हिन्दूतत्व-विवेचन

 

ALL ABOUT HINDUISM

 

का हिन्दी अनुवाद

 

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द समर्पण

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादिका

डा. स्वर्णलता अग्रवाल

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण : २०००

 

द्वितीय हिन्दी संस्करण: २००७

 

तृतीय हिन्दी संस्करण : २०१७

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

 

HS 292

 

PRICE: 160/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर, जि. टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड,

पिन २४९ १९२  में मुद्रित

For online orders and Catalogue visit: disbooks.org

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

समर्पण

 

उन सबको-

जिन्हें हिन्दूतत्त्व तथा

इसके उदात्त दर्शन से प्रेम है

और जो इसकी शिक्षाओं

का अनुसरण करते हैं !

 

 

 

प्रकाशकीय

 

हिन्दू-धर्म वस्तुतः समस्त धर्मों का स्रोत है। इसमें सभी धर्मों का बीज समाहित है। इसमें समस्त धर्मों का समावेश है, कोई भी धर्म इसकी परिधि से बाहर नहीं है।

 

सार्वभौमिक स्तर पर प्रभावकारी इस हिन्दूतत्त्व के प्रति जगत् के लोगों की रुचि होना स्वाभाविक ही है।

 

यह पुस्तक हिन्दूतत्त्व-रूपी स्फटिक के विभिन्न पहलुओं से परिचित होने की जिज्ञासा रखने वाले पाठकों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। इस पुस्तक का अँगरेजी संस्करण सर्वप्रथम सन १९४७ में 'ऑल अबाउट हिन्दूइज्म' (All About Hinduism) नाम से प्रकाशित हुआ था। प्रस्तुत पुस्तक सन् १९९३ में प्रकाशित इसके पाँचवें परिवर्धित संस्करण का हिन्दी अनुवाद है।

 

हम आशा करते हैं कि हिन्दूतत्त्व तथा इसके दार्शनिक पक्षों में रुचि रखने वाले हिन्दी भाषा-भाषी पाठकों के लिए यह हिन्दी संस्करण रुचिकर तथा उपयोगी सिद्ध होगा।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विश्व-प्रार्थनाएँ

 

 

हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव!

तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है।

तुम सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ हो

तुम सच्चिदानन्दघन हो

तुम सबके अन्तर्वासी हो।

 

हमें उदारता, समदर्शिता और मन का समत्व प्रदान करो।

श्रद्धा, भक्ति और प्रज्ञा से कृतार्थ करो।

हमें आध्यात्मिक अन्तःशक्ति का वर दो,

जिससे हम वासनाओं का दमन कर मनोजय को प्राप्त हों।

हम अहंकार, काम, लोभ, घृणा, क्रोध और द्वेष से रहित हों।

हमारा हृदय दिव्य गुणों से परिपूरित करो।

 

हम सब नाम-रूपों में तुम्हारा दर्शन करें।

तुम्हारी अर्चना के ही रूप में इन नाम-रूपों की सेवा करें।

सदा तुम्हारा ही स्मरण करें।

सदा तुम्हारी ही महिमा का गान करें।

तुम्हारा ही कलिकल्मषहारी नाम हमारे अधर-पुट पर हो।

सदा हम तुममें ही निवास करें

 

 

हे अदृश्य प्रभु! हे आराध्य देव! हे परमेश्वर! आप अनन्त आकाश से ले कर घास के छोटे-से तिनके तक इस असीम विश्व में व्याप्त हैं। आप मेरी आँखों के तारे हैं, मेरे हृदय के प्रेम हैं। मेरे जीवन के प्राण हैं; मेरे आत्मा के दिव्य तत्त्व हैं; मेरी बुद्धि तथा इन्द्रियों के प्रदीपक हैं; मेरे हृदय के मधुर अनाहत संगीत हैं और मेरे स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीरों के आधार हैं।

 

मैं एकमात्र आपको ही इस विश्व के सर्वशक्तिमान् शासक और मेरे तीनों शरीरों का अन्तर्यामी मानता हूँ। मेरे प्रभु! मैं आपको बारम्बार साष्टांग प्रणाम करता हूँ। आप ही मेरे एकमात्र आश्रय तथा अवलम्ब हैं। मेरी आस्था आप ही पर केन्द्रित है। हे प्रेम और करुणा के सागर! मेरा उत्थान करें! मुझे प्रबुद्ध करें! मेरा मार्ग-दर्शन करें तथा मेरी रक्षा करें! मेरे आध्यात्मिक पथ की बाधाएँ दूर करें तथा अज्ञानावरण को विदूरित करें! हे जगद्गुरु! मैं इस जीवन के, इस देह के और इस संसार के कष्ट एक क्षण के लिए भी अब और अधिक सहन नहीं कर पा रहा हूँ। हे प्रभु! शीघ्र दर्शन दें! मैं आपके लिए लालायित हूँ, मैं द्रवित हो चला हूँ। मेरी भाव-प्रवण, आन्तरिक प्रार्थना सुनें, सुनें। निष्ठुर बनें, मेरे स्वामी! आप दीनबन्धु हैं, अधम उद्धारक हैं, पतितपावन हैं।

 

 

सर्वेषां स्वस्ति भवतु

सर्वेषां शान्तिर्भवतु

सर्वेषां पूर्ण भवतु

सर्वेषां मंगलं भवतु

 

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिदुःखभाग्भवेत् ।।

 

असतो मा सद्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

मृत्योर्मा अमृतं गमय

 

शान्तिः शान्तिः शान्तिः

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय. 4

विश्व-प्रार्थनाएँ. 5

प्रथम अध्याय. 12

हिन्दूतत्त्व पर एक विहंगम दृष्टि... 12

धर्म का उद्देश्य... 12

हिन्दू-धर्म की विशेषताएँ. 12

योग और वेदान्त की महिमा.. 14

अभ्यास पर बल. 14

हिन्दू कौन है ?. 15

'हिन्दू' शब्द का उद्भव और महत्त्व... 16

भारत की आध्यात्मिक भूमि.. 17

ऐतिहासिक तथ्य... 18

हिन्दू-धर्म की उत्तरजीविता के कारण.. 19

इसका भविष्य... 19

द्वितीय अध्याय. 20

हिन्दू-धर्मग्रन्थ... 20

संस्कृत साहित्य... 20

धर्मग्रन्थ... 20

ऐहिक साहित्य... 37

तृतीय अध्याय. 39

हिन्दू-धर्म के विविध रूप. 39

धर्म की परिभाषा.. 39

वेदों की एकमात्र प्रामाणिकता.. 40

परिवर्तनशील धर्म. 41

अन्य धर्मों में धर्माचरण.. 41

धर्माचरण के लाभ. 41

धर्म के भेद. 42

सनातन-धर्म. 42

सामान्य-धर्म. 44

वर्णाश्रम-धर्म. 48

युग-धर्म. 56

उपसंहार. 57

चतुर्थ अध्याय. 58

हिन्दू-आचार-नीति.. 58

आचरण और चरित्र. 58

आचार-नीति अर्थात् आचरण-विज्ञान. 58

आचार-नीति, आध्यात्मिकता और धर्म. 59

आचार-नीति का अभ्यास करने के लाभ. 59

हिन्दू-धर्म में आचार-नीति की संहिताएँ. 60

हिन्दू-आचार-नीति के मौलिक सिद्धान्त... 60

उपासना के रूप सेवा.. 61

आचार-नीति के संवर्धन अथवा शोधन की प्रक्रिया.. 62

औचित्य तथा अनौचित्य का दर्शन. 63

यौगिक उद्यानकर्म. 66

उपसंहार. 67

पंचम अध्याय. 68

हिन्दू-सिद्धान्त... 68

कर्म का सिद्धान्त... 68

पुनर्जन्म का सिद्धान्त... 73

अवतार की अवधारणा.. 76

षष्ठ अध्याय. 78

हिन्दू-कर्मकाण्ड... 78

सन्ध्योपासना.. 78

दश शास्त्रोक्त संस्कार. 82

पंच-महायज्ञ.. 86

श्राद्ध और तर्पण.. 88

पितृ-पक्ष और महालया अमावस्या.... 90

नवरात्र या नौ-दिवसीय देवी-पूजन. 92

सप्तम अध्याय. 96

हिन्दू-उपासना.. 96

उपासना.. 96

उपासना की उपलब्धियाँ.. 96

सगुणोपासना तथा निर्गुणोपासना.. 98

भक्तियोग में भाव. 98

पूजा तथा इष्टदेवता.. 99

मूर्ति-पूजा का दर्शन तथा महत्त्व... 101

कर्मकाण्डीय (वैधी) भक्ति से परा-भक्ति की ओर. 109

हिन्दू-दर्शन की महिमा तथा हिन्दू-पूजा-पद्धति.. 110

निष्कर्ष. 111

अष्टम अध्याय. 113

हिन्दू-योग. 113

चार मार्ग. 113

कर्मयोग. 113

भक्तियोग. 114

राजयोग. 116

ज्ञानयोग. 118

समन्वययोग. 120

नवम अध्याय. 122

हिन्दू-धर्मविज्ञान. 122

हिन्दू-धर्मविज्ञान-विषयक वर्गीकरण.. 122

वैष्णव. 123

शैव. 127

शाक्त... 128

कुछ अन्य सम्प्रदाय. 129

आर्यसमाजी तथा ब्रह्मसमाजी.. 129

साधु तथा संन्यासी.. 129

दशम अध्याय. 134

हिन्दू पौराणिकी तथा प्रतीक.. 134

हिन्दू पौराणिकी.. 134

हिन्दू-प्रतीक.. 136

निष्कर्ष. 143

एकादश अध्याय. 145

हिन्दू-दर्शन-. 145

दर्शन : इसका उद्भव तथा इसकी सीमाएँ. 145

भारतीय दर्शन की शास्त्रसम्मत तथा शास्त्रविरुद्ध शाखाएँ. 147

षड्-दर्शन अथवा छह शास्त्रसम्मत मतवाद. 147

न्याय. 150

वैशेषिक.. 154

सांख्य.... 159

पुरुष की सत्ता का अनुमान. 165

योग. 171

पूर्वमीमांसा.. 177

उत्तरवर्ती मीमांसक.. 180

वेदान्त-दर्शन. 181

द्वादश अध्याय. 185

हिन्दू-दर्शन-. 185

शंकर का अद्वैत-दर्शन. 187

श्री रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत-दर्शन. 190

श्री मध्वाचार्य का द्वैत-दर्शन. 195

श्री निम्बार्क का द्वैताद्वैत-दर्शन. 199

श्री वल्लभ का शुद्धाद्वैत-दर्शन. 205

श्री चैतन्य का अचिन्त्य-भेदाभेद-दर्शन. 210

त्रयोदश अध्याय. 216

(शैव-सिद्धान्त तथा शाक्त-मत) 216

शैव-सिद्धान्त-दर्शन. 216

शक्ति-योग-दर्शन. 219

चतुर्दश अध्याय. 227

उपसंहार. 227

एकता : एक तात्कालिक आवश्यकता.. 227

धर्म की सेवा का सुयोग्य अधिकारी कौन है?. 228

शिक्षा तथा राष्ट्र-निर्माण.. 229

राष्ट्र के संगठन के लिए आह्वान. 232

परिशिष्ट-. 233

शिव-लिंग. 233

परिशिष्ट-. 235

भगवद्गीता : भारतीय संस्कृति की आधारशिला.. 235

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम अध्याय

हिन्दूतत्त्व पर एक विहंगम दृष्टि

 

सच्चिदानन्द को मौन प्रणाम जो समस्त मनों का मौन साक्षी है; जो अन्तर्यामी है; जिसने अपनी लीला के लिए इस विश्व को रचा है; जो इस विश्व का, शरीर और मन का तथा समस्त गतिविधियों का आश्रय है तथा जो समस्त संगठनों एवं उनके कार्यकलापों का आधार है।

धर्म का उद्देश्य

 

धर्म को अँगरेजी भाषा में 'रिलीजन' (Religion) कहते हैं। रिलीजन लैटिन शब्द 'रेलिजिओ' से बना है। 'रेलिजिओ' में दो शब्द हैं-'रि' (पीछे) तथा 'लिगेअर' (लाना या बाँधना) जो आत्मा को परमात्मा से पुनः बाँध देता या सम्बद्ध कर देता है, वह धर्म है। धर्म ईश्वर-साक्षात्कार का मार्ग दर्शाता है।

 

धर्म उन मानवों की गहन आन्तरिक आकांक्षा की पूर्ति करता है जो केवल पशुओं के समान जीवन-यापन करने मात्र से सन्तुष्ट नहीं होते तथा आध्यात्मिक आश्वासन, आश्रय और शान्ति चाहते हैं। मनुष्य केवल रोटी पर जीवित नहीं रह सकता। हममें से बहुतों के जीवन में एक समय आता है जब केवल सांसारिक सुखों से सन्तुष्ट हो कर हम 'कुछ और' के लिए छटपटाते हैं। कई लोगों के जीवन में विपत्तियाँ और परेशानियाँ उनका ध्यान आध्यात्मिकता से प्राप्त होने वाली सान्त्वना की ओर प्रवृत्त कर देती हैं।

हिन्दू-धर्म की विशेषताएँ

 

एक अपौरुषेय धर्म

 

हिन्दू-धर्म सार्वभौमिक धर्म है जो भारत में सर्वाधिक प्रचलित हुआ। यह समस्त जीवन्त धर्मों में प्राचीनतम है। यह किसी धर्मप्रवर्तक के द्वारा स्थापित नहीं किया गया। ईसाई, बौद्ध और इस्लाम धर्मप्रवर्तकों द्वारा चलाये गये थे। उनके उद्भव की तिथियाँ निश्चित हैं; परन्तु हिन्दू-धर्म के लिए ऐसी कोई तिथि निश्चित नहीं की जा सकती। प्रवर्तकों के उपदेशों से हिन्दू-धर्म की उत्पत्ति नहीं हुई; यह विशिष्ट गुरुओं द्वारा बताये हुए विशिष्ट सिद्धान्तों पर आधारित नहीं है। यह धार्मिक मतान्धता से मुक्त है।

 

हिन्दू-धर्म को सनातन-धर्म तथा वैदिक-धर्म भी कहते हैं। सनातन धर्म का अर्थ है शाश्वत धर्म। हिन्दू-धर्म उतना ही प्राचीन है जितना कि संसार। हिन्दू-धर्म सब धर्मों का जन्मदाता है। हिन्दू-धर्म-ग्रन्थ विश्व के प्राचीन ग्रन्थ हैं। हिन्दू-धर्म को केवल शाश्वत होने के कारण ही सनानत-धर्म नहीं कहा जाता, प्रत्युत् इसलिए भी कि यह ईश्वर द्वारा रक्षित है और यह हमें शाश्वत बना सकता है।

 

वैदिक-धर्म का अर्थ है वेदों का धर्म। वेद हिन्दू-धर्म के आधारभूत ग्रन्थ हैं। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने उपनिषदों में अपनी अन्तर्शात आध्यात्मिक (अपरोक्ष) अनुभूतियाँ व्यक्त की हैं। ये अनुभव साक्षात् और अचूक हैं। हिन्दू-धर्म में पुरातन ऋषियों की इन अनुभूतियों को अपनी प्रामाणिकता का आधार माना जाता है। अनादि काल से हिन्दू ऋषि-मुनियों द्वारा प्राप्त अमूल्य सत्य हिन्दू-धर्म का गौरव हैं; अतएव हिन्दू-धर्म एक अपौरुषेय धर्म है।

 

स्वतन्त्रता का धर्म

 

हिन्दू धर्म में यह दुराग्रह नहीं है कि केवल इसी के द्वारा मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है, अन्य किसी धर्म के द्वारा नहीं। यह ध्येय के लिए साधन मात्र है और सभी साधन जो अन्ततः एक लक्ष्य पर ले जाते हैं, वे समान रूप से मान्य हैं।

 

हिन्दू-धर्म मनुष्य के विवेकशील मस्तिष्क को पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान करता है। यह मानवीय तर्क की तथा मानव के विचार, भाव और आकांक्षा की स्वतन्त्रता पर अनुचित रोक नहीं लगाता। और उपासना के क्षेत्रों में यह सर्वाधिक स्वतन्त्रता प्रदान करता है। हिन्दू-धर्म स्वतन्त्रता का धर्म है। ईश्वर की प्रकृति, आत्मा, सृष्टि, उपासना का रूप और जीवन का लक्ष्य आदि प्रश्नों के सम्बन्ध में यह मानवीय तर्क और हृदय को पूर्ण स्वतन्त्रता देता है। सिद्धान्त विशेष की स्वीकृति अथवा कोई विशेष कर्मकाण्ड अथवा उपासना हिन्दू-धर्म नहीं है। यह विशेष सिद्धान्तों या उपासना के विशिष्ट रूपों को स्वीकार करने के लिए किसी को विवश नहीं करता। यह प्रत्येक व्यक्ति को चिन्तन करने, अनुसन्धान करने और विचार करने की स्वतन्त्रता देता है। अतएव सब प्रकार की धार्मिक आस्थाएँ, उपासना या साधना के विभिन्न रूप, कर्मकाण्ड एवं रीतिरिवाजों के अनेक प्रकार-सभी को हिन्दू धर्म में साथ-साथ सम्माननीय स्थान प्राप्त हुआ है और सभी में पारस्परिक सद्भावपूर्ण सम्बन्ध रहा है। इसी रूप में वे संस्कृत एवं विकसित हुए हैं।

 

जो व्यक्ति ईश्वर को सृष्टिकर्ता और शासक नहीं मानते, जो शाश्वत आत्मा के अस्तित्व अथवा मोक्ष की स्थिति को स्वीकार नहीं करते, हिन्दू-धर्म उनकी उपेक्षा नहीं करता। हिन्दू-धर्म ऐसे विचार वालों को भी हिन्दू-धर्म-समाज के सम्माननीय सदस्य मानता है।

 

हिन्दुओं का धार्मिक आतिथ्य लोकप्रसिद्ध है। हिन्दू धर्म अत्यन्त उदार है। यह हिन्दू-धर्म की मौलिक विशिष्टता है। हिन्दू-धर्म समस्त धर्मों का मान करता है। वह किसी अन्य धर्म से द्वेष नहीं करता। वह सत्य का किसी भी स्वरूप में मान करता है और उसे स्वीकार करता है।

 

भारत में अन्य धर्मों के अनुयायी प्रचुर संख्या में हैं; तथापि हिन्दू लोग उन सबके साथ सद्भाव, शान्ति और मित्रता से रहते हैं। अन्य धर्मों के अनुयायियों के साथ उनकी सहिष्णुता और सौहार्दभाव सराहनीय हैं।

 

तात्त्विक सिद्धान्तों, धार्मिक अनुशासन के ढंगों, कर्मकाण्ड की क्रियाओं एवं हिन्दू-समाज में प्रचलित सामाजिक आदतों में भेद होते हुए भी हिन्दुओं के समस्त वर्गों में धर्म की संकल्पना और जीवन तथा जगत् के प्रति दृष्टिकोण में एक अनिवार्य समानता है।

योग और वेदान्त की महिमा

 

वेदान्त (अथवा उपनिषदों का दर्शन) उच्च, उत्कृष्ट तथा असाधारण है। पाश्चात्य दार्शनिकों ने भी उपनिषदों के ऋषि-मनीषियों के प्रति सम्मान प्रकट किया है। वे उनके व्यक्तित्व की ऊँचाइयों को देख कर चकित रह गये हैं। शोपेनहावर नित्य उपनिषदों का अध्ययन करते और सोने से पूर्व उनमें निहित विचारों पर मनन करते थे। उन्होंने कहा है- "उपनिषद् मेरे जीवन में सान्त्वना के स्रोत हैं और वे मुझे मृत्यु के उपरान्त भी शान्ति प्रदान करेंगे।"

 

हिन्दू-धर्म में राजयोग की पद्धति विशिष्ट एवं अनुपम है। उसके उपदेश अत्यन्त व्यावहारिक और शिक्षाप्रद हैं। विश्व की कोई भी शारीरिक व्यायाम की विद्या हठयोग से प्रतियोगिता नहीं कर सकती। कुण्डलिनीयोग अद्भुत है। इसी कारण अमरीका और यूरोप के निवासी हिन्दू-संन्यासियों एवं योगियों की खोज में रहते हैं। वे बहुधा योग-शिक्षकों की खोज में हिमालय जाते हैं। कुछ तो हिन्दू-योगियों के शिष्य बन योगाभ्यास कर रहे हैं। यूरोप और अमरीका के अधिकांश लोग अब भी विश्वास और अभ्यास से हिन्दू हैं, यद्यपि वे जन्म से ईसाई हैं। वे राजयोग और वेदान्त का अभ्यास करते हैं।

अभ्यास पर बल

 

हिन्दू-धर्म में सब प्रकार के लोगों के लिए उनके स्वभाव, सामर्थ्य, रुचि, आध्यात्मिक विकास के स्तर तथा जीवन की परिस्थितियों के अनुसार आध्यात्मिक भोजन एवं योग-साधना की व्यवस्था है। अपना सामान्य व्यवसाय करने वाले मेहतर और मोची तक के लिए आत्मसाक्षात्कार हेतु योग साधना बतलायी गयी है। हिन्दू योग और वेदान्त के शिक्षक आत्म-संयम, तप, वैराग्य और व्यावहारिक साधना पर विशेष बल देते हैं; क्योंकि इनसे मन और इन्द्रियों पर नियन्त्रण प्राप्त करने, दिव्य शक्तियों को प्रकट करने अथवा आत्मसाक्षात्कार करने में बहुत सहायता मिलती है। हिन्दू-धर्म मात्र सिद्धान्तों का धर्म नहीं है। यह मुख्य रूप से व्यावहारिक है। किसी अन्य धर्म में आपको व्यावहारिक योग की इतनी विविधता और इतना उत्कृष्ट असाधारण दर्शन नहीं मिलेगा। यही कारण है कि भारत ही सन्तों, ऋषियों, योगियों और साधुओं की महान् भूमि रहा है।

 

धर्म दर्शन का व्यावहारिक स्वरूप है। दर्शन धर्म का बुद्धिसंगत पक्ष है। हिन्दू-धर्म का दर्शन सुगम दर्शन नहीं है। यह बौद्धिक उत्सुकता शान्त करने और व्यर्थ के वाद-विवाद के लिए भी नहीं है। हिन्दू-दर्शन जीवन की एक शैली है। हिन्दू-दार्शनिक श्रुतियों को सुन कर गम्भीरता से मनन करता है, आत्मविचार करता है, निरन्तर ध्यान करता है और तब आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करता है। उसका लक्ष्य मोक्ष होता है। वह अभी और यहीं जीवन्मुक्ति प्राप्त करने का प्रयास करता है।

 

एक हिन्दू के लिए धर्म मानव-जीवन का अध्यात्मीकरण है। उसके लिए धार्मिक संस्कृति ही वास्तविक स्वतन्त्रता की संस्कृति है। धर्म हिन्दू-जीवन के समस्त पक्षों का संचालन करता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मानव को आत्मा की स्वतन्त्रता की अनुभूति प्राप्त कर लेनी चाहिए। वास्तविक स्वतन्त्रता की संस्कृति हेतु सर्वाधिक अवसर धर्म में ही निहित है। जीवन में पूर्ण स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए धर्म ही एकमात्र साधन है।

 

केवल भारतवर्ष में ही ऐसा है कि प्रत्येक व्यक्ति को दर्शन के विषय में न्यूनाधिक ज्ञान है। पशुओं को चराने वाला ग्वाला, खेतों में हल चलाने वाला किसान, नाव चलाने वाला नाविक भी दार्शनिक सत्यों को प्रकट करने वाले गीत गाता है। नाई तक अपना उस्तरा उठाने से पूर्व ' नमः शिवाय', 'शिवोऽहम्' आदि मन्त्रों का उच्चारण करता है। परमहंस संन्यासियों (जो हिन्दू-धर्म के भ्रमणशील सन्त रहे हैं) ने घर-घर जा कर सर्वोच्च वेदान्त की शिक्षा का प्रचार किया है। मुट्ठीभर चावल के बदले में उन्होंने धार्मिक गीतों के माध्यम से हिन्दू धर्म और दर्शन के हीरे मोती घर-घर बाँटे हैं।

हिन्दू कौन है ?

 

सनातनधर्म-सभा की एक गोष्ठी में लोकमान्य तिलक ने कहा था- जो यह मानता है कि वेदों में स्वयंसिद्ध और स्वतः प्रमाण सत्य निहित हैं, वह हिन्दू है।"

 

हिन्दू महासभा ने एक और परिभाषा दी है- "जो व्यक्ति भारतवर्ष में उद्भूत धर्म में विश्वास करता है, वह हिन्दू है।"

 

कुछ लोगों के अनुसार- "जो मृतक का दाहसंस्कार करते हैं, वे हिन्दू हूँ।" एक अन्य परिभाषा के अनुसार- "हिन्दू वह है जो गौ और ब्राह्मण की रक्षा करता है।"

 

कुछ कहते हैं-"भारत को अपनी मातृभूमि और पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्थान मानने वाले हिन्दू हैं।"

 

अन्य कुछ लोग कहते हैं-"जो व्यक्ति अपने-आपको हिन्दू मानता और कहता है, वह हिन्दू है।"

 

कुछ लोग परिभाषा करते हैं- "जो व्यक्ति वेदों, स्मृतियों, पुराणों और तन्त्रों को धर्म का मूल एवं आचरण के नियमों का आधार मानता है तथा एकमात्र परब्रह्म, कर्म के सिद्धान्त अथवा प्रतिफलात्मक न्याय एवं पुनर्जन्म में आस्था रखता है, वह हिन्दू है।"

 

"जो वैदिक अथवा सनातन धर्म का अनुयायी है, वह हिन्दू है।" यह एक अन्य परिभाषा है।

 

"वेदान्त का अनुयायी हिन्दू है।" यह भी हिन्दू की एक परिभाषा है।

 

कुछ सुसंस्कृत विद्वानों के अनुसार- "कर्म के सिद्धान्त, पुनर्जन्म, अवतार, पितृ-पूजा, वर्णाश्रम-धर्म, वेद, ईश्वर के अस्तित्व में जिसे पूर्ण विश्वास है, जो वेदों की शिक्षाओं को पूर्ण आस्था से और मन लगा कर व्यवहार में लाता है, जो सन्ध्या, श्राद्ध, पितृ-तर्पण और पंचमहायज्ञ करता है, जो वर्णाश्रम-धर्म का पालन करता है, जो अवतारों की उपासना करता और वेदों का अध्ययन करता है, वह हिन्दू है।"

 

यही परिभाषा पूर्ण तथा सही है।

'हिन्दू' शब्द का उद्भव और महत्त्व

 

महान् आर्य-प्रजाति का वह समूह जो दरों के मार्ग से मध्य एशिया से भारत में आया, सर्वप्रथम सिन्धु नदी के पास के जनपदों में बस गया था। पारसी लोग 'सिन्धु' शब्द का उच्चारण 'हिन्दू' करते हैं और वे अपने आर्य भाइयों को 'हिन्दू' कह कर पुकारने लगे। हिन्दू सिन्धु का अपभ्रंश है।

 

हिन्दू आर्य गंगा के मैदानी क्षेत्र में फैल गये, तब पारसियों ने पंजाब और वाराणसी के बीच के समस्त क्षेत्र को 'हिन्दुस्तान' (हिन्दुओं के रहने का स्थान) नाम दे दिया।1

 

संस्कृत-साहित्य में प्रयुक्त हिन्दुस्तान का प्राचीन नाम है भारतवर्ष अथवा भरतखण्ड। यह नाम राजा भरत के नाम पर पड़ा। भरत प्राचीन काल में एक बहुत बड़े भूभाग पर शासन करता था। मनु ने समस्त केन्द्रीय हिमालय और विन्ध्य पर्वतों के मध्य के भाग को 'आर्यावर्त' (अर्थात् आर्यों का निवास-स्थान) नाम दिया। सम्पूर्ण भारत के लिए एक दूसरा नाम है जम्बूद्वीप। ग्रीक लोगों ने इस समूचे देश को 'इंडु' नाम दिया; इसी कारण समस्त यूरोप में 'इंडिया' नाम प्रसिद्ध हो गया।

 

'हिन्दू' शब्द मात्र नाम नहीं है। 'हिन्दू' नाम केवल केवल भौगोलिक महत्त्व का ही नहीं है, वरन् राष्ट्रीय और प्रजातीय महत्त्व का है। आरम्भ से ही हमारे राष्ट्र का समस्त इतिहास इससे सम्बद्ध रहा है। हमारे समग्र विचार और आदर्श इस नाम के साथ इतनी घनिष्टता से सम्बन्धित हैं कि इसकी एक सरल परिभाषा करना कठिन होगा। कवियों, पैगम्बरों और अवतारों ने इस नाम की महिमा गायी है। ऋषि-मुनि और सन्तों ने इस राष्ट्र के लिए शास्त्रों एवं दर्शनों की रचना करने हेतु जन्म लिया। वीरों और योद्धाओं ने इसकी प्रतिष्ठा के लिए अपने प्राण निछावर कर दिये। धर्मनिष्ठा, श्रेष्ठता, उदारता, दर्शन, धार्मिक प्रवृत्ति, योग, धार्मिक सहिष्णुता, प्रज्ञा, भक्ति, वैराग्य, आत्मसाक्षात्कार, सत्य, अहिंसा और शुचिता-ये सब 'हिन्दू' नाम से सम्बद्ध हैं।

 

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नवीन शोधों के अनुसार आर्य-प्रजाति के लोग बाहर से नहीं आये थे। वे भारत के मूल निवासी थे।

भारत की आध्यात्मिक भूमि

 

भारतवर्ष वह पावन भूमि है जिसने असंख्य ऋषियों, मुनियों, योगियों, सन्तों और पैगम्बरों को जन्म दिया है। इसने शंकर, श्री रामानुज जैसे आध्यात्मिक आचार्यों; कबीर, रामदास, तुकाराम, गौरांग महाप्रभु जैसे सन्तों; ज्ञानदेव, दत्तात्रेय, सदाशिवब्रह्मेन्द्र जैसे योगियों और बुद्ध एवं नानक जैसे पैगम्बरों को जन्म दिया। बुद्ध हमारे ही रक्त-मांस हैं।

 

भारत को गुरु गोविन्दसिंह तथा शिवाजी पर, राजा भोज और विक्रमादित्य पर, शंकर और कबीर पर, वाल्मीकि और कालिदास पर गर्व है। कृष्ण, राम एवं समस्त अवतारों ने भारत में जन्म लिया। कितना पवित्र है भारतवर्ष ! कितना भव्य है भारत ! वृन्दावन और अयोध्या की धरती की धूलि जिस पर कृष्ण और राम ने पावन चरण रखे, अब भी असंख्य लोगों के हृदयों को पवित्र करती है। महात्मा ईसामसीह ने भी अपने जीवन के अज्ञात काल में कश्मीर में रह कर भारतीय योगियों से योग सीखा था। धन्य है भारतभूमि!

 

भारतवर्ष आध्यात्मिक देश है। भारत ने कभी दूसरे देशों पर विजय प्राप्त करके उन पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं किया। सैनिक-विजय कभी उसका आदर्श नहीं रहा। उसकी सदैव यही कामना रही है कि उसके वासी आत्म-स्वराज्य अथवा पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त करें। भारत माता कभी दूसरों पर शासन करने के लिए नहीं कहती। वह चाहती है कि उसकी सन्तान बाह्य और आन्तरिक प्रकृति पर विजय प्राप्त करे; दिव्य गुण, नैतिक ऊर्जस्विता एवं आत्म-प्रज्ञा-जनित आन्तरिक आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न हो। आध्यात्मिक विजय और दूसरों के मन पर विजय प्राप्त करने हेतु उसका शस्त्र है-अहिंसा।

 

भारतवासियों का लक्ष्य है आत्मसाक्षात्कार। वे भौतिक समृद्धि और उन्नति को अधिक महत्त्व नहीं देते। उन्हें चाहिए योग (अथवा परम सत्ता के साथ सम्पर्क) वे अहिंसा, सत्य और ब्रह्मचर्य का अभ्यास कर परम साक्षात्कार करने के लिए किसी भी वस्तु का, सर्वस्व का, समस्त सांसारिक उपलब्धियों का त्याग करने के लिए उद्यत रहते हैं। उनकी प्रवृत्ति सदा आध्यात्मिक रहती है।

 

भारत की पावन भूमि में अनेक पवित्र नदियाँ बहती हैं। यहाँ शक्तिशाली आध्यात्मिक तरंगें समायी हुई हैं। श्वेत बर्फ से आच्छादित पुरातन हिमालय समग्र विश्व के लोगों को आकर्षित करता है। यह भूमि विशेष रूप से ध्यान, चिन्तन और योगाभ्यास के लिए उपयुक्त है। भारतवर्ष योगियों और सन्तों का देश है-यह भारत की एक विशिष्टता है जो दूसरों को आकर्षित करती है। यही कारण है कि अमरीका, इंग्लैण्ड और विश्व के प्रत्येक भाग से लोग योगाभ्यास के लिए भारत आते हैं।

ऐतिहासिक तथ्य

 

भारतवर्ष विश्व में सर्वाधिक सहिष्णु देश है। इसका हृदय अति उदार है। अपने स्नेहालिंगन में इसने समस्त राष्ट्रों को समाहित कर लिया है।

 

पाश्चात्य जातियाँ मूल हिन्दुओं अथवा आर्यों की ही वंशज हैं। वे आर्यों तथा हिन्दू-संस्कृत से अपने पुराने सम्बन्धों को भूल गये होंगे; परन्तु इतिहास इन्हें नहीं भुलायेगा। हिन्दू-संस्कृति की आश्रय भारत माता समुद्र पार रहने वाली अपनी सन्तानों को नहीं भूल सकती। वे उसे सदैव प्रिय हैं।

 

प्राचीन काल में हिन्दू-संस्कृति और हिन्दू-सभ्यता अपनी पराकाष्ठा पर थी। ग्रीस तथा रोम के निवासियों ने हिन्दुओं का अनुकरण करके उनके विचारों को ग्रहण कर लिया। किसी भी धर्म में इतने महान् सन्त, महात्मा, योगी, ऋषि, महर्षि, पैगम्बर, आचार्य, परोपकारी, योद्धा, कवि, राजनीतिज्ञ और नरेश नहीं हुए जितने हिन्दू-धर्म में। देश के प्रत्येक प्रान्त ने बुद्धिजीवियों, कवियों और सन्तों को जन्म दिया है। अभी तक भारतवर्ष में ऋषि, दार्शनिक, सन्त और उच्च श्रेणी के बुद्धिमानों की प्रचुरता है। अभी भी यहाँ सन्त-महात्माओं का बाहुल्य है।

 

हिन्दुओं को युद्ध, कठिनाइयों, विपत्तियों और क्रूरता का सामना करना पड़ा। फिर भी वे जीवित हैं। किसी रहस्यात्मक शक्ति ने उनकी रक्षा की है, किसी अदृश्य शक्ति ने उन्हें बचाया है। वही शक्ति सदा उनकी रक्षा करेगी।

हिन्दू-धर्म की उत्तरजीविता के कारण

 

हिन्दू-धर्म तो तपश्चर्या है मायावाद, बहुदेववाद है और सर्वेश्वरवाद। यह सब प्रकार के धार्मिक अनुभवों का समन्वय है। यह जीवन का एक सम्पूर्ण दृष्टिकोण है। इसमें हैं व्यापक सहिष्णुता, मानवता की गहराइयाँ और उच्च आध्यात्मिक ध्येय। यह धर्मोन्माद से मुक्त है। इसीलिए यह विश्व के अन्य महान् धर्मों के अनुयायियों के आक्रमणों के पश्चात् भी जीवित है।

 

कोई भी धर्म इतना उदार और सहिष्णु नहीं जितना हिन्दू-धर्म। हिन्दू-धर्म अपने मूल-तत्त्वों के विषय में अत्यन्त कठोर है; परन्तु बाह्य तथा अतात्त्विक स्वरूपों में पुनर्व्यवस्था के दृष्टिकोण से अत्यन्त उदार है। इसी कारण यह सहस्रों वर्षों से जीवित है।

 

हिन्दू-धर्म की नींव आध्यात्मिक सत्यों की तलशिला पर पड़ी है। हिन्दू-जीवन की सम्पूर्ण संरचना हिन्दू-ऋषियों और द्रष्टाओं द्वारा प्राप्त शाश्वत सत्यों पर आधारित है। यही कारण है कि यह संरचना अनेक शताब्दियों से जीवित है।

इसका भविष्य

 

हिन्दू-धर्म की महिमा अनिर्वचनीय है। इसमें वैश्व-धर्म के समस्त लक्षण हैं। इसके सिद्धान्त तथा मत सार्वभौमिक एवं भव्य हैं। इसका दर्शन महान् है। इसकी नीति आत्मा को उन्नत बनाने वाली है। इसके धर्मग्रन्थ अद्भुत हैं। योग-वेदान्त पर आधारित इसकी साधनाएँ अद्वितीय हैं। इस धर्म का भूतकाल अत्यन्त गौरवशाली रहा है। इसका भविष्य और भी अधिक गौरवमय। इसके पास घृणा, मतभेदों और युद्धों से विघटित हुए विश्व के लिए एक सन्देश है-जो ब्रह्माण्डीय प्रेम, सत्य और अहिंसा का सन्देश है, आत्मिक एकता का सन्देश है।

 

जितना अधिक आप भारत और हिन्दू-धर्म के निकट आयेंगे, उतना ही अधिक आप उसे प्रेम और श्रद्धा देने लगेंगे, और उतना ही अधिक आप ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हो जायेंगे; क्योंकि इस निकटता से आपमें जाग्रत होगी योगाभ्यास में रुचि तथा आप आत्मसात् करेंगे हिन्दू-धर्म की आत्मा को।

 

धन्य है भारत देश! धन्य है हिन्दू धर्म ! धन्य-धन्य हैं वे ऋषि और द्रष्टा जिन्होंने हिन्दू-धर्म की ज्वाला को प्रज्वलित रखा है!

 

 

 

 

द्वितीय अध्याय

हिन्दू-धर्मग्रन्थ

संस्कृत साहित्य

 

संस्कृत साहित्य को छह शास्त्रसम्मत और चार ऐहिक शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है। शास्त्रसम्मत साहित्य के अन्तर्गत हैं हिन्दुओं के प्रामाणिक धर्मग्रन्थ। प्राचीन संस्कृत साहित्य के परवर्ती विकास काल में ऐहिक साहित्य का सर्जन हुआ है।

           

धर्मग्रन्थ छह हैं-श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण, आगम और दर्शन।

 

ऐहिक साहित्य के अन्तर्गत चार प्रकार के व्यावहारिक ग्रन्थ हैं-सुभाषित, काव्य, नाटक और अलंकार।

धर्मग्रन्थ

 

श्रुतियाँ

 

श्रुतियाँ वेद कहलाती हैं। हिन्दुओं को अपना धर्म वेदों के माध्यम से श्रुतिप्रकाश द्वारा प्राप्त हुआ है। ये सहज ज्ञान द्वारा प्राप्त अनुभूति हैं और इन्हें अपौरुषेय अर्थात् नितान्त परा-मानवीय माना जाता है। इनका कोई विशिष्ट लेखक नहीं है। वेद हिन्दुओं का-नहीं, अखिल विश्व का-महिमाशाली गौरव है।

 

वेद शब्द की उत्पत्ति विद् धातु से हुई है, जिसका अर्थ है-धर्मग्रन्थ के सन्दर्भ में जानना। वेद शब्द का अर्थ है ज्ञान। इसका तात्पर्य ज्ञान के ग्रन्थ से हैं। वेद हिन्दुओं के आधारभूत ग्रन्थ हैं। वेद केवल अन्य पाँच धर्मग्रन्थों वरन् उपर्युक्त चार ऐहिक के भी स्रोत हैं। वेद भारतीय प्रज्ञा की निधि हैं जिन्हें मनुष्य शाश्वतकाल-पर्यन्त विस्मृत नहीं कर सकता।

 

अनादि तथा अनन्त सत्य की अभिव्यक्ति

 

वेद भारत के महान् प्राचीन ऋषियों को ईश्वर द्वारा अनुभव करवाये गये शाश्वत सत्य हैं। ऋषि शब्द दृश् धातु से बना है जिसका अर्थ है देखना। ऋषि मन्त्र अर्थात् विचार के द्रष्टा हैं। विचार उनके अपने नहीं थे। ऋषियों ने सत्य को देखा या सुना; इसलिए वेद वे हैं जो श्रवण किये जाते हैं। ऋषियों ने उन्हें लिखा नहीं; ये उनके मस्तिष्क की उपज नहीं हैं। वे उन विचारों के द्रष्टा थे जो पहले से ही प्रचलित थे। उन्होंने मात्र उन विचारों का आध्यात्मिक अन्वेषण किया। वे ही विचार के आध्यात्मिक ज्ञाता थे। वे वेदों के आविष्कारक नहीं हैं।

 

वेदों में प्राचीन ऋषियों के आध्यात्मिक अनुभव प्रस्तुत किये गये हैं। ऋषि मात्र अपने अन्तर्जात अनुभवों को लोगों तक पहुँचाने के माध्यम हैं। वेदों के सत्य प्रकटन हैं। विश्व के अन्य सब धर्म यह कहते हैं कि ईश्वर के विशेष दूतों ने उन्हें (धर्मों को) कुछ विशिष्ट लोगों को ही प्रदान किया था, किन्तु वेद अपनी प्रामाणिकता के लिए किसी विशिष्ट व्यक्ति के ऋणी नहीं हैं। वे स्वतः प्रमाण हैं; क्योंकि वे शाश्वत हैं, वे ईश्वरीय ज्ञान हैं।

 

स्रष्टा ब्रह्मा ने ऋषियों अर्थात् द्रष्टाओं को दिव्य ज्ञान प्रदान किया। ऋषियों ने उस ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। वैदिक ऋषि दिव्य अनुभूति प्राप्त महान् व्यक्ति थे। उन्होंने ब्रह्म या सत्य का साक्षात्कार किया था। वे ईश्वर-प्रेरित लेखक थे। उन्होंने धर्म और दर्शन के एक ऐसे सरल, विशाल एवं पूर्ण शास्त्र का विकास किया जिससे समस्त धर्मों के संस्थापकों और गुरुओं ने प्रेरणा प्राप्त की।

 

वेद सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ हैं। समस्त धर्मों के सत्य वेदों से प्रसूत हैं और अन्ततोगत्वा वेद ही उनके स्रोत हैं। वेद धर्म का मूल स्रोत हैं। वेद ही समस्त धार्मिक ज्ञान के स्रोत हैं। धर्म का उद्गम दैवी है। प्रारम्भिक काल में यह ईश्वर के द्वारा मनुष्य के लिए प्रकट किया गया। धर्म का मूर्त रूप वेद हैं।

 

वेद शाश्वत हैं, अनादि हैं, अनन्त हैं। कोई अज्ञानी पुरुष कह सकता है कि कोई पुस्तक बिना आदि और अन्त के कैसे हो सकती है। वेदों का अभिप्राय किसी पुस्तक से नहीं है। वेद ईश्वर के शब्द हैं। वेद ईश्वर के श्वास से उद्भूत शब्द हैं। वे ईश्वर के शब्द हैं। वेद मनुष्यों के वचन नहीं हैं, वे किसी मानवीय मस्तिष्क की रचना नहीं हैं। वे कभी लिखे नहीं गये, कभी रचे नहीं गये। वे शाश्वत हैं, अव्यक्तिक हैं। वेदों की तिथियाँ निश्चित नहीं की गयी हैं और कभी की जा सकती हैं। वेद शाश्वत आध्यात्मिक सत्य हैं। वेद दिव्य ज्ञान के मूर्त रूप हैं। पुस्तकें नष्ट हो सकती हैं; परन्तु ज्ञान नष्ट नहीं हो सकता। ज्ञान शाश्वत है, इसी दृष्टि से वेद शाश्वत हैं।

 

चार वेद और उनके उपविभाग

 

वेद चार विशाल ग्रन्थों में विभाजित हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। यजुर्वेद दो भागों में विभक्त है-शुक्ल और कृष्ण। कृष्ण अथवा तैत्तिरीय अधिक प्राचीन पुस्तक है। शुक्ल अथवा वाजसनेय में देदीप्यमान सूर्य देवता द्वारा याज्ञवल्क्य ऋषि के समक्ष किये गये दिव्य रहस्यों के उद्घाटन हैं।

 

ऋग्वेद २१ अनुच्छेदों में विभाजित है, यजुर्वेद १०९ में, सामवेद १००० में और अथर्ववेद ५० में। इस प्रकार सम्पूर्ण वेद ११८० अनुच्छेदों में विभाजित है।

 

प्रत्येक वेद में चार भाग हैं-मन्त्रसंहिता अथवा स्तोत्र, ब्राह्मण अथवा मन्त्रों तथा कर्मकाण्डों की व्याख्या, आरण्यक तथा उपनिषद् वेदों का चार भागों में विभाजन मानव-जीवन की चार अवस्थाओं (आश्रमों) के अनुकूल है।

 

मन्त्रसंहिता इहलोक में भौतिक समृद्धि और परलोक में सुख प्राप्ति के लिए वैदिक ईश्वर तथा देवी-देवताओं की प्रशंसा में गाये हुए स्तोत्र हैं। वे विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं को सम्बोधित ऐहिक तथा पारलौकिक विषयक छन्दबद्ध प्रार्थनाएँ, स्तोत्र और मन्त्र हैं। वेदों का मन्त्र-भाग ब्रह्मचारियों के लिए विशेष उपयोगी है।

 

वेदों के ब्राह्मण-भाग मनुष्यों को यज्ञ आदि यज्ञीय कर्मकाण्ड करने में सहायता करते हैं। इनमें यज्ञ में मन्त्रों का उपयोग करने की गद्यात्मक व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। ब्राह्मण-भाग गृहस्थों के लिए उपयोगी है।

 

आरण्यक वन्य पुस्तकें हैं, जिनमें कर्मकाण्डों की दार्शनिक व्याख्या दी गयी है। आरण्यक वानप्रस्थियों के लिए हैं।

 

उपनिषद् वेदों के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंश हैं। वेदों का ज्ञान साररूप में उपनिषदों में ही है। उपनिषदों का दर्शन भव्य, गम्भीर, उच्च और मर्मस्पर्शी है। उपनिषद् परमात्मा तथा जीवात्मा का ऐक्य उद्घोषित करते हैं। उनमें अत्यन्त सूक्ष्म एवं गम्भीर आध्यात्मिक सत्यों का उद्घाटन हुआ है। उपनिषद् संन्यासियों के लिए उपयोगी हैं।

 

समग्र वेद की विषयसामग्री कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड में विभाजित है। कर्मकाण्ड विभिन्न यज्ञों और धार्मिक अनुष्ठानों से सम्बन्धित है। उपासनाकाण्ड में ध्यान उपासना के विभिन्न प्रकारों और ज्ञानकाण्ड में निर्गुण ब्रह्म-सम्बन्धी ज्ञान का निरूपण किया गया है। मन्त्र तथा ब्राह्मण ग्रन्थ कर्मकाण्ड से सम्बन्धित हैं। इसी प्रकार आरण्यक ग्रन्थ उपासनाकाण्ड एवं उपनिषद् ज्ञानकाण्ड से सम्बन्धित हैं।

 

मन्त्रसंहिता

 

ऋग्वेदसंहिता हिन्दुओं का प्रधान, प्राचीनतम तथा सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है। यह भारत की महान् बाइबिल है। इसकी शैली-भाषा एवं श्वर-शैली अत्यन्त सुन्दर तथा रहस्यमय हैं। इसके अमर मन्त्र अस्तित्व के महान् सत्यों के प्रतीक हैं। यह सम्भवतः विश्व के समस्त धर्मग्रन्थों में सर्वश्रेष्ठ है। इसका याजक 'होतृ' कहलाता है।

 

यजुर्वेदसंहिता का अधिकांश भाग गद्य में है। यजुर्वेद के याजक (अध्वर्यु) यज्ञीय कर्मकाण्डों की व्याख्या करने के लिए इसे उपयोग में लाते हैं। यह ऋग्वेद के मन्त्रों का पूरक है।

 

सामवेदसंहिता का अधिकांश ऋग्वेदसंहिता ही है। यह सामवेद के याजक (उद्गातृ) के द्वारा यज्ञ में गाये जाने के लिए है।

 

अथर्ववेदसंहिता अथर्ववेद के याजक ब्रह्मा द्वारा उपयोग में लायी जाती है ताकि वह यज्ञ के अन्य तीन याजकों द्वारा संयोगवश किये जाने वाले अशुद्ध उच्चारणों और गलत ढंग से किये जाने वाले कर्मकाण्डों को शुद्ध कर सके।

 

ब्राह्मण तथा आरण्यक

 

ऋग्वेद के अन्तर्गत दो ब्राह्मण-ग्रन्थ हैं- ऐतरेय और सांख्यायन। मैक्समूलर के अनुसार, "ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ है। ब्राह्मण ग्रन्थ के पावन स्तोत्र अखिल विश्व के साहित्य में अनुपम हैं और उनका संरक्षण वस्तुतः अद्भुत है।" (History of Ancient Literature)

 

शतपथ ब्राह्मण शुक्ल यजुर्वेद से सम्बन्धित है, तैत्तिरीय और मैत्रायण-ब्राह्मण कृष्ण यजुर्वेद से। ताण्ड्य अथवा पंचविंश, षड्विंश, छान्दोग्य, द्भुत, आर्षेय और उपनिषद् ब्राह्मण सामवेद से सम्बन्धित हैं। अथर्ववेद का ब्राह्मण 'गोपथ' कहलाता है। प्रत्येक ब्राह्मण का एक आरण्यक है।

 

उपनिषद्

 

उपनिषद् वेदों के उपसंहार-अंश अथवा अन्तिम भाग हैं। उन पर आधारित शिक्षा वेदान्त कहलाती है। उपनिषद् वेदों का लक्ष्य और सारांश हैं। वे हिन्दू-धर्म की आधारशिला ही हैं।

 

प्रत्येक वेद के उतने ही उपनिषद् हैं जितनी उसकी शाखाएँ हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद की क्रमशः २१, १०९, १००० तथा ५० शाखाएँ हैं।

 

भारतवर्ष के विभिन्न मतों (यथा-अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, भेदाभेदवाद आदि) के समर्थक दार्शनिकों ने उपनिषदों की सर्वोच्च प्रामाणिकता को स्वीकार किया है। उन्होंने इन ग्रन्थों की व्याख्याएँ तो की हैं; परन्तु प्रामाणिकता इन्हीं की मानी है। उन्होंने अपनी-अपनी दर्शन-प्रणालियों को उपनिषदों के आधार पर ही विकसित किया है।

 

उपनिषदों के द्रष्टाओं की पाश्चात्य विद्वानों ने भी प्रशंसा की है। उस समय जब कि पाश्चात्य लोग इतने पिछड़े हुए थे कि छाल के कपड़े और घोर अज्ञानता में डूबे हुए थे, उपनिषदों के द्रष्टा शाश्वत परमानन्द में निमग्न रहते थे तथा उनकी संस्कृति और सभ्यता सर्वोच्चता के शिखर पर थी।

सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपनिषद् हैं-ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, कौषीतकी, श्वेताश्वतर तथा मैत्रायणि। ये सब परम अधिकृत ग्रन्थ हैं।

 

वेदों के मूलभूत सत्य आप सबके समक्ष उद्घाटित हो सकें! वेदों की माता गायत्री आपको ज्ञान-रूपी दूध-उपनिषदों की प्राचीन प्रज्ञा प्रदान करे!

 

उपवेद

 

चारों वेदों के पूरक के रूप में उपवेदों की संख्या चार है। ये हैं- आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र। क्रमशः इनका अर्थ इस प्रकार है-आयुर्विज्ञान, युद्ध-विज्ञान, संगीत-विज्ञान एवं राजशासन (polity) का विज्ञान

 

वेदांग

 

वेदों के छह व्याख्यात्मक अंग हैं-पाणिनि की शिक्षा और व्याकरण, पिंगलाचार्य का छन्द, यास्क का निरुक्त, गर्ग का ज्योतिष और विभिन्न ऋषियों द्वारा रचित कल्प-श्रौत, गृह्य, धर्म एवं शुल्ब।

 

शिक्षा स्वर-विज्ञान का ज्ञान है। यह वेदांग उच्चारण और स्वराघात से सम्बन्धित है। वेदों की सामग्री विभिन्न पाठों में विभाजित है। पद-पाठ में प्रत्येक शब्द को एक अलग रूप दे कर समझाया गया है। क्रम-पाठ में शब्दों को जोड़ों (pairs) में व्यवस्थित किया गया है।

 

व्याकरण से तात्पर्य संस्कृत व्याकरण से है। पाणिनि के ग्रन्थ अति-प्रसिद्ध हैं। व्याकरण के ज्ञान के अभाव में आप वेदों को नहीं समझ सकते।

 

छन्द में पिंगल के छन्दों (metre) की व्याख्या है।

 

निरुक्त भाषा-शास्त्र है।

 

ज्योतिष में खगोलविज्ञान और फलित ज्योतिष की व्याख्या है। इसमें नक्षत्र आदि की गतियों और मानव पर उनके प्रभाव का वर्णन किया गया है।

 

कल्प कर्मकाण्ड की प्रणाली है। यज्ञीय कर्मकाण्ड का निरूपण करने वाले श्रौत-सूत्र कल्प के अन्तर्गत आते हैं। शुल्बसूत्र में यज्ञ-क्षेत्र की नापों का वर्णन है। ये सूत्र भी कल्प के अन्तर्गत हैं। गृहस्थ जीवन पर प्रकाश डालने वाले गृह्य-सूत्र और नैतिकता, रीति-रिवाजों तथा विधि-विधानों की व्याख्या करने वाले धर्म-सूत्र भी कल्प के अन्तर्गत हैं।

 

प्रतिशाख्य, पदपाठ, क्रमपाठ, उपलेख, अनुक्रमणि, दैवत-संहिताएँ, परिशिष्ट, प्रयोग, पद्धतियाँ, कारिकाएँ, खिल और व्यूह कल्प-सूत्रों में वर्णित कर्मकाण्डों को और अधिक सविस्तार प्रतिपादित करते हैं।

 

कल्प-सूत्रों के अन्तर्गत अश्वलायन, शाख्यायन और साम्भाव्य ऋग्वेद के हैं। मशक, लाट्यायन, द्रह्यायन, गोभिल और खादिरा सामवेद के हैं। कात्यायन और पारस्कर शुल्क यजुर्वेद के हैं। आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, बोधायन, भारद्वाज, मानव, वैखानस और काठक कृष्ण यजुर्वेद के हैं तथा वैतान और कौशिक अथर्ववेद के हैं।

स्मृतियाँ

 

श्रुतियों के बाद स्मृतियों का महत्त्व है। ये हिन्दुओं के सनातन वर्णाश्रम-धर्म से सम्बन्धित पावन प्राचीन नियमसंहिताएँ हैं। वेदों में दिये हुए कर्मकाण्ड सम्बन्धी आदेशों (विधियों) की ये पूरक हैं और उनकी व्याख्या करती हैं। स्मृति अथवा धर्मशास्त्र की आधारशिला श्रुति है। स्मृति-ग्रन्थ वेदों के उपदेशों पर आधारित हैं। प्रामाणिकता में स्मृति का स्थान श्रुति के बाद दूसरा है। यह धर्म का निरूपण और विकास करती है। यह हिन्दू राष्ट्रीय, सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत कर्तव्यों का नियमन करने वाले नियमों और कानूनों का निरूपण करती है।

 

प्रत्यक्ष रूप से स्मृति कहलाने वाले ग्रन्थ धर्मशास्त्र (संहिताओं की पुस्तक) हैं। व्यापक रूप में स्मृति के अन्तर्गत वेदों के अतिरिक्त समस्त हिन्दू-शास्त्र जाते हैं।

 

समय-समय पर हिन्दू-समाज का नियमन करने वाले नियम स्मृतियों में निहित हैं। उनमें व्यक्तियों तथा समुदायों के लिए दैनिक आचरण में मार्गदर्शन देने के लिए और उनके रीति-रिवाजों को व्यवस्थित करने के निश्चित नियम दिये हुए हैं। स्मृतियों में प्रत्येक श्रेणी के मनुष्यों को परिस्थितियों के अनुसार कर्तव्यों का पालन करने से सम्बन्धित विस्तृत निर्देश दिये गये हैं।

 

इन स्मृतियों से हिन्दू अपना जीवन यापन करना सीखता है। वर्णाश्रम के कर्तव्यों तथा समस्त धर्मानुष्ठानों का विवेचन उन ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से किया गया है। स्मृतियों में मनुष्य के जन्म और आश्रम के अनुसार कुछ कर्मों का निर्धारण किया गया है और कुछ का निषेध। स्मृतियों का ध्येय है मानव-हृदय को परिशुद्ध करके उसे धीरे-धीरे अमरत्व के परम पद पर ले जाना तथा उसे पूर्ण एवं मुक्त बनाना।

 

ये स्मृतियाँ समय-समय पर बदलती रही हैं। स्मृतियों के आदेश तथा निषेध विशेष सामाजिक प्रतिवेश से सम्बन्धित होते हैं। जैसे जैसे हिन्दू-समाज के प्रतिवेश एवं परिस्थितियों में परिवर्तन होते गये, वैसे-वैसे विभिन्न काल के ऋषियों द्वारा नयी-नयी स्मृतियों का संकलन होता रहा है।

 

प्रसिद्ध हिन्दू-विधिकर्ता

 

समय-समय पर कोई--कोई महान् विधिकर्ता जन्म लेता रहा है। वह प्रचलित नियमों को विधिबद्ध (codify) करता है तथा उन नियमों को हटा देता है जो पुराने पड़ गये हैं। वह उनमें कुछ परिवर्तन करके, घटा-बढ़ा कर उन्हें समय की आवश्यकता के अनुरूप बना देता है, ताकि वेद की शिक्षा के अनुकूल लोग जीवन व्यतीत कर सकें। इन विधिकर्ताओं में मनु, याज्ञवल्क्य और पाराशर सुप्रसिद्ध हैं। हिन्दू-समाज इन्हीं तीन महान् विधिकर्ताओं द्वारा रचित नियमों पर आधारित है और उनके द्वारा संचालित होता है। विशेष रूप से उल्लेखनीय स्मृतियाँ इन्हीं तीन विधिकर्ताओं द्वारा रचित हैं, यथा- () मनुस्मृति अर्थात् मानव-धर्म-शास्त्र, () याज्ञवल्क्यस्मृति और () पाराशरस्मृति। मनु एक महानतम तथा प्राचीनतम विधिकर्ता हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति मनुस्मृति की ही है और महत्त्व में उससे द्वितीय स्थान पर है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति वर्तमान समय में भारत-भर में प्रामाणिक ग्रन्थ माने जाते हैं। हिन्दू-विधि से सम्बन्धित विषयों में मुख्यतः याज्ञवल्क्यस्मृति का ही ध्यान रखा जाता है। भारत सरकार ने भी प्राचीन कानूनों में से कुछ को मान्यता दे दी है।

 

मुख्य स्मृतियाँ या धर्मशास्त्र अठारह हैं। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्मृतियाँ मनु, याज्ञवल्क्य और पाराशर द्वारा रचित हैं। शेष पन्दरह स्मृतियाँ हैं-विष्णु, दक्ष, संवर्त, व्यास, हारीत, शततप, वसिष्ठ, यम, आपस्तम्ब, गौतम, देवल, शंख-लिखित, उशन, अत्रि और शौनक।

 

मनु के नियम सत्ययुग के लिए हैं। याज्ञवल्क्य के त्रेतायुग के लिए, शंख और लिखित के नियम द्वापर के लिए एवं पाराशर के नियम कलियुग के लिए हैं।

 

जो नियम नितान्त सामाजिक परिस्थिति, समय और वातावरण पर आधारित हैं, उन्हें समाज, समय और वातावरण में होने वाले परिवर्तनों के साथ परिवर्तित होते रहना चाहिए, तभी हिन्दू-समाज की उन्नति सुनिश्चित हो सकती है।

 

नवीन नियमावली की आवश्यकता

 

वर्तमान समय में मनु के द्वारा रचे हुए कुछ नियमों का अक्षरशः पालन करना सम्भव नहीं है। उनके भाव को ही ग्रहण किया जा सकता है, शब्दों को नहीं। समाज प्रगति कर रहा है। जब समाज विकसित होता है, तब वह उन विधि-नियमों से आगे बढ़ जाता है जो भूतकाल में कभी समाज के विकास में योगदान दे रहे थे। कई नवीन विचार जिनके विषय में विधिकर्ताओं ने सोचा भी नहीं था, अब उत्पन्न हो गये हैं। जो नियम पुराने पड़ गये हैं, उनका पालन करने के लिए लोगों से आग्रह करना व्यर्थ है।

 

हमारा वर्तमान समाज बहुत परिवर्तित हो गया है। अब इस युग की आवश्यकताओं के अनुरूप एक नयी स्मृति की आवश्यकता है। कोई अन्य मनीषी आज के हिन्दू-समाज के समक्ष नयी नियमावली प्रस्तुत करेगा, इसके लिए उपयुक्त समय अब गया है। वर्तमान समय का स्वागत है।

 

अन्तःस्वर

 

तप, जप, कीर्तन, ध्यान तथा गुरु-सेवा के द्वारा जिसका हृदय शुद्ध हो गया है, जिसका अन्तःकरण बिलकुल पवित्र है, उसे धर्म, कर्तव्य अथवा नैतिक कमर्मों में उसका अन्तःस्वर ही मार्ग-निर्देशन प्रदान करता है। सत्त्व-भाव से परिपूर्ण शद्ध हृदय का अन्तःस्वर वास्तव में उस अन्तर्यामी भगवान् की ही पुकार है जो हमारा आन्तरिक शासक है। यह स्वर स्मृति के विधि-विधानों से भी बढ़ कर है। यह स्मृतियों की स्मृति है। अपने हृदय को पवित्र बनायें और उस अन्तःस्वर को सुनने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करें। इस स्वर का श्रवण करने के लिए अपने कानों को समाचरित करें।

 

श्रुति और स्मृति

 

श्रुति और स्मृति हिन्दू-धर्म के दो प्रामाणिक स्रोत हैं। श्रुति का शाब्दिक अर्थ है- 'जो सुना जाता है' और स्मृति का अर्थ है- 'जो स्मरण किया जाता है' श्रुति प्रकटन है और स्मृति परम्परा। उपनिषद् श्रुति हैं, गीता स्मृति है।

 

श्रुति साक्षात् अनुभव है। महान् ऋषियों ने धर्म के शाश्वत सत्यों को श्रवण करके उनका आलेख आने वाली पीढ़ियों लाभ लिए छोड़ दिया। इन आलेखों से वेद बने। इस प्रकार श्रुति मूल-प्रमाण है। स्मृति अनुभव का अनुस्मरण है। इसीलिए स्मृति का स्थान प्रमाण के रूप में श्रुति के बाद है। स्मृतियाँ अथवा धर्मशास्त्र भी सन्तों द्वारा लिखित ग्रन्थ हैं; किन्तु वे अन्त्य-प्रमाण नहीं हैं। यदि स्मृति में श्रुति का खण्डन करने वाली कोई बात होगी, तो स्मृति अमान्य हो जायेगी।

इतिहास-ग्रन्थ

मैत्री-प्रबन्ध और आदेशात्मक-प्रबन्ध

इस शीर्षक के अन्तर्गत चार ग्रन्थ हैं- वाल्मीकि रामायण, योगवासिष्ठ, महाभारत और हरिवंश। वेदों में जो है, वह इनमें भी है; परन्तु अधिक सरल रूप में है। ये सुद्धत-संहिताएँ अर्थात् मैत्री-प्रबन्ध कहलाते हैं तथा वेद प्रभु संहिताएँ अर्थात् आदेशात्मक-संहिता जो अत्यन्त प्रामाणिक हैं। इन रचनाओं में ऐतिहासिक वर्णनों, कहानियों और कथोपकथन के रूप में सार्वभौमिक सत्यों की व्याख्या है। ये अत्यन्त मनोरंजक ग्रन्थ हैं जो बालकों से ले कर बुद्धजीवी विद्वानों तक सभी को रुचिकर लगते हैं।

 

इतिहास-ग्रन्थों में अत्यन्त रोचक और महत्त्वपूर्ण कथाएँ दी हुई हैं जिनके माध्यम से हिन्दू-धर्म के समस्त मूलभूत उपदेश पाठक के मन में स्थायी रूप से अंकित हो जाते हैं।

 

स्मृति-ग्रन्थों के नियमों और वेदों के सिद्धान्तों की छाप हिन्दू-पाठकों के मन पर उनके राष्ट्रीय वीरों के चमत्कारिक तथा श्रेष्ठ कर्मों के माध्यम से पड़ती है। इन उत्कृष्ट कथाओं से हमें हिन्दू-धर्म का स्पष्ट चित्र देखने को मिलता है।

 

सामान्य व्यक्ति के लिए उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों का गूढ़ दर्शन बोधगम्य नहीं है; इसलिए वाल्मीकि और व्यास ने जनसाधारण के लिए इतिहास लिखे जिनमें वेदों का गूढ़ दर्शन सर्वसाधारण के लिए उदाहरणों और आख्यानों के माध्यम से रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

 

दो सुप्रसिद्ध इतिहास-ग्रन्थ रामायण और महाभारत महाकाव्य हैं। वे हिन्दुओं के अति-प्रसिद्ध और उपयोगी शास्त्र हैं। रामायण ऋषि वाल्मीकि द्वारा और महाभारत व्यास जी द्वारा विरचित हैं।

 

रामायण

 

रामायण में आदर्श पुरुष राम की कथा वर्णित है। यह इक्ष्वाकु के वंशज सूर्यवंशी राजाओं के परिवार का इतिहास है जिसमें भगवान् विष्णु के अवतार रामचन्द्र और उनके तीन भाई जन्मे थे। रामायण के राम, सीता, लक्ष्मण, भरत और श्री हनुमान् जैसे आदर्श चरित्र हमारे मन पर हिन्दू-धर्म की स्पष्ट छाप छोड़ते हैं। राम और उनके भाइयों के जन्म, उनकी शिक्षा और विवाह, श्रीराम वनवास, सीता का हरण और उनकी प्रतिप्राप्ति, रावण-वध और श्रीराम-राज्य आदि के विवरण रामायण में विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किये गये हैं। मनुष्य को अपने से बड़ों, समवयस्कों और छोटों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए, राजा को किस प्रकार शासन करना चाहिए, मनुष्य को इस संसार में कैसे जीवन-यापन करना चाहिए, वह किस प्रकार मोक्ष, स्वतन्त्रता और पूर्णता प्राप्त कर सकता है-यह सब इस सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ से सीखा जा सकता है। रामायण से भारतीय जीवन की स्पष्ट झाँकी देखने को मिलती है। आज भी हमारे पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय आदर्शों के स्रोत रामायण और महाभारत के ये उच्च चरित्र ही हैं। इन ग्रन्थों के महान् राष्ट्रीय नायक आज भी प्रकाश स्तम्भ की तरह समस्त विश्व की जनता का पथ-प्रदर्शन करते और प्रेरणा प्रदान करते हैं। राम, भरत और लक्ष्मण के जीवन भ्रातृ-स्नेह और पारस्परिक सेवा का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। श्री हनुमान् एक असाधारण कर्मयोगी के रूप में उभर कर आते हैं। सीता का जीवन पतिव्रतधर्म, पवित्रता और माधुर्य का अनुपम उदाहरण है। श्री वाल्मीकि ने रामायण (जो आदि-काव्य है) में चौबीस हजार श्लोक लिखे हैं।

महाभारत

 

महाभारत कौरवों और पाण्डवों का इतिहास है। इसमें चन्द्रवंशी कौरवों और पाण्डवों के बीच कुरुक्षेत्र में होने वाले महायुद्ध का वर्णन है। कौरव और पाण्डव परस्पर चचेरे भाई थे। महाभारत हिन्दू-धर्म का विश्वकोश है। इसे पाँचवाँ वेद कहना उपयुक्त ही है। धर्म, दर्शन, रहस्यवाद और राज्यतन्त्र के अन्तर्गत कोई भी विषय ऐसे नहीं हैं जिनका वर्णन इस महाकाव्य में हुआ हो। इसमें अत्युच्च नैतिक शिक्षाएँ, कई सुन्दर कथाएँ, उपाख्यान, भाषण, धर्मोपदेश तथा दृष्टान्त हैं। इन्हीं के माध्यम से नीति और तत्त्वमीमांसा के सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये हैं। भगवान् कृष्ण की कृपा से पाण्डवों ने विजय प्राप्त की। श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास जी ने इस महाकाव्य की रचना की। इसमें एक लाख श्लोक हैं।

 

भगवद्गीता

 

महाभारत का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग भगवद्गीता है, महाभारत के युद्ध के प्रारम्भ होने से पूर्व रण-क्षेत्र में भगवान् कृष्ण और अर्जुन के बीच होने वाला यह द्भुत वार्तालाप है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथि बने, उन्होंने अर्जुन को हिन्दू-धर्म के मूलभूत सिद्धान्त समझाये। जिस प्रकार उपनिषद् वेदों का सार है, उसी प्रकार गीता उपनिषदों का सार है। उपनिषद् गौ के समान है, कृष्ण जी ग्वाले हैं, अर्जुन बछड़ा और गीता दूध है। जो गीता-रूपी दुग्ध का पान करते हैं, वे बुद्धिमान् व्यक्ति हैं।

 

गीता हिन्दू-साहित्य का अमूल्य रत्न है। यह सार्वभौमिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करती है। गीता समन्वययोग की शिक्षा देती है। विश्व के धार्मिक साहित्य में इसका उच्च स्थान है।

 

युद्ध-क्षेत्र में अपने सामने अपने प्रिय सम्बन्धियों और गुरु जनों को खड़े देख कर अर्जुन मूर्च्छित हो गया और उसने उनसे युद्ध करने से इनकार कर दिया। तब भगवान् कृष्ण ने उसे आत्मज्ञान का उपदेश दिया और उसे विश्वास दिलाया कि फल की चिन्ता किये बिना युद्ध करना उसका कर्तव्य है। तत्पश्चात् अर्जुन के मोह तथा संशय दूर हो गये। वह कौरवों ये युद्ध करके विजयी हुआ।

 

प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति का ज्ञान

 

महाभारत में धर्म-विषय पर भीष्म की वह अमर चर्चा भी है जो उन्होंने बाणों की शय्या पर लेटे-लेटे युधिष्ठिर से की थी। समग्र महाभारत इतिहास, नीति और धर्म का एक अद्वितीय विश्वकोश बन गया है।

 

रामायण और महाभारत में हमें प्राचीन भारत, उसके निवासियों, प्रथाओं, रहन-सहन के ढंग, कला, सभ्यता और संस्कृति तथा उसके उद्योगों का स्पष्ट विवरण मिलता है। इन दो ग्रन्थों को पढ़ने से आपको विदित होगा कि कभी भारत कितना महान् था। आपको उसे पुनः महान् बनाने की प्रेरणा भी मिलेगी। अन्य किसी देश में इतने महापुरुष, महान् गुरु, महान् योगी, महान् द्रष्टा, महर्षि, महान् पैगम्बर, महान् आचार्य, महान् नरेश, महान् नायक, महान् राजनेता, महान् देशभक्त और महान् परोपकारी व्यक्ति नहीं हुए जितने भारत में हुए। जितना अधिक आप भारत और हिन्दू-धर्म के बारे में जानेंगे, उतना ही अधिक उसका सम्मान और प्रेम करेंगे और परमात्मा को इस बात का धन्यवाद देंगे कि उसने आपको भारत में हिन्दू बना कर जन्म दिया। धन्य है भारतवर्ष ! धन्य है हिन्दू धर्म ! धन्य है उपनिषदों के द्रष्टा ! धन्य है दिव्य गीतों के रचयिता कृष्ण!

 

पुराण

 

पुराण इतिहास की ही श्रेणी के हैं। उनके पाँच लक्षण हैं- () सर्ग तथा सृष्टि-विज्ञान; () प्रतिसर्ग अर्थात् सृष्टि का विस्तार, लय तथा पुनःसृष्टि आदि; () सृष्टि आदि की वंशावली; () मन्वन्तर अर्थात् किस-किस मनु का समय कब-कब रहा और उस काल में कौन-कौन-सी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हुई थीं; और () वंशानुचरित अर्थात् राजाओं की वंशावली। समस्त पुराण सुहत्संहिताओं के अन्तर्गत हैं।

 

युगों-युगों से पुराणों के संकलनकर्ता व्यास हैं और इस युग के लिए वह पराशर के पुत्र कृष्णद्वैपायन हैं।

 

वेदों के धर्म को लोकप्रिय बनाने के लिए पुराण लिखे गये थे। उनमें वेदों का सार निहित है। पुराणों का लक्ष्य है जन-साधारण के मन पर वेदों की शिक्षा का प्रभाव अंकित करके ठोस उदाहरणों, पौराणिक कथाओं, कहानियों, आख्यानों, सन्तों, राजाओं और महापुरुषों की जीवनियों एवं महान् ऐतिहासिक घटनाओं के वर्णन के माध्यम से उनमें भगवद्भक्ति उत्पन्न करना। धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने हेतु सन्तों ने इन माध्यमों का ही उपयोग किया। पुराण विद्वानों के लिए नहीं, सामान्य व्यक्तियों के लिए थे जो उच्च दर्शन नहीं समझ सकते थे तथा जिनमें वेदों का अध्ययन करने की क्षमता भी नहीं थी।

 

दर्शन का अध्ययन बहुत ही कठिन है। यह केवल थोड़े से विद्वानों के लिए है। पुराण साधारण बुद्धि वाले व्यक्तियों के लिए हैं। पुराणों के माध्यम से धर्म अत्यन्त सरल और रोचक ढंग से सिखाया गया है। आज भी पुराण लोकप्रिय हैं। पुराणों में अति-प्राचीनकाल का इतिहास वर्णित है। उनमें जगत् के उन क्षेत्रों का भी वर्णन है जिन्हें साधारण भौतिक दृष्टि नहीं देख पाती। वे पढ़ने में बड़े मनोरंजक हैं और उनसे सब प्रकार की सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। बच्चे अपनी दादियों से इनकी कहानियों को सुनते हैं। पण्डित और पुरोहित मन्दिरों में, नदियों के तट पर एवं अन्य महत्त्वपूर्ण स्थानों में पुराणों की कथाएँ कहते हैं, जिन्हें समाज के सभी वर्गों के लोग बड़ी रुचि से सुनते हैं।

 

 

 

अठारह पुराण

 

अठारह मुख्य पुराण हैं और इतनी ही संख्या में उप-पुराण भी हैं। मुख्य पुराण हैं-विष्णुपुराण, नारदीयपुराण, श्रीमद्भागवतपुराण, गरुड़ (सुपर्ण)-पुराण, पद्मपुराण, वाराहपुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, मार्कण्डेयपुराण, भविष्यपुराण, वामनपुराण, मत्स्यपुराण, कूर्मपुराण, लिंगपुराण, शिवपुराण, स्कन्दपुराण और अग्निपुराण। इनमें छह सात्त्विक पुराण हैं जो विष्णु का गुणगान करते हैं, छह राजसिक हैं जो ब्रह्म की महिमा का वर्णन करते हैं तथा शेष छह तामसिक हैं। जो शिवजी की स्तुति करते हैं।

 

प्रारम्भिक साधक शिवपुराण या विष्णुपुराण का अध्ययन करके भ्रमित हो जाते है। शिवपुराण में शिवजी की बहुत प्रशंसा की गयी है और भगवान् विष्णु को निम्न स्थान प्रदान किया गया है। विष्णुपुराण में भगवान् हरि की स्तुति की गयी है और भगवान् शिव को गौण स्थान दिया गया है। कभी भगवान् शिव की महिमा कम कर दी है। भक्तों में अपने-अपने इष्टदेवों के प्रति श्रद्धा-भाव विकसित करने के उद्देश्य से ही ऐसा किया गया है। भगवान् शिव और विष्णु एक हैं।

 

पुराणों में भागवत और विष्णुपुराण सर्वश्रेष्ठ हैं। भागवत सबसे अधिक लोकप्रिय है। इसके पश्चात् विष्णुपुराण का स्थान है। मार्कण्डेयपुराण का एक अंश चण्डी अथवा देवी-माहात्म्य नाम से प्रसिद्ध है। भगवान् के मातृ-स्वरूप की उपासना ही इस अंश की विषय-सामग्री है। पवित्र पर्वो तथा नवरात्र के अवसर पर चण्डी का पाठ किया जाता है।

 

श्रीमद्भागवतपुराण और दशावतार

 

भागवतपुराण भगवान् विष्णु के विभिन्न अवतारों की ऐतिहासिक गाथा है। विष्णु के दश अवतार हुए हैं। प्रत्येक अवतार का उद्देश्य विश्व को किसी महान् संकट से मुक्त करना तथा दुष्टों का संहार करके सज्जनों की रक्षा करना रहा है। ये दश अवतार हैं-मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, रामचन्द्र, श्रीकृष्ण, बुद्ध और कल्कि (सफेद घोड़े पर सवार बीर जो कलियुग के अन्त में जन्म लेगा)

 

मत्स्य अवतार का उद्देश्य था जल प्रलय से वैवस्वत मनु को बचाना। कूर्म अवतार का उद्देश्य था प्रलय में खोयी हुई अमूल्य वस्तुओं को संसार को पुनः प्राप्त कराना। जब देव और असुरों ने क्षीर सागर का मन्थन किया, तो कछुए ने रई रखने के लिए अपनी पीठ प्रस्तुत कर दी थी। वामन अवतार का लक्ष्य था धरती की

 

जल से रक्षा करना जिसे हिरण्याक्ष नामक राक्षस पाताल में घसीट ले गया था। नृसिंह अवतार का लक्ष्य था प्रह्लाद के पिता राक्षस हिरण्यकशिपु के अत्याचारों से विश्व की रक्षा करना। वामन अवतार का लक्ष्य था राजा बलि की तपस्या और भक्ति से श्रीहीन हुई देवताओं की शक्ति को पुनः प्रतिष्ठित करके उसे देवताओं को लौटाना। परशुराम अवतार का लक्ष्य था क्षत्रिय राजाओं के दबाव से देश को मुक्त करना। परशुराम ने २१ बार क्षत्रिय प्रजाति का संहार किया। श्रीराम के अवतार का लक्ष्य दुष्ट रावण का संहार करना था। श्रीकृष्ण-अवतार का लक्ष्य था कंस और अन्य दानवों को मारना एवं गीता का अनुपम सन्देश दे कर भक्तिमत का प्रचार करना। बुद्धावतार का ध्येय था पशुबलि का अन्त करना और धर्मनिष्ठा का प्रचार-प्रसार करना। कल्कि अवतार का लक्ष्य है दुष्टता का नाश और सद्गुणों की पुनर्स्थापना।

 

तमिल पुराण

 

भगवान् शिव ने चार कुमारों को ज्ञान देने के लिए दक्षिणामूर्ति के रूप में अवतार लिया। उन्होंने सम्बन्धार, माणिक्कवासगर और पट्टिनाधर को दीक्षा देने के लिए मानव-रूप धारण किया था। वह अपने भक्तों की सहायता करने और उनके कष्ट हरण करने के लिए साक्षात् मानव-रूप में प्रकट हुए। भगवान् शिव की दिव्य लीलाएँ तमिल पुराणों-यथा शिवपुराण, पेरियपुराणम्, शिवपराक्रमम् तथा तिरुविलयडल- में वर्णित हैं।

 

उप-पुराण

 

उप-पुराण संख्या में अठारह हैं-सनत्कुमार, नृसिंह, बृहन्नारदीय, शिवरहस्य, दुर्वासा, कपिल, मानव, भार्गव, वारुण, कालिका, साम्ब, नन्दी, सूर्य, पाराशर, वसिष्ठ, देवी-भागवत, गणेश और हंस।

 

पुराणों की उपयोगिता

 

पुराणों का अध्ययन, धर्मग्रन्थों के पावन पाठ का श्रवण और भगवान् की लोकातीत लीलाओं का बखान भक्तों की साधना के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इनसे भगवान् बहुत प्रसन्न होते हैं। श्रवण नवधा-भक्ति का एक अंग है। पुराणों की कथाएँ श्रोताओं के हृदय में प्रेमा-भक्ति का संचार करती हैं। इससे जीव को अमरता प्राप्त होती है।

 

वेदों की भाषा अप्रचलित है और वेदान्त तथा उपनिषदों का दर्शन अत्यन्त कठिनाई से बोधगम्य हो पाता है। इस दृष्टि से पुराणों का विशेष महत्त्व है; क्योंकि उनमें दार्शनिक सत्यों और अमूल्य उपदेशों को सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया। इनसे जीवन के रहस्यों और परमानन्द प्राप्त करने के उपायों को समझने में सहायता मिलती है। इनके उपदेशों को ग्रहण करें और आज से ही धर्मनिष्ठा और आध्यात्मिक साधना का नया जीवन आरम्भ कर दें।

आगम

 

प्रचलित धर्मग्रन्थों का एक अन्य वर्ग आगम हैं। आगम ईश्वरपरक ग्रन्थ और देवोपासना की व्यावहारिक नियम पुस्तकें हैं। आगमों में तन्त्र, मन्त्र और यन्त्र सम्मिलित हैं। ये मन्दिरों आदि में की जाने वाली ईश्वर की बाह्य साकार उपासना का वर्णन करने वाले ग्रन्थ हैं। समस्त आगमों में ज्ञान, योग (चित्त की एकाग्रता), क्रिया (दीक्षणीय कर्म-काण्ड) और चर्य्या (बाह्य उपासना) का वर्णन है। इनमें सत्तामीमांसा, ब्रह्माण्डविज्ञान, मुक्ति, ध्यान, मन्त्र, दर्शन, गुह्य मण्डल (diagrams), तन्त्र-मन्त्र, मन्दिर-निर्माण, मूर्ति-निर्माण, घरेलू कार्यकलाप, सामाजिक नियम, सार्वजनिक त्यौहारों आदि का भी वर्णन है।

 

आगम तीन भागों में विभाजित हैं-वैष्णव, शैव और शाक्त। हिन्दुत्व के तीन मुख्य मत है-वैष्णव, शैव और शाक्त। इनके धर्म-सिद्धान्त सम्बन्धित आगमों पर निर्धारित हैं। वैष्णव अथवा पांचरात्र-आगम भगवान् का विष्णु के रूप में गुणगान करते हैं। शैव-आगम शिव के रूप में भगवान् की महिमा का वर्णन करते हैं। दक्षिण भारत, विशेषकर तिरुनेलवेली और मदुरै जनपदों में प्रचलित शैव-सिद्धान्त नामक महत्त्वपूर्ण दर्शन शैव-आगम पर ही आधारित है। शाक्त-आगम अथवा तन्त्र देवी के विभिन्न नामों के अन्तर्गत विश्वजननी के रूप में ईश्वर की महिमा का वर्णन करते हैं।

 

आगमों की प्रामाणिकता का स्रोत वेद नहीं हैं; परन्तु ये उनके विरोधी भी नहीं हैं। भाव तथा लक्षण में वे सब वैदिक हैं-यही कारण है कि वे प्रामाणिक माने जाते हैं।

 

वैष्णव-आगम

 

वैष्णव-आगम चार प्रकार के हैं- वैखानस, पांचरात्र, प्रतिष्ठासार और विज्ञानललित। ब्राह्म, शैव, कौमार, वासिष्ठ, कपिल, गौतमीय और नारदीय-ये पांचरात्र के सात विभाग हैं। महाभारत के शान्ति-पर्व का नारदीय-सर्ग पांचरात्र-सम्बन्धी ज्ञान का सबसे पुराना स्रोत है।

 

भगवान् विष्णु पांचरात्र-आगमों में परमेश्वर के रूप में प्रस्तुत हैं। वैष्णव-भक्त पांचरात्र-आगम को सर्वाधिक प्रामाणिक मानते हैं। उनका विश्वास है कि ये आगम स्वयं भगवान् विष्णु द्वारा प्रकटित किये गये। नारद-पांचरात्र में लिखा है-"ब्रह्म से ले कर तृण तक प्रत्येक वस्तु भगवान् कृष्ण है।" यह उपनिषदों के कथन-'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' के सदृश है।

 

वैष्णव-ग्रन्थों की संख्या २१५ है। इनमें ईश्वर, अहिर्बुध्न्य, पौष्कर, परम, सात्त्वत, बृहद् ब्रह्म और ज्ञानामृतसार संहिताएँ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

 

शैव-आगम

 

शैव लोग अट्ठाईस आगमों को मान्यता देते हैं जिनमें मुख्य आगमन 'कामिक' है। कश्मीर शैव-मत (जिसे प्रत्यभिज्ञ-प्रणाली भी कहते हैं) का आधार भी आगम ही हैं। प्रत्यभिज्ञ-प्रणाली के बाद की रचनाओं में अद्वैत की ओर स्पष्ट झुकाव दृष्टिगत होता है। दक्षिण शैव-सिद्धान्त और कश्मीर शैव मत वेदों के अतिरिक्त इन आगमों को भी अपने प्रामाणिक ग्रन्थ मानते हैं। प्रत्येक आगम के अन्तर्गत उप-आगम भी हैं। इनमें से केवल बीस के आंशिक अपूर्ण मूल-पाठ उपलब्ध हैं। शैव-आगमों में भगवान् शिव प्रमुख देवता हैं। कलियुग के लिए वह उपयुक्त देव हैं-सभी जाति के स्त्री और पुरुष उनकी उपासना कर सकते हैं।

 

शाक्त-आगम

 

धर्मग्रन्थों का एक वर्ग तन्त्र कहलाता है। ये ग्रन्थ शाक्तमत से सम्बन्ध रखते हैं। ये जगज्जननी के रूप में शक्ति-महिमा का वर्णन करते हैं। इनमें भगवान् के शक्ति-रूप का वर्णन है और दिव्य जननी की विभिन्न प्रकार की आनुष्ठानिक उपासना-विधियाँ निर्धारित की गयी हैं। आगमों की संख्या ७७ है। ये कुछ बातों में पुराणों जैसे हैं। इनमें सामान्यतः शिव-पार्वती का वार्तालाप है। इस वार्तालाप में कभी शिवजी पार्वती के प्रश्नों का उत्तर देते हैं और कभी शिवजी के प्रश्नों का पार्वती उत्तर देती हैं। महानिर्वाण, कुलार्णव, कुलसार, प्रपंचसार, तन्त्रराज, रुद्रयामल, ब्रह्मयामल, विष्णुयामल और तोडलतन्त्र महत्त्वपूर्ण शाक्त-आगम-ग्रन्थ हैं। आगमों में अनेक गुह्य तान्त्रिक अभ्यासों के बारे में बताया गया है। कुछ अभ्यास शक्ति प्रदान करते हैं तथा अन्य ज्ञान और मोक्ष। शक्ति भगवान् शंकर की सर्जक शक्ति है। शाक्तमत वास्तव में शैवमत का पूरक है।

 

आगमों पर उपलब्ध ग्रन्थों में सर्वाधिक प्रसिद्ध है- ईश्वरसंहिता, अहिर्बुध्न्यसंहिता, सनत्कुमारसंहिता, नारद-पांचरात्र, स्पन्दप्रदीपिका और महानिर्वाणतन्त्र

 

षड्दर्शन

 

यह हिन्दू-ग्रन्थों के बौद्धिक अनुभाग हैं। प्रथम चार सहजानुभूत हैं तथा पाँचवाँ दर्शन उत्प्रेरक एवं भावनात्मक है। दर्शन वेदों पर आधारित विभिन्न मत हैं। आगम ईश्वरपरक हैं। दर्शन-साहित्य दार्शनिक है। दर्शन उन विद्वानों के लिए है जिनमें प्रतिभा, विवेक, तर्क करने की क्षमता तथा सूक्ष्म बुद्धि है। पुराण, इतिहास और आगम जन-साधारण के लिए हैं। दर्शन बुद्धि को प्रभावित करते हैं; पुराण, इतिहास आदि हृदय को।

 

दर्शन के छह अंग हैं (षड्दर्शन) दर्शन का अर्थ है-किसी वस्तु या तथ्य को देखने की विधि। षड्दर्शन छह विभिन्न दर्शन-प्रणालियाँ या दर्शनिक मत हैं। दर्शनशास्र के छह मत सत्य के छह निरूपण (demonstration) हैं। प्रत्येक मत ने अपने ढंग से वेदों के विभिन्न भागों को विकसित किया है, क्रमबद्ध किया है तथा उनमें सह-सम्बन्ध स्थापित किया है। प्रत्येक विधि के एक सूत्रकार अर्थात् ऋषि हैं जिन्होंने उस मत के सिद्धान्तों को क्रमबद्ध करके उन्हें सूत्रों के रूप में प्रस्तुत किया है।

 

सूत्र सारगर्भित तथा अल्पाक्षरिक हैं। ऋषियों ने सूत्रों में अपने विचारों को प्रस्तुत किया है। उनके भाष्यों की सहायता लिये बिना इन सूत्रों को समझना बड़ा कठिन है। कई भाष्यकारों ने उनके भाष्य किये हैं। बाद में मूल-भाष्यों की भी टिप्पणियाँ तथा भाष्य लिखे गये।

 

षड्दर्शन (अर्थात् षट्शास्त्र) हैं- गौतम ऋषि द्वारा प्रवर्तित न्याय, कणाद ऋषि का वैशेषिक, कपिल मुनि का सांख्य, महर्षि पतंजलि का योग, जैमिनि का पूर्वमीमांसा और बादरायण (व्यास) का उत्तरमीमांसा अथवा वेदान्त। दर्शन-साहित्य तीन युग्मों में विभक्त है। इसकी शैली सूत्रात्मक है तथा इसमें वेदों के दर्शन को तकों की सहायता से समझाया गया है। ये युग्म हैं न्याय और वैशेषिक, सांख्य और योग, मीमांसा और वेदान्त।

 

सूत्र

 

स्वल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम्

अस्तोभमनवद्यं सूत्रं सूत्रविदो विदुः।।

 

सूत्र कम-से-कम अक्षरों की छोटी-सी रचना है जिसके लक्षण हैं जो अस्पष्ट हो, जिसमें सन्देहास्पद अभिव्यक्ति हो, जिसमें सम्पूर्ण अर्थ साररूप में समाया हुआ हो, जिसमें किसी प्रकार की अशुद्धि हो तथा जो अवरोध-रहित हो।

 

सूत्रकार कष्ट-कल्पित शब्दों तथा विचारों से युक्त दुर्बोध सूत्र में से यदि एक अक्षर भी कम करने में समर्थ होता है तो वह इतना हर्षित होता है कि जितना कोई पुत्र के जन्म पर। सूत्र-साहित्य का सर्वश्रेष्ठ, अत्यन्त सारगर्भित और सर्वथा परिपूर्ण ग्रन्थ है-पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी। पाणिनि समस्त सूत्रकारों के जनक हैं जिनसे उन सबने सूत्रों की रचना-विधि प्राप्त की है। सूत्रों का आशय है-ज्ञान के विशाल भण्डार को ऐसे संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करना जिसे सदैव स्मरण रखा जा सके। छह वेदांगों तथा षड्दर्शन से विश्व के सूत्र-साहित्य के बारह समूह (sets) बनते हैं। इनके अतिरिक्त अनेक उत्तरकालीन रचनाएँ भी हैं जैसे नारदभक्तिसूत्र, शाण्डिल्यभक्तिसूत्र आदि।

 

भाष्य

 

सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र पदैः सूत्रानुसारिभिः

स्वपदानि वर्ण्यते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ।।

 

सूत्रों का शब्दशः अनुवाद, उनकी विस्तृत व्याख्या भाष्य है। भाष्य में भाष्यकार के व्यक्तिगत विचार भी सम्मिलित रहते हैं। संस्कृति-साहित्य में (दृष्टान्तयोग्य) सर्वोत्तम भाष्य पतंजलि द्वारा रचित पाणिनि के व्याकरण-सूत्रों का भाष्य है। यह भाष्य इतना प्रसिद्ध है कि यह महाभाष्य कहलाता है और इसका प्रसिद्ध लेखक महाभाष्यकार। पतंजलि भाष्यकारों के जनक हैं। दूसरा महत्त्वपूर्ण भाष्य है शाबर स्वामी द्वारा रचित मीमांसा-सूत्र पर लिखी व्याख्या। शाबर स्वामी ने पतंजलि से ही भाष्य-रचना सीखी। तीसरा महत्त्वपूर्ण भाष्य है ब्रह्मसूत्रों पर शंकर द्वारा लिखित भाष्य जो शाबर भाष्य से मिलता-जुलता है। भारतीय षड्दर्शन पर वात्स्यायन, प्रशस्तपाद, विज्ञानभिक्षु, व्यास, शाबर और शंकर द्वारा भाष्य लिखे गये थे। वेदान्त या ब्रह्मसूत्रों पर रामानुज, मध्व, वल्लभ, निम्बार्क आदि द्वारा लिखे गये लगभग १६ भाष्य हैं।

 

वृत्ति

 

सद्वृत्तिः सन्निबन्धना

 

सूत्र की संक्षिप्त परन्तु स्पष्ट व्याख्या को वृत्ति कहते हैं। यह भाष्य की तरह विस्तृत नहीं होती। ब्रह्मसूत्रों पर बोधायण की वृत्ति एक श्रेष्ठ ग्रन्थ है।

 

 

वार्त्तिक

 

उक्त नुक्तदुरुक्तानं चिन्ता यत्र प्रवर्तते।

तं ग्रन्थं वार्त्तिकं प्राहुः वार्त्तिकज्ञ विचक्षणः ।।

 

वार्तिक वह रचना है जिसमें उन बातों की विवेचना होती है जिनको भाष्य में स्थान नहीं मिल पाता या जिनकी भाष्य में अपूर्ण व्याख्या की जाती है। इस अपूर्णता को दूर करने के लिए वार्तिक में कुछ आवश्यक तथ्य जोड़ दिये जाते हैं। वार्त्तिकों के श्रेष्ठ उदाहरण हैं-पाणिनि के सूत्रों पर कात्यायन का वार्त्तिक, शंकर के उपनिषद्-भाष्यों पर सुरेश्वर की और कर्ममीमांस के शाबर-भाष्य पर कुमारिल भट्ट का वार्त्तिक।

 

व्याख्यान अथवा टीका

 

मूल बात की सहायता से सरल भाषा में समझाना व्याख्यान कहलाता है। व्याख्यान में (विशेषकर काव्य के व्याख्यान में) श्लोक के विश्लेषण की आठ विभिन्न विधियाँ प्रयुक्त होती हैं-जैसे पदच्छेद, विग्रह, सन्धि, अलंकार, अनुवाद आदि। संस्कृत-साहित्य-शास्त्र के अध्ययन का यह एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। अनुव्याख्यान (जैसा कि श्री मध्व द्वारा लिखा गया) पूर्व-लिखित रचना की अधिक विस्तृत पुनरुक्ति है। अनुवाद मूल दुरुह पाठ का पुनरुल्लेख है। टीका व्याख्यान का ही दूसरा नाम है। वाचस्पति मिश्र का व्याख्यान (विशेषकर शंकर के ब्रह्मसूत्र-भाष्य पर) सर्वश्रेष्ठ है।

टिप्पणी

 

टिप्पणी वृत्ति की भाँति है; किन्तु वृत्ति की अपेक्षा कम रूढ़िवादी है। यह मूल-पाठ में प्रयुक्त कठिन शब्दों और पदों की व्याख्या मात्र है। उदाहरण है-पतंजलि के महाभाष्य पर कैयट की टिप्पणी पर नागेश भट्ट की टिप्पणी तथा वाचस्पति मिश्र की 'भामती' पर अमलानन्द की टिप्पणी पर अप्पय की टिप्पणी।

 

अन्य धर्मग्रन्थ

 

तेवारम तथा तिरुवाचकम (दक्षिण भारत के शैव सन्तों के भजन हैं), दक्षिण भारत के आलवार सन्तों के 'दिव्य प्रबन्धम्', कबीर के पद, तुकाराम के अभंग, तुलसीदास का रामचरितमानस -ये सब महान् आत्माओं के उद्गारों के रूप में उनके महान् ग्रन्थ हैं। इनमें वेदों का सार निहित है।

ऐहिक साहित्य

सुभाषित

 

सुभाषित गद्य या पद्य में लिखी गयी विद्वद्वाणी, उपदेश और कहानियाँ हैं। उदाहरणार्थ भर्तृहरि के तीन शतक, सुभाषित रत्न-भाण्डागार और सोमदेव भट्ट का कथासरित्सागर अथवा क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामंजरी। पंचतन्त्र और हितोपदेश भी इसी श्रेणी के ग्रन्थ हैं।

 

काव्य

 

काव्य पद्म, गद्य या गद्य-पद्य की मिश्रित शैली में लिखी गयी अत्यन्त विद्वित्तापूर्ण रचना है। सर्वोपरि काव्य-रचनाएँ हैं-कालिदास का रघुवंश और कुमारसम्भव, भारवि का किरातार्जुनीयम्, माघ का शिशुपालवधम् और श्रीहर्ष का नैषधीयचरितम्। समस्त संस्कृत साहित्य में सर्वश्रेष्ठ गद्यकाव्य श्रेष्ठ संस्कृत के प्रतिभासम्पन्न लेखक बाण भट्ट ने लिखे, उदाहरण-कादम्बरी और हर्षचरितम् गद्य-पद्य में मिश्रित प्रसिद्ध रचनाएँ हैं- चम्पूरामायण और चम्पूभारत। ये सब उच्च कोटि की कृतियाँ हैं जो सदैव भारतवर्ष की साहित्यिक उपलब्धियों को उजागर करती रहेंगी।

नाटक

 

ये शैक्षिक नाटक हैं जिनमें शृंगार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, भयानक, वीभत्स और रौद्र रसों का सुन्दर परिपाक हुआ है। यह कहा जाता है कि नवें रस शान्त पर कोई नहीं लिख सकता। इसकी प्राप्ति कैवल्यावस्था में ही हो सकती है। सर्वश्रेष्ठ नाटक कालिदास द्वारा रचित 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्', भवभूतिकृत 'उत्तर- रामचरितम्' और विशाखदत्तकृत 'मुद्रा-राक्षस' हैं।

 

अलंकार

 

अलंकारशास्त्र के इन ग्रन्थों के गद्य और पद्य-दोनों शैलियों की आलंकारिक भाषाओं की पूर्णता और सौन्दर्य के विज्ञान तथा सशक्त एवं ललित रचना से सम्बन्धित विवेचना है। ये संस्कृत साहित्य के मूल तत्त्व हैं तथा ये काव्य और नाटकों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। मम्मट का 'काव्यप्रकाश' और जगन्नाथ का 'रस-गंगाधर' सर्वोत्तम अलंकार-ग्रन्थ हैं।

 

उपसंहार

 

ये हैं समग्र संस्कृत-साहित्य के ग्रन्थ। भारतीय संस्कृति एक वृक्ष है; श्रुति उस वृक्ष की जड़ है; स्मृति, इतिहास और पुराण तने हैं; आगम और दर्शन शाखाएँ हैं; सुभाषित, काव्य, नाटक और अलंकार इस भारतीय संस्कृति-वृक्ष के पुष्प हैं।

 

स्मृति, इतिहास, पुराण, आगम और दर्शन वेद के ही विकसित रूप हैं। उनका अन्तिम स्रोत वेद है। उन सबमें सामान्य लक्ष्य है-मानव को इस योग्य बनाना कि वह अपना अज्ञान समाप्त कर सके तथा ईश्वरीय ज्ञान के द्वारा पूर्णता, स्वतन्त्रता, अमरता और परमानन्द की उपलब्धि कर सके। उनका यह भी लक्ष्य है कि मनुष्य ईश्वर के समान हो जाये, 'उससे' अभिन्न हो जाये।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

तृतीय अध्याय

हिन्दू-धर्म के विविध रूप

 

धर्म के साकार रूप, धर्म के नियन्ता और संरक्षक तथा धर्म के मूल-स्रोत ईश्वर को मौन प्रणाम!

 

धर्म क्या है? धर्म अर्थात् जो धारण करे। एकमात्र धर्म ही लोगों को धारण करता है। धर्म शब्द 'धृ' धातु से बना है जिसका अर्थ है धारण करना, और इसका शाब्दिक अर्थ है-वह जो इस विश्व को, विश्व के लोगों को, व्यष्टि से समष्टि-पर्यन्त अखिल सृष्टि को धारण करता है। यह परमेश्वर का शाश्वत दिव्य नियम है। समस्त सृष्टि का धारण-पोषण इसी सर्वशक्तिमान् दिव्य नियम द्वारा हो रहा है। इसलिए धर्म-पालन का आशय है-इन नियमों को समझ कर इनका पालन करना।

 

जो मनुष्य का कल्याण करे, वह धर्म है। धर्म इस विश्व का आधार है। धर्म व्यक्तियों की मर्यादा बनाये रखता है। जो सुरक्षा प्रदान करता है, वह धर्म है। धर्म शाश्वत सुख और अमरत्व का मार्ग प्रशस्त करता है।

 

जो धर्म है, वह वस्तुतः सत्य है; अतः जो सत्य बोलता है, वह धर्म को ही बोलता है तथा जो धर्म की बात करता है, वह सत्यवादी कहलाता है। दोनों एक ही वस्तु हैं।

 

मानव-चरित्र को विकसित करने वाले समस्त बाह्य कर्म तथा विचार और मानसिक अभ्यास भी धर्म के अन्तर्गत आते हैं। धर्म ईश्वर से उद्भूत होता है और आपको ईश्वर की ही ओर ले जाता है।

धर्म की परिभाषा

 

कोई भी भाषा पूर्ण नहीं है। संस्कृत शब्द 'धर्म' के लिए अँगरेजी में कोई समानार्थी शब्द नहीं है। धर्म की परिभाषा देना अत्यन्त कठिन है।

 

साधारणतया सदाचरण या कर्तव्य को धर्म कहा जाता है। धर्म सदाचरण का सिद्धान्त है। यह पवित्रता का सिद्धान्त है। यह एकता का भी सिद्धान्त है। भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा था कि जो द्वन्द्व को उत्पन्न करे, वह अधर्म है और जो द्वन्द्व का अन्त करके सामंजस्य लाये, वह धर्म है। जो भी सबको एकता के सूत्र में बाँध कर पवित्र दिव्य प्रेम एवं विश्व-भ्रातृत्व की भावनाओं को विकसित करने में सहयोग दे, वह धर्म है। जो भी विसंगति, फूट, असामंजस्य तथा घृणा को प्रोत्साहन दे, वह अधर्म है। जो भी विसंगति, फूट, असामंजस्य तथा घृणा को प्रोत्साहन दे, वह अधर्म है। धर्म सामाजिक जीवन को दृढ़ता प्रदान करता है तथा उसका पोषक है। धर्म के नियम सांसारिक कार्यकलापों का नियमन करने के लिए बनाये गये हैं। धर्म का पालन करने से इस लोक और परलोक में सुख प्राप्त होता है। धर्म अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने का साधन है। यदि आप इसका उल्लंघन करेंगे, तो यह आपको जीवित नहीं रहने देगा। यदि आप इसकी रक्षा करेंगे, तो यह आपकी रक्षा करेगा। मृत्यूपरान्त भी धर्म आपका एकमात्र साथी है। मानवता का मात्र आश्रय धर्म ही है।

 

जो मनुष्य को ऊँचा उठाता है, वह धर्म है-यह एक अन्य परिभाषा है। धर्म वह है जो आपको पूर्णता के मार्ग पर अग्रसर करता है। धर्म ईश्वर के साथ साक्षात् सम्पर्क करने में आपकी सहायता करता है। धर्म आपको दिव्य बनाता है। धर्म ईश्वर के पास तक पहुँचाने वाला आरोही सोपान है। आत्म-साक्षात्कार सर्वोच्च धर्म है। धर्म हिन्दू-नीति-शास्त्र का सार है। ईश्वर धर्म का केन्द्र है।

 

धर्म का अर्थ है आचार अर्थात् दैनिक जीवन का नियमन। आचार सर्वोच्च धर्म है। यह तप का आधार है। यही समृद्धि, सौन्दर्य तथा दीर्घायु प्रदान करता है और वंश के नैरन्तर्य में सहायक होता है। दुराचार और अनैतिकता कुख्याति, दुःख, रोग और अकाल मृत्यु की परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं। धर्म की जड़ें नैतिकता में हैं और धर्म के नियन्ता हैं स्वयं परमात्मा।

 

महर्षि जैमिनि के अनुसार-जो वेद-सम्मत हो और जो अन्त में दुःख का कारण नहीं बने, वह धर्म है।

 

वैशेषिक-दर्शन के अधिष्ठाता कणाद ऋषि ने वैशेषिक-सूत्रों में धर्म की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा दी है : "यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस सिद्धिः सा धर्म:" -जिससे अभ्युदय (इहलोक) तथा निःश्रेयस (परलोक में दुःख का पूर्ण निवारण तथा शाश्वत सुख की उपलब्धि) की प्राप्ति हो, वह धर्म है।

वेदों की एकमात्र प्रामाणिकता

 

चारों वेद, स्मृतिग्रन्थ, उन लोगों का व्यवहार जो इन ग्रन्थों की मूल भावना को आत्मसात् करके उनके अनुसार आचरण करते हैं, पावन पुरुषों का चरित्र और मनुष्य की आत्म-तुष्टि-ये सब धर्म के आधार हैं।

 

धर्म के विषय में वेद ही अन्तिम प्रमाण हैं। वेद के अतिरिक्त ज्ञान के किसी स्रोत से धर्म के विषय में नहीं जाना जा सकता। धर्म के विषय में तर्क प्रमाण-सिद्ध नहीं हो सकता। विश्व के धर्मग्रन्थों में वेद प्राचीनतम हैं। समस्त सभ्य संसार के श्रेष्ठ विद्वान् और पुरावेत्ता इसका समर्थन करते हैं। वे एक स्वर से घोषित करते हैं कि किसी भी मानवीय भाषा में लिखे गये ग्रन्थों में ऋग्वेदसंहिता निःसन्देह प्राचीनतम है। कोई भी पुरावेत्ता ऋग्वेदसंहिता के रचना-काल अथवा इसके प्राकट्य की तिथि निश्चित नहीं कर पाया।

परिवर्तनशील धर्म

 

जिस प्रकार एक चिकित्सक विभिन्न रोगियों को उनकी प्रकृति और रोगों के अनुसार विभिन्न औषधियाँ सेवन करने का परामर्श देता है, उसी प्रकार हिन्दू-धर्म विभिन्न व्यक्तियों के लिए विभिन्न प्रकार के कर्तव्य निर्धारित करता है। स्त्रियों के नियम पुरुषों के नियमों से भिन्न हैं। विभिन्न वर्गों और आश्रमों के नियमों में भी भेद हैं; किन्तु सत्य, अहिंसा, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह आदि कर्तव्य सभी मनुष्यों के लिए हैं।

 

व्यक्ति की परिस्थिति, युग, कर्म-विकास का स्तर और उसके समुदाय के अनुरूप ही उसका धर्म होता है। इस शताब्दी का धर्म दशवीं शताब्दी के धर्म से भिन्न है।

 

समय की परिस्थितियों के अनुसार धर्म का स्वरूप परिवर्तित हो जाता है। आपद्धर्म भी सामान्य व्यवहार से इसी प्रकार का व्यतिक्रम है। इस प्रकार का व्यतिक्रम विषम विपत्ति-काल में ही अनुमत है।

 

किन्हीं परिस्थितियों में जो धर्म है, अन्य परिस्थितियों में वही अधर्म बन सकता है। यही कारण है कि धर्म का रहस्य अत्यन्त गहन और सूक्ष्म माना जाता है। गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है-"कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र (धर्मग्रन्थ) ही प्रमाण हैं" (१६/२४) धर्म का सत्य गुप्त रहता है। श्रुतियाँ और स्मृतियाँ बहुत हैं। सबके लिए सुप्रकाशित धर्म-मार्ग वह है जिस पर आत्मसाक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति चल चुके हैं।

अन्य धर्मों में धर्माचरण

 

अन्य सब धर्म भी धर्माचरण को महत्त्व देते हैं। बौद्ध, ईसाई, जैन, सिक्ख, पारसी और इस्लाम-सभी धर्म इसे महत्त्व देते हैं। अफलातून, सुकरात, अरस्तु, काण्ट, स्वीडनबर्ग, स्पिनोज़ा आदि ने नैतिकता, कर्तव्यपरायणता तथा सदाचार को बहुत महत्त्व दिया है तथा इन्हें जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति का अपरिहार्य साधन बताया है। प्रत्येक धर्म धर्माचरण के कतिपय पक्षों पर बल देता है।

धर्माचरण के लाभ

 

धर्मग्रन्थों में पुरुषार्थ-चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को बहुत अधिक महत्त्व दिया गया है। अकेला धर्म ही मोक्ष, अमरता, असीमित परमानन्द, परम शान्ति और सर्वोच्च ज्ञान का द्वार है। धर्म ही मुख्य पुरुषार्थ है। धर्माचरण के द्वारा ही आप समस्त मानवीय कर्मों के सर्वोच्च गौरव तथा समस्त अभीष्ट वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ मोक्ष को प्राप्त करने की आशा कर सकते हैं।

 

धर्माचरण से ही जीवन के अन्तिम लक्ष्य, सर्वोच्च कल्याण अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है; आन्तरिक शान्ति, सुख और शक्ति का भी अनुभव होता है; जीवन पूर्णतः अनुशासित हो जाता है; शक्ति और क्षमताओं में वृद्धि हो जाती है तथा वह अनुभव कर लेता है कि इन नाम और रूपों के पीछे एक ही सारतत्त्व तथा जीवन्त-सत्य विद्यमान है। धर्माचरण करने वाला व्यक्ति तत्त्वान्तरित हो जाता है। उसका स्वभाव ही परिवर्तित हो जाता है। वह परम तत्त्व के साथ एकाकार हो जाता है। वह ऊपर-नीचे, दायें-बायें, सामने-पीछे, भीतर-बाहर और अखिल विश्व में ब्रह्म को व्याप्त देखता है।

धर्म के भेद

 

धर्म दो प्रकार का होता है : () सामान्य अथवा सार्वभौमिक, तथा () विशेष अथवा व्यक्तिगत। सन्तोष, क्षमा, आत्मनिग्रह, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, सत्यासत्य तथा सदसत्-विवेक, तत्त्वज्ञान और अक्रोध सार्वभौमिक धर्म के अन्तर्गत हैं। ये मनु के अनुसार धर्म की दश विशेषताएँ हैं। वर्णाश्रम-धर्म विशेष धर्म है।

 

धर्म के विभिन्न प्रकार हैं-सनातन धर्म, सामान्य-धर्म, विशेष-धर्म, वर्णाश्रम-धर्म, स्व-धर्म, युग-धर्म, कुल-धर्म, मानव-धर्म, पुरुष-धर्म, स्त्री-धर्म, राज-धर्म, प्रजा-धर्म, प्रवृत्ति-धर्म और निवृत्ति-धर्म।

सनातन-धर्म

 

सनातन धर्म का अर्थ है शाश्वत-धर्म, प्राचीन नियम। यह वेदों पर आधारित है। यह प्रचलित धमों में प्राचीनतम है। हिन्दू-धर्म ही सनातन धर्म है। वेदों में जिसे परमार्थ या अन्तिम मोक्ष का साधन घोषित किया गया है, वह सनातन धर्म अथवा हिन्दू-धर्म है।

 

सनातन धर्म की आधारशिला श्रुति है, स्मृतिग्रन्थ इसकी भित्तियाँ हैं तथा पुराण-इतिहास इसके स्तम्भ हैं। प्राचीनकाल में श्रुतियाँ मौखिक याद की जाती थीं। गुरु शिष्य को गा कर सुनाते थे और शिष्यगण उनका अनुसरण करते हुए उन्हें गाते थे। वे लिखित नहीं थीं। समस्त मत तथा दर्शन-पद्धतियाँ श्रुति को अन्तिम प्रमाण मानती हैं। श्रुति के पश्चात् स्मृति को प्रामाणिक माना जाता है।

 

अपने दर्शन की गहनता तथा श्रेष्ठता की दृष्टि से हिन्दू-धर्म अद्वितीय है। इसके नैतिक उपदेश उदात्त, अनुपम और उत्कृष्ट हैं। इसे प्रत्येक मानवीय आवश्यकता के अनुकूल बनाया जा सकता है। यह धर्म स्वयं में एक पूर्ण धर्म है। इसे किसी अन्य धर्म से कुछ प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। किसी अन्य धर्म ने इतने महान् सन्तों, योद्धाओं तथा पतिव्रताओं को जन्म नहीं दिया। आप इसके बारे में जितना अधिक ज्ञान प्राप्त करेंगे, इसके प्रति आपके श्रद्धा और प्रेम उतने ही अधिक बढ़ेंगे। आप जितना अधिक इसका अध्ययन करेंगे, उतना अधिक यह आपको प्रबोध तथा तोष प्रदान करेगा।

 

भारतवर्ष-धर्मो का आवास

 

संसार का धार्मिक इतिहास बतलाता है कि अनादिकाल से भारतवर्ष महान् सन्तों, द्रष्टाओं और ऋषियों का आवास रहा है। मनुष्यों के चरित्र का निर्माण करने वाले समस्त महान् धार्मिक आदर्श, मानवता को दिव्य गौरव की पराकाष्ठा पर पहुँचाने वाले सदाचरण और नीति के सर्वोच्च सिद्धान्त और आध्यात्मिकता के समस्त दिव्य सत्य जिन्होंने मानव को दिव्य बना कर राष्ट्रों, आध्यात्मिक आदशों तथा मानव-समाज के उद्धारकों को एक दिशा प्रदान की-ये सब सर्वप्रथम भारत में ही उदित हुए। भारतवर्ष का आध्यात्मिक क्षितिज सदा उपनिषद्-ज्ञान के स्वतः देदीप्यमान सूर्य के तेज से ज्योतित रहा है। जब कभी विश्व के किसी भाग में महापरिवर्तन हुआ है, उसका मूल-कारण भारत के किसी भाग में किसी महान् आत्मा के अवतरण द्वारा उत्पन्न आध्यात्मिकता की लहरें रहा है।

 

हिन्दुओं की संस्कृति, सभ्यता और धार्मिक स्वर्णयुग अन्य देशों की संस्कृति आदि की तुलना में अत्यन्त प्राचीन है। ईश्वर ने भारतवर्ष के ऋषि, योगी, महात्मा, आलवार, पैगम्बर, आचार्य, संन्यासी और सन्तों के माध्यम से सांसारिक प्राणियों में वार्तालाप किया। निश्चय ही उनके उपदेश तथा पुराणग्रन्थ ईश्वरप्रेरित हैं। ईश्वर एकमात्र प्रकाश और सत्य है जिससे समस्त धर्मों के उपदेश निःसृत होते हैं।

 

भारतवर्ष धर्मों का आवास है। इसका भक्ति और ईश्वरपरायणता में गौरवशाली स्थान है। यह योगियों तथा सन्तों के लिए प्रसिद्ध है। भारतवर्ष का लक्ष्य है आत्मदर्शन अर्थात् वैराग्य के द्वारा भागवती चेतना की प्राप्ति। भारतवर्ष का इतिहास धर्म का इतिहास है। इस देश की सामाजिक नियमावली धर्म पर आधारित है। योग, धर्म और धार्मिक नियमों से विरहित भारत का चित्र वैसा नहीं होगा जैसा कि वह सहस्रों वर्षों से रहा है। कुछ हिन्दू अभी तक सनानत-धर्म की विशिष्टताओं से परिचित नहीं हैं। यदि प्रत्येक हिन्दू जानता और समझता कि हिन्दू-धर्म क्या है, तो आज के हिन्दू इस धरती के देवता बन जाते।

 

ईश्वर करे, आप सब सनानत-धर्म-सम्बन्धी ज्ञान से विभूषित हों! ईश्वर करे, आप सब इस शाश्वत-धर्म की रक्षा करने के लिए प्रयत्नशील हों! भगवत्कृपा से आप सबके समक्ष हस्तामलक के समान सनातन धर्म के रहस्य प्रकट हों! आप सबको ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त हो! वेद और सनातन धर्म की जय हो! समस्त वेदों और सनातन धर्म के स्रोत ब्रह्म की जय हो!

सामान्य-धर्म

 

प्रत्येक धर्म का एक सामान्य रूप होता है और दूसरा विशेष रूप। सामान्य रूप सदा-सर्वदा एक-सा रहता है। यह किसी परिस्थिति में नहीं बदलता। इस पर समय, स्थान तथा परिवेश के परिवर्तन और व्यक्तिगत विशिष्टताओं का प्रभाव नहीं पड़ता। धर्म का यह पक्ष सनातन अथवा शाश्वत कहलाता है। जो समय, स्थान और परिवेश के अनुरूप बदलता है, वह धर्म का बाह्य पक्ष अर्थात् कर्मकाण्ड है।

 

सामान्य-धर्म सब मनुष्यों का धर्म है। वर्णाश्रम-धर्म विशिष्ट धर्म है जिसका पालन जीवन की विशिष्ट अवस्थाओं में तथा विशेष जातियों के द्वारा किया जाता है। सामान्य-धर्म का पालन सभी वर्णों-आश्रमों के व्यक्तियों तथा विभिन्न पन्थों के अनुयायियों द्वारा किया जाना चाहिए। परोपकारिता किसी एक जाति या समुदाय की सम्पत्ति नहीं है। प्रत्येक मनुष्य के पास यह गुण होना चाहिए।

 

धर्म के मौलिक सिद्धान्त

 

विष्णुसंहिता के अनुसार क्षमा, सत्य, मन का निग्रह, शुचिता, दानशीलता, इन्द्रिय-निग्रह, अहिंसा, गुरु-सेवा, तीर्थयात्रा, दया, सरलता, अलोभ, देव और ब्राह्मणों की उपासना और अद्वेष सामान्य-धर्म के संघटक तथा सब मनुष्यों द्वारा पालन करने योग्य (धर्म के) नियम हैं।

 

महाभारत के अनुसार श्रद्धा, तपश्चर्या, सत्य, अक्रोध, एकपत्नी-व्रत, शुचिता, विद्या, अनसूया, आत्मज्ञान और सहिष्णुता धर्म के मौलिक सिद्धान्त हैं।

 

पद्मपुराण में कहा गया है कि इन्द्रिय-निग्रह, सत्य, तप, दान, आत्म-संयम, सहिष्णुता, पवित्रता, अहिंसा, शान्ति और अस्तेय से धर्म का प्रादुर्भाव होता है और ये दश गुण धर्म की पहचान हैं। इस पुराण के अनुसार योग्य व्यक्तियों को उपहार देना; भगवान् श्रीकृष्ण पर अपने विचारों को संकेन्द्रित करना; माता-पिता की भक्ति करना, नित्य के भोजन का अंश सब जीवों को देना और गौ को ग्रास देना-ये धर्म के लक्षण हैं।

 

मत्स्यपुराण के अनुसार अद्वेष, अपरिग्रह, इन्द्रिय-संयम, तप, ब्रह्मचर्य, करुणा, सत्य, सहिष्णुता और धैर्य सनातन धर्म के मौलिक मूल-तत्त्व हैं।

 

राजयोगदर्शन के प्रतिपादक पतंजलि महर्षि का कथन है कि निम्नांकित दश गुणों का पालन सभी को करना चाहिए। प्रथम पाँच हैं-अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य (विचार, वाणी और कर्म में), अस्तेय और अपरिग्रह। ये यम हैं। अन्य पाँच गुण हैं-शौच (आन्तरिक तथा बाह्य शुद्धि), सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान। ये नियम हैं।

 

गीता में निम्नांकित गुणों को दैवी सम्पदा की संज्ञा दी गयी है-निर्भयता, अन्तःकरण की स्वच्छता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, शरीर-इन्द्रियों सहित अन्तःकरण की सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, कर्तृत्व-अभिमान का त्याग, शान्ति, निन्दादि करना, जीवों के प्रति दया, अलोलुपता, कोमलता, लोक और शास्त्र के विरुद्ध आचरण में लज्जा, व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव, तेज, क्षमा, धैर्य, शुचिता, अद्रोह तथा पूज्यता के अभिमान का अभाव, ये सब गुण इन चार मूलभूत गुणों की अभिव्यक्ति है- () सत्य, () अहिंसा, () शुचिता और () आत्मसंयम। बौद्धमत के अष्टम-मार्ग तथा भगवान् यीशु के 'सरमन आन माउण्ट' के सन्दर्भ में जिन गुणों की चर्चा की गयी है, वे भी उपर्युक्त मूलभूत गुणों के ही अन्तर्गत हैं।

 

आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने के लिए गुणों को विकसित करना अपरिहार्य है। ब्रह्म शुचिता है। शाश्वत ब्रह्म शुचिता के अभाव में नहीं प्राप्त हो सकता। ब्रह्म सत्य है। शाश्वत ब्रह्म सत्य के अभ्यास के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता। ब्रह्म निर्भयता है। जब तक आप सर्वथा निर्भय हो जायें, आप शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त नहीं कर सकते। शरीर के प्रति आसक्ति भय तथा देहाध्यास को जन्म देती है। यदि आप निर्भय हो जायें, तो अपने को शरीर मान लेने का भाव समाप्त हो जायेगा।

 

लोभ, कृपणता, क्रूरता और धृष्टता से आपने अपने हृदय को चकमक, लोहे अथवा हीरे से भी अधिक कठोर बना लिया है। दया, सहानुभूति, दान, वदान्यता, उदारता, अनपकार, सौम्यता, निःस्वार्थ कर्म और दीन-दुःखियों की सेवा द्वारा आप उसे कोमल बना सकते हैं। मिथ्याचार, असत्य और (पिशुनता) चुगलखोरी द्वारा आपने अपने हृदय को कुटिल तथा संकीर्ण बना लिया है। आर्जव, सच्चाई, शुचिता, दान और अलोलुपता हृदय को विकसित कर सकते हैं। आपने कामुकता के कारण हृदय को अपवित्र कर दिया है। मन, वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य के अभ्यास द्वारा उसे आप परिशुद्ध कर सकते हैं।

 

अहिंसा

 

अहिंसा एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गुण है। महर्षि पतंजलि ने इसे यमों में प्रथम स्थान दिया है। अहिंसा का अभ्यास मन, वाणी और कर्म से होना चाहिए। अहिंसा का अभ्यास कायरता या दुर्बलता नहीं है। यह सर्वोच्च श्रेणी की वीरता है। इसके अभ्यास के लिए असीम धैर्य, सहिष्णुता, अनन्त आन्तरिक आध्यात्मिक शक्ति और प्रबल इच्छा-शक्ति आवश्यक है।

 

अहिंसा सत्य की ही अभिव्यक्ति अथवा उसका रूपान्तरण है। सत्य और अहिंसा सदा साथ-साथ रहते हैं। जो अहिंसा में संस्थित हो गया है, वह विश्व को हिला सकता है। उसकी उपस्थिति में वैरभाव लुप्त हो जाता है, शेर और गाय, सर्प और नेवला शान्तिपूर्वक साथ-साथ रहने लगते हैं।

 

हिन्दू, बौद्ध और जैन-मतों में अहिंसा पर बहुत बल दिया जाता है। भगवान् यीशु ने 'शैलोपदेश' (Sermon on the Mount) में अहिंसा पर बहुत बल दिया है। वह कहते हैं-"यदि कोई आपके एक गाल पर थप्पड़ मारे, तो दूसरा गाल भी उसके सामने कर दें।"

 

जो अहिंसा में भली प्रकार स्थित है, वही आत्मसाक्षात्कार करने की आशा कर सकता है। जो अहिंसा का अभ्यास करता है, उसमें दिव्य विश्व-प्रेम अत्यधिक विकसित हो जाता है। अहिंसा का अभ्यास करने से अन्ततोगत्वा ब्रह्म से तादात्म्य भाव स्थापित हो जाता है। अहिंसक मनुष्य ही आत्मसंयम कर सकता है। प्रतिशोध-खून का बदला खून-आसुरी प्रकृति के व्यक्ति का सिद्धान्त है। यह पाशविक प्रकृति है। परन्तु बुराई के बदले भलाई करना दिव्यता है। अहिंसा के अभ्यासी को निरन्तर जागरूक रहने की आवश्यकता है। यदि किंचित् भी असावधानी हो गयी तो आप पूर्व के बुरे संस्कार और आवेगों के प्रभाव में जायेंगे तथा चाहते हुए भी हिंसा के प्रभाव में जायेंगे।

 

सत्य

 

ब्रह्म 'सत्' है। सत्य का पालन मन, वाणी और कर्म से करना चाहिए। यदि आप सत्य में स्थित हों, तो अन्य समस्त गुणों से आप स्वतः ही विभूषित हो जायेंगे। राजा हरिश्चन्द्र ने सत्य के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। इसी कारण वह अब भी अमर हैं। युधिष्ठिर भी सत्य के पुजारी थे। सत्य से बड़ा अन्य कोई गुण नहीं है। सत्य और अहिंसा नैतिक जीवन का मुकुट और गौरव हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में गुरु अपने दीक्षान्त-भाषण में शिष्यों से कहता है- "सत्यं वद" अर्थात् सत्य बोलो। संसार की जड़ें सत्य में हैं। धर्म की जड़ें सत्य में हैं। समस्त धर्मों की जड़ें भी सत्य में हैं। ईमानदारी, न्यायप्रियता, आर्जव तथा निष्कपटता सत्य की ही विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।

शुचिता

 

शुचिता का तात्पर्य है बाह्य और आन्तरिक अर्थात् शारीरिक और मानसिक शुद्धि। मन को शुद्ध करने के लिए पहले शरीर को शुद्ध करना पड़ता है।

 

शरीर भगवान् का मन्दिर है। नित्य स्नान करके और स्वच्छ वस्त्र पहन कर इसे शुद्ध रखना चाहिए। स्वच्छता ईश्वरपरायणता का एक अंग है। मन को शुद्ध रखने के लिए भोजन पर नियन्त्रण रखना आवश्यक माना गया है

भोजन का मन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सात्त्विक और पवित्र भोजन मन को पवित्र बनाता है। भोजन के सर्वश्रेष्ठ सूक्ष्म सारतत्त्व से ही मन बनता है; इसलिए, जैसा भोजन होगा, वैसा ही मन बनेगा।

 

आपको मन, वाणी और कर्म से शुद्ध होना चाहिए। आपका हृदय स्फटिक अथवा हिमालय की बर्फ की भाँति शुद्ध होना चाहिए; तभी दिव्य ज्योति अवतरित होगी। स्पष्टवादिता, निष्कपटता, आर्जव तथा सब प्रकार के अवगुणों का अभाव शुचिता के ही अन्तर्गत है। जो शुचि (शुद्ध) है, उसके लिए आध्यात्मिक मार्ग पर चलना अत्यन्त सरल है।

 

आत्मसंयम

 

आपको पूर्ण आत्मसंयम रखना चाहिए। आत्मसंयम से तात्पर्य है-शरीर और मन दोनों पर नियन्त्रण। आत्मसंयम का आशय आत्मपीड़न नहीं है। आपको नियमित और अनुशासित जीवन व्यतीत करना चाहिए। आपको अपनी समस्त इन्द्रियाँ अपने नियन्त्रण में रखनी चाहिए। इन्द्रियाँ उपद्रवी तथा निरंकुश घोड़ों के समान हैं। शरीर रथ है। मन लगाम है। बुद्धि रथी तथा आत्मा इस रथ का स्वामी है। यदि इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण रखा जाये, तो वे इस रथ को अगाध गर्त में गिरा देंगी। आप बरबाद हो जायेंगे। जो व्यक्ति लगाम को दृढ़ रख कर बुद्धिमत्ता से घोड़ों (इन्द्रियों) पर नियन्त्रण रखता हुआ रथ हाँकता है, वह कुशलतापूर्वक अपनी मंजिल (मोक्ष अथवा शाश्वत परमानन्द के धाम) तक पहुँच जायेगा।

 

आत्मसंयम का अर्थ है-आत्म-बलिदान, अहंकार का नाश, धैर्य, क्षमा, सहिष्णुता तथा नम्रता। वैराग्य के द्वारा राग पर विजय प्राप्त करें। विषयपरायण जीवन के दोषों-जन्म, मृत्यु, रोग, वृद्धावस्था, पीड़ा, दुःख आदि पर ध्यान देने से (दोष-दृष्टि या मिथ्या-दृष्टि रखने से) आपके मन में वैराग्य का उदय होगा। क्षमा, प्रेम और निःस्वार्थ सेवा द्वारा क्रोध तथा घृणा पर विजय प्राप्त करें। बुराई को भलाई द्वारा जीतें। बुराई के बदले भलाई करें। कामुकता को ब्रह्मचर्य और नियमित जप तथा ध्यान के अभ्यास द्वारा जीतें। लोभ को दान, उदारता और निष्काम कर्म के द्वारा जीतें। अभिमान को नम्रता द्वारा, भ्रम को विवेक और जिज्ञासा द्वारा जीतें। ईर्ष्या को उदारता, विशालता, आत्मभाव और श्रेष्ठता द्वारा जीतें। अहंभाव को आत्मबलिदान, आत्मसमर्पण, आत्मत्याग तथा अद्वैत, शाश्वत, आत्मदीप्त, आन्तरिक शासक, अन्तरात्मा अमर ब्रह्म के द्वारा जीतें।

 

आप सब धर्म के आधारभूत सद्गुणों को अपना कर (सामान्य-धर्म का पालन करके) शाश्वत परमानन्द और अमरता को प्राप्त करें।

 

वर्णाश्रम-धर्म

 

वर्णाश्रम-धर्म का सिद्धान्त हिन्दू-धर्म के मूलभूत सिद्धान्तों में से एक है। वर्णाश्रम-प्रथा हिन्दुओं की विशिष्टता है। यह हिन्दू-धर्म का विशेषता-सूचक गुण है। यह गुण-कर्म के अनुसार अखिल विश्व में प्रचलित है, यद्यपि कोई विशेष नाम इस प्रकार के भेद को कहीं और नहीं दिया गया है।

 

विभिन्न जातियों के कर्तव्यों को वर्ण-धर्म कहते हैं। चार जातियाँ हैं-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। जीवन की अवस्थाओं के कर्तव्य आश्रम-धर्म कहलाते हैं। चार आश्रम हैं-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।

 

सिद्धान्त

 

मानव-समाज एक विशाल यन्त्र के समान है। व्यक्ति और जातियाँ इसके पुरजे हैं। यदि पुरजे कमजोर और टूटे हुए हों, तो यन्त्र काम नहीं कर सकता। पुरजों से रहित यन्त्र कुछ नहीं है। मानव शरीर सुचारु रूप से तभी काम कर सकता है, जब उसके अंग स्वस्थ तथा बलवान् हों। यदि शरीर के किसी भाग में पीड़ा हो, यदि उसका कोई अंग हो, तो मानव-यन्त्र बिगड़ जायेगा और अपना सामान्य कार्य नहीं करेगा।

 

यही दशा मानव-समाज की है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन भली प्रकार करना चाहिए। हिन्दू-ऋषि-मुनियों ने वर्णाश्रम-धर्म के नाम से सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर आदर्श जीवन व्यतीत करने की एक योजना बनायी। हिन्दुत्व वर्णाश्रम-धर्म पर आधारित है। हिन्दू-समाज का ढाँचा वर्णाश्रम-धर्म पर टिका हुआ है। वर्णाश्रम-धर्म का पालन करके मनुष्य अपने क्रम-विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। यह धर्म अपरिहार्य है। यदि नियमों का उल्लंघन किया जाये, तो समाज शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा।

 

वर्णाश्रम-धर्म का लक्ष्य है सार्वभौमिक और शाश्वत धर्म का विकास। यदि आप धर्म की रक्षा करते हैं, तो धर्म भी आपकी रक्षा करेगा। यदि आप उसे नष्ट करते हैं, तो वह भी आपको नष्ट कर देगा। इसलिए अपने धर्म को कभी नष्ट करें। यह सिद्धान्त जितना व्यक्ति के लिए सत्य है, उतना ही एक राष्ट्र के लिए। धर्म ही राष्ट्र को जीवित रखता है। धर्म ही मनुष्य की आत्मा है। धर्म एक राष्ट्र की भी आत्मा है।

 

पाश्चात्य देशों में और सम्पूर्ण जगत् में वर्णाश्रम-धर्म है, यद्यपि इसका वहाँ दृढ़ता से पालन नहीं किया जाता है। कुछ पाश्चात्य दार्शनिकों ने तीन श्रेणियों में मानव-समाज को विभाजित किया है-दार्शनिक, योद्धा और जनसाधारण। दार्शनिक ब्राह्मणों के सदृश हैं। इसी प्रकार योद्धा क्षत्रिय के तथा जनसाधारण वैश्य और शुद्र के सदृश हैं। समाज को पूर्णरूपेण व्यवस्थित रूप देने के लिए यह पद्धति अनिवार्य है।

चार जातियाँ

 

ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में हिन्दू-समाज के चार भागों में विभाजन का उल्लेख है। उसमें लिखा है कि ब्राह्मण सृष्टिकर्ता परमात्मा के मुख से निकले, क्षत्रिय उनकी भुजाओं से, वैश्य उनकी जंघाओं से और शूद्र उनके पैरों से।

 

यह विभाजन गुण और कर्म के अनुसार किया गया है। गुण और कर्म से मनुष्य की जाति निर्धारित होती है। गीता (/१३) में भगवान् श्रीकृष्ण ने भी इसी तथ्य का समर्थन किया है। वह कहते हैं- "गुण और कर्मों के विभाग से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र मेरे द्वारा रचे गये हैं। उनके कर्ता को भी मुझ अकर्ता, अविनाशी परमेश्वर को ही जानो।"

 

गुण तीन प्रकार के होते हैं-सत्त्व, रजस् और तमस्। सत्त्व श्वेत है; रजस् लाल और तमस् काला है। ये तीनों गुण मनुष्य में विभिन्न अनुपात में पाये जाते हैं। जिन लोगों में सत्त्व की प्रधानता होती है, वे ब्राह्मण हैं। वे बुद्धिमान् तथा विचारक होते हैं। वे शासकों का पथ-प्रदर्शन करने वाले पुजारी, मन्त्री अथवा दार्शनिक होते हैं। कुछ लोगों में रजस् की प्रधानता होती है, वे क्षत्रिय हैं। वे योद्धा अर्थात् कर्मशूर व्यक्ति होते हैं। वे शत्रु अथवा आक्रामकों से युद्ध करके देश की रक्षा करते हैं। कुछ व्यक्तियों में तमस् की प्रधानता होती है। वे वैश्य अर्थात् व्यापारी हैं। वे व्यापार तथा कृषि द्वारा धनोपार्जन करते हैं। शूद्र सेवक हैं। उनमें इनमें से कोई भी गुण अधिक विकसित नहीं है। वे अन्य जातियों की सेवा करते हैं।

 

व्यापक अर्थ में सात्त्विक पुरुष, जो पवित्र और सद्गुणी है तथा दिव्य जीवन व्यतीत करता है, ब्राह्मण है। वीरोचित गुणों से युक्त राजसी व्यक्ति क्षत्रिय है। व्यापारिक प्रवृत्ति वाला राजसी पुरुष वैश्य है। तामसी पुरुष शूद्र है। हिटलर और मुसोलिनी क्षत्रिय थे। फोर्ड वैश्य थे।

 

शान्ति, आत्मसंयम, तप, शुचिता, क्षमाशीलता, आर्जव, ज्ञान, आत्मदर्शन तथा ईश्वर में विश्वास-ये ब्राह्मण के प्रकृतिजात गुण हैं। पराक्रम, भव्यता, दृढ़ता, दक्षता और युद्ध से भागना, उदारता और गर्व क्षत्रिय के प्रकृतिजात गुण हैं। इसी प्रकार कृषि, पशुपालन और व्यापार वैश्यों के प्रकृतिजात गुण हैं। सेवा-भाव शुद्र का प्रकृतिजात गुण है।

 

आध्यात्मिक अर्थशास्त्र का नियम

 

जाति-प्रथा अर्थात् वर्ण-धर्म में श्रम-विभाजन का सिद्धान्त निहित है। ऋषियों ने मानवीय प्रकृति का भली प्रकार अध्ययन किया था। वे इस परिणाम पर पहुँचे किं सब मनुष्य सब प्रकार के कार्य नहीं कर सकते। इसलिए उन्होंने यह आवश्यक ने कि सब विभिन्न वगों के लोगों को उनकी प्रवृत्ति, योग्यता अथवा गुणों के अनुसार विभिन्न प्रकार के कर्तव्य दिये जायें। ब्राह्मणों को आध्यात्मिक और बौद्धिक कायर्यों को सम्पन करने का उत्तरदायित्व दे दिया गया। राजनैतिक प्रशासन और सुरक्षा-कार्य क्षत्रियों को दिया गया। वैश्यों को राष्ट्र की खाद्य की आपूर्ति करने तथा आर्थिक व्यवस्था करने के काम सौंपे गये। शूद्रों को दासोचित कार्य सौंपे गये। ऋषियों ने हिन्दू-जाति की इन समस्त आवश्यकताओं को समझ कर वर्ण और आश्रम की प्रथा प्रचलित की थी।

 

यह श्रम-विभाजन वैदिक युग में आरम्भ हुआ। वेदों में लिखा है कि ब्राह्मण समाज का मस्तिष्क है, क्षत्रिय उसकी भुजा है, वैश्य पेट है और शूद्र चरण है।

 

एक बार मन, प्राण और इन्द्रियों में इस बात को ले कर झगड़ा हुआ कि कौन बड़ा है। विभिन्न अंगों और पेट के बीच भी झगड़ा हुआ। यदि हाथ पेट से झगड़ा करने लगे, तो समस्त शरीर को कष्ट होगा। यदि प्राण शरीर से निकल जायें, तो सभी अंग निष्क्रिय हो जायेंगे। शिर अथवा पेट हाथ-पाँवों से श्रेष्ठ होने का दावा नहीं कर सकते। यदि विभिन्न जातियों में यह झगड़ा हो कि कौन बड़ा है, तो समस्त सामाजिक ढाँचा अस्त-व्यस्त हो जायेगा। सर्वत्र असामंजस्य, सम्बन्ध-भंग तथा मतभेद की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। समाज के संचालन के लिए एक भिश्ती या नाई का उतना ही महत्त्व है जितना कि मन्त्री का। सामाजिक भवन आध्यात्मिक अर्थशास्त्र के सिद्धान्त पर खड़ा हुआ है। श्रेष्ठता या हीनता से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। समाज का प्रत्येक वर्ग अपनी-अपनी शक्ति तथा सामर्थ्य के अनुसार जनकल्याण अर्थात् विश्व-एकात्मता में योगदान देता है। यहाँ ऊँच-नीच का कोई प्रश्न नहीं उठता।

 

चरित्र से जाति-निर्णय

 

ब्राह्मण यदि अपवित्र, चरित्रहीन, दुराचारी तथा अनैतिक है, तो वह ब्राह्मण नहीं है। शूद्र यदि पवित्र और सद्गुणी है, तो वह ब्राह्मण है। विदुर कितने महान् थे! सत्यकाम जाबाल्य कितना महान् स्पष्टवादी तथा सीधा-सच्चा विद्यार्थी था। जाति का सम्बन्ध चरित्र से है। वर्ण का अर्थ त्वचा का रंग नहीं है; वर्ण है चरित्र या गुण का रंग। चरित्र और आचरण भी महत्त्वपूर्ण हैं, मात्र वंश-परम्परा ही नहीं। यदि कोई जन्म से ब्राह्मण है तथा साथ-ही-साथ उसमें ब्राह्मण के गुण भी हैं, तो यह अच्छी स्थिति है; क्योंकि कुछ गुण-सम्बन्धी योग्यताएँ ही ब्राह्मण का जन्म निर्धारित करती हैं।

जाति-प्रथा के लाभ और हानि

 

कई विदेशी आक्रमणों के बावजूद हिन्दू-धर्म जाति-व्यवस्था के कारण ही जीवित है; परन्तु जाति-व्यवस्था के कारण उनमें द्वेष और घृणा की भावनाएँ भी उत्पन्न हुई हैं। उनमें सहयोग की भावना नहीं है। यही कारण है कि वे आज निर्बल और बिखरे हुए हैं। व्यवस्था के नाम पर वे साम्प्रदायिक हो गये हैं। इसी कारण भारत की हो रही है।

जाति-व्यवस्था में कोई बुराई नहीं है। यह नितान्त त्रुटि-रहित व्यवस्था है; किन्तु इसमें बाह्य कारणों से दोष उत्पन्न हो गये हैं। वर्ग अपने-अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने लगे। योग्यता और चरित्र की कसौटी धीरे-धीरे लुप्त होने लगी। जाति का निर्धारण जन्म से होने लगा। समस्त जातियाँ अपने आदशों से च्युत हो गयीं और कर्तव्यों को भूल बैठीं। ब्राह्मण स्वार्थी हो गये और उपर्युक्त योग्यता प्राप्त किये बिना अपने जन्म के ही बल पर अपने को दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ समझने लगे। क्षत्रियों ने अपना शौर्य खो दिया। वैश्य लोभी बन गये। वे गलत साधनों से धनोर्पाजन करने लगे। वे लोगों के आर्थिक कल्याण का भी ध्यान नहीं रखते थे। दान देने और त्याग करने की भावना समाप्त हो गयी। शूद्र सेवा करने से कतराने लगे। वे बड़े अधिकारियों की तरह व्यवहार करने लगे। वे इस बात की अपेक्षा करने लगे कि दूसरे व्यक्ति उनकी सेवा करें। मानव के लोभ और अभिमान ने असंगति तथा असामंजस्य की स्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं।

 

वर्णाश्रम-धर्म में कोई बुराई नहीं है। मनुष्य के अहंकार और दम्भ ने समस्याएँ उत्पन्न की हैं। मनुष्य अथवा क्षुद्र जीव अपूर्ण है। उनमें दोष-ही-दोष हैं। वह केवल दूसरों से ऊँचा कहलाने का अधिकार प्राप्त करने की प्रतीक्षा में रहता है। ब्राह्मण सोचता है कि अन्य तीन जातियाँ उससे नीची हैं। क्षत्रिय सोचता है कि वैश्य और शूद्र उससे हीन हैं। इसी तरह एक धनिक शूद्र सोचता है कि वह निर्धन ब्राह्मण, वैश्य या क्षत्रिय से श्रेष्ठ है।

 

वर्तमान काल में वर्णाश्रम-धर्म नाम मात्र को जीवित बचा है। इसको भली प्रकार व्यवस्थित करना है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जो अपने आदर्शों से च्युत हो चुके हैं और जो भली प्रकार अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहे हैं, उन्हें अपने-अपने कर्तव्यों का भली प्रकार पालन करना चाहिए। उनकी शिक्षा-दीक्षा उपयुक्त ढंग से होनी चाहिए। उन्हें अपने आद्य उच्च स्तर के अनुरूप स्वयं को उठाना चाहिए। साम्प्रदायिक भावना समाप्त हो जानी चाहिए। प्रेम, भक्ति, सहयोग, त्याग तथा सेवा की भावनाओं से ओत-प्रोत उन्हें एक नये मानस का विकास करना चाहिए।

चार आश्रम

 

जीवन में चार आश्रम अथवा अवस्थाएँ होती हैं। इनके नाम हैं-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। प्रत्येक आश्रम के अपने-अपने कर्तव्य हैं। इन आश्रमों से मानव के क्रम-विकास में सहायता मिलती है। क्रम से चारों आश्रमों का जीवन व्यतीत करते हुए, मनुष्य अपनी पूर्णता तक पहुँचता है। प्रारम्भ से ले कर अन्त तक उसके जीवन का नियमन हो जाता है। प्रथम दो आश्रम प्रवृत्ति-मार्ग (कर्म-मार्ग) से सम्बन्धित हैं तथा अन्तिम दो (वानप्रस्थ और संन्यास) निवृत्ति-मार्ग (त्याग-मार्ग) से।

 

 

 

 

 

सुव्यवस्थित आध्यात्मिक क्रमविकास की ओर

 

सनातन धर्म में जीवन अत्यन्त क्रमिक रूप से व्यवस्थित है। इसमें मानवीय कार्यकलापों के विभिन्न पक्षों के विकास का पूर्ण अवसर रहता है। जीवन के प्रत्येक आश्रम के लिए उपयुक्त कर्मों तथा प्रशिक्षणों का निर्धारण कर दिया जाता है। जीवन एक महान् पाठशाला है जिसमें मानव के सामर्थ्य, क्षमताओं तथा मनःशक्तियों का क्रमशः विकास होता है।

 

प्रत्येक मनुष्य को क्रमिक रूप से विभिन्न आश्रमों में प्रवेश करना चाहिए। उसे किसी आश्रम में समय से पूर्व अपरिपक्व मनःस्थिति में प्रवेश नहीं करना चाहिए। एक अवस्था को पूर्ण करने के पश्चात् ही वह अगले स्तर में प्रवेश कर सकता है। प्रकृति में विकास क्रमिक होता है, अनायास नहीं।

 

मनु ने स्मृति में कहा है- "जो ब्रह्मचर्य-आश्रम में रहता हुआ ब्रह्मचर्य व्रत भंग किये बिना समस्त वेदों को अथवा कम-से-कम एक या दो वेदों का अध्ययन कर ले, वह गृहस्थ-आश्रम में प्रवेश कर सकता है। जब गृहस्थ अपनी त्वचा में झुर्रियाँ या अपने केशों में सफेदी देख ले, अपने पौत्र का मुख देख ले, तब उसे वन में चले जाना चाहिए। वन में जीवन का तृतीय भाग (आश्रम) व्यतीत करने के पश्चात् उसे समस्त आसक्तियों को त्याग करके जीवन के चतुर्थ आश्रम में एक तपस्वी की भाँति भ्रमण करना चाहिए।

 

हाँ, विशिष्ट परिस्थितियों में जीवन की किसी अवस्था (आश्रम) को छोड़ा ४६ जा सकता है। शुक जन्मजात संन्यासी थे। शंकर ने गृहस्थ- आश्रम में प्रवेश किये किस संन्यास ले लिया। कभी-कभी अति विशिष्ट परिस्थितियों में ब्रह्मचारी को भी संन्द ग्रहण करने की आज्ञा मिल जाती है; क्योंकि संसार के प्रति अपने ऋणों से पूर्व-जन्म में ही उऋण को चुका होता है। आजकल अयोग्य युवक-संन्यासी बहा दिखायी पड़ते हैं। यह प्राचीन नियमों के विरुद्ध है और इससे बहुत व्यवधान उपस्थि हो जाता है।

 

ब्रह्मचारी

 

प्रथम आश्रम-ब्रह्मचर्य-अध्ययन और अनुशासन का काल है। विद्यार्थियों को विलासप्रिय नहीं होना चाहिए। वह गुरु के पास रह कर बेदों और विद्याओं अध्ययन करता है। यह आश्रम उसका परिवीक्षा (probation) काल है। प्राचीन मा में गुरु साधारणतया जंगल में कुटी बना कर रहते थे। ये कुटियाएँ ही गुरुकुत अर्थात् अरण्य विश्वविद्यालय कहलाती थीं। विद्यार्थी भिक्षा-वृत्ति द्वारा भोजन करता था। धनी और निर्धन के बालक साथ-साथ रहते थे। विद्यार्थी गुरु को अपन आध्यात्मिक पिता मानता था और भक्ति, विश्वास और सम्मानपूर्वक उसकी सेवा करता था।

 

विद्यार्थी का जीवन उपनयन संस्कार (यज्ञोपवीत-संस्कार) से प्रारम्भ होता है। यह उसका दूसरा जन्म माना जाता है। उसे स्वभाव से सरल और परिश्रमी होन चाहिए। वह प्रातःकाल जल्दी उठ कर स्नान करता है और सन्ध्या तथा गायत्री-जा करता है। वह धर्मग्रन्थों का अध्ययन करता है। वह सरल एवं सन्तुलित भोजन ग्रहा करता है। वह पर्याप्त व्यायाम करता है। वह कठोर भूमि पर सोता है; कोमल सुखदायक बिछौना तथा तकियों का प्रयोग वह नहीं करता। वह अति-नम्र आज्ञाकारी होता है; वह गुरुजनों की आज्ञा मानता है और उनका आदर करता है। वा मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहने की चेष्टा करता है।

 

वह निरन्तर गुरु-सेवा में रत रहता है। वह स्त्री, मदिरा, मांस, इत्र, माला स्वादिष्ट भोजन, खट्टे तथा मसालेदार भोज्य पदार्थ, जीव-हिंसा, काम, क्रोध, लोभा नृत्य-गान, संगीत-वादन, जुआ, गपशप, मिथ्यापवाद और असत्य से अपने बचाता है। वह अकेला सोता है।

 

विद्यार्थी-जीवन के अन्त में वह अपने सामर्थ्य के अनुसार गुरु को दक्षिणा दे कर गृहस्थ-जीवन में प्रवेश करने के लिए घर वापस जाने की आज्ञा माँगता है। आज्ञा प्रदान करने से पूर्व गुरु निम्नांकित अन्तिम उपदेश देता है:

 

"सत्य बोलो। अपने कर्तव्य का पालन करो। वेदाध्ययन से विरत होओ। सन्तति की परम्परा को विश्रृंखल मत होने दो। गुरु को वांछित दक्षिणा देने के पश्चात् गृहस्थाश्रम में प्रवेश करो। सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर सदैव चलते रहो। अपने कल्याण की उपेक्षा मत करो। अपनी समृद्धि की उपेक्षा मत करो। वेदाध्ययन तथा वेदों के उपदेशों की उपेक्षा मत करो।

 

"देवों और पितरों के प्रति अपने कर्तव्य की उपेक्षा मत करो। माता को देवता मानो, पिता को देवता मानो, आचार्य को (गुरु को) देवता मानो और अतिथि को देवता मानो। केवल वही कर्म करो जो दोष-रहित हो। केवल सत्कर्म करो।

 

"आपको अपने से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को आसन आदि दे कर उनकी श्रान्ति दूर करनी चाहिए। उन्हें श्रद्धा, विनम्रता और सहानुभूतिपूर्वक उपहार देना चाहिए। यदि कर्मकाण्ड अथवा आचरण के सम्बन्ध में कोई संशय हो, तो महापुरुषों के जीवन से शिक्षा लो। यही आज्ञा है, यही शिक्षा है, यही वेदों का रहस्य है। यही दैवी आदेश है। इसका पालन करो। इसी पर मनन करो।"

 

गृहस्थ

 

दूसरा आश्रम गृहस्थाश्रम है। जब विद्यार्थी अपना छात्र-जीवन समाप्त करके गृहस्थ-जीवन के उत्तरदायित्व को वहन करने योग्य हो जाता है, तब अपने विवाह के समय वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। समस्त आश्रमों में यह आश्रम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि यह अन्य समस्त आश्रमों का आधार है। जिस प्रकार समस्त जीवन वायु द्वारा पोषित होते हैं, जिस प्रकार समस्त नदियाँ समुद्र में पहुँच कर विश्राम प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार समस्त आश्रम गृहस्थ-आश्रम में विश्राम पाते हैं। गृहस्थ आर्य-जीवन का हृदय है। प्रत्येक बात उस पर निर्भर रहती है।

 

हिन्दू के लिए विवाह एक पवित्र संस्कार है। पत्नी उसकी जीवन-संगिनी होती है। वह उसकी अर्धांगिनी होती है। उसके बिना हिन्दू कोई धार्मिक कर्मकाण्ड सम्पन्न नहीं कर सकता। धार्मिक कृत्य करते समय पत्नी पति के बायीं ओर खड़ी होती है। पति-पत्नी राम-सीता को अपना आदर्श मानते हैं।

 

गृहस्थ को सच्चाई और ईमानदारी से धनोर्पाजन करके उचित ढंग से इसका विभाजन करना चाहिए। उसे अपनी आय का दशवाँ भाग दान में व्यय करना चाहिए। ऐन्द्रिक सुख नीति-सिद्धान्तों की सीमा के भीतर ही भोगने चाहिए। गृहस्थ को माह में केवल एक रात्रि स्त्री-संग का सुख अनुभव करना विहित है।

 

गृहस्थ को निम्नांकित पाँच महायज्ञ करने चाहिए :

 

()          देव-यज्ञ वेदमन्त्रोच्चारण के साथ देवताओं को आहुति देना।

 

()          ऋषि-यज्ञ वेदाध्ययन, विद्यार्थियों को वेद पढ़ाना और ऋषियों को आहुति देना ऋषि-यज्ञ के अन्तर्गत

आते हैं।

 

()          पितृ-यज्ञ-मृतक आत्माओं को तर्पण देना एवं श्राद्ध अथवा वार्षिक कर्मकाण्ड सम्पन्न करना पितृ-यज्ञ

है।

 

()          भूत-यज्ञ-गायों, कौओं तथा पशुओं को भोजन देना भूत-यज्ञ है।

 

()          अतिथि-यज्ञ-अतिथियों को भोजन कराना और उनका मान-सम्मान करना अतिथि-यज्ञ है।

 

आतिथ्य गृहस्थों का प्रधान कर्तव्य है। उसे सर्वप्रथम अपने अतिथियों को, ब्राह्मणों को और सम्बन्धियों को भोजन करा कर तब स्वयं पत्नी सहित भोजन करना चाहिए।

 

जब गृहस्थ देखे कि उसके पुत्र उसके कर्तव्यों का भार वहन करने में समर्थ हो गये हैं तथा परिवार में उसके पौत्र पौत्रियाँ भी हैं, तब उसे समझना चाहिए कि उसके और उसकी पत्नी के लिए संसार को त्याग कर अध्ययन और चिन्तन में अपना जीवन व्यतीत करने का समय गया है।

 

 

वानप्रस्थी

 

इसके पश्चात् वानप्रस्थ-आश्रम की अवस्था है जिसमें गृहस्थ वानप्रस्थी के रूप में प्रवेश करता है। ब्रह्मचर्य जिस प्रकार गृहस्थ-जीवन की तैयारी है, उसी प्रकार वानप्रस्थ अन्तिम अवस्था संन्यास की तैयारी है। गृहस्थ-आश्रम के समस्त कर्तव्यों का पालन कर चुकने के पश्चात् मनुष्य को वन में या अन्य कहीं एकान्त-स्थान में जा कर उच्चतर आध्यात्मिक विषयों का चिन्तन-मनन करना चाहिए। अब वह सामाजिक बन्धनों और जीवन के उत्तरदायित्वों से मुक्त है। अब उसके पास धर्मग्रन्थों का अध्ययन करने के लिए प्रचुर अवकाश है। उसकी पत्नी उसके साथ जा सकती है, अन्यथा वह अपने पुत्र के साथ रहने के लिए स्वतन्त्र है।

 

संन्यासी

 

अन्तिम अवस्था संन्यास-आश्रम है। संन्यासी होने पर मनुष्य सब-कुछ त्याग देता है-धन-सम्पत्ति, जाति-भेद, कर्मकाण्ड, धर्मानुष्ठान तथा देश, राष्ट्र या धर्म-विशेष के लिए आसक्ति। वह भिक्षा माँग कर निर्वाह करता है। गहन ध्यान की उत्कृष्ट अवस्थाओं में प्रवेश कर लेने के पश्चात् वह अपनी ही आत्मा में आनन्दित हो उठता है। विषय-सुखों से वह विमुख हो जाता है। वह रुचि-अरुचि, इच्छा, अहंभाव, कामुकता, क्रोध, लोभ और अहंकार से मुक्त हो जाता है। उसमें समत्व दृष्टि तथा मानसिक सन्तुलन होता है। वह सबसे प्रेम करता है और ब्रह्मज्ञान वितरित करता हुआ प्रसन्नतापूर्वक भ्रमण करता है। मान-अपमान, निन्दा-स्तुति और सफलता-असफलता में वह समभाव रखता है। अब वह अति-वर्णाश्रमी हो जाता है अर्थात् वर्णाश्रम से परे हो जाता है। वह सर्वथा मुक्त हो जाता है। वह सामाजिक प्रथाओं और बन्धनों से भी मुक्त है।

 

ऐसा संन्यासी एक आदर्श पुरुष है। उसने पूर्णता और मुक्ति प्राप्त कर ली है। वह ब्रह्म ही है, जीवन्मुक्त है। इस पृथ्वी पर साक्षात् देवता-स्वरूप ऐसी महान् आत्माओं की जय हो!

 

आधुनिक परिस्थितियों में आश्रम-धर्म

 

इस युग में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रमों के प्राचीन नियमों का पूरा-पूरा पालन करते हुए जीवन व्यतीत करना सम्भव नहीं है, क्योंकि परिस्थितियों में बहुत परिवर्तन गया है; किन्तु उनमें निहित मूल-भावना को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इससे आधुनिक जीवन में बहुत सुधार हो सकता है। इन आश्रमों के नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करते हुए किसी को दूसरे आश्रमों के लिए निर्धारित कर्मों को नहीं करना चाहिए। ब्रह्मचारी को गृहस्थों, वानप्रस्थियों अथवा संन्यासियों के लिए विहित कर्म नहीं करने चाहिए। संन्यासी को दोबारा गृहस्थ-जीवन के सुखों को प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

 

समाज में शान्ति और व्यवस्था तभी स्थापित हो सकती है, जब प्रत्येक मनुष्य सुचारु रूप से अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करे। वर्णाश्रम-व्यवस्था का उन्मूलन सामाजिक कर्तव्यों को निर्मूल कर देगा, समाज-धर्म को जड़ से उखाड़ देगा। वर्णाश्रम-धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन किये बिना कोई भी राष्ट्र कैसे जीवित रहने की आशा कर सकता है!

 

विद्यार्थियों को पवित्रता और सादगी का जीवन व्यतीत करना चाहिए। गृहस्थ को आदर्श गृहस्थ का जीवन व्यतीत करना चाहिए। उसे आत्मसंयम, दया, सहिष्णुता, अहिंसा, सत्यता और मिताचार को व्यवहार में लाना चाहिए। जिन्हें वानप्रस्थ एवं संन्यास-आश्रमों का जीवन कठिन प्रतीत होता हो, उन्हें धीरे-धीर सांसारिक जीवन से विरत हो कर निष्काम सेवा, अध्ययन और ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।

 

सर्वोच्च स्थिति

 

वर्णाश्रम केवल शरीर से ही सम्बन्धित है; शुद्ध, सर्वव्यापक अमर आत्मा मे नहीं। आत्मज्ञान प्राप्त कर लें तथा दत्तात्रेय की भाँति अति-वर्णाश्रमी बन जायें। दत्तात्रेय के अनुसार-

 

महदादि जगत्सर्वं किंचित्प्रतिभाति मे।

ब्रह्मैव केवलं सर्वं कथं वर्णाश्रमस्थितिः ।।

 

अर्थात् महत् से ले कर नीचे तक अखिल जगत् मुझमें नहीं भासता। प्रत्येक वस्तु ब्रह्म ही है। फिर वर्णाश्रम कहाँ?

 

ईश्वर करे, आप सबमें वर्णाश्रम और वर्णाश्रम-धर्म का पूर्ण ज्ञान प्रकाशित हो। आप सबमें वैश्व-प्रेम और भ्रातृत्व की भावना विकसित हो ! आत्म-प्रशंसा तथा स्वाग्रह के लिए मनुष्य द्वारा निर्मित समस्त विघटनकारी अवरोध छिन्न-भिन्न हो जायें!

युग-धर्म

 

सत्ययुग में धार्मिक नियमावली भिन्न थी, त्रेतायुग में उसमें परिवर्तन कर दिया गया। द्वापर का धर्म अन्य युगों से भिन्न था। कलियुग में उन्होंने अन्य रूप धारण किया। धर्म समय-चक्र के साथ परिवर्तित होता रहता है। मनुष्य परिवर्तित होता रहता है। विभिन्न अनुभवों के कारण उसकी प्रकृति परिवर्तित होती रहती है; इसलिए उसके धर्म का बाह्य रूप भी परिवर्तित होना चाहिए।

 

सत्ययुग में जो ध्यान-चिन्तन से, त्रेता में जो यज्ञ से और द्वापर में जो विष्णु की उपासना से प्राप्त होता था, वही कलियुग अर्थात् लौहयुग में भगवान् विष्णु के नाम-कीर्तन से प्राप्त किया जा सकता है।

 

सत्ययुग में मनुष्यों का मन शुद्ध तथा विक्षेप-रहित था। उस युग में सिनेमा थे, होटल थे, नृत्यशालाएँ थीं और ही विक्षेप उत्पन्न करने वाली अन्य वस्तुएँ थीं। अतः उनके लिए ध्यान-चिन्तन सरल और सहज था। इसलिए सत्ययुग के लोगों के लिए ध्यानयोग को उपयुक्त बताया गया है। त्रेतायुग में यज्ञ-सामग्री सरलता से उपलब्ध होती थी। मनुष्यों की प्रवृत्तियों में सक्रियता थी। अतः उनके लिए अग्रिहोत्र, ज्योतिष्टोम, दर्शपौर्णिमा एवं अन्य यज्ञों को सम्पन्न करना सरल था; इसलिए उस युग में यज्ञ को सनातन धर्म का बाह्य रूप कहा गया। द्वापरयुग में अवतारों की अभिव्यक्ति हुई और लोग सरलता से भगवान् की प्रत्यक्ष उपासना कर सकते थे; इसलिए उस युग में उपासना को साधना का प्रमुख रूप माना गया। कलियुग में विक्षेप के लिए अनुकूल अनेक स्थितियाँ हैं। मनुष्य में ब्रह्मचर्य, इच्छा-शक्ति और विचार और विवेक-शक्ति का अभाव है। यज्ञ करने के लिए सामग्री प्राप्त होना दुर्लभ है। इसलिए हरि-कीर्तन तथा मानवता की निष्काम सेवा साधना के मुख्य स्वरूप बतलाये गये हैं।

उपसंहार

 

पूर्ण उत्साह से स्वधर्म-पालन करें। अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करें। धर्म में निहित समस्त गुणों को विकसित करें। सदाचार के मार्ग से तनिक भी विचलित मत हों। अपने सम्पूर्ण हृदय, मन और आत्मा से धर्म का पालन करें। स्वधर्म-पालन से प्रसन्नता तथा मुक्ति प्राप्त होती हैं तथा आपका क्रम-विकास त्वरित गति से होता है। आपको शीघ्र ही अमरत्व, शाश्वत परमानन्द, परम शान्ति, अखण्ड आनन्द, कैवल्य और पूर्णता प्राप्त होंगे। आपको शाश्वत परमानन्द के राज्य और अनन्त शान्ति के पथ की ओर ले जाने वाले परम ज्योतिरूप धर्म की जय हो!

 

हिन्दुत्व का शाश्वत धर्म सदा के लिए सुरक्षित रहे ! समस्त हिन्दू सच्चे प्रेम के बन्धन में बंध कर संगठित हों!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चतुर्थ अध्याय

हिन्दू-आचार-नीति

 

धर्म का चिह्न आचार अथवा सदाचार है। आचार भलाई का चिह्न है। आचार से ही धर्म की उत्पत्ति होती है। धर्म जीवन को समृद्ध बनाता है। धर्माभ्यास द्वारा मनुष्य इस लोक एवं परलोक में समृद्धि और कीर्ति प्राप्त करता है।

 

सदाचार सर्वोच्च धर्म है। यह समस्त तप और साधनाओं का आधार है। धर्मपरायणता, सच्चाई, सत्कर्म, शक्ति और समृद्धि-ये सब आचरण से ही उत्पन्न होते हैं।

आचरण और चरित्र

 

मनुष्य आकांक्षित पदार्थों को पाने की कामना करता है। कामना कार्य-रूप में परिणत होती है। यह आचरण कहलाता है। आचरण है व्यवहार। जो कामनाएँ अभिव्यक्त होती हैं, वे आचरण बन जाती हैं।

 

मनुष्य की कई प्रकार की इच्छाएँ होती हैं। कभी-कभी इच्छाओं में विरोध उत्पन्न हो जाता है। जो इच्छा विजयी होती है, वह दृढ़ निश्चय (will) कहलाती है। आन्तरिक प्रवृत्ति जो दृढ़ निश्चय को सम्भव बनाती है, वह चरित्र कहलाती है। चरित्र विशिष्ट गुणों का समुच्चय है जिससे व्यक्तिकता का निर्माण होता है।

 

मनुष्य के चरित्र की परीक्षा करने के लिए उसका बाह्य व्यवहार सदैव एक विश्वस्त पथ-प्रदर्शक सिद्ध नहीं होता है।

आचार-नीति अर्थात् आचरण-विज्ञान

 

नैतिकता (morality) अथवा आचार-नीति (ethics) आचरण का विज्ञान है। चरित्र में अच्छे-बुरे का अध्ययन आचार-नीति है। आचार-नीति का विज्ञान मनुष्यों को एक-दूसरे के प्रति एवं अन्य जीवों के प्रति व्यवहार करने का ढंग बताता है। इसमें वे विधिसंगत सिद्धान्त निहित हैं जिनके अनुसार मनुष्य को व्यवहार करना चाहिए। आचार-नीति है सदाचार।

 

नैतिकता कई प्रकार की होती है-मानवीय नैतिकता, पारिवारिक नैतिकता, सामाजिक नैतिकता, राष्ट्रीय नैतिकता और व्यावसायिक नैतिकता। डाक्टर व्यावसायिक नैतिकता का ध्यान रखता है। उसे अपने रोगियों के गुप्त रहस्यों को दूसरों के समक्ष प्रकट नहीं करना चाहिए। उसका कर्तव्य है कि किसी महामारी को रोकने के लिए वह सारे वारणिक उपाय करे और सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाई की ओर पूरा-पूरा ध्यान दे।

 

आचार-नीति एक सापेक्ष विज्ञान है। सम्भव है जो बात एक व्यक्ति के लिए अच्छी हो, वह दूसरे के लिए अच्छी हो। जो बात किसी विशिष्ट काल में और स्थान पर अच्छी हो, वह किसी अन्य काल तथा अन्य स्थान में अच्छी नहीं भी हो सकती है। नीतिशास्त्र स्वयं मनुष्य और उसके चतुर्दिक् के वातावरण के लिए प्रासंगिक है।

आचार-नीति, आध्यात्मिकता और धर्म

 

बिना आचार-नीति के आप आध्यात्मिक मार्ग में उन्नति नहीं कर सकते। आचार-नीति योग का आधार है। यह वेदान्त की आधारशिला है। यह वह दृढ़ स्तम्भ है जिस पर भक्तियोग का भवन टिका हुआ है। यह भगवत्साक्षात्कार का प्रवेश-द्वार है।

 

आचार-नीति की पूर्णता के बिना आध्यात्मिक उन्नति अथवा साक्षात्कार सम्भव नहीं है। योग के विद्यार्थी अथवा साधक में आचार-नीति विषयक दृढ़ता होनी चाहिए। उसे विचार, वाणी तथा कर्म से शुद्ध और सत्यनिष्ठ होना चाहिए। उसका आचरण उत्कृष्ट होना चाहिए। उसे किसी भी जीव को विचार, वाणी अथवा कार्य से नहीं सताना चाहिए। उसे सम्यक् विचार, सम्यक् वाणी और सम्यक् कर्म का पूर्णरूपेण अभ्यास करना चाहिए।

 

प्रत्येक धर्म की अपनी आचार-नीति होती है। ईसामसीह के शैलोपदेश (Sermon on the Mount) तथा दशादेश (Ten Commandments) में मनुष्य के उत्थान के लिए नैतिक शिक्षाएँ हैं। भगवान् बुद्ध का अष्टांग मार्ग नीतिशास्त्र का सारतत्त्व है। पतंजलि महर्षि के यम तथा नियम उत्कृष्ट नीतिशास्त्र के अंग हैं। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति और पाराशरस्मृति में भी मानव के लिए आचार-संहिता प्रस्तुत की गयी है। गीता में वर्णित तीन प्रकार के तप आचार-नीति का ही एक गहन स्वरूप हैं।

आचार-नीति का अभ्यास करने के लाभ

 

नैतिकता धर्म का प्रवेश-द्वार है। जो नीतिसंगत अथवा सद्गुणों से पूर्ण जीवन व्यतीत करता है, वह निर्वाण, पूर्णता अथवा मोक्ष प्राप्त करता है।

 

आचार-नीति के अभ्यास से आपको अपने पड़ोसियों, मित्रों, कुटुम्बिों, संगी-साथियों तथा अन्य लोगों के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए जीवन व्यतीत करने में सहायता मिलेगी। इसके अभ्यास से आपको स्थायी सुख और मोक्ष प्राप्त होगा। इससे आपका हृदय पवित्र तथा अन्तःकरण निर्मल बनेगा। नीतिशास्र के सिद्धान्तों का पूर्णतया पालन करने वाला नैतिक मनुष्य धर्म अथवा न्याय के मार्ग से किंचित् भी च्युत होगा। युधिष्ठिर ने आचार-नीति के अभ्यास के कारण शास्वत प्रतिष्ठा प्राप्त की। वह धर्म की प्रतिमूर्ति थे; इसलिए वह अब तक हमारे हृदयों में प्रतिष्ठित हैं।

 

सदाचरण भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि का मूल है। आचरण से ख्याति में वृद्धि होती है। सदाचरण आयु को बढ़ाता, समस्त विपदाओं एवं बुराइयों को नह करता और शाश्वत सुख प्रदान करता है। सदाचरण ही गुणों को जन्म देता है। अतः सदाचरण विकसित करें।

हिन्दू-धर्म में आचार-नीति की संहिताएँ

 

हिन्दू आचार-नीति सर्वोपरि है। हिन्दू धर्म में नैतिक अनुशासन पर बल दिया जाता है। यम तथा नियम योग और वेदान्त की नींव हैं। अविकसित मनुष्य स्वयं अपने लिए नहीं सोच सकते; इसलिए मनु और याज्ञवल्क्य जैसे महान् सन्तों और द्रष्टाओं ने आचरण के नियम बनाये हैं।

 

गीता में भगवान् कृष्ण कहते हैं- "कर्तव्य-अकर्तव्य का निर्णय करने में शास्त्रों को अपना प्रमाण मानें। आपको शास्त्र-विधि से नियत किये गये कर्मों को ही करना चाहिए" (१६/२४) याज्ञवल्क्य, मनु एवं ऋषियों द्वारा रचित स्मृतियों में स्पाह रूप से सदाचार के नियम निर्धारित किये हैं। आपमें शास्त्रोक्त नैतिक सिद्धान्तों और नियमों पर विचार करने हेतु क्षमता तथा समय का अभाव है; अतः आपको सन्त-महात्माओं से ही नीति-सम्बन्धी तत्त्व ग्रहण करके उसका अक्षरशः पालन करना चाहिए।

हिन्दू-आचार-नीति के मौलिक सिद्धान्त

 

हिन्दुओं की आचार-नीति सूक्ष्म, भव्य और गहन है। समस्त धमों ने आचार-नीति-सम्बन्धी विचारों की शिक्षा दी है, यथा- 'हिंसा मत करो, दूसरों को चोट मत पहुँचाओ, अपने पड़ोसियों को अपने समान प्रेम करो।' परन्तु उन्होंने कारण नहीं बताया है। हिन्दू-आचार-नीति का आधार है- "सर्वव्यापक आत्मा एक है। वह समस्त जीवों का अन्तरात्मा है। वह सामान्य पवित्र चेतना है। यदि आप अपने पड़ोसी को या किसी अन्य जीव को क्षति पहुँचाते हैं, तो आप अपने को ही क्षति पहुँचाते हैं; क्योंकि अखिल विश्व आपके अपने अतिरिक्त और कुछ नहीं है।" यह हिन्दू-आचार-नीति है। यह मूलभूत तात्त्विक सत्य है जो समस्त हिन्दू-आचार-नीति-सिद्धान्तों का आधार है।

 

आत्मा एक है। समस्त जीवों में एक ही प्राण स्पन्दित होता है। पुरुष, पक्षी और मानव-जाति में जीवन समान है। अस्तित्व समान है। यह उपनिषदों अथवा श्रुतियों की सुस्पष्ट घोषणा है। धर्म का यह मौलिक सत्य आचार-नीति अथवा नैतिकता अथवा सम्यक् आचरण के विज्ञान का आधार है। वेदान्त नैतिकता का आधार है।

 

प्रथम बात जो धर्म सिखाता है, वह है सब आत्माओं में निहित एकता। उपनिषदों का कथन है- "तेरा पड़ोसी वस्तुतः तू स्वयं है-जो तुझे उससे पृथक् करता है, वह मात्र एक भ्रम है।" एक आत्मा सब जीवों में निवास करती है। सार्वभौमिक प्रेम इस एकता की अभिव्यक्ति है। आत्मैक्य सार्वभौम भ्रातृत्व का आधार है। समस्त मानवीय सम्बन्ध इसी एकता पर टिके हुए हैं। याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहा- "प्रिय! देखो, केवल पति-प्रेम के कारण पति प्रिय नहीं है, आत्मा के प्रति प्रेम के कारण पति प्रिय होता है।" इसी प्रकार स्त्री, पुत्र, धन-सम्पत्ति, मित्र, संसार और स्वयं देवता भी अपनी आत्मा के कारण प्रिय हैं। सब इसलिए प्रिय हैं; क्योंकि सबमें एक ही आत्मा विद्यमान है। यदि आप किसी दूसरे व्यक्ति को क्षति पहुँचाते हैं, तो आप अपने को ही क्षति पहुँचाते हैं; यदि आप किसी की सहायता करते हैं, तो आप अपनी ही सहायता करते हैं। सब प्राणियों में एक ही प्राण तथा एक ही सामान्य चेतना है। यही सम्यक् आचरण की नींव है। यही आचार-नीति का आधार है।

उपासना के रूप सेवा

 

मात्र प्रकार समाज-सेवा समझता उसमें भाव नहीं कि समस्त विश्व परमात्मा का प्रकटीकरण वह परमात्मा ही सेवा कर रहा है। उसमें यह भी नहीं परमात्मा उसके उपकरणों (इन्द्रियों) के माध्यम से कार्य कर रहा और प्रत्येक परमात्मा को अर्पित भेंट एक यौगिक क्रिया है।

 

भारतवर्ष में व्यक्तियों को आमन्त्रित करने ५०० व्यक्तियों भोजन तैयार किया जाता हिन्दुओं लिए खिलाना परमात्मा उपासना है। यह अतिथि-यज्ञ है। हिन्दू प्रत्येक प्राणी को भगवान् है।

 

हिन्दू बड़े उदार, उदात्त, विशाल-हृदय, परोपकारी, सहानुभूतिपूर्ण, दयावान् सत्कारशील होते किसी देख अपने घर जायेंगे उसके साथ ऐसा व्यवहार करेंगे, मानो वह अतिथि हो। पहले उसे भोजन करवा कर वे भोजन करेंगे। संसार में कहीं ऐसा व्यवहार देखने-सुनने को नहीं मिलेगा। अन्य देशों भोजन का एक ग्रास भी बिना सकता।

 

हिन्दुओं विश्वास कि एक सन्त-महात्मा को अखिल विश्व को भोजन दे क्योंकि ज्ञान हो है कि साक्षात्कार प्राप्त सन्त ब्रह्म से एकाकार होता वह सारी सृष्टि से एकरूप हिन्दू-नीति-शास्त्र वेदान्त उत्कृष्ट दर्शन पर आधारित दर्शन जीवन एकत्व और चेतना सिद्धान्त को मानता नैतिकता एवं परोपकार इसी एकत्व अभिव्यक्तियाँ हिन्दू स्वयं भोजन से कौओं, कुत्तों, गायों और मछलियों भोजन देता है। सब रूपों में अन्तर्निहित एकमेव आत्मा ही महचानने प्रयास करता है। वह है कि दूसरों प्रेम करना को प्रेम है को कष्ट पहुँचाना स्वयं कष्ट पहुँचाना वैश्व-प्रेम के अभ्यास द्वारा अनुभव सारे के हैं, सारे पाँव उसी हैं और अखिल विश्व उसका आवास है (वसुधैव कुटुम्बकम्) धीरे-धीरे वह ब्रह्माण्ड आत्मा से एकाकार हो जाता है और परमात्मा से भी। हिन्दू-आचार-नीति धीरे-धी आत्मसाक्षात्कार की ओर प्रवृत्त करती है। आचार-नीति योग का एक साधन है।

आचार-नीति के संवर्धन अथवा शोधन की प्रक्रिया

 

समस्त नैतिक अनुशासनों का मूल मानसिक शोधन है। यह शोधन समस्त दुष्कर्मों से बचते हुए सद्गुणों के सक्रिय अभ्यास द्वारा ही सम्भव हो सकता है। हर समय भलाई करें। अहिंसा, सत्य और ब्रह्मचर्य पाप से बचने, सद्गुणों को अपनाने और आत्म-शोधन की तीन प्रक्रियाओं के प्रतीक हैं।

 

मनुष्य के अहंकार से ही सारी बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं। अहंकार अपने को आकांक्षा, इच्छा और लोभ के रूपों में व्यक्त करता है। इसके प्रभाव से मनुष्य घृणा, प्रेम, चाटुकारिता, अभिमान, अनैतिकता, मिथ्याचार, कूटनीति और भ्रान्ति में रस लेने लगता है।

 

देहाभिमान से उत्पन्न अहंकार का उन्मूलन करने हेतु शरीर की बुराइयों तथा नश्वरता पर सतत विचार करें। बुराई समझ कर उनका बहिष्कार करें और मानसिक रूप से उनसे ऊपर उठ जायें। जो वांछनीय है, उन्नयनकारी और दिव्य है, उसी का चिन्तन-मनन करें।

 

अनुचित कृत्य (विवेक की उपेक्षा करके किया गया अविचारपूर्ण कर्म) से ही समस्त प्रकार की विपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। विपत्तियों से मुक्ति पाने हेतु सदाचार का पालन करना चाहिए। अपने विचार, वाणी, कर्म आन्तरिक उद्देश्य तथा सामान्य आचरण में सत्य एवं पवित्रता का पालन दृढ़तापूर्वक करें। मनुष्य और वस्तुओं के प्रति कोई धारणा निर्मित करते समय तथा दूसरों के साथ अपने व्यवहार में स्नेह, सहनशीलता तथा उदारता का परिचय दें।

 

हर क्षेत्र में मनुष्य को इन सद्गुणों का अभ्यास करने तथा इनको व्यक्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। पिता-पुत्र, बड़े-छोटे, शिक्षक-विद्यार्थी, मित्र-मित्र, गुरु-शिष्य, नेता-अनुयायी, प्रजा-प्रशासक और राष्ट्र-राष्ट्र के पारस्परिक सम्बन्धों में हमें इस आदर्श को चरितार्थ करना चाहिए।

आपको सद्गुण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। इस बात का निश्चय कर लें कि आप धर्म से किंचिन्मात्र कदापि विचलित नहीं होंगे। आपको अपने मन को सावधानीपूर्वक प्रशिक्षित करना होगा और अपनी इच्छा-शक्ति को विकसित करना और बलवती बनाना होगा। इसी कारण यम, नियम और षट्सम्पत् पर बहुत बल दिया गया है। नित्य-प्रति के जीवन में किये गये आत्मत्याग एवं बलिदान के संकल्पित कर्मों द्वारा मन और इच्छा-शक्ति को प्रयोग में लाना एवं उन्हें अनुशासित बनाना चाहिए। इस प्रकार आचार-नीति के संवर्धन के लिए दो बातें आवश्यक हैं- निक जागरूकता और सम्यक् अभ्यास। आचार-नीति के संवर्धन में संवेदनशील सदसद्विवेक तथा भलाई एवं श्रेष्ठता के प्रति सुनिश्चित श्रद्धा का महत्वपूर्ण सवार होता है।

औचित्य तथा अनौचित्य का दर्शन

 

प्रत्येक व्यक्ति कहता है-"यह उचित है, वह अनुचित है, तुम्हारा कथर (अथवा व्यवहार) उचित है, उसका कथन (अथवा व्यवहार) अनुचित है"; परन वह यह ठीक-ठीक नहीं बतला सकता है कि 'उचित' तथा 'अनुचित' से उसका स्वा अभिप्राय है।

 

वह मापदण्ड क्या है जिससे आप किसी कार्य के उचित-अनुचित अथवा अच्छे-बुरे होने का निर्णय लेते हैं? उचित-अनुचित और भला-बुरा सापेक्ष शब्द है। उचित तथा अनुचित नैतिक स्तर से वैधिक पक्ष को और भलाई तथा बुराई इसके परिणामात्मक पक्ष को व्यक्त करते हैं। आपको अपना आचरण इस स्तर के अनुकूल बनाना होगा। जो किसी नियम के अनुसार होगा, वह उचित है। जो उपलब्ध करने योग्य है, वह अच्छा है। धर्म हमें नैतिक विज्ञान के आधार के लिए अन्तिम रूप में मान्य सामग्री प्रदान करता है।

 

औचित्य-अनौचित्य की सापेक्षता

 

सही और गलत तथा धर्म और अधर्म सापेक्ष शब्द हैं। इन नियमों को यथातथ्य परिभाषित करना बहुत कठिन है। कभी-कभी सन्त जन भी यह निर्णय करने में सम्भ्रमित हो जाते हैं कि विशिष्ट परिस्थितियों में क्या उचित और क्या अनुचित है। इसीलिए भगवान् कृष्ण ने भी गीता में कहा है- "क्या कर्म और क्या अकर्म है, इस विषय में बुद्धिमान् पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं; इसलिए मैं तुझे उस कर्म के विषय में बतलाऊँगा जिसे जान कर तू अशुभ से मुक्त हो जायेगा। तुझे कर्म, अकर्म और निषिद्ध कमाँ का स्वरूप अवश्य जानना चाहिए। कर्म की गति गहन है। जो व्यक्ति कर्म में अकर्म को और अकर्म में कर्म को देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है। वह समस्तः कर्म करते हुए भी योगयुक्त है" (/१६, १७ और १८)

 

 

 

उचित-अनुचित के उदाहरण

 

उचित तथा अनुचित सदा चतुर्दिक् परिस्थितियों के अनुसार सापेक्ष होते हैं। एक स्थिति में जो उचित है, दूसरी स्थिति में वही अनुचित हो जाता है। उचित और अनुचित समय, विशेष परिस्थितियों, वर्ण और आश्रम के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। नैतिकता एक परिवर्तनशील और सापेक्ष शब्द है। जो व्यक्ति किसी कुख्यात महिला के घर छह महीने में एक बार ही जाता है, उसकी अपेक्षा वह विषयी पुरुष अधिक अनैतिक है जो अपनी वासनापूर्ति के लिए अपनी विधिवत् विवाहित पत्नी को बार-बार उत्पीड़ित करता रहता है। अनैतिक विचारों में निरन्तर लीन रहने वाला मनुष्य सर्वाधिक अनैतिक है। दोनों में यह सूक्ष्म भेद आपको स्पष्ट रूप से समझ में गया होगा। क्षत्रिय राजा के लिए शत्रु को मारना उचित है। ब्राह्मण या संन्यासी के लिए खतरे के समय अपनी रक्षा करने हेतु भी किसी को मारना उचित नहीं। उन्हें कठोर सहिष्णुता और क्षमाशीलता का अभ्यास करना चाहिए। किसी महात्मा या गुरु पर यदि किसी अन्यायी अधिकारी द्वारा अन्यायपूर्ण अभियोग लगाया गया है, तो उसका जीवन बचाने के लिए झूठ बोलना ठीक है। इस विशिष्ट परिस्थिति में असत्य सत्य बन गया है। परन्तु ऐसा सत्य जिससे बहुतों को हानि पहुँचे, असत्य ही है। पथिकों की नित्य हत्या करने वाले डाकू की हत्या अहिंसा ही है। विशेष परिस्थितियों में हिंसा अहिंसा बन जाती है।

 

निवृत्ति-मार्ग पर चलने वाले संन्यासी या तपस्वी को क्षमा शोभा देती है; परन्तु शासक को शोभा नहीं देती। अपने को हानि पहुँचाने वाले व्यक्ति को शासक क्षमा कर सकता है; परन्तु जनता को अत्यधिक हानि पहुँचाने वाले को नहीं।

 

संकटपूर्ण परिस्थितियों के लिए कतिपय विशिष्ट धर्म होते हैं, जिन्हें आपद्-धर्म कहते हैं। जब भयंकर अकाल पड़ा तो ऋषि विश्वामित्र ने एक चाण्डाल से मांस ले कर देवयज्ञ में चढ़ाया। सन्त उशस्ति ने एक महावत से उच्छिष्ट अन्न ले कर खा लिया था, क्योंकि वह बहुत भूखे थे और कहीं से भोजन पाने में समर्थ नहीं थे।

 

औचित्य तथा अनौचित्य के सूचक

 

वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक ऋषि कणाद (इस दर्शन के) प्रथम सूत्र में कहते हैं- "जो तुम्हारे ऊर्ध्वगमन में सहायक बन कर तुम्हें परमात्मा के समीप ले जाये, वह उचित है। जो तुम्हारे अधोगमन का कारण बने और तुम्हें परमात्मा से दूर ले जाये, वह अनुचित है। जो धर्मग्रन्थों में उल्लिखित आदेशों के सर्वथा अनुकूल है, वह उचित है और जो उन आदेशों के प्रतिकूल है, वह अनुचित है।" यह उचित-अनुचित का परिभाषित करने का एक ढंग है। ईश्वरेच्छा के अनुकूल कार्य करना उचित तथा उसके प्रतिकूल कार्य करना अनुचित है।

 

एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह जानना कठिन है कि किन्हीं विशिष्ट कायों से कौन-सी ईश्वरीय इच्छा निहित है। इसीलिए मनीषी सन्तों ने यह घोषणा की है कि सम्बन्ध में लोगों को शास्त्रों, विद्वान् पण्डितों और आत्मज्ञानी पुरुषों द्वारा मान्य विचारों को स्वीकार करना चाहिए। जिसने वर्षों पर्यन्त निष्काम कर्मयोग का अभ्यास किया हो और दीर्घकाल तक ईश्वरोपासना की हो, ऐसा पवित्र पुरुष जब कुछ विष्टि कार्य करना चाहता है, तो उसे सहज ही ईश्वरीय इच्छा का पता लग जाता है। वह उस (इच्छा) की आन्तरिक, तीव्र तथा मौन वाणी सुन सकता है। साधारण मनुष्यों को यह दिव्य वाणी सुनने का प्रयास नहीं करना चाहिए। वे विकृत मन की वाणी को ईश्वरीय वाणी समझने की भूल कर सकते हैं। उनका निम्न वृत्तिक मन उन्हें भ्रमित कर देगा।

 

स्वार्थभाव बुद्धि को आच्छादित कर देता है। इसलिए यदि मनुष्य में लेशमात्र भी स्वार्थभाव है, तो वह उचित तथा अनुचित में भेद नहीं कर सकता। उसके लिए अति पवित्र, सूक्ष्म और तीव्र बुद्धि की आवश्यकता है। गीता में सात्त्विक, राजसी और तामसी बुद्धि का वर्णन इस प्रकार किया गया है-

 

"हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति-मार्ग को, कर्तव्य-अकर्तव्य को, भय-अभय को तथा बन्धन-मोक्ष को तत्त्व से जानती है, वह बुद्धि सात्त्विक है। जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म-अधर्म तथा कर्तव्य-अकर्तव्य को ठीक-ठीक नहीं जानता है, वह बुद्धि राजसी है। जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को धर्म मानती है तथा सम्पूर्ण अर्थों को विपरीत ही मानती है, वह बुद्धि तामसी है" (१८/३०, ३१ और ३२)

 

सदाचार के पथ पर अग्रगामी साधकों की सहायता के लिए विद्वानों द्वारा अनेक परिभाषाएँ दी गयी हैं। बाइबिल में कहा गया है- "दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें, जिस व्यवहार की आप अपने लिए उनसे आशा करते हैं।" यह बहुत सुन्दर नीति-वचन है। इसमें सदाचार का सम्पूर्ण सार निहित है। यदि कोई व्यक्ति सावधानी से इसका आचरण करे, तो वह कोई अनुचित कार्य नहीं करेगा। जो आपके लिए हितकर नहीं है, वैसा दूसरों के साथ भी करें, जिससे दूसरों की भलाई हो अथवा जो दूसरे को चोट पहुँचाये और जिसके कारण आपको लज्जित होना पड़े। वही कर्म करें जिससे दूसरों की भलाई हो तथा जो प्रशंसनीय हो। वैसा ही व्यवहार करें जिसकी आप अपने लिए दूसरों से आशा करते हैं। यही धर्म का रहस्य है। यही कर्मयोग का सार है। सम्यक् (औचित्यपूर्ण) आचरण की यह संक्षिप्त विवेचना है। ऐसे आचरण से आपको शाश्वत आनन्द की प्राप्ति होगी।

 

"अहिंसा परम धर्म है।" मन, वाणी तथा कर्म से किसी को चोट पहुँचाना सर्वगुणों में उत्कृष्ट गुण है। मन, वाणी और कर्म से अहिंसा में प्रतिष्ठित व्यक्ति कभी अनुचित कर्म नहीं कर सकता। इसी कारण महर्षि पतंजलि ने अपने राजयोगदर्शन में अहिंसा को बहुत महत्त्व दिया है। यम के अभ्यास में अहिंसा का प्रथम स्थान है। दूसरों को सुख पहुँचाना उचित है; उन्हें कष्ट और पीड़ा पहुँचाना अनुचित है। दैनिक व्यवहार में इस सिद्धान्त का पालन करता हुआ व्यक्ति आध्यात्मिक पथ पर अपना क्रमविकास कर सकता है। ऐसा कोई कर्म करें जिसके फलस्वरूप आपको भयभीत अथवा लज्जित होना पड़े। इस सिद्धान्त का पालन करने पर आप सर्वथा सुरक्षित रहेंगे। आपके विवेक तथा बुद्धि को जो भी सिद्धान्त अनुकूल प्रतीत हो, मनोयोग और आस्थापूर्वक उसी का पालन करते रहें। आप उन्नत हो कर परमानन्द-धाम को प्राप्त होंगे।

 

जो कार्य मन को उन्नत करे तथा शान्ति एवं सुख प्रदान करे, वह उचित है; जो कार्य मन में विषाद, पीड़ा और व्याकुलता को उत्पन्न करे, वह अनुचित है। उचित-अनुचित के परीक्षण का यह एक सरल उपाय है।

 

आध्यात्मिक क्रमविकास में सहायक कर्म उचित है और इसमें बाधा डालने वाला कर्म अनुचित है। आत्मैक्य की ओर अग्रसर करने वाला कर्म उचित है और विभिन्न जीवात्माओं में पार्थक्य की भावना उत्पन्न करने वाला कर्म अनुचित है। धर्मशास्त्रों के आदेशों के अनुकूल कर्म उचित है और उनके प्रतिकूल कर्म अनुचित है। ईश्वरीय इच्छा के अनुकूल कर्म उचित है और ईश्वरीय इच्छा के प्रतिकूल कर्म अनुचित है। परोपकार, सेवा और सहायता करना तथा दूसरों को सुख देना उचित है। दूसरी ओर, दूसरों को कष्ट देना और चोट पहुँचाना अनुचित है। किसी जीव को क्षति पहुँचाने के भाव से किया गया कर्म निश्चित ही नैतिकता है। नैतिक आदेश जीवों को सब प्रकार की पीड़ाओं से मुक्त रखने के लिए बनाये गये हैं।

 

दानशीलता उचित क्यों है? क्योंकि वह 'दान करो' के सिद्धान्त के अनुरूप है। चोरी अनुचित क्यों है? क्योंकि यह अस्तेय के सिद्धान्त के विरोध में है। दुःख और कठिनाई में पड़े किसी व्यक्ति की सहायता करना क्यों अच्छा है? क्योंकि इससे आपका चरित्र परिष्कृत होगा। इसे आपके हृदय में दयाभाव जाग्रत होगा। सदगुणों के अभ्यास द्वारा आपको भगवत्साक्षात्कार करने में सहायता मिलेगी। जीव-हिंसा में क्या बुराई है? क्योंकि इसका लक्ष्य अशोभनीय है। इससे आपका चरित्र भ्रष्ट हो जायेगा। इससे आप पशुओं के समान क्रूर बन जायेंगे।

यौगिक उद्यानकर्म

 

अनुचित कर्मों द्वारा आप अपने चरित्र को दूषित करते हैं। अच्छे कर्मों द्वारा आप श्रेष्ठ चरित्र का विकास करते हैं। चरित्रहीन व्यक्ति पाशविकता के स्तर पर उतर आता है। चरित्रवान् व्यक्ति सर्वत्र सम्मान्य, श्रद्धेय तथा पूज्य माना जाता है। सर्वत्र उस पर विश्वास किया जाता है। अतः यौवनकाल में ही सच्चरित्र का विकास करें। हृदय-रूपी उद्यान में दोषों को निराना और सद्गुणों का कर्षण करना सीखें। अवगुण तथा बुरी आदतें झाड़ियाँ हैं। सद्गुण अमूल्य फल-फूल हैं। प्रतिपक्ष-भावना की यौगिक विधि सीखें। काम, क्रोध, लोभ, अहंकार एवं स्वार्थपरता के विपरीत गुण पवित्रता अथवा ब्रह्मचर्य, क्षमाशीलता, उदारता, नम्रता और निःस्वार्थता हैं। कुशल यौगिक माली बनें। हृदय-रूपी उद्यान में सुन्दर पुष्पों का रोपण करें और हृदय उद्यान के मध्य भगवान् की प्रतिष्ठा करके उन पर ध्यान करें। आप शाश्वत आनन्द और अनश्वरता का उपभोग करेंगे।

उपसंहार

 

आपको आचरण के नियमों का पालन करना चाहिए। विधिकर्ताओं ने आपकी अपनी उन्नति तथा आध्यात्मिक क्रमविकास के लिए ये नियम बनाये हैं। विधिकर्ता महान् सन्त थे। उन्हें प्रत्यक्ष भगवत्साक्षात्कार हुआ था।

 

सदाचार का पालन करते रहना निःसन्देह कठिन है। जो ऐसा करता है, उसे उपहास, वैमनस्य और अत्याचारों का सामना करना पड़ता है। अतएव सहिष्णुता, दैन्य-भाव, मौन, सहनशीलता और क्षमा-भाव-इन गुणों का विकास करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। किसी भी मूल्य पर सदाचार की मर्यादा बनाये रखें। इसके लिए किसी भी प्रकार का मिथ्यापवाद सहन करने के लिए तैयार रहें। बुराई के बदले भलाई करें।

 

जीवन संकट में हो, तो नैतिकता का मार्ग छोड़ें। भौतिक लाभ प्राप्त करने के लोभ में सदाचार का त्याग करें। जब कभी भी किसी प्रकार भ्रम उत्पन्न हो जाये, तब शास्त्रों तथा सन्त जनों से शिक्षा लें। चरित्र-निर्माण करें। विकसित हों। अपना आदर्श सदा अपने समक्ष रखें। सदाचार का सदैव पालन करें। आप शीघ्र ही शाश्वत आनन्द एवं अमृतत्व प्राप्त करेंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

पंचम अध्याय

हिन्दू-सिद्धान्त

कर्म का सिद्धान्त

 

कर्म क्या है?

 

कर्म का अर्थ कार्य (क्रिया) ही नहीं, प्रत्युत् उसका परिणाम (फल) भी है। किसी कर्म का फल वस्तुतः कर्म से भिन्न नहीं है। यह (फल) कर्म का ही एक भाग है। इसे उससे (कर्म से) पृथक् नहीं किया जा सकता। श्वास-प्रश्वास, चिन्तन, वार्तालाप, दर्शन, श्रवण, भोजन करना आदि कर्म हैं। चिन्तन मानसिक कर्म है। कर्म हमारे वर्तमान जीवन के तथा इससे पूर्व-जन्मों के कार्यों का योग है।

 

कोई भी कार्य या विचार, जिसका परिणाम निकलता है, कर्म कहलाता है। कर्म के सिद्धान्त का अर्थ है-कार्य-कारण-सिद्धान्त। जहाँ कारण है, वहाँ कार्य अवश्य फलित होगा। बीज वृक्ष का कारण है। वृक्ष कार्य-रूप है। जब वृक्ष बीज उत्पन्न करता है, तब वह बीज का कारण बन जाता है।

 

कर्म किस प्रकार बनते हैं?

 

'मानव-प्रकृति त्रिविध है-इच्छा, ज्ञान और क्रिया। इन तीनों से कर्म बनता है।

 

कर्म की पृष्ठभूमि में इच्छा और विचार विद्यमान रहते हैं। किसी वस्तु के लिए इच्छा मन में उत्पन्न होती है। तब आप सोचते हैं कि उसे कैसे प्राप्त करें। फिर आप उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। इच्छा, विचार और कर्म सदैव साथ रहते हैं। यही मानो कर्म-रूपी रज्जु के तीन सूत्र हैं।

 

इच्छा कर्म को उत्पन्न करती है। आप आकांक्षित पदार्थों को प्राप्त करने हेतु कर्म तथा प्रयास करते हैं। कर्म के फलस्वरूप दुःख-सुख की उत्पत्ति होती है। अपने कर्मों का फल पाने के लिए आपको अनेक जन्म लेने पड़ेंगे। यही कर्म का सिद्धान्त है।

 

 

 

कर्म-सिद्धान्त की प्रक्रिया

हिन्दू-धर्म में ही नहीं, प्रत्युत् बौद्ध और जैन धर्मों में भी कर्म का सिद्धान्त मौलिक सिद्धान्तों में से एक है। मनुष्य जैसा बीज बोता है, वैसी फसल काटता है। यह कर्म का सिद्धान्त है। यदि आप बुरे कर्म करेंगे, तो उसका बुरा फल आएको भोगना पड़ेगा। यदि अच्छा कर्म करेंगे तो आपको अवश्य सुख प्राप्त होगा। पृथ्वी पर कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो कमों को अपने फल उत्पन्न करने से रोक सके। प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म मानो शाश्वत ईश्वरीय न्याय की तराजू पर तोले जाते हैं। कर्म का सिद्धान्त अटल है।

 

इस सृष्टि में अनायास ही और अव्यवस्थित ढंग से घटनाएँ घटित नहीं होतीं। वे नियमित रूप से उत्तरोत्तर घटित होती हैं। वे एक नियमित क्रम से एक-दूसरे का अनुगमन करती हैं। जो-कुछ आपके द्वारा अब हो रहा है और जो भविष्य में घटित होगा, उनके बीच एक निश्चित सम्बन्ध है।

 

प्रत्येक कर्म का त्रिविध परिणाम होता है। वह आपको समुचित पुरस्कार या फल देता है। वह आपके चरित्र को भी प्रभावित करता है और आपके मानस पर अपनी छाप छोड़ देता है। यह छाप उस कृत्य को पुनः करने के लिए आपको प्रेरित करेगी। बाहरी या भीतरी प्रेरणा के कारण मानसिक छाप मन में एक विचार तरंग का रूप धारण कर लेगी। प्रत्येक कर्म का प्रभाव संसार पर भी पड़ता है।

 

जैसी करनी, वैसी भरनी

 

पृथ्वी में छोटा-सा बीज बो देने से छोटा-सा अंकुर निकलता है। फिर अंकुर से पत्तियाँ निकलती हैं। तब उसमें फूल और फल लगते हैं। फल में दोबारा बीज आते हैं। आम के बीज से आम का पेड़ उत्पन्न होता है। यदि आप धान बोयेंगे तो गेहूँ की फसल की आशा नहीं कर सकते। जिस प्रकार का बीज होगा, उससे उसी प्रकार का पौधा उत्पन्न होगा। स्त्री के गर्भ से मानव ही उत्पन्न होता है। इसी प्रकार घोड़े से घोड़ा और श्वान से श्वान ही उत्पन्न होता है। इसी प्रकार यदि आप कुकर्म के बीज बोयेंगे, तो उनसे दुःख और कष्ट की फसल ही पैदा होगी। यदि आप सत्कर्मों का बीज बोते हैं, तो आप सुख की फसल काटेंगे। यही कर्म का सिद्धान्त है।

 

जो-कुछ आप अपने कर्मों द्वारा बोते हैं, वह आपको वापस मिल जाता है। यदि आप सेवा, दान और दया के कार्यों द्वारा दूसरों को सुखी बनाते हैं तो आप सुख का बीज बोते हैं। उससे आपको सुख-रूपी फल प्राप्त होगा। यदि आप कठोर शब्दों, अपमान, दुर्व्यवहार, क्रूर कृत्यों और अत्याचार द्वारा दूसरों को दुःख देते हैं, तो आप. दुःख का बीज बोते हैं। इस बीज से आपको पीड़ा, कष्ट, विपत्ति और दुःख का फल प्राप्त होगा। यह कर्म का अपरिवर्त्य सिद्धान्त है।

 

भूतकाल में किये हुए आपके कर्म वर्तमान परिस्थिति के लिए उत्तरदायी हैं और वर्तमान कर्म आपके भविष्य का निर्माण करेंगे। विश्व में अव्यवस्था या स्वेच्छाचार की तरह की कोई स्थिति नहीं है। आप अपने अच्छे कर्मों से अच्छे बनते हैं और बुरे कर्मों से बुरे।

 

यदि आप बुरे विचारों को प्रश्रय देते हैं, तो इसका कुपरिणाम आपको भोगना पड़ेगा। तब आप कठिनाई में पड़ेंगे और प्रतिकूल परिस्थितियों से घिर जायेंगे। तब आप अपने वातावरण और परिस्थितियों को दोष देंगे। इस कर्म-सिद्धान्त को भली प्रकार समझ कर बुद्धिमत्ता से रहें। श्रेष्ठ विचारों को स्वीकार करें। आप सदा सुखी रहेंगे।

 

कर्म, आदतें, चरित्र और भाग्य

 

विचार आपके भाग्य के निर्माता हैं। यदि आप श्रेष्ठ विचार रखेंगे, तो श्रेष्ठ चरित्र विकसित होगा; कुविचार रखेंगे, तो अधम चरित्र विकसित होगा। यह प्रकृति का अपरिहार्य नियम है। इसलिए आप उदात्त विचारों को पोषित करके सोच-समझ कर अपने चरित्र का निर्माण कर सकते हैं। विचार स्थूल रूप धारण करके कर्म बन जाता है। यदि आप मन को अच्छे तथा उन्नयनकारी विचारों पर ही टिका सकें, तब स्वभावतः आप अच्छे और प्रशंसनीय कार्य करेंगे।

 

आपका आचरण आपके चरित्र को प्रकट करता है। आचरण से आपका चरित्र बनता भी है। सदाचार को पोषित (विकसित) करने हेतु अनुशासन और अविरत सतर्कता की आवश्यकता है। आपको अपने प्रत्येक विचार, शब्द और कर्म के प्रति जाग्रत रहना होगा। दूसरों के साथ व्यवहार करते समय आपको अत्यधिक सावधानी रखनी होगी। सदाशय रखते हुए भी पूर्व-संस्कारों, प्रवृत्तियों और मनोवेगों के वशीभूत हो कर आप विचलित हो सकते हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त लोग भी सम्यक् व्यवहार करना नहीं जानते। सद्व्यवहार से यह प्रकट होता है कि आपका मन परिष्कृत (परिमार्जित) और संयमित है और आपकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि सचमुच श्रेष्ठ तथा आध्यात्मिक है। जप, प्राणायाम और मौनव्रत के अभ्यास से मनोवेगों आदि को नियन्त्रित करने में सहायता मिलेगी।

 

कर्म के बीज बो कर स्वभाव की फसल काटी जाती है। स्वभाव बो कर चरित्र की फसल प्राप्त होती है। चरित्र का वपन करके भाग्य की फसल मिलती है। इस प्रकार भाग्य आपकी अपनी रचना है। आपने ही इसे बनाया है। श्रेष्ठ विचारों को प्रश्रय दे कर, सत्कर्म करके तथा अपने सोचने के ढंग को बदल आप अपने भाग्य को निरस्त कर सकते हैं। अभी आप सोचते हैं कि आप शरीर है और आपका अमुक नाम है। अब इसके विपरीत सोचना प्रारम्भ करें। विचार करें कि आप सर्वव्यापक अमर ब्रह्म हैं। आप ब्रह्म ही हो जायेंगे। यह अपरिवर्त्य नियम है।

 

तीन प्रकार के कर्म

संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण

 

कर्म तीन प्रकार के होते हैं-संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण अथवा आगामी। अतीत के एकत्रित कर्म संचित कहलाते हैं। इनका एक अंश मनुष्य के चरित्र, उसकी प्रवृत्तियों, अभिवृत्तियों, झुकावों, क्षमताओं, इच्छाओं आदि में दृष्टिगोचर होता है। संचित कर्मों से ही प्रवृत्तियाँ उद्भूत होती हैं। प्रारब्ध भूत कर्मों का वह अंश है जो वर्तमान शरीर के लिए उत्तरदायी है। संचित कर्मों का वह अंश जिससे वर्तमान जन्म प्रभावित होता है, प्रारब्ध कहलाता है। यह पकी हुई फसल के समान है। इससे बचा जा सकता है और इसे बदला जा सकता है। इसे भोग करके ही क्षय किया जा सकता है। आप अपना पुराना ऋण चुकाते हैं। प्रारब्ध कर्म वह है, जो आरम्भ हो गया है और वस्तुतः फल प्रदान कर रहा है। संचित कर्मों के ढेर में से उसे चुना जाता है। क्रियमाण कर्म वह है जो भविष्य के लिए निर्मित हो रहा है-इसे आगामी अथवा वर्तमान भी कहते हैं।

 

वेदान्त-साहित्य में एक सुन्दर सादृश्य प्रस्तुत किया गया है। धनुर्धर ने तीर छोड़ दिया है, उसके हाथ से तीर छूट चुका है, वह उसे वापस नहीं लौटा सकता। अब वह दूसरा बाण छोड़ने वाला है। उसकी पीठ पर रखे हुए तरकश में बाणों का ढेर संचित कर्म है; जो बाण उसने छोड़ दिया, वह प्रारब्ध है और जो बाण वह छोड़ने वाला है, वह आगामी कर्म है। इसमें से संचित और आगामी पर उसका पूर्णाधिकार है; परन्तु प्रारब्ध उसे अवश्य ही भोगना पड़ेगा। अतीत के जो कर्म परिपक्व हो गये हैं, उन्हें उसको भोगना ही पड़ेगा।

 

एक अन्य सुन्दर सादृश्य भी है। अन्न भण्डार संचित कर्म है। अन्न-भण्डार का जो भाग बिक्री हेतु दुकान पर रख दिया जाता है, वह प्रारब्ध कर्म है और जो भाग नित्य बेचा जाता है, वह आगामी कर्म का प्रतिनिधित्व करता है।

 

ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने से संचित कर्म-समूह नष्ट हो जाता है। श्रेष्ठ और दिव्य विचारों को प्रश्रय देने एवं सत्कर्मों को करने से उसमें बहुत कुछ परिवर्तन किया जा सकता है। आगामी कर्म प्रायश्चित्त द्वारा, निमित्त-भाव (अर्थात् इस भाव से कि मनुष्य परमात्मा के हाथ का यन्त्र मात्र है) द्वारा तथा साक्षी-भाव (यह भाव कि व्यक्ति मन और इन्द्रियों के कर्मों का साक्षी मात्र है) से नष्ट किये जा सकते हैं।

 

स्वतन्त्र इच्छा की सर्वोच्चता

 

आप अपनी नियति के स्वामी हैं। आप अपने भाग्य के निर्माता हैं। आप जो-कुछ दुःख प्राप्त करते हैं, उसके लिए आप उत्तरदायी हैं। आप अपनी वर्तमान स्थिति के लिए उत्तरदायी हैं। यदि आप सुखी हैं, तो अपने कर्मों के कारण और यदि दुःखी हैं तो भी अपने कर्मों के कारण। प्रत्येक कर्म का फल देर-सबेर अवश्य मिलता है। सत्कर्म का परिणाम सुखद होता है तथा दुष्कर्म का दुःखद।

 

आपको भोग-स्वातन्त्र्य का नहीं, वरन् कर्म-स्वातन्त्र्य का अधिकार है। इसलिए भगवान् कृष्ण ने कहा है : "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन-कर्म करने का ही तेरा अधिकार है, कर्म-फल पर नहीं।" जनकादि ने कर्म के द्वारा ही पूर्णता प्राप्त की थी। आप अपने चरित्र, विचार और कामनाओं को परिवर्तित कर सकते हैं। मनुष्य की इच्छा सदा स्वतन्त्र है। स्वार्थपरायणता के कारण उसकी इच्छा दूषित हो गयी है। निम्न कामनाओं एवं रुचि-अरुचि से मुक्ति पा कर वह अपनी इच्छा को शुद्ध, दृढ़ और सक्रिय बना सकता है। प्रत्येक आत्मा एक ऐसे कृषक की भाँति है जिसके पास अपनी भूमि का एक टुकड़ा है। भूमि का क्षेत्रफल, भूमि की प्रकृति, ऋतु की परिस्थितियाँ आदि सब पहले ही निश्चय हो चुकती हैं। परन्तु कृषक इस बात के लिए पूर्ण स्वतन्त्र है कि वह भूमि को जोत कर और खाद दे कर अच्छी फसल प्राप्त करे या उसे अकृष्ट रहने दे।

 

जो-कुछ आप वर्तमान में हैं, वह भूतकाल के आपके विचारों और कर्मों का फल है। जो-कुछ आप भविष्य में बनेंगे, वह आपके वर्तमान विचारों और कर्मों का परिणाम होगा। जो प्रवृत्तियाँ आपने पूर्व जन्म में प्राप्त की थीं, उनके लिए सर्वाधिक उपयुक्त वातावरण आपको वर्तमान में प्राप्त होता है। भविष्य के लिए आप अपेक्षाकृत उत्तम परिस्थितियाँ बना सकते हैं। आप अपने इच्छानुसार कर्मों को रूप दे सकते हैं। आप पूर्णता की बहुत ऊँची स्थिति तक उठ सकते हैं। आप इन्द्र या पूर्ण योगी बन सकते हैं। आप अपना चरित्र, विचार और कर्म बदल सकते हैं। इसलिए भीष्म और वसिष्ठ ने पुरुषार्थ को भाग्य से उच्चतर स्थान दिया है।

 

जिस नाविक के पास डाँड, पतवार तथा पाल नहीं होते, उसे हवाएँ और तरंगें कहाँ-की-कहाँ बहा ले जाती हैं; किन्तु जिस निपुण नाविक के पास ये वस्तुएँ होती हैं, वह अपनी नौका को किसी भी इच्छित दिशा में ले जा सकता है तथा दूसरे किनारे पर कुशलतापूर्वक पहुँचा सकता है। इसी प्रकार जिस व्यक्ति को प्रकृति का नियम-विचार का नियम, कर्म का नियम और कारण कार्य का नियम-ज्ञात है, बह इस संसार-समुद्र को निर्भीकतापूर्वक पार करके निर्भयता एवं अमरता के दूसरे तट पर पूर्ण कुशलतापूर्वक पहुँच सकता है। इन नियमों के ज्ञान की सहायता ले कर वह सहायक शक्तियों से सर्वाधिक लाभ प्राप्त करने की दृष्टि से उनका (शक्तियों का) उपयोग करेगा और विरोधी तत्त्वों को कुशलता से निष्प्रभावी कर देगा। ज्ञान प्रकाश-स्तम्भ है। अतः ज्ञान नितान्त आवश्यक है। अज्ञानता महान् पाप है। अज्ञानी मनुष्य प्रकृति का शिकार या दास बन जाता है।

 

निष्काम कर्म की महिमा

 

स्वार्थपूर्ण कर्म मनुष्य के पुनर्जन्म का कारण है। पुनर्जन्म पुराने कर्मों को भोगते हुए नये कर्मों को जन्म देता है। पुनर्जन्म के दुःखों से मुक्त होने के लिए कर्म से मुक्त होना होगा। निष्काम कर्म आपको बन्धन में नहीं डालेगा। वह आपके हृदय को शुद्ध बनायेगा और ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करेगा जिसके कारण आपके ऊपर दिव्य प्रकाश तथा भगवत्प्रसाद का अवतरण होगा। सम्यक् चिन्तन करें, भद्रतापूर्वक कार्य करें, नियमित रूप से ध्यान करें और शाश्वत परमानन्द तथा अमरता प्राप्त करें!

पुनर्जन्म का सिद्धान्त

 

पुनर्जन्म अर्थात् आत्मा के आवागमन का सिद्धान्त हिन्दू-धर्म का आधारभूत सिद्धान्त है। पुनर्जन्म का शाब्दिक अर्थ है-पुनः मूर्त रूप में आना अर्थात् स्थूल शरीर को पुनः धारण करना। जीवात्मा पुनः एक मांसल आवरण ग्रहण करता है। आवागमन शब्द का अर्थ है- एक स्थान से दूसरे स्थान को जाना, नये संसार में प्रवेश करना।

 

संस्कृत शब्द 'संसार' संस्कृत धातु 'सृ' से निकला है जिसका अर्थ है-संसरण करना। उपसर्ग 'सम्' का अर्थ-अत्यधिक। जीवात्मा बारम्बार इस संसार में और अन्य सूक्ष्म उच्चतर लोकों में संसरण करता रहता है। आत्मा का इस प्रकार बार-बार संसरण ही संसार का वास्तविक अर्थ है।

 

संसार का अस्तित्व इसलिए है ताकि जीवात्मा आत्म-साक्षात्कार कर सके।।

 

मानव में असीम सम्भावनाएँ निहित हैं। शक्ति और बुद्धि का भण्डार उसके भीतर है। उसे अपनी अन्तर्निहित दिव्यता को प्रकट करना होगा। जीवन और मृत्यु से गुजरने का यही उद्देश्य है।

 

हिन्दू-धर्मग्रन्थों में पुनर्जन्म के सिद्धान्त का निरूपण

 

मृत्यु के पश्चात् आपका अस्तित्व समाप्त नहीं होगा। वर्तमान जीवन के पूर्व आपने असंख्य जीवन व्यतीत किये हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-"अर्जुना इससे पूर्व तुमने और मैंने कई जन्म लिये हैं। केवल में ही उनके विषय में जानता है। तुम नहीं जानते। जन्म के बाद मृत्यु होना अनिवार्य है और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होना। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र उतार कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार शरीर में वास करने वाला आत्मा पुराने शरीरों को त्याग कर नये शरीरों में प्रवेश करता है।"

 

उपनिषदों ने भी घोषित किया है- "जिस प्रकार एक जोंक एक तृण के अन्त में पहुँच कर दूसरे तृण-रूप आश्रय को पकड़ कर अपने को सिकोड़ लेती है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीर को मार कर-अविद्या (अचेतनावस्था) को प्राप्त कर दूसरे आधार का आश्रय ले अपना उपसंहार कर लेता है" (बृहदारण्यक उपनिषद् : //) "जिस प्रकार सुनार सोने का एक टुकड़ा ले कर उससे दूसरे नवीन और अधिक सुन्दर रूप की रचना करता है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीर को नष्ट कर-अचेतनावस्था को प्राप्त करा कर अन्य पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा अथवा अन्य भूतों के नवीन और सुन्दर रूप की रचना करता है" (बृहदारण्यक उपनिषद् : //) "अन्न की भाँति मनुष्य पकता है (अर्थात् जराजीर्ण हो कर मर जाता है) तथा अन्न की भाँति ही वह (कर्मवश) पुनः जन्म ले लेता है" (कठोपनिषद् : //)

 

कर्म और पुनर्जन्म

 

पुनर्जन्म का सिद्धान्त कर्म के सिद्धान्त का ही उपसिद्धान्त है। एक व्यक्ति तथा दूसरे व्यक्ति की प्रकृति में जो भेद पाया जाता है, वह उनके अपने पूर्व-कर्मों के कारण ही होगा। पूर्व-कर्म का अर्थ है पूर्व-जन्म। इसके अतिरिक्त आपके समस्त कर्मों का फल इसी जीवन में नहीं मिल सकता, इसलिए अवशिष्ट कर्मों का फल प्राप्त करने के लिए एक और जन्म होना चाहिए। प्रत्येक आत्मा बहुत बार जन्म लेता और मृत्यु को प्राप्त होता है। जब तक आप अविनाशी परम तत्त्व का ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक जन्म और मृत्यु की श्रृंखला समाप्त नहीं होगी।

 

अच्छे कर्म उच्च योनियों में जन्म लेने के तथा बुरे कर्म नीच योनियों में जन्म लेने का कारण बनते हैं। सदाचरण करने से उच्च लोकों की ओर ऊर्ध्वगमन होता है तथा दुराचरण करने से निम्न लोकों की ओर अधोगमन। विद्या का परिणाम मोक्ष है और इसके विपरीत (अविद्या) का परिणाम बन्धन है। जब तक अच्छे तथा बुरे कर्म नष्ट नहीं होते, मनुष्य सैकड़ों कल्पों में भी मोक्ष या कैवल्य मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। अच्छे और बुरे-दोनों प्रकार के कर्म जीव को अपनी जंजीर में मजबूती से बाँध कर रखते हैं। एक जंजीर स्वर्ण की है और दूसरी लौह की। शाश्वत तत्त्व का ज्ञान प्राप्त किये बिना मनुष्य के द्वारा मोक्ष नहीं प्राप्त किया जा सकता।

 

पूर्व-जन्मों के अस्तित्व के प्रमाण

 

नवजात शिशु हर्ष, भय और दुःख प्रकट करता है। इसका कारण तब तक समझ में नहीं सकता, जब तक कि हम यह मानें कि शिशु इस जीवन में कुछ चीजों को देख कर पूर्व-जीवन की तत्सदृश वस्तुओं की याद करता है। जो वस्तुएँ पहले हर्ष, भय और दुःख उत्पन्न किया करती थीं, वे इस जीवन में भी उसी प्रकार हर्ष, भय आदि उत्पन्न करती रहती हैं। भूतकाल की स्मृति पूर्व-जन्म को तथा आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करती है।

 

नवजात शिशु क्षुधा शान्त करने के लिए माँ का दूध पीता है। पूर्व-जन्म में इसी प्रकार करने की स्मृति बनी रहने के कारण वह ऐसा करता है। बच्चे को दूध पीने की इच्छा उसके पूर्व-जन्म के अनुभव के कारण होती है। इससे यह सिद्ध है कि यद्यपि शिशु की आत्मा ने पूर्व-शरीर त्याग कर नवीन शरीर धारण कर लिया है; परन्तु उसे पूर्व-जन्म के शरीर के अनुभवों का स्मरण है।

 

आप संसार में नितान्त विस्मरणशीलता की अवस्था तथा निपट अन्धकार में भटकते हुए नहीं आये हैं। आप पूर्व-जन्म में प्राप्त की हुई कुछ आदतें और स्मृतियाँ ले कर जन्म लेते हैं। इच्छाएँ पूर्व-अनुभव से उद्भूत होती हैं। हम देखते हैं कि कोई भी व्यक्ति बिना इच्छा के उत्पन्न नहीं होता। प्रत्येक प्राणी कुछ इच्छाओं को ले कर उत्पन्न होता है जिनका सम्बन्ध उसके पूर्व-जन्म में भोगी हुई वस्तुओं से होता है। इच्छाएँ पूर्व-जन्मों में उसके आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध करती हैं।

मृत्यु और पुनर्जन्म के मध्य आत्मा का मार्ग

 

आत्मा सूक्ष्म शरीर (लिंग-देह) के साथ उत्क्रमण करती है। सूक्ष्म शरीर इन उन्नीस तत्त्वों से निर्मित है-पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। जीवात्मा के समस्त संस्कार, वासनाएँ और वृत्तियाँ इस सूक्ष्म शरीर के साथ चली जाती हैं। सूक्ष्म शरीर फिर स्वर्ग की ओर चल देता है। जब शुभ कमों के फल समाप्त हो जाते हैं, तब यह अपने लिए नया शरीर तैयार करके पृथ्वीच पुनः जन्म लेता है।

 

जिनका आचरण अच्छा रहा है, वे उच्च योनियों में जन्म लेते हैं और जिसका आचरण अच्छा नहीं रहता, वे पाप-योनियों अथवा निम्न कोटि की योनियों में कच लेते हैं।

 

देवयान और पितृयान

 

ध्यान और उपासना करने वाला व्यक्ति जब मृत्यु को प्राप्त होता है तो प्रथमत वह प्रकाश में जाता है, फिर वह प्रकाश से दिवस को, दिवस से शुक्ल पक्ष को, शुक्ल पक्ष से उत्तरायण के छह मास को, उत्तरायण से वर्ष को, वर्ष से सूर्य को, सूर्य से चन्द्रमा को तथा चन्द्रमा से विद्युत् को जाता है। विद्युत् के क्षेत्र में पहुँच कर वह ऐसे व्यक्ति से मिलता है जो मानव नहीं है। वह व्यक्ति उसे कार्यब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भ के पास ले जाता है। यह देवों का मार्ग अर्थात् देवयान है।

 

लोकहित के काम करने वाला तथा दान करने वाला व्यक्ति मृत्यूपरान्त प्रथमतः धूम्रलोक को जाता है, फिर वह धूम्रलोक से रात्रि को, रात्रि से कृष्ण पक्ष को, कृष्णण पक्ष से दक्षिणायन को और वहाँ से वह पितृलोक को जाता है। पितृलोक से बह आकाश को तथा आकाश से चन्द्रमा को जाता है। वहाँ वह पुण्य कर्मों के क्षीण होने तक रहता है। पुण्य कर्मों के क्षीण हो जाने पर वह फिर इसी मार्ग से इस पृथ्वी पर लौट आता है। पहले वह आकाश बनता है, फिर वायु, फिर धुआँ, फिर कोहरा, फिर मेध और तब वर्षा की बूँदों के रूप में पृथ्वी पर गिरता है। तब वह भोजन में प्रवेश करता है जिसे मनुष्य खाते हैं। अन्ततः वह उनकी सन्तान बन जाता है।

 

वह खनिज-जगत्, वनस्पति-जगत् और पशु-जगत् के विभिन्न अस्तित्वों को पार करता है अर्थात् जरायुज (जरायु से उत्पन्न) बनने से पूर्व वह उद्भिज (बीज से उत्पन्न), स्वेदज (स्वेद से उत्पन्न) और अण्डज (अण्डे से उत्पन्न) बनता है।

संसार के बन्धन को किस प्रकार तोड़ें

 

इस संसार-चक्र अथवा भव-चक्र अथवा जन्म-मृत्यु-चक्र में बाँधने वाली जंजीरें आपकी इच्छाएँ ही हैं। जब तक आप इस संसार के पदार्थों की इच्छा करते रहेंगे, तब तक आपको उन्हें प्राप्त करके भोगने के लिए इस संसार में आना ही पड़ेगा। किन्तु जब इन भौतिक पदार्थों के लिए आपकी कामना समाप्त हो जायेगी, तब बन्धन टूट जायेंगे और आप स्वतन्त्र हो जायेंगे। फिर आपको अन्य जन्म लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। आपको मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी।

 

आप इस संसार में भटकते हैं, क्योंकि आप अपने को परमात्मा से भिन्न समझते हैं। ध्यान और योग के द्वारा यदि आप अपने-आपको 'उसके साथ एक कर दें, तो आप अमरता और शाश्वत परमानन्द प्राप्त करेंगे। शाश्वत तत्त्व के ज्ञान द्वारा कर्म के बन्धन को काट कर अपनी अन्तरात्मा-जो अन्तर्यामी है-की परम शान्ति का अनुभव करें। आप जन्म और मृत्यु के चक्र से छूट जायेंगे। पापों और दुर्वासनाओं से मुक्त हो कर आप जीवन्मुक्त बन जायेंगे। आप सभी जीवों में परमात्मा का दर्शन करेंगे तथा 'उसे' सभी जीवों के रूप में देखेंगे।

अवतार की अवधारणा

 

मनुष्य के आरोहण के लिए परमात्मा का पृथ्वी पर अवरोहण अवतार कहलाता है। गीता में भगवान् कृष्ण कहते हैं- "यद्यपि मैं अजन्मा अविनाशीस्वरूप तथा सब भूत-प्राणियों का ईश्वर हूँ, तदपि मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके योगमाया से प्रकट होता हूँ। जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को प्रकट करता हूँ। मैं साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए और दूषित कर्म करने वालों का नाश करने के लिए तथा धर्म-स्थापना के लिए युग-युग में प्रकट होता हूँ" (/, और )

 

ईश-कृपा का सिद्धान्त

 

भागवतों के अपने निजी शास्त्र हैं। इन्हें पांचरात्र आगम कहते हैं। इनमें वासुदेव-मत को प्रतिपादित किया गया है-इसलिए वे उपनिषदों के समकक्ष समझे जाते हैं। इनके द्वारा प्रतिपादित धर्म पथभ्रष्ट मानवता के लिए उपलब्ध ईश-कृपा पर आधारित है। इसलिए इस धर्म में अवतार के सिद्धान्त पर अधिक बल दिया गया है और उन अमर कथाओं का प्रचार किया गया है जो बाद में विष्णुपुराण, हरिवंशपुराण और भागवतपुराण में संकलित की गयीं। इन ग्रन्थों को पढ़ने से आपको भगवान् कृष्ण की महिमा का स्पष्ट ज्ञान होगा।

 

भगवान् कृष्ण, राम आदि अवतारों की उपासना द्वारा आपको आत्मसाक्षात्कार हो सकता है। बहुतों ने पहले से ही आत्मासाक्षात्कार प्राप्त कर लिया। तुकाराम, रामदास, सूरदास, मीराबाई, तुलसीदास आदि ने परमात्मा का आमने-सामने दर्शन किया है। उनकी सशक्त रचनाओं से उनकी उच्च आध्यात्मिक उपलब्धियों का परिवा प्राप्त होता है।

 

ईश्वर-अभिव्यक्ति की श्रेणियाँ

 

पूर्णावतार, अंशावतार और आवेशावतार-ये अवतारों के प्रकार हैं। भगवान् कृष्ण की कलाओं की संख्या १६ है। वे पूर्णावतार हैं। उन्होंने मानवीय प्राणी के समान जन्म लिया और मृत्यु को प्राप्त हुए। वे प्रकट हुए और अन्तर्धान हो गये। वे अब भी हैं। उनकी नित्य-लीलाएँ गोलोक (अर्थात् दिव्य वृन्दावन) में हुआ करती हैं। अवतारों के शरीर दिव्य अर्थात् अप्राकृत होते हैं। उनके शरीर मानवीय हाड़-मांस से नहीं बने होते।

 

केवल अज्ञानी तथा भ्रमित आत्माएँ अवतार-सिद्धान्त का विरोध करती हैं और यह मानती है कि भगवान् कृष्ण मात्र मनुष्य थे। उन्होंने पवित्र धर्मग्रन्थों का भी प्रकार अध्ययन नहीं किया है। वे अल्प बुद्धि के तामसी लोग हैं। वे छिद्रान्वेषण करने में ही रुचि रखते हैं। भगवान् कृष्ण कहते हैं- "दुष्कर्मों में रत भ्रमित तथा दुष्ट मनुष्य मुझे प्राप्त नहीं होते। माया उनकी बुद्धि को नष्ट कर देती है। वे दानवी स्वभाव के हो जाते हैं। ऐसा उनका भाग्य होता है।"

 

बन्धुओ ! आप सम्पूर्ण हृदय तथा मन से राम या कृष्ण की उपासना करें। उन्हें अपने हृदय में प्रतिष्ठित करें। वह शीघ्र ही आपको दर्शन देंगे और आप उनकी उपस्थिति को अनुभव करेंगे। आप अमरता और शाश्वत परमानन्द प्राप्त करेंगे। अवतारों की जय हो! भगवान् विष्णु के अवतारों भगवान् राम और भगवान् कृष्ण की जय हो! उनका अनुग्रह आप सब पर रहे!

 

 

 

 

 

 

 

 

षष्ठ अध्याय

हिन्दू-कर्मकाण्ड

सन्ध्योपासना

 

सन्ध्योपासना का शाब्दिक अर्थ है-दो बेलाओं के सन्धि-काल में उपासना। यह रात्रि तथा दिवस, पूर्वाह्न तथा अपराह्न एवं सन्ध्या तथा रात्रि के सन्धि-कालों में की जाने वाली प्रभु की प्रार्थना तथा उपासना है। सूर्य को अर्घ्य देना एवं गायत्री-मन्त्र का जप तथा उपासना करना इसके मूलभूत अंग हैं। वस्तुतः उपर्युक्त बेलाओं में की गयी प्रत्येक सन्ध्योपासना उपासक की दिनचर्या की अवधि में किये पापों के लिए, क्षमा एवं ज्ञान तथा दैवी कृपा की सम्प्राप्ति के लिए भगवान् से की गयी प्रार्थना है।

 

समुचित सन्धि-काल में सन्ध्योपासना करने से ही अधिक लाभ होता है। सन्धि-काल में शक्ति का विशेष स्फुरण होता है। सन्ध्या-काल की समाप्ति के पश्चात् यह शक्ति लुप्त हो जाती है।

 

एक अनिवार्य कर्तव्य

 

जिस हिन्दू का यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न हो चुका है, उसके लिए सन्ध्योपासना एक दैनिक धार्मिक कृत्य है। यह एक नित्य कर्म है। सन्ध्योपासना एक अनिवार्य कर्तव्य है जिसे आत्म-शुद्धि तथा आत्मोन्नति के लिए प्रतिदिन करना चाहिए।

 

सनातन धर्म के सभी अनुयायियों को सन्ध्योपासना करनी चाहिए। प्रत्येक ब्रह्मचारी तथा प्रत्येक गृहस्थ का यह दैनिक कर्तव्य है। यदि वह ऐसा नहीं करता, तो वह प्रत्यवाय-दोष का भागी होता है और उसका ब्रह्म-तेज नष्ट हो जाता है।

 

हिन्दू-शास्त्रों में कहा गया है कि जो भी ब्राह्मण, जो भी क्षत्रिय या जो भी वैश्य प्रतिदिन त्रिकाल सन्ध्योपासना नहीं करता, वह नरकगामी होता है। याज्ञवल्क्यस्मृति में केवल सन्ध्योपासना के प्रयोजन के लिए ही यज्ञोपवीत-संस्कार का विधान निर्धारित किया गया है। इस विधान के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य द्वारा यज्ञोपवीत धारण करने की आयु क्रमशः आठ, ग्यारह तथा बारह वर्ष की है; क्योंकि इस संस्कार-विशेष के पश्चात् ही उन्हें सन्ध्या तथा वैदिक अनुष्ठानों का पात्र समझा जाता है। उन्हें बाह्याभ्यन्तर रूप से स्वयं को शुद्ध रखना चाहिए। तभी वे दैवी विज्ञान की पावन महिमा से सुपरिचित हो सकते हैं।

 

सन्ध्योपासना के लाभ

 

जप, उपासना, स्वाध्याय, ध्यान, धारणा, आसन, प्राणायाम आदि का संयुक्त रूप सन्ध्या है। जो नित्य-प्रति सन्ध्या करता है, उसका मुखमण्डल ब्रह्म-तेज से उद्दीप्त रहता है, जो व्यक्ति निर्धारित विधि से शास्त्र-सम्मत समय पर नित्य-प्रति घ्यार करता है, वह विशुद्ध हो जाता है और उसका प्रत्येक प्रयत्न सफल होता है। उसे शक्ति तथा शान्ति की सम्प्राप्ति होती है। नियमित सन्ध्या पूर्व-संचित संस्कारों के पाश को विच्छिन्न कर प्रत्येक व्यक्ति की पुरातन परिस्थिति को पूर्णतः परिवर्तित कर देती है। इससे शुचिता, आत्मभाव, भक्ति एवं निष्कपटता का उदय होता है।

अनुष्ठान-विधि

 

आचमन, मार्जन, अघमर्षण, सूर्य-अर्घ्य, प्राणायाम, गायत्री मन्त्र का मौन जप एवं उपस्थान इस अनुष्ठान के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। आचमन में 'अच्युताय नमः', 'अनन्ताय नमः', 'गोविन्दाय नमः' इत्यादि मन्त्रों से अभिषिक्त जल का अधर से स्पर्श कराया जाता है और मार्जन में शरीर तथा मन की शुद्धि के लिए शरीर पर जल छिड़का जाता है। सूर्य-अर्घ्य में सूर्य देवता तो जल अर्पित किया जाता है और प्राणायाम के द्वारा श्वास-प्रश्वास को नियन्त्रित कर चंचल मन को स्थिर किया जाता है।

 

अर्घ्य

 

अर्घ्य तक के प्रथम चरण में जल को सम्बोधित स्तोत्र तथा उससे प्राप्त लाभों का उल्लेख है। मुख तथा शिर पर जल छिड़क कर भीगी उँगलियों से मुख, नासिका, कर्ण, वक्ष, स्कन्ध, शिर आदि विभिन्न अंगों के स्पर्श का प्रयोजन उक्त अंगों का पवित्रीकरण तथा इनके अधिष्ठातृदेवों का आवाहन है। इससे स्नायुकेन्द्र उद्दीप्त तथा सुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं।

 

अर्घ्य उन दैत्यों को दूर भगाता है जो उगते हुए सूर्य का मार्ग अवरुद्ध करते हैं। इसका निहितार्थ यह है कि काम, क्रोध तथा लोभ वे दैत्य है जो बुद्धि के विकास में बाधा उपस्थित करते हैं। बुद्धि ही सूर्य है।

 

प्राणायाम तथा जप

 

सन्ध्या का द्वितीय चरण प्राणायाम तथा गायत्री जप है।

 

 

 

सूर्योपस्थान

 

सूर्योपस्थान सन्ध्या का तृतीय चरण है। यह क्षमा, दया तथा भगवत्कृपा के निमित्त की जाने वाली प्रार्थना है। इस प्रार्थना में कहा गया है-"मुझे भूलोक में स्खलित मत होने दो। हे प्रभु, मुझ पर कृपा करो। मेरी शक्ति अत्यन्त क्षीण थी। हे भगवन्! मैंने कुकृत्य किये हैं। हे प्रभु, मुझ पर दया करो।" यह प्रातः, मध्याह्न तथा सान्ध्य प्रहर में सूर्यदेव को सम्बोधित-निवेदित वेद की ऋचाएँ हैं। सूर्य मनुष्य की बुद्धि है तथा अज्ञान अन्धकार है। ज्ञान प्रकाश है। जब आप अज्ञान के अन्धकार से मुक्त हो जाते हैं और जब वेद माता गायत्री की कृपा से आपकी अन्तःप्रज्ञा के चक्षु खुल जाते हैं, तब आपको शाश्वत आनन्द, चरम शान्ति तथा अमरत्व की सम्प्राप्ति हो जाती है। यह वह दिव्य प्रकाश है जो अज्ञान के अन्धकार तथा विक्षेप को नष्ट कर देता है; यह वह वन्दनीय दीप्ति है जिससे यह समस्त संसार ज्योतित है; यह वह पावन प्रकाश है जिसकी कृपा से भक्त का हृदय शाश्वत आनन्द से पूर्ण हो उठता है और यह वह सर्वोच्च ज्योति है जिसे साधक गायत्री मन्त्र के माध्यम से ईश्वर से प्राप्त करना चाहता है। वह ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे ज्ञान प्रदान करे जिससे उसे आत्मसाक्षात्कार हो।

 

सन्ध्योपासना-एक सम्यक् विज्ञान

 

सत्य का साक्षात्कार मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा है। वह सृष्टि के रहस्य से परिचित होना चाहता है। इस सम्बन्ध में शास्त्रों की सुस्पष्ट उद्घोषणा है- "जब अज्ञान का नाश हो जाता है, जब पाखण्ड तथा मिथ्याचार विच्छिन्न हो जाते हैं और जब मनुष्य को उसकी हृदय-गुहा में परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है, तभी उसके सम्मुख यथार्थ एवं अन्तिम सत्य अनावृत होता है।"

 

सत्य के राज्य में सफलता-प्राप्ति के लिए सन्ध्या-विज्ञान एक सम्यक् विज्ञान है। इस दैवी विज्ञान के अध्ययन में किसी को अपने मन में किसी प्रकार के अन्धविश्वास को स्थान नहीं देना चाहिए। किसी को इसकी महत्ता को सिद्ध करने की भी आवश्यकता नहीं है। इसकी महत्ता एवं महिमा एक ज्वलन्त सत्य है। आज का भौतिकवादी समाज भी सन्ध्या-विज्ञान में निहित सत्य के प्रति अपनी सहमति व्यक्त करता है। शास्त्रों में आया है- "ब्राह्मी-स्थिति वृक्ष, सन्ध्या इस वृक्ष का मूल, वेद इसकी शाखाएँ और धार्मिक कृत्य इसके पत्र हैं। अतः मूल अर्थात् सन्ध्या पर ही अधिक ध्यान देना चाहिए।" अब सन्ध्या की महिमा सर्वथा स्पष्ट हो गयी। सत्य-मार्ग के पथिक के लिए सन्ध्या नितान्त आवश्यक है। शास्त्रों के समादेश के अनुसार ब्राह्मण को किसी भी मूल्य पर नियमित रूप से प्रतिदिन सन्ध्या करनी चाहिए। शास्त्रों में कहा भी है-"अहरहः सन्ध्यामुपासीत।"

 

 

 

सन्ध्या के अभ्यास की पूर्वापेक्षाएँ

 

आहार

 

यदि आप इस विज्ञान में प्रशिक्षित होना चाहते हैं, तो आपको अपने भोजन के सम्बन्ध में अत्यधिक सावधान रहना चाहिए। भोजन नियमित और सात्त्विक होना चाहिए। भोजन का मनुष्य पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। आप एक छोटे शेर तथा बड़े हाथी के बीच के अन्तर को देखिए। समायोजित भोजन से आपका सम्यक् विकास होगा। विभिन्न प्रकार के गरिष्ठ भोजन से आलस्य उत्पन्न होता है। अतः आप अपने दैनिक भोजन-सम्बन्धी नियमों का कठोरतापूर्वक पालन कीजिए। आपकी शक्ति एवं सक्रियता सर्वदा अक्षुण्ण रहेगी।

 

आसन (बैठने की मुद्रा)

 

जो व्यक्ति सन्ध्या करता है, वह आसन पर ध्यान नहीं देता। वह किसी भी मुद्रा में बैठ जाता है। यह अधिक लाभप्रद नहीं होता। उसे प्रतिदिन एक निश्चित दिशा की ओर उन्मुख हो कर किसी सम्यक् आसन (पद्मासन या सुखासन) में बैठना चाहिए। जहाँ तक हो सके, उसे एक ही बैठक में (अपने बैठने की मुद्रा को परिवर्तित किये बिना) अपनी सन्ध्योपासना समाप्त कर लेनी चाहिए। उसे आसन के सम्बन्ध में पूर्ण रूप से दक्ष होना चाहिए, तभी वह सन्ध्योपासना करते समय अपने मन को एकाग्र कर सकेगा।

 

आस्था तथा भक्ति

 

आपको आस्था तथा भक्ति के साथ सन्ध्या करनी चाहिए। मन्त्र की आवृत्ति मात्र से विशेष लाभ नहीं होता। अपने पापों की क्षमा के लिए प्रभु से अन्तर्मन से प्रार्थना कीजिए।

 

युवा पीढ़ी से एक अनुरोध

 

कुसंस्कारों, भ्रान्तिपूर्ण शिक्षा-प्रणाली तथा कुसंग से ग्रस्त युवा छात्र सन्ध्या की महिमा तथा इसकी गहन प्रभावोत्पादकता को विस्मृत कर बैठे हैं। वे सन्ध्या नहीं करते। यह उनके लिए अर्थहीन हो चुकी है। वे नास्तिक हो गये हैं। वे सन्ध्या करने से पूर्व प्रयोगशाला में इसका परीक्षण तथा इसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में विज्ञान-सम्मत प्रमाण चाहते हैं। उनके विचारानुसार पाश्चात्य वैज्ञानिकों द्वारा इसकी पुष्टि अनिवार्य है। प्राचीन ऋषियों के कथन का उन पर कोई प्रभाव नहीं है। स्थिति कितनी पतनोन्मुखी है!

 

युवा छात्रो ! सन्ध्या की अवमानना कर स्वयं को विनष्ट मत कीजिए। सन्ध्या के दैनिक अनुष्ठान से आपका जीवन सफल होगा। इससे आपको भौतिक तथा आध्यात्मिक समृद्धि, सुस्वास्थ्य, दीर्घ जीवन एवं आन्तरिक शुद्धता की सम्प्राप्ति होगी। इसके अतिरिक्त सन्ध्या आपके लिए ईश्वर-साक्षात्कार में भी सहायक सिद्ध होगी। अब से ही सही, इसका अनुष्ठान प्रारम्भ कर दीजिए। आप इसी क्षण उद्विमताओं एवं कठिनाइयों के बीच भी नियमित रूप से नित्यप्रति सन्ध्या करने का संकल्प कीजिए। विलम्ब मत कीजिए और अपने निरर्थक कार्यकलापों को कम कर दीजिए। वार्तालाप तथा मेल-जोल कम कीजिए। आपको सन्ध्या के लिए पर्याप्त समय मिल जायेगा।

 

सन्ध्या-सम्बन्धी अनुशासन का दृढ़तापूर्वक पालन कीजिए। वर्षा हो या झंझावात, यहाँ तक कि यदि प्रलय होने लगे, तो भी सन्ध्या को अधूरी मत छोड़िए। बहुत लोग कहते हैं कि सन्ध्या के लिए उन्हें समय नहीं मिल पाता है; क्योंकि उन्हें अन्य अनेक कार्यों में व्यस्त रहना पड़ता है, किन्तु इसका कारण उनकी दुर्बलता एवं उत्तम संस्कारों का अभाव ही है। वे इस दैवी विज्ञान की महिमा को नहीं समझ पाते। यदि वे अपने किसी मित्र को नदी के तट पर सन्ध्या की मुद्रा में बैठे देख लेते हैं, तो चिल्लाना या कोई आपत्तिजनक कार्य करना प्रारम्भ कर देते हैं। उन अभागों को इस बात का ज्ञान नहीं रहता कि सन्ध्या के मूल में कौन-सा गूढ़ तत्त्व निहित है। इस पवित्र अनुष्ठान में रहस्यों-का-रहस्य निहित है। इसी कारण प्राचीनकालीन ऋषि कहते थे - "जो व्यक्ति प्रतिदिन सन्ध्योपासना नहीं करता, वह वास्तव में पशु है।"

 

परमात्मा आपको किसी भी मूल्य पर प्रतिदिन सन्ध्या करने की बुद्धि प्रदान करे! आप सन्ध्या-सम्बन्धी नियमों का पालन करें। आप समस्त क्लेशों से मुक्त हों और पवित्र सन्ध्या-विज्ञान आपको विशुद्धता, अपरिमित आनन्द तथा अपरत्व प्रदान करे!

दश शास्त्रोक्त संस्कार

 

मनुष्य के जीवन के विभिन्न चरणों के अनुरूप किये जाने वाले शास्त्र-विहित विशिष्ट कर्मों को संस्कार कहते हैं। मनुष्य के विशुद्धिकरण के लिए प्रयुक्त होने वाले ये शास्त्र-विहित कर्म हिन्दुओं के जीवन को पवित्र करते हैं। ये जन्म से ले कर मृत्युपर्यन्त व्यक्ति के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं को एक आध्यात्मिक गरिमा प्रदान करते हैं। ये मानव-जीवन की महत्त्वपूर्ण अवस्थाओं के विशेषक प्रतीक हैं। जिस प्रकार किसी चित्र की बहिरेखाओं को विभिन्न रंगों से अनुरंजित कर दिया जाता है, उसी प्रकार ब्रह्मण्य भी शास्त्रोक्त संस्कारों से तेजोमय हो उठता है। शैशवावस्था, बाल्यावस्था, युवावस्था एवं मृत्यु से सम्बन्धित पृथक् पृथक् संस्कार होते हैं।

 

संस्कारों की कुल संख्या बावन है, जिनमें दश संस्कार महत्त्वपूर्ण हैं। ये दश मुख्य तथा मान्यता-प्राप्त संस्कार हैं- गर्भाधान, पुंसवन, सीमान्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरण, उपनयन, समावर्तन और विवाह। इन संस्कारों में भी अब कुछ ही प्रचलित रह गये हैं। कुछ संस्कार मनुष्य की अबोधावस्था एवं प्रारम्भिक शैशवावस्था से सम्बद्ध हैं। कुछ संस्कार ऐसे धार्मिक अनुष्ठान हैं जिन्हें प्रतिदिन या विशिष्ट अवसरों पर सम्पन्न किया जाता है। इस प्रकार जन्म से मृत्यु तक हिन्दुओं का पूरा जीवन महिमान्वित एवं सुरक्षित रहता है।

 

गर्भाधान

 

गर्भाधान प्रजनन-क्रिया को पवित्रता प्रदान करता है। इसमें पति शिशु के जन्म के लिए ईश्वर से हार्दिक प्रार्थना करता है। वह ऋतु-शान्ति के अनुष्ठान या उत्सव के समय पवित्र मन्त्रों की आवृत्ति करता है और पत्नी इस मन्त्रपूत वातावरण में गर्भ धारण करती है। इससे भ्रूण के मस्तिष्क की कोशिकाओं में उत्तम संस्कार बन जाते हैं। शुद्ध बुद्धि एवं सम्यक् विवेक से सम्पन्न वास्तविक हिन्दू के लिए सम्भोग दैहिक सुख ही नहीं है। उस समय पुरुष अपनी दिव्य एवं रचनात्मक प्राणिक शक्ति का उपयोग एक मानव-शरीर के निर्माण के लिए कर रहा होता है। सम्भोग के समय पति-पत्नी को प्रफुल्ल-चित्त रहना चाहिए। अशान्ति, उद्विग्नता, क्रोध तथा घृणा की मनःस्थिति में उन्हें सम्भोग से विरत ही रहना चाहिए। उन्हें पवित्र शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए। यदि उनके मन में अर्जुन की प्रतिकृति उपस्थित होती है, तो उन्हें अभिमन्यु जैसे क्षात्रधर्मी एवं सुविज्ञ पुत्र की प्राप्ति होती है। यदि उनके मन में भगवान् बुद्ध का चित्र प्रतिबिम्बित होता है, तो करुणा आदि सद्गुणों से सम्पन्न पुत्र की प्राप्ति होती है। यदि उनके मन में धन्वन्तरि की प्रतिकृति उपस्थित होती है, तो उन्हें प्राप्त पुत्र विख्यात आयुर्वेदाचार्य होता है। इसी प्रकार यदि उनकी मानसिकता का केन्द्र-बिन्दु सूर्यदेव होते हैं, तो उन्हें महिमा-मण्डित एवं दीप्तिमान् पुत्र की प्राप्ति होती है।

 

पुंसवन

 

तृतीय मास में पुंसवन-संस्कार होता है। इसके लिए कुछ मन्त्रों का विधान है। इस समय शिशु के अन्नमय-कोष तथा प्राणमय-कोष का निर्माण होता है।

 

सीमान्तोन्नयन

 

सीमान्तोन्नयन-संस्कार सप्तम मास में वेद-मन्त्रों के पाठ के साथ किया जाता है। यह अशुभ एवं अनिष्टकर शक्तियों के दुष्प्रभावों से माता की रक्षा करता है तथा गर्भस्थ शिशु को स्वास्थ्य प्रदान करता है। इससे शिशु के शरीर का सम्यक् विकास होता है। मन्त्रों के पाठ से निःसृत समस्वरतापूर्ण स्पन्दनों तथा इस संस्कार से सम्बन्धित अनुष्ठान के परिणामस्वरूप शिशु के शरीर का संगठन इस विधि से होता है कि वह सौन्दर्यमण्डित हो उठता है।

 

 

 

जातकर्म

 

शिशु के जन्मग्रहण के पश्चात् तत्क्षण ही जो संस्कार होता है, उसे जातकर्म कहते हैं। वह उसकी दीर्घायु, बुद्धि तथा कुशलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है और उसे शहद तथा मक्खन खिलाता है।

 

नामकरण

 

नामकरण-संस्कार (शिशु को नाम दिया जाना) मन्त्र-पाठ के साथ दशवें, ग्यारहवें या बारहवें दिन सम्पन्न होता है।

अन्नप्राशन

 

यह संस्कार छठे मास में सम्पन्न किया जाता है। इसमें शिशु को पहली बार ठोस भोज्य पदार्थ दिये जाते हैं। इस अवसर पर मन्त्र-पाठ होता है और विभिन्न देवों को नैवेद्य अर्पित किये जाते हैं।

 

चूड़ाकरण

 

चूड़ाकरण या मुण्डन-संस्कार प्रथम या तृतीय वर्ष में किया जाता है। कर्ण-वैध का अनुष्ठान प्रथम या सप्तम वर्ष में या प्रथम वर्ष की समाप्ति के पश्चात् या चूड़ाकरण-संस्कार के साथ ही सम्पन्न होता है। इन अनुष्ठानों से शिशु का शरीर सन्तुलित रहता है और वीर्य तथा भ्रूण की विकृति के कारण उत्पन्न किसी भी पैतृक दोष का निराकरण हो जाता है। विद्यारम्भ भी एक संस्कार है जिसमें बालक को अक्षर-ज्ञान कराया जाता है। इसे अक्षराभ्यास भी कहते हैं। इन संस्कारों का सम्बन्ध जीवन की बाल्यावस्था से है।

 

उपनयन

 

जीवन की द्वितीय अवस्था अर्थात् युवावस्था से सम्बन्धित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान है-उपनयन-संस्कार। यह बालक का द्वितीय जन्म है जिसे आध्यात्मिक जीवन भी कहते हैं। उपनयन का अर्थ है-समीप ले जाना। इस अवसर पर बालक को गुरु के समीप उपस्थित किया जाता है। आचार्य उसे यज्ञोपवीत पहनाता है और गायत्री मन्त्र द्वारा दीक्षित कर उसे एक दण्ड प्रदान करता है। वह ब्रह्मचर्याश्रम का प्रारम्भ है जिसमें ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण रूप से पालन किया जाता है। यहाँ से उसके अध्ययन-काल का प्रारम्भ होता है। इस दीक्षा के माध्यम से वह द्विज हो जाता है अर्थात् वह द्वितीय जन्म ग्रहण करता है। बालक का जन्म माता-पिता की पारस्परिक इच्छा से होता है। यह उसका भौतिक जन्म है। गायत्री मन्त्र में दीक्षित होने के पश्चात् उसका एक अन्य जन्म होता है और यही होता है उसका यथार्थ जन्म। याज्ञवल्क्य के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य का उपनयन संस्कार क्रमशः आठ, ग्यारह तथा बारह वर्ष की आयु में होता है। मनु के अनुसार यह आयु ब्राह्मण के लिए पाँच वर्ष, क्षत्रिय के लिए छह वर्ष तथा वैश्य के लिए आठ वर्ष है।

 

यज्ञोपवीत एवं अन्य प्रतीकों का महत्त्व

 

यज्ञोपवीत में एक-दूसरे से गुँथे हुए तीन धागे होते हैं। यज्ञोपवीतधारी को विचार, वाणी तथा शरीर अर्थात् मन-वचन-कर्म पर त्रिविध नियन्त्रण रखना चाहिए। यज्ञोपवीत विश्व में स्थित विभिन्न त्रिपुटियों जैसे सत्-चित्-आनन्द, सृष्टि-स्थिति-प्रलय, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति (तीन अवस्थाएँ), सत्त्व-रजस्-तमस् (त्रिगुण) तथा ब्रह्मा-विष्णु-महेश (त्रिमूर्ति) आदि का संकेतक है।

 

दण्ड का यह निहितार्थ है कि विद्यार्थी को अपने मन, वचन और कर्म को नियन्त्रण में रखना चाहिए। जिसका इन तीनों पर नियन्त्रण है तथा जो मन, वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है, वह पूर्णता को प्राप्त होता है।

 

बालक एक कौपीन, एक छोटा पीत वस्त्र और कटि में मूँज निर्मित एक मेखला धारण करता है। आचार्य उस पर मृगचर्म रख देता है। उसका नवीन पीत वन नवीन देह का एवं पीत वर्ण आध्यात्मिकता का प्रतीक है। कौपीन-धारण इस तथ्य की और संकेत करता है कि बालक को पूर्ण ब्रह्मचर्य का विशुद्ध जीवन व्यतीत करना चाहिए। मेखला की लपेट त्रिविध होती है। इसका तात्पर्य यह है कि बालक के लिए संहिता, ब्राह्मण तथा उपनिषदों का अध्ययन आवश्यक है। मृगचर्म तपस्वी जीवन का संकेतक है-ऐसा ही जीवन उसे व्यतीत करना चाहिए।

 

समावर्तन

 

विद्यार्थी-जीवन की समाप्ति के पश्चात् जो संस्कार सम्पादित किया जाता है। उसे समावर्तन कहते हैं। विद्यार्थी वेदाध्ययन तथा व्रतों की समाप्ति के पश्चात् आचार्य को कुछ भेंट देता और औपचारिक स्नान की अनुमति प्राप्त करता है। यह स्नान उसके विद्यार्थी-जीवन के परिसमापन का प्रतीक है। घर लौटने पर उसका समावर्तन-संस्कार होता है। इस प्रकार अब वह विवाह कर जीवन की द्वितीय अवस्था अर्थात् गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए स्वयं को तत्पर पाता है।

 

विवाह

 

विवाह द्वारा मनुष्य का प्रवेश जीवन के द्वितीय आश्रम में होता है। यहीं से गृहस्थ-जीवन का प्रारम्भ होता है। वह मनुष्य के विहित कर्तव्यों का पालन करते हुए यज्ञ, स्वाध्याय तथा सन्तानोत्पत्ति द्वारा स्वयं को विभिन्न ऋणों से मुक्त करता है। वह (पति) वधू से कहता है- "मैं सौभाग्य के लिए पाणिग्रहण करता हूँ।" वे अपने हाथ में एक-दूसरे का हाथ ले कर पवित्र अग्नि की परिक्रमा करते हैं। नव-वधू अग्नि को धान्य की हवि प्रदान करते हुए यह प्रार्थना करती है- "मेरा पति दीर्घजीवी हो; मेरे कुटुम्ब की अभिवृद्धि हो।"

 

जीवन की अन्तिम दो अवस्थाएँ (आश्रम)

 

वानप्रस्थ एवं संन्यास, दो अन्य अवस्थाएँ हैं जिनके पृथक् पृथक् अनुष्ठान हैं। मनुष्य समस्त सांसारिक कर्मों का परित्याग कर वन में चला जाता है जहाँ वह स्वयं को संन्यास ग्रहण करने के लिए तैयार करता है। यह वानप्रस्थ का जीवन है।

 

संन्यासी संसार का परित्याग कर देता है और भिक्षा-वृत्ति ग्रहण कर स्वाध्याय तथा ध्यान का जीवन व्यतीत करता है।

 

प्रेतकर्म अन्त्येष्टि अर्थात् दाह-संस्कार को कहते हैं। यह उसके पुत्र तथा उत्तराधिकारी द्वारा सम्पन्न किया जाता है।

पंच-महायज्ञ

 

शास्त्रों में पंच-महायज्ञों का विधान है जिन्हें गृहस्थ को प्रतिदिन सम्पन्न करना चाहिए। प्रथम ब्रह्म-यज्ञ है जिसे वेद-यज्ञ भी कहते हैं। इसमें ब्रह्म, वेदों या ऋषियों को हवि या समिधा अर्पित की जाती है। देव-यज्ञ द्वितीय यज्ञ है। इसमें देवों को हवि या समिधा अर्पित की जाती है। पितृ-यज्ञ तृतीय यज्ञ है जिसमें पितरों को हवि या समिधा अर्पित की जाती है। चतुर्थ यज्ञ भूत-यज्ञ है जिसमें समस्त प्राणियों को बलि अर्पित की जाती है। पंचम यज्ञ अर्थात् मनुष्य-यज्ञ में उपर्युक्त पदार्थ मनुष्य को प्रदान किये जाते हैं।

 

इन पंच-महायज्ञों का सम्पादन मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में सहायक सिद्ध होता है। वह क्रमिक रूप से इस तथ्य से परिचित हो जाता है कि वह एक पृथक् इकाई हो कर इस विस्तृत ब्रह्माण्ड का एक अंग है। महान् ऋषियों द्वारा प्रणीत पवित्र शास्त्रों के अध्ययन से उसे ज्ञान प्राप्त होता है। मित्रों, सम्बन्धियों और साथियों से उसे सहायता प्राप्त होती है। उसका भौतिक शरीर उसके माता-पिता द्वारा प्रदत्त होता है। इस शरीर का पोषण गो-दुग्ध, शाकादि वनस्पतियों एवं फलों से होता है। पंच-महाभूत उसकी सहायता करते हैं। वह आक्सीजन एवं जल के अभाव में जीवित नहीं रह सकता। देव तथा पितर उसकी मंगल-कामना करते हैं। इस प्रकार प्रकृति का उस पर पंचविध ऋण होता है। अतः उसके लिए उक्त पंच-महायज्ञों के दैनिक सम्पादन द्वारा स्वयं को ऋण-मुक्त कर लेना अत्यावश्यक है। इसके अतिरिक्त चलते समय, सफाई-बुहारन करते समय, खेत में धान्य काटते समय, खाद्यान्न पीसते समय और पाक-कर्मादि करते समय मनुष्य से अचेतन रूप में अनेक कृमि-कीटों की हत्या होती रहती है। इन पापों के निराकरण का माध्यम ये यज्ञ ही हैं।

 

पंच-यज्ञ

 

ऋषियों, देवों, पितरों, भूतों एवं अतिथियों को गृहस्थों से सहायता की अपेक्षा रहती है। अतः गृहस्थों को पंच-यज्ञों को नित्यप्रति सम्पन्न करना चाहिए। धर्मग्रन्थों का अध्ययन-अध्यापन करना ब्रह्म-यज्ञ है। पितरों को तर्पण तथा जलार्पण एवं श्राद्ध करना पितृ-यज्ञ है। होम करना या अनि को आहुति प्रदान करना देव-यज्ञ है। बलि देना या सर्वभूतों को खाद्यान्नार्पण करना भूत-यज्ञ है। अतिथि-सत्कार करना मनुष्य-यज्ञ या अतिथि-यज्ञ है।

ब्रह्म-यज्ञ या ऋषि-यज्ञ

 

प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन शास्त्राध्ययन करना चाहिए। उसे अन्य लोगों के साथ ज्ञान का आदान-प्रदान करना चाहिए। इसे ब्रह्म-यज्ञ या ऋषि-यज्ञ कहते हैं। इसके अनुष्ठान से वह ऋषियों के ऋण से मुक्त हो जाता है।

देव-यज्ञ

 

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- "कल्प के आदि में प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ-सहित प्रजाओं को रच कर कहा कि इस यज्ञ के द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त होओ। यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित कामनाओं को देने वाला होवे और इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवगण लोग तुम लोगों की उन्नति करें। इस प्रकार आपस में (कर्तव्य समझ कर) उन्नति करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त होओगे। यज्ञ द्वारा बढ़ाये हुए देवता लोग तुम्हारे लिए (बिना माँगे ही) प्रिय भोगों को देंगे। उनके द्वारा दिये हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिये स्वयं ही भोगता है, वह निश्चय ही चोर है। इसका कारण यह है कि यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से छूट जाते हैं और जो पापी लोग अपने शरीर-पोषण के लिए ही पकाते हैं, वे पाप को ही खाते हैं" (अध्याय /१०, ११, १२ और १३) मनु कहते हैं-"मनुष्य को वेदाध्ययन तथा देव-अनुष्ठानों में सर्वदा संलग्न रहना चाहिए। वेदोक्त अनुष्ठानों से वह चल एवं अचल जगत् का आधार स्तम्भ बन जाता है।" ये यज्ञ जीवन-चक्र को दैवी इच्छा के अनुरूप प्रवर्तित करते हैं। इस प्रकार मनुष्य तथा संसार के विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।

 

पितृ-यज्ञ

 

पूर्वजों को नियमित रूप से तर्पण आदि अर्पित करना पितृ-यज्ञ है।

भूत-यज्ञ

 

गौ, श्वान, पक्षी, मत्स्यादि में भोजन-वितरण करने को भूत-यज्ञ कहते हैं।

 

मनुष्य-यज्ञ

 

निर्धनों को अन्न-दान करना मनुष्य-यज्ञ है। भूखों को भोजन, नंगों को वख, गृहविहीनों को शरण और दुःखी जनों को सुख देना इत्यादि कर्म मनुष्य-यज्ञ हैं। पीड़ित मानवता की किसी भी प्रकार की सेवा मनुष्य-यज्ञ है।

पंच-महायज्ञ के लाभ

 

प्रतिदिन दया तथा सहानुभूति से पूर्ण इन कार्यों को करने से मनुष्य के अन्तर में करुणा का विकास होता है। इससे घृणा नष्ट हो जाती है और मनुष्य का अहंकारपूर्ण हृदय क्रमशः कोमल होता जाता है। वह सार्विक प्रेम का धनी हो जाता है। उसका हृदय विस्तृत तथा जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है। स्वार्थ और अहम्मन्यता से उत्पन्न उसकी पृथकता की पुरानी भावना क्रमशः क्षीणतर होती हुई अन्ततः सर्वथा विनष्ट हो जाती है। उसे इस तथ्य का ज्ञान हो जाता है कि दूसरों को सुख दे करके, दूसरों की सेवा-सहायता करके, दूसरों के दुःखों को दूर करके और अपनी उपलब्धियों में दूसरों के भागीदार बना करके ही वह सुखी हो सकता है। नित्यप्रति किये जाने वाले पंच-महायज्ञों से उसे वरिष्ठ, समकक्ष तथा कनिष्ठ जनों से सम्यक् सम्बन्ध-स्थापन की शिक्षा मिलती है।

 

मनुष्य का कोई पृथक्, वैयक्तिक अस्तित्व नहीं होता। वह विश्व से सम्बद्ध है। वह माला में गूँथे एक दाने की भाँति है। उसका सारा जीवन यज्ञमय एवं कर्तव्यशील होना चाहिए। इसी विधि से मनुष्य का त्वरित विकास हो सकेगा, इसी विधि से उसे शाश्वत सत्ता के परमानन्द की अनुभूति हो सकेगी और इसी विधि से वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो कर अमरत्व प्राप्त कर सकेगा।

श्राद्ध और तर्पण

 

श्राद्ध जीव के भौतिक शरीर के परित्याग के पश्चात् उसकी शान्ति के लिए उसके सम्बन्धियों द्वारा किया जाने वाला संस्कार है। भौतिक कोष अर्थात् देह से मुक्त जीव को प्रेत कहते हैं। इस अवसर पर श्राद्ध के जिस अंश का सम्पादन किया जाता है, उसे प्रेत-क्रिया कहते हैं।

 

 

दिवंगत आत्मा को श्राद्ध तथा तर्पण से किस प्रकार लाभ पहुँचता है

 

पितरों के लाभार्थ सम्यक् समय तथा स्थान पर सुपात्र ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दान देने को श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध से पितरों को तुष्टि-लाभ होता है। पुत्र द्वारा श्राद्ध की सोलह आवृत्तियों के पश्चात् मृत पिता की आत्मा पितरों के सान्निध्य में सुखपूर्वक निवास करती है। अतः पुत्र को मृत पिता के लिए सपिण्डीकरण-अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए। श्राद्ध तथा तर्पण से पितृलोक की मृतात्मा की क्षुधा तथा पिपासा शान्त हो जाती है।

 

नरकगामी मृतात्माएँ क्षुधा-पिपासा से अत्यन्त पीड़ित रहती हैं। श्राद्ध-कर्म तथा चावल का पिण्ड-दान और तर्पण करके उन्हें कष्टमुक्त किया जाता है। अतः श्राद्ध-कर्म अनिवार्य है। जो मृतात्माएँ स्वर्ग में निवास करती हैं, उनको भी इससे तुष्टि, शक्ति तथा पोषण प्राप्त होता है।

 

श्राद्ध पितरों के सम्मान में किया जाने वाला एक अपरिहार्य अनुष्ठान है। इसे श्रद्धा, भक्ति तथा आदर के साथ सम्पन्न करना अत्यावश्यक है। जो पुत्र श्राद्ध तथा तर्पण नहीं करता, वह कृतघ्न पुत्र है। वह नरकगामी होता है। धर्मग्रन्थ उद्घोषित करते हैं-"जो श्राद्ध नहीं करता, उसका पुनर्जन्म निम्नतर योनियों में होता है। वह दुःखी तथा निर्धन जीवन व्यतीत करता है।"

 

दाह-संस्कार के लाभ

 

दाह-संस्कार मृतक की अन्त्येष्टि का सर्वोत्तम माध्यम है। यह मृतात्मा के लिए अत्यन्त लाभप्रद होता है। यदि मृतक का दाह-संस्कार नहीं होता, जो जीव पृथ्वी से ही सम्बद्ध रह जाता है। अपने भौतिक शरीर के प्रति मोह तथा आसक्ति के कारण वह उसके चतुर्दिक् मँडराता अथवा चक्कर लगाता रहता है और इस प्रकार स्वर्गलोक की उसकी दिव्य यात्रा में व्यवधान उपस्थित हो जाता है। मन्त्र के स्वरों के स्पन्दन, आहुतियाँ तथा तर्पण दिवंगत आत्मा को सुख तथा सान्त्वना प्रदान करते हैं।

 

सपिण्डीकरण-अनुष्ठान जीव के प्रेत-लोक से पितृ-लोक की ओर प्रस्थान करने में सहायक सिद्ध होता है। इस प्रकार वह पितृ-लोक में पहुँच कर पितरों में सम्मिलित हो जाता है। पुत्र पिता के शव की तीन बार प्रदक्षिणा करता है और 'तुम यहाँ से प्रस्थान करो' -इस मन्त्रोच्चारण के साथ उस पर एक बार जल छिड़कता है। दूसरे दिन अस्थियों को एकत्रित कर उन्हें किसी नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। जो लोग समर्थ हैं, वे वाराणसी या हरिद्वार जा कर गंगा में अस्थि-विसर्जन करते हैं।

 

ऐसा विश्वास किया जाता है कि जिस मृतक के देहावशेष को गंगा में प्रवाहित किया जाता है, उसे आध्यात्मिक प्रकाश से आप्लावित उच्चतर लोकों की प्राप्ति होती है और अन्ततः वह मुक्त हो जाता है।

 

पितरों के दो वर्ग

 

मृत्यु के पश्चात् तत्क्षण जीव अग्नि, वायु तथा आकाश से निर्मित अतिवाहिक नामक देह धारण कर लेता है। इसके पश्चात् भू-लोक में उसके द्वारा सम्पन्न घोर पापों तथा पुण्यकर्मों के अनुरूप उसे नारकीय दुःखोपभोग के लिए यातना-देह तथा स्वर्गिक सुखोपभोग के लिए दिव्य देह की प्राप्ति होती है। यातना-देह वायु-तत्त्व-प्रधान एवं दिव्य देह अग्नि-तत्त्व-प्रधान होती है। जीव को पितृ-लोक में पहुँचने में एक वर्ष लगता है।

 

पितरों के दो वर्ग होते हैं। प्रथम वर्ग के पितरों को दिव्य पितर कहते हैं। ये पितृ-लोक के अधिपति होते हैं। द्वितीय वर्ग के पितरों को मानव-पितर कहा जाता है जो पितृ-लोक में मरणोपरान्त पहुँचते हैं। ब्रह्मा सभी का पितामह है। आदि प्रजननकर्ता होने के कारण कश्यप तथा अन्य प्रजापति भी पितर हैं। पितृ-लोक भुवर्लोक के नाम से जाना जाता है।

 

पितर शब्द का अर्थ मुख्यतः निकटतम पूर्वज-जैसे माता-पिता आदि-होता है। सम्यक् श्राद्ध पितरों की तीन पीढ़ियों या समस्त पितरों के लिए किया जाता है। पिता, पितामह तथा प्रपितामह को तीन पिण्ड अर्पित किये जाते हैं और सर्वप्रथम दो ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। भोजन के आदान-प्रदान से सात पीढ़ियाँ पारस्परिक रूप से एक-दूसरे को प्रभावित कर सकती हैं।

पितृ-पक्ष और महालया अमावस्या

 

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितृ पक्ष की संज्ञा दी गयी है। इस मास का यह पक्ष दिवंगत पूर्वजों को पिण्ड दान देने के लिए पवित्र एवं शास्त्र-सम्मत माना जाता है और जहाँ तक इस पक्ष के अन्तिम दिन का सम्बन्ध है, इसे अन्त्येष्टि जैसे संस्कारों के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समझा जाता है।

 

सामान्यतः आज भी परम्परावादी हिन्दू प्रत्येक अमावस्या को दिवंगतात्माओं के लिए अर्घ्य एवं तर्पण का अनुष्ठान किया करते हैं। शास्त्रानुमोदित अनुष्ठान भी मृत्यु-दिवस पर प्रत्येक वर्ष किये जाते हैं। इसे श्राद्ध कर्म कहा जाता है। इस स्थिति में इन अनुष्ठानों को विशेष रूप से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में ही सम्पन्न करने का क्या महत्त्व है? वस्तुतः उक्त पक्ष में सम्पन्न किये जाने वाले अनुष्ठानों का प्रभाव अत्यधिक विशिष्ट होता है। भगवान् यम के एक वरदान के कारण ये आहुतियाँ पितरों तक तत्काल एवं प्रत्यक्ष रूप से पहुँच जाती हैं। वरदान का यह प्रसंग निम्नांकित है :

 

 

 

पितृ-पक्ष का उद्गम

महाभारत से उधृत एक कथा

 

महाभारत का प्रख्यात नायक दानवीर कर्ण अपने भौतिक शरीर के परित्याग के पश्चात् उच्चतर लोकों में ऊर्ध्वगमन करता हुआ योद्धाओं के लोक में पहुँचा। वहाँ जीवितावस्था में किये गये उसके असाधारण दान के पुण्य के फलस्वरूप उसे उसके दान से सहस्रगुना अधिक स्वर्ण तथा रजत के बृहद् भण्डार मिले। कर्ण की दान-राशि असीम थी, किन्तु उससे अन्न-दान की उपेक्षा हो गयी थी। इसके परिणामस्वरूप उसके चतुर्दिक् स्वर्ण तथा रजत की राशि तो एकत्र हो गयी; किन्तु उसकी तुष्टि के लिए उसे अन्न नहीं प्राप्त हो सका। उसने इसके लिए यमराज से प्रार्थना की। इसके प्रत्युत्तर में यमराज ने अन्न-दान की पूर्व-उपेक्षा के परिमार्जन के लिए उसे एक बार पुनः चौदह दिनों के लिए भू-लोक में भेज दिया। कर्ण मृत्यु-लोक में जा कर ब्राह्मणों तथा निर्धनों को चौदह दिनों तक भोजन कराता रहा। इसके अतिरिक्त उसने अन्तिम दिन महालया को जल-तर्पण एवं अन्य विहित अनुष्ठान भी किये। इस पक्ष के अन्तर्गत उसने भू-लोक में जो अनुष्ठान किये थे, उनके फलस्वरूप उसके अभावों का निराकरण हो गया। यह आश्विन मास का कृष्ण पक्ष था।

 

यमराज की कृपा से तब से एक ऐसी व्यवस्था का प्रचलन हो गया, जिसके अनुसार इस पक्ष-विशेष में किये गये इन अनुष्ठानों से निम्नांकित विलक्षण फल प्राप्त होने लगे। इस अवधि में दिया गया पिण्ड-दान सभी दिवंगत आत्माओं को, चाहे वे पारिवारिक दृष्टिकोण से पिण्ड-दान करने वाले व्यक्ति के प्रत्यक्ष सम्बन्धी हों या हों, प्राप्त होने लगा। पितृ-पक्ष की अमावस्या को किया हुआ पिण्ड-दान निस्सन्तान व्यक्तियों की दिवंगत आत्माओं तक को प्राप्त होने लगा। जो लोग परोपकार तथा अन्न-दान के विरत रहते थे और इसके फलस्वरूप जिन्हें मरणोपरान्त पितृलोक में इन सुख-सुविधाओं से वंचित होना पड़ता था, वे भी इन अनुष्ठानों से लाभान्वित होने लगे। जिन लोगों की मरण-तिथि अज्ञात रहती है और जिन लोगों का वार्षिक श्राद्ध सम्पन्न नहीं हो पाता, उन्हें भी पितृ-पक्ष का पिण्ड-दान प्राप्त होता है। जिन व्यक्तियों की मृत्यु भयंकर दुर्घटनाओं के कारण या अस्वाभाविक रूप से होती है और जिसके फलस्वरूप जिनकी दिवंगत आत्माएँ सामान्य रूप से पिण्ड-दान नहीं ग्रहण कर पातीं, उनको भी पितृ-पक्ष का पिण्ड-दान प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होता है। जबसे महान् कर्ण ने आश्विन पक्ष का यह अनुष्ठान प्रारम्भ किया, तभी से यमराज के उक्त वरदान फलित होने लगे। हिन्दू आज भी इस पक्ष के अनुष्ठान को अत्यधिक श्रद्धा और कठोर नियम के साथ सम्पन्न करते हैं। इस अवधि में वे प्रतिदिन तीन बार स्नान तथा आंशिक उपवास करते हैं। सर्वपितृ अमावस्या को सारे अनुष्ठानों का सम्पादन होता है और प्रचुर मात्रा में दान दिया जाता है।

 

 

 

 

दिवंगत आत्माओं की तुष्टि

 

महालया अमावस्या का दिन सभी हिन्दुओं के लिए महान् अर्थवत्ता और महत्त्व का दिन है। इस वार्षिक उत्सव के अवसर पर पूर्वजों की दिवंगत आत्माओं की तुष्टि तथा शान्ति के लिए हार्दिक प्रार्थना की जाती है। हिन्दू-इतिहास के अनुसार महालया अमावस्या के दिन सूर्य तथा चन्द्रमा का परस्पर मिलन होता है और सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है। उस दिन पितर हमारे पूर्वज यम-लोक-स्थित अपने निवास-स्थान का परित्याग कर मृत्यु-लोक में उतर आते हैं और अपने वंशधरों के घरों में निवास करते हैं।

 

अमावस्या से पूर्व का पक्ष अर्थात् प्रतिपदा से अमावस्या तक का काल पितरों की तुष्टि के लिए किये जाने वाले पवित्र अनुष्ठानों के लिए विशेष रूप से निर्धारित किया गया है। इस कृष्ण पक्ष में पितरों अर्थात् दिवंगत आत्माओं के सम्मान में किये जाने वाले अनुष्ठान गया में किये जाने वाले अनुष्ठानों के समकक्ष ही होते हैं। इन समस्त अनुष्ठानों का प्रयोजन पितरों का पूजन एवं उनकी इच्छाओं की तृप्ति है, ताकि वे वर्ष की शेष अवधि में शान्तिपूर्वक रह सकें।

नवरात्र या नौ-दिवसीय देवी-पूजन

 

धार्मिक अनुष्ठान, पारम्परिक पूजन एवं व्रत समयानुसार एक से अधिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होते हैं। ईश्वर की आराधना होने के अतिरिक्त ये जीवन्त अतीत के स्मरणोत्सव तथा रहस्यवादी निर्वचन के अनुसार लक्षणात्मक होते हैं। इसके अतिरिक्त से आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर जीव के विशिष्ट पथ-प्रदर्शक प्रकाश स्तम्भ भी हैं।

 

बाह्यतः देवी या माँ का नौ दिवसीय पूजन, जिसे नवरात्र-पूजा कहा जाता है, विजयोत्सव के रूप में प्रचलित है। शुम्भ-निशुम्भ के नेतृत्व में दुर्जेय राक्षसों द्वारा घोषित युद्ध में महाकाली की विजय के उपलक्ष्य में यह नौ-दिवसीय पूजा-अर्चा उन्हीं महाकाली को समर्पित की जाती है। किन्तु अपनी साधना की अवधि में महामाया के विभिन्न रूपों के पूजन के लिए आध्यात्मिक साधक द्वारा किये गये नौ रात्रियों के तीन भागों में विभाजन के मूल में जो सत्य निहित है, वह भव्य होने के साथ-साथ पूर्णतया व्यावहारिक भी है। ब्रह्माण्डीय स्तर पर इसका महत्त्व यह है कि यह मनुष्य के ईश्वर से सायुज्य या जीवत्व से शिवत्व की ओर विकास के विभिन्न चरणों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है। जहाँ तक इसके वैयक्तिक अभिप्राय या महत्त्व का सम्बन्ध है, यह व्यक्ति की आध्यात्मिक साधना की अपेक्षित दिशा की ओर संकेत करता है।

 

मानवीय अस्तित्व का केन्द्रीय प्रयोजन सर्वोच्च सत्ता अर्थात् ब्रह्म से अपने शाश्वत तादात्म्य से परिचित होना तथा स्वयं को उस दिव्य सत्ता के अनुरूप विकसित करना है। सर्वोच्च सत्ता में आत्यन्तिक पूर्णता निहित है जो पूर्णतः विशुद्ध अर्थात् निरंजन है। उस सर्वोच्च सत्ता के साथ अपने सायुज्य से परिचित और उसके तद्रूप होना उस (सर्वोच्च) सत्ता के साथ निश्चित रूप से समस्वरता प्राप्त कर लेना है। अतः प्रारम्भ में साधक को उन असंख्य अशुद्धताओं तथा आसुरी तत्त्वों से मुक्त होना है जो उसके पार्थिव शरीर-धारण की अवस्था में उसके साथ चिपट गये हैं। इसके पश्चात् उसे उदात्त, शुभ एवं दिव्य गुण प्राप्त करने हैं। इस प्रकार उसके विशुद्ध हो जाने तथा सत्त्वगुण से सम्पन्न होने के पश्चात् वह ज्ञान की दीप्ति से उसी प्रकार उद्दीप्त हो उठता है जिस प्रकार किसी पूर्णतः शान्त सरोवर का पारदर्शी जल सूर्य की प्रोज्ज्वल किरणों से द्युतिमान् हो जाता है।

 

दुर्गा-पूजा पापों का निराकरण

 

साधना की इस प्रक्रिया में दृढ़ संकल्प, पूर्व-संकल्पित प्रयास तथा श्रमसाध्य संघर्ष की अपेक्षा है। दूसरे शब्दों में इसके लिए असीम शक्ति अपरिहार्य है। यह भगवती माँ (जो ब्रह्म की परा-शक्ति है) ही है जो साधक के माध्यम से क्रियाशील रहती है। प्रथम तीन दिनों तक माँ का पूजन विकराल शक्ति-रूपा दुर्गा के रूप में किया जाता है। आपमें जो कुछ भी अशुद्धता, पाप या दोष है, उसके निराकरण के लिए आप माँ दुर्गा से प्रार्थना करते हैं। यह साधक में विद्यमान पाशविक प्रवृत्ति एवं निम्नतर आसुरी प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष कर उसे नष्ट कर देती है। वह ऐसी महाशक्ति है जो आपकी साधना की उसमें उपस्थित होने वाली समस्त विघ्न-बाधाओं से रक्षा करती है। इस प्रकार प्रथम तीन दिनों का उपयोग बल अर्थात् काषाय की निवृत्ति तथा अनिष्टकर मानसिक वासनाओं के निराकरण के लिए किये जाने वाले संकल्पित प्रयास तथा संघर्ष के लिए होता है। यह नवरात्र का प्रथम चरण है जिसमें माँ के ध्वंसात्मक स्वरूप का पूजन होता है।

 

लक्ष्मी-पूजन सद्गुणों की सम्प्राप्ति

 

अशुद्ध वासनाओं, दुष्प्रवृत्तियों अर्थात् मनुष्य के निषेधात्मक पक्ष पर विजय-प्राप्ति के पश्चात् इनके स्थान पर रचनात्मक गुणों की सम्प्राप्ति के लिए है। इसके अन्तर्गत भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण द्वारा प्रोक्त दैवी सम्पदा अर्थात् दिव्य गुणों को प्राप्त करना पड़ता है। साधक के लिए यह अत्यावश्यक होता है कि वह इन समस्त सद्गुणों की प्राप्ति एवं इनके विकास के लिए प्रयास करता रहे। इस प्रयास में सफलता प्राप्त होने पर उसे दुर्लभ ज्ञानरत्न प्राप्त होता है। इस रत्न का मूल्य चुकाने के लिए उसे अपार आध्यात्मिक सम्पदा को एकत्र करना पड़ता है। विरोधी गुणों के विकास (प्रतिपक्ष भावना) के अभाव में आसुरी प्रकृति पुनः बलवती हो उठती है। अतः साधक की साधना के लिए यह द्वितीय चरण पूर्ववर्ती चरण की भाँति ही महत्त्वपूर्ण है। इन दोनों चरणों के बीच का मूलभूत अन्तर यह है कि जहाँ प्रथम चरण में अपने व्यक्तित्व के मलिन एवं अहम्मन्यतापूर्ण निम्नतर पक्ष का संकल्पित भाव से निष्ठुरतापूर्वक दमन करना पड़ता है वहाँ द्वितीय चरण में शुचिता के विकास के लिए सुसम्बद्ध तथा सन्तुलित प्रयास करने पड़ते हैं। साधक की साधना के इस रमणीयतर पक्ष का चित्रांकन माँ लक्ष्मी के पूजन में होता है। वह अपने भक्त को अक्षय सम्पत्ति अर्थात् दैवी सम्पदा प्रदान करती है। लक्ष्मी ब्रह्म का सम्पत्ति-प्रदायक स्वरूप है। वह स्वयं पवित्रता की प्रतिमूर्ति है। इस प्रकार इस दिव्य त्रि-दिवसीय द्वितीय चरण में लक्ष्मी-पूजन सम्पन्न किया जाता है।

 

सरस्वती-पूजन

सर्वोच्च ज्ञान का उदय

 

दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन तथा विशुद्ध, सात्त्विक एवं दिव्य गुणों के विकास में सफलता प्राप्त करने के पश्चात् साधक एक अधिकारी व्यक्ति हो जाता है। इस स्थिति में वह परा ज्ञान के प्रकाश की सम्प्राप्ति के लिए तत्पर हो जाता है। अब वह दिव्य ज्ञान की उपलब्धि के लिए स्वयं को सक्षम पाता है। इस चरण के अन्तर्गत देवी सरस्वती (जो दिव्य ज्ञान की साकार अभिव्यक्ति और ब्रह्मज्ञान का मूर्त रूप है) का श्रद्धापूर्ण पूजन किया जाता है। उसकी दिव्य वीणा से भव्य महावाक्य एवं प्रणव के उदात्त स्तर निःसृत होते हैं। वह अपने दिव्य नाद के ज्ञान-दान के पश्चात् अपने उज्वल एवं तुहिनवत् श्वेत वस्त्र के अनुरूप पूर्ण आत्म-ज्ञान प्रदान करती है। इस प्रकार ज्ञानदात्री देवी सरस्वती के तुष्टिकरण के साथ इस तृतीय चरण का समापन होता।

 

दशवाँ दिन अर्थात् विजयादशमी देवी सरस्वती की कृपा के ज्ञान के अवतरण द्वारा प्राप्त जीवन्मुक्ति के उपलक्ष्य में व्यक्त विजयोल्लास का द्योतक है। अब जीव (सच्विदानन्द के) विशुद्धतम आत्म-भाव में प्रतिष्ठित हो जाता है। यह दिन अपनी लक्ष्य-सिद्धि या विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। सुदूर आकाश में मानो विजयकेतु फहराने लगता है। इस अवसर पर साधक के कण्ठ से ये स्वर स्वतः फूट पड़ते हैं-"मैं 'वह' हूँ। मैं 'वह' हूँ; चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्, शिवोऽहम्; चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्, शिवोऽहम्।"

 

आध्यात्मिक सफलता को सुनिश्चित करने वाला एक संयोजन

 

साधक के आध्यात्मिक विकास में इस संयोजन की भी एक विशिष्ट अर्थवत्ता है। यह प्रत्येक साधक के विकास के अपरिहार्य चरणों का द्योतक है। इन चरणों से होते हुए आध्यात्मिक क्रम-विकास की यात्रा करना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है। हम एक सोपान के पश्चात् दूसरे सोपान पर आरूढ़ होते हैं; किन्तु यदि हम प्रथम सोपान के पश्चात् अपनी साधना की यात्रा को लघुपथित करने के लिए अगले सोपानों की उपेक्षा कर देते हैं, तो परिणाम निश्चित रूप से दुःखद होते हैं। आजकल अनेक अज्ञ साधक आत्म-शुद्धि तथा दैवी सम्पत् की सम्प्राप्ति जैसी प्रारम्भिक पूर्वापेक्षाओं की पूर्ति के बिना ही पूर्ण आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए आतुर हो उठते हैं। तत्पश्चात् यही लोग इस बात का उलाहना देते हैं कि साधना-पथ पर उनकी वांछित प्रगति नहीं हो रही है। उनकी यह प्रगति कैसे सम्भव हो सकती है? जब तक अशुद्धताओं का परिमार्जन एवं निष्कलुषता का विकास नहीं हो जाता, तब तक ज्ञान का अवतरण असम्भव है। अपवित्र भूमि पर सात्त्विकता के पौधे का विकास नहीं हो सकता।

 

इस संयोजन या व्यवस्था के अनुरूप आचरण करने से आपके प्रयास निश्चित रूप से सफल होंगे। यह आपका एकमात्र मार्ग है। मुक्ति के लिए इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी मार्ग का निर्धारण नहीं हुआ है। दुर्गुणों को नष्ट करके इनके स्थान पर स्वयं में इनके प्रतिपक्षी सद्गुणों को विकसित कीजिए। इस प्रक्रिया के माध्यम से आपको उस पूर्णत्व की उपलब्धि होगी, जिसके परिणामस्वरूप आप ब्रह्म से अभिन्न हो जायेंगे। आपके जीवन का परम उद्देश्य यही है। इन उपलब्धियों के फलस्वरूप आप समस्त ज्ञान-भण्डार के स्वामी हो जायेंगे। आप अपनी सर्वज्ञता तथा सर्वशक्तिमत्ता को अनुभव करने लगेंगे। आप सभी वस्तुओं एवं व्यक्तियों में स्वयं को ही पाने लगेंगे। आप जीवन्मुक्त हो जायेंगे। आप जन्म-मरण के चक्र तथा संसार-रूपी दानव पर विजय प्राप्त कर लेंगे। अब आप सांसारिक क्लेशों तथा जन्म-मरण से सर्वथा असम्पृक्त हो जायेंगे। विजयश्री आपका वरण करेगी।

 

दिव्य माता की जय हो! वह आपको क्रमिक रूप से आध्यात्मिक सोपान के उच्चतम शिखर पर प्रतिष्ठित करके परमात्मा से एकीकृत करे!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सप्तम अध्याय

हिन्दू-उपासना

उपासना

 

उपासना ईश्वर के प्रति भक्ति, श्रद्धा और प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह ईश्वर से सायुज्य की तीव्र लालसा और उससे हार्दिक तदाकारिता की आध्यात्मिक पिपासा की द्योतक है। भक्त भगवान् से उसके प्रति उत्कट भक्ति की सम्प्राप्ति तथा अज्ञानावरण के अपनयन के लिए प्रार्थना करता है। वह उसके सौम्य अनुग्रह के लिए लालायित रहता है। वह उसके निरन्तर नाम-स्मरण, उसके मन्त्रों के जप, उसके गुणगान तथा उसके कीर्तन में संलग्न रहता और उसकी लीलाओं का श्रवण तथा गायन करता है। वह उसके भक्तों की सुसंगति में उसके धाम में निवास करता है। वह उसके रूप, उसकी प्रकृति, उसके गुणों और उसकी लीलाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित किये रहता है। वह अपने नेत्रों को बन्द करके प्रभु के स्वरूप का मानस-दर्शन करता है तथा परम शान्ति और चरम आनन्द का उपभोग करता है।

 

उपासना ईश्वर की उपस्थिति में रहने अथवा उसके सान्निध्य में पहुँचने के लिए किया गया उपासक का प्रयास है। 'उपासना' का शाब्दिक अर्थ है-ईश्वर के निकटस्थ होना। शास्त्रों तथा गुरु द्वारा उपदिष्ट विधि से अपने अभीप्सित आदर्श या उपास्य देवता पर अपना ध्यान केन्द्रित करके उनकी ओर अग्रसर होने को उपासना कहा जाता है। एक पात्र से अन्य पात्र में तेल डालते समय गिरते हुए तेल में जो प्रत्ययैकतानता होती है, वही प्रत्ययैकतानता उपासक के विचार में भी होनी चाहिए। इसे तैलधारावत् होना चाहिए। इसमें वे सभी शारीरिक तथा मानसिक अनुपालन एवं अभ्यास सन्निहित हैं जिनके द्वारा जिज्ञासु आध्यात्मिकता के क्षेत्र में संयमित और सन्तुलित प्रगति करता है और अन्ततः उसे अपने हृदय में ईश्वरत्व की विद्यमानता की प्रतीति होने लगती है।

उपासना की उपलब्धियाँ

 

प्रभु की उपासना से उपासक को हृदय की शुद्धि, आध्यात्मिक स्पन्दनों की समस्वरता, मन की सुस्थिरता, संवेगों के परिमार्जन तथा परिष्कार, पंचकोषों के समुचित समायोजन और अन्ततः ईश्वर-साक्षात्कार या ब्रह्मात्मभाव की सम्प्राति होती है।

 

उपासना से भक्त ईश्वर के निकट हो जाता है। दूसरे शब्दों में उसे प्रभु से संलाप करने की क्षमता भी प्राप्त हो जाती है और उसका मन शुद्ध भाव तथा ईश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम से आप्लावित हो उठता है। यह मनुष्य को शनैः शनैः दिव्य रूप में रूपान्तरित कर देती है।

 

उपासना से मनस्तत्त्व में परिवर्तन और रजस् तथा तमस् का निराकरण हो जाता है। फलस्वरूप, मन सात्त्विकता से ओत-प्रोत हो जाता है। इससे वासना, तृष्णा, अहंकार, काम, घृणा, क्रोधादि का भी क्षय होता है। उपासना उपासक की अन्तर्मुखी वृत्ति को जाग्रत कर देती है। अन्ततः उसके माध्यम से वह ईश्वर का सायुज्य प्राप्त कर जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। उपासना उसे अमरत्व तथा मुक्ति प्रदान करती है।

 

भ्रमर-कीट-न्याय के अनुसार मन अपने ध्येय विषय के साथ तद्रूप हो जाता है। आपकी प्रकृति आपके विचारों के अनुरूप ही होती है- यह एक अपरिवर्तनीय मनोवैज्ञानिक सत्य है। उपासना में एक ऐसी रहस्यात्मक अचिन्त्य शक्ति निहित है जो ध्याता तथा ध्येय को परस्पर अभिन्न कर देती है।

 

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-"हे परन्तप अर्जुन, मेरी अनन्य भक्ति से ही मेरा दर्शन, मेरा ज्ञान तथा मुझमें पूर्णतः अनुस्यूत हो जाना सम्भव है" (११/५४)

 

महर्षि पतंजलि ने उपासना के महत्त्व पर अपने राजयोग-सूत्रों में कई स्थलों पर पर्याप्त बल दिया है, क्योंकि उपासना राजयोगी के लिए भी आवश्यक है। राजयोगी का एक अपना पथ-प्रदर्शक इष्टदेवता होता हैवह चाहे योगेश्वर कृष्ण हों या योगीश्वर शंकर भगवान्। ईश्वर-प्रणिधान राजयोग और क्रियायोग का एक अंग है। पतंजलि कहते हैं-"उपासना से मनुष्य समाधिस्थ हो सकता है।"

 

आत्मिक उन्नयन, आध्यात्मिक प्रगति तथा जीवन को धर्मोन्मुख बनाने के लिए जिन उत्प्रेरक उपकरणों की आवश्यकता होती है, उनमें उपासना मात्र एक अनिवार्य आवश्यकता ही नहीं, अपितु समाज के प्रत्येक वर्ग तथा श्रेणी के लिए लाभप्रद भी है। इसका साधन भी सरल है।

 

जहाँ तक पशु तथा मानव के परस्पर सम्बन्ध का प्रश्न है-भोजन, पान, निद्रा, भय, मैथुनादि उभयनिष्ठ हैं। जो वस्तु मनुष्य को यथार्थ मानव या धर्माभिमुख बनाती है, वह है धार्मिक चेतना। जिस मनुष्य का जीवन केवल बहिर्मुखी तथा वासनाग्रस्त है एवं जो किसी प्रकार की उपासना नहीं करता, वह बाह्यतः मानव शरीर-धारी होते हुए, भी यथार्थतः पशु ही है।

 

 

सगुणोपासना तथा निर्गुणोपासना

 

प्रतीक-उपासना तथा अहंग्रह-उपासना- ये उपासना के दो प्रकार हैं। प्रतीक-उपासना सगुणोपासना है, जब कि अहंग्रह-उपासना निर्गुणोपासना है जिसमें निराकार तथा निर्गुण अक्षर या परात्पर ब्रह्म का ध्यान किया जाता है। शालग्राम, मूर्ति तथा भगवान् राम, भगवान् कृष्ण, गायत्री देवी आदि के चित्रों पर ध्यान केन्द्रित करना प्रतीक-उपासना है। विस्तृत नील वर्ण आकाश, सर्वव्यापी वायु तथा सूर्य का सर्वव्यापी तेज अमूर्त-उपासना के प्रतीक हैं। सगुणोपासना मूर्त तथा निर्गुणोपासना अमूर्त-उपासना है।

 

भगवान् कृष्ण की लीलाओं का श्रवण, कीर्तन या उनके नामों का गुणगान, प्रभु का अनवरत स्मरण, उनका पाद-सेवन, माल्यार्पण, वन्दन, प्रार्थना, मन्त्रोच्चारण, आत्मसमर्पण एवं भगवद्भक्तों, मानवता तथा देश की नारायण-भाव से सेवा सगुणोपासना के अवयव हैं।

 

आत्म-भाव से का गायन, आत्म-भाव से मानवता तथा देश की सेवा, आत्म-भाव या ब्रह्म-भाव से का मानसिक जप, 'सोऽहम्' या 'शिवोऽहम्' का ध्यान या 'नेति-नेति' सिद्धान्त द्वारा मायिक चक्र को निरस्त कर 'अहं ब्रह्मास्मि' या 'तत्त्वमसि' जैसे महावाक्यों पर ध्यान केन्द्रित करना अहंग्रह-उपासना या निर्गुणोपासना है।

 

सगुणोपासना भक्तियोग तथा निर्गुणोपासना ज्ञानयोग है। सगुण (सविशेष) ब्रह्म तथा निर्गुण (निर्विशेष) ब्रह्म के उपासकों को एक ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है; परन्तु भक्तियोग की अपेक्षा ज्ञानयोग अधिक दुष्कर है, क्योंकि इस आध्यात्मिक साधना के प्रारम्भ में ही देहाभिमान का परित्याग कर देना पड़ता है। जिनमें देहाभिमान है, उनके लिए अक्षर या अविनाशी ब्रह्म की प्राप्ति अत्यधिक कठिन है। इसके अतिरिक्त निराकार तथा निर्गुण ब्रह्म पर मन को स्थिर करना अत्यन्त दुःसाध्य है। अक्षर या निर्गुण ब्रह्म की धारणा के लिए सुतीक्ष्ण, एकाग्र तथा सूक्ष्म बुद्धि की आवश्यकता होती है।

भक्तियोग में भाव

भक्तियोग ज्ञानयोग या आध्यात्मिक ध्यान की अपेक्षा अधिक सरल है। भक्तियोग में भक्त प्रभु के साथ निकट एवं प्रेमपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करके धीरे-धीर अपनी प्रकृति, रुचि तथा क्षमता के अनुसार भक्ति के छह भावों में से किसी एक भाव की साधना करता है।

 

शान्त-भाव, दास्य-भाव, सख्य-भाव, वात्सल्य-भाव, कान्ता-भाव और माधुर्य-भाव भक्त के षड्लक्षण या भगवान् के प्रति उसके छह भाव हैं। प्रकार-भेद तथा भावनात्मक तीव्रता के वैभिन्य के कारण भाव परस्पर भिन्न होते हैं। इन भिन्न-भिन्न भावों का वर्गीकरण इनकी तीव्रता के अनुरूप होता है। शिशु की माता-पिता के प्रति जो भावना होती है, वही भावना भगवान् के प्रति प्रह्लाद तथा ध्रुव की थी। यह शान्त-भाव है। दास्य-भाव में भक्त का आचरण एक दास की भाँति होता है। उसका भगवान् ही उसका स्वामी होता है। हनुमान् भगवान् के आदर्श दास है। सख्य-भाव में समानता की भावना होती है। अर्जुन और कुचेला में यही भाव था। वात्सल्य-भाव में भक्त भगवान् को शिशुवत् समझता है। यशोदा तथा कौसल्या में क्रमशः श्रीकृष्ण तथा श्रीराम के प्रति यही भाव था। पति के प्रति पत्नी का जो भाव होता है, उसे कान्ता-भाव कहते हैं। सीता और रुक्मिणी में यही भाव था। माधुर्य-भाव इन समस्त भावों की पराकाष्ठा है। इसमें प्रेम की तीव्रता के कारण प्रेमी-प्रेमिका एक हो जाते हैं। राधा और मीरा में इसी प्रकार का भाव था।

 

माधुर्य-भाव भक्ति का चरमोत्कर्ष है। इसमें भगवान् में भक्त का अन्तर्लयन हो जाता है। इस भाव को प्राप्त भक्त भगवान् की आराधना, उसका निरन्तर स्मरण, उसका कीर्तन, उसकी महिमा का वर्णन, उसके नाम की आवृत्ति, उसका मन्त्रोच्चारण, उसकी प्रार्थना एवं उसको दण्डवत् प्रणाम करता है। वह उसकी लीलाओं का श्रवण, उसके प्रति अप्रतिबन्धित तथा उन्मुक्त भाव से आत्मसमर्पण करता और उसी कृपा तथा उसका सान्निध्य प्राप्त करके अन्ततः उसमें अन्तर्लीन हो जाता है।

 

माधुर्य-भाव में भक्त तथा भगवान् का निकटतम सम्बन्ध होता है। कान्ता-भाव तथा माधुर्य-भाव में विषयासक्ति के लिए कोई स्थान नहीं होता। ये भाव कामुकता से पूर्णतः असम्पृक्त होते हैं। कामुक या दूषित भाव-प्रवण लोगों के लिए इन दो भावों का ज्ञान असम्भव है; क्योंकि इनके मन में दूषित भावनाएँ या निरन्तर कामुक प्रवृत्तियाँ बद्धमूल हो चुकी होती हैं। सूफी सन्तों में भी प्रेमी-प्रेमिका का माधुर्य-भाव होता है। जयदेव-रचित गीतगोविन्द माधुर्य-रस से पूर्ण है। रहस्यवादियों द्वारा प्रयुक्त प्रेम की भाषा का अर्थ ठीक-ठीक समझना सांसारिक व्यक्तियों के लिए असम्भव है। इस भाषा का ज्ञान केवल गोपियों, राधा, मीरा, तुकाराम, नारद, हाफिज़ तथा उनके जैसे अन्य महान् भगवद्-भक्तों के लिए ही सम्भव है।

पूजा तथा इष्टदेवता

 

पूजा वैधी उपासना के लिए प्रयुक्त एक सामान्य पारिभाषिक शब्द है। इसके लिए अर्चन, वन्दन, भजनादि जैसे अनेक समानार्थक शब्दों का व्यवहार किया जाता है; किन्तु ये शब्द पूजा के कुछ निश्चित पक्षों के द्योतक हैं। भक्त का इष्टदेवता या देवता का कोई विशिष्ट रूप पूजा का विषय होता है। वैष्णवों के लिए नारायण या विष्णु या राम या कृष्ण के रूप में उनके विग्रह, शैवों के लिए शिव के अष्ट-रूप तथा शाक्तों के लिए देवी उपास्य हैं।

 

कभी-कभी भक्त पूजा के लिए अपने कुलदेवता या कुलदेवी का चयन कर लेता है और कभी-कभी देवता का चुनाव उसके गुरु द्वारा होता है। किन्हीं अवसरों पर वह स्वयं ऐसे देवता का चयन कर लेता है जो उसकी भावनाओं को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। वही उसके इष्टदेवता होते हैं।

 

बाह्य पूजा में किसी प्रतिमा, किसी चित्र या किसी प्रतीक जैसे विषय या आलम्बन को प्रयुक्त किया जाता है। उदाहरणार्थ विष्णु-पूजा के लिए शालग्राम तथा शिव-पूजा के लिए लिंग का प्रयोग किया जाता है।

 

पूजा का विषय सभी वस्तुएँ हो सकती हैं; किन्तु स्वभावतः इसके लिए उन्हीं वस्तुओं का चुनाव किया जाता है जो उपासक के मन को सर्वाधिक प्रभावित करती हैं। प्रतिमा या उपयोगी प्रतीक भक्त के मन में देवता के विचार को जाग्रत कर सकता है। शालग्राम-शिला मन की एकाग्रता को सरलतापूर्वक जाग्रत कर सकती है। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में किसी प्रतीक या प्रतिमा के प्रति अनुराग होता है। मूर्ति (विग्रह), सूर्य, अग्नि, जल, गंगा, शालग्राम तथा लिंग-ये सब परमात्मा के प्रतीक हैं जो साधकों के मन की एकाग्रता और हृदय की शुद्धि के लिए उपयोगी हैं। प्रतिमाओं या प्रतीकों की विशेष क्षमता के प्रति अपनी-अपनी आस्था के कारण उपासकों का व्यक्तिगत स्तर पर उनकी और रुझान हो जाता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसका अर्थ यह है कि मन किसी विशेष प्रतीक या प्रतिमा के माध्यम से इच्छित दिशा में ही सुचार रूप से कार्य करता है।

 

मानवता के अधिकांश का मन या तो अपवित्र है या दुर्बल। अतः इन लोगों की उपासना का विषय अनिवार्य रूप से पवित्र होना चाहिए। जो विषय वासना तथा घृणा की मनोवृत्तियों के लिए उत्तेजक होते हैं, उनसे दूर रहना चाहिए; किन्तु कोई उन्नत भक्त जिसका मन विशुद्ध है और जो प्रत्येक स्थान पर या प्रत्येक वस्तु में दिव्य सत्ता का दर्शन करता है, किसी भी वस्तु की उपासना कर सकता है।

 

पूजा में किसी दिव्य रूप का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रतिमा या चित्र को उपास्य विषय के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इस प्रतिमा की आराधना की जाती है। प्रतिमा, शिला या विग्रह या मूर्ति-ये सभी आलम्बन किसी ऐसे देवता-विशेष का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका इनमें आवाहन किया जाता है। लिंग शिव का प्रतिनिधित्व करता है। यह अद्वितीय तथा निराकार ब्रह्म का प्रतीक है। श्रुति में आया है : "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म-एकमात्र ब्रह्म की सत्ता है, ब्रह्म के अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तु की सत्ता नहीं है।" यहाँ द्वैत नहीं है। लिंग नेत्रों के लिए उज्ज्वल तथा आकर्षक एवं मन की एकाग्रता के लिए उपयोगी है।

 

शालग्राम विष्णु की प्रतिमा तथा उसका प्रतीक है। भक्त विशेष की अभिरुचि के अनुसार श्रीराम, श्रीकृष्ण, कार्तिकेय, गणेश, हनुमान्, दत्तात्रेय, सीता, लक्ष्मी, पार्वती, दुर्गा, काली, सरस्वती आदि की प्रतिमाओं का विधान है।

 

विष्णु तथा उनके अवतारों एवं शक्ति एवं शिव की प्रतिमाएँ ऐसी लोकप्रिय हैं जिनका पूजन मन्दिरों तथा घरों-दोनों स्थानों पर होता है। तिरुपति, पण्ढरपुर, पलनि तथा कतिरगाम आदि मन्दिरों के विग्रह शक्तिमान् देवता हैं। वे प्रत्यक्ष देवता हैं। वे भक्तों को वरदान देते, रोगमुक्त करते और उन्हें दर्शन देते हैं। इन देवताओं की लीलाएँ अद्भुत हैं। हिन्दू-धर्म बहुदेववादी नहीं है। शिव, विष्णु, ब्रह्मा तथा शक्ति एक ही ईश्वर के विभिन्न रूप हैं।

 

परमात्मा अपने भक्तों के समक्ष स्वयं को विभिन्न रूपों में अनावृत करता है। वह वही रूप ग्रहण करता है जिसका चयन भक्त अपनी उपासना के लिए किये रहता है। यदि आप उसकी पूजा चतुर्भुज हरि के रूप में करते हैं, तो वह आपके समक्ष हरि के रूप में प्रकट होगा और यदि आप उसकी पूजा शिव के रूप में करते हैं, तो वह आपको शिव के रूप में दर्शन देगा। यदि आप उसकी पूजा माँ दुर्गा या काली के रूप में करते हैं, तो वह आपके सम्मुख दुर्गा या काली के रूप में प्रकट होगा, यदि आप उसकी पूजा भगवान् राम, भगवान् कृष्ण या भगवान् दत्तात्रेय के रूप में करते हैं, तो वह आपके निकट राम, कृष्ण या दत्तात्रेय के रूप में उपस्थित होगा और यदि आप उसकी पूजा ईसा या अल्लाह के रूप में करते हैं, तो वह आपके समक्ष ईसा या अल्लाह के रूप में प्रकट होगा।

 

शिव या हरि, गणेश या सुब्रह्मण्य या दत्तात्रेय या भगवान् का कोई भी अवतार, राम या कृष्ण, सरस्वती या लक्ष्मी, गायत्री या काली, दुर्गा या चण्डी-इनमें से आप किसी की भी पूजा कर सकते हैं। ये सब एक ही ईश्वर के रूप हैं। उपास्य का कोई भी नाम और रूप हो-उपासना ईश्वर की ही होती है। अन्तर्व्यापी ईश्वर ही अपने विग्रह में अधिष्ठित हो कर पूजा ग्रहण करता है। यह नितान्त भ्रान्त धारण है कि एक रूप किसी अन्य रूप से श्रेष्ठतर है। सभी रूप एक तथा समतुल्य हैं। शिव, विष्णु, गायत्री, राम, कृष्ण, देवी तथा ब्रह्म एक ही हैं। एक ही ईश्वर हम सबका उपास्य है। जो विभिन्नता दृष्टिगत होती है, उसका कारण उपास्य विग्रहों की परस्पर विभिन्नता हो कर उपासकों की परस्पर विभिन्नता है। अज्ञान के कारण ही विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के अनुयायी परस्पर संघरर्षरत रहते हैं।

 

मूर्ति-पूजा का दर्शन तथा महत्त्व

मूर्ति-नवदीक्षित आध्यात्मिक साधकों का आलम्बन

 

मूर्ति नवदीक्षितों के लिए एक आलम्बन है। यह उनके आध्यात्मिक शैशव का आश्रय-स्थान है। प्रारम्भ में उपासना के लिए कोई रूप या प्रतिमा आवश्यक होती है। उपासना के लिए यह परमात्मा का एक बाह्य प्रतीक है। यह परमात्मा का स्मरण कराती है। भौतिक प्रतिमा मानसिक विचार को उत्प्रेरित करती है। मूर्ति-पूजा से मन सुस्थिर तथा सन्तुलित होता है। उपासक के लिए असीमता, सर्वशक्तिमत्ता, सर्वज्ञता, विशुद्धता, पूर्णत्व, स्वातन्त्र्य, पावनता, सत्य तथा सर्वव्यापकता की अवधारणाओं से संयुक्त होना अनिवार्य है। असीम या निरपेक्ष सत्ता पर ध्यान केन्द्रित कर पाना सबके लिए सम्भव नहीं है। अधिकांश लोगों के लिए एकाग्रता के अभ्यास हेतु मूर्त रूप आवश्यक है। सर्वत्र परमात्मा का दर्शन और उसकी उपस्थिति का भान सामान्य जन के लिए असम्भव है। आधुनिक मनुष्य के लिए मूर्ति-पूजा उपासना की सरलतम विधि है।

 

मन की स्थिरता के लिए किसी प्रतीक की अनिवार्यता असन्दिग्ध है। आश्रय के लिए मन को एक आलम्बन की आवश्यकता होती है। प्रारम्भिक चरणों में मन में चरम सत्ता की अवधारणा असम्भव होती है। उक्त अवस्था में किसी बाहा सहयोग के अभाव में मन का केन्द्रीभूत होना सम्भव नहीं हो पाता। प्रारम्भ में बिना किसी प्रतीय के मन को एकाग्र या ध्यानमन कर पाना असम्भव होता है।

 

प्रत्येक व्यक्ति मूर्तिपूजक है

 

वेदों में मूर्ति-पूजा का कोई उल्लेख नहीं मिलता; किन्तु पुराणों तथा आगमों में घरों तथा मन्दिरों-दोनों में मूर्ति-पूजा का विवरण मिलता है। मूर्ति-पूजा का प्रवलर केवल हिन्दू-धर्म में है, ऐसी बात नहीं है। ईसाई क्रास को पूजते हैं। उनके मन में क्राए की प्रतिमा अधिष्ठित रहती है। मुसलमान जब विनत हो कर नमाज अदा करते हैं, तथ उनकी मानसिकता में काबा का पत्थर रचा-पचा रहता है। कुछ योगियों तथा वेदान्तियों के अतिरिक्त संसार के सभी लोग मूर्तिपूजक हैं। उनके मन में किसी--किसी प्रतिमा के लिए स्थान अवश्य होता है।

 

मानसिक प्रतिमा भी मूर्ति का ही रूप है। इन दोनों में प्रकार-भेद हो का केवल मात्रा-भेद है। सभी उपासक, वे कितने ही प्रतिभा सम्पन्न क्यों हों, अपने मन में किसी रूप को प्रतिष्ठित करके उस पर अपने मन को स्थिर करते हैं।

 

प्रत्येक व्यक्ति मूर्तिपूजक होता है। चित्र या रेखांकन आदि प्रतिमा या मूर्ति के ही रूप हैं। स्थूल बुद्धि वाले व्यक्ति के आलम्बन के लिए मूर्त प्रतीक तथा सूक्ष्म बुद्धि वाले व्यक्ति के आलम्बन के लिए अमूर्त प्रतीक अपेक्षित होते हैं। वेदान्ती भी चंचल मन की स्थिरता के लिए को प्रतीक-रूप में प्रयुक्त करता है। केवल चित्रों अथवा पाषाण या काष्ठ की प्रतिमाओं को ही मूर्ति नहीं कहा जाता, मनीषी तथा नेता भी मूर्तिवत् उपास्य हो जाते हैं। तब मूर्ति-पूजा की निन्दा क्यों ?

 

ईश्वर से सम्पर्क-स्थापन का माध्यम

 

मूर्ति मूर्तिकार की अर्थहीन कल्पना हो कर एक ऐसा देदीप्यमान माध्यम है जो भक्त को आकर्षित करके उसे ईश्वरोन्मुख कर देता है। प्रतिमा-पूजन के साथ-साथ भक्त के हृदय में प्रभु की उपस्थिति की अनुभूति होने लगती है और उसका भक्ति-भाव उमड़ कर प्रभु की ओर प्रवाहित होने लगता है। आधुनिक विषयासक्त मानव के अज्ञान के कारण उसकी दृष्टि आच्छादित हो जाती है और वह परमात्मा के स्वरूप की प्रिय तथा सम्मोहक मूर्ति में प्रतिष्ठित दिव्य सत्ता का दर्शन नहीं कर पाता। इस शताब्दी की वैज्ञानिक प्रगति से ही आपको मूर्ति-पूजा की महिमा के सम्बन्ध में आश्वस्त हो जाना चाहिए। रेडियो नामक एक लघु पेटिका गायकों तथा वक्ताओं को किस प्रकार अपने में तल्लीन बनाये रखती है! यह एक यान्त्रिक तथा निर्जीव संरचना मात्र है जो तीव्र गति से फेंके जाने पर सहस्र खण्डों में विभाजित हो सकता है; किन्तु यदि आप इसके उपयोग करने की विधि से परिचित हैं तो आप इसके माध्यम से सहस्रों मील दूर गाये जाने वाले संगीत तथा विश्व के सुदूर स्थानों में होने वाले भाषणों का आनन्द उठा सकते हैं। जिस प्रकार रेडियो द्वारा आप समस्त विश्व के लोगों की ध्वनि तरंगों को ग्रहण कर सकते हैं, उसी प्रकार आपके लिए एक मूर्ति के माध्यम से सर्वव्यापी परमात्मा से सम्पर्क स्थापित करना भी सम्भव है। सर्वव्यापी परमात्मा की दिव्यता का स्पन्दन सृष्टि के कण-कण में हो रहा है। क्या दिक्काल का कोई ऐसा अणुवत् स्थान भी है जहाँ वह विद्यमान हो। तब आप यह कैसे कह सकते हैं कि वह मूर्ति में विद्यमान नहीं है?

 

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सहज ही कह देंगे- "ईश्वर तो एक सर्वव्यापी निराकार सत्ता है। उसे एक मूर्ति में कैसे आबद्ध किया जा सकता है?" क्या इन लोगों को कभी उसकी सर्वव्यापकता का ज्ञान हो पाता है? क्या ये लोग उसे केवल उसे-प्रत्येक वस्तु में सर्वदा परिव्याप्त देख पाते हैं? इसका एकमात्र उत्तर है नहीं। यह उनका केवल अहंकार है जो उन्हें ईश्वर की प्रतिमा के सम्मुख विनत नहीं होने देता है और इसी कारण वे अपना अर्थहीन तर्क प्रस्तुत कर देते हैं।

 

"अधजल गगरी छलकत जाय।" आध्यात्मिक दृष्टि से एक व्यवहार-कुशल व्यक्ति, जो ध्यान तथा उपासना में संलग्न रहता है और जिसका हृदय ज्ञान तथा अकृत्रिम भक्ति से ओत-प्रोत रहता है, वह सर्वदा मौन रहता है। वह मौन के माध्यम से ही अन्य लोगों को प्रभावित और प्रशिक्षित किया करता है। केवल वही इस तथ्य से अवगत हो सकता है कि मानसिक एकाग्रता के लिए प्रारम्भ में किसी मूर्ति की आवश्यकता होती है या नहीं।

 

किसी की बुद्धि कितनी भी कुशाग्र क्यों हो, वह किसी प्रतीक के अभाव में अपने मन को एकाग्र नहीं कर सकता। एक प्रतिभा सम्पन्न या विद्वान् व्यक्ति ही अपने अहंकार तथा दम्भ के कारण कहता है- "मुझे मूर्ति पसन्द नहीं है। मैं किसी रूप पर अपने मन को स्थिर करना नहीं चाहता।" वस्तुतः उसके लिए किसी निराकार सत्ता पर भी मन को एकाग्र कर पाना असम्भव होता है। वह सोचता है कि यदि लोगों को यह ज्ञात हो जायेगा कि वह साकार या सगुण सत्ता की उपासना करता है, तो वह उनके उपहास का पात्र हो जायेगा। वास्तविकता तो यह है कि वह किसी निर्गुण-निराकार सत्ता की भी उपासना नहीं करता। वह केवल बातें बनाता है और बहस करता तथा ढोंग रचता है। केवल अनावश्यक वाद-विवाद में ही उसके समय का अपव्यय होता है। अनेक सिद्धान्तों की अपेक्षा एक अभ्यास श्रेष्ठतर है। अधिकांश बुद्धिवादियों की बुद्धि उनके मार्ग में अवरोध ही उपस्थित करती है। ये लोग ब्रह्म की सत्ता को अनुमान-जन्य, समाधि को मन की प्रतारणा तथा आत्मसाक्षात्कार को वेदान्तियों की कल्पना मात्र मानते हैं। कितने मोहग्रस्त हैं वे। वे अज्ञान के आवरण में आबद्ध हो कर अपनी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता-जो आत्मज्ञान की तुलना में नितान्त नगण्य है-से दिग्भ्रमित हो गये हैं। इस प्रकार के लोगों की मुक्ति के लिए कोई आशा नहीं। सर्वप्रथम शुभ संस्कारों द्वारा उनके अशुभ संस्कारों का परिमार्जन किया जाना आवश्यक है। इसके पश्चात् ही वे अपनी त्रुटियों को समझ सकेंगे। परमात्मा उनकी बुद्धि को निर्मल करके यथार्थ ज्ञान के प्रति उनमें जिज्ञासा जाग्रत करे!

 

परमात्मा का एक प्रतीक

 

प्रतिमा (मूर्ति) एक प्रतीक है। मन्दिर में प्रतिष्ठित मूर्ति पत्थर, लकड़ी या धातु से निर्मित की जाती है; किन्तु भक्त के लिए यह एक बहुमूल्य वस्तु है। इसका कारण है कि इसमें भगवान् का चिह्नांकन है और यह उसकी प्रतीक है जिसे वह पवित्र और शाश्वत समझता है। ध्वज एक चित्रांकित वस्त्र का अंश मात्र होता है; किन्तु वह एक सैनिक के लिए उस वस्तु का प्रतीक है जो उसके लिए अत्यधिक प्रिय है। वह इस ध्वज के रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग के लिए भी उद्यत रहता है। इसी प्रकार भक्त के लिए प्रतिमा भी अत्यन्त प्रिय होती है। वह भक्त से अपनी भक्ति की भाषा में वार्तालाप करती है। जिस प्रकार ध्वज सैनिक में सामरिक शौर्य जाग्रत करता है, उसी प्रकार प्रतिमा भक्त में भक्ति-भाव जाग्रत करती है। प्रतिमा में ईश्वर का अध्यारोपण हुआ रहता है और इससे उपासक में दैवी विचारों की सृष्टि होती है।

 

कागज का कोई टुकड़ा मूल्यहीन होता है। आप उसे फेंक दिया करते हैं; किन्तु जब उस पर राजकीय चिह्न अंकित कर दिया जाता है अर्थात् जब वह कोई करेंसी नोट बना दिया जाता है, तब आप उसे अपने बटुवे या बक्स में सुरक्षित रख देते हैं। इसी प्रकार आपके लिए किसी सामान्य शिलाखण्ड का कोई मूल्य नहीं होता। आप उसकी उपेक्षा कर देते हैं। किन्तु यदि आप पण्ढरपुर में भगवान् कृष्ण की प्रस्तर-प्रतिमा या किसी अन्य मन्दिर में प्रतिष्ठित प्रतिमा का दर्शन करते हैं, तो आप करबद्ध हो कर उसके सम्मुख नतमस्तक हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि उस प्रस्तर पर प्रभु का चिह्न अंकित है। भक्त प्रस्तर-प्रतिमा पर अपने आराध्य प्रभु को उनके समस्त गुणों के साथ अध्यारोपित कर देता है।

 

मूर्ति-पूजन के समय आप यह नहीं कहते कि यह अमुक स्थान से आयी है, अमुक ने भेजी है, यह अमुक वस्तु से निर्मित है, यह अमुक मूल्य दे कर खरीदी गयी है आदि। आप उस प्रतिमा में प्रभु के समस्त गुणों का अध्यारोपण कर देते हैं और प्रार्थना करते हैं-"हे अन्तर्यामी ! तुम सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ तथा दयामय हो। तुम सर्वभूतों के आदि स्रोत, स्वयम्भू, सत्-चित्-आनन्द, नित्य तथा अविकारी हो। तुम मेरे जीवन के जीवन और मेरी आत्मा की आत्मा हो। मुझे प्रकाश और ज्ञान दो। तुम सर्वदा के लिए मेरा आश्रय-स्थल बन जाओ।" जब आपकी भक्ति तथा ज्ञान में तीव्रता एवं गहनता का प्रवेश हो जाता है, तब आपको प्रस्तर-प्रतिमा का दर्शन नहीं होता। उसमें आप उस प्रभु का ही दर्शन करते हैं जो चैतन्य है। नव-साधकों के लिए मूर्ति-पूजा अत्यावश्यक है।

 

विराट् का अविकल अंग

 

नव-साधक की साधना के प्रारम्भिक चरण में प्रतिमा नितान्त आवश्यक है। प्रतिमा-पूजन से ईश्वर प्रसन्न होता है। प्रतिमा पाँच तत्त्वों से निर्मित होती है। ईश्वर का शरीर भी पाँच तत्त्वों से निर्मित होता है। प्रतिमा तो प्रतिमा ही रह जाती है; किन्तु पूजा ईश्वर तक पहुँच जाती है।

 

जब आप किसी व्यक्ति से हाथ मिलाते हैं, तब वह बहुत प्रसन्न होता है। आप उसके शरीर के अल्पांश का ही स्पर्श कर रहे होते हैं; किन्तु इतने से ही उसे आनन्द प्राप्त हो जाता है। वह मुस्करा कर आपका स्वागत करता है। इसी प्रकार ईश्वर भी अपने विराट् शरीर के अल्पांश के पूजन से अत्यन्त प्रसन्न होता है। मूर्ति भगवान् के शरीर का एक अंग है। अखिल विश्व उसका शरीर है, उसका विराट् रूप है। पूजा भगवान् तक पहुँच जाती है। उपासक प्रतिमा में भगवान् तथा उसके समस्त गुणों को अध्यारोपित कर देता है। वह मूर्ति के माध्यम से भगवान् की सोलह प्रकार की सेवा अर्थात् षोडशोपचार करता है। पहले उसकी उपस्थिति के लिए उसका आवाहन करता है। इसके पश्चात् उसे आसन प्रदान किया जाता है। फिर उसका पाद-प्रक्षालन किया जाता है। तत्पश्चात् उसे अर्घ्य-दान दिया जाता है (अर्घ्य अतिथि-सत्कार का द्योतक है) इसके पश्चात् स्नान कराया जाता है। फिर उसे वस्त्राभूषित किया जाता है। फिर यज्ञोपवीत किया जाता है। तत्पश्चात् उसको चन्दन लगाया जाता है। फिर उसे पुष्प अर्पित किये जाते हैं (ये श्रद्धा-सुमन भगवान् के प्रति प्रेम तथा श्रद्धा के प्रतीक होते हैं) फिर धूप जलायी जाती है। इसके बाद दीप जला कर उसकी आरती उतारी जाती है। तत्पश्चात् उसे नैवेद्य और फिर ताम्बूल अर्पित किये जाते हैं। इसके बार कर्पूर जला कर उसका नीराजन किया जाता है। इसके पश्चात् उसे स्वर्ण-पुष्य अभि किये जाते हैं। अन्त में देवता से विदा ली जाती है (विसर्जन) पूजा के इन वादा रुभे मैं भक्त के आन्तरिक प्रेम की अभिव्यक्ति होती है। उसका चंचल मन स्थिर हो जाता है। इससे साधक को क्रमशः ईश्वर के सामीप्य का बोध होने लगता है, उसका हदा विशुद्ध हो जाता है और धीरे-धीरे वह अपने अहंकार को नष्ट कर देता है। प्रतीक के प्रति आस्थावान् भक्त प्रस्तर, मृत्तिका और पीतल की मूर्ति, चित्र, शालग्राम आदिये भगवान् के शरीर का ही दर्शन करता है। इस प्रकार की उपासना मूर्ति-पूजा हो ही नहीं सकती। समस्त पदार्थ परमात्मा का प्रकटीकरण हैं। वह संसार की सभी वस्तुओं में विद्यमान है। प्रत्येक वस्तु उपासना का विषय है; क्योंकि परमात्मा स्वयं को प्रत्येक वस्तु में अभिव्यक्त करता है और उसमें अवस्थित हो कर पूजित होता है। उपासना के उपक्रम से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि जो पूजा का विषय है, वह वरिष्ठ एवं चेतन है। वस्तुओं के प्रति यह धारणा भक्त के लिए अत्यन्त आवश्यक है। वस्तुओं को देखने-परखने के उक्त दृष्टिकोण के लिए अप्रशिक्षित मस्तिष्क को प्रशिक्षित करता आवश्यक है।

 

 

 

 

मूर्ति-पूजा से भक्ति का विकास

 

मूर्ति-पूजा मनुष्य की एकाग्रता को सरल तथा सहज बना देती है। आप परमात्मा को उसके किसी अवतार-विशेष के रूप में देखते हैं। मूर्ति-पूजा के माध्यम से आप अपने मनश्चक्षु से उक्त अवतार में अवस्थित परमात्मा की महान् लीलाओं को देख सकते हैं। इस विधि की गणना आत्मसाक्षात्कार की सरलतम विधियों में की जाती है।

 

जिस प्रकार किसी प्रख्यात योद्धा के चित्र से आपके मन में शौर्य की भावना जाग्रत होती है, उसी प्रकार ईश्वर का चित्र-दर्शन करने से मन दिव्यता के शिखर पर आरूढ़ हो जाता है। जिस प्रकार अपने खिलौने में किसी शिशु को अध्यारोपित करके उसके साथ खेलते हुए तथा उसे काल्पनिक स्तन-पान कराते हुए किसी शिशु में मातृ-भाव उत्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार भक्त प्रतिमा की उपासना तथा उस पर अपना ध्यान केन्द्रित करके अपनी भक्ति-भावना को विकसित करता है

 

नियमित पूजा से प्रतिमा-स्थित देवत्व का अनावरण

 

नियमित पूजा तथा मूर्ति में निहित देवत्व के प्रति आस्था-जनित हमारी आन्तरिक भावनाओं को अभिव्यक्त करने वाली अन्य विधाओं से मूर्ति में अन्तर्निहित देवत्व अनावृत हो जाता है। निश्चित रूप से यह एक आश्चर्यजनक तथा चमत्कारपूर्ण तथ्य है कि प्रतिमा सजीव तथा मुखर हो कर आपके प्रश्नों के उत्तर तथा आपकी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने लगती है। आपके अन्तर में परिव्याप्त परमात्मा मूर्ति में प्रसुप्त देवत्व को जाग्रत करने में सक्षम है। यह उस शक्तिशाली लेंस की भाँति है जो सूर्य की किरणों को कपास के ढेर पर केन्द्रीभूत कर देता है। लेंस और कपास दोनों में से कोई भी अग्नि नहीं है और सूर्य की किरणें भी कपास को स्वयं जला पाने में असमर्थ हैं। जब इन तीनों को एक विशिष्ट विधि से एकत्र कर दिया जाता है, तभी अग्नि उत्पन्न हो कर कपास को जला पाती है। प्रतिमा, साधक तथा सर्वव्यापी परमात्मा के सम्बन्ध में भी यही सिद्धान्त लागू होता है। पूजा प्रतिमा को दिव्य ज्योति से प्रकाशित कर देती है और तब प्रभु उस प्रतिमा में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। यहाँ से ही वे एक विशिष्ट विधि से आपको सुरक्षा प्रदान करते हैं। प्रतिमा से चमत्कार की सृष्टि होती है। जिस स्थान पर प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा होती है, वह तत्क्षण मन्दिर के रूप में परिणत हो जाता है। मन्दिर ही क्यों, वह स्थान तो वैकुण्ठ या कैलास ही हो जाता है। वहाँ कि निवासी दुःख-दैन्य, व्याधि, विफलता तथा स्वयं संसार से भी मुक्त हो जाते हैं। प्रतिमा में जाग्रत परमात्मा किसी अभिभावक देवदूत का उत्तरदायित्व बहन करता है और अपने सम्मुख श्रद्धा-विनत होने वालों के शीश पर आशिष-वर्षण करते हुए उन्हें आत्यन्तिक सुख प्रदान करता है।

 

 

 

प्रतिमा चिद्घन है

 

प्रतिमा दिव्य सत्ता का प्रतीक मात्र है। भक्त को उसमें किसी शिला-खण्ड या धातु-राशि के दर्शन नहीं होते। उसके लिए तो वह परमात्मा का ही प्रतीक है। मूर्ति में उसे अन्तर्यामी भगवान् की विद्यमानता की ही प्रतीति होती है। दक्षिण भारत के सभी शैव नयनार सन्तों ने शिवमूर्ति अर्थात् लिंग की पूजा के माध्यम से ही परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया था। भक्त के लिए प्रतिमा चिद्घन होती है। वह उससे प्रेरणा ग्रहण करता है। प्रतिमा उसका मार्ग-दर्शन करती है। वह उससे वार्तालाप करती है और विभिन्न प्रकार से उसकी सहायता करने के लिए मानव-शरीर धारण करती है। दक्षिण भारत के मदुरै मन्दिर में भगवान् शिव की मूर्ति ने एक लकड़हारे तथा एक वृद्ध स्त्री की सहायता की। तिरुपति के मन्दिर की मूर्ति ने अपने भक्त के सहायतार्थमानव-रूप धारण कर न्यायालय में साक्ष्य दिया। इस प्रकार के चमत्कार तथा रहस्य केवल भक्तों के लिए ही बोधगम्य होते हैं।

 

जब प्रतिमाएँ सजीव हो उठीं

 

किसी भक्त या सन्त के लिए जड़ पदार्थ जैसी कोई वस्तु नहीं है। यहाँ जो-कुछ भी है, वासुदेव या चैतन्य है-"वासुदेवः सर्वं इति।" वस्तुतः भक्त प्रतिमा में प्रभु के ही दर्शन करता है। एक राजा ने नरसी मेहता की परीक्षा ली। उसने उनसे कहा- " नरसी, यदि तुम भगवान् कृष्ण के सच्चे भक्त हो और यदि तुम्हारे कथनानुसार प्रतिमा स्वयं भगवान् कृष्ण है, तो तुम इसे गतिशील कर दो।" नरसी मेहता की प्रार्थना के फल-स्वरूप प्रतिमा गतिशील हो गयी। शिव-मूर्ति के सम्मुख रहने वाले पावन वृषभ नन्दी ने तुलसीदास द्वारा अर्पित भोजन ग्रहण किया। मूर्ति मीराबाई के साथ क्रीड़ारत रहती थी। वह उसके लिए सजीव तथा चेतन थी।

 

जब अप्पय दीक्षितार दक्षिण भारत स्थित तिरुपति मन्दिर गये, तब वैष्णवों ने उनको मन्दिर में प्रवेश नहीं करने दिया; किन्तु दूसरे दिन प्रातःकाल उन वैष्णवों ने देखा कि मन्दिर की विष्णु-मूर्ति शिव-मूर्ति में परिणत हो गयी है। मन्दिर का महन्त यह देख कर स्तब्ध रह गया। उसने अप्पय दीक्षितार से क्षमा माँगते हुए उनसे विनय की कि वे मूर्ति को पुनः विष्णु की मूर्ति में परिणत कर दें।

 

दक्षिण भारत के दक्षिण कनारा जनपद-स्थित उडिपि में कनकदास नामक एक महान् कृष्ण-भक्त रहते थे। जातिगत अकुलीनता के कारण उनके लिए मन्दिर-प्रवेश वर्जित था। वे मन्दिर की परिक्रमा करने लगे। ऐसा करते समय उन्हें मन्दिर के पीछे एक छोटी खिड़की दिखायी पड़ी। इस खिड़की के सामने बैठ कर वे आत्म-विभोर हो कर भगवान् कृष्ण का स्तुति-गान करने लगे। भगवान् कृष्ण के प्रति उनकी अगाध भक्ति और उनके संगीत के लयबद्ध माधुर्य से आकर्षित हो कर वहाँ बहुत लोग एकत्र हो गये। विग्रह में प्रतिष्ठित भगवान् कृष्ण भी अपनी स्थिति परिवर्तित कर कनकदास की ओर उन्मुख हो गये जिससे वे उनका दर्शन कर सकें। इस घटना ने पुजारियों को आश्चर्यचकित कर दिया। तीर्थयात्रियों को आज भी वह खिड़की और वह स्थान दिखाया जाता है जहाँ बैठ कर कनकदास ने स्तुति-गान किया था।

 

मूर्ति भगवान् से अभिन्न है; क्योंकि यह मन्त्र चैतन्य-जो स्वयं देवता है-की अभिव्यक्ति का वाहन है। मूर्ति के सम्बन्ध में भक्त में वही अभिवृत्ति अपेक्षित है जो यदि भगवान् उसे प्रत्यक्ष दर्शन दे कर उससे सुस्पष्ट स्वरों में वार्तालाप करें, तो वह प्रदर्शित करेगा।

 

वेदान्त और मूर्ति-पूजा

 

तथाकथित वेदान्ती को मन्दिर में प्रतिष्ठित मूर्ति के सम्मुख नतमस्तक होने में लज्जा का अनुभव होता है। वह समझता है कि उसके साष्टांग दण्डवत् करने से उसका अद्वैत वाष्पवत् विलुप्त हो जायेगा। अप्पर, सुन्दरार तथा सम्बन्धार आदि प्रख्यात तमिल सन्तों के जीवन-वृत्त का अध्ययन करने से आपको ज्ञात हो जायेगा कि अद्वैत के सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पक्ष में उनकी कितनी गहरी पैठ थी। यद्यपि वे सर्वत्र भगवान् शिव का दर्शन करते थे तथापि वे सभी शिव-मन्दिरों में जा कर शिव-मूर्ति के सम्मुख नतमस्तक होते थे और भजन गाया करते थे। ये भजन आज भी उपलब्ध हैं। तिरसठ नायनार सन्तों ने केवल 'चर्या' तथा 'क्रिया' के अभ्यास से ही परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया था। वे मन्दिर के फर्श पर झाडू लगाते, पुष्प-चयन करते, भगवान् के लिए माला गूँथते और मन्दिर में दीप जलाते थे। वे निरक्षर थे; किन्तु उन्हें आत्मसाक्षात्कार हुआ। वे व्यावहारिक योगी थे और उनके हृदय विशुद्ध भक्ति से. ओत-प्रोत थे। वे कर्मयोग के मूर्त रूप थे। उन्होंने समन्वययोग का अभ्यास किया था। उनके लिए मन्दिर की मूर्ति मात्र प्रस्तर-खण्ड हो कर चिद्यन थी।

 

मधुसूदन स्वामी को अद्वैत-साक्षात्कार, स्वात्मैक्य-दर्शन तथा अद्वैत-भाव का बोध हो चुका था; किन्तु वंशीधर भगवान् कृष्ण के सगुण रूप के प्रति उनकी अत्यधिक अनुरक्ति थी।

 

तुलसीदास को सर्वव्यापी सत्ता का साक्षात्कार हो चुका था। उनमें वैश्व-चेतना थी। सर्वव्यापी निराकार भगवान् से उनका वार्तालाप हुआ करता था; किन्तु धनुर्धर भगवान् राम के प्रति उनका तीव्र अनुराग मिट नहीं पाया था। अपनी वृन्दावन-यात्रा में जब उन्होंने मुरलीधर कृष्ण की मूर्ति देखी, तब उन्होंने कहा- "इस मूर्ति के सम्मुख मैं नतमस्तक नहीं होऊँगा।" तत्क्षण ही भगवान् कृष्ण की मूर्ति ने भगवान् राम की मूर्ति का रूप धारण कर लिया और तब उन्होंने उसके सम्मुख अपना शीश झुकाया। तुलसीदास की भाँति तुकाराम को भी यह वैश्व-अनुभव प्राप्त था। वे अपने अभंग में कहते हैं- "जिस प्रकार गन्ने में मधुर रस व्याप्त रहता है, उसी प्रकार मैं अपने भगवान् को सर्वभूतों में व्याप्त देखता हूँ।" किन्तु वे अपने कूल्हों पर हाथ रखे हुए पण्ढरपुर के विठ्ठल भगवान् का उल्लेख सगुण रूप में ही करते हैं। मीरा को भी सर्वव्यापी कृष्ण से अपने तादात्म्य का भान था; किन्तु वह 'मेरे गिरिधर नागर' की धुन की आवृत्ति अनवरत रूप से किया करती थी।

 

उपर्युक्त तथ्यों से हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि मूर्ति-पूजा के माध्यम से ईश्वर-साक्षात्कार सम्भव है तथा ईश्वर के सगुण रूप की उपासना उसके साक्षात्कार के निमित्त की जाने वाली उसके सर्वगत निराकार पक्ष की उपासना में भी अत्यधिक सहायक सिद्ध होती है। हम इस निष्कर्ष पर भी पहुँचते हैं कि प्रारम्भ में चित की एकाग्रता एवं ध्यान के लिए मूर्ति-पूजा अनिवार्य है और उपासना की इस विधि से भागवत-चेतना की सम्प्राप्ति में किसी भी प्रकार कोई अवरोध नहीं उपस्थित होता। जो लोग मूर्ति-पूजा के घोर विरोधी हैं, वे अज्ञान के निविड़ अन्धकार में भटक रहे होते हैं। पूजा और उपासना के यथार्थ ज्ञान से वंचित ये लोग मात्र विद्वत्ता-प्रदर्शन के लिए मूर्ति-पूजा के विरुद्ध अर्थहीन तथा अनावश्यक परिचर्चा और वाद-विवाद में संलग्न रहते हैं। यथार्थ साधन-सम्पत्ति के नाम पर उनके पास कुछ नहीं होता। अर्थहीन शब्दावली से बोझिल भाषा में सारहीन प्रवचन देना उनका स्वभाव तथा व्यवसाय बन गया है। अपने साथ-साथ उन्होंने अन्य अगणित लोगों के भी मन-मस्तिष्क को विकृत तथा अस्थिर करके उनका सर्वनाश कर दिया है। किसी--किसी रूप में समस्त संसार प्रतीकों और मूर्तियों की पूजा करता है। प्रारम्भ में मन को किसी स्थूल विषय या प्रतीक पर स्थिर करके उसे अनुशासित किया जाता है। जब यह स्थिर तथा सूक्ष्म हो जाता है, तब इसे 'अहं ब्रह्मास्मि' जैसी अमूर्त अवधारणाओं पर केन्द्रित किया जा सकता है। जैसे-जैसे साधक ध्यान के अभ्यास में प्रगति करता जाता है, वैसे-वैसे उसके लिए सगुण निर्गुण में परिणत हो जाता है और वह निराकार सत्ता से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। मूर्ति-पूजा वेदान्त की मान्यताओं के विरुद्ध नहीं है। इसके विपरीत यह उसकी सहायिका ही है।

 

जो लोग मूर्ति-पूजा के दर्शन तथा इसकी अर्थवत्ता से अभी तक अपरिचित थे, अब उन्हें इसका स्पष्ट बोध हो जायेगा और उनके ज्ञान-चक्षु खुल जायेंगे। शास्त्राध्ययन के विपरीत तथा योगियों, सन्तों के सम्पर्क से दूर रहने वाले अज्ञानी जन ही मूर्ति-पूजा के विरुद्ध अनावश्यक तर्क प्रस्तुत करते हैं।

कर्मकाण्डीय (वैधी) भक्ति से परा-भक्ति की ओर

 

उच्चतर भक्ति या परा-भक्ति तथा निम्नतर भक्ति या कर्मकाण्डीय भक्ति ये भक्ति के दो भेद हैं। कर्मकाण्डीय भक्ति को वैधी या गौणी-भक्ति कहते हैं। यह औपचारिक भक्ति है। वैधी-भक्ति भक्ति की निम्नतर विधा है जो बाह्य साधनों पर निर्भर है। इससे मन विशुद्धतर होता जाता है। इस भक्ति के द्वारा साधक के हृदय में ईश्वर के प्रति क्रमशः प्रेम की वृद्धि होने लगती है। वह किसी प्रतीक या प्रतिमा की आराधना करता, घण्टी बजाता तथा पुष्प, चन्दन, धूप, दीपादि से प्रतिमा-पूजन कर ईश्वर को नैवेद्य अर्पित करता है।

 

मुख्या या परा-भक्ति भक्ति का एक विकसित रूप है। इसे उच्चतर भक्ति की संज्ञा दी गयी है। यह समस्त परम्पराओं का अतिक्रमण कर जाती है। भक्ति की इस विधा के प्रति आस्थावान् भक्त को किसी विधि-विधान की चिन्ता नहीं रहती। पूजा या उपासना के बाह्य प्रारूप के प्रति वह सर्वथा उदासीन रहता है। वह सर्वत्र और सर्वभूतों में अपने प्रभु के दर्शन करता है। उसका हृदय ईश्वर-प्रेम से ओत-प्रोत रहता है। उसके लिए अखिल विश्व वृन्दावन है। उसकी मनोदशा अनिर्वचनीय होती है और वह परम आनन्द को प्राप्त करता है। वह जहाँ-जहाँ जाता है वहाँ-वहाँ प्रेम, विशुद्धता तथा आनन्द की किरणें विकीर्ण करता रहता है और जो कोई भी उसके सम्पर्क में आता है, उसके लिए वह प्रेरणाप्रद सिद्ध होता है।

 

प्रारम्भ में मूर्ति-पूजा करने वाले भक्त को अब सर्वत्र प्रभु के दर्शन होने लगते हैं और उसकी भक्ति परा-भक्ति का रूप ग्रहण कर लेती है। इसके फलस्वरूप वह वैधी-भक्ति की सीमाओं को पार करके रागात्मिका या प्रेमा-भक्ति के क्षेत्र में प्रविष्ट हो जाता है। उसे सर्वभूतों में ईश्वर की प्रतीति होने लगती है तथा वह शुभ-अशुभ, शिव-अशिव आदि जैसे विचारों से मुक्त हो जाता है। दुष्ट, दस्यु, नाग, वृश्चिक, पिपीलिका, श्वान, वृक्ष, काष्ठ-खण्ड, शैल-राशि, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, अग्नि, जल, पृथ्वी आदि में वह प्रभु का दर्शन करने लगता है। उसकी व्यापक दृष्टि तथा उसका दिव्य अनुभव वर्णनातीत है। ऐसे भक्तों की जय हो जो वस्तुतः भूसुर हैं और जो अन्य प्राणियों को सांसारिक पंक तथा मृत्यु-पाश से विमुक्त कर उन्हें उच्चतर स्थिति प्रदान करते हैं।

 

हिन्दू-धर्म जिज्ञासुओं को क्रमशः भौतिक प्रतीकों से मानसिक प्रतीकों की ओर, विविध मानसिक प्रतीकों से एकमेव सगुण ईश्वर की ओर तथा सगुण ईश्वर से परात्पर निर्गुण ब्रह्म की ओर ले जाता है।

हिन्दू-दर्शन की महिमा तथा हिन्दू-पूजा-पद्धति

 

हिन्दू-दर्शन तथा हिन्दू-पूजा-पद्धति कितनी उदात्त है! इसकी परिसमाप्ति प्रतिमा-पूजन में ही नहीं हो जाती। साधक मूर्ति-पूजा के माध्यम से भक्ति तथा समाधि के उच्च स्तरों तक पहुँच जाता है। मूर्ति-पूजा करते समय भी उसे सर्वव्यापी परमात्मा का ध्यान करना होता है। उसके लिए यह आवश्यक है कि उसे अपने हृदय तथा सर्वभूतों में ईश्वर की विद्यमानता का भान होता रहे। एक लघु प्रतिमा का पूजन करते समय भी उसे पुरुष-सूक्त की आवृत्ति तथा उस सहस्रशीर्ष, सहस्रनेत्र और सहस्रवार विराट् पुरुष का चिन्तन करना होता है जो विश्व में व्याप्त होने के साथ-साथ इसका अतिक्रमण भी कर जाता है और जो नित्य-शुद्ध आत्मा या ईश्वर के रूप में सर्वभूतों में अवस्थित रहता है। जो व्यक्ति मूर्ति के सम्मुख धूप, अगरबत्ती तथा कर्पूर जलाता है, वही यह भी कहता है-"सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा विद्युत् स्वयं दीप्तिमान् नहीं होते। ऐसी स्थिति में एक साधारण अग्नि-स्फुलिंग के लिए प्रकाशपूर्ण होना कैसे सम्भव है? वस्तुतः ये सब 'उसी' के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। अखिल विश्व 'उसी' की दीमि से दीप्तिमान् है।" हिन्दू-शास्त्रों में वर्णित पूजा की विधियाँ तथा उसके रहस्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी निर्भान्त तथा युक्तिसम्मत सिद्ध होते हैं। शास्त्राध्ययन तथा भक्तों एवं महात्माओं के सम्पर्क से वंचित अज्ञानी जन ही मूर्ति-पूजा की निन्दा करते हैं।

 

हिन्दू-धर्म से इतर प्रत्येक अन्य धर्म में कुछ निश्चित मत होते हैं जिनके अनुसरण के लिए लोगों को बाध्य किया जाता है। प्रत्येक ऐसे धर्म के पास सभी रोगों के उपचार के लिए एक ही औषधि होती है। समस्त स्थितियों के लिए तथा समस्त मनुष्यों के लिए एक ही प्रकार के भोजन की व्यवस्था कर दी जाती है। समस्त अनुयायियों के लिए एक ही नाप का वस्त्र होता है। हिन्दू इस तथ्य से अवगत हैं कि मूर्ति, क्रास, द्वितीया का चन्द्रमा आदि प्रतीक मात्र हैं, जो प्रारम्भ में मन की स्थिरता तथा उसकी एकाग्रता के विकास के लिए उत्प्रेरक सिद्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त इन्हें उन विभिन्न खूंटियों की भी संज्ञा प्रदान की गयी है जिन पर वे अपने आध्यात्मिक विचारों तथा अपनी आस्थाओं को लटका सकें। प्रतीक सबके लिए आवश्यक नहीं होता। हिन्दू-धर्म में इसे अनिवार्य नहीं माना गया है। उच्चतर स्थिति में योगियों एवं सन्तों के लिए यह अनावश्यक है। प्रतीक एक स्लेट की भाँति है जो प्रथम कक्षा के बाल-विद्यार्थियों के लिए ही उपयोगी होती है; किन्तु जिन लोगों के लिए यह अनुपयोगी है, उन्हें यह कहने का अधिकार नहीं है कि यह सबके लिए अनुपयोगी है। यदि वे इसे अनुपयोगी या व्यर्थ मानते हैं, तो इससे उनका अज्ञान ही परिलक्षित होता है।

निष्कर्ष

 

प्रारम्भ में मूर्ति-पूजा में कोई दोष नहीं होता। आपके लिए मूर्ति में ईश्वर तथा उसके गुणों का अध्यारोपण करना अनिवार्य है। आपकी चिन्तन-प्रक्रिया में इस तथ्य के लिए एक सुनिश्चित स्थान होना चाहिए कि मूर्ति में अन्तरात्मा निहित है। इसके पश्चात् साधक को शनैः -शनैः यह अनुभव होने लगता है कि उसके उपास्य प्रभु मूर्ति के साथ-साथ सर्वभूतों के हृदयों तथा विश्व के समस्त नाम-रूपों में भी अधिष्ठित हैं। उनकी विद्यमानता की प्रतीति उसे सर्वत्र होने लगती है।

 

मूर्ति-पूजा धर्म का इत्यलम् हो कर इसका प्रारम्भ मात्र है। जो हिन्दू-शास्त्र नव-साधकों के लिए प्रारम्भ में मूर्ति-पूजा की अनुशंसा करते हैं, वही उच्चतर स्थिति के साधकों के लिए असीम या निरपेक्ष सत्ता के ध्यान की तथा 'तत्-त्वम्-असि' आदि महावाक्यों की अर्थवत्ता के चिन्तन की भी अनुशंसा करते हैं।

 

पूजा के विभिन्न सोपान हैं। प्रथम सोपान मूर्ति-पूजा तथा द्वितीय सोपान मन्त्रोच्चारण और प्रार्थना है। पुष्पार्चना की अपेक्षा मानसिक उपासना श्रेष्ठतर है। परम तत्त्व अथवा निर्गुण ब्रह्म का ध्यान सर्वतोत्कृष्ट है।

 

आत्म-साक्षात्कार या ब्रह्म-साक्षात्कार सर्वोच्च स्थिति है। ध्यान का स्थान द्वितीय है। योगी परमात्म-तत्त्व पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करता है। उसके इस प्रयास में नैरन्तर्य होता है। मूर्ति-पूजा को तृतीय तथा यज्ञीय अनुष्ठानों एवं तीर्थाटन को चतुर्थ स्थान प्राप्त है। शास्त्र और गुरु दयामयी माता के समान हैं। वे साधकों के हाथ पकड़ कर पग-पग पर उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं और अपने इस अभियान में उस समय तक सक्रिय रहते हैं, जब तक साधक निर्विकल्प-समाधि को नहीं प्राप्त हो जाते। वे स्थूल-बुद्धि वाले नव-दीक्षित साधकों के लिए साधना की स्थूल विधियों का निर्धारण करते और विशुद्ध, सूक्ष्म तथा कुशाग्र बुद्धि से सम्पन्न उच्चतर स्थिति के साधकों को अमूर्त ध्यान की विधि का प्रशिक्षण देते हैं।

 

इनमें से प्रत्येक आध्यात्मिक प्रगति के एक विशेष चरण की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है। मानवीय आत्मा अपनी शक्ति तथा अपने क्रमविकास की न्यूनाधिक मात्रा के अनुरूप असीम या निरपेक्ष सत्ता को ग्रहण करने या उसका साक्षात्कार करने के लिए विभिन्न विधियों