्दू परम्परा में बताया गया है कि अवतार केवल मानवीय स्तर तक ही सीमित नहीं है। कष्ट और अपूर्णता की विद्यमाताका मूल मनुष्य के विद्रोही संकल्प में नहीं बताया गया, अपितु परमात्मा के सृजनात्मक प्रयोजन और वास्तविक संसार के मध्य विद्यमान विषमता में बताया गया है। यदि कष्ट का मूल मनुष्य के 'पतन' को माना जाए, तो हम निर्दोष प्रकृति की अपूर्णताओं की, उस भ्रष्टता की, जो सब जीवित वस्तुओं में विद्यमान है, और रोग के विधान (व्यवस्था) की व्याख्या नहीं कर सकते। इस निदर्शक प्रश्न से, कि मछलियों को कैंसर क्यों होता है, किसी प्रकार पिंड नहीं छुड़ाया जा सकता। गीता बताती है कि एक दिव्य स्रष्टा है, जो अगाध शून्य पर अपने रूपों का आरोप करता है। प्रकृति एक अपरिष्कृत पदार्थ है, एक अव्यवस्था, जिसमें से व्यवस्था का विकास किया जाना है; एक राति जिसे प्रकाशित किया जाना है। जब भी दोनों के संघर्ष में गतिरोध उत्पन्न हो जाता है, तभी उस गतिरोध को दूर करने के लिए दैवीय हस्तक्षेप होता है। इसके अतिरिक्त एक अद्भुत प्रकाशन की धारणा विश्व के सम्बन्ध में हमारे वर्तमान दृष्टिकोणों के साथ कठिनाई से ही मेल खाती है। कबीलों का परमात्मा धीरे-धीरे पृथ्वी का परमात्मा बना और पृथ्वी का परमात्मा अब विश्व का परमात्मा, सम्भवतः अनेक विश्वों में से एक विश्व का परमात्मा बन गया है। यह बात सोचने की भी नहीं है कि भगवान् का सम्बन्ध केवल क्षुद्रतम ग्रहों में एक इस ग्रह के केवल एक अंश से ही है।

 

अवतार का सिद्धान्त आध्यात्मिक जगत् के नियम की एक वाक्पटुतापूर्ण अभिव्यक्ति है। यदि परमात्मा को मनुष्यों का रक्षक माना जाए, तो जब भी कभी बुराई की शक्तियां मानवीय मान्यताओं का विनाश करने को उद्यत प्रतीत होती हों, तब परमात्मा को अपने-आप को प्रकट करना ही चाहिए। अवतार परमात्मा का मनुष्य में अवतरण है, मनुष्य का परमात्मा में आरोहण नहीं, जैसाकि मुक्त आत्माओं के मामले में होता है। यद्यपि प्रत्येक चेतन सत्ता इस प्रकार का अवतरण है, परन्तु वह केवल एक आच्छादित प्रकटन है। अहा की आत्मचेतन सत्ता और उसी की अज्ञान से आवृत्त सत्ता में अन्तर है।

 

अवतरण या अवतार का तथ्य इस बात का द्योतक है कि ब्रह्म का एक पूर्ण सप्राण और शारीरिक प्रकटन से विरोध नहीं है। यह सम्भव है कि हम भौतिक शरीर में जी रहे हों और फिर भी हममें चेतना का पूर्ण सत्य विद्यमान हो। मानवीय प्रकृति कोई बेड़ी नहीं है, अपितु यह दिव्य जीवन का एक उपकरण बन सकती है। हम सामान्य मर्त्य लोगों के लिए जीवन और शरीर-अभिव्यक्ति के अज्ञानपूर्ण, अपूर्ण और अक्षम साधन होते हैं, परन्तु यह आवश्यक नहीं कि वे सदा ऐसे ही हों। दिव्य चेतना इनका उपयोग अपने प्रयोजन के लिए करती है, जब कि अस्वतन्त्र मानवीय चेतना का शरीर, प्राण और मन की शक्तियों पर ऐसा पूर्ण नियन्त्रण नहीं रहता

 

यद्यपि गीता अवतार में इस विश्वास को स्वीकार करती है कि ब्रह्म संसार में किसी प्रयोजन को पूरा करने के लिए अपने-आप को सीमित कर देता है और तब भी उसके उस सीमित शरीर में पूर्ण ज्ञान विद्यमान रहता है; साथ ही यह शाश्वत अवतार पर भी बल देती है, अर्थात् कि परमात्मा मनुष्य में विद्यमान रहता है, दिव्य चेतना मानव-प्राणी में सदैव विद्यमान रहती है। ये दो दृष्टिकोण ब्रह्म के अनुभवातीत और अन्तर्व्यापी पहलुओं के द्योतक हैं और ये दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं समझे जा सकते। गुरु कृष्ण, जो मानव-जाति के आध्यात्मिक प्रबोधन में रुचि ले रहा है, अपने अन्दर विद्यमान ब्रह्म की गहराई में से बोल रहा है। कृष्ण का अवतार हमारे अन्दर विद्यमान आत्मा के प्रकटन का, अन्धकार में छिपे हुए ब्रह्म के प्रकाशन का एक उदाहरण है। भागवत के अनुसार'[72], "मध्य राति में, जब कि घने से घना अन्धकार था, घट-घटव्यापी भगवान् ने अपने-आप को दिव्य देवकी में प्रकट किया, क्योंकि भगवान् सब प्राणियों के हृदय में स्वयं छिपा हुआ है।"[73] उज्ज्वल प्रकाश काली से काली रात में प्रकट होता है। रहस्यों और प्रकाशनों की दृष्टि से रात बहुत समृद्ध है। रात्नि की उपस्थिति प्रकाश की उपस्थिति को कम वास्तविक नहीं बना देती सच तो यह है कि यदि रात हो, तो मनुष्य को प्रकाश की अनुभूति ही हो। कृष्ण के जन्म का अर्थ है- अन्धकारमयी राति में विमोचन (उद्धार) का तथ्य। कष्ट और दासत्व के क्षणों में विश्व के उद्धारकर्ता का जन्म होता है।

 

कृष्ण का जन्म वासुदेव और देवकी से हुआ कहा जाता है। जब हमारी सत्त्व प्रकृति शुद्ध हो जाती है[74], जब ज्ञान के दर्पण से वासनाओं की धूल को हटाकर उसे स्वच्छ कर दिया जाता है, तब विशुद्ध चेतना का प्रकाश उसमें प्रतिबिम्बित होता है। जब सब कुछ नष्ट हो गया प्रतीत होता है, तब आकाश से प्रकाश फूट पड़ता है और वह हमारे मानवीय जीवन को इतना समृद्ध कर देता है कि उसे शब्दों द्वारा कहकर नहीं बताया जा सकता। सहसा एक चमक होती है; हमें आन्तरिक आलोक प्राप्त होता है और जीवन बिलकुल नया और ताजा दिखाई पड़ने लगता है। जब हमारे अन्दर ब्रह्म का जन्म होता है, तब हमारी आंखों से केंचुली उतर जाती है और कारागार के द्वार खुल जाते हैं। भगवान् प्रत्येक प्राणी के हृदय में निवास करता है और जब उस गुप्त निवासस्थान का पर्दा फट जाता है, तब हमें दिव्य नाद सुनाई पड़ता है, दिव्य प्रकाश प्राप्त होता है और हम दिव्य शक्ति से कार्य करने लगते हैं। शरीरधारिणी मानवीय चेतना ऊपर उठकर अजन्मा शाश्वत के रूप में बदल जाती है। कृष्ण का अवसार भगवान् का शरीर में रूपान्तरण उतना नहीं है, जितना कि मनुष्यत्व को ऊंचा उठाकर भगवान् में रूपान्तरण।[75]

यहां गुरु शनैः शनैः शिष्य को उस स्तर तक पहुंचने के लिए मार्ग दिखाता है, जिस पर वह स्वयं पहुंचा हुआ है, मम साधर्म्यम् (मेरे साथ समानता) शिष्य अर्जुन उस संघर्ष करती हुई आत्मा का प्रतीक है, जिसने अभी तक उद्धार करने वाले सत्य को उपलब्ध नहीं किया है। वह अन्धकार, असत्य, सीमितता और मरणशीलता की शक्तियों से, जो उच्चतर संसार के मार्ग को रोके हुए है युद्ध कर रहा है। जब उसका सम्पूर्ण अस्तित्व किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है जब उसे यह पता नहीं चलता कि उचित कर्त्तव्य क्या है, तब वह अपने उच्चतर आत्म में, जिसका प्रतीक जगद्गुरु,[76] संसार-भर को उपदेश देने वाला कृष्ण है, शरण लेता है और उससे ज्ञान देने की कृपा करने की प्रार्थना करता है। "मैं तेरा शिष्य हूं; मेरी चेतना को प्रकाशित कर; मुझमें जो कुछ तमोमय है, उसे हटा दे, जो कुछ मैं गंवा चुका हूं, अर्थात् कर्म का एक स्पष्ट नियम, वह मुझे फिर प्रदान कर।" शरीर के रथ में सवार योद्धा अर्जुन है, परन्तु सारथी कृष्ण है और उसे ही इस याला का मार्गदर्शन करना है। प्रत्येक व्यक्ति शिष्य है, पूर्णता तक पहुंचने का महत्वाकांक्षी, भगवान् का जिज्ञासुः और यदि वह सचाई से श्रद्धा के साथ अपनी खोज जारी रखता है, तो लक्ष्य भगवान् ही मार्गदर्शक भगवान् बन जाता है। जहां तक गीता की शिक्षाओं की प्रामाणिकता का प्रश्न है, इस बात का महत्व बहुत कम है कि इसका लेखक कोई ऐतिहासिक व्यक्ति है या मनुष्य के रूप में अवतरित स्वयं भगवान्; क्योंकि आत्मा की वास्तविकताएं अब भी वही है, जो आज से हजारों साल पहले थीं और जाति एवं राष्ट्रीयता के अन्तर उन पर कोई प्रभाव नहीं डालते। असली वस्तु सत्य या सार्थकता है, और ऐतिहासिक तथ्य उसकी मूर्ति से अधिक कुछ भी नहीं है।"[77]

 

6. संसार की स्थिति और माया की धारणा

 

यदि ब्रह्म का मूल स्वरूप निर्गुण अर्थात् गुणहीन और अचिन्त्य (अर्थात् जिसके विषय में कुछ सोचा भी जा सके) हो, तो संसार एक ऐसी व्यक्त वस्तु है, जिसका सम्बन्ध परब्रह्म से तर्कसंगत ढंग से नहीं जोड़ा जा सकता। ब्रह्म की अपरिवर्तनीय शाश्वतता में सब चल और विकसमान वस्तुए आधारित हैं। उसके द्वारा ही उनका अस्तित्व है और भले ही वह किसी वस्तु का भी कारण नहीं हारा कुछ नहीं करता, किसी बात का निर्धारण नहीं करता, फिर भी उसके बिना वे वस्तुएँ रह नहीं सकतीं। यह संसार तो ब्रह्म पर निर्भर है, परन्तु ब्रहा इस सलार पर निर्भर नहीं है। यह एकपक्षीय निर्भरता और परम वास्तविकता तथा संसार के मध्य सम्बन्ध की तर्कपूर्ण अचिन्तनीयता 'माया' शब्द से सामने सती है। यह संसार ब्रह्म की भांति कोई मूल अस्तित्व (सत्) नहीं है और बत अनस्तित्व (असत्) ही है। इसकी परिभाषा सत् या असत्, दोनों में से किसी के श्री द्वारा नहीं की जा सकती।'[78] धार्मिक अनुभूतियों द्वारा आत्मा की परम वास्तविकता के आकस्मिक आविर्भाव के कारण हम बहुत बार संसार को अशुद्ध ज्ञान या मिथ्यार्थ ग्रहण के बजाय भ्रम (माया) समझने लगते हैं। यह एक परिसीमन है, जो अमापित और अमाप्य से पृथक् वस्तु है। परन्तु यह परिसीमन किसलिए है? इस प्रश्न का उत्तर तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक हम अनुभूतिमूलक स्तर पर हैं।

 

प्रत्येक धर्म में परम वास्तविकता की कल्पना इस रूप में की गई है कि वह हमारी काल-व्यवस्था से, जिसका आदि और अन्त है, जिसमें गति और उतार-चढ़ाव हैं, असीम रूप से ऊपर है। ईसाई धर्म में परमात्मा को इस रूप में प्रदर्शित किया गया है कि उसमें परिवर्तनशीलता नहीं है या अदल-बदल की छाया तक नहीं है। वह आदि से अन्त तक देखता हुआ शाश्वत वर्तमान में निवास करता है। यदि वही बात होती, तो दिव्य जीवन और इस विविध- रूप संसार में एक ऐसा पक्का भेद हो जाता, जिसके कारण इन दोनों में किसी भी प्रकार का सम्मिलन असम्भव हो जाता। यदि परम वास्तविकता एकाकी, निष्क्रिय और अविचल हो तो काल, गति और इतिहास के लिए कोई अवकाश ही होगा; काल अपनी परिवर्तन और अनुक्रमिकता की प्रक्रियाओं के साथ केवल एक आभास-मात्र बन जाएगा। परन्तु परमात्मा एक सप्राण मूल तत्व है, एक व्यापक अग्नि। यह प्रश्न किसी ऐसी प्रबल सत्ता का नहीं है, जिसके साथ विविध-रूपता का आभास जुड़ा हुआ है या किसी ऐसे सप्राण परमात्मा का, जो इस बहुविध विश्व में कार्य कर रहा है। ब्रह्म यह भी है और वह भी। शाश्वतता का अर्थ काल या इतिहास का निषेध नहीं है। यह समय का रूपान्तरण है। काल शाश्वतता से निकलता है और उसी में पूर्णता को प्राप्त होता है। भगवद्गीता में शाश्वतता और काल में कोई विरोधिता नहीं है। कृष्ण के अंकन द्वारा शाश्वत और ऐतिहासिक के मध्य एकता घोषित की गई है। ऐहिक गतिविधि का सम्बन्ध सनातन की आन्तरिकतम गम्भीरताओं के साथ है।

 

आत्मा सब द्वैतों से ऊपर रहती है; परन्तु जब उसे विश्व के दृष्टिकोण से देखा जाता है, तो वह अनुभवातीत विषय-वस्तु के सम्मुख खड़े अनुभवातीत कर्ता के रूप में बदल जाती है। कर्ता और विषय-वस्तु एक ही वास्तविकता के दो ध्रुव हैं। वे परस्पर असम्बद्ध नहीं हैं। वस्तु-रूपात्मकता का मूल तत्व, मूल प्रकृति, जो सम्पूर्ण अस्तित्व की अव्यक्त सम्भावना है, ठीक उसी प्रकार की वस्तु है, जिस प्रकार की वस्तु सृजनात्मक शब्द ब्रह्म, ईश्वर है। सनातन 'अहं' अर्धसनातन 'नाह' के सम्मुख रहता है, नारायण जल में ध्यानमग्न रहता है। क्योंकि 'नाह', प्रकृति, आत्मा का एक प्रतिबिम्ब-माल है, इसलिए यह आत्मा के अधीन है। जब परब्रह्म में निषेधात्मकता का तत्व घुसता है, तब उसकी आन्तरिकता अस्तित्व (नाम-रूप) धारण की प्रक्रिया में प्रकट होने लगती है। मूल एकता विश्व की सम्पूर्ण गतिविधि से गर्भित हो उठती है।

 

विश्व की प्रक्रिया सत् और असत् के दो मूल की तत्वों पारस्परिक क्रिया है। परमात्मा ऊपरी सीमा है, जिसमें असत् का न्यूनतम प्रभाव है और जिसका असत् पर पूर्ण नियन्त्रण है, और भौतिक तत्व या प्रकृति निचली सीमा है, जिस पर सत् का प्रभाव न्यूनतम है। विश्व की सारी प्रक्रिया सर्वोच्च परमात्मा की प्रकृति पर क्रिया है। प्रकृति की कल्पना एक सकारात्मक सत्ता के रूप में की गई है, क्योंकि इसमें प्रतिरोध करने की शक्ति है। प्रतिरोधक रूप में यह बुरी है। केवल परमात्मा में पहुंचकर यह पूरी तरह से छिन्न और परास्त हो पाती है। शेष सारी सृष्टि में यह कुछ कम या अधिक रूप में प्रकाश पर आवरण डालने वाली शक्ति है।

 

गीता आधिविद्यक द्वैतवाद का समर्थन नहीं करती, क्योंकि असत् का मूल तत्व सत् पर निर्भर है। भगवान् के दर्शन के लिए असत् वास्तविकता में एक आवश्यक महत्वपूर्ण वस्तु है। संसार जो कुछ है, उसका कारण तनाव है। काल और परिवर्तन का संसार पूर्णता तक पहुंचने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है। असत्, जो सब अपूर्णताओं के लिए जिम्मेदार है. संसार में एक आवश्यक तत्व  हैं, क्योंकि यही वह सामग्री है, जिसमें परमात्मा के के विचार मूर्त हाेते हैं [79] दिव् रूप (पुरुष) और भौतिक तत्व (प्रकृति) एक ही आध्यात्मिक समस्त के अंग हैं। जब सारा संसार बन्धन से मुक्त हो जाता है, जब यह निर्दोषता की स्थिति तक ऊंचा उठ जाता है, जब यह पूर्णतया आलोकित हो जाता है, तब भगवान् का प्रयोजन पूरा हो जाता है और संसार फिर अपनी मूल विशुद्ध सत् अवस्था में पहुंच जाता है, जो सब विभेदों से ऊपर है।

 

असत् क्यों है? पतन, या 'परम सत्' से अस्तित्वमान् (नाम-रूपमय) होने की स्थिति क्यों होती है? यह प्रश्न दूसरे शब्दों में यह पूछना है कि सत् और असत् के मध्य अविराम संघर्ष वाला यह संसार किसलिए बना है? परम हत, एक परमात्मा, संसार के पीछे भी है, परे भी और संसार में भी है। वह साथ ही सर्वोच्च सप्राण परमात्मा भी है, जो संसार से प्रेम करता है और अपनी दया द्वारा उसका उद्धार करता है। संसार अपने क्रमिक सोपान-तन्त्र के साथ जो कुछ है, उस रूप में यह क्यों है ? हम केवल इतना कह सकते हैं कि अपने-आप को इस रूप में प्रकट करना भगवान् का स्वभाव है। हम संसार के होने का कारण नहीं बतला सकते; हम केवल इसकी प्रकृति के विषय में बतला सकते हैं, जो अस्तित्वमान् होने की प्रक्रिया में सत् और असत् के बीच चल रहे संघर्ष के रूप में है। विशुद्ध सत् संसार से ऊपर है और विशुद्ध असत् निम्नतम विद्यमान वस्तु से भी नीचे है। यदि हम उससे भी नीचे जाएं, तो हम शून्य तक पहुंच जाएंगे, जो बिलकुल परम अनस्तित्व है। सच्चे अस्तित्वमान जगत्, संसार, में हमें सत् और असत् के दो मूल तत्वों के बीच संघर्ष दिखाई पड़ता है।

 

पारस्परिक क्रिया की पहली उपज ब्रह्माण्ड है, जिसके अन्दर व्यक्त सत् की सम्पूर्णता निहित रहती है। बाद में होने वाले सब विकास उसके अन्दर बीज-रूप में रहते हैं। उसके अन्दर अतीत, वर्तमान और भविष्य, एक सर्वोच्च 'अब' (अधुना) में निहित रहते हैं। अर्जुन सारे विश्व-रूप को एक विशाल आकृति में देखता है। वह ब्रह्म के रूप को अस्तित्व की सम्पूर्ण सीमाओं को तोड़ते हुए, सम्पूर्ण आकाश और विश्व को व्याप्त करते हुए देखता है, जिसमें लोक जलप्रपातों की भांति बह रहे हैं।

 

जो लोग भगवान् को अव्यक्तिक (निर्गुण) और सम्बन्धहीन मानते हैं, वे आत्म-प्रकाशन की शक्ति समेत ईश्वर की धारणा को अज्ञान (अविद्या) का परिणाम मानते हैं।[80]' विचार की वह शक्ति, जो उन रूपों को उत्पन्न करती है जो क्षणिक हैं और इसीलिए शाश्वत वास्तविकता की तुलना में अवास्तविक हैं, इन रूपों को उत्पन्न करने के कारण अविद्या कहलाती है। परन्तु अविद्या किसी इस या उस व्यक्ति का विलक्षण गुण नहीं है। यह भगवान् की आत्म-प्रकाशन की शक्ति कही जाती है। भगवान् का कथन है कि भले ही वह वस्तुतः अजन्मा है, परन्तु वह अपनी शक्ति द्वारा, आत्ममायया[81], जन्म लेता है। माया शब्द 'मा' धातु से बना है, जिसका अर्थ है - बनाना, रचना करना और मूलतः इस शब्द का अर्थ था - रूप उत्पन्न करने की क्षमता। वह सृजनात्मक शक्ति, जिसके द्वारा परमात्मा विश्व को गढ़ता है, योगमाया कहलाती है। इस बात का कोई संकेत नहीं है कि माया द्वारा या परमात्मा मावी, की रूप गढ़ने की शक्ति द्वारा उत्पन्न किए गए रूप, घटनाएं और वस्तुएं केवल भ्रम हैं।

 

कभी-कभी माया को मोह का स्रोत भी बताया जाता है।प्रकृति के इन तीन गुणों से मूढ़ होकर यह संसार मुझे नहीं पहचान पाता, जो कि मैं उन तीनों  गणों से ऊपर अनश्वर हूँ।"[82] माया की शक्ति के कारण हमारे अन्दर एक भ्रमित रहती है और दृश्य तत्व के जगत् में रहती है। परमात्मा का वास्तविक अस्तित्व राहत की क्रीड़ा और इसके गुणों द्वारा आवृत्त हो जाता है। संसार को भ्रामक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि परमात्मा अपने-आप को अपनी सृष्टि के पीछे छिपा लेता है। संसार अपने-आप में धोखा नहीं है, अपितु यह धोखे का निमित्त विजाता है। वास्तविकता को जानने के लिए हमें सब रूपों को छिन्न-भिन्न करके बावरण के पीछे पहुंचना होगा। यह संसार और इसके परिवर्तन परमात्मा का अवधान (छिप जाना) बन जाते हैं या स्रष्टा को उसकी सृष्टि द्वारा धुंचला या विरहानीय कर देते हैं। मनुष्य की प्रवृत्ति अपने मन को स्रष्टा की ओर प्रेरित करने के बजाय संसार के विषयों की ओर झुकने की रहती है। परमात्मा एक महान् इलिया प्रतीत होता है, क्योंकि वह इस संसार को और इन्द्रियों के विषयों को उत्पन्न करता है और हमारी इन्द्रियों को बहिर्मुख कर देता है।[83] अपने-आप को धोखा देने की प्रवृत्ति इन्द्रियों के विषयों को प्राप्त करने की इच्छा में निहित है। यह इच्छा वस्तुतः मनुष्य को परमात्मा से दूर ले जाती है। संसार की चमक-दमक हम पर अपना जादू फेर देती है और हम उससे प्राप्त होने वाले पुरस्कारों के दास बन जाते हैं। यह दुनिया या वस्तु-रूपात्मक प्रकृति या संसार पतित, दास और विजातीय है और यह कष्टों से भरा हुआ है, क्योंकि आन्तरिक सत्ता से विजातीय बन जाना कष्ट है। जब यह कहा जाता है कि 'मेरी इस दिव्य माया को जीतना बहुत कठिन है' तो इसका अर्थ यह होता है कि हम संसार और उसकी गतिविधियों को आसानी से भेदकर उनके पीछे नहीं पहुंच सकते [84]

 

यहां पर हम उन विभिन्न अर्थों में अन्तर कर सकते हैं, जिनमें 'माया' अवि शब्द का प्रयोग किया गया है, और गीता में इसका स्थान नियत कर सकते हैं। (1) यदि परम वास्तविकता संसार की घटनाओं से अप्रभावित रहती है, तो इन घटनाओं का होना एक ऐसा रहस्य बन जाता है, जिसकी व्याख्या हो ही नहीं सकती। गीता का लेखक 'माया' शब्द का प्रयोग इस अर्थ में नहीं करता, भले ही उसके विचार में यह अर्थ कितना ही निहित क्यों रहा हो। एक आदिहीन और साथ ही अवास्तविक अविद्या की धारणा, जो इस सारे संसार की प्रकृति का कारण है, गीता के लेखक के मन में नहीं आई। (2) व्यक्तिक ईश्वर के सम्बन्ध में यह बताया गया है कि वह अपने सत् और असत् को मिलाता है। उसके अन्दर ब्रह्म की अनिवार्यता भी है और साथ ही अस्तित्वमान् होने का विकार या परिवर्तन भी है।'[85] माया वह शक्ति है, जो उसे परिवर्तनशील प्रकृति को उत्पन्न करने में समर्थ बनाती है। यह ईश्वर की शक्ति या ऊर्जा या आत्मविभूति है; अपने-आप को अस्तित्वमान् बनाने की शक्ति। इस अर्थ में ईश्वर और माया परस्पराश्रित हैं, और आदिहीन हैं।[86] गीता में भगवान की इस शक्ति को माया कहा गया है।[87] (3) क्योंकि परमात्मा अपने अस्तित्व के दो तत्वों, प्रकृति और पुरुष, भौतिक तत्व और चेतना द्वारा संसार को उत्पन्न कर सकता है, इसलिए वे दोनों तत्व भी परमात्मा की (उच्चतर और निम्नतर) माया कहे जाते हैं।*[88] (4) क्रमश: माया का अर्थ निम्नतर प्रकृति हो जाता है, क्योंकि पुरुष को तो वह बीज बताया गया है, जिसे भगवान् संसार की सृष्टि के लिए प्रकृति के गर्भ में डालता है। (5) क्योंकि यह व्यक्त जगत् वास्तविकता को मर्त्य प्राणियों की दृष्टि से छिपाता है, इसलिए इसे भी भ्रामक ढंग का बताया गया है।[89] यह संसार कोई भ्रान्ति नहीं है, यद्यपि इसे परमात्मा से असम्बद्ध केवल प्रकृति का यान्त्रिक निर्धारण समझ लेने के कारण हम इसके दैवीय तत्व को समझने में असमर्थ रहते हैं। तब यह भ्रान्ति का कारण बन जाता है। दैवीय माया अविद्या माया बन जाती है। परन्तु यह केवल हम मत्योंर्म के लिए, जो सत्य तक नहीं पहुंच सकते, अविद्या माया है, परन्तु परमात्मा के लिए, जो सब-कुछ जानता है और इसका नियन्त्रण करता है, यह विद्या माया है। ऐसा लग कहै कि परमात्मा माया के एक विशाल आवरण में लिपटा हुआ है।'[90] (6) क्योंकि यह संसार परमात्मा का एक कार्य-माल है और परमात्मा इसका कारण है और जगह कारण कार्य की अपेक्षा अधिक यह संसार, जो कि कार्य-रूप है, कारण-रूप परमात्मा की अपेक्षा कम वास्तविक, कहा जाता है। संसार की यह आपेक्षिक अवास्तविकता अस्तित्वमान् होने कहा प्रक्रिया की आत्मविरोधी प्रवृत्ति द्वारा पुष्ट हो जाती है। अनुभव के जगत् में विरोधी वस्तुओं में संघर्ष चलता रहता है और वास्तविक (ब्रह्म) सब विरोधों से ऊपर है।[91]

 

7. व्यक्तिक आत्मा

 

वास्तविकता (ब्रह्म) स्वभावतः असीम, सर्वोच्च, निष्कलुष और अपनी एकता और परम आनन्द से इस प्रकार युक्त है कि उसमें किसी विजातीय तत्व का प्रवेश नहीं हो सकता। विश्व की प्रक्रिया में वे द्वैत और विरोध उत्पन्न होते हैं, जो असीम और अविभक्त वास्तविकता को आंख से ओझल कर देते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद के शब्दों में विश्व की प्रक्रिया भौतिक तत्व[92]' (अन्न), जीवन (प्राण), मन (मनस्), बुद्धि (विज्ञान) और परम आनन्द (आनन्द) की पांच अवस्थाओं में से गुज़री है। सब वस्तुओं को जीवन की सृजनात्मक दौड़ में भाग लेने के कारण उन्हें एक आन्तरिक प्रेरणा दी गई है। मानव-प्राणी विज्ञान या बुद्धि की चौथी अवस्था में है। वह अपने कर्मों का स्वामी नहीं है। उसे उस सार्वभौम वास्तविकता का ज्ञान है, जो इस सारी योजना के पीछे कार्य कर रही है। भौतिक तत्व, जीवन और मन को जानता प्रतीत होता है। उसने एक सीमा तक भौतिक जगत्, प्राणि जगत् और यहां तक कि मन के अस क्रिया-कलापों पर अधिकार कर लिया है, परन्तु अभी तक वह पूर्णतया प्रबु चेतना नहीं बन सका। जिस प्रकार भौतिक तत्व के बाद जीवन और जीवन के बाद मन और मन के बाद बुद्धि का स्थान आता है, उसी प्रकार बुद्धिमान मनुष्य एक उच्चतर और दिव्य जीवन के रूप में विकसित होगा। निरन्तर अधिकाधिक आत्मवृद्धि प्रकृति की तीव्र प्रेरणा रही है। संसार के लिए परमात्मा का ध्येय या मनुष्य के लिए ब्रह्माण्डीय भवितव्यता यह है कि इसी मर्त्य शरीर द्वारा अमर महत्त्वाकांक्षा को प्राप्त किया जाए; इस भौतिक शरीर और बौद्धिक चेतना में और इसी के द्वारा दिव्य जीवन को उपलब्ध किया जाए।

 

ब्रह्म मनुष्य के अन्तर्तम में निवास करता है और उसे विनष्ट नहीं किया जा सकता। यह आन्तरिक ज्योति है, एक छिपा हुआ साक्षी, जो सदा बना रहता है और जो जन्म-जन्मान्तर में अनश्वर है। उसे मृत्यु, जरा या दोष छू नहीं सकते। यह जीव का, जो आत्मिक व्यष्टि है, मूल तत्व है। जीव परिवर्तित होता है और जन्म-जन्मान्तर में उन्नति करता जाता है और जब आत्मा का ब्रह्म के साथ पूर्ण एकत्व स्थापित हो जाता है, तब वह उस आत्मिक अवस्था में पहुंच जाता है, जो उसकी भवितव्यता है; और जब तक वह दशा नहीं आती, तब तक वह जन्म और मरण के फेर में पड़ा रहता है।

 

प्रत्येक प्राणी में अस्तित्व के सब रूप पाए जाते हैं, क्योंकि मानवीय रूप के सुनिर्धारित लक्षणों के नीचे भौतिकता, संगठन और पशुत्व की रूपरेखाएं विद्यमान हैं। भौतिक तत्व, प्राण और मन, जो इस संसार को भरे हुए हैं, हमारे अन्दर भी विद्यमान हैं। जो शक्तियां बाह्य जगत् में कार्य कर रही हैं, उनका अंश हममें भी है। हमारी बौद्धिक प्रकृति आत्मचेतना को उत्पन्न करती है और वह आत्मचेतना मानवीय व्यष्टि को प्रकृति के साथ उसकी मूल एकता से ऊपर उठा देती है। समूह के साथ मिले रहने की सहज प्रवृत्तिज भावना से उसे जो सुरक्षा अनुभव होती है, वह जाती रहती है और वह सुरक्षा की भावना फिर एक ऊंचे स्तर पर पहुंचकर अपने व्यक्तित्व को बिना गंवाए दुबारा प्राप्त की जानी है। अपने आत्म के संघटन द्वारा संसार के साथ उसकी एकता एक सहज प्रेम और निःस्वार्थ कार्य द्वारा उपलब्ध की जानी है। प्रारम्भिक दृश्य में अर्जन प्रकति के संसार और समाज के सम्मुख खड़ा है और वह अपने-आप को बिलकुल अकेला अनुभव करता है। सामाजिक प्रमापों के सम्मुख झुककर आन्तरिक सुरक्षा प्राप्त करना नहीं इहता। जब तक वह अपने-आप को एक क्षत्तिय के रूप में देखता है, जिसका काम सड़ना है, जब तक वह अपनी पदस्थिति और उसके कर्तव्यों से जकड़ा हुआ है तब तक उसे अपने वैयक्तिक कर्म की पूरी सम्भावनाओं का पता नहीं चलता, इनमें से अधिकांश लोग सामाजिक जगत् में अपने विशिष्ट स्थान को प्राप्त करके अपने जीवन को एक अर्थ प्रदान करते हैं और एक सुरक्षा की अनुभूति, एक अलीयता की भावना प्राप्त करते हैं। साधारणतया सीमाओं के अन्दर रहते हए हम अपने जीवन की अभिव्यक्ति के लिए अवसर पा लेते हैं और सामाजिक दिनचर्या बन्धन अनुभव नहीं होती। व्यक्ति अभी तक उभर नहीं पाया है। वह है सामाजिक माध्यम से भिन्न रूप में अपने विषय में सोच भी नहीं पाता। अर्जुन सामाजिक प्राधिकार के सम्मुख पूर्णतया विनत होकर अपनी असहायता और दुश्चिन्ता की अनुभूति पर विजय पा सकता था, परन्तु वह उसके विकास को र्ग ऐवना होता। किसी भी बाह्य प्राधिकार के सम्मुख झुककर प्राप्त की गई सन्तोष जो और सुरक्षा की भावना आत्मा की अखण्डता के मोल पर खरीदी जाती है। आधुनिक विचारधाराओं, जैसे कि एकतन्त्रवाद, का कथन है कि व्यक्ति की रक्षा उसको समाज में लय करके ही की जा सकी है। वे यह भूल जाते हैं कि समाज का अस्तित्व केवल मानवीय व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करने के लिए है। अर्जुन अपने-आप को सामाजिक सन्दर्भ से अलग कर लेता है; अकेला खड़ा होता है और संसार के संकटपूर्ण और असहाय बना देने वाले पहलुओं का सामना करता है। अकेलेपन और दुश्चिन्ताओं पर विजय पाने के लिए झुक जाना मानवोचित रंति नहीं है। अपनी आन्तरिक आध्यात्मिक प्रकृति का विकास करके हमें संसार के साथ एक नये प्रकार की आत्मीयता की अनुभूति होती है। हम उस स्वतन्त्रता एक ऊपर उठ जाते हैं, जहां आत्मा की अखण्डता पर आंच नहीं आती। तब हम सक्रिय सृजनशील व्यक्तियों के रूप में अपने-आप को पहचान लेते हैं और तब हम बाहा प्राधिकार के अनुशासन के अनुसार जीवन नहीं बिताते, अपितु स्वतन्त्र सत्यनिष्ठा के आन्तरिक नियम के अनुसार जीवन बिताते हैं।

 

व्यक्तिक आत्मा ईश्वर का एक अंश है; भगवान् का एक काल्पनिक नहीं, अपितु वास्तविक रूप, परमात्मा का एक सीमित व्यक्त रूप। आत्मा, जो कि परमेश्वर से निकली है, भगवान् से निकास के रूप में उतनी नहीं है, जितनी कि उसके अंश के रूप में। वह अपना आदर्श उसी श्रेष्ठ मूल तत्व से प्राप्त करती है, जो एक पिता के रूप में है, जिसने उसे अस्तित्व प्रदान किया है। आत्मा का महत्वपूर्ण अस्तित्व दिव्य बुद्धि से उत्पन्न होता है और जीवन में उसकी अभिव्यक्ति उस भगवान् के दर्शन द्वारा होती है, जो भगवान् उसका पिता और उसका सदा विद्यमान साथी है। इसकी विशिष्टता उस दिव्य आदर्श और उन इन्द्रियों तथा मन के उस पूर्वापर-सम्बन्ध द्वारा निर्धारित होती है, जिन्हें यह अपने पास खींच लेती है। सार्वभौम एक सीमित मनोमय-प्राणमय-अन्नमय कोष में साकार हुआ है।[93] कोई भी व्यक्ति ठीक अपने साथी जैसा नहीं है। कोई भी जीवन किसी दूसरे जीवन की पुनरावृत्ति नहीं है, फिर भी सब व्यक्ति ठीक एक ही नमूने पर बने हैं। जीव का सार, मानव-व्यक्तित्व को अन्य सबसे पृथक् करने वाली विशेषता, एक ख़ास सृजनशील एकता है, एक आन्तरिक सोद्देश्यता, एक योजना, जिसने अपने-आप को क्रमशः एक सावयव एकता के रूप में साकार किया है। जैसा हमारा उद्देश्य होता है, वैसा हमारा जीवन होता है। व्यक्ति जो भी रूप धारण करता है, वह अवश्य ही अधिलंधित हो जाता है, क्योंकि वह सदा अपने-आप से ऊपर उठने का यत्न करता है; और यह प्रक्रिया तब तक चलती रहेगी, जब तक कि अस्तित्वमानता अपने उद्देश्य सत् तक पहुंच जाए। जीव परमात्मा के अस्तित्व में होने वाली गतियां हैं, जो व्यक्ति-रूप धारण कर चुकी हैं। जब जीव अनात्म और उसके रूपों के साथ एक मिथ्या एकात्मकता में फंस जाता है, तब वह बन्धन में पड़ जाता है; पर जब उचित ज्ञान के विकास द्वारा वह आत्म और अनात्म की सच्ची प्रकृति को हृदयंगम कर लेता है और अनात्म द्वारा उत्पन्न किए गए उपकरणों को आत्म द्वारा पूर्णतया प्रकाशित होने देता है, तब वह स्वतन्त्र हो जाता है। यह प्राप्ति बुद्धि या विज्ञान के घोषित कार्य करते रहने द्वारा ही सम्भव है।

 

मनुष्य के सम्मुख जो समस्या है, वह है - उसके व्यक्तित्व के संघटन की, एक ऐसे दिव्य अस्तित्व के विकास की, जिसमें कि आत्मिक मूल तत्व आत्मा जोर शरीर की सब शक्तियों का स्वामी हो। यह संघटित जीवन आत्मा द्वारा स्था आऔरत है। शरीर और आत्मा के मध्य अन्तर, जो मनुष्य को प्रकृति के जीवन से बाई रखता है, अन्तिम नहीं है। वह अन्तर उस आमूलवादी अर्थ में विद्यमान नहीं है जिसमें कि डेस्काटीज ने उसे बताया है। आत्मा का जीवन शरीर के जीवन में ठीक उसी प्रकार रमा रहता है, जैसे शारीरिक जीवन का प्रभाव आत्मा पर रहता है। मनुष्य में आत्मा और शरीर की एक सप्राण एकता है। वास्तविक द्वैत आत्मा और प्रकृति के बीच है। स्वतन्त्रता और परवशता के बीच संघटित व्यक्तित्व में, हम देखते हैं कि प्रकृति पर आत्मा की, परवशता पर स्वतन्त्रता की विजय होती हैं। गीता, जो इन दोनों को भगवान् के दो पहलुओं के रूप में देखती है, बताती है कि हम प्रकृति को आत्मिक बना सकते हैं और उसमें एक अन्य गुण का आधान कर सकते हैं। हमें प्रकृति को कुचलने या उसका विनाश करने की आवश्यकता नहीं है।

 

स्वाधीनता या नियतिवाद की समस्या का अर्थ केवल वहीं तक कुछ है, जहां तक उसका सम्बन्ध मानव-व्यक्तियों से है। यह समस्या उस परब्रह्म पर लागू नहीं होती, जो सब विरोधों से ऊपर है; और यह वनस्पतियों और पशुओं की उन जातियों पर ही लागू होती है, जो मनुष्य से नीचे हैं। यदि मनुष्य केवल सहजवृत्ति से चलने वाला सीधा-सादा प्राणी हो, यदि उसकी इच्छाएं और उसके निर्णय केवल आनुवंशिकता और परिवेश की शक्तियों के ही परिणाम हों, तब नैतिक निर्णय बिलकुल असंगत हैं। हम सिंह को उसकी भयंकरता के कारण बुरा नहीं कहते और मेमने की, उसकी विनम्रता के लिए, प्रशंसा ही करते हैं। मनुष्य को स्वतन्त्रता प्राप्त है।'[94] जीवन के सम्पूर्ण दर्शन का वर्णन करने के बाद गुरु अर्जुन से कहता है कि उसे जैसा अच्छा जान पड़े, वैसा वह करे।[95] गीता के सारे उपदेश में मनुष्य से यह अपेक्षा की गई है कि वह अच्छाई को चुने और सचेत प्रयत्न द्वारा उसे प्राप्त करे। परन्तु इस चुनाव की स्वतन्त्रता में अनेक बाधाएं भी है।

 

मनुष्य एक जटिल बहुआयामी (मल्टी-डाइमेंशनल) प्राणी है, जिसके अन्दर भौतिक तत्व, जीवन, चेतना, बुद्धि और दिव्य ज्योति के विभिन्न तत्व विद्यमान हैं। जब वह उच्चतर स्तर पर कार्य करता है, तब वह स्वतन्त्र होता है और वह अन्य तत्वों का उपयोग अपने प्रयोजन की पूर्ति के लिए करता है। परन्तु जब वह वस्तु-रूपात्मक प्रकृति के स्तर पर होता है, जब वह अनात्म से अपने भेद को पहचान नहीं पाता, तब वह प्रकृति के यन्त्रजात का दास बन जाता है। परन्तु जब वह मिथ्या रूप से अपने-आप को वस्तु-रूपात्मक विश्व के साथ एक समझ रहा होता है और यह अनुभव कर रहा होता है कि वह प्रकृति की आवश्यकताओं के अधीन है, उस समय भी वह एकदम हताश नहीं होता, क्योंकि अस्तित्व के सब स्तरों पर एक ही आत्मा काम कर रही होती है। भौतिक तत्व भी भगवान् का ही एक प्रकट रूप है। प्रकृति के निम्नतम रूपों में भी सहजता और सृजनशीलता का एक ऐसा तत्व विद्यमान है, जिसकी यान्त्रिक शक्तियों के रूप में व्याख्या नहीं की जा सकती। हमारे अस्तित्व के प्रत्येक स्तर की एक अपनी चेतना है, उसके अपने ऊपरी विचार हैं, अनुभूति, विचार और कर्म के उसके अपने ढंग हैं, जो आदत से बने हुए हैं। जीव को अपनी अस्पष्ट और सीमित चेतना को बनाए रखने का हठ नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह भी इसकी वास्तविक प्रकृति का विकृत रूप है। जब हम इन्द्रियों का दमन कर देते हैं और उन्हें अपने वश में रखते हैं, तब आत्मा की शिखा उज्ज्वल और निर्मल रूप से जलने लगती है, 'जैसे वायुहीन स्थान में रखा दीपक जल रहा हो।' चेतना का प्रकाश अपने स्वाभाविक रूप में रहता है और अनुभवगम्य आत्म, जिसमें कि अनुभव के उतार-चढ़ाव चलते रहते हैं, बुद्धि द्वारा नियन्त्रित रहता है। इस बुद्धि में चेतना का प्रकाश प्रतिबिम्बित होता है। तब हम प्रकृति के इस नाटक से ऊपर उठ जाते हैं और उस वास्तविक आत्मा का दर्शन करते हैं, जिससे सृजनात्मक शक्तियां निकली हैं; हमारा सम्बन्ध उससे नहीं रहता, जिसे चलाया-फिराया जाता है और तब हम प्रकृति के हाथों में असहाय उपकरण नहीं रहते। तब हम उच्चतर जगत् के स्वतन्त्र सहभागी बन जाते हैं, जो निस्तर जगत् में भाग ले रहे हैं। प्रकृति नियतिवाद की व्यवस्था है, परन्तु एक रुद्ध (बन्द) व्यवस्था नहीं है। आत्मा की शक्तियां उसे प्रभावित कर सकती है और उसकी गति की दिशा को मोड़ सकती हैं। आत्मा का प्रत्येक कार्य सजनात्मक कार्य है, जब कि अनात्म के सब कार्य वस्तुतः निष्क्रिय हैं। हम मूल वास्तविकता के सम्मुख, अस्तित्व की गम्भीरताओं के सम्मुख, अपने आन्तरिक जीवन में ही आते हैं। कर्म का नियम अनात्म के क्षेत्न में पूरी तरह लागू होता है, जहां प्राणिशास्त्रीय और सामाजिक आनुवंशिकता दृढ़ता से जमी हुई है। परस्तु कर्ता में स्वाधीनता की सम्भावना है; प्रकृति के नियतिवाद पर, संसार की अनिवार्यता पर विजय पाने की सम्भावना है। कर्ता मनुष्य को वस्तु-रुपात्मक मरुष्य के ऊपर विजय प्राप्त करनी चाहिए। वस्तु बाहर से भाग्य-नियत होने द्योतक है: कर्ता का अर्थ है - स्वतन्त्रता, अनिर्धारितता। जीव अपनी आत्मसीमितता में, अपनी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्वतःचालितता में सच्चे कर्ता का एक विकृत रूप है। कर्म के नियम पर आत्मा की स्वाधीनता की पुष्टि द्वारा विजय प्राप्त की जा सकती है। गीता में कई स्थानों पर[96] यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है कि आधिदैविक और आधिभौतिक के बीच कोई आमूलतः द्वैत नहीं है। विश्व की वे शक्तियां, जिनका मनुष्य पर प्रभाव पड़ता है, निम्नतर प्रकृति की प्रतिनिधि हैं। परन्तु उसकी आत्मा प्रकृति के घेरे को तोड़ सकती है और ब्रह्म के साथ अपने सम्बन्ध को पहचान सकती है। हमारा बन्धन किसी विजातीय तत्व पर आश्रित रहने में है। जब हम उससे ऊपर उठ जाते हैं, तब हम अपनी प्रकृति को आध्यात्मिक के अवतार के लिए माध्यम बना सकते हैं। संघर्षों और कष्टों में से गुजरकर मनुष्य अपनी अच्छे और बुरे में से चुनाव कर सकने की स्वतन्त्रता से ऊपर उठकर उस उच्चतर स्वतन्त्रता तक पहुंच सकता है, जो निरन्तर वरण की हुई अच्छाई में निवास करती है। मुक्ति आन्तरिक सत्ता कात्मकता, की ओर वापस लौट जाना है। बन्धन वस्तु-रूपात्मक जगत् का, आवश्यकता का, पराश्रितता का दास होना है।

 

तो प्रकृति और समाज ही हमारे आन्तरिक अस्तित्व पर हमारी अनुमति के बिना आक्रमण कर सकता है। मानव-प्राणियों के सम्बन्ध में तो परमात्मा भी एक विलक्षण सुकुमारता के साथ कार्य करता है। वह मनाकर हमारी स्वीकृति प्राप्त करता है, परन्तु कभी हमें विवश नहीं करता। मानवीय व्यक्तियों की अपनी-अपनी अलग पृथक् सत्ताएं हैं, जो उनके विकास में परमात्मा के हस्तक्षेप को सीमित रखती हैं। संसार एक यान्त्रिक ढंग से किसी पहले से व्यवस्थित योजना को पूरा नहीं कर रहा। सृष्टि का उद्देश्य ऐसे आत्मों को उत्पन्न करना है, जो स्वेच्छा से परमात्मा की इच्छा को पूरा कर सकें। हमसे अपने मनोवेगों को नियन्त्रित करने के लिए, अपने चित्त-विक्षेप और परिभ्रान्तियों को हटा देने के लिए, प्रकृति की धारा से ऊपर उठने के लिए और बुद्धि के द्वारा अपने आचरण को नियमित करने के लिए कहा जाता है, क्योंकि अन्यथा हम उस लालसा के शिकार बन जाएंगे, 'जो लालसा कि पृथ्वी पर मनुष्य की शतु है।"[97] गीता में व्यक्ति की भले या बुरे का चुनाव कर सकने की स्वाधीनता पर और उस ढंग पर, जिससे कि वह इस स्वतन्त्रता का प्रयोग करता है, जोर दिया गया है। मनुष्य के संघर्षों को, उसकी विफलता और आत्म-अभियोजन (दोषारोपण) की भावना को मर्त्य मन की बुटि कहकर या द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया का दौर-माल कहकर नहीं टाल देना चाहिए। ऐसा करना जीवन की नैतिक आवश्यकता को अस्वीकार करना होगा। जब अर्जुन सनातन (भगवान्) की उपस्थिति में अपनी आतंक और भय की भावना को प्रकट करता है, जब वह क्षमा के लिए प्रार्थना करता है, तो वह कोई अभिनय नहीं कर रहा, अपितु एक संकट की दशा में से गुज़र रहा है।

 

प्रकृति निरपेक्ष रूप से सब बातों का निर्धारण नहीं कर देती। कर्म एक दशा है, भवितव्यता नहीं। यह किसी भी काम के पूरा होने के लिए आवश्यक पांच घटक तत्त्वों में से एक है। ये पांच घटक तत्व है - अधिष्ठान अर्थात् वह आधार या केन्द्र, जिस पर हम कार्य करते हैं; कर्ता अर्थात् करने वाला; करण अर्थात् प्रकृति के साधक उपकरण; चेष्टा अर्थात् प्रयत्न और दैव अर्थात् भाग्य [98] इनमें से अन्तिम मानवीय शक्ति से भिन्न शक्ति या शक्तियां हैं, विश्व का वह मूल तत्व, जो पीछे खड़ा रहकर कार्य का संशोधन करता रहता है और कर्म और कर्मफल के रूप में उसका फल देता रहता है। हमें इन दो बातों में भेद करना चाहिए। एक तो वह अंश है, जो प्रकृति की व्यवस्था में अनिवार्य है, जहा रोकथाम का कोई फल नहीं होता, और दूसरा वह अंश है, जिसमें प्रकृति को नियन्तित किया घरा सकता है और उसे अपने प्रयोजन के अनुकूल ढाला जा सकता है। हमारे जीवन में देसी कई बातें हैं, जो ऐसी शक्तियों द्वारा निर्धारित कर दी गई हैं, जिन पर हमारा कोई बस नहीं है। हम इस बात का चुनाव नहीं कर सकते कि हम कैसे या कब या कहां या जीवन की किन दशाओं में जन्म लें। पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार, इन बातों का चुनाव भी स्वयं हमारे द्वारा ही किया जाता है। हमारे पूर्वजन्म के कमों द्वारा ही हमारे पूर्वजों, हमारी आनुवंशिकता और परिवेश का निर्धारण होता है। परन्तु जब हम इस जीवन के दृष्टिकोण से देखते हैं, तो हम कह सकते हैं कि हमारी राष्ट्रिकता, , जाति, माता-पिता या सामाजिक हैसियत के सम्बन्ध में हमसे कोई परामर्श नहीं किया गया था। परन्तु इन मर्यादाओं के होते हुए भी हमें चुनाव को स्वतन्त्रता है। जीवन ताश के एक खेल की तरह है। हमने खेल का आविष्कार नहीं किया और ताश के पत्तों के नमूने ही हमने बनाए हैं। हमने इस खेल के नियम भी खुद नहीं बनाए और हम ताश के पत्तों के बंटवारे पर ही नियन्त्रण रख सकते हैं। पत्ते हमें बांट दिए जाते हैं, चाहे वे अच्छे हों या बुरे। इस सीमा तक नियतिवाद का शासन है। परन्तु हम खेल को बढ़िया ढंग से या खराब ढंग से खेल सकते हैं। हो सकता है कि एक कुशल खिलाड़ी के पास बहुत खराब पत्ते आए हों और फिर भी वह खेल में जीत जाए। यह भी सम्भव है कि एक खराब खिलाड़ी के पास अच्छे पत्ते आए हों और फिर भी वह खेल का नाश करके रख दे। हमारा जीवन परवशता और स्वतन्त्रता, दैवयोग और चुनाव का मिश्रण है। अपने चुनाव का समुचित रूप से प्रयोग करते हुए हम धीरे-धीरे सब तत्वों पर नियन्त्रण कर सकते हैं और प्रकृति के नियतिवाद को बिलकुल समाप्त कर सकते हैं। जहां भौतिक तत्व की गतियां, वनस्पतियों की वृद्धि और पशुओं के कार्य कहीं अधिक पूर्णतया नियन्त्रित रहते हैं, वहां दूसरी ओर मनुष्य में समझ है, जो उसे संसार के कार्य में विवेकपूर्वक सहयोग करने में समर्थ बनाती है। वह किन्हीं भी कार्यों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है; उनके लिए अपनी सहमति दे सकता है या सहमत होने से इनकार कर सकता है। यदि वह अपने बुद्धिमत्तापूर्ण संकल्प का प्रयोग नहीं करता, तो वह अपनी मनुष्यता के प्रतिकूल आचरण कर रहा है। यदि वह अपने मनोवेगों और वासनाओं के अनुसार अन्धा होकर कार्य करता जाता है, तो वह मनुष्य की अपेक्षा पशु की भांति अधिक आचरण कर रहा होता है। मनुष्य होने के कारण वह अपने कार्यों को उचित सिद्ध करता है।

 

हमारे कुछ कार्य केवल देखने में ही हमारे होते हैं। उनमें स्वतःप्रवृत्ति की भावना केवल दिखावटी होती है। कई बार हम उन प्रेरणाओं के अनुसार कार्य करते होते हैं, जो सम्मोहन की दशा में हमें दी जाती हैं। भले ही हम यह समझें कि हम उन कार्यों को सोच-समझकर, अनुभव करते हुए और अपनी इच्छा से कर रहे हैं, परन्तु सम्भव है, हम उस दशा में भी उन प्रेरणाओं को ही अभिव्यक्त कर रहे हों, जो हमें सम्मोहन की दशा में दी गई थीं। जो बात सम्मोहन की स्थिति के विषय में सत्य है, वही हमारे उन अनेक कार्यों के विषय में भी सत्य है, जो देखने में भले ही स्वतःप्रवृत्त जान पड़ते हों, परन्तु वस्तुतः वैसे नहीं होते। हम बिलकुल नई सम्मतियों को दुहरा देते हैं और यह समझते हैं कि वे हमारे अपने चिन्तन का परिणाम हैं। स्वतःप्रवृत्त कर्म कोई ऐसी बाध्यतामूलक गतिविधि नहीं है, जिसकी ओर व्यक्ति को उसके अपने एकाकीपन या असहायता द्वारा धकेल दिया गया हो। यह तो सम्पूर्ण आत्म का स्वतन्त्र कर्म है। व्यक्ति को स्वतःप्रवृत्त या सृजनात्मक गतिविधि को सम्भव बनाने के लिए अपने प्रति पारदर्शक बन जाना चाहिए और उसके अन्दर विद्यमान विभिन्न तत्वों का एक आधारभूत समेकन हो जाना चाहिए। यह व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह अपने रजस् और तमस् पर अपनी सत्त्व प्रकृति द्वारा, जो वस्तुओं को सच्चाई और कर्म के उचित विधान की खोज में रहती है, नियन्त्रण करे। जब हम अपनी सत्त्वप्रकृति के प्रभाव में रहकर कर्म कर रहे होते हैं, तब भी हम पूर्णतया स्वतन्त्र नहीं होते। सत्त्व-गुण भी हमें उतना ही बांधता है, जितना कि रजस् और तमस्। केवल इतना अन्तर है कि तब हमारी सत्य और पुण्य की कामनाएं अपेक्षाकृत उच्चतर होती हैं। 'अहं' की भावना तब भी कार्य कर रही होती है। हमें अपने 'अहं' से ऊपर उठना होगा और बढ़ते हुए उस सर्वोच्च आत्मा तक पहुंचना होगा, जिसकी कि अहं भी एक अभिव्यक्ति है। जब हम अपनी व्यक्तिगत सत्ता को भगवान् के साथ एक कर देते हैं, तब हम लिगुणात्मक प्रकृति से ऊपर उठ जाते हैं। हम निगुणातीत 100 [99]हो जाते हैं और संसार के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।

 

 

8. योगशास्त्र

 

भारतीय दार्शनिक विचार की प्रत्येक प्रणाली हमारे सम्मुख सर्वोच्च आदर्श तक पहुँचने की एक व्यावहारिक पद्धति प्रस्तुत करती है। भले ही हम प्रारम्भ विचार से करते हैं परन्तु हमारा उद्देश्य विचार से परे निश्चायक अनुभव तक पहुंचना होता है। दार्शनिक प्रणालियों केवल आधिविद्यक सिद्धान्त ही नहीं बतलाती, अपितु है। मालिक गति-विज्ञान भी सिखाती हैं। यह कहा जा सकता है कि यदि मनुष्य बाहा का ही एक अंश है, तो उसे उद्धार की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी कि अपनी वास्तविक प्रकृति को पहचानने की। यदि उसे यह अनुभव होता है कि वह कापी है, जो परमात्मा से बिछुड़ गया है, तो उसे कोई ऐसी विधि बताई जाने की आवश्यकता है, जिसके द्वारा उसे यह बात याद जाए कि वह वस्तुतः परमात्मा का एक अंश है और इसके प्रतिकूल होने वाली कोई भी अनुभूति केवल भ्रान्ति है। यह ज्ञान बौद्धिक नहीं है, अपितु मनुष्य का अवयवभूत है। इसलिए मनुष्य की सम्पूर्ण प्रकृति का सुधार करने की आवश्यकता है। भगवद्गीता हमारे सम्मुख केवल एक अधिविद्या (ब्रह्मविद्या) ही प्रस्तुत नहीं करती, अपितु एक प्रकार का अनुशासन (योगशास्त्र) भी प्रस्तुत करती है। योग शब्द 'युज्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है बांधना या जोड़ना। योग का अर्थ है - अपनी आत्मिक शक्तियों को एक जगह बांधना, उन्हें सन्तुलित करना और उन्हें बढ़ाना '[100] अपने व्यक्तित्व के तीव्रतम केन्द्रीकरण द्वारा अपनी ऊर्जाओं को इकट्ठा जोड़कर और सन्नद्ध करके हम संकीर्ण 'अहं' से अनुभवातीत व्यक्तित्व तक पहुंचने का मार्ग बनाते हैं। आत्मा अपने-आप को अपने कारागार से बाहर खींच लाती है। कारागार से निकलकर वह बाहर खड़ी होती है और अपने आन्तरिकतम अस्तित्व तक पहुंच जाती है।

 

गीता हमारे सम्मुख एक सर्वांग-सम्पूर्ण योगशास्त्र प्रस्तुत करती है, जो विशाल, लचकीला और अनेक पहलुओं वाला है; जिसमें आत्मा के विकास और ब्रह्म तक पहुंचने के विविध दौर सम्मिलित हैं। विभिन्न प्रकार के योग उस आन्तरिक अनुशासन के विशिष्ट प्रयोग हैं, जो आत्मा की स्वतन्त्रता और एकता  के एक नये ज्ञान और मनुष्य-जाति के एक नये अर्थ तक ले जाता है। इस अनुशासन से सम्बद्ध प्रत्येक वस्तु योग कहलाती है, जैसे ज्ञानयोग अर्थात् ज्ञान का मार्ग; भक्तियोग अर्थात् भक्ति का मार्ग, या कर्मयोग अर्थात् कर्म का मार्ग

 

मानवीय स्तर पर पूर्णता प्राप्त करना एक ऐसा कार्य है, जो सचेत प्रयत्न द्वारा पूरा किया जाना है। हमारे अन्दर कार्य कर रही परमात्मा की मूर्ति हममें एक अपर्याप्तता की भावना उत्पन्न करती है। मनुष्य को एक यह भावना सताने लगती है कि सारी मानवीय प्रसन्नता दिखावटी, क्षणिक और अनिश्चित है। जो लोग केवल जीवन की ऊपरी सतह पर ही जीते हैं, हो सकता है. उन्हें यह बेचैनी, यह आत्मा की तड़प अनुभव होती हो और उनमें यह खोजने की इच्छा जागती हो कि उनका सच्चा हित किस बात में है। वे मानवीय पशु (पुरुषपशु) हैं; और पशुओं की भांति वे पैदा होते हैं, बड़े होते हैं, मैथुन करते हैं और अपनी सन्तान छोड़ जाते हैं और खुद मर जाते हैं। परन्तु जो लोग मनुष्य के रूप में अपने गौरव को अनुभव करते हैं, वे इस बेसुरेपन को तीव्रता से अनुभव करते हैं और समस्वरता और शान्ति के सिद्धान्त की खोज करते हैं।

 

अर्जुन उस प्रकार की मानवीय आत्मा का प्रतिनिधि है, जो पूर्णता और शान्ति तक पहुंचने की खोज कर रही है। परन्तु प्रारम्भिक अनुभाग में हम देखते हैं कि उसका मन आच्छन्न है; उसके विश्वास अनिश्चित हैं और उसकी सम्पूर्ण चेतना परिभ्रान्तिग्रस्त है। जीवन की दुश्चिन्ताएं तीव्र चुभन के साथ उसे स्पर्श करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी--कभी ऐसा समय आता है, (क्योंकि प्रकृति को किसी बात को जल्दी नहीं है) जबकि वह जो कुछ भी अपने लिए कर सकता है, वह सब विफल रहता है; जब वह घोर अन्धकार के गर्त में डूबता जाता है; एक ऐसा समय, जबकि वह प्रकाश की झलक के लिए, ब्रह्म के एक संकेत के लिए अपना सर्वस्व दे देने को तैयार हो जाए। जब वह सन्देहों, निषेधों, जीवन के विद्वेष और घनी निराशा द्वारा आक्रान्त होता है, तब वह उनसे केवल तभी मुक्ति पा सकता है, जब परमात्मा उस पर अपना हाथ रख दे। यदि उस दिव्य सत्य तक, जहां पहुंचने की सारी मानव-जाति को छूट है, केवल थोड़े-से ही लोग पहुंच पाते हैं, तो इससे यह प्रकट होता है कि केवल थोड़े-से लोग ही उसकी क़ीमत देने के लिए तैयार हैं। अपर्याप्तता, वन्ध्यता और श्रुद्रता की भावना उस पूर्णता की क्रिया के कारण है, उस रहस्य के कारण, जो एक इस प्रकार की व्यथा उत्पन्न करती है, जो वीरतापूर्ण आदर्शवाद और वाद परिपूर्णता को जगाती है। हमारे अन्दर विद्यमान परमात्मा की मूर्ति अपने-आप को आत्म-अनुभवातीतता की'[101] असीम क्षमता के रूप में प्रकट करती है।

 

9. ज्ञान और रक्षा करने वाला ज्ञान

 

पूर्णता का लक्ष्य किस प्रकार प्राप्त किया जाए? संसार एक ऐतिहासिक अस्तित्व मानता है। यह एक दशा से अगली दशा की ओर होने वाले परिवर्तनों की अस्थायी परम्परा है। जो चीज़ सारे संसार को चला रही है, वह कर्म ही है। यदि संसार ज्वार और भाटे के सिवाय निरन्तर अस्तित्वमानता के सिवाय और कुछ नहीं है, तो यह कर्म के कारण ही है। मानवीय स्तर पर कर्म इच्छा या राग अर्थात् काम के कारण किया जाता है। इच्छा का मूल कारण अविद्या या वस्तुओं की प्रकृति के विषय में अज्ञान है। इच्छा का मूल व्यक्ति की आत्मनिर्भरता के अज्ञानपूर्ण विश्वास में और व्यक्ति पर वास्तविकता और स्थायित्व की उपाधि थोप देने में निहित है। जब तक अज्ञान बना हुआ है, तब तक अस्तित्वमानता (नाम-रूप) के दुश्चक्र से बच पाना सम्भव नहीं। हम इच्छाओं का इलाज और नई इच्छाओं द्वारा नहीं कर सकते। हम कर्म का इलाज और अधिक कर्म द्वारा नहीं कर सकते। शाश्वत को ऐसी वस्तु द्वारा, जो क्षणस्थायी है,[102] प्राप्त नहीं किया जा सकता। चाहे हम अच्छी इच्छाओं के बन्धन में बंधे हों या बुरी इच्छाओं के बन्धन में, बन्धन तो दोनों ही हैं। इससे क्या अन्तर पड़ता है कि जिन जंजीरों में हम बंधे हैं, वे सोने की हैं या लोहे की ? बन्धन से छुटकारा पाने के लिए हमें अज्ञान से छुटकारा पाना होगा। यह अज्ञान ही अज्ञानपूर्ण इच्छाओं और इस प्रकार अज्ञानपूर्ण कर्मों का जनक है। विद्या या ज्ञान का अर्थ है- अविद्या, काम, कर्म की श्रृंखलाओं से मुक्ति।।

 

ज्ञान का घपला सैद्धान्तिक अध्ययन या सही विश्वासों से नहीं कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि अज्ञान कोई बौद्धिक भूल नहीं है। अज्ञान तो आध्यात्मिक अन्धता है। इसे हटाने के लिए हमें आत्मा की मलिनता को स्वच्छ करना होगा और आध्यात्मिक दृष्टि को जगाना होगा। वासना की आग और लालसाओं के कोलाहल का दमन करना होगा।'[103] अस्थिर और चंचल चित्त को इस प्रकार स्थिर करना होगा कि जिससे उसमें ऊपर से आने वाला ज्ञान प्रतिबिम्बित हो सके। हमें इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखना होगा; एक ऐसी श्रद्धा प्राप्त करनी होगी, जो बौद्धिक सन्देहों से विचलित हो सके; और बुद्धि को प्रशिक्षित करना होगा।[104]

 

ज्ञान एक प्रत्यक्ष अनुभव है, जो उसकी प्राप्ति के मार्ग में विद्यमान बाधाओं के हटते ही स्वयं प्राप्त हो जाता है। जिज्ञासु का प्रयत्न यह होना चाहिए कि उन बाधाओं को हटा दिया जाए; अविद्या की आवरण डालने वाली प्रवृत्तियों को दूर कर दिया जाए। अद्वैत वेदान्त के अनुसार, यह ज्ञान सदा विद्यमान रहता है। यह कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसे कहीं से प्राप्त किया जाना हो। इसे तो केवल प्रकट- भर किया जाना है। हमारे अनियत ज्ञान, जो हमारी इच्छाओं और संस्कारों द्वारा समर्थित होते हैं, वास्तविकता को प्रकट नहीं करते। मन और संकल्प की पूर्ण निःशब्दता, अहंकार का रिक्तीकरण उस प्रकाश, ज्ञान या आलोक को उत्पन्न करता है, जिसके द्वारा हम बढ़ते-बढ़ते अपने सच्चे अस्तित्व तक पहुंच जाते हैं।[105] यह शाश्वत जीवन है, हमारी प्रेम और ज्ञान की क्षमताओं का सम्पूर्ण परिपूरण; बोइधियस के शब्दों में, "एक ही क्षण में, असीम जीवन की बिलकुल एक-साथ और पूर्ण प्राप्ति "

ज्ञान और अज्ञान प्रकाश और अन्धकार की भांति एक-दूसरे के विरोधी है। जब ज्ञान का उदय होता है, तब अज्ञान मर जाता है और बुराई की जड़ ही कट जाती है। मुक्त आत्मा संसार को जीत लेती है। कोई ऐसी वस्तु नहीं बचती, जिसे जीतना शेष हो या सृजन करना शेष हो। तब कर्म-बन्धन नहीं रहता जब हम इस ज्ञान तक पहुंच जाते हैं, तब हम भगवान् में जीने लगते हैं।[106] यह चेतना कोई अव्यक्त चेतना नहीं है। यह वह है, "जिसके द्वारा तू निरपवाद रूप से सब अस्तित्वों को आत्मा के अन्दर और उसके बाद मुझमें देखेगा।" सच्चा मानव-प्राणी पूर्णता के इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए वैसा ही निष्ठावान् रहता है, जैसी निष्ठा वह किसी ऐसी स्त्री के प्रति दिखाता है, जिसे वह प्रेम करता है।[107]

 

10. ज्ञानमार्ग

 

हमारे लिए पूर्णता के लक्ष्य तक पहुंचने के, रक्षक सत्य को प्राप्त करने के तीन विभिन्न मार्ग हैं। वे हैं वास्तविकता का ज्ञान या भगवान् की उपासना और भक्ति या अपने संकल्प को दिव्य प्रयोजन के अधीन कर देना (कर्म) इन तीनों में अन्तर इस आधार पर किया गया है कि इनमें अलग-अलग सैद्धान्तिक, भावनात्मक और व्यावहारिक पक्ष पर बल दिया गया है। मनुष्य विभिन्न प्रकारों के होते हैं : चिन्तनशील, भावुक या सक्रिय परन्तु वे ऐकान्तिक रूप से इनमें से किसी एक ही प्रकार के नहीं होते। अन्त में जाकर ज्ञान, भक्ति और कर्म परस्पर मिल जाते हैं। परमात्मा अपने-आप में सत्, चित् और आनन्द, अर्थात वास्तविक, सत्य और परम आनन्दमय है। जो लोग ज्ञान की खोज करते हैं, उनके लिए वह शाश्वत प्रकाश है, मध्याह्न के सूर्य की भांति उज्ज्वल और देदीप्यमान, जिसमें अन्धकार का नाम भी नहीं है; जो पुण्य पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए वह शाश्वत पवितता है, स्थिर और समदर्शी; जो लोग भावुक प्रकृति के हैं, उनके लिए वह शाश्वत प्रेम और पावनता का सौन्दर्य है। जिस प्रकार परमात्मा में ये तत्व आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार मनुष्य भी आत्मा के समय जीवन को उद्देश्य बनाकर चलता है। भले ही तार्किक दृष्टि से ज्ञान, संकल्प और अनुभूति में अन्तर किया जा सके, परन्तु वास्तविक जीवन में और मन की एकता में इन तीनों में वस्तुतः अन्तर नहीं किया जा सकता। वे आत्मा की एक ही गति के विभिन्न पहलू है।"[108]

 

पूर्णता तक पहुंचने के लिए बौद्धिक मार्ग के रूप में ज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान के रूप में ज्ञान से भिन्न वस्तु है। वास्तविक (ब्रह्म) का आत्मिक ज्ञान सेवा या भक्ति का, या इस दृष्टि से ज्ञान का कार्य नहीं है, भले ही ये कार्य उसकी ओर ले जाने में कितने ही सहायक क्यों हों। क्योंकि पूर्णता के लक्ष्य और उसकी ओर जाने वाले मार्ग, दोनों के लिए ही 'ज्ञान' शब्द का प्रयोग हुआ है, इसलिए कुछ लोग यह सोचने लगे हैं कि उस लक्ष्य तक पहुंचने की अन्य पद्धतियों की अपेक्षा बौद्धिक मार्ग अधिक उत्कृष्ट है।

 

विशुद्ध और लोकातीत ज्ञान वैज्ञानिक ज्ञान से भिन्न वस्तु है, हालांकि वह इससे एकदम पृथक् नहीं है। प्रत्येक विज्ञान अपने-अपने ढंग से एक विशिष्ट वस्तु-व्यवस्था में उस उच्चतर अपरिवर्तनीय सत्य के प्रतिबिम्ब को व्यक्त करता है, जिसका प्रत्येक वास्तविक वस्तु आवश्यक रूप से अंग है। वैज्ञानिक या विभेदात्मक ज्ञान हमें उच्चतर ज्ञान के लिए तैयार करता है। विज्ञान के आंशिक सत्य आत्मा के सम्पूर्ण सत्य से भिन्न हैं। वैज्ञानिक ज्ञान इसलिए उपयोगी स्पोंकि यह मन को कष्ट देने वाले अन्धकार को दूर करता है और यह अपने सार की अपूर्णता को भली भांति दिखा देता है और मन को एक ऐसी वस्तु के लिए तैयार करता है, जो स्वयं इससे ऊपर है। सत्य को जानने के लिए हमें आत्मा के रुपान्तरण की, आध्यात्मिक दृष्टि के विकास की आवश्यकता होती है। अपनी साधारण आंखों से अर्जुन सत्य को नहीं देख पाया, इसलिए उसे दिव्य दृष्टि प्रदान की गई।

 

अस्तित्व के उच्चतर स्तरों पर आरोहण, उच्चतर आत्मा को प्राप्त करने के लिए अपना विलोप जिज्ञासा द्वारा अथवा ज्ञान की निष्काम लालसा द्वारा किया जा सकता है। यह जिज्ञासा मनुष्य को उसकी संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठा देती है और अस्तित्व के सार्वभौम सिद्धान्तों के चिन्तन में उसे आत्मविस्मृत बना देती है। अधिकार या यश के लिए ज्ञान प्राप्त करने की साधना हमें उतनी दूर नहीं ले जाती। यह साधना सत्य को प्राप्त करने के लिए की जानी चाहिए।

 

गीता में जिस आधिविद्यक विश्वास को स्वीकृत किया गया है, वह सांख्यदर्शन ही है, जिसमें कुछ आधारभूत हेर-फेर कर दिए गए हैं। परमात्मा में गम्भीर निष्ठा और मुक्ति में विश्वास के लिए तीन वस्तुओं को मानने की आवश्यकता होती है; एक तो आत्मा, जिसको मुक्त किया जाना है; दूसरे वह बेड़ी, जो उस आत्मा को बांधे हुए है और जिससे उसे मुक्त किया जाना है; और तीसरे परमात्मा, वह सत्ता जो हमें इस बन्धन से मुक्त करती है। सांख्यदर्शन में पुरुष (आत्म) और प्रकृति (अनात्म) के बीच द्वैत को स्पष्ट किया गया है। गीता में इन दोनों को परमात्मा के अधीन बताया गया है। आत्माएं अनेक हैं और वे सदा पृथक् रहती हैं। आत्मचेतन जीवन के सब परिवर्तनों के पीछे विद्यमान स्थायी सत्ता है। यह आत्म सामान्य अर्थों में प्रयुक्त आत्मा नहीं है, अपितु वह विशुद्ध, निष्क्रिय, स्वतःप्रकाशित मूल तत्व है, जो तो संसार से निकला है, संसार पर निर्भर है और जिसका निर्धारण ही संसार द्वारा किया जाता है। यह अद्वितीय और अखण्ड है। मनुष्य आत्म नहीं है, अपितु आत्म उसमें है और मनुष्य आत्म बन सकता है। अनात्म या प्रकृति का एक और परम मूल तत्व है। जिसकी कल्पना इस रूप में की गई है कि वह पहले अविभक्त भौतिक तत्व के रूप में था, जिसमें उसके सब घटक तत्व साम्यावस्था में थे। उस दशा में यह अव्यक्त थी। सब मानसिक और भौतिक तत्वों[109] की व्याख्या प्रकृति के विकास के परिणामों के रूप में की गई है। प्रकृति में तीन गुण हैं। गुण का शब्दार्थ होता है- रस्सी के धागे। ये गुण विभिन्न अनुपातों में प्रकट होकर विभिन्न प्रकार की वास्तविक सत्ताओं को उत्पन्न करते हैं। भौतिक तत्व के प्रसंग में ये तीन गुण हल्कापन (सत्व), गति (रजस्) और भारीपन (तमस्) के रूप में कार्य करते हैं। मानसिक तत्व के रूप में वे क्रमश: अच्छाई, आवेश और मूढ़ता के रूप में कार्य करते हैं। जब आत्म यह अनुभव कर लेता है कि वह प्रकृति के साथ सब प्रकार के सम्पर्क से रहित हो गया है, तो वह मुक्त हो जाता है। गीता इस व्याख्या को इस आधारभूत परिवर्तन के साथ स्वीकार करती है कि सांख्य में बताए गए पुरुष और प्रकृति, जिनमें कि द्वैत है, परम मूल तत्व परमात्मा के ही स्वभाव है।

 

बुराई गुणों के बन्धन में फंसने के कारण उत्पन्न होती है। यह इसलिए पैदा होती है, क्योंकि प्रकृति में जिस जीवन के बीज या आत्मा को डाला जाता है, वह गुणों के बन्धन में पड़ जाता है। किसी एक या अन्य गुण की प्रबलता के अनुसार आत्मा का उत्थान या पतन होता है। जब हम आत्म को प्रकृति और उसके गुणों से पृथक् पहचान लेते हैं, तब हम मुक्त हो जाते हैं। आधिविद्यक ज्ञान' योग अर्थात् एकाग्रीकरण की पद्धति द्वारा अनुभव[110] में रूपान्तरित हो जाता है। बहुत प्राचीन काल से ही 'योग' शब्द का प्रयोग कुछ एक विशिष्ट प्रकार के अभ्यासों और अनुभवों का वर्णन करने के लिए होता रहा है, जिन्हें बाद में ज्ञान,भक्ति और कर्म के विभिन्न सम्प्रदायों की शिक्षाओं के अनुसार ढाल लिया गया। इनमें से प्रत्येक ध्यानयोग या चिन्तन की पद्धति के अभ्यास का प्रयोग करता है। योग, पतंजलि के मतानुसार, मन की गतिविधियों का दमन है।[111] मैत्री उपनिषद का कथन है: "जैसे ईंधन मिलने पर आग चूल्हे में पडी-पड़ी बुझ जाती है, उसी प्रकार जब मन की गतिविधियों का दमन कर दिया जाता है (वृतिक्षयात्), तब चित्त अपने स्थान पर पड़ा-पढ़ा ही बुझ जाता है।"[112] हम सपन्त प्रबल संकल्प के प्रयोग द्वारा ही विचारों के कोलाहल और इच्छाओं के उत्पात का दमन करने में समर्थ हो सकते हैं। योगी से कहा जाता है कि वह बिस्तर कर्म द्वारा इस संयम को प्राप्त करे [113] मनुष्य अपने अस्तित्व के केवल एक अंश को, अपनी ऊपरी सतह की मनोवृत्ति को ही जानता है। इस सतह के नीचे भी बहुत कुछ है, जिसे वह बिलकुल नहीं जानता, हालांकि उस नीचे बाली वस्तु का उसके आचरण पर अनेक रूपों में प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी हम पूर्णतया अपने मनोवेगों के, सहज वृत्ति के और अस्वैच्छिक प्रतिक्रियाओं के वशीभूत हो जाते हैं, जो सचेत विवेक के नियम को उलट देती हैं। पागल व्यक्ति जहां इन मनोवेगों के पूर्णतया अधीन होता है, वहां हममें से अनेक भी उनके प्रभाव के वशवर्ती होते हैं, हालांकि सामान्य व्यक्तियों में इस प्रकार की दशाएं अस्थायी होती हैं। प्रेम या विद्वेष की प्रबल भावना के आवेश में हम ऐसी बातें कह या कर जाते हैं, जिनके बारे में जब हम बाद में अपने आपे में आते है, तब हमें पश्चात्ताप होता है। हमारी भाषा 'वह आपे से बाहर हो गया', 'वह अपने आप को भुला बैठा', 'वह तो मानो वह ही नहीं रहा', पुरातन दृष्टिकोणों की इस सचाई का संकेत करती है कि जो मनुष्य किसी तीव्र भावना से अभिभूत रहता है, उसमें कोई शैतान या भूत घुसा होता है।[114] जब तीव्र मनोवेग जाग उठते हैं, तब हम अधिकाधिक उद्दीप्य हो जाते हैं और सब प्रकार के असंयत विचार हम पर हावी हो जाते हैं। साधारणतया अचेतन चेतन के साथ सहयोग करता है और हमें कभी इस बात का सन्देह तक नहीं होता कि अचेतन विद्यमान भी है। परन्तु अगर हम अपने मूल सहज-वृत्तिजन्य नमूने के मार्ग से हट जाते है तब हमें अचेतन की पूरी शक्ति का अनुभव होता है। जब तक व्यक्ति पूरी तरह आत्मसजग हो जाए, तब तक वह अपने जीवन का स्वामी नहीं कर सकता। इसके अलावा, शरीर, प्राण और मन का समेकन किया जाना चाहिए। वस्तुतः आत्मचेतन प्राणी के रूप में मनुष्य को अपने अन्दर विद्यमान गम्भीरतार विरोधों का ज्ञान है। वह सामान्यतया कामचलाऊ से समझौते कर लेता है और अनिश्चित जीवन बिताता है। परन्तु जब तक उसकी बहुपक्षीय सम्भावनाओं में एक पूर्ण समस्वरता, एक सांग सन्तुलन हो जाए, तब तक वह पूरी तरह अपना स्वामी नहीं है। जब तक वह लालसाओं का वशवर्ती है, जैसे कि अर्जुन था, तब तक समेकन की प्रक्रिया कभी पूरी नहीं हो सकती। एक बढते हए व्यक्तित्व के लिए अविराम देख-रेख और संभाल की आवश्यकता है। संकल्प की शुद्धता के विकास द्वारा सांसारिक वस्तुओं के प्रति वासनाएं मर जाती हैं और मन में एक ऐसी शान्ति उत्पन्न हो जाती है, जिससे एक आन्तरिक निःशब्दता पैदा होती है, जिसमें आत्मा उस सनातन के साथ अपना सम्पर्क स्थापित करने लगती है, जिससे वह पृथक् हो गई है और अन्तर्वासी परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव करने लगती है। इस निःशब्दता में, जो पार्थिव संघर्षों के बाद आत्मा का विश्राम है, अन्तर्दृष्टि उत्पन्न होती है और मनुष्य वह बन जाता है, जो कि वह वस्तुतः है।

 

हमारी चेतना जब शरीर के साथ जुड़ जाती है, तब वह इन्द्रियों द्वारा बाह्य संसार के नियन्त्रण के कार्य को पूरा करने के लिए बहिर्मुखी हो जाती है; अपनी बहिर्मुखी क्रियाओं में यह इन्द्रिय-ग्राह्य वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए धारणाओं का उपयोग करती है; अन्तर्मुखी होने पर यह साधारणतया आत्म का अनुमान-सिद्ध ज्ञान उन कार्यों द्वारा प्राप्त करती है, जो इस अर्थ में तुरन्त जान लिए जाते हैं कि जानी गई वस्तुएं स्वयं ज्ञान के सिवाय किसी अन्य माध्यम द्वारा नहीं जानी जातीं। इस सबसे हमें यह पता नहीं चलता कि आत्म अपने मूल स्वरूप में क्या है। हम यह तो जान जाते हैं कि आत्म किस तत्व का बना है, परन्तु स्वयं आत्म को नहीं जान पाते। आत्म का अस्तित्वात्मक अनुभव प्राप्त करने के लिए हमें वस्तुओं की उस बाह्य और आन्तरिक विविधता से मुक्त होना होगा, जो आत्म के सार के प्रत्यक्ष या अन्तःस्फुरणात्मक दर्शन में बाधक है और उसे रोकती है। साधारणतया बाह्य और आन्तरिक प्रातिभासिक जगत् ही रंगमंच को घेरे रहता है और आत्म अपने सार के रूप में पहचाना नहीं जाता। हम अपने-आप को मनोवैज्ञानिक रूप से जितना अस्पष्ट करते जाते हेप। अर्थात अन्तर्निरीक्षण या मनन द्वारा अपने-आप को अस्पष्ट करते जाते हैं, रत्तर उतना ही अधिक हम आत्म की प्रातिभासिक अभिव्यक्तियों के सम्पर्क में आते और जाते हैं। यदि हमें अपने अन्दर विद्यमान सर्वोच्च आत्म को देखना हो, तो हमें एक भित्र प्रकार की साधना अपनानी चाहिए। हमें दृश्यमान वस्तुओं को हमें और हटा देना चाहिए: हमें अपनी प्रकृति के रुझान के विरुद्ध चलना चाहिक अपने-आप को नस-रूप में देखना चाहिए: प्रतीयमान अहंकार से बचना चाहिए, और विशुद्ध कर्तात्मकता, परम आत्म के गम्भीर गर्त तक पहुंचना चाहिए।

 

भगवद्गीता में हमें बताया गया है कि किस प्रकार साधक उपभोग और संयम की शारीरिक अतियों से दूर रहता है; वह किसी ऐसे स्थान पर जाता है, जहां बाहर की वस्तुओं के कारण ध्यान बंटे। वह कोई सुविधाजनक आसन लगाकर बैठता है; अपने श्वास को नियमित करता है; अपने मन को किसी एक हिन्दु पर एकाय करता है और इस प्रकार समस्वरतायुक्त (युक्त) बन जाता है और कर्म के फल की सब इच्छाओं से अनासक्त हो जाता है। जब वह इस एकता को प्राप्त कर लेता है, तब वह अपने सब साथी-प्राणियों के साथ एक पूर्ण सहृदयता अनुभव करने लगता है। इसलिए नहीं कि ऐसा करना उसका कर्त्तव्य है अपितु इसलिए कि उसे उन सबके प्रति सहानुभूति और प्रेम का अनुभव होने तगता है। हमारे सम्मुख गौतम बुद्ध का उदाहरण है, जो सबसे महान् ज्ञानी या ऋषि था और जिसके मानवता के प्रति प्रेम ने उसे चालीस वर्ष तक मानव जाति की सेवा में लगाए रखा। सत्य को जानने का अर्थ है- अपने हृदय को भगवान् तक ऊपर उठाना और उसकी स्तुति करना। ज्ञानी ही भक्त भी होता है और भक्तों में सर्वश्रेष्ठ होता है।'[115]

 

योग का विधिवत् अभ्यास करने का परिणाम गौण रूप से यह भी होता है कि साधक को अलौकिक शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं; परन्तु इन शक्तियों को प्राप्त करने के लिए योगाभ्यास करना व्यर्थ और बेकार है। बहुधा इसका परिणाम आादुरोग और विफलता होता है। आध्यात्मिक जीवन के साधक को यह चेतावनी दी जाती है कि वह अलौकिक शक्तियों के आकर्षण में फंसे। इन शक्तियों से हमारी सांसारिक उन्नति भले हो जाए, परन्तु वे साधुता की ओर नहीं ले जाती आध्यात्मिक दृष्टि से ये निरर्थक और असंगत हैं। गुप्त विद्याओं को जानने बाले व्यक्ति में, जो भौतिक क्षेल से ऊपर की वस्तुओं को देखने में समर्थ हो जाता है, कुछ ऐसी क्षमताएं विकसित हो जाती हैं, जिनके कारण वह सामान्य मानव-प्राणियों से ऊपर उठ जाता है; ठीक उसी प्रकार, जैसे आधुनिक तकनीक विज्ञान के जानने वाले लोग पुराने ज़माने के किसानों की अपेक्षा अधिक साधन- सम्पन्न होते हैं। परन्तु उसकी यह प्रगति बाह्य दिशा में होती है और आत्मा को अन्तर्मुख करने की ओर नहीं होती। योग का अभ्यास सत्य को प्राप्त करने के लिए, वास्तविकता (ब्रह्म) से सम्पर्क स्थापित करने के लिए किया जाना चाहिए। कृष्ण योग का स्वामी (योगेश्वर)[116]' है, जो हमें अपने जीवन में अपनी रक्षा करने में सहायता देता है। वह आध्यात्मिक अनुभव का भी सर्वोच्च स्वामी है, जो दिव्य गौरव के उन क्षणों को हम तक लाता है, जिनमें कि मनुष्य शारीरिक आवरण के परे पहुंच जाता है और दैनिक अस्तित्व की समस्याओं के साथ उन दिव्य गौरव के क्षणों के सच्चे सम्बन्ध का भी संकेत करता है।

 

11. भक्तिमार्ग

 

भक्ति व्यक्तिक परमात्मा के साथ विश्वास और प्रेम का सम्बन्ध है। अव्यक्त की पूजा (अव्यक्तोपासना) साधारण मानव-प्राणियों के लिए कठिन है, हालांकि ऐसे महान् अद्वैतियों के अनेक उदाहरण विद्यमान हैं, जिन्होंने अव्यक्तिक वास्तविकता (निराकार ब्रह्म) को बहुत सजीव भावुक रूप दिया।[117] व्यक्तिक परमात्मा की पूजा दुर्बल और निम्न, अशिक्षित और अज्ञानी[118]' सब लोगों के लिए एक सरलतर उपाय के रूप में प्रस्तुत की गई है। प्रेम की बलि उतनी कठिन नहीं है, जितना कि अपनी इच्छाशक्ति को भगवान् के प्रयोजन की ओर या अवस्थामय अनुशासन की ओर या चिन्तन के धका देने वाले प्रयत्न की ओर मोह पाना।

 

भक्ति-मार्ग का मूल अत्यन्त पुरातन काल की धुंध में छिपा हुआ है। आवेद की स्तुतियों और प्रार्थनाओं, उपनिषदों की उपासनाओं और भागवत धर्म की तीव्र धर्मनिष्ठा का प्रभाव गीता के लेखक पर पड़ा है। उसने उपनिषदों के धार्मिक पक्ष से सम्बन्ध रखने वाली उस विचारधारा को विकसित करने का प्रयत्न किया है, जिसे उपनिषदकार उन्मुक्त और सुस्पष्ट रूप में व्यक्त नहीं कर पाए थे। भगवान् ऐसा परमात्मा नहीं है, जो कि उस समय भी शान्तिपूर्ण अव्यक्तता में शयन करता रहता हो, जबकि आर्त हृदय सहायता के लिए पुकार रहे हों, अपितु एक प्रेमपूर्ण रक्षक परमात्मा है, जिस पर भक्त लोग इसी रूप में विश्वास करते है और अनुभव करते हैं। वह उन लोगों को मुक्ति प्रदान करता है, जो उसमें विश्वास करते हैं। वह घोषणा करता है, "यह मेरा वचन है कि जो मुझसे प्रेम करता है, वह कभी नष्ट नहीं होगा।"[119]

 

भक्ति शब्द 'भज्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है-सेवा करना; और भक्ति शब्द का अर्थ है - भगवान् की सेवा। यह परमात्मा के प्रति प्रेमपूर्ण अनुराग है। नारद ने भक्ति की परिभाषा देते हुए इसे परमात्मा के प्रति उत्कट प्रेम बताया है।[120]' शाण्डिल्य के मत से यह परमात्मा सर्वोच्च अभिलाषा है[121], जो केवल इस अभिलाषा के लिए ही है (अर्थात् इस अभिलाषा का और कोई प्रयोजन नहीं है) '[122] यह भगवान् की करुणा के विश्वासपूर्ण आत्मसाक्षात्करण के प्रति आत्मसमर्पण है। यह योगसूत्र का ईश्वरप्रणिधान है, जो भोज के मतानुसार, “एक ऐसा प्रेम है, जिसमें इन्द्रियों के आनन्द इत्यादि परिणामों की अपेक्षा किए बिना सब कार्य गुरुओं के गुरु को समर्पित कर दिए जाते हैं।"[123] यह एक प्रचुर अनुभव है, जो सब लालसाओं को समाप्त कर देता है और हृदय को परमात्मा के प्रेम से भर देता है।[124] भक्ति-मार्ग के समर्थकों की लोकोत्तर मुक्ति में उतनी रुचि नहीं है, जितनी परमात्मा की अटल इच्छा के प्रति पूर्ण वशवर्तिता में। मानवीय आत्मा परमात्मा की शक्ति, ज्ञान और अच्छाई के चिन्तन द्वारा भक्तिपूर्ण हृदय से उसके निरन्तर स्मरण द्वारा, दूसरे लोगों के साथ उसके गुणों के सम्बन्ध में चर्चा करने के द्वारा, अपने साथियों के साथ मिलकर उसके गुणों का गान करने के द्वारा और सब कार्यों को उसकी सेवा समझकर करने के द्वारा भगवान् के निकट पहुंच जाती है।[125] भक्त अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को भगवान् की ओर प्रेरित करता है। है। यदि अन्तर्यामितावाद के दर्शन की इस प्रकार व्याख्या की जाए कि वह मनुष्य प्रेम धर्म का सार है। यह उपासक और उपास्य के मध्य द्वैत को अंगीकार करता की अपने प्राणित्व की भावना या भगवान् की लोकातीतता की भावना को नष्ट कर दें, तो उसमें भक्ति और पूजा के लिए कोई स्थान होगा। प्राणी और स्रष्टा के भान्य भेद भक्ति-धर्म का सत्त्वात्मक आधार है। भगवद्गीता में सनातन माण के को दार्शनिक अनुमान के परमात्मा के रूप में उतना नहीं देखा गया, जितना कि उस करुणामय भगवान के रूप में, जिसे हृदय और आत्मा चाहते हैं और खोजते है जो व्यक्तिक विश्वास और प्रेम, श्रद्धा और निष्ठापूर्ण आत्मसमर्पण की भावाते को जगाता है। "ज्ञान का उदय होने से पहले द्वैतता भ्रामक है; पर जब हमारी बुद्धि ज्ञान से आलोकित हो जाती है, तब हम अनुभव करते हैं कि द्वैत तो अद्वैत हे भी अधिक सुन्दर है और द्वैत की कल्पना ही इसलिए की गई है कि पूजा की जा सके।[126]" फिर, "सत्य अद्वैत है; परन्तु द्वैत पूजा के लिए है। और इस प्रकार यह पूजा मुक्ति की अपेक्षा सौगुनी महान् है।"[127]

 

गीता में भक्ति बौद्धिक प्रेम नहीं है, जो कि अपेक्षाकृत अधिक चिन्तनात्मक और मननात्मक होता है। यह ज्ञान के आधार पर टिकी है, परन्तु स्वयं ज्ञान नहीं है। इसमें योग-पद्धति का कोई निर्देश निहित नहीं है और भगवान् का आनुमानिक ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा ही निहित है। शाण्डिल्य ने तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा है कि यह भक्ति हमें ज्ञान के बिना भी आत्मिक शान्ति प्रदान करती है, जैसे गोपियों को प्राप्त हुई थी।[128]' भक्त में एक अतिशय विनय की भावना होती है। अपने आदर्श भगवान् की उपस्थिति में वह अपने-आपको कुछ भी नहीं समझता। परमात्मा विनम्रता से, जो कि आत्मा का पूर्ण आत्मसमर्पण है, प्रेम करता है।[129]

 

साधारणतया भक्ति के साथ जुड़े हुए विशेष गुण, प्रेम और उपासना, दया और कोमलता पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक पाए जाते हैं। क्योंकि भक्ति में विनय, आज्ञापालन, सेवा-परायणता, करुणा और सदय प्रेम पर जोर दिया गया है और क्योंकि भक्त अपने-आप को समर्पित करना, आत्मसंकल्प को त्याग देना और निष्क्रियता अनुभव करना चाहता है, इसलिए यह कहा जाता है कि भक्ति अपेक्षाकृत स्त्री-स्वभाव की वस्तु अधिक है। स्त्रियां आशा करती है, कष्ट सहती हैं, चाहती हैं और प्राप्त करती हैं। वे करुणा, दया और शान्ति के लिए लालायित रहती हैं। स्त्रीत्व सब प्राणियों में है। भागवत में यह बताया गया है कि कन्याओं ने सर्वोच्च देवी कात्यायनी से प्रार्थना की कि वे उन्हें पति के रूप में कृष्ण को प्रदान करें।[130] जब स्त्रियां अपने अधिकतम सच्चे रूप में सामने आती हैं, तब वे सब-कुछ दे डालती हैं और बदले में कुछ भी नहीं मांगतीं। वे प्रेम करना और प्रेम पाना चाहती हैं। राधा प्रेममय आत्मा की प्रतीक है। भगवान् के साथ सम्बन्ध में भक्त लोग स्त्रियों की भांति अधिक होते हैं। "सर्वोच्च भगवान् ही एकमात्र पुरुष है; ब्रह्मा से लेकर नीचे तक सब प्राणी स्त्रियों की भांति हैं (जो उसके साथ मिलने के लिए लालायित है) "[131]

 

जब आत्मा अपने-आप को परमात्मा के सम्मुख समर्पित कर देती है, तब परमात्मा हमारे ज्ञान हमारी लुटियों को अपना लेता है और वह अपर्याप्तता के सब रूपों को परे फेंक देता है और सब वस्तुओं को अपने असीम प्रकाश और सार्वभौम अच्छाई की विशुद्धता में रूपान्तरित कर देता है। भक्ति केवल 'एकाकी की एकाकी की ओर उड़ान', आत्मा का संसार से विराग और परमात्मा से अनुराग मी है अपितु उस दिव्य भगवान् के प्रति सक्रिय प्रेम है, जो इस संसार का उद्धार करने के लिए इस संसार में प्रवेश करता है।

यह दृष्टिकोण, कि हम स्वयं अपने प्रयलों द्वारा भगवान् की दया प्राप्त करने में समर्थ नहीं हो सकते, एक तीव्र भावनामय धार्मिकता को जन्म देता है। जहां भक्ति में श्रद्धा और प्रेम की आवश्यकता होती है, वहां प्रपत्ति में हम केवल अपने-आप को परमात्मा के प्रति समर्पित कर देते हैं; हम अपने-आप को उसके हाथों में सौंप देते हैं और यह निर्णय स्वयं उसके लिए छोड़ देते हैं कि यह हमारे लिए जो ठीक समझे, हमारे साथ करे। इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि एक विश्वास की विनीत और प्रत्यक्ष भावना के साथ आत्मसमर्पण का सरल और तपस्यापूर्ण विशुद्ध सम्बन्ध स्थापित किया जाए। इसमें भक्ति के अनुशासन की तीव्रता की अपेक्षा आत्मसमर्पण की पूर्णता में वास्तविक धर्मनिष्ठा मानी गई है। हम स्वयं को अपने आत्म से रिक्त कर देते हैं और तब परमात्मा हम पर अधिकार कर लेता है। इस परमात्मा द्वारा अधिकार किए जाने के रास्ते में बाधाएं हमारे अपने गुण, अभिमान, ज्ञान, हमारी सूक्ष्म मांगें और हमारी अचेतन मान्यताएं और संस्कार हैं। हमें अपने-आप को सब इच्छाओं से रिक्त करना होगा और परम सत्ता में विश्वास रखते हुए प्रतीक्षा करनी होगी। परमात्मा की व्यवस्था में ठीक जमने के लिए हमें अपने सब दावों को त्याग देना होगा।[132]' भक्ति और प्रपत्ति के मध्य का अन्तर वानर-पद्धति (मर्कटकिशोर न्याय) और बिडाल-पद्धति (मार्जारकिशोर न्याय) के प्रतीकों द्वारा स्पष्ट किया गया है। बन्दर का बच्चा अपनी मां से चिपट जाता है और इस प्रकार बचा रहता है। इसमें बच्चे की ओर से भी थोड़े-से प्रयत्न की आवश्यकता होती है। बिल्ली अपने बच्चे को मुंह में उठाकर ले जाती है; बच्चा अपनी सुरक्षा के लिए कुछ भी प्रयत्न नहीं करता। भक्ति में परमात्मा की दया किसी सीमा तक यल द्वारा प्राप्त की जाती है, प्रपत्ति में यह मुक्त रूप से प्रदान की जाती है। प्रपत्ति में इस बात का कोई विचार नहीं रहता कि व्यक्ति दया पाने का पाल है या नहीं, या उसने कितनी सेवा की है।[133]' इस दृष्टिकोण का समर्थन प्राचीनतर परम्परा में प्राप्त होता है, "जब यह परमात्मा स्वयं चुनता है, तभी यह उसके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और उसी को वह अपना रूप दिखाता है। "[134] अर्जुन को बताया जाता है कि उसके सम्मुख दिव्य रूप भगवान् की दया से ही प्रकट हुआ था। फिर, यह कहा गया है कि "मुझसे ही स्मृति और ज्ञान उत्पन्न होते हैं और उनका क्षय भी मुझसे ही होता है।"[135] शंकराचार्य ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि केवल भगवान् ही हमें रक्षा करने वाला ज्ञान प्रदान कर सकता है।'[136] प्रपत्ति और भक्ति का अन्तर ईसाई विचारधारा के उस विवाद से मेल खाता है, जो सेण्ट ऑगस्टाइन और पैलेगियस के प्राचीन काल से चला रहा है और वह इस बात को लेकर है कि पतित प्राणी के रूप में मनुष्य का उद्धार केवल भगवान् की दया से हो सकता है या मनुष्य स्वयं भी कुछ कर सकता है और अपनी मुक्ति के प्रयत्न में कुछ योग दे सकता है।[137]

 

पैलेगियस स्वतन्त्र संकल्प में विश्वास रखता था। उसने मूल (आदि) पाप के सिद्धान्त का खण्डन किया और यह कहा कि मनुष्य अपने नैतिक प्रयत्न के अनुसार कार्य करते हैं। ऑगस्टाइन ने पैलेगियस के सिद्धान्त का विरोध किया और यह मत प्रस्तुत किया कि पतन से पहले आदम में स्वतन्त्र इच्छाशक्ति और हौवा ने सेब को खा जीरा हो गया और वह उनके सब वंशजों में चला रहा है। हममें से कोई भी इसकी शक्ति के द्वारा पाप से बचा नहीं रह सकता। केवल परमात्मा की दया ही पुण्यात्मा बनने में हमारी सहायता कर सकती है। क्योंकि आदम के रूप में हम सबने पाप किया था, इसलिए आदम के रूप में हम सब दोषी ठहराए गए है। फिर भी हममें से कुछ लोग परमात्मा की मुक्त दया के कारण स्वर्ग के लिए चुने जाते हैं; इसलिए नहीं कि हम उसके पान हैं या हम अच्छे हैं, अपितु इसलिए कि परमात्मा की दया हमें प्रदान की गई है। हममें से कुछ लोगों का उद्धार क्यों हो जाता है, जब कि अन्य लोगों को नरकवास करना पड़ता है, इसके लिए परमात्मा की निष्प्रयोजन रुचि के सिवाय और कोई कारण नहीं बताया जा सकता। नरकवास का दण्ड परमात्मा के न्याय को सिद्ध करता है, क्योंकि हम सब दुष्ट हैं। 'ऐपीसल टू दि रोमन्स' के कुछ स्थलों में सेण्ट पौल ने, सेण्ट ऑगस्टाइन ने और कैल्विन ने सार्वभौम पाप के दृष्टिकोण को स्वीकार किया है। परन्तु उस पाप के होते हुए भी हममें से कुछ का उद्धार हो जाता है, यह बात परमात्मा की दया की सूचक है। नरकवास का दण्ड और मुक्ति, दोनों परमात्मा की अच्छाई को, उसके न्याय और उसकी दया को प्रकट करते हैं। गीता का झुकाव पैलेगियस के सिद्धान्त की ओर है।

 

'भगवान के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण में भी मनुष्य का प्रयत्न रहता ही है। यह आत्मसमर्पण संकल्पहीन या प्रयत्नहीन नहीं हो सकता। दया के सिद्धान्त की व्याख्या विशेष चुनाव के रूप में नहीं की जा सकती, क्योंकि इस प्रकार की धारणा गीता के इस सामान्य मत से उल्टी पड़ती है कि "सब प्राणियों में भगवान् वहीं एक है।"[138]

 

श्रद्धा भक्ति का आधार है। इसलिए जिन देवताओं में लोगों की श्रद्धा है, उन सबको सहन कर लिया गया है। बिलकुल प्रेम होने से कुछ प्रेम होना अच्छा है; क्योंकि यदि हम प्रेम नहीं करते, तो हम अपने-आप में ही रुद्ध हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, निम्नतर देवताओं को एक भगवान् के ही रूपों में स्वीकार किया गया है।'[139] इस तथ्य पर ज़ोर दिया गया है कि जब कि अन्य भक्त लोग अन्य लक्ष्यों तक पहुंचते हैं, केवल वह, जो भगवान् का भक्त होता है, परम आनन्द को प्राप्त करता है।[140] जहां तक पूजा भक्ति के साथ की जाती है, वह हृदय को पविल करती है और मन को उच्चतर चेतना के लिए तैयार करती है। हर कोई भगवान् की मूर्ति अपनी इच्छाओं के अनुरूप ढाल लेता है। मरते हुए व्यक्ति के लिए परमात्मा शाश्वत जीवन है; जो लोग अन्धकार में भटक रहे हैं उनके लिए वह प्रकाश है।[141] जिस प्रकार क्षितिज सदा हमारी आंखों के बराबर ऊंचाई पर ही रहता है, चाहे हम कितना ही ऊंचा क्यों चढ़ते चले जाएं, उसी प्रकार परमात्मा का स्वभाव भी हमारी अपनी चेतना के स्तर से ऊंचा नहीं हो सकता। निम्नतर स्थितियों में हम धन और जीवन के लिए प्रार्थना करते हैं, और भगवान् को भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने वाला माना जाता है। बाद में चलकर चिन्तन में हम अपने-आप को सत्प्रयोजनों के साथ, जो भगवान् के प्रयोजन हैं, एकात्म करते हैं। उच्चतम स्थितियों में परमात्मा एक अन्तिम सन्तुष्टि बन जाता है, वह अपर जो मानव-आत्मा को पूर्ण कर देता है और भर देता है। मधुसूदन ने भक्ति की परिभाषा करते हुए इसे एक ऐसी मानसिक दशा बताया है, जिसमें मन प्रेमावेश से प्रेरित होकर भगवान् का रूप धारण कर लेता है।'[142] जब परमात्मा के प्रति भावनात्मक अनुराग अत्यधिक आनन्दमय हो उठता है, तब भक्त-प्रेमी अपने-आप को परमात्मा में भुला देता है।[143]' प्रह्लाद, जिसमें हमें परमात्मा में पूर्ण लीनता की आध्यात्मिक दशा दिखाई पड़ती है, परम पुरुष के साथ अपनी एकता को अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार का आत्मविस्मृतिकारक साथ अतासमय अनुभव अद्वैतवादी अधिविद्या का समर्थक नहीं माना जा सकता। पिपरोक्षानुभव में या उस अन्तिम दशा में, जिसमें व्यक्ति परब्रह्म में लीन हुआ रहता है, वह पृथक् व्यक्ति के रूप में शेष नहीं रहता

 

भक्ति ज्ञान की ओर ले जाती है। रामानुज की दृष्टि में यह स्मृति-सन्तान है। प्रपत्ति भी ज्ञान का ही एक रूप है। जब भक्ति प्रबल होती है, तब आत्मा में निवास करने वाला भगवान अपनी करुणा के कारण भक्त को ज्ञान का प्रकाश प्रदान करता है। भक्त अपने-आप को भगवान के साथ घनिष्ठ रूप से संयुक्त अनुभव करता है। भगवान् का अनुभव एक ऐसी सत्ता के रूप में होता है, जिसमें सब प्रतिपक्ष लुप्त हो जाते हैं। वह अपने अन्दर भगवान् को और भगवान् में अपने-आप को देखता है। प्रह्लाद का कथन है कि मनुष्य का सबसे बड़ा उद्देश्य भगवान् की परम भक्ति और उसकी विद्यमानताको सब जगह अनुभव करना है।[144] "जो नारी प्रेम करती है, उसके लिए प्रेम के आवेश में प्रियतम के हृदय पर लेटना या प्रेम से प्रियतम के चरणों को सहलाना, दोनों एक-सी बातें हैं।[145] इसी प्रकार ज्ञानी पुरुष के लिए, चाहे वह समाधि में लीन रहे या पूजा द्वारा भगवान् की सेवा करे, दोनों एक-सी बातें हैं।" भक्त के लिए उच्चतर प्रकार की स्वतन्त्रता भगवान् के प्रति आत्मसमर्पण कर देने में है।[146] संसार के लिए भगवान् के कार्य में भाग लेना सब भक्तों का कर्त्तव्य है।"[147]जो  लोग अपने कर्त्तव्य को छोड़ बैठते हैं और केवल 'कृष्ण-कृष्ण' कहकर भगवन का नाम जपते हैं, वे वस्तुतः भगवान् के शतु हैं और पापी हैं, क्योंकि धर्म की रक्षा के लिए तो स्वयं भगवान् ने भी जन्म लिया था।"[148] जब भक्त सच्चे तौर पर अपने-आप को भगवान् के प्रति समर्पित कर देता है, तब परमात्मा उसके मन की प्रमुख वासना बन जाता है और तब भक्त जो भी कुछ करता है, वह परमाला के यश के लिए करता है। भगवद्गीता में भक्ति अनुभवातीत के प्रति सम्पूर्ण आत्मसमर्पण है। यह है भगवान् में विश्वास करना, उससे प्रेम करना, उसके प्रति निष्ठावान् होना और उसमें लीन हो जाना। यह अपना पुरस्कार स्वयं ही है। ऐसे भक्त में उच्चतम ज्ञान का सार और साथ ही साथ पूर्ण मनुष्य की ऊर्जा भी विद्यमान रहती है।[149]

 

12. कर्ममार्ग

 

किसी ग्रन्थ के प्रयोजन का निर्धारण करते हुए हमे उस प्रश्न को देखना चाहिए, जिसे लेकर वह प्रारम्भ होता है (उपक्रम), और उस निष्कर्ष को देखना चाहिए, जिसके साथ वह समाप्त होता है (उपसंहार) गीता एक समस्या को लेकर प्रारम्भ होती है। अर्जुन युद्ध करने से इनकार कर देता है और कठिनाइयां उपस्थित करता है। वह कर्म से दूर रहने और संसार को त्यागने के लिए युक्तियां प्रस्तुत करता है, जो सुनने में ठीक जान पड़ती हैं। यह कर्म-संन्यास हा आदर्श गीता की रचना के काल में कुछ सम्प्रदायों पर विशेष रूप से प्रभाव जमाए हुए था। अर्जन के मत को परिवर्तित करना गीता का उद्देश्य है। इसमें यह प्रश्न उठाया गया है कि कर्म अच्छा है या कर्म का त्याग। और हाल में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि कर्म अच्छा है। अर्जुन यह घोषणा करता है कि उसकी दुविधाएं समाप्त हो गई हैं और वह लड़ने के लिए दिए गए आदेशों का पालन करेगा। सारे उपदेश में गुरु कृष्ण कर्म की आवश्यकता पर बल देता है।[150] वह अर्जुन की समस्या को हल करने के लिए संसार को 'भ्रम' और कर्म को 'जाल' कहकर नहीं टाल देता। वह इस संसार में मनुष्य को ऐसा पूर्ण सक्रिय जीवन बिताने का उपदेश देता है, जिसमें उसका आन्तरिक जीवन परमात्मा के साथ जुड़ा हुआ हो। इस प्रकार गीता कर्म करने का आदेश है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य को केवल सामाजिक प्राणी के रूप में, अपितु आध्यात्मिक भवितव्यता वाले एक व्यक्ति के रूप में क्या कुछ करना चाहिए। इसमें संन्यास की भावना के साथ-साथ कर्मकाण्ड की धर्मनिष्ठा वाले उन लोगों के विषय में भी उचित ढंग से चर्चा की गई है, जो इसकी नैतिक संहिता के अन्तर्गत आते हैं।[151] सांख्य, जो गीता में ज्ञान का ही दूसरा नाम है, हमें कर्म का त्याग करने को कहता है। एक सुविदित दृष्टिकोण यह है कि सब उत्पन्न ब्राणी कर्म द्वारा बन्धन में फंसते है और ज्ञान द्वारा उनका उद्धार होता है।[152] प्रत्येक कार्य, चाहे वह भला हो या बुरा, अपना स्वाभाविक परिणाम उत्पन्न करता है और उसके कारण संसार में शरीर धारण करना पड़ता है और वह मुक्ति में बाधा है। प्रत्येक कर्म कर्ता (करने वाले) के अहंकार और पृथक्ता की भावना को पुष्ट करता है और एक नई कार्य-परम्परा को चला देता है। इसलिए यह युक्ति प्रस्तुत की गई कि मनुष्यों को सब कर्मों को त्यागकर संन्यासी बन जाना चाहिए। शंकराचार्य, जो मुक्ति प्राप्त करने के लिए ज्ञानमार्ग का समर्थन करता है, यह युक्ति प्रस्तुत करता है कि अर्जुन मध्यमाधिकारी व्यक्ति था, जिसके लिए संन्यास ख़तरनाक होता; इसलिए उसे कर्ममार्ग को अपनाने का उपदेश दिया गया। परन्तु गीता भागवत धर्म द्वारा विकसित किए गए दृष्टिकोण को अपनाती है, जिसमें हमें पूर्ण मुक्ति प्राप्त करने और इस संसार में कार्य करते रहने में सहायता देने के लिए दुहरा प्रयोजन विद्यमान है।'[153] दो स्थानों पर व्यास ने शुकदेव से कहा है कि ब्राह्मण के लिए सबसे पुरानी पद्धति ज्ञान द्वारा मुक्ति प्राप्त करने और कर्म करते रहने की है।[154] ईशोपनिषद् में भी इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया गया है। यह मान लेना ग़लत है कि हिन्दू विचारधारा में अप्राप्य को प्राप्त करने पर अत्यधिक बल दिया गया था और उसमें यह दोष था कि वह संसार की समस्याओं के प्रति निरपेक्ष रही। जब ग़रीब लोग हमारे दरवाज़े पर नंगे और भूखे मर रहे हों, उस समय हम आन्तरिक धर्मनिष्ठा में लीन नहीं हो सकते। गीता हमसे कहती है कि हम इस संसार में रहें और इसकी रक्षा करें।

 

गीता का गुरु कर्म की समस्या की अत्यधिक सूक्ष्मता की ओर संकेत करता है, गहना कर्मणो गतिः।[155] हमारे लिए कर्म से बचे रह सकना सम्भव नहीं है। प्रकृति सदा अपना काम करती रहती है और यदि हम यह सोचें कि इसकी प्रक्रिया को रोका जा सकता है, तो हम भ्रम में हैं। कर्म को त्याग देना वांछनीय भी नहीं है। जड़ता स्वतन्त्रता नहीं है। फिर, किसी कर्म का बन्धन का गुण केवल उस कर्म को कर देने-भर में ही निहित नहीं है, अपितु उस प्रयोजन या इच्छा में निहित है. जिससे प्रेरित होकर कर्म किया जाता है। संन्यास का मतलब स्वयं कर्म को त्याग देने से नहीं है, अपितु उस कर्म के पीछे विद्यमान मानसिक द्वांचे को बदल देने से है। संन्यास का अर्थ है-इच्छा का अभाव। जब तक कर्म मिथ्या आधारों पर आधारित है, तब तक वह व्यक्तिक आत्मा को बन्धन मैं डालता है। यदि हमारा जीवन अज्ञान पर आधारित है, तो भले ही हम्मान हमें हरण कितना ही परोपकारवादी क्यों हो, वह बन्धन में डालने वाला होगा। गीता इच्छाओं से विरक्त होने का उपदेश देती है, कर्म को त्याग देने का नहीं।'[156]

 

जब कृष्ण अर्जुन को युद्ध लड़ने का परामर्श देता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि यह युद्ध की वैधता का समर्थन कर रहा है। युद्ध तो एक ऐसा अवसर पहा है, जिसका उपयोग गुरु उस भावना की ओर संकेत करने के लिए करता है, जिस भावना के साथ सब कार्य, जिनमें युद्ध भी सम्मिलित है, किए जाने चाहिए। अर्जुन शान्तिवादी रुख अपनाता है और सत्य और न्याय की रक्षा के लिए होने वाले युद्ध में भाग लेने से इनकार करता है। वह सारी परिस्थिति को मानवीय दृष्टिकोण से देखता है और चरम अहिसा का प्रतिनिधि बन जाता है। अन्त में वह कहता है:

 

इससे भला तो मैं यह समझता हूं कि यदि मेरे स्वजन चोट करें, तो मैं उनका निःशस्त्र होकर सामना करूं, और अपनी छाती खोल दूं उनके तीरों और बर्छो के सामने, बजाय इसके कि चोट के बदले चोट करूं। "[157]

 

अर्जुन यह प्रश्न नहीं उठाता कि युद्ध उचित है या अनुचित। वह अनेक युद्धों में लड़ चुका है और अनेक शलुओं का सामना कर चुका है। वह युद्ध और उसकी भयंकरता के विरुद्ध इसलिए है, क्योंकि उसे अपने मिलों और सम्बन्धियों (स्वजनम) को मारना पड़ेगा।[158] यह हिंसा या अहिंसा का प्रश्न नहीं है, अपितु अपने उन मिलों के विरुद्ध हिंसा के प्रयोग का प्रश्न है, जो अब शतु बन गए हैं। युद्ध के प्रति उसकी हिचक आध्यात्मिक विकास या सत्व गुण की प्रधानता का परिणाम नहीं है, अपितु अज्ञान और वासना की उपज है।'[159] अर्जुन इस बात को स्वीकार करता है कि वह दुर्बलता और अज्ञान के वशीभूत हो गया है।[160] गीता हमारे सम्मुख जो आदर्श उपस्थित करती है, वह अहिंसा का है; और यह बात सातवें अध्याय में मन, वचन और कर्म की पूर्ण दशा के, और बारहवें अध्याय में भक्त के मन की दशा के वर्णन से स्पष्ट हो जाती है। कृष्ण अर्जुन को आवेश या दुर्भावना के बिना, राग या द्वेष के बिना युद्ध करने को कहता है और यदि हम अपने मन को ऐसी स्थिति में ले जा सकें, तो हिंसा असम्भव हो जाती है। जो अन्याय है, उसके विरुद्ध हमें लड़ना ही चाहिए। परन्तु यदि हम घृणा को अपने ऊपर हावी हो जाने दें, तो हमारी पराजय सुनिश्चित है। परम शान्ति या भगवान् में लीनता की दशा में लोगों को मार पाना असम्भव है। युद्ध को एक निदर्शन के रूप में लिया गया है। हो सकता है कि कभी हमें विवश होकर कष्टदायक कार्य करना पड़े; परन्तु वह ऐसे ढंग से किया जाना चाहिए कि उससे एक पृथक् 'अहं' की भावना पनपने पाए। कृष्ण अर्जुन को बताता है कि मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी पूर्णता को प्राप्त कर सकता है। यदि कर्म को निष्ठा के साथ और सच्चे हृदय से, उसके फल की इच्छा रखे बिना किया जाए तो वह पूर्णता की ओर ले जाता है। हमारे कर्म हमारे स्वभाव के परिणाम होने चाहिए। अर्जुन है तो क्षत्निय जाति का गृहस्थ, परन्तु वह बातें संन्यासी की-सी करता है; इसलिए नहीं, कि वह बिलकुल वैराग्य और मानवता के प्रति प्रेम की स्थिति तक ऊपर उठ गया है, अपितु इसलिए कि वह एक मिथ्या करुणा के वशीभूत हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति को उस स्थान से ऊपर की ओर उठना होगा, जहां कि वह खड़ा है। गीता में लोक-संग्रह अर्थात् संसार की एकता पर जो बल दिया गया है, उनकी मांग है कि हम अपने जीवन की सारी पद्धति को बदलें। हम दयालु, भले आदमी हैं, जो एक कुत्ते को भी सता जाते देखकर विचलित और क्रुद्ध हो उठेंगे। हम किसी भी रोते हुए बच्चे या छेड़ी जाती हुई स्त्री की रक्षा के लिए दौड़कर पहुंचेंगे। फिर भी हम बहुत बड़े तैमाने पर लाखों स्त्रियों और बच्चों के प्रति अन्याय करते रहते हैं और अपने- आप को इस विश्वास द्वारा सन्तोष दे लेते हैं कि हम अपने परिवार या नगर या समय के प्रति अपना कर्त्तव्य निवाह रहे हैं। गीता में हमसे मानवीय भ्रातृत्व पर देने के लिए कहा गया है। शंकराचार्य ने इस बात की ओर संकेत किया है कहीं भी युद्ध करने का आदेश दिया गया है, वहां वह आदेशात्मा है (विधि) नहीं है, अपितु उस समय विद्यमान प्रथा का ही सूचक है।'[161] गीता ऐसे वित- पुल के काल की रचना है, जिस प्रकार के कालों में से मानवता समयम पर गुज़रती रहती है, जिनमें बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक, संधान एक-दूसरे के साथ संघर्ष कर रहे होते हैं; और जब इनमें उचित रूप से इमेजन नहीं होता, तब प्रचण्ड उत्पात होते हैं। स्वतःप्रमाण अच्छाई के विधान, और उसमें बाधा डालने वाली रूढ़ियों में चल रहे संघर्ष में कभी-कभी अच्छाई हे विधान को एक मनोवैज्ञानिक तथ्य और एक ऐतिहासिक प्रक्रिया बनने का अवसर देने के लिए बल का प्रयोग करना आवश्यक होता है। हमें इस संसार में, जैसा कि यह है, रहते हुए कर्म करना होता है और साथ ही इसे सुधारने के लिए भी भरसक प्रयत्न करना होता है। जीवन हमारा अधिक-से-अधिक जो कुछ विगाड़ सकता है, वह भी जब सामने हो, या जब हम सब प्रकार की हानि, शोक और अपमान में डूबे हुए हों, तब भी हमें ग्लानि से मलिन नहीं होना चाहिए। पदि हम गीता की निष्कामता और समर्पण की भावना के अनुसार कार्य करें और अपने शबुओं तक से प्रेम करें, तो हम संसार को युद्धों से मुक्ति दिलाने में सहायता करेंगे।[162]

 

यदि हम कर्म के फल में अनासक्ति और परमात्मा के प्रति समर्पण की भावना विकसित कर लें, तब हम कर्म करते रह सकते हैं। जो व्यक्ति इस भावना से कार्य करता है, वह नित्य-संन्यासी है।[163]' जब जो कुछ उसे प्राप्त होता है, वह उसे ग्रहण कर लेता है और जब आवश्यकता होती है, तब वह बिना दुःख से उसे त्याग भी देता है।

 

यदि कर्म की पद्धति के प्रति विरोध है, तो वह स्वयं कर्म के प्रति विरोध नहीं है, अपितु कर्म द्वारा मुक्ति पाने के सिद्धान्त के प्रति विरोध है। यदि अज्ञान या अविद्या मूल बुराई है, तब ज्ञान ही उसका सबसे बढ़िया इलाज है। ज्ञान की प्राप्ति ऐसी वस्तु नहीं है, जो काल में उपलब्ध हो सकती हो। ज्ञान सदा विशुद्ध और पूर्ण है और वह किसी कर्म का फल नहीं है। एक सनातन उपलब्धि, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता, किसी क्षणिक कर्म का परिणाम नहीं हो सकती। परन्तु कर्म ज्ञान के लिए मनुष्य को तैयार करता है। 'सनत्सुजातीय' पर टीका करते हुए शंकराचार्य ने कहा है: "मुक्ति ज्ञान द्वारा प्राप्त होती है; परन्तु ज्ञान हृदय को पवित्न किए बिना उत्पन्न नहीं हो सकता। अतः हृदय की शुद्धि के लिए मनुष्य को श्रुतियों और स्मृतियों द्वारा विहित वाणी, मन और शरीर के सब कर्म करने चाहिए और उन्हें परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए।"[164] इस प्रकार की भावना से किया गया कर्म यज्ञ या बलिदान बन जाता है। यज्ञ का अर्थ है- परमात्मा के निमित्त पवित्न बनाना। यह वंचन या आत्मबलिदान नहीं है, अपितु स्वतःस्फूर्त आत्मदान है; एक ऐसी महत्तर चेतना के प्रति आत्मसमर्पण, जिसकी सीमा हम स्वयं हैं। इस प्रकार के आत्मसमर्पण द्वारा मन मलिनताओं से शुद्ध हो जाता है और वह भगवान् की शक्ति और ज्ञान में भागीदार बन जाता है। यज्ञ या बलिदान की भावना से किया गया कर्म बन्धन का कारण नहीं रहता।

 

भगवद्गीता हमारे सम्मुख एक ऐसा धर्म प्रस्तुत करती है, जिसके द्वारा कर्म के नियम से, कर्म और उसके फल की स्वाभाविक व्यवस्था से, ऊपर उठा जा सकता है। लोकोत्तर प्रयोजन की ओर से प्राकृतिक व्यवस्था में कोई मनमाने जातक्षप का तत्व विद्यमान नहीं है। गीतां का गुरु वास्तविकता के जगत् को पहचानता है, जिसमें कर्म का नियम लागू नहीं होता और यदि हम अपना सम्बन्ध उस जगत् के साथ जोड़ लें, तो हम अपने गम्भीरतम अस्तित्व में स्वतन्त्र हो जाएंगे। कर्म की श्रृंखला को यहीं और अभी, अनुभवजन्य संसार के प्रवाह में रहते हुए तोड़ा जा सकता है। निष्कामता और परमात्मा में श्रद्धा को पुष्ट करके हम कर्म के स्वामी बन जाते हैं।

 

जो ज्ञानी ऋषि परम ब्रह्म में लीन होकर जीवन व्यतीत करता है, उसके लिए यह कहा जाता है कि उसे कुछ करने को शेष नहीं है, तस्य कार्य विद्यते [165] सत्य के द्रष्टा को कुछ भी करने या पाने की महत्त्वाकांक्षा शेष नहीं रहती। जब सब इच्छाएं नष्ट हो जाती हैं, तब कार्य कर पाना सम्भव नहीं है। उत्तरगीता में इस आपत्ति (ऐतराज़) को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है : "जो योगी ज्ञान का अमृत पीकर सिद्ध हो गया है, उसके लिए कोई कर्त्तव्य शेष नहीं रहता; यदि कर्त्तव्य शेष रहता है, तो वह सत्य का वास्तविक ज्ञानी नहीं है I''[166] सारा ज्ञान, सारा प्रयत्न परम ज्ञान को, उस अन्तिम सरलता को प्राप्त करने का साधन है। प्रत्येक कर्म या उपलब्धि इस अस्तित्वमान् होने के कर्म की अपेक्षा कम है। सारा कर्म सदोष है।[167]

 

शंकराचार्य ने इस बात को स्वीकार किया है कि ज्ञान की प्राप्ति के बाद भी मृत्युपर्यन्त कार्य करते रहने में कोई ऐतराज़ की बात नहीं है।'[168] इस प्रकार के व्यक्ति को केवल सैद्धान्तिक दृष्टि से सब कर्तव्यों से ऊपर कहा जाता है।[169] इसका अर्थ है कि सिद्धान्ततः आध्यात्मिक स्वतन्त्रता और व्यावहारिक कार्य के बीच कोई विरोध नहीं है। यद्यपि अगर ठीक-ठीक कहा जाए, तो ज्ञानी ऋषि को करने के लिए कुछ बाकी नहीं बचता, ठीक वैसे ही, जैसे परमात्मा को करने के लिए कुछ बाकी नहीं है, फिर भी ज्ञानी ऋषि और परमात्मा, दोनों ही संसार के निर्वाह और प्रगति, लोकसंग्रह, के लिए कार्य करते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि कार्य करने वाला परमात्मा है, क्योंकि व्यक्ति तो अपनी सब इच्छाओं से अपने-आप को खाली कर चुका है।'[170] वह कुछ नहीं करता, किंचित् करोति क्योंकि उसका कोई बाह्य प्रयोजन नहीं होता, इसलिए वह किसी वस्तु पर दावा नहीं करता और अपने-आप को स्वतःप्रवृत्ति के सम्मुख समर्पित कर देता है। परमात्मा उसके द्वारा कार्य करता है और यद्यपि इस प्रकार के व्यक्ति के लिए कोई भी पाप कर पाना असम्भव है, फिर भी उसके बारे में पाप और पुण्य का प्रश्न ही नहीं उठता।'[171] आत्म की शान्ति में स्थिर होकर वह सब कर्मों का करने वाला, कृत्स्रकर्मकृत्, बन जाता है। उसे ज्ञात रहता है कि वह परमात्मा के कार्य का केवल साधन-मान है, निमित्तमात्रम[172] जब अर्जुन का लम्बा विषाद फलीभूत होता है, तब उसे पता चलता है कि परमात्मा की इच्छा में ही उसकी शान्ति निहित है।'[173] परमात्मा के नियन्त्रण के अधीन रहकर प्रकृति अपना काम करती रहती है। व्यक्ति की बुद्धि, मन और इन्द्रियां महान् सार्वभौम प्रयोजन के लिए और उसी के प्रकाश में कार्य करती हैं। जय या पराजय उसे विचलित नहीं करती, क्योंकि वह सार्वभौम आत्मा की इच्छा से ही होती है। जो भी कुछ घटित होता है, उसे व्यक्ति राग या द्वेष के बिना स्वीकार कर लेता है। वह द्वैतों से ऊपर उठ चुका होता है द्वन्द्वातीत) वह उस कर्तव्य को.जिससे उसकी आशा की जाती है कर्त्तव्य, कर्म, व्यथा के बिना स्वतंत्रता तथा स्वतःस्फति के साथ करता है।

 

सांसारिक मनुष्य संसार की विविध गतिविधियों में खोया रहता है। वह अपने-आप को परिवर्तनशील (क्षर) संसार में छोड़ देता है। निश्चलतावादी सामा पीछे हटता हुआ परम ब्रह्म (अक्षर) की निःशब्दता में पहुंच जाता है। परन्तु गीता का आदर्श मनुष्य इन दोनों चरम सीमाओं से आगे पहुंचता है और पुरुषोत्तम की भांति काम करता है, जो इस संसार में फंसे बिना इसकी सब सम्भावनाओं में मेल बिठाता है। वह कर्मों का करने वाला है और फिर भी करने वाला नहीं है, कर्तारम् अकर्तारम्। भगवान् अश्रान्त और सक्रिय कार्य करने वाले का आदर्श है, जो अपने कर्म द्वारा अपनी आत्मा की अखण्डता को खो नहीं बैठता। मुक्त आत्मा कृष्ण और जनक की भांति शाश्वत रूप से स्वतन्त्र है।"[174] उनक अपने कर्त्तव्यों का पालन करता था और संसार की घटनाओं से क्षुब्ध नहीं होता था।[175] मुक्त आत्माएं उन लोगों के पथ-प्रदर्शन के लिए कार्य करती हैं, जो विचारशील लोगों द्वारा स्थापित किए गए प्रमापों का अनुगमन करते हैं। वे इस संसार में रहती हैं, किन्तु अपरिचितों की तरह। वे शरीर में रहते हुए सब कठिनाइयों को सहती हैं।[176] और फिर भी वे शरीर के लिए नहीं जीतीं। उनका अस्तित्व पृथ्वी पर होता है, परन्तु उनकी नागरिकता स्वर्ग की ही होती है। "जिस प्रकार अपण्डित व्यक्ति अपने कार्य के प्रति अनुराग होने के कारण कर्म करता है, उसी प्रकार पण्डित व्यक्ति को भी केवल लोक-संग्रह करने की इच्छा से आसक्ति के बिना कर्म करना चाहिए। "[177]

 

जहां बौद्ध आदर्श चिन्तन के जीवन को ऊंचा बताता है, वहां गीता उन सब आत्माओं को अपनी ओर आकृष्ट करती है, जिनमें कर्म और अभियान की लालसा है। कर्म आत्मपूर्णता के लिए किया जाता है। हमें अपने उच्चतम और अन्तर्तम अस्तित्व के सत्य को खोज निकालना होगा और उसके अनुसार जीना होगा और अन्य किसी बाह्य प्रमाप का अनुगमन नहीं करना होगा। हमारा स्वधर्म, बाह्य जीवन, और हमारा स्वभाव, आन्तरिक अस्तित्व, एक-दूसरे के अनुकूल होना चाहिए। केवल तभी कर्म स्वतन्त्र, सरल और स्वतःप्रवृत्त हो सकेगा। परमात्मा के संसार में हम परमात्मा की इच्छा के अनुकूल केवल तभी जी सकते हैं, जब कि हम अद्वितीयता की बहुमूल्य अपार्थिव ज्योति को जगाए रखें। अपने-आप को भगवान् के हाथों में छोड़कर अपने-आप को उसके उपयोग के लिए पूर्ण साधन बनाकर हम उच्चतम आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं।

 

कर्मयोग गीता के अनुसार जीवन के लक्ष्य तक पहुंचने की एक वैकल्पिक पद्धति है और इसका अन्त ज्ञान में होता है।[178] इस अर्थ में शंकर का यह मत ठीक है कि कर्म और भक्ति आध्यात्मिक स्वतंत्रता के साधन हैं। परन्तु आध्यात्मिक स्वतन्तता सक्रियता के साथ असंगत नहीं है। कर्त्तव्य के रूप में कार्य समाप्त हो जाता है, परन्तु सारी गतिविधि समाप्त नहीं हो जाती। मुक्त व्यक्तियों की गतिविधि स्वतन्त और स्वतःस्फूर्त होती है और परवशतात्मक नहीं होती भले उन्हें ज्ञान प्राप्त हो चुका है, फिर भी वे संसार के कल्याण के लिए, कार्य करते हैं।[179] कार्य साधन के रूप में नहीं किया जाता, अपितु वह एक लक्षण बन जाता है। जब हम संन्यास आश्रम ग्रहण कर लेते हैं, तब भी अन्य आश्रमों के कर्तव्य तो छूट जाते हैं, परन्तु संन्यास आश्रम के कर्त्तव्य नहीं छूटते सामान्य गुण (साधारण घमी)-जिनका पालन करना सबके लिए आवश्यक है, जैसे दया का आचरण- अपनाए ही जाते हैं। इस प्रकार कर्म और मुक्ति एक-दूसरे से असंगत नहीं हैं।[180]

गीता ने उन अनेक सम्प्रदायों और संहिताओं को अपना लिया है, जो उससे पहले ही एक-दूसरे से होड़ कर रही थीं, और उनको एक ऐसे धर्म के पहलुओं के रूप में रूपान्तरित कर दिया है, जो कहीं अधिक आन्तरिक, स्वतन्त्र, सूक्ष्म और गम्भीर है। यदि लोकप्रिय देवताओं की पूजा की जानी है, तो यह भी साथ ही समझ लेना होगा कि वे केवल एक ही भगवान् के विविध रूप-माल है। यदि बलियां दी जानी हैं, तो वे आत्मिक होनी चाहिए, भौतिक पदार्थों की नहीं। आत्मसंयम का जीवन या अनासक्त कर्म यज्ञ है। वेद उपयोगी है, परन्तु गीता के उपदेश के विस्तृत जलप्लावन की तुलना में वह एक पोखर के समान है। गीता ब्रह्म और आत्मा के उस सिद्धान्त का उपदेश देती है, जिसे उपनिषदों के अनुयायी खोजते हैं और जिसका वर्णन करते हैं। चित्तवृत्ति को केन्द्रित करने का योग उपयोगी है, परन्तु भगवान् योगेश्वर है। सांख्य का द्वैतवाद अद्वैतवादके रूप में अपना लिया गया है, क्योंकि पुरुष और प्रकृति सर्वोच्च स्वामी पुरुषोत्तम के ही दो स्वभाव हैं। वही एक है, जो दया प्रदान करता है। वही भक्ति का सच्चा विषय है। उसी के लिए सब काम किया जाना चाहिए। उद्धार करने वाला ज्ञान उसी का ज्ञान है। धर्म के परम्परागत नियमों का पालन किया जाना चाहिए, क्योंकि उन्हें उसने ही स्थापित किया है और वही नैतिक व्यवस्था को बनाए रखता है। नियम अपने-आप में कोई साध्य नहीं है, क्योंकि अन्तिम लक्ष्य तो भगवान् के साथ ऐक्य स्थापित करना है। गीता का गुरु उस समय प्रचलित विभिन्न सम्प्रदायों में मेल स्थापित करता है और हमारे सम्मुख एक ऐसी सर्वांग-सम्पूर्ण शान्ति-योजना प्रस्तुत करता है, जो स्थानीय और अस्थायी नहीं है, अपितु सब कालों और सब मनुष्यों के लिए है। वह बाह्य विधियों या कट्टर सिद्धान्तात्मक धारणाओं पर ज़ोर नहीं देता, अपितु मानव-स्वभाव और अस्तित्व के मूलभूत सिद्धान्तों और महान् तथ्यों पर बल देता है।

 

13. वास्तविक लक्ष्य[181]

 

गीता उस आत्मिक जीवन की एकता पर बल देती है, जिसे दार्शनिक ज्ञान, भक्तिपूर्ण प्रेम या परिश्रमपूर्ण कर्म के रूप में नहीं बांटा जा सकता। कर्म, ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं, तब भी जब कि हम लक्ष्य की खोज कर रहे होते हैं और लक्ष्य को प्राप्त कर लेने के बाद भी यद्यपि हम एक ही पद्धति पर होइल रहे होते, फिर भी जिस वस्तु की हम खोज कर रहे होते हैं, वह एक हो है। हम पर्वत के शिखर पर भले ही अलग-अलग मागों से चढ़े, परन्तु धारक की में दिखाई पड़ने वाला दृश्य सबके लिए एक जैसा होगा। ज्ञान की एक सशरीर में कल्पना की गई है, जिसका शरीर हृदय प्रेम है। योग, जिसकी विभिन्न अवस्थाएं ज्ञान और ध्यान, प्रेम और सेवा है अन्धकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने वाला प्राचीन मार्ग है।

 

लोकातीतता का लक्ष्य ब्रह्मलोक तक पहुंचने के रूप में या ब्रह्मभाव या ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त करने के रूप में प्रकट किया गया है। इसका एक पक्ष है संसार से पृथक् हो जाना (कैवल्य) गीता में इन सभी दृष्टिकोणों का उल्लेख है। अनेक स्थानों पर ऐसा सुझाव दिया गया है कि मुक्ति की दशा में द्वैत लुप्त हो जाता है और मुक्त आत्मा सनातन आत्मा के साथ मिलकर एक हो जाती है। यह ऐसी दशा है, जो सब गुणों और विशेषताओं से परे है, दुःखरहित है, स्वतन्त्र और शान्तिमय है। यदि शरीर हमारे साथ चिपटा रहेगा, तो प्रकृति तब तक कार्य करती रहेगी, जब तक कि शरीर उतारी हुई केंचुली की भांति अलग नहीं कर दिया जाता। जीवन्मुक्त या स्वतन्त्र हुई आत्मा शरीर में रहते हुए भी बाह्य संसार की घटनाओं के प्रति क्रिया तो करती है, परन्तु वह उनमें उलझती नहीं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, आत्मा और शरीर दो पृथक् वस्तुएं हैं, जिनका द्वैत मिट नहीं सकता और हम ऐसे किसी कर्म के विषय में सोच भी नहीं सकते, जो मुक्त आत्मा द्वारा किया गया हो।

गीता में मुख्य रूप से इस प्रकार के दृष्टिकोण पर जोर नहीं दिया गया। गीता की दृष्टि में आध्यात्मिक स्वतन्त्रता की दशा हमारी सम्पूर्ण प्रकृति को अमर विधान और परमात्मा की शक्ति में रूपान्तरित कर देने में निहित है। परमात्मा के साथ समानता (साधर्म्य) पर ज़ोर दिया गया है, एकरूपता या तोदात्म्य (सायुज्य) पर नहीं। मुक्त आत्मा दिव्य ज्ञान से स्फूर्ति प्राप्त करती है और दिव्य संकल्प से उसे गति मिलती है। वह ब्रह्मभाव की स्थिति प्राप्त कर लेती है। उसकी शुद्ध प्रकृति ब्रह्मतत्व में घुल-मिल जाती है। जो भी कोई इस लोकातीत दशा को प्राप्त कर लेता है, वह योगी, सिद्धपुरुष, जितात्मा, युक्तचेता, एक अनुशासित और लयबद्ध प्राणी बन जाता है, जिसके लिए सनातन सदा वर्तमान रहता है। वह विभक्त निष्ठाओं और कर्मों से मुक्त हो जाता है। उसके शरीर, मन और आत्मा, फ्रायड के शब्दों में चेतन, पूर्वचेतन और अचेतन, निर्दोष रूप से साथ मिलकर कार्य करते हैं और एक ऐसी लय को प्राप्त कर लेते हैं, जो आनन्द की भावसमाधि में, ज्ञान के आलोक में और ऊर्जा की प्रबलता में अभिव्यक्त होती है। मुक्ति अमर आत्मा का मर्त्य मानवीय जीवन से पृथक्करण नहीं, अपितु सम्पूर्ण मनुष्य का रूपान्तरण है। यह मानवीय जीवन के तनाव को नष्ट करके प्राप्त नहीं की जाती, अपितु उसे रूपान्तरित करके प्राप्त की जाती है। उसकी सम्पूर्ण प्रकृति सार्वभौम के दर्शन के प्रति विनत हो जाती है और विचित्ल आभा से भर उठती है और आध्यात्मिक प्रकाश से दमकने लगती है। उसके शरीर, प्राण और मन लीन नहीं हो जाते, अपितु वे शुद्ध हो जाते हैं और दिव्य प्रकाश के साधन और सांचे बन जाते हैं और वह स्वयं अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति बन जाता है। उसका व्यक्तित्व अपनी पूर्णता तक, अपनी अधिकतम अभिव्यक्ति तक ऊपर उठ जाता है; और शुद्ध और मुक्त, प्रफुल्ल और भारमुक्त हो जाता है। उसकी सब गतिविधियां संसार को संगठित रखने के लिए होती हैं, चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्।'[182] मुक्त आत्माएं सारे संसार के उद्धार का भार अपने ऊपर ले लेती हैं। आत्मा की गतिकता का और इसके सदा नये-नये विरोधों का अन्तं संसार का अन्त होने पर ही हो सकता है। द्वन्द्वात्मक विकास तब तक नहीं रुक सकता, जब तक कि सारा संसार अज्ञान और बुराई से मुक्त हो जाए। सांख्य- मत के अनुसार वे लोग भी, जो कि उच्चतम ज्ञान और मुक्ति के अधिकारी हैं, दूसरों का कल्याण करने के विचार से इस संसार का परित्याग नहीं करते। अपने-आप को प्रकृति के शरीर में लीन करके और उसके उपहारों का उपयोग करते हुए वे प्रकृतिलीन आत्माएं संसार के हित का साधन करती हैं। संसार को अपने आदर्श की ओर आगे बढ़ना है, और जो लोग अज्ञान और मूढ़ता में खोए हुए हैं, उनका उद्धार मुक्त आत्माओं के प्रयत्न और दृष्टान्त, ज्ञान और बल द्वारा होना है।[183] ये चुने हुए लोग मानव जाति के स्वाभाविक नेता हैं। हमारे आध्यात्मिक अस्तित्व के कालहीन आधार में लंगर जमाकर मुक्त आत्मा (सनातन व्यक्ति) जीव-लोक के लिए कर्म करता है।[184] शरीर, प्राण और मन की व्यष्टि को धारण करते हुए भी वह आत्मा की सार्वभौमता को बनाए रखता है। वह जो भी कर्म करता है, उससे उसका भगवान् के साथ निरन्तर संयोग अविचलित रहता है।[185] जब विश्व की यह प्रक्रिया अपनी पूर्णता तक पहुंच जाती है, जब सारे संसार का उद्धार हो चुकता है, तब क्या होता है, इस विषय में कुछ कह पाना हमारे लिए कठिन है। हो सकता है कि तब भगवान्, जो असीम सम्भावना है, अपनी अभिव्यक्ति के लिए किसी अन्य सम्भावना को शुरू कर दे।

 

गीता इस बात को स्वीकार करती है कि वास्तविकता तो परब्रह्म है, परन्तु विश्व के दृष्टिकोण से वह सर्वोच्च ईश्वर है। सर्वोच्च ईश्वर ही एकमात्र वह रूप है, जिसमें मनुष्य का विचार, क्योंकि वह सीमित है, सर्वोच्च वास्तविकता की कल्पना कर सकता है। यद्यपि इन दोनों में परस्पर क्या सम्बन्ध है, यह तार्किक दृष्टिकोण से समझ पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है, परन्तु जब हम वास्तविकता का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते हैं, तब यह समझ में जाता है। इसी प्रकार मुक्ति की अन्तिम दशा के सम्बन्ध में बताए गए दो दृष्टिकोण एक ही दशा के अन्तःस्फुरणात्मक और बौद्धिक, दो रूप हैं। मुक्त आत्माओं को पृथक् व्यक्तित्व की कोई आवश्यकता नहीं होती, लेकिन फिर भी वे अपने-अपने को सीमित करके इसे धारण करती हैं। इस विषय में दोनों मत एक हैं कि जब तक मुक्त आत्माएं संसार में जीती रहती हैं, वे किसी--किसी प्रकार का कर्म करती रहती हैं। वे आत्मिक स्वतन्त्रता के साथ और एक आन्तरिक आनन्द और शान्ति के साथ कार्य करती हैं जिस आनन्द और शान्ति का स्रोत या उसका बना रहना किसी बाह्य वस्तु पर निर्भर नहीं है।

 

 

 

गीता में ब्रह्मलोक या परमात्मा के संसार को अपने-आप में शाश्वत नहीं बताया गया, अपितु वह प्रकटन (अभिव्यक्ति) की दूरतम सीमा है। आनन्द हमारे विकास की सीमा है और हम विज्ञान के स्तर से ऊपर उठकर उस तक पहुंचते हैं। इसका सम्बन्ध ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्ति से है। परम तत्व आनन्दमय आत्मा नहीं है, ईश्वरीय बना हुआ आत्मा ही है।[186]' विशुद्ध आत्मा पंचकोशों से भिन्न है।[187] जब ब्रह्माण्ड का प्रयोजन पूर्ण हो जाता है, जब परमात्मा का राज्य स्थापित हो जाता है, जब पृथ्वी पर भी भगवान् का राज्य वैसा ही होता है, जैसा कि वह स्वर्ग में है, जब सब व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त कर लेते हैं और उस स्तर से ऊपर उठ जाते हैं, जिसमें कि जन्म और मरण होते हैं, तब यह ब्रह्माण्डीय प्रक्रिया उस रूप में पहुंचा दी जाती है, जो सब अभिव्यक्तियों से परे है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय 1

अर्जुन की दुविधा और विषाद

 

वास्तविक प्रश्नह

 

धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेले समवेता युयुत्सवः

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय 1।।

 

धृतराष्ट्र ने कहा :

 

(1)          हे संजय, जब मेरे पुत्ल और पाण्डु के पुल धर्म के क्षेत्र कुरुक्षेल में युद्ध करने की इच्छा से एकल हुए,

तब उन्होंने क्या किया ?

 

धर्मक्षेत्रे : धर्म के क्षेत्र में। क्या उचित है या धर्म है, यह निर्णय करने का गुण मनुष्य में ही विशेष रूप से पाया जाता है। भूख, नींद, भय और यौन इच्छा तो मनुष्यों और पशुओं में समान रूप से पाई जाती हैं; उचित और अनुचित के ज्ञान के कारण ही मनुष्य पशुओं से पृथक् समझा जा सकता है।'[188]

 

यह संसार धर्मक्षेत्र है, नैतिक संघर्ष के लिए समर-भूमि। निर्णायक तत्व मनुष्यों के हृदयों में विद्यमान है, जहां कि ये युद्ध प्रतिदिन और प्रतिघड़ी चल रहे हैं। पृथ्वी से स्वर्ग तक और दुःख से आत्मा तक धर्म के मार्ग द्वारा ही उठा जा सकता है। अपने शारीरिक अस्तित्व की दृष्टि से भी हम धर्म का आचरण करते हुए सुरक्षा की स्थिति तक पहुंच सकते हैं, जहां पहुंचकर प्रत्येक कठिनाई का अन्त आनन्द में होता है। यह संसार धर्मक्षेत्र है, सन्तों के पनपने की भूमि, यहां आत्मा की पविन ज्वाला कभी बुझने नहीं पाई है। इसे कर्मभूमि भी कहा जाता है। हम इसमें अपना कार्य करते हैं और आत्मा के निर्माण के प्रयोजन को पूरा करते हैं।

 

गीता का उद्देश्य किसी सिद्धान्त की शिक्षा देना उतना नहीं है जितना कि धर्म के आचरण की प्रेरणा देना। जो वस्तु जीवन में पृथक् नहीं की जा सकती, उसे हम सिद्धान्त में भी पृथक् नहीं कर सकते। नागरिक और सामाजिक जीवन के कर्तव्यों में धर्म का, उसके कार्यों और सुअवसरों समेत, विधान किया गया है। जो भी वस्तु भौतिक समृद्धि और आत्मिक स्वतन्त्रता को बढ़ाती है, वह धर्म है।'[189] गीता की शिक्षा वह रहस्यवाद नहीं है, जिसका सम्बन्ध मनुष्य के केवल आन्तरिक अस्तित्व से होता है। जीवन के कर्त्तव्यों और सम्बन्धों को मिथ्या मानकर उन्हें त्याग देने के बजाय यह उन्हें आत्मिक स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए सुअवसर के रूप में स्वीकार करती है। जीवन हमें इसलिए मिला है कि हम इसे पूर्णतया रूपान्तरित कर सकें।

 

रणभूमि को धर्मक्षेल या धर्म की भूमि इसलिए कहा गया है, क्योंकि ईश्वर, जो धर्म का रक्षक है, इसमें सक्रिय रूप से उपस्थित है।

 

कुरुक्षेत्रे : कुरुओं के क्षेल में। कुरुक्षेत्न कुरुओं की भूमि है। कुरु उस काल का एक प्रमुख गोल था।[190]

 

'धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे' शब्दों से मृत्यु द्वारा जीवन का नियम ध्वनित होता है। भयंकर भगवान् उस रूप का एक पक्ष है, जो अर्जुन को युद्धक्षेल में दिखाई पड़ता है। जीवन एक सेग्राम है, आत्मा का बुराई के विरुद्ध युद्ध सृजन की प्रक्रिया दो परस्पर विरोधी तत्वों में, जो एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े होते हैं, निरन्तर तनाव की उन दोनों के पारस्परिक विरोध से विकास आगे बढ़ता है और सृष्टि के प्रयोजन में प्रगति होती है। इस संसार में अपूर्णता, बुराई और अविवेक के तत्व हैं और हमें कर्म द्वारा, धर्म द्वारा इस संसार को बदलना है। इन तत्वों को, जी अभी तर्कबुद्धि के लिए अपारदर्शक हैं, विचार के लिए पारदर्शक बनाना है। युद्ध एक प्रतिशोधात्मक निर्णय है और साथ ही साथ एक अनुशासन का कार्य भी। कुरुक्षेत्र को तपःक्षेत्र, तप का या अनुशासन का क्षेत्र भी कहा जाता है।'[191] युद्ध मनुष्य-जाति के लिए, दण्ड भी है और साथ ही साथ उसे स्वच्छ करने का साधन भी। परमात्मा निर्णायक होने के साथ-साथ उद्धारक भी है। वह संहार करता है और सृष्टि करता है। वह शिव और विष्णु है।

 

मामकाः : मेरे लोग[192] यह ममत्व अर्थात् मेरा होने की भावना अहंकार का परिणाम है, जो सारी बुराई की जड़ है। यहां कौरवों के ममकार या स्वार्थ-भावना को स्पष्ट किया गया है, जिसके कारण सत्ता और प्रभुत्व के प्रति लोभ बढ़ता है।

 

संजय : संजय अन्धे राजा धृतराष्ट्र का सारथी है और वह राजा को युद्ध की घटनाएं सुनाता है।

 

दो सेनाए

 

संजय उवाच

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा

आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् 2।।

 

संजय ने कहा :

 

(2)          तब राजा दुर्योधन पाण्डवों की सेना को व्यूह-रचना में खड़े देखकर अपने आचार्य के पास पहुंचा और बोला :

 

आचार्य: गुरु, जो शास्त्रों का अर्थ जानता है, उसे दुसरों को सिखाता है और उस शिक्षा पर स्वयं आचरण करता है।

 

द्रोणाचार्य ने कौरवों और पाण्डवों, दोनों पक्षों के राजकुमारों को ही युद्ध विद्या सिखाई थी।

 

पश्यैतां पाण्डुपुत्लाणामाचार्य महतीं चमूम्।

व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता 3।।

 

(3)          आचार्य, पांडु के पुत्लों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसकी व्यूह- रचना आपके बुद्धिमान शिष्य

धृष्टद्युम्न (द्रुपद के पुत्र) ने की है।'[193]

 

अल शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।

युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः 4।।

 

(4)          यहां पर बड़े-बड़े धनुर्धारी योद्धा खड़े हैं, जो युद्ध में भीम और अर्जुन के समान हैंयुयुधान, विराट् और

महारथी द्रुपद [194]

 

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।

पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः 5।।

 

(5)          धृष्टकेतु, चेकितान और वीर काशिराज, इनके साथ ही पुरुजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य हैं।[195]

 

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः 6।।

 

(6)          पराक्रमी युधामन्यु और वीर उत्तमौजा, सुभद्रा का पुन, द्रौपदी के पुल, ये सबके सब महारथी हैं। सौभद्र

अर्जुन और सुभद्रा के पुत्न अभिमन्यु का नाम है।

 

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम

नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते 7।।

 

(7)          हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ, अब हमारी सेना में जो प्रमुख नायक हैं, उनको भी जान लीजिए। आपकी सूचना के

लिए मैं उनके नाम बताता हूं।

 

द्विजोत्तम : ब्राह्मणों में श्रेष्ठ द्विज वह है, जिसने यज्ञोपवीत धारण किया हो। द्विज का शब्दार्थ है-जिसका दो बार जन्म हुआ है। शिक्षा का लक्ष्य है व्यक्ति को आत्मिक जीवन में दीक्षित कर देना। हम प्रकृति के जगत् में जन्म लेते हैं। हमारा दूसरा जन्म आत्मा के जगत् में होता है। तद् द्वितीयं जन्म, माता सावित्नी, पिता तु आचार्यः व्यक्ति प्रकृति के शिशु के रूप में उत्पन्न होता है और बढ़ता हुआ आत्मिक मनुष्यत्व तक पहुंचता है और आलोक का शिशु बन जाता है।

 

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः

अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव 8।।

 

(8)          आप, भीष्म और कर्ण और युद्ध में विजयी होने वाला कृप, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र।[196]

अन्ये बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः

नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः 9।।

 

(9)          आप भी अनेक योद्धा हैं, जिन्होंने मेरे लिए अपने प्राणों को संकट में डार दिया है। वे तरह-तरह के

शस्त्रों से सज्जित हैं और सब के सब युद्ध में। प्रवीण हैं।

 

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।

पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् 10।।

 

(10)        हमारी यह सेना, जिसकी रक्षा भीष्म कर रहे हैं, अपार है, जबकि पाण्डवों की सेना, जिसकी रक्षा भीम

कर रहा है, बहुत सीमित है।

 

अपर्याप्तम् : अपर्याप्त, जो काफ़ी नहीं है।श्रीधर

 

अयनेषु सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि 11।।

 

(11)        इसलिए आप सब लोग अपने-अपने स्थानों पर रहते हुए सब मोर्चों पर दृढ़ता से जमकर सब ओर से

भीष्म की ही रक्षा करें।

 

शंखध्वनि

 

तस्य संजनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः

सिंहनादं विनधोच्चैः शङ्ख दध्मौ प्रतापवान 12।।

 

(12)        उसे आनन्दित करने के लिए वयोवृद्ध कुरु, प्रतापी पितामह, ने सिंह की भांति ज़ोर की गर्जना की और

अपना शंख बजाया।

 

उसकी तथा अन्य लोगों की दृष्टि में कर्त्तव्य का पालन व्यक्तिगत विश्वास की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। सामाजिक व्यवस्था सामान्यतया सत्ता (प्राधिकार) के प्रति आज्ञापालन पर निर्भर रहती है। क्या सुकरात ने क्रिटो से नहीं कहा था कि वह ऐथन्स के उन क़ानूनों को नहीं तोड़ेगा, जिन्होंने उसका पालन-पोषण किया है, उसकी रक्षा की है और सदा उसका ध्यान रखा है?

 

सिंह की भांति ज़ोर से गर्जना की : भीष्म ने दृढ़ता के साथ आत्मविश्वास प्रकट किया।

 

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः

सहसैवाभ्यहन्यन्त शब्दस्तुमुलोऽभवत् 13।।

 

(13)        उसके बाद शेख, भेरियां, ढोल, नगाड़े और सिंगी बाजे एकाएक बज उठे और उनके कारण बड़े ज़ोर

का शोर होने लगा।

 

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ

माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः 14।।

 

(14)        तब अपने विशाल रथ में, जिसमें सफ़ेद घोड़े जुते हुए थे, बैठे हुए कृष्ण और अर्जुन ने अपने दिव्य शंख

बजाए।

 

सारे हिन्दू और बौद्ध साहित्य में रथ मानसिक और शारीरिक वाहन का प्रतीक है। घोड़े इन्द्रियां हैं। रासें उन इन्द्रियों का नियन्त्रण हैं, परन्तु सारथी, पथ- प्रदर्शक, भावना या वास्तविक आत्मा है। सारथी कृष्ण हमारे अन्दर विद्यमान आत्मा है [197]

 

पाञ्चजन्य हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः

पौण्डूं दध्मौ महाशङ्ख भीमकर्मा वृकोदरः 15।।

 

(15)        कृष्ण ने अपना पांचजन्य और अर्जुन ने अपना देवदत्त शंख बजाया और भयंकर कार्य करने वाले और

बहुत खाने वाले भीम ने अपना महान् शंख पौण्ड्र बजाया

 

इससे युद्ध की तैयारी सूचित होती है।

 

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।

नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ 16।।

 

(16)        कुन्ती के पुत्र राजा युधिष्ठिर[198] ने अपना अनन्तविजय शंख बजाया और नकुल तथा सहदेव ने अपने सुघोष

और मणिपुष्पक नाम के शंख बजाए

 

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी महारथः

धृष्टद्युम्न्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः 17।।

 

(17) और महान् धनुर्धारी काशीराज ने, महारथी शिखण्डी ने, धृष्टद्युम्न और विराट ने और अजेय सात्यकि ने।

 

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते

सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् 18।।

 

(18)        हे पृथ्वी के स्वामी, द्रुपद ने और द्रौपदी के पुत्रों ने और महाबाहु अभिमन्यु ने सब ओर अपने-अपने शंख

बजाए

 

घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।

नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो ब्यनुनादयन् 19।।

 

(19)        वह तुमुल शब्द पृथ्वी और आकाश को गुंजाता हुआ धृतराष्ट्र के पुत्नों के हृदयों को विदीर्ण करने लगा।

 

अर्जुन द्वारा दोनों सेनाओं का अवलोकन

 

 

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः

प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुषम्य पाण्डवः 20।।

 

(20)        तब अर्जुन ने, जिसकी ध्वजा पर हनुमान की मूर्ति अंकित थी, व्यूह- रचना में खड़े हुए धृतराष्ट्र के पुत्तों

को देखा और जब शस्त्रास्त्र लगभग चलने शुरू हो गए, तब उसने अपना धनुष उठाया।

 

प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते : जब शस्त्र चलने शुरू हो गए। यह संकट का काल अर्जुन को गहरी चिन्ता में डाल देता है। विरोधी दल युद्धसज्जा में खड़े हैं। शंख बज रहे हैं और प्रत्याशित युद्ध की उत्तेजना उन सब पर छाई हुई है। तब एकाएक आत्मविश्लेषण के क्षण में अर्जुन यह अनुभव करता है कि इस संघर्ष का अर्थ यह है कि जीवन की सारी योजना को, जाति और परिवार के, कानून और व्यवस्था के, देशभक्ति और गुरुओं के प्रति आदर के उन महान् आदर्शों को, जिनका वह निष्ठापूर्वक पालन करता रहा था, त्याग देना होगा।

 

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत 21।।

 

(21)        हे पृथ्वी के स्वामी, तब उसने हृषीकेश (कृष्ण) से ये शब्द कहे : हे अच्युत (कृष्ण) मेरे रथ को दोनों

सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा करो।

 

अच्युतः अविचल; यह भी कृष्ण का नाम है।'[199]

 

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धकामानवस्थितान्

कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुधमे 22।।

 

(22)        जिससे मैं इन लोगों को देख सकूँ, जो युद्ध के लिए उत्सुक खड़े हैं और जिनके साथ मुझे इस युद्ध में

लड़ना है।

 

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं एतेऽत्ल समागताः

धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेयुद्धे प्रियचिकीर्षवः 23।।

 

(23)        मैं उन सबको देखना चाहता हूं, जो यहां लड़ने के लिए उद्यत होकर इकट्ठे हुए हैं और जो दुष्ट बुद्धि वाले

दुर्योधन का युद्ध में भला करने की इच्छा से आए हैं।

 

युद्ध की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। उसी प्रात:काल युधिष्ठिर ने भीष्म द्वारा की गई दुर्भेद्य व्यूह-रचना को देखा था। भय से कांपते हुए उसने अर्जुन से कहा था : "इस सेना के मुकाबले में हम कैसे जीत सकते हैं ?''[200] अर्जुन ने एक प्राचीन श्लोक का उद्धरण देकर अपने भाई को उत्साहित किया था : "विजय की इच्छा रखने वाले लोग शक्ति और बल से उतना नहीं जीतते, जितना सत्य, करुणा, दया और पुण्य से। जहां कृष्ण हैं, वहां विजय सुनिश्चित है। "विजय उसके गुणों में से एक है और उसी प्रकार विनय भी।"[201] कृष्ण अर्जुन को अपने-आप को शुद्ध करने और सफलता के लिए दुर्गा से प्रार्थना करने के अलाह देता है। अर्जुन अपने रथ से उतर पड़ता है और देवी की साति एक मन्त्र पढ़ता है। इस भक्ति से प्रसन्न होकर देवी अर्जुन को वर देती है "हे पाण्डव, तू बहुत जल्दी अपने शत्रुओं को जीत लेगा। स्वयं भगवान नारायण तेरी सहायता करने के लिए विद्यमान हैं।" और फिर भी अकुंर ने एक कर्मशील मनुष्य की भांति अपने इस कार्य की उलझनों पर विचार नहीं किया। अपने गुरु की उपस्थिति, भगवान् की चेतना उसे यह समझने में सहायता देती है कि जिन शतुओं से उसे लड़ना है, वे उसके लिए प्रिय और पूज्य हैं। उसे न्याय की रक्षा और अवैध हिंसा के दमन के लिए सामाजिक बन्धनों को तोड़ना होगा।

 

पृथ्वी पर भगवान् के राज्य की स्थापना भगवान् और मनुष्य के मध्य सहयोग से होने वाला कार्य है। सृष्टि के कार्य में मनुष्य भी समान भाग लेने वाला है।

 

एवमुक्तो हषीकेशो गुडाकेशेन भारत

सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् 24।।

 

(24)        हे भारत (धृतराष्ट्र), गुडाकेश (अर्जुन) के ऐसा कहने पर हृषीकेश (कृष्ण) ने उस श्रेष्ठ रथ को दोनों

सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा कर दिया।

 

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सवेषां महीक्षिताम्।

उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति 25।।

 

(25)        उसने भीष्म, द्रोण और सब राजाओं के सम्मुख खड़े होकर कहा : हे पार्थ (अर्जुन), इन सब इकट्ठे खड़े

हुए कुरुओं को देखो।

 

तलापश्यत् स्थितान्पार्थः पितृनय पितामहान्

आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्लान्पौलान्सीस्तथा 26।।

 

(26)        वहां अर्जुन ने देखा कि उसके पिता, दादा, गुरु, मामा, भाई पुल और पौल तथा मित्र भी खड़े हुए थे।

 

श्वशुरान्सुहृवश्चैव सेनयोरुभयोरपि

तान्समीक्ष्यस कौन्तेयः सर्वान्वन्धूनवस्थितान् 27।।

 

(27)        और उन दोनो सेनाओं में श्वसुर और मिल भी खड़े थे। जब कुन्ती के पुन अर्जुन ने इन सब इष्ट-बन्धुओं

को इस प्रकार खड़े देखा तो,

 

कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्

दृष्टम स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् 28।।

 

(28)        उसका हृदय दया से भर आया और उसने उदास होकर कहा :

 

स्वजनम् : उसके अपने लोग, सम्बन्धी अर्जुन को कष्ट और चिन्ता हत्या के विचार से उतनी नहीं हुई, जितनी अपने सम्बन्धियों की हत्या के विचार से। साथ ही देखिए, अध्याय 1, श्लोक 31, 37 और 45 सामान्यतया युद्धों के प्रति हमारा दृष्टिकोण यान्त्रिक-सा रहता है और हम युद्ध से सम्बन्धित आंकडों में उलझ जाते हैं। परन्तु थोड़ी-सी कल्पना से हम इस बात को अनुभव कर सकते हैं कि किस प्रकार हमारे शतु भी मानव प्राणी हैं। वे भी पिता और पितामह हैं। उनके भी अपने वैयक्तिक जीवन हैं। उनकी भी अपनी इच्छाएं और आकांक्षाएं हैं। आगे चलकर अर्जुन पूछता है कि क्या इतना संहार कर देने के बाद प्राप्त हुई विजय किसी काम की होगी भी या नहीं। दे. . 1, श्लोक. 36

 

अर्जुन का विषाद

 

हे कृष्ण, अपने लोगों को अपने सामने युद्ध के लिए अधीर खड़े देखकर,

 

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं परिशुष्यति

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते 29।।

 

(29)        मेरे अंग ढीले पड़ रहे हैं। मेरा मुंह सूख रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे है।

 

गांडीवं संसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते।

शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव मे मनः 30।।

 

(30)        गाण्डीव धनुष मेरे हाथ से फिसला जा रहा है और मेरी सारी त्वचा में जलन हो रही है। मुझसे खड़ा नहीं

रहा जाता और मेरा मन चकरा-सा  रहा है।

 

अर्जुन के शब्दों से हमारे मन में एक ऐसे व्यक्ति के अकेलेपन का विर आता है, जो सन्देह, विनाश के भय और खोखलेपन (निरर्थकता) से पीड़ित है, जिससे स्वर्ग और पृथ्वी की समृद्धि और मानवीय प्रेम का सुख छिना रहा है। यह असह्य विषाद सामान्यतया उन सब लोगों को अनुभव होता है अं वास्तविकता का (ब्रह्म) दर्शन करने के अभिलाषी होते हैं।

 

निमित्तानि पश्यामि विपरीतानि केशव

श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे 31।।

 

( 31)       और हे केशव, मुझे अपशकुन दिखाई पड़ रहे हैं। इस युद्ध में अपने सम्बन्धियों को मारने से मुझे कोई

भलाई होती दिखाई नहीं पड़ती।

 

अपशकुनों की ओर अर्जुन का ध्यान जाना उसकी मानसिक दुर्बलता और अस्थिरता का सूचक है।

 

नकाक्षेविजयं कृष्ण राज्यं सुखानि च।

किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा 32।।

 

(32)        हे कृष्ण, मुझे विजय नहीं चाहिए और राज्य चाहिए और सुख ही चाहिए। हमें राज्य से, सुख-भोग

से, यहां तक कि जीवित रहकर भी क्या करना है?

 

गहरे शोक के क्षणों में हमारी प्रवृत्ति त्याग की पद्धति को अपनाने की ओर होने लगती है।

 

इस श्लोक में संसार के त्याग की ओर अर्जुन का झुकाव सूचित होता है : संन्याससाधनसूचनम् - मधुसूदन

 

येषामर्थे कासितं नो राज्यं भोगाः सुखानि

इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि 33।।

 

(33)        जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते थे, वे लोग तो अपने प्राणों और धन का मोह त्यागकर यहां

युद्ध में खड़े हुए हैं।

 

आचार्याः पितरः पुत्लास्तथैव पितामहाः

मातुलाः श्वश्शुराः पौलाः श्यालाः सम्बन्धिनस्थता 34।।

 

(34)        गुरु, पिता, पुत्न और दादा, मामा, श्वसुर, पौल और साले तथा अन्य सम्बन्धी (यहां खड़े हैं)

 

एतान्न हन्तुमिच्छामि घानतोऽपि मधुसूदन

अपि तैलोक्यराजस्य हेतोः किं नु महीकृते 35।।

 

(35)        तीनों लोकों के राज्य के लिए भी, हे कृष्ण, मैं इन्हें मारने को तैयार नहीं हूं। फिर इस पृथ्वी के राज्य के

लिए तो कहना ही क्या! भले ही ये लोग मुझे क्यों मार डालें।

 

तीनों लोकों से अभिप्राय पृथ्वी, स्वर्ग और अन्तरिक्ष की वैदिक धारणा से हैं।

 

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः काप्रीतिः स्याज्जनार्दन

पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः 36।।

 

(36)        हे कृष्ण, धृतराष्ट्र के इन पुत्लों को मारने से हमें क्या सुख प्राप्त हो सकता है? इन दुष्ट लोगों को मारने से

हमें केवल पाप ही लगेगा।

 

इस रक्तपातपूर्ण बलिदान से हमें क्या लाभ होगा? जिन लोगों को हम इतना प्यार करते हैं, उनके शवों पर से गुज़रकर हम किस लक्ष्य तक पहुंचने की आशा कर सकते हैं?

 

अर्जुन सामाजिक रूढ़ियों और परम्परागत नैतिकता को देखकर चल रहा है, अपने व्यक्तिगत सत्य के अनुभव को देखकर नहीं। उसे इस बाह्य नैतिकता के प्रतीकों को मार डालना होगा और अपनी आन्तरिक शक्ति का विकास करना होगा। उसके जिन पहले गुरुओं ने उसे जीवन का मार्ग दिखाया था, उन्हें मार डालना होगा। उसके बाद ही वह आत्मज्ञान प्राप्त कर सकेगा। अर्जुन अब भी ज्ञानसम्पन्न स्वार्थ की भाषा में बोल रहा है।

 

भले ही शतु आक्रान्ता हों, हमें उन्हें नहीं मारना चाहिए। पापे प्रति पापः स्यात् : एक पाप का बदला लेने के लिए दूसरा पाप मत करो।दूसरों के क्रोध को बिना क्रोध किए जीतो; बुरे काम करने वालो को साधुता से जीतो: कंजूस दान देकर जीतो और असत्य को सत्य से जीतो।"[202]

 

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान्

स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव 37।।

 

(37)        इसलिए अपने सम्बन्धी इन धृतराष्ट्र के पुत्लों को मारना हमारे लिए अि नहीं है। हे माधव (कृष्ण), अपने

इष्ट-बन्धुओं को मारकर हम किस प्रकार सुखी हो सकते हैं?

 

यद्यप्येते पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः

कुलक्षयकृतं दोष मित्रद्रोहे पातकम् 38।।

 

(38)        भले ही मन में लोभ भरा होने के कारण ये सब परिवार के विनाश की बुराई और मिलों के प्रति द्रोह

करने के पाप को देख नहीं पा रहे;

 

कथं ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्

कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन 39।।

 

(39)        परन्तु हमें तो कुल के विनाश के कारण होने वाला दोष भली भांति दिखाई पड़ रहा है। इसलिए हे

जनार्दन (कृष्ण), हमें इस पाप से दूर रहने की समझ होनी चाहिए।

 

वे लोभ से अन्धे हो गए हैं और उनका ज्ञान नष्ट हो गया है। परन्तु हमें तो दोष दिखाई पड़ रहा है। यदि हम यह मान भी लें कि वे स्वार्थभावना से और लोभ से दोषी हैं, तो भी उन्हें मारना ठीक नहीं; और यह और भी बड़ा दोष होगा, क्योंकि जो लोग अपने लोभ के कारण अन्धे हैं, उन्हें उस पाप का ज्ञान नहीं है, जिसे वे कर रहे हैं। परन्तु हमारी तो आंखें खुली हैं और हमें दीख रहा है कि हत्या करना पाप है।

 

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः

धर्मे नष्टे कुले कृत्स्रमधर्मोऽभिभवत्युत 40।।

 

(40)        कुल का विनाश हो जाने पर पुराने चले रहे कुल के धर्म अर्थात विधान नष्ट हो जाते हैं और इन धर्मो

के नष्ट हो जाने पर सारे परिवार में अधर्म फैल जाता है।

 

युद्ध हमें हमारे प्राकृतिक घरेलू परिवेश से अलग कर देते हैं और सामाजिक परम्पराओं से, जो कि लोगों के परिपक्व संकल्प और अनुभव का सार है, हमें उखाड़कर दूर फेंक देते हैं।

 

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः

स्त्रीषु दुष्टासु वाष्र्णेय जायते वर्णसंकरः 41।।

 

(41)        और जब अधर्म फैल जाता है, तब हे वाष्र्णेय (कृष्ण), परिवारों की स्त्रियां भ्रष्ट हो जाती हैं। और जब

स्त्रियां भ्रष्ट हो जाती हैं, तब वर्णसंकर अर्थात विभिन्न जातियों का मिश्रण हो जाता है।

 

सामान्यतया 'वर्ण' शब्द का अर्थ जाति किया जाता है, हालाकि वर्तमान जाति-व्यवस्था किसी प्रकार गीता के आदर्श से मेल नहीं खाती।

 

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।

पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः 42।।

 

(42)        और यह वर्णसंकर सारे परिवार को और उस परिवार को नष्ट करने वाले लोगों को नरक में पहुंचा देता

है, क्योंकि उनके पिंजरों अर्थात् पूर्वजों की आत्माएं अन्न और जल से वंचित होकर गिर पड़ती हैं।

 

यहां इस विश्वास की ओर संकेत है कि मृत पूर्वजों को अपने कल्याण के लिए अन्न और जल की बलि की आवश्यकता होती है।

 

दोषैरेतैः कुलप्तानां वर्णसंकरकारकैः

उत्सायन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः 43।।

 

(43)        कुल का विनाश करने वाले लोगों के इन दुष्कर्मों के कारण, जिनसे वर्णसंकर अर्थात् जातियों का मिश्रण

उत्पन्न होता है, सदा से चले जातिधर्म और कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं।

 

जब हम सदा से चली रही परम्पराओं में निहित आदर्शों को छिन्न-मित कर देते हैं, जब हम सामाजिक सन्तुलन को बिगाड़ देते हैं, तब हम संसार केवल अव्यवस्था फैला रहे होते हैं।

 

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन

नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम 44।।

 

(44)        हे जनार्दन (कृष्ण), हम यह सुनते आए हैं कि जिन लोगों के पारिवारिक धर्म नष्ट हो जाते हैं, उन्हें

अवश्य ही नरक में रहना पड़ता है।

 

अहो बत महत्पापं कर्तु व्यवसिता वयम्।

यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुघताः 45।।

 

(45)    रे, हम तो यह बड़ा भारी पाप करने लगे हैं, जो राज्य का आनन्द पाने के लोभ से अपने इष्ट-बन्धुओं को

मारने के लिए तैयार हो गए हैं।

 

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः

धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् 46।।

 

(46)        यदि धृतराष्ट्र के पुत्र शस्त्र हाथ में लेकर मुझे मार डालें और मैं बिना शस्त्र उठाए, बिना उनका मुकाबला

किए युद्ध में मारा जाऊं, तो वह मेरे लिए कहीं अधिक भला होगा।

 

क्षेमतरम् की जगह कहीं-कहीं एक और पाठ 'प्रियतरम्' भी है।

 

अर्जुन के शब्द तीव्र व्यथा और प्रेम में कहे गए हैं। उनका मन दो संसारों के सीमान्त पर विद्यमान है। वह कुछ करने के लिए संघर्ष कर रहा है, जैसा कि मनुष्य आदिकाल से ही संघर्ष करता रहा है और फिर भी वह कुछ निर्णय कर पाने में असमर्थ है, क्योंकि उसमें तो अपने-आप को, अपने साथियों को और उस विश्व की वास्तविक प्रकृति को ही समझ पाने की शक्ति है, जिसमें कि उसे ला खड़ा किया गया है। वह युद्ध के कारण होने वाले शारीरिक कष्ट और भौतिक असुविधाओं पर जोर दे रहा है। जीवन का मुख्य उद्देश्य भौतिक आनन्द की खोज नहीं है। यदि हम केवल वृद्धावस्था, अपंगता और मृत्यु की घटनाओं द्वारा ही जीवन के अन्त तक पहुंच जाएं, तो हम अवश्य सुरजीवन को गंवा रहे होंगे। किसी आदर्श के लिए, प्रेम और न्याय के लिए, हमे अत्याचार का विरोध करना होगा और कष्ट तथा मृत्यु का सामना करना होगा। युद्ध के ठीक किनारे पर पहुंचकर अर्जुन हिम्मत हार जाता है और हासारिकता के विचारों के कारण युद्ध से विरत हो जाना चाहता है। उसे अभी यह समझना बाकी है कि पत्नियां और सन्तानें, गुरु और सम्बन्धी केवल उनके अपने निमित्तप्रिय नहीं होते, अपितु आत्मा के निमित्त प्रिय होते हैं। अभी अर्जुन को उस गुरु की वाणी सुननी शेष है, जो यह उपदेश देता है कि उसे ऐसा जीवन व्यतीत करना चाहिए, जिसमें उसके कर्मों का मूल कामना में या इच्छा में नहीं होगा और यह कि निष्काम कर्म-अभिलाषाहीन कार्य नाम की भी कोई वस्तु होती हैं।

 

एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोस्पथ उपाविशत्

विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः 47।।

 

(47)        यह कहकर अर्जुन रणभूमि में अपना धनुष-बाण छोड़कर शोक hat R व्याकुल-चित्त होकर अपने रथ

में बैठ गया।

 

अर्जुन की यह परेशानी एक अनवरत आवर्ती दुर्दशा का एक नाटकीकरण है। उच्चतर जीवन की देहली पर खड़ा हुआ मनुष्य इस संसार की तड़क-भड़क से निराश हो जाता है; फिर भी मोह उससे चिपटे रहते हैं और वह उन्हें पालता रहता है। वह अपनी दिव्य वंश-परम्परा को भूल जाता है और अपने व्यक्तित्व में आसक्त हो जाता है और संसार की परस्पर संघर्षशील शक्तियों से उद्विग्न होने लगता है। आत्म-जगत् में जागने और उसके द्वारा लादे गए दायित्वों को स्वीकार करने से पहले उसे स्वार्थ और मूढ़ता (लोभ और मोह) रूपी शलुओं से लड़ना होगा और अपने आत्मकेन्द्रित अहंकार के अन्धकारपूर्ण अज्ञान पर विजय पानी होगी। आत्मिक स्वभाव से दूर जा पड़े मनुष्य को फिर उस तक वापस पहुंचाना होगा। यहां पर जिस वस्तु का चिलण किया गया है, वह है मानवीय आत्मा का विकास इसके लिए देश और काल की कोई सीमा नहीं है। यह युद्ध मनुष्य की आत्मा में प्रतिक्षण होता रहता है।

 

इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्ने

श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः।

 

यह है श्रीमद्भगवद्गीता उपनिषद् में, जो कि ब्रह्मविद्या, योगशास्त श्रीकृष्ण-अर्जुन-संवाद है, अर्जुन का विषादयोग नामक पहला अध्याय "[203]

 

ब्रह्मविद्या : ब्रह्म का विज्ञान वास्तविकता क्या है? क्या यह घटनाओं अनवरत क्रम ही सब-कुछ है या इनके अलावा कुछ और भी वस्तु है, जिस कभी अवक्रमण नहीं होता ? वह क्या है, जो अपने-आप को इन विविध रूपें प्रकट करने में समर्थ है? अनन्त सम्भावनाओं वाली इस समृद्ध लीला को कोर चलाता है या प्रेरित करता है? क्या उनका कोई लक्ष्य, कोई अर्थ है ? वास्तविकत की प्रकृति को समझने में हमारी सहायता करना ब्रह्मविद्या का उद्देश्य है। तार्किक गवेषणा आत्मिक ज्ञान की प्राप्ति में सहायक है। शंकराचार्य ने अपनी पुस्तक 'अपरोक्षानुभूति' में कहा है कि ज्ञान की उपलब्धि विचार के सिवाय अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती, जैसे संसार की वस्तुएं प्रकाश के बिना दिखाई नहीं पड़ सकती।[204]

 

योगशास्त्र : योग का शास्त्र। बहुत-से लोग हैं, जो समझते हैं कि दर्शन की जीवन से कोई संगति नहीं है। कहा जाता है कि दर्शन का सम्बन्ध वास्तविकता के परिवर्तन-रहित विश्व से है और जीवन का गतिविधि के अनित्य विश्व से। यह दृष्टिकोण इस तथ्य के कारण सत्य समझा जाने लगा कि पश्चिम में दार्शनिक चिन्तन उन नगर-राज्यों में सबसे पहले शुरू हुआ था, जिनमें लोगों के दो वर्ग थे; एक तो धनी और ठाली-कुलीन लोग, जो दार्शनिक चिन्तन के विलास को भोगते थे और दूसरे, बहुत बड़ी संख्या में दास लोग, जो ललित और व्यावहारिक कलाओं की साधना से वंचित थे। मार्क्स की यह आलोचना, कि दार्शनिक लोग संसार की व्याख्या करते हैं, जब कि वास्तविक कार्य इस संसार को बदलता है, गीता के रचयिता पर लागू नहीं होती; क्योंकि उसने केवल संसार की एक दार्शनिक व्याख्या, ब्रह्मविद्या, प्रस्तुत की है, अपितु उस व्यावहारिक कार्यक्रम, योगशास्त्र भी, प्रस्तुत किया है। हमारा संसार एक अद्भुत दृश्य नहीं है, कि जिसे देखकर मनन किया जाए, यह तो समर-भूमि है। केवल गीता की दृष्टि में व्यक्ति के स्वभाव में सुधार ही सामाजिक सुधार का उपाय है।

 

कृष्णार्जुन-संवाद : कृष्ण और अर्जुन के मध्य वार्तालाप गीता के रचयिता ने मनुष्य के अन्दर परमात्मा की अनुभूत विद्यमानता को नाटकीय अभिव्यक्ति प्रदान की है।

 

जब अर्जुन को अपने उचित कर्त्तव्य से विरत होने का प्रलोभन होता है, तब उसके अन्दर विद्यमान शब्द (ब्रह्म), उसकी प्रामाणिक स्फुरणा उसके लिए आदिष्ट पथ स्पष्ट कर देती है, जब कि वह अपने निम्नतर आत्म की सूक्ष्म कानाफूसियों को त्याग देने में समर्थ हो जाता है। उसकी आत्मा का आन्तरिकतम बीजांश सम्पूर्ण विश्व का भी दिव्य केन्द्र है। अर्जुन का गंभीरतम आत्म कृष्ण है।[205]' मनुष्य और परमात्मा को मध्यस्थ के रूप में किसी तीसरे पक्ष की आवश्यकता उससे अधिक नहीं है, जितनी कि दो प्रेमियों को होती है। परमात्मा के उतना निकट और कोई नहीं है, जितने कि हम स्वयं हैं और उसे पाने के लिए हमारे पास केवल प्रेमोद्दीप्त हृदय, एक विशुद्ध संकल्प होना ही काफी है। अर्जुन अपने परमात्मा के सम्मुख अनावृत और किसी भी मध्यस्थ के बिना अकेला खड़ा होता है। परमात्मा और मनुष्य के मध्य एक अविरत सम्बन्ध रहता है और उनका संवाद तब तक चलता रहता है, जब तक कि उद्देश्य की पूर्ण समस्वरता स्थापित नहीं हो जाती।

 

यह दैवीय मूल तत्व हमसे दूर नहीं है, अपितु बिलकुल निकट है। परमात्मा कोई दूरस्थ दर्शक या समस्या का दूरस्थ निर्णायक नहीं है, अपितु एक मित, सखा है, जो सदा, विहारशय्यासनभोजनेषु, हमारे साथ रहता है (11, 42) ऋग्वेद में दो पक्षियों का उल्लेख किया गया है, जिनके पंख सुन्दर है स्वभावतः मिल हैं और जो एक ही वृक्ष पर साथ-साथ रहते हैं।'[206]

विषाद : उदासी। अध्याय का अन्त निराशा और दुःख में होता है और हमें भी 'योग' कहा गया है, क्योंकि आत्मा का यह अन्धकार भी आध्यात्मिक जीक की ओर प्रगति के लिए एक आवश्यक सोपान है। हममें से अधिकांश लोग परम प्रश्नों का सामना किए बिना ही सारा जीवन बिता देते हैं। कभी विरले संकट के क्षण में ही, जब हमारी महत्वाकांक्षाएं ढेर हुई हमारे पैरों के पास पड़ी होती है। जब हमें पश्चात्ताप तथा व्यथा के साथ अनुभव होता है कि हमने अपने जीवन की क्या दुर्दशा कर डाली है, हम चिल्ला उठते हैं: "हम यहां किसलिए है?" "इस सबका क्या अर्थ है? और हमें यहां से कहां जाना है?" "मेरे परमात्मा, मेरे परमात्मा, तूने मुझे क्यों त्याग दिया है?" द्रौपदी चिल्ला उठती है : " पति मेरे हैं, पुल, सम्बन्धी, भाई, पिता मेरे हैं और हे कृष्ण, तुम भी मेरे नहीं हो। "[207]

 

अर्जुन एक महान् आत्मिक तनाव में से गुज़र रहा है। जब वह अपने-आप को सामाजिक दायित्वों से पृथक् कर लेता है और पूछता है कि उसे समाज द्वारा उससे प्रत्याशित कर्त्तव्यों को क्यों पूरा करना चाहिए, तो वह अपने सामाजिकीकृत आत्म को पीछे कर देता है और अपने-आप को व्यष्टि, एकाकी और सबसे पृथक् रूप में पूरी तरह अनुभव करता है। वह संसार के सम्मुख भयावनी अवस्था में पटक दिए गए एक अजनबी व्यक्ति के समान खड़ा होता है। यह नई स्वतन्त्रता, चिन्ता, एकाकीपन, सन्देह और असुरक्षा की गम्भीर अनुभूति उत्पन्न कर देती है। यदि उसे सफलतापूर्वक काम करना हो, तो उसे इन अनुभूतियों पर विजय पानी ही होगी।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अध्याय 2

सांख्य-सिद्धान्त और योग का अभ्यास

 

कृष्ण द्वारा अर्जुन की भर्त्सना और वीर बनने के लिए प्रोत्साहन

 

संजय उवाच

तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्

विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः 1।।

 

संजय ने कहा :

 

(1)          इस प्रकार दया से भरे हुए और आंसुओं से डबडबाई आंखों वाले अर्जुन से, जिसका मन दुःख से भरा

हुआ था, कृष्ण ने कहा :

 

अर्जुन की दया का दैवीय करुणा से कोई मेल नहीं है। यह तो एक प्रकार को स्वार्थवृत्ति है, जिसके कारण वह ऐसा कार्य करने से हिचकता है, जिसमें उसे अपने ही लोगों को चोट पहुंचानी होगी। अर्जुन एक आत्मदया की भावुकतापूर्ण मनोवृत्ति के कारण इस कार्य से पीछे हटना चाहता है और उसका गुरु कृष्ण उसको फटकारता है। कौरव लोग उसके अपने सम्बन्धी हैं, यह बात तो उसे पहले भी मालूम थी।

 

श्रीभगवानुवाच

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्

अनार्यजुष्टमस्वयंमकीर्तिकरमर्जुन 22।।

 

भगवान् कृष्ण ने कहा :

 

(2)          हे अर्जुन, तुझे यह आत्मा का कलंक (यह उदासी) इस विषम समय में कहां से लगा। यह वस्तु श्रेष्ठ

मन वाले लोगों के लिए बिलकुल अनजानी है (आर्य लोग इसे पसन्द नहीं करते), यह स्वर्ग ले जाने वाली

नहीं है और (पृथ्वी पर) यह अपयश देने वाली है।

 

अनार्यजुष्टम् : आयर्यों के अयोग्य। कुछ लोगों का कहना है कि आर्य लोग के हैं, जो आन्तरिक संस्कार और सामाजिक व्यवहार को, जिसमें कि उत्साह और सौजन्य, कुलीनता और सरल व्यवहार पर ज़ोर दिया गया है, अंगीकार करते हैं।

 

अर्जुन को संशय से छुटकारा दिलाने के प्रयन में कृष्ण आत्मा की अनश्वरता के सिद्धान्त का उल्लेख करता है और अर्जुन की प्रतिष्ठा और सैरिक परम्पराओं की भावनाओं को जगाता है। उसके सम्मुख भगवान् के प्रयोजन को प्रस्तुत करता है और इस बात का संकेत करता है कि संसार में कर्म किस प्रकार किया जाना चाहिए।

 

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप 3।।

 

(3)          हे पार्थ (अर्जुन), ऐसे नामर्द मत बनो, क्योंकि यह तुम्हें शोभा नहीं देता। इस मन की तुच्छ दुर्बलता को

त्याग दो और हे परन्तप (शतुओं को सताने वाले अर्जुन), उठकर खड़े हो जाओ।

 

अर्जुन के सन्देहों का समाधान नहीं होता

 

अर्जुन उवाच

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोण मधुसूदन

इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजाविरिसूदन 4।।

 

अर्जुन ने कहा :

 

(4)          हे मधुसूदन (कृष्ण), मैं युद्ध में भीष्म और द्रोण पर किस तरह बाण चला पाऊंगा ? हे शलुओं को मारने

वाले कृष्ण, वे तो मेरे लिए पूजनीय हैं।

 

गुरुनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तं भैक्ष्यमपीह लोके।

हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहैव भुजीय भोगानुधिरप्रदिग्धान् 5।।

 

 

(5)          इन पूजनीय गुरुओं को मारने की अपेक्षा तो इस संसार में भीख मांगकर जीना कहीं अधिक भला है।

यद्यपि उन्हें केवल अपने लाभ का ही ध्यान है, फिर भी वे मेरे गुरु हैं और उन्हें मारकर मैं केवल उन सांसारिक सुखों का उपभोग कर पाऊंगा जो उनके रक्त से सने हुए होंगे।

 

रुचिरप्रदिग्धान् : खून से सने हुए। यदि हम इतिहास के प्रत्येक रक्तरंजित पृष्ठ के पीड़ितों की दशा को हृदयंगम कर लें, यदि हम नारियों के कष्टों, शिशुओं के चीत्कारों और विपत्ति, अत्याचार तथा विविध रूपों में अन्याय के वृत्तान्तों को सुनें तो कोई भी ऐसा व्यक्ति, जिसमें ज़रा भी मानवीय अनुभूति है, इस प्रकार की रक्तरंजित विजयों में आनन्द अनुभव नहीं करेगा।

 

चैतद्वियःकतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः

यानेव हत्वा जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुख धर्तराष्ट्राः 6।।

 

(6)          हमें तो यह भी मालूम नहीं है कि हमारे लिए क्या भला है; हम उन्हें जीत लें, या वे हमें जीत लें। धृतराष्ट्र

के जिन पुत्रों को मारने के बाद हमें जीने की कोई इच्छा नहीं है, वे ही हमारे सम्मुख युद्ध में आकर खड़े हुए हैं।

 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसमूढचेताः

 यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे, शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् 7।।

 

(7)          मेरा सम्पूर्ण अपनापन (भावुकतापूर्ण) दया की दुर्बलता से ग्रस्त हो उठा है। अपने कर्त्तव्य के विषय में

मेरा चित्त मूढ़ हो गया है। इसलिए मैं तुमसे पूछता हूं। मुझे निश्चित रूप से यह बताओ कि मेरे लिए क्या

भला है। मैं तुम्हारा शिष्य हूं।[208] मैं तुम्हारी शरण में आया हूं; मुझे उपदेश दो।

 

निश्चितम् : निश्चित रूप से। अर्जुन केवल निराशा, चिन्ता या संयोगा प्रेरित नहीं है, अपितु वह निश्चय के लिए तीव्र इच्छा से भी प्रेरित है।

 

अपनी अविवेकशीलता को अनुभव करना व्यक्ति के विवेक के विक की ओर आगे बढ़ना है। अपूर्णता की सजग अनुभूति इस बात की द्योतक कि आत्मा सचेत है और जब तक वह सचेत है, वह सुधर सकती है, जैसे कि जीवित शरीर किसी जगह चोट खा जाने या कट जाने पर फिर स्वस्थ हो सक है। मानव-प्राणी पश्चाताप के संकटकाल में से गुज़रकर उच्चतर दशा की बढ़ता है।

 

जिज्ञासुओं का यह सामान्य अनुभव है कि वे जब प्रकाश की देहली पर खड़े होते हैं, तब भी वे संशयों और कठिनाइयों से ग्रस्त रहते हैं। जब प्रकाश किस आत्मा में चमकना शुरू होता है, तो वह उसके प्रतिरोध के लिए अन्धकार को भी बढ़ावा देता है। अर्जुन के सामने बाह्य और आन्तरिक कठिनाइयां, उदाहरण के लिए सम्बन्धियों और मिलों का प्रतिरोध, संशय और भय, वासनाएं और इच्छाएं विद्यमान हैं। इन सबको वेदी पर बलि कर देना होगा और ज्ञान की आग में भस्म कर देना होगा। अन्धकार के साथ संघर्ष तब तक चलता रहेगा, जब तक व्यक्ति का सम्पूर्ण अपनापन प्रकाश से भर उठे।

 

दीनता के बोझ से दबा हुआ, क्या सही है और क्या गलत, इस विषय में दुविधा में पड़ा हुआ अर्जुन अपने गुरु से, अपने अन्दर विद्यमान भगवान् से प्रकाश और पथ-प्रदर्शन प्राप्त करना चाहता है। जब किसी का संसार नष्ट हो रहा हो, तब वह केवल अन्तर्मुख होकर भगवान् की असीम दया के उपहार के रूप में ज्ञान की खोज कर सकता है।

 

अर्जुन किसी अधिविद्या की मांग नहीं करता, क्योंकि वह ज्ञान का अन्वेषक नहीं है। वह तो एक कर्मशील मनुष्य है; इसलिए वह कर्म का विधान जानना चाहता है। वह अपना कर्त्तव्य जानना चाहता है। वह जानना चाहता है कि उसे इस कठिनाई के अवसर पर क्या करना है। "स्वामी, तुम मुझसे क्या करने की अपेक्षा करते हो?"

 

अर्जुन की भांति साधक को अपनी दुर्बलता और अज्ञान को अनुभव करना होगा और फिर भी उसे परमात्मा की इच्छा के अनुसार 'कार्य करने, और वह इच्छा क्या है, इसे खोज निकालने के लिए कटिबद्ध होना होगा।

 

हि प्रपश्यामि ममापनुयाद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।

भूमावसपलमृद्धं अवाप्य राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् 8।।

 

(8)          चाहे मुझे सारी पृथ्वी का धनसम्पन्न एवं प्रतिद्वन्द्वीहीन राज्य और देवताओं का स्वामित्व भी क्यों मिल

जाए, परन्तु मुझे ऐसी कोई वस्तु दिखाई नहीं पड़ती, जो मेरे इस शोक को दूर कर सके, जो मेरी इन्द्रियों को सुखाए डाल रहा है। अर्जुन के मन के इस संघर्ष की चिकित्सा की जानी चाहिए। उसे एक नई, सम्पूर्ण और सर्वांगीण चेतना प्राप्त करनी होगी।

 

संजय उवाच

एवमुक्त्वा हृषीकेश गुडाकेशः परंतप

योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूवह 9।।

 

संजय ने कहा :

 

(9)          इस प्रकार पराक्रमी गुडाकेश (अर्जुन) ने हृषीकेश (कृष्ण) से ऐसा कहने के बाद गोविन्द (कृष्ण) से ऐसा

कहा कि मैं युद्ध नहीं करूंगा और चुप हो गया।

 

योत्स्ये : मैं युद्ध नहीं करूंगा।' ऐसा प्रतीत होता है कि अर्जुन ने गुरु की सलाह की प्रतीक्षा किये बिना इस विषय में अपना मन बना लिया है। वह गुरु से उपदेश देने के लिए तो कहता है, परन्तु उसका मन उपदेश को ग्रहण करने के लिए खुला हुआ नहीं है। इस कारण गुरु का कार्य और भी कठिन हो जाता है।

 

गोविन्द : इस शब्द द्वारा गुरु की सर्वज्ञता सूचित की गई है।'[209]

तूष्णीं बभूव : चुप हो गया। सत्य का स्वर केवल शान्त होने पर ही सुन जा सकता है।

 

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत

सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः 10।।

 

(10)        हे भारत (धृतराष्ट्र), इस प्रकार दोनों सेनाओं के मध्य में विषादग्रस्त होकर बैठे हुए उस अर्जुन से हृषीकेश (कृष्ण) ने हंसते-से हुए कहा- विषाद के उस क्षण में अर्जुन के डूबते हुए हृदय ने कृष्ण की दिव्यवाणी सुनी। हंसी इस बात की द्योतक है कि उसने अर्जुन के बुद्धिवाद के प्रति प्रयत्न को, या जिसे आजकल सतृष्ण चिन्तन कहा जाता है, उसे भांप लिया था। रक्षक भगवान् का, जिसे कष्ट पाती हुई मानवता के समस्त पापों और दुःखों का ज्ञान है, रुख प्रेममय दया और उत्सुकतापूर्ण विवेक का है।

 

आत्मा और शरीर के भेद का निरूपण : हमें उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए, जो अनश्वर है

 

श्री भगवानुवाच

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे

गतासूनगतासुंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः 11।।

 

श्री भगवान् ने कहा :

 

(11)        तू उनके लिए तो शोक कर रहा है, जिनके लिए तुझे शोक नहीं करना चाहिए और फिर भी तू ज्ञान की

बातें करता है। ज्ञानी लोग मृतों के लिए या जीवितों के लिए शोक नहीं किया करते।

 

कश्मीर के संस्करण में यह मिलता है : "तू बुद्धिमान व्यक्ति की तरह बात नहीं कर रहा" : "प्राज्ञवन्नाभिभाषसे'[210]

 

यहां गुरु 11 से लेकर 38 तक के श्लोकों में संक्षेप में सांख्यदर्शन के ज्ञान की व्याख्या करता है। यह सांख्य कपिल का सांख्यदर्शन नहीं है, अपितु उपनिषदों का सांख्यदर्शन है।

 

त्वेवाहं जातु नासं त्वं नेमे जनाधिपाः

चैव भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् 12।।

 

(12)        ऐसा कोई समय नहीं था, जब मैं नहीं था या तू नहीं था या ये सब राजा नहीं थे और कभी कोई ऐसा

समय आएगा, जब कि हम सब इसके बाद नहीं रहेंगे।

 

शंकराचार्य इस अनेकता के उल्लेख को केवल रूढ़ मानते हैं। उनकी युक्ति है कि बहुवचन का प्रयोग केवल शरीरों के लिए किया गया है, जो कि अलग- अलग हैं, एक विश्वजनीन आत्मा के लिए नहीं।'[211]

 

रामानुज कृष्ण, अर्जुन और राजाओं में किए गए भेद पर ज़ोर देता है और उसे अन्तिम मानता है और उसका विचार है कि प्रत्येक व्यक्तिगत आत्मा अनश्वर है और समस्त विश्व के साथ समयुगीन है।

 

यहां पर परमं आत्मा की शाश्वतता की ओर संकेत नहीं है, अपितु अनुभवजन्य अहम् की पूर्वसत्ता और उत्तरसत्ता की ओर संकेत है। अहम् की अनेकता अनुभवसिद्ध विश्व का एकत्व है। प्रत्येक व्यक्ति प्रारम्भिक अनस्तित्व से वास्तविक के रूप में पूर्ण अस्तित्व की ओर, असत् से सत् की ओर आरोहण कर रहा है। जहां सांख्य-प्रणाली में आत्माओं की अनेकता स्थापित की गई है, वहां गीता इस अनेकता का मेल एकता से बिठा देती है। क्षेतज्ञ एक है, जिसमें हम जीते हैं, चलते-फिरते हैं और जिसमें हमारा अस्तित्व है। ब्रह्म सब वस्तुओं का आधार है और वह अपने-आप में कोई वस्तु नहीं है। ब्रह्म काल में नहीं रहता, अपितु काल ब्रह्म में रहता है। इस अर्थ में भी जीवों का कोई आदि है, अन्त आत्माएं ब्रह्म की भांति हैं, क्योंकि कारण और कार्य मूलतः एक है, जैसा कि "मैं ब्रह्म हूँ", "वह तू है" इत्यादि उक्तियों से सूचित होता है। सूसो से तुलना कीजिए : "सब प्राणी दिव्य मूल तत्व में अपने आदर्श की भांति शाश्वत काल से विद्यमान चले रहे हैं। सब वस्तुएं, जहां तक वे अपने दिव्य आदर्श के अनुकूल-अनुरूप हैं, उनकी सृष्टि होने से पहले भी परमात्मा के साथ एकरूपता में विद्यमान थीं।"

 

व्यक्तिक ईश्वर, दिव्य स्रष्टा, अनुभवजन्य विश्व का समकालीन है। वह अनुभवगम्य अस्तित्वों का पूर्णरूप है। "जीवों का स्वामी गर्भ के अन्दर विचरण करता है। जन्म बिना लिये भी वह अनेक रूपों में जन्म लेता है।"[212]

 

शंकराचार्य का कथन है कि "वस्तुतः केवल परमात्मा ही है, जो पुनर्जन्म लेता है। "[213] इसकी पास्कल के इस वक्तव्य से तुलना कीजिए कि इस संसार का अन्त होने तक ईसा कष्ट सहता रहेगा। मानवता पर जो आघात किए जाते हैं, उन्हें वह अपने ऊपर ले लेता है। सिरजी गई वस्तुओं की दशाओं को वह सहन करता है। मुक्त आत्माएं जब तक काल है, तब तक कष्ट उठाती हैं और काल की समाप्ति होने पर शान्ति में प्रवेश करती हैं, हालांकि वे दिव्य जीवन में इस समय भी भाग लेती हैं। अन्तर इतना है कि व्यक्तिक भगवान् ने स्वेच्छा से अपने-आप को सीमित किया हुआ है, जब कि हम विवशता के कारण सीमित हैं। यदि वह भगवान् प्रकृति के इस नाटक का स्वामी है, तो हम इसके नाटक के अधीन पान है। अज्ञान व्यक्तिगत आत्मा पर प्रभाव डालता है, परन्तु विश्वजनीन आत्मा पर नहीं। जब तक विश्व की प्रक्रिया समाप्त हो, तब तक व्यक्तियों की अनेकता और उनके पृथक् पृथक् गुण विद्यमान रहते हैं। यह बहुविधता सृष्टि से पृथक् नहीं की जा सकती। मुक्त आत्माएं सत्य को जानती हैं और उसी में जीवन बिताती हैं, जब कि अमुक्त आत्माएं कर्म के बन्धन में फंसी हुई एक जन्म के बाद दूसरा जन्म लेती जाती हैं।

 

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्षीरस्तल मुह्यति 13।।

 

(13)        जैसे इस शरीर में आत्मा बचपन से यौवन और वार्धक्य में से गुज़रता है उसी प्रकार की वस्तु इसका

दूसरा शरीर धारण कर लेना है। धीर व्यक्ति इससे घबराता नहीं।

 

तुलना कीजिए, विष्णुस्मृति : 20, 491

 

मानव-प्राणी जन्म और मरण की एक श्रृंखला में से गुजरकर अपने-आप की अमरता के योग्य बना लेता है। शरीर में होने वाले परिवर्तनों का अर्थ आत्मा में परिवर्तन नहीं है। इसके द्वारा धारण किए गए शरीरों में से कोई भी नित्य नहीं है।

 

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत 14।।

 

(14)        हे कुन्ती के पुल (अर्जुन), वस्तुओं के साथ सम्पर्क के कारण ठण्ड और गर्मी, सुख और दुःख उत्पन्न होते

हैं। वे आते हैं और चले जाते हैं; सदा के लिए नहीं रहते। हे भारत (अर्जुन), उनको सहन करना सीख

 

ये विरोधी वस्तुएं सीमित और सामयिक कारणों पर निर्भर हैं, जब कि ब्रह्म का आनन्द सार्वभौम, स्वतः विद्यमान, और विशिष्ट कारणों एवं वस्तुओं से निरपेक्ष है। यह अविभाज्य सत्ता उस अहंकारात्मक अस्तित्व के सुख और दुःख की घट-बढ़ का समर्थन करती है, जो इस बहुविध विश्व के सम्पर्क में आता है। सुख और दुःख की ये मनोवृत्तियां स्वभाव की शक्ति द्वारा निर्धारित होती हैं। ऐसा कोई बन्धन नहीं है कि सफलता पर प्रसन्न और विफलता पर दुःखी हुआ ही जाए। हम इन दोनों में पूर्णतया उदासीन रह सकते हैं। यह अहम् की चेतना है, जो आनन्द मनाती है और कष्ट पाती है और यह तब तक ऐसा करती रहेगी, जब तक कि यह जीवन और शरीर के उपयोग द्वारा बंधी हुई है और अपने ज्ञान और कर्म के लिए उन पर निर्भर है। परन्तु जब मन स्वतन्त्र और उदासीन हो जाता है और एक रहस्यपूर्ण शान्ति में मग्न हो जाता है, जब इसकी चेतना प्रबुद्ध हो जाती है, तब जो भी कुछ घटित होता है, उसे यह प्रसन्नता से स्वीकार कर लेता है, क्योंकि यह जानता है कि ये सब सम्पर्क तो आने-जाने वाले हैं। ये उनके अपने अंग नहीं हैं, भले ही ये उसके साथ घटित होते हैं।[214]'

 

यं हि व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते 15।।

 

(15)        हे मनुष्यों में श्रेष्ठ (अर्जुन), जिस मनुष्य को ये दुःखी नहीं करते, जो दुःस और सुख में समान रहता है, जो

ज्ञानी है, वह अपने-आप को अपन जीवन के लिए उपयुक्त बनाता है।

 

अमर जीवन मृत्यु के बचे रहने से भिन्न वस्तु है, जो प्रत्येक प्राणधारी को दिया गया है। यह जीवन और मरण से ऊपर उठ जाना है। शोक और दुःख के अधीन रहना, भौतिक घटनाओं से विक्षुब्ध हो उठना और उनके कारण अपने निश्चित कर्त्तव्य के पथ से, 'नियतं कर्म से, विचलित हो जाना इस बात को प्रकट करता है कि हम अब भी अविद्या या अज्ञान के शिकार हैं।

 

नासतो अविद्यते भावो नाभावो अविद्यते सतः

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः 16।।

 

(16)        जिसका अस्तित्व नहीं है, उसका अस्तित्व हो नहीं सकता; और जिसका अस्तित्व है, उसका अस्तित्व

मिट नहीं सकता। इन दो बातों के विषय में सत्य के देखने वालों ने यह ठीक-ठीक निष्कर्ष निकाल लिया है।

 

सदाख्यं ब्रह्म : शंकराचार्य ने वास्तविक (सत्) की परिभाषा करते हुए कहा है कि यह वह वस्तु है, जिसके सम्बन्ध में हमारी चेतना कभी विफल नहीं होती; और अवास्तविक (असत्) वह वस्तु है, जिसके सम्बन्ध में हमारी चेतना विफल रहती है।'[215] पदार्थों के सम्बन्ध में हमारी चेतना बदलती रहती है, परन्तु अस्तित्व के सम्बन्ध में नहीं बदलती। अवास्तविक ने, जो कि इस संसार का एक क्षणिक प्रदर्शन-माल है, अपरिवर्तनशील वास्तविकता को ढका हुआ है, जो नित्य प्रकट रहने वाली है।

 

रामानुज के मतानुसार शरीर है और वास्तविक आत्मा है।

 

मध्व ने इस श्लोक के प्रथम चतुर्थांश की व्याख्या में कहा है कि यह द्वैत का प्रतिपादक है; अविद्यते अभावः अव्यक्त प्रकृति का विनाश नहीं हो सकता। सत् वैसे ही अविनश्वर है।

 

अविनाशि तु तद्धिद्धि येन सर्वमिदं ततम्।

विनाशमव्ययस्यास्य कश्चित्कर्तुमर्हति 17।।

 

(17)        इस बात को समझ लो कि जिससे यह सब व्याप्त है, वह अविनश्वर है। इस अपरिवर्तनीय अस्तित्व का

विनाश कोई भी नहीं कर सकता।

 

ततम् : छाया हुआ, व्याप्त। साथ ही देखिए 8, 22, 46; 9, 4; 11, 38 और महाभारत 12, 240, 201 शंकराचार्य ने 'व्याप्तम्' शब्द का प्रयोग किया है।

 

ईश्वर, सर्वोच्च भगवान्, भी अपना विनाश नहीं कर सकता।'[216] यह सत्य स्वतः सिद्ध है। यह बात किसी को भी अज्ञात नहीं है।[217] धर्मग्रन्थ परमात्मा पर विजातीय गुणों के धोपे जाने या अध्यारोपण को हटाने में सहायता देते हैं, बिलकुल अज्ञात वस्तु को प्रकट करने में नहीं।

 

आत्मतत्व से रामानुज का अभिप्राय संख्या-सम्बन्धी अनेकता के बीच गुणात्मक एकता और समानता से है।

 

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः

अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माधुध्यस्व भारत 18।।

 

(18)        यह कहा गया है कि शाश्वत आत्मा के, जो अविनाशी और अज्ञेय है, ये शरीर तो नष्ट होने वाले हैं।

इसलिए हे अर्जुन, तू युद्ध कर।

 

यहां शरीरी शब्द व्यक्ति के सच्चे आत्म की ओर संकेत करता है, जैसा कि शारीरिक मीमांसा[218] वाक्यांश में किया गया है, जो व्यक्ति के आत्म की प्रकृति के सम्बन्ध में एक अनुसन्धान है। यह अज्ञेय है, क्योंकि इसे ज्ञान के सामान्य साधनों से जाना नहीं जा सकता।

 

एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।

उभौ तौ विजानीतो नायं हन्ति हन्यते 19।।

 

(19)        जो यह सोचता है कि वह मारता है, और जो यह सोचता है कि वह मारा जाना है, वे दोनों ही सत्य को

नहीं जानते। यह आत्मा तो मारता है और मारा जाता है।

 

यहां लेखक आत्म और अनात्म में, सांख्य के पुरुष और प्रकृति में भेद कर रहा है।'[219]

 

जायते म्रियते वा कदाचि- नायं भूत्वा भविता वा भूयः

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो हन्यते हन्यमाने शरीरे 20।।

 

(20)        वह कभी जन्म नहीं लेता और कभी वह मरता ही है। एक बार अस्तित्व में जाने के बाद उसका

अस्तित्व फिर कभी समाप्त नहीं होगा। वह अजन्मा, शाश्वत, नित्य और प्राचीन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मरता।

 

देखिए कठोपनिषद्, 2, 18 तुलना कीजिए, वधेनास्य हन्यते छान्दोग्य उपनिषद्, 8, 1, 5 यहां आत्मा का वर्णन इस रूप में किया गया है कि वह 'अस्तित्व में आई है।' दिव्य रूप में यह सदा रहने वाली है और इसे अपना अस्तित्व परमात्मा से प्राप्त होता है।

 

शंकराचार्य ने इस वाक्यांश का इस प्रकार सन्धिविच्छेद किया है : भूत्वा अभविता

 

 

वेदाविनाशिनं नित्यं एनमजमव्ययम्।

कथं पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् 21।।

 

(21)        जो यह जानता है कि यह अविनाश्य और शाश्वत है, यह अजन्मा और अपरिवर्तनशील है, हे पार्थ (अर्जुन), इस प्रकार का मनुष्य कैसे किसी को मार सकता है या किसी को मरवा सकता है?

 

जब हमें मालूम है कि आत्मा अजेय है, तब कोई इसे कैसे मार सकता है!

 

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही 22।।

 

(22)        जैसे कोई व्यक्ति फटे-पुराने कपड़ों को उतार देता है और दूसरे नये कपड़े पहन लेता है, उसी प्रकार

यह धारण करने वाली आत्मा जीर्ण- शीर्ण शरीरों का त्याग कर अन्य नये शरीरों को धारण कर लेती है।

 

शाश्वत आत्मा एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं चलती-फिरती, परन्तु शरीरधारिणी आत्मा एक स्थान से दूसरे स्थान तक आती-जाती है। यह हर बार जन्म लेती है और यह प्रकृति की सामग्री में से अपने अतीत के विकास और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार एक मन, जीवन और शरीर को अपने आसपास समेट लेती है। आत्मिक अस्तित्व विज्ञान है, जो शरीर (अन्न), जीवन (प्राण) और मन (मनस) के लिविध रूपों को संभाले रखता है। जब सारा भौतिक शरीर नष्ट हो जाता है, तब भी आत्मा के वाहन के रूप में प्राण और मन के कोश बचे रहते हैं। पुनर्जन्म प्रकृति का नियम है। जीवन के विविध रूपों के मध्य एक सोद्देश्य सम्बन्ध है। कठोपनिषद् से तुलना कीजिए, 1 ,61 ''अन्न की तरह मनुष्य पकता है और अन्न की तरह वह फिर जन्म लेता है।"

 

आत्मा के लिए शरीर अनिवार्य जान पड़ता है। तब क्या शरीर को मारना उचित है? सुनिर्दिष्ट सत्ता के संसार का भी एक विशेष अर्थ है।

 

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः

चैनं क्लेदयन्त्यापो शोषयति मारुतः 23।।

 

(23)        शस्त्र इस आत्मा को छेद नहीं पाते और अग्नि इसे जला पाती है। पानी इसे गीला नहीं करता और

वायु ही इसे सुखाती है।

 

अच्छेद्योऽयमदायोऽयमक्लेयोऽशोष्यएवच

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः 24।।

 

(24)        इसे छेदा नहीं जा सकता; इसे जलाया नहीं जा सकता; इसे किया जा सकता है और इसे सुखाया

जा सकता है। वह नित्य है, यह अन्दर व्याप्त है, अपरिवर्तनशील है और अचल है। यह सदा एक रहता है।

 

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते

तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि 25।।

 

(25)        इसे अव्यक्त, अचिन्तनीय और अविकार्य कहा जाता है। इसलिए उसके ऐसा समझते हुए तुझे शोक

नहीं करना चाहिए।

 

यहां पर जिस वस्तु का वर्णन है, वह साफ़-साफ़ सांख्य का पुरुष है। उपनिषदों का ब्रह्म नहीं। पुरुष रूप या विचार की पहुंच से परे है और जिन परिवर्तनों का मन, प्राण और शरीर पर प्रभाव पड़ता है, वे उसे स्पर्श नहीं करते। यदि इस बात को परमात्मा पर भी लागू किया जाए, जो कि एक ही सर्वव्यापी है, तो भी वह अचिन्त्य और अविकार्य आत्मा है, जिसका अर्थ यहां अपेक्षित है। अर्जुन का शोक अस्थान में है, क्योंकि आत्मा को चोट पहुंचाई जा सकती है। और मारा जा सकता है। रूप बदल सकते हैं, वस्तुएं आनी-जानी हैं, परन्तु उन सबके पीछे जो वस्तु विद्यमान है, वह सदा एक ही रहती है।[220]

 

जो नाशवान है उसके लिए हमें शोक नहीं करना चाहिए

 

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्

तथापि त्वं महाबाहो नैव शोचितुमर्हसि 26।।

 

(26)        और यदि तू यह भी समझे कि आत्मा नित्य जन्म लेता है और नित्य मरता है, तो भी हे महाबाहु (अर्जुन), तुझे शोक करना उचित नहीं है।

 

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युधुवं मृतस्य च।

तस्मादपरिहार्येऽर्थे त्वं शोचितुमर्हसि 27।।

 

(27)        क्योंकि जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु सुनिश्चित है; और जो मर चुका है, उसका जन्म लेना सुनिश्चित है।

इसलिए जिससे बचा ही नहीं जा सकता, उसके लिए तुझे शोक नहीं करना चाहिए।

 

तुलना कीजिए : "इस अस्तित्व के घूमते हुए संसार में कौन मरा हुआ व्यक्ति फिर जन्म नहीं लेता ?”[221] इस तथ्य को हृदयंगम करने से हमारे अन्दर सन्तुलन और अनुपात जाएगा।[222]

 

हमारा जीवन लघु है और मृत्यु सुनिश्चित है। हमारे मानवीय गौरव की यह मांग है कि हम ठीक बात के लिए कष्ट और दुःख को स्वीकार करें।

 

परन्तु मृत्यु की अनिवार्यता हत्याओं को, आत्महत्याओं को और युद्धों को उचित नहीं ठहरा सकती। केवल इसलिए कि सब भनुष्यों को अवश्य मरना है हम जानबूझकर अन्य लोगों की मृत्यु की कामना नहीं कर सकते। सही बात पह है कि सम्पूर्ण जीवन का अन्त मृत्यु में है: सारी प्रगति नाशवान् है और सांसारिक अर्थ में कोई भी वस्तु नित्य नहीं है। परन्तु जीवन की प्रत्येक पूर्ण उपलब्धि में है लक्ष्य का केवल साधनमात्र है। जिस वस्तु पर परिवर्तन या समय का पूरी तरह प्रभाव पड़ता है, उसका कोई अपना आन्तरिक महत्व नहीं है। शाश्वत योजना यह केन्द्रीय सत्य है कि विश्व की घटनाएं पृथ्वी पर उसे पूरी तरह कार्यान्वित होने का अवसर देती हैं या नहीं।

 

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत

अव्यक्तनिधनान्येव तत्नल का परिदेवना 28।।

 

(28)        सब प्राणियों का आदि या आरम्भ अप्रकट है। उनका मध्यभाग प्रकट है और उनका अन्त फिर अप्रकट

है। हे अर्जुन इसमें विलाप करने की क्या बात है?

 

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।

आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येन वेद चैव कश्चित् 29।।

 

(29)        कोई उसे एक अद्भुत वस्तु के रूप में देख पाता है। कोई दूसरा उसका वर्णन एक अद्भुत वस्तु के

रूप में करता है और कोई अन्य एक अद्भुत वस्तु के रूप में उसे सुनता है; पर सुनकर भी उसे कोई जान नहीं पाता।

 

यद्यपि आत्मा के सत्य तक पहुंचने के लिए सब लोग स्वतन्त्र हैं, फिर भी उस तक केवल वे बहुत थोड़े-से लोग पहुंच पाते हैं, जो उसका मूल्य आत्म- अनुशासन, स्थिरता और वैराग्य के रूप में देने को तैयार रहते हैं। यद्यपि सत्य तक पहुंचने का मार्ग सबके लिए खुला है, फिर भी हममें से अनेक को उसे खोजने के लिए कोई प्रेरणा ही अनुभव नहीं होती। जिनको प्रेरणा अनुभव होती है, उनमें से अनेक संशय और दुविधा के शिकार रहते हैं। जिन लोगों को कोई संशय नहीं भी होता, उनमें से भी अनेक कठिनाइयों से डर जाते हैं। केवल हुए विरली आत्माएं ही संकटों हो पाती है। का सामना करने और लक्ष्य तक पहुंचने में सफल

 

कठोपनिषद से तुलना कीजिए 2, 7 "जब व्यक्ति उसे देख भी लेता है, सुन भी लेता है और उसके बारे में घोषणा भी कर देता है, तब भी उसे कोई समझ नहीं पाता।" - शंकराचार्य।

 

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।

तस्मात्सर्वाणि भूतानि त्वं शोचितुमर्हसि 30।।

 

(30)        हे भारत (अर्जुन), सबके शरीर में निवास करने वाला (आत्मा) शाश्वत है और वह कभी मारा नहीं जा

सकता। अतः तुझे किसी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

 

मनुष्य आत्मा का, जो कि अमर है, और शरीर का, जो कि मरणशील है, समास है। यदि हम यह भी मान लें कि शरीर स्वभावतः मरणशील है, तो भी क्योंकि वह आत्मा के हितों की रक्षा का साधन है, इसलिए उसकी भी सुरक्षा की जानी चाहिए। अपने-आप में यह कोई सन्तोषजनक युक्ति नहीं है, इसलिए कृष्ण योद्धा के रूप में अर्जुन के कर्त्तव्य का उल्लेख करता है।

 

कर्तव्य-भावना को जगाने का प्रयास

 

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य विकम्पितुमर्हसि।

 धर्म्यद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षनियस्य विद्यते 31।।

 

(31)        इसके अतिरिक्त अपने कर्त्तव्य का ध्यान करते हुए भी तुझे विचलित नहीं होना चाहिए। क्षत्रिय के लिए

धर्मयुद्ध से बढ़कर और कोई कर्त्तव्य नहीं है।

 

उसका स्वधर्म अर्थात् कर्म का नियम उससे युद्ध में लड़ने की मांग करता है। यदि आवश्यकता हो, तो सत्य की रक्षा के लिए युद्ध करना क्षलिय का सामाजिक कर्त्तव्य है। संन्यास उसका कर्त्तव्य नहीं है। उसका कर्त्तव्य शक्ति के प्रयोग द्वारा व्यवस्था बनाए रखना है, 'सिर घुटाकर' साधु बन जाना नहीं।'[223] कृष्ण अर्जुन को बतलाता है कि योद्धाओं के लिए न्यायोचित पुद अधिक अच्छा और कोई कर्त्तव्य नहीं है। सीधा स्वर्ग ले जाता है। यह एक ऐसा विशेषाधिकार है

 

यहच्छ्या चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।

सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् 32।।

 

(32)        हे पार्थ (अर्जुन), वे क्षत्रिय सुखी हैं, जिन्हें संयोग से इस प्रकार का युद्ध इस लड़ने का अवसर प्राप्त होता

है। यह युद्ध मानो स्वर्ग का खुला हुआ द्वार है।

 

क्षत्रिय का सुख घरेलू आनन्द और उपभोग में नहीं है, अपितु न्यायोचित की रक्षा के लिए लड़ने में है।[224]

 

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्य संग्रामं करिष्यसि

ततः स्वधर्म कीर्ति हित्वा पापमवाप्स्यसि 33।।

 

(33)        यदि तू इस धर्मयुद्ध को लड़ेगा, तो तू अपने कर्त्तव्य और यश से च्युत हो रहा होगा और तू पाप का

भागी बनेगा

 

जब न्याय और अन्याय के बीच संघर्ष चल रहा हो, उस समय जो व्यक्ति मिथ्या भावुकता या दुर्बलता या कायरता के कारण उस युद्ध से अलग रहे, वह पाप कर रहा होता है।

 

अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्

सम्भावितस्य चाकीर्ति मरणादतिरिच्यते 34।।

 

(34)        इसके अतिरिक्त मनुष्य सदा तेरे अपयश की बातें कहा करेंगे; और जो आदमी सम्मानित रह चुका हो,

उसके लिए बदनामी मृत्यु से भी कहीं बुरी है।

 

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः

येषां त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् 35।।

 

(35)        ये बड़े-बड़े योद्धा यह समझेंगे कि तू भय के कारण युद्ध से विमुख हो गया है और जो लोग तेरा बहुत

आदर करते थे, वे तुझे बहुत छोटा समझने लगेंगे।

 

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः

निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुःखतरं नु किम् 36।।

 

(36)        तेरे शतु तेरे बल की निन्दा करते हुए बहुत-सी अनकहनी बातें कहेंगे। इससे बढ़कर और दुःख की क्या

बात हो सकती है!

 

इसका गीता की इस मूल शिक्षा के साथ वैषम्य देखिए कि मनुष्य को स्तुति और निन्दा के प्रति उदासीन रहना चाहिए।

 

हतोवाप्राप्स्यसिस्वर्गजित्वावा भोक्ष्यसेमहीम्

तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः 37।।

 

(37)        यदि तू युद्ध में मारा गया तो तू स्वर्ग पहुंचेगा; यदि तू विजयी हुआ तो तू पृथ्वी का उपभोग करेगा।

इसलिए हे कुन्ती के पुल (अर्जुन), तू लड़ने का निश्चय करके खड़ा हो।

 

चाहे हम आधिविद्यक सत्य को देखें, चाहे सामाजिक कर्त्तव्य को; हमारा मार्ग स्पष्ट है। ठीक भावना से अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए कहीं ऊंचा उठ पाना सम्भव है; और अगले श्लोक में कृष्ण उस सही भावना का संकेत करता है।

 

सुखदुःखे समे कृत्वा लामालाभौ जयाजयौ

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि 38।।

 

(38)        सुख और दुःख को, लाभ और हानि को, जय और पराजय को समते पु समझ और युद्ध के लिए तैयार

हो जा; तब तुझे पाप नहीं लगेगा।

 

इस पर भी, इससे पहले के श्लोकों में कृष्ण ने लज्जा का विचार करने प्रति स्वर्ग की प्राप्ति पर और भौतिक प्रभुत्व पर जोर दिया है। सांसारिक बातो कहने के बाद अब वह घोषणा करता है कि इस युद्ध को समबुद्धि की भावन करना होगा। परिवर्तन की अधीरतापूर्ण इच्छा के सम्मुख झुके बिना, भावुकताल उतार-चढ़ावों के अधीन हुए बिना हमें अपने-आप को सौंपे गए काम को परिस्थितियों में रहते हुए करना है, जिनमें हमें ला खड़ा किया गया है। जब हमें शाश्वत भगवान् में विश्वास हो जाता है, और हम उसकी वास्तविकता को अनुभव कर लेते हैं, तब इस संसार के कष्ट हमें विचलित नहीं करते [225] जो व्यक्ति अपने जीवन के सच्चे लक्ष्य को खोज निकालता है और अपने-आप को पूरी तरह उसके लिए समर्पित कर देता है, वह महात्मा है। भले ही उससे बाकी सब चीजें छीन ली जाएं, भले ही उसे नंगा, भूखा और अकेला सड़कों पर भटकना पड़े, भले ही उसे कोई ऐसा मानव-प्राणी दिखाई पड़ता हो, जिससे वह आंखें मिला सके और उससे सहानुभूति पा सके, फिर भी वह मुस्कुराता हुआ अपनी राह पर चलता जाएगा, क्योंकि उसे आन्तरिक स्वाधीनता प्राप्त हो चुकी है।

 

योग की अन्तर्दृष्टि

 

एषा तेभिहिता सांख्ये बुद्धिोंगे त्विमां श्रृणु

बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि 39।।

 

(39)        हे पार्थ (अर्जुन), यह मैंने तुझे सांख्य का ज्ञान बताया है। अब तू योग का ज्ञान सुन। इस ज्ञान को ग्रहण

करके तू कर्म के बन्धनों को परे फेंक देगा।

 

गीता में सांख्य शब्द से अभिप्राय सांख्यदर्शन की प्रणाली से नहीं है और योग का ही अर्थ पातंजल योग है। सांख्य के दार्शनिक सम्प्रदाय में स्पष्ट रूप से पुरुष (आत्मा) और प्रकृति (अनात्मा) के द्वैत को स्थापित किया गया है, परन्तु गीता उसके ऊपर उठ गई है और इसमें एक परमात्मा की वास्तविकता का प्रतिपादन किया गया है, जो सबका स्वामी है। सांख्य अपरिवर्तनशील परमात्मा की स्फुरणा का बौद्धिक विवरण प्रस्तुत करता है। यह ज्ञानयोग है। कार्य का और कर्मयोग है। देखिए 3, 3 अब तक जिस ज्ञान का वर्णन किया गया है, वह केवल वार्तालाप या विद्वत्तापूर्ण वाद-विवाद की वस्तु नहीं है। उसका आन्तरिक रूप से अनुभव होना चाहिए। गीता में सांख्य ज्ञान पर और इच्छा के परित्याग पर जोर देता है और योग कर्म पर। जो इस बात को जानता है कि आत्मा और शरीर पृथक् हैं, कि आत्मा अविनश्वर है और संसार की घटनाओं से विचलित नहीं होता, उसे किस प्रकार का आचरण करना चाहिए? यहां पर गुरु कृष्ण बुद्धियोग का, अर्थात् बुद्धि या समझ को एकाग्र करने का, विकास करता है। बुद्धि केवल धारणाओं को बनाने की क्षमता-भर नहीं है। इसे पहचानने और वस्तुओं में विभेद करने का कार्य भी करना पड़ता है। समझ या बुद्धि को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि उससे अन्तर्दृष्टि स्थिरता और समता (अनुकूल और प्रतिकूल वस्तु में समत्व का भाव) प्राप्त हो सके। मन का सम्बन्ध इन्द्रियों से हो, इसके बजाय मन को बुद्धि द्वारा मार्ग दिखाया जाना चाहिए, जो कि मन की अपेक्षा उच्चतर है। 3, 42 मन को बुद्धि के साथ जोड़ा जाना चाहिए (बुद्धियुक्त)

 

यहां शास्त्रीय सांख्यदर्शन का, जो कि गीता के समय निर्माण की दशा में था, प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इसके अनुसार पुरुष निष्क्रिय है और वस्तुतः उसका बन्धन और मुक्ति से कोई वास्ता नहीं है। बन्धन और मोक्ष मूलतः बुद्धि के कार्य हैं। यह बुद्धि चौबीस मूल तत्वों[226] में से एक है। प्रकृति में से क्रमशः भौतिक तत्व की पांच तात्त्विक दशाओं का आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी का-और भौतिक तत्व के पांच सूक्ष्म गुणों का शब्द, स्पर्श, रूप, स्वाद, गन्ध का तथा बुद्धि या महत् का, जो ज्ञान और संकल्प का विभेदक तत्व है तथा अहंकार या 'मैं' की भावना का और अपने दसों इन्द्रिय-सम्बन्धी कृत्यों-पांच ज्ञानेंद्रियों और पांच कर्मेन्द्रियों के कृत्यों- के साथ मन का विकास होता है। बुद्धि पुरुष प्रकृति के भेद को हृदयंगम कर लेती है, तब मुक्ति प्राप्त हो जाती है। इस दृष्टिकोण को गीता के ईश्वरवाद के अनुकूल ढाल लिया गया है। बुद्धि शरीर रूपी रथ का सारथी है। इस रथ को इन्द्रियों के घोड़े खींच रहे हैं, जिनकी रासों में मन संभाले हुए है। आत्मा बुद्धि से ऊपर है, परन्तु वह केवल निष्क्रिय साक्षी मात्र है। कठोपनिषद में बुद्धि को सारथी बताया गया है, जो मन द्वारा इन्द्रियों का नियन्त्रण करती है और उसे आत्मा को जानने में समर्थ बनाती है।'[227] यदि वृद्धि आत्मा की चेतना से प्रकाशित हो उठे और उसे अपने जीवन का प्रेरक प्रकार बना ले, तो उसका मार्गदर्शन विश्व के प्रयोजन के साथ समस्वर हो जाएगा। यदि आत्मा का प्रकाश बुद्धि में समुचित रूप से प्रतिफलित होता हो, अर्थात् यदि बुद्धि सब मलिन करने वाली प्रवृत्तियों से स्वच्छ कर दी जाए तो वह प्रकाश विकृत नहीं होगा और बुद्धि का आत्मा के साथ मेल रहेगा। अहंकार और पृथकत्व की भावनाएं उस समस्वरता के दर्शन से समाप्त हो जाएंगी, जिसमें प्रत्येक वस्तु सबमें और सब वस्तुएं प्रत्येक में विद्यमान हैं।

 

गीता में सांख्य और योग परस्पर बेमेल प्रणालियां नहीं हैं। उनका उद्देश्य एक ही है, परन्तु उनकी पद्धतियां भिन्न हैं।

 

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो विद्यते

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् 40।।

 

(40)        इस मार्ग में किया गया कोई प्रयत्ल कभी नष्ट नहीं होता और कोई बाधा ही बनी रहती है। इस धर्म का

थोड़ा-सा अंश भी बड़े भारी भय से रक्षा करता है।

 

कोई भी बढ़ाया गया कदम व्यर्थ नहीं जाता। प्रत्येक क्षण एक लाभ ही है। इस संघर्ष में किया गया प्रत्येक प्रयल एक बड़ा गुण गिना जाएगा।

 

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन

बहुशाखा हनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् 41।।

 

(41)        हे कुरुनन्दन (अर्जुन), इस क्षेल में दृढ़ संकल्प वाली बुद्धि एक ही होती है, परन्तु अनिश्चित मनमाने लोगों

के विचार अनेक दिशाओं में बिखरे हुए और अनन्त होते हैं।

 

दृढ़ संकल्पशून्य बुद्धि की चंचलता का दृढ़ संकल्प वाली बुद्धि की एकाग्रता और एक-उद्देश्यता के साथ वैषम्य दिखाया गया है। मानव-जीवन किसी एक श्रेष्ठ उद्देश्य में अपने आप को लगाकर पूर्णता प्राप्त कर सकता है, अनन्त सम्भावनाओं की असंयत खोज द्वारा नहीं। एकाग्रता साधना द्वारा प्राप्त की जानी है। चित्त -विक्षेप हमारी स्वाभाविक दशा है, जिससे हमें मुक्त होना है। परन्तु यह मुक्ति प्रकृति के या यौन-भावनाओं के, जाति या राष्ट्र के रहस्यवादों द्वारा प्राप्त नहीं होगी, अपितु 'वास्तविकता' की एक सच्ची अनुभूति द्वारा प्राप्त होगी। इस प्रकार की अनुभूति द्वारा प्राप्त हुई एकचित्तता एक सर्वोच्च गुण है और उसे तोड़-मरोड़कर कठमुल्लापन के रूप में नहीं बदला जा सकता।

 

दुनियादारों के लिए ज्ञान नहीं

 

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः

वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः 42।।

 

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगति प्रति 43।।

 

(42 - 43)               वे अविवेकी लोग, जो वेद के शब्दों में आनन्द लेते हैं, जिनका कथन है कि इसके सिवाय और

कुछ नहीं है, जिनका स्वभाव लालसापूर्ण है और जो स्वर्ग जाने के इच्छुक हैं, वे इन फूलों जैसे (आकर्षक) शब्दों को कहते हैं, जिनका परिणाम कर्मों के फल के रूप में पुनर्जन्म होता है और वे लोग आनन्द और शक्ति की प्राप्ति के लिए अनेक विशेष प्रकार की विधिया बताते हैं।

 

गुरु सच्चे कर्म और कर्मकाण्डीय पविनता में अन्तर बताता है। वैदिक यज्ञों का उद्देश्य भौतिक लाभों की प्राप्ति है। परन्तु गीता हमें स्वार्थ की सब लालसाओं का त्याग करने को कहती है और सम्पूर्ण जीवन को एक बलिदान (यज्ञ) बनाकर, जो कि सच्ची भक्ति के लिए समर्पित हो, कर्म करने के लिए कहती है।

 

मुण्डकोपनिषद् से तुलना कीजिए, 1, 2, करते हैं कि केवल यज्ञ 10 "वे मूर्ख, जो यह विभ (इष्टापूर्तम्) करने से पुण्य मिलता है और अन् किसी प्रकार पुण् नहीं मिलता, स्वर्ग में आनन्द का उपभोग करने के बाद फिर इस मर्त्-जगत में वापस जाते हैं '' साथ ही देखिए ईशोपनिषद, 9,12, कठोपनिषद 2, 5 वैदिक आर्य जीवन को अधीरतापूर्वक स्वीकार करने मे दृष्टि से शानदार बच्चों के समान थे। वे उस मानवता के यौवन के प्रतिनिध जिसका कि जीवन उस समय तक ताज़ा और मधुर था और चिन्ताजनक विकल नहीं हुआ था। उनमें परिपक्वता का सन्तुलित ज्ञान भी था। परन्तु लेकर ने अपना ध्यान केवल वेदों के कर्मकाण्ड तक ही सीमित रखा है, जो कि वेद की सारी शिक्षा नहीं है। जहां वेद हमें कर्मफल की इच्छा के साथ, चाहे वह अस्पार्थ स्वर्ग हो और चाहे उसका फल एकं नये सशरीर जीवन में मिलना हो, कर्म करते का उपदेश देता है, यहां बुद्धियोंग हमें मुक्ति की ओर ले जाता है।

 

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ विधीयते 44।।

 

(44)        जो लोग आनन्द और शक्ति प्राप्त करने में लगे रहते हैं और जिनके मन (वेद के) इन शब्दों द्वारा प्रेरित

रहते हैं, उनकी भले और बुरे का विवेक करने वाली बुद्धि आत्मा में (या एकाग्रता में) भलीभांति स्थिर नहीं होती।

 

उनका मन परमात्मा में एकाग्र नहीं होगा।'[228] बुद्धि, जिसे भलीभांति प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, अपने सामान्य कर्त्तव्य से विचलित हो जाती है।

 

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन

 निर्द्धन्तोनित्यसत्त्वस्थोनिर्योगक्षेम आत्मवान् 45।।

 

(45)        वेदों का विषय तीन गुणों की क्रिया से सम्बन्धित है। परन्तु हे अर्जुन, तू इस त्रिगुणात्मक प्रकृति से

स्वतंत्र हो जा। तू सब द्वन्द्वों से (परस्पर विरोधी युग्मों से) मुक्त हो जा और दृढ़तापूर्वक सत्त्वभाव में स्थित हो जा। अर्जुन और रक्षण की चिन्ता छोड दे और आत्मा को प्राप्त कर।

 

 

नित्यसत्त्व : अर्जुन से कहा गया है कि वह गुणों से ऊपर उठ जाए और सत्व में स्थिर हो जाए। अर्जुन से सत्व-गुण के परे पहुंचने को नहीं अपितु शाश्वत सत्य तक पहुंचने को कहा गया है। परन्तु शंकराचार्य रामानुज ने यहां इसका अर्थ सत्व-गुण दिया है। सांसारिक जीवन के निर्वाह के लिए आवश्यक कर्मकाण्डीय विधियां इन गुणों का परिणाम हैं। पूर्णता का पुरस्कार प्राप्त करने के लिए हमें अपना ध्यान परम वास्तविकता की सगाना होगा। परन्तु मुक्त व्यक्ति का आचरण बाह्य रूप से वैसा ही होगा, संत कि उस व्यक्ति का होता है, जो सत्व-गुण की दशा में स्थित है। उससे कर्म ति और अनासक्त होंगे। वह कर्मफल की इच्छा के बिना कर्म करता है। वेद कर्मकाण्ड के अनुयायी ऐसा नहीं करते।

 

योगक्षेम का अर्थ है-नई वस्तुओं की प्राप्ति और प्राप्त हो चुकी वस्तुओं की रक्षा।[229]

 

आत्मवान् : आत्मा वाला, सदा सचेत [230] आपस्तम्ब का कथन है कि आत्मा को प्राप्त करने से अधिक ऊंची वस्तु और कोई नहीं है।[231] उस आत्मा को जानना, जिसका आदि है, विनाश; उस आत्मा को, जो अमर है और जिसे हम नहीं जानते, जानना मनुष्य का सच्चा लक्ष्य है। यदि हम इस पक्ष को दबा देते हैं, तो हम उपनिषद् के शब्दों में आत्मा के घातक हैं।[232]

 

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।

 तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः 46।।

 

(46)        जब सब ओर जल ही जल की बाढ़ आई हो, उस समय एक पोखर का जितना उपयोग होता है, उतना

ही उपयोग ज्ञानी ब्राह्मण के लिए सब वेदों का है।

 

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