हिन्दूतत्व-विवेचन

 

ALL ABOUT HINDUISM

 

का हिन्दी अनुवाद

 

 

 

लेखक

श्री स्वामी शिवानन्द समर्पण

 

 

 

 

 

 

 

अनुवादिका

डा. स्वर्णलता अग्रवाल

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रकाशक

 

डिवाइन लाइफ सोसायटी

पत्रालय : शिवानन्दनगर-२४९१९२

जिला : टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड (हिमालय), भारत

www.sivanandaonline.org, www.dlshq.org

प्रथम हिन्दी संस्करण : २०००

 

द्वितीय हिन्दी संस्करण: २००७

 

तृतीय हिन्दी संस्करण : २०१७

(,००० प्रतियाँ)

 

 

 

 

 

© डिवाइन लाइफ ट्रस्ट सोसायटी

 

 

 

 

 

 

HS 292

 

PRICE: 160/-

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

' डिवाइन लाइफ सोसायटी, शिवानन्दनगर' के लिए

स्वामी पद्मनाभानन्द द्वारा प्रकाशित तथा उन्हीं के द्वारा 'योग-वेदान्त

फारेस्ट एकाडेमी प्रेस, पो. शिवानन्दनगर, जि. टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड,

पिन २४९ १९२  में मुद्रित

For online orders and Catalogue visit: disbooks.org

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

समर्पण

 

उन सबको-

जिन्हें हिन्दूतत्त्व तथा

इसके उदात्त दर्शन से प्रेम है

और जो इसकी शिक्षाओं

का अनुसरण करते हैं !

 

 

 

प्रकाशकीय

 

हिन्दू-धर्म वस्तुतः समस्त धर्मों का स्रोत है। इसमें सभी धर्मों का बीज समाहित है। इसमें समस्त धर्मों का समावेश है, कोई भी धर्म इसकी परिधि से बाहर नहीं है।

 

सार्वभौमिक स्तर पर प्रभावकारी इस हिन्दूतत्त्व के प्रति जगत् के लोगों की रुचि होना स्वाभाविक ही है।

 

यह पुस्तक हिन्दूतत्त्व-रूपी स्फटिक के विभिन्न पहलुओं से परिचित होने की जिज्ञासा रखने वाले पाठकों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। इस पुस्तक का अँगरेजी संस्करण सर्वप्रथम सन १९४७ में 'ऑल अबाउट हिन्दूइज्म' (All About Hinduism) नाम से प्रकाशित हुआ था। प्रस्तुत पुस्तक सन् १९९३ में प्रकाशित इसके पाँचवें परिवर्धित संस्करण का हिन्दी अनुवाद है।

 

हम आशा करते हैं कि हिन्दूतत्त्व तथा इसके दार्शनिक पक्षों में रुचि रखने वाले हिन्दी भाषा-भाषी पाठकों के लिए यह हिन्दी संस्करण रुचिकर तथा उपयोगी सिद्ध होगा।

 

- डिवाइन लाइफ सोसायटी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विश्व-प्रार्थनाएँ

 

 

हे स्नेह और करुणा के आराध्य देव!

तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है।

तुम सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ हो

तुम सच्चिदानन्दघन हो

तुम सबके अन्तर्वासी हो।

 

हमें उदारता, समदर्शिता और मन का समत्व प्रदान करो।

श्रद्धा, भक्ति और प्रज्ञा से कृतार्थ करो।

हमें आध्यात्मिक अन्तःशक्ति का वर दो,

जिससे हम वासनाओं का दमन कर मनोजय को प्राप्त हों।

हम अहंकार, काम, लोभ, घृणा, क्रोध और द्वेष से रहित हों।

हमारा हृदय दिव्य गुणों से परिपूरित करो।

 

हम सब नाम-रूपों में तुम्हारा दर्शन करें।

तुम्हारी अर्चना के ही रूप में इन नाम-रूपों की सेवा करें।

सदा तुम्हारा ही स्मरण करें।

सदा तुम्हारी ही महिमा का गान करें।

तुम्हारा ही कलिकल्मषहारी नाम हमारे अधर-पुट पर हो।

सदा हम तुममें ही निवास करें

 

 

हे अदृश्य प्रभु! हे आराध्य देव! हे परमेश्वर! आप अनन्त आकाश से ले कर घास के छोटे-से तिनके तक इस असीम विश्व में व्याप्त हैं। आप मेरी आँखों के तारे हैं, मेरे हृदय के प्रेम हैं। मेरे जीवन के प्राण हैं; मेरे आत्मा के दिव्य तत्त्व हैं; मेरी बुद्धि तथा इन्द्रियों के प्रदीपक हैं; मेरे हृदय के मधुर अनाहत संगीत हैं और मेरे स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीरों के आधार हैं।

 

मैं एकमात्र आपको ही इस विश्व के सर्वशक्तिमान् शासक और मेरे तीनों शरीरों का अन्तर्यामी मानता हूँ। मेरे प्रभु! मैं आपको बारम्बार साष्टांग प्रणाम करता हूँ। आप ही मेरे एकमात्र आश्रय तथा अवलम्ब हैं। मेरी आस्था आप ही पर केन्द्रित है। हे प्रेम और करुणा के सागर! मेरा उत्थान करें! मुझे प्रबुद्ध करें! मेरा मार्ग-दर्शन करें तथा मेरी रक्षा करें! मेरे आध्यात्मिक पथ की बाधाएँ दूर करें तथा अज्ञानावरण को विदूरित करें! हे जगद्गुरु! मैं इस जीवन के, इस देह के और इस संसार के कष्ट एक क्षण के लिए भी अब और अधिक सहन नहीं कर पा रहा हूँ। हे प्रभु! शीघ्र दर्शन दें! मैं आपके लिए लालायित हूँ, मैं द्रवित हो चला हूँ। मेरी भाव-प्रवण, आन्तरिक प्रार्थना सुनें, सुनें। निष्ठुर बनें, मेरे स्वामी! आप दीनबन्धु हैं, अधम उद्धारक हैं, पतितपावन हैं।

 

 

सर्वेषां स्वस्ति भवतु

सर्वेषां शान्तिर्भवतु

सर्वेषां पूर्ण भवतु

सर्वेषां मंगलं भवतु

 

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिदुःखभाग्भवेत् ।।

 

असतो मा सद्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

मृत्योर्मा अमृतं गमय

 

शान्तिः शान्तिः शान्तिः

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विषय-सूची

 

प्रकाशकीय. 4

विश्व-प्रार्थनाएँ. 5

प्रथम अध्याय. 12

हिन्दूतत्त्व पर एक विहंगम दृष्टि... 12

धर्म का उद्देश्य... 12

हिन्दू-धर्म की विशेषताएँ. 12

योग और वेदान्त की महिमा.. 14

अभ्यास पर बल. 14

हिन्दू कौन है ?. 15

'हिन्दू' शब्द का उद्भव और महत्त्व... 16

भारत की आध्यात्मिक भूमि.. 17

ऐतिहासिक तथ्य... 18

हिन्दू-धर्म की उत्तरजीविता के कारण.. 19

इसका भविष्य... 19

द्वितीय अध्याय. 20

हिन्दू-धर्मग्रन्थ... 20

संस्कृत साहित्य... 20

धर्मग्रन्थ... 20

ऐहिक साहित्य... 37

तृतीय अध्याय. 39

हिन्दू-धर्म के विविध रूप. 39

धर्म की परिभाषा.. 39

वेदों की एकमात्र प्रामाणिकता.. 40

परिवर्तनशील धर्म. 41

अन्य धर्मों में धर्माचरण.. 41

धर्माचरण के लाभ. 41

धर्म के भेद. 42

सनातन-धर्म. 42

सामान्य-धर्म. 44

वर्णाश्रम-धर्म. 48

युग-धर्म. 56

उपसंहार. 57

चतुर्थ अध्याय. 58

हिन्दू-आचार-नीति.. 58

आचरण और चरित्र. 58

आचार-नीति अर्थात् आचरण-विज्ञान. 58

आचार-नीति, आध्यात्मिकता और धर्म. 59

आचार-नीति का अभ्यास करने के लाभ. 59

हिन्दू-धर्म में आचार-नीति की संहिताएँ. 60

हिन्दू-आचार-नीति के मौलिक सिद्धान्त... 60

उपासना के रूप सेवा.. 61

आचार-नीति के संवर्धन अथवा शोधन की प्रक्रिया.. 62

औचित्य तथा अनौचित्य का दर्शन. 63

यौगिक उद्यानकर्म. 66

उपसंहार. 67

पंचम अध्याय. 68

हिन्दू-सिद्धान्त... 68

कर्म का सिद्धान्त... 68

पुनर्जन्म का सिद्धान्त... 73

अवतार की अवधारणा.. 76

षष्ठ अध्याय. 78

हिन्दू-कर्मकाण्ड... 78

सन्ध्योपासना.. 78

दश शास्त्रोक्त संस्कार. 82

पंच-महायज्ञ.. 86

श्राद्ध और तर्पण.. 88

पितृ-पक्ष और महालया अमावस्या.... 90

नवरात्र या नौ-दिवसीय देवी-पूजन. 92

सप्तम अध्याय. 96

हिन्दू-उपासना.. 96

उपासना.. 96

उपासना की उपलब्धियाँ.. 96

सगुणोपासना तथा निर्गुणोपासना.. 98

भक्तियोग में भाव. 98

पूजा तथा इष्टदेवता.. 99

मूर्ति-पूजा का दर्शन तथा महत्त्व... 101

कर्मकाण्डीय (वैधी) भक्ति से परा-भक्ति की ओर. 109

हिन्दू-दर्शन की महिमा तथा हिन्दू-पूजा-पद्धति.. 110

निष्कर्ष. 111

अष्टम अध्याय. 113

हिन्दू-योग. 113

चार मार्ग. 113

कर्मयोग. 113

भक्तियोग. 114

राजयोग. 116

ज्ञानयोग. 118

समन्वययोग. 120

नवम अध्याय. 122

हिन्दू-धर्मविज्ञान. 122

हिन्दू-धर्मविज्ञान-विषयक वर्गीकरण.. 122

वैष्णव. 123

शैव. 127

शाक्त... 128

कुछ अन्य सम्प्रदाय. 129

आर्यसमाजी तथा ब्रह्मसमाजी.. 129

साधु तथा संन्यासी.. 129

दशम अध्याय. 134

हिन्दू पौराणिकी तथा प्रतीक.. 134

हिन्दू पौराणिकी.. 134

हिन्दू-प्रतीक.. 136

निष्कर्ष. 143

एकादश अध्याय. 145

हिन्दू-दर्शन-. 145

दर्शन : इसका उद्भव तथा इसकी सीमाएँ. 145

भारतीय दर्शन की शास्त्रसम्मत तथा शास्त्रविरुद्ध शाखाएँ. 147

षड्-दर्शन अथवा छह शास्त्रसम्मत मतवाद. 147

न्याय. 150

वैशेषिक.. 154

सांख्य.... 159

पुरुष की सत्ता का अनुमान. 165

योग. 171

पूर्वमीमांसा.. 177

उत्तरवर्ती मीमांसक.. 180

वेदान्त-दर्शन. 181

द्वादश अध्याय. 185

हिन्दू-दर्शन-. 185

शंकर का अद्वैत-दर्शन. 187

श्री रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत-दर्शन. 190

श्री मध्वाचार्य का द्वैत-दर्शन. 195

श्री निम्बार्क का द्वैताद्वैत-दर्शन. 199

श्री वल्लभ का शुद्धाद्वैत-दर्शन. 205

श्री चैतन्य का अचिन्त्य-भेदाभेद-दर्शन. 210

त्रयोदश अध्याय. 216

(शैव-सिद्धान्त तथा शाक्त-मत) 216

शैव-सिद्धान्त-दर्शन. 216

शक्ति-योग-दर्शन. 219

चतुर्दश अध्याय. 227

उपसंहार. 227

एकता : एक तात्कालिक आवश्यकता.. 227

धर्म की सेवा का सुयोग्य अधिकारी कौन है?. 228

शिक्षा तथा राष्ट्र-निर्माण.. 229

राष्ट्र के संगठन के लिए आह्वान. 232

परिशिष्ट-. 233

शिव-लिंग. 233

परिशिष्ट-. 235

भगवद्गीता : भारतीय संस्कृति की आधारशिला.. 235

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रथम अध्याय

हिन्दूतत्त्व पर एक विहंगम दृष्टि

 

सच्चिदानन्द को मौन प्रणाम जो समस्त मनों का मौन साक्षी है; जो अन्तर्यामी है; जिसने अपनी लीला के लिए इस विश्व को रचा है; जो इस विश्व का, शरीर और मन का तथा समस्त गतिविधियों का आश्रय है तथा जो समस्त संगठनों एवं उनके कार्यकलापों का आधार है।

धर्म का उद्देश्य

 

धर्म को अँगरेजी भाषा में 'रिलीजन' (Religion) कहते हैं। रिलीजन लैटिन शब्द 'रेलिजिओ' से बना है। 'रेलिजिओ' में दो शब्द हैं-'रि' (पीछे) तथा 'लिगेअर' (लाना या बाँधना) जो आत्मा को परमात्मा से पुनः बाँध देता या सम्बद्ध कर देता है, वह धर्म है। धर्म ईश्वर-साक्षात्कार का मार्ग दर्शाता है।

 

धर्म उन मानवों की गहन आन्तरिक आकांक्षा की पूर्ति करता है जो केवल पशुओं के समान जीवन-यापन करने मात्र से सन्तुष्ट नहीं होते तथा आध्यात्मिक आश्वासन, आश्रय और शान्ति चाहते हैं। मनुष्य केवल रोटी पर जीवित नहीं रह सकता। हममें से बहुतों के जीवन में एक समय आता है जब केवल सांसारिक सुखों से सन्तुष्ट हो कर हम 'कुछ और' के लिए छटपटाते हैं। कई लोगों के जीवन में विपत्तियाँ और परेशानियाँ उनका ध्यान आध्यात्मिकता से प्राप्त होने वाली सान्त्वना की ओर प्रवृत्त कर देती हैं।

हिन्दू-धर्म की विशेषताएँ

 

एक अपौरुषेय धर्म

 

हिन्दू-धर्म सार्वभौमिक धर्म है जो भारत में सर्वाधिक प्रचलित हुआ। यह समस्त जीवन्त धर्मों में प्राचीनतम है। यह किसी धर्मप्रवर्तक के द्वारा स्थापित नहीं किया गया। ईसाई, बौद्ध और इस्लाम धर्मप्रवर्तकों द्वारा चलाये गये थे। उनके उद्भव की तिथियाँ निश्चित हैं; परन्तु हिन्दू-धर्म के लिए ऐसी कोई तिथि निश्चित नहीं की जा सकती। प्रवर्तकों के उपदेशों से हिन्दू-धर्म की उत्पत्ति नहीं हुई; यह विशिष्ट गुरुओं द्वारा बताये हुए विशिष्ट सिद्धान्तों पर आधारित नहीं है। यह धार्मिक मतान्धता से मुक्त है।

 

हिन्दू-धर्म को सनातन-धर्म तथा वैदिक-धर्म भी कहते हैं। सनातन धर्म का अर्थ है शाश्वत धर्म। हिन्दू-धर्म उतना ही प्राचीन है जितना कि संसार। हिन्दू-धर्म सब धर्मों का जन्मदाता है। हिन्दू-धर्म-ग्रन्थ विश्व के प्राचीन ग्रन्थ हैं। हिन्दू-धर्म को केवल शाश्वत होने के कारण ही सनानत-धर्म नहीं कहा जाता, प्रत्युत् इसलिए भी कि यह ईश्वर द्वारा रक्षित है और यह हमें शाश्वत बना सकता है।

 

वैदिक-धर्म का अर्थ है वेदों का धर्म। वेद हिन्दू-धर्म के आधारभूत ग्रन्थ हैं। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने उपनिषदों में अपनी अन्तर्शात आध्यात्मिक (अपरोक्ष) अनुभूतियाँ व्यक्त की हैं। ये अनुभव साक्षात् और अचूक हैं। हिन्दू-धर्म में पुरातन ऋषियों की इन अनुभूतियों को अपनी प्रामाणिकता का आधार माना जाता है। अनादि काल से हिन्दू ऋषि-मुनियों द्वारा प्राप्त अमूल्य सत्य हिन्दू-धर्म का गौरव हैं; अतएव हिन्दू-धर्म एक अपौरुषेय धर्म है।

 

स्वतन्त्रता का धर्म

 

हिन्दू धर्म में यह दुराग्रह नहीं है कि केवल इसी के द्वारा मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है, अन्य किसी धर्म के द्वारा नहीं। यह ध्येय के लिए साधन मात्र है और सभी साधन जो अन्ततः एक लक्ष्य पर ले जाते हैं, वे समान रूप से मान्य हैं।

 

हिन्दू-धर्म मनुष्य के विवेकशील मस्तिष्क को पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान करता है। यह मानवीय तर्क की तथा मानव के विचार, भाव और आकांक्षा की स्वतन्त्रता पर अनुचित रोक नहीं लगाता। और उपासना के क्षेत्रों में यह सर्वाधिक स्वतन्त्रता प्रदान करता है। हिन्दू-धर्म स्वतन्त्रता का धर्म है। ईश्वर की प्रकृति, आत्मा, सृष्टि, उपासना का रूप और जीवन का लक्ष्य आदि प्रश्नों के सम्बन्ध में यह मानवीय तर्क और हृदय को पूर्ण स्वतन्त्रता देता है। सिद्धान्त विशेष की स्वीकृति अथवा कोई विशेष कर्मकाण्ड अथवा उपासना हिन्दू-धर्म नहीं है। यह विशेष सिद्धान्तों या उपासना के विशिष्ट रूपों को स्वीकार करने के लिए किसी को विवश नहीं करता। यह प्रत्येक व्यक्ति को चिन्तन करने, अनुसन्धान करने और विचार करने की स्वतन्त्रता देता है। अतएव सब प्रकार की धार्मिक आस्थाएँ, उपासना या साधना के विभिन्न रूप, कर्मकाण्ड एवं रीतिरिवाजों के अनेक प्रकार-सभी को हिन्दू धर्म में साथ-साथ सम्माननीय स्थान प्राप्त हुआ है और सभी में पारस्परिक सद्भावपूर्ण सम्बन्ध रहा है। इसी रूप में वे संस्कृत एवं विकसित हुए हैं।

 

जो व्यक्ति ईश्वर को सृष्टिकर्ता और शासक नहीं मानते, जो शाश्वत आत्मा के अस्तित्व अथवा मोक्ष की स्थिति को स्वीकार नहीं करते, हिन्दू-धर्म उनकी उपेक्षा नहीं करता। हिन्दू-धर्म ऐसे विचार वालों को भी हिन्दू-धर्म-समाज के सम्माननीय सदस्य मानता है।

 

हिन्दुओं का धार्मिक आतिथ्य लोकप्रसिद्ध है। हिन्दू धर्म अत्यन्त उदार है। यह हिन्दू-धर्म की मौलिक विशिष्टता है। हिन्दू-धर्म समस्त धर्मों का मान करता है। वह किसी अन्य धर्म से द्वेष नहीं करता। वह सत्य का किसी भी स्वरूप में मान करता है और उसे स्वीकार करता है।

 

भारत में अन्य धर्मों के अनुयायी प्रचुर संख्या में हैं; तथापि हिन्दू लोग उन सबके साथ सद्भाव, शान्ति और मित्रता से रहते हैं। अन्य धर्मों के अनुयायियों के साथ उनकी सहिष्णुता और सौहार्दभाव सराहनीय हैं।

 

तात्त्विक सिद्धान्तों, धार्मिक अनुशासन के ढंगों, कर्मकाण्ड की क्रियाओं एवं हिन्दू-समाज में प्रचलित सामाजिक आदतों में भेद होते हुए भी हिन्दुओं के समस्त वर्गों में धर्म की संकल्पना और जीवन तथा जगत् के प्रति दृष्टिकोण में एक अनिवार्य समानता है।

योग और वेदान्त की महिमा

 

वेदान्त (अथवा उपनिषदों का दर्शन) उच्च, उत्कृष्ट तथा असाधारण है। पाश्चात्य दार्शनिकों ने भी उपनिषदों के ऋषि-मनीषियों के प्रति सम्मान प्रकट किया है। वे उनके व्यक्तित्व की ऊँचाइयों को देख कर चकित रह गये हैं। शोपेनहावर नित्य उपनिषदों का अध्ययन करते और सोने से पूर्व उनमें निहित विचारों पर मनन करते थे। उन्होंने कहा है- "उपनिषद् मेरे जीवन में सान्त्वना के स्रोत हैं और वे मुझे मृत्यु के उपरान्त भी शान्ति प्रदान करेंगे।"

 

हिन्दू-धर्म में राजयोग की पद्धति विशिष्ट एवं अनुपम है। उसके उपदेश अत्यन्त व्यावहारिक और शिक्षाप्रद हैं। विश्व की कोई भी शारीरिक व्यायाम की विद्या हठयोग से प्रतियोगिता नहीं कर सकती। कुण्डलिनीयोग अद्भुत है। इसी कारण अमरीका और यूरोप के निवासी हिन्दू-संन्यासियों एवं योगियों की खोज में रहते हैं। वे बहुधा योग-शिक्षकों की खोज में हिमालय जाते हैं। कुछ तो हिन्दू-योगियों के शिष्य बन योगाभ्यास कर रहे हैं। यूरोप और अमरीका के अधिकांश लोग अब भी विश्वास और अभ्यास से हिन्दू हैं, यद्यपि वे जन्म से ईसाई हैं। वे राजयोग और वेदान्त का अभ्यास करते हैं।

अभ्यास पर बल

 

हिन्दू-धर्म में सब प्रकार के लोगों के लिए उनके स्वभाव, सामर्थ्य, रुचि, आध्यात्मिक विकास के स्तर तथा जीवन की परिस्थितियों के अनुसार आध्यात्मिक भोजन एवं योग-साधना की व्यवस्था है। अपना सामान्य व्यवसाय करने वाले मेहतर और मोची तक के लिए आत्मसाक्षात्कार हेतु योग साधना बतलायी गयी है। हिन्दू योग और वेदान्त के शिक्षक आत्म-संयम, तप, वैराग्य और व्यावहारिक साधना पर विशेष बल देते हैं; क्योंकि इनसे मन और इन्द्रियों पर नियन्त्रण प्राप्त करने, दिव्य शक्तियों को प्रकट करने अथवा आत्मसाक्षात्कार करने में बहुत सहायता मिलती है। हिन्दू-धर्म मात्र सिद्धान्तों का धर्म नहीं है। यह मुख्य रूप से व्यावहारिक है। किसी अन्य धर्म में आपको व्यावहारिक योग की इतनी विविधता और इतना उत्कृष्ट असाधारण दर्शन नहीं मिलेगा। यही कारण है कि भारत ही सन्तों, ऋषियों, योगियों और साधुओं की महान् भूमि रहा है।

 

धर्म दर्शन का व्यावहारिक स्वरूप है। दर्शन धर्म का बुद्धिसंगत पक्ष है। हिन्दू-धर्म का दर्शन सुगम दर्शन नहीं है। यह बौद्धिक उत्सुकता शान्त करने और व्यर्थ के वाद-विवाद के लिए भी नहीं है। हिन्दू-दर्शन जीवन की एक शैली है। हिन्दू-दार्शनिक श्रुतियों को सुन कर गम्भीरता से मनन करता है, आत्मविचार करता है, निरन्तर ध्यान करता है और तब आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करता है। उसका लक्ष्य मोक्ष होता है। वह अभी और यहीं जीवन्मुक्ति प्राप्त करने का प्रयास करता है।

 

एक हिन्दू के लिए धर्म मानव-जीवन का अध्यात्मीकरण है। उसके लिए धार्मिक संस्कृति ही वास्तविक स्वतन्त्रता की संस्कृति है। धर्म हिन्दू-जीवन के समस्त पक्षों का संचालन करता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मानव को आत्मा की स्वतन्त्रता की अनुभूति प्राप्त कर लेनी चाहिए। वास्तविक स्वतन्त्रता की संस्कृति हेतु सर्वाधिक अवसर धर्म में ही निहित है। जीवन में पूर्ण स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए धर्म ही एकमात्र साधन है।

 

केवल भारतवर्ष में ही ऐसा है कि प्रत्येक व्यक्ति को दर्शन के विषय में न्यूनाधिक ज्ञान है। पशुओं को चराने वाला ग्वाला, खेतों में हल चलाने वाला किसान, नाव चलाने वाला नाविक भी दार्शनिक सत्यों को प्रकट करने वाले गीत गाता है। नाई तक अपना उस्तरा उठाने से पूर्व ' नमः शिवाय', 'शिवोऽहम्' आदि मन्त्रों का उच्चारण करता है। परमहंस संन्यासियों (जो हिन्दू-धर्म के भ्रमणशील सन्त रहे हैं) ने घर-घर जा कर सर्वोच्च वेदान्त की शिक्षा का प्रचार किया है। मुट्ठीभर चावल के बदले में उन्होंने धार्मिक गीतों के माध्यम से हिन्दू धर्म और दर्शन के हीरे मोती घर-घर बाँटे हैं।

हिन्दू कौन है ?

 

सनातनधर्म-सभा की एक गोष्ठी में लोकमान्य तिलक ने कहा था- जो यह मानता है कि वेदों में स्वयंसिद्ध और स्वतः प्रमाण सत्य निहित हैं, वह हिन्दू है।"

 

हिन्दू महासभा ने एक और परिभाषा दी है- "जो व्यक्ति भारतवर्ष में उद्भूत धर्म में विश्वास करता है, वह हिन्दू है।"

 

कुछ लोगों के अनुसार- "जो मृतक का दाहसंस्कार करते हैं, वे हिन्दू हूँ।" एक अन्य परिभाषा के अनुसार- "हिन्दू वह है जो गौ और ब्राह्मण की रक्षा करता है।"

 

कुछ कहते हैं-"भारत को अपनी मातृभूमि और पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्थान मानने वाले हिन्दू हैं।"

 

अन्य कुछ लोग कहते हैं-"जो व्यक्ति अपने-आपको हिन्दू मानता और कहता है, वह हिन्दू है।"

 

कुछ लोग परिभाषा करते हैं- "जो व्यक्ति वेदों, स्मृतियों, पुराणों और तन्त्रों को धर्म का मूल एवं आचरण के नियमों का आधार मानता है तथा एकमात्र परब्रह्म, कर्म के सिद्धान्त अथवा प्रतिफलात्मक न्याय एवं पुनर्जन्म में आस्था रखता है, वह हिन्दू है।"

 

"जो वैदिक अथवा सनातन धर्म का अनुयायी है, वह हिन्दू है।" यह एक अन्य परिभाषा है।

 

"वेदान्त का अनुयायी हिन्दू है।" यह भी हिन्दू की एक परिभाषा है।

 

कुछ सुसंस्कृत विद्वानों के अनुसार- "कर्म के सिद्धान्त, पुनर्जन्म, अवतार, पितृ-पूजा, वर्णाश्रम-धर्म, वेद, ईश्वर के अस्तित्व में जिसे पूर्ण विश्वास है, जो वेदों की शिक्षाओं को पूर्ण आस्था से और मन लगा कर व्यवहार में लाता है, जो सन्ध्या, श्राद्ध, पितृ-तर्पण और पंचमहायज्ञ करता है, जो वर्णाश्रम-धर्म का पालन करता है, जो अवतारों की उपासना करता और वेदों का अध्ययन करता है, वह हिन्दू है।"

 

यही परिभाषा पूर्ण तथा सही है।

'हिन्दू' शब्द का उद्भव और महत्त्व

 

महान् आर्य-प्रजाति का वह समूह जो दरों के मार्ग से मध्य एशिया से भारत में आया, सर्वप्रथम सिन्धु नदी के पास के जनपदों में बस गया था। पारसी लोग 'सिन्धु' शब्द का उच्चारण 'हिन्दू' करते हैं और वे अपने आर्य भाइयों को 'हिन्दू' कह कर पुकारने लगे। हिन्दू सिन्धु का अपभ्रंश है।

 

हिन्दू आर्य गंगा के मैदानी क्षेत्र में फैल गये, तब पारसियों ने पंजाब और वाराणसी के बीच के समस्त क्षेत्र को 'हिन्दुस्तान' (हिन्दुओं के रहने का स्थान) नाम दे दिया।1

 

संस्कृत-साहित्य में प्रयुक्त हिन्दुस्तान का प्राचीन नाम है भारतवर्ष अथवा भरतखण्ड। यह नाम राजा भरत के नाम पर पड़ा। भरत प्राचीन काल में एक बहुत बड़े भूभाग पर शासन करता था। मनु ने समस्त केन्द्रीय हिमालय और विन्ध्य पर्वतों के मध्य के भाग को 'आर्यावर्त' (अर्थात् आर्यों का निवास-स्थान) नाम दिया। सम्पूर्ण भारत के लिए एक दूसरा नाम है जम्बूद्वीप। ग्रीक लोगों ने इस समूचे देश को 'इंडु' नाम दिया; इसी कारण समस्त यूरोप में 'इंडिया' नाम प्रसिद्ध हो गया।

 

'हिन्दू' शब्द मात्र नाम नहीं है। 'हिन्दू' नाम केवल केवल भौगोलिक महत्त्व का ही नहीं है, वरन् राष्ट्रीय और प्रजातीय महत्त्व का है। आरम्भ से ही हमारे राष्ट्र का समस्त इतिहास इससे सम्बद्ध रहा है। हमारे समग्र विचार और आदर्श इस नाम के साथ इतनी घनिष्टता से सम्बन्धित हैं कि इसकी एक सरल परिभाषा करना कठिन होगा। कवियों, पैगम्बरों और अवतारों ने इस नाम की महिमा गायी है। ऋषि-मुनि और सन्तों ने इस राष्ट्र के लिए शास्त्रों एवं दर्शनों की रचना करने हेतु जन्म लिया। वीरों और योद्धाओं ने इसकी प्रतिष्ठा के लिए अपने प्राण निछावर कर दिये। धर्मनिष्ठा, श्रेष्ठता, उदारता, दर्शन, धार्मिक प्रवृत्ति, योग, धार्मिक सहिष्णुता, प्रज्ञा, भक्ति, वैराग्य, आत्मसाक्षात्कार, सत्य, अहिंसा और शुचिता-ये सब 'हिन्दू' नाम से सम्बद्ध हैं।

 

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नवीन शोधों के अनुसार आर्य-प्रजाति के लोग बाहर से नहीं आये थे। वे भारत के मूल निवासी थे।

भारत की आध्यात्मिक भूमि

 

भारतवर्ष वह पावन भूमि है जिसने असंख्य ऋषियों, मुनियों, योगियों, सन्तों और पैगम्बरों को जन्म दिया है। इसने शंकर, श्री रामानुज जैसे आध्यात्मिक आचार्यों; कबीर, रामदास, तुकाराम, गौरांग महाप्रभु जैसे सन्तों; ज्ञानदेव, दत्तात्रेय, सदाशिवब्रह्मेन्द्र जैसे योगियों और बुद्ध एवं नानक जैसे पैगम्बरों को जन्म दिया। बुद्ध हमारे ही रक्त-मांस हैं।

 

भारत को गुरु गोविन्दसिंह तथा शिवाजी पर, राजा भोज और विक्रमादित्य पर, शंकर और कबीर पर, वाल्मीकि और कालिदास पर गर्व है। कृष्ण, राम एवं समस्त अवतारों ने भारत में जन्म लिया। कितना पवित्र है भारतवर्ष ! कितना भव्य है भारत ! वृन्दावन और अयोध्या की धरती की धूलि जिस पर कृष्ण और राम ने पावन चरण रखे, अब भी असंख्य लोगों के हृदयों को पवित्र करती है। महात्मा ईसामसीह ने भी अपने जीवन के अज्ञात काल में कश्मीर में रह कर भारतीय योगियों से योग सीखा था। धन्य है भारतभूमि!

 

भारतवर्ष आध्यात्मिक देश है। भारत ने कभी दूसरे देशों पर विजय प्राप्त करके उन पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं किया। सैनिक-विजय कभी उसका आदर्श नहीं रहा। उसकी सदैव यही कामना रही है कि उसके वासी आत्म-स्वराज्य अथवा पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त करें। भारत माता कभी दूसरों पर शासन करने के लिए नहीं कहती। वह चाहती है कि उसकी सन्तान बाह्य और आन्तरिक प्रकृति पर विजय प्राप्त करे; दिव्य गुण, नैतिक ऊर्जस्विता एवं आत्म-प्रज्ञा-जनित आन्तरिक आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न हो। आध्यात्मिक विजय और दूसरों के मन पर विजय प्राप्त करने हेतु उसका शस्त्र है-अहिंसा।

 

भारतवासियों का लक्ष्य है आत्मसाक्षात्कार। वे भौतिक समृद्धि और उन्नति को अधिक महत्त्व नहीं देते। उन्हें चाहिए योग (अथवा परम सत्ता के साथ सम्पर्क) वे अहिंसा, सत्य और ब्रह्मचर्य का अभ्यास कर परम साक्षात्कार करने के लिए किसी भी वस्तु का, सर्वस्व का, समस्त सांसारिक उपलब्धियों का त्याग करने के लिए उद्यत रहते हैं। उनकी प्रवृत्ति सदा आध्यात्मिक रहती है।

 

भारत की पावन भूमि में अनेक पवित्र नदियाँ बहती हैं। यहाँ शक्तिशाली आध्यात्मिक तरंगें समायी हुई हैं। श्वेत बर्फ से आच्छादित पुरातन हिमालय समग्र विश्व के लोगों को आकर्षित करता है। यह भूमि विशेष रूप से ध्यान, चिन्तन और योगाभ्यास के लिए उपयुक्त है। भारतवर्ष योगियों और सन्तों का देश है-यह भारत की एक विशिष्टता है जो दूसरों को आकर्षित करती है। यही कारण है कि अमरीका, इंग्लैण्ड और विश्व के प्रत्येक भाग से लोग योगाभ्यास के लिए भारत आते हैं।

ऐतिहासिक तथ्य

 

भारतवर्ष विश्व में सर्वाधिक सहिष्णु देश है। इसका हृदय अति उदार है। अपने स्नेहालिंगन में इसने समस्त राष्ट्रों को समाहित कर लिया है।

 

पाश्चात्य जातियाँ मूल हिन्दुओं अथवा आर्यों की ही वंशज हैं। वे आर्यों तथा हिन्दू-संस्कृत से अपने पुराने सम्बन्धों को भूल गये होंगे; परन्तु इतिहास इन्हें नहीं भुलायेगा। हिन्दू-संस्कृति की आश्रय भारत माता समुद्र पार रहने वाली अपनी सन्तानों को नहीं भूल सकती। वे उसे सदैव प्रिय हैं।

 

प्राचीन काल में हिन्दू-संस्कृति और हिन्दू-सभ्यता अपनी पराकाष्ठा पर थी। ग्रीस तथा रोम के निवासियों ने हिन्दुओं का अनुकरण करके उनके विचारों को ग्रहण कर लिया। किसी भी धर्म में इतने महान् सन्त, महात्मा, योगी, ऋषि, महर्षि, पैगम्बर, आचार्य, परोपकारी, योद्धा, कवि, राजनीतिज्ञ और नरेश नहीं हुए जितने हिन्दू-धर्म में। देश के प्रत्येक प्रान्त ने बुद्धिजीवियों, कवियों और सन्तों को जन्म दिया है। अभी तक भारतवर्ष में ऋषि, दार्शनिक, सन्त और उच्च श्रेणी के बुद्धिमानों की प्रचुरता है। अभी भी यहाँ सन्त-महात्माओं का बाहुल्य है।

 

हिन्दुओं को युद्ध, कठिनाइयों, विपत्तियों और क्रूरता का सामना करना पड़ा। फिर भी वे जीवित हैं। किसी रहस्यात्मक शक्ति ने उनकी रक्षा की है, किसी अदृश्य शक्ति ने उन्हें बचाया है। वही शक्ति सदा उनकी रक्षा करेगी।

हिन्दू-धर्म की उत्तरजीविता के कारण

 

हिन्दू-धर्म तो तपश्चर्या है मायावाद, बहुदेववाद है और सर्वेश्वरवाद। यह सब प्रकार के धार्मिक अनुभवों का समन्वय है। यह जीवन का एक सम्पूर्ण दृष्टिकोण है। इसमें हैं व्यापक सहिष्णुता, मानवता की गहराइयाँ और उच्च आध्यात्मिक ध्येय। यह धर्मोन्माद से मुक्त है। इसीलिए यह विश्व के अन्य महान् धर्मों के अनुयायियों के आक्रमणों के पश्चात् भी जीवित है।

 

कोई भी धर्म इतना उदार और सहिष्णु नहीं जितना हिन्दू-धर्म। हिन्दू-धर्म अपने मूल-तत्त्वों के विषय में अत्यन्त कठोर है; परन्तु बाह्य तथा अतात्त्विक स्वरूपों में पुनर्व्यवस्था के दृष्टिकोण से अत्यन्त उदार है। इसी कारण यह सहस्रों वर्षों से जीवित है।

 

हिन्दू-धर्म की नींव आध्यात्मिक सत्यों की तलशिला पर पड़ी है। हिन्दू-जीवन की सम्पूर्ण संरचना हिन्दू-ऋषियों और द्रष्टाओं द्वारा प्राप्त शाश्वत सत्यों पर आधारित है। यही कारण है कि यह संरचना अनेक शताब्दियों से जीवित है।

इसका भविष्य

 

हिन्दू-धर्म की महिमा अनिर्वचनीय है। इसमें वैश्व-धर्म के समस्त लक्षण हैं। इसके सिद्धान्त तथा मत सार्वभौमिक एवं भव्य हैं। इसका दर्शन महान् है। इसकी नीति आत्मा को उन्नत बनाने वाली है। इसके धर्मग्रन्थ अद्भुत हैं। योग-वेदान्त पर आधारित इसकी साधनाएँ अद्वितीय हैं। इस धर्म का भूतकाल अत्यन्त गौरवशाली रहा है। इसका भविष्य और भी अधिक गौरवमय। इसके पास घृणा, मतभेदों और युद्धों से विघटित हुए विश्व के लिए एक सन्देश है-जो ब्रह्माण्डीय प्रेम, सत्य और अहिंसा का सन्देश है, आत्मिक एकता का सन्देश है।

 

जितना अधिक आप भारत और हिन्दू-धर्म के निकट आयेंगे, उतना ही अधिक आप उसे प्रेम और श्रद्धा देने लगेंगे, और उतना ही अधिक आप ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हो जायेंगे; क्योंकि इस निकटता से आपमें जाग्रत होगी योगाभ्यास में रुचि तथा आप आत्मसात् करेंगे हिन्दू-धर्म की आत्मा को।

 

धन्य है भारत देश! धन्य है हिन्दू धर्म ! धन्य-धन्य हैं वे ऋषि और द्रष्टा जिन्होंने हिन्दू-धर्म की ज्वाला को प्रज्वलित रखा है!

 

 

 

 

द्वितीय अध्याय

हिन्दू-धर्मग्रन्थ

संस्कृत साहित्य

 

संस्कृत साहित्य को छह शास्त्रसम्मत और चार ऐहिक शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है। शास्त्रसम्मत साहित्य के अन्तर्गत हैं हिन्दुओं के प्रामाणिक धर्मग्रन्थ। प्राचीन संस्कृत साहित्य के परवर्ती विकास काल में ऐहिक साहित्य का सर्जन हुआ है।

           

धर्मग्रन्थ छह हैं-श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण, आगम और दर्शन।

 

ऐहिक साहित्य के अन्तर्गत चार प्रकार के व्यावहारिक ग्रन्थ हैं-सुभाषित, काव्य, नाटक और अलंकार।

धर्मग्रन्थ

 

श्रुतियाँ

 

श्रुतियाँ वेद कहलाती हैं। हिन्दुओं को अपना धर्म वेदों के माध्यम से श्रुतिप्रकाश द्वारा प्राप्त हुआ है। ये सहज ज्ञान द्वारा प्राप्त अनुभूति हैं और इन्हें अपौरुषेय अर्थात् नितान्त परा-मानवीय माना जाता है। इनका कोई विशिष्ट लेखक नहीं है। वेद हिन्दुओं का-नहीं, अखिल विश्व का-महिमाशाली गौरव है।

 

वेद शब्द की उत्पत्ति विद् धातु से हुई है, जिसका अर्थ है-धर्मग्रन्थ के सन्दर्भ में जानना। वेद शब्द का अर्थ है ज्ञान। इसका तात्पर्य ज्ञान के ग्रन्थ से हैं। वेद हिन्दुओं के आधारभूत ग्रन्थ हैं। वेद केवल अन्य पाँच धर्मग्रन्थों वरन् उपर्युक्त चार ऐहिक के भी स्रोत हैं। वेद भारतीय प्रज्ञा की निधि हैं जिन्हें मनुष्य शाश्वतकाल-पर्यन्त विस्मृत नहीं कर सकता।

 

अनादि तथा अनन्त सत्य की अभिव्यक्ति

 

वेद भारत के महान् प्राचीन ऋषियों को ईश्वर द्वारा अनुभव करवाये गये शाश्वत सत्य हैं। ऋषि शब्द दृश् धातु से बना है जिसका अर्थ है देखना। ऋषि मन्त्र अर्थात् विचार के द्रष्टा हैं। विचार उनके अपने नहीं थे। ऋषियों ने सत्य को देखा या सुना; इसलिए वेद वे हैं जो श्रवण किये जाते हैं। ऋषियों ने उन्हें लिखा नहीं; ये उनके मस्तिष्क की उपज नहीं हैं। वे उन विचारों के द्रष्टा थे जो पहले से ही प्रचलित थे। उन्होंने मात्र उन विचारों का आध्यात्मिक अन्वेषण किया। वे ही विचार के आध्यात्मिक ज्ञाता थे। वे वेदों के आविष्कारक नहीं हैं।

 

वेदों में प्राचीन ऋषियों के आध्यात्मिक अनुभव प्रस्तुत किये गये हैं। ऋषि मात्र अपने अन्तर्जात अनुभवों को लोगों तक पहुँचाने के माध्यम हैं। वेदों के सत्य प्रकटन हैं। विश्व के अन्य सब धर्म यह कहते हैं कि ईश्वर के विशेष दूतों ने उन्हें (धर्मों को) कुछ विशिष्ट लोगों को ही प्रदान किया था, किन्तु वेद अपनी प्रामाणिकता के लिए किसी विशिष्ट व्यक्ति के ऋणी नहीं हैं। वे स्वतः प्रमाण हैं; क्योंकि वे शाश्वत हैं, वे ईश्वरीय ज्ञान हैं।

 

स्रष्टा ब्रह्मा ने ऋषियों अर्थात् द्रष्टाओं को दिव्य ज्ञान प्रदान किया। ऋषियों ने उस ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। वैदिक ऋषि दिव्य अनुभूति प्राप्त महान् व्यक्ति थे। उन्होंने ब्रह्म या सत्य का साक्षात्कार किया था। वे ईश्वर-प्रेरित लेखक थे। उन्होंने धर्म और दर्शन के एक ऐसे सरल, विशाल एवं पूर्ण शास्त्र का विकास किया जिससे समस्त धर्मों के संस्थापकों और गुरुओं ने प्रेरणा प्राप्त की।

 

वेद सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ हैं। समस्त धर्मों के सत्य वेदों से प्रसूत हैं और अन्ततोगत्वा वेद ही उनके स्रोत हैं। वेद धर्म का मूल स्रोत हैं। वेद ही समस्त धार्मिक ज्ञान के स्रोत हैं। धर्म का उद्गम दैवी है। प्रारम्भिक काल में यह ईश्वर के द्वारा मनुष्य के लिए प्रकट किया गया। धर्म का मूर्त रूप वेद हैं।

 

वेद शाश्वत हैं, अनादि हैं, अनन्त हैं। कोई अज्ञानी पुरुष कह सकता है कि कोई पुस्तक बिना आदि और अन्त के कैसे हो सकती है। वेदों का अभिप्राय किसी पुस्तक से नहीं है। वेद ईश्वर के शब्द हैं। वेद ईश्वर के श्वास से उद्भूत शब्द हैं। वे ईश्वर के शब्द हैं। वेद मनुष्यों के वचन नहीं हैं, वे किसी मानवीय मस्तिष्क की रचना नहीं हैं। वे कभी लिखे नहीं गये, कभी रचे नहीं गये। वे शाश्वत हैं, अव्यक्तिक हैं। वेदों की तिथियाँ निश्चित नहीं की गयी हैं और कभी की जा सकती हैं। वेद शाश्वत आध्यात्मिक सत्य हैं। वेद दिव्य ज्ञान के मूर्त रूप हैं। पुस्तकें नष्ट हो सकती हैं; परन्तु ज्ञान नष्ट नहीं हो सकता। ज्ञान शाश्वत है, इसी दृष्टि से वेद शाश्वत हैं।

 

चार वेद और उनके उपविभाग

 

वेद चार विशाल ग्रन्थों में विभाजित हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद। यजुर्वेद दो भागों में विभक्त है-शुक्ल और कृष्ण। कृष्ण अथवा तैत्तिरीय अधिक प्राचीन पुस्तक है। शुक्ल अथवा वाजसनेय में देदीप्यमान सूर्य देवता द्वारा याज्ञवल्क्य ऋषि के समक्ष किये गये दिव्य रहस्यों के उद्घाटन हैं।

 

ऋग्वेद २१ अनुच्छेदों में विभाजित है, यजुर्वेद १०९ में, सामवेद १००० में और अथर्ववेद ५० में। इस प्रकार सम्पूर्ण वेद ११८० अनुच्छेदों में विभाजित है।

 

प्रत्येक वेद में चार भाग हैं-मन्त्रसंहिता अथवा स्तोत्र, ब्राह्मण अथवा मन्त्रों तथा कर्मकाण्डों की व्याख्या, आरण्यक तथा उपनिषद् वेदों का चार भागों में विभाजन मानव-जीवन की चार अवस्थाओं (आश्रमों) के अनुकूल है।

 

मन्त्रसंहिता इहलोक में भौतिक समृद्धि और परलोक में सुख प्राप्ति के लिए वैदिक ईश्वर तथा देवी-देवताओं की प्रशंसा में गाये हुए स्तोत्र हैं। वे विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं को सम्बोधित ऐहिक तथा पारलौकिक विषयक छन्दबद्ध प्रार्थनाएँ, स्तोत्र और मन्त्र हैं। वेदों का मन्त्र-भाग ब्रह्मचारियों के लिए विशेष उपयोगी है।

 

वेदों के ब्राह्मण-भाग मनुष्यों को यज्ञ आदि यज्ञीय कर्मकाण्ड करने में सहायता करते हैं। इनमें यज्ञ में मन्त्रों का उपयोग करने की गद्यात्मक व्याख्या प्रस्तुत की गयी है। ब्राह्मण-भाग गृहस्थों के लिए उपयोगी है।

 

आरण्यक वन्य पुस्तकें हैं, जिनमें कर्मकाण्डों की दार्शनिक व्याख्या दी गयी है। आरण्यक वानप्रस्थियों के लिए हैं।

 

उपनिषद् वेदों के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंश हैं। वेदों का ज्ञान साररूप में उपनिषदों में ही है। उपनिषदों का दर्शन भव्य, गम्भीर, उच्च और मर्मस्पर्शी है। उपनिषद् परमात्मा तथा जीवात्मा का ऐक्य उद्घोषित करते हैं। उनमें अत्यन्त सूक्ष्म एवं गम्भीर आध्यात्मिक सत्यों का उद्घाटन हुआ है। उपनिषद् संन्यासियों के लिए उपयोगी हैं।

 

समग्र वेद की विषयसामग्री कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड में विभाजित है। कर्मकाण्ड विभिन्न यज्ञों और धार्मिक अनुष्ठानों से सम्बन्धित है। उपासनाकाण्ड में ध्यान उपासना के विभिन्न प्रकारों और ज्ञानकाण्ड में निर्गुण ब्रह्म-सम्बन्धी ज्ञान का निरूपण किया गया है। मन्त्र तथा ब्राह्मण ग्रन्थ कर्मकाण्ड से सम्बन्धित हैं। इसी प्रकार आरण्यक ग्रन्थ उपासनाकाण्ड एवं उपनिषद् ज्ञानकाण्ड से सम्बन्धित हैं।

 

मन्त्रसंहिता

 

ऋग्वेदसंहिता हिन्दुओं का प्रधान, प्राचीनतम तथा सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है। यह भारत की महान् बाइबिल है। इसकी शैली-भाषा एवं श्वर-शैली अत्यन्त सुन्दर तथा रहस्यमय हैं। इसके अमर मन्त्र अस्तित्व के महान् सत्यों के प्रतीक हैं। यह सम्भवतः विश्व के समस्त धर्मग्रन्थों में सर्वश्रेष्ठ है। इसका याजक 'होतृ' कहलाता है।

 

यजुर्वेदसंहिता का अधिकांश भाग गद्य में है। यजुर्वेद के याजक (अध्वर्यु) यज्ञीय कर्मकाण्डों की व्याख्या करने के लिए इसे उपयोग में लाते हैं। यह ऋग्वेद के मन्त्रों का पूरक है।

 

सामवेदसंहिता का अधिकांश ऋग्वेदसंहिता ही है। यह सामवेद के याजक (उद्गातृ) के द्वारा यज्ञ में गाये जाने के लिए है।

 

अथर्ववेदसंहिता अथर्ववेद के याजक ब्रह्मा द्वारा उपयोग में लायी जाती है ताकि वह यज्ञ के अन्य तीन याजकों द्वारा संयोगवश किये जाने वाले अशुद्ध उच्चारणों और गलत ढंग से किये जाने वाले कर्मकाण्डों को शुद्ध कर सके।

 

ब्राह्मण तथा आरण्यक

 

ऋग्वेद के अन्तर्गत दो ब्राह्मण-ग्रन्थ हैं- ऐतरेय और सांख्यायन। मैक्समूलर के अनुसार, "ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ है। ब्राह्मण ग्रन्थ के पावन स्तोत्र अखिल विश्व के साहित्य में अनुपम हैं और उनका संरक्षण वस्तुतः अद्भुत है।" (History of Ancient Literature)

 

शतपथ ब्राह्मण शुक्ल यजुर्वेद से सम्बन्धित है, तैत्तिरीय और मैत्रायण-ब्राह्मण कृष्ण यजुर्वेद से। ताण्ड्य अथवा पंचविंश, षड्विंश, छान्दोग्य, द्भुत, आर्षेय और उपनिषद् ब्राह्मण सामवेद से सम्बन्धित हैं। अथर्ववेद का ब्राह्मण 'गोपथ' कहलाता है। प्रत्येक ब्राह्मण का एक आरण्यक है।

 

उपनिषद्

 

उपनिषद् वेदों के उपसंहार-अंश अथवा अन्तिम भाग हैं। उन पर आधारित शिक्षा वेदान्त कहलाती है। उपनिषद् वेदों का लक्ष्य और सारांश हैं। वे हिन्दू-धर्म की आधारशिला ही हैं।

 

प्रत्येक वेद के उतने ही उपनिषद् हैं जितनी उसकी शाखाएँ हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद की क्रमशः २१, १०९, १००० तथा ५० शाखाएँ हैं।

 

भारतवर्ष के विभिन्न मतों (यथा-अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, भेदाभेदवाद आदि) के समर्थक दार्शनिकों ने उपनिषदों की सर्वोच्च प्रामाणिकता को स्वीकार किया है। उन्होंने इन ग्रन्थों की व्याख्याएँ तो की हैं; परन्तु प्रामाणिकता इन्हीं की मानी है। उन्होंने अपनी-अपनी दर्शन-प्रणालियों को उपनिषदों के आधार पर ही विकसित किया है।

 

उपनिषदों के द्रष्टाओं की पाश्चात्य विद्वानों ने भी प्रशंसा की है। उस समय जब कि पाश्चात्य लोग इतने पिछड़े हुए थे कि छाल के कपड़े और घोर अज्ञानता में डूबे हुए थे, उपनिषदों के द्रष्टा शाश्वत परमानन्द में निमग्न रहते थे तथा उनकी संस्कृति और सभ्यता सर्वोच्चता के शिखर पर थी।

सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपनिषद् हैं-ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, कौषीतकी, श्वेताश्वतर तथा मैत्रायणि। ये सब परम अधिकृत ग्रन्थ हैं।

 

वेदों के मूलभूत सत्य आप सबके समक्ष उद्घाटित हो सकें! वेदों की माता गायत्री आपको ज्ञान-रूपी दूध-उपनिषदों की प्राचीन प्रज्ञा प्रदान करे!

 

उपवेद

 

चारों वेदों के पूरक के रूप में उपवेदों की संख्या चार है। ये हैं- आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र। क्रमशः इनका अर्थ इस प्रकार है-आयुर्विज्ञान, युद्ध-विज्ञान, संगीत-विज्ञान एवं राजशासन (polity) का विज्ञान

 

वेदांग

 

वेदों के छह व्याख्यात्मक अंग हैं-पाणिनि की शिक्षा और व्याकरण, पिंगलाचार्य का छन्द, यास्क का निरुक्त, गर्ग का ज्योतिष और विभिन्न ऋषियों द्वारा रचित कल्प-श्रौत, गृह्य, धर्म एवं शुल्ब।

 

शिक्षा स्वर-विज्ञान का ज्ञान है। यह वेदांग उच्चारण और स्वराघात से सम्बन्धित है। वेदों की सामग्री विभिन्न पाठों में विभाजित है। पद-पाठ में प्रत्येक शब्द को एक अलग रूप दे कर समझाया गया है। क्रम-पाठ में शब्दों को जोड़ों (pairs) में व्यवस्थित किया गया है।

 

व्याकरण से तात्पर्य संस्कृत व्याकरण से है। पाणिनि के ग्रन्थ अति-प्रसिद्ध हैं। व्याकरण के ज्ञान के अभाव में आप वेदों को नहीं समझ सकते।

 

छन्द में पिंगल के छन्दों (metre) की व्याख्या है।

 

निरुक्त भाषा-शास्त्र है।

 

ज्योतिष में खगोलविज्ञान और फलित ज्योतिष की व्याख्या है। इसमें नक्षत्र आदि की गतियों और मानव पर उनके प्रभाव का वर्णन किया गया है।

 

कल्प कर्मकाण्ड की प्रणाली है। यज्ञीय कर्मकाण्ड का निरूपण करने वाले श्रौत-सूत्र कल्प के अन्तर्गत आते हैं। शुल्बसूत्र में यज्ञ-क्षेत्र की नापों का वर्णन है। ये सूत्र भी कल्प के अन्तर्गत हैं। गृहस्थ जीवन पर प्रकाश डालने वाले गृह्य-सूत्र और नैतिकता, रीति-रिवाजों तथा विधि-विधानों की व्याख्या करने वाले धर्म-सूत्र भी कल्प के अन्तर्गत हैं।

 

प्रतिशाख्य, पदपाठ, क्रमपाठ, उपलेख, अनुक्रमणि, दैवत-संहिताएँ, परिशिष्ट, प्रयोग, पद्धतियाँ, कारिकाएँ, खिल और व्यूह कल्प-सूत्रों में वर्णित कर्मकाण्डों को और अधिक सविस्तार प्रतिपादित करते हैं।

 

कल्प-सूत्रों के अन्तर्गत अश्वलायन, शाख्यायन और साम्भाव्य ऋग्वेद के हैं। मशक, लाट्यायन, द्रह्यायन, गोभिल और खादिरा सामवेद के हैं। कात्यायन और पारस्कर शुल्क यजुर्वेद के हैं। आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी, बोधायन, भारद्वाज, मानव, वैखानस और काठक कृष्ण यजुर्वेद के हैं तथा वैतान और कौशिक अथर्ववेद के हैं।

स्मृतियाँ

 

श्रुतियों के बाद स्मृतियों का महत्त्व है। ये हिन्दुओं के सनातन वर्णाश्रम-धर्म से सम्बन्धित पावन प्राचीन नियमसंहिताएँ हैं। वेदों में दिये हुए कर्मकाण्ड सम्बन्धी आदेशों (विधियों) की ये पूरक हैं और उनकी व्याख्या करती हैं। स्मृति अथवा धर्मशास्त्र की आधारशिला श्रुति है। स्मृति-ग्रन्थ वेदों के उपदेशों पर आधारित हैं। प्रामाणिकता में स्मृति का स्थान श्रुति के बाद दूसरा है। यह धर्म का निरूपण और विकास करती है। यह हिन्दू राष्ट्रीय, सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत कर्तव्यों का नियमन करने वाले नियमों और कानूनों का निरूपण करती है।

 

प्रत्यक्ष रूप से स्मृति कहलाने वाले ग्रन्थ धर्मशास्त्र (संहिताओं की पुस्तक) हैं। व्यापक रूप में स्मृति के अन्तर्गत वेदों के अतिरिक्त समस्त हिन्दू-शास्त्र जाते हैं।

 

समय-समय पर हिन्दू-समाज का नियमन करने वाले नियम स्मृतियों में निहित हैं। उनमें व्यक्तियों तथा समुदायों के लिए दैनिक आचरण में मार्गदर्शन देने के लिए और उनके रीति-रिवाजों को व्यवस्थित करने के निश्चित नियम दिये हुए हैं। स्मृतियों में प्रत्येक श्रेणी के मनुष्यों को परिस्थितियों के अनुसार कर्तव्यों का पालन करने से सम्बन्धित विस्तृत निर्देश दिये गये हैं।

 

इन स्मृतियों से हिन्दू अपना जीवन यापन करना सीखता है। वर्णाश्रम के कर्तव्यों तथा समस्त धर्मानुष्ठानों का विवेचन उन ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से किया गया है। स्मृतियों में मनुष्य के जन्म और आश्रम के अनुसार कुछ कर्मों का निर्धारण किया गया है और कुछ का निषेध। स्मृतियों का ध्येय है मानव-हृदय को परिशुद्ध करके उसे धीरे-धीरे अमरत्व के परम पद पर ले जाना तथा उसे पूर्ण एवं मुक्त बनाना।

 

ये स्मृतियाँ समय-समय पर बदलती रही हैं। स्मृतियों के आदेश तथा निषेध विशेष सामाजिक प्रतिवेश से सम्बन्धित होते हैं। जैसे जैसे हिन्दू-समाज के प्रतिवेश एवं परिस्थितियों में परिवर्तन होते गये, वैसे-वैसे विभिन्न काल के ऋषियों द्वारा नयी-नयी स्मृतियों का संकलन होता रहा है।

 

प्रसिद्ध हिन्दू-विधिकर्ता

 

समय-समय पर कोई--कोई महान् विधिकर्ता जन्म लेता रहा है। वह प्रचलित नियमों को विधिबद्ध (codify) करता है तथा उन नियमों को हटा देता है जो पुराने पड़ गये हैं। वह उनमें कुछ परिवर्तन करके, घटा-बढ़ा कर उन्हें समय की आवश्यकता के अनुरूप बना देता है, ताकि वेद की शिक्षा के अनुकूल लोग जीवन व्यतीत कर सकें। इन विधिकर्ताओं में मनु, याज्ञवल्क्य और पाराशर सुप्रसिद्ध हैं। हिन्दू-समाज इन्हीं तीन महान् विधिकर्ताओं द्वारा रचित नियमों पर आधारित है और उनके द्वारा संचालित होता है। विशेष रूप से उल्लेखनीय स्मृतियाँ इन्हीं तीन विधिकर्ताओं द्वारा रचित हैं, यथा- () मनुस्मृति अर्थात् मानव-धर्म-शास्त्र, () याज्ञवल्क्यस्मृति और () पाराशरस्मृति। मनु एक महानतम तथा प्राचीनतम विधिकर्ता हैं। याज्ञवल्क्यस्मृति मनुस्मृति की ही है और महत्त्व में उससे द्वितीय स्थान पर है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति वर्तमान समय में भारत-भर में प्रामाणिक ग्रन्थ माने जाते हैं। हिन्दू-विधि से सम्बन्धित विषयों में मुख्यतः याज्ञवल्क्यस्मृति का ही ध्यान रखा जाता है। भारत सरकार ने भी प्राचीन कानूनों में से कुछ को मान्यता दे दी है।

 

मुख्य स्मृतियाँ या धर्मशास्त्र अठारह हैं। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्मृतियाँ मनु, याज्ञवल्क्य और पाराशर द्वारा रचित हैं। शेष पन्दरह स्मृतियाँ हैं-विष्णु, दक्ष, संवर्त, व्यास, हारीत, शततप, वसिष्ठ, यम, आपस्तम्ब, गौतम, देवल, शंख-लिखित, उशन, अत्रि और शौनक।

 

मनु के नियम सत्ययुग के लिए हैं। याज्ञवल्क्य के त्रेतायुग के लिए, शंख और लिखित के नियम द्वापर के लिए एवं पाराशर के नियम कलियुग के लिए हैं।

 

जो नियम नितान्त सामाजिक परिस्थिति, समय और वातावरण पर आधारित हैं, उन्हें समाज, समय और वातावरण में होने वाले परिवर्तनों के साथ परिवर्तित होते रहना चाहिए, तभी हिन्दू-समाज की उन्नति सुनिश्चित हो सकती है।

 

नवीन नियमावली की आवश्यकता

 

वर्तमान समय में मनु के द्वारा रचे हुए कुछ नियमों का अक्षरशः पालन करना सम्भव नहीं है। उनके भाव को ही ग्रहण किया जा सकता है, शब्दों को नहीं। समाज प्रगति कर रहा है। जब समाज विकसित होता है, तब वह उन विधि-नियमों से आगे बढ़ जाता है जो भूतकाल में कभी समाज के विकास में योगदान दे रहे थे। कई नवीन विचार जिनके विषय में विधिकर्ताओं ने सोचा भी नहीं था, अब उत्पन्न हो गये हैं। जो नियम पुराने पड़ गये हैं, उनका पालन करने के लिए लोगों से आग्रह करना व्यर्थ है।

 

हमारा वर्तमान समाज बहुत परिवर्तित हो गया है। अब इस युग की आवश्यकताओं के अनुरूप एक नयी स्मृति की आवश्यकता है। कोई अन्य मनीषी आज के हिन्दू-समाज के समक्ष नयी नियमावली प्रस्तुत करेगा, इसके लिए उपयुक्त समय अब गया है। वर्तमान समय का स्वागत है।

 

अन्तःस्वर

 

तप, जप, कीर्तन, ध्यान तथा गुरु-सेवा के द्वारा जिसका हृदय शुद्ध हो गया है, जिसका अन्तःकरण बिलकुल पवित्र है, उसे धर्म, कर्तव्य अथवा नैतिक कमर्मों में उसका अन्तःस्वर ही मार्ग-निर्देशन प्रदान करता है। सत्त्व-भाव से परिपूर्ण शद्ध हृदय का अन्तःस्वर वास्तव में उस अन्तर्यामी भगवान् की ही पुकार है जो हमारा आन्तरिक शासक है। यह स्वर स्मृति के विधि-विधानों से भी बढ़ कर है। यह स्मृतियों की स्मृति है। अपने हृदय को पवित्र बनायें और उस अन्तःस्वर को सुनने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करें। इस स्वर का श्रवण करने के लिए अपने कानों को समाचरित करें।

 

श्रुति और स्मृति

 

श्रुति और स्मृति हिन्दू-धर्म के दो प्रामाणिक स्रोत हैं। श्रुति का शाब्दिक अर्थ है- 'जो सुना जाता है' और स्मृति का अर्थ है- 'जो स्मरण किया जाता है' श्रुति प्रकटन है और स्मृति परम्परा। उपनिषद् श्रुति हैं, गीता स्मृति है।

 

श्रुति साक्षात् अनुभव है। महान् ऋषियों ने धर्म के शाश्वत सत्यों को श्रवण करके उनका आलेख आने वाली पीढ़ियों लाभ लिए छोड़ दिया। इन आलेखों से वेद बने। इस प्रकार श्रुति मूल-प्रमाण है। स्मृति अनुभव का अनुस्मरण है। इसीलिए स्मृति का स्थान प्रमाण के रूप में श्रुति के बाद है। स्मृतियाँ अथवा धर्मशास्त्र भी सन्तों द्वारा लिखित ग्रन्थ हैं; किन्तु वे अन्त्य-प्रमाण नहीं हैं। यदि स्मृति में श्रुति का खण्डन करने वाली कोई बात होगी, तो स्मृति अमान्य हो जायेगी।

इतिहास-ग्रन्थ

मैत्री-प्रबन्ध और आदेशात्मक-प्रबन्ध

इस शीर्षक के अन्तर्गत चार ग्रन्थ हैं- वाल्मीकि रामायण, योगवासिष्ठ, महाभारत और हरिवंश। वेदों में जो है, वह इनमें भी है; परन्तु अधिक सरल रूप में है। ये सुद्धत-संहिताएँ अर्थात् मैत्री-प्रबन्ध कहलाते हैं तथा वेद प्रभु संहिताएँ अर्थात् आदेशात्मक-संहिता जो अत्यन्त प्रामाणिक हैं। इन रचनाओं में ऐतिहासिक वर्णनों, कहानियों और कथोपकथन के रूप में सार्वभौमिक सत्यों की व्याख्या है। ये अत्यन्त मनोरंजक ग्रन्थ हैं जो बालकों से ले कर बुद्धजीवी विद्वानों तक सभी को रुचिकर लगते हैं।

 

इतिहास-ग्रन्थों में अत्यन्त रोचक और महत्त्वपूर्ण कथाएँ दी हुई हैं जिनके माध्यम से हिन्दू-धर्म के समस्त मूलभूत उपदेश पाठक के मन में स्थायी रूप से अंकित हो जाते हैं।

 

स्मृति-ग्रन्थों के नियमों और वेदों के सिद्धान्तों की छाप हिन्दू-पाठकों के मन पर उनके राष्ट्रीय वीरों के चमत्कारिक तथा श्रेष्ठ कर्मों के माध्यम से पड़ती है। इन उत्कृष्ट कथाओं से हमें हिन्दू-धर्म का स्पष्ट चित्र देखने को मिलता है।

 

सामान्य व्यक्ति के लिए उपनिषदों और ब्रह्मसूत्रों का गूढ़ दर्शन बोधगम्य नहीं है; इसलिए वाल्मीकि और व्यास ने जनसाधारण के लिए इतिहास लिखे जिनमें वेदों का गूढ़ दर्शन सर्वसाधारण के लिए उदाहरणों और आख्यानों के माध्यम से रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

 

दो सुप्रसिद्ध इतिहास-ग्रन्थ रामायण और महाभारत महाकाव्य हैं। वे हिन्दुओं के अति-प्रसिद्ध और उपयोगी शास्त्र हैं। रामायण ऋषि वाल्मीकि द्वारा और महाभारत व्यास जी द्वारा विरचित हैं।

 

रामायण

 

रामायण में आदर्श पुरुष राम की कथा वर्णित है। यह इक्ष्वाकु के वंशज सूर्यवंशी राजाओं के परिवार का इतिहास है जिसमें भगवान् विष्णु के अवतार रामचन्द्र और उनके तीन भाई जन्मे थे। रामायण के राम, सीता, लक्ष्मण, भरत और श्री हनुमान् जैसे आदर्श चरित्र हमारे मन पर हिन्दू-धर्म की स्पष्ट छाप छोड़ते हैं। राम और उनके भाइयों के जन्म, उनकी शिक्षा और विवाह, श्रीराम वनवास, सीता का हरण और उनकी प्रतिप्राप्ति, रावण-वध और श्रीराम-राज्य आदि के विवरण रामायण में विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किये गये हैं। मनुष्य को अपने से बड़ों, समवयस्कों और छोटों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए, राजा को किस प्रकार शासन करना चाहिए, मनुष्य को इस संसार में कैसे जीवन-यापन करना चाहिए, वह किस प्रकार मोक्ष, स्वतन्त्रता और पूर्णता प्राप्त कर सकता है-यह सब इस सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ से सीखा जा सकता है। रामायण से भारतीय जीवन की स्पष्ट झाँकी देखने को मिलती है। आज भी हमारे पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय आदर्शों के स्रोत रामायण और महाभारत के ये उच्च चरित्र ही हैं। इन ग्रन्थों के महान् राष्ट्रीय नायक आज भी प्रकाश स्तम्भ की तरह समस्त विश्व की जनता का पथ-प्रदर्शन करते और प्रेरणा प्रदान करते हैं। राम, भरत और लक्ष्मण के जीवन भ्रातृ-स्नेह और पारस्परिक सेवा का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। श्री हनुमान् एक असाधारण कर्मयोगी के रूप में उभर कर आते हैं। सीता का जीवन पतिव्रतधर्म, पवित्रता और माधुर्य का अनुपम उदाहरण है। श्री वाल्मीकि ने रामायण (जो आदि-काव्य